Sanmati Library, Jaipur
Ath Bhasha Vartman Chaubisi Pooja Likhyate
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चौबी० पूजन संग्रह २९० ॥ वरवृद्ध नमस्ते । वीतराग विज्ञान नमस्ते । चिद्विलास धृतध्यान नमस्ते ॥ ४ ॥ स्वच्छ गुणांबुधि रत्न नमस्ते । सत्व हितंकर यत्न नमस्ते । कुनयकरी मृगगज नमस्ते। मिथ्याखग वर बाज नमस्ते ॥५॥ भव्य भवोदधितार नमस्ते । शर्मामृत सितसार नमस्ते ॥ दर्श ज्ञान सुख वीर्य नमस्ते । चतुरानन धरधीर्य नमस्ते ॥ ६॥ हरिहर ब्रह्मा विष्णु नमस्ते । मोहमदं मनु जिष्णु नमस्ते । महादान महाभोग नमस्ते । महाज्ञान महयोगनमस्ते । महाउग्र तपशूर नमस्ते। महामौन गुणभूरनमस्ते ।धर्मचक्र वृषकेतु नमस्ते । मवसमुद्र शत सेतु नमस्ते ॥ ८॥ विद्याईश मुनीश नमस्ते । इंद्रादिक नुतसीस नमस्ते । जय रत्नत्रयराज नमस्त ।सकलजीव सुखदाय नमस्ते॥९॥ अशरणशरण सहाय नमस्ते। भव्यसुपंथ लगाय नमस्ते। निराकार साकार नमस्ते । एकोनेक अधार नमस्तो॥१०॥लोका लोक विलोक नमस्ते। त्रिधा सर्व गुण थोक नमस्ते । सल्ल दल्ल दल मल्ल नमस्ते । कल्लमल्लजितछल्ल नमस्ते॥११॥भुक्ति मुक्ति दातार नमस्ते। उक्ति शुक्ति शृगार नमस्ते। गुण अनंत भगवंत नमस्ते ।जे जै जै जयवंत नमस्त॥१२ इति श्रीजिन चरणाग्रोपरिपुष्पांजलिंक्षपेत् ।। , चौबी. || अथ वर्तमान चतुर्विंशति जिन समुच्चय पूजा प्रारभ्यते। पजन मंग्रह २९१ (वृंदावन कृत) कवित्त। स्थापना-ऋषभ अजित संभव अभिनंदन,सुमति पन सुपार्श्व जिनराय। चंद पुहप शीतल श्रेयांस नमि,वासपूज पूजत सुरराय। विमल अनंत धर्म जस उज्ज्वल, शांति कुंथु अरमल्लि मनाय॥ मुनिसुव्रत नमि नेमि पार्श्वप्रभु, वर्धमान पद पुष्प चढाय ॥१॥ ॐ ह्रीं श्री वृषभादि महावार पर्यन्त चतुर्विशति जिनेन्द्रा अत्राऽवतरताऽवतरतसंवौषट्आह्वाननम् डों ह्रीं श्री वृषभादि महावीर पर्यन्त चतुर्विशति जिनेन्द्रा अत्र तिष्ठत तिष्ठत ठः ठः स्थापनम् । रों ह्रीं श्रीबृषभादिमहावीरपर्यन्त चतुर्विंशतिजिनेन्द्राअत्रममसन्निहिताभवत भवत वषट् सन्निधीकरणम् अथ अष्टक। (चाल-द्यानतराय कृत नदीश्वर की) जल-मुनिमनसम उज्ज्वलनीर, प्रासुक गंधभरा । भर कनक कटोरी धीर, दीनो धार धरा । चौवीसों श्रीजिनचंद, आनंद कंद सही। पद जजत हरत भवफद, पावै मोक्षमही। ॐ ह्रीं श्रीवृषभादि महावीरान्त चतुरविशति जिनेन्द्रेभ्यो जन्मजरा मृत्यु रोग विनाशनाय जल निर्वपामीति स्वाहा। - , + पजन चौबी. चदन-गोसीर कपूर मिलाय, केशर रंग भरी। जिनचरनन देत चढाय, भवआताप हरी। चौबीसों श्री जिन चंद आनंद कद सही। पद जजत हरत भव फंद, पावं मोक्ष मही। डों ह्रीं श्री वृषभादि महावीरान्त चतुर्विशति जिनेंद्रेभ्यः संसारा ताप रोग बिनाशनाय संग्रह २९२ चंदनं निर्वामीति स्वाहा। अक्षत-तंडुल सित सोम समान, सुंदर अनियारे। मुक्ताफल की अनुमान, पुंज धरो प्यारे। चौबीसों श्रीजिन चंद, आनद कंद सही। पद जजत हरतभव फंद पावै मोक्ष मही। 'डों ह्रीं श्रीवृषभादि महावीरांत चतुर्विंशति जिनेन्द्रेभ्योऽक्षय पद प्राप्तये अक्षतान निर्वपामीतिस्वाहा पुष्प-बरकंज कदर कुरंड, सुमन सुगंधभरे। जिन अमधरो गुणमड, काम कलंक हरे ॥ चौबीसों श्रीजिन चन्द, आनन्दकन्द सही। पद जजत हरत भव फंद, पावै मोक्ष मही॥ ॐ ह्रीं श्रीवृषभादि महावीरांत चतुर्विशति जिनेंद्रेभ्य. कामवाण विनाशनाय पुष्पं निर्वपामीति स्वाहा। नैवेय-मन मोदन मोदक आदि, सुंदर स्वच्छ बने । रसपूारत प्रासुक स्वाद जजत क्षुधादि हने । चौबीसों श्री जिन चंद,आनंद कंद सही। पद जजत हरत भव फंद,पावै मोक्ष मही। ॐ ह्रीं श्री वृषभादि महावीरांत चतुर्विंशनि जिनेद्रेभ्यः क्षुधा रोग विनाशनाय नैवेद्यं निर्वपामीति स्वाहा दीप-तम खंडन दीप जगाय, धारो तुम आगे । सब'तिमिर मोह छैजोय, ज्ञानकला जागे। चौवीसों श्रीजिन चन्द, आनन्द कन्द सही। पद जगत हरत भव फंद, पावै मोक्ष मही॥ .
म चोवी समह में ही श्रीवृषभादि महावीरान्त चतुर्विंशतिजिनेन्द्रेभ्यो मोहान्भकार विनाशनायदीपंनिर्वपामीति स्वाहा धूप-दशगंध हुताशन मांहिं, में प्रभु खेवतहूं । मिसिधूम करम जरजाय, तुमपद सेवतहूं। चौबीसों श्री जिन चन्द आनन्द कन्द सही । पद जजत हरत भव फंदपावं मोक्षमही। डोंहीश्री वृषभावि महावीरान्तचतुर्विशति जिनेन्द्रेभ्योऽष्टकर्म दहनायधूपंनिर्वपामीतिस्वाहा फल-शुचिपक्क सरस फलमार, सब ऋतुके लायो । देखत दृग मनको प्यार, पूजत सुख पायो। चौवीसों श्री जिन चन्द, आनन्दकन्द सही। पद जजत हरत भव फन्द, पावै मोक्ष मही॥ डों ह्रीं श्री बृषभादि महावीरान्त चतुर्विशति जिनेन्द्रभ्यो मोक्ष फल प्राप्तये फलं निर्वामीति स्वाहा। अर्घ-जल फल आठों शुचिसार, ताको अर्घ करूं । तासों अरबू सुखकार, भवतर मोक्ष वरूं। चौवीसों श्रीजिनचद आनन्द कंद सही। पद जजत हरत भव फंद पावै मोक्ष मही॥ डोहीश्री वृषभादिमहावीरान्तचतुर्विशतिजिनेन्द्रेभ्योऽनपदप्राप्तयेअर्धनिर्वपामीति स्वाहा। अंथ जयमाला।दोहा। महाअर्घ-श्रीमत तीरथ नाथपद, माथनाय हित हेत । गावू गुणमाला अबै, अजर अमर पद देत ॥१॥ घत्ताछंद-जयभवतम भंजन जनम निकंजन रंजन दिन मन स्वच्छकरा। शिवमग परकाशक अरिंगण नाशक, चौबीसों जिनराजवरा ॥२॥ । । . - चौबी० पजन संग्रह २९४ छंद पडी ॥ जय ऋषभदेव ऋषिगण नमंत। जय अजितजीत बसु अरि तुरंत। जय संभव भव भय करत चूर। जय अभिनदन आनंदपूर॥३॥ जय सुमति सुमतिदायक दयाल ।जय पन पत्र दुति तन रसाल । जय जय सुपार्श्व भवपाश नाश । जय चंद्र चंद्रतन दुति प्रकाश ॥ ४॥ जय पुष्पदंत दुति दंतसेत । जय शीतल शीतल गुणनिकेत। जय श्रेयनाथ नुतसहस भुज्य । जय वासव पूजत, वासु पूज्य ॥ ५॥ जय विमल विमलपद देनहार। जय जय अनंत गुण गण अपार । जय धर्म धर्मशिव शर्मदेत । जय शांशि शांति पुष्टि करेत ॥६॥ जय कुंथ कुंथआदिक रखेय । जय अर जिन वसुअरि क्षय करेय । जय मल्लि मल्लहत मोह मल्ल । जय मुनिसुव्रत व्रत सल्लदल्ल।७जय नमि नित वासव नुत सप्रेम । जय नमिनाथ वृषचक्र नेम । जय पारमनाथ अनाथनाथ । जय वर्धमान शिव नगर साथ ॥ पत्ता छन्द-चौवीस जिनंदा आनंद कंदा, पाप निकंदा सुखकारी । तिन पद युग चंदा उदय अमदा, वासव बंदा हितधारी॥९॥ डोंहीश्रीवृषभादिमहावीरान्तचतुर्विशतिजिनेन्द्रेभ्योऽनर्धपदप्राप्तये महानिर्वपामीतिस्वाहा अथ पाशीर्वाद। (सोरठा) भुक्ति मुक्ति दातार, चौकीसों जिनराज वर । तिनपद मन बचधार, जो पूजे सो शिवलह॥१॥ इत्याशीर्वादः। इति श्रीचतुर्विंशति तीर्थ कर समुच्चय पूजा संपूर्णा ॥ .
बी० पूजन संग्रह १ अथ श्रीऋषभदेवजिन पूजा लिख्यते। (वृन्दावन कृत) अडिल। स्थापना-परम पूज्य पुषभेश स्वयंभू देवजू । पितानाभि मरु देवि करें सुरसेवज।। कनक वरण तनतंग धनुष पनसत तनो। कृपासिंधु इन आय तिष्ट मम दुख हनो ॥१॥ ॐ ह्रीं श्रीऋषभदेव जिनेन्द्र अत्रावतरावतर संवौषट् आदाननम् । डों ह्रीं श्री ऋषभदेव जिनेन्द्र अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठः ठः स्थापनम् । डों ह्रीं श्री ऋषभदेव निनेन्द्र अत्र मम सन्निहिनो भव भव वषट् सन्निधीकरणम् । अथ अष्टक । छंद द्रुतविलंवित जल-हिमवनोद्भव वारि सुधारिके । जजनहूं गुण बोध उचारिके ॥ परमभाव सुखोदधि दीजिये। जन्म मृत्यु जरा क्षयकीजिये।ॐ ह्रीं श्री ऋषभदेव जिनेन्द्राय गर्भ,जन्म, तप, ज्ञान, निर्वाण पंचकल्याण प्राप्ताय जन्ममृत्यु जरा रोग विनाशनाय जलं निर्वपामीति स्वाहा । चन्दन-मलय चंदन दाह निकंदनं । घत उभ कर में कर बंदनं । जजतहूं प्रसमाश्रम दीजिये । तपत्त- ताप त्रिधा क्षय कीजिये ॥ॐ ह्रीं श्री ऋषभदेव जिनेन्द्राय गर्भ, जन्म,तप, ज्ञान, निर्वाण पंचकल्याण प्राप्ताय संसारा ताप रोग विनाशनाय चन्दनं निर्वपामीति स्वाहा ।
- . चोषी० अक्षत-अमल तंडुल खंडविवर्जितं । सित निशेश हिमामय तर्जितं । जजतई तसु पुंज धरायजी। पूजन अखयसंपत्ति दो जिनराय जी। ॐ ह्रीं श्रीऋषभदेव जिनेन्द्राय गर्भ, जन्म, तप, ज्ञान, संग्रह निर्वाण पंचकल्याण प्राप्ताय अक्षय पद प्राप्तये अक्षतान् निर्वपामीति स्वाहा ।। २९६ पुष्प-कमलचंपक केतुकि लीजिये। मदन भंजन भेट धरीजिये। परमशील महा सुखदाय हैं।। समर शूल निमूल नसाय हैं ॥ ॐ ह्रीं श्री ऋषभ देव जिनेन्द्राय गर्भ, जन्म, तप, ज्ञान, निर्वाण पंचकल्याणप्राप्ताय काम वाण विनाशनाय पुष्पं निर्वपामीति स्वाहा ॥ नैवेद्य-सरसमोदन मोदक लीजिये । हरनभूख जिनेश जजीजिये । सकल आकुल अंतक हेतु है। अतुल शांति सुधारस देतु है ॥ ॐ ह्रीं श्री ऋषभदेव जिनेन्द्राय गर्भ, जन्म, तप, ज्ञान, निर्वाण पचकल्याण प्राप्ताय क्षुधा रोग विनाशनाय नैवेद्यं निर्वपामीति स्वाहा ॥ दीप-निवड मोह महातम छाईयो। स्वपरभेद न मोहि लखाईयो । हरन कारन दीपक तासकें । जज- तहूं पदकेवल भासके॥ॐ ह्रीं श्री ऋषभदेव जिनेन्द्राय गर्भ, जन्म, तप, ज्ञान, निर्वाण पंचकल्याण प्राप्ताय मोहांध कार विनाशनाय दीपं निर्वामीति स्वाहा। धूप-अगरचंदन आदिक' लेयके । परम पावन गंध सुखेय के । अनि संगजरें मिस धमके। सकल कर्म उ. बहु घूमकै ॥ डों ह्रीं श्रीऋषभदेव जिनेन्द्राय गर्भ, जन्म, तप, ज्ञान, निर्वाण पंच कल्याण प्राप्ताय अष्ट कर्म दहनाय धूपं निर्वपामीति स्वाहा । - -- 13 -" nir ८ चौबी०|| फल-सुरस पक्क मनोहर पावने । विविधि ले फल फूल रचावने। त्रिजगनाथ कृपा अव कीजिये। पूजन हमें मोक्षमहाफल दीजिये ॥ डों ह्रीं श्री ऋषभदेव जिनेन्द्राय गर्भ, जन्म, तप, ज्ञान, संग्रह निर्वाण पंचकल्याण प्राप्ताय मोक्ष फल प्राप्तये फलं निर्वपामीति स्वाहा॥ २९७ अर्घ-जलफलादि समस्त मिलायके । जजतहू पद अर्घ चढायके । भगतवत्सल दीनदयाल जी। करहु मोहि सुखी लख हालजी॥ ॐ ह्रीं श्री ऋषभदेव जिनेन्द्राय गर्भ, जन्म, तप,ज्ञान, निर्वाण पंचकल्याण प्राप्ताय अनर्घ पद प्राप्तये अर्घ निर्वपामीति स्वाहा। अथ पंचकल्याणक । छंद द्रुतविलंबित। गर्भ-असित दोयज साढ सुहावनी। गरभ मंगलता दिन पावनी । हरिशची पितु मातहि सेवही । जमतहहम श्री जिनदेवही ॥१॥ डो ह्रीं श्रीऋषभदेव जिनेन्द्राय आषाढ कृष्ण दोयज गर्भ कल्याणकाय अर्घ निर्वपामीतिस्वाहा जन्म-असित चैत सुनौमि सुहाईयो । जनम मंगल तादिन पाईयो । हरि महागिर पे जजियो तवै। हम जजै पद पंकजको अबै ॥२॥ ओं ह्रीं श्री ऋषभदेव जिनेन्द्राय चैत्र कृष्ण नवमी जन्म कल्याणकाय अर्घनिर्वपामीतिस्वाहा तप-असित नौमी सुचैत धरैसही ।तप विशुद्ध सबै समता गही। निज सुधारस सो लवलाईयो । हम जजै पद अर्घ चढाइयो चौबी० संग्रह २९८ ओं ह्रीं श्रीऋषभदेव जिनेन्द्राय चैत्र कृष्ण नवमी तप कल्याणकाय अर्घ निर्वपामीति स्वाहा. ज्ञान-असितंफागुण ग्यारस सोहनो। परम केवलज्ञान जगोभनो। हरि सबै सुर पूजत आयके'। हम जर्जे इत मंगल गायक ॥४॥ डों ह्रीश्रीऋषभदेव जिनेन्द्राय फाल्गुणकृष्ण एकादशी ज्ञान कल्याणकायअघनिर्वपामीतिस्वाहा निर्वाण-असित चौदस माघ विराजई । परम मोक्षलियो जिनराजई । हरि समूह जजै कैलासजी। हम जजै अतिधार हुलासजी॥५॥ डों ह्रीं श्री ऋषभदेव जिनेन्द्राय माघ कृष्ण चतुर्ददशीमोक्षकल्याणकायअघनिर्वपामीतिस्वाहा अथ जयमाला । घत्ताछन्द। महाअर्घ-जय -जय जय जिनचदा आदिजिनंदा, हरि भवफंदा कंदाज । वासव शतबंदा धर आनंदा, ज्ञान अमंदा नंदाजु ॥१॥ छंद मोतीदाम। त्रिलोक हितकर पूरण पर्म । प्रजापति विष्णु चिदातम धर्म। यतीश्वर ब्रह्म विदांबरबुद्ध । वृषंक असंख कृपांवुधि शुद्ध ॥२॥ जबै गर्भागम मगल जान । तबै हरिहर्ष हिये अति आन ॥ पिता जननी पद सेव करेय। अनेक प्रकार उमंग भरेय ॥३॥जये जबही तबही हरिआय । गिरीद्रविणे कियो न्हौनस जाय ।नियोग समस्तकियो तितसार । सुलायप्रभू पुन राज अगार ॥ ४॥पिता करसौंप चौबी० पजन संग्रह २९९ कियो तितनाट । अमंद अनंद समेत विराट । सुथान पयान कियो फिर इंद्र । इहां सुर सेव करें जिन चंद्र ॥ ५॥ कियो चिरकाल सुखाशितराज । प्रजा सवआनंदको नितसाज । सुलिप्त सुभोगन में लख योग । कियो हरिने यह उत्तम योग ॥६॥ निलंजन नाच रच्यो तुमपास । नवोरस पूरित भाव विलास । बजे मिरदंग हम हम जोर । चले पगझार झना झन झोर ॥७॥ घनाघन घण्ट करें ध्वनि मिष्ट । बजे मुहचंग सुरान्वित सुष्ट । खडी छिनपास छिनेहीअकाश । लछिन दीरघ आदि विलास ॥८॥ ततछिन तोहि विले अवलोय । भए' भवतै भयमीत वहोय । सुभावत भावन बारह भाय । तहां दिव ब्रह्म ऋषीश्वर आय ॥ ९॥ प्रबोधि जिनेशगए निजधाम । तबैहरिआय रची शिविकाम।कियो कचलोच प्रयाग अरन्य। चतुर्थम ज्ञान लह्यो जग धन्या१०धरो जबयोग छमास प्रमान । दियो श्रेयांस तिन्हें इषु दान । भयो जब केवल ज्ञान, जिनिन्द । समोसन ठाठ रच्यो सुधनिन्द ॥११॥ तहां बृषतत्व प्रकाश अशेश । कियो फिर निर्भय थान प्रवेश। अनंत गुणातम श्री सुखरास । तुम नित भव्य नमें शिवआस पत्ता छन्द-यह अरज हमारी सुन त्रिपुरारी, जनम जरा मृत दूरकरो । शिवसंपति दीजे ढीलन कीजे, निज लखलीजे कृपा धरो॥ १३ ॥ • ह्रीं श्रीऋषभदेव जिनेन्द्राय गर्भ, जन्म, तप ज्ञान निर्वाण पंचकल्याण प्राप्ताय अनर्घपद प्राप्तये महाघ निर्वपामीति स्वाहा ॥ अथ आशीर्वाद-आर्या छन्द । जो ऋषभेश्वर पूजें,मन बच काय शुद्धकर प्राणी।सो पावें निश्चैसे, मुक्त भुक्तिसार सुखदानी ॥ ४॥ इत्याशीर्वादः ॥ इतिश्री ऋषभ देव तीर्थकर पूजा संपूर्णा ।
२ अथश्रीअजितनाथजिन पूजा प्रारभ्यते। चौबी० पजन संग्रह ३०० (वृन्दावनकृत)। सर्वया वा छंद अशोक पुष्पमंजरी। स्थापना-त्याग वैजयंत सार सारधर्म के आधार, जन्मधार धीर नम श्रेष्ट कौशलापुरी । अष्टदुष्ट नष्टकार मात वैजया कुमार, आयु पूर्वलक्ष दक्ष है वहत्तरे पुरी । ते जिनेश श्रीमहेश शत्रुके निकंदनेश, अत्र हेरिये सुदृष्ट भक्तपे कृपापुरी ॥ आय तिष्ट इष्टदेव में करूं पदाजसेव, पर्म शर्म दाय पाय आप शनापुरी॥ ॐ ह्रीं श्री अजित नाथ जिनेन्द्र अत्रावतरावतर संवौषट आह्वाननम् । ॐ ह्रीं श्री अजितनाथ जिनेन्द्र अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठः ठः स्थापनम् । ॐ ह्रीं श्री अजितनाथ जिनेन्द्र अत्रमम सन्निहितो भव भव वषट् सन्निधीकरणम् ॥ अथाष्टक। छंद चिभंगी, मनुप्रयासक ॥ जल-गंगाद्रह पानी निर्मल आनी, सौरभसानी सीतानी । तसु धारत धारा त्रिषा निवारा, संतागारा सुखदानी। श्री अजित जिनेशं नुतनाकेशं, चक्रधरेशं खग्गेशं । मनवांछित दाता त्रिभुनत्राता, पूजूं ख्याता जग्गेशं॥ ॐ ह्रीं श्री अजितनाथ जिनेन्द्राय गर्भ, जन्म,तप, ज्ञान निर्वाण पंच कल्याण प्राप्ताय जन्म मृत्यु जरा रोग विनाशनाय जलं निर्वपामीति स्वाहा ।
पजन संग्रह चौबी० चन्दन-शुचि चंदन बावन ताप मिटावन, सौरभ पावन घसल्यायो । तुम भवतप भंजन हो शिव रंजन, पूजनमंजन में आयो। श्री अजितजिनेशं नुतमाकेशं चक्रवरेशं खम्गेशम् । मनवांछित दाता त्रिभुवनत्राता,पूजू ख्याताजग्गेशम् । डग ह्रीं श्री अजितनाथ जिनेन्द्राय गर्भ, जन्म, तप, ज्ञान, निर्वाण,पंचकल्याण प्राप्तायसंसारा ताप रोग विनाशनाय चन्दनं निर्वपामीति स्वाहा। ३०१ अक्षत- सितखंड विवर्जित निशिपतितर्जित, पुंजविर्जित तंडुलको । भव भाव निखर्जित शिवपद सर्जित,आनंद भर्जित दंदलको। श्री अजितजिनेशं नुतनाकेशं, चक धरेशं खग्गेशम् । मन- वांछितदाता त्रिभुवनत्राता पूजू ख्याता जग्गेशम् । उौं ह्रीं श्री अजितनाथ जिनेन्द्रायगर्भ, जन्म, तप, ज्ञान, निर्वाणपंचकल्याण प्राप्ताय अक्षय पद प्राप्तये अक्षतान् निर्वपामीति स्वाहा। पुष्प-मनमथ मदर्भजन धीरज ग्रन्थन,ग्रंथ निग्रन्थ निग्रथंपती। तुम पादको सेस,धार असेस,आदिको सेसै अर्चपती। श्रीअजित जिनेशं नुतना केशं चक्रधरेश खग्गेशम् । मनवांछितदाता त्रिभुवन त्राता, पूजू ख्याता जग्गेशम्। ह्रीं श्री अजितनाथ जिनेन्द्राय गर्भ, जन्म, तप, ज्ञान, निर्वाण पंचकल्याण प्राप्ताय काम वाण विनाशनाय पुष्पं निर्वपामीति स्वाहा। नैवेद्य-आकुल कुल वारन थिरता कारन, क्षुधा विदारन चरुलायो । षट रस कर भीने अन्न नवीने, पूजन कीने सुख पायो॥ श्री अजितजिनेशं नुतमाकेशं, चक्रधरेशं खग्गेशम् ।मनवांछितदाता त्रिभुवनत्राता पूजू ख्याता जग्गेशम् । डों ही श्री अजितनाथ जिनेन्द्राय गर्भ, जन्म, तप,ज्ञान, चौबी० पजन संग्रह ३०२ निर्वाण पंचकल्याण प्राप्ताय क्षुधारोग विनाशनाय नैवेद्यंनिर्वपामीति स्वाहा ॥ दीप-दीपक मणिमाला जोत उजाला, भर कनथाला हाथलिया। तुम भ्रमतम हारी शिव सुखकारी, केवलधारी पूजकिया। श्री अजितजिनेशं नुतनाकेशं । चक्रधरेशं खग्गेशम् । मनवांछितदाता त्रिभुवन त्राता, पूजू ख्याता जग्गेशम् । रों ह्रीं श्रीअजितनाथ जिनेन्द्राय गर्भ, जन्म तप, जान निर्वाणपंचकल्याण प्राप्ताय मोहांधकार विनाशनाय दीपं निर्वपामीति स्वाहा। धूप-अगरादिक चूरन परिमल पूरन, खेवत कूरन करम जरै । दशहूं दिशि ध्यावत हर्ष बढावत, अति गुण गावत नृत्य करें। श्री अजितजिनेशनुतनाकेशं,, चक्रधरेशं खग्गेशम् । मनवांछित दाता त्रिभुवनत्राता, पूजु ख्याता जग्गेशम् । • ह्रीं श्री अजितनाथ जिनेन्द्राय गर्भ जन्म, तप, ज्ञान, निर्वाण पंचकल्याण प्राप्ताय अष्ट कर्म दहनाय धूपं निर्वपामीति स्वाहा। फल-बादाम नरंगी श्रीफल चंगी, आदि अभंगी सो अरचूं। सब विघ्न विनाशै सुख परकाशे, आतम भाशै भव विरचूं। श्री अजित जिनेशं नुतनाकेश चक्रधरेशं खग्गेशम्। मनवांछित दाता त्रिभुवनत्राता, पूजूं ख्याता जग्गेशम् । डों ह्रीं श्री अजितनाथ जिनेन्द्राय गर्भ, जन्म, तप ज्ञान, निर्वाण पंचकल्याण प्राप्ताय मोक्ष फल प्राप्तये फलं निर्वपामीति स्वाहा। अर्घ-जल फल सब सज्जे पाजत बज्जे, गुणगण रज्जे मन मज्जे। तुम पद युग मज्जे सज्जनजज्जे, ते भव भज्जे निज कज्जे। श्री अजितजिनेशं नुतमाकेशं, चक्र धरेशं खग्गेशम् । मनवांछित दाता रे - चौवी० पजन संग्रह ३०३ त्रिभुवन त्राता पूजं ख्याता जग्गेशम् । डों ह्रीं श्रीअजितनाथ जिनेन्द्राय गर्भ, जन्म, तप, ज्ञान, निर्वाण पंचकल्याण प्राप्ताय अनर्घपद प्राप्तये अर्घ निर्वपामीति स्वाहा । पथ पंचकल्याणक। छंद दुतिमयकं। गर्भ-जेठअसेत अमावस सोहे। गर्भदिनानंदसो मन मोहे । इंद्र फनीद्र जर्जे मनलाय । हम पद पूजत अर्घ चढाय ॥१॥ ' डोह्रीश्रीअजितनाथ जिनेन्द्राय ज्येष्ठ कृष्णअमावस्या गर्भ कल्याणकायअर्घनिर्वपामीतिस्वाहा जन्म-माघशुदी दशमी दिन जाए । त्रिभुवन मे अति हर्ष बढाए । इंद्र फनिंद्र जजै तित आय । हम इत सेवत मन हुलसाय ॥२॥ ॐ ह्रीं श्रीअजितनाथ जिनेन्द्राय माघशुक्ल दशमी जन्म कल्याणकायअर्घ निर्वपामीतिस्वाहा तप-माघशुदी नवमी तपधारा । भवतन भोग अनित्य विचारा । इंद्र फनींद्र जर्जे तित आय । हम पद पूजें हैं सिरनाय ॥३॥ डोंह्रीं श्रीअजितनाथ जिनेन्द्राय माघशुक्ल नवमी तप कल्याणकायअर्घ निर्वपामीति स्वाहा। ज्ञान-पौष शुकल, ग्यारस शुभदाय। त्रिभुवन भान सुकेवल पाय । इंद्र फनींद्र जजै तित आय । हम पद पूर्जे प्रीत लगाय ॥४॥ - चौबी० पजन संग्रह ३०४ ॐ ह्रीं श्रीअजितनाथ जिनेन्द्राय । पौष शुक्ल एकादशी ज्ञान कल्याणकाय अनिर्वपामीतिस्वाहा निर्वाण-पंचमि चैत्रशुदी निरवाण। निजगुण राजलियो भगवान । इंद्र फनींद्र जजे तितआय। हमपद पूर्जेहैं मुणगाय ।। ठोंह्रीं श्रीअजितनाथजिनेन्द्राय चैत्रशुक्लपंचमी मोक्षकल्याणकाय अर्घनिर्वपामीतिस्वाहा अथ जयमाला। दोहा। महाअर्घ-अष्ट दुष्टको नष्टकर, इष्ट मिष्ट निजपाय । सिष्टधर्म भाखो हमें, पुष्ट करो जिनराय ॥१॥ छंद पद्धडी । जय अजितदेव तुम गुण अपार । मैं कहूं कछुक लघुबुद्धि. धार । दश जन्मत अतिशय वल अनंत । शुभ लक्षण मधुर वचन भनंत ॥ २ ॥ संहनन प्रथम मल रहित देह । तन सौरभ श्रोणित श्वेत जेह । वपु स्वेदविना महरूप धार । समचतुर धरै संठाण सार ॥३॥ दश केवल गमन आकाश देव । सुरभिक्ष रहै योजन शतेव। उपसर्ग रहित जिनतन सुहोय। सबजीव रहित वाधा सुजोय । मुखचार सर्वविद्या अधीश । कवला अहार वर्जित गरीश । छाया बिन नखकच बढे नाहि । उन्मेष टमकनहि भ्रुकुटिमाहि॥५॥सुरकृत चौदह अतिशय बखान। सबजीव मित्रता भावजान । कटक विन दर्पन वत सुभूम। सब धान्य वृक्षफल रहे झूम। ॥६॥ षटऋतुके फूल फले निहार । दिशि निर्मल जियआनंद धार । जय शीतल मंद सुगंध वाय। पद पंकजतल पंकज रचाय ॥णामल रहित गगन सुरज उचार वरषा गंधोदक होतसार । वर धर्मचक्र आगै चलाय । वसु मंगल द्रव्य धरे बनायावासिंहासन छत्र चमर सुहाय। भा मंडल छबि वरनीन जाय । तरु उच्च अशोकरु पुष्पवृष्टि । ध्वनि दिव्य और पजन चौबी० / दुंदुभी मिष्ट ॥९॥ गज्ञान शर्म वीरज अनंत । गुण छियालीस इम तुमलहंत । इन आदि अनंते सगुण धारावरनत गणपनि नहि लहत पार।१०।तुम समोसरण मह इंद्र आय । पदपजत वसुविधि द्रव्यलाय। संग्रह अति भक्ति सहित नाटक रचाय । ताथेइ थेइ धुनि रहीछाय ॥ ११॥ पगनपुर सननन सनननाय । ३०५ तननन तननन तानगाय । घननननननन घंटा घनाय । छम छम छम छम घुघरू बजाय ॥ १२ ॥ टम टम टम टम दम मुरज ध्वान। संसाप्रविसारंग भरत तान । झट सट झट अट पट नटत नाटा इत्यादि रच्यो अद्भुत, सु ठाठ ॥१३॥ पुनि बंद इंद्र नुत थुति करंत । तुमहो जगमें जयवत संत । फिर तुम विहार कर धर्मवृष्टि । सब योग निरोधो परमदृष्टि ॥ १४॥ सम्मेदथकी लिय मुक्तिथान । जय सिद्ध शिरोमणि गुणनिधान ।श्रृंदावन वंदत वार वार । भव सागरते मोहि तार तार ॥१५॥ घचाछन्द। जै अजित कृपाला गुणमणि माला,संयमसाला बोधपती॥वर सुजस उजाला हीरहि माला ते अधिकाला स्वच्छ अती ॥ १६ ॥ • ह्रीं श्रीअजितनाथ जिनेंद्राय गर्भ, जन्म, तप, ज्ञान निर्वाण पंचकल्याण प्राप्ताय अनर्घपद प्राप्तये महा निर्वपामीति स्वाहा । अथ आशीर्वाद (छंद मदावलिप्त) जो जन आजत जिनेश जजैहे मन वचकाई । ताको होय अनंत ज्ञान सम्पति सुख दाई। पुत्र मित्र धन धान्य सुजस त्रिभुवनमे छावें । सकल शत्रु क्षयजांहि अनुक्रम सो शिव पार्दै • ॥ इत्याशीर्वादः ॥ इति श्रीअजितनाथ जिन पूजी संपूर्णा ॥२॥ " ।
