Adarsh Library, Jaipur

Rinajal Dhanjal

Renu Karnishwarnath · 2011/03

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ऋणजल धनजल

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ऋणजल धनजल
फणीश्वरनाय रेणु
राजकमल प्रकाशन
नयी दिल्ली

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प्राक्कथन आपने रेणु जी को पुस्तक 'ऋपजल घनजल' के लिए कुछ लिखने को कहा है । मैं क्या लिखू, समझ नहीं पा रहा हूं। बिहार के जिस सूखे की कया इममे है उमसे लोहा लेने की कोशिश मैंने भी को यो। किसी भी विपत्ति से ग्रस्त लोग मुझे बरावर तक्मात रहे है, और मैं भरसक जो सूमता रहा है, करता गया हूँ। जी ने इस पुस्तक में बिहार की जिस वाढ का जिक्र किया है उमको भयानकता भी मैंने, चण्डीगढ की अपनी एकान्त कैद में, महसूम की थी। बाढ़ की उस सबर ने ही मुझे इतना विह्वल कर दिया था कि मैंने इदिरा जी को एक महीने के परोल के लिए पत्र लिखा या । उस वाट की थाह नेने का मौका मुझे तो नहीं दिया गया, पर रेप जो उसमें खूब ट्वे । मनुष्य ही किसी क्रातिकारी का पौर किसी साहित्यकार का, प्राणदिदु होता है मनुष्य, उसको दूमरी एकाग्रता तोड़ देता है । में अब तक अपने सामयं भर मनुष्य की मुसीबतों मे जूझने का प्रयास करता रहा हूं। रेण जी ने भी यह लड़ाई, अपनी कलम के माध्यम से नदी है। उनरा सारा साहित्य, इस दृष्टि से अनेक ममकालीन मनुष्य का इतिहाम है। रेण जी मेरे लिए सिर्फ लेखक नहीं थे वलि महयात्री भी थे। बिहार आन्दोलन में वे मेरे साथ किसी भी हद तक जाने को तैयार हैं । अब ती

वे इतनी दूर चल गये हैं कि ईश्वर की मर्जी के बगैर वहां तक पहुंचना
असम्भव-सा है।
'ऋणजल-वनजल' पढ़ते हुए अक्सर मुझे रेणु जी का चेहरा याद आय
वह चेहरा जो हमारे बीच था, हम सब के साथ था ।
उनकी स्मृत में मेरे प्रणाम !
-
१६-११-१९७७
जदाकाश नारा

प्रकाशकीय यह सच, एक दुखद सच है कि रेणुजी की भौतिक काया नि.शेप हो चुकी है, लेकिन साथ-ही-साथ, यह भी सच है कि रेणुजो हमारे बीच प्राज भी मौजूद हैं-अपने सम्मोहक व्यक्तित्व से जुडी स्मृतियों के रूप मे, जो समय-प्रममय हमारे मन को झकझोरती और भारी कर जाती हैं; तथा उन अक्षर-कृतियों के रूप में, जो हमारे लिए और प्रानेवाली पीढ़ियों के लिए भी प्रेरणा का प्रक्षय स्रोत बनी रहेंगी। रेणुजी की यह कृति-ऋणजल धनजल-कई दृष्टियो से ऐतिहासिक महत्त्व रखती है। पहली पौर मुख्य बात, कि बाढ़ और सूखे की दो मभूत- पूर्व दुर्घटनामों का यह ऐतिहासिक दस्तावेज है, और दूसरी, कि इसके प्रकागन की पूरी रूपरेखा तय करने के साथ-साथ इसका नामकरण तक उन्होंने स्वयं किया था, और इसके लिए पन्द्रह-बीस पृष्ठों की एक भूमिका लिख चुकने की सूचना भी उन्होने दी थी। किन्तु, दुर्योगवश, वह महत्त्वपूर्ण भूमिका हमे उपलब्ध नहीं हुई और उसी बीच सहसा उन्होंने हमेशा-हमेशा के लिए प्रांखें मूंद ली। रेणुजी के जीवनकाल में यह पुस्तक प्रकाशित नही हो सकी, इसकी कचोट हमें हमेशा रहेगी। और, अव यह पुस्तक उनकी उस भूमिका के बगैर ही प्रकाशित हो रही है, यह दुहरा दुख भी उस कचोट में शामिल हो गया है। यह एक मूल्यवान धरोहर थी रेणुजी की, जिसे अब हम पाठकों के हाप में दे रहे हैं । रेणुजी के प्रति हमारी यह मूक श्रदांजलि है।

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श्रद्धांजलि
:
कवि की यात्राएं : रघुवीर सहाय
समग्र मानवीय दृष्टि : निर्मल वर्मा
..

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कवि की यात्राएँ रघुवीर सहाय फणीश्वरनाथ 'रेणु' उन गिने-चुने लोगों में से थे जिनसे एक बार 'मिलने के बाद फिर उनके बारे में और कुछ जानना रह नहीं जाता। प्रेम से भरा व्यक्तित्व कमी रहस्यमय बना रह सकता है ? उससे तो हर बार मिलने पर ऐसा लगता है कि जहां पिछली बार छोडा था उससे मागे शुरू कर रहे हैं-ऐसा नही कि हर बार नये सिरे से जानना पड़ रहा है। व्यक्ति सम्पूर्ण कहाँ होता है, केवल कम या ज्यादा सम्पूर्ण होता है। रेणु कम-से-कम इतने सम्पूर्ण थे कि हर परिवेश मोर हर सन्दर्भ में उनके मौलिक लक्षण एक ही रहते थे, रागानुराग के मारोह-अवरोह से उनका ठाठ नहीं बिगडता था। वह जैसा सोचते ये वैसा बोलते थे और जैसा वोलते थे वैसा लिखते थे और फिर जव उसको पढो तोलगता था कि रेणु दोल रहे है। रेणु के लेखन को इस विशेषता को मोर कम भालोचकों का ध्यान गया है, यद्यपि यह इतनी स्पष्ट है कि इघर ध्यान दिलाने की जरूरत नहीं पड़नी चाहिए थी। हो सकता है कि अत्यन्त स्पष्ट होने के कारण ही यह विशेषता, विशेषता न मानी गयी हो। जैसा हिन्दी मालोचना-जगत् का स्वभाव रहा है, विलक्षणता मोर विचित्रता खोजकर उससे चौकने को प्रातुर सहृदयों ने रेणु को शैली को आंचलिक कहकर अपने को नागर जताने का प्रयत्न किया था। पर वह उनके अपने व्यक्तित्व की, न मांचलिक न नागर, बल्कि विश्वसनीय मभि- व्यक्ति है। पांचलिक-जंसो कोई शली या विषयवस्तु भी होती है, यह ऋणजल धनजल/8 मानना राजनैतिक केन्द्रीकरण के वज़न पर किसी सार्वदेशिक साहित्य के दम्भ की प्रतिष्ठा करना है। रेणु ने दूसरों में ऐसे किसी दम्भ को कभी इतना महत्त्वपूर्ण नहीं पाया कि या तो जवाब में कोई प्रांचलिक मुद्रा अपनाते या तथाकथित महा- नगरी साहित्य की नकल करने लगते। उनके लिए लोग ही सत्य थे -वहां तक सत्य जहां तक वह उन्हें जानते थे और उनसे एक हो सकते थेचाहे वे कहीं के रहनेवाले हों। यह प्रास्था उनमें आजीवन बनी रही। मृत्यु से कुछ दिन पहले १५ और १६ मार्च को अस्पताल में दो बार उनसे लम्बी बातचीत हुई थी : तब वह कह रहे थे कि लोकसभा चुनाव में जनता पार्टी जीतकर पा गयी तो हम लोगों को और अधिक काम करना पड़ जायेगा --अन्याय के प्रति सतत असहमति का और समाजवाद के विचार के विकास का काम आज (मापात-काल) से भी तव अधिक आवश्यक हो जायेगा। उन्हें बहुत-सी बातें, बहुत-से लोग याद आ रहे थे । यह कोई नयी बात न थी, और न यही कहा जा सकता है कि इस प्रकार के संस्मरणों पर किसी भागामी आशंका की छाया मंडरा रही थी। नहीं, वह वैसे ही सहज भाव से अपनी जेल-यात्राएँ याद कर रहे थे जैसा मैंने उनके मुख पर १६७४ में देखा था। उन्होंने हंसकर कहा : एक ज़माने में क्रान्ति- कारी जेल जाता था, तपेदिक का मरीज होता था और प्रेम करता था। मैंने इससे भी अधिक किया। ये तीनों करके विवाह भी किया। फिर ललक कर बोले : दिनमान के लिए एक धारावाहिक संस्मरण-माला लिखूगा--- 'मेरी प्रणय-कहानी' । वह ऑपरेशन से हमेशा के लिए अच्छे हो जाने को आतुर थे और उसके बाद यही संस्मरण लिखना नहीं, १९७४ की जेलयात्रा में 'मैला आंचल' और 'परती परिकथा' के अपने पात्रों से कैसे दोबारा मेंट हुई, इसकी कहानी लिखने के पुराने वायदे को पूरा करना चाह रहे . थे। उनके भीतर लोग-ही-लोग जाग रहे थे, चल रहे थे, गा रहे थे और उन्हीं लोगों के बीच वह स्वयं खड़े हुए थे, अपनी युवावस्था के प्रवर्तक अनुभव-प्रेमविवाह की किंचित् विनोदभरी स्मृति से मग्न, परन्तु आत्मकेन्द्रित नहीं। उन्हें अपने भीतर की करुणा और न्यायप्रियता पर सहज विश्वास - - १० / ऋणजल पनजल था कि वह--कदि की एकमात्र पूंजी-अपने-मापको सुद-दर-मूद बढ़ातो रहेगी। न कोई शास्त्र उनका सम्बल पान कोई मतवाद, यहाँ तक कि वह भक्तिभाव भी नहीं जो उन्होंने परम्परा से दान में पाया था; बल्कि उसको तो झकझोरकर ही वह कुछ लिख पाते थे, या कहें कि उसको झकझोरने के लिए ही वह लिखते थे। उनके लेखन में अपूर्व वर्णनशक्ति है और वह सिवाय उतनी ही मपूर्व पर्यवेक्षण शक्ति के मोर कहां से पा सकती है ? वह चारों भोर जो कुछ देखते हैं उसके ब्यौरे उनके लिए रमणीप होते हैं पर लिखने के लिए स्मृति में रखने योग्य ब्यौरों का चुनाव करते समय वे निर्ममता से बहुत-से व्योरों को रद्द करते जाते होगे, यह उनके अद्वितीय चयन से ही प्रकट है । यह दुर्लभ गुण उन्हें उन तमाम हिन्दी-लेखको से ऊच स्थान पर ला बिठाता है जो व्योरों को घटिया लोगों का रोजगार मौर उपदेश को, प्रयवा दार्शनिकता को, श्रेष्ठ साहित्यिक कर्म मानते हैं । रेणु का देखना एक ही साथ बाहर प्रौर भीतर दोनों भोर होता है । यही उनके ब्योरों को प्रर्थ दे जाता है : अलग से मर्थ गढकर बनाने की ज़रूरत तो उन्हें होती ही नहीं, सीधे शब्दों से उलया करके बताना भी उनकी शैली में मनावश्यक हो जाता है। इस तरह रेणु अपनी ही किस्म के एक सन्देशवाहक हैं । वह जिसका संदेसा लाते हैं उसके-जैसे हुए बिना ला नहीं मकते और जब वह उसके- जैसे होने की कोशिश करते हैं, यानी जहां उन्हें कोशिश करनी पड़ती है, तो वह उस कोशिश को छिपाते नहीं जैसे सितारवादक सितार की पौर उसकी सुन्दरियो पर चलनेवाले हाथ को नहीं छिपाता, जबकि हाथ नहीं स्वर ही उसका प्रेप है (यह झलक मूखा-वृत्तान्त में मिलेगी)। उनमे अपनी रचना-प्रक्रिया के प्रति यह विश्लेपणात्मक रुझान माधुनिक कवि का है जो अपने परिवेश से सम्बन्ध इस स्वीकार के साथ बनाता है कि कोई बना-बनाया सम्बन्ध नहीं है, न किसी बने-बनाये सम्बन्ध की घोषणा कर देने से ही वह बन जायेगा। जहाँ परिवेश से यह सम्बन्ध प्रपेक्षया कम प्रयलसाध्य होता है वहां वह मकारण माधुनिकता का दावा करने के लिए उसका विस्फीत प्रदर्शन नहीं करते। १९७५ के भय भौर मातंक में ऋणजल धनजल/११ मानना राजनैतिक केन्द्रीकरण के वज़न पर किसी सार्वदेशिक साहित्य के दम्भ की प्रतिष्ठा करना है। रेणु ने दूसरों में ऐसे किसी दम्भ को कभी इतना महत्त्वपूर्ण नहीं पाया कि या तो जवाब में कोई प्रांचलिक मुद्रा अपनाते या तथाकथित महा- नगरी साहित्य की नक़ल करने लगते । उनके लिए लोग ही सत्य थे-वहाँ तक सत्य जहां तक वह उन्हें जानते थे और उनसे एक हो सकते थे-चाहे वे कहीं के रहनेवाले हों। यह आस्था उनमें आजीवन बनी रही। मृत्यु से कुछ दिन पहले १५ ओर १६ मार्च को अस्पताल में दो बार उनसे लम्बी बातचीत हुई थी : तब वह कह रहे थे कि लोकसभा चुनाव में जनता पार्टी जीतकर आ गयी तो हम लोगों को और अधिक काम करना पड़ जायेगा -अन्याय के प्रति सतत असहमति का और समाजवाद के विचार के विकास का काम आज (आपात-काल) से भी तब अधिक श्रावश्यक हो जायेगा। उन्हें बहुत-सी बातें, बहुत-से लोग याद पा रहे थे। यह कोई नयी वात न थी, और न यही कहा जा सकता है कि इस प्रकार के संस्मरणों पर किसी भागामी आशंका की छाया मंडरा रही थी। नहीं, वह वैसे ही सहज भाव से अपनी जेल-यात्राएं याद कर रहे थे जैसा मैंने उनके मुख पर १९७४ में देखा था। उन्होंने हंसकर कहा : एक ज़माने में क्रान्ति- कारी जेल जाता था, तपेदिक का मरीज़ होता था और प्रेम करता था। मैंने इससे भी अधिक किया। ये तीनों करके विवाह भी किया। फिर ललक कर बोले : दिनमान के लिए एक धारावाहिक संस्मरण-माला लिखूगा- 'मेरी प्रणय-कहानी'। वह ऑपरेशन से हमेशा के लिए अच्छे हो जाने को आतुर थे और उसके बाद यही संस्मरण लिखना नहीं, १९७४ की जेलयात्रा में 'मैला आंचल' और 'परती परिकथा' के अपने पात्रों से कैसे दोबारा भेट हुई, इसकी कहानी लिखने के पुराने वायदे को पूरा करना चाह रहे थे। उनके भीतर लोग-ही-लोग जाग रहे थे, चल रहे थे, गा रहे थे और उन्हीं लोगों के बीच वह स्वयं खड़े हुए थे, अपनी युवावस्था के प्रवर्तक अनुभव-प्रेमविवाह की किंचित् विनोदभरी स्मृति से मग्न, परन्तु मात्मकेन्द्रित नहीं। उन्हें अपने भीतर की करुणा और न्यायप्रियता पर सहज विश्वास १० /ऋणजल वनजल था कि वह कवि की एकमात्र पूजी--प्रपने पापको सूद-दर-मूद बढ़ातो रहेगी। न कोई शास्त्र उनका सम्बल या न कोई मतवाद, यहां तक कि वह भक्तिभाव भी नहीं जो उन्होने परम्परा से दान में पापा या; बल्कि उसको तो झकझोरकर ही वह कुछ लिख पाते थे, या कहें कि उसको झकझोरने के लिए ही वह लिखते थे। उनके लेखन मे अपूर्व वर्णनशक्ति है और वह सिवाय उतनी ही मपूर्व पर्यवेक्षण-शक्ति के और कहाँ से पा सकती है ? वह चारों मोर जो कुछ देखते हैं उसके ब्योरे उनके लिए रमणीय होते हैं पर लिखने के लिए स्मृति में रखने योग्य ब्यौरो का चुनाव करते समय वे निर्ममता से बहुत-से ब्योरो को रद्द करते जाते होगे, यह उनके अद्वितीय चयन से ही प्रकट है । यह दुर्लभ गुण उन्हें उन तमाम हिन्दी-लेखको से ऊंचे स्थान पर ला बिठाता है जो व्यौरों को घटिया लोगों का रोजगार मौर उपदेश की, अथवा दार्शनिकता को, श्रेष्ठ साहित्यिक कर्म मानते हैं । रेणु का देखना एक ही साथ बाहर और भीतर दोनों मोर होता है । यही उनके भ्योरो को प्रथं दे जाता है : अलग से मर्थ गढ़कर बनाने की जरूरत तो उन्हें होती ही नहीं, सीधे शब्दो से उलथा करके बताना भी उनकी दली में अनावश्यक हो जाता है। इस तरह रेणु अपनी ही किस्म के एक सन्देशवाहक हैं । वह जिसका संदेसा लाते हैं उसके-जैसे हुए बिना ला नही मकते और जब वह उसके- जैसे होने की कोशिश करते हैं, यानी जहां उन्हें कोशिश करनी पड़ती है, तो वह उस कोशिश को छिपाते नहीं-जसे सितारवादक सितार की पौर उसकी सुन्दरियो पर चलनेवाले हाथ को नही छिपाता, जबकि हाय नहीं स्वर ही उसका प्रेय है (यह झलक सूखा-वृत्तान्त में मिलेगी)। उनमे अपनी रचना-प्रक्रिया के प्रति यह विश्लेषणात्मक रुझान भाधुनिक कवि का है जो अपने परिवेश से सम्बन्ध इस स्वीकार के साथ बनाता है कि कोई बना-बनाया सम्बन्ध नहीं है, न किसी बने-बनाये सम्बन्ध की घोषणा कर देने से ही वह बन जायेगा । जहाँ परिवेश से यह सम्बन्ध अपेक्षया कम प्रयत्नसाध्य होता है वहां वह अकारण आधुनिकता का दावा करने के लिए उसका विस्फीत प्रदर्शन नहीं करते । १६७५ के भय मोर मातंक में ऋणजल धनजल/११ - पटना की बाढ़ में अपने घर में नज़रवन्द रेणु को सूखाक्षेत्र में जाने की तरह का और नये चेहरों में अपना चेहरा पहचानने का प्रयत्न नहीं करना पड़ता, पर वह जहां हैं वहीं से जाते वहुत दूर-दूर तक हैं। मनुष्य, पशु-पक्षी, जो भी चलता दिखता है उसके साथ-साथ जाते हैं। उनमें विना अपना चेहरा पहचाने उनका लेखक पूर्ण नहीं होता चाहे वह घर से बाहर न निकले हों और अजनबियों के बीच न गये हों। रेणु के जो दो वृत्तान्त यहां प्रकाशित हैं, एक प्रकार से उनके रचना- जगत् की एक अद्भुत घटना के प्रमाण हैं । एक में जहां उन्हें देश पार कर कहीं जाना पड़ा है वह काल में अपने भीतर गये बिना पूर्ण रहते हैं, दूसरे में जहाँ देश का संक्रमण नहीं होता वहां काल में उनकी यात्रा अनिवार्य हो गयी है। तभी न कहा है कि रेणु एक सम्पूर्ण व्यक्ति हैं। दोनों वृत्तान्तों में नौ वर्ष का अन्तर है (इस बीच उन्होंने 'दिनमान' में एक और संस्मरणमाला, नेपाल-क्रान्ति के अपने अनुभवों को लेकर प्रकाशित की थी)। लेखक के मन में अपने कवि-मानस की निरन्तरता की इच्छा का अनुमान हम इसी से कर सकते हैं कि उन्होंने यह संकलन तैयार करते हुए ऊपर से देखने पर देवी परन्तु, वास्तव में मानवकृत संकटों के अपने नौ वर्ष पहले और बाद के अनुभवों को अन्तर्युक्त माना। रेणु ने अकाल-जैसे सामाजिक अनुभव में बैठकर १६६६ के पहले भी कुछ-न-कुछ लिखा था, किन्तु अवश्य ही निरी किताव बनाना उनका उद्देश्य न था। किसी ईमान- दार लेखक के लिए किताब की संरचना भी उतनी ही सृजनात्मक होती है जितनी उसमें या अन्यत्र संकलित उसकी रचनाएँ हैं और 'ऋणजल' और 'धनजल' को एक साथ रखने में निश्चय ही रेणु का कोई रचनात्मक प्रयोजन रहा होगा-निरा शब्द-चमत्कार नहीं। रेणु इस संकलन की एक भूमिका लिख रहे थे या लिख चुके थे । गाँव से फरवरी '७६ के एक पत्र में उन्होंने प्रकाशक को बताया था कि पन्द्रह- वीस पृष्ठ को वह भूमिका रवाना की जा रही है, "जिस दिन भूमिका लिखने बैठा, चासनाला खदान की अभूतपूर्व दुर्घटना घट गयी भूमिका में १५ जनवरी '३४ के भूकम्प से लेकर अब तक के दैवी प्रकोपों के (जिन्हें याद करके रोंगटे खड़े हो जाते हैं) छुटपुट संस्मरण हैं. मैंने अपनी इन १२ / ऋणजल धनजल - रचनाप्रो को 'जुनल' कहा है ।" वह भूमिका कभी प्राप्त नहीं हुई। इससे हम रेण के रचना-प्रक्रिया-जगत् में बैठकर मनुमान ही लगा सकते हैं कि किस कलात्मक कारण से उन्होने इस पुस्तक की सृष्टि की होगी। वह कारण बहुत करके यही रहा होगा कि इन दो वृत्तान्तो मे वह भीतर से बाहर और बाहर से भीतर की अपनी मानस-यानाम्रो का रचनात्मक अन्तरसम्बन्ध देख पाये थे । इन लेखों में कहानी, कविता या नाटक उस रूप में विद्यमान नहीं है जिसमें साहित्यिक व्याख्याता उन्हें देखने के मादी हो चुके हैं पर इनमे ये सब है और यह प्रमाण भी है कि कोई रपट भी उतनी सर्जनात्मक हो सकती है जितनी वह रचना, जी रपट नहीं है- बातें कि लेखक मपने व्यक्तित्व के प्रति सजग हो।

। मग्र मानवीय दृष्टि मल वर्मा मुझे याद है । वह एक लम्बा जलूस था, जो इमरजेन्सी से कुछ महीने इले दिल्ली में निकाला गया था। जयप्रकाशजी सबसे आगे थे। हजारों रोग उनके पीछे उमड़े पा रहे थे। देश के कोने-कोने से लोग जलूस में मिल होने पाये थे। मैं चलते-चलते अपनी पांत भूल बैठा और अजन- बयों के एक जत्थे में चला पाया। साथ चलनेवाले सज्जन से पूछा कि वह कहाँ से आये हैं ? "विहार से", उन्होंने कहा और तवतुरन्त बिना कुछ सोचे हुए मैं उनसे पूछ बैठा,"रेणुजी मी आये हैं ?" उन्होंने गद्गद् दृष्टि से मुझे देखा। "नहीं, वह बीमार हैं। या नहीं सके। आप उन्हें जानते हैं ?" मैं चुपचाप उनके साथ चलने लगा। आप उन्हें जानते हैं ? -यह प्रश्न बहुत देर तक मेरे भीतर गूंजता रहा। मैं उनसे केवल दो-तीन बार मिला था, पर आज भी मैं अांखें मूंदकर उनका चेहरा हूबहू याद कर सकता हूँ-उनके लम्बे झूलते बाल, एक संक्षिप्त-सी मुस्कराहट, जो सहज और अभिजात सौजन्य में भीगी रहती थी। कुछ लोगों में एक राजसी, 'अरिस्टोक्रेटिक' गरिमा होती है, जिसका ऊंचे या नीचे वर्ग से सम्बन्ध नहीं होता-वह सीधे संस्कारों से सम्बन्ध रखती है। रेणुजी में यह अभिजात भाव एक 'ग्रेस' की तरह व्याप्त रहता था। किन्तु जिस चीज़ ने सबसे अधिक मुझे अपनी तरफ खींचा वह उनका उच्छल हल्कापन था। वह छोटे-छोटे वाक्यों में संन्यासियों की तरह बोलते थे और फिर शरमा कर हंसने लगते थे। उनका 'हल्कापन' कुछ वैसा ही था जिसके बारे में चेखव ने एक बार कहा था, "कुछ लोग जीवन में बहुत भोगते-सहते हैं-- १४ / ऋणजल धनजल .

ऐसे आदमी ऊपर से बहुत हल्के और हंसमुख दिखायी देते हैं। वे अपनी पौड़ा दुसरों पर नही थोपते, क्योकि उनको शालीनता उन्हें अपनी पीड़ा का प्रदर्शन करने से रोकती है।" रेणु ऐसे ही 'शालीन' व्यक्ति थे। पता नहीं जमीन की कौन-सी गहराई से उनका हल्कापन ऊपर प्राता था। यातना को कितनी परतो को फोडकर उनकी मुस्कराहट में बिखर जाता या--यह जानने का मौका कभी नहीं मिल सका। वह अब नहीं हैं, मेरे लिए यह प्रव मी एक अखबारी अफ़वाह है, जिस पर में विश्वास नहीं कर पाता । उनको मृत्यु अभी तक मेरे लिए सत्य नहीं बनी है । मुझे हैरानी होती है कि उनकी बार-बार की बीमारी की सबर मुझे इस भयानक खबर के लिए तैयार नहीं कर पायो। हम कुछ मित्रों की बीमारी के इतने अभ्यस्त हो जाते हैं जैसे उनकी कुछ जानी- पहचानी मादतो के-मृत्यु से उनका सम्बन्ध विठाना असम्भव पौर मसहनीय जान पड़ता है। मुझे अपना दुस भी असम्भव जान पड़ता है। जिस व्यक्ति को केवल दो-तीन बार देखा था उसके न रहने से मुझे अपनी लिखने की दुनिया इतनी सूनी और सुनसान जान पडने लगेगी, मैंने कभी ऐसा नहीं सोचा था। अब सोचता हूँ. तो समझ में माता है, हमारी चीजों को चाहे बहुत कम लोग पढें किन्तु हम लिखते बहुत कम लोगो के लिए हैं। मैं जिन लोगो को ध्यान में रखकर लिखता था उनमें रेणु सबसे प्रमुख थे। मैं हमेशा सोचता था, पता नही मेरी यह कहानी, यह लेख, यह उपन्यास पढ़कर वह क्या सोचेंगे । यह खयाल ही मुझे कुछ छद्म और छिछला, कुछ दिखावटी लिखने से बचा लेता था। कुछ लोग हमेशा हम पर सेंसर का काम करते सत्ता का सेंसर नही, जिसमें भय और धमकी छिपी रहती है- किन्तु एक ऐसा सेंसर, जो हमारी पारमा मोर 'कांशस', हमारे रचना-कर्म की नैतिकता के साथ जुड़ा होता है। रेणुजी का होना, उनकी उपस्थिति ही एक अंकुश मौर वरदान थी। जिस तरह कुछ साधु-सन्तों के पास बैठ कर ही असीम कृतज्ञता का अहसास होता है, हम अपने भीतर घुल जाते हैं, स्वच्छ हो जाते हैं, रेणुजी की मूक उपस्थिति हिन्दी साहित्य मे कुछ ऐमी - ऋणजल धनजल/१५ - ही पवित्रता का बोध कराती थी। वह समकालीन हिन्दी साहित्य के सन्त लेखक थे। यहां मैं सन्त शब्द का उसके सबसे मौलिक और प्राथमिक अर्थो में इस्तेमाल कर रहा हूं---एक ऐसा व्यक्ति जो दुनिया की किसी चीज़ को त्याज्य और घृणास्पद नहीं मानता-~~-हर जीवित तत्त्व में पवित्रता और सौन्दर्य और चमत्कार खोज लेता है-इसलिए नहीं कि वह इस धरती पर उगनेवाली कुरूपता, अन्याय, अंधेरे और प्रांसुओं को नहीं देखता, बल्कि इन सबको समेटनेवाली अबाध प्राणवत्ता को पहचानता है; दलदल को कमल से अलग नहीं करता, दोनों के बीच रहस्यमय और अनिवार्य रिश्ते को पहचानता है। सौन्दर्य का असली मतलव मनोहर चीजों का रसास्वादन नहीं, बल्कि गहरे अर्थ में चीज़ों के पारस्परिक सार्वभौमिक, देवी रिश्ते को पहचानना होता है. इसलिए उसमें एक असीम साहस और विवेक तथा विनम्रता छिपी रहती है। इस अर्थ में हर सन्त-व्यक्ति अपनी अन्तर्दृष्टि में कवि और हर कवि अपने सृजनात्मक कर्म में सन्त होता है। रेणुजी का समूचा लेखन इस रिश्ते की पहचान है, इस पहचान की गवाही है और यह गवाही वह सिर्फ अपने लेखन में ही नहीं, जिन्दगी के नैतिक फ़ैसलों, न्याय और अन्याय, सत्ता और स्वतन्त्रता की संघर्ष-भूमि में भी देते हैं। रेणुजी की इस पहचान में सौन्दर्य की नैतिकता उतनी ही महत्त्वपूर्ण है जितनी नैतिक अन्तर्दृष्टि की संवेदना। दोनों के भीतर एक रिश्ता है, जिसके एक छोर पर 'मैला आँचल' है, तो दूसरे छोर पर है जयप्रकाशजी की सम्पूर्ण क्रान्ति । दोनों अलग-अलग नहीं है-वे एक ही स्वप्न, एक लालसा, एक 'विज़न' के दो पहलू हैं । एक-दूसरे पर टिके हैं। कलात्मक 'विजन' और क्रान्ति दोनों की पवित्रता उनकी समग्र दृष्टि में निहित है, सम्पूर्णता की मांग करती है : एक ऐसी सम्पूर्णता, जो समझौता नहीं करती, भटकती नहीं, सत्ता के टुकड़ों पर या कोरे सिद्धान्तों की आड़ में अपने को दूपित नहीं करती। वह एक ऐसा मूल्य है जो खुली हवा में सांस लेता है और इसलिए अन्तिम रूप से पवित्र और सुन्दर और स्वतन्त्र है। यह प्राकस्मिक नहीं था कि रेणुजी की इस समग्र मानवीय दृष्टि को १६ /ऋणजल धनजल - - -- अनेक जनवादी और प्रगतिवादी मालोचक सन्देह की दृष्टि से देखते ये-- कमा है यह मजीव लेखक, जो गरीवी की यातना के भीतर मी इतना रस, संगीत, इतना मानन्द छक सकता है, मूखो-परतो जमीन के उदास मरुस्थल में मुरों, रंगों और गंधों को रासलीला देख सकता है। सौन्दर्य को बटोर सकता है, प्रासुमों को परखता है, किन्तु उसके भीतर से झांकती धूल- धूरित मुस्कान को देखना नहीं भूलता--एक सौन्दर्यवादी की तरह नही, जो मुन्दरता को अन्य जीवित तत्त्वों से अलग करके उनका रसा- स्वादन करता है । रेणु एथोस्ट नहीं थे। किन्तु वह हाय-हाय करते, छाती पोटते प्रगतिशील लोगों के माडम्वर से बहुत दूर थे, जो मनुष्यो की यातना को उसके समूचे जीवन से अलग करके अपने सिद्धान्तों को लेबोरेटरी में एक रसायन की तरह इस्तेमाल करते हैं। कितनी बड़ी विडम्बना थी कि मार्क्सवादी मालोचक, जिन्हें सबसे पहले रेणुजी के महत्त्व को पहचानना था, अपने थोथे नारों में इतना आत्मलिप्त हो गये कि जनवादिता को दुहाई देते हुए सीधे अपनी नाक के नीचे जीवन्त जनवादी लेखक की अवहेलना करते रहे। किन्तु यहाँ मैं गलत हूँ। यह विडम्बना नहीं थी। यह एक ऐसी दृष्टि की भयानक परिणति थी जो एक तरफ अपने को प्रगतिशील घोपित करता था, दूसरी तरफ बिहार के जन-आन्दोलन को फासिस्ट और जयप्रकाशजी को देशद्रोही करार कर सकती थी : वह दुष्टि, जो शब्दों के साथ इतना सिनिकल ढंग से बलात्कार कर सकती है, यदि रेणु जी को प्रतिगामी, सौन्दर्यवादी लेखक प्रमाणित करने की कोशिश करे तो हम सोम अवश्य हो, पाश्चर्य नहीं होना चाहिए। रेणुजी ने बहुत निकट से मनुष्य को पीडा, मजबूरी पोर गरीवी को देखा था, इसलिए वह उसके साथ कोई मंदालिक खिलवाड नहीं कर पाते थे। साहित्य मे वह ऐसी उम्र में पाये थे जब अनेक लेखक वहुत-मी किताबें लिख चुके होते हैं। वह अपने साय अनुभवों की पूरी सम्पदा लाये ये। ये मनुभव उनके उपन्यासो में इतने ताजे और तात्कालिक जान पड़ते हैं कि लगता है कि जैसे उनके पात्रो में मिट्टी के जरें चिपके हैं, जिन्हें पमी- अभी उन्होंने धरती से निकालकर अपनी कथानों मे पिरोया है। उन्होंने जिस मूदम संवेदना मोर गहरे लगाव से बिहार के एक अंचल पूणिया की ही पवित्रता का बोध कराती थी। वह समकालीन हिन्दी साहित्य के सन्त लेखक थे। यहाँ मैं सन्त शब्द का उसके सबसे मौलिक और प्राथमिक अर्थो में इस्तेमाल कर रहा हूं--एक ऐसा व्यक्ति जो दुनिया की किसी चीज़ को त्याज्य और घृणास्पद नहीं मानता-~-हर जीवित तत्त्व में पवित्रता और सौन्दर्य और चमत्कार खोज लेता है----इसलिए नहीं कि वह इस धरती पर उगनेवाली कुरूपता, अन्याय, अंधेरे और आंसुओं को नहीं देखता, बल्कि इन सबको समेटनेवाली अवाध प्राणवत्ता को पहचानता है। दलदल को कमल से अलग नहीं करता, दोनों के बीच रहस्यमय और अनिवार्य रिश्ते को पहचानता है। सौन्दर्य का असली मतलब मनोहर चीजों का रसास्वादन नहीं, बल्कि गहरे अर्थ में चीज़ों के पारस्परिक सार्वभौमिक, देवी रिश्ते को पहचानना होता है-इसलिए उसमें एक असीम साहस और विवेक तथा विनम्रता छिपी रहती है। इस अर्थ में हर सन्त-व्यक्तिः अपनी अन्तर्दृष्टि में कवि और हर कवि अपने सृजनात्मक कर्म में सन्त होता है । रेणुजी का समूचा लेखन इस रिश्ते की पहचान है, इस पहचान की गवाही है और यह गवाही वह सिर्फ अपने लेखन में ही नहीं, जिन्दगी के नैतिक फ़ैसलों, न्याय और अन्याय, सत्ता और स्वतन्त्रता की संघर्ष-भूमि में भी देते हैं। रेणुजी की इस पहचान में सौन्दर्य की नैतिकता उतनी ही महत्त्वपूर्ण है जितनी नैतिक अन्तर्दृष्टि की संवेदना। दोनों के भीतर एक रिश्ता है, जिसके एक छोर पर 'मला आँचल' है, तो दूसरे छोर पर है जयप्रकाशजी की सम्पूर्ण क्रान्ति । दोनों अलग-अलग नहीं हैं---वे एक ही स्वप्न, एक लालसा, एक "विज़न' के दो पहलू हैं। एक-दूसरे पर टिके हैं। कलात्मक 'विज़न' और क्रान्ति दोनों की पवित्रता उनकी समग्न दृष्टि में निहित है, सम्पूर्णता की मांग करती है : एक ऐसी सम्पूर्णता, जो समझौता नहीं करती, भटकती नहीं, सत्ता के टुकड़ों पर या कोरे सिद्धान्तों की आड़ में अपने को दूपित नहीं करती। वह एक ऐसा मूल्य है जो खुली हवा में सांस लेता है और इसलिए अन्तिम रूप से पवित्र और सुन्दर और स्वतन्त्र है। यह आकस्मिक नहीं था कि रेणुजी की इस समग्र मानवीय दृष्टि को १६ /ऋणजल धनजल .

