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Paryavaran Ki Samskriti

Shubhu Patwa · 2011/03

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पर्यावरण की संस्कृति वाग्देवी प्रकाशन बीकानेर

पर्यावरण की
संस्कृति
शुभ परया

वाग्देवी प्रकाशन
सुगन निवास, चन्दन सागर
बीकानेर-334001
लगभू पटवा
प्रपम मस्तारण 1989
द्वितीय मस्करण 1900
मूल्य: पनपन रपये मात्र
बनादिलीत निनाकर
मुर: मांगमा प्रिन्टर्स
ISBN 81-85127-19-0 (Ist Edition)
पसागर,नागर
ISBN 81-85127-25-5(2nd Edition)
PARYAVARAY KI SAMSKRITT (Cavironment)
by Shubhu Patwa
Rs. 5500

सहभागिनी ऊपा को
निर्भय हो झेलती रही हर प्रहार, झंझावात
देती रही सम्बल, ऊर्जा

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अपनी ओर से कुछ समय से हमारे देश में पर्यावरण को लेकर तीव्र चिन्ता महसूस की जाने लगी है । क्रियात्मक रूप से विभिन्न तरह के काम और आन्दोलन भी देश में अनेक क्षेत्रों में चल रहे है । पिछले कुछ वर्षों से 'थार के पर्यावरण' को लेकर मुझे भी एक आन्दोलन में निकट से काम करने का अवसर मिला और इस तरह देश भर में चल रहे आन्दोलनों को कुछ-कुछ जानने का अवसर भी सहज ही प्राप्त होता गया। ज्यों-ज्यो मैंने इन आन्दोलनो को निकट से देखा त्यों-त्यों मुझे इसकी जरूरत भी अधिकाधिक महसूस होती गई। लेकिन मुझे लगा कि अब तक जो आन्दोलन चल रहे हैं वे या तो पेड़-पौधो, पहाड, नदी-नालो को ववाने अथवा नये जंगल लगाने तक सीमित होकर ही चल रहे है । बहुत अंगों तक यह अत्यन्त जरूरी है । जिस तेजी से जंगल या वन नष्ट हो रहे हैं और हमारे प्राकृतिक जीवन पर जो दुष्प्रभाव दिखाई देने लगा है उसे देखते ऐसे कामों का मूल्य भी बहुत हो जाता है । मुझे यह लगता रहा कि पर्यावरण के प्रश्न को इतने तक सीमित करके नहीं देखा जा सकता। क्योंकि जंगल लगाना और वनो की रक्षा करना ही मान पर्यावरण नहीं है । दूसरी बात यह भी है कि प्रकृति मे जो कुछ विद्यमान है उसकी रक्षा या सवर्द्धन जंगल लगाने अथवा वनों की हिफाजत करने मात्र के ऐसे कामों से पूरी तरह संभव नहीं है जो सरकारी तंत्र या कुछ आन्दोलनों के माध्यम से हो रहा है। ऐसा करना बहुत अच्छा और जरूरी काम है तब भी इसकी सार्थकता पूरी तरह से तभी असदिग्ध हो सकेगी जब हमारा दृष्टिकोण बदले। जो भी आन्दोलन चल रहे हैं, यह बुनियादी बात समझनी चाहिए कि आज जीवन के प्रति जो प्टिकोण बन गया है और विकास का जैसा नजरिया प्रचलित हो पुषा हे उसे बदला जाना जरूरी है। यह यदलाव सरन नहीं है और तब तक तो और भी कठिन है जब तक ऐगे आन्दोलनों रोगक्रिय रूप से जुड़े लोगों का नजरिया ही स्पष्ट न हो जाये। हम रष्टि से यह पुस्तक लिगते समय मुझे जो कुछ पड़ना-गमाना पड़ा वह मेरे लिए बहुत लाभप्रद रहा और मेरा विश्वास है कि यह पुस्तक उनके लिए भी फाफी सहायक गिर होगी जो पर्यावरण के साथ उगमे जुड़े बुनियादी मुद्दों को भी समझना चाहते है । मै यह मानता हूँ कि परिपक्व और विकसित समझ के अभाव मे होने वाले काम और उसे करने वाले कार्यकर्ता दूसरों के लिए ही अच्छे औजार सावित हो सकते है । आज चारों ओर यही स्थिति है । विकसित प्रौद्योगिकी और विज्ञान भी आज क्या कुछ लोगों के स्वार्थों की पूर्ति के औजार ही नहीं है ? ऐसा है, इसी कारण समग्र प्राणी जगत् के लिए यह विज्ञान और प्रौद्योगिकी श्रेयस्कर साबित नही हो रही है । यह बात मैंने इस पुस्तक में कई स्तरों पर बार-बार स्पष्ट करने की कोशिश की है। यह ठीक है कि वर्तमान स्थितियों में रह रहे समाज को जहाँ तक वह जा चुका है वहा से पूरी तरह से लौटा पाना कठिन है । किसी बीच के रास्ते से भी कुछ बनता प्रतीत नही होता । अतः पर्यावरण औरपरिवेशिकी के प्रति सजग लोगों के लिए यह चुनौती भरा समय है । जीवन और मौत मे मे कभी बीच का रास्ता नहीं निकल सकता । इसमे से तो किसी एक को ही चुनना होता है। तब क्या कोई ऐसा भी होगा कि मृत्यु को चुने? चाहे हम मृत्यु को न चुनें, पर हम अग्रसर उसी ओर हो रहे हैं । सहज मृत्यु एक स्वाभाविक क्रिया है, पर हम बलात् मौत के शिकार होने से यदि अपने को न बचा सके तो यह हमारा दुर्भाग्य ही है । क्योकि मनुष्य समाज अन्ततः विवेकशील प्राणी है। हमारा विवेक आज कसौटी पर है। इस पुस्तक से यदि अपनी कसोटी का परीक्षण करने की ओर उन्मुख हो सके तो मैं यह श्रम सफल मानूगा यह पुस्तक लिखने की प्रेरणा या राइच्छा मेरे मित्र श्री नन्दकिशोर आचार्य की ही थी। मुझे बार-बार इसके लिए अभिप्रेरित न किया जातातो मैं यह काम शायद नही कर पाता । उनका ऐसा कहा मैं कितनाक कर पाता हूँ यह तो वे जानते हैं और कई बार काफी क्षुब्ध भी होते हैं, पर यह जो मैंने उनका कहा किया है उसमे दूसरा दवाव मेरे अनुज दीपचन्द सांसला का भी खासा रहा है । कभी सीधा मुझे और कभी आचार्य जी के द्वारा बार-बार मुझे इसके लिए कहा जाता रहा । तभी मैं यह काम पूरा कर पाया। इसलिए मुझ से भी अधिक मन्तोप शायद इन दोनो को है । मेरे घर के साथ रहने वाले सदस्य तो हर क्षण इस काम में मेरे सहायक रहे हैं । मैं इन सभी का कृतज्ञ हूं। । शुभ पटवा भोनारार, 31 अक्टूबर, 1988

अनुक्रम
पर्यावरण की संस्कृति
पर्यावरण की संस्कृति 13
धमका मानवीयकरण 31
औद्योगिक सस्कृति 39
प्राकृतिक सम्पदा
प्राकृतिक सम्पदा 51
ताकि सनद रहे 67
73
जल-जीवन भी है 81
यह धरती
थार का पर्यावरण
थार का पर्यावरण 93
वन और धार को सामाजिक वानिकी 98
गोचर-औरण 106
इत्यलम
देशालाममा
119
123

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पर्यावरण की संस्कृति सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड मे पृथ्वी एक ऐसा नक्षत्र है जिसमें प्राण और वनस्पति दोनों हैं । इसीलिए इसका विशेष महत्व है। किसी अन्य ग्रह में भी यह विशिष्टता हो सकती है, पर अभी तक हमे इसका पूरा ज्ञान नहीं है। पृथ्वी पर प्राण और वनस्पति का हमेशा एक समतोल रहा है। सहज समतोल प्रकृति का स्वाभाविक गुण है । प्रकृति में जो कुछ विद्यमान अथवा दृश्यमान है उसमें मनुष्य सर्वोत्कृष्ट कृति है। प्रकृति का एक अनुपम अनमोल अंग है। सीलिए प्रकृति के सहज मन्तुलन मे जब किसी प्रकार का बिगाड़ होता है तो उसकी सर्वाधिक जिम्मेदारी मनुष्य समाज की होती है। उसी का दायित्व बन जाता है कि बिगाड़ से उत्पन्न विसंगतियों को समाप्त करे और फिर से उसे पटरी पर लाये। आज पर्यावरण, परिवेशिकी और प्रदूपण जैसे शब्दों का काफी शोर है । जब से पश्चिम में 'एनवायर्नमेन्ट, इकोलोजी और पोल्यूशन' के प्रश्न पर तीव्र चिन्ता होने लगी है, भारत में भी यह शोर तेज हो गया है। हमारे यहां यह ममस्या आजादी के बाद पिछले बीस-तीस सालों से आये आधुनिक विकास के कारण अधिक गहन हुई है। जिसे आधुनिक शब्दावली में 'पर्यावरण और परिवेशिकी' कहते है उमे भारतीय पारम्परिक शब्दावली मे 'प्रकृति' कहा जाता रहा है। विश्वकवि रवीन्द्रनाथ ठाकुर से जब भारतीय संस्कृति के बारे में पूछा गया तो उनका उत्तर था भारत की संस्कृति न गावों की है और न शहरों-नगरो की । भारतीय संस्कृति 'अरण्य' संस्कृति है। हमारे इतिहास, परम्परा, दर्शन और संस्कृति का निर्माण 'अरण्य' में ही हुआ है। महान ऋषि, महपि, विद्वान, दार्शनिक, तपस्वी अरण्य मे ही रहे और अपने क्रिया-कलापो से भारतीय मानस को प्रभावित किया । मनुष्य का जो स्वरुप आज हमारे सामने है उसके आदि रूप का भी हम साक्षात्कार करें। प्राण का प्रादुर्भाव जल में हुआ। करोड़ों वपो तक पानी में, ही विभिन्न प्रकार की वनस्पतियो की उत्पत्ति होती रही और समाप्त होती रही । विकास-विनाश का यह क्रम चलता रहा । युगों तक चले इस क्रम मे मे ही स्तनपायी प्राणियों का प्रादुर्भाव हुआ। यतमान युग यही स्तनपायी युग है जिसका मर्वश्रेष्ठ रूप मनुष्य है। आज जो मनुष्य पृथ्वी पर है उमी का प्रथम रूप आदि मानव है। आदि मानव वनों में रहकर और रात पेड़ों की डालियों पर गोकर विताता रहा । प्रथम विकास के बतौर उमने आग पर काबू पाया और इस तरह रात मे हिंसक प्राणियो, पशुओं से बचने के लिए आग जलाने का क्रम शुरू हुआ। विकाम का यह क्रम धीरे-धीरे चलता रहा । अपने आवास के लिए गुफाए बनानी शुरू की। पेट भरने के लिए कन्द-मूल, फल और जंगल के पशु उमके आहार के साधन बने। जो कन्द-मूल, फल यह साता उसके बीज जहां गिरते उसमे होने वाले पौधे जंगल में महज होने वाले पौधों से अधिक अच्छी तरह पनपते और अच्छे फल देते। जब उसने यह देगा तो उसके मन में भूमि को कुरेद कर बीज बोने का विचार जन्मा। इमी विचार ने 'हत' और कृषि को जन्म दिया। विकाम का यह क्रम अनवरत चलता रहा। आज जिस आधुनिक कान, विज्ञान और प्रौद्योगिकी से हमारा सम्पूर्ण 'प्रकृति सन्तुलन' या पर्यावरण विगड रहा है, क्या उसका प्रादुर्भाव आदिकाल से चला आ रहा है ? यही प्रश्न खड़ा होता है कि तब क्या यह विकास एक 'वेजा' विकास है ? यह नही होना चाहिए? इस पुस्तक में हमे इन्ही प्रश्नों के उत्तर खोजने है । अब हम अरण्य संस्कृति को देखें। हमारे प्राचीनतम गंथ वेद, महाभारत और रामायण है । ज्ञान, दर्शन और चरित्र का जो समपुट हमे इन ग्रंथों में मिलता है-यह वेजोड है। इन्ही ग्रंथों में हमे प्रौद्योगिकी और विज्ञान भी देखने को मिलते है। कथानकी के सहारे इन ग्रन्थों में वे सभी यातें बतला दी गई हैं जिनमे भभ्य मानव समाज की परिकल्पना की जा सकती है। भारत का सांस्कृतिक आदर्श और परम्परागत आधार अध्यात्म रहा है । आज हम यह मानने लगे हैं कि मनुष्य को आवश्यकताएं अनन्त है । लेकिन इसको प्राप्त करने में आधुनिक विकास कभी सक्षम हो नहीं सकेगा-~यह अब गर्वमान्य तथ्य समझा जाने लगा है। अनन्त की प्राप्ति केवल आध्यात्मिक क्षेत्र में ही संभव है जो भारतीय परम्परा और संस्कृति मे हमे देखने को मिलती है । आधुनिक विकास ने भोगवादी संस्कृति को पनपाया है। उसे ही बलशाली बनाया है। इसी भोगवादी संस्कृति ने प्रकृति को अपना शत्रु मान लिया है । मनुप्य प्रकृति का स्वामी बन बैठा है और प्रौद्योगिकी का जो जाल 14 पर्यावरण की गंस्कृति उसने फैलाया है उसमें प्रकृति का शोपण प्रमुख लक्ष्य है। यह पश्चिम की दृष्टि है। ठीक इसके विपरीत भारतीय दृष्टि प्रकृति के शोपण की न होकर उसके संरक्षण की, समतोल और श्रद्धा की रही है। प्रकृति पर विजय पाने की धारणा तो पश्चिम की रही है। भारतीय दृष्टि में मनुष्य प्रकृति का स्वामी नही, उसकी सन्तान है। प्रकृति के साथ भारतीय जन का यही पारम्परिक रिश्ता भारत की 'अरण्य संस्कृति' है। यही 'अरण्य संस्कृति' आज के आधुनिक समाज में 'पर्यावरण की मंस्कृति' के रूप में हमारे सामने है। लेकिन इसे देखने-समझने की दृष्टि मे आज भारी चक आ गई है। जब हम आधुनिक ममाज की बात करते है तो यह स्पष्ट करना भी ज़रूरी है कि कैसा आधुनिक समाज, कौन-सा आधुनिक समाज ? आधुनिकता का तात्पर्य मेरी दृष्टि में किसी भी चीज का ऐसा नूतन और नवीन रूप है जिसमें ऐमी कोई विकृति न हो जो मनुष्य की महत्ता को क्षीण करती हो । लेकिन आज आधुनिकता की पहचान पश्चिम के ज्ञान और यांत्रिक कौशल में निहित है। यंत्र पर दिनोदिन बढ़ती निर्भरता ने मनुष्य की महत्ता को समाप्त किया है । लेकिन ऐसा कोई भी समाज परम्परागत भारतीय दृष्टि से आधुनिक समाज नहीं कहा जा सकता। इस प्रकार के विचारों पर यह आरोप सहज ही लग सकता है कि यांत्रिक कौशल और प्रौद्योगिकी के वर्तमान विकास को नाकारा मान लेने से क्या हम फिर में पापाण-काल की ओर नहीं धकेल दिये जायेंगे? ऐसा सोचने वाले वस्तुओं के विकाम के हामी हो सकते है, मनुष्यो के विकास के नहीं । जब हम विकास की बात करते है तो यह प्रश्न उपस्थित होता है कि विकास किसका? वस्तुओं का या मनुष्यो का? तथाकथित आधुनिक विकास के अगुआओं की दिलचस्पी वस्तुओं के विकास में ही अधिक है । यह भौतिक- वादी दृष्टि है जो भोगवाद पर अवलम्बित है । भोगवाद का पेट कभी भरता नहीं । उसकी लिप्सा जठराग्नि के माफिक होती है जो कभी शान्त नहीं हो सकती। जबकि भारतीय दृष्टि हमे बताती है कि यह प्रकृति सबका पेट भर सकती है, पर किसी एक का भी लालच पूरा नही कर सकता । पर्यावरण या प्रकृति में आये इस असन्तुलन का दायी सर्वाधिक रूप से मनुष्य रहा है । जब हम सम्पूर्ण पर्यावरण या समग्र प्रकृति की बात करते है तो उसमें नदी, जल, जंगल, पहाड, पशु-पक्षी, हवा ही केवल नहीं है। हमारे सामाजिक- आर्थिक सरोकार और सास्कृतिक-राजनीतिक परिस्थितियां भी प्रभावित 'पर्यावरण की संस्कृति 15 होती हैं । इस तरह पर्यावरण का फलक काफी विस्तृत हो जाता है । वेशक प्राकृतिक पर्यावरण हमारे सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक, राजनीतिक पर्या- वरण को अधिक प्रभावित करता है। क्योंकि विकास की धुरी में प्राकृतिक संसाधनों-स्रोतो का स्थान प्रमुख है। अब तक जो कुछ होता रहा है वह मनुष्य के लिए, मनुष्य के हाथों हुआ है। पिछले सौ-डेढ सौ सालो में जो कुछ होता रहा उसका व्यापक असर पिछले बीस-तीस सालो से देखने में आ रहा है । और इन वीस-तीस सातों में जो कुछ हुआ है वह विकास के नाम पर हुआ है। विकास और इसी विकास से उत्सजित अपशेषों ने सम्पूर्ण पर्यावरण और परिवेशिकी के लिए गहन संकट खडा किया है। यह विकास विज्ञान और प्रौद्योगिकी के बल पर हुआ है। आधुनिक विकास के प्रवक्ता या प्रौद्योगिकी की अनथक वकालत करने वाले यह तकं अक्सर देते रहे है कि आज दुनिया का जो नक्शा हमारे सामने है--- पया यंत्र और विज्ञान के अभाव में उसकी कल्पना की जा सकती थी ? लेकिन हम यह देखें कि जिमे विकाम माना जा रहा है वह किस वर्ग के हिस्से मे आया। एक उदाहरण से बात अधिक स्पष्ट हो जायेगी। सन् दो हजार तक दुनिया की आबादी लगभग सात सौ करोड़ हो जाएगी। विकास के लिए जो संसाधन अत्यन्त जरूरी है उनमे से एक ईधन प्रमुख है । बल्कि यह भी कह सकते हैं कि यह मर्वाधिक महत्वपूर्ण संसाधन है । सन् दो हजार में अनुमानित सात सो करोड़ आबादी को ईंधन को आपूर्ति के लिए 2300 करोड़ टन से अधिक कोयला चाहिए । अनुमान से पता चलता है कि यह रापत धनी वर्ग मे 67 प्रतिशत और निर्धन वर्ग में 33 प्रतिशत होगी । अब आबादी का अन्तर देखें । गन् दो हजार तक आबादी का जो अनुमान है उसमे धनी वर्ग 23 प्रतिशत और निर्धन वर्ग 77 प्रतिशत माना गया है । यह तो मन् दो हजार मे अनुमान की बात हुई । अब हम वास्तविक स्थिति को भी देखें। गात दशक में दुनिया की आबादी में 31 प्रतिशत धनी लोग थे जो ईधन के लिए 87 प्रतिशत कोयला पपा लेते थे। ठीक इसके विपरीत निर्धन वर्ग की आवादी 69 प्रतिशत थी, लेकिन ईंधन के लिए उन्हें मात्र 13 प्रतिशत कोयला ही मिल पाता था। ये आंकड़े मंयुक्त राष्ट्र संघ के हैं और इन पर भरोमा करना गलत न होगा। गगा उदाहरण गे यह जाहिर है कि यंत्र और विज्ञान ने जो विकाम का मदन पड़ा किया है वह दुनिया के कितने प्रतिगत लोगों को नगीव हुआ है । गया में गमन विभाग को दृष्टि कहा जा सकता है ? 16 पर्यावरण की गंगति विकास की इसी असंगति ने हमारे मामाजिक, सांस्कृतिक, आर्थिक और राजनीतिक पर्यावरण को भी दूपित किया है, क्योकि यह असन्तुलन सभी पक्षों को प्रभावित करता है और हर पक्ष मे विसंगतिया प्रतिविम्बित होती रही है । आगे के पृष्ठो में हम इन पर कुछ विस्तार से चर्चा करेंगे । विकाम की बात कहने वाले भी दुहाई मानव समाज के विकास की ही देते है। अत. हमें थोड़ा यह भी देख लेना चाहिए कि मानव समाज क्या है ? कैसा मानव ममाज हम इस धरती पर देखना चाहते है ? मानव समाज क्या 'सम्पूर्ण प्रकृति' का ही एक हिस्सा नहीं है ? सम्पूर्ण प्राणी जगत् में मनुष्य सबमे भिन्न और उत्कृष्ट है । क्योकि उममें चेतना है, सृजनशीलता है, प्रज्ञा है । इसलिए मनुप्य एक सामाजिक प्राणी है। लेकिन वह प्रकृति की सम्पूर्णता का ही एक हिस्मा है। यह भारतीय दृष्टि है। भारतीय दृष्टि से मनुष्य होने का अर्थ इस बात में निहित है कि जो जैविक संसार है उसके साथ उसका व्यवहार कैमा है । सम्पूर्ण प्राणी-जगत् मे उसका स्थान बुनियादी तौर पर इसलिए भिन्न और विशिष्ट है कि वह स्वतत्र रूप मे विचार करने की, सोचने की क्षमता रखता है । चूकि उसमे स्वतत्र चेतना का गुण विद्यमान है इसलिए किसी भी कर्म या कारण के प्रति वह उत्तरदायी भी माना जाता है । ये ही दो आधारभूत बातें हैं जिनसे मानव समाज निर्मित होता है। यदि इन दो गुणो का समुचित विकास किसी भनुप्य में नहीं दिखायी दे तो मानना होगा कि वह देहधारी के तौर पर ही मनुष्य कहलाएगा। जब हम यह मान लेते हैं कि जैविक समार मे मनुप्य सबमे उत्कृष्ट, मक्षम और चेतनाशील है तो उममे यह अपेक्षा स्वाभाविक है कि वह ऐमे कृत्य करे जो जीवन और जगत् को संरक्षण और पोषण दे सके । जव जीवन और जगत् को पोपण देने की बात आती है तो हमे यह देखना होगा कि इस धरती पर जो कुछ विद्यमान या दृश्यमान है वह पोपित हो, पुष्ट हो । इम पर होने वाले किसी भी आन्तरिक या बाहरी आघात का प्रतिकार मानव समाज का दायित्व बन जाता है । यह दायित्व भी चेतनाशील मनुष्य का ही है कि वह यह समझे कि जो उससे कम ममर्थ है उमे भी जीने का हक है और वह हक उमे प्रकृति से सहज ही प्राप्त है । अतः उसकी रक्षा हो और यह रक्षा मनुष्य अपने जागृत विवेक के माध्यम से कर सकता है । पशु-पक्षी और वनस्पतिया, पेड़-पौधे मनुष्य मे कम चेतनाशील जैव हैं । उनका विनाश पर्यावरण की संस्कृति 17 महत्ता का यदि मनुष्य अपने लिए करता है तो यह मानना होगा कि यह वास्तयिय अर्यो मेन चेतनाशील है और न विवेकशील । इस प्रकार उमेदायित्व-चौध वाला भी नहीं कहा जा गकना। गीलिए विज्ञान और प्रौद्योगिकी को मनुष्य की तुलना में यदि अधिक महत्व देने की बात कही जाती है तो यह माना गाना चाहिए कि सम्पूर्ण जैव. जगत् के साथ एक तरह से पाशविकता और अतिचार करने की बात को वत दिया जा रहा है । इसके मूल में भी मनुष्य ही है। क्योकि प्रौद्योगिकी में स्वतत्र चेतना और म्य-विवेक का विकाम कभी भी गंभव नहीं है । इमे ममझ लेने के लिए यह जानना काफी है कि जिस 'न्यूकनीय ऊर्जा' को दुनिया वरदान मान चुकी, वह वरदान है या अभिशाप । इम पृथ्वी पर परमाणु ऊर्जा को मानव जाति के उत्थान के लिए शान्तिपूर्ण अभिनव प्रयोग माना गया । लेकिन भाज मानव जाति के लिए वह सबसे बड़ा सतरा साबित हो रहा है। परमाणु ऊर्जा के एल्फा, बीटा और गामा किरणो का जैविक मगार पर किम म्प मे प्रभाव पड़ने वाला है यह वैज्ञानिको को भली-भाति मालूम है । विकिरण मे निकले अणु गोनी को तरह शरीर को चीर कर अन्दर प्रवेश कर जाते है । इस में हाल मे गैरनोबिल दुर्घटना (26 अप्रैल, 1986) के दुष्परिणाम भले ही छिपाये जा रहे हों या कहा जा रहा हो कि सभी दुप्परिणामो को निष्प्रभावी कर दिया गया है, पर अमरीकी जीव-विज्ञानी एच जे मूल र ने सन् 1927 में ही विकिरण मे उत्पन्न होने वाले खतरो पर एक शोध प्रबन्ध प्रस्तुत कर वैज्ञानिको के सामने यह साबित कर दिया था कि विकिरण मे मीधा प्रभावित होने वाला तत्समय का व्यक्ति ही नहीं, बल्कि उमको मन्ताने भी उसके दुष्प्रभावो से अछूती नहीं रह सकती। परमाणु ऊर्जा के अपशेषों के निपटारे के बारे में भी स्पष्ट राय है । जो अपशेष नदियो या ममुद्रो मे छोड़ दिये जाते है वे धीरे-धीरे भूमिगत जल में मिल जाते है और उनकी 'रेडियो-एक्टिविटी' अन्ततः मिट्टी मे रह जाती है । यही नहीं 'न्यूकलीय रियेक्टरों' की कार्यक्षमता एक निश्चित अवधि-बीम, पच्चीस या तीस वर्ष की होती है। इस अवधि के बाद इन रियेक्टरों के विघटन का खतरनाक प्रश्न खड़ा होता है। पर न उनका विघटन सभव है और न स्थानान्तरण । जाहिर है वे जहा खड़े होते है वही मिट्टी, जत और वायु को "रेडियो एक्टिव' वनाते रहते है। यह ऋम शताब्दियो तक भी चलता रह सकता है । इस्तेमाल-शुदा ऐसे न्यूकलीय ऊर्जा केन्द्रों का यह राक्षमी या 'डाकिनी' रूप मम्पूर्ण जीव-जगत के लिए कितना घातक है, अब किमी के 18 पर्यावरण की संस्कृति लिए संदिग्ध नहीं रहा है। राजस्थान के कोटा शहर में परमाणु बिजलीघर मे से 'न्यूकलीय' रिसाव की बातें भी जब तव सुनने को मिल ही रही है। राजस्थान के लोग कोटा में इस 'डाकिनी' रूप को देख सकते है । मनुष्य के स्वतंत्रचेता और विवेकशील होने की बात हमने कहीं। यह भी माना कि मनुष्य होने का अर्थ भी यही है। तव विज्ञान और प्रौद्योगिकी के आविष्कारों से 'प्रकृति के समतोल' मे जो छेड़-छाड या असन्तुलन आया है, उमका कारक भी यही स्वतंत्रचेता या विवेकशील मनुष्य ही क्या नहीं है ? सभ्य और विवेकशील मानव समाज के सामने आज यही चुनौती है । मानव समाज के ही हाथों आज हमारा पर्यावरण दूपित है और प्रकृति लुट रही है । इसका कारण खोजना अधिक जटिल नहीं है। आज कुछ गिने-चुने लोगो के हाथी में अर्थ सत्ता केन्द्रित है। यह बात समूचे विश्व पर लागू है। इसी केन्द्रित अर्थ सत्ता की पिछलग्गू अनेक सरकार हैं। इस अर्थ सत्ता के अपने स्वार्थ है। इनके मनो में प्रेम की जगह लोभ और करुणा की जगह बर्बर हिंमक वृत्ति हावी है। उनके लिए सभ्य होना वस्तुओं का या भौतिक ससाधनों का अम्बार लगा देना भर है। उनके लिए नैतिकता मनुष्य के अस्तित्व का बुनियादी धर्म नहीं है । नैतिक होने मे वे मानवत्व की सिद्धि नही मानते । वल्कि उनका लक्ष्य प्रवृति मे जो कुछ उपलब्ध है उसे निचोड़ लेना मात्र है। इमीलिए केन्द्रित अर्थ सत्ता के बल पर बडे पूजीपति और उद्योगपति ऐसे वैज्ञानिकों और प्रौद्योगिकी विदो को खरीद लेते हैं जो अपने कर्तव्यों को भूल चुके है । उनका अनुसधान, अन्वेषग मात्र सत्ता के उस केन्द्र को परिपुष्ट बनाये रखने के लिए होता है । दुर्भाग्य मे ऐसे वैज्ञानिको और प्रौद्योगिकीविदों की कमी नहीं है। 'रेडियो एक्टिविटी' के बारे में अमेरिका की 'नेवल रेडियोलॉजिकल लेबोरे- टरी' ने जो कुछ कहा है उसमे उपरोक्त कथन की पुष्टि होती है। बहुत विवशता भरी दशा में उसका यह कहना है-चूकि हमे यह नहीं पता कि मानव शरीर इन दुष्प्रभावो मे अपने-आपको पूरी तरह मुक्त कर सकता है या नहीं, इमलिए हमारे सामने यही रास्ता बच रहता है कि हम अपने मन मे एक ऐसा निर्णय ले ले कि मनुष्य 'रेडियो एक्टिविटी' की अमुक मात्रा घरदाश्त कर सकता है। यह विवशता क्या है। न जानने की इम विवशता पा भ्रम में पड़े रहना क्या वैज्ञानिक दृष्टि कही जा सकती है ? तब भी हम विज्ञान पर इतराते है । क्या यह अधकचरा ज्ञान भर नहीं है ? और क्या यह उचित है कि जो हम नहीं जानते उग पर आधिकारिक तौर पर कुछ कहें ? पर्यावरण की संस्कृति 19 काम भी इंग पृथ्वी पर पन्द्रह लाम मे भी अधिक जीव-जन्तु और वनस्पतियां, पेड-पौधे है। ये सभी एक-दूसरे पर अवलम्वित है। इस प्रकार हम यह मान सकते हैं कि यह 'प्रकृति' या 'पर्यावरण-पग्वेिगिपी' एक ऐसा जटिल-दुम्ह तंत्र है जिसे गगझना बहुत कठिन है। विज्ञान और प्रौद्योगिकी जो कुछ आज विकास के नाम पर कर रहे है वह गाफ तौर पर बेगमझी मे किये जाने वाले काम हैं जो मानवत्व मे परे है। हमे यह समझना भी जारी है कि प्रकृति में भी प्रतिवादी या बदला लेने की अटूट क्षमता है। उसको शक्ति अपरिमित है, अनुगनीय है । यह शोपण को दीर्घ काल तक कभी नही रहेगी। ऐगे अनेक उदाहरण हम आगे से पृष्ठों में देखेगे। प्रकृति की विविधता से लेकर भाषा, वेश-भूषा, धर्म और सामाजिक परम्पराएं मर्वत्र भिन्न-भिन्न रही है। हमारे सामाजिक जीवन का भी मही और वास्त विक पैमाना यही है कि इन मव के बीच एक मुव्यवस्था स्थापित हो। यह मनुप्य के हाथों में ही रहा है। मम्पूर्ण प्राणी-जगत् अथवा प्रकृति में ऐमी व्यवस्था हो कि विनाश की ओर खदेड़े जाने की चाही-अनचाही अथवा जानी-अनजानी प्रवृत्ति पर नियत्रण लग सके। यह कैरी गम्भव हो गकेगा- आज के समाज के लिए एक चिन्तनीय सवाल है। गी जी जुग ने सन् 1933 में अपनी पुस्तक 'मॉडर्न मन इन मर्च आफ ए मोल' मे विसा हे कि आधुनिक मनुष्य आज उन्नति की चरम सीमा पर है और कल वह उससे भी आगे निकल जाने वाला है। आधुनिक मनुष्य विज्ञान, शिल्प और संगठन के बारे में यह समझ लिया है कि ये कितने लाभ- कारी है. पर यह भी समझ लिया है कि वे कितने विनाशकारी हो सकते हैं । यह विकास मानव जाति की शुभाकाक्षाओ की दष्टि मे अधिकतम निराशा- जनक है। जुग यहा तक कहते है-कुल मिलाकर मेरा विश्वास है कि मैं यह कह कर अतिशयोक्ति नहीं कर रहा कि आधुनिक मनुष्य को, मनोविज्ञान की भाषा में कहे तो, लगभग प्राणान्तक आधात पहुंचा है और परिणामस्वरूप वह घनी अनिश्चितता में जा पड़ा है। हमारे सामाजिक-सास्कृतिक जीवन के आधारभूत नियमो सदा एक मुगंगति, एकता और समादर रहा है। विकास के नाम पर जब इसे पैरो तले रोद दिया जाता है तो विद्वैप और घृणा पनपने लगती है ! आज सम्पूर्ण ममाज भौतिक बाहुल्य के कारण घृणा मे भरा दिखाई पड़ता है। आज छल, वल, 20 पर्यावरण की सस्कृति भय, असत्य और निष्ठुरता ही जीवन की वास्तविकताएं बनी दिखाई देने लगी हैं । येशक इन सबके बीच सत्य, प्रेम के आदर्श भी काम कर रहे है और छल, बल, भय की जडों को कुतरा भी जा रहा है । लेकिन आसुरी वृत्तियो का जो घना दबाव बढ़ता जा रहा है उसे अनदेखा नहीं किया जा सकता है। हमारे सामाजिक जीवन की यह दशा यत्र और विज्ञान से उपजे लोभ के फल- स्वरूप है । सही अर्थों में यदि सोचा जाय तो यत्र और विज्ञान लोभ के साधन नही होने चाहिए। लोभ की जगह प्रेम, करुणा और महृदयता को स्थान मिलना ज़रूरी है । हमारे सामाजिक-मास्कृतिक पर्यावरण को सुदृढ़ बनाने के लिए यह जरूरी है। तभी उच्च मानवीयता के आदर्श कायम हो सकते है । डॉ. राधाकृष्णन कहते है-~यदि हम एक दूसरे के प्रति दयालु नहीं है और यदि पृथ्वी पर शान्ति स्थापित करने के हमारे सब प्रयत्न असफत रहे है, तो उसका कारण यह है कि मनुष्यो के मनो और हृदयो में दुष्टता, स्वार्थ और द्वैप से भरी अनेक रुकावटे है जिनकी हमारी जीवन प्रणाली कोई रोकथाम नहीं करती। यदि हम आज जीवन द्वारा तिरस्कृत है तो इसका कारण कोई दुष्ट भाग्य नहीं है । जीवन के भौतिक उपकरणों को पूर्ण कर लेने मे हमारी सफलता के कारण हमारे मन मे आत्मविश्वास और अभिमान की एक ऐसी मनोदशा उत्पन्न हो गई है, जिसके कारण हमने प्रकृति का ज्ञान संचय और मानवीकरण करने की बजाय उसका शोपण करना प्रारम्भ कर दिया है । हमारे सामाजिक जीवन ने हमे साधन तो दिये हैं, पर लक्ष्य प्रदान नही किये। हमारी पीढ़ी के लोगो पर एक भयानक अन्धता छा गई है। लेकिन इस अन्धता का उपाय हमे ही खोजना है। प्रकाश की किरण कही से यदि फूट सकती है तो वह मनुष्य ही है। समाज का जो स्वरुप आज हमारे सामने है उसी में से एक ऐसे संसार की रचना करनी होगी जो सत्य, करुणा और सृजनशीलता पर अवलम्बित होगी। इसके लिए तीन संघर्ष होना स्वाभाविक है। उन शक्तियों को नियमित करना होगा जो अपनी हद से बाहर आ चुकी है। यहा हमे अपनी हद यानी सीमा क्या है-यह भी समझ लेना चाहिए। हम अपने शरीर को ही लें। शरीर की रचना ही ऐसी हुई है कि उसमे हर तरह मे हदबन्दी है ! यदि हम उस हदबन्दी को उलांघते है तो विषमता, दुःख और क्लेश को न्योतते है। इस हद को लाघने के जो भी कदम है वे प्रत्यक्ष या परोक्ष मे अन्ततः एक जकड़न ही खड़ी करते हैं। हम जो भी करना चाहे यदि कुदरती हद के मुताबिक करते रहे तो जकड़न से मुक्त रह सकते है । पर्यावरण की संस्कृति 21 जो व्यवस्था आग विद्यमान है-दमे उगो में से कुदरती हदों को शोजना होगा और उगे स्थापित करना होगा। विगया यह जटिल और अत्यन्त संघर्षमय है, लेकिन यह परिस्थिनियों का तकाजा भी है। आज अत्यधिक यंत्रीकन व्यवस्था के धीच हम गहे हैं। इसी गे मे हमे आनी परम्परागत व्यवस्था को गोजना होगा । हमारे प्राचीन ग्रंथ इममे अत्यन्त सहायक हो सकते हैं । यह दुर्भाग्य है कि इन्हें हम विस्मृत करते जा रहे है। वराह मिहिर भारतीय ज्ञान परपरा के उन महानतम विद्वानों में से एक है जिनकी तुलना योरोपीय रेनेसा के प्रमुख विद्वान लियोनार्दो द विशी गे को जाती रही है । उनका प्रसिद्ध ग्रय 'वृहत्महिता' भारतीय ज्ञान का विश्वकोप माना जा सकता है। लेकिन इस ग्रंथ के विशद अनुशीलन की आधुनिक भारतीय समाज ने कभी जरूरत ही नहीं समझी। पश्चिम का हस्तक्षेप और बेहद प्रभाव भारतीय मानस को इस दिशा में सोचने से विमुख रखने में निरन्तर सफल रहा है । इसी प्रकार हम अपने वेदों को देखें। चार वेद, चार उप वेद और छ. वेदांगो को जोड़कर वैदिक साहित्य की उपादेयता एक समय निर्विवाद रूप से स्वीकार की जाती रही है। लेकिन इनमें निहित विज्ञान और प्रौद्योगिकी के बारे मे आज की धारा के तहत कभी भी विशद अध्ययन- अन्वेपण नहीं हुआ । पश्चिम के राजनेताओ और पूजीपति वर्ग ने भारतीय वाड,मय के इन उत्कृष्ट और शाश्यत ग्रंथों को रद्दी के टुकड़े करार देने में ही अपना हित और स्वार्थ देखा और बहुत हद तक ये इसमे सफल भी रहे । आज विश्व भर में कंप्यूटर वैज्ञानिकों का भारी दबदया है। भारत मे सन् 1985 के बाद से 'कंप्यूटर' की जो आंधी उमड़ी है वह कहा जाकर शान्त हो बैठेगी यह तो समय ही बतायेगा, लेकिन वैदिक गणित ने दुनिया के कंप्यूटर वैज्ञानिको में हलचल पैदा कर दी है। वैदिक गणित के आधार पर सोलह सूत्रो की एक खोज पुरी के शकराचार्य दिवगत स्वामी भारती कृष्ण तीर्थ ने की थी। उसके बाद रुड़की विश्वविद्यालय के प्राध्यापक डॉ. नरेन्द्र पुरी ने हाल ही में अपनी विश्व यात्रा में वैदिक गणित की मौलिकता और आधुनिक उच्च प्रौद्योगिकी में इसकी उपयोगिता को लेकर जो व्याख्यान दिये है उससे लदन। वाशिंगटन, हार्वर्ड, शिकागो, हामधुर्ग, वलिन, मिलान, जिनेवा और पेरिस जैमे शिक्षा केन्द्रो का ध्यान खीचा गया है। वहां के शिक्षा संस्थानो व अनु- सधान संगठनो ने वैदिक गणित को अपनाने में उत्सुकता दिखाई है। आधुनिक प्रौद्योगिकी को वैदिक गणित यदि नई दिशा दे राकता है तो इसे भारतीय दष्टि मे निहित प्रौद्योगिको ही माना जा सकता है । ठीक इसी तरह 22 पर्यावरण को सस्कृति चिकित्सा विज्ञान में चरक सहिता और सुश्रुत उल्लेखनीय है । अग्नि पुराण आदि प्राचीन साहित्य, दर्शन और विज्ञान के ऐरो अनेक ग्रथ व हस्तलिखित पाडुलिपिया हमारे यहां विद्यमान है जो भारत के सास्कृतिक, शैक्षिक, सामा- जिक वैभव को उजागर करते है। लेकिन दीर्घ काल तक साम्राज्यवादी ताकतों तथा व्यापारिक प्रतिष्ठानो के हाथों में सिमटी शासकीय वृत्तियों की जकड़न में बन्धा भारतीय समाज अपने परखे-परखाये तरीके, परम्परा, ज्ञान और तकनीक को न केवल भूलता गया, उसे कपोल गल्प भी मानने लगा। शायद यह विश्वास कर पाना कठिन हो कि राउरकेला और भिलाई में जो इस्पात आज निर्मित होता है उससे बेहतर इस्पात व लोहा बनाने की तकनीक भारत में मौजूद रही है । सन् 1800 के आसपास देश में लगभग दस हजार भट्टिया ऐसी थी जिनसे लोहे और इस्पात का उत्पादन होता था। इनकी उत्पादन क्षमता 35 से 40 सप्ताह की कार्य अवधि मे वीस टन थी। कहने का तात्पर्य सिर्फ इतना है कि जो सामाजिक-सांस्कृतिक व आर्थिक पर्यावरण भारत का रहा है उसे पश्चिम की कलुपित छाया ने प्रदूपित किया है और इस प्रदूषण के कलमप को छांटने के लिए फिर से हमें अपनी परम्परा, ज्ञान और तकनीक तथा विद्याग्रहण करने के तरीको की ओर लौटना होगा। हमे एक समन्वित-सन्तुलित भारतीय दष्टि पुनर्स्थापित-पुविकसित करनी होगी। यह दृष्टि ही पर्यावरण की हमारी अपनी रप्टि, हमारी अपनी संस्कृति हो सकेगी। दरअराल भारतीय ताने-बाने को नष्ट कर अंग्रेजी हुकूमत ने अपने अस्तित्व को बनाये रखने के लिए जो ढाचा,निमित किया, स्वाधीनता के बाद हमने भी कमी-बेश उसी तर्ज पर उसे मंजूर कर लिया। इस देश को अपनी परम्परा में लौटाने के लिए गांधी (मोहनदास करमचन्द गांधी) ने जो दृष्टि दी उरा ओर किसी ने ध्यान ही नहीं दिया । सन् 1909 में 'हिन्द स्वराज' पुस्तक के जरिये बापू ने भारतीय समाज और उसकी व्यवस्था व प्रबन्धन पर साफ- साफ दृष्टिकोण प्रस्तुत कर दिया था । 'हिन्द स्वराज' को हम 'पर्यावरण को संस्कृति' का निचोड़ मान सकते है। दुर्भाग्य से स्वाधीनता के बाद इस देश को दिशा देने वालो ने इस छोटी-सी पुस्तक की जो उपेक्षा की उससे बडे हादसो की सम्भावनाएं ही प्रवल हुई और अब तो वे घटित भी होने लगे है । आजादी के बाद राज्य सचालन का ढाना पूरी तरहास पदमाजाला तरी था और हमारी समाज व्यवस्था तथा ऐतिहासिक परम्परामोन्से उसेंका.

