Adarsh Library, Jaipur
Samrat Harsh
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समाट
हब
शंकर बाम
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दो शब्द श्री शंकर वाम इतिहास पुरुषों पर अनेकानेक पुस्तकें लिख चुके हैं । इतिहास उनका विषय है और इस दिशा में जो उन्होंने दक्षता प्रगट की है उसके प्रमाण में वे अनेक पुरस्कार भी प्राप्त कर चुके हैं। प्रस्तुत पुस्तक सम्राट् हपं भी उसी कड़ी में है और उसे सुबोध कथानक की भापा में इस तरह प्रस्तुत किया गया है कि वह यालकों, किशोरों और नव साक्षरों के लिए सहज रुचिकर हो सके। उचित और आवश्यक है यह कि हम राष्ट्र के इतिहास निर्माता पुरुषों के चरित्र से परिचित हों और श्री शकर वाम का उद्यम इस दिशा में सराहनीय है । उत्तरोत्तर विकास हेतु अनेकानेक शुभकामनाओ सहित- दिल्ली जैनेन्द्रकुमार
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विषय- सूची पृष्ठ संख्या क्रमांक १. विषय खुशी में जहर पहाड़ टूटा बदला और वदला राजतिलक २. ३. ४. १४ २२ २६ ३५ ૪૨ ४६ वहन की खोज * ७. ५६ ६० ६. दोनों राजी मेहमान का स्वागत नालन्दा में 8. में १०. कोई भेद नहीं ११. कमर कस ली १२. अहिंसा का वल १३. सच्ची विजय १४. लड़ाई की ओर १५. लड़ाई नहीं १६. अश्रुपूर्ण विदाई १७. ६७ ७१ ७७ ८४ ... ... ६० १०३ १०६ सर्वस्व का दान 1 खुशी में जहर आज से लगभग १४०० वर्ष पूर्व थानेश्वर में एक राजा राज्य करते थे। उनका नाम प्रभाकरवद्धन था। वे बड़े शक्ति- शाली थे । उनका वंश पुष्प-भूति के नाम से प्रसिद्ध था। उनके दो लड़के और एक लड़की थी। बड़े लड़के का नाम राज्यवर्धन, छोटे का नाम हर्षवर्द्धन और लड़की का नाम राज्यथी था। उनके दोनों लड़के योग्य, सुशील, योद्धा और पराक्रमी ये। लड़कों की भांति लड़की भी विदुपी और विनम्र थी । वह नृत्य, संगीत आदि में विशेष रुचि रखती थी। उसका विवाह कन्नौज के राजा गृहवर्मा के साथ हुआ था। प्रभाकरवर्द्धन बूढ़े हो गये थे। इस कारण उनके दोनों बेटे राज-काज चलाते थे । इन दोनों बेटों में राज्यवदन तो बिल्कुल साधु स्वभाव का था और उसकी इच्छा सन्यासी हो जाने की थी। लेकिन हर्प बड़ा बुद्धिमान, तेजस्वी और पराक्रमी युवराज था। वह राज्य के हर काम में बड़ी दिलचस्पी लेता था और हररोज़ नये-नये अनुभव प्राप्त करता था। उन दिनों भारत पर हूणों के हमले वार-बार हो रहे थे। हूण भेड़िये थे । उन्हें खून का चस्का लग गया था। शान्ति से वे ज़िन्दगी क्योंकर बिताते ? वे वंक्षु के किनारे से चलकर भारत को रौंदना चाहते थे। प्रभाकरवर्द्धन के जमाने मे हूणों का यह हमला पंजाब पर हुआ। यह देख राजा ने अपने दोनों बेटों को वहां लड़ने भेजा। ।
Jun खुगी में जहर दोनों झट पंजाव जा पहुंचे और उन्होंने हूणों के घोड़े को बारा एकाएक सिन्धु नदी के किनारे रोक दी। हर्ष को अपार सेना ने हूण-सेना का तलवारों से स्वागत किया। अत्याचारी हूणों की राह अब तक दुनिया में कहीं भी नहीं रुकी थी। हिन्दुस्तान में एकाएक अपना रास्ता रुका जान उन्होंने हिन्दुओं की फौज पर भयंकर हमला किया, मगर यह हमला चट्टान पर तलवार चलाने के समान था। तलवार टूट गई। उनके सामने अट्ठारह बरस का वीर युवक उस प्रभाकर- वर्द्धन का बेटा था, जिसने कुछ ही दिनों पहले हूणों के देश को तवाह किया था और उनके घरों में पंठ-पंठ कर उन्हें मारा था । वह भला कैसे बर्दाश्त करता कि वे ही हूण उसकी पवित्र जन्मभूमि पर पांव रखें । वह थानेश्वर से आंधी की तरह उठा और हूणों की दीवार से सिन्धु के तीर पर जा टकराया। पृथ्वी मानो हिल गई; क्योंकि भारत का वीर वालक संसार की सबसे मजबूत और सूंखार ताकत हूणों के खिलाफ लड़ रहा था। घमासान युद्ध छिड़ गया। लाशे गिरने लगीं। खून की नदी वह चली। पर कोई थका नही । कई दिनों तक देवासुर-सग्राम होता रहा। हर्षवर्द्धन अपनी सेना का हौसला सदा बढ़ाये रखता। ऐसा होता भी क्यों न ? सारी खतरे को जगहों में, लड़ाई को अगली कतार में, सबकी आँखों के सामने हर्षवर्द्धन को तलवार नाचती रहती। उसकी वीरता और निर्भयता देख कर तो कायर के हौंसले भी बढ़ जाते। फिर यहाँ तो उसकी सेना में भारत के चुने हुए वीर थे। स्वयं हर्षवर्द्धन तपस्वी का जीवन बिताता था। लड़ाई के मैदान में राते उसने जमीन पर मो कर विताई। देश की चिन्ता उसकी चिन्ता थी। फिर जब देश के दुश्मन उसके दरवाजों पर हथौड़े की चोट कर रहे थे, द्रव सम्राट हर्प १० वह किस तरह आराम कर सकता था ! मामूली से मामूली सिपाही के साथ उसका भाईचारा था और लड़ाई के मैदान में वह स्वयं को भी एक साधारण सैनिक से अधिक नहीं समझता था। । न यह लड़ाई सचमुच ही देवासुर-संग्राम था। एक ओर तो देवताओं की तरह हिन्दुस्तान के आर्य हिन्दू थे, दूसरी ओर असुरों की तरह खौफ़नाक हूण । मगर जैसे देवताओं की सेना का सेनानी स्कंद था, वैसे ही भारतीयों का सेनापति हर्पवर्द्धन था । आखिर उसने असुरों को हरा कर छोड़ा। हूणों को भगा दिया और भारत की लाज बचा ली। इतना ही नहीं, हर्ष ने सीमा पार कर उन पर आक्रमण किया। बड़ी घमासान लड़ाई हुई। सारा मैदान सिरों और धड़ों से पट गया। हूण लोग लम्बी दाढ़ी और मूछ रखते थे। भालों से कट-कट कर गिरे हुए उनके सिर मैदान में ऐसे लगते थे, जैसे शहद की मक्खियों के छत्ते हों । हूण सेना उनके सामने न ठहर सकी। बात को वात में वीर हर्ष ने दुश्मन के पाँव उखाड़ दिये। इसके बाद हर्प की थकी सेना ने वंक्षु नदी के पार उतर कर आराम किया। वंक्षु नदी के किनारे केसर के खेत थे और वहां का केसर एशिया और यूरोप के अनेक देशों में विकने जाया करता था। केसर के खेत खूव लहलहा रहे थे । क्यारियों में फूल चमक रहे थे। हर्ष की घुड़सवार सेना के घोड़े उन क्यारियों में लोटने लगे। उनके अयालों में केसर के फूल खुस गये और चारों तरफ महक उड़ने लगी। राज्यवर्द्धन मन ही मन अपने भाई के पराक्रम को देख बाग़-बाग़ हो उठा। इस लड़ाई में उसने भाग न लिया था। वह अपने छोटे भाई हर्षवर्द्धन की तलवार के जौहर देखना ..
खुशी में जहर
चाहता था । हर्षवर्धन ने पहली बार अपने ही भुजवल से हूगों
के दांत खट्टे किये थे, जिसे देखकर वह बहुत खुश था।
सुबह का समय था । सूरज ने अभी-अभी आंखें खोली थीं।
उसे देख रात न जाने कहाँ भाग गई थी। सैनिक शिविर में
राज्यवर्द्धन और हर्षवर्द्धन दोनों आपस में बातचीत कर रहे
थे। हर्ष चाहता था कि इतनी दूर आये हैं तो दुश्मन का सिर
पूरी तरह कुचल कर ही चलें। राज्यवर्द्धन इस पक्ष में नहीं
था। उसका कहना था कि अपने राज्य में वापिस लौट चलें
और वहाँ कुछ मास विश्राम करने के बाद नये उत्साह और
जोश के साथ अपने दुश्मनों को सबक दिया जाये। लेकिन हर्ष
की इच्छा पूरी न हो सकी। इसी समय थानेश्वर से आये हुए
दूत ने शिविर में आकर खबर दी-
"महाराज प्रभाकरवर्द्धन सरुन वीमार है। उनकी हालत
बड़ी गम्भीर है । वे अपने दोनों पुत्रों से मिलना चाहते हैं।
यह समाचार सुन कर राज्यवर्द्धन ने कहा, "हर्ष भाई तुम
फौरन थानेश्वर लोट जाओ। मैं शीघ्र ही यहाँ का प्रवन्ध करके
लौटूगा । तब तक तुम पिताजी को धीरज वैधाना।"
हर्ष को अपना इरादा वदल कर भाई की आज्ञा का पालन
करना पड़ा। वह उसी समय चुने हुए सैनिकों को साथ लेकर
थानेश्वर चल दिया।
थानेश्वर पहुंचते-पहुंचते रात हो गई थी। सूरज धरती
पर अंधकार की चादर डाल कर पहाड़ों के पीछे चला गया
था। हर्प और उसके सैनिक लगातार कई दिनों की यात्रा के
कारण वेहद थक चुके थे। लेकिन जब राज्य की सीमा में
पहुंचे तो सबको बड़ी खुशी हुई। जहां-तहां हर घर-द्वार पर
राजकुमार की विजय की खुशी में दिये झिलमिला रहे थे और
जगह-जगह उत्सव मनाये जा रहे थे।
१२
सम्राट् हर्प
थानेश्वर पहुँच कर हर्प ने महल में प्रवेश किया। परम
भट्टारक, महाराजाधिराज प्रभाकरवर्द्धन दुखार में वेहोश अपने
पलंग पर लेटे हुए थे। उनके पास ही महामंत्री, राज्य के बड़े-
बड़े अफसर और सेवक खड़े थे। हर्ष को सामने देख सवने
झुक कर अभिवादन किया।
महामंत्री ने महाराज को धीरे से जगाते हुए कहा, ,
"महाराज! "महाराज.... जागिये..."देखिये राजकुमार
हर्प विजय करके लौटे हैं.... आपके पास खड़े हैं ।"
हर्प से भी न रहा गया, बोल उठा, पिताजी! देखिये मैं
आ गया हूँ।"
प्रभाकरवर्द्धन को कुछ होश आया। धीरे से आँखें खोलते
हुए बोले, "हर्प ! मेरा बेटा हर्षवर्द्धन आया है !! मेरे पास
आओ, वेटे !"
हर्प आगे बढ़कर उनके पास बैठ गया। अपना हाथ उनके
हाथ में देकर कह उठा, "पिताजी यह क्या हो गया आपको ?
क्या मैं आपकी कुछ भी सेवा नहीं कर सकता ?"
महाराज ने हर्प के सिर पर हाथ फेर कर कहा, "यह तो
शरीर का धर्म है, बेटा! जिसने जन्म लिया, उसकी मृत्यु भी
होगी। इसे कोई नहीं रोक सकता। अव मैं पका फल हो गया
हूँ। एक न एक दिन जाना ही पड़ेगा। मेरी एक बात ध्यान से
सुनो।"
"कहिए, पिताजी!" हर्प ने भरे गले से कहा।
महाराज धीमे स्वर में बोले, "तुम राजगद्दी पर बैठने के
योग्य हो। तुमने राज्य की तमाम जनता का मन मोह लिया
है। उसने एक योग्य राजा के सभी गुण तुम में देखे हैं । वही
तुम्हीं को राजा बनाना चाहती है । बोलो, मेरी इच्छा पूरी
करोगे न ?"
सुमी में जहर
"मैं इस योग्य नहीं हूं, पिताजी! दुबला और कमजोर
आदमी हूँ। राज्य का बोझ कम उठा नागा?" हर्ष ने दुःख
से कहा।
महामंत्री बोल उठा, "कुमार! महारान का नन इन हालत
में दुन्द्वाना ठीक नहीं। वे चंद मिनटों के मेहमान है । क्या उनको
यह अन्तिम इच्छा भी पूरी न करोगे?"
हर्ष का दिल पानी-पानी हो रहा था। बिछुड़ते हुए पिता
को देख उसका दिल बैठा जा रहा था। महामंत्री की बात नुन
कर वह तड़प उठा। दोला, "मैं आपके बादैग का पालन
करूंगा।"
.. और दूसरे ही क्षण प्रभाकरवन की आंखें मदा के
लिए वन्द हो गई। राज्य की सारी जनता मोक के नागर में
हूब गई। जीत की खुशी में जगमगाते हुए मारे दीप एकाएक
बुझ गये। सब जगह मातम छा गया।
राजकुमार हर्षवन की खुशी में जैसे विधाता ने दुःख का
जहर घोल दिया।
land
: २ :
पहाड़ टूटा
लगभग दो दिन बाद युवराज राज्यवर्द्धन भी जीत की
त्रुशी में डूबा हुआ थानेश्वर आ पहुँचा । लेकिन नगर में घुसने
पर उसकी तमाम खुशी हवा हो गई। लोगों के चेहरे उदास
दिखाई दिए। राजभवन पहुँचने पर रोने-चिल्लाने की आवाज़
उसके कानों में पड़ी। उसने सोचा, कुछ न कुछ अमंगल जरूर
है। वह एकदम सन्न रह गया। द्वारपाल ने बताया कि "महाराज
प्रभाकरवर्द्धन नहीं रहे और उनके साथ राजमाता भी सती हो
गई। राजकुमार हर्षवर्द्धन पर तो जैसे बिजली गिरी है। वह
बार-बार विलख-विलख कर रो रहे हैं। अब उन्हें आप ही
समझाइये । आपके सिवा उनका कोई नहीं है।"
राज्यवर्द्धन तेज़ी से महल में गया। उसे देखते ही हर्प के
दुःख का बांध फूट पड़ा और वह बड़े भाई के गले से लिपट कर
रोने लगा। बोला, "भैया, पिताजी चल बसे और माताजी भी
हमें छोड़कर चली गई। अब क्या होगा? हमारी देख-भाल
करने वाला अब कौन है ?"
राज्यवर्द्धन ने हर्प को पास बैठाया, उसे समझाया, धीरज
दिया । फिर दोनों श्मशान भूमि पर चले आये और
जहां माता-पिता के शरीर जले थे, उस स्थान के पास आकर
बैठ गए।
राज्यवद्धन चिता की गर्म राख मुट्ठी में लेकर बोला,
"मुझे दुःख इसी बात का है कि माता-पिता के अन्तिम दर्शन न
हो सके।"
१४
पहाड़ टूटा
१५
हर्ष ने कहा, "पिताजी को भी तुम्हें देखने की बड़ी इच्छा
थी। मरते दम तक उनकी आंखें दरवाजे पर ही लगी रही और
अन्त में उन्होंने तुम्हारा और राज्यश्री का नाम लेते हुए अपने
प्राण छोड़े।"
"खैर! जो होना था, वह हो चुका । अब पश्चात्ताप करने
से कोई लाभ नहीं है।"
हर्प की आँखों से आंसू बह रहे थे। यह देख राज्यवर्द्धन
से भी न रहा गया। उसकी आंखों में भी आंसू छलछला आये।
हपं का हाथ अपने हाथ में लेकर बोला, "माता-पिता का
विछोह किसे दुःखी और विचलित नहीं करता, हर्प ! लेकिन
किया भी क्या जाये ? इस तरह हाथ पर हाथ धरे बैठने से तो
दुःय हलंका नहीं होगा। दुःख कम होगा अपने मन को दूसरे
कार्यों में लगाने से।"
"यही मैं भी सोच रहा हूँ, भैया !" हर्ष ने कहा और विखरे
हुए अस्थि-फूलों की ओर देखने लगा। फिर सहसा साहस
वटोरता हुआ राज्यवर्द्धन से बोला, "भैया, तुम राजगद्दी पर
बैठो और मैं तुम्हारे कार्य में हाथ वटाऊ, तभी मन लग सकता
है, अन्यथा नही।"
राज्यवर्द्धन फीकी हंसी हंस पडा । वोल, "हर्ष, जब मैं हूणों
पर आक्रमण करने यहाँ से विदा हुआ था, तब यह राजप्रासाद,
यह साम्राज्य भरा-पूरा था । अव लौटने पर देखता हूँ कि यहाँ
का सुख, राजवैभव नष्ट हो चुका है और सब कुछ सूना-मूना
सा लगता है । समय भी कितनी जल्दी बदलता है !"
"ठीक कहते हो भया !" हर्ष ने कहा, "यही सवाल
चौंध रहा है। मनुष्य कितने अरमान लेकर मुख की
जुटाता है, पर जब अंत काल जाता है तो सारी,ब्द'
सम्राट हर्प
-
!
इकर उसे जाना पड़ता है।
"यह सव सत्य है, लेकिन तुम्हारे लिए यह बात नहीं ।
भी तुमने जीवन में देखा ही क्या है ? तुम मुझसे अधिक
वल और बुद्धिमान हो। मेरी एक प्रार्थना है, स्वीकार
रोगे ?"
"प्रार्थना नहीं, आज्ञा दो भैया !" हर्ष बोल उठा।
इसी समय सारथी ने आकर टोका, "राजकुमार ! रथ तैयार
है । महामंत्री ने कहला भेजा है कि अधिक देर तक श्मशान
भूमि में वैठना ठीक नहीं, इससे मन में विराग जन्म लेता है।"
दोनों राजकुमार सुनकर उठ खड़े हुए। वे रथ में बैठ महल
में चले आये।
महामंत्री उनका इन्तज़ार कर रहे थे। उन्हें देखते ही
राज्यवर्द्धन से बोले, "कुमार! अव अधिक दिनों तक थानेश्वर
की राजगद्दी सूनी नहीं रखी जा सकती। तुम दोनों में से एक
को राजपद सुशोभित करना ही होगा। नियम के अनुसार
राजा के बड़े पुत्र का गद्दी पर अधिकार पहले है । राज-पुरोहित
ने राजतिलक करने के लिए शुभ मुहूर्त भी निकाल लिया है।"
सुनकर राज्यवर्द्धन का माथा ठनका । झुझला कर बोला,
"महामंत्री जी ! आपका कहना ठीक है। फिर भी मुझे सोचने
के लिए समय दीजिए। एकदम निर्णय कर डालना मेरे वश
की बात नहीं।"
"अच्छी बात है। मैं दो दिन का समय देता हूँ। तव तक
अच्छी तरह सोच-विचार कर लो। मैं चलता हूँ।" कह कर
.महामंत्री चले गये।
राज्यवर्द्धन पुनः विचारों में खो गया। हर्प बड़ी देर तक
चुपचाप अपने भाई के चेहरे पर बदलते हुए हाव-भावों को
..