चौबी. पजन F ३ अथ श्रीसंभवनाथजिन पूजा लिख्यते। संग्रह ३०६ ॥ ॥ ॥ वृन्दाबनकृत । छंद मदावलिप्त कपोल ॥ स्थापना-जय संभव जिनचंद सदा हरिगण चकोर नुत । जयसेना जसुमात जयतराजा जितारि सुत ॥ तज ग्रीवक ले जन्म नगर सावित्री आई । सो भव भंजन हेत भगत पर होऊ सहाई ॐ ह्रीं श्रीसंभवनाथजिनेन्द्र अत्रावतरावतर संवौषट् आह्वाननम्। ॐ ह्रीं श्रीसंभवनाथजिनेन्द्र अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठाठः स्थापनम् । ॐ ह्रीं श्रीसंभवनाथजिनेन्द्र अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट् सन्निधीकरणम् । पथ अष्टक । छंद चौवोल। (ख्याल)॥ जल-मुनिमन सम उज्वल जल लेकर, कनक कटोरीमे धारा । जनम जरा मृत नाश करनको, तुम पदतर डाळं धारा ॥ संभव जिनके चरन चरचते, सब आकुलता मिटजावै। निजनिधि ज्ञान दरश सुख वीरज, निराबाध भविजन पावै ॥ॐ ह्रीं श्रीसंभवनाथजिनेन्द्राय गर्भ, जन्म, तप, मान, निर्वाण पंचकल्याण प्राप्ताय जन्म मृत्यु जरारोग विनाशनाय जलं निर्वपामीति स्वाहा। चन्दन-तपत दाहको कंदन चंदन मलयागिरको घसलायो। जगवंदन भी फंदन खंडन समरय लख शरने आयो ॥ संभव जिनके चरण चरचते सब आकुलता मिटजावें । निज निधि ज्ञान वरश - चौबी० - पजन ३०७ सुख वीरज, निराबाध भविजन पावै ॥ ॐ ह्रीं श्रीसंभवनाथजिनेन्द्राय गर्भ, जन्म, तप, ज्ञान, निर्वाण पंचकल्याण प्राप्ताय संसारा ताप रोग "विनाशनाय चन्दनं निर्वामीति स्वाहा। संग्रह अक्षत-देवजीर सुखदास कमलवासित सित सुन्दर अनियारे । पुंजधरूं जिन चरनन आगे लहू अखै. पद को प्यारे ॥ संभव जिनके चरण चरचते सब आकुलता मिटजावे । निज निधि ज्ञान दरश सुख वीरज निरावाध भविजन पावै ॥ ॐ ह्रीं श्रीसंभवनाथजिनेन्द्राय गर्भ, जन्म, तप, ज्ञान, निर्वाण पंचकल्याण प्राप्ताय अक्षय पद प्राप्तये अक्षतान् निर्वपामीति स्वाहा। पुष्प-कमल केतुकी बेल चमेली चंपा जुइ जु सुमन वरा । तातूं पूजत श्रीपति तुम पद मदनबाण विध्वंस करा ॥ संभव जिनके चरण चरचते सब आकुलता मिटजावै। निज निधि ज्ञान दरश सख वीरज निराबाध भविजन पावै ॥ ॐ ह्रीं श्री संभवनाथजिनेन्द्राय गर्भ, जन्म, तप, ज्ञान, निर्वाण पंचकल्याण प्राप्ताय कामवाण विनाशनाय पुष्पं निर्वपामीति स्वाहा। नैवेद्य-घेवर वावर मोदन, मोदक खाजा ताजा सरस बना । तासोंपद श्रीजिनको पूजत क्षुधारोग, तत्काल हना ॥ संभव जिनके चरण चरचते सब आकुलता मिटजावे। निज निधि ज्ञान दरश, सख वीरज निराबाध भावजन पावै ॥ ॐ ह्रीं श्रीसंभवनाथ जिनेन्द्राय, गर्भ, जन्म, तप, ज्ञान, निर्वाण पंचकल्याण प्राप्ताय क्षुधारोग विनाशनाय नैवेयं, निर्वपामीति. स्वाहा । दीप-घटपट परकाशक घनतमनाशक तमढिग ऐसो दीप धरूं । केवल, जोत उद्योत होऊ मो यही 1 ।
। चोबी० पजन संग्रह ३०८ सदा अरदास करूं। संभव जिनके चरण चरचते सब आकुलता मिटजावे । निज निधि ज्ञान दरश सुख वीरज निरावाध भविजन पावै॥ ॐ ह्रीं श्रीसंभवनाथ जिनेन्द्राय गर्भ, जन्म, तप, ज्ञान, निर्वाण पंचकल्याण प्राप्ताय मोहांधकार विनाशनाय दीपं निर्वपामीति स्वाहा । धूप-अगर तगर कृष्णागर श्रीखडादिक चूर हुतासनमे । खेवतहूं तुम चरण जलजटिग करमछार जर हुए छिनमे ॥ संभव जिनके चरण चरचते सब आकुलता मिटजावै । निज निधि ज्ञान दरश सुख वीरज निराबाध भविजन पावै ॥ ॐ ह्रीं श्रीसंभवनाथजिनेन्द्राय गर्भ, जन्म, तप, ज्ञान, निर्वाण पचकल्याण प्राप्ताय अष्ट कर्म दहनाय धूपं निर्वामीतिस्वाहा। फल-श्रीफल लौंग बदाम छुहारा एला पिस्ता दाखरमै । ले फल प्रासुक पूजू तुम पद देऊ अखेपद नाथ हमें ॥ संभव जिनके चरण चरचते सब आकुलता मिटजावै। निज निधि ज्ञान दरश सुख वीरज निरावाध भविजन पावै ॥ॐ ह्रीं श्रीसंभवनाथ जिनेन्द्राय गर्भ, जन्म, तप, ज्ञान, निर्वाण पंचकल्याण प्राप्ताय मोक्षफल प्राप्तये फलं निर्वपामीति स्वाहा । अर्घ-जल चंदन तंडुल प्रसून चरु दीप धूप फल अर्घ किया। तुम को अरपू भाव भगति धर जैजे जे शिव रमन पिया ॥ संभव जिनके चरण चरचते सब आकुलता मिटजावे । निज निधि ज्ञान दरश सुख वीरज निराबाध भविजन पावै ॥ ॐ ह्रीं श्रीसंभवनायजिनेन्द्राय गर्भ, जन्म, तप, ज्ञान, निर्वाण पंचकल्याण प्राप्ताय अनर्घपद प्राप्तये अर्घ निर्वपामीति स्वाहा। - --
-
सेबी०
पजन
संग्रह
३०९
है
अथ पंचकल्याणक (छंदहंसी)
गर्भ-माता गर्भ विषे जिनआय। फागुणसित आठे सुखाय ।। सेयो सुरनिय उप्पन एंव नानाविधि
में जजू जिनिंद ॥ ॐ ह्रीं श्रीसंभवनाथजिनेन्द्राय फाल्गुण शुक्ल अष्टमी गर्भ कस्याणकाय अर्घ
निर्वपामीति स्वाहा
जन्म-कातिक सित पूनम तिथिजान । तीन ज्ञानयुत जन्म प्रमान । धर गिरराजजजे सुर राज । तिन्हें
जजू में नितहित काज ॥ ॐ हीं श्रीसंभवनाथ जिनेन्द्राय कार्तिक शुक्ल पूर्णिमा जन्म कल्याण
काय अर्घ निर्वपामीति स्वाहा ।
तप-मगसिर सित पून्यों तप धार। सकल संग तन जिन अनगार ।। ध्यानादिक वल जीते कर्म । चरचू
चरन देऊ शिवशर्म ॥ ॐ ह्रीं श्रीसंभवनाथजिनेन्द्राय मार्ग शिर शुक्ल पूर्णिमा तप कल्याणकाय
अर्घ निर्वपामीति स्वाहा।
ज्ञान-कार्तिक कलतिथि चौथ महान । घाति घान लिय केवल ज्ञान ॥ समवसरण, में तिष्टे देव ।
तुरिय चिहन चरचं वसुभेव ॥ ॐहीं श्रीसंभवनाथजिनेन्द्राय कार्तिक कृष्ण चतुर्थी शान कल्याण
काय अर्घ निर्वपामीति स्वाहा।
निर्वाण-चैत शुकल तिथि षष्टी घोष। गिरि समेदतें लीनो मोष ॥ चार शतक धनु अवगाहना।
२
चौबी० पूजन संग्रह १३१० ॥ जजू तासपद थुतिकर घना ॥ ॐ दी श्रीसंभवनाथ जिनेन्द्राय चैत्र शुक्ल षष्ठी मोक्ष कल्याणकाय अर्घ निर्वपामीतिः स्वाहा। अथ जयमाला (दोहा), महाअर्घ-श्रीसंभवके गुण अगम, कहिन सकत सुरराज में वश भगतिसुधीठव्हे, विनवूनिजहितकाज ॥ छंद मोतीदाम-जिनेश महेश गणेश गरिष्ठ । सुरासुर सेवित इष्ठ वरिष्ठ ॥ धरै वृषचक कर अपचूर । अतत्व क्षपातम मनसूर । सुतत्व प्रकाशन शासन शुद्ध । विवेक विराग बढावन बुद्ध ॥ दयातरु तर्पन मेघमहान । कुनयगिरि गंजन वजसमान ॥ सुगर्भ जन्म महोत्सव माहि । जगज्जन आनंदकंद लहाहि ॥ सो. पूरव साठहि लक्षजु आय । कुमार चतुर्थम अंस रमाय ॥ चवालिस लाखसु पूरव एव । निकंटक राज कियो जिनदेव ॥ तजो कछु कारनपाय सुराज । धरे व्रतसंयम आतमकाज ॥ सुरेंद्र नरेंद्र दियो पय दान । धरे वनमें निज आतम ध्यान ॥ कियो चवघाति कर्म विनाश। लियो तब केवल ज्ञान प्रकाश ॥ भए समवश्रुत ठाठ अपार । खिरे धुनि झेलहि श्रीगणधार ॥ भने षट द्रव्य तने ! विस्तार चहू अनुयोग अनेक प्रकार ॥ कहे पुन त्रेपन भाव विशेष । उभय विधि है उपसमजु भेष ॥ सु सम्यक् चारित्र भेद सरूप । अबै इम छाइक नो सुअनूप ॥ ८॥हगो बुधि- सम्यक चारित दान । सु लाभरु भोगुप भोग प्रमाण ॥ सुवीरज संयुत ए नव जान । अठारह छयोपसम इममान ॥९॥ मति श्रुति अवधि उभेविध जान। मनपरजे चक्षु और प्रमान ॥ अचक्षु तथावधि दानरुलाभ । सभोगुप । पी. पजन संग्रह ॥ - भोगरु वीरज साभ ॥१०॥तावत संयम और सुधार । धरे गुण सम्यक चारित भार॥ भए वसु एक सभापति एह । इकीस उदीक सुनो अब जेह ॥ ११॥ चहूंगत चार कषाय तिवेद । छः लेश्या और अज्ञान विभेद ॥ असंयमभाव लखो इसमाहि । असित और अतव कहांहि ॥ १२ ॥भए एकवीस सुनो अब और । विभेद त्रय परिणाम कठोर ॥ सुजीवित भव्यत ओर अभव्य । तरेपन येम भने जिन सव्यः ॥ १३॥तिन्होंमें कितेक त्यागन जोग। कितेक गहें सुमिटे भवरोग ।। कहो इन आदि लहो फिर मोख । आनंतगुणातम मंडित चोख ॥१४॥ जजूं तुम पाय जप गुणसार । प्रभू हमको भवसागर तार । गहिं शरणागत दीनदयाल । विलंब करो मत हे गुणमाल ॥ १५ ॥ पत्ताछन्द-जै जै भवभंजन मुनिमन रंजन दया धुरंधर कुमति हरा॥ वृंदावन वंदत मन आनंदत दीजे आतम ज्ञान वरा ॥ १६ ॥ ॐ ह्रीं श्रीसंभवनाथ जिनेन्द्राय गर्भ, जन्म, तप, ज्ञान, निर्वाण पंचकल्याण प्राप्ताय • अनर्थ-पद प्राप्तये महाघ निर्वपामीति स्वाहा। अथ आशीर्वाद । छंद अडिल-जो वाचें यह पाठ सरस संभवे तनो। सो पावें धनधान्य सरस संपति घनो । सकल पाप छै जाय सुजस जगमें बढे। पूजत सुरपद होय अनुक्रम शिव चढे॥ १७॥ इत्याशीर्वादः । इति श्रीसंभवनाथजिन पूजा संपूर्णा ॥३॥ J - . चौबी० ४ अथ श्रीअभिनन्दन नाथ जिन पूजा प्रारभ्यते। समह (वृन्दावनकृत) छंद मदावलिप्तकपोल ॥ ३१२ स्थापना-अभिनंदन आनंदकंद सिद्धारथ नंदन । संवर पिता दिनंदचंद, जिहि आवत बंदन॥ नगर अयुध्या जनम, इंद्र नागेंद्रजु ध्यावें तिने जजनके हेतु, थाप हम मंगल गावें ॥१॥ डों ही श्रीअभिनंदननाथ जिनेन्द्र अत्रावतरावतर संवौषट आह्वाननम् । डों ही श्री अभिनन्दनाथ जिनेन्द्र अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठः ठः स्थापनम् । डों ही श्री अभिनन्दननाथ जिनेन्द्र अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट सन्निधीकरणम् । अथ अष्टकोकुंद गीता। जलं-पमहगत गंगचंग,अभंग धारसुधारहे । कनकमणि गणजडित,झारीद्वारधारनिकार है । कलुपताप निकंद,श्रीअभिनंदअनुपमचंदहे। पदवंद बंदजजैप्रभ,भवदंदफंद निकंद है। उोह्रीं श्रीअभिनन्दननाथ जिनेद्राय गर्भ, जन्म, तप, ज्ञान, निर्वाण पंचकल्याण प्राप्तायजन्म मृत्युजरा रोगविनाशनाय जलं० चन्दन-शीत चंदन कदलि नंदन, सुजल संग घसायकै । है सुगंध दशों दिशामे, भ्रमै मधुकर आयके। 'कलुपतापनिकंद श्री अभिनंद अनुपम चंद । पद बन्द वृन्द जजै प्रभू भवदन्द फन्द निकन्द है। : डों ही श्री अभिनन्दननाथ जिनेन्द्राय गर्भ, जन्म, तप, ज्ञान, निर्वाण पंचकल्याण प्राप्ताय संसाराताप रोग विनाशनाय चन्दनं निर्वपामीतिस्वाहा॥
पजन . PAL 1 . - चौबी० अक्षत-हीर हिम शशिफेन मुक्ता, सरस तंडुल सेत है। तासको ठिंग पुंज धारू', अखै पदके हेत है। कलुष ताप निकंद श्री अभिनंद अनुपम चंद है। पदं वन्द वृन्द जजै प्रभू भवदंद फदनिकन्द है । संग्रह ॐ ह्रीं श्री अभिनन्दनाथ जिनेन्द्राय गर्भ, जन्म, तप, ज्ञान, निर्वाण पंचकल्याण प्राप्ताय ३१३ अक्षय पद प्राप्तये अक्षतान निर्वपामीति स्वाहा। पुष्प-समर सुभट मिटन कारण, सुमन सुमन समानहै । सुरभिते जाप करे, झंकार मधुकर आन. कलुषताप निकंद श्री अभिनंद अनुपम चंद है । पद बन्द वृन्द जजे प्रभभवदंद फंद निकन्द है। ओं ह्रीं श्री अभिनन्दनाथ जिनेन्द्राय गर्भ, जन्म, तप, ज्ञान निर्वाण पंचकल्याण प्राप्ताय काम वाण विनाशनाय- पुष्पं निर्वपामीति स्वाहा। नैवेद्य-सरस ताजे नव्य गव्य,मनोग चित हरलेयजी । छुधाछेदन छिमा छितिपतिके, चरन चरचेयजी। कलुषताप निकंद श्री अभिनंद अनुपम चंद है । पदवन्द-वृन्द जजे प्रभू भवदंद फन्द निकन्द है। ॐ ह्रीं श्री अभिनन्दननाथ जिनेन्द्राय गर्भ, जन्म, नप, ज्ञान, निर्वाण पंचकल्याण प्राप्ताय क्षुधा रोग विनाशनाय नैवेयंनिर्वपामीति स्वाहा। वीप-आतम तम मर्दन किरन, वरबोध भानु विकाश है । तुम-चरनढिग दीपकधरूं, मोहिहोउ सुपर- -- प्रकाश है । कलुपताप निकंद श्री अभिनंद अनुपम चंद है. पदवन्द वृन्द जजे 'प्रभू भवदंद फंद निकन्द है।.. 'डों ह्रीं श्री अभिनन्दननाथ जिनेन्द्रायगर्भ, जन्म, तप, ज्ञान, निर्वाण पंच- - चौबी० संग्रह कल्याण प्राप्ताय मोहधिकार विनाशनाय दीपंनिर्वपामाति स्वाहा। धप-भूर अगर कपूर चूर, सुगंध अगनि जराय है। सब करम काष्ट सुकाष्टमें,मिस,धूप धूम उडाय है कलुषताप निकंद श्रीअभिनंद अनुपम चंद है । पद वन्द वृन्द जजै प्रभू भवदंद फंद निकन्द है ॥ गे ही श्री अभिनन्दन नाथ जिनेन्द्राय गर्भ, जन्म, तप, ज्ञान निर्वाण पंचकल्याण प्राप्ताय अष्ट कर्मदहनाय धूपं निर्वपामीति स्वाहा । फल-आंब निंबू सदा फलादिक, पक्क पावन आनजी। मोक्ष फलके हेतु पूजं, जोर के युग पानजी । कलुषतापनिकंद श्री अभिनंद अनुपम चंद है। पदवन्द वृन्दजजे प्रभु भवदंद फंद निकन्द है। डों ही श्री अभिनन्दननाथ जिनेन्द्राय गर्भ, जन्म, तप, ज्ञान निर्वाण पंचकल्याण प्राप्ताय मोक्ष फल प्राप्तये फलं निर्वपामीति स्वाहा । अर्घ-अष्ट द्रव्य समार सुंदर, सुजस गाय रसाल ही । नचत रचत ज® चरणयुग नायनाय सुभालही। कलुपताप निकंद श्री अभिनंद अनुपम चंद है । पद वन्द वृन्द जजै प्रभभवदंद फद निकन्द है गे ही श्री अभिनंदननाथ जिनेन्द्राय गर्भ, जन्म, तप, ज्ञान निर्वाण पंचकल्याण प्राप्ताय अनर्षपदप्राप्तय अर्घ निर्वामीति स्वाहा। पथ पंच कल्याणक (छन्द हरिपद) गर्भ-गुकल छट वैशाख विष तज, आए श्रीधरदेव । सिद्धारथ माताके उदरमें करेंशची शुचि सेव ।
ELE - रतन वृष्टि आदिक वरमंगल, होत अनेक प्रकार। ऐसे गुणनिधिको में, पूजंध्या वारंवार ॥१॥ डोंही श्रीअभिनंदननाथ जिनेन्द्राय वैशाख शुक्ल षष्टी गर्भ, कल्याणकायअर्घ निर्वपामीतिस्वाहा जन्म-माघशुकल तिथदादशके दिन,तीन लोकहितकार।अभिनंदन आनन्दकन्दतुम लीनों जगअवतार। एक महूरत नरक माहिह,पायो सबजिय चैन। कनकवरन कपि चिन्ह धरन,पद जजूंतुम्हें दिनरेन॥२॥ ॐ ह्रींश्रीआभनदननाथ जिनेन्द्राय माघशुक्ल द्वादशीजन्म कल्याणकायअघनिर्वपामीति स्वाहा तप-साढे छत्तिस लाख सुपूरव, राजभोग वरभोग । कछु कारण लखमाघशुक्ल, द्वादशिको धारो योग। षष्टम नेम समापत करलिये, इंद्रदत्तघर छोर।जय धुनि पुष्परतन गंधोदक, वृष्टि सुगध समीर।३। डोहीं श्रीअभिनंदननाथ जिनेन्द्राय माघशुक्ल द्वादशी तप कल्याणकाय अर्धनिर्वामीति स्वाहा ज्ञान-पोष क्षुक्ल चौदसको घाते, घाति करम दुखदाय । उपजायो वरबोध जासको केवलिनाम कहाय । समवसरण लहि बोध धरम कहि भव्यजीव सुखकंद। मोको भवसागरते तारो जेजेजे अभिनंद ४ उही श्रीमभिनंदननाथ जिनेन्द्राय पोषशुक्लचतुर्दशी ज्ञान कल्याणकाय अर्घनिर्वपामीतिस्वाहा निर्वाण-योगनिरोध अघाति घात लहि गिर समेदतेंमोख।मास सकलसुखरास कहेवैशाखशुक्लछठचोख । चतुरनिकाय माय तितकीनोभगतिभाव उमगाय।हम पूजें इतअर्घलेयजिमि विधन सघन मिटजाय डोंहीश्रीअभिनंदननाथ जिनेन्द्राय वैशाखशुक्ल षष्टी मोक्ष कल्याणकाय अघ निर्वामीतिस्वाहा - .
4 । नौवी० अथ नयमाला ।दोहा। पूजन संग्रह महाअर्घ-तुंग सुतन धनु तीनसो,अरु पचास सुख धाम। कनक वरन अवलोकिकै,पुनिपुनि करूं प्रणाम? छंद लक्ष्मीधरा-सच्चिदानंद सज्ञान सदसरनी । सत्सरूपा लई सरसुधा सरनी। सर्व आनंदकंदा महा देवता। जास पदान्ज से सदा देवता ॥२॥ गर्भ औ जन्म निःकर्म कल्याण में । सत्वको शर्मपूरै सबे थानमें । वंश इक्ष्वाकमें आप ऐसे भए । ज्यों निशा सर्दमें इंदु स्वच्छे ठये ॥३॥होत वैराग्य लोकांतसुर बोधियो,फेर शिविका सुचढि गहन निज सोधियो। घाति चौघातिज्ञान केवल भयो । समवसर्णादि धन देव तब निर्मियो ॥४॥ एक है इंद्र नीली शिला रत्नकी। गोल साढेदसै योजने जत्न की। चार दिश पंडिका वीस हज्जारहें। रत्नके चूरका कोट निरधारहें।५। कोट चहूं ओर चढूंद्वार तोरनखचें । तास आगे चहूं मानवा रचे । मान मानी तजे जास ढिग जायके । नम्रताधार सेवे तुमें आयके ॥ ६॥ विंब सिंहासनों पर तहां सोह ही। इंद्र नागेंद्रके ते मने मोह ही। वापिका वारिसो जत्र सोहभरी, । जासमें न्हातही पापजावै टरी।७। तास आगे भरी खातिका बारिसों । हंस सूवादि पक्षी रमें प्यारसों । पुष्प की वाटिका बाग वृक्षे जहां । फूल औ श्री फलें सर्वही, तहां । ८। कोंट सोवर्ण का तासआगे खडा, चार दरवाजे चौ ओर रत्नों जडा। चार उद्यान चारों दिशामे गिना । हे ध्वजापंक्ति औ नाटशालाबना।९। तास आगे तृतीकोट रूपा मई । तूपनो जास चारों दिशामें ठई। धामासद्धांत धारीनके हैं जहां । - पजन चौबी० || औ सभाभूमि हे भव्यतिष्ठं तहां ॥ १०॥ तासु आगे रची गंधकूटी महा। तीन हैं कहनी सार शोभा लहा। एक पैतो निधेही धरी ख्यात हैं । भव्य प्राणी तहांलो सबै जात हैं॥ ११ ॥ उसरी पीठ चक्र धारी गमें। तीसरी प्रातिहार्य लसें भागमें । तासपै वेदिका चार थंभानकी । है बनी सर्व कल्याणके सग्रह ३१७ खानकी ॥ १२ ॥ तासपे हैं सुसिंहासनं भासनं । जासपै पन प्राफुल्ल हे आसनं । तासुपे अंतरीक्षं विराजें सही। तीन छत्रे फिरै सीस रत्ने यही ॥ १३॥ वृक्ष शोकापहारी अशोके लसें । दुंदुभी नाद ओ पुष्पखंते खसे । देहकी जोतसों मंडलाकार है । सात भव भव्य तामें लखें सारहे ॥ १४॥दिव्यबोनी खिरे सर्वशंका हरॆ । श्रीगणाधीश झेलें सु शक्ती धरै। धर्मचकी तुही कर्मचक्रीहने । सर्व शकी नमें मोद धारें घनें ॥१५॥ भव्यको बोध सम्मेदते शिव गए । तत्र इंद्रादि पूजै सुभक्ती मए । हे कृपासिंधु मोपे कृपा धारिए । घोर संसारते शीघ्र मो तारिए ॥१६॥ पत्ता छन्द-जै जै अभिनंदा आनंदकंदा, भवसमुद्र वरपोत इवा । भ्रमतम सत खंडा भानु प्रचंडा, तार तार जग रैनदिवा ॥ १७॥ डों ह्रीं श्रीअभिनंदननाथ जिनेन्द्राय गर्भ, जन्म. तप, ज्ञान, निर्वाण पंचकल्याण प्राप्ताय अनर्घपद प्राप्तये महाघ निर्वपामीति स्वाहा। पत्ता छन्द-अथ आशीर्वाद श्री अभिनंदन पाप निकंदन, तिन पद जो भवि जजें सुधार ताके पुन्य भानु वर जगे, दुरित तिमिर फाटे दुखकार । पुत्र मित्र धनधान्य कमल यह विकसे सुखद जगत हित प्यार। कछुक कालमें सो शिवपावें,पढ़ें सुनें जिन जजै निहार ॥ १८॥ इत्याशीर्वादः ॥इति.
। चौवी० दीप-रतन जडित-अथवा घृत पूरित, वा कपूरमय जोत जगाय । दीप धरूं तुम चरनन आगे, जाते पूजन केवलज्ञान लहाय । हरिहर बंदिनं पाप निकंदित सुमतिनाथ त्रिभुवन के राय। तुम पद पद्म संग्रह सद्म- शिवदायक जजत मुदित मन उदित सुभाय । डों ह्रीं श्री सुमतिनाथ जिनेन्द्राय गर्भ जन्म ३२० तप, ज्ञान, निर्वाण पंचकल्याण प्राप्ताय मोहांधकार रोग विनाशनाय दीपंनिर्वपामीतिस्वाहा । धूप-अगर तगर कृष्णागर चदन, चूर अगनि में देत जराय । अष्ट करम यह दुष्ट जरत हैं धूम धूम यह तास उडाय । हरि हर बंदित पाप निकंदित सुमतिनाथ त्रिभुवन, के राय। तुम पद पद्म सद्म शिवदायक जजत मुदित मन उदित सुभाय । रों ह्रीं श्री सुमतिनाथ जिनेन्द्राय गर्भ, जन्म, तप,ज्ञान, निर्वाणपंचकल्याण प्राप्ताय अष्टकर्म दहनाय धूपं निर्वपामीति स्वाहा । फल-श्रीफल पूगी कदली दाडिम, आंब निवु फल प्रासुक लोय । मोक्षमहा फल चाखन कारण पूजतहूं तुमरे युग पाय । हरि हर बंदित पाप निकदित सुमतिनाथ त्रिभुवन के राय । तुम पद पद्म-समशिवदायक-जजत मुदित मन उदित सुभाय। ॐ ह्रीं श्री सुमतिनाथ जिनेन्द्राय गर्भ जन्म, तप, ज्ञान निर्वाण पचकल्याण प्राप्ताय मोक्ष फल प्राप्नये फलं निर्वपामीति स्वाहा । अर्घ-जल चंदन तंडुल प्रसून चरु, दीप धूप फल सकल मिलाय। नाच राच सिरनाय समचूं, जैजै जै जै जै जिनराय । हरिहर बंदित पाप निकंदित सुमतिनाथ त्रिभुवन के राय । तुम पद पद्म सम शिवदोयक जजत मुदित मन उदित सुभाय । ॐ ह्रीं श्री सुमतिनाथ जिनेन्द्राय गर्भ, जन्म .
तौबी०
संग्रह
३२१
.
1
तप, ज्ञान, निर्वाणपंचकल्याण प्राप्ताय अनर्घपद प्राप्तये अघ निर्वपामीति स्वाहा ॥
अथ पंचकल्याणक चौपई।
गर्भ-संजयंत तज गरभ पधारे। श्रावण शुदि दुतिया सुखकारे । रह अलिप्त मुकर जिमछाया । जजूं
चरन जैजै जिनराया ॥१॥ डों ही श्रीसुमतिनाथ जिनेन्द्राय श्रावण शुक्ल द्वितीया गर्भ
कल्याणकाय अर्घ निर्वपामीति स्वाहा।
जन्म-चैत्र शुक्ल ग्यारस कहजानो। जन्मे सुमति सहित अयज्ञानो । मानो धरो धरम अवतारा। जजू
चरण युग अष्ट प्रकारा॥२॥ डों ह्रीं श्रीसुमतिनाथ जिनेन्द्राय चैत्र शुक्ल एकादशी जन्म
कल्याणकाय अर्घ निर्वपामीति स्वाहा ।
तप-नवमी सित वैशाख ही भाखो। तादिन तपधर निज़रस चाखा ।पारण पन सम्म पय कीनो । जजत
चरन हम समता भीनो॥३॥ डों ह्रीं श्रीसुमतिनाथ जिनेन्द्राय वैशाख शुक्ल नवमी तप
कल्याणकाय अधैं निर्वपामीति स्वाहा।
ज्ञान-शुकल चैत्र एकादशि हानें। घातिसकल जे जगपति जानें। समवसरण में कहे वृषसारं । जजू
अनंत चतुष्टय धारं ॥४॥ डों ही श्रीसुमतिनाथ जिनेन्द्राय चैत्र शुक्ल एकादशी ज्ञान
कल्याणकाय अर्ष निर्वपामीति स्वाहा।
-
चौबी० पूजन संग्रह ३२२ निर्वाण-चैत्र शुकल ग्यारस निरवाणा। गिर समदतें त्रिभुवन माना । गणअनंत निज निर्मलधारी। जजू देव सुधलेऊ हमारी ॥५॥ डों ह्रीं श्रीसुमतिनाथ जिनेन्द्राय चैत्र शुक्ल एकादशी मोक्ष कल्याणकाय अर्घ निर्वपामीति स्वाहा। अथ जयमाला। दोहा। महाअर्घ-सुमति तीनसो छत्तिसौ,सुमति भेद दरसाय । सुमतिदेऊ विनतीकरूं, सुमति विलंब कराय ? दयावेलतरु सुगुण निधि, भवि कुमोद गणचंद । सुमति सतीपति सुमतिको, ध्यावो धरआनंद ॥२॥ पंच परावरतन हरण, पंच सुमति सितदैन । पंच लब्धि तादारके, गुण गाऊ दिन रैन ॥३॥ छंद भुजंग प्रियात। पिता मेरुराजा सवैसिद्ध काजा ।जप नामजाका सवै दुःख भाजा । महा सुर इक्ष्वाक वंशी विराज । गुणग्राम जाके सर्वेठोर छाजे ॥ ४॥ तिन्हीं के महापुन्य सों आप जाए। तिहूलोक में जीव आनंदपाए । सुनीसीर ताहीघरी मेरु धायो । क्रियाजन्मकी सर्वकीनी जथायो॥ ५॥ बहुर तातको सौंप संगीत कीनो। नमें हाथ जोरे भली भक्ति भीनो । बिताई दसे लाखही पूर्व वाले । प्रजा लाख उंतीसही पूर्वपाले ॥ ६॥ कछू हेत ते भावना वार भाए । तहां ब्रह्म लोकांतके देव आए । गए बोध ताहीसमें इद्र आयो । धरे पालकीमें सुउद्यान लायो ॥णा नमें सिद्धको केस लौंचे सवे ही। धरे ध्यानशुद्धं जु घाती हनेही । लह्योकेवलं औ समोसन साजं । गणाधीशजू एकसौ सोल राजं ॥ ८॥ खिरै शब्दतामें छहों द्रव्य धारे। गुण पर्ज उत्पाद व्ये धोव्य सारे। तथा कर्म आठों तनी तीथि साजं । 1 . 4 पूजन चौबी० मिलेजासके नाशतें मोक्षराजं ॥९॥ धरै मोहनी सत्तरं कोड कोडी। सरित्यत्प्रमाणं थिति दीर्घ जोडी। अरू ज्ञान हग वेदनी अतरायं । धरै तीस कोडा कुडी सिंधुकायं ॥१०॥ तथा नाम गोत कुडाकोडि वीसं। संग्रह समुद्र प्रमाणं धरै सत्तईस । सु तेतीस अब्धि धरै आयु अधि । कहे सर्वको तनी वृद्धि लब्धि ॥११॥ जघन्य प्रकारे धरै भेद येही। मुहुर्त वसु नाम गोत्रं गणेही। तथा ज्ञान दृग्मोह प्रत्यूहआयं । सुअंतर्मुहूर्त धरै थित्तगायं ॥ १२ ॥ तथा वेदनी बारहै ही महूतं । धरै चित्त ऐसे भनो न्यायजूत । इन्है आदितत्वार्थ भाखो असेशा । लहो फेर निर्वाणमाही प्रवेशा॥१३॥ अनतं महंत सुसन्तं सुततं । अमंद अफंदं अनदं अभंतं । अलक्ष विलक्षं सुलक्षं सुदक्षं। अनक्षं अवक्षं अभक्षं अतक्ष ॥११॥ अवर्ण अघणं अमण अकणं। अभणं अतणं असणं सुसणं । अनेकं सदेकं चिदेकं विवेकं । अखंड सुमंडं प्रचंडं तदेकं ॥ १५॥ सुपर्म सुधर्म सुसमं अफर्म । अनंत गुणाराम जैवंत वर्मा नमें दासकृदावनंसनआई। सबै दुःखतेमोहिलीजेछुडाई। पत्ता छन्द-तुम सुगुण अनंता ध्यावत संता, धमतम भंजन मातंडा। सतमत करचंडा भविक जमंडा, कुमत कुबल इन गनहंडा ।। १७१। डों ह्रीं श्रीसुमतिनाथ जिनेन्द्राय गर्भ, जन्म, तप ज्ञान निर्वाण पंचकल्याण प्राप्ताय अनघ पद प्राप्तये महाघ निर्वपामीति स्वाहा। अथ आशीर्वाद-छंद रोडक-सुमतिचरण जोजजेभविकजन,मन बचकाई।ताससकल दुःख ददफंद,तत छिनःजाई। पुत्रमित्र धन धान्यशर्म,अनुपम सो पावें । टुंदावन निरवाण लहें,जो निहचे घ्यावें॥१० इत्याशीर्वादः ॥ इति श्रीसुमतिनाथ जिन पूजा संपूर्णा ॥५॥ T पोषी० पजन संग्रह ३२४ 44 ६ अथ श्रीपद्मप्रभ जिन पूजा लिख्यते। (वृन्दाबनकृत) छंद मदावलिप्तकपोल वा रोडक स्थापना-पदमरागमणि वरन धरन तनतुंग अढाई । शतक दंड अघ खंड सकल सुर सेवत आई ॥ धरणितात विख्यात सुसीमाजके नंदन । पम चरन धर राग सुथा इनकर वंदन ॥१॥ ॐ ह्रीं श्रीपमप्रभजिनेन्द्र अत्रावतरावतर संवौषट् आह्वाननम् । ॐ ह्रीं श्रीपद्मप्रभजिनेन्द्र अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठाठः स्थापनम् । ॐ ह्रीं श्रीपमप्रभजिनेन्द्र अत्र मम सन्निहितो भव भव वपट् सन्निवीकरणम् ॥ अथ अष्टक । चाल होलीकी तालयुत ॥ जल-गंगाजल अनि प्रासुकलीनो सौरभ सकल मिलाय।मनवचतन त्रयधार देतही जन्मजरामृतजाय। पूजं भावसो श्रीपद्मनाथ, पदसार पूजं भावसो ॥ ॐ ह्रीं श्रीपप्रप्रभजिनेन्द्राय गर्भ, जन्म, तप, ज्ञान, मिर्वाण पचकल्याण प्राप्ताय जन्ममृत्यु जर रोग विनाशनाय जलं निर्वपामीति स्वाहा । चन्दन-मलयागिन कपूर चंदन घस, केसररंग मिलाय। भवतपहरन चरन पर वारो,मिथ्यातापामटाय॥ पूजु भाव सो श्रीपमनाथ पदसार, पूM भाव सो॥ ॐ ह्रीं श्रीपमप्रभजिनेन्द्राय गर्भ, जन्म 'तप, ज्ञान,निर्वाण पंचकल्याण प्राप्ताय संसाराताप रोग विनाशनाय चन्दनं निर्वपामोतिस्वाहा। .