अनेक जनवादी और प्रगतिवादी पालोचक सन्देह की दृष्टि से देखते थे- कमा है यह अजीब लेखक, जो गरोबी की यातना के भीतर मी इतना रस, संगीत, इतना मानन्द छक सकता है, मूखी-परती जमीन के उदास मस्स्थल मे मुरों, रंगों और गंधों की रासलीला देख सकता है। सौन्दर्य को बटोर सकता है, प्रांसुओं को परखता है, किन्तु उसके भीतर से झांकती धूल- धूसरित मुस्कान को देखना नहीं भूलता-एक सौन्दर्यवादी की तरह नही, जो सुन्दरता को अन्य जीवित तत्त्वों से अलग करके उनका रसा- स्वादन करता है । रेणु एथोस्ट नहीं थे। किन्तु वह हाय-हाय करते, छाती पीटते प्रगतिशील लोगों के माडम्बर से बहुत दूर थे, जो मनुष्यों की यातना को उसके समूचे जीवन से अलग करके अपने सिद्धान्तों को लेबोरेटरी में एक रसायन की तरह इस्तेमाल करते हैं । कितनी बड़ी विडम्बना थी कि माक्र्सवादी मालोचक, जिन्हें सबसे पहले रेणुजी के महत्त्व को पहचानना था, अपने थोथे नारों में इतना प्रात्मलिप्त हो गये कि जनवादिता की दुहाई देते हुए सीधे अपनी नाक के नीचे जीवन्त जनवादी लेखक की अवहेलना करते रहे। किन्तु यहाँ मैं गलत हूँ। यह विडम्बना नहीं थी। यह एक ऐसी दृष्टि की भयानक परिणति यी जो एक तरफ अपने को प्रगतिशील घोषित करता था, दूसरी तरफ बिहार के जन-आन्दोलन को फ़ासिस्ट और जयप्रकाशजी को देशद्रोही करार कर सकती थी : वह दृष्टि, जो शब्दो के साथ इतना सिनिकल ढंग से बलात्कार कर सकती है, यदि रेणु जी को प्रतिगामी, सौन्दर्यवादी लेखक प्रमाणित करने की कोशिश करे तो हमे क्षोभ अवश्य हो, पाश्चयं नहीं होना चाहिए। रेणुजी ने बहुत निकट से मनुष्य को पीडा, मजबूरी और गरीवी को देखा था, इसलिए वह उसके साथ कोई संद्धान्तिक खिलवाड नहीं कर पाते थे। साहित्य मे वह ऐसी उम्र में पाये थे जब अनेक लेखक बहुत-सी किताबें लिख चुके होते हैं । वह अपने साथ अनुभवों को पूरी सम्पदा लाये अनुभव उनके उपन्यासो मे इतने ताजे और तात्कालिक जान पड़ते हैं कि लगता है कि जैसे उनके पात्रों मे मिट्टी के जरें चिपके हैं, जिन्हें अभी- मभी उन्होने धरती से निकालकर अपनी कथामों में पिरोया है। उन्होने जिस सूक्ष्म सवेदना और गहरे लगाव से बिहार के एक अंचल पूणिया की जमीन को कुरेदा था उसके फैलाव को महीन और मांसलछवियों में ध्वनित किया था, उसके लिए गद्य की भाषा को अप्रत्याशित रूप से काव्यात्मक मुहावरे में ढाला था-वह हिन्दी उपन्यास में अभूतपूर्व घटना थी। अभूत- पर्व इस अर्थ में नहीं कि उनसे पूर्व किसी अन्य लेखक ने अपने गांव या क्षेत्र पर उपन्यास नहीं लिखे थे। अनेक कथाकारों का नाम लिया जा सकता है, जिन्होंने उनसे पहले भी पांचलिक उपन्यास लिखे थे। रेणु का स्थान यदि अपने पूर्ववर्ती और समकालीन आंचलिक कथाकारों से अलग और विशिष्ट है तो वह इसमें हैं कि पांचलिक उनका सिर्फ परिवेश था, उसके भीतर बहती जीवनधारा स्वयं अपने अंचल की सीमायो का उल्लंघन करती थी। रेणु का महत्त्व उनकी प्रांचलिकता में नहीं, आंचलिकता के अतिक्रमण में निहित है । विहार के एक छोटे भूखण्ड की हथेली पर उन्होंने समूचे उत्तरी भारत के किसान की नियति-रेखा को उजागर किया था। यह रेखा किसान की किस्मत और इतिहास के हस्तक्षेप के बीच गुंथी हुई थी, जहां गांधीजी का सत्याग्रह आन्दोलन, सोशलिस्ट पार्टी के आदर्श, किसान सभानों की मीटिंगें अलग-अलग घागों से रेणु का संसार बुनती हैं । सैकड़ों पात्र पाते हैं, जाते हैं-उनकी गति, उनका ठहराव, उनकी ऊहा- पोह और प्रात्मसंघर्ष एक पूरी इमेज हम पर अंकित कर जाता है । सिनेमा के परदे पर हम जैसे ग्राइन्स्टाइन की फ़िल्मों में व्यक्ति और समूह, चलती हुई भीड़ में स्तव्ध चेहरे और अनेक का गत्यात्मक द्वन्द्व, हलचल और तनाव देखते हैं; बिल्कुल जैसे पूर्णिया के परदे पर उसकी पीठिका में हम भारतीय ग्रामवासी और इतिहास के बीच मुठभेड़ और टकराव की गड़- गड़ाहट सुनते हैं। एक ऐसा क्षण आता है जब पात्र और पीठिका में कोई अन्तर नहीं रहता-दोनों एक-दूसरे में इतना गुंथ जाते हैं कि मनुष्य, घरती और इतिहास के बीच सीमाएँ धुल-सी जाती हैं किन्तु प्रापसी मुठ- भेड़ से जो विजली चमकती है, विहार के अवसन्न, धूलभरे आकाश में जो चिनगारी कौंधती है, रेणु ने कैमरे की आँखों से उसे अपनी जीवन्त फड़- फड़ाती तात्कालिकता में पकड़ने की कोशिश की थी। यह अद्भुत ड्रामा था! शायद ही किसी हिन्दी उपन्यासकार ने उप- १८/ऋणजल धनजल ग्यास की 'नेरेटिव' परम्परा को मिझोड़ कर उसे प्रेमवन्दीय ढांचे से बाहर निकाल कर इतना नाटकीय, इतना लचीला, इतना काव्यात्मक बनाया था जितना रेण ने और यह नाटकीयता, यह कविता अलंकारमय भोर कृषिम नहीं थी, क्योंकि परम्पराग्रस्त किसान मोर माधुनिक ऐति- हासिक आन्दोलन के बीच जिस मुठभेड को रेणु ने अपना विषय बनाया था उसमें पहले से ही बारूदी नाटकीय विद्यमान थे। उनमें सिर्फ दिया, सलाई लगाने की देर थी। रेणु ने जिस तीली से किसान के उदास, धूल-धूसरित क्षितिज में छिपी नाटकीयता को आलोकित किया था उसी तीली से हिन्दी के परम्परागत यथार्थवादी उपन्यास के ढांचे को भी एकाएक ढहा दिया था। मेरे विचार में यह रेण की अविस्मरणीय देन मोर उपलब्धि है। मेला पांचल मौर परती परिकथा महज़ उत्कृष्ट प्रांचलिक उपन्यास नहीं हैं, वे भारतीय साहित्य मे पहले उपन्यास हैं जिन्होंने अपने अमित ढंग से, झिझकते हुए भारतीय उपन्यास को एक नयी दिशा दिखायी थी, जो यथार्थवादी उपन्यास के ढांचे से बिल्कुल भिन्न थी। उन्होंने उपन्यास की नरेटिव, कथ्यात्मक परम्परा को तोड़ा था -उसे अलग-अलग 'एपीसोड' में बांटा था, जिन्हें जोड़नेवाला धागा कया का सूत्र नहीं, परिवेश का ऐसा लंडस्केप या जो अपनी प्रात्यन्तिक लय में उपन्यास को रूप और फॉर्म देता है। रेणुजी के यहाँ समय में बंधी घटनाएं नही, ऊबडखाबड जिन्दगियो की यह लय, यह स्पंदन उपन्याम के हिस्सो को एक-दूसरे से जोडता है। रेणुजी पहले कथाकार ये जिन्होंने भारतीय उपन्यास की जातीय सम्भावनामों की तलाश की थी; शायद सजग रूप से कही, शिल्प मौर सिद्धान्त के स्तर पर तो अवश्य ही नहीं, बल्कि एक ऐसे रचनात्मक स्तर पर जहाँ ज़िन्दगी का कच्चा माल स्वय कलाकार के हाथो अपने प्राण, जो फॉर्म का दूसरा काम है, खीच लेता है, ताकि वह एक नये खुले, मुक्त ढांचे मे सांस ले सके । फॉर्म को असली उपलब्धि इसी प्राणवत्ता में निहित है-- बाकी सव प्रश्न तकनीकी और शिल्प के हैं । पालोचक की बहस का विषय जरूर हों, कथाकार का उनसे कोई नाता नहीं। - - में रेणु जी की मृत्यु को असामयिक नहीं कहूंगा। हर मृत्यु एक तरह से असामयिक होती है, क्योंकि जिन्दगी का कारोबार किसी विन्दु पर पूरा नहीं होता, किन्तु खास इस दौर में-इमेरजेंसी की यातना के बाद उनका अचानक हमारे बीच से चला जाना बहुत पूर और असहनीय जान पड़ता है। यह उनकी विजय का क्षण था और वह नहीं हैं ! २०/णजल धनजल ऋणजल धनजल

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- वाढ़ : १६७५

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कुत्ते की आवाज़ मेरा गांव ऐसे इलाके में है जहां हर साल पश्चिम, पूरब और दक्षिण की-कोशी, पनार, महानंदा और गंगा की-बाढ से पीड़ित प्राणियों के ममूह पाकर पनाह लेते हैं, सावन-भादों मे ट्रेन को खिड़कियों से विशाल और सपाट परती पर गाय, बैल, मैस, भेड़, बकरों के हजारों झुण्ड-मुण्ड देखकर ही लोग बाढ़ की विभीपिका का अन्दाज लगाते हैं। परती क्षेत्र में जन्म लेने के कारण अपने गांव के प्रधिकांश लोगो की तरह मैं भी तैरना नहीं जानता। किन्तु दस वर्ष की उम्र से पिछले साल तक-वॉप स्काउट, स्वयंसेवक, राजनीतिक कार्यकर्ता अथवा रिलीफ- वर्कर की हैसियत से बाढ-पीड़ित क्षेत्रों में काम करता रहा हूँ। और लिखने की बात ? हाई स्कूल में वाढ पर लेख लिखकर प्रथम पुरस्कार पाने से लेकर-'धर्मयुग' में 'कथा-दशक' के अन्तर्गत बाढ की पुरानी कहानी को नये पाठ के साथ प्रस्तुत कर चुका हूँ। जय गंगा (1947), डायन कोशी (48), हड्डियों का पुल (48) प्रादि छुटपुट रिपोर्ताज के मलावा मेरे कई उपन्यासो में बाढ़ की विनाश-लीलामो के अनेक चित्र अंकित हुए हैं । किन्तु, गांव में रहते हुए बाढ़ से घिरने, बहने, मसने और भोगने का अनुभव कभी नही हुमा । वह तो पटना शहर मे 1967 मे ही हुमा, जब अट्ठारह घण्टे की अविराम वृष्टि के कारण पुनपुन का पानी राजेन्द्र नगर, कंकड़ बाग तथा अन्य निचले हिस्मो मे घुस प्राया था। मर्थात् बाढ को मैंने भोगा है, शहरी प्रादमी की हैसियत से । इसलिए इस बार जब बाढ़ का पानी प्रवेश करने लगा, पटना का पश्चिमी इलाका छाती-मर पानी में डूब गया तो हम घर में इंधन, पाल, मोमबत्ती दियासलाई, सिगरेट, पीने का पानी और काम्पोज़ की गोलियां जमाकर बैठ गये और प्रतीक्षा करने लगे। सुबह सुना, राजभवन और मुख्यमंत्री-निवास प्लवित हो गया है। दोपहर में सूचना मिली, गोलघर जल से घिर गया है ! (यों, सूचना बंगला में इस वाक्य से मिली थी-"जानो! गोलघर डूबे गेछे !") और पांच बजे जव कॉफ़ी हाउस जाने के लिए (तथा शहर का हाल मालूम करने) निकला तो रिक्शेवाले ने हँसकर कहा--"अव कहाँ जाइयेगा? कॉफ़ी हाउस में तो 'अबले' पानी आ गया होगा।" "चलो, पानी कसे घुस गया है, वही देखना है," कहकर हम रिक्शा पर बैठ गये। साथ में नयी कविता के एक विशेषज्ञ व्याख्याता-प्राचार्य- कवि मित्र थे, जो मेरी अनवरत अनर्गल-अनगढ़ गद्यमय स्वगतोक्ति से कभी बोर नहीं होते (धन्य हैं !)। मोटर, स्कूटर, ट्रेक्टर, मोटर साइकिल, ट्रक, टमटम, साइकिल, रिक्शा पर और पैदल लोग पानी देखने जा रहे हैं, लोग पानी देखकर लौट रहे हैं। देखनेवालों की प्रांखों में, जुबान पर एक ही जिज्ञासा- 'पानी कहाँ तक पा गया है ?' देखकर लौटते हुए लोगों की बातचीत "फेजर रोड पर आ गया! आ गया क्या, पार कर गया। श्रीकृष्ण- पुरी, पाटलिपुत्र कॉलोनी, बोरिंग रोड, इण्डस्ट्रियल एरिया का कहीं पता नहीं 'अव भट्टाचार्जी रोड पर पानी आ गया होगा।''छाती-भर पानी है। विमेंस कॉलेज के पास 'डुवाव-पानी' है । 'पा रहा है ! ""आ गया !! .."घुस गया 'डूब गया. डूब गया. बह गया !" हम जब कॉफ़ी हाउस के पास पहुँचे, कॉफ़ी हाउस वन्द कर दिया गया था। सड़क के एक किनारे एक मोटी डोरी की शक्ल में गेरुमा-भाग-फेन में उलझा पानी तेजी से सरकता पा रहा था। मैंने कहा-"प्राचार्यजी, प्रागे जाने की जरूरत नहीं। वह देखिए-~~पा रहा है। मृत्यु का तरल A अातंक के मारे मेरे दोनों हाथ बरबस जुड़ गये और सभय प्रणाम- निवेदन में मेरे मुंह से कुछ अस्फुट शब्द निकले (हाँ, मैं बहुत कायर और २४ / ऋणजल धनजल । दरपोक हूँ!)। रिक्शावाला बहादुर है । कहता है-"चलिए न-योड़ा और भागे !" मोड का एक प्रादमी बोला-"ए रिवशा, करेंट बहुत तेज है। प्रागे मत जामो!" मैंने रिक्शावाले से अनुनय-भरे स्वर में कहा-~"लौटा ले मैया । आगे बढ़ने की जरूरत नहीं।" रिक्शा मोड़कर हम 'अप्सरा' सिनेमा हॉल (सिनेमा-शो वन्द ! ) के दगल मे गांधी मैदान को प्रोर चले। पैलेस होटल और इण्डियन एपर लाइंस दास्तर के सामने पानी भर रहा था। पानी की तेज धारा पर लाल. हरे नियन' विज्ञापनों की परछाइयां सैकड़ों रंगीन सांपों की मृष्टि कर रही थीं। गांधी मैदान की रेलिंग के सहारे हजारों लोग सडे देख रहे थे। दशहरा के दिन रामलीला के 'राम' के रथ की प्रतीक्षा में जितने लोग रहते हैं उससे कम नहीं थे.. गांधी मैदान के मानन्द-उत्सव, सभा-मम्मेलन और खेल-कूद की सारी स्मृतियों पर धीरे-धीरे एक गंरिक पावरण पाच्छादित हो रहा था। हरियाली पर शनैः-दान: पानी फिरते देखने का अनुभव सर्वया नया था। कि इसी बीच एक अधेड़, मुस्ट ण्ड और गंवार जोर-जोर से बोल उठा --ईह ! जब दानापुर डूब रहा था तो पनियां बाबू लोग उलटकर देखने भी नहीं गये."भव बूझो !' मैंने अपने माचार्य-कवि मित्र से कहा-"पहचान लीजिए । यही है वह 'माम पादमी', जिसकी खोज हर साहित्यिक गोष्ठियों में होती रहती हैं । उसके वक्तव्य में 'दानापुर' के बदले 'उत्तर विहार' प्रयवा कोई भी वादग्रस्त प्रामीण क्षेत्र जोड् दीजिए..." माम के साढ़े सात बज चुके पोर आकाशवाणी के पटना-केन्द्र से स्थानीय समाचार प्रसारित हो रहा था। पान की दुकानो के सामने खड़े लोग चुपवाप, उत्कर्ण होकर सुन रहे थे." .. पानी हमारे स्टुडियो को सीढ़ियों तक पहुंच चुका है और किसी भी क्षण स्टूडियो में प्रवेश कर सकता है।"

। समाचार दिल दहलानेवाला था। कलेजा धड़क उठा । मित्र के चेहरे पर भी अातंक की कई रेखाएं उभरीं। किन्तु हम तुरन्त ही सहज हो गये; यानी चेहरे पर चेष्टा करके सहजता ले पाये, क्योंकि हमारे चारों ओर कहीं कोई परेशान नज़र नहीं पा रहा था। पानी देखकर लौटे हुए लोग श्राम दिनों की तरह हंस-बोल रहे थे; बल्कि आज तनिक अधिक ही उत्सा- हित थे। हां, दुकानों में थोड़ी हड़बड़ी थी। नीचे के सामान अपर किये जा रहे थे। रिक्शा, टमटम, ट्रक और टेम्पो पर सामान लादे जा रहे थे। खरीद-बिक्री वन्द हो चुकी थी। पानवालों की बिक्री अचानक बढ़ गयी थी। आसन्न संकट से कोई प्राणी आतंकित नहीं दिख रहा था । .. पानवाले के प्रादमकद आईने में उतने लोगों के बीच हमारी ही सूरतें 'मुहर्रमो' नज़र आ रही थीं। मुझे लगा, अब हम यहां थोड़ी देर भी ठहरेंगे तो वहां खड़े लोग किसी भी क्षण ठठाकर हम पर हंस सकते थे- 'जरा इन वुज़दिलों का हुलिया देखो ?' क्योंकि वहाँ ऐसी ही बातें चारों ओर से उछाली जा रही थीं.-"एक बार डूब ही जाये ! • ''धनुष्कोटि की तरह पटना लापता न हो जाये कहीं ! .."सब पाप धुल जायेगा" चलो, गोलघर के मुंडेरे पर ताश की गड्डी लेकर बैठ जायें "विस्कोमान बिल्डिंग की छत पर क्यों नहीं ? . . “भई, यही माकूल मौका है। इनकम टैक्सवालों को ऐन इसी मौके पर काले कारवारियों के घर पर छापा मारना चाहिए। प्रासामी बा-माल.. राजेन्द्रनगर चौराहे पर 'मंगजिन कॉर्नर' की आखिरी सीढ़ियों पर पत्र-पत्रिकाएँ पूर्ववत् विछी हुई थीं। सोचा, एक सप्ताह की खुराक एक ही साथ ले लूं। क्या-क्या ले लूं ? ..हेडली चेज, या एक ही सप्ताह में मच/जर्मन सिखा देनेवाली किताबें, अथवा 'योग' सिखानेवाली कोई सचित्र किताब ? मुझे इस तरह किताबों को उलटते-पलटते देखकर दुकान का नोजवान मालिक कृष्णा पता नहीं क्यों मुस्कराने लगा। किताबों को छोड़ कई हिन्दी-बंगला और अंगरेजी सिने पत्रिकाएं लेकर लौटा। मित्र से विदा होते हुए कहा-"पता नहीं, कल हम कितने पानी में रहें। "वहरहाल, जो कम पानी में रहेगा वह ज्यादा पानी में फंसे मित्र की सुधि लेगा।" - २६ / ऋणजल धनजल पलट में पहुंचा ही था कि 'जनसम्पर्क' को गाड़ी भी लाउडस्पीकर से घोषणा करती हुई राजेन्द्रनगर पहुंच चुकी थी। हमारे 'गोलम्बर' के पास कोई भी मावाज, चारो बड़े ब्लॉको की इमारतो से टकराकर मंडराती हुई, चार वार प्रतिध्वनित होती है। सिनेमा अथवा लॉटरी को प्रचारगाड़ी यहां पहुंचते ही–भाइयो' पुकारकर एक क्षण के लिए चुप हो जाती है। पुकार मंडराती हुई प्रतिध्वनित होती है--भाइयो"भाइयो"भाइयो ..! एक अलमस्त जवान रिक्शाचालक है जो अक्सर रात के सन्नाटे में सवारी पहुंचाकर लौटते समय इस गोलम्बर के पास मलाप उठता है- 'मुन मोरे बन्धू रे-ए-ए.."सुन मोरे मितवा-वाचा-य...' गोलम्बर के पास जनसम्पर्क की गाड़ी से ऐलान किया जाने लगा- 'भाइयो ! ऐसी सम्मावना है कि बाढ़ का पानी"रात्रि के करीब बारह बजे तक... .."लोहानीपुर, कंकड वाग"मोर राजेन्द्रनगर में घुस जाये। मत: भाप लोग सावधान हो जायें।' (प्रतिध्वनि । सावधान हो जायें ! सावधान हो जायें !! ...) मैंने गृहस्वामिनी से पूछा-'गैस का क्या हाल है ?" "वस, उसी का डर है । अव खत्म ही होनेवाला है। असल में सिलिए- हर में 'मीटर-उटर' की तरह कोई चीज नहीं होने से कुछ पता नहीं चलता। लेकिन, अन्दाज़ है कि एक या दो दिन कोयला है। स्टोव है। मगर किरासन एक ही वोतल...' "फिलहाल, बहुत है 'बाढ का भी यही हाल है। मोटर-उटर की तरह कोई चीज नहीं होने से पता नही चलता कि कब प्रा धमके।"-ने कहा। सारे राजेन्द्रनगर में सावधान-सावधान' ध्वनि कुछ देर गूंजती रही। ब्लॉक के नीचे की दुकानों से सामान हटाये जाने लगे। मेरे पलट के नीचे के दुकानदार ने, पता नहीं क्यो, इतना कागज इकट्ठा कर रखा था । एक मलाव लगाकर मुलगा दिया। हमारा कमरा धुएं से भर गया। फुटपाथ पर घुली चाय को झुग्गी दुकानो मे सिगड़ियां सुलगी हुई थी और यहां बहुत रात तक मण्डली बनाकर शोर-जोर से बातें करने का रोज का सिलसिला जारी था। बात के पहले या बाद मे बगैर कोई गाली । पाजल धन जल/२७ जोड़े यहां नहीं बोला जाता-"गांधी मैदान (सरवा) एक दम लवा- लब भर गया."(अरे तेरी मतारी का) करंट में इतना जोर का फोर्स है कि (ससुरा) रिक्शा लगा कि उलटिये जायेगा.''गांजा फुरा गया का हो रामसिंगार? चल जाय एक चिलम 'बालुवरी-माल'---फिर यह शहर (वेट्चः) डूबे या उबरे।" विजली ऑफिस के 'वाचमैन साहेब' ने पच्छिम की ओर मुंह करके ब्लॉक नम्बर एक के नीचे जमी दूसरी मण्डली के किसी सदस्य से ठेठ मगही में पूछा-~~"का हो ? पनियां पा रहलो है ?" जवाब में एक कुत्ते ने रोना शुरू किया। फिर दूसरे ने सुर में सुर मिलाया। फिर तीसरे ने। करुण प्रार्तनाद की भयोत्पादक प्रतिध्वनियां सुनकर सारी काया सिहर उठी। किन्तु एक साथ करीब एक दर्जन मानव- कण्ठों से गालियों के साथ प्रतिवाद के शब्द निकले.-"मार स्साले को। अरे चुप चोप! (प्रतिध्वनि : चोप! चौप! चौप !!): कुत्ते चुप हो गये। किन्तु आनेवाले संकट को वे अपने 'सिक्स्थ सेंस' से भांप चुके थे. अचानक विजली चली गयी। फिर तुरत ही आ गयी" : शुक्र है ! भोजन करते समय मुझे टोका गया-"की होलो? खाच्छो ना केन ?" "साच्छि तो "खा तो रहा हूँ।" ~ मैंने कहा--"याद है ! उस वार जव पुनपुन का पानी प्राया था तो सबसे अधिक इन कुत्तों की दुर्दशा हुई थी।" हमें 'भाइयो ! भाइयो ! सम्बोधित करता हुआ जनसम्पर्कवालों का स्वर फिर गूंजा । इस बार 'ऐसी सम्भावना है' के बदले 'ऐसी आशंका है' कहा जा रहा था । और ऐलान में 'खतरा' और 'होशियार' दो नये शब्द जोड़ दिये गये थे.."याशंका! खतरा! होशियार'.. रात के साढ़े दस-ग्यारह बजे तक मोटर-गाड़ियां, रिक्शे, स्कूटर. सायकिल तथा पैदा चलनेवालों की 'श्रावाजाही' कम नहीं हुई। और दिन तो अव तक सड़क सूनी पड़ जाती थी ! ...पानी भव तक आया नहीं ? सात बजे शाम को फेजर रोड से प्रागे बढ़ चुका था। २८ / ऋणजल धनजल

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। - नहीं, कुकुर नहीं. "कुकुर को भगानो!" बीमार नौजवान सप्-से पानी में उतर गया-"हमारा कुकुर नहीं जायेगा तो हम हैं नहीं जायेगा।" फिर कुत्ता भी छपाक् पानी में गिरा--"हमारा आदमी नहीं जायेगा तो हम हुँ नहीं जायेगा".. परमान नदी की बाढ़ में डूबे हुए एक 'मुहसरी' (मुहसरों की वस्ती) में हम राहत बांटने गये । खबर मिली थी वे कई दिनों से मछली और चूहों को झुलसाकर खा रहे हैं। किसी तरह जी रहे हैं। किन्तु टोले के पास जब हम पहुंचे तो ढोलक और मंजीरा की आवाज़ सुनायी पड़ी। जाकर देखा, एक ऊँची जगह मचान' बनाकर स्टेज की तरह बनाया गया है । 'बलवाही' नाच हो रहा था। लाल साड़ी पहनकर काला-कलूटा 'नटुमा' दुलहिन का हाव-भाव दिखला रहा था; यानी, वह 'धानी' है। 'घरनी' धानी घर छोड़कर मायके भागी जा रही है और उसका घरवाला (पुरुष) उसको मनाकर राह से लौटाने गया है। घरनी कहती है "तुम्हारी बहन की जुबान बड़ी तेज़ है। दिन-रात खराव गाली बकती रहती है और तुम्हारी बुढ़िया मां वात के पहले तमाचा मारती है। मैं तुम्हारे घर लौटकर नहीं जाती।" तब घरवाला उससे कहता है, यानी गा-गाकर समझाता है.---'चल गे धानो घर धुरी, बहिनिक देवै टांग तोड़ी धानी गे, बुढ़िया के करवे घर से वा-हा-र' (मो धानी, घर लौट चलो! वहन के पैर तोड़ दूंगा और बुढ़िया को घर से बाहर निकाल दूंगा!) इस पद के साथ ही ढोलक पर द्रुत ताल बजने लगा--'धागिड़गिड़ धागिड़गिड़- चकैके चकधुम चकैके चकधुम-चकधुम चकधुम !' कीचड़-पानी में लथपथ भूखे-प्यासे नर-नारियों के झुण्ड में मुक्त खिलखिलाहट लहरें लेने लगती है। हम रिलीफ़ बाँटकर भी ऐसी हंसी उन्हें दे सकेंगे क्या! (शास्त्रीजी, आप कहाँ हैं ? बलवाही नाच की वात उठते ही मुझे अपने परम मित्र भोला शास्त्री की याद हमेशा क्यों आ जाती है ? यह कभी वाद में !)"एक वार, १६३७ में, सिमरवनी-शंकरपुर में बाढ़ के समय 'नाव' को लेकर लड़ाई हो गयी थी। मैं उस समय 'बालचर' (ब्वाय स्काउट) था। गांव के लोग नाव के अभाव में केले के पौधों का 'भेला' बनाकर किसी तरह काम चला रहे थे और वहीं सवर्ण ज़मींदार के लड़के नाव पर हारमोनियम-तवला के साथ 'झिझिर' (जल-विहार) करने निकले थे। गांव के नौजवानों ने मिलकर - ३० ऋणजल धनजल

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! रामसिंगार की मण्डली डॉटकर चुप करा देती है। चोप.. चोप! मुझे अचानक अपने उन मित्रों और स्वजनों की याद आयी जो कल से ही पाटलिपुत्र कॉलोनी, श्रीकृष्णपुरी, बोरिंग रोड के अथाह जल में घिरे हैं. जितेन्द्रजी, विनीताजी, वाबू भैया इन्दिराजी, पता नहीं कैसे है--किस हाल में हैं वे ! शाम को एक बार पड़ोस में जाकर टेलिफोन करने के लिए चोंगा उठाया-बहुत देर तक कई नम्बर डायल करता रहा। उधर सन्नाटा था एकदम । कोई शब्द नहीं-~~-'टुग फुग' कुछ भी नहीं। विस्तर पर करवट लेते हुए फिर एक बार मन में हुग्रा, कुछ लिखना चाहिए। लेकिन क्या लिखना चाहिए ? कुछ भी लिखना सम्भव नहीं और क्या ज़रूरी है कि कुछ लिखा ही जाये ? नहीं। फिर स्मृतियों को जगाऊँ तो अच्छा'. पिछले साल अगस्त में नरपतगंज थाना के चकरदाहा गाँव के पास छाती-भर पानी में खड़ी एक आसन्नप्रसवा हमारी मोर गाय की तरह टुकुर-टुकुर देख रही थी... नहीं, अब भूली-बिसरी याद नहीं। बेहतर है, अांखें मूंदकर सफ़ेद भेडों के झुण्ड देखने की चेष्टा करूं.."उजले-उजले, सफ़ेद भेड़.. सफ़ेद भेड़ों के झुण्ड । झण्ड'"किन्तु सभी उजले भेड़ अचानक काले हो गये। वार-बार आँखें खोलता हूं, मूंदता हूं। काले को उजला करना चाहता हूँ। भेड़ों के झुण्ड भूरे हो जाते हैं। उजले भेड़.."उजले भेड़ 'काले भूरे किन्तु उजले 'उजले ''गेंहुए रंग के भेड़... ! "ओई द्याखो-एसे गेछ जल !"-झकझोरकर मुझे जगाया गया। घड़ी देखी, ठीक साढ़े पांच बज रहे थे। सवेरा हो चुका थापा रहलो है ! आ रहलो है पनियां । पानी आ गेलो। हो रामसिंगार ! हो मोहन ! हो रामचन्तर--अरे हो. आँखें मलता हुआ उठा। पच्छिम की ओर, थाना के सामने सड़क पर मोटी डोरी की शक्ल में-मुंह में झाग-फेन लिये-पानी आ रहा है। ठीक वैसा ही जैसा शाम को कॉफ़ी हाउस के पास देखा था। पानी के साथ- साथ चलता हुआ, किलोल करता हुप्रा बच्चों का एक दल"उधर, पच्छिम-दक्षिण कोने पर-~दिनकर अतिथिशाला से और आगे-~-भंगी वस्ती के पास बच्चे कूद क्यों रहे हैं ? नहीं, बच्चे नहीं, पानी है । वहाँ . ३२ /भणजल धनजल मोड़ है, थोडा अवरोध है-इसलिए पानी उछल रहा है पच्छिम-उत्तर को मोर,ब्लॉक नम्बर एक के पास -पुलिस चौकी के पिछवाड़े में पानी का पहला रेला माया"लॉक नम्वर चार के नीचे सेठ की दुकान के बायें वाजू मे लहरें नाचने लगी। अब मैं दौड़कर छत पर चला गया। चारों ओर शोर-कोलाहल- कलरव-चीख-पुकार मोर पानी का कलकल रव । लहरों का नर्तन । सामने फुटपाप को पारकर प्रब पानी हमारे पिछवाडे मे सशक्त बहने लगा है। गोलम्बर के गोल पार्क के चारों ओर पानी नाच रहा है. 'आ गया, श्रा गया ! पानी बहुत तेजी से बढ़ रहा है, चढ रहा है, करेण्ट कितना तेज है ? सोन का पानी है । नहीं, गंगाजी का है। प्रा गेलो... मामने की दीवार की ईंटें जल्दी-जल्दी डूबती जा रही हैं । बिजली के खम्भे का काला हिस्सा डूब गया। ताड के पेड़ का तना क्रमश: इवता जा रहा है"हब रहा है। .."मभी यदि मेरे पास मूवी कैमरा होता, अगर एक टेप रेकॉर्डर होता! वाढ तो बचपन से ही देखता प्राया है, किन्तु पानी का इस तरह पाना कमी नहीं देखा । अच्छा हुप्रा जो रात में नही पाया। नही तो भय के मारे न जाने मेरा क्या हाल होता. "देखते ही देखते गोल पार्क डूब गया। हरियाली लोप हो गयी। प्रव हमारे चारों ओर पानी नाच रहा था" "भूरे रंग के भेड़ों के मुण्ड । भेट दौड़ रहे हैं-भूरे भेड । वह चायवाले की झोंपडी गयी, गयो, चली गयी। काश, मेरे पास एक मूवी कैमरा होता, एक टेप रेकॉर्डर होता तो क्या होता? अच्छा है, कुछ भी नहीं। कलम थी, वह भी चोरी चली गयी। अच्छा है, कुछ भी नही-मेरे पास । मचानक सारी देह में कंपकंपी शुरू हुई। पानी के बढने की यह रफ्तार है तो पता नही पानी कितना बढे । वहाँ कोई बैठा थोडी है कि रोक देगा-प्रद नहीं, वम भव, हो गया । 'ग्राउण्ड-फ्लोर' में छाती-भर पानी है । इसके दाद भी यदि पानी बढता गया तो दूसरी मंजिल तक न भी पाये----कण्ट्रेक्टर द्वारा निर्मित यह मकान निश्चय ही दह जायेगा। १९६७ मे पुनपुन का पानी एक सप्ताह तक झेल चुके हैं ये मकान । हर साल घनघोर वर्षा के बाद कई दिनों तक घुटने-भर पानी में डूबे रहते हैं।

- और सरज़मीन ठोस नहीं-'गार्वेज' भरकर नगर बसाया गया है" "पुनपुन की बाढ़ इसके 'पासंग' बराबर भी नहीं थी। दोनों ओर से तेज़ धारा गुजर रही है। पानी चक्राकार नाच रहा है, अर्थात् दोनों ओर गड्ढे गहरे हो रहे. हैं. वेवस कुत्तों का सामूहिक रुदन, बहते हुए सूअर के बच्चों की चिचिया- हट, कोलाहल-कलरव-कुहराम ! . हो रामसिंगार, रिक्शवा वहलो हो। घर-घर-घर! ..'कल एक पत्र गाँव भेज दिया था। किन्तु कल एक कप कॉफ़ी नहीं पी सका । कल 'दोसा खाने को बहुत मन कर रहा था. कोक पीने की इच्छा हो रही है । कण्ठ सूख रहा है। प्रियजनों की याद आ रही है। थर-थर कांपता हुआ छत से उतरकर फ्लैट में पाया और ठाकुर रामकृष्ण देव के पास जाकर बैठ गया---'ठाकुर ! रक्षा करो। बचानो इस शहर को"इस जलप्रलय में...' "अरे दुर साला। कांदछिस केन ? .. रोता क्यों है ! बाहर देख! साले! तुम लोग थोड़ी-सी मस्ती में जब चाहो तब राह-चलते 'कमर दुलिये- दुलिये' (कमर लचकाकर, कूल्हे मटकाकर) ट्वीस्ट नाच सकते हो। रम्वा-सम्बा-हीरा-टीस और उलंग नृत्य कर सकते हो और बृहत सर्वग्रासी महामत्ता रहस्यमयी प्रकृति कभी नहीं नाचेगी ?..ए-बार नाच देख! भयंकरी नाच रही है-ता-ता-थे ई-थेई, ता-ता थेई-थेई। तीवा तीनवेगा शिवनर्तकी गीतप्रिया वाद्यरता प्रेतनृत्यपरायणा नाच रही है। जा, तू भी. नाच !" अगरबत्ती जलाकर, शंख फूंकता हूं-नाचो माँ ! .."उलंगिनी नाचे रणरंगे, आमरा नृत्य करि संगे। ता-ता थेई-थेई, ता-ता थेई-थेई. मदमत्ता मातंगिनी उलंगिनी-जी भरकर नाचो! बाहर कलरव-कोलाहल बढ़ता ही जाता है। मोटर, ट्रक, ट्रेक्टर, स्कूटर पानी की धारा को चीरती, गरजती-गुरांती गुजरती हैं। सुबह सात बजे ही धूप इतनी तीखी हो गयी ? सांस लेने में कठिनाई हो रही है। सम्भवतः ऐसी घड़ी में वातावरण में प्रॉक्सिजन की कमी हो जाती है। उमस, पसीना, कम्पन, धड़कन ? तो, क्या.. तो क्या ? अब, तुमुल तरंगिनी के तरल नृत्य और वाद्य की ध्वनियों को शब्दों ३४/ ऋणजल धनजल मे बांधना मसम्मव है ! प्रब"पव...सिर्फ हिल्लोल-कल्लोल-कलकल कुलकुल-छहर-छहर-झहर महर-मरमर-अर, र-र-र है-ए-ए धिग्रा-ध्रिग- धातिन-धा तिनधा-मा-पाहै-मंया-गे-झाय-मारय-भय-मघ-माय झिझिना. झिझिना कललकुलल-कुलकुल-वा-प्रा-य-वा-मा-म-मो-ॐॐ.... 'ई-ई. छछना-छछना-हा-हा-हा ततया-ततथा-कलकल-कुलकुल...!! पानी बढ़ना रुक गया है ? ऐं ? रुक गया है ? बीस मिनट हो गये। पानी जस-का-तंस, जहाँ-का-तहाँ है ? कम-से-कम अभी तो रुक गया है। ...'तू-ऊ-ऊ-क ! फिर मैंने शंखध्वनि को ? नहीं। रेलवे लाइन पर एक इंजन तार स्वर में चीख रहा है-तू-ऊ-ऊ-ऊ-ऊ! कड़वी चाय के माथ काम्पोज दोटिकिया लेकर बिछावन पर लेट जाता हूँ।