पहाड़ टूटा १७ देखता रहा । उसे गंभीर देख वह रह न सका । उसके पास जाकर बोला, "क्या कह रहे थे, भैया ! तुम्हारी यह चुप्पी मुझसे नहीं देखी जाती। अगर तुम्ही अनमने रहे तो मेरा मन कैसे लगेगा?" राज्यवर्द्धन जैसे सोते से जाग पड़ा। वोला, "हां, मैं कुछ कहना चाहता था हर्ष !" "आज्ञा दो भया !" हर्ष ने विनीत स्वर में कहा, "आज शायद पहली बार मुझे आपकी सेवा करने का अवसर मिलेगा।" "मैं, यह यह रहा था," राज्यवर्द्धन ने अपने उत्तरीय को सँभालते हुए कहा, "इस माया-मोह रूपी मंसार से मेरा मन उचट गया है। मैं यह राज-पाट सब छोड़कर जगल मे जाना, चाहता हूँ।" "जंगल में जाकर क्या करोगे?" हर्प ने पूछा । राज्यवद्धन ने जमीन पर तलवार फेंक दी और बोला, "अब मैंने हाथ में तलवार न लेने का निश्चय कर लिया है। यह राज्यलक्ष्मी त्याग रहा हूँ। तुम. राज्य-भार संभालो। मैं सन्यास लूगा।" यह क्या कह रहे हो भैया! तुम्हारा यह आदेश ठीक वैसा! ही है, जैसे किसी देशभवत से कहा जाये कि वह अपनी जन्म- भूमि मे. विश्वासघात करे ।/मेरी इतनी कठोर.परीक्षा न लो, भया ! मैं उसमें सफल न हो सकू गा।" "नही हपं ! मैं केवल आयु में तुमसे बड़ा हूँ, लेकिन ज्ञान, अनुभव और नीति में तुम मुझसे कही अधिक बड़े हो । राज्य पद के लिये तुम्ही सर्वथा योग्य हो। राजगद्दी तुम्हें ही मिलनी चाहिये । मैं सन्यास ग्रहण कर ईश्वरभक्ति में डूबना चाहता -हूँ, तभी भव-सागर से तर सकूगा । राज्य-पद मेरे लिए कांटों की सेज होगी। मैं उस पर चैन से न सो सर्केगा।" राज्यवर्द्धन ने गम्भीर होकर कहा। J + -
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पहाड़ टूटा १६ w हर्ष हंस कर बोला, "ठीक तो यह होता कि आप ढाल वनकर अपने छोटे भाई की रक्षा करते; उसे समझाते; नीति के दो-चार पाठ पढ़ाते। लेकिन आप मुझे मंझधार में अकेला छोड़कर स्वयं अपने कर्तव्य से पोछे हटे जा रहे हैं...."नही, आपको अपना यह फैसला बदलना ही पड़ेगा।" राज्यवद्धन ने विनम्र भाव से कहा, "मैं अपने इरादे पर अटल रहना चाहता हूँ। और इसके लिए मुझे तुम्हारी मदद की जरूरत है।" हर्प का शरीर थर्रा उठा। उसके मन ने अनेक विचारों का तूफ़ान उठ खड़ा हुआ। वह कुछ कह न सका। चुपचाप भाई की बातें सुनता रहा। सहसा द्वारपाल ने कक्ष में प्रवेश किया। वह अभिवादन करके बोला, "देव क्षमा करें । कान्यकुब्ज से राजकुमारी राज्य- श्री का संदेश लेकर दूत आया है । वह आपसे तुरन्त मिलना चाहता है।" "उसे भेज दो।" हपं ने कहा। दूत तुरन्त हाजिर हुआ। शीश झुका कर बोला, "देव, जिस दिन सम्राट् प्रभाकरवद्धन के मरने की खबर मिली, उसी दिन मालवा के राजा देवगुप्त ने महाराज गृहवर्मा को मार डाला।" दोनों भाई चौंक कर एक साथ कह उठे, "क्या कह रहे हो, दूत ! कह दो कि यह सच नहीं है।" दूत ने हाथ जोड़कर कहा, "अपराध क्षमा हो देव ! लेकिन समाचार है सच । राजकुमारी राज्यथी को मालवा-नरेश वन्दी वना कर ले गया है। वह अब थानेश्वर पर चढ़ाई करना चाहता है।"
२० सम्राट हर्प - . सुनते ही राज्यवर्द्धन की भौंहें तन गई । वह कठोर हो गया। उसके मन में छाया हुआ शोक काफूर हो चला । मुट्ठियाँ कस कर बोला, "दुष्ट देवगुप्त की यह हिम्मत !" उसने अपनी फेंकी हुई तलवार उठा ली। उसकी भुजाएँ फड़क उठीं। फिर हर्पवर्द्धन से वोला, "अब मैं संन्यास न लूगा। अब तो मालवा के दुष्ट शासक देवगुप्त का विनाश करके ही दम लूगा । आज गीदड़ शेर की मूछ मरोड़ने की हिम्मत कर रहा है। ईधन अपने-आप आग जलाने के लिये खड़ा है । मैं उस दुष्ट के वंश का नाश करूँगा। पुष्पभूति वंश के अपमान का वदला लूंगा। अपनी बहन राज्यश्री को मुक्त कराना मेरा पहला कर्तव्य होगा।" भाई की बातें सुनकर हर्षवर्धन जोश से भर उठा । उसका वीरोचित खून खौल गया। बोला, "भैया ! मैं भी तुम्हारे साथ चलना चाहता हूँ। अपनी बहन का बदला देवगुप्त से गिन-गिन. कर लूंगा।" राज्यवर्द्धन रोप से बोला, "नहीं हर्प ! गीदङ को मारने के लिए शेरों की सेना ले जाना वेकार है । तिनके को तोड़ने के लिये कुल्हाड़ी उठाने से ,हँसी होती है। उसके लिए भारी तैयारी करने का मतलब होगा, उसके बड़प्पन को स्वीकार करना।" :: सुनकर हर्प को संतोप मिला । वह केवल हँस दिया । उसी समय राज्यवर्द्धन ने सेनापति भण्डि को बुलाकर, आज्ञा दी, "दस हजार घुड़सवार सेना तुरन्त सुसज्जित की. जाये। एक प्रहर के बाद हम यहाँ से कूच कर देंगे। ... आदेशालेकर भण्डि. चला गया. : एक प्रहर के बाद राज्यवर्द्धन हर्प से गले मिलकर विशाल . .
पहाड़ टूटा
सेना के साथ चल पड़ा। हपं घोड़ों की टापों से उड़ती हुई धूल
में ओझल होते हुए अपने भाई को वड़ी देर तक देखता रहा।
फिर लोट पड़ा। वह मन ही मन सोच रहा था, "काल की
करवट कितनी विकट है ! जब काल करवट लेता है तो अनेक
दुःख एक साथ झेलने पड़ते हैं । दुःख एक-एक करके नही आते।
उनका एक साथ आना ही मनुष्य की परीक्षा है।
सोचते-सोचते वह सोने के कमरे में चला गया।
IME
ROR
PARTY
बा
: ३ :
बदला और बदला
ह्वा की तरह थानेश्वर की सेना मालवा पहुँच गई। अभी
सवेरा ही था। मालवा नरेश देवगुप्त कपटी और कायर था।
जैसे ही वह जागा, उसे सुनाई पड़ा, 'हर हर महादेव !
वह घबरा उठा। थानेश्वर की सेना की चढ़ाई को सूचना
थी यह । उसने तुरन्त अपने सिपाहियों को साथ लिया और
किले के फाटक पर आ डटा। भयंकर मार-काट आरम्भ हो
गई। किले के भीतर से वाणों की वर्षा होने लगी, पर बाहर
से
समुद्र की तरह लहराती हुई राज्यवर्द्धन की सेना बढ़ती
ही चली आ रही थी। उसने सीढ़ियाँ लगाकर किले की दीवार
फाँदने का प्रयत्न किया। मालवा सेना ने कहर ढाया। फिर भी
राज्यवर्द्धन ने हिम्मत नहीं छोड़ी। वाणों की वर्षा झेलकर भी
वे आगे बढ़ते रहे और थोड़ी देर वाद किले में पैठ गए। उन्होंने
भीतर से द्वार खोल दिया और सारी थानेश्वर की सेना टिड्डी
दल की तरह किले में प्रवेश कर गई। मालव सेना को भागने
का मी अवसर न मिला । थोड़े से ही बच सके, धाकी सब मारे
गये। लेकिन देवगुप्त राज्यवर्द्धन के हाथ न लगा। वह भाग कर
अवन्ती के किले में जा छिपा।
राज्यवर्द्धन उसे कब छोड़ने वाला था ? उसने तो प्रतिमा
की थी कि मैं अपनी बहन का बदला देवगुप्त से लूगा, तभी
पलंग पर सोऊँगा, अन्यथा जमीन पर सोकर रातें काटूगा ।
राज्यवर्द्धन ने उसी रात अवन्ती पहुँच कर किले के पास
२२
बंदला और बदला २३ अपना लश्कर उतार दिया। किसी को कानों-कान खबर भी न हो सकी। देवगुप्त चुपचाप भीतर अपनी सेना के प्रबन्ध में जुटा हुआ था। राज्यवर्द्धन के गुप्तचर ने पता लगा लिया कि किले के भीतर भारी तयारी की गई है; इमलिये लड़ाई न करके किसी तरकीव से किले में प्रवेश करना चाहिये, तभी विजय मिल सकेगी। ऐसे अवसर पर भण्डि की बुद्धि अपना चमत्कार दिखाती थी। उसने हर्प से कहा, "महाराज, फाटक खोलना मेरा काम है । आप तैयार रहें। जैसे ही विगुल बजे, आप तुरन्त किले में । घुस जाएँ।" राज्यवर्द्धन ने स्वीकृति दे दी। उसी रात वाराती के वेश में सौ सैनिकों के साथ एक सजी हुई वारात ने किले के सेनापति से भीतर जाने की इजाजत मांगी। घोड़े पर सवार दूल्हे ने भी कहा-"सेनापति जी ! वापसी पर आपको भी मिठाई दी जायेगी, मेरी शादी हो जाने दीजिए।" मेनापति बड़ा तेज मिजाज आदमी था। उसने किसी तरह भी बारात को भीतर न जाने दिया। यह देख बारात के साथ चल रही एक नर्तकी ने उससे कहा, "सेनापति जी! मेरी भी मजूरी हो जाने दीजिये। अगर बारात न गई तो मुझे धेला भी न मिलेगा।" नर्तकी सुन्दर और चंचल थी। उसे देखकर मेनापति का मन डोल गया। उसने कहा, "पहले यहां अपना नाच दिखाओ, तव जाने दूंगा।" नर्तकी राजी हो गई । सेनापति और फाटक के सभी रक्षक शराब पीकर बैठ गये। महफिल जम गई। नतंकी नाचने लगी। उसका हाव-भाव देखकर सभी झूम उ । .
२४
सम्राट हर्ष
से कुछ जवान आगे बढ़े और वे भो नर्तको के साथ नाचने लगे।
सिपाहियों को संख्या पचास से अधिक न थो। वे सब सेनापति
के पास ही बैठे हुए थे। नर्तको नाचतों हुई सेनापति के पास
जाकर झुकी और अपनी कटार उसको छाती में भोंक दी।
नाचने वाले वारातियों ने सैनिकों को दबोच लिया। कोई चिल्ला
भो न सका। फाटक पर वारात का कब्ज़ा हो गया । दूल्हे ने
घोड़े से उतर कर पूरा फाटक खोल दिया और नर्तको से बोला,
"राज्यवर्द्धन को बुला लाओ।"
भण्डि ने, जो नर्तकी बना हुआ था, विगुल बजाया और
थोड़ी ही देर में राज्यवर्द्धन सेना सहित किले में प्रविष्ट हो
गया।
इस काण्ड का किसी को पता भी न चला। राज्यवर्द्धन ने
किले के भीतर की सारी सेना का सफाया कर दिया। मालव
नरेश ने इस बार भी भागने की कोशिश को, पर राज्यवर्द्धन
पहले ही से सतर्क था। उसने फुर्ती से आगे बढ़कर तलवार से
देवगुप्त को गर्दन पर वार किया, जिससे उसका सिर कटकर
ज़मीन पर लोटने लगा। राज्यवर्द्धन ने भाले की नोंक पर सिर
को उठाया और किले के बुर्ज पर टांग दिया।
देवगुप्त से अपनी बहन का बदला लेने के बाद राज्यवर्द्धन
ने राज्यश्री की खोज की, लेकिन वह नहीं मिली। निराश
होकर वह लौट पड़ा। लौटते हुए उसने अनेक गुप्तचर राज्यश्री
का पता ढूंढ़ निकालने के लिए तैनात किये ।
उन दिनों वंगाल में शशांक राजा राज्य करता था। वह
मालव नरेश देवगुप्त का परम मित्र था। राज्यवर्द्धन के मालवा
जीत लेने का समाचार उसे मालूम हुआ तो वह मन ही मन
चितित हो उठा। राज्यवर्द्धन को शक्ति को देखकर उसकी
बदला और बदला । आत्मा कांप गई । उमे यह भय सताने लगा कि कहीं राजकुमार मेरा सिंहासन न छीन ले। शंका और ईया से वह व्याकुल हो : उठा। उसके मन में बार-बार यही प्रश्न उठने लगा कि किस प्रकार राजकुमार को दुनिया से उठा हूँ? युद्ध में मारना तो उसने असम्भव समझ लिया; क्योंकि शशांक को विश्वास हो गया था कि राज्यवर्द्धन को हराने वाला सेनानी अभी तक पंदा ही नहीं हुआ है। अन्त में उसने छल-नीति से काम लेने का निश्चय किया। देर तक वह मन ही मन अनेक प्रकार के तर्क- वितर्क करता रहा, फिर एकाएक प्रसन्न हो उठा। उसकी ऑखों में चमक आ गई और वह अपने-आप पर खुद ही मुस्करा उठा। उसने एक अचूक पड्यन्त्र सोच लिया था, जिसके द्वारा उसकी इच्छा पूर्ण हो सकती थी। वह उठा और अकड़ता हुआ महल में टहलने लगा। मालवा-विजय के उपलक्ष्य में राज्यवर्द्धन का मम्मान करने के लिए शशांक ने अपना दूत भेज कर रास्ते में से ही उसे बुलवा लिया। राज्यवर्द्धन उस पर विश्वास करके चल पड़ा। दावत देने के बाद भरे दरवार में शशाक ने राज्यवर्द्धन को राजमी वस्व प्रदान किये। उन पर सोने-चांदी का काम किया गया था। उस चमचमाती हुई और सुगन्धित पोशाक में राज्य- वर्द्धन को देखकर सभी दरबारी तालियां बजाने लगे। फिर म्वर्ण-मुद्राओं तथा आभूपणों से भरा हुआ थाल राजकुमार को भेट कर शशांक ने उसकी प्रशसा में कुछ गब्द कहे । इसके बाद दरवार उठ गया। राज्यवर्द्धन अपने सरदारो के साथ शिविर की ओर लौट पड़ा। राजकुमार थोडी दूर तक ही आया था कि उसका सिर चकराने लगा। उसने सरदारों को बताया, "मेरी सारी देह में जैसे आग जल रही है !"
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20
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बदला और वदला
२७
.
सरदार घबरा उठे। तुरन्त उसे लेकर गिविर की और
भागे । वहाँ तक पहुंचते-पहुंचते राजकुमार बेहोश हो गया। वैद्य
के आने तक उसकी सारी देह काली पड़ गई और हाय-पर
अकड़ने लगे। छावनी में कुहराम मच गया। देखते-देखते
राजकुमार राज्यवर्द्धन मदा के लिये सो गया। वेहोशी में ही
उसकी मृत्यु हुई थी, इमलिये न उसने मां खोली और न
किमी मे कुछ कह-मुन सका। वह चुपचाप शान्त हो गया।
इस दुर्घटना का रहस्य यह था कि शशांक ने पोशाक के
कपड़े प्राणघातक विप में तर करा दिये थे। उसी के प्रभाव से
राजवर्द्धन की ऐसी अकाल मृत्यु हुई।
विजली की तरह राज्यवर्द्धन की मृत्यु का समाचार
थानेश्वर पहुंचा। प्रजा में एक बार फिर शोक की लहर फैल
गई। लेकिन हर्षवर्द्धन के दिल में शोक के स्थान पर क्रोध
की ज्वाला धधक उठी। उसकी भौहें टेढ़ी हो गई; नथुने फूल
उठे। उसका स्वरूप भयंकर हो उठा। वह टम समय ऐसा
लगने लगा मानो विष्णु ने नरसिंह का या शिव ने भैरव का
रूप धारण किया हो । पाम ही वड़ा मेनापति खड़ा था। उसके
मामने हर्ष ने प्रतिज्ञा की, “माना कि आज सूर्य का अन्त हो
गया, पर अभी थानेश्वर में अंधकार नहीं होगा। मैं अभी
जीवित हूँ। अपने भाई का बदला में प्रशाक मे लूगा । वह दुष्ट
बचकर नहीं जा सकता।"
मेनापति मिहनाद की भुजायें फड़क उठीं। हपंवर्द्धन को
उमकी प्रतिमा पर आशीर्वाद देते हुए उनने कहा, "तुम वीरहो।
तुम्हारे वंश की नीति है दुश्मन को गेप न रखना । तुम उनी
परम्परा का अनुसरण करो। आज मियार ने तुमको चुनौनी
दी है। शशांक ने तुम्हारे भाई को मार कर थानेश्वर में
महाप्रलय मचा दी है। परशुराम ने अपने पिता के मारे जाने
२८ सम्राट हर्प पर इक्कीस बार राजवंशों का नाश किया। तुम भी वीर हो । शशांक का नाश तुम्हारे ही हाथों लिखा हुआ है। ईश्वर तुम्हें यश दे।" सेनापति सिंहनाद के वीरता से भरे शब्दों में आग में घी का काम किया । हर्षवर्द्धन का स्वर और भी कठोर हो गया। "आर्य सुनिये । मैं आपके चरणों को छूकर प्रतिज्ञा करता हूँ, शीघ्र ही शंशांक का सिर पृथ्वी पर लोटेगा। दुष्टों के पैरों में वेड़ियाँ पड़ जायेंगी। या तो मैं इस प्रतिज्ञा को पूरा करूँगा, वरना अपने शरीर को आग में झोंक दूंगा।" इतना कहकर हर्पवर्द्धन अपनी प्रतिज्ञा पूरी करने में जुट गया।
राजतिलक
थानेश्वर का राजसिंहासन पाली पड़ा था। मन्त्री सभाही
मारे शासन को चला रही थी। हपंवद्धन राजा बनने से इंकार
कर रहा था। उसे राज्य-शासन में तनिक भी दिलचस्पी न
रही थी। बहन के लापता होने तथा बड़े भाई की हत्या से वह
निराश हो गया था।
उसकी यह दशा देखर महामंत्री मे न रहा गया। वह
राजभवन में आकर हर्प से बोला, “पन्द्रह दिन बीत चुके हैं,
कुमार हपं ! अब तो दुःख को भूल जाओ। भाई-बहन के गोक
डव कर इस तरह कब तक अपने शरीर को घुलाते रहोगे ?