. पी० अक्षत-तंदुल उज्ज्वल गंध अणीयुत, कनकधारभरलाय। पुजधलं तुमचरनन आगे,मोही अखेपदवाया। पजंभाव सो श्रीपानाथ पदसार, पूजंभाष सो ॥ ॐ हीं श्रीपद्मप्रभजिनेन्द्राय गर्भ, जन्म, तप, ज्ञान, निर्वाण पंचकल्याण प्राप्ताय अक्षय पद प्राप्तये अक्षतान् निर्वपामीति स्वाहा। पुष्प-पारिजात मंदार कल्पतरु, जनित सुमन शुचिलाय। समरशूल निरमूल करनको, तुमपद पनचढाय ॥ पूजू भाव सो श्रीपद्मनाथ पदसार, पूजू भाव सो॥ ॐ ह्रीं श्रीपमनाथजिनेन्द्राय गर्भ, जन्म, तप, ज्ञान, निर्वाण पंचकल्याण प्राप्ताय काम वाण विनाशनाय पुष्प निर्वपामीति स्वाहा । नैवेद्य-घेवर बावर आदि मनोहर, सद्य सजे शुचिभाय।क्षुधारोग निरनाशन कारण, जजूंहर्ष उरलाय॥ पूजू भाव सो श्रीपमनाथ पदसार, पूजू भाव सो ॥ ठों ह्रीं श्रीपद्मनाथजिनेन्द्राय गर्भ, जन्म, तप, ज्ञान, निर्वाण पंचकल्याण प्राप्ताय क्षुधारोग विनाशनाय नैवेद्य निर्वपामीति स्वाहा। दीप-दीपकजोत जगाय ललितवर,धमरहित अभिरामातिमर मोह नाशन के कारण,जजूंचरण गुणधाम॥ पूजंभावसो श्रीपग्रनाथ पदसार, पूजुभावसो॥ ॐ ह्रीं श्री पमनाथ जिनेन्द्राय गर्भ, जन्म, तप, ज्ञान, निर्वाण पंचकल्याण प्राप्ताय मोहांधकार विनाशनाय दीपं निर्वपामीतिस्वाहा। धूप-कृष्णागर मलयागिर चंदन, चूर सुगंध मिलाय। अगनिमांहि जारूं तुमआगे, अष्टकरम जराय पूजंभावसो श्रीपमनाथपदसार, पूजूभावसों ॥ ॐ ह्रीं श्री पद्मप्रभ जिनेन्द्राय गर्भ, जन्म, तप, ज्ञान, निर्वाण पंचकल्याण प्राप्ताय अष्ट कर्म दहनायधूपं निर्वपामीतिस्वाहा। ।
चौबी० 'पजन संग्रह ર फल-सुरसवरन रसना मन भोवन,पावन फल अधिकार । तासो पूजंयुगमचरणयह,विघ्तकर्मनिरवार । पूजू भावसो श्री पननाथ पदसार, पूजू भावसो॥ॐ ह्रीं श्री पद्मप्रभ जिनेन्द्राय गर्भ,जन्म,तप ज्ञान, निर्वाण पंचकल्याण प्राप्ताय मोक्ष फल प्राप्तये फलं निर्वपामीति स्वाहा। अर्घ-जल फलआदि मिलायगाय गुण,भगतिभाव उमगाय । जजूंतुशिवतियवर,जिनवर आवागमन मिटाय। पूजू भावसो श्री पद्मनाथ पदसार, पूजू भाव सो॥ ॐ ह्रीं श्री पद्मप्रभ जिनेन्द्राय गर्भ, जन्म, तप, ज्ञान, निर्वाण पच कल्याण प्राप्ताय अनर्घ पद प्राप्तये अर्घ निर्वपामीतिस्वाहा। अथपंचकल्याणक। छंद द्रुतविलंबित वा सुन्दरी। गर्भ-असित माघ सुछठ वखानिये । गर्भ मंगल को दिन मानिये।उरधग्रीवक सों चय राजजी। जइंद्र जजै हम आजजी। ॐ ह्रींश्रीपद्मप्रभ जिनेन्द्रायमाघ कृष्ण षष्ठीगर्भकल्याणकायअर्घनिर्वपामीतिस्वाहा जन्म-कृष्ण कार्तिक तेरस को जए, त्रिजग जीव सुआनन्द को लए । नगर स्वर्गसमान कुसंबिका। जजतहे हरिसंयुतअंविका ॥ २॥ ॐ ह्रीं श्री पद्मप्रभ जिनेंद्राय कार्तिक कृष्ण त्रयोदशी जन्म कल्याण काय अर्घ निर्वपामीति स्वाहा। -कृष्णतेरस कार्तिक भावनी। तप धरो वन षष्टम पावनी। करत आतमध्यानधुरंधरो। जजत हैं हम पाप सबैहरो॥३॥ॐ ह्रीं श्रीपद्मप्रभ जिनेन्द्राय कार्तिककृष्णत्रयोदशीतपकल्याणकाय अर्घ निवपामीति स्वाहा ज्ञान-शुक्ल पूनम चैत सुहावनी । परम केवल सो दिन पावनी । सुर सुरेश नरेश जजें तहां । हम जजै पद - जन - २२७ पंकजकोयहां॥४॥ॐह्रीं श्री परप्रभ जिनन्द्रायचैत्र शक्लपूर्णिमा ज्ञानकल्याणकायअर्घ निर्वपामीतिस्वाहा बोबी० निर्वाण-असित फागुण चौथ सुजानिये। सकल कर्म महारिपु हानिये । गिर समेव थको शिवको गए। हम जर्जे पदध्यानविषे लए ॥५॥ ॐ ह्रीं श्री पद्मप्रभ जिनेन्द्राय फाल्गुण कृष्ण चतुर्थी मोक्ष सग्रह कल्याण'काय अर्घ निर्वपामीति स्वाहा॥ मथ जयमाला। पत्ता छन्द। महाअर्घ जैपद्मजिनेशाशिवसमेशा,पादपद्मजजिपोशाजभवतमभंजनमुनिमनरंजन,कंजनकोदिवसाधेशा चौपाई-जेजे जिन भविजन हितकारी । जै जै जै भवसागर तारी॥जे जैसमवशरणधनधारी। जैजै वीत राग हितकारी ।।२॥ जे तुम सात तत्वविधि भाख्यो। जे जे नव पदार्थ लख आख्यो ।जैषट द्रव्य पंचयुत काया।जे सब भेद सहित दरसाया ॥३॥जे गुणथान जीव परमानो। जे पहिले अनंत जिय जानो।जै दूजे सासादन माही। तेरह कोटि जीव थित आही॥ ४॥जै जै नीजे मिश्र गुणथानो। जीवसु बावन कोटि प्रमानो॥जे चौथे अवत गुण जीवा ॥ चार अधिक शत कोटि सदीवा ॥ ५॥ जय जिय देश वरत में शेषा। कोटि सात सौ है यित वेशा ॥ जै प्रमत्त षट शून्य दोय वसु । पांच तीन नवपंच जीव लसु । जै जै अपरमत्तगुण कोरं । लक्ष छानवै सहस बहोरं ॥ निन्यानवें एक शत तीना येते मुनिनितरहतप्रवीना ।। ७॥ जै जै अष्टम में दुइधारा ।आठ शतक सत्तानो सारा॥ उपसममेंदुइसौ निन्यानो । क्षपकमाहितसुदूने जानो ॥ ८॥जे इतने इतने हितकारी। नवै दसैयुग श्रेणी धारीणजे ग्यार -
चौवी०
उपसम मगगामी। दोस निन्यानों अधामी॥ ९॥ जै जै क्षीणमोहगुण थानो। मुनि शत पांचअधिक
पूजन अट्टानो ॥ जजे तेरहमे अरहंता । युग नभ पनवसु नव वसुसंता॥१०॥ येते राजत है चतुरानना हम वंदें
संग्रह पदथुति कर आनन॥जै अजोग गुणमे जे देवा। पनसौठानौ करौसुसेवा॥११॥तित अइउल्लघु भाखत
३२८
कर थित फिर शिव आनंद चाखत ॥ ये उत्कृष्ट सकल गुण थानी। तथा जघन्य मध्य जेप्रानी।१२।तीनो
लोक सदनके वासी। निजगुण परज भेदमय रासी। तथा औरद्रव्यनके जेते । गुण परयाय भेद हैं तेते१३
तीनों कालतनेजु अनंता । सो तुमजानत युगपत संता॥ सोई दिव्य वचन के द्वारे। दे उपदेश भविक
उद्धारे॥ १४॥ फेर अचल थल वासा कीनो।गुण अनंत निज आतम भीनों। चरम देहत किचित ऊनो
नर आकृतितित है नित गूनो ॥१५॥ जैजै सिद्ध देव हितकारी। बार बार यह अरज हमारी।मोको दुख
सागर ते काढो। वृन्दाबन याचत है ठाढो ॥ १६ ॥
सत्ताछन्द-जैजै जिनचंदापना नन्दा, परम सुमति पद्माधारी॥ जै जन हितकारी दया विचारी जै जै
जिनवर अविकारी ॥१७॥ ॐ ह्रीं श्री पद्मप्रभ जिनेन्द्राय गर्भ, जन्म, तप,ज्ञान, निर्वाण पच
कल्याण प्राप्ताय अनर्घपद प्राप्तय, महाघ निर्वपामीति स्वाहा ।।
न्द रोडक-अथआशीर्वाद-जजत पद्म पदपनसमताके सुपाअत ॥ होतवृद्धिसुतमित्रसकल आनंदवृन्द
शत । लहत स्वर्गपद राज तहत चय इत आई॥ चक्रीको सुख भोगअंत शिव राजकराई॥१८॥
इत्याशीर्वादः॥ इति श्री पद्मप्रभजिन पूजा संपूर्णा ॥६॥
चौबी० पूजन संग्रह ३२९ ७ अथश्रीसुपार्श्वनाथ जिन पूजा प्रारभ्यते। वृन्दावन कृत (छंद गीता) स्थापना-जेजेंजिनंद गनिंद इंदनरिंद गुणचिंतन करे।तन हरितमणिसम हरत मनतमलखतउरआनदभरे नृप सुपरतिष्ट वरिष्ट इष्ट महिष्ट सिष्ट प्रथिप्रिया।तिननंदके पदवंद वृंद अमंदथापत युतक्रिया। ॐ ह्रीं श्रीसुपार्श्वनाथ जिनेन्द्र अत्रावतरावतर सवौषट् आहाननम् । ॐ ह्रीं श्रीसुपार्श्वनाथ जिनेन्द्र अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठः ठः स्थापनम् ।। डों ह्रीं श्रीसुपाश्र्वनाथ जिनेन्द्र अत्र मम सन्निहितो भव भव वषद् सन्निधी करणम् । मथ अष्टक (चाल द्यानतरायकृत सोलह कारण भष्टककी) जल-उज्वल जल शुचि गंध मिलाय । कचनझारीभर करलाय । दयानिधि हो कृपानिधि हो।जै जग बंधु दयानिधिहो । तुम पदपजूं मनवचकाय । देव सुपारस शिवपुर जाय दयानिधि हो० ॥ डों ह्रीं श्रीसुपार्श्वनाथ जिनेन्द्राय गर्भ, जन्म,तप,झान, निर्वाण पंचकल्याण प्राप्ताय जन्म मृत्यु जरा रोग विनाशनाय जलं निर्वपामीति स्वाहा। चन्दन-मलयागिर चंदनघस सार । लीनों भवतप भंजन हार। दयानिधि हो दयानिधि हो । जय जग बन्धुं दया निधिहो। तुम पद पूजू मन वच काय,देव सुपारस शिवपुर जाय । दयानिधिहो । -
।
चौबी०
-
13
पजन
संग्रह
३३०
ॐ ह्रीं श्री सुपार्श्वनाथ जिनेन्द्राय गर्भ, जन्म, तप, ज्ञान निर्वाण पंचकल्याण प्राप्याय
संसाराताप रोग विनाशनाय चन्दनं निवंपामीति स्वाहा ।
अक्षत-देवजीर सुखदास अखंड। उज्वल जल छालित सितमंडः । दयानिधि हो दयानिधि हो । जय
जगबन्धु दयानिधि हो। तुम पद पूजू मन बच काय। देव सुपारस शिवपुर जाय दयानिधि हो।
डों ह्रीं श्री सुपार्श्वनाथ जिनेद्राय गर्भ, जन्म, तप, ज्ञान निर्वाण पंचकल्याण प्राप्ताय
अक्षय पद प्राप्तये अक्षतान् निर्वपामीति स्वाहा।
पुष्प-प्रासुक सुमन सुगंधितसार। गुंजत अलि मकरध्वजहार । दयानिधि हो दयानिधि हो । जय
जग बन्धु दयानिधि हो । तुम पद 'पूजूं मन वच काय,देव सुपारस शिवपुर जाय। दयानिधि हो.
ह्रीं श्री सुपार्श्वनाथ जिनेन्द्राय गर्भ, जन्म, तप, ज्ञान निर्वाण पंचकल्याण प्राप्ताय
काम वाण विनाशनाय पुष्पं निर्वपामीति स्वाहा ।
नै अ-धा हरन नेवज वर लाय । हरूं वेदनी तुमै चढाय। दयानिधि हो दयानिधि हो। जय जग
बन्धु दयानिधि हो। तुमपदपू मनवचकाय, देव सुपारस शिवपुर जाय दयानिधि होय० ॥
ॐ ह्रीं श्रीसुपार्श्वनाथ जिनेन्द्राय गर्भ, , जन्म, तप, ज्ञान, निर्वाण पंचकल्याण प्राप्ताय
क्षुधा रोग विनाशनाय नैवेद्यं, निर्वपामीति स्वाहा ।
दीप-लित दाप भरकर नवनीत। तुम ढिग धारत हूं जगमीता दयानिधि हो दयानिधि हो। जय जग
-
पोपी० संग्रह ३३१ बन्धुदया निधि हो। तुम पद पूजं मनवच काय, देव सुपारश शिवपुर जाय दया निधि हो॥ ॐ ह्रीं श्रीसुपार्श्वनाथ जिनेन्द्राय गर्भ; जन्म, तप ज्ञान, निर्वाण पंच कल्याण प्राप्ताय मोहधिकार विनाशनाय दीप निर्वपामीतिस्वाहा ॥ धूप-दशविध गंध हुताशन माहि। खेवत अष्टकर्म जरजाहिदियानिधिहो। दयानिधिहो जय जगबन्धुदया निधि हो।तुम पद पूजू मन वच काय,देव सुपारस शिवपुर जाय दयानिधिहोगाह्रीं श्रीसुपार्श्वनाथ जिनेन्द्राय गर्भ,जन्म,तप,ज्ञान,निर्वाण पंचकल्याण प्राप्तायअष्टकर्म दहनायधूपंनिर्वपामीतिस्वाहा फल-श्रीफल पिस्ता आदि अनूप । ले तुम अप्रधरूं शिव भूपा दया निधिहो । दयानिधि होजयजगबन्धु दया निधिहो।तुम पदपूMमनवचकाय देवसुपारस शिवपुर जाय। दयानिधिहो। ह्रीं श्रीलुपार्श्वनाथ जिनेन्द्रायगर्भ,जन्म,तप,ज्ञान,निर्वाण पंच कल्याण प्राप्तायमोक्षफल प्राप्तयेफलं निर्वपामीतिस्वाहा अर्घ-आठों दरबसाज गुणगाय । नाचतराचत भगति बढ़ाय । दयानिधिहो दयानिधि हो । जयजगवन्शु दयानिधि हो।तुम पदपूजमनवचकाय,देवसुपारसशिवपुरजाय दयानिधि होगह्रीं श्री सुपार्श्वनाथ जिनेन्द्राय गर्भ,जन्म,तप,ज्ञान,निर्वाण पंच कल्याण प्राप्तायअनर्घपद प्राप्तये अघनिर्वपामीतिस्वाहा अथ पंचकल्याणक । छंद द्रुतविलंबित वा सुन्दरी। गर्भ-शक्लभादव षष्ठी जानिये। गर्भमंगल ता दिन मानिये ॥ करत सेव शचि रच मातकी। अर्घलेय जजू वसुभांत की ॥ १ ॥ॐहीश्रीसुपार्व नाथ जिनेन्द्राय भाद्रपद शुक्ल षष्ठी गर्भ कल्याण काय
चौवी०
अर्घ निर्वपामीति स्वाहा ॥
पूजन | जन्म-शुकलज्येष्ठ दुवादशि जन्मये । सकलजीव सुआनन्द तन्मये । त्रिदशराजजज गिरिराजजी।
संग्रह हम जजें पद मंगल साजजी ॥२॥ ॐ ह्रीं श्री सुपार्श्वनाथ जिनेन्द्राय ज्येष्ठ शुक्लद्वादशी जन्म
३३२ कल्याणकाय अर्घ निर्वपामीतिस्वाहा ॥
तप-जनम के तिथ श्रीधरनेधरी।तप समस्तप्रमादनको हरी। नृपमहेन्द्रदियोपय भावसों । हमजइत
श्रीपद चावसों ॥३॥ ॐ ह्रीं श्री सुपार्श्वनाथ जिनेन्द्राय ज्येष्ठ शुक्ल द्वादशी तप कल्याणकाय
अर्घ निर्वपामीति स्वाहा।
ज्ञान-भ्रमर फागुण छ? सुहावनो। परम केवल ज्ञानलहावनो॥ समवसन विषेषभाषियो। हम जजै पद
आनंद चाखियो ॥ ४॥ ॐ ह्रीं श्रीसुपार्श्वनाथ जिनेंद्राय फाल्गुणकृष्णषष्ठी ज्ञानकल्याणकाय
अर्घ निर्वपामीति स्वाहा ।
निर्वाण-असित फागुन सातय पावनो । सकल कर्म कियो छयभावनो ॥ गिर समेद थकी शिवजात है
जजतही सब विधन विलातहै ॥ ५॥ ॐ ह्रीं श्री सुपार्श्वनाथ जिनेंद्राय फाल्गुण कृष्णसप्तमी
मोक्ष कत्र्याणकायअघ निर्वपामीति स्वाहा।
प्रथजयमाला दोहा।
महाअर्ध-तुगअंग धनुदोयसौ,शोभा सागरचन्द ॥ मिथ्यातपहर सुगुन कर, जयसुपाश्र्वसुखकन्द ॥१॥
पजन संग्रह ३३३ छन्दकामनी मन मोहन। जति जिनराज शिवराजहेत हो। परम वैराग्यआनंदभरत हो ॥ गर्भ के पूर्वपटमास धनदेवने। नगर निरमापियाधानारसीसेवने ॥२॥ गगन से रत्नकी धार बहुवर्षही। कोस्अर्धबेवारसवहर्ष ही ॥ तातके सदन गुणवदनरचनारची। मात कीसर्वविधकरतसेवाशची ॥३॥ भयो जब जन्म तब इंद्रओसनचलो। होय चकित तुरतअवधितैलखभलो।सप्तपगजायसिरनायवंदनकरी।चलतउमगोतवैमानधनधनघरी ॥१॥ सातविध सैनगजवृषभरथवाजिले। गंधर्वनृत्यकारीसबैसाजिले ॥ गलितमदगंडऐरावती साजियो। लक्ष योजन सुतन वदन सतराजियो॥५॥ वदनवसुदन्त प्रतिदन्तसरवर भरे। तासुमध्यशतक पन वीस कमलन खरे॥ कमलनीमध्य, पनवीसफूले कमल । कमल प्रतिकमलमह एकसौआठदलदासवदलकोटि सतवीस परमान जू। तासपर अपछरा नचहि युत मानजू॥ तततता तततता विततता ताथई । धृगमता धृगमता धृगमता मैलई ॥७॥धरत पग सनननन सनननन गगनमें। नपरेशनननन झननननपगन में। नचत इत्यादि केइभांति सो मगन में । केई तित बजत बाजे मधुरगगन में ॥८॥ कई दृम हम सुदृम मृदंगधुधुने । केईझल्लर झनन झनननं झंझुनै। केई संसामदिसंसापदि सारंगसुर केईवीनापटहवंसिवा जै मधुर॥९॥ केई तन तननन तननन तानें पूरै ।शुद्ध उच्चार सुर केई पाठें पूरें।। केई झुक झुकफिरें चक्रती भामिनी । धृगतां धृगतां परम शोभावनी ॥१०॥ केई छिननिकट छिन दूर छिन थूल लघु।
चौवी० पूजन संग्रह ३३४ धरत वैक्रिय परभावसो तनसूभघु।कई करतालकर ताल तलमें धुनें । तत वितत घन सुखराजतवाजे मूनें ॥ ११ ॥ इंद्रआदिक सकलसाज सग धारकै । आयपुर तीनफेरी करी प्यारक॥ शचीतवजायपरसूत थलमोद में । मात करनींद लीनो तुमैं गोद में ॥१२॥ आन गिरबाननाथ ही दियोहायमें। छत्रअरचमरवर हरि करतमाथमें ॥ चढेगजराजजिनराजगुणजापियो । जायगिरराजपांडुकशिलाथापियो ॥ १३ ॥लेय पंचमउदधिउदक करसुरन । सुरनकलसन भरेसहितचर्चितपुरन । सहस अर आठ सिरकलस ढारोजबै । अघघघ घघघघ भभभभभौतवै ॥ १४ ॥ धधधध धधधध धुनिमधुरहोतहै । भव्य जनहसके हर्षउद्योत है ॥ भयोइमन्हौन तब सकल गुण रंग में। पोंछिश्रृंगारकीनो शचीअंगमें ॥१५॥ आनपितुसदन शिशु सोंप हरिथलगयो । बालवयतरुण लहिराजसुखभोगियो ॥ भोगतज योग गह चार अरीको हने। धार केवल परमधर्म द्वैविधभने ॥१६॥ नाश अरिशेष शिवथानवासी भये। ज्ञानहग शर्म वीरजअनंते लये॥ सोजगतराज यह अरज उरधारियो । धर्म के नन्दको भव उदधितारियो ॥१७॥ ॥ घत्ताछन्द॥ जैकरुणाधारीशिवहितकारी,तारन तरन जिहाजा हो। सेवक नितवन्दे मनआनन्द, भवभयमेटन काजाहो अह्रीं श्रीसुपार्श्वनाथजिनेन्द्राय गर्भ जन्म तप ज्ञान निर्वाण पंच कल्याण प्राप्ताय अनर्घपद प्राप्तयेमहाअर्घ निर्वपामीतिस्वाहा ॥ ॥ अथआशीर्वाद । दोहा॥ श्रीसुपार्श्वपद युगलजो, जजै पढे यह पाठ । अनुमोदै सो चतुरनर, पावे आनंद ठाठ॥१९॥ इत्याशीर्वाद ॥ इतिश्री सुपार्श्वनाथ जिनपूजा संपूर्णा ॥ ७॥ ॥
wth चौबी० पूजन 'संग्रह ३३५ i H ८ अथ श्रीचन्द्रप्रभजिन पूजा लिख्यते । बृन्दावन कृत। छंद छप्पे(यमकालंकार) स्थापना-चारुचरन आचरन चरन,चित हरनचिहन चर। चंद चंदतन चरन चंदथल,चहत चतुर नर ॥ चतुक चंड चकचूर चार चिद, चक्रगुणाकर ॥ चंचल चलित सुरेश चूलनुत, चक्रधनुर हर ।। चरअचरहितुतारनतरन,सुनतचहकचिरनंदशुची।जिनचंद चरनचरचूचहत,चितचकोर नच रच रुची। दोहा-धनुषडेढ़सो तुंगतन,महासेननृपनंद ॥मात लक्ष्मणा उर जये। थापू चंद जिनन्द ॥ २॥ ॐ ह्रीं श्री चंद्रप्रभ जिनेन्द्रअनावतरावतर संवौषट् आव्हाननम् ॥ ॐ ह्रीं श्रीचंद्रप्रभ जिनेन्द्र अत्रतिष्ठ तिष्ठ ठः ठः स्थापनं । ॐ ह्रीं श्री चंद्र प्रभ जिनेंद्र अत्र ममसन्निहितो भव भववषट् सन्निधी करणम् ॥ अथमष्टक (चाल द्यानतरायजी कृत भाषा नंदीश्वराष्टककी) जल-गंगादिक निरमल नीर, हाटक ,गभरा । तुम चरन जजूंवरवीर, मेटो जन्म जरा ॥ श्रीचंद्रनाथ दुति चंद्र चरननचंद्र लगे। मन वच तन जताअमंद,आतम जोत जगे। ॐह्रीं श्रीचंद्रप्रभजिनेन्द्राय गर्भजन्मतप ज्ञाननिर्वाणपंचकल्याणप्राप्ताय जन्ममृत्युजरारोगविनाशनायजलंनिर्वपामीतिस्वाहा। चन्दन-श्री खंड करपूर सुचग,केशर रंगभरी। घस प्रासुक जल के संग,भव आताप हरी। श्री चन्द्रनाथ -- । । । चौबी० दुतिचन्द्रचरणन चन्द्रलगे। मनवच तन जजत अमन्द,आतम जोत जगे। ॐ ह्रींश्रीचन्द्रप्रभजिनेन्द्र पूजन गर्भ,जन्म,तप,ज्ञान,निर्वाण पंच कल्याणप्राप्ताय संसाराताप रोग विनाशनायचंदनंनिर्वपामीतिस्वाहा संग्रह अक्षत-तंडुलसित सोम समान, समलय अनियारे ॥ दियपुंजमनोहर आन,तुमपदतर प्यारे॥ श्रीचन्द्र ३३६ नाथ दुतिचन्द्र, चरणन चन्द्र लगे । मन वच तन जजत अमन्द, आतम जोत जग॥ ॐ ह्रीं श्री चन्द्रप्रभ जिनेन्द्राय गर्भ जन्म तप ज्ञान निर्वाण पंच कल्याण प्राप्ताय अक्षय पदप्राप्तये अक्षतान् निर्वामीति स्वाहा ॥ पुष्प-सुरद्रुमके सुमन सुरंग,गंधित अलि आवै । तासो पद पूजत चंग कामविथाजावै॥श्रीचन्द्रनाथदुति चन्द्र,चरणन चन्द्रलगे। मन वच तन जजत अमन्द,आतम जोतजगह्रीं श्री चंद्रप्रभजिनेन्द्राय गर्भ जन्म तप,ज्ञान,निर्वाण पंच कल्याण प्राप्ताय कामवाण विनाशनायपुष्पंनिर्वपामीति स्वाहा।। नैवेद्य-नेवज नानाप्रकार, इंद्री वलकारी। सोले पूजूंपदसार,आकुलता हारी॥ श्रीचंद्र नाथ दुतिचंद्र चरणन चन्द्र लगे॥मन वच तन जजत अमंद,आतम जोत जगे।। ॐ ह्रीं श्री चन्द्रप्रभजिनेंद्राय गर्भ जन्म तप ज्ञाननिर्वाणपंचकल्याणप्राप्ताय क्षुधारोग विनाशनाय नैवेद्यं निर्वपामीतिस्वाहा ॥ दीप-तमभंजन दीप सवार,तुमढिग धारत हूं।मम तिमिर मोह निवार,यह गुणधारतर्राश्रिीचंद्रनाथदुति चंद्र चरणन चंद्र, लगे। मन वच तन जजत अमन्द,आतम जोत जगाहीश्रीचंद्रप्रभ जिनेद्राय गर्भ जन्मेतपज्ञान निर्वाण पंच कल्याण प्राप्ताय मोहांधकार विनाशनायदीपनिर्वपामीति स्वाहा॥ - - - - चोवी०|| धूप-वश गन्ध हुताशन मांहि,प्रभुखेवत हूं। ममकर्म दुष्ट जर जाहि, या सेवत । श्री चंद्रनाथ दुति चंद्र, चरणन चंद्र लगे मन वचतन जजत अमन्द, आतम जोत जगे॥ ॐ ह्रीं श्रीचंद्रप्रभ पजन जिनेन्द्राय गर्भजन्मतपज्ञान निर्वाणपचकल्याणप्राप्ताय अष्टकर्मदहनाय धूप निर्वपामीतिस्वाहा। संग्रह ३३७ फल-अति उत्तम फलसुमंगाय, तुम गुण गावत हू । पूजू तन मन हरषाय, विधन नसावत हू ॥ श्रीचंद्र नाथ दुतिचंद्र, चरणन चंद्र लगे । मन वच तन जजत अमन्द, आतम जोत जगे॥ ॐ हीं श्री चंद्रप्रभ जिनेन्द्राय गर्भ जन्म तप ज्ञान निर्वाण पंच कल्याण प्राप्ताय मोक्ष फल प्राप्तये फलं निर्पयामीति स्वाहा॥ अर्घ-सज आठों दर्व पुनीत,आठोअंग नमू । पूजू अष्टम जिनमीत, अष्टम अवनि गम ॥ श्रीचन्द्रनाथ दुति चन्द्र चरणन चन्द्र लगे । मनवच तन जजत अमन्द, आतम जोत जगे॥ ॐ ह्रीं श्रीचन्द्र प्रभ जिनेन्द्राय गर्भ जन्म तप ज्ञान निर्वाण पंच कल्याण प्राप्ताय अनर्घ पद प्राप्तये अर्घ निर्वपामीति स्वाहा। अथ पंच कल्याणक । छंद तोटक । गर्भ-कलि पंचम चैत सुहातअली । गरभागम मगल मोदरली॥ हरि हर्षित पूजत मातपिता। हम ध्यावत पावत शर्म सिता ॥ १ ॥ ॐ ह्रीं श्री चद्रप्रभ जिनेन्द्राय चैत्र कृष्ण पंचमी गर्भ कल्याण, काय अर्घ निर्वपामीति स्वाहा ॥
पजन चौबी०|| जन्म-कलिपोष इकादशि जन्म लियो। ति लोक विष सुख थोकभयो॥ सुरईश जजें गिरिशीश तवें हम पूजत हैं नुत शीश अवै । ॐह्रीं श्रीचंन्द्रप्रभ जिनेन्द्राय पौषकृष्ण एकादशी जन्म कल्याणा संग्रह काय अर्घ निर्वपामीति स्वाहा ॥ ३३८ तप-तपदुर्द्धर श्रीधर आपधरा । कलपौष इकादशि पर्व वरा ॥ निज ध्यान विषै लवलीनभए। धनसो दिन पूजत विघ्न गए ॥ॐ ह्रीं श्रीचंद्रप्रभ जिनेन्द्राय पौष कृष्ण एकादशी तप कल्याणकायअर्घ निवपामीति स्वाहा ॥ ज्ञान-वर केवल भानुउदोत कियो । तिहलोकतनो भ्रम मेट दियो। कलि फागुणसप्तमि इंद्र जजै । हम पूजहि सर्व कलंक भजें ॥४॥ॐ ह्रीं श्री चंद्रप्रभ जिनेन्द्राय फाल्गुणकृष्णसप्तमी ज्ञानकल्याण काय अर्धनिर्वपामीति स्वाहा॥ निर्वाण-कलि फागुण सप्तमि मुक्त गए । गुणवंत अनन्त अवाध भये॥ हरिआयजजै तित मोद धरे। हम पूजत ही सब पाप हरे ।। ॐ ह्रीं श्रीचंद्र प्रभ जिनेन्द्राय फाल्गुण कृष्णसप्तमी मोक्षकल्याण काय अर्घ निर्वपा मीति स्वाहा ॥ अथ जयमाला।दोहा। महाअर्घ-हे मृगंकअंकिन चरन, तुम गुण अगम अपार ॥ गणधरसे नहि पारलही,तो को समरथसार!? पैतुम भगति सुहियेमम,परै अति उमगाय । तातें गावंगुणसुगुण, तुम ही होऊ सहाय ॥२॥ है . - - छंद युग्म पद्धड़ी ॥ जे चंदजिनंद दयानिधान । भव कानन हाननदवप्रमान ॥ जे गर्भ जनम मंगल बी० || दिनंद । भविजीव विकाशन शर्म कंद ॥३॥ दश लक्ष पूर्व की आयु पाय। मनवंछित सुखभोगेजिनाय । पूजन लख कारण व्हे जगते उदास । चिते अनुप्रेक्षा सुख निवास ॥४॥ तितलोंकांतिक बोध्योनियोग । हरि संग्रह शिविका सज धरियो अभोग। तापे तुम चढ जिनन्दराय । ताछिन कीशोभा को कहाय ॥ ५॥ जिन ३३९ अंगसेत सित चमर ढार । सित छत्र सीस गल गुलक हार ॥ सित रतनजडित भूषणविचित्र । सितचंद्र चरण चरचे पवित्र॥ ६ ॥ सित तन दुति नाकाधीशआय । सित शिबिका कांधेधर सुचाय ॥ सित सुजस सुरेश नरेश सर्व । सित चितमें चिंतत जात पर्व ॥ ७॥सित चन्दनगर निकसि नाथ । सित वन में पहुंचे सकल साथ ॥ सित शिला शिरोमणि स्वच्छछाह । सिततप तित धारो तुम जिनाह ।८ । सितपयको पारन परमसार । सित चंद्रदत्त दीनो उदार ॥ सित करमें सोपय धारदेत। मानो वांधत भव सिंधु सेता९। मानो सुपुण्य धारा प्रतच्छ ।तित अचरज पनसुरकिय ततच्छ ॥फिर जाय गहन सित तप करत । सित केवलजोतिजग्योअनंत॥१०॥लहि समवसरन रचनामहान। जाके देखत सवपापहान॥ जह तरुअशोक शोभे उत्तंग। सव शोकतनों चूरे प्रसंग ॥ ११ ॥सुर सुमन वृष्टिनभते सुहात। मनु मनमथ तज हदि पारजात ।। वाणी मुखसो जिम खिरतसार । मनु तत्वप्रकाशन मुकरधार ।। १२ ॥जहां चौसठ चमर अमर दुरंत । मनुसुजस मेघझर लगि पतंत ॥ सिंहासन है जहां कमलयुक्त । मनुशिव सरवरको कमल युक्त ॥ १३ ॥ दुंदुभि जित वाजत मधुर सार । मनु कर्म जीत को है नगार। सिर छत्र पजन संग्रह चोबी•| फिरेयसेतवर्ण। मनुरतन तीन यह पाप हर्ण।॥ १४॥ तन प्रभा तनो मंडल सुहात । भविदेखतनिजभव सात सात ॥ मनुदर्पन दुति यहजगमगाय । भविजन भव मुख देखत सुआय ॥ १५ ॥ इत्यादि विभूति अनेक जान । बाहिज दीखत महिमा महान । ताको वरनत नहि लहत पार ।तो अंतरंग को कहे सार ३४० ॥ १६॥ अन अनन्त गुणन युत कर विहार । धर्मोपदेश दे.भव्यतार । फिर योग निरोध अघाति हान । सम्मेद की लिय मुकति थान ॥ १८॥ वृन्दवन वदत सीस नाय । तुम जानत हो मम उरज भाय । 'तातें क्या कहूं सुवार वार । मम वंछित कारज सार सार ॥ १८॥। पत्ता छन्द-जय चन्दजिनन्दा आनन्द कन्दा, भव भय भजन राजे हो ॥ रागादिक द्वन्दा हरि सब फन्दा, मुकति मांहि थिन साजे हो ॥ १९ ॥ ॐ ह्रीं श्री चन्द्रप्रभ जिनेन्द्राय गर्भ, जन्म, तप, ज्ञान, निर्वाण पञ्च कल्याण प्राप्नाय अनर्घपद प्राप्तये महाघ निवपामीति स्वाहा ॥ अथ आशीर्वाद-चौबोल-आठों दर्व मिलाय गाय गुण,जो भविजन जिनचंद जजे। ताके भव भव के अघ भाजै, मुक्ति सारसुख ताहि सजे । यमके त्रास मिटें सब ताके, सकल अमंगल दूर भजें वृदावन ऐसोलख पूजत, जातें शिवपुर राज रज ॥ इत्याशीर्वादः॥ इति श्रीचद्रप्रभजिनपूजा संपूर्णा ॥ -- , ९ अथश्रीपुष्पदन्तजिन पूजा प्रारभ्यते। (बृन्दावन कृत)छंद मदावलिप्त कपोल वा रोडक। स्थापना-पुष्पदंत भगवंत संत, सु जपत अनंत गुण । महिमावंत महंत कंत, शिवतिय रमंत मुन। काकंदी पुर जनम, पिता सुग्रीव रमा सुत। श्वेत वरन मनहरन,तुम्हें थापू त्रिवार नुत ॥१॥ ॐ ह्रीं श्रीपुष्पदंत जिनेन्द्र अत्रावतरावतर संवोषट् आह्वाननम् । रों ह्रीं श्री पुष्पदन्त जिनेन्द्र अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठः ठः स्थापनम् । डों ह्रीं श्री पुष्पदन्त जिनेन्द्र अत्र मम सन्निहितो भव भववषट् सन्निधीकरणम् । अथअष्टक (चाल होरी ताल युत) जल-हिमवन गिरिगत गंगा जलवर,कंचन भुंग भराय।करम कलंक निवारन कारनजजू तुम्हारे पाय । मेरी अरज सुनीजे पुष्पदन्त जिनराय,मेरी। गेही श्रीपुष्पदन्त जिनेन्द्राय गर्भ, जन्म, तप ज्ञान निर्वाण पंचकल्याण प्राप्ताय जन्ममृत्यु जरा रोग विनाशनाय जलंनिर्वपामीति स्वाहा । चन्दन-बावन चंदन कदली नंदन,कुंकुम संग घसाय । चरचं चरन हरन मिथ्यातप, वीतराग गुणगाय। मेरी अरज सुनीजे पुष्पदन्त जिनराय,मेरी० । डों ही श्री श्रीपुष्पदन्त जिनेन्द्राय गर्भ, जन्म तप, ज्ञान,निर्वाण पंचकल्याण प्राप्ताय संसारा ताप रोग विनाशनाय चन्दनं निर्वपामीति स्वाहा।
