Shri Jawahar Vidyapith Binasar, Bikaner
Ganesh Gun Shatak
Front matter
hi आचार्यश्री गणेशीलालजी म.सा. का जीवन परिचय .. .. .. उदयपुर श्री सायबलालजी श्रीमती इन्द्रा बाई मारू 1947 सा.व.3 1962मि.ब.] उदयपुर मुनि मोतीलालजी 15 वर्ष 03 मास 28 दिन फाल्गुनसुदी 3 संवत् 1990 जावद 28वर्ष 03 मास .. .. 17 दिन .. 43वर्ष07 मास 15 दिन निवासी पिता का नाम माताका नाम गौत्र जन्म तिथि दीक्षा तिथि दीक्षा स्थल दीक्षा गुरु दीक्षा के समय उम्र युवाचार्य पद तिथि युवाचार्य पद प्रदान स्थल युवाचार्य पद के समय दीक्षापर्याय युवाचार्य पद के समय उम्र युवाचार्यकाल युवाचार्य काल में दीक्षा (संतोकी) आचार्य पद तिथि आचार्यपदस्थल आचार्य पद के समयउम्र आचार्य पद के समय दीक्षा पर्याय आचार्य शासनकाल शासन काल में दीक्षा (संतोकी) सांसारिक धर्मपत्नी कुल आयु स्वर्गवास तिथि स्वर्गवास स्थल 9वर्ष04 मास 05 दिन 18 .. आ.सु.8 संवत् 2000 भीनासर 52वर्ष 17मास 20 दिन 37 वर्ष07मास 22 दिन 19वर्ष 06मास 09दिन 9 श्रीमती कमलाबाई 72 वर्ष 05मास-29 दिन मा.ब.2संवत् 2019 उदयपुर
गणेश गुण शतक
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श्री धर्मेशमुनिजी म. सा.
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प्रकाशक
श्री अखिल भारतवर्षीय साधुमार्गी जैन संघ
समता भवन, बीकानेर (राज.)
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गणेश गुण शतक
श्री धर्मेशमुनिजी म.सा.
* प्रवेश : अगस्त, 2007, 3100 प्रतियाँ
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रियायती मूल्य : 10/-
अर्थ सहयोगी :
श्री मोतीलालजी रतनलालजी सांखला, अजमेर (राजस्थान)
१५५४५५
प्रकाशक :
श्री अ. भा. साधुमार्गी जैन संघ
समता भवन, रामपुरिया मार्ग, बीकानेर (राज.)- 334005
दूरभाष 0151-2544867,3292177,2203150 (Fax)
आवरण सज्जा व मुद्रक :
तिलोक प्रिंटिंग प्रेस, बीकानेर
दूरभाष : 9314962474/75
प्रकाशकीय १५५४४ शान्तक्रान्ति के अग्रदूत, शुद्ध श्रमणाचार के प्रतिपालक एवं प्रतिबोधक श्री गणेशाचार्यजी के दीक्षा शताब्दी वर्ष के उपलक्ष्य में शासन प्रभावक आदर्श त्यागी विद्वान श्री धर्मेशमुनिजी म.सा. ने अपने श्रद्धासुमन पिरोकर आचार्य गणेश गुणशतक को सौ तों की गीतमाला को अर्घ्य के रूप में समर्पित किया है, वह इनकी काव्य प्रतिभा को विभिन्न रूपों में उजागर करती है। स्वयं मुनिप्रवर के शब्दों में- अर्ध्य चढ़ाना मंगलकारी, श्रीचरणों में रचकर भारी। गणेशाचार्य मेरे गुरूराया, जेह मेरे मन में उमड़ाया। शतक एक सुन्दर रचकर, गुरू चरणों में लाया सजाकर। प्रचलित तों एवं लोकगीतों की धुन के आधार पर इस शतक के माध्यम से मुनिश्री ने गुरू गणेशाचार्य के विभिन्न गुणों एवं संघर्ष गाथा को गीतात्मक शैली में प्रस्तुत कर जन-मन को उनके प्रति श्रद्धाभाव से पूरित करने में सार्थक सफलता प्राप्त की है। बालक गणेश के जन्म से मृत्युपर्यन्त के संघर्षशील जीवन को गीतों के रूप में आबद्ध कर मुनि पुंगव ने समाज के समक्ष प्रस्तुत कर बड़ा उपकार किया है। शान्तक्रान्ति के अग्रदूत की शान्तक्रान्ति का वर्णन भी अत्यन्त ओजस्वी शब्दों में हुआ है- श्रमण संस्कृति रक्षक पूज्य गणेशी भारी, गौरवमय पद की दी जिसने कुर्बानी प्यारी। देख स्वच्छन्द वृत्ति आत्मा प्रकाशित होती, कर्तव्य दृष्टि से तो करी समझाईश सारी। समाचारी एवं विशुद्ध श्रमणाचार के प्रति स्वच्छन्द वृत्ति के कारण जब श्री गणेशाचार्य ने श्रमण संघ का त्याग किया, वह पूज्यवर के दृढ़ निश्चय एवं कथनी-करनी के अभेद को प्रकट करता है- श्रमण संघ रो त्याग करने गुरू गणेश विचार कर्यो। शान्तक्रान्ति है करणी अब तो, मन में दृढ संकल्प कर्यो।। सबरी बातां सुण ने गुरूवर शांतक्रान्ति या फैलाई। हलुकर्मी जो आत्मा सारी सुणने मन में हर्षाई।। श्री गणेशचार्य के सम्पूर्ण जीवन को उपसंहार गीतिका में मुनिप्रवर ने जिस तरह आबद्ध किया है, वह गागर में सागर समाविष्ट करने की ४४५ XXXXXXXXXXXXXXXXXXXXXX
X
उनकी काव्य प्रतिभा का ज्वलन्त प्रमाण है-
जन्म से यौवन वय के बाद संयम धारकर,
हुक्म गण के ईश बन गणेश नाम यथार्थ कर,
श्रमण संघ सिरताज बन गणा नाम ईश सार्थक किया,
फिर युवाचार्य नानेश को निज भार सारा सौंपकर,
स्वर्गवासी हो गये पंडित मरण का वरण कर।
इसका विवरण क्रमबद्ध इसमें किया शुभभाव से,
'धर्मेश मुनि' मिट जाये भ्रान्ति पढ़े-सुने जो चाव से।
इस 'आचार्य गणेश गुणशतक' को प्रसिद्ध समाजसेवी धर्मनिष्ठ,
संघप्रेमी, गुरूभक्त श्री मोतीलालजी रतनलालजी सांखला, अजमेर के अर्थ
सहयोग से प्रकाशित कर समाज को समर्पित करते हुए हमें परम हर्ष हो
रहा है। हम अर्थ सहयोगी के प्रति हार्दिक आभार प्रकट करते हैं।
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५५५५५५५५५५
निवेदक
मदनलाल कटारिया
संयोजक-साहित्य प्रकाशन समिति
१५४४५४४५
גאאאאא
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अर्थ सहयोगी परिचय । शांति क्रांति के जन्मदाता आचार्यश्री गणेशीलालजी म.सा. के जीवन के विभिन्न रूपों को काव्यरूपी माला में पिरोकर विद्वान श्री धर्मेशमुनिजी म.सा. ने उक्त कृति प्रस्तुत की है जिसका प्रकाशन स्व. श्री चुन्नीलालजी सांखला की पुण्यस्मृति में श्री मोतीलालजी रतनलालजी सांखला के अर्थ सौजन्य से हुआ है। धर्मनिष्ठ सुश्रावक स्व. श्री चुन्नीलालजी सांखला का जन्म 31.01. 1931 को ग्राम जेठाना जिला अजमेर (राज.) में हुआ था। आपके पिता स्व. श्री लक्ष्मीचंदजी सांखला एवं माता स्व. श्रीमती सुगनकंवर से विरासत में आपको जिनशासन की सेवा एवं समाजसेवा की भावना प्राप्त हुई। आपकी धर्मसहायकिा श्रीमती उमरावकंवर सुपुत्री श्री चंदनमलजी तातेड़ मसुदा निवासी भी इसी भावना से ओतप्रोत है। आपके चार पुत्रों में अग्रज पुत्र श्री मोतीलालजी सा. सांखला अत्यंत ही मृदुभाषी एवं सरलमना हैं। आप सामाजिक धार्मिक कार्य हेतु सदैव उदारतापूर्वक तहेदिल से सहयोग प्रदान करते हैं आप अनेकों संस्थाओं से जुड़े हुए हैं। व्यवसायिक कार्य कुशलता एवं व्यस्तता के बावजूद आप अपने जीवन में नित्य सामायिक प्रतिक्रमण एवं धर्म-ध्यान में तल्लीन रहते हैं। वर्तमान में आप श्री साधुमार्गी जैन संघ, अजमेर के मंत्री के रूप में अपने कार्यों को मूर्त रूप प्रदान कर रहे है। इस वर्ष अजमेर वर्षावास में विराजित शास्त्रज्ञ, तरुणतपस्वी आचार्यप्रवर 1008 श्री रामलालजी म.सा. की आज्ञानुवर्तिनी विदुषी महासती श्री अर्चनाश्री जी म. सा. आदि ठाणा के दर्शन, वंदन एवं प्रवचन श्रवण का निरन्तर लाभ प्राप्त कर रहे हैं। आपकी धर्मपत्नी श्रीमती मीनाजी भी सच्चे अर्थों में धर्मसहायिका है। श्रीमती मीनाजी साधु-संतों की सेवा में सदैव तत्पर रहती है। आप परम् सौभाग्यशाली है कि आपके दोनों सुपुत्र श्री सुधीरजी, श्री सुमितजी XX XXXXXXXXXXXXXXXXXXXXXXXXX एवं पुत्रवधुऐं श्रीमती रानू व श्रीमती विनिता भी आपके संस्कारों के अनुगामी हैं। आपके द्वितीय पुत्र श्री रतनलालजी सांखला एवं धर्मसहायिका श्रीमती विजयलक्ष्मीजी भी अपने कुल की मर्यादा का निर्वहन करते हुए अपने परिवार की यश एवं कीर्ति को आगे बढ़ा रहे हैं। परिवार के पदचिन्हों पर चलते हुए पुत्र मोहित व पुत्रवधू श्रीमती खुशी एवं पुत्री कु. मुग्धा (बी. ई., एम.बी.ए.) आपके हर कार्य में सहयोग प्रदान कर रहे हैं। तृतीय एवं चतुर्थ पुत्र श्रीमूलचन्दजी, श्री गौतमचन्दजी एवं पुत्री श्रीमती कमलाबाई खींचा सेवाभावी एवं धर्म-ध्यान से ओतप्रोत है। संघ समर्पित सांखला परिवार सत कार्यों में अग्रणी भूमिका निभा रहा हैं। संपूर्ण सांखला परिवार जिस प्रकार धर्मसेवा, समाजसेवा और साथ ही व्यवसाय के क्षेत्र में प्रमाणिकता के साथ अपना आदर्श प्रस्तुत कर रहे हैं। वह अपने आप में समाज के लिए एक अनूठा उदाहरण हैं। भविष्य में सांखला परिवार का संघ के प्रति इसी तरह अहोभाव बना रहेगा। इसी आशा एवं विश्वास के साथ...... גאאאאאא १४४५४४ १४
५५५५५५५५५
समर्पण
आई दीक्षा शताब्दी सुखकर।
चाह जगी मेरे मन के भीतर।।
अर्ध्य चढ़ाना मंगलकारी।
श्रीचरणों में रचकर भारी।।
אאאאאאאאאאאאאאאאאאאאאאאאאאאאאאאאאאאאאאאאא
गणेशाचार्य मेरे गुरुराया।
णेह मेरे मन में उमड़ाया।।
शतक एक सुन्दर रचकर।
गुरुचरणों में लाया सजाकर।।
णमो णमो नाना गुरुराया।
शरण मुनि-धर्मेश है आया।।
तव पट्टधर श्रीराम सुहाया।
करता अर्पण लो पूज्यराया।।
EXXXXXXXXXXXXXXXXX गणेश गुण शतक/7
१४४४
(2) मेवाड़-महिमा
तर्ज- ख्याल
...........
सब हर्ष मनाओ गाओ यश गाथा राजस्थान की।।टेर।।
चप्पे-चप्पे में था जहाँ पर, राजाओं का राज्य।
छोटे-छोटे खण्डों में था, जो पूरा विभाज्य जी।।1।।
५४५४
גאאאא'
राजपूतों के दिल में जिसका, गौरव अपरम्पार |
समय पड़े उस पर सब देते,
तन मन अपना वार जी।।2।।
मेद पाट की गौरव गाथा, थी उसमें महान् ।
महाराणा प्रताप से जन्मे, कर्मवीर महान् जी।।3।।
दानवीर भामाशाह जैसे, जन्मे जहाँ साहूकार।
महारानी पद्मिनी जैसी, हुई अनेकों नार जी। 14 ||
महाराणा प्रताप ने देखो, उदयपुर बसाया।
उदयसिंह नृप की स्मृति जो,
जन-जन के मन भाया जी।।5।।
सतपुड़ा व अरावली की, श्रेणियों से सुवेष्टित।
भव्य महल अट्टालिकाएँ,
जाली झरोखों से सज्जित जी।।6 ||
तत्कालीन नृप थे यशधारी, फतहसिंह दरबार।
न्यायमूर्ति निपुण थे पूरे, "धर्म" भाव सुखकार जी।।7 ||
גאאאאאאא
8/गणेश गुण शतक xxxxxxxxxxxxxxxxx
(3) अन्तर प्रेरणा
तर्ज - धीरे धीरे बोल
...........
गुरु गुण गा तूं हर्ष मना, हर्ष मना तूं हर्ष मना।
गुरु गुण गावे जो कोई, जिनपद पावेगा वोही ।।टेर।।
दीक्षा शताब्दी जिनकी है इस साल।
वे हैं प्यारे पूज्य गणेशीलाल |
कहा मान ले, दृढ़ धार ले, जीवन इनका रच सही।। 1।।
सौ गीतों में जीवन यह सुखकार।
सौ ही तों में करना तैयार।।
मत ढीलकर, चित्त धीर धर, होना है अस्थिर नहीं।।2।।
इससे मेरे मन में जगा विचार ।
आचार्य गणेश गुण शतक यह हितकार।
"धर्म" भाव से, रचूं चाव से, धुन अन्तर्मन जग गई।। 3 ।।
XXXXXXXXXXXXXXXXX गणेश
XXX गणेश गुण शतक/9
(4) स्वप्न दर्शन
तर्ज - जब तुम्हीं चले परदेश
था उदयपुर मझार,
श्रेष्ठि सुखकार सायबचंद प्यारा।
जो मारु कुल उजियारा ।। टेर।।
वह ओसवाल जाति भूषण,
नहीं जीवन में
कुछ
भी
दूषण।
था जाति न्याति व राज्य में यश विस्तारा ||1||
थे देवस्थान के अधिकारी,
वल्लभनगर में सुखकारी।
अन्याय अनीति का करते दूर किनारा । |2||
ऐसे ही सद्गुण धारी थी,
अर्धांगिनी जिनकी प्यारी थी।
था इन्द्रा बाई नाम अति सुखकारा ।।3 ||
एक रजनी सुख शय्या सोती,
शुभ स्वप्न एक है वह लखती।
होता है पुलकित तन-मन उसका सारा । 14 ||
उठ "धर्म" ध्यान को वह ध्याती,
पतिदेव को प्रेम जगा कहती।
जो देखा स्वप्न में दृश्य अति प्रियकारा ।।5।।
10/गणेश गुण शतक
गुण शतक५५५५xxxxxxxxxxxxx
K
P
(5) गर्भ पालन
तर्ज- गाजे-गाजे जेठ आषाढ़ सावन
...........
हर्षिया हर्षिया हर्षिया ए तो, मन में घणा हर्षिया हो।
सायबचंदजी सुण ने बात ने।। टेर ।।
बोल्या बात म्हारी तू तो, सुणले कामण प्यारी ओ।
भाग्य जागण रो अवसर आवियो।।1।।
आसी-आसी कुल में कोई, पुण्यवंत बाल आसी ओ।
यश फैलासी जग मांय ने।।2।।
सुण-सुण इन्द्राबाई बात, आनन्द मन में पाया हो।
गर्भपालन करे कोढ़ सूं।।3।।
खाटा, खारा और चरपरा, तामसी ठंडा बासी ओ।
भोजन सारा ही तज डालिया।।4।।
तामसी वृत्ति रे पोषण रा, साधन सब ही तजिया ओ।
सात्विक वृत्ति ने धारे प्रेम सूं।।5।।
"धर्म" ध्यान में चित्त लगावे, शुद्ध भावना भावे ओ।
दान देवे है घणां मोद सूं। 16 ||
WA
XXX
AXXXXXXXXXXXXXXXX गणेश गुण शतक/11
XXXXXX
(6) पुत्र जन्मोत्सव
तर्ज- होवे धर्म प्रचार
...........
छाया हर्ष अपार, सायब श्रेष्ठी घर।
हाँ बंटे बधाई आज, सायब श्रेष्ठी घर।। टेर।
संवत् उगणीसो सैंतालीस, सावण बदी तीज निखालीस।
दिन था शनिवार, सायब श्रेष्ठी घर||1||
אאאאאא
इंद्रा माँ का भाग्य सवाया, सुंदर पुत्ररत्न एक जाया।
प्रतिभा का नहीं पार, सायब श्रेष्ठी घर||2||
श्याम सलोनी मोहिनी मूरत, लगती प्यारी सबको सूरत।
सौम्य वदन सुखकार, सायब श्रेष्ठी घर।।3।।
प्र
अंगोपांग पुष्ट व सुंदर, सुलक्षण से मंडित सुखकर।
देह यष्टि सुखकार, सायब श्रेष्ठी घर।।4।।
देख-देख सबका मन मोहे, "धर्म" प्रेम अनुरंजित होवे।
पावें आनन्द अपार, सायब श्रेष्ठी घर।।5।।
MOST
12/गणेश गुण शतक ५५५५५५५५५५५५५XXXX
.
(7) नामकरण
तर्ज- जाओ जाओ ऐ
...........
होता होता है नाम यथारथ,
जिसमें हो गुणवास ।। टेर।।
नाम हो मोटा दर्शन खोटा,
नहीं उसमें कुछ सार।
किं शुक पुष्पवत होता है,
यह बिल्कुल ही बेकार ||1||
सुन खुश खबरी सब ही आते,
श्रेष्ठी सायब द्वार।
देख के श्याम सलोनी सूरत,
हर्षित हुए अपार ||2||
मंगल गावें झूले झूलावें
जन्मोत्सव में सारे।
मिलकर के सब बड़े प्रेम से,
गणेश नाम उच्चारे।।3।।
५४५४४
8888
द्रव्य देह गुण को लखकर के,
नाम निक्षेप कराते।
"धर्म" भाव निक्षेप न जाने,
फिर भी हर्षित हो जाते।।4।।
XXXXXXXXXXXXXXX गणेश गुण शतक/13
(8) बाल क्रीड़ा
XX
तर्ज- कृष्ण कन्हैया लाला
...........