बीती हुई बातें याद करने मे कोई लाभ नहीं। माना कि आप
पर घोर मुसीवत आ पड़ी है। लेकिन दिल छोटा न करें।
विपत्तियों में धैर्य मे काम लेना ही मच्चे वीर की कसौटी है।
इस विकट ममय में पृथ्वी का भार वहन करने के लिए आपको
ओपनाग का रूप धारण करना होगा।"
हपंवद्धन ने निराश भाव से महामन्त्री की ओर देखा।
उनकी आँखों में पीड़ा और सहानुभूति लहरा रही थी। यह
देख हर्ष का दिल भी रो उठा। यह महामंत्री में बोला, "मुझे
सोचने के लिए कुछ समय दें। मेरा मन बहुत विचलित है।'
महामनी ने कहा, "ठीक है, राजपुत्र ! आप सोच लें।
लेकिन राजगद्दी पर आप ही को वैठना होगा। एक के बाद
एक आने वाली मुसीबतों मे राज्य में भय और शासन में ढोला-
पन आ गया है। जनता पबराई हुई है। इसलिए आप तरल
२६
३०
सम्राट हर्ष
सिंहासन ग्रहण करें। भाई के हत्यारे शशांक से बदला लें और
वहन राज्यश्री का उद्धार करें।"
"नहीं, सेनापति ! सिंहासन ग्रहण कर मैं दिन-रात काँटों
की सेज पर नहीं सो सकता। यह मेरे लिए बिल्कुल असम्भव
है।" हर्प आवेश से वोला।
महामंत्री हँस पड़ा। फिर कुछ गंभीर होकर वोला,
"राजपुत्र ! ज़रा देश को हालत पर तो गौर करो। तुम्हारे
सिंहासन पर न बैठने से अनेक शक्तिशाली शत्रुओं की नज़र
इस राज्य पर लगी हुई है। अगर अभी से राज्य-कार्य में ध्यान
न दिया गया तो यह शासन किसी दूसरे के हाथ में चला
जायेगा।"
सेनापति की बात सुनकर हर्षवर्द्धन सोच में पड़ गया।
फिर धीरे से बोला, "अच्छा, आज की रात मुझे विचार करने
दो । कल सुबह मैं अपना निश्चय आपको बता दूंगा।"
इस आशा से कि राजकुमार का निर्णय मेरे अनुकूल ही
होगा, महामंत्री खुशी-खुशी महल से बाहर चला गया।
सुबह उठते ही हर्षवर्द्धन ने महामंत्री को महल में बुला कर
अपना निर्णय सुना दिया। सुनकर महामंत्री निराश हो गये।
उन्होंने तुरन्त मंत्रियों की सभा बुलाई और राजकुमार के
फैसले को सबके सामने रखा । सारी सभा में खलबली
मच गई।
मंत्रियों ने एकमत होकर निर्णय किया, "यदि हर्षवर्द्धन
राजा नहीं बनेंगे, तो हम भी मंत्री नहीं रहेंगे।"
यह समाचार हर्ष के पास पहुंचा। वह गम्भीर हो गया
उसी समय प्रजा के चुने हुए कुछ व्यक्तियों का भी एक समृ
उनके महल में पहुँचा। सभी ने प्रजा की ओर से प्रस्ताव रख
-
राजतिलक
"यदि आप यानेश्वर के राज-सिंहासन पर नहीं कंगे तो हम
मव अनशन प्रारम्भ कर देंगे । फिर इस कार्य में हमारे प्राण ही
क्यों न निकल जायें।"
हरवद्धन यह सुनकर चौंक उठा। वह उन सभी को वचन
देते हुए बोला, "अगर मेरी प्रजा और अधिकारी-वर्ग की इच्न
है कि मैं राजा य तो मैं इच्छा न होते हुए भी राज-काज
करूंगा । प्रजा को प्रार्थना स्वीकार करना मेरा धर्म है।"
राजकुमार की बात सुनते ही सब व्यक्ति खुशी से उछल
पड़े। "सम्राट् हपंवद्धन की जय ! मा भारती की जय !!"के
शब्दों से आकाश गूजने लगा।
दूसरे दिन सुबह ही सारे थानेश्वर में खुशी की लहर दौड़
गई। हपंवदंन के राजा बनने की बात सुनकर सारी प्रजा
उसको बधाई देने दौड़ पड़ी। महल के बाहर का मंदान अपार
भीड़ से भर गया। हपं ने बड़े आदर से सवका अभिवादन
स्वीकार किया। राज-पुरोहित ने राजतिलक का शुभ मुहूर्त
निकाला और दिन की घोषणा कर दी। राज्य के तमाम
जागीरदारों, राजाओं और सरदारों को निमंत्रण भेजा गया।
पारों और खुशी का सागर उमड़ पड़ा।
राजगद्दी के लिए निश्चित दिन आते-आते थानेश्वर में देश
के सभी भागों से आये हुए लोगों की भीड़ लग गई। दो वर्षों
के बाद वहां का सिंहासन सजने वाला था। इन दो वर्षों
में जनता ने न जाने कितने दुःख सहे थे। पर आज लोग उस
शोक को भूल गये । जान पड़ता था, आज उनके जीवन का
नया दिन था।
मेक समय पर दरबार लगा। देश के सभी राजे-महाराजे
बैठे हुए थे। कामरूप के राजा की ओर से भी एक,
मेगानि
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राजतिलक । 1 । उपहार लेकर आया हुआ था। सभी अपने-अपने स्थानों पर विराजमान थे । वीचों-बीच सोने का सिंहासन सजा हुआ अपने स्वामी की प्रतीक्षा कर रहा था। दोपहर होते ही पडितों ने शंख बजाये। श्राह्मणों ने वेदमंत्र पढ़ना आरम्भ किया, वाजे वजने लगे, और उसी उत्साह में जय-जयकार करते हुए लोगों ने देखा कि सिहासन के पीछे पर्दे से राजकुमार हर्पवर्द्धन निकल रहे हैं । वे गंभीर चाल से आकर सिंहासन पर बैठ गये। जय- जयकार का कोलाहल वढ़ गया। चारों ओर फूलों, स्वर्ण मुद्राओं और रत्नों की वर्षा होने लगी । ऐसा जान पड़ा, मानो आनन्द के मारे आकाश फट पड़ना चाहता है। इस कोलाहल के बीच कुलगुरु ने राजकुमार को राजतिलक किया। उपस्थित प्रजा ने आनन्द और हर्ष का अनुभव किया। नगर को कुमारियो ने सम्राट् पर पुष्प वर्षा कर अपनी प्रसन्नता प्रकट की। सम्राट हर्प इस अनोखे प्रेम को देख गद्गद् हो उठे। उन्होंने अपने सिंहासन से उठ कर कहा, "राजा और प्रजा का पिता-पुत्र का नाता है । दोनों के हृदय में एक-दूसरे के प्रति प्रेम होना स्वाभाविक है। मैं भी आज अपनी प्रजा का प्रेम पाकर प्रसन्नता का अनुभव कर रहा हूँ। मेरी प्रजा फले- फूले, सुखी रहे, यही मेरी मनोकामना है। मैं आप सब को इच्छा से सम्राट् बना हूँ। अव मेरा पहला कार्य होगा अपनी वहन राज्यश्री को योजना; दूसरा देश का सगठन; तीसरा अपने शत्रुओं का अंत करना।" प्रजा सम्राट् का भापण पुनकर बहुत प्रसन्न हुई। इतने में एक आदमी ने कहा, "सम्राट् आपसे मेरा एक निवेदन है । आप शत्रुओ को हरा कर उनको प्राण दण्ड दे। उनके प्रति दया या क्षमा का भाव अपने मन मे तनिक न आने दें।" ।
३४
सम्राट हर्ष
सम्राट् मुस्कराकर बोले, "अभी शत्रु हारा ही कहाँ है ?
दूत की कल्पना क्यों करते हो ! शत्रु को दण्ड देने का समय
आने दो, फिर देखा जाएगा।"
सम्राट् के सुन्दर वचन सुनकर प्रजा में उल्लास छा गया।
सवके हृदय सम्राट के प्रति अपार श्रद्धा और प्रेम से भर गये।
इसके बाद महाराज सब से विदा लेकर अपने महल में चले
गये और अगला कार्यक्रम बनाने में व्यस्त हो गये।
बहन की खोज
राज-तिलक हो जाने के बाद महाराजहपंवईन अपने शासन
का भार महामन्त्री को मीप कर वहन राज्यधी की खोज में
चल पडे। उमेटते हुए वह विन्ध्याचल पर्वत के बीहड़ जंगलों
में जा पहुंचे।
विन्ध्याचल के इन वन-प्रदेश में दिवाकर मित्र या आरम
था। दिवाकर मित्र बौद्ध भिक्षु थे। यह मायमराटो-मी
नदी के किनारे था। इस विशाल आश्रम में जनक विद्यार्थी
शिक्षा ग्रहण किया करते थे। उन दिनावि मित्र के ज्ञान
की प्रमिद्धि मारे भारतवर्ष में फंनी दी।
हर्षवर्सन अपनी वह्न यो योजने गजने उनके आश्रम में
पहुँचे । दिवाकर मिव का उन्होंने सिर जाकर प्रणाम किया।
दिवाकर मित्र ने उन्हे आदि देकर पाग पडी चटाई पर
बैठने के लिये कहा। पंवद्धन आयम से शान्तिपूर्ण वातावरण
में बहुत प्रभावित हुए। थोड़ी देर बाद ममा हर्षवर्धन ने स्वयं
ही दिवाकर मित्र में कहा, ' भगवन् ' में पानेश्वर का राजा हैं।
मेरे परिवार के मारे व्यक्ति नाट हो गये है। केवल एक यह
बची थी। वह अपने पति के मर गाने के कारण सन्य
इधर आई हो। मैं उमी को गोत में घर आया है।
बापको कुछ मालूम हो तो बनाय
दिवाकर मित्र ममादा
वोल, 'नुम थानेश्वर के म
"ह मुझे
-
।
गे ने कई
सम्राट हर्ष
1
है, लेकिन साक्षात्कार आज ही हुआ। बहुत खुशी हुई तुम से
मिल कर। मुझे तुमसे बड़ी सहानुभूति है, लेकिन खेद है कि
तुम्हारी वहन राज्यश्री के बारे में मुझे कुछ भी पता नहीं और
न कोई समाचार ही मिला है। पर चिन्ता की कोई आवश्यकता
नहीं। भगवान बुद्ध अवश्य तुम्हारा कल्याण करेंगे।"
इतना कहकर दिवाकर मित्र मौन हो गये। उन्होंने भगवान्
के ध्यान में अपनी आँखें वन्द कर लीं। सम्राट हर्ष भी उदास
भाव से उनके निकट वैठ गये, मानो उनसे भगवान के सहारे
की याचना कर रहे हों।
तभी एक आदमी दौड़ता हुआ आश्रम में आया और बोला,
"भगवन् ! अनर्थ हो गया।
दिवाकर मित्र ने आँखें खोली । बोले, "क्या बात है
नन्दन ?
-
नन्दन बोला, "भगवन्, महान् संकट आ पड़ा है। एक
स्त्री अग्नि में भस्म होने जा रही है। कृपया आप उसे
वचा लें।"
नन्दन की बात सुनकर सम्राट हर्षवर्द्धन का माथा ठनका।
उनके मन में शंका पैदा हुई। उन्होंने अधीर होकर नन्दन से
पूण, "भाई वह स्त्री कहाँ है ? वह क्यों अपने जीवन को
समाप्त करना चाहती है ? इस समय वह कहाँ है ?"
"महाराज, वह विन्ध्य के वीहड़ में है। बड़ी भारी चिता
धू-धू कर जल रही है। वह स्त्रो उस चिता के पास बैठी रो
रही है।"
सम्राट् हपं से न रहा गया। वह नन्दन से बोले, "मुझे उस
स्थान पर ले चलो । वह स्त्री अवश्य हो वहन राज्यश्री
होगी।"
बहन की खोज दिवाकर मित्र की आंखें चमक उठी। मुस्कराकर उठते हुए वह बोले, "भगवान् करे ऐसा ही हो। मेरे आश्रम में आकर कोई निराश न लौटे, यही में सर्वशक्तिमान् से प्रार्थना करता रहता हूँ।" सम्राट हर्षवर्धन नन्दन के साथ चल पड़े। दिवाकर मिन्न उनके पीछे-पीछे हो लिये। x x X . मनुष्य अधिक कष्टो से घबरा उटता है। अधिक कष्टों में वह जोवन को समाप्त करने की सोच बैठता है। यही हाल राज्यश्री का था। वह पागलों की भांति बड़बड़ा रही थी, "मेरा भाई नहीं आया और न आयेगा ही ! वह मर चुका है। हपं अभी छोटा है। मौखरी वंश में मेरी मुध लेने वाला कोई है ही नहीं। सब इस दुयिया के लिये सो गये हैं। अरी विन्ध्याचल की भूमि, तू ही फट जा! तुझ मे में समा जाऊँ! सीता की भांति मुझ दुखिया को भी तू शरण दे. मां ! नही. नही, मैं तो इस चिता में जलूंगी। चिता की आग जल चुकी है। हा माता ! हा पिता ! तुम कहाँ हो ' मैं तुम तक अभी पहुँच रही हूँ।" वह जोर-जोर से गेनो और विलाप करनी हुई चिता की ओर बढ़ी। इसी समय नन्दन और दिवार नाथ पंवदन में जंगल में प्रवेश किया। .:. देखने के बाद मनाइने अधीर होकर पहा. नर + ई भी नहीं दिना रहा, मुनिवर ! गज्यश्री होगी। मुझे को लग रहा है कि कहीं वह इन्दर र चिन्ता कर ले।" दिवार निवदेव वाग्नेहरु
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बहन की खोज कुमार ! उन दिशा में जलती चिता की ओर मुंह किये, आकाश की ओर पागल की तरह देखती हुई वह स्त्री राज्यों के अलावा और कौन हो मकतो है ?" मम्राट् हपंवदंन ने भी दूर मे राज्यश्री का विलाप मुना। वे चिल्ला उठे, "वहन ठहरो ! मैं आ गया है। तुम्हारा भाई हर्ष आ गया है। धीरज धरो! अपने को मंभालो ! पर राज्य श्री चिता तक पहुंच चुकी थी। उसने न मुना । वह बड़बड़ा उठी, "मेरा कौन है ? अग्नि मेरा घर है।" यह कह कर वह चिता में कूदने वाली ही थी कि सम्राट हर्षवर्द्धन ने उसे पकड़ लिया। राज्यश्री ने चौंक कर हर्ष की ओर देखा, "कोन ?. हर्ष! हर्ष गद्गद् होकर बोले, "हां राज्यश्री, तुम्हारा भाई हर्प ! ..... मैं तुम्हें लेने आया हूँ.... चलो।" वे उसे चिता से दूर ले आये। फिर दोनो भाई-बह्न प्रेमपूर्वक मिले। इतने में दिवाकर मित्र भी आ पहुंचे। उन्हें देख कर सम्राट् हर्पवद्धन ने कहा, "वहन, इन्हे प्रणाम करो। ये हमारे गुरु हैं। तुम्हारे पति के मित्र हैं । इनका नाम दिवाकर मिन्न है।" राज्यश्री ने दिवाकर मित्र को प्रणाम किया, किन्तु पति का नाम आते ही वह रो उठी। मम्राट हर्षवर्द्धन ने उने धीरज बंधाया। वह चुप हुई। तब उमने हपंवदंन से अपने पति को मृत्यु का हाल कहा । वह मालवा के राजा की जेल से कैसे भागी, यह भी बनाया । मम्राट हर्षवद्धन और दिवाकर मित्र दोनों ने राज्यश्री की ये मत्र वाते बड़े ध्यान मे मुनी और उसे सबकुछ भूल जाने के लिए कहा । कुछ समय तक शान्त रहने के बाद दिवाकर मित्र राज्यश्री से बोले "देवि ! चिन्ता न करें। मोक को त्याग दे । शोक
४०
सम्राट हर्ष
कभी न बुझने वाली आग के समान है। सारा संसार नश्वर
है । भगवान बुद्ध आपको शक्ति देंगे । आपके जीवन को सुखी
वनायेंगे।" और इतना कह कर वे चुप हो गये।
सम्राट हर्प ने कहा, "अच्छा वहन ! जो हो गया, सो हो
गया । अव बीती वातों को याद करने से कोई लाभ नहीं । होनी
बड़ी बलवान् होती है । उसे कोई टाल नहीं सकता। तुम मेरे
साथ थानेश्वर चलो । मैं तुम्हें लेने आया हूँ।"
"नहीं भैया, मुझे चिता में जल जाने दो। मेरे लिये कुछ
शेप नहीं रह गया है। मैं किस मुह से तुम्हारे साथ जाऊँ ?"
राज्यश्री ने आँखों में आँसू भर कर कहा।
हर्पवर्द्धन वोले, "यह सच है वहन, लेकिन इस तरह प्राण
त्यागने से क्या होगा? मेरी भी हालत बहुत बुरी है, वहन !
लेकिन काल से साँस का जो ऋण लिया था, उसे तो किसी न
किसी तरह चुकाना ही होगा।"तुमसे यही प्रार्थना है, मेरा
साथ न छोड़ो । अपने इस अभागे भाई के पास रहो । हम दोनों
दुःखी भाई-बहन एक दूसरे का सहारा वनें।"
राज्यश्री सोच में पड़ गई। फिर कह उठी, "अच्छा हर्प,
मैं प्राण त्याग नहीं करूँगी । लेकिन मैं भिक्षुणी अवश्य
वगी।"
हर्प ने निराश स्वर में कहा, "लेकिन वहन यह काम
तुम्हारे लायक नहीं । ..... मुनिवर मित्र! आप ही राजश्री को
समझाएँ।"
पर राज्यश्री नहीं मानी। वह दिवाकर मित्र से बोली,
"भगवन् ! आपके वचन सत्य हैं। मैं भगवान बुद्ध की शरण में
जाना चाहती हूँ। मुझे वौद्ध धर्म ग्रहण करने की आज्ञा
आप जैसे गुरु का मिलना कठिन है । आप मनुष्यों में रत्न हैं।"
दें
बहन की खोज
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।
दिवाकर मिव ने उत्तर दिया, "देवि, तुम्हारा बड़ा भाई
ही तुम्हारा गुरु है । उसको आजा पर ही तुम वौद्ध धर्म ग्रहण
कर सकती हो।"
राज्यश्री दिवाकर मित्र का उत्तर मुन कर हर्षवर्द्धन की
ओर आशा भरे नेत्रों में देखने लगी। तीनों कुछ काल तक
शान्त रहे। फिर मम्राट हर्षवर्द्धन बोले, "वहन, दिवाकर
मित्र ठीक कहते हैं । वे दुगों में महारा देने वाले हैं। मैं आर्य
दिवाकर मित्र से निवेदन करेंगा कि वे तुझे अपनी शिप्या
वनायें; परन्तु अभी तू भिक्षुणी न वन । पहले में शत्रुओं का
नाश कर लू, फिर मैं और तू दोनों एक माय वौद्ध वनगे।"
राज्यथी ने सम्राट हपंवर्धन की वात खुश होकर मान
ली। सम्राट् में दिवाकर मित्र मे थानेश्वर चलने को कहा।
दिवाकर मित्र चलने को राजी हो गये । मम्रा हपंवदन अपनी
वहन और दिवाकर मित्र के साय मकुशल थानेश्वर लोट पड़े।
,
HOMORE
: ६ :
दोनों राजी
दिवाकर मित्र के साथ जब दोनों भाई-बहन कन्नीज पधारे
तो वहाँ की जनता ने उनका भव्य स्वागत किया। राजगद्दी
पुनः आवाद होने की कल्पना कर लोग फूले न समाये ।
कन्नौज के महामंत्री ने महल में आकर दोनों को फूलों के
हार पहनाये और वौद्ध गुरु दिवाकर मित्र के चरण छुए। फिर
अपनी इच्छा प्रकट करते हुए कहा, "अब महारानी राज्यश्री
कन्नौज के सिंहासन को सुशोभित करें । वह आज कई मारा से
उत्तराधिकारी की प्रतीक्षा में सूनी पड़ी है।"
यह सुन राज्यश्री की आँखों में आँसू उमड़ पड़े। उसे पति
की याद ताजा हो आई । सम्राट हर्षवर्द्धन ने बहन को बहुत
समझाया-बुझाया और कहा, "बहन ! महामंत्री ठीक ही कह रहे
हैं। तुम शासन का भार सम्हालो। इससे तुम्हारा दुःख बहुत
कुछ हलका हो जायेगा और प्रजा के सुख-दुःख का भी ध्यान
रख सकोगी।"
लेकिन राज्यश्री नहीं मानी। वह वोली, "सिंहासन पर
स्त्री कैसे बैठ सकती है ? राज-काज देखने की उसमें योग्यता
कहाँ ? पुरुप का काम नारी को शोभा नहीं देता, भैया ! मैं
सिंहासन पर न दैठूगी।
"यही तुम भूल करती हो, बहन ! नारी को पुरुष से हीन
किसी भी दशा में न समझना चाहिए। उसमें पुरुप से भी
अधिक क्षमता होती है। वह कठिन से कठिन काम पुरुप की
?
૪૨
दोनों राजी
४३
अपेक्षा अधिक योग्यता में कर सकती है । वह फूल से कोमल
और वन से कठोर होती है । केवल उसके मन में यह बात
समा जानी चाहिए-जहाँ चाह वहां राह ।" सम्राट् हपं कुछ
गंभीर हो गए थे।
फिर भी राज्यश्री अपनी वात पर अटल रही। बोली,
"भैया तुम जो इतनी ज्ञान की बातें वधार रहे हो, तो स्वयं
ही क्यों नहीं कान्यकुब्ज का सिंहासन ग्रहण करते ! इसमें
आपत्ति ही क्या है ?"
"नहीं, राज्यश्री ! मुझसे यह अन्याय न होगा। कान्यकुब्ज
का सिंहामन तुम्हारा है । तुम्हें उन पर बैठना ही पड़ेगा।"
हर्ष ने विरोध किया।
राजयी हम कर बोली, "मंन्याम लेने जा रही स्त्री को
तुमने इमलिए रोका हपं, कि उमे मिहामन का लालच दे
मको ! ...नही भैया, अब मेरे लिए मिहामन में कोई आकर्षण
नहीं रहा । पति के रहते हुए हिन्दू स्त्री को जो मान-सम्मान
मिलता है, वह उसके मरने के बाद कहाँ ? आर्य स्त्रो को मृत्यु
तभी हो जाती है, जबकि उसका पति रण में पराजय का मुह
देयता है या उसकी मृत्यु हो जाती है।"
सम्राट ने पीझ कर कहा, "मेरे ही लिये कौन-मा आकर्षण
है, राज्यश्री ?...मैं भी सन्यासी होना चाहता था, लेकिन
कर्तव्य इच्छा मे बड़ा होता है। कनंव्य पर इच्छाओं को बलि
देनी पड़ती है। राजा का कर्तव्य नो उममे भी बड़ा होता है।
मुझे भी इच्छा न होते हुए थानेश्वर का राज्य ग्रहण करना
यह मुन कर राज्यश्री का दिल पिघल उठा। अपने भाई
के कंधे पर हाथ रख कर वह बोली, "मेरे दु.गो भाई मैं
होगा।"
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दोनों राजी
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और दुःखी न करूंगी। लेकिन सहायता के लिए तुम मेरे निकट
रहोगे न ?"
