Shree Jubilee Naagari Bhandar Bikaner

Pahli Stithi Antim Stithi

Chandra Aulak · 2011/03

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पहली स्थिति
अतिम स्थिति
(कहानी सग्रह)

जान भारती 1114 पवार, Pिrim

पहली स्थिति
अंतिम स्थिति
चन्द्रा औलक
112136
पायर

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उसकी याद को अर्पित
जिन्हें इस प्रयास से
सर्वाधिक प्रसन्नता होती

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भूमिका' श्रीमती चंद्रा औलक की कहानियो का ससार एक बिलकुल अलग संसार है। एक ऐसा संसार जो इसी ससार के बीच है । और वह दुनिया उस नारी की दुनिया है जो आज की है आज के भीतरी विघटन और सत्रास को लेकर जीती है इसीलिए इनकी कहानियों में एक सहज आधुनिकता समा जाती है जो इस नारी की आधुनिकता है जो टूटते हुए भी खुद को बचा रही है-- जो पूर्णत्व की आकांक्षा करते हुए भी लगातार अपूर्ण बनी रहतं के लिए अभिशप्त है। इन कहानियों में घर है लेकिन मन के वे घरौदे नहीं है जो घर को घर बनाते है । इन घरो मे फ्रिज है रसोई में गैस है, पर खाना जैसे फ्रिज में पकता है और गैस पर ठडा होता है। तमाम भौतिक उपादानों के बीच एक चटखे हुए अंतर्मन के अधेरे, टूटन और करुणा के प्रसग इन कहानियों में बिखरे पड़े है । और अंतर्मन के अंधेरों से मुक्ति पाने के लिए सबंधों के क्षणजीवी दीये भी बन कहानियों में टिमटिमाते रहते है और पूर्णत्व के महासुख के लिए इन कहानियों के कुछ करुण क्षण अतीत में लौट लौटकर इसमे निशान और सहारे खोजते रहते हैं- जैसे कि शायद अतीत ही दारुण वर्तमान का दुख भी है और दारण वर्तमान को जीते हुए अतीत में ही सुख के कुछ अवशेष बिखरे हुए है । इन घरों में खिडकिया है उनसे रोशनी भी आती है और अंधेरा भी। इन कहानियों के पात्रों के मन के दरवाजों पर जेसे बरसों से दोर-बैल भी लगी है पर डोर बेल बजने पर घर का दरवाजा खुलता है मन का दरवाजा उसी तरह अपने पाट बंद किये बैठा रहता है । बाह संसार के साय ही अंतस् के संसार की आवाजे भी सुनायी देती [4] viu] है . और सब पर चलते भी हैं परंतु पहुंचते कहीं नहीं क्योकि वे पैर मन की मजिल तक नहीं पहुचाते । श्रीमती चंद्रा औलक की कहानियों के महिला पात्र अश्रुविगलित अधीन और अनुसरणात्मक दुनिया से बाहर निकलकर आहत और अपराजेय व्यक्तियों के रूप में सामने आते है और अपने अस्तित्व के लिए, अपनी अधूरी भावनाओं के पूर्णत्व के लिए संघर्षरत रहते है-एक ऐसे आहत और कटे टूटे व्यक्ति के रूप में जो अपने घावों को सहलाता उन पर मरहम भी लगाता जाता है लेकिन उन्हीं घावों को तेज नश्वर से बार बार हरा भी करता जाता है । इन कहानियो के कथ्य और नारी की पूर्णत्व की तलाश को तारीखों के कैलेडर पर पीछे नही लौटाया जा सकता-लगता है कि उसकी इसी टूटन अकेलेपन अंदर के अंधेरो और शीशे की तरह चटके हुए अस्तित्व में सास ले रहे तमाम प्रश्न और स्थितियां अपना उत्तर और संतुलन खोजेगी-- क्योंकि ये कहानिया परिवार समाज या सबंधों को फैशन के बौद्धिक अतिरेक में तोडती नहीं बल्कि अंतस् की पूर्णता के लिए उत्सर्ग करते हुए एक नये सतुलन की भूमिका की माग करते हुए सामने आती है। और ऐसा कर सकना आसान काम नहीं था-सहजता से सहज सपूर्णता की मांग और उसकी भूमिका का निर्माण एक कठिन दायित्व है जिसे बहुत आसानी से श्रीमती चंद्रा औलक ने निभाया है। 241088 -कमलेश्वर

आमुख
संघर्ष जो सिर पर तना सडा रहता है । और सहा खडा
पीसकर सूखा भुस्सा बना देता है । व्यक्ति में ज्ञान बुद्धि सोच
नहीं रहने देता कि व्यक्ति ठीक से सोच पाये।
आम आदमी को इस युग ने ठीक से कुछ दिया ही नहीं
इसलिए पता भी नहीं पड़ता-क्या ठीक है क्या
गलता
दुछ ऐसी ही स्थितियां एवं पात्रों को लेकर कहा है इस
संग्रह मैं ।
यह कहना कैसा बन पहा है कितना स्पष्ट एवं अस्पष्ट
रहा है यह पाठक पर है।
पर एक भयपूर्ण स्थिति जो आज सामने है उससे व्यक्ति
ऊपर उठना चाहता है छुटकारा चाहता है।
छूटे या उठे न भी पर उठ सकने की मांग करता है।
इसका अंत कहा है ? यही तलाश है ।
-चंद्रा मालक

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क्रम
VII
1
16
31
मूमिका
मुख
सूखा
दबे दबे कहीं
छुटकारा
युद्ध और दगाबाज इतिहास
दावा
ठीक बेठीक के बीच
आखें
नया युग पुराना युग
पहली स्थिति
अतिम स्थिति
47
58
70
84
93
105

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सूखा बेहद गर्मी में आयी थी वह । गाडी सामने वाले बरगन के घेरे मे खडी करने को कहकर वह सीढिया चढ़ आयी । कॉलबेल देने पर दरवाना नहीं खुला तो उकताहट सो हुई, पर बाहर पृथले आकाश में उडती मिट्टी और हवा म हिलती शाखाओं में मन अटका रहा। दूसरी बेल पर नाम पूछा गया । दरवाजा भी नाम बताने के बाद ही खोला गया । सामने नगे सिर, नगे पैर, विखरे स बाला वाली कृशकाय-सी मा । ऐसे फटे चिये हाल में मा को देखकर जैसे एक गहरा धक्का लगा हो उस । देहक आते खिशखिझाये से भाव पर काबू रखते हुए, उसने हाथों में भरा सामान मा के फैले हाथा मे पर लिया। मा ने सब स्टूल पर परकर फिर से स्वागती बाहे बेटी के लिए फैलायीं । फैली दाहों मे क्षण भर को सिमटी तो लगा कि एक हल्के से सतोप में अभी अभी उठी दहक कहीं विलीन हो गयी "अकेली होती है तो पूछकर ही खोलती है। झेप मिटाने जैसा एक भाव मा के होंठों के आस-पास तक फैल गया, जिसे अलक्ष्य करते हुए उसने पूछा, “क्यों, राजी घर मे नहीं है। 'बच्चों के स्कूल गयी है राजी कहती मा सामान कमरे की ओर ले गयी। "ये दूध में फ्रिज मे रख रही हू जाते हुए कहीं भूल न जाऊ? कहते हुए वह मा के पीछे पीछे कमरे की ओर गयी। 'दूध ? हा, दूध की गडबड चल रही है ? "और रोनी को फटा हुआ दूध देना पड रहा है। 'फटा हुआ ? मा के चेहरे पर चिंता की झाई-सी ठहर गयी। यह फिर क्या हुआ रौनी को? पर मा के पूछने से पहले ही उसने बताया, “ऐसे ही पेट की गडबड़ी है कहते हुए कमरे मे झाकी तो मा दोबारा झेपी, पुराने पोथी-पत्रा दूर सरकाते हुए बोली, 'तुम्हारे पापा की याद आती है, तो सब निकाल लेती है।

॥ बेटी ने उपर ध्यान नहीं दिया तो पूछा, “इस कमरे मे दैटोगी? लड़की के न बैठने पर मा को प्रतीत हुआ कि ऐसे छितरायेपन ने लड़की को विचलित किया है । मा बेटी दोनों क्षण भर एक-दूसरे को निहारकर डाइनिंग रूम मे आयीं, तो मा ने पूछा, 'कुछ पिओगी? और पानी के लिए फ्रिज खोला । 'नहीं, मैं चाय पीऊगी। उसने निश्चित स्वर में कहा, और रसोई में जाकर पूज, भगौना कहा है? 'उस ताख मे ठहरो देती हूं। तत्पर होती-सी मा आयी, तब तक भगौना टूटकर चाय का पानी पर चुकी थी वह। चाय की प्यालिया लगाते समय लड़की की निगाह कोने मे पडे अटैची पर पड़ी, तो पूछा, ये सामान किसका है? 'राजी की बहन आयी है फरीदाबाद स मा ने बताया, 'इन दिनों वो नहीं है न, तो मिलने वाले आते हैं। अपने रहते मिलने जो नहीं देता।" चाय की खटपट में उसका ध्यान उपर गया नहीं था। बाद मे सुना तो सहसा उफन पड़ी, बोली, “मुझे नहीं सुनना ये सब, न मैं सुनने आयी हू, कि कौन किसको मिलने नहीं देता।" अपने फट गुब्बार को समेटती सी वह ड्राइवर को चाय देने चली गयी । लौकर अपनी प्याली उठायी और कमरे मे आ गयी । मा उस समय बचेखुचे सामान को ट्रक के हवाले करती पूर्ववत् चारपाई के कोने मे सिमट गयीं। बिना मा की ओर देखे ही उसे ज्ञात हुआ कि भा की आखे पापा की तस्वीर को निहार रही है। पापा की तस्वीर पर उसकी दृष्टि भी उठी, फिर बिस्तर के कोने मे सिकुडी मा पर, और तब कमरे से अन्य चीजों पर । कमरे की चीजों की लय के साथ-साथ एक अदृश्य दिलासे जैसा आरोपित भाव मा की आकृति पर है, जिसे ओढे मा मानो स्वयं को सहला रही हैं। इस खास तरह की अवशता को पता नहीं क्यों वह स्वाभाविक रूप में नहीं ले सक्ती । ये अवशता उसे गढ़ रही है, ऐसा भाव उसने जाहिर नहीं होन रिया । चाय सिप करते हुए उसने खिडकी का पर्व खींच लिया । खिड़की के टूटे हुए शीशे पर धूप-कभरी रोशनी झिलमिलाने लगी, आप रोशनान वाली खिड्की का पर्वा भी हटा दिया करो।" उसने मा की ओर दृष्टि फेर ली। पर रोशनशान से कबूतर और गिलहरिया आ जाती हैं।" वह पिध्की से बाहर देखने लगी जहा मेहराब्तले सचमुच कबूतर और कबूतरी एक-दूसरे की गरन पर सिर टिकाये चुप बैठे थे। नीचे थीं दीटेही बीटे । बगीचे को 2/पर यिात आतन म्यिात दीवार पर यदा का सिर उठाती गिलहरिया थीं, जिनकी आखों मे अजीब-सी सतर्कता का भाव ठहरा है। विस्मय से भरकर उसने आखे फेर ली। मा ने याद दिलाया, "चाय ठडी हो रही है।" फिर से चाय पीने लगी, तो मा एक किताब उठा लायीं, “परसों यहीं छूट गयी थी तुमसे "अरे. । उसने किताब उठाते हुए कहा, और मैं सोचू कि कहा ोड आयी . . । किताब झोले मे परते समय पाया - मा उसकी लायी हुई चीजे गौर से देख रही हैं। फिर उन्हे यथास्थान रखते हुए कहा, "इतना क्यों खर्च करती हो? उसे मा का भीगा सा उलाहना मीठी पुलक से भरता रहा था, तभी मा बोली, "इतना कहा खा पाऊगी मैं। 'हो जायेगा खर्च, एक-एक करके।" पर ये घी का डिब्दा और बिस्किट" 'एक-एक चम्मच कभी डाल लिया करो- दाल सब्जी मे दोनों कुछ देर ऐसे ही बैठी रहीं, फिर थोड़ी शिक्षक के साथ मा बोली, 'मना कर रखा है डॉक्टर ने जो कुछ उत्साहित होते से कहा, "थोडे स कुछ नहीं होता, फिर नासपाती का कहा था - उस दिन "हा, वो मैं जरूर खाऊगी। मा का भीगा उत्साह अच्छा लगा। कहा, "ये भी खा लेना।' मा कुछ सोच में पड गयीं कि नहीं खाया गया तो बेटी के काम से भी जायेगा। पर पूरी बात कही नहीं गयी। वैसे कहना चाहती हैं वे, पर यह डर बना रहता है कि बात मीना को भायेगी कि नहीं, कि बात का कौन-सा सिरा उसे ग्रहणीय होगा, या नहीं भी होगा। मा ने सिर उठाया तो उस किसी पत्रिका के पन्ने लौटाते पाया। फिर उकताकर जैसे पत्रिका वापस परनी चाही। "बड़ी उलझाव भरी है।" -लडकी ने सिर झटका। उसकी ऊबन मिटाने को अथवा सन्नाटा भग करने को ही मा ने एक सार्थक सवाल पूछ लिया, "अपने पापा के श्राद्ध मे आओगी तुम ? "श्राद्ध में?" मीना मा के सामने ही आन बैठी । “उन दिन राजी से बात हुई थी, सूमा मैंने उसे बताया था कि उन दिनों गुड्डम के इम्तिहान चल रहे हगि । बाते मानो फिर चुक गयी हों, और कमरे में रह गयी हो मा बेटी की बेआवाज सासे । अचानक मा के चेहरे पर विस्मय उभर आया। कहा, 'कल एकम मन मे मिलने का खयाल आया तो क्लिनिक से सीधी दस पक्ड ली, पर बाद मे याद आया कि तुम आजकल घर पर नहीं रहती हो। तब अगले स्टाप पर उतर गयी।' अच्छा किया, आये नहीं। आजकल घर क्या - किसी जगह भी टिके रहना होता नहीं। कभी यहा, कभी वहा . 'हा, मा ने जैसे सुर से कहा हो, अब कितनी व्यस्त हो गयी है मीना -- व्यस्त और जिम्मेदार। जो पहले कभी नहीं थी। और बचपन मे तो सिर्फ अपने म ही रत। सबस अलग-थलग ! -- अब देखो, वो हाल मेरा है। मा बोलीं, अब मुझे तो अच्छा ही नहीं लगता यहा पर कहा जाये। 'क्यों ? पहले आप घूमने जाती थी ? ম। बस दो कदम और फिर वापस हा, तुम्हारे पापा थे- तब बेटी ने दात काट दी, 'घूमना चाहिए उससे ध्यान बटता है।" "वैसे तो दूर दूर जाने का मन होता है, पर मा कहते कहते रुकीं, जैसे फिर ऐसा कुछ कह दिया है, जिसम कुछ तथ्य नहीं बस, सन्नाटा भग करने के लिए बाते । और अब तो सन्नाटा झेलने की अभ्यस्त हो गयी हैं वे। कितने कितने दिन हो जाते हैं, किसी से बोले। 'पहले तो आप मडल मे जाते थे रामा कृष्णा मिशन ? पर इन दिनों सूखे की वजह से मडल के लोग चला उगाहने मे जुड़े हैं। 'ये तो अच्छा है। ऐसे कामों मे जाना चाहिए। पर वह नहीं जाती। लोगों मे वैसी भावनाए हैं कहा? मा ने सोचा और देखा, बेटी बाहर देख रही है, जहा दो एक गिलहरिया एलेस्टोनिया के पत्ते कुतरती रह-रहकर इधर उपर देख लती हैं। लङकी ने बाहर से ध्यान हटाकर भीतर देखा तो मा ने कहा, 'सोचती हू, अब जो तुम आयी हो, तो तुम्हारे साथ ही उतर जाऊगी - ददा की दुकान तक ही सही लङकी एकाएक उछलकर खड़ी हो गयी, अब मैं यहा एक पल भी नहीं - - 4/पनी स्थिति अतिम स्थिति मैं भी पागल हू रकूगी। मा हक्का बक्या देखती रही कि लडको क्सि बात का बुरा मानकर बमक पड़ी है। शायद उसे अच्छा नहीं लगा - मा मे घूमने की लालसा होना? लडकी नमतमानी बाली, 'वैस सोच लिया था कि कुछ देर रहूगी। बातचीत होगा । पर ऐसा होता नहीं । आआ, और वात क्या से क्या हो जाती है। वह गुस्स से भर गयी और अपने गुस्स से खुद ही आतकित होती सी अपने आने पर पछता रही थी कि अच्छा भली बैठी थी 1- अचानक विजली गयी, और रौनी ने कहा - यहा गर्मी म बेकार घुटोगा- जाआ, मा से मिल आओ। और दखो कि वह मान गयी। कडकती गर्मी मे कहा भागी गयी- ये सब लेने ? बेकार कितना डाल आयी ? कुछ 'नरूरत थी ? पता नहीं, क्या हो गया था उस ? - जानती नहीं थी, इसस अलग यहा होना क्या है। हतबुद्धि-सी मा पूछ आयीं, ‘पर हुआ क्या है ? मा के खिन्न हो जाने से वह उल्टा विरक्त ही हुई है । क्या मा को जरा भी आभास नहीं हुआ, अपने उपेक्षणीय से स्वीकार का ? तब मा को भी ध्यान हुआ बेटी के मर्माहत होने का।- पर उन्होंने यही तो कहा था, कि बेटी का पैसा बेकार होने देने से तो अच्छा है, ये पैसा बटी के उपयोग मे ही आये। मा बेटी दोनों ही तब तथ्यो तथा एक-दूसर की सवेनाओं के जानकार होते हुए भी एक-दूसरे के अहसास की माग को गैर जरूरी ठहराते हुए, अपनी अपनी अपेक्षाओं की प्रतीक्षा लिय बैठी रहीं। अतीव अवहेलना प्रकट करते हुए लङकी बोली कि हमेशा सोचती है, मा के यहा उसे जाना चाहिए, पर यहा आने पर हमेशा पछताना ही पय है । तब प्रण लेती है नहीं आयेगी अब । फिर पता नही कैत फस जाती है - ऐसी जगह, जहा सिवा अपन दूसरे का खयाल हैई नहीं। हालाकि तब लङकी को लगा भी था कि वह खुन कितनी अलग तरह की है कि उसका सबध विभिन्न विषयों से है, जबकि मा मीना नहीं है, पर इनके लिए कोई क्या करे जो दूसरो को समझने की कोशिश ही नहीं करती? - चलो, माना कि रोगग्रस्त हैं। खा पी नही सकतीं, पर भावना की खातिर भी उपहार रख नहीं सकती? - वह फिर कडवाहट से भर गयी, आप खा भी सकती हैं ? कोई कसम है कि कभी खायेगी नहीं? - खाया नहीं - पहल? 'पहले? पर अब भयभीत होते से कहा था मा ने।

" तव उतन ही निभीक स्वर में उसने उत्तर दिया कि "चलो दरोग, आगे भी आग मा पानी पानी हो गयीं। अपने कटु स्वर को आप ही मन म सयत करते उसने मन को उत्तर दिया कि क्यों न कहे वह ये ? क्या जानती नहीं कि जान बूझकर इनकार किया है, कि - बेटी ऊची उठ गयी है ? - कि प मा का अधिकार नहीं है सेना? और जब भेटी-छोटी मांगे ये सुद उटाती हैं ? ये शोला है, इन्ह चाहिए-ये पोथी- ये भजन - कलम । अवज्ञा जैसे भाव में उसन मन ही मन में कहा, 'क्यों कोई दे य सब? - आप गुद नहीं खरी सक्ती ? अपन लिए? पूछो, तब एक जबाब सुन लो - निकली ही कब हैं ? कुछ करने लायक नहीं रहीं। सहसा मा ने सोचा - सच तो है कि अपने लिए वह कुछ क्यों नहीं करती। तब लङकी भीतर डूबी रही । करने लायक क्या पापा थे ? पर किसी का कभी अहसान नहीं लिया उन्होंने ? और कुछ अगर किसी ने पीछे पड़कर लिया ही है, तो मन से न चाहते हुए भी स्वीकार लिया है। मान रखने के लिए। कभी कोई शझट उठने नहीं दी।- साचने के बाट काफी खिन्न हो आयी थी वह और उसी खिन्नता मे होंठ हिल आये थे, भावहीनता का एक ये - इनका उगहरण है, और दूसरी तरह से एक्स्ट्रीमेस्ट ५ पापा कि किसी बच्चे ने कोई जिद की है कभी, तो उन्होंने किसी को मायूस नहीं किया । अगर एक बेटे बटी के यहा स पेट भर के भी चले हैं, और दूसरे ने कुछ आगे रख लिया है, तो पहले वाले क यहा का राज दूसरे पर खोले बिना वे उसके साथ भी बैठ जायेगे। भूल जायेगे अपना पट भरा होने की बात । बिना किसी हील-हुज्जत साथ देना, इस तरह धीमे धीम खुशी बाट देते थे सबम वे पापा की ऐसी यानों के बीच उसकी आख गीली हो आयी थीं । उस क्षण मा बेटी दोनों की नम आख अपने अपने ढग से मानो उस स्वर्गवासी की तस्वीर व आत्मा को छूती रहीं। मा मानो भीतर ही कुछ कह पडी, 'देखो, बेटी का मनोवेग । यदि धीरे धीरे हरकत मे आता, तो समझ में आ सकता था, पर वज्रपात की तरह यदि अचानक पूनो को कोई अमावस मे बदल डाले? बालो-ऐसा सैलाब थामा जा भी सकता है? फिर शायट देटी ने कहा-'सोचा था, स्थितियों से समझौता करना सीख लिया होगा इन्होंने । ये लोग तो यहा शहीन होने मे ही आनदित हो रहे हैं। समझ मे आने वाली बात है कोई? फिर से मुखर हो आयी, 'हन है। अभी परसों मैंने कहा कि लाओ, मैं ही दवा ला देती हूं तो मना कर दिया, 6/पहनी स्थिति अनिम स्थिति यह बात कहकर कि बाजार बद है। हालाकि दवा की दुकानेहली रहती हैं टी के दिन ददा अब तक नहीं आयी। अब मेरे साथ चलकर ये दवा लेगी। कोई चाहिए इन्हें वह जैसे कहे गये को बार बार दोहराते थक रायी हो, और उसमें शब्दों की थकान या ऐसे दकियानूसीपन से उत्पन्न वितृष्णा, या फिर उतासीनता ही भर गयी हो, कि जिस सबब होंठ फडफड आये हों - 'पता नहीं, कौन-सी सदी मे रह रहे हैं। इन्हें पता ही नहीं बाहर लोगों पर क्या क्या कहर बरस रहा है? वह विदेश और देश मे विपति जनित हादसों के घटित होन के ब्यौरों के दौरान रौनी के सर्जन के जवान बेटे की मृत्यु का प्रसग सुनाने के उपरात बोली और इतने पर भी देखो, मरने वाले के बाप का हौसला कि उसने अपनी ड्यूटी मे कोई व्यवधान तक आने नहीं दिया। यहा तक कि कभी कोई मातहत दो चार मिनट की भी कोताही बरते- और एक ऑपरेशन के बाद दूसरे ऑपरेशन की तैयारी में जरा सी भी ढील आ जाये, तो वह इसे सहेगा नहीं। ऐसे मौकों पर यही कहा है डॉक्टर ने, कि - ये दो चार उपचार के क्षण जो व्यर्थ कर दिये गये हैं, ये हमारे नहीं, ये क्षण मरीज के थे, जो इससे लाभ उठा सकता था। - तिस पर सराहना की बात यह कि डॉक्टर ने कभी अपने से बाहर नहीं निकाली कि उसका जवान बेटा मर गया है। न ही कभी इसका आभास होने दिया है किसी को।- पर पता नहीं - ये, घर या बाहर कभी बात पड जाय तो क्या कहती होंगी? शायद उसे अपनी छवि का खयाल हो आया था कि मा की बातों के दायरों मे उसका परिचय कितना सकुचित हो उठता होगा ? ऐसे मौकों पर मा टुन कैसी बेहूदा दिखायी देती होंगी? उसकी दृष्टि फिर पापा की तस्वीर पर उठी। और देखो कि पापा कैसे इस किस्म के बेहूदापन से दूर रहे थे ? अपना परिचय कभी चितारा ही नहीं था। सब कुछ स्वाहा हो जाने पर भी उफ नहीं की। फैक्टरी के जल जाने का एक लफ्ज मुह पर नहीं लाये। -तब एक छाम भी पल्ल नहीं था कि किसी दूसरे छोटे मोटे छप्पर तले ही कोई जुगाड जमा लेते । बस, एक अन्द जूते लायक चमडे की सरीत करते - और यों एक जूता बनवाकर बेचते, तब कहीं घर मे चूल्हा जलता । इसके माने यह ता नहीं कि पापा मे ज्यादा की आकाक्षा नहीं थी? पर भूलकर भी कभी टडी नि श्वास नहीं भरी उन्होंने। पापा की याद ने तब उन दिनो वाली मा का चेहरा भी याद दिला दिया । तब वो सुटर काया वाली मा कितना कुछ दरगुजर कर लेती थीं । छोटी-बड़ी दोनों बहन समान की उठती उगलिया या कथोपकथन कभी सहारती नहीं थीं । मामा मामी के यहा रहने पर जो सुनना पड़ता, इसकी भी आदी नहीं थीं । तव मा ही समझाती कि आज सहने-सुनने का वक्त है हमारा । सारे रिश्ते तद तक के होते हैं, जब तक औकात हो । फिर हमारे सिर पर मीना और लीना की पाई की जिम्मेदारी है। मा ने उन दिनों तब दो दो, चार चार मीटर कपड़ नापफर वेचने में भी हेटी नहीं मानी । न ऐसी कोई गैरत ही पाली कि कोई समझे, कौन किससे कितना फर्क है? - अपने बच्चों पर हीनता की छाप नहीं पड़ने दी। सोचने पर तब उसे महसूस हुआ था कि वह व्यर्थ ही मा के प्रति क्रूर और अशिष्ट हो आयी थी, पर कुछ देर मौन रहने के उपरात उसमे नया मलाल उभर आया कि पापा मौजून थे, तब तक ही मा म स्थिरता थी, पर पापा के आख मूलते ही वे कैसी हो गयीं ? पापा और मा के बीच का जतर उस नये सिरे से सताने लगा था, कि पापा जैसा धीरज भी मा मे नहीं था-पापा के बाद ही मा ने चारपाई ले ली थी। फिर जरा सी बीमारी में यबद्धकर अपनी वसीयत तक लिख डाली थी और इस तरह सब पर प्रकट हो गया कि पापा की पूजी का सरक्षक रौनी है। - -छि, कैसा सशयाकुल मन । पापा मरते मर जाते, पर अपने मुह से सरक्षक का नाम बाहर न निकालते, कि सुनकर चारों भाई बहन अवाक रह और देखा कि कितने मनायोगपूर्वक सुना उन सबने । और लीना ने तो सरेआम कान ही खडे कर लिय। - बहुत लाडली मानती है खर को। पर निरर्थक लिप्सा मे फसी। सिर से पैर तक सासारिकता मे रत। साचते ही नये सिर से झुकला आयी वह, 'फिर उस देखो, जैस कोई काम नहीं उसको । पैसा है, बच्चे पढ रहे है, पर काम की जगह हाय-हाय सुन लो मा को ध्यान नहीं पड़ कि मीना किसको सबोधित कर रही है। पूछ, तो बोली, और किसे कहूगी, लीना ही है । हमशा काय काय सुन ला उसकी । आगे कोई कम तरलीफे हैं हमे, कि सुनो इनरी । वो भी, कि जब दूर दूर तक तकलीफ हो न कहीं जाते। - N सहसा रौनी की तकलीफ का खयाल आया मा को। तव चाहा पूछ, कैसा है रोनी पर देख आयी है मा कि रात भर पीय कटकती है उसे, पर सहार है उसम कभी मा ने उसके सहार की सराहना की थी, और मीना ने कहा था-आपके सामने चुप रहता है नहीं तो देखा क्रो कैस बच्चों जैसा बिल्लाता है अच्छा इन दिनों फैक्टरी का काम कौन देखता है। सहसा मा ने पूण तो बोली कौन ददेगा ? तु ही रेखता है। 8'पनी म्बिात अतिम स्थिति था उसने . था । 'फैक्टरी का एक विंग समेटना 'हा, पर सब कुछ सही हाल में हो, तब न? कभी अचानक पता चलता है, मशीन ठीक नहा। मशीन ठाक हुई, तो बिजली गायब । बिजली आती है, तब वर्कर नहीं होते। - हों भी ता, पहल मागे सुनो उनकी । महगाई बढ़गी तो मागे साथ बढ़ेगी एक बार एसी झझटा के दरमियान मा न लङकी के पापा की उपस्थिति को चितारा वे होते तो 'झझट किमी के होने से गयी हैं ? - और कोई न कोई शझट तो रहगी ही, फिर कोई ठेका था जन्म भर का? पापा जब नहीं रहे तब राज यहा आती थी वह । गुड्डम को कहती, वह मा को घुमाने ले गाय । सुर वह घर मे रहती । दर तक अकेली इन कमरों मे घूमती । छज्जे पर जहा पापा खडे रहते थ वहा से नाच देखती। पहले सुबह-सुबह पापा उथर से आते दिख जात थ । आन भी कोई दृध लेकर उपर से आता तो उस पापा के होने का भ्रम होता । पर ये पापा नही होत, और वह हट आती । आकर घर झाडती बुहारती और वे तमाम काम करती जिन्ह पापा निबाहत थ । फिर वह अपना शादीवाला फोटो एलबम उठा लेती। पापा जब उसके घर आते थ, यही दसा हुआ फोटो एलबम देखने लगते थ । कभी वे गुड्डम की भइग बुक निकाल लत, और राइटिंग टेबल पर बैठकर किताब मे रग भरते रहते । कभा किताव के हाशिय में कोई नया डिजाइन बना देते । गुड्डम स्कूल से लौटती तो उसे दिखाकर सहसा चक्ति कर देत । इतवार की छुट्टी वे गुड्डम के साथ बिताते - ताश के खेल खेलते हुए। किसी अन्य छुट्टी के दिन उसे और गुड्डम को लिय हुए वे शॉपिंग मे ही साथ दते। मीना की दी खरीद की फेहरिस्त उनकी जेब मे होती। फिर भी मुहजबानी सब याद होता उन्हे । और वे शॉपिंग विंडो पर ठिठक जाते, फिर उसकी ओर देखते। वह आगे बढ़ जाती तो वे भी नहीं रुकते । ऐसा प्राय नयी दिल्ली के इम्पोरियम की दुकानों पर होता। उन दुकानों पर खरीद की चीजों को लेकर उसम और पापा मे एक खेल-सा चलता । गुडडम भी उसका अनुसरण करती । पापा के साथ भागम भाग मे गुड्डम को एक खास तरह की खुशी हाती। शॉपिंग के बाद भी पापा को एक-एक चीज की याद होती कि इसे कहा से खरीदा था। कोई पुरानी चीज भी दिखायी दे जाये, तो कहते - बब्चे। (बब्वे कहकर पुकारते थे) ये हमने साथ नहीं खरीदी थी। मूसा' - बाद मे-पता नहीं, कैसी साटे सी आ गयी थीं वैसा रसभरा प्रदर्शन कहीं ही गया । वे मुस्कराहटे भी हवा हो गयीं। परिस्थितियों की प्रतिकूलता के आगे हटे रहकर उसने क्रूरता को जान लिया था। उन दिनों पापा सैनी की नयी इमारत की नींव रखवा चुके थे। इमारत का उठना और निगरानी दोनों पापा के जिम्मे थी। बिल्डिंग बनने के दौरान यदि किसी बात पर कोई कहा सुनी हुई है, तो उसके सस्त सुस्त पर पापा ने कोई सख्ती नहीं बरती । न ही अपने लिए यह कामना सजोई कि कोई उनके लिए कुछ तरदुद करे। सब याद आने पर वह पापा और मा मे तुलनात्मक भेट किये बिना नहीं रहती कि मा ढुलमुल है।दूसरों पर निर्भर । कोई कयी ले आया, बाल सवार दिये, तो ठीक, नहीं बिखरे तो हैं ही। चपल किसी ने ला दी, तो ठीक, नहीं तो चट्टिया ही चटखाती फिरेगी । वही हाल खाने-पीने का है। -ये कच्चा है, यह पक्का - ये हल्का, यह भारी। सिला अधसिला वह जैसे खुद किसी लिजलिजेपन से भरी सिहर सी आयी हो ओफ। ऐसी अभद्रता ने तब मा को मानो अपलक उपर देखने पर विवश किया है, कि लडकी को हुआ क्या है? - लेकिन इससे लड़की की कडवाहट में कोई अतर नहीं आया। उसने समझाना चाहा कि जरूरी नहीं कि वात सिले-धूले की हो, असल चीज है नुक्स निकालना, कि बेकार जैसे काम ही क्यों किये जाय? उसकी भौहे खिंच गयीं 'भाभी जी हमारे यहा यही करती हैं। नौकरों तक मे नुक्स निकालना • ये ऐसा है, वो वैसा । बस, मैं अपना काम खुही करती हू। भई, खु. काम करना बढिया है, पर दूसरों में नुक्स निकालकर क्यों ? आपको नौकरों की जरूरत नहीं, पर नौकर चाकरों वाले घर मे औरों को तो नौकरों से काम है। -पर ये कमाऊ और लायक बेटों की मा हैं, तो इस बात का गर्व तो करेगी ही मेरा मतलब है-लोग अच्छी बात क्यों नहीं सोचते? - यही दात आपमं है मा जानती है, यह एक सादा सा सवाल है, पर इस सवाल का जवाब क्या उतना आसान है ? और कि किसी की किसी से तुलना की जा सकती है? मुदी आखों और ढीले शरीर का भार तकिये पर बल देते मा कह पर्डी -"बस, वक्त-वक्त की बात होती है। "वक्त निबाह ही रहे हैं - हम भी! - रात-रात भर उलटी-यूक खखार उबकाई- सब सभालते हैं। लध्वी के रजीना स्वर से ही मा को अपना सब याद आ गया । बड़े घर की, 10 पहनी स्थिति अतिम स्थिति अनगिनत कमरों वाली हवेली की जिम्मेदारी । तिस पर ऊची नाक वाली सास । वे सब समस्याए क्या आज लोगों के आगे हैं भी ? पर, उस जैसों को लिपटा रहना पड़ता था उस सबसे - जीवन की परिपूर्णता के लिए । आज उन दधनों म बथे रहने देना वाला ही नहीं, तो कितना कुछ सिर से गुजर गया है लङकी, तब खुद को जैसे धृष्टता से अलग खींचते हुए कसमसाई . 'पर, पता नहीं कैसी फ्रस्ट्रेशन भर दी है ~ सबमे ? काश, लड़की जानती कि वास्तविकता भाति-भाति की जटिलताए लिये होती है। - पर पता चले साफ ? या झुंझलाहट के पीछे मुद्दा ही हो कुछ, कि अशिक्षा तो है नहीं मुद्दा ? लडकी भी ठीक यही सोच रही थी, आखिर कुछ अधूरा छूटा नहीं। शिक्षा के अतिरिक्त भी जहा आज वह है, वहा रहकर जीवन दृष्टि व्याप्त ही हुई है उसकी । फिर? हौले से दोनों आखों के गिर्द दोनों हाथों की उगलियों से - कोरों को पोंछते हुए उसने जैसे को समझाने का प्रपास किया हो - 'वैसे मुझे कुछ शिकायत नहीं, तब खुद हद होकर भी क्यों मा के कमजोर कथों को उसने झझोडा था ? -- शायद मा मे शक्ति स्फूर्ति चाही थी उसने । मा को रसोई मे देखा है, कभी पकवानों में रुचि लेते भी। तब उस उम्र में आखों मे स्वप्निल-सी उमग थी, लीना उससे पहले ही ससुराल चली गयी थी। पीछे अब घर मे वही थी । सिलाई बुनाई उसी के लिए। रसोई मे बनने वाले पक्वान भी उसी के लिए। ससुराल पहुच जाने पर भी प्राय पापा मिलने आते। कभी कभार जब मा आ जाती- तो अनायास रसोई मे धीमी-सी हलचल मच जाती । परिवार मे जबसे गुड्डम ने जन्म लिया, पर मे सिलाई बुनाई की धूम । गुड्डम मा के साथ रहकर खिली रहती थी। अब वह मा कहीं नहीं । खिसियानी-सी सूरत और तकिये का सहारा लिय टोली यली सी मा पर वह काफी खीज खीज आयी है, कि, अभी आप पापा जैसे बूढ़े तो नहीं ही हो? पर पापा ने खुद को कभी बूर नहीं माना था । दयनीय और मोहताज भी नहीं बाद मे जब पापा अस्वस्थ थे, तब भी किसी ने उन्हे अस्वस्थ नहीं माना । वे सुन अपन को भी कभी अस्वस्थ नहीं लगे। मा को हटा देते थे- 'तुमसे अब होता नहीं। हो भी, तो असहाय-सी दीखती हो। हटो ' उन्हीं पापा का असहाय होना तब याद आया । उन दिनों पापा को कानों से कम - मूना।