देखो माँ इंद्रा रे आंगणे में आनन्द छायो।
खेलत देख निज बाल ने मन हर्ष समायो।। टेर।।
५.९५९
Exxxxx
माता निज लाल ने गोदी ले, लाड लडावे।
निज स्तन रो पान कराय, मन में अति हर्षावे।।
गा-गाकर लोरियाँ निज लाल ने झूले झुलायो।।1।।
काजल टीकी कर लाल ने, पहरावे वागा।
पाँव झांझरिया झणकार, पगल्याँ करे आगा।।
हाथ पकड़ निज लाल ने, चलणो सिखायो।।2।।
ठुकम-ठुमक कर चालता, जद दौड़न लाग्यो।
साथियाँ रे साथे खेलण, माँय अब तो मनड़ो जाग्यो।।
देखने सब दिल मॉय, अति ही मोद मनायो।।3।।
मीठी बोली तूं माता लाल ने सुशिक्षा देवे।
विनय, विवेक, सद्ज्ञान री सब बाताँ केवे।।
सुण-सुण ने "धर्म" संस्कार लाल है पायो।।4।।
५५५५५४४
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14/गणेश गुण शतक XXXXX
शतक ५५५५५५५५XXXXXXXXXX
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(9) गणेश की शिक्षा
तर्ज- देख तेरे संसार की हालत
...........
लाल गणेश को पाँच वर्ष का,
देख के करे विचार।
देना शिक्षण अब हितकार।।
१५५४५५५५५५५५५५५
ऐसा सोच के अपने मन में,
लेते निश्चय धार।
देना शिक्षण अब हितकार|| टेर।।
सुंदर एक पोशाक सजावे, साथ में पट्टी बरता लावे।
फिर अच्छा मिष्ठान खिलावें, गणेश देख यह अति हर्षावे।
शुभ मुहूर्त में लेकर आये, पाठशाला मझार ||1||
अध्यापक को सौंपते लाकर, कहते सायबलालजी हंसकर।
इस बालक को देना सुंदर शिक्षा, अपना ही समझकर।।
होगा महा उपकार आपका, भूलें नहीं लिगार।।2।।
सुनकर शिक्षक भी हर्षाते, बालक गणेश को स्नेह बताते।
स्वर व्यंजन का ज्ञान कराते, अंक गणित भी साथ सिखाते।।
हिन्दी, उर्दू भाषा का भी, देते ज्ञान अपार । 13 ।।
विनय, विवेक के दीप जलाते, जीवन अपना वे चमकाते।
शिक्षक साथी आनंद पाते, देख प्रतिभा मन हर्षाते।।
"धर्म" रुचि भी पैदा होती, देखो हृदय मझार ||4||
KAKKAKKKAKAKAKAKKKगणेश गुण शतक/15
(10) धर्मरुचि गणेश की
तर्ज- रेशमी सलवार
...........
श्रेष्ठी सायबलाल धर्म व्रत थे धारी।
पाते जिससे संघ में, आदर वे भारी।। टेर।।
अवकाश ज्योंही कुछ मिलता, चल धर्म स्थान में आते।
प्रिय लाल गणेशी को भी, दे प्रेरणा साथ में लाते।
करते संस्कारी।।1।।
पूज्य पिता के संग में, वे धर्मस्थान आ जाते।
दया, सामायिक आदि सब धर्मक्रियाएँ करते।।
हर्षित हो भारी।।2।।
कुछ ज्ञान-ध्यान भी अब तो वे, सीखते हैं चित्त धरकर।
प्रतिक्रमण, सामायिक और तत्त्वज्ञान भी सुखकर।।
रुचि रखकर भारी।।3।।
धीरे-धीरे अब देखो वे "धर्म" रंग में रमते।
साधु-संतों की सेवा भी अन्तर्मन से करते।।
खेल रुचि तज सारी।।4।।
Sel
५४४
16/गणेश गुण शतक ५५५XXXXXXXXXXXXXXX
(11) पूज्य
श्रीलालजी का आशीर्वाद
तर्ज- इक प्यार का नगमा है .......
एक बार उदयपुर में, आनन्द अति छाया था।
संघनायक पूज्यश्री, श्रीलाल जी आया था।। टेर।।
५५४४
नर नारी सब मिलकर, सेवा करते सुखकर ।
इक दिवस पास बैठे, सायबचंदजी आकर।।
गणेश ने आकर के, निज शीष झुकाया था।।1।।
पूज्यश्री उसे लखकर, फरमाते तब हँसकर।
क्या दीक्षा तुम लोगे,
सुखकर।
सुन वचन गणेशी ने, बड़ा हर्ष मनाया था।।2।।
इस जीवन
में
श्री सायबचंदजी को, पूज्यराज यों फरमाते।
यदि दीक्षा यह ले तो, मत रोकना समझाते।।
"धर्म" संघ का ध्रुव तारा, होगा बतलाया था।।3।।
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XXXXXXXXXXXXXXXXXXगणेश गुण शतक/17
(12) गणेश की कार्यकुशलता
तर्ज- चांदनी ढल जायेगी
अध्ययन को छोड़ देते,
पिताजी साथ ले जाते।
दफ्तर मझारी रे,
गणेश को भारी रे।।1।।
काम-काज में हाथ बँटाते,
छोटे-मोटे ड्राफ्ट बनाते।
उत्साह दिल धारी रे,
गणेश को भारी रे।।2।।
सायबचन्दजी खुश होते,
मन में आनन्द पाते।
देख हुशियारी रे,
गणेश को भारी रे।।3।।
बन जाते योग्य पूरे,
संभाले ये कार्य सारे।
निश्चिंत बने भारी रे,
गणेश को भारी रे।।4।।
"धर्म" ध्यान से रखे नाता,
सुख-शांति का जो है दाता।
भव-भव मझारी रे,
गणेश को भारी रे।।5।।
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Xxx
18/गणेश गुण शतकXXXXXXXXXXXXXXXXXX
(13) गणेश का सगपन
तर्ज- प्यासे पंछी नील गगन में ........
एक दिन इन्द्राबाई बोली, गणेश होग्यो स्याणो।
अब जल्दी सूं परणाणो।
सुन्दर बहु रो म्हारे घर में, झटपट चाहिजे आणो।
अब जल्दी सूं परणाणो।।टेर ।।
इतरे में तो केशरीमलजी, मेहता चल घर आया।
देख-देख सब ही मन रा मन, आनन्द अति ही पाया।।
पूछण लाग्या आदर भाव सूं,
किण विध हो गयो आणो।।1।।
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हर्षित होकर बोल्या मेहता, अर्ज एक है म्हारी।
कन्या सुन्दर नाम है कमला, म्हारे प्राण सूं प्यारी।।
इणरो सगपण धार्यो मन में, आज तय कराणो।।2।।
आप रो लाडलो लाल गणेशी, म्हारे मन में भायो।
इणरे खातिर आप द्वार पर, चलकर आज मैं आयो।।
अर्जी ऊपर मर्जी कर दो, मैं चावां वर पाणो।।3।
सुणने सगला ही हर्षाया, मन इच्छित फल पाया।
सगपण तय कर दीनो झटपट, मंगल गीत गवाया।।
"धर्म" प्रेम उमड़यो आपस में, भाग्य योग सूं जाणो।।4।।
אאאאאאאאאאאאאא
TXXXXXXXXXXXXX
गणेश गुण शतक/19
(14) विवाह की तैयारी
NXXX
तर्ज- पावन पुरुषोत्तम राम की कथा
...........
मंडियो ब्याव सायब श्रेष्ठी घर, छाई खुशियाँ अपरम्पार ।
खुशियाँ अपरम्पार, गणेशी बनड़ो हुओ तैयार।।टेर।।
चवदह वर्ष री उमर में भी, दिसे जोध जवान।
श्याम सलोनी सूरत प्यारी, चमके सूर्य समान।।1।।
ढोल नगाड़ा बाजण लाग्या, शहनाई सुखकार।।
बहिनां हिलमिल मंगल गावें, छायो आनन्द अपार | 2 ||
उबटन करने नहलावें फिर, शुद्ध वस्त्र लें धार।
कान में कुण्डल ऊपर झेला, गल मोती रा हार।।3।।
दश अंगुली मुद्रिका पहने, लहरियो छल्ला दार।
तुरा किलंगी सोहे उण में, लटके पास कटार ||4 ||
सुंदर तिलक भाल पर चमकें, निरखें सब नर-नार।
बैठ घोड़ी पर हुए रवाना, जान सजी सुखकार ||5 ।।
जरीदार है दुपट्टो हाथ में, चमक रह्यो दीदार।
"मुनि धर्मेश" कहे सब रे दिल, खुशियाँ रो नहीं पार ।।6 ||
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20/गणेश गुण शतकXXXXXXXXXXXXXXXXXX
RRRRRRRRRRRRRRR/
(15) जान प्रस्थान विवाह सम्पन्न
तर्ज- म्हारों बनड़ो हजारी गुल रो
...........
म्हारो बनड़ो गणेशी देखो आज, घोड़ी पर चढ़ झट चाल्यो।
लारे जानियाँ रो छेह न पार,
घोड़ी पर चढ़ झट चाल्यो।।टेर।।
आगे आगे हैं ढोल निशाण, सहनाईयाँ गूंजे जोर री।
गावें गीत सुहागन नार - घोड़ी..... ||1||
होता मुख्य बाजारां रें मांय, मंडप माहे जद आया।
लेवें सासूजी बधाय तिणवार - घोड़ी..... ||2||
झट तलवार सूं तोरण बांध, घोड़ी सूं नीचे उतरिया।
लाया चंवरी रे मंडप मझार घोड़ी......||3||
आया कमलाबाई सज श्रृंगार, वर माला लीनी हाथ में।
वें पहनाई हैं हर्ष दिल धार घोड़ी...... ||4||
पछे पंडितजी मंत्र उच्चार, हथलेवो जोड़यो हाथ सूं।
वें तो परणावे भंवर डार - घोड़ी..... 115।।
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Xx
श्री मेहता जी दे प्रीतिदान, बाई ने भेजे सासरिये।
करी खातरदारी जान री अपार - घोड़ी....... ||6||
देवें विदाई बाई ने ममता मार, शिक्षा तो देवें प्रेम सूं।
बहे "धर्म" स्नेह री अश्रुधार - घोड़ी...... 1|7 ||
אאאאא
XXXXXXX
XXXXXXXXगणेश गुण शतक/21
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(16) वधू आगमन
तर्ज- ए मोति भर समंदरियाँ में नीपजे
...........
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विवाह करी ने घरे आवियाँ,
छायो है आनंद अपारो।
बधावें माता मोद सूं।। टेर।।
कुंकुं रा पगल्याँ बहु रा मांडने,
लाया निज आंगन मझारो।।1।।
।
आरती उतारें बेनड़ प्रेम सूं
निरखें निज भावज रो दीदारो।।2।।
सास-श्वसुर रे पगे लाग ने,
करे सब ने ही नमस्कारो।।3।।
देख बहू ने सब हरषियाँ,
दीनों है आशीष सुखकारो।।4।।
"धर्म" स्नेह तो सब रे उमड़ियों,
जोड़ी मिली आ श्रेयकारो।।5।।
२४५५५५५५५xxxxxxx
22/गणेश गुण शतकXXXXXXXXXXXXXXXXXX
EXXXXX
(17) सुहाग रात
तर्ज- मैं तो ढूँढ़यो रे
राग-रंग में दिवस बीत्यो जाय,
घड़ियाँ तो आई रात री।
मन में छायो है हर्ष अपार ।।टेर।।
सज सोलह सिणगार कमलाबाई,
ऊभी महल मझार।
कब आवें म्हारे पियु परमेश्वर,
कर रही खड़ी इंतजार ||1||
लाल गणेशी पहुंच्या सीधा,
चल निज महल मझार।
कोमल शय्या बिछी है सुंदर,
जाय विराज्याँ तिणवार ||2||
नमन करें झट आय चरण में,
और करें सत्कार।
सारा महल में छाय गई जद,
प्रेम री सुखद बहार ।।3।।
नैणां सूं नैण मिले जी,
जग्यो परस्पर हेत।
नयण-नयण री बात में जी,
गोरी रो मन हर लेत।।4।।
दोनों हिलमिल बड़े प्रेम सूं,
सुख विलसे संसार।
गृहस्थ "धर्म" रे जीवन मांही,
छाई है सौरभ अपार ।।5।।
XXXXXXXXXXXXXगणेश गुण शतक/23
(18) गृहस्थ
में प्रवेश
तर्ज- चुप-चुप बैठे हो ........
גיא
युवक गणेश अब गृहस्थी में आते हैं
धीरता व वीरता के गुण विकसाते हैं।।टेर
छोटी वय में भी, बड़े निडर होके रहते हैं।
विकट समस्या में भी, धैर्य नहीं तजते हैं।।
सुख-दुःख में भी आप सदा मुस्काते हैं।।1।।
अकस्मात् एक दिन महा वज्रपात हुआ।
इकलौती बहिन का मृत्यु से साक्षात् हुआ।।
श्रेष्ठी सायब स्थानक में, पौषध को ठाते हैं।।2।।
लोगों ने समाचार देने का विचार किया।
लेकिन आपने तो साफ इन्कार कर दिया।।
सुनकर सब बड़े आश्चर्य को पाते हैं।।3।।
अन्त्येष्टि क्रिया हेतु, श्मशान लाये जब ।
इंधन की कमी देख, पुनः सब जाते तब ।।
पीछे कौन बैठे यहाँ सब घबराते हैं।।4।।
;וא'
गणेशी ने कहा तब आप चले जाईये।
बैठा हूँ मैं यहाँ कुछ विचार न लाईये।
देख "धर्म" धैर्यता को सब हर्षाते हैं। 5 ।।
Xxx
24/गणेश गुण शतकxxxxxxxxxxxxxxxARY
--
(19) दुःख का पहाड़ : गणेश के सिर
तर्ज- पल-पल बीतें उमरियाँ
...........
पल-पल करते बीते रे, सुख में जीवन सारा ।
गणेश का प्यारा-प्यारा, गणेश का प्यारा।। टेर।।
मगर अचानक दुःख के बादल मंडराते-2,
महामारी से जन-मन अति ही अकुलाते।
जिससे सबकी आँखों में बहे अश्रु की धारा ।।1।।
घर-घर में कोहराम मचा ये भारी है-2,
श्मशान भूमि में लाशों का क्रम जारी है।
कई घर उजड़ते रे, नहीं मिलता उठावन हारा ।।2।।
उसी चपेट में श्री गणेश भी आ जाते-2,
मात-पिता और पत्नी सब ही विरलाते हैं।
पूरा घर उजड़ता रे जमा हुआ जो सारा ।।3।।
दुःख सागर में ये तो गोते खाते हैं-2,
साथी स्नेही सब मिल धैर्य बंधाते हैं।
उजड़ा घर जमाने का "धर्म" चित्त धारा ।।4।।
XXXX
XXXXXXXXXXXXXXXXXXगणेश गुण शतक/25
KXXXXXX
(20) श्री जवाहर का चातुर्मास स्वीकृत
तर्ज-जिया बेकरार है
...........
उदयपुर मझार है, छाई खुशी अपार है।
जैन जवाहर चातुर्मास के, पाये जब समाचार हैं।।टेर ।।
फतहसिंहजी नृप अर्जी ले, दीवान खास जब आये हो-2
पूज्यश्री श्रीलाल चरण में, रखकर मन हर्षाये हो-2
करना अब स्वीकार है, अर्ज करें नर-नार हैं।1।।
विनती सुनकर पूज्यश्री ने, उत्तर यों फरमाया हो-2,
मैं आने में पूर्ण असमर्थ, साफ-साफ बतलाया हो-2,
मगर भेजूं इस बार है, जवाहर पेटी सुखकार है।
लाभ उठाना इसका भारी, जीवन बने श्रेयकार है।।2।।
पूज्यवर वचनों को सब मिलकर, सादर शीष चढ़ाते हो-2,
भावी पूज्य का चातुर्मास पा, फूले नहीं समाते हो-2,
छाया हर्ष अपार है, प्रमुदित सब नर-नार है।
कब आयेंगे जैन जवाहर, करने लगे इंतजार है।।3।। .
;אאאאאאא
इतने में तो मिली बधाई, जैन जवाहर आये हो-2,
शहर बाहर में आय विराजे, सुनकर सब हर्षाये हो-2,
उमड़ पड़े नर-नार है, बोले जय जयकार है।
"धर्म" भाव उमड़ाया भारी, दर्शन कर श्रेयकार है।।4।।
26/गणेश गुण शतकxxxxxxxxxxxxxxxxxx
...........
(21) पूज्य जवाहर का उदयपुर प्रवेश
तर्ज- मन मोयो रे तुंगियापुर
मन मोह्यो रे, उदयपुर नगर सुहावणो रे।
जठे पधाऱ्या जैन जवाहर रे।।टेर।।
नर-नारी तो दर्शन पाविया रे
मन में छायो है हर्ष अपार रे।।1।।
श्रद्धा भक्ति सूं करे वंदना रे।
कर रह्या है जय-जयकार रे।।2।।
मुख्य बाजार सूं शहर में आविया रे।
श्रावक-श्राविका रो झुंड अपार रे।।3।।
नव ठाणा सूं आप विराज्याँ रे।
मोती मुनि गुरु भ्राता साथ रे।।4।।
वीतराग वाणी श्रीमुख उच्चरी रे।
मानो बरसे है अमृतधार रे।।5।।
ज्यों बादल गर्जना सुन मोरिया रे।
नाचे कुंके है तिणवार रे।।6।।
त्यों ही तो वाणी सुण आप री रे।
हर्षित होवे नरनार रे।।7 ||
तपस्या री झड़ियाँ लागी जोर री।
चहुँदिश छायो आनंद अपार रे।।8।।
लाल गणेशी आवें कोड सूं रे।
वाणी सुनी ने करे विचार रे।19 ।।
असार संसार माहे राचता रे।
पायो नहीं जीवन में कुछ सार रे||10||
"धर्म" मार्ग पर अब चालणो रे।
मन में निश्चय लीनो धार रे।।11।।
XXXXXXXXXXXXXXX गणेश
गुण शतक/27
(22) गणेश का वैराग्य उद्भव
तर्ज- घर आया मेरा परदेशी
...........
गुरुवर मुझ पर मेहर करो।
चरण शरण में शीघ्र वरो।।टेर।।
.....
मात-पिता, पत्नी प्यारी, पाये मृत्यु दुःखकारी।
एक बचा मैं ध्यान धरो-चरण
11111
संसार असार लगा सारा, संयम ही है सुखकारा।
लेना चाहता मेहर करो
11211
KX
.....
अंधविच डोल रही नैया, एक तुम्ही हो खिवैया।
गुरुवर इसको पार करो
||3||
दुःख से अति घबराया हूँ, आप शरण में आया हूँ।
मेरा शीघ्र उद्धार करो ||4||
तन मन मेरा अर्पित है, सबकुछ चरण समर्पित है।
अर्जी अब स्वीकार करो |5||
दृढ़ निश्चय मन धारणकर, आया अब तेरे दर-पर।
"धर्म" गुरु उद्धार करो .... | 16 ||
28/गणेश गुण शतक
गुण शतकxxxxxxxxxxxxxxxxx
XXX
(23) दीक्षा का निश्चय
तर्ज- धरती धोरां री
...........