, चौबी० पजन संग्रह ३५२ अक्षत-शालि अखंडित सौरभ मंडित, शशिसम दुति दमकाय ।ताको पुजधरूं चरनन ढिग, देऊ अखय पद राय ! मेरी अरज सुनीजे पुष्पदन्त जिनराय,मेरी० । ॐ ह्रीं श्रीपुष्पदंत जिनेद्राय गर्भ,जन्म, तप, ज्ञान निर्वाणपंचल्याण प्राप्ताय अक्षयपद प्राप्तये अक्षतान् निर्वपामीति स्वाहा। पुष्प-सुमन सुमनसम परिमल मण्डित गुंजत अलिगण आय । ब्रह्मपुत्र मद भंजन कारण, जजूं तुम्हारे पाय । मेरी अरज सुनीजे पुष्पदंत जिनराय,मेरी० । डों ह्रीं श्रीपुष्पदंत जिनेन्द्राय गर्भ,जन्म,तप, ज्ञान निर्वाण पंचकल्याण प्राप्ताय काम वाण विनाशनाय पुष्पं निवंपामीति स्वाहा। नवेद्य-घेवर बाबर फेणी गोझा, मोदन मोदन लाय । क्षुधा वेदनी रोग हरनको,भेंट धरूं गुणगाय मेरी अरज सुनीजे पुष्पदन्त जिनराय, मेरी० । डों ह्रीं श्रीपुष्पदन्त जिनेन्द्राय गर्भ, जन्म, तप, ज्ञान निर्वाण पंचकल्याण प्राप्ताय क्षुधारोग विनाशनाय नैवेद्यं निर्वपामीति स्वाहा। दीप-वाति कपूर दीप कंचनमे, उज्वल जोति जगाय । मोहनाशक तुमको लख, धरूं निकट उमगाय । मेरी अरज सुनीजे पुष्पदन्त जिनराय,मेरी० । डोह्रींश्री पुष्पदन्त जिनेन्द्राय गर्भ जन्म तप ज्ञान निर्वाण पंचकल्याण प्राप्ताय मोहांधकार विनाशनाय दीपं निर्वपामीति स्वाहा। धूप- दसवर गंध धनंजयके संग,खेवत हूं गुण गाय । अष्ट करम यह दुष्ट जरें सो,धूमधूम सु उडाय। मेरी अरज सुनीजे पुष्पदन्त जिनराय । मेरी०। डों ह्रीं श्रीपुष्पदन्त जिनेन्द्राय गर्भ, जन्म, तप ज्ञान, निर्वाणपचकल्याण प्राप्ताय अष्ट कर्म दहनाय धूपं निर्वपामीति स्वाहा।
पजन संग्रह चौवा०|| फल-श्रीफल पुगी और सुचिरभट,दाडिम आंबमंगाय । तासो तुमपद पप्रजजंडू विधन सघन मिटजाय। मेरी अरज सुनीजे पुष्पदन्त जिनराय । मेरी । गेही श्रीपुष्पदन्त जिनेन्द्राय गर्भ, जन्म,तपज्ञान निर्वाण पंचकल्याण प्राप्ताय मोक्ष फल प्राप्तये फलं निर्वपामीति स्वाहा। संग्रह अर्घ-जल फल सकल मिलाय मनोहर,मन बच तन हुलसाय । तुम पद पूजं प्रीतिलगाके जैजेजे त्रिभुः ३४३ वनके राय । मेरी अरजसुनीजेपुष्प दन्त जिनराय । मेरी०। डों ही श्रीपुष्पदंत जिनेन्द्राय गर्भ जन्म तप ज्ञान निर्वाण पंचकल्याण प्राप्ताय अनघंपदप्राप्तये अघ निर्वपामीति स्वाहा ॥ अथ पंचकल्याणक । (छंद स्वयंभू) गर्भ-नौमी तिथकारी फागुणधारी, गर्भमाहि थित देवाजी। तज आरण थानं कृपा निधानं, करत शची तित सेवाजी । रतनन की धारा परम उदारा, पडो व्योमते साराजी। में पंजं ध्याऊ भक्ति बढाऊं, करो मोहि भव पाराजी ॥१॥ डों ही श्रीपुष्पदंत जिनेद्राय फाल्गुण कृष्ण नवमी गर्भ कल्याणकाय अर्घनिर्वपामीति स्वाहा। जन्म-मगसिर सितपक्षं परिवा साक्षं,जनमे तीरथनाथाजी। तबही चवभेवा निरजरयेवा,आय नये निज माथाजी। सुरगिर नहवाये मगल गाये,पूजेप्रीत लगायेजी। में पूजूंध्याऊ,भक्ति बढाऊ निज निधि हेतु सहाई जी ॥२॥ डों ही श्रीपुष्पदंत जिनेन्द्रायमार्गशिर शुक्ल प्रतिपदा जन्म कल्याणकाय अर्घनिर्वपामीतिस्वाहा पजन - चोबी० तप-सित मगसिर मासा थितसुखरासा एकमके दिन धाराजी। तप आतमज्ञानी आकुलहानी मौन सहित अविकारा जी। सुरमित्र सुदानीके घरआनी, गोपय पारन कीनोजी। तिनको में बंदू पाप संग्रह निकंदं जो समतारस भीनोजी ॥३॥ ३४४ डों ह्रीं श्रीपुष्पदंत जिनेन्द्राय मार्गशिर शुक्ल प्रतिपदा तप कल्याणकायअर्घनिर्वपामीति स्वाहा ज्ञान-सित कातिक गाये,दोयज धाये घातिकरम परचंडाजी। केवल परकाशेभ्रमतम नाश सकल सार सुख मंडाजी । गणराजअठासाआनंदभासी,समवसरनव्रपदाताजी।हरि पूजन आयो सीस नवायो हम पूर्जेजगताताजी ॥४॥ डों ही श्रीपुष्पदंत जिनेन्द्राय कार्तिक शुक्ल द्वितीया ज्ञान कल्याणकाय अर्घ निर्वपामीतिस्वाहा निर्वाण-भाद्रव सितसाराआठधारा गिरसमेद निरवानाजी।गुण अष्ट प्रकाराअनुपम धाराज कृषा- निधानाजी । तित इदसुआयो पूज रचायोचिन्ह तहां करदीनोंजी। मैं पूजतहूं गुण ध्याय महीसो तुमरे रसमें भीनोजी ॥५॥ डों ह्रीं श्रीपुष्पदन्त जिनेन्द्राय भाद्रपद शुक्लाष्टमी मोक्ष कल्याणकायअघनिर्वपामीति स्वाहा।। मथ जयमाला॥दोहा॥ महाअघ-लक्षण मकर सुश्वेततन तुंग धनुष शत एक।सुर नर बंदित मुक्ति पतिन तुम्हें सिर टेक ॥१॥ पुहप रदन गुण वदन जिम, सागर तोय समान । क्योंकर कर अजुलिन कर, करिये तासु प्रमान । . - ।
पजन संग्रह ३१५ - । ॥ छंद तामरस ॥ पुष्पदंत जयवंत नमस्ते । पुण्यतीर्थकर संत नमस्ते । ज्ञान ध्यान अमलान नमस्ते। चिदिलास सुखखान नमस्ते ॥३॥ भव भय भंजन देव नमस्ते । मुनिगण कृत पदसेव नमस्ते । मिथ्या निशि दिन इंद्र नमस्ते । ज्ञानपयोदधि चंद्र नमस्ते॥४॥भव दुखतरु निष्कन्द नमस्ते । राग दोष मद दहन नमस्ते । विश्वेश्वर गुण भूर नमस्ते । धर्म सुधारस पूर नमस्ते॥५॥ केवल ब्रह्म प्रकाश नमस्ते । सकल चराचर भास नमस्ते। विघ्नमहीधर विज्जनमस्ते । जै ऊरधगति रिज्ज नमस्ते॥६॥जे मकराकृत पाद नमस्ते। मकरध्वज मदवाद नमस्ते। कर्म भर्म परिहार नमस्ते । जै जै अधम उधार नमस्ते॥७॥ दया धुरंधरधीर नमस्ते । जेजे गुणगंभीरनमस्ते । मुक्ति रमणिपतिवीर नमस्ते । हसंभव भयपीर नमस्त॥८॥व्ययउत्पति थितधार नमस्ते । निजाधारअविकार नमस्ते । भव्य भवोदधि तार नमस्ते । वृंदावननिस्तारनमस्तो। घत्ताछन्द-जै जै जिनदेवं हरिकृत सेवं, परम धरमधन धारी जी। मैं पूजु ध्याऊ गुण गण गाऊं, मेटो विथा हमारीजी ॥ १०॥ डों ह्रीं श्रीपुष्पदंत जिनेन्द्राय गर्भ,जन्म,तप, ज्ञान निर्वाण पंच- कल्याण प्राप्ताय अनर्घ पद प्राप्तये महानिर्वपामीति स्वाहा । अथ आशीर्वाद ॥ छद मदावलिप्त-पुहपदत पद संत जजें, जो मन वच कायी। नाचे गावें भगति करें, शुभ परणति लायो । सो पावै सुख सर्व, इंद अहमिंद तनोवर। अनुक्रमते निरवान लहै, निह, प्रमोद धर॥ ११॥ 10-इत्याशीवादः।। इति श्रीपुष्पदंत जिन पूजा संपूर्णा ॥९॥ - चौवी० पूजन संग्रह ३४६ १० अथ श्रीशीतलनाथ जिन पूजा लिख्यते। (वृन्दावन कृत) छंद मातग (मत्तगयद) (सवैया २३ वां) स्थापना-शीतलनाथ नमूं धरहाथ सु, माथ जिन्हो भवगाथ मिटाये । अच्युततै च्युत मात सुनंदके, नंदभये पुर भद्दल आये ॥ वंश इक्ष्वाक कियो जिन भूषित, भव्यनको भवपार लगाये ऐसे कृपा निधिके पद पंकज, थापत हूं हियहर्प वढाये ॥ १ ॥ ॐ ह्रीं श्रीशीतलनाथ जिनेन्द्र अत्रावतरावतर संवोषट् आव्हाननम्। ओं ह्रीं श्रीशीतलनाथ जिनेन्द्र अत्र तिष्ट तिष्ट ठः ठः स्थापनम् । ॐ ह्रीं श्रीशीतलनाथ जिनेन्द्र अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट् सन्निधीकरणम् ॥ अथ अष्टकोछद वसंत तिलका। जल-देवापगास वरवारि विशुद्ध लायो । गारहेम भरभक्ति हिये वढायो । रागादिदोष मल मदन हेतुयेवा । च» पदान्ज तव शीतलनाथ देवा ॥ ओं ह्रीं श्रीशीतलनाथ जिनेन्द्राय गर्भ, जन्म, तप, ज्ञान,निर्वाण पंचकल्याण प्राप्ताय जन्म मृत्यु जरा रोग विनाशनाय जलं निर्वपामीति स्वाहा। चन्दन-श्रीखंडसार वर कुंकुम गारलीनो। कसंग स्वच्छघस भक्ति हिये धरीनो॥ रागादिदोषमद मर्दन ।
चौबी० पजन संग्रह ३४७ तु येवा । चचूं पदाज तव शीतलनाथ देवा॥ ओह्रीं श्रीशीतलनाथजिनेन्द्राय गर्भ, जन्म, तप, ज्ञान, निर्वाण पंचकल्याण प्राप्ताय ससारा ताप रोग विनाशनाय चन्दनं निर्वपामीति स्वाहा। अक्षत-मुक्तासमान सित तंडुलसारराजे । धारंत पुंज कलकुंज समस्त भाजे । रागाऽदि दोष मद मर्दन हेतुयेवा । च» पदान्ज तव शीतलनाथ देता ॥ ॐ ह्रीं श्रीशीतलनाथ जिनेन्द्राय गर्भ, जन्म, तप, ज्ञान, निर्वाण पचकल्याणप्राप्ताय अक्षयपद प्राप्तये अक्षतान् निर्वामीति स्वाहा। पुष्प-श्रीकेतुकी प्रमुखपुष्प अदोष लायो । नौरंग जंगकर भग सुरंग पायो। रागादि दोष मद मर्दन हेतु येवा। चर्चे पदाब्ज तव शीतलनाथ देवा। डों ह्रीं श्रीशीतलनाथजिनेन्द्राय गर्भ, जन्म,तप ज्ञान, निर्वाण पचकल्याण प्राप्ताय काम वाण विनाशनाय पुष्पं निर्वपामीति स्वाहा । नैवेद्य-नैवेद्यसार चरु चारु संवार लायो । जंबूनद प्रभृत भाजन सीसनायो। रागादि दोष मद मर्दन हेतु येवा । च» पदाब्ज तव शीतलनाथ देवा ॥ ो ह्रीं श्रीशीतलनाथ जिनेन्द्राय गर्भ, जन्म, तप, ज्ञान, निर्वाण पंचकल्याण प्राप्ताय क्षुधा रोग विनाशनाय नैवेयंनिर्वपामीति स्वाहा । दीप-स्नेह प्रपूरित सुदीपक जोतिराजें। स्नेह प्रपूरित हिए जजतेऽघ भाजें। रोगादि दोष मद मर्दन हेतुयेवा। च» पदाब्ज तव शीतलनाथ देवा। ॐ ह्रीं श्रीशीतलनाथ जिनेन्द्राय गर्भ, जन्म, तप,ज्ञान, निर्वाण पचकल्याण प्राप्ताय मोहांधकार विनाशनाय दीपं निर्वपामीति स्वाहा। धूप-कृष्णागरू प्रमुखगंध हुताश माही। खेको तवाप्र वसुकर्म जरंत जाही। रागादि दोष मद मर्दन - ।
चौबी० पजन सग्रह ३४८ हेतु येवा । च» पदान्ज तव शीतल नाथ देवा। ॐ ह्रीं श्रीशीलनाथ जिनेन्द्रायः गर्भ, जन्म, तप, ज्ञान, निर्वाण पंचकल्याण प्राप्ताय अष्ट कर्म दहनाय धूपं निवंपामीति स्वाहा। फल-निंबांम्र कर्कटि सुदाडिम आदिधारा । सौवर्णगंध फल सारसुपक्कपारा । रागादि दोष मद मर्दन हेतु येवा । चपदान्ज तव शीतलनाथ देवो । डों ह्रीं श्रीशीतलनाथ जिनेन्द्राय गर्भ, जन्म, नप, ज्ञान, निर्वाण पंचकल्याण प्राप्नाय मोक्ष फल प्राप्तये फलं निर्वपामीति स्वाहा। अर्घ-कश्रीफलादि वसु प्रासुक द्रव्यमाजे। नाचे रचे मचत बज्जत सज्जबाजे । रागादि दोष मद मर्दन हेतु येवा । च» पदाब्ज तव शीतलनाथ देव । रोह्रीं श्री शीतलनाथ जिनेन्द्राय गर्भ, जन्म, तप, ज्ञान, निर्वाणपंचकल्याण प्राप्ताय अनर्घपद प्राप्तये अर्घ निर्वपामीति स्वाहा । अथ पंच कल्याणक । छंद इंद्रवजा । गर्भ-आठ वदी चैत गर्भमाही। आये प्रभू मंगल रूप ताही। सेवै शची मात अनेक भेवा।चयूँ सदा शीतलनाथ देवा ॥ १ ॥ डों ह्रीं श्रीशीतलनाथांजनन्द्राय चैत्र कृष्ण अष्टमो गभ कल्याणकाय अर्घ निर्वपामीति स्वाहा। जन्म-श्रीमाघकी द्वादशि श्याम जायो। भूलोक में मंगलसार आयो। शैलेंद्र पै इंद्र फणींद्र जज्जे। मैं ध्यान धारो भवदुःख भज्जे ॥२॥ ॐ ह्रीं श्रीशीतलनाथ जिनेन्द्राय माघ कृष्ण द्वादशी जन्म कल्याणकाय अर्घ निर्वपामीतिस्वाहा। 4 चौबी० || तप-श्रीमाघकी द्वादशी श्याम जानों । वैराग्यपायो भव ताप हानों। ध्यायो चिदानंद निवार मोहा।च च- पूजन सदा चर्ण निवारी कोहा ॥३॥ ॐ ह्रीं श्रीशीतलनाथ जिनेन्द्राय माघ कृष्ण दादशी तप संग्रह कल्याणकाय अर्घ निर्वपामीति स्वाहा। ३४९ ज्ञान-चतुर्दशी पौष वदी सुहायो । ताहीदिना केवल लब्धि पायो । शोभे समौसृत्य वखान धर्म । चचूं सदा शीतल पर्म शमं ॥ ४॥ ॐ ह्रीं श्रीशीतलनाथ जिनेन्द्राय पौष कृष्ण चतुर्दशी ज्ञान कल्याणकाय अर्घ निर्वपामीति स्वाहा । निर्वाण-कुंवारकी आठय शुद्ध वुद्धा । भये महा मोक्ष सरूप शुद्धा । सम्मेद तँ शीतलनाथ स्वामी । गुणाकरंता सुपदं नमामी ॥ ५॥ ॐ ह्रीं श्रीशीतलनाथ जिनेन्द्राय आश्विन शुक्लाष्टमी मोक्ष कल्याणकाय अघ निर्वपामीतिस्वाहा। अंथ जयमाला। छंद चंचल तरंग। आप अनंतगुणाकर राजे ।वस्तु विकाशन भान समाज में यह जान गही सरना है। मोह महारिपुको हरनाहै दोह-हेम वरन तनतुंग धनु, नव्वै अति अभिराम । सुरतरु अंक निहार 'पद, पुनि पुनि करूं प्रणाम ॥ छंद त्रोटक-जै शीतलनाथ जिनंद वरं । भवदाघ देवानल मेघझरं । दुख भूभृत भंजन वज 1 पूजन । पौषी० || समं । भव सागर नागर पोत पमं ।३। कुह मान मया गद लोभ हरं । अरि विघ्नगयंद मृगेंद्र वरं। वृष वारिद वृष्टन सृष्टिहितू । परदृष्टी विनाशन सुष्ट पितू ॥ ४॥ समवश्रुत संयुत राजत हो। उपमा संग्रह अभिराम विराजतहो । वरबारह भेद सभाथितको । तित धर्म बखान कियो हितको ॥५॥ ३५० पहिले मह श्रीगणराज रजें । दुतियेमहकल्पसुरीजु सजें । तृतिये गणणी गुण भूरि धरें। चवथे तिय- जोतिष जोतिभरें ॥६॥ तियव्यंतरनीपनमें गिनिये । छहमें भुवनेसुर तिय भनिये । भुवनेश दसौथित सप्तम है । वसमें वसु व्यंतर उत्तम है ।। ७॥ नवमें,नभ जोतिष पंचभरे । दसमें दिवदेव समस्त खरे। नर द इकादशमें निवसैं । अरु बारहमे पशु सर्व लसैं ॥ ८॥ तज वैर प्रमोद धरे सबही। समता रस मग्न लसे तबही । धुनि दिव्यसुनें तज मोहमलं । गणराज असीहै ज्ञान बलं॥९॥ सवके हित तत्व बखान करें । करुणा मन रंजन शर्म भरें। वरण षट द्रव्यतने जितने । वर भेद विराजत हैं तितने॥१०॥ पुनिध्यानउभे शिवहेतु मुना । इक धर्म दुती सुकलं, अधुना । तित धर्मसुध्यान तना गनिये । दशभेद ठखै भ्रमको हनिये ॥११॥ पहिलो अरिनाश अपाय सही। दुतियो जिनवैन उपाय गही । त्रिति जीव विचे निज ध्यावत है । चवथो सु अजीव रमावत है ॥१२॥ पनमो सु उदेबल टारन है । छहमों अरि राग निवारन है । भव त्यागन चिंतन सातमहै । वसुमो जित लोभन आतम है ॥ १३ ॥ नवमो जिनकी धुनि सीसधरें । दसमो जिन भाखित हेतकरें । इम धर्मतनो दस भेद भनो । पुनि शुक्लतनो चहुं येम गनो ॥१४॥ सु पृथक्त वितर्क विचार सही। सु इकत्व वितर्क विचार गही । पुनि सूक्ष्म क्रिया प्रतिपात
-
३५९
चौवी.
कही। विपरीतक्रिया निरवृत्त लही ॥१५॥ इन आदिक सर्व प्रकाश कियो। भविजीवन को शिवस्वर्ग
पूजन दियो । पुनि मोक्ष विहार कियो जिनजी। सुखसागरमग्न चिरंगुण जी॥ १६॥ अब में शरणा पकड़ी
संग्रह तुमरी। सुध लेऊ दयानिधिजी हमरी। भवव्याधि निवारकरो अबही। मत ढोलकरो सुख दो सबही॥१७॥
घत्ताछन्द-शीतलजिन ध्यावो भगति बढावों, ज्यों रत्न त्रय निधि पावो । भव दंद नसावो. शिवथल
जावो,फेर न भव वनमें आवो ॥ १८॥ ॐ ह्रीं श्रीशीतलनाथ जिनेन्द्राय गर्भ, जन्म,' तप
ज्ञान, निर्वाण पंचकल्याण प्राप्ताय अनर्घ पद प्राप्तये महाघ निर्वपामीति स्वाहा ।
॥ छंद मालिनी॥
अथ आशीर्वाद-दृढरथ सुत श्रीमान, पंच कल्याण धारी । तिनपद युग पद्म,जो जजें भक्ति धारी।
सह सुख धन,धान्य दीर्घ सौभाग्य पावै । अनुक्रम अरि दाह, मोक्षको सो सिधावें ॥ १९॥
इत्याशीर्वाद. ॥ इति श्रीशीतलनाथ जिन पूजा संपूर्णा ॥ १०॥
चोवी० पूजन संग्रह ३५२ EE ११ अथश्रीश्रेयांसनाथजिन पूजा प्रारभ्यते। 7 (वृन्दावन कृत) छंद गीता वा हरिगीता। स्थापना-विमलनृप विमलासु अन,श्रीश्रेयांसनाथ जिनंद । सिंहपुरी जनमे सकल,हरिपूज धरी आनंद। भवबंध ध्वंसन हेतलखि, में शरन आयो येव । थापो चर्णयुग उरकमलमें, जजन कारन देव ॥१॥ ॐ ह्रीं श्री श्रेयांसनाथ जिनेन्द्र अत्रावतरावतर संवौषट् आव्हाननम् । डों ह्रीं श्रीश्रेयांसनाथ जिनेन्द्र अत्र तिष्ट तिष्ठ ठः ठः स्थापनम् । ॐ ह्रीं श्री श्रेयांसनाथ जिनेन्द्र अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट् सन्निधीकरणम् । अथ अष्टक । छंद गीता वा हरिगीता। जल-कलधौत वरन उत्तंग हिमगिर, पद्मद्रहतें आवई। सुरसरित प्रासुक उदकसोभरि, गधार चढावई श्रेयांसनाथ जिनंद त्रिभुवन, बंद आनंदकंद है दुखदंद फंद निकंद पूरन, चंदजोत अमंद है। डों ह्रीं श्री श्रेयांसनाथ जिनेद्राय गर्भ, जन्म, तप, ज्ञान, निर्वाण पंचकल्याणप्राप्ताय जन्म मृत्यु जरा रोग विनाशनाय जलं निर्वामीति स्वाहा । चंदन-गोसीर वर करपूर कुकुम, नीरसंग घसों सही । भवताप भंजन हेत भवदधि,सेतवर्ण जजू यही । श्रेयांसनाथ ज़िनन्द त्रिभुवन,वंद आनंदकंद है। दुख दन्द फन्द निकंद पुरण,चन्द जोत अमन्द है चौबी० पजन सग्रह ३५३ डों ह्रीं श्रीश्रेयांसनाथ जिनेन्द्राय गर्भ,जन्म, तप,ज्ञान,निर्वाण पचकल्याण प्राप्ताय संसारा ताप रोग विनाशनाय चन्दन निर्वपामीति स्वाहा। अक्षत-सितशाल शशि दुति शुक्तिसुंदर, मुक्तिकी उन हारहे । भरथार पुंज धरत पदतर, अखय पद करतार है । श्रेयांसनाथ जिनन्द त्रिभुवन बंद आनंद कद है । दुख दन्द फन्द निकद पूरण, चन्द जोत अमन्द है। रों ह्रीं श्री श्रेयांसनाथजिनेन्द्राय गर्भ, जन्म, तप, ज्ञान, निर्वाण पंचकल्याण प्राप्ताय अक्षय पद प्राप्तये अक्षतान निर्वपामीति स्वाहा । पुष्प-शुध सुमन सुमन समान पावन,मलयतै मधु झंकरै । पदकमलतर धरते तुरन सो, मदन को मद क्षेकरें। श्रेयांसनाथ जिनन्द त्रिभुवन, वंद आनंद कंद है। दुख दन्द फन्द निकद पूरण,चन्द जोत अमन्द है। गे ह्रीं श्रीश्रेयांसनाथ जिनेन्द्राय गर्भ, जन्म, तप, ज्ञान निर्वाण पंचकल्याण प्राप्ताय काम वाण विनाशनाय पुष्पं निर्वपामीति स्वाहा। नैवेद्य-यह परम मोदक आदिसरस, सवारि सुंदर चरु लियो । तुम वेदनी मदहरनलख, च» चरण शुचिकर हियो। श्रेयांसनाथ जिनन्द त्रिभुवन बंद आनंद कंद है । दुख दन्द फन्द निकंद पूरण, चन्द जोत अमन्द है। डों ह्री.श्रीश्रेयांसनाथ जिनेन्द्राय गर्भ, जन्म, तप, ज्ञान, निर्वाण पचकल्याण प्राप्ताय क्षधा रोग विनाशनाय नैवेद्यं निर्वपामोति स्वाहा । दीप-संशय विमोह विभर्मतम, भंजन दिनंद समानहो । तातें चरन ढिग दीप जोऊ, देहु अविचल चोबी० पूजन 'संग्रह -- ज्ञान हो । श्रेयांसनाथ जिनन्द त्रिभुवन, बंद आनंद कंद है । दुख दन्द फन्द निकंद पूरण, चन्द जोत अमन्द है। ॐ ह्रीं श्रीश्रेयांसनाथ जिनेन्द्राय गर्भ, जन्म, तप, ज्ञान, निर्वाणपंचकल्याण प्राप्ताय मोहांधकार रोग विनाशनाय दीपं निर्वपामीति स्वाहा। धूप-वर अगर तगर कपूर चर,सुगंध भूर बनाईया। दहि अमर जिव्हविर्षे चरनढिग, करम भरम जराईया श्रेयांसनाथ जिनन्द त्रिभुवन, बंद आनंद कंद है। दुख वन्द फन्द निकंद पूरण, चन्द जोत अमन्द है। डों ह्रीं श्रीश्रेयांसनाथ जिनेन्द्राय गर्भ, जन्म, तप, ज्ञान, निर्वाण पंचकल्याण प्राप्ताय अष्ट कर्म दहनाय धूपं निर्वपामीति स्वाहा ॥ फल-सुरलोक अर नरलोकके फल, पक्क मधुर सुहावने । ले भगति सहित जजूं चरन, शिवपरम पावन पावने । श्रेयांसनाथ जिनन्द त्रिभुवन, बंद आनंद कद है। दुख दन्द फन्द निकंद पूरण, चन्द जोत अमन्द है।, सें ह्रीं श्रीश्रेयांसनाथ जिनेन्द्राय गर्भ, जन्म, तप, ज्ञान निर्वाण पंचकल्याण प्राप्ताय मोक्ष फल प्राप्तयो फलं निर्वपामीति स्वाहा। अर्घ-जल मलय तंडुल सुमन चरु अरु, दीप धूप फलावली । करअर्घ चर्च् चरण युग प्रभु, मोहितार उतावली। श्रेयांसनाथ जिनन्द त्रिभुवन, वद आनद कद है । दुख दन्द फन्द निकंद पूरण, चन्द जोत अमन्द है । डों ह्रीं श्रीश्रेयांसनाथ जिनेन्द्राय गर्भ, जन्म, तप, ज्ञान,निर्वाण पंचकल्याण प्राप्ताय अनर्घपद प्राप्तये अर्घ निर्वपामीति स्वाहा ॥
- चोवी० पजन संग्रह ३५५ अथ पंचकल्याणक। पार्या छन्द। गर्भ-पुष्पोत्तर तज आये, विमला उर जेष्ठकृष्ण षष्ठी को। सुरनर मंगल गाये, मैं पूजु नाशकरम दुष्ठी को । ह्रीं श्रीश्रेयांसनाथ जिनेंद्राय जेष्ठ कृष्ण षष्टी गर्भकल्याणकाय अर्घ निर्वपामीति स्वाहा। जन्म-जनमे फागुन कारी, एकादशि तीन ज्ञान गधारी । इक्ष्वाकवंश तारी, मैं पूजू घोर विघ्न दुःख टारी॥२॥ • ह्रीं श्रीश्रेयांसनाथ जिनेन्द्राय फाल्गुण कृष्ण एकादशी जन्म कल्याणकाय अर्घ निर्वपामीति स्वाहा। तप-भवतन भोग असारा, लख त्यागो धीर शुद्ध तप धारा । फागुन वदी इग्यारा, में पूज, पाद अष्ट परकारा ॥३॥ ॐ ह्रीश्रीश्रेयांसनाथ जिनेन्द्राय फाल्गुण कृष्ण एकादशी तप कल्याणकाय अघ निर्वपामीति स्वाहा। ज्ञान-केवलज्ञान सु जानन, माघ वदी पूर्ण तित्थको देवा ॥ चतुरानन भवभानन,बंदू ध्यावू करू सुपद सेवा ॥४॥ ॐ ह्रीं श्रीश्रेयांस नाथ जिनेन्द्राय माघ कृष्ण अमावस्या ज्ञान कल्याणकाय अघ निर्वपामीति स्वाहा। निर्वाण-गिर समेदले पायो, शिवथल तिथ पूर्णमासि सावनको । कलिलायुध गुण गायो, में पूजू आप निकट आवन को ॥५॥ 'ॐ ह्रीं श्रीश्रेयांसनाथ जिनेन्द्राय श्रावण शुक्ल पूर्णिमा मोक्ष कल्याणकाय अर्घ निवपामीति स्वाहा ॥ , चौबी० पजन संग्रह ३५६ - अथ जयमाला । छन्द चंचलतरंग । महा अर्घ-शोभित तुंग शरीरसु जानो । चापअसी शुभलक्षण मानो। कंचनवर्ण अनुपम सोहे । देखत रूप सुरासुर मोहे ॥१॥ छद पद्धडी। जै जै श्रेयांसजिन गुण गरिष्ठ। तुम पदयुग दायक इष्ट मिष्ट । जै शिष्ट शिरोमणि जगतपाल । जै भविसरोज गण प्रातकाल ॥२॥ जे पंच महावत गज सवार । ले त्यागभाव दल बल सुसार । जे धीरजको दलपति वनाय । सत्ताथित महा रणको मचाय ॥३॥ धर रत्न तीन तिहुँ शक्तिसाथ । दश धरम कवच तपटोप माथाजै शुक्ल ध्यान कर खडग धार । ललकारो आठो अरि प्रचार ॥ ४॥ तामें सबको पति मोह चंड । ताको ततखिन कर सहस खंड । फिर ज्ञान दरस प्रत्यूह हान । निजगुण गढलीनो अचल थान ॥५॥ शुचिज्ञान दरस सुख वीर्यसार। हुव समवशरण रचना अपार । तितभाखे तत्व अनेक धार । जाको सुन भव्य हिये विचार ॥ ६॥ निजरूप लहो आनंदकार भ्रम दूर करनको अति उदार । पुन नय प्रमाण निक्षेपसार । दरसायो कर संशय प्रहार ॥ ७॥ तामे प्रमाण युगभेदयेव। परतक्ष परोक्ष राजस्वमेव । तामे प्रतक्ष के भेद दोय। पहिलो है संविवहार सोया ताके युग भेद विराजमान । मति श्रुति सो है सुंदर महान । है परमारथ दुतियो प्रतक्षा है भेद युगम ता मांहि दक्ष ॥ ९॥ एक यकदेश इक सर्वदेश । इक देश उभैविधि सहित वेश । वर अवधि सुमन 1
जन
बी० || परजै विचार । है सकलदेश केवल अपार ॥ १० ॥ चर अचर लखन युगपत प्रतक्ष । निरदंद्व रहित
परपंच पक्ष । पुन हैं परोक्ष मह पंचभेद । समि रितअरु प्रतिभिज्ञान भेद, ।११। पुन तर्क और अनुमान
माना आगमयुत पन अब नय बखान । नैगम संग्रह व्यवहार गढ । रिजु सूत्र शन्द अर समभिरूढा१२॥
संग्रह
पुन एवंभूत सु सप्त येम। नय कहै जिनेश्वर गुणजु तेम । पुन द्रव्यक्षेत्र अर काल भाव । निक्षेप चार
३५७
विधि इम जनाव ॥ १३ ॥ इनको समस्त भाख्यो जिनेश । जो समझत भ्रम नहिरहत लेश । निज ज्ञान
हेत यह मूल मंत्र । तुम भाखे श्रीजिनवर स्वतंत्र ॥ १४ ॥ इत्यादि तत्व उपदेश देय । हनि शेष करम
निरवान लेय । निर्वाण जजत वसु द्रव्यईश । वृंदावन निन प्रति नमत शीस ॥१५॥
पत्ता छन्द-श्रेयांस जिनेशा सुगुण महेशा, वज्र धरेशा ध्यावत है। हम निशिदिन वंदें पाप
निक, ज्यों सहजानन्द पावत हैं ॥ १६ ॥