रिश्ता कायम होना आवश्यक था। हमारे कर्णधार उसमे असफल ही नहीं रहे, निष्क्रिय भी रहे। भारतीय समाज व्यवस्था से राज्य व्यवस्था का ताल- मेल यदि ठीक प्रकार से बनाया जाता तो मादेश और अध्यादेशो के स्थान पर स्वत. स्फूर्त नीति और आयोजनाओ का निर्माण होता और उसी में से ऐसी विकेन्द्रित व्यवस्था निकल आती जो नीचे के स्तर पर एक सुदृढ धरातल पर स्थापित होती। भारत के सदर्भ में हम इसे देखे तो पायेगे कि भले ही भारत की प्राचीन शासन व्यवस्था 'राजतन्त्र' परम्परा वाली थी, पर उसमे नीति निर्धारण ऊपर से नहीं थोपा जाता था। मामन तत्र को संचालित करने के लिए जो शिक्षा-दीक्षा उस समय दी जाती थी वह आज के 'प्रबन्धन' जैसी नही थी। लोक मानस के अनुम्प शिक्षा-दीक्षा ही वास्तविक शिक्षा-दीक्षा मानी जाती थी। कौटिल्य के अर्थशास्त्र में समाज और राज्य के कर्तव्यो का जो सांगोपांग विवेचन है उसके सामने लोकशाही की प्रगतिशीलता को भी नतमस्तक हो जाना चाहिए। याज्ञवल्क्य स्मृति, मनु स्मृति में लोक मानस के प्रति श्रद्धा और परम्पराओ' का जोगमायोजन है आज उसके अध्ययन अनुशीलन की जरूरत है । क्योकि इग लोकशाही की तथाकथित प्रगतिशीलता आज बोझ सावित हो रही है । राजा होने का अयं तब लोक मानस और लोक आदर्श की अनुपालना में अपनी क्षमता की आहुति देना रहा है । तब सचमुच में राज्य-धर्म लोक-धर्म का नियामन था और राज्य वास्तविक अर्थों में समाज से नियंत्रित था। राज्य गत्ता को भी मर्यादा थी। उसका उल्लंघन समाज के प्रति एक तरह रो अनादर था जो गरल नहीं था। हम चाणक्य के काल की देते तो पायंगे कि राज्य का ढांचा भी तब सासा विकेन्द्रित था । गायों के समूह स्वतत्र होते थे और गांव समूहों के मुखिया राज्य दरवार मे यहा के प्रतिनिधि होते थे। ऐसे प्रतिनिधियों को राभा में गर्वसम्मत राय पर नीतियों का निर्धारण होता था। कहने को पंचायत राज गेर सगद ता लोक प्रतिनिधियों की ऐसी ही सभाएं और ढाचा हम अपनी पतंगाल लोकतांत्रिक व्यवस्था में भी देख रहे है, लेकिन हम यह गन भी जागते हैंजिसम्पूर्ण राष्ट्र की मत्ता आज तो केवल कुछ ही लोगों की मुट्ठी में कन्द्रित होकर रह गई है। ग राजनीतिक प्रदूषण को गंगा दी जा गकती है। पर भी जानने योग्य नभ्य है कि आज जिन्हे हम पिछड़ी जाति का वर्ग कहते 1- गभग हर गदी में गता इन्ही के पाग रही है । उन्नीसवी सदी के प्रारम्भ मे भारत मेगभग 600 छोटी-बटी रियागत थी। इनमें से आधे से अधिरियागोंगे पियसरी जागियो मा वनयागियों का राज्य था । यही ययो, परिणरीगंधति भारत की यह सनातन परम्परा रही है कि नदी, जल, भूमि, पहाड़, पशु-पक्षी, जगल, पेड, वनस्पति का स्वामी कभी राज्य सत्ता नही रही । इनका उपयोगकर्ता या उपभोक्ता ही इसकी रक्षा और संवर्द्धन का जिम्मेवार रहा है । यह सब प्रकृति के दिये हुए उपहार माने जाते रहे हैं । इन पर किसी एक का स्वामित्व अथवा व्यापार का अधिकार भारतीय परम्परा में पाप माना जाता रहा है । ये प्रकृति के दिये उपहार हैं जो जीवनाधार माने जाते रहे है। जब तक यह परम्परा रही तब तक श्री-समृद्धि और आनन्द भी सभी ओर रहा। राजस्थान का पश्चिमी क्षेत्र प्राकृतिक विकटता का एक नमूना है। यह थार का मरुस्थल कहलाता है । यहा प्रकृति के उपहार के बतौर विपुल मात्रा में पशुधन मिला । गौधन के कारण यह क्षेत्र घी-दूध का सरस क्षेत्र माना जाता रहा है । पांचवे-छठे दशक तक गौपालक न अपने धन (पशुधन ही को यहां धन की संज्ञा है) को बेचते थे और न दूध-छाछ को । प्रकृति को दुरुहता के बावजूद भारतीय परम्परा की अमिट छाप यहां इस रूप में आजादी के बाद तक देखने को मिलती रही है। यहां 'दूध बेचना' और 'पूत बेचना' एक वरावर माना जाता रहा है। पूत बेचने का मतलब अपनी सन्तान का सौदा करने से है। लेकिन अब यह परम्परा लगभग अदृश्य हो गई है। अब तो 'डेयरी परियोजना' के आने से दूध बेचने की होड़ इस कदर लग गई है कि गौपालक अपने ही घर के नन्हे शिशु के लिए भी बमुश्किल दूध रखते हैं। भारतीय समाज की ये परम्पराएं धीरे-धीरे टूटनी तो ब्रिटिश काल से ही शुरू हो गई थी। ब्रिटिश हुकूमत की कुटिल चालो ने हमारी परम्पराओ को ध्वस्त करना इसलिए जरूरी समझा कि इनके रहते लूट-खसोट के उनके इरादे पूरे नहीं हो सकते थे। महात्मा गांधी की अंग्रेजों के बारे में यह स्पष्ट राय थी कि वे चालबाजी करके हमे रिझाते हैं और रिझाकर हम से काम लेते है । एक तरफ भारतीय जन का इस तरह शोपण होता था और दूसरी तरफ भारत को सम्पदा के विनाश का सुनियोजित षड्यंत्र निर्मित होता था। ब्रिटिश हुकूमत ने अपने हित स्वार्थ के लिए जो पड्यंत्र खड़ा किया था, आजादी के बाद भी उस जुमे को उतार फेंकने का सामर्थ्य हम हासिल नही कर पाये। शिक्षा पद्धति से लेकर अपनी प्राकृतिक सम्पदा तक के नीति-नियमों में हम यह झलक देख सकते हैं। शिक्षा पद्धति की उपादेयता का नमूना तो इतने मे ही हम देख सकते है कि जो नौकरशाही इस शिक्षा पद्धति में से निकली वह भारतीय जन के प्रति किस हद तक उत्तरदायी नजर आ रही है । भारतीय समाज के प्रति वर्तमान नौकरशाही पर्यावरण की संस्कृति 25 किसी भी स्तर पर उत्तरदायी नहीं है । ठीक इसके विपरीत मामाजिवा- आर्थिक और कानूनी तौर पर यदि कोई वर्ग आज सर्वाधिक सुरक्षित रक्षित है तो यही नोकरशाही वर्ग है । दूगरी ओर लोकशाही के हाल जो ताम-झाम देख रहे हैं और उससे जो जन प्रतिनिधि निकल कर आते है, नीति-निर्धारण से लेकर क्रियान्वयन तक यश-अपयश के दायी वे ही होते है । जबकि हकीकतन उनके हाथ में कुछ भी करने के कोई प्रभावी अधिकार ही नहीं है । नोकरशाही का छल-चल इन जन प्रतिनिधियो को अपनी चालबाजियों से रिहाता रहता है। पिछले कुछ वर्षों से तो भारतीय राजनीति के परिदृश्य पर नौकरशाही और राजनेताओं का जमा गठजोड निर्मित हुआ है उससे लोकशाही, विकेद्रित शासन तत्र नैतिकता, न्याय और विधि सम्मत प्रबन्धन के शाश्वत अर्थ ही बदलते जा रहे है। शिक्षा पद्धति की ही तरह प्राकृतिक वन सम्पदा के प्रति भी ब्रिटिश हुकूमत का नजरिया भारतीय प्टि और परम्परा के सर्वथा प्रतिकूल रहा। बनो पर वनवासियों और घुमवू जातियो का परम्परागत अधिकार रहा है। यह अधिकार स्वाभाविक रूप से ही व्यवस्थित और मर्यादित भी रहा। ये मर्यादाएं सामाजिक विधि-निषेध पर आधारित थी जिन्हें न केवल पवित्रता का पुष्ट आधार प्राप्त था, सबके लिए समान रूप से आर्थिक सम्बल भी थी। वन, वृक्ष, जडी-बूटिया, चरागाह, शिकार और जलस्रोत आदि जब तक साभु- दायिक आधार पर गांव के अपने नियत्रण में रहे तब तक यह वन सम्पदा सुरक्षित थी। पूरी तरह से सबकी आवश्यकता पूर्ति में भी यह वन सम्पदा सक्षम था । पर अब वह बात नही रही । ब्रिटिश हुकूमत के लिए ऐसी सन्तुलित और आत्मनिर्भरता की यह व्यवस्था कैसे उचित होती । इसे तोड़ने और वृहद् भारतीय जन को पराथित बनाने मे ही हुकूमत की निहित सफलता छिपी थी। दीर्घ काल तक शासन में रहने और भारत की विपुल सम्पदा का शोषण कर अपनी एय्याशी का पेट भरने के लिए ऐसा कुछ करना उनके लिए जरूरी था कि लोग जल्दी से जल्दी उनके मोहताज हो जायें। इसीलिए ब्रिटिदा हुकूमत ने वनो का स्वामित्व अपने अधिकार में लेने का पड्यंत्र रचा। पहली बार सन् 1865 मे 'भारतीय वन अधिनियम' का निर्माण किया गया। सन् 1894 मे 'राष्ट्रीय वन नीति' धोपित हुई । यह सिलसिला आजादी के बाद अभी तक निरन्तर चला आ रहा है । इनके रहते वन कितने सुरक्षित रह पाये है और किस बेरहमी से वनो का विनाश हुआ- इमे हम आगे के पृष्ठो में देखेंगे। 26 पर्यावरण की संस्कृति इन नीतियों से भारतीय समाज के बहुत बड़े हिस्से का सामाजिक-आर्थिक आधार छिन्न-विछिन्न हो गया। यह वर्ग आज भी दरिद्रता का अभिशाप भोग रहा है। स्वाधीनता के बाद भी इस अभिशाप मे कोई कमी नहीं आई। इसमे इजाफा हो हुआ है। यहां फिर वापू (महात्मा गाधी) का उल्लेख अप्रासंगिक नही होगा। 'हिन्द स्वराज' में गांधी ने जो कुछ कहा उसका कई क्षेत्रों में बड़ा उपहास किया गया। लेकिन गांधी अपनी बात पर पूरी तरह दृढ़ थे। उनकी बातो का जिस तरह उपहास हुआ-बहुत असह्य होते हुए भी गांधी उससे विचलित नहीं हुए वल्कि अपने अभिप्राय को और दृढ़ता से स्पष्ट किया । स्वतंत्र भारत का कैसा रूप होगा उसका चित्र सन् 1922 में ही गांधी ने खीच दिया था। 'यग इंडिया' मे9 मार्च, 1922 को गाधी ने लिखा--स्वराज्य में रेलें होगी, किन्तु उनका उद्देश्य भारत का सैनिक या आर्थिक शोपण नहीं होगा, बल्कि उनका उपयोग भीतरी व्यापार बढ़ाने और तीसरे दर्जे के मुमाफिरो के जीवन को काफी आरामदेह बनाने में किया जायेगा। तीसरे दर्जे की मुसाफिरी करने वाली जनता जो किराया देती है, उसका कुछ बदला उसे मिलेगा। कोई यह आशा नहीं करता कि स्वराज्य में रोगों का सर्वथा अभाव होगा। इसलिए स्वराज्य मे अस्पताल तो अवश्य होगे, परन्तु यह आशा रखी जाती है कि तब अस्पतालो का उद्देश्य भोग विलास के रोगियों की अपेक्षा दुर्घटनाओ के शिकार होने वालों की सेवा करना अधिक होगा। बेशक, चरसे के रूप मे यंत्र भी होंगे। आखिर तो परखा भी एक नाजुक यंत्र ही है इसमें मुझे कोई शंका नहीं कि स्वराज्य में भारत मे कई कारखाने खडे होंगे, जिनका उद्देश्य लोगो को लाभ पहुंचाना होगा, न कि आजकल की तरह जनता का खून चूसना । जल सेना का तो मुझे कुछ पता नहीं, लेकिन इतना अवश्य जानता हूँ कि भावी भारत की स्थल सेना के सैनिक भारत को गुलाम बनाये रखने और दूसरे राष्ट्रो को आजादी छीनने के लिए रखे गए भाड़े के टू नहीं होगे । तव स्थल सेना बहुत कुछ घटा दी जायेगी, उसमें अधिकाश स्वयं सेवक होगे और उसका उपयोग आन्तरिक व्यवस्था रखने के लिए पुलिस शक्ति की तरह किया जायेगा । स्वराज्य मे कानून होगे और कानूनी अदालते भी होगी, परन्तु वे लोगों की स्वतंत्रता की रक्षा के लिए होंगे, न कि आज की तरह एक नौकरशाही के हथियार होगे, जिसने एक सम्पूर्ण राष्ट्र को शक्ति- होन बना दिया है तथा जो उसे और भी शक्तिहीन बनाने पर तुली हुई है । अन्त में स्वराज्य में जो चाहे उसे लंगोटी पहनने और खुले मे सोने की स्वतंत्रता होगी । लेकिन मुझे आशा है कि आजकल की तरह लाखो आदमियों के लिए पर्यावरण की संस्कृति 27 एक मैला सा चिथडा पहनकर घूमना जरूरी नहीं होगा, जो आवश्यक कपड़ा खरीदने का साधन न होने से आज लगोटी का काम देता है । न स्वराज्य में लासो पोगो को मकानो के अभाव मे थके हुए और भूमे शरीरो को सुले में आराम देना पड़ेगा। गाधी के उपरोक्त विचार शायद एक बार हमे अटपटे लगे। यह गोचा जा सकता है कि पर्यावरण से इन विचारो का क्या सरोकार । लेकिन इन बातों मे गाधी जिस तरह के समाज और जीवन की अपेक्षा करते है-यही हमारा सामाजिक-आर्थिक पर्यावरण है । गांधी ने इसे बहुत सहज ढंग मे मामने रस दिया है। यह कहा जा सकता है कि क्या गाधी के इन विचारों के आधार पर कोई समाज निर्मित किया जा सकता है ? क्या व्यावहारिक तौर पर यह सभव है ? क्या यह मात्र दिवास्वप्न तो नही ? इन प्रश्नो से अलग हट कर स्वराज्य के बाद से इस समय तक जो स्थिति मारत की है, हम उस ओर थोडा झाक लें । गांधी का कहा या बताया आज के भारत मे 'नहीं' के बराबर प्रतिविम्बित हो रहा है । सीधे से हम कह सकते हैं कि गांधी के सपनो वाला यह भारत नही है । तब जो भारत आज है, फिर वह ऊबाऊ क्यो है ? उत्तर स्पष्ट है कि गाधी के रास्ते नहीं चलकर भी हम सुख और आनन्द कहा पा सके ? तब गाधी के विचारो को आजमाने और उनके परिणामों को परखने की ही आज जरूरत है, न कि उस पर शका करने की। गाधी के ये विचार ऐसे जीवन मूल्यो को इंगित करते है जो मानवमुखी कहे जा सकते है। ऐसी व्यवस्था और प्रौद्योगिकी जो मानव प्रकृति या सामान्य जीवन्त प्रकृति से भिन्न न हो-~यदि अपनाई जाती है तो उसमे वह ऊवाऊपन निश्चय ही नहीं रहेगा जिससे हम आज बुरी तरह से ग्रस्त है । माधी के विचार हमे उपयुक्त और सही साबित होते दिखाई देते है क्योकि आज जो ताना-बाना हमारे चारो ओर खड़ा है वह गांधी के सुझाये ताने-चाने से सर्वथा विपरीत या प्रतिकूल दिशा वाता है । अत. सही दिशा की पहचान हमारे लिए स्वतः ही सरल हो जाती है। गाधी पर यह आरोप लगाया जाता रहा है कि वे विज्ञान, प्रौद्योगिकी और प्रगति के विरोधी है । 'हिन्द स्वराज' में उन्होंने इन आरोपो का न केवल सशक्त जवाव दिया है बल्कि एक सुसंगत दृष्टि और सुगम मार्ग भी दिखाया है। यह केवल भारतीय जन मानस के लिए ही नही है अपितु एक जागतिक दृष्टि इसमें निहित है। 28 पर्यावरण की संस्कृति 1 विज्ञान, प्रौद्योगिकी और प्रगति का मूल्यांकन आखिरकार किस तरह की कसौटी से किया जायेगा । वस्तुओ के विकास से मूल्याकन किया जाये या जीवन विकास से । आज जिस परिस्थिति से सम्पूर्ण मानव समाज घिरा हुआ है उममे प्रकृति, विज्ञान और प्रौद्योगिकी सबका समावेश अनिवार्य हो गया है। लेकिन हमे यह मानना चाहिए कि विज्ञान और प्रौद्योगिकी मे हम वैसा विवेक नही भर सकते कि आवश्यकतानुमार वह स्वतः अपने आपको नियंत्रित कर ले । ठीक इसके विपरीत प्रकृति को यह बसूवी पता रहता है कि कब और कहां उसे अपने कदम रोकने है। प्रकृति पर विजय पा लेने के मिथ्या अहकार मे गस्त हम लोग प्रकृति के इस अन्त.चक्र और नियंत्रण क्षमता को न समझ पाये है और न पूर्वानुमान ही लगा सकते है । प्रकृति की हर बात में, आकार में, गति में, यहां तक कि हिंसा में भी एक सीमा है। अत्त. प्रकृति की व्यवस्था और नियन्त्रण स्व-मन्तुलक, स्व-समायोजक तथा स्व-शोधक है। विज्ञान और प्रौद्योगिकी के माथ निश्चय ही ऐमा नहीं हो सकता। वहा 'स्व' जैसा कुछ नही। अतः यह देखना जरूरी है कि वैज्ञानिक अनुसंधान की दिशा क्या हो ? इमे केवल वैज्ञानिकों के ऊपर छोडा गया तो नतीजे कैसे होगे अनुभवो से जाहिर है । महान दार्शनिक और वैज्ञानिक आइस्टाइन ने स्वय कहा है लगभग मभी वैज्ञानिक आर्थिक दृष्टि में पूरी तरह आश्रित है और ऐमे वैज्ञानिकों को सख्या बहुत थोडी है जिन्हे मामाजिक उत्तरदायित्व का थोड़ा-बहुत बोध हो । आइंस्टाइन के इस कथन के बाद वैज्ञानिको के बारे में कुछ और कहने की जरूरत नहीं रह जाती। पर्यावरण की दृष्टि स्व-मन्तुलक, स्व-समायोजक और स्व-शोधक होनी चाहिए । प्रकृति मे तो यह खूबी सहज विद्यमान है । विज्ञान और प्रौद्योगिकी में यह दृष्टि महज विद्यमान नही हो सकती। तब यह तय करना जरूरी है कि वैज्ञानिक अनुसंधानो की दिशा ऐसी होनी चाहिए जो मानव को हिमा की वनिस्वत अहिंसा की ओर ले जाये और प्रकृति के माथ नाहक मंघर्ष की जगह उसके साथ एक मामंजस्य और सहयोग की ओर आकर्षित करे। हमे यह मानना चाहिए कि जागतिक और जैविक तौर पर हम प्रकृति की व्यवस्था के ही अंग हैं और इसके साथ हम जीवन्त और अहिंसक रूप से सहयोग करें। पर्यावरण के प्रति हमारी समझ का अभिप्राय इसी में निहित हमे इस बात को और सरलता से समझने के लिए एक बार फिर गाधी के विचारों को टटोलना चाहिए। "हिन्द स्वराज' में गांधी ने रैली और पर्यावरण की संस्कृति 29 अस्पतालो के बारे में कहा है कि रेल से अकाल की स्थितियों को बढावा मिला है । रेलों के कारण जहा महंगाई होती है अनाज यहां सिंच जाता है। वहां जाकर अनाज विक जाता है। इसी प्रकार अस्पतालो को गांधी ने पाप की जड़ कहा है । वे कहते हैं उसकी बदौलत लोग शरीर मा जतन फम करते है और अनीति को बढ़ावा मिलता है। गांधी के इन कथनों को उपहास में उड़ाने की नहीं इसके ममं और स्वत्व में पैठकर मूल को टटोलने की जरुरत अब यह सवाल विना गोचे टाला नहीं जा सकता कि हमारी जीवन-पद्धति क्या होनी चाहिए। हमे उन बुनियादी सत्यों की ओर लौटना होगा जो भौतिक ससाधनो और वस्तुओं के विकास की दौड़ मे तिरोहित हो गए है। तथाकथित आधुनिक सभ्यता की केंचुल को अब फाड़ना होगा। हमारी अपनी सभ्यता क्या है इसे फिर से समझना और ठीक से समझ कर आत्म- सात करना होगा । गांधी की नजर में मभ्यता वह आचरण है जिसरी आदमी अपना फर्ज अदा करने की कुव्वत सीखता है । फर्ज अदा करने के मानी है नीति का पालन करना । गांधी कहते हैं नीति का मतलव मन और इंद्रियों को वश मे रखना है। ऐसा करते हुए ही हम अपने आपको पहचानते हैं और यही सभ्यता है। लेकिन अपने आपको पहचानने की हमारी दृष्टि पर इस समय एक पट्टी बंधी हुई है । आंखो पर पट्टी बाधे खड़ा यह समाज यद्यपि बहुत अल्प-एक छोटा समाज है, लेकिन अत्यधिक समर्थ समाज है। इस समाज की दशा मदिरा के नशे मे डूबे या अफीमची जैसी है जो इन दुर्व्यसनों से अत्यधिक दुःखी होते हुए भी उस लत को न छोड़ पाने के लिए विवश है । जाहिर है यह संकट जिस वर्ग का है उसमे निर्धन वर्ग नहीं है । लेकिन यह निर्धन वर्ग उनके शोषण का शिकार है और खुद असहाय-सा खडा है । उसके शोपण का सबसे बड़ा हथियार आज की विकसित प्रौद्योगिकी है जो धनी वर्ग के हाथों मे सेल रही है । हम जिस जीवन-पद्धति और बुनियादी सत्यो की ओर लौटने की बात कह रहे हैं उसमें प्रमुखतः इस प्रौद्योगिकी के जुए को सिर से उतार फेंकना जरूरी है । क्या हम ऐसा कर सकते है ? निश्चय ही बहुत कष्ट साध्य और सघर्प भरा काम है। पर यह वक्त की अनिवार्यता है। जिन भयकर मुसीवतो मे मम्पूर्ण मानव समाज घिर चुका है उसमें बचाव के लिए करो या मरो जैमा दृढ़ और माहस भरा कदम ही कोई नतीजे दे सकता है। 30 पर्यावरण की संस्कृति श्रम का मानवीयकरण भानय श्रम और ऊर्जा का समतोल यदि प्रकृति और परिवेशिकी के साथ ठीक तरह से कायम रहता तो पर्यावरण का जो सकट जिम विकट रूप में हम देख रहे हैं वह शायद न होता । श्रम में मानवीयकरण से सीधा तात्पर्य है श्रम की प्रतिष्ठा । श्रम की महत्ता मानवीय जीवन में क्यो महत्वपूर्ण है और हम जिसे 'श्रम की बचत' मान बैठे हैं वह वास्तव में वचत है अथवा श्रम के प्रति उपेक्षा-यह जानना जरूरी है। प्रकृति का नियंत्रण सर्वत्र अनूठा है। श्रम के लिए मानव को दो हाथ देकर प्रकृति ने उसकी एक सीमा निर्धारित कर दी है। जो कुछ प्रकृति में विद्यमान है-दो हाथों के वन पर आदमी अपने लिए यदि उसका उपयोग करता रहे तो प्रकृति की सम्पदा असूट है । लेकिन आज वैसी वात नही रही। यंत्र ने मानव श्रम की महत्ता को ही कम नहीं किया उसे विलासिता और एय्याशी की ओर भी धकेल दिया। इसका दुष्प्रभाव हमारे सामाजिक-सांस्कृतिक जीवन पर भी पडा है। हम सभी जानते है कि आदमी जन्म मे तो अच्छा ही कहलाता है। गुण-दोप परिस्थिति और 'व्यवस्था के फलस्वरूप बाद में पनपते हैं। श्रम के मानवीय- करण का अर्थ आदमी में विद्यमान सहिष्णुता, करुणा और मवेदना को और अधिक विकसित करना है । इसके विपरीत मानव श्रम का स्थान यदि मशीन या यत्र ले ले तो इन गुणों का धीरे-धीरे ह्रास होने लगता है । परिणामस्वरूप जो सन्तुलन 'मानव श्रम' मे निहित होता है वह विगड़ता जाता है। इसी असन्तुलन के दुष्फल आज सर्वत्र दिखाई दे रहे हैं और सम्पूर्ण मानवता बल्कि प्राणी जगत् मतप्त है। श्रम के मानवीयकरण का दूसरा पहलू सावलौकिक सम्पन्नता भी है। यत्र के महारे से आने वाली सम्पन्नता सावलौकिक नहीं हो सकती । गांधी ने कहा है कि यदि यत्र के माध्यम से हर एक आदमी तक खुशहाली पहुंच सकती हो तो वह उन्हे स्वीकार्य है। लेकिन अनुभव बताता है कि ऐसा कभी हुआ नहीं। आज सम्पूर्ण विश्व में वेकारी और खुशहाली, अमीरी और गरीवी का जो अनुपात है वह चौकाने वाला है । ऐसा अनुमान है कि सन् दो हजार तक दुनिया मे धनी और निर्धन का अनुपात 23 और 77 के लगभग रहेगा। यही स्थिति भारत में भी रहने वाली है। भारत की आत्मा को ठीक तरह से समझने वालो मे महात्मा गाधी प्रमुख है । वे बहुत साफ कहते हैं कि यंत्रों से काम लेना उसी अवस्था मे ठीक कहा जा सकता है जब हमारे पास किसी निर्धारित काम को पूरा करने के लिए पर्याप्त आदमी न हों या नपे-तुले हों। यहां तो काम के लिए जितने आदमी चाहिए उनसे कही अधिक बेकार बैठे है । इसके साथ ही गांधी यह भी स्पष्ट करते हैं कि यंत्र का सहारा मेहनत वचाने के लिए करना मनुष्य की महत्ता को घटाना है। यह भी देखना जरूरी है कि समय और श्रम की बचत के लिए जो यंत्र काम में आ रहे हैं वे किनके लिए हैं। यदि इनका लाभ सबके लिए एक समान हो और किसी वर्ग विशेष के लिए न हो तो भी यह देखना तो जरूरी है ही कि वह करोड़ो बेरोजगारो की गर्दन पर तो सवार नही हो रहा । इस प्रकार के विचारो के बावजूद गांधी इस बात को भी स्पष्ट करते है कि यंत्र मानव श्रम की वचत का कारक बनता है या ऊवाऊ श्रम का विकल्प बनता है—यह भी देखना चाहिए। भारतीय परिस्थितियों के संदर्भ मे देखें तो मानव श्रम कभी ऊबाऊ नही रहा। घरो में हाथ से आटा पीसने के काम से लेकर किसी भी तरह की मजदूरी के कामों में श्रम के साथ लोकगीतो, हरजम, भजन और सन्त वाणी की मधुर अनुगूज हमेशा वातावरण को सरस बनाती रही है। आज भी श्रम करती मजदूरिनो के कण्ठों से फूटते मीठे स्वर यत्र-तत्र सुनने को मिल सकते है । श्रम का ऐसा संस्कृतीकरण अन्यत्र कही है या नहीं, भारत के ग्रामांचल और दूर- दराज के कस्वों मे अभी भी देखा जा सकता है। यंत्रीकरण के धुएँ मे जो क्षेत्र अभी तक पूरी तरह से नही पटे है-वहां भारत की ऐसी सरस श्रम परम्परा अभी भी मौजूद है। लेकिन यह परम्परा सर्वत्र रही है। इस विश्वव्यापी परम्परा के सदर्भ मे ग्यारहवें पोप का कथन प्रासंगिक होगा। पोप कहते है-कारखाने मे निर्जीव मामग्री तो सुधर कर निकलती है, लेकिन श्रमिक ध्रप्ट और अपमानित होकर। भारत मे श्रम को मनुष्य की आत्मा के कल्याण का कारक माना गया है, वही गरीर को श्रम के तप में कुन्दन और तेजस्वी होना मानते रहे है । गीता में भगवान श्रीकृष्ण कहते है-कम करना ही प्रभु का स्मरण करना है। कर्म का तात्पर्य यम मे ही है। 32 पर्यावरण की गम्वृति श्रम के मानवीयकरण का तात्पर्य यह भी है कि ऐसा होने से ही भोग-विलास की वस्तुओ की गिरफ्त से हम मुक्त हो सकेंगे । जो कुछ निरर्थक है-यंत्र और प्रौद्योगिकी ने आज उसे जीवन के लिए आवश्यक बना दिया है। श्रम का मानवीयकरण हमे जांच-परख की ऐसी हप्टि प्रदान करता है जिससे हम निरर्थक और मायंक का भेद कर सकते हैं । यही नहीं, इसके माध्यम से हम वाचिक नही-व्यावहारिक स्तर पर अपना जीवन ढालने में भी समर्थ हो मकते है। श्रम के मानवीयकरण से 'बाजार की महत्ता' पर भी नियंत्रण लग सकता है । विज्ञान और प्रौद्योगिकी ने आदमी के सहज-मामाजिक रिश्तो को तिरोहित कर दिया। इसी से उपजी 'बाजार की व्यवस्था' ने हर चीज का मूल्य निर्धारित कर दिया और अर्थशास्त्र के ऐसे मिद्धान्त लागू हो गए जिनमे कोई भी ऐसा काम संभव नहीं जो सहज साझीदारी या आपसी उत्तरदायित्व की भावनाओं मे गुम्फित हो । ऐसा व्यवहार 'बाजार की व्यवस्था' मे 'अनार्थिक' कहा जा सकता है जिसके लिए याज कही जगह नहीं है । हमारे यहां जिस प्रकार के सहज सामाजिक रिश्ते रहे है उसे एक उदाहरण से स्पष्ट किया जा सकता है। प्रख्यात दार्शनिक-विचारक डॉ छगन मोहता कहते हैं-मैं करीव दस-बारह साल का था। मेरी बहिन की शादी थी। हम जहां रहते थे उसके निकट कुम्हारों का मोहल्ला था। वहा से विवाह की वेदी में काम आने वाली मटकियां लानी थी। उसे हम 'बे' बोलते हैं। मैं कुम्हार के पास गया और 'वे' पहुंचाने के लिए कहा । उसने कहा घर जाकर दादी से कह दो कि शाम तक 'वे' घर पहुंच जायेगी। बीकानेर के पास एक गांव है नापासर । यहां के एक बड़े सेठ का एक कर्मचारी भी उसी समय कुम्हार के यहा आया। उसने कुम्हार से कहा कि विवाह की 'वे' मुझे दे दो और मुह मांगी कीमत ले लो। कुम्हार ने कहा 'वे' एक ही थी जो 'यजमान' को दे दी। ज्यादा पैसा देने वाला तू आज आया है। यजमान से मेरा पीढ़ियो का सम्बन्ध है। डॉ. मोहता इसे हमारी अर्थ व्यवस्था की 'यज्ञ मूलक प्रवृत्ति' या 'यजमानी प्रथा' मानते हैं और कहते है कि हमारी यह ऐसी आर्थिक व्यवस्था थी जो पर्यावरण से सम्बन्ध रखने वाली थी। यह व्यवस्था श्रम के मानवीयकरण से ही स्थापित हो सकती है। आज हम यह मान बैठे है कि आर्थिक और भौतिक उन्नति ही वास्तविक विकास है । जबकि मच्चाई तो यह है कि मात्र उत्पादन बढ़ाने से विकास का श्रम का मानवीयकरण 33 सपना अधूरा सावित हो रहा है । विकास का वास्तविक मूल्यांकन तो मानव श्रम को उत्पादन कार्यों से जोड़ने मे है । बड़े पैमाने पर निर्धन और वेरोजगारों को मुख्यधारा से जोड़ने के लिए यदि हम मंकल्पशील है तो उन्हें उत्पादन कार्यों से जोड़ना निहायत जरूरी है । मानव श्रम को बचाने वाली कोई भी प्रौद्योगिकी उत्पादन वढाने के लक्ष्य तो पूरे कर सकती है, पर उन लोगो को जो आज असहाय पड़े है-उत्पादन कार्यों से जोड़ नहीं सकती। यदि ऐमा नही होता है तो जैसा ग्यारहवें पोप ने कहा कि श्रमिक भ्रष्ट और अपमानित होता है-मात्र वही तक बात नहीं रहती-प्रकारान्तर मे एक हिंसक ममाज पनपता है और पर्यावरण को हानि पहुंचाने जैसे आत्मघात की ओर अग्रसर होने का खतरा सड़ा होता है । हम देख रहे है कि आज यही हो रहा है । आज जिन स्थितियों मे हम घिर चुके है-ऐसे मनोवल की जरूरत है कि श्रम को मनुष्य की देह और आत्मा के स्प में प्रतिष्ठित किया जा सके। भारत की अपनी परम्परा तो यही रही है कि आध्यात्मिक शील और भौतिक वैभव मे कभी टकराहट नहीं हुई। हमारे इतिहास में ऐगे अनेक उदाहरण मौजूद है। राजा श्रेणिक, तीर्थंकर महावीर, शालीभद्र महाराज, आम्रपाली आदि अनेको नाम इतिहास में भरे हैं जो भौतिक वैभव में नख-शिख तम सरावोर होते हुए भी अध्यात्म और शील मे सदा शीर्ष पर रहे और 'अनन्त' की प्राप्ति के लिए अध्यात्म को ही सही मार्ग माना-न कि मौतिक संसाधनो को। विरामत में मिली यह परम्परा आज पुनर्स्थापित होनी अकल्पनीय तो लगती है, पर वक्त की अनिवार्य माग अवश्य है। आनन्द कुमार स्वामी मनुष्य के कौशल, उसकी शक्ति और मशीन की निर्भरता के बारे में इस तरह तुलना करते है मौका दिया जाये तो दस्तकार म्वयं ही मशीन और औजार के मूक्ष्म भेद की स्पष्ट व्याख्या कर सकता है । कालीन बुनने का करपा एक औजार है जो ताने के धागो को खीच कर रसता हैं ताकि दस्तकार की उंगलिया उनके चारो ओर बाना बुन मके। इसके विपरीत विजली गे चलने वाला करघा एक मशीन है जो मूलत: आदमी के हिस्से के काम को भी खुद करके संस्कृति को नष्ट करता है । हमारे धर्मो में भी आवश्यकताओं और लालसाओं का निग्रह मानव चरित्र के निर्माण के लिए जरूरी बताया है । जैन धर्म में अपरिग्रह को पाच महाव्रतों में में एक माना गया है। यह व्रत तभी हासिल हो सकता है जब श्रम का मानवीयकरण संभव हो। यदि भौतिकवादी दृष्टिकोण से यह बात हम देखें तो पायेगे कि आज मानव श्रम की वनिस्वत वस्तुओं के उत्पाद को अधिक महत्व दिया जा रहा है । 34 पर्यावरण की सस्कृति - मनुष्य की सहज सृजनात्मकता पर यह एक आघात है। इससे आदमी का रूप मानवीय या इन्सानी गुणों से भटक कर दानवी प्रवृत्तियों की ओर अग्रसर होने लगता है । दानवी प्रवृत्ति में शोषण, पोषण और दोहन के बीच किमी तरह का अन्तर कर पाना संभव ही नहीं है । पर्यावरण के समतोल, सन्तुलन में ऐमा होने से ही विमंगतियां आती हैं। श्रम के मानवीयकरण का ज्यों-ज्यों ह्रास होता जा रहा है त्यों-त्यों इसके दुष्परिणाम भी सामने आ रहे है । हमारी ग्रामीण अर्थ-व्यवस्था आज चर- मराने लगी है और पूरी तरह से टूटने की अवस्था तक आ पहुंची है । थेरोजगारी दिनोदिन बढ़ रही है । श्रमजीवी वर्ग में भी हताशा और निराशा बढ़ती जा रही है। तब भी आशा की एक किरण, एक चिनगारी अभी नजर आ रही है। बहुत कुछ सो देने के बाद अभी भी समय हमारे हाथ में है। अभी भी यदि हम अपने गांवों के पुनर्निर्माण की ओर अभिमुस हो जाये और गांधी के बताये मार्ग पर चल सके तो समस्या से निजात पा सकते है । गांधी अभी भी एक अवलम्बन साबित हो सकते है। गांवो के पुननिर्माण के प्रसंग पर गांधी ने गांव से सम्बद्ध हर एक पहलू का विवेचन और समाधान सुझाया है । गांव में शिक्षा से लेकर सफाई, स्वास्थ्य, खेती, ग्रामोद्योग, यातायात, रक्षा और ग्राम स्वराज्य जैसे प्रत्येक पहलू पर गांधी ने बहुत स्पष्ट दृष्टिकोण रखा है । इन पर प्रयोग और अमल में लाने की एक पहल भर करने की ही जरूरत है । लेकिन आज तो स्थिति उलटी है । आज गांव उजड़ रहे है और शहरों की आबादी वढ रही है । सन् 1981 मे भारत के शहरों की आवादी 16 करोड़ तक पहुंच गई थी। बढती हुई इस आवादी के बोझ को शहर झेल नही पा रहे है । यह ठीक है कि शहर तो हमेशा रहे है और सदियों से रहे है । लेकिन तब उनका अपना ही परिवेश और ताना-बाना था। वे अपनी सीमा को समझते थे और लूट की चाही-अनचाही प्रवृत्ति से मुक्त थे। तब गांव और शहर के बीच सम-रसता का रिश्ता था । अंग्रेजी हुकूमत के आने तक यह रिश्ता बदस्तूर था, अटूट था। धीरे-धीरे यह परिवेश टूटने लगा। आजादी के बाद भी यह टूटन नहीं थमी। गाधी की सीख और चेतावनी का असर सत्ता के गलियारों में सैद्धान्तिक चर्चाओं तक ही मिकुड़ा रहा। श्रम का मानवीयकरण 35 यह हालत क्यो हुई ? इमे गौर से देखें। मिट्टी और पानी जीवन के मवरी बड़े आधार हैं । खाद्य और कृषि संगठन की ओर मे हुआ एक अध्ययन यह बताता है कि भारत के पाम प्राकृतिक संपदा का जो विपुल भण्डार है, कम उपज वाले जो माद्यान्न उत्पादन है, हाथ के औगारो का जो उपयोग है, रामायनिक यादो व कीटनाशको की जमी नगण्य लोकप्रियता है, मानव शक्ति की जो बहुलता है-आदि कारणों मे जमीन और मिट्टी की जीवनाधार क्षमता इतनी विपुल रही है कि वह तीन गुना आवादी के भरण-पोषण का भार उठाने का मामयं रगती है। लेकिन आज यह स्थिति तेजी से बदल रही है । रोती जब तक जीवनाधार रहती तभी तक ऐसा रह सकता था । आज तो मेती व्यवगाय हो गयी है । इसी कारण परिस्थितियो का बदलाव भी दृष्टिगोचर होने लगा है । यह अध्ययन बताता है कि देश को एक शताब्दी तक अपने लोगों का गेट भरने के बारे में निश्चिन्त हो जाना चाहिए। लेकिन यह निश्चिन्तता तभी आ मकती है जब हम अपने पर्यावरण की अनदेखी नही करें । कृषि की जो नई तकनीक है उममे मिट्टी और पानी का समुचित संरक्षण यदि नहीं हो सकता तो वैसी तकनीक हमारे लिए बेहतर और उचित कमे कही जा सकती है ? बेहतर तकनीक के बारे मे जब हम सोचते है तो उसका बुनियादी आधार धम के मानवीयकरण मे ही मन्निहित है । हमारी समाज-व्यवस्था का जो ढांचा अब तक रहा है-उसे भी देखा जाना चाहिए । काम धन्धों और जातियो के बीच सदियो मे सम्बन्ध रहे है । प्रकृति मे जो कुछ उपतब्ध है उसके उपयोग का भी जातीय आधार पर सहज स्व- निर्धारण देखने को मिलता है । यह भी देखने को मिलता है कि प्रकृति की उम सम्पदा का मरक्षण भी स्वत: उसी वर्ग का उत्तरदायित्व माना जाता रहा है आज भी ऐसे इलाके है जहां वस्तु-विनियम के आधार पर काम होता है । ये इलाके अपनी जरूरत की चीजे खुद पैदा करते हैं और आत्मनिर्भर है । पीडियो से चले आ रहे इस तरह के सन्तुलन और मामाजिक-आर्थिक प्रणाली की वर्वादी तथाकथित विकास के नाम पर होती चली गई। इसी से परवशता भी बढती गई और सामाजिक तनाव भी इसी कारण वढने लगे। विपुल गम्पदा वाले भारत को अभावों वागा देश कहा जाने लगा। । 36 पर्यावरण की संस्कृति हम कुछ उदाहरण देखे- शिवालिक की तराई में उगने वाली भाभर घास से रस्मो चुनी जाती रही है। इसी रस्सी से चारपाइयां बनाई जाती हैं । 'वान रस्सी' बनाने वाले पीढ़ियो से भाभर घास काट कर लाते रहे है । राहारनपुर के लगभग 40,000 परिवार इस धन्धे में लगे रहे हैं । लेकिन सन् 1951 के बाद इन जंगलो का ठेका दे दिया गया। घास इन चुनकरो के हाथो से छिन गई। और तो और यही भाभर घास कागज के कारखानी को सस्ते मूल्य पर और पीढियो से रस्सी बनाने वाले दस्तकारो को महंगे मूल्य पर मिलने लगी। यही हालत देश के कुम्हारों की है । कच्ची मिट्टी के बर्तन बना कर अपना पेट भरने वाले 15 लाख कुम्हार अव बेहाल हैं । आज प्लास्टिक, कांच और अल्मू नियम ने इन्हे चौपट कर दिया है । खूबसूरती और सहूलियत के नाम पर इन बर्तनो का उपयोग, खाना पकाने से लेकर जल सग्नहण तक हर घर में होने लगा है। लेकिन किसी ने यह नही सोचा कि मिट्टी के बर्तनो की तुलना मे ये बर्तन स्वास्थ्य के लिए कितने हानिकर है। कुम्हारों की चेहाली तो दर- किनार है। इसी तरह भारत को कपड़ा नीति है जो नगे लोगो को तन ढकने लायक कपडा तो मुहैय्या नही करा सकी, पर हथकरघा पर कुठाराघात तो कर ही दिया। भारत लोहा और इस्पात बनाने मे सदियों से समृद्ध रहा है। इस्पात बनाने की आधुनिक तकनीक भले कितनी ही बेहतर हो, पर भारत के गाडिया लोहारो की अपनी तकनीक से बने इस्पात की मांग दुनिया भर में रही है । प्राचीन अभिलेख और पुरालेख विदो ने इस पर विशद प्रकाश डाता है, पर यह हुनर तो चौपट ही हुआ है । अब तो वह खात्मे की दहलीज पर है। भारत के परम्परागत इस्पात उद्योग पर ब्रिटिश हुकूमत ने सन् 1800 के बाद अपने स्वार्थों की पूर्ति के लिए हमला किया। मानवीय श्रम से प्रस्फुटित ऐसे हुनर ब्रितानियों को आँख की किरकिरी थे। वे जानते थे कि इनके रहते भारतीय जन-मानस को परवश नही बनाया जा सकता। दुर्भाग्य से भाजादी के बाद भी इस नजरिये मे बदलाव नहीं आया। इस प्रकार हाथ के कामों के छिनते चले जाने, सेती के व्यावसायिक होते जाने, यमका गलाचुटता चला गया।