देख के दृढ़ता इनकी सारी, देते जवाहर आज्ञा प्यारी।
करने लगे तब तैयारी, गणेश भारी ओ।।टेर।।
ब्रह्मचर्य का व्रत धार, रखने लगते हैं चौविहार।
रहते सेवा में सुखकार, गणेश भारी ओ।।1।।
श्रमण प्रतिक्रमण सुखकार, सीखा कुछ ही दिन मझार ।
भरते स्तोक ज्ञान भंडार, गणेश भारी ओ।।2।।
देख के प्रतिभा इनकी प्यारी, आश्चर्य होता सबको भारी।
कहने लगते नर व नारी, गणेश भारी ओ।।3।।
दीक्षा उदयपुर करवाओ, मुहूर्त जल्दी से निकलाओ।
झट-पट ज्योतिषी बुलवाओ, गणेश भारी ओ।।4।।
मिगसर बद एकम जो आवें, मुहूर्त ज्योतिषी बतलावें।
सुनकर मनड़ो अति हर्षावे, गणेश भारी ओ।।5।।
होती दीक्षा तय उस वार, छाई मन में खुशी अपार |
होती "धर्म" गीत गुंजार, गणेश भारी ओ।।6।।
אאאאא
EXXXXXXXXXXXXXXXXXगणेश गुण शतक/29
(24) अभिनिष्क्रमण
तर्ज- इम झूरे देवकी रानी
...........
KXXXX
छायो-छायो आनन्द अति छायो।
दीक्षा रो ठाठ सवायो रे। टेर।।
उदयपुर री जनता सारी।
हर्षित है मन में भारी रे।।1।।
घर-घर में मंगल गावें।
वैरागी ने लाय जिमावे रे।।2।।
साथे पन्नालालजी भी आया।
दीक्षा लेवण उमाया रे।।3।।
जद पूर्ण हुयो चौमासो।
ओ उमड़ पङ्यो जन खासो रे।।4।।
कर विहार मुनिवर आया।
नगरी बाहर ठहराया रे।।5।।
मंडप विशाल भरायो।
जन-मन में आनन्द छायो रे।।6 ||
दरबार फतहसिंह आया।
बलवंत दीवान यश गाया रे।।7।।
ऐ ढोल निशाण भजावे।
दीक्षा रो लाभ लिरावे रे।।8।।
अभिनिष्क्रमण कर आया।
गणेश घणां हर्षाया रे।1।।
नर-नारी मंगल गावे।
जिन "धर्म" रो यश फैलावे रे||10||
१४
30/गणेश गुण शतक४४४४५४५५१RRRRRRRRR
(25) शृंगार परिहार : साधु वेश स्वीकार
तर्ज- गिरधर आओ तो सही रे
...........
लोगों देखो तो सही रे, लोगो देखा तो सही।
लाल गणेशी संयम धारे, देखो तो सही।। टेर।।
अभिनिष्क्रमण कर आया, गुरुवर रे चरणार |
वंदन करने आया झट-पट, भीतर कक्ष मझार ।।1।।
कुल नाई भी हर्षित होकर, उत्तरासन ले धार ।
मुंडन कर अभिषेक करावे, हर्ष रो नहीं कोई पार ||2||
वस्त्राभूषण सब ही तजिया, तजियो सब परिवार।
द्रव्य मुंडन रे साथ में, भाव मुंडित हुआ अणगार ।।3 ।।
१५
चोलपट्टो कटि पहनकर, ऊपर चद्दर धार।
मुँहपत्ति बांधी मुँह पर जद, चमक्यो भव्य दीदार।।4 ||
बहत्तर हाथ वस्त्र रे साथे, काष्ठ पात्र लिया धार।
रजोहरण हाथ में लेकर, आया गुरु चरणार।।5।।
मुनि वेश धर खड़ा चरण में, अर्ज करे तिणवार ।
देख गणेश रे "धर्म" रंग ने, चकित हुया नर-नार | 6 ||
१४४५४५
XXXXXXXXXX
XXXXXगणेश गुण शतक/31
(26) गुरु
चरणों में विनय
אאאא
तर्ज- पल्लो लटके
11
अर्जी सुनलो गुरुसा अर्जी सुन लो।
दे दो संयम रो दान, म्हारी अर्जी सुन लो।।टेर।।
मोह ममता ने छोड़ शरण में, आयो अब मैं थारे।
अधबिच नैया डोल रही है, अब तो करो किनारै।।
गुरुसा स्वार्थी संसार ओ तो, लाग्यो सगलो।।1।।
आप आज्ञा में तन मन म्हारो, अर्पण है ओ सारो।
देकर संयम साज इणने, भव सूं पार उतारो।।
गुरुसा चरणां रे चाकर री, अरदास सुण लो।।2।।
प्राण तजूं पर प्रण नहीं तोडू, ओ दृढ़ निश्चय म्हारो।
बण जावो पतवार गुरुवर, एक आसरो थारो।।
गुरुसा म्हारा वचन ऊपर, विश्वास कर लो।।3।।
ज्ञान-ध्यान और तप-संयम री अंतर ज्योति जगाऊँ।
काट कर्म दल जल्दी सूं मैं, सिद्ध-बुद्ध बन जाऊँ।।
गुरुसा ऐसी "धर्म" री ज्योति म्हारे भीतर भर दो।।4।
32/गणेश गुण शतक
शतकxxxxxxxxxxxxxxxxxx
(27) चेतावनी और संयमदान
तर्ज- सीता माता की गोदी में-मूंदड़ी
...........
सुनकर लाल गणेशी री बात, पूज्य फरमावियो जी।
करलो मन में और विचार, साफ चेतावियो जी।।टेर।।
देख गणेश री पूर्ण तैयारी, संघ साक्षी लेकर सुखकारी।
पूज्य जवाहर दीक्षा पाठ उच्चारियो जी।।1।।
चउवीसत्थव री विधि कराई, सावद्य योग दिया छुड़वाई।
नवकोटि सूं जावज्जीव दुःख कारिया जी।।2।।
सुनकर जनता सब हर्षाई, मुनि गणेश की जय बोलाई।
वंदन करके सब ही आनंद पावियाजी ।।3।।
अरिहंत सिद्ध स्तुति सुखदाई करके लीना पास बिठाई।
करके शिखालोच मोती मुनि शिष्य बणाविया जी114
वंदन लुल लुल करे चरण में, हर्षित होवे अति ही मन में।
"धर्म" गुरु चरणों में, चित्त रमावियो जी।।5।।
१५५
אאאאא
EXXXXXXXXXXXXXXXXXगणेश गुण शतक/33
(28) जवाहर की
कृतज्ञता
तर्ज- घुड़लो घूमेला जी घूमेला
...........
אאא
म्हारा मोतीलाल गुरुराज, म्होटा उपकारी जी उपकारी।
ज्यारी महिमा रो नहीं पार, गुण रा भंडारी जी भंडारी ।।टेर।।
सिंगोली में जन्म लिया है, कटारिया कुल धन्य हुआ है।
माता वृद्धि उदयचंद तात, ज्यांरा सुखकारी जी सुखकारी।।1।।
अठारह वर्ष री वय रे मांही, राजमलजी गुरु सुखदाई।
संयम लियो हर्षाय, ए तो श्रेयकारी जी श्रेयकारी||2||
गुरु भाई ज्यांरा मगन मुनीश्वर, राम-लक्ष्मण सी जोड़ी सुखकार ।
घोर तपस्वी राज संघ में, था भारी जी था भारी।।3।।
शिष्य जवाहर ज्यांरा सुखकर, गुरु मगन वियोग ने लखकर।
विक्षिप्त हुआ तिणवार, पाया दुःख भारी जी दुःख भारी ।।4।।
सेवा करने पूरी वारी, रखी सार संभाल थी सारी
दिया जैन जवाहर राज संघ ने हितकारी जी हितकारी।।5।।
उण उपकार ने चित्त में धरकर, मुनि गणेश ने शिष्य बनाकर।
भेंट कियो सुखकार, "धर्म" कहे आभारी जी आभारी।।6।।
34/गणेश गुण शतक
शतकXXXxxxxxxxxxxxxxxx
(29) गणेश का प्रथम पाद-विहार
तर्ज- होली आई रे
...........
मेवाड़ी सपूत स्याणो, श्रमण वेश धर निकल्यो हो।
कर्म शत्रु परास्त करवा, रण में चढ़ियो ओ।
जोश भारी हो-2, ओ मुनि गणेश दृढ़ता धारी हो।।टेर।।
आगे आगे पूज्य जवाहर, मोती मुनिवर चाले हो।
गजवंती चाली सूं ए तो, लारे चाले हो।।1।।
EXXXXXXXXXXX
थोड़ो सो सामान आपरे, कंधा ऊपर लीनो हो।
एक मील रो विहार लगभग, पैदल कीनो हो।।2।।
मगर परीषह प्रथम विहार में, ए तो जब्बर पायो हो।
पगां मांहि छाला, खांधे सोजो आयो हो।।3।।
छतरियां मांहे उतरिया ठंडी, लहरा जब्बर आवे हो।
बुखार भी चढ़ग्यो जोर रो, नहीं बतावे हो।।4।।
गुरुदेव ने खबर पड़ी, उपचार सूं शांति पाई हो।
"धर्म" वीर पग प्रातः आगे दिया बढ़ाई हो।।5।।
१५५५५५५५
XXXXXXXXXXXXXXXXXXTTUTET
गुण शतक/35
(30) पूज्य श्रीलालजी की भविष्यवाणी
तर्ज- इन्हीं लोगों ने
...........
चलकर आये-3, नाथद्वारा, गुरुवरजी प्यारा ।। टेर।।
आगे विराजे मन्ना मुनिवर, पूज्य श्रीलाल जी प्यारा ।।1।।
दर्शन करके हर्षित होते, मस्तक चरणों में डारा ||2||
१५
देख के पूज्यवर आनंद पाते, और वचन उच्चारा ।।3।।
मुनि गणेश को खूब पढ़ाओ, और करो हुशियारा ||4||
कल्पतरु सम है सुखदायक, होगा शासन उजियारा ।।5।।
सुनकर मन में गद्गद् होते, वचनों को सिर पर धारा ।।6 ||
"धर्म" ध्यान की वृद्धि करते, करते हैं उग्र विहारा। 17 ||
אאאאאא
31. गणेश की ज्ञान साधना
तर्ज- शांतिनाथजी को कीजे जाप
मुनि गणेशी गुण भंडार, गुरुवर साथ में करें विहार।
विनय वैयावच्च खूब करे, अपना ज्ञान निधान भरें।।टेर।।
उन्नीसो त्रेसठ चौमासा, गंगापुर में किया सोल्लास।
चौसठ का रतलाम करें, अपना ज्ञान निधान भरें।।1।।
विचरत आये थांदला शहर, कर गुरुजन्म भूमि पे महर।
पैंसठ का चौमासा करे, अपना ज्ञान निधान भरे||2||
36/गणेश गुण शतकxxxxxxxxxxxxxxx
;אא'
धर्म-ध्यान का ठाठ लगा, आबाल-वृद्ध में जोश जगा।
चातुर्मास को पूर्ण करें, अपना ज्ञान निधान भरें।।3।।
किया वहाँ से जब विहार, आये रंभापुर मझार ।
गुरुदेव बीमार पड़े, अपना ज्ञान निधान भरें।।4।।
उल्टी-दस्तों की बौछार, सौ डेढ़ सौ का नहीं पार |
हालत यूं कमजोर परे, अपना ज्ञान निधान भरे।।5।।
अग्लान भाव हृदय मझार, करते सेवा ममता भार।
देख सभी आश्चर्य करे, अपना ज्ञान निधान भरे।।6
उसका फल पाया सुखकार, खुल गया गुरु का ज्ञान भंडार।
"धर्म" का खूब उद्योत करे, अपना ज्ञान निधान भरे।।711
(32) गणेश का संस्कृत अध्ययन
तर्ज- तन कोई छूता नहीं ........
देख प्रतिभा आपकी गुरुवर यूं विचारते।
उच्च अध्ययन है कराना, अपने मन में ठानते।।टेर।।
छासठ-सड़सठ का चौमासा, जावरा, इन्दौर कर।
महाराष्ट्र की ओर जाना, मन ही मन में धारते।।1।।
महाराष्ट्र पधारते हैं, आप जब विहार कर।
अहमदनगर चौमासे की है, विनती स्वीकारते।।2।।
संस्कृत अध्ययन कराने की, लगन मन में लगी।
दोष इसको परम्परा से, आप भी है मानते।।3।।
XXXXXXXXXXXXXXXXXगणेश गुण शतक/37
।
करके हिम्मत आपने, इस रुढ़ि का प्रतिकार कर |
स्व-शिष्यों को पढ़ाना, यह संकल्प मन में ठानते।।4।।
जुबनेर व फिर घोड़ नदी, फिर जामगाँव चौमासा कर।
अहमदनगर चौमासा का आग्रह पुनः वे मानते।।5।।
संघ के संतोष हेतु, दी परीक्षा शिष्यों ने।
गुणे व अभयंकर शास्त्री, आश्चर्य इसको मानते।।6 ||
उत्तीर्ण प्रथम श्रेणी में हुए, दोनों ही महामुनि।
देख के अपने हृदय में, सब ही आनंद मानते।।7।।
आदेश पूज्य श्रीलाल का पाके, गुरुवर ने किया।
उग्रतम विहार वहाँ से, रत्नपुरी के वास्ते ।।8।।
आप दीक्षा गुरु की सेवा में ही रह अध्ययन करे
घोड़नदी मीरी हिवड़ा चिंवड़ विराजते ।।9।।
सत्ततर का चौमासा, शहर सतारा आ गये।
रतलाम गुरु के चरण में, आनंद अति ही मानते।।10।।
पुनः गुण्यासी का चौमासा, शहर सतारा कर।
घाटकोपर जलगाँव चौमासा साथ विराजते।।11 ||
पधार जाते पूज्य जवाहर जब पुनः मालवा में।
आप रहते जलगाँव में, मोती गुरु के वास्ते।।12।।
खूब देते साज उनको, अंतिम समय जानकर।
तीन वर्ष बाद फिर गुरु सेवा में पधारते।।13।।
सुनते "धर्म" देशना जो एक बार भी यदि।
जिंदगी में आपको वो कभी नहीं बिसारते।/14 ||
१५५१५
38/गणेश गुण शतकXXXXXXXXXXXXXXXXXX
(33) थलियों में धर्म का डंका
तर्ज- तावड़ा धीमो पड़जा
...........
गणेश गुरु थलियाँ में आया रे, गणेश गुरु थलियों में आया।
साल चौरासी रो चौमासो, भीनासर ठाया।।टेर।।
आगे उठा सूं विहार कर, जद सरदारशहर आया।
दया दान विरोधी सुण ने, भारी घबराया रे||1||
गोचरी लेवण आप पधारिया, पत्थर बहराया।
कई हत भागी कुत्ता रा बच्चा बहराया रे।।2 ||
कई निज संता रा भ्रम में, आहार दियो बहराय।
खबर पड़त ही पातरां सूं वे, पाछो लियो हटाय ।।3।।
सत्य तथ्य सुण कई हलुकर्मी, शुद्ध श्रद्धा अपनावें।
चुरू चौमासे करायने, वे भारी हरषावे | 14 ||
देख फक्कड़ता इण योगी री, मन में मोद मनावे।
रुक्ष आहार तो देवे कोढ़ सूं, घृत नहीं बहरावे।।5।।
जिणसूं तन में सुस्ती आई पर आनन्द मन छाया।
पूर्ण कर चौमासो गुरुवर, सेवा में है आया।।6 ||
"धर्म" रहस्य सुण चुरूवासी, मन में पछताया।
छियासी रो पुन: चौमासो, गुरु संग करवाया।।7।।
५५५५५५५
אאאאאאאאאאאאאאאאאאאאאאאאאאאאאאאאאאאא!
XXXXXXXXXXXXXXXXXXगणेश गुण शतक/39
(34) ब्यावर चातुर्मास
तर्ज-नित उठ के सज्जन ........
गाओ गाओ सज्जन, गुरु गणेश भजन, यदि पाना।
चाहो मुक्ति में अपना ठिकाना।।टेर
संवत् उगणीसे ऊपर सित्यासी करते आग्रह ब्यावरवासी।
अर्जी संघ की सुनते, गुरु महरबान बनते, ध्यान लगाना।।1।।
मुनि गणेश गुण भंडारी, देता चातुर्मास यह भारी।
करना खूब जतन, रखकर पूरी लगन, लाभ उठाना।।2।।
सुनकर सब ही मन हर्षाते, चातुर्मास हेतु मुनिवर आते।
मन में जगती उमंग, छाया "धर्म" का रंग, हरषाना।।3।।
אאאא
(35) मारवाड़ की ओर
तर्ज- बाजरां री पाणत करता
4
...........
ध्यावो ध्यावो रे सब मिल, आज मन ध्यावो क।
गुरु गणेश रा आज सब गुण गाओ।।टेर।।
ब्यावर रो चौमासो कर पूरो चाल्या क।
ऐ तो मारवाड़ धरा मांहि पग धाव्या।।1।।
तिवरी में चरण पड़ता, वैर मिटग्यो क।
भायां भायां रे आपस रो, क्लेश झट हट गयो||2||
40/गणेश गुण शतकXXXXXXXXXXXXXXXXX
इठ्यासी रो चौमासो फलौदी ठायो क।
धर्म-ध्यान रो तो आनंद अद्भुत आयो।।3।।
मावड़ीया माता रे बलिदान चढ़तो क।
पंद्रह सौ जीवां रो, घमासान हुवतो।।4।।
अभयदान मिल्यो वे तो सुख पाया क।
देख जब्बर प्रभाव, थारा गुण गाया।।5।।
जोधपुर चौमासे में भाग जाग्यो क।
गुरु चरणा में निवयासी में ठाठ लाग्यो।।6।।
"धर्म" रो ठाठ देख, झूम जाओ क।
गुरु चरणां में दौड़ दौड़ सब आओ।।7।।
(36) हुक्मसंघ का संगठन
...........
तर्ज- जिंदगी इक सफर है सुहाना
अजमेर सम्मेलन मन भाये, चल साधु-साध्वी आये।। टेर।।
खुशियों का नहीं पार वहाँ, छाई धर्म बहार जहाँ।
उगणीसौ नब्बे मन आये।।1।।
चार तीर्थ का साज सजा, सुसंगठन का चंग बजा।
सुन सुन सब हरषाये।।2।।
हुक्मसंघ के दो विभाग, हो गये उसके पंच महाभाग।
फैसला करना चाहे।।3।।
אאאאאא
XXXXXXXXXXXXXXXXXX गणेश गुण शतक/41
K
५४
षष्टम पट्ट मन्ना जवाहर, दो आचार्य हितकार।
गणेश युवराज मन भाये।।4।।
पाँच पंचों ने निर्णय दिया, सुनकर सबका हर्षा हिया।
जय जयकार गुंजाये।।5।।
क्षमायाचना सब करते, "धर्म" व्यवहार खुला करते।
वंदन कर सुख पाये। 6 ।।
(37) पूज्य मन्ना का स्वर्गारोहण
तर्ज- इक परदेशी मेरा ......
...........