ॐ ह्रीं श्रीश्रेयांसनाथ जिनेन्द्राय गर्भ, जन्म, तप, ज्ञान, निर्वाण पंचकल्याण प्राप्ताय अनर्घ
पद प्राप्तये महाघ निवंपामीति स्वाहा।
अथ आशीर्वाद । सोरठा-जो पूजे मनलाय, श्रेयांसनाथ पदपदमको । पावे इष्ट अघाय, अनुक्रम सो
शिवतिय वर ॥१७॥
इत्याशीर्वादः । इति श्रीश्रेयांसनाथ जिन पूजा संपूर्णा ॥ ११ ॥
१२ अथ श्रीवासुपूज्य जिन पूजा प्रारभ्यते। चोबी० जन संग्रह ३५८ (वृन्दावनकृत) कवित्त । स्थापना-श्रीमत वासुपूज्य जिनवरपद, पूजन हेत हिये उमगाय । थापूं मनवचतन शुचि करके, जिनकी पाटल देव्यामाय ॥ महिष चिन्ह पगलसे मनोहर, लालवरन तन समतादाय । सो करुणा निधि कृपादृष्टि कर, तिष्टहु सुपर तिष्ट इह आय ॥ १ ॥ ॐ ह्रीं श्रीवासुपूज्यजिनेन्द्र अत्रावतरावतर संवौषट् आह्वाननम् । ॐ ह्रीं श्रीवासुपूज्यजिनेन्द्र अत्र तिष्ठ तिष्ट ठाठः स्थापनम् । ॐ ह्रीं श्रीवासुपूज्यजिनेन्द्र अत्र मम सन्निहितो भवभव वषट् सन्निधीकरणम् ॥ अथ अष्टक । छंद जोगीरासा (आचलीबंध) जल-गंगाजलभर कनक कुंभमें, प्रासुक गंध मिलाई।करम कलंक विनाशन कारण, धार देत हरखाई। जिनपद पूजू लवलाई, जिनपद पूजं मनलाई। वासुपूज्य वसु पूजत नुतपद, वासव सेवत आई। चालब्रह्मचारी लख जिनको, शिवतिय सन्मुखधाई । उौं ह्रीं श्रीवासुपूज्यजिनेन्द्राय गर्भ, जन्म, तप,ज्ञान,निर्वाण पंचकल्याण प्राप्ताय जन्ममृत्यु जरारोगविनाशनाय जलं निर्वामीति स्वाहा । U तन الم बी० || चंदन-कृष्णागर मलयागिर चंदन, केशर संग घप्ताई ।भव आताप निवारन कारन,पूजं मन चितलाई॥ जिनपद पूजं लवलाई, जिनपद पूजू मनलाई । वासुपूज्य वसुपूजतनुतपद, वासव सेवत आई ।। बाल ब्रह्मचारी लख जिनको, शिवतिय सन्मुख धाई ॥ डों ह्रीं श्रीवासुपूज्यजिनेन्द्राय गर्भ, जन्म तप, ज्ञान, निर्वाण पंचकल्याण प्राप्ताय संसारा नापरोगविनाशनाय चन्दनं निर्वपामीति स्वाहा अक्षत-देवजीर सुखदास शुद्धवर, कंचन थाल भराई।पुंज धरत तुम चरनन आगे, तुरत अखैपद पाई। जिनपद पूजू लवलाई, जिनपद पूजू मन लाई । वासुपूज्य वसुपुजत तुमपद,वासव सेवत आई। बालब्रह्मचारी लख जिनको, शिवतिय सन्मुखधाई । डों ह्रीं श्रीवासुपूज्यजिनेन्द्राय गर्भ, जन्म, तप, ज्ञान, निर्वाण पंचकल्याण प्राप्ताय अक्षय पद प्राप्तये अक्षतान निर्वपामीति स्वाहा। पुष्प-पारिजात सतान कल्पतरु, जनित सुमनबहुलाई। मीनकेतु मद भंजन कारण, तुम पद पन चढाई ॥ जिन पद पूजू लवलाई, जिनपद पूजू मनलाई । वासुपूज्य वसुपूजत नुतपद, वासव सेवत आई ।। वाल ब्रह्मचारी लख जिनको, शिवतिय सन्मुख धाई ।।डों ह्रीं श्रीवासुपूज्यजिनेन्द्राय गर्भ,जन्म, तप, ज्ञान, निर्वाण पंचकल्याण प्राप्ताय कामवाण विनाशनाय पुष्पं निर्वपामीति स्वाहा ॥ नैवेद्य-नव्य गव्यआदिक रस पूरित, नेवज तुरत उपाई। क्षुधारोगनिवारन कारन, तुम्हेंजजू सिरनाई। जिनपद पूजू लवलाई, जिन पद पूजू मनलाई । वासुपूज्यं वसुपूजतनुतपद, वासव सेवत आई। बाल ब्रह्मचारी लख जिनको, शिवतिय सन्मुख धाई ॥डौं ह्रीं श्रीवासुपूज्यजिनेन्द्राय गर्भ, जन्म, + संग्रह तप, ज्ञान,निर्वाण पंचकल्याण प्राप्ताय क्षुधारोगविनाशनाय नैवेयं निर्वपामीति स्वाहा। दीप-दीपकजोति उदोत होत वर, दश दिश में छबिछाई ॥तिमिरमोहनाशक तुमको लख, जजूचरण हरपाई ॥ जिन पद पूजं लवलाई जिनपद पूजृमनलाई । वासुपूज्य वसुपुजत नुतपद वासवसेवत आई ॥ बाल ब्रह्मचारीलख जिनको शिवतिय सन्मुखधाई ॥ॐ ह्रीं श्रीवासुपूज्यजिनेन्द्रायगर्भ, जन्म, तप, ज्ञान,निर्वाण पंचकल्याण प्राप्ताय मोहांधकार विनाशनायदीपंनिर्वपामीतिस्वाहा ॥ धूप-दशविध गंधमनोहरलेकर,वीतिहोलमेंडाई॥ अष्ट कर्म यह दुष्ट जरत हैं,धूमधूम सुउडाई। जिन पद पूजलवलाईजिनपद पूजू मनलाई । वासुपूज्य वसु पूजत नुतपद बांसव सेवत आई। बाल ब्रह्मचारीलख जिनको शिवतियसन्मुख धाई ॥ ॐ ह्रीं श्री वासुपूज्य जिनेन्द्राय गर्भ, जन्म,तप, ज्ञान, निर्वाण पंचकल्याण प्राप्ताय अष्टकम दहनाय धूपं निर्वपामीतिस्वाहा ।। फल-सुरस सुपक्व सुपावन फलले,कंचन थाल भराई। मोक्षमहाफलदायकलख,प्रभुभेट धरूंगुणगाई। जिनपद पूजूलवलाई,जिन पद पूMमन लाई। वासुपूज्य वसुपूजत नुत पद वासव सेवत आइ । बालब्रह्मचारी लख जिनको शिवतियःसन्मुख धाई ॥ ॐ ह्रीं श्रीवासु पूज्य जिनेन्द्राप गर्भ, जन्म, तप, ज्ञान, निर्वाण पंचकल्याण प्राप्ताय मोक्षफल प्राप्तयेफलंनिर्वपामीतिस्वाहा। अर्घ-जलफलद्रव्य मिलाय गायगुण,आठोंअगनमाई|शिव पद राजत हेत श्रीपति,निकट धरूयहलाई जिनपद पूजूलवलाई जिन पदपूजूमन लाई । वासुपूज्य वसुपूजतनुतपद वासव सेवत आई बाल दोबी० पजन । संग्रह ३ ब्रह्मचारीलख जिनको शिवतियसन्मुखधाई ॥ ॐ ह्रीं श्री वासुपूज्यजिनेन्द्राय गर्भ, जन्म, तप, ज्ञान,निर्वाण पंचकल्याण प्राप्ताय अनपद प्राप्तये अर्घनिर्वामीतिस्वाहा। अथपंचकल्याणक । छंदपाईता। गर्भ-कल छट्टीअषाढ सुहायो । गर्भागममंगल पायो । दसमें दिवतें इत आए। शत इंद्रजजै सिरनाये॥१॥ डों ह्रीं श्रीवासु पूज्य जिनेन्द्राय आषाढ कृष्ण षष्ठी गर्भकल्याणकाय अर्घ निर्वपामीतिस्वाहा । जन्म-कल चौदस फागुण जानो । जनमें जगदीश महानो॥ हरि मेरु जजे तब जाई । हम पूजत हैं चितलाई ॥२॥ॐ ह्रीं श्री वासुपूज्य जिनेन्द्रीय फाल्गुण कृष्ण चतुर्दशी जन्म कल्याणकाय अर्घ निर्वपामीतिस्वाहा। तप-तिथि चौदस फागुण श्यामा । धरियो तप श्रीअभिरामा ॥ नृप सुंदर घर पय पायो । हम पूजत अति सुख पायो ॥ ३॥ ॐ ह्रीं श्रीवासुपूज्यजिनेन्द्राय फाल्गुण कृष्ण चतुर्दशी तप कल्याणकाय अर्घ निर्वपामीति स्वाहा। ज्ञान-सितमाघहि द्वितिया सोहै। लह केवल आतम जोहै ॥ अनअंत गुणाकर स्वामी । नित बंदू त्रिभुवन नामी ॥ ४॥ ॐ ह्रीं श्रीवासुपूज्यजिनेन्द्राय माघ शुक्ल द्वितीया ज्ञान कल्याणकाय अर्घ निर्वपामीति स्वाहा। -- चौबी० पूजन 'संग्रह ३६२ निर्वाण-सित भादव चौदस लीनो । निरवान सुथान प्रवीनों। पुरचंपा थानक सेती। हम पूजत नित हित हेती ॥५॥अहीं श्रीवासुपूज्यजिनेन्द्राय भाद्रपद शुक्ल चतुर्दशी मोक्ष कल्याणकाय अर्घ निर्वपामीति स्वाहा। अथजयमाला।दोहा। महाअर्ध-चंपा पुरमें पंचवर, कल्याणक तुम पाय । सत्तर धनु तन सोहनो, जे जे जे जिनराय ॥ छंद मोतीदाम-महा सुखसागर आगर ज्ञान । अनंत सुखामृत सुक महान ॥ महाबल मंडित खंडित काम । रमाशिवसंग सदा विसराम ॥२॥ सुरेंद्र फणेंद्र खगेंद्र नरेंद्र । मुनिंद जजै नित पादरविंद प्रभु तव अंतर भाव विराग । सुवालहित वतशील सुहाग ॥३॥ कियो नहि राज उदास सरूप। सुभावन भावत आतम रूप॥ अनित्य शरीर प्रपंच समस्त । चिदातम नित्य सुखाश्रितवस्त ।। अशर्ण नही कोऊ शर्ण सहाय ।जहांजिय भोगत कर्म विपाय ॥ निजातमको परमेश्वर शर्ण। नहीं इनके विन आपद हणं ॥५॥ जगत यथाजल बुद्बुद येव । सदा जिय एक लहै फलभेव ॥ अनेक प्रकार धरी यह देह । भ्रमें भवकानन आनन नेह ॥६॥ अपावन सात कुधात भरीय । चिदातम शुद्ध सुभाव धरीय ॥ धरे इनसे जब नेह तबेव। सु आवत कर्म तवे वसुभेव ॥७॥ जवे तनभोग जगत्त उदास। धरेतब संवर निर्जर आस ॥ करे जब कर्म कलंक विनास। लहे तब मोक्ष महा सुखरास ॥ ८॥ ॥ ॥
चोवी० तया यह लोक नराकृत नित्त । विलोकिय ते षटद्रव्य विचित्तः॥सु आतम जानन वोध विहीन । धरै किन तत्व प्रतीत प्रवीन ॥ ९॥जिनागम जान रु संयम भाव । सबै निजज्ञान विना विरसाव ॥ संग्रह || सुदुर्लभ द्रव्य सुक्षेत्र सुकाल। सुभाव सवै जिहते शिवहाल ॥ १० ॥ लहो सब योग सुपुण्य वसाय । कहोकिम दीजिये ताहि गमाय॥ विचारत यो लोकांतिक आय। नमें पद पंकज पुष्प चढाय ॥ ११ ॥ कयो प्रभु धन्य कियो सुविचार । प्रबोधि सुयेम कियो जुविहार ॥ तबै सुधर्मतनो हरि आय। रचो शिविका चढि आप जिनाय ॥१२॥ धरेतप पाय सुकेवल बोध । दियो उपदेश सुभव्य सबोध ॥ लयो फिर मोक्ष महा सुखरास । नमे नितभक सोई सुख आस ॥ १३ ॥ घत्ताछन्द-नित वासव वंदित पापनिकंदित, वासुपूज्य व्रत ब्रह्मयती ॥ भव संकल खंडित आनंद मंडित, जैजै जैवंत यती ॥१४॥ ॐ ही श्रीवासुपूज्यजिनेन्द्राय गर्भ, जन्म, तप, ज्ञान, निर्वाण पंचकल्याण प्राप्ताय अनर्घ पद प्राप्तये महार्घ निर्वपामीति स्वाहा। अथ आशीर्वाद । सोरठा-वासुपूज्य पदसार, जजे दरव विध भावसो ॥ सो पावे सुखसार, भुक्ति मुक्ति इत्याशीर्वादः । इति श्रीवासुपूज्यजिन पूजा संपूर्णा ॥ १२ ॥ को जो परम ॥
पूजा चौबी० पूजन संग्रह ३६४ १३ अथ श्रीविमलनाथजिन लिख्यते। (घृन्दावनकृत) छंद मदावलिप्तकपोल। स्थापना-सहस्रार दिवत्याग,नगर कंपिलाजनम लिय । कृतधर्मा नृपनंदन, मातु जयसेन धर्मप्रिय ।। तीनलोक चरनंद, विमलजिन विमल विमल कर । थापू चरण सरोज, जजनके हेत भाव धर ॥१॥ ॐ ह्रीं श्रीविमलनाथ जिनेन्द्र अत्रावतरावतर संवौषट् आव्हाननम् । डों ह्रीं श्री विमलनाथ जिनेन्द्र अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठः ठः स्थापनम् । डों ह्रीं श्री विमल नाथ जिनेन्द्र अन मम सन्निहितो भव भव वषट् सन्निधी करणम् । अथ अष्टक । सोरठा। (चाल मनसुखरायजी कृत नंदीश्वर अष्टक की)। जल-कंचन झारी वारि, पदम द्रहको नीरले । तृषारोग निरवार । विमल विमलगुण पूजिये। ओं ह्रीं श्रीविमलनाथ जिनेन्द्राय गर्भ जन्म, तप, ज्ञान निर्वाण पंचकल्याण प्राप्ताय जन्म, मृत्यु जरा रोग विनाशनाय जलं निर्वपामीति स्वाहा। चंदन-मलयागर करपूर, देववल्लभा संग घस । हर मिथ्यातप भूर । विमल विमल गुण पजिये। ॐ ह्रीं श्री विमलनाथ जिनेन्द्राय गर्भ, जन्म, तप,ज्ञान, निर्वाण पंचकल्याण प्राप्ताय ससारा ताप रोग विनाशनाय चन्दनं निर्वपामीति स्वाहा।
पोषी० पजन संग्रह अक्षत-पासमती सुखदास,श्वेत निशापति को हंसे। पूरे वाछित आस। विमल विमल गुण पूजिये। ओ ह्रीं श्री विमलनाथ जिनेन्द्राय गर्भ, जन्म,तप, ज्ञान,निर्वाण पंचकल्याण प्राप्ताय अक्षय पद प्राप्तये अक्षतान निर्वपामीनि स्वाहा। पुष्प-पारिजात सुखवास, सुंदर शुद्ध सुगधमय । मदन दहन के काज। विमल विमल गुण पूजिये। ॐ ह्रीं श्रीविमलनाथ जिनेन्द्रीय गर्भ, जन्म, तप, ज्ञान, निर्वाण पंचकल्याण प्राप्ताय काम वाण विनाशनाय पुष्पं निर्वपामीनि स्वाहा । नेवेद्य-नव्य गव्य रसपूर, सुवरन थार भराइके । क्षुधा वेदनीचूर। विमल विमलगुण पूजिये । ॐ ह्रीं श्रीविमलनाथ जिनेन्द्राय गर्भ, जन्म, तप, ज्ञान, निर्वाण पंचकल्याण प्राप्ताय क्षुधा रोग विनाशनाय नैवेद्यं निर्वपामीति स्वाहा। दीप-माणिक दीप अखंड, गोछाई वर मोदसो। हरो मोहतम चंड। विमल विमल गुण पूजिये। डों ह्रीं श्रीविमलनाथ जिनेन्द्राय गर्भ, जन्म, नप,ज्ञान निर्वाण पंचकल्याण प्राप्ताय मोहांध कार रोग विनाशनाय दीपं निर्वपामीति स्वाहा । धूप-अगर तगर घनसार, देवद्वार कर चूर वर । खेवू वसु अरिजार, विमल विमलगुण पूजिये। ॐहीं श्रीविमलनाथ जिनेन्द्राय गर्भ,जन्म, तप,ज्ञान, निर्वाण पंचकल्याण प्राप्ताय अष्टकर्म दहनाय धूपं निर्वपामीति स्वाहा। - चौबी० पजन संग्रह ३६६ । फल-श्रीफल सेव अनार,मधुररसीले पावनो मोक्ष फलनकेसाराविमल विलमगुणपूजियोह्रीं श्रीविमल नायजिनेन्द्राय गर्भ,जन्म,तप,ज्ञान,निर्वाणपंचकल्याणप्राप्तायमोक्ष फल प्राप्तये फलंनिर्वपामीतिस्वाहा अर्घ-आठों दरव सवार, मनसुख दायक पावने । जजू अरघ भर थार। विमल विमलगुण पजिये। गे ही श्री विमलनाथ जिनेन्द्राय गर्भ, जन्म, तप, ज्ञान, निर्वाण, पंचकल्याण प्राप्ताय अनघ पद प्राप्तये अ निर्वपामीति स्वाहा। अथ पंच कल्याणक । छन्द द्रुतविलंवित वा सुंदरी । गर्भ-गरम जेठवदी दशमी भनो । परम पावन सोदिन सोभनो । करत सेव शची जननी तनी । हम जजै पदप शिरोमनी ॥ १ ॥ में ही श्रीविमलनाथ जिनेन्द्राय ज्येष्ठ कृष्ण दशमी गर्भ कल्याणकाय अर्घ निर्वपामीति स्वाहा। जन्म-शुकल माघ चतुर तिथि जानिये । जनम मंगल तादिन मानिये । हरि तबै गिरिराज विषे जजे। हम समर्चत आनंदको सजै ॥ २॥ ॐ ह्रीं श्रीविमलनाथ जिनेन्द्राय माघ शुक्ल चतुर्थी जम्म कल्याणकाय अर्घ निर्वपामीति स्वाहा । तप-तपधरे सितमाघचतुरभली। निजसुधातमध्यावत हैरली। हरिफणेश नरेशजजें तहां। हम जजै नित आनंदसोयहाह्रीं श्रीविमलनाथ जिनेन्द्राय माघशुक्ल चतुर्थी तपकल्याणकायअर्घ निर्वपामीतिस्वाहा " । कल्याणकाय ज्ञान-विमल माघ छटी हन घातिया। विमल बोधलियो सवभासिया। विमल अर्ष चडायजāअवे विमल आनंद देऊहमें सबै॥४॥ ॐ ह्रीं श्रीविमलनाथ जिनेन्द्राय माघशुक्ल पष्टी झान कल्याणकाय अघनिर्वयामीति स्वाहा। निर्वाण-भ्रमरसाट वसू अति पावनो। विमल सिद्ध भये मन भावनो। गिरि समेद हरी तित पूजिया। हम जजें इत हर्ष धरें हिया ॥५॥ ॐ ह्रीं श्रीविमलनाथ जिनेन्द्राय आषाढ कृष्णाष्टमी मोक्ष अघ निर्वपामीति स्वाहा॥ मथ जयमाला। दोहा। महाअर्घ-गगन चहत उडगण गमन,छित तिथिके छहजेमातिम गुणवरनन वरनना,मांहि होयतव केम ? साठ धनुष तन तुंग है, हेम वरण अभिराम । वर वराह पद अंकलख,पुनि पुनि करूं प्रणाम॥२॥ छंद त्रोटक-जय केवल ब्रह्म अनंत गुनी। तुम ध्यावत शेष महेश मुनी । परमातम पूरन पापहनी। चित चिंतत दायक इष्ट घनी॥३॥ भव आतप ध्वंसन इंद्र करं। वर सार रसायण शर्म भरं । सब जन्म जरा मृत दाघहरं । शरनागत पालन नाथ वरं ॥४॥ नित संत तुम्हें इन नामन ते। चित चिंतत हँ गुण गामिन ते। अमलं अचलं अटलं अतुलं । अरलं अछल अथलं अकुलं ॥५॥ अजरं अमरं अडरं अहरं। अपरं अभरं असरं अनरं। अमलीन अछीन अरीन हने। अमतं अगतं अरतं अपने ॥६॥ अक्षधा अतृषा अभयातुमहो । अमदा अगदा अवदा तुमहो । अविरुद्ध अकुड अमान धुना । अतलं - - तोबी० पूजन संग्रह ३६८ 1 असल अन अंतगुना॥७॥अरसं सरसं अकलं सकलं । अवचं सवचं अमनं सवलं ।इनआदि अनेक प्रकार सही। तुमको जिनसंत जपे नितही॥ ८॥ अव में तुमरी शरना पकरी। दुख दूरकरो प्रभुजी हमरी । हम कष्ट सहे भव कानन में । कुनिगोंद तथा थल ओनन में ॥९॥ तित जामन मनं सहे जितने । कहि केम सके तुमसो तितने । सुमुहूरत अंतरमांहि धरैछह त्रय त्रय छ छहकाय खरें॥ १० ॥ क्षिति वन्हि क्यारिक साधरना । लघु धूल विभेदनिसौ भरनो । परतेक वनस्पति ग्यार भये । छ हजार दुवादसभेद लहे ॥११॥ सब द्वै त्रै भू षट छः सुभया। इक इंद्रिय की परजाय लया । जुगेंदिय काय असी गहियो । तिय इंद्रिये साठन में रहियो ॥ १२॥ चतुरिंद्रिय चालिस भेद धरा । पन इंद्रियके चवतीस वरा । सब ये तन धार तहां सहियो । दुख घोर चितारिन जात हियो ॥१३॥ अब मो अरदास हिये धरिये । दुखदंद सवै अबही हरिये । मन वंछित कारज सिद्धि को।सुखसार सबै घर रिद्धि भरो ॥ १४॥ पत्ताछन्द-जय विमल जिनेशानुतना केशा, नागेशा नरईश सदा। भवताप अशेषा हरन निशेशा दाता चिंतित शर्मसदा ॥ १५॥ॐ ह्रीं श्री विमलनाथ जिनेन्द्राय गर्भ,जन्म, तप, ज्ञान निर्वाण, पंचकल्याणप्राप्ताय अनर्घ पद प्राप्तये महाघ निर्वपामीतिस्वाहा । अथ आशीर्वाद दोहा-श्री मत विमल जिनेशपद,जो पूजे मन लाय। पूरैवछित आसतसु,में पुजूगुणगाय। इत्याशीर्वादः॥ इति श्री विमलनाथ निज पूजा संपूर्णा ॥ १३॥ 4 . 4 .
१४ अथ श्रीअनन्तनाथ जिन पूजा प्रारभ्यते। चौबी० पूजन संग्रह - (वृन्दाबन कृत) कवित्त। स्थापना-पुष्पोत्तर तज नगर अयुध्या, जनम लियो सूर्या उर आय । सिंहसेन नृपके नंदन,आनंद असेस भरे जगराय । गुणअनंत भगवंत धरे,भवदंदहरे तुम हे जिनराय। थापतहुं त्रयवार उचरकै, कृपासिंधु तिष्टा इत आय ॥१॥ ॐ ह्रीं श्रीअनंतनाथ जिनेन्द्र अत्रावतरावतर संवौषट् आव्हाननम् । ॐ ह्रीं श्रीअनन्तनाथ जिनेन्द्र अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठाठः स्थापनम्। ॐ ह्रीं श्रीअनन्तनाथ जिनेन्द्र अघ्रमम सन्निहितो भव भव वषट् सन्निधिकरणम् । अथ अष्टक । बंदगोता। जल-शुचिनीरनिर्मल गंगको ले,कनक गभराईया। मलकरम धोवन हेत, मन वच काय धार ढराईया। जगण्ज परम पुनीत मीत, अनंत संत सुहावनो। शिवकत वंत महंत ध्यावो, भ्रंत तंत नसावनो। ॐ ह्रीं श्री अनन्तनाथ जिनेन्द्राय गर्भ, जन्म, तप, ज्ञान, निर्वाण पंचकल्याण प्राप्तार - : * जन्ममृत्यु जरारोग विनाशनाय जलं निर्वपामीति स्वाहा । , । चौबी० जन संग्रह ३७० . चन्दन-हरिचंद कदलीनंद कुंकुम, दंदताप निकंद है। सव पापरुज संताप भंजन, आपको लख चंद है। जग पूज परम्पुनीतमीत,अनन्तसंतसुहावनो। शिव कन्त वन्त महन्त ध्यावोभ्रन्त तन्त नसावनो। ॐ ह्रीं श्रीअनन्तनाथ जिनेन्द्राय गर्भ,जन्म, तप, ज्ञान,निर्वाण पंचकल्याण प्राप्ताय संसारा ताप रोग विनाशनाय, चन्दनं निर्वपामीति स्वाहा। अक्षत-शितशाल दुति उजियाल, हीरहिमाल गुलकनितेघनी। तसु पुंज तुमपदतर धरत, पद लहत' स्वच्छ सुहावनी। जग पूज परमपुनीत मीत, अनन्तसंत सुहावनो। शिवकन्त वन्त महन्त ध्यावो भ्रन्त तन्त नसावनो। • ह्रीं श्रीअनन्तनाथ जिनेन्द्राय गर्भ, जन्म,तप, ज्ञान, निर्वाण पंचकल्याण प्राप्ताय अक्षय पद प्राप्तये अक्षतान् निर्वपामीति स्वाहा । पुष्प-पुष्कर अमरतर जनितवर, अथवा उ.वरकर लाईया। तुम चरन पुष्कर तरधरत, शरशूल सकल नसाईया। जग पूज परमपुनीत मीत, अनन्तमत सुहावनो। शिवकन्तवन्त महन्तध्यावो भ्रन्त तन्त नसावनो। ॐ ह्रीं श्रीअनन्तनाथ जिनेन्द्राय गर्भ, जन्म, तप, ज्ञान, निर्वाण पंचकल्याण प्राप्ताय काम वाण विनाशनाय पुष्पं निर्वपामीति स्वाहा । नैवेद्य-पकवान नैना घ्राणरसना, की,प्रमोद सुदाय है । सो लाय चरन चढाय, रोगक्षुधाय नाश करायह जग पूज परमपुनीत मीत,अनन्तसंतसुहावनो। शिवकन्त वन्त महन्त ध्यावो भ्रन्त तन्त नसावनो। ॐ ह्रीं श्रीअनन्तनाथ जिनेन्द्राय गर्भ, जन्म,तप, ज्ञान, निर्वाण पंचकल्याण प्राप्ताय क्षुधा - बेबी - - रोगविनाशनाय नैवेद्यं निर्वपामीति स्वाहा ॥ वीप-तममोह भानन जानआनन,आनशनं गहीअबै। वर,दीप धारूं वारितुमढिग, सुपर ज्ञान जु दो सबै। जग पूज परमपुनीत मीत, अनन्तसंतसुहावनो। शिवकन्त वन्त महन्तध्यावो भ्रन्त तन्त नसावनो। ॐ ह्रीं श्रीअनन्तनाथ जिनेन्द्राय गर्भ, जन्म, तप, ज्ञान, निर्वाण पंचकल्याण प्राप्ताय मोहांधकार रोग विनाशनाय दीपं निर्वपामीति स्वाहा । धूप-यह गध चूर दशांग सुंदर, धूम धुज में खेय है। वसुकर्म भर्म जराय तुमढिग, निज सुधातम वेय है। जगपूज परमपुनीत मीन, अनन्तसत सुहावनो। शिवकन्त वन्त महन्त ध्यावोभ्रन्त तन्त नसावनो। ओं ह्रीं श्रीअनन्तनाथ जिनेन्द्राय गर्भ, जन्म, तप, ज्ञान,निर्वाण पंचकल्याण प्राप्ताय अष्ट कर्म दहनाय धूपं निर्वपामीति स्वाहा। फल-रस थक्कपक्व सुभक्व चक्व,सुहावने मृदुपावने । फल सारबंद अमंद ऐसो,लाय पूज रचावने। जग पज परमपुनीत मील, अनन्त, संत सुहावनो। शिव कन्त वन्त महन्त ध्यावो भ्रन्ततन्त नसावनो। ॐ ह्रीं श्रीअनन्तनाथ जिनेन्द्राय गर्भ, जन्म, तप, ज्ञान, निर्वाण पंचकल्याण प्राप्ताय मोक्ष फल प्राप्तये फलं निवंपामीति स्वाहा। अर्घ-नीर चंदन शालि नंदन, समनचरु दीवाधरूं । अरुधूप फलयुत अर्घ कर,कर जोरयुग विनती करूं। जग पूज परमपुनीतमीत, अनन्तसंत सुहावनो । शिवकन्त वन्त महंत ध्यावो दंत तन्त नसावनो।
चौबी०
पूजन
संग्रह
३७२
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ॐ हीं श्रीअनन्तनाथ जिनेद्राय गर्भ, जन्म, तप, ज्ञान निर्वाण पंचकल्याण प्राप्ताय अनर्थ
पद प्राप्तये अर्घ निर्वपामीति स्वाहा।
अथ पंच कल्याणक । छंद सुंदरी वा द्रुतविलं वित।
गर्भ-असित कार्तिक एका भावनो । गर्भको दिनसोगिन पावनो। किय शची तित चर्चन चावसोहम
जर्जे इतआनन्द भावसो॥ १॥ ॐहीश्री अनंतनाथ जिनेन्द्राय कार्तिक कृष्ण प्रतिपदा गर्भ
कल्याणकाय अर्घ निर्वपामीतिस्वाहा ॥
जन्म-जनम जेठवदी तिथि द्वादसी । सकल मंगल लोक विपैलसी। हरि जजे गिरिराज समाजतें। हम
जर्ज इत आतम काजतें॥२॥ ॐह्रीं श्रीअनंतनाथ जिनेन्द्राय ज्येष्ठ कृष्ण द्वादशी जन्म
कल्याणकाय अर्घ निर्वपामीति स्वाहा।।
तप-भव शरीर विनश्वर भाईयो । असित जेठ दुवादस गाईयो। सकल इंद्र जजे तित आय के । हम
जजै इत मंगल गाय के ॥३॥ ॐ ह्रीं श्रीअनंतनाथ जिनेन्द्राय जेष्ठ कृष्ण द्वादशी तप कल्याण
काय अर्घ निर्वपामीति स्वाहा ।
ज्ञान-असित चेत अमावसको सही। परम केवलज्ञान जग्यो तही । लहि समव श्रुति धर्म धुरंधरो।
हम समर्चत विध्न सबै हरो॥४॥ ॐ हीं श्रीअनन्तनाथ जिनेन्द्राय चैत्र कृष्ण अमावस्या
ज्ञान कल्याणकाय अघ निर्वपामीति स्वाहा ।
