Agarchand Bhairondan Sethiya Jain Parmarthik Sanstha, Bikaner

Sharawak Ka Ahinsha Vrth

Javaheer Lal · 2011/01

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व्याख्यान-सग्रह-सार माला का प्रथम पुण्य श्रावक का अहिखा व्रत. श्रीमजैनाचार्य पूज्य श्री जवाहिरलाल जी महाराज के व्याख्यानों के आधार पर सम्पादक-मुन्नालाल शास्त्री प्रकाशक- श्री साधुमार्गी जैन पूज्य श्री हुक्मीचद जी महाराज की सम्प्रदाय के हितेन्छु श्रावक मंडल रतलाम (मालवा) प्रथमावृत्ति ६००० पौराब्द २४५४ विक्रमान्द १९८५ मूल्य ॥

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वक्तव्य शानं पंच विधं प्रोक्त श्रुतज्ञानं विशेपत प्राणी मान के दुसो का अन्त कर अक्षय मुस देनेवाला एक धर्म ही है। किन्तु धर्माधर्म, हत्याकृत्य की पहचान आप्त पुरुषों क वास्य (उपदेश) द्वारा ही सुगमता पूर्वक हो सकती है, इमा कारण से शास्त्रकारों ने किसी अपेक्षा सर, जल्दी के कारण, प्रूफ सशोधन ठीक तरह न होने से इधर उधर कुछ अशुद्धियें छप गई है, पाठक महाशय कृपया सुधार कर पढ़ें । महत्पुस्पा क. श्रुत्वा धर्म विजानाति, श्रुत्या त्यजति दुमतिम् । श्रुत्ला ज्ञानमवाप्नोति श्रुत्वा मोक्षमवाप्नुयात् ॥ प्रवण करने में ही धम जाना जाना है, श्रवण करने से ही ट्युद्धि हटती है, श्रवण करने पर ही सत्य ज्ञान की प्राप्ति होती है, इसी तरह श्रवण करने से ही मोक्ष प्राप्ति होती है, जिसके समडो उदाहरण शास्त्रों में विद्यमान है। महत्पुरुषों के एए एक वाक्य महान ऋद्धि मिदि का दाता होता है। क्योंकि वे जगत के कल्याण की भावनाओं को.मुख्य रस कर हा ( और प्रसार के कटो व परिमहों को सहन करते हुए एक प्रत से दूमेरे प्रान्त म विचर कर ) उपदेश परमात रहते है । किन्तु आयावर्त का हा बहुत सा विभाग ऐसा है जहाँ देशालानु- सार चारिनकी कठिनाइयों को निभाते हुए नहीं विचार सक्ते ह । उन प्रान्तो में वमनेवाले सजनों को व भावा प्रजा को भी उन महापुरुषा के वाक्य रूप साहित्य २ - का लाभ मिल सके, इस हेतु से कई एक महानुभावों की इन्छा जगत् विरयात महाप्रतापी उप्र चारित्र क्रिया के आराधक वैराग्यपुज श्रीमद् जनाचार्य महारा- जाधिराज श्री श्री १००८ श्री श्रीलालजी महाराज के व्याख्यानों का सग्रह करके एक अच्छा साहित्य तैयार कराने की थी, किन्तु धावकों में इस प्रकार का सगठन बल न होने से यह कार्य किसी ने अपने हाथ में न लिया, अत हम लोग उस प्रभावशाली सारगर्भित साहित्य से वचित ही रह गये । तथापि उन्हां के गादीधर वतमान जैनाचार्य महाराज श्री श्री १००८ श्री जवाहिरलाल जी महाराज साहब की व्याख्यान शैली भी विद्वतायुक्त प्रतिभाशाली असरकार वैसे ही रोचक भी है। इतना ही नहीं, वर्तमान युग की आवश्यकतानुसार समाज को सन्मार्ग दर्शक एव जैन सिद्धान्तों को पुष्टिकारक है । इस तरह श्रोताओं के हृदय में अपूर्व भाव पैदा करती है । सक्षेप में इन महात्मा के वाक्य भी जैन साहित्य की सामी को पूर्ण करने वाले हैं। इस मंडल की स्थापना होने के बाद कितने ही सभासदों की भावना प्रबल होते २ महल की चतुर्थ बैठक ( रतलाम ) के समय प्रस्ताव में रक्सी गई, जिसको विद्यमान सभासदों ने उत्साह सहित अनुमोदन करके प्रस्ताव पास कर दिया। इतना ही नहीं उससे कार्य में परिणित करना व इसके लिये सर्च लगाना भी स्वीकार किया। तदनुसार श्रीमान् के व्याख्यानों का संग्रह स १९८३ के व्यापर चातुर्मास में प स १९८४ के भीनासर के चातुर्मास में, यो दोनो वप में कराया गया और वे व्याख्यान ज्या के त्यों छपवा कर प्रकाशित करने के लिये बहुत से सजनो ने इच्छा दर्शाई थी। इसी तरह ब्यावर मे मडल की बैठक ने प्रस्ताव भी किया या तदनुसार जॉफीस भी प्रमश व्याख्यान छपवा कर प्रसिद्ध करने की तैयारी कर रहा था भिन्तु गत वर्ष भीनासर मे मडल की छठी बैठक हुई थी, उस में व्याख्यानों के विषय में यह ठहराव हुआ कि व्याख्यान सग्रह कराया जाता हे यह भविष्य में भी कराया जाये और पहले जो सग्रह हुआ है व हो रहा है उनका सशो- थन कराया जावै । तैयार होने पर ऑफिस तरफ से प्रसिद्ध किये जाय इत्यादि । तदनुसार दोनों वर्षों के व्याख्यानों का सशोधन काय शुरू कराया। जिस पर से यह प्रतीत हुआ कि व्याख्यान जैसे के तैसे छपवाने में अन्य बहुत बढ जान, कोई २ विषय के मजमून में पुनरोक्ति हो जान, प्रत्येक विषयों का प्रति पादन जुदे२ विभागों में बट जाने से साहित्य की परिपूर्णता म कमी रह जाने, इसी तरह प्रत्येक विभाग भी सड २ वट जान से वाचक को जा आनन्द व असर होना चाहिये नहीं हो सस्ना। एमी ही राय सास २ विद्वान् व प्रतिष्टित सजनों की मिली थी उन व । 'पर से सब व्याख्यानों में से छटणी कराके जिन २ विषयों की पुष्टा में जो २ प्रमण हेतु, उदाहरण प्रवक् . आय है, उनका एक स्थान पर सगठन करा रेना अत्या:- श्यक जान कर, प० मुन्नालाल जी चैद्य सोजत वारों के द्वारा जो साहित्य तयार कराया है, उसमे से यह एक पुष्प आपके समक्ष रसते हैं। यद्यपि ऐमा वरने मे मडल ऑफिस को धन व समय का निशेष व्यय करना पड़ा कि तु पाठको के लाभार्थ प्रत्येक विषय पर एक निबन्ध चनया वर प्रकाशित किया जाने का ही निश्चय किया है। उसमें से यह 'श्रावक का आहंसा नन' नामक पुस्तक पके कर स्मलों में पहुंचाते हैं। आशा है कि वाचक इस साहित्य को अपना कर हार उत्माह को घटावगे और पूर्ण कोरीश द्वारा अपने २ यहाँ ग्राह बना पर उत्ता -साहित्य के प्रचार में अपना भी हक समय लाभ के भागा बनगे। यहाँ यह भी बता देना समयोचित होगा कि व्याख्याना का सग्रह कराने के उक्त साहित्य तैयार कराने में मडल को बहुत राच हुआ ह। वह मर अराहदा रख कर भीनासर कमीटी के ठहराव अनुसार कल कागज व छपाइ आदि राच के लागत के आधार पर ही पुस्तक की किंमत रक्सी है। इसका स्पष्ट उदाहरण पुस्तक की रोचकता, भव्यता ओर विशारता से रवय आपको अनुभव हो जावेगा। विज्ञप्ति उक्त साहित्य म जो • भूल नजर जावे कृपया सचित करे तारि आगामी आवृत्ति में उचित सुधार किया जाये। स्पष्टीकरण साधु महात्माओं की भाषा परिमित होता है, इसालिये व रान मोच ममम कर शास्त्र को दृष्टी म रस र हा उपैदश परमाते हैं। पर नग्राहरू, अनुवादव, सशोधक व सम्पादक महाशयों से भाव उरट हो गये हा अयचा साधु की भाषा से विपरीत वचन लिये गये हो तो यह जुम्मेवारी पूज्य श्री वे उपर नहा हे मितु यह दोप कार्यस्ताओं का समझें। जो . विषय शास्त्र वा दृष्टा मे विरुद्ध मालम दे उसका खुलासा पूज्य श्री में अपना ऑफिम के माय लिया पटा रन से हो सकेगा। इत्यरम भवदीय- बालचद धी श्रीमाल घरमाण पतलिया सेक्रेटरी प्रेसिडेण्ट श्री ध्ये० साधुमार्गी जैन पूज्य श्री हुपमीचदजी महारान की सम्प्रदाय के हितेच्छु श्रावक मडल ऑफिस, रतलाम (मालवा, विषय सूची. 00000 विषय पृष्टांक- H १ जीवन का उपयोग १ २ सब जीव सुख चाहते है .. ३ हिसा किसे कहते हैं २७. ४ हिंसा के कारण ५ हिसा के भेद आर पहले व्रत का सूत्र पाठ से विस्तार . ६ पहले ( अहिंसा) व्रत के अतिचार अतिचारों की विशेष व्यारया ८ हिंसा के कर्म और उनसे बचने का उप य ९ सासारिक कार्य और अहिंसा ८६

॥श्री॥
श्रावक का अहिंसा व्रत।
जीवन का उपयोग।
इ
स बात से कोई इन्कार नहीं कर सकता कि मनुष्य
जन्म बडे पुण्य से मिलता है। जो मनुष्य इस अमूल्य
देह को पाकर भी व्यर्थ की मौज-शौक में इसका अत
कर देता है, उसके बरावर कोई मूर्ख नहीं कहला
सकता। बुद्धिमान् इस देह को पाकर क्षण क्षण में
अपनी श्रेष्ठ साधना का मत्र जपता रहता है पर मूर्व यही समझता है
कि मैंने मनुष्य जन्म पाया है, फिर ऐसा देह नहीं मिलेगा, इसलिये जो
कुछ मौज-शोक करल वही मेरी है।
मित्रों ! यह इस मनुष्य का अज्ञान है कि वह इस प्रकार का
विचार लाता है। वह नहीं समझता कि मैं जिसको मौज-शौक समझ
रहा हू वही मेरे दु ख का कारण होगा। समझे भी कहां से ? समझ
ज्ञान के बिना नहीं आ सकती । असमझ ' ही अज्ञान है और
अज्ञान ही का दूसरा नाम आध्यात्मिक अन्धकार है। अज्ञान के
बराबर मनुष्य के लिये कोई अधकार दुनिया में नहीं है । ससार में
जितने बुरे काम होते हैं, उन सब का कारण अज्ञानता और मन का
तिमिर है । अज्ञानता को दूर करना अधकार में से प्रकाश में आना है।
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। मित्रों! आप लोग बिजली स परिचित हैं। आप जानते हैं कि बिजली पावर हाउस में पैदा होती है। और जिन जिन जगहोंपर इस के तार के साथ ग्लोब लगे रहते हैं, वहा के बटन दबाने से उन जगहोंपर अधकार मिटकर प्रकाश फैल जाता है। ठीक इसी तरह जो लोग आध्यात्मिक अंधकार को मिटाना चाहते हैं, उन्हें सद्गुरु रूपी पावर हाउस से सम्बन्ध जोडना चाहिये। याद रखिये कोरे सम्बन्ध जोड़ने से कुछ नहीं होगा। पावर-हाउस पावर देता है, घर में उस के तार के साथ ग्लोबभी लगा है, पर जबतक बटन नहीं दबामा जाता, प्रकाश नहीं होता। अपने आध्यात्मिक अधकार को र करने के लिये भी मनुष्य को भक्ति-रूपी बटन दबा लेना चाहिये | गुरु में जितनी ताकत होगी उतना प्रकाश देगा। गुरु का चुनाव पहले करना चाहिये। खूब परिक्षा कर देख लेना चाहिये कि जिसको मै अपना गुरु बमाता हू वह वास्तव में गुरु बनने योग्य है या नहीं। आज गुरु बनने के लिये बहुत से वेषधारी मनुष्य ' मुह- धेि रहते हैं, पर परीक्षकों को मालूम होता है कि अधिकांश उनमें 'गुरु' तो क्या पर साथी बनने योग्य भी नहीं होते। भारतवर्ष भावुक देश है । यहा के निवासियों मै , जितना धर्म-प्रेम है, उतना अन्य देश वासियों में नहीं। धर्म-प्रेम ही के कारण 'साधु' नामधारी पर इतना भक्ति-पूर्वक विश्वास करते हैं कि तन मन धन से सेवा करने तैयार रहते है। क्या भारतवर्ष को छोड़कर किसी देश में ५६ लाख साधु " - 2 -- 'नहीं।' क्या आपने कभी यह हिसाब लगाया है कि इन साधुओं का प्रति दिन कितना खर्च भारतर्ष को उठाना पड़ता है ? लोग 'स्वयं भूखों रहते हैं, नगे रहते हैं पर साधुओंके लिये भर पेट अन्न और वन का प्रबन्ध करते हैं । साधुओं को कई बार ऐसे ऐसे माल खानेको मिलते हैं कि कई अभागों ने वैसे भोजन के दर्शनभी नहीं किये होंगे। यदि इस हिसाब से इनका खर्च गिना जाय तब तो कई लाख रुपये होते है पर आप इस हिसाव से नहीं, साधारण से साधारण खुराक प्रति मनुष्य चार आने के हिसाब से भी जोडेंगे तब भी प्रतिदिन १४ लाख, प्रति मास ४ करोड २० लाख, और प्रति वर्ष ५० करोड १० लाख रुपैये का सर्च होता है। लोगोंने इतना बडा खर्च अपने सिर क्यों उठा रक्खा है ? इस लिये कि हमारे में रहा हुआ जो अधकार है वह दूर हो जाय । उद्देश्य कितना पवित्र और कितना उच्च है। पर क्या आज यह उद्देश्य सफल होता है । क्या इस भावुकता में वही उबता रही हुई है ? नहीं।' क्यों. इस लिये कि सच्चे गुरु नहीं।' कई गुरु कहलानेवाले ऐसे हैं कि जिनका गाजा और भग के बिना कुछ काम नहीं चलता, चडस के बिना जिनकी आखें चढी रहती है, और दम लगाये बिना तो मानों उन का दम ही निकला जा रहा है। मित्रों ! आप ऐसोंको अपना गुरु न चुनिये। और ऐसों को भी म चुनिये, जो गुप्त और आश्चर्पयुक्त आध्यात्मिक ज्ञान रखते हुए भी कई धार असावधानी से चिडचिडेपन, खेद, मूर्खता या किसी प्रकार के दुर्व्यसन का आखेट बन जाते हैं। परन्तु ऐसे को चुनिये, जो अपने रोप-शुन्यता, दृढ़ता, शान्ति और असीम धैर्य के द्वारा दिखाता है। महत्व को साहस, , .

. मित्रों! आप लोग बिजली स परिचित है। आप जानते हैं कि बिजली पावर-हाउस में पैदा होती है। और जिन जिन जगहोंपर इस के तार के साथ ग्लोब लगे रहते हैं, यहा के वठन दवाने से उन जगहोंपर अधकार मिटकर प्रकाश फैल जाता है। ठीक इसी तरह जो लोग आध्यात्मिक अंधकार को मिटाना चाहते हैं, उन्हें सद्गुरु रूपी पार हाउस से सम्बन्ध जोडना चाहिये । याद रखिये कोरे सम्बन्ध जोड़ने से कुछ नहीं होगा। पावर-हाउस पावर देता है, घर में उस के तार के साथ ग्लोबभी लगा है, पर जबतक बटन नहीं दबाया जाता, प्रकाश नहीं होता। अपने आध्यात्मिक अधकार को र करने के लिये भी मनुष्य को भक्ति-रूपी बटन दबा लेना चाहिये । गुरु में जितनी ताकत होगी उतना प्रकाश देगा। गुरु का चुनाव, पहले करना चाहिये । खूब परिक्षा कर देख लेना चाहिये कि जिसको मैं अपना गुरु बनाता हू वह वास्तव में गुरु बनने योग्य है या नहीं। आज गुरु बनने के लिये बहुत से वेषधारी मनुष्य मुंह- वि रहते हैं, पर परीक्षकों को मालूम होता है कि अधिकांश उनमें 'गुरु' तो क्या पर साथी बनने योग्य भी नहीं होते। -भारतवर्ष भावुक देश है । यहा के निवासियों में जितना धर्म-प्रेम है, उतना अन्य देश वासियों में नहीं। धर्म-प्रेम ही के कारण' साधु नामधारी पर इतना भक्ति-पूर्वक विश्वास करते हैं कि तन मन धन से सेवा करने तैयार रहते है। क्या भारतवर्ष को छोडकर किसी देश में ५६ लाख साधु नहीं।' म्या आपने कभी यह हिसाब लगाया है कि इन साधुओं का प्रति दिन कितना खर्च भारतवर्ष को उठाना पडता है ! "लोग स्वय भूखों - 2 ३ रहते हैं, नगे रहते हैं पर साधुओंके लिये भर पेट अन्न और वस्त्र का प्रबन्ध करते हैं । साधुओं को कई बार ऐसे ऐसे माल खानेको मिलते है कि कई अभागों ने वैसे भोजन के दर्शनभी नहीं किये होंगे। यदि इस हिसाब से इनका खर्च गिना जाय तब तो कई लाख रुपैये होते हैं पर आप इस हिसाब से नहीं, साधारण से साधारण खुराक प्रति मनुष्य चार आने के हिसाब से भी जोडेंगे तब भी प्रतिदिन १४ लाख, प्रति मास ४ करोड २० लाख, और प्रति वर्ष ५० करोड ४० लाख रुपैये का खर्च होता है !! लोगोंने इतना बड़ा खर्च अपने सिर क्यों उठा रक्खा है ? इस लिये कि हमारे में रहा हुआ जो अधकार है वह दूर हो जाय | उद्देश्य कितना पवित्र और कितना उच्च है ! पर क्या आज यह उद्देश्य सफल होता है । क्या इस भावुकता में वही उबता रही हुई है ? नहीं।' क्यों। इस लिये कि सच्चे गुरु नहीं ।' कई गुरु कहलानेवाले ऐसे हैं कि जिनका गाजा और भग के बिना कुछ काम नहीं चलता, चडस के बिना जिनकी आखें चढी रहती हैं, और दम लगाये बिना तो मानों उन का दम ही निकला जा रहा है। मित्रों ! आप ऐसोको अपना गुरु न चुनिये । और ऐसों को भी म चुनिये, जो गुप्त और आभयुक्त आध्यामिक ज्ञान रखते हुए भी कई धार असावधानी से चिडचिडेपन, खद, मूर्खता या किसी प्रकार के दुर्व्यसन का आखेट बन जाते है। परन्तु ऐसे को धुनिये, जो अपने महत्व को साहस, रोप-शुन्यता, दृढ़ता, शान्ति और असीम धैर्य के द्वारा दिखाता है। , CC . । - यदि आपको ऐसे गुरु न मिले तो गुरु बिना रह जाओ पर अन- धिकारी को गुरु मत बनाओ। जो अनधिकारी को गुरु बना लेता है, उसे दिखनेवाली इस छोटीसी भूल के बदले महा पश्चात्ताप तथा अनन्त जन्म मरणका दुख भोगना पडता है। भाइयो ! जैन साधुको शास्त्रकी भाषामें श्रमण' कहा है। और उसके उपासक को 'श्रमणोपासक' कोई प्रान कर सकता है कि उपासकको 'श्रमणोपासक' क्यों कहा ? 'अरिह तोपासक' क्यों नहीं कहा ? इसका उत्तर यह है कि 'श्रमणोपासक' कहने से अरिहन्तोंका भी समावेश हो जाता है पर केवल 'अरिहन्तोपासक' कहनेसे अमणो का उपासक नहीं हो सकता। इसमें एक और भी बात है वह यह कि तीर्थकर समय विषेशमें भवतार लेते है अतएव उनके जमानेमें जो होते हैं वे ही लाभ उठा सकते हैं । पर श्रमण तो जब तक प्रभु का गासन चलता है तब तक रहते है इस- लिये उनको श्रमणों के दर्शन होते रहते है । पर अरिहन्तों के नहीं । श्रमणोपासक को शास्त्र में द्विजन्मा' और 'श्रावक ' भी कहा है । क्यों कि सूत्र में, व्रतधारी श्रावक होते ही उसके लिये पाठ कहा गया है कि-' श्रमणोवासए जाया' अर्थात् श्रावक का जन्म हुआ। श्रमणोपासक का अर्थ आप समझ गये होगे और श्रावक का अर्थ शास्त्र सुननेवाला यह भी आप समझते होंगे। पर 'द्विजन्मा' शब्द का अर्थ आपके समझने योग्य है । कोपों में और अय शास्त्रों में 'द्विजन्मा' गर के कई अर्थ मिलते हैं। जैसे-त्राम्हण, पक्षी, साधु, श्रावक आदि । ब्राह्मण का नाम द्विजन्मा तब पडता है जब कि उसका उपनयन (यज्ञोपवित) सस्कार हो जाता है । यज्ञोपवित (जनोई) लेने के बाद, वह ससार को माया जाल से दूर होकर तत्व-विचार आदि में लीन हो जाता था .

अर्थात् अपने पूर्व जीवन से बहुत भिन्नता कर लेना था, इसी लिये उसे (ब्राह्मणको) 'द्विजन्मा ' याने दूसरा जन्न धारण करनेवाला कहा है।' पक्षी को द्विजमा' क्यों कहा ? इसका मतलब यह है कि पक्षी शुरूमें एक अडे के रूपमें होता है । न सके हाथ पैर होते है और न उसके पख आदि सिर्फ तरल पदार्थ के रूपमें अडे में रहता है । कालान्तर में वह अडा झटकर उसमें से पख आदि धारण किया हुआ पक्षी निकलता है। वह पक्षी पहले किस रूपमें था और बाद में किस रूपमें आगया अर्थात् उसने अपने जीवन काल में कैसा महान् अन्तर फर दिया, इसी लिये उसे भी 'द्विजन्मा' कहा है। साधु के लिये यही बात समझनी चाहिये । साधु पहले गृहस्थ था। अब उसने साधु व्रत ले लिया, अपने जीवन में महान् अन्तर कर दिया इसलिये साधुको भी द्विजन्मा कहा है। यानी ' अणगार जाए' साधुका जन्म हुआ। श्रापक द्विज मा क्यों कहा गया अब यह बात शायद आप समझ गये होंगे । श्रावक भी अपने जीवन में महान् अतर कर देता है इसलिये यह भी द्विज मा कहलाता है। कई भाई सोचते होंगे कि हमने प्रावक के घर में जन्म लिया है इसलिये हम ' श्रावक' ही है । या ब्राह्मण के घर जन्म लिया है, इसलिये हम ' ब्राह्मण' ही हैं । अत हम भी 'द्विजन्मा' कहलानेके अधिकारी हैं। पर ऐमा नहीं है । यह खयाल करना भी गलत है। " कारण ?" , कारण यही कि जैसे मयूर, हस, धगुला आदि प्राणियोंके अण्डो को हम मयूर, हस, बगुला नहीं कह सकते । चे इन पक्षियोंके अंडे हैं, यह हम मानते है, पर ये वे पक्षीही है, ऐसा नहीं मानते । हा, काला- न्तर में जब ये फुटकर पक्षीरूप धारण कर लेंगे तब यथा नाम कहे जा सकेंगे और तभी ये 'द्विजन्मा' कहलाने के अधिकारी समझे जायेंगे । इसी प्रकार श्रावक या ब्राह्मणके घर जन्म ले लिया, यह तो हुआ उन पक्षियोंकी तरह अडे के रूप आना, पर जब श्रावक-सुत श्रावक व्रत धारण कर लेता है और ब्राह्मण पुत्र का उपनयन संस्कार होता है तभी वे क्रमश श्रावक या ब्राह्मण कहलाते हैं और तभी द्विजन्मा कहलाने के लिये अधिकारी माने जाते हैं। जो श्रावक-तत्वसे अज्ञात है, मिथ्या बोलता है, दुराचरणौका सेवन करता है वह 'द्विजन्मा' नहीं है। इसी प्रकार जो ब्राह्मण ब्रह्मचर्य आदि गोसे रहित है, ससारकी माया जाल से दूर नहीं है, यह भी 'द्विजन्मा' नहीं है। जैन शास्त्रने 'द्विजन्मा।श्रमणापासक' या ' श्रावक' बनने में, हरेक मनुष्य के लिये उदारता पूर्वक द्वार खोले हैं। जब आप शास्त्र खोलकर देखेंगे, तो पता लगेगा उन से उच्च वर्ण से लेकर शुद्र तक जैन श्रावक तो क्या पर साधु तक बने हैं। जो शास्त्र धर्म पालनके लिये इस प्रकारका हरेक मनुष्यको समाना- धिकार नहीं देता यह शास्त्र कहलाने योग्य नहीं कहा जा सकता। धैसे तो ससारमें 'शास्त्र' नामकी यहुतसी पुस्तकें हैं। वैधक शास्त्र शास्त्र' कहलाता है, कोटॉकी' कानूनकी पुस्तक यानी 'धारा शास्त्र' भी 'शास्त्र' कहलाता है पर मैने जो 'शान' शव का नाम लिया है, यह इनसे बिलकुल भिन्न है। ये शास्त्र शरीरसे सम्बन्ध रखनेवाले शरीर का ही भला चाहनेवाले हैं इसलिये ये लौकिक शास्त्र है, पर जिसके द्वारा शारीरिक ममत्व छुटे आत्माके अन्वेशण में सहायता मिले, आत्मा से परमात्मा बननेका जिमसे ज्ञान प्राप्त हो और इन्हीं . -- ७ - बातोंके साथ इन्ही सम्बन्ध में जगतके साहित्य का विचार आगे, उसे शास्त्रकार 'शास्त्र' कहते हैं। शास्त्रों के अगाध विचारोंका हम वर्णन नहीं कर सकते | हमारी जिहा थक जाती है । वैदिक ग्रन्थोंमें इसी भावको व्यक्त करनेके लिये 'नेति नेति' शब्द मिलता है। प्रिय मित्रों ! जिस शास्त्र का मैने उल्लेख किया है क्या यह मास्त्र क्या यह उदार शास्त्र किसी व्यक्ति विशेष के साथ पक्षपात करेगा? क्या वह कभी कहेगा कि धर्म पालनेका अधिकार अमुक अमुक व्यक्ति को है ? क्या वह कहेगा कि धर्म पालनेका अधिकारी अमुक ही हो सक्ता है और अमुकोंके लिये अनधिकार चेष्टा है ? 'नहीं, कभी नहीं।' पैर में सोना हरेक नहीं पहन सकता । जिसके ऊपर राजाकी महरबानी होती है. वही पहनता है। इसका मतलन यह हुआ कि सोना महरवानी की चीज है। इसका उपयोग हरेक नहीं कर सकता। धर्म महरवानीकी चीज नहीं । जो धर्म किसी का पक्षपात नहीं करता वही धर्म 'धर्म' है और वही राष्ट्रीय व विश्वमै कहलाने योग्य है। कई भाई सोचते हैं कि धर्मकी आराधना अमुक व्यक्ति विपेश व साधु ही कर सके हैं, हरेक नहीं, यह विचार विना जडका है। धर्मका इतना सकुचित अर्थ नहीं है । धर्म में ऐसी मात्रा नहीं है कि उपया उपयोग थोडे व्यक्ति ही कर सकें और जगत मात्र उससे वचित रहे । अगर धर्ममें इतनी सकुचित मात्रा ही होती तो धर्मके फैलाने वाले अन- तारोको लेगईघर, परमेश्वर, प्रभु के नाम से क्यों पुकारते है धर्म खास व्यक्तियों के लिए नहीं पर सारे संसार के लिये है। .