संत-सती अब सब विहार कर गये।
मन्ना पूज्य चल सीधे ब्यावर आ गये।।टेर।।
सबके मन उस समय खुशी अति छाई थी।
क्योंकि अब आपस की मिट गई जुदाई थी।
एक स्थान पर सब आके रह गये।।1।।
चातुर्मास की तो सब योजना बना रहे।
नर-नारी दौड़ दौड़ सब वहाँ आ रहे।।
पर खुशियों पे काले घन छा गये।।2।।
अकस्मात् रोग का, प्रकोप कुछ ऐसा हुआ।
सारे संघ पर मानो, वज्र का प्रहार हुआ।।
सुन्ना मुन्ना पूज्य स्वर्गवास हो गये।।3।।
|42/गणेश गुण शतकx
गुण शतकXxxxxxxxxxxxxxxxxx
सारा उत्तरदायित्व पूज्य जवाहर पे आ गया।
उदयपुर चातुर्मास जब पूरा हो गया।
सम्मेलन निम्बाहेड़ा मन भा गये। 14 ।।
संघ के सब साधुओं को यही निर्देश दिया।
निम्बाहेड़ा पहुँचने का सबको आदेश दिया।
"धर्म" संदेश जब सब पा गये।।5।।
(38) निम्बाहेड़ा सम्मेलन
तर्ज- नगरी नगरी द्वारे द्वारे
गाँव-गाँव और नगर नगर से, मुनिवर चलकर आते हैं।
निम्बाहेड़ा के वासी सब, मन में अति हर्षाते हैं। टेर।।
सबके दिल में एक लक्ष्य है, संगठन दृढ़ बनाना है।
अनुशासनबद्ध मर्यादाओं का निर्धारण करना है।।
शुभ भावों से मिलकर आपस में सलाह मिलाते हैं।।1।।
बहुत जोश था बहुत होश था, पर नहीं कुछ वहाँ कर पाये।
स्वच्छन्द वृत्ति लख कुछ संतों की, मन में सबही शर्माये।।
देख दशा यह पूज्य जवाहर, सबको यूं फरमाते हैं।।2।।
अनुशासन में चलने की मन जो भी इच्छा रखते हैं।
शुद्धाचार के पालन की जो, मनोकामना करते हैं।
वो साधक रह सकते साथ में, निज अभिप्राय बताते हैं।।3।।
XXXXXXXXXXXXXXXXXXगणेश गुण शतक/43
सुनकर के आदेश पूज्य का संत-सती चिंतन करते।
अनुशासन-प्रिय साधु-साध्वी, पूज्य चरण में आते।।
"धर्म" संघ की व्यवस्था का, सब ही ध्यान लगाते हैं। 1411
גגו'
(39) युवराज चादर की घोषणा
तर्ज- श्री महावीर स्वामी की सदा जय हो......
निर्ग्रन्थ मुनिराज सब मिलकर, एक ही भाव भाते हैं।
करना क्या श्रेष्ठ है अब तो, निर्णय अपना बताते हैं।।टेर।।
सम्मेलन में जो पंचों ने दिया, निर्णय था वह भारी।
अमल लाना है उसको अब, यही है सर्व श्रेयकारी।।
उसी पर पूज्य जवाहर घोषणा कर सुनाते हैं। 11 ।।
फाल्गुन सुद तीज के शुभ दिन, ओढ़ानी है यह अब चादर।
चतुर्विध संघ सुनकर यह, फूलता हृदय के अन्दर ।।
जावदवासी ये सुन करके, अर्ज अपनी सुनाते हैं।।2।।
XXX
करो प्रदान शुभ अवसर नाथ यह,
अर्ज
सुनकर
के।
जावद संघ आपके चरणों का, चाकर यों समझकर के।।
आश पूरे दयालु देवता ! विनती सुनाते हैं।।3।।
विनय सुनकर श्रीसंघ का पूज्य गुरुवर मनन करते।
श्रावणी मेघ बनकर के जावद पर बरस पड़ते हैं।।
"धर्म" भावों से हर्षित हो कृपा जल शीष चढ़ाते हैं। 14 ।।
44/गणेश गुण शतकxxxxxxxxxxxxRRRRRY
में
(40) जावद में युवराज महोत्सव की तैयारी
तर्ज- थारी म्हांनै ओलुं जी आवे
आज जावद नगरी में आनंद छायो,
ओ युवराज महोत्सव मन भायो।
गुरुवर नगरी में आनंद छायो।।टेर।।
सब ही मिल सोचे महोत्सव सफल बणाणो।
तो काई कांई काम कराणो, गुरुवर.... ||1||
कोई तो धन भेंट चढ़ावे।
तो कोई निज तन सूं दौड़ लगावे, गुरुवर...... ||2||
चहुं दिशा में शुभ संदेशो भेजावे।
तो सुण-सुण सब हर्षावे, गुरुवर...... 1|3||
XXXXXXXXXXXXXXXXX
सब ही जावद मांहे चलकर आवें।
तो देख व्यवस्था सुख पावें, गुरुवर...... ||4||
५५५५५
फागण सुदी तीज रो दिन शुभ आवे।
तो "धर्म" मण्डप भर जावे, गुरुवर...... | 15 ।।
卐
SXXXX
XXXXXXXXXXXXXXXXXXगणेश गुण शतक/45
(41) युवाचार्य चादर प्रदान
तर्ज- ढोला ढोल मजीरा बाजे रे-2
भाया घर-घर आनंद छाया रे-2,
पूज्य जवाहर जावद मांही देखो आया रे।।टेर।।
युवाचार्यजी साथ में रे संत सती परिवार ।
दूर दूर तूं आया देखो नर-नारी सुखकार ।।
सब ही दर्शन कर हर्षाया रे।।1।।
उगणीसो नब्बे में, फागुण सुदी तीज आ आई।
युवाचार्य पदोत्सव खातिर, घर-घर खुशियाँ छाई।।
ए तो सब ही आनंद पाया रे।।2।।
उच्च पाट पर पूज्य विराज्या, नीचे परिषद् ठाठ ।
नंदीसूत्र स्वाध्याय पूर्ण हुयो, सब ही जो रह्या बाट ।।
आशा मन में जो सब लाया रे।।3।।
सुधर्म री पीठ सूं रे पूज्य जवाहर गाजे।
सब बातों रों करें खुलासो, सुन खुशियाँ मन छाजे।
सब ही आज्ञा शीष चढ़ाया रे।।4।।
युवाचार्य प्रतीक री चादर हाथाँ सूं ओढ़ावे।
चतुर्विध संघ हाथ लगाकर निज सहमति प्रगटावे।।
सब ही जय जय घोष गुंजाया रे।।5 |||
जैसी श्रद्धा मुझ पर राखी, वैसी इण पर रखजो।
आंरी आज्ञाओं पर सब ही, तन-मन अर्पण करजो।।
पूज्य
ने यह फरमाया रे।।6 ||
खूब फले और फूले शासन, "धर्म" संघ विकसावे ।
ऐसा पूज्य जवाहर अंतर आशीर्वाद दिरावें।
सुनकर सब ही शीष नमाया रे।17 11
גא'
५५४
46/गणेश गुण शतकXXXXXXXXXXXXXXXXXX
(42) युवाचार्य की विनती
तर्ज- हे प्रभु पँच परमेष्ठी ......
हे
पूज्यराज मुझे यह वर दो।
मुझ में पावन शक्ति भर दो।।टेर।।
डाला भार जो मुझ पर भारी,
वहन करूँ इसको सुखकारी।
ऐसी कृपा मुझ पर कर दो।।1।।
चाहे संकट कुछ भी आवे,
पर नहीं विचलित मन हो पावे।
ऐसा संबल मुझ में भर दो। 2 ||
श्रमण संस्कृति का हो रक्षण,
इसके हित में सबकुछ अर्पण ।
कर सकू ऐसा शुभ वर दो।।3।।
चतुर्विध संघ है यह प्यारा,
इसका प्रतिपल मुझे सहारा।
मिलता रहे ऐसा कर घर दो।।4।।
इसकी सेवा मैं कर पाऊँ,
"धर्म" भाव प्रतिपल विकसाऊँ।।
ऐसी ज्योति मुझ में भर दो।।5।।
XXXXXXXXXXXXXXX XXX गणेश गुण शतक/47
(43) चतुर्विध संघ
तर्ज-दिल्ली चलो, दिल्ली चलो
करें प्रतिज्ञा, करें प्रतिज्ञा, करें प्रतिज्ञा जी।
आप चरण की साक्षी से हम करें प्रतिज्ञा जी।।टेर।।
५५५५
जैसी श्रद्धा आप पर हमारी गुरुवर,
वैसी रहेगी युवाचार्यश्री जी पर।
पालन करेंगे तन मन से, उनकी आज्ञा जी।।1।।
चाहे कोई कितने ही हमें लुभावेंगे,
पर नहीं बहकावे में, हम उनके आवेंगे।
रहे हमारे मन में इसकी, प्रतिपल
सुज्ञा
जी।।2।।
गण व गणेश हमको प्राणों से प्यारे।
तन-मन आदि यह सारा इन पर हम वारें।
विश्वास रखें आपकी न करें अवज्ञा जी।।3।।
चतुर्विध संघ आपको विश्वास दिलाता है,
सत्य "धर्म" की प्रेरणा पा शीष झुकाता है।
विकसित होती यह हमारे रहे सुप्रज्ञा जी।।4।।
48/गणेश गुण शतकxxxx.
(44) रत्नीपुरी में प्रथम चौमासा
तर्ज- आये हैं तेरे दरबार ओ पारस
...........
छाया है हर्ष अपार, पूज्य जवाहर मन में।
हल्का कर अपने सिर का भार,
पूज्य जवाहर मन में।।टेर।।
अन्तर आशीर्वाद है देके,
कुछ संतों को साथ में करके।
कराते युवराज विहार ||1||
रत्नपुरी में प्रथम चौमासा.
फली है सबके मन की आशा।
फैला है यश अपार ||2||
जैन जैनेतर प्रवचन सुनते,
प्रतिभा लखकर हर्षित होते।
करते हैं सब ही जय जयकार ।।3।।
दान, शील, तप भाव की ज्योति,
रत्नपुरी में प्रज्वलित होती।
बीते चौमासा सुखकार । |4||
कर विहार गुरु चरणों में आते,
चंद्र सूर्य सम शोभा पाते।
"धर्म" संघ के मझार।।5।।
Xxxxxx
EXXXX
XXXXX गणेश गुण शतक/49
(45) देवास चातुर्मास : उत्तराधिकार प्रदान
तर्ज- जो आनंद मंगल चाहो रे
.....
पूज्य जवाहर चरणों में चल आया संघ देवास।
युवाचार्यश्री के चौमासे की,
वह विनती लाया खास।।टेर।।
१४४४
पूज्यराज ने भावना देखी, और किया चौमासा नक्की।
सब बातें हो गई पक्की, रे फल जाती संघ री आश||1||
कर शिरोधार्य गुरुवाणी, चल आये गणपति ज्ञानी।
देवास की जनता जानी है, जब फैली है सुवास ।।2।।
सब दौड़-दौड़ कर आते, जिन वचनामृत को पाते।
निज मन में मोद मनाते रे, बुझाकर अपनी प्यास ।।3।।
आसोज मास मझारी, आया रत्नपुरी संघ भारी।
जहाँ विराजते सुखकारी रे, श्री पूज्य जवाहर खास ।।4।।
KX
उनका संदेशा लाये, जो खोल सभा में सुनाये।
सब सुनकर के हर्षाये रे, छाया मन उल्लास ।।5।।
श्रीसंघ व्यवस्था सारी, थी मुझ पर जो जिम्मेवारी।
अब संभालेंगे सारी रे, श्री युवाचार्यजी खास।।6 ||
सुन सब ही मन हर्षाते, पर आप गंभीर बन जाते
और मन में चिंतन करते रे, हो कैसे "धर्म" विकास।17 ||
50/गणेश गुण शतकXxxxxxxxxxxxxxxx
X kkkkkkk
(46) श्री शांतिसागरजी का मिलन
तर्ज- तन डोले, मेरा मन डोले
जहाँ भी जाते, हर्ष मनाते, दर्शन कर नर-नार रे।
श्रीसंघ में आनन्द छाया है। टेर।।
काठियावाड़ की ओर जवाहरं, अपने कदम बढ़ाते।
दे के विदाई आप, उदयपुर चातुर्मास कराते।।
आनंद छाया, हर्ष सवाया, जन्मभूमि मझार रे।।1।।
पूर्ण कर चौमासा गुरुवर, बांठेड़ा पधारे।
दिगंबराचार्य श्री शांति सागर, वहाँ विराजे प्यारे।।
सुन हर्षाते, मिलने को आते, भरी सभा मझार रे।।2।।
सुन उपदेश अति हर्षाए, चर्चा करना चाहे।
समय कौन-सा ठीक रहेगा, बोल आप फर्मायें।।
चिंतन करते, समय तय करते, दोपहर का सुखकार रे।।3।।
एक जगह पर ठीक समय में, दोनों पूज्य पधारे।
नर-नारी भी ठीक समय पर, आ पहुँचे थे सारे।।
चर्चा चलती, मधुरस भरती, सुन छाता आनंद अपार रे।।4।।
सचोट उत्तर सुन गणपति के, मन में मोद मनाते।
नर-नारी सब बड़े प्रेम से, जय-जय नाद गुंजाते।।
स्थान पर आते, हर्ष मनाते, देख "धर्म" व्यवहार रे।।5।।
XXXXXXXXXXXXXXXXXगणेश गुण शतक/51
אאאא?
(47) मरुधरा में धर्म की झड़ियाँ
तर्ज- पौ फाटी दिन ऊगण लाग्यो
...........
ओजी पूज्य गणेशी मेवाड़ स्पर्शकर, मरुधर माहे पधारे।।टेर।।
ओजी चोराणु रे चौमासे, बीकाणें विराज्याँ
सब रा कारज सारें।।1।।
ओजी धर्म-ध्यान री झड़ियाँ लागी।
युवक रा संशय निवारे।।2।।
ओजी जिण सूं धर्म भावना जागी।
समकित, रत्न नै धारे।।3।।
ओजी चार महिनां रो कर चौमासो।
थलियाँ मांहे सिधारें।।4।।
।
ओजी दया-दान रो ध्वज फहरायो।
सब रा भ्रम निवारें।।5।।
ओजी आगे बठे सूं जयपुर पधारे।
श्रावक अर्ज गुजारें।।6।।
ओजी पंचाणु रो चौमासो जयपुर फरमावो।
आग्रह अति ही धारे।1711
ओजी आखिर गुरुवर हाँ फरमावे।
खुशियाँ छाई सारे।।8।।
ओजी जौहरी परख कर मन हर्षावे।
श्रावक व्रत ने धारे।1।।
ओ जी "धर्म" ध्यान में बीते चौमासा।
कोटा शहर पधारे।11011
xx
52/गणेश गुण शतकxxxxxxxxxxxxxxxxx
(48) नवयुवक का कोटा आगमन :
कपासन में संयम ग्रहण
तर्ज- उठ भोर भई .......
सुनकर के आपकी गुण गरिमा एक नवयुवक कोटा में आया।
करके पावन दर्शन,
उसका अन्तरमन अति ही हर्षाया।।टेर।।
विनम्र भाव से वंदन कर, परिचय अपना देता सुखकर।
और कहता दीक्षा लेने को, मैं आप शरण में हूँ आया।।1।।
तब गुरुवर कहते दीक्षा की शिक्षा, लो पहले तुम सुखकर।
फिर निर्णय करना इस पर तुम,
सुन मन में आश्चर्य वह पाया। 2 ||
कहाँ अन्य साधु तो आगे हो, जल्दी लो दीक्षा यों कहते।
पर ऐसे निर्लोभी सद्गुरु को, पुण्योदय से मैं पाया।।3।।
कर शिक्षा लेने का निर्णय, गुरु चरणों में वह रह जाता।
चल साथ-साथ में पैदल ही, जब शहर उदयपुर में आया।।4 ||
वहाँ पर भी परीक्षा लेते हैं, वैराग्य की श्रावक गण हितकर।
लख दृढ़ता दीक्षा की सुखकर, लाभ यह लेना मन भाया ।।5।।
आज्ञा लेने को ये सब, जाकर के आग्रह है करते।
पर आखिर दीक्षा कपासन, देना निश्चय सबने ठाया।।6।।
संवत् उन्नीसो छिन्नू की, पौष सुदी आठम सुखकर।
दीक्षा देकर के निज मुख से, शिक्षा दे योग्य है बनाया।।71
वे ही तो पट्टधर बनकर के, गुरु नाना नाम से चमक रहे।
जिनके शासन में "धर्म" संघ, देखो कैसा यह विकसाया।।8।।
XX
XXX
XXXXXXXXXXX
XXXXXगणेश गुण शतक/53
...........
אא
(49) जवाहराचार्य के दर्शन ः सरदारशहर चातुर्मास
तर्ज- उड़ते पंछी नील गगन में
कपासन में दीक्षा देकर आप रवाना होते।
चल मारवाड़ में आते।।
ग्राम-ग्राम को पावन करके, जिनवाणी बरसाते।
चल मारवाड़ में आते।।
गुर्जर प्रांत से शहर सादड़ी, पूज्य जवाहर आते।
दर्शन कर नवदीक्षित शिष्य की भेंट चढ़ा हर्षाते।।
देख दृश्य नर-नारी सब ही, मन में अति हर्षाते।।1-11
गुरुदेव संग विहार कर, ब्यावर, अजमेर फरसते।
चातुर्मास फलौदी कर, फिर गुरु सेवा दिल धरते।।
वृद्धावस्था देख पूज्य की, भीनासर आ जाते। 12
अब तो आप अहर्निश तन्मय, गुरु सेवा में रहते।
एक क्षण भी उससे वंचित, रहना वे नहीं चाहते।
पर सरदारशहर चौमासा, गुरुदेव फरमाते।।3।।
नहीं कोई जाने को तत्पर, तब करें आप तैयारी।
देख अचानक विहार आपका, रोते हैं नर-नारी।।
सबको दे संतुष्टी आप तो, आगे चरण बढ़ाते।।4।।
डूंगरगढ़ में अकस्मात् ही, वज्रपात हुआ भारी।
मोती मुनि की प्यास परीषह से, मृत्यु हुई दुःखभारी ।।
फिर भी मन मस्ती से आप तो, गंतव्य को जाते।।5।।
सरदारशहर के नर-नारी सब अपना भाग्य सहराते।
नर-नारी सब दौड़-दौड़कर, सेवा लाभ उठाते।।
हुक्म सुमेर मुनि दीक्षा दे, "धर्म" संघ विकसाते।।6।।
54/गणेश गुण शतकXXXXXXXXXXXXXXXXX
kx
(50) श्री जवाहराचार्य का स्वर्गारोहण
तर्ज-धर्म जिनेश्वर मुझ हिवड़े बसो
...........
आया गुरुवर करने चौमासो, सरदारशहर सुखकार ।
पूज्य जवाहर चरण शरण में, भीनासर मझार।।टेर।।
देख प्रतिभा गुरुवर हर्षिया, निश्चिंतता मन धार ।
मन में चिंतन अब तो करियो, आतम शुद्धि सार11111
आलोचना करके श्रीमुख सूं संथारा लियो धार।
पंडिम मरण ने वरियो, पहुंच्या स्वर्ग मझार ||2||
सुण संदेशो चतुर्विध संघ आयो, पावें दुःख अपार ।
फिर भी मन में धीरज धार ने, कर्यो सुविचार ||3||
पूज्य गणेश ने पाट बैठाया, बोल्या जद जयकार ।
आचार्य पद दियो मोद सूं, वंदना करें उणवार ।।4।।
पूज्य जवाहर देह परठियो, श्रावक संघ ले धार ।
चंदन चिता पर रखी ने, कियो अंतिम संस्कार ।।5।।
"धर्म" संघ रा नायक गणेशी, करे है कल्प विहार ।
देशनोक चौमासो ठावियो, छायो आनंद अपार ।।6 ||
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<XXXXXXXXX TUTET
XXX गणेश गुण शतक/55
(51) आगमदर्शी आचार्यश्री गणेश
तर्ज- आशाओं का हुआ खातमा
...........