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पजन संग्रह ३७३ निर्वाण-असित चैत्र अमावस गाईयो। अवतवाति हने शिवपाईयो। गिरिसमेद ज. हरिआईके। हम जले पद प्रीति लगाईकै ॥५॥ ॐ ह्रीं श्रीअनंतनाथ जिनेन्द्राय चैत्रकृष्ण अमावस्या मोक्ष कल्याणकाय अर्घ निर्वपामीति स्वाहा। अथ जयमाला॥दोहा॥ महाअर्ध-तुमगुण वरनन एम जिम। खं विहाय करमान। तथामेदनी पदनि कर कीनो चहत प्रमान। जय अनंत रवि भव्यमन, जलज श्रृंद विहसाय। सुमतिकोक तियथोक सुख,वृद्धकियो जिनराय। छंद नयमालिनी वा चडी--जय अनंत गुणवंत नमस्ते । शुद्धध्येय नित संत नमस्ते । लोका लोक विलोक नमस्ते, चिन्मूरति गुण थोक नमस्ते ॥३॥ रतन त्रय धर धीर नमस्ते। करम शत्रुवर वीर नमस्ते। चार अनंत महंत नमस्ते । जै जै शिवतिय कंत नमस्ते ॥४॥ पंचाचार विचार नमस्ते । पच करण मद हार नमस्ते । पंच परावत चूर नमस्ते । पंचम गति सुखपूर नमस्ते ॥ ५॥ पंचलन्धि धर- णेश नमस्ते, पंच भाव सिद्धेश नमस्ते। छहो द्रव्यगुण ज्ञान नमस्ते, छहो काल पहचान नमस्ते ॥६॥ छहो काय रक्षेश नमस्ते, छह सम्यक् उपदेश नमस्ते । सप्तविषन वन वन्हि नमस्ते (जे केवल अपरन्हि नमस्ते ॥७॥ सप्ततत्वगुण भनन नमस्ते । सप्त शुभ्रगति हनन नमस्ते । सप्त भंग के ईश नमस्ते। सातो नय कथनीश नमस्ते॥८॥अष्ट कर्ममल दल नमस्ते। अष्ट योग निरशल्य नमस्ते - चौबी० पजन सग्रह २७४ अष्टम धराधिराज नमस्ते । अष्ट गुननं सितराज नमस्ते ॥९॥-जै नव केवल प्राप्त नमस्ते । नौ पदार्थ थित आप्त नमस्ते । दसौं धरम धरतार नमस्ते। दसौं बंध परिहार नमस्ते ॥ १०॥ विघ्न महीधर बिज्जु नमस्ते । जे ऊरधगति रिज्जु नमस्ते । तन कनकंदुति पूर नमस्ते। इक्ष्वाकं जगसूर नमस्ते ११ सही अंक'निशंक नमस्ते । चित चकोर मृगअक नमस्ते । धनुपचास तन उच्च नमस्ते । कृपासिंधु गुण सुच्च नमस्ते ॥ १२ ॥ राग दोष मदटार नमस्ते । निज विचार दुखहार नमस्ते । सुर सुरेश गणवृन्द नमस्ते । वृन्द करो सुख कद नमस्ते ॥ १३ ॥ पत्ताछन्द-जै जै जिनदेवं सुरकृत सेवं, नितकृत चित्त हुलास धरं । आपद उद्धारं समतागारं, वीतराग विज्ञान वरं ॥ १४॥ ॐ ह्रीं श्रीअनंतनाथ जिनेन्द्राय गर्भ, जन्म, तप, ज्ञान, निर्वाण, पंच. कल्याण प्राप्ताय अक्षय पद प्राप्तये महाघ निर्वपामीति स्वाहा। अथ आशीर्वादः-छंद मदावलिप्तकपोल । जो जन मन वच काय,लाय जिनजजे नेहधर। वा अनुमोदन करै करावे, पढे पढावे पाठवर । ताके नित जो होय सु मंगल, आनंद दाई । अनुक्रम ते निर. वान लहे, सामग्री पाई ॥१५॥ इत्याशीर्वादः ॥ इति श्रीअनंतनाथ जिन पूजा संपूर्णा ॥१४॥ । ।। -- + - १५अथ श्रीधर्मनाथ जिन पूजा लिख्यते। चौबी पजन संग्रह ३७५ (वृदावनकृत) छंद माधवी॥ स्थापना-तजकै सर्वारथ सिद्ध विमान सु,भानुके आन आनंद बढायो। जगमात सुबतके नंदन होय, भवोदधि डूबत जंतु कढायो।। जिनको गुण नामहि माहि प्रकाश है, दासनको शिवस्वर्ग पठायो। तिनके पद पूजनहत त्रिवारसु, थापतहूं यह फूल चढायो ॥ १ ॥ ॐ ह्रीं श्रीधर्मनाथजिनेन्द्र अत्रावतरावतर संवौषटु आह्वाननम् । ॐ ह्रीं श्रीधर्मनायजिनेन्द्र अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठाठः स्थापनम् । ॐ ह्रीं श्रीधर्मनाथजिनेन्द्र अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट् सन्निधीकरणम् ॥ अथ अष्टक (छंद जोगीरासा) जल-मुनिमनसम शुचिसीर नीर, अति मलय मेल भर झारी । जन्म जरामृत ताप हरनको, चरचुं चरन तुम्हारी ॥ पर्म धर्म सिमर मन, धर्म जिन अशरण शरण निहारी। पूजू पाय गाय गुण सुन्दर, नाचूं दे दे तारी॥ ॐ ह्रीं श्रीधर्मनाथजिनेन्द्राय गर्भ, जन्म, तप, ज्ञान, निर्वाण पंचकल्याण प्राप्ताय जन्म मृत्यु जरारोग विनाशनाय जलं निर्वपामीति स्वाहा । -- चौवी० पजन संग्रह ३७६ चन्दन-केशर चंदन कंदली नंदन, दाह निकंदन लीनो। जलसंग घस लस शशी समकर भव आताप हरीनो। परम धर्म सिमर मन, धर्म जिन अशरण शरण निहारी। पूजू पाय गाय गुण सुन्दर, नाचूं दे दे तारी॥ॐ ह्रीं श्रीधर्मनाथ जिनेन्द्राय गर्भ, जन्म, तप, ज्ञान, निर्वाण पंचकल्याण प्राप्ताय संसारा ताप रोम विनाशनाय चन्दनं निर्वपामीति स्वाहा। अक्षत-जलज जीर सुखदास हीर, हिम नीर कीर सम लायो। एंज धरत आनंद भरत, भवदंद हरत हरषायो । परम धर्म सिमर मन, धर्मजिन अशरण शरण निहारी। पूजू पाय गाय गुण सुन्दर, नाचूं दे दे तारी॥ ॐ ह्रीं श्रीधर्मनाथ जिनेन्द्राय गर्भ, जन्म, तप, ज्ञान, निर्वाण पंचकल्याण प्राप्ताय अक्षय पद प्राप्तये अक्षतान् निर्वामीति स्वाहा। पुष्प-सुमन सुमनसम सुमन थालभर, सुमनवृंद विहंसाई।सुमन्मथमद मथनके कारण, चरचूं चरण चढाई ॥ परम धर्म सिमर मन, धर्मजिन अशरण शरण निहारी। पूजं पाय गाय गुण सुन्दर, नाचूं दे दे तारी। ॐ ह्रीं श्रीधर्मनाथजिनेन्द्राय गर्भ, जन्म, तप, ज्ञान, निर्वाण पंच कल्याण प्राप्ताय काम वाण विनाशनाय पुष्पं निर्वपामीति स्वाहा। नेवेय-घेवर बावर अर्ध चंद्र सम,छिद्र सहस्र विराजे । सुरस मधुर तासों पदपूजत,रोग असाता भाजे ॥ परम धर्म सिमरमन, धर्मजिन अशरण शरणनिहारी। पूजू पाय गाय गुण सुन्दर,नाचूंदे दे तारी॥ ॐ ही श्रीधर्मनाथ जिनेन्द्रीय गर्भ, जन्म, तप, ज्ञान, निर्वाण पंचकल्याण प्राप्ताय क्षुधा रोग गोषी पूजन सग्रह ३७७ ॥ विनाशनाय नैवेद्य निर्वपामीत स्वाहा । दीप-सुन्दरनेह सहितवर दीपक, तिमिर हरण घर आगे। नेह सहित गाऊंगुण श्रीधर, ज्यूं सुबोध उर जागे॥ परम धर्म सिमर मन, धर्मजिन अशरण शरण निहारी। पूजू पाय गाय गुण सुदर, नाचूं दे दे तारी ॥ ॐ ह्रीं श्रीधर्मनाथ जिनेन्द्राय गर्भ, जन्म, तप, ज्ञान, निर्वाण पंचकल्याण प्राप्ताय मोहांधकार विनाशनाय दीपं निवेपामीति स्वाहा। धूप-अगर तगर कृष्णागर तर, दिवहरि चंदन करपूरे । चूरखेय जल जवन माहि, जिम करम जरै 'वसुकूरे ॥ परम धर्म सिमर मन, धर्मजिन अशरण शरण निहारी। पूजू पाय गाय गुण सुन्दर, नाचू देदे तारी ॥ ॐ ह्रीं श्रीधर्मनाथजिनेन्द्राय गर्भ, जन्म, तप, ज्ञान, निर्वाण पंचकल्याण प्राप्ताय अष्ट कर्म दहनाय धूपं निर्वपामीति स्वाहा । फल-आम्र कम्रक अनारसार, फल भार मिष्ट सुखदाई। सो ले तुमढिग धरहुं कृपानिधि, देहु मोक्ष ठकुगई। परम धर्म सिमर मन, धर्मजिन अशरण शरण निहारी। पूजू पाय गाय गुण सुन्दर, नाचूं देदे तारी॥ ॐ ह्रीं श्रीधर्मनाथ जिनेन्द्राय गर्भ, जन्म, तप, ज्ञान, निर्वाण पंचकल्याण प्राप्ताय मोक्ष फल प्राप्तये फलं निर्वामीति स्वाहा। अर्घ-आठों द्रव्य साज शुचित हर,हरषि हरषि गुण गाई। वाजत हम हम हम मृदंग गत, नाचत ताथेई थाई। परम धर्म सिमर मन, धर्मजिन अशरण शरण निहारी । पूजू पाय गाय गुण सुन्दर,
चौबी०
पूजन
संग्रह
३७८
नाचूं देदे तारी॥ ॐ ह्रीं श्रीधर्मनायजिनेन्द्राय गर्भ, जन्म, तप, ज्ञान, निर्वाण, पंचकल्याण
प्राप्ताय अनर्घ पद प्राप्तये अर्घ निर्वपामीति स्वाहा।
अथ पंचकल्याणकाराग टप्पा
चाल यह है-खोयो रे गवार तें, सारो दिन योंही खोयो ।
गर्भ-तेरस कृष्ण वैशाख हो, गर्भ दिवस अविकार, जग जन वांछित ।
पुजो हो अवार, धर्म जिनश्वर पूजो ॥ पूजो हो अवार ।।
ॐ ह्रीं श्रीधर्मनाथ जिनेन्द्राय वैशाख कृष्ण त्रयोदशीगर्भ कल्याणकाय अघनिर्व पामीति स्वाहा।
जन्म-शुकल माघ तेरस लयों हो, धर्म धरम अवतार, सुरपति सुरगिरि पूजो ॥
पूजो हो अवार, धर्म जिनेश्वर पूजो, पूजो हो अवार।
ॐ ह्रीं श्रीधर्मनाथ जिनेन्द्राय माघशुक्ल त्रयोदशी जन्म कल्याणकाय अघ निर्वपामीतिस्वाहा।
तप-माघशुकल तेरस लयों हो, दुर्धर तप अविकार, सुर ऋषि सुमन त पूजो॥
पूजो हो अबार, धर्म जिनेश्वर पूजो, पूजो हो अवार ।
श्रीधर्मनाथ जिनेंद्राय माघ शुक्ल त्रयोदशी तप कल्याणकाय अर्घ निर्वपामीति स्वाहा।
ज्ञान-पौष शुकल पूनम हने अरि, केवल लहि भवितार, गनसुर नरपति पूजो ॥ पूजो हो अवार, धर्म जिनेश्वर पुजो, पूजो हो अबार । पूजन ॐ ह्रीं श्रीधर्मनाथ जिनेंद्राय पोष शुक्लपूर्णिमा ज्ञान कल्याणकाय अनिर्वपामीति स्वाहा । संग्रह || निर्वाण-जेष्ठ शुकल तिथि चौथ की हो, शिव समेद तें पाय, जगत पूज्य पद पूजो । ३७९ पूजा हो अबार, धर्मजिनेश्वर पूजो, पूजो हो अबार । ॐ ह्रीं श्रीधर्मनाथ जिनेंद्राय ज्येष्ठ शुक्ल चतुर्थी मोक्ष कल्याणकाय अर्घ निर्वपामीति स्वाहा। अथ जयमाला । दोहा। महाअर्घ-घनाकारकर लोकपट, सकल उदधि मसतत ।लिखे शारदा कलम गही, तदपि न तव गुणअंत॥ छंद पद्धड़ी-जै धरमनाथ जिनगुण महान । तुम पद को मैं नित धरूं ध्यान ॥ जै गरभ जनम तप ज्ञान युक्त । वर मोक्ष सुमगल शर्म भुक्त ॥ २ ॥ जै चिदानंद आनंद कंद । गुण वृंद सुध्यावत मुनि अमद॥ तुम जीवनिके बिनहेत मित्त । तुमही हो जिन जगमे पवित्त ॥३॥तुम समवसरण में तत्वसार। उपदेश दियो है अति उदार ॥ ताको जे भवि निज हेत चित्त। धारे ते पावें मोक्ष वित्त ॥ ४॥ में तुम मुख देखत आज पर्म । पायो निज आतम रूप धर्म ॥ मोको अब भव भयते, निकार । निर्भय पद दीजै परम सार ॥ ५ ॥ तुम सम मेरो जग में न कोय । तुमही तें सवावध काज होय।। तुम दया धुरंधर धीर ॥
+ चौबी० पूजन संग्रह ३८२ चन्दन-वरबावन चंदन कदलीनंदन, धन आनंदन सहितघसो॥ भवताप निकंदन ऐरानंदन, वंदि अमंदन चरण वसो॥ श्री शान्ति जिनेशं नुत शकेश, वृष चक्रेशं चक्रेशं ॥ हन अरि चक्रेशं हे गुण धेशं, दयामृतेशं मक्रेशम् ॥ॐ ह्रीं श्रोशान्तिनाथ जिनेन्द्राय गर्भ, जन्म, तप, ज्ञान,निर्वाण पंचकल्याण प्राप्ताय संसारातापरोग विनाशनाय चन्दनं निवपामीति स्वाहा ॥ अक्षत-हिमकरकर लज्जित मलय सुसज्जित, अच्छत जज्जित भरथारी ॥ दुःखदारिद गज्जत सद पद सज्जत, भव भय भज्जत अतिभारी ॥ श्री शान्तिजिनेशं, नुत शकेशं,वृष चक्रेशं चक्रेशं ॥ हन अरि चक्रशं हे गुण धेशं. दयामृतेशं, मकेशम् ॥ ॐ ह्रीं श्री शान्तिनाथ जिनेन्द्राय गर्भ,जन्म,तप, ज्ञान, निर्वाण पंचकल्याण प्राप्ताय अक्षय पद प्राप्तये अक्षतान् निर्वपामीतिस्वाहा। पुष्प-मंदार सरोजंकदली जोज,पुज भरोजं मलय भरं ।। भर कंचन थारी तुम ढिग धारी,मदन बिदारी धीर धरं ॥ श्री शांनि जिनेशं नुतशकेशं, वृषचक्रेशं चक्रेशं ॥ हन अरिचक्रेशं हेगुणधेशं दयामृतेशं मकेशम् ॥ ॐ ह्रीं श्रीशान्तिनाथ जिनेन्द्राय गर्भ, जन्म, तप, ज्ञान,निर्वाण पंचकल्याण प्राप्ताय कामवाण विनाशनाय पुष्पं निर्वपामीति स्वाहा। नेवेद्य-पकवान नवीने पावन कीने, षटरस भीने सुखदाई ॥ मन मोहन हारेक्षुधाविदारे, आगेधारे गुणगाई॥ श्री शान्ति जिनेशं नुतशकेशं, वृष चक्रेशं चक्रेशं ॥ हन अरि चक्रेशं हेगुणधेशं, दया मृतेशं मकेशम् ॥ ॐ ह्रीं श्री शान्तिनाथ जिनेन्द्रार्य गर्भ,जन्म, तप, ज्ञान, निर्वाण पंच कल्याण - बोबी० जन संग्रह ८३ प्राप्ताय झुधारोग विनाशनाय नैवेद्यं निर्वपामीति स्वाहा ।। दीप-तुम ज्ञानप्रकाशे भ्रमंतम नाशे, नेय विकाशे सुखराशे ॥ दीपक उजियारा यातेधारा, मोह निवारा निजे मासे ॥ श्री शान्ति जिनेशं नुतशके,वृष चक्रेशं चकेशं ।। हन अरि चक्रेश हेगुणधेशं,दया मृतेशमशम् ॥ ॐ ह्रीं श्री शान्तिनाथ जिनेन्द्राय गर्भ, जन्म, तप, ज्ञान, निर्वाण पंचकल्याण प्राप्तायमोहांधकार विनाशनाय दीपं निर्वपामीति स्वाहा ॥ धूप-चंदन करपूरं कर वर चूरं,पावक भूरं माहि जरं॥ तसुधूम उडानाचत जावें,अलि गुंजावेंमधुर स्वर श्री शांतिजिनेश नुतं शक्रेश,वृषचक्रेशं चक्रेशं । हन अरिचक्रेशंहेगुण धेशं, दया मृतेशं मकेशम् । ॐ ह्रीं श्री शान्तिनाथ जिनेन्द्राय गर्भ, जन्म, तप, ज्ञान, निर्वाण पंचकल्याण प्रास्ताय अष्ठकर्म दहनाय धूपं निर्वपामीति स्वाहा ॥ फल-बादाम खजूरं दाडिम पूर,निवुक भूरं ले आयो । तासो पद जज्जे शिव फल सज्जे,निज रस रज्जे उम गायो॥ श्री शांति जिनेशं नुतशक्र, वृष चक्रेशं चक्रेश ॥ हन अरि चक्रेशं हे गुणधेशं,दया मृतेशं मकेशम् ॥ ॐ ह्रीं श्रीशांतिनाथ जिनेन्द्राय गर्भ, जन्म, तप ज्ञान, निर्वाण पंच कल्याण प्राप्ताय मोक्ष फल प्राप्तये फलं निर्वपामीतिस्वाहा। अर्घ-वसु द्रव्य सवारी तुम दिग धारी, आनंदकारी दृगप्यारी ॥ तुम हो भवितांरी करुणाधारी, यातें ...थारी शुरनारी।। श्री शांति जिनेशं नुत शकेशं,वृष चक्रशं शक्रेशं । हन अरि चक्रेशं हेगुणधेशंदया ।
चौबी० पूजन संग्रह ३८४ मृतेशं मक्रेग ॥ ॐ ह्रीं श्री शांतिनाथ जिनेन्द्राय गर्भ, जन्म, तप, ज्ञान, निर्वाण पंच कल्याण प्राप्ताय अनर्घ पदप्राप्तये अर्घ निर्वपामीति स्वाहा ॥ अथ पंच कल्याणक। छंद सुन्दरी वात विलंबित । गर्म-असित सातय भादव जानिये । गरभ मंगल तादिन मानिये॥शचिकियो जननी पदचर्चनं। हम करें इत ये पद अर्चनं ॥१॥ ॐ ह्रीं श्रीशांतिनाथ जिनेन्द्राय भाद्रपद कृष्ण सप्तमी गर्भ कल्याण काय अर्घ निर्वपामीति स्वाहा ॥ जन्म-जन्मजेठ चतुर्दशि श्याम है । सकल इंद्रसु आगत धाम है। गज पुरे गजसाज सवै तवे। गिरिजजें इत में जज हूं अबै ॥ २॥ॐ ह्रीं श्री शांति नाथ जिनेन्द्राय ज्येष्ठ कृष्ण चतुर्दशी जन्म कल्याण काय अर्घ निर्वपामीति स्वाहा ॥ तप-भव शरीर सुभोग असार है । इम विचार तबै तपधार है ॥ भ्रमर चौदस जेठसुहावनी। धरम हेन जजू गुण पावनी॥३॥ॐ ह्रीं श्री शांतिनाथ जिनेन्द्राय ज्येष्ठ कृष्ण चतुर्दशी तप कल्याणकाय अर्घ निर्वपामीति स्वाहा॥ ज्ञान-शुक्ल पोष दशे सुखरास है। परम केवलज्ञान प्रकाश है। भव समुद्र उधारन देवकी,हम करें नित मंगल सेवकी ॥ ४॥ॐ ह्रीं श्री शांतिनाथ जिनेंद्राय पौष शुक्ल दशमी ज्ञान कल्याणकाय अघ निर्वपामीतिस्वाहा॥
संग्रह ३८५ चौबी०|| निर्वाण-असित चौदस जेठ हनेअरी।गिरि समेद थकी शिवतियवरी।सकल इंद्रजजें तित आयके । हम जजें इत मस्तक नायके ॥५॥ ॐ ही श्री शांतिनाथ जिनेंद्राय जेष्ठकृष्ण चतुर्दशी मोक्ष कल्याण पूजन काय अर्घ निर्वामीति स्वाहा ।। अथ जयमाला। छंद रथोड़ता। महा अर्घ-शांति शांतिगुणमडितेसदा । जाहि ध्यावतसुपडिते सदा । मैं तिन्हें भगति मंडित सदा । पूजहूं कलुष हंडिते सदा ॥१॥ मोक्ष हेत तुमहीदयाल हो ! हेजिनेशगुणरत्नमाल हो॥ में अबै सुगुण दाम ही धरूं । ध्यावते तुरत मुक्तितिय वरूं ॥२ ॥ छंद पद्धरी ॥ जे शांतिनाथ चिद्रूपराज । भवसागर में अद्भुत जहाज ॥ तुम तजसरथ सिद्ध थान ।सर्वारथ युत गजपुर महान ॥३॥ तित जन्म लियो आनंद धार । हरि तत छिन आयो राजद्वार ।। इंद्राणी जाय परसूत थान । तुमको कर मेले हरष मान॥४॥ हरि गोद देय सो मोद धार। सिर चमर अमर ढारत अपार ॥ गिरराज जाय तितसिला पांडु। ताप थापो अभिषेक मांडु ॥५॥तित पंचम उदधितनो सुवारि । सुर कर कर कर लाये उदारि ॥ तब इंद्र सहसकर करि अमंद। तुमसिर धारा ढारो सुनंद ॥ ६ ॥ अघ घघ घघ घघ धुनि होत घोर। भभ भभ भभ धधधध कलस शोर ॥ टमटम टमटम वाजत मृदंग। झननन नननन नन नपुरंग ॥७॥ तननन -
--
ܢܢ
चौबी० नन नन नन तनन तान। घननन नन घटा करत ध्वानाताई थेई थेई थेई थेई सुचाल। युत नाचत
नावत तुमहि भाल ॥८॥ चटचट चट अटपट नटत नाट ।झटझटझट हटनट शट विराट। इम नाचत
पूजन
राचत भगत रंग। सुरलेत जहां आनंद संग॥९॥ इत्यादि अतुल मंगल सुठाठ। तित बनो जहां
संग्रह
सुरगिर विराट ॥ पुनकर नियोग पितु सदन आय। हरि सौंपो तुम तित वृद्ध थाय ॥ पुन राजमाहि
३८६
-लहि चक्ररत्न । भोग्यो छखंड कर धरम यत्न ॥ पुन तप धर केवल रिद्धि पाय। भवि जीवनि को
शिवमग वताय ॥ ११॥ शिवपुर पहुचे तमहे जिनेश । गुणमडित अतुल अनंत भेश ॥ में ध्यावत हूं
नित शीस नाय। हमरी भवबाधा हर जिनाय ॥ १२॥ सेवक अपनो निज जान जान। करुणाकर
भवभय भान भान ॥ यह विघ्न मूलतरु खंडखंड । चित चिंतन आनंद मंड मंड ॥ १३॥
घत्ताछन्द-श्रीशान्ति महंता शिवतिय कंता, सुगुण अनंता भगवंता ॥ भवभ्रमण हनंता सौख्य अनंता,
दातारं तारनवंता॥१४॥रों ह्रीं श्रीशांतिनाथ जिनेन्द्राय गर्भ जन्म तप ज्ञान निर्वाण पंचकल्याण
प्राप्ताय अनर्घपद प्राप्तये महाघ निर्वपामीति स्वाहा ।
अथ आशीर्वादः कवित्त-शांतिनाथ जिन के पदपंकज, जो भवि पूर्जे मनवचकाय ॥ जन्मजन्म
के पातक ताके, ततछिन तज के जांय पलाय ॥ मन वंछित सुख पावें सो नर, वाचे भाव भगति अति
लाय ॥ तातें वृन्दावन नित वंदे, जातें शिवपुर राज कराये ॥ १५॥ इत्याशीर्वादः ॥
इति श्रीशांतिनाथ जिन पूजा संपूर्णा ॥ १६ ॥
पोबी० पूजन संग्रह ३८७ 1 १७ अथ श्रीकुंथुनाथ जिन पूजा प्रारभ्यते । (वृन्दावनकृत) छद माधवी। स्थापना-अज अंक अजै पद राज निशंक,हरे भवशंक निशंकित दाता। मतमत्त मत्तगके माथे गथे, मतवाले तिनै हनिज्यों हरि हाता। गजनागपुरी लियो जन्मजिन्हें, रविके प्रभुनंदन श्रीमतिमाता । सहकुंथुसु कुंथुनिके प्रतिपालक,थापू तिन्हें युत भक्ति विख्याता ॥ ॐ ह्रीं श्री कन्थुनाथ जिनेंद्र अत्रावतरावतर संवौषट् आह्वाननम् । ॐ ह्रीं श्रीकुन्धुनाथ जिनेंद्र अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठः ठः स्थापनम्। ॐ ह्रीं श्रीकुंथुनाथ जिनेंद्र अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट् सन्निधी करणम् । अथ अष्टक (मनसुखरायजीकृत चाल मरहटी की) जल-सुरतरनीको उज्वल जलभर कनक भृङ्ग मेरी । मिथ्यातृषा निवारण कारण, करूं धार नेरी ॥ कुंथुसुन अरजदोस केरी,कंथुसुन अरजदास केरी। भवसिंधु पड़ा हूं नाथ निकालो,बांह पकरमेरी। प्रभुसुन अरजदास केरी,प्रभसुन अरजदास केरी। जग जंजाल पडाहूं वेगनिकालो,बांहपकड़ मेरी।
पोषी० पजन संग्रह ३९० डों ही श्रीकुंधुनाय जिनेंद्रीय गर्भ, जन्म, तप, ज्ञान, निर्वाण पंचकल्याण प्राप्ताप अन्ट कम दहनाय धूपं निपामीति स्वाहा। फल-लौंग लायची पिस्ता केला, कमरक शुनि लेगी। मोक्ष महाफल नामन कारन जज सुकर देरी । कुंथु सुन अरजदास केरी, कुंथु मुन अरजदास केरी,मार्मिधुपटाई नाप निकालो,यह पकदमेरी। प्रभ सन अरजवान फेरी, प्रभसुन अरजदाम केगे। जग उजाल पढाई पेग निकालो,यांहपकडमेरी डॉ दी श्रीथनाथ जिनेद्राय गर्भ, जगम, नप, ज्ञान निर्माण पंचकल्याण प्राप्ताय मोक्ष फल प्राप्नये फलं निपामांति स्वाहा। अर्घ-जल चंदन तंडुल प्रसून चम, दीप धूप लेरी। फलगन जजन कर मनमुर भर हो जगत फेरी कुंथु सुन अरजदाम केरी, कुंथे पुन अग्जदाम केरी,भार्मिधु पड़ा हूं नाथ निकालो, बांह पकर मेरी। प्रभूसुन अरजदास केरो,प्रभसुन अरजदास करी।जग जंजाल पड़ाह गनिकालो,बांह पकड मेरी। उही श्रीकुंधनाय जिनंद्राय गर्भ, जम्म, तप,ज्ञान, निर्वाण पंचकल्याण प्राप्ताय अनर्घ पद प्राप्तये अचं नियामीति स्वाहा। पथ पंच कल्याणक । कंद मोतीदाम। गर्भ-सुसावनकी दशमी कल जान । जो परवारयसिद्धिविमान। भयो गरमागम मंगल सार । जजें
चौबी०
4
पजन
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संग्रह
३९१
हम श्रीपति अष्ट प्रकार ॥१॥ रों ह्रीं श्रीकुंथुनाथ जिनेन्द्राय श्रावन कृष्ण दशमी गर्भ
कल्याणकाय अर्घ निर्वपामीति स्वाहा।
जन्म-महा वैशाखसु एकम शुद्ध । भयो तव जन्मति ज्ञान समुछ। कियो हरि मंगल मंदर सीस।
जजें हम अत्र तुम्हें नुतसीस ॥२॥ डों ह्रीं श्रीकुंथुनाथ जिनेन्द्राय वैशाख शुक्ल प्रतिपदा
जन्म कल्याणकाय अर्घ निर्वपामीति स्वाहा ।
तप-तज्यो षटखंड विभव जिनचंद । विभव हित चित्त चितारि सुछंद । धरे तप एकम शुद्धि वैशाख ।
सुमग्न भये निज आनंद चाख ॥३॥ ॐ ह्रीं श्रीकुंथुनाथ जिनेन्द्राय वैशाख शुक्ल प्रतिपदा
तप कल्याणकाय अर्घ निर्वपामीति स्वाहा ।
ज्ञान-शुदी तियचैत सुचेतन शक्त। चहूं अरि क्षेकर तादिन व्यक्त । भई समवश्रुति भाख सुधर्म ।
जजू पद ज्यूं पद पाईये पर्म ॥ ४॥ डों हों श्रीकुन्थुनाथ जिनेन्द्राय चैत्र शुक्ल तृतीया ज्ञान
कल्याणकाय अर्घ निर्वपामीति स्वाहा।
निर्वाण-शुदी वैशाख सुएकम नाम। लियो तिहदिवस अभय शिवधाम । जले हरि हर्षित मंगल गाय।
समर्चित हूं सु हिय बच काय ॥५॥ ॐ ह्रीं श्रीकुन्युनाथ जिनेन्द्राय वैशाख शुक्ल प्रतिपदा
मोक्ष कल्याणकाय अर्घ निर्वपामीति स्वाहा ।
अथ जयमाला।भडिल। चौबी० पूजन संग्रह ३९२ महाअर्घ-षट खंडनके शत्रु राजपद में हने। धरदीक्षा षट खंडन पाप तिन्हें हने। त्याग सुदर्शन चक्र धरमचकी भये । करमचक्रचकचूर सिद्ध दृढ गढलये॥ १॥ ऐसे कुन्थु जिनेश तने पद पन को। गुण अनंत भंडार महासुख समको।पूजू अरघ चढाय पुरणानंदहो। चिदानंद अभिनंद इंद्रगणवंदहो छंद पद्धडी-जय जय जय जय श्रीकुंथुदेव । तुमही ब्रह्मा हरि त्रिंबकेव । जय वुद्ध विदांबर विष्णु इंश । जय रमाकंत शिवलोक सीस॥३॥जय दयाधुरंधर सृष्टिपाल । जयजय जगबंधू सुगुण माल । सर वारथ सिद्धि विमान छार । उपजे गजपुरमें गुणअपार ॥ ४॥ सुरराज कियो गिरन्हौन जाय । आनंद सहित युत भक्तिभाय । पुनि पिता सौंप कर मुदित अंग। हरि तांडव नृत्य कियो अभंग ॥ ५॥ पुनि स्वर्गगयो तुम इतदयाल । वयपाय मनोहर प्रजापाल। षटखंड विभव भोगो समस्त । फिर त्याग योग धारो निरस्त ॥६॥ चवघाति घात केवल उपाय । उपदेश दियो सव हित जनाय । जाके जानत भ्रम तम विलाय । सम्यक दर्शन निर्मल लहाय ॥७॥ तुम धन्यदेव किरपा निधान । अज्ञान छियातम हरन भान । जय स्वच्छ गुणाकर सुक्क सुक्त । जय स्वच्छ सुखामृत मुक्त भुक्त ॥८॥ जय भवभय भंजन कृत्य कृत्य। मैं तुमसे हूं निज भृत्य भृत्य । प्रभुअशरण शरण अधारधार। मम विघ्नमूल गिर जार जार ॥९॥जय कुनय यामिनी सूर सूर । जय मन वंछित सुख पूर पूर। मम करम बंध दृढ चूर -
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चौबी०
पूजन
संग्रह
३९३
चूर । निजसम आनंद दे भूर भूर ॥१०॥अथवा जबलो शिव लहूं नाहि । तवलो येतो नितही लहां हि ।
भव भव श्रावककुल जन्म सार। भव भव सत मत सत संग धार ॥ ११॥ भव भव निज आतम
तत्वज्ञान। भव भव तप संयम शीलदान । भव भवअनुभवनिज चिदानंद । भव भव तुम आगम
हे जिनंद ॥१२॥भव भव समाधि युत मरनसार । भवभव वृत चाहूं अनागार। यह मोको हे करुणा
निधान । सब जोग मिलो आगम प्रमाण॥१३॥ जवलो शिव सपति लहूं नांहि । तबलो मैं इनको नित
लहाहि ।। यह अरज हिये अवधारि नाथ । भव संकट हर कीजे सनाथ ॥ १४ ॥
पत्ता छन्द । जय दीनदयाला वरगुणमाला, विरद विशाला सुख आला । मैं पूजू ध्याऊं सीस निवाऊं,
देहु अचल पदकी चाला ॥ १५॥ ॐ ह्रीं श्रीकुन्थुनाथ जिनेन्द्राय गर्भ, जन्म, तप, ज्ञान
निर्वाणपंचकल्याण प्राप्ताय अनर्घ पद प्राप्तये महा अर्घ निर्वपामीति स्वाहा।
अथ आशीर्वादः-छद त्रोटक-कुन्थु जिनेश्वर पाद पदम जो प्राणी ध्यावे ।
अलिसम कर अनुराग सहज सो निजनिधि पावे ।
जो वाचे शरदह करै अनुमोदन पूजा।
वृन्दावन तिन पुरुष सदशसुखिया नांह दूजा ॥ १६ ॥
॥ इत्याशीर्वादः ॥ इति श्रीकुंथुनाथ जिन पूजा संपूर्णा ॥ १७ ॥
चौबी. पूजन संग्रह ३९४ १८ अथ श्रीअरनाथजिन पूजा प्रारभ्यते। (वृदाबनकृत) छप्प। स्थापना-तप तुरंग असवार धार, तारन विवेकवर । ध्यान शुकल असिधार, शुद्ध सुविचार सुबक्तर ॥ भावन सेना धरम दसो, सेनापति थापे । रतन तीन धर शक्ति, मंत्रि अनुभव निरमापे सत्ता तल सोहं सुभट,धुनि त्याग केतु शत अग्रधर। येविधि समाज सजराजको,अरजिन जीतेकर्मअर ॐ ह्रीं श्रीअरनाथजिनेन्द्र अन्नावतरावतर संवौषट् आह्वाननम् । ॐ ह्रीं श्रीअरनाथजिनेन्द्र अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठाठः स्थापनम् । ॐ ह्रीं श्रीअरनाथजिनेन्द्र अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट् सन्निधीकरणम् ॥ अथ अष्टक । छंद त्रिभंगी। जल-कन मणिमय झारी गसुख कारी, सुरसरितारी नीरभरी । मुनि मनसम उज्वल जनम जरादल, सो ले पदतल धारकरी । प्रभु दीनदयालं अरिकुल कालं, बिरद विशालं सुकमालं ॥ हन मम जंजालं हे जग पालं, अर गुणमालं वर भालं ॥ ॐ ह्रीं श्रीअरनाथजिनेन्द्राय गर्भ, जन्म, तप, ज्ञान, निर्वाण पंचकल्याण प्राप्ताय जन्म मृत्यु जरा रोग विनाशनाय जलं निर्वपामीति स्वाहा। चन्दन-भवताप नसावन विरद सुपावन, सुन मन भावन मोद भयो। तात घसबावन चंदन पावन, चौपी० पजन संग्रह ३९५ चर्ण चढावन उमगायो । प्रभु दीनदयालं अरि कुलकालं, विरद विशालं सुकमालम् । हन मम जंजालं हे जग पालं, अर गुणमालं वर मालम् ॥ ॐ ह्रीं श्रीअरनाथ जिनेन्द्राय गर्भ, जन्म, तप, ज्ञान, निर्वाण पंचकल्याण प्राप्नाय संसारा ताप रोग विनाशनाय चन्दनं निर्वपामीति स्वाहा। अक्षत-तंडुल अनियारे श्वेत सवारे, शशि दुति टारे थाल भरे । पद अर्षे सुदाता जगविख्याता, लख भवताता पुजधरे॥ प्रभु दीनदयालं अरि कुलकालं, विरद विशाल सुकमालम् । हन मम जंजालं हे जग पाल, अर गुण मालं वर भालम्॥ ॐ ह्रीं श्रीअरनाथजिनेन्द्राय गर्भ, जन्म, तप, ज्ञान, निर्वाण पंचकल्याण प्राप्ताय अक्षय पद प्राप्तये अक्षतान् निवंपामीति स्वाहा । पुष्प-सुरतरुके शोभिन सुरन मनोभित, सुमन अछोभित ले आयो। मनमथ के छेदन आप अवेदन, लख निरवेदन गुण गायो । प्रभु दीनदयालं अरि कुलकालं विरद विशालं सुकमालम् । हनमम जंजालं हे जग पालं, अर गुण मालं वर भालम् ॥ 0 ह्रीं श्रीअरनाथजिनेन्द्राय गर्भ, जन्म, तप, ज्ञान, निर्वाण पंचकल्याण प्राप्ताय काम वाण विनाशनाय पुष्पं निर्वपामीति स्वाहा । नैवेद्य-नेवज सुचि भक्षक प्रासुक अक्षक, पक्षक रक्षक स्वच्छधरी। तुम करम निकक्षक भस्मक लक्षक, दक्षक पक्षक रक्षकरी ॥ प्रभु दीनदयालं अरि कुलकाल, विरद विशालं सुकमालम् । हन मम जंजालं हे जग पाल, अर गुण मालं वर भालम् ॥ डों ह्रीं श्रीअरनाथजिनेन्द्राय गर्भ, जन्म, तप, ज्ञान, निर्वाण पंचकल्याण प्राप्ताय क्षुधा रोग विनाशनाय नैवेद्यं निर्वपामीति स्वाहा।