हपं प्रसन्न होकर बोला, "अवश्य ! मैंने निश्चय किया है
कि तुम्हारे साथ थानेश्वर का राज्य ग्रहण कीं। लेकिन मैं
महाराजाधिराज की उपाधि न स्वीकार करके केवल कुमार
उपाधि ग्रहण करूंगा और अपना उपनाम दिवाकर मित्र के
आग्रह पर 'शिलादित्य' र गा ।
राज्य भर में यह निश्चय बड़ी प्रसन्नता से सुना गया।
चारों ओर खुशी छा गई । लोग महल के बाहर जमा होकर
राज्यश्री को बधाई देने लगे। सम्राट हर्षवर्धन ने राज्यश्री
की सलाह से कन्नौज का राज्य अपने राज्य में मिलाकर राज्य
की राजधानी 'कन्नौज' बनाये जाने की घोपणा की।
मेहमान का स्वागत
सन् ६२६ ई० में ह्वेनसांग चीन से भारत की यात्रा पर
चल पड़ा। चीन में उस समय टंग वंश का राज्य था। भारत
में हर्पवर्द्धन का राज्य था। इस महान दानवीर राजा के गुणों
के अनेक किस्से-कहानियाँ सुनकर ही ह्वेनसांग को हर्प से भेंट
करने की इच्छा हुई। बड़ी उमंग के साथ वह स्थल मार्ग से
गोवी का रेगिस्तान पार करके तुरफान, कूचा, ताशकन्द,
समरकन्द, बलख, खोतान और यारकन्द होता हुआ हिमालय
पार करके भारत आया । आते ही वह हर्ष से मिलने कन्नौज
की ओर चल पड़ा।
वह कन्नौज से कुछ ही दूर बीहड़ों में भटक रहा था कि
डाकुओं की एक टोली ने उस घेर लिया । डाकुओं ने उससे
कहा, "तुम्हारे पास जो कुछ माल है, उसे हमारे हवाले कर दो।
नहीं तो मार-मार कर बुरी गत वना देंगे।'
ह्वेनसांग हँस कर वोला, "मेरे पास शान्ति, अहिंसा और
प्रेम का धन है । यदि तुम चाहो तो ले सकते हो।"
डाकुओं के सरदार ने समझा कि यह भिक्षु हमारा मज़ाक
उड़ा रहा है। इसलिए वह कड़ककर बोला, "मूर्ख ! धन देता है
या नहीं ?"
पर ह्वेनसांग घबराया नहीं। वह उस सरदार से प्रेमपूर्वक
वोला, "भाई मैं तो तुमसे पहले ही कह चुका हूँ कि मेरे पास
तृष्णा या मोह उत्पन्न करने वाला धन नहीं है, मेरे पास तो
सुख देने वाला धन है।"
.
४६
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४८
सम्राट हर्ष
।
ने कहा,
min
इस पर एक डाकू ने कहा, "मूर्ख ! सुख देने वाले धन को
तो हम मांग ही रहे हैं । धन से ही तो सुख प्राप्त होता है !
ह्वेनसांग ने उत्तर दिया, "तुम शान्ति से सुख प्राप्त कर
सकते हो। किसी को न सता कर तुम अमर बन सकते हो।
किसी को न सताना ही अहिंसा है। ये शान्ति और अहिंसा के
दो अमूल्य धन तुम ग्रहण करो।"
डाकुओं का सरदार आग-बबूला हो गया। गुस्से में भर
कर वह बोला, "मूर्ख, शैतान, तेरी यह हिम्मत ! तेरी शान्ति
और अहिंसा को मैंने मुर्दे में देखा है । तेरे कहे सुख को मैं धोखा
मानता हूँ। तू धन निकाल, नहीं तो मैं तेरी जान निकालता हूँ।"
ह्वेनसांग मौन रहा। इसी बीच में एक डाकू
"इसे फाँसी दे दो। इसने हमारा अपमान किया है। फाँसी देने
के बाद ही हम इसकी तलाशी लेंगे।"
सब डाकुओं ने इस बात का समर्थन किया। वे सब फाँसी
का फंदा लटकाने में लग गये। इधर ह्वेनसांग भगवान बुद्ध
को स्मरण करने लगा। वह उनकी भक्ति में खो गया। उसकी
भक्ति के प्रभाव से ही एक भयंकर और तेज आँधी चल पड़ी।
सब डाकू घबरा गये। सबने इसे ह्वेनसांग का चमत्कार माना
और चमत्कार को नमस्कार करने की दुनिया की आदत है ।
उन्होंने तुरन्त दौड़कर ह्वेनसांग के चरण पकड़ लिए । चरण
पकड़ते ही आँधी रुक गई। वे चारों डाकू ह्वेनसांग के शिष्य बन
गये । उन्होंने बौद्ध धर्म स्वीकार कर लिया ।
इन सब कठिनाइयों को पार कर ह्वेनसांग कन्नौज की
सीमा पर पहुंचा। महामंत्री सिंहनाद ने यात्री के आने की
सूचना सम्राट् हर्प को दी। वे तुरन्त रथ में बैठ कर चीनी
मेहमान का स्वागत ४६ wwwwwww यानी का स्वागत करने पहुंचे। सम्राट हर्षवर्धन ने मेहमान का दिल से स्वागत किया और उसे पुष्पहार पहनाये । ह्वेनसांग अपना यह स्वागत देय गद्गद् हो गया। नगर के गण्यमान नागरिकों ने उस पर फूल बरसाकर जय-जयकार के नारे लगाये। इसके बाद सम्राट् उसे अपने रथ में बैठा कर महल की ओर चल पड़े। मार्ग में सड़क के दोनों ओर अपार भीड़ विद्वान् चीनी यात्री का स्वागत करने के लिए उमड़ पड़ी थी। जगह-जगह पर चीनी यात्री के सम्मान में स्वागत सभाएं और आयोजन किये गये। इस समय तक बौद्ध धर्म का पतन हो चुका था और हिन्दू धर्म ने फिर से अपनी धाक जमा ली थी। देश में जब भी कोई बौद्ध विद्वान् आता तो आर्य विद्वानों की भौहें तन जाती और वे उसे वाद-विवाद में हराने की कोशिश करते। एक दिन ह्वेनसाग को भी आर्यभट्ट ने ललकारा। उस समय सारे भारत में उनका नाम फैल चुका था। ह्वेनसाग उनसे वाद-विवाद के लिए तैयार हो गया। लेकिन प्रश्न उठा कि जीत-हार का फैसला :कौन करेगा ? आखिर राज्यश्री को यह काम सौपा गया । वह बड़ी विदुपी थी। दूसरे दिन शुभ मुहूर्त में शास्त्रार्य शुरू हुआ। उस समय के दो तेजस्वी पंडितों की चर्चा सुनने के लिए, नगगे के सभी विद्वान वहाँ आ गये। दोनो शात भाव में आमनो पर बैठे थे । दोनों के मुख पर तेज था। दोनो मद-मद मुस्करा रहे थे। वे सावधान होकर एक-दूसरे के सवालो का जवाब दे रहे थे। बीच में बैठी थी राज्यश्री, हार-जीत का फैमला करने के लिए। ह्वेनसाग का पक्ष था--मन को शुद्धि ही मोक्ष है।
सम्राट हर्ष आर्यभट्ट कहते थे-'काया को यातनाओं की आँचौं में तपाये वगैर मोक्ष कहाँ ? इस तरह वाद-विवाद होते कई दिन बीत गये । हर रोज़ दोनों नये-नये तर्क पेश करते। परन्तु एक दिन ऐसा हुआ कि आर्यभट्ट ह्वेनसांग की वात का जवाब न दे सके। राज्यश्री ने तुरन्त कहा-आर्यभट्ट हार गये। राज्यश्री कितनी महान् थी! अपने गुरु आर्यभट्ट को हारते देखकर भी सच से नहीं डिगी। ह्वेनसांग ने कहा था, "मैं हार गया तो हिन्दू धर्म ग्रहण करूंगा।" आर्यभट्ट ने कहा था, "मैं हार गया तो तुम्हारा शिष्य हो जाऊँगा।" शर्त के अनुसार आर्यभट्ट ह्वेनसांग का शिष्य बनने को तैयार हो गए। परन्तु पहले राज्यश्री ने कहा, "मेरे गुरु हारे, मैं नहीं हारी। आपकी जीत आधी जीत है । मुझे हरा देंगे तभी वह पूरी होगी। तभी मेरे गुरु आपके शिष्य बनेंगे।" ह्वेनसांग झिझका । पुरुष नारी से विवाद नहीं करते। पर राज्यश्री क्या साधारण नारी थी! वह नहीं मानी। हनसांग को उससे वाद-विवाद करना पड़ा। परन्तु अन्त में वह हार गई। आर्यभट्ट ह्वेनसांग के शिष्य बन गये और वह मित्रसेन के नाम से मशहूर हुए। अव तो सारे उत्तर भारत में वौद्ध धर्म को फिर से धाक् बैठ गई। सम्राट हर्षवर्द्धन ने विजयी ह्वेनसांग को राजसभा में बुलाया। उससे प्रेमपूर्वक मिले। इस प्रकार चीनी यात्री के प्रति सम्राट के दिल में आदर और प्रेम बढ़ता ही गया। वे ह्वेनसांग को अपना घनिष्ठ और विश्वसनीय मित्र मानने लगे। इन्हीं दिनों हनसांग ने नालन्दा विश्वविद्यालय को देखने की इच्छा प्रकट की। सम्राट हर्ष ने उसकी बात मान ली और स्वयं उसके साथ चल पड़े। उनके साथ दिवाकर मित्र भी थे।
नालन्दा में नालन्दा का प्रमिद्ध विश्वविद्यालय आजकल के पटना शहर मे चौतीस मील दक्षिण में स्थित वडगाँव नामक स्थान पर था। आज भी यहां नालदा विश्वविद्यालय के खण्डहर देवे जा मकते है। नालन्दा विश्वविद्यालय तव सारे संसार में प्रसिद्ध था। कोरिया, जापान, चीन, लका, तिव्बत, मलाया, वर्मा, हिन्द- एशिया और तुर्किस्तान आदि दूर-दूर के देशों से विद्यार्थी यहाँ शिक्षा प्राप्त करने के लिए आते थे । नालन्दा विश्वविद्यालय से शिक्षा प्राप्त कर चुकने के बाद जब ये विद्यार्थी अपने देशों में जाते थे, तब उनका वहाँ वडा सम्मान होता था। राजा लोग राज सिंहासन पर खड़े होकर उनका सम्मान और आदर करते थे। नालन्दा में पढे ये विद्यार्थी 'नालन्दा बन्' कहलाते थे। कोई. कोई व्यक्ति तो सम्मान पाने के लालच से अपने आपको झूठ-मूठ ही नालन्दा-बन्धु कह दिया करते थे। उस समय नालन्दा विश्वविद्यालय में दस हजार विद्यार्थी शिक्षा प्राप्त करते थे। चारों ओर चार कोनो वाली और बड़ी- बड़ी आठ दीवारें थीं और पहाड की चोटी के समान नुकीले और ऊँचे-ऊँचे चौमजिले मठ थे। आकाश मे बाते करते हुए इसके बुर्ज और कंगूरे ऐसे जान पड़ते थे, मानो प्रात काल के कुहरे में मुंह छिपा रहे हों। भवन की खिडकियां इतनी ऊँची थी कि वहाँ से मेघों का आना-जाना साफ दीख पडता था। इसके 2'T नालन्दा में ५३ अन्दर तरह-तरह के चमकीले रंगों से रंगी हुई और बैल-बूटों से सुशोभित बड़ी-बड़ी कोठरियां थीं। विश्वविद्यालय में विद्यार्थियों को शिक्षा के साथ-साथ हर प्रकार की सुविधाएं मुफ्त मिलती थी। खाने के लिए भोजन, पहनने के लिए कपड़े, पढ़ने के लिए पुस्तके, बीमारों के लिए दवाइयाँ आदि अनेक प्रकार की आवश्यक चीजें पढ़ने वालों को दी जाती थीं। योग्य विद्यार्थी को अच्छी कोठरी और शेप सभी को साधारण कोठरी रहने को मिलती थी। इस महान् विद्यालय का सारा खर्च विद्या-प्रेमी राजाओं और दानी धनिकों के दान से चलता था। इसके अलावा बड़े-बड़े राजाओं ने इसके लिए सौ से अधिक गांव जागीर के तौर पर दे दिये थे । मुमात्रा के राजा थाल पुत्रदेव ने भी अपने राज्य के पांच गांव नालन्दा के खर्च के लिए दान दिये थे। नालन्दा विश्वविद्यालय में सौ से अधिक विपयों की शिक्षा दी जाती थी । इन विषयों को पढ़ाने वाले एक हजार से अधिक विद्वान आचार्य वहाँ थे । शीलभद्र वहाँ के प्रधान आचार्य थे। इनके अतिरिक्त दूसरे प्रसिद्ध आचार्य थे-धर्मपाल, चन्द्रपाल, गुणमति, स्थिरमति, प्रभामिन, जिन्मिन, ज्ञानचन्द्र, शीघ्रबुद्ध आदि। तिव्वत के लामा सम्प्रदाय के संस्थापक पद्मसम्भव भी इसी विद्यालय में शिक्षा पाते थे। विश्वविद्यालय छोड़ते समय आचार्य लोग छात्रों को उपदेश देते थे। उन्हें उनके भावी जीवन में सन्मार्ग पर चलने की शिक्षा देते थे। उनके उपदेशों में से एक उपदेश था-"क्रोध को क्षमा मे जीतो। दुरे मनुप्य पर अच्छी बातों से विजय पाओ । लालची को दान से जीतो । झूठ बोलने वाले को सत्य योल कर जीतो।" नालन्दा के चारों ओर ऊंचे-ऊंचे मठ थे। उनके बीच-बीच
५४
सम्राट हर्ष
में सभास्थान और विद्यालय बने थे, जो समाधियों और
मन्दिरों से घिरे थे। यहीं आचार्यों के चौमंज़िले ऊँचे-ऊँचे
मकान थे। उन मकानों की शोभा देखते ही बनती थी। उनमें
रंग-बिरंगे साज-सामान लगे थे । अनेकों प्रकार के कीमती
रत्न उनकी दीवारों में जड़े थे । आमों के यहाँ अनेकों वाग भी
थे। यहाँ के तालावों में खिले नीले कमल बड़े सुन्दर लगते थे।
विश्वविद्यालय का अनुशासन बहुत ही सन्तोपजनक था।
यहाँ के नियम बड़े कड़े थे। हर एक काम के करने में समय की
पावन्दी का खास तौर से ध्यान रखा जाता था। हर रोज़
सुवह एक बड़ा घण्टा बजता था, जो नहाने का समय बताता
था। ठीक उसी समय चारों दिशाओं से छात्रगण हजारों की
संख्या में अपने-अपने कपड़े लिये तालाव की ओर चल पड़ते थे।
नहाने के लिए ऐसे दस तालाब वहाँ बने हुए थे।
नालन्दा विश्वविद्यालय का एक विशाल पुस्तकालय भी
था। यह नौ मंज़िला था और हवा से बातें करता था। उसकी
ऊँचाई तीन सौ फुट थी। इस पुस्तकालय में वौद्ध धर्म के सभी
ग्रन्थों के अलावा अन्य अनेक दुर्लभ पुस्तकें भी थीं । सारी
दुनिया में उस समय ऐसा पुस्तकालय कहीं भी नहीं था ।
यह सारा विश्वविद्यालय एक बड़ी दीवार से घिरा हुआ
था। इसमें प्रवेश करने का केवल एक ही दरवाज़ा था। उस
द्वार पर एक पंडित बैठता था। वह द्वार-पंडित कहलाता
था। विश्वविद्यालय में भर्ती होने वाले विद्यार्थी को पहले उसके
पूछे सवालों का जवाब देना पड़ता था। ये सवाल बड़े मुश्किल
होते थे । केवल कुछ ही विद्यार्थी उनका उत्तर दे पाते थे। इस
प्रकार सफल विद्यार्थी को ही विश्वविद्यालय में भर्ती किया
जाता था।
सम्राट हर्षवर्द्धन ह्वेनसांग के साथ नालन्दा विश्वविद्यालय
नालन्दा में -~ में पधारे। ह्वेनसांग यहां शिक्षा ग्रहण करने के लिए आये थे और सम्राट् विश्वविद्यालय का निरीक्षण करना चाहते थे। उनके स्वागत में सारा विश्वविद्यालय सजाया गया था। भिक्षुओं और विद्यार्थियों ने अनेक प्रकार के वाद्य बजाकर दोनों मेहमानों का स्वागत किया। विश्वविद्यालय के मुन्य आचार्य शीलभद्र ने सम्राट को पुष्पहार पहना कर प्रसन्नता प्रकट की । हपंवर्द्धन ने विश्वविद्यालय को घूम-घूम कर देखा। नालन्दा विश्वविद्यालय में बौद्ध और वैदिक दोनों प्रकार की विद्याओं की साय-साय पढ़ाई देख कर नम्राट् बहुत प्रसन्न हुए । देशी व विदेशी विद्यार्थियों में किसी भी प्रकार का भेद- भाव न देख कर सम्राट् को बहुत खुशी हुई। प्रधान आचार्य शीलभद्र ने ह्वेनसांग को योग्य जिनामु समझ कर दाखिल कर लिया। साथ ही उन्हें अनेक मुविधाएं भी प्रदान की। अन्त में, विश्वविद्यालय की ओर मे सम्राट् के सम्मान में एक उत्सव का आयोजन किया गया। सम्राट ने अपने भाषण में आचार्य शीलभद्र की भूरि-भूरि प्रशंमा की। विश्वविद्यालय के खर्च को चलाने के लिए उन्होंने अपने राज्य में से सौ गांव भी दान दिये । सम्राट् के दान पर उपस्थित जन-समुदाय प्रसन्न हो उठा । आचार्य शीलभद्र ने भी अच्छा अवसर देखकर सम्राट हर्षवर्द्धन को 'शिलादित्य द्वितीय' की उपाधि से विभूपित किया। सम्राट् ने सिर झुका कर बाचार्य का प्रसाद स्वीकार किया। इसके बाद इतिहास में सम्राट हर्षवर्धन के नाम के साथ 'शिलादित्य द्वितीय और जोड़ा जाने लगा। इसके बाद सम्राट् सवसे स्नेहपूर्ण विदा लेकर कन्नोज लौट आये।
8 : सोने में सुहागा रास्ते में लौटते हुए सम्राट् अचानक एक घने जंगल में भटक गये। बड़ी देर तक इधर-उधर घूमते रहे । गर्मी काफी थी और भूख से उनका मन व्याकुल था, गला सूखा जा रहा था। इसी समय उन्हें दूर एक झोंपड़ी दिखाई दी। उनके कदम उसी ओर चल पड़े। बड़ी देर तक चलने के बाद वे एक बड़े आश्रम के पास आकर रुके । तभी किसी ने मधुर और वारीक आवाज़ में टोका, “पथिक तुम कौन हो? तुम्हें क्या चाहिए ?" आवाज़ सुन कर सम्राट् के आश्चर्य का ठिकाना न रहा यह आवाज़ पिंजड़े में बंद एक मैना की थी। उसकी इतनी शुद्ध संस्कृत वाणी सुन कर सम्राट् ठगे से रह गये। उनकी भूख- प्यास वहीं गायव हो गई। उन्होंने बड़ी देर तक कौतूहल से मैना से बातचीत की। मैना ने एक पंडित की तरह सम्राट के प्रश्नों के उत्तर दिये। । चकित सम्राट् सोचने लगे, जिसके आश्रम के पिंजड़ों में बंद पक्षी इतने चतुर और विद्वान हैं, उनका मालिक कितना विद्वान होगा! तभी एक तेजस्वी पुरुष हाथ में पूजा का थाल लिये हुए उस आश्रम में आया । पूछने पर मालूम हुआ कि वह ही आश्रम का स्वामी है । महाकाली का भक्त है और पूजा करके लौटा है ।
सोने में गुहापा W घंटों तक दोनों में घुल-मिल कर बातें होती रही । सम्राट पर उस तेजस्वी पुरुप की बातों का वड़ा प्रभाव पड़ा । मन ही मन उन्होंने उसे अपना ससा मान लिया। बार-बार आग्रह करने पर सम्राट ने उसके साथ भोजन किया। भोजन कर चुकने के बाद जव समाट् विश्राम करने लगे तभी मैना ने अपने स्वामी से कहा, "क्या आप अपने घर आये मेहमान को कविता नहीं सुनायेंगे ?" सम्राट् ने आश्चर्य से पूछा, "क्या आप कविता भी लिखते हैं ?" "हाँ", उस तेजस्वी पुरुष ने सिर हिला कर कहा, "मुझे थोड़ा-बहुत शौक है, इसलिये कभी-कभी लिख लेता हूँ।" "तो सुनाइये ।" सम्राट् ने आग्रह किया। प्रतिभावान् पुरुप ने दो-तीन कविताएं सुना दी । सुन- कर सम्राट् बहुत प्रसन्न हुए। उन्होंने कवि की पीठ ठोकी और उसकी कल्पना को बार-बार सराहा । अपनी कविता पर इतनी प्रशंसा और सम्मान पाकर कवि को अपार सुख हुआ। साथ ही उसकी झिझक भी मिट गई । उसने अपना हाल ही में रचा ग्रन्थ हपं के सामने रख दिया। उसे पढ़कर तो हर्ष वाह-वाह कर उठे। बोले, "तुम वास्तव में गुदड़ी के लाल हो । आज से तुम मेरे दरबार में रहोगे । मैं तुम्हे राजकवि का पद देता हूँ। कवि सम्राट् का आग्रह न टाल सका। यह कवि 'महाकवि वाणभट्ट' के नोम से संसार के साहित्य में विख्यात है। उसका लिखा हुआ यह ग्रन्थ महाकाव्य था, जो कादम्बरी के नाम से । मशहूर है। सम्राट् हपं विद्याप्रेमी थे। वे स्वय साहित्य और कला मे
C
कादम्बरी ।
PATNAV
सोने मे सुहागा
रुचि रखने के साथ विद्वानों का आदर भी करते थे। उन्हें
संगीत और कविता से प्रेमं था । वह स्वयं भी कवि थे और उन
दिनों 'प्रियदर्शी' नामक काव्य लिग रहे थे।
मम्राट् के इन्हीं गुणों को देख बाणभट्ट उनकी ओर
आकर्षित हुआ। उमे पाकर सम्राट् बहुत युश हुए। उनकी
कवि-कल्पना को बल मिला। मोने में सुहागे का सा काम
हुआ। वे वाणभट्ट को साथ लेकर कन्नीज चले आये। यही
कवि उनका सलाहकार भी बना, जो सम्राट् को गुप्त बातों में
सलाह देता था।
: १० :
ई
कोई भेद नहीं
सर्दी का मौसम था। ठंड इतनी थी कि शरीर ठिठुर जाता
था। हवा जैसे काटने को दौड़ती थी। तिस पर तेज आँधी के
साथ घना अंधेरा छा रहा था। आकाश में बादल गरज रहे
थे। बीच-बीच में विजली भी चमक रही थी। रात आधी से
अधिक ढल चुकी थी। कन्नौज नगर के बाहर हरिजनों की
अनेक झोंपड़ियाँ तारों की तरह बिखरी हुई पड़ी थीं, जो आँधी
के तेज थपेड़ों से हिल उठती थीं। उनमें से एक झोपड़ी में से
छनकर प्रकाश वाहर को आ रहा था। इस झोपड़ी में एक
बच्चा रो रहा था। वच्चा भूखा था। उसकी माँ उसे प्यार से
समझा रही थी, "वेटा ज़िद न कर; अब सो जा। कल तेरे
पिताजी तुझे बहुत सारा खाने को ला देंगे।"
लेकिन बच्चे पर माँ की इन बातों का कोई असर न हुआ।
उसके पेट में तो चूहे कूद रहे थे। फिर उसे विना खाये चैन
कैसे पड़ता! वह रोता ही रहा ।
झोंपड़ी के बाहर किसी के आने की आहट सुनाई दी । उस
स्त्री ने चौंक कर पूछा, "कौन है ?'
