Acharya Shri Vinaychandra Gyan Bhandar, Jaipur

Shri Ramchandrabhooshan

Lacchiram · 2011/09

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श्रीरामचन्द्रोविजयते तमाम् ।
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प्रेय प्रेमी पाठक ! यह लीजिये, आज "श्रीरामचन्द्र भूषण" आपकी भेट:
रता हूं। "हाथके कगनको कहाभारसी" आप स्वयं सुविज्ञ है, इसके प्रत्येक
रत्नकी बहुमूल्यता अवश्यही अनुमान करलेंगे । निवेदन केवल इतनाही
मात्र है कि यदि किसीकारणवश स्वकण्ठमें विभूषित करनेका अवकाश
नपाइये तो मन मन्दिरहीमे स्थान दान देकर मुझे कृतार्थ कीजियेगा।

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श्रीरामचंद्रभूषणकी विषयानुक्रमणिका। सरख्या विषया पृष्टावा सम्पा विषया पृष्टाका tw . " ८ ९ ९ " १ मगलाचरण २ अलङ्कारस्वरूपवर्णन ३ अर्यालङ्कार तथा पूर्णापमालदार वर्णन ४ तवकोपमालङ्कारवर्णन ५ पूर्णापमा माला अलवारवगन • धर्मभिन्न मालोपमालदारवर्णन ७ एक धर्ममालोपमालारवर्णन ८ अनेक धर्ममालोपमालङ्कार वर्णन पर्म लुप्तोपमालङ्कार वर्णन १-वाचक लुप्त २-उपमेय लुप्त ३-उपमान लुप्त ४-धर्मवाचक लोप ५-टपमान उपमेय लुम ६-उपमेय धर्म लोप ७-वाचक उपमेय लुम ८-उपमान वर्म लोप ९ -उपमान वाचक धर्मलुप्त १०-उपमेय वाचक धर्मलोप ११-वाचक उपमान उपमेयलोप १२-उपमान उपमेय धर्मलोप १३-चारोंको लोप पूर्ण लुम १४-उपमाके भेद वर्णन १० अनन्वयालङ्कार वर्णन ११ उपमानोपमेय अलङ्कार वर्णन १२ प्रतीप अलङ्कार वर्णन द्वितीय प्रतीप तृतीय प्रतीप चतुर्थ प्रतीप पञ्चम प्रतीप १३ रूपक अलङ्कार वर्णन -तद्रूप रूपक अधिकोक्ति २३ २-नप रुपक होनोक्ति ३-तद्रूप रूपक समोक्ति १७ ४-अभेद रूपक अधिकोक्ति ५-अभेट रूपक होनोक्तिः -अभेद रूपक समोक्ति ७-अपर सपक वर्णन ८-निरग सपक वर्णन ९-परम पारत रूपक वर्णन १४ परिणामालङ्कार वर्णन १-समस्त विषयक रूपक १९ १५ समस्न विषयक परिणामालङ्कार वर्णन २० १६ उल्लेखालङ्कार वर्णन द्वितीय उल्लेख वर्णन २१ २७ सुमिरन भ्रम सन्देहालद्वार वर्णन २२ १० १८ भ्रमालङ्कार वर्णन २९ सन्देहालङ्कार वर्णन ૨૩ २० शुद्वापन्हुति अलङ्कार वर्णन २१ हेतु अपन्हुति अलङ्कार वर्णन २२ परजस्तापन्हुति अलङ्कार वर्णन २६ २३ भ्रांत्यापन्हुति अलङ्कार वर्णन ૨૭ २४ ठेकापन्हुति अलङ्कार वर्णन २५ कैतवापन्हुति अलङ्कार वर्णन २८ २६ उत्प्रेक्षालङ्कार वर्णन ૧૨ १-उक्तविषयावस्तोत्प्रेक्षा वर्णन २-अनुक्तविषयावस्तोत्प्रेक्षा वर्णन ३१ २७ हेवात्प्रेक्षा अलङ्कार वर्णन ૨૨ १५ १-सिद्धि विषयाहेतोतत्प्रेक्षा २-मसिद्धिविषयाहेतोत्प्रेक्षा ३३ ३-फलोत्प्रेक्षा ३४ ४-असिद्धि विषया फलोत्प्रेक्षा " " " ३ " .

श्रीरामचंद्रभूपणकी विषयानुक्रमाणका । ४५ है " संप्पा विषपा एपनि संग्न्या विपया एपोका २८ गम्पोरधारमार वर्मन ३१ ४० परिसरापुर मबार वर्णन २९ सनविग्रपोधि भगार वर्णन . ४८ मेपालंकार वर्णम ३ सापहमावि रागाप्ति मार सन २८ -भीमा पर वर्णन ११ मेकाधि पोधि भम्भार वर्णम २-मिापद वर्णन १२ सम्मवासिययोति मतदार वर्णन ४ ३-मोषमार्ण मपार गुप तर दिवीप वर्णन मिठ बढेष "मम्मातिगयोनिमार नग सममित इमेप २४ चपणाविमोकि भगार वर्णन ५-माधुर्ष मुम सममिव इसेप ५ मत्वम्हाधिवपोकि भगार बर्णन 1-मसार गुण सममित रोप २६ दुरूपयोगता भागार पणन ४९ मप्रस्तुति मर्यसा मगार वर्णन ५० दिलीप वर्णम कारब मुशकारन म्यम टीपम २कारण मुकारमकपन ५८ । पपभर वर्णन -सामाग्य मुख मिशेष पपन "पकामगार वर्मन १८ रोपकासि भगार बम ४-पिशेष मुख तामाप कपन ५-गुम्म मत्वायमें गुबम्पन १-प्रपम पातचि २-भारनि ५ प्रस्तुत भर मनाकर बर्षम २-ौष पहात ५१ परवानोठि भार पर्जन १-म रपमा .९ प्रतिषस्तुपमानारमन २-पर्यापीछि ४ शम्दाहार वर्णन YU ४१ मिन भरमार वर्मन ५२ किया मावस्तुवि मग्मार वर्णन १ीवार नबन १-सुवि माय सिमा पर २-पर्पमें भवर्यकोवर्म २-स्तुति माय स्तुति ३-ममम पनी एक धर्म -विना माब मिया ४-सरममसरम निरमा ५३ भाषागार पर्व ४९ १-पपम विषयामास १-मसर भर्प २-दिदीप पचम पर ४५ मदिरेमगारवर्मन ५४ पिरोपाभाट महकमरपन १-मरिक ५ विभागमा भहार पर २-मनीष पिमापना -मदीप विमापना ४॥ समोहिमागार पर्पन ४-चतुर्प विमाषमा ४४ मिटिमगार पर्यन ५-पंचम दिमापना १८ - दिमागमा समागेकि मामार वर्णन ५५ ५६ विरोपोषि मर्मकार रन ४. पारकर भारपणा ५७ मसम्भवाम्बार पन ४८ सरम

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(८) भीगमचंद्रभूपणयी विभपानुक्रमाणका । , . समया पिपया पवर संनया विषया १५ स्मायो मम्भर नरेन १८ भाकि मम्मर पर .. वगुणाचार पत्र ११ मिमति भम्भारपण १८ मपूर्ण अधर भिषापर्णन १५/१२ सिपाभार पर्वन शिवीय मन रापिपि मर्मकार मन १२१ ९९ मापनबार (१२५ हेतु मर्मकार वर्णव भाषामा वर्ण ११ मिमित भार वर्जन २नीलीप वर्णन १२ सामान भगाकार पर १२० पहागार मन मीनियमकार बर्मन 1-अप्रतिमबुमार वर्मय १ पिपा मम्भार गर्वन २-मारियम मावि नुमाम 1 गूगेतर मार पिचर मबार वर्षय ११ -मम्पपीरियामास २-दिलीप बन १२९ 1.स्माभर वर्णन ४-सानुभास वर्णन १८ पिहितकार बम ५-पास मारियमक रोक्तिभकारवर्षम ११२ बोकबारमार ५ गुणधि मरभर पक्ष 4-मादिपकीमोड । २१५ मिमि मलमा बम १ मुक्ति मम्बार बम मन्तबर्ष मा भो २३मोहिमपारवर्ष भास (२ ११४ रोति भागार पत्र र वर्णन ९-समागारम १५५ स्वमायोकि मम्मर मम 1 -परपाधि बन ११५ माविक भरभरपाई २१८ एजश मनि ११.ग्रा भार वर्ष १५ोमबर्षिय हापडकमपि। T ।

॥ श्रीगणेशायनमः ॥ ॥अथ रामचन्द्र भूषण लिख्यते॥ V watc ॥ मङ्गलाचरण ॥ ॥वरवै॥ श्रीगुरु गणपति शारद गोरीनाथ । भरत लपन रिपुसूदन सियवर साथ॥१॥ ॥ कवित्त ॥ वेलि फलिगई कौशिला के कामना की कल, फैल्यो भाग नाग नर सूरज सुमन को। लछिराम जाग्यो दशरथ को अ- खण्ड ओज, मण्डित भुवन दल्यो दावा दुसमन को ॥ राम- चन्द्र, भरत, लषन, शत्रुहन चारु, ब्रह्म अवतार भार भूतल दमन को। गाज्यो रघुबंश अवतंश अमरेश राज्यो, औधअंश ढेर में सुमेर त्रिभुवन को ॥२॥ जोग वल जागे भाग नाग नर देवन के, सन्तन सरोज रामचन्द्र भूषण। को समोर समुदे भयो । लछिराम राम अवतार के अतकही में, असुर अरातिन अमान अमुचे भयो ॥ भासमान अवध अमन्द उदयाचल पे, परम प्रताप की प्रभा को प्रमुदै भयो । यौदहो भुवन अवर्तश राजवंश मणि, ब्रह्मराशि कौशिला उदर सौ उदे भयो ॥३॥ शा सुधा शशि धेनु रभा कल्पतरु मणि, मालाकार म हिमा नखन के बरन में। अंकुश गजेन्द्र वाजि कमला कमल धनु, खल वण्ड कुलिश गरल आचरन में ॥ लछिराम जन धन लाली अनुराग मद, पेप ध्वज वेघराज भानंद भरन में। शोभा सिन्धु मयि रच्यो मनमथ मानो थारु, चौदहो रतन रामचन्द्र के चरन में ॥४॥ कौशल कलश महाराज राम रघुवीर, महारानी मेथिली सनेह समुदे रहैं। लछिराम शारद महेश घरवानी पेस, 'चा यो वेद विरद वितान मुदै रहैं ॥ मणि-मच गज-रथ पा लकी अरिन्द मोलि, रतन सिंहासन प्रकाश प्रमुवै रहैं। घायो फल चौदहो रतन स्यौ सषिचु धन, चायो न्यो चरणाम्धुज उवे रहैं ॥५॥ शारद सभाग अनुराग में रतन पारें, परम प्रकाशमान भान अश भोज की। चैन भार सरल तरंगें परिमल सक, नैन रामचन्द्र चारु चरीक चोज की । लछिराम नखन म हायर प्रमाली लसें, लाली तरवान राशि धान्यो-पल मोज की। भूपन विशाल भाल चौदहो भुवन रज, मालीक मैथि ली के चरण सरोज की ॥६॥ युग चा -11 . है रामचन्द्र भूषण। ३ ॥दोहा॥ मांगत वर करजोरि युग, सीस नमित लछिराम । रामवन्द्र भूषण रुचिर, ग्रन्थ वनै सुखधाम ॥७॥ श्री सीतावर चरित मय, अलङ्कार शुभ रीत । वरने पण्डित कवि यथा, वा पथ परखि पुनीत ॥८॥ ॥ अथ अलङ्कारस्वरूप वर्णन-दोहा ।। बचन छन्द वर व्यङ्ग में, विलग चमक परिमान । भूपन बत पद अर्थ में, अलङ्कार अनुमान ॥९॥ युगल भांति परमान तिहि, प्रथमीलङ्कार । शब्दा फिरि दूजो कहत, मन प्राचीन बिचार ॥१०॥ 11 अथ अथालङ्कार तथा पूर्णोपमालङ्कार वर्णन-दोहा ।। सम समता बाचक धरम, उपमेयऽरु उपमान । चायो जहें पद अर्थ मैं, तहँ पूरन उपमान ॥११॥ ॥ यथा-छप्पै ॥ गुरु वशिष्ट तप राशि, विदित रतनाकर से बर। महाराज दशरथ, भुवन रबि से प्रताप कर ॥ नायो फल से कुँवर, चारु सुर नर मन मोहैं। कौशिल्या केकई सुमित्रा, छवि लों सोहैं । लछिराम सुधा सरि सीस रजु, वन प्रमोद तट लहि लहर। अमरेश-पुरी लों जगमगै, अवध नगर आनन्द बर ॥१२॥ || कुण्डलिया॥ सजल श्याम--धन से लसत, सिंहासन श्रीराम । शुभग सची लों मेथिली, अङ्ग बाम अधिगम ॥

रामचन्द्र भूपणन अन पाम अभिराम, लपन सुरतरु से फूले । भरत शत्रुहन सुमत, भ्रमर से विहरत भूले ।। परने कवि लछिराम, गुप्क्षरत मन्दर से गज । जयति कोशलाधीश, नवल गोरी घर सेसज ॥१३॥ । कविच ॥ सुरभि समीर मुकुलित वन वागन में, छीर सर सरिता समौज समुदे वयो। लछिराम रा राग नगर पगर घर, नाग नर देषन प्रकाश प्रमुर्दे वयो ॥ गणपति गोरि शम्भु शारद असीसे वेय, इन्वहू ते असुर अतङ्ग अमुदै गयो। कौशल क लस रामचन्द्र पाल-सूरज लों, ब्रहमराशि कौशिला उदर सो उठे भयो ॥१४॥ । पुना। काछनी फमर लसे छोरें पटुका की पीरे फहरें प्रसन हीरे लाल गुन गथ के । लछिराम ललित हरीरे धनु-चान कर, लोचन विशाल भाल भाग समरय के ॥ रामचन्द्र भरत ल पन रिपुसवन पै, ये रहे अपार ओज आनंद अकथ फे। क रत बिहार सह तीर सरयू पे घारो-फल से कुमार महाराज दशरथ के ॥१५॥ ॥पुनः॥ कीरति अमन्द चार चन्द चतिका सी फेली, घढ्यो दान दनों देयराज दरसन सौ। युगुल जसीले भुजदण्ड पे अखण्ड सांने, ममर प्रचण्ड ध्योम खम्म तरपत सोलछिराम नाग नर सागर मगन पी, राजहंस स मिसिरी फे सरयत सौ।

N रामचन्द्र भूषण ५ दूषन दुखद सुर सङ्गमी समाजें राम, रघुवंश भूषन सुमेर परवत सों ॥१६॥ ।। पुनः ॥ सौरभित सोरे जानें युगुल जसीले कर, मेंहदी चलित अरविन्द अरुनारे से। लछिराम चिन्तामणि आरसी से ओज दार, वदन समौज देवि रूप लों सॅवारे से ॥ पांवड़े सुमन परिपूरन प्रकाशमान, ढारे सकुचनि गौन गज मतवारे से। मण्डित महावर चरन मैथिली के मंजु, मानिक महल खिलैं थलज हजारे से ॥१७॥ || पुनः॥ शुभग सुरङ्ग नैन विरद वहाली सङ्ग, विकसत मौज में सरोज मानसर से। वदन विशाल भाल परम प्रकाश ओज, वगरि विराजै लछिराम बिजु वर से ॥ भुज फरकीले आंगु- रीन में नवल नख, आवदार मंजु मुकताहल के लर से। राव रामचन्द्र के युगल कर दान बारि, बरसत बारहो महीने जलधर से ॥१८॥ ॥ अथ तवकोपमालकार वर्णन-दोहा ।। अर्थ सदृश में जहँ परै, समता सम.उपमान । जहँ तहँ मिलि तवकोपमा, अलङ्कार परमान । ॥ यथा कवित्त ॥ शरद कलाधर सों बदन विशाल जैसो, विहँसनि तैसी चारु चन्द्रिका उमङ्ग की। युगल जसीले जिमि अरविन्द से हैं नैन, लखनि तिरीछी तिमि आनंद प्रसङ्ग की। लछिराम रामचन्द्र भुज फरकीले जैसे, तैसी वसीकरन सगुन मौज रङ्ग । . ६ रामचन्द्र भूषण! की। सिरमोर मालीक अवधपुरी है जैसी, तैसी धार तरल तरंगें रामगा की ॥२०॥ ॥ पुनः॥ लखन कुमार जैसो दाहिने लसत तेसो, वाम भाग शत्रु छन सुखमा समाजे है। भूपन भुअन जैसो सामुहे भरत पी छे, तैसोई सुमन्त गुणधीरता जहाजे है ॥ लछिराम जैसे घा जि घरही कुरा तेसी, बांक घरछेती रघुवंशिन वराजे है। विरद अखंड राम रघुधीर जैसो तेसो, वीर अमनेक महावीर सो बिराजे है ॥२१॥ ॥ मय पूर्णोपमामासा गणन-पोश ॥ जहें अगनित उपमेय को, विरचि एक उपमान । अलकार मालोपमा, वर्णनीय परमान ॥२२॥ ॥ पपा कपिच ॥ चन्द्रिका सी दीपति पदन की विराजे पर, विसनि येस चन्द्रिका लों विलसति है। माल ख्योर चन्दन चमक चारु चन्द्रिका सी, थन्द्रिका सी हीरा मोती करूँगी घसति है। चन्द्रिकी सी फर में नवल नख माला जोति, लछिराम चन्द्रि का पान हुलसति है। राव रामचन्द्र पीर चान्यो जुग रायरे की, चायो विसि चन्द्रिका सी कीरति लसति है ॥२३॥ ॥ मप पर्मभिममासोपमासार वर्णन-दोरा ।। पर्णनीय पक धर्म पर, कल्पित बहु उपमान । धर्मभिन्न मालोपमा, प्राचीनन मत मान ॥२॥ ॥ पपा कविच ॥ आवकर फलफि फवीलोकार चन्द्रिका सो, उन्नत अमल 14 रामचन्द्र भूषण । - हिमालय के हजारा सों। लछिराम विलसत भूपर झलक भ- यो, छलकत हीरा गज गौहर के थारा सों॥सौरभित सीरो मलयज सों मजेजदार, सातौ दीप दीपति में थरकत पारा सों। चौदहो भुअन रामचन्द्र को सुजस फैल्यो, मङ्गलीक न- वल धवल गङ्गधारा सों ॥२५॥ ॥ अथ एकधर्मामालोपमालङ्कार वर्णन-दोहा ।। जहँ उपमान अनेक रचि, एक धर्म की रीति । एक धर्म मालोपमा, बरनै सुकवि सप्रीति ॥२६॥ ॥ यथा कवित्त ॥ जेठ भान कर से कपिल कोप लर से हैं, माला सों द- वानल त्यों गजब गहर से। काल बिकरारे से कुमार दामिनी से देव, दारुन कला से प्रलै सिन्धु की लहर से ॥ लछिराम जालिम जंजीरे जमजाल से ये, कालदण्ड ख्याल से कमालिया कहर से । कालिका कृपान मुण्डमाली के त्रिशूल से हैं, राम चन्द्र बान फनमाली के जहर से ॥२७॥ ॥ अथ अनेकधर्म मालोपमालङ्कार वर्णन-दोहा ।। जवहिँ बहुत- उपमेय को, सम सुबहुत उपमान। सम अनेक मालोपमा, नव प्राचीन प्रमान ॥२६॥ ॥ यथा सबैया॥ भाल 4 हीरन की कलँगी, लरके नषतावली के लर से हैं। आनन ओज कलाधर से, लछिराम हँसैं छटा श्री बरसे हैं। बाहैं मृणाल सी कञ्जन से कर, मौज उमाह हरा हरसे हैं। सातऊ दीप मैं श्रीरघुबीर, प्रकाश प्रताप दिवाकर से हैं॥२७॥ ॥ । L रामचन्द्र भूपण। ॥ अप पम्मलुप्तापमापकार पर्णन-दो॥ वर्णनीय याचक धरम, अरु उपमान सुवेस । इनहि घटाये सीनिलों, लुप्तोपमा सुदेस ॥२८॥ ॥अप पम्पमुसोपमा,-पया सर्वया ॥ वाह भुजङ्ग सी पालव से कर, आगुरी पै नख हीरक हार से । त्यो लछिराम घटान से रस, प्रभा विहँसे मुफताहल थार से ॥ ये भ्रमरायली लो जुलफे, जुग भोई कमान सी आनन मार से । पाल मयत लों भाल थली, रघुनाथ के लो चन खल कुमार से ॥२९॥ ॥मप वापरल्स, पपा सर्वया ॥ मृदु माधुरी हांसन ही मनमें, मुकतालर को घरसावत है। अति भोज प्रभाकर की महिमा, मिथिालापुर में घर सावत है ॥ लछिराम सुरूप मनोहर राज-कुमारन को तर सावत हैं। रघुनाथ कलाधर आनन की, परमा रस में सर सावत हैं॥३०॥ ॥अप स्पमेय सप्त,-पया सबैया ।। सांवरे गोरे घटा छटा से, विहरे मिथिलेश की बाग यली में। दोने धरे अरविन्दन पे,भवलोकि ग्हे तरु की अ वली में ॥ स्यों लछिराम सुरेस कुमार से, आनन की रुचि भांति भली में। ग्राम की राजसिरी सी बुडून के चन्वन स्योर है भाल पली में ॥३॥ ॥मय उपमान मुस-पथा सपैया॥ आनन पे कड़ी ऐसी प्रभा, घड़ी लालिमा सी दृग पा 1- + “९ रामचन्द्र भूषण। सँवारे । त्यों फरकीले भुजा बलवन्त, उदार से हाथ लसैं गजरारे ।। धूम गोराई व स्यामता की, लछिराम लखै मिथि- लेस जो हारे । लक्खन राम से राज समाज में, राजत कौन महीप के बारे ॥३२॥ ॥ अथ धर्मवाचक लोप,-यथा सवैया ।। लोचन बान हैं भीहैं कमान, कलाधर आनन भूषन तारे भाल मसाल मरालिया गौन, मिले बिहँसै मुकताहल थारे॥ मङ्गल मूरति मंजु मनीन के, माल गरे लछिराम हजारे ।ल- क्खन राम सुरेस कुमार, सुरेस कुमार स्वयम्बर वारे ॥३३॥ ॥ अथ उपमान उपमेय लुप्त-यथा दोहा॥ बाल बेषधर ख्याल से, बिलसत बर बनमाल । जनक स्वयम्बर जगत से, दरसत राज मराल ॥३४॥ || सवैया ॥ कान की छोरन मंजु मरोरन, लालिमा में भरे लोचन बाड़े । चन्दन ख्योर पै स्वेद के बुन्द, चढ़ीं चल भौहैं गरूर में गाढ़े॥ बाहैं बली फरके लछिराम, सही रघुबीर यौँ बीरता माढ़े। श्री मिथिलेस मुनीस के सौहैं, सरासन शम्भु को 0 23 हेरत ठाढ़े ॥३५॥ ॥ अथ उपमेय धर्म लोप, यथा सवैया ।। त्यौर तिरीछी किये मुनि सङ्ग में, हेरत शम्भु सरासन मार से । त्यौं लछिराम दुहूं कर बान, कमान लौँ भौहें सु. ब्रहमवतार से ॥ सामुहे श्री मिथिलापति के, अभिराम सही

रामचन्द्र भूषण।
से ॥३६॥
रस वीर सिँगार से। नीलम चम्पक हार से कौन, स्वयम्बर
में मृगराज कुमार
॥अप पाचफ उपमेय सप्ता-पया पर ।।
सरद कलाधर विहरत मग्नल साज ।
थीथिन अवध विराजत नृप सिरताज ॥३७॥
॥भय नपमान पर्मलोप,--पपा परवै॥
रघुवर सों को त्रिभुअन भुज बलवन्त ।
धनु सो भयो कहा कर गिरजा फन्त ॥३८॥
॥अप तपमानपायक पम्मसुम–पया पर।
राजमहल रघुनन्दन चन्दन ख्योर ।
भरत लपन रिपुसूदन लोचन कोर ॥३९॥
॥अप उपमेपपायक पर्मसोप-पपा परी ।।
चपल स्याम धन चपला सरजू सीर ।
मुकुत माल मय वारिज भ्रमर अंजीर ॥२०॥
॥भप बापक उपमान उपमेय सोप-पपा परपै ॥
दान बारि सो सींचत त्रिभुवन हेरि ।
असुर सेन हनि राखत धरमहि फेरि ॥४॥
।। अप अपमान उपमेप पर्म सोप–पवा पर।
आप समान सुरेसहि समुझि सकोप ।
रापन मन में राखत आकर ओप ॥२२॥
॥भय पारी को सोप पूर्ण पपया पर ।।
अङ्गद सो कहिं तारा पिरव सैंभार ।
मम सोहाग हरसोहे तिनहि निहार ॥२॥

. रामचन्द्र भूषण। ११ ।। अथ उपमा के भेद वर्णन-दोहा । शब्द सुनत में होय जव, वाचक ज्ञान सुबेस । तहँ श्रोती उपमा कहत, नागर कवि गन देत ॥४॥ अरथ निरूपण में जहां, समुझि पर सुख साज। तहँ उपमा गनि आरथी, जे कविन्द सिरताज॥४५॥ ॥ अथ अनन्वया लकार वर्णन-दोहा।। जहां होय उपमेय को, उपमेयै उपमान । अलङ्कार बरने तहां, अनन्वया सुखदान ॥४६॥ ॥ यथा सबैया ॥ बारिज बीरबधूटी प्रभाकर, मन्द परै रजनी परमाली। ज्वालामुखी बड़वानल की, लछिराम त्यों धूम धुजी सिख- राली ॥छार करें खल बंशन को, अवतंश हितून पै अंश गुलाली। श्री रघुनाथ प्रताप लों भूपर, रघुनाथ प्रताप की लाली ॥४७॥ ॥ कवित्त ॥ राम सम राम मेथिली लो मैथिली की प्रभा, लषन सो लषन सहायक हमेस को । लछिराम ललित भरत शत्रुहन सम, ललित भरत शत्रुहन है सुबेस को॥ कैकई सी कैकई सुमित्रा लों सुमित्रा देवि, दानी रघुबंश बरदानियां महेस को। कामधेनु कौशिला सी कौशिला कलपतरु, कौशल सों कौशल नगर कौशलेश को ॥८॥ सुघर सुकण्ठ सों सहायक सुकण्ठ भूप, अङ्गद सों अ. गद अमोल अनुमानो में । सेवक सक्ल हनूमान सों अभङ्ग जङ्ग, हनूमान सेवक सबल सलमानो में ॥ लछिराम कनक श्री که रामचन्द्र भूषण। भवन सो कनक मोन, रामगड सम रामगह मौज मानो में। त्रिभुवन मोलि राव रामचन्द्र मेथिदी लों, राव रामचन्द्र मे थिदी को परमानो में ॥१९॥ ॥ सर्पया ॥ मांझ खयम्घर में मिथिलेस के, राम सी राम की ला लिमा छाई। रूप की राशि प्रकाशिका लों, विजेमाल गरे पहिरावन आई।यों लछिराम लसी कर कक्ष में, भारती के मन को भरमाई । मैथिदी सी तिहूदोकन में, मिली मैथिली की शुम सुन्दरताई ॥५०॥ ॥ पुनः॥ सूरज से घड़े ओज अमन्द, मलीन परे नृप मण्डल ता रे। भी मिथिलेस के मानन पे, चढ़े औरई ओज अनरव पसारे ॥ को परने लछिराम समा, जयमाल अवे गरे माल गरे । राम से राम सिया सी सिया, सिरमौर घिरधिषि चारि सँवारे ॥५१॥ ॥मपम्पमानोपमेय महार वर्णन-दोरा ॥ जहें उपमा उपमेय को, परसपरी व्यवहार । तो उपमा उपमेय कहि, भूपन मानव हार ॥५२॥ ॥ यया कषित ॥ भरत लपन शत्रुहन मोर मण्डली लों, मोर-धन्व भाग भरतादि के समा सो है । लछिराम सर मघावान रघुर्व शिन सो, दान रघुवंशिन को सरनि भघा सो है। मालाफार थी जुरी लो मैथिली विलास पर मिली विलास वीजुरी की रामचन्द्र भूषण। १३ अरमासी है। राम रघुवीर श्याम घन परमा सो भन्यो, श्याम घन राम रघुबीर परमा सो है ॥५३॥ "पुनः॥ गोरे अङ्ग रङ्ग चारु चम्पक बरन वारे, हरष हलोरें मौज मन्द विहसन की। ख्योर कासमीरी पोरी पाग त्यो युगल भाल, कोरे लाल कलैंगी मरोरै जुलफन की ॥ लछिराम तेज तरुनापन हरनि अंस, वदन दुहूं पैं परमाली श्री लहन की। तिरछौंहैं भौहैं शत्रुहन सी लषन लसै, लषन सी भौहें तिर- छोहैं शत्रुहन की ॥५॥ ॥ सत्रया॥ श्री अमरावती लौं मिथिला, मिथिला सम श्री अमरा- वती मोहै। सागर छीर खयम्बर सो, त्यों स्वयम्बर सागर छीर बनो हैं । सारद मैथिली सी लछिराम, सुमेथिली सा- रद लो गुन जोहैं । लक्खन राम कलाधर से, सु कलाधर लक्खन राम से सोहै ॥५५॥ ॥ अथ प्रतोप अलकार वर्णन दोहा ।। बर्णनीय को होय जब, सब सुरूप उपमान । बरनत प्रथम प्रतीप तहँ, पण्डित सुमति निधान ॥५६॥ ॥ यथा कविता नवल नकीव से अलापचारी कोकिल त्यो, चारन से च- चरीक आनंद अतूले हैं । सेनप सुबीर से बिहङ्ग बिहसीले सोर, लछिराम सर से सुमन सजमूले हैं। विरद बितान रघुवंशिन से बाग बन, भाग भरे दल से बिलास अनुकूले - . स रामचन्द्र भूपण। हैं। रावरे प्रताप से महीप रामचन्द्र चारु, किंशुक अनार क चनार का फूले हैं ॥५७॥ ॥ सया ॥ पायन से गुल्लाला जपा दल, पन वधूक प्रभा वियर हैं। हाथ से पल्लव नौल रसाल के, लाल प्रभाव प्रकाश करे हैं। लोचन की महिमा सी त्रिवेनी, लखे लछिराम प्रिताप हरे हैं। मेथिली आनन से अरविन्द, कलाधर आरसी जा नि पर हैं। ६॥५८॥ ॥ मय द्विवीय मसोप-दोग। जयहि होय उपमान सो, वर्णनीय अपमान । तह दूसरो प्रतीप कहि, नव प्राचीन प्रमान ॥५९॥ ॥ पवा करित॥ कात्तिल रुके न घाटे चरपी रुभिर घल, खल भल पार ति खलक जोम लाली को। लछिराम थार में असुर मुण्ड माल दे दे, परवान पाये मुण्डमाली महाकाली सो॥ वाली जा जोहर जवान जहरीली पाडि, प्रथल अता प्रलयानल प्रनाली को। सङ्ग सान रापरी कृपान राय रामचन्द्र, हेरे क्यों न पन्नगी हजार फन वाली को ॥६॥ ॥ सर्वया ॥ पारनवृन्द सो स्याम घटा, अरुप्सानी रहे सिपरालो प हार है। स्यों लछिराम प्रताप सौ राबरे, सूरज चारहो को अ वतार है। औध सो श्री रघुनाथ नरेश, धन्यो अमरावती म मलचार है। कीरति कैसे गरूर करें धरा, या विधि पावन गह की धार है ॥६॥ । 1 रामचन्द्र भूषण १५ L - ॥ अथ तृतीय प्रतीप वर्णन-दोहा ।। वर्णनीय सों होय जव, अन आदर उपमान । तह तीसरो प्रतीप है, पण्डित राव प्रमान ॥२॥ ॥ यथा सर्वया ॥ भाल बिसाल पै राजसिरी जग, लोचन में लसै लालिमा नीकी । आनन ओज पै त्यों अभिराम, कहा कलाचन्द कलि- न्द अनी की॥ हेरि स्वयम्बर में लछिराम, थकी मति राजन की अवली की। श्री रघुबीर सिया छवि सामुहैं, स्याम घटा विजुरी परे फीकी ॥३॥ ॥ अथ चतुर्थ प्रतीप वर्णन-दोहा॥ सर बर में उपमेय के, जब न तुले उपमान । चौथो भेद प्रतीप तहँ, बरनत बुध सुखदान ॥६॥ ॥ यथा कवित्त । दाहक असुर कर परसत सीरो सुर, रैनिदिन बिरद ब- राबरै निहारो में। सुहृद सरोज सांझ सम्पुटित होते याके, वन जन फूले त्रिभुवन के अखारो में ॥ समता तुलै न हेरे भरमत अम्बर में, राहु की डरन थरकत जुग चारो में।'पा- वन प्रभाकर प्रताप रामचन्द्र सोहैं, कैसे कला बारहों विभा- कर बिचारो में ॥६५॥ ॥ अय पञ्चम प्रतीप वर्णन-दोहा ।। वर्णनीय के सामुहें, ब्यर्थ मान उपमान । पंञ्चम भेद प्रतीप को, तहँ विरचत गुनमान॥६६॥ ।। यथा कपित्त। मण्डन भुभन फरकीले मुरण्ड बल, वजर गुमान म- रामचन्द्र भूपण । - घवान के दलत है । जुगल जसीले फर मोज के उमङ्गन में, कलपलता के दीह दल को मलत हैं। साहिवी सरम राज नीति के धरम सोहैं, शङ्कर सुमेरहू के राघदलत हैं। गज मुकसाहल सुजस रामचन्द्र आगे, अपर महीप जस ओरे लों गलत हैं ॥३७॥ ॥अप पर मसकार पणन-दोगा। जहुँ अभाव पाचक धरम, पिपयी विषय विलास । करि एके गुन थापिये, रूपक भूपन रास ॥१८॥ करि सुरूप पफे कहूं, कहुँ न भेद गुन हीन । अधिक होत सम प्रिविधि ये, वरनत मत प्राचीन ६९॥ ॥ पप एप पर अषिकोफिपया कपिच ।। पसत मलीन पर यामी में विसासी यह, मखमली म्यान सो लहर षाज लाली से। लछिराम जा धूमधाम की लपट यामें, वह वषिमाति परसन मुख हाली ते॥ वह फाटि भागे यह कातिल रुके न राव रामचन्द्र कर घर पायें मुण्डमाली ते । जोहर म्वलित भरी कहर हपान पर अधिक बहाली फनमालिनी फनाली ते ॥७॥ ॥मप लूप रपकीनोकि-पया सरीया ।।, चपल पारु धुने सब रण में, होत लका कर लेत लगाम के। बाग मरोर में मोर धजी, कल बोलत आनंद में गुन माम के॥ माफुरे चीते कुरान पे, लछिराम मही महिमा अभिराम के। सागर फांदिवे को फ्फरे, पर-दीन परिन्द महीपति राम के ॥७॥ -- + रामचन्द्र भूषण। १७ ॥ अथ तद्रूप रूपक समोक्ति-यथा कवित्त ।। रदन बलाक बिज्जु भूखन चमक भाल, पंचरंगी वे रङ्ग धनु सरसत हैं। ककुभ 'कलोले भिरे मन्दर फिरत फूले, फैलि सङ्गवारेन के अङ्गपरसत हैं । लछिराम गरजें कुमार अन्ध- कार कैसे, कजरारे असुर सँवासे झरसत हैं। सावन फुहारे गंड मंडित भसुण्ड मग, रामचन्द्र गज मतवारे वरसत हैं॥७२॥ ॥ अथ अभेद रूपक अधिकोक्ति-यथा कवित्त ।। गरजि ककुभ कुञ्जरीन सों कुलेलें करें, छोड़त फुहारे फैलि सुण्डन हजारा को । बिर, सु लछिराम चहलै अजब गैल, बदन चमक विज्जु आनँद अपारा को ॥ कारे लाल-पीरे हरे भूषन जवाहिर के, रङ्ग साज राम देवराज के अखारा को। बारिद बगर बर वारन झमक झूमें, बरसत बारहौ महीने बास्थिारा को ॥७३॥ ।। अथ अभेद रूपक होनोक्ति-यथा सवैया ।। पावन सीतल बारि सुबेस, किये धरा धौल सबै लहरी है। मानस मंजु मुनीसन के, भरै आनँद आले प्रभा फहरी है। ध्यानहु तें अघओघ हरें, लछिराम तिहूंपुर में ठहरी है। की- रति गङ्ग तरङ्गनि राम, करार के नाहर हू छहरी है ॥७॥ ॥ अथ अभेद रूपक समोक्ति-यथा सवैया ।। साखें भुजा फरकीली बहार में, पल्लव हैं करत्यों अरुनारे। ये सुमनावली हैं नख वृन्द, मलिन्द सुरूप त्रिलोक निहारे॥ मेटै ललाट कुअङ्क विरञ्चि, सदा रस एक समोज सँवारे । कामना आठऊ जाम फलै ,कुलपद्रुम राम नरेस हमारे ॥७५॥ 4 १८ विभि.. भोरौ रूपक चतुर । रामचन्द्रभूषण। ॥ अय अपर पक, पर्णन-दोहा।। बरने मति मान । प्रथम निरमान दूसरो, परस्परित परमान ॥७६॥ - पुनि प्रमान कहि तीसरो, गन्थन मन, सरसाय। फिर समस्त विपयक दिये, चोये भेव लखाय ॥७७॥ ॥ भप निरज प वर्णन-पया सर्वया ॥ भालप मोतिन की कलेंगी मनि, मानिक माल गरे मन भावे । भोह कमान त्यों लोचन बान, घिलोकनि खंजर र ते समावे॥ पानि सरोज मृणाल भुजा, लछिराम सभा सुभ सा गर पावै। राम घटा अंग द्रोपत्ति में, मुसकार्नि छटा निरखे - - यनिआवै ॥७८॥ 1 1 . - || भय परम्परित उपक वर्णन-यया दोहा।। सुर समाज सीतल फरन, मलयज मलय समीर । पेरी पन वाहक प्रवल, पदयानल रघुधीर ॥७९॥ ॥ मय परिणामा सवार वर्णन-दोदा ।। करे क्रिया उपमान रेसि, 'वर्णनीय को रूप । भलङ्गार परिणाम तह, परनेत कषि कुल भूप ॥८॥ ॥ यया पषिता ' स्याम पन घरन बिरामत घसन पीरे, सिरपेच हीरेलाल हिलत सँवारे हैं। लछिराम जुगल जसीले फ्रकीले भुज, पाल ग्राहम बेष पर विरद मारे । तरकसी कन्य काक पक्ष की लटक, नैन चपल तिरीछे स्वाक्षरीट सो निहारे हैं। सादुका सुबाहु सीस कसिकै कमान रामचन्द्र परफमल अ चूफ पान मारे हैं ॥८॥ में रामचन्द्र भूषण । १९ || पुन: ॥ • सोहैं मुनि संडली महान वेद मंत्रन सों, मालीक मष धूम मने सरसावै हैं । मंडन भुअन दसरथ के सराही भाग, सुन्दरी सुमन की सुमन बरसावै हैं। लछिराम रामचन्द्र लखन सुरुप हेरि, विहँसि किरातिनै कुतूहल मचावे हैं । पुलकि पसीजे गजरारे हाथ पल्लव सों, गुम गज मोतिन के हार पहिरावे हैं ॥८॥ ॥ अथ समस्त विषयक रूपक वर्णन-दोहा । विषय जवहि आरोपिये, सकल वस्तु के साथ। लखि समस्त विषयक तबहि, अलङ्कार सुभ गाथ ॥८३॥ ॥ यथा कवित्त ॥ झमके मंतङ्ग झख राज सङ्ग परिहरि, र. वाजि माला मौन सुखमा सरीर की। मन्दर पताके वारि बोनर विराट फैले, आंचे ओज बैरिन पै बाइव के भीर की ॥ लछिराम रोछ ब्याल बरबस बोलें खुले, वोहित हरौल था लखन के धीर की। आनंद अभङ्ग राजें तरल तरङ्ग सङ्ग, सागर गैं: भीर सेना राम रघुवीर की ॥८॥ || पुनः गुज़रत कुक्षर कुलेल में गरज घोर, रदन वलाक फुही फहर विसेस को। लछिराम सातौ दीप सीरी सुभ नीति पौन, विरद अभङ्ग मही महक प्रवेस को ॥ श्याम घन राम चन्द्र मैथिली अचल विजु, लपन भरत शत्रुहन मोरं बेस को। बारहौ महीने बर बरसें रतन बारि, दरवार वारिद बगर कौशलेश को ॥८५॥ ।