अब? सुनने लगा था 1 फोन पर भी बात ठीक समझ नहीं पाते थे। उसे ऊचा बालना पड़ता और शुझलाकर वह रिसीवर थर देती। कभी फोन पर छटपटाती सी आदान में पापा कहते 'हा, हा समझ गया मुझे याद रहेगा। वस्तुत उनकी याद पर आघात हुआ था। वे पास होने पर भी कहते - 'मुझ सब याद है। पर - जब तक तुम तैयार होओ, मैं सो तू - जरा दर? पर सोन म भी अब वे ज्यादा वक्त लेने लगे थे। अचानक जब उठ आते तो घडी म वस्न देखत - जो निर्धारित समय के बाद का ही होता । तब उनके चेहरे की नस आपस म गुध जाती, एक सर्द-सी औफ । के साथ ही उनकी गुडी मुडी नसो पर तब अनचान्ही-सा करुणा भी बिखर जाती । दयनीय-सा कोई भाव वहा घर कर लेता, और वह विस्फारित नत्रा से ताकते, मानो पूछ रहे होत अब फिर सही कभी -- । पर, हुआ क्या है आपको पापा ? पूछ जान पर तब उनके चेहरे का भाव ढल सा जाता। अब मुझे याद भी नहीं रहता - बच्चे। -वे अवाक देखन लगते। और उनका मुड जाने को उठा हुआ बदहवास सा काम जहा का तहा गद्य रहता। 'पर पापा ? वह कहती - ‘सुनते वक्त ध्यान ता द लिया करो। ध्यान देता हूँ पापा पूरा ध्यान उसके चेहरे पर अटकाये अटकाये अपनी कमी स्वीकार करने जैसा भाव चेहरे पर उतार लाने, कहते – 'पर - मैं तो खुर कहता हू बच्चे- मैं याद रखना चाहता हू पर यान से उतर जाता है। देचारगी तथा खिसियानपन जैसा भाव उनके मुह स हडता रहता है, जिसे देखकर उतास सी होती वह मुह दूसरे कामो की ओर फेर लेती है। अतिम बार भी जहा उन दानों को साथ जाना था वे जा नहीं सके थ। सोकर उठे तो कहा 'पता नहीं ये दर्द जा क्यों नही रहा? फिर से उस दई वाली बात से शमिता से हो उठे हो, मानो कितने अवसरों पर हुई किसी एसी ही की या ने उन्ह पानी पानी सा कर दिया हो। कैसे थ पापा ? और उनम टिपा वह उत्कट इच्छा कि दूसरों के हा काम आये:-- पापा की या मे बरबग आखे भर आयी। अतिम बार जब पापा से मिलने आयी, तब भी नहीं बताया उन्हेंनि कि थोड़ी देर पहले बड़ी दी से इमी दर्द के सर्भ मे ही जान पूछ रहे थे वे बल्कि उसमे पहा पूण अचानक कैम बच्चे। "ह बिन निम म्पिति 'यों ही - बस ।' उनके कौतूहल को बिटर विटर तातेप्रसने उनस्ट हल पूछा तो दोले - बस, दर्द है। तुम्सरी दहन करती है - स्पोईसाइटस होगा। कहने भर से मानो निश्चित से हो गये हों वे । 'डक्टर से क्यों नहीं दिखवाते ? उसने सुहाया । 'बस, अब दिखवाऊगा । तुम्हारी मा गयी है डॉक्टर का दिन जानने खवर कहा, 'अपनी बताओ, सब ठीक है ? कुछ जरूरत हो मेरी ? उसने सिर हिला दिया, पर जैसे विश्वास न हुआ हो उन्हे, कहा 'मैं चल सकता ह यह मत समाना कि घर में 'वो नहीं है तो मैं उसे बाद मे दता दूगा । और याद रखो, तुम्हारे साथ जाना तुम्हारी मा को गढ्य नहीं कभी अच्छा ही लगा है। फिर कुछ . हटात उसने खुद को नियमित किया । मा बेटी दोनों की नजरे एक दूसरे से गुजरती अदृश्य पर टिक गयी हैं। क्षण-क्षण को जीतने का विश्वास सजोया है लड़की ने। मा दूर तक सोच गयी, कि बेटी आगत प्रकाश अप्रकाश, सभाव्य-असभाव्य देख सकती है। मा को श्रेष्ठरूपा अपने जैसा ही चाहती है बेटी। मा भी कहे कि 'कुछ जरूरत हो मेरी तुम्हे ? पर नहीं, वे पापा नहीं बन सकीं। बेटी कह देगी कि 'आप तो लायबिलटी हो। -सच, आज बेटी का टिफिनबॉक्स लगाने वाली मा क्या वे हैं भी? लडकी भी टिफिनबॉक्स के दायित्व का सोच रही है। आज मा वाला दायित्व मीना पास है। थककर चूर होने पर भी यह दायित्व निभाना अच्छा लगता है। जिस दिन गुड्डम अपना टिफिनबॉक्स घर भूल जाये, या कभी रौनी की फैक्टरी में छुट्टी होने पर ही, वे दोनों गुड्डम को लच फाइवस्टार होटल मे करदाने जाये तो पापा का 'लच बॉक्स लिए-लिए स्कूल आना याद आ जाता है। गुड्डम के स्कूल पहुचने की भागमभाग मे तैयार होते हुए खुद को जब भी कभी शशे मे निहारा है, तो इस विषय को लेकर भीतर तक पेनीट्रेट करने पर सोचा है कि बेटी को लच खिलाने की खातिर (प्राय) तरादुर करना क्या आज के युग मे सभव है भी ? - या आने वाले कल मे क्या हाथ पाव इतने क्रियाशील रहेंगे, कि हर हफ्ते बेटी को खिलाने के लिए बढिया होटल ले जा सके? और क्रियाशीलता न रहने पर जब वह मा जैसी हो जायेगी, तब गुड्डम भी उसे । । मुखा/13 ऐसी वेपहचान आखों से देखेगी। ऐसा सोचने का अवसर जब जब आया है, उसे लगा है कि कल्पना और सच्चाई दोनों जब एक दूसरे के सामने होते हैं, तब एक बहुत बड़ा झूठ भी उन दोनों के बीच आन खड़ा होता है। पर ऐसे झूठ की मौजूदगी का खयाल तब आता है, जब मन पर ढेर सारी उासीनता उतर आती है। तब व्यक्ति दुनिया को भावात्मक नजरिये से देखने की आकाक्षा करता है। वह सहसा ही चेत-सी गयी। ध्यान हुआ, अभी ही तो - अपनी आकाक्षा के विपरीत वह मा के अपरिवर्तित दृष्टिकोण पर आघात कर चुकी है। यह कहकर कि अभी लोग हैं, दुनिया म कि जो अकेले बैठकर भी हस लेते हैं। पर आप जैस ध्रुव भी अभी है, जो एक जगह डटे हैं, तो डटे ही हैं। और सीधी राह घर कभी पहुंचते ही नहीं, कि माने, सीधे से चादी लगाने पर जो ताला खुल ही गया तव तो घर पहुच ही गये। फिर ग्रुव का क्या होगा ? -- वह तो अटल है। -तो मत हटो अटल से । खडे रहो। पर हटोगे नहीं, तो गाडी तो आयेगी और खट से निकल जायगी।"खट - वह सकत से बताती है कि नहीं हटोगे तो सिर तो पटरी पर कटेगा ही। हा, मा मानो सुनते ही भयभीत-सी आगे को सरक आयीं । वह भी उठ गयी थी। उसके दोनों हाथों की उगलिया एक-दूसरे से गुथी हुई थीं, और वह निर्लिप्त-सी कमरे के दरवाजे की ओर बढी थी। उसके जाते ही अधर होती सी मा भी उठकर अनायास उसके समीप आन खड़ी हुई। सच्चाई की कडवाहट और प्रबल तिरस्कार मानो वह घूट चुकी हो । बोलीं, 'कोई और बात करो। आहत स्वर मे मा ने अपनी ही कही हुई बात और अधिक आतुरता से कही, 'कुछ और. मीना, कहो। मास रहो। 'कुछ और हैई नहीं इच्छ न रहते हुए भी कहा। “पर कितने ही समाचार होते हैं । म्न की आतुरता मानो बढती ही जा रही हो । “समाचार मैं पढनी ही नहीं।" उसका स्तर वैसा ही निर्विकार अब भी है। मा के स्वर की व्याकुलता चुक नहीं रही। उल्टा मीना को अनमनपन से भर दिया । बोली "सूखा पड रहा है।" झुलाहट की झाग उसमे मानो सूस मिहार पसर गयी है। बोली, "किमान भूों मर रहा है - गप घर रहे हैं।" उसका स्वर गुर्राकर टूट सा गया है। बुद्धप में जैस अवशता और राग किसी को तोड डाल । पर सोचा - रोग तोहहेकहे को भी तोड़ देता है। 14/पह स्थिति निम स्थिति मा सिर हिला रही है। किसान के भूखे मरने के प्रति, या गर्थ के चरन पर ? पर मा के चेहरे की कातरता सहारी नहीं जा रही उसस। अब क्व आभोगी। वहीं भातर भाव। "देखो, जव वम निकल । आवेग उसमे फिर उमड आया है। उसक सालीपन को, गिलगिलानी सी तरलता को दपहचान से कगार पर पक गया है आपग। फ्रिज से दूध की थैलिया उद्यान तक सोच का हिम्सा भी मिट्टी मिट्टी हो गया है। सूखे समुद्र की छटपटाती मछली आखों तक उठ आयी है। यह सूरी अया मा देख ले, 'ससे पूर्व ही आखे बवाती वह सीढिया उतर गयी। सूखा/5

दबे-दवे कही'
--
M
गेट के दूसरे कोने पर साल बजरी के आर पार भागती लकी ने एक नजर देखकर पूज,
आ गयीं आटी"
"," मैंने सिर हिलाया और बराम की सीढियों पर बैठ गयी।
बैठने पर भी मेरा हाफ्ना ब नहीं हुआ। ऐसी हताशा मे लग रहा था कि मेरे मरने
और जीने के बीच सिर्फ एक रेखा भर का अतर रह गया है
मैं ध्यान बटाने के लिए
अन्यत्र देखने लगी । लकी तब स्क्वेयर की दीवारों के साथ-साथ चलती अपनी जाफरी
से सटकर खड़ी हो गयी थी । पूज, "क्या है ? आज अकेली खड़ी हो?
'हा, आज शनि को भी पापा दफ्तर चले गये हैं।"
'तुम्हे कुछ चाहिए ?"
लध्वी ने सिर हिला रिया, 'नहीं, पापा आ जायेंगे अभी
मैं चाहती हु लड़की को कुछ दू, लेकिन झिझक रही क्योंकि अभी अपनी
लडखडती सासों पर भी काबू नहीं पा सकी । और देने के लिए उठना पड़ेगा।
आप यहा हवा में क्यों बैठी हैं।
हा, हवा मे बैठना ठीक नहीं । मैं उठकर दीवार की ओट तखत पर बैठ गयी हू।
यहा से बाहर का कुछ हिस्सा दिख जाता है। बाहूमनी आयेगी तो लिख जायेगी। पर बाहर
कोई छाया तक नहीं पटक रही।
मेरे पर्स मे एकाप सैंडविच था, जो मैंने उस लड़की को देना चाहा था, पर जिसे अब
मैं खा रही थी। पर्स में छोटी सी बोतल में पानी है मेरे पास, मैं चाहू तो इस घटे आप
घटे मे मैं दवा भी ले सकती हूं।
अब बाहर दूसरा पहर ढल रहा है। हवा मे घुलती मिलती के किनमिन का दृश्य
उत्पन्न कर रही हैं। उस किनमिन मे सहसा बिल्ली के तीन चार बच्चे अपनी खडसे
निकलकर मानो मा की तलाश मे आखों के पपोटे खोले बढ़ रहे हैं। उनमे जो एक बच्चा
-
/16/

बद्ध है, वह धीरे से दरामटे की सीढी चढ़ आया । उसे भगाने के उद्देश्य से 'श्चि की आवाज निस्सलती हु तो लड़की जाफरी के पार से बोलती है ये, यो नहीं निकलगे आटी। "अच्छा। ताली बनाकर भगाने को उठती ह तो सीने मे पचका लगते ही 'खो-खों, भीतर किसी आपात जैसी चुभने लगी है। मैं तलफला उटी है। दवा और पानी - एकसाथ मुह में डालकर गटक गयी हू। ताले स चाबी लटकायी है, तो लजी ने आकर ताला खोल दिया है। 'चलो आटी। 'थैक्यू । अब तुम जाओ शायद तुम्हारे पापा आये हो?" लड़की के स्पर्श से आराम मिला हो जैसे। थोड़ी देर बाद जब बाहर निकली तो बिल्ली को तल पर पसरे पाया। फिर वही झुरालाहट । क्या समझ रखा है इन जानवरों ने कि मौका मिलते ही आकर गुदगुदे बिस्तर पर टाठ जमायेगे ? दरवाजे के पीछे से छिपकर बिल्ली पर ब्रूम फेका, जाफरी का गेट बद किया, तो सिङकी की ताख पर परी दवा दिख गयी। डॉक्टर की हिदायत भी याद आयी - 'कायद से लेते रहिएगा दवा। फिर बाहूमनी की हिदायत - 'लग के इलाज करो बीजी । चेहरे पर तो मरयाहा सा पीलापन फैला हुआ । ऐसी बाते जैसे एक अदृश्य सकट सा खींच लाती हैं । और तब अपेरे मे ही जैसे किसी निर्दिष्ट स्थान की ओर भागने लगती हू मैं । अकेली। तब ये दिन, ये क्षण जैसे सिकुडने से लगते हैं। जैसे उजले दिनों के बाद, एक पुंथली गुफा हों क्षण । लंबे जीवन के बाद एक सीमित क्षण। अपने मे सीमित-सी पहले नहीं थी मैं। बल्कि जब आयी थी तो पोसियों में जिज्ञासा थी, और वे जानते नहीं थे कि मैं खुद ही किसी से दोस्ती करना नहीं चाहती । पर बाद मे आभास होने पर वे दूर हट गये। दूर से ऐसे देखते, जैसे कोई चुपचाप मदारी का तमाशा देखता हो। पिछले महीने, अभी जब मुआइना नहीं कराया था, तो सामने वाली पझेसन का एक मुहावरा सा कान मे पड़ गया आप न मूए ब्रह्मना और न मरने दे। उस मुहावरे के अर्थ एकाएक समझ में नहीं आये थे, पर बाद मे जब सुना - 'इनको ठीक नहीं होना तो न हों, पर हमे तो रातों को सोने दे। तो सुनकर सन्न रह गयी मैं। माने - मुझे मरने देना नहीं चाहते, या कह रहे हैं - 'जाओ, मरो भी, किसी तरह हमारी दवं दब कही/17 - नींद की ही खैर मागो। फिर उसी दिन बल्कि उसी सुदह में डॉक्टर के यहा गयी। वह मुआइने के पहले मेरे कानों मे इस पडोसन लड़की के पिता के शब्द भी गूज आये थे या तो इनका खाविंद बेटी सहित इनके ही पास आन रहे, या फिर ये ही बेटी और बच्चों के पास जा रहे।' देखो कि कैसी विषम स्थिति है ?' आवाज मेरे होंठों से बाहर निकल पड़ी, तो डॉक्टर ने पूछ, 'स्थिति क्या सचमुच ऐसी है? डॉक्टर अब मेरी पल्स देख रहा था, फिर परीक्षण टेबल पर वक्ष और पसलिया। फिर पूज, "इतना विषम तो क्या है?' मैंने धीरे धीरे सब कुछ बता दिया। और आपको शक है - भयानक रोग का" "पता नहीं, पर रोग इसी तरह बिगड़ते हैं। कोई भी गाठ •या लगातार एक ही जगह पर आघात ?" मैंने डॉक्टर को बताया कि सिम्पटम्ज से मुझे पता चलता है आप सिम्पटम्ज जानती हैं?" बॅक्टर उस समय ब्लडप्रेशर की ऊपर नीचे गिरती गति पर ध्यान केद्रित किये था । फारिग होते ही पूछा, 'इससे पहले मुआइना कराया था?" मैंने सिर हिला रिया- “नहीं, पर मेरा दामाद बिना मुआइने भी उठ गया था।" देखे, पूर्व कल्पना के अर्थ कुछ नहीं होते। अब आप अपनी सोचिए।" डॉक्टर जब जाच स्लिपे तैयार कर रहा था तो सोच रही थी कि जाच परिणाम तो इस अज्ञात स्थिति से कई गुणा दारुण होते होंगे। पर एक लिहाज से सार्थक भी, कि परिणाम निष्क्रिय मन को झकझोरकर प्रतिक्रियावादी और फुर्तीला बना देते होंगे । माने कि सद्ध लोगो - जूझो!- भूचाल आने के बाद की स्थिति से जूझो । कुछ मुआइने हो गये थे, कुछ खाली पेट होने थे। अत प्रेसक्रिपशन हाय मे लिये हुए मैं पास के मेडिकल स्टोर से दवाइया से आपी तो कानों मे बॅक्टर का स्वर अनुगूज जैसा गच्का-'फौरन शुरू कीजिए-ठीक हो जायेगी। तब सोचा कि लोग सदैव जीने की सलाह ही क्यों देते हैं? जानते नहीं कि अतत तो मरना ही है। भीतर किसी ने कहा-मौत क्या आती है कभी आदमी के चाहने पर ? पवाए. ? पर हममे से कितने दवाए खरीदने की हैसियत रखते हैं? 18/पहस्पिति निम स्थिति घर के गेट पर छज्जे तले उस दिन भी वही कोडी था। एक टाग-कटा भी कभी-कभार मिलता है यहा और तीन ककात बच्चे । पता नहीं कितनी बार मुझसे घट खा चुके हैं इसी भागने की लत पर। पर सवारियों की कतार के आगे-कभी यहा, कभी वहा दिख ही जाते हैं। मुआइने वाले दिन उन पर गुस्सा नहीं कर सकी मैं । शायद कि बरसों से ये लोग दवा-दारू के लिए ही इक्या कर रहे हों। उस दिन दाहमनी पर भी खीज हुई नहीं । शायद यह भी एक वजह हो कि उस दिन वह जल्दी आयी थी, और मैंने उसे सिर्फ उलाहना दिया था कि पहले श्राद्ध पर भी गैरहाजिर थी वह। बाहमनी ने उलाहने की वह शर्मिदगी जञ्च कर लेते कहा था - 'वाकई झूटी पड़ी हू मैं, बीजी, पर उस दिन किसी ने घर मे मेरे मालक की ही तिथि बता दी थी। ये दो दो तिथिया जो मिल जाती है न, आदमी न इसकी सोच सकता है, न उसकी, फिर जैसे दूसरे कह - तैसे करना पड़ता है। मैं हैरत मे बोली थी- 'बता, ऐसे मे तुम्हारा भरोसा कर भी सकती हू मैं? तब साथ ही मुझे यह याद आया कि मैं खु. क्या अपना भरोसा कर सकी थी, कि कभी डॉक्टरी इलाज को भी जाऊगी ? पर कभी काम चलते हैं जोर जबर के दम खम पर, कि हौसला मुझमे इतना ही था कि जाच के दौरान में विरोधी कामना कर रही थी, कि कैंसर हो ही जाये, और मैं छूट नहीं तो मेरे गिर्द तो अघेरा है । अधेरे मे मुझे एक अजीब सी शक्ल भी दिखने लगती है, जो खुद पर तवज्जो एकाग्र करने की माग करती है, जबकि इस माग से उसीन रहना चाहती हू मैं । ज्वालामुखी को फटने देना चाहती हू, कि फटेगा, तभी तो पातु के खजाने हथ लगेगे। मतलब जहा एक की मौत, वहा दूसरे की जिंदगी । पर देखो कि एक बार फिर जिंदगी की रक्षा के लिए अस्पताल गयी है। पहले परीक्षण डॉक्टर के हाथ मे आ चुके थे, पर खाली पेट हुई जाच के पर्चे अभी ढूढ़े जा रहे थे। टूढ-भाल अली को सौंप, डॉक्टर ने पूण, दवा लेती रही थीं। 'पहले क्या लेती रही थीं। 'वही, जो कभी-कभार डॉक्टर ने दी होगी।" जानती हैं, दवाए बिस्क्राइब कराये बिना नहीं लेनी चाहिए? डॉक्टर ने पर्ची पर लिखा-'सेल्फ मैडिकेशन दवन्दबे यही/19 उस क्षण भयभीत हे आते पूछा, "क्या इन दाओं से हुआ है। जाक रिपोर्ट मिल गयी और देख ली गयी। फिर लिटाकर परीक्षा किये, और डॉक्टर ने अपने हाथ खींच लेते कहा, "इस लिहाज से तो हर की कोई बात नहीं। डॉक्टर ने बताया कि वह तो डर ही गया था। पर मैं नहीं डरी । ह, यह जबान पर आया था, कि लिहाज इस तिथि का मानो, चाहे उस तिथि का, करना नहीं पड़ता है, जो टॉपर समझे। जब अपनी प्रिसक्रिप्शन उठा रही थी में परीक्षण टेबल पर सिर उटाकर के हुए एक हृष्ट पुष्ट नौजवान को डॉक्टर कह रहा था, 'एकमरे करदा ही ले आप . कभी वाहर की तदुरुस्ती भी अमूमन ऐसी होती है कि कोई सोच ही नहीं सकता कि भीतर कहीं रोग होगा पूरी बात सुने बिना ही में आ गयी थी। अगर कुछ देर और वह रहती तो शयर उस मरीज से ही पूछ बैठती कि आप किसी सुभाष को जानते हैं? कभी-कभी किसी की शक्ल किसी दूसरी शक्ल से इतनी मिलती-जुलती है कि आदमी सशय घेडकर उसे असल मान लेता है। - - कैसे भरे भरे शरीर वाला, हसती आरों वाला था सुभाष । रुना और बच्चों को साथ लिये उसके सामने था । उसी दिन तो बता रहा था 'मैं अब वो घर बदल ही लूग्य । वहा जच्च नहीं लगता मुझे घर बदलने की चाह उसकी आखें मे सैलाब जैसी बह रही थी। यही था सुभाष मे। एक आग्रह, एक उतावलापन और उमडन । क्यों है उसमे ऐसी उमड़न रेकाबूपन सा ? एक तेज धार वाला जज्दा ? 'टच वुड' - यदि ऐसे जच्चे को कुछ हुआ?- मैं कपकपा आयी थी। फिर मैंने अपनी भावना पति से कही थी, 'देखो, याज्ञनिक साहब । ऐसे मे मगल या शनि के लिए दे दालना चाहिए। 'अच्छा-अच्छ, दे देगे भरोसा रखो । पर तुम भी दामाद से कम उतावली नहीं हो? पर सुभाष का भरोसा क्या ज्यों-का-त्यों रख सके हम घर बदलने की जगह उसने दुनिया ही बदल ली । कैसे सारे भरोसे कन्वे ो जाते हैं। बाहमणी से भी कच्चे भरोसे वाली बात उठायी दी मैंने तो बोली-बीजी, क्या 20/पहनी स्थिति अतिम स्थिति - करू दुखड हू। वैसे आप वक कहती हैं कि हम लोग लोभ की वजह से बन्नाम हैं। पर मैं आपके अहसानों से दबी हू। आपने रजाई बनवानी है न, जब कहो, आ जाऊगी । पर कसूर मेरा उतना नहीं भी, क्योंकि मालक सिर पर था, तो बपिनी थी मुझे, अब कभी अनाथ बेटे का ही खयाल आ जाता है, कि आखे गडाये बैठा होगा बई मा कब आयेगी, और कब कुछ लायेगी ? उसी के लिए घूमती रहती हू - घूमती रहती हू अपनी गीली आख पोंछतेनपोछते वह फिर बोली - 'बीजी, अब क्योंकि मैं ही मैं हू न पीधे तो सोचती हूं कि हाय, मेरे बच्चों को कभी स्लना न पड़े | इसलिए घूमते-घूमते ''घूमते' शब्द पर वह इतना जोर डालती है कि लगता है, बामनी के ललौहे गालों पर मानो निरतर घूमने की अतिरिक्त गरिमा उतर आयी हो । या फिर उसके चेहरे पर सनास की तपन हो । जो हो, उसकी दया मुद्रा ने मुझे बाथ लिया है। - और मेरा वह गर्व झड गया है कि मैं उसके काम आती है। फिर रह रहकर आखे पोछने के दोरान वह बाली - 'बीजी, मैं हमेशा झूठी पड़ती हु कि मैं उपर से सीधी निकल जाती थी। पर कलंक्या, बधबधाय घर ही रह गये हैं अब । बस – हदे लिय और पलटी। और ये कभी कभार का चक्कर भी, बीजी, लालच मे. कि लोग दिन तिहार के सिवा कब देते हैं ? मेरा कभी कभी का आना ये तो जोगी वाला फेरा है-बीजी सोच रही हु मरा अस्पताल के चक्कर काटना भी सिवा जोगी के फरे के और क्या है ? कभी हटे ची तरह - खिडकी से ददा हासिल कर ली, कभी नहीं। क्या इस सरकारी हदे का कोई लाभ कभी हुआ उसी वक्त खेलती खिलाती लडकी फिर टोक गयी है, आटी, फिर बाहर बैठी "ह, यह खुले दरवाजे के बाहर आसमान दीखता है। 'ह, पर खुले दरवान से पिल्ला भी ता आता है। 7 मैं लडकी की ओर देखती हू । वह अपने बालों को कानों के पीछे समेटती कहती है, वह रहा । कुर्सी के नीच. है वो मैं धीरे से फुसफुसाई । परले कोन स ब्रूम उठाया और पिल्ल पर फेका । पिल्ला कृकू करता सीढियों की आर लुढका और फिर जैसे सब कुछ ठहर गया। टीक तब आयी दाङ्मनी । आने ही अफ्सास जना चेहरा जमीन पर झुका दिया । फिर हलत-पलत फर्श पर ही तत्त से टेक लगाते हुए कहा "ठहर जरा दव वहीं/21 हे भगवान, मोताज - " उलट "सचमुच शर्मिता हु बीजी । पहली को तो आयी नहीं, पर सतमी का तो मुझे भी अफसोस है। बाहर से देखा, आप थीं नहीं, और मैं बाहर ही बाहर लेती निकल गयी । वैसे आती भी नहीं, बीमार सी थी में, पर पेट तो पालना है बीजी । किसी को न बना । कहते हुए उसके हठ एक दूसरे से जुड़कर गोल ह्ये गये। 'पर अष्टमी तो आज निकल गयी। फिर आने का फायदा । वह बात काट देती है, “नहीं बीजी । आज, आप सतमी का सीधा दे सकते हो । अब इसी शाम से न उसने अपनी हथली फर्श पर जमात हुए अपने वक्तव्य को वेस प्रमाणित करते जैसे भाव मे बताया, जाज शाम स क्ल बारह बजे तक अष्टमी है। बस, सूरज चढते ही आप तरपण डाल देना -फिर ले जाऊगी, मैं। रुककर फिर कहा, “वैसे' सुलट हो जाता है मुझसे भी, पर निवाह रही हू- सुख से हो, चाहे दुख से फिर अपनी पोटली की गाठ पर कुहनी जमाये, हाथ ठुड्डी पर घरे अदृश्य मे ताकती सी अपने मालक से मिलने वाले सुखों को वह रह रहकर चितार लेती रही। ऐसा करके जैसे अपनी मौजूदा व्यथा को कम कर रही हो । 'तुम नीचे क्यों बैठी हो? सहसा मैंने उस पर दृष्टिपात करते हुए उसे तख पर बैठन का इशारा किया। तब अपनी पोटली फर्श से सरकाती, ढिलकती सी उठी और हरहराती बेल जैसी फूलती सास भरने लगी। उसकी लयबद्ध बातों पर मेरा ध्यान अब पूरी तरह केद्रित है। फिर भी मैं जान नहीं पा रही कि अपनी बातों से वह मरे साथ अपना दुःख बाट रही है, या उसकी मौजूदगी और वातों का लाभ मुग दे रहा है, और उसके दुःख सुन सुनकर मैं अपना दुख कम कर रही है। बातो से ही दुःख कम हो, इतना ही सही - यांकि दुख ही नहीं, सिर पर बीमारी और बुद्धपा भी है। गम और पीडाए । फिर भी बाहूमनी की पीय और मरी पीडा मे अतर है। मैं गम या यातना ढोकर उस साधिकार शर्मिता करती है। उसय खोट भूल चूम उधाडकर मैंने उसे यदा-का दुखी ही किया है। शायर इसीलिए अब मैं चाह रही कि उसे दोष भावना से मुक्त कर दू। पर क्या देकर उसकी पीध का अत किया जा सकता है ? क्या कोई किसी को कुछ दे सका है ? व्यक्ति मु को ही कुछ नहीं । सका । - सोचते ही नय सिरे से सुभाष का हसता चेहरा मरे सामने आ गया है। सुभाष कह रहा है -- देने की बात रह ही गयी, और म चली गयी। मैंक्तिना चाहता था-म पर अपनी निष्ट व्यन्न वरु? अगर एक बार आजपम - अब तो उस क्तिना मुग रादाद अब म को मुसनहीं चला गया है गुभाष सामि दिन नीत्शे का व्यक्ति देने का सुख क्यों पाना चाहता है ? क्या बडप्पन ओढना चाहता है - दे सकने का बडापन ? यह भी क्या सुन को ही देना न हुआ ? कम से कम निष्काम धर्म तो नहीं है यह नहीं गीता का निष्काम त्याग है यह? यह सोचने का एक तरीका है कि हमने देने में शक्ति का उपयोग किया। और अब शनि लुप्त हो गयी है, तो और दो। और नहीं तो देन की लालसा तो रखो ही। पर बिना शकित के लालसा जब गूगी हो गयी है ये तव चीजों का मोल हुआ ? चीजों की याद आने पर मैं बाहूमनी के लिए अलग की हुई चीजे उठ लाकर उसे झोले मे डालने को कह रही 'महाराज वही वडी उमरा करे। तेरे बच्चों की तती हवा न लगे। बीजी, तेरे पुन तेरे को सुखी करे।" बाहमनी गठरी म सहेजकर, गठरी फिर तत्त के पायते घर देती है । गठरी का सहारा लिए फिर ऊय जाती है। ठडी हवा ने या आराम ने उसे अभिभूत कर लिया है। मैं भी उसकी ऊय नहीं तोडती बल्कि उठ नाती हूँ कुछ खोजने, कुछ और – जो मैं उसे दे सकती । हू। पर किसलिए ? क्या ये सुनने के लिए कि मैं उसके काम आती हू ? और बदले मे उससे असीस मोल लेती हू ? मोल न सही, पर जानने सुनने का सुख तो किसी हद तक लेती हूँ। सहसा बाह्मनी तमककर उठी है। भौचक इधर उधर देखा और पूछ, 'कितना वक्त हुआ बीजी ? फिर मिचमिचाती आखों से उतरती सध्या मे शायद किसी भूली राह पर पडे अपने बच्चों को खो रही है। उसे पानी देती हू मैं, तो पानी पिओ। मैं जानती हू वह जब भी जाने या अनजाने मे यह यटों पड़ जाती है तो उठते ही पानी मागती है। फिर मौसम जैसे ही जाडे का होने लगेगा, वह खुद-ब-खुद आयेगी और चाय की तलव जतायेगी। पर अब ? --- पानी पीकर, कपडे झाडती उठ खड़ी हुई है वह । गठरी थाड़ी भारी लगी । उसे बगल मे सभालते बोली, झपकी सी लग गयी बीजी पर बद्य सुख मिला । पैरों को कैसा आराम । वीजी, राम तुझे सुखी रखे । वडा वड्डा सुख। सोचा सुख कभी मोल बिका है ? या किसी के दिये पाया किसी ने ? वह तो अपने आप आयेगा-भीतर से। 'बीजी, तो कल अष्टमी को आना है न ? श्राद्ध है ई कल-जतरी देखकर बताया था किसी ने . - - चुप रहती हू जैसे उसे तौलकर पक्का कर रही होऊ कि कहीं - तो रस्सू नहीं तो सीधा मदिर भेन दू वह कहती है, आ जाऊगी घूमती हुई, कभी भी आ जाऊगी । न भी आयी, तो आप ढापकर रख देना। न हो, अगले दिन ले जाऊगी। पता नहीं न बीजी वह आजिज-सी सूरत बना लेती है, पता नहीं, कौन यजमान कहा रोक ले। पर अपना भरोसा कायम रखने के साथ ही मुझे भी तैयार कर रही है-अपने अनुपस्थित रह जाने की सभावना से । 'यजमान पर है बीजी ! क्या करू, पेट जो पालना " है पिर- - 'यजमान' शब् यो उच्चरण करती है, जैसे जानती नहीं कि यजमान या मौत क्मि कैसे आडे आन रहे। -मौत? क्या वह जानती है कि दात करते समय वह कैसे विनीत हो आती है ? और मौत का भय ? मैंने सोचा - कितनी बढिया चीज है मौत। कि एक को विनीत बनाती है, दूसरे को विनीत होने से बचाती है। दाह्मनी चल पड़ी, अपना विश्वास दिलाती सी कि वह आयेगी। हो सका तो मेरी बेटी के घर भी चली चलेगी।- आहा । मैंने सुना है बीजी, कि बडी राणी है -- आपकी बेटी । नाम की राणी ही नहीं, वो तो परम करम की भी राणी है।' बाहूमनी देवारी रूना' भी नहीं कह सक्ती या शायद राणी कहने से ही मन-भर तृप्ति मिलती है। रूना क्या सचमुच रानी है ? धर्म कर्म की रानी - बाहूमनी कहती है -'बेटी राणी दाला धर्म निभा रही है, कि अपने मालिक का छोड हुआ काम हिम्मत से सभाल रही है। नहीं तो कौन कर सकता है बीजी? पीछे रह जाओ न- - तो कोई मुह उठा के नहीं देखता । बीजी, कभी तो -दता खुट नहीं देख सकता । और मुझे तो कभी शक हो जाता है कि मैं उस छोटे को देख भी रही हूँ ? कई बार बीती यतीम जैसा मागता है, तो डाट देती ह- चला जा, नहीं है कुछ--फिर बुलाकर फुसलाती हू- कल ला दूगी . मानकर सो जाता है । तब उसे देख देखकर रोती है। क्यों ? - जो मन्नत माग-मागकर लिया - पर देखो, कि मागकर बेटा लेने वाला ही नहीं रहा, कि अब आखों मे भरे उमे। अव लाले पेट भरने के बचे हैं। - पेट भरने तक पहुची, तो लगा, देर हुई कुछ पेट को भी चाहिए । रसोई मे इपर उपर अपन म्पिति अतिम स्थिति । एक टोस्ट देखती हू । सामने ताख मे एक सेब और केला धरा है। चाय तैयार होने तक रहा नहीं गया। जल्दी ही खत्म हो गया सब। अब? :- अब काफी है। चायटोस्ट से फौरी तौर पर रिलीफ मिली - तो सोना चाहा, नींद आते ही सारी खराश-खूश गायव हो जायेगी । पर खराश मौजूद है, या जमकर सूख गया है खून गले मे ही ? एक प्याली चाय वैसे भी चाहिए मुझे । पर स्टोव मे तेल कितना है ? पता होता तो पूछ आती, कि राशन वाले ने कार्ड रिन्यू कराया है या नहीं ? या तेल दे भी देगा ? अच्छा होता, फरी वाले से एक बोतल ले ही लेती। चलो पानी उबलने दू। पर वरतनों को हाथ लगाने का मन नहीं होता – महीनों पहले कली का सोचा था-पर वरतन सामने आने पर कली की सोच सताती है। दरतनों को ही बार बार रगडने लगती है। कभी नीवू से, कभी इमली से ही चमकाती हू पर कली तब और उतर जाती है। देखकर एक बार 'रूना ने ही कहा था 'एक तो आप बरतन कली नहीं कराते। पता नहीं क्यों सकोच हुआ था बताने मे, कि 'छब्बीस भागता था, छोटे छोटे दरतों के । एक रुपये की खातिर छोड गया । बोला बचता ही क्या है ? तीस के छब्बीस नहीं मजूर - तो रहने दो।' 'तीस के छब्बीस । शब्द खाता रहा था । 'कली की जगह, चाहे सिक्का जड जाते तुम कहना चाहा था, पर उसकी अकड के आगे चुप दनी रही । क्या करती, पीछे-पीछे जाती? - पर पीछे गयी थी मैं, और वह सामान साइकिल पर बाथ रहा था। इधर मुझे भी पैरों मे मरहम लगाते देर हुई, तो चला गया वह । जाने दो - मैं पराठा ही खा लूगी- दही के साथ। दही की याद आयी, तो पाया, पढ़ेमडे दही खट्टा हो चुका है। राशन कार्ड भी, अगर दुकान से न बना, तो कहा जाना पड़ेगा ? - मुझसे दूध के डिपो ही नहीं जाया गया और दूध के टोकन रद्दी की टोकरी मे डाल दिये थे। पर थैली मे दूध मिल जाता है। चाहे भारी हो -हल्का हो, पर दूध की भटकन नहीं। नहीं तो घर से कहीं जाना होता है ? ये छुट्टिया है, तो अस्पताल जाना हो रहा है । पर गढ़ता कितना है कि छुट्टिया अस्पताल खा रही हैं। और पैसा दवाए खोस रही है, जबकि राशन तक पर खर्च करने की जगह मुझे रग और कैनवस चाहिए होत हैं। गले को चाय से गर्म करके दूसरे सारे उपचार भी कर लिये हैं। रग और फोल्ड खोल बैठी, लेकिन देर तक नहीं चला | कमर दब-दवे कहीं125 - टूटने को हुई, तो खराश भी तेजी से उठी । चलो, छोडकर सो जाती है। यों भी पखे तले घरघराहट लगातार बढ़ रही है। देख, कहीं कोई खिडकी तो खुली नहीं रह गयी कि बिल्ली ही उछल आये रगों पर सब सुरक्षित-सा है। हाथ-पडी मे चाबी और भर लू घडी दस पर रुकी है । दस से ज्यादा क्या होगा ? टाइम-पीस थोडा पीछे है। अनुमान से घुमाती हू बटन, पर घुमाते ही बटन हथेली पर आन रहा । ये क्या? - ये तो बटन बदलना पड़ेगा ? पहले ऐसा था, कि पड़ी का कुडा एक ओर से छिदा-सा था और स्ट्रेप बाहर आ जाता था। एक बार सनाने टोका 'स्ट्रेप तो ठीक करवाओ अमा।' 'क्या है स्ट्रैप को? ये तो इपर से कुछा गया चला लगता है 'बाई जो । रूना हताशा मे बोली 'जो हो, इसे काम लायक ही बनाओ फिर वही सकोच । कैसे कहू कि पाच तक का खर्चा बैठेगा? कली को लेकर टोके जाने पर भी कहकर टाल दिया था कि 'ज्यादातर में स्टील से ही काम चलाती हू। अब बटन निकल जाने की बात जानेगी, तो छुसलायेगी कि 'दस रुपये आप मुझसे लो, पर इसे चालू रखो। नहीं बताऊगी। पड़ी उठाकर दराज मे ही रख दूगी। नहीं तो बहुत उबदारी में पड जाऊगी, कहकर कि 'सवाल दस रुपये का नहीं - और है कि ' आगे सोचने से पहले लगा, पचका पेट मे है, पर दर्द सीने मे। - मुह मे कसैली-सी उबकाई । बेसिन तक गयी और थूक दिया । गाड गाय और पीला-सा । कुल्ले करके सीपा बिस्तर पकड। ठीक से लपेटकर सिर्फ सास लेने भर जगह रखी। पैरों तले तकिया है, अब पैर भी नहीं टीसेगे। नींद आ रही थी, पर बामनी पीम नहीं लेड रही। आपको टीके लगदाने चाहिए। पैर की बीमारी जाती रहेगी। जूते - ही बाल देखो। वह अपने पैरों के तलवे दिखाने सगी । ये जूतों ने काटा है आपका टीकों से ठीक हो . जायेगा। 'टीक हो जायेगा, पर येसु क्यों नहीं ठीक होता। बहमनी का चेहरा फिर आजिज हो आया 'इलाज तो करना ही पड़ता है। - ऐसे गिलासे पर अवक सोचने सगी कि बहमनी अपने मस्कीन होने की खत कैसे भूल पपीहै? १६/ पम्पिति विन स्थिति । - पर भूल ही गयी है, तभी तो यादहानी दिलाती कह आयी है आप टीके जरूर लगवाना, बीजी 1 बडे बडे एम्जीमा के जख्म तक ठीक हो जाते हैं यह जो मुझे इतना जोर देकर समझा रही है, अपना कितना कर सकती है ? - पर फिर सोचा, शायद इसे व्यापि यह न हो ? पर हो भी, तो अतर होता है व्यापि मे ? दुःख मे - व्यक्ति मे? उसे जरूरत थी पेटीकोट जम्पर की । दे दिया। बाकी फिर टूढ रखूगी। हालाकि उसके सामने पे गाठ-भर कपडे । उनमे दो-तीन पेटीकोट भी, शायद रूना के पास सुभाष की अम्मा के पडे हों । वही यहा अल गयी हो। किस उद्देश्य से ? यह कुछ भी नहीं कहा । पर उसे तो वैसे भी वस्तुओं से मोह है नहीं। मोह नहीं कि चलो, अब जैसा तैसा कट ही जायेगा उसका। बामनी ने सुना, तो इतना साथ और जोड - 'बीजी, चलो कट ही जायेगा पर अकेलापन नहीं कटता। और वो तो अभी है ई बच्ची। और ये तो आपने बद्ध अच्छा किया कि बाबू जी को आपने राणों के पास भेज दिया । उसका अकेलापन तो काटने वाले अब आप ही हो। नहीं तो बीजी उसने ठड्या नि श्वास फेकते हुए कहा, रहेपा काटना बद्ध मुश्किल होता है। बामनी ने कान छू कहा, 'मन कभी तो बडा बेचैन हो जाता है बीजी, जैसे मैं पागल हो गयी होऊ । पर नहीं, फिर सोचती हू-पगला गयी तो इन्हे कौन पालेगा ? हिम्मत तो मैंने बायनी है न, डरने उरने से कोई चलेगा? - बीजी, डरो तो डर और डराता है । बडे हौसले से काट रही हू पर, अगर आपको सुनाऊ कि कैसे एक बार हारी-मादी पड़ी थी एक बार नहीं कितनी ही बार ऐसा होता है बीजी । शरीर जो रोगसोग का घर हुआ, पर मैं लड़कियों को नहीं जगाती कभी, और खुद सो भी नहीं सकती। - तब आधी रात को आता है, और घेर लेता है। बिलकुल उसी तरह की खुशबू बीजी, जो जीते-जागते आदमी मे होती है। कभी इसे सपना नहीं, सच ही समझ लेती हू। आखिर जिसके साथ जिंदगी बितायी है, उसे इतनी जल्दी दूर कैसे समझ ले" मैं उसे रूना की बाते बताने लगती हू कि कैसे सुभाष बार-बार सपने मे आकर सारी बाते पूज्ने लगता है। सुनते ही वह पहले जैसी दयाई हो आयी - 'पूछेगा कैसे नहीं बीजी ? - मरने की ये कोई उमर है? - -कौन मरना चाहता है ? लोग नहीं कहते, कि रूह नहीं मरती? - कुछ रुककर बोली मेरा वो जद जिंदा था, एक दिन मैं बीमार लेटी थी। दफ्तर से ।