गणस्य ईश गणेश की महिमा, सुन-सुन जनता उमड़ पड़ी।
निज क्षेत्रों को पावन करने की, विनती ले आय खड़ी।।टेर।।
सुनकर पूज्यवर ब्यावर चौमासा करने की मन ठाये।
गाँव-गाँव में विचरण करते, शहर बाहर जब चल आये।
ठहराए आग्रह कर वहाँ पर, बगीची थी एक बड़ी। 11 ||
लोग सभी गुरु स्वागत की, तैयारी में लग जाते हैं।
वनस्पति की देख विराधना, चुपके से चल आते हैं।।
पहुँच गये स्थानक तब ही, सब लोगों को यह खबर पड़ी।।2।।
ऊहापोह मच जाती भारी, श्रद्धालु मन दुःख बढ़ता।
प्रातःकाल होते ही, भारी वर्षा का पानी बहता।
देखा चमत्कार जब ऐसा खुशियाँ सब में उमड़ पड़ी।।3।।
विरोधी तूफान मचाने में भी बाज नहीं आये।
पर धर्मी तो "धर्म" कमाई, करके मन में हरषाये।।
चातुर्मास सानंद पूर्ण हुआ आई विहार की शुभ्र घड़ी ।।4।।
xxxx
56/गणेश गुण शतकxxxxxxxxxxxxxx
(52) धर्म प्रचार की ओर
तर्ज- यह मीठा प्रेम का प्याला
...........
यह गणेश गुरु गुण धारी, फैली है महिमा भारी।
दर्शन करके सुखकारी, पावें आनन्द नर नारी।।टेर।।
जहाँ-जहाँ भी आप है जाते, नर नारी सुनकर हर्षाते।
वाणी इनकी प्यारी, फैली है महिमा भारी ||1||
ब्यावर का चौमासा करके, मारवाड़ के गाँव स्पर्श के।
बगड़ी चौमासा धारी, फैली है महिमा भारी ! |2||
फिर मेवाड़ में चरण बढ़ाये, चौमासा बड़ीसादड़ी ठाये।
आया आनन्द भारी, फैली है महिमा भारी।।3।।
भीमसिंहजी राज राणा ने, सुन उपदेश तजी है उनने।
हिंसा सब दुःखकारी, फैली है महिमा भारी। 14 ||
फिर तो जगह-जगह पर भारी, जागीरदारों ने तज दी सारी।
कुव्यसन बीमारी, फैली है महिमा भारी।।5।।
"धर्म" मर्म समझ सुख पाये, सत्संग करके मन हर्षाये।
बोले जय-जय भारी, फैली है महिमा भारी।।6 ||
אג'
XXXXXXXगणेश गुण शतक/57
४४४
(53) मालवा की ओर
१४
Xxx
तर्ज- सावन का महीना .......
...........
मेवाड़ धरा से आगे, अब चले मालव की ओर
सुन-सुन के नर नारी, चरणों में आते दौड़।।टेर।।
गणेश गुरुवर मंदसौर आये, जैन-जैनेतर हर्ष मनाये।
चौमासे की विनती, करते हैं कर जोड़।।1।।
योग्य व्यवस्था नहीं जम पावे, जिससे सब ही मन अकुलावे।
सिंधी भाई मन में पाते हैं दुःख घोर ।।2।।
रत्नपुरी में चौमासा ठाया, धर्म-ध्यान का आनंद पाया।
पूर्ण करके जाते, इन्दौर शहर की ओर ||3||
कॉन्फ्रेन्स शिष्टमंडल चरणों में आया,
संघ संगठन संदेशा लाया।
एक चौमासा होव, बड़ों का एक ठोर ||4||
अपने विचारों को स्पष्ट बताते, तीन वर्ष की स्वीकृति देते।
जिससे सबके दिल में छाई हर्ष हिलोर ।।5।।
संत विनोबा मिलने आये, करके वार्ता मन हर्षाये।
जावरा संघ की विनंती, चौमासे की पुरजोर ।।6 ||
लखकर आग्रह विनती मानी, पर नियम विरूद्ध देख खेंचातानी।
अन्य संतों की लखकर, चले जयपुर ओर 117 ||
कई-कई परीषह दारुण आये, फिर भी नहीं आप कभी घबराये।
चातुर्मास में "धर्म" रंग छाया बहु जोर । 18 ।।
58/गणेश गुण शतक
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(54) जयपुर का विजयी चातुर्मास
तर्ज- खम्मा खम्मा खम्मा म्हारा
खम्मा खम्मा खम्मा म्हारा पूज्य गणेशी ने।
महिमा वारी सुण हर्षावां जीओ, गुण गांवा जीओ।।टेर।।
ज्ञान-दर्शन-चारित्र री महिमा फैली भारी।
गुण गावे जयपुर का नर-नारी जीओ।।11
तेरहपंथी आचारज तुलसी भी आया।
जयपुर चौमासे रंग लाया जीओ।।2।।
बाल
दीक्षा रोकियो बवंडर भारी।
विरोधी वाणी जनता सारी जीओ।।3।।
जयप्रकाश नारायण नेता ने बुलाया।
पर नहीं सफलता पाया जीओ।।4।।
रोष में भरियोड़ा दोष आप माथै मंडियो।
तो रामनिवास बाग में झड़ियो जीओ।।5।।
क्षमायाचना रे दिन आय जद अड़िया तो।
सुन उत्तर सांचो हड़बड़िया जीओ।।6 ||
थाने-थे-थै-थाने करता जद वे बोल्या तो।
भाषा रो विवेक बतायो जीओ।।7 ||
इण तरह चौमासो ओ बीत्यो पूरी शान सूं तो।।
"धर्म" संघ माहे यश छाया जीओ||8||
१४४
XXXX
KXXXXXXXXXXXXXगणेश गुण शतक/59
(55) दिल्ली चर्चा
तर्ज- खम्मा खम्मा खम्मा म्हारे
खम्मा खम्मा ओ म्हारा शासन रा धणिया।
महिमा थारी सुण हर्षाया हो गुण गाया हो।।टेर।।
जयपुर रो चौमासो करने, आगे चरण बढ़ाया ओ।
पल्लीवाल खेतर रो विचरण सब रे मन में भायो हो।।
पृथ्वी पूज्य रो आग्रह जद, आयो आगरा स्पर्शायो।।1।।
हर्ष भाव सूं साथै रहकर, आगे आप पधार्या हो।
अलवर भरतपुर स्पर्शकर, दिल्ली रो लक्ष ठाया हो।
सुणने संदेश पावन दौड़या, आया घणा हर्षाया। |2||
स्वागत री आ भीड़ देखने, सब ही अचरज पाया हो।
सुण-सुण ने उपदेश आरो, मंगल मोद मनाया हो।।
सब रा मन में प्रश्न एक आयो संशय उमड़ायो।।3।।
आचार्य तुलसीजी पूरा आडम्बर सूं आया हो
राजनेता रा दरवाजा सब जाय-जाय खटकाया हो।
ऐसो दृश्य नहीं बण पायो कांई रहस्य छायो।।4।।
दया दान विरोध में केई परचा भी छपवाया हो।
जाने लेकर नगर नागरिक आप शरण में आया हो।
स्पष्टीकरण सुण हर्षावे निर्णय करणो चावें।।5।।
जैनेंद्रकुमारजी आदि शिष्टमंडल वनावे हो।
आचार्य तुलसी ने जाकर साफ-साफ वतलावे हो।।
आचार्य दोनों मिल चर्चा करलो सव रो संशय हरलो।।6।।
बड़ी कठिनाई सूं लिखित चर्चा स्वीकारे हो।
जैन-जैनेतर विद्धानों री समिति निर्धारे हो।।
60/गणेश गुण शतकxxx
.
XXXXXX ५५५५५५ ........... दोनों तरफ ही प्रश्न लिखित देवें उत्तर जद पावे। 17 11 उणरे ऊपर प्रति प्रश्न, पुनः समिति बणावे हो। दोनों रे उत्तर पर पुस्तक दिल्ली चर्चा छपावे हो।। सुज्ञ निर्णय उणसूं साफ लेवें, कुण कपट सेवे।।8।। जद-जद ऐसो मौको आयो, जरा नहीं घबराया हो। प्रतिवादी परास्त करने विजय ध्वज फहराया हो।। जिणसूं "धर्म" संघ आनंद पायो, गौरव खूब छायो। 9 ।। (56) फक्कड़ योगी तर्ज- वृंदावन का कृष्ण कन्हैया गणनायक गणेश देख लो निर्लेपी कैसा भारी। जितरो बढ़े सम्मान आप रो उतरी अनासक्ति धारी।।टेर।। राष्ट्रपति राजेंद्रप्रसादजी समाचार जद पायो हो। पूज्य गणेशी अठे विराजे, दर्शन ने मन उमड़ायो।। राष्ट्रपति भवन पधारौ व्याख्यान देने सुखकारी।।1।। पर निर्लेप साधना रा धणी, उत्तर ऐसो फरमायो। राज्य व्यवस्था में दखल पड़े, ओ काम अनुचित कहलायो जब भी अवसर मिले आपने मिलणो होसी श्रेयकारी।।2।। और अनेक राजा महाराजा, विनती जद-जद ले आया। ऐसो ही उत्तर दियो सबने नहीं जरा-भी ललचाया।। मान-सम्मान री नहीं अभिलाषा, किंचित् मन में है धारी।।3।। छोटा-मोटा, अमीर-गरीब रो, भेद नहीं मन में ज्यारे। केवल "धर्म" सम्मुख हो मानव ऐसी आशा दिल धारे।। ऐसा फक्कड़ योगी हाँ वे, जन-जन रा महा-हितकारी।।4।। प्र kkkkk XXXXXXXXXXXXXXXXXXTORT गणेश गुण शतक/61
(57) पर दुःख कातरता
तर्ज- पर्वतों के पेड़ों से
१५४
पर दुःख कातरता गुण, जिसमें भारी था।
पूज्य गणेशीलाल महाउपकारी था।।टेर।।
दिल्ली की जनता ने फैलाई धर्म बहार।
अखिल हिन्द में तव यश फैला भारी था।।1।।
अलवर चौमासे का करके मन में विचार।
जमना पार क्षेत्रों में विचरण जारी था।|2||
टोटरी मंडी में अकस्मात् वेदना हुई।
दिल्ली संघ डॉक्टरों को ले आया, उसवारी था।।3।।
निरीक्षण कर सब ने निर्णय यह धारा।
पालकी से दिल्ली ले जाना, शिष्य समूह भारी था। 14 ||
शिष्यों ने गजानंद को कंधों पर बिठलाया।
मन उत्साहित, पर तन अकड़ा भारी था।5।।
रोक के झट उनको पालकी से उतर गये।
देख
दयालु का हृदय, द्रवित हुआ भारी था। 6 ।।
संत सोचे जब तक तो गजानन्द चल ही पड़े।
देख के यह सबका दिल घबराया भारी था।17 ||
आखिर चातुर्मास दिल्ली ही कर पाये।
निरवद्य उपचार ही लगा प्रियकारी था। 1811
उपदेश श्रवण की मच गई धूम वहाँ ।
बौद्ध विद्धान् हंगरी आया, उस वारी था। 19 ।।
स्याद्वाद को समझ, मन प्रसन्न हुआ।
"धर्म" प्रभावना कर, चला गुणधारी था। 11011
62/गणेश गुण शतक
गुण शतकXXXXXXXXXXXXX
........... ४ (58) अलवर चौमासा : शल्य चिकित्सा तर्ज- जहाँ डाल डाल पर धीर-वीर-गंभीर गुणाकर, सहन शक्ति के धारी। वे गणपति थे सुखकारी।। जिनके चेहरे पर सौम्यता, झलक रही थी भारी। वे गजानंद सुखकारी।।टेर।। दो हजार आठ में गुरुवर विचरत अलवर आये। चातुर्मास कर पूज्यश्री ने, वचनामृत बरसाये।। जिसको पाकर कृतकृत्य हुई, जनता वहाँ की सारी। 1 ।। अलवर नरेश खुद दर्शन करके, मन में अति हर्षाये। संगठन भूमिका को ले, कॉन्फ्रेन्स प्रमुख जब लाये। गुरुदेव के भावों को सुन, हर्षित होते भारी।।2।। वेदनीय कर्म के प्रबल उदय से सारा संघ घबराया। डॉक्टर मूलगावकर ने, कर निरीक्षण बतलाया।। शल्य-चिकित्सा करनी ही है, होगी अब श्रेयकारी।।3।। गाँव-गाँव से नर-नारी सुन, दौड़-दौड़ कर आये। दर्शन दे गुरुवर जनता को, शल्य कक्ष में जावें।। शल्य-चिकित्सा की सब वहाँ पर, रखते पूर्ण तैयारी। 14 ।। क्लोरोफॉम नहीं सूंघा, और गुरुवर ऐसा कहते। पूर्ण सजग हूँ चाहे देह को, काट गाँठ यहाँ रख दें।। सुनकर डॉक्टर हुए चकित, जब ऑपरेशन हुआ जारी।।5।। तेरह तोले की गाँठ हाथ ले, डॉक्टर बाहर आया। ऑपरेशन की पूर्ण सफलता का सब हाल बताया।। सुनकर सब ही हतप्रभ होते, नर-नारी तब भारी ।।6।। आत्मशुद्धि कर चौमासे का, विहार कर पधारे। जयपुर आदि क्षेत्र स्पर्शकर, सबकी आशा पूरे।। दो हजार नव का चौमासा "धर्म" उदयपुर भारी।।7 || XXXXXXXXXXXXXXXXXX STORT गुण शतक/63 XXX
...........
(59) वनराज की गुरुराज से भेंट
तर्ज- निर्बल से लड़ाई बल धीर की .....
महा हिंसक से लड़ाई दया धीर की।
यह कहानी है मेवाड़ी उस वीर की।।टेर।।
पूज्य गणेश करे विहार, फिर ग्राम नगर मझार ।
संयम साधना से शुद्धि, वे हैं कर रहे।।
कभी चलें राजमार्ग, कभी चलें वनमार्ग।
निर्भय देवता वे भू पर, यूं विचर रहे।
नहीं जीवन का डर, नहीं कोई है फिकर।
नहीं परवाह करे हैं, दुःख-पीर की।।1।।
सतपुड़ा की तलहटी, बांध कमर गुरु सेंठी।
उस वनराज में है आगे बढ़ रहे।।
साथ में दो युवा संत, देख चले पीछे पंथ ।
आगे देख के वो एकदम डर रहे।।
बैठे बीच राह मझार, सिंह बड़े दो खूखार ।
जिन पे दृष्टि पड़ी है इस धीर की।।2।।
खड़े दृष्टि स्थिर कर, बहा करुणा निर्झर ।
कहे वनराज से हिंसा तुम छोड़ दो।।
छोटे मुनि मेरे साथ ये भी पूरे निष्पाप।
हम चलते हैं आगे राह छोड़ दो।।
देख सिंह शीष झुकाते मानो "धर्म" बोधि पाते।
राह पकड़ी सीधी है नदी तीर की।।3।।
64/गणेश गुण शतकXXXXXXXXXXXXXXYY.
(60) परीषह उपसर्ग
तर्ज- थान वेगरा बुलाया, थे मोड़ा किणविध......
म्हारा गणेश गुरु उपकारी,
करता विचरण सुखकारी रे भाई।
सह्या उपसर्ग वे भारी,
थांने कहूं बात अब सारी रे भाई।।टेर।।
कई बार थलियाँ में आया,
जद गोचरिया सिधाया रे भाई।
कई कुकरिया बहराया,
कई पात्रा में पत्थर नखाया रे भाई।।1।।
पर आप क्षमा भंडारी,
मन समता रखी भारी रे भाई।
एक बार खुरमपुरा मांहि,
मुनि हणुतरे वेदना छाई रे भाई।।2।।
ले आज्ञा ठहरे आई,
जिण एक मकान रे मांहे रे भाई।
उण रो पति रात्रि मंझारी,
आय तंग करै बठै भारी रे भाई।।3।।
एक रात जंगल के मांही,
ठहरिया पूज्यवर श्री आई रे भाई।
सुबह प्रतिक्रमण कर तांई,
देख सर्प एक दुखदाई रे भाई।।4।।
बैठो सिरहाने कुण्डली मारी,
पर गुरुवर धैर्यता धारी रे भाई।
चार गाँव घूमता पाई,
डेढ़ रोटी भिक्षा के मांही रे भाई। 5 ।।
XXX XXXXXXXXXXXXX गणेश गुण शतक/65
xx
אאא
साथे खट्टी छाछ कुछ आई,
सब संत बांट ने खाई रे भाई।
क्षुधा परीषह सह्यो भारी,
"धर्म" भाव दिल में धारी रे भाई।।6।।
..........
१५
(61) जांबुड़ा की नाल
तर्ज- सुख कारण हो भवियण मंगलिक
गुरुवर आवियां रे, क विचरत जांबुड़ा री नाल।
ठहरन खातिर कर रह्यो रे, कोई जगह री संभाल।।टेर।।
चौकी ऊपर आय ने रे लीनी आज्ञा है सुखकार।
संध्या होते ही गयो रे, चौकीदार घर द्वार||1||
रात री ड्यूटी ऊपर आयो, रे मुसलमान जिणवार ।
देख संत ने कोपियो रे, क वो तो खूब करे तकरार ||2||
आखिर तज उण स्थान ने रे, आया झाड़ की छांव मझार।
खुश होकर वो तो जाय सूतो रे, भीतर दे कपाट सुखकार ।।3 ||
पर वे रात्रि में चमकियो रे, गयो बुरी तरह घबराय ।
आय शरण में वो पड़ियो रे, तत्क्षण गुरुवर रे सुखदाय ।।4।।
माफी मांगे हाथ जोड़ रे, वो तो ले जावें तिण स्थान।
शिक्षा दे गुरु प्रेम सूं रे, करै कुव्यसन पचक्खान। 15 ||
साथ विहार में हो गयो रे आयो चालीस मील चल लार।
"धर्म" भाव उमड़यो घणो रे वो तो पायो आनंद सार ।।6।।
१५
66/गणेश गुण शतक
गुण शतकxxyyuuuuuu222222
(62) सादड़ी सम्मेलन
तर्ज- शिवपुर जाना हो तो प्यारे
पूज्य गणेशीलाल जिनकी महिमा अपार-2|
जैन जगत् के लाल, छाया हर्ष अपार ।।
सम्मेलन का निश्चय करके,
घोर परीषह भी सहकर के।
पहुँचे सादड़ी मझार ||1||
बाईस संप्रदाय के सारे, संत-सती ग्यारह सौ ग्यारे।
छप्पन प्रतिनिधि धार |2||
संवत् दो हजार नव भारी, वैशाख सुदी तृतीया सुखकारी।
तीन बजे श्रेयकार।।3।।
सम्मेलन प्रारंभ जब होता, अध्यक्ष पद निर्वाचन होता।
गजानंद सुखकार ||4||
समाचारी निर्धारण करते, सुसंगठन की भूमिका रखते।
करके गहन विचार ।।5।।
किसको आचार्य पद देना, इसका अब है निर्णय करना।
होगा अति श्रेयकार ।।6।।
सुनकर पूज्य हस्ती यों बोले, गणेश पूज्य का नाम है खोले।
सुन करते सब स्वीकार | 17 ||
पर गुरुवर नहीं पद को चाहते, उठकर सभा बीच से जाते।
करते "धर्म" विचार ||8||
EXXXXXXXXXXXXX XXX गणेश गुण शतक/67
xxxx
...
...........