सतपय Tr- . " - 17 - ॥ मय भपर पक पर्णन-दोश। भोरो रूपक चतुर घिधि, वरने प.मति मान । प्रथम निरसन दूसरो, परस्परित परमान ॥७६॥ : 6 पुनि प्रमान फहि तीसरो, गन्थन मन, सरसाय। फिर समस्त विषयक दिये, चोये भेव लखाय ॥७॥ ॥ भप निरज रूप वर्णन--या सर्वया ॥ भालपै मोसिन को करूंगी मनि, मानिक माल गरे मन भाये । भो? कमान त्यों लोचन धान, पिलोकनि खजर र ते समावे॥ पानि सरोज मृणाल भुजा, लछिराम सभा सुम सा गर पावे ! राम घटा अंग द्वीपति में, मुसकानि छटा निरस्खे पनिआवै ॥७८॥ ॥ भय परम्परित रूपर पर्णन-पया दो सुर समाज सीतल फरेन, मलयज मलेय समीर। पैरी पन दाहक प्रवल, चदयानल रघुवीर ॥७९॥ । भय परिणामा लार वर्णन-बोदा ॥ फरें क्रिया उपमान रचि, 'वर्णनीय को रूप । मलझार परिणाम सह, घरनत फपिःफुल भूप ॥८॥ ॥ यया पिता ' स्याम धन परन विगजत पसन पीरे, सिरपेच हीरेलाल हिलत सेंबारे हैं। लछिराम जुगल असोल फ्रफीले भुज, पाल ग्राम पंप पर पिग्द पगारे हैं। सरक्सी कन्ध काफ पक्ष की लटक, नैन नपल तिरीछे स्वमगेट सो निहारे हैं। साहुपा मुपा सोस फसिके पमान, रामचन्द्र परफमल अ चूप घान मारे हैं ॥८॥ ~ रामचन्द्र भूषणः। v1 । ग । सिरताज राज महाराज रामः रघुबीर, दानी दीनबन्धु बीर कौशल नंगर को ॥९॥ ॥ पुनः॥ श्यामधन सोहैं मुनि मंडली मयूरन को, पुरुष पुरातन प्रमान बेद बर को। मौज मैं सरासन -सिरोमनि: महेश जा- न्यो, ठान्यो देवःवृन्द या प्रकास जोति बर को ॥ लछिराम राजबंस कामद कलस गन्यो, जन बन दानियां सुमेर सब थर को। मिथिला सुरेस प्राननाथ मेथिली त्यों, मान्यो मि- थिलेस बाल ब्रह्म रूप रघुबर को ९११ भूषित भुजङ्ग परमानत महेस मंजु, सीमा कञ्जनालगन- पति गौरि भा हैं। बर गजराज के बिचारैखल सुण्ड जन, बल्ली भवसागरं तरन अभिलार्षे हैं। लछिराम जुगल जसीले परमा- नै खम्भ, असुर अभेरै कालदंड रुख रार्षे हैं।रावरे प्रचंड भुज दंडन को रामचन्द्र त्रिभुवन मानत कलप तरु सार्षे हैं ।।९२॥ " || अय, द्वितीय उल्लेख वर्णन-दोहा।।. बहु गुन मंडित बरनिये, बहु बिधि एक सुरूप। सहँ दूजो उल्लेख कहि, पंडित कवि रस रूप ॥१३॥ ॥ यथा कवित्त ॥ मन्दर महीपन में सुन्दर सुमेर बर, देवन में ब्रहमरूप- रासि के अतन हो। राजहंस नीति में अनीति के कराल, काल दान सनमान बेलि राखत जतन हो ॥ जङ्ग जैत जुगल जसीले फरकोले भुज, बारन उबारन विरद बरतन हो। कलश प्रभाकर सुबंस राव , रामचन्द्र गुन रतनाकर के चौदहो रतन हो ॥९॥ 13 1 २० रामचन्द्र भूपण। - - 1 ॥ पुनः॥ मुखर गैंभीर चान्यो पीर को पिलास पर, सामी स विजु मैथिली है जोति सत्ता की। अजवादि भूपन सभासद मयूर मंजु, सन्त मुनि मण्डली समीर छम छत्ताकीताल छिराम असुर जवासे सरसत जन, अलबेली, आनि पानि जलधर मत्चा की। दान पारि मोजे तिरछोहें इन्द्र धनु-चारु, भौहें पड़ी रामचन्द्र कौशल चकचा की॥८६॥ ॥मय समस्त पियक परिमामासहार पणन-दोरा॥ माँ समस्त विषयक विषे, मिलि परिणाम प्रकास-1 सकल विषय परिणाम त, बरनत सुमति बिलास॥८७॥ ॥ यया सर्पया॥ 1-छीर को खच्छ सरीर छटा मलें, महितमाल विसाल प न्यो भरे । त्यो लछिराम अदेव ओ देवन को, मन वेखिये को हहन्यो हरे ॥ सङ्गमी गंग-सरङ्गित वीरता, सौह समीप मनो- रथ यौ फरे । सागर भी रघुनन्दन के कर फल सो, मानिक मोती सन्यो करे ॥८८ तह ॥भप रस्मेस्वामहार पर्णन-पोरा ।। जब एक को घणिये, बहुत समुसि बहुरोति । मलद्वार उल्लेख तहे, भापत सुकवि सप्रीति मा९॥ ॥पपा फपिच॥ घोहित-विसाल भवसागर भयहर पे, अधम उभारन पती के रगर को । लछिराम शारद महेश वरदानी.ब्राहम, जेत पार माली रावन नगर को। निरजीवे पायो जुग घोदहो भुषन पति, भान पंश पिरष वितान के बगर को। T - 1- - 4

L
रामचन्द्र भूषण
५
।। अथ शुद्धापन्दुति अलङ्कार वर्णन-दोहा ॥
तदाकार आरोपिये, पूरब धन दुराय ।
शुद्धा पन्हुति तहँ कहैं, अलङ्कार कविराय ॥१०॥
। यथा सर्वया ॥
सम्भु सरासन तोयो सही, दिवि लों जग जोति प्र-अ.
कास पसायो । सातऊ दीपन में जस के, लछिराम महीपन
को मद गायो॥ पूयो मनोरथ मैथिली को, मिथिलापुर
में मन मोहनी डायो। राज कुमार नये रघुबीर, अनङ्ग
विजे कर रूप सँवायो ॥१०७॥
॥ पुनः ॥
मण्डित फेन लका से लगाम तैं, ऊपर सू थरके जथा
पारे । गौर गनेन गिरिन्दऊ को, लछिरास न मानै नदी नद
नारे ॥ बाज लौं बैरी लवा पैं परें, लखि वारै परी मुकताहल
थारे । राम नरेस के ये न तुरङ्ग, परिन्द हैं सूरज के रथ वारे॥
॥ अथ हेतु अपन्हुति अलहार वर्णन-दोहा ।।
वस्तु युक्ति बल सों दुरै, बरने और प्रभाव ।
हेतु अपन्हुति समुझि मन, बिरचत पंडित राव ॥१०९॥
॥ यथा कवित॥
दीरघ दतारे भारे दिगपाल मंडल ते, बिरचत कीच मग
मद के पनारे हैं। झूमत झमकि झनकारत जंजीरें जोर, ब-
न्दन बलित रंग सुर धनु टारे हैं ॥ गजराज राव रामचन्द्र
के सु लछिराम, गरजनि छोड़ें सुण्डा दण्डनि फुहारे हैं। ब-
रसत बरहो महीने वारिधारा मेघ, मंगलीक मंडित मजेज
मतवारे हैं ॥११॥

२२ रामचन्द्र-भूपण छटा है नखतावली की, रसराज ऊपर अजूया अवतार की। हीरालाल पलित ललित मोर संग फेघौ, कलँगी फलित भाल भरत कुमार की ॥१०२॥ F + T ॥ पुनः फैधों रूप रासि के प्रकास पै सुमंगलीक, चनन घसी करन मंत्र लहरेले को। रंग वार केधों अनुराग रामचन्द्रही को, जगमग्यो भाल पैसुभाग व्याह-बेले कोलछिराम को-रसबीर-के सिखर सोहैं, मेला रषि-चन्द्र की मरीमिन समेले को । मौर सों दलित,अलबेली जुलफ्न, पर, सिरपंच कंधों श्री लखन अलबेले को॥१०॥ Mirrll पुनIFITT गोरे रंग ऊपर विरामत अअब जामा,-सूरज सिंगार फेधों चम्पक सुमन को। कंगन फलित कर,परमप्रकास कधी, लोहित कमल रच्यो रंग नौरतन को ॥ धीरे मुख मंडित य झाली अधरन लाली, केंधों सोम सांस विकसत राते धन को। रंगवार अजब तरङ्ग जोति मालाफर, फेधों मनि मोर मंग लीक शत्रुहन को ॥१२॥ चार में तिनछी पिला के उतरति पार, कधी या पनाली पनगी की झला मल है। लछिराम केघो प्रले पासर प्रनाली जोर, जौहर जमाली पाली काल करतल है ॥ रावन समर में महीप रामचन्द्र कर, फेधौ या कृपान ज्यालामुखी की सफल है। असल कुमारी परषानल प्रवेंट को, यारहो कला के मारतंड की नकल है ॥१४ा ! - - . F

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२६ रामचन्द्र भूपण। -- ॥ सर्वया ॥ राज कुमारन की अवली में, विराजत यो नयो राज कु- मार है। तेज तपोबल में लछिराम, नया विधि को रसराज सिंगार है । बन्द सो पासर हून अमन्द, दिवाकर तो रज नी सुख सार है। मोहन मंत्र संपारो भयो, मिथला मकर ध्वज को अवतार है ॥११॥ ॥ मय परजस्वा पनुवि असहार पर्णन-दो। और पीच भारोपिये, और गुन ठहराय । पर जस्ता पन्हुति करें, भूपन सव कविराय ॥१२॥ ॥ यया कामिच॥ षगर विलास घेम्व असुर तमालिन को, हायल करत पलही के परखन में । कवि लछिराम धूम धाम कीन कौंधे, कछू दारुन दिगन्सन प्रभाली हरपन में ॥ सुभट सिरोमनि महीप रामचन्द्र यान, जुगुल प्रदोप पाली लाली लसै धन' में । राबरो प्रताप गजरथ पे सवार घेस, घरसत घिरदय हाली प्रिभुमन में ॥११३॥ उन्नत भसुण्हे फरि छोड़त फुहारे नीर, भारे कजरारे करें में निरस हैं। कपि लछिराम गेल गुज़रत मोह मन, मंडित कपोलन मलिन्द वे थिरत हैं। तोरै लोह लगरे म आले विन्द वाले, गज मतवाले ये न फूलिके फिरत हैं। मरोरि पाल के कुमार सुरपति पाले, ख्याल भरे मन्दर त ह॥११॥ । पुन' ।। मेले हीप राम , रामचन्द्र भूषण। २७ + । ॥ अथ भ्रांत्या पन्हति अलङ्कार वर्णन-दोहा ।। परको भ्रम छूटै जहां, काहू बचन प्रबीन। भ्रांत्या पन्हुति कहत हैं, भूषन तहँ रस लीन ॥११५॥ ॥ यथा कवित्त॥ भभरो न मोर धन बीजुरी के मौजन में, सांवरो बरन पीत बसन सरीर को । मङ्गलीक मुख पान कोकनद मानसर, भांवरै भरत भौंर भूले करि भीर को॥राजबंस मानो मि- थिलेस के स्वयम्बर में, लछिराम धोखो चक्रवाकन गंभीर को । सुरन अताप कर सूरज सताप यान, त्रिभुअन मंडित प्रताप रघुबीर को ॥११॥ ॥ पुनः ॥ बन्दन विसाल भाल भूषित गणेश धोखें, देवी देव दौरे कत बर गुन गाथ के । राज बंस मानौ ये न दिग्गज कुमार फैले, गुजरत बगर सँवारे सुभ साथ के ॥ राजहंस भूले ये न सावन घटा के घेर, लछिराम रंग ये न ढारे रङ्ग नाथ के। झरना झरत ये न मरकत मन्दर हैं, राजै मद मंडित मतङ्ग रघुनाथ के ॥११७॥ ॥अथ छेका पन्हुति अलङ्कार वर्णन-दोहा ॥ सङ्कित सत्य पदारथै, दुरवै ब्योंत विचार । छेका पन्हुति भूषन, बरनत रस अवतार ॥११८॥ ॥ यथा कवित्त ॥ झहरात वीजुरी लो जरद बसन छोरै', माधुरी हँसनि मौज ओज धनु बर को चलाक बृन्द हार हीरा मो- २८ रामचन्द्र भूषण। 7 तिन के, सजल पवन सङ्ग स्वेद के लहर को॥ बाई बल शार सरासने जवासो कन्यो, लछिराम हेरत परसराम पर को। विमति सों घुझ्यो राम स्याम धन कैसो, षोल्यो परनत पिरव विलास जलधर को ॥११९॥ । पुनः॥ - सौरभित सुन्वर सिँगार त्रिभुअन सुर, सुन्दरी विहार' मग मालीक मत को । लछिराम तीनो ताप हरत हरप मान, परम प्रकाश चारु चन्द्रिका के सत को ॥ गङ्ग लोपू नीत गज गौहर हरा लो आय, सुमति सों षड्यो भृगुनन्द भाल रस को। सीरो सम हीरो कोन रामचन्द्र जस, राम व रनत विरद मलैज परवत को ॥१२०॥ ॥मप कैतमा पनावि मसबार बगन-दोरा॥ और मिस जहें और को, परने पचन विलास। कैतव पन्हुति सिहि कहैं, अलङ्कार मुद भास ॥१२१ ॥ यया सया॥ लालिमा श्री सरवान की तेज में, सारदा लौ सुखमा की निशेनी । नेपुर नील मनीन जड़े, जमुना जगे जौहर में सुख वेनीयों लछिराम छटा नख नौल, सरकिनी गा प्रभा फल पेनी। मेथिली के चरनाम्युज म्याज, लसै मिथिला मग मजु त्रिबेनी ॥२२॥ ॥ पया पित माधुरी सनि हार हीरक रदन मोती, जोड़े लाल अ धर सुरा अनुमाने को । डोरे नेन मानिक पटिक मनि से रामचन्द्र भूषण। २९ तताई' नीलम चुनीन पूतरीन परमाने को लछिराम ख्योर कासमीर भाल पोखराज, रङ्गमङ्गलीक मरकत वर माने को। रामचन्द्र बदन के व्याज मिथिला में खोल्यो, मदन जवा- हिरी जवाहिर खजाने को ॥१२३॥ ॥ पुनः॥ अतुल अमोल भुज बल को न वारा पार, भूषन मनीन के सभाग सरसत हैं। रेखित हथेली आब आंगुरी नखन पर, पूतरी महीपन अतंकि परसत हैं। कबि लछिराम दान धारा धूम धाम हेरि, मङ्गलीक मेघ साहिवी को तरसत हैं। रामचन्द्र कर मिस कामद कलप तरु, चायो फल बारहो महीने बरसत हैं ॥१२॥ ॥ अथ उत्प्रेक्षालङ्कार वर्णन-दोहा ।। बस्तु हेत फल में जहां, सम्भावना सतर्क । उत्प्रेक्षा भूषन तहां, बरनत हैं मति अर्क ॥१२५॥ है प्रकार गनि बस्तु में, प्रथम उक्त अनुमान । फिरि अनुक्त विषया कहत, उत्प्रेक्षा गुनमान ॥१२॥ हेत फलहु में या विधे, जुगल रीति दरसाय। सिधि असिद्धि विषया सहित, उत्प्रेक्षा सरसाय॥१२७। ॥ अथ उक्त विषया वस्तोत्मेक्षा वर्णन-दोहा ।। जोग वस्तु:सम बरनि जहँ, ताहि उक्त परिमान । जहँ अजोग कलपित सुतहँ, बस्तु अनुक्त बखान ॥१२८॥ ॥ यथा सवैया ॥ शम्भु सरासनै तोयो सनाल सो; भाल विसाल प्रताप , ३० रामचन्द्र भूपण। सोहावे । त्यो लछिराम स्वयम्यर में, मिथिलेस अनन्द अमात न छावे ॥राम गरे जयमाल के देत, सुमेथिली यो समता सरसावै। मानौ रमा रतनाकर में, रतनापली भी हरि को पहिराये ॥१२९॥ ॥ पुन ॥ ख्याल में कक्ष के नाल सों तोन्यो, सरासन शार को विकराल है। मैथिली के पहिरावत में, लछिराम सन्यो शुभ आनंद जाल है। मण्डित मोज स्वयम्बर में, लसे राम गरे यो सरोज की माल है। मानो कलाघर के हियरे, नखतावली बेपित पारिव लाल है ॥१३०॥ ॥ यया विच॥ मनरथ साह मिथिलेस राजमण्डल में, आगमन जैसो मुनि सग से अरत को । नगर उगर नौल विरद वितान पर, घगर स्वयम्पर सुमेर परवत कों॥ लछिराम रामचन्द्र लखन सुभाष सील, सगुन सुरूप यो सराहिबो सुमत फो। अवन पवन दूत पचन विलास पी-, राप दसरथ मानो कन्द सर वंत को ।।१३१॥ ॥ पुनः ॥ मायो मान मोज दीप दीपन महीपन को, फहन्यो नि सान रघुर्वस अमरेस को। छुट्यो सा मैथिली नगर मिथि लेस्टूव्यो राम कर कमल सरासन महेस को ॥ लछिराम लक्ष्मिन पिरद पलित दूत, वचन विवाो तुम दुखद प्र धेस को औघ उदयाचल सिंहासन पे मानो, परभात पर माकर पर्यन अवधेस , دس रामचन्द्र भूषण। ॥ अथ अनुक्त विषयावस्तोत्प्रेक्षा-यथा कवित्त ।। सोधि शुभ लगन महीप दसरथ बेस, अवध नगर सजे सुभग बरात हैं। लछिराम गरजे नगारे धूमधाम सङ्ग, चतु- रङ्ग चमू तें असुर थहरात हैं। विसद हरीरे हीरे मानिक जटित कारे, पीरे लाल रङ्ग यौँ निसान फहरात हैं। दीने मघवान मंजु मानौ गजरथ पर, पँचरङ्ग चौर आसमानी लहरात हैं ॥१३३॥ ॥ पुनः ॥ मङ्गलीक राव दसरथ की बरात सजी, बैरी थहरात रघु- बसिन की भीर तें। कवि लछिराम गंज गरजे निसान बान, बिछले भिरत बाजि गवन समीर ते ॥ मंडित सिखर भाल मचले मतङ्ग झूमे, भौंर मननात मद नदन गंभीर तै । सु- डन फुहारे दै भसुण्डन उठावै मानौ, आवै कड़े दिग्गज कु. मार कासमोर ते ॥१३॥ ॥ सवैया ॥ मान गयो मघवान को भूलि, लखे दसरत्थ बरात छटा घने बरसैं मुद में, रचे देव वधूटी विमान अटा है। लाल अमारी मतङ्गन पै, लछिराम करै समतान कटा है। आवत कजल मेरु मनौ, चढ़ी पच्छिमी नौल गुलाली घटा है ॥१३५॥ ॥ पुनः॥ मोर लों मंजु नचैं धरनी पर, मण्डित फेन लगाम उमा हैं। कान के वीच लसै का पी, फिरै त्योर तिरीछी अलात है । फूल ।

. १३२ रामचन्द्र भूपण। अदा हैं ॥ काम कबूतर लो लछिराम, छले यो अटेरन की परमा हैं। याजि यली रघुवंसिन के, मनो सूरज के रथै मू मन चाहे ॥१३॥ ॥ भय देतात्मेदा भलबार पणनोहा॥ कथन जोग सम सम्भवित, सिदि विषयसो त । यरने कवि कोघिद सर्वे, गृन्थन धीच सचेत ॥१३७॥ ॥भय सिदि पिपया देतोस्मेसा असहार पणन–पया फपिच ।। राज वंश भूपन कगर मिथिला के मच्यो, धूम धाम न गर यितान यो गरव सौ । झमके मता झूमें गरजे नगारे नौल, छपि रहे देव घरछेतन विरव सौ ॥ विसद सुवेय भेट्यो मिफ्लेिस लछिराम, राब दसरथ मिल्यो यसन जरव सौ । चन्द्रिका परस पान हेत में सुधाके मानो, मघवान मि लत सुधाकर शरद सों ॥३८॥ "पुनः॥ बोलत नकीय नौल फहरे निसान ऊंचे, हारचार भीर दुई दल भराभर सौ मङ्गलीक पाजे बजे गरजे मतगतैसे, लछिराम रह रतनाकर लहर सौ ॥ अग में भरत मिथिलेस दसरथ मृको, ता समे पिलास रूप आनंद अमर-सों। मानो रवि चन्द की मरीचिन मजेजे मिल्यो, सुरगुर साह उदयाचल सिपर सो ॥३९॥ ॥सपैया ॥ सोर पन्यो मिथिलापुर में बजी, दुन्दुभी दीह विनोद धगा रो।सारव गोरी गनेस महेस, असीसत उन्नत हाथ पसारो॥ 11 रामचन्द्र भूपण ૨૨ रामको यौं दसरत्थ रहे, मुख चूमि गरे लपटाय निहारो। छी- रधि मंजु सओज मनौ, भन्यो अङ्ग समौज कलाधर वारो॥ ॥ पुनः॥ मौज मई मिथिलापुर में, चतुरङ्ग चमू सजि आई व- रात है । त्यौं उछले मैं जवाहिर की, लरै टूटें तुरङ्गन के ल- हरात है ॥ लक्खन राम को यौं दसरत्थ, लिये निज गोद न मोद अमात है। ताप मिटाइबे के हित मानौ, पपीहरा स्वा- ती के वुन्द अन्हात है ॥११॥ ॥ अथ असिद्धि विपया हेतोत्पेक्षा वर्णन-दोहा ।। असम्भवित अकथन जहां, सम तर्कना समेत । तहँ असिद्धि विषया कहैं, उत्प्रेक्षा सु निकेत ॥१४२॥ ॥ यथा कवित्त ।। द्वारचार वगर वरात कौसलेस जू की, मच्यो धूम धाम मिथिलेस के सहर में। कलित प्रसेद मोर झालरें बलित मुख, जुलफें लसी त्यों परिमल के नहर में ॥ चारु गजरथ पै विराजे रामचन्द्र कछू बिहँसत लछिराम माधुरी गहर में। मंडित मरीची मारतण्ड सङ्ग भोर खिले, कोकनद मानौ छविसागर लहर मैं ॥१४२॥ ॥ पुनः॥ गरजें निसान वान फहरें पताके, देव बरसैं सुमन त्यों बिमानन प्रसङ्ग तैं। लछिराम हीरालाल थार मुकताहल के, वारें मिथिलेस बेस आनँद अभङ्ग ते ॥ उतरे अमन्द राम- -- STTE चन्द्र रामचन्द्र भूषण। धेय रितुराजी सङ्ग पारिद घगर. कन्यो, रसराज मानौ रत नाकर तर ते ॥१३॥ ॥ अय फलोत्प्रेक्षा वर्णन-दोहा।। कथन जोग व्यापार फल, सम सम्भवित प्रधान । सिद्धि विषय फल तह कहत, उतप्रेक्षाहि सुजान ॥१een ॥ पपा कविच॥ पाग अलबेली पै समाग मणि मोर सोहै, कोरें मुकता हल मिलिस लाल हीरे में । लछिराम तैसी बेस वदन पहा ली पड़ी, पड़ चस्व लाली चारु लखनि गैमीरे में। मिथिलेस आंगन रंगीलो रामचन्द्र रूप, पीरे लाल स्याम सेत मण्डप हरीरे में। चन्द फल दीने हेत विहरे ममन्द मानो, सारा धनु जलधर के जैजीरे में ॥१५॥ ॥ पुनः॥ व्याह घर पानक घसन भार भूपन से, नखसिख जागे जोति नवल निकाई में । लछिराम लोने धूमधाम के घिमा नन से, परंसे सुमन सुर सुन्दरी भलाई में ॥रामचन्द्र भरत लखन शनुहन छयि, छलकी परे है सोरभित सुघराई में आगमन मानो मिथिलेस मन सीरे रेत, अङ्गमान चान्योफल मनि अँगनाइ मे ॥१४॥ ॥ पुनः सरपा॥ दूलह येप विसाल यिनोद मे, चारिह ओर सुगन्ध स मीर है।ये रही आंगन मै मिथिलेस के, आनन राम प्रभा सुगंभीर है। सामु रोग एके रछिराम, करी गिरा स्यों रामचन्द्र भूषण। ३३ में उपमा तदवीर है। देखिये इन्दु उदै को मनौ, उदयाचल में अमरावली भीर है ॥१४७॥ ॥ पुनः॥ श्री रघुनाथ के माथ भली, मनिमौर लसी कलँगी नव- रङ्ग मैं । त्यो लछिराम दुहूं कँधा पै, जुलफै मुकताहल हार प्रसङ्ग मैं ॥ ता सुखमा की बरावरी कौं, न. भारती नौल नटीलों उमङ्ग मैं । मंजु मनोरथ पूजिबे मानौ, मिली जमुना बर गङ्ग तरङ्ग ॥१८॥ ॥ अथ असिद्धि विषया फूलोत्प्रेक्षा वर्णन-दोहा ।। असम्भवित सम जहँ रच, तर्क सकल व्यापार । तहँ असिद्धि बियया कहत, फल उत्प्रेक्षा चार ॥१४९।। ॥ यथा कवित्त ॥ भूषन वसन रघुनाथ सिय सुन्दरी पै, मण्डित मनीन लरकत लर हीरे को। कवि लछिराम गल-बांहीं में सुब्याह रीति, गोरो स्याम रङ्ग झलकत सुभ सीरे को ॥ मण्डली मु- नीन की चहूंघां चकचौधै चारु, वारत प्रकास रति मदन गँ- भीरे को। बांध्यो हित रतन सनाल कञ्ज मानो विधि, मर- कत मन्दर सुमेर के जंजीरे को ॥१५०॥ , ॥ पुनः ।। मिथिलेस मण्डप अखण्ड ओज रासि कैसे, परम प्रकास छायो बाहिरे महल के । लछिराम राम सिय भांवरै भरत फैले चारु चरनन ते तरंगें परिमल के ॥ बरसै बिमानन तै विबुध ब- रामचन्द्र भूषण। मानो राथल फल सङ्गमी सकल चारि, चिकसे कमल मड़े मोती झलाझल के ॥१५॥ ॥ पुनः सर्वया ॥ राम को वूलह बेप अनूप, बनी सिय सुन्दरी कोमलता है। पारों गोराई पै पीजुरी को, सैंबराई पै काली घटा कल सा है। मण्डप भीतर भावरे देत, सही लछिराम रची स मता है । संग सबै फ्ल के हुलसी, तुलसी मै लसी मनो हेम लता है ॥१५२॥ ॥ पुन ॥ आगन मे मिथिलेस के यो, रघुनन्दन मेथिली ओज घिसाल है। भावरे देत प्रभा पद कल की, फैली फिर नख जोतिन जाल है। लाली लसे तल की लछिराम यो, स्या मता ते प्रतिविम्बित चाल है। संगमी दानि सबै फल की मनो भूपर चारु त्रियेनी की माल है ॥१५३॥ ॥ अप गम्पोस्प्रेक्षासार वर्णन-दोस। घस्तु हेत फल कल्पना, जनो मनो पद हीन । गम्योत्प्रेक्षा कहत कोउ, ललित गुप्त परवीन ॥१५॥ । . ॥ यया पिच ख्योर कासमीरी यीच तिलक मलेज मेनु, मनि मोर फलेंगी मरोर भाल थल में। फण्ठा फण्ठमाळ हीरे लाल गज मोदर के प्रश्न बहाली लाली पान ओंठ फल में मिथिळेस भौन लछिराम सुर मुनि सोह, टूटी परेंथगर षषूटी प्रेम पल में। जिते रुम्ब फेरत विसि राम, सिते, चन्द्र मारतण्ड की मरीनी शलासर,