जो बोले सो निहाल खें मूंदे, बहुत देर तक, 'शवासन' की मुद्रा में लेटा रहा। किन्तु, शान्तिकर प्रोपधि (ट्रेक्विलाइजर) तथा 'पासन' का कोई सुफल नहीं एमा । इसके विपरीत, आन्तरिक यन्त्रणा धीरे-धीरे और भी तीव्र, और म्भीर होकर प्राण के निकटतम हो गयी। दीर्घ निःश्वास का क्रम बढ़ता गया। एक बार लगा कि अब सचमुच दम घुट जायेगा। छटपटा उठा। और, आँखें खुलते ही मोहाच्छादित ! ..'यह क्या ? कमरे की सभी दीवारों पर, फर्श पर, सामानों पर-नीचे-ऊपर सभी ओर एक रहस्य- पूर्ण अलौकिक आलोक-जाल ! एक सचल रश्मि-धारा !!...मेरे सारे शरीर पर बेलबूटेदार सुफेद झीनी चदरी-सी यह क्या है जो सजीव है ? रोमांचित हुआ। फिर तुरत ही सबकुछ समझ गया. 'यह तो विश्व- प्रकृति की लीला हो रही है न ? मेरे ब्लाक के चारों ओर फैली हुई, वेगवती जलधारा पर सूर्य की प्रखर किरणें पड़ती हैं और प्रतिच्छटा प्रेक्षित होकर हमारे कमरे में इन्दरजाल फैला रही है ? ..."बहुरूपी'-(बंगला नाटक-मण्डली) के पालोक-सम्पात करनेवाले उस प्रसिद्ध कलाकार का नाम अभी याद नहीं पा रहा. फिल्मवाले 'आउटडोर' में बड़े-बड़े आईने ले जाते हैं । उनको 'रिफ्लेक्टर' कहते हैं. "अपने कमरे के बड़े भाईने में अपने को देखकर मुस्करा पड़ा। मुंह-प्रांख-कान-हाथ-पैर पर वही प्राभा दौड़ रही थी। लग रहा था, मेरी देह कमरे के शून्य में तैर रही है। इस सम्मोहन से मुक्त होने का मन नहीं करता .. वाहर, कोलाहल ही नहीं-किलोल, तमाशबीनों की भीड़ उमड़ . ३६ / बणजल धनजल ! नतिकाजी छोटी बाल्टी मायी है । घुटने पोर कमर-भर पानी मे लड़के नहा रंग पानी बर्वाद कर जल-किलोल"पुनपुन को बाढ के समय भी ऐसा ही मेला "लो, वही जीपवाला फंसा । 'टॉप-गियर पर गुर्राती हु को फिर अचानक बन्द हो गयी। इसके बाद 'मेल्फ' को चालू करने की चेटही कुछ देर 'खचचचच "खचचचच...' फिर निस्तब्ध । निश्चय ही 'गिपर बॉक्स' में पानी भर गया होगा। जीप के फंस जाने पर, आस-पास जल- विहार करनेवालो और जल-उत्सव देखनेवालों को बड़ी खुशी हुई। जीप के वेवस होते ही एक सम्मिलित हँसी की लहर चारों मोर फैल गयी... पुनपुन को बाढ़ में हमें फंसा देखकर देखने वालो का पहला जत्था हंसते- हंसते लोटपोट हो गया था। ऊपर को भोर अर्थात् हमारी पोर देखकर ताने देता हुमा एक छोकरा जोर-जोर से बोला था-"अच्छा! हा हा. हा-हा "घर मे गम का सलोंढर, पांच मिनट में ही खाना बनानेवाला कुकर, दिन-रात चालू रेडियोग्राम, पलंग के पास मे टेलिफोन और ठण्डा पानी का फ्रीज । अव बोलो-बच्चू ! कहां सटक गयी सारी नवाबी? एं? ही ही ही ही! ..रा ! साहय लोगों को टेबुल पर 'छोटी हाजिरी' दो और मेमसाहेब के वास्ते वायरूम के टब मे साबुन का झग" हाहाहाहा." ठीक हुप्रा है।" जीप से उतरकर कई लोग पोछे से गाडी को धकेलने लगे तो नहाने- वाले लड़कों की टोली मदद करने आ गयी-"अरे साहब, मागे धकेलकर कहाँ ले जाइएगा? पीछे की मोर ठेलकर वापस कीजिए।" कुछ लड़के सामने से धकेलने लगे-"मार जवानो-हइयो !" कुछ पीछे से ठेलते रहे --"मार जवानो-हइयो!" गाडी एक गड्ढे से निकलकर दूसरे में फंस गयो। लड़के खुश होकर नहाने लगे... रिक्शावालो का साहस और उत्साह दुगुना हो गया है। तेज धारा के वावजूद, कमर-भर पानी में नीचे उतरकर रिक्शा को खोंच रहे है। 'जलकेलि' करनेवाले लड़के हर रिक्शावाले को विना मांगे मदद दे रहे हैं। रिक्शा को पीछे से ठेलकर पार करवा रहे हैं-"हैइयो-यो है है. है।" बीच-बीच में ट्रैक्टर और ट्रक मपनी सारी ताकत लगाकर पानी को चीरते हुए निकल जाते हैं। पानी मे हिलकोरे और गोलम्बर के प्राकाश - उगा था। S प्रावाज "हे हैं। तैर रहे हैं। कियों से देखता हूँ और कभी पूरव के बरा ला विल्डिंग है। उस मकान की जब नीं बाढ़ आ गयी थी। चारों ओर इकट्ठी की ही ढेरी पर राह के कुत्तों ने शरण ली थी। पानी कान का काम शुरू हुआ तभी समझा था कि मकान प्लान पर फिर से विचार कर अावश्यक सुधार वार जब कि आसपास के मकानों के 'ग्राउण्ड फ्लोर' भर पानी में हैं, इस बिल्डिंग के अहाते में चार-पांच इंच-भर पानी है। मकान की पहली सीढ़ी भी पानी से बाहर है और संयोग की वात : एक सप्ताह पहले इसके सामनेवाले मैदान में नये मकान की नींव डाली गयी और सोन का पानी आ गया। हमारे ब्लाक के बायें बाजू में--पटना इम्प्रूवमेंट ट्रस्ट के कई नये ब्लाक बनकर अभी-अभी तैयार हुए हैं--कटि-स्नान कर रहे हैं । "ए कि? जल चले गेछ ? कले जल नेई ? वड्डो मुश्किल'---निष्प्राण 'हैण्डपम्प' के हैण्डिल को चलाती हुई लतिकाजी बोली। "किन्तु, पुनपुन की बाढ़ के समय तो कभी पानी बन्द नहीं हुआ ?" मैंने गम्भीरतापूर्वक कहा। "अरे दुर तोमार" पुनपुन की वाढ़ की बात । मैं पूछ रही हूं कि अब क्या होगा ? "देखू, टोमैटो की मां के कल में है या वहाँ भी। वड़ाती हुई, हाथ में छोटी बाल्टी लेकर छत के रास्ते वह चली गयी। महा-मुश्किल ! मैंने पम्प के हैण्डिल को चलाकर देखा---एकदम वेजान नहीं। भरोसा है थोड़ा. राजेन्द्रनगर के इलाके में ऊपर के तल्लों में पानी की किल्लत हमेशा रहती है। प्रेशर कम रहता है। बहुत दिनों तक कष्ट झेलने के बाद, तीन साल पहले हमने सड़क के किनारे 'अण्डर- ग्राउण्ड मेन लाइन' में डेढ़ सौ फीट 'पाइप' जुड़वाकर हैण्डपम्प लगवाया। गांव के ट्यूबवेल का पानी जब सूख जाता है- हम ऊपर से पानी डालकर उसको पुनर्जीवित करते हैं । यहाँ भी वही करना होगा। घड़े से एक 'मग' पानी लिया, पम्प की थुथनी (नोजल) को ऊपर की ओर करके पानी बड़- ३८/ऋणजल.धनजल डाल दिया, फिर हैण्डिल चलाने लगा। तबतक लतिकाजी छोटी बाल्टी मे पानी लेकर पहुंची और मुझ पर बरस पड़ी। "एक मग पानी बर्बाद कर दिया न ! मुन्नी की मां के पलट से पानी ला रही हूँ।" यह घडे में पानी डालकर फिर वाहर गयी तो मैंने हैंडपम्प को फिर एक 'मग' पानी पिलाया भोर हैण्डिल चलाने लगा। वह उल्टे-पांव दौडी अायों, "तुम समझते क्यों नहीं? फिर एक मग पानी बर्बाद किया न? परा बुद्धि से भी तो काम लिया करो। जव 'मेन पाइप' में ही पानी नहीं तो.."मिछे मिछे.. वेकार पानी डालकर..." तब तक पम्प मे जान मा गयो यो। पम्प की उल्टी हुई थुथनी से पानी का फव्वारा निकला और मैं भीग गया। पुरषायं-भरे स्वर में कहा, "बुद्धि से ही काम लेकर तो पब तक जी रहा हूँ, श्रीमती जी। लीजिए, घर में जितने भी वतन हैं. पात्र-अपात्र-कुपान-सवमें पानी स्टोर कर लीजिए। श्रीकृष्णपुरी को ओर न पानी है, न बिजली। इधर भी, जब तक "मुना है, स्टेशन भी डूब गया है। गाड़ी बन्द..." मैं कहता हूँ, "भरे, स्टेशन क्या दूबा होगा-रेलवे लाइन पर पानी प्रा गया होगा। लेकिन, यह सवर कौन ले प्राया?" टोमटो, गांधी और बालाजी वगैरह घर मे बन्द रहनेवाले लड़के घोडे हैं ! सब निकलकर गया था। सुनछि, एयरोडममो डूबे गेछ ।" मोर, स्टीमर सविस तो दो दिन पहले से ही बन्द है. 'जल-थल-नभ समी मार्ग बन्द ! छत पर गया। ब्लाक के सभी बत्तीसों फ्लैट के लोग छत पर जमा थे। गंगा नही, सोन का पानी ! "गंगा पचानक डेढ़ हाथ नीचे चली गयो" गंगा मैया की कृपा नही तो, भव तक पटना का नाम-निशान तक नहीं रहता। पुनपुन का क्या हाल है माई ? .."पानी कहाँ-कहाँ है मोर कहां-कहां नही है ?.."पश्चिमी पटना तो समझिए कि एकदम 'इविये' गया है, इधर स्टेशन, गांधी मैदान, कदमकुमा, पीरमुहानी, नाला रोह, लोहानीपुर, मन्दोरी 1-~-सब जगह कमर से लेकर छाती-भर पानी है। मन्दीरी को हालत सबसे बदतर है। प्रथाह पानी है वहाँ । नही, अशोक ।

राजपथ पर एक बूंद भी पानी नहीं है "धूप इतनी तेज है तो पानी जरूर घटेगा.. आपके कल में पानी आ रहा है न? देखिए, पानी-बिजली कब तक चालू रहे''अव तक कोई नाव नहीं, पायी। नाव नहीं स्टीमर आयेगा आपके लिए.. पानी स्टोर कर रहे हैं न ?.."खाना क्या है, बस खिचड़ी पका लो और आलू का भुर्ता । वस.."वह देखिए-पीपे की नाव बनाकर आ रहे हैं, कुछ लोग।" सभी नीचे की ओर देखते हैं। नीचे मेला और रेला बढ़ता ही जा रहा है। पता नहीं, इन लड़कों को मोटर का ट्यूब कहाँ से इतना मिल गया ?..'मिलेगा कहाँ से ? सड़क पर जितनी फंसी गाड़ियां लावारिस पड़ी हुई हैं, सभी के टायर-ट्यूव निकालकर ला रहे हैं। तैरना, पानी उलीचना और बीच-बीच में ब्लाक के किसी फ्लैट की खिड़की की ओर देखकर फिकरे कसना-सबकुछ पूर्ववत् चल रहा है। ऊपर, एक हवाई जहाज मंडरा गया. 'अरे, ऊपर से क्या देख रहे हो, ज़रा नीचे उतर पायो भाई. 'शायद, हवाई फोटो ले रहा है "अरे भाई, फोटो लेकर क्या करेगा? समी अखबारों के मशीनघर में पानी घरघरा रहा है ''पता नहीं, क्या हो, पानी बढ़ सकता है। पानी बढ़ा है। ''हाँ, देखिए. पानी फिर बढ़ रहा है ? ए ? पानी फिर बढ़ने लगा । अब खैर नहीं... फ्लैट में आकर रेडियो ट्यून किया। सुबह से ही फतुहा-ट्रांसमिशन सेंटर से प्रोग्राम प्रसारित किया जा रहा है."आवाज़ किसी पेशेवर 'अना- उंसर' की नहीं। शायद, वहां के दरवान या इंजीनियरिंग-सेक्शन के किसी कर्मचारी की आवाज.. सीधे और सपाट ढंग से वह बीच-बीच में सूचना देता है कि छज्जू बाग के मुख्य स्टुडियो में पानी आ जाने के कारण फतुहा से प्रोग्राम हो रहा है 'अब आप एक कव्वाली का रिकार्ड सुनिए । सितार वजने लगता है तो रिकार्ड रोककर कहता है--सुनिए, कव्वाली नहीं, यह सितार का रिकार्ड है. ''अव आप हमारा दिल्ली का समाचार सुनिए" प्रारम्भ की दो पंक्तियाँ डूब गयीं..."अब आप पूरे समाचार सुनिए । पटना की बाढ़ की स्थिति में कोई सुधार नहीं हुआ है। पिछले अठारह घण्टे से पटना का सम्पर्क देश के शेप भागों से कटा हुआ है। दूरसंचार के सभी साधन भंग हो गये हैं, गाड़ियों का आना-जाना बन्द है क्योंकि -- - - ४० / ऋणजल धनजल पटना जंकशन रेलवे स्टेशन की रेल की पटरियां पानी मे डूब गयी हैं । प्राज एयर इण्डिया का विमान पटना हवाई अड्डे पर नहीं उतर सका. "अब माप फिल्मो गोत सुनिएहम तुम कमरे मे बन्द हो और चावीखो जाये..." .."अनाउंसर पेशेवर नही हो। लेकिन, रिकार्ड उसने चुनकर लगाया है। रेडियो से-पटना का देश के शेप भागो से सम्पर्क कट जाने की बात सुनने के बाद मेरे अन्दर का 'मैं' कातर हो उठा। ऐसा लगा कि एक द्वीप पर अकेला बैठा हुमा हूँ। चारों भोर समुद्र लहरा रहा है। कहीं किसी जहाज का मस्तूल या किसी नाव का पाल नही दिखलायी पड रहा... न जाने कब नीद मा गयी। जगा तो दिन के चार बज रहे थे। हर दस मिनट पर पश्चिम की खिड़कियों पर जा खड़ा होना, फिर पूरब के बरामदे पर भाकर बाहर देखना-नियम-सा बन गया है, हर बार बिजली के खम्भे पर, सामने की नंगी दीवार की ईंटों पर पोर ताड़ के तने पर निगाह डालकर देखना कि पानी घटा है या बढ रहा है। सो, जागते ही खिड़कियो के सामने जाकर खड़ा हो गया। भीड़ में अपने किसी भी परि- चित का चेहरा ढूंढ रहा हूँ। नही, इस भीड़ मे कही भी कोई अपना परि- चित नही.."भीड़-प्रिय पादमी कभी किसी का अपना नही होता.''वह व्यक्ति अपने परिवार के कनिष्ठतम प्राणी के साथ बाढ़ का मेला देखने आया है। परिवार के सभी सदस्य रंग-बिरगी पोशाक पहने हुए हैं। मोरर्ते और लड़कियां सजी-धजी हुई हैं । बंगला मे इसी को 'हुजुग' कहते हैं। इस हुजुग को, मेला देखनेवाली भीड़ को, देखकर बाढ़ के पानी मे डूब मरने को जी करता है... छत पर माने का मन नहीं करता। यहाँ ऐसी-ऐसी बातें सुनने को मिलती हैं कि दिल हवने लगता है मौर कभी खून गर्म हो जाता है और कम उम्र को मल्हड़-सी लड़कियों की तरह मधेड़ औरतें वचकानी बातें करने लगती हैं तब । असल में, में ही सठिया गया हूँ। "मच्छा, बतलाइए तो, सोन बढ़ रहा है या वढ रही शुद्ध है ? मुस्कुराहट"नदी तो स्त्रीलिंग है, इसलिए सोन बढ़ रही खिलखिलाहट , - ... ! - श्राप भी कैसे 'कवी' हैं जी ? जानते नहीं, सोन तो मर्द है । नदी नहीं, नद है। समझे ? तभी तो राजधानी में घुस आया है"ही ही ही ही ! आपने दाढ़ी रख ली, इसीलिए बाढ़ आ गयी। कटा लीजिए, पानी घट जायेगा! "हा हा हा एक भाई साहब हैं जो कभी भी किसी मौके पर कोई ऐसी बात नहीं करते जिसे सुनकर मन में कोई उत्साह या आनन्द अथवा राहत मिले। आज दिन-भर अपने फ्लैट में पता नहीं हथोड़े से क्या ठक-ठककर ठोंकते. रहे और अभी छत पर एकत्रित प्राणियों (जिनमें 'फेमनिन' की संख्या ही गरिष्ठ है) के बीच पाकर 'ठकाठक' कई कठोर खबरें ठोंक गये.-.-"पुनपुन के तटबन्ध में भी 'नीच' हो गया है. इधर गंगा का पानी फिर बढ़ने लगा है.. और, और सचिवालय के पास स्टीमर पा गया है और सारे कागजात को सुरक्षित..." खिलखिलाकर हँसनेवालियों के चेहरे एक ही साथ वुझ गये-मानो विजली गुल हो गयी-हाय राम! तब तो समझिए कि प्रलय.. भाई साहब कल से ही जिस बात को हज़ार वार कह चुके हैं उसी को फिर, अपनी खल्वाट खोपड़ी पर हाथ फेरते हुए, कहते हैं- "भगवान बुद्धा ने कहा था कि इस शहर को तीन बातों से हमेशा खतरा रहेगा..." हजार बार सुनकर भी हर प्राणी की उत्सुकता नहीं मिटती-"कौन- कौन-सी तीन चीज़...?" मैं पूछना चाहता था कि सचिवालय के पास स्टीमर पा जाने की खवर भाई साहब को कहां से मिली । वे मौर्य-युग में पहुंचे हुए थे, अतः चुपचाप नीचे अपने कमरे में चला पाया। अब सूरज की लाली बाढ़ के गंदले जल में घुल रही है। ऐसा दृश्य- अर्थात् बाढ़ के जल पर डूबते हुए सूरज की किरणों को रंगीन लकीरें खींचते बहुत बार देखा है, मैं उस अंधियारी की प्रतीक्षा में हूँ-जो प्राज रात इस नगर में छानेवाली है. पानी घटा नहीं है । भीड़ बढ़ गयी है। कोलाहल में कोई कमी नहीं। ..'अाज साढे सात बजे प्रसारित होनेवाला प्रादेशिक समाचार नहीं प्रसारित हुप्रा । कव्वाली, फ़िल्मी गीत, तवला, वायलिन और सितार के ४२ / ऋणजल धनजल घिसे-कटे रिकार्ड बजते रहे."प्रादेशिक समाचार नही प्रसारित हुमा तो क्या बिगड़ गया? प्रसारित ही होता तो क्या बन जाता ? वाड का पानी घट जाता ? कोई राहत मिल जाती?...मैंने एक वार लगातार तीन महीने तक अपने गांव में बिना अखवार पहकर पौर विना रेडियो सुनकर अनुभव किया है । कोई फर्क नही पड़ता । बल्कि एक पुराना रोग (कब्जि- यत) दूर हो गया था." पानी की धारा पर बहुत देर तक निगाहे गडाकर देखते रहने से एक प्रानन्ददायक भ्रम होने लगता है । सारा मकान स्टीमर की तरह तैरता हुमा-सा लगता है."उधर, पूरब की ओर कुछ हुमा, शायद, लडके उपर दौड यो रहे हैं, एक साथ ? नाव पा रही है। हां, नाव ही है । नाव पर सात-पाठ सरदारजी और कई गैर-सरदार बैठे हैं। किसी भी सिख को देखते ही मेरे मन के अन्दर यह अभिवादन 'भक्तिभाव' से गूंजने लगता है-~-'जो बोले सो निहाल-सत सिरी अकाल !' मरदार जी लोगों का दल जलविहार करने नही, रिलीफ बोटने पाया है। सामनेवाले पंचमंजिला इमारत के मुंडेर पर पनाह लेनेवालो को वे बुला रहे हैं-"नीचे मानो!" हमारे ब्लाक के बायें जो मकान बनकर तैयार हुए हैं, उनमे अव तक चालीस-पचास वाढपीड़ित परिवार माकर डेरा डाल चुके थे-रिक्शा- वाले, खोमवावाले, रद्दी कागज-शीशी-बोतल खरीदनेवाले। सभी रोटियो लेने उतरे। सरदार स्वयंसेवकों ने चिल्लाकर कहा-"पानी में मत उतरो। हम वहीं मा रहे हैं।" नाव हमारे फ्लंट के नीचे से गुजरी। नीचे वाले फ्लैट से किसी ने पूछा, "क्या दे रहे हैं ? "रोटी, सब्जी और घुघनी। और पीने का पानी भी। रोटी बहुत मच्छी है, गर्म है बढ़िया आटे की है। क्यो, चाहिए क्या है ?" स्वयं- सेवक सरदारजी ने एक रोटी निकालकर दिखलाते हुए कहा । फिर पूछा --"माप लोगों की छत पर पनाहगुर्जी कोई नही..." इसके बाद नाव को घेरकर भूखे-प्यासे लोग अपने बाल-बच्चों के साथ रोटियां लेते रहे और शोर मचाते रहे.."रिलीफ देनेवालो को यह परली " टोली थी 'दिन-भर के भूखे-प्यासे प्राणियों को तृप्तिपूर्वक भोजन करते हुए, चूंट-घूटकर पानी पीते हुए देखकर रोम-रोम पुलकित हो उठा। ज़ोर से पुकार उठा, "जो बोले सो निहाल-सत सिरी अकाल !" और- नाव पर बैठे स्वयंसेवकों ने मेरे इस हार्दिक अभिनन्दन को स्वीकार करते हुए एक साथ 'सत सिरी अकाल' कहा । फिर पूछा, "कुछ चाहिए ? रोटी- 'पाणी?" मैंने कहा, "उधर, कम्युनिटी हाल "दिनकर अतिथिशाला में, और उसके पच्छिम की ओर जाइए, वहाँ बहुत लोग हैं। "हां-जी, उधर हमारी एक नाव गयी हुई है।" "विजली आ गयी है । जल-थल पालोकित हो गया है । पुनपुन की बाढ़ के समय, पानी की धारा पर बिजली के लटुओं और मर्करी-ट्यूब का जैसा पालोक-नृत्य देखा था. -वैसा ही दृश्य 'किन्तु, सारा पश्चिमी 'पटना घोर अन्धकार में डूबा होगा । 'दिल्ली से रेडियो पर कहा जा रहा है-पटना के लोग मौत से .. जूझ रहे हैं। कमरे के कोने से ठाकुर रामकृष्ण देव बोले-"की रे? सारा दिने .."दिन-भर में तीन बार ढूंसकर खाया है ? दिन-भर सिगरेट फूंकता रहा, चाय पीता रहा । यही है तुम्हारा मौत से जूझना?"घर से बाहर निकलता क्यों नहीं ? पाश्रम के स्वयंसेवकों के साथ दुखियों की सेवा करने क्यों नहीं आता? उस बार तो खूब उत्साह के साथ गया था। क्या हुना इस बार?" "ठाकुर ! तुम तो जानते हो। मैंने कसम खायी है, बाढ़-पीड़ितों की -सवा करने के लिए अव नहीं जाऊँगा।" "एई तोमार तीसरी कसम ?" लतिकाजी भींगी साड़ी में लथपथ लिपटी हुई पायीं और वाथरूम को ओर जाती हुई बोली, "प्रोदेर'' उन्हें खिला आयी।" मैंने कुछ भी नहीं समझा। वह स्नान करके, कपड़े बदलकर पायीं। छा, "मोदेर माने ?" "ओई वेचारा कुकुरदेर 'वेचारे कुत्ते । एक ने चायवाले की झोपड़ी १४/ऋणजल धनजल को 'प्रास्ताना' (बसेरा) किया है । दूसरा-वहां इंटों की ढेरी पर है मौर तोमरा तीन नम्बर ब्लाक की एक खाली दुकान के रैक पर बैठा है। रोटी दे पायी है और, उस चायवाले को देखो। मुझे रोटी खिलाते देखकर दौड़ा पाया और लाठी से वेचारे को कोचने लगा। कहने लगा, मेरा छप्पर नोंचकर बर्बाद कर देगा।" "मगा दिया ?" "नही। अपने ब्लाक के लड़के सब नीचे थे। उन्होंने कहा, कुत्ते को अगर भगाया तो तुम्हारी झोपड़ी कल बह जायेगी।" बाहर विजली चमकी । पूरब और दक्षिण की भोर प्रकाश में काले मेघ उमड आये हैं। उमस से देह चिपचिपा रही है। बाहर 'भावाजाही' अब तक बन्द नही हुई है । भीड़ नही है। किन्तु, लोग आज भी साढ़े ग्यारह बजे तक चल रहे हैं । हर ग्रादमी के हाथ मे एक लाठी-दूसरे मे झोली, बोतल या डालडा का डिब्बा अथवा गठरी "सचमुच, मौत से ही जूझ रहे हैं। पानी मे मंसता हुमा डेढ वित्ते का कोई कोडा डंक मार दे और एक घण्टा में ही सव समाप्त.."दीवार गिर पड़े पोर खेल खत्म...फिर कही कोई तटबन्ध टूट जाये अथवा गगाजी का कोप बढ जाये और चारों ओर पानी की एक उठती हुई ऊंची दीवार के साथ पटाक्षेप। प्रय बिजली की प्रत्येक कौंध के तुरन्त बाद ही मेघ गरज उठता है। इसका मतलब है कि बादल अब पटना के प्राकाश पर छा गया। बाहर निकलकर देखा और मुंह से सहसा निकल पड़ा--"तुम्ही क्यो बाकी रहोगे आस्मा.."जरा बाहर पाकर देखो इन बादलों को की भीषण..." एक कुत्ते ने रोना शुरू किया। किन्तु, कल के रुदन से प्राज का रोना भिन्न है । कल वे माशंका और मातंक को सूंघ रहे थे और, प्राज मौत को बहुत करीब देखकर रो रहे हैं."मुझे फिर टेप-रिकार्डर की ज़रूरत... असल मे इस रुदन को जिसने सुना है, वही समझ सकते हैं---'प्रो-य-य-हूं- के-ॐ ॐ-हा-हा-हा-य-ह""-प्रों-प्रा-मा..." आज उन्हे डॉटकर कोई चुप नहीं कर रहा । इसलिए वे सम्मिलित सुर में रह-रहकर रो रहे हैं ! उनकी करुण पुकार में कोई वाघा नही पड़ती।

" ''कुत्तों को चुप किया, तेज हवा के पहले झोंके ने । हवा तेज़ हो गयी। विजली जल्दी-जल्दी कौंधने लगी कड़ककर टूटने लगी। एक बार तो लगा, आस्मान चरचराकर फट ही गया। हवा नहीं, यह तूफ़ान है। आँधी आ गयी ? सभी फ्लंटों की खुली हुई खिड़कियों और दरवाजे के पल्ले काठ के पंख की तरह फड़फड़ाने-धड़धड़ाने लगे। धड़ाधड़ खिड़कियां बन्द होने लगीं। अव, हवा के साथ मूसलाधार वृष्टि ! घनघोर वर्मा... पास ही किसी मकान में कोई भयातुर प्रात्मा 'अजान' देने लगी-"अल्ला. हो अ-क-ब-र..." पुनपुन की वाढ़ को न्योतकर ले आनेवाली, अट्ठारह-वीस घण्टे तक अविराम होनेवाली वर्षा की याद आयो "उस बार मुंगेर के किसी इलाके में वादल टूटकर (वर्ट) गिरा था और पांच मिनट में ही कई गांव पानी के मतल तल में समा गये थे. सब-कुछ सम्भव है। ."उन लोगों पर अभी क्या बीत रही होगी जो छतों पर, खुले आस- मान के नीचे हैं ? ''अव जो दृश्य उपस्थित हो रहा है, होता जा रहा है, उसे देखने का साहस नहीं बटोर पा रहा हूँ। विश्व-प्रकृति का यह उन्मत्त नृत्य, अब इस शहर को डुवाकर ही बन्द होगा."ॐ नमस्ते सते सर्वलोकाश्रयाय.. त्वमेकं शरण्यं त्वमेकं वरेण्यं...भयानां भयं भीषणं भीषणानां...परेषां परंरक्षणं- रक्षणानां तदेकैस्मरामस्तदेकंजपा.."भवांमोधिपोतं शरण्यं बजाम:...!!! संसार-सागर से उवारनेवाले एकमात्र 'पोत' को सुमिरता हुआ, रक्षकों के भी रक्षक की शरण गहता बाहर की ओर देख रहा हूँ। पानी बढ़ता जा रहा है । लेकिन, अव डर नहीं लग रहा । अव काहे का डर ? ... दिन में सूअर के बच्चे जिस तरह डूबते-बहते हुए मर रहे थे, उसी तरह मरने को तैयार हूं। किन्तु, चिचियाऊँगा नहीं उनकी तरह । मृत्यु की वन्दना गाता हुआ मरूंगा.'तेंतीस-छत्तीस साल पहले का एक गीत (रवि ठाकुर के प्रसिद्ध गीत का हिन्दी-अनुवाद और सुन्दर अनुवाद !)~~'कंगन' फ़िल्म का पुराना गीत गुनगुनाने लगता हूँ। फिर, वाहर की घनघोर वर्ग के ताल पर, ज़ोर से~गला खोलकर गाना शुरू कर देता हूँ-"मरण रे- ए-ए-ए तुहु मम श्याम समा-पा-या-न घोर घटा का मोर-मुकुट घर घर ४६ / ऋणजल धनजल

विजली की मुरली अघर पर "गा
दे
अमृत"गा-प्रा-प्रा-ग्रा-न मरण
रे-ए-ए-ए"."
दम मिनट बरसकर वादल छंट गये। हर पलट की खिड़कियां फिर
खुल गयी । आसमान साफ़ हो गया"पटना एक बार फिर बन गया।
बाहर झांककर देखा-कई लोग जाल फेंककर मछलियां पकड़ रहे
हैं।
ऋणजल धनजल / ४७

-- पंछी की लाश वर्षा के बाद वातावरण का ताप कम हुा । किन्तु, बिछावन पर लेटते ही बाढ़ की स्मृतियाँ- 'नास्टेल्जिया' की तरह फिर लौटकर आने लगीं और मन पसीजने लगा. ऐसा क्यों होता है ? इसके मूल में क्या है ?.. बहुत देर तक प्रात्मविश्लेषण करता रहा। बचपन से 'बाढ़' शब्द सुनते ही विगलित होने और बाढ़ पीड़ित क्षेत्रों में जाकर काम करने की अदम्य प्रवृत्ति के पीछे-'सावन-भादों' नामक एक करुण ग्राम्य गीत है, जिसे मेरी बड़ी बहिन अपनी सहेलियों के साथ सावन भादो के महीने में गाया करती थी। प्राषाढ़ चढ़ते ही-ससु- राल में नयी बसनेवाली बेटी को नहर बुला लिया जाता है। मेरा अनुमान है कि सारे उत्तर बिहार में नव-विवाहिता बेटियों को 'सावन-भादों' के समय नहर से बुलावा पा जाता है. और जिसको कोई लिवाने नहीं जाता, वह बेचारी दिन-भर वर्षा के पानी-कीचड़ में भीगती हुई गृहकार्य सम्पन्न करने के बाद रात-भर नहर की याद में आँसुओं की वर्षा में भीगती . रहती है। 'सावन-भादों' गीत में ऐसी ही, ससुराल में नयी बसनेवाली कन्या की करुण कहानी है : "कासी फूटल कसामल रे देवा बाबा मोरा सुधियो न लेल, बाबा भेल निरमोहिया रे देवा भैया के भेजियो न देल, भैया भेल कचहरिया रे देवा भउजी बिसरि कइसे गेल...?" ४८ / ऋणजल धनजल (प्रव तो चारो मोर कास भी फूल गये यानी वर्षा का मौसम बीतने को है । पिछली बार तो बाबा खुद प्राये थे। इस बार बाबा ने सुधि नही ली। बाबा अब निर्मोही हो गये हैं। मैया को 'जमीन-जगह' के मामले में हमेशा कचहरी में रहना पड़ता है । लेकिन, मेरी प्यारी भाभी मुझे कैसे मूल गयी ?) भाभी भूली नहीं थी, उसने अपने पति को ताने देकर बुलाने के लिए भेजा। भाई अपनी बहिन को लिवाने गया. इसके बाद गीत की धुन बदल जाती है। कल तक रोनेवाली बहुरिया प्रसन्न होकर ननदो और सहेलियों से कहती है: हो रे सुन सखिया ! सावन-भादव केर उमडल नदिया मया मइले बहिनी बोलावे ले-सुन सखिया..." मो ननद-सखी ! सावन-भादों को नदी उमड़ी हुई है। फिर भी गरे भैया मुझे बुलाने आये हैं । तुम जरा सासजी से परवी कर दो कि मुझे जल्दी विदा कर दें। ''साम कहती है, मैं नहीं जानती अपने ससुर से कहो। ससुर ताने देकर कहता है कि नदी वाले इलाके में बेटी की शादी के बाद दहेज में नाव क्यो नहीं दिया। पन्त मे, पतिदेव कुछ शर्तों के साथ विदा करने को राजी होते हैं । ससुराल को दुखिया-दुलहिन हंसी-खुशी से भाई के साथ मायके की प्रोर विदा होती है । लेकिन, नदी के घाट पर पाकर देखा कही कोई नाव नही। अब क्या करें! भाई ने हिम्मत से काम लिया। कास-कुश काटकर, मूंज की डोरी बनाकर और केले के पौधो के तने का एक 'बेड़ा' बनाया और उस पर सवार होकर भाई-बहिन उमड़ी हुई कोशी की धारा को पार करने लगे। किन्तु, बीच नदी में पहुंचते ही लहरें तेज हो गयौं । वेढा डगमग करने लगा। और, "कटि गेल कासी-कुशी छितरी गेल यम्हवा खुलि गेल मुंज कर डोरिया-रे सुन सखिया ! ...'बोचहि नादिया में अइले हिलोरवा धुटि गेले भैया केर बहियां-रे सुन सखिया ! ""डूवी गेलं भैया केर बेड़वा-रे सुन सखिया !।" माखिर:

(नदी की उत्ताल तरंगों और धूणिचक्र में फंसकर बेड़ा टूट गया । भाई का हाथ छूट गया। और, भाई का बेड़ा डूब गया। भाई ने तैरकर वहिन को बचाने की चेष्टा की, किन्तु, तेज़ धारा में असफल रहा। डूबत्ती इई बहिन ने अपना अन्तिम सन्देशा दिया-मां के नाम, बाप के नाम फिर किसी बेटी को सावन-भादों के समय नैहर बुलाने में कभी कोई देरी नहीं करे । और, देरी हो जाये तो जमुना का पेड़ कटवाकर नाव बनवाये, और तभी लड़की को लिवाने भेजे!) .. तकिये का गिलाफ भीग गया। गीत की पक्तियां मन में गूंजती रहीं और आँखें बरसती रहीं। ऐसा हमेशा हुआ है । .. और, इस गीत के साथ पिछले कई वर्षों से एक और करुण गीत- कथा की कहानी जुड़ गयी है। इसलिए, इस गीत का दर्द दूना हो गया है ...'तीसरी कसम' की शूटिंग के दिनों शैलेन्द्र जी मुझसे 'महुआ घट- वारिन' की 'ऑरिजिनल' गीत-कथा सुनना चाहते थे ताकि उसके आधार पर गीत लिख सकें । एक दिन हम 'पबई-लेक के किनारे एक पेड़ के नीचे जाकर बैठे । 'महुआ-घटवारिन' का गीत मुझे पूरा याद नहीं था। इसलिए मैंने एक छोटी-सी भूमिका के साथ 'सावन-भादों' का गीत अपनी भोंडी और मोटी आवाज़ में, भरे गले से सुना दिया। गीत शुरू होते ही शैलेन्द्र की बड़ी-बड़ी आँखें छलछला पायीं और गीत समाप्त होते-होते फूट-फूट- कर रोने लगे। गीत गाते समय ही मेरे मन के बांध में दरारें पड़ चुकी थीं। शैलेन्द्र के आँसुओं ने उसे एकदम तोड़ दिया। हम दोनों गले लगकर रोने लगे । 'ननुआँ' (शैलेन्द्र का ड्राइवर) टिफिन कैरियर में घर से हमारा दोपहर का भोजन लेकर लौट चुका था। हम दोनों को इस अवस्था में देख- कर वह चुपचाप एक पेड़ के पास ठिठककर बहुत देर तक खड़ा रहा... इस घटना के कई दिन बाद, शैलेन्द्र के 'रिमझिम' में पहुंचा। वे तपाक से बोले- चलिए, उस कमरे में चलें। आपको एक चीज़ सुनाऊँ।" हम उनके शीतताप-नियन्त्रित कमरे में गये। उन्होंने मशीन पर 'टेप' लगाया। बोले-'याज ही 'टेक' हुआ है। "मैंने पूछा-'तीसरी कसम?" वोले-'नहीं भाई ! 'तीसरी कसम' का टेक होता तो आपको नहीं ले जाता?''यह 'बन्दिनी' का है. पहले, सुनिए तो...!" । ५०/ऋणजल धनजल रेकार्ड शुरू हुप्रा-"प्रब के बरस भेज मैया को बावुल सावन में लोजो बुलाय रे "अमुनो तले फिर से झूले पड़ेंगे "कसके रे जियरा छलके नयनवां वरन जवानी ने छीने खिलौने बावुलजी में तेरे नाजों की पाली."वीते रे जुग कोई चिट्यो ना पाती, ना कोई नहर से पाये रे. ए-ए।" कमरे मे 'पबई-लेक के किनारेवाले दृश्य से भी मर्मान्तक दृश्य उप- स्थित हो गया। हम दोनों हिचकियां ले-लेकर रो रहे थे--प्रांसू से तर- बतर: शैली ने (तब वाण्टू यानी हेमन्त ! ) किसी काम से अथवा गीत सुनने के लिए कमरे का दरवाजा खोला और हमारी अवस्था देखकर पहले कई क्षणो तक प्रवाक रहा। फिर कमरे से चुपचाप बाहर चला गया... कमरे में बार-बार वही रेकार्ड बजता रहा और न जाने कब तक बजता रहता यदि शकुनजी प्राकर मशीन बन्द नही कर देती। भीगे हुए तकिये पर तोलिया रखकर लेट गया। जी-भर रोनेने के बाद जी हल्का हो गया था। दृश्य पर प्रशान्ति छा गयी था. "मीठी नीद मा गयी। मोर को एक सुन्दर अपूर्व सपना देख रहा था। और सपने मे मी मानन्दातिरेक से रो रहा था लतिकाजी ने झकझोरकर जगाया- "ऐ? ऐ? की हयेछ ? ... क्या हुमा ?" जगकर मन खीझ उठा "हतना सुन्दर सपना बीच मे ही टूट गया... मुझे क्यो जगाया "मैं नीद में रोऊँ या हंसं-इससे किसीका क्या बिगड जाता है ?..'माह ! लतिकाजी बोली-"ऐसे मे कभी-कभी प्रादमी का दम घुट जाता "घट जाता तो घुट जाता...' .. दरवाजे की कुण्डी खटखटायो । जाकर दरवाजा खोला तो सामने हंसते हुए शेलेन्द्र खड़े थे। उनके साथ में थे, उनके एक प्रिय-स्वजन, पटना के प्रियदर्शन डाक्टर भोला । मैं अचरज मे गूंगा हो गया। उनसे कुछ पूछना चाहता था। लेकिन, मुंह से वोली ही नहीं निकल रही थी। शैलेन्द्र बोल रहे थे-"माना ही पड़ा. वेबो और गोपा के लिए योग्य 1 'पात्रों को देखने के लिए। अकेला वाण्टू और काका वेचारे क्या करें?... अपनी प्यारी बेटियों के लिए मुझे पाना पड़ा-ऐसे दुर्दिन में भी भला कोई आता है ? .. वावुलजी मैं तेरे नाजों की पाली, फिर क्यों हुई. पराई-यह सुनकर कौन ऐसा बाप है जो "वाण्ट्र' को कबीर, दादू और रैदास पढ़ने को कहता था। पता नहीं, उसने पढ़ा या नहीं. इधर उसने एक बड़ा ही प्यारा गीत लिखा है। एल. पी. में आ गया है। सुनिए न..." क्या सुनूं ? सपने का संसार ही समाप्त हो गया। अब जगकर, अवसन्न अवस्था में सुन रहा हूँ-फतुहा से वचता हुआ- 'नात-कव्वाली- गजल-ठुमरी-सितार' का रेकार्ड! जग गया। परन्तु, सपने से इस तरह अभिभूत रहा कि बहुत देर तक 'जलप्रलय' को भूल गया। चाय पीता हुआ वहुत देर तक सपने में अचानक मा गये शैलेन्द्र के अभियोग और उलाहने-भरे शब्दों पर विचार करता रहा 'सचमुच, हम सभी कितने स्वार्थी सिद्ध पच्छिम की खिड़की से झांककर देखा~करेण्ट की गति थोड़ी मन्द पड़ गयी। कलवाला 'रिद्म' नहीं है वह वहाँ सफेद-सी कोई चीज़ 'मॅसती' हुई चली आ रही है. 'खरगोश या विलायती चूहा या कोई चिड़िया ? • मुर्गी है- सफेद मुर्गी ! पानी की धारा के साथ हिलकोरे खाती हुई पूरब की ओर सड़क की मुख्य खरस्रोता धारा में पहुंची और वहाँ से तेज़ रफ्तार में बहने लगी. 'कल पानी के साथ हवाई चप्पल, बच्चों के खिलौने, कंघी, सायकिल का बास्केट, प्लास्टिक के रंगीन कटोरे वगैरह भैंसते दिखलायी पड़ते थे । अाज सुबह उठकर पंछी की लाश पर दृष्टि पड़ी तो मन इस अपशकुन से आशंकित हो गया। रात के तीसरे पहर में एक बार उठकर देखा था, मछली पकड़नेवालों के अलावा तीन- चार व्यक्ति पैर से टटोल-टटोलकर कुछ खोज रहे थे। जो कुछ मिलता था उसे हाथ में एक बार लेकर देखते । अपने झोले में रख लेते या फिर पानी में फेंक देते "सूअर के कई बच्चों की लाशों को लाठी की 'वहगी' में लटकाकर भंगियों का दल आ रहा था । दल के एक युवक ने मुर्गी की लाश का पीछा किया । पानी से उठाकर डेने को खींचकर जांचने लगा. । ५२/ऋणजल धनजल

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. तमाशबीन जनता की छोटी-बड़ी टोलियों का प्रागमन शुरू हुआ... एक नीमजवान 'नवसिखुना' कैमरावाला लड़का कमर भर पानी में खड़ा होकर--पूरव मुंह से-यानी सूरज की ओर मुंह करके-तस्वीरें ले रहा है। नहानेवाले लड़के उसके समाने जाकर मुंह चिढ़ा रहे हैं । एक लड़का गले तक पानी में डूबकर अद्भुत आवाज़ में डूबती हुई लड़की का अमि- नय करते हुए पुकारा-"व-चा-प्रो ! बचाओ ! मैं डूवी जा रही हूँ..." भीड़ का एक कड़ियल जैसा आदमी कैमरावाले से तैश में कुछ कह रहा है । ब्लाक नम्बर एक के छत पर खड़े लोग भी चिल्ला-चिल्लाकर कुछ कह रहे हैं। हमारे ब्लाक के मुंडेरे से भी आवाजें कसी जाने लगीं. यहां लोग कल से घिरे हुए हैं, न कहीं नाव है, न रिलीफ और ये फोटो लेनेवाले सिर्फ तस्वीर ले रहे हैं ? .. इसी को कहते हैं कि किसी का घर जले और कोई मौज से तापे.. मत खींचने दो किसी फोटोवाले को कोई भी फोटो... इनको पैसा कमाने का यही मौका मिला है ? कैमरावाला जवान (नवसिखुआ भले ही हो) बुद्धिमान है। उसने तुरन्त कैमरे का रुख तमाशबीनों की ओर कर दिया । तैश में प्राया हुआ कड़ियल-जैसाआदमी तुरन्त ठंडा हो गया और गले में लिपटा हुआ अंगोछा ठीक कर मुंह पर हाथ फेरकर फोटो खिंचाने के पोज में खड़ा हो गया। नहानेवाले लड़कों ने वहां पहुंचकर पानी उलीचना-छींटना शुरू किया। भीड़ का दूसरा आदमी अब तैश में आकर नहानेवाले ऊधमी लड़कों को डॉटकर भगाने लगा। छाती-भर पानी में भागते हुए लड़कों में से एक, अपने ड्रम के 'बेड़े' पर चढ़ गया और अपने पैंट के अग्रभाग के एक विशेष स्थान की ओर संकेत करके बोला--'इसका फोटो लो'.. 'कुछ लोग हंसे। कुछ ने मुंह फेर लिया और कई लोग एक साथ--- "अरे-रे-रे-रे कहकर चुप हो गये.''छाती-भर पानी में जाने का साहस उनमें नहीं था.. मुझे पांच सात महीने पहले देखी हुई युगोस्लावी फिल्म (वी पार विविच्ड, इरिन) के एक दृश्य की याद आ गयी । झरने में अर्द्धनग्न नहाती इरिन को चारों भोर से छिपकर देखनेवाले आवारे लड़कों को जव इरिन के ससुर ने खदेड़ते हुए कहा था कि अव अगर इधर कभी देखा तो जान से मार डालूंगा. "विल 'किल यू' तो भागते हुए छोकरों हरमजदवा..." ५४ / ऋणजल धनजल में से एक ने कुछ दूर जाकर, उलटकर ऐमो ही मुद्रा बनापो थो--'किल दिम!" फोटो लेनेवाला लड़का 'डिमोरलाइन्ड' होकर कैमरा ममेटकर चला गया. मेरा कोई मित्र होता या में खुद होता तो इम 'पोज को कमी मिस' नहीं करता। ... लेकिन कमरावालो के प्रति लोगों का मचानक यह ग्रामोश क्यों ? यह तो अच्छी बात नहीं। अपने कई प्रेस-फोटोग्राफर मित्रों तथा अन्य गर-पेशेवर फोटोग्राफर दोस्तों को याद पायी जनार्दन ठाकुर, सत्य- नारायण दूमरे, सूर्यनारायण चौधरी,वासुदेव शाह, सत्यदेव नारायण मिन्हा (प्रार. एस. चोपड़ा तो बम्बई जा बसे) तथा गुरु उप्पल के प्रलावा बहुत मम्भव है वाहर के जाने-माने छायाकार माये हों । पता नहीं, उनके साथ क्या-क्या व्यवहार करें ये?" मैं अब अपनी छत पर 'चचागिरी करने के लिए पहुंचा। मेरे ब्लाक के लडके मेरे नाम के साथ 'चचा' जोडकर मुझ सम्बोधित करते हैं। छत पर जो भी 'मतीजे' मौजूद मिले उन्हें मैंने समझाया कि किसी फोटो लेने वाले को 'हूट' न किया जाये। वे तुरन्त समझ गये-"अच्छा चचाजी! हम लोग नीचे जाकर इन लड़कों को ममझा देते हैं..." नहानेवालो की टोली के उत्माह में बाधा डाली-एक गाय की लाश ने। लाश फूलकर मसती मोर दुर्गन्ध फैलाती हुई पा रही थी। मेरे कमरे की खिडकियों से बददू का पहला झोंका प्राया ब्लीचिंग पाउडर और फिनायल की महक के साथ सहनी हुई लाश को दुर्गन्ध "लगता है, किसी मुहल्ले में यह भटक गयी थी। और, वहाँ इस पर प्रचुर मात्रा में ब्लीचिंग पाउडर और फिनायल डाला गया था. असह्य दुर्गन्ध ! कहीं हमारे लाक के नीचे किमी दुकान मे न अटक जाये । फिर तो मांस लेना भी मुश्किल हो जायेगा। जीना दूभर हो जायेगा !.."नहीं, अब तक धीरे-धीरे वहती हुई माती लारा, सड़क को मुख्य पारा के पास जाते हो--एक दार नाच- कर-तेज धारा के माप हो गयी और फिर उसकी गति काफी तेज हो गयी। *एई जा! . स फुस्लोस समाप्त ! मैंने कहा था न?" रमोई- ऋगजल धनजल ५५ लती हुई लतिका जी बोली ! 1. चुपचाप कोयलेवाला को तैयारी करने लगीं। चरामदे पर खड़ा रहा. वह पा रहे हैं, डॉक्टर शिव- में बड़ी-सी लाठी लेकर टेकते हुए, अस्पताल जा रहे हैं." क्या यही सितार वजा रहे थे? पूछू ? .."नहीं, अभी तो यह सितारवादक नहीं। मर से घोती लपेटे, गंजी पहने-लाठी टेकते और मुस्कराते चित मुखड़े पर दृष्टि पड़ी-यो! परेसजी हैं । 'रूपरंग' नाट्य निदेशक-लेखक अभिनेता.. परेसजी मेरे ही ब्लाक की ओर पा ? मेरे फ्लैट के नीचे आकर वोले..-"अरे! यहाँ तो बहुत तेज है । लगता है, उठाकर फेंक देगा।" उन्होंने पूछा, "सिगरेट है न ? और किसी चीज़ की ज़रूरत ? जी नहीं, हम लोगों का क्वार्टर ऊंची ह पर है। पानी नहीं है.. मित्रों की खोज-खबर लेने निकला हूं।" मैंने कहा- "इधर कहीं किरासन तेल मिलेगा? हम लोगों की 'गस' अभी-अभी खत्म हुई है. स्टोव के लिए किरासन चाहिए। यदि उधर..." "अच्छी बात ! देखते हैं ?"-परेसजी नीचे से ही चले गये। लतिका मुझे झिड़की देती हुई बोली-"तुम भी कैसे हो ? बेचारा हाल-समाचार पूछने पाया था और तुमने किरासन तेल की फरमाइश कर दी. 'लज्या नेई तोमार एकटू ?" "लाज की क्या बात है इसमें ? मित्र हैं । बाढ़ से पीड़ित नहीं हैं ! हाल-समाचार पूछने आये थे.. इनसे सहायता मांगने में क्या लाज ?" दिल्ली से प्रसारित समाचार में कहा जा रहा है कि सेना के जवान लोगों को सुरक्षित स्थानों में पहुंचा रहे हैं ! हेलिकाप्टरों से खाद सामग्रियाँ गिरायी जा रही हैं ! .. केन्द्रीय खाद्य-मन्त्री ने हवाई सर्वेक्ष' के बाद वक्तव्य दिया है... दिल्ली के समाचार के बाद, पटना के फतुहा 'कम्प-केन्द्र' से आवश्यक सूचना प्रसारित की जा रही है, आज किसी पेशेवर अनार की अावाज़ है-भीषण बाढ़ के कारण, पटना नगर मे पानी की आप वाधा पड़ गयी है, अतः पेयजल का भीषण अभाव हो गया है "ना - ५६/ऋणजल धनजल । से अनुरोध है कि वे किसी भी प्रकार के पानी को पन्द्रह मिनट तक उगलने के बाद काम मे ला सकते हैं... किसी भी तरह के पानी का मतलब हुमा कि बाढ़ के पानी को भी पन्द्रह मिनट तक उबालकर (छानकर नहीं ?) पी सकते हैं ?.. मैंने अपने कमरे के कोने में बैठे हुए देवता से कहा-"अब इस शहर के सभी नागरिक 'परमहंस' हो जायेंगे"तुमने कहा है न-जिस दिन नाली के गन्दे पानी और गंगाजल में कोई भेद नही मानोगे लेकिन, मैं परमहंम नहीं होना चाहता । दया करके मेरे 'टप' को 'ठप्प' मत करना।" 'घायल' पा रहा है। नरेन्द्र घायल । मैंने इसका नाम दिया है-- स्वामी मुश्किल मासानानन्द । पुनपुन की बाढ के समय भी सबसे पहले 'घायल' ही पहुंचा था। बीमारी के समय, अस्पताल में लगातार तीन महीने तक सेवा करता रहा। में तो, उसकै जिला-जवार, गाँव-घर का भैया ही हूँ--किन्तु पटना के किसी भी दुखी भौर बीमार साहित्यसेवी को सेवा मोर सहायता के लिए वह सदा तत्पर रहता है-चाहे वह पण्डित शिवचन्द्र शर्मा हो या कोई अज्ञात कुलशील नया लेखक "माते हो उसने पूछा--"माभी! लगता है आपका गैस खत्म हो गया है। नाला रोड में पानी भरा हुआ है और गैस कम्पनी भी डूबा हुप्रा है..." मैंने कहा-"मगर किरासन तेल की कोई व्यवस्था कर सको..." "व्यवस्था क्या, ले ही भाता हूँ।" बह उठ खडा हुमा । लतिकाजी ने रोकते हुए कहा-"मरे, कहाँ जाते हो ? भभी तो चुल्हा मुलगा लिया है। चाय पी लो।" मैंने कहा-"उस दिन फेजर रोड पहुंच नहीं सका । डबल रोटी नहीं ला सका। डी० लाल को दुकान डूब चुकी थी। कार कम्पनी भी..." "मा जायेगी रोटी भी। अशोक राजपथ पर मिल जायेगी।" "भव तुम लगे न फरमाइशी..." "मोर मापकी सिगरेट का क्या पोजिशन है ?" "सिगरेट तो है । लेकिन, हयुमा मार्केट खुला हुमा हो तो विश्वनाथ दुकान से मगही पान..." लतिकाजी प्रब सचमुच क्रुद्ध हो गयी-"पोर, चार बोतल कोका- । ऋणजल धनजल/५७ कोला? नहीं घायल । कुछ भी नहीं लाना है "ऐसे दुर्दिन में प्रादमी को अपनी ज़रूरत कम करनी चाहिए और इनकी फेहरिस्त लम्बी होती जा " जनाब सत्यनारायण दूसरे साहब कन्ध से झोला-झव्वा लटकाये पाये -~-घुटने तक पेंट समेटे । मैंने पहला सवाल किया-"स्टूडियो कितने पानी में है ?" - "कमर-भर।" "फोटो लेते समय लोग गालियां तो नहीं देते, यानी 'हूट-ऊट' तो नहीं करते ?" "यह पापको कैसे मालूम हुआ ? कुछ अजीव हालत है, इस बार.. पत्रकार और फोटोग्राफर को लोग नाव पर चढ़ाना भी नहीं चाहते ... मैंने तो पच्छिम पटना करीब-करीब कवर कर लिया है।" "कहीं, शारदेय पर नजर पड़ी ?" "दो दिन पहले 'संगी होटल' में थे-ऐसा मालूम हुआ है वह बम्बई चला गया होगा।" "बोटानिकल गार्डेन के पशु-पक्षियों का क्या हाल है ?" "पोल्ट्री फार्म तो एकदम साफ है.. बोटानिकल गार्डेन के भी कई जानवर बह गये हैं। कुछ डूब भी गये होंगे।" दूसरे और घायल चाय पीकर चले गये। मैं फिर कुदरत का जलवा देखने के लिए खिड़की के पास हो गया. अब वह किस मृत प्राणी की लाश आ रही है ? बहकर आनेवाली कोई भी छोटी-बड़ी चीज हमारे ब्लाक के पिछवाड़े में आकर मन्द गति से इधर-उधर थोड़ा चक्कर काटती है। हमारे ब्लाक की अर्धवृत्ताकार इमारत के पास प्राकर, हर पलट के नीचे से गुजरती हुई, सड़क की ओर जाकर तेज़ धारा के साथ हो जाती है । शायद, बछड़ा है । नहीं। यह अलसेसियन कुत्ता है । दोनों कान शान से खड़े हैं ? रोव में कहीं कोई कमी नहीं। कान से पूंछ तक इसकी मुद्रा प्रोर तेवर देखकर ही समझ लेता हूँ-इसने बहादुरी से मौत को वरण किया है। मौत की छाया पर झपट्टे मारकर लड़ता हुमा मरा है । .."बाढ़पीड़ित ग्रामीण क्षेत्रों में मृत पशुओं की-गाय, बैल, घोड़े, ५८/मणजल धनजल . - बकरी मादि को-लाशें बहुत बार देख चुका हूं"मलसेसियन कुत्त को लाश, शहर को बाढ का प्रतीक, पहली बार देख रहा हूँ। बाहर शोर हुमा कुम्हार में भी पानी घुस गया। कुम्हरार और कंकड़बाग में प्राज पानी घुसा है। "अब प्राचीन पाटलिपुत्र (प्रशोक के पाटलिपुत्र) को धरती के नीचे से खोदकर उद्धार करेंगे या आधुनिक पटना को भूगर्म में जाने से बचायेंगे? अब इधर-उधर-बाहर, भीतर कुछ भी देखने का मन नहीं करता। क्या करूं। कुछ पढ़ने की चेष्टा की जाये.. विश्वकवि की शरण गहूँ। निबन्धमाला-द्वितीय खण्ड । पृष्ठ उलटाया मोर पढना शुरू किया तो अचरज के मारे बहुत देर तक चुपचाप कमरे के कोने में बैठे ठाकुर को देखता रहा यह कैसा संयोग? पृष्ठ उलटाया और यहां भी वाद का प्रसंग?"यह क्या सम्पूर्ण 'काकतालीय'-मंयोग है ?".."और रवीन्द्र- नाथ ठाकुर को भी पंछी की लाश पर ही दृष्टि पड़ी थी ? पढ़ना शुरू करता हूँ-मिलाइदह, ६ अगस्त, १८६४.. नदी एक बार कानाय भरे गेछ । प्रो पारटा प्राय देवा आय ना.."माज देखते पैलून, छोटो एकटि मृत पाखी सोते भेसे भासछ"पोर मृत्युर इतिहास वैन बोझा जाच्छे...किसी, एक गांव के बाहर बाग में, माम की डाली पर दम का 'मासा' (घोंसला) रहा होगा। सांझ को 'वासा' में लौटकर संगी-माथियों के नरम-नरम गर्म हैनो के साथ अपना पंस मिलाकर प्रान्त देह मो रहा होगा'"हठात् पमा ने जरा करवट लो मोर पेड के नीचे की मिट्टी प्रररा कर फंस गयो । नोडच्युत पंछी ने हठात् एक मुहूर्त के लिए जग. कर चें' किया, इसके बाद फिर उसको जगना नहीं पड़ा। मैं जय मफरवल में रहता हूं--रहस्यमयी प्रकृति के पास, अपने साथ अन्य जीव का प्रभेद मॉकचित्कर उपलब्धि करता हूँ। शहर मे 'मनुष्य-ममात्र मत्यन्त प्रधान हो जाता है । वहां वे निष्ठुर रूप से अपने मुत्र-दुल के सामने अन्य किसी प्राणो के सुख-दुख की गिनती ही नहीं करते. "एक पटी के सुकोमल पंखों से प्रावृत्त पन्दमान क्षुद्र वक्ष के अन्दर जीवन का अानन्द कितना प्रबल है, इसे मैं अचेतन भाव से "भूले थाकते पारिने...'

कलाकारों की रिलीफ़ पार्टी आज सुबह से ही 'अपने लोग' -स्वजन-सनेही, मित्र और प्रीतिभाजन- जन-हमारी सुधि लेने पा रहे हैं। कोई खाली हाथ नहीं पाता। एक हाथ में लट्ठ और दूसरे में हमारे लिए कोई-न-कोई आवश्यक सामान .."सभी एक अभूतपूर्व 'मेकअप' में-लुंगी या धोती लपेटे, गंजी पहने । डाक्टर रामवचन राय प्राये, तो उनके हाथ में जो लाठी थी वह उनसे भी वजनी रही होगी। मैंने हंसकर कहा था-"प्राचार्यजी, लाठी में गुण बहुत हैं, सदा राखिये संग। नदि-नाला..." परेसजी आये, हाथ में बोतल लेकर- -"बहुत मुश्किल से एक बोतल 'ऊपर' किया है। प्राज-भर तो काम चल जायेगा न...?" बोतल पर 'ब्लैकनाइट' का लेवुल' "हालांकि काफ़ी मटमैला और बदरंग था । लतिकाजी प्रातंकित स्वर में बोलीं--"यह 'क्यों.. फिर " 'फिर...?" "जी, किरासन तेल !" एक क्षण पहले ही जिनको मेरा कोई महामद्यप और 'माताल' मित्र -समझकर दरवाजे पर से ही विदा करने को सोच रही थीं लज्जित और पुलकित होकर उन्हें धन्यवाद देने लगी--"अन्दर प्राइए न.. भीगकर आये हैं। चाय पी लीजिए।" मैंने लतिकाजी से एकान्त में अनुनय किया--"तुम दया करके इनसे यह मत पूछा करो कि दाम फितना लगा। आर्टिस्ट लोग हैं, छोटी-सी बात से ही ठेस लग जाती है इन्हें ।" ६०/ऋणजल धनजल अभी कुछ देर पहले डाक्टर रामवचन राय एक बड़ शोले मे हरी और टटको मन्जियां भरकर ले प्राये--झिंगुनी, रामतोरई, करेला, परवल, फ्रेंचवीन. हरी मिर्च और चार दूधिया-नाजुक मकई के बाल... लतिकाजी ने प्रोपचारिकतापूर्ण वातों के साथ ही पूछ लिया-"तीन चार किलो तो जरूर होगा~मब मिलाकर। इतना क्यों ले भाये? ...कितना दाम...?" मैंने बात को बीच में काटते हुए रामवचनजी से कहा-"असल दिक्कत किरासन तेल की है।" तीमार बम एकई कथा--किरासन तेल । नहीं, रामवचनजी, भाप किरासन तेल मत लाइएगा । मैं भी अभी निकलूंगी, ले माऊँगी देखिए न, माज सुबह से जो भी माते हैं सबसे बस किरासन तेल की दिक्कत "मैं तो डरो कि कही अपने नये जमाय' और 'कुटुम्ब' को भी किरासन तेल की दिक्कत मुनाकर फरमाइश न कर बैठें।" परेसजी बैठे ही थे कि डाक्टर रामवचन गय डालडा के एक नये डिब्बे मे किरासन तेल लेकर लौटें। इसके तुरन्त बाद ही धीमान पापल एक किरासन तेल वेंडर को ही गाड़ी के साथ लेकर प्रकट हुए-~~"लीजिए, कितना तेल लीजिएगा।" घायल के हाथ में 'फरेज़नी' की दो डबल रोटियां थीं-"अभोक राजपथ पर एक दुकान में मिल गयी..." मित्रों के जाने के बाद लतिकाजी की बेकार को वहस को मैंने समाप्त करने की चेष्टा को-"देखिए मैं, यानी पटना का एक लेखक, अर्यात कलाकार, बाढ से घिरा हुआ हूँ."एरा प्रामार जातेर लोक, "ये हमारी विरादरी के लोग है-लेखक, कवि, पत्रकार, कथाकार, आर्टिस्ट, अभि- नेता-मेरी सुधि लेने पाते हैं और मेरे लिए 'रिलीफ़' ले पाते हैं । मुझे जिस चीज़ की जरूरत होतो है उनसे वेझिझक कह देता हूँ.."पपने को धन्य मानकर, उनके लाये हुए 'सौगात' को प्रसाद से भी अधिक पवित्र समझकर, निविकार चित्त से उप मोग करता हूँ। इसमे लाज-शर्म की वार मथवा 'जग हँसाई कहाँ है ?."हाँ, बेटी के ससुराल से पाये हुए फल तपा मल को प्राप निश्चय ही अलग रख दीजिए।" सरदारों को रिलीफ टोली आज दोपहर मे भी रोटी-पानी बाँट गयो - है। प्रासपास के मकानों में बसेरा लिये हुए लोग गर्म-गर्म रोटियां खाते हुए वतिया रहे हैं-"पूरी से भी ज्यादा स्वाद है इस रोटी में "कितना प्रेम से 'चोट-वखर' करते हैं; न किसी को कम न किसी को ज्यादा 'वोल रहे थे कि साँझ को भी 'लंगर' पायेगा, घबराना मत."ई 'लंगर' का है हो ?"..."हं हं हैं- लंगर नहीं समझा-यही जो खा रहे हो।" अभी टेलीफ़ोन लाइन ठीक रहती तो कहीं से जाकर सीधे अपने पुराने मित्र सरदार चन्द्रमौलेश्वर सिंह को इन संवादों के साथ बधाई दे देता.."चन्द्रमौलेश्वर नाम सिख नामावलि में असाधारण, 'अनकॉमन' और अजनवी भले ही हो-सरदार चन्द्रमौलेश्वर श्री पटणासाहव गुरु- द्वारा प्रबन्धक कमेटी के जनरल सेक्रेटरी हैं। पंजाबी सिक्ख नहीं, पूर्णिया को सिक्ख हैं। इसलिए इतना मनोहर नाम है। हां, हमारे जिला में पन्द्रह- वीस टोलों के ऐसे-ऐसे बड़े गाँव भी हैं जहाँ अचानक पहुंचकर किसी को भ्रम हो सकता है कि हरयाणा अथवा पंजाब के किसी इलाके में आ गया है..'ढोर चराते हुए सिक्ख, खेत गोड़ते हुए सिक्ख, बैलगाड़ी पर सरदार, घोड़े पर-इधर-उधर हर तरफ़ छोटी-बड़ी, रंग-बिरंगी (और बदरंगी भी) पगड़ियोंवाले-छोटे-बड़े सरदार "गुरु तेगबहादुर ने असम जाते समय यहाँ गंगा पार कर डेरा डाला था और यहां के लोगों के बीच 'सतसंग' करके धर्मप्रचार किया था। पांच धर्मप्रचारकों को वह छोड़. कर गये थे। अब तो इस इलाके में दो गुरुद्वारे हैं-उचला में, लक्ष्मीपुर में। बोली, पूर्णिया के गांव की ही बोलते हैं. हमारे मित्र सरदार श्री चन्द्र- मोलेश्वर इसी इलाके के एक बड़े गांव 'उचला' के निवासी हैं तथा तेग- बहादुर द्वारा रखे गये पांच धर्मप्रचारकों में से एक के वंशज हैं। इसलिए गुरुद्वारा पटना साहब की ओर से बटनेवाली 'रिलीफ़' का थोड़ा श्रेय स्वयं लेता हुआ मैं कहता हूँ-"यह भी समझो कि''हमारे पूर्णिया के 'परताप' से ही..." शाम को एक नया दल पाया। एक मुहल्ले के कई प्रवासी बंगाली- विहारी गायक, वादक, लेखक, गीतकार, कवियों ने मिलकर मुहल्ले के घर-घर से 'मुठिया' जमा किया। एक नाव किराये पर ले आये। अपने हाथों से रोटियां बेलकर, सेंककर, सब्जी पकाकर बड़े-बड़े 'देग' में ले ६२/भणजल धनजल प्राये हैं। दूध के चूरे मोर दवाइयां भी हैं."नाव पर खड़े एक युवक को सूरत अतिपरिचित-सी लग रही थी। वह भी मुझे उसी दृष्टि से देख रहा था और मेरी ही तरह भटक रहा था। मैंने पुकारा-"मालोकीमालोक- धन्वा ?" यह हंसा । नाव से नीचे उतरकर हमारे पलट के नीचे माया। उसने दाढी मुड़ा ली है मौर मेरी दाढ़ी बढ़ गयी है, इसलिए मैंने फिर लतिका को छेडा--"बाहर भाकर देखिए, हमारे तरण कलाकारों की रिलीफ़ पार्टी।" तरुण कलाकारों को नाव रोटी, सब्जी, दूध, दवा बांटती हुई चली गयी। मैं बहुत देर तक चुपचाप न जाने क्या सब सोचता रहा कि मन फिर कातर होने लगा। किन्तु अपनी कसम को याद करके तुरन्त 'चंगा' हो गया। लतिका देवी अपने सगे, सम्बन्धियो मोर छात्रामो का हाल-समाचार जानने के लिए निकल पड़ी हैं। मुझसे इस बार इस औपचारिकता का निर्वाह भी नही हो सकेगा-मुझे इसका खेद है। इन दिनों छत पर पहुंचने का अर्थ है 'गांधी मैदान पहुंच जाना; मतलब छत पर पहुंचते ही अपार जनता के बीच पहुंच जाना-सा हो जाता है। पहुंनते ही चारों मोर से प्रत्येक पलैट के निवासियों द्वारा सचित, संग्रहीत तथा सम्पादित समाचार मिलने लगजाते हैं. इण्डस्ट्रियल स्टेट में दरवाजा नहीं खुल सकने के कारण एक पूरा परिवार ही.. किदवईपुरी मे एक स्कूटर पर स्वामी-स्त्री और बच्चे की लारों-स्वामी स्कूटर का हैण्डिल एकदम टाइट' होकर पकडे हुए था."एक लड़की के बक्से में दो बच्चे मिले । एक मर चुका था। बक्से के अन्दर एकचिट्ठी थी.."हम लोग पानी से घिरे हैं। मगर माप लोगो में से किसी को यह बक्सा मिले...' "अरे साहब, तटबन्ध को तो 'फलाना' ने उड़ा दिया है.. वीमेंस कालेज में क्या हुमा सो मालूम है ? अब मैं ऐसी बातों से नहीं चिढ़ता । मुझे इन लोगो से मब सहानुभूति होने लगी है । वेचारे चारो मोर से पानी से घिरे हुए लोग, छत पर माकर कुछ सुन-सुनाकर अपनी 'बोरियत' को दूर कर लेते हैं.."सम्भव है ऐसी विपदा को घड़ी में प्रादमी थोडा वेमतलब और बेसिर-पर की 'नानसेंस' " वोलकर कुछ राहत हासिल करता हो। किन्तु, आज पहुंचते ही एक मतलव की बात की-बोरिंग रोड की प्रोर से किसी फ्लैट में प्राकर टिके हुए एक पटनियां-बंगाली नौजवान ने। बोला-"हम लोग अगस्त से लेकर अक्तूबर तक किसी भी स्थानीय समा- चारपत्र के दो-तीन कालम को कभी नहीं पढ़ते थे---उत्तर बिहार की वाढ़ के समाचारों के कारण। हर वर्ष नियमपूर्वक प्रानेवाली हर बाढ़ को पिछले साल की बाढ़ से बढ़कर वताया जाता। किसी तटबन्ध का टूट जाना और फसल के साथ जान-माल की वर्वादी के समाचारों के कोई प्रभाव हम पर नहीं पड़ते थे। इसीलिए इस बार ऐसा लगता है कि "हे मोर प्रभागा देश, जादेर कोरेछो अपमान हते हवे तादेर समान..." उस युवक को इस तरह आवेश में पाकर पावेगपूर्ण प्रावृत्ति करते सुनकर उसकी फूफी या मौसी ने पुकारकर कहा था-"खोकन, की सव जा-ता देश-टेश निये जादेर-तादेर संगे तुई 'प्रावोल-तावोल' बले वेड़ा- च्छिस?..'नीचे चल! मन में हुआ कि टोकू-"की दीदी ?..'पापनि रवि ठाकुरेर कविता के प्रावोल-ताबोल बलछेन ?" किन्तु फिर समझा कि वह 'भद्रमहिला' शायद ठीक ही कह रही है । इम्प्रूवमेंट ट्रस्ट के नये मकान की छत पर वाढपीड़ितों के कई परिवार एकत्रित होकर वार्तालाप कर रहे हैं। ऐसी ही खबरें वहाँ भी प्रसारित प्रचारित हो रही हैं. "कमला-बलान नदियों के इलाके में रहनेवाले एक व्यक्ति ने कहा-"जे दुखे छोड़लहु घोराघाट, से दुख लागले रहल साथ..." जिस दुख के कारण घोराघाट छोड़ा वह दुख साथ लगा ही रहा । कमला- बलान ने गांव उजाड़ दिया, तो भागकर पटना पाये । पटना पाये तो- ले वलया! पटना में भी वही हाल !" उसके साथी ने कहा-"पटना में भी वही हाल कैसे ? वहां, अपने गांव में, बाढ़ के समय रहने को तिमंजिला मकान मिलता था ! एँ ! बोलो! ऐसन नरम-नरम, गरम-गरम रोटी और रसादार तरकारी वहाँ मिलता था? ए? बोलो?" "प्रय हो, रेडियो में तो वोलिस है कि होली-कफ्टर से बनल-बनावल, ६४/ऋणजल धनजल - पकल-पकावल खाना गिरावल जाता है । मुदा इधर कहाँ गिराइस है एको दिन? अय हो...?" "सुनते हैं जी? सरदारजी लोग के 'लंगर' मे ममी जो पियाज की चटनी दिया था ऐसा स्वाद था कि क्या बतायें। कि सच्चो कहते हैं- टोकरियो भर रोटी हम उत्ती-सी चटनी से खा जाते !" "घेत्त मदें ! टोकरी-भर रोटी खाने का मिजाल है तुम्हारा ?" दाम को साढ़े सात बजे पटना उर्फ फतुहा कैम्प केन्द्र ट्यून किया--- "मब आप रामरेणु गुप्त से समाचार मुनिए...!" तो प्राज न्यूज एडिटर श्री एस. एन. मिश्रा सदलवल फतुहा कैम्प केन्द्र पहुंच गये हैं ? "रात मे दो विशेष प्रसारण की विशेष सूचनाएं प्रसा- रित की गयी हैं। लतिकाजी रात के साढे आठ बजे लौट आयी, तो उधर से जितनी सबरें लेकर लोटी पी उनमे से प्रायः सभी समाचार कुछ हेर-फेर के साथ मैं अपनी छत पर ही सुन चुका था। .."पानी मे 'क्लोरिन' की मात्रा इतनी बढ़ा दी गयी है कि घाय, कॉफी, रोटी, दाल सबमे बस एक ही स्वाद । कहते हैं क्लोरिन का दांत के 'एनामेल' पर बुरा असर होता है ! .."कल रात को काले भयावने बादलों को देखकर मुंह से सहसा निकला था और मैंने सिगरेट की डब्बी पर लिख दिया था-"तुम्हीं क्यों वाकी रहोगे मास्मां !"...माज उसके नीचे दूसरी पंक्ति लिखकर प्रसन्न हुआ- "तुम ही क्यों बाकी रहोगे मास्मा ! कहर बरसाकर शहर पर देख लो!"..'कहर 'वरसा' कर या 'बरपा' कर? नही, बरसाकर ही ठीक है !.."किन्तु मुझे सन्देह है कि ये पंक्तियां मेरी नहीं किसी मोर शायर की हैं."दुष्यन्त को लिखकर पूछ् । बहुत देर तक दुष्यन्त की एक गजल की कई पंक्तियों को मन-ही-मन दुहराया। फिर शमशेर के शेर को इन दो पंक्तियो को तरन्नुम के साथ गुनगुनाता रहा-"जहाँ में अब तो जितने रोज़ अपना जीना होता है। तुम्हारी चोटें होनी हैं, हमारा सीना होना है। जहाँ मे भव तो जितने रोज..." शायद क्लोरीन में अन्य गुण-अवगुण के अलावा शीघ्र सुलाने की भी ऋणजल घनजल/६५.