(63) गणेश चरणों में संतों की अरदास
तर्ज- सासू लड़ मत लड़ मत न्यारी
पूज्य भरदो भरदो हुंकार थे जल्दी भर दो।
सब करा हाँ अरदास, म्हांने राजी कर दो।।टेर।।
संगठन रो तो ओ मंडाण मंडग्यो,
आपरो अनुशासन सब रे मन जचग्यो।
इण पर आप मोटो ध्यान धर दो।।111
सुन गुरुदेव जद मौनवृत्ति धारी,
संत मुनिराज बोल्या कर हुशियारी।
मौन स्वीकृत्ति को जयकार कर दो।।2।।
जद गुरुदेव बोल्यां बात सुणो म्हारी,
बणाई जो आप सब मिल समाचारी।
पालन करवां रो सब हाँ भर दो।।3।।
अनुशासन साथ म्हने संयम प्यारो,
उणसूं ही रैवैला संबंध म्हारो।
आलोचना कर पूर्ण शुद्धि कर दो।।4।।
शिक्षा-दीक्षा प्रायश्चित्त और विहार सब,
एक आचार्य रे हाथ अधिकार रैवें अब ।
ऐसो मिलकर सब निश्चय कर दो।।5।।
पालण होवैला जब तक म्हारे साथ हैं,
और समझावण रो काम खाली हाथ है।
नहीं तो मैं खुलौ वात नोट कर दो। 16 ||
सुण सुण वचनां ने शीष चढ़ाई,
पूर्व संप्रदाय रा सब पद छिटकाई।
सदस्यता फार्म कैवें सब भर दो।17 11
68/गणेश गुण शतकxxxxxxxxxxxxx
v-rwas-a-ve--
(64) आचार्य उपाचार्य पदारोहण
तर्ज- सोते सोते ही निकल गई ......
आई आई रे वैशाख सुदी तेरस प्यारी।
तेरस प्यारी रे भैय्या सुखकारी ।।टेर।।
पूज्य गणेशी री स्वीकृति पा संत सभी हर्षाया।
पूर्व संप्रदाय ने तज सब आप शरण में आया।।
गूंजी-गूंजी रे संगठन री शहनाई प्यारी।।1।।
आचार्य पद आत्मारामजी ने दे सम्मानित कीनो।
सर्व सत्ता रो अधिकार रो पद पूज्य गणेशी ने दीनो।
दीनी दीनी रे उपाचार्य री चद्दर प्यारी।।2।।
אאאאאאאאאאאאאאאאאאאאאאאאאאאאאאאאאאאאאאא
सोलह मंत्री रो मंत्रिमंडल स्थापित कीनो।
प्रधानमंत्री रो पद प्यारो, आनंदऋषिजी ने दीनो।।
गूंजी-गूंजी रे जयकार जद प्यारी प्यारी।।3।।
संगठन री मजबूती खातिर, संयुक्त चौमासो कीनो।
सोजत, भीनासर भी निर्धारित कीनो।।
करी-करी रे कोशीश बठै सब भारी।।4।।
पर नहीं चाल्या अनुशासन में गुरुदेव फरमायो।
संयमहीन स्वछंदवृत्ति सूं, मन म्हारो घबरायो।।
कही-कही रे "धर्म" गुरु बात सारी।।5।।
Xxx
XXXXXXXXXXXXगणेश गुण शतक/69
...........
(63) गणेश चरणों में संतों की अरदास
तर्ज- सासू लड़ मत लड़ मत न्यारी
पूज्य भरदो भरदो हुंकार थे जल्दी भर दो।
सब करा हाँ अरदास, म्हांने राजी कर दो।।टेर।।
संगठन रो तो ओ मंडाण मंडग्यो,
आपरो अनुशासन सब रे मन जचग्यो।
इण पर आप मोटो ध्यान धर दो।।1।।
सुन गुरुदेव जद मौनवृत्ति धारी,
संत मुनिराज बोल्या कर हुशियारी।
मौन स्वीकृत्ति को जयकार कर दो।।2।।
जद गुरुदेव बोल्यां बात सुणो म्हारी,
बणाई जो आप सब मिल समाचारी।
पालन करवां रो सब हाँ भर दो।।3।।
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अनुशासन साथ म्हने संयम प्यारो,
उणसूं ही रैवैला संबंध म्हारो।
आलोचना कर पूर्ण शुद्धि कर दो।।4।।
शिक्षा-दीक्षा प्रायश्चित्त और विहार सब,
एक आचार्य रे हाथ अधिकार रैवें अब ।
ऐसो मिलकर सब निश्चय कर दो।।5।।
पालण होवैला जब तक म्हारे साथ हैं,
और समझावण रो काम खाली हाथ है।
नहीं तो मैं खुलौ बात नोट कर दो।।6।।
सुण सुण वचनां ने शीष चढ़ाई,
पूर्व संप्रदाय रा सब पद छिटकाई।
सदस्यता फार्म कैवें सब भर दो।।711
xx
68/गणेश गुण शतक४
शतकxxxxxxxxxxxxxxxxxx
(64) आचार्य उपाचार्य पदारोहण
तर्ज– सोते सोते ही निकल गई
...........
आई आई रे वैशाख सुदी तेरस प्यारी।
तेरस प्यारी रे भैय्या सुखकारी।।टेर।।
पूज्य गणेशी री स्वीकृति पा संत सभी हर्षाया।
पूर्व संप्रदाय ने तज सब आप शरण में आया ।।
गूंजी-गूंजी रे संगठन री शहनाई प्यारी||1||
आचार्य पद आत्मारामजी ने दे सम्मानित कीनो।
सर्व सत्ता रो अधिकार रो पद पूज्य गणेशी ने दीनो ।
दीनी दीनी रे उपाचार्य री चद्दर प्यारी।।2 ||
גגאגאאאאאאאאאאאאאאאאאאאאא
सोलह मंत्री रो मंत्रिमंडल स्थापित कीनो।
प्रधानमंत्री रो पद प्यारो, आनंदऋषिजी ने दीनो।।
गूंजी-गूंजी रे जयकार जद प्यारी प्यारी।।3।।
xxxx
संगठन री मजबूती खातिर, संयुक्त चौमासो कीनो।
सोजत, भीनासर भी निर्धारित कीनो।।
करी-करी रे कोशीश बढ़ सब भारी।।4।।
पर नहीं चाल्या अनुशासन में गुरुदेव फरमायो।
संयमहीन स्वछंदवृत्ति सूं, मन म्हारो घबरायो।।
कही-कही रे "धर्म" गुरु बात सारी।।5।।
EXXXXX
EXXX गणेश गुण शतक/69
KAKKARXKAKKKKKKAKKKK
(65) महान त्याग
तर्ज- वीर जिनेश्वर सोई दुनिया
श्रमण संस्कृति रक्षक पूज्य गणेशी भारी।
गौरवमय पद की दी, जिसने कुर्बानी प्यारी।।टेर।
देख स्वच्छंदवृत्ति आत्मा प्रकम्पित होती।
कर्त्तव्य दृष्टि से तो, करी समझाईश सारी ।।1 ||
फिर भी नहीं देख सुधार, गुरुवर ने निश्चय धारा ।
भरी सभा में एक दिन, घोषणा कर दी भारी।।2।।
सम्मेलन में मिल सबने, संघ बनाया हमने।
मुझ पे संचालन की सब, डाली थी जिम्मेवारी।।3।।
अनाधिकार चेष्टा करते, नियमों से भी कुछ नहीं डरते।
आचारहीनों का पक्ष, लेते पदाधिकारी।।4।।
आदेश जो भी देते, पालन नहीं होते।
उल्टे आक्षेप करते, चोरी और सीनाजोरी।।5।।
אגאגא
इसीलिए ये सोचा, पदवी का क्या करना अच्छा।
यही निश्चय करके, करता हूँ घोषणा भारी।।6।।
सुसंगठन का मैं हूँ कामी, बनेगा जब भी नामी।
रहूंगा हरदम तत्पर मैं, या उत्तराधिकारी।।7।।
प्रसंगोपात जैसा उचित लगेगा वैसा।
"धर्म" व्यवहार उनसे, रखूगा मैं हितकारी।।8।।
70/गणेश गुण शतकx
गुण शतकxxxxxxxxxxxxxxxxxx
K५१
KXxxxx
(66) शान्त-क्रान्ति
तर्ज- ब्याव बिनणी बिलखु मैं तो
श्रमण संघ रो त्याग करने,
गुरु गणेश विचार कर्यो।
शांतक्रांति है करणी अब तो,
मन में दृढ़ संकल्प कर्यो।।टेर।।
इण क्रांति ने सुनकर बहुश्रुत समर्थ मुनिवर है आया।
श्रीचरणों में समाचारी रो, रहकर चिंतन कर पाया।
नियम निर्धारियो, नेतृत्व स्वीकारियो,
पर नहीं आगे डग भरियो।।1।।
लालमुनिजी शिष्य-शिष्या ने, लेकर चरणों में आया।
मदनलाल महाराज श्री रा, संत साथ जुड़ हर्षाया।।
प्रेम बढ्यो, संभोग खुल्यो और,
गुरुवर ने संबल मिलियो।।2।।
कई आज्ञा में विचरण करणों, निश्चय मन में है ठायो।
कोई मैत्री संबंध जोड़कर, श्रद्धा-भाव निज प्रगटायो।।
सलाह मिलावें, निर्णय बतावें, भविष्य रो सुख भरियो।।3।।
सब री बातां सुणने गुरुवर, शांतक्रांति या फैलाई।
हलुकर्मी जो आत्मा सारी, सुणने मन में हर्षाई।।
मिटी भ्रांति हुई "धर्म" क्रांति,
जद श्रद्धा सुर तरु लहरायो।।4।।
XXXXXXXXXXXXXXXXXX गणेश गुण शतक/7
;אאאא
...........
(67) चतुर्विध संघ की विनंती
तर्ज- पद्म प्रभु पावन नाम तिहारो
संघ चतुर्विध क्रांति सुणने, मन मैं करे विचारो।
अब कांई कर्त्तव्य है अपनो, चिंतन करणों सारौ।।1
संघ, संघपति पर आस्था रो, आयो मौकों प्यारौ।
श्रद्धा री परीक्षा रो ओ, अवसर है श्रेयकारो।।2।।
पूर्ण समर्पण भाव सूं मिलने, अर्ज करी सुखकारो।
रुग्णावस्था आप री गुरुवर, देख चिंतित संघ सारौ।।3।।
भावी व्यवस्था "धर्म" संघ री, करणी अब श्रेयकारो।
सुणने सारा आनंद पाया, आया चरण मझारो।।4 ||
...........
(68) चतुर्विध संघ की पुकार
तर्ज- जय बोलो महावीर स्वामी की
यह संघ चतुर्विध आया है।
चरणों में विनती लाया है।।टेर।।
गुरुदेव कृपा कर सुन लेना, अर्जी पर मर्जी कर देना।
यह पक्की आशा लाया है, यह संघ चतुर्विध आया है।।1
दीर्घायु की कामना करते हैं, पर देह दशा लख झुरते हैं।
मन सब का अति मुाया है, यह संघ चतुर्विध आया है। 12
जो शांतक्रांति विकसाई है, हम सबका कौन सहाई है।
यह प्रश्न साथ में लाया है, यह संघ चतुर्विध आया है।।3।।
है कौन हमारा संरक्षक, भावी संघ का हो संचालक।
यह घोषणा सुनने आया है, यह संघ चतुर्विध आया है। 14 ||
गुरुदेव आप अब फरमा दो, उत्तराधिकारी बतला दो।
यह "धर्म" भावना लाया है, यह संघ चतुर्विध आया है। 15 ।।
१४५
72/गणेश गुण शतक ४५४४५४४xxxxxxxxxxx
(69) उत्तराधिकारी का चयन
तर्ज- ओ नाग कहीं जा बसियो रे
...........
गुरुवर सा दृष्टि दौड़ावें रे, सुन संघ अरदास ।
अर्जी पर मर्जी करावें रे, सुन संघ अरदास ।।टेर।।
है शिष्य समूह जो सारा, आज्ञा में चलता प्यारा ।
उन सब पर दृष्टि घूमावै रे, सुन संघ अरदास ।।1।।
IXXX
कोई ज्ञानी-ध्यानी-पंडित, कोई विविध गुणों से मंडित।
कोई तपस्वी घोर कहावै रे, सुन संघ अरदास । |2||
कोई तर्कवादी हैं शूरा, कोई सेवाभावी पूरा।
उन सबकी परख करावै रे, सुन संघ अरदास ।।3।।
इन सब में हैं श्रेयकारी, मुनि नानालाल गुणधारी।
उन पर दृष्टि टिक जावे रे, सुन संघ अरदास ||4||
है पक्के बाल ब्रह्मचारी, सूरत है मोहनगारी।
गुरु गजानंद हर्षावे रे, सुन संघ अरदास ।।5।।
समर्पित जीवन सारा, अनुशासनबद्ध है प्यारा ।
सब योग्य गुणों को पावै रे, सुन संघ अरदास ।।6।।
EXXXX
Kkkk
कर गहन परीक्षण सारा, गुरुवर ने निश्चय धारा।
फिर "धर्म" सभा में आवै रे, सुन संघ अरदास ।।7 ||
XXXXXXXXXXXXXXXX
गणेश
गुण शतक/73
........... EXXX X (70) उत्तराधिकारी की घोषणा तर्ज- फिरकी वाली, तू कल फिर आना ओ संघ वालों इक बात सुनाता, मन में हर्षाता। सुन लेना सब ध्यान से, अब करूँ व्यवस्था सारी शान से।।टेर।। सोचा था श्रमण संघ में जागृति आएगी, पर ना आई। फैली स्वछंदता मिट जाएगी, पर ना मिट पाई।। दिन-दिन शिथिलता बढ़ती पर, जागृति नहीं आई। किसे कहूँ यह व्यथा की कहानी, सब करें मनमानी।। डरें न खेंचातान से||1|| कर्तव्य दृष्टि से समझाया, पर समझ ना वो पाये। धर्म नीति से डराया, पर ना डर वो पाये।। मेरी आशा हुई निराशा, तब दिल में यह ठानी। करी पदवी की यह कुर्बानी, संयम हित जानी।। डरा न अपमान से।।2।। अनुशासनप्रिय साधक, जो भी हो वो आवे। शिष्य ममत्व तज आना, चाहे सब मिलं आवे।। श्रमण संस्कृति के रक्षण का, जो साधक हो कामी । उनकी यह एक निशानी, एक ही आज्ञा मानी।। चलें गुरु की आन से।।3।। मुनिवर नाना उत्तराधिकारी, होंगे "धर्म" संघ के। संघ चतुर्विध सारा इनके, अनुशासन में रह के।। हरदम उन्नति के शिखर पर, चढ़ता रहे संघ प्यारा। बस यही है एक इशारा, चमकें संघ हमारा ।। सुनो सब कान से। 14 11 74/गणेश गुण शतकXXXXXXXXXXXxxxxxxx १४४ גוג?
(71) युवाचार्य महोत्सव का निर्णय
तर्ज- वासुपूज्य जिन अन्तर्यामी ....
XXXXXX
גאאאאא'
गुरु गणेशी री घोषणा सुण, सगला हरषावे रे।
तहत करी उण वचनां ने सब,
अपने शीष चढ़ावे रे।।टेर।।
चारों संघ मिल सोचे मन में, अब कर्त्तव्य निभाणो रे।
जल्दी सूंओ युवाचार्य पद-महोत्सव, धूम मनाणो रे।।1।।
राज ज्योतिषी सूं श्रावक मिल, शुभ मुहूर्त निकलावे रे।
आसोज सुदी द्वितीया रो,
मुहूर्त सगलां रे मन भावे रे।।2।।
जल्दी सूं तैयारी करवा, लागा नर और नारी रे।
उदयपुर की गली-गली में, खुशियाँ छाई भारी रे।।3।।
उदयपुर दरबार ने जाकर, सारी बात बतावें रे।
महोत्सव खातिर सूर्य गोखड़ा से, प्रांगण बक्षावें रे।।4।।
श्रावक इण मंगल महोत्सव री, मंगल भावना भावे रे।
भारत के कोने-कोने में "धर्म" बात फैलावे रे।।5।।
५५५५५
XXXXXXXXXXXXXXXXXXगणेश गुण शतक/75
xxx,
(72) कथनी-करनी एक : गुरु गणेशी नेक
तर्ज- मेरे मन की गंगा और
...........
जब तक जिसकी कथनी और उसी रूप में करणी का।
बोल प्यारे बोल संयम होवे ही नहीं।।टेर।।
उसके जीवन की क्या कीमत, इस दुनिया में होती है।
केवल फूटा ढोल समझकर, दुनिया उसको हंसती है।
उसकी यादों पर दुनिया, क्या सोचे ही नहीं।।1।।
पर जिसने निज कथनी और करनी, सदा एक-सी रखकर के।
जीवन को आदर्श बनाया, जैसा कहा वही करके।।
ऐसे गुरु गणेश की यादें, आवे कि नहीं।।2।।
संयम ही है मुझको प्यारा, सदा एक ही नारा था।
पर जिसने नहीं समझा, उससे किया दूर किनारा था।।
धर्मसंघ से निष्कासित होगा ही सही|3||
ऐसे "धर्म" गुरु का गौरव, आज सभी हम गाते हैं।
श्रद्धा से नत् होकर के भाव सुमन चढ़ाते हैं।।
गजानंद की वही परम्परा चलेगी सही।।4।।
76/गणेश गुण शतकxxxxxxxxxxxxxxxxxx
XXXXXXXXXXXXXXXXXXXXXXXXXX
(73) भक्तों का प्रवाह उमड़ पड़ा
तर्ज- वारी जाऊँ चिरमी ने
...........
सुण संदेशो हरषिया, संघ महोत्सव रो सुखकार।
वारी जाऊँ गुरुवर ने।।टेर।।
चाल्या निज-निज स्थान तूं ऐ पहुंच्या गुरु दरबार ||1||
दर्शन कर वंदन करें, ऐ कर रह्या जय जयकार ||2||
उदयपुर बाजार में ए भरिया, नर और नार।।3।।
करें व्यवस्था कोढ़ सूं, ऐ उदयपुर सरदार ||4 ।।
आसोज सुदी ओ बीज रो दिन, उग्यो अति पेयकार ।।5।।
सब ही चाल्यां महलां में, जठे भरियो "धर्म" दरबार ।।6 ||
...........
(74) राजमहल में आगमन
तर्ज- नखरालो देवरियो
मेवाड़ी ओ हीरो, गणेश गुरु लागै प्यारो।
लागै प्यारो, कैसो मोहनगारो रे।।टेर ।।
आसोज सुदी द्वितीया रो दिन, ओ शुभ संदेशो लायो।
युवाचार्य पद महोत्सव रो, ओ छायो रंग सवायो।।
सुण-सुण नै उमड़यो, भक्तां रो दल प्यारो।।1।।
नहीं चालवां री शक्ति है, फिर भी मन हर्षायो।
बैठा पालकी शिष्य समूह जद गुरुवर नै है लायो।।
दर्शन कर हरषायो चतुर्विध संघ सारौ।।2 |
भावी संघ रा नायक भी तो, साथै आप रे आया।
श्रावक-श्राविका दर्शन करने, मन में आनंद पाया।।
जय-जय सूं हैं गूज्यों, "धर्म" मण्डप सारौ।।3।।
XXXXX
IXXXX
EX
EXXXXXXगणेश गुण शतक/77
XXXXXXXXXXXX
(75) माता सिणगारा की प्रसन्नता
तर्ज- म्हारां आलीजा भरतार
...........