रामचन्द्र भूषण।
३७
।
॥ पुनः॥
भूपन
विसाल हीरा लाल मनि मोती माल, ककन क-
लित कर मुद्रिका प्रभा की हैं। लछिराम राम अङ्ग स्याम घन
रङ्ग पर, जुलफै जंजीरेदार पुल परमा की हैं॥छोरै सेत पट
फहरीली मन्द गजगौन, सारद मरोरै मन मौजें समता की
हैं। मरकत मन्दर पै सङ्गमी रतनहार, नहरें तरङ्गदार गङ्ग
जमुना की हैं ॥१५॥
॥ अथ रूपकातिशयोक्ति अलङ्कार वर्णन-दोहा ।।
जह बरनत उपमान के, वर्णनीय अवतार ।
अतिशयोक्ति रूपक तहां, प्राचीनन मत चार ॥१५७॥
॥ यथा कवित्त॥
मिथिलानगर बसीकरन सुरूप जासु, विरद वितान छा-
यो नखत नरेस को। कवि लछिराम सिरमोर है स्वयम्बर में,
करिकै कलप-तरु कुल कौसलेस को ॥ पायो सोर चौदहो
भुअन सिसुपन सूधो, राख्यो प्रन मैथिली समेत मिथिलेस
को । कमल सनाल में झमकि झकझोयो तोयो, देहधारी
मदन सरासन महेस को ॥१५८॥
॥ पुनः॥
माधुरे मुखर में अतङ्ग त्रिभुअन छाय, बगराय विरद स्व-
बम्बर कगर में । पल्लवित साखै सुरतरु फरकाय फन्द, मोजन
मचाय राजबंस के वगर में ॥सींचे बल वारिसों प्रबेस कै
स्वदेस निमि, लछिराम नौल ब्रहम तेज के रगर में। बीजु-
री बलित लै कुमार अमरेस तोयो, स्याम धन सम्भु धनु
शिशिलानगर मैं ॥७॥

३८
। रामचन्द्र भूषण।
॥ पुनः सरैया ॥
सीस लसे मनिमोर मनोहर, भूषन भार बहार में तारे ।
रूप भयो नख ते सिख लौ धनु धान लसे कर में गम
रारे॥है धन रा है चम्पक अन, अनाअनी विधि सांच में
बारे । श्री दसरस्य के सामुहे में, गजरस्थ पे चारि कलाम
पारे ॥१०॥
भूपर पारि खिले अरविन्द, मलिन्द ज्यों ऊपर. प्रेमा
लोरे । स्खलन कीर कपोत लसे, मुकता लर पास विलास
षियोरै ॥ मण्डित कक्ष सनाल कितै, लछिराम तिईपुर के
चित चोरै । कोसिला सामु, हेम लता, धऍ धारी सुब्रम
किये गठि जोरे ॥१६॥
॥मय साप माविशयोकि मलबार पणन-दोरा॥
मिलित मपन्हय होय जो, उस्प्रेक्षा में धीर। 1
सापन्हवातिशयोकि तहे, धरनें कवि गम्भीर ॥१६॥
॥पया कविच॥
मापुरी हँसनि हार हीरक बहार सग, परखत कधि कर
सौरम सदन है । लछिराम अधर बहाली ते धचन पर, वा-
हिम के दाने अमी अयली रपन है ॥ अनमोल गोल चुन्यो
चिन्तामणि आरसी रों, अङ्गहीन तुले कत पापुरो मदन है।
सारे मंद अभ्यर सराहें सुर मूलि चारु, चन्द्रिका पलित रा
मचन्द्र को घदन हे ॥१३॥
॥भय भेदकाविशपोक्सि मलार पणन-दोरा ।।
और शध्दन की जहां, उतकर्पता सुबेस ।
अतिशयोक्ति मेदक तहां-वृत सुफवि नरेस ॥१६॥

रामचन्द्र भूषण। ॥ यथा कविच ।। गुजरत माते गजरथ के मतङ्ग और, मङ्गलीक राजपथ सौरभ नहर की। लछिराम तापर झमेले रघुबंशिन के, औरै कला लखन बघेले अगहर की ॥ तीर भीर नाग नर देव के विमानन तें, औरे धूमधाम रामनङ्ग के लहर की। कल्पलता मैथिली प्रमोद बन कामद सों, और प्रभा राव रामचन्द्र के सहर की ॥१६५॥ ॥पुनः॥ लखन भरत शत्रुहन मान पान औरै, और अमनैकी ह- नूमान बलवान की। दिबिधि मयन्द नलनील केसरी सुकंठ औरै छटा अंगद बिभीषन सभान की। लछिराम रतन सिँ- हासन प्रमान औरे, ऍड़ अलबेली रामचन्द्र के प्रभान की। दान सनमान सान बिरद बितान औरै, और आनि बानि कौशलेश के निशान की ॥१६६॥ ॥ पुनः॥ जुगल कपोल जादू जुलफें जॅजीरेदार, हीरा लाल मोती हार जौहर सँवारे में । करुना कलित सीलसागर तरङ्ग सम, लोचन अभङ्ग मौज रंग रतनारे में॥मंगलीक बदन बिलास लछिराम और, कलँगी मरोर मौर भाल सजवारे में। और आनि और बानि और चढ़े सान भुज, और धनुबान राम कर गजरारे में ॥१६७॥ ॥पुनः॥ रामचन्द्र वदन बिलोकि व्याह बानक में,मंगलीक औ- रई उछाह सरसत हैं। दशरथ पिला समित्रा केकर्ड के

रामचन्द्र भूषण।
॥
॥ पुनः
सपैया
सीस लसे मनिमोर मनोहर, भूपन भार बहार में तारे।
रूप भन्यो नख से सिख लों धनु धान लसे कर मै नम
रारे ॥ है घन रङ्ग है चम्पक अ, अनाअनी-विधि सांच में
ढारे । श्री यसरत्य के सामुहे में, गजरत्य पे चारि कलापर
घारे ॥१६०॥
५
-
--
भूपर चारि खिले अरविन्द, मलिन्द ज्यों उपर. प्रेमा
लोरे । खजन कीर कपोत लस,
मुकता लर पास विलास
वियोरै ॥ मण्डित कल सनाल कितै, लछिराम तिहूपुर के
चित चोरें । कोसिला सामु, हेम लता, पु धारी सुगम
किये गठि जोरै ॥१६॥
। मप सापागातियोक्ति भार वर्णन-दो।
मिलित अपन्हव होय जाँ, उत्प्रेक्षा में धीर ।
सापन्हयातिशयोक्ति तह, वरनें कवि गम्भीर ॥१६॥
॥ यया कपिच॥
माधुरी सनि हार हीरक घेहार संग, परखत को कर
सौरम सदन है। लछिराम अधर बहाली ते पचन पर, वा-
हिम के दाने अमी अपली रबन है। अनमोल गोल चुन्पो
चिन्तामणि मारसी लो, अ हीन तुले कत थापुरो मदन है।
सारे मंद अम्वर सराहे सुर भूलि चारु, चन्द्रिका पलित रा
मचन्द्र को पदन है ॥१६शा
॥ भय भेदनावित्रपोक्ति ममहार पणन-दोरा ।।
ओरे शब्दन की जहां, उतकर्पता सुबेस । -
अतिशयोकि भेदक तहां, मानत सुकवि नरेस॥१६॥

रामचन्द्र भूषण। ३९ - ।। यथा कवित्त ॥ गुजरत माते गजरथ के मतङ्ग औरै, मङ्गलीक राजपथ सौरभ नहर की। लछिराम तापर झमेले रघुबंशिन के, और कला लखन बघेले अगहर की। तीर भीर नाग नर देव के विमानन तें, और धूमधाम रामगङ्ग के लहर की। कल्पलता मेथिली प्रमोद बन कामद सों, और प्रभा राव रामचन्द्र के सहर की ॥१६५॥ ॥ पुनः॥ लखन भरत शत्रुहन मान-पान औरै, और अमनैकी ह- नूमान बलबान की। हिबिधि मयन्द नलनील केसरी सुकंठ औरै छटा अंगद बिभीषन सभान की।लछिराम रतन सिँ- हासन प्रमान और, ऐंड अलबेली रामचन्द्र के प्रभान की। दान सनमान सान बिरद बितान और, और आनि बानि कौशलेश के निशान की ॥१६६॥ ॥ पुनः॥ जुगल कपोल जादू जुलफ जंजीरेदार, हीरा लाल मोती हार जौहर सँवारे में। करुना कलित सीलसागर तरङ्ग सम, लोचन अभङ्ग मौज रंग रतनारे में। मंगलीक बदन विलास लछिराम और, कलँगी मरोर मौर भाल सजवारे में। और आनि और बानि और चढ़े सान भुज, और धनुवान राम कर गजरारे में ॥१६७॥ ॥पुनः ।। रामचन्द्र बदन बिलोकि ब्याह बानक में, मंगलीक औ- रई उछाह सरसत हैं। दशरथ मौसिला सुमित्रा केकई के - - . । रामचन्द्र भूषण। ॥ पुनः सौपा। सीस लसे मनिमोर मनोहर, भूषन भार बहार मे तारे। रूप भन्यो नख ते सिख लो धनु धान लसे कर मै गम रारे ॥ है घन रङ्ग है चम्पक अम अनामनी विधि सांच में गरे । श्री वसरत्य के सामुहे में, गजरत्य पे चारि कलापर बारे ॥१०॥ भूपर चारि खिले अरविन्द, मलिन्द ज्यों ऊपर. प्रेम लोरै । खलन कीर कपोत लसे, मुकता लर पास बिलास पिथोरै ॥ मण्डित कल सनाल किते, लछिराम तिहपुर के चित चोरै । कौसिला सामुहैं हेम लता, पर्प धारी सुब्रम किये गठि जोरै ॥१६॥ ॥ भव सापनमातिशयोक्ति महार वर्षन-दोग। मिलित अपन्हव होय जाँ, उस्प्रेक्षा में धीर । सापन्हवातिशयोक्ति तहें, घरने कथि गम्भीर ॥१६॥ ॥पया कपिच॥ माधुरी सनि हार हीरक बहार सग, परखत काँधे कर सौरभ सदन है। लछिराम अधर बहाली ते वचन पर, पा- दिम के दाने अमी अवली रदन है ॥ अनमोल गोल अन्यो मिन्तामणि भारसी रौ, अन हीन तुले कत घापुरो मदन है। तारे मंद अम्मर सराहे सुर भूलि चारु, चन्द्रिका यलित रा मचन्द्र को घदन है ॥१६॥ । भय भेदकातिशयोकि मसकार पणन-दोरा॥ और शब्दन की जहां, उतकर्पता सुबेस । अतिशयोक्ति भेदक तहा, मानत सुकवि नरेस ॥१६॥ .

रामचन्द्र भूषण। ३९ के ॥ यथा कवित॥ गुजरत माते गजरथ के मतङ्ग और, मङ्गलीक राजपथ सौरभ नहर की। लछिराम तापर झमेले रघुवंशिन के, औरै कला लखन बघेले अगहर की। तीर भीर नाग नर देव के विमानन तें, औरै धूमधाम राममङ्ग लहर की । कल्पलता मेथिली प्रमोद बन कामद सों, और प्रभा राव रामचन्द्र के सहर की ॥१६५ । पुनः॥ लखन भरत शत्रुहन मान पान औरै, और अमनैकी ह- नूमान बलवान की। हिबिधि मयन्द नलनील केसरी सुकंठ और छटा अंगद बिभीषन सभान की॥ लछिराम रतन सिँ- हासन प्रमान औरै, ऐंड़ अलबेली रामचन्द्र के प्रभान की। दान सनमान सान बिरद बितान और, और आनि बानि कौशलेश के निशान की ॥१६६॥ पुन:॥ जुगल कपोल जादू जुलफें जंजीरेदार, हीरा लाल मोती हार जौहर सँवारे में । करुना कलित सीलसागर तरङ्ग सम, लोचन अभङ्ग मौज रंग रतनारे में ॥ मंगलीक बदन विलास लछिराम और, कलँगी मरोर मौर भाल सजवारे में। और आनि और बानि और चढ़े सान भुज, ओरें धनुवान राम कर गजरारे में ॥१६७॥ ॥ पुनः॥ रामचन्द्र वदन विलोकि व्याह वानक में, मंगलीक औ. रई उछाह सरसत हैं। दशरथ कोसिला सुमित्रा केकई के . 4 -- ४० रामचन्द्र भूपणा मन, लछिराम औरई प्रकास परसत हैं। विबुध यधूटी मरे औरई सुमनहार, औरई अदा सों अमरेस दरसत हैं। और खजाने खुले अवध नगर पर, और भांति होरा लाल मोती परसत हैं ॥१६८॥ ॥ अय समन्यासियोक्ति अलकार पणन-पोस। 7 ज] अजोग मे जोग की, करे कल्पना धीर । सम्बन्धातिशयोक्ति तह, प्रथम क्हत गम्भीर ॥१६॥ ॥ यया कविच॥ गुजरत मुखर कुलेल में नगर पर, मानि पन मेरल मयूर खटफस हैं। कोकिल कपोत कीर मंन्दिर कलस कई घ गा नीर तें समीर भटकत हैं। लछिराम उन्नत पवीले पहरात नौल कारे हरे पीरे लाल नग लटकत हैं। थिबुध पधूटी आनि हेरे आसमान छोदि, घगरे पिमान मे निसान मटकत हैं ॥१७॥ ॥ पुनः॥ खेलत कुमार ले कुमार गजराजन के, करत लेल गुम्यन कगर पै । फषि लछिगम नौल धूमधाम के निसान पहरास नोरंग समीर की लहर पे॥ रामचन्द्र सुभग सिंहा सन लसत जाग्यो, अजय अमन्द ओज धादिरे नगर पे फरकाय चन्द्रिका सघन पीजुरी को चूमि, नचत मयूर माते मन्दिर सिखर १७ ॥ दिसीप पर्मन-दो।। तरहि जोग मे कल्पना, करि भजोग निरसङ्ग । सम्यन्भातिशयोक्ति तह, दजी लखि सुभ अङ्गः ॥१७२॥ । २ ।

रामचन्द्र भूषण। ४१ 4 ॥ ८ A , - .. • यथा सवैया कानन कुज प्रमोद बितान भरे, फलफूल,सुगन्ध विधान। बावली के अरविन्दन पै, मकरन्द मलिन्द सने सुभ गाने। त्यौं लछिराम तरंगन तै, सरजू के कड़े सुर साजि बिमाने। औधपुरी महिमा यों चितै, अमरावती को हम क्यों सनमाने । ॥ पुनः ॥ सान भरे भुजदण्ड अखण्ड, तिहूं पुर मण्डन, मान भरै को। आंगुरी वै अलकेस धनी, सनी मौजन में अनुमान अरै को॥ यों नखभा लछिराम लखें, नखतावली के परमाने धरै को। श्री रघुनाथ के हाथन सामुहैं, कल्पलता सनमान करै को ॥१७॥ . ॥ अथ अक्रमातिशयोक्ति अलङ्कार वर्णन-दोहा ॥ कारन कारज सङ्ग जह, अक्रम बरन न होय । अक्रमातिशयउक्ति तह, भाषत हैं सबकोय ॥१७५॥ ॥ यथा कवित्त ॥ बलवान बिरद अखण्ड महीमण्डल पै, मण्डित महान फैल्यो तरनि के तेजे में। लछिराम राख्यो धूमधाम के समर बीच, भौहैं करि भङ्ग दल दारुन दरेजे में ॥ त्रिभुअन ता समे निहारि आचरज दाबैं आंगुरी दसन बरवस नवरेजे में। चान रघुबीर के लगत एकबार ही में, रोदे पै कमान कोरें असुर करेजे मैं ॥१७॥ ॥ पुनः॥ चमू चतुरङ्गिनी चपल चढ़ी रावन की, सावन घटा लों सनी रोष रन रङ्ग तैं। वानर बिराट भालु वांकुरे लखन .

હેર - रामचन्द्र भूषण। सा, घोर घन योलें धन बीरता प्रसाते॥लछिराम सौ मट मेरे गजरथ कट, कोधानल फेटे रामचन्द्र भौ भा तें। समर ममेले में समकि एकधार कड़े, म्यान ते कृपान प्रान अरिंगन असे ॥१७७॥ ॥अथ घपलाविशयोक्ति अपहार वर्णन-दोश सुनतहिं नाम प्रसन्न के, सिद्धि काज अनयास । गनि चपलातिशयोक्ति त अलकार सबिलास॥१७८॥ ॥ यया सर्वया ।। मण्डल राव मुनीसन के, जुवराजी कथा मुद में अको हैं। स्यों लछिराम तिहूंपुर में, दिल वेपन के मन मान बड़े हैं। तेई सबै पुर पीथिन में, अघ केकई के घरदान पर हैं। कानन राम पयान सुने, वसरत्य के प्रान विमान चढ़े हैं। ॥पना॥ पचवटी के विहङ्ग उमस में, पोलत पानी सुधारस घटे । त्यो लछिराम अदेष ललाट से, आयु की रेख के अज वे छूटे ॥ आसुरी हाधन ते पल एक में, भाग सोहाग के भाजन फूटे । आगम श्री रघुनाथ सुने, मुनि मण्डली के मन पन्धन टूटे ॥१८॥ ।। मप मत्पन्वातिशयोकि भसार पणन-दोहा।। कम पूरख पर को जहां, अति अनमिल विपरीति । अस्यतातिशयोकि सो, परने पुध करि प्रीति ॥८॥ ॥ यया कपित॥ अभव अस्खण्ड पार्ह घलित लतालों पसी, मण्डित यि रद मारू मन मा मद्दति है। परम निसा पान कीवे को रामचन्द्र सूषण। ४३ रुधिर चाह, लछिराम साहस अभङ्ग में बढ़ति है ॥ रन रङ्ग बीच रावरी कृपान रामचन्द्र, बङ्क बाढ़ि फन पै बहाली यों बढ़ति है। प्रान पहिलेही हरै असुर सँघातिन के, पीछे पन्न- गी लो म्यान बामी ते कढ़ति है ॥१८२॥ । पुनः॥ भान बंस सूषन सिरोमनि सुभट कीनो, लङ्क पै अतङ्क भरी देवन अकस ते । गजरथ वाजिन गरजि महावीर मही पटकै लपेटिकै लँगूर छोर कस तैंधूमधाम ऐसी रामचन्द्र बीरता की मची, लछिराम रावन सरोष सरकस ते । बैरी मिले गरद भरोरत कमान गोसे, पीछे कई बान तेजमान तरकस तें ॥१८॥ ॥ अथ तुल्य योगता अलङ्कार वर्णन-दोहा ।। चतुर चतुरविधि कहत हैं, लुप्त योग्यता चार । बय॑न्य को जहें धर्म थक, प्रथम कहत व्यापार ॥१८४॥ ॥ यथा कवित्त ॥ रावन महीप चतुरङ्गिनी चमू लै चढ्यो, द्वै रह्यो अतङ्क वङ्क रोदा ठनाठन में । लछिराम जोगिनी जमाति भूत सङ्ग नाचैं, शङ्कर उसाचिन अभङ्ग प्रेस धन में ॥ प्रवल प्रचण्ड भुज दण्ड फरकन लागे, खड़क निको बान तरक से छन में । लखन समत्थ वीर वानर विराट भालु, रघुवीर प्रफुलित होत रन वन में ॥१८५॥ ॥ पुनः सवैया ।। सूकर स्यार कुरङ्ग मतङ्ग, मिलै मुनि देवन की अश्ली मैं। जोगी जती तपसी लछिराम, वरेंपरी किन्नरी भांति , ૨૨ रामचन्द्र भूषण ॥ सन, घोर धन बोले बैन थीरता प्रसङ्ग तेलछिराम सौ मट मेरे गजरथ कट, कोषानल फेटे रामचन्द्र भाभा तें। समर झमेले में झमकि एकवार कड़े, म्यान ते कृपान प्रान अरिगन अग ते ॥१७७॥ ॥ भय चपलातिशयोक्ति अपार वर्णन-दोहा ।। सुनसहिं नाम प्रसङ्ग के, सिद्धि काज अनयास । गनि चपलातिशयोक्ति सके अलङ्कार सविलास॥१७८३ ॥ पया सपैया मण्डल राव मुनीसन के, जुवराजी कथा मुद में अकले है। त्यो लछिराम तिहपुर में, द्विज वेषन के मन मान को हैं। सेई सबै पुर पीमिन में, अब केकई के घरवान पड़े हैं। फानन राम पयान सुने, वसरस्थ के प्रान विमान चढ़े हैं। ॥ पुनः ॥ पञ्चवटी के विहम उमङ्ग में, बोलत बानी सुधारस घूटे । स्यों लछिराम अक्ष ललाट ते, आयु की रेख के घे छूटे । आसुरी हाथन से पल एक में, भाग सोहाग के भाजन फूटे । भागम श्री रघुनाथ सुने, मुनि मण्डली के मन पन्धन टूटे ॥१८॥ ॥ मप मत्पन्ताविसयोकि मसकार वर्णन-दोरा॥ कम पूरव पर को जहा, अति अनमिल विपरीसि ।। अत्यन्तातिशयोक्ति सो, वरने धुध करि प्रीति ॥१८॥ ॥ यया कपिध॥ अजव अस्त्रण्ट थाह पलित लतालों पसी, मण्डिस वि रद मारू मन्त्र मा मति है। परम निसा पान कीये को - - रामचन्द्र भूषण। १३ ते रुधिर चाह, लछिराम साहस अभङ्ग से बढ़ति है ॥ रन रङ्ग बीच रावरी कृपान रामचन्द्र, बङ्क बाढ़ि फन पै बहाली यों चढ़ति है । प्रान पहिलेही हरै असुर सँघातिन के, पीछे पन्न- गी लो म्यान बामी तें कढ़ति है ॥१८२॥ ॥पनः॥ भान बंस भूषन सिरोमनि सुभट कीनो, लङ्क 4 अतङ्क भरी देवन अकस ते । गजरथ बाजिन गरजि महाबीर मही पटकै लपेटिकै लँगूर छोर कस लें ॥ धूमधाम ऐसी रामचन्द्र बोरता की मची, लछिराम रावन सरोष सरकस तैं। बैरी मिले गरद मरोरत कमान गोसे, पीछे कई बान तेजमान तरकस ॥१८३॥ ॥ अथ तुल्य योगता अलङ्कार वर्णन-दोहा।। चतुर चतुरविधि कहत हैं, लुप्त योग्यता चार। बय॑न्य को जहें धम्म यक, प्रथम कहत ब्यापार ॥१८४॥ । यथा कवित्त ॥ रावन महीप चतुरङ्गिनी चमू लै चढ्यो, द्वै रह्यो अतङ्ग वङ्क रोदा ठनाठन में। लछिराम जोगिनी जमाति भूत सङ्ग नाचैं, शङ्कर उमाचित अभङ्ग प्रेस धन मैं ॥ प्रवल प्रचण्ड भुज दण्ड फरकन लागे, खड़क निको बान तरक से छन में। लखन समत्थ वोर वानर विराट भालु, रघुवीर प्रफुलित होत रन बन में ॥१८५॥ ।। पुनः सवैया ।। सूकर स्यार कुरङ्ग मतङ्ग, मिलें मुनि देवन की अबली मैं। जोगी जती तपसी लछिराम, वरें परी किन्नरी भांति . .

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२४
रामचन्द्र भूषण।
भली में ॥ श्री रघुनाथपुरी की प्रभा, सरजू के तरफ से सब
गली में। सिद्धि सुरापी असन्त औ सन्त, विमान चढ़े लसे
व्योम थली में ॥१८॥
।। द्वितीय पणन-यो॥
धर्म अवय॑न्य को जहां, एके विधि ठहराय ।
तुल्य योग्यता दूसरी, घरनत सघ कविराय ॥१८७॥
।। यया कपिच ॥
अमल अमोल गोल कोमल कपोल पर, आरसी अमन्द
दल कमल ठगत हैं। लछिराम लोचन सुरा मंगलीक मीन,
वारे खखरीट धन हरिन ढगत है। सौरभिन पदन समोज
बिसत चारु, पचन बिलास रामचन्द्र के जगत है। दाडिम
अमी के दाख माखन मधुर मधु, कन्द मिसिरी के फन्द फीके
से लगत हैं ॥१८८॥
॥ वतीय पर्णन-दोश॥
जो अवय॑ अरु धर्य को, धर्म एकई साज ।
तुल्प योग्यता तीसरी, परनस कयि सिरताज ॥१८९॥
। पपा कपिच
नैन विकसीले मंग भूधन मरोर कोर, भाल पे यिसाल
ओज वे रसो गहर में । फरकत जुगल जसीले भुज माठौ
आम, यदन सरोज यो पाली मौजार में लाममा-
जैद अभग रंग धीर सम, राव रामचन्द्र पीरताई की लहर
में । यिरद पहार संग वैरी हित अग पर, हार ओ सुरंग
साल देत मुद घर मै ॥१९॥

रामचन्द्र भूपण। १५ 4 f ॥ अथ चतुर्थभेद वर्णन-दोहा।। 5. करै वर्त्य समता सगुन, व्यापारादिक संग। तुल्य योग्यता चौथई; बरने प्रेम उमंग ॥१९१॥ । ।। यथा सवैया ॥ मंगल रासि महेस हो तूं, अमरेस हो तूं सिगरे परमा- ने। तीनहू लोकन मैं अलकेस, धरे लछिराम तूं दान के बाने ॥ पूरन ब्रह्म बिरश्चि तुहीं, गुन में सुगनेस गिरा सन- माने ।, छीर समुद्र गंभीर हो. तूं, बलबीर हो तूं रघुबीर सयाने ॥१९॥ .. ॥ अथ दोपकालङ्कार वर्णन-दोहा ।। जहँ अवयं अरुं वयं को, गुन करि एक प्रभाव । अलङ्कार दीपक तहां, भाषत पण्डित राव ॥१९३॥ ॥ यथा कवित्त॥ विरद अखण्ड भुजदण्डन प्रचण्ड बल, मण्डन करन त्यों बिलास विकसत हैं। अजब अतङ्क त्रिभुअन में असङ्क फैल्यो, नन बन सामुहे उमङ्ग उमसत हैं । जैतवार सुखद सराहै उछिराम कैसे, वार में अचूक वार पार हुलसत हैं। मद सौं मतङ्ग जङ्ग बाज मृगराज राम, रघुवंस सूषन प्रताप सों ल- सत हैं ॥१९॥ ।। अथ दोपकाबृति अलङ्कार वर्णन-दोहा ।। सुकवि दीपकावृत्ति को, वरनत तीनि प्रकार । प्रथम सुआवृत्ति पद फिरें, पढावृत्ति निरधार ॥१९५॥ || प्रथम पदावृति यथा-कवित्त ।। गरजें नगारे लौल गरछैनल वर, वीरनपै वांकुरे वहा- - - ४६ रामचन्द्र भूषण। ली घदलति है। लछिराम रथ पाजि नट के घटा से नये, सूरज के रथ की प्रमाली प्रचलति हैं। रामचन्द्र सौर पर- सी रघुवंसिन की, हेरि हेरि आसुरी सिखर मचलति हैं। तप तप हलचल होत त्रिभुअन भारी, जव जय चम क्तु रजिनी चलति हैं ॥१९॥ ।। मप अर्णवृति यया-दोए । जहि अरथ की आस्ते, फिरि फिरि पद में हेरि । दीपक अरया वृत्ति साँ, घरनतं बुधवर टेरि ॥१९७० ॥पया कपिच॥ सातो दीप अजय अता सरसाय धरी, वगर विराट वेप घिरद वगारे तूं । लछिराम सान में सुमन खिले देवन के, असुर षितान पर गमय गुजार हूं। सिरमौर बीर भान स अवतंस राम, जय चमू चारु चतुरङ्गिनी सँवारे तू । वि कसै सिसारे फ्ले कुमुद कलीन फोरि, वार पार अन्धकार मार अवतारे तूं ॥१९८॥ । मप इसीप पदापति वर्णन मोहा।। पद अरु अर्थ दूहून की, आपति फिरि फिरि होय । कहत पदार्थापति तह, दीपक आकृति जोय ॥१९९॥ ॥ यया कविच॥ करिफ फुलेल मनकारत जैजीरे जोर, उन्नत भसुण्ड नीर छोदत फुहारे से । लछिराम राब रामचन्द्र के नगर घर, घी पिन घगर धीच मानव पसारे से । धारे मद यहत झरत सरना से सजे, घदन अमन्द महा मन्दर सँघारे से। गुलरत } , रामचन्द्र भूषण। ४७ को , झमकै मतंग मतवारे मंजु, गुञ्जरत झमकै मलिन्द मत- वारे से ॥२०॥ ॥ अथ प्रतिवस्तुपमालकार वर्णन-दोहा।। जबहिँ वाक्य वल, कीजै एक समान । प्रतिबस्तुपमा भूषनै, तहँ बरनत मतिमान ॥२०१॥ ॥ यथा सवैया॥ सागर श्री मुकातहल सों, महा मन्दर औषधी लों सुभ साजै । गङ्ग तरङ्ग लौं तीन्यों धरा, द्विजराज सों वेदही सोंभ लौ राजै । धीर सों वीर गंभीरता सों, गुनी यो लछि- राम सयान समाजै । ताप सों देव दिनेस प्रकास, प्रताप सों राम नरेस बिराजै ॥२०२॥ ।। अथ दृष्टान्तालकार वर्णन-दोहा॥ बरनि विम्ब प्रतिबिम्ब सम, वाक्य धर्म जुग साज। अलङ्कार दृष्टान्त तह, परमानत कविराज ॥२०॥ ॥ यथा सवैया।। माधुरी हास विलास भन्यो मुख, भाल पै चन्दन ख्योर सुहावै । त्यों लछिराम खुले कर दान मै', कल्प लतान मैं मौज न आवै ॥ राम कलाधर की सुखमा लखे, आंखिन को रुख और न भावै । छोड़ि तरङ्ग सुधासरि को, कोऊ पोखरी में जल पीवन धावै ॥२०॥ 11पुनः॥ साहसी सिंह सुन्यो बन में तिमि, लक्खन वीरता जागे विशाल है। कामकी सुन्दरता लछिराम त्यों, मोहिनी में रिपु दौन की चाल है । सम्भु को दान सुरेस की साहिवी, राम । न M - । - - .