आया, तो समझा, । बीमारी का बहाना किये पडी हू- तो मेरे सिर ते झप हटा लिया। हसने लगा और बोला 'चल इधर -'मा ई-बहाना करके पी है। उस दिन बीमारी मे भी मेरा दुख भाग गया था । और देखो कि उसे सचमुच का बहाना समझकर वह फिर हस पड - पर अब उलटा उन्हीं बातों को भुलाने का बहाना टूढ़ना पडता है। ऊपर से सारी रात आख नहीं लगती। लगे भी तो खुल जाती है। आख लगने नहीं दे रही बामनी ? पलग की पाटी पर वक्ष यामे लटकी हू मैं । कमरे मे टाइम पीस की अकेली टिक टिक ही मेरे साथ जाग रही है। बहुत मन हो रहा है कि नींद नहीं घेरती तो तो दो हाथ रग ही चढाऊ कैनवस पे पर डरती हु जोखों मे पडना भारी पडेगा । दीवार से लटकी तार मे स्विच है, उसे दवा दिया है -घड़ी मे, टाइम देखने के लिए बस गरदन उठते और जरा सा गरदन वापस लौटाते, फिर जती खखार उठी है और उठती ही गयी पीडा । साथ ही सारा खाया-पिया बाहर चिलमची मे। फर्श पर भी गडमड-सा गिरा है कुछ। लाल रस्टी और कुछ सफेद पीले छिछडे से । कपकपी सी छूट रही है। देखकर सोचा, सेब का रग ही होगा ? केल का गूना या चाय का पानी : खट्टे दही का मट्व भी पिया था । फूड पायजन हुआ लगता है। सेक केला सभी फल तो मसाल से पकाते हैं लोग । तल घी का भी क्या एतवार ? या दवाए भी होंगी, इनम? किसी ट्यूमर की गाठ फूटी हो सकती है। पीरे से सतर्कतापूर्वक उव हू । पुन क खाली सा महसूसत वसिन पर कुल्ले किये हैं। चिलमची से दबू आ रही है। बाहर से मिट्टी लाकर डाल दू। फर्श पर भी। कमरे में चलते हुए सिटकनी पर हाथ धरकर खड़ी हू। पट स-दवाया है दरवाजा, कि आसानी से खुल जाय। खुले दरवाने के बाहर मीठी बयार है। गर्म ददन पर उसकी सिहरन मुझे बडे दुलार से पलोस रही है। पक्षियों का कुछ धीमा कुछ मुखर कलरव कानों मे जैसे अमृत घोल रहा है। ये कौन सी भाषा है, जिसमे पश्चे अपने साथी परिंदों का आह्वान कर रहे हैं ? पक्षियों की आवाज का अनुकरण करती मेरी निगाह जाफरी के झरोखों तक दौड गयी है, फिर धीरे से बरामने मे भी घूमने लगी हू मैं । तखत पर भीगे सीगे कपडे पडे हैं। जाफी के कोने मे फ्टा चिया-सा तकिया ।- गुच्छ मुच्छ कपर्खे का ढेर !- पवें को फैला ही दू सोचते उपर बढ़ी हू। देखती हु कि उस गुच्छ मुच्छ मसनद-सी में वहे आराम से मुदी आखें वाला कुत्ता आन-निमग्न नींद ले रहा है। 'हरामखेर। मैंने उसे मन मे गाली दी । विन्सी के पिल्ले पर से यूम कल फका था, वही पध या दहा उसे उथ लिया और तारकर मारा-झटके से उठता कुता। किकिआया और दूर भाग - "म्दिात म यिन " गया। दात पीसते हुए कहा, “तेरी ये हिम्मत ? कुत्ते? जाफरी से सकती लडकी हसने लगी - बोली, कुत्ता कोई गाली है आटी ? वह फिर हसी, "और आप जो उस पर दया रखती थीं न, तो उसकी आदत बिगाड दी है, आपने। “दया करके पड़े रहने देने का मतलब कि मेरा ही नुकसान करे।" “पर खिझियाया कुता है आटी ? देखी नहीं, लाल लाल आखे ? आराम के लिए तो आता है। आपे से बाहर का आराम निकल जाये, तो पता चले इसे ? पर अगले ही क्षण मेरे भीतर किसी ने मुझसे ही पूछ 'क्या दया और डिक्टेटरशिप - दोनों साथ-साथ चरते हैं। तानाशाही वाले मुद्दे को बरतरफ करके सोचती हूँ कि अच्छ हता, तो एक पेटीकोट नम्पर मैं बाह्मनी को कल ही दे देती । पर आज तो श्राद्ध लने आना था ही उसे। रे देती । पर बात क्या इतनी ही है ? भीतर फिर किसी ने यह सवाल उठाया, कि न भी आती वह तो भी श्राद्ध सामग्री तो किसी न किसी से देनी ही थी। पर तुम्हारे लिए जरूरी थी वामनी की उपस्थिति। सोचा तब ये दया का ढोंग क्यों ? कुते के अलावा अब फिर्तव्यविमूढ-सी खडी । सहसा ही चूदे गिरनी शुरू हुई हैं। बाहर झाड़ियों में पधेसी की मुर्गिया पख फडफदा आयी है। इधर उधर देखते बिल्ली के बच्चे भी निकटवर्ती झाडी मे दुबक गये हैं। तभी देखती हू आहट सूघता इधर कुत्ता बढ आया है। दुरदुराये जाकर भी जीवन लालसा में पूछ हिलाये आगे आना कोई करेगा? शायद राहत के लिए करते हैं लोग? अच्छा, अगर मैं ही आज राहत चार और रूना से कहू कि अपने बाबू जी को कुछ दिन यह भेज दो ? तो कोई मुझे कुत्ता ही नहीं कहेगा ? -- पर मुझे मेरी वर्तमान व्याधि अधिक यातनादायक लग रही है। - की यातना और अपनी यातना मे अतर नहीं कर पा रही हू में । ये इन दो तिथियों के मिल जाने जैसा अतर है, जो स्पष्ट नहीं हो रहा । कौन व्याधि असल है, कौन नकल, पता ही नहीं पड रहा? स्व-नव बही/29

पर, अतर है कहीं-किमी पीडा भ, यातना और यातना मे ? स्वार्थ मे ? - -कैंसर
और कैंसर मे ? भले ही प्रत्यको खा रही हो कसर गाठ ? दबे-दबे
कहीं न कहीं ?
पति रिम फिी

छुटकारा जाने के पहले मैं भैया के कमरे मे आन खड़ी हुई है। कमरे मे रोज का देखा सब कुछ ज्यों का त्यों सजा है, और जैसे भायभाय करते सन्नाटे से कमरा घिरा है । कुछ देर पहले, कमरे के फर्श पर तो थोड़ी सी घूप सिमट आयी थी, वह अब खिड़की के पीछे छिप गयी है। यह पूप, जैसे मुझम तुकाछिपी करता कुन्नी का चेहरा हो, जो आखमिचौनी करता मुझसे मेरे जाने का सकल्प छीन लेना चाहता हो । और. इस समय खिडकी पर खी यही सोच रही है कि कुन्नी के स्कूल से छूटने का समय होने से पहले ही चल दू। कुन्नी को खाना देकर जब लौटी थी तो हेढ बज रहा था। मा को तैसा घेड गयी थी, वैसी ही वह अब भी सुई डोरे में व्यस्त थी। आगन पार करते समय लगा था, कि सुई डेरा मा का सदैव सगी रहेगा, जैसे मा इसे विरासत में साथ लायी हो। यही बात एक दिन अरण भैया से छिद्दी थी- 'मा का सुई-वेरा क्या छुआया नहीं जा सकता। भैया वैसा ही दीवार की ओर चुपचाप देखता रहा था। यही प्रश्न मैंने दोबारा किया, तो बोला देखो, अरुण भैया । अब हम दोनों को कुछ करना चाहिए ~ मा के लिए। तब हम दोनों चौथे वर्ष मे थे। मैं आर्ट्स की और भैया एम० बी० बी० एम०- के। भैया ने एक अधूरी सी जम्हाई लेते हुए कहा था -- 'कुछ अपने लिए करना होगा या मा के लिए। में भैया की बात नहीं समझी । उसकी बात समझ मे कम आती है, उलझी ज्याद होती है। पिता जी की बातों की तरह। दोनों को सुलझाकर कहने को कहो, तो उन्हे खी= - /31/ आती है। 'तुम खीजते क्यों हो। मैं भैया से कहती हू। 'खोजता हू वह मुझे ऐसे देखने लगता है, जैसे उसे मेरी बात का विश्वास नहीं हो रहा। और मा ने एक बार कहा था- 'तुम भी उसी का अनुरूप हो।' 'तब तो अच्छा है। तुम अपनी वीज मुझ पर शाह लो। और वस्तुत सीज मुशमे जन्म लेने लगी थी। कितु मा की उलि को स्वीकारा हो, यह पाद नहीं पड़ता, पर मैंने भैया से पूष था- 'अच्छ, कोई किसी का अनुरूप शेता 'होता क्यों नहीं । सभी सभी के अनुरूप हे सकते हैं. अकुर पेड ही के अनुरूप नहीं होता क्या? भैया से तव मैंने यह आशा नहीं की थी, कितु भैया बद्य है और उमने बात का समर्थन किया है, यही बहुत था। वैसे भैया मुझसे दो-अढाई वर्ष ही बड़ा है, किंतु बाते वह वर्षों के अनुपात से नहीं, अपनी विद्वत्ता के अनुपात से करता है। - यो वास्तव मे विद्वान थीं बद्धी दीदी, किंतु वह अब नहीं हैं - और अब भैया ही बल लगता है। और बेटी है कुन्नी। आह, बेचारी कुन्नी । - मैं पेमी सी प्रस्फुटित निश्वास को झेखें के भीतर कसकर भींच लेती हू। कुन्नी और दीदी की याद ऐसा करने से और अधिक बढ़ जाती है, और मन को मथने लगती है। डबडदाई आखों से बाहर देखने लगती हु तो पाती हू-सड़क पर बिखरी धूप मैली और पृथती पड गयी है। दीदी तब थी- धूप उस दिन भी घुफ्ती और मैली पड गयी थी। धूप की मैल का एक विषा जैसे दीदी के मुख पर चिपट गया था, और लगा था, कि मौत का बेघडक साया जैसे पीले चेहरे को ग्रस रहा था। वैसी ही उस दिन भी वह खिड़की पर खी थी, और दीदी ने उसका आचल थाम लिया था दीदी अमिया' भी नहीं कहती थीं। खास तौर से जब कोई विशेष बात कहनी होती -और इसी तरह आचल या साड़ी का घेर कुछ भी सच लेती थीं। में दीदी की साट पर बैठ जाती हू- 'क्या है? - 12/पहली स्थिति अनिम चिनि 'कुन्नी अभी नन्हा अकुर है, उसे तुम बोर्डिंग हाउस से हटा लेना। अच्ा क्तुि 'पर, म से मत कहना- तुम समाती हो? 'मैं सब समाती हू-पर तुम क्यों नहीं समानी हे दीदी ? मैं एक जम्हाई सेती, फिर उठ जाती है। 'तुम कुछ कुछ अध्य-जैसी होती जा रही हो। मुझे याद आ गया -म भी कह रही थीं। 'किंतु- तुम ऐसा न करना । जानती थे, ऐसा कुछ समय से पहले सोचना दीदी का चेहरा और पीला पड़ गया। 'समय से पहले कुछ भी अच्छा नहीं होता, समीं ? समझने या न समझने की दुविधा मिटाने के लिए मैं फिर बाहर देखने लगी थी। बाहर रिमतिम दूने गिरने लगी थीं, भीतर दीदी । मैंने पलटकर देखा तो दीदी ने मुह फेर लिया। दीदी शायद चाहती थी, में उनका 'रिमझिम आसुओं का गिरना न देख सकू। 'यह असमय की वर्ष है, तुमने देखा । एकदम बद हो गयी है और पूप छिटक आयी है। मैं दीदी की ओर जान बूझकर नहीं देखती। पेदी असमय मे जा रही थीं। -- हम अपनी कोशि बेकार कर चुके थे। और आज. सुबह से ही ऐसा हो रहा है कि वर्ष सहसा आ चुकी है। स्कूल जाते समय मैं कुन्नी के लिए प्रता टूटती हू-तोमा कहती हैं "छते की जरूरत नहीं -- असमय की वर्ष है - लेकिन ये एक घंटे पड जाये तो अच्छा ही है। फसले बच जायेगी।- फरवरी का अत है, सोचती हू-अब फसले क्या बचेगी, वह भी दो-एक ईंटो से! फरवरी। - घर में फरवरी महीने मे वैसे भी चुप्पी छई रहती है। फरवरी के अत मे दीदी का प्राणत हुआ था। तब से यह तीसरी फरवरी है। अत से कुछ दिन पहले दीदी ने कहा था क्लब चलने को। 'अफ भैया को यही कहकर पुकारती थीं वह। 'बहुत दिन हुए क्लब नहीं गये। 'क्लब ? क्यों ? भैया भौह उठकर, दीदी के चेहरे पर गौर से जसे कुछ पढ रक्ष छुटकारा/33 हो। और फिर टाल गया हो। 'क्लब जाकर क्या होगा। जाने के मन हो रहा है। जाने क्यों यह का काब मुझे अच्छा लगता है। मैं जानती ह क्यों कितु आगे नहीं कहा गया। क्योंकि सभी जानते थे, क्लब की दीवार का एक हिस्सा कब्रिस्तान से सटा था। 'उल्लू बोलते हैं इस क्लब मे -कौन जाता है वह भैया कहता है और फिर भैया और दीदी - दोनों ही तब सुदूर मे देखने लगते हैं। कोई कुछ नी कहता। उसी दिन पहली गाड़ी से भैया दिल्ली चला गया था, और उसके अगले ही दिन- भैया के साथ दिल्ली से एक डॉक्टर आकर दीदी के फेफड़े की जाच कर गया था। दोबारा दिल्ली पहुवकर भैया ने दवाइया भेजी थीं फिर एक खत । खत का पूरा ब्यौरा याद नहीं पड़ता । कुछ अश याद हैं। भैया ने नौकरी कर ली है। अब दिल्ली में जगह ढूढ़ रहा है। बीच-बीच में आता रहेगा। कितु अरुण भैया बीच मे आया नहीं। दो-एक खत आये। दीदी का हाल पूर्ण फिर दीदी नहीं रहीं। खत भी नहीं आये। और - दीदी के प्राण्णत के बहुत दिनों बाद जब भैया आया भी, तो पहले तो अपने कमरे मे बैट ही नहीं गया उससे । मरने से पहले दीदी ने इसी कमरे मे आना चाह था। इसी कमरे के सामने खाट विध्वाई थी, क्योंकि खिड़की के बाहर वाली यही सदी सम्क-क्लब को गाती थी। बा में इसी कमरे में बैठकर भैया एकटक दीवार को ताकता रहता था। उसे जो भी खाने को दिया जाता, सा नहीं सकता। हर चीज से इन्कार ? वाह. पिता जी अचमा प्रकट करते । म ज्यान देर नहीं देतीं, तो पिता राजते। 'इनका तो तकियाक्लामा गया है -नई दिय पीना है? - नीं!- वेला?- म करती हैं-'केले और दूप से उसे उलटी हो जाती है। 'और पड़ने से ? -क्या मिली! 'लेकिन अब नीरसी है ओहपीने करसी पर पैमे पुग्वे हैं? 'नेकी कर लेने पर का पैसे की नीं घुशेम दी जान से ही .

ताकि भैया न सुन ले। अन्न हुआ, भैया विना सुने ही चला गया । कितु भैया के पीछ छुड जाने के साथ ही भैया की चर्चा अपना पीछा नहीं छुड सकी। चर्चा रोज होता रही, फिर हारकर मा ने कहा - 'मुझे क्यों सुनाते हैं ? मैंने क्या आस लगाई है, कि कमा के भेजे ? आस नहीं लगाई, लेकिन पैसा जरूर गला डाला है। तुम्हारी महत्वाकाक्षाए थीं कि मेरी सतान पढे । 'सभी की होती हैं 'मेरी हरगिज नहीं थी 'यह और अच्छ जभी उसने पढने से इनकार कर दिया है। और नौकरी करनी पी-घर छेडना पड़ा और फिर मा हट जाती हैं। पिता से वहस मे पडना उन्हे हमेशा खलता है और वह और उद्विग्न हो उठती हैं। उद्विग्न में भी हू। जब से भैया गया है, व्यर्थता का बोध कर इधर उधर डोल रही हू। पिता जी से कुछ कहना चाहती छ कह नहीं पाती। हा, भैया से चलते समय कहा था- "देखना, मेरे लिए नौकरी टूढ़ देना 'तुम्हारे लिए अभी ? न, ठीक नहीं । वैसा हुआ तो बुला लूगा । 'देखना, खत लिखना। 'अच्छ। और होशियारी से रहना और सुनो, रुपये कुछ और मेरे पास हैं 'नहीं, नर्स । भैया झुंझला आता है, 'इन्हे पास रखो । जरूरत होगी तो मगवा - सूगा। और भैया ने दो तीन बार रुपया भगवाया था। कभी कभार पता पा जाने पर मा को आयात-सा लगता -'इसके माने हैं ? पता नहीं नौकरी है या छूट गयी। और तब एक दिन डाकिया पिता जी के नाम खत ले आया। पिताजी को कषे का सहारा देती वह तागे मे बिठला रही थी कि डाकिया पिता जी के हाथ मे खत थमा गया। सोच रही है कि पिता जी खत पढ़कर शीघ्र ही भैया के आने की सूचना दे। या ऐसा कुछ कितु ज्यों ज्यों पिता खत पढते जाते, उनके चेहरे का रम बदलता जाता, और अत मे चेहरा इतना भारी हो गया कि चेहरे का भाव समझना असभव छुटकारा/35 हे गया। 'क्या है पिता जी 'तुद ही पढ लो। और पिता जी के चेहरे का कौतुक एक कसैली मुस्कान मे परिणत हो गया। उसके बाद राह भर कोई किसी से दात नहीं कर सशालौटने पर भी दोनों के बीच मातम मनाती जैसी चुप्पी छई थी। मा ने उन्ह आया जानकर जानना चाहा था डॉक्टर ने क्या कहा। किंतु पिता जी ने मा की मुगी मे वह खत पमा लिया था- जो थोड़ी देर पहले डाकिये ने उन्हे दिया था। मा ने खत पढ लिया, तो पिता जी ने हास्यास्पद जैसा भाव म पर लाते हुा कहा आज तक सफे वालों पर किसी ने कीच नहीं उछला था अब वह - - भी हो गया। और बाद मे तो पिता जी ने स्थिति को इतना तूल दिया, कि मा भी हताश हे आयी। पिता जी ने इसकी परवाह न करते हुए खत एक खास अदाज मे पढ सुनाया 'जैसाकि आप जानते होंगे, आपका पुत्र अरुण पिछले महीने से मेरे पास रह रहा है। जब वह आया, तो उसके पास पैस-पेला कुछ न था। साना भी मेरे साथ खाता था। उसने मुझे बताया कि वह एक अच्छी नौकरी पर है और अब दक्षिण जा रहा है, किंतु शनिवार की शाम को जब मैं आया, तो पड़ोसियों ने बताया कि वह बिस्तर बैग लेकर चला गया है। आपका पुत्र मेरे पचास रुपये बर्तन वगैरह लेकर लापता है, इसलिए आपको लिख रहा हूँ आप मेरी वह हानि पूरी कर दे। इस बारे मे खामोश रहने के अर्थ होंगे कि मैं वह रास्ता अस्तियार करू, जो अब तक नहीं किया। यानी मामला पुलिस मे दे दू। पर मुझे आशा है, आप अपने अनुभव और सफेद बालों का खयाल करते हुए मुझे उस चीज पर आमादा न होने देगे, जो मैं करना नहीं चाहता। आप भी एक भले आदमी की हैसियत से वही करेंगे, जो उचित इतना ही कहकर पिता जी चुप हुए हमें यह नहीं । उन्होंने मेरी और सकेत करते हुए कहा था अभी तो यह जा रही थी, उसके साथ। पिता जी का सकेत समझकर एक सुरसुरी-सी मेरे पूरे शरीर मे दौड गयी किंतु 16/पहली स्थिति अतिम स्थिति तभी 'टेलीग्राम है और मैं झट दौडकर 'तारं ले लेती हूँ फिर तार पढ लेने पर आकर सा को जैसे दिलासा देने लगती हू अब तो भैया आ ही रहा है। एक ओर की बात जानने से कुछ बात बनती है। उसी सप्ताह फिर भैया आ गया। और भैया का आना सुनकर मा दौडती आयीं । भैया की थकी, विश्रात मुद्रा पर जैसे ग्लानि की मोटी तह जमी हुई थी। और सानि की वह तह तब और विकृत-सी होती फूट आयीं, जब मा ने चार तहों मे दबा-कुचला वह खत भैया के सामने पर दिया । खत पढकर भैया स्तब्ध बैठा रहा। फिर एक झेप की हसी हसकर कहा अच्छ। ऐसा फिर मुझे पास खड्य देखकर कहा - 'अच्छ, तू बता अमिया । तू क्या विजय से शादी कर लेगी। मैं हतप्रभ होती, सिर हिला देती हू- 'नहीं। मेरा नकारात्मक उत्तर सुनकर भैया जरा-सा विक्षुब्ध हो आता, मुस्करा देता है 'वैसे वह सात सौ रुपये महीना कमाता है। रेलवे-डॉक्टर है। तुम्हे मालूम है, सफर का भी पास भी मिलता है। तेरी तरह उसे दस-बीस उधार नहीं मागने पडते फिर दोस्त कहता हुआ भैया जेब से दस-दस के नोट निकालकर मुझे देता है - 'उसकी मा यहीं रहती हैं। उसने मा को भी लिखा है कि किसी वजह से ही मेरा लिहाज करके उसने मुझे अपने पास रखा था- और अब उसकी मा बीस रुपये वसूल कर ले कितु भैया की कोई भी बात नयी न थी । विजय की मा आकर बीस रुपये की जगह पचास रुपये ले जा चुकी थी, कितु पचास रपये देकर मा की कमर अब तक टूट चुकी थी। तब भैया के सामने उस बार मा कम पर्छ । भैया चला गया, तो मेरी परीक्षाए सिर पर आ गयीं। और परीक्षा-फल के बीच के दो मास बाद मे व्यतीत करने कठिन हा आये। वैसे देहली जब परीक्षा देने गयी थी, तभी मिल्क कॉलोनी मे जौरी तय कर ली थी, कितु पिता लेने आ गये थे, और कहा था 'कुन्नी से वायदा कर आया हू कि तुम्हे तेता अगा। और मैं मान गयी थी। मौसी ने पूर्ण था- नौकरी का क्या निश्चित किया ? 'नतीजा निकलने पर सोचूगी। हरकाग17 - - और वह लौट आयी थी, न लौटती तो अच्छथा। मा के आगे जबाबदेही न करनी पड़ती। मा ने पूजया अरण का काम करता है। और उसे ठीक से पता नहीं था कि भैया का काम करता है। दह जो भी ताननी थी, वही बता दिया - 'कमसेकम नौकर जरूर है कहीं। और पिता जी तिलमिला आये थे- 'इसे तुम नौकरी करती है? 'तब किसे कहते हैं नौकरी ? अगर न मिली होती तो आप कहते, नौकरी कोई देर थोडे ही हैं, कि पेड तले जाते ही मिल जाते - और अब मिली है, तो कहते हैं कोई नौकरी है। में जैसे हाफने लगती हू- 'आप तो चाहते होंगे, भटक भटकाकर किसी तरह वापस आ जाता, तो अच्छ था, क्योंकि उसकी हार पर आप खुश घेते, कि देखा आखिर, पर ही तो आना पडा। पिता जी जैसे कुछ कहते कहते रुक गये और फिर अपने कमरे की ओर मुड गये। सामने है मा और वह अप्रस्फुटित स्वर मे कह रही हैं 'घर। -पर लौटना । वह आखे मलने लगती हैं, हाथ हटाती हैं, तो लगता है, आखे फिर थुपली ढेकर हुक गयी हैं, जैसे मकड़ी का जाला कहीं आखों पर अटका हो। 'घर लौटकर लेगा भी क्या ? घर लौटने जैसा घर मे है भी कुछ १ वह जैसे अपने आपसे ही कहती जा रही हैं। 'घर लौटने के माने भी क्या हो सकते हैं। मा की आखों का प्रश्नचिहन पढकर कह पड़ती हू-'तव । 'तब यही, कि घर लौटने का सवाल उठाना ही मूर्खता है। मा की आखों मे उत्ताप जैसा कुछ उमड आता है, और स्वर भी उत्तप्त हो उठता है 'घर क्या है ? जहा था है, वहीं घर है। मा के उत्तप्त स्वर पर मुझमे खीज-सी भर आती है। मैं कहती हू- और, अब उसी धषे मे लगना भी मो आपको अच्छा नहीं लग रहा। अच्छा हुआ, उस दिन मा ने मेरा उत्तप्त स्वर सुना नहीं। अब सोचती हू तो अपनी सीन 18/पहनी स्थिति अनिम स्थिति पर अपने को ही कोसता हुआ पाती हू। यह भी कि चुभती बात यदा कदा क्यों कह घलती हूयह नी कि जानती न होऊ कि मा को क्या भला, क्या बुरा लगता है, किंतु मा ही सबसे पहले हताश होती है, और पिता जी को कहने को मिलता है। फिर वह सुन नहीं सकी और घुलती हैं। मैं तब तीखी बात कह देती हू कि शायर मा दद जाये, भूल जाये, या फुसल जाये। किंतु मा को बहलाना आसान नहीं । हा, दीदी कभी-कभी सभाल लेती थीं, और मैं तब भी प्रतिवाद करती थी- 'मा की बाते मुझे कुछ समझ मे नहीं आतीं। दीदी कभी-कभी स्तब्य बैठी देखती रहतीं । फिर कहीं - ऐसा नहीं है । मा ने ठीक ही सोचा है । अण्ण बॅक्टरी कर लेगा, तो घर बन जायेगा । अच्छी लड़की घर मे आ जायेगी- नहीं तो लडके भटक जाते हैं। जिंदगी मे पर नहीं बना पाते। मुझे अवसर मिल गया था - 'दीदी, आपको अच्छा लडका मिल गया था, पर पर. बना ? मैं जदान दात तले दाब लेती हू कि कहना नहीं चाहिए था, पर अब ? मैंने दीनी को उनके खटित सुहाग की याद दिला दी थी, किंतु साथ ही दीदी के चुनाव पर भी मुझे खेद हो आया । दीदी ने जान-बूझकर कि 'जीजा' को क्षय है, क्यों उनसे विवाह किया? 'उस समय क्या मा ने आपको मना नहीं किया था ? दीदी शायद दूर देख रही थीं, कहा -- 'यही तो भूल हुई। और बाद मे मैंने भूल मान ली यी 'किंतु बाद मे भूल मानने के माने' और अब कल से ही सोच रही हू कि दीदी की तरह कहीं भूल तो नहीं कर रही ? बाद मे भूल मानने के माने क्या होंगे ? किंतु मैं दीदी जैसा दुख मा के लिए नहीं छोडे जा रही । दीदी का दुर्भाग्य मा के लिए दुर्भाग्य बना, किंतु मैं ऐसे किन्हीं बथनों मे बधी नहीं है। और फिर कल मा के कानों से भी निकाल चुकी है। और सुनकर मा जैसे सोते से जगी हो 'क्या दिल्ली जाओगी? नौकरी के लिए? शायल पिता जी ने सुन लिया था। वह भी आ गये थे। 'एक ने नौकरी करके पाट भर दिय है अब दूसरे की बारी है ? आप हमेशा ऐसी बाते करके ही हौसला पस्त कर देते हो, पिता जी। 'खर. 'मा मेरे तीखे स्वर को बीच मे काटकर शायद पिता की धारणा सष्ट करने छुटकारा/39 - का प्रयास करती हैं। उनका मतलब है-जैसाकि अष्ण चला रहा है-उसे वह नौकरी नहीं मानते लेकिन न मानने का मतलब? मा फिर मेरी उत्तेजना को शात करने के भाव से कहती हैं - 'मतलब कि आरजी पया है, वह कुछ भी हो सकता है। पिता जी दूर ही से सुन रहे थे अब पास आकर उन्होंने मेरे कथे पर धीरे से हाय थर दिया । फिर मेरे दोनों कयों को बडे धीरज से दबाते हुए - मुझे गभीर लहजे मे पूरा एहसास हो सके, ऐसे नाटकीय स्वर में समझाकर बताया 'आरजी पये के माने कुलीगीरी, चपरासीगीरी, मुशीगीरी, फाकागीरी और उवईगीरी। में सिहरकर कषे हटा लेती है। वैसे पिता जी खुद ही झपे ढीले करते हुए बर्ड शका प्रदर्शन मुद्रा मे हट गये थे। 'चलो, कुछ ही सही। मैं फिर अपनी जगह पर आ जाती हू 'आप इसे कुछ मानते हैं ? और फिर उसके अपने लिए तो यह ठीक ही है कि वह इस घर से छूट गया। पिता मुझे दिल्ली वाली मौसी के यहा रहने की याद दिलाते हैं । 'छूट तो तुम भी गयी थीं। और वह छूटना गलत भी न था। और छूटे रहने मे ही बल्कि ज्या सुख था, क्योंकि वह कुछ तो था। मैं सिर्फ देखती रही थी कि पिता जी और क्या कहते हैं- 'पर वह सिर्फ अपने लिए। पूरा नहीं तो अपूरा सुख । वह भी नहीं तो बेफिक्री। 'चलिए, यही सही किंतु इससे भी क्या इगित हुआ? हुआ तो किसी से भी नहीं वह पत्र आया, क्या हुआ ? तुम्हारी दीती नहीं रही, क्या हुआ ? तुम भी पिता जी बहुत कुछ कह गये थे, और मा विक्षिप्त हुई थी पिता के जाने के बा" मा को शात करने का उपक्रम-सा कुछ किया था, तब मा ने कहा पा 'देफिकी जिसे तुम समाते हो, वह सिर्फ पीठ रिये रहना ही है। वैसे इस उमर मे, इतना भी गनीमत होता होना चाहिए भी - पर क्योंकि समाज ऐसा होने को अच्छा नहीं कहता । असग-अलग बिखरकर हम रह नहीं सक्ने-सुगठित रूप को ही समाज परिदार मानता - - साने ऐमा क्या है, कि मा की दलीते मुझे बस्पास्प- सगती हैं, या कि दिक्षित-मन 40 पति इन दिन समाज पर रोष हो आता है। 'शायर समाज को सुगठित सेवा, सुगठित रस अथदा यश भी चाहिए लगता है, बहुत धीरे कहे हुए शब्द भी मा ने सुन लिये थे। तभी कहा था - .'और ऐसा यश सुख-सतान ही दे सकती है और. और जब अरुण जानता था, कि पिता अब खुद कुछ नहीं कर सकते जिंदगी भर जो कर सकते पे वह भी नहीं किया न कभी सुझाव दिया, न सहयोग - उल्टा व्यग कसे फिर भी अरुण समझ न सका कि खुद वह क्या भूल कर गया लेकिन नहीं, जैसा पिता था वैसा ही पुत्र निकला .मा रोने लगती हैं। रोते-रोते ही कहती हैं - 'डरपोक और भॊदू । अपनी तरह का वार करने वाला जानती हू कि मा का रोना केवल पुत्र के भोदूपन को लेकर नहीं, पुत्र के बनवासी हो . जाने का भी है। हालाकि अपने भोंदूपन मे पुत्र मा का चार हजार नकद और गहना भी डाल चुका है, और जिस मा ने इतने का कभी नाम नहीं लिया वही वक्त पर अब पुत्र का चेहरा देखने से भी लाचार है। ‘पर क्या किया जा सकता है। मैंने मा को समझाने का प्रपत्ल किया था 'लोग क्या चार चार, पाच-पाच साल तक पढ़ने के बाद भी फेल नहीं हो जाते? किंतु मा को जितना ही समझाना चाहती हू मा के आसू उतने ही वेग से बहने लगते हैं और। मैं कहती - 'यह भी क्या अच्छा नहीं हुआ कि वह फेल हो गया ? और जो पास हो जाता, तो क्या हम फाइनल का खर्च उठा सकते ? मा अब भी जार जार रो रही है, और झिल्लीदार आखों से अदृश्य मे देख रही है। 'फिर. इस तरह क्या पढाई हो भी सकती है ? घर की हालत भीतर ही भीतर का पहुच गयी है, वह क्या जान नहीं रहा था ? क्या समझता न था कि इन हालों मे कितने दिन जिया जा सकता है? 'यही तो 'कहती मा खुलकर रो देती हैं, क्योंकि इस बात को मा और भी अच्छी तरह जानती है। मैं मा को बहलाने की अतिम शिश करतो और पढ़ फिजिक्स में आना। चाहता था, जो आपने माना नहीं, वहा' कि डॉक्टरी करना बेहतर है। और वह मुटवारा/ALI , आपको अपनी मुश्किल समझा न सका 'समझा नहीं सका ? मा रोते-रोते कहती हैं - एसा ही दूषमुह बच्चा था। कह नहीं सकता था मा एक चुप आह खींचकर सिर हिलाने लगती है। 'खर, जो भी है अब वह सुखी हो गया है। 'तुम इसे सुखी होना कहती हो।" . मा नये सिरे से रोने लगी- और शायद रात भर रोती रहीं - और आज सुबह तक मा की आखे लाल थी । पपोटे सून रहे थे । देखकर पिता जी ने कहा था - 'तुम्हे क्यों चिड मची है ? मिल्क कॉलोनी वाली नौकरी उसके लिए अच्छी है। अपने घर के उपयुक्त भी। कम-से-कम देहली की बसों का किराया, पोबी की धुलाई, या कभी-कभार का बूट पालिश वगैरह चल जायेगा। फिर घर मे रहने से तो अच्छा है घर से छूटना भी तो एक उपलब्धि है। और डेढ सौ रुपये महीने की बचत तुम्हारी भी हुई मा बडबधती रहीं- 'डेढ़ सौ रुपया बब जाना ही सब है? - बेटी का बोझ उतारने का मोल ? सूब सफल हु- एक-एक करके सदको घर से निकालने में सफल हो रही और मा का रोना नये सिरे से शुरू हो जाता है । मैं और मा दोनों मिलकर रोने लगती है। मैं रोती जाती और सोचती हु मा को पराजप की आग से कोई नहीं बचा सरा महत्वाकाक्षाओं का मोह वह किसी भी तरह तोड नहीं सही। पर वे महत्त्वाक्षर भीतर ही-भीतर अब उन्हें तोड रही हैं। कपडेलते समालते हीच मन हुआ है, जा के मा का हाय वद्यक, किंतु मा रसोईपर में हिचों में कई तरह की चीजे भर रही हैं। में उनके माप पर उतरी विना का रेखाओं को गिनकर सौटाना चाहती हू कि मा वर्ग से करती हैं और... अगर दर व भी पहे, तो कहना-इस्तिापन देखते लेकिन इराक्ष इला र क्या है मैं बुराते स्वर में काली हू- अगर दर फिर पेसोमा अतिम तो इतने अचे सपने बसे है और एक पक्षशय पाने दगारमा, गिल्ली से सौटने के अभी ठग से गुमनाउमेद करने सी है। मदेगीटीई में - कुन्नी क टिकन पार कर उनी का कारण केवी-मारेर वा T Irrfer, और तब -- - 'दन । घडी में एक बजा है। मा सूरो हुए क्पड इक्ठे करके उन पर लोहा फेरने लगती हैं । मुझसे देखा नहीं जाता, पर मना करने का भी बल मुहम नहीं है । कुन्नी के खाने का डिब्बा लगाते समय सोच रही हू यह आखिरी साना लगा रही है। कल से यह काम भी मा को करना पड़ा। जीजा मरकर मा पर अन्याय कर गयीं, हम जीकर अन्याय किये जा रहे हैं मुझमे भरने की इच्छा बलवती हो जाती है। मा मुरमुरे रेवडियों या दूसरी ऐसी चीजों की पोटली मेरी ओर वा देती है रख ले, इनम गुड की सेम है। मा के बढे हुए हाथ से वह पोटली-सी पकड लेती सोवती हू- ‘मा का याद है खाने के बाद सेम पाती हू-गुड भी-और मा को याद आता भी रहेगा - बहुत कुछ फिर सहसा एक और खयाल आता है कि मुझम तो मरने की इच्छा भी वलवता हा सकती है, पर मा तो मरने की इच्छा भी नहीं करतीं । क्या मा न हों, तो मैं कुन्नी की परवरिश कर सकूली और मुझे लगा कि घर छोडकर, असल मे, हमने मा को छुटकारा नहीं दिया, छुटकारा हमने आने को ही दिया है। और मेरे मन मे हुआ था कि यहीं रहकर ही नौकरी कर दूर घर में स्कूल तक जाते हुए - राह भर यही सोचती रही हू कि बाद की पढ़ाई भी यहीं हो सकती हैं, किंतु जाने क्यो यहा रहकर कुछ भा करने का सोचते हुए मा मे अतद्र जैसा कुछ उभरने लगता है, और यहीं रहने के सवाल पर मन कतई नहीं जमता। सामने से कुन्नी भागती हुई आती है . आज देर कर दी। 'क्यों ? मैं कुन्नी का मुह हाथा में भर लती है। 'जरूर तुम्हारा घटा जली बज गया होगा। और हम लोग रोज वाली शीतलपाटी पर जाकर बैठ जाते हैं। रोज की तरह ही छोटे छोटे शुओं में बैठकर लड़किया अपने टिफन बॉक्स अपन सामने खोले मुह चला रही हैं। कुछ लडकिया पेड-तले बिधी बचों पर बैठी हैं, कुछ छोटे बच्चे स्तार बाप फिसलपट्टी की सीढिया चढ रहे हैं। दो एक बच्चे मेरी गा राउड को रोकने के प्रयास में बयकर घूमते जाते झूले पर उछल कर सवार हो जाते हैं। आज पार्क वाली बेच पर बैठते हैं। कुन्नी के स्वर पर मैं चौंक जाती हूं- 'क्या नहीं नहीं, रोज वाली जगह ही ठीक है। इटकारा/43 - 'सुनी। में टिफन-बॉक्स खोलने लगती हू-पिजद्दी से आवाज आती है क्यों। आटी अप चलो, यहा के मोर लिखाऊ आपको । सुनो, सुनो । आपने क्यों की आवाज सुनी। पर अभी तुम खाना खाओ, और कभी देख लेगे मोर। कुन्नी खाने लगती है तो धीरे से पूछती हू-'तुम्हारी परीक्षाए कव हैं ? 'दिसबर मे क्यों। 'हा, तब तक मैं आ जाऊगी। और मैं कुन्नी को धीरे धीरे अपने जाने का ब्यौरा समझाने लगती है। इसके अतिरिक्त अपनी लहर में और क्या क्या समझाती जा रही हू, इसका ज्ञान नहीं, पर बीच बीच मे छिपाकर आसू पोछ लेती हूँ। और हा, तुम अम्मी का खूब खयाल रखना । उनसे झगद्य न करना। अच्छा । कुन्नी सिर हिलाकर हामी भरती है । मैं टिफन बॉक्स वापस झोले में घरने लगती है। तभी कुन्नी अचकचाये स्वर मे कह पाती है - 'पर आप जाओ ही नहीं । हमारे पास ही रह जाओ। 'यह कैसे हो सकता है ? मैं जैसे हडबडा जाती है। फिर हवा में उड आते कुन्नी के बालों को मैं कानों पर समेट लेती है। हम वापस चलने लगते हैं, तो कुन्नी मुझे गेट तक पहुचाने आती है। गेट पर रुककर मैं हाथ उठा लेती हू, कुन्नी भी 'बाई करती है, किंतु फिर पास आ जाती है। 'पर आटी, दिल्ली में जाप रहोगी किसके पास? 'क्यों ? मौसी जी हैं -बोर्डिंग हाउस भी है। मैं ये भी कहना चाहती थी कि तुम इन बातों की सोच मत करो, कुन्नी, किंतु कुन्नी ही बोल पड़ी 'ममी कहती थी, बोर्डिंग हाउस अच्छा होता है, पर मेरा कभी भी मन नहीं लगता था। आप कभी भी वहा मत रहना। अच्छा - नहीं रहगी। स्कूल का पटा बजने लगता है, और फिर मैं हाथ उठा देती है कुन्नी थोड़ी देर वही खडी रहती है। फिर मरी ओर भाग आती है। उसके भागने का ढग ऐसा है कि मुझे महसूस होता 44/पनी स्थिति अतिम स्थिति - नैस मेरी आत्मा को किसी न क्सकर मुट्ठी मे भींच लिया है । कुन्नी आकर मरी टागों स चिपक जाती है। 'आप क्या आज की गाड़ी सही पा रही हैं ? हा, कुन्नी को पुचकारती हू- किंतु, एडमिशन के बाद - छुट्टिया होंगी और मैं चली आऊगी। कुन्नी का मन जैसे इस पर जमता नहीं, वह कुछ और कहना चाहती है, पर मैं उसका मुह गेट की ओर मोड देती हू- 'जाओ, तुम्हारी क्लास लाइन मे लग रही है। कुन्नी दूसरी लड़कियों के साथ भागने लगती है। घर लौटकर मा को छुट पुट कामों मे व्यस्त पाती हू- सूखी मिर्चे या धनिया पीस कर सिलबटा धोकर अलग रख रही हैं। मुझे एक नजर देख लिया कि 'द आयी हू, किंतु रोज की तरह पूछ नहीं। मैं चुपचाप टिफन बॉक्स धोने लगती हू और फिर उसे यथास्थान पर भैया के कमरे मे चली जाती है। - यों नहीं चल तब से अब तक इसी एकात कोने म दुबकी हू। खिड़की के बाहर जो सुनसान सडक क्लब की ओर जाती है उस पर एक दरिद्र युवती लपकती जा रही है। उसका फरा आचल हवा मे फरफराता फट फट उड रहा है, किंतु उसे फटे आचल की मानो जरा भी परवाह नहीं । फटे आचल को बार बार वक्ष से लपेटती जा रही है। उसे एक भी गति की सुधि नहीं, अनुभूति नहीं, बस बेसुध होती जा रही है - निश्चित मन। सोचती हू- सभी क्यों नहीं इस दरिद्र बाला जैसे बेसुध अथवा निश्चित हो जाते ? और क्यों छोटी छोटी बातों पर कुढते हैं ? क्या मैं बातों पर कुढना छोड नहीं सकती ? - सकती कि मुझे एक भी गति की अनुभूति न रहे, सुधिन रहे ? किंतु अपने को ही उत्तर देती हू कि - अनुभूतिविहीन नहीं हो सकती। और मा को अतिम सूचना देने चल पडती हू। कमरे के भीतर जो कमरा है, उसी स जुध है सहन या बरामना यहीं से झाककर --मा खाट पर बैठी हैं, उनके आगे बहुत-सा दिखराव है। कपडे और ऊने भी- ख, मा शायद कुन्नी के गरम मोजों मे पैदद लगा रही है, या उनमे नयी एडिया फिट कर रही हैं। मा से बिता लेने आयी हु किंतु सामने पड़ने का साहस नहीं होता, इसलिए भी कि मेरा मुह मा के आसू धूले मुख जैसा पवित्र नहीं। मैं फिर भैया के कमरे मे वापस आ जाती है। भैया के पैड मे से एक पन्ना खींचती देखती छुटकारा/45

बस, आते ही
-
हूँ। एक महीन की सी आवाज पन के पैड से अलग होने पर होती है मैंभया के
कलमदान के बोल स क्लम गींचकर पन्ने पर कुछ लिखती है और उसे मोड़कर भैया की
पुस्तकों के बार, जो देवल बुक शेफ मे जुद है, रख देती हू। मा सुदह रोज एक बार
यहा आती है, सब कुछ को टीक करके चली जाती है
अम्मी पा
जायगी
नहीं, भया की फितार्यो म नहीं -मा का मन
फिर आगन की ओर वापस आती हू - और मा का मूई-घर वाला बक्मा देख
लेती हूँ। चिठी उसी पर थर देती हू । हा, यहा से आसानी से पच जायेगा शुक्कर
पढती हू- 'मा, मैं जा रही हू तुम समझ लेना सोच रही मा क्या
समझेगी? मैंने मा को समझाना चाहा था।
या कि मैं भी बिसुप जाये जा रही है।
मुमे एक भी गति की सुधि नहीं ? अनुभूति नहीं?
-
.
46/पग्ली स्थिति प्रतिम म्पिति