"एक पथिक ।" उत्तर मिला।
"क्या चाहिए ?" अन्दर से आवाज़ आयी।
"मुझे आश्रय चाहिये। आँधी और वर्षा घिर आई है।
धरती जैसे डोलना चाहती है और आसमान फट पड़ने के लिए
वेचैन है।" पथिक ने कहा।
-
-
६०
「是非。
“
是
,
૬૨
सम्राट्-हर्ष
आगन्तुक की वातें सुन कर उस स्त्री ने अपने पति को
जगाया। वह हड़बड़ा कर उठा और बाहर दरवाज़े की ओर
लाका। उसने विजली की चमक में देखा, गठे हुए शरीर का
एक युवक खड़ा है। उसके कपड़े पुराने और फटे हुए हैं और
दाढ़ी बढ़ी हुई है, लेकिन चेहरे पर अपार तेज है। वह उसे
अन्दर ले आया।
एक फटे-पुराने टाट की ओर इशारा करके उसने पथिक को
वैठने के लिए कहा और उसकी सेवा में हाथ जोड़ कर खड़ा
रहा।
पथिक ने टाट के टुकड़े पर बिना किसी संकोच के बैठ कर
झोंपड़ी को चारों ओर से बड़े ध्यान से देखा । झोंपड़ी का
छप्पर टूट चुका था और जगह-जगह से छलनी हो गया था।
जब पानी वरसता तो खड़े रहने के लिए भी जगह न रहती।
चारों ओर मिट्टी के टूटे वर्तन विखरे पड़े थे। एक कोने में बने
चूल्हे में ठंडी राख पड़ी थी। ऐसा मालूम होता था कि कई दिन
से इस घर में भोजन नहीं बना । इसी समय सोया हुआ बच्चा
जागकर जोर-जोर से रोने लगा।
पथिक ने उसकी चीख सुनी तो उससे रहा न गया। वह
घर के मालिक से बोला, "भाई, बच्चा इतने ज़ोर से क्यों रो
रहा है ? क्या बीमारी है उसे ? वैद्य को क्यों नहीं दिखाते ?"
तव तक स्त्री ने उठ कर बालक को चुप कराने का प्रयत्न
किया, पर वह रोता ही रहा। पिता ने उस बालक की ओर
देख कर उदास भाव से पथिक से कहा, "वैद्य रोग का इलाज
कर सकता है, लेकिन पेट को भूख शांत करने की दवा उसके
-
पास कहाँ ?"
पथिक ने सुनकर आश्चर्य से कहा, "तो क्या यह वच्चा
कोई भेद नहीं भूख से बिल-बिला रहा है ? फिर आप इसे खाना क्यों नहीं देते?" पिता का गला भर आया। वह बोला, "कहाँ से खिलाऊँ इसे ? घर में अन्न का एक दाना भी नहीं है। हम तीनों कई दिन मे भखे है।" पथिक चौंक पड़ा। वह धीरे से बुदबुदाया, "कई दिन से भूखे......" फिर उस आदमी से बोला, "आप क्या काम करते है ? आपको उस काम से इतना भी प्राप्त नहीं होता कि तीन जीवों का पेट भर सको?" पथिक के सवालों को सुन कर उस आदमी के मुख पर निराशा छा गई । उसका गला रुध गया। वह विनम्र आवाज में बोला, "मैं कवि हूँ, कविता करता हूँ। इसी साधना में मेरा सारा जीवन व्यतीत हुआ है।" "लेकिन कविता से तो पेट नहीं भर सकता ! वह तो आत्म- सुख ही दे सकती है, पेट की आग बुझाना उसका काम नहीं।" पथिक ने कहा । "मैंने तो अपना सारा जीवन काव्य-रचना में ही विताया है। इसके सिवा में कुछ भी दूसरा काम नहीं कर सकता।" वह आदमी निराश-सा होकर वोला। "तुम्हारा नाम क्या है ?" "दिवाकर।" "तुम सम्राट् के पास क्यों नहीं जाते ? वे अवश्य तुम्हारी महायता करेंगे।" पथिक ने समझाया और पोटली खोल कर कुछ मिठाई तीनों में बांट दी। उस मनुष्य ने मिठाई का एक टुकड़ा मुंह में डाल कर चात का छोर पकड़ते हुए कहा, "मैं जानता हूं कि हमारे सम्राट हर्षवर्द्धन कविता-प्रेमी हैं । मैं अछूत हूँ, हरिजन हूँ। उन तक पहुंचने में डरता हूँ। मुझे डर है कि कहीं वे मेरा अपमान ६४ सम्राट- न कर दें। यदि उन्होंने मेरा उचित आदर न किया तो मेरे मन को बड़ी ठेस पहुँचेगी और मुझे दुःख होगा।" पथिक ने झोपड़ी वाले की बात बड़े ध्यान से सुनी । उस मन शोक और दया से भर गया। उसके मुख पर करुणा . भाव झलक आये। वह मुस्कराकर बोला, “सम्राट हर्षवर्द्धन मनुष्य के गुणों की कद्र करने वाले हैं। फिर वह चाहे बड़ा चाहे छोटा, उनकी दृष्टि में कोई भेद नहीं। वे सब को समः रूप से देखते हैं। उनके यहाँ जाति-पाँति का कोई सवाल : नहीं उठता। वे सब धर्मों के प्रति उदार हैं।" "नहीं-नहीं, मुझे डर लगता है। अगर सम्राट् को मे कविता पसन्द नहीं आई तो मेरा अपमान भी हो सकता है गरीब के पास और रखा ही क्या है ? उसे अपनी इज प्यारी होती है। अगर सम्राट ने मुझे न चाहा तो मेरा दि टूट जायेगा और मैं कहीं का न रहूँगा।" पथिक बोला, "तुम अपने आपको नीच समझते हो, या तुम्हारी भूल है। तुम एक बार भी उनके दरवार में जाक कविता पाठ करते तो सम्राट् तुम्हारा जरूर आदर करते।" दिवाकर ने पथिक की ओर घूर कर देखा जैसे उसे कु और संदेह हुआ हो। वह बोला, "क्या बात है पथिक, सम्राट् की बहुत तरफदारी कर रहे हो ? मालूम पर : राम्राट् की तुम पर असीम कृपा है।" पथिक हँस पड़ा। बोला, "सभी गुणियों पर कृपा है।" "तुम में क्या गुण है ?" "मैं शिल्पकार हूँ।" "ओह ! तो क्या सचमुच सम्राट् मेरा आठ "क्यों नहीं !" पथिक ने उसे सान्त्वना -
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सम्राट् हर्ष
धीरज भी जाता रहा। अन्त में वह सैनिकों के साथ साहस
कर सम्राट् की राजसभा तक चला गया ।
राजसभा में पहुँचते ही दिवाकर की दृष्टि राज-सिंहासन
पर बैठे सम्राट पर पड़ी। उन्हें देखते ही उसका सिर चकराने
लगा। उसके दिमाग में रात वाले पथिक का चेहरा ताज़ा हो
आया। वह मन ही मन बड़बड़ा उठा, "तो, क्या रात वाले
पथिक सम्राट् ही थे?" वह तुरन्त सिंहासन के निकट जा
पहुँचा। वहाँ उसने सम्राट को झुक कर प्रणाम किया।
सम्राट ने सिंहासन से उठ कर दिवाकर को गले लगाया।
दिवाकर यह सब देख गद्गद् हो उठा। हर्ष ने हँस कर कहा,
"दिवाकर, सम्राट् गुणी जनों का आदर करते हैं। वह स्वयं
कवि हैं। कवि की मनोदशा को वह अच्छी तरह जानते हैं।
आज से तुम मेरी राजसभा में रहोगे। अव तुम खूब कवितायें
लिखो और नाम कमाओ। मुझे तुम्हारी उन्नति देखकर बहुत
खुशी होगी।"
सम्राट ने फिर सारे सभासदों को सम्बोधित करते हुए
कहा,
"सभासदो! कल मैंने झोंपड़ी में एक अनमोल रत्न पाया
है। वह आपके सामने प्रस्तुत है। वह है हमारी नगरी का मौन
साधक प्रतिभा सम्पन्न कवि दिवाकर ! सूर्य की भाँति इसकी
आभा भी चतुर्दिक फैले, इसी विचार से मैं इसे यहाँ ले आया
। अब ये भी आपकी सेवा में रहेंगे । आपके मित्र बनेंगे।"
अपनी बात पूरी करके सम्राट् सिंहासन पर बैठ गये।
इतने में ही वाणभट्ट और मयूर कवि सम्राट के पास आये।
दिवाकर को उन दोनों ने वारी-बारी से गले लगाकर प्रसन्नता
प्रकट की। अपनी गरीवी का अन्त निकट देखकर दिवाकर की
खुशी का ठिकाना न रहा।
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MAMIL Is कमर कस ली पकड़ने के लिए कसमसा उठे। उन्होंने सेनापति सिंहनाद को बुलाकर तुरन्त मेना तैयार करने का हुक्म दिया। विशाल सेना के साथ हर्ष ने दूमरे ही दिन बंगाल की ओर कूच किया। पहले ही दिन को बात है, उन्होंने विश्राम के लिए मरस्वती नदी के किनारे सेना के साथ पड़ाव डाल दिया था। तभी गवर गुनकर गांव का सरपंच उनके स्वागत के लिए आया। सरपंच ने पुष्पहार पहना कर सम्राट् को एक अंगूठी भेंट की। अंगूठी उँगली में पहनते हुए हर्ष के हाथ से जमीन पर गिर पड़ी। सिंहनाद देखकर कांप गया। बोला, महाराज ! अंगूठी हाथ मे गिरी, यह तो बड़ा अपशकुन हुआ। पता नही शशांक मे युद्ध का क्या परिणाम निकलता है ?" लेकिन सम्राट् हपं समय के बड़े अच्छे पारखी थे। उन्होंने उस अंगूठी को उठाया और बोले, "यह बडी शुभ शकुनी अंगूठी है । इसकी जैसी छाप भूमि पर लगी है, वैसी मेरी छाप समूचे भारत पर पड़ेगी।" सम्राट् के इस उत्तर से सैनिकों का माहस वढा । वे बडे उत्माह ले आगे बढ़े। सैनिक रुके नही, वे चलते ही रहे। रात का पहला पहर था। शशांक को सैनिक टुकडी एक मैदान के वीचों-बीच थी। थकान के कारण सय मिपाही चुपचाप पडे थे। केवल हाथियों के घटों को आवाज या पीलवानो के हुक्के का गुड़गुड़ाना ही कभी-कभी सुनाई पड़ जाता था। उमी समय हां की मेना ने आगे बढ़कर शशाक की फौज को घेर लिया और 'हर हर महादेवका घोप करते हुए उम पर टूट पडे । शशांक को सेना बहुत थकी हुई थी। उममें इतना दम नही था कि वह हथियार उठा सके। सैनिको ने उसे एकदम तहम- नहम कर दिया। लेकिन शशाक अब भी अपने मिपाहियों को बढ़ावा देता हुआ चिल्ला रहा था। सम्राट हर्ष की तलवार का
सन्नाट हर्ष
"
जौहर देखने लायक था। उसने अपने किरमिजी रंग के घोड़े
को शशांक के हाथी पर अड़ा दिया और साध कर वळ चलाते
हुए कहा, “लौहपुर को लूट का माल लेते जाओ।"
वर्षे का वार अचूक था। शशांक लुढ़क कर अपने ही हाथी
के पैरों तले कुचला गया और दूसरे ही क्षण उसकी वोटी-बोटी
पिस गयी।
यह सम्राट हर्प की पहली विजय थी। इस प्रकार उसने
अपने भाई राज्यवर्द्धन की मृत्यु का वदला शशांक से लिया।
कन्नौज लौटने पर लोगों ने उनका दिल खोलकर अभिनन्दन
किया। सारे राज्य में विजय के उत्सव की बड़ी धूम-धाम
रही। जगह-जगह नाच-तमाशे और नाटक खेले जाने लगे।
लेकिन इस विजय से ही हर्षवर्द्धन ने संतोष नहीं किया ।
उसने अपने शत्रुओं का नाश करने के लिए पूरी तरह से कमर
कस ली।
लगातार पाँच वर्षों तक वह लड़ाइयों में उलझा रहा।
उसने अनेक राजाओं को हरा कर उन्हें अपने अधीन होने के
लिए वाध्य किया। लेकिन किसी राजा का राज्य अपने राज्य
में नहीं मिलाया। केवल उनसे हर साल कर के रूप में कुछ
रकम तय करके छोड़ दिया।
इस तरह उसने अपना राज्य विस्तार हिमालय से लेकर
नर्मदा नदी तक कर लिया। पाँच वर्षों के समय में वह लड़ाइयों
में इतना उलझा रहा कि सेना के हाथियों पर से होदे तक न
उतरे। सैनिक अपने रक्षा कवच न उतार सके। समस्त उत्तरी
भारत उनके नाम से काँपने लगा।
सम्राट् लगातार की लड़ाइयों से ऊब कर कन्नौज लौटा,
अब उसने जनता को भलाई के कामों को ओर ध्यान देना
उचित समझा।
लेकिन धूप : १२ : अहिंसा का बल दोपहर हो चली थी। मूरज ठीक सिर पर था, में गर्मी नहीं थी। वह भली मालूम हो रही थी। सम्राट हर्ष- वर्टन महल की खिड़की में खड़े कुछ सोच रहे थे। नीचे वाग में हवा मे संकड़ों फूल झड़कर हरी-हरी घास पर विछ गये थे। ऐसा लगता था जैसे रग-विरंगा कालीन विछा हुआ हो। लेकिन मम्राट् का ध्यान प्रकृति की बिखरी हुई इस सुन्दरता को ओर नहीं था। वे किसी गहरी सोच में डूबे हुए थे। महल में दिवाकर मित्र के साथ राज्यश्री और ह्वेनसांग का आना वे न जान सके। तीनों ने उनके मुख पर छाये हुए चिन्ता के भावों को पढ़ लिया। वे आकर चुपचाप खड़े हो गये। सम्राट् ने स्वयं हो कुछ समय बाद राज्यथी से कहा, "वहन, बड़ी चिन्ता की बात है कि बंगाल का वसुमित्र अभी तक पकड़ा नहीं जा सका । उधर वल्लभी का राजा फिर अपना मिर उठाये हमें ललकार रहा है। उसने हमसे मित्रता के सम्बन्ध तोड़ दिये हैं। दक्षिण में महाराष्ट्र का राजा चालुक्य- राज पुलकेमिन हमारा सामना करने के लिए तैयार है। हमारी सेना नर्मदा के उस पार उतरना चाहती है, पर चालुक्य की सेना नर्मदा के उस पार खड़ी हमारा इन्तजार कर रही है। मैं इन मय शत्रुओं पर विजय पाने को वेचंन हूं।" राज्यश्री जो अब वौद्ध धर्म के अनेक ग्रन्यों का अध्ययन कर चुकी थी, बोली, "भैया, कही शस्त्र से भी सच्ची विजय ।
اور اور مي
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७४ सम्राट हर्ष सम्राट हर्षवर्द्धन ने दिवाकर मित्र की वात पर शंका करते हुए पूछा, "गुरुवर, फिर शक्ति का सिद्धान्त क्या गलत है ? शक्ति न हो तो वह मनुष्य ही क्या ? तव पौरुष की बात करना ही व्यर्थ है।" हर्प की बातें सुनकर दिवाकर मित्र हँस पड़े, "नहीं सम्राट्, मैंने यह कब कहा कि मनुष्य में शक्ति नहीं होनी चाहिए या उसे शक्ति का सर्वथा त्याग कर देना चाहिए। शक्ति का सहारा अवश्य लेना चाहिये, लेकिन वह दुष्ट और पापी का अन्त करने के लिए हो, साम्राज्यों के बढ़ाने के लिये नहीं।" सम्राट ने दिवाकर मित्र के वचनों को सुना तो वे निराश हो गये। खिन्न होकर उन्होंने कहा, "अगर यह बात मान लू तो फिर मेरी सारी पृथ्वी को जीतने की इच्छा धूल में मिल जायेगी। मैं अपने दुश्मनों का दमन न कर सकूगा। पुलकेशिन का नाश करने की मेरी प्रतिज्ञाएँ पूरी न हो सकेंगी। मेरे शत्रु मुझे निर्वल समझ कर राज्य पर बार-बार आक्रमण करेंगे और मैं यू ही देखता रह जाऊँगा। नहीं-नहीं, यह मुझसे न हो सकेगा । मैं जीते-जी अपने पैरों पर आप कुल्हाड़ी न मारूंगा।" इस बार सभी गम्भीर हो गये। दिवाकर मित्र हर्ष के तर्को का उत्तर सोचने लगे। राज्यश्री ने अपने नेत्र बन्द कर भगवान् से हर्प को सद्बुद्धि देने की प्रार्थना की। तभी पास बैठे भिक्षु हेनसांग (जोकि अभी हाल ही में नालन्दा विश्वविद्यालय से शिक्षा ग्रहण करके लौटे थे) कुछ सोचकर एकाएक चौंक पड़े। उनकी आँखें चमक उठीं। वे प्रसन्न होकर बोले, "आपकी सारी पृथ्वी को जीतने की प्रतिज्ञा अवश्य पूरी होगी, सम्राट् ! आपके शास्त्र सारे संसार को कुटुम्ब मानते हैं, सबसे परिवार की भांति प्रेम करने को कहते हैं । इस प्रकार आप सब राजाओं को प्रेम - महिमा का बल भाव मे जीत सकते हैं । सव आपके शीघ्र ही भिन्न हो जायेंगे। आपके देश में सम्राट अशोक ने ऐसा ही किया था। उसने इसी मिदान्त से चीन, लंका, वर्मा और स्याम आदि देशों से मित्रता की थी।" "लेकिन उनकी तो बात अलग थी। शत्रुओं ने उनको तलवार की मार से डर कर ही साधीनता स्वीकार की थी और प्रेम का नाता जोड़ा था ।" सम्राट हर्प चिन्तित होकर बोले। द्वेनसांग ने कहा, "सम्राट् आपकी भी विजयी सेनायें मब और युद्ध करने के लिए गई हुई हैं । उसकी सूचना एक दो दिनों में आती ही होगी। हर तरफ से आपको विजय की हो मुबर मिलेगी, ऐमा मेरा विश्वास है।" और वही बात हुई। ह्वेनसाग अपनी बात कह रहे थे कि मेनापति सिंहनाद ने उपस्थित होकर कहा, "महाराज अभी- अनी खबर मिली है कि वंग-नरेश वसुमित्र युद्ध में खेत रहा और सारी बंग सेना काट दी गई।" यह सुनकर सम्राट हर्ष- चढ़न प्रमन्न हो उठे। उन्होंने सेनापति सिंहनाद को वहुत-बहुत धन्यवाद दिया। इसके तुरन्त बाद सेनापति भण्डि ने भी आकर कहा, "ममाचार आया है कि वल्लभी के राजा पराजित हो गये हैं। उनके हजारों सैनिक नावों में बैठकर नदी पार करने लगे थे लेकिन आंधी से वहुत-सी नावे उलट गई और अधिकांश मनिक काल के गाल में समा गए। मम्राट हर्षवद्धन को वां खिल उठी। उनको प्रसन्नता का ठिकाना न रहा । कुछ समय के बाद फिर सेनापति भण्डि ने कहा, "सम्राट्, बल्लभी के राजा को हमारी सेना ने वन्दी बना लिया है, पर वल्लभी के नागरिक अभी भी विद्रोही हैं।
सम्राट हर्ष । . उनके विद्रोह को पूरी तरह से कुचला नहीं जा सका है। लाख प्रयत्न करने पर भी उन पर काबू पाना असम्भव लगता है।' "वह क्यों ?" सम्राट ने निराश होकर पूछा। भण्डि ने कहा, ''वल्लभी की जनता का अपने राजा पर अपार स्नेह है। राजा भी प्रजापालक है। दोनों एक-दूसरे को जी-जान से चाहते हैं। इसलिए राजा के कैद होते ही वल्लभी के तमाम नागरिक विद्रोह कर बैठे हैं।" भण्डि की बात सुनकर राजश्री कह उठी, "देखो भैया, प्रेम का प्रभाव ! एक व्यक्ति के लिए देश के लाखों लोग जीवन वलिदान करने के लिए तैयार हो गये। सम्राट हर्षवर्द्धन की प्रसन्नता धीरे-धीरे खत्म हो चली । वे विचारों में खो गये । उनके मुख पर एक बार फिर चिन्ता की रेखायें प्रकट हो गई। सम्राट् को चिन्तित जानकर ह्वन- सांग बोला, "सम्राट् चिन्ता न करें। आपकी कठिनाई का हल अपने आप ही हो गया है। आपके देश में सम्राट अशोक ने भी कलिंग को जीता था । उसे भी पूरी विजय नहीं मिली थी, क्योंकि कलिंग के नागरिक विद्रोही बने रहे। सम्राट अशोक ने तब अपनी नीति में परिवर्तन कर अहिंसा और प्रेम का मार्ग अप- नाया था। तो सम्राट, अव आप भी वल्लभी राजा और जनता पर प्रेम व अहिंसा के वल से विजय पाने की कोशिश करें।" ह्वेनसांग के मौन होते ही सम्राट के मुख पर मुस्कराहट दिखलाई देने लगी और उन्होंने घोपणा की, "आप सब मेरे हितैपी हैं। मुझे विपत्तियों में सहायता देते हैं । मैं अब अपनी युद्ध-नीति में परिवर्तन करूँगा । अव युद्ध नहीं होंगे।' " सम्राट् की इस घोपणा का सवने स्वागत किया। सभी जय-जयकार कर उठे। फिर सम्राट ने वल्लभी नरेश को दरवार में उपस्थित करने का आदेश दिया।
..