४८ रामचन्द्र भूषण। नरेस में त्यों कर स्याल है। दीपति सान कलाधर को, कीरतिमान भरत्य भुआल है ॥२०५॥ ॥ भय निदर्शन मणार पर्णन-दोहा । फरि एफें आरोपिये, जुसम वाक्य जुग अर्थ । शब्दनि जो सोमानिये, निदरसना सामर्थ ॥२०॥ ॥ यया सर्वया ॥ ओज पतङ्ग सरोज पिलास, मनोज मै मोहनी रीति फंसी है। स्वच्छता गा सुधाकर में, सुधा देवन में तप रीरि जसी है। मेघ मलेज में सीतलता, लछिराम छमा छवाम्मे सरसी है। थाह बली रघुनाथ के हाथन, घीच सुधीरता आदि घसी है ॥२०७॥ । द्वितीय वर्णन-पोश॥ पपि अव के बीच में, प धर्म करि गौर । पर्यहु धीच अवयं को, थापै तिमि सिरमौर ॥२०८॥ ॥ बन्य में मपन्य को पर्म यया- मानन ओज अमन्द प्रभान, कलाधर में,वही छाह पर है। धन मिलोचन की लछिराम, प्रकासक लालिमा, कस फरी है। मौज महातम की महिमा, फल कल्प-लता परतीति धरी है। गौर गंभीरता श्री रघुनाथ की, छीर समुद्र के बीच भरी है ॥२०९॥ । भय मान्य में पन्य को एफ धम्म, पया-सया।। मानस मंजु मे आनँव भाष, सदा रस एकई की अमि लावे । सांकर में बने खम्भ धरा, अवलम्बन और की आवत मांखे ॥धूसरी यात गने न कळू, लछिराम प्रमानहि साया ॥

1 रामचन्द्र भूषण ४९ के रस चाखें । लायक श्री रघुनाथ कृपानिधि, पैज पपीहरा को मन राखें ॥२१०॥ ॥ अथ सद अर्थ असद अर्थ निदर्शना सद अर्थ यथा-दोहा ।। करै अवस्था सों निजै, भलो बुरो फलदान । सासद अर्थ निदर्शना, इमि असदर्थ प्रमान ॥२११॥ ॥ सवैया।। सन्तने सींचत हैं सुख वारि सों, जीव ऋषीन को त्यों रखवारो। आनँद को भरै मोर मुनीन पे, भूमि कृषीन ते ताप निकारो॥ चाहिये साहिबी सों जम ऐसई, यो लछिराम प्रमान हमारो । स्याम घटा सिख देत यही, रघुनाथ को या विधि रूप सँवारो ॥२१२॥ ॥ अथ असद अर्थ यथा-दोहा । असद जो निज व्यवहार करि, औरन पर धरि ज्ञान । तहँ असदर्थ निदर्शना, कविकुल करत प्रमान ॥२१३॥ ॥ यथा सवैया ॥ धूरि धुरेटे चपेट परे महि, सङ्ग न कोऊ सहायक गोत है। भैया सगो भयो बैरी समे लहि, बूडिगयो बल बांह उ- दोत है। और कहा कहिये लछिराम जू, सोई मिले फल जाकर बोत है। तारा' कही मुख बालि निहारिक, राम न जाने को या फल होत है ॥२१४॥ ॥ अथ व्यतरेकालकार वर्णन-दोहा ।। जहें अवध अरु वयं को, कछु विशेष व्यवहार । 'अधिक न्यून सम भेद विधि यह व्यतिरेक विचार ॥२१५॥ A 요. रामचन्द्र भूषण। कपिच ॥ -- . प ॥भषिक पपा- सुहृद सरोजन पै वैसई विलास भर, कुमुद कुचासी तिमि सम्पुदित डर सों। कोफ मुनि मण्डल असोक अनुः रागन में, भाग भरे भौर कषि कोयिद अमर सोलछिराम राजें रजनीहू में प्रकासित सो, तुलिगो विचार में बराबरी के लर सौ । मण्डन मुअन महाराज रामचन्द्र फछू, राषरोप ताप है विशेप विनकर सो ॥२१॥ ॥म्यून यया-फविच॥ सौरभित सीतल सुधारस पलित घर, कुमुद हिसून पे सुरुप स्यों जगत है । लछिराम चहके चकोर मन जीवन पे, जीयन लौ कर को प्रवाह उमगत है। मालीक मण्डल म नोहर अमल अंस, असुर समालिने करत यल गत है। मे थिली घदन सम कार चन्द पूनो कछु, थासर विलास पर, ऊनो सो लगत है ॥२१७॥- । मप सम म्यवरेक यपा सपैपा भेहि कमान छटा पटपीत पै, जोति अमा जगै आहिर नीरे । सहमी सौरम रासि सुधामई, भूपर फैलत रह हरी रे ॥ बांधत चोलि कथा लछिराम स्यों, मोर मुनीन के जोर अंजीरे । स्पाम घटा रघुनाथ सुरूप, करै सब के मन मौन । में सीरे ॥२१॥ ।। अय सहोक्ति मार वर्णन-पोरा ॥ । रस मेवित जो घरनिये, सप को एके साथ। भूफ्न सुभगासहोक्ति तहैं, परमानस गुन माय १२१९॥ ॥

रामचन्द्र भूषण। ५१ - - ॥ यथा सवैया ॥ आरत बैन सो दीन दुखी मिल्यो, साहसहू रच्यो सोक समूरो । भेटत ही भरि अङ्क कलङ्क के, अङ्क मिटाय रच्यो रन सूरो ॥ राजसिरी परमारथ स्वारथ, भाल विभीषन के भन्यो रूरो। आनन सामुहे श्री रघुनाथ के, एकई बार म- नोरथ पूरो ॥२२०॥ ।। अथ विनोक्ति अलङ्कार'वर्णन-दोहा ।। जह प्रस्तुत कछु विन रहै, छीन प्रगट दरसाय । भूषन प्रथम विनोक्ति तहँ, वरनै बुध कविराय ॥२२१॥ ॥ यथा कविच ॥ बीते कई वासर अपार वार आसरे में', सागर गंभीर धीर धरम धिराज है। लछिराम कोटिन प्रताप बड़वानल सो, दारुन दरेरे दल दरप दराजै है ॥ कौशल कलस कम नैत जङ्ग जैत सङ्ग, जामवन्त जदपि सुकण्ठ की समाजै है। विनै बनचारी की नरेस मणि रामचन्द्र, रोष बिन वीर पैन वीरता बिराजै है ॥२२२॥ ॥ पुनः॥ चांह पल विरद विसाल वरिवण्ड वीर, मण्डन भुअन बीरताई है अमर में लछिराम ललित गणेश अमरेस ब्रह्म, साली समसेर गज केहरी कमर में ॥ ज्वाली जमवान धन घोरिया कमान रोदे, जदपि न सोर ऐलो शम्भु के उमर में। चौदह सहस खरदूषन समत्थ सोहैं, सोहैं ते न राम रथ विम या समर में ॥२२३n ५२ रामचन्द्र भूषण। - . - ॥सर्पया.॥ कानन भो] अमरावती यो, सुर मान लो सान सनो लहरात है। पुक्ष प्रताप प्रभा लछिराम, सुराते पताकन से फहरात है ॥ राम सुरूप निधान को रूप, प्रकासक पथक्टी न अमात है । लक्खन-मेथिली साथ जऊ, रिपुदौन भरत्य विना न सोहात है ॥२२॥ ॥ पुनः॥-- केसरी अजद नील सुखेन, सुकंठ पै साहिबी मों मलकी है। बाको पिभीपन रीछपती, नल लालिमा मोरन में ल लकी है ॥ राम सिरोमनि त्यों लछिराम ज्, धीरता लक्खन की पल की है। सेनप सान भरे सिगरे, हनुमान विना न प्रभा दल की है ॥२२५॥ ।। द्वितीय वि०-दोश।। कछुक होन प्रस्तुत भये, जहें प्रभाव सरसाय। है पिनोक्ति तह दूसरी, परनत फषि समुदाय ॥२२६॥ । पपा फविच।। मेथिली विसाल ग्रहमरासि की कलस फल, ताप गरजन माल सिलक धनागो। आरत पचन अपराधहि छमा कराय, लछिराम रछिमन विनती सुनावगो । परम सुजान ६शवदन प्रतापवान, भासमान दूसरो विरद अग छावेगो। धरम घि राज महाराज रामचन्द्र सोह, परिहरे गरय प्रभा अनन्त पावेगो ॥२२७॥ ॥सर्वया ॥ घीय समा सहिफै अपमान, चिचारिफ ही में गुमान ली १ .

रामचन्द्र भूषण। । को । श्री रघुनाथ के सामुहे बैन, अनाथ सो बोल्यो लखाय गती को भेंटते अङ्क कुअङ्क मिट, दियो भाल थली भलो भाग सुटीको । छूटत ही दसकण्ठ को साथ, विभीपन राव त्रिकूट मही को ना२२८॥ ॥ अथ समासोक्ति अलङ्कार वर्णन-दोहा।। प्रस्तुत में अस्फुरित जहँ, अप्रस्तुत को भाव । अलङ्कार तहँ कहत हैं, समासोक्ति कविराव ॥२२९॥ ।। यथा कवित्त ॥ धनुष सो धनु बूंदें वान सौ प्रकासमान, बीजुरीलों मा- धुरी हँसनि भावसन मैं । बरन घटालों बकुलावली सु मोती माल, मुखर सो बैन धारा दान सरसन में । लछिराम सीरे त्रिभुवन जन गावे जस, जालिम जवासा वैरी वन झरसन में । झलकी पर हैं परमानद सो अभिराम, चारु चतुराई सु- न्दराई स्याम धन में ॥२३०॥ * ॥ अथ परिकर अलङ्कार वर्णन-दोहा।। जहां विशेषण ठानिये, आशय सहित प्रबीन । अलङ्कार परिकर तहां, बरनत हैं रसलीन ॥२३१॥ ॥ यथा कवित्त ।। मङ्गलीक माला गरे हार गज मोतिन के, ख्योर भाल मलय विसाल अवतारा को । आनन सुरूप सरवर हांस हीरा हार, बचन अमीरस अमन्द सुभ सारा को ॥ अरविन्द नैन *तिलक-यामें प्रकाश वर्णन कवि स्याम धन को कर है, रोवि रहस्य रामचन्द्र की अस्फुरति है। यह प्रस्तुति में अप्रस्तुति भई ।। IA 4 रामचन्द्र भूषण। अङ्ग भूषन जवाहिर के, लछिराम जस हिमालय के पसारा को। सीतल करेंगे मेटि ताप मिभुअन राम स्याम मन प्रस्त घरसि दान धाराको ॥२३२011 ॥मय परिकर बैंकर भसकार वर्णन 'दोरा माभिप्राय विशेप सो, परिफर मंफुर माति । घरनत बुध अनुमान करि,मन्यन को मत जानिः॥२३॥ ॥पया सईया।। चन्द सो आनन भाल विसाल में, चन्दन ख्योर सभाय सिँगार में । माल गरे मुफतावली के, अरबिन्द विलोचन मोज के भार में ।। सेवारि घटा सो लसे, लछिराम सो गुन सीरे विचार में। राम कृपानिधि देहें सही, फल धान्यो कृपा करिके यकवार में ॥२३॥ ॥ मय इमेपारुहार वर्णन-दोहा॥ शब्द एकही में जहां, भर्य बहुत सुख साज। ।, अलकार अश्लेप त], चरनत पण्डित रान ॥२३५॥ जुगल रीति सौ प्रथमही, गनि अभिन्न पद धीर। फिरि पूजो गनि भिन्न पद, प्रथन मत गम्भीर ॥२३६, ॥ अभिम पद पर्णन-दो॥ मेद भिन्न पर फालिये, पदसों पर परमानि। । अरथ भिन्न करि शब्द के, उपमाश्लेषहि मानि ॥२३७१ ॥ यया कपिच॥ परम प्रकास मान सौरमित स्वच्छ सान, पावन त्रिजग तिलका और विरेपी में ममिमाप शीतलस्म गुणा को मपेसा। - - - रामचन्द्र भूषण। , ... सीरे गुन सरवस है। भूषन महेस हिज देवन हरन ताप, सुभ स्वेत बरन प्रभाव एक रस है॥ नागरी सिँगार चारु नागर नरेस चाहैं, लछिराम लोचन अनन्द आदरस है। तरल तरङ्ग गङ्ग चन्द्रिका अभङ्ग मलै, मङ्गलीक राव रामचन्द्र को सुजस है ॥२३८ सांवरे बरन सुकमार श्री मुखर मंजु, बनक विलास में सुमन धनु सर के । परम प्रमोद बन सङ्ग बीजुरी सी, बाम, औलि बक माल मुकताहल के लरके॥ मन्दर धरन लछिराम रस बरसत, खरके रहत रङ्ग मानस में हर के। मङ्गलीक मोहन अमन्द अभिराम राजै, काम धन स्याम रामचन्द्र जस वर के ॥२३९॥ ॥ अथ भिन्न पद-यथा कवित्त । मंडित पराग भाग सुखमा सँवारे स्वच्छ, सीरे त्रिभुअन जन सङ्ग रस वर के । हरन प्रदोष मारतंड' ते महातम त्यों, लछिराम राजे अवतंस भूमि थर के । राजबंस देव हिज राजन परम प्रिय, कामद रतन है महान सरवर के । कमल सुरङ्ग के त्रिबेनी के तरङ्ग कैयौं, मङ्गलीक चरन महीप रघु- वर के ॥२४॥ ॥ अथ ओज माधुर्य प्रसाद गुन संक्रमितश्लेष-यथा दोहा ।। माधुर्योज प्रसादं में, गुन संक्रमित सुधीर । त्रिबिधि घरमि अश्लेष पुनि, सुकषि सुनत गंभीर ॥२४१ ॥ अय ओज गुन सँक्रमित श्लेप यथा दोहा ।। झलकै शब्द न वाच में अर्थ सुबहु गम्भीर । ओज समुन संक्रमित सो, प्रथम श्लेष सुधीर ॥२४२।। 1 -- ५६ रामचन्द्र वर्मा , ॥ फाषिच ॥ मन सपही के हेरें कछुक विलास हीमें, परम प्रशस मान सुमन समीर के।जंग जैतवार मही मंडल अखेर मोज, आब सो पलित जगे जौहर गंभीर के ॥ दिन मनि मित्र निसाचरन पे और सान, लछिराम आनंद पलित रस पीर के । कोक नद' घारे काम कैवर सँवारे कंधों, करुना कलित नैन राम रघुवीर के ॥२३॥ ।। भय मापुय्य गुन मैकमिव लेप यथा-वारा॥ कछु प्रकाश गम्भीरता, कछुक शब्द के संग। माधूरज गुन संकमित, या श्लेप नव रंग ॥२४॥ ॥सया ॥ प्यन्द्रिका चन्दन चारु पिलास, मिले नखतावली माल समाजे । चौह चकोर भिरे मुनि मंडल, मदित रूप सुधा मई साजे | आनंद अस ममास न गात में, यो लछिराम धनी पर काजे । कामद राम कलाधर है, के कलाधर पञ्चवटी में विराजे ॥२२५॥ । भय मसाद गुन मविपमेण पया-दोहा॥ यियिपि मांति सौ शब्द में, अर्थ प्रकाशक मानि । गुनि प्रसाद गुन सकमति, पौ अश्लेप पखानि ॥२४५॥ ॥कवित॥ मेरी गज पर भाल फोरत करे न यार सहज सिफारीख ल मृग मंडरी को है । लछिराम राम सम्म दल में सिंगार फूदि नाघात पहार नद नाद अम्परी को है। अजय उमा रामच मिचन्द्र भूषण। रनरङ्ग में मुरै न केहूं, वरन लँगूर को प्रभाव लहरीकोहै। बलवान् महावीर मण्डन भुवनबन, केसरीकुमार के कुमार केसरी को है ॥ २४६॥ ॥ अथ अप्रस्तुतिप्रशंसालङ्कारवर्णन-दोहा॥ बरनत अप्रस्तुति जहां, प्रस्तुति भा अनयास । अप्रस्तुति परशंस तह, भूषण परम प्रकास ॥२४७॥ कारजमुख कारन कतहुँ, वरनत समुझि सुयान । कारनमुख कारज कतहुँ, या प्रकार अनुमान ॥२८॥ कहि विशेष सामान्य मुख, कतहुँ विचारत धीर, कतहूं कहि सामान्य मुख, यौं विशेष गंभीर ॥ २४९॥ कतहुँ तुल्य प्रस्तावमें, तुल्यकथन सुखसाज । अप्रस्तुति परशंस भनि, पञ्चभेद कविराज ॥२५॥ जाहि चाह करि कवि रचे, प्रस्तुति तिहि परमानि॥ अनचाहे जो अस्फुरे, अप्रस्तुति अनुमानि ॥२५॥ ॥ अथ कारजमुख कारनकथन-यथा कबित्त ॥ नील नल नागर उजागर सुकण्ठ सौहैं, हनूमान अङ्गद सुखेन रोष रुपलें । लछिराम जामवन्त केसरी कुमुद सेना बानर विराट भाल पैजन परुषते । रावणके सोहैं दूत वचन अभूत बीर उतरत सेत बांधि दारुण दुरुषते। लखनि गंभीरताई गरव त्यों वीरताई, बलकी पर है रामलखन धनुष ।।२५२॥ ॥ तिलक॥ यह जो समस्त वृत्तान्त वर्णन कियो सो कारण प्रस्तुत है अरु सेनाके प्रभावते जो दूतके हृदय में भयानक भयो ताको नेकहू ना कह्यो सोई कागज़ अप्रस्तुत है । - - रामचन्द्र भूषण ॥ अथ कारनमुख कारजकपन-यया कवित्त ।। फहरे निसान मारू पाजे त्यों वजत मञ्जु, किले मतगन की माला वितरति है । लछिराम हरप इरोल हनुमान मुख, मङ्गद बहाली अङ्ग अङ्ग सुतरति है।मुज फरकीले नलनील पड विकसत, सुघर सुकण्ठ सोहैं चारु चितरति है। लखनि तिरीछी राम लखन चखन कोरे, सागरपे सेत वॉषि सेना उतरति है ॥ २५३॥ ॥ तिलक॥ यह सेनाको उत्कर्ष मागमन वर्णन कियो सो कारण अप्रस्तुत है ताते रावणकी रुचि संग्राम देत पायवो कारण प्रस्तुत है ताको दूत ना प्रगट कियो । ॥अप सामान्पमुसाधिशेषकपन-यपा कवित्त ।। हेरत ही परदोप दुखी, पर आनंदसों मुख है सतसङ्गमें।। त्यों लछिराम विवेके प्रभाव, सोमने सदा सतवार उमङ्ग में।। आने न फैसह झूठ सुभाषन, भावस वीरताभाव उतङ्गमे ॥ते पनि हैं रघुवीरके सामुहै, जे भट जूझत हे रनरङ्गमें।।२५४॥ ॥सिएक॥ सामान्य पदार्थ प्रथम वर्णन करि पश्चात् शूरनको विशे- पकार उपदेश्यो। ॥ अथ विशेपमुमसामान्यकथन-पपा सर्वया ॥ ये उनके शिर साजें किरीट, मुदी पगरी त्यों संवारत हैं मने, वे उनके धनुवान संवारत, थे उनके मुख पान प्रभा सने ॥ भोर कहांलों कई लछिराम, सभी जग फैली विचार सबै ठने। ।

रामचन्द्र भूषण। PRILDRO- साथमें लक्खन औ रघुनाथकी रीति प्रतीति निहा- रतही बने ॥२५॥ ॥ तिलक॥ यामें विशेष श्रीराम लक्ष्मणको दृष्टान्त देत हैं सामान्य परस्पर जनावत है। ॥अथ तुल्यप्रस्तावमें तुल्यको कथन-दोहा॥ शैव सदा बडभागमैं, पूजत गौरि महेश। राम रसिक सिय-रामके, गावत गुणगण बेस॥२५६॥ ॥ अथप्रस्तुतअंकुरअलङ्कारवर्णन-दोहा ॥ दूजी प्रस्तुतिको जहां, प्रस्तुति बीच प्रभाव ।। प्रस्तुत अङ्कुर मानिये, अलङ्कार कविराव ॥२६७ ॥ ॥ यथा कबित्त ॥ भरम गवावे झरबेरि संग नीचन तें, कण्टाकित बेल केत- कीनपे गिरत है। परिहरिमालती सुमाधवी सभासदनि, अधम अरूसनके अङ्ग अभिरत है ॥ लछिराम शोभा सरवर में बिलास हेरि, मूरख मलिन्द मन पल ना थिरतहै । रामचन्द्र चारु चरनाम्बुज बिसारि देस, वन वन बेलिन बबूरे में फिरतहै ॥२५८॥ ॥ पुनः ॥ भरम गँवाय लोक लाजके भरम खोले, बोले बैन अनरथ आनंद लगनसे । भोर सांझ बहकि विहंगनसे लालीपर, भाँवरें भरत बे विचार तन मनसे ॥ लछिरामरूप रामचन्द्र कल्पतरु छोडि, कल्पना करत झूठे झुठिये वचनसे । रङ्गदार सूरख महीपन बदन सुक, बिन माग्मेवे यार मेरा मा :

६०
रामचन्द्र भूषण।
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॥ अथ परजायोक्ति मलकार वर्णन-दोहा।।
पचननकी रचना अधिक, प्रथम भेद परमानि ।
व्याजदि कारण साधिवो, परजायोक्ति प्रमानि ॥२६॥
॥प्रथम पपनरपना-यथा कविस ॥
दशो अवतारके गुनानुवाद सुने कान, दानी दीनबन्धु भार
भुषन उड़ाये । लछिराम घनुप स्वयम्वर कहाहै मौलि,
मण्डली महीपनकी वीरता मुड़ायते ॥ सरहन सा है तिर
है क्यों लगो. नेन, देखें ना ननद पिन हीतल जुटायेतें।
गति हे गंभीर ब्रह्मराशि रघुवंशगम,रघुवीर मैथिलीके कान
छुडायते॥२६॥
॥ पुन ॥
परिहार फलि है फलकि नल नील सूके, मन्द परिने है
सान पानर बहालीसों । लछिराम जामवन्त सुघर मुकण्ठ
दल, वृद्धि वहिजे हे भोर लहर फालीसों ॥ अरज मुखेन
पीर लछिमन रावरेसों, उतरु कहीजे राजनीतिकी प्रना-
ठीसों । गोमतीकी भांति शिला सुन्दरी बने न सक, राष राम-
चन्द्र चरनाम्बुजकी लालीसों ॥२६२॥
॥ पुन'॥
वालि तने बदन विलोकि विदसौं है फोन,तापस कटकमें
मुभग जगभारीको जामवन्त केसरी सुकण्ठ पौन येई, कडू
| मानों लछिराम में प्रथम पनचारीको ॥ अङ्गद बिसि दशक-
न्धरसों पोल्यो यही, धीरगनतीमें पजवायो करतारीकों।
मान्यो मालवान जाऱ्या विछलि विकूट पीर, घावनि चतुर जो
उजान्यो फुलवारीकों ॥ २६३॥

रामचन्द्र भूषण। ६१ ॥ अथ दूसरी पर्यायोक्ति वर्णन-सवैया।। चातुरी सो मनि-पालने ऊपर, साजती हैं फलफूलके दोने। पच्छिन पीजरेके लछिराम, बुलावती चारे चखाय सलोने ॥ श्रीरघुनन्दनको मचल्यो लखि, ढारती मेलमिलाप के टोने। और महीपकुमारन कौशिला,बांटती हीरक हार खिलोने२६४ ॥ पुन: ॥ या नख नौलसों गङ्ग कटी,वढी तीनहूं लोक तरङ्ग पसारे॥ फेरि मिलाय हौं मैं करते, बहु बासर सों यह ब्योंत विचारे॥ नेम यही द्विजदेवनतै, लछिराम निषाद हैं नाम हमारे । पावन पाय पखारिकै राम, उतारौं तुम्हें तरनीके सहारे ॥ २६५ ॥ अथ निन्दाव्याजस्तुतिअलवार वर्णन-दोहा॥ व्याजहि निन्दाके जहां, अस्तुति भाव अमन्द । व्याजस्तुतिनिन्दा तहां, बरनत कविकुलचन्द ॥२६६॥ ॥ यथा कबित्त ॥ बदन विरूपलखि सूरपनखाको मारू, बाजे बजवाये मन देवनके कसके । लछिराम चौदही सहस पलही में मारे, दल खरदूषन समर सरकसके ॥ बिछुलि कमान रोदे फोरेंभाल भेजे, फेरि कतरें करेजे रेचे आलम अकसके। परवसी दरद न बूझै रघुवीर बडे,बेदरद बानहें तिहारे तरकसके॥२६७॥ ॥ पुनः॥ राजहंसिनीनमैं सुरूप राजहंस रचि, सनमान सङ्ग मानस- रमें घिरत हैं। परखि परीनपै प्रभा त्यों लछिराम छाय, परम प्रकाश टूटि तारेलों गिरत है ॥ बरजो न मानै बरजोरी १२ रामचन्द्र भूषण। मलभरि २ मसुरनकीरति कुमारी सो भिरत हैं। राव राम- चन्द्र पीर जालिम तिहारो जस, चौदों मुपन व्यभिचारीसों फिरत हे ॥२६८॥ ।। अप स्तुतिष्याजनिन्दा वर्णन-दोहा ।। मस्तुतिमें झलकै जहां, निन्दाको परभाव । अस्तुति निन्दा व्याज तई, वरनत पण्डित राव ॥२६९॥ ॥ यथा कविता वारन उबारनमें पाइन सों दूनो दोरि, द्रोपदी समेके चौकपन पिसरत हो । ब्रह्मराशि रघुवंशभूपन परमहस, पारस पहार पग पीछे क्यों घरत हो ॥ चापो युग चौदही मुवन देव दीनबन्धु, पेजपरिपार्टीपे अनाक निकरत हो । लछिराम किरेमें राष रामचन्द्र वीर, कोशलकलश हे कनोडे- क्यों परत हो।। २७० ।। ॥ पुन ॥ देव मन्दि छोरे षटपारन गरव गारि, सिन्धु सेत वाधिषको परचत फोरेको । परमकुलीन परमातमा परमहस, पेर सेवरी मेर विरद रियोरेको । शिरताज राज महाराज रामचन्द्र पीर, घरमधिराज रापरेसो वरजोर को शहर शरासन स्वपम्पर में तोरे अच, लछिराम शङ्कट शरासनहि तोरे को ॥२७१ ॥ ॥सषेया॥ माल्यो न उक्सन की धनु रेखें, विमान की पायुलों बेग फरीदे । गीप जययुसों जन रच्यो, फिरि जानि जरापन लाज परी है।वाटिके फन्दसों फोदि बच्यो, लछिराम कथा को

रामचन्द्र भूषण।
६३
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कहै सिगरी है। वीरको रावन रावरे सो, बनमें जिन राम की
वाम हरी है॥२७२॥
॥ अथ स्तुति व्याज स्तुति-दोहा॥
अस्तुतिमिस झलकै जहां, अस्तुति और सुबेस।
अस्तुति मिस अस्तुति तहां, वरनैं सुकवि नरेस ॥२७३॥
॥ यथा कवित्त ॥
रोदेसों विछलि रथ सारथी समेत वेधै, बदन तुरङ्गन पै
बेझे लों तरत हैं। लछिराम अजब अतङ्क वार ज्यालाकार,
मालामें असुरके न केहूं अतरत हैं ॥ तापर प्रचण्ड यह
कौतुक सराहै कोन, रामअवलोको जिन्हें कीन्हे छतरत
हैं। भेना भाल फोरि पान कुञ्जर बरेजा फेरि, कातिल
करेजनकेरेले कतरत हैं ॥ २७४ ॥
॥ निन्दा व्याजनिंदा-दोहा ।।
निन्दामिस बरनत करें, निन्दा अपर महान ।
निन्दा मिस निन्दा तहां, परमानत गुनवान ॥२७॥
॥ यथा सवैया॥
श्रीमिथिलाके स्वयम्बर में, धनुभङ्ग समै ते सबै परमाने ।
सुन्दरी देव अदेवनकी भरी, भूरि भयङ्कर तेसनमान॥तापर
कौतुक या बगयो, लछिराम सुकीरति कौन बखानै । रावन
रावरे बाहन को बल, अङ्गदके पग औरऊ जाने ॥२७६ ॥
॥ अथ आक्षेपालवारवर्णन-दोहा॥
आक्षेपालङ्कारकों, त्रिविधि कहत गुनधीर ।
प्रथम निषेधाभास फिरि, बचन फेर गम्भीर ॥२७७॥