युद्ध और दगाबाज इतिहास बात इतनी थी कि वह हार गयी थी, और इस हार से छोजकर उसने जिंदगी की रंगशाला का पर्दा खींच दिया था, पर पर्दा पूरी तरह खिचा नहीं, जैसे एक पट परिवर्तन होकर रह गया हो। और यह पट परिवर्तन हुआ जब आधी रात का समय था, और आग की लपटों सदृश्य ऊची सी उठती राह | अतः लोग-बाग नींद से जगकर भागे चले आये थे। पर जब तक लोग इकह हों, दीवार फलाद आये, तब तक शाति पर स्पष्ट हो गया था कि आखिर कब से वह मोक्ष द्वार टटोलती आ रही थी। टटोल रही थी पर घर या बाहर कहीं कोई उसे अपनी बात का हामी मिला नहीं था। कुछ पूछने पर एक ही जवाब मिलता कि 'गृहस्थ जीवन मे तो सताचारपूर्वक रहना ही मुक्ति, मोक्ष या सन्यास है। यों सदाचारी जीवन की इस पद्धति ने उसे सर्वप्रथम अल्पायु म ही झकझोरा था। मात्र सत्रह वर्ष की थी तब । मानसिक रूप से अपरिपक्व, पर एक मा भी, कि प्रौढ पत्ति के सान्निध्य मे रहकर भी जो अपने बच्चे को अस्पताल की मेज पर आतों मे पानी चढ़ाये जाने के लिए पद्य देख रही है। सूखकर काटा हुए दस मास के बच्चे को लोथ । पानी की पिचकारी सरीखी टट्टियों से निचुड जाती लोथ । उस दिन भी देखी नहीं गयी थी, मा की आतों का गुच्छा सी बनी नन्ही देह। चाहिए थी शाति को शाति मोक्ष। मोक्ष, पर आसानी से नहीं मिलता, और साथन जुटाने पड़ते हैं, जैसेकि दगा फसाद या कोई ड्रामाई दृश्य ही, कि कुछ तमाशाई हो जुट जाये । इससे पूर्व मुक्ति सभव नहीं । क्योंकि लोकमत की अपेक्षा रहती है, और लोरें के प्रत्यक्षदर्शी होने की भी। हा, यह अब आधी रात के बावजूद लोग जुट चुके थे। यहा तक कि लस्त-पस्त एक-एक बच्चा तक बिस्तर बेडकर कॉलोनी के स्क्वेयर में जमा हो चुका था। को थकैलकर सब धूधू करती लपटों तक पहुंचना चाहते थे। पर जिन्होंने लपटे देखी थीं, और एक-दूसरे वह आग बुझाने की कार्यवाही मे व्यस्त ठीक से शाति के हुलिये का जायजा तक न ले सके। अलबत्ता बाद वालों ने देखा था- समाधिस्थ सी बैठी बत्तीस इस्तीस वर्षीया शाति को। दोनों कुहनिया दोनों जायों के बीच। दोनों हाथ आश्चर्यमय नमस्कार की मुद्रा मे वेळी को छूते हुए। बिना हुकारे - बिना कराहे - मुटर मुटर ताकती शाति । एकत्र भीड को शाति का ऐसा एकटक ताकते जाना जरा नहीं भाया । कारण कि शाति की दशा जरा भी दयनीय प्रतीत नहीं हो रही थी। यहा तक कि बच्चों और बूझे को भी वैसा विस्मित करने जैसा कुछ नहीं दिखा शाति मे। आक्रात करने जैसा इसलिए भी कुछ शेष बचा नहीं था कि शाति के प्राण अभी प्रतीक्षित थे। किसी को एक बार देखने को । शायद अपने हसते-खेलते बच्चों को । दो प्यारे प्यारे फूलों को । इसलिए भी कि इस बीच उस पर पानी तो फेका जा ही चुका था, कपडे भी फेके गये थे, और जली हुई साी तक खींच ली गयी थी और फेकी गयी थी कमीज, जिसे उसने वक्ष से चिपका लिया था । और फिर एक ओढनी, जो अपजले, चिपचिपाये बालों पर ओद्य दी गयी थी और पूजा जा रहा था- 'क्यों शाति, कैसी हो? पर शाति निरुत्तर । बस, ट्रकुर टुकुर ताकती सी । जैसे सिर को कोई हथौडे से पीट रहा हो । पूछता हुआ कि सुकुमार बच्चों को छोडकरवेगाने देश जाना कैसा लगेगा- तुम्हे शाति कैसे हुआ, यह भी ठीक से याद नहीं आ रहा उसे । यों भी जब वह स्कूल में इतिहास पढ़ती थी, तो वह नायकों के नाम हार जीत के स्थान, तिथिया आदि महज रट लेती थी। इतिहास तो उसने बाद मे जाना, लाई क्लाइव की भूमिका पढकर, पलासी का युद्ध पढ़कर, या पानीपत के युद्ध मे इब्राहिम लोदी को अंग्रेजों से लोहा लेते देखकर । इतने पर भी इतिहास की सच्चाई उसे तिथियों तक ही सीमित लगती रही। जैसे इतिहास को नायक, महान व्यक्ति या किसी धर्मपथी ने अपने अनुकूल गढवा लिया हो । जभी तो इतिहास में आम आदमी का जिक्र तो दूर, सच्चाई की परछाई तक नहीं होती। हो भी कैसे ? सच्चाई तो अनुभव के स्तर पर पहुचकर ही आकी जा सकती है वर्षों की पुख्ता दीदार को सेप लगाकर धने के बाद। और शाति ने जो कदम अब ज्यया था, वह वर्षों की दीवार को ढाने या उलायने जैसा ही था। फिर भी उसके साथ ये कि सहसा छोटे ही पड गये। वह इस तरह कि विवाहित जीवन के चौदह वर्षों को झुठलाना उसे बूते के बाहर लगा था, और मुह 48/पहनी स्थिति अंतिम स्थिति बरबस एक कराह सी निकल गयी। जैसेफि उसके सीने को कोई रासायनिक तार से भीच भींचकर बेदम किये दे रहा हो। शाति। तू बच्चों को ननिहाल ले ही क्यों गयी थी?" पर उन्ह ननिहाल छोड आने के पीछे भी एक इतिहास था। एक आम आदमी की इशक । बददिमागी। हुआ यह था कि आज सबर स्कूल जात वक्त उसके गोल मटोल रोहित की ड्राइग-फाइल घर ही छूट गयी थी । शाति ने देखा, तो अविनाश से कहा कि 'ड्राइग मास्टर को फोन कर दो ताकि सजा म दे उसे। फोन किया गया, पर फोन शायद मास्टर तक नहीं पहुचा, फिर भी मोहित बिना सजा-माये ही घर वापस आया था, पर तब तक अविनाश दो तीन पैग चाकर शाति को बकझक चुका था। नशा अब कुछ शराब का, तो कुछ बच्चे से हमदर्दी भरे स्नेह के भावातिरेक का, अविनाश पर इस हद तक तारी हो चुका था कि बच्चे की पीठ वेंकते हुए अपने अहसास के बलबले को थोडा उछाल दिया उसने । खुमारी अब तक और बढ़ चुकी थी । सो कहा उसने – 'तुम्हारी ड्राइग-बुक में तो स्कूल ही पहुचा आता, पर इस तुम्हारी जाहिल मा ने ही मना कर दिया कि सिर्फ फोन कर दो। कमीनी कहीं की। मरवा दिया बच्चे को। बस, इस बहस ने ही तब पूरा दिन बिगाड दिया था । फिरों की अदला बदली, उससे पैदा हृद्र और इल्जाम-प्रति-इल्जाम ने एक कटु युद्ध-इतिहास के पन्ने खोल लिये थे। और फिर पन्नो मे जुडझे गये तनातनी के तलापफुज हिकारत के पैदद - और यूसों की मार । गाली गलौज और आखिर मे शाति सह ही नहीं सकी। कहा- 'यह शराब-सिगरेट की ही बरबादी है कि पीकर पस्त पद्य रहता है यह आदमी घर पर, ताकि घर नष्ट नीड बन जाय। अविनाश उस वक्त ट्राजिस्टर पर - 'जवा है मोहब्बत नूरजहान का बेहतरीन तराना सुन रहा था कि फिवरा सुनते ही उछलकर बैठक से बाहर आ गया और पूरे जोर से चीखा- 'नष्ठ-नीड की खोज करने वाली तुम्हीं तो थी न कि शराब से ढेर हो गया था वह नीड । तुम्हारे कुकरम से तो नहीं ? कुकरम-- या खोज करने वाली कहा हू मैं ? मैं तो जीने वाली है। तिल-तिल करके । युर और दगायब हातहामा-9 - जी रही हूं-- शराब की नाली म पडे हुए के साथ। जो सोचता है, नष्ट नीड के लिए त्रिकोण की जरूरत होती है । और अगर तुम्हे मौका मिले, तो त्रिकोण बनाने मे भी पीछे रहागे ? या पीछे रहे हो कभी बस, इस एक जुमले ने ही आग पर घी का काम किया था, और अब शाति के बाल अविनाश के हाथ में थे। फिर लाते और घूसे । तव शाति पर भी भवानी सवार हो गयी। कहा -- "लो, मार डालो, एक्वारगी ही अब शाति सीना तानकर खड़ी थी। अविनाश ने आव देखा न ताव, उसे गले से पक्ड लिया, गला छूट गया तो उसका मुह नोच लिया। नाखूनों की चीर फाड स शाति का होंठ कटकर नीचे लटक गया । वह चकराकर गिर पड़ी । होश आने पर उसे खून म चिलक सी महसूस हुई। शीशे मे जाकर देखा तो मास का लोथद्य दातों तक लटक आया था। फिर जब खून रिसना ब- नहीं हुआ, तो कहा- 'इस वहशी को नाखून भी बाघ जैसे ही चाहिए। फुरसत नहीं नाखून काटने की भी । बस, फुरसत है दिन दहाडे बोतले चढाने की। वक-बक करती वह रोती भी गयी और सीढ़िया भी उतरती गयी। नीचे पहुचकर सोचा, वह जरूर पुलिस को इतिला दे देगी । नहीं, वह खुद थाने जायेगी इस आदमी की कारगुजारी निखाने । लेकिन उसे याद आया कि पुलिस तो अविनाश के लिए पिछले साल भी बुलायी जा चुकी है, अविनाश ही के भाई के द्वारा, और बयान भी लिये गये थे कि 'यह पीकर मार पीट करता है। बीवी को पिस्तौल दिखाता 'पर वही चुप रही थी, तो उस बार पिस्तौल जन्न होते-होते बची थी। नहीं, अब भी शाति को चुप ही रहना होगा। कि बेकार जो अविनाश पुलिस की आखों मे आ गया, तो अब जो दो पैसे कमाता है, उससे भी जायेगा। तब? क्या करे शाति? श्रीमती बोहरा से जा बताये? पर उससे भी क्या होगा - सिदा बदनामी के ? खुद अपने मुह अपने खाविंद की बनामी करे ? वह भी दूसरों के आगे? नहीं, नहीं करेगी वह । उलटे पैर सीढिया चढ़ आयी शाति । वापस आने पर पाया कि वह नशे की झोंक में बच्चों को खटेड रहा है। कहता है कि 'चलो, हम पिक्चर देखेगे। इसको सडने दो यहीं। बच्चों ने पलके उयकर मा को देखा, फिर पलके गिरा दी। वह तमककर बोली-'अपने उद्देश्यों की आइमे बच्चे को मत घसीटा करो। शति ने बच्चों को अपने पास खींचते हुए फिर कहा नहीं जायेगे वे तुम्हारे साथ में ले जाऊगी उन्हे, जहा चाहगी। - एम्पिनि अनिम स्थिति बच्चों को खुद से सटाते हुए पता नहीं क्या-क्या याद आता रहा उसे कि मन कट कटकर टुकड़े होता रहा । या कि उबल-उबलकर जिंदगी देने वाले के निकट शिकायत करता उसका मन | शायद कहा हो कि देने वाले ने क्यों औरत का जन्म दिया उसे? देर तक मुकद्दर पर आसू बहने के बाद अविनाश के उद्देश्य से बैठक मे झाका, तो वह दोनों टांगे फैलाये, पायजामा दोनों घुटनों से ऊपर खींचे, कुहनी पर औये मुह चित पड़ा मिला। बच्चों की कॉपी-किताब सभालते बीच पाया कि छोटी मन्नो तो खाते-खाते कुर्सी पर ही सुद्धक गयी है। ज्यों त्यों बच्चों को साथ लिया और अविनाश को चित पद्धा जेटकर वह सीढ़िया उतर गयी। . और. अब कुछ लोगों ने एहतियातन उसे बैठक मे पहुचा दिया । विसिनिटी की महिलाए भी किवाड के इर्द-गिर्द सरक गयीं। उनमे से एक ने बच्चों के लिए उत्सुकता जताई, रोहित और मन्नो नहीं दिख रहे?" “यहीं स्क्वेयर ही मे कोई ले गया होगा।" 'कहा?" चोपच परिवार की महिला पास बढ़ आयी, "झगडे के बार मा ही साथ स्कूटर मे ले गयी थीं दोनों को ।" "और अविनाश?" “दह गया था बाद | जब पर मे कोई नहीं था। किसी ने सिनेमा की ओर जाते देखा या उसे।" 'जब घर मे बाय बाय हो, तो बियाबान मे मर्द क्या करेगा? आप कह क्या रही हैं कि बापदाय शाति की वजह से है ? - अरे, वह तो इसी बात पर रोज-रोज कुढती रही कि पर मे आते ही जैसा रग तुम्हारा देखेगे बच्चे, अरे, वही रग तो पकडेग वे। पढे लिखेगे नी, तो तुम्बरे जैसा ही तो बनेगे । आवारा । और मान लो, बेटा तुम्हरा किसी तरह पढ़-लिख भी गया, तो बाह के बाद ही बीवी को पीटेगा- तुम्बरी तरह "अच्अ ," कहती पहले वाली महिला बढ आपी "बताओ, कोई गया है बुलाने मुद और दगाबाद इतिहाम/51 उसे? "किसे ? अविनाश को ? श्रीमती वोहरा गुगुआई, 'कोई गया भी होगा, तो कहा टूटेगा। कुछ पता हो कि किस सिनेमा हॉल मे है। 'यहीं पास वाले मे है। क्या नाम है, जहा 'प्यार की मजिल लगी है। 'चुपचुप देखो, उसे ला रहे हैं। कोई बाहर से बताने आया । महिलाए वापस सहन के दरवाजे पर जा पहुचीं। दो-चार लोगों ने अविनाश के थाम रखा था, जिनसे हाथ छुडता वह सहन पार करके अब शाति के सामने था । 'क्या सचमुच शाति? उससे और कहा नहीं गया । क्योंकि जो था, उसने उसका नशा हिरन कर दिया था और वह पछाड खाता लगभग शाति पर गिर ही गया था कि वोहरा ने थाम लिया, तो वह फूट फूटकर रोने लगा। 'यह क्या हो गया। सब बारी-बारी से बढस बचाने लगे । 'यह वक्त रोने का नहीं । डॉक्टर बुलाओ। किसी ने उसे रोककर कहा, 'डॉक्टर बुला लिया है। लोग अब डॉक्टर की सूरत तलाशने लगे । डॉक्टर सचमुच सहन में था । इकडे हुए लोगों को पीछे हटाते हुए कुछ लोग डॉक्टर के लिए रास्ता बनाने लगे। भीड चीरकर डॉक्टर भीतर गया, तो लोग भी भीतर की ओर उमडे। अब शाति के हाथ अलग कर रहा था डॉक्टर। अब वेहरा रिख रहा था। पूज, 'यह-कैसे कटा होठ" शाति हटात चेत-सी गयी। महिलाओं मे सुसुर पुसुर होने लगी, 'डर गयी बेचारी। "डॉक्टर ने आदेश दिया। शाति अप्रतिम.सी देखती रही। डॉक्टर मुआयना करता रहा । निचला पड जल चुका था। चेहरा आसा । बाहों की उपडी हुई खाल सिंच जाने से नीचे की नगी चमडी दिखने लगी थी। शाति किंतु वैसी ही शिश-र । इतय की शिशर । अविनाश भी बुत-सा खद्ध सोच रहा था, काश, कि आज रात पर न घेता वह, तो यह सब कुछ होता ही नहीं। या गया भी था तो रसोई मे ताला ही बन जाता । यह मिट्टी का तेल न जुटा पाती। लेकिन यह तुम अब सोच रहे हो? जैसेकि जानते थे तुम, वह ऐसा करेगी? और अब रहा ही क्या अब तो नगे हो ही गये 'लोगों को हटाइए 5/पह स्थिति अंतिम स्थिति - - हो। और कि 'आदमी अविनाश, तुम हो एक ही बेहया । और उसे याद आया कि बेहया उसे शाति ने बताया था, और उसने तमतमा आते कहा था - 'बेहयाई का मजा चखाऊ तुम्हे ? और वह आगे से डरी नहीं थी। और ज्यादा निडर हो आते कहा था 'वह भी कर लो तुम । एक शराबी चीखने चिल्लाने के अलावा कर भी क्या सकता है ? जान ले सकता है ? ले, ले जान । बेगैरत के साथ जीकर भी क्या करना है ? 'बेगैरत हू मैं ? उसने आस्तीने कसते हुए कहा था 'और लन्चर भी 1 हैं ? तो तुम क्या हो? कमीनी? 'हा, मैं हू कमीनी, क्योंकि आज तक भी कमीने के साथ ही हू। मैं मरी नहीं । डूबी नहीं 'तो अब तुम्हे कमीने के साथ में ही रहने नहीं दूगा।' उसने उसके हाथ पैर कस दिये थे। पर उसका चबङचबड करना रुका नहीं था। बोली थी- 'नहीं रहने दोगे, वही अच्छा होगा। जितना कुछ इस घर के लिए किया, उसका सौदा हिस्सा भी कहीं और करूगी, तो बच्चे पल ही जायेगे। 'तब-अभी क्यों नहीं चली जाती छोडाडकर - बच्चों को भी? 'हा, तुम्हे ऐश करने छोड ही जाऊगी। सभालना बच्चों को भी। मेरी जैसी कोई फस ही जायेगी। मेमना बनना तो आता है तुम्हे ? एक महान नाटककार हो। सच ही, वह मेमना ही नहीं पा कि नाटककार ही बना नहीं खा ? उसे खुन पर रोना आया । देखकर पधेसी दिलासा देने लगे, 'हिम्मत से काम लो । अच्छी हो जायेगी।' जो आदमी एबुलस लेने गया था, उसने आकर एबुलेस की सूचना के साथ यह भी बताया कि उसने बड़े भाई को खबर कर दी है।मा और भाई अभी आते होंगे। महिलाओं मे फिर तुसपुस उठी, “कोई भाई भी है, हमे तो पता नहीं था ?" 'और नहीं "इससे पहले भाई के पास ही तो था । पर करतूत खेडे तब ना नहीं ही छूटा पीना, तो शाति ने ही कटा-परिवार में कैसे रहते हैं, यह आदत बलो अब इसी बात पर तो छोड आया था यह कहकर कि तुझे रहो। चमचागीरी करो इनकी मेरा तो है यह सौतेला भाई। मैंने क्या लेना है किसी से? - युट और दागका इतिहमा 'तो सातेले भाई है? महिलाओं का सकुचित स्वर और सिमट गया। 'मा तो सग्गी थी न ? सग्गे वेटे की करतूतों के मारे बेचारी सौतेले के पास रहती सनने दो। 1 ओह । इसीलिए इतना रो रहा है कि अब इसका क्या होगा?" कुछ महिलाओं ने पुर पुर बर करने को कहा, “बई टहरो जरा डॉक्टर जाच कर रहा है।" सभी महिलाए नये सिरे से गरदन उचकाये भीतर झाकने लगी। देवे स्वर में छोक्टर ने अपना मत प्रदर्शित किया, 'बचेगी नहीं, पर पेट पीठ सुरक्षित है। शायद एक दो पर्सेट चास हो जाये - बचाव का भीतर डॉक्टर का मत सुना जा रहा था। वाहर चर्चा थी, पुलिस केस हाथ मे से लेगी। पर बच जायेगी। डॉक्टर ने पेट और पीठ सुरक्षित बतायी है।" और देखती नहीं कि उसके प्राण कैसे बच्चों मे अटके हुए हैं। महिलाओं ने कान छू लिये, राम राम देखो कि मा क्या मर के भी मर सकती है ? और हे मेरे राम बच्चे। बच्चे पता पायेंगे, तो सह सकेगे?" 'देख लो । बेचारी ने पेट पीठ एक करके पाले थे एबुलेस मे ले जाते समय पुरुष-स्वियों का जमघट और ज्यादा बढ़ गया । शाति को सब कुछ अर्थ रात्रि के स्वप्न जैसा लग रहा था। अर्थहीन और अप्रासगिक सा । फिर चार दिन और चार रात - इस अप्रासगिक दृश्य मे और जोड दिये गये। मा, सास, जेदानी जेठ और सबके पार रोहित और मन्नो खडे थे । कोई शाति के सीने पर मुद्गर कूटने लगा। आर्यो से दरिया फूट निकला । आखों की कातरता खुन से ही नहीं झेली गयी। पलके जुड गयीं । दोनों बच्चों को हटा लिया गया तो दद आखों से ही कहा, 'कह ले जा रहे हो उन्ह। अपने कृत पर खुद ही शर्मिदा होते उसने परितप्त चेहरा फेर लिया पर होंठ हिलते रहे - 'रोहिता ओ मेरी मन्नो डॉक्टर आ गया, “यह क्या हो रन है ? आप तो खुद ही मरीज को मार डालने पर उतारू है।" अगले दिन भी वही 'रोहित 1म-नो जेठ जेठानी बोले, अब यही हमारे बच्चे हैं।" पहनी स्थिति अनिम स्थिति 1 आप इन्हे पास ही रखना।" शाति के मुह से लबा नि श्वास फूट पड़ा। 'नहीं, तुम ही उन्हे देखोगी । खुद । शाति की मा ने हिम्मत बधायी । "इनकी तो फिकर छेड दो तुम | सास ने दिलासा दिया। अविनाश ने भी इस बीच दुनिया भर का उद्यम बिना हिचकिचाहट के दिखाया। सबसे बड़ी बात कि इतने गहरे सदमे मे शराब छुई तक नहीं, कि जैसे भी हो, इस दुनिया से भाग जाती निहायत भली बीवी, और दुनिया के मत को किसी भी कीमत पर अपने हित म बचाना है। शाति को अपने प्राणों से अनुप्राणित करने मे उसने दिन को दिन और रात को रात नहीं समझा । नतीजा यह रहा कि शाति हैरानी से आखे फाडे बिना नहीं रही। मन म नये सिरे से कुछ कीलने लगा । दोष भावना से शिराए फटने को हुई। छटपटाहट को ध्यान मे लेते डॉक्टर ने ताजा खून चद्यया । फलों का रस दिया गया । शाति ने आखे खोली अब वह अपेक्षाकृत शात थी । चैतन्य थी । प्रज्ञा चक्षु । अच्छी तरह देखने समझने मे समर्थ । तब लगा कि उससे भारी अन्याय हुआ है। पूछे जाने पर बयान दिया कि उसका मशा वैसा करने का नहीं था। पता नहीं, किस कुपडी मे मति मारी गयी थी। क्या सूझा था कि एसा हो गया उससे, कि इस दुर्घटना के बारे मे स्पष्ट कुछ नहीं जानती वह । और दो दिन होश रही, तो कहा, 'कैसी अभागी है वह कि अपने नाम की लाज भी नहीं रखी गयी उससे । कितना दिक किया सबको ? अच्छा, अब आप जाओ। भाभी आप जेठ जी को भी और अम्मा को भी ले जाओ और बेजी कहा 'कहते-कहते थक-सी गयी। देजी आ गयीं, तो पूछ “बेजी, मन्नो ने खाना खाया कि नहीं' 'खा लिया बेटी, तू कोई फिकर न कर। और रोहित। - उसने पढना तो नहीं छोड़ दिया। उसकी परीक्षाए हैं। बेजी ने रोती आखे फेर ली। और बाद वाले दिनों मे शाति न रोई, न कराही । पर आखे थक जाने पर ही मुदतीं, इससे पहले नहीं । जरा खटका होता तो आखे फिर खुलकर सतर्क होती । चारों ओर ताकी, और फिर बद हो जातीं। किसी अन्य खटके पर चौंकती वह कह आती, रोहित 'तू घबडया तो नहीं ना देख, छोटी बहन को मारना नहीं । देख मन्नो --कहीं रोई तो नहीं ? उसे कहो कि ठीक होने पर हम खूब घूमेगे। अपू घर दीवा ली पर, घुमाऊगी ! फिर चौथे दिन, नहीं, रात मे सज्ञा जाती रही। सुदह हुई, तो सास रुकने लगी। कोई " अच्छा, यु और दगाबाज इतिहास/55 दस ग्यारह के बीच श्वास चुक गये और बस । कभी उसने मोक्ष चाहा था। श्वास तो मोक्षम भी चुकते ही। पर जीते जी बच्चों को- जब चाहती, देख लेती । तब यह न लगता कि उन्हे भुला दिया है उसने । तब जीकर ही सद्गति पाती वह । पर अब सद्गति प्राण गवाकर पायी । पर हा, एक अतर कि प्राणात काल में चारों ओर घर परिवार, समान- सब था । पर अत हुआ इस दृश्य का भी । शव जब्त कर लिया गया। मुखानों के जमादारों ने बताया, 'चीर फाड होगी। पर चीर फाड हुई नहीं । उचित समय पर पागलखाने के डॉक्टर का प्रमाणपत्र मिल गया कि साल भर से शाति पागल थी। शव तब बिना चीर फाड के ही वापस मिल गया। शव को लिफ्ट से नीचे लाया गया। लोग वहा पहले से ही इक्ठे य, वे बढ आये। देखा, शव की टांगे और बाहे पहियो से वधी हैं । चेहरे पर झुलसन के दाग अब फफोलों मे बल गये हैं । सटके होठ - और फफोलों से दहता वदूदार पानी । जो पानी नसों द्वारा चद्यया गया था, वह अती और पेट मे भर गया था। प-ह घटे पहले कै और मूत हान से शव दुर्गधित हो गया था । अत. शव को कम्पाउड में एक ओर पद्य रहने लिया । दधी हुई पहिया सोलन मे भी कोई तुक नहीं थी । स्नान पाट तक उटा से जाना भी किसी के बूते का नहीं था । परिणामतः बाल्टी भर भरकर अस्पताल का पानी ही ऊपर से चल दिया गया। कपडे भी ऊपर से ही द्यल रिये गये । अविनाश से माग मे सिंदूर भरवा दिया गया। सारे सबपिया द्वारा मुह देख लिये जाने पर मुह पर साल शॉल ग्रल दी गयी । मुह फिर सीधा श्मशान पहुचकर ही उपाय गया । बारह वर्षीय रोहित से मटका फुडवाने क बा- मुखाग्नि की रस्म का निर्वाह कराया गया। रोहित का चिता जैसा तपा चहापसा चेहरा चिता के क्रमश: बुझ जन तक बुमसा गया। नवबर को ठडी हवा मे पिता के अगरे भी रारा ओढ़कर पडे रहे । बस, इस वर्ष का दीली का इतना ही न रहा ।, इतना और कि चौपेनिविली पाई। रिम अविनाश अम्पिया प्रदह कर अप ! सेर्ग मै पुगगाट उटी "मरा मार - रिमा ने 'जि. पास, नदे- शरदी को" दूगरा म्बर "एन।' तेन का निई कले ममप रेरित कुछ अपिरागि पर कादरा अभी पेशा ऐम मेहमर पापा सब देने मना करत" दूसरी ने अपना मत व्यक्त किया, 'ठीक है, बेटा जवान नहीं, पर बाप तो छयालीस से ऊपर हो गये । पहला बेटा होता तो करता यह सब कि नहीं? और बेटा जब है, तो वही हकदार है। हमारे यह तो बड़े बूढ़े के कहने पर बाल भी मुडवा देते . 'छि । एक अन्य महिला ने मत का विरोध करते हुए कहा, आजकल कौन सिर मुड़वाता है ? अरे, पगड़ी तक नहीं पहनते। 'चलो धोती सही, पर इन्होंने तो धोती भी तहा कर रख दी। एक पी लिखी महिला बोली, 'छट हुए बाल और कुर्ते-पाजामे में तो मैं ही नहीं पहचान पायी इसे । लगा, जैसे जनकथारी श्वेताबर मुनि खद्य हो।" "आखिर मा थी। अगर बेटा कुछ पल के लिए मुनि बन भी गया तो क्या ? एक गभीर कठ ने उपर्युक्त कथन का अनुमोदन करते हुए कहा, “मा के लिए जितना त्याग किया जाये,थोड है। किंतु इतने बडे एकत्रय मे से किसी एक ने भी यह नहीं कहा कि पति द्वारा पत्नी के लिए कितना त्याग किया जाना पर्याप्त है कि क्या करके व्यक्ति महान नाटकीयता से तौबा कर लेगा कि आने वाले दिनों मे कोई ऐसे दगाबाज युद्ध या इतिहास को फिर नहीं दोहरायेगा? यु- और दगावज इतिहास/57 दावा । तारा जब भी मदिर जाती है, कोई-न-कोई कामना मन मे उग ही आती है। इन दिनों उसे किसी अच्छी नियुक्ति की जरूरत थी, अत स्वभावत ही उसने कुछ अधिक झुककर मूर्तिमान श्री राम जी के आगे हाथ जोडे । पुजारी उस समय श्री राम जी की प्रस्थापना सीढियों पर बिखरे बासी फूल एकत्र कर रहा था। उसके सिर उठाते ही तारा ने पूर्ण, 'पुजारी जी, भगवान कितना समय और लेगे? पुजारी जी जरा देर को ऊपर देखे! कहा, भगदान बहुत दूर की सोचते हैं।" तारा पोडा मुस्कराई। कहा, "ठीक है, तब तो ऐसी चिंता नहीं पर पुजारी जी, यह तो अमरीका पाकिस्तान को हथियारों से लैस किये जा रहा है, तो भी भगवान दूर की सोच रहे होंगे। "बेशक," पुजारी जी मुस्कराये, 'यों तो राजनीति मे भावुकता घातक होती है, किंतु हमारे देश की जलवायु ऐसी है कि हम हिंसा से काम ले ही नहीं सकते । अत. बेकार उलझते भी नहीं तभी तो हम टिके हुए भी हैं। आखिर भगवान ने हमे वक्त पर आगाह कर दिया। अभी कुछ बिगद्य तो नहीं? तारा ने चाहा, पूछे - आगाह दिगडने के वक्त किया था, जब देश विभाजित हुआ था? जन-सहार, जो आज तक चलता आ रहा है। पर सौ बार्तों की बात कि भगवान दूर की सोचते हैं, और उसी मे कल्याण भी आ जाता है। नीति पर चलते हुए सलाचारी जीवन बिताते जाओ काम अपने-आप बनते जायेंगे, किंतु घर पहुचने पर अचानक जब तारा प्रसाद छोटे भाई को देने लगी, तो उसकी आखे भाई की बाहों और फैले हार्थों पर पड़ीं, और आखे फिर फिसलती ही गयीं । छोटे भाई दिी के समूचे शरीर पर सूखी नसों का हुआ जाल । उसके पैर तक सूखकर ठट्ठर हो रहे हैं। दाद के आने वाले दिनों मे शाय- वह विंगे की ओर देख नहीं सकेगी। बड़े भैया के पडे होने का आभास हुआ, तो उनकी ओर दिना देखे ही कहा, “बरसात के दिनों मे दूप 1581 । मुझसे पिया नहीं जाता । दानों वक्त का दूध आप बिंतो को दे दिया करे। महीना भर पहले की बात याद आयी, इतदार की छुट्टी तारा ने पैंडिंग केस तैयार करन में बिनाया थी । तब हाथ में नौकरी नहीं था। एक एडवोकेट क साथ प्रैक्टिस् सीखती थी। अपना एकाथ पुराना केस भी तैयार कर लेती थी। उस दार यह भी सोचा था" कि अपने पुराने मुवक्किल को घर पर ही बुलवा लेगी। यों हाथ के हाथ केस थमाकर रुपप वसूल करके बड भाई स कहगी - 'इन रुपयों से भाई पडोसी की तरह दो चार मुर्गिया खरा- लाये । अडे पर के हो जाने पर दिनो मतवातर अड खाने से तदुरुस्ती पकड लेकर दौड धूप करन लायक हो जायेगा। केस तद एकाथ हा तैयार हो पाया था, दूसरा कस अधूरा ही पड़ रहा । सोम, मगल, यहा तक कि वृहस्पति भा बीत गया, पर केस तैयार नहीं हुआ। मुर्गियों लायक रक्म जमा हुई नहीं, और आज भी बिना वैसा ही क्लात है। पिछले हफ्ते भी यही था, और आन फिर बृहस्पति है। पिछले चार दिन से खिन्नता की परत मन पर मुर्दा झिल्ली जैसी पडी है । क्ल छुट्टी लेकर एक ड्राफ्ट तैयार किया भी था, पर दोबारा पढने पर लगा कि आखिरी पैरा सारहीन मा था, और सारहीनता ने ही केस के इफेक्ट को मार दिया था । उसन एक पुरान क्लायट के केस के बारे में सोचा, जिसस कभी तय हुआ था कि वह केस जीत जाने पर पूरी रकम का एक चौथाई भाग तारा को देगा। पर उसने भी आधी ही रकम दी थी, यानी बाकी रकम के लिए तारा उस पर दावा करे । बस, यही होता है, जभी तो लोग कहते हैं कि यह पेशा औरतों के लिए नहीं, अभागी औरतों के लिए है। हालाकि ऐस केसों के लिए तारा को मुशी भी रखना पड़ था। बाद में मुशी के मन मे खोट आ गया। वह रूपयों की उगाही करता, पर बाहर ही-बाहर रुपया हडप जाता । सुनकर इशु ने कहा, 'तुम प्राइवेट प्रैक्टिस छोड ही दो । आनरेरी मजिस्ट्रेट की अवधि चुक जाने पर स्थायी मजिस्ट्रेट के पल के लिए एप्लाई कर दो। तुम सफल हो सकती हो' 'जैसे इतना आसान है? 'जरूरत हो, तो आसान बनाना भी सीखना पड़ता है। पर अपने लिए मैंने एक दूसरी जगह एप्लाई कर रखा है देखकर हिम्मत टूट जाती है। एक वेरोजगार भाई के दुविधाजनक चेहरे का भाव वह इशु को कैसे समझाये? इशु ने गहरी सोच में डूबे रहकर एक रुपये का पैकेट थमाते हुए कहा 'यह बिंदो बस, बिंदो को ही नावा/59 . को दे देना । वह अपने लिए खु- सोचेगा 1 तदुरुस्ती रहेगी, तो भाग-दौड भी कर लेगा। नहीं । उसने रुपये लौटा दिये, 'अभी रो।' पिछले महीनों की गिरी पट्टी बात तारा को मदिर में भी एक बार याद आयी थी, और उसने भगवान से कहा था- 'मुझे दूसरे के धन से बचाओ। दान देना है, तो अपने घर से दो। और मुझे दो तो शक्ति दो जूझने को पर तारा मे शक्ति तो इतनी-सी भी नहीं, कि जहा पैसा हूदा पछ है, वहा एक रिमाइडर ही भेज देती । रुप वसूली पर मुर्गिया खरीती जा सकती थीं । पर कहीं न कहीं रकम डूबी पी है । बकाया वसूलने वाला ही कोई नहीं । हा, सहायता का हाथ इशु ने बढाया था । इशु पराया नहीं, पर उसे अभी अपना भी नहीं कह सकती तारा। अहसान न लेना ही अच्छा। जाने कहा कहा और कब-कब की दाते सोचती हुई तारा जब कार्यालय पहुची, तो जमादार अभी झाडू लगा रहा था। 'मिस साब, आप क्यों इतना जल्दी दफ्तर आती फिर पढा, फिर सुधारा, 'तुम काम खत्म कर लो पहले।" तारा रुकी रही। जमादार के जाने के बाद, तारा ने पहले अपूरे केस को देखा, और अलग पर दिया । इसे इतवार को पर पर तैयार करेगी । फिर दूसरा ड्राफ्ट कि जिसका अतिम पैरा सुधारना था । पूरा पैरा नये सिरे से लिखा । उसे पद्य । फिर सुधारा, और तब फेयर करके केस से टाक लिया । अन्य कर्मचारी आये, इससे पूर्व ही तारा दफ्तर की फाइले तैयार कर चुकी थी, फिर भी काम मे इतनी तल्लीन कि उसके साथी कब आकर अपनी मेजों पर बैठे और कब लच के लिए उठ भी गये, उसे पता नहीं चला । वह शायर वक्त और काम के गणित को ही जानती है। कभी अपनी आखों से सुन ही को कागज पर झुका देखती है, अक्षर का जोडतोड करती । सिर उठता है आहट पर, किंतु आज आहट बादल की थी, और अब धीरे धीरे बरस रहा था। कूर्गों पर दृष्टि गद्यये सोचा- काश, जीवन इतना ही होता कि व्यक्ति लहराते हरेपन को देखता रहता । पूतों की महक उसे भिगोये रहती, और व्यक्ति की भूख-प्यास, नींद चुक जाती । व्यक्ति जरूरतों का गुलाम भी न रहता । और होता उसके पास बेहिसाब वक्त । तब व्यक्ति को जैसा उडता, या कपास के फूल जैसा खिल जाता । तब आकाश की स्वच्छता बरसती । उासियों के बादल न उमडते हुए और चुपचाप बरसता।- मात्र सौंदर्य व्यक्ति के गिर्न तब चिंताओं 60/पनी स्थिति अतिम स्थिति का कळपरा भी न होता । इस टीन की छत पर गिरने वाली बूंदे - मीठी घटियों जैसी ठनकती। कहीं से एकाकी यात्री आता और सुरीली घटियों में झूम जाता, या अपनी किसी खोई सगिनी की टूट-भाल मे आखे बिछा देता । और नहीं तो मायूसी के क्षणों में अपने झोल को टटोलता -एक बरसाती फल निकालकर चखता, और सोचता कि उसकी सरिनी पास होती, तो वह नासपाती का जायका कैसा है ? सखी से पूछता । वह अजनबीपन से भरा उत्तर देती -- 'खटा। बरसाती पानी जसा । और उसके मुह मे कच्चे सेव या आडू जैसा जायका भर जाता । कच्च फल कुतरते हुए दानों का अजनवीपन बीत जाता । सखी बरसान की ऊबन सहनी सहती सो जाती, जागती, जब सूरज के तमाम रग अस्ताचल में भर जाते। पर अस्ताचल में रग भरने से पूर्व ही बजा पाच का सायरन, और उसके सपनों का अहसास असलियत में बदल गया । मन में जमादार के उपस्थित होने का आभाम उसे सीट से उठ जाने को प्रेरित किये है । अकसर यही हुआ है कि जमादार की मौजूदगी से आख चुगत हुए सिडना पड़ा है उसे । जिस दिन जमादार अनुपस्थित हो, उस दिन चाबी का गुच्छा छनकला है । पर चौकीदार का उजनी जल्दी नहीं रहती कि तारा को, जूनों की आवाज पर सिर उठाना पडे? पर देर सबेर कार्यालय की चौहद्दी छोडनी ही पडती है जिगी तब दौडने लगती है सड़कों पर । पूरा घटा सवारियों को बस के दडबे मे पख फडकडाती मुनियों जैसा चढ़ते उतरते देखती है । तरह-तरह की आवाजों में दछ जाती है सारा । और बस वजन से दब जाती है, तब ड्राइवर कसमसाता सा कह आता है - 'ओए, हुण चलण भी देगा कि नहीं पता नी ऐ केडिया गाटिया गालद ने पे कुछ रुककर फिर -- ओए, पता बी आ ~ मामा तरा अग बैईवा ए- चलान करन नू। यनि इतने पर भी क्डक्टर की सीटी सुनापी नहीं पड़ी तो सरदार बडबडता है. 'चलो पुत्तरो, भरी जाओ - कास गलदा- ईन्हों नूपता नहीं, बई गड्डी लेट हुदी ऐ । कीन्ह कीन्हा चिर खत्तार छडदै ने गड्डी नू और पक्कापेत करती फालतू सवारियों को सचेत करता वह चिल्ला पडता - ओए, लमके न गड्डी नाल कोई बी। रोन रास्ता इन्हीं सुनी सुनायी बातों में कटती है, और घर आ जाता है । तब लगता है, परा एक दडवे स दूसरे पडदे मे आन पहुची है। ताग को देखते ही बिंदो उत्साह से भर जाता है आओ जी, आओ, एडवोकेट साहव । मनिस्ट्रेट जी। कई बार बिता की भूल सुधारने का मन होता है, कि वह तारा को एडवोकेट या मनिस्ट्रट कारन युगये, एक क्लर्क है - तारा - सिर्फ सहायक । पर क्या - दाना161 । । कि वह बिंदो को टोक नहीं सकती। वितो आज भी रोज की तरह सीढियों पर ही, रोज वाले मुहावरे से स्वागत करता खद है। पर बितो के दुबलाये तन या चेहरे पर आखे टिकाये बिना ही देहरी लाथ जाती है तारा । विदो उसके आगे रोस्ट किये हुए टोस्ट प्लेट म लिये पूछता है, “खस्ता बने हैं न? तारा सिर हिलाती है, तो कहता है, क्यों, पस नहीं आये?" पूछे हुए का जवाब नहीं दे पाती तारा । क्यों है ऐसा कि यह दातावरण नागवार न होकर भी असहय है ? शाति और अशाति के बीच के सथि स्थल को टूढ़ रही है तारा । पर वह स्थल कहीं दिख ही नहीं रहा । फिर देर रात तक जगी रही तारा और खिडकी का पल्ला खुला रह गया था ! नींद खुली दूसरे पहर । मच्छरों के काट खाने से । उठी, और डोरी खींचकर चिक गिरा दी । चिक खुली तो सीपी ड्रेसिंग टेबल के शीशे पर आन गिरी। वजनी शीशा हिचकोला साता गिरा, जिसे तारा ने घुटने पर सेला । शीशा मेज पर परकर घुटने को देखा । घुटने का मास छिलकर अलग हो गया और सूजन उभर आयी दिखी । उस रात टीस के मारे सोया नहीं गया । सोचा, प्रभातकालीन बना अभी कर ले। अक्सर नींद उखड जाने पर वह बन्ना करने लगती है। सुबह उठा जो नहीं जाता। पर दो पहर रात गये उनींदापन भी कहीं पीछा छोडता है। बार बार नींद को झटके से भगाना पडता है, लेकिन आखिर में जीत नीट की ही होती है । तब एक पलिश-सी पैन। होती है। खुर से पूछती है तारा "यह बनना हो रही थी? भगवान से भी धोखा। सौदेबाजी? तारा क्या करे ? जानबूझकर तो करती नहीं । तारा जैसे जवाबदेही करती है - 'पर यह तो हाजिरी भरने जैसा ही हुआ न? फिर अर से कोई पूछता है । जसा । काम करो या न करो। टीक है । तारा मानती है कि यह बिना किये खाने जैसा है। साथ ज्याकर मागने जैसा । पर मांगे किससे? वही अपर भरकर भेजता तारा को, तो? और कि ताराने देखा है कि इस सारणीदारी के बाहर भगवान ने बहुतों को तु कुछ दे रखा है। पोधे और गर्षो सक को । पर यही बात है न, यही न, कि 'सकल पारप है जग माहीं । बस, तग के लिए है कि पानीय को भी कहीं न उकेरो । वह रात तब ऐसी तस्गर और टकराहट मे ही देती और निजात मिली सीपा दफ्तर पहुंचने पर । रि वापसी, फिर - तनसाहसरी करने 624+ दिन नमि । उच्चाटन । वैसी ही उद्विग्नता । बिंदो और भाई का सामना होने पर उन्हें खाली या निहत्था महसूस करने पर याद आन लगता है सब, कि क्यों? हा, यह कब स है? तारा हिसाब लगाने बैठती है। शायद भाभी के जाने के बाद से, या भाभी के जाने की बात फैल जाने के बाद से या कि भाभी के रहते ही पर मुद्दा ? भाई को पक्षाघात के दार बहाली के आदेश न मिलना । भाई बदस्तूर फिटनेस प्रस्तुत नहीं कर सके । सरकारी अस्पताल का ठप्पा नहीं था। पहले ही सरकारी इलाज करवात, सरकारी छुटटी लेते। भाभी की बात पर भाई हसते। 'छुट्टी भी गैर सरकारी होती है। भाभी खीजकर माथा पकड लेती । तुम्हारे पास छुटिटयों का हिसाब है ? नौकरी में ब्रेक आ गयी तो 'नहीं-ब्रेक नहीं आयेगी। भाई तसल्ली दिलाते। भाभी अपना डर व्यक्त करती 'पता नहीं, लिया जा भी सकेगा तुम्हे ? अब होगा वही जो होना है इसके बाद भाभी ने और पूछताछ छोड दी। महीने के आखिर म, एक दिन स्कूटर मे सामान धरा, और मायके चली गयी। भाई को इन बातों का दुख हुआ हो या भाभी के जाने का मलाल - भाई को देखने से इस बात का पता नहीं चलता । भाई बल्कि पहले से ज्यादा निद्व हो गये हैं। घर के प्रति ज्यादा जिम्मेदार । भाभी का प्रसग उठाया जाये, तो टाल देते हैं। कहा जाये भाभी यह कहती है 'तो बीच में टोक देते हैं कहने दो, जो कहती करती है । छुट्टी ‘पर भैया 'तारा समझाने जाये तो कहते हैं 'चली गयी है तो उसके जान से हमारा तो कुछ बिगड नहीं रहा। घर में सबको वन पर सब मिलता है। मिलने वाले अब भी आते हैं। सबका पहले जैसा सत्कार होता है। बितो काम पर लग ही जायगा । कम्मो ब्रिलियट स्टूडेंट है। उसके बारे में और तुम्हारे बारे म सबरी उमा राय है । तुम्हारा ओहा भैया। इससे ज्यादा नहीं कह पानी तारा । ओह के नाम पर ही गश-सी आ जाता है उसे । पर भाई कहते हैं भाभी का भार भाभी पर प्रेजे अपन लिए अप कमाकर इकन्टा करने दो उसे ।हम पर अहसान तो नहीं भोपेग अपनी कमाई का - - - वात - पर इसम भाई का ही कसूर नहीं है कि अपनी नौकरी नहीं सभाले रहे वह । अव भी ‘स्यों नहीं अपने को 'फिट' साबित करते ? क्यों सबकी गलतियों को सहारा लिये ना रहे है? अपने को दूसरी बातों मे खपा रहे हैं ? सूरज उगते ही पूछताछ किसको क्या चाहिए? चाय पानी सब मेज पर तैयार। फिर वक्त पर सदको मेज पर बुलाना बाद म मेज खाली करना । भाभी इन्हीं दातों का उल्लेख करती टोक्ती थी- 'तुम क्या इन्हीं कामों के लिए हो? इतना वक्त अगर अपने इलाज पर लगाते ? तारा क्या भाभी जैसी बन सकती है । प्रतिवाद कर सकती है। ऐसे मे मा होती ता मा की जागरूकता के आगे भाई को हैरान रह जाना पड़ता था। यह नहीं कि तारा मे मा जैसी जागरूकता नहीं - पर तारा के पास भाई जैसे व्यक्ति के लिए कोई हल नहीं, पर यही तारा दफ्तर की कुर्सी पर ढेरा मसलों का हल निकालनी रही है। निकाल रही है । कारण है, वहा तारा अनुशासन के विधि विधान से बची है। काम मे कोई एडवाहट नहीं । भीतरी आख दुनी है। फुरसत मिलने पर दाहर की आप भी खुल जाती हैं। कुर्सी पर बैठे बैठे ही बाहर का सब दिख जाता है। दफ्तर का दरवाजा जिम लेन पर खुलता है, वहा से कुछ फीट की दूरी पर है पुलिस क्वार्टरों की दीवार । कहीं कहीं मझोले कद के पेड दिख जाते हैं । शहतूत या आडू के हैं । दालान और स्वार्टर। यह क्वार्टर इकतल्ला है। पास से निकलो तो बन दरवाजों म नीती निंदगियों का कोई आभास नहीं होना । पीछे तक चलते जाने पर एक निर्जन सा अहाता रियाया दे जाता है। एक चौकोर चौहटी म एक छितराया सा भारी पेड । शायद पीपल है। पूज्ने पर किसी ने बताया- 'पहले यहा कचहरी लगती थी। पर कचहरी का काई आभास कहीं न होता । थोद्य सीध में चलने पर टीन के शडवाला एक ब दरवाना । दरवाने की ऊपरी पटटी पर लिखा है डी ई एस यू 1928 1952-पर यहा भी कहीं काई मानीय आभास नहीं । लौटन पर फिर वही जनशून्य सा अहाता, जिसके सामने तारकोल का पक्का मैदान है। थोडे फाराले पर दिनली के सभी का चौड़ी सड़क तक नाता सिलसिला । यह सडक बिजली के सभों के साथ दूर तक भागती गयी है, जिसपर राजपुर रोड की सुर इमारत हैं। सड़क पर पहिय भागत है, तो पहिर्या के साथ-साथ इमारत भी पूमती रहती हैं। फिर ये पहिये और इमारत तारा को नये सिरे से घर की देहरी पर पर रेत है । देहरी, जो कि तारा के लिए वास्नीय और अवानीय एक्माथ है करें कि ता। दफ्तर के गिक वातावरण की चीर फाड जैसी चीरफाड इस हो की नहीं कर मानी। यह देही तारा का दर्शन-द्वार है। ताग का हाकि आस्था का मनिन । म के । Mबिर अलममित्र । अध्यात्मवार से मडित स्थली । पर कुछ अतिरिक्त भी है कि जिसमे फसकर भटक जाता है तारा का मन । ऐसा कुछ कचोटता रहता है कि मन करता है, अपना परायों को, यहा तक कि नौकरी पेड-डकर सन्यास ल ले वह । एसा तब होता है, जब तारा याददारता की परते उयेड बैठती है। और उन परता में छिप रिख जाते हैं कुछ दृश्य। कुछ घटित । पाद आ रहा है, एक जानकार के यहा से तारा के लिए एक रिश्ता आया था। तारा राजी नहीं हुई - रिश्ता लौट गया । दात आयो गयी हो गयी। पर हमारे समाज मे बहुताहित है, दिखाने की। दिल से कोई आयी गयी नहीं करता । रिश्तेवालो ने भा वही किया, बदला लिया। पहले कुछ पावना भाई पर निकाला । दावा किया । भाई की तनखाह जन्त करानी चाही। पर भाई की तनखा थी नहीं, और वही रकम पता नहीं किस तिकडम रा तारा के नाम लाद दी। और रावी देखिए कि वे दावा भी जीत गये और तारा की पगार रुकवा दी। कान मे पडा कि पगार सूची से तारा का नाम ही नदारद है। एस ए डी ए से जानकारी हासिल करने पर पता चला, तनखाह पाने के लिए नमानत चाहिए। एडमिनिस्ट्रेशन ने इस सहज लेते हुए कहा - 'किसी की श्योरिटी दी होगी आपने ? पर तारा इसे कैसे चलता अफयर मान ले ? उसने अदालती ऑर्डर पढ़ा, और सन्न रह गयी। तनखा पर कुर्की के ऑर्डर । उसके कागज उच्चाधिकारी के पास फर्दर श्योरिटी के लिए भजे गये । तारा की बुलाहट हुई। पर आश्चर्य कि उच्चाधिकारी ने छान बीन किये बिना ही श्यारिटी फार्म पर दस्तखत कर दिये । बोझ हत्का हुआ और वात फैल जाने का डर भी दूर हुआ। तनदाह का मुह दखा तारा न, पर डबडबाई आसां से । सोचा, इतना बझ पाखड? और, कि तारा यदि यह रिश्ता मान लेती और उस पर म आज जैसा कुछ हुआ होता, तो ऐसे लोगों में से एक भी तारा के बारे म एसा न साचता, जैसाकि तारा के बॉस ने सोचा, और किया । पर इसकी तह मे कारण, अधिकारी का विश्वास भी हो सकता है । फिर उस विश्वास को ही शिरोधार्य करते हुए तारा न नियत अवधि में पूर्व ही अपना पर छाड दिया। अब तारा निर्भय थी । उसने जाना कि व्यक्ति को डराता है डर । और डर उसे होता है, जिसके पास कुछ है ? अब तारा के पास कुछ नहीं न पैसा, न ओहता । हा, बेकारी का बोझ है। इस बोझ को उतारना है तारा ने। नये सिरे से कितना हाथ पसार पसारकर उतारा था बेकारी का बोझ । अनगिनत जुनजुओं के बार तफ्तर की मेज-कुर्सी मयस्सर हुई थी तारा को । जिस दिन पहली बार वह कुर्सी पर बैठी थी, कालातर मे ऋषि-मुनिया द्वारा की गयी तपस्याओं के सुने-सुनाये प्रसग याद हो आये थ, दावा/65 कि कैसे वर्षों एक टाग पर खडे रहने के उपरात उन लोगों की तपस्या सफल होती थी। आज यदि तारा खुद को तीते अनुभवों की गर्दो गुबार से बाहर खींच भी ले, तो भी क्या दह यह भूल जायेगी कि कैसी असाध्य रही होगी ऋषि मुनियों के लिए वैसी भगवद्-प्राप्ति असाध्य किंतु मधुर। क्योंकि असाध्य ही मधुर होता है। वे तपस्वी भी यति आज तारा को देख, तो तारा के क्षार क्षार तलुओं, या छिद्र छालों का आकलन कर पायगे वे ? जान पडेगा उन्हे कि सघर्प ने आज के व्यक्ति को किस हद तक छील लिया है, कि शिव-दरबार मे स्वीकृति, या आज सरकारी दरबार मे नियुक्ति - दिना हलकान हुए क्तिनों के लिए सभव है ? अपवाद को छोड़कर - शेष सभी प्रत्याशी हलकान होने वाली श्रेणी से ही सदपित होते हैं। यही वजह है कि विजयी होने के बाद इन्हीं हलकान होने वालों को लोग 'मुर्मू कहते हैं। भाभी भी यही कहती थीं (भाई से)- अपनी बहन से क्हो - ये साना भरपेट खाया करे। साधु सन्यासियों जितना खाने पीने से कोई काम करने लायक रहना भी है ? मैं दफ्तर मे हू न पता है - काम कैसे खून चूस लेता है। 'खून अभी है। तारा भाभी की बात काट देती। 'इसे यह भी समझाओ कि जूता ढग का पहना करे । जरा इसके पैरों का हाल तो देखो। भाभी तब बाटा शूक्पनी का जूता उसके पैरम फिट बैठती, कहती अव चलकर - देखो। - वह पैर खींच लेती 'यह अपने लिए रखो भाभी। ऐसे अवसर पर भैया आ जाते तो कहते- 'तारा, यह ऊबङ खादड जूते तो सच ही पैर छील लगे। बात मानो भैया के आगे उप रह जाती वह । इसलिए भी कि तब भैया की तनसा यर में आती थी । भाभी का प्यान तब उसके पहरावे पर भी गया था। उन्होंने भाई से ढाका और सटाऊ साही लाने को कहा। भाई ने बात की ताई की -'सब, तारा, मोटे सूत से वन पर युमौरिया उतर आती हैं 'रहने दो भैया आत है मुगे। किमी चीज का असर नहीं होता तारा पररान तर, न अब । घर के स्टोव के आगे धुरी हो, या मेज पर - एसको गरन में कोई दर न पडता । कुछ भी गये, 66 निम दिन v सक्कड पत्थर, सब हजम | पर म कही पट्टी रहे, औंधी सौंधी, होती। हा, भाभी का गद्देदार पलग जरूर कुछ दिन रीढ माचुभता रहा था पर बात म वह पलग उसने भाभी के पास भिजवा दिया था। चुभने को रहा ही नहीं । अब तो - यो भी सध भाई के हाथ है, और भाई तो गगा ही दूसरी बाते है। सस्ता दालरोजी । महगे बिस्किट । तारा को कहना पड़ता है - 'यह आप लोगों के लिए है। - कम्मो को खिलाय ,खाई नहीं जाती ये चीज उससे। दफ्तर मे गेहू के गस्से आम रस से निगलती है, पर घर पर वहीं आम उसे गर्मी करता है। -सुनकर भाई मन मसोसते कहते हैं - 'हा, गर्म तो है आम । तारा कैसे कहे कि मौसम की गर्मी से कई गुना अधिक गर्मी कहीं भीतर सालती है उसे ? और वह इससे बच भी नहीं पा रही कि सबके उठने की राह मे तारा ही दीवार जैसी उठी खडी है सबकी तरक्की की राह उसी ने रोक रखी है। उसी की वजह से परिवार के अन्य सन्स्य दयनीय-से हो आये हैं। सच, एक भाभी को छोड सभी से टकराई है तारा । भाई क्यों तारा को वक्त पर खान की हिदायत करते हैं? बितो क्यों उसकी निखरी खाट पर दरी की तह जमा देता है ? उसकी चारपाई पर कभी ऊय जाती है, तो वह क्या कुर्सी पर ही झूलता रहता है ? इन बाता पर कभी तारा जुसलाय भी, तो दिो और बडे भैया मुह बाय एक दूसर को देखने लगते हैं। आज यही हुआ, मदिर से परत कर आते ही तारा सहसा झुझलाई . 'मेरी चपला को कोई न छुआ करे । आखिर क्या पहनकर मरिर जाऊ ? देखो, ये पैर ।' दोनों भाई एक दूसरे को कैफियत तलदी जैसे भाव से देखकर मानो बोले थकी आज ' तारा को भी महसूस हुई थी थकान, पर रोज यह थकान भी भली ही लगती थी। फिर आज ही क्या पैर मनों भारी लग रहे हैं जबकि राधा जी के पैर तो कितने कोमल सुर महावर रगे-से थे। कृष्ण जी के उठे हुए पैर भी उतने ही लचकदार रजित। वैसा ही पहरावा । दोतरफी शीशों के बायस कतारों कतार चौषियाता सौंदर्य आश्चर्य कि रोज की देखी जानी ये मूर्निया आज तारा के लिए एक अनुभव बन गयी हैं। अनुभव, जो किसी को अपन प्रिय के प्रति अभिमान प्रकट करने को प्रेरित करे। तारा ने जडित शीशे मे तब सुद को भी देखा था, और भारी मन से सीढिया उतर आयी थी। सतोप असतोष के पलड़े में झूलती तारा सहसा कर्बला की मोड पर रुकी । सामने - दावा/67 से ठडे पानी की गाड़ी को ढलान पर ठेलता एक युवा गुनगुना आया - 'दुविधा को धारा से अव तुम्हीं मुझ निकालो। मार्केट के चौराहे से युदा ने गाई त्यागराज मार्ग की ओर मोड दी। साथ ही गुनगुनाहट भी दव गयी। पर तारा की चेतना आज ददी नहीं । शाया कि व्यक्ति सता सोया नहीं रह सकता । ध्वनिपूर्णता और ध्वनिहीनता की सतगता लिय जीता है। पर आ गया। बिंटो कम्मो को प्राब्लम समझाता रजिस्टर मे उतारता जा रहा था। 'यह रजिस्टर तो मैथ्स का है। तारा ने टो। 'मैडम ने कहा था कम्मो सकपका सी गयी। 'मैडम ने स्कूल रजिस्टर मे भाई की लिखाई भराने को कहा था ? झल्लाकर बिनो ने तड से वह पन्ना फाड डाला । 'जब तक रजिस्टर से पन्ना अलग नहीं होगा- इन्ह चैन थोड पड़ेगा। वितो ने कुर्सी अधेर मे खींच ली । कम्मो ने आखे किताव पर गाड लीं। बड़े भाई थे, अपर चलकर आराम करो। तारा अदर गयी तो भाई ने खाने को कहा । बोली, 'नहीं। 'वजह? 'डॉक्टर ने वजन बनने को मना किया है। आप नाराजी की वजह मान रहे । पर 'नहीं। मैं कम्मो की बात कर रहा था कि एक मे मन नहीं लगा-- दूसरा रजिस्टर ले लिया । इसके अलावा तो कभी तग नहीं क्यिा उमन, कि लडकिया जैस सखी-सहलियों स चख-चख करती हैं। वीडियो क पास बैठी गानों की सुरे मिलाती हैं । बेचारी बच्ची है, उसी गुस्सा । गुस्सा, मालूम है,तुम्हारे लिए नुकसानदेह भी है ? 'नुकसान तो हो लिया । फिर, उस पर इतना बात-बतगड? बोली, "मैंने इतना ही तो कहा था कि पैसे के मामले में लापरवाही टीक नहीं। मा होती तो कहती कि नहीं कि अब कम्मो के भले-बुरे की जिम्मेदारी क्सि पर है। अचानक तारा के सामने एक साफ शफाक सवाल तिर आया, 'जैसे अपन भले-बुरे के लिए जिम्मेदार तुम भगवान को मानती हो। और खाने से इन्कार भी क्या इसीलिए नहीं किया था कि तुम भगवान से रूटी थीं ? तुमने उन्हे उलाहना नहीं लिया था कि वे सुर पर कितने उतार हैं और तुम पर कृपा करने में कितनी किमययत से काम लिया था 68पनी स्थिति अनिन बित भगवानन? और नहीं तो क्या? - तारा ने कहा, और अपर में भगवान के सामने खड़ी रही 'निस पर यह भा चाहते हो, तुम पर किमायती होने का दावा भी न करू मैं ? आसुओं से भरा आख लिये तारा नीचे कम्मो और बिली के पास बैठ गयो। दावा 169 से ठडे पानी की गाडी को ढलान पर ठलता एक युवा गुनगुना आया - 'दुविधा को धारा से अव तुम्हीं मुझे निकालो। मार्केट के चौराहे स युवा ने गाडी त्यागरा1 मार्ग की ओर मोड दी। साथ ही गुनगुनाहट भी दव गयी । पर तारा की चतना आत दबी नहीं । शाय' कि व्यक्ति सा सोया नहीं रह सकता । ध्वनिपूर्णता और प्वनिहीनता की सजगता लिय जीता है। घर आ गया। विटो कम्मो को प्राब्लम समझाता रजिस्टर में उतारता जा रहा था। 'यह रनिस्टर ता मैथ्स का है। तारा ने टाका। 'मैडम ने कहा था कम्मो सक्पका सी गयी। 'मैडम ने स्कूल रजिस्टर मे भाई की लिखाई भराने को कहा था ?" झल्लाकर बिनो ने तडस वह पन्ना फाड डाला । जब तक रजिस्टर से पन्ना अलग नहीं हागा - इन्हे चैन थोड पड़ेगा। दिदो ने कुर्सी अपरे मे खीच ली। कम्मो ने आख किताब पर गाडी । बडे भाई थ, अदर चलकर आराम करो। तारा अनार गयी तो भाई ने खाने को कहा । बोली, 'नहीं। 'वजह? 'डॉक्टर ने वजन बाने को मना किया है। आप नाराजी की वजह मान रहे 'नहीं। मैं कम्मो की बात कर रहा था कि एक म मन नहीं लगा - दूसरा रजिस्टर ले लिया । इसक अलाया तो कभी तग नहीं किया उमने, कि लडकिया जैसे सखी-सहलियों से चख-चख करती हैं। वीडियो क पास बैठी गानों की सुरे मिलाती है । बेचारी बन्ची है, उसी पर गुस्सा । गुस्सा, मालूम है तुम्हारे लिए नुकसानदेह भी है " 'नुकसान तो हो लिया। फिर, उस पर इतना बात बतगड ? दोली, "मैंन इतना ही तो कहा था कि पैस के मामले में लापरवाही टीक नहीं। मा होती तो कहती कि नहीं कि अब कम्मो के भल बुरे की जिम्मदारी क्सि पर है ? अचानक तारा के सामन एक साफ शफाक सवाल तिर आया, जैसे अपने भन्न-बुरे के लिए जिम्मेदार तुम भगवान को मानती हो । और खाने से इन्कार भी क्या इसीलिए नहीं किया था कि तुम भगवान से रूटी थीं ? तुमन उन्हे उलाहना नहीं गया था कि वे सुर पर कितने उतार हैं ? और तुम पर कृपा करने में कितनी किफायत से काम लिया था 68 पनी स्थिति निम यिार

