Bharatiya Vidya Bhavan Library, Mumbai
Dhanshasanam
Front matter
খামান্তিঙ্গার গা আবালিৰামলা মাল, নির্বিন १३ लोक २३ गुरुजन राजाका पाप नाश करते है २४ उत्तमद्विज पापार्जितद्रव्यको ग्रहण नहीं करते हैं ११ २५ पापार्जितदव्यदानसे दुर्गति मिलती है ३५ २६ 'पारसे दव्य कमानेवाला राजा मूर्ख हैं २७ द्विजलोग पापार्जित द्रव्यको इच्छा नहीं करते २८ पापी राजाका द्रव्य उत्तमपुरुष नहीं लेते इत्यएविधदानलक्षणम् ॥ द्वितीयोऽध्यायः २९ मंगलाचरण व प्रतिज्ञा ३० पात्रापानविवेकशून्य कर्मसंचय करते हैं ३१ दानसे सब वश होज.ते ३२ सत्पात्रदानफल १४ ४-५ ३३ शांतसचारित्र दाताओंको देखकर सब शांत होजाते हैं१४ ३४ दातारोंके भेद ३५ आपत्रदान निषेध ३६ मिथ्याटिदाननिषेध ३७ क्रोधी व शत्रुजारादिकोंको दाननिषेध ३८ दानधनसे पुण्यपाप कमाते हैं ३९ सम्यग्दृष्टिको जैन संघकी रक्षा करनी चाहिए १६ १२-१३ ४० दानसे किन २ उद्देश्यों की पूर्ति होती है ! ४१ सत्पात्रदानका माहात्म्य ४२ दान सुभोजन के समान है १३ सप भादिसातगुण क्षेत्रादिके समान है १७. ४४ संपात्रका आदर व अनादर करनेका फल १८.१९.१८-१९ १५ पांत्रदानसे दोषनाश और गुणलाम १९, २०, ७ विपर्यानुक्रमणिका ward २१ २१ २७ . 1. पृष्ठ श्लोक १६ दयादिगुण गंगानदी आदि के समान हैं . २० '४७ दानमें आदरभाववालेको क्रोधादिक दूषित नहीं करते २०. २२ '४८ पात्रप्रेमका फल २० २३ ९ सभी पात्र दानीके आश्रयमें आते हैं २४ ५० अनादरफा निषेध २५ ५१ दानके पांच दोप ५२ दानके गुणपंचक २२ इत्युत्तमपात्रसामान्यविधिः। तृतीयोऽध्यायः ५३ दानफे भेद .५४ चारो दानों में अभयदान श्रेष्ठ है २३ ५५ अमयदानका लक्षण २३ ५६ अभयदाता आदरणीय है २३ "५७ अभयदान परंपरासे मोक्षदायक है ५८ अभयदानका माहात्म्य २४ ५९ शरणागत शत्रुका रक्षण करना भी अभयदान है २५ ६० प्रकारान्तरसे भी अभयदान बतलाते हैं। ६१ अभयदानीको पाप पीडा नहीं देता है २५ ६२ राजासे अभयदान कैसे मांगना चाहिये ! २६१०-११ ६३ उद्धार करनेयोग्य चीजें १२ ६४ अमयदानके अनेक भेद १३ ६५ अभयदानसे ही श्रेष्ठ सुख मिलता है २७ ६६. अभयदानसे मिलनेवाले लाम २८ १५.२४ ६७ निर्दयतास होनेवाले फलको उदाहरणके द्वारा दिखाते हैं 11 दानशासनम् पृष्ठ श्लोक . - ६८ जीवे पालनेसे [रक्षणसे] होनेवाले लाभ ३२-३३२६-२७ ६९ दूसरे जीवोंको कष्ट देना पाप है .२८ ७० विघ्न उपस्थित न करनेका उपदेश ३३ ७१ उत्तम श्रावकोंकी रक्षा करनी चाहिये ७२ धर्मप्रभावनाका फल ३४-३५.३१-३३ ७३ जिनमहोत्सवमें सब देशोंसे जैन-बंधुओंको बुलानेका उपदेश .. .३५ ७१ जिनपूजनमें पीरके समान रहें . . . ३६-३७ ३६-३८ ७५ भावपूर्वक चैत्यालय जानेका फल ३७-३८ ३९.४० .७६ जाप देनेका फल ४२ ७७ भटोंके समान चतुःसंघका सत्कार करना चाहिये ३८ ७८ विनोंको दूर करनेवाला पिलोकमान्य होता है ७९ वैद्यादिके समान धर्मोत्सवमें प्रवृत्तिका उपदेश ४४ ८. शांतिसे कर्म जीतने का उपदेश १५ ८१ जिनमूनोत्सबके लिए कौन योग्य है ! :४६ ८२ पूजाके भेद ४० ४७-४८ ८३ संतोपपूर्वक पूजा करनी चाहिये ४९ ८४ जिनपूजन करनेवाले निर्मलपुण्यका संचय करते हैं ११.... ५० ८५ जिनपूजा को रोकना पाप ४२ . ५१ ८६ पापत्यागोपदेश ४२ ५२ ८७ पुण्योत्पादक कार्य करनेका उपदेश. १२ ४३ ८८ फकडीके समान धर्मका फल मठा होता है .५४ ८९ मव्य जिनपूजनसे अपनेको धन्य मानते हैं १३५५-५६ ९० फोई मेंढक के समान संसारगें सुख मानते हैं ९१ धर्मग्रमावफल है .