रामचन्द्रभूषण। राखे जतन दुरावसो, वर निषेधके साथ । आक्षेपालङ्कार यों, परनत बुध बुधिनाय ॥२७८ ॥ ॥ प्रथम निषेधामास-यथा संपेया॥ वानर वालि वली को कुमार हौं, अङ्गद मानिये नाम इमारो । तीनहू लोकनके शिरमौर हमें इत भेजिये न्योत विचारो॥ मीसह हायनके पलसों, लछिराम जू या न टयो पग टारो । दूतनमें दशकन्धर श्रीरघुनाथ-अभाव अभूत निहारो ॥ २७९॥ ॥ पुम ॥ जयप केसरी नील मयन्द, सुखेन लंगूर जहीं फलों देव गछपती हनुमान सुकण्ठ को, ज्वालिया आनन लछिराम गो॥ लक्खन नाननको लछिराम, प्रवाह समपरत्या कनोडे- रापन इतनमें रघुवीरके, पेरको जौहर जानि परेगो ॥ द्विसीयवचनफेर-यमा सवैया ॥ चारिह मोर की किरने, अथवा फरक्यो फनमाल फनीको । कोटिन भार अंगार को है, अथवा वडवानल या अवनीको ॥ राक्षसी देरि वली हनुमाने, र, लछिराम सतर्क मनीको। भान-ग्दे प्रले-धासरको, भयषा मुखलङ्क लेंगूर घनीको ॥२८१ ॥ । पुमः॥ जीवन ग्रीमहाराजकुमार, पपानसमे उपो ना उम- गो। लक्सने साय सुने लछिराम, म या पलमें यही म्योत भरेगो॥छोडियो भोप अचानक तो, पली या प्रतवारोलकीर , रामचन्द्र भूषण। खचैगो । प्रान विलोकियै पञ्चवटी बन, एवरे सों पहिले पहुँचैगो ॥२८२॥ ॥ अथ विरोधाभास अलङ्कार बर्णन -दोहा । भासै विदित विरोध जह, जमकवलित पदसङ्ग । बरनि विरोधाभास तह, अलङ्कार नवरङ्गः ॥ २८३॥ ॥ यथा सवैया ॥ किङ्कर श्रीरघुनाथको हौं, कछू किङ्करताको न ब्यौंत विचारौं । साथी सुकण्ठ हरौलको हौं, रनरावन साथी हरौ- उपछारौं ॥ हौं सुत केसरीको लछिराम, सुकेसरी लकबली- नको मारौं । मौज मढ्यो महाबीर हैं। मैं, महावीर निशाच- के मद गारौं ॥२८॥ भेज ॥ अथ विभावनाअलकारवर्णन-दोहा॥ जनके। विदित होय बिन' कारने, कारज को सव साज । वरनत प्रथम विभावना, अलङ्कार सिरताज ॥२८॥ नि ॥ यथा कबित्त ॥ ऋषिनकी वामै हेरि करती कलामै सम्पा, श्याम घन बरन संवारै कौन कलके । बलकल बसन सुरूप त्रिभुवन भन्यो, भाल बिन कलँगी मसाल झलाझलके ॥ गजरथ पालकी चमर छत्र हीन तऊ, लछिराम लसत सिंगार विश्वदल के। कौशलकुमार ये अतर पान छोडे बन, बदनकी श्वासन तरङ्ग परिमलके ॥२८६॥ ॥ पुनः॥ भूषन बसनवारे बलकल डारे अङ्ग रोमरोम अनुरूपे रूप के सहर हैं । जटाजूट शिखर, परिमित भाल, परम - रामचन्द्र प्रतापपान जगर मगर हैं । दल दूव मासन सिंहासन सोमा समान लछिराम नाम रघुबीर ब्रझपर हैं। श्यामपन वरन अफेले आभरन भूमि, परनकुटीमें ये कहांके कला- घर है ॥२८७॥ ॥ द्वितीय विमाषना वर्णन-दोहा।। हेतु अपूरणते जहा, कारण पूर अशङ्क । वर विखुप विभावना, मानि दूसरो म ॥२८८॥ ॥ यया कषिस ॥ तरकसी छोटी कघ छोटे छोटे घनुमान, छोटे कर छोटी छोटी माँगुरी वगरमैं। छोटे छोटे बदन विशाल भाल नैन लाल, पार गभवारे बालप्रभाकी लहरमैं ॥ लछिराम छोटे पग चलिक कुमार दोळ, करत अचूक मार माचरज इरमें। इनू |मान अङ्गन्द भरत्य शत्रुहन हारे, लसन समत्य लवकुशके | समरमै ॥२८९॥ पुनः॥ खेलत सिकार रघुवंशी लपकुश लोने, बाल पेपधारी तक साइसी सजव के । द्वेजके मयत तन परन निशक मन, ल- छिराम शिखर चढेयाजोर जपके ॥करन किरात फॉरें गजमु- कताके हेत, करती किरातिने कुतूहल अजयके । गेटे धनुषानन सों धन वन मन्दरमें, गिरत मतङ्ग महामारेसे गजवके ॥२९॥ ॥ पुन॥ बार गभवारे वान तरकस राते पोरे, धनुप हरे शिशुपन के कुलेले हैं। लछिराम जामवन्त दिपिद मयन्द कटे, केसरी रामचन्द्र भूषण। ६७ us. कुमुद नील नल झगरेले हैं ॥ हनूमान अङ्गद विभीषन सुकण्ठ लटे, शत्रुहन भरथ लखन अलबेलेहैं । राजवंशी रघुवंशी बानर विराट भालु, पलमैं खिलौने सम लवकुश खेलेहैं ॥२९॥ ॥ तृतीय विभावना वर्णन-दोहा ।। विद्यमान प्रतिबाधकहुँ, कारज पूरो अंश । तीजो भेद विभावना, परमानत वुधवंश ॥२९२॥ ॥ यथा कबित्त ॥ सङ्ग मुनिवारे हठ कारकै निखङ्ग छोरे, मानत न केहूं मृगयाके भराभर मैं । अधकटे अरना बराह बाघ लोटे भूमि, गैंडा गरवीले गिरे चोटन कहरमैं ॥ मन्द २ विहँसि अमन्द लछिराम लोने, लवकुश राते बीरताई की रगर मैं॥ वारन वराह बाघ बरपै किरातनके, बरजत मारू बान भारत शिखर मैं ॥२९३॥ ॥ पुनः॥ ज्वाली जग सारथी शिखर फोरि फहरात, तोरत बदन बाजी गन गुन गथमैं । लछिराम रेले थहरावन झमेले लङ्क, छावन अतङ्क बगमेले बीर पथमैं ॥ विहति विडारे डारे भूपर प्रकाशमान, तोरन चमर छत्रवार अनरथमैं । रोष्यो रन रङ्ग रामचन्द्र बरजत मारें, लखन कुमार बान रावनके स्थमैं ॥२९॥ ॥ चतुर्थ विभावना वर्णन-दोहा ॥ कारनके तनसों जहां, कारज को अवतार । भेद चतुर्थ विभावना, भाषन मुमतिभंडार ॥ २९५ ॥ , रामचन्द्र भूषण। प्रतापपान जगर मगर हैं ॥ दल दूब मासन सिंहासन सोभा समान लछिराम नाम रघुवीर ब्रह्मवर हैं। इयामधन बरन अकेले आभरन भूमि, परनकुटीमें ये कहकि कला- घर हैं ॥ २८७॥ ॥ द्वितीय विमाषना वर्णन-दोहा ।। हेतु अपूरणते जहां, कारज पूर अशङ्क। परन विषुप विभावना, मानि दूसरो अङ्क ॥२८८॥ ॥यपा कषित ॥ तरकसी छोटी कध छोटे छोटे धनुवान, छोटे कर छोटी छोटी मागुरी वगरमै । छोटे छोटे बदन विशाल भाल नेन | लाल, वार गभवारे पालप्रभाकी लहरमै । लछिराम छोटे पन चलिक कुमार दोऊ करत अचूक वार आचरज घरमै । इनू मान अङ्गद भरत्य शत्रुहन झारे, लखन समत्य लवकुशके समरमें ॥२८९॥ ॥ पुनः॥ खेलत सिकार रघुवशी लवकुश लोने, बाल वेपधारी तक साइसी सजय के । द्वैनके मयत तन परन निशक मन, ल- छिराम शिखर चढ्या जोर जयके ॥करन किरात फार गजमु- कताके हेत, करती किरातिने कुतूहल अमवके । छोटे धनुवानन सों घन वन मन्दरमें, गिरत मतद महामारेसे गजवके ॥२९॥ ॥ पुन ॥ वार गभवारे वान तरफस राते पोरे, धनुप हरीरे शिशुपन के फुलेले हैं । लछिराम जामवन्त दिविद मयन्द कटे, केसरी | रामचन्द्रभूषण। a लखैया जोर मैथिली विरह जाग्यो, जालिम जोन्हैया तेज तीन तरनिसों ॥३०॥ ॥ पुनः॥ वासन बसन तपै आसन असन औरै, दल फल फूल मूल सूल हूल हरके । वगरे विहङ्ग प्रतिकूल ठौर और बोले, गुजरत भौर जादू जालिम जहरके ।। लछिराम लखन विरह मैथिलीके वस्यो, दारुन दवालों गुणवारिमें लहरके । सौरभ समीर तीर करत करेजे रेजे, मालाकार कोकनद पंपासर- वरके ॥ ३०१॥ अथ विशेषोक्ति अलंकार वर्णन-दोहा ॥ हेतसङ्ग सामर्थसों, तऊन कारज होय । विशेषोक्ति भूषन तहां, बरनत ग्रंथन जोय ॥३०२॥ ॥ यथा कबित्त ॥ बरि गये वालि खरदूषन बिरोधवङ्क मेघनाद रावन-करन घट घालामैं । चौदहों भुवन खल बंशन विधंसि पर भभकि, उलीची बटपारनके सालामैं ॥ अजब अतङ्क लङ्क शिखर चढी त्यों घोर, जौहर ज्वलित जंग जैतपत्र आलामैं ।लछि राम-सङ्कट कराल काठ केसी, राम जरत न रावरे प्रतापा- नल ज्वालामैं ॥३०३॥ ॥ पुनः॥ वान महारावन सुरासुर समत्थ-दल, खलभल पोजा स्वयम्बर प्रवेसको । लछिराम जाके भुजदण्डन अखण्डन पै विरह प्रचण्डबरदानि या हमेसको तोरेको मरोरै बरजोरैको जुगल गोसे, घनघोर व्रतभो सुमेर मिथिलेसको । बलकार - 1 ।

रामचन्द्र भूषण। M ॥ यथा सवैया॥ भूपर मुद्रिका डारिदियो तरुते हनुमान विचार होते। अङ्क विलोकते शङ्कभरी, सुन्यो बैन विनीत, मुधारस घोते। श्रीरघुवीर को दूत ही मैं लछिराम ते अम्ब छमा कर गोते । मेथिली लोचन पारिजसों उमड़े उजागर सामर सोते ॥२९६॥ पञ्चम विमाधना वर्णन-दोहा ॥ प्रगट अकारन वस्तुसों, कारज वपु व्यवहार। पञ्चम भेद विभावना, गति मति उदय उदार ॥२९७॥ ॥ यया कवित्त॥ वाइपली भजन सुकण्ठ शिरमौर मृगराजकी दपटमें सिरीछे तरजत । लछिराम केसरी कुमुद नील नल मारतण्ड मुख तेज जिन्हें कौन घरजत है। बानर विराट रीछ कातिल कटक हेरि, लङ्क दल दारुन के घीर लरमत है । सुनरत कुन्नर कलोलें जामनन्त प्रले मेष घरवानी हनुमान गरजत है ॥२९८ ॥ अप षष्टम विमाषना धर्णन-दोहा॥ कारन ते उपजे जहां कारण परम बिरोध । छब्यों भेद विभावना, वरनत सुमति प्रबोध ॥ २९९ ।। ॥ यथा कवित्त ॥ परत न चन रेन वासर सपन पन, केसी कदै साप धीर नासन परनि सो । लछिराम रोप्यो मारतण्ड मो कुचाल पर फलप समान पल पति या उरनिसों ॥ पन्नग विलासी मले मन्दर पवन आफै, परचत वैरी वाइपानल जरनिसों । लखन -- रामचन्द्र भूषण। ७१ . ॥ यथा कवित्त ॥ सुघर सुकण्ठ सोहैं दाहिने अगदके फूले न समात यों बिलास बांहबलके । लछिराम लङ्गर लँगूर की लपट तैसी, ख्यालही मैं झपट पसारै खलभलके ॥ उपटी परै हैं करक- लित गदाकी छटा, विकसे अपर राम लखन सबलके जौहर जंजीरे लालमुख हनूमान हेरि, सीरे गात पारे पर रावनके दलके ॥३१०॥ ॥ पुनः॥ दिग्गज नगारे देव गरजत आपहीतें, सगुन शची त्यों गौरि पूजन करति हैं । लछिराम सातो दीप सुन्दरी सँवारें साज, असुरकी बामें वन-दावालों जरतिहैं। छीर भरे सागर सरित सरितान मौलि, मन्द मधु मालती समीर ही हरति हैं। अवध अमन्द रामचन्द्र अवतारहेत, भाँवरें दिनेशकी दिग- ङ्गना करति हैं ॥३११॥ ।। पुनः॥ गुञ्जरत कुञ्जर झमकि मतवारे वाजि, नागर वटासे नट बागन मुरनके । लछिराम रथके झमेले रङ्गन्दार मारू, बगर वितान पौन गौन आतुरनके ॥ जामवन्त जालिम सुकण्ठ लछिमन बीर, तेजे लहरेजे सब जंगके जुरनके । रावराम- चन्द्र चतुंरगिनी चमके भार, रेजेहोत कहर करेजे असुरनके ॥३१२॥ ॥ द्वितीय असङ्गति वर्णन-दोहा । और ठौरही जहँ करत, और ठौरको साज । गनत असङ्गति दूसरी,सुकबिनके शिरताज ।।३१३॥ , .

८०
रामचन्द्र भूषण।
याके सातो दीपके महीप तऊ, तनक न छोड्यो भूमि
धनुष महेसको ॥३०॥
॥ सर्वया ॥
घेर घनो धननादको सामु त्यों घटकर्नके बानकी कोर्ट।
बोलत जाके केपे घरनी, लछिराम घरे शिर वीरता मोटें।
रापनसों बलवान धनुर्घर, राखे निशाचर आयुध खोटें । खाली
परें न तऊ दलमैं, हनूमान इठीके लँगुरकी चोटें ॥३०५ ॥
॥ अथ असम्मषालकार वर्णन-दोहा॥
कोन? कारण सिद्धिको, करत असम्भव देस।
अलकार मानें तहां, असम्भावना बेस ॥३०६॥
॥ यपा सवैया॥
केसरी त्यों नल नील सुकण्ठ, पहारहि रुपालमें खोदि
बहे । भगद मोहनूमान मुखेन, सही लछिराम धुमा फहरे हैं।
पानर भालु कोलाहल में,जल जीव तरङ्ग सबै दविजे हैं। जाने
को आज महीपति राम, सबै दल वारिधि बांधिक ऐहैं।॥३०७॥
॥ पुन ॥
तोरिक पाननके तरुको, तहीं गेद अरामनिको विदरेगी।
मारिद रायनके मुतको, लछिराम न केसई शक घरेगो ।
तेल मो तूल दुकूलन में, सिखी पन्नग फांस हीसों निकरेगो।
| जाने को आज त्रिकूट प्रभा, हनूमान लंगूरसों पर
करेगो॥३०८॥
। भय असङ्गति अलद्वार वर्णन-दोहा।।
कारन ज भिन्न यल, कारजको सब साम।
प्रथम असङ्गति भेद यों, वरनत बुध कविराज ॥ ३०९॥

रामचन्द्र भूषण, ७१ ॥ यथा कवित्त ॥ सुघर सुकण्ठ सोहैं दाहिने अङ्गन्दके फूले न समात यों बिलास बांहबलके । लछिराम लङ्गर लँगूर की लपट तैसी, ख्यालहीमैं झपट पसारै खलभलके ॥ उपटी पर हैं करक- लित गदाकी छटा, विकसे अपर राम लखन सबलके । जौहर जंजीरे लालमुख हनूमान हेरि, सीरे गात पोरे पर रावनके दलके ॥३१०॥ ॥ पुनः॥ दिग्गज नगारे देव गरजत आपहीते, सगुन शची त्यों गौरि पूजन करति हैं । लछिराम सातो दीप सुन्दरी सँवारें साज, असुरको बामै बन-दावालों जरति ॥ छोर भरे सागर सरित सरितान मौलि, मन्द मधु मालती समीर ही हरति हैं। अवध अमन्द रामचन्द्र अवतारहेत, भाँवरें दिनेशकी दिग- ङ्गना करति हैं ॥३११॥ ॥ पुनः॥ गुजरत कुञ्जर झमकि मतवारे बाजि, नागर बटासे नट बागन मुरनके । लछिराम रथके झमेले रङ्गदार मारू, बगर वितान पौन गौन आतुरनके ॥ जामवन्त जालिम सुकण्ठ लछिमन बीर, तेजे लहरेजे सब जंगके जुरनके । रावराम- चन्द्र चतुंरगिनी चमूके भार, रेजेहोत कहर करेजे असुरनके ॥३१२॥ ॥ द्वितीय असङ्गति वर्णन-दोहा ॥ और ठोरही जहँ करत, और ठौरको साज । गनत असङ्गति दूसरी, मकविनके शिरताज ॥३१३॥ 1MN

॥ यथा कवित्त ।।
किले मतङ्गमारू गरजे निसान वान, उतरत सेना बोधि
सागर सबेरे हैं। लछिराम लखन महीप रामचन्द्र मागे,
कोलाहल वानर विराट माल मेरे हैं । मूली भाल तिलक
इराको लतबीच करि, हरवर चोहरे-अटान चरी टेरे हैं।
ममुर वधूटी वरवस फोन मालाकार छुद्र घटिकाके कण्ठमा-
ल करि हेरे है॥३१॥
॥ पुन ॥
घोसाकी धमक अन्धकार भार धूमघाम, मारू बजे बाजे
कोप कातिल कहरसों । जामवन्त जालिम मुकण्ठ केसरी
त्यों सग, हनूमान अगद ललाईकी लहरसों ॥ लछिराम राम
चन्द्र विरद वितान जोर, वगन्पो अतहलकपीच भराभरसों।
हरपर हैरै दशफन्धर कटक चढ़यो, करन किरीट ले विक-
टके शिखरसों ॥३१॥
॥ अप तृतीयअसंगसिषर्णन-दोहा ।।
आरमित कामहि तजे, और काज मनलाय ।
परनि मसङ्गतिभेदको, तीमो घुषकविराय ॥३१६॥
यया सर्वया ॥
घेद विधान पिमेयर देत, पड़ी विधिसों द्विज देव निहोयो।
भौचक पानरको दल आप, हुसासन कुण्टको पारि सों
बोन्यो । कोष भयो लछिराम भहीं, सामुढे मगल को
भट फोन्यो । राक्न श्रीमप साधन छोड़ि, पली ले गदा हनू-
मान पे दोयो॥ ३१७॥

रामचन्द्रभूषण। ७३ ॥ अथ विषमालंकारवर्णन-दोहा ॥ अनमिल संग समान जह, प्रथम विषम यह रीति । वरनत कवि कोविद सवै, ग्रन्थनमें कार प्रीति ॥३१८॥ ॥ यथा कवित्त ॥ सेनप सुकण्ठ नल केसरी कुमुद सोहैं, हरवल हनूमान व- जर शरीरको। जामवन्त जालिम सरोहिया लखन बंक, तीखो बान शत्रुहन भरत गंभीरको ॥ लछिराम अन्धकार भा- रकोन वारापार, तापर झमेला रघुवंशिनकी भीरको । यु- गल कुमार सुकुमार लव कुश कहां, परमकठोर घोर दल रघुवीरको॥३१९॥ ॥ पुनः॥ राजवंश-कलश कलपतरु देवनके, कहां वह अलप अपावन सकलहै । पारस पुरन्दर धुरन्धर धरम कहां, सबर कुमारी जीव घात करतल है ॥ परमकुलीन वै कुमार दशरथ राव, अजब अयोग लछिराम यासकल है। त्रिभुवन मण्डन महान रामचन्द्र कहां, सूखो सब जूठो सेवरीको बनफल है॥ ३२०॥ ॥ द्वितीयविषमवर्णन-दोहा॥ कारनको रंग औरई, कारज रंग विधि और। अलङ्कार दूजो विषम, परमानत सब ठौर ॥३२१ ॥ ॥ यथा सवैया ॥ फोरत भाल मतङ्गानके, विथुरे मुकताहल त्यों रतनारे । यो लछिराम निशाचर वंशके, छार करें मद रोषमें ढारे ॥ AAJ MP4MARA १० ७४ रामचन्द्र भूपण। रावणके रथपे झपटें, फनशेप लोंके फुफकार हजारे । श्यामपटारघुनाथके हाथों पान चलें वडवानलवारे॥३२२॥ ॥ अप सृतीयषिपमवर्णन-दोहा ।। मेटि अर्थ आभीष्टको, विपरीते फल होय । भेद तीसरे विपमको, वरने धुप सब कोय ॥ ३२३ ॥ ॥ यथासवैया ॥ आरतसों पुरुपारथ में, परमारथ स्वारथ स्वाद मठी परे । त्यों लछिराम गैंभीरता मत्र में, मौज महातम कानि कठी परे॥ श्रीरघुनाथ प्रताप कथान में, ज्वालसी मान अन्न बढी लरे। माधुरी पाते विभीपणकी सुने, रावणफे उर ताप चढ़ी परे ३२४ और विपम कर्चाको क्रियाको फल होय और अनर्थ होय ॥ यथा सबैया ॥ षोर निशाचर वाँद पली, दुहुँ भैयनको भरिके अकयान्यो। पेज पताल प्रवेशके यौं, लछिराम तिहूपुर सोर वगायो । चीचहि पाप लंगर धनी, गज माइके चाह सोंवार उपायो। ठेवल्पोरामहि मारियेको,महिरापने श्रीहनूमान पछान्यो३२५ ॥ अप सम अलकार विविध वर्णन-दोहा॥ यथायोग्य सङ्गम प्रथम, समया परनत धीर । कारनको रंग काजमें, मिले दुतिय गम्भीर ॥ ३२६॥ घिनश्रम कारनसिद्धता, आरम्भनमें होय । पाविधि भूषण त्रिविध सम,परने कवि सबकोय॥३२७ ।। ॥ अप प्रपम यथायोग्यको सङ्ग-यमा फवित्त ॥ जालिम मसीले राजवश अवतस मश, परमप्रतापी त्यों प्रताप झलामलको । वास विरुद्ध क्रुद्ध कातिल झपट यान, .

रामचन्द्र भूषण। ७५ -:-.. वैस तरुनापन तिरीछो त्यों युगलको लछिराम रावण विलो- कत विहसि उतै, विकसत रामहरि वार हलचल को। मन्दर महान मतवारो मेघनाद तैसो, बजर सॅवारो है लखन बाँह बलको ॥ ३२८॥ ॥'द्वितीय समकारण, गुणकारजमें,-यथा कवित्त ।। शोक मैथिलीको हयो बिहरि अशोक बाग, दूत रघुवीर अन्यो गुणन गभीरको । दायो लङ्क प्रलै ज्वालमालासी प्रतापधर, अछय कुमारै मायो बजर शरीरको ॥ परम विरागी मिल्यो रक्षक विभीषणसों, लछिराम धरणि धनी है धर्मधारको॥जालिम जलधि कुद्यो हनूमान बलवान, शिरमौर शाखामृग सुवन समीरको ॥३२९ ॥ ॥ तृतीय समकारजकी सिद्धि बिनाश्रम आरंभही में यथा सवैया॥ जा महिमा को सुरेश गणेश फनेश विचारत सोधन आयो। जाहि सराहत है गिरिजावर ब्रह्म सनातन वेदन गायो॥ सङ्गमते बन, जीवनके लछिराम तपोबल भौन भरायो तारघुनाथके हाथन वेस विनाश्रम सेवरीलो फलपायो॥३३०॥ ॥ अथ विचित्रालद्वार वर्णन-दोहा । करै जतन विपरीति कछु, फल विचित्रकी चाह । तेहि विचित्रभूषण कहत, बुध कविन्द नरनाह ॥३३॥ ॥ यथा कवित्त ॥ गरजै निसान बान किले मतंग मारू, हुङ्करत वार संग खलभल कीबेको । ठनके कमान रोदे झनकै कृपान रचें, रु- धिर विहद नह योगिनीन पीवेको ॥ कौतुक अनोखोरणरङ्ग

रामचन्द्र भूषण।
राम रावन में, कहत बने न विपरीति घर छीवेको। कुद्ध धान
कातिल निशाचर समरचीच, मरत उमाद में अमरलोक ली
वेको ॥ ३३२ ।।
॥ मप अधिक अलंकार वर्णन-दोहा ।
अधिक होय आधारते, अब आधेय स्वरूप ।
प्रथम अधिक भूपण तहां, पर मानत बुध भूप॥३३३॥
॥ सपा कवित्त ।
उन्नत पहार नदी नदन अपारन को घोल कर विरद
बहाली बगरत है। लआिम देव नरदेव सन्त घन वना पापन
परम सीरो मानद भरत है। विरद बितानमें महीप रामचन्द्र
दीप, दीप कलाधर लों कुतूहल करतहे । फैल्यो छीर-सागर
तरङ्गसो तिहारो यश छोरमें दिगतनके छलक्यो परसदे॥३३१
॥ द्वितीयमधिकर्णन-दोहा॥
जबर्हि होय भाषेयते, अधिक अपार सुरूप ।
मलकार दूजो अषिक, पर मानत कृषिभूप ॥ ३३५॥
॥ यथा सवैया॥
चौदहों लोकनकी रचना, भुयभार समेत पसी उर बीचे।
| जामें नदी नदपुन पहार, महापन मण्डल ओलि अपीचे ॥
जामहिमाकी गंभीरतामें, सुरशम्मुहके मन आषत खीचे ।
राम सनातन ब्रह्मते राजत, फोशिला मञ्चल छोरके नीचे३३६
॥ अप अस्पालकारवर्णन-बोहा।।
भस्प मल्स भाषेयते, लखिय छाममाघार।
अधिक मेद वरनन करें, जे प्रधान श्रृंगार ॥ ३३७॥

रामचन्द्र भूषण।
॥ यथा सवैया॥
श्रीरघुनाथप्रतापकी आँचते, भागती देशनके बहिरेहैं ।
सुन्दरी वै लछिराम अदेवकी, मानती आनंदको जहिरे हैं।
हायल मन्दर कन्दरामें, परी छाम यौं सङ्क भरी गहिरेहैं ।
आरसीके भुजबन्द रचे,कर कङ्कन सुंदरीके पहिरे हैं॥३३८॥
॥ अथ अन्योन्यालंकारवर्णन-दोहा।।
होय परस्पर दुहूँते, आनंद अङ्ग प्रकास ।
अन्योन्यालङ्कार तह, प्रथम कहत सविलास ॥ ३३९॥
॥ यथा सवैया॥
वै उनके धनुवान संवारिकै राखत सामुहें मौज गभीरके ।
वै लछिराम उमाहनमें कल कोरे निहारत छोरै मनीरके ॥
वै उनके मुखै हेरि भैरै गरे माल घने मुकताहल हीरके।
भागभरे सबलोग सराहत आनंद लक्खन श्रीरघुबीरके३४०॥
॥ अन्य प्रकार-यथा कवित्त ॥
सुघर सुकण्ठसों हरष हनूमान हनूमानसों सुकण्ठमें उमाह
उमसति है । जामवन्त बीरसों विभीषन बहाली विभीषनते
सुजामवन्त सीमा हुलसति है ॥ गज रथ बाजी सों बिलास
रघुवंशी रघुवंशिनसों बाजी गजप्रभा विलसति है । चतुर-
ङ्गिनी सों राम लखन विराजे राम लखनसों सेना चतुरङ्गिनी
लसति है॥३४१॥
॥ अथ विशेषालंकारवर्णन-दोहा ॥
अनाधार आधेय जह, प्रथम विशेष प्रमान ।
चतुर चारु वरनन करें, ग्रंथनमें सुखदान ॥३४२॥

७८
रामचन्द्र भूषण
॥ यथा सवेया॥
वाइवली हनुमान निशाचरी सेनमें कीनो महाउतपात
रावनके रयम लछीराम इन्यो गदा सारथी चक निपात हैं।
सेनपकते लपेटि लैंगरमें दीने उहाय फटे फहरातहैं ।
सागर व्योमके बीच लटे उलटे दल उपरतेमडरात है ॥३४३
॥द्विसीय वर्णन-दोहा॥
लघुभारम्भहि में जहां, अधिक सिद्धि हे जाय।
दूजो कहत विशेप त, अलकार सरसाय ॥ ३४४॥
॥ यया सर्वया ॥
जाहि विलोकि डरै यमराजऊ दूत विचारे विचार अधीर मैं।
नाम न जानत रघुवीरको यों लछिराम गुमान गंभीर में
साधन थोरे कहौलों कहाँ मतवारे न डारत है पग नीर,1,
नीर में मावतही सरयूके फलें फल चान्यो मुरापिन भीर में !
॥ सृतीयवर्णन-दोहा॥
बहु मलमें वरनन करे, सके वस्तु परभाव।
तह तीसरो विझेप गनि, वरनत पंसित राव ॥ ३४६ ॥
॥ यथा सवेया॥
गोकुल गोकुलनाय बने, अजमें अमराज सनेह संपारे ।।
द्वारिका मण्डल द्वारिकानाय, जगे जगन्नाथ समुद्र किनारे ।
व्योमयली महि सातों पताल, लसे लछिराम प्रताप पसारे॥
चौदहों लोक सनाथ करें, रघुनाथ मनायक नाय हमारे३४७
॥ अप व्याघात अलंफारवर्णन-दोहा ।
जहां मोरते औरई, कारज सङ्ग विरुद ।
प्रथम कहत व्याघात तह, जे प्रवीन मति शुद्ध ॥३४८॥

रामचन्द्र भूषण। ७९ ॥ यथा कवित्त ॥ शुभग सहोदर सुजान गुनमान पूरो, रहत हजूरै रह्यो प्रेषके लहरमै । लछिराम रामसों मिलत एक बार टूट्यो नातो कुल धरम अखण्ड रोष बरमैं ॥ दाहिने सुकण्ठ लोहै जामवन्त जालिमके, लखनै लखाय कमनैती हश्वरमैं । मेघनाद रावनके रथ पथ आगे बान,मारत विभीषन विराटलों समरमैं ।।३४९॥ ॥ प्रथम व्याघात-यथा सवैया । श्रीरघुबंशिनकी कलँगी, कलपट्ठम दीन हितू बरजोरें। कौशल भूपर भाजन भाग, अशीशत हैं लछिराम करोरें । जासों बली रघुवीर सदा, बटपारन शोकसमुद्रमें बोरें । ताहग कोर कटाक्षनसों, सबसन्तनके भवबन्धन छोर॥३५०॥ ॥ पुनः॥ वेद पुरानमें चारु चरित्र, विचारत हारत हैं विधि होरे। शङ्कर शारदा गौरि गणेश, जमैं लछिराम यों नाम गंभीरे ॥ जाकी झलाझलमें रद रङ्ग, जरे जग राकस वंश जंजीरे । श्रीरघुनाथके वान बली ते,करें सबसन्तनके मन सोरे॥३५॥ ॥ द्वितीय व्याघातवर्णन-दोहा ॥ जहँ कारजकी सिद्धिता, लखि विरुद्धके साथ । व्याघातहि गनि दूसरो, अलङ्कार शुभ गाथ॥३५२॥ ॥ यथा कवित्त॥ जामवन्त जालिम जमाति सङ्ग जङ्ग बाज, सुघर सुकण्ठ विभीषन गुनगथमैं । हनुमान अङ्गद सुकेसरी कुमुद नील नागर सुखेन गाये विरद अकथ मैं ॥ शत्रुहन लखन समर भट भारे कटैं, रोषे रघुनंदी रही ताप न भरथ मैं । सेन # ८० रामचन्द्र भूपण। चतुरमिनी सहारें लव कुश त्यों त्यों फूलेनासमात रामचन्द्र फूल रथमैं ॥ ३५३॥ ॥ अप गुम्फ अलङ्कारवर्णन-दोहा ॥ परम्परा जई वरनिये, कारनको शुभ रूप । मलकार परमान किय, गुम्फ सुकवि रसरूप ॥३५४ ॥ ॥ यया-सवैया ॥ भाषमें सन्तनको सतसत है, सन्त सिखाक्त ज्ञान गंभीरको। ज्ञानसों पेद विषेक विचार, विवेक विचारसों साधन धीरको॥ साधनसों लछिराम उदार, उदारतासों दया धर्म शरीरको। सागर पारसरूप समोज, मिले तप सासुहें श्रीरघुवीरको ३५५ ॥ भय एकावलीमलहारवर्णन-दोहा॥ अहित मुक्तके सङ्ग जई, सुपद जैजीरा जोर । मलकार एकापली, यों भनि कविशिरमोर ॥ ३५६॥। ॥ यया कषित ॥ किले मत झनकारत जैजोर जोर, घोसाकी धमक तिन सौ पहरातहै। पौसाकी धमक आगे जामवन्त मालि मको, जमकी जमातिलों जमक लहरासहे ॥ जामवन्त आगे त्यों मुफण्ठ यों मुकण्ठ आगे लखन सदल लहरातहे। लखन सदल आगे धूमधाम राम रामचन्द्र मागे नाहरीनिसान फहरात हे।। ३५७॥ ॥पुनः॥ रस-भीर लीला रामचन्द्रपे दुचन्द केसी, दशगुनी कौचन सपन्द झलाझलपै । लछिराम पन परमाठीते पचासगुनी

'रामचन्द्र भूषण।
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बगर बहाली पैजपाली वाह वलपै ॥ बलकी परतिबांह बल
उतसाहनते, सौगुनी बिलोचन बदन मारू दलपै ॥ लोचन
बदन तें सरासर सहस गुनी, जङ्ग जोर भ्रूधनु मरोर भाल
थलपै ॥३५८॥
॥ अथ मुक्तप्रकेशी अलङ्कारवर्णन-दोहा ।।
एकावलिके बीच जब, प्रश्नोत्तर शुभरङ्ग ।
मुक्तप्रकेशी तहँ कहैं, अलङ्कार नवरङ्ग ॥ ३५९ ॥
॥ यथा कवित॥
शोभा सरवरके विशाल हैं मृणाल कैसे, जैसे सुण्ड कलभ
सँवारे विधि धीरके । कैसे सुण्ड कलभ संवारे विधि धीर
बर, जैसे ये भुजङ्ग भाये मण्डन शरीरके ॥ लछिराम कैसे हैं
भुजङ्ग सुखमासों भरे, जैसे मरकत खम्भ खलक सुधीरके ।
मरकत खम्भ कैसे परम प्रचण्ड जैसे, भुजदण्ड जुगल
जसीले रघुवीरके ॥३६० ॥
॥ अथ मालादीपक अलंकार वर्णन-दोहा॥
दीपक अरु एकावलीको सङ्गम जहँ होय ।
मालादीपक भूषनै, परमानत सब कोय ॥३६॥
॥ यथा कवित्त ॥
जोगानल मण्डित गिरीशलों समाधि रचि, रातो दिन
परचै अशोक उपवनमैं । लछिराम तापर अतङ्क लङ्क रावन
को एकसी भयङ्कर कलङ्क त्रिभुवनमैं ॥ सङ्गमी सनेह बिर-
हाकुल स्वरूप राम, सने स्वेद वही ब्रह्मराशि पुलकनमैं ।
बरसें न कैसे अँसुवानके प्रवाह बस्यो, घनश्याम रामचन्द्र
मैथिली चखन मैं ॥ ३६२ ॥

रामचन्द्र भूषण। ॥ सवेया॥ पावन देव पुरातन ब्रह्म हैं ध्यान धरै मनहोत अशोक है। शारद नारद शेष गणेश गन्यो शिरमौर महेशको थोक है ।। वेद पुराणनमें लछिराम यही चरचा कविकल्पना कोक है । श्रीहनुमान हियेरघुनाथ बसे रघुनाथहीमैं सब लोक, ३६३ ॥ ॥ भय सारअलारनिविषवर्णन-पोहा॥ गुन वरधनके दोषते, के दुर्टून सनमान । सार अलकृत करत, कविवर तीनि प्रमान ।। ३६४॥ । यया कषित ।। पल्ल्व नवलहूते सुमन सिरीपशुभ, सुमनसिरीपढ़ते दानी मनहरको । लछिराम दानी मनहरते हरप राम, फेन फरकीलो छीर सागर लहरको॥छीरसर फेनते मलेज परिमल, परिमल ते सुभाव सूघो मखमलपरको । परमखमलहू ते कोमल | कमल मञ्ज, कोमल कमलते मुभाव रघुवरको ।। ३६५॥ ।। द्वितीय दोपकारी पपा-कवित्त ॥ चारहो विभाकरते पाड़वा मनल ज्वाली, वाइवा अनलते फनाली शेपवरमें। शेषफन ज्वालासों ठम्बनकर पान, पान उसनते कालकूट कातिल गहरमें ॥ लछिराम कालकूटते ब्रह्मफांस, ग्रझफांसते प्रले प्रकाश पासव-चमरमै । वासवर्ष भरते कहर कालदण्ड, कालदण्हते कहर राम रावन सम- रमें॥३६६॥ ॥दोपगुणकारी-पपा सवैया ॥ काठते उन्नत पोर पहार पहार से ही खलकी अषलीको । हो खलको अपलीते विसासी विराजत केवर काम छलीको ॥