-
भगवान ने
और नहीं तो क्या? तारा ने कहा, और अधेर में भगवान के सामन खड़ी रही
तिस पर यह भी चाहने हो, तुम पर किफायती होने का दावा भी न करू मैं ? आसुओं से
भरो आखे लिये तारा नाचेकम्मो और विंटो के पास बैठ गया।
दावा 69

ठीक-बेठीक के बीच घी मे पाच बजे थे। चित्रा और श्रीनाथ मे से एक को भी दह्य न देखकर अमृता ने पैर जीने पर रखा कि सुन पद्य, 'सिर्फ आप घटा लेट।" अकेली? क्यों ? -तुम्ह तो श्रीनाथ लाने वाला था न' 'फोन आया था कि लेने आऊ ? पर मैंने कहा, तुम खुद वक्त पर पहुच जाओ, काफी है।" तभी गेट पर आवाज हुई 'कॉफी हो या चाय, समझीं । शेर लोग किसी से पीछे नहीं रहते। ये तो जनाब, स्कूटर किसी और का है नहीं तो बदा वक्त पर ही रफ्तार पकडता है। फिर स्कूटर रखते हुए श्रीनाथ ने एक अदद आवाज ऊपर भी फेकी, “ओ श्रीमती ऊपा जी । तुम्हारी ननद तुम्हे मुबारकबाद देने आयी हैं । इनका बाकायदा स्वागत करो। आवाज पर ऊषा और बेटा बालकनी से नीचे झाकने लगे। चित्रा और अमृता को देखा तो सीढियों की ओर आकर ज्या ने दोनों को गले से लगाया, “सगाई से पहले मैं आयी थी, पर दोनों में से एक से भी मुलाकात नहीं हुई। बद्दी व्यस्त है, मैंने टीक शब्द चुना कि नहीं। ऊपा हसन लगी। "काम काजी नन कहो न भाभी। चित्रा ने वाक्य पूरा करते हुए कहा। “ऐसी बात नहीं ऊया, मा को बारी बारी से देखना पड़ता है, तो एक भी नहीं आ सकी। भाभी ने हसते हुए कहा, 'भा के पाचों बेटे ब्याहे गये। पाच बहुए हैं । बारी-बारी से पास रखकर सेवा करती रहगी । तुम अपना ठिकाना टूट्ये । नहीं अमृता दी ?" दोनों नन एकसाथ हसी । फिर चित्रा ने धीरे से पूछा, "क्यों, टिकाना कोई लिस्ट मे है भाभी nol अर्थ जानकर भाभी ने कहा, 'तुम हमी भरो तो लिस्ट में नाम ही नाम लग जायेंगे। बात हमी की चल पड़ी तो वित्रा ने पूछ, 'अच्छ, भाभी, निम्मो ने क्या हामी भर दी थी? "निम्मो की छेधे तुम । अपने भाई को नहीं जानती ? वह इस मामले मे क्या निम्मो की सुनता ? अरे, वह तो किसी की बात की परवाह न करे । फिर निम्मो की उग्र ही अभी क्या है ? अभी पिछले साल तो टेन प्लस-टू मे आयी है। यह तो लडके वालों का ही दबाव था कि मुह मीय करा दो, सो हो गया। ऊषा दोनों को साथ ले गयी, और अदर से कूजा मिश्री का टुकड़ा उठा लायी, 'लो, मुह मीठ करो। “न । इससे मुह मीठ नहीं करेंगे हम । चित्रा ने मुह फेर लिया, “जबकि समधी, सुना है, मिठाई भरी तब्धिया ले गये हैं।" "अरे बाबा बैठ तो भाभी ने दोनों को जबरन सोफे मे घसा देते कहा। “सास लो। पानी पिओ वह सब भी होगा।" "क्यों नहीं होगा? लेगा जरूर होगा!' कहता हुआ श्रीनाथ बैठक मे पहुचकर बहनों को कयों से सोफे मे ठीक से घसाने का नाटक करता-सा हसने लगा। फिर एकाएक गभीरता से भर आता वह बोला, “क्यों, चित्रा, कमरा अबकी कैसा जमा है। अमृता ने गौर से देखकर कहा, "ह, लगा तो करीने से है। और यह सोफा, नया लिया है 7 बात पूरी होने से पहले ही श्रीनाथ कह पद्य, “ऊपा ही कहीं से उठ लायी थी, फिर वेक पीटकर कारगर बना दिया। है तो कारीगर औरत थोड़ी देर पहले वाली श्रीनाथ की गभीरता ने अब उपशमता का जामा ओढ लिया। ऊपा कितु भनक पा चुकी थी, अत चाय बनाते बीच कहा, "इनकी तो बाते ही ऐसी क्षेती हैं- उव कहा से लाना था ? सोफा भाई का है -रवि का श्रीनाथ ने फिर बीच मे काट दिया, "पालतू पध था, सो पारों ने मार लिया।" स्पष्टीकरण करते हुए ज्या को कहना पध, “तुम्हीं बताओ चित्रा, कि घर मे कोई चीज फालतू होती भी है ? यह तो रवि ने ही कहा, कि ऊषा, अव निम्मो के रिश्ते की बात चल पीयर से लोगों का आना जाना रहेन। यह सोफासेट ले जाओ। और " " सबके - । वाकई चित्रा, तब से कोई न कोई आया ही रहता है। अब कृष्णा दीदी का लडका ही शिमले से आया हुआ है, बटी अपने बटी को तो जानती होन। अपना नाम कान मे पड़ने पर बटी भीतर झाका तो ऊषा बोली, “लो, वह आ ही गया। अमृता और चित्रा ने एक नजर शाक्कर पाया, बटी लबा हो गया है। ऊपा ने बटी से बताया, 'ये बड़ी है, अमृता दी नहीं पहवाना पहचानोगे कैसे? मैडम फैमिली प्लानिंग जो बन गयी हैं। "पर चित्रा आटी को तो पहचान लिया । "हा, उसको टी०वी० पर जो देखते रहते है।" ऊपा ने कहा और बटी के हाथ मे लिफाफा देखकर उसे खोला, सदेस है। सदेस प्लेट मे परोसते हुए ऊपा बोली, 'लो दीदी चित्रा तुम भी – मिवई से ही मुह मीठा करो। फिर वह बटी की बात ले बैठी, "लडकी दिखाने के लिए दिल्ली बुलाया है । पसद आ गयी इसे, तो जल्दी ही शादी भी कर देगे। “अभी कम उम्र नहीं, बटी।' अमृता ने जिज्ञासा प्रकट की। 'कम उम्र कहकर आपने मित्रा को तीस पार करा दिये, और आपको तो कुछ कह ही नहीं सकती मैं पर चित्रा के तो कब की मेहदी रव जाती।' ऊया ने कहा। 'चित्रा लेकिन वह माने तब न? ऊपा बोली, 'माने, जो कोई जोर डाले। मा ने जोर डाला, तभी आप मुझे देखने आयी थीं, यह आपका भाई तब बीस-इक्कीस का खेगा। नहीं? ऊषा हर बात के साथ हुकारा भरवा लेती है। नहीं तो अमृता जवाब देती - 'दूसरे भाई ट्रासफर होकर चले गये थे, और मा के पास श्रीनाथ की बहू की दरकार थी। इसी बीच कौतूहलवश बटी कह पथ, “आटी, मैं तो अभी उन्नीस ही का हून? “उन्नीस का ही सही, पर पसद आने पर लड़की वालों को तो कहनी ही पड़ेगी। अब अपनी निम्मो का ही लो, उन्हे पसद आ गयी, तो सुर ही पक्का करने की उतावली पड़ गयी उन्हें । और हमारी भी फिकर कम हुई, कि चलो, सध्या अच्छा मिल गया।' ऊपा दामाद का फोटो उठा तापी । पल्लू से फोटो को पोंछते हुए, बारी-बारी से अमृता और चित्रा को दिखाते हुए कहा, "हमारी निम्मो से भी ज्यादा स्मार्ट है लड़का अभी और कई खूबसूरत तस्वीरे हैं -एलबम मे निम्मो साथ ले गयी है। "निम्मो दिल्ली कब आयेगी चित्राने - 1 पूछा 72/पनी स्थिति अनिम स्थिति "बस, यही पारहो के इस्तिहान के बाद । बाद में, यह महेन्द्र पर है, उसे बारहवा कराये न कराये। हम तो कहेंगे, तो तगी मे सही, शादी की तैयारिया करनी ही पडेगी। अमृता करना चाह रही थी कि एका भी तो नो सकता है, पर ऊया अब तक अपनी तगी का ब्यौरा देने लगी थी कि तगी तो अभी और सहनी है - इधर निम्मो के बोडिंग झउस का बिल चुकाया, कि उधर जेटू और गोगी की नयी क्लासों की कॉपी किताबे-पीस--और इस बार तो नयी इसे भी, कि पिछली से एकदम घेटी हो गयी है। जिक्र आते ही उषा ने बटी से पूज, 'गोगी नहीं दिख रध । क्यों, गोगी को कहीं घेड आये थे। "ह, मार्केट में रुका है, मेरी पततून लन का लो, आ गया वह पर्दा हटाकर गोगी ने कहा, “वटी दा, पतलून प्रेस होने में अभी आधा घटा और लगेगा।" श्रीनाथ ने लपककर गोगी को पीठ के बल घुटनों पर लेते वहा, "बल्लू । बटी जो आइसक्रीम और कोक दिलवाता है तुम्हे, इसीलिए उसके लिए तुम मार्केट के चक्कर काटते नहीं थकते।" गोगी ने खुद को धीरे से अलग किया तो श्रीनाथ ने कहा, अकेले-अकेले जलेबी और सदेस भी उद्यते खे? और बटी जो तुम्हारे अमीर मौसी मौसे का बेटा है, तो लाड तो लषयेगा ही।' वटी ने श्रीनाथ के मूड मे देखा, तो एक लिफाफा श्रीनाय को थमा दिया, “अकल, देखिए, अच्छी है।' श्रीनाथ न लिफाफा खोलकर देखा - 'जुराब । देखते ही श्रीनाथ का रंग लाल हो गया। "तुमसे रुका नही गया गोगी ? कल इससे अच्छ, सर बाजार से मैं ले देता तुझे 'यह मैंने लिया है। अच्छा नहीं तो वापस हो जायेगा अकल!' बटी ने श्रीनाथ के तपे और गोगी के सकपकाये-से चेहरे पर एकसाथ नजर दौछते कहा। “सदर बाजार से छ सवा छ मे बढिया मोजा आ जाता। "बुरा यह भी नहीं है अक्ल । और साढे छ काही! महगा कख है? बटी ने श्रीनाथ का खास विरोफ-सा करते कस, "अकल, आप वाकई उतावले हो उठते हैं। फिर मौसी को पुकारा, "आटी, आप इन्हे ठडी कोक पिलाइए। ठीक-ठीक के बीच सुनते ही श्रीनाथ का उपान दद-सा गया, तो गोगी की दबी सास भी उभरी । इस तरह बात रफा दफा धेने पर बटी ने कहा, “आटी ! मैं रवि मामा से पूछकर पता लगा लू कि महेन्द्र कब आ रखा है। "क्या कह रहे हो ? क्या महेन्द्र आ रहा है ऊया को जैसे हाथों-पैरों की पड गयी हो। पर श्रीनाथ ने ऊया की बात पर ध्यान नहीं दिया, वह चित्रा से गोगी व छोटे की पढाई की बाते ले बैठा । फिर एकाएक क्या सूझा कि गोगी की काबलियत सप्रमाण देने को उछल पड । कहा, अरे गोगी शाह । अपनी बुआओं को, एक एस्से तो सुनाओ, अपना । दह श्रीमती गादी वाला। थोद्य आराम करने दो उसे, अमृता ने कहा, 'यही बहुत है कि टीक से पढ रहा है वह। 'ठीक-वेठीक की यहा परवाह नहीं जनाब । श्रीनाथ फिर शेखी बघारने की खुमारी से भर गया । 'न ही हमने थोडे बहुत का ख्याल किया है कभी देखो, कि थोडी-बहुत चलते ही एक कोठी तैयार हो गयी । फिर इसी थोडी थुड मे यह छुटके शाह अवतरित हुए। और इस थोड-थुड के चलते ही निम्मो की सगाई हो गयी। इस ठीक बेठीक मे ही उसकी शादी भी हो जायेगी। और यह ठीक बेठीक तब भी चलता ही रहेगा। अपने ऊचे ठहाके के बराबर का ही जोरदार हाथ श्रीनाथ ने गोगी की पीठ पर आजमाया, और सुद ही उसे दरगुजर करने वाले अन्ज मे गोगी को जैसे दिलेरी का सबक पद्यते हुए कहा, शेर बच्चे, उठ। उठ खडा हो जा-सुना दे।" पसोपेश में पड गोगी उठने को ही था कि श्रीनाथ ने उसकी कलाई कसकर उसे सीधा किया, 'ये हा, यह हुई न हिम्मत । अव सुना डल अमृता के दोबारा रहने दो' पर भी नीनाथ हिचकर नहीं, बल्कि दुगुने उत्साह से कहा, 'दस मे से आठ नबर मिले हैं, इस एस्से मे इसे।" गौरवान्वित होने जैसी भावना के वश उसने गोगी को सदेग शक्झोरा क्यों थे। यही एस्से पूरी क्लास मे अव्वल नबर पर रहा था कि नहीं ? और गागी को स्वीकारना पछ-'हा, साथ ही प्रत्याशित प्रोत्साहन से शेपने और झुकने के बावजू उसने उतावली में एस्से की पहली पक्ति साहसी तोते जैसी उगल डाली, नीमनी गायी वाज प्राइम मिनिस्टर ऑफ इडिया । हा यह हुई न दात। आगे n " अद आगे 74/पनी स्थिति अनिम स्थिति । । आगे सुनाते समय गोगी जहा जहा रकता, वहा से बीच-बीच म सिरा टटोलकर उम आग बढना पडता । और उनब एसा होता, उसरी वाह पर श्रीनाथ की जकड और अधिक कस जाता। व पडित जवाहरलाल जी की पुत्री थीं। बचपन स हा चतुर, देशभक्त, निर्भय और साहसी थीं । वह तेरह मास जल मे रहीं। श्री लालबहादुर शास्त्री के मनिचकाल में वह सूचना और प्रसारण मत्री रहीं। उन्होंने जनवा । नीतियों को आगे बद्यया । राष्ट्रीयता की भावना से प्रेरित अपने एक भाषण मे उन्होंने कहा कि उनऊ रक्त की एक-एक वृ भी पनि राष्ट्र के काम आय, तो उसे देने मे वह नहीं हिचकेगी। वह देश के लिए शटी हुई। इदिरा गाधी अमर हैं। निवध की समाप्ति पर दाना बुआओं द्वारा ताली पीट जाने पर गोगी लज्जा और गई से शुकता गया । और बुआए भी निश्चित हुई कि चलो गोगी को छुट्टी मिली । पर शिमा प्रसग की इति हुई नहीं, कि निबध की इति से अति हर्षित होकर गोगी को श्रीनाथ एक नया हुक्म दे बैठा था कि गोगी वह चिट्ठी पढकर सुनाये, जो उसे लिखने को दी गयी थी। - 'राइट टू यूअर आटी, बैंकिंग हर फार द गिफ्ट शी सैंट यू । चिटटी के प्रस्ताव पर गागी हिचकिचाया, फिर साफ मना कर दिया, 'नहीं आता। जाता कैसे नहीं ? अभी कल तो सुना रहे थे। श्रीनाथ ने गोगी को साहस ही नहीं बधाया, बल्कि बीच-बीच की सुर्सिया बतानी शुरू की, 'इट बाज ए ब्युटीफुल वाच । इट सेड मी इन मार्द एग्जाम्ज । एवरी फ्रैंड ऑफ प्राइन लाइक्ड इट रुक रुककर पूरे अपूर वाक्य दोहराते हुए गोगी बीच-बीच मे 'हर' को 'हिम' कह जाता। तब श्रीनाथ उसे 'हर' और 'हिम का प्रयोग भेट - यानी जेडर भद बताने लगता कि 'हिम से चिटठी अकल को और 'हर लिखने से आटी को सबोषित की जाती है। पर बीच का पूरा मैटर ज्यों का त्या प्रयोग होता है। और जेडर को लेकर श्रीनाथ गोगी के साथ तब तक खपता रहा, जब तक उसने जेडर भट गोगी के दिमाग मे घुसा नहीं दिया। माहौल को हल्का करने के प्रयास में चित्रा ने पूछा, “वैसे कितने साल का है यह अक्तूबर मे दस का हुआ है। गोगी के सिर से जैसे भारी बोझ उतरा हो । कुछ इस तरह हुमककर उसने घुटने ठीक-बीच क बीच/75 रल दवा मोन का लवर उतार गिराया और मोना पैर पर चढ़ने लगा । श्रीनाथ भी स गागी म निवृत्त हो चुरा, कुछ इस तरह उमने दगल म दुवक हुए छुटक की ओर तारा, और अपनी होगना बुल आगज २२ उपयोग करते हुए कहा, 'क्यों भई छुटके । तुम बुआ को अपनी गिनती नहीं सुनाआगे? गाला में सिमटा हुआ धुरा वारी बारी से कभी दुआओं को और कभी श्रीनाथ को दनुन लगा। लीनाथ न एक माटा आश देते हुए उम गोली से अलग रिया और कहा, 'सुनाजी गिनता । यह सिक्का । हा अठन्नी मिलगी।" श्रीनाथ ने मुट्टी गालकर अठन्नी दिखायी छुटकापली पर चमक्ता गाल अठन्नी पर आस टिकाय कुछ दर देखता रहा, फिर धीर धीरे गिनती शुरू की। गिनती के दौरान हुनका तीस, इकतीस पर ही पहुचता कि फिर चालीस, पचास या सत्तर पर पहुच जाता । एसा बार बार हाता, और श्रीनाथ को दिमागपच्ची करनी पडती । लीफ दर सीक करके समशाना पडता कि कैस एक दशक के वाट दूरार दशक पर पहुचा जाता है। अपनी महनत पुचकारे या अठन्नी का चुबक काम न आने पर श्रानाथ का उत्साह नाता रहा । माथ पर न सिर्फ वल उभर आये, वरन् उपा को भी कोसे बिना नहीं रहा गया उससे। - 'मैं दिन भर दफतर म सिर खपाता है और यह पर पर रहते हुए भी ध्यान नहीं देती। जबकि इम्तहानों में सिर्फ एक हफ्ता रह गया है। मेहनत न कराई गयी, तो इस पहली में कौन लेगा ? पूरा साल, और साल की फीस भी जाया जायगी। पर फीसे कौन मैडम की जेब से नाती हैं। उषा को लभ्य बनाकर कही गयी श्रीनाथ की उनि पर दोनों बहने शर्मसार सी हो उठी कि बातों की भाप ऊपा तक पहुची तो क्या सोचेगी ऊपा, कि ननदे बैठी बैटी भाभी की बुराई सुन रही है? पर इस शर्मसारी को तब दूर किया बटी ने । वह महेन्द्र का प्रोग्राम बता रहा था कि कब आयगा । बटी की आवाज पर रसोई से ज्या भागी आयी और पूछा, आने का तो पक्का है न? 'बिल्कुल पक्का आटी कै बजे? ऊया व्यग्र हो उठी। 'वह नहीं मालूम। 'ले, तब क्या पता किया? 76पनी स्थिति अनिम स्थिति आ जायगा । श्रीनाथ ने वड सहन लेते हुए कहा अभी सवा सात ही - पर सही वक्त ता मालूम हाना चाहिए, तब फिकर नहीं रहती। हम क्या फिकर काना है, उस गाड चढाना है? वटीस फिर बीदवार का कूट गया - आटी, वैसे महेन्द्र को ऊपर आने को कुछ है नहीं । गरि मामा क आत हा नीच स हा जाना है। - अशोका मे डिनर । और फिर मैफर शाम पिक्चर।" तुम्हारा प्राग्राम तुम जाना, पर दामात जव मसुराल आ रहा है, वह भी पहली बार ता रयाल ता हर तरह स रखना होगा न कि कच्चापन तो मामला बिगाड देगा। दान उपा को चिरया - आआहा । कच्ची सगाई वटा का सुनाकर ऊपा सकुचायी सा कह आयी 'वन्यू इस कच्ची मे ही अभी सात महीन और निकालन है। वटी के जाने के बार भाभी, मगाई का पूरा किस्सा सुनाते हुए कान छूती रही और गिनाती रही कि किस-क्सिको क्या रिया । बोली 'लोग कहते है आजकल दान दहेज नहीं रहा । पर यह देखो कि कितन आयोजन करने पडत हैं। और वह भी तो पैसे ही की जातिशबाजी है । फिर कितना तो अपना को ही एकजुट करने मे झेलना पड़ता है। दी.तुम तो कैंप पर थी, पर चित्रा स पूछो कि जेठ जी और ससुर जी को कितने तरला से राजी किया था। पैरों में सिर देकर अपन रिश्त का वास्ता दिया । कहा जैसे मान से मेरी डाली घर लाये थ, वैस ही पोती के भी महावर रचानी होगी इससे पहले डोली उठेगी नहीं ? तो मुझ बेटा के हवाले रिये बाबू जी ने अनन्खी करते हैं मेरी। मैंने कहा - " बेटे नालायक हैं, पर बहुए तो नहीं ? मुझे बहुओं का कसूर बताओ? नीनाथ घर की फूल-फाक छाडकर ऊषा की दान देने आन खड्झ हुआ -- 'हौसला अफजाई क्गे ननदो । करो। भाभी का पेट भरो। उसने कहकहा लगाया। फिर कहा- औरत इन मामला मे वाकई हाशियार है। इस फूफा के जवाब मे ऊपा ने भी कुछ जोशीली आवाज मे ही जवाब दिया 'फालतू की जंग बघारने स पर नहीं चलता, साहब जी । यह होशियार औरत ही है, तो आपस गुजारा कर रही है। श्रीनाथ जोर से मुट्ठिया भींचकर कसमसाया 'यह जालिमाना दाते बन करो मिनी - तुम्हारी यह चाक चौबती दामाद ने सुन ली, तो सब चौपट हो जायेगा। - ठीक-बठीक के बीच/77 - - " तमा का नाम आन पर ज्यान मार का पूरा पाया ज्यते हुए स्टील का डिन साधिकार धानाय को थमात हुए डिन्य को रसमलाई असि भरदा सान का अश देकर श्रीनाथ का सीठियों की ओर माह लिया। दामा के आन और जान के बीच का समय तक निहायत मधुर, सपत और मुगल बना रहा । दामा- जब तक नीच गरि के साथ सा, जा रेलिंग से मामा कर दपती रही। सब चल गये तो, यह रोटी पर आन बेटी। रसमलाई गगी के लिए निचलने क बल, छुटके का पुटने पर गीचर उस गिवान सगी । मु” कतली मे बची हुई कॉपर उटना । दामाद का गित करके श्रीनाथ असर आया तो हकी मौज म था । उपा का कॉफीपत दगा ताकमा 'इस औरत स जितनी चाही कॉफी पिलग लो।" फिर हायों का गलाकर बनातहा कहा- पायाक यह • या कुपा हो रही है मैडम" आप से कम गाती हूासा, देवर मून नहीं जलाती -- और काटा भी नहीं बनती आप सा 'माने, मैं काटा हूँ। दूढ मगन ? जानती है काटा किसे कहत हैं ? मैं फोजी ह फौजी श्रीनाथ ने कहा और आनन-फानन म चुस्ती स सारे पर को फिर वैसा ही चुस्त दुरुस्त सवार दिया । दैड कवर की सलवट तक निकालना उसी नजर से नहीं छूटा। जितनी देर ऊपा रसोईघर म रही, श्रीनाथ फुनी से फर्श पर विरारा एक-एक तिनका चुन कर यथास्थान लगाता रहा । चित्रा का पर्स अलमारी म परते वक्त दिखा सटी के नीचे गोगी का जूता । आग-बवृला होते कहा - शू रैक किसलिए है ? कहत हुए शू रैक में जा धरा । फिर कि- "मुझे क्या देख रहा है अब जा क्पडे बल। अबकी शायद गोगी से उतारी हुई टी-शर्ट सेटी पर छूट गयी थी । श्रीनाथ ने लक्ष्य किया, तो गरज पद्य - अब यहीं डाल दी - यह टी शर्ट और यहीं पड़ी रहेगी ये।" आवाज पर ऊषा आयी और गोगी को अलमारी की ओर भागते देख कर टी शर्ट उसक हाथ से लेकर हैंगर पर टागी, और गोगी की पीठ पर हाथ धरे उसे साथ ले गयी। अब सुन पड चलो, खाने बैटो। श्रीनाथ नै फोरिडग कुर्सिया टैरेस पर खोल दी। टैरेस की दीवार वाले होल्डर मे एक नया बल्ब लगाकर-बटन दबाया, और कहा- जाये। 'नहीं, सब दही खायेगे। । 'यह जूता पटकने की जगह है। जूता श्रीनाथ ने । 'चित्रा, तुम जहा चाहो, खाना वहीं सर्व किया 18/ पस्थिति अनिम स्थिति है and - भेज पर दोनों बहनों ने देखा, स्टील की कटारिया रश्शनी में धर्ममा रही हा गर्म सालन का भगौना ऊषा नै कटोरदान पर धराशी श्रीनाथ ने टिप्पणी की यह.. ढग है? सञ्जी कटोरदान मे भरी गयी देखते समय श्रीनाथ को खुली किताब आखों आगे लिए दिखा गोगी । “यह पढने की मेज है / फटकार के साथ ही किताब छीनकर बैध्य में। फेक दी गयी [-- "खाने का वक्त होता है, तो किताब खोल लेता है, फिर पबई के वक्त बजाता है डडके।" गोगी की दोनों बाहे झटक दी गयी उठाओ प्लेट प्लेट म सालन चपाती रखते समय गोगी के हाथ कापने लगे। अब सब -- एकात चुप्पी मे चल रहा था कि सहसा श्रीनाथ ने गोगी की प्लेट पर नजर दौड़ाई - "अभी एक चपाती भी नहीं खायी एक और लो। ऊया ने उस देखा - क्यों मजबूर करत हो?" ताव खाता उठ रहा था श्रीनाथ, तो दिखा, कटोरी अभी सब्जी से भरी थरी है। खुट पर काबू नहीं पा सका। पूछा 'कौन खायेगा यह जूठन ? ऊषा ने आनन फानन मे सालन की कटोरी अपनी ओर खींच ली। और यह चपातिया। "यह भा खराब नहीं जायगी। ऊषा ने दो चपातिया और उय ली। चित्रा बोली 'हा, बच भी जायेगी, तो सब सुबह नाश्ते मे ले लेगे।" खाना जूठा पडा रहे, यह मुझ बरदाश्त नहीं। 'बरदाश्त शब्द से भयभीत गोगी धीरे से उठ गया । जभी सुन पद्ध अब जूठे बरतन यहीं छोडे जा रहे हैं। गोगी सहमा सा बरतनों की ओर पलटा, तब तक बरतन उचय जा चुके थे। अमता गोगी को साथ ले गयी किंतु श्रीनाथ की भभक ने वहा भी पीज नहीं छोड आइना, मेहमानों के पास कोई काम नही तुम्हारा कि अट सट इस लो, और खाना झक मारता रहे । मेहमानों के कमरे के पास से गुजरने की जुर्रत तक न करना कभी । समो। कहते हुए श्रीनाथ कमरे मे पहुचा । उषा भी आपी और गोगी को अपने साथ सटाये सटाये बोली- 'समझ गया है, अब उसे सोन दो । साक्षी जुटाने के तौर पर दोनों बहनों की ओर ताकते हुए श्रीनाथ बोला - 'काई कायना कानून, मैनर्ज न कभी सिखाया -नसिखाने देगी। ऊपा से और सयत नहीं रह गया। कहा "जूठे बरतन नहीं उअये न ? मैंने मुडु - ठीर-बठी बीच 79 - - नहीं बनाना - इन्ह । न ही कोस कोस कर गून नलाना है। 'दून तो तुमन मग जलाना है और इन्हें मुड़ भी क्यो बनाना है तुम्न दुरस्त मुडु तो तुन्हे मिला ही हुआ है। श्रीनाथ देर तक चीखता रहा, और घर को दुहारता भी रहा। बैठक जमाता रहा, और फिर बैड स्म के बटन पर हाथ आन पग । सहसा बब जल उटा और यहा भी लिख गया, मुह के आग लुलो फिनाद लिय - पढना गांगा। यह दही किताब थी, जिसे कुछ दर पहले गोगो से छीनकर श्रीनाथ ने इथर फेवा था । श्रीनाथ एकाएक चिलाया 'लो - आकर देख लो अपने हानहार का सुपड़ताई कि कैस इनरी पाई अधरे मे ही चल रही थी? ऊषा आ गयी तो कहा 'पर कहा है फुरसत तुम्ह इधर ध्यान देने को ? तुम्ह तो ध्यान देना है, मरो वेदन्नती करने पर। 'पही है इज्जत करान का तरीका? जोर से चीखना? ऊषा की आख डबडबा आयीं 'कि डर के मारे सबका सून ही सूख जाये? ~कहते कहत ऊपा की आवान रथ गयी ।- 'तुम्हारे लिए ही चीखता हू बडे होकर तुम्हीं पर थूकंग। 'पर तुम तो अभी से थूक रहे हो ऊपा सिसकने लगी और सिसक्ते-सिसकते गागी से चिपरती वहीं सो गयी। - - देर तक श्रीनाथ सदको तक्यिा, गद्दी चद्र ओढन आनि देता - बचों को उठाकर अलग सुला आया । पानी की टको भग्ने को छोड खुद बच्चों वाली सटी पर पड़ा रहा। बाहर हवा सनसना आयी । हवा में मिट्टी और पानी की गए । श्रीनाथ फिर उटा और टैरेस की एक-एक चीज छज्जे तक खींच ली । पानी की टोंटी बर करके आया, तो छोटे की घरघराती सासा न कान भारी कर लिये। विक्षिप्त सा बडबडाता रहा।- पता नहीं ठडा गरम क्या क्या खिला दिया है, कि घरघरा रहा है। खासी बिगड़ गया लगा जैसे बात ऊषा के कानों को छू गयी हो । अनमनेपन से उत्तर दिया- "मौसम से है सब फिर दिन मे बटी के गुब्बारों से भीगा था वह जल पता नहीं कैसे फिर वहन लगा था कि चित्रा उटी। श्रीनाथ को बाहर जाते देखती पडी रही। क्या है चित्रा' अमृता भी उठ बैटी! पानी की आवाज खामोश हो गयी। चित्रा वापम विछोने पर पलटी। श्रीनाथ सोया नहीं।" "अभी - मियाल आतम चिनि -- बाहर हवा थम गयी। कुछ सोचने के बाद अमृता ने कहा 'उसका मन उखड जाता है- तो देर तक अशात रहता है।" दोनों बहनों को सुन पड़ी ऊपा की आवाज क्या तग करते हो। 'तग तुम करती हो।' श्रीनाथ था। “तग कभी हुए होते तो जानते! "जानता हूँ अपनी औलाद की दुश्मन हो?' 'दुश्मन कौन है ? औलाद से पूछना । वह सोचते हैं यह पापा हैं -- या प्रेत?" “सोचना तो नतीजे के बाद पड़ता है।- नतीजा जानती हो। नतीजा भी प्यार से निकलता है। मार से नहीं। 'प्यार का ही तो पछतावा है - और सुख भी सुख ? मैंने तो तुम्ह तडपते ही देखा है। श्रीनाथ की खदबाहट मे सम्मिलित ऊषा की रथी आवाज भी रह रहकर उठती, सिसकती और डूब जाती। -- “यही अच्छा रहा, कि मरी लङकी तुमसे दूर रही अब भी इस घर मे - तडपना तडपाना देखने से पहले ही चली जाये भाग जाये ससुराल, वही अच्छा होगा 'लेकिन तुम भागकर किस ससुराल जाओगी फिर आवाज नहीं आयी। छोटे की खासी - सुन पड़ी तो-चित्रा उठी अलमारी से पर्स निकाला विक्स ली, और छोटे के बिस्तर पर गयी । तभी कमरे का शटर ठेलती हुई ऊषा आयो। बिखर बालों में पिन खोंसी- कपड़ की सार सभाल की फिर अलमारी से दवा निकाली -- छोटे की प्रती को घुटने पर लिया और खुराक हलक मे उद्देल दी। अटे का सिर पलोसते हुए-पता नहीं कद स्पा, बच्चों की कच्ची उम्र के किस्से ले बैठी कि कैसे ठिकाने देठिकाने रहते-रहते आज यह दशा हो गयी है इनकी । जव से शादी हुई, यह दूसरा फैमिली स्टेशन है। कितने सालो बाद तो कहीं एक साथ रहने को मिलता है । तब बच्चे वचार कब, कैस कुछ सीखे? इधर यह है कि बाहर ही रहे ~ तो बस अपना ही देखना सारी सार सभाल सीख गये । अब यह आने पर कुछ भी उन्हे अपने मन का लगता ही नहीं। अकेला रहने स कुछ स्वभाव भा वैसा हो गया है - एकपक्षीय-सा । ऊपर से दिल्ली के दफ्तर में काम भी ज्यादा ही है। फिर थके थकाय आओ।- आकर बच्चों को भी पाओ । पटाते हैं। - पर पढ़ाते-पाते सुद ऊपन लगते हैं। सारा काम एक के बूते का नहीं, समझाती हू कहती हू- चलो एक ट्यूटर ही लगा देते हैं- होता था इन्हे -- और घर । अर-बी/81