जिस प्रकार कुदरतकी चीजोंको उपयोगमें लाने का सबको हक है उसी प्रकार धर्मको पालनमें सबका हक बराबर है। सूर्य किसी खास व्यक्ति के घर प्रकाश नहीं करता पर सारे जगत को प्रकाश देता है। जल किमी खास व्यक्तिकी तृषाको नहीं बुझाता पर पानवाले सब प्राणियों को बुझाता है । वायु, कुछ प्राणियोंके लिये ही जीवन दाता नहीं चरन सब प्राणियों के लिये है। अग्नि केवल राजा के ही पकानोंके बनाने में काममें नहीं आती पर सर्व साधारण उसका उपयोग कर अपने अपने उपयोगकी वस्तुए बना सकते हैं। मित्रों ! यदि सूर्यमें उपरोक्त गुण न हो, जलमें ऊपर कही हुई शक्ति न हो, वायुमें बतलाई हुई विशेषता न हो, अग्नि पक्षपात रखती हो तो क्या कोई उन्हे, सूर्य, जल, वायु, अग्नि आदि के नाम से पुकारेंगे? - 'नहीं। " इसी प्रकार धर्म सबके काममें आनेकी वस्तु है। जो धर्म कुछ व्यक्तियों के काममें आवे और कुछ न आवे वह अपूर्ण है। कुदरत की सव वस्तुओंपर सर्व साधारण का हक है, हरेक को अधि- कार है कि वह उन चीजोंको काममें लावे । यदि उन वस्तुओंसे किसी को कुछ हानि पहुचे तो यह दोप उस वस्तुका नहीं है, . वस्तु तो गुण वाली ही है । पर उसमे जो अवगुण हुआ है वह उस उपयोग करनेवालेकी प्रकृति के अनुसार नहीं थी, इसलिये हुआ | सूर्य सबको रोपनी देनेवाला है पर ससारमें कितनेही प्राणियों के लिये यह रोपनी अधकार पैदा करनेवाली सी हो जाती है। जैसे-उल्लू जिमगादर आदि को सूर्य के प्रमाश में दिखाई नहीं देता। इनको रात्रिमेंही दिखता है। इन प्राणियोंको दिखाई नहीं देता यह दोष सूर्यका नहीं, पर इनकी प्रकृति का है। .

- कुदरतकी वस्तु सबको फायदा पहुंचाती है, चाहे उसका उपयोग राजा करे, ब्राह्मण करे, चाडाल करे, साधु करे, सबके लिये वह एका रूप है। किसीका भेद भाव नहीं करती। वर्मभा ऐसी ही वस्तु है। कई भाई धर्मको एक 'हो आ' ममरते है। वे समझते है कि धर्म एक भयकर इतकी बीमारी है। जो इसका स्पर्श करता है, उसका सन नाश हुए बिना नहीं रहता । ससार में आज जो विश्रृखलता फेल हुँई नजर आती है, वे समझते है कि इसके फैलानेमें 'धर्म' नामको वस्तुका जबरदस्त हाथ है। मैने पनोंमें ऐसे लेख देखे है, लोग इसी विश्वास के कारण 'ईश्वर' और 'धर्म' नामकी वस्तुका अस्तित्व दुनियामेही उठाने के लिये कमर कस रहे हैं। वे समझते है कि 'ईश्वर' और धर्म · जितने जल्दी दुनियाके पर्देसे उठ जाय उतनाही तली मानर समाजका भला होगा। जिन युक्तियों के आधार पर इन भाइयोंने 'ईश्वर' और 'धर्म' को अर्थ चन्द्राकार देने का लिखा है, वे युक्तिये इतनी पोची और सार हीन है कि सिर्फ धर्म की व्याख्या जाननेवाला बालक भी उनका खडन सहल से कर सकता है। मिनों ! वर्म यदि छूत की बिमारी की तरह होता, उसका फल दुनिया में दुःख फैलाने वाला, सुव्यवस्था में हस्तक्षेप करनेवाला मालूम होता तो तीर्थंकर भरतार और महापुरुष इसकी जड मजबूत करने के लिये क्या इतना उद्योग करते ? जिन भाईयोंने शास्त्रों का कुछ भी मनन किया है, वे जानते हैं कि धर्म परलोक में सुख देने वाला ही नहीं पर इहलोक में भी कल्याणकारी है। * + एलोप परलोए हिआए सोहाए खम्माए निसेस्साए अणुगाभियत्ताए मध्य।

. धर्म की जसी सुन्दर व्याख्या जैन शास्त्र बतला रहा है, वैसा ही कणाद न्यायगास्त्र में भी बतलाया है।* जिस 'धर्म' शब्द की इतनी सुन्दर व्याख्या है भला क्या वह त्यागने योग्य माना जा सकता है ? जिन दिनो मानव समाज में वर्म का आदर था, उन दिनों यह आनन्द से अठखेलिया करती थी। पर जब से उसके प्रति उदासीन रहना आरम्भ किया तभीसे घोर हाहाकार और चारों तरफ से करुणापूर्ण चित्कार सुनाई देती है। धर्म पालन के दो मार्ग है। एक गार्हस्थ्यरूपसे और दूसरा अण- गार रूप से । गृहस्थावस्था में रहकर जो धर्म पालन करता है, वह श्रावक' कहलाता है और घरबार त्याग कर जो धर्म आराधना करता है वह कहलाता है-'साधु। मित्रो। साधु के आचार विचार क्या होते हैं, फिर कभी मौका हुआ तो बतलाऊगा | अभी आप लोगोंको श्रावक के कर्तव्य क्या होते है, बतलाना चाहता हू। यह बात तो मैंने पहले ही प्रगट कर दी थी कि श्रावका हरेक जातिका बन सकता है। इसके लिये शास्त्र यह नहीं कहता कि अमुक जातिमाला ही हो। श्रावक के दो भेद होते हैं। एक 'समकिती-श्रावक , और दूसरा 'ती-श्रावक'। समकिती-श्रावक उसे कहते हैं, जो देव 'अरिहन्त', गुरु निर्मन्य', और धर्म 'अरिहन्त भाषित '. पर आस्ता रखता है। यतोम्युटय निश्रेयस सिद्धि स धर्म । - .

. । प्रती-श्रावक वह कहलाता है, जो उपर कही हुई बातों के मानने के साथ साथ श्रापक के टिये जो जो व्रत बतलाये गये हैं, उनका यया शक्ति पालन करनेवाला हो। मित्रों । बारह व्रतवारी श्रानकों की अपेक्षा आज सामान्य व अपूर्ण प्रतधारी श्रावक ज्यादा देखने में आते हैं। आप लोगा में ज्यादा तर किंचित व्रतधारी श्रापक ही है । इसका कारण हमे तो यही माइम होता है कि आप लोग १२ तवारी श्रारक बनने में कठिनता का अनुभव करते हैं । आप समझते है कि ती श्रावक बनना बहुत मुश्किल है । १२ बनधारी नती-श्रावक बनने पर ससार का हम कुछ भी काम नहीं कर सकते । १२ व्रतधारी-श्रावक बनने पर हमको दुनिया के सब कामों से अलग रहना पटेगा । हमें हमारी सुख-समृद्धि से वचित रहना पडेगा । और हमें उनसे भी दूर रहना पडेगा, जिन बन्धुओं को और स्त्री पुत्रों को हम बहुत ही प्यार करते हैं। मित्रों ! नती श्रावक बनने में आप जिन जिन कठिनाइयों का अनु- मान करते है, विश्वास रखिये ने कठिनाइये इसमे नहीं हैं। इस बात को तो आप गूब जानते होगे कि 'आन द' 'कामदेव' आदि बडे बडे ऋद्विशाली पुरुष प्रती धारक थे और चेटक उदायण आदि बडे बडे राजा भी। आप अपनी ऋद्धि आर वृद्धिके साथ सुखसे इनके द्भिः वृद्धि सुखके साथ तुलना कीजिये । जब इतने बडे २ पुरुपमी व्रती शावक हो सकते हैं तब भला सोचिये तो सही आप क्यों नहीं हो सकते । वगालमें चैतन्य प्रभु नामके एक प्रसिद्ध मक्त हो गये हैं। उन्होंने बहुत से ऐसे देवी भक्तों को जो पशु बलिदान के पक्षपाती थे अहिंसक बनाया उनके उपदेशका असर बगाल पर इतना पडा कि वहा के बहुत से मनुष्य उनके मत के अनुयायी बन गये। इनके शिष्यों कई करोडपति भी ये । चैतन्य प्रभु गरीबों और अमीरों में कोई भेद नहीं रखते थे। उनके गरीव शिष्य जिस प्रकार भिक्षा मागने जाया करते उसी प्रकार ये धनवान करोडपति शिष्यों को भी यही काम सौपते थे। इनके शिष्य केवल रोटीकी ही भिक्षा नहीं मांगते पर मित्रों परमेश्वरका नामलो' यह भिक्षा भी मागते ये। जिस समय लोग करोडपतियों के बच्चों को साधु वेगमें देखते उनका ह्रदय प्रेमसे उमड पडता और शक्ति से विशेष वस्तु द्वारा भी इनका आदरसत्कार कर अपना अहोभाग्य मानते थे । जब इनको कोई स्त्री पुस्प मिक्षा देने तयार होते तब कहते कि मुझे इस भिक्षाकी जरुरत नहीं है अतरात्मा जिससे तृप्त हो, ऐसी ईश्वर के स्मरण रूपी मिक्षा दीजिये । चैतन्य प्रभु एक बार दक्षिणमें गये । एक दिन उन्होंने गीता पाठ करनेवाले एक पडितके पास बैठे हुए एक स्त्रोता की आग्दों से अविरल अश्रुधारा बहाते देखा | वह था किसान । चत य प्रभु ने उमसे पूछा:- भक्त । तू क्या समझा। किसान - महाराज, भगवान् कृष्णने अर्जुनको जो वाणी सुनाई, मेरे ऐसे भाग्य कहा कि उसे सुनता । आज में उस वाणी को सुनकर धन्य धन्य हुआ हू । इसी आनन्द से मेरा हृदय उछल रहा है, बाकी मैं कुछ नहीं समझा । गीतापाठी पडित के हृदयों वैसा प्रेम न था । प्यारे मित्रों । इसी तरह आप लोग भी तीर्थकरोंकी वाणि को अनय प्रेमसे अवण करेंगे तो आपके हृदय भी उस किसान की भाति द्रवित हागे । तीर्थंकरों और गणधरो की वाणीको सुन कर भी आपके हृदय प्रेमसे न उमड़ेंगें तब कब उमड़ेंगे । याद रखिये जिस मनुष्यका हृदय कोमल होगा वही उपदेश ग्रहण कर सकेगा। हृदय कमल पिक- सित किये बिना आनन्द कहां भाप लोगोंने आनद कामदेव आदि श्रावकों के कई बार चरित्र सुनें होंगे, यदि हृदय कोमल कर सुनते तो असर अवश्य होता। आपके हृदय से यह उमग अवश्य फट निकलती कि जब ऐसे ऐसे सासारिक कार्य करनेवाले भी व्रती-श्रावक हो सकते है तर हम क्यों न बने । पानी में रहनेवाला कमल सूर्यको किरणों को स्पर्श करते ही खिल उठता है पर पानी से बाहर रहनेवाला सूख जाता है। मित्रों क्या आप जानते हैं कि बडे बडे श्रावक गृहस्थों और राजा महाराजाओं के चरित्रों की नोंध शास्त्र में क्यों ली गई ? इसीलिये कि इन चरित्रों से दूसरे लोग शिक्षा लें और अपने जीवन को नियमित बनाने। . विद्वानों का कहना है कि ' अनियमित जीवन सबा जीवन नहीं है । । अतएर समझदारों का कर्तव्य है कि अपने जीवन में एक भी ऐसा कार्य न होने दें जो अनियमित ढग से किया जा सके। अनिय- मित कार्यों का कोई ढाचा तो बनाया जाता ही नहीं, केवल अटकल पच्चू होते हैं। जो मनुष्य मकान बनवाते समय अटकळपच्चू का सहारा लेता है सा सुदृद्ध नहीं होता जसा विचारपूर्वक बनाते । क्यो ? इसलिये कि आप जानते हैं कि अगर मकान का नकशा ठीक तौर से न बनाया जायगा तो मकान सुदृद्ध और अच्छे ढग से न होगा। मित्रों । इसी प्रकार आप याद राखये कि नशा या ढाचा बनाने का नियम सिर्फ मकान के लिये ही लागू नहीं पडता पर हरेक काम लागू पडता है । लेखक के पुस्तक रचने में, चित्रकारफे चित्र बनाने में, वक्ता के व्याख्यान देने मे, सुधारकके सुधार करने में, आविष्कारक के गोपण में, सेनापति के समाम कराने में, इन सभी कार्यों में, कार्य - १५ भारम्भ के पूर्व जिस प्रकार कार्य करना हो. उसका नकशा, मस्तिष्क में सावधानी के साथ रच लेना पड़ता है ! जैसी पूर्व कल्पित नको की एकता, सुदृटता और पूर्णता होगी वैसी ही अन्त में उस कार्य की सिद्धि होगी। आप लोग अपने जीवनको नियमित बनाईये नियमित बनानेसे आपका जीवन परिपूर्णता को पहुचने लगेगा । और आपको अपने जीवन का प्रत्येक क्षण शान्तिमय और हरेक कार्य सुख पूर्ण प्रतीत होगा। यदि आप में यह सोचने की ताकत नहीं कि हम किस प्रकार अपने जीवनका ढांचा बनावें तो आप शास्त्र में वर्णित बडे बडे श्रावको के आदर्श चरित्रों को सामने रखिये। सामने रखकर उन चरि- त्रोंके भानको समझिये । चरित्रोंका भाव शरीरमें रहे जीवके समान है। जिस शरीरमें जीव नहीं वह शरीर किसी कामका नहीं। जीन विना के शरीर को कोई प्यार नहीं करता, वह सबको भपकर-सा दिखाई देता है । जीव बिना के शरीरको लोग गाड देते हैं, जला देते है, पानी में फेक देते हैं, घरमें उपयोगी वस्तुके तरीके कोई उसका सचय नहीं करता । इसी प्रकार कथा के भावको न समझनेसे कोई फल नहीं होता वह चैतन्य बिना के शरीरके समान है । वस्तुकी कीमत उसमें रहे हर सारभृत गुणसे है। सारहीन वस्तुको कोई नहीं पूछता वह निकम्मी है । यदि आप चरित्र के भावको समझकर उसे अपने जीवन में उतार लेंगे तो निश्चय समझिये कि आप भी उस चरित्रनायक के समान बन जायगे । यही उसके समान बनने की कृजी है। कई बार यता लोग कया के बाहिरी वर्णनको बडे बडे अलकायें से सजाते हैं पर सार भूत वर्णनको बहुत सूक्ष्मम्प-अल्परूप देते हैं, इस लिए श्रोता लोग उस कथा के सारको समझ ही नहीं सकते। कई . जगह ऐसा भी होता है कि श्रोता हो अर्थमा अनर्थ कर देता है ! वक्ता कहता क्या है और आप समझते क्या हैं । एक पडितजी रामायण की करा वाच रहे थे। उन्होंने कहा- सीताका हरण हो गया पर एक श्रोता ने समझा 'सीताका हरणिया हो गया याने सीता मृगी ( हरिणी) चन गई। कथा रोज बचती थी। वह श्रोता इमेगा उत्सुक रहता कि देखें सीता, हरिणी से वास्तविक सीता कव बनती है। बहुत दिनों बाद कथा समाप्त होनेके अवसर तक भी, हरिणी बनी हुई सीता का वास्त- विक सीता होने की बात न सुनी तब उस श्रोतासे न रहा गया, वह बोल ही तो उठा कि 'पडित जी महाराज ! सीता हरिणी तो हो गई पर फिर सीता हुई या नहीं। पडितजीने अपने मिरपर हाय लगाकर कहा-'फुटे नसीब तुम्हारे और हमारे शामिल ही ! मैंने कहा था क्या और तुम समझ क्या?" भाइयों ! जिस प्रकार इस श्रोताने अपनी ही भूल से कुछ का कुछ अर्थ किया वेसा न होने पारे । कई भाई आजकल निकलते हुए शास्त्रों को खरीद कर अपने आप वाच जाते है। यह अच्छा है, पर इससेभी अच्छा तो यह हो कि अपने से विशेष विद्वान् साधु के पासही से सुनें । साबु जिन वचनों के द्वारा आपको समझायेंगे उसका अनर कुछ और ही होगा और अपने आप पढनेका कुछ और ही । भोले भाईको साधु के मुखारविंद से निकले हुए शब्द सावारण भने ही जचे पर उनमें अजब म धुरी और शक्ति होती है। हाथी दात तो आपने देखा ही होगा। जब वह दात होता है तब उसके द्वारा यह नगर के दरवाजे के बटे बडे विवाड ताड डालता है। पर जन नही दात खेरादी यहा चूटा तय र हाक बहनें पहनती है उसमें वह शक्ति नहीं होती। भले ही वह चूडा बहनोंके श्रगारको वादे पर वह कियाड तोडने की शक्ति, जो हाथी के पास रहने पर थी, वह उस में कभी नहीं आसकती इसी प्रकार धर्म गुरु के मुखारविंद से निकले हुए वचनों में जो शक्ति होती है वह उस दातपाले हाथी के पराक्रम के सदृश होती है और जो साधारण मनुष्यों के मुह से वचन निकलते है वा खुद छपे हुए प्रन्यादि पढते हैं वे उसे उस बहिन के चूड़े के समान भले ही शोभा देने वाले हाँ पर उसकी बराबरी कभी नहीं कर सकते। मैंने ऊपर साधु के वचन की जो विशेषता बताई है वह नाम- धारी साधु के वचन से ताल्लुक नहीं रखती । नामधारी साधु के वचन में वह शक्ति न मिलेगी यह उसी साधु के अन्दर उतनेही विशेष प्रमाण में मिलेगी जो जितना ध्यानी मौनी और योगाभ्यासी अर्थात भावित आत्मागान तथा रूप का मुनि होगा। ध्यानी मौनी और योगाभ्यासी साधु के साथ यदि इतना समय न हो कि वह आपको शास्त्र सुना सके और केवल कुछ सत्सगमा ही लाभ आपको मिले तो भी आपको निराश न होना चाहिये । सच्चे साधुके सत्सगसे सत्सगी के पापोंका अन्त जरूर होजाता है, एसे कई उदाहरण मिलते है । प्रभवा चौर और बिलायती सचे साधुओं के समागमसे पवित्र वनगये । इसीप्रकार वाल्मिकी नामका एक बड़ा भारी हत्यारा डाकू था ! यह कोली था। साधुओं पर भी इसको दया न आती थी मगर सत्सगसे वह वाल्मिकी अपनेमें महा ऋपि बन गया। जिसकी बनाई हुई रामायण को लोग बडी भक्तिपूर्वक पडते हैं और अपने जीवन को आदर्श बनाते है। १२ व्रतधारी श्रावक बनने का उल्लेख हमने ऊपर किया था। हमने कहा था कि श्रावकनतो इसलिए नहीं बनते कि वे इसमें कठिनता का अनुभव करते है। .

, - मित्रों | जिस प्रकारका जीवन अभी आप बिताते है, उसमेंकी उच्छृखलता, व्रत धारण करनेपर आपको जरूर निकाल देनी होगी पर उस उच्छृखलता के निकालने से आपकी हानि न होगी, काम होगा। लाभ आपको ही नहीं पर ससारको भी होगा। आज क अधिकांश लोगों में उच्छृखलता बढ़ रही है। उनकी यह उच्छृखलता उनके हरेक काम में नजर आती है। उच्छृखलता के कारण से ही आज सारे संसार में वर्णसकर कार्य फैल रहे है। वर्णसकर कार्य से मेरा मतलब यह है कि जिस वर्णवालेको जो कार्य करना चाहिये उसे न कर भिन्न वर्णवाले के कार्य को स्वीकार करना । वर्णसकर कार्य दुनिया के लिए हानिकर है । ससारमें आज इतनी बँचा- तानी करने पर भी लोग सुखपूर्वक अपना पेट नहीं भर सकते। इसके खास कारणों में से यह भी एक है। श्रीकृष्ण ने गीताके अदर- श्रेयान स्वधर्मो विगुणः, पर धर्मात्स्वनुष्ठितात् । स्वधर्मे निधनं श्रेयः, पर धर्मों भयावह ॥ 'यदि अपने धर्ममें कुछ कठिनाईयें हों और दूसरे के धर्ममें सरलता दिखलाई देती हों तो भी अपने धर्मके लिए प्राण दे देने चाहिये-लिखा है 'अपने धर्मके लिए प्राण दे देने चाहिये' क्या इसका मतलब यह है कि एक शराबी शराब पीना अपना धर्म समझता है शराब के बिना उसका कुछ भी काम नहीं चलता इससे उसे मर जाना चाहिये ? क्या एक आदमी पर-स्त्री के साथ मौज मजा उडानेमें ही धर्म मानता है उसके बिना उसे चैन नहीं पडती, कोई इस दुष्कर्मसे छुडाने की कोशीश करे तो क्या उसे उसके विरुद्ध लडकर मर जाना चाहिये। राजा प्रदेशी जिसके हाथ सदा खून से सने रहते थे, मनुष्योंकी हिंसा करना ही उसने , ३

2
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अपना धर्म मान लिया था क्या उसे अपना वह धर्म मुनिके उपदेश से न
त्यागना चाहिये या?
तब इस श्लोकका क्या अर्थ
हुआ
मित्रों । यदि अपने कार्य को ही चाहे वह बुरा ही क्यों न हो, उसे
ही धर्म मान लिया जाय तबतो उसे उसके लिए मर जाना ही चाहिये ।
पर ऐसा अर्थ नहीं है। जो ऐसा अर्थ मानता है वह बड़ी भारी गलती
करता है।
हमने जहाँ तक इस श्लोक पर विचार किया है तथा अन्य विद्वानों
के इस पर के विचार सुने है उससे यही विश्वास होता है कि यहाँ
'धर्म' शब्दका सम्बन्ध वर्णाश्रम धर्म के साथ है, न कि किसी और
अर्थ के रूपमें ।
वर्णाश्रम धर्म के साथ यदि ऐसा कडा उपदेश न दिया जाता तो
ससार की व्यवस्था ठीक तरह से नहीं रहती ।
भारतर्पकी सामाजिक नीव वर्णाश्रम पर कायम की गई थी।
तक लोग अपने अपने वर्ण के अनुसार ठीक २ तरह से कार्य
फरते थे तब तक शान्ति थी पर जब इसकी स्थिती डॉवाडौल हो गई
तभी से सारे सुखोंकी जड हिल गई ।
पहले का वर्णाश्रम आजकल से बिलकुल भिन्नता रखता था।
आजकल का वर्णाश्रम केवल नाम मात्र का वर्णाश्रम है। आज का
ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य व शूद्र का पुत्र, अपने पूर्वज इसी वर्ण में गिने
जाते थे इसलिये अपना भी उसी नाम से परिचय देता है तथा लोक
भी ऐसा ही समझने लग गये हैं। पर पहले अमुक वर्णकी सतति होने
से उसे उसी वर्ण का, माना जाय, यह बात नहीं थी,
उसके
फर्तव्य के अनुसार उसे विशेष वर्ण' के अन्तरगत करके पुकारते
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१९ थे। इस व्यवस्था के अनुसार ब्राह्मणा शूद्र तक हो सकता था और शूद्र प्राह्मण तक [* उत्तराध्ययन के २५वें अध्याय मे 'वर्णाश्रम' के लिये ऐसा कथन है- कम्मुणा बम्मणो होइ, कम्मुणा होइ खत्तिओ। चइस्सा कम्मुणो होइ, मुद्दो हवइ कम्मुणा ॥ ३३॥ अर्थात् कर्म के अनुसार ही मनुष्य नाह्मण, क्षत्रिय, वेश्य व शूद्र होता है। ब्राह्मण को ब्राह्मण कर्म, क्षत्रिय को क्षत्रिय कर्म, वैश्य को वैश्य कर्म और शूद्र को शूद्र कर्म करने की व्यवस्था योग्यतानुसार ग्रथों में बतलाई है। इसका मतलब यह नहीं है कि जैसे ब्राह्मण का कर्म विद्याध्ययन करना है और क्षत्रिय का वीरता रखना, पर ब्राह्मण में वीरता न होनी चाहिये और क्षत्रिय में विद्या का अभार होना चाहिये । वैश्य का काम व्यापार करना है और शुद्र का सेना, पर इसका अर्थ यह नहीं है कि वैश्यकी स्त्री को कोई दुष्ट उडा ले जाता हैं तो भी वैश्य को वीरता कर के न बचाना या हम शृद्र बन जायेंगे इसलिये किसीकी सेवा न करें। मित्रों ! याद रखिये हरेक मनुष्य मे चारों गुणों की जरूरत है। प्रश्न उठाया जाता है कि तब वर्णाश्रम कैसा ? इसका उत्तर यह है कि हरेक मनुष्य हरेक कार्य में पूर्ण प्रवीण नहीं होता, इसलिये जिसमें जिस गुणकी विशेषता हो उसेही उस कार्य के योग्य समझने चाहिये । हमने उच्छृखलता शन्द का ऊपर प्रयोग किया था। वर्णसकर कार्य उसी उच्छ्खलता का फल है। और भी अनेक प्रकार की उच्छु- खलताएँ मनुष्यों में वह रही है। १२ व्रत धारण करने पर हामिकर दो माझमतामेति मागणवेति शूदताम् ।