चौबी० पूजन संग्रह निर्वाण-चैत अमावस तिथ शुभ कर्म । नाश बासकिय शिवथल पमं ॥ निहचल गुण अनत भंडारी। जजू देव सुध लेऊ हमारी ॥५॥डों ह्रीं श्रीअरनाथजिनेन्द्राय चैत्र कृष्ण अमावस्या मोक्ष कल्याणकाय अर्घ निर्वपामीति स्वाहा। ३९८ अथ जयमाला।दोहा। महाअर्घ-बाहर भीतरके जिते, जाहर अर दुखदाय । ताहर कर अरजिन भए, साहर शिवपुर राय ॥ राय सुदर्शन पिता जसु, मित्रादेवी माय । हेम वरण तन वर्षवर, नव्वे सहस सु आय॥ छद त्रोटक-जय श्रीधर श्रीकर श्रीपतिजी। जय श्रीवर श्रीभर श्रीमति जी॥ भव भीम भवोदधि तारन है । अरनाथ नमो सुख कारण है ॥३॥ गरभादिक मंगल सार धरे। जग जीवनके दुखदंद हरे ॥ कुरुवंश शिखामणि तारन है। अरनाथनमो सुख कारण है ॥४॥ कर राज छखंड विभूति भई । तप धारत केवल बोध ठई ॥ गण तीस जहां भ्रम वारण है अरनाथ नमो सुख कारण है ॥५॥ भवि जीवन को उपदेश दियो । शिवहेत सर्वजन धारलियो ॥ जगके सब सकट टारन है । अरनाथ नमो सुख कारण है ॥ ६ ॥ कहि वीत परूपण सार तहां । निजशर्म सुधारस धार जहां। गति चार हृषीपन धारन है । अर नाथ नमो सुख कारण है ।। ७॥ षट काय ति जोग तिने ।
चौबी०
पजन
संग्रह
३९९
पनवीस कषाय सुज्ञान मथा ॥ सुर संयम भेद पसारन है । अरनाथ नमो सुख कारण है ॥ ८॥ रस
दर्शन लेश्य छ भव्यजुगं । षट् सम्यक् सेनय भेद युगं ॥ जुगहार तथा सु अहारन है । अर नाथ
नमो सुख कारण है ॥ ९ ॥ गुणथान चतुर्दश मारगणा । उप योग दुवादस भेद गणा । इम बीसव
भेद उचारण है । अरनाथ नमो सुख कारण है ॥१०॥इन आदि समस्त वखान कियो । भवि जीवन ने
उर धार लियो ॥ कितने शिववादि वधारन है । अरनाथ नमो सुख कारण है ॥ ११ ॥ फिर आप
अघाति विनाश सवै । शिव धाम विषे थितकीन तवै ॥ कृतकृत्य प्रभू जगतारन है । अरनाथ नमो
सुख कारण है ॥ १२ ॥अब दीनदयाल दया धरिये। मम कर्म कलंक सबै हरिये ।। तुमरे गुण को
कछु पार न है । अरनाथ नमो सुख कारण है ॥ १३ ॥
पत्ताछन्द-जय श्रीअरदेवं सुरकृत सेवं, समता भेवं दातारं । अरि कर्म विदारन शिवसुख
कारन, जै जिनवर जगत्रातारं ॥ १४ ॥
डों ह्रीं श्रीअरनाथजिनेन्द्राय गर्भ, जन्म, तप, ज्ञान, निर्वाण पंचकल्याण प्राप्ताय अनघपद
प्राप्तये महाघ निर्वपामीति स्वाहा ।
अथ आशीर्वादः-छंद आर्या-अर जिनके पदसारं,जो पूर्जे द्रव्य भावसो प्राणी । सो पात्रे भव
पारं, अजरामर मोक्षथान सुखखाणी ॥ १५ ॥
इत्याशीर्वादः । इति श्रीअरनाथजिन पूजा संम्पूर्णा ॥ १८ ॥
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-
चौबी
१९ अथ श्रीमल्लिनाथ जिन पूजा लिख्यते।
पजन
संग्रह
॥
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(वृन्दावनकृत) छंद मदावलिप्त कपोल ।
स्थापना-अपराजिततें आय नाथ, मिथिलापुर जाए । कुंभरायके नंद, प्रजापति मात बताए ।
कनक वर्ण तन तुग, धनुष पच्चीस विगजे ॥ सो प्रभुतिष्टो आय, निकट मम ज्यों भ्रमभाजे ।।
डों ह्रीं श्रीमल्लिनाथजिनेन्द्र अत्रावतरावतर संवौषट् आह्वाननम् ।
डों ह्रीं श्रीमल्लिनाथ जिनेन्द्र अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठाठः स्थापनम् ।
डों ह्रीं श्रीमल्लिनाथनिनेन्द्र अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट् सन्निधी करणम् ।
अथ अष्टक । छंद जोगीरासा ।
जल-सुर सरिता जल उज्वल लेकर, मणि शृंगार भराई ॥ जनम जरा मृत नाशन कारण, जजू
चरण जिन राई । राग दोष मद मोह हरन को, तुमही ही वरवीरा ॥ याते शरण गहीजगपतिजी,
वेगहरो भव पीरा ॥ ॐ ह्रीं श्रीमल्लिनाथ जिनेन्द्राय गर्भ, जन्म, तप, ज्ञान, निर्वाण पंचकल्याण
प्राप्ताय जन्म मृत्यु जरा रोग विनाशनाय जलं निर्वपामीति स्वाहा ।
चन्दन-बावन चंदन कदली नंदन, कुंकुम संग घसायो। लेकर पूजू चरण कमल प्रभु, भव आताप
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।
- पी० जन पह १ नसायो॥ राग दोष मद मोह हरन को, तुम ही हो वरबीरा। याते शरण गही जगपति जी, वेग हरो भव पीरा ॥ों ही श्रीमल्लिनाथजिनेन्द्राय गर्भ, जन्म, तप, ज्ञान, निर्वाण पंचकल्याण प्राप्ताय संसारा ताप रोग विनाशनाय चन्दनं निर्वामीति स्वाहा। अक्षत-तंडुल शशिसम उज्वल लीनो, दीनो पुंज सुहाई । नाचत राचत भक्ति करतही, तुरत अषेपद पाई ॥ गग दोष मद मोह हरन को, तुम ही हो वरबीरा । याते शरण गही जगपति जी, वेग हरो भव पीरा ॥ों ह्रीं श्रीमल्लिनाथ जिनेन्द्राय गर्भ, जन्म, तप, ज्ञान, निर्वाण पंचकल्याण प्राप्ताय अक्षय पद प्राप्तये अक्षतान् निर्वपामीति स्वाहा। पुष्प-पारिजात मंदार सुमन, संतान जनित महकाई । मोर सुभटमद भंजन कारण, जजूं तुम्हें शिर नाई॥राग दोष मद मोह हरन को, तुम ही हो वरवीरा । याते शरण गही जगपति जी, वेग हरो भव पीरा ॥ओं ह्रीं श्रीमल्लिनाथ जिनेन्द्राय गर्भ,जन्म, तप, ज्ञान, निर्वाण पंचकल्याण प्राप्ताय काम वाण विनाशनाय पुष्पं निर्वपामीति स्वाहा । नैवेद्य-फेणी गोझा मोदन मोदक, आदिक सब उपाई। सो ले क्षुधा निवारण कारण, जर्ज चर्ण लव लाई ॥ राग दोष मद मोह हरन को, तुम ही हो वरबीरा । याते शरण गही जगपति जी, वेग हरो भव पीरा ॥ * ह्रीं श्रीमल्लिनाथ जिनेन्द्राय गर्भ, जन्म, तप, ज्ञान, निर्वाणपंचकल्याण प्राप्ताय क्षुधारोग विनाशनाय नैवेद्यं निर्वपामीति स्वाहा ।
चौबी० पूजन संग्रह '४०२ ॥ दाप-तिमिर मोह उर मदिर मेरे,छाय रहो दुख दाई । तास नाश कारणको दीपक,अद्भुत जोत जगाई। राग दोष मद मोह हरन को, तुम ही हो वरबीरा । याते शरण गही जगपति जी, वेग हरो भव पीरा ॥ 0 ह्रीं श्रीमल्लिनाथजिनेन्द्राय गर्भ, जन्म, तप, ज्ञान, निर्वाण पचकल्याण प्राप्ताय मोहांधकार विनाशनाय दीपं निर्वपामीति स्वाहा। धूप-अगर तगर कृष्णागर चंदन, चुर सुगंध बनाई। अष्टकर्म जारन को तुमढिग, खेवत हूँ जिनराई । राग दोष मदमोह हरन को, तुम ही हो वर वीरा । याते शरण गही जगपति जी,वेगहरोभव पीरा॥ ॐ ह्रीं श्रीमल्लिनाथजिनेन्द्राय गर्भ, जन्म, तप, ज्ञान, निर्वाण पंचकल्याण प्राप्ताय अष्ट कर्म दहनाय धूपं निर्वपामीति स्वाहा । फल-श्रीफल लौंग बदाम छुहारा, एला केला लाई ॥ मोक्ष महाफल दाय जानके, पूजू मन हरपाई ॥ राग,दोष मद मोह हरन को, तुम ही हो वरबीरा। याते शरण गहीजगपतिजी, वेगहरोभव पीरा॥ ह्रीं श्रीमल्लिनाथजिनेन्द्राय गर्भ, जन्म, तप, ज्ञान, निर्वाण पंचकल्याणप्राप्ताय मोक्षफल प्राप्तये फलं निर्वपामीति स्वाहा । अर्घ-जलफल अर्घमिलाय गायगुण, पूजू भक्ति बढाईं। शिवफल राजहेतु हेश्रीधर, शर्णगही में आई ॥ राग दोष मदमोह हरन को,तुम ही होवर बीरा।याते शरण गही जगपति जी,वेग हरोभव पोरा।
बोबी० पजन संग्रह १०३ ॐ ह्रीं श्रीमल्लिनाथ जिनेन्द्राय गर्भ, जन्म, तप, ज्ञान , निर्वाण पंचकल्याण प्राप्ताय अनर्ध पद प्राप्तये अर्घ निर्वपामीति स्वाहा। अथ पंचकल्याणक। छन्द लक्ष्मीधरा। गर्भ-चैत की शुद्ध एकम भली राजई। गर्भ कल्याण कल्याणको साजई॥ कुंभराजाप्रजापतिमाता तने देवदेवी जजें सीसनावें घने ॥१॥ों ह्रीं श्रीमल्लिनाथजिनेन्द्राय चैत्र शुक्ल प्रतिपदा गर्भ कल्याण काय अर्घ निर्वपामीति स्वाहा । जन्म-मार्गशीर्षे शुदी ग्यारसी राजई। जन्म कल्याणको दिवस सो छाजई ॥ इंद्रनागेंद्र पूर्जे गिरिद्र जिन्हें । में जजूं ध्यायके सीस नाऊं तिन्हें ॥२॥ओं ह्रीं श्रीमल्लिनाथ जिनेन्द्राय मार्गशिर शुक्ल एकादशी जन्म कल्याणकाय अर्घ निर्वामीति स्वाहा। तप-मार्गशीर्षे शुदी ग्यारसी के दिना । राजको त्याग दीक्षा धरोहे जिना ॥ दान गोक्षीरको नंदघेणे दियो। मैं जजू जासके पंच चर्जे भयो॥३॥ों ह्रीं श्रीमल्लिनाथजिनेन्द्राय मार्गशिर शुक्ल एकादशी तप कल्याण काय अर्घ निर्वपामीति स्वाहा। ज्ञान-पौषकी श्याम दूतीहने घातिया। केवलज्ञान साम्राज्य लक्ष्मी लिया॥धर्म चक्रीभये सेव शकीकरें। में जज चर्ण ज्यों कर्म वक्री टरें॥४॥रों ह्रीं श्रीमल्लिनाथ जिनेन्द्राय पौष कृष्ण द्वितीया ज्ञान कल्याणकाय अर्घ निर्वपामीति स्वाहा । T --
PNP
पजन
संग्रह
१०६
घत्ताछन्द-जय जिनस्वामी त्रिभुवन नामी, मल्ल विमल कल्याण करा भवदंद विदारन
आनंद कारण, भवि कुमोद निशईशवरा ॥२१॥
ॐ ह्रीं श्रीमल्लिनाथजिनेन्द्राय गर्भ, जन्म, तप, ज्ञान, निर्वाण पंचकल्याण प्राप्ताय अनर्घ
पद प्राप्तये महाध निर्वपामीति स्वाहा।
अथ आशीर्वादः । छंद शिखरिणी-जजें हैं जो प्राणी द्रव्य अर भावादि विधिसों करें नाना भांति
भगति थुतिवा नौति सुधिसों । लहे शकी चक्री सकल सुख सौभाग्य तिनको ॥
तथा मोक्षे जावे जजत जन जो मल्लि जिनको ॥२२॥
इति श्रीमल्लिनाथजिन पूजा संपूर्णा ॥ १९॥
चोवी० पजन सग्रह १०७ २० अथ श्रीमुनिसुव्रतनाथ जिन पूजा प्रारभ्यते। (वृन्दावनकृत) छंद मत्तगयंद । स्थापना-प्राणतस्वर्ग विहायलियो, जिनजन्मसु राजगृही मह आई। श्रीसुहमित्त पिता जिनके, गुणवानमहा पवमा जसु माई । वीस धनुष तन श्याम छवी, कच अंक हरीवर वंश बताई। सो मुनिसुव्रतनाथ प्रभूकह, थापत हूं इत प्रीति लगाई ॥१॥ ॐ ह्रीं श्रीमुनिसुव्रतनाथजिनेन्द्र अत्रावतरावतर संवौषट् आह्वाननम् । ॐ ह्रीं श्रीमुनिसुव्रतनाथजिनेन्द्र अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठ ठः स्थापनम् । ॐ ह्रीं श्रीमुनिसुव्रतनाथजिनेन्द्र अत्र मम सन्निहितो भवभव वषट् सन्निधीकरणम् । पथ भष्टका छंद गीता। जल-उज्वल सुजल जिम यश तुमारो, कनक झारी में भरूं । जरामरण जामन हरण कारण, धार तुम पदतर करूं ॥ शिवसाथ करत सनाय, सुव्रतनाथ मुनिगुणमाल हैं। तसु चरण आनंद भरण तारण, तरण विरद विशाल हैं । अब श्रीमुनिसुव्रत में पायन पलं, सुखदाय लख पायम परूं।
संग्रह डॉ ह्रीं श्रीमुनिसुव्रतनाथ जिनेन्द्राय गर्भ, जन्म, तप, ज्ञान, निर्वाण पंचकल्याण प्राप्ताय जन्म मृत्यु जरा रोग विनाशनाय जलं निर्वामीति स्वाहा । चन्दन-भवताप घायक शांति दायक, मलयहरि घस ढिगधरूं । गुण गाय सीस नवाय पूजत, विघ्न ताप सर्व हरूं ॥ शिवसाथ करत सनाथ, सुव्रतनाथ मुनि गुण माल हैं । तसु चरण आनंद भरण तारण, तरण बिरद विशाल हैं। अब श्रीमुनिसुव्रत में पायन परूं,सुखदाय लख पायन परूं॥ • ह्रीं श्रीमुनिसुव्रतनाथ जिनेन्द्राय गर्भ, जन्म, तप, ज्ञान, निर्वाण पचकल्याण प्राप्ताय संसारा ताप रोग विनाशनाय चन्दनं निर्वपामीति स्वाहा । अक्षत-तंडुल अखंडित दमक शशिसम, गमक युत थारी भरूं । पद अषय दायक मुकति नायक, जान पद पूजी करूं ॥ शिवसाथ करत सनाथ सुव्रतनाथ मुनिगुण माल हैं । तस् चरण आनदभरण तारण, तरण विरद विशाल हैं। अब श्रीमुनिसुव्रत में पायन परूं। सुखदाय लख पायन परू । डौं ह्रीं श्रीमुनिसुव्रतनाथ जिनेन्द्राय गर्भ, जन्म, तप, ज्ञान, निर्वाण,पंचकल्याण प्राप्ताय अक्षयपद प्राप्तये अक्षतान् निवंपामीीत स्वाहा । पुष्प-वेला चमेली रायवेली, केतकी करना सरूं । जगजीत मन्मथ हरण लख, प्रभु तुम निकट ढेरी करूं ॥ शिवसाथ करत सनाथ सुव्रतनाथ मुनिगुण माल हैं। तसु चरण आनंद भरण तारण, तरण विरद विशाल हैं ॥ अव श्रीमुनिसुव्रत में पायन परू, सुखदाय लख पायन परूं । F .
H डों ह्रीं श्रीमुनिसुव्रतनाथ जिनेन्द्राय गर्भ, जन्म, तप, ज्ञान, निर्वाण पंचकल्याण प्राप्ताय काम वाण विनाशनाय पुष्पं निर्वपामीति स्वाहा । नेवेद्य-पकवान विविध मनोग्य पावन, सरस मृदुगुण विस्तरूं । सो लेय तुम पद तर धरतही, क्षुधा डायनको हरूं ॥ शिव साथ करत सनाथ, सुव्रतनाथ मुनि गुण माल हैं। तसु चरण आनद भरण तारण, तरण विरद विशाल हे । अबश्रीमुनिसुव्रत में पायन परूं, सुखदायलख पायनपरूं। डों ह्रीं श्रीमुनिसुव्रतनाथ जिनेन्द्राय गर्भ, जन्म, तप, ज्ञान, निर्वाण पंचकल्याण प्राप्ताय क्षुधा रोग विनाशनाय नैवेद्यं निर्वपामीति स्वाहा। दीप-दीपक अमोलक रतन मणिमय, तथा पावन घृत भरूं ॥ सों तिमिर मोह विनाश, आतम भास कारण ज्वधरूं । शिव साथ करत सनाथ, सुव्रतनाथ मुनि गुण माल हैं । तसु चरण आनंद भरण तारण, तरण विरद विशाल है।अब'श्रीमुनिसुव्रत में पायन पलं, सुखदाय लख पायनपरूं ।। डों ह्रीं श्रीमुनिसुव्रतनाथ जिनेन्द्राय गर्भ, जन्म, तप, ज्ञान, निर्वाण पंचकल्याण प्राप्ताय 'मोहधिकार विनाशनाय दीपं निर्वपामीति स्वाहा। धूप-कर्पूर चंदन चूर भूर, सुगंध पविक में धरूं । तसु जरत जरत समस्त पातक, सार निज सुख को भरूं ॥ शिवसाय करत सनाथ, सुव्रतनाथ मुनि गुण माल हैं। तसु चरण आनंद भरण तारण, तरण बिरंद विशाल हैं ॥ अब'श्रीमुनिसुव्रत में पापन परू, सुखदाय लख पायन पलं। . JAD dkiyo चाबी संग्रह ४१० डों ही श्रीमुनिसुव्रतनाथजिनेन्द्राय गर्भ, जन्म, तप, ज्ञान, निर्वाण पंचकल्याण प्राप्ताय अष्ट कर्म दहनाय धूपं निर्वपामीति स्वाहा। फल-श्रीफल अनार सुआंबआदिक, पकफलअति विस्तरूं । सो मोक्ष फलके हेतु लेकर, तुम चरण आगे धरूं ॥ शिवसाथ करत सनाथ,सुव्रतनाथ मुनि गुण माल हैं। तसु चरणआनंदभरण तारण, तरण विरद विशाल हैं ॥ अव श्रीमुनिसुव्रत में पायन परू, सुखदाय लख पायन परू। "ॐ ह्रीं श्रीमुनिसुव्रतनाथजिनेन्द्राय गर्भ, जन्म, तप, ज्ञान, निर्वाण पंचकल्याण प्राप्ताय मोक्षफल प्राप्तये फलं निर्वपामीति स्वाहा । अर्घ-जल गंधआदि मिलाय आठों, दर्व अर्ध सजो वरू। पूजू चरण पंकज भगति युत, सागर तरू ॥ शिव साथ करत सनाथ, सुव्रतनाथ मुनि गुणमाल हैं। तसु चरण आनंदभरण तारण, तरण घिरद विशाल हैं ।। अब श्रीमुनिसुव्रत में पायन परू, सुखदायलख पायन परू। डॉ ह्रीं श्रीमुनिसुव्रतनाथ जिनेन्द्राय गर्भ, जन्म, तप, ज्ञान, निर्वाण पंचकल्याण प्राप्ताय अनर्घ पद प्राप्तये अर्घ निर्वपामीति स्वाहा। पथपंचकल्याणक । छंद त्रोटक। गर्भ-तिथ दोयज सावन श्याम भयो । गरभागम मंगल मोद भयो॥हरि वृन्दशची पितु मात जात जगत ज ।
चौबी. पजन संग्रह ४११ हम पूजत ध्यावत पाद कजें ॥ उौं ह्रीं श्रीमुनिसुव्रतनाथ जिनेन्द्राय श्रावण कृष्ण द्वितीया गर्भ कल्याणकाय अर्घ निर्वपामीति स्वाहा। जन्म-वैशाख वदी दशमी वरनी। जन्मे तिहि दिवस त्रिलोक धनी॥ सुर मन्दर ध्याय पुरंदरने । मुनि सुव्रतनाथ हमें शरने ॥ २॥ उ ही श्रीमुनिसुव्रतनाथजिनेन्द्राय वैशाख कृष्ण दशमी जन्म कल्याणकाय अर्घ निर्वपामीति स्वाहा । तप-तप दुर्द्धर श्रीधरने गहियो । वैशाख वदी दशमी कहियो॥ निरुपाधि समाधि सुध्यावत हैं। हम पूजत भक्ति बढावत हैं ॥३॥ डों ह्रीं श्रीमुनिसुव्रतनाथजिनेन्द्राय वैशाख कृष्ण दशमी तप कल्याणकाय अर्घ निवंपामीति स्वाहा। ज्ञान-वरकेवल ज्ञान उद्योत कियो। नवमी वैशाख वदीसुखियो ॥धन मोह निशाभनि मोक्षमगा। हम पूजतहें भवसिधु धगो॥ ४॥ डों ह्रीं श्रीमुनिसुव्रतनाथजिनेन्द्राय वैशाख कृष्ण नवमी ज्ञान कल्याणकाय अर्घ निर्वपामीति स्वाहा । निर्वाण-वदी वारस फागुण मोक्षगये। तिहुंलोक शिरोमणि सिद्ध भये ॥ सु अनंत गुणाकर विघ्नहरी। हम पूजत हैं मनमोद भरी ॥५॥ों ह्रीं श्रीमुनिसुव्रतनाथजिनेन्द्राय फाल्गुण कृष्ण द्वादशी मोक्ष कल्याणकाय अर्घ निवंपामीति स्वाहा ।
चोवी० पजन संग्रह ४१२ अथजयमाला।दोहा। महाअर्घ-मुनिगण नायक मुक्त पति, सुक्त व्रताकर युक्त ।भुक्ति मुक्ति दातार लख, वंदूंतन मनउक्त। छंद त्रोटक-जय केवल भान अमान धरं । मुनिस्वच्छ सरोज विकाश करंगभव संकटभंजन लायक हैं । मुनिसुव्रत सुबत दायक हैं ॥ २ ॥ घनघात वनं दव दीप्तभनं ।भववोध तृषातुर मेघधनं॥ नित मंगल धुंद पधायक हैं। मुनिसुव्रत सुत्रत दायक हैं ।। ३ ।। गरभादिक मंगल सारधरे। जगजीवन दुखदंद हरे ॥ सब तत्व प्रकाशन लायक हैं। मुनि सुव्रत सुत्रत दायक हैं॥ ४॥ शिव मारग मंडण तत्व कहो । गुणसार जगत्रय शर्म लहो ॥ रुज रागरुदोष मिटायक हैं। मुनि सुत्रत सुत्रत दायक हैं ॥ ५॥ समवश्रुतिमें सुरनार सही। गुण गावत नावत भाल मही ।। अरु नाचत भक्ति बढ़ायक हैं। मुनि सुबत सुत्रत दायक हैं ॥ ६ ॥ पग नपुरकी धुनि होत भने । झननं झननं झननं अननं ॥ सुरलेत अनेक रमायकहैं । मुनिसुव्रत सुबत दायकहें ॥७॥ धननं घननं घन घंट बजे। तननं तननं तन तान सजे॥ हम हम मृदंग वजायक हैं । मुनि सुत्रत सुबत दायक हैं।॥ ८॥छिनमें लघु ओ छिनथूल बने । युत हावविभाव विलास पने ॥ मुखतें पुन यो गुणगायक हैं। मुनि सुव्रत सुप्रत दायक है ॥९॥ धृगतां धृगतां पग पावत हैं। सननं सननं सु नचावत है ॥अति आनंद को पुन पाय कहें । मुनि सुत्रत सुबत दायक हैं,॥ १०॥ अपने भवको फल लेत सही। शुभ भावनते सब पाप वही । तितते सुखको ।
चोबी०
पजन
संग्रह
४१३
हैं
सब पायक हैं। मुनि सुप्रत सुब्रत पायक हैं ॥ ११ ॥इन आदि समाज अनेक तहाँ । कहि कौनसके
जु विभेद यहां ॥ धन श्रीजिनचंद सुधायक हैं। मुनिसुव्रतं, सुव्रत दायक हैं ।। १२ ।। पुन वेश विहार
कियो जिनने । वृष अमृत पृष्टि कियो तुमने ॥ हमको तुमरी शरनाहक है । मुनि सुव्रत सुवत दायक
हैं ॥ १३ ॥ हमपे करुणा कर देव अबै । शिवराज समाज सु देहु सबै ॥ जिम होऊ सुखाश्रम नायक
। मुनि सुव्रत सुब्रत दायक हैं ॥ १४ ॥भवि वृन्दतनी विनती जु यही। मोहि देऊ अभैपद राजसही॥
हम आन गही,शरनाइक है । मुनि सुव्रत सुबत दायक है॥१५॥
घत्ताछन्द-जय गुणगण धारी शिव हितकारी,शुद्ध बुद्ध चिद्रूप पती॥ परमानंद दायक दास
सहायक, मुनि सुव्रत जयवंत यती ॥ १६ ॥ डों ही श्रीमुनिसुव्रतनाथजिनेन्द्राय गर्भ, जन्म, तप,
ज्ञान, निर्वाण पंचकल्याण प्राप्ताय अनर्घ पद प्राप्तये महाघ निर्वपामीति स्वाहा ।
अथ आशीर्वादः । वोहा-मुनिसुव्रत के चरणयुग, जो पूजे अभिनंद।
सो सुर नर सुख भोग के, पावे सहजानंद ॥ १७ ॥
इत्याशीर्वादः। इति श्रीमनिसुव्रतनाथजिन पूजा संपूर्णा ॥ २०॥
चौबी० २१ अथ श्रीनमिनाथजिन पूजा प्रारभ्यते । पूजन संग्रह ४१४ (वृन्दावन कृत) छंद मदावलिप्त कपोल, वारोडक । स्थापना-श्रीनमिनाथ जिनंदनमो विजयारध नंदन । विख्यादेवी मात सहज सव पाप निकंदन ॥ अपराजित तज जै मिथुलापुर वर आनंदन ॥ तिन्हें सुथा यहां त्रिधा करके पद वंदन ॥१॥ ॐ ह्रीं श्रीनमिनाथ जिनेन्द्र अत्रावतरावतर संवौषट् आह्वाननम् । ॐ ही श्री नमिनाथ जिनेन्द्र अत्र तष्ठ तिष्ठ ठः ठः स्थापनम् । ॐ ह्रीं श्री नमिनाथ जिनेन्द्र अत्र मम सन्निहितो भवभव वषट् सन्निधीकरणम् ॥ अथ भष्टक । छंद सुन्दरी वा द्रुतविलंबित । जल-सुरनदीजल उज्वल पावनं । कनक भंग भरो मन भावनं । जजतहूं नमि के गुण गाय के । युग पदाधुज प्रीति लगाय के ॥ ॐ ह्रीं श्री नमिनाथ जिनेन्द्राय गर्भ जन्म तप ज्ञान निर्वाण पंच कल्याण प्राप्ताय जन्म मृत्यु जरारोग विनाशनाय जलं निर्वपामीति स्वाहा । चन्दन-हरि मलयमिल केशरसे घसो। जगतनाथ भवातपको नसो। जजतहं नमि के गुणगाय के । युग पदाम्बुज प्रीति लगाय के ॥ ॐ ह्रीं श्री नमिनाथ जिनेन्द्राय गर्भ जन्म तप ज्ञान निर्वाण पंचकल्याण प्राप्ताय संसारा तापरोग विनाशनाय चन्दनं निर्वपामीति स्वाहा ॥
पूजन संग्रह अक्षत-गुलक के सम सुन्दर तंडुलं । धरत पुंज सुभुंजत संकुलं । जजत हूं नमि के गुणगाय युग पदाम्बुज प्रीति लगाय के ॥ ॐ ही श्री नमिनाथ जिनेन्द्राय गर्भ, जन्म, तप, ज्ञान, निर्वाण पंचकल्याण प्राप्ताय अक्षयपद प्राप्तये अक्षतान् निर्वपामीति स्वाहा ।। पुष्प-कमल केतकि वेल सुहावनी । समरशूल समस्त नसावनी॥ जजत हूँ नमि के गुण गायके । युग पदाम्बुज प्रीति लगाय के ॥ ॐ ह्रीं श्री नमिनाथ जिनेन्द्राय गर्भ, जन्म, तप, ज्ञान, निर्वाण पंच कल्याण प्राप्ताय कामवाण विनाशनाय पुष्पं निर्वपामीति स्वाहा ।। नैवेद्य-शशिसुधासम मोदक मोदनं । प्रबल दुष्ट क्षुधामद खोदनं ॥ जजत हूं नमिके गुण गायके। युगपदाम्बुज के॥ ॐ ह्रीं श्रीनमिनाथ जिनेन्द्राय गर्भ, जन्म, तप, ज्ञान, निर्वाण पंच कल्याण प्राप्ताय क्षुधा रोग विनाशनाय नैवेद्यं निर्वपामीति स्वाहा ॥ दीप-शुचि घृताश्रित दीपक जोइया। असम मोह महातम खोइया ॥ जजत हूं नमि के गुणगाय के। युगपदाम्बुज प्रीति लगाय के ॥ ॐ ह्रीं श्री नमिनाथ जिनेन्द्राय गर्भ, जन्म, तप, ज्ञान, निर्वाण पंचकल्याण प्राप्ताय मोहांधकार विनाशनाय दीपं निर्वपामीति स्वाहा ॥ धूप-अमर जिह्न विषे दश गंधको । दहत दोहत कर्म कबंधको ।। जजत हूँ नमि के गुण गायके । युगपदाम्बुज प्रीति लगाय के ॥ ॐ ह्रीं श्री नमिनाथ जिनेन्द्राय गर्भ, जन्म, तप, ज्ञान, निर्वाण पंचकल्याण प्राप्ताय अष्टकर्म दहनाय धूपं निर्वपामीति स्वाहा ॥ प्रीति लगाय ॥
चौबी० पूजन संग्रह ४१६ -- फल-फल सुपंक्व मनोहर पावने। सकल विघ्न समुर नसावने ॥ जजत हूं नमि के गुण गायके। युगपदाम्बुज प्रीति लगाय के॥ॐ ही श्री नमिनाथ जिनेन्द्राय गर्भ, जन्म, तप, ज्ञान, निर्वाण पंचकल्याण प्राप्ताय मोक्ष फल प्राप्तये फलं निर्वपामीति स्वाहा । अर्घ-जल फलादि मिलाय सनोहरं । अरघ धारतही भय भवहरं । जजत हूं नमि के गुण गाय के। युग पदाम्बुज प्रीति लगाय के ॥ ॐ ह्रीं श्री ममिनाथ जिनेन्द्राय गर्भ, जन्म, तप,ज्ञान, निर्वाण पंचकल्याण प्राप्ताय अनर्घपद प्राप्तये अर्घ निर्वपामीति स्वाहा ।। अथ पंच कल्याणक । छद पाइता। गर्भ-गरभागम मंगल धारा । युग आश्विन श्याम उदारा॥हरि हर्ष जजे पितु माता । हम पूर्जे त्रिवभुन जाता॥१॥ॐ ह्रीश्रीनमिनाथ जिनेन्द्रायआश्विनकृष्णद्वितीया गर्भ कल्याणकाय अंघ निर्वामीति स्वाहा जन्म-जन्मोत्सव श्याम अषाढा । दशमी दिन आनंद बाढा ॥ हरि मंदिर पूर्जे जाई। हम पूर्जे मन वच काई॥२॥ों ही श्रीनमिनाथ जिनेन्द्राय आपाळकृष्ण दशमी जन्मकल्याणकायअर्घ निर्वपामीति स्वाहा तप-तप दुर्धर श्रीधर धारा । दशमी कलिषाढ उदारनिज आतम रसझरलायो । हम पूजतआनंद पायो।। ॐ ही श्रीनमिनाथ जिनेन्द्राय आषाढ कृष्ण दशमी तप कल्याणकाय अर्घ निर्वपामीति स्वाहा ॥ मान-शित मगसिर ग्यारस चूरे । चव घात भये गुणपूरे ॥ समवश्रुति केवल धारी।
पजन चौबी० तुम को नित नमो हमारी॥ ४॥ ॐ ह्रीं श्रीनमिनाथ जिनेन्द्राय मार्गशिर शुक्ल एकादशी ज्ञान कल्याणकाय अर्घ निर्वपामीति स्वाहा । संग्रह निर्वाण-वैशाख चतुर्दशि श्यामा । हनि शेषवरी शिववामा ॥ सम्मेद थकी भगवता । ४१७ हम पूजें सुगुण अनंता ॥५॥ डों ह्रीं श्रीनमिनाथ जिनेन्द्राय वैशाख कृष्ण चतुर्दशी मोक्ष कल्याणकाय अर्घ निर्वामीति स्वाहा ॥ अथ जयमाला॥दोहा॥ महाअर्घ-आयु सहस दश वर्षकी, हेम वरण तन सार ॥ धनुष पंचदशतुंगतन,महिमा अपरंपार ॥१॥ चौपाई-जयजयजय नमिनाथ कृपाला। अरिकुल गहन दहन दवज्वाला ॥ जयजय जग धरम पयोधर धीरा । जय भव भंजन गुण गंभीरा ॥२॥ जयजय परमानंद गुणधारी। विश्व विलोकन जन हितकारी ॥ अशरण शरण उदार जिनेशा । जयजय समवसरण आवेशा॥३॥ जयजय केवलज्ञान प्रकाशी। जय चतुरानन हनि भव पाशी ॥ जय त्रिभुवन हित उद्यमवंता। जयजयजयजय नमि भगवंता ॥४॥ जय जय तुम सप्ततत्व दरशायो । तासु सुनत भवि निजरस पायो॥ एक शुद्ध अनुभव निज भाखें। दो विध राग दोष क्षय आखे ॥ ५॥ द्वय श्रेणी द्वय नय द्वय धर्म। दो प्रमाण आगम गुण शर्म ॥ तीन लोक त्रययोग त्रिकालं। सरल पल्ल त्रयवात वयालं ॥६॥चार बंध संज्ञा गति ध्यान। आरा धन निछेपं चो दानं ॥ पंच लब्धि आचार प्रमाद। बध हेतु पैताले सादं ॥७॥ गोलक पंच-भाव
पजन
॥
चौबी.