थोड़ी शक्ति होती है। बिछावन पर लेटा और सम्भवतः दस मिनट के बाद ही गहरी नींद आ गयी। सुवह साढ़े छह बजे छत पर दौड़-धूप और आपाधापी से नींद खुली... आकाश में एक साथ कई विमानों की सम्मिलित भनभनाहट "हां! हाँ! लगता है इसी में हैं। इसी में...? इण्डियन एयसफ़ोर्स का प्लेन है न ? तब इसी में हैं !... उठकर खिड़की पर गया। आज अभी भीड़ कम है। बाहर, भीतर सभी लोग प्रास्मान की ओर अांखें उठाकर देख रहे हैं। 'एहि में हो... एहि में हो ? एहि में..'बीचवाला में.. हमको तो आवाज़ से ही पता लग गया कि यही प्लेन है। आकाशवाणी से प्रसारित प्रत्येक बुलेटिन में कल से ही कहा जा रहा है कि सेना के विमान और हेलिकॉप्टरों के द्वारा बाढ़ में फंसे हुए लोगों को सुरक्षित स्थानों में भेजा जा रहा है और पके-पकाये भोजन के पैकेट गिराये जा रहे हैं ! अतः हवाई जहाज़ की आवाज़ सुनते ही सभी की आंखें आकाश की ओर टंग जाती हैं 'कहाँ गिराया दरवाजे की कुण्डी खड़की सुबह साढ़े सात बजे ही पानी हेलकर सुधि लेने कोन 'उदार बन्धु' आ गये ? विछावन छोड़ना ही पड़ा'पास- पड़ोस के ब्लॉक के दो-तीन सज्जन । उनका अधेड़ अगुप्रा आगे बढ़कर वोला-'आपको थोड़ा कष्ट दिया। माफ़ किया जाये। देखिए, तीन दिन हो गये । अब तक हम लोगों के चारों ब्लाक में एक भी नाव नहीं मिली। सुना है कि 'कलेक्टेरियट' में 'ज्वायंटली' जाकर कहने से नाव मिलती है। तो सोचा कि आपको ही अगुमा बनाकर ले चलें। आपके रहते फिर.." "मुझे ? अरे मेरे लिए तो मुश्किल है. मैं तो इतना लाचार हो गया हूँ..'कि," मैं हकलाने लगा। "क्यों-क्यों ? बीमार-उमार हैं क्या ?" "मेरा चेहरा देखकर आप कुछ नहीं समझ सके ?" "हाँ, हाँ। इधर थोड़ा कमज़ोर लग रहे हैं । तो क्या तकलीफ है ?" साथ में आये हुए नौजवान को मालूम था कि मैं पेप्टिक अलसर का मरीज़ हूँ। उसने कहा, "पेप्टिक अलसर है तो आपरेशन क्यों नहीं करवा कुछ? । - ६६/ऋणजल धनजल लेते? "प्रापरेशन नहीं। इसको इण्डियन मेडिकल इंस्टिट्यूट-दिल्ली में डाक्टर प्रारमप्रकार के द्वारा 'फ्रोज' करवाना है।" "यह फ्रीज़ क्या होता है ?" "होता है..." "माफ किया जाये । आपको कष्ट दिया।" "साला, मिथ्येदादी, बेइमान जोच्चोर' भूटा । भाग यहाँ से।" कमरे के कोने में मुझ पर दनादन गालियां दागी गयी। ऐमी गालियां सुनकर मन प्रमन्न हो जाता है."तो ठाकुर प्रसन्न है ! 'तुम तो जानते हो ठाकुर, मैंने एक शब्द भी झूठ नहीं कहा । मैंने यह भी नहीं कहा कि पेप्टिक अलमर के कारण उनके साथ जाने में असमर्थ हूँ.."अब तुम्ही बताप्रो न, नाव लेकर मैं क्या करता, मथवा वे हो क्या करेंगे? उपर सारा पच्छिमी पटना अगम पानी में है--प्राप छाती-मर पानी में ही हैं । कही डुवाद पानी तो है नहीं। कही से एक नाव मिल भी गयी तो रोज प्रापस मे ही सिर-फुटोवल...' सुबह आठ बजे का ममाचार सुनकर ही समझा कि लोग अाज सुबह साढ़े छः बजे आकाश की ओर हवाई जहाज को क्यो देख रहे थे । केन्द्रीय खाद्यमन्त्री के बाद स्वयं प्रधानमन्त्री हवाई सर्वेक्षण करने के लिए (प्रायो थी) पाये थे। प्राज पानी घटा है। अविराम वहनी हुई धारा की गति और भी मन्द हुई है । बाढ के जल में प्रब एक विचित्र-मो महक मा गयो है ''माज एक भी नहाने वाला नही, कही भी। पानी में नहाते हुए ऊधमी लड़कों ने कई दिनो मे जी को काफी कुढाया था। ग्राज वे नहीं है, तो लगता है कही जिन्दगी है ही नही.."जलप्रलय में मी वे जलकेनि करते रहे। रोग के कोडो की पर्वाह किये बिना राजेन्द्रनगर गोलम्बर के गोल पार्क के चारो पोर 'तेज गति से चक्कर मारनेवाली' टम प्रभूतपूर्व 'नयो नदी में नहाने वाले लडके सब माज कहां चले गये ? एक नाव से मेडिकल स्वयमेवको को टोली एलान कर रही है- "भाइयो! वाढ़ के कारण पटना नगर में तरह-तरह के मामक रोगों के ऋपाजल धनजल/६० - - फैलने की आशंका है। आपके दरवाजे पर हमारे स्वयंसेवक टीका लगाने पहुंच रहे हैं। कृपया, फौरन टायफायड तथा हैजे का टीका ले लें।" एलान सुनकर मन में तुरन्त सवाल उठा-'इतनी दवाइयां अभी मौजूद होंगी ? अथवा बाहर से आनेवाली दवाओं के समाचार के आधार पर...?" रेडियो से बिहार के बाढ़पीड़ितों के लिए 'दान' मिलने के समाचार निरन्तर पा रहे हैं. रोटियाँ, दूध के चूरे, पके-पकाये भोजन, विटामिन की गोलियां, दवाइयाँ, रुपये-अनाज' रात में छत पर सुना-कलं हम लोगों के इलाके पर-राजेन्द्रनगर- लोहानीपुर में हेलिकॉप्टर से खाने के लिए सामान गिराये जायेंगे। 'कल दिल्ली से और भी कई बड़े मन्त्री आ रहे .. सेना ने पटना शहर को बचाने का काम अपने हाथ में ले लिया है। आर्मी के जवानों ने वचाव- कार्य शुरू कर दिया है. राजेन्द्रनगर में कल खाद्यसामग्री गिराये जाने की बात एकदम पक्की है । देख लीजिएगा! और सचमुच दूसरे दिन सुबह सात बजे से ही राजेन्द्रनगर में 'एयर- ड्रापिंग' का काम शुरू हो गया । ''आकाश में एक दैत्याकार आँखफोड़वा-टिड्डा जैसा भूरे रंग का फौजी हेलिकॉप्टर, साइरन की तरह अविराम पतली सीटी-सी बजाता हुआ, घोर गर्जन करता हुआ, छतों पर धूल का धूणिचक्र उड़ाता, 'लो- फ्लाइंग' करके धीरे-धीरे नीचे की ओर आता है । 'थुथने' को तनिक आगे की ओर झुकाकर, पूंछ ऊपर किया...। गरगराहट और भी तेज़ हो गयी और लो.''लो' 'वह गिरा बड़ा वक्सा है.. कार्ड बोर्ड का वक्सा." हा-हा.. 'सी-ई-ई-ई-ई.. गरगरगरगरगरगर "गुड़रगुड़गुड़र "सी-ई-ई-ई- ई-गरगरगरगरगर--एक और आ गया उधर से.. उस छत पर एक बक्सा फिर गिरा । एक नहीं दो ?'.."सिं-ई-ई-ई-गरगरगरगर"इस छत पर भी गिरेगा, अपने छत पर भी गिरेगा. सिंई-ई-ई... पाइलट सिख नौज- वान है, हँस रहा है. 'ए, देखो। होशियार। बच्चों को पकड़ो। उड़ जायेंगे. वह चटाई उड़ी.. साड़ी-ब्लाउज़-तोलिया सव उड़ा...सिंई-ई .. ६८ / ऋणजल धनजल गरगरगरगर गिरा, गिरा... निश्चय ही उनके पास मूवी कैमरा होगा। उनके पास 1-अर्थात् हेलिकॉप्टर पर जो लोग बैठे है ? .. कैसे लगते होगे ऊपर से हर छतो के दृश्य "सभी मकान के मुंडेर पर प्रौरत-मर्द-बच्चे, इधर से उधर दौड रहे हैं, ऊपर की भोर हाथ पसारे। एक-दूसरे को धकेलते, गिरते-पड़ते लोगों के झुण्ड, हर मकान के छत पर ...? ...सि-ई-ई-ई-ई-गरगरगरगर-गुडर-गुहरगुड़र--अपने छत पर कोई लाल फ़्लंग नहीं ? लाल फ्लैग दिखलामो यहां भी गिराम्रो प्रोमिस्टर पाइलट-मॉन दिस रूफ''पाइलट साहेव, इधर भी...इधर भी...मरे यहां कुछ बिछा दौ--सिगनल दो, यहाँ गिरावेगा. यहां-यहाँ "ए, पाइलट साहेब, सर्दारजी-ई...गिराइए"गिराइए."ए, लाल 'फ्लॅगिंग' करो.. सिं-इ-ई-ई-ई-गरगरंगरगर-गुड़रगुड़रगुड़र"यहाँ "इस छत पर क्यों नहीं गिरता ? ...सि ई ई ईई। गरगरगरगरगर ।

। मानुष बने रहो पानी की धारा एकदम मन्द हो गयी। पानी का रंग धारा की गति के साथ ही धीरे धीरे बदल रहा है। वहाव बन्द होते ही पानी का रंग कुछ ही घण्टों में हरा हो जायेगा। पानी पर हरे रंग की पपड़ी जम जायेगी और हवा में सूखी मछली की गन्ध जैसी 'बिसाइन' महक । आज कई स्थानीय दैनिक पत्रों ने एक पन्ने का 'अंक' निकाला है। पत्रकार मित्र सूर्यनारायण चौधरी कई हिन्दी-अंग्रेजी अखबार लेकर आये। डेढ़ पृष्ठों में टेंडर, वाण्टेड, विश्वविद्यालयों तथा अन्य सरकारी अर्ध- सरकारी संस्थानों की विशेष विज्ञप्तियाँ। बाकी में पटना नगर की बाढ़ के सचित्र समाचारों के बीच-बीच में यत्र-तत्र 'बॉक्स न्यूज़' : दिल्ली से इतने हजार किलोग्राम माडर्न रोटी आ रही है। दिल्लीवालों के दैनिक राशन में रोटी की कटौती: विदेश से 'केक' और 'चीज़' भी: आगरे के पेठे: कलकत्ते से भी रोटियां : प्राण-रक्षक दवाइयाँ और कपड़े। अखबार पढ़ने के बाद बात समझ में आयी कि क्यों कुछ देर पहले छत पर भाईसाहब इतने उत्तेजित, असन्तुष्ट और क्रुद्ध थे। निश्चय ही उन्होंने आज का अखबार पहले ही पढ़ लिया था। हमारी छत पर हेलिकॉप्टर से पाँच पैकेट जो गिरे थे उनमें से तीन, भाईसाहब तथा उनके परिवार और सगे-सम्बन्धियों के हाथ लगे थे और तीनों में बस चिउरा, भुने चने, पॉप कान और दालमोठ ? बाकी दो पैकेट में भी यही चीजें थीं। भाई साहब के मुंह से, घुले हुए पान की जाफरानी पीक की गुड़गुड़ाहट के साथ लानत-भरी आवाज़ निकली-"क्या तमाशा है !" फिर ,पीक थूककर चालू ७०/ऋणजल धनजल 1 हो गये-"एज इफ वी पार लेवररतमागा है"दिल्ली का रोड कहाँ है ? बतलाइए। वटर, केक, 'चीज' कुछ भी नही, सिर्फ चूडा-चना- फरही ?.."दोरिंग रोड, कृष्णापुरो या पाटलिपुत्र कोलोनी की बात छोडिए -~-पही, प्रभी, राजेन्द्रनगर में ही कंट्राक्टर, फलाने प्रसाद सिंह के एरिया में जो पैकेट गिराये गये हैं सबमें 'ए-वन' चीजें-~-मतलब, ग्रेड-बटर-चीज सबकुछ---और हम लोगों की छत पर सिर्फ ये 'रॉटन' चबेने ? बोलिए, इमका क्या जवाब है ? एं?.."खुद, सरकारी रेडियो बोलता है कि :राजेन्द्रनगर इज ए पास एरिया-' पालीशान इलाका है राजेन्द्रनगर पौर वहां गिरायी जाती हैं • दिस इज शीयर पासियालिटी"नही तो मोर क्या"अरे साहब, खा गया-खा गया, सब सा गया..." "जो कुछ मिला है भाप भी चवा लीजिए । वरना..." "वरना, क्या...?" वरना, नरम हो जाने पर कुरमुराहट नहीं । "हुंह ! चबा-लीजिए ? 'माई एम नाइदर ए विलेजर नार ए लेबरर, पार ए बेगर.." मेरे मुंह पर अपनी मुंहतोड प्रग्रेजी में 'रिटर्न पॉट' मारकर माईसाहब का क्रोध तत्काल कुछ कम हो गया। अपनी एक 'केलिकुजिका'* से उन्होने कहा-"पंकेट ले जाप्रो और उधर 'झोपड- पट्टी' से जो लोग माये हुए हैं उन लोगो को 'हिस्ट्रिब्यूट' कर दो."खा गया, सब खा गया..!!" बाकी दो पकेट पानेवालों ने अपनी छत पर उपस्थित लोगों के बीच 'भाग बंटवारा कर लिया था। धूडा पोर दालमोठ चबाता हुमा प्रोफेसर साहब का नौकर कहता है--"चूडा बहुत 'फाइन' है और दालमोठ एकदम पियोर पोस्टमन मे छाना है..." * दस साल पहले दिल्ली मे, अपनी पत्नी की छोटी बहन का परिचय देते हुए डा० सुरेश अवस्थी ने किसी सस्कृत कोप का हवाला देकर प्रथं सहित यह शब्द बताया था। उन्होने सिरियसली' कहा था या दिल्लगी में, नहीं कह सकता किन्तु तब से मैं इस शब्द को भद्रतापूर्वक व्यवहार मे लाता हूँ।

- - भाईसाहब नीचे गये तो मेरे पास एक दूसरे सज्जन सरककर आ गये। नम्र और दवी हुई आवाज़ में (फुसफुसाहट में) उनकी शिकायत थी : "उधर प्लास्टिक के बड़े-बड़े 'कन'.. हाँ, इतने बड़े कि उसमें करीव चार घड़े पानी तो जरूर"एकदम मिल्की व्हाइट कैन के मुंह पर टाइट किया हुआ जेड ब्लैक कैपलवली. "मैंने कल खुद अपनी आँखों से देखा है। हेलिकॉप्टर से गांधी मैदान में पानी पर 'थपाथप' गिराया गया, वहाँ से पार्टी का आदमी बटोरकर नाव पर लेकर वेस्ट पटना की ओर चले गये ..'मानता हूँ कि हम लोगों के एरिया में पीने के पानी की कमी नहीं है लेकिन, कैन...?" "उस छत पर अभी ही एक लाल फ्लास्क-छोटा-गिराया है।" "उधर, लोहानीपुर की एक छत पर कपड़े का वण्डल भी गिरा है। शायद, गलती से गिर पड़ा है।" "एयर ड्रापिंग दो तरीके से करते देखा। एक, मुंह की ओर से पाइलट के बगल में बैठकर, दूसरा-दुम की ओर से। मुंह की ओर से गिरानेवाला, पैकेट गिराते समय दुम ऊपर की ओर उठाकर, मुंह नीचे की ओर झुका लेता है और दुम की ओर से गिरानेवाला सिर ऊपर की मोर उठा लेता है। कभी-कभी इतना करीव आ जाता है कि उस छत पर लगा कि एक आदमी को हाथों-हाथ पैकेट दे दिया 'धन्न है।" अभी रेडियो से एक आवश्यक सूचना प्रसारित करके लोगों को साव- धान किया गया है : 'कृपया अपनी छतों पर ऐसा सामान नहीं रखें जो उड़ सकते हों । हेलिकॉप्टर जब आपकी छत के ऊपर पहुंचे तो उस समय कपड़े, चटाई, कितावें वगैरह हटा लें, और छोटे बच्चों को भी...' छोटे बच्चे ही क्यों, हेलिकॉप्टर के बवण्डर में पड़कर क्षीणकाय अल्प- प्राण वड़े-बूढ़े भी उड़ जा सकते हैं. और औरतों को चाहिए कि हेलि- कॉप्टर के नीचे जाने के पहले दक्षिणी ढंग से साड़ी पहन लें। नहीं तो, जैसा कि अमी देखा-सारी बीच नारी है कि नारी वीच · सारी है कि सारी है कि नारी है कि खाली बस नारी है। कुण्डी खड़की के तीन-चार विद्यार्थी हाथ में स्टील •मेडिकल ...

टोली को 'गाइड' कर रहा है, हमारे ब्लाक का किसोर टोमेटो। बेचारा थोड़ा तुतलाता है मौर उत्तेजना अथवा उत्साह में तुतलाहट बहुत बढ जाती है। हमारे ब्लाक के रविजी तो मेडिकल स्क्वाह के साथ ही हैं ? "माई । यह हैजें और टाइफाइड दोनों एक ही साथ वाली दवा नहीं है ? क्या नाम है उसका 1 टी० ए.? सिर्फ हैजे की सूई ? तब तो दो बार? .."लगा दो दाहिने हाथ के बांह पर हो । अब मेरे दायें और बायें हाथ में कोई फर्क नही 'इतनी बार सूई ली है, फिर भी सूई देखकर तनिक घबरा ही जाता हूं। मौर हैजे की सूई का दर्द बाढ में इतना बढ़ जाता है कि... बस, धन्यवाद...!! मेडिको-वालेंटियर ने बुखार की गोलियां, प्रांख मे डालनेवाली दवा और बोरिक पाउडर की पुडिया दी. जियो । सुखी रहो!! पास के ही एक फ्लैट के सभी निवासी, जो अब तक बाहर खड़े हंस. बोल रहे थे, मचानक मन्दर चले गये। फ्लेट एकदम निशब्द ! टोमेटो ने कुण्डी खड़कापी । भभिमावक ने दरवाजे पर प्रकट होकर ऐसी मुखमुद्रा बनायी मानो पूजा का चन्दा मांगनेवाले लड़कों से निबटना है-'क्या है ? हैजे की सूई ? हम लोग तो ताजा-ताजा गरम-गरम खाते हैं । बासी चीजें नहीं खाते। सूई लेने की क्या जरूरत ?" टोमेटो हकलाता है। किन्तु, कभी-कभी मौके पर वाजिव जवाब देते समय उसकी बोली जरा भी नहीं भटकती। उसने कहा--"एक आप ही लोग ताजा मोर गरम खाते हैं. वाकी सभी लोग बासी, ठण्डा भोर सड़ा- गला खाना खाते हैं, क्यों?" दरवाजा सशब्द बन्द हो गया। सीढ़ियों से उतरते समय एक लड़का वोला- "असल बात कुछ और है। हम लोगो के साथ कोई लेडी स्टूडेण्ट नहीं है न । मोर इस फ्लंट में सब मिलाकर ज्यादा..." "लेही स्टूडेण्ट नहीं। कल से वी. एस. एफ. के जवान रहेगे साय। तब देखना कि बिना चीचपड़ किये किस तरह..." शायद, रविजी बोल रहे थे। अपने ब्लाक के, एक हीरा लड़का'-रंजन की याद पाती है । स्वस्थ, सुन्दर, सभ्य मोर उत्साहो। राजीव रंजन ! मभी रहता तो निश्चय ही .

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वया है ? लोफ, लोफ "डबल रोटी गिर रही है इस बार "दौड़ के। लपक लो। हट जामो। मेरा है मैंने लूटा। इधर कहाँ ? "वाह । बहादुर लड़की है "वहादुर नही, लुटारू ललना । फिर पायेगा । तैयार रहो... सुबह से ही, जब पहली बार पैकेट गिराये जा रहे थे, तभी से 'एयर ड्रापिंग' के इस अभूतपूर्व दृश्य के 'बैंक ग्राउण्ड' में एक फ़िल्मी रिकार्ड बजाने का मन कर रहा है । किस फिल्म का वह गाना है, नहीं जानता। किन्तु 'मुखड़ा से लेकर ताल और वोल सब एकदम फिट । मगर मेरे पास रिकार्ड प्लेयर होता मोर बह रिकार्ड होता तो हर बार एयर ड्रापिग के समय छत पर निश्चय ही बजाना शुरू कर देता। चूंकि, मेरे पास कुछ भी नहीं। इसलिए पैकेट गिराते समय मेरे मन मे वह गाना मय म्युजिक प्रौर मुखडे के-कुछ नये 'बोल' लेकर बजता रहता है। सी-ई। ई। ई। ई-गरगरगरगर-गुड़रगुडरगुडर-मा गया जो भा गया। गिरा गिरा गिरा "लूट लूट लूट ले "ए पायलट साहेब... पं-प-पं पपम पपम में-ए-ए-खाना मिलेगा, पोना मिलेगा, मैया की शादी है सबकुछ मिलेगा, खाम्रो मेरे यार, पोमो मेरे यार । लूटो मेरे यार, मीटो मेरे यार.. पपम पपम 4-ए-ए-पायलट साहेब, इधर भी गिराइए। जरा रहम खाइए, यो ना दौडाइए। पानी भी पिलाइए । फ्लास्क भी गिरा- इए। इधर इधर इधर गिरा, उधर-उधर-उधर गिरा । क्या-क्या गिरा, क्या-क्या लूटा । ए. ये चूडा-चना-दालमोठ? छोडो नहीं यार, फांको मेरे यार । जो भी गिरे लूट ले, जो भी मिले ढूंस ले । महंगा है फोकट का माल...... पपम पपम पे-एं... "अरे ? तुम यहाँ बैठे हो। ऊपर छत पर जाकर देखो..." "पांवरुटिर वृष्टि होच्छे"-लतिका हडबड़ाती हुई प्रायी। "सिर्फ पाव रोटी या उसके साथ मोर भी कुछ ?" "पोलिथिन पेपर के बड़े-बड़े पैकेट गिराये जा रहे हैं। पता नहीं उममें और क्या-क्या है।" दिल्ली की-कलकत्ते को रोटी, प्रास्ट्रेलियन मक्खन, यू. के. का केक, चीज़ मोर मागरे के पेठे? मेरी रसना अचानक रसवन्ती ही नहीं- बाढ मा गयो मुंह मे। बिना चप्पल के ही छत पर दौडा। किन्तु, पहुंचते ही हेलिकॉप्टर के बवण्डर ने मेरे सिर पर, वाल आंख-कान,मुंह में टोकरी-भर धूल झोंक दिया। पनिायी हुई जीभ अचानक सूखकर काठ जैसी हो गयी। छत के एक कोने में दीवार के सहारे खड़ा होकर धूल झाड़ रहा था, आँखें मल रहा था कि एक उछलती-कूदती किशोरी-सी दोखनेवाली कन्या ने मेरे हाथ में एक थैला थम्हाते हुए कहा-"यहाँ इस तरह खड़ा रहिएगा तो कुछ भी नहीं मिलेगा। लीजिए।" 'माल' से भरा थैला लेकर नीचे उतर पाया। लतिकाजी के आगे यह आस्मानी तोहफा डालकर सीधे नहाने के घर में घुसा. मेरी देह के प्रत्येक लोमकूप में धूल के कण समा गये थे और सारे शरीर में खुजली और जलन हो रही थी। ऊपर छत पर कुहराम और हाय-तोबा जारी था -~~-"लेकिन, माडर्न का ब्रेड कहाँ है ? यह तो लोकल अन्नपूर्णा है दिल्ली वाली रोटी नहीं गिरायो ? बटर केक-चीज़ कुछ भी नहीं ? पेठा भी नहीं ?..'तमाशा है ! ब्रेकफास्ट के समय इघर चना-चवेना और अभी लंच में भुआई हुई फफूंद लगी लोकल लोफ असल माल सब उधर ही •खा गया ! सब खा गया !" दरवाजे पर आकर एक 'भद्र स्त्री' भाषण देने लगी-"यह तो गरीबों को बांटने के लिए गिराया जा रहा है। हम लोगों ने सुवहवाला सव -सामान बाँट दिया है और अभी भी जितना मिला है, सब ग़रीबों को दे देंगे।" लतिका कह रही थी-"हम लोग भी बांट देंगे। रिक्शेवाले हैं, दाई .... किन्तु, वह भद्र स्त्री कहती जा रही थी-“दाई और रिक्शावाले -गरीव थोड़ो हैं । हम लोग उधर जाकर'.." मैं बाथरूम में नहाता हुआ ठण्डे दिमाग से सबकुछ समझ रहा था 'बात यह हुई होगी कि इनकी छोटी बहन ने कहा होगा कि एक थैला "तीस नम्बर' को दे दिया। इस पर परिवार के सभी उसकी मूर्खता पर नाराज हुए होंगे और उनको विश्वास हो गया होगा कि तीस नम्बर को जो थैला दिया गया है, उसी में सब 'असल माल'-माडर्न ब्रेड, बटर, केक, चीज़ और पेठे... ७६ /ऋणजल धनजल "प्रापसे किसने कह दिया कि हम गरीव नही हैं ?" मैं बाथरूम से बाहर निकलार बोला। हमने दरवाजा बन्द ही किया था कि दस्तक पडी। खोलकर देखा, इम्प्रूवमेट ट्रस्ट के नये मकान के बाढ़पीड़ितों का एक छोटा-सा जत्या- चार-पांच छोटे-छोटे लड़के-लड़कियां पर दो-तीन मद,एक मौरत-- "बाबू ! मालुम हुप्रा है कि हजूर एक झोला भरकर रोटी लूटे हैं। बच्चा सब भूखल' है।" यह पूछने की ज़रूरत नहीं समझी कि कहां और किससे मालूम हुमा है । चेला उनके सिपुर्द कर दिया। जत्थे के अगुमा ने रोटियो को गिनकर कहा--"बस ? ई तो छवे गो है । मालूम हुआ कि..." उस दिन सांझ तक हर दस-पन्द्रह मिनट के बाद दरवाजे की कुण्डी खटखटाती रही-"दाबू ! मुना कि मापको एक बोरा रोटी और विला- यती गुलगुला और दूध का पोडर हाथ 'लगल' है"अरे हजुर बाबू साहब ! आप लोगो को भगवानजी बहुत दिया है."कोनों' चीज का 'कम्मी' है ? थोड़ा 'गरीबो' का खियाल करिये "एक तो गिरानेवाला एक 'चश्मखोर' कि जहां पर गिराना चाहिए वहां नहीं गिरामा तिस पर आप लोग 'बाब मैया' होकर ऐसा 'गरीव मार' करियेगा तो..गरीबन के हक "भला उतना बडा थैला में 6वें गो रोटी होगा. खाली रोटिये होगा भला...?" "भद्र स्त्री ने अच्छी सजा दो!" दो दिन तक सुबह से शाम तक तीन-चार बार, दो-दो हेलिकॉप्टर हमारे गोलम्बर के ऊपर 'लो फ्लाइंग' करके रिलीफ बरसाते रहे। उनकी गरगराहट मनमनाहट को प्रतिध्वनियां, छत पर (सिर पर) 'भूत-नृत्य' करते हुए लोगों का कुहराम "उनकी धमाचौकडी सहते-सहते मनायास ही तन पत्थर का तथा मन 'सन्त' का हो गया है। एक ओर, गुरू-गोरव गर्जन के साय ऊपर से करुणा और दया बरसायी जा रही है। दूसरी पोर स्वयंसेवी संस्थाएं चुपचाप ट्रको, नावों - और ठेलों पर खिचड़ी, चावल, रोटी, दूध, नमक, पानी, मोमबत्ती, दियासलाई, कपड़े और दवाइयाँ-स्लम तथा गरीब मुहल्लों में बाँट रही हैं। रोज-रोज कोई-न-कोई नयी राहत की घोपणा होती रहती है। प्रत्येक 'कार्ड होल्डर' को पाँच किलो गेहूं मुपत : रिक्शाचालकों को भी । पांच किलो अनाज मुफ्त में मिलेगा। सरकारी कर्मचारियों को पन्द्रह दिनों का वेतन अग्रिम मिलेगा। सिर्फ पन्द्रह ही दिनों का नहीं.''पुनर्विचार के बाद फैसला लिया गया है। एक महीने का वेतन बतौर अग्रिम मिलेगा जिसका भुगतान बाद में धीरे-धीरे किया जा सकेगा। सेना के सभी अंग राहत में लगे हुए हैं। जलसेना (नेवी) को भी सतर्क और तैयार रहने का आदेश दिया गया है। बी० एस०एफ० के जवान डाक्टरों को लेकर संक्रामक रोगों से बचने के लिए लोगों को टीके...! और एम्फिबियन (मेढ़क गाड़ी) पा रही है जो जल और थल में समान रूप से दौड़ेगी... पानी का बहाव बन्द होने के बाद सड़ांध के साथ 'ब्लिचिंग-पाउडर' की उत्कट गन्ध से हवा बोझिल रहती है। किन्तु, मेरी पंचेन्द्रियों में से अधिकांश शिथिल हो गयी है। इसलिए, किसी तरह का कष्ट नहीं हो रहा। ऐसी ही मनःस्थिति में-पता नहीं क्यों-सेल्फ से 'परती : परि- कथा' निकालकर ले आता हूँ। थोड़ी देर, पृष्ठों को उलट-पलटकर पढ़ने की चेष्टा करता हूँ। पढ़ता हूं-- कोनार नदी के किनारे----डैमसाइट पर, एक विशाल 'क्रेन' की छाया में बैठते हुए कहा था जीत ने-न जाने कोसी का काम कब शुरू हो''यह मेरा इलाका है। कोसी-कवलित अंचल । जहां हर साल लाखों प्राणियों की बलि लेती है कोसी महा- रानी.. "जितेन्द्र ने इरावती से कहा था-'पापका दुख मैं समझता हूँ। अनुभव करता हूं, आपके यहां की नदियों में खून की बाढ़ आयी थी। एक अन्धवेग, एक पागलपन, एक जनून । रक्त की धाराएं बहीं.. सिर्फ वाढ़ ही ५८ / ऋण जल धनजल नहीं, दावानल भी । मयंकर लपटें उठानेवाला। सबकुछ जल गया ! धन- सम्पति, कला-कौशल। मैं उसको भीषणता को कल्पना कर सकता हूँ। पौर, आप भी कल्पना कोजिए उस भूमाग की। डायन कोसी के सुफेद- बलुवाही मांचल पर विखरे लाखों नये नरकंकालों की कल्पना से माप डर तो नहीं जायेंगी?.... "इरावती का सपना : उसका प्यार फिर पनप रहा है । इंसान सिर्फ कत्ल मौर बलात्कार ही नहीं करता। इंसान गढ भी सकता है। गड़ रहा है। बना रहा है। रचना कर रहा है-समाज के लिए, पवाम के लिए। वीरान को बसाने के लिए, बच्या धरती को शस्य-श्यामला बनाने के लिए?.. "समाज को मानवीय और मनुष्य को सामाजिक बनाना हो मुक्ति का एकमात्र पन्य है "हमारी मिट्टी मे सास्कृतिक सोना फल सकता है... प्राण नही, अनुभूति नहीं। अब मनुष्य को यन्त्र चला रहा है.''टेक्नालोजी के युग मे हम लोग जीवन-उपभोग का मूल तकनीक ही खो बैठे हैं..." 'परती : परिकथा' की इन पक्तियों को रेखाकित करके रख देता हूँ। फिर 'जुलूस' निकाल लाता हूं। मन्तिम पृष्ठ को अन्तिम पंक्तियो को पढता हूँ - 'मैं एक विशाल परिवार की बेटी हूँ..'इन मात्मीय स्वजनो के बीच पारस्परिक सहानुभूति और सहयोगिता फिर से पनपाऊँगी मैं अपनी सत्ता को इस समाज मे विलीन कर रही हूं-लोक संस्कृतिक- मूलक समाज के गठन के लिए...!!' 'कलरबक्स’ उठाकर लाता हूँ। कुची से 'परती : परिकथा' तथा 'जुलूस' की चिन्हित पक्तियो पर गहरा काला रंग पोतकर भी मन्तोष नहीं होता। मन मे जमी हुई प्रशान्ति पिघलती नही । तब दियासलाई को एक सलाई जलाकर इन पृष्ठों को छुलाता हूँ। अचानक, कोने में बैठे देवता चिल्ला रठते हैं-"ए-ए-ए की होच्छे ? यह क्या हो रहा है ? तेरा दिमाग खराब हो गया है क्या?" फूट-फूटकर रोता हुआ कहता हूं- "ठाकुर ! तुम जानते हो- कितनी अगाघ मास्या, अटूट विश्वास और दृढ निष्ठा के साथ मैंने ये पंक्तियां लिखी थी। इन चरित्रो के निर्माण के लिए मैंने अपने हृदय का :

- कितना रक्त...!" "साला । गाँजाखोर, अहंकारी । बोल, तुमने लिखी थी ये पंक्तियाँ ...?...मैं-मैं करके तभी से बकरे की तरह में मिया रहा है और औरतों की तरह रो रहा है ? तुमने लिखी थीं...?" होश में पाया- "नहीं ठाकुर। मैं कौन होता हूँ लिखनेवाला- परिम गढ़नेवाला? तुमने जो भी, जैसा भी लिखवाया-लिखता गया।" "तो, फिर अपने मन से इन पंक्तियों पर कालिख क्यों पोत दिया? भाग पयों लगा रहा था? और कालिख पोतने से, साग लगाने से क्या 'अक्षर' मिट जायेंगे ?...मैंने मानुष की क्या परिभाषा दी है ? याद है ?" "जिसको अपने मान का होश हो--वह 'मानुष'..." "तब ? हमेशा अपने मान का होश रखो। मानुष बने रहो। रोने से कुछ नहीं होगा । यो माउन की रोटी और विलायती गुलगुला तुम नहीं सूट सके, इसका दुख मुझे भी है।"---ठाकुर हंसे-"अब जरा बाहर निकालकर खोजो। कहीं मिल ही जाये।" मन का अपसाद दूर हो गया। किताबों को सिर से छुलाकर सेल्फ में रख दिया। उस दिन सुबह । 'हिन्दुस्तान स्टैण्डर्ड' के प्रतिनिधि जनार्दन ठाकुर शाये। जनार्दनजी अंग्रेजी के पनकार हैं। लेकिन, मुझसे हमेशा मैथिली में ही बोलते हैं । पाते ही बोले-"हमर किछु प्रश्न मछि-बाढ़क सम्बन्ध में..." "बालक सम्बन्ध में ?.."मुझसे इस बाढ़ का क्या सम्बन्ध ?' "सम्बन्ध है।" "जनार्दनजी! दया करके बाढ़ के बारे में कोई चर्चा नहीं। बाढ़ की बातें भी अब गंधाने लगी हैं।" उन्होंने मेरो बात को अनसुनी करके पूछा--"पटना का क्या भविष्य है अर्थात् भविष्प क्या होगा?"हाँ, मैं जानता हूं कि आप कोई भविष्य- जाता ज्योतिषी नहीं, रचनाकार हैं।" जनार्दनजी का मुखमण्डत गम्भीर था। ५० एपजत पनजल में कुछ देर चुप रहा। फिर कहने लगा -"बिहार की राजधानी को पटना मे हटाकर फिर राजगोर ने चलिए। यदि वह समय नहीं दोतिर ऐसा कीजिए कि सारे नगर के हर घर की छत पर नाव, ताइवेट पानी किमी स्टीमर पर संकट की घड़ी में प्रापरक्षा के लिए पो-जो कारण रहते हैं-रसना अनिवार्य कर दीजिए. प्लास्टिक के सामान बनाने वाली कम्पनियों से छोटी-छोटी हॉगियां बनाने को कहिए"हर मकान के प्राउण्ड फ्लोर के रेंट में मैकड़े पचहत्तर की कमी और सर के तल्लों में थोड़ी-सी वृद्धि जीवन बीमा निगम वालों ने परामर्श करके-हर मकान मालिक से हर महीने के भाड़े में जीवन बीमा का मनिवार्य अंग... और पटना ही क्यों, वाड ने किसी भी प्रदेश का पिण्ड कभी नहीं छूटने - मैंने देखा, जनार्दनजी अपनी छोटी-सी डायरी में नोट कर रहे हैं- "मरे ! आप तो सचमुच..?" "सचमुच नहीं तो और क्या?" वे डायरी अपने पाकेट में रखकर उठ खड़े हुए। मैंने अपना प्रण पूरा किया। बाढ़ के पानी मे पर नहीं दिया। छत के रास्ते दूसरे फ्लैट को सीढियों से उतरकर-इंटो पर पर रखता हुअा- सड़क पर पाया और रिवो पर अकेला वैठकर उधर ही चला जिधर से बाढ़ के जल को पहले-पहल भाते देखा था. रास्ते में देखा-दीवारों पर लाल दाग लगाकर अग्रेजी में काले रंग से 'एच. एफ. एल.75' लिखा जा रहा है। रास्ते चलते एक युवक ने दूसरे से कहा--"एफ० एल० तो सुना था । यह एच० एफ० एल० क्या है भाई ?" कॉफी हाउस खुला देखकर प्रसन्न हुआ। लेकिन, अन्दर कदम रखते ही 'फफूंद की गन्ध लगी तो लौटना चाहता था। देखा, सारे कॉफी हाउस मे बस एकमात्र सतीश ग्रानन्द-कला संगम नाट्य संस्था के प्राण- चुपचाप बैठे हैं। उनका चेहरा देखकर डरा--वाढ में निश्चय ही इनका बहुत नुकसान हुआ होगा, शायद"मुझे देखकर उनका चेहरा तनिक खिला। बोले-"माज हो, प्रभी ही थोडी देर पहले खुला है। मैं ही पहला ग्राहक हूँ और आप दूसरे..."