सच्ची विजय
कन्नौज में मम्राट हर्षवर्द्धन का राजदरबार लगा हुआ था।
मविगण अपनी-अपनी जगहों पर बैठे हुए थे। लोगों को मा-
ठम भीड़ थी। सब के सब बन्दी नरेश को देखने के लिये अधीर
थे। तभी सम्राट् आकर अपने मिहामन पर विराजमान हुए।
लोगों ने उनका जय-जयकार किया ।
हर्षवर्धन ने उन सबका अभिवादन स्वीकार किया। इसके
बाद उन्होंने सेनापति सिंहनाद को आज्ञा दी-"धन्दी ध्रुवमेन
को दरबार में हाजिर करो।'
कुछ ही समय में वल्लभी के राजा ध्रुवसेन बन्दी बनाकर
राजदरवार में लाये गये। उन्हे देख मभी सभासद जीत की
खुशी में झूम उठे। दरवार में चारों ओर से बदी को प्राण-दण्ड
देने की आवाजें उठने लगीं।
मम्राट हर्षवर्द्धन ने सभासदों को यह आवाज मुनी तो
चौंक पड़े। उन्हें इम निर्णय पर बहुत अचम्भा हुआ। गभीर
स्वर में उन्होने मवमे पूछा-"पहले यह तो पता लगे कि वन्दी
को प्राणदण्ड किम अपराध पर दिया जाये?"
सभी सभासद चुप रहे । किनी में कुछ जवाब न बन पड़ा।
काफी देर के बाद एक सभामद ने माहम के माथ कहा, “वल्लभी
के राजा युद्ध में हम से हार चुके है। कन्नौज के राज-नियम
के अनुसार वे प्राणदण्ड के भागी है।"
"लेकिन दण्ड कमा और क्यो? क्या युद्ध में हार जाना
७०
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सच्ची विजय ७६ अपराध है ?" हर्ष ने कठोर होकर पूछा। "वल्लभी नरेश के साथ युद्ध में कन्नौज के मैकड़ों सैनिक हताहत हुए। क्या इसका बदला हम नरेश से न लेंगे? उन्हें अवश्य प्राण-दण्ड मिलना चाहिये।" दूसरी आवाज़ उठी, "हां वल्लभी नरेश को मूली पर चढ़ा दिया जाये।" सम्राट् ने सभासदों के वचनों को बड़े ध्यान से सुना। सभी सभामदों ने इस पर प्रसन्नता प्रकट की। कुछ देर के बाद सम्राट् बोले, "वल्लभी पर कन्नौज की विजय हुई, माना । पर वल्लभी निवासी उसे हृदय से स्वीकार नहीं करते । वे विद्रोही बने हुए हैं । उनके इस विद्रोह को भी दूर करने का आप उपाय वतावें।" इस समाचार को सुन सभी सभासद एक-दूसरे का मुंह ताकने लगे। उनमें से किसी से भी उत्तर देते न बना। इनमें शत्रुघ्न नाम का एक सभासद था। वह सम्राट् का मुह-लगा मंत्री भी था। उसने साहस करके कहा, "सम्राट् आप सभी वल्लभी के निवासियों को राजद्रोह के कारण प्राण-दण्ड दें उनके घरों में आग लगा दें। उनके बच्चों को मौत के घाट उतार दें। विद्रोहियों को कुचलने का यही एक रास्ता है। विद्रोह इसी नीति से शान्त हो सकता है।" सभासद शत्रुघ्न के एक-एक शब्द को सभी ने बड़े ध्यान से सुना। सभी सभासदों में शत्रुघ्न के प्रति सम्मान की भावना बढ़ चली। राजसभा में कुछ देर तक फिर शान्ति छा गई। थोड़ी देर बाद इस चुप्पी को तोड़ते हुए राज्यश्री ने कहा, "प्रजा का पालन करना राजा का धर्म है । प्रजा को उजाड कर वह शासन किस पर करेगा? क्या उजडे प्रदेश पर? क्या
सम्राट हर्ष
श्मशान भूमि पर ? क्या युद्ध भूमि में पड़ी लोथों पर? पर यह
ध्यान रखो कि जहाँ शक्ति से काम नहीं चलता, वहाँ अहिंसा
और प्रेम की विजय सम्भव है। शक्ति की विजय का असर
कुछ ही समय तक होता है, पर अहिंसा और प्रेम की विजय
युगों-युगों तक अमर रहती है। मेरे विचार से वल्लभी के राजा
ध्रुवसेन को छोड़ दिया जाये और वल्लभी की विद्रोही जनता
पर प्रेम की सच्ची विजय पाने की कोशिश की जाये।"
दिवाकर मित्र ने राज्यश्री के विचारों का स्वागत करते
हुए कहा, "मैं राज्यश्री के प्रस्ताव का समर्थन करता हूँ।'
राजसभा में उपस्थित सभी सभासदों ने राज्यश्री की बात
को स्वीकार किया । तव सम्राट हर्पवद्धंन ने घोपणा की, "मैं
वल्लभी के राजा को छोड़ता हूँ और घोपणा करता हूँ कि
उनके व मेरे राज्य के सम्बन्ध आज से स्थायी हो जायेगे। इन
सम्बन्धों का आधार प्रेम व अहिंसा होगा।"
सम्राट हर्षवर्द्धन की नीति में एकदम परिवर्तन देख सभी
सभासद दंग रह गये। सम्राट् ध्रुवसेन के वेड़ी-बन्धन खोल
दिये गये।
६ बसेन गद्गद् हो उठा। सम्राट् की इस उदारता और
शान्ति नीति को देख कर उसने सिर झुका कर हर्ष को
अभिवादन करते हुए कहा, "जीवन में पहली बार मैंने यह
अनुभव किया है कि प्रेम की विजय ही सच्ची विजय है ।
उसका कोई भी शक्ति मुकाबला नहीं कर सकती। प्रेम की
धार तलवार की धार से अधिक पैनी और प्रभावकारी होती
है । तलवार का बार शरीर पर होता है और उसके जन्म से
गून निकलता है। लेकिन प्रेम का बार सीधे मन पर होता है
और उसका जख्म दिखाई नहीं देता। जख्म होता ही नहीं है,
सन्नी विजय पर उमका ददं जन्म से भी ज्यादा असर और अनुभव कराने वाला होता है। प्रेम के वशीभूत होकर मैं सम्राट् की आधीनता स्वीकार करता हूँ।" मारो ममा ने तालियां बजाकर ध्रुवसेन के प्रति अपनी खुशी व्यक्त की। तभी सम्राट् ने उठ कर कहा, "यह तो वल्लभी नरेश की महानता है, जो उन्होंने मेरी आधीनता स्वीकार कर मेरे गौरव को बढ़ाया है। लेकिन मेरे लिये यह उचित नहीं जान पड़ता। मैं धूवसेन को स्वतन्त्र करता हूँ, इस विश्वास के माय कि वह हमारे साथ हमेशा के लिए मित्रता बनाए रगंगे।" सभामदों ने उठ कर जोर से नारे लगाये-"सम्राट् हर्प- वदन की जय हो! रानी राज्यधी की जय हो !! वल्लभी नरेश महाराज ध्रुवसेन को जय हो !!!" मभासद नारे लगा कर अपनी जगह पर बैठ गये। थोड़ी देर बहन राज्यश्री के साथ सम्राट हपं ने धीमे स्वर में वार्ता- लाप किया, फिर हंसी की चांदनी विखेरते हुए उठ खड़े हुए और महामंत्री से बोले, "राजकुमारी चारमिना को यहां ले आओ।" "जो आज्ञा !" कह कर महामन्त्री चला गया। इधर राजसभा में खलबली मच गई। लोग आपस में पानाफूमी करने लगे। सब को जवान पर एक ही बात थी, "राजकुमारी चालमित्रा को एकाएक सम्राट् ने राजसभा में क्यों बुलवाया है ? न जाने अब महाराज कौन-सा नया गुल पिलाने वाले हैं ?" एक ने कहा, "राजकुमारी ने कोई अपराध किया होगा, ८२ सम्राट हर्ष उसी की सज़ा शायद उसे दरवार में सुनाने वाले हैं। राज- कुमारी आती ही होगी।" दूसरा बोला, "नहीं, यह बात नहीं। सुना है चारूमिना वौद्ध धर्म की दीक्षा लेना चाहती है। उसी की घोषणा सम्राट दरवार में करने वाले हैं।" इस प्रकार सभा में तरह-तरह की बातें हो ही रही थीं और लोग अपनी-अपनी समझ के अनुसार राजकुमारो के बारे में अटकलें लगा रहे थे, तभी महामंत्री के साथ चारूमित्रा ने दरवार में प्रवेश किया। उसे देखते ही दरवार में एकदम खामोशी छा गई। लोग सम्राट के मुख से राजकुमारी के विषय में कुछ सुनने को बेताब हो उठे। उनका कौतूहल बढ़ गया था। सब गर्दनें ऊँची उठा कर देखने लगे। राजकुमारी अपने पिता के पास आकर खड़ी हो गई। उसके पीछे राज्यश्री खड़ी थी। सम्राट उसे अपने साथ लेकर जहाँ ध्रुवसेन खड़े थे, वहाँ पहुँचे। सब को सम्बोधित कर वह वोले, "सभासदो ! आज वल्लभी नरेश ने हमें सदा मित्रता निभाने का आश्वासन दिया है। मैं भी अपनी ओर से इस मित्रता को अधिक दृढ़ करने के लिए राजकुमारी चारूमित्रा का हाथ ध्रुवसेन के हाथ में देता हूँ। अव दोनों राज्य अधिक गहरे मित्र बन गये हैं और यह नाता हमेशा निभायेंगे, ऐसा मैं अपनी ओर से आश्वासन देता हूँ।" इतना कह कर सम्राट ने अपनी पुत्री का हाथ ध्रुवसेन के हाथों में दे दिया। राजद्वार पर शहनाई वजने लगी। दिवाकर मित्र ने आगे बढ़ कर वर- वधु को आशीर्वाद दिया। इसके बाद दोनों सम्राट् गले मिले। -
सच्ची विजय
८३
वनसांग आश्चर्य से यह सब देख रहा था। उसकी
प्रमन्नता का ठिकाना न रहा । उसने हपित होकर गद्गद् कण्ठ
में कहा, "भारतवर्ष एक रहस्यमय देश है। दो सम्राट् जो
पहले शनु थे, अब मिन्न हो गये है । दोनों ने ऐसा करके एकता,
गुरक्षा और शान्ति कायम रखने का प्रयत्न किया है। आज
इतिहास का पुराना पन्ना फिर दोहराया गया है। सम्राट
अशोक ने शान्ति का सन्देश फैलाने के लिए अपने प्रिय पुन
महेन्द्र और पुत्री सघमित्रा को लका भेजा था। उसके बाद
आज फिर सम्राट् हपंवर्द्धन अपनी पुत्री को वल्लभी के राजा
ध्रुवमेन को प्रदान कर सौराष्ट्र भेज रहे हैं।"
इसके बाद सभा वर्खास्त 1 लोग खुशी मे झूमते हुए
अपने-अपने घरो की ओर चल दिये।
: १४ :
लड़ाई की ओर
सुवह का समय था। सारी धरती जाग गई थी। पहाड़ियों
के पीछे सूरज झांकने लगा था। सब कुछ उजला-उजला और
सुहावना लग रहा था। बाग-बगीचों में हरी-हरी घास पर
रात ने जाते समय कितने ही मोती लुटा दिये थे। सम्राट
हर्षवर्द्धन अपने राजदरबार में बैठे थे। दरवार में सूर्य की
सुनहरी किरणें विखर रही थीं, जो वहाँ जड़े अमूल्य रत्नों और
पत्थरों में अपूर्व जगमगाहट पैदा कर रही थीं।
राजदरबार लगा था। सभासदों को भीड़ थी, लेकिन वहाँ
विल्कुल शान्ति थी। महाकवि बाणभट्ट का कविता पाठ हो
रहा था। वे 'हर्प चरित' के कुछ अंश सम्राट् को सुना रहे थे।
सम्राट् के मुख पर मुस्कान विखर रही थी, और सभासद
कविता सुन-सुनकर आत्मविभोर हो रहे थे । भिक्षुवर ह्वेनसांग
भी महाकवि की ओर बड़े कौतुक से देख रहे थे। उन्हें आश्चर्य
हो रहा था महाकवि की प्रतिभा पर। काव्य रस में सभासद
डूव
गये थे। ऐसा लगता था कि दरवार में कोई न बैठा हो ।
सम्राट् हर्षवर्द्धन के एक विशेप गुप्तचर ने इसी समय
राजदरवार में प्रवेश किया। सभी सभासदों की आँखें उसकी
ओर उठ गयीं। गुप्तचर ने सम्राट को सिर झुकाकर निवेदन
किया, “सम्राट् ! महाराष्ट्र-नरेश चालुक्यराज पुलकेशिन द्वितीय
८४
सड़ाई की मोर का एक दूत वाहर आया हुआ है । वह आपसे भेंट करना चाहता है।" सम्राट् के माथे पर बल पड़ गये। बाणभट्ट को कविता- पाठ अधूरा छोड़कर नीचे बैठ जाना पड़ा। हपं वोले, "उसे सादर ले आयो।" कुछ ही क्षणों में दूत ने सम्राट के सामने उपस्थित होकर अभिवादन किया और कहा, "महाराष्ट्र के सम्राट् पुलकेशिन द्वितीय अपनी सेना के माय नर्मदा नदी के किनारे पर पड़ाव डाले हुए हैं । उन्होंने आपको युद्ध के लिए निमंत्रण भेजा है।" इतना कहकर दूत ने एक पत्र सम्राट की ओर बढ़ा दिया। मम्राट् ने पत्र को मुहर तोड़ी और एक लम्बी सांस में उसे पढ़ गये। पढ़ते ही वे कठोर हो गये। पत्र राज्यश्री को देते हुए वे बोले, "तो सम्राट् पुलकेशिन युद्ध के लिए तैयार हैं। मेरी नीति का अनुचित लाभ उठाना चाहते हैं । मैंने युद्ध न करने की प्रतिज्ञा की है, पर वे युद्ध के लिए तैयार हैं। लेकिन मैं इसके विरुद्ध हूँ। बेकार का गून वहाना नहीं चाहता। इसका मतलब साम्राज्य गतरे में है। देश की रक्षा और मर्यादा का मवाल आ खड़ा हुआ है । बड़ी कठिन समस्या है।" सभी मभासद युद्ध की बात सुनकर गम्भीर हो गये। हो, सेनापतियों के मुग पर अवश्य कुछ सुशो दिखलायो पड़ती थी। सारी सभा शान्त थी। राज्यश्री पन पढ़ कर बोली, "यह मंमार शान्ति के रास्ते में रोड़े अटकाता रहता है । सुख, चन और अमन को यह संसार हिंमा द्वारा पाना चाहता है, जो फेवल एक धोया है। मच्चा मुगु-चन और अमन, प्रेम तया अहिंसा को अपनाने से मिलता है। भैया हर्षवर्दन, तुम चिन्ता न करो। धीरज रखकर अपनी नीति पर डटे रहो। तुम्हारी विजय होगी।"
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माई की मार
3
राज्यमी के मौन होते ही मनादि निहनाद ने दंग
बावाज में कहा, "नत्राट् ! बातिा के मन में नाति
है। मैंने वनेक वृद्धों को देना है। अनेक नामानों के दल को
अपना गुजात्रों में नोला है। पर मब कनारमने यही पाया है
किम का पूरी तरह में नाग कर देना ही उदित है। गंगा
करने से ही मानाय की गुस्सा और शान्ति कायम रह
मलती है।"
नाति निहनाद की बात गजदरबार में जान्थिन नना-
नदी के हृदय में पर कर गयी। टनरी वान यानन्द करते
हर मेनानि भन्डि ने कहा, "मम्राट् ! वायुयान पुलगिन
द्वितीय आपने बार युद्ध करने के लिए आया है। वह
ती गस्ति को कम समझता है। इनलिए वह बार-बार
आक परायन को चुनौती देता रहता है। अगर आप उनकी
चुनौती को स्वीकार नहीं करेंगे, तो वह मन नारं नामान्य
को डावांडोन कर सकता है। एक न एक दिन वह अनावधान
देवकर हमारे माम्राज्य पर अन्य आरन करेगा।"
मनाट् मोच में पड़ गए। कुछ देर दावादरम में ननवनी
रही, तिर मम्राट ने दरवार दान करने की घोषणा की
और तुम्न आदरानीन ममा दुलबाट। आम लोगों के बने
जाने के बाद मत्राट् ने मनानि निहलाद ने पूछा, 'कया हन
पुनगिन द्वितीय की हा मरते हैं ?"