दरअसल एक धुनियादी भूल हमारी समझ और चेतना में बुरी तरह से पेठ गई। जो प्राकृतिक ससाधन और सम्पदा धरोहर के रूप में हमें प्राप्त हुई है, हमने उसी का भक्षण करना शुरू कर दिया। यह वैसी ही बात है जैसे एक व्यापारी अपनी मूल पूजी को साना शुरू कर दे और अन्तत. वह कंगाल या दिवालिया हो जाये। यदि थम के मानवीयकरण को पुनर्स्थापना हो जाये और यंत्रीकरण का अन्धा जोर थम जाये तो मूल पूंजी को पाते जाने को राक्षसी भूख स्वतः रुक सकती है । हमारे पर्यावरण और परिवेशिकी पर यह एक बड़ा खतरा है और इससे मुक्ति के लिए थम के मानवीयकरण का दृढ़ संकल्प जरूरी है । स्वावलम्बन के लिए भी यह जरूरी है क्योंकि समाधान का आधार हर स्तर पर यही हो सकता है। 38 पर्यावरण की संस्कृति औद्योगिक संस्कृति आर्थिक विकास या औद्योगिक सम्वृद्धि का तात्पर्य यदि वस्तुओं का अम्बार खड़ा कर देने में ही निहित है तो यह मानवीय ऊर्जा और पर्यावरण की संस्कृति से कोई मेल नहीं रखता। इसके विपरीत लोगों को पहले से अधिक काम मिलने की यदि अनुकूल परिस्थितियां विकसित होती है तो उसमे समग्र विकास की सम्भावनाएं तलाशी जा सकती है। जब अधिकतम लोगों को काम मिलते रहने की परिस्थितयां बन जाती है तो वहा विकास उत्पादन आधा- रित न होकर श्रमाधारित हो जाता है । इस हालत मे शोषण और असन्तुलन की सम्भावनाएं भी कम हो जाती है। यंत्र की जगह मानवश्रम और प्राकृतिक सम्पदा पर अवलम्बन बढ़ जाने से यथोचित सन्तुलन भी बना रह सकता है। आज जो औद्योगिक संस्कृति हमारे चारो ओर घेरा डाले राड़ी है यह बहुत अधिक प्राचीन नही है । इस धरती पर मनुष्य का अस्तित्व तो कोई पन्द्रह लाख वर्ष रो रहा है लेकिन औद्योगिक विकास का युग डेढ़ पौने दो सौ साल से पुराना नही है। अपनी आवश्यकता के अनुरूप उत्पादन और निर्माण में मनुष्य को दक्षता इससे पूर्व भी रही है, पर उसमें पूंजी का निवेश और उत्पादन मुख्य न रहकर मानवश्रम और उसको आवश्यकता की पूर्ति प्रमुरा रही है । आज उत्पादन की होड़ के साथ बाजार की प्रतिस्पर्धा भी तीव्र होती जा रही है। इसीलिए आयात, निर्यात, वचत, लागत के मिजान बैठाना आवश्यक हो गया है। इन डेढ़ सौ सालों मे जो औद्योगिक विकास हुआ है उसने जिस प्रकार की औद्योगिक संस्कृति को जन्म दिया और विकसित हुई उसने मनुष्य की तुलना में वस्तुओ के प्रति रुझान को बढाया है । वस्तुओं के प्रति निरन्तर बढ़ती जा रही अभिरुचियों में मनुष्य की सवेदनशीलता, उसकी ताकियता और किसी हद तक सम्प्रेषणीयता भी समाप्त हुई है। अपने उत्पादों को खपत के लिए, अधिक अधिक बाजारों की तलाश के लिए विज्ञापनों और प्रचार का जो आतक सड़ा किया जाता है उसके कारण लोगों की दिलचस्पी वस्तुओं में ही अटक कर रह जाती है । यह सोचने का अवकाश ही नहीं बच पाता कि जिस वस्तु का इस्तेमाल वे अपने दैनंदिन जीवन में कर रहे हैं वह पर्यावरण और परिवेशिकी के किस तरह के विनाश और भारी चुकारे के बाद उनके हाथ लगी है। इस औद्योगिक सस्कृति ने भौतिक वस्तुओं को मनुष्य जीवन में प्रमुख स्थान दे दिया है। अधिकाधिक उत्पादन के परिणामस्वरूप मनुष्य की मौलिक सृजनात्मक क्षमता पर निरन्तर आघात होता चला आ रहा है । अधिक उत्पादन का तर्क मानव जीवन और सामाजिक विकास का तर्क तो हो नहीं सकता, क्योकि जिन संहारक शक्तियों के माध्यम से यह हासिल किया जा रहा है उससे अन्तत अनेक बुराइया और विषमताए ही पैदा होती है। इस औद्योगिक सस्कृति ने गरीबो की हालत को अधिक दुरूह और विकट ही बनाया है। औद्योगिक विकास के वर्तमान ढांचे को बनाए रखने के लिए जो कीमत हमे चुकानी पड़ रही है यदि उस पर ठीक तरह से विचार करे तो इस नतीजे पर पहुचेंगे कि इस औद्योगिक विकास का ताना-बाना कितना महंगा है । औद्योगिक रूप से उन्नत देशों मे से एक है अमेरिका । प्राकृतिक संसाधनों की दृष्टि से भी दुनिया के देशो की तुलना में अमेरिका अधिक सौभाग्यशाली है। तब भी अमेरिका के औद्योगिक ढांचे को बनाये रखने के लिए दुनिया के चालीस प्रतिशत संसाधनो का इस्तेमाल हो जाता है। यह भी कितनी आवादी के लिए मात्र छ प्रतिशत आबादी के लिए। दुनिया के औद्योगिक ढांचे को बनाये रखने के लिए कच्चे माल के रूप मे जो प्राकृतिक ससाधन उपलब्ध हैं वे कितने समय तक पर्याप्त होगे इसका आकलन कितनी ही 'अध्ययन रिपोर्ट्स' मे देखने को मिल सकता है। इन अध्ययनो मे एक बात सामान्य रूप से एक सी ही देखने को मिलती है कि सभी प्राकृतिक संसाधन सीमित है और एक दिन वे चुकने वाले हैं। लेकिन यह गृष्टि कब तक मौजूद रहेगी इस पर एक भी 'अध्ययन रिपोर्ट' में कोई टिप्पणी नहीं मिलती। औद्योगिक विकास का यह स्वरूप एक तरफ अपने ही भारी बोझ से चरमरा रहा है और दूसरी तरफ उससे उत्पन्न होने वाले प्रदूषण के खतरों से बचने का कोई उपाय नही मूझ रहा है। कोई भी विकास यदि प्रदूषण युक्त है तो उसके दुष्चक्र रो मुक्त होने के लिए की जाने वाली व्यवस्था आसान नहीं हो सकती। उदाहरण के तौर पर हम परमाणु ऊर्जा ही ले । औद्योगिक विकास में ऊर्जा का योगदान सर्वाधिक और प्रमुख है । कोयला और तेल के निरन्तर समाप्त हो रहे भण्डारी के कारण वैकल्पिक ऊर्जा स्रोत के तौर पर परमाणु 40 पर्यावरण की संस्कृति ऊर्जा हमारी प्रौद्योगिकी का एक नायाब तोहफा माना गया, लेकिन बहुत शीघ्र ही इसकी आय ने हमारे पर्यावरण को बेरहमी से अपनी चपेट में ले लिया और अब यह समझ में आने लगा कि जिरो प्रौद्योगिकी की सर्वाधिक चमत्कारी और बेशकीमती उपलब्धि माना गया यह कितनी विनाशकारी सिद्ध हो रही है। रूस की चेरनोबिल दुर्घटना के बाद परमाणु ऊर्जा के प्रश्न पर सगूची दुनिया में चिन्ता और विरोध बढा है । लेकिन इस हिंसक प्रौद्योगिकी के बारे मे सही- सही जानकारी देने से कतराते रहने की प्रवृत्ति शुरू से ही रही है। सन् 1957 में विहस्केल रियेक्टर की दुर्घटना से लेकर 26 अप्रैल, 1986 को हुई चेरनोबिल दुर्घटना तक की कहानी एक ही हकीकत बयान करती है कि वास्तविक वात आम लोगों से छुपाई जाती है और सही जानकारी सगय पर जानबूझ कर नहीं दी जाती। मोटे के आधार पर 'परमाणु रियेक्टरों मे तगभग तीन सौ दुर्घटनाएं अब तक हो चुकी हैं। इस औद्योगिक संस्कृति ने किसे क्या दिया है-यदि यह लेखा-जोसा किया जाये तो पायेंगे कि एक सीमित वर्ग ने भले ही इससे बहुत कुछ पाया हो, पर बहुत बड़े वर्ग ने काफी कुछ खोया है। 3 दिसम्बर, 1984 को यूनियन कारवाइड ने भोपाल मे जो धमासान किया उसे दुनिया कभी भूल नही सकेगी। भोपाल की उस काली रात ने एक साथ ढाई हजार प्राणो को काल का ग्रास बना डाला। चालीस वर्ग किलोमीटर तक फैली जहरीली गैस के कारण हजारों लोग अस्पतालो की दहलीज तक पहुचा दिये गए। उस 'डायन' रात को तब भी भूख शान्त नहीं हुई। 10 जुलाई, 1976 को इटली के नगर सैवेसा मे हुई दुर्घटना ने अनेक बच्चो की त्वचा पर ऐसा जहरीला प्रभाव छोड़ा कि उनके शरीर पर फोड़े ही फोड़े उट आये । हजारों लोगों को सुरक्षित स्थानों पर पुनर्वासित करना पड़ा। इस दुर्घटना में एक रासायनिक संयत्र में विस्फोट हो जाने से 'डाईआक्साइड' नाम का जहर 18 वर्ग किलो मीटर क्षेत्र में फैल गया था। इसी तरह 11 जुलाई, 1978 को स्पेन, 25 जनवरी, 1984 को ब्राजील और 19 नवम्बर, 1984 को मैक्सिको सिटी मे हुई दुर्घटनाओं ने हजारों लोगों को मौत का मुंह दिखा दिया । जिस तेजी के साथ औद्योगिक विकास दुनिया में छाया और उसके दुष्परिणाम ज्यों-ज्यो सामने आने लगे-- इसका प्रतिरोध भी शुरू होने लगा। एक सर्वेक्षण के अनुसार परमाणु ऊर्जा की रेडियो धर्मिता के कारण विनाश के खतरों से लोग पहले से अधिक सचेत हुए है । इंग्लण्ड मे परमाणु बिजली औद्योगिक संस्कृति 41 का विरोध पहले जहां 65 प्रतिशत था वहां घेरनोबिल दुर्घटना के बाद बढकर 83 प्रतिशत हो गया। अमेरिका में 67 प्रतिशत से बढ़कर 78 प्रतिशत, युगोस्लाविया में 40 प्रतिशत से बढ़कर 74 प्रतिशत, कनाडा में 60 प्रतिशत से बढ़कर 70 प्रतिशत, प.जर्मनी में 40 प्रतिशत से बढ़कर 69 प्रतिशत और फिनलंण्ड में 33 प्रतिशत गे 64 प्रतिशत हो गया है। फिनलैण्ड की चार हजार महिलाओं ने इसके विरोध का हतप्रभ कर देने वाला, पर प्रभावी तरीका निकाला । इन महिलाओं ने शपथ ली कि जब तक सरकार परमाणु बिजली बनाने की नीति नहीं बदलती तब तक वे गर्भधारण नहीं करेंगी। इन महिलाओ का यह निश्चय किसी भी सरकार के लिए न केवल चुनौतीपूर्ण है, अपितु गहरा चिन्तनीय सवाल भी है। यह धरती रेडियो- धर्मिता से मुक्त नहीं है और इगीलिए ये महिलाएं भावी सन्तति का जीवन खतरे मे नही डालना चाहती। फिनलैण्ड की इन चार हजार महिलाओ के लिए लुई मंकनीस (इंगलैंड के एक कवि) की कविता 'अजन्मे शिशु की प्रार्थना' संभवतःप्रेरणास्पद रही हो। औद्योगिक संस्कृति के विकसित हो रहे घटाटोप मे लुई मैकनीस की 'अजन्मे शिशु की प्रार्थना' उसकी विकृतियो को इस तरह उजागर करती है- अभी नही मै ले पाया हूं जन्म ! सुनो, ओ सुनो शर्ते मेरी, जिनके बिना न मै इस धरती पर आऊंगा खून चूसने वाले ये चमगादड, चूहे, का खोदने वाली नरभक्षी छायाएं कत्तई मेरे पास न आएं। अभी नहीं मैं ले पाया हूँ जन्म ! मुझको दो आश्वासन, दो आश्वासन मुझको, जिसके बिना न मैं इस धरती पर आऊंगा! मुझ को भय है तथाकथित यह मानव नामक जाति ऊची दीवारों के अन्दर मुझे करेगी कैद, चालाकी से भरे असत्यों से मुझको विचलित कर देगी, 42 पर्यावरण की सस्कृति सोने की मदिरा से बदहवास कर देगी, काले कठिन शिकंजों में मुझको कर देगी, पून सने मैदानों में कर देगी मेरी सैनिक हत्या! अभी नहीं मैं ले पाया हूँ जन्म ! मेरे लिए प्रबन्ध करो ताजे पानी का, जिसमे घुल कर मेरी आत्मा स्वच्छ बनेगी हरी घास, जिम पर क्षण भर मैं सपने देखू । नये जवान वृक्ष जिनसे में बात कर सा, खुला हुआ आकाश, छांह मे जिसकी, पंछी गीत सुनायें और चमकती एक किरण जो मुझे तमस से सदा ज्योति की ओर ले चले! अभी नहीं मैं ले पाया हूँ जन्म ! फिन्तु अभी से मुझे क्षमा दो उन पापो के लिए जिन्हे मेरे माध्यम से कायर दुनिया किया करेगी ! वे विचार, वह वाणी जो मेरे माध्यम से दुनिया सोचेगी, अथवा दुनिया बोलेगी- मुझे क्षमा दो उस जीवन के लिए जो कि अपनी हत्या करने के बाद मुझे जीना ही होगा। अभी नहीं मैं ले पाया हूँ जन्म ! किन्तु मुझे अभ्यास करा दो उरा अभिनय का, जो मुझको करना ही होगा। उस धीरज का, जो उस समय शक्ति दे मुझको जय बूढ़े मुझ पर अनुचित उपदेश उंडेले, जब सत्ताएं मेरी गति मे बाधा डाले, जब ऊचे पहाड़ मेरी किस्मत पर टूट, औद्योगिक संस्कृति 43 जब उत्ताल तरंगें मुझको आमंत्रण दें, जब मृगतृष्णाएं मुशको दरदर भटकाएं, जय मेरी ही सन्तान चिढ़ कर मुझ पर लानत भेजें! अभी नही मैं ले पाया हूँ जन्म ! सुनो पर! जो पशु है या जो अपने को गुदा समझता है, ऐसे को मेरे पारा फटकने मत दो अभी नही मैं ले पाया हूँ जन्म ! लेकिन मुझ मे भर दो इतनी ताकत जिगसे मैं विद्रोह कर सकू उससे- जो मेरी मानवता को काले पत्थर मे बदल रहा हो, जो मुझको मशीन का पुजा बना रहा हो, जो मेरा व्यक्तित्व कुचलने को आतुर हो, जो मेरी पूर्णता धूल मे मिला रहा हो, जो मुझको मुर्दा पत्ते की तरह वहां से यहा, यहा से वहा उड़ा ले जाना चाहे ! मुझ को पूरा मौका दो अपनी सार्थकता सिद्ध कर सकू, मैं अपना हक अदा कर सकू सडी लाश-सा भूरो गिद्धो से खाये जाने के पहले ! वरना मेरा गला दबा दो धरती पर लाने से पहले ! यह कविता पर्यावरण और परिवेशिकी का एक प्रभावी दस्तावेज कही जा सकती है। उद्योगो का यह तीव्र विकास सामाजिक-आर्थिक समस्याओं के समाधान भी सहायक नहीं हो सका है । निर्धन देश हो या धनी देश-बेरोजगारी और गरीवी का अनुपात औद्योगिक विकास के अनुपात में घटने की जगह बराबर चढता चला गया। जाहिर है पूजी और आर्थिक विकास कुछ हाथो में सिकुड- सिमट कर सीमित हो गया । दरअमल आधुनिक औद्योगिक विकास ने आदमी के हाथो से होने वाले काम की जगह मशीन को हर जगह स्थापित कर डाला। जिसका परिणाम यह 44 पर्यावरण की संस्कृति हुआ कि मानवश्रम पर आधारित व्यवस्था क्षीण होती चली गई। इससे स्वावलम्बन की परिस्थितियां ही समाप्त होने लगी। जिसे करने में मनुष्य को मर्वाधिक आनन्द की अनुभूति हो सकती है और जिसमें उसकी सृजनशीलता, कल्पनाशक्ति और उपयोगिता झलकती है-यह दो हाथ और मस्तिष्क का उपयोग ही है । यदि इनके उपयोग से मनुष्य को वंचित कर दिया जाये तो उमे परोक्ष रूप गे असहाय बना डालने का पड्यन्त्र माना जाना चाहिए। जिम काम में आदमी को अपने मृजन का बोध ही नहीं हो वह काम चाहे कितना ही बड़ा क्यों न हो, दूरगामी दृष्टि में उसके लिए सुप्पकर नहीं हो सकता। जो औद्योगिक विकास उन्नीगयी और वीमवी सदी में फलता-फूलता रहा वह माधारण आदमी की पहुंच मे बहुत ही दूर रहा है। यही कारण है कि आम निर्धन, बेरोजगार और हुनरगन्द, जरूरतमन्द व्यक्ति उससे कोई लाभ प्राप्त नही कर मका । आधुनिक औद्योगिक प्रबन्ध में ऊर्जा, यंत्र और पूजी का ममावेश जिस अनुपात मे होता है वह कभी भी आम आदमी के पास पूरी मात्रा मे उपलब्ध नहीं हो मकता। स्वाभाविक है कि ऐसी हालत में यह उस ओर देश भी नहीं सकता। ठीक इसके विपरीत गांधी ने जिग ग्रामौद्योगिकी पर जोर दिया वह न जटित है और न दुरूह । उगमे न भारी पूंजी निवेश है और न बेहद ऊर्जा की आवश्यकता । इसके माध्यम से आम जरूरत की चीजों का उत्पादन स्थानीय खपत के आधार पर स्थानीय मंसाधनों से सहज ही संभव हो सकता है । इसके लिए जटिल आयोजनाओं की भी आवश्यकता नही । औद्योगिक विकाग के लिए जिस आधारभूत ढांचे की जरूरत अनिवार्य होती है वह 'इन्फ्रा- स्ट्रक्चर' भी सर्वत्र प्राप्य है । उत्पादन के फेन्द्रीकरण से पैदा होने वाली विसंगतिया और विपमताएं भी गांधी की उद्योग नीति में नदारद है क्योकि उममें परावलम्बन किंचित भी नहीं रहता। इस तरह की अवधारणा के लिए शिक्षा मर्वाधिक सहायक हो सकती है । अर्थशास्त्रीय शब्दावली में शिक्षा भी 'समाधन' ही कहलाती है। लेकिन जो शिक्षा आज दी जा रही है क्या गांधी की 'उद्योग नीति' में सहायक हो सकती है ? क्योकि जिम विज्ञान और प्रौद्योगिकी से हमारे पर्यावरण और परिवेशिकी को आघात पहुंच रहा है यह इसी शिक्षा की ही तो देन है । शिक्षा का प्रमुख काम 'जीवन मूल्यों' के प्रति व्यक्ति की आख को सजग करना होता है। शिक्षा जीवन मे तभी सहायक हो सकती है जब वह मनुष्य औद्योगिक संस्कृति 45 के विवेक को जागृत करे। आग विज्ञान और प्रौद्योगिकी में अपरिमित शक्ति है, लेकिन उस शक्ति ने समाज में विपमता और अगन्तुलन ही बढ़ाया है। मतलब यह कि जिन हाथों में विज्ञान और प्रौद्योगिकी की चाबी है उनके पाग उसके इस्तेमाल का बैगा विवेक नहीं है। यदि विवेक और चिन्तन जागृत हो जाये तो जीवन-मूल्यों की पहचान और गरम में कोई कोताही नहीं हो गकती। शिक्षा, शान, प्रौद्योगिकी और उत्पादन का एक और पहलू भी है । वस्तुओ फा उत्पादन या प्रौद्योगिकी का जैगे के तसे रुप में उपयोग आदमी को परजीवी बनाता है । जवकि शिक्षा मे जन्मा विवेक व्यक्ति को स्वतंत्र चेता इन्सान बनाता है । हम किगी व्यक्ति को कुछ भी नहीं दें, पर उसमें शान और विवेक भर दें तो उमे आत्म-निर्भरता गा गयी गयल समाधन उपलब्ध कराया माना जा सकता है। ज्ञान और विवेक जागृत करने वाली ममर्थ शिक्षा यदि दी जाये तो आज विपुल विकास के वावजूद सिर उठा रही समस्याओं का स्वतः शमन हो सकता है । आज जो विकास हमारे चारो ओर छाया हुआ है उसमें प्रलोभन और कभी न पूरी हो सकने वाली लालसाएं कुंडली मार कर बैठी हैं। लेकिन स्व-विवेक और ज्ञान के जरिये इन पर नियंत्रण पाया जा सकता है । कठिन परिश्रम और सयम से उपभोग की बेजा वृत्ति सहज हो नियंत्रित हो सकती है । इस तरह की वृत्ति से जो परिणाम निकलेंगे उनमे समतामूलक समाज व्यवस्था का ढांचा आसानी से निर्मित हो सकेगा। भारतीय परम्परा और संस्कृति की पीठ पर जब हम समता की बात करते है तो उसमें भौतिक संसाधन ही नहीं सम्पूर्ण प्राकृतिक सम्पदा के उपभोग और दोहन में भी समता का समावेश मानकर चलते है। जव ऐसी स्थितियां बन जाती है तो प्रकृति के साथ अतिचार करने और मनुष्य को विकृत बनाने वाली व्यवस्था भी समाप्त हो सकती है । यह मिथ्या धारणा है कि भौतिक सम्पदा-जिसमे वस्तुओ से लेकर धन तक शामिल है- की बहुलता से मनुष्य सुखी हो सकता है या सभी समस्याओं का शमन उसमें निहित है । पंसा सर्वशक्तिमान मान लिया गया है, लेकिन वास्तविक अर्थों में तो यह विनिमय का साधन भर है । सर्वशक्तिमान का दर्जा पैसे को इसलिए मिल गया है कि भौतिकवाद को चुनौती देने की सामर्थ्य मुट्ठी भर लोगों में यची है । लेकिन हमे यह समझना चाहिए कि परिवर्तन की दिशा मी सदा मुट्ठी भर लोग ही बताते रहे है । 46 पर्यावरण की संस्कृति इन मुट्ठी भर लोगों के लिए भौतिक उपलब्धियां कभी भी मुख्य नहीं रहीं, उनका स्थान तो गौण हो रहा है। हर युग में न्याय, विवेक, धैर्य और संयम मे चलने वाले लोग मुट्ठी भर हुए हैं । समाज में वे ही पूजनीय माने गए हैं । इसीलिए हमारी परम्परा मे राजा से फकीर को अधिक उच्चस्थ माना गया है । संत कबीर तो कहते भी है- 'मन लागो मेरो यार फकीरी में, जो सुख पावे राम भजन में, सो सुख नाहि अमोरी में भारत की यह परम्परा और सभ्यता आज वेशक जीर्णावस्था में हो, पर अभी भी जीवित है और 'डूबते को तिनके के सहारे' की माफिक प्रेरणा भी फूंकती रही है । यही परम्परा फिर से पुनर्स्थापित की जानी जरूरी है और सम्पूर्ण विश्व में भारत ही ऐमा राष्ट्र है जहा यह पहल हो सकती है । जो औद्योगिक सस्कृति आज हमारे सामने है, बहुत कुछ वह ब्रिटिश हुकूमत की देन है । नितानी हुक्मरानो का अन्तिम उद्देश्य भारत का आर्थिक शोषण और भारतीय जन को पूरी तरह से परावलम्बी बनाना था । लम्बे समय तक हुकूमत के लिए भी ऐसा करना जरूरी था। लेकिन यह कैसे संभव हो सकता था। इसे भी उन्होने बहुत बारीकी से समझा। उस समय में भारत के गांव मामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक तौर पर पूर्ण स्वावलम्बी और एक व्यवस्थित संगठनात्मक ढाचे मे आवद्ध थे । इसे तोड़ना ब्रितानियो के लिए जरूरी था। उन्होंने इसे तोड़ा। इसीलिए वे शासन कर मके । आज हमारा देश येशका स्वतंत्र है, पर गांव की अपनी वह गरिमा पुनः नही नोट पायी है। जो नशनर गांव की आत्मा को घायल कर चुका, उसे पूरी तरह येअसर नही कर पाये है । गुलामी की वेड़ियो ने गांवो के पावों में जो पार कर दिये, ये भरे नहीं जा सके हैं। लेकिन यह भय कौन करने वाला है ? यदि हम यह अपेक्षा करें कि इसके लिए कोई व्यवस्था या शागन केन्द्रीय स्तर पर किसी प्रकार का कदम उठायेगा तभी कुछ हो सकता है तो यह कुछ नहीं करने का निरा वहाना भर होगा। गांवों की अपनी क्षमता, स्वावलम्बन और अपना व्यवस्थित, संगठित ढांचा यदि कोई पुनर्स्थापित कर ममता है तो वह जन अभिक्रम के बल पर ही हो मकता है । दूगरो को दी हुई बैसासियों को छोड़ कर अपने पायो की मजयूनी को टीक प्रकार से तौलने का माहस ऊपर से या बाहर से नहीं आ मक्ता। उगे स्वयं ही जागृत करना होगा। यह तो अन्दर मे आयेगा। अन्दर की ग्याला को जगाना होगा। औद्योगिक संस्कृति 47 इसके लिए तात्कालिक तौर पर कुछ कठोर निर्णय भी लेने पड सकते हैं । मसलन यह कहना होगा कि गांव को जाने वाली सड़क को छोड कर गांव जन अपनी ही बनायी पगडण्डी पर ही चलेंगे। गांव की सम्पदा पर गांव जनो का अधिकार होगा। मिट्टी, जल, भूमि, वृक्ष, जंगल पर गांव का आधिपत्य ही रहता आया है । व्यवस्था के नाम पर नाहक बाहरी आधिपत्य अस्वीकार्य होगा। गाव के लोग अपना जल प्रवन्ध, अपनी शिक्षा की जरूरत का खुद प्रबन्ध करेंगे । इस प्रकार स्वनिर्भरता कायम होगी और पराश्रितता समाप्त होगी। गांव का शिल्प और गांव का उद्यम गांव की जरूरतें पूरी करने में सहायक होगा। गांव की सडक को छोड अपनी पगडण्डी पर चलने का संकल्प जय दृढ हो जायेगा तो गांव की सम्पदा निर्ममता से शहर की भेंट नही चढेगी। तब शहर और गांव एक दूसरे की आपूर्ति के आधार बन सकेंगे, शोषण के नहीं । जो एक समय हमेशा बने रहे है । गांवों का ऐसा परम्परागत प्रवन्धन जब पुनर्स्थापित हो जायेगा तो पिछले डेढ-पौने दो सौ सालों से पनपी औद्योगिक संस्कृति की चूलें स्वतः ही हिलने लगेगी। क्योकि यह तो हम जान हो चुके है कि उद्योग और प्रौद्योगिकी का तथाकथित विकास खुद ही के बोझ से इतना दब चुका है कि अब उमकी मांस फूलने लगी है । कथित विकसित देशो मे इस हकीकत से जहां लोग परेशान होने लगे है, वही कथित विकासशील देश और अविकसित देश भी उनके बोझ को पूरी तरह भांपने लगे है। इसीलिए पर्यावरण और परिवेशिकी का मवाल जहां विकसित कहे जाने वाले देशों के लिए गहन चिन्ता का विषय बना हुआ है वहां निर्धन देशों में भी लोग इस ओर सचेत हो उठे हैं । भारत जैसे देश मे यह सवाल जिम गम्भीरता से लिया जा रहा है वह वैश्विक स्तर के इस सोच को ही इगित करता है। 48 पर्यावरण की मंगति

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प्राकृतिक सम्पदा गांधी का यह कथन कि 'यह धरती सबकी जरूरत पूरी कर सकती है, पर किमी एक का भी गालच पूरा नही कर सकती' न केवल तर्क के आधार पर, अपितु हालात को ध्यान में रख कर मोचें तो भी सर्वथा सही प्रतीत होता है । विज्ञान और प्रौद्योगिकी आज विकास के प्रसर सेतु मान लिए गए है, पर उनकी अधोगति से अब दुनिया परिचित होने लगी है । बहुत से कारणो में मे इसका एक मुख्य कारण प्रौद्योगिकी को यह जटिलता भी रही है जो आम और निर्धन व्यक्ति को पहुंच से बाहर की चीज है । आम आदमी के लिए रोजमर्रा की आवश्यकताओं को पूर्ति बुनियादी बात है। ये आवश्यकताएं सरलता से कैसे पूरी हो सकती है यही देसना व्यवस्था का प्राथमिक दायित्व बनता है । आम आदमी के लिए भोजन, वस्त्र, आवास और जिन परिस्थितियो मे वह जीता है उसमें निर्मित उसकी संस्कृति यदि बखूबी उपलब्ध रहे तो एक गन्तुलित और समतापरक गमाज की परिकल्पना साकार हो सकती है। इसके लिए कोई भी बाहरी 'मॉडल' उपयुक्त नही हो सकता। क्योकि वैसा 'मॉडल' निर्धन और आम आदमी की क्षमता से बाहर का होगा। वैसा 'मॉडल' वना देने में जो पूंजी और बाहरी समाधनो की जरूरत पड़ेगी वे सहज रूप से बिना किसी प्रकार के विनाश के प्राप्त नहीं किये जा सकते। ठीक इसके विपरीत स्थानीय सामग्री और स्थानीय उपभोग को आधार मानकर यदि नीतिगत निर्णय ले लिए जाय और उमके क्रियान्वयन मे स्थानीय सहमति को प्रमुखता दी जाय तो एक नये प्रकार के समाज की संरचना की जा सकती है। ऐसी संरचना मे हमारी प्राकृतिक सम्पदाएं अत्यधिक सहायक हो सकती है। प्रकृति मे जो कुछ विद्यमान है उसका मूल्य अपरिमित है । उसके दोहन और उपभोग और उसकी पुनर्रचना, पुनर्भरण में नियंत्रण स्थापित करने की मामर्थ्य स्वयं प्रकृति के ही पास है। मनुष्य अपने विवेक से प्रकृति के इम अनूठे सामर्थ्य के साथ सुसगति कायम करने के लिए यदि सकल्पित हो जाय तो शुरू में उल्लिखित गांधी के कथन का गूढार्य हर व्यक्ति ममझ मकता है । मनुष्य प्रकृति का ही एक अंग है । उमे प्रकृति ने दो हाथ देकर उपभोग को सीमा निर्धारित कर दी है। मनुष्य की मम्पूर्ण चर्या-आहार, शौच, निद्रा