"दूसरे तो सत्यनारायण ही हो सकते है और क्या हाल हैं ? इतने उदास क्यों हैं ?" "उदास ? जी, उदास नहीं चिन्तित ।" "अरे राम। कॉफी है या क्लोरोकॉफी ?.. कैसी चिन्ता? सार्व- जनिक या व्यक्तिगत ?" "साहब, एक नया नाटक खेलने को सोचा था। वह तो अव निकट भविष्य क्या दूर भविष्य में भी अजब है, स्टेज के लिए कोई लड़की या स्त्री मिल ही नहीं रही... "आपने क्या उम्मीद की थी ? इस बाढ़ में कहीं से मसती हुई प्रा जायेगी?" मैंने पूछा। सतीश अप्रतिभ हुए। फिर कुछ याद करके वोले-"इधर प्रापकी मुलाकात 'यौनाचार्य' से नहीं हुई है ? इस बाढ़ ने उनकी सारी दमित वासनाएं लीजिए, नाम लिया और आप प्रकट हो गये।"-सतीश ने बाहर की ओर देखकर कहा । हमारे कॉफी हाउस के एक एडवोकेट मित्र हैं। पिछले साल हिन्दी में यौन-मनोविज्ञान की कहानियों का एक संग्रह प्रकाशित करवाया है। पुस्तक प्रकाशन के बाद मित्रों ने उन्हें 'यौनाचार्य' की उपाधि प्रदान की तो उन्होंने सहर्ष स्वीकार कर लिया । अपना परिचय देते समय वह यह कहना नहीं चूकते कि वे चार-चार बार रस्टीकेट हो चुके हैं और यह कि वे छात्रों के 'चिर नेता' हैं और ताउम्र रहेंगे। यौनाचार्यजी ने सगर्व स्वीकार किया--"भाई ! इस बाढ़ से पटना नगर और इसके नागरिकों की जो भी तबाही हुई हो-मैं तो फायदे में क्या "जो आज तक कमी नसीब नहीं- वह इस बाढ़ के प्रताप से या महिमा से कहिए तीन-तीन यंग लड़कियाँ और कई स्त्रियां मेरे घर में शरणार्थी होकर आयीं.."सुबह में कोई चाय दे रही है तो कोई हलुमा तो कोई प्रामलेट तलकर ला रही है। कोई दोपहर को अपनी प्रेमकहानी कहती तो कोई रात में दो बजे तक गाना सुनाती। और मेरा वाथरूम ? चलकर ज़रा सूंघ लीजिए-नहीं विश्वास हो तो-लेवेंडर की सुरभि से सदा सुरभित रहता है। अव आपको क्या बतायें ?" ५२/ऋणजल धनजल उस दिन हो नही, एक सप्ताह तक अपनी किस्मत खुलने का किस्सा लोगों को कॉफी पिला-पिलाकर सुनाते रहे । यहां तक कि दिल्ली के एक वरिष्ठ पत्रकार बाढ के सिलसिले में पटना माये ये। उनको भी अपना भाग्य फिरने का किस्सा सुनाने पहुंचे। होटल में मौका नहीं मिला तो हवाई अड्डे तक पहुंचकर, दक्तव्य देने के लहजे में उनसे कहा-"साहब, मादमी क्या ? इस बाढ में तो मछलियां भी 'सेक्सी' हो गयी थी..." मुझे उसी दिन लगा था कि योनाचार्य अब 'काम' से गये। मौर इन पंक्तियों के लिखते समय उनके मित्रो से तया स्वय उनके मुंह से सुना कि उनकी अवस्था सगीन है । सिर चकराता है मौर सिर के अन्दर 'वैकुमम' जैसा लगता है । प्रांखो के प्रागे सरसों के फूल नजर माते हैं । डाक्टरो ने कोई सिरियस रोग बताया है। जिसका सम्बन्ध--नाक तया मांस के जरिये-दिमाग से है.. भगवान उनको चंगा करें। । यो, पटना शहर मी बीमार ही है। इसके एक बांह मे हैजे की सूई का और दूसरी मे टाइफायड के टीके का घाव हो गया है । पेट से 'टेप' करके जलोदर का पानी निकाला जा रहा है। मखें जो कंजक्टिवाइटिस (जोय वाग्ला) से लाल हुई थी-तरह-तरह को नकली दवामों के प्रयोग के कारण क्षीणज्योति हो गयी है। कान तो एकदम चौपट ही समझिए -हियरयिंग एड से भी कोई फायदा नहीं । बस, 'माइरन लंग्स' अर्थात् रिलीफ की सांस के भरोसे अस्पताल के बेड पर पड़ा हुमा। किसी तरह "हुक-हुक' कर जी रहा है। "ॐ सर्वविघ्नानुत्सारय हुँ फट् स्वाहा..."

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सूखा : १६६६ (विहार) 产 भूमिदर्शन की भूमिका (१) पिछले कई वर्षों से संकड़ों घाब्द, नाम, देश, समस्याएं और समाचार मेरे लिए बेमानी हो रहे हैं, होते जा रहे हैं, उनमें-डेमोक्रेसी, चाइना, चुनाव, रेल-दुर्घटना, साद्यान्न, भ्रष्टाचार, जनता, सत्यमेवजयते, कपy, फारिंग, बाढ-फ्लड, दहाड़, मूखा-जरी-मुखाड़ जैसे नित्य के समाचारों में इस्तेमाल होने वाले शब्द भी हैं जिनके विना माजकल किसी का काम नहीं चल सकता। रोजाना अखबार के पन्नों में खोजकर निकालता हूं-धनबाद के 'हवल-मर्डर' यानी दुहरी-हत्या अर्थात् दो बहनो के खून की रहस्यपूर्ण कहानी"किस तरह उनकी प्रेतनियाँ, सड़क से माने जाने वाले प्रतिष्ठित पोर मद्र जनों को कार को रोककर अपने घाव दिखलाती हैं । दुहाई देती हैं-'वषामो "पुलिस.. इन्साफ़' और फिर लोप हो जाती हैं. मोहित मजुमदार के मुकदमे में मेरी ज्यादा दिलचस्पी है। इसलिए, कोन राज्य मन्त्री 'रूलिंग-ग्रुप' में मोर कोन 'डिसिडेंट' यह जानने की कभी उत्कट अभिलाषाएं नहीं होती। इसलिए, 'हथिया-नच्छत्तर' नहीं 'फरा' पौर भयानक सूखे की माशंकामो प्रोर सम्भावनामों-भरी खबरें प्रकाशित होने लगों तो 'पलह-बाढ-दहाड' की तरह 'ड्राउट' सूखा-सुखाड-भुखमरी भी मेरे लिए धीरे-धीरे बेमतलब हो गये। ""इसी कारण, कलकत्ते के एक प्रसिद्ध बंगला (अंग्रेजी) दैनिक का विशेष संवाददाता-जिसको विशेष रूप से "डाउट' देखने के लिए भेजा गया था-मेरी बातें सुनकर हतभम्म' हो गया (हं! डाउट देखने प्राये . हैं मानो छत्तर-सोनपुर का मेला देखने आये हैं ।) दीपावली के तीन दिन पहले पाँच बजे शाम से हज़ारों पटाखे हमारे शहर, यानी बिहार की राजधानी, पटने की सड़कों, गलियों, फुटपाथों, हमारे फ्लैट के मुंडेरे, गलियारे में धूम-धड़ाके और धमाके-से छूट रहे थे और मुझसे सवाल पूछा जा रहा था, "मोशाय ? खावेन की ?... खाइएगा क्या ? उधर गांवों में जो कुछ देखकर पा रहा हूँ मैंने बीच में ही टोककर कहा था, "प्रामादेर दिकेमाने आमार खेते कोसी-प्रोजेक्टेर कृपाय भालो धान होये छे।" मेरा जवाब सुनकर 'विशेप संवाददाता मोशाय' अवाक् कुछ क्षण मेरी ओर ताकते रहे। फिर, अपनी गलती के लिए क्षमायाचना की मुद्रा बनाकर बोले, "प्रामि भेवेछिलाम जे पापनि हिन्दी-राइटर श्री', सुना था, हिन्दी में एक ही 'पेन नेम' के हजारों ग्रादमी होते हैं. 'देखछि, कथाटा सत्ती।" रसके जाने के बाद मुझे भी अपने 'लेखक' पर अचरज मिली दया आ गयी। मेरा लेखक जो इस हद तक कुण्ठित और पतित हो गया है कि हर अहम सवाल और समस्या पर मुंह बिदकाकर एक ही बात कहता है-“सव झूठ है । बकवास है । पाल फ्राड । स्टंट !". पाइने में अपनी काया की छाया से पूछता हूं-"तुमने कभी कोसी- कवलित जनों, अकाल-पीड़ितों और शरणार्थियों के दुख-दर्द को भोगकर जीती-जागती छवियाँ आंकी थीं ? क्या हो गया तुझे जो इस तरह 'वोतल प्रसाद' हो गया तू ?" इस सवाल के जवाब में मुझसे सवाल किया जाता है-"कोन कहता है सूखा पड़ा है ? सरकार ? सोशलिस्ट (प्रजा-संयुक्त) ? कम्युनिस्ट ? कांग्रेसी ? कौन बोलता है ? कोई मिनिस्टर ? कोई जनता का सेवक ? ' पाल फाड।" किन्तु, दूसरे ही दिन लेखकजी यानी 'बोतल प्रसाद' ने देखा कि सूखे । के नाम पर राजधानी के 'वार' और सब्ज़ी बाज़ार में सुरा से लेकर बैंगन तक की कीमतें अचानक बढ़ गयी हैं तो उसका माथा ठनका, तब वह पटना की सड़कों पर 'ड्राउट' देखने निकला। । ? ८८/ऋणजल धनजल नगीना राम सब्जीवाले ने हंसते हुए कहा, "सूखा नही, हुजूर, वाढ ! बाहर से पांच हजार 'बाबू लोग' पटना पाये हुए हैं। गर्दनीवाग, पार ब्लाक से शुरू करके भिखना पहाड़ी तक के सभी होटलों मे जाकर देखिए --एक भी कुर्सी खाली नहीं मिलेगी मापको।" कल्लू अण्डेवाले ने बात में ज़रा पेंच लगाकर कहा, "ज्यादा दिन नहीं सर । बस, पचीस तारीख तक !.."उसके बाद सभी लोग अपने-अपने घर लौट जायेंगे। भाव खुद-ब-खुद गिर जायेगा। यह कमाई तो समझिए कि बाढ़ का पानी..." (.."बाढ । दुग्धोज्ज्वल खादी की टोपियों की बाढ़, ज्वार-भाटा। तरंग ! एक लहर इधर से जाती है, एक लहर उधर से प्राती है."जय है ए-ए, जय हे-ए-ए-ए-भारत!) 'बार' का बेरा अब्दुल सूखा जवाब देता है, "साहब ! व्हिस्की कोई भी नहीं । न स्काच, न देशी, न नेपाली..." होटल के मैनेजर ने सुनाया, "तन्दूरी क्या, कोई भी चिकन नही। डेढ़ सौ मुगियों के आर्डर तो रोज 'उघर से यानी बाहर से मिलते है... प्लीज़ वेट टिल टवेटी फिपथ।" (सूखा पड़ा है 'बार' मे। अकाल है, होटलो मे.."पड़ गया बंगाले में काल, मरी कंगाले से धरती-पटी कंकालो से धरती")। रोज दिल्ली मर्थात् केन्द्र से कोई-न-कोई 'अन्नदाता' उड़कर प्राता है 'ड्राउट' देखने । (छत्तर का मेला हो गया यह ड्राउट ! ) रोज राज्य का कोई-न-कोई मालिक (वडा, छोटा, मंझला, संझला, पांच, छठ, सत्तो... मालिकों का मकाल है यहां ? एक पर एक मालिक हैं) 'भयानक' पोर "भीषण' बयान दे डालता है, केन्द्र के अन्नदाता कहते हैं, पहले उन चूहो का मन्त करो जो अन्न-वस्त्र को ही नही-सारे राज्य की जनता की मात्मा को कुतर रहे हैं। अखबारों की मोटी सुखियां रोज-रोज एक ही बात को विभिन्न पादों में दुहराती हैं। राजधानी में, शहरों में दीपावलियां सजती हैं। पटारो फूटते हैं, फुलझड़ियां छूटती हैं।.."उधर, गया के गांवो मे, मुंगेर के दक्षिणी हिस्से में, पलामू पोर हजारीबाग को पहाडियो और जगलो की धरती की छातियां दरकती जाती हैं, पानी पाताल की ओर खिसकता जा रहा है । आदमी भूख से ऐंठ-ऐंठकर मरने लगते हैं। (.."सब झूठ! जयप्रकाश नारायण नामक 'यादमी' को कोई काम तो है नहीं। अतः वह इसी तरह कभी भूदान, कभी भोटान, कभी नगालैंड, कमी कश्मीर पर बे-बात की बात करता है। अब सूखा की समस्याओं पर वात करता है और एक सर्वदलीय-सभा बुलाकर सुख-चैन से सोये हुए लोगों के सूखे हृदय में 'करुणा' का संचार करने की कोशिश कर रहा है। मगर, उसकी अपील लोगों के सिर और टोपियों के ऊपर से गुजर जाती है. इतना फ़ालतू समय और पैसे किसके पास हैं ?..'चलो दिल्ली: जय हिन्द !) 'आदमी मर रहे हैं'-खबरें आने लगीं ! दिल्ली से 'दिनमान' के सम्पादक का तार पाया है। वह सूखा क्षेत्र देखने आ रहे हैं। (मानो छत्तर का मेला देखने आ रहे हैं ! ) क्या मैं कुछ दिन उनके साथ चल सकूँगा ? किन्तु तार पाकर मुझे तनिक भी खुशी नहीं हुई। मुझे अपनी 'अच्छी फसल कटाने के लिए गांव जाना है। "उनके आने के पहले ही 'कट पड़ो बन्दे !' लेकिन लाख कोशिश करके भी 'बन्दा' कट नहीं सका । 'दिनमान' सम्पादक वात्स्यायनजी ही नहीं--पा रहे हैं एक पुराने क्रान्तिकारी, कवि- उपन्यासकार और चिन्तक-अज्ञेय यानी यायावर ! सूखी धरती पर भूख से तिलमिलाकर मृत्यु से साक्षात्कार करनेवालों से साक्षात्कार करने के लिए। भारी मन लेकर हवाई अड्डे पर जाता । हवाई जहाज़ से करीव डेढ़ दर्जन स्थानीय असन्तुष्ट कांग्रेसी नेता उतरते हैं। सबसे बाद में अज्ञेय जी दिखलायी पड़े। राजनैतिक पहलवानों की टुकड़ी मार्च करती हुई आगे बढ़ी। मैंने वात्स्यायनजी को छूकर रोक दिया. इन्हें जाने दीजिए ! वे मुस्कराये ! मैं अपने चेहरे पर सूखे-से-सूखे हुए आदमी का मुखौटा. लगाना चाहता था। किन्तु, हड़बड़ी में जो मुखोटा लगाया, वह एक अपराधी का था। झुकी हुई निगाहें और वुझा हुप्रा दिल ! अज्ञेय प्रसिद्ध मितभाषी हैं । किन्तु मुझे हमेशा यही लगा है कि उनका ६०/ऋणजल धनजल मौन ज्यादा मुखर होता है । उन्होने मुझसे कोई सवाल किये बिना-चुप रहकर ही-पूछना शुरू कर दिया-माप सूखा क्षेत्र में हो मापे हैं ? क्यों नहीं? लेखक क्या समाज के बाहर का प्राणी है ? क्यो ? ऐसी उदासीनता क्यों ? तुम इस हद तक बीमार हो ? क्यों ? जवाब दो- क्यो? मैं सिर झुकाकर चुप रहता हूँ। कोई जवाब नहीं दे सकी, मेरी प्रा।

भूमिदर्शन की भूमिका (२) पटना, गया, मुंगेर, हज़ारीबाग, पलामू जिले के नक्शे सामने बिछे हुए हैं, पचास-साठ अथवा सौ बरस पहले आंके गये नक्शे। मैं यह भी नहीं जानता कि पटना से जमूई कौन-सी सड़क जाती है। गया से चतरा तक जानेवाली सड़क कैसी है। मुझे नहीं मालूम कि छतरपुर किस जिले में 'पड़ता है । मैं चश्मा लगाकर भी नक्शों के नन्हे अक्षरों को नहीं पढ़ सकता। अज्ञेय नक्शा देखते समय चश्मा उतार लेते है। वह बीच-बीच में कोई सवाल करते हैं। मैं सुनकर भी नहीं सुनने का भाव दिखलाता हूं। 'जवाब देते हैं पत्रकार-मित्र जितेन्द्रसिंह । सोचता हूँ, यदि आज जितेन्द्र नहीं होते तो...? मैंने सोचा था, अज्ञेय सबसे पहले बिहार के मुख्यमन्त्री से मिलेंगे। 'फिर कृषिमन्त्री से। तव सरकारी हवाई जहाज़ अथवा हेलिकॉप्टर या 'जीप पर सेवार होकर सरकार की मर्जी से सूखा-क्षेत्र में जायेंगे। जहाँ- जहाँ जायेंगे, वहाँ के सरकारी अधिकारी पहले से ही उनकी यात्रा के उद्देश्य की पूर्ति के लिए तत्पर और प्रस्तुत रहेंगे। किन्तु, उनकी डायरी में सबसे ऊपर जयप्रकाश नारायण का नाम था-जो एक दिन पहले 'पटना से गया चले गये थे। और अज्ञेय उनसे मिलने के बाद ही संकटग्रस्त क्षेत्रों में जायेंगे। अतः तुरत गया चल पड़ना उचित समझते हैं । सोचा था, भोजन के बाद एक घण्टा विश्राम करेंगे तो अपनी भी 'दिवानिद्रा में कोई व्याघात नहीं होगा। दोपहर के भोजन के बाद भोजन- 'पान-शयनविलासी तन-मन को तनिक सुख-नींद तो चाहिए ही। किन्तु, मैं •६२ / ऋणजल धनजल नौद-भरी प्रांखो और अनमना-मन लेकर मोढ़ना-बिछावन, तहमत- तौलिया वगैरह समेटकर तहियाने लगा। पौर, जिसकी निगाह में संसार का सर्वश्रेष्ठ प्रालसी हूँ यानो 'पालस्य-यो', 'पालस्य-भारतो' मोर 'मालसी-विहार का प्रतीक' मादि हूँ-वह मेरी दयनीय दशा देखकर खुगी से हम-हंसकर मरी जा रही थी। क्योंकि मेरे चेहरे पर बंगला का एक 'छडा' (फिकरा) स्पष्ट लिखा हुमा था-"पड़ेछि मोगलेर हाये, 'खाना' खेते हवे साये जितेन्द्र विना टैक्सी के निराश वापस लौटे तो भरोसा हुप्रा, कम-से- कम कुछ घण्टों की मोहलत मिली। पर सवाल उठा कि भगर टैक्सी से नही चलना है तो गया जानेवाली गाडी मे भब ज्यादा देर नही। सिर्फ बीस मिनट । मेरी राय ली जाती तो कल म्बह के पहले किसी गाडी से चलने का प्रोग्राम नहीं बनाता। किन्तु 'यायावर' ने तुरत कन्धे मे कैमरा लटकाया -एक हाथ मे अटैची और दूसरे में बास्केट.. मेरा अब तक विस्तर मी नहीं बंधा है, बैंग में डाली जानेवाली चीजें चारों भोर 'छत्राकार' बिखरी हुई हैं। मैं एक पांव मे पाताबा डालकर, पाजामा में पहनाई जानेवाली डोरी खोज रहा हूँ, पौर, मन-ही-मन मना रहा हूँ कि यदि मेरे 'अयात्रीसुलम संस्कारों' को यात्रा के लिए अशुभ मानकर- अयवा नाराज होकर भो-मुझे मुक्ति दे दें तो मुझे दुख नही होगा। (उनके जाते ही लम्बी तानकर चैन से सो रहूंगा ! ) एक बार ऐसा लगा कि वह चुप रहकर जो कुछ कह रहे हैं, उसका प्राशय है, "ती, भाप माराम कीजिए। मैं चला।" लेकिन, मुस्कराकर बोले, "मैं मदद करूं?" मैं चुप रहा । घर का दूसरा प्राणी मदद करने के साथ बड़वडा रहा था, "भाईजी तो एक वेकार का बोझ ले रहे हैं अपने साथ..." समझनेवाले ने मुझे 'बोझा' समझकर भी 'बेकार का' नहीं समझा। (समझते तो अच्छा होता ! ) और मुझे लगा कि मब देर करूंगा तो दरवाजे के पास खडो विशाल-काया मुझे अपने दूसरे कन्धे पर लटकाकर • धूपचाप चल पड़ेगी। माdिो मोटीनहातका दिन। बिहार में हर पर्व के एक दिन पहले एक छोटा पर्व मनाया जाता है, छोटी होली, छोटी दिवाली! 'नहान' का दिन अर्थात् छत्तर के मेले का दिन और पटना-गया लाइन (पी० जी० ट्रेन ! ) की रेलवे यात्रा! दुर्गा का नाम लेकर निकला था। स्टेशन पहुंचकर 'काली' का नाम जपने लगा. गाड़ी में कहीं भी तिल धरने की जगह नहीं। दोनों फ़र्स्ट क्लास के डिब्बों पर पुण्यार्थियों का पूर्ण अधिकार । हमें कम्पार्टमेंट के अन्दर क्या, पांवदान पर भी पैर रखने देना नहीं चाहते थे। मुझे पन्द्रह-वीस दिन पहले की एक घटना याद आयी। आसाम मेल पर इसी तरह मेला देखनेवालों ने पूरा कब्जा कर लिया था और सबसे तेज़ चलनेवाली उस गाड़ी को बरौनी से खगड़िया तक ही पहुंचने में दस घण्टे लग गये थे। चेन खींचने से लेकर घनघोर 'रोड़ेबाजी' तक हुई थी-जमकर । पचासों निरपराध यात्री घायल हुए थे और अन्त में 'फ़ौजी पैसेंजरों' को राइफ़ल निकालकर 'लोड' करने की ज़रूरत महसूस हुई थी "मुझे 'पटना-गया लाइन' की अपनी उन यात्राओं की याद आयी जिनमें रोड़े से लेकर रगड़-झगड़ और गालियों का मुकाबला करना पड़ा था. आज भी यही सारे लक्षण उपस्थित हैं । प्लेटफार्म पर चहलकदमी करता हुआ पुलिस का सिपाही हमारी कोई मदद करने में असमर्थ है। जितेन्द्र हार गये तो 'अज्ञेय' आगे बढ़ गये और अपनी दोनों भुजाओं को पसारकर भीड़ को ठेलने लगे--"पाप वाहर नहीं निकलेंगे तो मैं गाड़ी को आगे नहीं बढ़ने दूंगा। चलिए..." भीड़ में सन्नाटा छा गया। लोग हड़वड़ाकर उतरे। किन्तु भीड़ को भड़कानेवाला 'एलिमेंट' सक्रिय हुआ तो भीड़ कम्पार्टमेंट के सामने लग गयी। हमने दरवाज़ा बन्द किया और दरवाजे पर हजार धक्के पड़ने लगे। खिड़कियों पर प्राघात होने लगे। अन्दर खड़े लोगों ने दरवाजा खोलकर अपने मित्रों को अन्दर बुलाना शुरू किया। मैं चुपचाप 'नाम-जाप' कर रहा था। मुझे लगा, अव 'क्लाइमेक्स' बहुत नज़दीक है। अज्ञेय टमककर फिर दरवाजे के पास जाने लगे। मैंने जितेन्द्र की ओर देखा और जितेन्द्र दौड़कर दरवाजे पर गये गाड़ी खुली, लटकते हुए लोग चिल्लाने लगे- "अन्दर आने दीजिए, गिर जायेंगे।" मुझे मालूम है, अन्दर पाने के बाद वे बहस शुरू करेंगे और गालियां बकेंगे। फिर, अगले स्टेशन पर उतरकर- १४/ ऋणजल धनजल रोहे ने हमारे मिर तोड़े !."मन्दर मानेवानों ने तुरत माना कार्यक्रम गुरू कर दिया यानी 'युदं देहि' की मुद्रा बनाकर बहस करने लये। गुरू किया एक नोजवान ने। बात का सूत्र जोर-जबर्दस्तो मपने हाप में लिया एक अधेड़ खादीधारी प्रादमी ने, जो अपने को क्सिान बहता पा मोर हर बात को 'एज ए क्मिान' पेश करता या। पोलिटेक्निक स्कूल का विद्यापी और 'बस' का 'फण्डक्टर' (सबसे मूर्ख यह 'वस कण्डक्टर।) मोर एक बढ़ा देहाती मोर एक किशोर बहस के वक्ता थे।"हमारे 'सेन्त माफ हमर' ने बातावरण के तनाव को ढीला कर दिया मोर हम बीत गये। हमागे गर्दन पर सवार भोर बात-बात में सिर तोड़ने को तैयार क्सिान जो' कांग्रेस राज को गाली देने लगे। नेतामों को भला-बुरा कहने लगे। उनका सारा गुस्मा एक ही पदार्थ पर पा-जिसे खाकर (उनके कपना- नुमार) माज के नेता 'लोहरी' करते हैं या 'मुर्ग-मुसल्लम'! हर यात के बाद वह मुर्गा-मुर्गी भोर मुर्गी के मण्डे का जिक्र करना नहीं भूलते--हम लोगों ने लाठी खाये, जेल गये। देश को माजाद किया"मव तो एक मुर्गी का मण्डा खिला दीजिए मौर काम.. अब तो बिना मुर्गो के...। मैंने उनकी मुर्गी की टांग पकड़ी यानी उनका हपियार अपने में लिया पोर हर बात के बाद उसका इस्तेमाल शुरू किया तो सिंहजी' यानी एज ए किसान' बोलने वाले की बत्तीसी निकल भायी। वह समझ गये कि हम उनमें से नहीं जिन पर उनका गुस्सा है। व्यग्य-विनोद का जादू चल गया । जो हमारा सिर तोडने माये ये-उतरते समय मुस्करा- कर नमस्कार करके उतरे। जो नौजवान अपने स्टेशन पर उतरकर हम पर रोड़ा फेंकता--वह जहानाबाद स्टेशन पर उतरकर हमारे लिए चाय- वाले को बुलाने गया। कहते हैं, यात्रा शुभ हो तो पद-पद पर संयोग भी बढिया जुटता जाता है । गया स्टेशन से हमे बुनियादगंज मुहल्ले मे-जै० पी० के पड़ाव पर जाना था। प्लेटफार्म पर पांव रखते ही मेरी एक पुराने सापो पर नजर पड़ी, जो रेलवे कर्मचारी है। जब कभी गया स्टेशन पर पहुंचा है, उससे मुलाकात हो गयी है और हर बार वह पुराना 'कामरेड' (रेलवे यूनियन का!) मेरे काम पाया है। इस वार, उसकी नजर बचाकर, कतराफर ऋणजसधनजल/१५ - " - एक ओर से गुज़र जाना चाहता था। किन्तु, उसने देख लिया। सलाम का 'चलता-फिरता जवाब' देकर आगे बढ़ जाना चाहा, मगर उसने हाथ थाम लिया-"इस तरह खब्तुलहवास''कहाँ 'जे० पी० से मिलने ? यार, कहाँ जा रहे हो ? जे० पी० अभी स्टेशन पा रहे हैं। सच कहता हूं, उनकी गाड़ी लगी हुई है. "एडिटर साहब को रोको; नाहक कहाँ परेशान होने जायेंगे? बनारस जा रहे हैं जे० पी०..." मैं दौड़कर स्टेशन के बाहर गया। हमारा सामान टैक्सी के मुंडेरे पर रखा जा चुका था। वे हमारी प्रतीक्षा कर रहे थे। मैंने यह सूचना दी। सामान उतार लिया गया। जितेन्द्र ने बुनियाद- गंज टेलिफ़ोन करके पता लगाया, बात सच थी । वह प्लेटफार्म की ओर गये और हड़बड़ाये लौटे-"बुला रहे हैं आप लोगों को। गाड़ी खुल रही, है. गाड़ी और प्लेटफार्म के आखिरी छोर तक हम दौड़ गये। दूर से ही देखा--एक कम्पार्टमेंट के दरवाजे के फ्रेम में जड़ा-सा एक व्यक्ति खड़ा है । मद्धिम रोशनी में भी चेहरे को एक प्रसन्न मुस्कान पालोकित कर रही कब प्राये ?.."मैं तो अभी बनारस जा रहा हूं, तीस तारीख को झुमरी तिलया मैं रहूंगा. उसके बाद ? दो-तीन-चार लगातार पटना।" मुझे देखकर हँसकर बोले- "अच्छा''तो आप भी हैं।" मैं चुपचाप मुस्कराता रहा । जवाब दिया जितेन्द्र ने हाथ जोड़कर- "जी ! हिन्दी के दो...।" जयप्रकाश जी ने गया, जमूई, हज़ारीबाग़ और पलामू के कई इलाकों और गांवों के नाम बताकर कहा-"वहां ज़रूर जाइए''हाँ, वह इलाका भी सबसे ज्यादा 'एफ़ क्टेड' है.."वहाँ तो पीने को पानी भी नहीं। वहाँ ज़रूर जाइए." गाड़ी खुली तो मैंने पढ़ा, जे० पी० के अोठों पर हमारे लिए यह सन्देश स्पष्ट अंकित था : नाभिनन्देत मरणं नाभिनन्देत जीवितम्, कालमेव प्रतीक्षेत निर्देशम्मृतको यथा" एक नयी (प्राइवेट) टैक्सी लेकर तीन अपटूडेट जवान सरदार किसी गांठ और परिवार के पूरे हिन्दू या बौद्ध पुण्यार्थी की ताक में घात लगाकर है। ६६/ऋणजल धनजल । बैठे थे । हमे देखकर उनके दिमाग मे कोई बात नहीं पा रही थी। एक मेरे लम्बे केसों को भोर देखता, दूसरा प्रमेय को दाढ़ी को और तीसरा जितेन्द्र के गोरे एवं गोल मुखमण्डल को। इसीलिए, धुनियादगंज मुहल्ले तक जाने का माहा उन्होंने हमसे 'फ़कत' बीस रुपये मांगा था। और, लोटकर जब बुनियादगंज के बदले 'सकिट हाउस' पहुंचाने का किराया पूछा तो वे प्रवाक होकर एक-दूसरे को देसने लगे। भनेय को चाय से प्रीति नहीं। किन्तु, उन्होंने खानसामा को बुलाकर मेरे लिए 'वेड-टरी' का प्रार्डर देते हुए भुझसे समय पूछा तो मुझे लगा कि मैं सचमुच इनका बेकार का बोझ हूँ, मिनमिनाकर जवाब दिया--"साढे छह बजे हैं !" ( ईमान की बात है, घर मे साढ़े सात से पहले कभी नहीं.") .."मज्ञेय अाज तक 'वोधगया' कभी नही गये, वोघि का दर्शन नहीं किया। फिर कहाँ पायी करुणा?.. मैं भी बोधगया कभी नहीं गया.. वोधगया के रास्ते के गांव संकटग्रस्त हैं। बौद्ध धर्म स्वीकार करता है कि दुःख है और इतना ही पर्याप्त है कि हम दुःख से मुक्ति पा सकते हैं। सुख पायेंगे या नहीं, हम नहीं जानते चौद्ध संसार से परे कोई वस्तु नही मानते । बुद्ध ईश्वर के विषय में पूर्णतया अज्ञेयवादी हैं, किन्तु हमारे धर्म मे ईश्वर का हर जगह उपदेश देते हैं---सगुण-निर्गुण दोनों का... मैं रामकृष्ण का स्मरण करता हूँ"देवघर मे भूखे-नंगे सन्यालों को देखकर, काशी-यात्रा स्थगित करके बैठे हैं.-"पहले इन्हे भरपेट भोजन दो.."चूल्हे में जाय तुम्हारी काशी की गंगा मैं तीर्य करने नहीं जाता... इन्हें भरपेट खाने दो, ये ही शिव हैं । ये ही नारायण..." ऋगजल धनजल/६७ भूमिदर्शन की भूमिका (३) खानसामा 'वेड टी' लेकर जिस समय आया-असली नींद का समय वही था। ऐसी नींद कि आँखें मूंदे रहिए और फिर भी सवकुछ देखिए- सुनिए । 'अन्दर से दरवाजा खोला गया। खानसामा पाकर चला गया। दो-तीन मिनट के बाद चम्मच और प्यालियों के टकराने की तुनुक-टुन- टुन आवाजें हुईं। और तव समझा कि 'वेड टी' का एक अर्थ 'जागिये कृपानिधान' भी होता है। इस बार भी गया पाकर यहां के प्रसिद्ध तिलकुट की, देव के मगही पान, गया की ठुमरी और यहाँ के साहित्यिक मित्रों की यादें पायीं। ऐसी सुहावनी सुवह में नींबू-चाय पीते हुए गया के सांस्कृतिक पक्ष पर कोई समाजशास्त्रीय गप-सप' शुरू करके सूरज उगाया जा सकता था। किन्तु, 'यायावर' अपने कैमरे के लेंस, फिल्टर और जूम का हिसाब-किताव बैठाने में व्यस्त थे, चुपचाप जिसका मतलब साफ था-'जागिए ही नहीं। तैयार हो जाइए कृपानिधान ।' हम लोग अभी तैयार भी नहीं हो पाये थे कि वरामदे पर कई व्यक्तियों के पग एवं पादुका-ध्वनि सुनायी पड़ी। झांककर देखा : रात के कथाकार-माई के साथ और भी कई साहित्यिक-मित्र ! परिचय और चायपान के साथ-साथ बातें शुरू हुई। लेकिन, कविता और कहानी- उपन्यास पर नहीं, सूखा और मुखमरी से सम्बन्धित समस्याओं पर ही। उन्होंने जो देखा-सुना और अनुभव किया है"एक-एक कर सुनाया। उन गाँवों के नाम लिखाये जहाँ की हालत बदतर है। वहां पहुंचने के रास्ते : ६८/ऋणजल धनजल का तुक, - बतलाये । और हमारी तात्कालिक पोर जटिल समस्या उन्ही के मफल उद्योग से हल हुई। दोस्तों ने न जाने कहाँ से ढूंढकर, एक ऐसे मस्तमौला 'टैक्मी-एजेन्ट' को 'ऊपर' किया जिसको देखते ही मुझे लगा, इस आदमी से पुरानी जान-पहचान है। उसके गले की मावाज सुनकर, बातें करने का ढंग देखकर एकाएक पहचाना."यह तो वही टैक्सीवाला है जिसके नाम मेरे नाम से मिलाकर वम्बई से पाये हुए "फ़िल्म यूनिट' के लोग नुटकी लेते थे। मैंने कहा--" -"तुम्हारी गाडी पर हम कोयलबर की मोर, देहात मे गये थे। तुम्हारा नाम "रामेश्वर या कोई ईश्वर..." "वस, बस । अब हमको भी याद हो गया। तभी से हमहूं यही सोच रहे थे कि । नाम मेरा कौलेश्वर है, जी।'बस मव समझ गया ।... आप जितना दे देंगे"मंजूर होगा हमको। नवादा तक ही क्यों, एक हो दिन के लिए क्यों ? दो-तीन-चार-पांच जितना दिन रखिए। मगर, गाड़ी जब छोडिएगा और जहाँ से भी छोडिएगा"ड्राइवर के हाथ मेरे नाम 'दू-कलम' खत लिखकर जरूर भेज दीजिएगा। मेरे पास बहुत-से वाबू लोगों मोर 'फोरेन' के साहब लोगो के सिट्टिफिकेट है ।" उसने कहा कि उसका ड्राइवर एकदम 'सूघा' लडका है । (सीधा और सूधा में बहुत फर्क है।) कोई नशा नही, काई ऐब नही। साथ रहेगा, देखिएगा ही। और अपनी ही गाडी समझिएगा। 'यायावर' गाड़ी को नजदीक से देख पाये। रात मे स्टेशन पर कई जरा-जीणं टैक्सियों की दुरवस्या वे देख चुके थे। गाडी को अवस्था अच्छी है। प्रोग्राम बना, सबसे पहले वोधगया का। कवि-मित्र के कथनानुसार वोधगया के रास्ते में ही कोख-जली धरती की पहली झलक मिल जायेगी। .."साहित्यिक मित्रगण कम-से-कम मन्दिर पोर बोधि के दर्शन के समय अज्ञेय के संग-संग रहना चाहते हैं । वे 'टूरिस्ट व्यूरो' की गाडी लेकर बोधगया की ओर चल पड़े। बोधगया जाने के पहले स्थानीय किसी अधिकारी से सरकारी लेखा- जोखा ले लेना उचित समझा गया। हम ए डी. एम. के बंगले पर पहुंचे। युवक हाकिम ने हमे बैठाकर अपने रिलीफ अफसर के सहयोग से वीस- ऋणजल धनजल /8E - ! : पच्चीस मिनट में---"हमें पूर्ण विश्वास है कि इस लड़ाई में हमारी ही जीत होगी।" बातचीत के सिलसिले में मैंने शुरू से ही लक्ष्य किया था, ए. डी. एम. साहब किसी भी अंग्रेजी शब्द और वाक्य के पहले उसका हिन्दीरूप बोलते थे. "कठिन श्रम-योजना, लघु सिंचाई अनाज-वितरण, अभियान, निर्माण .''हमें मालूम था कि युवक और नये अफसर लोग जन-सम्पर्क के महत्त्व को समझते हैं। जानते हैं, किस वर्ग के लोगों से कैसी बातें करनी चाहिए ! लेकिन, बाद में जब पता चला कि वह बंगाली है तो अचरज हुप्रा! निष्ठा पूर्वक हिन्दी बोल रहे थे."किस' वर्ग के लोगों से 'कैसी' वाते ही नहीं... किस भाषा' में वातें करनी चाहिए, ए. डी. एम. यह भी जानते हैं । वोधगया में मन्दिर और बोधि का दर्शन हमने सामूहिक रूप से किया। मन्दिर के प्रांगण में घूमते हुए मुझे रह-रहकर 'रिपुंजय, बिम्बिसार, अजातशत्रु, शिशुनाग, महापभनन्द, चन्द्रगुप्त, अशोक, शून्य- पुराण और कम्युनिस्ट मैनिफेस्टो की याद पायी.."राहुलजी, भदन्त और नागार्जुन की याद आयी । “वर्षों पहले पढ़ी बातें, 'वज्रयान' और 'बजत्व' की व्याख्या : व्रजत्व लाभ करना मनुष्य का जन्मसिद्ध अधिकार है। मनुष्य का अधिकार ही सबसे बड़ा है। मनुष्य ही सत्य है, और सब मिथ्या।"महासुख ही महाप्रभु, महाशून्य, वही करुणा, वही सर्व-देवता। "एक्क न किज्जई मन्त न तन्त, निम्न घरनी लई केलि करन्त । निय घर धरनी जाव न मज्जई, ताब कि पंचवर्ण विहरिज्जई ....!! साहित्यिक मित्रों के प्रसन्न-विदा-सम्भाषण का सम्बल लेकर हम आगे वढ़े । और यहीं से हमारी असली यात्रा शुरू हुई ! 'यायावर' जो अब तक पीछेवाली 'सीट' पर थे, सामने ड्राइवर के पास अपने 'लटकन-छटकन' के साथ जा बैठे। मेरे ठीक सामने । किन्तु, मैं उनकी 'पीठ' नहीं देख रहा था उनका सिर । जो स्वयंचालित यन्त्र की तरह, कांच के 'वाइपर' की तरह बायें से दाहिने और दाहिने से वायें घूम रहा था। टोह लेती हुई आँखें। ड्राइवर के बायें कन्धे पर उनकी उंगली पड़ी. "ड्राइवर गणेश ने 'ब्रेक' लिया।...'यायावर' उतर पड़े। घास 'गढ़ कर यानी खोदकर लौटती हुई औरतें."सिर पर टोकरियां। धान का बोझा नहीं, सूखी- १००/ ऋणजल धनजल झुनाई घास ! साय मे वह नन्ही बच्ची क्लिक ! प्रब एक 'कलर' चाहिए, शायद । गाड़ी से दूसरा कमरा लेकर 'यायावर' को दौड़ना पडा। "मगध की छोरियां कुछ गोरियाँ (कुछ कारियां भी ! ) कुछ भोरियां.."बाजरे की कलगी नहीं, पिछली-पास भी नही.."सिर पर पास को टोकरियां लेकर तेजी से चली जा रही हैं । 'यावावर' ने कैमरे का बटन दबाना चाहा कि सबसे अगली (जो पहले भी बच निकली थी !) मुंह पर कपड़ा डालकर अचानक इस तरह 'फिरको' की तरह मुड़ गयी कि 'याया- वर' हार कर भी हंस पड़े। ऐसा लगता है, बोधगया जाते समय ही 'यायावर' की दृष्टि में कई 'प्रॉपजेक्ट' या 'सबजेक्ट' पड़ चुके थे। दो फलांग के बाद, जहाँ से हमारी गाड़ी फिर गया शहर को मोर मुड़ी"ड्राइवर गणेश के कन्धे को छूकर गाडी रोकी गयी। देखा-वहां, एक खेत मे काला-कलूटा, दुबला-पतला, भूखा-प्यासा, थका-हारा बूढा धान के सूखे पौधो को हँसिया से काट रहा है, यदि हमारी 'यात्रा' कण्डक्टेड किस्म की होती तो मैं यह कदापि विश्वास नहीं करता कि यह बूढा सचमुच कोई बढ़ा है जो संकट से लड रहा है- उसने कई ऐसे 'पोज' दिये जो कुराल-सफल कोई चरित्र-ममिनेता भी नहीं दे सकेंगे। भगवान् सफल नाटककार ही नहीं, 'डाइरेक्टर' भी है। (देखिए दिनमान, ६ दिसम्बर, पृ० २४-२७) । गया शहर छोड़ कर हम नवादा को मोर जा रहे हैं। ग्राम गुरुचक और बुद्धगरे के नाम पढ़कर हमे गांवों मोर जगहों के नामो पर एक समाज- शास्त्रीय गप्प' शुरू करने का अवसर मिला : इस रास्ते से बुद्ध गये होगे। मोर, ग्राम गुरुचक्र मे 'श्रीचक्र' की तरह कोई अनुष्ठान सम्पन्न हुमा होगा। वात्स्यायनजी भी मुस्कराकर इस बातचीत में शरीक होना चाहते ये कि अचानक सड़क के दोनों मोर का भू-भाग--संडाकेप--सपाट, सू- सा-मा-मा!!--यह क्या ? जहाँ तक वृष्टि जाती है-एक तृण नहीं। कही एक तिनका भी हरा नहीं। बंजर-परतो परतो नहीं.."धान के खेत हजारों एकड । प्रकृति के प्रकोप को मारी धरती!-पह क्या देख रहा हूँ ? यह किसका शाप है ? ...किसका पाप...? हंसुमा पहुँचते-पहुंचते वोतलप्रसाद यानो लेखकजी न जाने कहां हवा ऋणजल धनजल/१०१ । में 'विला' गये। उनकी जगह पर रह गया--बिहार के एक गांव का एक किसान का बेटा, जो सिर्फ यही सोच रहा है कि यदि उसके ज़िले में, इलाके में ऐसा सूखा पड़ा होता तो उसकी ज़मीन, उसके गांव, गाय-बैल, औरत- बच्चे ऐसे ही इसी तरह गांवों के आस-पास थोड़ी हरियाली देखकर आँखों को ही नहीं, जलते हुए दिल को भी राहत मिलती है । जिन्दगी गांवों को अगोर कर सिमटी-सिकुडी पड़ी हुई है। अव हमारी आँखें और कुछ नहीं देखतीं 'सिर्फ़ सूखा और अकाल ! ..'आने-जानेवालो की गठरियों में क्या है- गेहूं, मकई, बाजरा ? गाड़ियों पर क्या है, वोरे में ? अनाज या चारा?..'अन्न के बोरे नहीं, सूखा पुनाल । दुकानों के सामने क्या है-मकई ? पंजाबी मकई ? .. इधर कहाँ जा रहे हैं-सभी लोग ? वह बढ़ी बकरी लेकर कहाँ जा रही है ? ज़रूर बेचने जा रही होगी।''गांवों के पास-पास बच्चे खेलते-भागते तो हैं ? वह छोटा-सा लड़का हमारी गाड़ी को देखकर, हाथ हिलाकर 'हो- य-य' कहकर खुश तो हुआ ! • 'वह लड़की हमारे गाँव की सुरती की तरह लगती है । यह बूढ़ा नयी लालटेन खरीदकर ले जा रहा है । ''उस गांव में निश्चय ही किसी की शादी हुई है या गौना हुआ है, रँगे हुए कपड़े सूख रहे हैं। शादी या गोने में 'भोज' हुआ होगा? बच्चे पढ़ने जा रहे हैं ? क्या खाकर जा रहे हैं ? स्कूल में मुफ्त दूध मिलता होगा ? हाल ही, थोड़ी-सी वर्षा हुई है---इससे कुछ फ़ायदा तो हुआ होगा ! लेकिन, कहाँ ? देखता हूं कहूं-हां, वहाँ वहाँ हरियाली की पतली-सी रेखा ! रबी का रंग "दूर-दूर खेतों में लोग दिखायी पड़ते हैं, हल जोतते हैं, कुदाल चलाते हुए: वहाँ रहा 'एण्टिएयरक्राफ्ट'.."कच्चे कुंएँ की डोल के लम्बे-लम्बे बांस-सूखी धरती और प्रासमान की पृष्ठभूमि में ऊपर-नीचे गिरते हुए लठे-लोग लड़ रहे हैं । वहां भी वहां कुछ खोदा जा रहा है-पाहर, पैन या कूप ? कुछ भी हो वे लड़ रहे हैं ।" यह, एकदम क़रीव ही कच्चे कूप पर तीन लढें चल रहे हैं । डोरियों की लम्बाई से जल के तल-वाटर-लेवेल-का पता चलता है--सचमुच पानी पाताल की ओर भागा जा रहा है। तीन जन पानी भर रहे हैं, १०२/ ऋणजल धनजल ए, कपन' ठीक कर रहा है। एक हल जोत रहा है । लड़ रहे हैं, सभी !... ड्राइवर के कन्धे पर अब उँगली रखने की जरूरत नही होती--एक हुँ पर ही गाड़ी रोक देता है। हल जोतनेवाले माई जी से नाम पूछा तो उसने सुनकर भी कोई जवाब देने की जरूरत नही समझी ! (सडक से गुजरनेवाले हर प्रादमी के सवालों का जवाब देने लगे तो वह खेत कव जोतेगा?) 1 बलों को एक भद्दी गाली देकर हांकते हुए उसने हमे भी अपने हाय के 'पने' से हांकने की कोशिश की। हम हांके नहीं गये और उसके काम मे वाधा डाले विना उस की प्रतीक्षा करने लगे। बस, दो मिनट में ही उसका हल खेत के उस किनारे से इस किनारे की मेड तक 'रेह' फाड़ता हुमा करीव या जाएगा-- और क़रीब-तोहर नाम की हो भाय ?'-नाम ? नाम हमर-जागो ! --क्लिक 1 ..'जागो ने अपनी दुलहिन को-जो खेत के उस मेंड़ के पास खड़ी थी-इशारे में कुछ कहा। उसकी 'दुलहिनियां' पेड़ की आड़ में चली गयी। रेपुरा-सिरसा गांव के इस हल वाहे ने अपना नाम 'जागो' बतलाकर हमारे सभी सवालों का एक ही जवाब दे दिया था ! उधर, खेतों में काम करनेवालों के हाथ रुके नहीं। एक आदमी हमारे पास प्राया-हाय की मिट्टी झाडता हुमा । हमे देखकर मुस्कराया। फिर पूछा-'क्या देखने माये हो ? यह मूखा ? "ऐमा कभी नहीं हुमा–लेकिन, हम लोग लड़ रहे हैं। थोडा-सा पानी पडा है। और बाकी कूप-कुओ से-जहां तक हो सके प्रादमी जान रहते तो हिम्मत नही हारेगा । 'प्रव, भगवान् की मर्जी "अच्छा तो-परनाम!' "यायावर' फोल्डर खोलकर नक्शा देखते हैं । पूछते है-'क्या नाम बताया था उस गांव का ?.."प्राप ने लिखा था, हां, कोसला ! हंसुआ से राजगिर रोड की ओर मुड़कर छह माइल पर है कोसला गांव । उसके बाद मियांधीधा"उमसे पूरव कछुमारा। 'यायावर' पूछते हैं-'कछुमारा या कहुमारा ?'–हाँ, कहुअारा! कवि-कथाकार-पालोचक-पत्रकार मित्रो ने उन गांवो के नाम लिखवाये हैं जहाँ भूमिहीन-जनो को-खेत-मजदूरो की 'बस्तियां' हैं ! माजलजनजल/१०३