"केवर हा ही नहीं, अस्ति मेहनंगा के लिए निया
मरते हैं। दूर के टोल मुहावने नाते हैं, नत्राट् ! नरिन वने
महाराष्ट्र मंत्राट् के पान बहुत मामूली नारत है। वह हमारी
मना मदन बार मुरावना नहीं कर माता। उने भारी मुह
की मानी पहनी।" नेनाति ने कहा।
सम्राट हर्प
"वह कैसे ?" सम्राट ने पूछा।
"सम्राट् ! संगठन अपने आप में बहुत बड़ी ताकत होती है।
हमारा पुलकेशिन के साथ अव तक तीन बार युद्ध हुआ है।
इन तीनों बार हमारी सेनाएँ राज्य के भिन्न-भिन्न भागों में
दुश्मन से लोहा ले रही थीं। इसलिए ताकत बँटी हुई थी,
जिससे हम ठीक तरह दुश्मन की खबर न ले सके। उल्टे हमें
ही पीछे हटने के लिए विवश होना पड़ा और हम असफल हुए। ।
पर अव वह वात नहीं है। इस बार हमारी पूरी ताकत एक
ही जगह रहेगी।" सेनापति ने आवेश में आकर कहा ।
उसी समय वात का छोर पकड़ते हुए दूसरे सेनापति भण्डि
ने कहा, "हम हार नहीं सकते, महाराज ! इस बार हम अपनी
तीनों हारों का बदला चालुक्यराज से दिल खोलकर लेंगे।
उसे नाकों चने चबाने के लिए विवश कर देंगे। नर्मदा सदियों
तक इस युद्ध को याद रखेगी।
सम्राट हर्षवर्द्धन दोनों सेनापतियों की बात ध्यान से सुन
चुके थे। वे अपने पास बैठे ह्वेनसांग, दिवाकर मित्र और
राज्यश्री की ओर बार-बार देख रहे थे । दिवाकर मित्र अभी
तक चुप थे । वे अव अपनी चुप्पी को तोड़ते हुए बोले, “सम्राट्,
मैंने सभी की वातें सुनीं। यह बिल्कुल सच है कि विजय
आपके चरण चूमेगी, लेकिन मेरा यही मत है कि अहिंसा और
प्रेम की जीत जरूर होगी। शत्रु सीमा पर पड़ाव डाल चुका
है। साम्राज्य की सुरक्षा के लिए आप भी अपनी सेना को
सीमा पर भेज दें, पर युद्ध न करें।"
दिवाकर मित्र की बात से सभी एकमत दिखलाई पड़े।
सम्राट हर्षवर्धन ने इसी समय शंका करते हुए कहा, "गुरुवर,
दो शत्रु सेनाओं में युद्ध न हो, यह असम्भव है । एक दूसरे को
।
मड़ाई को भोर
देखकर जब उममें जोश भर जायेगा, तब उसे रोकना कठिन
होगा। फिर महाराष्ट्र के सम्राट की सेना तो युद्ध के निश्चय
मे ही आयी होगी।"
मम्राट हर्षवर्द्धन की गंका से भरी बात पर दिवाकर मिन्न
हंसते हुए बोले, "सम्राट् शंका न करें। युद्ध की बात मन में
न मोचें । भगवान् बुद्ध सब ठीक ही करेंगे।"
दूसरे दिन मुबह सम्राट् ने सेना और सेनापतियों के साथ
नर्मदा नदी की ओर कूच किया। इधर राज्यश्री और दिवाकर
मित्र ने उनके चले जाने के बाद महाकवि वाणभट्ट को सम्राट
पुलकेशिन के पास एक पत्र देकर भेजा। फिर कुछ समय के
बाद दोनों हनसांग के साथ युद्ध-भूमि की ओर चल पड़े।
: १५ :
लड़ाई नहीं
दोपहर का समय था। आकाश में वादलों के टुकड़े रुई के
ढेर की तरह विखरे हुए थे। उनके पीछे सूरज की किरणे
सैकड़ों लकीरों में बँटी हुई बहुत भली लगती थीं। नीचे धरती
पर नर्मदा कल-कल करती वह रही थी । वड़ी चुलवुली
और गहरी नर्मदा! उत्तर-दक्षिण को बाँटने वाली नर्मदा !
गंगा-यमुना-सी पवित्र नर्मदा ! इसके दोनों किनारों पर दो
साम्राज्यों की सीमायें मिलती थीं। उत्तर दिशा में सम्राट
हर्पवर्द्धन शिलादित्य का राज्य था और दक्षिण दिशा में
महाराष्ट्र के सम्राट् चालुक्यराज पुलकेशिन द्वितीय का। आज
इस सीमा पर दोनों का भाग्य-निर्णय होने वाला था।
नर्मदा नदी के एक किनारे पर उत्तर की ओर सम्राट
हर्पवर्द्धन अपनी साठ हज़ार सेना के साथ पड़ाव डाले हुए थे।
उनकी सेना के हाथी चिंघाड़ रहे थे। घोड़े हिनहिना रहे थे
और चल पड़ने को मचल उठते थे। सैनिकों की आवाजें पास के
वन-प्रदेश की शान्ति को भंग कर रही थीं। नदी के दूसरी ओर
महाराष्ट्र के सम्राट् पुलकेशिन अपने वीर सैनिकों के साथ डटे
हुए
थे । ऐसा लगता था जैसे गाँव का गाँव उठकर किनारे पर
चला आया हो। मेले की तरह रौनक थी। कोई सैनिक वीर
रस का गीत गा रहा था तो कोई तलवार की धार और तेज
करने में मग्न था।
तभी एकाएक दक्षिण दिशा में विगुल बज उठा। चारों
६०
No text on this page.
१५ :
लड़ाई नहीं
दोपहर का समय था। आकाश में वादलों के टुकड़े रुई के
ढेर की तरह विखरे हुए थे। उनके पीछे सूरज की किरणें
सैकड़ों लकीरों में बँटी हुई वहुत भली लगती थीं। नीचे धरती
पर नर्मदा कल-कल करती बह रही थी। बड़ी चुलबुली
और गहरी नर्मदा! उत्तर-दक्षिण को वाँटने वाली नर्मदा !
गंगा-यमुना-सी पवित्र नर्मदा! इसके दोनों किनारों पर दो
साम्राज्यों की सीमायें मिलती थीं। उत्तर दिशा में सम्राट
हर्पवर्द्धन शिलादित्य का राज्य था और दक्षिण दिशा में
महाराष्ट्र के सम्राट चालुक्यराज पुलकेशिन द्वितीय का। आज
इस सीमा पर दोनों का भाग्य-निर्णय होने वाला था।
नर्मदा नदी के एक किनारे पर उत्तर की ओर सम्राट
हपंवर्द्धन अपनी साठ हजार सेना के साथ पड़ाव डाले हुए
थे
उनकी सेना के हाथी चिंघाड़ रहे थे। घोड़े हिनहिना रहे थे
और चल पड़ने को मचल उठते थे। सैनिकों की आवाजें पास के
चन-प्रदेश की शान्ति को भंग कर रही थीं। नदी के दूसरी ओर
महाराष्ट्र के सम्राट् पुलकेशिन अपने वीर सैनिकों के साथ डटे
हुए थे। ऐसा लगता था जैसे गाँव का गाँव उठकर किनारे पर
चला आया हो । मेले की तरह रौनक थी। कोई सैनिक वीर
रस का गीत गा रहा था तो कोई तलवार की धार और तेज
करने में मग्न था।
तभी एकाएक दक्षिण दिशा में विगुल बज उठा। चारों
।
लड़ाई नहीं
दिगायें कांपने लगीं। धरती से उड़ी धूल
उठी। यह देख हर्षवर्धन की सेना में में
वह युद्ध के लिए तैयार होने लगी। पुन
वजे। सव योद्धा मोर्चों पर आ डटे।
इधर-उधर हटना शुरू हो गया। न
संभाल लिये।
६२ सम्राट हर्ष भण्डि ने देखा समाट हर्षवर्द्धन अपने इन्द्रनील हाथी पर चुपचाप बैठे हैं और बार-बार चारों ओर दृष्टि डालकर खिन्न हो रहे हैं। सहसा वाणों की वर्षा और अधिक तेज हुई। सम्राट हर्प- वर्द्धन की सेना का रहा-सहा साहस भी ठण्डा पड़ गया। वह भागने लगी। सिपाही घायल होकर गिरने लगे। सेनापतियों ने उन्हें रोका । महावली हर्षवर्द्धन से यह न देखा गया। उन्होंने तुरन्त ही एक नाव मँगाई और उसमें बैठ नाव पर सफेद झण्डी वाँधने की आज्ञा दी गई। नाव सम्राट् की आज्ञा पाकर लहरों पर इतराती हुई आगे बढ़ चली। सम्राट को नाव में बैठे जाते देख कर उनकी सेना की भगदड़ रुक गई। सेनापति भण्डि व सिंहनाद सम्राट् के इस कार्य को देखकर अवाक रह गये। वे दोनों अपने-अपने मन मसोस कर रह गये। दूसरी ओर पुलकेशिन की सेना में अपार जोश था। वे लड़ने-मरने के लिए उतावले हो रहे थे। सिर पर कफन बाँधे तैयार खड़े थे । लेकिन जब उन्होंने सफेद झण्डी वाली नाव को अपनी ओर आते देखा, तव वे सबके सव चकित रह गये । वे आश्चर्य से एक-दूसरे का मुंह ताकने लगे। उनके सेनापति ने अपने साथी से कहा, "यह सरासर धोखा है। महाराज हर्प हम पर धोखे से आक्रमण करना चाहते हैं, हमारी आँखों में धूल झोंक रहे हैं। हमें उनसे सतर्क रहना होगा।" साथी सेनापति ने कड़क कर कहा, "तुम्हारी अक्ल तो खराब नहीं हो गई है ? देखते नहीं हो, नाव पर सफेद झण्डी सार ३४ सम्राट हर्ष ? । बँधी है ? इसका मतलब होता है शत्रु संधि करना चाहता है। और सम्राट हर्प भी नाव में अकेले ही आ रहे हैं। एक आदमी इतनी विशाल सेना के सामने कैसे टिक सकता है ? निश्चय ही वे धोखा नहीं दे रहे।" इतना कह उसने तुरन्त सेना को युद्ध बन्द करने का आदेश दिया। सम्राट् पुलकेशिन की सेना ने सेनापति की आज्ञा पा अपने हथियार डाल दिये । सभी सैनिक आ रही नाव की ओर टकटकी लगाकर देखते रहे। धीरे-धीरे नाव किनारे पर आ लगी। उसमें से सम्राट हर्षवर्द्धन नीचे उतरे। इसी किनारे के पास ही सम्राट् पुलकेशिन का डेरा था। सम्राट हर्षवर्द्धन ने डेरे के पास खड़े एक सैनिक को बुलाकर एक पत्र दिया। वह सैनिक पत्र लेकर अन्दर गया। उसने पत्न पुलकेशिन के हाथों में थमा दिया। पत्र पढ़कर तुरन्त ही सम्राट् पुलकेशिन वाहर आये । बाहर खड़े सम्राट हर्षवर्द्धन ने उन्हें देखा। महाप्रतापी हर्पवर्द्धन को देख पुलकेशिन चौंक पड़े । चकित हो वह वोल उठे, “सम्राट् आप? इस समय ? अब तो युद्ध चल रहा है ! आपकी सुरक्षा खतरे में है। अगर लड़ाई में आपको कुछ हो गया तो? आप तुरन्त लौट जाइये। मेरे सैनिक आपको नर्मदा पार सुरक्षित पहुँचा देंगे।" सम्राट् हर्पवर्द्धन मुस्करा उठे । बोले, "मैं युद्ध नहीं करना चाहता । व्यर्थ ही जान-माल की हानि होते मैं नहीं देख सकता। मैं आपसे मित्रता करने आया हूँ।" युद्धवन्दी और मित्रता करने की बातें पुलकेशिन ने सुनीं और कहा, "आप की बहन राज्यश्री की ओर से भेजे दूत .
सम्राट् हर्ष और अधिक विनम्र होकर पौने, “ऐसा न कहीं पुलकेशिन ! भगवान ने मैरी आँखें खोल दी हैं। शान्ति, प्रेत और सह-अस्तित्व का मार्ग मुझे मिल गया है। अब उनी पर मैं चलूगा। मैं इस नतीजे पर पहुंचा हूं कि लड़ाई में राज्य जीते जा सकते हैं, पर मन नहीं; और सच्ची जीत लोगों के दिलों को जीतने में होती है। इसलिये अब में अब न उठाऊंगा।" पुलकेशिन हंस पड़ा। फिर पहले से भी दृढ़म्बर में बोला, "आप युद्ध छेड़ना चाहें या न चाहें, लेकिन में युद्ध अन्न छेडगा। मैंने हूणों को हराने वाले सम्राट हर्षवर्द्धन में युद्ध करने की प्रतिज्ञा कर ली है। मैं देखना चाहता है, मुझमें कितनी शक्ति है ? वैसे मैं कहाकवि वामन दाइको अस्वीकार भी नहीं कर सका हूं।"
सम्राट हर्ष
सम्राट हर्षवर्द्धन वाणभट्ट का नाम सुन चकित से रह गये ।
वे राज्यश्री के प्रयत्न की मन ही मन प्रशंसा कर उठे और
फिर साहस कर बोले, "चालुक्यराज सम्राट पुलकेशिन ! आप
वीर हैं। मैंने पहले आप से युद्ध करने की ठानी थी। अपनी
संसार भर को जीतने की प्रतिज्ञा को पूरा करना चाहा था ।
पर अब संसार को शस्त्र से नहीं, प्रेम और अहिंसा से जीतना
ही ठीक समझा है। आप मेरा प्रस्ताव स्वीकार करें; मेरे मित्र
बनें !'
चालुक्यराज सोच में पड़ गया। उसके मस्तिष्क में अनेक
विचार आने-जाने लगे। अधिक समय तक वह इस हालत
में
न रह सके। वोले, "मैं अभी इसका निर्णय न कर सकूँगा ।
इसके लिए मुझे नये सिरे से विचार करना होगा। मैं तो आप
से घनघोर युद्ध करने के विचार से यहाँ आया था। मेरे राज्य
की सीमाएँ भी अपने हाथ फैलाना चाहती हैं। समूचा दक्षिण
इस समय मेरी मुट्ठी में है।"
"मैं जानता हूँ, पुलकेशिन ! आपकी वीरता और प्रताप को
मैं जानता हूँ और इसलिए इच्छा है कि भारत की दो प्रवल
शक्तियाँ आपस में मित्र बन जाएँ।" हर्प ने कहा।
इसका उत्तर देते हुए सम्राट् पुलकेशिन ने दुःख भरे स्वर
कहा, "उत्तर भारत के वीर सम्राट हर्षवर्द्धन ! तो मेरी इच्छा
पूरी न हो सकेगी? मुझे इसका दुःख होगा । मेरा सारा उत्साह
समाप्त हो जायेगा।'
"सम्राट् ! यह समय आपस में लड़ने का नहीं है । आपसी
फूट भारत में घर कर चुकी है। उसके बीज बहुत अन्दर तक
पहुंच चुके हैं। एक राज्य दूसरे राज्य को नष्ट करने के प्रयत्न
में लीन है। देश को इस दशा से उबारो !
में
!
लड़ाई नहीं महाकवि वाणभट्ट तो पहले ही इस प्रस्ताव को लेकर आ चुके हैं, किन्तु मेरी इच्छा है कि युद्ध हो।" "पर क्यों ?" सम्राट हर्षवर्धन ने दुःखित होकर कहा, "हजारों सैनिक व्ययं में अपने प्राण गंवा देंगे, मानमंदा वा पानी उनके रक्त से लाल हो जायेगा। क्या उससे आपके मन को शान्ति मिलेगी ?" पुलकेशिन दूर हो उठा। ठहाका मार कर बोला, "बाज शेर गाय कैसे बन गया ? जिस सम्राट् ने लगातार छ. वर्ष तक अपनी तलवार को म्यान में एक पल भी वियाम न करने दिया, जिसने इस अवधि में अपने तन से लड़ाई की पोशाक न उतारी और लाखों नर-नारियों के खून से अपने हाथ रंगे, वही आज ऐसी बातें करे ! इसमें अवश्य कोई न कोई गड़बड़ है । मुझे तो यकीन नहीं हो रहा आपको इस शान्ति नीति पर।" सम्राट हर्प और अधिक विनम्न होकर बोले, "ऐसा न हो पुलकेशिन ! भगवान ने मेरो आँखें खोल दी हैं। शान्ति, प्रेम और सह-अस्तित्व का मार्ग मुझे मिल गया है । अब उसी पर मैं चलूगा ! मैं इस नतीजे पर पहुंचा हूँ कि लड़ाई से राज्य जीते जा सकते हैं, पर मन नहीं, और सच्ची जीत लोगो के दिलो को जीतने में होती है। इसलिये अब में शस्त्र न उठाऊँगा।" पुलकेशिन हंस पड़ा। फिर पहले से भी दृढ स्वर में बोला, "आप युद्ध छेड़ना चाहें या न चाहे, लेकिन में युद्ध अवश्य छेडगा। मैंने हूणों को हराने वाले सम्राट हर्षवर्द्धन से युद्ध करने की प्रतिज्ञा कर ली है। मैं देखना चाहता हूं, मुझ में क्तिनी शक्ति है ? वैसे मैं कहाकवि वाणभट्ट के प्रस्ताव को अस्वीकार भी नहीं कर सका हूं।"
६८
सम्राट हर्ष
सेनापति ने तत्काल उपस्थित होकर कहा-"आज्ञा,
सम्राट !"
पुलकेशिन ने कहा, "हमने सम्राट हर्षवर्द्धन से संधि कर
ली है । अव युद्ध नहीं होगा। सेना को वापिस लौटने का आदेश
दो।" "जो आज्ञा", कह कर सेनापति जयकेतु चला गया ।
ठीक उसी समय नर्मदा नदी के किनारे पर एक दूसरी
नाव आकर लगी। इस नाव से द्वेनसांग, राज्यश्री और
दिवाकर मित्र उतरते दिखलाई पड़े। ये तीनों ही सम्राट
पुलकेशिन के डेरे की ओर बढ़े चले आ रहे थे। डेरे के पास
पहुँचते ही बाहर वार्तालाप में मग्न खड़े सम्राट हर्षवर्द्धन ने
उन्हें पहचान लिया। उन्होंने भी सम्राट हर्षवर्द्धन व पुलकेशिन
को पहचान लिया।
दोनों सम्राटों को इकट्ठा देख वे ठिठक कर उनके पास
आकर खड़े हो गये । सम्राट हर्षवर्धन ने उन तीनों का परिचय
सम्राट् पुलकेशिन से कराया। उनसे मिलकर सम्राट पुलकेशिन
को बड़ी खुशी हुई। परिचय के बाद राज्यश्री सम्राट् पुलकेशिन
से बोली, “सम्राट हर्ष आपके पास ही आरहे थे। भैया
हर्षवर्द्धन और आपके बीच चल रहे युद्ध को हम खत्म करना
चाहते हैं। पर आप दोनों संयोग से यहाँ मौजूद हैं, जिसकी
हमें खुशी है।"
ह्वेनसांग ने भी विनम्र भाव से कहा, "हाँ, चालुक्यराज
मैं भी यही चाहता हूँ। दो दिलों के बीच फैलो खाई किर्स
तरह पट जाये तो सबसे अच्छी बात होगी।"
"मेरी भी यही इच्छा है।" दिवाकर मित्र ने कहा
"लेकिन यह सब हो, तभी न ! और वह हो कैसे ?"