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ठेलकर हारा
.
।
मुह पर न सही, पीठ पीछे ही कहगे
तो क्या हुआ ? कहने से ही कोई जीत जाता है।
'वही, कि तुम करके ही जीतोगी - पहले नहीं -'
'चलो आपने किया ? दाव पर लगा दिया सब पर-पर पल्ले हार ही पीन? मैं
सिर्फ यही कह रही हू भाभी, कि दाव अगर हारना ही है, तो इसे कुछ वर्ष दूर
जाये।
'पर आक्रामक तो गिर्द छाय रहेंगे
अजीब इकतरफा बात है
अजीब तो तुम्ह लगता है। कभी अम्मा से पूछो ? अम्मा से क्या - हमे ही कहते
हैं दलाली खाते हैं नहीं तो क्यों बूढी गायों को बाप हैं पर दुधमुही बछिया को
ठिकाने लगा रहे हैं। अब बताओ?
'बताना यही है, कि निडर रहो। और बिना ढाल कवच के, अपनी राह चलते
जाओ। श्रीमती गाधी की तरह ।
और गोली खाकर, सो जाओ, उनकी ही तरह ।
'बदनामियों के डर स, फासी के फर में सिर देन से अच्छा तो गोली खाना ही
होगा? नहीं?
इस पर कोई कुछ नहीं बोला, जैसे उपरोक्त प्रस्ताव सर्वसम्मति से पारित हो चुका
हो, पर स्वीकृति चिह्न लगाये जाने मे आडे आ रहा हो
ठीक बेठीक के बीच का कुछ
टीक बेठीक के बीच /83