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करते हुए
'यायावर' हँसुप्रा पहुंचकर वायीं ओर गाड़ी मोड़ने को कहते हैं-
"राजगिर जानेवाली सड़क यही है...।"
रास्ते में, भेलुवा गांव के खेतों में कुछ कम उम्र के लड़के भी काम
हुए दिखलायी पड़े । कूप खोदा जा रहा है । "बृजनन्दन सिंह, विपिन
विहारी शर्मा, विजेन्दर, विजयकुमार और लटना । मुसहर का नंग-धडंग
वालक । "हम जव गाड़ी की ओर लोट रहे थे, तब सुना विजेन्दर या
विजयकुमार हँस-हँसकर कह रहा था-"सार ! लटनो के फोटो खिचा
गेलइ । फोटो में सार लंगटे ठाड़ रहते...?"
"कोसला और कितना
दूर
?" हर आनेवाले राही से पूछते हैं हम ।
"वस, पागे । 'डेढ़-दू कोस ।"..'हर जवाब देनेवाला जवाब देकर
खड़ा हो जाता है और बहुत देर तक हमारी गाड़ी की ओर अचरज से
ताकता रहता है। (अपूर्ण)
१०४/ऋणजल धनजल

भूमि-दर्शन की भूमिका (४) पक्की सडक से उतरकर, कुछ दूर तक 'कच्ची' पर गाड़ी जहां तक सकी-गयी। हम गाही से उतर पड़े। पगडण्डी के दोनों ओर सूखी री-झारी' की क्यारियां-जंगली 'मुटके' का साग भी नही ! मिट्टी के टे-छोटे घर, उजड़े मघ..'उजड़े झोपड़े.."हवा मे श्मशान-जंसी 'चिड़ा- 'गन्ध "छप्पर पर सूखती चिरकुट-कयरी फूटे हुए मिट्टी के बर्तन- सन-कुत्ते का डोलता और हांफता हुमा एक कंकाल बिना बोले- के क ओर चला जाता है। एक माता अपने बच्चे को गोदी में लेकर मा रही हमे देखकर ठिठक गयी। उसका बच्चा भवाक्-उदास मांखों से हमारी र देखता रहता है। मां मुंह फेर लेती है। काले-काले होठो के बीच, कंद दांतो पर बिजली-सी कौंध गयी-मैंने 'मूलमन्त्र' जपना शुरू किया। हम गांव के मध्य भाग मे पहुंचे। एक मिट्टी को गिरी-पड़ी दीवार के स एक 'सुनखुन'–बूढ़ी बैठी थी हमे देखते ही बड़बडाने लगी। क्रोध से सके नथुने के मास-पास की सिकुडी-सिमटी चमडी थर-थर कांपने लगी -उसको धुडकती मांखें पोर टूटी दन्त-पंक्तियां मैं मन ही मन जलि का सहस्र नाम' जपने लगा-घोररूपा, घोरदंष्ट्रा, घोरा, घोरतरा, कोटराक्षी बहुभाषिणी.. प्रचण्डा... चण्डी.."चण्डवेगिनी, क्षिणो, योगिनी, जरा, राक्षसी, डाकिनी, वेदमयी, वेदविभूषणा निष्ठुर- दिनी.."मा...!! एक झोपडे से झांकती हैं-एक जोडी गुस्से से भरी तेज प्रांखें- क सात-आठ साल की बच्ची की। उसकी अधेड़ मां हड़बडाकर उठ मा...

वैठती है, कपड़े से अपनी देहढंक ती है । गुस्से में कुछ वुदबुदाती है । दूसरे तीसरे फिर चौथे झोपड़े के प्राणी भी कुनमुनाकर निकलते हैं-बच्चे, बूढ़ियां, अधेड़ और जवान औरतें। मर्द एक भी नहीं-एक नंग-धडंग, चित्ती कौड़ियों जैसी आँखोंवाले, दुबले-पतले-पीले बीमार वालक के सिवा! हममें से कोई भी 'मगही' बोलना नहीं जानता। लेकिन मेरा विश्वास है कि जो थोड़ी-सी भी मैथिली या बंगला अथवा भोजपुरी-यहाँ तक कि ठेठ हिन्दी-बोल ले सकते हैं, वे समय पड़ने पर 'मगही' बोल-समझ, सकते हैं । बोली के 'लय' को पकड़कर मैं न जाने कौन-सी 'भाषा' बोलने लगता हूं। मगही जाननेवाले इसे शुद्ध मगही नहीं मानें, समझ सव-कुछ लेंगे। मैं बोला: "गाँव में कोनो मरद-पुरुखवन केर पता न है ! कहां गेल हो, ईसव ?" "जइते कहाँ ? कमावे कोड़े ला।"-तुरत जवाब मिला। "चुल्हवा में की पक्क्त हलै ? धुंइयां देखैहियेक् ।" "पक्के के की है जे पकतई ! लड़कोरिया लेल गोइठवा में अगिया सुलगत हय-प्रोकरे धुंइयाँ...।" "पक्के के कुछ नम हउ-त ई वचवा सब की खइतउ ? की गे-तोर की नाम हो ? बोल ना, लजावे है काहे ? ई लइका केक्कर है ? ..'बीमार है ? ओ?.."भुक्खल है-खाये विना एकर एइसन दसा है: 'प्रो..." -~-मेरी बातचीत सुनकर तनाव कम हुआ। मुझे लगा, चारों ओर तनी हुई कमानियाँ अचानक ढोली हो गयों । वे क़रीब आयीं, आने लगीं। आध दर्जन से अधिक भूखी माताओं के बीच मैंने अनुभव किया-गाँव की दादी, फूफी, काकी, मौसी चारों ओर से दौड़कर आयी हैं--मेरे आने की खबर सुनकर-बाल-बच्चों को लेकर ! "पांच जन केर मजदूरी-पांच मुट्ठी एहे खेसारी-देखऽ ! "खसरियो निपट्ट घुनायेल-से देखऽ!!" "मलिकवन के कौन फिकिर? घर में अनाज-पानी भरल है।" "हमनिये के उपजायेल, ओसायल-बरायल और घर में संइतलं अन- . " १०६ / ऋणजल धनजल

जवा-देखल अनजवा कहाँ चल जइत, भैया ?"
"अपने बिजली के कुइयां खना रहलन हैं।"
"गरीवन के देखे वाला केयो नहीं।"
"सात दिन केर लड़कोरिया के एह खेसारी के घाठा? हे परमेसर,
एसन कम्भी न देखली।"
"माइये के ना खाएला मिलतइतऽबचवा जीयतय कैसे ?"
"दुधवे न होइ है."
"कीप मान टाकिंग...।"--'यायावर' अपने कमरे के 'न्यूफाइण्डर'
में देखते हुए कहते हैं।
"तोहर को नाम ही गे...?"--मैं पूछता हूँ उस तेज और गुस्से भरी
मांखोंवाली सात-पाठ साल की लडकी से, जो अपनी बेटी-जेंसी लगती
"बोल ने गे। बता दहिक ने गे, जसोधिया।"
"जसोचा।"
"वाः जसोदा माई ...1" जितेन्द्र कहते हैं।
सूखे मुखड़ों पर मुस्कराहट खेल गयी। मैं यशोदा का हाथ पकड़कर
अपनी मोर खोंचता हूँ। वह नाराज और कुछ डरी-सी (ठीक अपनी बेटी.
जैसी! ) मुंह से सिर्फ 'बक्-वक्' उच्चारण करके-घुडकती हुई निगाह से
देखती है। सौरधर से झांककर देखती है-एक मूखी, पीली, युवती-
माता । चिथड़े में लिपटे हुए शिशु को भोर दिखलाकर अपनी वहिन मे हंस
कर कहती है--"ई प्रकलवा के भी छापी उतरवा दे..."
मकाल और मूखा में जन्मे हुए बच्चो के सही नाम 'अकालू' और
"सुखाड़ी नहीं तो और क्या होग?
पूछता हूँ--"मकल वा केर छठी कहिया भेलय ?"
"कल हो त।"
"कोप मॉन टाकिंग...।"
"मकलवा के महतरिया केर की नाम ?"
"बच्ची देवी।"
"मकलवा के ई मोसी है न? एक्कर की नाम?"

"कलेसरी देवी।" "भात खइला कतेक दिन भेलउ?" इस सवाल पर सभी हंस पड़ी। एक बोली : ऐ-हे-ए "आसिने में भात खलिए..." "तोहर की नाम हो रे बबुप्रा ?" "पिनोदपा..."-चित्ती-कोड़ी सी आँखोंवाला बीमार बालक 'चें- चें-कर बोला। "विनोदवा नाम है।" "विनोदवा केर बाप कहाँ ?" "कलकत्ता में बहनोय बिजली कम्पनी में काज करत हइ ओकरे 'लग..." "कोनो सरकारी कार्ड-उर्ड' भैटलै है केकरों ई गांव में ? लाल रंग केर काट'...?" इस सवाल पर वे फिर हँसी। इस बार शुष्क हंसी-'कहाँ मिलल है 'कटवा' और 'कटवा' भेटलो करतय त दुकनवां में अनाज नहिं।" "मलिकवन के करेजा में तनिको दया-धरम नहि।" "जेकरा खातिर बाप-दादा से लेकर हमर लइका-पोता हड्डी गला के 'राँगा कइलक-प्रोकरा सबके नजर में पानी नहि ।" मालिक-टोले का एक आदमी बहुत देर तक चुपचाप गप सुन रहा था। मौका मिलते ही बोल उठा : "पारे! आदमी को खिलानेवाला कौन बाप का बेटा जनम लिया है। भगवान् जिसको चाहें खिलावें चाहे...! उसकी बात पूरी नहीं हो पायी। विनोदवा की मां बोली : "अरे, भगवान् "भगवान मालिकवने सब के ओर' 'नहित भगवानो आन्हर है कि वहिर'"हाय रे' 'एसन अनियाव ? तीन-तीन दिन पर हमन के एकगो मडुनो के रोटी न मिले और हुन कर हवेली में पुरनमासी के सतनरैनजी के कथा में पूड़ी-बुंदिया केर जेवार और रूपाव ऐसन कि बोलो मत । चोरी में पकड़ा देगा । डकैती में फंसा देगा । जेहल में देगा।'.. जेहल में देगा, त उहे दे दो। जेलवा में खाये के त मिलतई ?.."हः हः, गरीब के देखेवाला १०८ / ऋणजल धनजल को-य-न-ही..." "ठोक बात।"-जितेन्द्र ने पांख मूंदे, सिर झुकाये कहा। "मलिकवन के घर हैजा-फोती मइमो...।" मैं सिहर पड़ा, इस शाप से ! जितेन्द्र ने भी सिर हिलाकर 'हुहु' किया। बूढी रुक गयो-"पेटवा जरहै त मुंह से गरिया निकसय है ।" "थारियो-लोटवो वेचलइए, बकरी-बकरा सब...।" "ई जाड़ा त केतना के..." "अगिया जरतय कइसे ?" "लकड़ियो-जलावनो सब मलिकवने के..." "माग लागो हुनकर।" "विनोदवा । इधर या । यहाँ सामने...।" 'यायावर' के कैमरे को उसकी प्रांखें छेद देंगी-ऐसा लगा। रोशनी एकदम कम हो गयी थी। "पलंश चमका तो बिनोदवा के चेहरे पर मातक की एक हलकी झलक देखने को मिली, जिसे देखकर सभी हंस पड़े। "जशोदा माई ? बिनोदवा"।" इससे मागे क्या कहूं ? क्या कहना चाहिए? कह दूं-जाकर खाना भेज दूंगा। दूध भेज दूंगा? दवा भेज दूंगा? क्या कह दूं? हम यहाँ क्यों माये? यह क्या देखा? मज्ञेय अव चुपचाप खडे हैं। जितेन्द्र का मुंह एकदम लाल हो गया है । मैं "विदा' मांगने के लिए शब्द ढूंढ रहा हूँ-"तब ?..'प्रय हम सब चलित हैं। फेर मायेव...।" "मच्छा त-परनाम!.."परनाम!!.. पन्नाम!!!" हम न जाने कहाँ पाये थे ! ..."इनफेरनो? नरक में? या 'पारा- डिसो' में यानी स्वर्ग मे ? हम कौन हैं ? यह कौन 'लोक' या? यह कौन- सा युग है ? हम कहां हैं ? उलटकर देखा : सभी एकटक हमारी भोर देख रही थी.. गांव से विदाई के दिन गांव के हर टोले की मोरते-गांव के पादमी को इसी तरह खड़ी होकर देखती हैं । न हाय हिलाती हैं और न रूमाल ...चित्ती कोड़ी जैसी पाखोंवाला दुबला-पतला भूखा बिनोदवा-भूखी जशोदा, सूखी बच्चीदेवी, दाने को तरसती कलेसरी मोर सूखी मां की छाती को ..

- -- - चूसता हुअा-सात दिन का शिशु- -अकलवा ! ''इनसे मैंने क्यों कह दिया कि फिर ग्राऊंगा? में कोसला गांव फिर कभी नहीं पाना चाहता। कभी नहीं पाऊँगा, यहां! क्योंकि जानता हूँ..'जब लौटकर पाऊँगा तो देखूगा 'जशोदा नहीं है । अथवा अकलवा अपनी माँ को खाकर चल वसा है। सुनूंगा- विनोदवा को आखिरी दिन घुनी खेसारी का 'घाठा' भी नहीं मिल सका था। मैं खोजूंगा-यहाँ कहीं कोसला गांव था? यहाँ जशोदा थी ?... जशोदा मा-ई-ई ! .. जशोदा बेटी-ई-ई। गाड़ी में पाकर हम सभी चुप बैठे रहे, घंटों। गाड़ी आगे बढ़ी- मियाँबीघा गाँव की पोर । किन्तु गांव के बाहर पहुंचकर हमारी हिम्मत नहीं हुई, गांव में प्रवेश करने की ।' 'हमारी गाड़ी लोट चली । रास्ते में, कोसला गाँव की ओर, खिड़की से झांककर देखा-साँझ का अन्धकार घना हो गया था । एक नन्ही-सी रोशनी भी कहीं नहीं थी। किन्तु, लगा विनोदवा की आँखें 'दपदपा' कर जल उठीं ! यदि कोसला गांव की भूखी-प्यासी औरतें हमें गालियां देकर, झाडू- बुहारन से मार-मारकर, हमारे कपड़े-लत्ते नोंच-खसोट कर गांव से विदा करती तो हम अपने बचाव के लिए न उँगली उठाते और न मुंह से 'चूं' शब्द निकलता।"हमारे पेट में अन्न भरा था, देह पर ज़रूरत से ज्यादे कपड़े थे । हमसे बढ़कर और कोन अपराधी होगा ?... वही अच्छा होता । क्यों कह पाया कि लौटकर फिर आऊंगा?... क्या लेकर आऊँगा । खाली हाथ-भरे पेट, किस मुंह से पाऊँगा यहाँ... अज्ञेय मुझे कहाँ ले आये ? "हम कहाँ पाये ?.."छह बज गये ?" "नवादा।" "हम आज रात कहाँ ठहरेंगे ?" "यहीं। लेकिन, सबसे पहले यहाँ के एस० डी० पी० से मिलना श्रावश्यक है। अभी, जितेन्द्र ने घड़ी देखकर कहा : "मेरी 'बस' में अभी एक घण्टा भर देरी है । चलिए..." तुरत..." ११०/ऋणजल धनजल नवादा के एस० डी० प्रो० जनाव अब्दुल खैर के बंगले पर जब हम पहुंचे, रोशनी जल चुकी थी। बरामदे पर, बाहर में कई कारिन्दे, क्लर्क और चपरासियों के अलावा तीन-चार 'व्यापारी-कम-नेता' किस्म के लोग भी थे। हमें चम्बर' में बैठाकर चपरासी अन्दर से खवर ले आया कि 'साहब' नमाज पढ़ रहे हैं । "इस समय 'मगरिब की नमाज' (यानी सूर्यास्त के समय पढ़ी जानेवाली) पढ़ रहे हैं या 'नमाजे-इस्तरका' (मकाल और मूखा के समय वर्षा के लिए पढी जानेवाली)? हम 'परदास' लगाकर बैठे। जिन्दगी में बहुत बार वहुत-से 'हुजूरो' के दरबार मे दीदार के इन्तजार में बैठा हूँ। इसलिए, ऐसे लोगों को अच्छी तरह पहचानता हूं जो मिलनेवालों को 'मन्दर हवेली' से खबर भेजते रहते हैं-मालिक पूजा कर रहे हैं या साहब नमाज पढ़ रहे हैं । कोने की दीवार पर गया जिले का वडा नकमा टंगा था । अज्ञेय और जितेन्द्र कोने में खड़े होकर नक्शा देखने लगे। मैं बैठा सोच रहा था कि हाकिम साहब अमो पायेंगे तो उनके चेहरे पर कैसे भाव होंगे। पूजा ध्यान और रोजा-नमाज के बाद आदमी का तन-मन पिघला-सा रहता है। लेकिन हाकिम पर्दा हटाकर प्रकट हुए और मारे अचरज के अवाक् हो गये। शायद, पूछना चाहते थे-आप लोग कौन हैं जो इस तरह मेरी गैर- हाजिरी में मेरे दफ्तर का नक्शा देख रहे हैं ? लेकिन, हकलाते हुए बोले -"आप लोग कौन "पाप लोगो को पहचाना नही।" जितेन्द्र बोले : 'प्रादाब अर्ज । अभी बतलाता हूं। आप हैं दिनमान- सम्पादक.. मैं जितेन्द्र और पाप हैं। हम 'ड्राउट-एफेक्टेड' इलाके में घूम रहे हैं।" "प्रो..! मैंने समझा कि आप लोग कोई रिलीफ देने आये हैं। .."खर ! तो, महाशय रिलीफ यानी 'सहाय' का काम देखने के लिए तो .."और हां, रिलीफ' का क्या मतलव समझते हैं, आप ? सहापता? जी नहीं ! गलत ! रिलीफ का सही माने है 'स-हान्य '.."समझा?" जितेन्द्र मांखें मूंदकर और सिर झुकाकर वर साहब के तर्जे-बयां का मजा ले रहे थे। अज्ञेय मेरी ओर देखते हैं : आदमी जिन्दादिल हैं... हमे पद-यात्रा के लिए सहर्ष प्रस्तुत देखकर उनको फिर अचरज :

- हुया । कहने लगे-सहाय का कार्य और 'कार्यक्रम' तो वही है जो अ लोगों ने पढ़ा होगा या यहां आने के पहले सुना होगा। ''अंचल अधिकारी अर्थात् अंचलाधिकारी' 'अर्थात् 'मतलब समझते हैं न ?"--अज्ञेयजी से इस बार पूछा गया। "हाँ साहब, समझने की बात है। आज कल, हर बात का सही और ग़लत मतलब होता है। अब तक मैं जानता था कि 'प्रधानमन्त्री' का मत- लव 'प्राइम मिनिस्टर' होता है । मगर, यहाँ पाकर मालूम हुआ कि यहाँ भी एक 'प्रधान मन्त्री' रहते हैं...।" मैंने अचरज से पूछा : "दूसरे प्रधान मन्त्री कौन हैं ?" उन्होंने हँसकर मेरी ओर देखा और एक स्थानीय सार्वजनिक संस्था का नाम लिया। यह पूछने पर कि विधान-सभा में इस क्षेत्र से प्रतिनिधि कौन हैं, जवाब मिला--"साहब, यहाँ 'कांग्रेस-राज' नहीं । यह 'जनसंघी' पाकेट है। "जन-प्रतिनिधि' विधानसभा में हमेशा ग़लत सवाल करते हैं और उनको जवाब भी हमशा लत मिलता है।" हम खैर साहब को मान गये ! हमें बाहर से आनेवाले खाद्यान्न के दैनिक प्राँकड़े पूछने की ज़रूरत नहीं पड़ी। हाकिम ने वा-तकल्लुफ़ हम लोगों से माफ़ी मांगकर टेलिफ़ोन उठाया और उस छोर पर बैठे किसी 'साहब' को पिछले कई दिनों के आँकड़े देने लगे-"हां, लिखिए ! लिख रहे हैं न ? तारीख पचीस नवम्बर ...पाँच वैगन मकई.. जनाव, यहां से तिलैया स्टेशन की लाइन 'जाम' है। वैगन खाली हो जल्दी तव तो"रात में हमारे सिपाही पहरा तो करते हैं, मगर''कल ही रात कई मुसहरों को पकड़ा है-बोरे से अनाज निकाल रहे थे. और सब ठीक है"उधर का क्या हाल है "आज का 'स्टेटमेण्ट' तो स्टेशन से आदमी आने पर ही दिया जा सकेगा.''प्रादाब अर्ज!" एस० डी० ओ० साहब ने 'रेड कार्ड' के बारे में पूछा। जवाव देते समय उनके होंठों पर फिर 'वक मुस्कराहट' खेल गयी। बोले-'रेड कार्ड ! रिलीफ कोड ११८ ?.."हां, साहब । कार्ड बँट रहे हैं । जहाँ अब तक नहीं बंटे हैं, आशा है कि 'शीघ्रा-ति-शीघ्र'...!" - ११२/ऋणजल धनजल हमने कोसला और मिर्याविघा का नाम लिया और सूचना दी- "वहाँ रेडकार्ड नहीं मिला है किसी को।"वहां की हालत चिन्ताजनक इतनी देर मे पहली वार खर साहब को गम्भीर होते देखा। उन्होंने न जाने क्यो, हमारी पोर बारी-बारी से देखा और फिर गर्दन हिलाते हुए कहा-"हो, उघर नही वेटा है । "मैं हंसुमा के अंचलाधिकारी को कल ही ताकीद करता हूँ। "हालत चिन्ताजनक नही रहेगी। और मेरे 'योग्य' कोई सेवा?"

भूमि-दर्शन की भूमिका (५). हम नवादा के 'इंसपेक्शन बंगलो नम्बर वन' के अहाते में दाखिल हुए। पास ही बस-स्टैंड है, जहाँ आने-जानेवाली गाड़ियां पन्द्रह मिनट तक' रुकती हैं । बहुत बार इस सड़क से हज़ारीबाग़ गया हूँ। हर बार, इस 'इंसपेक्शन बंगलो' में एक रात गुजारने की ख्वाहिश हुई है । लेकिन, यहाँ प्राकर लगता है कि यहाँ बहुत बार रह चुका हूँ। यहाँ ही नहीं, किसी भी 'इंसपेक्शन' या डाक' अथवा 'हाल्टिंग'-बंगले में पहुंचकर लगा है, इसके पहले भी रात बिता चुका हूँ। यहाँ खानसामा-बावर्ची के एक ही जैसे चेहरे । हर जगह की 'छोटी' और 'बड़ी हाज़िरी' के एक ही स्वाद और कमरों में एक ही तरह की गन्ध । हर 'बंगले' में देखा है, मच्छरदानी लगानेवाले डण्डे और खूटे इसी तरह, हिलते-डुलते रहते हैं । ऐसे पड़ाव पर पहुंचते ही 'साहब लोग' सबसे पहले वावर्ची को बुलवाते हैं : ब्रेकफ़ास्ट या लंच अथवा डिनर में क्या दे सकता है ? और, हर वावर्ची एक ही जवाब देता है-"जो आर्डर दीजिएगा, वन जायेगा। ...स्पेशल-डिश भी बन जायेगा।" हमने पहुंचते ही एक 'पॉट' गर्म पानी का ऑर्डर दिया। कॉफ़ी पीने के बाद, कुछ देर तक वाहर अकेला खड़ा पूणिमा के चाँद को देखता रहा । याद आयो : उत्तर बिहार के भारत-नेपाल सीमा- वर्ती अंचलों में आज की रात 'समाचकेवा' पर्व मनाया जा रहा होगा। हिमालय से उतरनेवाले पंछियों का स्वागत कर रही होंगी-हर गांव की कुमारी कन्याएँ-दल बाँधकर गीत गाती हुईं...! जिस साल धान ११४ /ऋणजल धनजल की फसल मारी जाती है, एक भी मुर्गावी या लालसर को भावाज नहीं सुनाई पड़ती-हालांकि कभी-कभी पचासों एकह धान को एक ही रात मे 'चुग' कर साफ कर देती हैं, इनको टोलियां । फिर भी, इन चिड़ियों के मागमन को शुभ समझा जाता है।... एक पवित्र मधुर सुगन्ध ने मन में सम्घ्या-मारती की वेला का शंख फूंक दिया, मन के कोने में । कमरे में लौटकर देखा, 'यायावर' अपने दिन- मर के काम का 'लेखा-जोखा' ले रहा है-चुपचाप । यात्री को मन- पसन्द धूपबत्ती का एक पैकेट हमेशा साथ रखना चाहिए । हर जगह- जहां भी जाइए-अपने ही कमरे की गन्ध मिलेगी."हर पहाव पर भपना घर। बावर्ची से जिस चीज के बारे मे पूछा, एक ही जवाब मिला-- "फस्टक्ला-स!" पाटा बढ़िया होगा न ?-~फस्टक्ला-स ! फुलके यानी चपाती बनाना जानते होने ?–फस्टक्लास! वर मिर्च-मसाल की सब्जी ?-वेजिटेवल-स्ट ? फस्टक्ला-स ! ... वावर्ची से इस इलाके के सूखा और प्रकाल के बारे में कुछ पूछने का साहस नही हुमा । एक ही जवाब मिलेगा-फस्टक्ला-स । रात्रि-भोजन के समय मुंह मे पहला कोर डालते समय-विनोदवा और जसोदा की याद आयो । नर्म-गर्म फुलके की तारीफ नहीं कर सका। मुझे लगा, प्रज्ञेय को प्रांखों के सामने भी उन्ही की मूर्तियां प्रकट हुई। 'वेजिटेबल-स्टिउ' के बारे में कुछ कहना चाहते थे। नहीं कह सके ।' हम कुछ क्षण तक हाथ में रोटी के टुकडे लेकर बैठे रहे। .."मडुमा की भाधी रोटी और खेसारी का घाठा खाकर बच्चे चिरकुट-कथरी के नीचे घुटने से ठुड्डी लगाकर सो गये होंगे । 'खर साहब ने कहा है, शीघ्रातिशीघ्र उन इलाकों में रेड कार्ड बंट जायेंगे ।... विदेशों से मिल्क पाउडर, विटामिन की गोलियां मोर जम-जेलो' के हजारों-हजार डिब्बे मा रहे हैं।'' कोई भूख से नहीं मरेगा। "चपाती सचमुच फस्टक्लास बनाया है।" "पौर स्टिउ भी।" "पंचल अधिकारी अर्थात् अंचलाधिकारी।"

" गरिलीफ का अर्थ सहायता !" "गया के ए-डी-एम आर० एन० घोष बहुत निष्ठापूर्वक हिन्दी वोलते थे।" "खैर साहब का प्रश्न ?.. क्या रिलीफ़ देने पाये हैं, आप लोग?" "प्रतिनिधि ऐसे हैं कि हमेशा गलत सवाल पूछते हैं मोर गलत जवाब मिलता है। "बाहर पटाखे कैसे छूट रहे हैं ? पूर्णिमा. लक्ष्मीपूजा के उपलक्ष्य में ?" "पता नहीं।" "धान के पौधों को काटने के बाद धरती में जो हिस्सा रह जाता है, उसको यहां क्या कहते हैं ?" "सुट्टी।" "प्रापने पूछा था कब भात खाया, तो क्या जवाब दिया ?" "प्रासिन महीने में ही।" "मुसहर नाम क्यों ?" "शायद 'मूषक' के बिल से अनाज निकालकर खाने के कारण। शायद, मूषक का शिकार करके खाने के कारण।" "मरते हैं और मरेंगे तो ये भूमिहीन लोग ही।" "हुँ"। कल हम लोग किस समय चलेंगे ?" "यह आपके ऊपर है। आप जव तैयार हो जायें।" सुबह जल्दी उठने के लिए रात को जल्दी ही सो गया। नींद भी जल्दी पायी। टूटी भी शीघ्र ही-रात के डेढ़ बजे ! कई भीषण धड़ाके और विस्फोट सुन कर 'धड़फड़ा' कर उठ बैठा-पटाखे नहीं, बम...! डेढ़ बजे रात से शुरू करके भोर साढ़े चार बजे तक यही विस्फोटक सिलसिला रहा । हर दस मिनट के बाद गोलाबारी! प्रौख में लोटी हुई नींद उड़ जाती। पेड़ों पर सोये हुए परिन्दे डेने फटपटाकर अन्धकार में फिर इधर-उधर उड़ते । सो नहीं सका; अच्छा हुअा। नोंद के साथ सपने भी प्राते थे। ऐसे सपने, जिन्हें देखकर प्रादगी नीद में 'गों-गों' करने लगे। सीने से तर-बतर हो जाये । ११६/प्रणजल धनजल "चाय का सही स्वाद, सौरभ और गुण रात्रि-जागरण के बाद ही मिलता है। मूरज उगा । नक्शा खुला। नया खुलते ही मुझे संस्कृत पाठ के उन 'पण्डितों' की कहानी याद पाती है जो हर 'चतुप्पथ' पर पहुंचकर शास्त्र सोलते पोर खोजते थे-क: पन्या:?.."महाजनो येन गतः"जमुई से पहले यह कौन-सी जगह है जहां बिहारशरीफ से एक सड़क पाकर मिल जाती है ? फिर, डायरी में लिसे जगहों के नाम नक्शे मे खोजे जा रहे हैं : कौमा. कोल, पकरी-बरावां, देवनगढ, चौरमा, खड़गौर, कादिरगंज एक-एक गांव के नाम के साय संकहों मुखडे प्राखो के सामने उमरते हैं-माटी के पुतले ! हजारों भूखी-प्राक्रोश से जलती हुई मांखें ! सिर्फ, एक स्थान के नाम के साथ एक ही व्यक्ति को मूरत सामने माती है । सोखोदेउरा : जयप्रकाश"। हमारी गाडी नवादा छोडकर कोमाकोल को प्रोर बढ़ी जा रही है। पौर, मेरी स्मृतियां मुझे तेज गति से पीछे की ओर लेकर मागी जा रही हैं-१६४०, ४१. ४२ की ओर। .."देवली कम्प-जैल से एक लेख लिखकर बाहर भेजा है जे० पी० ने। उसे पुस्तिका के रूप में प्रकाशित किया गया है-'क्या यह युद्ध मवि. भाज्य है ?'.. देवली कम्प-जेल से, प्रमावतीजी के हाथ भेजते समय एक चिट्ठी पकडी जाती है । अंगरेजी सरकार देश-विदेश के पत्रो मे उस चिट्ठी को प्रकाशित करके जे० पी० को 'बदनाम' करने की चेष्टा करती है। लेकिन वह चिट्ठी ऐतिहामिक महत्त्व की हो जाती है । 'मगस्त शान्ति' में-जे० पी० की चिट्ठी मे बताये गये प्रोग्राम ही कारगर सावित हुए। जे० पी० का जेल से पलायन । प्राजाद-दस्ते का संगठन । हनुमाननगर (नपाल में) गिरफ्तारी। फिर, प्राजाद दस्ते के सैनिको द्वारा हनुमाननगर जेल पर हमला बहुत-सी घटनाएँ। 'जेल में हमारे एक 'मिलिटेंट कामरेड' ने एक 'प्रतिदल' के कार्य- कत्ता को उठाकर पटक दिया था और छाती पर बैठकर पूछ रहा था- "फिर जे० पी० को रिएक्शनरी कहेगा?...जान से मार डालूंगा।"...