विषयानुनमणिका " पृष्ठ लोक .,६३ । २९२ जिनोत्सवादिमें एकाग्रचित्तको आवश्यकता ४४/५९ ९३ संयमियों के हृदयों कोधोद्रेक करनेवाला हिंसक है ५४ ८.६० .९४ साधुओंके चित्त विकार उत्पन्न करने का निषेध ४४ :- ६१ ९५ सजनोंकी धृत्ति कमल के समान है ४५. ६२ .९६ पापफा पश्चात्ताप करनेसे जैनी बनते हैं ९७ गर्यादिको छोडकर देयगुरु आदिकी सेवा करें १५ :६४ ९८ लोकमें पुण्यात्मा और पापीयोंकी प्रवृत्ति ९९ अस्थिर चित्तपाले पुण्यसंचय नहीं करते १०० कोई अहंकारसे विघ्न डालते है १७ :,६७ .१०१ उत्सबमें लोगोंकी प्रवृत्ति ४७ ६.८.६९ १०२ जन्मसफल करनेका उपदेश ४८७०.५१ १०३ मिनपूजोत्सबमें क्रोध मत करो ७२ .१०४ धार्मिकजनोंकी प्रवृत्ति ४९ -७३ १०५ धर्मार्थधनव्ययका उपदेश १०६ मिथ्याटि और सम्यग्दृष्टिका परिणाम १०७ देवार्थकके सत्कार करने का उपदेश १०८ जिनमंदिरमें वर्जनीय क्रियाएं ५१-५२ ७८.८० .१०९ जिनालयमें सम्यवृत्तिका उपदेश ५३. ११० जिनालयमें क्रोधादिक शांत करने का उपदेश ५४ ८२ -१११ आत्माको शुभकार्यमें ही प्रवृत्त करे ५४ ११२ जिनेंद्रचरणचर्चित पुगंधोदकादिको धारण करने का उपदेश ८४ ११३ धारण करने का प्रयोजन ८५ ११४ गंधोदकादिक भोगकी इच्छासे ग्रहण न करें १११५ शुद्धयादिके लिए गंधोदक लगाने का उपदेश, ५५ F :८६ दानशासनम् १५८ ५९ . पृष्ठ लोक ११६ देव व गुरुकी सेवाका उपदेश .८८ .११७ निर्दयी पापबंध करता है ५६ .११८ धर्मके अनुकूल परिमहकी रक्षा करमेका उपदेश ५७ ११९ पुरदेशादिको अपने अनुकूल बनानेका उपदेश ५७ १२० पापोपार्जित द्रव्य यर्जनीय है ५७-५८९२-९३ १२१ प्रकारांतरसे अभयदान .१२२ भूपशब्दकी निरुक्ति १२३ राजाका कर्तव्य ५९९६-९७ १२४ पुष्यहीन राजाको सजन धिक्कारते हैं १२५ राजासे अभयदानके लिए प्रेरणा करें। ९९ १२६ धर्मद्रोहीके घरमें शुभ क्रियायें घ लक्ष्मी प्रवेश नहीं करती हैं ६० १०० १२७ पापीमें बन्ध्याके समान शुभाचरण उत्पन्न नहीं होते हैं ६१ १०१ १२८ पुण्यपाप कर्मोकी महिमा ६१ १०२ १२९ अपने पिता स्वामी आदिकी निंदा न करें .१३० तीर्थकर गुरु आदिके निंदा करनेसे दुर्गति प्राप्त होती है ६२. १०४ १३१ मत्सरी राजाका जीवन संकटापन्न होता है। १३२ राज्यमें ब्रह्महत्यादिके रोकनेका उपदेश ६२। १०६ १३३ धाधधनिफे समान द्रव्य शुभाशुभ सूचक है १०७ १३४ याचकोको सन्तोषपूर्वक धन देखें १३५ शरणागत धीर भादियाँको धिक्कारनेवाला राना पापी है १०९ १५६ अभयदानमें विघ्न डालनेका फल दुःखदायक है ६४ -१३७ प्राण जानेपर भी धर्मको हानि नहीं पहुंचाने 4 .
विषयानुक्रमणिका १. . ७० . पृष्ठ श्लोक •१३८ जिनोत्सवमें विन डालनेसे तीव्र पापबंध होता है ६५ १३९ धर्म संकटोको दूर करना राजाका धर्म है ६५ १४० जिनधर्म प्रभावनामें विघ्न डालनेका फल ६६-६७ ११४-११८. १४१ दूसरेका धन अपहरण करने का फल ६७ , ११९ १४२ जिनपूजनार्थ प्रदत्तद्रव्यमें कम नहीं करें ६८ १२० १४३. जिनालय के लिये प्रदत्तद्रव्यका अपहरण न करें ६८१२१-१२२ १४४ जिनमंदिर आदि फोडनेका फल ६९ १२३. ११५ अल्पद्रव्य देकर मंदिरके माम खेत आदि को नहीं खरीदना चाहिए. ६९ १.१२९ १४६ धनिक रक्खे हुए गरीबोंके धनको नहीं ले. ७०, १२५ १४७ स्याश्रितप्राणियों की रक्षा करनी चाहिए १२६ १४८ भावरहितकायचेष्टा आत्मकल्याणकारी नहीं है ७० १२७ । १४९ धर्मसे उत्पन्न धनको धर्म कार्यमें ही लगाना चाहिए ७१ १२८ . १५० धर्मादिकी निंदा करनेवाले मोक्षके पात्र नहीं होते ७१ .१२९ . १५१ सद्गोत्री व जिनयोगियोंकी निंदा करनेका फल ७२.१३०-३१ ; १५२ कामार्थी व धनार्थियोंकी मित्रता किन २ से होती है ७२ १३२ १५३ क्रोधी के समान वेश्यागामी अहित कर लेता है ७३ १३३ १५४ गृहमें अकेली खीको नहीं रहनी चाहिए ७३ १३४ १५५ पापीके हृदय में गुरूपदेश ठहर नहीं सकता है ७४ १३५ १५६ अच्छे बुरे कार्य के लिए काल लब्धिकी आवश्यकता. ७४-७५ १३६-३७ १५७ गुरुक्रमोल्लंघनका निषेध १५८ निजवंशधर्मपरंपराको उल्लंघने का निषेध १५९ वीतरागी साधुओं को कभी कष्ट नहीं पहुंचाये: १४० १६० पंचमकाल में मुक्ति क्यों नहीं है !, '७६ १३८ : ८७ दानशासनम् पृष्ठ- लोक 4 - १६१ इस पंचमकाल में श्रावक लोग पुरोहित को ::किस दृष्टिसे देखते हैं ? ७८-७९ १४२-४५ १६२ जिनपूजकको आदर से देखनेका उपदेश १६३ पंचम काल में लोगों की प्रवृत्ति ८०-८१ १४७-४८ १६४ जिनालयमें कलह 'अभश्यमक्षणका निषेध ८११४९-५० १६५ पात्रोंकी निंदा करनेवाला डोंबारी होता है ८२ १५१ १६६ सज्जन हमेशा उपकार ही करते हैं ८२ १५२ १६७ मोही जीव सम्यग्दर्शन ज्ञान चारित्रसे भ्रष्ट होते हैं८३ १५३ १६८ नारियल के समान लोककी प्रवृत्ति होती है ८३ १५४ १६९ प्राचीन आर्थाचीन राज्यपद्धति । ८४ १५५-५६ १७ पूज्म सर्जनोंको राज्य में पीडा न देनेका उपदेश८५.१५७ . १७ रोजा सेवकोंको संतुष्ट रक्खें ८५ .१५८ १७२ स्वामी सेवक के धन को अपहरण न करें।८६-८७ १५९-६२ १७३ सेवकोंपर ईर्याभाव न करें १६२ १७४ सेंधकोंझा उपकार न करनेवाला स्वतः सेयक बन जाता है ८७. १६३ १७५ मृत्यको रक्षा करने का उपदेश १६४ १७६ परद्रव्यका हरण न करें ८८१६५.