आखे । मेरी आखों के सिलसिले म मुझे मरे बॉस ने कहा था कि - *आखों मे जलन है, तो तार दवा डलवा आइए। - जब मैं सड़क तक आ गयी, तो सोचा कि अगर डॉक्टर मिल जाये तो मैं आखे टैस्ट भी करवा लू । सड़क के सिग पर रुकते वक्त लगा कि दिन पूरी रौनक से शहर पर अया हुआ है। मैंने आवाज दी – 'स्कूटर' - एक काले झडे वाली कार सामने से निकलती हुई कह गयी – “हडताल है - स्कूटर टैक्सी नहीं मिलेगी। अचानक मुझे अहसास हुआ, सडके अपेक्षाकृत शत है, और उन पर तेज रोशनी है। सूरज की उजली किरणे पैरों तले जैसे बिछी है। और -खुद दिन हसी खुशी मे अपने तमाम काम रोशनी रहते रहते खत्म कर झलने की उतावली मे है। मैंने इस बीच क्रॉसिंग पार करते हुए अपने को तेज रोशनी का कायल मान लिया था। ये भी कि इन्सान के तमाम कार्य कलापों के पीछे सिर्फ प्रकाश ही काम कर रहा है। प्रकाश ही हमारी आखे हैं । इसकी वजह यह थी कि उससे पहले हमेशा मुने धुपला धुधला सा अपेरा प्रभावित किये रहता था 1 दिन हो या रात,एक ऐसा झुटपुटा मुझे प्रिय था कि जिसमे पक्षियों का कलरव घुल मिल गया ो या फिर धुथली-सी दुपहरी हो, जो अपने सन्नाटे मे और भी गहरी और उलास हो गयी हो। लेकिन वह कायापलट परसों मेरी पोसिन ने किया, कह कर कि आप शाम को या रात को लिखने का काम न किया करो। 'क्यों " मैंने तो उसने बताया- आपने अपनी आखे नहीं देखी " उसने मेरी आखों मे झाकने की कोशिश की लगता है यरकान हो गया है। 'नहीं, वह तो मेरी आखों का रग ही पीता सा है। मैंने पडोसिन की बात काट दी। 'तो ये लाली कैसी है ' कहते हुए उन्होंन मेरी पलके उपार्डी । कहा, "आख तो सारी पाई पड़ी हैं।" पद्धेसिन के फैसले को मैंने मान आखों की जलन तो कुछ ददी है, पर क्या करू "मैन लाचारी बतलाई। - हुए कहा, "पिछले महीने से "क्या करो किसी अच्छे से डॉक्टर को दिखाओ। 'वह तो में भी सोच रही मैंने उसे ये नहीं बताया कि डॉक्टर छुट्टी लेकर आराम करने को कहेगा, तो मेरा हर्ज होगा । अगर मैं उसे अपने उस सपने की बात बता देती जब मैं अभी हो गयी थी, तो वह जरूर हसती । पोसिन के चेहरे की याद करके मुझ आखों की इतनी तेज जलन में भी हसी आ गयी। हालाकि जिस दिन से सपने मे अपेपन का अनुभव हुआ था, उस दिन से आखो की राशनी के पक्ष को मैं गभीरता स ले रही थी। शायद यही वजह थी कि अब आखों पर मनोवैज्ञानिक रोग भी सवार हो चुका था । या फिर आज की दोपहर का यह एक प्रभाव था कि आखे लाल होकर जल रही थीं, या फिर सडक इतनी लबी हो गयी थी कि उस पर चलते चलते मेरे बदन का पानी पसीना बन रहा था। और वह पसीना टपाटप मेरी आखों मे चू रहा था। असल मे लुडलो कैसल रोड की चाई है ही एसी मैंने अपने को समझाने की कोशिश की और सडक छेडकर क्रिश्चियन स्कूल के गेट की ओर मुड़ गयी । स्कूल के पीछे टीचरो के क्वार्टरों के पास एक टीचर बैग झुलाए आ रही थी। "हैलो । आप आप किससे मिलेगी। 'किसी से नहीं। मेरी बच्ची शायद आपसे पढ़ चुकी है। "क्या नाम था। वह टीचर रुक गयी। मैं उसकी सफेद किनारी वाली पोती पर निगाहे गडाये थी। सोच रही थी - आखे खराब हो तो सफ्द रग अच्छा लगता है। "क्या नाम था ?" टीचर ने मुझे ध्यान से देखा। "नीना - बस पाचवे तक पढ़ी थी, वह अब क्वीन मेरी मे है। "टीचर ने होंठ फैलाय। जब वह चली गयी तो मैं उसके पके हुए चेहरे के बारे मे सोचने लगी, फिर उसके हों पर फैली आरजी हसी के बारे में । में जैसे ही सोचती हुई मुडी, मेरा एक पैर क्यारी के पास पडे हुए पत्थर से टकरा गया। मैं गिरते-गिरत बची और मैंने घूमकर देखा कि कोई देख तो नहीं रहा था। एक भूरी बिल्ली मुझे दीखी जो कि बायीं और से निकलकर पीछे के क्वार्टरों की ओर भाग गयी थी। मैं बगीचा पार करने लगी। बगीचे म भट्टी हुई पत्तियो जब पैरों तले पद्धतीं, तो अनीबसी सामोशी के भम होने का अहसास होता है और साथ ही परिदों के शरीर पर ध्यान जम जाता।बरी की सड़क के पार पेड था और आगे स्कूल की दिल्डिंग थी । उस वक्त शयः रिसेस रहा होगा। क्योंकि लकिया 'वैरी नाइस सुरु 'मेरा क्या शुओं मे बटी हुई थी, और बाते कर रही थीं । कुछ लडकिया पेचे की छद मे गोल घेरा बनाये मुह चला रही थीं। नीली ट्पूनक के अदर से सकियों की सफेद ब्लाउन वाली पीठ दिख रही थीं या कभी उनके भोल चेहरे, और बी बी आसे दिख जाती । रिबन में गुथी हुई उनकी चोटिया इधर उधर हिल रही थीं। - इनमे से कितनी लडकियों ने आज अपने मा बाप से रिकॉर्ड दुक, रवर पैसिल या डिसैक्शन बॉक्स के लिए पैसे मागे होंगे। और इनमे से कितनों को मिले होंगे पैसे । और न मिलने पर कितनों ने आखों म आसू भर लिये होंगे । कहकर कि जायेगा, सालाना इम्तिहन है - रिकॉर्ड बुक कम्पलीट न हुई तो सुद ही फेल होना पडेगा। इनके माता-पिताओं ने तब किसी तरह इनकी माग पूर्ण की होगी। - जो हो अब इन लड़कियों की आखों में न आसू हैं, न निरीहता, बल्कि एक ऐसी देफिकी है जो -एक खास उम्र की याद दिलाती है जब हम लोग स्कूलों मे होते थे। लेकिन जब दिल्ली आये, तम हम स्कूल और कॉलेज के चौहद्दी से बाहर थे। स्कूल अगर आना भी होता था तो किन्हीं समस्याओं का निलन करने हेतु । कई बार घर में झगद्य होता था। 'मन क्यों नहीं कुछ करता? " और मैं खुद इस बात को बढ़ाकर उसे घर से बाहर काम की तलाश में जाने को कहती थी। "एक दिन जरूर जाऊगा, लेकिन तुम लोग कह कह कर जब तक छील न लो, तब तक कैसे जाऊगा। 'तब तक नहीं, तो भी कहीं तो जाओ, भगवान के लिए या मुझे मेरे हाल पर छेड दो 'मैं भी यही चाहता हूं। मुझमे बस इम्पलस की कमी है - वह पूरी भर जायेगी तव तक और ~ ऐसी सताबें के दौरान जब क्रिश्चियन स्कूल में नौकरी की तलाश मे आना होता था, तो मन मे घर मे अलग हो जाने का सपना पला करता था। स्कूल मे स्थित क्वार्टरों मे आकर रहने का सपना । फिर शाम से जब हम सैर को इधर आते तो सेसिल होटल मे रुककर कोई पेय जल पीते। उस वक्त सेसिल होटल एकदम सागर जैसा शत और विशाल दिखता। अब वह सेट जेवियर स्कूल की तिमजिली दिल्डिग है। स्कूल से बाहर निकलते ही दिखा राजभवन । एकदम बदला हुआ सा लगा । फिर सामने वाले गिरजे के साथ साथ सडक पर ऊची-ऊची दीवारे खड़ी कर दी गयी हैं। ये भी अजीब लगा । सङक जैसे इन दीवारों की वजह से ही लबी ले गयी हो । ह, सिर्फ नोटीफाइड एरिया कमेटी की बिल्डिग वहीं की वहीं है । बिल्डिग के बाहर खुदाई करते मजदूर थककर जगले के सहारे खडे हो गये थे। मैंने सोचा था, इनसे ही अस्पताल का रास्ता पूछ लूगी। लेकिन इससे मुझे उनके आराम म खलल पहने की सभावना लिखी। बात 86'पही मिति अतिम स्थिति - में जब एक अत्र जैसा दीखने वाला लडका पास से गुजरा, तो उसे मैंने ठहरा लिया। "सुनो, यह पहाड़ी के लिए एक राह है। "हा है, वो रही। उसने हाथ के इशारे से बता दिया । स्कूल की कुछ लडकिया भी शायद पीछ पीछे आ रही थीं। आपको कहा जाना है? एक ने पूछा । "हिंदू राव अस्पताल "वह ऊची बिल्डिंग दीख रही है ना वही है। मेरी नजर ऊपर उठ गयी, जा हल्के रगो वाली एक बिल्डिग थी। यहा से कितनी दूर पडेगा।मैं लडकियो को देखन लगी । वे सब भी मुझे देखने को रुक गयी। 'कोई खास दूर नहीं बस पाच-सात मिनट लगेंगे। इसके बाद पाच मिनट तक वे मर साथ साथ चलती रहीं। अब और कितना है? मैंने पीछ रह गयी लड़की से पूछ। "अभी और थोड है।-एक बेटी लडकी बोली। 'तुम क्या गेज स्कूल की हो? "नहीं, हम सब बेनीप्रसाद मे हैं।' अगली लडकिया रुककर पीछे देखने लगी। मुझे याद आया दो बार मैं इस स्कूल में भी नौकरी को पूछते हुए आयी थी। तब यह नया नया खुला था। मुझे खुर पर हैरानी हुई - कि मैं लडकिया की पोशाक दखकर भी उन्हें पहचान क्यों न सकी । दोबारा जब ध्यान दिया, तो वह पोशाक मटमैले सलटी रग की सगी, या हो सकता है,पोशाक घिसकर अपना रग खो बैठी हो । जैसे इसान अपनी रगत सो बैठता है। इन ख्यालों से छुटकारा पाने के लिए मैंन लडकी स पूछ- “तुमन ता कहा था पाच-सात मिनट लगगे। मेरे सवाल पर वह लङकी मुस्कराई - "अगर तेज तेन चलो तो इतना ही वक्त लगेगा।" उसकी बात पर आगे वाली लड़किया नैसे मुस्कराने लगी। "तेज-तेज तो सिर्फ तुम ही चल सकती हो।" वे चारो लद्धमया फिर अपने बल्ले शुलाती हुई रुक गयीं। "तुम कौन-सी क्लास महो। मैंन दद्दी सहकी से पूछ। "नवीं मे।" "और तुम? मु7 और बाहर - “पर अभी म। और या साम "दासी मारा बारहमानसर्ग, फिर का "बग पीरती।" दूगरी न कार - "हम लोग या तक पद र अनन।" नब वे पतटीं तो मैंनय मिरस उनरीगरुवासिता नसीम म अम्मर मुग अपने रिम्नानी एन का आमस गरन लगता है। रिदमानी शिन से कसद किताब, बैग, ता और न गन क्या क्या आगा क आग पूम जाता है। पराम दोन दालगाम गर्म बता का लावा और वानभाया के ताने । पिता भी ना की नेक समार। अगर तुम काम पर सग गओ | रोनरीकी दामी दान । पता नहीं कितन सेग आर भी राहय पर इन बाता की वह ग घूम रहे होंग सिनेमापरा के बाहर या कॉफी हाक बटर, -गाली गलिय व रान विना नहोंग, जरकि घर वाले उनरों की इन्तजार में चारपाई पर करवट सते रहा हागे । घर वाला को कई-कई बार कितने तर क ग्याना न बुरी तरह परा भोगा लफ्नि उनम से कुण सोगा की ही आशाए राव निम्नी हागी। वाकी लाग आश्वस्त हर मप हाग। यानी कि 'कुछ हो । हमारी बना कसरी वरी नहीं करता। इसी तरह अब पर मैं भी आश्वस्त हो गयी है। सव कुछ मन के हप म पेड रिया है मैन । कुछ भी बुरा नहीं लगता । मेरा काम है सिर्फ तनग्नाह लाकर दे देना । मान चुपचाप गर्च निवहता रहता है। कभी कभी पड़ती है तो विस्फोटक स्थिति पर कहासुनी होत होते बात बद गाती है। एस वन में सबसे छिपाकर अपने को कोसती क्याकि चाहकर भी में घर को इतना कुछ नहीं दे सस्ती, जो कि एक मा को दना चाहिए। लेकिन में अपनी भावुकता में सिर्फ घुट सकती है। फिर भी नीना और सते को जो कुछ चाहिए होता है, वे मुझसे नहीं मागते । हर चीज के लिए पापा को पार करते हैं। मान कहता है कि पापा क्या कर, अपना सिर फासी मे दे। ये सारी बात हर रोज दोहराई जाती है । चुपचाप अम्मा इन्हे सुनती रहती हैं या शायः कुढती रहती हैं। खास तौर पर बेटे मोहन के लिए -- नब वह अम्मा से भी छिपकर, भाई से भी छिपकर हथेली मरे आग बनता है। भाभी पैनीस पैसे चालीस पैस। सिर्फ एक अठन्नी। उस वक्त में कुढन की पहचान आसानी से मैं कट सी जाती है। मुझे सारे पैसे घर में नहीं दे देने चाहिए ये भी मैं तब सोचती हू । अम्मा ठीक ही कहती हैं-- मान को तुम जितना दागी, वह उतनी ही सर्च कर देगा। यह सुनकर फिर अम्मा की जगह उलटा मान की कुढेगा और पूछगा- आज रात को क्या बनेगा। मदन का मुह लटक जायेगा और वह सिगरेट + कर सकती ५९ पनी स्थिति अतिम स्थिति फूलता रहेगा। 'मुझे क्यों पूछते हो। मैंने आजकल अम्मा की ओर देखकर जवाब देना शुरू किया है। लेकिन इन दिनों मदन मेरी इस प्रवृत्ति से चिढ़ जाता है। 'तो मुझसे क्यों पूछता है ? मैं भी चिढ जाती हू ।'जो भी सस्ता हो वही ते आओ।' “सस्ता कुछ भी न हो तो न लाऊ? नहीं ला सकते, तब तो मुझे डूब मरना चाहिए। बताओ क्या करू? इस तरह शुरुआत से ही बिगड जाती है बात । मदन कहता है- 'इतजाम अब खुद ही किया करो । इन छुट्टियों मे राशन पानी डाल लेना । समशीं । वह सिगरेट बुझा देता है। शायद खुद ही बुझ जाता है। 'और कुछ? मैं भी पूछकर बुझ जाती है। कुछ नहीं वह किसी खास हौंस से उठ जाता है। मैं भभक पडती हू 'तब इस वक्त बख्श दो। बॉस के काम मे गलतिया कर किसी तरह से तो जीने दा ना। इन बातों का शायद कभी अत न होगा। सोचते ही मैं वहा से हिली। बैठूगी " "आप क्या राह देख रही हैं ? मुझे चौंककर बढते हुए देखकर किसी ने पूछा मैं? हा नहीं मैं ओ पी डी की राह टूढ थी। 'वह एक बजे बन हो जाता है, आप मैडिकल सुपरिटडट के पास जाइए। "उससे क्या होगा? 'दह आपको कोई दवा दिलवा देगा। औरतों का लिहाज करते हैं मैंने उस आदमी की सूरत देखी। उसके बाल खिचडी हो रहे थे और चेहरा विकना था। उसके पीले दात बाहर झाक रहे हैं। धीरे धीरे वह आदमी चला गया, तो मैं बाहर आ गयी। लिहाज । अव मैं शाय- लिहान के बारे मे सोच रही थी। क्या असल में कोई किसी का लिहाज करता है। लिहाजनाम की चीज आज किसम है। और लिहाज की कोई ख्वाहिश भी क्यों करे ? मुझे यह सोचकर खुशी हुई कि उन्नीस वर्ष से लेकर अब तक की उम्र मैंने झूठे लिहाजों मे पझर व्यर्थ नहीं होने दी। और अब तो मैं सुन बलिहाज हो गयी हू। मन मे सैक॰ बार आता है कि सबसे साफ कह दू-कि वे लोग पुर अपने लिए कुछ करे। सास तौर पर आखों वाले सपने के बाद । दह पता नहीं क्यों, तब से मैं तेजी से अधेरे मे ही डूबते जाना महसूस करती रही है। यह जानने के अमा बाद कि अपापन क्या होता है, अपकार का एक बहुत बध विस्तार मेरे सामने खद्य होने लगता है। उससे में इतना ज्यादा डर जाती है कि कई मौकों पर मैं शाय- अपने से ही चौंककर इधर उपर देखने लगती हा हा यही वजह रही होगी कि एक और व्यक्ति जब मेरे पास से गुजरा, और मैंने उसे अपनी ओर देखकर सकते पाया तो मैंने क्षण भर बाट ही दूसरे पथ पर चलना शुरू कर दिया । सहसा उसने पूछ - "आपको किपर की राह चाहिए 'राह' मुझे अचानक सूझ गया। अब दफ्तर वापस लौटने से बेहतर होगा, भाई के यहा चले जाना। भाई का पर पास पड़ता है। कल आसानी से यहा से सुबह-सुबह अस्पताल आ सकूगी। यह तय करते ही मैंने पूछा "सब्जी मडी को कौन सी राह जाती - - 'वो उधर है 'एक बस भी तो जाती है?” मैंने अपनी जानकारी पक्की करनी चाही। "हा । अडतीस नबर । पर उसके लिए घटा-पौन घटा रुकना पड़ता है। पैदल यहा से दस मिनट का रास्ता है। मैंने एक नजर में ही उस व्यक्ति का हुलिया देखकर अपने को सड़क पर डाल दिया आपको शायट मैडिकल सुपरिटेडेट से काम था? 'नहीं। मैंने उस व्यक्ति पर एक सरसरी नजर डाली और आगे बढ गयी। वह सलेटी रग की कमीज और भूरी पतलून पहने था। उसके सिर पर छोटे छोटे मेहदी रगे दाल थ। मुझे उसकी भूरी आखों मे हल्की सी काइयापन के पुट का आभास-सा लगा । वह अचानक बताने लगा 'मुझे मेहता से मिलना था। वह व्यक्ति अपना काम और लड़की की ताजी फिक्स हुई जॉब के बारे में अब सब कुछ बताने लगा था। मैं जब उससे पीय छुडने के लिए थोडा फासला बढ़ाने के लिए जल्दी मे आगे बढ़ी तो एक कार तेजी से मेरी बगल से निकल गयी। 'यह घुमावदार सडक है । सवारी के आने का पता नहीं चलता। वह इस तरह फिर मेरे पास पहुच गया। उस वक्त में सड़क के किनारे किनारे चल रही थी। उसने अपनी बातों का सिलसिला नये सिरे से जमाने का उपक्रम शुरू किया ही था कि अचानक एक और गाड़ी मेरे पास से सरसराती हुई निक्ल गयी। उसने कहा 'इसे मुझे दे दीजिए। और अपना वह बोला । मह स्थिति अनिम स्थिति - हाथ मेरे बैग की ओर बढाया ! मुझे उसकी मूर्खता पर, जो वास्तव मे कोइयापन रहा होगा, मन मे हसी आयी। और मेरे हाथ की जकड अपने बैग पर और बढ़ गयी। 'क्यों, इसमे कोई खास खजाना है, जो आप डर रही हैं?" "नहीं, मैं डर नहीं रही। सुली रोशनी मे कैसा डर ? मैने कह दिया। फिर भी मुझे उसका वह मूर्खतापूर्ण प्रश्न वेतरह काट रहा था। मैं सोच रही थी, खजाना है तो भी, और नहीं है तो भी, क्या यह आदमी सोचता है कि मैं अपना बैग उसे थमा दूगी ? या वह मुझसे सबध बदना चाहता है। कितना बेवकूफ इसान है | क्या बैग को वह इतनी भारी चीज समझता है, जो इसान उटया नहीं सकता. फिर भी ढोंग दिखा रहा है। 'लगता है, अपने जीते-जी, अपने यहा आपने कभी किसी को अपना बोझ उयने नहीं दिया ? मैंने जैसे उसकी इन्क्वायरी की हो। "कतई नहीं। उसने बड़े आराम से कहा, जैस मेरे व्यग्य या परिहास का उस पर कुछ असर न हुआ हो । इस तरह वह अपने परिवार के बारे मे बताने का मौका पा चुका था। और बता रहा था कि उसने कैसे संघर्ष करके पैर जमाये । और अब उसकी दो बेटिया अपने पार्यो पर खड़ी हैं। रही पत्नी, सा वह गृह सेवा मे रत, और मैं राष्ट्र-सेवा मे। मैं सोच रही थी कि वह सिपी है। दौडधूप और तिकडम में माहिर है। इसलिए ये । मुलतान का रहने वाला भी हो सकता है। लेकिन मैंने ये बात पूछी नहीं। क्योंकि मैं उसे बातचीत का और मौका देना नहीं चाहती थी मेरे इस रवैये को शायद उसने भाप लिया था। और अब वह कुछ कुछ हतोत्साहित हो चुका था। अब और कितना चलना है?" मैंने निर्विकार लहजे मे पूछ । सुनते ही एकाएक वह विनम्र हो आया था - अब बहन जी, आप अगर धीरे धीरे चलेगी, तो तो वक्त लगेगा ही।" मैं अब तक काफी थकने के बावजूर अपने को नियत्रित रखे हुए थी। क्योंकि भाई के यहा मुझे पहुचना जरूर है। और बस फिर किसी आर्थिक स्थिति की चिंता नहीं रहेगी। न वहा आपसी तना” का डर होगा । अगर ये डर और चिंता न होती तो ? मैंने सोचा, मेरी नजर अचानक पहाड़ी पर छाये हुए पुंधलके पर जा रुकी। मुझे याद आया, जब मैं पेडो की शव शव अस्पताल की पहाड़ी पर चढ रही थी। तब भी धूप जैसे मरी-मरी सी छाव की गोद मे लेटी थी। और अब भी उजाला होने पर भी पहाड़ी पर फैली हुई झाडिया और बीच से कटी हुई सडक किसी सुखद यात्रा की याद दिलाती जा रही हैं, जैसे सजोली से शिमले की यात्रा की याद दिलाती जा रही हो । काश, आज की ये यात्रा उन्हीं दिनों की आख/91 तरह बेफिकी मे भीगी होती। और ये उतनी ही सुखकर और लदी होती [ सजोली और शिमले की स्मृति ने मुझे जैसे अचानक ताना कर लिया था। तभी उस व्यक्ति ने पास आकर कहा “यह रही सब्जी मडी मैं इधर जाऊगा। और आप सीधी पीपल वाली गली तक चली जाना।" ओह ! शुक्रिया ।" मैं उसी ताजगी मे जसे अब भी गद्ग थी । वह 'शुक्रिया' सुनकर ठहर गया। देसिए, आप अगर बुरा न मान तो अपन वटा तक चलकर पानी या चाय पी ले। मरी सारी प्रफुल्लता काफूर हो गयी। मुझे अचानक काठ मार गया। इससे पहले, मैं सिर्फ, चिंता या अनिश्चितता को ही लेकर उलझ रही थी। और उस व्यक्ति, निसने कि अपने को मिया वाली का बताया था के संघर्ष की मन-ही-मन सराहना भी कर चुकी थी, और मुझे उम्मीद बघ रही थी, कि किसी न किसी इलाके के लोग, हिंदुस्तान का नाक बचाने को कोई तेज आदोलन चलाये रखेगे। तब और लोग इन लोगों की आखों म देखेगे, भले ही ये लोग बैकवर्ड हैं, भले ही शुष्क शुष्क । पर, तब हिंदुस्तान का नक्शा जरूर दूसरा ही होगा! - लेकिन अब मुझे अपनी ही दुद्धि पर तरस हो आया । शायद आखों के धोखे का लिहाज रखना भी जरूरी हो चुका था। मैंने अपना सरक्षण आप करते हुए कहा- "मैं घर से दाहर चाय पानी नहीं पीती। ये आपकी मर्जी है। मैंने तो आपको परेशान हालत में देखकर - इसानियत के नाते कहा था।" यह कहकर उसने अपने को एकाएक पूरा अपा सिद्ध कर दिया था। भाई के घर की दिशा में मेरा एक कदम नहीं बढ । उन्नीस-ए के बस-स्टाप की ओर घूमते वक्त नजर एक बार उसी व्यक्ति पर पड़ी । मुझे लगा, अभी हमारे सामने सिर्फ आर्थिक चिंता की ही समस्या नहीं है, पता नहीं कितनी विकट समस्याए और हैं, जिनके लिए हम आखों की जरूरत है। लेकिन, जिसे आखों की तत्काल जरूरत थी, वह व्यक्ति तब काफी दूर जा चुका था। इतना कि पर स्थित अतिम स्थिति नया युग पुराना युग बस स्टाप से घर तक पहुचने मे वह रोज दस मिनट लगा देती है । अत धीमे कदमा से आन भी घर की राह पर अर्चना बेराक चलती गयी। अचानक याद आया कि आज सुबह डीबट की प्रतिलिपि घर ही भूल गयी थी । और बस जब चल पड़ी तो या हुआ था कि आज का पूरा दिन अब व्यर्थ जायेगा । लेकिन देर तक इसी बात मे उलझे रहने के बाद निगन मिल गया। यानि डीबेट किसी और विषय पर आधारित हो जाये तो ? जैसे-. सुकरात। सुकरात क्या आत्मवीर था। -और-इस विषय का प्रतिपादन करने के बाद उसे आत्मसतोष सा मिला- कि आज का पूरा दिन बेकार हाने से बच गया - क्योंकि एक नयी सुलझी हुई कड़ी हाथ आ गयी थीं। -- यानी सुकरात आत्मवीर था।- सोचते सोचते वह घर की सीढियों तक बढ गयी। गेट का एक दर मालती के पत्तों से घिरा हुआ था । अलग कोना सा, अच्छा लगा । फिर धीरे धीरे फाटक के अन्र पुसी, लेकिन कमरे म पैर देते ही लगा, आत्मसतोप की करेट और मालती के खिले हुए फूल जैरा मर गये हों। जाने कैसी मुर्दा मुर्दा जिंदगी है। उसने दबे पाव इधर उधर शाका । उस वक्त - बैठक मे कोई न था। -कुछ आदाजे आ रही थीं। -- पिछले कमरे से । मजु और अरुण रेडियो के गीत के साथ लय मिलाकर गा रहे थे। यहा, यह घुघरुओं की आवान है, इसलिए नृत्य-चर्चा हो रही है अब ।- • ये सब अर्चना के सामने नहीं होता, फिर भी अर्चना को मजबूर करता है कि वह सोचे, कि यह वही अरुण है, कि जिसके लिए सोच सोचकर दह झुलस रही है? – कि लडका पर मे पड़े पडे बेजार हो उठा होगा? -कि जिसकी खातिर वह अपने को 1931 अभागा, कह कर कोसती रही है। आखिर अरुण की मानसिक स्थिति कब उलझी थी? - उसे भी याद नहीं आता ? इतने बरसों बाद क्या याद आ सकता? - अब यानी जब उसे बी० ए० पास किये एक साल हो गया है, इससे दो साल पहले एफ० ए० की कम्पार्टमेट, एक साल पहले एफ. ए. उससे दो साल पहले दसवा, और नवीं क्लास का भी साल जोड लिया जाये, जो आठ साल बनते हैं। तेईस मे से आठ साल घटा दिये जाये तो बचे पद्रह । - हा, -वह जब पद्रह-सोलह का था, तो वह खोया खोया सा रहने लगा था । जैसे फिक्र मे गल रहा हो। उन दिनों उसके पापा का व्यापार डूब रहा था। यानी अर्चना के पति प्रभात व्यापार के डूद जाने के बाद भी बहुत कुछ छिपाने की कोशिश कर रहे थे। अरुण ने एक बार दवे स्वर से प्रतिवाट किया था कि वह काम देखेगा। लेकिन पापा ने कहा था 'तुम अभी पो । दसवातक पढना काफी नहीं होता। इसके बा- प्रभात के कारोबार के बिखर जाने साफ-साथ, अरण और उलझा उलझा और बिखरा बिखरा सा रहने लगा। और तब-बेफ्रिकी से वह कभी पढन सका। यह भी नहीं कि उसे फीस न भर पाने की फिक्र हो या कि किताबे न खरीद सकने का गम हो. फिर भी एक बेनाम का डर था, जो उसे असता जा रहा था। और धीरे धीरे वह खालीपन से भरता गया। वैस ठीक तरह से अर्चना आज भी नहीं जानती कि अरुण पर इस सत्मे का असर कब और कैसे हुआ? और क्यों उसम पैतृक भीस्ता पर करती गयी। लेकिन तब एक दो नौकरिया करने के बाद भी वह नौकरी छोडकर अलग कोटर मे सिमट सा गया, तो अर्चना की जिंदगी के पर्ने का एक और रिंग खनखना कर टूट गया । और जिस स्टेज पर अर्चना सघर्ष कर रही थी, वह अचानक नगी हो गयी। कभी कभार अर्चना सोचती - अगर मैं मर जाऊ लेकिन जिंन्गी ऐसी नहीं कि चाहने भर से कोई मर जाये। । -अब आज भी अपने मर जाने की बात सोचती हुई जब वह कोरीझेर म जूती उतारने लगी, तो लिखा, अरुण पद्य है, और वह हौले हौले इशारे से कुछ समझा रहा है। उसने असम की उटी हुई उगली देसी- यानी 50 पैसे1- अभी देखती हू-" अर्चना कुछ कट सी गयी और आखों मे आसू भर आये । उसने बटुआ टटोला, पैसे हथेली पर उतर आये । पन्ह सिम्के जिनमे से 50 अरुण ने उट लिये। फिर चैकन्नी आखों से इधर उधर देखना, 94'पनी स्थिति अनिम स्थिति - कये दबावर चप्पल घिसटता खिसक गया। वह वहा से हटने का इरादा कर ही रही थी लेकिन आभास हुआ कि उसके पीछे कोई खडा है। और उसी का ध्यान आकृष्ट करने के लिए कुछ कह भी रहा है। 'लगता है, तुमसे भी कुछ ले गया है।" प्रभात की पुपली सी छाया उसे दिखायी दी 'इथर दिन मे मेरे से भी मागे थे पैसे। मेरे पास सिर्फ अठन्नी थी, मैंने कहा ये ले बेशक जाओ लेकिन इसमे से दस पैसे लौटा देना फिर उसने वे भी नहीं लौटाए। एक पथकती-सी गर्माहट अर्चना के होंठों तक आयी, और उदासी का एक झोंका और उसके मन पर लद गया। उसे अपने ऊपर ही अवभा हुआ कि ऐसी बातों का कुछ उत्तर उसके पास क्यों नहीं होता। - क्यों सिर्फ सिसकती सी कराहट-सी उफनकर रह जाती है, और फिर सब पहले जैसा शात हो जाता है प्रभात दिन भर क्या करता है ? कोई कौतूहल अब मन मे नहीं उठता | सारी जिज्ञासाए जैसे लबी तान कर सो ते हैं। इतना भी नहीं होता कि जाकर देख, पिछले कमरे मे बैठा वह क्या कर रहा है ? या मजु ही कहा है अब ? - ऐसी ही जडवत् वह बैठक मे बैठी थी, जब प्रभात की आवाज सुनायी दे गयी। - “तुम इधर ही अलग से पखा चला के बैठी हो - और सौ का बल्ब जल रहा है। - जो सीखना पढना है, वह उपर भी तो कर सकती हो । आखिर जो इसान थका हारा बाहर से आया है, उसे कम से कम पखा पानी तो चाहिए ही-" ओह -- तो ये मजु उधर पढ रही है? - लगा जैसे मजु ने किताब से आख उठाकर देखा हो और फिर पूरी बात सुने बिना ही पापा के आगे से हटकर सीधी दराम मे चली आयी हो । सोचा होगा थोडे दिनों की बात ही तो है। स्कूल खुल जाने पर सुन ही घर से छुटकारा मिल जायेगा। जर्वना ने देखा, मजु ने भीगी हुई आखों के आगे किताब खोल ली है, लेकिन पापा के सवालों के पीछे फैली हुई दूरिया ने उस जैसे खोखल की धूमिल गट्टान पर फेक दिया है । लकिन उस पता नहीं कि पापा उस वहा भी पहुचकर अव सवालिया चेहरे से देख रहे हैं। “मजु, मैंने पखे के तले बैठने से मना तो नहीं किया तुम्ह । यही कहा है कि तुम्हारी अम्भी आ गयी है, इसलिए इधर आ बैटो लेकिन बजाये समझने की कोशिश करने के तुम गुमसुम इधर आन बैठी हो।" - नया युग पुराना युग कुछ भी नहीं अर्चना ने दिना मजु की ओर देख जान लिया - कि मजु मे मूक प्रतिक्रिया जगी है। जैसे अभी चीख उठेगी कि अम्मी के आने का पता चलता तो जभी वह इधर आती, या अपने आप जान जाती, कि अम्मी आ गयी हैं। जभी गुसलखाने से निकलकर अर्चना ने उसे पास खींच लिया 'क्या है मजु मजु विलग होकर पलग पर बैठ गयी । मजु की मरी हुई आवाज, दुझी हुई कैरेट जैसी रेगती हुई उठी, और अर्चना के सीने पर थककर डूब गयी। उसने चाहा कि नाउम्मीदी के सदमे से आहत, निढाल होकर चूर चूर वहीं गिर जाये। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। वह सिर्फ खालीपन से भरी भरी रसोई मे जा खड़ी हुई। झटके से एक गिलास पानी लेकर होंठों से लगाया और खाली गिलास रख दिया । रसोई का दरवाजा भेटते वक्त देखा,प्रभात हाथ मे बर्फ थामे एकटक उसे ही ताक रहा है। और प्रभात की खुली आखों में शिकायत है कि अर्चना ने देकार गर्म पानी क्यों पी लिया? उसने चाहा कहे -- 'क्या फर्क पड़ता है। लेकिन अनुत्तर ही रसोई से बाहर आ गयी। पलग पर मजु को देखा तो याद हुआ, मजु ने परसों ही रिमार्क कसा था तरदुद आपके लिए ही खास तौर से किया जाता है।" चलो अच्छा हुआ, आज की बर्फ सभी के काम आ जायेगी। इस तरह से मजु पक्षपात होने वाली बात को भूल जायेगी।- लेकिन मजु का तर्क क्या सही है ? और उसके कष्ट को क्या इस घर मे मान्यता दी जाती है? - अगर ऐसा है तो क्यों ? और मजु क्या यह सब समझती है। मजु किस कक्षा मे है अव? - शायर ग्यारहवीमे - हा स्कूल का आखिरी साल है। इसके बाद फर्स्ट इयर, - ज्यादा से ज्याना दी० ए० फिर शादी-वादी हो जायेगी, और मजु का दृष्टिकोण सुद-ब-खु बल जायेगा। मजु की प्रवृत्ति ऐसी क्यों है ? अजीब लड़की है, पढाई मे जितनी ही होशियार, खाने-पहनने के बारे में उतनी ही बेलिहान । जाने समुराल मे कैसे खपेगी ? रसाने की तस्तरिया और शर्बत अर्चना ने मजु की ओर बढाये, लेकिन मनु के सिर हिलाकर इकार करने के बाल, किसी ने उसे नहीं हुआ। प्रभात ने जाकर देखा तो मा पुस्तक मसिर गहये पट रही थी। और अर्चना अपलटी अवस्था मे कनपटी को हथेली पर रिये मत के पसेकी आर ताक रही थी। उन्होंने तश्तरी अर्चना की ओर बादी "चलो, तुम तो लो- - अकेली दहा- यानी--फिर उसी की मुत-सुविधा को प्राथमिकता नबकि प्रभात- *- 96 दिन म दिन मजु के रूठने की बात जान गया है ? लेकिन मजु अगर और दिनों की तरह सब खा पीकर चट कर जाती तो प्रभात कहता - 'मजु, बच्चे आखिर अम्मी के लिए भी कुछ रहने दिया करो 1-1 या कहो कि तुम्हे घर मे कुछ खाने को नहीं मिलता। -" ऐसे ही एक अवसर पर प्रभात ने अपने बदन की हड्डिया उयाडकर दिखायी थी मनु को कि किस प्रकार अब वह एक ढाचा रह गया है। पिछली बीमारी से पहले वह लगातार पद्रह दिन तक एक वक्त भोजन करता रहा है। सिर्फ बजट पूरा करने के लिए। मजु उसके सामने चुप रही थी। लेकिन प्रभात के जाने के बाद ही अर्चना से कहा था, 'देखा अम्मी कैसे दिखा रहे थे। • भई, आपको सूखकर काटा होना अच्छा लगता होगा । हम क्यों सूखे ? हम तो दोनों वक्त भरपेट खायेगे। अगर बजट का ऐसा ही ख्याल है, तो आप भी अपने लिए कोई काम खोज लो दिन भर घर का ही भार ढोना क्या सब कुछ । - • अर्चना ने मजु को टोका था, एसी बात नहीं कहते मजु। लेकिन मजुपर इसका कुछ भी असर नहीं पड । अगले दिन ही मजु ने कहा था "आज हम मूवी देखेंगे। -" अर्चना मजु की जिद का प्रतिरोध नहीं कर सकी । क्योंकि मजु इस प्रकार की जिद कभी नहीं करती। लेकिन उस बार वह जिद पर डटी रही । तस्वीर वह आज ही देखेगी। इस जिद पर - प्रभात गुस्से से लाल-पीला हो गया था। जानती हो, इस जिद मे क्या है ?" प्रभात ने मजु के कपे पर हाथ पर दिया । मजु का दिल चौकनी की तरह पटकता रहा होगा, कि पापा अब जरूर कोई तेज और देढगी बात कहने वाले हैं। हलाकि उन्होंने जो कहा था, वह प्रबल वेग को शात करके कहा था। लेकिन उनका सयत भाव और शब्द अर्थ सब खोखले बन के रह गये थे। और कह चुकने पर उनके कपों के उभार ढीले पड गये थे। उनके जाने के बाद मजु अर्चना की ओर पलटी थी। - "देखा, कहते हैं, मैं जिर करूगी तो वह भी ताइव करना जानते हैं ? अगर ऐसी भाषा का प्रयोग हम करे, तो कहेंगे कि खीजकर बोलती है-"। - लेकिन तुम्हे भी तो जिद नहीं करनी चाहिए थी। मजु?" - "बात सिर्फ जिद की है क्या ?" मजु एक दूसरे अवसर का किस्सा सुनाने बैठ गयी "उस दिन सामने वाला गुगा और उसकी बहने आ गये, तो मुझे रसोई मे कुछ चाय पानी का प्रवप करना पड गया । अब पापा रह-रहकर शाक जाते और बुबुदाते रहे। उन दोनों के जाते ही ऐलान के तौर पर हिदायत दी कि आज अब काफी बेरहमी से खर्च कर चला गया है। -शाम का निबटारा भी तुम्ही करो। मैं कुछ नहीं करने का। नया युग पुराना दुग97 बना झाली तब मैंने कोई जवाब नहीं रिया । रसोई मे घुसकर आटा और वेसन निकाला, प्याज काटी, और गूथ गायकर कर मिस्से पराठे बना डाले । साथ मे बेसन और दही वाली कढी भी - । वस, देखा और दुन्दुगते रहे कि कमाना पड़ता है, तो पता चलता है। जमे इनकी कमाई उजाड डाली हो। अर्चना ने उसे दोदारा चुभा दिया- 'फिर वैसी बाते-ऐसे नहीं कहत, मजु-कुछ समझदारी बरतत हैं। लेकिन आज वही मज जब समझदारी से काम लेकर दो दार साने को मना कर चुकी, तो प्रभात अर्चना पर उत्तेजित हो उठे।-- 'तुम्ह भी अगर नहीं खाना तो दद्य दो, उटा के रख दिया जाये। सुनते ही मजु और अर्चना दोनों ही झटके से उठकर बैठ गयीं । फिर खाते वन अर्चना ने मजु को पास खीच लिया। 'चल, अब खा ले बच्ची नहीं तो पापा को दुख होगा -" जैस मजु कुछ और सोच रही हो, अचानक कह पड़ी आपको खिलाना ही तो पापा सविषय है अगर कहो कि भाई को भूख लगी होगी, तो कहेंगे- वह अपनी मर्जी का मालिक है । जरूरत होगी, खु. ही खायेगा । इन्ह क्या मालूम नहीं कि इनके डर से भाई किचन की ओर देख तक नहीं सकता । के तो चोरी छिपे मैं ही कुछ न कुछ भाई को खाने को देती रहती है। पर भाई खुले दिल से उसे भी पा नहीं सकता कि अगर पापा ने खाते देख लिया, तो सोचेगे, इसे खाने के सिवा कुछ काम ही नहीं। 'ये तुम्हारा अन्याय है। दिन भर तुम्हारे पापा का तुम्हीं लोगों का तो फिकर रहता है मजु। सुर तो वह खाते तक नहीं। -" - फिकर अपना तो मैं खुद ही करती हूँ अम्मी । जहा तक भाई का सवाल है, उसे सामो देखकर दे भी दे, तो भी इतना कम देगे, कि मुझे शर्म आ जाती है - क्यों ? भाई को क्या भूख नहीं लगती? - अगर यह खुन बिना खाये रह सकते हैं, तो क्या सभी रह सकते - अर्चना खाने के दौरान से लेकर शर्दत की आखिरी कू खत्म कर लेन क दौरान तक रह-रहकर बाहर देखती रही थी। और तब मजु को टहोका देकर कहा 'जरा देख आ, अगर वह आ गया हो। सावपानी बरतने पर या कि बहुत धीमी आवाज पर भी जैसे प्रभात के कान रहे हों. १९/पहनी म्यिात अनियति पूम-"क्या? - - 'कुछ नहीं" कहकर अर्चना टाल गयी। फिर लगा जैसे कुछ गलत काम करते-करते प्रभात द्वारा पकड़ी गयी हो। जिससे अपरिचित डर की एक घुटी-घुटी सी गध अब उसे धीरे धीरे घेर रही हो। "तुम क्या चाय लोगी" प्रभात ने विषय बदल दिया। "चाय ? "रा ठहर जाये, क्यों?" वह कहना चाहती थी कि अभी ठडा शर्बत पिया है - लेकिन उसके कुछ कहने से पहले ही प्रभात ने कहा- 'मैं तो और रुक नहीं सकता, तुम जानती हो, चाय के बिना मुझे सिर दर्द होने लगता है। चाय पीते वक्त प्रभात ने दबी जवान से जाहिर करने की कोशिश की, कि अर्चना के अभी चाप न पीने की असलियत वह जानता है। कहा - "पहले में राह देखता था। आवाज देकर बुला भी लेता था। लेकिन अब मुझसे वे सब चोंचले नहीं होते। तुम उसका स्वागत करो, शायद उससे कुछ इनाम तुम्हे मिले। - इन सब बातों का जवाब अर्चना के पास कभी नहीं रहा। आज भी नहीं था। 'मैं नहीं जानता' - कहते-कहते प्रभात के गले मे जैसे कुछ अटक गया शायद आजक्ल का यही दस्तूर हो कि हृष्ट-पुष्ट नौजवानों को सब कुछ तैयार मेज पर मिले। लेकिन अपने पिता के सामने मैं ऐसा नहीं कर सकता था। यानी- ऐसा मौका अगर जिंदगी मे आता, कि मेरे बापू को भोजन की थाली उटकर मेरे सामने लानी पड़ती तो मैं कट के मर जाता। लेकिन आज: प्रभात की बाते जैसे वह गले से उतार नहीं पाती। अगर पेट तक ले भी जायेगी, तो पेट की एक-एक अतडी पिडाने लगेगी। और लगेगा कि वह छटपटाती हुई घर से बाहर निकलकर धरती के शून्य छोर तक आ गयी है। उसके परे सिर्फ दिल की धड़कन है। आज भी 1-प्रभात की दाते सुनकर उसका सिर चकराने लगा। प्रभात का ये उबाल सिर्फ बेटे की असमर्थता को लेकर है। - या इसमे प्रभात की अपनी असमर्थता भी नत्थी है? - नहीं - ये तो शायद तीसरी कुढन है (जो सिर्फ प्रभात के सग ही होती है, जहा वह निस्सग है) वह चाहता है, अपनी असमर्थता को न देखे । उसकी नजर बेटे की असमर्थता या लटके चेहरे पर भी नहीं। वह बेटे से पैदा होने वाले लाभ पर नजरे गये है। - इसलिए दुःख पा रहा है। - उस दुख को वह अर्चना से बाटना चाहता है। अर्चना, शायद सहानुभूति जताये। लेकिन अर्चना क्या प्रभात के रवैये को सगत मानती है ? -- क्या प्रभात की कुढन दूर कर सकती है? - प्रभात की अटपटी आवाज अब और सष्ट सुनायी दी -'और तिस पर यह कि वह नया युग पुराना युग/99 - अपने को आर्टिस्ट समझता है। यह नहीं जानता कि आज अच्छे अच्छों को आर्ट से कुछ तलब नहीं होता -1 लेकिन मा को इसी बेटे पर अब दुलार आ रहा है। ऐसा जब हम करते थे तो इसे लल्लो चप्पो कहा जाता था।" अर्चना का मन किया कि प्रभात की बात के जवाब मे कहे 'वक्त-वक्त की बात है। तुम्हारे आगे बेटे का चेहरा शायः नहीं आता। एक बाईस-तेईस साल के नौजवान का चेहरा कैसा होता है, शायद तुम भूल गये हो -। लेकिन मेरे लिए यही बात ज्यादा महत्त्व की है।- मैं वो नहीं हो सकती जो तुम हो - लेकिन चाय खत्म हो गयी थी, और प्रभात उठ गया था, और जाते-जाते कह गया था कि इस बीच अगर अर्चना को चाय पीना हो तो चाय केतली मे बची है। - । कोई और दिन होता तो अर्चना चाय ठडी होने से पहले ही पी लेती, लेकिन आज शनिवार है। चाय देर से पीने पर भी काम चल सकता है। रात देर से भी नीं आयेगी तो क्या?- शनिवार को रसोई में इतनी जल्दी जाने के लिए उसके मन मे कोई उत्साह नहीं था। हा, पिछले शनि भी लिली के सफेद पत्तों पर उठी तारों के सुनहले सेले डर्ज का निरीक्षण कर रही थी। तो मोटिरा आयी थी। मोंदिरा उससे दस साल छोटी है, लेकिन उसने आते ही सुझाव दिया था, - इस मुर्दा जिंदगी से बाहर, कुछ देर के लिए निकला जाये तो अर्चना दीदी आपको कैसा लगेगा? उस प्रस्ताव पर सिर्फ उसे आपत्ति थी, इसलिए वह लोधी गार्डन की मटियाली हाडियों तक पहुचते-पहुचते रुक गयी थी। मजु और अरुण जब आगे चले गये, तो मोंदिरा ने चुप्पी तोडी - 'मैं सिर्फ आपके लिए आयी थी, अर्चना दीदी कि आखिर आपने अरुण के लिए क्या सोचा ? उसने शायर कुछ भी नहीं सोचा था, इसलिए उसके पास कोई जवाब नहीं था। "और जीजा जी को कहना तो वैसे ही बेकार है। क्योंकि वह अपनी जगह सीजे-खीजे-से रहते हैं। और उन्हे हम कुछ कह भी नहीं सकते चाहे जैसी भी गाधी खींच सके, कुछ देर सींचते ही रहे कभी । कुछ तो किया ? लेकिन अरुण की बात तो समझ मे ही नहीं आती। - हो सकता है, यह खानदानी बीमारी हो। लेकिन आप इसे दूर तो कर सकती हैं।- कव तक कोई एक, दो या पाच-दस देता रहेगा आप उससे साफ क्यों नहीं कहीं कि वह कुछ वरे-" हा-वह क्यों नहीं कहती किसी को शाय- उसम साहस नहीं-वह देखकर कार 100-1म्पिति उतिम मिति जाती है कि किस तरह वह सिर अले सब से पड रहता है। 'और यह तो बडी विस्फोटक स्थिति है अबैना दोटी. गीजा इसे कतर रहे हैं? -' "वे दोनों ही टाल रह हैं मोंदिरा। वह धीरे धीरे बताती रही- “क्योंकि विस्य ब्रहण करने वाली एक चीज उन दोनों में मौजूद है (व तो सिर्फ विस्फोट बांटने क आले भर हैं-1 '- तब उस एक को ही बोझ उठाये रहने दीजिए। लगता है आपका बोझ कम किये जान की गुजायश नहीं। -" -फिर वे लोग धीरे धीरे लौट आये थे। मोंदिरा के बहुत समझाने पर भी मोंदिरा की बात उसके दिमाग मे उतरी नहीं थी। वह साच रही थी- पहले प्रभात के चेहरे की उभरी हडिडया देखकर मन गलता था । और अब वही हहियों का ठहर बेटे की छाती पर देखने के बाद बाप की उभरी हड्डिया स्वाभाविक लगती हैं। -प्रभात के स्वास्थ्य मे रचा कीड भी मेरी छाती कुतरता था, और अरुण की हड्डिया भी महीन सुइयों की तरह मेरा ही सीना छेदती हैं। अब मेरे से सीधा कतई नहीं देखा जाता। सब पीठ पीछे होता रहता है। - - रसोई से बाहर - दालान काफी धुला धुलाया था। वह वहीं देर हो गयी ।- थोड़ी देर मे प्रभात आयेगा । अर्चना को औंषा पद्ध देखकर रसोई में घुस जायेगा । फिर उठेगी बरतन घिसे जाने की आवाज । पर्र घर्र , वह उसके सीने को रादती रहेगी। मरी मछली जैसा उसका वक्ष लताड सहन कर लेगा, लेकिन ऊपरी समवेदना जताने नहीं उठेगा। कभी उसके सीने की मछली अधमरी होती है, और तडफडाती हुई रसोई म घुस जाती है वह उस दिन प्रभात गुस्से मे वरतन पटककर विम सने हाथों से बाहर आ जाता है । किसी किसी दिन वह शात, स्थिर आखों से उसे मात्र देखता भर है, और विम का डिब्बा उसके हाथ से ले लेता है। 'तुम छोड दो,-" उस दिन वह छीना झपटी नहीं करती। वह अपने को धोखा दे लेती है - "दो ही तो बरतन हैं। दूध का और केतली "लेकिन मिलकर भी तो कर सकते हैं ? - वह सिर्फ सोचती है, और विदेश की बहुत-सी सेल्फ हैल्प की बात ताश के पत्तों जैसी उसके सामने बिखर जाती हैं। लेकिन सारी विदेशी बाते क्या अपने ऊपर घटाई जा सकती हैं ? तो फिर यही क्या? क्या वह तीस रुपये महीने की नौकरानी ही रख लेने का प्रस्ताव प्रभात के सामने नहीं रख - नया युग पुराना युग/101 सकती? लेकिन प्रभात से कैसे कहे ? वह मजु के स्कूल की सारी स्लिपे उनके आगे विखेर देगा । और बचे हुए रुपये भी -हमेशा यही होता है। और वह रुपये उसे फिर से प्रभात को लौटाने पड़ते हैं। फिर ? किससे कहे वहा शायद आज प्रार्थना करे। आतुर होने पर अक्सर वह भरयि मन से प्रार्थना करती है। फिर भरी हुई आखों को पोंछकर जब बगीचे की ओर आती है, वहा प्रभात आखे बट किये सिगरेट पीता मिलता है । वह दवे पाव लौटकर रसोई का काम खत्म करने मे लग जाती है। ऐसे में वह किचन टेवल पोयेगी, चकला बेलन साफ करेगी, दही जमायेगी और सुबह के लिए कोई दाल भिगो देगी, ताकि प्रभात को सब्जी की तलाश मे सुबह-सुबह न दौडना पडे। हा, पहले रसोई का कचरा फेक ले। रसोई धोकर एक साथ बाहर निकलेगी। बाहर निकलने पर, वह आहट बचाती, चारपाई डलने बढेगी, तभी प्रभात चौंक -- जायेगा। - - तुम्हारी बस के पैसे अभी ही निकाल दू।- वह चुपचाप बिस्तर विछाती रहेगी। तो वह पूछेगा 'हा, सुबह क्या ले जाओगी कुछ भी वह बेमन से कहेगी। 'रोज एक ही जवाब। ये कुछ भी कह देने से अनाजा नहीं लगा सकता -- सीधे कहो, भिंडी, बैंगन या लौकी सभी ठीक है - या सिर्फ फल - डबल रोटी या ऐसा ही कुछ।" कहती हुई वह अपनी डायरीखाल लेगी। 'डबल रोटी तुम क्या समझती हो, सस्ती रहती है।" सस्ते-महगे के चक्कर से बचने के लिए वह फिर अपनी इयरी मे उलझ - जायेगी। - 'बाजार द हो जायेगा। पहले मुझे तो फारिग करो -" वह प्रभात की दात का अनुमोदन करेगी- "हा, तुम्हे मुदा दूप के लिए उठना बता है। तुम सो जाआ। - प्रभात सो जाता है, अरुण और मनु भी । तर रमे पहले ही उटना पद्य। - बहर दूटों की आवान पर जमे प्रभात के काना JOK - - । - इनका। - अब इनके लिएनये सिरे से चूल्हा जलेगा ! बरतन घिसे जायेगे वह यह देखने के लिए उतावली मे बरामदे की ओर बढी कि कहीं अरुण ने प्रभात की उक्ति सुन तो नहीं ली ? – लेकिन सुन भी ली हो, तो क्या फरक पड़ता है। अब तो सबकी आख का पानी मर गया है। वह रसोई मे गयी, और अरुण के लिए सब्जी, दाल और चपाती ले आयी- देखकर अरुण ने दही अलग कर लिया । 