.. पगली-घंटी बज गयी थी। ...जेल से रिहा होने के बाद मेरे एक मित्र ने जे० पी० की शान के खिलाफ़ कुछ कह दिया तो बचपन के उस लँगोटिया यार से फिर मेरी कमी बातचीत नहीं हुई.--"पाइ हेट टु टाक विद यू...।" गाड़ी रुकी । 'यायावर' को भूखे-प्यासे वैल-गायों का एक झुण्ड मिल गया है। वहाँ, उस खेत में हल में जुता हुमा एक जानवर गिर पड़ा है। 'आकाश में गिद्धों की टोली डैने पसारकर 'भांवरी' ले रही है।... सड़क के दाहिनी अोर छोटी-छोटी पहाड़ियों और चट्टानों पर कुहरा-सा छाया हुआ है। धरती पर एक ही रंग पुता हुआ है-~-धूसर, उदास । शस्यहीना धरती पर-दरारें।...'पतरंगा' चिड़िया पास ही किसी झाड़ी में बैठकर अपने जोड़े को पुकार रही है। एक लड़के के हाथ में अच्छी जाति का ऊख देखकर मैं समझ गया, सोखोदउरा आश्रम अव नज़दीक है। माश्रम पहुंचने के पहले एक बार फिर पीछे की ओर मन भागा।"प्रथम आम चुनाव के बाद, पटना के अंजुमन-इस्लामिया-हॉल में चुनाव में हार-जीत के कारणों पर विचार करने के लिए 'पार्टी' की आम सभा वैठी है---सैद्धान्तिक सवालों के अलावा व्यक्तिगत आक्षेप और आरोपों के तीर एक-दूसरे पर छोड़े जा रहे हैं । 'जे० पी० आंखों में आंसू भरकर सभा-भवन से बाहर निकल गये और तभी से निकले हुए हैं। ऐसे लोगों की एक बड़ी जमात है जो जे० पी० से नाराज़ हैं । जो मानते हैं कि जे० पी० ने उनकी 'जवानी' को मुफ्त में बर्बाद कर दिया। भारत में ही नहीं, एशिया के समाजवादी आन्दोलन को जे० पी० ने नुकसान पहुंचाया है 'मैं भी उनसे नाराज़ लोगों में से एक हूं। लेकिन, मेरी नाराजगी के ये कारण नहीं । आश्रम पहुंचते ही कई 'प्रस्तर-मूर्तियों' पर आंखें पड़ी।"रानीपतरा सर्वोदय प्राश्रम और इस आश्रम में क्या अन्तर है, वह इन कलाकृतियों को देखकर समझ गया। आश्रमवासियों के साथ डेढ़-दो घण्टे तक रहकर हमें जो कुछ जानना और पूछना था~जान लिया । बिना कुछ पूछे जो कुछ जाना जा सकता था, जान लिया । आश्रम के कृषि-विशेषज्ञ ने हमें पांच पके हुए . ११८/ऋणजल धनजल अमरूद दिये-जे० पी० के भाश्रम का फल । सूंघकर देखा, मच्छी जाति परसामा गांव के पास खेत मे करीब दो-तीन सौ मजदूर काम कर रहे थे। मिट्टी का काम । पानी का खजाना! हमारी गाड़ी रुकी। ऐमा लगा, कोसला और मियांविधा के सभी भूमिहीन मुसहर रजवार ही अपने बाल-बच्चों के साथ यहां काम पर जुटे हुए हैं। यहां भी 'बोली' ने हमारी वड़ी मदद की। मुंगेर के इस अंचल में अपभ्रंश 'अंगिका' बोली जाती है। ..."भारत को यहां की बोली में 'मता' कहा जाता है । . यहां भी वही माक्रोश, वही गुस्सा। किन्तु यहां भी उन्होंने अपना दिल खोलकर हमारे सामने रख दिया।"भैया, छिपा के भी बात तोहरा से ? ऐहन दिन... जितिये में 'भता' खेलिए." जयप्रकाशजी के प्राश्रम के पांच फलों में से दो हमने बंगाली मुसहर (उस नाम हीन नारायण) के पांच साल के पुत्र को दिया "तुम्हारा फल, तुम्हीं को समर्पित भूमि-दर्शन की भूमिका (६) - अज्ञेयजी ने हाथ में अमरूद लेकर वंगाली मुसहर के बच्चे को बुलाया तो पहले वह झिझका। उसको विश्वास ही नहीं हुआ। फिर 'हुलसता' हुआ दौड़ आया। उस समय उसके सूखे-मुरझाये चेहरे पर एकाएक आनन्द की आभा देखकर लगा-कोई 'अलौकिक' दृश्य देखा ! ऐसा लगा, मिट्टी की मूर्ति अचानक' (नहीं, इतना अधिक भावुक होने की अावश्यकता नहीं! मावुकता के 'दौरे' में ही 'नक्षत्र मालाकार' ने...! कल शाम से ही रह-रहकर 'नक्षत्र मालाकार' की याद आ रही है।... १९४६ में पूर्णिया-भागलपुर के कुछ इलाकों में अकाल पड़ गया था। सभी बड़े किसानों और ग़ल्ले के व्यापारियों ने अनाज छिपा लिया था। 'हाहाकार मचा कि बंगाल के बाद इस बार बिहार की बारी है । किसान- मजदूरों की पार्टियाँ आवश्यक बैठक बुलाकर अकाल की समस्या पर विचार करने का प्रोग्राम तय ही कर रही थीं। उधर, नक्षत्र मालाकार ने हज़ारों मुक्खड़ों की टोली लेकर बड़े किसानों और व्यापारियों के 'बखार' और 'गोले' को लुटवाना शुरू कर दिया । रोज-रोज़ खबरें पाने लगी- आज मोहनपुर में 'अाज ढोलवाजा में 'अाज पीरपती के हाट पर। उसका नाम सुनते ही ग़रीबों के गांव में खुशी की लहर दौड़ जाती; अमीरों की हवेलियों में सन्नाटा छा जाता और अधिकारियों का प्राराम हराम ! .."फरार नक्षत्र पर पांच हजार रुपये का इनाम 'बोला' गया। 'हमारी' पार्टी ने स्पष्ट कर दिया कि वह हमारे दल का सदस्य नहीं, उरे पार्टी से निकाल दिया गया है ! ...मैं नक्षत्र को बहुत नजदीक से जाना १२० / ऋणजल धनजल । . था। एक गरीब माली का बेटा, जिसके पिछवाड़े में बस एक धुर जमीन धी, जिसमें फूलों की खेती होती थी। जवानी में कदम रखने से पहले ही सत्याग्रहियों के शिविर मे चला गया। जेल गया। फिर १९३७-३८ मैं जयप्रकाराजी द्वारा परिचालित 'समर स्कूल ऑफ पॉलिटिक्स' सोनपुर में समाजवाद का मन्त्र पाया। (नक्षत्र मालाकार नाम जयप्रकाशाजी ने ही दिया था। नहीं तो, उसका नाम नछत्तर माली हो रहता या नछतरा...) १९४२ की क्रान्ति मे जिसकी बहादुरी की कहानियां सुनकर बूढों की हाहिड़यां भी कसमसाने लगती थी। गोरे फोजी तक जिसके नाम को सुन- कर घबराते थे। ऐसे साथी को लुटेरा प्रोर डकत कहने का साहस हममें नहीं था। हमने उसे 'गुमराह' कहा। उन्हीं दिनों, साप्ताहिक 'जनता' (पटना) मे अकाल पर मेरा एक लम्बा रिपोर्ताज प्रकाशित हुमा, जिसमें नक्षत्र के 'कृत्यो' कीमालोचना मोर निन्दा की गयी थी। नक्षत्र अपने विरोधियो पौर दुश्मनों को 'नाक' काट लेता था। (पूणिया मागलपुर में पाज भी दर्जनो ऐसे नकटे-कनकटे हैं, जिन्हे नक्षत्र ने ही सजा दी थी।) रिपोर्ताज प्रकाशित होने के कई सप्ताह बाद मेरे पास नक्षत्र ने जो संवाद भेजा, उसका प्राशय था : जिस नाक-कान पर तुम सुनहले फ्रेम का चश्मा लगाकर लिखते-पढ़ते हो, उसको काटने के लिए जब रात में पहुंचा, तब तुम लिख रहे थे। उस समय तुम्हारा चेहरा मुझे फूल-जैसा लगा। तुम जो मन में पाये, लिखो। मुझे गालियां दो। मगर, एक बार इन गांवों में भाकर देखो। सब कुछ भूल जामोगे। "मादमी इतना बेदर्द हो सकता है ?.. सात दिन के भूखे बच्चों के मुंह पर हंसी देखकर जेल-फांसी और नरक सब कबूल करके तुम भी वही शुरू करोगे जो में कर रहा हूँ।... दस-पन्द्रह वर्षों के बाद, प्रब लगता है कि साथी नक्षत्र ने ठीक हो कहा या-जेल-फांसी पोर नरक सव कबूल (नहीं, इतना मधिक भावक होने की आवश्यकता नहीं!) जमुई पहुंचते-पहुंचते मेरे मन को वेदी पर फिर एक मूत्ति पाकर दिराज गयो । जिमकी प्रतिमा को तोड़ चुका था, उसी जयप्रकार की एक नयी मूत्ति (नहीं, इतना अधिक भावुक होने की प्रावश्यकता नही!) लेकिन, मेरा विश्वास है, यदि यह 'मादमी' नहीं होता तो यह सूखो घरती - माज लहू की धारा में नहाती रहती। 'यायावर' मरे हुए पशुओं के कंकालों के पास लड़ते हुए कुत्तों, उड़ते हुए गिद्धों और कागों के झुण्ड को देखकर उतर पड़ते हैं । मैं अपने मन में सद्य:स्थापित मूर्ति को फिर हिलाता-डुलाता हूं। (भावुक होने के बदले 'साइंटिफिकली' सोच-विचारकर जे० पी० को 'क्रान्ति' की राह का रोड़ा क्यों न कहा जाये ? क्योंकि, 'शास्त्र' कहता है...!) जमुई से वापस लौटते समय सिकन्दरा के चौराहे पर फिर नक्शा खोला गया (कः पन्थाः ? ) 1 जाते समय ही 'यायावर' ने ड्राइवर से पूछा था, "सिकन्दरा से विहारशरीफ़ जानेवाली सड़क कैसी है?" ड्राइवर ने विना जाने-बूझे ही कह दिया था-"बहुत रद्दी। इत्ता बड़ा-बड़ा रोड़ा है रास्ते में । कच्चा है...।" किन्तु, 'यायावर' की समझ में यह वात नहीं आ रही थी कि पुरानी सड़क को रद्दी क्यों बना दिया गया जबकि नयी-नयी सड़कें खुलती हैं। 'पुरानी सड़क की तो और अच्छी अवस्था होनी चाहिए। अत: सिकन्दरा पहुंचकर हमने 'बस कण्डक्टरों' से पूछा । मालूम हुआ, सड़क की हालत बहुत अच्छी है। चौराहे पर पहुंचकर गाड़ी रोकी गयी-हम पढ़ने लगे, यहाँ से बिहारशरीफ़ कितनी दूर है, नवादा कितने माइल कि पास वाली दुकान से एक आदमी दौड़कर आया। देखने में वह 'रोड सरकार' यानी 'सड़क का चौकीदार' की तरह लगता था-~-नाटा, चेहरे पर चेचक के दाग, खाकी 'हाफ़-शर्ट पहने और हाथ में एक छोटा-सा डण्डा। लपक- कर उसने पूछा--"ह्वाट ! ह्वाट ?" उसके गले की आवाज़ सुनकर ही समझ गया-गांजा! फटी और बुझी हुई आवाज में उसकी अंग्रेजी समझ में नहीं आयी। उससे पूछा- "भाई, बिहारशरीफ़ जाने वाली यह सड़क कैसी है ?" "दिस रोड इज वेटर।" उसने जवाब दिया। चाय की दुकानों पर बैठे हुए लोगों को हँसते-मुस्कराते देखकर समझ गया कि यह आदमी यहाँ का 'मसखरा' है। अज्ञेयजी ने कहा--"अरे माई, आप अंग्रेजी में क्यों बोल रहे हैं ? हम तो हिन्दी में पूछ रहे हैं ?" वात पूरी होने के पहले ही उसने जवाब दिया--"क्योंकि मेरा जन्म अंग्रेजों के समय हुअा था। यैस । वार्न इन इंग्लिश राज। माइ नेम?" । १२२/ऋणजल धनजल माप.. लाला एजेण्ट ! यम थैक्य"सैल्यूट।" हम बहुत देर तक हंसते रहे।"सिकन्दरा चौक पर, चाय की दुकानों पर बैठे हुए लोग भी बहुत देर तक हंसते रहे होगे। यदि अज्ञेय नहीं होते तो मैं यहाँ रुक जाता। तीसी के तेल में पकते हुए उरीद के गरम-गरम पकोडे.. काली-काली केतलियो को टोटियों से अनवरत निकलते हुए .."पुरमुरे" .. गपशप चारो ओर के. "वसो पर चढ़ते-उतरते लोगो के चेहरे गांजे का घुमा मोर लाला एजेण्ट को मसखरी...! अपनी डायरी में नोट कर लिया है : यहां फिर कभी माना है।" राह-चलते, एक-दो सेकण्ड के लिए कोई मिलता है और हमारे मन को गुदगुदाकर हंसा देता है। ऐसे लोग बहुत वार मिलते हैं। उनकी याद एक- एक कर पाती है। "दिस रोड इज बेटर!" 'यायावर' के नक्शे मे अंकित सड़क के दोनों मोर पुराने पेड़ों की पंक्तियां-पुरानी सड़क की यादगारी हैं । नयी सहक बनी है । वायौं पोर पैडों की दुहरी पक्तियां मौर दाहिनी पोर दूर तक फैले हुए खेत ! .. भगहनी-सांझ की महक पहली बार मिली। सचमुच, यह महक बेहतर है। दोनों मोर के गांवो मे पुपाल के ढेर लगे हैं । धान की दवनी हो रही है। गांवो की पोर लौटते हुए पशुओं के रोम-रोम पुलक्ति हो रहे हैं। सड़क के मासपास माने जानेवाले प्राणियो के चेहरे पर नमी दिखलायी पड़ती है। अगहनी धान के नये चूहे की और गुड़ की मिली-जुली गन्ध-जलते हुए पेट्रोल की गन्ध पर रह-रहकर छा जाती है। बोधगया से जमुई तक की सूखी-दरको धरती और मूसे-मूरो प्राणियो को देख-देखकर जलती हुई आँखों में कोई अंजन लेप गया। मानो इस 'पट्टी' में (वेल्ट को क्या कहेंगे?) धान को अच्छी सेती हुई है।... रवी को हरियाली गोधूलि के रग मे घुल-मिलकर तन-मन में ममागे लगी।" सामने, यानी ठीक पच्छिम में--राजगिर पहाड़ियों की घोटियों पर-तुरत हुवे हुए सूरज की किरणों के रंगीन परस! पी, पूरब की मोर पूर्णिमा के एक दिन बाद उगनेवाले चांद के उगने कोपर - -- । 'अजेय जी को वचपन की बातें याद आने लगीं। पिता, माता और भाइयों की यादें! मितभापी 'अज्ञेय' एकाएक मुखर हो उठे। लगा, टेपरेकार्डर पर 'टेप' बजाकर 'संस्मरण' सुन रहा हूँ...! ..."तीस-चालीस साल पहले, इसी इलाके में पुरातत्त्ववेत्ता श्री हीरानन्द शास्त्री धरती की खुदाई करवा रहे हैं । मिट्टी के नीचे से निकलने वाली सही-टूटी मूर्तियों के होंठों पर अंकित मुस्कराहट को देख-परखकर इतिहास के पुराने पृष्ठों पर फिर से कुछ लिखते जाते हैं । ''याज यहाँ, कल वहां-कैम्प की ज़िन्दगी! .."बालक 'अज्ञेय' अपने भाइयों के साथ विहारशरीफ बाज़ार आया है नाटक देखने-पहली वार । सत्य हरिश्चन्द्र नाटक । खेल देखकर रोया है। और, लोटते समय-बिहारशरीफ़ से नालन्दा के बीच-सभी भाई डाकुओं के हाथ में पड़ जाते हैं। डाकुओं ने बैलगाड़ी के गाड़ीवान और नौकर को बांध दिया और 'अज्ञेय-बन्धुओं को अपने साथ लेकर चले । भाई लोग डरे, रोये। डाकुओं ने धमकी दी, चुप हो गये। किन्तु, 'अज्ञेय' को लग रहा था कि वह 'नाटक' ही देख रहा है। अन्त में, सत्य की ही जीत होगी। और हुई भी। डाकुओं को न जाने कैसे सुवुद्धि प्रायो-आपस में कुछ सलाह करने के बाद बच्चों को गाड़ी के पास पहुंचा दिया ! 'स्मृति-कथा' सुनते समय रह-रहकर मेरी मांखों के सामने अखबारों में प्रकाशित होनेवाले अाजकल के समाचारों की सुखियाँ साया हो जाती ...विहारशरीफ के पास टैक्सी रोककर मुसाफिरों को लूट लिया गया... कल शाम को हजारीबाग की ओर से आनेवाली 'वस' को रोककर डाकुओं ने यात्रियों का सबकुछ छीन लिया...!! किन्तु, डरा नहीं । अन्त में, सत्य की जीत होती है ! पीठ-पीछे चांद उगा। 'पालो-छाया' का 'खेल' शुरू हुआ। सामने से आते ट्रकों और जीपों की रोशनियाँ, वैल-गाय-भैंस-कुत्ते-सियार की जलती हुई अांखें "गांवों में जलते हुए अलाव ", कस्बों को 'विजली-बत्तियों' की माला। शायद मुझे नींद आ गयी थी और चलती हुई गाड़ी में सपना देख रहा । १२४ / ऋणजल धनजल हुमा था। पता नही." ""पाम बैठे गुमसुम महयात्री ने हमसी कि वह अभी अपने बचपन की कोई बहानान्? ऐसा ही भ्रम, डाल्टनगंज जाते समय हमा! पाली, विक्रम, परवल के घनखेतों को देन्ददे देना कि हम भारतीय नृत्यकला-मन्दिर मे बंटवर कुमार्गदनाममहिनी प्रट्टा' नृत्य देख रहे हैं : सोलहों सिंगार करके मोहिनी नाममात्र यक. कर पापल झनकारती हुई इस खेत से उस दनिहाल में जा रही है- थिरकती हुई । राबिन्द्रिक किन्तु, गीत चल रहा है, मात्र मदारि रंगे रग मिसाते होवे । 'माज रंग-मागरे तूफान उठेकांचा-सवून धानेर खेते...। - नहरी इलाके को सुजला-सुफला धरती पास्य के भार से दबी हुई-मी लगती है । जहाँ तक दृष्टि जाती है~-धानी रंग को माया । प्रत्येक प्राणी के चेहरे पर पानी है, मन मे रम है। धान काटकर लौटनेवाले मजदूरों की चाल मे मस्ती है। चरवाहे गोत मलाप रहे हैं। बच्चे-बच्चियों को मिल. कारियां सुनायी पडती हैं । भर पेट चारा-पानी पाकर जानवर बैठे जुगाली कर रहे हैं । "यह सव भोर का सपना तो नहीं? मैं बार-बार पोखें मूंद- कर खोलता रहा। 'यायावर' मन्नपूर्णा की इस छवि को जी भरकर निहारने और प्राकने के लिए गाड़ी में उतरकर सेतो के बीचवाली मेड़ पर चले गये हैं। जवान मुसहर और मुसहरनियो को टोनी धान काट रही है-'निहुर' कर। मालिक-किसान कन्धे पर बडी लाठी (जिसे 'गोजो' कहते हैं यह!) लेकर मैड पर बैठा तहलथी पर खंनी मल रहा था भोर रस मरी 'वतियो' सुनाकर मजदूरों का मनोरंजन कर रहा था। हमे देस बोला-"मरे, फोटो लेना है तो चले जाइए मन्दिर मे। बहुत-से भागा लोग मामे हुए हैं।" हमारी ओर से कोई जवाब न पाकर उसने ड्राइवर गणेश से कहा-"का हो हलेवर साहेब ? गांजा-वाजा नहीं है पल्ले में ? एक चिलम चल जाये, ।" कौन कहेगा कि बिहार मे सूखा मोर मकाल है ? .."यह कैसी माया (कहीं घूप कही छाया ! ).."मोरंगाबाद के बाद फिर घरती को झुलसी भणजल घनजल/१२५ तब हुई लाश पड़ी मिली ! कुरूप, कुत्सित, भूखण्ड... आकाश में छाये सलेटी रंग के बादलों का रंग और भी गाढ़ा हो गया। पहाड़ियों की घुमावदार घाटियों के तीखे मोड़ शुरू हुए और आस- मान झरने लगा। 'यायावर' के कमरों को छुट्टी मिली। मृदंगम ! मोहिनी अट्टम गाड़ी के इंजिन से लगातार एक नया सुर निकल रहा है - चढ़ाई-उतराई के समय देह में गुदगुदी लगती है।...'अज्ञेय' रह-रहकर डायरी में कुछ लिख लेते हैं। घनघोर वृष्टि लेकर हम डाल्टनगंज पहुंचे, छह बजे शाम । डिप्टी कमिश्नर डॉ० कुमार सुरेश सिंह के बंगले पर सात बजे । डेढ़ घण्टे तक, सारे जिले की स्थिति और समस्याओं पर प्रकाश डालते हुए डी० सी० साहब ने बार-बार कहा-बुरे दिन तो अब आनेवाले हैं ! किसी नयी जगह में रात में पहुंचना मुझे हमेशा अच्छा लगता है। सुबह सूरज की रोशनी में नयी जगह का रूप धीरे-धीरे उजागर होता है और एक अमिट छाप छोड़ जाता है, मन पर। किन्तु, सुबह झड़ी लगी थी। सबकुछ ढंका-ढंका हुआ था। सबकुछ इसी तरह रहता तो अच्छा होता । हम कहीं नहीं जा पाते । कुछ नहीं देखते । गया और जमुई के गांवों में खेतों में लड़ते हुए लोगों को देखकर बल मिला था। भूखी औरतों और बच्चों की आंखों में क्रोध की चिनगारी देखकर मन में एक श्रद्धा-सी उमड़ पायी थी। किन्तु पलाम् में जो कुछ देखा...? ...२४ जुलाई, १९६६ को सुखाड़ी महतो ने भूख-प्यास से डाल्टनगंज में दम तोड़कर भुखमरी की घोषणा कर दी। २६ जुलाई को सुखदयाली भूइयां । २७ को जित्तन भूइयाँ । ''मन्नू मांझी की औरत । एक औरत तीन बच्चों के साथ कूप में गिरकर मर गयो। एक अज्ञात व्यक्ति' "एक औरत.''एक बच्चा...!! दिन खुला । हम गांवों की पोर निकले । बसना गांव में भारत-सेवक समाज की ओर से 'मुफ्त लंगर' चालू किया गया है । डी० सी० उद्घाटन करेंगे । आयोजकों ने हमें भी निमन्त्रित किया है। वसना पहुंचकर देखा, सैकड़ों भूखी आत्माएँ एक जगह एकत्रित होकर १२६ / ऋणजल धनजल । हाकिम के माने की प्रतीक्षा कर रही हैं। रोहि सिकरही है। भाकियो कतरी जा रही हैं। प्रवेश-द्वार पर पशोक के परोधि मा रहे है। माक टेस्ट किया जा रहा है। भाषण देनेवासो के नाम गोरहिये जारहे है। कोन स्वागत करेगा, कौन धन्यवाद देंगे 1-सप ठीक किया जाता है और भूसो की भीड़ रह-रहकर सड़क को पोर देराती है-इस गाड़ी को भाये?' गमा मोर मुगेर के लोग हाप-पोय मार रहे थे। उपरने की भी.तो कोशिश कर रहे थे। यहां लोग हिम्मत हारकर-अपने कोणrfant है."अब जो हो ! क्या पारा है ! हर पादमी के पेहरे पर गौतम, जिसे देखकर अब वे डरते नही। हर-भय, गुरादुत, भूत-गा, सी. रुदन कुछ भी नहीं। ठहर जाइए। प्यारे भाइयो । भय पाप गर्ग श्री. रिपोर्ट प्रस्तुत कर रहे है। इसके माद प्रतियोग । सरा कीजिए । 'ठ जाइए । राडे हो जाइए । पर भी गा लगाए । गुनि ...प्यारे माइयो! ...ये लोग कौन हैं जो प्यारे भाइयों को रा तरह मारगम्यो. धित फरणे समझा रहे हैं ? क्या ये नहीं जानते किगारेगामापीर बहिनो को भाषण सुनाना व्यर्थ है ? पति-नाटकीय ढग से एक महिला (जो निपा ही पनि होगी) हाथ में माला लेकर घेसुरी पायारा - तारमा पधारे हृदय मे हमारे" गाती हुई प्रकट हुई। मुझे लगा, ही गाय भव रोकेंगे। लेकिन, हम पुदो रहे पौर यह महिला एक-एक नजर एक-एक पग बढ़ाती गाती रही ।.."उसके हापकी गामा 31 नायलन की साडी ..."उसके गीरा की पिता-पातावरणीभी कुरूप बनाती रही। मन्त मे, पत्तल पड़े। हर पाने में एक रोटी पोर एक Animun की घुघनी । "यायावर' तसवीरें सींगो में पारा है। माग जिस पक्ति की पोर मुहता है-उपर के पल में रोटी र पानी है। जिसके पत्त मे कुछ नहीं कहा है पदमाग नहीं रहा. चाप देख रहा है । वप टूट पड़े है मगर किसी पोरगी.

लाश पड़ी मिली ! कुरूप, कुत्सित, भूखण्ड' आकाश में छाये सलेटी रंग के बादलों का रग और भी गाढ़ा हो गया। पहाड़ियों की घुमावदार घाटियों के तीखे मोड़ शुरू हुए और आस- मान झरने लगा। 'यायावर' के कैमरों को छुट्टी मिली। मृदंगम ! मोहिनी अट्टम गाड़ी के इंजिन से लगातार एक नया सुर निकल रहा है - चढ़ाई-उतराई के समय देह में गुदगुदी लगती है। "अज्ञेय' रह-रहकर डायरी में कुछ लिख लेते हैं। घनघोर वृष्टि लेकर हम डाल्टनगंज पहुंचे, छह बजे शाम । डिप्टी कमिश्नर डॉ० कुमार सुरेश सिंह के बंगले पर सात बजे । डेढ़ घण्टे तक, सारे जिले की स्थिति और समस्याओं पर प्रकाश डालते हुए डी० सी० साहब ने बार-बार कहा-बुरे दिन तो अब आनेवाले हैं ! किसी नयी जगह में रात में पहुंचना मुझे हमेशा अच्छा लगता है। सुवह सूरज की रोशनी में नयी जगह का रूप धीरे-धीरे उजागर होता है और एक अमिट छाप छोड़ जाता है, मन पर । किन्तु, सुबह झड़ी लगी हुई थी। सबकुछ ढंका-ढंका हुआ था। सबकुछ इसी तरह रहता तो अच्छा होता । हम कहीं नहीं जा पाते। कुछ नहीं देखते । गया और जमुई के गांवों में खेतों में लड़ते हुए लोगों को देखकर बल मिला था। भूखी औरतों और बच्चों की आंखों में क्रोध की चिनगारी देखकर मन में एक श्रद्धा-सी उमड़ आयी थी। किन्तु पलामू में जो कुछ देखा...? ."२४ जुलाई, १९६६ को सुखाड़ी महतो ने भूख-प्यास से डाल्टनगंज में दम तोड़कर भुखमरी की घोषणा कर दी। २६ जुलाई को सुखदयाली भूइयां । २७ को जित्तन भूइयाँ । 'मन्नू मांझी की औरत । एक औरत तीन वच्चों के साथ कूप में गिरकर मर गयी। एक अज्ञात व्यक्ति एक औरत''एक बच्चा...!! दिन खुला। हम गांवों की पोर निकले । बसना गांव में भारत-सेवक समाज की ओर से 'मुफ्त लंगर' चालू किया गया है । डी० सी० उद्घाटन करेंगे। आयोजकों ने हमें भी निमन्त्रित किया है। वसना पहुंचकर देखा, सैकड़ों भूखी आत्माएँ एक जगह एकत्रित होकर १२६ / ऋणजल धनजल हाकिम के प्राने की प्रतीक्षा कर रही हैं। ...रोटियां सिक रही हैं । माजियां कतरी जा रही हैं। प्रवेश-द्वार पर अशोक के पत्ते बांधे जा रहे हैं । 'माइक' टेस्ट किया जा रहा है। भाषण देनेवालो के नाम नोट किये जा रहे हैं। कौन स्वागत करेगा, कौन धन्यवाद देंगे-सब ठीक किया जा रहा है और भूखों की भीड़ रह-रहकर सड़क की मोर देखती है--'इस गाड़ी से कौन प्राये?' गया मोर मुंगेर के लोग हाथ-पांव मार रहे थे। उवरने की जी-तोड़ कोशिश कर रहे थे। यहां लोग हिम्मत हारकर अपने को छोड़ दिया है. अब जो हो! क्या चारा है ! हर मादमी के चेहरे पर मौत को छाया, जिसे देखकर प्रब वे डरते नही। डर-भय, सुख-दुःख, भूख-प्यास, हंसी- रुदन कुछ भी नहीं। "ठहर जाइए। प्यारे भाइयो ! अब मापके सामने श्री.."रिपोर्ट प्रस्तुत कर रहे हैं। इसके बाद प्रीतिभोज । जरा सद्र कीजिए।"वैठ जाइए । खड़े हो जाइए । इधर भीड़ मत लगाइए । सुनिए ...प्यारे भाइयो! ... ये लोग कौन हैं जो 'प्यारे भाइयो' को इस तरह 'प्यार' से सम्बो. धित करके समझा रहे हैं ? क्या ये नही जानते कि "प्यारे भाइयों और वहिनों' को माषण सुनाना व्यर्थ है ? पति-नाटकीय ढंग से एक महिला (जो निश्चय ही प्रध्यापिका होगी) हाथ मे माला लेकर वेसुरी प्रावाज में-"ननों के तारे हमारे पधारे हृदय में हमारे" गाती हुई प्रकट हुई। मुझे लगा, डी० सी० साहब अब रोकेंगे। लेकिन, हम कुढ़ते रहे मौर वह महिला एक-एक पंक्ति पर एक-एक पग बढ़ाती गाती रही ।"उसके हाथ की माला.."उसकी नायलन की साड़ी.."उसके गीत की पंक्तियो-वातावरण को और भी कुरूप बनाती रही। मन्त में, पत्तल पड़े। हर पत्ते मे एक रोटी और एक मुट्ठी सोयाबीन की घुधनी । "यायावर' तसवीरें खींचने में व्यस्त हैं। उनका कैमरा जिस पंक्ति की मोर मुड़ता है-उधर के पत्तो मे रोटी तुरत डाल दी जाती है। जिसके पत्ते में कुछ नहीं पड़ा है, वह मांग नहीं रहा है कुछ । चुप- चाप देख रहा है । बच्चे टूट पडे हैं मगर किसी और न हंसी है, न लगी।

मैंने जीवन में ऐसे लोगों की भीड़ कम देखी है, चलते-फिरते मुर्दो की.. टोली। मुझे लगा, मुंह में ग्रास डालकर चबाते हुए बिना कोई स्वाद पाये ही लोग निगलते जा रहे हैं। आयोजकों में से एक 'चौघरी क़िस्म' का आदमी किसी कार्यकर्ता से कह रहा था : "साइनबोर्ड का कपड़ा ठीक से खींच दीजिए।"फ़ोटो में ठीक से नाम उतरेगा नहीं।" हम 'बसना' से भागे-पहाड़ी गांवों की ओर । नावा, खेंगरा, केंडा, तुकवरो गाँव । जंगलों में झरवेरियों की झाड़ियों के नीचे खड़ी निराश औरतें। 'गेंठी' खोजते हुए जवान । प्रोकराहा गाँव के रत्तूसिंह ने हमें प्रेम से पाँच वेर लाकर दिये। 'वसना' में जो कुछ देखा था-रत्तूसिंह की एक सरल मुस्कराहट ने ही सबको पोंछ-मेट दिया। उससे पूछा गया कि जब यह वाजरा भी नहीं मिलेगा तो क्या करोगे? क्या होगा? उसने उसी तरह सरलता से जवाब दिया-"होते की? खायला मिलते-त मरते।" खाने को नहीं मिलेगा, तो मरेंगे। और क्या होगा "और क्या होगा? रत्तूसिंह मर जायेगा तो क्या होगा? इतने लोग मर गये तो क्या हुआ ? ...क्या होगा? कुछ नहीं होगा न ...

Rinajal Dhanjal

Author
Renu Karnishwarnath
Title
Rinajal Dhanjal
File name
Rinajal Dhanjal
Text
OCR done
Citation
1920
Published
2011/03
Publisher
Rajputana Printing Press
Language
Sanskrit
Pages
139
Library
Adarsh Library, Jaipur
Classification
Geography
DLI number
552136
Barcode
4990010032859.00
Scanning centre
C-DAK, Kolkata
Digital publisher
Digital Library of India
VMLT id
OFRWMxUfvAC
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