२० ये उच्छृखलताएँ दूर करनी होगी। उच्छंखलता अभिमान की पुत्री है। १२ व्रतधारी को व्यर्थ का अभिमान दूर करना होगा और जब अभि- मान दूर हो जायगा तो फिर उच्खलता भी अपने आप नष्ट हो जायगी। उच्छूखलता उस अभिमान की पुत्री नहीं है, जिसे विद्वान् लोग स्वाभिमान या धर्मयुक्त्याभिमान के नाम से पुकारते हैं। स्वाभिमानी में उछ्खलता नहीं होती । उखलता उसी होती है जो मिथ्याभिमान का शिकार बना हुआ है। मिव्याभिमान और स्वाभिमानमें उतना ही अन्तर है जितना आकाश और पाताल में, या दक्षिण ध्रुव और उत्तर ध्रुवमें। जहाँ मिथ्यामिमान धर्मको ठोकर मारता है वहाँ स्वाभिमान वर्म के लिये बलिदान होजाता है। जहाँ मिध्याभिमान कर्नन्यसे पराङ्मुख होता है वहाँ स्वाभिमान उसे हृदयके सिंहासन पर विराजमान करता है जहाँ मिथ्याभिमान विगसके लिये चरण चूमता फिरता है वहाँ स्वा- भिमान अपने नेत्र के थोडेसे इशारेसे उसे अपना गुलाम बना देता है मिथ्याभिमान जहाँ थर थर कापता है, स्वाभिमान नहीं पैर जमाकर उसपर विजय प्राप्त करता है। मियाभिमान जीवनका अपकर्य और स्वाभिमान उत्कर्ष करने. पाला है। मिथ्याभिमान के कारण लोग अपनी शक्ति से अधिक कार्य करने की उमंग रखते हैं । देखते हैं कि इसी के वशीभूत होकर कई लोग हरेक कार्यमें शक्तिसे अधिक अपव्यय करते हैं। वे समझते हैं कि इस कृष्यसे लोगोंपर हमारी छाप पडेगी और हम प्रतिष्टा के पात्र माने जायेंगे । उनका यह कृत्य भोले लोगोंकी आखों के सामने कुछ दिनोंके लिये चका चौंध पैदा कर सकता है पर अधिक दिनोंतक नहीं। समय आनेपर नग्नसत्य दिखलाई देता है और लोगोंकी नजरोंसे वे इतने गिर जाते है कि जिसका अनुमानभी नहीं किया गया था । मित्रो ! मिध्याभिमान में उद्दडता रहती है इसीलिये मिध्याभिमानी मनुष्य समझता रहता है कि 'हम चौडे और बाजार सकडा ।' इसी मनुष्य का यह विश्वास जब सीमा पार पहुंच जाता है तब वह मुंहके बल ऐसा गिरता है कि सम्हलना मुश्किल हो जाता है । मिध्याभिमानी अपनाही पतन नहीं करता पर भोले भाले लोगोंके उत्तेजन का कारण बनकर उनका भी पतन कराने में सहायक होता है। वे भोले लोग, जो झूठ बोलने में हिचकिचाहट लाते थे, इन्हीके ससर्ग से अब इसको अपने उत्थान का कारण मानने लगते हैं। जिनको विश्वासघातके नामसे चिड थी वे अब इन्हीं के कारणसे इसी के अनय भक्त बन जाते हैं। मित्रों ! स्वाभिमान में यह बात नहीं होती। मिथ्याभिमान में जहाँ उद्दडता थी वहाँ इसमें नम्रता होती है। नम्रतामें अजब आकर्षण शक्ति होता है। यह हरेकको अपनी तरफ खेंच लेती है। और लोगोंके पाससे यह वह काम कर दिखलाती है जिसके लिये दूसरे कई प्रयत्न करनेपर भी सफलता नहीं मिलती थी । शास्त्रमें जितने उच्च श्रावक हुए हैं यदि उनकी उन्नतिका कारण आप गहरे में पैठकर देखेंगे तो पता लगेगा कि इनकी उन्नतिका मुख्य कारण नम्रता था। प्योर भाईयों ! आप लोगोंका यह विश्वास कि 'व्रती आवक बनने में कठिनता है ' इसका मैंने कुछ निराकरण किया। इसपरसे आप समझ गये होंगे कि ब्रतोंके पालने में कठिनता पंसी नहीं है , २२ जैसी हम आप समझ रहे है। विशेप विश्वास आपको तब हो जायगा जबकि आप क्रमा १२ व्रतोंका खुलासा, सुन लेंगे। एक बात आपको शायद और खटकती होगी और व्रतोंका खुलासा करनेपर भी शायद खटके । वह यह कि जब ब्रत इतने सुगम है इनके पालने में कोई कठिनता नहीं दिखती तब लोग इनको क्यों नहीं पालते' मित्रों ! आप जिसको अच्छा समझ गये आपके हृदयने जिसका अनुमोदन कर दिया, उसके प्रति ऐसी शका उठाना ही व्यर्थ है। मित्रो ! जिस कार्यकी अनुमोदना हृदय कर लेता है, उसे कार्यों शीघ्र परिणित करना श्रेयस्कर माना गया है । इतनेपर भी आपको उस कार्य की साधनामें कठिनता और कष्ट प्रतीत होते है वे उस कार्य में नहीं है किन्तु आपके मनमे हैं। यदि आप उनकी ओर से अपना मनोभाव बदल डालेंगे तो टेढा मार्ग झटपट सीधा दिखाई देगा और कठिनता सुगमनामे परिणित हो जायगी । - सब जीव सुख चाहते हैं. मनुष्य प्राणी संसार के तमाम जीवोंसे महायुद्धिशाली माना गया है। यह प्राणी स्व-पर का जितना ज्ञान कर सकता है उतना और कोई भी प्राणी नहीं कर सकता । जिस प्रकार यह अपने सुख दुःख का ज्ञानी होता है उसी प्रकार उसमें यह भी ताकत है कि यह दूसरे प्राणियों के मुख दुखों का ज्ञान प्राप्त कर सके । वैसे तो हरेक मनुष्य को यह ज्ञान किसी अवस्या तक प्राप्त है पर सर्वाश से उन्हीं महापुरुषोंको होता है जो तीर्थकर तथा सर्वज्ञ - कहे जाते हैं । साधारण मनुष्य ज्यादा से ज्यादा अपनी चाइन्द्रिय आदि की स्थूल शक्ति जहॉतक काम कर सकती है वहीं तक किसी वस्तु के बारेमें ज्ञान प्राप्त कर सकवा है पर तीर्थकर या सर्वज्ञ कहे जानेवाले महापुरुषों में वह शनि होती है, कि दृष्ट अदृष्ट तमाम वस्तुओंकी अर्यात् जीव अजीयको अन्त तक की असलियतका ज्ञान रखते हैं यह तो आप जानही गये होंगे कि जीन अजीव कहनेसे ससार की तमाम वस्तुओंका ग्रहण हो जाता है। तीर्थकर प्रभु व मर्वज्ञोंने हमें ज्ञान कराया है कि 'समस्त जीव सुखके अभिलापी है, कोई भी दुखको पसद नहीं करता ।' ससारके जीवोंकी इतनी प्रकारकी जातिये है कि हम उनकी गिनती नहीं कर सकते । अतएव प्रभुने हमें इन तमाम जीवोंके मोटे पाच माग कर सबका बोध करा दिया है । वे पाच भाग ये हैं - 'एकेन्द्रिय, वेन्द्रिय, तेन्द्रिय, चौरेन्द्रिय और पचेन्द्रिय ।' अर्थात् एक इन्द्रियाले "जीव, दो इन्द्रिययाले जीव, तीन इन्द्रिय- घाले जीव, चार इन्द्रियवाले जीव, और पांच इन्द्रियवाले जीर। , 1 - पृथ्वीकायिक, अपकायिक, तेजसकायिक वायुकायिक, और वन स्पति आदिकी जिसके केवल स्पर्श इन्द्रिय होती उनकी एकेन्द्रिय जीवों में गिनती है। जिसके स्पर्श और रसेन्द्रिय हो. उनकी वेन्द्रिय जीवोंमें गिनती है । 'जैसे कृमि आदि । जिसके स्पर्श, रस, घ्राण इद्रिय हो उनकी तेन्द्रिय जीनोंमें गिनती है। जैसे चीटी आदि। स्पर्श, रस, 'घाण, चक्षु इन्द्रिय हो उनकी चौरेन्द्रिय जीवों में गिनती है जैसे मक्खी आदि । । मनुष्य योनि, तिर्यंच, देवयोनि जिनके स्पर्श, रस, घ्राण, चक्षु, श्रोत्र हो उनकी पचेन्द्रिय जीवोंमें गिनती है। जल में जीव है यह बात आज के साइन्सने पूर्ण रीति से सिद्ध कर दिया है। हम आखों से नहीं देख सकते पर वैज्ञानिकोंने यंत्रों के द्वारा जल में लाखों हलते चलते जीव बतलाये हैं। वैसेही खास थावर योनि के जीवों का पिण्ड है। इससे निश्चय होगया है कि जैन का सिद्धात सत्य ही है। जिस प्रकार कई लोग जल में जीव नहीं मानते वैसेही वनस्पतिमें भी नहीं मानते। पर विज्ञान के बल से अब यह सन्देह मिटता जाता है। वैज्ञानिकोंने इन में जीव होना सिद्ध कर दिया है। विज्ञानाचार्य जगदीशचन्द्र बोस का नाम आप लोगोंने सुना होगा। ये ससार के बहुत वडे वैज्ञानिकों में गिने जाते है। इन का यूरोप अमेरीका आदि देशों में बडा मान किया जाता है। ससार के कई धुरधर वैज्ञानिक इन को अपना गुरु माननेमें अपना सौभाग्य समझते हैं। इन्होंने एक बार ' वनस्पति में जीव है। इस का प्रयोग बबईमें बतलाया था । दर्शकों ।

. की फीस ४०) र थी । लोकमान्य तिलक स जलसेके प्रेसिडेण्ट थे। लोगोंकी भीड बहुत ज्यादा थी। १०) टिनो के देनेपर भी लोगोंको जगह नहीं मिलती थी । जगदीश बाबू जिस समय अपना प्रयोग दिखाने लगे उस समय सामने की लाइनमें पौधों के गमले रक्खे । उन गमलोंके भागेकी तरफ काचके बडे बडे तखत लगाये। फिर सूक्ष्मदर्शक यत्रको योग्य स्थान पर सजाकर उपस्थित जन समुदायसे कहा कि आप लोग सामने देखिये, मैं इन पौधोंको खुश करता हूँ। इतना कह कर बोस बाबू पोधोंको हर्षोत्पादक शद्वोंमें सम्बोधन कर उनकी तारीफ करने लगे। ज्यों ज्यों तारीफ करते गये त्या त्यों वे पौधे, जैसे किसी आदमीकी स्तुति करने पर वह आदमी खुश होता है उसी प्रकार खुश होकर फूलने लगे ! पर जब इन्होंने उनकी निंदा करनी शुरू की, खरान शद्व उनके लिये प्रयोग करने लगे तो वे पोधे मुरझाने लगे। लोगोंको बडा आश्चर्य हुआ उनको विश्वास होगया कि वृक्षोंमें जीव होता है। बोस बाबू इतना ही करके न रह गये पर उहोंने वृक्षोंमें स्नायु जाल है, और वह मनुष्यों की तरह स्पन्दित होता है, इसको भी सिद्ध कर बतलाया। ये एक-दो प्रयोग ४०) रु खर्च करने पर माल्म पडे पर भाप जैन सिदान्त के लघुदडक नामक एक थोकडेको सीखकर साइन्स का कितना ज्ञान प्राप्त कर सकते हैं। इन वैज्ञानिकोंने जिस प्रकार वनस्पतिमें जीव सिद्ध किया है इसी प्रकार धातुओं में भी सिद्ध किया है। इनका साइन्स अभी अपूर्ण है। पर हमारे अरिहन्तोका साइन्स बहुत बढा चढा है। यहा तक पहुचनेमें न जाने इनको कितना समय लगेगा इन्होंने अभी एक मशकी खोजकी है पर हमारे शास्त्रोंने इनके गरीर २६ - " अवगाहना आदि का भी कर दिया है। ये शास्त्र आजकल के पर वनस्पतिमें एक इन्द्रिय मानी जाती है। यहा पर कई भाई शका कर सकते है कि जब इनमें एक इन्द्रिय है, कान आदि तो है ही नहीं, फिर निंदा स्तुति का ज्ञान किस प्रकार करते होंगे ? जैन शास्त्र के 'आचाराग' 'विशेष आवश्यक सूत्र' तथा 'ठाणाग सूत्र' की टीका में इसका बहुत अच्छा खुलासा किया गया है, वहां देखना चाहिये । हाल के विज्ञानने वनस्पति, जल आदि मे जीवोंकी सत्यता प्रगट की, पर अग्नि वायु आदि में अभीतक नहीं कर सका इससे हमको निराश न हो जाना चाहिये । कारण हम पहलेही कह चुके है कि यह अभी तक अपूर्ण है। सम्भव है यह अपनी इसी प्रकार की कोशिश के बल से किसी दिन इस सत्य तक भी पहुँच जाय । प्यारे मित्रों । जब वनस्पति आदि एकेन्द्रिय जीव भी सुख दुस का अनुभय करते है और दुखको न चाहकर सुखको पसन्द करते हैं तब अन्य प्राणी भी यही चाहते होंगे, क्या आपको अब भी इस बातमें शका रह सकती है। वहा एफेंद्रिय जीवों के भी भावरूप पाचों इन्द्रियों का क्षयोपशम यत- लाया है। उपकरण इन्द्रिय एकही होने से उन्हें एकेंद्रिय कहे है - . हिंसा किसे कहते है। महा पुरुषो को वाणि, उनका किया हुआ वर्णन, पीछे के लोगों का मार्गदर्शक है। वह बतलाता है, अमुक काम करने से तुम्हारी हानि होगी और अमुक से लाभ । साधारण पुरुषों से जिनमें महाशक्ति होती है उसे महापुरुष कहते है। महापुरुप बातों से नहीं होते पर उस के बनने के लिये बडी तपस्या करनी पड़ती है। इनके मार्ग में कई कट आ उपस्थित होते है पर फिरभी सत्य के मार्ग से नहीं चूकते । परीक्षा करनेवाला सोने को तपाता है, काटता है, कसौटीपर फसता है, फिर मालूम करता है कि यह सोना ह या नहीं। इसी प्रकार महापुरुषों की भी परीक्षा होती है। इन के परीक्षक देवता और इन्द्र यद्यपि इनकी परीक्षा लेने आते हैं फिर भी सचे महापुरुषों के •सामने उनकी ही परीक्षा हो जाती है । मित्रों ! महापुरुषों के अनुभवको ही शास्त्र कहते हैं। महापुरुषोंने 'जिस बात को बड़े आत्मभोग से समझी उनके प्रताप से उन वस्तुओ का ज्ञान हम सहज से कर सकते है । जैसे खेती करने पाले सब नहीं होते पर उसे का लाभ सब को मिलता है, वैसे ही आत्मा का पूरा दमन किया होगा क्रोध, मान, माया, लोभ, कपायो को वश किया होगा, दया की भावना रगरग में रमाई होगी, परमात्मा में लीन हो गये होगे, शास्त्र' ऐसे ही महापुरुषों के फरमाये हुए हैं। ऐसे शास्त्र अपन परूप नहीं सकते पर उनका उपयोग कर सकते हैं। आकाश में गरुड पक्षी के बराबर पतगिया नहीं उड सकता, पर उडने का अधिकार समान है। उसी प्रकार उचे महात्मा लोग शास्त्रों का .

२४ मंथन कर जितना लाभ उठा सकते हैं उतना अपन नहीं, पर फिरभी उस पतगियों की माफिक अपने हकको काम में लाना चाहिये । अपने जैसे अल्पज्ञानी जीवोंके लिये, यदि ये शास्त्र न होते तो अपने को ऐसा ज्ञानका लाभ कुछमी नहीं होता। भाइयों | आप लोग शास्त्र को समझकर उनके बतलाये हुए मार्ग का अनुसरण करेंगे तभी आपको उनकी (महात्माओंकी) तरह आनन्द मिलेगा। किसान खेती कर अनाज पेदा करता है। उस अनाज से वह अपनी भूख मिटाता है । क्या उसी अनाजसे दूसरोंकी भूख नहीं मिट सकती ! महात्मा पुरुषोंने ये शास्त्र रचे हैं, जब उनको इससे लाभ पहुचा तब क्या अपनेको नहीं पहुंच सकता ? 'जरूर पहुंच सकता है।' जिस ज्ञानने उनको आत्मस्वरूप परमात्माके दर्शन कराये विश्वास रखिये यदि उसका अपन उपयोग करेंगे तो अपनेको भी करायेगा। उन महापुरुपोंको शास्त्र प्रगट करनेमे एक रहस्य जरूर था। घह यह कि 'जगतका उपकार करना।' इसको भी कोई लोभ कहते हैं पर यह लोभ कैसा? जैसे वृक्ष फलता है वैसा । मित्रों ! क्या उन महपुरपोंकी वाणि अपने अकेलोंके लिये ही है ! मही नहीं, जैसे वृक्षके फल हरेकके लिये हैं वैसेही शास्त्र हरेकके लिये है, उससे हरेक तिर सकता है। आप कह सकते हैं, महाराज ! सिद्धान्त किसका सत्य मानना चाहिये ? ससारमें जैन, वैष्णव, क्रिश्चियन, मुसलमान सभी के सिद्धान्त प्रचटित है और सभी यही कहते हैं कि हमारे सिद्धान्त को मानो, तिर माभोगे । किस सिद्धान्त पर चलना चाहिये। -

में पूछता हूँ कि मुसलमान के बनाये कपडे से आपकी लज्जा
निवारण होगी या हिन्दू के बनाये कपडैसे ?
(उत्तर) 'दोनों के कपडे से ।'
ब्राह्मण की खेती से पैदा हुए अन्न से आप लोगो की भूख मिटेगी
और शूद्र के द्वारा की हुई खेतीसे ?
(उत्तर) 'दोनों से मिट सकती है।'
प्यारे मित्रों ! आप लोग मूल सिद्वान्त पर ध्यान दिया कीजिये।
इससे सारी शकाए दूर हो जायेंगी। जैन हो या वैष्णन, क्रिश्चीयन
हो या मुसलमान सब के सिद्धातों का साररूप मक्खन अर्थात् तत्व-ज्ञान
लेने से जो सत्य है वह मिल जायगा ।
बडे बडे अन्यों में जो वाते हैं महारमा पुरुषोंने अपने ज्ञान के लिये
थोडे शन्दोंमें उनको समझादी है, जैसे-
दया धर्म को मूल है, पाप मूल अभिमान ।
तुलसी दया न छोडिये, जब कग घट में माण ॥
धर्म का मूल क्या है?
.
दया।"
2
दया किस लिये ? दया क्यों समझनी चाहिये क्या जैन-शास्त्र
कहता है इसलिये क्या वेदान्त या वैष्णव कहते हैं इसलिये
मित्रों ! यहे प्रश्न और किसी से न पूछो । अपनी आत्मा से पूछौं।
दया आपको क्षण क्षणमैं नजर आयगी और वह जरूरी है इसीलिये यह
धर्मका मूल मानी गई है। इसके लिये शास्त्र के प्रमाण को कोई
जरूरत नहीं।

आपके सामने एक आदमी चमकती हुई नगी तलवार लेकर खडा
है वह आपको मारना चाहता है। दूसरा मनुष्य आपकी रक्षाकी चेष्टा
करता हुआ उसे इस बातका उपदेश देता है कि प्यारे ! इसको क्यों
मार रहा है ? वह जबाव देता है कि इसे मारना मेरा धर्म है, मनुष्य
की हत्या करने से पुण्य होता है, ऐसा मेरा शास्त्र कहता है ।
बतलाइये, इन दोनोंमें से आपको प्यारा कौन लगेगा ?
'रक्षा करनेवाला ।
जो मनुष्य तलवार के द्वारा आपके जीवन का अन्त करना चाहत
है, वह यह कृत्य करता तो है अपने शास्त्रके अनुसारही, पर आप उस
शास्त्रको कैसा मानेंगे'
'रद्दीकी टोकरीमें डालने लायक ।'
क्यों
'इसलिये कि वह अपनी आत्माके विरुद्ध है।'
यस, आत्मा के विरुद्ध जो जो बातें हों, प्यारे मित्रों ! वहीं अधर्म
है। उनका करना पाप है। इसलिये उन कार्योंकी मनाई की गई है।
महाभारत के अन्दर भीष्म पितामहने यही बात कही है-
'आत्मनः प्रतिकूलानि परेपा न समाचरेत् ।।
मित्रों ! दया केवल मनुष्योंमें ही नहीं होती परन्तु इसका स्थूल
रूप दूसरे प्राणियों में भी देखने में आता है। सिंहनी दूसरोंपर इसका
करती है, क्या यह अपने बच्चे पर करती है ?
.
नहीं।'
+क्यों ? इसलिये कि उसमें उसके प्रति दया है।"

'साँप काटने से मनुष्य कई बार प्राण मुक्त हो जाते है, क्या सभी सॉप काटते है" -- महीं। उनमें भी दया का किंचित भाव है नहीं तो सबको काट ,खाय और सब मर जाय । मनुष्य मनुष्य में भी दया है नहीं तो एक दूसरेको मार डाले । माता बच्चेको सूखेमें सुलाती है पर स्वय गीले पर सोती है। क्यों ? क्या वह बच्चा जन्मता ही उसे कमा कर देता है ? या और कुछ सहायता करता है ? नहीं।' तब माता ऐसा क्यों करती है ? इसीलिये कि उसमें दया है। मित्रों ! दयाहीन प्राणी हिंसक, कूर, पापी कहा जाता है। अत- एव दया करना सबका मुख्य कर्तव्य होना चाहिये। याद रखिये दया का दूसरा नामही अहिंसा है और अदयाका नामही हिंसा है। मोटी समझ से 'हिंसा' वह कहलाती है जिस कृत्य के द्वारा किसी प्राणीके जीवनका अन्त किया जाय । प्रश्न उठ सकता है कि आत्मा जब अजर अमर अविकल है त्रिकाल भी मारने से नहीं मरती तब हिंसा कैसी ? जो वस्तु नाश नहीं होती उसका नष्ट होना कैसा? मित्रों ! लोगोंके विचार आज सकुचित हो रहे हैं जब इनके विचार विस्तृत हो जायेंगे तब हिंसाके सच्चे सरूप का ज्ञान इनमें फैल जायगा । भर्म के विषय में दुनियां में जो कुतकें फैल रही हैं, अर्घमें जो खींचा . तानी की जाती है, वास्तविक ज्ञान के फैलनेपर यह सब अन्धाधुझे मिट जायगी। भाइयों ! आत्मा अविनाशी है तभी तो हिंसा लगती है। यदि इसके विपरीत आत्माकी अनारमा बन जाती हो तो हिंसा किसे गे! मारनेवालेकी आत्मा नष्ट होगई और मरनेवालेकी आत्मा का नाश हो गया तव तो हिंसा अहिंसा का सवालही नहीं रहा । आत्मा अजर अमर अविनाशी है, तुम्हारीही तरह दूसरोंकी है । आत्मा के पास आयुष्य कर्म है उसको अकालमें जुदा कर देना, यानी आत्मा से प्राणोंका अलग कर देना उसीका नाम हिंसा है। जैसे घासलेट तैल, जो रातभर लालटेन में जल सकता है उसको दियासलाई वतलाकर एकदम भवका कर जा डालना, उसे 'अकाल में नष्ट कर दिया' कहा जाता है। इसी प्रकार आत्मा के पास आयुष्य कर्म होते हुए भी छुरी तलवार आदि से दुख पहुचाकर अन्त कर देना उसे हिंसा कहते है। मित्रों ! मोटी दृष्टिसे जो हिंसा कही जाती है उसे आप समझ जैन -शास्त्र इससे भी गहरी बात बतलाता है कि किसी प्राणि को मन वचन कर्मसे किसी प्रकारका दुख पहुचाना हिंमा है । इससे भी गहराईके साथ कहता है कि 'करना' । कराना' और ' किये हुएको अच्छा मानना ' मनसे वचनसे और कर्मसे, वह भी हिंसाही हे । और समझिये । यदि आप किसीको गाली देकर किसीके मन दुखानेका प्रयत्न करते हैं तो समझिये कि मैं एक प्रकारकी हिंसा कर रहा हूँ। यदि आप किसीका अपमान कर रहे हैं तो भी समझ लीजिये कि मैं एक प्रकारकी हिंसा का भागी बन रहा हूं। यदि आप किसीको लढाई झगडा करनेकी सलाह देते हैं तो समझिये कि मेरा यह कृत्य एक प्रकारको हिंसा में सामिल है। इतनाही नहीं, मनसे भी किसीका 'बुरा समझना यह भी हिंसा है। गये । पर - ३३ इन तमाम हिंसाओंके करनेवाले प्राणियोंको यथा समय बदला चुकाना पडता है। शास्त्र में "तदूलमछ' की एक जगह बात आई है। लिखा है कि तंदलमच्छ एक मार के नाक की अणीपर समुद्र में बैठा था। यह जन्तु अगुलीके कई हमारवें हिस्सेकी बराबर होता है। एक दिन मगर मुँह फैलकर सुख से जलों बैठा हुआ था । सैकडों मच्छियें उसमें आती और निकल जाती । तदूलमच्छ ने सोचा कि यदि मैं मगर, होता,तो इनमें से एक को भी जिंदी न छोडता, सबको स्वाहा कर जाता । तदूल मच्छने उस समय क्रिया कराया कुछ नहीं, केवल उसकी इसी पापमपी भावनासे नरक में गया और असख्य वर्षातक दुख उठाता रहा । प्रिय मित्रों ! जिस प्रकार भनमें किसी का बुरा चितवना हिंसा में गिना गया है वैसेही प्रगट रूप में किसी की निंदा करना यह भी हिंसा के बराबर है। इसके प्रमाण में महाभारत में भी एक उदाहरण मिलता हैं। जिस समय अर्जुन त्रिगौसे वीरता पूर्वक युद्ध कर रहे थे, उन्हें देख कर्ण ने पाण्डव सैय पर भयकर रूप से आक्रमण किया । 'दोनों ओर से अस्त्रशस्त्रों की वर्षा होने लगी। चोरोंकी हुँकार पनि से आसमान गूंज उठा । कर्ण के बाण अनेकों पाण्डव सैनिकों को धरा- शायी करने लगे। उधर अर्जुनने गित-रान सुशर्मा को मार गिराया। भीमने दुर्योधन के छ भाईयोंको सदाके लिये भूशायी कर दिया । यह देख, कर्ण ने युधिष्ठिर पर ऐसा भयानक आक्रमण किया कि उनकी बुरी दशा हो गई । रणक्षेत्रसे भाग चले । उहें भागते देख, सेनाकेभी पैर उखड गये । भीम, सात्यकि और धृष्टद्यन्नने उन्हें बडे २ उत्साहवर्धक शद्वोस उत्साहित कर रोक रखा। फिर दोनों पक्ष जमकर लडाई होने लगी। फर्ण के बारपार आक्रमण से भीमको वडा क्रोध चढ़ आया।

३२ तानी की जाती है, वास्तविक ज्ञान के फैलनेपर यह सब अन्धाधुद मिट जायगी। भाइयों । मारमा अविनाशी है तभी तो हिंसा लगती है। यदि इसके विपरीत आत्माकी अनारमा बन जाती हो तो हिंसा किसे गे! मारनेवाले की आत्मा नष्ट होगई और मरनेवालेकी आमा का नाश हो गया तब तो हिंसा अहिंसा का सवालही नहीं रहा । आत्मा अजर अमर अविनाशी है, तुम्हारीही तरह दूसरोंकी है । आत्मा के पास आयुष्य कर्म है उसको अकालमें जुदा कर देना, यानी आत्मा से प्राणोंका अलग कर देना उसीका नाम हिंसा है । जैसे घासलेट तैल, जो रातभर लालटेन में जल सकता है उसको दियासलाई बतलाकर एकदम भवका कर जला डालना, उसे 'अकाल में नष्ट कर दिया' कहा जाता है। इसी प्रकार आत्मा के पास आयुष्य कर्म होते हुए भी छुरी तलवार आदि से दुख पहुचाकर अन्त कर देना उसे हिंसा कहते है। मित्रों ! मोटी दृष्टिसे जो हिंसा कही जाती है उसे आप समझ गये । पर जैन-शास्त्र इससे भी गहरी बात बतलाता है कि किसी प्राणि को मन वचन कर्मसे किसी प्रकारका दु ख पहुचाना हिंमा है । इससे भी गहराईके साथ कहता है कि 'करना कराना' और ' किये हुएको अच्छा मानना ' मनसे वचनसे और कर्मसे, वह भी हिंसाही है । और समझिये । यदि आप किसीको गाली देकर किसीके मन दुखानेका प्रयत्न करते हैं तो समझिये कि मैं एक प्रकारकी हिंसा कर रहा हूँ। यदि आप किसीका अपमान कर रहे हैं तो भी समझ लीजिये कि मैं एक प्रकारकी हिंसा का भागी बन रहा हूं। यदि आप किसीको लढाई झगडा करनेकी सलाह देते हैं तो समझिये कि मेरा यह कृत्य एक प्रकारको हिंसा में सामिल है। इतनाही नहीं, मनसे भी किसीका 'बुरा समझना यह भी हिंसा है। .