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प्राकृतिक सम्पदा गांधी का यह कथन कि 'यह धरती सबकी जरूरत पूरी कर सकती है, पर किसी एक का भी लालच पूरा नहीं कर सकती' न केवल तर्क के आधार पर, अपितु हालात को ध्यान में रख कर सोचें तो भी सर्वथा सही प्रतीत होता है । विज्ञान और प्रौद्योगिकी आज विकास के प्रखर सेतु मान लिए गए है, पर उनकी अधोगति से अब दुनिया परिचित होने लगी है । बहुत से कारणो में से इसका एक मुख्य कारण प्रौद्योगिकी की वह जटिलता भी रही है जो आम और निर्धन व्यक्ति की पहुंच से बाहर की चीज है। आम आदमी के लिए रोजमर्रा की आवश्यकताओं की पूर्ति बुनियादी बात है। ये आवश्यकताएं सरलता मे कैसे पूरी हो सकती हैं यही देखना व्यवस्था का प्राथमिक दायित्व बनता है । आम आदमी के लिए भोजन, वस्त्र, आवास और जिन परिस्थितियो में वह जीता है उसमें निर्मित उसकी संस्कृति यदि वखूवी उपलब्ध रहे तो एक मन्तुलित और समतापरक ममाज की परिकल्पना साकार हो सकती है । इसके लिए कोई भी बाहरी 'मॉडल' उपयुक्त नहीं हो सकता। क्योंकि वैसा 'मॉडल' निर्धन और आम आदमी को क्षमता से बाहर का होगा। वैसा 'मॉडल' वना देने में जो पूंजी और बाहरी संसाधनों की जरूरत पड़ेगी वे सहज रूप से विना किसी प्रकार के विनाश के प्राप्त नही किये जा सकते । ठीक इसके विपरीत स्थानीय सामग्री और स्थानीय उपभोग को आधार मानकर यदि नीतिगत निर्णय ले लिए जाय और उसके क्रियान्वयन मे स्थानीय सहमति को प्रमुखता दी जाय तो एक नये प्रकार के समाज की संरचना की जा सकती है। ऐमी संरचना मे हमारी प्राकृतिक सम्पदाएं अत्यधिक सहायक हो सकती है। प्रकृति में जो कुछ विद्यमान है उसका मूल्य अपरिमित है । उसके दोहन और उपभोग और उसकी पुनर्रचना, पुनर्भरण में नियंत्रण स्थापित करने की सामथ्यं स्वयं प्रकृति के ही पास है। मनुष्य अपने विवेक से प्रकृति के इम अनूठे सामर्थ्य के साथ सुमंगति कायम करने के लिए यदि संकल्पित हो जाय तो शुरू में उल्लिखित गाधी के कथन का गूढार्थ हर व्यक्ति समझ मकता है मनुष्य प्रकृति का ही एक अंग है । उमे प्रकृति ने दो हाथ देकर उपभोग की मीमा निर्धारित कर दी है । मनुष्य की सम्पूर्ण चर्या-आहार, शौच, निद्रा, - - गव मे एक सीमा है और गवकी एका लय है। यह सीमा और लय विकृति की ओर उन्मुस न हो, यह मनुष्य के विवेक पर निर्भर है । मम्पूर्ण मनुष्य गमाज मे विवेक के जागृत हो जाने से ही प्रकृति हमारी हर जरूरत को महजता से पूरा कर पायेगी। यदि ऐमा नही होगा तो यही प्रकृति अपने दुप्चक से हमे अपने किये का मजा भी चखा देगी। यदि हम स्वीकार कर लें कि हम सब-सम्पूर्ण प्राणि-जगत्-प्रकृति की सन्तान ही हैं तो यह मान लेने में हमे किंचिद भी झिझक नहीं होनी चाहिए कि हम बेसहारा नहीं हैं। प्रकृति की एक अनुपम निधि है वृक्ष । इस धरती पर और भारत भूमि पर इतनी विविध वृक्षावलिया है कि वे मनुष्य जाति से लेकर सम्पूर्ण प्राणि-जगत् की हर जरूरत पूरा कर सकती है। इमीलिए भारत के महान ऋपियों, महर्पियों ने पेड़ लगाने और उनकी परवरिश करने पर अपने उपदेशों में सर्वाधिक बल दिया। हम जानते हैं कि पेड-पौधे, विभिन्न प्रकार की वनस्पतिया, झाडियां, घासें धरती मां का आंचल हैं। आचल ही नही रक्षा कवच भी हैं। जब तक यह आचल या "रक्षा कवच' ठीक हालत मे रहा, यह धरती, इसकी मिट्टी और इनमें वसेरा करने वाले कीट, जीव-जन्तु भी ठीक हालत मे रहे। तब तक तेज धूल-भरी आधियां, भूमि और मिट्टी का कटाव, बाढ, नदी-नालो का विध्वंसक बहाय भी नियत्रित रहता रहा। ज्यो-ज्यो इनका विनाश होता गया, विध्वंस की दुःखदायी घटनाएं भी बढती गई। अनेक सर्वेक्षणों मे इन घटनाओ की विस्तृत जानकारी हमे मिलती है। राजस्थान में अरावली के जगलो के विनाश मे जो दुदिन पिछले एक-डेढ दशक से देखने पड़ रहे हैं वे केवल राजस्थान के लिए ही घातक नहीं हो रहे है, भारत के एक बडे भू-भाग को लील लिये जाने के खतरे पैदा हो गए है। अरावली पर्वत शृखला गुजरात के पालनपुर मे दिल्ली तक उत्तर-पश्चिम से दक्षिण-पश्चिम और उत्तर-पूर्व की ओर लगभग 692 किलोमीटर मे विस्तृत है। 50 हजार वर्ग किलोमीटर क्षेत्र मे मे कोई पांच हजार वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में ही जगल बचे हैं। इस विनाश मे यहां के आदिवामी और गिरिजन समाज के जीवन और उनके भरण-पोषण पर जो दुष्प्रभाव पड़ा है वह तो पीडादायी है ही, पर इमने भी दु सदायी अमर पर्यावरण और परिवेशिकी पर पढ़ा है जिगं फिर मे व्यवस्थित करने का कोई अन्य विकरप विज्ञान और प्रौद्योगिकी के पास नहीं है। 52 पर्यावरण की गंम्मृति डॉ. सरदारसिंह ढाबरिया के अनुसार वनविहीन अरावली के कारण इस भू- मण्डल पर बनी रहने वाली नमो की पर्त समाप्त हो गई है, और अब एक गर्म पर्त बनने लगी है। इसके कारण अरब सागर और बगाल की खाड़ी से उठने वाले मानसून अब बिना बरसे ही जाने लगे है । यही पर्वत शृंखला एक समय में पूर्व और उत्तर-पूर्व को ओर भारतीय रेगिस्तान को रोकती भी रही है। लेकिन अब यह पर्वत-माला रेगिस्तान के विस्तार के प्रतिकार में निर्वल हो गयी है। वनों के विनाश से अरावली मे अचितित, अनुचित और अवैधानिक खनन कार्य भी बढ़ने लगा है । इससे यहा भू-क्षरण को समस्या विकराल होने लगी है । अरावली के वनो के विनाश से पैदा होने वाली समस्याओं पर जो अध्ययन अव तक सामने आया है वह हमे सचेत करने के लिए पर्याप्त है । लेकिन अभी तक न मालूम किस महाविनाश को और देखना है कि हमारी सुपुप्त अवस्था मे कोई हरकत नजर नहीं आ रही। हमारी प्राकृतिक सम्पदाओं मे मिट्टी और जल अत्यधिक मूल्यवान ससाधन है। जल और मिट्टी के सह-चरण से जीवन का सचरण होता है। मिट्टी और जल में अनगिनत सजीव तत्त्व होते है । ऐसा माना जाता है कि एक घन सेंटी- मीटर उपजाऊ मिट्टी में अरवो जीवित प्राणी है। आज इस जीवन्त मिट्टी को रासायनिक उर्वरकों से विनष्ट किया जा रहा है। दरअसल, प्रकृति की इस सम्पदा के साथ हमारा जीवन्त और सच्चा रिश्ता पूरी तरह से जैसे टूट-सा गया है। हमारी परिवेशिकी के साथ हिंसा और विलगाव की इन परिस्थितियो मे प्रकृति प्रदत्त स्वास्थ्य, सौंदर्य और स्थायित्व दीर्घकाल तक प्रस्थापित नहीं रह सकते। इनके पुनर्स्थापन के लिए हमे लालच और स्वार्थ की वृत्ति का त्याग करना होगा और मानव मूल्यो का सम्मान कर उन्हे दृढ इच्छा-शक्ति के साथ अंगीकार भी करना होगा। प्राकृतिक सम्पदा पर निर्भरता एक प्रकार से स्व-निर्भरता मानी जा सकती है क्योकि प्रकृति में जो भी कुछ है-वनस्पति, जीव-जन्तु, जल-मिट्टी आदि, राभी जीवन्त है, प्राणवान है। जो जीवन्त या प्राणवान है उन्हें अपने लिए खुराक भी चाहिए। यह प्रकृति की ही सूची है कि वह अपनी खुराक स्वयं तैयार करती है, उसी से वह स्वयं पोषण प्राप्त करती है और अपने नियमित चक्र से दूसरों को भी पोपित करती है। विज्ञान और प्रौद्योगिकी के जरिये सभी प्रकार के उत्पाद मनुष्य ने निर्मित कर लिए है, पर जीवनयापन के लिए जो पोषण या सुराक उसे चाहिए द्वारा प्राकृतिक सम्पदा 53 उसके लिए वह अभी भी प्रति पर है । इसलिए यह जरूरी है किती उन सभी अवस्थाओ को .. ऐसा करने मे हम असफल रहे समय दूर नहीं कि जीवनदायी प. पडे। यह निरर्थक अहकार ही मानना विज्ञान के जरिये 'वृत्रिम खुराक' ५। हम मानते है कि मिट्टी मे भी ज पुनर्भरण स्वय करने की सामर्थ्य साथ अत्यधिक उत्पादन ले लेने केल की जव कोशिश की जाती है तो वह मानी जाती है। यह न . नि जीवन्त तत्त्वो के नष्ट होने के स. अप्राकृतिक तरीको से अधिक जहा-जहां वेशुमार इस्तेमात होता भी देख सकते है। इस प्रकार अप्राकृतिक तरीको से तो लिया जा सकता है, पर उन सकता है और न सन्तुलित ही रखा वजह है कि ऐसे खाद्यान्नो ! 41 विभिन्न प्रकार की व्याधिया जो साद और कीटनाशकों (दार साद्यान्नों, मिट्टी और जल मेने मिट्टी मे रासायनिक उर्वरको की उसकी क्षमता से अधिक उत्पादन सिलसिला बहुत जल्दी समाप्त हो के अति शोपण से निकले परिणामो. . - जबकि मिट्टी की नैसर्गिक उर्वरा असंस्य जीवाणु तत्व होते हैं। ये ज. सूखी पत्तियो, मृत पौधों तथा विि 54 पर्यावरण की संस्कृति करते है। इसके बदले में ये अपने अवशेप छोड़ते हैं जो मिट्टी को उर्वर बनाते है। हम केंचुए को लें। यह जन्तु मिट्टी को उपजाऊ बनाने मे अत्यधिक सहायक होता है । अपना रास्ता बनाने के लिए केचुआ दिन भर मिट्टी को आगे-पीछे खोदता रहता है । वह मिट्टी को मुह मे भर कर मल-मूत्र के साथ निकाल देता है। यदि जमीन मे हजारो केंचुए हो तो मिट्टी नरम और भुरभुरी बनने मे दिक्कत नहीं आती। ऐसा मानते हैं कि एक केचुआ छ महीने मे 9 किलोग्राम सेन्द्रीय पदार्थ अपने शरीर से तैयार कर मिट्टी में मिला देता है । मिट्टी मे जो जीवाणु होते हैं वे एक घंटे में दो बार अपना वंश बढ़ाते है। इस प्रकार चौबीस घंटों में 1,70,00,000 जीवाणु पंदा होते है । इन जीवाणुओ पर अन्य जीव जन्तुओ का जीवन निर्भर रहता है । इस तरह यह एक ऐसा प्राकृतिक चक्र है जिससे हर जीव-जन्तु की जाति एक-दूसरे के नियंत्रण में सहायक होती है। इसी प्रकार बड़े मृत जानवरों को खाने के लिए गिद्ध, चील, गीदड़ रहते हैं। जगल को साफ-सुथरा रखने के ये अपने ही तरीके है जो सब कुछ सन्तुलित रखते हैं। इसे समझने के लिए भयानक दुर्भिक्ष और अकाल के कारण पश्चिमी राजस्थान मे सन् 1985, 1986 और 1987 मे मरे भारी पशुधन की ओर हम अपनी नजर करें। पशुधन की असंख्य मौतों के कारण जंगल सड़ान्ध मे नहीं बदल गये, पर हड्डियों के कंकाल हजारो मृत पशुओ की साक्षी देते रहे। चयों ? गिद्ध और चील जंगल की सफाई के लिए तैनात जो है । ये सभी बातें प्रकृति के अपने सहज सन्तुलन की बातें हैं जिसके लिए बाहरी या ऊपरी उपाय कभी भी पर्याप्त नहीं हो सकते। लेकिन कई वार ऊपरी या बाहरी उपाय भी करने पड़ सकते हैं । यही पर मनुष्य का विवेक कसौटी पर चढ़ता है। चीन का एक उदाहरण हमारे सामने है। चीन मे खाद के लिए मनुष्यो और पशुओं का मल-मूत्र ही काम में लेते हैं। भारत में जहा मेहतर पाखाना साफ करते है और बदले में उन्हें मेहनताना भी दिया जाता है, वहीं चीन के किसान घरों के पाखाने साफ करने का ठेका लेते है। इसकी उत्तम 'कम्पोस्ट खाद' बनती है और खेतो मे डाली जाती है। चीन में तो यह बात एक शिष्टाचार की सज्ञा मे आती है कि कोई मेहमान जिस घर में खाना साये अपना अवशिष्ट भी वही त्यागे। सन् 1908 मे प्राकृतिक सम्पदा 55 शंघाई गगर का पापाना 2,50,000 रुपये (सत्गमय 31,000 डालर) मे विका था। उगमे गे 3,80,00,000 टन अवशिष्ट निकला था। इस मनुष्य में विवेक से निर्मित तकनीक कहा जा सकता है। आज इन्ही अवशिष्टो-मल-मूत्र आदि के कारण हमारे नदी जल प्रदूषण, नगरो-शहरों का प्रदूषण एक समस्या बना हुआ है। इसके समुचित और गार्थक उपयोग से इस समस्या री भी बचा जा सकता है और सेतों की मिट्टी को रासायनिक उधरको के विनाश से भी बचाया जा सकता है । मिट्टी की ही तरह प्राकृतिक सम्पदा में वायु और जल भी प्रमुस तत्त्व है। शुद्ध वायु की जब हम बात करते हैं तो हमारा ध्यान वनों और पेड़-पौधों की और राहग हो चला जाता है। वन सम्पदा तो अपने आप में ही अपरिमित स्परो मूल्यवान है और मनुष्य मे लेकर सभी जीवधारियों का पोपण करने का उरामे सामथ्र्य है। लेकिन सबसे अधिक पोषक तत्व जो हमे पेड़ो से मिलता है, यह है अमूल्य 'आक्सीजन'। आवसीजन की कीमत की यदि रुपयों में तुलना करें तो एक वृक्ष एक साल में 5,000 रुपये की प्राणवायु पैदा करता है। एक वृक्ष को औसत आयु यदि हम 50 वर्ष मानें तो अपने जीवन काल मे एक पेड़ हमे 2,50,000 रुपये मूल्य की 'आक्सीजन' प्रदान कर देता है। आज वायु प्रदूषण के भारी सकट के दौर से हम गुजर रहे है । विज्ञान के पास भी वायु के शुद्धीकरण की कोई तकनीक नहीं है । वायु प्रदूषण पर नियंत्रण के लिए पेड़-पौधे ही एकमात्र सहारा है। पेड़-पौधे किसी भी उन्नत प्रौद्योगिकी के जरिये कारखानो मे पैदा नहीं हो सकते। अतः यह काम वनो और वृक्षा- वलियो पर ही निर्भर है। वायुमण्डल को । शुद्ध रखने के साथ-साथ पेड़ मिट्टी के कटाव, भू-क्षरण को रोकने की क्षमता भी रखते है। एक साधारण पेड़ भी एक सौ वर्ग मीटर क्षेत्र में मिट्टी को वहने से रोक देता है। साथ ही अपनी पत्तियो और अपने पर पक्षियो के वसेरे से मिट्टी को उर्वरा भी बनाता है। पेड़ो का काम यही आकर थम नहीं जाता। मिट्टी मे आर्द्रता को बनाये रखने और जल के पुनर्चक्रीकरण में भी वनो का महत्त्वपूर्ण योगदान है। वनो से वायुमण्डल का तापमान घटता है, आर्द्रता बढ़ती है जो अन्तत. वर्षा मे सहायक होती है। पेड पशु-पक्षियो व मनुष्यो के लिए भोजन, ईंधन, रेशा आदि भी देते है । 56 पर्यावरण की संस्कृति " " " एक अनुमान से वृक्ष का कुल योगदान यह माना गया है-- एक वृक्ष की औसत आयु पचास वर्ष मानते हुए-- 1. आक्सीजन का निर्माण 2,50,000 रुपये 2. वायु प्रदूषण पर नियंत्रण 5,00,000॥ 3. भू-क्षरण रोकने और मिट्टी मे उर्वरा शक्ति का निर्माण 2,50,000 4. जल का पुनर्चक्रीकरण व आर्द्रता पर नियंत्रण 3,00,000 5. पशु-पक्षियों को बसेरा 2,50,000 6. प्रोटीन व वसा का निर्माण 20,000 कुल योग 15,70,000 , इस प्रकार एक वृक्ष अपने जीवन काल में 15,70,000 रु. मूल्य का योगदान प्रदान करता है । लेकिन यह तो एक व्यावसायिक तरह का आकलन है । इस आकलन को सही आकलन नहीं कहा जा सकता क्योंकि पेड़-पौधे, धन आदि सम्पूर्ण पर्यावरण और परिवेशिको के आधार है और जो कुछ प्रकृति मे विद्यमान है वे सब एक-दूसरे पर जिस प्रकार से अवलम्बित है उसके आधार पर इसका मूल्य और परिमाण अपरिमित है। प्रकृति को एक और अनूठी-अनोखी सम्पदा है जल । जल तो जीवन ही है। यह मानकर चलते है कि जहां जल है वहां अवश्य ही जीवन है। इस प्रकृति में जो कुछ विद्यमान है उसमे मिट्टी और जल का ही सर्वाधिक सहकार है। जिस क्षेत्र में अच्छी मिट्टी और पर्याप्त जल है वहा सम्पदा का विपुल भण्डार होना मान सकते है । वह एक समृद्ध क्षेत्र कहा जा सकता है । मानव समाज को जल के रूप मे प्रकृति से प्रदत्त एक अनुपम, अनमोल भेट है। प्रकृति का यह संसाधन यद्यपि बहुत सीमित है, तब भी विवेक सम्मत उपयोग यदि होता रहे तो इसे अपरिमित भी मान सकते हैं । जल की रष्टि से भारत को दो हिस्सों में बाट सकते है । एक नम अथवा जल- बहुल क्षेत्र और दूसरा सूखा अथवा जलविहीन क्षेत्र । लेकिन जिस क्षेत्र को हम जलविहीन क्षेत्र मानते है वहां भी वर्षा का पानी तो होता ही है । वर्ष भर में इतनी 'बरसात' तो हो ही जाती है कि वर्षा के समूचे पानी को अगर संगृहीत कर लिया जाय तो वह उपभोग के अनुपात मे काफी पर्याप्त होता है । ऐसे क्षेत्रों में जल संग्रहण के परम्परागत तरीकों का अति विकसित और समुचित रूप हमे देखने को मिल सकता है। पश्चिमी राजस्थान के थार मरुस्थलीय जिलों में ऐसे जल संग्रहण क्षेत्र व प्रणालियां देखी जा सकती है। प्राकृतिक सम्पदा 57 वर्षा के जल पर ही मुख्य निर्भरता के कारण इन क्षेत्रों में जल के उपभोग के भी अत्यन्त सकुचित और नियंत्रित स्वभाव लोगों में रहे हैं । एक ही जल से नहाने-धोने, पोछा लगाने, गोवर थापने और ऐसे ही वहुविध उपयोग प्रचलित रहे है । इस प्रकार की परम्परा को प्रकृति के सानुकूत माना जाता रहा है और इससे मानव जीवन भीपण दुविधाओ से वचा भी रहा है । ऐसे परम्परा- गत तरीके भारत के हर हिस्से में रहे है । अब हम पहले यह देखें कि पानी आता कहां से है और कहा चला जाता है। जितना पानी प्रकृति से प्राप्त होता है - वर्षा से, नदी, पहाड़ो और वर्फ के पिघलने आदि से, वह आज भी उतना है जितना कि धरती के प्रारम्भ होगा। भारत इस दृष्टि से दुनिया मे सबसे अधिक समृद्ध देश है जिसके पास हिमालय का विपुल जल स्रोत है । इस भू-मंडल पर तेरह मौ मिलियन (एक मिलियन के बराबर दस लास) घन मीटर पानी उपलब्ध है । यह संख्या हमारे दिमाग को झकझोरने वाली है, पर सत्य है । इस उपलब्ध पानी का 97 प्रतिशत पानी समुद्री या नमकीन है । शेप मीठा पानी है। इसमे द्रव रूप मे मात्र 0.7 प्रतिशत ही है, बाकी बर्फ के रूप में है । द्रव रूप में उपलब्ध 0.7 प्रतिशत मे से भी 06 प्रतिशत भूतल में है और 0 1 प्रतिशत पानी नदी-झीलों में है। इन आकड़ों से हमें भूतल के जल की महत्ता का अनुमान हो जाता है । लेकिन जल का एक दूसरा स्रोत वर्षा भी है । दुनिया की समूची घरती पर जितनी वर्षाप्रतिवर्ष होती है उससे कुल 10,000-12,000 मिलियन हेक्टेयर मीटर पानी प्राप्त होता है । भारत में वर्षा के पानी का कुल अनुपात 400 मिलियन हेक्टेयर है । इसमे से दो सौ तीस एम. एच एम. पानी वाप्प बन कर उड़ जाता है । एक सौ दस एम. एच. एम. नदी-झीलो में चला जाता है और शेप 60 एम. एच. एम भूतल में चला जाता है । यह पानी भूतल के जल का पुनर्भरण करता है। हमारे यहां पानी की दैनंदिन खपत प्रति व्यक्ति 50 लीटर मानी गई है। इस प्रकार भारत की कुल आबादी को मात्र 1.4 मिलियन हेक्टेयर पानी चाहिए। जाहिर है पानी की कमी नहीं, उसके प्रवन्ध की कमी है। डॉ. स्वामीनाथन सहित अनेक कृषि वैज्ञानिक यह मानते है कि यदि हम अपने देश के 'बरसाती पानी का बेहतर उपयोग कर सकें - जिसकी अति अनुकूल सम्भावनाए हैं-तो अनेक समस्याओ का समाधान संभव है । साद्यान्न 58 पर्यावरण की संस्कृति उत्पादन के क्षेत्र में भी इससे वृद्धि की जा सकती है। इस समय देश में 16 करोड़ टन खाद्यान्न पैदा होता है जबकि वर्षा के पानी को कृषि का आधार बना लेने पर कृषि वैज्ञानिक मानते हैं कि भारत की खाद्यान्न उत्पादन क्षमता 3500 से 4000 मिलियन टन हो सकती है । यह वर्तमान क्षमता से बीस गुना अधिक होगी। अकेले राजस्थान में ही वर्षा के जल संग्रहण से खेती की जाय तो अब से दुगुना अनाज पैदा किया जा सकता है। इस तरह हम देखते है कि प्रकृति की एक विपुल सम्पदा जो जल है, हमे वरदान की तरह प्राप्य है । विज्ञान और प्रौद्योगिकी का मानवीय स्वरूप यदि वन जाय तो इस सम्पदा के बेहतर उपयोग के उपाय खोजे जा सकते हैं। जल सम्पदा के उपयोग के जो बेहतर उपाय इस समय हमारे सामने है वे बड़े-बड़े भीमकाय बांधी और नहर योजनाओ के रूप में ही दिखाई दे रहे है । विज्ञान और प्रौद्योगिकी ने परम्परागत तालाबों, झीलों, जोहड़ों, कुइयों, वेरियों उकेरियों की उपेक्षा की है जो वर्षा के पानी के संग्रहण के सम्पन्न उपाय थे। थार मरुस्थल में, जो जलाभाव के लिए जाना जाता है-कुइयां, बेरियां उकेरियां, जोहड़, टांके आदि जलापूर्ति के विश्वसनीय साधन बने रहे हैं। यह विश्वसनीयता इंदिरा गांधी नहर परियोजना के आते ही टूटी है । बीकानेर जिले के कई गांव इंदिरा गांधी नहर परियोजना से पेयजल आपूर्ति के बतौर जुड़े हुए हैं, लेकिन वहां लोगों को दुर्दिन ही देखने पड़ रहे हैं। नहर से पानी आने का कोई भरोसा नही रहा है । इन गांवों के लिए जब नहर से पेयजल योजना बनी और 'जल सप्लाई शुरू हुई तो गांव जनों में उल्लास और उत्साह था, पर वहुत जल्दी यह उल्लास ठंडा पड़ गया। बीकानेर में बामनवाली, शुभलाई, सोडवाली और जैसलमेर जिले मे सुल्ताना, अर्जुना, डीगा आदि गाव ऐसे ही हैं जहां नहर का पानी पहुंचते ही लोग पारम्परिक स्रोतो को भूल गए और अन्ततः पछताए । देश को भू-जल सम्पदा का उल्लेख हमने ऊपर किया है, लेकिन इसका जल स्तर भी निरन्तर घट रहा है। लाखो नलकूपो से खीचे जाने वाले पानी से कीमती जल भंडारों का कितना क्षय हुआ इसका तथ्यात्मक विवरण तो नही बताया जा सकता, पर जिन क्षेत्रों में भू-गर्भ के जल का स्तर नीचे चला गया है वहां उसके उपयोग के प्रति सतर्क होना अत्यन्त जरूरी है। लेकिन इस अनिवार्यता के प्रति कोई सचेत नही है। जोधपुर जिले में मथानिया गांव में अस्सी नलकूप है । इन्ही नलकूपों के पानी से यहा लाल मिर्च की बेशुमार खेती प्राकृतिक सम्पदा 59 की जाती है। यहां सन् 1974 से 1988 तक पिछले चौदह वर्षों में पानी का जल स्तर बारह मीटर नीचे जा चुका है। जिस भारी मात्रा में हम भूतल के पानी को मशीनों से उलीच रहे है उसी मात्रा में वह 'रिचार्ज नहीं हो रहा। यह वात हमे सोचने को विवश करती है कि भू-जल का उपयोग हम किस रूप मे करें। वैकल्पिक तौर पर जो उपाय हमारे सामने हैं उनमें से एक ही पुस्ता उपाय है वर्षा के पानी का अधिकतम सग्रहण । वर्षा के पानी को रोकने के लिए तालाबो के निर्माण की परम्परा हमारे यहां बहुत प्राचीन रही है । इन तालावी के आगोर (कैचमेन्ट एरिया) इतने व्यवस्थित रहे है कि वर्षा की एक बून्द भी बेकार न जाय । इन आगोरों की पवित्रता को बनाये रखने के प्रबन्ध भी वहुत माकूल रहे हैं । अनेक सरोवरो के भागोर तो इतने पवित्र माने जाते रहे है कि वहां कोई जूते पहन कर भी नहीं जा सकता । शौच, मल-मूत्र त्याग तो इन क्षेत्रो में पूरी तरह वर्जनीय माना जाता रहा है । लेकिन यह परम्परा अव समाप्त प्रायः है। राजस्थान के दो बड़े जिले जोधपुर में 50 और बीकानेर में 40 तालाब सन् 1988 तक तो देखने को मिलते रहे हैं, पर वे तव उपयोग की हालत में नहीं रहे। लेकिन बीकानेर जिले के कोलायत गाव में विशाल कपिल सरोवर अभी भी अपनी विपुलता को लिए हुए है। इस तालाब के 64 घाट है और करीब एक सौ उनचास वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में इस तालाब का आगोर फैला हुआ है। पर दुर्भाग्य कि ईंट भट्टों के लिए मिट्टी खोदने वालो ने इस के आगोर को भी नहीं छोड़ा है। अब ऐसे तालाबी को परम्परा तो जैसे लुप्त प्राय. ही हो गई है। गावों के लिए और विशेष रूप से ऐसे क्षेत्रों के लिए जिन्हे पूरी तरह से वर्षा पर ही निर्भर रहना पड़ता है-तालाब, टाके, जोहड़, कुइया ही बेहतर तकनीक साबित हो सकते हैं। आकड़ो से यह पता चलता है कि वर्षा के पानी का बहुत बड़ा अश संगृहीत नहीं होता और वह बह कर चला जाता है। उसका संग्रहण किया जा सकता है । यह कार्य कठिन भी नहीं है । यह माना जाता है कि देश की तीन प्रतिशत भूमि पर तालाब रहे है। इन तालाबों में होने वाली वर्षा का 25 प्रतिशत पानी भी जमा होता रहा है । अतः तालाब बनाकर वर्षा के पानी को रोकने की तकनीक समुचित और बेहतर तकनीक है, लेकिन आज इसे पूरी तरह भुला दिया गया है। इनको जगह अव बड़े बाधी और नहरो ने ले ली है। देश में बड़े बाध और वृहद सिंचाई योजनाएं हमारे पर्यावरण के लिए कितना उपयुक्त हैं इस पर मी पर्यावरण को संस्कृति 60 अब तीने सवाल खड़े होने लगे हैं। इन बांधों के बनने से लोगों के उजड़ने, वनों के विनाश होने, वनस्पति और वन्य जीवों के हास से पर्यावरण और परिवेशिकी पर जो प्रतिकूल असर पड़ता जा रहा है उससे हमारे नियोजक बेखबर है। भाखड़ा बांध और पोंग बांध के कारण हजारों परिवार उजड़ गए। भासड़ा वध के कारण 2100 परिवार और पोग डेम के कारण 16000 घर उजड़े। नर्मदा घाटी परियोजना के अन्तर्गत तीस बड़े बांध, 300 मंझोले बाध और तीन हजार छोटे बांध बनेंगे। बीस हजार करोड़ रुपये की यह योजना किसे, कब, क्या देगी यह तो भविष्य के गर्भ में है, लेकिन इस परियोजना के कारण एक लाख तीम हजार लोग विस्थापित होगे। एक लाख 28 हजार हेक्टेयर भूमि डूब में आ जायेगी और इसमे 44 हजार हेक्टेयर वन भी विनष्ट हो जायेंगे । यह सारा मामला ही दहला देने वाला है। लेकिन कितने लोगो को इमकी परवाह है। जो क्षति होने वाली है उमकी आपूर्ति भी कभी होगी, सच-सच बताने वाला कोई नही है। विज्ञान और प्रौद्योगिकी के इस रूप को रौद्र और विध्वंसक ही कहा जायेगा जो हमारे पर्यावरण और परिवेशिकी के लिए कत्तई उपयुक्त नहीं है, पर आधुनिक विकास के हिमायती लोगों को अभी यह बात समझ मे नहीं आ रही । इन वांधी का निर्माण ऊर्गा और कृषि के लिए ही किया जा रहा है। लेकिन अनेक कृषि विशेषज्ञ अब तालावो की ओर लौट रहे हैं । भूतपूर्व कृषि आयुक्त डॉ.डी. आर मुंबला मानते है कि पानी का बेहतर प्रबन्ध तालावों के जरिये किया जा सकता है । तालावों मे अधिक पैदावार लेने के माथ, बाढों को रोकने और भूगर्भ का जल स्तर बढ़ाने में भी तालावों से मदद मिलती है। एक गमय था जब तालाव पर्यावरण का हिस्सा थे और वन, मिट्टी की तरह जीवनाधार भी थे। यही कारण रहा कि तमिलनाडु में 27 हजार तालाब होने का उल्लेग मिलता है। मध्यप्रदेश में तालाबों मे मिचाई की परम्परा रही है । महाराष्ट्र में भी ऐमा ही रहा है । सन् 1958-59 तक पूरे देश में कुल सिंचित क्षेत्र में तालाबो मे मिनाई का भू-भाग 21 प्रतिशत था जो 1978-79 में घटकर दम प्रतिशत रह गया। इसकी वजह यया है ? आजादी के बाद विकाम को जो दिशा रही उसमें भी तालाबों की उपेक्षा मोहुई? क्यों यहे बांधों की तरफ देश के नियोजको का रमान वदता चला गया? ये बांध फन तो जब देंगे तभी पता चलेगा, पर दुपएल सो इनके शुरू होने में ही मिलने लग जाते हैं। प्राकृतिक सम्पदा 61 जो कुछ हमारी परम्परा में विद्यमान था उसे वेकार क्यों मान लिया गया? इन सब बातों की तफसील में जाने से यह मन्तव्य बनता है कि आधुनिक विकास की 'डोर' जिन अंगुलियों में थमी है वे हमारी अपनी परम्परा से परिचित अंगुलियां नही रही। विकास का लाभ मुट्ठी भर हाथों मे सिमटा रहे और बहुसंख्य आबादी हमेशा उनकी मोहताज बनी रहे - इस विकास का यही अर्थ बच रहता है। यह रष्टिन भारतीय है, न ही पर्यावरणीय दृष्टि है और न इसमें समता के दर्शन होते हैं। यह एकांगी रष्टि है। जबकि भारत का पर्यावरण समग्रता का प्टि- कोण लेकर, समतोल और सन्तुलन का दर्शन लेकर चलता रहा है । पर्यावरण और परिवेशिकी के बारे में विदेशी समझ रखने वाले बहुत से लोग बढती आबादी को भी पर्यावरण असन्तुलन का एक बड़ा कारण मान बैठे हैं। आज जो परिस्थितियां हमारे मध्य हैं उन में हमे यह कारण राही प्रतीत होता है । लेकिन वास्तविकता यह नही है। भारत के संदर्भ में हम देखें। हम अपने पर्यावरण और परिवेशिकी के समतोल को बने रहने देने का प्रयास करें और यह मानें कि जो कुछ प्रकृति में है वह सबके लिए है। विज्ञान और प्रौद्योगिकी के बेजा दबावों से प्रकृति को मुक्त रखने में यदि हम सफा हो जायें तो भारत के प्राकृतिक संसाधन दुगुनी आबादी का पेट भर सकने के सामर्थ्य में भी सरा उतर सकते हैं । बेशक यह मान लेना चाहिए कि विज्ञान और प्रौद्योगिकी कुछ हाथों मे, कुछ लोगों के हितों व स्वार्थों को पूरा करने के लिए नहीं होकर यदि सबके लिए हो तो वे सहायक भी सिद्ध हो सकते है क्योकि वैसी प्रौद्योगिकी हिंसक प्रौद्योगिकी नही होगी। तब विज्ञान और आत्मज्ञान में समन्वय और सहोदर का रिश्ता स्थापित हो सकेगा। शायद हमें एक बारगी यह बात अतिशयोक्तिपूर्ण ही लगे कि वर्तमान प्राकृतिक संसाधन दुगुनी आबादी का पेट भर सकते है। लेकिन गहराई में जाये तो ऐसा नहीं लगेगा । भारत में उपलब्ध मानव श्रम को हम अभी यथोचित काम में नहीं लगा पाये है । यह प्रश्न समाजशास्त्रियों के लिए चुनौतीपूर्ण है कि करीब चालीस हजार जातियों वाला हमारा समाज अव तक कैसे टिका रह मका । इसका एक ही कारण है जो परिवेशिकी से जुड़ा है। भारतीय समाज मंयम और आस्थाओं से भरा समाज है । यहां जातीय आधार पर धन्धों का वर्गीकरण और ऐसी ही स्व-नियंत्रित व्यवस्था रही है। प्राकृतिक संसाधनो के दोहन और उपभोग में भी वही परम्परा रही है । यही कारण है कि दुनिया की कितनी ही मभ्यताएं और संस्कृतियां नष्ट हुई, पर भारत की सभ्यता 62 पर्यावरण की संस्कृति और सस्कृति पर चाहे कितने ही हमले हुए, लेकिन वह मस्तक उठाकर बराबर खड़ी रही। इसका एक दूसरा कारण भी रहा है । भारतीय परम्परा में मिट्टी और जल दोनों ही पवित्र और पूजनीय माने जाते रहे है। नदियों, सरोवरों के जल और उनकी मिट्टी किसी न किसी रूप में पवित्र मानी गई है। यही बात पेड़-पौधों और बहुत अंशो तक पशुधन के बारे में है । पेड़ों और पशु-पक्षियों की भी यहां पूजा होती रही है । गाय और विपला सर्प दोनों पूजे जाते है। इन परम्पराओं की वर्तमान युग में क्या सामंजस्य और उपादेयता शेष रही है-इस पर भी समाजशास्त्रियो को चिन्तन करना अपेक्षित है। तथाकथित प्रगतिशीलता का जामा पहने हमारे चिन्तक इनको निरा पोंगापन करार दे सकते है, लेकिन प्रगतिशीलता का अर्थ किसी भी हालत मे अधोगति की ओर उन्मुख होना नही है । अतः इन परम्पराओ में पोगापन देखने की जगह इनके वैज्ञानिक और प्रतीकात्मक अर्थों को उजागर करने की जरूरत है। हमारे देश की प्राकृतिक सम्पदा के बारे में यद्यपि समग्र अध्ययन तुलनात्मक दृष्टिकोण के साथ अब तक भले न हुआ हो, पर फुटकर अध्ययनों से जो नतीजे निकलते है वे भी आशान्वित तो करते ही हैं । खाद्य और कृषि संगठन ने 1983 मे 'विकासशील विश्व में भूमि की सम्भावित क्षमता और जनसंख्या पर एक अध्ययन किया। विवादास्पद होने के बाद भी इस अध्ययन से भारत का एक सन्तोषप्रद चित्र उभरता है । इस अध्ययन से भी यही निष्कर्ष निकलता है कि सन् दो हजार तक देश की आबादी करीब 104 करोड़ तक पहुंच जायेगी, पर इसके साथ ही विभिन्न परम्परागत सिंचाई योजनाओं के समुचित उपयोग से उपज भी बढ़ जायेगी। इस तरह यह अनुमान लगाया गया है कि सन् दो हजार तक देश के 262 करोड़ 10 लाख लोगों का पेट भरने की क्षमता इस भूमि की होगी। लेकिन यह तभी होगा जब हम अपनी परम्परा में लौटें । इसे पीछे लौटना भी नहीं कहा जायेगा। यह तो यथार्थ और उसमे से निकले नतीजों तथा अनुभवों से सबक लेना और अपनी समझ को सही करना माना जायेगा। देश की 270 करोड़ 50 लाख हेक्टेयर भूमि खेती लायक है । इस कुल जमीन की अलग-अलग स्थितियां होते हुए भी यह तय है कि सम्पूर्ण जमीन का यथोचित उपयोग करने की एक सुनियोजित योजना तैयार करने से उक्त अध्ययन के निष्कर्ष के समरूप लक्ष्य अजित किये जा सकते है । प्राकृतिक सम्पदा 63