पुलकेशिन ने चिन्ता व्यक्त करते हुए कहा।
-
लड़ाई नहीं EE इसका केवल एक ही उपाय है, प्रेम । प्रेम वह चमत्कारी जादू है, जो गहरी से गहरी और चौड़ी से चौड़ी पाई को भी पाट देता है। "लेकिन तुम्हें मालूम है कि दिल का शीशा एक बार चटकने पर जुड़ना असम्भव हो जाता है। इतने वर्षों का मैल पल भर में कैसे धुल सकेगा?" राज्यश्री कह उठी, "ससार में कुछ भी असम्भव नहीं, चालुक्यराज ! जहाँ चाह वहां राह । यदि मन में लाओ तो सव सम्भव होगा।" राज्यश्री के मुख से भीठे वचनों को सुन सम्राट् पुलकेशिन मुस्करा उठे। उन्होंने राज्यश्री की प्रशसा करते हुए कहा, "देवि! आप भी खूब हैं । मेरे युद्ध का ही खात्मा करना चाहती हैं । मैं तो आज पराक्रमी सम्राट् से अपने वाहुवल को तुलवाना चाहता था । आप उसमें वाधा डाल रही है । चलो आपका ही कहा मानेगे । अव बतलाइये, आप चाहती क्या है इसके उत्तर में राज्यश्री ने कहा, "मम्राट्, मेरे भेजे महाकवि वाणभट्ट आपकी सेवा मे आ ही चुके है। मै शान्ति चाहती हूँ। वेकार का खून बहते मैं नहीं देखना चाहती। आप दोनों सम्राट् मित्र बनें और प्रतिज्ञा करे कि भविष्य मे आपस में कभी भी युद्ध न करेंगे।" और इतना कह वे गम्भीर हो गई। सम्राट् पुलकेशिन ने राज्यश्री के मौन होने पर कहा, "आओ, शिविर में चलें। वही बात करेंगे। वैमे आपका भेजा सदेशा मुझे मिला । महाकवि वाणभट्ट से देर तर बातचीत भी मैं कर चका हूँ।" कह कर वे सब शिविर को ओर चल पड़े। शिविर में पहुँच कर पुलकेशिन ने अगर का समय और सबको खाने के लिये फल प्रस्तुत किए। ?" ।
सम्राट हर्ष से संतरे को फाँक मुंह में डालते हुए राज्यश्री ने पूछा, "तो फिर बाणभट्ट से हुए वार्तालाप का क्या निष्कर्ष निकला?" "वही, जो आप चाहती हैं । आपकी आज्ञा मानकर मैं आज युद्ध न करने की प्रतिज्ञा करता हूँ।" अंगूर के रस का एक पूंट पीते हुए पुलकेशिन बोला, “सम्राट हर्ष और गुरुवर दिवाकर मित्र दोनों के लिए मेरे हृदय में बड़ी श्रद्धा है, मैं किसी भी प्रकार उनकी वात को टाल नहीं सकता। देवि राज्यश्री को मैं अपनी बहन मानता हूँ, उन्हें भी नाराज़ न होने दूंगा।" तभी राज्यश्री को वाणभट्ट का स्मरण हो गया। उसने पूछा, “महाकवि वाणभट्ट कहाँ गए हैं ? दिखाई नहीं दिये।" पुलकेशिन हँस कर बोला, “महाकवि वाणभट्ट हमारे महा- कवि रविकीति के साथ यहीं कहीं घूम रहे होंगे । दोनों विद्वान और मस्त-मौजी जीव हैं। उन्हें अभी वुलवाता हूँ।" उन्होंने अपने सेवक को दोनों को बुलवाने भेजा। सेवक के जाते ही बाणभट्ट अपने मित्र रविकोति के साथ पुलकेशिन के शिविर में उपस्थित हुए। दोनों के मुख पर अपार तेज था और वे मन्द-मन्द मुस्करा रहे थे । रविकीति उन दिनों दक्षिणी भारत में संस्कृत के माने हुए प्रसिद्ध कवि थे। दोनों ने सवको अभिवादन किया। कुछ देर शान्ति रही; फिर सव खड़े हुए। सम्राट हर्षवर्द्धन ने कहा, "आओ, सम्राट चालुक्यराज पुलकेशिन ! हम दोनों गले मिलें । देखो, कितना सुन्दर समय आज आया है। आज दो सम्राट् देश की एकता और शान्ति रखने को एक साथ प्रतिज्ञा कर रहे हैं । युद्ध से विनाश होता है। इसलिए युद्ध रोकने की घोपणा कर रहे हैं।" दोनों सम्राट् गले मिले। वे अपार प्रसन्नता अनुभव करने //
सम्राट हर्ष
।
लगे। इसी बीच महाकवि वाणभट्ट ने महाकवि रविकीति से
कहा, "वाह मित्र, कैसा संयोग है देखो तो उत्तर और दक्षिण
के दो कवि आज अचानक आ मिले हैं। आओ हम भी प्रतिमा
करें कि अपनी लेखनी से देश की जागृति में सहायक कविताएँ
लिखा करेंगे।"
दोनों महाकवि गले मिले। दोनों ने प्रतिज्ञा की। सारा
वायुमण्डल हर्प से भर उठा । ह्वेनसांग चकित हो यह सब
देखता रहा।
दोनों ओर की सेनाओं को सन्धि को खवर दे दी गई।
खबर मिलते ही दोनों ओर से जय-जयकार होने लगा । दोनों
सम्राटों ने एक-दूसरे से विदा मांगी। इसो समय पास खड़े हुए
दिवाकर मित्र दोनों राजाओं को आशीर्वाद देते हुए बोले, "आज
युद्ध होते-होते रुक गया है। अनेकों मनुष्यों का खून बहने से
वचा; यह प्रसन्नता की बात है। अनेक स्त्रियाँ, मातायें और
वहनें इसके लिये आपको धन्यवाद देंगी। शान्ति और अहिंसा
की आज विजय हुई। भारत का इससे महान कल्याण हुआ है।
नर्मदा के तट पर आज जो घटना घटी है, वह अमर रहेगी।
सारा देश फले-फूले । आप दोनों सम्राट् लोभ और हिंसा के
विचार मन में न लावें। भगवान बुद्ध आपको शक्ति दें। सव
का कल्याण हो।
आशीर्वाद पाकर दोनों सम्राट् सेना सहित अपने-अपने
देश को लौट आये। दोनों को मित्रता खूब फली-फूली।
सम्राट् हर्पवर्द्धन का राजदूत, चालुक्यराज सम्राट् पुलकेशिन
को सहायता से फ़ारस देश पहुँचा । वहाँ के राजा ने भी मित्रता
बढ़ाने के लिए अपना दूत हर्पवर्द्धन के दरबार में भेजा।
। अश्रुपूर्ण विदाई ममस्त उत्तरी भारत सम्राट हर्षवर्द्धन के अधिकार में आ चुका था। कितने ही छोटे-छोटे राज्य आपस में मदा लड़ने- झगड़ते रहते थे, और एक-दूसरे से जलते थे। सम्राट हर्ष ने अपने प्रभाव में उन सबको एकता के सूत्र में बांध दिया था और उनकी शक्ति सगठित हो गई थी, जिससे वे हर अपत्ति में एक होकर उसका मुकाबला कर सकते थे। स्वयं सम्राट हर्ष- वर्द्धन भी अव युद्धप्रिय राजा न रह गए थे। उनकी इच्छा अब अधिक साम्राज्य बढ़ाने की न थी। वे अब शान्ति और अहिंसा के रास्ते को अपनाकर देश के निर्माण में जुटे हुए थे। एक दिन की बात है । साँझ हो रही थी। पक्षी अपने-अपने घोंसलों की ओर लौट रहे थे। सूरज की किरणें धरती से विदा ले रही थीं। रोशनी में चौपायों को उड़ती हुई घूल गुलाल-सी लग रही थी। सम्राट् हर्षवर्द्धन महल के झरोखे में बैठे यह मुहावना दृश्य मग्न होकर देख रहे थे। लेकिन उनका मन किन्हीं दूसरे ही विचारों में उलझा हुआ था। इसलिए वे भिक्षुवर ह्वेनसाग का आना न जान सके। उन्होंने पीछे से सम्राट् के कंधे पर हाथ रखा तो वे चौंक उठे। ह्वेनसाग को मामने देख उन्होंने मुस्कराकर उनका स्वागत किया और बोले "आओ भिक्षुवर! आपको देखकर न जाने क्यो मन को मारी व्यथा एकदम दूर हो जाती है।" ह्वेनसांग ने पास ही आसन खीच कर बैठते हुए कहा, ।
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Ի
, .-. «4 r-:
१०५ अश्रुपूर्ण विदाई "अभी-अभी किस सोच में डूबे हुए थे, सम्राट् ! मैं भी सुनूं ! शायद मन का कुछ वोझ हलका हो जाये।" सम्राट् भारी मन से कह उठे, "देश की हालत देखकर कभी- कभी मन उचट जाता है। दिल करता है, संन्यास लेकर भिक्षु बन जाऊं।" "यह तो अकर्मण्यता होगी सम्राट, आप जैसे मेधावी पुरुप के लिए !" ह्वेनसांग ने अपनी नुकीली दाढी में उँगलियाँ फेरते हुए कहा । "जिसके सिरपर ताज, उसके सिर में खाज । डर कर आप कर्तव्यों से छुटकारा नहीं पा सकते । भागो नही, दुनिया को बदलो । तभी ससार का उद्धार होगा।" सम्राट ने कहा, "भिक्षुवर! मुझे सोच तो केवल इस बात का है कि आये दिन लूटमार और डाकेजनी की घटनाएँ राज्य मैं बढ़ती जा रही हैं। जनता पर आतक छा गया है । समझ में नहीं आता, क्या किया जाये।" ह्वेनसांग ने कहा, "इसमें घबराने की कोई बात नहीं, सम्राट् ! आप मंत्रिमंडल में परिवर्तन कीजिये। जिसके जिम्मे जनता के जान-माल की रक्षा का काम है, उसे तुरंत पद से हटा कर अपना विश्वासपात्र आदमी नियुक्त कीजिए ।" फिर उन्होंने अपने साथ हुई डाकुओं से मुलाकात की चर्चा की। उसे सुनकर सम्राट् को विश्वास हो गया कि प्रेम और अहिंसा से इस संकट पर भी विजय पाई जा सकती है। जो भी हो, ह्वेनसांग अपनी भारत यात्रा से प्रसन्न था। वह भारत के हर राज्य में घूम चुका था। तभी ह्वेनसांग से वातों ही बातों में सम्राट हर्षवर्द्धन ने कहा, "भिक्षुवर! आप चीन देश के रहने वाले हैं। आप ही अपने देश के राजा से मेरे मित्रता के सम्बन्ध कायम करा दें।"
सम्राट हर्प हूँ ह्वेनसांग ने प्रसन्न होकर कहा ! “सम्राट आप चिन्ता न करें । चीन के सम्राट् आप जैसे सुशोल हैं। वे भी आप के समान शान्ति-प्रिय और अहिंसा-प्रेमो हैं। आपको मित्रता वे अवश्य स्वीकार करेंगे । मैं अब जल्दी ही अपने देश जाने वाला । वहाँ पहुँच कर आपका सब काम ठीक करा दूंगा।" सम्राट हर्प सुन कर चौंक पड़े। ह्वेनसांग के चीन वापस जाने की बात से उनका मन दुःखी हो गया। वे दुःख भरे स्वर में ह्वेनसांग से बोले, "भिक्षुवर ! आपका प्रेम मुझे मिला । वह अव छिन जायेगा, ऐसा मैं नहीं सोचता था । आपसे मैंने अनेक वातें सीखीं। मुझे आपकी सलाह से रास्ता मिला; उपदेशों से वल मिला, साहस मिला, शान्ति मिली । अब मैं आपको यहाँ से जाने न हूँगा। आप यहीं रहेंगे, मेरे पास।" "हाँ, भिक्षुवर! आप नहीं जायेंगे, यहीं कन्नौज में रहेंगे। हमारा मार्गदर्शन करेंगे।" पीछे से राज्यश्री ने, जो कि चुपचाप खड़ी होकर दोनों का वार्तालाप सुन रही थो, सहसा आगे आते हुए कहा। राज्यश्री को सामने देख सम्राट् हर्पवर्द्धन चौंक कर बोले, "वहन तुम यहाँ कैसे ? तुम तो अनुप्रिया गई थीं न ? वहाँ से प्रयाग भी जाने वाली थी। फिर इतनी जल्दी लौट भी आई ?" "नहीं भैया, मेरा अनुप्रिया जाना न हो सका । केवल प्रयाग से ही लौट आई हूँ। मेले की तैयारी आरम्भ हो चुकी है। भिक्षुवर भी हमारे साथ मेले में जायेंगे । ठीक है न भैया!" सम्राट हर्षवर्द्धन कह उठे, “हाँ-हाँ विल्कुल ठीक ! भिक्षुवर हमें छोड़ कर कहीं नहीं जायेंगे । नहीं तो मैं भी यहाँ न ? रहूँगा।"
मयुपूर्ण विदाई १०७ "सम्राट् आप दुःखित न हों, मैं अभी जा ही कहाँ रहा हूँ ! अच्छा यह तो वतायें कि आप इस बार प्रयाग के मेले में क्या नई बात करने जा रहे हैं ?" भिक्षु द्वेनसांग नै सम्राट् हर्ष- वर्द्धन मे पूजा राज्यथी वोली, "अब की बार मेला अन्य वर्षों की अपेक्षा काफी बड़े परिमाण में होगा। इस मेले के लिए भैया भी कुछ निर्णय कर चुके हैं।" वह धीरे से मुस्कराई। "कसा निर्णय ?" ह्वेनसाग ने आश्चर्य मे पूछा। "भिक्षुवर ! प्रयाग में होने वाला मेला इस बार पहले मैलों में भिन्न होगा। इस मेले में मैं अपना सब कुछ दान करूंगा। वहन राज्यश्री के सामने को हुई प्रतिज्ञा के असार संन्यासो वनूगा । लेकिन आप तो जा रहे हैं। आप ही बताइये किसके साय काटूगा संन्यास के वे दिन?" कहते-कहते सम्राट् का गला भर आया और वे चुप हो रहे । ह्वेनसांग ने उन्हें धीरज देकर कहा, "सम्राट् ! मैं आपके साथ रहूंगा । आप चिन्त न करें। युद्ध पर होने वाले भारो खर्च को आप इस बार भूखी-नंगो जनता में बाँट दें। सारे संसार के मामने यह एक नया काम होगा। इससे हो मनुष्य को सच्चो मेवा होगी। यह भारत के लिये गर्व करने की बात है। इससे अधिक प्रसन्नता को वात और क्या हो सकती है ?" "युद्धों और सेना पर होने वाला अपार व्यय यदि मानव जाति की सेवा और उन्नति पर किया जाये तो धरती स्वर्ग वन जाये । देवताओं का निवास स्थान यही हो । स्वर्ग के सुख की मद भूल जायें, भिक्षुवर !" सम्राट हर्षवर्धन ने गम्भीर होते हुए कहा। ।
१०८
सम्राट हर्ष
।
सुन कर ह्वेनसांग गद्गद् हो गये। फिर बोले, "मैं जल्दी
ही लौट आऊँगा। प्रयाग के मेले में अवश्य उपस्थित होऊँगा।
इसलिए कल ही चला जाऊँगा, ताकि जल्दी वापस आ सकू।"
और दूसरे ही दिन भिक्षुवर चीन देश जाने के लिये तैयार
हो गये। सम्राट हर्प ने अश्रुपूर्ण नेत्रों से गले मिल कर उन्हें
विदा दी और उनसे जल्दी ही लौट आने का वचन लिया।
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सम्राट् हर्ष
।
को भी दान में देने लगे। सम्राट अपने वहुमूल्य गहने, राजसी
पोशाक आदि सब-कुछ दान कर चुके थे। उनके शरीर पर अव
केवल एक वस्त्र शेप रह गया. था, इसलिए इस प्रकार के दान
बन्द करने की घोषणा की जा चुकी थी। इतने में एक भिखा-
रिन जो अधनंगी थी, आयी और वस्त्र की भीख मांगने लगी।
सम्राट् के खजांची ने उसको फटकारते हुए कहा,"चल हट यहाँ
से ! अब कोई दान-बान नहीं मिलेगा। महाराज के पास देने
के लिए अव कुछ नहीं रहा। वे सव-कुछ दे चुके हैं। तू अव सोते
से जागी है ! पहले आने को क्या हो गया था?
भिखारिन आँखें नीची करके वोली, "मुझे पता ही अभी
यहाँ आने पर लगा है। अगर पहले पता होता तो अब तक ले
भी जाती। पेट में कई दिन से अन्न नहीं है। अगर दिला दो तो
कृपा होगी। मन आपको लाख दुआएँ देगा।"
खजांची कड़क कर वोला, "जाती है या संतरी से धक्के
मार कर निकलवा हूँ ! बड़ी आई दुआ देने वाली। चल भाग
यहां से ?"
सहसा हर्पवर्द्धन के कानों में फटकारने की आवाज़ पड़ी।
उन्होंने खजांची से कहा, "भिखारिन को आने दो। उसे
कुछ न
कहो।"
भिखारिन सकुचाते हुए आई । उसका सारा शरीर भूख के
मारे कमजोर पड़ गया था। शरीर पर फटे चिथड़े लदे होने के
कारण उसका बुरा हाल था। सम्राट् ने उसे देखा और पसीज
कर कहा, "पगली तू कहाँ थी? तूने तो, मालूम होता है कई
दिन से भोजन भी नहीं किया है। अव सव दान वन्द हो चुका
है। तू तब से न जाने कहाँ थी? खैर, ले यह मेरा वस्त्र और
जाकर अपना तन ढक। "
.
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११२
सम्राट हर्ष
इतना कह कर सम्राट हर्षवर्द्धन ने राज्यश्री से एक पुराना
वस्त्र भिक्षा में मांग कर स्वयं पहना और भिखारिन को अपना
वस्त्र दान कर दिया। भिखारिन दुआ देती हुई जाने लगी, तभी
सम्राट
ने उसे रोक कर कहा, "जरा ठहर, खाने के लिए भी
कुछ लेती जा।"
उन्होंने अपने लिये थोड़े से मीठे चावल रखे थे, वह सारे के के
सारे तश्तरी समेत उसके सामने रख कर वोले, "इनसे कुछ देर
के लिए पेट की आग शान्त हो जायेगी। इसी से सन्तोप कर
ले। यही सबसे बड़ा धन है। इसके अलावा मेरे पास देने के
लिए कुछ भी नहीं बचा।"
भिखारिन खुशी-खुशी चली गई। उसके जाने के बाद सम्राट
हर्पवर्द्धन ने राज्यश्री से कहा, "वहन ! यह संसार है। यहाँ का
तमाशा देखा कितना विचित्र है ? मनुष्य की कीमत घटती जा
रही है और धन ही सब-कुछ हो गया है। इनसानियत को कोई
नहीं पूछता।"
"हाँ, भैया ! इसीलिये संसार को विचित्रता को खान कहा
गया है।" राज्यश्री ने गम्भीर होकर कहा।
सम्राट् हर्प वोले, "वहन, आज मेरी प्रतिज्ञा पूरी हुई।
संसार से भी मुझे कोई मोह नहीं रह गया है । आओ हम दोन
चलकर वौद्ध धर्म स्वीकार कर लें।"
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दुस्द का दान UMAN wiliwrir wwww परों के पास गिरा। वार खाली गया था ! सम्राट् बालवान बच गए थे। वह कटार देखते ही हन कर के। तुरन्त अपना सोना खोल कर खड़े हो गए और कह उठे, "गयु के लिए बाज यह शरीर भो दान है। जिसको भी मुझ से दुश्मनी है, वह हिम्मत से आगे बढ़कर कटार से मेरे प्राण ले ले। मैं कुछ न हूँगा।" सत्राद यह सब कह ही रहे थे कि उनके चारों ओर ती भीड़ में एक शोर सुनाई पड़ा। सभी ने देखा किसेनापति भल्डि और सिंहनाद एक तिलकधारी ब्राह्मण को पकड़े हुए चले जा रहे हैं। दोनों सेनापतियों ने उस ब्राह्मण को सम्राट् के चरणों में लाकर डाल दिया और उत्साह के साथ कहा, “महाराज!यही वह आदमी है, जिसने मेले में आग लगवाने और आपकी जान लेने की कोशिश की है।" सम्राट् में अपराधी को देखा और अपराधी ने झुके सिर से सम्राट् को। इसी बीच में ह्वेनसांग ने कहा, "सम्राइ, यह वैचारा नासमझ मालूम पड़ता है । इसे भी आज क्षमा । दान मिले।" राज्यश्री ने ह्वेनसांग की बात का समर्थन किया। सम्राट ने कुछ बोलने से पहले बड़ी भीड़ की ओर देखा। कहीं भी उन्हें ह्वेनसांग की वात का विरोध नजर नहीं जाया । उन्होंने अपराधी को क्षमा प्रदान करते हुए कहा, “जाओ, आज सर्वस्व दान के इम पुणे अवसर पर तुझे भी क्षमा करता हूँ। फिर ऐसा काम न करना।" अपराधी छोड़ दिया गया और वह तुरन्त भीड़ में खो गया। भीड़ ने उनाद हर्षवर्द्धन के इन न्याय पर प्रसन्नता प्रकट की।
7 + सर्वस्व का दान इसी अवसर पर राज्यश्री ने कहा, "भैया आप अभी सिंहा- सन न छोड़ें। देश को अभी आपके नेतृत्व की जरूरत है। उसकी हालत में सुधार होने पर ही आप भिक्षु बनने का विचार करें।" उपस्थित जन-समूह ने भी सम्राट् से यही कहा । यात्री ह्वेनसांग ने भी प्रसन्न होकर इसी बात को दोहराया । अन्त मैं सम्राट हर्षवर्धन को सब की बात माननी पड़ी। वे मुस्कराते हुए एक ओर चले गए। लोगों ने हर्षध्वनि की-"सम्राट् हर्प- वद्धन की जय ! दानवीर की जय !! शान्ति-अहिंसा की जय !!!"
देवदत्त अटल प्रेरणादायक, सुरुचिपूर्ण एवं रोचक साहित्य बाल-उपन्यास १. सोरों का सन्त (यूनेस्को द्वारा पुरस्कृत) रामकृष्ण शर्मा २०० २. हीरे की अंगूठी योगराज थानी २०० ३. माँ की ममता योगराज थानी २०० .४. वटुक वहादुर रामकृष्ण शर्मा २०० ५. चले चन्दा के देश शंकर वाम २०० ६. सम्राट हर्ष शंकर वाम २०० शंकर बाम ७. सम्राट् ललितादित्य २०० ८. भगीरथ की वेटी २०० जीवन-साहित्य १. जय जवान धर्मपाल शास्त्री १५० २. प्रेरक प्रसंग भारत सरकार १.५० ३. जंगल में खुशहाली शंकर वाम द्वारा पुरस्कृत नाचे १.५० ४. हमारे रक्तदीप श्री व्यथित हृदय २०० ५. शहीद जो देवता बन गए I श्री व्यथित हृदय ०० ६. शहीद जो देवता बन गए II श्री व्यथित हृदय २०० ७. बोलते खून की कहानियाँ श्री व्यथित हृदय २०० ८. भारतीय युग निर्माता सत्यपाल गुप्त ३.५० जीवनोपयोगी-साहित्य ६. अणु युग का नया सवेरा डॉ. अरुण रश्मि २.५० १०. खाद्य मोर्चा हम ही जीतेगे आशा रानी वोहरा २५० ११. अपना विकास आप कीजिए श्यामकपूर रामकृष्ण शर्मा