रामचन्द्र भूषण। कैवरते लछिराम लखे महामशल है बलराम वलीको । है सबहीते'कठोर सुन्यो व्रत श्रीरघुवीर प्रतापवलीको३६७॥ ॥ अथ यथासंख्यअलंकारवर्णन-दोहा ।। वस्तु जहां बरनन करें, क्रम सरीति शुभसाज । यथासंख्य भूषन तहाँ, बरनत बुध कविराज ॥३६८॥ ॥ यथा सवैया ॥ पनगराज फनावलीलों परिपूरो पताल पुरी क्रमुदै रहै भूपर तुङ्ग तरङ्गलों शारदा त्यों रतनावलीको समुदै रहै । मङ्गल व्योम थली लछिराम प्रभाकर बारहोंलों प्रमुदै रहै । मैथिली श्रीरघुनन्दनकोचिरजीवी प्रताप त्रिलोक उदै रहै३६९ ॥ कवित्त ।। मङ्गलीक चरन करन अधरन चढी, लालिमा गहर गुन कोमल बटोरके । लछिराम जंघ भुजदण्डन प्रचण्ड डर, बिरचे कठोर सान अजब हलोरके । भुजमूल भाल चन्द्रवदन विलास हास, परम प्रकाश पुन रस वीर बोरके ॥ भौंह भंग लोचन तिरीछे जुलफन वारे, बार घुघुरारे कारे लखन किशोरके ॥३७०॥ ॥ अथ पर्यायअलङ्कारवर्णन-दोहा॥ इक आशय क्रमसों जहां, धरि अनेक इक रीति । अलङ्कार पर्याय तह, प्रथम कहत करि प्रीति ॥३७१॥ ॥ यथा सवैया॥ अङ्गद रीछपती नल नील सुखेन सुकेशरी आनंद पागे । लक्खन रामके त्यों लछिराम-उमङ्ग भरे मन यों अनुरागे । - रामचन्द्र भूषण। भामिये मैथिलीकी कुशलात सुफांदिवे भारी मलाइल भागे। वानरी सेन सुकण्ठ बली हनुमानहीको मुख हेरन लागे॥३७२॥ ॥द्वितीयवर्णन-दोहा॥ जब भनेकको आसरे, राखत कमसों एक । अलङ्कार पोय तह, दूजो गनि सविवेक ॥ ३७३ ॥ ॥ यथा सवैया॥ वानर जामें विराट महाबली, रीछ भयङ्कर भूरि कुलाचें सेनप श्रीहनुमन्त मुकण्ट, मखेन सुकेशरीमें भरी आचें ॥ लक्सनकी धनुवान प्रभा, लछिराम विजे रणखेललो राचें । रामचमू चतुरङ्गिनीते भरी, माश विभीपनके मनसाचे३७४॥ ॥ अप परसअलंकारवर्णन-दोहा॥ वीषे तनकहिके जहां, मिले पित्त पहुसाल । परवृतभूपन तह कहे, जे प्रवीन कविराज ॥३७५॥ ॥यपा कविस॥ वहिवली वीरताके गरमें निसान घोर, बेरीपन दारुन प्रवा पानल घलकी । लछिराम राजनीति कीरति सरङ्ग गङ्गा पूजती दिगङ्गना दिगन्तनमें छठकी ॥ चिरजीवी चापो युम चौदहों मुवन पर, पेसी मानि पानि रामचन्द्र करतलकी। दण्टक विपिनवारे वगर किरात कोल, कन्द मूल दे देराशि लहें चान्यो फलकी॥ ३७६ ॥ ॥ सवेया॥ जा महिमाको सवारत शम्मु, विचायोजक रझोरावन रूमे। चारिडू घेदनमें घरचा, यही पूरमब्रह्म प्रताप नमूठो ॥

रामचन्द्र भूषण। औठर दानी गरीबनेवाज, कृपानिधि यों लछिराम न झूठो। चायो पदारथ को लयो सेवरी, तारघुनाथहि दैफल जूठो । ॥ अथ परसंख्याअलङ्कारवर्णन-दोहा । थपे वस्तु थल और में, कार निषेध थल और । परसंख्याभूषन तहां, बरनत सुकवि सगौर ॥ ३७८ ॥ ॥ यथा कवित्त ॥ बन्दनवलितबेस बगरविहद्दमौलि, कुंडलित शुण्डरदमद- के प्रचारमैं । बरन गणेश मणिमंडिस रतन झूल, झुमिकै चलत हैं मलिन्द झनकारमैं । लछिराम रावरे मतङ्गनपै रामचन्द्र वैरही प्रभाजोगजरथके अगारमैं। विधिषिकरारमें न दिग्गज- कुमार में न, कजलपहारमें न घन बन भार मैं ॥३७९ ॥ ॥ पुनः॥ असुर मतगन्नपै सोरघनघोर सङ्ग लागत गरद मेले गरवन भारी मैं । लछिराम लालितलपटलहरीली लोल, तड़पीली ते- जमान तड़प तयारीमें ॥ रावरे करन रामचन्द्र जमधर जौन ज्वाली जङ्ग जौहर अतङ्क अवतारीमैं । विज्जु विकरारी फण पन्नगी हजारी मैं न बजरकी बारी मैं नववर कुमारीमैं ॥३८०॥ ॥ पुनः॥ झगर मतङ्गमद करत मलिन्द पान, झूमत मतङ्ग मत- वारेलों रंगरमैं । तीतर मुरग वनचरमें विरोध बोध हीन बान कण्टक पराग फूल गरमें ॥ लछिराम तरल तुरङ्ग दीप तेज तातें, भरम पराजै बेरीवृन्दके बगरमैं । चित्र की समाजै लाजरहित बिराज राजें, राजनीति ऐसी रामचन्द्रके नगरमैं ॥ ३८१ - रामचन्द्र भूषण। ॥ पुन ॥ मदमकरन्द सम्पुटित साँझ का पाके, बिटप सचोट फल भूपर गिरत हैं।बचन विलास वशीकरण अमी है चन्द्र- मुखनिचकोर व्यभिचारीलों घिरत हैं॥ लछिराम राम राम- चंद्र राजनीति ऐसी, ज्याला हठ जोगिनके मङ्ग अभिरत है। नगर रगर बन वागन बगर एक, पारही मलदि मतवारेलों फिरत है।।३८२॥ ॥मय विकल्पमलंफार वर्णन-दोहा॥ के पद के यह करहिंगे, नई याविधि मुविचार । तई विकल्प सूपण कहत, जे प्रवीण पृङ्गार ॥ ३८३ ॥ ॥ यया सवेया॥ नाम हमारो चरपति रावन, या जग में यक्ष पावन छेदों । दारिदी टेक न काल भिरे, भट सामुहें दूसरे कोन गने हो। जायचढे रहे राजसमाज, नौ लछिराम फछु पछितेहो। के रघुनाथसे युद्ध करौं, के गिरीशको फेरि दशौं शिर हो । ॥अप दिविभिसमुचय मलंकार वर्णन-पोहा ॥ काहू यल बहु भाव जाँ, उपमत एके सङ्ग। प्रथम समुच्चय तह कहत, मलकार नवरङ्ग ॥ ३८५।। ॥ यया कविता करें पान तरफस फोरें त्यो कमान रोदे ठनकत घोर जल पाणीकी लहरमें । फरफे प्रचण्ड सजदण्ड त्यों पहाली नेन सरफे युगलकर मौन भराभरमें ॥ लछिराम रामचन्द्र रापण चमूको हेरि द्वेरहे कदम्पहार दौरा हरयरमें । भौ

-
रामचन्द्र भूषण।
८७
भङ्ग लाल भाल बदन विशाल ओज, अङ्ग अङ्ग फूले न
समात बखतरमैं ।। ३८६॥
॥ पुनः॥
आगमन राम अवतारके बधावरे में, त्रिभुवन छावै अंश
जगर मगरमै । लछिराम शारद महेश मुनि शिरताजै, देव
देवराज मौजें देविन रगरमै । मङ्गल अवाज साजै सुंदरी
समाजै राज, रङ्ग चारु कौशिला के चौकठ कगरमैं । दिग्गज
दराजै दीह दुन्दुभी दराज बाजै,बगर बगर बाजे कौशिला
नगरमैं ॥३८९॥
॥ द्वितीय वर्णन ॥
जहँ अनेक इक सङ्गदै ,करें सुऔरै साज ।
भेदस मुच्चय दूसरो, बरनत कविशिरताज ॥ ३९ ॥
॥ यथा कवित्त ॥
वगर वगर बाजै नगरनिसान भारी, बगरे बिमानव्योम रवि
स्थभोरमैं । लछिसम जागे भाग नाग नर देवन के, मङ्गल
महेश गावें हरष हलोमैं । बरसैं महीप दशरथराज पथ पोरी,
गज स्थ मोती कर झमक झकोरेमैं। अञ्चल उदयगिरि अम-
न्दरामचंद्र चारु,कौशल कलपतरु कौशिलाके कोरे||३९१॥
॥ पुनः॥
दशरथराव रामचन्द्रकी छठीमें चारु, विकसे बसन्तकुसु-
माकर बहारसे। लछिराम सातौं दीप उमगिअशीस देत, हीरा
हेम हिमालै सुमेरु अवतारसे ॥मौजमें मतङ्गगजरथके कलोलें
खुले, मालाकार मण्डित रतन मोतीहारसे । घन बन भारसे
पहारसे डगर डोलें, बगर बगर बोलें दिग्गज कुमारसे ॥३९२॥

८८
रामचन्द्र भूषण।
॥ पुन॥
अघकटेलाखन लरकि मतवारकटे,कोटिन फरकि रहे लोटत
गरदमें । घोर घमासान पान परसे दुहुँनदल, रावण महीप
रामचन्द्र रोपमदमौलछिराम झकरजमाति जोगिनीन लेले,
लादे मुण्डमाल रही ताब न वरदमें । पटके पछीरे हनुमानके
लयारे हारे झपटें हजारे भरे भूपर दरदमैं ॥ ३९३ ॥
॥ सवैया॥
पारिदलों दशरत्य महीप लुटाय रहे रतनावली साजे ।
रमन राव रचे लछिराम चढ़े गजरत्य बने शिरतानें ॥
देववधूटी विमाननतें परसें सुमनापली पासप गामें ।
श्रीरघुनन्दनके अवतारमें औषवहार वधावरे वाजें ॥३९४॥
ा पुन ॥
मोघ उदे उमडी त्यों वदी, रघुपशिनकी फलंगी विस घासें ।।
गा गुनी पिरदापलीको, उड़े रङ्ग तरङ्ग सबै मुरदीसें ।
तुन्दुभी दीव मृदङ्ग पमें, लछिराम सराहिरहे सवईसें ।
श्रीरघुनाय लियो अवतार, तिरपर हाय पसारि मीसे ३९५
॥फविस ॥
श्रीपसिष्ठ मानव मुकण्ठ नल हनूमान, दिविद मयन्द
जामवन्त जोगमताके । ललन भरव शवसूदन सुमन्त नील,
लहेश्वर केसरी कुमुद छमछसाके॥ लछिराम रामचद्र मैथिली
सभासनते,सदलसमेर त्यों मपेनशुभसत्ताके ।मवतस राजवंश
रत्नसिहासनपे, सपों सभासदों कौशल चकत्ताके ॥३९६॥

रामचन्द्र भूषण। ॥ पुनः॥ राजें रामगङ्ग निरमली कुण्ड गोप्रतार श्रीसहस्त्राधार स्व- र्गद्वार भार गारमें ॥ सप्तहरि क्षीरेश्वर नागेश्वर देव काली लछिराम कोटेश्वर जगर मगरमैं ॥ जन्मभूमि कनकभवन यज्ञ देवी बुध सज्जन प्रमोदवन आनंद बगरमै । सीताराम लखन भरत शत्रुहन मणिरतन सिंगार हार कौशल नगरमैं ॥३९७॥ ॥ अथ कारकदीपकअलवारवर्णन-दोहा ।। एकहिमें जहँ बहुक्रिया, उपजे क्रमके संग । अलंकार वर्णन करें, कारक दीपक ढंग ॥ ३९८॥ ॥ यथा सवैया॥ फूलि रहै भुजदण्ड प्रचण्ड सुकौचके बन्द सबै करके हैं। त्यों लछिराम विशाल प्रभामुख ज्वालियारंग प्रलयकरकेहैं। भारी गदा उछले करमें वा लंगूरके लंगर यों खरके हैं। रावणकी चमू हेरतही हनुमानके रोम सबै फरक हैं॥३९९ ॥ ॥ अथ समाधिअलंकार वर्णन-दोहा॥ और हेतमिलिक जहां, कारज सुगम सहेत । तह-समाधिभूषण कहत, जे कविपरमसचेत ॥४०॥ ॥ यथा कबित्त ॥ सुपर सुकण्ठ हनूमान अङ्गदादि बीर, ज्वाली जामवन्त दुल कहर कलापसों। लछिराम लखन बनत वरदानी बीर, बानजा सहसफन सूरज सतापसों ॥ नल नील सागर उजा- गर त्यों सेतु कर, मण्डित भुवन रामचंद्रके प्रतापसों । लंक पंक वारन विदारन अदेव भयो औरऊ सुगम श्रीविभीषन मिलापसों ॥४०१॥ , -

१०
रामचन्द्र भूपणा
-
॥ अय मत्पनीकमलंकारपर्णम-दोहा ।
प्रबलशत्रुसों हारिके, तादित अहित उपाय ।
प्रत्पनीक भूपण तहां, वर्णत पण्डितराप ॥४०२॥
॥यपा कमिस ॥
मापद पराग परसत परमानंदमें, नाग नरदेव भाग समम
गरपसों । लछिराम बाकी शक्ति मेथिली प्रतापराशि, अनुष
लखन भन्यो पीरता गरपसों ।। ताहूको न डरत अकस राखि
पूरपकी, मयनके वेले रोष सागर सरवसों। विष्णुरूप रावरा
मचार्दि समुझि राहु,अपला सतावत प्रभाकरे परपसो॥४०३॥
॥ सवेया ॥
पीसक हायनमें ले कृपाण कुतूहली षेप विराट पनायो ।
मेष भयङ्करसो गरज्यो तृण ओट देवाणी गंभीर मुनायो ।
यो मनि रोप भन्यो लछिराम कही तू न मानत रावण गायो।
रामकी हेरि प्रचण्ड चमू छली मेथिलीको र पावन आयो॥
॥ अप काष्यापत्तिमलशरवर्णम-दोहा ।
पद कीनो तो यह कहा, ऐसो जहां विचार ।
याविधि परणे सकविमन, कान्यार्थीलंकार ॥४०५॥
॥ यथा कवित्त॥
नील नल भगद मुकण्ठ केसरी त्यों कुछ कुमुद सपेण
हनूमान रणरेलेमें । जामषन्स जालिम जमाति जमराणी संग,
यानर विराट भालु पीर पगमेलेमें । लछिराम लखन प्रचण्ड
धनुधर तेसो, रापण कदाहे रामसमर कुलेलेमें । पाँच्यो मिन
अलधि भयफर परीम सिन्हें गहियो त्रिकूट कहा समर अमे-
में ॥४०६॥

रामचन्द्र भूषण। ॥ अथ काव्यलिंगअलंकारवर्णन-दोहा । जोग समर्थन अर्थ जो, ता सामर्थ करैन । काव्यलिंग भूषण तहां, वर्णत सुकवि सचैन । १०७॥ ॥ यथा कबित॥ शारद महेश गणपति शारदेश गावें, दानी चारु चौदहौं रतन राशि खत्ताके । सागर लों जाके बाँहवलको न वारापार, अभय रहत लछिराम छमछत्ताके ॥ चौदहौं भुवन महाराज रामचन्द्र बीर, रन बन बबर असुर गजमत्ताके। फारिह करेजे केलि-पत्तासे कुदिन तेरे, दामन लगेहैं हम कौशलच- कत्ताके ।। ४०८॥ ॥ पुनः॥ सागर सुधासी लसै अवधनगरतट, बगर वधूटी त्यों विमा- ननके रेलेमैं । लछिराम जामें करें मञ्जन सुवारेहीसों, ब्रह्मरूप राम रघुवंशिन झमेले में ।। रामकी दोहाई जमतोको न डरत वही, परसत पौन रज रेत लहरेलेमैं । औरेलों बिलात अघ मन्दर हलोरे भंग, रामगंग तरल तरंगनके मेलेमें ॥ ४०९॥ ॥बरवै।। पाप न तोसों डरपे या लछिराम । अधम उधारन सहित सियवर राम ॥ ४१०॥ ॥ अथ अर्थान्तरन्यासअलंकारवर्णन-दोहा ।। कहि विशेप सामान्य करि, फेरि समरथै ताहि । यों अर्थान्तरन्यासको, सुकविन रूप सराहि ॥ ११॥ ॥ यथा सवैया ॥ जामें बस्यो वडवानल जालिम,ज्वालिया त्यों जलजन्तु भन्यो

रामचन्द्रभूषण।
1
। दारुन उपर, सुरसा जो, न माने सहारतमें हरकोई ॥
दुग सरंगनकी महिमा, लछिराम लखे न कियो उरको है।
सागर कूयो षड़ो हनूमान, कहा रघुनाथ के किंकर कोहे४१२
।। मरवै॥
अंगद पग नहिं तान्यो रावण-वझ।
कोन पात जन रघुपर सुर अवतश ।। ४१३॥
॥ द्वितीय वर्णन दोहा॥
परनि प्रथम सामान्यता, फिरि विशेष सामर्थ ।
गनि अर्थान्तरन्यासको, भेद दूसरो अर्थ ।। ४१४॥
॥ यथा सवैया ॥
वानरपशकुमार मुकेसरी, सापी सुकण्ठको भौति भलीमें ।
भक्त भन्यो अनुराग तरग, लसे अनुरागिनकी अपलीमें ।
तापर एक पड़ो गुण या, लछिराम सवारयो मिरश्चिपलीमें।।
श्रीरघुनाय हरौलीको अक,लिल्पो हनुमानकी भालपलीमें।।
॥परये ॥
राजकुंवर दलमण्डन लखनकुमार ।
तापर अपर अपूरव सियवरप्पार ।। ४१६ ।
॥अप विकस्वरमलंकारवर्णन दोहा॥
परनि विशेप सुप्रथमही, फिरि सामान्यप्रमान ।
फिरि विशेप ताको किये, विकस्वर भूपण जान ।।४ १७॥
॥ यपावित ॥
मुनि मख राखे अभिलापे रूप गौतमीके शम्भुपन तोरे
वेस मिथिलेशमनके । लछिराम तापे यही पात या कहा है
जाके सेवक सुरेश मलकेश पन फनके ॥ मार्नेदमें जाकी

९३ रामचन्द्र भूषण। दानधारा न रुकत परमाने दीनबन्धु का साँकर सुमनके । पारस पुरन्दर धुरन्धर धरम राम, रघुवंश भूषण कलस त्रि भुवनके ॥ ४१८॥ ॥ बरवे ॥ लखन वाण आतितीक्षण बड़ी न बात । फणसहस्र अवतारी जगविख्यात ॥ ४१९ ॥ ॥ अथ प्रौढोक्ति अलंकारवर्णन-दोहा॥ कथन करै उत्कर्षता, देत हेतको लाय । अलंकार प्रौढोक्ति तहँ, चरण कवि सरसाय ॥ ४२०॥ ॥ यथा कवित्त ॥ मण्डित अमृत छत्रमाला पन्नगेश देश बर फन साला मलयजलै अरति है। अम्बर अमर अमरेश उपहार लै लै सुरज सुधाकरहि पावन करति है ॥ लछिराम रामचंद्र कीरति कलपलता जब जब सातौं सिन्धु पार उतरति है। जैतवार जङ्ग रतनाकर तरङ्गमौलि तब तब हीरक-वितान वितरति है ॥ १२१॥ ॥ पुनः॥ बिलपति कुमुद अदेखी सने सोकसर, सातौ दीप सुहृद सरोज पखरे रहैं। लछिराम लालित मरीचिन वगरसो हैं,भास- मान वारही कलाके भभरे रहैं। तेरहों प्रभाकर प्रताप राम- रावरेसो, बटपार वैरी वन बन्दर बरे हैं। दिग्गज सदल महा- मंगल मसाल हेरि, अगरे दरद दिगवारमें भरे रहैं ॥ ४२२॥ ॥-पुन: ।।- चारु चन्द्र चन्द्रिका शरदसों प्रकाश करे, राजत शिला- १४ रामचन्द्र भूषण । सो मिल्यो गङ्गकी लहरते। मङ्गलीक मलय मदेशकी प्रभासों पुन्न पावन परम राजइसन सदरत ॥ जेतपार चौर शेष सगमीसों लछिराम, शुभग सुरीन मुकतालहके लरते । सीरो सेत जस रावरे को राप रामचन्द्र, नीर छीर-सर हिमालयके सिखरतें ॥१२३॥ ॥ अप सम्भावनामलंफारवर्णन-दोहा॥ जो यों हो तो यों कहे, सम्भावना मुरूप । कविकुल पानत है सदा, पाप्रकार मुमनूप ॥ १२४ ॥ ॥ पपा का जाके घाँदवलको भनेक अमरावतीलों, जीत्यो देवराज देवपशनके योफोम । लछिराम जाकी हॉफ प्रयघनघोर मोर, खलभल पारत दिगन्तनके भोकोंमें। धूमधाम रावण महीप रामचंद्र साहै, तिरछौ तूही महागीर अपलोकोमी वाण सों पिदारे व साली मेघनाद भाल, ज्वाली जन लखन स राहों तव तोकोंमें ॥ ४२५॥ ॥ पुन ॥ माके वाण परम प्रचण्रकी कथान गार्षे, ठगेर ठोर मसुर पधूटी करिमतसों। लछिराम तप्ते भुजदण्डके अखण्ड मोज, मेरिनके भाल करें कालदण्ड छतों ॥ धूमधाम लगार लैंगूरमें कपीशहूकी, वीसपिसे वारतें अचूक परवतसों। रावण समर तब रामसम होतो जप टखनसों भाई मो रोल हनुमतसों ।। ४२६॥ ॥बरवे॥ रामचद्रदल-महिमा तव फदिमात । जोक शारद कोटिन मुख जठभात ॥ १२७॥ .

रामचन्द्र भूषण। ॥ अथ मिथ्याध्यषसितअलंकारवर्णन-दोहा॥ मिथ्याहीमें जहँ करे, मिथ्यासिद्धि प्रधान । मिथ्याध्यवसित भूषणाई, तह वर्णत मतिमान ॥ १२८ ॥ ॥ यथा संवैया ॥ काटिही बीसो भुजा रद आपने मुण्ड मिलै दशौं भालको फोरों बाटिहौं ज्यान जटायु बुलायकै भागिहों बेगि नयौं मुख मोरौं। जङ्ग जुरौं रिपु दोन भरत्थसों वा क्षण ही लछिराम निहोरों रावण तो मैं त्रिकूटधनी जोपै बारिधिमें बली बालिको बोरौं। || बरवै ॥ भुव अकाश रवि चन्द्रहि करि जलपान । उखन सवानहि मिलिहौं रावण प्रान ॥ ४३०॥ ॥ अथ ललितअलंकारवर्णन-दोहा॥ कहिय कछुक प्रतिविम्बतों, तासु बनाय सुधीर। अलंकार वरण तहाँ, ललित सुमति गम्भीर ॥ ४३१॥ ॥ यथा कवित्त ॥ कारज सरेन कीन्हें नगर अतङ्कपथ बगर स्वयम्बर महीपन लरजतें। लछिराम राम रघुवीर मैथिलीको साथ छूटे ना परशुराम रावरी गरजते ॥ भङ्ग भयो पलमें शरासन मद्देश अब जुरिहै न केहूं विधि बलकी दरजते । ओसर बितीते अनरथ उपचार केहूँ विछुयो कमान बाण आवत अरजतें।। ४३२॥

रामचन्द्र भूषण। " ॥सपैया॥ दूत कयो जिन दायो त्रिकूटको अङ्गद वीरता गाई मया। त्यों लछिराम न मानी कछु, अब होत कहा यहुती परखा है।। केती करी चतुरङ्गिनी सेन, परी रघुनाथपे रोप प्रमारे। रावण ता खन मानी न तू, विप पोय अमीफल चाखन चाहे ॥ ॥ पुन ॥ रावण तू अपमान कियो, भली भाँतिसों राजसभा सब गावे । आतुर जाय मिल्पोरघुनाथसों, लेके भपकी न्योत बताये। भोसर चूक्पो न फेर मिले, लछिराम करो अब जो मन भाये। आयो यमको छोड़ि भला वन्यो राप विभीषणे कोन पुलावे॥ ॥ परवै॥ मूठ सीनि पन पीते विनु रघुनाय । भव तू क्यों शिर पीटत मलि मलि द्वाय ॥ ४३५॥ ॥ अप ग्रहणमलकारविषिषषर्णन-दोहा । मनवाछितफलसिद्धि ज, श्रमविन होय सुषेस । प्रपम प्रदर्पण सरेको, जे कवि शुभग सरेस ॥४३६॥ ॥पया कवित्त ॥ पसरे प्रभा पन्यो पारस मिल्यो सो सिल्पो, मदगद कण्ठ भरे मानद सदनसे । भूझिये कुशल पारिलोचन जुगल तक, परम प्रताप यों करोरिन मदनते ॥ लछिराम पनघोर दुन्दुभी भवाले महा, मङ्गल अवध श्रीगणेशके रहनते। सौरभो श्रीभरत रामचन्द्रको सरूप तोलों, मागमन जान्यो हनुमा- मफे पदनते ॥ १३७॥ - रामचन्द्र भूषण। १ ॥ सवैया॥ हेरिखे देत विहङ्गके मानस, ब्रह्मसरूपहिमें अनुरागे । भाय भरत्थसों भेंट्यो तहीं, पुलके ततु यौं लछिराम सभागे ।। मंजु मनोरथ फेलि फल्यो, परमाने सवै तप पूरण जागे । मौज मढ़े उमड़े करुणाखड़े, श्रीरघुनाथ जटायुके आगे४३८ ॥वरवै॥ उर अगस्त्य अनुसुइया मनस्थ होत । सोहैं श्रीरघुनन्दन भानु उदोत ।। ४३९ ॥ ॥ द्वितीयमहर्षण वर्णन-दोहा । मनवाञ्छित फलते अधिक, फल विनश्रम मिलिजाय । समुझि प्रहर्षण दूसरो, हरप न हृदय समाय ॥४४०॥ ॥ यथा कबित्त ॥ अङ्गद सुकण्ठ हनूमान बलवान आगे सङ्गम सदल जामवन्त विभीषणको । लछिराम नील नल केसरी कुमुद दायें वाम- भाग द्विविद सुषेण हरपणको ॥ गरजे निसान कल कौशल नगर बर बगरे विमान घनघोर करपणको । शत्रुहन सौरयो श्याम घन आवरण तोलों सोहें रथ रामचन्द्र मैथिली लषणको ।। ४४१॥ ॥ सवैया ॥ मोरही प्रेमसों पूजनके भले आसन द्वार कुटीपै रचे हैं। ब्रह्मसुरूपहि भेटिवेको छन या अभिलाप दिये विरचे हैं। त्यों लछिराम फलो तिगुनो यौं मनोहर आनंदमें उमचे हैं। मैथिली लक्खन श्रीरघुनाथको हेरतही सरभङ्ग नचे हैं ४४२ रामचन्द्र भूपण। ॥ परमे॥ भरद्वाज अनुमानत आनंदकन्द । लखन मैथिली भागे श्रीरघुनन्द ॥ १४३ ॥ ॥ मुसीय प्रहर्पण वर्णन-योहा॥ मन जाकी चिन्ता करे मिले पस्तु सोइ आय। तीजो भेद प्रदर्पणदि, परगट कियो लखाय ॥४४४॥ ॥ यथा कमित्त ॥ तिलक त्रिकूट श्रीविभीपण विशाल भाल, पालिघधिपम्पा दे सकण्ठहि असकाको । लछिराम सुरपनखा त्यों खर- दूपणके, पदन विदारि पोरे वीरद के डकाको ॥ यावधान वंशहि मिध्वसन सदल मारे, मेघनाद कुम्भकर्न रापनसे बड़ा- | को। कोशिला महल बेठी बुझिवे सगुन तोलों, गरजे भरत राम भाये जीति लंकाको ॥ ४१५॥ ॥ सवैया॥ जाके लिये बहुपासर में जपेमंत्र महातम घेदन गाये । जा महिमाके विचारसमें भरे ख्याल खरे बहुकाल गैपाये ॥ और कहाँलों को लछिराम किती उपचार कला वगराये ।। | जाहित पेठेसुतीक्षण भोरते राम किशोरते सामु भाये॥४६॥ ॥ मप विषावालारवर्णम-दीदा मनवाञ्छित चिसचाइमें, फलप्रभाष विपरीति । भूपण परणि विपाद इमि, कोपिद कपि भपिरीति ॥४४७) ॥ यथा कविता सन्त सुर चौदहौं भुवन राजवंशनपे, रतनसिंहासन प्रका- श महाजरको । लछिराम रामचन्द्र मैथिली टखन छन कीने रामचन्द्र भूषण। वन गौन औध शोक सरासरको । मंडित सुनीन मण्डलीनमें बसिष्ठ मन वै रह्यो कुलालचक्र हीरो हारि थरको । राजअभि- पेक औषधीनपै नजर कान वज्र यों बजर वाणकैकयीके बरको ।। ४४८॥ ॥ सवैया॥ सोरहौ साजि सिंगार सनेहमैं बङ्क विलोकनि चञ्चलताकी। चाहती रामहि अङ्क भरयोचदि लक्खन भौहैं सरोपप्रभाकी। त्यौं लछिराम सुरूपकी राशिलों सौहैं खडीलसै वानकवॉकी। चाह भरी मिलिवेकी रही कटी नासिका कानलै सूर्पनखाकी। ॥ बरवै॥ उतरि सिन्धु किमि ऐहैं राजकुमार । तबहिं सुन्यौ दशकन्धर दल इहि पार ॥ ४५० ॥ ॥ अथ उल्लासअलंकारवर्णन-दोहा । औरहिके गुण दोषते, थपि अनत गुण दोष । अलंकार उल्लास तह, चौविधि रचि मति चोख ॥४५॥ ॥ औरके गुणते औरको गुण-यथा सवैया । जाहित शम्भु सुरेश गणेश महेश महामख साधन फेटे । नाहित जोगी जपी तपसी, यती जाल त तनुछार धुरेटे ॥ कौतुक या लछिराम लखो, पुलके तनु यों अनुराग लपेटे । राक्षसवंश विभीषणेते,भरि अंकमैं भाय भरत्थोंभेटे ॥४५२। ॥ औरके दोषते औरको दोष-यथा सवैया ॥ मैथिलीको छलते उनमें हरयो कान सुने खर दूषणे मारे फेरि बली हनूमान लँगरते बाग उजारि त्रिकूटहि जारे

१००
रामचन्द्र भूषण।
कोन कहै रचना लछिराम, पेरें दुख औरपे औरके डारे।
रामफे रोपन रापन दोपन राक्षसै वानर भालु सहारे॥४५३ ॥
॥ परवे॥
इन्द्रजीत वच मुनतहि लक्खन ईस ।
समरझपटि क्रोधावर काट्यो शीत ॥ १५४॥
nोरके दोपते औरको गुण-यथा सवैया ।
पालि बलीके सहारतही मुखसाहिषी भार सुकण लियो है।
या बिपरीति कहालों कहें लछिराम लखे भकुलात हियो हे॥
औरके दोपन औरही को गुण गावत वेद पुराण बियो है।
रावनक मपमानते राज विभीपदको रघुनाथ दियो है ॥४५५॥
" परवे॥
विमटा सपन सुनायो रावणनाश ।
पुलकेतन मन सियके पलित विलास ॥ ४५६ ॥
॥ मोरके गुणते औरफो दोप-यथा सर्वया ॥
भी चढी वडी भालपे लालिमा भोज पिराजत सूरजभशको।
त्यों चतुङ्गिनीमें लछिराम चमूपति चातुरी चारु प्रशसकी।।
यो फरके भुजदण्ड अखण्ड परीमें करें पननाद विध्वंसको।
लम्पनको धनुवाण दवानल दारुण दीद निशाचर पशफो४५७
परखे।
विकट वानरी सेनारामसिंगार।
कालनिशाचर फुलमें स्तरति पार ॥ ४५८॥
॥ अथ भषज्ञाअएंफारवणन-दोहा ।
गुणन मोरके गुणनते, प्रयम अवज्ञा साज ।
निमि न मौरको मोरही, दोप लगे शिरताज ॥ ४५९ ॥