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पवनार में प्रयोग किये गए। विनोवा का मानना है कि एक एकड भूमि मे अपने संसाधनों और अपने हाथों से सिंचाई कर एक किसान अपने परिवार का भरण-पोषण कर सकता है। ये मब ये उपाय है जो तथाकथित आधुनिक विकाम मे कोई मेल नहीं पाते। इस विगडी हुई हालत मे जो कारगर उपाय हो सकते है वे तकनीको पर आधारित न होकर प्राकृतिक प्रक्रियाओ से ही जुड़े हो सकते है। इन्हीं उपायों मे हम दीर्घकालीन स्थायित्व की ओर बढ सकेंगे। ऐसी कृषि व्यवस्था ही, जिसमें जैव्य खाद, फमल चक्र और घासों का सन्तुलित उपयोग होगा, एक समुन्नत कृपि व्यवस्था साबित होगी। इसमे मिट्टी की उर्वरता के लिए बाहरी उपायो की जगह मिट्टी मे ही पैदा होने वाली सुराक महायक होगी। कृषि और पशुपालन माथ-माथ चलेंगे जिससे मिट्टी की उर्वरता की सहज पूर्ति होती रह सके । इस प्रकार विपुल प्राकृतिक सम्पदा के रूप में मिट्टी, जल, वन मुख्य है जो जीवनाधार बने रह सकते हैं। कृपि का सन्तुलित उपयोग इस आधार में महायक हो सकता है। मिट्टी, जल और धन के समतोल के लिए प्रकृति की गोद मे ही बैठे जीव-जन्तु, पशु-पक्षी भी सहायक होते हैं। इस तरह ये ऐसी कडियां है जो एक दूसरे मे पूरी तरह आबद्ध है। इनका पिशृंखलन ही विनाश का कारण बनता है। इनका शृखलावद्ध स्वरूप सबका जीवनाधार बना रह सकता है। लेकिन यह कैमे रह सकता है ? हमें यह ममझ लेना जरूरी है कि हमारी प्राकृतिक सम्पदा की बर्बादी किन कारणो से हो रही है, कौन कर रहा है ? मवसे बड़ा संकट आधुनिकीकरण है। कृषि हो या उद्योग, दोनों ही क्षेत्रों में आधुनिकीकरण ने हमारी प्राकृतिक सम्पदा को बुरी तरह रौदा है । कृषि के क्षेत्र में आज हम देखते है कि किसान का नकदी फसलो की ओर रुझान बढ़ा है। लेकिन इसका कारण क्या है ? बड़ी सिंचाई योजनाओ से जो पैदावार ली जाती है वह परम्परागत सिंचाई प्रणालियों से काफी महंगी बैठती है । ऐसी हालत में यदि नकदी फसलों का सहारा नहीं लिया जाये तो घाटे को कभी पूरा ही नहीं किया जा सकता । खेतो की जमीनों पर भी सफेदा जैसे पेड़ो का सघन वृक्षारोपण इसी कारण बढता चला जा रहा है। सफेदा केवल खेतो में मिट्टी का शोषण ही नहीं करता, वे खेतिहर मजदूर जो अब तक खेतो मे श्रम का पसीना बहा कर अपने रोजगार का सहज ही जुगाड कर लेते थे-सफैदे के वाद बेमहारा-वेहाल होने लगे हैं। मफैदा औद्योगिक उपयोग का पेड़ हो प्राकृतिक सम्पदा 65 सकता है, लेकिन ऐगा औद्योगिक उत्पाद आम आदमी को क्या देता है ? कुछ नहीं। मेती को ही गरह औद्योगीकरण भी आम आदमी के लिए अब तक सहायक मिद नही हुआ है। उद्योगो को कच्चा माल कहां गे मिलता है ? प्रकृति गे। पर यह किन लोगो गे छीन कर उद्योगों की भेंट चढता है ? माय व कृषि संगटन के भूगपूर्व विशेषन डॉ. वी वी कृष्णमूर्ति ने दक्षिणी मैगर के कुछ क्षेत्रों का अध्ययन किया और बताया कि कागज में कारपाने लग जाने से यहां के किगान गकट में पड़ गए हैं। नंजन गूड के पाग कयिनी नदी के अगल-बगल में कई कागज के कारसाने है। सरकार ने फगलों का कचरा काम में लेने की छूट भी इन कारमानो को दे दी। यही कचरा एक गमय तक यहां के पशुओं के लिए चारे के रूप में काम आता रहा है । अब तो कगरी धाग और धान का पुआल भी कारखानों को भेंट चढ़ना शुरू हो गया। ज्यो. ज्यो ऐसा होता गया इस क्षेत्र का किमान और पशुधन संकट में पड़ता गया। महाराष्ट्र के भडारा और चन्द्रपुर जिलों के लोगो का पुश्तैनी धन्धा चटाई और टोकरी बनाना है। इसके लिए कच्चा माल बांस है। पहले यह बास जंगलो से मिल जाता था, पर फिर गरकार का आधिपत्य हो गया । अन्ततः वाग भी कागज के कारगानो की बलि चढ गया। बुरड जाति के ये लोग बेकार हो गए। इसी प्रकार कितनी ही अन्य वन गम्पदाओ को उद्योगों की भेंट चढ़ाया जा रहा है। औद्योगीकरण के कारण जहां वन गम्पदा आम आदमी के हाथो रो छिनी जा चुकी, वही कारसानो के अपशेप उनके जीवन को दूपित करने के लिए छोड दिये गए । इस तरह आम आदमी दोनो तरह गे ठगा गया। अत यह जरूरी हो जाता है कि विकाग के इन प्रतिमानों को पूरी तरह बदला जाये। यह माना जा सकता है कि भूस, गरीवी और बेहाली की हालत मे पर्यावरण और परिवैशिको को वात किमी के हृदय को स्पर्श नही कर मकती, लेकिन आत्मघात करने की छूट भी किसी को नहीं दी जा सकती। समाज तथा व्यवस्था को इस बात पर टिकाये रखना मुट्ठी भर पर्यावरणवादियो के लिए दुष्कर काम तो हो सकता है, पर असंभव नहीं। क्योंकि यह प्रकृति जो स्वयं अपनी नियंता है-ऐसे ही लोगों के माथ हो सकती है जो प्रकृति को मा मानते हों। हमे नही भूलना चाहिए कि यह प्रकृति जहा रचना या मृजन करती है . वहीं विध्वंम और विनाश भी करती है। 66 पर्यावरण की संस्कृति ताकि सनद रहे फिर से एक नये समाज की रचना करने की दिशा में कोन पहले आगे आये ? यह मवाल गभीर भी है और चुनौतीपूर्ण भी। हम देख रहे हैं कि विकास का जो पहिया इस समय जिस गति से चल रहा है वह जीवन देने के लिए नही, गर्दने उडा देने के लिए ही जैसे चल रहा हो। यह विकास वरदान है या अभिशाप, इस बात को चिन्तनशील समाज पूरी तरह समझ चुका है। तब भी वह उमसे मुक्त नही हो पा रहा है। जो जाल विज्ञान और प्रौद्योगिकी के सहारे बुना जा चुका है उसे काटने का सामर्थ्य इसमें भी नहीं है । परमाणु ऊर्जा के विकिरण और रामायनिकों से पैदा होने वाले प्रदूपणों से उत्पन्न खतरो को झेलने के सिवा बचने का कोई उपाय हमारी इस कथित बेहतरीन प्रौद्योगिकी के पास भी नहीं है । पूरी दुनिया इन सतरो मे चिंतित है, लेकिन किमी के पास कोई उपाय नही है । ममूची दुनिया में इन खतरो से चिंतित कोई व्यक्ति यदि रहा है तो उनमे एक गांधीजी हैं । सन् 1908 में जिस 'हिन्द स्वराज' पुस्तक की रचना बापू ने की-अपने उन विचारी को वे अन्त तक सही मानते रहे। 5 अमटूबर, 1945 को महात्मा गांधी ने एक पत्र इसी सम्बन्ध में पडित जवाहरलाल नेहरू को भी लिखा। ये दिन हमारी आजादी की लड़ाई के परवान चढते दिन थे। आजादी के तुरन्त बाद भारत को क्या दिशा लेनी है उग पर भी सोचने का यही सही समय था। गांधीजी को यह स्पष्ट प्रतीत होता रहा कि पश्चिम की औद्योगिक सभ्यता पूरी तरह से अमानवीय है और अपने पर्यावरण-परिवेशिकी से कटी हुई है। भारत के माध्यम से गांधीजी सम्पूर्ण विश्व के मामने एक ऐसे समाज का प्राकल्प प्रस्तुत करना चाहते थे जिसमें सत्य और अहिंसा हर एक की जीवन- दृष्टि बने और दानवी सभ्यता से मुक्ति मिल सके। गाधीजी का पंडित नेहरू को लिखा यह पत्र एक ऐमा ऐतिहासिक दस्तावेज है जिसे कई दृष्टियो से विवेचित-विश्लपित किया जा सकता है। जहा तक पर्यावरण और परिवेशिकी का प्रश्न है यह पत्र स्पष्ट प्टि लिए हुए है जो केवल भौतिक और वस्तुगत विकास की सीमाओं की ओर ही नहीं, हमारे सामाजिक-सांस्कृतिक विकास और सरोकारों की तरफ भी इंगित करता है। गांधी अपने पत्र मे लिखते हैं-- चि जवाहरलाल, तुमको लिखने का तो कई दिनो से इरादा किया था, लेकिन आज ही उसका अमल कर सकता हूँ। अंग्रेजी मे लिखू या हिन्दुस्तानी में यह भी मेरे सामने सवाल रहा था । आखिर में मैंने हिन्दुस्तानी मे ही लिखने को पसन्द किया। पहली बात तो हमारे बीच मे जो बड़ा मतभेद हुआ है उसकी है । अगर वह भेद मचमुच है तो लोगो को भी जानना चाहिए क्योकि उनको अन्धेरे में रखने से हमारा स्वराज का काम रुकता है। मैने कहा है कि 'हिन्द स्वराज' मे जो मैंने लिखा है उम राज्य पद्धति पर मैं वित्कुल कायम हूँ। यह सिर्फ कहने की बात नहीं है, लेकिन जो चीज मैने 1908 के माल में लिखी उसी चीज का सत्य मैंने आज तक अनुभव से पाया हे । आखिर में मैं एक ही उसे मानने वाला रह जाऊं उसका मुझ को जरा-सा भी दुःख न होगा। क्योकि मैं जैसे सत्य पाता हूँ उसका मैं साक्षी बन सकता हूँ। "हिन्द स्वराज' मेरे सामने नहीं है । अच्छा है कि मैं उमी चित्र को आज अपनी भाषा में सींचू । पीछे यह चित्र 1908 जैसा ही है या नही उसकी मुझे दरकार न रहेगी, न तुम्हे रहनी चाहिए। आखिर में तो मैंने पहले पया कहा था उमे सिद्ध करना नहीं है, आज मै क्या करता हूं वही जानना आवश्यक है। मैं मानता हूँ कि अगर हिन्दुस्तान को मच्ची आजादी पानी है और हिन्दुस्तान के मारफत दुनिया को भी, तव आज नहीं तो कल देहातों में ही रहना होगा- झोपड़ियों में, महलो में नहीं । कई अवज (अरब)आदमी शहरों में और महलों में मुस मे और शान्ति से कभी रह नहीं सकते, न एक दूसरों का खून करके मायने हिंसा से, न झूठ से यानी असत्य से । सिवाय इस जोड़ी के (यानी सत्य और अहिंमा)मनुष्य जाति का नाश ही है उसमे जरा मा भी शक नहीं है । उम सत्य और अहिंसा का दर्शन हम देहातो की सादगी में ही कर सकते है। यह सादगी चर्या में और चर्या में जो चीज भरी है उसी पर निर्भर है। मुझे कोई डर नहीं कि दुनिया उल्टी ओर ही जा रही दिखती है । यो तो पतंगा जब अपने नाश की ओर जाता है तब सबमे ज्यादा चक्कर खाता है और चक्कर साते-खाते जल जाता है। हो सकता है हिन्दोस्तान इस पतंगे के चक्कर में से न बच सके। मेरा फर्ज है कि आम्विर दम तक उसमे में उसे और उसके मारफत जगत् को बचाने की कोशिश करू। मेरे कहने का निचोड यह है कि, मनुष्य जीवन के लिए जितनी जारत की चीज है उम पर निजी काबू होना - 68 पर्यावरण की संस्कृति चाहिए-अगर न रहे तो व्यक्ति बच ही नहीं सकता है। आखिर तो जगत् व्यक्तियों का ही बना है । बिन्दु नही है तो समुद्र नहीं है। यह तो मैने मोटी बात ही कही कोई नई बात नहीं की है। लेकिन 'हिन्द स्वराज' में भी मैंने यह बात नही की है। आधुनिक शास्त्र की कदर करते हुए पुरानी बात को मैं आधुनिक शास्त्र की निगाह से देखता हूँ तो पुरानी बात इस नये लेबल में मुझे बहुत मीठी लगती है । अगर ऐसा समझोगे कि मैं आज की देहातों की बात करता हूँ तो मेरी बात नहीं समझोगे। मेरी देहात आज मेरी कल्पना मे ही है। आखिर में हर एक मनुष्य अपनी कल्पना की दुनिया में ही रहता है। इस काल्पनिक देहात मे देहात जड़ नही होगा-शुद्ध चैतन्य होगा । वह गन्दगी मे, अन्धेरे कमरे मे जानवर की जिंदगी बसर नहीं करेगा, मरद और औरत दोनो आजादी से रहेगे और सारे जगत् के साथ मुकाबला करने को तैयार रहेगे । वहां न हैजा होगा, न मरको होगी, न चेचक होगे। कोई आलस्य मे रह नही सकता है, न कोई ऐश-आराम मे रहेगा। सबको शारीरिक मेहनत करनी होगी। इतनी चीज होते हुए मैं ऐसी बहुत सी चीज का ख्याल करा सकता हूँ जो बड़े पैमाने पर बनेगी। शायद रेलवे भी होगी, डाकघर, तारघर भी होगे । क्या होगा, क्या नही उसका मुझे पता नहीं । न उसकी मुझको फिकर है । असली बात को मैं कायम कर सकू तो आने की और रहने की खूबी रहेगी। और असली बात छोड़ देता हूँ तो सब छोड़ देता हूँ। उस रोज जब हम आखिर के दिन वकिंग कमेटी में बैठे थे तो ऐसा कुछ फैसला हुआ था कि इस चीज को साफ करने के लिए वकिंग कमेटी 2-3 दिन के लिए बैठेगी। बैठेगी तो मुझको अच्छा लगेगा, लेकिन न बैठे तब भी मैं चाहता हूँ कि हम दोनों एक दूसरे को अच्छी तरह समझ ले। उसके दो सबब है। हमारा सम्बन्ध सिर्फ राज कारण का ही नहीं है । उससे कई दरजे गहरा है। उस गहराई का मेरे पास कोई नाप नहीं है । वह संबंध टूट भी नहीं सकता। इसलिए मैं चाहूंगा कि हम एक दूसरे को राज कारण मे भी भली-भांति समझें। दूसरा कारण यह है कि हम दोनों में से एक भी अपने को निकम्मा नहीं समझते हैं । हम दोनो हिन्दुस्तान की आजादी के लिए ही जिन्दा रहते हैं और उसी आजादी के लिए हमको मरना भी अच्छा लगेगा । हमे किसी की तारीफ की दरकार नहीं है। तारीफ हो या गालिया-एक ही चीज है। खिदमत में उसे कोई जगह ही नहीं है। अगरचे में 125 वर्ष तक सेवा करते-करते जिन्दा रहने की इच्छा करता हूँ तब भी मैं आखिर में बूढ़ा हूँ और तुम मुकाबले में जवान हो । इसी कारण मैंने कहा है कि मेरे वारिस तुम हो । कम से कम उस ताकि सनद रहे 69 वारिस को मे समझ लू और मैं क्या है वह भी वारिस समझ ले तो अच्छा ही है और गुले चैन रहेगा। गाधी के इस पय को महज राजनीतिक महत्ता तक ही क्यों सीमित रखा गया? जवकि यह पत्र मात्र इतना ही महत्व नहीं रखता, अपितु इसकी समाज- शास्त्रीय महत्ता भी है । यह पन भाषा के चुनाव से शुरू होकर भारत के भावी स्वरूप के बारे में जो खुलासा करता है उसमे हमारा पर्यावरणीय सरोकार स्पष्ट रूप से झलकता है और एक जागतिक दृष्टि के दर्शन भी होते हैं । आज आजादी के चार दशक पूरे हो चले। इन चार दशको में भारत ने उल्लेखनीय प्रगति की है, लेकिन वह भारत तो नहीं बन सका है जिसे गांधीजी के सपनो का भारत कहा जा सके । न सही 'गाधी के सपनों का भारत', वह भारत भी तो नहीं है जहा सामाजिक-सास्कृतिक दृष्टि मे समतामय परिस्थितिया हो और सबको समान रूप से जीने का हक मिल गया हो । भारत की प्राकृतिक सम्पदा और उसकी विविधता समूचे विश्व मे वेजोड़ है, लेकिन उस सम्पदा से आम आदमी की सम्पन्नता नहीं जुड़ सकी। यह भी नही कह सकते कि भारत निर्धन देश है, लेकिन उसे धनी देश भी कैसे कहा जा सकता है जहा आज भी आधी आवादी भूसी सोती हो। रोटी, कपड़ा, स्वास्थ्य और पाव पसारने को, दो क्षण सुस्ताने को आश्रय-जिन्हें जीवन की बुनियादी जरूरत कहा जा सकता है-सबके लिए मुहैय्या नहीं है । हम कह सकते हैं कि आजादी से पूर्व भी यह राव क्या था? और आजादी को लड़ाई का मुख्य आधार भी यही तो था कि अंग्रेजी हुकूमत भारत की विपुल सम्पदा का शोषण कर अपना ही पेट भर रही है। भारत को कंगाल बना यह अपनी सम्पन्नता, अपने ऐश्वर्य में इजाफा कर रही है। आजादी के बाद यह लूट अंग्रेजों के हाथो से छिन गई, पर आम आदमी को उसके हक नहीं लौटाए गए। हमारी प्राकृतिक सम्पदा, उससे जुड़े अन्य ससाधन, हमारा सामाजिक चरित्र, हमारी सामाजिक चिन्ताएं-चेष्टाए जिस प्रकार से छिन्न-भिन्न हो चुकी थी, फिर से संयोजित कहा हो सकी ? हमारे वन, चरागाह, जल सोत, नदी, तालाब, कुएं, बावडिया आदि एक रामय मे सामूहिक सम्पत्तिया रही है और इन पर सामाजिक नियंत्रण रहा है। हमारा समाज एक ऐसा समाज रहा है जिसकी मर्यादाएं, कर्तव्य और अधिकार 70 पर्यावरण की संस्कृति स्व-सन्तुलन पर आधारित रहे है। ब्रिटिश हुकूमत ने इन्हें तोड़ा ताकि गुलामी का शिकजा दीर्घकाल तक पूरी पकड़ के साथ मजबूती से कायम रह सके । पर यह सिलसिला आजादी के बाद भी समाप्त कहां हुआ ? गांधीजी का 5 अक्टूबर 1945 का नेहरू के नाम पत्र इसीलिए यहां प्रासंगिक है। यह पत्र इसलिए भी आज अधिक प्रासंगिक है कि इस दिशा में अब गहराई से सोचा जाने लगा है। देश में, समाज के हर तबके मे एक वर्ग फिर से अपनी परम्परा मे लौटने के लिए आन्दोलित है। देश के सभी क्षेत्रो मे ऐसे अनेक छोटे-मोटे सबल समूह अपने पर्यावरण, अपनी संस्कृति, अपनी परम्परा पर बात करने के लिए, सोचने के तिए और फिर से लौटने के लिए खड़े होने लगे हैं। पर्यावरण का जो विनाश पिछले डेढ-पौने दो सौ सालों में हुआ है उसे रोकने का कोई भी कारगर उपाय यही हो सकता है कि हम नीतिगत तौर पर यह माने कि जो प्राकृतिक सम्पदा है उस पर किसी वर्ग अथवा किसी सत्ता का नही, समाज का हक है और अपनी प्रकृति से जुड़े लोग ही उसे ठीक तरह से सम्हाल सकते है, संवर्द्धन कर सकते है। निश्चय ही यह ऐसी चुनौती है जो कार्य के स्तर पर कहने जैसी महज नही है । आधुनिक विकास का लुभावना छल और दुनिया भर में अपने निहित हितों- स्वार्थों के लिए खडा एक मजनूत वर्ग दुनिया भर की सरकारो को प्रभावित करने में सक्षम है। न केवल सरकारें, दुनिया भर में एक ऐसा वौद्धिक वर्ग, वैज्ञानिक और प्रौद्योगिकीविद् भी इस मजबूत और शक्ति सम्पन्न वर्ग का पिछलग्गू बना हुआ है। इसीलिए ऐसे अनुसंधान और निष्कर्ष तीव्रता से प्रसारित-प्रचारित किये जाते हैं कि आम आदमी उसकी गिरिफ्त में आने से वमुश्किल ही बच पाता है । संचार और संवाद के उन्नत व विकसित साधनो वेजा दुरुपयोग है जो परमाणु विकिरण की माफिक ही घातक असर छोड़ता जा रहा है। लेकिन तब भी क्या? महाविनास की घंटियां कुछ ही कानों मे सही, पर दन- दना रही हैं और एक प्रतिकारात्मक सशक्त आवाज अब उनके छल को निर्वरान करने में भी लगी है । दुनिया भर मे प्रौद्योगिकी के सतरे, न्यूक्लीय ऊर्जा से पैदा होने वाले विनाश और ऐसे अन्य कितने ही झंझावात, रासायनिक तेजावी वर्षा, वायु-जल प्रदूषण आदि में लोग मचेत होने लगे हैं, इनके प्रतिकार मे सड़े होने लगे है। इन सबके जो हिमायती हैं उनसे भी अब जवाब मांग जाने लगे है। का यह ताकि सनद रहे 71 हम तुलनात्मक रूप से देखें तो प्रलय के ऐसे कगार पर भारत अभी नही पहुंचा है । भोपाल जैसी त्रासदी भारत के लिए खतरे का सायरन ही है और भारत के लोग समय रहते सचेत भी हो उठे हैं । केरल मे कोतमंगलम् के पास पेरियार नदी के किनारे दो हजार मेगावाट क्षमता वाले एक परमाणु विजली- घर की स्थापना का वहा की जनता, धार्मिक और प्रबुद्ध लोगो ने तीव्र विरोध किया। प्रधानमंत्री को ज्ञापन भेजे गए । नतीजा यह हुआ कि सरकार अपना इरादा बदल लिया । लेकिन तब भी पर्यावरण और परिवेशिकी के सरक्षण के लिए बुनियादी और कठोर निर्णय नहीं लिए जा सके । पर्यावरण और परिवेशिकी पर हो रहे चौतरफा हमले, हमारी प्राकृतिक सम्पदा, हमारी सम-सामयिक स्थितियों का यहां सक्षेप मे जो विश्लेषण हुआ है उससे भी कही अधिक विस्तार से इस विषय पर कहा जा सकता है, लेकिन जो कुछ यहा कहा गया है वह खतरो के संकेत ठीक प्रकार से समझने के लिए निश्चय ही पर्याप्त है । फिर भी इन संकेतों की पुष्टि के लिए हमें कुछ तथ्यों को भी टटोलना चाहिए। भारत को अपनी प्राकृतिक सम्पदा पर नाज रहा है। अब यह देखना जरूरी हो गया है कि क्या आज भी इस पर नाज किया जा सकता है ? हमारी प्राकृतिक सम्पदा की जो दुर्दशा हो चुकी , उसके विस्तृत ब्यौरे मे हम यहां नही जायेगे, पर हमारी चिन्ता वास्तव मे सही है, यह समझने के लिए कुछ जानकारियां हमे देखनी ही चाहिए । आगे के पृष्ठो मे हम इन्ही जानकारियो को थोड़ा टटोलते हैं । 72 पर्यावरण को संस्कृति यह धरती जो धारण करने का सामर्थ्य रख सके वही धरती या धरित्री है। लेकिन भारत की भूमि तो मां वसुन्धरा है । क्या नहीं है इस धरती मे। विपुल और विविध खनिज, वनस्पतियां, पेड़-पौधे, जीव-जन्तु, जल और सबका कष्ट, शोक, रोग, ताप हर लेने वाली वात्सल्य भरी करुणामयी कोख जिससे यह देश धन-धान्य पूरित होता रहा है। लेकिन आज इस धरती को चारों हाथ लूटा जा रहा है। जैसे यह मां वसुन्धरा नही किसी वहशी की निर्मम वासना पूरने को वस्तु भर हो। इसी वासना- लालसा ने इस धरती के पर्यावरण को बिगाड़ा है। इसी लूट के कारण इस देश की लगभग आठ हजार हेक्टेयर जमीन प्रतिवर्ष बीहड़ वनती जा रही है । इन बीहड़ों को फिर से सुधारने का क्रम तो बहुत ही धीमा है और विगाड़ का सिलसिला थमा नही है । परिणाम साफ है कि सुधार का कोई असर बहुत शीघ्र दिखाई नहीं देने वाला । इन वीहड़ों के सुधार की गति ऐसी है कि सुधार क्रम के चलते-चलते ही बीहड़ दुगुने हो जायेंगे। ये वीहड़ डाकुओं के आरामगाह बने रहे है। उत्तरप्रदेश, राजस्थान और मध्यप्रदेश के बीहड़ डाकुओं के आश्रय स्थल रहे है। चम्बल घाटी नाम से कौन अपरिचित है जहां के दस्यु यागियो ने सन् 1972 में लोकनायक जयप्रकाश नारायण के सामने आत्मसमर्पण किया था। इन तीनों प्रदेशो के बीहड़ों से भी तीस लाख टन अनाज हर साल पैदा होता है । फल, लकड़ी, चारा और कई प्रकार के कच्चे माल भी प्राप्त होते है । तब भी यह अनुमान है कि इन बीहड़ो से देश को 157 करोड़ रुपये की हानि होती है। इन वोहड़ो के सुधार की भी कई बड़ी-बड़ी योजनाएं बनी, पर ऐसा लगता है कि वे सभी किसी बीहड़ में ही दुबक कर रह गई । इन योजनाओ के कोई नतीजे सामने नहीं आये, क्योकि अधिकांश योजनाएं कागजों तक ही सिकुड़ी रही । सन् 1971 में केन्द्र सरकार के गृह मत्रालय ने इन बीहड़ों के विकास की योजना पर्यावरण के लिहाज से भले नही बनाई हो, पर पर्यावरण से अद्भुता कोई विषय हो ही कैसे सकता है ? गृह मंत्रालय की यह योजना डाकू उन्मूलन के उद्देश्य से वनी, पर हम जानते हैं कि पर्यावरण के कई पहलुओ से भी जुडी हुई है यह समस्या। सत्ताईस सालों में इस योजना पर 1,224 करोड़ रुपये व्यय होने वाले थे। पर यह योजना ही लागू नहीं हो सकी। चम्बल घाटी विकास प्राधिकरण की ओर मे चम्बल कमांड क्षेत्र में !! हजार हेक्टेयर जमीन में वृक्ष आदि लगाने की योजना, 115 किलो मीटर के घेरे में मिट्टी के तटबन्ध बनाकर घास आदि लगाने के काम किये गये । लेकिन ये सभी काम समस्या के सामने अत्यल्प है। ये बीहड़ आखिर बनते कसे है ? इस धरती पर एक हरियल चादर बिछी रहनी चाहिये । यह चादर चाहे पेड़-पौधों और झाड़ियों के रूप में हो, चाहे घासो के रूप में । लेकिन घरती जब वनस्पति विहीन हो जाती है तो वहा वर्षा के साथ मिट्टी भी वह चलती है । इसी से दरें बनते है और आगे चलकर बीहड़ मे बदल जाते है। ऐसी ही कथा परती भूमि की है । जमीन बजर क्यों होती चली जाती है ? हमारे देश मे परती या बजर भूमि कितनी है, इसका कोई पुस्ता आंकड़ा तो नहीं है, पर यह शायद 14 करोड़ 60 लाख हेक्टेयर है । दिल्ली की एक संस्था 'परती भूमि विकास समिति' मानती है कि देश में कोई दस करोड़ हेक्टेयर भूमि इस समस्या से जुड़ी है। रेतीले टीलो, अति नमी और भू-क्षरण के विभिन्न कारणो से जमीन बंजर बनती है । आंधियों से क्षतिग्रस्त होने वाला भू भाग एक करोड़ उन्नतीस लाख हेक्टेयर है । इसी तरह समुद्री तटो पर रेत के टोले 10 से 20 लाख हेक्टेयर के बीच है। पानी से भूमि कटाव, पानी का जमाव, दरें और झूम खेती से ग्रस्त जमोन 7 करोड़ 36 लाख हेक्टेयर है। यह अनुमान चाहे सर्वथा सही नहीं भी हो, पर भूमि के बंजर होते चले जाने का एक कारण सिंचित क्षेत्रों में कृषि का उचित प्रबन्ध नहीं होना भी है । राजस्थान के नहरी क्षेत्रों में उचित प्रवन्ध के अमाव में जमीन के बंजर होने के किस्से नहरी भूमि का उपयोग करने के साथ ही सुनने में आने लगे हैं । लेकिन ये किस्से नही, हकीकत है। इंदिरा गांधी नहर परियोजना (राजस्थान नहर) के लूणकरनसर लिफ्ट सिंचाई क्षेत्र मे नहरी पानी की सिंचाई से मूगफली के रिकॉर्ड उत्पादन पर हम खुशी से झूम ही रहे थे कि इस क्षेत्र में संकडो बीघा भूमि के बंजर हो जाने के तथ्य ने पर्यावरण और परिवेशिकी के प्रति सजग लोगों को चौंका दिया। इस बात को अपने एक लेख मे सबसे पहले जब इस लेखक ने उद्घाटित किया तो कृषि विशेषज्ञों को विश्वास नहीं हुआ। पर हकीकत पर पर्दा डाल भी तो । 74 पर्यावरण की संस्कृति नहीं सकता कोई । लूणकरनसर लिफ्ट सिंचित क्षेत्र में 19 जे. एम. डी, 294 आर. डी., 282 आर. डी, 276 आर डी., तथा कई अन्य क्षेत्रों में जमीन क्षारोय हो गई या तीन से छः फुट की गहराई मे ही पानी आ गया। यहा के किसानों के अनुसार करीव 105 चको मे से तीस चको में यह समस्या विकट रूप मे पैदा हो गई है और लगभग दो सौ बीघा भूमि की उर्वरता नष्ट हो गई। इस क्षेत्र मे पहले कभी इतनी कम गहराई पर पानी नहीं था और सिंचाई से खेती नहीं होती थी। नहर आने के बाद 1974-75 से ही सेती होने लगी और छः साल में ही यह समस्या खड़ी हो गई। जल और मिट्टी दोनों ही वहुमूत्य प्राकृतिक संसाधन है । इनसे हमारी भूमि यदि नष्ट होती है तो इसका कोई अन्य कारण नहीं, केवत हमारे पर्यावरण की समझ की कमी भर है । लूणकरनसर के जिस हिस्से मे यह समस्या बनी, वहा की जमीन में जिप्सम अत्यधिक मात्रा में है । भूमि के अन्दर की पतं कम गहराई में ही चट्टानी हे और इसलिए सिंचाई के पानी का रिसाव गहरे तल मे नही जाता । इसी कारण 5-7 फुट खोदते ही पानी आने लगा। यह समस्या मिट्टी और भूमि के बारे में हमारी ठीक समझ नही होने के कारण पैदा हुई । यदि प्रकृति की म्यूवियों को वारीकी से देखें तो पायेंगे कि प्रकृति ने अपना सन्तुतन स्वयं बना रखा है । यह प्रकृति या पर्यावरण का ही सन्तुलन है कि यहां की मिट्टी अथवा भूमि अधिक पानी नहीं झेल सकती। इसीलिए प्रकृति ने यहां वर्षा का अनुपात कम दिया। हमने प्रकृति के इस विज्ञान और तकनीक को बिना समझे यहां की जमीन मूंगफली की उपज के लिए अधिक पानी दिया तो विगाड़ होने लगा। यह घटना किसी बड़े विगाड की शुरुआत है और हमें समय पर सचेत हो जाने का संकेत भी देती है। जमीन और मिट्टी की सही समझ के अभाव में अधिक या कम पानी का इस्तेमाल जैसे घातक होता है वैसे ही हरित क्रान्ति के नाम पर भूमि से अधिक पंदावार लेने के लिए विना समझ के रासायनिक सादों का उपयोग भी घातक ही होता है । सघन सिंचाई और सघन सेती वाले ऐसे क्षेत्री का अध्ययन यह बताता है कि वहां रासायनिक उर्वरकों से पैदावार तो एक बार बढ़ गई, पर वह स्थायी कभी नहीं रह सकी। हरित क्रान्ति के नाम पर मिट्टी में नैसर्गिक तौर से विद्यमान पोषक तत्व नष्ट होते चले जाने का दूसरा असर खाद्यान्नों की पौष्टिकता पर पड़ा। उनमे भी वे तत्व नही रहे जो अन्यथा मिलते रहे हैं। इससे आदमी और पशुओं के शरीर में प्रतिरोधक क्षमता का हास हुआ और उससे विभिन्न प्रकार की यह धरती 75 व्याधियां खड़ी होने लगी। चण्डीगढ़ के 'पोस्ट ग्रेज्यूएट इन्स्टीट्यूट' के अनुसंधान में जो निष्कर्ष सामने आये है वे बताते हैं कि हमारे आहार में जिक की कमी शरीर की वृद्धि और लैगिक विकास पर असर डालती है । घावों के भरने मे भी इसी कारण कठिनाई होती है । मधुमेह से पीड़ित ऐसे रोगी जिन्हे अल्सर है, उनमे जिंक की कमी पायी गई है। मिट्टी की उर्वरता को बढ़ाने के लिए अनेक किस्मो की खादें बाजार में धुआधार प्रचार के साथ हमें देखने को मिल जाएंगी, लेकिन खेत मे काम करने वाला किसान उनका उपयोग करने से पहले यह कभी नहीं जान पाता कि मिट्टी में इस समय किस तत्व की कमी है और जो खाद वह उपयोग मे ले रहा है उसमे वे तत्व कितनी मात्रा में है। इस नासमझी का नतीजा मिट्टी के जीवाणु तत्वों को नष्ट करने के रूप में ही सामने आता है । लगातार रासायनिक खादो का इस्तेमाल करते-करते मिट्टी भी एक प्रकार से नशीली हो जाती है और बार-बार उसे खाद देते रहना पड़ता है जिसका अन्ततः नतीजा घातक ही निकलता है। रासायनिक खाद की जगह मिट्टी को उपजाऊ बनाने के लिए गोवर,भेड़- बकरी की मेगनी, पेड़ों की पत्तिया आदि अधिक उपयोगी माने जाते रहे है । मिट्टी मे रहने वाले कितने ही कीड़े, जीव-जन्तु, पक्षी आदि मिट्टी के उपजाऊ- पन के मजबूत आधार रहे हैं । परिवर्तित फसत चक्र और मिश्रित खाद्यान्नों की खेती-बुआयी भारतीय कृषि परम्परा रही है । ये परम्पराएं व्यावसायिक कृषि के आते-आते समाप्त हो गई। मिट्टी के कीड़े, जीव-जन्तु, घासे, खरपतवार आदि तो खेत मे ट्रेक्टर के प्रवेश करते ही उसकी बलि चढ़ गए। मिट्टी के अपने पर्यावरण के प्रतिकूल हमने मिट्टी सुधारने के जितने भी उपाय किये, तात्कालिक सुधार के बाद अन्ततः विगड़ी हालत की ओर ही अग्रसर होते गए। भूमि को बंजर बनाते जाने मे खदानों में होने वाले खनन कार्य भी कम भागी- दार नही है । खनिजो के सनन का हमारे पर्यावरण पर अनेक तरह से असर पड़ता है । यह तर्क दिया जा सकता है कि खनिज आपूर्ति के लिए खनन तो करना ही पड़ेगा । ऐसे तर्कों के पोछे मशा क्या है यह देखना जरूरी है । किसी बड़े विनाश के मूल्य पर या विलासिता की पूर्ति के नाम पर क्या यह सब करने की छूट दी जा सकती है ? आजादी के बाद देश के खनिज उत्पादनों में जो वढोतरी हुई है उसे भी हमे ध्यान में रखना होगा। जो खनिज भूगर्भ में है वे कितने मूल्यवान है और इनके निर्माण में जितना समय लगा है, उसी गति से क्या वे फिर निर्मित हो 76 पर्यावरण की संस्कृति रहे है ? यदि ऐसा नहीं है तो हमें उनके उत्खनन और उपभोग की एक सुसंगत नीति तय करनी ही चाहिए। खनिज उत्पादन तो 70 करोड़ (सन् 1950 में) से बढ़कर 1981 में 3400 करोड़ का हो गया। लेकिन हमें यह भी देखना है कि ऐसा किस मूल्य के चुकारे के बदले हुआ है और देश के आम आदमी को इसमे क्या मिला है ? हमारे पर्यावरण और परिवेशिकी पर इसका क्या असर पड़ा है ? उत्खनन का असर भूमि, वन, जल और वायु प्रदूषण सभी पर पड़ता है। इससे वहां के प्राणी जगत् पर जिसमें मनुष्य भी एक इकाई है क्या असर पड़ता है ? दून घाटी का नाम कौन नहीं जानता। देहरादून शिक्षा और शोध के महत्वपूर्ण केन्द्र के साथ-साथ आकर्षक पर्यटन केन्द्र भी है । बासमती चावल, चाय और लीची जैसे फलों की यहा पैदावार होती है । लेकिन आज यह घाटी खतरों की घटाओ से घिरी है । यहां चूना पत्थर का बेरहमी से खनन हो रहा है । इंडियन इन्स्टीट्यूट आफ मेनेजमेट, बंगलौर के प्रो. जयन्त वंद्योपाध्याय ने अपने एक अध्ययन से जो निष्कर्ष दिये है वे हमारे पर्यावरण के लिए कई दृष्टियों से घातक हैं और सचेत करने वाले है। खनन के कारण नदियो का पानी दूषित होने लगा है, वायुमंडल मे प्रदूषण बढा है, चरागाह नष्ट होने लगे है और पशुधन घटने लगा है। इस खनन के विरुद्ध स्वयंमेवी संगठन निरन्तर संघर्ष कर रहे हैं। न्यायालयो से भी कई आदेश खनन कार्य बन्द करने के जारी हुए है। देहरादून मे तो खनन कम हुआ है, पर घाटी के आन्तरिक भागों में यह बढ ही रहा है । राजस्थान मे सीसा, जस्ता, टंगस्टन, एस्बेस्टस, फासफोराइट, खड़िया, ताबा, काओलिन और चूना आदि खनिजों के विपुल भण्डार है। जितना खनिज है और जिस तरह से वह खोदा जा रहा है उसमें कही भी इस बात का ध्यान नहीं रखा जा रहा कि खनन के बाद उस भूमि का क्या होगा? खनन से वनो के विनाश, भू-क्षरण और अन्य समस्याओं के प्रति किसी भी प्रकार का नीति- गत निश्चय या योजना हमारे सामने नहीं है । अलबत्ता कुछ अपवाद अवश्य हैं। गुजरात में बड़ोदा-बम्बई राजमार्ग के किनारे चीनी मिट्टी की खुदाई होती है । लगभग दो सौ एकड़ में फैले उत्खनन से बने खड्डो को एक सुरम्य झील का रूप दे दिया गया है। यहां मछलियां छोड़ी गई हैं और हजारों पेड़ लगाए गए हैं । सभी पेड़ स्थानीय प्रजातियों के यह धरती 77 है। पानी और पेड़-पौधों के कारण यह स्थल पक्षी विहार बन गया है । कोई नव्वे प्रकार के पक्षी यहां पाये जाते है। विभिन्न तरह से हो रहे भूमि के विनाश का सर्वाधिक असर चरागाहों पर पड़ा है जो अन्ततः हमारे पशुधन को ही प्रभावित करता है। देश भर में निरन्तर पड़ने वाले अकालों और सूखे ने भी चरागाहों की हालत को बदतर बनाया है। भारतीय ग्रामीण जन का जीवनाधार कृपि और पशुपालन ही है । कृषि भी चूकि वर्षा पर निर्भर है अतः मुख्य आधार पशुपालन ही है। देश की पुल राष्ट्रीय आय मे से 6 प्रतिशत पशुपालन से होती है । यह तो सीधी आय हुई, अपरोक्ष रूप से पशुधन हमे कहां, क्या और कितना देता है यह अनुमान लगाना बहुत कठिन है। यह विपुल पशुधन चरागाहों पर अवतम्वित है । लेकिन चरागाहों की हालत कैसी है ? देश में कुल आरक्षित चरागाह लगभग एक करोड़ तीस लाख हेक्टेयर है । एक तो ये हमारे पशुधन की संख्या को देखते हुए ही अपर्याप्त हैं और दूसरे ठीक हालत मे भी नहीं है। करीब 3 करोड़ 60 लाख हेक्टेयर जंगलों में भी पशुधन का प्रवेश लगमग होता ही है। लेकिन चरागाहों के विकास की सुनिश्चित योजना बनाने की दिशा में कभी कोई ध्यान नहीं गया। इन चरागाही की स्थिति प्रमुखतः यर्पा पर निर्भर रही है। हिमालय और समशीतोष्ण क्षेत्रों मे जहां उत्तम चरागाह है, वहीं राजस्थान मे वृक्षविहीन चरागाह ही मुख्य रूप से देखने को मिलते है । जंगलों के प्रति हर स्तर पर हमारी वेरुपी रही है । यदि सामाजिक स्तर पर यह बेरुखी समाप्त हो जाये तो न केवल गंभीर अकालों में हम अपने पशुधन की रक्षा ही कर गकते है, रेगिस्तान के बढते फैलाव, अनावृष्टि और सूमे मे भी राहत पा सकते हैं। चरागाहो की रष्टि मे राजस्थान ऐमा प्रदेश है जहां इनकी निहायत जरूरत है । पशुधन की दृष्टि से राजस्थान देश में तीसरे स्थान पर है। यहा के ग्रामां- चल का मुख्य जीवनाधार पशुधन ही है। यहां कुल पशुधन 4,94,86,000 है। राज्य की कुल आय का बारह प्रतिशत पशुपालन मे प्राप्त होता है । दूध और ऊन उत्पादन में यह प्रदेश देश में शीपं पर है। राजस्थान में गोचर और ओरण की परम्परा मदियो से रही है। यहां की प्रकृति, जलवायु और जरूरत सभी के बीच गोचर और ओरण अनिवार्य और पवित्र स्थल माने गए हैं। पश्चिमी राजस्थान में गौधन और भेड़ें मर्वाधिक है। प्रकृति ने यहां ऐगी घामें, पेड-पौधे और झाडियां दी जो ग पशुधन के 78 पर्यावरण की गंस्कृति लिए उत्तम चारे का प्रबन्ध कर सके । सेजड़ी और घेरी जमे पेड़-झाड़ियां कम वर्षा और अधिक गर्मी को झेल सकते है। इनकी पत्तिया इन पशुओं का श्रेष्ठ भोजन है । सेवण और धामण घास को भी कम वर्षा और अधिक तापमान अनुकूल हैं । ये घासें भी पशुओं का अच्छा भोजन हैं। तात्पर्य यह है कि इस प्रकार 'थार का पर्यावरण' जिस तरह की वनस्पति, पशुधन और जलवायु मे बनता है, उन सब के बीच एक सहज सन्तुलन हमें देखने को मिलता है । यह तो एक बात हुई । वास्तव में इस समय स्थिति भिन्न है। गोचर-ओरण के प्रति राजस्थान में निहायत उपेक्षा का भाव है । सेवण-धामण घास, मेजड़ी- वेरी अथवा थार की वनस्पतियों के संरक्षण के प्रति किसी प्रकार की सक्रियता नहीं है । थार अचल में नहर का पानी आने के बाद तो इस दिशा में और भी ज्यादा बिगाड हुआ है । थार की वनस्पतियो की जगह विदेशी किस्म के पेडो ने ले ली है । सफंदा (यूकेलिप्टस), इजरायली बबूल, सुबबूल और कुछ ऐसी ही प्रजातियां जो न यहां की जलवायु और न यहां के लोगों, पशु-पक्षियो के लिए उपयोगी है, भारी मात्रा मे लगाये गए है । इन पेडो ने थार के पर्यावरण को पहले से अधिक बिगाड़ा है। इस विगाड़ मे ट्रेक्टरों, रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशको का भी कम योगदान नहीं है। थार की भूमि और यहां की मिट्टी इनके लिए कितनी उपयुक्त है और कितनी अनुपयुत्ता-इसकी जांच पडताल ठीक तरह से कभी हुई ही नही है और यदि हुई है तो उसकी अब तक अनदेसी ही की गई है । परिणाम माफ है-नहर आने के बाद भी उमके अब से बेहतर लाभ नहीं मिल पाये। पिछले चार-पांच सालों के अकालों और सन् 1988 के मीपण अकाल में भी नहर किसी भी प्रकार से महारा नहीं बन सकी। मुश्किल मे भी यदि सहारा न बन सके तो अच्छे समय में कोई चीज कितनी ही लाभकर क्यों न हो, उसकी कोई पृथक पहिचान या महत्ता नही आंकी जा सकती। निराशा की इम अवस्था मे भी आशा की एक किरण फिर भी उभरी नजर आती है । बीकानेर के निकट एक गाव है भीनामर । इस गाव मे सन् 1984 मे गोचर-चरागाह और पर्यावरण के लिए एक आन्दोलन चल रहा है । 'गोचर चरागाह विकास और पर्यावरण चेतना भीनासर आन्दोलन' नाम है इस आन्दोलन का । लेकिन लोकप्रिय नाम तो 'भीनासर आन्दोलन' है । भीनासर गांव में करीब पांच हजार बीघा जमीन गोचर चरागाह के रूप आरक्षित है । चरागाहो के विकास के लिए इस आन्दोलन के माध्यम से जो प्रयोग हो रहे है उसने सभी वर्गों के लोगों का ध्यान खीचा है । विशेपज्ञों, प्रशासकों और यह घरती 79 सामाजिक कार्यकर्ताओं का भी। पोड़ा पानी भी मिल जाये तो फसे गोगर को हरा-भरा रखा जा सकता है, ये ही है 'भीनामर आन्दोलन' के प्रयोग। जन भागीदारी और स्पष्ट प्टि में हर पायं गहन हो गाना है यह 'भीनागर आन्दोलन' ने यतला दिया है। ऐगे प्रयोग गाय-गांव में किये जा गगते है। स्थानीय स्तर पर म प्रकार की योजनाए बनाने और यही के लोगों को जोड़ने गे कहीं भी 'भीनारार यान्दोलन' के प्रयोग दोहराये जा सकते हैं । यह अकाल में निजात पाने का एक स्थायी विकल्प बन सकता है। इस तरह हमने देखा कि जिसे हमने मां वसुन्धग माना उसे भी लुटेरे हाथों में हम नहीं बचा गरे । लेकिन हमने यह भी देगा कि अब देश भर में भूमि मंवद्धन के लिए आवाजें उठने लगी हैं। जहां भी कहीं भूमि के विनाश को वात और उसके कारण पर्यावरण पर बुरे अगर पटने की बात गामने आई है कुछ ममूह रचनात्मक प्रतिरोध में उठ गडे हुए है। यह एक शुभ संकेत है और पर्या- वरण के प्रति देश में बढ़ती चेतना का घोतक भी है। 80 पर्यावरण की संस्कृति जल-जीवन भी है जल प्रकृति की अलभ्य सम्पदा है। भारत उन सम्पन्न देशों में है जहां जत विपुल मात्रा में उपलब्ध है, लेकिन कठिनाई यह है कि सभी जगहों पर यह गुलभ नहीं है। थार मरुस्थल के क्षेत्रों में मीलो तक जल स्रोत नहीं मिलते । एक आदमी की तो पूरी जिन्दगी ही मात्र पीने योग्य पानी जुटाने मे ही चली जाती है-ऐमे भी कई गाव है राजस्थान के मरुस्थलीय जिलो में। जल में जीवन है । ऐसी मधुरिमा, शीतलता और ताजगी कि थके-हारे प्राणी को भी एक बार स्फूर्ति से भर देता है जल । जल केवल जल ही नहीं है । यह आवरू भी है । 'रहिमन पानी राखिये, विन पानी मव सून/पानी गए न ऊबरे मोती, मानम, चून' । जो आब जल मे है वह किमी और में कहीं। जहां जल नही है वहा प्राण भी नहीं है। जलहीन क्षेत्र निर्जन ही मिलेंगे। जगल मे भी कही जन का स्रोत यदि होगा तो वहा जीवन होगा ही। पशु- पक्षी, मनुष्य या वनस्पति सभी को जल तो चाहिए ही। जल के बिना इनमें से किसी में भी जीवन रह नहीं सकता। मतलब यह कि जल प्रकृति की एक अनुपम भेट है प्राणी-जगत् को । लेकिन इम अनुपम भेंट को भी क्या हम महेज कर रख पा रहे है ? जल प्रदूषण की विकट समस्या से लेकर जल के इस्तेमाल तक में मनुष्य समाज क्रूर होता जा रहा है । कभी जल को पवित्र और पूजनीय समझा जाता था, उसके प्रति करुणा और ममता का भाव हममे गहरे तक था। जल की एक-एक बून्द के प्रति श्रद्धा और सवेदना का रिश्ता था। यह सब अब विखर गया। आज तो जल का उपयोग जिस निर्मम भाव से आधुनिक मानव समाज करता है उस देख यह लगता है कि यदि ऐमा ही होता रहा तो बहुत जल्दी हम इम अनुपम भेंट मे हाथ धो बैठेंगे। जैसा कि हम मानते है कि पानी के मामले में भारत भाग्यशाली देश है। कैसे? एक तो हिमालय ही मबमे वडा जल भण्डार है भारत के पास । औमत वर्मा का अनुपात भी यहां सन्तोपजनक है। भारत की औसत वर्ग 1,170 मिमी है । हमारे उत्तर-पूर्वी अंचल में यमे चेरापूंजी में वर्षा 11,400 मिलीमीटर है तो धुर थार मरुस्थल के जिले जैसलमेर, बीकानेर में न्यूनतम 200मिलीमीटर वर्षा का अनुपात है। भारत को वर्षा मे 40 करोड़ हेक्टेयर मीटर पानी मिलता है। पर हम इमे महेज कर पित्तना रय पाने हैं ? भू जल स्रोत मी भारत के पाग हैं । वहुत पाके आंकड़े तो नहीं, पर अनुमानत. नीन अरब सत्तर करोड़ हेक्टेयर मीटर पानी भूगर्भ मे लगभग तीन मौ मीटर गहरी मतह में उपलब्ध है। भू जल का जिम तेजी मे हमारा ममाज उपयोग कर रहा है, उमी तेजी मे भूगर्भ के पानी का पजाना फिर भर नहीं रहा। स्वाभाविक है कि इस दिशा में यदि ठीक तरह गे नही मोचा गया और पानी के उपभोग पर ययोचित नियंत्रण नही रसा गया तो यह अमूल्य योत शीघ्र हमारे हाथों मे निकल जायेगा। पानी का उपयोग पेयजल या अन्य परेलू आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए तो अधिक नहीं होता। जितना पानी देश में पता है उसका 92 प्रतिशत मिचाई के कामों में लगता है। मात्र आठ प्रतिशत पानी ही घरेलू कामों में इस्तेमाल होता है। नलकूपो के जरिये भूतल से निकाला जाने वाला पानी भी मुख्यतः सिंचाई के काम ही आता है। देश में 2,58,000 हेक्टेयर जमीन की सिंचाई मन् 1961 तक नलकूपो के जरिये होती थी जो गन् 1974 में बढ़कर 55 लाय 60 हजार हेक्टेयर हो गई। इस तरह भूमिगत जल से मेतो की सिंचाई की बढती रपतार को समय रहते नियंत्रित करना अत्यन्त जरूरी है। यह तो एक सतरा है ही कि भू जल का स्तर कम हो रहा है। इसमे एक दूसरी विमंगति भी खडी होती है जो सामाजिक-आर्थिक स्तर पर असन्तुलन भी गड़ा करती है। इस विसंगति से बचना तो निहायत जरूरी है । कुओं का जल स्तर जब गिरता है तो उसकी मार साधारण किसान पर या सामुदायिक कुओं पर ही अधिक प्रभावी होती है । सम्पन्न किसान तो अपने कुए का जल स्तर गिरने पर उसे और गहरा कर लेते है, पर सामान्य व्यक्ति के लिए अथवा सामुदायिक कुओं को गहरा करने के लिए मुक्कमिल प्रबन्ध हो पाने कठिन होते है। पर्यावरण की दृष्टि मे कुओ के गिरने जत स्तर का प्रभाव अन्ततः बहु आयामी होता है और उसके उपाय न करना घातक बन जाता है । वर्षा का पानी सचित करना और उसका खेती तथा अन्य विभिन्न कार्यों में उपयोग करने की परम्परा भारत में बहुत गमृद्ध रही है । पूरे देश में करीब 82 पर्यावरण की संस्कृति दो लाख हेक्टेयर भूमि में तालाब और झीलें रही है। दक्षिण भारत में तो तालावों से सिंचाई की अत्यन्त विकसित परम्परा रही है। मद्रास प्रेसीडेन्सी के समूचे क्षेत्र में करीब 53 हजार तालाब रहे हैं। यह तथ्य सन् 1856 में हुए एक अध्ययन मे प्रकाश में आया है। सन् 1958-59 तक पूरे देश में कुल सिंचित रकवे मे से इक्कीस प्रतिशत भू भाग पर तालावों से सिंचाई होती थी, पर 1978-79 तक आते-आते यह घटकर दस प्रतिशत रह गई। तालावों में वर्षा के पानी का मंग्रहण और उसका पेती के लिए उपयोग गुजरात, मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, राजस्थान, तमिलनाडु आदि कई प्रदेशों में बहुत विकसित रूप में रहा है । यह माना जाता रहा है कि तालावों मे मिचाई करना अधिक लाभदायक, कम खर्चीला और उत्पादन की दृष्टि से भी बहुत मन्तोपजनक है । नहर और बड़ी सिंचाई योजनाओ मे एक हेक्टेयर पर सिंचाई की लागत चालीस हजार रुपये बैठती है । तालाबों को बांधने में प्रति हेक्टेयर लागत का अनुमान करीब पांच हजार रुपये बँटता है । इससे भी अधिक महत्वपूर्ण बात यह है कि नहरी का रम-रसाय, सिंचाई के पानी का वितरण आदि जहां काफी जटिल और विवाद- पूर्ण रहता है वही तालाबो मे यह कार्य विकेन्द्रित और स्थानीय स्तर पर सहजता से हो सकता है। जल प्रबन्ध की ऐसी समुचित और बेहतर तकनीक जो हमारे देश मे इतनी विकमित थी, आज अन्तिम सांसें गिन रही है । अंग्रेजी शासकों ने तो इस तकनीक को पूरी तरह मे उखाड डालने का काम भारतीय लोगों के स्वावलम्बन को नष्ट करने के लिए किया था, पर स्वाधीनता के बाद भी यह मिलमिला क्यों जारी रहा? एक महत्वपूर्ण जल स्रोत जो हमारी अपनी परम्परा और पर्यावरण का महत्व- पूर्ण हिस्सा रहा है--वह तो इस तरह ममाप्त हुआ, दूसरी ओर नदी जल का प्रदूषण बरावर बढता ही रहा। हमारे औद्योगिक विकास और प्रौद्योगिकी ने देश के आम आदमी को क्या दिया तथा उसका जीवन स्तर, माली हालत कितनी सुखमय हुई—यह जिस तरह किसी से छिपी बात नहीं है उसी तरह औद्योगिक अपशेपो से नदियों को प्रदूपित करने की घटनाएं भी किसी से छिपी नहीं है। कर्नाटक राज्य के धारवाड जिले का एक शहर है हरिहर । यहा रेयन बनाने का एक कारखाना है । इस रेयन के लिए पॉली फाइबर बनाने का भी एक कारखाना है। ये दोनो कारगाने प्रतिदिन 45 हजार घन मीटर गन्दा पानी - जल-जीवन भी है 83 छोडने हैं । यह पानी तुगभद्रा नदी में जाकर गिरता है । बारपानेदारों का तो कहना है कि नदी में गिराने से पहले पानी को साफ किया जाता है, पर ऐसा होता तो वहा के लोगों का स्वास्थ्य निरन्तर गिरता नहीं जाता । फमलो पर भी प्रतिकूल असर नहीं पड़ता। ऐसी ही बात तमिलनाडु के आट जिले की है। यहां चमडा शोधन के कोई 250 कारखानो मे वह कर जाने वाला पानी साग और चर्म रोग बढ़ाता है। एक अध्ययन के अनुसार आटि, येल्लोर, रानीपेट, वाणिय वाडी, विशारम, तिमिर और आंबूर शहरी की करीब दस हजार एकड़ जमीन इसके कारण नष्ट हो चली है। प्रदूषण का यह संकट नदी जल तक ही गीमित नहीं है। यह सतरा भू जल को भी लीन रहा है। यह सही है कि भू जल में वाहरी प्रदूषण की गम्भावनाएं बहुत कम रहती है, लेकिन अपने ही निहित स्वार्थों में लिप्त रहने के दुष्परिणाम हमेशा दूमरो को ही झेलने पड़ते है । राजस्थान के पाली, वालोतरा मे कपड़ों की रंगाई-छपाई के उद्योग ने यहा के लोगो का जीवन पूरी तरह से बदरंग कर डाला है। पाली और बालोतरा में कोई 1500 रगाई-छपाई के छोटे-बड़े उद्यम स्थापित है जो रोज एक करोड पाच लाख लीटर पानी दूसरो के भाग्यो को यहा ले जाने के लिए छोड़ते है। यह पानी भूमि मे रिसाव से इन स्थानों के कुओ, तालावों या अन्य जल सोतो में जा मिलता है । इससे कैसर फैलने का खतरा पैदा हो गया है । इसका असर यहा की खेती पर भी पड़ने लगा है। जल प्रदूषण का असर कहां नहीं है ? कर्नाटक मे कारवार शहर में समुद्र तट पर बसा है एक गाव विनगा। यहा के मछुआरे भी दुखी है क्योकि यहा की कास्टिक मोडा फेक्टरी का दूषित पानी समुद्र में छोड़ा जाता है और उससे भारी तादाद मे मछलिया मरने लगी है । मछुआरों का धधा चौपट होने लगा। यही किस्सा बिहार मे भागलपुर मे गुजरने वाली गंगा का है । यहा भी कार- माने अपने अपशेप गगा में छोडते है जो मछलियो की जान पर बन आता है। जल गे ही जुड़े है वाँध । आजादी के बाद बाँधो के निर्माण का मिलसिला तेजी से शुरू हुआ और इन्हे स्वतंत्र भारत के नये देवालय बताया गया। ये बोध सिंचाई और विजली दोनो के लिए बनाने जरूरी समझे गए। इन दोनों मी यापूति इन बांधो मे कितनी हो गको और देश के पर्यावरण पर इसका क्या 84 पर्यावरण की संस्कृति असर पड़ा, अब इन पर कितने ही अध्ययन और उनके निष्कर्ष सामने आ गए हैं और उससे सबक लेकर हम अपने भविष्य का मार्ग तय कर सकते हैं । पर लगता है अभी कुछ और खोना, कोई बड़ी कीमत चुकाना बाकी है। हमारी जितनी प्रमुख नदियां है उन सभी पर या तो बांध बन चुके अथवा बन रहे हैं । ज्यों-ज्यों बांध बनाने का क्रम तेजी पकड़ता गया त्यों-त्यो देश भर मे यत्र-तत्र सत्रिय पर्यावरणवादियों ने इनके हानि-लाभ के तलपट बनाने भी शुरू कर दिये। बांधों का सीधा असर वनों और वनोपज पर आश्रित स्थानीय जनो पर पड़ता है। जहां भी कही बांध बने है लोग बेघर हुए है, बेरोजगार हुए हैं। उन्हे विस्थापित करने या रोजगार देने की योजनाएं तो बेशक बनी है, लेकिन वे योजनाएँ उनको कितनी राहत दे पायी, पीछे घूम कर यह किसी ने नहीं देखा । बांधो के कारण विस्थापित हुए लोगों के पुनर्वास पर जो भी अध्ययन हुए हैं उनसे पता चलता है कि संकट घटे नही, समस्याओं से मुक्ति मिली नहीं। भाखडा वाध बनने के कारण कोई दो हजार एक सौ परिवार उजड़े, पर बसे 730 ही। पोग वाध के विस्थापितो की कथा तो और भी मर्मान्तक है । करीव सोलह हजार परिवार बेघर हुए, पर फिर से घर बसाने के लिए राज- स्थान में जिन्हें जमीन मिली वे मात्र नौ हजार ही थे । इसमें भी निर्धन और अनपढ़ लोग और जिनको पहुँच नही थी वे लोग अधिक घाटे में रहे । जिनको राजस्थान मे जमीन दी गई वे भी सुखी नही रह सके । पहाड़ी आबो-हवा में रहे लोगो के लिए धुर रेगिस्तानी जलवायु कैसे अनुकूल पड़ता । पहाड़ी खेती और रेगिस्तान में खेती का अन्तर समझने में न मालूम उन्हे कितनी उम्र लगे। गुजरात में उकाई वाध से प्रभावित 18,500 परिवारो मे से 3500 परिवार ही बसाये जा सके। एक तरफ बांधो के निर्माण की दुखान्तिका यह हे तो दूसरी ओर इन बांधो से मिलने वाला पानी-विजली यहा-कहा चिराग जलाते है, यह भी देखना चाहिए। रिहंद विद्युत परियोजना से उत्तरप्रदेश और बिहार की पच्चीरा लाख एकड भूमि सिंचित होगी और तीन लाख किलोवाट बिजली पैदा होगी। पर यह विजली मिलेगी किसे ? डेढ लाख किलोवाट एक अल्युमिनयम कारखाने को, जल-जीवन भी है 85 पचास हजार किलोवाट मुगलसराय-हावड़ा रेत चलाने को और पचास हजार किलोवाट एक और वारसाने को। इस परियोजना री 46 हजार लोग और एक सौ छ गाव उजड गए । सच ही कहा है कवि दुप्यन्त कुमार ने 'कहा तो तय था चिरागां हर एक घर के लिए, कहां चिराग मयस्सर नही शहर के लिए।' इन बाधो और नहरो से पैदा होने वाले हालात का दूसरा फलक भी देखें। नहर से सिंचाई और उससे होने वाले साद्यान्न उत्पादन तथा पर्यावरण पर पड़ने वाले अमर पर भूतपूर्व कृषि आयुक्त और हरियाणा कृषि विश्वविद्यालय के भूतपूर्व कुलपति डॉ डी.आर. भूबला मानते है कि बांधों और नहरों से सेती का लाभ दीर्घकाल तक ले पाना नामुमकिन है । उनका अध्ययन बताता है कि सूखे क्षेत्रो मे दस-बीस सालो मे पानी का रिसाव और मिट्टी में खार बन आने का अंदेशा रहता है। नमी वाले इलाको मे तो नहर के लाभ शुरू से ही सन्देहा- स्पद रहते है। नमी वाले क्षेत्रों में बड़े या मंझोले बाँध मिट्टी और पर्यावरण के लिए उपयुक्त नहीं है । वहा पैदावार भी घटने की संभावना रहती है। डॉ. भूबला के इन निष्कर्षों पर हमारा ध्यान क्यों नही जा रहा, पर हम देख रहे है कि भाखडा नहर क्षेत्र में भूजल का स्तर प्रतिवर्ष एक मीटर की गति से ऊपर भा रहा है। चार लाख हेक्टेयर खेतों मे पानी तीन मीटर गहराई तक आ गया है। जमीन मे क्षार की समस्या खड़ी हो गई। भूजल भी खारा होता जा रहा है। राजस्थान नहर (इदिरा गाधी नहर परियोजना) को ही लें। अब तक इतना तो मान लिया गया है (दबी जुबान) कि कुल सात हजार वर्ग किलोमीटर सिंचित क्षेत्र में से पांच सौ वर्ग किलोमीटर क्षेत्र जल रिसाव का शिकार हो चुका है और यह गति वरावर बढ़ रही है। सोचा गया था कि करीब दो सौ साल तक भू तल में पानी के जमाव की समस्या यहां खड़ी नहीं होगी, लेकिन भूमि के अन्दर बहुत कम गहराई मे ही कठोर पतं आ जाने से यह खतरा कुछ ही वर्षों में सिर पर मंडराने लगेगा। मध्यप्रदेश की तवा बांध को लें। सन् 1975 में यह बाँध बन कर तैयार हो गया, लेकिन मिट्टी की यथोचित जांच के अभाव मे सेतो मे भूतल मे पानी जमा होने लगा। इसे उलीचने के लिए सात सौ नलकूप लग रहे हैं जो जमा पानी को उलीचेंगे। इस बाघ और पानी के जमाव के कारण होशगावाद में 'मिट्टी बचाओ' अभियान शुरू हुआ। पर्यावरण की संस्कृति 86 यही एक खतरा नहीं है । रेगिस्तान में खेती पर्यावरण के लिए अन्य कई कारणो से भी घातक होगी और हो भी रही है । सदियों से चले आ रहे परम्परागत चरागाह समाप्त होगे। वे सेतो मे बदल जायेंगे । इससे पशुपालन पर प्रतिकूल असर पड़ेगा। हर एक पशुपालक को तो सिंचित क्षेत्र में भूमि मिल नही सकेगी। तब उसका निर्वाह कैसे होगा? चरागाह नही रहेंगे तो वे कहां जायगे? अभी भी जिन लोगों को सिंचित क्षेत्र में भूखण्ड आवटित हुए है उनमे से आधे से अधिक स्थानीय लोग न होकर दूसरे इलाकों के है । पीढ़ियो से जिन लोगो के पास भूमि रही है उनमें से भी बहुत से अव भूमिहीन हो गए हैं, क्योंकि उनको जमीन सिंचित क्षेत्र में आ गई है और कानूनी दांव-पेचों में वे जमीन पाने के हकदार नहीं हैं। पैदावार के प्रश्न पर भी डॉ. भूबला का मत है कि सिंचाई से अच्छी पैदावार लेना सन्देहास्पद ही है। बिहार, मध्यप्रदेश और उड़ीसा मे कोई पच्चीस लाख हेक्टेयर भूमि पर सिंचाई से खेती होती है। यहां मुख्य पैदावार धान की है जो प्रति हेक्टेयर एक टन से भी कम है। उत्तरप्रदेश में नमी के कारण दूसरा सिंचाई संभव नहीं होने से अक्सर गेहूं की फसल से हाथ धोना पड़ता है। डॉ. भूवला मानते है कि विगत वीस सालों मे साद्यान्न उत्पादन में उत्तरोतर वृद्धि नहरी सिंचाई से न होकर नलकूपो से सिंचाई किये जाने से हुई है। आखिर बड़े बांधो से हमें मिलता क्या है ? गांव-गांव में जब तालाबो से सिंचाई को प्रणाली थी तो वे खतरे भी नहीं थे जो इन बांधो से सामने आ रहे हैं और लोग भी अधिक स्वावलम्बी थे। ऐसी उत्तम परम्परा को छोड़ने का कोई कारण भी तो प्रतीत नहीं होता । बड़े भीमकाय बांध और नहरें भारत जैसे देश के लिए इसलिए भी अनुपयुक्त हैं कि यहां के लोग, यहां की मिट्टी और यहा के पर्यावरण, यहां की परम्परा के साथ इन बांधो का किसी प्रकार का सरस रिश्ता बन ही नहीं पा रहा है । अपनी परिवेशिकी और पर्यावरण के प्रति देश के कुछ सजग लोग इसीलिए अब इन बांधों और नहरों के प्रतिरोध में खड़े भी होने लगे है । विष्णु प्रयाग पन-विजली परियोजना विख्यात फूलो की घाटी और पहाड़ के ऐसे संवेदनशील क्षेत्र में बनने वाला था कि बन जाता तो यहा के लिए बड़ा घातक सिद्ध होता । चिपको आन्दोलन के नेता श्री चण्डीप्रसाद भट्ट ने इस ओर समाज को सचेत किया। एशिया भर में सबसे ऊचाई पर बनने वाले इस . जल-जीवन भी है 87 बाँध से भूगलन के बड़े रातर पैदा होते । जंगल के लगातार कटते रहने से अलकनन्दा नदी में सन् 1970 में आई बाढ़ और विनाश के घाव भरे नहीं थे । इसीलिए फिर से अलकनन्दा के वहाव को रोक कर बांध बनाने की लुभावनी योजना के मूल सतरो को ठीक-ठीक समझने में श्री चण्डीप्रमाद भट्ट को अधिक कठिनाई नहीं हुई। योजना आयोग से दो सौ छियासठ करोड़ रुपये की मजूर शुदा यह योजना रोक दी गई। लेकिन मामला अभी भी समाप्त नहीं हुआ है शायद । दक्षिण मे सैरन्ध्री घाटी पन-विजली परियोजना को भी इमलिए छोड़ना पड़ा कि देश भर में पर्यावरण पर पड़ने वाले दुष्प्रभावो पर चर्चा छिड़ गई और यह समझा गया कि योजना की वनिस्वत पर्यावरण का प्रसंग अधिक सशक्त है । महाराष्ट्र के गढ चिरोली मे वनवासियो का हुजूम अप्रैल 1984 में इसलिए एकजुट होकर जा डटा कि इचमपल्ली और भूपालपतनम वाघ उनके अस्तित्व पर हमला था। इन दोनो परियोजनाओ से 1,72,000 हेक्टेयर जंगल डूब में आ जाते और करीब 75 हजार लोग विस्थापित होते। इन वनवासियों का साथ बाबा आमटे, चिपको नेता श्री सुन्दरलाल बहुगुणा और वनवासी नेता श्री लालशाम शाह ने भी दिया। ये परियोजनाएं रद्द हुई। ये उदाहरण यह समझने के लिए पर्याप्त है कि जहा कही भी ऐसे 'आधुनिक मदिर' उस क्षेत्र को मरघट मे बदलने वाले साबित हुए और वहां के लोग समय रहते खड़े हो गये तो अन्तत. वहां ये योजनाए स्थगित ही की गई । इससे यह तो समझ ही सकते है कि पर्यावरण के प्रति अव सभी क्षेत्रों में संवेदनशील नजरिया बन रहा है। यद्यपि यह सच है कि अभी भी तीन और अविराम सघर्ष की संभावनाएं वैसी ही है । वे कम नहीं हुई है क्योकि विज्ञान और प्रौद्योगिकी और 'विशाल योजनाओ' का जुआ अभी हमारे सिर से हटा नहीं है। अन्यथा लघु और लघुतम काम अधिक स्थायी, बेहतर और अधिक हितकर हो सकते हैं--यह समझ पाना अधिक दुरुह नहीं है । ऐसे अनेक उदाहरण मिलेंगे जहा छोटी-छोटी इकाइयां अधिक लाभकर सिद्ध हुई हैं । तालाबो के जरिये सिंचाई के तो हमने कई उदाहरण देस ही है, विद्युत उत्पादन के भी कई उदाहरण हमारे सामने हैं। पहाड़ी क्षेत्रों में बिजली उत्पादन की छोटी-छोटी इकाइयों का उद्भव हमारे देश में बहुत पुराना है। दार्जिलिंग मे सन् 1887 में ही एक छोटा पर्यावरण की संस्कृति 88 220 किलोवाट का पन-विजलीघर लग गया था। पहाड़ी क्षेत्रों में ऐसे कितने ही स्थान हो सकते हैं जहा विजली पैदा कर हमारे देहातों को सप्लाई की जा सकती है। चीन मे इस प्रकार के 88 हजार छोटे पन-विजलीघर है जो 6929 मेगावाट विजली पैदा करते है। उत्तरप्रदेश, हिमाचल, जम्मू-कश्मीर, अरुणाचल प्रदेश, पश्चिमी बंगाल और सिक्किम में सन् 1980 मे ऐसे छोटे विजलीघर बने भी थे, पर अभी तक यह पता नहीं लगाया जा सका कि वृहद स्तर पर इसे कहां तक हाथ में लिया जा सकता है। चीन में छोटे बिजलीघरों पर लोग अपनी ओर से भी धन लगाते हैं, बैको से भी कर्जा मिलता है। सरकार भी सहयोग करती है। ऐसा मानते हैं कि छोटे बिजली संयंत्र कम उत्पादकता वाले और अधिक खर्चील होते है । पर यह मानने का पुख्ता आधार किसी के पास नहीं है । यदि यह मान भी लें कि ऐसा अनुमान सही है तब भी यह तो मानना ही होगा कि कोई भी विकेन्द्रित व्यवस्था सदैव आम जन के हित में ही होती है। देश में कतिपय स्वयंसेवी संगठन छोटे पन-बिजलीघर लगाने के लिए आगे आये हैं । चमोली (उ. प्र.) के जाखेश्वर शिक्षण संस्थान ने एक छोटा संयंत्र लगाया है। 65 हजार रुपये लागत का यह संयंत्र दस किलोवाट क्षमता का है। टिहरी में लोक जीवन विकास भारती संस्था भी बूढा-केदार के पास एक छोटा संयंत्र लगा रही है । गढ़वाल विश्वविद्यालय भी इस ओर अग्रसर है। इस तरह जल के बहुआयामी उपयोग हमने देखे । बिजली पैदा करने से लेकर अन्न और वनस्पति के उत्पादन तक में जल की सर्वाधिक अहम भूमिका है । और सबसे बड़ा योगदान है प्यास बुझा कर प्राण संचरण का। यह प्राण 'संचरण' जल मिट्टी में भी करता है, मनुष्य मे भी और पशु-पक्षी में भी। इतना सब होते हुए और यह सब समझते हुए भी हमारे पास कोई समग्र जल नीति नहीं है । सबसे बड़ी जीवन सम्पदा होते हुए भी जल के प्रति हमारी चिन्ताएं अति साधारण और सतही सी रही है। देश की विपुल जल-सम्पदा के समुचित उपयोग के लिए एक सर्वव्यापी राष्ट्रीय जल नीति होना जरूरी है, लेकिन हम देखते है कि अब तक जल विवादों का निपटारा तात्कालिक स्तर पर ही होता रहा है । रावी-व्यास और सतलज के पानी के बंटवारे का विवाद इसका प्रमाण है । स्पष्ट जल नीति के अभाव में दो प्रान्तों के बीच जल- -जीवन भी है 89 नदी-जल बंटवारे के विवाद कभी हल होते ही नहीं । नये-नये पेंच डाले जाते रहे हैं और सरकार उन्ही पेंचों को कसने-ढीला करने मे लगी रहती है। जल नीति तो हमारी नहीं है, पर जल प्रदूषण निवारण के लिए अवश्य कानून बना हुआ है। भारत के स्वास्थ्य मंत्रालय की ओर से जल प्रदूषण के अध्ययन के लिए 1962 में एक विशेपन समिति बनाई गई। इसकी सिफा. रिशों और कई और दौर से गुजरते-गुजरते 1974 में जल प्रदूषण निवारक विधेयक बना । प्रदूषण, जल-मल कचरा, कारखानों का कचरा आदि से होने वाले प्रदूषण से बचने के लिए इस विधेयक में प्रायधान किये गए । विधेयक में केन्द्रीय व राज्य बोर्डो के गठन का प्रावधान भी है। इन बोडों के अधिकारो और कार्य क्षेत्र का सुलासा भी विधेयक में किया गया। धन के प्रावधान के लिए 'उप कर' लगाने पर भी 1977 मे जल उप कर (प्रदूषण रोकथाम) कानून बनाया गया। यह सब हुआ, पर प्रदूपण फैलाने वाले कारखानों या संस्थानों को बन्द करने के अधिकार बोडों को प्राप्त नहीं हुए। यह सोचा गया कि बोर्डो को अधिक सक्षम बनाया जाना चाहिए ताकि जल प्रदूपण की रोकथाम के लिए प्रभावी कार्यवाही हो सके । इस ओर अभी कोई ठोस निर्णय नहीं हो सका है। जाहिर है हमारी प्राथमिकताएं ये नही, दूसरी है । अन्यथा कोई कारण नहीं कि जल जो जीवन की प्राथमिक और मूलभूत जरूरत है, उसके प्रति भी हमारा दृष्टिकोण इतना साधारण क्यों हो। जल की महत्ता के अनुरूप जल के साथ हमारा रिश्ता फिर से जुड़ना पर्यावरण और परिवेशिकी को रक्षा के लिए जरूरी है । जन्यथा जल जहां जीवन है वही प्रलयंकारी भी। 90 पर्यावरण की संस्कृति и и ܫܐ समझने की चिन्ता नहीं करते । अनुदार या उदार जैसी बात उन्ही के लिए इमे ठीक से समझने के लिए हमें थार की संस्कृति को देखना और समझना होगा । जब हम इसे देखने की कोशिश करेंगे तो यह समझते देर नहीं लगेगी कि जिसे थार की अनुदार प्रकृति कहा जाता है वह भी कितनी जीवन्त । यह जीवन्तता हमे थार के कण-कण में, हर गाव और वहां के वासियों में देखने को मिलेगी। यह जीवन्तता थार की लोक संस्कृति में-जो लोकगीतों, लोक- कथाओ और लोकनत्यों में रूपायित है-देखी जा सकती है । इसका दूसरा रूप थार के लोगों के रहन-सहन, पहनावे-परिधान, शिल्पकला और बसावट में देख सकते है। इन सबको ठीक से देखेंगे तो 'थार का पर्यावरण' ममझने मे हमें महजता होगी । इस पुस्तक मे 'थार का पर्यावरण' पर पृथक से चर्चा का कारण भी यही है कि यह एक भिन्न प्रकार की प्रकृति है जिसे अनुदार मान थार का पर्यावरण 'यार' का पर्यावरण क्या सम्पूर्ण परिवेशिको और पर्यावरण से कोई भिन्न बात है ? मोटे तौर पर देखें तो हर स्थान का अपना ही 'पर्यावरण' होता है । थार का भी, पहाड़ का भी और कही और का भी। इस सब में बहुत कुछ साम्य होते हुए भी, कुछ ऐमो भिन्नता भी होती है जिमरी उनकी अलग पहचान की जा सकती है। लेकिन यहां हम केवल 'थार के पर्यावरण' की ही बात क्यों करना चाहते है प्रकृति के विविध रूपों मे थार की प्रकृति ही ऐसी है जो सब से मिन्न रूप में देखने को मिलती है । थार शब्द मामने आते ही हमारा ध्यान सूखा, रेगिस्तान, मरुस्थल, अकाल जैसी प्राकृतिक स्थितियों की ओर चता जाता है। यह भी कहा जा सकता है कि 'यार' में ही प्रकृति का सर्वाधिक अनुदार रूप देखने को मिलता है । लेकिन ऐसा कहना प्रकृति या पर्यावरण को ठीक से नहीं समझने जैसी बात ही मानी जायेगी । प्रकृति अनुदार है या उदार- यह किसके सोचने का प्रश्न है ? उनके-जो इससे केवल लेने भर की सोचते है - उसे सहेजने- मानी रखती है । इस प्रकृति का या पर्यावरण का अपना ही चत्रा है जो अपने ही मे गतिमान है । यही चक्र थार का भी है ।