६६ १७७ चोरी से होनेवाली अवस्था १७८ जिनधर्म महान वृक्ष के समान है १६९ १७९ पंचखीसे मानहानि होता है ९० १७० १८० परखी गुरु-देव-धन अग्राह्य है १८१ देवव्यादिसे पुण्य नष्ट हो जाता है १८२.द्रव्यापहरणका फल ९१.९२१७३-७४ १८३:अत्यंत लोम से धन कमानेका निषेध ९३ १७९ . , ८८ ८.८९ १६७.१६८ ९० विषयानुक्रमणिका उदास न होवे पृष्ठ श्लोक १८४ न्यायोपार्जित धन सबको वृद्धिका कारण होता है ९३ १८० १८५ देने का संकल्प कर न देने का फष्ठ १८१ १८६ धर्मदव्य व दूसरों के अनादिक हरण करने का फल ९४ १८२-१८३ १८७ अन्य गृहमें भोजन करनेपर उसके बदलेमे कुछ देनेका विधान १८४ १८८ दत्तद्रव्य प्रहण करने का विधान ९५ १८५ जिनालय जीर्ण होनेपर धनवान् श्रापक १८६ १८९ जिनेंद्र व मुनींदोंकी प्रतिमा सविकार नहीं बना ९६ १८७ १९० प्राचीन आर्वाचीन काल में राजाओंकी स्थिति ५६ १८८ १९१. राजदरिमें मंडषचनादिका निषेध ९६.९७ १८९-१९१ १९२ धनान्ध लोगोंका व्यवहार ९७.९८ १९२-१९३ १९३ विष्न का फल तरक्षण मिलता है १९४ पापका फल विचित्र होता है ९७-९९ १९५-९७ १९५ग्नि से देश नष्ट हो जाता है १९६ अभयदान का फल अचिन्त्य है १०१ १९९.२०१ १९७ धु गरे मोहकी वृद्धि करनेवाले है १०२ २०२ १९८ मिथ्यावादिसे बचनेका आदेश १०२ २०३ .१९९ जो विधा सत्फल प्रद है उसीको पढना चाहिए १०३ २०० राजाको खजानेके समान पुण्यकी मी रक्षा करनी चाहिए १०३ २०५ २०१ अमय दानका फल १०३.१०४ २०६-२०७ २०२ पुण्य वृक्ष को दानसे बढानेका आदेश २०३ सम्जन लोग ऐसा विचार करें २०१ उपहार २०१ १०४ २०८ १०४.१०५२०९.२११ १०५ २१२ दानशासनम् १ १ ८ चतुर्थोऽध्यायः। दामशाला लक्षण पृष्ठ लोक २०५ मंगलाचरण व प्रतिज्ञा १०६. २०६ नवीन गृहसंस्कार २०७ पुराण गृहसंस्कार ३ २०८ सर्वथा आहार वर्जनस्थान १०७ २०९ मंगलगृह १०७ -५-७ २१० अप्रशस्त गृह १०८ २११ गुरुओके भागमन में सूतकियोंका कर्तव्य १०८ ९.१० २१२ देवगुरुओंके सेव्य वस्तुका नहीं खाना २१३ गुरुओंके भोजन स्थानकी अशुद्धिका फल २१४ चाण्डालादिके लिए जैनगृह प्रवेश निषेध १०९ १३-१४ २१५ पात्रदानके लिए अशुचिगृहमे नहीं ठहरे और उस का फल ११० १५.१७ २१६ गृहसंस्कार का विधान ११०-११११८-१९ २१७ साधुप्रविष्टगृह में भूतादि को पीडा नहीं होती है १११ २०२१ २१८ सुपात्रागमनसमय मे गृह की सजावट करें ११२२२-२५ २१९ पापी त्रियोंकी वृत्ति २५ २२० धर्म के लिए दाता और याचक दोनों नही है ११३ २६. २२१ पुण्यवती स्त्रियोंकी वृत्ति २२२ दानशालाकी पवित्रता ११५.१५ २८-३६ २२६ उपसंहार रति हामशानिधिः। ... २७:
विषयानुप्रामणिका पचमोऽध्यायः। पाप्रसेपायिधिः। पछ लोक १ २ ६ ८ १२० १२ २२४ मंगलाचरण व प्रतिज्ञा २२५ दानविषि २२६दानम २२७ देशगुण २२८ फाल्गुण २२९ उत्तमपात्रदानकाटमाम २३० मध्यम पात्रदान फारम २३१ शास्त्रकम २३२ विधिगुण कम २३३ द्रव्यलक्षण २३१ स्पृष्ट दोप २३५ पान २३६ नवधामकि २३७ प्रतिप्रह २३८ उपचासन २३९ पापपूजा २४० प्रणामादि चतुष्प २४१ भातार दोष २१२ भाहार सुदि २१३ सेवाफट २१४ मोक्षफट २४५ लोग अपना दम्य का दुरुपयोग करते हैं २४६ पुष्पसंस्कारके लिए प्रपन करें रति पासेवनविभिा १२० १६ १२१ १२१ १२२ १२२ १२३ २२ १२१२४.२५ दानशासनम्, पष्ठोऽध्यायः। द्रव्यलक्षण पृष्ठ. श्लोक १ १ २४७ मंगलाचरण व प्रतिज्ञा २४८ द्रव्यलक्षण २४९ द्रव्यगुण २५० अनुचित द्रव्य २५१ निषिद द्रव्य २५२ पर्युषित द्रध्य २५३ कारण २५४ निषिद्धआहार दत्तफल २५५ अनतिक दत्ताहारफल २५६ निषिद्धाहार २५७ दासपकहार २५८ नीचभांडपकाहार २५९ अनतिकपकाहार २६० सतावतमिश्रण २६१ कुलीननीचमिश्रण २६२ दुष्टोंके संसर्गसे धर्मनाश २६३ दासीपकाहारको फुललो दान न देखे २६४ गृहिणी पकाहार २६५ प्रशस्तदान २६६ उपसंहार १२६ १२६ ३ १२७ ४ १२७ १२७-२८.६.८ १२८ १२९ १२९. १२९ १२ १२९ . ५ १६ १६ . २० . १३२ २१-२३ १ विषयानुक्रमणिका १ २ ४ L सप्तमोऽध्यायः। पृष्ठ श्लोक २६७ मंगलाचरण २६८ प्रतिज्ञा २६९, धार्मिक लक्षण ३ २७० पाच प्रकार के पात्र २७१ पात्र भेद २७२ उत्तम पात्र १३५-३६६-१२ २७३ एकाकीविहारनिषेध २७४ गुरुसेवा १३७ १४ २७५ गुरु के प्रति कर्तव्य १३७-३११५.२० २७६ आर्यिकाओं के साथ मुनियोंका निवास निषेध १४० २१. २७७ एकाकीपिहारसे दोष . १४० २२ २७८ अभिमान निषेध १४१ २.७९ दीक्षोद्देश्य १४१-४४ २४.४० २८० दीक्षा के लिए अयोग्य पुरुष २८१ मिध्यादृष्टियोंसे धर्म की हानि होती है १४८ २८२ गुरुवोंकी हमेशा सेवा करनी चाहिए ५३. २८३ साधु भोजनसमयमे श्रापककी निदान करें १४२ ५४ २८४ दुर्जन अपनी दुष्टता कभी छोडते २८५ शिष्य आज्ञाकारी वधूके समान रहें १४९ २८६ सम्यग्दृष्टियोंके परिणाम २८७ पहिले सम्यग्दर्शन होता है २८८ क्रोधादिसे किन्ही २ के सम्यग्दर्शन नष्ट होता है।५२ २८०. व्यवहार सम्यग्दर्शन के अभाव में निश्चय सम्यग्दर्शन नहीं हो सकता है १४५-४७ ४१-५१. . १५०-५१५७-६२ १५१ १५२६५-६६ .