'दही मुझे सूट नहीं करता। “यह गलत है, दूध दही, अडा वगैरह तुम्हे सूट करत हैं। अगर तुम ये सब लगातार खाओ, तो एकदम फरक आदमी बन जाओ -1 लेकिन यह उत्साह वह देर तक न बनाये रख सकी । उसे यह सोचकर धक्का सा लगा कि दूध की बोतले गिनी गिनाई आती हैं जिसमें से सिर्फ मजु, प्रभात और अर्चना ही पी सकते हैं। बाकी का दूध चाय कॉफी या दही के लिए भी कम पड जाता - लेकिन क्या वह दूध छोड नहीं सकती? - उसमे इस सवाल ने सिर उठाया, लेकिन लगा कि नहीं, दूध वह कम भले ही कर दे, छोड देने पर काम करना मुश्किल हो जायेगा इस पर एक सवाल और ऊपर उठ आया । – काम न कर पाने की वजह क्या सिर्फ दूध छोड देना भर ही है? - इस तर्क को वह पूरी ईमानदारी से स्वीकार करना चाहती है, पर कर नही पाती, - क्याकि ये वजहे कभी एक नहीं होती, न अकेली होती हैं। एक वजह के साथ ही अनगिनत दूसरी वजहे होती हैं । जैसे पौष पर छाई बेल । जो एक बार पौष पर छाती है, तो पोप का मूल रूप ही नष्ट कर डालती है। - शायर ऐसी ही किसी आवेष्टित स्थिति मे है खुद अर्चना - क्षार क्षार-और पस्त- मुह फाडकर कुछ नहीं कह सकती-किसी का रहस्य नहीं जानती। जैसे उसका रहस्य है, जो ये नहीं जानते, कोई नहीं जानता । अर्चना ने आखे मूटकर सोचा । और अगर वह अब इसी क्षण मर जाय-1 और तभी उस आभास हुआ अरुण के उठने का -वह चारपाई स उठ गयी।- अरे,खरबूजा देना मैं भूल गयी। खरबूजे को पूरा छीलकर उसने सबको बाट दिया। इस दौरान उसने निश्चित किया कि वह अरुण से कहेगी, वह जिंगी को गभीरता से ले। प्रभात की तरह हथियार न डाल दे। - और फिर प्रभात को तो दुनिया ने धोने के चक्कर में कसकर पस्त कर डाला था - वरना क्या था, वह धीर धीरे चलता रहता-1 जबकि तुम अभी जवान 1 इंटेलीजेट हो और नये ऐरा मे रहते हो-तुम्हे नये दौर के अनुकूल काम करना चाहिए।- नया युग पुराना युग'107 -तभी उसे लगा कि कोई पास खद्ध कानों मे फुसफुसा रहा है। आज वह सामने वाला के साथ था। मैंने उसे उनके साथ आते देखा था।- है तो होशियार-जरूर इसने उन्हे किसी न किसी चक्करबाजी में डाल रखा है। सुनते ही उसका सारा ताना दाना छिन्न भिन्न हो गया। अब क्या कुछ कहा ना सकेगा उसस? लेकिन मोंदिरा उसकी ऐसी बातों को बहाना कहेगी। उसके तर्क को अवैज्ञानिक बताकर मादिरा बाइबल के स्वल और केन का उदाहरण देगी। भाई द्वारा भाई को, और पुत्र द्वारा पिता को मार डालने का उदाहरण सामने रखेगी। और अविवाहित मा का- कि कैसे शर्म से बचने के लिए अपने बच्चे का गला वह घोंट देती थी लेकिन विवाहित मा के बारे में माहिरा कुछ नहीं कहेगी । और उसकी आखों के सामने अरुण का चेहरा कितने कोणा से उभरता रहेगा - । जिस चेहरे पर डर और वहम ने राख मी घड दी है जिसके वाला पर मिट्टी की गहरी पर्ते अब सफेट होने जा रही हैं, और जिसकी आखो के गिर्न जैसे फिसी ने गड्ढे खोद डाले है जिनमे हड्डिपों के पिजर उग आये हैं । वह हार गयी है। अपन को और ज्यादा बा झासा देन मे असफल है। उसे पुत्र मानकर शुन्य है। नही, उसकी कोई नहीं होती वह । किसी की कोई नहीं होती । किसी पर दया नहीं कर सकती। अपन पर क्तिनी दया वह और करे? 114 पहनी म्पिति जतिम स्थिति पहली स्थिति अतिम स्थिति सिर्फ पुरा 'दम्मो । दमो! - सहसा आवाज गले मे भिवगयी। घबडकर आखे खोल दी, तो पाया, र उसी का कमरा है । सब कुछ ज्या-कात्यों है । हे प्रभु ।' यही दोहराता रहा, . पबाहट पर गयी नहीं, और दाये हाथ से चादर हटाकर दूर फेक दी। बिजली के खभे रोशनी मे भीतर का सब हल्का हल्का दिखायी दे जाता रहा । पास जाकर यडी देखी, अं दिल को सुबह होने की तसल्ली दी। आखे मूदकर शात और एकाग्र होने का प्रयास किया मन फिर भटकने लगा तो कमरे में टहलते हुए शैल्फ के सामने जा खद्य हुआ । शेल्फ पुरानी फाइलें थी । कारोबारी कागज, अब इनसे उसे क्या सरोकार कारगुजारी की यादे। जीने का बहाना नहीं सिर्फ धोखा ! नीम अपेरे मे दिखायी दे गयी . शोल्फ के अपर परी पत्नी दम्मो की तस्वीर । सिलवर रगे फ्रेम मे तस्वीर सौम्य अं शात-सी । सदा अपनी मौन भाषा मे कुछ न कुछ बताती हुई। पर अब यह तस्वीर ' उस अनुबध वाली फाइल जैसी ही नहीं रह गयी है। विवाह सरचना की याद दिलाती-र्स पर जिन यादों से उसने इन दिनों दूर रहना चाहा । दूर रहना ही नहीं चाहा, छूटना । चाहा। पर क्या करे, छूट सकता ही नहीं सोचा तो फिर से घबड़ा गया । लगा कि अकेले कमरे मे नये सिरे से वह दमयती को आकारित करने लगा है। तब चाहा । सीढिया उतर कर सड़क पर चला जाये गहरी साफ-साय में कुछ दूढ़ने। क्षणाश ही तब अपनी आखों से खुद को सड़क पर भागता देख लिया उसने पिछले पाच वर्षों मे कितनी बार सदेह भागा था, इन सड़कों पर! इससे आगे सोच पर ताला झलकर देहरी बाहर आया कि पानी पी ले, पर गलियारे में सहसा ही उसके पैर रुक गये, क्योंकि बैट मे तेज रोशनी बाहर तक आ रही थी और वह सोचने लगा था कि रोशनी कैसे गयी, जबकि बहू भी मायके गयी हुई है। शायद कि लडका ही रात बत्ती खुली शेखर सो गया हो?-देखने के लिए वह पर्दे से झाका तो लडके को कागजों के ढेर मे खोया पाया बोला-“अच्छा है, अपने को खपाये रखो काम मे /105/ . पता नहीं किस पुन में कह गया था, और किसी प्रकार की कोई प्रतिक्रिया जाने-सुने बिना ही रसोई मे पानी पीने चला गया। बाहर आया तो दरवाजे की सिटकनी खोलकर स्टेपरकेस मे खद्य हो गया । अनायास का - "भगवान, माफ करन "फिर पता नहीं क्या सोचकर वहीं प्रणाम की मुद्रा में लेट गया । उठा तो सहसा लगा कि उसके सारे क्रियाकलाप दमयती जैसे हो गये है। उसने कदम वापस उठाया कि चाय बनायेगा, - पर नहीं, चाय तक तो बहू आ ही जायगी । अब वह सशटे हाथ में नहीं लेता।-पहले पा कि जा-बजा जरूरत पड़ने पर ऐसा कर लेता था।-कि परदेस म टिकना कम ही मिलता था। पर पूछे कोई, वह घूमता ही क्यों था ? शायद कि शुरू से ही यही देखा जाना था उसने । एक ढर्रा था, सो वही चल निकला । कागजपतर । एजेट, खाते -1 और प्रात-प्रात मे एजेटों की तलाश । अनुबध और अग्रिम राशि के चैक।- लडके का कागनों मे गर्क होना उसम फिर से ताजा हो आया । - पर कितना काटदायक है इसम गहराई तक उलझना ! अधेरी गुफा मे मकडे की मानिंद लटकने । - जैसा। - बहुत पहले ही इसमे फस गया था वह । वषे हुए चक्कर को तोडकर, भीतरी अमूर्त सपना साकार करने की इच्छा से । हालाकि दूर दूर जाकर जड जमाने के फैलाने के खिलाफ थी दम्मो । आवाजाही के चक्कर से बेजार वह कहती कि ."पैर जमाने के लिए नहीं दौते तुम ? उसमे तुम्हे सुशी हसिल होती है, उसी मे व्यर्थ गवाते हो वक्त और पैसा भी। वह दम्मो को मूर्ख बताता -पैसे का लोभी। 'तुम चाहे जो कहो, है यही बात। -" दम्मो के कहने का अर्थ होता कि वह पैसे को पैसा नहीं समझता । उस बार दम्मो की बात झूठी साबित करने के लिए ही उसने दम्मो को साथ ले लिया। दोनों बाते हो जायेगी। बध और मझला दोनों मैट्रिक का प्राइवेट इम्तहान भी दे लेगे, और बचत भी हो जायेगी यानि कम खर्च बालानशीन । जब इम्तहान निपट गये, और वह वह वैसा ही पछपडावत काटने लगा, पम्मो सशय में पड गयी। इधर उपर करते बोली - "दिन भर ड्राफ्ट और नक्शे ही तैयार करते रहोगे, या आगे की भी सोचोगे" 106/पही म्यिनितिम स्थिति -- दम्मो ने क्या यही नहीं कहा कि वेकार घर में पड़े रहत हो? - वह इन बातो से विद्धता और फट भी पड़ता - "बैंक ~ मरी गुरु - मैं ऊब गया हु - खुद से तुमसे काम-काज से ।" दमयती कान खडे कर लेती – 'वीजने को बेड कुछ आता भी है तुम्हे ? – फिर थोड दब जाते कहती 'कमाना तुम्हें रास नहीं आता? वह कुछ चुभती बात कहने को होता, पर खुद पर काबू पा लेते कहता 'मुझे तो लगता है -सुख ही तुम्हे रास नहीं आता ? वह कहना चाहती, सुख किसे रास नहीं आता ? पर यह न कहकर कहती - 'मुझे क्या है, पडे रहो जैसे पडे हो, किसी के कहे थोड़ा चलोग ।" तब वह औरत की बुद्धि पर तरस खाते माथे पर लकीर खींच लेता । उस अनपढ़ बताता, काम बिगाडने वाली भी । और आगे के लिए तबीह कर देता कि वह उसक कामो मे टाग न अडया करे!- इसके बाद, हा ~ वह कोई राह टूढ ही रहा था कि उसे पार्टनर ने दिल्ली बुला भेजा, और बात बन-सी गयी । अब आगे हा जब वह दिल्ली से आगे जाने लगा, तो दम्मो को साथ ले जाना बेमानी सा लगा। बच्चों की तो छुट्टिया है ई। फिलहाल दम्मो को मायके में ही पडे रहने दिया जाये । मन में यह सोच लेने पर उसने दम्मो के विवार दम्मो पर ही लादते हुए, अपना निर्णय कह सुनाया, और कहा -- 'इसलिए साथ नहीं ले जा रहा हू-कि मौका है, तुम आजादी से चाहो. जैसे चाहो रहो --।' जिसके अर्थ ये थ, कि तुम भी जोर लगा देखो, वैसा कमाने की दिशा मे। तुम्ह भी तो पता चले बात करना आसान है, या पैसा कमाना ? दम्मो के मुह स बोल नहीं पूरा । मायके म है वह । कुछ भाप बाहर निकली – तो, भाई जायेगी। जानकर सब सदिग्ध आखों से देखेंगे। मा पर क्या बीतेगी ? पिता अलग सत्रस्त होंगे। सुनने पर बडे मझले पर भी बुरा असर पड़ेगा ही। जबकि दोनो के दाखिले की आगत की बात वह उठाना भी चाहती थी- पर कुछ सोचकर इतना ही कहा -- अलग जगह - - भाभिया जान लेनी होगी। उसने तत्काल पूछ- “किराया कौन देगा?'- बात जैसे सिर्फ किराये की ही हो ? पर दमयती चुप। तब स्तभित रह गया था वह कि दमयती ने झट निर्णय भी ले लिया? - कि उसने कहा और दमयती ने मान लिया? - बुद्धू औरत । - घरों में क्या क्या घट जाता है ? तब कोई भीतर तक ले लेता है ? ऐसा नहीं ले सकती थी -कि-पति यानि वह चाहे कितना पनी स्थिति अतिम स्थिति/107 ही चौपट हो, – पर वेमुरब्बत नहीं हो सकता ? बाहर थोड़ी उजास फूटी है । योसल में पक्षी रहस्यमय ढग से फुसफुसाय हैं । ये पख फटफ्टाकर सामने आ जाये, तो उनके क्रियाकलापों के अर्थ जान लेगा वह | पक्षी नहीं दिये, तो दही एक सीटी ऊपर चढ के नीच झाका । नीचे तमाम हरा-भरा है। पेड़ो की लहराती लबी शाखों के पार कोलतार की सड़क, और फिर छ सात फीट ऊची दीवार । दीवार के पार ोटी-सी वस्ती है। कम ऊचाई वाली इकतल्ला कोठरिया है, जिनके बीच एक दोतल्ला चौबारानुमा मकान । यहा से मकान की पीठ दिख रही है। दो रगा की पुताई - उस पर । बाय हिस्से पर नीली और दाहिने पर गाची रग पुताई । पहले ये घर जरूर सयुक्त रहा होगा । विभक्त होने पर पुताई क रग भी अलग-अलग हो गय होंगे। मकान स बहुत ही ऊचे पर छितराया हुआ है सघन-सा नीम । निंदौलियों के बोझ से मफान पर झुक झुक जाता है। - बाजू के दालान में अचानक एक अकेली चारपाई म कोई उठ बैठा देखकर चाटनी मे नहाये आगन मे बिछी दो चारपाइयो की कल्पना मन म उठ आयी नयी नयी ब्याही दम्मो और वह - फिर जबरहा, दम्मो ने जब अलग मकान ले लिया, तो पूछ- भुगतान कैसे करोगी? मतलब किराये वगैरह का ?" उसन बात सहज हसी में टालते पहले तो 'हातिमताई का नाम लिया, फिर फेरी वाले की याद दिलायी जो हनुमान चालीसा बेचता हू--| नस-दमयती और शीरी फर - हाद बेचता हूँ 'कहता था न ? -कैसी सीधी लड़की जानता था इसे? पर जरा भी सचकीली नहीं निकली ये ? बाद मे पता चल गया कि वह झोला लटकाये घर पर कपड़ बेचती फिरती है। दमयती से एक बार भिडत-सी हो गयी। वैसे ऐसी भिडत सहवन नहीं होती। उसे सिर्फ आकस्मिक मान लेता है व्यक्ति । खुद को धोखा देने के लिए । वह अपने को बचाता 1 अनदेखा-सा व्यवहार कर रहा था। पर दमयती ही आगे धढ आयी कि आओ उस वक्त काम का बहाना बनाकर तेती से एक ओर चल या वह । पर पीछे पीछे दमयती के शब्द भागे आये। - 'देखो, अब जो देख लिया है, तो आना न भूलना। देखा पहले ही था पर गया बुलावे पर । वह ठहरा था तो अच्छा लगा था पर ऐसा 10 पह धिनि अतम मिति - सोच, जैसे पराये के यह जाकर हरने पर लगे । हलाकि जितने दिन वह वा रहा, दम्मो काम का हर्ज करके उसके पास ही बनी रही। और अहसास भी दिलाती रही, जैसे इसके पहले दाते दिन लौट आये हों। पहले जैसी उसकी चारपाई दमयती को चारपाई की दगतमासान के पार-तम सी गली मे आटेट बिधये-तीनों बन्दै थे। पर ये अन्याय है। वह आ गया। -वे दिन भी पा सडेबहेही उसमे साकार हो रहे हैं। दम्मो के न रहने पर अब दमो ही के नये घर में हर दिन उसका कोई न कोई रूप सामने आता ही है। कटपीस का झाला लिय दम्मो । नल-दमपती वैवती दम्मो ! अस्पताल के आगन की सफाई की देखभाल करती । मरीजों की भोरन ट्राली सजवाती 1 गिनती, हिसाब - मामान स्टोर मे रखवाती - प्लाट पर सी नीवे खुददाती, पौध सवारतो. अतत कुचले हुए शरीर वाली लावारिस लाश जसो पद्म दम्मो । दहल जाता है तब । बेचैनी से भरा इम्तहा की छटपटाहट महसूस करते, मन, बुद्धि और विचारों की धुनाई करने लगता है। चैन किंतु हरिद्वार -- मथुरा-वृावन पहुचने पर भी हाथ नहीं आता। अपनी मूर्खता की बाते बतियाता फिरता है। हैरत मे भरकर लोग देखो -फिर सिरफिरा मानकर किनारा कर लेते हैं। 'क्यों सिर खाते हो-भाई राह देखो अपनी।" कोई सवा-यूटा हौसला बचाने कहता है 'न तो एक माथ कोई आता ही न ही जायेगा पथ " पह दात भी उसके लिए नयी ही थी। पहले सुनी ही नहीं थी। सोचा. कि साथ न आने वाली बात तो समझ में आती है -- पर साथ जाने वाली बात तो मुमकिन हो सकती है ? दम्मो की चटखती चिता उसके सामने आ जाती है । चाहने पर वह कूद सकता था। चाहता भी था, पर कैसे लोगों ने उसे घेर रखा था? लगभग सुर पर लटका लिया था उसे । अगर वह भागता तो एक तमाशा सद्य हो जाता। भरने कोन देता ? बस, झुलस जाता। वह छुलसन-कभी गयी ही नहीं। - आस फिर नीचे गयी । पौधे गिनने शुरू कर दिये । दोनों कोनों में एक-एक चादनी कापड बीच मे चपा योडी दूर मोतिया फिर नीबू। - चारों ओर है कन्ने। कुल नौ पौष हैं। फिर, तार के साथ पिहरवा है। सामने जाली को छूता एक बरगत ~! पती के सारे-ईटे।-ईट पर ईंटा सुदाई वाले गड्ढे से होकर लाती वह। वही ईट - पही स्थिति अतिम स्थिति/I09 - - फिर एक पर एक आडी चुनकर क्यारियों पर बाघ खींच देती । नालिया पहले खोद रखी होती- और तैयार परती मे बीज धत्तकर मिट्टी ठीक से जमाती। जब पानी दे रही होती तब किसी से बात न करती। किसी की बात का जवाब भी नहीं देती। बाद में बताती- "पूसा इस्टीच्यूट से मगवाये थे बीजा-" बाद मे पानी देना सीखकर आयी है कि ठीक से पानी न देने से पौष बिगड जाती है। -'पानी ठीक से दो। पौष कभी बिगळेगी नहीं ?" - पर कहीं से आकर सुअर और गाये पौष लताह जाते हैं । एक बार केना । लाल-लाल मखमली गुच्छ के गुच्छ केना चबाती गाय को देख लिया उसने । गाय को मार ही नहीं सकती वह, पर दया भी कैसे करे दम्मो । गाय को भले ही दूब से भी मुलायम रगदार फूल-तुष्टि देते हो ? पर इससे कोई उदरपूर्ति होती है ? पर गाय भी कैसे जाने कि अन्याय कर रही है ? हलक से पार ले जाने का लोभ जो है उसे। बेचारी गाय।-पर गाय से ज्यादा बेचारी तब दम्मो को बनना पड़ता। बाड-काटे- और तारों पर तारे । बाबें पर बाडे । पेड काट-काटकर बिछाई जाती ऊची शाये। बेलों और फूलों का आनद सुख खुद कब लेगी दम्मो?. और कभी ये बरसात चौमासा बन गयी तो? दम्मो की जान सासत में है। ऊपर बालकनी पर हाय और कुहनिया टिकाये देखता रहता है वह । कितना टीठ क्षेसला है इसका ? ये थकती नहीं ? आते-जाते लोग देखते हैं, इसे इसका भी लिहाज नहीं ? बन्चे बूढ़े कभी रुककर खडे भी हो जाते हैं, देखने। वह खुद तमाशाइयों जैसा- आश्चर्य और दया बरसा रहा है दम्मो पर । दम्मो देखकर भी नहीं बुलाती। वह भी मन्द को नहीं जाता । उलटा बीच मे उकताई-सी आवाज मे कुछ कह देता है - कोई अपूरी बात, सुझाव! वहीं से कहती है, वह भी "वहा से क्या कहना?-पापदा पहुचाना है. आकर पहुचाओ।" वह अपना रहा सहा मशविरा भी मिट्टी कर देता है।' 'इस दम्मो मे इतजार का मादा हो तब न? माली बुलवा दे सकता है वर, अगर दम्मो चाहे? - पर बाट जोहने की ताव शुरू से ही नहीं थी उसमे । सोचती है, दोनों तरह से उसे ही हलकान होना है, फिर काम को कल पर टाले क्यों? टालती कुछ भी नहीं वह | जूते की पट्टी निकल गपी है तो, परदे का रिंग हो, या अलगनी की कील । उसी समय ध्यान मे आया है- तो कील टोकनी ही चाहिए। जूना 10. पहले यिनि उतिम स्थिति गाठना ही चाहिए।- एक बार इसी तरह बिजली खेल्डर था। ठीक कर रही थी फिर बल्ब से टेस्ट किया झेल्डर, बिजली ने करारा झटका दे दिया। नीचे बिस्तर न होता तो ढेर हो जाती । अब, सिर्फ हथेली झुलस गयी। ऐसे मौकों पर वह निर्लिप्त-सा एक आप रिमार्क कस उसे शर्मिदगी मे बल देता रहा है। वह कहती • “आलतू फालतू हून, पढ़ी-लिखी होती, सराहना ही पाती?" सराहना पाने को कैसा शौक और करने का जज्दा कि करती चले, करती चले । पर आश्चर्य कि जितने दिन दम्मो के यह रहा, अम-कमाई उसने स्थगित कर दी थी। पर एक जगह विश्रामचिहन बना रहे, यह भी उसे सहय नहीं था। उन्हीं दिनों उसने प्रौढ सस्था की शुरुआत की । सस्था क्योंकि पास थी, अत- मजाक-मजाक मे ही यह उसके लिए पाठशाला बन गयी। पास हो एक मदिर भी था । प्राय. ही वह पाठशाला से मदिर चली जाती। अगली बार जाने पर उसे नियमित छात्रा बने पाया। कहने लगी-यो-एक महीने मे परीक्षाए होगी अब-" -"और मदिर?" बोली - “वक्त मिलता है तो जाती हू। अभी हाल मे गया था, तो घर पर नहीं थी। बड़े से पूछने पर पता चला मदिर मे गोरखपुर वाले स्वामी जी आये हैं। पड़ी में पौने नौ ये पूछा “पौने नौ भाषण - होगा" मझले ने बताया- "वक्त नहीं पता, पर मगल का सकीर्तन रात नौ से साढे दस तक चलता है। फिर आरती मदिर की ओर चल पथ तो सोचा, 'गाने का शौक पूरा नहीं हुआ तो सकीर्तन की लौ लग गयी है। - औरते भी अजीब होती हैं -एक जगह टिक नहीं सकती।' दम्मो के ख्यालों से मुक्त होना चाहा, तो रास्ते की ऊचाई पर आखे दौडी । रास्ता हरियाली से भरा है। बायीं ओर लोकल रेलवे स्टेशन है। बाहर की रगदार शिरियों से स्टेशन का प्लेटफार्म पटरी-पेडपीपे दिखायी दे जाते हैं। जहा से सीढिया स्टेशन के लिए उठती हैं, ठीक वहीं से पूम जाओ तो सामने वाली सड़क पर मदिर दिख जाता है। एकाय बार पहले देखा है, मदिर भव्य है। प्रागण और मूर्तिया भी भव्य। पर मदिर के ठीक सामन जो रास्ता कर्बला को जाता है। वह खडे होकर लोग मूतते हैं । मूतने की बड़ी-बड़ी धारिया नीचे तक फैली हैं। वहीं मदिर है। भीतर मूर्तिया है । और स्वामी जी। 1 पहनी स्थिति अतिम स्थिति/III - -यही दयालुता - - पूजारी पता नहीं क्यों स्वामि जिओ को लेकर उसकी कोई भी राय नहीं बनती। दम्मो - दूर से रिख गयी, तो जूते उतारकर कोठरी तक चला गया। ओट मे खड होन पर सुनायी दे गया- 'स्वामी जी, एक दीन-पापिष्ठ पर कैसे तपोमय-ज्योति अकित होगी?' 'बस, सहज-सहज-बढे जाओ-देखो दीनों को हृदय मे रखता है वह। - स्वामी जी मा और बच्चे का उताहरण देकर उसे समझा रहे हैं। - 'बच्चा बार बार अपने को मलमूत्र से गदा कर देता है, पर मा हर बार स्नेह से उस साफ कर देती है। कहा नहीं कि- 'मूत पलीत कपड होये, साबन मल-मल लइये धोया यही है ममता - दम्मो पलटी, तो देखकर स्तभित रह गयी। 'तुम ?" उसने नहीं बताया कबसे खड है वह । फिर साथ-साथ चलने पर लगता रहा, जैसे लग्न मडप मे चल रहा हो ऐसा ही हुआ था लग्न के बाद घर पहुवने पर। मा ने रस्मों के निर्वाह मे घटों खड रखा था। बाद में जब लोग इधर उपर हुए तो एक मुह-बोली बहन ने दम्मो का पूघट उलट दिया। उतावली मे कहा जल्दी से देख ले वह दम्मो की बजाये बहन को देखने लगा। माने "इस जल्दी का सबब तो बहन बोली – 'कौन जाने, दुल्हिन गौने से कब लौटे ? वही तो हो रहा है, कि नहीं जानता दम्मो कब लौटे और उस लम्न के दिन दम्मो को देख लिया था। वह भी कनखियों से उसे ही देख रही थी। और खुश थी। पर वह र क्या, सुश नहीं था ? हा, दम्मो छोटी थी। छोटी-छोटी आखे पनी पलके, सीपी-सी नाक, गोल-गोल चेहरा । हा, ड्टी पर गड्य था । औसत लहकी । इससे कभी बात हो सकेगी। बात दम्मो से कम ही हुई। गौने के बा' भी । मा जल्दी चली गयी थीं, अब उसके लिए दम्मो कम और बाबू जी ज्यादा थे। दपत्ति वाला लाड दुलार - पिता की भक्ति में डूब गया था। तब दम्मो ने गुपचुप एक राह निकाल ली। अकेले मे उनास होते ही- कार्यालय के प्रवेश द्वार के निकट खडे होकर अलार्म पछी का बटन दबा देती । घडी टनटनाती, तो वह प्रागा की ओर मुड़ कर लेता । दाल मे देर रात गये घूमने भी जाना पडता । दम्मो अपनी रहे उसकी कुहनी मे पर देती । सतर्क हो जाता वह "कोई देख लेगा" पर दम्मो को पह तमाशा-सा लगता। एपी बिति उतिम दिन पूछती - 'कोई पहचान का इलाका है ?" कहता -- 'हा', तब वे बेपहवान इलाक मे घूमते। बेपहवान इलाके की कोठिया दम्मा को भा जातीं। वह ध्यान स एक-एक काठी को देखती - 'इनमे से कोई एक कमरा किराये पर नहीं देगा हमे? --पर हमारे है नहीं। पर वह हवेली नहीं - कोठी चाहती थी। दिन में वह जाकर कोठी मे काई कमरा देख भी आती । कहती-रसोई बढिया थी। साफ-सुथरी छोटी। वैसे घर किराये पर लेने के लिए वह आजिज निहोरे लेती । यही हाल थियटर बायस्कोप को लेकर होता, पर सिनेमा देखना कभी कभार ही होता । का भी आधा शा देखकर उठना पडता, क्योंकि बाबू जी के भोजन का समय ही यही होता, और ये कि वह और बाबू जी एक थाली मे ही खाते थे। मा के बाद मे इतना ही फर्क पड कि जो आसन पहले मा बिछाती थी, अब नौकरों की सहायता से दम्मो बिछाती है। बाद मे अकेली पर ही सारी जिम्मेदारी आ गयी तो मन मे दबी ललके दबी ही रह गयी। जो नहीं दबा, वह था प्यार । जिम्मेदारी । या पति की नस नस को जानना पहचानना । कभी उसे जताकर कहती कैसे काठ दिल के हो? वह उसकी ओर देखता तो कहती 'मेरे मन की नहीं समझते, मत समझो, पर छोटों की -छाटी छाटी चाहतों जरूरतो पर तो ध्यान दो ही। उन्हे समझो भी? "क्यों कहती हो? समयने लायक नहीं रहा, इसलिए कहती- 'मैं लायक समझकर ही कहती हू- मालूम, अपने पति के लिए लायक सुनना कितना -पर तुम्हे पता? -- वह उसे बताना चाहता था, उसके बाबू (दम्मो के) ने (ससुर) उसे घर बुलाकर क्या कहा। पूछ- 'क्या कहा? बताया- 'नालायक बताते हुए कहा कि उसने नौकरी-याने तुमने नौकरी लेने का सोच लिया है। मैं चुपचाप सुनता रहा था तो बोले 'तुम्हे खानदानी समझकर बेटी ब्याही थी । भला आदमी जानकर । पर ऐसे निकलेगे-उसे पटक दोगे? जैसे उसके लिए कहीं वर नहीं था? बहुत ये चाहने वाले-वर- उसके लिए? उसने पूछ- “दम्मो, सच ! चाहने वाले थे तुम्हारे ? सुख देता है। - पहनी स्थिति अतिम स्थिति/113 +- "क्या यही पूछने पीछे-पीछे आये थे ? मदिर ? तो सुनो कि, उम्मीठे तो जगानी पडती हैं, सभी जगाते हैं। पर मुझे किसी का क्या पता ? - कोई या कि नहीं। हा, दम्मो को सिर्फ अपना पता है, पर उसने क्या पाया उम्मीदे जगाकर? यह कभी पहले पूछ था दम्मो से, तो उसने कहा था। तवे पर पड़ी रोटी देखी है कभी पडी रहे तो कोयला हो जाती है। उसने पडी रोटी नहीं देखी, सिर्फ दम्मो को देखा है । जिस किसी ने भी उसे जिस चूल्हे मे झोंका है, वह झोंकी जाकर, सा सी किये बिना ही नली है। दिन रात मैला कूटा है उसने । फर्श के जक रगडे हैं। धनिया पोलीना पीसा है। अधाधुध पिलकर सतुष्ट भी हुई है। निश्चित भी । करने से अलग उसे फुरसत और के लिए नहीं । फिर क्यों लिया हवाला दम्मो के बाप ने, उसके चाहने वालो का? ऐसी लडकी को किसी ने चाहा होगा, उसने फिर पूछा - "कोई मगेतर था तेरा ? - एक था. - - - 'फिर क्यों नहीं पटाया पिता ने उसे ही? "बिरादरी का नहीं था। 'तुम उसे जानती हो? - "जानने से कुछ होता ? सभी निर्मोही होते हैं।" कोई और निर्मोही हों कि न हो, वह जरूर निर्मोही था । निर्मोही था, तभी दम्मो के न चाहने पर भी उसने दम्मो को पाच बच्चों की मा बना दिया था। वह डरती थी। कहती थी कि जुम्मेदारी उठाने की काबलियत उसम नहीं है। तो चलो अच्छा हुआ कि एक मर ही गया, पर दम्मो रोई थी। उसे तो खुश होना चाहिए था?- सुनकर बुझ सी गयी। फिर बोली-“पहले मा बनकर जनो -बच्चा --1 फिर खुश होना।" एक फिर गर्भ मे ही गिर गया। दम्मो कितु बच गयी। अब तीन बच्चों को बेजारी मे ही सही,पर सभाल रही है। या यता-कदा उसी के पास रहता है। कहती है -“चौपट हो रहेगा - "और जिन्हे तुम पाल रही हो वो? कहती -"मैं तो कुछ भी नहीं कर सकी न, और वक्त बीत गया। मेरे लिए अगला जन्म होगा, अच्छ करने को।" अब पह कहती है, तब वह एक सास भी नहीं भर सकती। चेहरा सुक जाता है।- . - - 11पही म्पिति निम बिति फिर हारे जैसे स्वर मे कहती है - "सब राधावल्लभ पर छेडे हू अब तो। उसने एक बार राधा वल्लभ ही के सामने चुपचाप खडे देखा था उसे, पर वह सीढिया उतरती - शिव स्थापना की सीढ़ियों पर आन बैठी थी। फिर लोटा उठाया जल भरकर शिव जो पर भार बाधकर छेडती रही जल। यो, इस तरह जल शेडना उसे भी अच्छा लग रहा था। और वह अपनी भीतरी गाठे भी मानो श्री देव पर खोल रहा था। हालाकि उस समय उसके भीतर प्रगाढ द्वद्व भी था। उसने चार महीने से दफ्तर का किराया नहीं दिया था। बिजली-पानी भी नहीं भरा। कनेक्शन कट गया है। तब भी चला रहा है। हप मे नकद अब कम रह गया है। उगाही पर सभावनाए टिकी थीं, पर एजेंटों के घपले सामने आने से मन उचाट सा हो गया है। कुछ पोस्ट डेटेड चैक हैं, पर कौन कब भुना देगा? -- और खिन्नता जैसे असाध्य रोग या पुरानी काई जैसी भीतर जम गयी है। यह दम्मो की आवाज थी कि सहसा वह ख्यालों से हटकर अपने आप में आ गया। 'सिर पर बोझ है शभो। आप कोगे,मन को बायो । पर मन बेहद बध गया है, इतना कि कोई आवाज नहीं आती अगर से । दूसरे काम सारे वैसे-के वैसे पड़े हैं। वह जो अदर था, कि-करो करो। वह अब नहीं है। अब न प्रौढ सस्था जाने को मन करता है, न ज्ञान भारती।' मन पहले ही कब करता था उधर का रुख ? हठकता था, क्योंकि छेटे बों मे सबसे ज्यादा उम्र की में ही थी। शर्म से सिर डाले डाले ही सीखा जो सीखा । और जब से 'ज्ञान भारती मे इम्तहान दिया, अब जाती ही नहीं। अदर धुकधुकी बैठ गयी है पास फेल की " खामोशी छ गयी है। शायद आचल को आखों पर दिये दम्मो बाहर आ गयी है, आते ही सामने पाया उसने एक मरखना-सा गूदड मे लिपटा आदमी । 'शिव, शिव । कहते शिव की सीथ मे देख रहा है। "क्या माग रहे हो ? दम्मो मरखने से पूछ रही है। वह सिर हिला देता है। "शिक शिव भगवान से कोई मागा जाता है ?" दम्मो उससे सिर खपाने खड़ी हो गयी। बोली-"फिर हम मागेंगे का जाकर ? कहो ? और बिना मागे भी हम क्या माग नहीं रहे ? अगर आवाज नहीं देंगे, तो सुनेगा कैसे? -- कि सुनकर ही तो साकल खोलने दो पहली स्थिति अतिम स्थिति/115 आयेगा ? सुनकर भी न आये- ये उसकी मर्जी।' -कि दर उसका है। पर दम्मो के लिए उसने दर खोल दिया था कि परीक्षा परिणाम और नियुक्नि-पत्र – दोनों साथ-साथ मिले ये उसे। मैट्रिन भर्ती हुई थी वह । लेकिन सुपरिटेंडेट मिली तो, वह भली महिला थी। अस्पताल की बयटिशन भी वही थी। अत दम्मो को रसोई का कार्य भार सौंप दिया गया। इस काम मे कोई दिक्कत भी पेश नहीं आयी उसे । बाट म वहीं रिहायश भी मिली : पर कर्बला वाला घर छेडते समय दम्मो की आखे डबडबा आयी थीं। अब खाने पीने, किसी हद तक पहनने तक का भी आराम है। पर दोनों बड़े को होस्टल मे छोडना पड़ा है। खर्चा बढ़ गया है। दम्मो पूरी तनखा बचाती है, दोनों बड़ों के निए। छेटा कभी ही उसके पास रहता है। एक दिन सिर्फ यह बताने आयी थी कि अस्पताल से दूर क्वार्टर मिल रहा है। उसमे सब रह सकेगे। 'तुम मैडम से पूछ लो।" उसने सुझाव दिया - बोली – “क्या कहते हो ? खुद मैडम ने ऊपर से ऑर्डर करवाये हैं, कहती हैं - अलग किराया क्यों भरते हो।" सोचा - जरूरत मे सबको मा बाप मानकर चलने वाली है दम्मो । उसे मस्का लगाते हुए कहा – “वशीकरण मत्र फूला है, मैडम पर? - "छि:, ऐसा कहते हो? वह एकाएक गभीर हो आती बोली- “कोई मत्रतत्र से होता है ऐसा कुछ ? पूछा 'फिर कैसे होता है। बोली- वो कक-सताइया वनवाई थीं न, मैडम को अच्छी लगी - मुझे बैंक यूवेरी मच भी कहा। दम्मो अपनी बेटी-बेटी आखे झिपझिपाती है | चश्मा नाक तक उतर आया है उमे ऊपर ले लेती है। कहता है -“तो चमचागीरी मे पास हुई, यही सही।" वह चिढ गयी।-"फिर वही बात?-दई, स्वामी जी ने नहीं कहा था, सौददाजी करोगे तो मरोग" "तुम मरी हो कोई ऐसा करके? "देखो, दिल से इज्जत करोगे न, तब भगदान स्वीकारेगा। कोई भूखा है वह ? मैडम को देखो न, कुछ कम्मी है उस ? कितने तरह के खाने पकते हैं यह रोज 1 देखो जैती, 116/पहनी स्थिति निम स्थिति जैम, पुडिग, खीर -“वह सब गिना गिनाकर बोली --"पर वह कभी देखती भी नहीं चीजों को कभी सिर्फ चाय ले ली। -"जो हो-मैं अस्पताल मे रहने नहीं आऊगा। तब उसने नाम- लाटरी मे लिखा दिया, प्लाट के लिए। -बाबू जी। देखा नीचे शनिवार वाली थी। 'दे दो माई-बाप ।' सुनकर रुकने को कहा। सिक्का फेका । उठने लगी तो उसे रोका - 'ठहरो। एक रोटी थी रसोई मे~एक धोती निकाली दम्मो की । आकर लेने का इशारा किया तो बोली -- "बाबू, नीचे ही आओ, ऊपर चा नहीं जाता । चोट है पीठ मे -' कपद्य उसने कमर मे लपेटा -- पलटी तो हठात् -- कुचली-सी पीठ। - 'ये कैसे हुआ? पूछने पर बोली अलाव जल रहा था। मैं दखी नहीं-जा गिरी--अबढापने को नहीं देता कोई - उतारन सुतारन भी इसी तरह उघड देखा था दम्मो को सपने मे । अस्पताल के सामने लेटी हुई । निर्वस्त्र। उसे आता देखकर - अस्पताल का पर्दा खींचकर-कमर के गिर्द ले लिया। "इधर क्यों आती हो "कितनी बार यही सवाल पूछ है दम्मो से । चुप रहती है। कभी गीली आखों से-जैसे परिताप बहा डालत कहती हो – “अज्ञान जन्य घोर पाप छुडने हैं -कहीं कोई पाप नहीं तुम पर दम्मो को जी-जान से समझाना चाहता है। उस पर प्राण छिडकता है वह, पर वह नहीं मानती 'मरा काम पब है,-हैं-- तुम्हीं दिलवा दो - काम की स्थिति क्या दम्मो साथ नहीं आयी। भयभीत-सा दम्मो को उठाया है -“आओ मेरे साथ। कहती है - "पहले तुम जाओ। - देखो, - मेरा नाम लिखा है वह्य -" फिर उसे वहीं का वहीं सद्ध देखकर वह मुह दूसरी ओर फेर लेती कहती है -"नहीं न, मेरी बात रखी ही कब थी तुमने? वह क्यों दम्मो की कोई बात नहीं रख सका था? कितनी सताईसी रहने लगी थी दम्मो? आखिरी बार कहा "देखो अब तो मकान भी बन गया है। दोनों बडे - - पहा स्थिति बनिन स्थिनि/117 - - - अपने अपने घर मे रहने लगे हैं। तुम भी घर मे ही रहो।" 'वो घर कोई उनका है ? ससुराल वालों ने दिया है घर उन्हे । चलो मैंने तुम्हे दिया। आखिर हम दो तो हैं नहीं न ? 'कहो, मैंने दो होने का कभी कहा है। नहीं कहा, पर निर्मोही तो बने रहे हो ? रूखे भी रूखा हू मैं? नहीं हो?-मा के मरने पर जो रोये नहीं। काश दम्मो जानती कि उसके पति की मा सिर्फ मा ही नहीं थी, घर का स्तभ भी थी मा । शहतीर थी। और उसी शहतीर को दरका कर मा उन सबके लिए पीछे भूचाल छेड गयी थीं। मा दाहवाही की कितनी लोभी थीं, कि धन मान कम हुआ तो निय भी बनी। यह कभी भी जाना नहीं, कि जो तख दरका गयी है, उसका नतीजा क्या होगा, कि मझधार मे डगमग डगमग कर रहा है तख्ता अब भी मा बिन 'देखो, तुम पिछला सब भूल जाओ। और यह घुमक्कडी भी छोड़ दो।" अच्छा, सोचता हू- इस पर? 'सोच मैं लूगी । बस,जिपका देना है, दे दबाकर छुट्टी करो तुम। 'लडकों से सलाह करूगा। दुला भेजा है, दोनों को - मैंने अत्यत आश्चर्य चाहे सिर से कुछ लाय जाये, दम्मो किसी के आगे पढ़ेगी नहीं। फिर अब ऐसा क्या हुआ है कि बुला भेजा है ? कहा- अद लगना है थक गयी हो?" कहते-कहते स्वर उसका धीमा हो आया है। दम्मो का सिर जरा सा टेवा हो गया है। कनखियों से देखी है - पूछती सी. बात का आज पता चला है तुम्हे ?" 'नहीं दम्मो। एक तो वह भी गया है। यह कहने मे झिशक होने लगी उसे । - नहीं झिझक नहीं, थकावट । नहीं उसे थकावट भी नहीं । थकने से ज्यादा बजारा है उसे । उकताहट और अनमनापन । जिसने सिवा उपरामता के उसमे कुछ नहीं छोड़ । बस निष्क्रियता। दम्मो चुप है। हाइमास के पिंजर सरीखी अहिल बैटी है। कहने को उसके पास भी नहीं कुछ। फझडये होंठ सुले हैं, पर गुलकर रह गये हैं, भावनाए भीतर लिये लिये । वह भावनाए कहीं थीं भी र तब क्या था? - सूफा सूखा सा - ॥ पहनी पनि अनिन स्थिति 64 H - 'देख कर डर आता है, मुझे तो? पूज कैसा डर ?" वह दमयती को देखने लगा । लटके हुए गाल । छोटा सा माथा, उस पर तीन-चार लकीरे। भीतर को थसी मिचमिची सी आखे । दमयती यों देखा जाना सह नहीं सकी। दोली "ऐसे क्यों देखते हो? मैं पहले भी ऐसी ही थी। बिलकुल ऐसी तो नहीं थी दम्मो ? ऐसी नहीं थी। 'तुम भूलना मत पर दोनों से बात मैं ही करूगी। पहले जैसा दम्मो को देखता रहा वह । जैसे- यही ठीक है, "स्वीकार है उसे। दम्मो जानती है, बेटों से बात नहीं हो सकेगी उससे । कतराता ही रहेगा। देटे आये तो बिना भूमिका दाथे, बिना कतराये वह बोली – 'पधा समेटने की सलाह दी है मैंने ।" दोनों ने पूरी गभीरता से सुना, पर कहा कुछ नहीं । दम्मो बात खोलकर बताने लगी, शायर इस उम्मीद मे कि सुनकर कहेंगे- 'ठीक है बाबू जी, छुट्टी करो । चुकाना है किसी का, तो हम बैठे हैं। आप ठाठ से मा के पास रहो। पर दो मे से एक ने भी ये कहा नहीं । अलबत्ता मा को, पहली बार सूझ-बूझ रखने दाली मा बताया। बद्य बोला 'पाटे वाले पपे मे रखा भी क्या है?" मझले ने राय दी 'छोटा भी जमकर रहना सीखेगा। जिंदगी बन जायेगी।" बडे ने जोड - "और नहीं तो, पोदी वाले कुत्ते की तरह का हिसाब तो है ही -" मझला बोला अपना फर्ज जान जायेगा, बूढ़े मा बाप के प्रति । जबकि अब बीवी । भी है-1 दोनों की उपती बाते दम्मो को गड रही है, यह दम्मो पर चढ़ते-उतरते रग से जान लिया था उसने । तब दम्मो ने चेहरे से सारे रगों को उतार फेकते कहा - "मने सुन लिया है। अपना दल बेकार यहा न गवाओ -समझतार बेटो। जाओ, काम सभालो।" अब दम्मो का साथ पाकर भीतर ही-भीनर तृप्ति हो रही है। दम्मा भी इन रिनों विस्तर मे दुवकी रहती है। एक दिन दुबके दुबके ही निवृत्ति लेने की बात छड दी। पद स्थिति तिन म्पिति 119 - - कहा -"मकान रेहन रखकर चुका सकते हैं र्जा?" बोला रहन न भी रखे। सरकार को किस्तों से मतलब? "तो छोडो, किस्ने तनखा से ही भुगतने दो। ठेकेदार का भी देना है। - भाई जामिन है ? भाई की बात उसने पहली बार ही सुनी थी। अव से भर गया । दम्मो ने ही पार दिलाया -"वही बिल्डिंग और नौकरी मे सिफारिश करने वाला था। बादू बताते हैं - दूर के नाते से है भाई-" सोचन लगा, दुनिया मे कहा कहा से आकर देगाने अपने बन जाते हैं। फिर अचानक कह उटी-'ये घर, वैसे मुझे पसद तो नहीं, पर पर रहने क लिए तो चाहिए। इस मैं छोड़ नहीं सकती। - तुम हो, घाटा है - कुछ रुककर कहा अच्छा, तुम छोटे को नहीं कह सक्ने क्या?" 'छोये, कहना क्या ? - तुम उमे लिया ही लाओ।" फिर उसी सप्ताह दरियाप्त किया गये थे- सिर हिला दिया तो पूछा - "क्या कहता मा?" आयेगा। -" उसे पा- आया, टे ने कहा था- 'मा के साथ मा नैमा बनना पड़ेगा?" 'क्या मतलब" वह दोला नहीं, तो समझ में आया । मा के सामने वह सिगरेट भी नहीं पी सकेगा - - "पर या भी तोटे बेटम परापी सकी को शाम" -"पर उस तरह रहना भी मुश्चित है दाबूनी । अपरहले २ न अनग" "मैं दूसरी शाटों की प म था। फिर मैं अस्तापा- "कभी मैं भी आ जाता था।" "परफितना अर्म- हा तव शरबत स अदा ५, फिर शादत दग"सिम स्से म भी रिहम गुद्री प्रतिमा स-सरदेश । दर-त' यम" "मने पर मग पर अर मिरहिम्म-म बगर - matforदिर हो बैदा मैं, तो? - मैं ढीला नहीं पडना चाहता ? सुनकर दम्मा बोली- 'उसने कहा, और तुमने मान लिया?-जुम्मटार वाकई बहुत है वह। दम्मो स सहमत होता सा चुपा गया था वह ! फिर साचा हम क्या कहना था सो कह दिया। आय या किन आय - अगली सास म मुह से निकला आयेगा ही, नहीं तो कहा जायेगा? - यह मुन कितना थक चुका था - भटक भटककर । भटक्न ही फिर राह दे देता है। और इसान खप जाता है, जहा भी सींग समाय । खोजी तो बस कोई काई ही होता है । एकाएक दम्मा का चहरा मन मे जग जाता है। दम्मा पाम पड़ी धीमी सास भर रही थी। वह दम्मो के पास सरक गया । मन हुआ,दम्मो को अकमे ल ल । सिर पैरा पर पर दे। देखो कि पानी का चश्मा दम्मो न खोजा । पर इस घर से उसे लगाव ही नहीं। चश्मा शायद असाध्य रागिर्यो के लिए होता है ? - - पर इसी घर के नीच नो बगीचा लगाया था उसने, उससे उस लगाव है। अकसर को बुलवा कर काट घट कराती है और पौष कैसे जा रह है, ये पूछती है। इस बार बरगट के बेटे रह जान पर चिता व्यक्त की थी • 'देखो, दो साल में सभी उपर तक उसर आये है पौष, फिर ये दरगद क्यों पीछ रह गया ? - "ये -बट १ माली ने इगित करत कहा। “सह सहज उठता है बट- -पर कितना सहन- भाली अक्खड था, दम्मा की असहनता पर आख फाड-हत उघाइ बैठा आपने बरगद लगवाया ही क्यों? समझकर दम्मो बोली - "मेर काम नहीं आयेगा, यही न? -पर सबक काम तो आयेगा? सबम कभी खेटे की पत्नी और होने वाला उसका बच्चा भी तो शामिल नहीं था ? नितदों पर भार न डाल पान वाली खडखड चावत वीनती हुई घेट की बहू आखों के आगे आ गयी। "अब तुम घंटे के रास्त पर लाना । उसके बच्चे की ठीक स दखभाल करना । इस तरह परिवार के लिए पु को उत्सर्ग करना-तुम भा पही वित अनिम स्थिति' - अचभ में देखा दम्मो को -1 क्या इस उम्र मे नय सिरे से सीखगा वह ये सब दम्मा कुछ याद करक दोली कैस दोनों बटों ने तवर बदल लिय थे। उस वक्त अगर भगवान लाज न रखता, ता-लेनगर मकान कब्जे में कर लता पर भगवान जब लाज रखन पर आता है, तो मौक की राह नहीं देखता । एन वक्त पर झट लता है सेई उत्सगी । वरना हमारा कौन होता था वह इजीनियर ! दूर का कोई न ? - पर आज तो अपना नजदीकी भी वक्त पर काम आता है काई । बताओ कोई पैर छुएगा नहीं, ऐस म भगवानका दम्मो उसी के आगे झुककर उसके पैर छूने लगी। ये क्या करती हो? इस झिशक भरे अपने ही प्रश्न की बहुत ही मध्यम सी आवाज उसके कानों मे उटी, और वहीं डूब भी गयी। फिर बहुत ही एहतियात और बारीकी से उसने अपने पैर भी हटा लिये। यह क्या हुआ ? दम्मो पलक बिना इपकाये देखती रही। हा, क्या हुआ ? वह भी नहीं जान पाया। पर कुछ था कि उसका इस घर से लगाव जाता रहा था। इस घर मे उसका कुछ नहीं अब । कैम एक क्षण मे यह घर किसी आत्मोत्सर्गी का ो गया है ? कौन है वह ? कौन एक एक ईंट नोडता है ? कौन गढता । बात ब्रह्मज्ञान का रख ले बैठी। दम्मो कहती-कभी कभी तो भगवान मायाजाल रचा देते हैं। हमे बताने के लिए कि तुम भी रचना सीखो। और गये । और हम गढ़ते हैं। अपने गढ़े हुए मे सुधार भी करते हैं। कितने परिवर्तन भी । वह भी इसलिए परिवर्तन करता है कि हम जान जाये कि अनत परिवर्तन हैं ससार में । और वह गुट दारबार गढ़ता है। और फिर तोड देता है। हममें से ओछपन भगाने के लिए। खेटापन । कितु दम्मो की कही हुई कोई बात मेरीअरुचि को मुझमे से भगाने मे समर्थ न हो सकी। दम्मो की मजूर छुट्टिया अब खत्म हो चुकी है। दम्मा छुटी बधने की सोच रही थी, तभी ट्रसफर ऑर्डर आ गये । स्टाफ के काफी सत्स्य बड़े अस्पताल के लिए चुन लिए गये हैं, उसी में दम्मो भी चुनी गयी । ट्रासफर ऑर्डर उसने भी पद्य । शायद - अस्पताल की गाडी लेने आयेगी । अत पहले से तैयार थी दम्मो । गाई आने पर सीढिया उतर गयी। 122/पही स्थिति निम स्थिति अपना बैग और इभेला खिड़की में भीतर फेक दिया । हैंडल पकड़कर घुमाया, और ऊपर हाथ उदया। मेटाडोर तब तक झटके से भागी, और बगीचे का चक्कर काटती फर्राटे से सड़क पर आन पहुची और साथ ही दम्मो की चीख - 'रान्डम। फिर चीख घुट गयी। सभी लोग अपनी अपनी बालकनिया पर आन खड़े हुए। बच्चे और मन सीढिया उतर आय। सडक भीड और कोलाहल । बुत बना खड़ा था वह। ये कैस हो गया। इसीलिए तो नहीं, कि वह पैर हटा बैठा था ? नहीं,दम्मो ऐसी नहीं थी । वह ऐसा कर ही नहीं सकती थी । वह तो उलटा प्रार्थना करती थी अकाल मृत्यु हरणम् सर्वव्याथि फिर, सर्वाथार ने उसे यह दिया ? -- वह कहती थी- सर्वा धार पूर्ण पाप क्षय कर देता है। हमे सपूर्ण बनाने के लिए। यही है, यही सपूर्ण स्थिति। जब-जब सपने मे दिख जाती है दम्मो वह पूछता है और बार बार जानना चाहता है -आगे क्या है? -वह क्यों अभी भी भटक रही है। इस बात का जवाब दम्मो ने आज ही दिया - 'रेखो, ये खेटा हैन- बहुत छटा बन कर भागा आता है मेरे जाचल मे। तीन चार बरस के बेटे बच्चे जैसा मैं उसे चुभकारती हू दुलराती हू- पर खाली हाथ कोई मा अपन जाये को दुलार सकती

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Pahli Stithi Antim Stithi

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Chandra Aulak
Title
Pahli Stithi Antim Stithi
File name
Pahli Stithi Antim Stithi
Text
OCR done
Citation
1970
Published
2011/03
Publisher
Gyan Bharati Dehli
Language
Sanskrit
Pages
139
Library
Shree Jubilee Naagari Bhandar Bikaner
Classification
Literature
DLI number
551268
Barcode
4990010032026.00
Scanning centre
C-DAK, Kolkata
Digital publisher
Digital Library Of India
VMLT id
O8CU7qIYVKf
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Pahli Stithi Antim Stithi