लिया गया और उगे उदार बनाने गो कई छोटी-बड़ी गोगनाएं यनने लगीं। लेकिन इन गयमै थार के पर्यावरण की पल इष्टि सही भी लक्षित नहीं होती। यह एप्टि गार गी संगृति गो टीक तरह मे गमलने गेही पाई जा गबनी है। इगलिए इस पर विस्तृत पर्चा और गहराई गे अध्ययन की जाल है। अलबत्ता, यहां ग ओर मात्र गगन भर करना ही हमाग अभीष्ट है। थार मरस्थल प्रकृति के विविध और गोहफ नर्गिकरणोंगे जहां यचित रहा है वहीं यहां का लोक मानग रंग, ग, गग, ग्ग, की नोक अभिव्यंगनाओं में यहुत समृद्ध भी रहा है। प्रकृति को हरीतिमा मा गतरंगी कृपातु प तो थार को नहीं मिला, पर मूर्प की उज्ज्वल रश्मियों के सात रंग गुबह-शाम मरधरा मे रेतीले धोरों पर जिग तरह सिलते हैं ये श्वेत-धवन हिम शिमरी से कहीं भी कम आकर्षक या लुभावने नहीं कहे जा ममले । जो स्वच्छ-निगल नीलाम थार में देगने को मिलता है यह अन्यत्र कहीं भी नहीं मिलता । आकाश भी कितना भयपूर्ण और ऐश्वर्यशाली है-यह तो धार की धरती पर गहे होकर ही देग सकते हैं । धार के जीवन को रंगों का अहसाग शायदं सूर्य की सतरंगी किरणों से ही मिला हो । थार की सूपी परती पर लाल-करांबा या धानी-पीसा रंग तो नहीं खिलता, पर इन रंगों से फूटने वाला महमारा यहां के गांवों की औरतें अपने जीवन में उतार चुकी हैं। लाल कसूये रंग में हरियल-पीले बूटे या धानी-पीले रग में हरियल बूटों की ओढनी-चुनरी कब-किसे, किस वय में ओढ-पहननी है, इस बात को पीढ़ी-दर-पीढी यहां की महिलाएं जानती हैं । मनमोहक फूल-पत्तिया तो थार के गर्भ से नहीं फूटती, पर अपनी कल्पना शक्ति मे फूल-पत्ती, वेल-बूटों के चित्र और उनके रग-मंयोजन देखते ही बनते हैं । और यह सब थार के जीवन में महज रूप से रचा-पना है। इसमें कहीं विशृंखलन आया है तो वह इन दशकों में ही आया है जब ऐरो सरस जीवन को आधुनिक विकास ने धकियाना शुरू किया है। थार की शिल्पकला और आवादियों की बसावट को भी बारीकी से देखें तो पायेंगे कि प्रकृति के समरूप सब कुछ अपने जीवन में लोगों ने ढाल लिया । घरो का शिल्प और आकरप यहा ऐसा है कि तेज गर्मी और सर्दी में घर सदा आरामदायक बने रहै । सीमेन्ट और इस्पात के न आने तक यह बात हर घर में रही । अलबत्ता, अव नये आकल्प के घर झुलसा देने वाले भी है और ठिठुराने वाले भी । इनको आरामदायक बनाने के लिए अव 'कूलर' और 'हीटर' जरूरी हो जाते हैं। 94 पर्यावरण की मंस्कृति थार को इस संस्कृति और लोकजीवन को गहन रूप से समझना जरूराह इसके लिए सुलो दृष्टि से अध्ययन की आवश्यकता है। तभी बहुत बारीकी से हम 'थार के पर्यावरण' को समझ सकेंगे। तभी इस पर पृथका और विस्तृत चर्चा संभव हो सकेगी। जो संकेत यहाँ प्रस्तुत किये गए हैं उनके आधार पर थार की प्राकृतिक स्थितियो को यहां हमे थोड़ा विस्तार से देखना चाहिए। जो कुछ भी हमारे आमपाम है उन सय पर प्रकृति का प्रभाव ही सर्वाधिक है। थार के पर्यावरण में भी थार की प्रकृति का ही सर्वाधिक प्रभावी रूप हमें देखने को मिलेगा और उसी की छाया यहां के सामाजिक-सास्कृतिक-आर्थिक जीवन पर प्रतिविम्बित होती दिखाई देगी। जब हम थार की प्रकृति की बात करते हैं तो एक मपाट दृश्य हमारे सामने चित्रित हो जाता है। प्रकृति का एक ही रूप यहां देखने को मिलता है जो धुर मरुस्थल-रेगिस्तान का रूप है । यहां वर्षा नहीं, मुखा है । अच्छा जमाना नहीं, अकाल-दुष्काल है । लेकिन तब भी जीवन है, एक जीवन्तता है और जैसा कि कहा जा चुका है कि सतरंगी-सरम जीवन है। इसे हम क्या कहेगे ? प्रकृति का अपना सन्तुलन नहीं तो यह क्या है । इस मन्तुलन को यदि विगाड़ा न जामे, मानव प्रयत्नों से यदि इमे सहेजा जाये तो थार मरुस्थल अभिशाप की जगह वरदान भी सावित हो सकता है । यह सच है कि थार का जीवन विलासिता, ऐय्याशी या मौज-मस्ती का जीवन नही है । किन्ही अंशों में ऐश्वयं-भरा जीवन भी नहीं माना जा सकता । यहाँ का जीवन जीवट-मरा है और अलमस्ती वाला भी। यहां का प्राणी-जगत्-पशु पक्षी, मनुष्य जाति-कठोरतम परिस्थितियों मे बसर करने का अद्भुत सामर्थ्य रखता है । यही वात यहां की वनस्पति के बारे में कहीं जा सकती है। मरुस्थल का जहाज कहा जाने वाला ऊंट, भेड़-बकरी और गोधन तथा इसी तरह यहा की वनस्पति~-थार का कल्पतरु खेजडी, बोरड़ी, रोहिड़ा, फोग, केर, सेवण-धामण घास आदि वनस्पतियां कठोरतम हालात में भी खड़े रह मकते हैं । यह थार की विराट प्रकृति है और इनमें अनोखा सन्तुलन है । इसे ठीक से समझने और यहां की जीवन कला को गहराई में पैठ कर देखने से ही 'थार की थाती' का अनुमान लगाया जा सकता है । यह मान लिया गया कि थार तो प्रकृति-विहीन है, पर यह गलत है । थार की विपुल प्राकृतिक सम्पदा है जिसे आधुनिक विकास की आंख ठीक तरह से थार का पर्यावरण 95 देस-रामले तो इरो द्विगुणित किया जा गकता है । 'एप्रोप्रिएट टेक्नोलॉजी' के नाम पर यह देखना आवश्यक है कि'यार' के लिए गया 'एप्रोप्रिएट' है। थार की भूमि, यहां की वन सम्पदा, यहां का पशुधन, गंगोर सुगे में बरसाती जल मे संचयन के गहा के पररो-समझे जल प्रबन्धन के तरीके, गोचर-ओरण और इन सब के बीच एक गहन गन्तुलन बनाये रगने पाती तकनीक हो 'एप्रोप्रिएट टेक्नोलॉजी' साबित हो सकती है । सवाल हैनगा ऐगा हुआ है ? थार को गम्पूर्ण अर्थ व्यवस्था इन्ही मब पर अवलम्बित रही है । पशुधन यहाँ में अर्थचा की रीढ रहा है । पशुधन के संवर्द्धन के लिए जो युग किया जाना पाहिए उसकी जगह पार की धरती पर भी पूपि विकारा को अंधी दौड पत रही है। नहर आने से सिंचित कपि और कृगि मन्नों, ट्रेक्टर इत्यादि तमा रासायनिक खादों के इस्तेमाल ने 'थार पर्यावरण' मी मूत माया गो गो नश्तर लगाए हैं उसमे आज राव ठगे से पड़े है । भयंकर सगे के गमय गत . सबसे बड़े सोत नहर ने अंगूठा दिपाया है जिस पर 1500 करोड़ से भी अधिक रुपये पन हो चुके हैं । यह ठीक है कि पशुपालन थार को जीविका का मुख्य आधार है, लेकिन ऐसा नहीं है कि यहां कभी कृषि होती ही न हो । शार को मुख्य कृषि उत्पाद मोठ, वाजरा और ग्यारही है । लेकिन प्राचीन अभितेसो मे गेहूं, मूंग, कपास, तिरा, जौ, चना और गरसो के उत्पादन लिगे जाने ने उल्लेख भी मिलते है । रवी की इन फसलों के लिए वर्षा के समय तालावों में एकत्र पानी का उपयोग होता रहा है । इसी पानी से जमीन की गिनाई कर ये उत्पाद लिये जाते थे। इससे यह साबित होता है कि सिंचाई के आधुनिक साधनो मे अगाय में भी गाद्यान्न फसलें ली जाती थी। कपारा जैगी व्यापारिक पागल भी रोने का उल्लेख मिलता है, लेकिन वह अत्यल्प होता था। जीवन को अपनी जरूरत भर जितना। आज स्थिति भिन्न है। थार मरुस्थल के गंगानगर और बीकानेर जिलों के उन हिस्सों में जहां सिंचित कृषि हो रही है-साधान उत्पादन की बनिस्बत व्यापारिक फसलें लेने पर ही अधिक जोर है । उगका एक कारण भी है। यदि व्यापारिक फराले नहीं ली जायें तो भापि पर होने वाले व्यय को आपूर्ति भी नही हो सकती। सिंचाई के लिए नहर से मिलने पाता पानी, यांत्रिकता और रासायनिक खादो-कीटनाशकों पर पढने वागा सर्व इतना भारी होता है कि व्यय और आय का सन्तुलन विठाने के लिए व्यापारिक फग लेना एक विवशता भी बन गई है। प्रमगे भूमि और मिट्टी का जो क्षय होता है, यह 26 पर्यावरण की संस्कृति पहानी तो पहले कही ही जा चुकी है । उसे फिर मे दोहराने की यहा जरूरत नहीं। परमाती पानी को संचित करने के जो भी तरीके यहां प्रचलित रहे हैं उनमें तालाय, कुई, पापड़ी, पुण्ड यादि मुख्य रहे हैं। एक-एक बून्द पानी का मोल थार ने लोग वगूवी जानते थे और इसीलिए अपने दैनंदिन जीवन में भी पानी के इस्तेमान के प्रति इतने संवेदनशील थे कि घी मे पानी को अधिक मूल्यवान, महत्त्वपूर्ण मानते थे। एक नवविवाहिता के हाथ मे पानी से भरा घटा छूटकर फूट जाने और पानी व्यर्थ बह जाने पर उसे मारा-श्वसुर की कठोर फटकार सुनने तथा उमी के हाथ मे घी का भरा घड़ा फूट जाने पर स्नेह भरी हिदायत भर मिलने की कथा पानी के प्रति थार के व्यवहार को स्पष्ट प्रकट करती है। नवविवाहिता ने अपनी माग मे जब पूछा कि घी तो अधिक मूल्य- यान है, तो भी मात्र हिदायत और पानी ठुलने पर कठोर पाटकार-ऐगा क्यो? तो मारा का वह को इतना भर उतर था कि पानी के विना तो जीवन नहीं है, घी के बिना वेशक रहा जा सकता है। पानी के प्रति शहरी समाज का आज जो रिश्ता निगम बन गया है वह थार के ग्रामांचल में आज भी ममता, आदर और पवित्रता से भरा हुआ है। यही ठीक है कि आज जो चुनौतियां विद्यमान है उनका मुकाबला करने के लिए ही आज की परिस्थितियों में रहते हुए ही रास्ते तलाशने होगे। वे गस्ते क्या हो सकते हैं ? हमें विगत दो-तीन दशकों के अनुभवों और आधुनिक विकास की घटनाओं में निकले निष्कपों की ठीक-ठीकपडताल करनी चाहिए। तब हम लगेगा कि वे रास्ते हमारी परम्परा, परिवेशिकी और पर्यावरण मे मे ही निकलने चाहिए । ऐगे ही रास्ते स्थायी, राहत देने वाले और सुखद हो मकते हैं और इन रास्तों की पर्याप्त संभावनाएं मौजूद हैं। मवाल यह देखने का है कि विकास और 'समुचित विकास' के अर्थ सबके लिए है अथवा कुछ एक के लिए। थार का पर्यावरण 97 वन और थार की सामाजिक वानिकी आज सामाजिक वानिको का नारा बहुत जोरो से सुनाई देता है। यह सामा- जिक वानिकी क्या है ? आज की दृष्टि से देखे तो हम यह पायेंगे कि सामाजिक वानिकी के नाम पर जो वनीकरण किया जाता है उसमे अधिकतर वे पौधे लगते है जो पेड़ बनकर कटते है । जो पेड़ कटते हैं वे किसी समाज या समु. दाय के वृहत्तर हित के लिए नहीं, अपितु औद्योगिक भूख को मिटाने के लिए ही कटते है । तब यह वानिकी 'सामाजिक' कैमे कही जा सकती है ? इसके विपरीत थार की सामाजिक वानिकी जो सदियों-पीढ़ियों से हमारी परम्परा मे रही है उमे देखे तो पायेंगे कि वह अपने समाज-समुदाय का जीवनाधार साबित हुई है । गोचर और ओरण मामाजिक वानिकी के ही पुख्ता और पवित्र रूप रहे है । हम इन पर आगे थोड़ी विस्तार से चर्चा करेंगे । इससे पहले हमे देखना चाहिए कि राजस्थान-जहा थार का अचल फैला हुआ है की भौगोलिक स्थिति कैसी है । यह भी देखना जरूरी है कि भारत की वन नीति क्या है । इसका इतिहास क्या है । यह देखना इसलिए भी जरूरी है कि इससे वनों के प्रति हमारी शासकीय चिन्ताएं और प्रतिबद्धताए स्पष्ट होती हैं । हमें राजस्थान की भौगोलिक स्थिति का वानिकी के सदर्भ में थोडा जायजा लेना चाहिए। पचास प्रतिशत से अधिक भूमि परती-भूमि के रूप में है। इस प्रदेश की भौगोलिक स्थिति अत्यन्त विपम है । पानी का अभाव, मर्द और गर्म तेज हवाएं, अन्धड-तूफान, अकाल-मूखा इस प्रदेश की पहचान हैं। अकाल का तो यह स्थायी घर है। म प्रदेश के साथ प्रकृति का यह असन्तुलित व्यवहार कभी वनों के अन्धा- धुन्ध निर्मम विनाश के कारण ही हुआ माना जा सकता है। राजस्थान का रेगिस्नान प्राकृतिक वेरुपी के वनिस्वत मानव-जनित ही माना गया है। यह मानते हैं कि पश्चिमी राजस्थान के पार क्षेत्र में कमी मरस्वती नदी बहती थी। मगहर पुगताय गास्त्री (म्ब.) डॉस्टर विष्णु श्रीधर वाकणकर की अब राजस्थान तक को ग्योज के आधार पर यह माना गया है कि ढाई लाख वर्ष पूर्व सरस्वती नदी इस प्रदेश में वहती थी। 40 हजार वर्ष पूर्व आये भूचाल से इस नदी का वहाव अरावली की ओर सरक गया। दस हजार वर्ष पूर्व एक और भूचाल आया और सरस्वती नदी घाघरा नदी के मार्ग से होते हुए हनुमानगढ़ और मूरतगढ़ के बहावलपुर क्षेत्र में सिन्धु के समानान्तर बहती हुई कच्छ के मैदान मे मिल गई। राजस्थान के गंगानगर जिले में पीलीबंगा और कालीबंगा मे हुई खुदाई मे जो पुरातत्व अवशेष मिले है उन्हे हडप्पा और मोहनजोदडो काल के माने गए हैं। डॉक्टर वाकणकर भी यही मानते हैं कि विश्व की प्राचीनतम संस्कृति हड़प्पा इसी नदी के किनारे फली-फूली। इस तरह इतिहास और पुरातत्व अन्वेपकों के अब तक के नतीजों के आधार पर यह मान लेना युक्ति- संगत ही कहा जायेगा कि राजस्थान का थार रेगिस्तान मानवजनित ही प्रतीत होता है। राजस्थान देश में पहला प्रदेश है जहा सर्वाधिक एक करोड अस्सी लाख (18 मिलियन) हेक्टेयर परती-भूमि है। राजस्थान के वाद मध्यप्रदेश और महाराष्ट्र का स्थान है । राजस्थान मे कुल भूमि तीन करोड़ बयालीस लाख चौतीस हजार हेक्टेयर है। इस कुल भूमि का 6 प्रतिशत 20,77,000 हेक्टेयर वन और करीव सवा पाच प्रतिशत 18,36,000 हेक्टेयर भूमि चरागाहों के लिए है । आंकड़ो से यह भी पता चलता है कि प्रदेश में वनो का विनाश कभी न रुकने वाला चक्र रहा है । सन् 1957 मे जहा 12.94 प्रतिशत वन थे वे सन् 1977 तक घट कर 10 प्रतिशत हो रह गए। इसमे भी हरे पेड़ों से आच्छादित वन तो मात्र तीन प्रतिशत हैं । वनो का विकास इस प्रदेश के लिए यद्यपि एक गंभीर चुनौती है, लेकिन यदि हम अतीत की ओर थोडा झाककर इस चुनौती का सामना करने की कोशिश करें तो यह कार्य इतना दुरुह नहीं लगेगा। वैसे तो भारत की संस्कृति ही अरण्य संस्कृति रही है। रामायण और महाभारत जैसे महाकाव्यों मे दण्डकारण्य, नन्दन वन तथा खाण्डव वन जैसे आकर्षक वनों का उल्लेख मिलता है । गौतम बुद्ध ने वनों के बारे में सदियों पहले वह सब कह दिया था जो आज की भोगवादी दुनिया के वानिकीविद सोच भी नही सकते । गौतम बुद्ध ने कहा- 'वन असीम दया और परोपकार की ऐसी विशेष देन है जो अपने निर्वाह के लिए कुछ मांग नहीं करता और अपने जीवन के उत्पादों को उदारतापूर्वक देता है, वन और थार की सामाजिक वानिकी 99 यह सभी जीवो को गरक्षण प्रदान करता है और उस लावहारे को भी छाया देता है जो कि उराका विनाश करता है।' हमें भारत को वन नीति और उसके इतिहास को भी देखना चाहिए । हमारे देश में कुल वन क्षेत्र करीब बाईरा प्रतिशत है जो कि विश्व के औसत प्रतिशत से बहुत कम है । उत्तम परिवेशिकी (प्रकृति) सन्तुलन के लिए माना गया है कि न्यूनतम 25 से 33 प्रतिशत वन क्षेत्र होना चाहिए। भारत में नुक्त परती-भूगि 140 मिलियन हेवटेवर (एक अरल स्यानोग वरोड़) मानी भारत में वन गरक्षण के बारे में हम पीछे सातकर देते। चन्द्रगुप्त मौर्य के शासनकाल मे वानिकी प्रशासन का सर्वप्रथम उरलेरा मिलता है। यह 300 ईसा पूर्व की बात है जब बनो और वन्य जीयो के संरक्षण के लिए एक वन अधीक्षक की नियुक्ति की गई । सम्राट अशोक के शासनकाल में सड़को और शिविर स्थली के आसपारा वृक्षारोपण को बड़ा महत्त्व दिया जाता था। मुगल काल में सम्राट अकबर ने नहरो और राजमागों के आरापारा वृक्षारोपण के प्रति गहरी रुचि दिखायी थी। लेकिन इरा सच्चाई से भी अनदेखी नहीं की जा सकती कि आबादी के विस्तार के साथ-साथ वनो का विनाश और कटाई भी बढ़ती गई । राज्याध्यक्षी और शासकों ने कुछेक वृक्षों का 'शाही वृक्षा' के स्प मे अभिषेक किया और शेप को लकडहारों के भरोसे छोड दिया । तव भी यह सच है कि- 'चारो और लकडहारे है फिर मी पेड कहा हारे हैं। अग्रेजी हुकूमत ने भारत की विपुल सम्पदा का निष्ठुरता मे विदोहन किया था। वन सम्पदा का भी गोरे हाथों ने निर्ममता से विनाश किया । सागवान और दक्षिण भारत मे चन्दन के वनो की कटाई भारी मात्रा में हुई। यह लकड़ी ब्रिटिश नौसेना के उपयोग और योरोपीय बाजारों में ले जायी गई । इस तरह अट्ठारहवी और उन्नीसवी सदी मे वनो का विनाश भारी मात्रा में तेजी से हुआ। इसी बीच मानवजनित वन संरक्षण की दिशा में पहला कदम सन् 1842 में उठा जब नीलाम्बूर (केरल) मे प्रथम सागवान के बाग की स्थापना हुई । सन् 1855 में पूरे देश में वनों के संरक्षण के लिए नियम निर्धारित किये गए । सन् 1864 में डॉ. डिकट्रिच वांडिस नाम के व्यक्ति को प्रथम वन महा- निरीक्षक नियुक्त किया गया । सन् 1878 में एक संशोधित मारतीय वन 100 पर्यावरण की संस्कृति अधिनियम लाया गया। सन् 1878 में ही देहरादून में पहला वन विद्यालय सोला गया और सन् 1891 मे प्रान्तीय वन सेवा का शुभारम्भ किया गया। सन् 1906 मे देहरादून में इम्पीरियल फॉरेस्ट रिसर्च इन्स्टीट्यूट (सम्प्रति वन अनुसंधान सस्थान तथा महाविद्यालय) की स्थापना की गई। सन् 1910 में राष्ट्रीय स्तर पर वानिकी बोडं बना। लेकिन सन् 1914-18 में प्रथम विश्व युद्ध के दौरान भारी मात्रा में वन नष्ट भी हुए। सन् 1947 मे भारत जव स्वाधीन हुआ तो गोरे वन अधिकारी देश छोड़ कर चले गए और वन मरक्षण की कमान भारतीय अधिकारियो के हाथों में आ गई। छठे दशक में स्वाधीन भारत मे वन सरक्षण के लिए नये-नये कानून बने । इसी दशक मे वन महोत्सव आरम्भ हुआ। इसी अवधि में मानव निर्मित वनों का भी प्रादुर्भाव हुआ। 12 मई, 1952 को राष्ट्रीय वन नीति की घोषणा हुई। यह वन नीति 19 अक्टूबर 1894 के वन प्रबन्धन नियमो की सामान्य नीति के अध्ययन के आधार पर तैयार हुई। भारत मरकार ने 1950 में वन नीति निर्धारित करने के लिए केन्द्रीय वन वोर्ड का गठन किया, लेकिन मजेदार बात यह कि मई 1951 से मई 1970 के दो दशक के इम दीर्घकाल मे केन्द्रीय वन वोर्ड को मात्र बारह वैठक हुई। तेरहवी और चौदहवी वैटके फरवरी 1973 और अक्टूबर 1974 मे हो पायी। सन् 1950 से 1980 तक तीस वर्ष की अवधि में वनों के योजनाबद्ध विकास पर 483.22 करोड़ रुपये का पूजी निवेश हुआ। जबकि केवल छठी योजना मे ही 692.49 करोड़ रुपये व्यय करने का प्रावधान रखा गया। इसी अवधि मे मन् 1974 मे सामाजिक वानिकी कार्यक्रम शुरू हुआ। चाहे छठे दशक मे राष्ट्रीय वन महोत्सव शुरू किया गया हो अथवा सन् 1974 सामाजिक वानिकी का कार्यक्रम, लेकिन ये सभी सरकारी अभिक्रम मात्र वन कर ही रह गये। जन आन्दोलन की रचना नहीं हो सकी । यही कारण है कि विपुल धनराशि के खर्च का कोई सन्तोपजनक प्रतिफल कही भी दिखायी नहीं देता। वन और पेड़ की पूजा भारतीय जीवन के मूल मे है । सामाजिक वानिकी की अवधारणा भी भारत के लिए नई नहीं है। हमारे ओरण-चरागाह और गोचर इसके प्रमाण हैं। प्राचीन काल मे इनका संरक्षण श्रद्धा और आस्था के साथ होता रहा है। पीपल, खेजड़ी और बड़ के पेड़ों की पूजा आज भी ग्रामीण अंचल का श्रद्धास्पद और सहज करुणामय अभिक्रम है । तन्त्र की जटिलता ने वन और थार की सामाजिक वानिकी 101 एक ओर तो आम जन के इस व्यवहार को कुटिलतापूर्वक सण्डित और ध्वग्न किया, जबकि दूसरी ओर वन महोत्सव अथवा मामाजिक वानिकी के नारे आम जन के जीवन मे रच-पच ही नही पाये । ये मात्र औपचारिक अनिमम भर ही रह गये । ऐमा क्यों होता रहा इन कारणों को समझना जटिल नही है। जिन हायों में इन कामी का दायित्व था, उनका इन कार्यक्रमो के साथ प्रीतिकर जुड़ाव कभी नहीं रहा । इसीलिए इन कार्यक्रमो में उनकी संलग्नता ऊपरी, दिखावटी और कागजी रही । इसीलिए ये नारे मोखले सिद्ध होते रहे हैं । इम मन्तव्य की पुष्टि के लिए राजस्थान को ही लें। पूरे देश में मर्वाधिक परती-भूमि राजस्थान में है और सबमे कम वन भी इमी प्रदेश में है । लेकिन इस प्रदेश की परम्पराओ को देखें तो पायेंगे कि वनों के प्रति केवल करुणामय भाव ही यहा नहीं रहा, अकथ श्रद्धा भी यहां रही है। नये-नये नाम और भोग- यादी मस्कृति दुर्भाग्य से इस करुणा और श्रद्धा पर भारी आघात पहुंचाते रहे हैं। राजस्थान में शायद ही कोई गाव ऐसा हो जहा गोचर-चरागाह आरक्षित न रहे हों। प्रदेश के मंदिरों के नाम पर 'ओरण' छोड़ने की परम्परा अति प्राचीन रही है और सामाजिक स्तर पर उनका मंरक्षण श्रद्धा के साथ होता रहा है । औरण और गोचर चूकि मार्वजनिक सम्पत्ति है इसलिए आज की व्यवस्था में इसका कोई मंरक्षक नहीं । वग इमीलिए लालची गिद्ध-दष्टि इम पर गय टिकी रहती है और जब जिसके मन में आया उस पर अतिक्रमण किये जाते हैं । राजनीति को शुद्धता और दायित्वहीनना ने इन प्रवृत्तियो को प्रोत्साहन दिया है। परिणाम यह हुआ कि गोचर और औरण को परम्परा विलुप्त होती गई। इस पर हम आगे और विस्तार से चर्चा करेंगे। आज जिम गामाजिर वानिकी यो यान तेज प्रचार के बाद भी किसी से कानों गा नहीं पहन रही है यह सभी गोगर और औरण ये म्प मे जन-जन में रची. पपी पी। मी परपरा को यदि अशुग बनाने की कोई पहल और कोशिंग होती तो गामाजिक वानिशी मा उईग्य स्यतः फलीभूत हो जाता । परिपमी गजम्मान मेहर गांव में प्रारमित गांगर-परागाह छोडने की परम्परा भीग गरिमामीन है। इन पगमाही में हरे वृक्ष पाटना आराप माना जागा पार और गामाने पाले पनि होने । गम्थान के गर्न अभिमगि माहरण देगका गाभिलेग भोकोमोमिनोकामे गांपररावापिार गरगा ये गाप. गापमा परी राना गया है। गामागिर पानिशीगगे यार सरोका? 102 पनि लेकिन आज सामाजिक वानिकी के प्रायः ममी अभिप्रम भोगवाद को प्रश्रय देने वाले मिस हुए हैं। गोचर परम्परा के पवित्र भाव इसीलिए नही जुड पाये हैं। मामाजिक वानिकी कार्यक्रम को लागू करते समय यह स्पष्ट कहा गया कि मामाजिक वानिकी का सर्वाधिक लाम ग्रामीण निधन को मिलना चाहिए। भारत मरकार के ग्रामीण विकास मंत्रालय के तत्कालीन मचिव श्री डी. वंद्योपाध्याय ने राज्यों के मुख्य सचिवों को जो अद्धशासकीय पत्र क्रमाक एम. 13011/1/85 पॉलिसी युनिट दिनांक 28 मार्च 1985 लिया उसमें उपयुक्त उल्लेख स्पष्ट है। इस पत्र में यह भी लिखा है कि सामाजिक वानिको मे ग्रामीण समुदाय की महमागिता होनी चाहिए । कार्य का चयन और निर्धा- रण तथा वृक्षारोपण के लिए पौधों का चयन, उनका रख-रखाव और सुरक्षा मादि कार्य जन-ममुदाय की सलाह और अभिशंसा के आधार पर किया जाना चाहिए। लेकिन हम देखते हैं कि वास्तविक अर्थों में यह बात कही भी देखने को नहीं मिलेगी। सामाजिक वानिकी का ममूचा कार्यक्रम ऊपर मे थोपा हुआ अथवा एक बेजा ताम-झाम मात्र बना हुआ है। राजस्थान के किसी भी क्षेत्र मे निधन ग्रामीण के लिए युकेलिप्टस (मफंदा) उपयोगी पेड़ नहीं है। यह औद्योगिक उपयोग का पेड़ है। केवल युकेलिप्टस ही नहीं सुबवूल और इजरायली यवूल भी ऐसे ही पेड़ हैं। पर ये पेड़ राजस्थान में पूब लगे हैं। भारत सरकार के पर्यावरण विभाग और राजस्थान के वन विभाग के सहयोग से प्रादेशिक सेना के जवानों ने मन् 1983 में इन्दिरा गाधी नहर परियोजना क्षेत्र में चरागाह विकास और वनीकरण का काम शुरू किया। यह कार्य करीव पचाम हजार हेक्टेयर क्षेत्र में किया जाना है । 'इको-टास्क फोर्स' के नाम से चल रहा यह कार्य बड़ा महंगा है। 600 जवान यहां कार्य कर रहे हैं जिन्हें एक हजार रुपये माहवार से 6 लाख रुपये प्रतिमाह वेतन ही देना पड़ रहा है । इन पर तीन मेजर, नौ जूनियर कमीशंड आफिसर (जे. सी.ओ.) और एक कर्नल भी तैनात है । भोजन, वस्त्र, वाहन, मोटर पम्प और दूसरे ताम- झाम पर जो खर्च हो रहा है उसका मिजान भी लाखों के बारे-न्यारे करने वाला है । नहर से मिलने वाला पानी और खुले हाथों से उसका इस्तेमाल- यह सब इतना मारी है कि बहुत अच्छा कार्य मानते हुए भी महगा सौदा ही कहा जा सकता है। यह महंगा मौदा भी मान्य हो जाये यदि इसी काम में जन- भागीदारी जुड जाये। अब से सताश लागत पर तव बेहतर परिणाम भी श्रा वन और थार की सामाजिक वानिकी 103 सकते है । और सबसे महत्वपूर्ण बात यह कि तब चरागाह और वनीकरण स्थानीय अनुकूलता व आवश्यकता को प्रमुखता देते हुए होने को गभावना भी बन सकती है। जिससे क्षेत्रीय अर्थचक्र सुदृढ़ वन मकता है। इसी प्रकार का कार्य इन्दिरा गाधी नहर के दोनों तरफ किया गया है। विश्व खाद्य कार्यक्रम तथा विश्व बैंक को सहायता से नहर के किनारोपर जो पौधे लगाए गए है ये सभी विदेशी प्रजातियों के है । मुख्यतः मफंदा और इजरायली बबूल यहा सडे है । यहां के वृक्षारोपण को देखने से यह धारणा पुष्ट होती है कि हम पश्चिम के ज्ञान पर ही इतराते रहे है । सफेदा, इजरायली बबूल और सुबवूल पश्चिम से हमने उधार लिए और वहा की झूटन पर सिर ऊंचा किये खुश हो रहे है। एक साधारण-सा मवाल खडा होता है कि यदि ये पेड़ हमारे अनुकूल होते तो खेजडी, फोग, रोहिड़ा आदि की तरह इस धरती पर ही क्यो न होते। इतना ही नहीं, यदि यहा की धरती इन्हें अपनी कोख मै सहज ही धारण करती तो पश्चिम से हर वर्ष आने वाले पक्षियो के साथ प्राकृतिक रूप से आये योज यहां निश्चय ही अंकुरित होते । पर ऐसा तो कहीं देखने को नहीं मिलता। जबकि इसके विपरीत सन् 1987 में अखबारो मे छपा कि जयपुर के आसपास शीत- लहर के कारण आठ-दस वर्ष पुराने सफंदे के पेड जल गए और करोडो रुपये की हानि हो गई । स्पष्ट है कि यदि ये पेड यहां की प्रकृति के अनुकूल होते तो सर्दी के प्रकोप को खेजड़ी की तरह झेल लेते और कुछ न बिगड़ता। भीषण सर्दी हो या गर्मी-खेजड़ी के वृक्ष लद-फद खड़े रहते है। क्यों ? इसलिए कि प्रकृति ने इस पेड को यहा की परिवेशिकी के लायक ही बनाया है। लेकिन उधार और अधकचरे ज्ञान के अहंकार ने सेजड़ी को भरपूर उपेक्षा को । रोहिडा, फोग, वावलिया, वोरटी को सामाजिक वानिकी से अलग रखा गया। सौभाग्य से थार की इन वनस्पतियों को उपयोगिता और लाभो को अव समझा जाने लगा है। आखिर खेजडी और थार की वनस्पतियो को प्रकृति ने यही पर क्यों दिया? खेजडी पशुओ के लिए पोषक चारा, इंधन और फल, घनी हरी छाया, मिट्टी के लिए उर्वरक तत्व और पंछियों के लिए बसेरा देने में समर्थ है जो इस क्षेत्र की परम आवश्यकता है। क्योंकि यह क्षेत्र पशुपालन बहुल, कम वर्षा और शुष्क क्षेत्र है । खेजडी यहां की जरूरतों की पूर्ति करने में सक्षम-समर्थ पेड़ है। इजरायली बबूल और सफंदा में यह क्षमता है ही नहीं। 104 पर्यावरण की संस्कृति । इसीलिए 258 वर्ष पू. वि.गंवत 1787, भाद्रपद शुक्ला दशमी के दिन रोजड़ी की रक्षा के लिए जोधपुर के निकट मेजड़ली जनपद में 363 लोग शहीद हो गए । यह घटना हमे क्या गदेश देनी है ? यही कि मेजडी इरा क्षेत्र का जीवन रक्षक है, आधार है । एक कल्पतरु है जो दुदिन भीर भीषण रांकाट मे भी राहत प्रदान कर सकता है। सामाजिक वानिकी के लिए बलिदान की ऐसी घटना इतिहास मे दुसरी नहीं है। जिस सामाजिक वानिकी कार्ययग की गफलता के लिए आज जी तोड़ प्रयारा हो रहे है उगका मूल तो गाग्नीग परणग में गदेव ही रहा है । इगी मरुधरा नो माटो पर पान गौ न पूनं गत जाम्भोजी महाराज ने जो जीयन टि रामाननोदी-सामाजिक नानिको की उरागे अधिक सशक्त कोई अवधारणा हो हो नही रानाती। सन्त जाम्भोजी ने उनतीग सिद्धान्तो को यदि हग देरो तो पायेंगे कि उनसे महान और रामयं पर्यावरणविद दुनिया में कोई नहीं हुआ। लेकिन हम उन्हे भूल गए । पश्चिम की नमक और लुभावनी तड़का- भड़क ने हमे अपनी परम्परा से विलग कार डाला। गीलिए सन्त जाम्भोजी ये सिद्धान्तो की महत्ता को देखने-समझने की आस हमारे पास नहीं रही। सामाजिक वानिकी की ये पुष्ट और परली हुई अवधारणाए है। इन पर किसी तरह वो शया को गुजाइश नहीं, लेकिन यह रानाल निर्मगता से हमारे सामने खड़ा है कि क्या इन परम्पराओ को पुनरर्थापित किया जा सकता है ? इस सवाल का उत्तर किसी एक ने हाय गे नहीं है, पर गामाजिक वानिकी के मकराद पूरे करने के लिए हमे अपनी परम्परा मे ही उत्तर तलाशने होंगे। हमे यह भी मान लेना चाहिए कि परम्परा का अर्थ हर जगह प्रतिगामी ही नहीं होता। धन और थार की सामाजिक वानिकी 105 गोचर-ओरण गोचर-ओरण थार मरुस्थल के ऐसे आधार रहे है जिन्हे पृथक करके थार के पर्यावरण को पूरी तरह नहीं समझा जा सकता। वैसे तो सम्पूर्ण मारत ही कृषि प्रधान रहा है। कृषि और पशुपालन भारत के ग्रामांचल का साशा आधार है, पर थार मरुस्थल का तो मुख्य आधार ही पशुपालन है । यही कारण है कि यहां गोचर की परम्परा अति प्राचीन रही है । औरण की परम्परा, गोचर की परम्परा सदा पवित्र और सर्वहितकारी रही है। इस परम्परा पर ज्यों-ज्यो जख्म गहरे होते गए थार की दीन-हीन अवस्था भी बढती गई । गोचर के प्रति श्रद्धा के भाव ज्यों-ज्यों तिरोहित होते गए, इसके रख-रखाव और सवर्द्धन के प्रति वेरुखी भी बढ़ती गई। एक सवाल खड़ा हो सकता है कि ऐसा क्यों होता रहा? इसका उत्तर एकाकी नही हो सकता। हमारे सोच और चिन्तन की समग्र दृष्टि ही इसका उत्तर है जिस पर इस पुस्तक में काफी कुछ कहा गया है । अब तो सवाल यही है कि क्या अब भी हम सबक लेने को तैयार नहीं है ? जब हम यह सोचते है तो पाते है कि थार का पर्यावरण अभी भी इस हालत में है कि उसे सन्तुलित बनाये रखना अधिक दुरुह नही है। नश्तर लगने के उपरान्त भी अभी तक हालत उपचार की स्थिति से बाहर नहीं गई है । रोग बढ़ा है, पर लाइलाज नहीं हुआ है । यदि अभी भी थार के पर्यावरण को सन्तुलित बनाये रखना है तो इसके गोचर- ओरण को सम्हालना होगा।थार का पर्यावरण बहुत-कुछ इसी पर निर्भर है । कैसे? थार मरुस्थल में औसत वर्षा का अनुपात सामान्यतः 8 से 30 सेन्टीमीटर है जबकि पूरे राजस्थान में यह औसत 18 से 75 से.मी. है। विगत एक सौ साल के आंकडो मे यह पता चलता है कि पश्चिमी राजस्थान में आम तौर पर सूखा रहा है । करीब आधी सदी मूमा अथवा गमीर मूखा और अकाल मे रही है जब मात्र 25 प्रतिशत जमाना हुआ होगा। पांच वर्ष ऐसे रहे हैं जव 25 मे 50 प्रतिशत जमाना हुआ है और पांच वर्ष 50 से 75 प्रतिशत जमाने वाले रहे है। पूरी एक सदी में मात्र बारह वर्ष ऐसे रहे हैं, जव अच्छा जमाना हुआ है। राजस्थान और मुख्यत पश्चिमी राजस्थान के ग्यारह जिले पशुधन बहुल क्षेत्र हैं । राज्य में कुल पशुधन 4 करोड़ 94 लाख 86 हजार है। इसमें गायें । करोड 34 लाख 65 हजार तथा भेडें एक करोड़ तैतीस लाख छयासी हजार है । पश्चिमी राजस्थान के ग्यारह जिलो-जोधपुर, नागौर, पाली, जालौर, बाडमेर, जैसलमेर, बीकानेर, गंगानगर, चूरू, झुंझनू और सीकर में दो करोड तैतीस लाख बीस हजार(23 32 मिलियन)पशुधन है । पश्चिमी राजस्थान में ही थार मरुस्थल के सात जिलो-बीकानेर, जोधपुर, बाडमेर, जैसलमेर, चूरू, नागौर और गगानगर में यदि हम गायों और भेड़ों की संख्या देखेंगे तो वह कुल पशुधन का लगभग आधा होगा । इन जिलो में कुल गौधन 36 लाख तथा कुल भेड़ें 73 लाख 18 हजार 904 है । इस विपुल पशु सम्पदा से राज्य को कुल आय का 19 प्रतिशत प्राप्त होता है । इन तथ्यों से यह जाहिर है कि राजस्थान मे पशुपालन एक महत्वपूर्ण धन्धा है और पश्चिमी राजस्थान तथा थार के क्षेत्र का यह मुख्य आधार रहा है । पशु सम्पदा के वैभव से भरे इस मरुक्षेत्र की परिवेशिकीय और पर्यावरण- स्थितियों की ओर यदि हम गौर करें तो पायेगे कि इतना विपुल पशुधन देकर प्रकृति ने यहां सूखा और अकाल का अभिशाप क्यो दिया? और मूखे तथा अकाल के इस अभिशाप के रहते यहां पशु सम्पदा मे निरन्तर वृद्धि कैसे होती रही । तथ्यो से पता चलता है कि सन् 1951 में पश्चिमी राजस्थान के ग्यारह जिलो मे 99 लाख पशुधन था जो सन् 1983 तक बढ़ कर दो करोड से भी अधिक हो गया। ठीक इसके विपरीत मन् 1951 में जहां 0 90 हेक्टेयर चरागाह भूमि हमारे पशुधन के लिए उपलब्ध थी वह घटकर 0 38 हेक्टेयर भर रह गई। पश्चिमी राजस्थान की अधिकांश भूमि घास तथा वानिकी के उपयोग के लिए ही अनुकूल है । इसके उपरान्त यहा चरागाह की बनिस्बत खेती का प्रतिशत मन् 1960 मे 26 प्रतिशत भूमि पर बेती होती थी जो सन् 1970 में 38 प्रतिशत और आठवें दशक के समाप्त होते-होते 44.57 प्रतिशत खेती होने लगी। यह समझने की बात है । यहां की भूमि खेती की बजाय चरागाह के लिए ही उपयुक्त है जबकि आंकड़ो मे जाहिर है कि खेती का क्षेत्र वढा है और चरागाह का क्षेत्र घटा है । दूसरी ओर पशुधन मे भी वृद्धि हुई है । दरअमल अभिशाप तो यह परिस्थिति है । स्वाधीनता मे पूर्व जव इम मरुधरा को नियोजित विकाम की हवा नहीं लगी वढा। गोचर-ओरण 107 । क. 2 4 5 भी तय परम्परागन मगझ रगो वाले हमारे पुरगो ने हर माप और क्षेत्र में गोचर-ओरण आरक्षित किये । अधिकांश जिलो के राजस्व रिकार्ड इसका प्रमाण है। इन ग्यारह जिलों में नाम 46जार हेक्टेगर गोचर परागात राजस्व रिकार्डो मे दर्ज है। गजम्मान गनग्य अधिनियम के अनुगार गोचर चरागाह क्षेत्र की भूमि को किंगी अन्य म्प मे पग्विनित किया जा गकता है और न गगगाह गोलोर कोई और उपयोग उगका दिया जा सकता है। जिलाधार चरागाह भूमि जिलेका नाग गगाह भूमि (हेक्टेयर में) जोधपुर 1,23,000 नागौर 7.1,000 3 নী 02,000 जालोर 51,000 चाडमेर 2,13,000 6. जैसलमेर 89,000 यीकानेर 39,000 8 चूर 48,000 9. सीकर 48,000 10. भूझुन् 45,000 श्रीगंगानगर 26,000 गोग 8,46,000 इम लेखक ने परम्परागत गोचर चरागाहो की वर्तमान स्थिति का जब अध्ययन किया तो पाया कि अधिकाश चगगाहों की तरफ किसी भी स्तर पर कभी कोई ध्यान ही नहीं दिया गया । अध्ययन के दौरान रामाही पर नाजायज काटजे अथवा राजकीय स्तर पर उनका अन्य कामो मे उपयोग करने के कतिपय मामले भी मिले । स्वाधीनता गे पूर्व उन्ही चरागाहो का उपयोग केवल गोचर के लिए ही किये जाने की छूट थी । तत्कालीन राज्य व्यवस्था इग प्रमंग पर इतनी सजग और सक्रिय थी कि गोचर की भूमि पर पेड़ काटने, धारा उसाड कर बेचने अथवा सघन रूप से भेड-बकरी चराने वालों को भी दण्डित किया जाता था । अध्ययन के दोगन इस तरह के कई उदाहरण देखने को मिले । ऐमा करने वालो को आर्थिक दण्ट दिया जाता । गोबर और जोरण की एक 7 108 पर्यावरण की संस्कृति पवित्रता भी तव के समय में स्थापित थी और हर व्यक्ति उमे बनाये रखने के लिए प्रतिवद्ध था। तब का यह सामाजिक संस्कार और व्यवस्था आज पूरी तरह मे विलुप्त हो चुकी है । गोचर और ओरण की पवित्रता नष्ट हो चुकी है। एक तरफ यह पवित्रता और सामाजिक व्यवस्था छिन्न-भिन्न हो गई तथा दूसरी ओर तथाकथित सुनियोजित विकास गे गोचर और चरागाह की कोई मुध नहीं ली । आज हम यह महसूस करते हैं कि पश्चिमी राजस्थान में अकाल और सूमे का इतना सपन दुष्प्रभाव इसीलिए बना हुआ है। किसी भी स्तर पर चरागाहों के विकास की दिशा मे गम्भीरता मे सोचा ही नहीं गया। राजस्थान मरकार के सामने पशुधन यो बचाने के लिए पारा-चारे का गम्भीर संकट सदैव पहा रहता है । तब भी चरागाहों के विकास की दिशा में कोई बड़ी योजना अब तक मामने नहीं आई है। ऐमा तो नहीं कहा जा सकता कि राजस्थान सरकार ने ऐसी कोई योजनाएं बनाई ही नहीं। विशाल राजस्थान नहर (अब इन्दिरा गांधी नहर), मरुस्थल विकास योजना और सूमा उन्मूलन कार्यक्रम, मघन पशु विकास योजना आदि कुछ ऐसी योजनाएं गिनाई जा सकती हैं जो थार मरुस्थल की जरूरतों को पूरा करने के लिए उपयोगी कही जा नकती हैं । लेकिन अब तक का अनुभव बताता है कि अकाल के गम्भीर समय में राजस्थान को पूरी तरह से पंजाब और अन्य प्रदेशों के उस घास-कचरे पर आश्रित रहना पडता है जो किसी भी सूरत मे पाने योग्य नहीं होता है । यह घास-कचरा सर्वथा अपौष्टिक होता है जिसके निरन्तर सेवन से गायों को रतौंधी, पेट के विकार हो जाते है और कालान्तर मे गर्भ धारण करने की क्षमता ही समाप्त हो जाती है । रपष्ट है कि यह पास- तूड़ी-कचरा सिलाकर हम जो पशुधन मौत के मुंह से बचा पाते हैं वह प्रकारान्तर मे नकारा पशुधन ही होता है। ऐसी स्थिति में पश्चिमी राजस्थान का अर्थ- चक यदि डगमगा उठता है तो इसमे ताज्जुब क्या? इस बात को जानते हुए भी कि पश्चिमी राजस्थान और थार के सम्पूर्ण जन- पदों के अर्थ-चक्र की धुरी पशुधन है-इसके संवर्द्धन और संरक्षण की तरफ उपेक्षा क्यो बरती गई ? इस मवाल का उत्तर यह लेखक यहां देकर विपयान्तर नही होना चाहता । अलबत्ता यह समझना जरूरी है कि प्रकृति ने इस धरती पर गम्भीर मूखा देते हुए भी पर्याप्त सन्तुलन बनाये रखा है। इस सन्तुलन को यदि ठीक से समझ लिया जाये तो सूबे के बावजूद भी अकाल और दुप्काल के दुष्प्रभावों से थार को सहा ही बचाया जा सकता है। प्रकृति ने इस क्षेत्र में अत्यल्प वर्षा दी है तो मिट्टी भी ऐसी दी है कि जिसमे मेती करना लामकर नहीं हो मकता। लेकिन इसके विपरीत पशुधन के पोषण गोचर-ओरण 109 के लिए ऐसी घासें और पेड-पौधे दिये हैं जो इस मिट्टी और सामान्य सी वर्षा मे ही खिल सकते है-जीवित रह सकते है । सेवण, धामण घास तथा खेजड़ी, योरटी, फोग जैसे पेड और झाडियां न केवल यहां की मिट्टी के लिए उपयुक्त हैं-इनको थोडी सी वर्षा और नमी मर चाहिए जो गंभीरतम सूखे के बावजूद भी मिल ही जाती है । अध्ययन से पता चलता है कि अनावृष्टि के वर्षों में भी ऐसा कोई वर्ष नहीं रहा जब यह धरती वर्षा की बून्दों से वंचित रही हो, एक वार भी न भीगी हो । मरुधरा की ये वनस्पतियां भू क्षरण को रोकने में पूर्णतः समर्थ हैं । घासो, फोग, मीणिया और वूई की झाड़ियों मे रेत के टिब्यो को स्थिर करने की गजब की क्षमता है । आंधियो के कारण रेत के धोरे इधर से उधर पसरने से सहज ही रोके जा सकते हैं-यदि इन वनम्पतियों से इस धरती को नगा होने से बचा ली जाये । सुनियोजित, गतिशील, उन्नत तकनीक के आज के विकास ने इस ओर ध्यान ही नहीं दिया। प्रकृति और परिवेशिकी में स्वतः विद्यमान इस विकल्पो के स्थान पर पश्चिम से आयातित विकल्प थार की धरती पर थोपे गए। युकेलिप्टस, इजरायली वबूत, सुबबूल जैसी वनस्पतियों ने मिट्टी और वायु की आर्द्रता को क्षीण कर डाता। फलतः प्रकृति के पेट में स्वत उपजने वाली वनस्पतियां विलुप्त होने लगी । वेशक इस विलोप में मनुष्य के लालची हायो तथा पशुधन का अति चरण भी भागीदार है। लेकिन इन पर नियंत्रण के दायित्व को कभी भी गम्भीरता से नहीं निवाहा गया। यह भी रामझने की बात है कि थार की भूमि सेती के लिए तथा अति सिंचाई से मेनी के लिए कतई उपयुक्त नहीं है । इस बात को मिट्टी के सर्वेक्षण से ही नही, सिंचाई से जिस भू भाग में गेती हो रही है वहां के अनुभवों और परिणामो मे भी जाना जा सकता है । यह लेखक अपने अध्ययन के दौरान अनेक क्षेप आप से देख गुका है जहां अति सिंचाई के कारण भूमि बंजर होने लगी है । यह दुष्परिणाम एक दशक की मिचाई मात्र से बीकानेर जिले के टूणकरनसर परिक्षेत्र में देखा जा सकता है जहां सैकड़ों योगा भूमि अति सिंचाई में गप्ट हो गई है । यदि अब भी हम सचेत नहीं हुए तो विनाश की यह प्रक्रिया कहां जाकर रुकेगी-हम गहन ही अनुमान लगा सकते हैं । यह अति गिचाई मरुस्थल में आयी नहर का फल है। जबकि इन परियोजना का उद्देश्य इस क्षेत्र को परिवेशिकी के पुनर्यापन और भूमि को मरुस्थतीकरण गे रोमने का नया पानी को अधिकतम उपयोग करने का होना चाहिए । दुर्भाग्य गे ऐगा गर्वागोग म्प से नहीं हो गका है । यल्कि इसके विपरीत मिचाई के 110 पर्यावरण मी गंगति कारण चरागाहों पर खेती और यान्त्रिकता का हमला ही वढा है। इससे जंगलों से घास, झाड़ियां समाप्त हुई है । आंधियां, भू-क्षरण, मिट्टी की आर्द्रता का विलोप तथा अल्प वर्षा का अत्पतम हो जाना इसी के दुष्परिणाम है। निश्चय ही ये दुष्परिणाम एक दिन या एक वर्ष के नहीं हो सकते । विगत एक- डेढ दशक मे विकास के सब्ज सपनों ने ही यह स्थिति ला खडी की है और आज पूरा पश्चिमी राजस्थान ठगा सा सडा है । गेती यहां लाभकर नही-पशुपालन ही उपयुक्त है-इसे स्वीकार किया जाये या नहीं, इस प्रश्न पर भले विवाद हो जाये, लेकिन प्रकृति का स्वरूप पहचानने में अब भी हम कोताही करते है तो इसे मात्र जड़-हठ ही कहा जायेगा । हमारा यह जड़-हठ ही हमे अकाल और सूपे की विकट परिस्थिति से मुक्त होने मे वाधक रहा है । अन्यथा यदि हम अपने पुरखों की स्थापित उन परम्पराओं को याद करें तो पता चलता है कि थार के किसी भी जिले में शायद ही कोई गांव हो जहां गोचर या ओरण आरक्षित न हो । यह गोचर और ओरण ग्रामांचलों के पवित्र स्थत रहे है । गोचर और ओरण के संरक्षण की दृष्टि मे वर्ष 1987 के प्रारम्भ मे इस लेखक ने बीकानेर जिले का जव मधन अध्ययन किया तो पाया कि राजस्थान नहर (अव इन्दिरा गांधी नहर) के आने के वाद बीकानेर जिले मे कृषि भूमि का विस्तार भले ही हुआ हो, चरागाहों की भूमि तो घटी है। बीकानेर जिले के अधिकांश गांवों में गोचर और ओरण आरक्षित रहे है। राजस्व अधिनियम के अनुसार गोचर चरागाह को किसी अन्य उपयोग में नहीं लिया जा सकता। लेकिन नहर आने से जिले के जो गांव उपनिवेशन क्षेत्र में आ गये वहां की गोचर और ओरण जमीनें भी उपनिवेशन के अन्तर्गत आ गई। जिले की चार तहसीलो मे से तीन--बीकानेर तहसील के 81 गाव, लूणकरनसर तहसील के 27 गांव और कोलायत तहसीत के 67 गांव उपनिवेशन के नीचे आ गये है और इन गांवों की गोचर व औरण की जमीन जो 49,245 बीघा थी अब घटकर 15,984 बीघा रह गई है। बीकानेर जिला मुख्यतः पशुधन-चहुल जिला रहा है। जिले में सन् 1988-89 की अवधि में करीब 4,55,736 गायें तथा 10,79,973 भेड़ें थी। ऊंट, बकरी तथा अन्य पशु भी जिले में अच्छी तादाद में था। और यहां की अर्थ- व्यवस्था पर भी इसका अच्छा-खासा असर है । स्वाभाविक है कि पशुपालन ग्रामाचल का मुख्य धन्धा माना जाता रहा है । एक समय था जब लोगों में यह दृष्टिकोण विकसित था और पशुधन-खास तौर से गोधन के लिए गोचर चरागाहों के आरक्षण की परम्परा थी। तत्कालीन गोचर-ओग्ण 111 राज्य व्यवस्था भी इसे प्रोत्साहित करती थी। पुराने अभिलेखों को देखने से पता चलता है कि धनी-परोपकारी लोग पशुधन के लिए गोचर भूमि आरक्षित कराने में पहल करते थे । बीकानेर नगर से करीब एक किलोमीटर पर 'सदा नत्थानिया' नाम से 27205 बीघा आरक्षित गोचर चरागाह इस तथ्य का प्रमाण है। तत्कालीन नरेश महाराजा कर्णसिंह ने विक्रम संवत् 1733 में नत्यू शाह नाम के एक धनी व्यक्ति के आग्रह पर गोधन के चरने के लिए यह भूमि आरक्षित की थी। यह किवदंती चली आ रही है कि नत्थू शाह को प्रार्थना पर महाराजा कर्णसिंह ने उन्हें अपना घोडा देकर कहा कि इस घोड़े पर सवार होकर जितनी जमीन पर तुम घूम सकते हो-वह समूची धरती गोचर भूमि के बतौर छोड़ी हुई मानना। महाराजा कर्णसिंह के इन्ही वचनो के आधार पर यह गोचर चरागाह आरक्षित हुआ। राज्य शासन के तत्कालीन 'मेम्बर्स आफ कोसिल ने सवत् 1937 को जो आदेश इस सम्बन्ध में जारी किया उसके अनुसार ऐवड-भेड़ चराने पर गुनहगारी के बतौर 25 रुपये जुर्माना तथा चरागाह में खेत बोने पर 11 रुपये जुर्माना का प्रावधान किया गया। गोचर चरागाह की ही तरह देवालयों और मंदिरों के नाम से 'ओरण' या 'ओयण' छोड़ने की परम्परा भी इस जिले में विद्यमान थी। देशनोक प्रसिद्ध करणी माता के मंदिर के नाम से 9687 बीघा ओरण छोड़ी गई। यह ओरण आज भी विद्यमान है, और करणी माता मंदिर ट्रस्ट इमकी देखभाल करता है । यद्यपि इस देखभाल के नाम पर बढ़ती आबादी के दबाव के कारण ट्रस्ट ने सैकड़ों वीघा ओरण को अब तक बेच दिया है। अलबत्ता यह प्रश्न जांच का है कि ओरण की जमीन को बेचा जा सकता है अथवा नहीं । देशनोक की इस ओरण के बारे में यह लोकोक्ति प्रचलित है कि करणीजी ने गोधन के चरने के लिए इस भूमि को चरागाह के रूप में आरक्षित किया था। करणीजी को देवी का अवतार मानते है । चौदहवी शताब्दी के अंतिम काल में करणोजी के रूप में देवी का अवतार हुआ माना जाता है। करणीजी का जन्म संवत 1444 का माना जाता है और विक्रम संवत 1476 देशनोक ग्राम की स्थापना की तिथि मानी जाती है । इससे यह स्पष्ट है कि देशनोक की ओरण करीब 6 मी वर्ष पुरानी है। इस ओरण को पवित्र स्थल माना जाता है। परम्परा से यह वात चली आ रही है कि औरण में खड़े वृक्ष नहीं काटे जाते और न वहा की किसी वनस्पति का कोई व्यापारिक उपयोग किया जा सकता है। अभिलेखों के आधार पर 112 पर्यावरण की संस्कृति इस बात के उल्लेख भी मिलते है कि देशनोक मे रेल सेवाओ के लिए जब रेल की पटरी ओरण के बीच में से होकर निकालनी पड़ी तो वहां उगे झड़ वेरी के वृक्ष काटने पड़े । पेडो की इस कटाई के लिए तत्कालीन नरेश ने देवी करणीजी के सामने पूजा-अर्चना की और उन्ही की आज्ञा समझकर रेल लाइन के बीच मे अवरोध के रूप मे आने वाले पेड़ कटवाये। इस तरह काटे गये एक- एक पेड़ का एक-सौ एक-सौ रुपये मुआवजा के बतौर मदिर में जमा कराये गये। गोचर-ओरण की रक्षा की यह परम्परा आज लुप्त हो चुकी है। जिस 'सदा नत्थानिया' चरागाह के बारे मे राज्य शासन का स्पष्ट आदेश है कि उसे गायो के चरने के लिए ही इस्तेमाल किया जाये उस पर एक समय किसी ऐरे- गेरे ने नही, सेना ने ही अपना कब्जा जमा लिया था। सेना को तोपाभ्यास के लिए गोचर से बेहतर जगह शायद न मिलती । गांव के तीव्र विरोध पर यद्यपि सेना ने तोपाभ्यास बंद कर दिया, लेकिन इस विशाल चरागाह के विकास की किसी को सुध नहीं है। बीकानेर जिले का एक बड़ा गांव है नापासर । इस गाव की 9890 बीघा गोचर की जमीन थी। आज यह जमीन बिना मालिक के सूनी पड़ी है और धड़ाधड़ नाजायज कब्जे हो रहे हैं। यही स्थिति गंगाशहर की 6289 बीघा गोचर भूमि की है । निकट के ही गांव भीनासर के पास एक समय में 5207 बीघा गोचर चरागाह था। यह चरागाह कभी का नष्ट हो गया होता यदि स्थानीय ग्रामीण जाग न उठते । पिछले वर्ष (1986) तक इस चरागाह पर नाजायज कब्जो का निरंतर दवाव बना हुआ था । लेकिन गाव की जागृति से यह दवाव अब कुछ कम प्रतीत हो रहा है । नाजायज अतिक्रमणों का काफी हिस्सा मुक्त कराया गया है । तब भी तत्कालीन नगरपालिका की ओर से नाजायज रूप से हुए भूखड-विक्रय से घटी गोचर को क्षतिपूर्ति की ओर कभी किसी ने सोचा तक नहीं। सन् 1944 के आसपास इस गोचर चरागाह का थारक्षण राज्य कोप में दस हजार रुपये जमा देकर कराया गया था । लेकिन अब चरागाहों के आरक्षण की ऐसी परम्परा देराने को भी नहीं मिलती। जिले के राजस्व अभिलेख बताते हैं कि संवत् 2012 के बाद गोचर चरागाहो के आरक्षण का नजरिया ही लुप्त हो गया। जयमलसर गांव में कहने को 2416 बीघा गोचर है, पर वास्तविक रूप से आज कितना शेष बचा है बताना कठिन है । लूणकरनसर तहसील में एक गांव गोचर-ओरण 113 है सुई। यहां 1525 बीघा गोचर आरक्षित है । इस गांव में करीव 7-8 हजार पशुधन-गाय, भेड़, बकरी, ऊंट आदि है । लेकिन आश्चर्य कि गांव के बड़े- बुजुर्ग भी गांव में कोई गोचर है-यह नहीं बता सके । गोचर चरागाह के प्रति यह बदला हुआ रिश्ता है और ऐसे कितने ही गांव है जहां यह रिश्ता अव बदल रहा है। यह बदलाव नहर के पानी का परिणाम है । जिन गायो मे नहर का पानी आ गया वहा गोचर और ओरण जिसे हम 'अरण्य' संस्कृति कहते हैं-समाप्त होने लगे है । नहर ने खेती का विस्तार किया है-सिंचित प्रणाली के विकसित होने रो चरागाहो का विलोपन हो गया है। नहर के सम्पूर्ण सिंचित क्षेत्र में एक इंच चरागाह गोचर आरक्षित नहीं है । आरक्षण को तो बात ही क्या-सिंचित क्षेत्र के मानचित्र में गोचर-ओरण चरागाह के लिए कोई स्थान भी नहीं है । बेशक वन विभाग को कुछ भूमि वन विकास के बतौर मिली हुई है जिस पर वह वृक्षारोपण, चरागाह विकास जैसे कुछ काम करता देखा जा सकता है । लेकिन उसके परिणाम अभी सामने आने वाकी है । बीकानेर जिले में ऐसे 36 भूखण्ड है जहा वन विभाग चरागाह अथवा वन विकास कर रहा है । वन विभाग का यह काम 1974-75 से ही चालू है। पर गोधन-पशुधन को इससे कितना लाभ मिल रहा है यह देखने की बात है। नहर से पानी आने के साथ ही कृषि विकास के साथ-साथ यदि चरागाह विकास की दिशा मे गंभीरता से सोचा गया होता तो जो अकाल आज इतना दुःखदायी हो रहा है यह न होता। ऐसा तो नहीं कहा जा सकता कि ऐसी कोई योजना बनी ही नहीं। राज्य वन विभाग की ओर गे दो लाख हेक्टेयर क्षेत्र में चरागाह विकास की एक योजना सन् 1978 मे तैयार की गई थी। चरागाह विकास की यह योजना कोई 105 करोड़ रुपये को थी, लेकिन एक दशक हुआ वह ठंडे बस्ते में ही पड़ी है । वेशक वन विभाग को कोई ढाई लास एकड़ भूमि नहरी क्षेत्र मे मिली हुई है, पर उससे यदि कुछ प्राप्त होता तो दुदिनों में राहत मिली होती। यह कहना भी अप्रासंगिक न होगा कि यह नहर एक मुलावा-एक छलावा सिद्ध हुई है । यदि यह न होता तो विगत मूरो और दुभि में इससे ऐसी राहत तो मिलती हो, कि हमारा पशुधन और जनधन दूसरों के सामने मोहताज न होता। संकट की पड़ी में नहर यदि साझीदार नहीं है क्या इसे छलावा न कहा जायेगा ? अरवो गाय को यह योजना क्या दरा मरुप्रदेश के लिए विलासिता सावित हो रही है । आखिर यह कौन नही चाहेगा कि कष्ट के समय हमारा 114 पर्यावरण को संस्मृति कोई साक्षीदार बने । और ऐसे समय में भी यदि कोई मुंह मोड़ ले तो उसे क्या कहेंगे? नहर क्या यही नहीं कर रही है ? इसके कारण कुछ भी गिनाये जा सकते है। उन कारणों को भी हम अपने सामने रखें और सिंचित कृषि के साथ-साथ परम्परागत 'अरण्य रास्कृति' पर भी सोचें--ओरण चरागाह के संरक्षण-सवर्द्धन पर भी विचार करें। यह इसलिए भी जरूरी मानना चाहिए कि संपूर्ण पश्चिमी राजस्थान और थार के जिलो में पशुधन सर्वाधिक है और थार का अर्थाधार पशुपालन ही है । लेकिन यह आधार अकालों की मार तथा योजना की प्राथमिकताओ मे बनी विसगतियो के कारण हिल रहा है। अन्यथा चरागाहो के विकास के लिए योजनाएं बन-बन कर ठण्डे बस्तों मे ही नहीं पड़ी रहती। सम्पूर्ण पश्चिमी राजस्थान में कुल 8 लाख 46 हजार हेक्टेयर गोचर चरागाह है । बीकानेर जिले में यह भूमि 39,000 हेक्टेयर है और हर गांव के गोचर चरागाहों को एक-सी स्थिति है। यह सच है कि चरागाहो के विनाश का बड़ा कारण अति चराई और बढती आबादी है । लेकिन दूसरा कारण सिचित कृपि और यांत्रिकता का दबाव भी है। यदि हम पशुधन को राष्ट्रीय सपदा मानते हैं--जो कि है ही-तो हमे सोचना होगा कि इनके संरक्षण के लिए क्या उपाय किये जायें। जिम तरह असिंचित क्षेत्र में सूरी के कारण चरागाहों को विकसित करने में कठिनाई आ रही है उसी तरह सिंचित क्षेत्र मे ऐसी दृष्टि के अभाव तथा प्राथमिकताओं के यथोचित निर्धारण में श्रुटि के कारण-चरागाह नष्ट हो चरागाहों के हालात के अध्ययन समय यह भी देखने को मिला कि स्थायी रूप से आरक्षित चरागाह या औरण सिंचित क्षेत्र की परिधि में आते ही नष्ट हो गये। बीकानेर तहसील का मेहरासर गाव एक समय मे 2370 बीघा गोचर का मालिक था। पर आज एक गज भूमि भी इस गाव में गोचर की नही है । इस गाव की एक सौ हेक्टेयर भूमि को वन विभाग ने 'सिल्वी पेस्ट्रोल' (वन व चरागाह) विकास के लिए 1980-81 मे अपने हाथ में ली थी। लेकिन पीढियों से आरक्षित गोचर के छिन जाने का मलाल ग्रामवासियों के दिलों मे गहरे तक पेठा हुआ है । सारा गांव में कभी 1221 बीघा गोचर थी, पर वह अब घट कर 242 बीघा रह गई है । पनपालसर गाव में 614 बीघा गोचर और ओरण थी, लेकिन वह गाव अब गोचर-विहीन है। कोलायत तहसील के 25 गांवों की गोचर सिंचित क्षेत्र की भेंट चढ चुकी है और अब गोचर-ओरण 115 वहा गोचर क्या होती है-~बताने वाला भी नहीं है। पशुधन यहुल गांव छत्तरगढ़ अव गोचर-विहीन गाव है। यहा कभी 2786 बीघा गोचर भूमि आरक्षित थी। लूणकरनसर गाव मे एक समय 4138 वीघा ओरण थी जो अव घटकर 1685 बीधा रह गई है। लूणकरनसर क्षेत्र की भूमि सही अर्थो में सिंचित कृषि के लिए लाभकर ही नहीं है। यहां की मिट्टी अधिक पानी झेल ही नहीं सकती। अधिक पानी देकर खेती के कारण चक 294 आर डी , चक 282 आर.डी., चक 19 जे.एम डी., चक 276 आर डी की जमीनों में भूमि का जल स्तर काफी ऊपर आ गया है । यहा किसानो ने बताया कि 3 से 6 फुट जमीन खोदने से ही पानी निकल आता है। सिंचाई से जो पानी भूमि मे गहराई मे उतर जाना चाहिए वह भूमि की कठोर पर्त के कारण ऊपर उठने लगा है। अध्ययन के दौरान पता चला कि लूणकरनसर के इस क्षेत्र मे सैकडी वीघा भूमि अब रोती के योग्य नहीं रही है। यह स्थिति 5 से 10 साल की सिंचाई के फलस्वरूप बनी है जो चौकाने वाली है। ठीक इसके विपरीत यदि कम पानी की उपजें लेने की दिशा में सोचा जाता और उन्नत तरीकों से ऐसी कठोर पर्त वाली भूमि पर घासें, थार की पारम्परिक वनस्पतियां और वृक्षावली विकसित की जाती तो परिस्थितियां अधिक बेहतर होती। बेहतर परिस्थितियो को विकसित करने का बीकानेर जिले के ही एक गाव भीनासर मे प्रयोग हो रहा है । जन आन्दोलन के रूप में 'गोचर चरागाह विकास और पर्यावरण चेतना भीनासर आन्दोलन' के नाम से विगत चार साल (सन् 1984 से) में यहा जो काम हुआ है उसने विकास के परम्परागत तरीको पर विश्वास और आस्था की सघन तह जमाई है । भीनासर के चरागाह क्षेत्र में थार की वनस्पतियों-घेर, खेजड़ी, फोग और सेवण, धामण घास लगाने तथा विकसित करने के प्रयोग किये जा चुके है । खेजड़ी वृक्ष को यह मानकर छोड़ दिया गया था कि यह तो धीमे-धीमे बढता है-भीनासर आन्दोलन के माध्यम से एक जन पौधशाला स्थापित कर लासो मेजड़ी के पौधे तैयार किये गये जो जिले में वनीकरण के काम आये हैं । सेवण घास उगाने और एक बार उगाने के बाद बार-यार कटाई लेने का प्रयोग यद्यपि नया नहीं है, पर उसका नयापन इसलिए माना जा रहा है कि यह काम सुनियोजित रूप से एक जन-आन्दोलन के रूप में वहां होता रहा है । भीनासर में जो कुछ होता रहा है वह थार मरुस्थल के गावों के लिए एक 'मॉडल' है । गोचर का विकास और पुनरुद्धार इस 'मॉडल' के माधार पर हर 116 पर्यावरण की संस्कृति गाव में हो गकता है। जन-शक्ति के जग उठने से सब कुछ सहज और सरल हो सकता है । भोनासर ने यह कर दिखाया है । अतः यह माना जा सकता है कि जन-जागृति और उत्प्रेरणा से गोचर विकास का वैसा काम हर कही हर गाव में हो सकता है। सेवण पास पशुओं का उत्तम पौष्टिक आहार है जो कम पानी और अधिक तापमान में भी सड़ी रह सकती है। रोजड़ी, येर, फोग ये सभी ऐसी ही वनस्पतिया हैं। हर गांव में गोचर भूमि पर पानी का कोई न कोई परपरागत स्रोत बनाया जा सकता है। ताल-तालाब भी हो सकते हैं और भू जल भी कुए सोद कर प्राप्त किया जा सकता है। राजस्थान विश्वविद्यालय में जून 1986 मे देश के प्रमुख भू-वैज्ञानिकों की कायंगोष्ठी में यह तथ्य सामने आ ही चुका है कि मरुस्थलीय पश्चिमी क्षेत्र में भू जल के विपुल भण्डार हैं। भू जल के इस विपुल भण्डार का बेहतरीन उपयोग मरुस्थलीय वनस्पतियों को उपजाने मे किया जा सकता है। चूंकि भू जल अति मूल्यवान है अतः उसका बेजा उपयोग तो अपराध ही होगा, पर प्रकृति का यह अजय सन्तुलन है कि थार की वनस्पतियों को बेशुमार पानी ही नहीं चाहिए । अतः इस कार्य मे भू जल लेने से किसी प्रकार के असन्तुलन का अन्देशा नहीं है । गांव-गांव में जो गोचर-ओरण उपलब्ध हैं उसके सहित नये सिरे से जरूरत के अनुसार गोचर भूमियो का आरक्षण कर उनके विकास की विकेन्द्रित योजना तैयार की जा सकती है । ऐसी विकेन्द्रित योजना ग्रामाधारित होगी जो गांय की जरूरत, गांव की परिस्थिति, गांव को अनुकूलता-प्रतिकूलता से मेल खाती होगी। उसका सम्पूर्ण प्रवन्ध गाय के हाथ में रहेगा। इस तरह इसे आत्म- निर्भर और स्वावलम्बी अभिक्रम बनाया जा सकता है। यह काम केन्द्रित स्तर पर नहीं हो सकता और मामूहिक साझेदारी की सम्भावनाएं भी केन्द्रित स्तर पर काफी जटिल होती है । अलवत्ता, 'फोडर बैक' के तौर पर ऐसी केन्द्रित व्यवस्था अनुकूल और हितकर मानी जा सकती है । गाव की अपनी जरूरत भर के लिए तो गांव का अपना विकसित गोचर ही होना चाहिए ताकि दूसरों का मोहताज न रहना पड़े। गोचर-ओरण के पुनरुद्धार के काम में किसी प्रकार के संसाधनो की अपेक्षा दृढ इच्छा-शक्ति को ज्यादा जरूरत है। स्पष्ट दृष्टि और समुचित नीति यदि हो तो संसाधनो की पूर्ति भी सहज ही हो सकती है। यदि ये बातें सुनिश्चित हो जाये तो गांव-गांव मे गोचर आरक्षण, संरक्षण और संवर्द्धन का काम जन गोचर-ओरण 117 आन्दोलन के रूप में किया जा सकता है। अकाल का समाधान तात्कालिक राहत नहीं, उसके स्थायी उपाय हैं जो गोचर-ओरण के समुचित विकास में निहित है। इसके लिए हमे अपनी प्राथमिकताओं का पुननिर्धारण भी करना होगा। असगतियों को पहचानने की अपनी 'देसी' दृष्टि विकसित करनी होगी। प्रौद्योगिकी और विज्ञान को उपयुक्तता की कसौटी पर परखना होगा और यह समझना होगा कि जो हमारे प्राकृतिक संसाधन हैं उनमे इससे किस तरह इजाफ. हो सकता है। हमे पहले अपनी जरूरतें देखनी होगी और यह भी देखना होगा कि जिन तरीको से हम अपने संसाधनों का विकास करना चाहते है वे कितने टिकाऊ है। यह समझने के लिए यदि हम गांवों के बड़े-बुजुर्गों के अनुभवों को अपनी कसौटी बनायें और उसमे से नया मार्ग तलाशने का प्रयत्न करें तो वह अधिक व्याव- हारिक सावित होगा। लेबोरेटरी टू लेण्ड'-प्रयोगशाला से खेत या जमीन तक पहुँचने का हमारे वैज्ञानिकों का अभियान वास्तविक अर्थों में अधिक लाभकर तभी सिद्ध हो सकता है जब अनुभव और शोध के निष्कर्षों में कोई सामंजस्य स्थापित किया जा सके । आज इसका अभाव है। आज हम जानकारी बढ़ाने में लगे हैं। उसको उपयुक्तता को कसौटी पर कसने और उसके नतीजों को खुले मन से स्वीकार करने में हिचक रहे है। यह हिचक तभी समाप्त हो सकती है जब हम 'विशेपज्ञ' के अहंकार से अपने को मुक्त करें। तभी हम अपनी जमीन को देख सकेगे और उस पर विखरे अनुभवों को सहेज सकेंगे। तब जो मार्ग या समाधान निकलेगा वह किसी नये संकट की आशंका से मुक्त भी होगा और सब की सुध लेने वाला भी। 118 पर्यावरण की संस्कृति इत्यलम पर्यावरण और परिवेशिकी के बारे में अब तक जो कहा गया है उसमें नया कुछ नहीं है । भारतीय परम्परा और ज्ञान न तो प्रकृति के नैसर्गिक गुणो से पृथक है और न इनमे कोई टकराहट है । अतः जिस विषय को लेकर यह पुस्तक तिखी गई है उसमे कुछ नया कहा गया हो- ऐसा यह लेखक नही मानता । जो कुछ इस पुस्तक में कहा गया है वह एक तरह से पुनर्कथन है । इसमे अभिनव यदि कुछ है तो यह इसकी सम्प्रेपणीयता है, पर यह बात भी इस लेखक के कहने की नही है । यह निर्णय भी तो पाठक ही करेंगे। यह सच्चाई भी सुधी समाज को स्वीकार करनी चाहिए कि पर्यावरण पर लिसना या चर्चा करना अव फैशन बनता जा रहा है । हमारी सतही चिन्ताएं सवालो को पैना बनाने की जगह उन्हे भोथरा बनाती है । हम अपने समाज को इसरो वचा राकें - यह अत्यन्त आवश्यक है । हमें यह देखना और समझना जरूरी है कि पर्यावरण और परिवेशिकी को बाजार में चलने वाला ऐसा सिक्का नहीं बनने दें जिसकी कीमत तो दिनो-दिन बढ़ती नजर आये पर उसमें होने वाले भीतरपात को रोक नहीं सर्वं । पर्यावरण के आन्दोलन को मजबूत बनाने के लिए इससे बचना तो जरूरी है ही, यह भी जरूरी है कि इनको हम पहचानें और निवंसन भी करें। आज जिस तरह के समाज की रचना हो चुकी है उसमें मनुष्य को, उसके मन-मस्तिष्क को विकृत होने से बचाना पहली जरूरत है । यह अत्यन्त दुरुह काम है। फिर भी यह हो सकता है। इसके लिए संयम और विवेक को ही सहारा बनाना होगा। यह तभी हो सकता है जब हम सत्य से सामना करने से वचने को चेप्टा करने की बजाए उसका मुकाबला करने का साहस जुटायें । हमें यह भी मानना चाहिए कि आज जो सत्य है वह शाश्वत तो नहीं है, पर कल वह असत्य भी नहीं हो जायेगा। आज जो सत्य है वैसा ही कल चाहे न मी हो, पर उसकी पृष्ठभूमि अगले सत्य की पीठ पर चिपकी रहती है और यह एक अनवरत प्रक्रिया है। इस तरह आज के सत्य का अनुभव आने वाले कल को प्रशस्त करने में सहायक होता है ।