दानशासनम्' ७० ७४ १५५ पृष्ठ श्लोक २९० सम्यग्दृष्टि पुण्यसाधन के अभावमें भी मुक्ति पाते है १५२ ६७ २९.१ कोई २ स्वतः सम्यादृष्टि हो जाते हैं १५३ ६८ २९२ बहुतसे सम्यग्दर्शनसे च्युत हो जाते हैं २९३ भावभेदं से सम्यग्दर्शन के असंख्यात भेद हो जाते है २९४ निर्दोष सम्यादृष्टि मोक्षको प्राप्त करते हैं ७१ २९५ क्रोध सम्पग्दर्शनको नष्ट कर देता १५४ २९६ संसार महायज्ञके समान है १५४ २९७ क्रोधका अनिष्टफल २९८ प्राचीन और आर्वाचीन जैनोंमें अंतर २९९ क्रोध अश्वत्य आदि के समान पुण्यनाश १५५.५८ ७६-८१ ३०० स्त्रीविडम्बनमाइ, १५८-६१८२-८८. ३०१ मध्यमपात्र १६१-६२ ८९-९२ ३०२ मव्यलक्षण ३०३ मव्योंका कर्तव्य १६३ ९१ ३०४ जघन्यपात्र १६४ ९५ ३०५ मुनियोंके पांचभेद ३०६ परखीगृहप्रवेशनिषेध ३०७ मध्यमपात्र १६५ ९८.२९ ३०८ जघन्यपात्र १६५.६६१००.१०१ ३०९ अपात्रवर्णन १६६-६७ १०२.१०५ ३१० कुपात्रवर्णन १६७१०६-१०८ ३११ पुनः तीन प्रकार के पात्रोंका वर्णन करता है १६३ .
विषयानुक्रमाणिका पृष्ठ श्लोक ११० १६८ १११ १६८ ११२ १६९ १७० ११७ १७० ११८-११९ १७० १२० १७१ १२१ ३१२ कार्यपात्र ३१३ कामपात्र ३१४ पुन पञ्चविधमा ३१५ साधक ३१६ वैद्योंका स-मान ३१७ ज्योतिषियोंका समान ३९८ मत्रवादियोका सन्मान ३१९ दैवज्ञका स-मान ३२० सम्यग्दृष्टि नतिकादि भी पान है ३२१ शीलमाहात्म्य ३२२ उपसंहार अष्टमोऽध्यायः। दातलक्षणविधि । ३२३ मगलाचरण व प्रतिज्ञा ३२४ दासलक्षण ३२५ सप्तगुण ३२६ सगुणलक्षण ३२७ आस्तिक्यमति ३२८ श्रद्धागुण ३२९ तुष्टिमाह ३३० भक्तिमाह ३३१ साधुभोंका उपचार ३३२ नित्य अतिथि सकार करें ३३३ विज्ञान ३३१ कजस दाला १ १७२-७३ २-४ १७३ ५ १७३ १७४ १७४ ८ १७५ १७५ १७६ ११-१२ १७७ १७७ १५ ... दामशासनम् Anamnaram २९ पृष्ठ श्लोक "३३५ अलुब्धदाता १७८ ३३६ पात्रसेवाफल ३३७ उत्तमक्षमा १७९ ३३८ मृदुवचनमाह १८०' '३३९ शक्तिमाह • १८०-८१ २०.२१ '३०० दातृपात्रफलमा १८१-८२ २२-२६ ३४१ क्षुधा कैसी है १८३ २७ ३४२ मुनिगण आहार किसवास्त लेते हैं ३४३ भोजनके समय मौन क्यों धरना चाहिए -१८४ ३४४ मौनगुणमा '१८४ ३०-३२ ३४५ मौनका उपदेश १८५ ३४६ पतिव्रताके समान पुण्यवचनको ही बैठे १८६ ३४ ३४७ शाल ही बोलने सुनने योग्य है। १८६ ३४८ मौनधारी की सदा प्रशंसा करते हैं . १८६ '३६ ३४९ पाठान्तर १७. ३७ ३५० भोजननिषिद्धस्थान १८७ ३५१ दाननिषेध १८८-८९३९-४० ३५२ भोजनान्तराय १८९-९० ४१-४२ . ३५३ आहारके समय दया ३५५ निर्दोष तपस्त्री कल्पवृक्षके समान है ३५५ प्रतीकदानमाह १५६ पुष्पवृद्धि के लिए सदा दान पूजादि करते है '१९१-९२४७.४८ ३५७ फार्थ को विचार कर ही करना चाहिए १९२ ३५८ साधुवाँको दिल खोरकर दान देखें १९३ ४५ विषयानुक्रमणिका १७ पृष्ठ सोक १९४ १९५ ५७ १९७ १९८ ६२ ३५९ लोकरीति ३६. साधुसतर्पणमें बहाना ३६१ आहारमें पर्जन विषय ३६२ कठोर यचनकास्याग ३६३ आहारके समय यर्य मनुष्य ३६४ भोजन के समय और भी वर्य विषय ३६५ उत्तमदात्युगल लक्षण ३६६ प्रशस्तदात्री ३६७ पात्रप्रशंसा ३६८ पुण्यवती साची खी ३६९ दानकार्यमें पर्य:व्यक्ति ३७०-दानमें प्रशस्तव्याकि ३७१ सूतकी व माहारदान ३७२ स्वहस्तकर्तव्य ३७३ दानफल ३७४ आहार और भादर ३७५ पुग्यपापार्जन मनके अनुसार होता है ३७६दानमाहात्म्य ३७७ आपम्पयायिक ३७८ गुस्सया ३७९ वृक्ष कौन है: ३८. गुरेखासे पश्चाश्चर्य २८१ चतुकार में मुक्त क्यों होते हैं ? ३८२ पुण्यवान् दाता ३८५ पादानमें सपान १९९६४-६५ १९९ २०० ६७ २०० २०१ २०१-२ ७०.