१०१ रामचंद्र करती भुवन, सुखन असुर परिवार ॥ ४६०॥ रामचन्द्र भूषण। ॥ प्रथम औरके गुण औरको न लगैं-यथा दोहा॥ बरसत सुर नर नाग शिर, आनंदशीतलभार । , ॥ द्वितीय औरको दोष औरको न लगै-यथा दोहा संग सहोदर एक थल, लखत देव द्विजघात । बसन विभीषणके हिये रावणको उतपात ॥ ४६१॥ ॥ अथ अनुज्ञालंफारवर्णन-दोहा।। दोपहिको गुण मानिकै, चाहक तन मन होय । कहत अनुज्ञा भूषणहि, पंडित कवि सब कोय ॥४६२॥ ॥ यथा सवैया॥ रथेपै चढि या चतुरंगिनी लै, जुरिहैं रण रंग समानत हैं। रघुनाथसों बोलिदौं रावणहौं, जे कला धनुकी सब जानत हैं। कटि हैं सुत नाती संघाती सबै, लछिरामन टेक द्वैठानतेहैं। हरिवोवन मैथिलीको छनमें हम आनंद यों परमानत हैं१६३॥ ॥ बरवै॥ कुम्भकरण हँसि बोल्पो सुनु रघुवीर । कटिबो भलो समरको सनमुख वीर ॥ ४६॥ ॥ अथ लेसालंकारवर्णन-दोहा ।। गुणमें दोष विलोकिये, दोषहिमें गुणधीर । अलङ्कार लेसो द्विधा, वर्णत कवि गम्भीर ॥ ४६५ ॥ ॥ दोषमें गुणवर्णन-यथा सवैया ॥ काजद राजकुमारनको मृगया वन खेलिवो ख्याल तरङ्गमें। हेम-कुरंग निहारतही रघुवीर चले भले वीरता रङ्गमैं ॥

रामचन्द्रभूषण। पानसो पाको बध्यो घनमें लछिराम इते मच्यो कौतुक सगर्ने । रापण आपनेही रय हो मैथिलीको छलहीके प्रसङ्गम४६६ ॥मरवे ।। निजसुतहित कैकेयी, पन दिय राम । अपयश त्रिभुवन फेल्यो, नगरनिकाम ॥ ४६७ ॥ ॥दोषमें गुण-यमा फवित्त ।। अङ्गद सुपेण जामवन्त हनुमान मागे, करत अभङ्ग पार सङ्गर मुमनते। लछिराम लच्छिमन दाहिने मरम खोलें, रा- कस भयङ्करी प्रभाव परखनसे ॥ री विकराल कपिकुभर कराउनसों, वरने करन मन पाती दुसमनते रामचन्द्रसो रण पण्डित विभीषणभो,सदठ सकुलदसमन्धर दमनते४६८ ॥ पुनः॥ भूमि-भार हरण भरण आभरण भूरि माग्योभाग नाग नर । देव सन्त जनमें । लछिराम देव द्विमराज हिय भे-करन गरजे निसान दशमौलिके वधनमें ॥ रामचन्द्र विरद वितान तान सातों दीप सरल सहारे यातुधान रन पनमें । कोशल कराल फेफपीकोपरदान हार पारस पदार चारु चौदामुवनमें ४६९॥ ॥ समेमा । काननमें हो मैमिलीको भय दीनो विशाल विकूट वसायके उक्सनराम सो युद्ध जुन्योलछिराम लड़ाको लकीर खचायके फेल्यो चरित्रदशी विशियों विपिहू रहे भाँगुरी दाँत दवायके। रावणसङ्ग चमफुलमें पहुँच्यो मुरलोक निसान जायकै ७० रामचन्द्र भूषण । १०३ ॥ बरवै ॥ सुरपति-सुरा सिय पग परछत करि चोच । वायस तनु धरि परस्यो यापर लोच॥ ४७१॥ ॥ अथ मुद्रालङ्कारवर्णन-दोहा॥ सोच्यास्थ सूचनासों, अरथ करत लै धीर । कछु अन्य सन्निधि सङ्गमी, मुद्रा गुण गम्भीर ॥४७२॥ ॥ यथा कवित्त ॥ जाके भुजदण्डन अखण्ड अतुलित बल, खल भल स- मर भयङ्कर पसारेसे । लछिराम जाके करतलमें चपलताई, वादिन बताई वेग सहस सहारेसे ॥ रावण प्रहस्तमें प्रमाण रावरेसो करौं, जालिम जुरेंगे इन्द्रजीत मतवारेसे । जाके मान रेखें संक नाखत बिचारे ताके आवें चले बाण ये बजर विकरारेसे ॥ ४७३॥ ॥ सवैया ॥ मान मलै असुरावलीके लछिराम यों जालिम जङ्ग जसीले। सङ्गम श्रीरघुवीर निषङ्गते पैज प्रताप प्रभा बरसीले ॥ बझे करेजनके किरचें दशकन्धर थानके प्रान बसीले । रोदे कमान है भालके भेजन पान करें किनवान बसीले ४७४ ॥ पुनः॥ साँकरेमें सुर सन्तनके वगराये प्रताप अनन्त प्रभानके । चार तेरे कॅपे धरती लछिराम हरे हलकम्प जहानके ॥ मैथिली वार विलम्ब रती अब औसर वार छली मदपानके । भालथली बटपारकी चूरके, गारें गरूर गदा हनमानके४७५|| १०४ रामचन्द्र भूपण। ॥ परवे॥ घन गरजन दल रावन कुलिश कठोर । प्रलयपपनदवदरपन लखन किशोर ॥ ४७६ ॥ ॥ मप रत्नावलीमलकारवर्णन दोहा ।। कमसों वर्णन कीजिये, प्रकृति अर्य शुभसाज । भूपण भनि रत्नाक्ली, ने प्रभाव शिरताज ॥ ४७७ ॥ ॥ यपा सया॥ स्यौं गुरु मङ्गल सूरज सोम सुरेश महेश गणेशे विचायो।। पारस कामदुद्दा कठपद्रुम दानिया पारिदहको निहापो ॥ सागर सातौ सभाग मुमेरु त्यों गग प्रयाग प्रकाश प्रचान्यो। श्रीरघुधीर कृपानिधिको गुण ले सबहीको पिरचि संपायो। ॥ परवे॥ पारसमणि फलपगुम बजर गंभीर रच्यो ब्रह्म इरवर दे हनुमत वीर ॥ ४७९॥ ॥ अय सणालंकारवर्णन-दोहा । तजे मापनो गुण जहांधारण करि गुण सग। अलंकार सदण वहाँ, पर्णत रसिक प्रसंग ।। ४८०॥ । यपाकषित॥ कोकनद फरमें कमान मान रतनारे, तरकसे कन्ध हेरि हीन घरफतके । मंगली माधुरी इसनि लछिराम सोई कोर्षे करें छोर पट फैले फरकतके ॥ श्याम घन मरण महीप | रामचन्द्र चारु, परी परमही मेन रंग खरकतामोहर हरीरे पीरमणिके जेभीरे गरे हीरेलाल मोती होत हार मरकतके४८१ -

रामचन्द्र भूषण।
बरवै॥
सरयु-तीर श्रीरघुवर करत विहार ।
वार पार यमुना करि जगमग धार ॥ ४८२॥
॥ अथ अपूर्वअलंकार द्विधावर्णन-दोहा ।।
प्रथम संग गुण ग्रहण करि, फिरि वातनि निजरंग।
पूर्वरूप पहिलो कहत, जे प्रवीण सब रंग ॥ ४८३॥
॥ यथा कवित्त ॥
परसतही मैं बन्योहारगज गौहरको, गंग गहबरलै प्रकाश
करबरसों । लछिराम तापर अमन्द आचरज परै प्रतिबिम्ब
लोचन त्रिवेणी हरबर सों॥छावत प्रभायौं पहिरावत लखन
गरे राम रघुबीर भरे आनंद गहरसों । मंगलीक रंग मुकता
इलको एतो होत विकसत सेतु रामगंगकी लहरसों ॥४८॥
। बरवै ॥
भरत गरे लर मानिक मरकत होत ।
परसत फिरि करकचन अरुण उदोत ॥ ४८५॥
॥ द्वितीयवर्णन-दोहा॥
हेत रचन गुण मिटनको, मिटै न गुण रँगधीर ।
पूर्वरूप दूजो कहत, जे कवीन्द्र गम्भीर ।। ४८६ ॥
॥ यथा कवित्त ॥
अङ्गराग आभरण भूषण सुभाय अङ्ग, जगमगै जोति
जोगराशिलों वसनमैं । चूँघटके घेरसों न खोलति बदन मन्द,
स्वासन समीर होत सुरभि रसनमैं ॥ रिषिनकी बामै
लछिराम चरचित चौहें अदरसहूल आदरसलों जसनमें ।
परनकुटीमैं डर बैठति अकेली कटै झांझरीसों काँधै घन वन
सरसनमैं ॥४८७॥

१०६ रामचन्द्र भूषण। ॥ परवे॥ सन्तसमाजन सहजहु हनुमत बोर। बदनज्वालसो जालिम बजर शरीर ॥ १८८॥ ॥अप मतणमलफार वर्णन-दोहा॥ संगतिको गुण कैसहू, ग्रहण करे न सुभाष । भूपण तहां मतदणे, घरणत पण्डितराव ॥ १८९ ॥ ॥ यया कषिस ॥ शाखासे कलपलतिकाके भुजदण्ड भारी, करके रहत भरे मानंद महान है । लछिराम माँगुरी नखनते त्रिलोकचीच, परसत बरबस नौ रतन दान है। उमचे सुमन या चरित्र अदभुत हेरि, रङ्ग सतसग गाये घेदन प्रमान है। करुणा कलित करकमलप्रसग तक पन्नगी स्वभावको न छोड़ति कृपान ॥ ४९०॥ ॥ परथे॥ लक यशसिन पीचे सियको बास। अमरूपिणी मतिको तदपि प्रकास ॥ ४९१॥ ॥ मप मनुगुणभलकार वर्णन-पोहा ॥ पूरम गुण सतसङ्गन्ते, चोखो गहवर क्षेरि । मलकार भनुगण कई, मकविशिरोमणि टेरि ॥ ४९२ ॥ ॥ पपा समैया ॥ लक्स्पन लालके हायनकी परमा उभरोखी उदे लहरे है। त्यों लछिराम छटापट पीतकी मङ्गन चम्पई चारु करे हे ॥ शसक मन्द में हीरक-हारकी सेत भभीरी अमोखी मरे है। हामनमें गमयरे लिये मणि माणिक लालिमा चोखी परेश९३ रामचन्द्र भूषण। १०७ , ॥ बरवै ॥ मरकतमणिकी माला पहिरत राम । और श्यामता झलकति तन घनश्याम ॥ ४९४ ॥ ॥ अथ मिलितअलङ्कारवर्णन-दोहा॥ जहँ सादृश्य विलोकतहि, लखि न परे कछु भेद । अलङ्कार वर्णन करें, मिलित सुबुधि, बिनखेद ॥४९६॥ यथा सवैया ॥ गोल कपोलनपै जुलफ लसे, कुण्डल कानन बैस बहाली। पाग सुही सरच मणीनके, चारू चुनीनकी त्यों परमाली।। आनन यो लछिराम प्रकाशमें, सबिलास छटा रुखवाली। जानिपरे न सुनीशनहूको, भरथके ओठन पानकी लाली ॥ ॥ बरवै॥ करत शत्रुहन दानहि सुबरुनहार । मिलत चम्पई रंगमें बुधन बिचार ॥ ४९७॥ ॥ अथ सामान्य अलङ्कारवर्णन-दोहा ॥ जह पदार्थ सादृश्यमें, अनुमानत नहिं भेद । अलङ्कार सामान्य तह, परमानत बिन खेद ।। १९८॥ ॥ यथा कबित्त ॥ पम्पासरवर भोर पूजनसमैके हेत हरवर आये भरे शील त्यों चखनके । लछिराम रामचन्द्र चारु अनुशासनतें चहके चहूँषां चञ्चरीक हरखनके । अरुण अमन्द कल कोमल प्रकाशमान सौरभित सुन्दर प्रकाश परखनके । तोरत सजल पहिचाने न परत कौन कमल सुरङ्ग कौन कर हैं ल- वनके।। ९९ ॥

१०८ रामचन्द्र भूषण। ।। परवे॥ गङ्गधार मुकताइल परसत राम । परखिजात नईि केहूं जग अभिराम ॥ ५००॥ ॥ अथ उन्मीलिप्तमलंकारवर्णन-पोहा ॥ मिलित विपैमें मई फुरे, भेद कछूक प्रमान । उन्मीलित भूषण तहों, वरणत कलानिधान ॥५०१॥ ॥ यया कविस्त । पावन परम गङ्गपारा सो मुरूप राजे परम प्रकाशमान श्वेत स्वच्छपटत । मोगरा चमेली कुन्द मालतीके माल गरे मङ्गलीक दूने अश रक्त दपटते ॥ कोतुफमें फल कुमारी मुनिवृन्दनकी हारी देरि हेरि लता भोटन कपटते । कढ़े मैथिलीके चाननीमें पहिचाने द्वार परनकुटीके परिम- लकी लपटते ।।६०२॥ ॥ परवे॥ सापन पन वन सोहें गरज समीर । सुन्तनसों पहिचानत गज रघुपीर ।। ६०३ ॥ ॥ अथ विशेपकमलफारवर्णन-दोहा ।। चशेपक सामान्यसों, ज. पिशेप पहिचान । त. विशेप पणन करत, प्रवीण मतिमान ॥५०४॥ ॥ पपा सपा ॥ झमें जैमीरनमें जकरे फरें सामुर्दे दिग्गमहको दिवाने । पूरे प्रयापदे मदके लछिराम धरानदलों सरसाने ॥ यारे महाचिकरारे विराट विचारे न देवनहू अनुमाने । मके मायनी रनि पटा गरजे ते मतद्ग परें पदिचान।।३.६॥

रामचन्द्र भूषण।
१०९
॥ बरवै॥
रामसङ्ग जब विहरत आनंद चार ।
छत्र हाथ पहिचानत भरत कुमार ॥५०६॥
॥ अथ गूढ़ोत्तरअलंकारवर्णन-दोहा ।।
साभिप्राय सुभाव जहँ, उत्तर दै परवीन ।
गूढ़ोत्तरवर्णन करें,जे कवित्त रसलीन ॥५०७॥
॥ यथा कबित्त ॥
बोल्यो बालिनन्दनसों बिहँसि गंभीर वैन, रावण महीप
भन्यो गरख अवासेमें । कैसे विरहानलज्वलित जुग तापसी
वै अङ्गद उतर दीने सुमति प्रकाशेमैं ॥ लछिराम आयो दूत
सङ्गी जिन अङ्गनतें परचे अँगारे विकराल रोष रासेमें । ताके
तनतापनतें शिखर त्रिकूट सब, रावरो नगर बन्यो बगर
तमासे मैं ।। ५०८॥
॥ पुनः॥
अङ्गदै विलोकि बोल्यो रावण बिहँसि कैसे बीर तापसीवे
कत बीरता प्रमानकी । जङ्ग मृगयाके बेझे बानर सुभट सङ्ग
लछिराम चतुरङ्गिनी त्यों यातुधानकी ॥ उतर गंभीर बालि
तरपन सागरमें आगर अमन्द ओज सीमा सुखदानकी ।
प्रलयभानु बजर गुमान जैतवार जाने रेखें परखेखें वन लख-
नके बानकी ॥५०९॥
॥ बरवै ॥
जङ्ग रङ्ग कत करि बिरही राम ।
सङ्गर तिमि दशकन्धर जिमि हरि बाम ॥ ५१० ॥

रामचन्द्रभूषण।
।
अथ चिनोत्तरमकारवर्णन-दोदा ॥
प्रश्नहि में उत्तर जहां, प्रथम भेद मतिसङ्ग ।
एक प्रश्न बहु उतरको, चित्रोत्तर विधि रङ्ग ॥ ५११॥
॥ यथा सवेया॥
पालिके नन्दनसों दशकन्धलग्यो कछुवूझन भाव गंभीर है।
सागर फेसे तर तपसी लिये सङ्गमें वानर भालकी भीर है॥
होरके तीखे त्रिकूटको मोज किती लछिराम रचे तदवीर है।
जोन जुरेगो निशाचरी सेनसों जालिम जूथपको महागीर है।
परवे॥
मेघनाद रनमण्डन वासषधीर ।
तासु गरव-हरको जग बजरशरीर ॥५१३ ॥
॥ द्वितीयवर्णन ॥ यथा सबैया ।।
सोयो शरासन शहरको किन,कोन लियो धनु त्यों भृगुनायों
कौन बध्यो मृगराजसों बालिको,कौनसुकण्ठदि कीनोसनायसों
राजसिरीको विभीपन भाल दे को लछिराम जित्यो दशमाथसों
उत्तर एकई पार दियो रचना सिगरी रघुनायके हायसो ११४
परवै॥
को मस-रक्षक दीनो मुनि सियरूप ।
माल मैपिली केदिगर गम अनूप ॥१५॥
॥ अप सूक्ष्मालंफारवर्णन-पोहा ॥
पर माशय मातुर बहो, मन अपने मनुमानि ।
शुभसम्पंग चेष्टा करन, सूक्षम भूपण ठानि ॥॥१६॥

रामचन्द्र भूषण
॥ यथा कबित्त ॥
शिखर त्रिकूट कोटिकलश निहारतमैं, हार दीने अंगद
सरोवर सजलके । लछिराम सहस बदन अवतारीके निसाने
रसवीरके नसामै मंत्र कलके ॥ फरकीले बाँहबल बदन
विशाल भाल भौहे चढी लालीमें प्रताप झलाझलके । हनू-
मानसोहैं तिरछेहैं लछिमनवीर, वानन बरेजे कई रेजेकै
कमलके ॥ ५१७॥
॥ पुनः॥
दाहे लङ्क रावण गरख चकचूर करि, अक्षयकुमारहि
पछारे पैज प्रनके । लछिराम कुशल प्रबोधि मैथिली त्यों तोरि
नाग सोधे राकस अभंग रण रंगके ॥धनुष बलित श्री विभी-
पण करन दीने चारुचित्रपट हनूमान श्याम घनके । पल्लव
जवासे बगराय दै कछूक तिन जुगल प्रवीण त्यों सम्हारे मौज
मनके ।। ५१८॥
॥ सवैया ॥
लक्खन पाती लिख्योगनिकै कह्यो दूतहि रावनको यह दीजो।
माँझ सभामें जो हारि मिल्यो लखतै भुज बीसऊंभाल पसीजो।
धावन हाथही फेन्यो सफन्दमैं याविधिसों लछिराम सुनीजो।
राखियो बन्द खुलै न कहूं खुले नाम कथा न प्रमाण गनीजो ॥
॥ बरवै ॥
मायावी शूर्पनखै लखि रघुनाथ ।
लखनहि चितये नासाश्रुति धरि हाथ ॥ ५२० ॥
॥ अथ पिहितअलंकारवर्णन-दोहा ॥
दुरी क्रिया परकी समुझि, प्रगटै जतन स्वभाव ।
भूषण पिहित प्रमान किय, परमिति पण्डितराव॥५२१॥

रामचन्द्र भूपण। , ॥ यया कभित ॥ मण्डित मनीन मण्डलित कलझापलीपे, नोरंग निसानेकी बनक परखनको । सलिसभाल भृकुटीनकी मरोरे मञ्ज, घनघोर बगर बनती हरखनको ॥ रामचन्द्र पीछे त्यों तिरीछे नैन कोरनकी, पूतरी पटेतीभाष भास्यो ना सखनको । शिखर सुपेलते अखाये लगवनको, सानमें विभीषण लखावत लखनको ।। ५२२॥ ॥ पुनः॥ सेनप सुषेण राव सुघर मुकण्ठ सोहें जामवन्त जालिम मितेया खलकनके । हनूमान भङ्गाद विभीषण विराटबीर, केसरी कुमुद नल नील पलकनके॥ लछिराम शत्रुहन भरत समर हारे, दल रघुवंशी वयते पलकनके । लखनै लखा- पत चखन रामचन्द्र येई लव कुश पारे गभयारे अलकनके ॥६२३॥ ॥परवे॥ हेरत सुपर मुकण्ठदि रघुकुलचन्द । हग मरोरि लवकुशपर मानवकन्द ॥२४॥ । अप ब्याजोक्तिमलफारवर्णन-पोहा ।। निज माफारदिको दुरे, कहे भोर परमानि । मलकार न्यामोतिको, याविधि कचिन वखानि ॥ ५२६ ॥ ॥ यथा सवैया॥ प्राङ्गण हो सदा पूजत शकरे वादे भयकर को नमें भानो । वेदविधानन होम हुताशने ब्रह्मके शासनहीं शुभठानो ॥

रामचन्द्र भूषण। ११३ क्षत्रिनके धनसों लछिराम सुमैथिली भूख तरङ्गहि भानो। बन्धन भीख न दीजै हमैं व्रत है कई वासरको परमानो।।५२६॥ ॥ बरवै॥ मशकरूप धरि हनुमत सुरसहि हेरि । विनयब्याजवर वातन ऐहौ फेरि ॥ ५२७ ॥ ॥ अथ गूढोक्तिअलंकारवर्णन-दोहा ॥ व्याजहिं पर उपदेश करि, परम चातुरी सङ्ग । अलंकार गूढोक्ति तह, वरणत कवि नवरङ्गः ॥ ५२८ ॥ ॥ यथा सवैया॥ खिले फूल हौ भोरघने बन बाग यौं स्वामिनीको परखाक्नेहै। लखि याविधि गौरिके पूजनको लछिराम हियो हरषाव है। पहिलेही मराल मयूर चकोर मलिन्दनको मडरावनेहै । हसि बोलि अली भली मैथिलीकी फिरि काल्हि इतै सँग आवने ॥५२९॥ ॥ बरवै॥ विहँसि कह्यो रघुनन्दन पावन बाग । एहैं फेरि सुमनहित गुरु अनुराग ॥ ९३० ॥ ॥ अथ बिब्रोक्तिअलंकारवर्णन-दोहा।। व्यंगसहित अश्लेष जह, रचना कवि शुभरंग । अलङ्कार विनोक्ति तहँ, बरनत प्रेमतरङ्ग ॥ ५३१ ॥ ॥ यथा सवैया ॥ लसे लाली भरे अरविन्द खिले भ्रमरावली सङ्गम साजतिहैं । लता चम्पई खञ्जन कीर कपोत सुकोकिल मन्द अवाजति हैं। लछिराम या अंश विदेह रची परसीली समीरते लाजति हैं। प्रभा पावन सौरम सङ्गसनी बनी बागमैं वागविराजति ५३२ रामचन्द्र भूषण। ॥ फपित्त ॥ मघवान मन्दर पछायो मेघनाद मोलि ख्याली कुम्भ- करण विराट रनवनमै । अपर कुमार कालदण्डऊ कतलबाज, चारु चतुरगिनी प्रभात प्रलेपनमें ॥ तापर त्रिकूट भन्पो सागर तरे को पार, लछिराम योग अश राम लछिमनमैं। रावरेसों रावण संपायो राजहंस पाज, यजर शरीर महावीर त्रिभुवनमें ॥५३३॥ ॥ अथ युक्तिअलंकारवर्णन-दोहा ।। मरम छिपाने कर किया, सग सुमति व्यापार। अलङ्कार त युक्तिवर, वरनत रस अवतार ।। ५३४ ॥ ॥ यथा सवैया ॥ रामकुमारको यो सुरूप सभागमें तोरत फूल कली है। त्यों लछिराम सरोजसे लोचन कोरन पारि प्रभा मचली है। चातुरीसों लतिकानकी मोट सँभान्यो सनी मलिकी मपली है। वागते यों अनुराग भरी सिय मन्दरी घूघट घालिचली हे५३५ ॥परदे ॥ सहमि सकोचनि हेरत सियमुख राम । मागे लखन तिरीछे पाग मराम ॥ ५३६॥ ॥ मय लोकोक्तिमलकारवर्णन-दोदा।। फहनायति नई लोकमय, लोक पचनपरमानि । झलार लोकोक्ति सई, परनत कवि सुखदानि ॥५३७ ॥ ॥ यया सर्वया ॥ जा रघुनायकी हेरि प्रभा शची शारदा पारवती मभिला । जापर शेप गणेश मद्देश निहारत वारत सिदिन लाखें ।

रामचन्द्र भूषण। तापतिकी पतिनी लछिराम सुता मिथिलेशकी ताजगताखें । रावण छोरि अनार अँगूर कहा फल फूल धतूरको चाखें५३८ । पुनः॥ जा महिमाको न गायसके चतुरानन शारद सौक सरूर पै । कोटिनको दिये राजसिरी अरु कोटिनको दिये धामन धूरपै तीनिहूं लोकनके शिरताज विराजै प्रभा लछिराम त्यों घूरपै । रावण राजसिंहासनै छोड़ि करै कोऊबैठक बेल बबृस्पै ५३९ ॥ बरवै॥ छोडि मानसर मञ्जुल लघु-सर जात। राजहंस तजि मोती काँकर खात ॥५४०॥ ॥ अथ छेकोक्तिअलंकारवर्णन-दोहा ॥ होत जवहिं लोकोक्तिमें, अर्थान्तरकी खानि। अलङ्कार छेकोक्ति तहँ, कविपण्डित परमानि ॥५४१॥ यथा सवैया॥ अङ्गद तैं बड़े बापको पूत है तापस पीछे क्यों जन्म गॅवावे । रावन जाने प्रभावन तैं कछू वासरमें लछिराम लखावै ॥ मैं विरतान्त कहा अपनो कहौं या उपखान तिहूं पुर गावै ॥ वैद वही जो हरै सब रोगन पालै प्रजा सोई राव कहावै ५४२ ॥ पुनः॥ तापस भेट्यो विभीपन जाय क्यों रावन या अनुमान अरै है । बोल्यो प्रहस्त प्रभावनतें रघुनाथको जानत जानिपरे है ॥ या जगमें उपखान प्रसिद्धि सही लछिरामकथा बगरै है। चौरको चोर सुजानै सुजान जतीको जती पहिचानि परे है। DDNAL रामचन्द्र भूपण। ॥ घरखे ॥ इन्द्रजीत रनफर्कश लखन सबान । भटको भट पहिचानत यह उपखान ॥५॥४॥ ॥ अथ धक्रोक्तिअलंकारवर्णन-दोहा ।। अर्थ फेरकी कल्पना, लेप काकुते ठानि। मलङ्कार वक्रोक्ति त,वरनत कपि गुणखानि ॥५४॥ ॥ यथा सवेया॥ झूमत सागर पार खड़े मदमाते मलिद फिरें मड़राये । त्यों लछिराम भशुण्डन शुण्डकों उचो करें भेरै आनंद भाये पूरे पले-घनसे गरजें लछिराम अतङ्क समा सरसाये । रावन कीजिये वारनको वली पारन श्रीरघुचीरके आये५४६ ॥ अप फाइफरि-यथा सधैया ॥ पायो निकूटको पासरमें हनूमान पली रघुवीर कलासे । दोरे निशाचर मारिवेको न परै कहुँ फन्द फांक हवासे ॥ छारके बोल्यो कुमार समीरको यों लछिराम छके हैं हलासे । मायई फेरि का दिनमें रि, फिरि ऐसे लँगू तमासे ५१७ ॥स्यमावोक्तिमलद्वारपर्णन-दोहा ॥ जातिस्वमाय स्वरूप गुण, दताकार परमानि । स्वभायोक्ति भूपन भलो, वरनि प्रत्यक्ष प्रमानि ॥५४८॥ ॥ सपा सपेया॥ कौशिला जन्म समे रघुनाथके मगल राशि महाफल पावे । भाल विशाल पर पुलके घस गानन आभान भोन ममाय।। नासिका मोरनि त्यो लछिराम फट अधगयटीको फरकाये । माधुरे रोदनके भग छोदन यचटछग्गी छपाय।५३९॥

रामचन्द्र भूपण। ११५ ॥ पुनः॥ ब्रह्मकी राशि प्रभा उपटी पर गोल कपोल कछू फरकोये। सॉवरो गात सोहात सबै मनि जोति की कौंधे जगामग जोये ॥ मोरनि भौहे मरोरनि भालकी आनंदवीज सबै डर बोये । कौशल भूपर श्रीरघुनंदन कौशिला सूपकीसेज सोय।।९६०॥ ॥ पुनः॥ चारै किती रतनावली थार किती मधुरे स्वर मङ्गल गावें । कौशिला आननचन्द निहारि चकोरनीलों उर आनंद छावें । साँवरे अङ्गनपै सिगरी लछिराम लरें मुकता बरसावें । मङ्गल गाय झुलाय सबै हरे रामलला सुख चूमनधा३।९५१॥ ॥ पुनः॥ भाल थली गभवारी लटैं कहुलागर सिंहनखी शुभ साजें। पीरे झंगा कर कडून हीरक राते खिलौननकी छवि छाजे ॥ त्यों मचलें मणि आँगन में लछिराम सुने बरहीन अवाजें । कौशिला हाथनसों पिछलैं भली रामलला पग पैंजनीबाजै९५२ । कबित्त ॥ बार गभवारे कन्ध कलित कपोलनपै, कठुला बलित ब- धनहा कण्ठ भायेहैं । पीरी पीरी काछनी सुरङ्ग उकसीली पाग इत उत हेरनि चपलगति ठाये हैं। जैतवार खेलि रघुवंशिन सो रणरङ्ग लछिराम छोर पटभुव फरकाये हैं ।राते पीरे तरकस धनुष हेरीरेवान रथ रघुनाथ सौहैं लव कुश आये हैं ॥५५३॥ ॥ पुनः॥ ऊपर परे हैं भालु वानर असुर कटे फरकत भूपर मतङ्ग मतवारे हैं। मड़रात बाजी विनवीरके वगर बाज ठौर ठौर ब- ११८ रामचन्द्र पण दिपले रुधिर पना॥ लछिराम अजवतमासे पलहीमें मचे हेरिखको फेरि मन खरके हमारे हैं। वनफल चाखि मैथिलीसों लव कुश भा अम्ब चलि देखे तखिलोने खेलि मारे।।१५॥ ॥वरवे॥ तरकस गते पीरे लघु धनुवान । खेलत मृगया टव कुश शिशुप नसान ।। ५५५ ॥ अप माषिक अलारपणेन-छोहा ॥ परनत भूत भविष्य मह, अरु प्रत्यक्ष प्रमान । अलङ्कार भाषिक तहाँ, अथनमत भनुमान ॥५५६॥ ॥ यथा कवित्त ॥ विहरत जैसे रहे शिखर लतान पीच पैसई चरन चिह्न थे- सपिलसत हैं । लछिराम ठोर ठोर गङ्गाके तरङ्गन में मजन किये त्यों हेरि हिय हुलसत है। सौरभित भूपर मुमन परना- सन के परम प्रकाश परिमल में बसत हैं । मैथिली लखन गम- चन्द्रको घरमराज आजलों चरित्र चित्रकूटमें ठसत है ५६७॥ ॥परदे॥ अवघराजसिंहासन जिमि सिप राम । कनकभवन में विदरत तिमि अभिराम।। ६५८॥ ।। अप उदासअलंकारवर्णम-दीदा ॥ अनुपलक्षित चरित जस, अधिकारी के संग। वरनत शुभग उदात्त कवि,अलंकार नव रग ।। ५५९।। ॥ यथा फवित्त ॥ कनक भवन रंगरापटी-शिखर फसे भानुरय संगमी चि । भान सुरवालाको । लछिराम हीरक मुकृप्त कलसायली पे, ११९ नकी तिलकों ॥५६३॥ रामचन्द्र भूषण। झूमि झूमि झेलत चकोर चन्द्रलाला को ॥ रतन सिंहासन महीप रामचन्द्रसौहैं जब जब सोर घोर घन मतवाला को । मेले सुद मोटै कोट कौशल कँगूरन ते तब तब चूमत मुरैले विज्जुमाला को॥५६० ॥ ॥ पुनः॥ वगर बगर नौरतन झरनासे झरै पङ्कित प्रवाह महा मद की नहर सों । लछिराम गाढे गढपतिनके गढदेस गरद मि- लावै गाजिगरब गहर सों ॥ राम रघुबीर गजरथके मतंग पाचे पदवी गजेन्द्र अमरेशके सहरसों । उन्नतभशुण्डै शुण्डादण्ड भरि भरि वारि छोडत फुहारे व्योम गंगकी लहर सों॥५६१॥ मारतण्ड मण्डलसो परमप्रताप जाको मण्डन भुवन भुजदण्डबल साजें हैं । लछिराम नारद महेश अलकेश द्वार शारदेश सहसबन लखिलानें हैं ॥ डगर डगर फिरै सुमन सरस फूले नगर बगरमें वधावरे सुवाजें हैं । कोटि पाकशासन सों परम प्रकाशमान रावरामचन्द्र ते सिंहासन बिराजें हैं५६२ कोकिल चकोर मोर गुञ्जरत भौंर माते राजहंस चाखें मुकताहलहिलक सों। फूल फलदलसों विटपलतिकावैलसैं- सौरतितमन्दमन्द मारुतझिलकतों ।। लछिराम जामें रचें गस मैथिलीके साथ रावरामचन्द्रजीकी चारुता चिलक सों। तीर सरयूके औध भूपर प्रमोदवन क्यानहो सिंगार त्रिभुव- ।। पुनः॥ ॥ पुनः॥