प्रौद्योगिकी के पास ऐगा विवेक या एप्टि नहीं है जो मत्य की इस अनवरतता को देग मफे और उसकी पृष्ठभूमि को समझ मके । एमी कारण इस पर घरावर प्रश्न चिल्ल लगते रहे हैं। इसी कारण इतने विकास और विस्तार के बाद भी उस लक्ष्य को प्राप्त नहीं किया जा सका है जिसके तक पर विज्ञान और प्रौद्योगिकी का विस्तार करते रहने में सर्वत्र उदारता बरती जाती रही है। ये लक्ष्य क्या है- इन पर इग पुस्तक में सागोपाग चर्चा हुई है। अतः उसे दोहराने की अव जरूरत नहीं है। तब क्या हम एक ऐगे समुदाय की कल्पना कर सकते है जो अपनी विरासत की प्रामाणिकता को अमंदिग्ध रूप से स्वीकार कर ले? आज के वौद्धिक समाज के लिए यह मान लेना कठिन है कि बिना तक की कगोटी के वह किसी बात को स्वीकार कर ले । लेकिन यही बौद्धिक समाज यदि यह स्वीकार कर लेता है कि प्रत्येक व्यक्ति को स्वतंत्रता से रहने, जीने और व्यवहार करने का अधिकार है और उगमे कोई किसी का अतिक्रमण नहीं करेगा तो इस समय व्याप्त सकट की गहनता बहुत अंशों तक कम हो जायेगी । पर हम जानते हैं कि आज सत्ता को केन्द्रित किये रखने की भरसक कोशिशें हो रही है। राग-सत्ता और धन-सत्ता में केन्द्रीयकरण का प्रयास इतना विकृत रूप लेता जा रहा है कि जीवन के हर क्षेत्र को अपनी छाया से लील रहा है। ज्ञान-विज्ञान भी आज राज-सत्ता और धन-सत्ता के सामने बिकाऊ हो गए है। यही कारण है कि विज्ञान और प्रौद्योगिकी के निष्कर्ष समाजोन्मुखी न रह कर समूह या वर्ग हितो को पुष्ट करने वाले ही सावित हो रहे है। एक समय था कि बौद्धिक निष्ठाएं किसी वर्ग के लिए न होकर समष्टि के लिए होती थी। इसी तरह धर्म और धर्मगुरु भी महज औपचारिक और संस्थागत, सम्प्रदायगत न रहकर समग्र हित की चिन्ता में बड़ी से बड़ी जोखिम उठाने से चूकते नहीं थे। यह सब भारत की विरासत में हम देख सकते हैं। इसकी प्रामाणिकता और उपादेयता को वेलाग रूप से परखा जाना जितना जरूरी है उतना ही इनको पुनःसस्कारित करना भी जरूरी है । एक प्रकार का अदृश्य नियंत्रण या लगाम भारतीय समाज पर तब कायम था। वैसा नियत्रण अब नहीं रहा है और इसी कारण स्वेच्छाचारिता को प्रोत्साहन मिलता जा रहा है। इसी कारण हमारा जीवन चक्र, जीवन की प्राथमिकताए, जरूरतें और संकल्पनाएं बदल गई है । अपनी निष्ठाओ से हम विमुस हो रहे है। इसीलिए हमारा जीवन और क्रियाएं अनेक विरोधाभासों और उलझनो से घिर गई है । इनसे निकलने का मार्ग सत्य, संयम और प्रेम ही हो सकता है -- 120 पर्यावरण की सस्कृति जो समस्त जीव जगत् के लिए हितकारी है, पर आधुनिक विकास में इन सवको देखने-समझने की दिव्य-सृष्टि का अभाव है। उपाय भी एक ही बच रहता है कि हम आधुनिक विकाम के जुए को सिर से उतार फेंके। अव यह किसी से छिपा नहीं है कि इस विकास के जरिये एक अत्यल्प वर्ग ही लाभ मे रहा है, जबकि यहुत बडा वर्ग कष्ट और विषमता में ही जीता रहा है। एक पराश्रित समाज के निर्माण से बेहतर है कि सुखोपभोग कम हो जायें, पर एक स्वावलम्बी और आत्मनिर्भर ममाज की संरचना हो जाये। जब हम यह बात करते हैं तो एक प्रकार से अनुतरदायी व्यवस्था को समाप्त करने की बात ही सोच रहे होते है । इसलिए हमें यह मानकर चलना चाहिए कि टकराहट अवश्यम्भावी है और इससे बचते रहना अन्तत. अन्धे कुए में उतरते जाना ही कहलायेगा। अतः यह जरूरी है कि हम अपने पर्यावरण और परिवेशिकी को ठीक तरह से समझें । ऐमी उत्तरदायी व्यवस्था का निर्माण करें जिसमे सबका समावेश हो और चेतना के स्तर पर समाज के उस वर्ग को जागृत कर उसे भी सक्रिय बनायें जिसे आधुनिक विकास ने अलग-थलग पटक रखा है। ऐमा होने मे ही पर्यावरण की रक्षा और परिवेशिकी का सन्तुलन बना रह सकेगा। पर्यावरण गन्तुलन को अव सर्वांगीण रूप से विकास की समिधा से जोडना होगा। हमे अपनी आवश्यकताओ को सीमित करना होगा। गांव और शहर के विभाजक भटकाव को ममाप्त करना होगा । गांवो की वर्वादी और शहरों पर बढ रहे निरन्तर दवायों की असलियत को देखना होगा। यह अमरियत हमें बताती है कि वर्वादी और बढते दवावों के पीछे कुछ मुट्ठी भर लोगो के पार्थ और लालच होते हैं । इमी लालच और स्वार्थपरता ने वस्तुओ के लक्ष्य और उसके उत्पादन पर जोर देते रहने की नीति अपना रखी है। इसमें व्यक्ति प्रमुस न होकर गौण है । हमारी सभी योजनाओं में उत्पादन को लक्ष्य बनाया जाता है। मानव श्रम के रूप में बने दो हाथ योजनाओं के लक्ष्य का आधार नहीं बनते। गावो का खोखलापन बढते जाने के पीछे भी कारण यही है कि वहा की सम्पदा बहुत सस्ते में छीन ली जाती है और गांव की जरूरत पर वही चीज़ बहुत महंगी उपलब्ध कराई जाती है। आधुनिक कहे जाने वाले अर्थशास्त्र के सिद्धान्तों से तो इसे युक्तिसंगत कहा जा सकता है, पर यह ऐसी विसंगति है जो असन्तुलन ही पैदा करती है । गांव और शहर के बीच टकराव का यही प्रमुख कारण है । विगत मे हुए किसान आन्दोलन जैसी घटनाएं यही इत्यलम 121 बताती हैं । चाहे ऊर्जा हो या शिक्षा-गांच की बनिस्बत शहर का पेट पहले भरने की नीति और शहर के पेट का लगातार बढता आकार भी गांव के खोराले होते चले जाने और शहर के बोझ के बढ़ते जाने का कारण है । ऊर्जा का उत्पादन कितना ही बढा हो-गांव के हिस्मे मे तो थोडा मा ही आता है। इसी तरह शिक्षा के क्षेत्र में चाहे कितनी ही प्रगति हुई हो, आज तक ऐसा 'ग्राम्य विश्वविद्यालय' स्थापित नहीं हो सका जो ग्रामांचलों की भाव-भूमि पर शिक्षश-प्रशिक्षण का प्रवन्ध करे। ये विसंगतियां प्राथमिकताओ के निर्धारण की त्रुटियों का प्रतिफल है। इन त्रुटियों से मुक्त होने की दृढ इच्छा-शक्ति जव तक नहीं होगी तब तक आधु- निक विकास की नोंच-खसोट भी रोकी नही जा सकेगी। कोई भी उपाय कारगर नहीं हो सकता जब तक कि मर्ज की गहनता को ठीक से न समझ लिया जाये । पर्यावरण की समझ पर आधारित संस्कृति की सकल्पना ही इस मर्ज की गहनता को समझने में सहायक हो सकती है। 122 पर्याारण की संस्कृति देखा - समझा यह पुस्तक लिखते समय बहुत कुछ देखने-समझने का अवसर प्राप्त हुआ। निम्नोक्त पुस्तकों, शोध-पत्रों, गमाचार पत्रों में छपे लेखों और समाचारो से जानकारियां मिली और अपने अनुभव के आधार पर विषय को समझने में इनसे सहायता भी 1. हिन्द स्वराज्य-गांधीजी (अनुवादक-अमृतलाल टाकोरदास नाणावटी) नवजीवन प्रकाशन मन्दिर, अहमदाबाद 2. संक्रान्ति और सनातनता--डॉ.छगन मोहता, वाग्देवी प्रकाशन, बीकानेर 3. हमारा पर्यावरण-सं. अनुपम मिश्र, गांधी शान्ति प्रतिष्ठान, नई दिल्ली 4. धर्म और ममाज--डॉ. राधाकृष्णन, राजपाल एण्ड संज, नई दिल्ली 5 समुचित तकनीक :बेहतर भी, कारगर भी-ई.एफ शुमाकर (अनुवादक- भवानीदत्त पंड्या) राधाकृष्ण प्रकाशन, नई दिल्ली 6. संरक्षण या विनाश-सरला देवी, ज्ञानोदय प्रकाशन, नैनीताल 7. रचनात्मक जीवन-डॉ. राधाकृष्णन, सरस्वती विहार, नई दिल्ली 8 संस्कृति का व्याकरण- नन्दकिशोर आचार्य, वाग्देवीप्रकाशन, बीकानेर 9. राजस्थान की प्रशासनिक व्यवस्था (सन् 1574-1818)-डॉ. जी. एस एल. देवडा, धरती प्रकाशन, बीकानेर 10 विकास की कीमत--मध्यप्रदेश लोकायन एवं लोकहित समिति, सिंगरौली की गतिविधियो का दस्तावेज 11. राष्ट्रीय वन नीति--लोकसभा सचिवालय, नई दिल्ली, मई 1985 12. नोट्स ऑन द एक्सपीरियन्स ऑफ डॉट परसेप्शन, रिफलेक्शन एण्ड प्रीडिक्शन [-एल. पी भरारा, केन्द्रीय मरू अनुसंधान संस्थान, जोधपुर 13. मूविंग टेक्नोलोजी (वॉ. 1,नं. 3,दिसम्बर 1986) द वाटर क्राइसिस ----डॉ. के. एस. कालबाग 14. अमर शहीद--प्र. मं. श्रीकृष्ण सहारण, अ भा.जीव रक्षा विश्नोई सभा, अबोहर।