, . इन तमाम हिंसाओंके करनेवाले प्राणियोंको यथा समय बदला चुकाना पड़ता है। तदूलमच्छ' को एक जगह बात आई है। लिखा है कि तंदलमच्छ एक मार के नाक की अणीपर समुद्र में बैठा था। यह जन्तु अगुलीके कई हजारवें हिस्सेकी बराबर होता है। एक दिन मगर मुंह फैलकर सुख से जलों बैठा हुआ था। सैकडों मच्छिये उसमें आती और निकल जाती । तदूलमच्छ ने सोचा कि यदि मैं मगर, होता, तो इनमें से एक को भी जिंदी न छोडता, सबको स्वाहा कर जाता । तदूल मच्छने उस समय किया कराया कुछ नहीं, केवल उसकी इसी पापमयी भावनासे नरक में गया और असख्य वर्षातक दुख उठाता रहा । प्रिय मित्रों ! जिस प्रकार मनमें किसी का बुरा चिंतवना हिंसा में गिना गया है वैसेही प्रगट रूप में किसी की निंदा करना यह भी हिंसा के बराबर है। इसके प्रमाण में महाभारत में भी एक उदाहरण मिलता है। जिस समय अर्जुन त्रिगतीसे वीरता पूर्वक युद्ध कर रहे थे, उन्हें देख कर्ण ने पाण्डव सैन्य पर भयंकर रूप से आक्रमण किया। दोनों ओर से अस्त्रशस्त्रों की वर्षा होने लगी । वीरोंकी हुँकार पनि से आसमान गूंज उठा | कर्ण के बाण अनेकों पाण्डव सैनिकों को धरा- शायी करने लगे । उधर अर्जुनने निगर्त-रान सुशर्मा को मार गिराया। भीमने दुर्योधन के छ भाईयोंको सदाके लिये भूशायी कर दिया । यह देख, कर्ण ने युद्धिष्ठिर पर ऐसा भयानक आक्रमण किया कि उनकी बुरी दशा हो गई । रणक्षेत्रसे भाग चले । उन्हें भागते देख, सेनाकभी पैर उखड गपे । भीम, सात्यकि और धृष्टद्यन्नने उन्हें बडे २ उत्साहवर्धक शवोस उत्साहित कर रोक रखा फिर दोनों पक्ष में जमकर लड़ाई होने लगी। कर्ण के वारवार आक्रमण से भीमको बडा क्रोध चढ़ आया। - " । वे कौरव सेना में गदा लेकर घुस पडे और सैकडों हाथियों और गज सेनाके नायकों को मार-मारकर ढेर करने लगे। जैसे प्रचड वायुके होके से मेघोंकी घनी घटा भी उड जाती है वैसे ही भीम के प्रचड पराक्रम के धागे कौरव सेना तितर बितर होने लगी। उधर अर्जुन त्रिंगको मारकर अपने पक्षमें चले गये। वहाँ भाकर उन्होंने देखा कि सेनामें युधिष्टिर' नहीं है और अकेले भामही कालान्तक यमकी भांति शत्रुकुलका नाश कर रहे हैं। तब उन्होंने भीमसे पूछा- 'भाई ! धर्मराज कहा है।" भीमने लडते ही लडते उत्तर दिया- वे कर्ण के बाणोंसे पीडित हो अपने शिविर में चले गये हैं।' यह सुन अर्जुन भी उधर ही चल पडे । कृष्ण और अर्जुन को समर क्षेत्र से लहू-लुहान शरीरसे लिये हुए लौटते देखकर युधिष्ठिरने समझा, कि वे कर्णको मारकर चले आ रहे हैं। उन्होंने बडी प्रसन्नता से पूछा- क्यों भाई, तुमने कर्णको किस तरह मारा। अर्जुन- महाराज, मैं तो अमी त्रिगत लोगोंको मारकर चला था रहा हू । मुझे, आपको समर क्षेत्रमें न देखकर बडी चिंता हुई, इसीलिये चला आ रहा है । अब मैं कर्ण की और चलता हूँ और उसे 'बिना मारे न लौटूंगा।' • कर्ण से हारे हुए उदास युधिष्ठिर को अर्जुन की ये बातें सुन, नाही दुख हुमा । वे अपने आप में न रहे । कर्ण को इन लोगों ने - अभी तक नहीं मारा, यह जानकर उनका हिताहित ज्ञान लुप्त हो गया। उन्होंने बड़े क्रोध भरे शब्दोंमें अर्जुन और उनके गादीव धनुपको धिक्कार दिया । उनकी कठोर वन समान वाणि अर्जुन से न सही गई, वे खड्ग लेकर अपने परम पूज्य भाईको मारने के लिये तैयार होगये। जिनके नेत्रोंके इशारे मात्र पर वे ससारको न्यौछावर कर देने के लिये सदा प्रस्तुत रहते थे तथा जिनकी आज्ञाका पालन करते हुए संसार में जहाँ तक कष्ट और दुखको पराकाष्टा है, वहाँतक उठा चुके थे और उठा रहे थे। समय भी क्या ही विचित्र परिवर्तन शील रहे है। अबोध मनुष्य के मन का कैसा रग विरगा व्यवहार है ! अर्जुन को इस प्रकार दुष्कृत्य करते देख, कृष्णने झटपट उनका हाथ पकड लिया और कहा- - "अर्जुन ! तुम यह कैसी मूवता कर रहे हो 2 क्या तुम्हारी धुद्धि मारी गई है। जो युधिष्ठिर तुम्हें पुत्र के समान प्यार करते हैं, जितका तुमने आज तक कभी मनादर नहीं किया, उन्ही को मारने के लिये तैयार हो रहे हो ? जरा सोचो तो सही क्या युधिष्टिरके मारने पर तुम जीवित रहना पसन्द करोगे ? क्या बडों की मान प्रतिष्ठा का तुम्हें तनिक भी ध्यान नहीं रहा ? मालूम होता है कि तुम पागल हो गये हो। श्रीकृष्ण की बाते सुन, अर्जुन के सिर से तत्काल क्रोध का भूत उतर गया । घे लाजित होकर सिर झुकाये खडे हो रहे । कुछ देर के धाद हाथ जोडकर कहने लगे- मगयन् । आपने ठीक कहा । मेरी बुद्धि सचमुच मारी गई थी, परन्तु मैं लाचार था। मैंने प्रतिज्ञा की थी कि गो मेरे इस गांडीव धनुष की निंदा करेगा, उसे में तत्काल मारूँगा। भाई साहबने इसका कुछ भी विचार न कर मेरे धनुष्यको धिकारना आरम्भ कर दिया, इसीलिये मैं भी क्रोध के मारे अधा हो गया । यदि वे मुझे लाख गालिया देते, तो भी मैं कुछ न बोलता। उनकी गालियों झिडकियों और धिक्कारों को मैं आशीर्वाद समझता हू । अब आपही कहिये, पूज्य भ्राता के ऊपर हाथ उठाकर मैंने जो महापाप किया है उसका प्रायश्चित क्या है ? मुझे तो आत्मघात ही एक मात्र प्रायश्चित माम होता है । अब मैं इस अधम शरीर को न रक्यूँगा ।' यह कह कर अर्जुन ने प्योंही अपनी गर्दन तलवार से उडा देनी चाही, त्योंही श्रीकृष्णने खड्ग समेत उनका हाथ पकड लिया और खड्ग को छीन कर दूर फेंक दिया । अर्जुन की इस धर्मशीलता से धर्मराज युधिष्ठिर बडे प्रसन्न हुए- उनके मनमें जो थोडी बहुत ग्लानि पैदा हुई थी, वह मिट गई । उन्होंने अर्जुन को स्नेह पूर्वक आलिंगन करते हुए कहा- 'प्यारे पार्य ! भाई अर्जुन !! मैं वास्तव में दोपी हूँ। तुम्हारा क्रोध अन्याय युक्त नहीं था। मैने व्यर्थ ही में तुम्हारी तथा तुम्हारे गाडीव, धनुष की निंदा की, तुम अपनी प्रतिज्ञा पालन करो। क्षत्रिय प्रतिज्ञा भ्रष्ट कमी नहीं होता। "A , t- इतना कह युधिष्ठिर ने अपनी गर्दन आगे कर ली। अर्जुन असमजस में पड गये । एक तरफ धर्म सकट, और दूसरी तरफ गांडीर धनुप की प्रतिज्ञा ! श्रीकृष्ण-अर्जुन ! श्रेष्ठ पुरुष का अपमान करना उनकी मृत्यु के- वरानर है इसलिये अपि तुम्हें बड़े भाईका अपमान न करना चाहिये पा इस समय इनका अपमान करो. यह इनके मृयु वराबर होगा। . श्रीकृष्ण की बात सुनकर अर्जुन उनके चरणों में झुक पडा और बोला-नाह नुरारि, आपके बिना ऐसी सलाह कौन देता !"मान में . 2 ३९ हिंसाके भेद और पहले नत का सूत्रपाठ से विस्तार । सूत्र--थलग पाणाइवायं समणोवासो पचखाइ, से पाणा- इवाए दुर्विए पन्नचे, सं जहा संकप्पो म आरम्मो म, तस्य समणोंवासओ सकप्पओ जावजावाए पधक्खाइ, नो आरम्म ओं। टीका-द्विन्द्रियादयः स्यूळवं चैतेपा सकळलौकिक जीवत्व प्रसिद, एतदपेक्षयैकेन्द्रियाः (णां) सूक्ष्माधिगमेना (न) जीवत्व सिद्धारति, स्यूला एवं स्यूलकास्तेषां प्राणा-इन्द्रियादय तेपा- मतियातः स्थूळमाणातिपात. त श्रमणोपासक श्रावक इत्यर्य: प्रत्याख्याति, तस्माद् विरमत इति भावना । स च माणातिपातो द्विविध- प्रज्ञप्त तीर्थंकर गणधद्विविधः प्ररूपित्त इत्यर्थ 'तयथे'. त्युदा हरणोपन्यासार्थ , सकल्पनश्वारम्भजश्व, सकल्पाजात' संकल्पना, मनस- सकल्पाद द्वीन्द्रियादिमाणिन, मांसास्थि- चर्मखवालदन्ताधर्थ व्यापादयन्तो भवति, आरम्भाजातः आरम्भज तत्रारम्मोहबदताखननस्तत् (लवन) प्रकारस्तस्मिन् शख चदणकापपीलिकाधान्यगृहकारकादि सघट्टन पारितापद्राव लक्षण इति, तत्र श्रमणोपासकः संकल्पतो यावजीरयापि प्रत्या- ख्याति, न तु यावज्जीवयैव नियमत इति, 'नारम्भज' मिति, तस्या- पश्यतयाऽऽरम्मसद्गावादिति, आइ-एव सकल्पत किमिति सूक्ष्म प्राणातिपातमपि न प्रत्याख्याति ? उच्यते एकेन्द्रियादि पायो दुष्परिहारा समवासिना सकल्पैव सचित्त पृथ्व्यादि परिमोगात् । " ३८ हिंसा के कारण। प्रिय मित्रों ! हिंसा किन किन कारणों से होती है इसका विवरण शास्त्र में आया है। यदि उन तमाम कारणों का विस्तार पूर्वक वर्णन किया जाय तो बहुत समयकी जरूरत है अत: संक्षेप में बतलाया जाता है। ससार में करोडों ऐसे प्राणि विद्यमान है, जो हमें दृष्टिगत नहीं होते । उनका पुज हमारे शरीर के चारों तरफ चक्कर काटता है पर हम उन्हें देख नहीं सकते । ऐसे प्राणियोंकी हिंसा, अनजान में चलते, फिरते, उठते, बैठते, श्वासलेते, किसी वस्तु को इधर उधर रखते एस आग जलाते समय हो जाती है। चींटी आदि जिन प्राणियों को हम आंखोंसे देख सकते है, उनकी भी प्राय अनजान में इसी प्रकार हिंसा हो जाती है। रहे बडे प्राणी, उनकी हिंमा मनुष्य क्यों करता है? इसके उत्तर में शास्त्र कहता है कि कोई मासके लिये, कोई हड्डियों के लिये, कोई चमडे के लिये, कोई चर्बी के लिये, कोई दातों के लिये, कोई रक्तके के लिये, कोई बालोंके लिये इसी प्रकार और भिन्न भिन्न स्वार्थों के कारण बिचारे पशु- 'ओंकी हिंसा की जाती है। किसी यस्तुको सडा कर उसका कोई पदार्थ तैयार करना यह भी एक हिंसाका कारण है । क्यों कि सडानेपर उस वस्तुमें सैकडों सूक्ष्म जीप पैदा होते हैं। जैसे शराब आदि । ऐसी चीजें काम में लानेवाले उन जोषों की हिंमा के कारण बनते हैं तथा उन जाँघों के मरने पर दुधि आदि फैलफर जो रोगादि फैलते है यह भी हिंसा का ही साधन माना गया है। . " हिंसाके मेद और पहले नत का सूत्रपाठ से विस्तार । सूत्र--थलग पाणाइवाय समणोवासओ पचखाइ, से पाणा- इवाए दुर्विए पन्नचे, त जहा-संकप्पओ अ आरम्भओ अ, सत्य समणोवासओ सकप्पओ भावजावाए पञ्चक्खाइ, नो आरम्म ओ। . . टीका-द्विन्द्रियादयः स्यूलत्वं चैतेपां सकळलौकिक जीवत्व प्रसिद्ध , एतदपेक्षयकेन्द्रियाः (णां) सूक्ष्माधिगमेना (न) जीवत्व सिद्धीरति, स्यूला एव स्थूलकास्तेषां माणा-इन्द्रियादय तेषा- मतियातः स्थूळमाणातिपात. त श्रमणोपासक श्रावक इत्पर्यः प्रत्याख्याति, तस्माद् विरमत इति भावना । स च प्राणातिपातो द्विविध- प्रज्ञप्त तीर्थंकर गणधरैद्विविधः प्ररूपित इत्यर्थ 'तद्यथे. त्युदा हरणोपन्यासार्थ., सकल्पजश्चारम्मजश्च, संकल्पाजात' सकल्पजः, मनस- सकल्पाद् दीन्द्रियादिमाणिन. मांसास्थि- चर्मखवाकदन्ताय व्यापादयन्तो भवति, आरम्माज्जातः आरम्भज तत्रारम्भोहबदताखननस्तत् (लवन) प्रकारस्तस्मिन् शुख चदणकपिपीलिकाधान्यगृहकारकादि सबट्टन पारिताफ्ट्राव लक्षण इति, तत्र श्रमणोपासका संकल्पतो यावज्जीचयापि प्रत्या- ख्याति, न तु यावज्जीवयैव नियमत इति, 'नारम्भज' मिति, वस्या- वश्यतयाऽऽरम्मसद्भावादिति, आह-एव सकल्पत किमिति सूक्ष्म पाणातिपातमपि न भत्यास्याति ? उच्यते एकेन्द्रियादि मायो दुष्परिहारा समवासिना सकल्पैच सचित्त पृथ्न्यादि परिमोगाद ।

४० भावार्थ-सकल आबालवृद्ध पुरुषों द्वारा प्रसिद्ध जो द्वीन्द्रियादि जीव उनका स्थूल' शब्दसे यहां ग्रहण होता है। उसको अपेक्षा सूक्ष्मनुद्धिसे जानने योग्य एकेन्द्रिय जीवको चौकिको जीवपनेसे प्रसिद्ध नहीं इसलिये उनको सूक्ष्म कहा है। अतएव लौकिक प्रसिद्ध जो स्यूल जीव उनका जो इन्द्रियादिक प्राण उसका नाश करना उसको स्यूब "प्राणीतिपात कहते हैं। उसको श्रमणोपासक श्रावक त्यागता है। अर्थात् 'उस स्थूल हिंसासे निवर्तता है। यह प्राप्रातिपात तीर्थंकर गणन भगवान्ने दो प्रकारका वतलाया है। यह इस तरह है-एक सफल्पज और दूसरा आरम्मज | सकल्पसे पैदा होनेवाले अर्थात् मनके सकल्प द्वारा द्वीन्द्रियादिक प्राणियोंको मास, हट्टी, चर्म, नख, केश, दांत आदिके वास्ते मारना उसे सकल्पज कहते हैं। और आरम्भसे पैदा होनेवाले अर्थात् हल दतेली आदि से पृथ्वी खोदने आदि आरम्भमें शंख चदणक (जीव विशेष) चींटी आदि धान्य निष्पत्तिकरण अथवा घर बनाने "आदिमें सतापना विराधना होती है उसको आरम्भज कहते हैं। इन दोनों हिंसा में से श्रमणोपासक श्रावक सकल्पज हिंसाका यावजीवनका भी त्याग करता हे परतु कोई अल्पकालका भी कर सकता है। हा, आरम्मजा हिंसाका त्याग श्रावकको सम्पूर्ण रीतिसे नहीं होता है। क्योंकि इसको गृहकार्यमे उस हिंसाका सद्भाव होनेसे । यहा कोई शका करता है कि जैसे सकल्प से स्यूल प्राणातिपात का त्याग करता है वैसे ही सूक्ष्म प्राणातिपातका भी त्याग क्यों नहीं करता। उत्तर है-गृहवासियोंको एके- न्द्रियोंकी हिंसा प्राय दुष्परिहार है क्यों कि वह सकरप के द्वारा भी पृथ्वी आदिका परिभोग करता है। -- पहले ( अहिंसा) व्रत के अतिचार. सूर-थूलग पाणाई वायवे रमणस्स समणोवासएण इमे पच अइयारा जाणियचा-तजहा पधे वहे छपिच्छेदे ए अइभारे भत्त- पाण वुच्छए। (टीका)-अतिचार रहितमनुपालनाय, तथा चाह-'धूळगे'स्यादि, रधूलक प्राणातिपात विरमणरस विररित्यर्थ प्रमणोपासकेनामी पञ्चति- चारा• 'जाणियव्या' ज्ञपरिज्ञया न समाचरितव्या--न समाचरणीया , तद्य- थेत्युदाहरणोपन्यासार्थ, तत्र वधन बन्ध-सयमन रज्जुदामनकादिभि- ईनन बघ ताडन कसादिभि, उरिः शरीरं तस्य छेद पाटन कर पत्रा- दिभि भरणभार अषि भरण अतितार प्रभूतस्य पूगफलादे स्कन्ध पृष्ठ्यादिष्वारोपणमित्यर्थ भक्तअशनमोदनादिपान-पेयमुदकादि तस्य च व्यरच्छेद निरोधोऽदानमित्पर्य एतान् समाचरन्नति प्रयमाणुव्रत तदत्राय तस्य विधि- बन्धो दुविधो-दुप्पदाण चतुप्पदाण च, अहाए अणहार य, अणहाए न वट्टति वधेत्तु, अट्ठाए दुविधो-निरपेक्खे सावेक्खो य, जिरवेक्खोणेय सणित जं वधति साक्खो ज दाम गठिणोज व सक्केति पलीवणगादि सु मुचितु छिदितु वा तेण ससरपासएण पन्धे व एव ताप चतुप्पदाण, दुपदाणपि दासो वा दासी वा चोरी वा पुत्तो वाण पढतगादि जति वज्झति तो साक्खाणि वधितचाणि रक्खितन्वाणि य जधा अग्गिभया- दिसण विणस्सति ताणि किर दुपदचतुप्पदाणि सावगेण गेण्डि तच्याणि जाणि अवद्धाणि चेव अच्छति, नहो तथा चेव, वधोणाम ताळणा अणहाए, हिरवेक्खो णिरवेक्खो णिहय ताति, सावे- क्खो पुण पुच्चमेव भीतपरिसेणहोतध्व, मा हणण कारिजा, । जति करेज्ज ततो मम्मे मोत्तूण ताथे लताए दारेण वा एक्कं दो तिणिवारे हत्थपाद कण्णणकाइ णियत्ताए छिदति, सावेखो गह वा अरुय वा छिदेज्ज वा डहेज चा, अतिभारो ण भारी वेतन्यो, पुत्र चेव जावाहणाए जीविया सा-मोतवा, ण होषमा अण्णा जीविता ताधे दुपदे। जं सय उक्खियति उत्तारेति वा भार एवं पहाविज्जति, बङ्गलाण जधा.साभाविया ओ-वि भारातो अशओ कीरति, हल,सगडे मुवि घेळाए मुयति, आसहत्यी पाई, ए विही, भत्त पाण वोछेदो ण कस्सइ कातन्चो, तिम्व छुद्धो मा मरेज, तधेव, अणवाए दोसा परिहरेज्जा, सावेक्खो पुणरोग णिमित्तं वा वायाए वा भणेज्जा अज्ज तेण देमित्ति, सतिणिमित्तं वा उपवास कारावेज्जा, सव्वत्थविजतणा जधा थूलग पाणाति- वातस्स अतिचारो ण भवति तथा पयनितव्वं, णिरवेक्ख बंधादि मुय लोगो व.घातादिया दोसा भाणियव्वा ।* * बन्धो द्विविधो-द्विपदाना चतुपपदाना व अर्थायाऽनय च, अनर्थाय बद्ध अर्थाय द्विविध निरपेक्ष सापेक्षश्च, निरपेक्षो यन्निश्चल बध्नाति बाढ, सापेतो यहामनन्धिना यच शक्लोसि प्रदीपनकादिपु मोचयितु छेत्तुवा तेन ससरस्पाशकेन बद्धव्य, एव तावत् चतुप्पदानां, द्विपदानामपि दासो वा टासी वा चौरो वा पुनो वाऽपठदादिर्यदि घध्यते तदा सापेवाणि बद्धव्यानि रक्षितच्यानि च यथाऽग्निभयादिपु न विनश्यन्ति, ते किल द्विपदचतुष्पदा श्रावकेण ग्रहीतव्या येऽबद्धा एव तिष्टन्ति, वधोऽपि तथैव, वयो नाम ताहन अनर्थाय निरपेक्षो निर्दय तात्यति, सापेक्ष पुन पूर्वमेव भीतपदा भवितव्य मा घात कुर्यात् , यदि कुर्यात् ततो मर्म मुक्त्वा तदा लतया दवरण वा एक्शो हिस्त्रिारान् ताइयति, छविच्छेदोऽनर्थाय तथैव निरपेतो हस्तपादकर्ण नालिकादि निर्दयतमा छिनत्ति, सापेक्षो गण्ड वा अरवा छिन्द्याद्वा दहेद्वा, प्रतिमारो नारोपयितव्य पूर्वमेव या वाहनेनाऽऽजीविका सा मोक्तभ्या, न भवेदन्या जीधिका तदा द्विपदो य स्वयमुत्क्षिपति उत्तारयति वा भार एवं वायते, बलिधदर्दानां यथा स्वाभाविकादपि भारादन क्रियते, हलशकटेवपि बेलाया मुञ्चति अश्वहस्यादिप्यम्प एवं विधि, भक्तपानण्यवच्छेदो न न वर्तते .

१३ - पहा नत अतिचार रहित पालन करना चाहिये । स्थूल प्रणातिपात से निवर्तनेवाले व्रतधारी श्रावकको पंच अतिचार जानने योग्य है परतु आचरण करने योग्य नहीं हैं। पच अतिचार ये हे--(१) बधन, (२) वध, (७) छविठेद, (१) अतिभार, (५) भत्तपाणि विच्छेद । किसी रस्सी आदि से बाधना उसे 'बधन' कहते हैं। चाबुक जादि से मारना उसे बध कहते हैं । करोत आदि शस्त्रों से शरीर को फाडना उसे 'छबिछेद' कहते है सुपारी नारीयल आदि भारको पशुफे कंधे, पीठ आदिपर भक्तिसे 'ज्यादा भरना उसे 'अतिभार ' कहते है। 'मत्त ' याने ओदन आदि खाने की चीज, और पाण याने पानी आदि तृपा मिटानेकी वस्तु, उसका विच्छेद कर देना अर्थात् भातपानी 'म देना, उसे ' भत्तपाणिविच्छेद ' नामक अतिचार कहते हैं। अतिचारो का विस्तृत भावार्थ । बध दो तरहके है। दो पदों ( मनुष्यादिको ) का और चौपदों (गौ आदि ) का । उसके भी दो भेद-अर्थ से बापना और अन से बांधना । अनर्थ से बात करें। अर्थ के दो भेद-निरपेक्ष और सापेक्ष । निरपेक्ष उसे कहते हैं जो अति गाढा वाव लगा दिया जाय । इसे अतिचार . कस्यापि कत्तय तीवन्मा म्रियेत, तथेयानीय दोपान् परिहरेत, “न- धीय' इत्येतस्य पदस्य दोषान्-अनर्याप दोपान " सापेक्ष पुन रोगनिमित या पाया या भणे-यध तुभ्य म ददामाती, शान्तिनिमित योपयास कारयेत्, सर्वत्रापि यतना यथा स्थूलप्राणातिपातस्यातिधारो म भयति तथा प्रयति सच, शिरपेसवधादिषु च लोकोपघातादयो दोश भवितव्या ॥६॥ .

कहते है। सापेक्ष उसे कहते हैं जो डोरी आदिस गाठ ऐमी देवे जिमको अग्नि आदिके लगनेपर शीत्रतासे खोल सके। यदि बाधना हो तो घुलवा गाठ से नहीं वाधे । यह चतुष्पाद की विधि है। द्विपदों में दासदासी चोर पुत्र आदि को सुधारने के लिये बाधै तब भी निरपेक्ष न वाधे । उसकी रक्षा करे । जिस से अग्नि भयादि से उसका नाश न होजाय । श्रावक के लिये ऐसे दो पदों तथा चतुष्पदों को रखने में विशेष सुविधा होती है जो बिना वाधे ठहर सके। (२) 'बध' को ताडनभी कहते हैं। यह दो प्रकार से होता है अर्थ से और अनर्थ से। निक्षतासे दया रहित जो ताडन किया जाता है उससे अतिचार होता है। और सापेक्षतासे ऐसा विचार करे कि ये पशु आदि किसीकी, घात न कर डाले। यदि किसी का नुकसान करता हुआ दिखाई दे तो मर्मस्थान को वाधा पहुचे ऐसा ताडन न करे । (३) 'छबिछेद । भी अनर्थ के लिये तथा निरपेक्ष से हाथ पार कान नासिकादि का निर्दयता से छेदने को अतिचार कहते है। सापेक्षता से बीमारी की गांठ मस्सा आदि को छेदन करने से अपना दाग (डाम) देने में अतिचार नहीं माना गया है। (४) अतिभार न भरना चाहिये । और पशुऑपर बोझ लादनेकी आजिविका भी न करें। यदि दूसरी आजीविका न हो तब द्विपद (मनु यादि) सय जिस भार को उठा सके या रख सके ऐसे से अधिक न भरे । बैल आदि पर स्वाभाविक भार से अधिक न भरे । हल गाडी में भी नियत समय से ज्यादा न जोते। हाथी घोडे आदि की भी यही विधि समानी चाहिये। (५) भात पाणी से किसी प्राणी को विच्छेद न करें। क्यों कि कई एक तीन क्षुमा तृपा आदि से मर जाते है। इससे अनर्थ दोप यो दण्ड दे, चोरोंफो वाधे और मौका आ पडे तो जु-मी को सजा भी दे । गुस्से में आकर नहीं, पर न्यायसे अभियुक्तको पूरी जाँच कर यदि यथार्थ में दोषी हो और उसके जीनसे प्रजाको महान् कष्ट पहुचनेकी, शाति मा की पूरी सभावना हो तो उसे फांसीकी सजा देना यह भी साक्षप में गिना जायगा। से तो राजा फांसीको सजा दे सफता है पर जिन्हें कयल बंधन की ही सजा दी गई है उसके भरण पोषणमें कभी दुष्टताका परिचय म देना चाहिये । राजा का कर्तव्य है कि उसकी भूख प्यास तथा अन्य शारीरिक बाधाए न रुके इसकी तरफ ध्यान रखता रहे। इतने दिन तो उसकी जिम्मेवारी उसीके उपर थी पर अब उसके जीवन की जिम्मे- वारी राजा पर है। यदि उसे किसी प्रकारका न्याययुक्त कानूनी कष्ट के सिवाय कष्ट भोगना पडेगा उसका पाप राजाके सिर पर होगा। जो राजा इस बातका ध्यान न रखेगा उसका दोष राजा के ऊपर तो होगा ही, पर उसका राज्य भी दोषी हो जायगा। मित्रों ! यह बात तो हुई द्रव्य बंधनकी । ऐसाही भाष बधन के लिये समझ लेना चाहिये । अर्थात् जातिके बधन रीति रिवाज ठहराव कानून ऐसे न हो कि बिचारे गरीब कुचल कुचल कर रिब-रिवकर मर जायें। यदि आप अपनी समाज में अयाय युक्त कानूनों का प्रचार न करेंगे और जो अभी प्रचलित कितने ही विपरीत कानून है उनको ठुकरा देंगे तो आपकी समाजमें रामराज्य-सा आनन्द फैल जायगा, कोई सन्देह नहीं है। पहले अतिचारका कुछ विचार हुआ अब दूसरे अतिचार वध जाता है । इसके दो भेद होते हैं। एक परास्ते चलते हुए बिना कसूर किसी मनुष्य .

" , अतिचारौकी विशेष व्याख्या. पहला '' नामक आतिचार आया है । वध के दो भेद होते हैं। एक तो दो पद को बांधना और दूसरा चौपदको बांधना। दास दास नौकर चाकरोंकी गिनती दो पदमें है और हाथी घोडा गाय आदिकी चौपदमें। ये दो कारणोंसे बांधे जाते हैं, जैसे-अहाये अनहाये-अर्थ के लिये और अनर्थके लिये । किसीको बिना मतलब बाधना और उसे कष्ट देना, उसकी कुदरती बाढको रोक देना, यह एक प्रकारकी हिंसा है। श्रावकको चाहिये कि इससे बचे । अठाये अर्थात् अर्थसे बाधना । इसके दो भेद है-निरपेक्ष और सापक्ष । निरपेक्ष उसे कहते है जो लापरवाही से बाबा जावे, ऐसा वाँधा जावे कि वह अपने हाथ पैर भी न हिला सके। ऐसा बाँधना श्रावकका धर्म नहीं है। दूसरा बाधना है सापेक्ष, मतत्व के लिए करुणायुक्त जो बावा जावे उसे सापेक्ष कहते है। शास्त्र कहता है कि पशु आदिको करुणाभाव से इसप्रकार न बाधे कि उन्हें दुःख हो । मौके चेमौके जैसे लाय ( अग्निकांड ) आदिमें जल्दी खोला जा सके। दोपद-दास दासी यदि उदण्डता करते हो उनको सुधारने के लिये बाधना यह सापेक्ष बाधना है। चोरको चोरी करने की सजा याने चोरी की आदत मिटाने के लिये बाधना यह भी सापेक्ष है । इसीप्रकार पुत्रको पढनेके लिये बाधना यह भी सापेक्ष है। मैं पहले कई बार कह चुका हूँ कि यह धर्म राजाओं के मुकुट पर रइनेघाला है। राजा इस धर्मको धारण कर सकता है। जो राजा इस धर्म को करे और अपने फज अनुमार प्रजा के कल्याण के लिये अन्याइयों - धारण, ४७ - को दण्ड दे, चोरोंको बाधे और मौका आ पडे तो जुल्मी को सजा भी दे। गुस्से में आकर नहीं, पर न्यायसे अभियुक्तको पूरी जाँच कर यदि पार्थ में दोषी हो और उसके जीनेसे प्रजाको महान् कट पहुचनेको, शाति भग की पूरी सभावना हो तो उसे फासाकी सजा देना यह भी साक्षेप में गिना जायगा। घेसे तो राजा फांसीकी सजा दे सकता है पर जिन्हें कयल बंधन की ही सजा दी गई है उसके भरण पोषणमें कभी दुष्टताका परिचय म देना चाहिये । राजा का कर्तव्य है कि उसकी भूख प्यास तथा अन्य शारीरिक बाधाए न रुके इसकी तरफ ध्यान रखता रहे। इतने दिन तो उसकी जिम्मेवारी उसीके उपर थी पर अब उसके जीवन की जिम्मे- वारी राजा पर है । यदि उसे किसी प्रकारका न्याययुक्त कानूनी कार के सिवाय कष्ट भोगना पडेगा उसका पाप राजाके सिर पर होगा। जो राजा इस बातका ध्यान न रक्खेगा उसका दोष राजा के ऊपर तो होगा ही पर उसका राज्य भी दोषी हो जायगा । मित्रों ! यह बात तो हुई द्रव्य बंधनकी । ऐसाही भाव बधन के लिये समझ लेना चाहिये । अर्थात् जातिके बधन रीति रिवाज ठहराव कानून ऐसे न हो कि बिचारे गरीब कुचल कुचल कर रिब-रिखकर मर जावें | यदि आप अपनी समाज में अयाय युक्त कानूनों का प्रचार न करेंगे और जो अभी प्रचलित कितने ही विपरीत कानून है उनको ठुकरा देंगे तो आपकी समाजमें रामराज्य-सा आनद फैल जायगा, इसमें कोई सन्देह नहीं है। पहले अतिचारका कुछ विचार हुआ अब दूसरे अतिचार वध (हनन) पर विचार किया जाता है । इसके दो भेद होते हैं। एक अनर्थ,' दूसरा 'अर्थ' । रास्ते चलते हुए बिना कसूर किसी मनुष्य .