२१८ रामचन्द्र भूपण। हिचले रुधिर पनारे ।। लछिराम अजवतमासे पलहीमें मचे हेरिखको फेरि मन खरके हमारे हैं। वनफल चाखि मैथिलीसों लव कुश भा अम्ब चलि देखे तखिलोंने खेलि मारे।।५५४॥ ॥ परवे॥ तरकस गते पीरे लघु धनुवान । खेलत मृगया लव कुश शिशुप नसान ॥५५५ ॥ अप माषिक अलारवर्णन-दोहा॥ वरनत भूत भविष्य जह, अरु प्रत्यक्ष प्रमान । अलकार भाविक तहाँ, अयनमत अनुमान ॥५५६॥ ॥ यथा कवित्त ॥ विहरत से रहे शिखर लतान वीच वैसई चरन चिह्न ये- सपिलसत हैं । लछिराम ठोर ठौर गङ्गके तरङ्गन में मज्जन किये त्यों हेरि हिय हुलसत है। सोरभित भूपर मुमन परना- सन के परम प्रकाश परिमल में बसत हैं । मैथिली लखन राम- चन्द्रको घरमराज माजलों चरित्र चित्रकूटमें लसत हैं५५७॥ ॥परवे॥ अषधरानसिदासन मिमि सिप राम । कनकभवन में विहरत तिमि मभिराम॥६५८॥ ॥मष उदात्तअलंफारषर्णम-दोहा॥ भनुपलक्षित चरित जस, मधिकारी के संग। परनत शुभग उदात्त कवि,अलंकार नव रग ॥६५९॥ ॥ यपा कवित्त ॥ कनक भवन रंगरावटी-शिखर फैसैं भानुरथ संगमी मि भान सुरपालाको । लछिराम हीरक मुकुस फलसापली पे, विदान्यो हैं । रघुवंशभूषण प्रकाशमान त्रिभुवन बेर सेवरीके परमपुरुप परमानंद परमहंस ताडुका सुबाहु सुकताइलै शाखि विरद बगायो है ।। लछिराम बन्धनौरैया साँगरेमें बन बाँधि बन्ध सागरमें कटकस्तायो है। अन्धकार भारवंश शमुख तारिखको नाम रामचन्द्र विधि रावरो सँवायो है५७० वानर विराट वंशसुघर सुकण्ठ हित बालिके वधनको प्र- -प्रचण्ड वीर व्योम अनुमान है । लछिराम सूधो साधुरामको रामचन्द्रभूषण। ॥ यथा कवित्त ॥ ॥ पुनः॥ भाव परमाने है।कीने सुरसाके मान खण्डन अखण्डभुज परम परमदूत वाटिका उजारे दशकन्ध पहिचान है।छार कीने लङ्क हि लंगरते पछारे अछे केसरीकिशोर नाम याते जग जाने है ।। ५७१॥ ॥ वरवै॥ नाम लखन बर याते जगत जहान । लखत न दूजो रन भट आप समान ॥५७२॥ ॥ अथ प्रतिषेधालंकारवर्णन-दोहा॥ अर्थ फेर साधन करें, दरशित मुख्य अभाव । अलङ्कार प्रतिषेध को, यों वर्णत बुधराव ॥५७३॥ ॥ यथा कवित्त ॥ शङ्कर कमानौं न ताडुका सुबाहुबल कनक कुरङ्ग यान वगर विचारेको । वालिको न संहरन वेधन है ताल माल गरको सेतन सहारेको । खोलिये मरममन भरम नसरदूपन लिलाना करिडारेको। वान वरपन

१२०
रामचन्द्रभूषण।
॥षरवे॥
अवधनगरकी सुखमा भुव अवतश ।
उगर बगर म विहरत दशरथवश ॥ ५६४॥
॥ अथ अत्युक्तिअलङ्गारवर्णन-दोहा ॥
जहाँ दान वश वीरता, अकथित अद्भुत भाव ।
अलकार अत्युक्ति को, या विधि प्रगट प्रभाव ॥५६५॥
॥ यया कवित्त ॥
साज्यो दल सबल महीप रामचन्द्र धूम घोसाकी धमक
त्यों मतङ्ग फिलत हैं । लछिराम लाली चढ़ी धनुधर पीर-
नके फहरे निसान मारू वान अगिलत हैं ॥ दिग्गज कमठ
कोल वृषभ दपारे भङ्ग भारके भरमबारे पारे से हिलत है।
हारे लफवारे शीशपदन हजारे फेलि शेपफन फेनके पनारे
उगिलत हैं॥५६६॥
॥ पुन ॥
राव रामचन्द्र चतुरङ्गिनी तिहारी जप करत पयान मुंदि
भानुको उदोत है । गरजे मतङ्ग दीह दुन्दभी धुकार सुनि फू-
ल्यो न समात रघुवशिनको गोत है। लछिराम रजत पुरङ्गस्वर
यारनके पकनपलित सातो सागरको सोत है । फूटत पहार
टूटें पनविकरारे तव अन्धकार भारमई त्रिभुवन होत है५६७
॥घरये ॥
गज रय मणि मुकतादल रघुवर दान ।
राष अमर छसि रहन करत न सान ॥५६८॥
॥अथ निरुक्तिअपहारवणन-दोहा ॥
नाम योगते औरई, अर्थ कल्पना भाष ।
तह निरुक्ति भूपण फहत, जे प्रवीन घुघरा ॥ ५६९॥

श्रीअवतार शिरोमणि यों विरुदावली वेद पुरान सुनी मैं। रामचन्द्र भूषण। १२३ ॥ बरवै॥ लखन वान जब चलिहैं सोर बगारि । कल न परेगी कलपित ज्वाल निहारि ॥ ६७९ ॥ ॥ अथ हेतु अलंकार वर्णन-दोहा॥ हेतु होत क्रम सहित जहँ, कारन कारज साथ । प्रथमरूप परनन करत, या विधि जे गुणनाथ ॥ ५८०॥ ॥ यथा सवैया॥ सेवरी गीध अजामिलकी लछिराम कथारही फैलि गुनी मैं ।। कौल जवाहिरी सन्तनको कब लालकी चौकीकी मोलचुनी मैं। राम जो तें न गरीषनेवाज तो कौन गरीवनेवाज दुनीमैं ५८१ ॥ कवित्त ॥ जामवन्त जालिम सुकण्ठ शिरमौर आगे क्रुद्धवान केसरी सुखेन मुखलालीमैं । कुमुद कटाक्ष नल नील अंग अंगद के फहरे निसान आसमानलों प्रभालीमें ॥ घोरत बिभीषन हलाहल बताय भेदै लछिराम ख्यालभरे चाल मतवालीमैं। रावन मतंग मान रावरपै आवे चढ़े केसरीकिशोर रामलखन बदालीमैं ॥५८२॥ ॥ पुनः॥ दानी दीनबन्धु बरदानी शम्भु शारदेश पारस पहार हार जगर मगरको । ब्रह्मराशिमैथिलीश विजु घनश्यामसंग लछि- राम चायों फल झर त्यों रगर को अधम उधारिवेकी आनि बानि बाइबल बोहित विशाल भवसागर बगरको विरद गंभीर भानुबंश राम रघुबीर सांकरेसहायक है कौशलनगरको५८३

१२२
रामचन्द्र भूषण।
-
राम नागर संभारो आज रन विकरार कुम्भकरन करा-
रेको॥६७४॥
॥ पुन ॥
गोलको बनाययो न लायबो परारो धन देवन सतायो
न मारत घमण्डहों । गीपको न समर मुनिनकी न मण्डली
हो मुन्दरीसों खेलिवो न वजर अखण्डहों । लछिराम पीसों
मुजदण्ड विष दण्डनको तोरिनेके देत यो उदण्ड काल-
दण्डहाँ। रापन प्रचण्ड रामचद्रको न दूत माज मसुर
कुमुदपे प्रलेको मारतण्डहों ॥ ५७५ ॥
। परवेः॥
लखन हमें ना मानो रापन राज।
असुर पश गम ऊपर नव मृगराज ॥६७६ ॥
॥ अप विधिमलारवर्णन-दोहा।।
सिद्धि अर्यको साजिये, अर्थ फेरि मुखसाज
अलझार विधि परनि कहि, या प्रकार शिरताज ॥५७७॥
॥ यथा कवित॥
मानर म जाने ते हमारे भुज वीसपे परमप्रचण्डबल मन
वाज फरके । रापन सुभट राम लखने सराहों किमि प्रम-
जोति गजित सहायक अमरके ॥ कृषि लछिराम धूम धाम
की धमफलों में कादर ले कादर भगया हरपरके । मण्डित
भसण्डित विरपेरिघृन्दै हेरि विहसत सौ सङ्ग पण्डित
समरके ॥६७८॥

रामचन्द्र भूषण। १२३ " ॥ बरवै॥ लखन बान जब चलिहैं सोर बगारि । कल न परैगी कलपित ज्वाल निहारि ॥ ६७९ ॥ ॥ अथ हेतु अलंकार वर्णन-दोहा॥ हेतु होत क्रम सहित जहँ, कारन कारज साथ । प्रथमरूप परनन करत, या विधि जे गुणनाथ ॥ ५८०॥ ॥ यथा सवैया॥ श्रीअवतार शिरोमणि यों विरुदावली वेद पुरान सुनी मैं। सेवरी गीध अजामिलकी लछिराम कथारही फैलि गुनी मैं ।। कोल जवाहिरी सन्तनको कब लालकी चौकीकी मोलचुनी मैं। राम जो तें न गरीबनेवाज तो कौन गरीबनेवाज दुनीमैं ५८१ ॥ कवित्त ॥ जामवन्त जालिम सुकण्ठ शिरमौर आगे क्रुद्धवान केसरी सुखेन मुखलालीमैं । कुसुद कटाक्ष नल नील अंग अंगद के फहरे निसान आसमानलों प्रभालीमैं ॥ घोरत विभीषन हलाहल बताय भेदै लछिराम ख्यालभरे चाल मतवालीमैं । रावन मतंग मान रावरेपै आवे चढ़े केसरीकिशोर रामलखन बहालीमैं ॥ ५८२॥ ॥ पुन॥ दानी दीनबन्धु बरदानी शम्भु शारदेश पारस पहार हार जगर मगरको।ब्रह्मराशिमैथिलीश विजु घनश्यामसंग लछि- राम चायों फल झर त्यों रगर को अधम उधारिवेकी आनि बानि बाबल वोहित विशाल भवसागर बगरको । विरद गंभीर भानुवंश राम रघुवीर सांकरेसहायक है कौशलनगरको५८३ १२४ रामचन्द्र भूषण। ॥बरये॥ मेघनाद अपलोको लछिमन बाज । झपटे तुमहिं लवा करि सगर साज ।।५८४॥ ॥ द्वितीयहतुवर्णन-दोहा॥ वस्तु एकही अङ्ग जई, हेतु सकारज सङ्ग। हेतु अलङ्कृत दूसरो, भेद बरनि शुभरङ्ग ॥५८५ ॥ ॥ पपा कवित॥ भानवशभूपन कलशराजहंसन के परम प्रकाशमान राम जलपरके । परसत बारहों महीने दानधारा वेस हीरालाल मोती गम रथ गिरिषरके ।। लछिराम औरत न लागे देर काहू समे गरलपटाय दीन मण्डल निधरके। पारस पुरन्दरधुर- न्घर धरमवन्त चान्यों फल फलत कलपतरवरके ॥५८६ ॥ ॥ पुन ॥ कौशल कलस चारु चौदहों भुवनपति आरत फलपतरु पेसो कत पाठ में । मैथिली लखन हनूमान अमन्दादि सो लछिराम दूजो क्यों सभासद गनाऊं में ॥ असहन पीरके गंभीर ग्रह दोपनमें चारन ग्याग्न घिरद गोदराऊ में । दानी दीनबन्धु गवरेसों फोन रामचन्द्र जाके दरपार दोरि दरद सुनाऊं में ॥५८७॥ जन्म भूमि रतन सिंहासन कनक भौन मन्दिर महन्त महीपा उन धनीफेह । सीता राम टखन भरत शत्रुहन जस रछि- गम रामायन वानर मनीफे हैं ॥ राम गङ्गतीर परमानंद प्रमोदयन नामें तरु पेलि अमरापती पनीके है । दरशन ॥ पुनः ॥

अनुप्रास दै विधि रचे, छेकावृत्ता फेल ॥ ५९३॥ रामचन्द्र भूषण। १२५ सन्त श्रीअवध अनुरागिनते अब हम नानी के हमारे भाग नीके हैं ॥५८८॥ ॥ पुनः॥ नाग नर देव देवराज आभरन ऐसो पारस पहार दरबार कत जाँचों मैं । लछिराम लखन भरत शत्रुहन सोहैं बिरद- बितान मैथिलीके रङ्गराचों मैं ।। दानी दीनबन्धु बरदानि या गिरीश गौरि चौदहौं भुवनपै लकीर यह खांचों मैं । शिरताज राज महाराज रामचन्द्रवीर कौशलकलस है कलपतरु सांचों मैं ॥५८९॥ ॥ बरवै॥ लखत नैन रघुनाथहि होत सनाथ । रङ्क राव बनि बिहरत शुभगुनगाथ ॥५९० ॥ ॥ अथ शब्दालडारवर्णन-दोहा ॥ शुभस्वर चित्र विचित्रकी, रचनाबरनन वेश। इमि शब्दालङ्कार फिरि, वरनत चित्रप्रवेश ॥५९१ ॥ गत शब्दालङ्कारमें, छेकादिक अनुप्रास । पर प्राचीन नवीन मत, या विधि कियो प्रकास ॥ ५९२ ॥ आवृत्ति जहँ अक्षरनकी, आदि अन्त सह मेल । ॥ अथ छेकावृत्ति अनुप्रासवर्णन-दोहा । बार अनेकन कीजिये, आवृति दै द्वै बर्न । शनि छेकानुप्रास तहँ, आदि अन्त यकढन ॥५९४ ॥ आदि वर्ण आवृत्तिछेकानुप्रासवर्णन ॥ यथा कवित्त॥ चौर चारु भूधर भरत क्षितिपाल छत्र शत्रुहन सामुहें ma-MODEn-man रामचन्द्र भूषण। शरासन मुवेलेको । सुमन सुकण्ठ हनुमान हाथ मनिमजु व्यमन विभीपन विलास वगरेलेको । रङ्गराज मेयिली महीप रामचन्द्र राजें शासन ममन्त लछिराम लहरेलेको । परम प्रकाशन विलासन मलित सम्यो शुभग सिंहासन भवध मलखेलेको ॥५९५॥ ॥परथे॥ मणि मुकताइल वरसत धारिद घेश । शुभग सिंहासन सिय सँग रामनरेश ॥ ५९६ ॥ ॥ अन्तषषत्ति ऐफानुमासवर्णन-पयाफपित्त ॥ पदन सदन गुनगन परमाने ज्ञान सरसनि सिनि सवारो अवतारों में लछिराम धूम धाम लोचन सकोचन सुभोहनके सचिन धनुप रुख टारों में ॥ मैथिली अमन्द रामचन्द्र यों सिंहासन विलासन पगर औधनगर निहारों में । सौज श्रीमनोज कर भूपर अमङ्गलीक मडलीक मोजपर जलघर पारों में ॥ ५९७॥ ॥अप प्रत्याहमासवर्णन-दोहा ॥ फहुँ सरि घरन अनेककी, कतहुँ अनेकन पार । क आवृत्ति एफईकी, परने दोय प्रकार ॥ ५९८॥ ॥अपत्यानुमास मादिवर्णमनेफफी अमेफवारमापत्ति । ॥ पपा कवित॥ पारस पुरन्दर परमहंस परवीन, धरम धुरन्धर धनी त्यों धीर फल में । लछिनाम ललित लहेजे लाज लाइनमें, पिरद विशाल पगरेले घोहपलमें ॥ अषध भमर भमरापती अमन्द मोज, कामदकला है कमनीय करसलमै । मगलीक रामचन्द्र भूषण। १२७ मैथिलीलों मोहिनी न मण्डलमें राव रामचन्द्रसों न राजा रसातलमैं ॥५९९ ॥ ॥ अथ आदिवर्ण एककी अनेकवार आवृत्ति-यथा सवैया ॥ मानस मानमहेश मराल मिल्यो महावीर मनोरथ राजहै । मंगल मूरति मैथिली गम महातम मौलि मुनीन समाज है ॥ मोहनमंत्र-मई मुसकानि मनोहर माधुरी मौज सलाज मोद मन्यो मणिमन्दिर मौलि महीपति मण्डलको महाराज है ॥अथ अन्तवर्ण अनेककी अनेकबार आवृत्ति यथा कवित्त॥ खेले खर दूषन सिकार बगरेले जंग, झेले कुम्भकरन कुलेले अनरथके लछिराम लेकर कमान अगरेले छेले मान मेघनाद महिरावन समथके ॥ मेले बान रावन सुहेलेके भुजन फेले, रेले रंग रुधिर प्रकाश लङ्कपथके । कौनको पछेले ते न समर झमेले बीच, बाँकुरे बघेले अलबेले दशरथके।।६०१॥ ॥ अथ वृत्तिभेदवर्णन-दोहा॥ अक्षर माधूरज मिले, उपनागरिका साज । परुषा ओज प्रसादस्यो, सरल कोमलाराज ॥६०२ ॥ ॥ अथ उपनागरिका-यथा कवित्त ।। भानुवंश भूषनके भारी भुजदण्डनपै औरै आव छावै जमा जौहर जंजीरकी । चाखै चरबीनको चमकि चपलासी राखे चाह अलबेली गजराजनके भीरकी॥ कवि लछिराम ज्वालमालासी ज्वलित वार कीने पार जातिगढ़ी गजब गंभीर की। रुधिर तरंग छोही म्यानते बिछोही जोही रणरंग जालिम सरोही रघुबीरकी॥ ६०३ ॥ .

रामचन्द्र भूषण। । पुमः॥ कौशलकुमारके सिकारमें मजव धूम, वारपार फेलत मत भटभीर को। लछिराम सजिषे सहमि पन बन पीच, मन्दर दरीन दुई परिहरि धीर को ॥ भरना पराइ माघ चीते अधफारे परे, हरिन हजारे भरे गरद गभीरको। भेजा भाल रेजालों गिरत गज भूमें जब चलत ममेजदार नेजा रघुवीर को॥ ६०४॥ ॥ पुन ॥ माजि भलवेले राम रघुवंश भूपन के,कहर फुलेलम समीर अभिरत हैं। लछिराम जोहरी इसारे के असर पर वेस विजुरी लो दल बादरे तिरत हैं। शिखर मरोर लफ कोर कलंगीकी तेसो मण्डलित मोरमें कबूतरे पिरत हे । फरकीले फेन मुख मण्डित मजदार छेला धने धागन मुरेलासे फिरत ६०५१ ॥ पुन ॥ लखन सुदाहिने भरत पाम भागसो शत्रुहन सामुहें सिंगार गुनगय के । कवि लछिराम राम श्याम घन रङ्गपर वारों- भोज आगर मनङ्ग समरथ के ॥ बोलत नकीव नौल विरद झमेले दलवेले यालरपिलों प्रकाश राजपयके । सङ्ग लह- रेले रघुबशिनके मेले साँझ विहरत मौष मटवले दशरप के ॥६०६॥ ॥ पुन'॥ फतरें करे के हरीनके कहर बचें विचरन मन्दर पराइ यस दवके । लछिराम रग में कुरगन कतलयाम मीजुरीलों पेधक रामचन्द्र भूषण। १२९ अदान मैं गरव के ॥ करत कुतूहले किरातिनै कलान हेरि वारै कामकैवर सिकार मैं सजव के राव रामचन्द्रके लह- रवारे बानन ते गज मतवारे गिरें मारे से गजब के ॥६०७॥ ॥ पुन: ॥ करत कुरंगन की चौकड़ी चपल मन्द रंगदार वाजी वीर कौशल कुँवर को। लछिराम संग स्यों बकैती बरछैतनकी, आनंदअपार मैं सिकार भराभरको ॥ अरना बराह बाघ फारे अधफारे परे, फरकै महेश हेरि लोहूकी लहर को। कतर करेजा आँतरीनके लरेजा फोरि मनमथनेजालों वरेजा रघुवर को ॥६०८॥ ॥ पुनः॥ सहज सिकारमें सवार होत बाजीपर, सङ्गमें लखन रघुवं- । शिन झमेला के । वारे भीर भामिनी हरान गज गौहरके कन्द मूल फूल फल दल वागमेला को ॥ लछिराम गैडा मृग रायमृग मारेपर, बिहसें किरात गाय गुन लहरेला को । हह- लत भूतन अचल रजरेला जब चौनला चलत रामचन्द्र अलबेला को ॥६०९॥ ॥ पुनः॥ वारन वराह बाघ चीते चक,धेि गिरें अधफारे गैडनपै झमक झमेले की । कवि लछिराम धूम धामकी धमक धरा, अजब अतक भारी भटनके मेले की॥ धन बन मन्दर शि- खर चकचूर होत, धूरि तैं अंधेरी औरै बासरके बेले की ।

१३०
रामचन्द्रमा
पीथिन बगर फुफकारसी फनाली जय दगत धुनाली रामचा
अलबेले की ॥६॥
॥ मम परुपात वर्णन-यया कवित।।
घनकस घण्टा पोर उकिले मसंग मारू घाँसे की धमकसों
घरासल त्यों पस के । गब्बर गनीमनके गठदेस पारदसे क
ठिन करेजे पटपारनके कस के ॥ पट्टन मसुर पीर पन
पिछलाने सरें गजवके मारे गिरें कन्दराहू यस के। राम
रामचन्द्र चतुरङ्गिनी चमूके चलें उमाडोल मन्दर घराण
गढ़ मसकें ।। ६११॥
॥ पुनः॥
घाँस की धमक मास उकिले मतगन से, कराकर कमठ
कठोर पीठ फूटे ना । लछियम घसक मसक यों भयकर
में मंग से वृषभ की च्या लों मिति छूटेना ॥ हल चल होङमैं
सहसफन घर ढके, परराय मापने इलाहलहि घटे ना । राव
रामचन्द्र रायरेके दलभार फहू टकराप दिग्गज पगारद
टूटे ना ॥ ६१२॥
पुनः॥
उद्धत उमाद रामचन्द्र के शिकार पीच झूद वे तुरङ्ग
मक वागें वरमस हैं। लछिराम रोपे कमानके चदत मान
धन पन मन्दर अप्त तरणत है ।। मृगनपे मृग मृगराजन
मृगयण सफरपे सूफर छत्तीले रजत है। भपकटे गेंडनपे
अपफटे गजराम गरद उपेटे मातफेटे रजरत ॥६१३॥

रामचन्द्र भूषण।
॥ पुनः॥
करत कलोल क्रुद्ध कोटिन करौल सङ्ग बोलत नकीब
वानी विरद गंभीर की । उत ते लखन रिपुसूदन भरत बीर
खोपरी बिदारै मृगराजनके भीर की॥ छलबली चपल तु-
रङ्ग लछिराम तैसो, लहरें विगारें मृगमण्डलके धीर की।
कुण्डलित कोरै लहरेठी रङ्गदार फिरें, फेंटी आँतवारन
बरेठी रघुबीर की ॥६१४॥
॥ पुनः ।।
मण्डलित छत्र नीचे कुण्डलित मोरवारी अजब अटेरन
सिंगार भट भीर के। मृग मृगराज पै परत परवाज सम
बड़पन राखें रोष सागर गंभीर के ॥ लकासे लगामते
छलकि लछिराम हैरै मन्दर शिखर मौजें सुमन समीर के।
ललक छटासे पटे बाजके पटासे फिरें, नटके बटाले बाजि
राम रघुवीर के ॥६१५॥
॥ अमृतध्वनि ॥
सेना जब चतुरङ्गिनी महाराज रघुवीर ।
असुरसमर हित सजतबर सँगरत धनु धर बीर ॥
सँगरत धनुधर वीर विरद गम्भीरघलकत ।
गरजग्गजनि गंभीरजलधि जजीरच्छलकत ॥
टुट्टत विपिन सुकुट्टत अरिंगढ़ जुट्टत जेना।
फुट्टत गिरिवर छुट्टत खलमद लुट्टत सेना ॥ ६१६ ॥

रामपन्द्र भूषण।
॥ पुन ॥
समत चार चतुरङ्गिनी रामचन्द्र भूपाल ।
खल भल फैलत अमुरपुर छुट्टतगढ़ विकराल ।
छुटतगढ़ विकरालद्दश दिगपालइलकत ।
फुट्टत्त खलदल भालग्गज मतवालल्लटकत ।।
सग्गस्सुएन समीर लखन गम्भीरग्गजत ।
पजत नवल निसानस्सुभट कृपानस्सनव ॥ ६१७ ॥
॥ अथ कोमलापासवर्णन । यया कवित्त ।।
देव दशरथ रामचन्द्रकी छठीके दिन, फपिनपे कीने
मोज इसके हमारे से । लछिराम लालित रतन हीर होदे झूल
भरके भशुण्डरद मोलि विकरारेसे ॥ भननात और झन-
कारे लोप लङ्गरके परन गणेश भालचन्दन संवारेसे । गर
गजरारे वे गयन्द गजरप पारे, गुजरत गैल विन्ध्य परवत
पारेसे ॥ ६१८॥
॥ पुनः ॥
तन मन वारि त्रिमुवनको सिंगार मानि, लोचन मनिन्द
मैथिलीक देरि फरक । शारद सुरेश मलकेशअमरेश भाल,
भूपन तिलक जा परागसे निपरके ॥ लछिराम राव रामचन्द्र
के चरन चारु, मालीक मोजमान भानंद समर के । सौरभ
तरङ्ग सर मुगल मसीले राजें, रङ्गदार पारिन महान
मानसर के ॥६१९॥

रामचन्द्र भूषण।
॥ पुनः॥
सातौ सिन्धु सातों पुरी सातों रसातल स्वर्ग, सातों मुनि
सातों द्वीप सातों स्वर गाजे हैं । लछिराम दीनबन्धु अधम उ.
धारन त्यों,साँकरे उवारनके विरद विराजे हैं। वङ्का गढ़ लंका
बलि रावन गरव गारि, आरत सुकण्ठ विभीषन से निवाजे
हैं। राव रामचन्द्र अवतारके अतङ्कहीमें, चान्यों युग डंका
रघुवंशहीके बाजे हैं ।। ६२०॥
॥ पुन: ॥
मिलित महावर महीन मेंहदी के बुन्द बेषित नखनपर
जोतिनभलीके हैं। कवि लछिराम आँगुरीन पै अजब ओज,
सङ्ग सौज मौजमान चम्पक कलीके हैं।भानुवंश भूषन महीप
रामचन्द्र चख' सीरे होत हरि मनमोहन थलीके हैं।
पल्लव वधूक कोकनद मद गारे ठारे, जुगल जसीले पद
जनकललीके हैं ६२१
॥ पुनः॥
सङ्ग शुभ तरल तरङ्ग गङ्ग रङ्ग पी३, सन्त सुर सुजस
सुधाके सरवत सो । लछिराम जालिम जसीले भुजदण्ड हेरि,
असुर बिलात घनवन डरपत सो ॥ वारों अमरेश रावरे पै
राव रामचन्द्र, समता सँवारों कौन मन तरपत सो॥मालाकार
मन्दर महान देव मण्डलमें, मङ्गलीक मौलि तू सुमेरु
परवत सो॥६२२॥

रामचन्द्रभूषण।
॥पुन॥
दशरय देव देवि कोशिला सुकेकई त्यों सुमुखि सुमित्रा
शारदाके समतानकी । लछिराम जामवन्त अङ्गन्द मुखेन
आदि लकेश्वर सूरजमों विनय विधानकी ॥ चादी कर
गाय जस अवतश भोष मरमान मनमें अभय वरदान की।
श्रीगुरु समन्त स्यो भरत शत्रुहन मौलि, रामचन्द्र मैथिली
लखन हनुमान की ।। ६२३ ॥
पुन: ॥
मुनि मख राखि रूप गौतमी सवारि तोरे,शम्भुपनु व्याही
सिय सूरज मखारों में । पालि खर दूपन विधस हेस रावनके
रामेश्वर थापि सेत सागर प्रचारों में ॥ लछिराम तेही महा
राज रामचन्द्र पीर, त्रिसुवन मोलि छत्रपाल अवतारों में।
वानी देव मन्दर पुरन्दर महीको ऐसो, धरम धुरन्धर न दूसरी
निहारों में।। ६२॥
॥ पुन: 0
सम्पत समुनि वेद मक विधु माघौ मास, सित गुरुमा
वशी में पूरन प्रभासी को । बन्दीपन वंश रामहंस मानसिंह
द्वार, बिरद गषेया मन सबसविलासी को॥राजारापराने मर
दाने सममाने और, चरित अपार ब्रह्म पावन प्रकासी को ।
रामचन्द्र भूपन अवध अमिराम रच्यो लछिराम राम राम-
चन्द्र जसराशी को ॥ ६२५ ॥

रामचन्द्र भूषण। ॥दोहा॥ सतकवि सन्त गुनीनसों, विनय करत लछिराम । विगरो वरन सुधारि हैं, चरित समुझि सियराम।।६२६॥ रामचन्द्र भूषन पढ़ें, जो सप्रेम करि गौर । अलङ्कार समुझै द्र, रामचन्द्र शिरमौर ॥ ६२७ ॥ सुकवि रीझि हैं करि कृपा, तो कविता लछिराम । नतरु व्याजसों मैं रट्यो, श्रीसियवर को नाम ॥ ६२८॥ इति श्रीरामचन्द्रभूषण काव्ये लछिरामकविविरचिते अर्थ शब्दालकार व्याख्या सम्पूर्णम् शुभम् ।

जाहिरात। क्रय्यपुस्तकें-(भापा-काम ) रामरसायन रामायन-रसिकनिहारीत रसिफामिया सटीक राममिका सटीक पनि केशवदास प्रणीत काम्पनिर्मपमाषा भन्दबद (मिसारीपासक्त) मनहरण भन्दा कठिम (माउंकार ) वर्णन नगदिनोप [पनाकरमत नायकाभेद ] रसराम [ मतिरामात नायकामेर] रुक्मिणीपरिणय-महारान भीरपरामसिंहन ऐस मपीत मतिमा पक्लिास-निसमें सम देशांतरकी यात्रा भौर पे मुखको पुराने मग्म और मीने संटन किया है दोहा मपित्तोंमें (मुमाषित) रसतरंग सानमाफिमार्गी भनवरंगी पय कम्पगढ़ महाराममणीत भावपंचाधिका कविपदमाहव दिनेश पइछामाग (कौफिककामि भिसा) मुषिप्रवेश दूसरामाग साम्पवसमपानुसार मानवापरम्पकर्मधर्म पापसमंगरी माँशपचीसी (कपहार) मेमोहरमीकप्पगापन सापारणगोपनभिषि रामगठा समह (रामठीगा करनेणेको परमोपयोगी) भीपुरुष रागमनोहर (जीपुति गामे पोग्म मनन ) | रसवाटिफा-(भरकारपर्णन) .- -- .. +- M - - M H - -- - संपूर्ण पुस्तफा " पासूपीपय " मग है मंगाछीमिपे खेमराज श्रीकृष्णदास, "भीषेाटेश्वर" (स्टीम् ) पन्नाम लेतना-मुम्पाई

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Shri Ramchandrabhooshan

Author
Lacchiram
Title
Shri Ramchandrabhooshan
File name
Shri Ramchandrabhooshan
Text
OCR done
Citation
1960
Published
2011/09
Publisher
Bambai, Shrivenkteshvar Steem Press
Language
Sanskrit
Pages
154
Library
Acharya Shri Vinaychandra Gyan Bhandar, Jaipur
DLI number
314236
Barcode
99999990312370.00
Scanning centre
Banasthali University
Digital publisher
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