शिव भौने । छहो दरव सम्यक अनुकीने ॥ हानि वृद्धि तप समय समेता। सप्तभंग वाणी के नेता
॥८॥सयम समुद्घात भय सारा ! आठ करम मद दल गुणधारा ॥ नवों लब्धि नव तत्व प्रकाश।
संग्रह
नौ कषाय हरि तूप हुलासे ॥ ९॥ दसों बंधके मूल नसाये। सो इन आदि सकल दरसाये ॥ फेरे
४१०
विहर जगजन उद्धारे। जयजय ज्ञान दरस अविकारे ॥१०॥ जय वीरज जय सूक्षम वंता। जय
। अवगाहन गुणवरनंता ॥ जयजय अगुरु लघू निरबाधा। इन गुणयुत तुम शिवसुखसाधा ॥११॥
ताको कहत थके गणधारी। तो को समरथ कहें प्रचारी ॥ ताते में अब शरणे आयो। भवदुःख मेट
देहु शिवरायो॥ १२॥ बारवार यह अरज उमारी। हे त्रिपुरारी हे शिवकारी॥ पर परनतिको वेग
मिटावो। सहजानंद सरूप भिटावो ॥ १३ ॥ वृन्दावन याचत शिरनाई। तुम मम उर निवसो जिन-
राई । जबलों शिवनहि पाऊं सारा । तब लौ यही मनोरथ झारा ॥ १४॥
पत्ताछन्द-जयजय नमिनाथं हो शिवसाथं, औ अनाथ के नाथ सदं ॥ ताते शिरनायो भगति बढायो,
चिहन चिन्ह शतपत्र पद ॥ १५॥ ौं ह्रीं श्रीनमिनाथ जिनेन्द्राय गर्भ, जन्म,तप, ज्ञान, निर्वाण
पंचकल्याण प्राप्ताय अनर्घ पद प्राप्तये महाघ निर्वपामीति स्वाहा।
अथ आशीर्वादः-श्रीनमिनाथ तने युगल, चरण जजे जो जीव ।।
सो
सुरनर सुख भोगवर, होवे शिवतिय पीव ॥ १६ ॥ इत्याशीर्वादः ।।
इति श्री नमिनाथ जिन पूजा सम्पूर्णा ॥२१॥
बोबी० पजन संग्रह ४१९ २२अथ श्री नेमिनाथ जिन पूजा प्रारभ्यते। (वृन्दाबनकृत) छद लक्ष्मीधरा वा अर्धलक्ष्मीधरा। स्थापना-जैतिजे जैतिजे जैतिजै नेमिकी, धर्म अवतार दातार सो चैनकी ॥ श्रीशिवानद भवफंद निकंद, ध्यावें जिन्हें इद्र नागेंद्र औ मैनकी॥ परम कल्याण के देनहारे तुम्ही, देव हो सेव ताते करूं ऐनकी ॥ थापहूं वारत्रय शुद्ध उच्चार त्रय, शुद्धता धार भवपारको लेनकी ॥ १ ॥ ॐ ह्रीं श्रीनेमिनाथ जिनेन्द्र अत्राक्तरावना सवौषट् आव्हाननम् । ॐ ह्रीं श्रीनेमिनाथ जिनेन्द्र अत्र तिष्ठ तिष्ठ टःठ. स्थापनम् । ॐ ह्रीं श्रीनेमिनाथ जिनेन्द्र अत्रमम सन्निहितो भवभव वषट् सन्निधीकरणम् ।। अथ अष्टक । चाल होली तालयुत। जल-निगम नदी जल प्रासुक लीनो, कंचन भंग भराय । मन वच तन ते धार देतही, सकल कलंक नसाय ॥ दाता मोक्ष के, श्रीनेमिनाथ जिनराय, दाता मोक्ष ॥ॐ ह्रीं श्रीनेमिनाथ जिनेन्द्रायगर्भ, जन्म,तप,ज्ञान,निर्वाण पंचकल्याण प्राप्ताय जन्ममृत्यु जरारोग विनाशनाय जलं निर्वपामीतिस्वाहा। चन्दन-हरिचंदन युत कवलीनंदन, कुंकुम संग घताय ॥ विघ्नताप नाशन के कारण, जजू तिहारे 4 ४२० ॥ चौवी. पाय ॥ दाता मोक्षके, श्रीनेमिनाथ जिनराय, दाता मोक्ष के॥ॐ ह्रीं श्रीनेमिनाथ जिनेन्द्राय गर्भ, पूजन जन्म,तप,ज्ञान,निर्वाणपंचकल्याण प्राप्ताय संसारा तापरोगविनाशनाय चन्दनं निर्वपामीतिस्वाहा । संग्रह अक्षत-पुण्यराशि तुम यश सम उज्वल, तंडुल शुद्ध मंगाय ॥ अखै सौख्य भोगनके कारण, पुंजधरूं । गुणगाय ॥ दाता मोक्ष के, श्रीनेमिनाथ जिनराय, दातामोक्षके ॥ॐ ह्रीं श्रीनेमिनाथजिनेन्द्राय गर्भ, जन्म,तप,ज्ञान, निर्वाण पंचकल्याण प्राप्ताय अक्षयपद प्राप्तये अक्षतान् निर्वपामीति स्वाहा ।। पुष्प-पुंडरीक तृण द्रुमको आदिक, सुमन सुगंध मिलाय ॥ दर्पक मनमथ भंजन कारण, जनुं चरण लवलाय ॥ दाता मोक्ष के,श्रीनेमिनाथ जिनराय, दाता मोक्ष के॥ ॐ ह्रीं श्रीनेमिनाथ जिनेन्द्राय गर्भ, जन्म,नप,ज्ञान, निर्वाण पचकल्याण प्राप्ताय कामवाण विनाशनाय पुष्पं निर्वपामीति स्वाहा। नैवेद्य-घेवरबावर खाजे साजे, ताजे तुरत मंगाय ॥क्षुणावेदनी नाश करन को, जजू चरण उमगाय ॥ दाता मोक्ष के, श्रीनेमिनाथ जिनराय, दाता मोक्ष के ॥ ॐ ह्रीं श्रीनेमिनाथ जिनेन्द्राय गर्भ,जन्म, तप, ज्ञान, निर्वाण पंचकल्याण प्राप्ताय क्षुधारोग विनाशनाय नैवेद्यं निव॑पामीति स्वाहा । दीप-कनकदीप नवनीत पूरकर, उज्वल जोत जगाय ॥ तिमिर मोह नाशक तुमको लख, जजू चर्ण हुलसाय ॥ दाता मोक्ष के,श्रीनेमिनाथ जिनराय, दाता मोक्ष के॥ॐ ह्रीं श्रीनेमिनाथ जिनेन्द्राय गर्भ, जन्म, तप, ज्ञान, निर्वाण पंचकल्याण प्राप्ताय मोहान्धकार विनाशनाय दीपं निर्वपामीति स्वाहा । धूप-दशविध गंध मंगाय मनोहर, गुंजत अलिगण आय ॥ दसों बंध जारन के कारण, खेऊ तुम हिंग - चाबी० पूजन संग्रह ४२१ लाय । दाता मोक्ष के, श्रीनेमिनाथ जिनराय, दाता मोक्ष के ॥ ॐ ही श्रीनोमनाथजिनेन्द्राय गर्भ, 'जन्म,तप,ज्ञान, निर्वाण पंचकल्याण प्राप्ताय अष्ट कर्म दहनाय धूपं निर्वपामीति स्वाहा ।। फल-सुरस वरण रसना मनभावन, पावन फल सु मंगाय ॥ मोक्ष महाफल कारण पूजूं, हे जिनवरतुम पाय ॥ दाता मोक्ष के, श्रीनेमिनाथ जिनराय, दाता मोक्षके ॥ ॐ ह्रीं श्रीनेमिनाथ जिनेन्द्राय गर्भ, जन्म, तप, ज्ञान, निर्वाण पंचकल्याण प्राप्ताय मोक्षफल प्राप्तये फलं निर्वपामीति स्वाहा ।। अर्घ-जल फल आदि साज शुचि लीनों, आठों दर्व मिलाय ॥ अष्टम थितिके राज करन को, जजू अंग वसुनाय ॥ दाता मोक्षके,श्रीनेमिनाथ जिनराय, दाता मोक्ष के ॥ॐ ही श्रीनेमिनाथ जिनेन्द्राय गर्भ,जन्म,तप,ज्ञान,निर्वाण पचकल्याण प्राप्ताय अनर्घ पद प्राप्नये अर्घ निर्वपामीति स्वाहा। अथ पंचकल्याणक। छन्द पाइता गर्भ-सित कातिक छह अमंदा। गरभागम आनदकंदा॥शचिलेय शिवापद आयी। हम पूजें मनवचकायी॥ ॐ ह्रीं श्रीनेमिनाथजिनेन्द्राय कार्तिक शुक्ल षष्ठी गर्भकल्याणकाय अर्घ निर्वपामीति स्वाहा ।। जन्म-सित सावन छट्टअमंदा।जनमे त्रिभुवनके चदा॥पितु समुद महासुख पायो। हमपूजतविघ्न नसायो। ॐ ह्रीं श्रीनेमिनाथ जिनेन्द्राय श्रावण शुक्ल षष्ठी जन्मकल्याणकाय अर्घ निर्वपामीति स्वाहा ॥ तप-तज राजमती बतलीनो ।सित सावन छट्टप्रवीनो॥शिवनार तबै हरषाई । हम पूजै पद शिर नाई। ॐ ह्रीं श्रीनेमिनाथ जिनेन्द्राय श्रावण शुक्ल षष्ठी तप कल्याणकाय अनिर्वपामीति स्वाहा ॥ है .
चौबी० २३ अथ श्रीपार्श्वनाथ जिन पूजा लिख्यते। पजन संग्रह ४२४ (वृन्दावनकृत) कवित्त । स्थापना-प्राणत देव लोकते आये, वामादे उर जगदाधार । अश्वसेन सुत नुत हरिहर हरि, अंक हरित तन सुख दातार । जरत नागयुग बोधदियो जिहि, भुवनेश्वर पद परम उदार । ऐसे पारसको तज आलस, थाप सुधारस हेत विचार ॥ १ ॥ डों ह्रीं श्रीपार्श्वनाथजिनेन्द्र अत्रावतरावतर संवशेषट् आह्वाननम् । डों ह्रीं श्रीपार्श्वनाथजिनेन्द्र अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठाठ स्थापनम् । डों ह्रीं श्रीपार्श्वनाथजिनेन्द्र अत्र मम सन्निहितो भवभव वषट् सन्निधीकरणम् ॥ अथ अष्टक । छंद प्रमिताक्षरा। जल-सुर दीर्घिका कन कुंभ भरूं । तव पाद पद्मतर धार करूं ॥ सुखदाय पाय यह सेवत हूं । प्रभुपार्श्व सार्च गुण वेवत हूं॥ों ह्रीं श्रीपार्श्वनाथजिनेन्द्राय गर्भ, जन्म, तप, ज्ञान, निर्वाणपंचकल्याण प्राप्ताय जन्म मृत्यु जरारोग विनाशनाय जलं निर्वपामीति स्वाहा ।
पूजन ४२५ M चौबी० || चन्दन-हरिगंध कुंकुम कपूर घरौँ । हर चिन्ह हेर अरचूं सुरतूं ॥ सुखदाय पाय यह सेवत हूं। प्रभु पार्श्व सार्श्व गुण वेवत हूं ॥ ॐ ह्रीं श्रीपाश्र्वनाथजिनेन्द्राय गर्भ, जन्म, तप, ज्ञान, निर्वाण संग्रह पंचकल्याण प्राप्ताय संसारा ताप रोग विनाशनाय चन्दनं निर्वपामीति स्वाहा। अक्षत-हिमहीर निरज समान शुचं। वर पुंज तंडुल तवाग्रमुचं ॥ सुखदाय पाय यह सेवतहूं। प्रभुपार्व सार्श्व गुण वेवतहूं ॥ ) ह्रीं श्रीपार्श्वनाथजिनेन्द्राय गर्भ, जन्म, तप, ज्ञान, निर्वाण पंचकल्याण प्राप्ताय अक्षय पद प्राप्तये अक्षतान् निर्वपामीति स्वाहा। पुष्प-कमलादि पुष्प धनुपुष्प धरूं । मद भंजन हेत ढिग पुंज करूं ॥ सुखदाय पाय यह सेवतहूं। प्रभु पार्श्व सार्श्वगुण वेवत हू॥रों ह्रीं श्रीपार्श्वनाथजिनेन्द्राय गर्भ, जन्म, तप,ज्ञान,निर्वाण पंचकल्याण प्राप्ताय काम वाण विनाशनाय पुष्प निर्वपामीति स्वाहा । नेवेद्य-चरु नव्यगव्य रससार करूं । धर पाद पनतर मोद भरूं ।। सुखदाय पाय यह सेवत हूं। प्रभु पावं सार्श्व गुण वेवत हूं ॥ ॐ ह्रीं श्रीपार्श्वनाथ जिनेन्द्राय गर्भ, जन्म, तप, ज्ञान, निर्वाण पंचकल्याण प्राप्ताय क्षुधारोग विनाशनाय नैवेद्यं निर्वपामीति स्वाहा दीप-मणि दीप जोति जगमग्ग मई । तब पाद कंजतर वारदई ॥ सुखदाय पाय यह सेवत हूं। प्रभु पार्श्व सार्श्व गुण वेवत हूं ॥ ॐ ह्रीं श्रीपार्श्वनाथजिनेन्द्राय गर्भ, जन्म, तप, ज्ञान, निर्वाण पंचकल्याण प्राप्ताय मोहांधकार विनाशनाय दीपं निर्वपामीति स्वाहा ।
॥ संग्रह। - चौबी० धूप-दश गंध खेय मन माचत हैं । वह घुम घूम मिस्त नाचत हैं । सुखदाय पाय यह सेवत हूं। प्रभु पूजन पार्च सार्श्व गुण देवतहू ॥ डो ह्री श्रीपार्श्वनाथ जिनेन्द्राय गर्भ, जन्म, तप, ज्ञान, निर्वाण पचकल्याण प्राप्ताय अष्ट कर्मदहनाय धूपं निर्वपामीति स्वाहा। ४२६ 11 फल-फल प्रासुक तुमदिग लाय धरूं । ताते शिव सुन्दर नार वरूं ॥ सुखदाय पाय यह सेवत हूं। प्रभु पार्श्व सार्श्व गुण वेवत हूं॥ • ह्रीं श्रीपार्श्वनाथजिनेन्द्राय गर्भ, जन्म, तप, ज्ञान, निर्वाण पंचकल्याण प्राप्ताय मोक्षफल प्राप्तये फलं निर्वपामीति स्वाहा । अर्घ-जल आदिसाज सबद्रव्य लिया। कनथार धार नुतनृत्य किया ॥ सुखदाय पाय यह सेवतहूं । प्रभु पार्श्व सार्श्व गुण वेवतहूं ॥ ौं ह्रीं श्रीपार्श्वनाथजिनेन्द्राय गर्भ, जन्म, तप, ज्ञान, निर्वाण पंचकल्याण प्राप्ताय अनर्घपद प्राप्तये अर्थ निर्वयामीति स्वाहा। अथ पंचकल्याणक । छद लक्ष्मी धरा। गर्भ-पक्ष वैशाखकी श्याम दूजीभनो। गर्भ कल्याणको दिवस सोहीगनो।देव देवेंद्र श्रीमातुसेवें सदा। में जजू नित्यजो विघ्न हो विदा ॥ १ ॥ ॐ ह्रीं श्रीपार्श्वनाथजिनेन्द्राय वैशाख कृष्ण द्वितीया गर्भकल्याणकाय अर्घ निर्वामीति स्वाहा । जन्म-पौषकी श्याम एकादशीको स्वजी। जन्मलीनो जगन्नाथ धर्म ध्वजी ॥ जायके नाक नागेंद्रने पूजिया। में जजू ध्यायके भक्ति धारूं हिया ॥२॥ों ह्रीं श्रीपार्श्वनाथ जिनेन्द्राय पौष कृष्ण चौवी. 4 पजन संग्रह '४२७ . एकादशी जन्म कल्याणकाय अर्घ निर्वगामीति स्वाहा तप-कृष्ण एकादशी पौष की पावनी । राजको त्यागवैराग धारोवनी।। ध्यान चिठ्ठपको ध्याय सातामई। आपको में जजू भक्ति भावे लई ॥ ॐ ह्रीं श्रीपाश्वनाथ जिनेन्द्राय पौष कृष्ण एकादशी तप कल्याणकाय अर्घ निर्वयामीति स्वाहा । ज्ञान-चैतकी चौथ श्यामा महा भावनी । तादिना घातिया घात शोभावनी ॥ वाह्य अभ्यंतरे छद लक्ष्मी धरा । जैति सर्वज्ञ में पाद सेवा करा॥ ४॥ॐ ह्रीं श्रीपार्श्वनाथ जिनेन्द्राय चैत्र कृष्ण चतुर्थी ज्ञान कल्याणकाय अर्घ निर्वपामीति स्वाहा । निर्वाण-सप्तमी शुद्ध शोभे महा सावनी। तादिना मोक्ष पायो महा पावनी ॥ शैल समदते सिद्धराजा भये । आपको पूजते सिद्ध काजा ठये ॥५॥ॐ ह्रीं श्रीपार्श्वनाथ जिनेन्द्राय श्रावण शुक्ल सप्तमी मोक्ष कल्याणकाय अर्घ निर्वपामीति स्वाहा । . अथ जयमाला।दोहा। महाअर्घ-पार्श्व परम गुण रास है, पार्श्व करम हरतार पास शर्म निजवास दो, पार्स धर्म धरतार ।। नगर बनारस जन्मलिय, वंश इक्ष्वाक महान ।। आयुवरष शततुंगनन, हस्तसु नत्र परमाण ॥ ॥
चौबी० २४ अथ श्रीवर्धमान जिन पूजा लिख्यते। पजन संग्रह ४३० (वृन्दावनकृत) छंद मत्तगयन्द । स्थापना-श्रीमतवीर हरो भव पीर भरो सुखसीर अनाकुल ताई। केहरि अंक अरी करदंक नये हरि पंकत मोल सुहाई ॥ मैं तुम को इन थापत हूं प्रभु भक्ति समेत हिये हरषाई। हे करुणाधन धारक देव यहां अब तिष्ठहु शीघहि आई ॥ १ ॥ ॐ ह्रीं श्रीवर्धमान जिनेन्द्र अत्रावतरावतर संवौषट् आह्वाननम् । ॐ ह्रीं श्रीवर्धमानजिनेन्द्र अत्र तिष्ठ निष्ठ ठः ठः स्थापनम् । ॐ ह्रीं श्रीवर्धमानजिनेन्द्र अत्र मम सन्निहितो भवभव वषट् सन्निधीकरणम् ॥ अथ अष्टक । (चाल द्यानतरायजी कृत नंदीश्वराष्टक की) जल-क्षीरोदधि.सम शुचि नीर, कंचन भंग भरू । प्रभु वेगहरो भव पीर, यातें धार करूं । श्रीवीर महा अति वीर, सन्मति नायक हो । जय वर्धमान गुण धीर, सन्मति दायक हो ॥ ॐ ह्रीं श्रीवर्धमान जिनेन्द्राय गर्भ, जन्म, तप, ज्ञान, निर्वाण पंचकल्याण प्राप्ताय जन्म - 1 - चौबी० पजन संग्रह ३३१ मृत्यु जरारोग विनाशनाय जलं निर्वपामीति स्वाहा । चन्दन-मलयागिर चदन सार, केशर संग घसो। प्रभु भव आताप निवार, पूजत हिय हुलसो॥ श्रीवीर महा अतिवीर, सन्मति नायक हो । जय वर्धमान गुण धीर, सन्मति दायक हो॥ ॐ ह्रीं श्रीवर्धमान जिनेन्द्राय गर्भ, जन्म, तप, ज्ञान, निर्वाण पंचकल्याण प्राप्ताय संसारा ताप रोग विनाशनाय चन्दनं निर्वपामीति स्वाहा। अक्षत-तडुल सित शशिसम शुद्ध, लीनो थार भरी । तसु पुंज धरूं अविरुद्ध, पाऊं शिव नगरी ॥ श्रीवीर महा अति वीर, सन्मति नायक हो । जय वर्धमान गुण धीर, सन्मति दायक हो ॥ ॐ ह्रीं श्रीवर्धमान जिनेन्द्राय गर्भ, जन्म, तप, ज्ञान, निर्वाणपंचकल्याण प्राप्ताय अंक्षय पद प्राप्तये अक्षतान निर्वपामीति स्वाहा पुष्प-सुर तरुके सुमन समेत, सुमन सुमन प्यारे । सो मन्मथ भंजन हेत, पूजू पद थारे॥ श्रीवीर महा अति वीर, सन्मति नायक हो। जय वर्धमान गुण धीर, सन्मति दायक हो । ॐ ह्रीं श्रीवर्धमान जिनेन्द्राय गर्भ, जन्म, तप, ज्ञान, निर्वाण पंचकल्याण प्राप्ताय काम बाण विनाशनाय पुष्पं निर्वपामीति स्वाहा। नैवेद्य-रस रज्जत सज्जत सय, मज्जत थाल भरी। पद जज्जत रज्जत अय, भज्जत भूखअरी ॥ श्रीवीर महा अति वीर, सन्मति नायक हो। जय वर्धमान गुण धीर, सन्मति दायक हों ।। .
चोबी० पजन संग्रह ४३२ ॐ ह्रीं श्रीवर्धमान जिनेन्द्राय गर्भ, जन्म, तप, ज्ञान, निर्वाण पंचकल्याण प्राप्ताय क्षुधा रोग विनाशनाय नैवेद्यं निर्वपामीति स्वाहा । दीप-तमखण्डित मंडित नेह, दीपक जोवतहूं । तुम पदतर हे सुखगेह, भ्रमतम खोवत हूं। श्रीवीर महा अति वीर, सन्मति नायक हो। जय वर्धमान गुण धीर, सन्मति दायक हो । ॐ ह्रीं श्रीवर्धमान जिनेन्द्राय गर्भ, जन्म, तप, ज्ञान, निर्वाण पंचकल्याण प्राप्ताय मोहांध कार विनाशनाय दीपं निर्वपामीति स्वाहा। धूप-हरि चंदन अगर कपूर, चूर सुगंध करा । तुम पद तर खेवत भूर, आठों कर्म जरा ॥ श्रीवीर महा अति वीर, सन्मति नायक हो। जय वर्धमान गुण धीर, सन्मति दायक हो । ॐ ह्रीं श्रीवर्धमान जिनेन्द्राय गर्भ, जन्म, तप, ज्ञान, निर्वाण पंचकल्याण प्राप्ताय अष्ट कर्म दहनाय धूपं निर्वपामीति स्वाहा । फल-फतु फल कलवर्जित लाय, कचन थाल भरा। शिव फल हित हे जिनराय, तुमढिग भेट धरा ॥ श्रीवीर महा अति वीर, सन्मति नायक हो । जय वर्धमान गुण धीर, सन्मति दायक हो। ॐ ह्रीं श्रीवर्धमान जिनेन्द्राय गर्भ, जन्म, तप, ज्ञान, निर्वाण पंचकल्याण प्राप्ताय मोक्ष फल प्राप्तये फलं निर्वपामीति स्वाहा। अर्घ-जलफल वसु सज हिमथार, तन मन मोद धरूं । गुण गावं भवदधि तार, पूजत पाप हरूं ॥ ।
चौबी० संग्रह ४३३ श्रीवीर महा अति वीर,सन्मति नायकहो । जय वर्धमान गुणधीर,सन्मति दायक हो॥ॐह्रीं श्रीवर्धमान जिनेन्द्राय गर्भ,जन्म,तप,ज्ञान,निर्वाणपंचकल्याण प्राप्ताय अनर्घपद प्राप्तये अर्घ निर्वपामीति स्वाहा। अथ पंचकल्याणकाराग टप्पा। गर्भ-मोहि राखोहो गरना। श्रीवर्धमान जिनराजजी ॥ मो० ॥ गरभ अषाढसित छह लियो थित, त्रिशला उर अघ हरना ॥ सुरपति तितसेव करो नित, में पूजं भव हरना। मोहि राखो हो शरणा, श्रीवर्धमान जिनराजजी । मो०॥ ॐ ह्रीं श्री वर्धमानजिनेन्द्राय आषाढ शुक्ल षष्ठी गर्भ कल्याणकाय अर्घ निर्वामीति स्वाहा। जन्म-जनम चैनसित तेरस के दिन, कुंडल पुर कन वरना। सुर गिरि सुरगुरु पूज रचायो, में पूजें भव तरना ।। मोहि राखो हो शरणा, श्रीवर्धमान जिनराजजी ।। मो० ॥ ॐ ह्रीं श्रीवर्धमान जिनेन्द्राय चैत्र शुक्ल त्रयोदशी जन्म कल्याणकाय अघनिर्वपामीति स्वाहा। तप-मगसिर असित मनोहर दशमी, तादिन तप आचरना । नृप कुमार घर पारण कीनो, मैं पूजू तुम चरणा ॥ मोहि राखो हो शरणा, श्रीवर्धमानजिनराज जी ॥ मो०॥ ॐ ह्रीं श्रीवर्धमान जिनेन्द्राय मार्गशिर कृष्ण दशमी तप कल्याणकाय अघनिर्वपामीतिस्वाहा । ज्ञान-शुकल दशे वैशाख दिवस अरि,घाति चतुक छै वरना । केवल लहिभवि भवसर तारे, जजू चर्ण सुख भरना ॥ मोहि राखो हो शरणा, श्रीवर्धमान जिनराज जी ॥ मो० ॥
चौबी० पजन संग्रह ४३४ ॐ ह्रीं श्रीवर्धमान निनन्द्राय वैशाख शुछ दशमी ज्ञान कल्याणकाय अयं निर्वपामीति स्वाहा । निर्वाण-कातिक श्याम अमावसके दिन, पावा पुरते परना ॥ गणफण वृन्द जजे तित बहुविध, में पूजू भय हरना । मोहि राखो हो शरणा, श्रीवर्धमान जिनराज जी ॥ मो० ॥ ॐ ह्रीं श्रीवर्धमानजिनेन्द्राय कार्तिक कृष्णामावस्या मोक्ष कल्णाणकाय,अर्घ निर्वामीतिस्वाहा। अथ जयमाला । छंद गीता। महाअर्घ-गणधर अशनिधर चक्रधर,हलधर गदाधर वरवदा। अर चापधर विद्यासुधर,त्रीशूलवर सेवे सदा॥ दुखहरण आनंदभरण,तारणतरणचरणरसालहै। सुकुमाल गुणमणिमाल,उन्नतभालकी जयमाल है ।। घत्ताछन्द-जय त्रिशला नंदन हरिकृत वंदन, जगदानंदन चंदवरं ॥ भवताप निकंदन तन मन वंदन, रहित सपन्दन नयन धरं ॥२॥ छंद त्रोटक-जय केवल भानुकला सदनं । भवि कोक विकाशनकं वदनं ॥ जगजीतमहारिपु मोह हरं । रजज्ञान दृगंबर चूरकरं ॥३॥ गरभादिक मंगल मंडित हो । दुख दारिदको नित खंडित हो ॥ जगमाहि तुम्ही सत पंडित हो । तुमही भवभाव विहंडित हो ॥ ४॥ हरिवंश सरोजनिको रवि हो । बलवंत महंत तुम्ही कविहो ॥ लह केवल धर्म प्रकाश कियो । अबलो सोइ मारग राजत यो॥५॥ पुन आप तने गुणमाहि सही। सुर मग्न रहे जितने सबहो ॥ तिनकी वनिता गुण गावत हैं। लय माननि सो मन भावत हैं ॥ ६ ॥ पुन नाचत रंग अनेक भरी। तुम भक्ति विषे पग येम भरी ।। झननं
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चौबी० पूजन संग्रह .४३४ ॐ ह्रीं श्रीवर्धमान जिनेन्द्राय वैशाख शुक्ल दशमी ज्ञान कल्याणकाय अयं निर्वपामोतिधाहा। निर्वाण-कातिक श्याम अमावसके दिन, पावा पुरते परना ॥ गणफण वृन्द जजे तित बहुविध, में पूजूं भय हरना । मोहि राखो हो शरणा, श्रीवर्धमान जिनराज जी॥ मो० ॥ ॐ ह्रीं श्रीवर्धमानजिनेन्द्राय कार्तिक कृष्णामावस्या मोक्ष कल्णाणकाय अर्घ निर्वामीति स्वाहा। अथ जयमाला। छंद गीता। महाअर्घ-गणधर अशनिधर चक्रधर,हलधर गदाधर वरवदा। अर चापधर विद्यासुधर,त्रीशूलवर सेवे सदा॥ दुखहरण आनंदभरण,तारणतरणचरणरसालहै। सुकुमाल गुणमणिमाल,उन्नतभालकी जयमाल है। घत्ताछन्द-जय त्रिशला नंदन हरिकृत वंदन, जगदानंदन चंदवरं ॥ भवताप निकंदन तन मन वंदन, रहित सपन्दन नयन धरं ॥२॥ छंद त्रोटक-जय केवल भानुकला सदनं । भवि कोक विकाशनकं वदनं ॥ जगजीतमहारिपु मोह हरं । रजज्ञान हगंवर चूरकरं ॥३॥ गरभादिक मंगल मंडित हो । दुख दारिदको नित खंडित हो ॥ जगमांहि तुम्ही सत पंडित हो । तुमही भवभाव विहंडित हो ॥ ४॥ हरिवंश सरोजनिको रवि हो । बलवत महंत तुम्ही कविहो । लह केवल धर्म प्रकाश कियो । अबलो सोइ मारग राजत यो॥५॥ पुन आप तने गुणमांहि सही । सुर मग्न रहे जितने सबहो । तिनकी वनिता गुण गावत हैं। लय माननि सो मन भावत हैं ॥ ६ ॥ पुन नाचत रंग अनेक भरी। तुम भक्ति विषे पग येम भरी । झननं - पोषी० || मननं सननं सननं । सुरलेत तहां तननं तननं ॥ ७॥ घननं घननं घनघंट बजे। हमदं हमद मिरदंग पूजन सजे ॥ गणनांगण गर्भगता सुगता। ततता ततता अतता वितता ॥८॥धृगतां धृगतां गत बाजत संग्रह || है। सुरताल रसालजु छाजत हैं। सननं सननं सननं नभमे ।इक रूप अनेकजु धार भमें ॥९॥ ४३५ केइ नार सु बीन बजावत हैं।'तुमरो यश उज्वल गावत हैं ॥ करताल विषे करताल धरें । सुरताल विशालजु नादकरें॥ १०॥ इन आदि अनेक उछाह भरी । सुर भक्तिकरे प्रभुजी तुमरी ॥ तुमही जग जीवन के पितु हो। तुमही बिन कारणते हितुहो॥ ११ ॥ तुमही यह विघ्न विनाशन हो । तुमही निज आनंद भासनहो ॥ तुमही चित चिंतत दायक हो । जगमांहि तुम्ही शिव लायक हो ॥ १२ ॥ तुमरे पन मगल मांहि सही। जिय उत्तम पुण्यलयो सब ही ॥ हमको तुमरी शरणागत है । तुमरे गुण में मन पागत है ॥ १३ ॥ प्रभु मो हिय आप सदा वसिये। जबलों वसुकर्म नही नसिये। जबलों तुम ध्यान हिये वरतो । तबलों श्रुति चिंतन चित्त रतो॥१४॥तबलों व्रत चारित चाहत हूं । जबलो शुभभाव सुगाहत हूं। तबलों सत सगति नित्त रहूं। जबलों मम संयम चित्त गहूं ॥१५॥ जबलों नहिनाश करूं अरको । शिवनार वरूं समता पर को। यह वो तबलों हमको जिनजी। हम याचत हैं इतनीसुन जी॥१६॥ घत्ताछन्द-श्रीवीर जिनेशा नमित सुरेशा, नागनरेशा भगति भरा ॥ वृन्दावन ध्यावे विधन नसावे, वांछित पावे शर्मवरा ॥ १७ ॥ ॐ ह्रीं श्रीवर्धमान जिनेन्द्राय गर्भ, जन्म, तप, ज्ञान, निर्वाण पंचकल्याण प्राप्ताय अनर्घ पद प्राप्तये महाघ निर्वपामीति स्वाहा ! ॥
चोबी० संजन ka w पूप्रह ४३६ अथ आशीर्वादः । दोहा-श्रीसन्मतिके युगल पद, जो पूजे धर प्रीति। वृन्दावन सो चतुर नर, लहे मुकति नव नीति ॥ १८॥ इत्याशीर्वादः । इनि श्रीवर्धमानजिन पूजा संपूर्णा ॥ २४ ॥ अथ पूर्णार्य-छंदत्रोटक-सुनिये जिनराज त्रिलोक धनी। तुममें जितने गुणहे तितनी कह कौन सके मुखतें सबही । तिहि पूजतहूं गह अर्घ यही॥१॥ॐ ह्रीं श्रीऋषभ,अजित,सम्भव,अभिनन्दन, सुमति,पन,सुपार्श्व,चन्द्रप्रभ,पुष्पदन्त,शीतल,श्रेयांस,वासुपूज्य,विमल,अनन्त,धर्म, शान्ति,कुन्थु, अर, मल्लि, मुनिसुव्रत,नमि,नेमि,पार्श्व,वर्द्धमान इति चतुर्विशति जिनेन्द्रेभ्यःपूर्णाघ निर्वपामाति स्वाहा । अथ आशीर्वाद । कवित्त-ऋषभ देवको आदि, अंत श्रीवर्धमान जिनवर सुखकाररातिनके चरण कमल को पूजे, जो प्राणी गुणमाल उचार ॥ ताके पुत्र मित्र धन योधन, सुखसमाज गुण मिले अपार । सुर पद भोग भोग चक्रीव्हे, अनुक्रम लहै मोक्ष पद सार ॥ २॥ इत्याशीर्वादः ॥ अथ कविनामादि वर्णन। छंद मनहरण-काशीजी में काशीनाथ नन्नूजी अनंत राम, मूलचंद आडत सुराम आदि जानियो। सज्जन अनेक तहाँ धर्म चंदजीके नंद, वृदावन अग्रवाल गोल गोत मानियों ।। ता ने रचो पाठ पाय मन्नलालको सहाय, बालबुद्धि अनुसोर सुनो सरधानियो । तामें भूलचुक होय ताहि शोध शुद्धकीजो, मोहि अलपज्ञजान क्षमाउर आनियो॥१॥ इति श्रीवर्तमान चतुर्विशति जिनेन्द्राणां वृन्दावनकृताभाषा पूजा सम्पूर्णा
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