४८ या पशुको डण्डे आदि से चोट पहुचाना अनर्थ में गिना जाता है। अर्थ ' हनन ' के दो भेद है । एक सापेक्ष और दूसरा निरपेक्ष । दया रहित होकर लग उपांग के चोट पहुच जाने का विचार न कर जो चोट पहुंचाई जाती है उसे निरपेक्ष कहते हैं। और जो सुधार के खयाल से अपना प्रत भग न हो जावे-मानों में अपने ही शरीर पर मार मार रहा हू ऐसा खयाल कर जो दह देता है, वह सापेक्ष है। तीसरा अतिचार है 'छविछेदन ।' इसके दो भेद-सापेक्ष और . निरपेक्ष । है श्रावक लोग चीर फाड के कामोंसे डरते या धूजते नहीं हैं। जो दुखियोंके दुख को निवारण करने के लिये उनके व्रण अर्श आदि का छेदन कर तथा मवाद खून आदि साफ कर मरहम पट्टियोंकी सेवा करता है, उसके अन्दर अपूर्व करुणा का उदय होता है। अब चौथा अतिचार अतिभार ' आया। पहली बात तो यह कि श्रावक को गाडी आदि से अपनी आजीविका चलानी ही नहीं चाहिये । यदि चलानी ही पडे तो सापेक्ष और निरपेक्ष का ध्यान जरूर रखना चाहिये । बैल तथा घोडों भादि के ऊपर इतना बोझ न लाद देना चाहिये कि विचारों के हाथ टाग टूट जाय या शक्ति से ध्यादा काममें लेने से अपनी जीवन लीला जल्दी समाप्त करनी पड़े। कई मनुष्य भी अपने पेट के लिये बोझ उठाने का काम करते हैं। आप लोगोंका कर्तव्य है कि दया कर उनसे शक्ति से प्यादा का न लें । उसको उतना ही बोझा उठानेका अधिकार है जितना वह अपने हाय से सुख पूर्वक उठा सके और रख सके। कोई प्रश्न कर सकता है कि यदि यह आदमी अपनी मर्जी से, शक्तिसे यादा बोझ उठाना चाहे तो?

४९ । - इसका उत्तर यह है कि यदि वह अपने मन से भी उठाना चाहे तो भी श्रावकको उसे न उठाने देना चाहिये । क्यों कि इस प्रकार बोझा उठाने से उसकी जिंदगी जल्दी खतम हो जाती है। ऐसा पुस्तकों के अन्दर पदने में आया है। ऐमा करने से एक दोष और भी हो और वह यह कि करुणा का भाव नष्ट हो जाता है। । इन मनुष्य बैल. घोडो आदि के ऊपर ज्यादा न लादना चाहिये, यह बात तो आप समझ ही गये । यहा यह भी समझ लेना चाहिये कि अ-समय में लडके लडकियोंका विवाह ' करना' यह भी उन पर अनुचित बोझा डालना है। -जोडे के साथ विवाह कर देना यह भी अनुचित बोझा है। प्रजाके हित को सामने न रख कर जो कानून ( अन्याय युक्त ) उनके द्वारा जबरदस्ती पलाये जाते हैं यह भी एक प्रकार का बोझ है । अतएन इन कामों को श्रावक व्रतधारी मनुष्य ( राजा आदि भी ) कभी न करे । जिन पशुओं और मनुष्यों को अपने अधीन कर रक्खे है उनको समय पर विश्राम देना, शक्ति से अधिक काम न लेना इस तरफ से कभी बे-भान न होना चाहिये । पाँचवा अतिचार ' भत्त पाणी विच्छेद' है । इसके भी पूर्ववत् दो भेद है। श्रावक को चाहिये कि अनर्थ से किसी को भूखों न मारे । सापेक्ष भूखों मारने में कोई दोष नहीं गिना गया है। समाज के अन्दर अभी कुछ ऐसी बेहदी फैली हुई है कि वैद्य वगरे आज्ञा देते है कि इसको रोटी आदि मत देना तो भी घरवाले 'कुछ तो खा ले। कह कहकर जबरदस्ती खिलाते है । रोग अवस्था में भूखों मारना रोगी को भूखों मारना नहीं है पर रोग को भूखों मारना है। इसी प्रकार रोग अवस्था में रोटी देना रोगीको ७ ५० । -- . रोटी देना नहीं है पर रोग को रोटी देना है। वेध आदि निश्चय कर कहे कि इस रोग में रोटी आदि देना हानिकर है ऐसी अवस्था में रोटी न दी जाय तो यह पाप का काम नहीं, पर' करुणा का काम है। किसी को सुधारने के लिये, 'रोटी न दी जायगी। ऐसा भय दिखाना सापेक्ष में गिना गया है। मित्रों ! आप लोगों को समुच्चयः रूप में अतिचारों के रूप बतलाये गये है। आपको चाहिये कि इन में सापेक्ष और निरपेक्ष का ध्यान रख- कर इस व्रत को पालने की अवश्य कोशीश करें। -

हिंसा के कार्य और उनसे बचने का उपाय ।
1
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--
त्रों! हिंसा बुरी है ऐसा सारा जगत कहता है
मि
पर इसके सच्चे स्वरूप को समझे बिना इस से
बच नहीं सकते। हिंसा का स्वरूप शास्त्र में
निराले निराले ढंग से बतलाया है, इसका यही
मतलब है कि मनुष्य इसके वास्तविक रूप को
पहचान ले। वस्तुके गुण दोष को अनेक रूप से बतलाने का तात्पर्य
केवल यही है कि यदि वह वस्तु अच्छी हो तो उसके प्रति लोग आदर,
और बुरी हो तो उसका तिरस्कार करें-धिकार करें ।
प्यारे भाइयों ! आत्मा हिंसा कब करती है और दया कब, यह मैं
आपको बतलाना चाहता हूँ।
आत्मा मे दो गुण हैं-शुभगुण और अशुभगुण । शुभ गुण में
प्रवृत्त होने से आमा दया करती है और अशुभ में प्रवृत्त होने से
हिंसा।
हिंसा और अहिंसा आत्मा के परिणाम है। इस पर गणधरोंने शास्त्र
के अदर बडी ही मार्मिकता के साथ चर्चा चलाई है। उनके परिश्रम
का लाभ लेना प्रत्येक मनुष्य के लिये शुभदायी होगा ।
शास्त्र में जिस प्रकार एक यस्तु के अनेक भेद बतलाये हैं उसी
प्रकार हिंसा के भी कई भेद बतलाये हैं। इसका कारण यही है कि
किसी भी प्रकार से लोग हिंसा से बचें। हिंसा के बुरे गुणों को प्रगट
करमा, हिंसा पर कोई क्रोध नहीं है, यह तो उसके सच्चे सरूपको
मनलाना है।

-- . वस्तु के यथार्थ गुण दोष बतलाना ससार कल्याण के लिये बहुत जरूरी है। शास्त्र यदि हिंसा आहिंसा का रूप न समझाये तो मनुष्य उससे दृर कैसे रह सकता है ? जो मनुष्य सर्प के जाति स्वभाव को नहीं जानता वह उसके डसने से कैसे बच सकता है । जो जहर के गुण को नहीं जानता, वह अवश्यही धोखा खा जाता है। इसी प्रकार जो हिंसा के रूप को नहीं जानता वह उससे बच नहीं सकता। हिंसा से बचनेवाले प्राणी की आत्मा में अपूर्व जागृति उत्पन्न होती है । हिंसा से बचना दयावान् का खास लक्षण है। प्यारे मित्रों ! सब प्राणियों ने अपनी अपनी रक्षा के लिये-खाने के लिये दाढ व दॉत, देखने के लिये नेत्र, सुनने के लिये कान, सूंघने के लिये नाक, चखने के लिये जीम आदि अग उपाग/अपने अपने पूर्व कर्म के अनुसार प्राप्त किये हैं । इनको छीन लेनेका , मनुष्य को कोई अधिकार नहीं है। जो मनुष्य मक्खी के पंख को नहीं बना सकता उसे, उसको नष्ट करने का अधिकार नहीं है । परन्तु स्वार्थ ऐसी चीज है कि इसकी ओट में कुछ भी नहीं दिखता । जो अग उपांग दूसरे के लिये उपयोगी हैं, मनुष्य कहा करते हैं कि यह तो हमारे लिये पैदा किया गया है। ऐसे कहने वाले को सिंह मनुष्य की भाषा में कहे कि तू मेरे खाने के लिये पैदा किया गया है, तो वह मनुष्य उसे क्या. जबाब देगा ? मित्रों ! ये सब स्वार्थ है, इसी कारण अज्ञानी मनुष्य अपने अज्ञान से यद्वातद्वा ऐसी हिंसा करने का पाप किया करता है । ज्ञानी पुस्प ऐसा कभी नहीं करता । यह सब प्राणियों को सुख का अभिलापी समझता है । यह किमी के द्वारा किसी प्राणी की हिंसा करने का आधिकार नहीं समझता। -- --

-
जो दूसरे के हाड लेता है, क्या उसके हाड ( हड्डीयें) बचे
रहेंगे? कभी नष्ट न होंगे?
होंगे।'
जो दूसरे के मास को हरण करेगा, क्या उसके मासका कभी नाश
न होगा!
.
,
'होगा।
.
'
जो दूसरे का चमडा उतारता है, क्या उसका चमडा नए न
होगा।
होगा, अवश्य होगा।'
जो प्राणी निस जीव की हिंसा करता है उसे उमका बदला अवश्य
चुकाना पडेगा । इसीलिये ज्ञानी कभी हिसा नहीं करते। जो अज्ञान
से हिंसा करते है वे उसे योग्य उपदेश देकर उडाने का प्रयत्न करते
उदयपुर
में एक वकील ने पूछा कि ' महाराज ! आमा जा
अजर अमर है त जीव रक्षा की क्या जरूरत 2'
कहा --आमा अजर अमर है तभी तो दया की जरूरत है।
यदि आत्मा नष्ट हो जाती हो तो फिर न मारने वाले को पाप और न
मरने वाले को।
प्यारे भाइयों ! पहले आप लोग आत्मा के स्वरुप को ठीक तौर से
समझो 1 समझने के बाद ही आप कर्तव्यातव्य का ज्ञान प्राप्त कर
सकेंगे।
फर्तन्याकर्तव्य के ज्ञान के बिना भल्याभक्ष्य का भी कैसे वयाले
रह सकता है

कई भाई कर्तव्याकर्तव्य के ज्ञान न रखने से ही अभक्ष्य-अभक्षण, जैसे मांस और अभक्ष्य-पेय, जैसे शराब आदि का उपयोग करते हैं। वीडी सिगरेट चुरुट भी इसीके अज्ञान से लोग काग मे लाते हैं। याद रखिये, मास और शराब आदि खाने पीने में पाप तो है ही पर साथ में यह अस्वाभाविक भी है। मैंने एक पादरी की लिखी पुस्तक में पटा था कि हिन्दू लोगों से हम ( ईसाई ) विशेष दया रखने वाले हैं। हिन्दू शास्त्रों के अनुसार गेहूँ आदि पदार्थों में जीव है । हिन्दु लोग गेहुँओं को पिसाकर खाते हैं, इसमें कितनी हिंसा होती है। एक बात और भी है जब गेहूँ आदि की खेती की जाती है, तब भी पानी के मिट्टी के, और न जाने कौन कोन से हजारों जीवों की हत्या होती है, तब कहीं जाकर वे [ हिन्दू ] अपना पेट भरने में समर्थ होते हैं। इस पर भी वे अपने को अ-हिंसक मानते है। हम (ईसाई ) लोग सिर्फ एक बकरे को मारते हैं इससे एक से अधिक का पेट भर जाता है । हिंसा बहुत कम होती है । मित्रों ! पादरी ने अपनी पुस्तक में, 'जो इस प्रकार लिखा है, क्या आप इसका उत्तर दे सकते हैं ? आप लोगों की चुप्पी से मालूम होता है कि आप इसका उत्तर नहीं दे सकते । खैर, सुनिये- जो पादरी अपने को । कम, और हिन्दुओं को हिंसक विशेष रूप से मामता है यह अनजान भोले लोगों की आखों में धूल झोंकने का काम करता है। वह इस दलील से हिन्दुओं के प्रति घृणा प्रगट करवाना चाहता है । और चाहता है कि 'इस दलील के सुनने में लोगों पर हमारी अप पड जायगी और ईशु के चरणों में बहुत से लोग - - - सर झुका देंगे।' यह इस पादरी भाई का खयाल निलकुल गलत है। उसे समझ लेना होगा कि मैं जो दलील पेश करता हूँ, सच्चे अहिंसा के अर्थ या मर्म जानने वाले के सामने यह काफर की तरह उड जायगी। सोचिपे, क्या बकरा आसमान से टपक पड़ा है ? नहीं है। उसका जन्म फिसी बकरी के गर्म से हुआ है। उस पारी में कितना चारा खाय और कितना पानी पीया | जन्म लेने के बाद उस बछेने कितना चारा खाया और कितना पानी पीया, इसका भी हिसाब लगाना बहुत जरूरी है। अब आप बकरे की हिंसा और धान पैदा करने वाली हिंसा दोनों का मिलान कर देखिये किसमें ज्यादा हिंसा हुई। एक बड़ी बात इसमें और भी रही हुई है। क्या धान आदि के रा पेट भरने वाला उतना क्रूर स्वभाव का हो सकता है जितना मास खानेवाले का होता है ? यदि नहीं तो फिर मास खाने के गुण और धान खानेवाले के अवगुण कैसे गाये जाते हैं, कुछ समझ में नहीं आता। ऊपर ऊपर के विचार करने से पादरी को तो हमने दोषी ठहरा दिया और यह भी कह दिया कि वह अपनी झूठी सफाई देकर लोगों को धोका देता है । पर आपने अपनी खुद की भी कभी बिचारी है । खैर, विषयान्तर हो पाने के भय से इस आई हुई वात को यहीं . पर रोक कर पूर्व विषय पर ही आजाइये । मेने ऊपर कहा था कि मास खान में पाप तो है ही, पर मनुष्य के लिये अस्वाभाविक भी है। यदि स्वाभाविक होता तो बिना शराब व मास के एक प्राणी मी नहीं मिलता । स्वाभाविक उसे कहते हैं जिसके बिना जीवन निर्वाह ही न हो सके । जैसे पानी के बिना प्राणी नहीं जी सकता । पर हम देखते हैं कि शराब व मास के बिना आज करोड़ों की सल्या में जी रहे है। - शराव के कारण कई राजाओंका खून हुआ है और कई शारा वियों ने शराब के नशे में अपनी माँ बहिनों के साथ कु-कृत्य किया है, ऐसा सुनने में आया है । सच बात तो यह है कि शराब पीने पर दिल पर ऐसा नीच असर होता है कि भले बुरे का कुछ भी ध्यान नहीं रहता । यही क्यों, आप चुरुट को ही लीजिये । एक अंग्रेज,विद्वान् को चुरुट पाने का बहुत शौक था । एक दिन उसे चुरट के जोर से नशा खूब चढ आया । उसकी औरत सोई हुई थी, छुरे से उसे मारना चाहा पर थोडी देर में नशे के उतर जाने के बाद इस नीच विचार पर धिक्कार देने लगा। थोड़ी देर पीछे उसने फिर चुरट पिया इस बार उसने अपनी स्त्री को छुरे से मारने का कु-कृत्य कर ही तो दिया। चुरट पीने से जब इतना पतन हो जाता है तब शराब से कितना होता होगा, इसका विचार आपही कीजिये। शराब पीने वालों के हाथ से हजारों सून, हुए हैं । जिस अमेरिका को आप अनार्य देश कहते हैं वहॉवालों ने इसका बहिष्कार कर दिया है। पर आपके आर्य देश में इसकी दिन व दिन बढती हो रही है इसका क्या कारण है ? शराब और मास का ओसवाल जातिने त्याग क्रिया है, पर सुनते हैं कई कौम के दुश्मन ओसवाल नाम धर कर छुपी रीतिसे इसका उपयोग करते हैं | जातिवालों की तरफ से 'इस कृत्य का तिरस्कार होना चाहिये। प्यारे मित्रों ! याद रखिये शराव और मास ने कई देवी-प्रति । .

पालों को राक्षसी-प्रकृतिवाले बना दिये हैं और उनके सुखमय जीवन को दुख में परिणित कर दिया है । G जिस घर में शराब पीने का रिवाज हे, जरा उस घर की दशा तो देखिये ! स्त्रिये बच्चे टुकडे टुकडे के लिये हाय हाय करते है पर वह शराब का शौकीन शराब के नशे में झूमता है ! उसके वन का शक्ति का, समयका नाश होता है, पर उसे कुछ भी पता नहीं। मास खाना अ-स्वाभाविक है, यह मै पहले कह चुका हूँ। मास खाना अच्छा है या बुरा, इसकी परीक्षा अमेरिका में १०००० विद्या- थियों पर की गई थी। पाँच हजार विद्याथियों को केवल शाकाहार-फल- फल अन्न आदिपर और पाँच हजार विद्यार्थियो को मासाहार पर रक्खे । ६ महिने बाद जॉच करने पर मालूम हुआ कि जो विद्यार्थी मासाहार पर रमेव गये ये उनकी वानस्पत शाकाहारखाले सब बातो में तेज रहे। शाकाहारियों में दया, क्षमा, रिता गुण प्रगट हुए और मासाहारियों में क्रोध, क्रूरता, भीरुता आदि । मासाहारियों से शाकाहारियों में बल विशेष पाया गया। इनमें मानसिक विकाश भी अच्छा हुआ । इस फक को देख कर वहाँ के लाखो मनुष्यों ने मास खाना सदैव के लिये छोड दिया। श्री गाधीजी जिस समय पिलायतके एक शहर में किसी के घर निमन्त्रित हुए तो वहाँ क्या देखते है कि बहुत से यूरोपियन शाका- हारी थे, बनिस्पत हिन्दुस्थानियों के । मासाहार मनुष्यों के लिये स्वाभाविक है या अ-स्वाभाविक इसकी जाँच अमेरिका में हुई, उसका नतीजा आपने मुना, अब एक और जाँच आप कीजिये । यह जॉच पशुओं पर से होनी चाहिये । क्यों कि मनुष्य ने अपनी बुद्धि का विकास किया है इसलिये इसने अस्वाभाविक को भी स्वाभाविक मान लिया है। पकौल लोग बेईमानी को जितना सचा -- . , , रूप दे सकते है उतना भोला भाला मनुष्य नहीं दे सकता । पशु पक्षा पढे हुए नहीं है इसलिये प्रकृति के कानूनों को तोडने की हिम्मत इनमें नहीं है। प्रकृतिके कानूनों की परीक्षा इन पर घडी अच्छी रीति से हो सकती है। पशुओं में दो पार्टिये है। एक मासाहारी पार्टी और दूसरी शाका हारी (घास पार्टी ) । मासाहारी पशुओं के नाखून पैने होते है जैसे कुत्ता, विल्ली, सिंह आदि के । और घासपार्टीवाले पशुओं के पैने नहीं होते, जैसे हाथी, गाय, भैस, ऊँठ आदि के । घासपार्टी वाले पशु, मनुष्यों के मित्र रूप है । वे घास खाकर दूध देते हैं पर कुत्ता मास भक्षी होने से रोटी भी खाता है और काटने से भी नहीं चूकता । घासपार्टीवाले शान्त होते हैं और मासपार्टीवाले क्रूर । खाने पीने का असर शरीर पर और मन पर जरूर पडता है। इस बात को मैं गीता से भी पुष्ट कर सकता हूँ। अच्छा, अब मैं मासाहारियों की दूसरी पहचान बतलाता हूँ | मासाहारी पशुओं के जबडे लो होते हैं और घासपार्टीगालों के गोल | 'गाय और कुत्ते के जबडे देखने से यह भेद साफ मालूम होगा । मासाहारियों की तीसरी परीक्षा यह है कि वे पानी जीभ से चपल चपल कर पीते हैं और शाकाहारी होट टेक कर | गाय, भेंस, बदर तथा सिंह, कुत्ता, बिल्ली आदि के देखने से यह भेद मालम हो जायगा। ऊपर की परीक्षा के साथ मनुष्य का मिलान करने से अ-विरोध रीतिसे सिद्ध हो जाता है कि मनुष्य प्राणी मासाहारी बनने योग्य नहीं है। कई विद्वान् डाक्टरोंने यह सिद्ध कर बतलाया है कि घास साने

| वाले, मासखानेवाले और अन्नखानेवाले प्राणियों की आतें एक-सी
नहीं होती।
-
वदर के शरीर में मास को पचानेवाली आतें नहीं हैं इसलिये
वह कभी मास नहीं खाता, फल चट उठाकर खा जाता है। जर विचार
कीजिये जो मनुष्य की शकल का प्राणी (बदर ) है, वह तो मास
नहीं खाता, पर मनुष्य कहलाने वाला मास खाता है ।।
आप जरा पक्षियोंकी तरफ देखिये । आपने कबूतर को कभी
कीडा खाते देखा है।
नहीं
'और कौए को 2
हो।"
क्या आप जानते है कि कबूतर को और कोए को यह पाठ
किसने पढाया
प्रकृति ने
आपने कभी तोतेको मास खाते देखा है ?
नहीं।'
वह आपकी भाषा सिखाने से सीख सकता है। जो मनुष्यकी
भाषा सीखे वह तो मांस नहीं खाता पर जिसकी अपनी भाषा है वह
मनुष्य मांस खाय यह कितनी लजाकी बात है।
अरे मनुष्य ! ह तकदीर लेकर आया है जरा तकदीर पर भरोसा
रस और प्रकृतिके कानून को मत तोड। क्या मासन खानेवाले भूखों
मरते है।
हम देखते हैं कि जितने मामाहारी मूखों मरते हैं उतने शाकाहारी
भूखों नहीं मरते।
.

व्यवहार दृष्टि से शाकाहारी हर प्रकारसे सुखी और मासाहारी दुखी दिखाई देते हैं। प्यारे मित्रों ! मुो विश्वास है कि आप लोग मास का सेवन नहीं करते । ऊपर जो निवेचन किया गया है वह इसलिये कि आप मासके गुण दोप को अच्छी तरह समझ जॉय और इसके सेवन करनेनाले भाईयों को सच्चा मार्ग दिखा सके । भाइयों ! यद्यपि आप माससेती नहीं हैं पर अहिंसावादी और 'अहिंसा परमोधर्म ' के अन्दर विश्वास रखनेके कारण कहा जाता है कि हिंसा के द्वारा होनेवाला आप कोई भी काम न करने में अपना कर्तव्य समझते हैं। मैं चाहता हूँ कि वैसेही आप, जिन चीजों के लिये हिंसा होती है, उसको भी पापपूर्ण समझ कर त्याग कर देंगे। कई चीजें आज बाजारों में ऐसा निरुती दिखाई देती है जो ऊपर से चमकती हुई सुन्दर और साफ दिखाई देती ह पर उनकी बनावट में महा हिंसा तथा घृणित वस्तुओं का उपयोग किया जाता है। आपने विला. यती सफर देखी होगी। मुना जाता है कि कई भाई आजकल मिठाई बनाने में इसका सूत्र उपयोग करते हैं। उनका कहना है कि इसमें मैल कम होता है और देशी सकर के बनिस्पत कुछ सस्ती भी मिलती है। हाय हाय । जो भाई एक चिंटी के मारेन में पाप समझते हैं वे ही अज्ञान से कुछ लाभके लिये धर्म तथा देश को पतन के गहरे गहर डाल देते है। माना कि यह दिखने में साफ और कीमत में सस्ती है पर क्या आपने कभी इसपर विचार किया है कि यह कैसे घृणित प्रकार से बनाई जाती है तथा इसके खाने से शरीर को क्या हानि राभ पहुँ- में चता है - व (१) एन साइक्तो पीडिया ब्रीटानिका' नाम का एक बहुत की शोध के बाद तैयार हुआ अन्य है। जिसके प्राधार पर सरकार फैसला कासन काम म लाया जाता है।' भारत में जो सकर बनाई जाती है उसमें भी पाप होता है पर विदेशी जितना घोर पाप नहीं। भारत में पाई जाने वाली सकर में एकेद्रिय आदि प्राणियों का रिमा होता है पर पनेहियों की-1 आदि- जिन्हें आप माता के नाम से पुकारते है--की नहीं । करती है। उसके ६६७ ॥ पृष्ट पर लिखा है कि- 'सदर साफ करते समय हरेक जायर का रक्त (पून ) तथा एडिया के कोलमे का चूरा डालने में हे () 'सिक्सनरी यॉफ चार्टस ' उठी 'प्रायत्ति लदन, पृष्ट ८२९ में लिसा है कि-'गागदे यनाने में प्रात: उस समय १५ मन सपर में २७ मन हडियो के कोलसे का चूरा ातने में प्राता है (३) स्वामी भास्करा लिसते है कि-"जन विलायत गया तब मन फितने ही सार यनाने के कारयाने देसे । उनले परले सर ( मजिल ) में पहुचते ही, मुझे उलटी होगी, ऐसा मालूम हुा । म नहीं जानता था कि ऐसी अपवित चीजों से मपर बनती हा पर नजरो देखने पर से खेद पाश्चय होता है कि जिन चीजो के स्पर्श से भी महार पाप लगता है, वे हो, हिन्द- लोगा से किस प्रकार पाई जाती है" 'भारत मिा' ता 06-10-११०५ के एक में लिखा है कि- "अच्छी सकर याने के लिये जिस प्रकार इस देशम दृध काम में प्राता उमी प्रकार यहाँ ( विलायत में) जानवरों के लोही स सफर (सॉट) का । कारण कसाईसानों में, दृध के घनिस्पत लाही सस्ता (४) है मैल काटा जाता मिलता है (१) मिरिश कहते हैं कि-'साट सूअर के लोही से साफ करने में श्राती है। (६) ॥ जे टेलर सी ई अपने 'शूगर मशीनरी' नाम के प्रथ लिखते है कि-'इगलण्ड वैगेरे देशों साउ साफ करते समय पानी और (७) परई 'ज्ञान-सागर समाचार' ता १५ १० १९०५ के थक परदेशी सकर नाना प्रकार के रोगसे पीदित सर्व प्रकार के प्यारे मित्रों ! आप इससे यह मत समझना कि मै सकर खाने का पक्षपाती हूँ। मैं तो सकर का कतई बहिष्कार आप लोगो से करताना चाहता है। नारण गह स्वाम्य को नाम करने वाली और शरीर के लिये अ-प्राकृतिक चीज है। की हड्डिये, बल और स्था तथा मनुष्य के मूत्र से साफ की जाती है। जिनकी हवा से भी डरे, ऐसे कोढ वगेर रोगवाले लोगों का भी मून ! (5) 'स्वदेशोन्नति दर्पण -परदेशी सकर अपवित्र हे इतना ही नहीं पर उसके अन्दर छोटे २ प्राणी कीडा मकोडी श्रादि की पाते मास हाड पिंजर तथा शरीर के अन्दर के रेसे होते है। मोरम ग्वाड तो वीट बाजर ताडी वगेरो से बनती है पर उसके अन्दर सडा हुअा लोही तथा रोगिष्ट जानवरों की हड्डियों का मिश्रण होता है। (8) मि फिनल नाम के अग्रज गृहस्थ लिखते है कि-'विलायती साड़, जो भारतवर्ष में फैली हे वह दिखने में सफेद और कीमत में सस्ती पड़ती है, पर उसके कारण बहुत मे रोग हिन्दुस्थान में फैल चुके है । यह खाद शरीर के रक्त को बिगाडती है तथा शक्ति का नाश करती है । दूध श्रादि पदार्थों में अपन इसे ढालते है, पर अपने को मानना चाहिये कि हम ग्बाद नहीं पर जहर डाल रहे हैं। इगलेड और भारतवप के बड़े २ वैद्य और डाक्टरो ने स्पष्ट रूप से अपना मत दिया है कि- यह खाड़ धर्म शास्त्रकी दृष्टि से तो खाना मना है ही, पर इससे प्लेग, महामारी इत्यादि रोग होते है और बालकों तथा बड़ी उमर धाले मनुष्योंकी मृत्यु सख्या बढ़ी है । इसलिये जो धर्मको न मानता हो उसे आरोग्यकी दृष्टिसे भी इसका खाना छोड़ देना चाहिये । (१०) हिन्दी बगवासी ' कलकत्ता ता. ३०-३-१९०३ के अकमें लिखता है कि सिर्फ हिन्दुस्थानमें से २८ लाख मन जानवरोफी हड्डिये, साइ धगैरे पनि के पदार्थ बनाने के लिये विलायत जाती है। स्वदेशी सांद कदाचित परदेशी मे महगी मिले तो भी उसमें पवित्रता गार तन्दुरस्ती है तथा मीडा ज्यादा होता है, उसेही खरीदनी चाहिये । जिसकी शशि स्वदेशी साह वापर की नहीं है, उसे गुद काम में लाना चाहिये इससे गोहत्या अटकेगी श्री शुभारमशाको सन्दि होरर दूध भी दही मगैरे सरने होंगे।