माता सिणगारा ने लाया, बैठा पालकी में भाया।
कैवे मोटी पुनवानी थारी, आज हो माता जी।
देख आज हो माता जी,
देखो खुशियाँ छाई भारी हैं।।टेर।।
आवै माताजी झट चाल, भेटे गुरु गणेशीलाल।
अन्नदाता ओ कांई करियो, ओ गुरुवरंजी।।1।।
म्हारो छोटो नानालाल, भार दीनो मोटो डाल।
सुन गुरुवर बोल्या मुस्काई, ओ भविंकजन।।2।।
नानो आज जग रो बणसी, शासन खूब दीपासी
सुण गुरु वचनां ने पुलकाया, ओ भविकजन।।3।।
थारो जैसो नाना नाम, मतकर जो अभिमान।
थे नाना बण शासन चलाईजो, ओ लाडेश्वर ।।4।।
पीयो म्हारो धौळो दूध, गुरु सा राखी कृपा खूब । .
वांरी "धर्म" ध्वजा ने, फहराईजो ओ लाडेश्वर ।।5।।
אאאאא
78/गणेश गुण शतक
शतकxxxxxxxxxxxxxxxxxx
(76) चादर प्रदान दिवस
तर्ज- प्यार करो ऋतु प्यार की आई
आसोज सुदी यह द्वितीया देखो, लाई हर्ष बधाई है।
उदयपुर के राज प्रांगण में, चहुँदिश जनता छाई है।।टेर
सूर्य झरोखें के नीचे ही, उच्च पट्ट इक शोभ रहा।
उस पर देखो पूज्य गणेशी, सबके मन को मोह रहा।।
साधु-साध्वी की पंक्ति भी, सबके मन को भाई है।।1।।
तीस हजार जनता में प्रमुख, भगवतसिंह नृपराज रहे।
नंदीसूत्र स्वाध्याय पूर्ण कर, पूज्य गणेशी गाज रहे।।
साधुमार्गी धर्म संघ की, महत्त्वता बतलाई है। 12 ||
शुद्धाचार व अनुशासन की, भीति पर संघ टिका हुआ।
मिथ्या आडंबर असंयम से, संघ हरदम दूर रहा।।
पूर्वाचार्यों की जो थी रीति नीति, सब समझाई है।।3।।
हुक्म, शिव और उदय, चौथ, श्रीलाल, पूज्य जवाहर थे।
अनुशानबद्ध संगठन कामी उच्च क्रिया के धारक थे।।
यथाशक्ति मैंने भी उनकी, कुछ-कुछ टेक निभाई है। 14 ।।
वृद्धावस्था हो गई मेरी, इस कारण विचार किया।
भावी उत्तराधिकारी का, मैंने अब यह चयन किया।।
यों कहकर मुनि नाना को निज चादर खोल उढ़ाई है। 5 ।।
इनके नेतृत्व में जिनशासन, खूब फले आशीष दिया।
सारा संघ इनकी आज्ञा में चलता रहे आदेश दिया।।
नतमस्तक हो सबने आज्ञा, अपने शीष चढ़ाई है।।6।।
साधुमार्गी "धर्म" संघ का, बच्चा बच्चा झूम उठा।।
आचार्यश्री नानेश की, सबने जय बोलाई है।।7 ||
XXXXXKAKKKAKKARXXX गणेश गुण शतक/79
XXX
१४४
אאאאא'
(77) युवाचार्य के उद्गार
तर्ज- वह शक्ति हमें दो दयानिधे
...........
वह संबल
मुझ
में भर दो अब,
गुरुदेव लक्ष पर डट जावें।
हे नाथ आपकी कृपा से,
शुद्ध सत्य धर्म पर मिट जावें।।टेर।
मुझ
छोटे साधक पर गुरुवर,
यह भार आपने जो डाला।
संघ रूपी रथ को हम गुरुवर,
उन्नति शिखर पर ले जावें।।1।।
גאגאאאא'
भूमिका कैसी हो संघ की,
जो स्वप्न आपने संजोया।
साकार रूप हम सब मिलकर,
ऐसा ही उसको दे पावें ।।2।।
स्वार्थ की भीति तोड़ के हम,
कंधे से कंधा जोड़ के हम।
यह शांतक्रांति का आंदोलन,
हर गाँव-नगर में पहुँचावें।।3।।
सुसंगठित कर सब अपने को,
असंयम से इसे दूर रखें।
शुद्ध सत्य "धर्म" स्वरूप समझ,
निज आत्मज्योति को प्रगटायें।।4 ||
५५५५
80/गणेश गुण शतक५५४५XxxxxxxxxxKRRY
kkkkkk
(78) संघ समर्पणा
तर्ज- उड़ उड़ रे, उड़ उड़ रे
करां करां ओ-3,
मैं आज प्रतिज्ञा आप चरण में सब गुरुसा।
तन-मन म्हारों सारो अर्पण,
आप शरण में सब गुरुसा ।।टेर।।
xxxx
शांतक्रांति री धूम मचाई,
वृद्धावस्था रे मांही गुरुसा ||1||
इण री पूरी टेक निभास्यां,
घर-घर अलख जगास्यां गुरुसा ।।2।।
शिथिलाचार ने दूर हटाकर,
१५५५५५५५५५५५५५x.
शुद्ध संयम ज्योति जगास्यां गुरुसा ।।3।।
शिष्य-शिष्यां रो ममत्व त्याग ने,
संगठन नाद गुंजास्यां गुरुसा ।।4।।
नाना मुनिवर संघ सेवरो,
आज्ञा शीष चढ़ास्यां गुरुसा।।5।।
"धर्म" संघ ओ थारो प्यारों,
इण रो मान बढ़ास्यां गुरुसा ।।6 ||
xxxx
XXXXXXXXXXXX गणेश गुण शतक/81
(79) साधुमार्गी संघ स्थापना
तर्ज- ओ दूर जाने वालों
...........
अब संघ गुरु चरण में, करता है मिल के चिंतन।
क्या नाम रखना संघ का, इस पे है करता मंथन।।टेर।।
करते सभी ऊहापोह, नहीं निर्णय कुछ होता।
तब समाधान हेतु गुरुदेव चरण में आता ।।
रखता समस्या अपनी, करके चरण वंदन।।1।।
गुरुदेव ने यह सुनके, निज मुख से है उच्चारा।
श्री साधुमार्गी संघ, नाम सब से प्यारा ।।
रखते समीक्षा सारी, करके गहन चिन्तन।।2।।
आदि-अनंत-अनादि, त्रिपुटि का है जो धारी।
महामंत्र जो है प्यारा पद पांच युक्त भारी।।
चार साधुओं को, और एक सिद्ध पद को नमन ।।3।।
अरिहंत रूप साधु मार्ग जो बताते।
यह साधुमार्ग प्यारा, क्यों ध्यान में न लाते।।
चारों तीर्थ जंगम, उस "धर्म" संघ को वंदन।।4।।
१५४xx
82/गणेश गुण शतकXXXXXXXXXXXXXXXXXX
(80) संघ गान
तर्ज- झण्डा ऊँचा रहे हमारा
...........
अमर रहें यह संघ हमारा।
साधुमार्गी संघ सबका प्यारा ।।टेर।।
ऋषभदेव ने साधु बनकर,
केवल ज्ञान की ज्योति पाकर।
साधुमार्ग का किया उजारा,
अमर रहे यह संघ हमारा।।1।
जिसने साधुमार्ग अपनाया,
साधुमार्गी वह कहलाया।
चतुर्विध संघ जो है प्यारा.
अमर रहे यह संघ हमारा।।2।।
महावीर प्रभु मुक्ति सिधाये,
आचार्य सुधर्मा पाट पे आये।
जम्बू आदि ने किया प्रचारा,
अमर रहे यह संघ हमारा।।3।।
मध्यकाल ऐसा कुछ आया,
पाखंड ने अति जोर जमाया।
विभिन्न रूप में हुआ बंटवारा,
अमर रहे यह संघ हमारा। 14 ||
אאאא
KXXXXXXXXXXXXXXXXX गणेश गुण शतक/83
KRXXXXX
फिर भी अखंड अडिगता धारे,
लोका हरजी की सुन ललकारें।
जाग उठा जन जन मन प्यारा,
अमर रहे यह संघ हमारा।।5।।
אאאא
५५५५५५५५
पूज्य हुक्म ने बिगुल बजाया, शिवमुनि, उदय,
चौथ मन भाया।
श्रीलाल ने इसे संभारा,
अमर रहे यह संघ हमारा।।6।।
ने विकसाया,
जैन
जवाहर
पूज्य गणेशी ने सरसाया।
नाना गुरु का अब है सहारा,
अमर रहे यह संघ हमारा।।7 ||
गौरव इसका जन-जन मन हो,
तन-मन-धन इस पर अर्पण हो।
एक संगठन एक ही नारा,
अमर रहे यह संघ हमारा।।8।।
;אאאאא!
भाग्योदय हम सबका आया,
ऐसा "धर्म" संघ है पाया।
हम सबके प्राणों का प्यारा,
अमर रहे यह संघ हमारा।।9।।
84/गणेश गुण शतक
शतकxxxxxxxxxxxxxxxxxx
xxxx
(81) संलेखना संथारा चिंतन
तर्ज- भूल्यो मन भमरा कांई भमे ........
पूज्य गणेशी मन चिंतवे, वेदना देह अपार ।
जो करणो सब कर दियो, शासन रे हितकार ||टेर।।
में
अब एक ही अंतर कामना,
रही मन
सुखकार।
संथारो करूँ ऊँचा भाव सूं, पंडित मरण आधार ||1||
אאאאאא
पहला करूँ आलोचना, शल्य दूर निवार ।
प्रायश्चित्त लेय शुद्ध बनूं, संलेखना करूँ स्वीकार ||2||
पछे संथारो आदरूं, तजकर सब प्रमाद।
ऐसो निश्चय मन धारने, करें युवराज ने याद ।।3।।
सुणने तुरंत हाजिर हुआ, जोड़ी दोनूं ही हाथ।
विनय भाव सूं सुण रह्या, "धर्म" गुरु री बात ।।4।।
(82) संथारे के लिए परामर्श
तर्ज- जरा सामने तो आओ
...........
जरा ध्यान से अब बात सुणिये कहे, गणेश गुरु हितकार है।
रहना-रहना सजग अब आप सब, नहीं जीवन का कोई एतबार है।।
डॉक्टर शूरवीरसिंहजी आये, विचार विमर्श आप कर लेना।।
करूँ पंडित मरण सुखकार है, यही जीवन का अंतिम सार है।।1।।
גא
EXXXX
XXXXXXXगणेश गुण शतक/85
१५५९५५
;אאא
सुनकर के युवाचार्य चकित हुए, इतने में डॉक्टर भी आ ही गये।
प्रतिदिन की तरह देख के वापिस वो जब चले ही गये।।
तो पूछा क्या विचार है ?, सुन छूटी नयनों में अश्रुधार है।।2।।
देख के खुद ने ही, जल्दी से वापिस बुलवाया है डॉक्टर को।
बोले शेष उपचार रहा है, और भी इस तन नश्वर को।।
अब मेरा मैं करूँ उपचार, है जो शास्त्र विधि अनुसार 113 ||
सुनकर डॉक्टर साहब बोले, आप तो ज्ञानी हैं पूरे प्रभो।
डॉक्टर थ्यौरी भी फैल हो गई, आपके सामने मेरे विभो।।
जचे आपके ज्ञान मझार है, करना वही अति श्रेयकार है।।4।।
तत्क्षण सबको पास बुलाकर, अंतिम शिक्षा देते हैं।
अनुशासन में रहना सब ही, क्षमायाचना करते हैं।।
सुन छूटती नयनों में धार है, सब झुके चरण मझार है।।5।।
इतने में तो जल्दी से गुरु, युवाचार्यजी से कहते हैं।
एक ही इच्छा संथारे की, विधि कराओ फरमाते हैं।।
छाई शांति पूर्ण अपार है, "धर्म" वीर को देख तैयार है। 16 ।।
१५
(83) संथारा ग्रहण
तर्ज- कलदार रुपइया चाँदी का
अब युवाचार्यश्री गुरुवर को, संथारे की विधि कराते हैं।
जैसे शादी में बनड़े को, मानों श्रृंगार सजाते हैं। टेर।।
86/गणेश गुण शतकXXXXxxxxxxxxxxxx
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महामंत्र उच्चारण करके, फिर ईर्यावहि पाठ उच्चारते हैं।
फिर तस्सउत्तरी का पाठ बोल, कायोत्सर्ग शुद्ध कराते हैं।।1।।
ध्यान विशुद्धि करके फिर, चउवीसत्थव कराते सुखकर।
दशवैकालिक के चार अध्ययन, मधुलय से शुद्ध सुनाते हैं।।2।।
दो बार शक्रस्तव उच्चरित कर, संलेखना जब है फरमाते।
तब नयनों नीर छलक आते, पर गुरुवर तो मुस्काते हैं।।3।।
था दिवस माघ बदी एकम का, दस बजकर बीस मिनट लगभग।
उस समय संथारा तिविहारी, खुद "धर्म" गुरु अपनाते हैं।14।।
(84) आत्म-रमणता
तर्ज- खड़ी नीम के नीचे ..........
אא
१५xxxx
अस्थिर इण संसार सूं, गुरुवर निज ममता ने मारनै।
आत्म-ध्यान में रमण करें गुरु, संथारो स्वीकारनै।।टेर।।
इहलोक-परलोक सुख व, जीवन-मरण री आशा ने।
तजकर गुरुवर चित्त धरे हैं, सिद्ध प्रभु रा वासा नै।।
कर्म शत्रु सूं जूझं रह्या गुरु, समता शस्त्र धार नै।।1।।
सहस्त्रों बिच्छु एक साथ में, डंक शरीर में मारें जब ।
उणसूं भी हा! अधिक वेदना, व्याप्त हुई गुरुवर के तब ।।
फिर भी टसको नहीं करें गुरु, भेद ज्ञान विचारने।।2।।
अंतिम क्षण तक पूर्ण सजग बन, आत्म-स्वरूप में रमण करें।
स्वाध्याय भी, प्रतिक्रमण भी, पूर्ण सजग हो श्रवण करें।।
क्षमायाचना करें सभी सूं, "धर्म" भाव दिल धार नै।।3 |
xxxx
XXXXXXXX
XXXXXX गणेश गुण शतक/87
(85) गुरु गणेश का स्वर्गारोहण
तर्ज- पैसा फैंको तमाशा देखो
...........
छोड़े छोड़े छोड़े गुरुवर छोड़े, इस नश्वर तन से प्यार छोड़े।
झूठे संसार से व्यवहार छोड़े।।
आत्मभावों में करते रमण, प्रभु से आत्मा का तार जोड़े।।टेर।।
हाड माँस और खून का, जिसमें भरा भण्डार है।
मल मूत्र का हो रहा, प्रतिपल जहाँ संचार है।।
छोड़े दुर्गन्ध का आगार छोड़े, अशुचि का भंडार छोड़े।
रग-रग में जिसके रोग भरे हैं, ऐसे देह से प्यार छोड़े।।1।।
जीर्ण-शीर्ण जो वस्त्र हो, क्या कोई ममता रखता है।
नये वस्त्र की प्राप्ति पर क्या, कोई देरी करता है।।
XXXXXX
अनित्य भावना धार छोड़े, अशुचि भावना धार छोड़े।
आत्मा को अजर-अमर समझ, छोड़े शरीर का व्यापार छोड़े।।2।।
माघ बदी वह बीज का दिवस बड़ा बदकार था।
तीन बजकर बीस मिनट पर, मचा हाहाकार था।।
गुरुवर तन से प्राण छोड़े, स्वर्ग से अपना स्थान जोड़े।
रोते बिलखते "धर्म" संघ को, गुरुवर निराधार छोड़े।।3।।
88/गणेश गुण शतकxxxxxxxxxxxxxxxxx
(86) संथारा सीझा
तर्ज- छप्पय
...........
गुरुवर गणेश का, सीझता संथारा सुखकार,
मच गया सारे संघ में, तब था हाहाकार।
तत्क्षण सारे देश में, देते खबर पहुँचाय,
सुनकर सुदूर प्रांत में, नर-नारी दुःख पाय।
चलते निज-निज स्थान से, उदयपुर दिश धार,
"धर्म" गुरु का करन हित, अंतिम संस्कार।।
(87) देह-दर्शन
तर्ज- सच्चा भगत बन जाऊँ
..........
सुन-सुनकर सब आवें, चल उदयपुर नर नार।
गुरु गणेश के जो सुनें, महाप्रयाण समाचार ||टेर।।
दूर-दूर से आती भारी, अस्सी हजार की जनता सारी।
हाहाकार मचावे सुन, महाप्रयाण समाचार ।।1 ||
कई संथारे के दर्शन पावें, त्याग-तप की भेंट चढ़ावें।
नयनों में नीर बहावे सुन, महाप्रयाण समाचार ||2||
पर जो बाद में पहुँचे आके, केवल शव को सामने पाके।
मन में अति दुःख पावें सुन, महाप्रयाण समाचार | 3 ||
"धर्मेश" ने नहीं समाचार पाया, बाद में सुनकर अति पछताया।
आज भी दिल पछतावे सुन, महाप्रयाण समाचार ||4||
אגאגא
XXXXXXXXXXXXXXXXX TUTET
XXX गणेश गुण शतक/89
...........
אא?