७२ २०३ ७३-७४ '२०४.५७५-७६ २०५ २०५ २०६ २०६ ८२ ८३ १८ । निशासनम्। . - ३८४ गुरुभक्तिफल २०७८४-८५ ३८५ उत्तमदाता २०७-८ ८६.८७ ३८६ सपानदानफल २०८-९८८-८९ ३८७ पुण्यस्मरूप २०९ ३८८ पुण्यकी प्रबलता २०९ ३८९ भक्ति विशेष २१० ९२-९४ ३९० अन्तरायफल १२११ ३९१ सुकृतीच पापीका जीरन ३९२ उपकार्यपान १२१२ ३९३ भक्तिफल १२१२। ३९१ देयपदार्थ १२१३.. .९९ ३१५ धर्मात्माओंका सत्कार २१५ १००-१०१ ३९६ दानफल १०२ ३९७ दातृवात्सल्य २१५ ११.६ ३९८ मिथ्यादृष्टि होनेपर भी सहकार २१६. १०४ ३९९ श्रध्दानफल ॥२१६२ १०५ ४०० बडे पुरुषोंको गाली नहीं देखें,२१६ । १०६ ४०१ कुत्तेके समान कृतज्ञ रहो २१७ ४०२ करणत्रपलक्षण '२१४ - १०८ ४०३ राजलक्षण या दातृहृदय २१८ ४०१ दातृवचन २१८ ४०५दातृकाय २१८ ४०६ तामसदान २१९ ११२ ४०७ गर्वित,दाता ३१९।। ११३ ४०८ मनुष्य कपि होता है २२१०० १२४ २१५ 4 - विषयानुक्रमणिका ४१९ राजसदान . पृष्ठ श्लोक १०९ मानी दातासे हानि r २२० , ११५ HINI २२०. ११६ ४११ साविकदान २२१ ११५ ११२ उत्चमादि भेद २२१.११८-१९ ११३ असीमव्यवहारका फल २२२ १२० ४१४ गर्वसे हानि २२२ १२१-२२ ११५ मनरहित दान २२३ १२३-२४ ११६ मनवचनरहितदान २२३.२४ १२५.२७ ४१७ भिन्नभावदत्तदान २२४. १२८ ४१८ त्रिकरणशुद्धिकी आवश्यकता २२५ १२९ १,१९ त्रिकरणशुद्धिपूर्वक दत्तदान । २२६ १३: १४२१ दाता.वेश्याके समान हो २२७ १३१ ४२१ पात्रानुसार द्रव्यपरिणमन २२७ . १३२ ४२२ पुण्यसे लोम नष्ट हो जाता है २२८ .१३३ ४२३. शूद्रामत्याग २२८ १३४ १२४ 8च्छूद्राहारप्रहण २२९-३० १३५-३७ .१२५ चातुर्य महत्व २३० १३८:३९ १२६ स्वर्गच्युतों का लक्षण २३११४०-११ .४२५ दाताओंका परिणाम २३२ १४२ १२८ पापियोंसे धर्म दूर रहता है। २३३ १४३ ४२९ याचकोंकी दुर्दशा २३३६. .१४४ ४३० याचकत्व महाकष्ट है २३३ .१४५ १३१ दाता धृति मादिगुणोंको धारण करें। २३४ १४६ ४३२ दान मौनसे देखें ४३३ दानरहित संपत्ति की निरर्यकता ११८ २३५ .११७ २३५।
पानशासनम् । . - . ॥ पृष्ठ लोक ४३४ मानवीयमनोवृत्ति २३६१४९:५० ४३५ दूसरोंको कर्ज देनेवाला कैसा होता है २३६' १५१ ४३६ परार्थीपहरणफल २३७ १५२. ४३७ नीचव्यवहाररयाग २३७. १५३ १३८ रणनीति २३८. १५४ ४३९ ऋणदोष २३८ । १५५ १४० मायाचारदोष २३८' १५६ ४११ दरिद्र . ..२३९' १५७ ४४२ विभाषमायसे युक्त युवती २३९ १५८ ४१३ धर्मविध्वंसिनी श्री । .. २३९ २५९ ४४५ बहानाबाजी करनेवाली स्त्री व उसके प्रकार २४०.१६०.६१ ५३५ पात्रानादर फल १४६ गर्भिणी अनादर फरें तो '२०१।१६३ ४४७ अर्ध अन्नदान २४२ १६४ १४८ क्रोधदत्तादार -२४२१६५-६६ ४४९ पंक्तिमेदकृतफल २४३ १६७ ४५० देवगुरुओंमें उदासीनता न करें २४३' १६८ ४५९ उपकारियों के प्रकार २४३.४४ १६९-७१ ४५२ दाताओंके प्रकार । २४४.४५१७२-७५ ४५३ मियादृष्टियोंको दान देनेका फल । २४६,१७६-७७ ४५४ भयप्रदत्तदान ।' . १२४६ १७८ ४५५ न्याघ्ररूपदाता ।। २४७ १७९ ४५६ दाताओंके और भी मद",'!..२४७-४८ १८०-८५ ४५७ पात्रदानादिकके लिए द्रव्यको कमी '२४८. १८६ ४५८ मिथ्याद्दष्टिदत्तदामफल 1ri. init२१९५०.१८५.९० . -- .