२३ पदि आप इसकी सत्यता की परीक्षा करना चाहते है तो मै आप से पूंछना ह कि क्या आप केवल पन्द्रह दिन तक सकर के ऊपर दिन निकाल सकते हैं। नहीं।' . और रोटियों पर। 'सारी जिंदगी।" तब यतलाईये प्राकृतिक याने शरीर को लाभ पहुँचाने वाली इन दोनेंचौजों में से कौन हुई। लोग कहते हैं 'राडों ने दुनिया को बिगाड़ दिया ।' मैं कहता है कि जितनी खाँड (सकर) ने दुनियाँ को बिगाडा है, उतना नहीं। अकबर बादशाहा के जैसे मुगल राज्य में भारत में ३ से ४ रु. मन तक घी मिलता था। एक रुपैये के ७ सेर वा की बात तो आज भी आप अपने बृढे बडेरों से पूछ सकते हैं। उस समय के लोग आज की तरह चाय की महमानी नहीं करते थे। उस समय चाय का प्रचार हिंदुस्थान में आज की तरह नहीं था। यहाँ चाय का विशेष प्रचार लाई कर्नन के जमाने से हुआ। चाय शरीर के लिये नुकसानकारक और बडी ही अपवित्र वस्तु है । चाप अनेक गरीब लोगों की अश्रुपारा से साँची देशी और विलायती सकर की परीक्षा- (१) देशी और विलायती दोनों सफर को जुदे २ वर्तन में रखयो। फिर दोनों में थोडा २ सफरीक सिंह (गधक का तेजार) डालो। देशी सहर में से तुरत मीठी मट्टी जैमी सुवास और मोरसमे से दुगंध पायेगी। (२) काच के गिलास म गरम पाणी भरकर उसमें थोडी मोरम साकर हालिये गलने समय सूक्षदर्शकयत्र से देखेंगे तो लोही रजकण दिसलाइ नग। Home जाती है, यह आपको अभी मा हम नहीं पड सकती, पर जब इस पर विशेष विचार करने का मौका होगा तब आमको मालूम पडेगी कि किस प्रकार वहनो और बच्चों की हाय हाय और बाय बाय से यह चाय बढाई जाती है । किस प्रकार गरीबों का पसीना और खून एक होता है । मित्रों । ये भाई वहन और बंच और कोई नहीं, आपके भारतीय ही है। इन बेचारों को चाय के खेतों में निर्दय अंग्रेज व्यापारियों के द्वारा सदैव मार सहनी पडती है। क्या ऐसी पापमय चाय का पान करना आप ठीक समझेंगे ?* प्यारे मित्रों ! चाय की ही वजह से आज हिन्दुस्थान में खॉड की ज्यादा मांग बढ़ गई है। लोग यदि नुकसानकारक इस चाय को छोड दें तो विश्वास है कि आपको विदेशी अपवित्र सॉड मगनानी ही न पडे। पहले के लोग सोड के ज्यादा शौकीन नहीं थे। खॉड की मिठा- इये भी इतनी नहीं बनती थीं। लोग ज्यादातर गुड की लापसी से ही अपना काम निकलते थ। भारत के लोगों में ज्यों ज्यों ऐश आरामी बढती गई त्यो त्यों सुख- माल होकर हरेक विलायती चीजों का ही पसन्द करने लगे। पहले के लोगों का सिद्धान्त था- 'मोटा खाना मोटा पहिनना ।' पर अब ' पतला खाना और पतला पहिनना' हो गया है। कहाँ है अब वह बच्चो की सुन्दर हास्यमयी माधुरी और कहाँ है वह जवानों का जोश? प्यारे भाइयों ! आपकी यह ऐश, आरामी बडी खतरनाक है । यह न केवल इहलोक की, पर परलोक की भी टु ख देनेवाली है । ® चाय पर विशेष विचार किसी अगाडी की पुस्तक में प्रकाशित किया जायगा। -सम्पादक।

इहलोक की तो यों है कि इसके प्रताप से आप दिन दिन शक्ति हीन हो रहे हैं, और शौकिनी चीजें करीब करीब तमाम ही विदेश से आने से दरीदी भी। और परलोक की यो कि शोक करने की जितनी भी बाजें आज दिखाई देती हैं ये प्राय. महापाप से बनती हैं। शौक की चीजों में सबसे पहला नबर कपडे का है । आज कल कपडा प्राय, विलायत से आता है। यह दिखने में चटकीला मटकीला और सुन्दर होता है पर कई विद्वान् अंग्रेजों ने अपनी पुस्तकों में लिखा है कि इनके बनाने में चर्चा आदि काम में लाई जाती है। सुना गया है कि ची योग्य प्रमाण में सीधी न मिल सकने के कारण कसाईखानों में सैकडो भूक गरीव प्राणियों का वे-रहमी के साथ नित्य करल होता है। मित्रों । यह कलखाना आप लोगों ओर केवल आप लोगों के लिये चल रहा है। यदि आप अपनी मौज शोक को कम कर दें तो यह होनेवाला भयकर हत्याकाड शीघ्र वद हो सकता है । मेरा यह कटाक्ष न केवल विदेशी वस्त्रो की तरफ है पर उन वस्त्रों की तरफ भी समझिये जो भारत की मिलो में तैयार होते हुए मी ची आदिसे बचे हुए नहीं हैं । मित्रो । जरा विचार तो कीजिये कि आप किसकी सन्तान है। आप उन वीर क्षत्रियों की सतान है जिन्होंने दूसरों की रक्षा के लिये अपने शरीर का मास काट कर दे दिया पर उस शरणागत का एक बाल भी बाँका न होने दिया । आप लोग इस वार का नाम जानते है ? इस चौर का नाम धावाजा मेवरथ । एक दिन की बात है, राजा मेवरथ अपने धर्मस्थान में बैठा हुआ था। एक भयभ्रान्त कबूतर उडता हुआ उनकी गोद में आ गिरा } बोला-

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शिकारी- कैसे ?"
राजा--" मुझे यह कबूतर पसद आगया, मैं इसके बदले मे, तू
मागे सो देनेको तैयार हूँ।"
शिकारी-
ऐसा ? अच्छा, मैं मॉगूगा वह देगा 2"
राजा-
शिकारी-" देखना, अपनी जबानसे फिर मन जाना। में ५सी
वैसी चीज मागनेवाला नहीं हूँ, या मुझे अपनी शिकार दे दे।"
कबूतर को छोडकर चाहे सो माग ले सब कुछ देनेको
"
बरावर ।"
तैयार हूँ"
शिकारी- अच्छा तो मुझे इस कबूतरके बराबर अपने शरीर का
मांस दे दे।"
मित्रों ! राजा मेघरथ अपने शरीरको नाशवान् समक्ष कर इस
चातको कबूल करता है और अपने शरीर का मास काट कर दे देता है।
जिनफे पूर्वज एक प्राणीकी रक्षाके लिये अपने शरीर का मास
काट कर देना कबूल कर लेता है पर प्राणी की हिंसा नहीं होने देता है,
भब उन्होकी सतान अपने तुच्छ मौज-शौक के लिये हजारों प्राणि-
में के नाश को देखकर भी हृदय में दया न लाये उन्हें क्या कहना
गहिये है
आपके पूर्वज पहले बिमा चौंका, देशका बना कपडा पहनते
-जिसे आज के लोग खादी' के नामसे पुकारते है।
मित्रों ! सादी के उपयोग से म केवल पैसेकी ही बचत होती है
धर्म भी होता है।
!

६८ विलायती कपडों का नव इस देश में प्रचार नहीं या तन लाखों मनुष्य इसी वधे के द्वारा अपने पेट भर लेते थे। इतिहास कहता है कि बाद में सार्थी अंग्रेजोंने उन विचारे गरीबों के अगुठे कटवा लिये और अपने देश (विलायत) के यत्रों का यहा प्रचार वढा दिया | मिल भी यहा भेज दिये गये। इन मिलों से भी देशके मनुष्योंकी क्षति कम न हुई। सैकडों मनुष्योंकी रोटी पर कुछ मनुष्य ही हाथ साफ करने लगे और बाकी के भूखों मरने लगे। देशका सौभाग्य समझिये कि कई धर्म गुरुषों और देशके नेताओंने इस भयकर अत्याचार को पहचाना और चर्खे का पुननिर्माण किया । चई के द्वारा आज फिरसे सैकड़ों भाई-बहनोंको रोटी हाथ आने लग गई। जो भाई खादी का उपयोग करता है, वह गुप्त रीतिसे इन गरीब भाई वहनों को मदद पहुंचा कर पुण्योपार्जन करता है , ऐमा माना जाता है मित्रो ! याद रखिये, खादी सादी और देश की आजादी है। मित्रों, क्या आप जानते है कि देश पराधीन का होते है ! , नहीं।" मैं बतलाता हूँ। जो देश वस्त्र और रोटी के लिये दूसरे का मुँह नहीं ताकता, वह कभी पराधीन नहीं हो सकता पर जो इन दो बातों के लिये दूसरों की तरफ देखता है वह गुलाम बने बिना नहीं रह देश वस्त्र से तो गुलाम धन हो चुका, अब रोटी के लिये भी के पास हाथ पसार ने लग गया है। मित्रो ! रोटी से मतलब आप अपने घर जैसी रोटी की ही बात मत ममझ लेना । रोटी से मेरा मतलब खान पान की चीजों से है।

. विस्कुट विलायत आते हे, आपके कई देश भाई उनको मजे से खाते है, यह रोटी की पराधीनता नहीं तो और क्या है ? सुनते हैं, देश में ' वेजिटेबिल ' नाम का नकली घी (!) तो फैला ही था, अब एक प्रकार की लकडी का भाटा भी आने लग प्यारे भाइयों । ये विस्कुट, यह घी, और यह आटा आपके शरीर का कितना नाश करने वाला है ? विस्कुट आदि खाद्य पदार्थ किस प्रकार सडा कर बनाये जाते है और आप लोग उसके डिब्बों पर के चटकीले सुदर मनमोहक लेबिल देख कर किस प्रकार खरीद कर पेट में रख देते है। पहले के लोग देशी सादी जतियें पहनते थे, पर अब आप में से अधिकाश लोग पिलायती वटों का उपयोग करना ज्यादा पसन्द करते हैं । देशी जूती मरे हुए जानवरो के चमडे से बनती है पर विलायती बूटों के लिये सको पशुओं का कत्ल किया आता है । चमडा जितना मोटा और मुलायम हो उतना ही वह अच्छा गिना जात है। इसी कार्य को सिद्ध करने के लिये हत्यारे लोग पशुओं को पहले खरीद लेते हैं, बाद में कई दिनोंतक भूखों रख कर उनकी चर्बी गला देते है, फिर लहों की मार से वे इस बुरी तरह से मारते हैं कि उनका सारा शरीर रोटी की तरह फल जाता है। अन्त में ये हत्योर कत्ल करने की मशीनों के भगाडी हरा हरा कोमल घास डालते है। ये विचारे अनेक दिनों के भूखे प्यासे अबोध पशु अपने पेट की तीन याला मिटाने के लिये ज्यों ही खाने के लिये उस पर मुंह डालते हैं त्यों ही मशीन की मोटी और चमचमाती हुई तेज तुरी कर-र-र करती हुई उनकी गर्दनों पर घे रहमी में गिर कर उनके मिर को धड़ से अलग कर देती है। उट- पटाते हुए उन पशुओं के शरीर, निकलती हुई उनमें से खून की अनेक

७०
तेज वाराऐं गौर नाचती हुई उनकी पुतलिये देख कर उस समय किस
का हृदय करुणा से न उभरेगा ? कौन उस विभत्स दृश्य को देख रोमा-
श्चित न होगा ? और कौन कठोर हृदय उस अवसर पर न रो पडेगा 2
मित्रों ! क्या मौज शौक के तुच्छ सुख के लिये ऐसे भयानक
हत्याकाड का भागी बनना योग्य है ? यदि नहीं, तो आप सिर्फ बूट ही
नहीं, पर ऐसे ऐसे भयानक हत्याकाण्ड जिस वस्तु के बनाने के लिये रचे
जाते हो, उन सब का त्याग कर दीजिये ।
मित्रों ! आप मेरे पास दया देवी के दर्शन करने के लिये है।
तो आये हैं न
श्रावक -'जी हॉ।'
2
क्या आप जानते हैं कि दया देवी का मान्दर कहाँ हैं।
श्रावक- हृदय में।'
भाई साहबों ! दया माता यदि हृदय में होती ते दया के उपदेश
देने की जरूरत ही नहीं पड़ती। हदय में दया हो, क्या ऐसी हालत
में दिया दया' पुकारने की जरूरत पड सकती है?
नहीं।'
जिसके शरीर मे चैतन्य है उसे फिर कोई बुलायगा ?'
-
नहीं।
प्रया चैतन्य छिपा रह सकता है ?
नहीं।'
प्रिय मित्रों ! जिस प्रकार आप लोग वर्म की स्थूल क्रिया करने

७३ शास्त्रकी बात इस समय कुछ न कहकर पाश्चात्यों का इस विषय पर स्पा मत है, साइन्टीफिकिस्टोंने इस पर ज्या राय जाहिर की है, यह सुनिये---- ये कहते हैं कि प्रकृति की वस्तुओ में गति की प्रतिगति और माघात का प्रत्याघात होता रहता है। उदाहरण रूप एक पर्वत के पास नाकर मावाज दी गई कि 'तुम्हारा धाप चोर !' तो उसकी प्रति पनि निकलेगी- 'तुम्हारा बाप चौर।' जैसी धनि की जायगी वैसी ही प्रतिध्वनि निकलेगी। अगर कोई अपने चापको चोर कहताना चाहे तो उसे कहे कि तुम्हारा वाप चोर ।' यदि न चाहे तो न कहे । जिस प्रकार प्रतिध्वनि में ' तुम्हारा बाप चौर' कहा, इससे तुम्हें दुख होता है, ऐसा समझ कर किसी को कट शब्द कभी न कहने चाहिये । मगळ से मगल और अमगल से अमगल होता है। गति की प्रति- गति और अघात का प्रत्याघात होता रहता है। जो पार्ट आज दूसरों से करवाते हो, वही पार्ट कभी तुम्हें करना पडेगा। साराश यह कि यदि तुम किसी को कष्ट दोगे तो तुम्हे कष्ट मिलेगा। तुम किसी के प्राण लोगे तो कभी तुम्हें प्राण देने पड़ेंगे। शस्त्र से गर्दन उडाओगे तो वापस गर्दन उडेगी। मास खाओगे तो अपने शरीर का मास खिलाना पडेगा। हॉ, एक बात जरूर है, जीवन निर्वाह के लिये प्रकृति की शोभा न बिगडे, इसको ध्यान में रखकर सरलता से, बिना किसी को दुख दिये अपने निर्वाह का आयोजन किया जाता है, उसे अधर्म नहीं कह सकते । धर्म किसी का नाश नहीं चाहता। जो मनुष्य नीति से पैसा पैदा करता है, उसे कोई चोर बदमाश कह कर दड देता है ? नहीं।'

? प्राणी आज सतंत्र नहीं है, इन परतत्रता को जजीरों से जकाडे हुओं को मुसानेवारा कौन है? ये विचार परतंत्र पर मारनवारा भी फौनसा स्वता है। यह भी परतर है। यदि परतन्त्र न होता तो उसे यह पापमय काम ही क्यों करना पड़ता किसका परतत है ? कौन इसको गुलाम बनाये रक्खा है ? उत्तर मिलता हे-तृष्णा, लोभ, मोह और अज्ञानता आदि का यह दास है। वह मोह से रागान्ध मनुष्य उसके प्राण लेकर अपना बनाना चाहता है। हैं। वह उसका मास साकर अपना मास बढाना चाहता है, उसको मार कर अपना पोषण करना चाहता है । उसके प्राणों की इसे तनिक भी परवाह नहीं, उसके दुःख से कुछ भी करुणा नहीं आती । पर इसे विचारना चाहिये कि यदि ऐमा ही समय मेरे लिये आयगा तो मेरा क्या हाल होगा? मनुष्य उस प्राणी को किस कसूर से मारता है ? किस गुहे से वह मारा जाता है ? क्या उसने गाली दी ? क्या उसने कुछ हरण किया। 'नहीं' तर क्यों मारा जाता है ? ये बिचारे तमाम भद्र प्राणी है । इनमें से बहुत से घास खाकर तुम्हारा रक्षण कर रहे हैं । ये प्रकृति को शोभानेवाले हैं। इन शोभाने वालोंको मारकर लोग अपना काम निकालते हैं तथा खाने में मजा मानते हैं। इन मनुष्यों की मजा में उन बिचारोंकी कजा होती है। इस कजामें मजा माननेवालों का कुछ हिसाव होता है ? हाँ।' क्या? - - . - शास्त्रकी बात इस समय कुछ न कहकर पाश्चात्यों का इस विषय पर क्या मत है, साइन्टीफिकिस्टोंने इस पर क्या राय जाहिर की है, यह सुनिये-- वे कहते हैं कि प्रकृति फी वस्तुओ में गति की प्रतिगति और बाघात का प्रत्याधात होता रहता है। उदाहरण रूप एक पर्वत के पास जाकर आवाज दी गई कि 'तुम्हारा धाप चोर ।' तो उसकी प्रति पनि निकलेगी- 'तुम्हारा बाप चोर।' जैसी पनि की जायगी वैसी ही प्रतिध्वनि निकलेगी। अगर कोई अपने बापको चोर कहाना चाहे तो उसे कहे कि तुम्हारा बाप चौर ।' यदि न चाहे तो न कहे । जिस प्रकार प्रतिध्वनि में तुम्हारा बाप चोर' कहा, इससे तुम्हें दुख होता है, ऐसा समझ कर किसी को कटु शब्द कभी न कहने चाहिये । मगल से मगल और अमगल से अमगल होता है। गति की प्रति. गति और अधात का प्रत्साघात होता रहता है। जो पार्ट आज दूसरों से करवाते हो, वही पार्ट कभी तुम्हें करना पडेगा। साराश यह कि यदि तुम किसी को कष्ट दोगे तो तुम्हें कष्ट मिलेगा। तुम किसी के प्राण लोगे तो कभी तुम्हें प्राण देने पडेंगे। शस्त्र से गर्दन उडाओगे तो वापस गर्दन उडेगी। मास खाओगे तो अपने शरीर का मास खिलाना पड़ेगा। हाँ, एक बात जरूर है, जीवन निर्वाह के लिये प्रकृति की शोमा न बिगडे, इसको ध्यान में रखकर सरलता से, बिना किसी को दुप दिये अपने निर्गह का आयोजन किया जाता है, उसे अधर्म नहीं कह सकते । धर्म किसी का नाश नहीं चाहता । जो मनुष्य नीति से पैमा पैदा करता है, उसे कोई चोर बदमाश कह कर दंड देता है ? 'नहीं। - .

पर जो नीति अनीति का कुछ भी खयाल न कर केवल पैसों से अपनी जेब भरना चाहता है उसे कोई क्या कहेगा ? 'चोर , बदमाश आदि। उसे दड मिलेगा? अवश्य । यही बात अपने निर्वाह कार्य के लिये समझनी चाहिये । जो अपने मौज शौक के फतूर में आकर मूक प्राणियों का वध करता है, उसे भी दड मिले बिना न रहेगा। माता के स्तन से बालक दूध पीता है यह उसका धर्म है, पर जो बालक माता के दूध की जगह स्तन का खून पीना चाहता है, क्या उसे कोई बालक या पुत्र कहेगा? 'नहीं।' लोग उस बालक को चालक या पुत्र नहीं पर जहरीला कीडा कहेंगे। यह प्रकृति गौ, भैंस, बकरी आदि से दूध दिलाती है। जगत का इससे बड़ा उपकार होता है पर लोगों की अजब ताकीद इन उप- कारी पशुओं का जल्दी खात्मा कर, एक दो दिन पेट भर कर ज्यादा दिन तक पेट भरने वाले घी दूध के स्त्रोत को बद कर देती है। इसका मतलब यह हुआ कि फलों को धारे धीरे आते देख कर वृक्ष का मूलोच्छेदन कर दिया गया। इन विचारे मूक प्राणियों की वकालत कौन कर ? गजब की बात है कि साक्षात् इनकी करुणामरी चीख को सुनकर भी हत्यारों का दिल पत्थर-सा क्यों रहता है। परतत्र है इसलिये। इनको काम क्रोध मोह , ७५ आदि ने अपने वश में इस प्रकार कर लिये है कि इनको कुछ सूमता ही नही. आप लोगों में से बहुत से भाई निर्मासाहारी है। ये अपने मन में सोचते है कि मासाहारी ही पापी होते हैं, हम तो इम पाप से बचे हुए हैं। लोगों को दूसरे की बात की कडी टीका सुन कर मजा आता है पर जब उनके स्वार्थ के काम की कोई टीका करता है तब उनको अच्छी नहीं लगती। अच्छी लगे या न लगे सबा आदमी तो गुण दोप वतला ही देता है। जो केवल मासाहारियों को ही पापी समझता है उसे चाहिये कि पहले अपने थोकडे खोलकर देखें कि उसमें कितने प्रकार के पाप बत- लाये है। क्या उन पापों का करने वाला पापी नहीं गिना जायेगा । जरूर गिना जावेगा।" जैन शास्त्र के अन्दर १८ प्रकार के पाप माने गये हैं। जैसे- झूठ, चोरी, जारी, क्रोध, मान आदि करना। जो इन पापों का सेवन करे और धर्मात्मा बनने की डीग मारे क्या यह वास्तव में धर्मात्मा है ? नहीं। मित्रों जैन सिद्धात को यदि कोई ठडे मस्तिष्क से विचारेंगे तो पता चलेगा कि यह कैसा पूर्ण है। इसकी आदि से लेकर अन्त तक की तमाम बातें ठीक उतरती हैं। हिसाब करनेवाले बहुत मिलेंगे पर आना पाई तक का हिसाब मिलाने वाले को क्या आप बड़ा बुद्धिमान म कहेंगे? कहेंगे।' पाप से बचना चाहिये 'धर्म करना चाहिये' इस प्रकार बहुत से भाई कहते है, पर पार्यों से बचने का और धर्म को करने का बहुत - , । - -- . कम भाई विचार करते है। ये माई कसाई को बुरा कहते है, पापी समझते हैं, पर स्वय जालसाजी करने से बाज नहीं आते, कपट करने से नहीं चूकते, दूसरे पर दोष मॅढने में नहीं भूलते, गरीबों के गले दबाने में भय नहीं खाते, झूठे मुकदमे चलाने में शर्म नहीं लाते, बिलकुल खोटी गवाहिये दिलाने में पैर पीछे नहीं रखते, दूसरे के धन को स्वाहा करने में नहीं हिचकते, पराई स्त्रियों पर खोटी नजर रखने में घृणा नहीं लाते। कहाँ तक कहें, ये पाप करते है पर पापी कहलाने में अपनी तौहीन समझते है। कसाई छुरी फैर कर कत्ल करता है, पर ये कलम को चला कर ही कई बार कइयों की एक साथ हत्या कर डालते हैं। विचारा कसाई हत्या करके हत्यारा कहलाता है पर ये कई हत्याएं करके भी धर्मात्मा बने रहते हैं। ये लोग यह नहीं समझते कि जैसे हम फंसाते है, वैसे हम भी फंसाये जायेंगे, हम मारते हैं पर कभी हम भी मारे जायेंगे | आघात का प्रत्याघात हुए बिना न रहगा। मित्रो ! शास्त्र कहता है कि एक बार तमाम प्राणियों को अपनी आत्मा के तुल्य देख जाओ फिर पता लग जायगा कि दूसरों को दुख कैसा होता है। "आत्मौपम्येन पुरुषः प्रमाणमधिगच्छति।" आत्मा के तुत्य तमाम प्राणियों को देखने पर सुख दुख की साक्षी तुम्हारा हृदय अपने आप देने लग जायगा। आपको शास्त्रों के देखने की जरूरत न रहेगी, सच्चिदानद अपने आप शास्त्र का सार बतला देगा। मित्रों ! मनुष्य को दूसरे के भले बुरे कामों की मालूम पड जाती है पर उसमें स्वय में कैसे कैसे भले बुरे गुण हैं, यह मालूम बहुतों को नहीं पड़ती। उनको तो तभी गायम पडती है, जब लोग उनके गुणों पर कुछ टीका टिप्पणी करने लगते है। जो मनुष्य अपने गुणों की टीका देखकर उनको सुधारने की कोशीश करता है यह बुद्धिमान् गिना जाता है। मित्रों । अपनी आत्मा हिंसक को देख कर-शिकारी को देख कर उसे झूर दुष्ट कहती है पर अपनी आत्मा ने भी अनेक वार जीवों को मारा होगा, उन्हें कष्ट पहुंचाया होगा। 'हे आत्मन् ! अब तू शिकारी नहीं है, हिंसक नहीं है यह तू समझ गयी हो तो अब अज्ञान के जाल में मत पड़ना ।' ऐसी भावना . कीजिये। " भावना से आपकी आत्मा में अजन शक्ति चमकृत होगी और आपको थोडे ही दिनों में आनन्द का अनुभन होने लगेगा। यह आनन्द पोडे प्रमाण में न मिलेगा, पर इतने प्रमाण में मिलेगा कि आप उम्र. आनन्द की भेट दूसरों को भी कर सकेंगे। एक बात जरूर है, और वह यह कि यह भावना सार्थ की न हो। इस भाषना में 'मुझे धन मिले' 'पुत्र मिले। 'स्वर्ग, मिले, में इतना वैभवशाली बनू' राजा बन जाऊँ' 'बादशाह बन जाऊँ आदि की कक्षा न हो। भावना अपने लिये न हो पर ससार की कल्याण कामना की हो। उसमें प्रार्थना की जाय कि- दयामय, ऐसी मति हो जाय । त्रिभुवन की कल्याण कामना दिन दिन वढती जाय। टेका।। औरों के सुख को मुख समझू, मुख का करूँ उपाय । अपने सब दुखों को सहलँ, पर दुख सहा न जाय ॥१॥ भूला-भटका उलटी-मति का, जो है जन समुदाय । उसे दिखाऊँ सच्चा सत्पथ, निज सर्वस्व लगाय ॥ २ ॥ -- . जन आप ऐसी भावना करने लग जायेंगे तब आपकी आत्मा में अपूर्व जागृति उत्पन्न होगी । आपका सचिदानंद प्रगट हो जायगा और मुस्कराता हुआ घोषणा करेगा कि- 'मित्ती मे सव्व भूयेसु ।' * अभी तो आप परदेशों से धन कमा लाते है और यहाँ (मार- वाड में ) आकर गप्पे मारा करते हैं पर उक्त घोषणा होने पर क्या आप इस प्रकार निकम्मे बैठे रहेंगे ? उस समय आपको एक क्षण का विश्राम लेना भी ओचित्य से परे मालूम होगा। उस समय आप के जीवन की वह धारा जो अबलवेग से नीच स्वार्थों के गहन गहर में पतित हो रही है, निस्वार्थ की मदाकिनी का रूप धारण कर धराधाम पर शान्त गभीर गति से प्रवाहित होने लग जायगी। आप के जीवन की वह धारा जो अभी ईपी, क्लेश, दुःख, आदि के विपैले पौदोंके बढाने में सहायक बनती है, उस समय प्रेम, हर्प, मानन्द, शान्त्वना आदि की वल्लरियों को नव-पल्लवित करने में आधारभृत-सी होकर अखिल विश्व के सर्व प्राणियों की गुप्तरूप से सेवा वजायगी। याद रखिये, आपको शास्त्र में धिम्म सहाया अर्थात् धर्म के अन्दर सहायता देने वाले कहे हैं। क्या गप्पे मारनेवाले कमी- धर्म के सहायक कहला सकते है ? नहीं।' धर्म के सहायक वे ही कहला सकते हैं जो सयं धर्म नियमों का सन्ताप . # 'सब माणो मेरे मिनह।'