15. तो आज तस्वीर इतनी उलटी क्यों दिखती है (अंग्रेजो से पहले का भारत- लेखमाला)-धर्मपाल, जनसत्ता, नई दिल्ली, दिनांक 25.3 1986 16. मरुस्थल के बढ़ते पदचाप-डॉ. सरदारसिंह ढावरिया, राजस्थान पत्रिका, जयपुर, दिनांक 1.10.1986 17. गांधी की विश्व-दृष्टि-सुधीरचन्द्र, नवभारत टाइम्म, नई दिल्ली दिनांक 7.9 1987 18. चेरनोबिल दुर्घटना की बढ़ती छाया-सुभाष शर्मा, नवभारत टाइम्ग, नई दिल्ली, दिनांक 27.4.1988 19. राष्ट्रव्यापी पर्यावरणीय संकट एवं उसका निदान-डॉ. सरदारसिंह ढावरिया, नवभारत टाइम्स, जयपुर, दिनाक 56.1988 20. कही यह भस्मासुर हमे ही भस्म न करे-सुभाष शर्मा, जनसत्ता, नई दिल्ली, दिनांक 3.6.1988 21. अपनी वराह मिहिर परम्परा में फिर झांकिये~-नन्दकिशोर आचार्य, जनसत्ता, नई दिल्ली, दिनांक 16 6.1988 22. वैदिक गणित से कंप्यूटर भी बन सकते हैं-माणिक भट्टाचार्य, जनरात्ता, नई दिल्ली, दिनांक 18.6 1988 23. राजस्थान में रेगिस्तान के नीचे पानी ही पानी-नवभारत टाइम्म, नई दिल्ली, दिनाक 13 6.1986 24. भारतीय संस्कृति का आधार सरस्वती थी, गंगा नहीं-जनसत्ता, नई दिल्ली, दिनांक 22.12.19861 124 पर्यावरण को संस्कृति

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Paryavaran Ki Samskriti

Author
Shubhu Patwa
Title
Paryavaran Ki Samskriti
File name
Paryavaran Ki Samskriti
Text
OCR done
Citation
1954
Published
2011/03
Publisher
Vagdevi Prakashan Bikaner
Language
Sanskrit
Pages
129
Library
Shree Jubilee Naagari Bhandar Bikaner
Classification
Literature
DLI number
551073
Barcode
4990010031851.00
Scanning centre
C-DAK, Kolkata
Digital publisher
Digital Library Of India
VMLT id
OCsWnutrIPJ
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