विषयानुक्रमणिका पृष्ठ रलोक . ४५९ दान देमेघालोंको रोकनेका फल २५०.५१ १९१९२ ५६० निमत्रणफर रोकनेका का फल २५१ १९३ ४६१ मिध्यादृष्टिको दयासे धो दान देणे २५१ ४६२ जनश्रावकको घरके बाहर नही तिमाये २५२ ४६३ अशिक्षित मि यादृष्टियोंको दान न दे २५२ १९६ ४६४ अपकारियोंको धर्म समझकर द्रव्य न देवें २५२ १९७ ४६५ गायकादियोंको पान समझकर दान न देखें २५३ १९८ ४६६ अपात्रदानफल २५३ १९९ ४६७ इद्रियवशकरनेवाले सयमियोको पोपे २५३ २०० १६८ वेश्याकी सगति पैसेवालों के साथ होती है २५४ २०१ ४६९ कुलाङ्गना के समान दाता उपकारियों की सेवा करें २५४ २०२ ४७० दुष्टकार्यो में उद्योग मत कर २५४ २०३ १७१ भन्यकर के समान दत्तपदार्थका प्रहण न करें २५५२०४-२०५ ४७२ परद्रव्यपर आक्रमण न करें २५६ २०६ १७३ जिनर्चित गध,उदक,पुप्पोको ग्रहण करें २५६ २०७ १७४ पात्राप्तिद्रव्यका स्पर्श न करें २५६ २०८ १७५ दत्तद्रव्यमहणनिषेध २५७ २०९.१० ४७६ दत्तद्रव्याग्रहणफल २५० २११ ४७७दत्तद्रव्यग्रहणफल ४७८ भ यदव्यग्रहणनिषेध २६०६१ २१४१७ ४७९ देवगुरुसेवाफट ४८० देवद्रम्पमहणार ४८१ प्रशसाहतदान . ३ २२० २१२-१३ २६१ २१८१५ २६१ २२० २६२ २२१ २२ दानशासनम्, M -- है - 17 पृष्ठ लोक १८२ निष्फलद्रव्य २६२ ૨૩૨ ५८३ देवादिद्रव्यहरण फल २६२ २२३ ४८४ स्मरणकर न देने काफ्ल २६३ २२१-२५ ४८५ लिखितादत्तदानफल २६३ २२६ ४८६ वचन देकर न देनफा फल २६३ २२७ ४८७ मर्यादा के भीतर न देना २६४ २२८ ५८८ अयोग्यधनप्रहणफल २६४ २२९ ४८९ उनी के फिफर बनते है २६४ ४९. विचारकर या पचन देकर न देने का पल २६१ २३१ ५९१ पुण्यपापमेद २६५ २३२ ४९२ दाताओंकी शक्ति देखफर याचना करें २६५ २३३-३४ ४९३ दाता के प्रति क्रोध नहीं करभेका उपदेश २६६ २३५ ४९४ सफलजीवन २६६२३६-३७ ४९५ प्रसादलक्षण २६६, २३८ १९६ पुण्यात्माओंकी वृत्ति । २६७२३९-४० ४९७ देव च ऋषिसचाफल २६८ २४१ ४९८ देव व गुरु धादिा के प्रति दुर्घचननिषेध २६८ (२४२ ४९९ अन्योंसे द्वेष करने का निषेध २६८ २४३ ५०० अन्यत्री गुणरक्षण २६९ २४४ ५०१ पापरतोंकों.सुख नहीं मिलता है २६९ २४५ ५०२ केवल्यादिको निंदाका निषेध २६९ २४६ ५०३ देवगुरुके प्रति विघ्न न करने का उपदेश २७० २४७ ५०० विधिकी विचित्रता .५०५ धर्म कार्य में विघ्न न करने का उपदेश २७ ७३२४९-५३ ५०६ उपसहार २.४ २५४ - स विषयानुक्रमणिका . . +- + " नवमोध्यायः। औषधिदानविधानम् पृष्ठ लोक ५०७ मंगलाचरण व प्रतिज्ञा २७५ १ ५०८: उत्कृष्टजैन २७५ 46९ वात्सल्यगुण ५१० योगियोंकी प्रकृति के अनुकूल आहार देखें २७६ ५११ आदरगुण • २७६ ५१२ आदर न करनेवाला मूर्ख मिथ्यादृष्टि है २७६ । ६ ५१३ साधुओंको औषधि देने की विधि २७७ . ७ ५१४ प्रारमक्तादि औषधसेवम फलं २७७.. ५१५ अन्तरमकादिफल २७८-६९ ५१६ भोजन समय २७८. . १० ५१७ भोजन विधि २७९ २१-१२ ५१८ औषधि दानफल २८०.२८११३-१४ ५१९ पात्रनिंदासे रोग दूर नहीं होता है। २८१ १५ ५२० दुष्टजन २८२ १६-१७ ५२१ उपसंहार ..२८३ १ दशमोऽध्यायः। शानदानविधानम् ५२२ शास्त्रकी निरुक्ति ५२३ शास्त्रका महत्व, -२८४ २ ५२४ धर्मक्रियाओंफी सिद्धि २८४।३ ५२५ केवलहानकी सिद्धि ५२६ मिध्याज्ञाननाश ५२७ शास्त्रप्रकाशन .. .. : '२८ . १४ २८५ .५ २८५ ६ पीनशासनम् ArranAAAAAAAAA । . ++ पृष्ठ लोक ५२८ ठोकाया उपकार २८५ ५२९ लोकका उद्धार २८६ ५३० शाखप्रतिष्टा ।। २८६ । ९-१० ५३१ शानदानफल २८६-८७ ११.१३ ५३२ पवित्रकार्य में धनव्ययका विचार न करें २८७१४-१५ ५३३ विनयका महत्त्व २८८ ५३४ शाखपटनयोग्यस्थान २८८ ६१७ ५३५ पुस्तकादिदानफल २८८ १८ ५३६ गुरुमक्तिका फल २८९ ५३७ सज्जन कमी शास्त्राध्ययन छोडते नहीं ५३८ पुत्रका अज्ञान दूर करने का उपदेश २८९ २१ ५३९ शास्त्रदानफल २९० :२२ ५४० जिनबिम्यपूजाफल २९० ५४१ साधुसेवाफल २९१२४-२५ ५१२ अल्पानल्पगुणियों की पूजा '. २९१ “२६ ५४३ अल्पानल्पज्ञानियों की पूजा २९१ १२७ ५४४ व्यसहायसे विद्वानोंको तैयार करने का फल २९२ २८ ५४५ दान देते समय सजन प्रमाण नहीं करते २९२ २९-३० ५४६ दानहीन संपत्ति व्यर्थ है, ... २९३ ५४७ विद्वानोंका अपमान न करें '..२९३ ५४८ शास्त्र पटनेवालोंको इतर काममें लगानेका फल २९४ ५४९ प्रसिद्धगुरु का नाम लेना २९४'. ३५ ५५० ज्ञानसाधनापहरणफल २९४ ५५१ ज्ञानसाधनदहनफट -- २९४ ५५२ गुरुवोंके अपिनय का फल २९५ r 1 , ३५ . ।