. . पाटन करते हैं तथा सबै दृदय से प्रेममयी भाषा में दूसरों को उसका धोध कराते है। गाये मारनेवाले सय तो पाप वाँधते ही है पर दूसरों से भी वधपाते है। क्यों कि इन चोयी गप्पों में दूसरों की निंदा, दूसरों की गली और दूसरों की खोटी-ओखी ही का मुख्य विषय चलता रहता है। आपस झट माज खूब बढ़ रही है इसका मुख्य कारण क्या? ये ही गप्पें।' मित्रों ! यदि आपके कुछ काम नहीं है तो व्यर्थ की बातें मत मारो, फजूल गप्पें न उटाओ। इन बडबडाहटों से आपकी आध्यात्मिक शक्ति कम हो जाती है । अत एव अवकाश के समय मौन का अप- लम्बन करो । मौन साधारण को शक्तिमान् पुरुप बना देता है। जब किसी एजिन की शक्ति को काम में लानी होती है तब मशीन चलानेवाला कारीगर उस मशीन की शक्ति को सचित कर लेता है। बुद्धिमान् मी उस एजिन चलानेवाले कारीगर की नाई अपने मस्तिष्क की शक्तियों एकत्रित करके उनको रोकी हुई रखता है ताकि जब ओर जहाँ चाहिये वही उनका उचित और सशक्त प्रयोग करके वह अपने भावश्यक कार्य को सफलता के साथ सम्पादन कर लेता है । बक- झक करने वाले में यह शक्ति नहीं होती। यदि व्यर्थ की बकझक की टेव लोगों में न होती, फजूल की निंदा करने का अभ्यास लोगों में न होता, अकारण गप्पों के लिये लोग अपने अमूल्य समय का नाश न करते तो आपकी समाज में ये दल- बदियें, ये धडे और ये पार्टियें कभी नहीं दिखाई देती । मित्रों ! मैं पहले कह चुका हूँ कि वे फैलाना हिंसामें गिना उपा है, अतएव द्वेप बुद्धि छोड दीजिये। आप ' औरों के सुखको ,

८०
'देख कर कभी न जल्गा' इस मत्रका जाप कीजिये, पवित्र बन जायेंगे।
मैं आपको वेद सुनाऊँ, पुराण सुनाऊँ या कोई धर्मशास्त्र सुनाऊँ, सनमें
यही चात मिलेगी।
कई भाई कह सकते है कि दूसरोंके सुख से हमें क्या फायदा
आप इस भेद के पर्दे को उठा डाल्येि फिर देखिये क्या आनंद
आता है । आप यदि इस पडदे को उठा-देंगे तो ईश्वर के दर्शन
हो जायेंगे।
जानू हरि दूर है, हरि है हिरदा मॉय ।
आडी टाटी कपट की, तासे सूझत नॉय ।।
(कबीर)
ईश्वर कहता हे-हृदय शुद्ध करो, विश्वास रखो, मेरे दर्शन पा
नाओगे । इसके बिना मेरी भेट के लिये भटकते ही रहो पर कहीं न
पाओगे।
हृदय शुद्धि का उपाय वही है जो मैने ऊपर बतलाया या
अर्थात् दूसरे के सुख को देख कर सुखी बनो यही हृदय शुद्धि का उपाय
मै
।
-
मेरा अनुमान है, ऐसी हृदय शुद्धि आप लोगों ने नहीं की । आप
कहेंगे कैसे ? सुनिये-
किसी के मकानमें सरकारने मुफ्त में नल लगवा दिया । अब
उस मनुष्यको कितना सुख होगा ? वह समझेगा-अहा, मेरे उपर
सरकारको कितनी महरवानी मेरे घरमें नल लगाकर मेरी इज्जत की
गई है । है कोई मेरे समान दूसरा कोई इज्जत का पात्र
इस प्रकार मुफ्त में नल लगाने से इस भाईको कितनी खुशी हुई
2

पर नव सरकार, जिस प्रकार इसके घरमें नल लगाया यदि उसी प्रकार सबके घरमै नल लगवा दे तो उस भाईको उतना आनन्द होगा ? नहीं। वह समझेगा-'याह, इसमें क्या हुआ ? सब के घरों में छगाया पैसे मेरे घर में भी क्या सब के घर में नल लगाने से वह नक खोटा हो गया ? नहीं। पर उस भाई के हृदय मे द्वेप उत्पन्न हो गया, इसलिये पहले जो मुंठों पर ताप देता था, वह भूल गया। जब उसके घर में नल लगा था तब वह समझता था कि में बड़ा और सब छोटे। पर जब सब के घरों में नल लग गये तब कहने लगा- इसका क्या ।" इसी प्रकार में वहनों की बात कहता हूँ- एक सेठानी सोने के दागीनों में हीरों जडी बगडिये पहन कर दो चार गरीब दासियों के साथ लटपट करती चलती है, तब समझती है- 'मैं बडी । पर जब किसी देवता के प्रताप से उन गरीब दासियों को हारे के दागीने मिल जाये तो उस सेठानी को कितना दुस होगा। उस सेठानी से पूँछा जाय- क्या ये तेरे बाप का छूट कर लाई हैं, जिसमे तुझे इतना दुख होता है? मित्रों ! इस प्रकार की द्वेष बुद्धि छोड दो और उपरोक्त मत्र का जाप करो। रामचन्द्र, हरिश्चन्द्र और पांडवों की लोग स्तुति क्यों करते हैं। इसके विरुद्ध, रावण, फस और कौरवों को लोग विकार क्यों देते हैं।

.. . इसलिये कि वे दूसरोके दुश्वको अपना' दुःख और दूसरों के सुख को अपना सुख समझते थे। स्मरण रहे, वे चीर ये और वीरों से ही दया. (अहिंसा) होती है। अहिंसा क्षानधर्म के बिना नहीं पाली जाती । धनियाशाही के हाथों में जब से हिंसा आई है तब से यह कायरों का चिन्ह बन गई है। मित्रों ! आप (मोसवाल भाई) किसी जमाने में क्षत्रिय थे। आपके अदर क्षत्रियान का खून दौडना चाहिये। जितने तीर्थकर हुए हैं वे सब क्षत्रियनश में उत्पन्न हुए है। यह धर्म (अहिंसा) कायरों का नहीं है। आप रामचन्द्र की कथा सुनिये-- जिस समय महाराणी केकई, महाराजा दशरथ से राम को वन- पास और भरत को राज्य मिलने का वचन देने को कहती है, उसे सुन कर दशरथ मूर्छित होकर गिर पडते हैं, इतने में राम आते हैं। पिता को मूर्छित अवस्था में देख कर केकई से पूँछते हैं- "माता जी! क्या बात है, जो आप भी उदास हैं और पिता जी भी भूमि पर पड़े हुए है ?" केकई विकराल सिंहनी के रूप में बैठी थी, लाक लाल आखें कर बोली- क्या बात है ? बात क्या हो, यही बात कि तुम महाराज के पुत्र हो, वैसे मेरा पुत्र भरत नहीं है। माता जुदी जुदी हुई : तो क्या, पिता तो एक ही है।" "हाँ माता जी! आप सही फरमाती हैं। कैकई- " तब तुम्हें राज्य मिले, और मेरे बेटे को नहीं ?" - - - - - रोम--- "क्यों नहीं माता जी, जर मिरना चाहिये।" काई- "राम, तुम मोठे बहुत घोरते हो, पर अब मैं तुम्हारे फंदे में नहीं आने की।" नहीं आना चाहिये माता जी!, यह आपका फरमाना बहुत ठीक है। राम-( पिता की तरफ मुगातिय होकर ) पिता जी ! पूज्य पिता जी !! आप वीर क्षत्रिय हैं, आपको माता के वचन मुन कर घबराना न चाहिये । आप गौक से माता के वचन को पूरा कीजिये। मुझे वन जाने में कोई दुख नहीं है। मित्रों । आपमें ऐसा भ्रातृ प्रेम या मातृ प्रेम है ? आज भाई भाई छोटी छोटी बात के लिये सिर फोडने को तैयार हो जाते हैं। कोटों तक मुकदमा बाजी चलती है । मैंने सुना था कि बरई के अन्दर दो माईयों ने अपने धन का बराबर हिस्सा बाँट लिया, पर बडे भाई का बोया हुआ एक सुपारी का पेड, छोटे भाई की जमीन के हिस्से में आ गया। यडे भाई ने कहा- मैंने इस पेड को बोया है, इसलिये इस पेड पर मेरा हक है।' उत्तर में छोटा भाई बोला-' तुमने बोया तो क्या हुआ, मेरे जमीन के हिस्से पर है, इसलिये एक वर्ष सुपारी तुम लो और एक वर्ष इम' बडे भाई ने यह बात नहीं मानी । आखिर, कोर्ट में मुकदमा चगा खों साये खर्च हो गये । जज एक दिन,इन्कायरी करने के लिये उस ने को देखने आये । यहाँ आकर कहा-' काट दो इस माशकारी . नेह को, जिसके कारण इतनी तकलीफ उठानी परी ।। "

-
आखिर, पेड काटा गया। तब जाकर कही उन भाइयों को
शान्ति आई।
सुपारी का पेड काटना जितना उन्हें श्रेय लगा, उतना एक के
पास या आधा आधा देने में राजी न हुए।
मित्रों ! कह। यह भाइयों का नाशकारी मुकदमा और कहाँ राम
का भाई के लिये राज्य को ठुकरा देना ।
फेकई दशरथ से कहती है.--" पहले वचन देना सहज था अब
पालना मुश्किल है।
राम कुछ अन्याय से कहती होऊँ तो तुम बोलो ।
राम-नहीं माताजी | आप अन्याय कैसे बोल सकती है?
आप तो यह राज्य भरत के लिये मेरे भाई के लिये मॉगती हो, न्याय
के अनुसार किसी रास्ते चलने वाले के लिये मांगती तो भी अनुचित
नहीं था।
राम ने दूसरे के सुख के लिये वनवास ग्रहण किया था। बुरा क्या
हुआ ? लौटते समय लंका का राज्य अपने साथ और लेते आये ।
मित्रों । " दूसरों का सुख चाहो" इस मन की साधना अब और
बतला कर क्या करूं? आप समझ ही गये होंगे ।
-
.
यहाँ पर हमने मोटी मोटी बातों का थोडे में दिग्दर्शन कगया है ।
हिंसा अहिंसा का विषय महान् है। सपूर्णता से कहना, हमारी बुद्धि
से परे बात है। शास्त्र के अन्दर गणवरों ने इस विषय पर अच्छा
प्रकाश डाला है, सद्गुरु के द्वारा उनके परिश्रम का लाभ लेना बडा,
शुभदायी होगा।

विशेष कर उपदेशकों का है कि वे नामश कर्तव्य पालने का उपदेश दूसरा भातर यह है कि नाक को शू हिंसा का सर्वथा त्यागी तो होगा पडता ही है पर लक्ष्यों को भी जहाँतक बन पडता है, (हा का ध्यान रखता है। हो, पहला काम उसका स्थूल जीवों की रदा करना है। मिध्यावी में यह बात नहीं होती। गांका पड़ने पर पर इस नियम फा हद के पार भी काम कर वेदना है। मित्रों ! हमने ऊपर मिस श्रावक के गुण बतलाये है, ये विवेकी भावक के समझने चाहिये। केवल नामधारी आज कल के प्रारकों यह गुण बहुत कम देखा जाता है। क्यों कि सचे उपदेश के अमात्र से उन्हें कर्तव्याकर्तव्य का ज्ञान कैसे प्राप्त हो सकता है। कर्तव्या- कर्तव्य का अर्थ अन्डी तरह न समझ सकने के कारण ही बहुत से माई कर्तव्य के पालने में है। यह दोष, पालनेवाले माईयों का कम भशो में दिखाई देता है। मेरी समझ में यह दोप म नहीं देते, या शास्त्रों का कुछ का कुछ अर्थ समझा देते हैं। याद रखिये, जो साधु के कर्तव्य को गृहस्थ से पालने को कहता है वह उसे अपने माग से युत करता है। आज गृहस्य (श्रावक ) के सिर पर सूक्ष्म की रक्षा का अर्थात् थावर जीवों की रक्षा करने का भार इतना डाल दिया कि वे इसका विशेष ज्ञान न रखने से, स्थूक हिंसा से भी नहीं बच सके। गृहस्य के लिये मुख्य कर स्थूल हिंसा से बचने का विशेष आग्रह किया गया है। यदि स्थूल के सिनाय सूक्ष्म (थार) हिंसा से ही बचने का मुस्य कर्तव्य होता तो शास्त्र में शूल्ला ओ पाणामाया ओ वे रमणम् ।" । के बदले- मुहमा ओ वे रमणम् !" मन धारक को बताते ।

सांसारिक कार्य और अहिंसा।। यह बात तो आप जानते ही हैं कि सासारिक कार्यों में प्रवृत्त होना साधु का काम नहीं है। यह काम गृहस्थ का माना गया है। साधु इस कार्य में इसलिये प्रवृत्त नहीं होते कि यह आरम्भ युक्त होता है। सचा साधु आरंभ का कोई भी काम नहीं करता इसीलिये शास्त्र के अन्दर साधु को निरारमी कहा है। ससारिक कार्यों में धनादि का होना आवश्यक माना गया है। साधु जब सासारिक कार्योंमें हाथ डालना ही नहीं चाहता तब वह पैसा आदि क्यों कर अपने पास रक्खेगा। पैसा आदि पास न रखनेसे ही साधु को निपरिग्रही भी कहा है। जिस प्रकार शास्त्र के अन्दर साधु को निरीरभी निपरिग्रह कहाँ है, उसी प्रकार श्रावक गृहस्थ को अल्पारभी अल्पपरिग्रही कहा गया है। यहाँ गृहस्थ के साथ 'श्रामक' शद्व हमने जान बूझ कर रखा है। कारण, श्रावक-गृहस्थ ही ऐसा हो सकता है। श्रापक से भिन्न गृहस्थ याने 'मिथ्यात्वी' दूसरे शद्रों में इहलौकिक सुख वैभव को ही अपने जीवन का मुख्य उद्देश्य मानने वाला गृहस्थ ऐसा नहीं होता। यह महारम्भी महापरिग्रही बनने का ही अभिलापी हुआ करता है। इससे आप यह मत समझिये कि श्रावक इहलौकिक सुख से पंचित रहता है या पचित रहने के लिये उसे उपदेश दिया गया है। नहीं, श्रायक के लिये ऐसा नियम नहीं है। श्राषफ इहलौकिक सुखों के लिये प्रयत्न करता और सुख भी भोगता है, पर उसे अपने जीवन का उद्देश्य नहीं समझता। मिथ्यानी में और भाषक में यह एक मडा भारी अन्तर है। -- . त्या था उस समय असंख्य जल जीनों को देख कर कह देते कि मेरे स्नान के लिये असल्य नीव मारे जाते हैं, इसलिये यह हिसा डेि श्रेय नहीं है।' पर ऐसे कहे चिना स्नान करके हाथी पर विराज- जन हो याट वाट के साथ बरात के अहस को साथ ले, उग्रसेन के हल पर गये। वहाँ बारे में जीवों को देख कर जगत को जीवों का दस्य बताने के लिये सारथी से पूँछा अहसो तत्य निजतो दिस्सपाणे मयदुए । वाडे हि पारे हिं च सनिरुद्धेमु दुक्खिये ॥ अर्थात् ये सब सुख के अर्थी जीव बाडे और पीजरे के अन्दर रोक कर किसलिये दुप्पी किये गये हैं ? पारयो ने उत्तर दिया--- गझ विवाह कन्जमि भोया पो उस्स तस्सण वयाणि विणासिणी॥ नब भद्र सुख के अमिलापी प्राणियों को तुम्हारे विवाह नों को भोजन देने के लिये इकट्ठे किये गये है। रचन को सुन कर महा प्रज्ञानान् जीवों के हितेन्दु करने लगे- जड । झ कारणा ए ए हम्मति छ वह जिया, नम्मे एयंतु निस्से स परलोए भविस्साई । यदि मेरे विवाह के निमित्त बहुत प्राणी मारे जाते हैं तो यह हिंसा मुझे परलोक में शान्तिदायिनी न होगी । श्री नेमीनाथ जी के अभिप्राय से सारथी के द्वारा सब जीव छोड एल आदि सब आभूषण उतार कर उस सारधी मानाय जा T

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1 . हाता है | इस बहन ने यह तेले का दड किसम से निकाला यह हमारी समझ में नहीं पाया। अमेरीकागले यहाँ आकर हमारे भाइयों पर दया करें, पर हम अपने भाई बहनो के प्रति तिरस्कार करें, यह कहाँ का न्याय है। मनुष्य, पशु पर दया और छोटे छोटे जीनों को बचाने की कोशीश करे पर मनुष्य के प्राण जाते हो उस तरफ कुछ भी ध्यान न यह कितनी भारी गैर समझ है! मित्रों । साधु को तो छ-काया की हिंसा का त्याग है, आपको नहीं है, फिर भी सूक्ष्म जीवों की ओट में आप अपने कर्तव्य के प्रति उदासीनता दिखलाते हो यह उचित नहीं है। दुनिया में ऐसा कोई आरभ का काम नहीं जिसमें कर्मम न होता हो । काम को ज्ञान पूर्वक करने से पाप बध कम होता है और अज्ञान से करने से भयकर पापबध हो सकता है। कई भाई विचारते होंगे कि रोठी करने वाली बहन पाप से नहीं पच सकती। मैं कहता है वह पाप से बहुताश मे वचती हुई पुण्य प्रकृति का बध भी कर सकती है। आप कहेंगे- कैसे ?। इसका उत्तर है-जो बहन रसोई करने को अपने पा आया हुआ कर्तव्य समझती है, वह समझती है कि इस रोटी से बहुतों की आत्मा को शान्ति मिलेगी, अपने को मजदूरनी न समझ कर जयणा पूर्वक लकडियों को, फण्डों को और चूल्हे को साफ करती हुई, जीनों को बचाती हुई रसोई करती है, यह पाप प्रकृति में भी पुण्य प्रकृति बावती है। पर जो अपने को मजदूरनी समक्ष कर वे परसाही से रमोई करती है और मोजन करनेवालों को राक्षस समझती है वह बहन पाप प्रकृति में, और पाय महति आँध देती है।

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२३ 'कभी नहीं।' बहुना है आदि के साथ अन्य संकरा प्राणी भी पीस लिये भाइयों, जरा विचार कीजिये यह सब पाप किसके जुग्गे आयेगा? आप लोगों ने पुण्य बाधने की कोशीश की, पर यह तो उलटा पग बन गया। ममल यह हुई कि 'मियाजी नमाज गुडाने गये न्टे रोजे गले पढे।' . सुना जाता है कि आज कल लोगो की प्रवृत्ति फ्लोवर मिल (नाटा पीसने की चपी) में आटा पिसाने की और बहुत बढ रही है। पाद रसिये, इन मिलों में आटा पिसावाने में गेहुँओं का सार (पोष्टिक तत्व) जर जाता है। शरीर के पोषण के लिये बहुत कम अश बाकी रह जाते है। दूसरी बात यह है कि धट्टी में आटा पीसना, और इस मिल में पिसवाना, इसमें जो पाप होता है उसमें भी आकाश पाताल का अतर होता है। धोडी देर के लिये मान लीजिये कि आपने अपने घर सेर दो सेर या पाँच सेर जितना भी आटा पीसा, मिर्फ उसी का जितना पाप लगना होगा, लगेगा। पर आप जब गिरनी (मिल) में आटा पिसनाऐंगे, वह चाहे एक सेर पिसमाया हो या एक मन, पर दिन भर उसके चलने से--उसके आटा पीसने से जो पाप होगा, उस सम पाप के हिस्से में आपका भी हिस्सा रहेगा। मिल में आटा पिसवाना, उससे होने वाले पाप में सीर (हिस्सा) डालना है। अरण (बबई ) में मैंने अपनी आखों से देखा है कि जिस गिरनी में अपने भाई आटा पिसनाते हैं उसी में मांस बेचनेवाले जब मास वेच डालते है तर लौटते समय उसी टोपली में पिसवाने के लिये गे? लेते आते हैं और उसी गिरनी में पिसनाते हैं । चे गेहूँ, मास की टोपली में .

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- दय जीवों को मोक्ष क्यों नहीं हो जाती है ये २२००० पर्प 'युप को बिना हाथ पॉप हिलाये हुलाये बैठे रहते है, क्यों का मोक्ष होने में देर हो रही है ? याद रहे, आलस्य करने से मोक्ष नहीं मिलती। भाइयों और बहनों ! आप लोग शास्त्रों को देखिये-समझिये, यदि अप में इतनी शक्ति न हो कि उनके तत्व को समझ सकें तो सद्- गुरुओं से समझिये । जब आप शास्त्रताय को समझ लेंगे और यह 'जान जायेंगे कि किस क्रिया के करने से पुण्य तया पाप होता है, तब पता लग जायगा कि हमें क्या करना चाहिये और उनसे अनामिज्ञ रहने करण अभी क्या कर रहे है । इस ज्ञान के अभाव से लोग केवल देवा-देवी का अनुकरण करते हैं और अल्प पाप में भी महा पाप मान कर विरोध करते है। उदाहरण रूप, कई भाई सनवती साधु मुनिराजों को आचार विचार पालते हुए देख कर उनकी सूक्ष्म बातों का उसी माफिक अनुकरण करना प्रारम्भ कर देते हैं। साधु किसी को दान नहीं देते इस लिये हम भी साधु के सिवाय किसी को न दे, साधु, गृहस्य को अनेक प्रकार की क्रियाओं के द्वारा उनका जीवन निर्वाह रूप परोपकार नहीं करते वेसे हम भी न करें, या साधु जिन कामों को न करे, ऐसे परोपकार कार्य में पाप समझें । यह समझना शास्त्र विवि के अनजानों का है। क्यों कि सनरती मुनिराजोंका आचार कल्प और कल्प की मर्यादा अलग है और गृहस्थों की अलग। जैसे किजिनकन्पी महाना अकेले रहते, मौन रखते, धर्मोपदेश नहीं देते, दूसरे साधुओं कि क्या च आदि तय नहीं करते, यह उनका कल्प है । परतु यदि विरक्ल्यो साधु जिनकन्नी के देखा-देखी अनुकरण करके वयाच्च करना, सघ की सेवा करना, परोपकार करना छोड दे तो उसको निर्दयी कहा है। 4

।
आने से मास का कुछ अग उन गेहुँओं में लग जाता है । वे गेहूँ जब गिरन
में पिसवाये जाते है तब उन गेहुँओं का अश उसमें रह जाता है। अ.
आप गेहूँ पिसाने आये, उनके गेहुँओं का अश पहले से ही लगा तो
रहता ही है अब वह अश आपक गेहुओं में आ गया, आपने यह
आटा खाया, कहिये आप भ्रष्ट हुए या नहीं ?
आलस्य के कारण धर्म की ओट में जो आटा पीसने का त्याग ले
लेती है और धार्मिणी वन बैठती है, उसे मै तो तब धर्मिणी समझू जब वह
आटा खाने का ही त्याग ले ले।
मैं दादर (बबई) भी था तब कुछ काठियावाडी बहनें दर्शन करने
आई । उनमें एक वुड्ढी बहन भी थी। बात चलने पर मैने उनसे कहा-
'गिरनी मे तो आटा अब आप नहीं पिसवाती हैं न?'
मने तो काई हरकत न थी, पर ए म्हारी
बहुओं कहे छे के- 'अमो बबई नी सेठाणियों पई, हवे हाथ
थी पीसमो?"
मैं- “ठीक, ए बेनों बंबई नी सेठाणियों थई एटले पासवानो
दुःख तो बीजा ने आपी, ए दुख थी मुक्त थई, पण सतति प्रसन करवानु
दुख, जे एक महा दु ख गणाय छ- बीजा ने सुपर्द की धू के ?
मित्रो ! सतति प्रसन करना एक महा सकट से निकलना है, इस
संकट से न निकल कर केवल धट्टी पीसने के सकट से ये दूर हो गई
तब ये वबई की सेठानिये कैसे बन गई?
यहाँ (मारवाड) की बहनें कुछ कम नहीं हैं। उनसे दो
कदम आगे रखने वाली है।
बहनों, धर्म की. औट लेकर आरय से जीवन मन विताओ।
यदि आलस्य से ही- सुस्ली में पड़े रहने से ही मोक्ष मिलती हो तो
बुड्ढी बोली-

फेन्द्रिय जीवों को मोक्ष क्यों नहीं हो जाती । ये २२००० 4 २ आयुष्य को विना हाथ पॉर हिलाये इलाये बैठे रहते है, क्यों इससी मोक्ष होने में देर हो रही है ? याद रहे, आलस्य करने से मोक्ष नहीं मिलती। भाइयों और बहनों ! आप लोग शास्त्रों को देखिये-समझिये, यदि अप में इतनी शक्ति न हो कि उनके तत्व को समझ सके तो सद्- गुरुओं से समझिये । जब आप शाaar को समझा लेंगे और यह जान जायेंगे कि किस निया के करने से पुण्य तथा पाप होता है, तब पता लग जायगा कि हमें क्या करना चाहिये और उनसे अनभिज्ञ रहने के करण अभी क्या कर रहे है । इस ज्ञान के अमान से लोग केवल देखा-देखी का अनुकरण करते है और अल्प पाप में भी महा पाए मान कर विरोध करते हैं। उदाहरण रूप, कई भाई सत्ता साधु मुनिराजों को आचार विचार पालते हुए देख कर उनकी सूम बातों का उसी माफिक अनुकरण करना प्रारम्भ कर देते हैं। साधु किसी को दान नहीं देते इस लिये हम भी साधु के सिवाय किसी को न दे, साधु, गृहस्थ को अनेक प्रकार की क्रियाओं के द्वारा उनका जीवन निर्वाह रूप परोपकार नहीं करते वैसे हम भी न करें, या साधु जिन कामों को न करे, ऐसे परोपकार कार्य में पाप समझें । यह समझना शास्त्र विधि के अनजानों का है। क्योंकि सर्वत्रती मुनिराजोंका आचार कप और कल्प की मर्यादा अलग है और गृहस्थों की अलग। जैसे किजिनकपी महाना अकेले रहते, मौन रखते, धर्मोपदेश नहीं देते, दूसरे साधुओं कि क्या च आदि कृय नहीं करते, यह उनका कल्प है। परतु यदि स्थिवरकल्पी साधु जिनकल्ली के देखा-देखी अनुसरण करके बयाश्च करना, सघ की सेना करना, परोपकार करना लोड दे तो उसको निर्दयी कहा है। - न - जैसे- ठाणाग सूत्र के ४ ये ठाणे में आय अणुकम्प 'THE ऐगे नो पराणुकम्पे । " अर्थात् कोई कोई पुरुप अपनी आत्मा की। खान पान आदि से रक्षा करता है परन्तु दूसरे की नहीं करता, यह तो जिनकल्पी या प्रत्येक-बुद्धि या निर्दयी कहा है।' शास्त्र के कथन से यह बात स्पष्ट है कि जिनकल्पी या प्रत्येकबुदि दूसरे की ऊ स पानी आदि से रक्षा न करे यह उनका उत्कृष्ट उत्सर्ग मार्ग का कल्प परन्तु यदि स्थिवर कल्पी सावु उसका अनुकरण करके दूसरे सापुर की अन्न पानी आदि से अनुकम्पा न करे तो वह निर्दयी कहा जाता है। वैसे ही साधु महात्माओं को जिन जिन कामों को करने का कल्प नहीं है उन उन कामों को मुनिराज का कल्प बतला कर, अगर श्रावक भी परोपकारादिक छोड दे तो उसे भी निर्दयी समझना चाहिये । इसलिये साधु के देखा देखी परोपकार के काम गृहस्थ को छोड देना विधि मार्ग का अज्ञान है। साधुओ की भाव शुचि अति। उत्कर्ष होने से स्नान दत-धावन आदि की, ब्रह्मचर्य की रक्षा के लिये द्रव्य शुचिकी तरफ शास्त्र विधिसे उदासीनता देख कर कोई भोला जीव यह अर्थ निकाल ले कि जैसे साधु महात्मा स्नान दत-धावन आदि नहीं करते इसलिये श्रावकों को भी नहीं करने चाहिये, यह समझना श्रारक के कल्प से अनजानों का है। क्यों कि शास्त्र में 'आनन्द' आदि श्रावकों का आचार कयन जहाँ चला है वहाँ स्नान की और दन्त-धावन आदि की विधि का कथन है। परन्तु सर्वथा नहीं करना ऐसा नहीं है। कोई मूर्खता से कहे कि श्रावक को दन्त-धावन स्नान आदि नहीं कल्पता, समझना चाहिये कि वह शास्त्र व श्रावक-धर्म से अनजान है। शास्त्र में गृहस्थाश्रम चलानेवाले श्रावक के लिये स्नान या दत धापन आदि बाह्य शुचि का निवेव नहीं किया है बल्कि अ-निधि का .