(88) पटासीन
तर्ज- मैं तो आरती उतारूं रे
झट पाट बिठावें रे गुरुवर नाना ने
जय जय गुरुवर नाना जय जय जय ।।टेर।।
संघ चतुर्विध मिल्यो आंण, गुरुवर नाना ने।।
निर्जीव शव ने जाण, गुरुवर नाना ने।
वोसरावें दिल दुःख मान, गुरुवर नाना ने।।
चद्दर ओढ़ावें जद, आचार्य रो देवे पद,
जय जय बोलावें रे, गुरुवर नाना ने।।1।।
वंदना करें सुखकार, गुरुवर नाना ने।
अनुशासन करें स्वीकार, गुरुवर नाना ने।।
विश्वास देवें हितकार, गुरुवर नाना ने।
शुभकामना करें उसवार, गुरुवर नाना ने।।
मंगल गावें झूम-झूम, गीतों की मचाई धूम,
हर्ष मनावें रे, गुरुवर नाना ने। 2 ।।
एक आँख में अश्रुधार, गुरुवर नाना ने।
दूसरे में हर्ष बहार, गुरुवर नाना ने।।
वर्ते मंगलाचार, गुरुवर नाना ने।
बोले जय-जयकार, गुरुवर नाना ने।।
"धर्मेश" नहीं पाया जाय, दिल में जल रही लाय,
अब भी सतावे रे, गुरुवर नाना ने।।3।।
גאגאגא
१५५
90/गणेश गुण शतक ५५४४
शतक ५४४५XXXXXXXXXXXX
(89) महाप्रयाण यात्रा : अग्नि संस्कार
तर्ज- धन म्हारा भाग
हाय म्हारां गुरुसा स्वर्ग सिधाविया।
सो सगलां रा मन, मुाया ओ राज ।।टेर।।
चाँदी री तो एक भारी डोल बणाई।
तो स्वर्ण कलश ऊपर जड़िया ओ राज||1||
גאגא
उणमें जद गुरुवर सा ने बैठायो।
तो हजारों ही लोग लारै आया ओ राज||2||
जय-जयकार सूं आकाश गुंजावे।
तो नयनों सूं नीर बहावे ओ राज।।3।।
राजा महाराजाओं ने जलै जलावे।
तो गंगोदभव मांहे सब लावे ओ राज । 4 ।।
RXXX
4444444444xxxxxxxxxxx
चंदन चिता एक मोटी है चुनावें।
तो उण मांहे गुरु शव सजावे ओ राज।।5।।
अंतिम संस्कार कर अग्नि जलावें।
तो राख री ढेरी बण जावे ओ राज।।6।।
रोवतां बिलखतां सब पाछा आया।
तो "धर्म सभा में भराया ओ राज||7 ||
XXXXXXXXXXXXXXXXX गणेश गुण शतक/91
XXXXXXXX ५५५ Xxx ........... xx (90) श्रद्धाञ्जली सभा तर्ज- तुम अगर साथ होने के कर गुरु रो अंतिम संस्कार, सब ही मिलकर आया। चे तो पंचायती नोहरा मझार, सबही मिलकर आया।।टेर नव प्रतिष्ठित आचार्यश्री आया, लारे संत-सती परिवार ||1|| ज्योंही ऊँचे पाट पर आप विराज्याँ, चकित हुआ है नर-नार ।।2।। जैसे कोई सामने पूज्य गणेश विराज्याँ, वैसो बण गयो रूप आकार ||3|| सबसूं पहली सत्येंद्रमुनिजी पंजाबी, दीनी श्रद्धांजलि वे उणवार ||4|| बाद में गुजराती जनकमुनिजी, ओ आया दूर देश सूं तिणवार। 15 ।। बाद में स्थविर मुनि सूरजमलजी प्यारा, वे तो बोल्यां हाँ नयनों आँसू डार ।।6 || धर्मदास संप्रदाय रा कानमुनि बोल्या, बोली मनोहर सती सुखकार । 17 || नानूजी और कौशल्याजी सतीवृंद और सूं, दीनी श्रद्धांजलि थी उणवार ||8|| बाद में आचार्यश्री खुद फरमावियाँ, श्रद्धा स्निग्ध निज उद्गार। 19 ।। और भी अनेक श्रावक श्राविका, बोल्या श्रद्धायुक्त निज विचार ||10|| אאאאא' 92/गणेश गुण शतक ५५५५५५५xxxxxxxxxx
स्थान-स्थान शोकसभा जो जो हैं बुलाई,
साधु-साध्वियां रा आया समाचार | 111 ||
वे तो सब श्रद्धांजलि अंक माहे देख लो,
"धर्म" भावना दिल धार||2||
:
(4444444xxxxxx xxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxx
(91) गर्गाचार्य : गणेशाचार्य
तर्ज- दिल के अरमां आँसूओं में ......
पूज्य गणेशीलाल ऐसे हो गये।
गर्गाचार्य आदर्श ताजा कर गये।।टेर।।
सूत्रों में है सूत्र, उत्तराध्ययन अहा।
कैसी शिक्षा उससे, प्रभु जी दे गये।।1।।
शिष्य ममत्व से बड़ा संयम महत्व।
समझना यह प्रेरणा प्रभु दे गये।।2।।
संयम उपेक्षा देख गर्गाचार्यजी।
पाँच सौ शिष्य तज अकेले रह गये।।3।।
लेकिन गणेशाचार्य ने देखो यहाँ।
श्रमण संघ में ढीलता लख कह गये।।4।।
चाहे रहूँ अकेला, पर हरगिज नहीं।
सहूं असंयम वृत्ति को चेता गये। 5 ।।
कहा नहीं केवल, कर दिखला दिया।
ग्यारह सौ साधु-साध्वी को तज गये।।6।।
श्रमण संस्कृति का हो रक्षण एक ही।
"धर्म" संदेशा सबको वे यह दे गये।।7 ||
XX
XXXXXXXXXXXXXXXXX गणेश गुण शतक/93
(92) गणेश का सेवाभाव
तर्ज- कद आवैला-2 सांवरिया म्हारै.........
म्हारा गुरुवर-2, पूज्य गणेश मोटा उपकारी।
ज्यारै सेवा-2 गुण री आज जावां बलिहारी ।।टेर।।
पूज्य जवाहर मोती गुरु री सेवा तन सूं साधी।
छोटा-मोटा संता री भी, पूरी सेवा कीधी।।
पायो सेवा-2, रो मेवो मीठो राज। मोटा ||1||
XXX
.......
श्रमण संघ रा नाथ बणने, मन में कर्यो विचार ।
वृद्ध संत-सतियाँ री सेवा, कैसे हो सुखकार ।।
रख्यो-2 प्रमुख संता में विचार। मोटा ||2||
और बात करणी सब सोरी, सेवा करणी दोरी।
सुण-सुण ने सब खिसकण लाग्या, बात बणा सब कोरी।।
देख्यो-2 संतां रो जद ओ विचार। मोटा ||3||
.......
पूरण बाबा और सार्दुलजी वृद्ध संत श्रेयकार।
खुद रा शिष्यां ने भेज्या झट, वांरी सेवा मझार।।
करी सेवा-2, वैयावच्ची अणगार | मोटा 114||
साधुमार्गी संघ में भी, सेवा री आ देन।
दीनी ऐसी जब्बर जिण सूं छा रह्यो अमन चैन ।।
कर सेवा-2, "धर्म" निज जाणा मोटा 11511
94/गणेश गुण शतक xxxxxxxxxxxxxxxxx
INK
(93) महादान
तर्ज- पणिहारी .........
एक दिन इन्दौर शहर में प्यारा पूज्यवरजी,
आयो भक्त चरणार|
दान री महिमा सुणने प्यारा पूज्यवरजी,
जाग्यो भाव सुखकार ।।टेर।।
एक रुपयो जेब में प्यारा पूज्यवरजी,
दस री कमाई सूं शेष।
वो ही दे दूं दान में प्यारा पूज्यवरजी,
आयो मन विचार ||1||
लेकिन सेठ सब लैण ने प्यारा पूज्यवरजी-2,
कर दियो साफ इंकार।
इण सूं मन दुःख उपज्यो प्यारा पूज्यवरजी-2,
सुण ने करी ललकार |12||
अपनी आगद रो दसवों सुनो श्रावकजी-2
कुण है कीनो दान।
बोलो सभा रे मायनै सुनो श्रावक जी-2,
उणरो ऊपर नाम।
सुणनै सब मन समझिया प्यारा पूज्यवरजी-2,
कीनो 'धर्म' विचार||3||
XXXXXXXXXXXXXXXXX गणेश गुण शतक/95
KRXX
(94) गुरु गणेश के वर्षावास
तर्ज- यह किले धार की कथा
..........
हुए बड़ भागी वे क्षेत्र अति सुखकारी-2,
जहाँ चातुर्मास किए पूज्य गणेशी ने भारी ।।टेर।।
पूज्य जैन जवाहर चरणों में संयम धारा-2,
किया प्रथम चौमासा, गंगापुर श्रेयकार |
किया द्वितीय गुरु संग, रत्नपुरी मझारी।।1।।
גאאאא!
किया तीजा थांदला, चौथा जावरा प्यारा-2,
इन्दौर पाँचवां, छट्ठा नगर मझारा।
किया सातवां जुन्नर शहर, अति प्रियकारी।।2।।
आठवां घोड़नदी, जामगाँव में नवमां-2,
अहमदनगर किया पुनः चौमासा दसवां।
पुनः घोड़नदी किया ग्यारहवां, अति श्रेयकारी।।3।।
किया बारहवां मीरी, तेरहवां हिवड़ा जानो-2,
चिंचवड़ चौदहवां, पन्द्रहवां सतारा भारी।।4।।
घाटकोपर अठारहवां पूर्ण कर चौमासा-2,
तीन साल रहे जलगाँव, गुरु सेवा की ले आशा।
बावीसवां भीनासर किया सुखकारी।।5।।
96/गणेश गुण शतक Xxxxxxxxxxxxxxxxx
दो चुरू चौमासे क्रमबद्ध हैं धारे-2,
पच्चीसवां ब्यावर शहर करना स्वीकारें।
किया छब्बीसवां फलौदी जाकर भारी।।6।।
फिर जोधपुर उदयपुर किया चौमासा-2,
रतलाम देवास उदयपुर पूरी आशा।
बत्तीसवां बीकानेर भूमि मझारी ।।7।।
फिर जयपुर उदयपुर
फलौदी चौमासे धारे-2,
छत्तीसवां भीनासर सेवा सू प्यारे।
पूज्य जवाहर पहुँचे स्वर्ग मझारी । 18 ।।
आचार्य पद पा देशाणे सैतीसवां कीना-2,
सरदारशहर ब्यावर बगड़ी जस लीना।
इकचालीसवां बड़ी सादड़ी भारी।।9।।
रतलाम जयपुर दिल्ली अलवर प्यारा-2,
छयालीसवां उदयपुर स्वीकारा ।
जोधपुर कुचेरा बीकानेर क्रम वारी । |10||
पचासवां गोगोलाव किया चौमासा-2,
कानोड़ जावरा क्षेत्र की पूरी आशा।
अंतिम चौमासे चार उदयपुर भारी ।।11।।
जहाँ-जहाँ चौमासे किये, "धर्म" यश छाया-2,
और भक्तों ने भी भारी लाभ उठाया।
कर रहे हैं आज भी, याद सभी नर नारी||12||
Xxx
XXXXXXXXXXXXX गणेश गुण शतक/97
KXxxx
גאגא?
xxx
(95) आचार्य परम्परा
तर्ज- आओ बच्चों तुम्हें दिखाएँ....
אאאאאאאא)
५५४
सुनलो सब ही ध्यान लगाकर झांकी संघ महान की।
प्रभु वीर के परम्परागत, आचार्य भगवान की।
वन्दे शासनम्, वन्दे शासनम् ।।टेर।।
स्वामी सुधर्मा प्रभु वीर के, प्रथम पाटवी नामी थे।
जम्बू प्रभव और शय्यंभव, यशोभद्र शिवकामी थे।।
संभूति विजय और भद्रबाहु स्थूलिभद्र व महागिरी।
बलिसिंहजी सोहन स्वामी वीर स्वामी जी हुए सूरी।।
स्थंडिलाचार्य जीवधर व आर्य समन्द गुणवान की।।1।।
नंदिल नागहस्ती रेवत व सिंह गणी गुणवान हुए।
सांडिलाचार्य हेमवंत और नागजीत पुण्यवान हुए।।
गोविंद भूतदीन छोग गणी, दुःसही आचार्य बने।
पाट सताईस पर है देखो, देवर्धिगणी क्षमाश्रमण बने।।
शास्त्र लेखन का कार्य करके, बाजी रख दी ज्ञान की ||2||
वीरभद्रजी शंकरभद्रजी यशोभद्र वीरसेन मुनि।
वीर संग्राम जिनसेन हरिषेण जयसेन जगमाल गुणी।।
देवऋषि और भीमऋषिजी कर्मऋषि गुणधारी थे।
गजसेनजी देवसेनजी शंकरसेन उपकारी थे।।
लक्ष्मी लाभ और रायऋषि पद्मसूरी हरि महान् की।।3।।
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कुशलदत्त उपनीऋषि जय और विजय देवसेनजी।
सूरसेन महासूरसेन महासेन और गजसेनजी।।
जयराज व मिश्रसेनजी विजयसेन शिवराज गुणी।
लालऋषिजी ज्ञानऋषिजी भाणोजी व रूपमुनि।।
जीवाजी व तेजराजजी कुंवरसेन महान् की ।।4।।
हरजी गोदा फरसराम लोकपाल महाराज दौलजी।
लाल पूज्य के शिष्य हुक्म ने क्रियाद्धार क्रिया तोल जी।।
शिवचार्य उदय चौथ श्रीलाल जवाहर नामी थे।
उनके ही तो पाट पर, हुए गणेशाचार्यजी स्वामी थे।।
वर्तमान "धर्म" संघनायक, नाना गुरु महान् की।।5।।
(96) तात्कालीन संघ में साधु-साध्वी
तर्ज- घुसो बाजे रे ......
संत-सती सारा रे, संत-सती सारा रे।
था पूज्य गणेश जब, स्वर्ग सिधारा रे।।टेर।।
पन्नामुनि बगतावर सूरज, धन सागर अणगारा रे।
केशव करणीदानमुनि, लागै सबने प्यारा रे।।1।।
सुंदर ईश्वर गोपी इंद्र, रामेश्वर हितकारा रे।
कंवर घेवरमुनि बाबू था, संघ में जो सारा रे।।2।।
तेजकंवर वल्लभ गुलाबजी पानकंवर सती प्यारा रे।
कस्तूराजी आदि था मोता जी वारा रे।।3।।
XXXXXXXXXXXXXXXX गणेश गुण शतक/99
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चंपा सूरज मोहन मान प्यारकंवर सुखकारा रे।
पार्वताजी केशर पान कंचन हितकारा रे।।4।।
आनंद चांद बदाम सुमति सती वल्लभजी प्रियकारा रे।
नंदाजी झमकूजी सती खेताजी वारा रे।।5।।
भूरा चंपा पान मनोहर शायर चंद्रा धीरज रे।
सुगन बदाम छगन भंवरजी सतीवर इचरज रे।।6।।
पेप नानू और फूल इंद्र रोशन अनोखा सूरज रे।
सुगन धापू गुलाब शांता जी सारे सुकज रे।।7।।
छोटाजी रसाल लाडजी और सती सरदारा रे।
सौभाग जीवणा गटू धापू सती सुखकारा रे।।8।।
चतर नगीना सिरेकवर सुगन गुलाब हितकारा रे।
संपत कंकु सूरज शायर, संपत प्यारा रे।।9।।
सूरज कमला उगम रोशन गुलाब सती श्रेयकारा रे।
टीपू नगीना राजकंवरजी मोहनगारा रे।।10 11
वरजू धापू और हगामजी रंगू मंडल रा सारा रे।
"धर्म" संघ में सोलह और तिहोतर प्यारा रे।।11।।
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100/गणेश गुण शतक XXXXXXXxxxxxxxxx
(97) गुरु गणेश की शिष्य परम्परा
तर्ज- हरिगीतिका
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जिनके विमल उपदेश में, वैराग्य रस की धार थी।
सुनने वालों के हृदय में, गूंजती झणकार थी।।
विरक्त बन चरण शरण में, शिष्यत्व धारण किया।
उनका नामोल्लेख कर, आनंद पाता है हिया।।1।।
तेवीस सिंतबर पैंतीस को, आचार्य जवाहरलाल नै।
संघ का सब भार सौंपा, पाया गणेशीलाल नै।
फूल, डूंगर रतन करणी सुंदर चौथ तपसीलालजी।
नाना मगन शंभू नारायण, आईदान गुणमालजी ।।2।।
हुक्म सुमेरु धूल ईश्वर नेम कुंदन मगन थे।
गोपी इंद्र हनुमंत तोला घेवर बाबू सुमन
थे।।
इनमें से अब तो दो ही कुल "धर्म" संघ में राज ते।
आचार्यश्री नानेश व इंद्रमुनि संयम साज ते।।3।।
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XXXXXXXXXXXX गणेश
गुण शतक/101
(98) गणेश वंदना
तर्ज- सुनो सुनो ऐ दुनिया वालों
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वंदन हम करते मंगलमय, गणेश गुरुवर ज्ञानी को।
श्रमण संस्कृति के रक्षक उस, अग्रदूत सेनानी को।।टेर।।
जिसने तन मन सारा अपना, इस पर ही था वार दिया।
इसके रक्षण हेतु जिसने, गरल पान स्वीकार किया।।
याद करेगा सहस्रों वर्ष जग, जिनकी पद कुर्बानी को।।1।।
श्याम सलौनी सूरत जिनकी, कितनी मोहनगारी थी।
पंचम स्वरमय मीठी बोली, लगती कितनी प्यारी थी
झूम उठते श्रद्धालु श्रवणकर, जिनकी वाणी को।।2।।
जहाँ-जहाँ पर चरण पड़े, वह पुण्य क्षेत्र है धन्य हुआ।
दर्शन जिसने पाये उसका, मानव जीवन धन्य हुआ।।
"मुनि धर्मेश" नित्य करता वंदन,
सम्यक्त्व रत्न के दानी को।।3।।
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102/गणेश गुण शतक ५
शतक ४४xxxxxxxxxxxxxxx
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(99) तुम्हारी जय हो
तर्ज- हीरा मिसरी का
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गणनायक गणेश, तुम्हारी जय जय हो।
जिनशासन प्राणेश, तुम्हारी जय जय हो।।टेर।
इंद्रा माँ का भाग्य सवाया, श्रेष्ठी सायब मन हर्षाया।
मारू कुल राकेश, तुम्हारी जय जय हो।। 1 ।।
मात-पिता-पत्नी विरलाई, मन में विरक्त भावना आई।
बन गये तुम योगेश, तुम्हारी जय जय हो।। 2।।
गुरु जवाहर से तुम पाये, आतम गुण अद्भुत विकसाये।
पद पाये शासनेश, तुम्हारी जय जय हो।। 3 ।।
श्रमण संघ के नाथ कहाये, ममत्व भाव किंचित् नहीं लाये।
था एक ही आदेश, तुम्हारी जय जय हो।। 4।।
अनुशासनबद्ध संयम प्यारा, जिस साधक ने लक्ष यह धारा।
रखी कृपा विशेष, तुम्हारी जय जय हो। 5 ।।
चतुर्विध संघ की लख व्यथा, निज हाथों से करी व्यवस्था।
स्थापित किया पाटेश, तुम्हारी जय जय हो।।6 ||
अंतिम समय निकट जब आया, संथारा कर स्वर्ग सिधाया।
बन गये तुम स्वर्गेश, तुम्हारी जय जय हो।।7।।
गुरु नाना अनुशासन पाकर, मन में अति प्रमुदित होकर।
गुण गाथा "धर्मेश", तुम्हारी जय जय हो।।8।।
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XXXXXXXXXXXXXXXXX गणेश गुण शतक/103
(100) उपसंहार
तर्ज- हरि गीतिका
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इस पुस्तिका के सार का यहाँ हो रहा उपसंहार है।
गणेश गुरुवर हुक्मगच्छ के सप्तम पट्ट के धार है।।
जन्म से यौवन वय के बाद संयम धार कर।
हुक्मगण के ईश बन गणेश नाम यथार्थ कर।।1।।
श्रमण संघ सिरताज बन गणा नाम ईश सार्थक किया।
पद त्याग कर गर्गाचार्य के आदर्श को प्रस्तुत किया।।
फिर युवाचार्य नानेश को निज भार सारा सौंपकर।
स्वर्गवासी हो गये पंडितमरण का वरण कर ||2||
इसका विवरण क्रमबद्ध इसमें किया शुभ भाव से।
"धर्मेश मुनि" मिट जाये भ्रान्ति पढ़े-सुने जो चाव से।
संघ-संघपति पर दृढ़ बनेगी भविकजनों की आस्था।
हो समर्पित पावेंगे वे मुक्ति का सद रास्ता ।।3।।
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104/गणेश गुण शतक XXXXXXXXXXXXXXXXX
आचार्यश्री गणेशीलालजी महान् संत
थे। आचार्यश्रीजी को श्रमणों का संगठन
प्रिय था। मगर वे संगठन को साधन
मानते थे, साध्य नहीं। वे जैसा तैसा
संगठन नहीं चाहते थे। वे सच्ची साधुता
के दृढ़ हिमायती थे। इसलिए वे उसी
संगठन के हिमायती थे जहां शुद्ध संयम
पालन हो सके और अनुशासन कायम
रहे। उनकी दृष्टि में श्रमण संस्कृति का
रक्षण और उसके आधार पर आत्मोन्नति
तब ही सम्भव है जब चारित्र पालन में
मनसा, वाचा, कर्मणा के पवित्र भाव हो।