विषयानुक्रमणिका २५ है। 11- - , .. - . ५० पृष्ठ लोक ५५३ अज्ञानी उस्ल् २९५ ३८ ५५४ आगमपर मलिनयनाच्छादनफल २९५ ५५५ अविनय फलो ', '२९६ ४०-४१ ५५६ साधुजनोंकी परोक्षमें निंदा न करें । २९६ ४२ ५५७ गुरुके प्रति क्रोधका निषेध २९७. ४३ ५५८ अन्यनिदाफल २९७ ५५९ मूखीका शाप कुछ नहीं कर सकता है २९८ ४५ ५६० गाली देनेवालोंके लिए प्रायश्चित्त नहीं है २९८. ५६१ विना शुद्धि के दान पूजा व्यर्थ है,। २९९, १६२ शास्त्रादि के प्रति उदासीन न हो २९९ ५६३ शास्त्रपठन निषिद्धस्थान २९९ ५६४ मूर्ख लोग विद्वानोंका अनादर करते हैं ५६५ शास्त्रोपदेशकके अभिप्राय का घात न करें . ५१ ५६६ उपदेशकोंके प्रति उदासीन नहीं हो ५२ ५६७ उदासीन लक्षण ५.६८ ८ विद्वानोंके अनादरसे होनेवाली दस बातें ५४ ५६९ अल्प वेतनका निषेध ५७० पुस्तकादिन्यासापहरणनिषेध ५७१ इस से ज्ञानदर्शनावरण कर्मका बंध होता है ३०२ ५७ ५७२ मिथ्यादृष्टि ५८ ५७३ कलिकालमें शास्त्रस्वाध्यायको दशा ५७४ मायाचारसे ज्ञानादि गुण प्रकट नहीं होते हैं. ३०३. ५७५ दुराचारी विद्वानोंको कध-देते हैं। ५७६ जिनागमको रक्षा करो ५७७ उपसंहार 'इति शास्त्रदानविधानम् । .३०० ३०१ ३०२ ३०३.. ..५९ . ३०१.६२ । दानशासनम् ७ .- एकादशोऽध्यायः। भावलक्षण विधानम् । पृष्ठ लोक ५७८ राजाके समान पुण्यपरिकरोंको मिलाना चाहिए ३०५ ५७९ दुटोंके हृदय में जिनमुनि आदि के प्रति दया भाव नहीं रहता ३०५ २ ५८० जीवोंके परिणामभेद ३०६ ३.५ ५८१ कोई ककडीके समान परिणामयाले होसे है ६ ५८२ कोई कचरियाके समान होते हैं ३०७ ५८३ कोई जम्बूफल के समान होते है ३०७.३०८ ५८४ कोई कंधे के तुल्य होते हैं ५८५ कोई जलौक के तुल्य होते हैं ५८६ कोई कुत्ते के तुल्य होते हैं ३०९१३-१४ ५८७ कुत्ते के समान तज्ञ बनना चाहिये ५८८ कुत्ते के समान नीच दोषोंको ही प्रहण करते हैं ३१० ५८९ कोई भेडियेके तुल्य होते हैं ५९० कोई मत्स्य के समान हिताहित नहीं सोचते ५०.१ आपसमें द्वेषभाव नहीं करें ३१० ५९२ कोई वेश्याके तुल्य होते हैं २० ५९३ कोई मासलोभी मछली के तुल्य होते है ५९४ कोई कार के समान होते हैं ૨૨ ५९५ कोई जमीन खोदनेवाले के तुल्य होते हैं २३ ५९६ कोई चंदरकै सदृश ससारमें घूमते हैं ५९७ कोई मयूर के समान मदकपायी होते हैं २५ ५९८ हिंसाको सुनकर सज्जम भाग जाते है २६ ५९९ कोई कुत्तेके सदृश सम्जनासे ईर्या, करते हैं ३१२ २७ विपयासुक्रमणिका 4 पृष्ठ श्लोक ६०० कोई परोपदेशमें पंडित होते हैं ३१३ ६०१ कोई बैलके तुल्य होते हैं ३१३ ६०२ कोई पिंगलके तुल्य मिष्टयचनी होते हैं ३१३ ६०३ कोई चिकोडतुल्य होते है ६०१ कोई सिंहके तुल्य पाप कमा लेते हैं ३१४ ३२ ६०५ कोई संफेतादिस प्रणाम करते हैं ३१४ ६०६ कोई बिल्ली के तुल्य हिंसातुर होते हैं ३१४ ३४ ६०७ कोई हिंसानंदी होते हैं ६०८ कोई कर्म के तुल्य भ्रमण करते हैं ६०९ पापी उल्लू के तुल्य धर्मको देखते नहीं ६१० कोई चूहे के तुल्य विवेकहीन होते हैं ६११ कोई कौवेके तुल्प मर्मभेदी होते हैं ६१२ कोई मनुष्योंका नाश करते हैं ३१६ ६१३ कोई तृणके तुल्य होते हैं ६१४ कोई गाय बैलफे समान स्त्री देखकर संतुष्ट होते हैं ३१६ ४२ ६१५ कोई बलात्कारसे परस्त्रीगमन करते हैं ३१६ ४३ ६१६ कोई बाह्यतपसे पापसंचय करते है ३१७ ६१७ कोई कैदीके तुल्य भोगकी इच्छा करते हैं ६१८ दुष्टोंके लिये उपकार अपकारके लिये होता है ३१७ ६१९ कोई कर्मफल देता है, कोई नहीं देता है ६२० पापोदयसे प्राप्त संपत्तीको भोग नहीं सकते ४८८ ६२१ कोई दानादिमें विघ्न उपस्थित करते है ४२ ६२२ पापोदय होनेपर रंमाके तुज्य मृत्यको प्रग्स होते हैं ३१८ '६२३ कुत्ते के पेटमें घोके तुज्य पापियोंमें धर्म नहीं ठहरता है ४० ३१८ ..
'दानशासनम् पृष्ठ ऋोक ६२५ किसी को नीचसंगतिसे धर्मधारण की इच्छा नष्ट होती है ६२५ मिध्यादृटिम दव्यदान, भक्ति आदि से दर्शन, पुण्य नए होते हैं ६२६ कहीं २ मामकुंमके तुल्य धर्म नहीं ठहरता है .३१९. ५१ ६२७ योग्यस्थान को देखकर पुण्यचीजका यपन करें, ३१९: ५५ १६२८ अकार्यसे पाप धंध होता है ३२०५६ ६२९ पापकर पुण्य ३२०:५७ ६३० पुण्यकर पाप ३२१-५८.५९ ६३१ पापकर पुण्य ३२१,०६० ६३२ कोई पागल कुत्ते के सदृश होते हैं. ६२१- ६३३ कोई अंतराय करनेवाले होते है -३२२. ६२ .६३४ स्यामिद्रोहादिसे पापसंचय होता है ३२२- ६३५ जारादिकोंको दानादिक का निषेध ३२२. .-६४ ६३६ दाता की निंदा नहीं करें ६३७ द्रव्यको सत्पात्रमें देनेका उपदेश ६३८ परिप्रहसे मन सदा चंचल होता है ३२३.. ६७ ६३९ पुण्यप्रभाव से विष्न नष्ट होते हैं ३२४.६८ ६४० दर्शनचारित्ररहितज्ञान- ३२४.६९.७० ६४१ गुरुवोंकी अनुमति के बिना चारित्रपालन निषेध ३२४,३२५.७१-७२ ६४२ व्यर्थ अर्थ ६४३ विवेकीको पापचोर स्पर्श नहीं करते. ३२५, ७४ ६.१ सम्यग्दृष्टिको दोन समझकर याचक छोड़ देते हैं.३२६ ७५ .६४५ परिप्रहरक्षणतत्पर सदा अस्वस्थ रहता है ३२६. ७६ ३२२.