। की रूप में माना है। गेोग इमन्य मार शुचि के भेद को न समझ कर केरल गृह मगरह कर गन्देपन से शरीरादिक को रख कर लोगों में यह कहता है कि गन्दा रहना, स्नानादिन रहना, यह हमारे प्रारम का आचार का है। हो, अमत्त स्नानादिक को धारक यार सुचि समझता है न स्तरा भायशुचि नहीं लगाना । जैनेतर शास्त्रों में भी स्नान को है' ऐसा कहनेवाला जन के प्रारक की मर्यादा का अनजान है और जैन समाज में धर्म की घृणा पैदा करने रूप पाप का भागी है। साधु मुनिराजोंकी आचार विधि धारकों से बिलकुल भिन्न है अत प्रायक के लिये साधुओं की क्रिया पालने का कहीं आदेश नहीं है। यह बात में अपने मन से नहीं कह रहा है, शास्त्र देखने से आपको इस बात का पता लग जायगा। भावकों को सोच समझ कर ही किसी बात का त्याग लेना चाहिये, देखा देखी नहीं । साधुओं को भी त्याग कराते समय श्रावक की वस्तु स्थिति पर दृष्टि मपश्य डालनी चाहिये । यह नहीं कि कोई श्रावक बैठे बैठे ही वैराग्य में आकर सथारा लेने की इच्छा प्रगट करे और साधु वास्तविक स्थिति को न समझकर झटत्याग करा दे । यदि इस प्रकार का श्रावक मेरे से त्याग लेगा और में उसे इसके अयोग्य समझूगा तो इस कृत्य के लिये साफ इन्कार कर दूंगा। मैं अन्ध-श्रद्धावाला तो है नहीं कि वचा मी अगर अन्न का त्याग ले ता मैं उसे धर्म समश कर दे दूं। जो साधु लौकिक दृष्टि को मामने न रखते हुए गृहस्थ को किसी ऊँचे प्रकार का त्याग करा देता है समझना चाहिये कि वह उस पर अनुचित बोझ डालता है। मुनियों को अपनी रिधि पालने के लिये, शास्त्र में लिखे किसी उच्च साधु को अपना आदर्श मानना चाहिये उसी प्रकार श्रावक को अपनी है। जैसे- ठाणाग सूत्र के ४ ये ठाणे में-- " आय अणुकम्पे नाम ऐगे नो पराणुकम्पे । " अर्थात् कोई कोई पुरुष अपनी आत्मा की है:- खान पान आदि से रक्षा करता है परन्तु दूसरे की नहीं करता, वह था- तो जिनकल्पी या प्रत्येका-बुद्धि या निर्दयी कहा है। शास्त्र के इस. कथन से यह बात स्पष्ट है कि जिनकल्पी या प्रत्येकवुद्धि दूसरे को अन्न पानी आदि से रक्षा न करे यह उनका उत्कृष्ट उत्सर्ग मार्ग का कल्प है परन्तु यदि स्थिवर कल्पी साधु उसका अनुकरण करके दूसरे साधुओं की अन्न पानी आदि से अनुकम्पा न करे तो वह निर्दयी कहा जाता वैसे ही साधु महात्माओं को जिन जिन कामों को करने का कल्प नहीं है उन उन कामों को मुनिराज का कल्प बतला कर, अगर श्रावक भी परोपकारादिक छोड दे तो उसे भी निर्दयो समझना चाहिये । इसलिये साधु के देखा देखी परोपकार के काम गृहस्थ को छोड देना विधि मार्ग का अज्ञान है। साधुओं की भाव शुचि भतिः उत्कर्ष होने से स्नान दंत-धावन आदि की, ब्रह्मचर्य की रक्षा के लिये द्रव्य शुचिकी तरफ शास्त्र विधिसे उदासीनता देख कर कोई भोला जीव यह अर्थ निकाल ले कि जैसे साधु महात्मा स्नान दत-बावन आदि नहीं करते इसलिये श्रावकों को भी नहीं करने चाहिये, यह समझना श्रापक के कल्प से अनजानों का है। क्यों कि शास्त्र में 'आनन्द' आदि श्रावकों का आचार कयन जहाँ चला है वहाँ स्नान की और दन्त-धाग्न आदि की विधि का कथन है। परन्तु सर्वथा नहीं करना ऐसा नहीं है। कोई मूर्खता से कहे कि श्रावक को दन्त-धावन स्नान आदि नहीं कल्पता, समझना चाहिये कि वह शास्त्र व श्रावक-धर्म से अनजान है। शास्त्र में गृहस्थाश्रम चलानेवाले श्रावक के लिये स्नान या दत धापन आदि बाह्य शुचि का निवेध नहीं किया है बल्किास-विधि का .

- बैट बैठे ही वैराग्य में आकर सथारा लेने की इच्छा प्रगट करे भार साधु वास्तविक स्थिति को न समझ कर झटत्याग करा दे। यदि इस प्रकार का कृत्य के लिये साफ इन्कार कर दृगा । म अन्य-श्रद्धावादाता नहीं कि वहा भी अगर अन्न का त्याग ले ता म उसे धर्म समझ कर दे दूं। उचे प्रकार का त्याग का देता है समझना चाहिस कि हटापा सानुको यस्ना आदर्श मानना चाहिये दी प्रशर यायपनी किया है । हो, जन्नत लानादिक को कारक पार शुचि समता हे शिनु बरण माववि नहीं समता | जेनेतर शासों में भी स्नान को मी र में माना है। जो लोग इस दस मार शुचि के भेद को न समझ कर योगल शाश्रम में रह कर गन्देपन से शरीरादिक को रख कर जंगों में यह कहता है कि 'गन्दा रहना, स्नानादि न रहना, यह हमारे शावक या आचार है। ऐसा कहनेवाला जैन धर्म के शावक की मर्यादा का अगजान है भोर जैन समाज में धर्म की घृणा पैदा करने रूप पाप का भागी है। साधु मुनिराजोंकी आचार विधि धारकों से बिलकुल मिन अत श्रावक के लिये साधुओं की क्रिया पालने का कहीं आदेश नहीं है। यह बात मैं अपने मन से नहीं कह रहा है, शान देखने से आपको इस बात का पता लग जायगा। आयकों को सोच समझ कर ही किसी बात का त्याग लेना चाहिये, देखा देखी नहीं । साधुओं को भी त्याग कराते समय धारक की स्त स्थिति पर दृष्टि अश्य डालनी चाहिये । यह नहीं कि कोई श्रापक श्रावक मेरे से त्याग देगा और में उगे इसके अयोग्य समझेंगा तो इम जो साधु लौकिक दृष्टि को मामने न रखने हुए गृहस्य को किमी मुनियों को अपनी विपि पालने के लिये, शास्त्र में दिये किसी ठा अनुचित बोझ डाटना है। "

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१० . 2 . - मित्रों ! वीतराग का मार्ग, जेसा आप समझते हैं, उससे निराला है। आज आप आटे की मॉड लगा कर कपडा तैयार करके देनेवाले रेगरों और वलाइयों को अछून कहते हैं, उनसे दूर रहते है । पर मिल के कपड़ों में अक्सर ची लगाई जाती हे- चीनाले कपडे आपके गले में डालते है उहें आप 'बडे सेठ '-- क्योंकि वे मिल के मालिक हैं न,- कहते है और उनसे हाथ मिलाने में अपना अहो- भाग्य समझते हैं। चार्द से सृत पग कर कपडे बनवाने में लोग पाप समझते हैं और मैंचेस्टर ' के कपडे को पहन कर 'पवित्र हो गये। मानते हैं। ऐसी बुद्धि को क्या कहना चाहिये, जो महा हिंसा करने पाले को उत्तम और अल्प हिंसा करने वाले को नीच माने चखों के लिये आज के वैज्ञानिक लोग कहते हैं कि यह सिर्फ पैसा पैदा करने का ही नहीं, पर एकाग्रता प्राप्त करने का भी साधन है। यह चर्खा विधवाओं के धर्म की रक्षा करने वाला और भूखों की भूख मिटाने याल कहा जाता है। देश की दरिद्रता मिटाने के लिये आज की बडी बडी वनवाली बहनें भी इमे कातती है। चर्खा आज कल का अविष्कार नहीं, बहुत पहले का है, इसका जिक्र जैन शास्त्रों की कना में भी आया है। इस पर योग्य विचार कर्तव्याकर्तव्य का जानकार ही कर सकता है। आज कर्तव्य के विषय में बडी उलटी समझ हो रही है तभी तो लोग खेती को महा पाप और दूसरे अनार्य याणिय को श्रेष्ठ समझते हैं। यह भी सुनने आया है कि लोग बाजर से घी लाने में पुण्य और घर पर गाय को पाल कर घी पैदा करने में पाप मानते हैं। पर याद रखिये, खेती को जैन शास्त्र में पैश्य कर्म बतलाया गया है। उत्तराध्ययन जी के ३ रे अध्याय में ऐसा कथन है कि चार अग का आराधने बाग पुण्यशाली पुरुष वर्ग-मुख उपयोग कर उस घर में जम लेता है जहाँ दम बोल ही गोगलाई होनी है। पहला विधि पालने के लिये 'आनन्द' आदि उच्च धारकों की दिनचर्या पर ध्यान देना चाहिये । 'आनद ' आदि श्रापकों की नॉध शास्त्र में श्रावकों के आदर्श के लिये ही ली गई है। यदि ऐसा न होता तो इन लोगों की नोंध लेने से शास्त्र को क्या लाभ ? - 'आनन्द ' आदि उच पुरुषों की दिनचर्या के अनुकूल अपनी दिनचर्चा न बिताने के ही कारण आज भारत के मनुष्यों को आयु बहुत घट गया है। आज के लोगों की दिनचर्चा स्फुर्तिप्रद होने की जगह आलस्यमय हो गई है। यही कारण है कि यूरोप के मनुष्यों की आयु औसत प्रतिशत ७० से ७५ है, और भारतीयों की २० से २५ तक . की ही ॥ विचार कीजिये इतना महदतर क्यों ?, यूरोप वृद्ध होकर क्यों मरता है और भारत तरुण होने के पूर्व ही क्यों मर जाता है ? जिस आयु में यूरोप निवासी सेनामें भर्ती होने की उस्कटा प्रदर्शित करता है वहाँ भारतीय मृत्यु की घडियें क्यों गिनने लगता है ? सिर्फ एक कारण, उनका रहन सहन विधि व्यवहार सब नियमित और यहॉ वालो का सब अनियमित । भळा अनियगित जीवन भी कोई जीवन है ? मित्रों ! मैंने ऊपर आपको देखादेखी अनुकरण करने का कुछ दिग्दर्शन कराया, अब जरा कर्तव्याकर्तव्य के ज्ञान न होने से अल्प पाप को महापाप समझ कर विरोध करते है इस पर भी कुछ कह देना चाहता हूँ। दूर कहाँ जाऊँ, आप खादी को ही लीजिये। लोग कहते हैं-'हम खादी इसलिये नहीं पहनते कि चर्खा गरन गरन फिरता है इससे वायु काय की हिंसा होती है।' ठीक है, पर विलायती (मँचेस्टर आदि का) कपडा तो छहो काया की हिंसा के द्वारा तैयार होता है, यह आपको मालूम है? .

- ~ मित्रों ! वीतराग का मार्ग, जैसा आप समझते हैं, उससे निराला है। आज आप आटे की मॉड गा कर कपडा तैयार करके देनेवाले रंगरों और बलाइयों को अछ्न कहते हैं, उनसे दूर रहते हैं। पर मिल के कपड़ों में अक्सर ची लगाई जाती है चर्वीयाले कपडे आपके गले में डालते है उन्हें आप 'बडे सेठ'- क्योंकि वे मिल के मालिक हैं न,- कहते है और उनसे हाथ मिलाने में अपना अहो- भाग्य समझते हैं। चर्खे से सृत पदा कर कपडे बनवाने में लोग पाप समझते हैं और ' मैचेस्टर ' के कपडे को पहन कर 'पवित्र हो गये। मानते हैं। ऐसी बुद्धि को क्या कहना चाहिये, जो महा हिंसा करने याले को उत्तम और अल्प हिंसा करने वाले को नीच माने ? चों के लिये आज के वैज्ञानिक लोग कहते है कि यह सिर्फ पैसा पैदा करने का ही नहीं, पर एकाग्रता प्राप्त करने का भी साधन है। यह चीं विधवाओं के धर्म की रक्षा करने वाला और भूखो की भूख मिटाने वाला कहा जाता है। देश की दरिद्रता मिटाने के लिये आज की घडी बडी बनवाली बहनें भी इसे कातनी है। चसी आज कल फा आमिष्कार नहीं, बहुत पहले का है, इसका जिक्र जैन शास्त्रों की करा में भी भाया है। इस पर योग्य विचार कर्तव्याकर्तव्य का जानकार ही कर सकता है। आज कर्तव्य के विषय में बड़ी उलटी समझ हो रही है तभी तो लोग खेती को महा पाप और दूसरे अनार्य वाणिज्य को श्रेष्ठ समझते हैं। यह भी सुनने आया है कि लोग बाजर से घी लाने में पुण्य और घर पर गाय को पाल कर घी पैदा करने में पाप मानते हैं। पर पाद रखिये, खेती को जैन शास्त्र में वैश्य कर्म बनलाया गया है। उत्तराध्ययन जी के ३ रे अध्याय में ऐसा करना है कि चार मग को आराधने वाला पुण्यशाली पुस्पा-गुरा अमोग कर उस घर में जमता है जहाँ दस बोन की यागराई होनी है . + - - विधि पालने के लिये 'आनन्द आदि उच्च मानकों की दिनचर्या पर ध्यान देना चाहिये । 'आनद ' आदि श्रावकों की नोंध शास्त्र में श्रावकों के आदर्श के लिये ही ली गई है। यदि ऐसा न होता तो इन लोगों की नॉव लेने से शास्त्र को क्या लाभ ? 'आनन्द ' आदि उच्च पुरुषों की दिनचर्या के अनुकूल अपनी दिनचर्चा न बिताने के ही कारण आज भारत के मनुष्पों का आयु बहुत घट गया है। आज के लोगों की दिनचर्चा स्फुर्तिप्रद होने की जगह आलस्यमय हो गई है । यही कारण है कि यूरोप के मनुष्यों की आयु औसत प्रतिशत ७० से ७५ है, और भारतीयों की २० से २५ तक की ही॥ विचार कीजिये इतना महदतर क्यों ? यूरोप वृद्ध होकर क्यों मरता है और भारत तरुण होने के पूर्व ही क्यों मर जाता हैं ? जिस आयु में यूरोप निवासी सेनामें भर्ती होने की उत्कटा प्रदर्शित करता है वहाँ भारतीय मृत्यु की घडियें क्यों गिनने लगता है ? सिर्फ एक कारण, उनका रहन सहन विधि व्यवहार सब नियमित और यहाँ वालों का सब अनियमित । भला अनियगित जीवन भी कोई जीवन है ? मित्रों ! मैंने ऊपर आपको देखादेखी अनुकरण करने का कुछ दिग्दर्शन कराया, अब जरा कर्तव्याकर्तव्य के ज्ञान न होने से अल्प पाप को महापाप समझ कर विरोध करते है, इस पर भी कुछ कह देना चाहता हूँ। दूर कहाँ जाऊँ, आप खादी को ही लीजिये। लोग कहते हैं-'हम खादी इसलिये नहीं पहनते कि चर्या गरन गरन फिरता है इससे वायु काय की हिंसा होती है।' ठीक है, पर विलायती (मैंचेस्टर । आदि का) कपडा तो छहो काया की हिंसा के द्वारा तैयार होता है, यह आपको मालूम है ? .

- मित्रो ! वीतराग का मार्ग, जैसा आप समझते हैं, उससे निराला है। आज आप आटे की माँड गा कर कपडा तैयार करके देनेवाले रगरों और बलाइयों को अछून कहते हैं, उनसे दूर रहते हैं। पर मिल के कपड़ों में अक्सर ची लगाई जाती है। चीयाले कपडे आपके गले में डालते है उ हें आप 'बडे सेठ' क्योंकि ये मिल के मालिक हैं न,- कहते है और उनसे हाथ मिलाने मे अपना अहो. भाग्य समझते हैं। चार्वे से सृत पेदा कर कपडे बनवाने में लोग पाप समझते हैं और मेचेस्टर' के कपडे को पहन कर 'पवित्र हो गये। मानते हैं। ऐसी बुद्धि को क्या कहना चाहिये, जो महा हिंसा करने पाले को उत्तम और अल्प हिंसा करने वाले को नीच माने ? चों के लिये आज के वैज्ञानिक लोग कहते है कि यह सिर्फ पैसा पैदा करने का ही नहीं, पर एकाग्रता प्राप्त करने का भी साधन है। यह ची विधवाओं के धर्म की रक्षा करने वाला और भूखों की भूप मिटाने याला कहा जाता है। देश की दरिद्रता मिटाने के लिये आज की घडी बड़ी धनवाली बहनें भी इमे कातती है। चर्खा आज कल का अविष्कार नहीं, बहुत पहले का है, इसका जिक्र जैन शास्त्रों की का में भी आया है। इस पर योग्य विचार कर्तव्याकर्तव्य का जानकार ही कर सकता है। आम कर्तव्य के विषय में बडी उलटी समझ हो रही है तभी तो लोग खेती को महा पाप और दूसरे अनार्य वाणिज्य को श्रेष्ठ समझते हैं। यह भी सुनने आया है कि लोग बाजर से बी लाने में पुण्य और घर पर गाय को पाल कर घी पैदा करने में पाप मानते हैं। पर याद रखिये, खेती को जैन शास्त्र में वेश्य कर्म बतलाया गया है। उत्तराध्ययन जी के ३ रे अध्याय में ऐसा करना है कि चार मग का आराधा शाला पुण्यशाली पुरुष वर्ग-सुख उपभोग कर उस घर में जम लेता है जहाँ दम बोल की योगाई होती है। पहला

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२०१ ले जानें, वे भारतीयों को सस्ता घी दे इस में कुछ न कुछ रहस्य समझना चाहिये । क्योंकि वे दिनानिय बनने के लिये तो व्यापार करते ही नहीं न मित्रों ! आप अहिंसावादी होने का गौरव करते है तो अहिंसा का सच्चा अर्थ समझिये । आहिंसक कहलाने वाले कई भाई अहिंसा का वास्तविक अर्थ न जानने से कई बार ऐसे काम कर बैठते है कि अन्य धर्मावलम्बी बन्धु उनके कार्यों को देख कर ईसी उडाते है, और तो और जैन धर्म को जाते है। कहॉ जैन धर्म की अहिंसा की विशालना ओर कहाँ इन भाइयों को अहिंसा के पीछे हिंस का बडा माग ! हिंसा अहिंसा का रूप न समझ मनाने के कारण ही कई धारक चींटी मर जाने पर जितना अफसोस जाहिर करते हैं, उतनी भी दया मनुष्य पर अत्याचार करने में नहीं लाते । यह बात हृदय में अमित कर लीजिये कि अत्याचार करना जितना पाप है कायरता के भय मे (यश न चलने से ) तमो- गुणी मौनावलम्भन कर अत्याचार महन कर लेना भी उतना ही पाप, है। हाँ, वास्तविक शांतिधारण कर लेना यह तो महान् धर्ष है। पों में पढ़ते हैं कि- 'गुडे लोग हिन्दू महिलाओं का अपहरण कर ले जाते है । स्त्रियों को अकेले में देस कर चोरी कर ले जाने का कृत्य, जिस प्रकार उन लोगों का नीच और महा पृणित फन्य कहा जायगा, यदि उसी प्रकार पति, पुत्र, भाई या पिता के सामने यह दुष्ट घोरी कर ले जाय और वे कायर बन कर भाग खडे हों तो उन्हें, उस गुडे से भी महानीच, महाकायर और महा पाप को करने वाले समाने माहिये। .

वह मनुष्य पुत्री का पिता, बहिन का भाई, पत्नी का पति और और माता का पुत्र होने लायक नहीं है जो मौका पड़ने पर उनकी रक्षा न कर सके। दु ख के साथ कहना पड़ता है कि आज के अधिकाश जैन-बन्धु इस मामले में अपने अन्य सहयोगी (हिन्दू) बन्धुओं से बहुत पीछे नजर आते हैं। जैनों की अहिंसा पर लोग टीका टिप्पणी करते हैं और इनकी अहिंसा को कायर ' बनानेवाली ' कहते है शायद इसका कारण भी यही हो। 'सुधा' नामक पत्रिका में अहिंसा पर एक आलोचनात्मक लेख पढा था । उसमें लेखक ने गीता के- " अनार्यजुष्टमस्वय॑मकीर्तिकरमर्जुन इस श्लोक में जो 'अनार्य' शब्द आया है उसका अर्थ- 'जैन' या 'बौद्ध ' किया है । शायद उसने आज के जैनों की अकर्मण्यता देख कर ऐसा अनुमान लगा दिया हो । पर यदि लेखक जैन शास्त्र की आहंसा पर लिखने के पहले शास्त्रों का अवलोकन कर विचार पूर्वक लिखा होता तो मेरा अनुमान है कि ऐसा लिखने का कभी साहस न करता । जैनों की आहिंसा अनायों की नहीं पर धीर आयों की है। सचा जैन काम पड़ने पर रण समाम में जाने से नहीं हिचकता । हॉ, वह इस बात का जरूर खयाल रखता है कि मैं अन्याय का भागी न बन जाऊँ, मेरे से व्यर्थ की हिंसा न होजाय । अहिंसा कायर बनाती है या कायरों की है यह बात अहिंसा के भास्ताविक गुण को न समझने वाले ही कह सकते हैं। आहिंसा-नत वीर शिरोमणि ही धारण कर साता है । कायर अहिंसा--धारी नहीं कहला - १०३ सकते। वे अपनी कायरता छिपाने के लिये भले ही अहिंसा का ढोंग रचले पर उन्हें अहिंसक कहना योग्य नहीं कहा जा सकता । वैसे तो सचा अहिंसावादी व्यर्थ मे एक चींटी के प्राण हरण करने में धरी जायगा क्यों कि यह संकल्पजा हिंसा है। इस कृत्य को वह अपना प्रत भग का कारण समझता है। पर जब न्याय से रण समाय में जाने का मौका आ पड़े तो वह सग्राम करता हुआ भी अपने ब्रत को अखंडित समझता है। मित्रों ! जो संकल्पजा हिंसा करता है उसे पापी के नाम से पुकारते हैं पर जो आरम्भ जनित करता है उसे इस नाम से नहीं पुकार सकते । भाइयों ! भद आप लोग समझ गये होंगे कि जैन की अहिंसा इतनी सकुचित नहीं है कि ससार कार्य में बाधक हो, पर इतनी 'विस्तृत है कि बडे बडे राजा महाराजा भी धारण कर सकते हैं। उनके व्यवहार में किसी प्रकार की रुकावट नहीं आ सकती। जैन अहिंसा यदि सकुचित होती और ससार कार्य में बाधक होती तो पूर्व के राजा महाराजा इस धर्म को कैसे धारण करते ? में पहले कह चुका हूँ कि श्रावक सकल्पजा हिंसा का त्यागी होता है और आरभजा का आगार रखता है । वह आरम्भ से बचने की कोशीश सकल्पना से पहले करने में महा मूर्खता मानता है। उसे कम से करना ही श्रेयस्कर प्रतीत होता है। वह मानता है कि इसमें प्यादा कठिनाइयों का सामना भी नहीं करना पडता । प्यारे मित्रों ! आप लोगों को अहिंसा का अच्छी तरह ज्ञान हो जाय इसलिये अव एक मोटी बात और कह देता हूँ। अहिंसा के आप तीन भेद कीजिये। सात्विकी राजसी और तामसी) साविकी आहिंसा वीतराग पुरुष, पूर्णत्यागी मुनिगण, आरम्म १०४ - ~ त्यागी निकी श्रावक आदि निरारम्भ रीति से अर्थात् जिस वृत्ति को पाल्ते हुए दूसरे किसी जीन को दुख न हो, वे ही पाल सकते है। राजसी अहिंसा उसे कहते हैं जिसमें अन्याय के प्रतिकार के लिये आरम्भजा हिंसा करनी पडे। जैसे राम और रावण का दृष्टान्त लीजिये। रायण, राम की सीता को हरण कर ले गया था। राम ने सीता को माँगा, पर उसने न दिया, तब लाचार होकर राम ने उसके विरुद्ध शस्त्र उठाया और उसका नाश किया। यह हिसा जख्र है पर यह रामसी अहिंसा का ही पक्ष कहलाता है। रावण ने शस्त्र उठाया वह संकल्पना हिंसा थी और राम की आरम्भजा, वस इस में यही फर्क है। चेटक महाराजा और कोणिक का सग्राम बतलाता है कि श्रावक अपने अहिंसा व्रत को पालन करता हुआ न्याय पक्ष की रक्षा के लिये जो हिंसा करता है वह आरम्भजा हिंसा है परन्तु सकल्पजा हिंसा की अपेक्षा अहिंसा ही है । यह अहिंसा साविक्री से नीचे है पर तामसी* से-जिसमें अपनी माता, स्त्री, बहन आदि पर अत्याचार कोई करता हो, उसे देख कर मन में बहुत क्रोध रखता है, पर कहीं मर जाऊँगा या मुझे कोई मार डालेगा अत चुप्पी साधना ही अच्छा है, लोगों के कहने पर कहे कि मैं अहिंसा-व्रत का पालक हूँ, मुझे उस पर दया आगई थी, इसलिये छोड दिया-इससे बहुत ऊँची है । तामसी अहिंसा आत्मा के सद्गुण को नाश करने वाली और पतन की तरफ ले जाने वाली है। जो ऐसी अहिंसा से अहिंसक कहलाना चाहता है वह वास्तव में कायर है, नपुंसक है, ससार में बोझ रूप है। इतना ही नहीं, वह जाति का, सस्कृति का और धर्म का महा धातक है। - तामसी अहिंसा केवल दिखने में अहिंसा है पर वास्तव में हिंसा ही है।

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Sharawak Ka Ahinsha Vrth

Author
Javaheer Lal
Title
Sharawak Ka Ahinsha Vrth
File name
Sharawak Ka Ahinsha Vrth
Text
OCR done
Citation
1905
Published
2011/01
Publisher
Sharawak Mandal Ratlam Malva
Language
Sanskrit
Pages
122
Library
Agarchand Bhairondan Sethiya Jain Parmarthik Sanstha, Bikaner
Classification
Literature
DLI number
546436
Barcode
4990010024911.00
Scanning centre
C-DAK, Kolkata
Digital publisher
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