विषयानुक्रमणिका क लोक ६४६ याचितवस्तु न मिलो तो दाताको छोड़ देते हैं , ३२६, ७७ ६४७ याचकोंको लज्जा आदि नहीं रहते ३२७ ६४८ दुर्जनसंगतिसे सज्जन भी दोषी होते हैं १२७: ६४९ स्त्रियोंका वल्लभ कौन है ? ३२७ ६५० देवकार्यमें विघ्न डालने का फल ३२७॥ ६५१ छिद्रान्वेषो महापापी होता है .३२८ ६५२ देवस्थानादिसे द्रोह नहीं करें. ३२.८...८३ ६५३ पापीको प्रामाधिपस आदि प्राप्त नहीं होसकते .३२८...८४ ६५४ सम्यग्दृष्टिका आदर करनेका वचन देकर : उदासीन नहीं होवे ६५५ कंजूसका घर अपवित्र होता है ३२९.. .८६ ६५६ पुण्यक्षेत्रको स्पर्श नहीं करनेवाले सूतकी जन सचरित्र होते हैं ३२९ ६५७ पूजाके नामसे द्रव्यापहरण फल ६५८ स्याम्यादि द्रव्यापहरणफल ३३० ६५९ पात्रके बहानेसे द्रव्यापहरणफल ६६० पुण्यवान को पापकर्म आश्रय नहीं करते हैं ९२ ६६१ अशुभपरिणामसे पापासव ३३० ६६२ जनमुनियोंके समाधिभंगफल ९४ ६६३ पापभीर गुरुजनोंके आसनपर नहीं बैठते ३३१९५-९६ ६६४ सजन पापकार्य को त्याग दें ९७ ६६५ तपश्चरणसे मुख ३३२९८-९९ ६६६ आचरण के अनुसार फल ३३२ ६६७ स्वक्षेत्रको छोडनेवाला पापी है ६६८ मातापितादिकों की निंदाका फल ३३३ . ८७ ३३०
दानशासनम्
पृष्ठ लोक
६६९ स्वद्रव्यको छोडकर परंद्रव्यका अपहरण न करें ३३३
६७० देवव्यापहरणनिषेध
३३४ १०४
६७१ देयद्रव्यादिसे ईयां नहीं करें
३२४
६७२ देवदापहरणका प्रत्यक्ष फळ
३३५ १०६
६७३ पंचपापोंके त्यागने का उपदेश
३३५ १०७
६७४ शुद्धिकी प्रतिज्ञा
३३५
६७५ जिनधर्म के अपवादको दूर करें ३३६ १०९-१०
६७६ अविभक्तोंकी शुदि
३३६ १११
६७७ विभकोंकी शुद्धि
३३६-३९ ११२-२१
६७८ धनका उपयोग
३३९ १२२
६७९ शुद्धिविधान
१२३
६८० प्रघरचनाकाल
३१० १२४
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संपादकीय निवेदन. श्रावकोंका अनुदिनका कर्तव्य ज्या पं दत्ति है। जिस घर में दान व पूजाके लिए स्थान नहीं है यह घर नहीं स्मशानभूमिके समान है। जिस संपत्तिका उपयोग दानप्जा कार्यमें नहीं होता है उस संपत्तिका होना न होना बराबर है। इस लिए महर्षि कुंदकुंदस्वामीने आदेश दिया है कि दाणं पूजा मुक्खं सावयधम्म ण सावया तेण विणा । : • दान और पूजा ये दो ही प्रावकके मुख्यकर्तव्य हैं। यदि थापक कहलाकर जो दान और पूजा नही करें तो समझना चाहिये कि वह श्रावक नहीं है। लोकातिशायी पुण्यके कारणसे श्री त्रिलोकोप्रभु तीर्थकर परमेष्ठी सर्वलोकहितकारी अक्षयदानको देते हैं। जिसके द्वारा लोकका उद्धार होता है। तीर्थकरप्रभुके दरवारसे अधिक पुण्यसूचक स्थान दूसरा नहीं है। उसके लिए समस्त भव्यप्राणी तरसते हैं। जहांपर त्रिलोकी- नाय दाता हों और गणधरादिक मइदिक ऋपि पात्र हों वहांके दानका क्या वर्णन किया जाय । इसलिए आत्मकल्याणेच्छु सजनोंका कर्तव्य है कि उस अक्षयदानको देनेके सामर्थ्यको प्राप्त करें । उस के लिए अनेक भोंसे. आहारादि लौकिक दान देने का अभ्यास होना चाहिये। सारांशतः मोक्षमार्ग के लिए दानकार्यकी परम आवश्यकता है। इसके विना यह भव्य मुक्तिसाम्राज्यको सुखसे प्राप्त नहीं कर सकता है। संसार में परिभ्रमण करनेवाले प्राणियोंको स्वर्गमें जाकर कुछ काल . विश्रांति मिलती है और वहाँके जीव अपनेको सुखी मानते हैं। परंतु मनुष्य लोकमें जो विशिष्टदान देते हैं उससे प्रभावित होकर जब वे पंचाधर्य करने के लिए आते हैं तब वे देव अपने जीवनको विकारते है कि इतने सष वैभवोंकि होते हुए भी हम पात्रदान नहीं कर सकते -- - . ११)... है। केवल उपचारमाक्कि कर सकते है, मुख्यमति नहीं कर सकते है। इसलिए मनुष्यों का ही यह भाग्य है कि जहां पात्रदान देने की पात्रता है। ऐसे दुर्लम मनुष्यभव, इंद्रियपूर्णता, निरोगशरीर, कुल- जातिकी शुद्धि आदि साधनों को पाकर भी जो दानादिक सहकार्य नहीं करते हैं तो समझना चाहिये उनका संसार दी है। 1.:. इस प्रथमें चतुर्विधदानका सूक्ष्म विवेचन : किया गया है। श्री परमपूज्य विद्वान् तपोनिधि स्व. मुनिराज मुधर्मसागरजी महाराज वे स्व. धर्मवीर सेठ रावनी सखाराम, दोशी की प्रेरणासे इस प्रथका मैंने संपादन घ अनुवादन किया है। खेद है कि इस प्रथके प्रकाशन के समय दोनों. महापुरुप यहां नहीं हैं। परंतु - आशा है कि परलोकमें उनकी आत्मावोंको शांति होगी। ". । हमें इसके संशोधन के लिए दो ताडपत्र व दो हस्तलिखित इस प्रकार चार प्रतियां मिली थी। परंतु लेखकोंकी पासे चारों ही प्रतियां अशुद्धियोंसे भरी थी । तथापि हमने यथामति, आर्षाविरोधसे । इस कार्य का.संपादन, किया है। कहीं दोष नजर आवे तो उसे विद्वद्गण : सुधार ले वह दोष हमारा समझें । उसके लिए ग्रंथकारको भला बुरा,नकहें यह निवेदन है। ।। प्रथका । प्रकाशन अन्यधार्मिक- सज्जनोंके...सहयोगसे: श्री सेठ गोविंदनी रावजी दोशीने किया है। हमारे , मित्र पं.-"जिनदासजी शास्त्रीने प्रूफ “संशोधनके कार्य में हमें पूर्ण सहायता दी है.। इसलिए उन सब.सज्जनोंके प्रति हम कृतज्ञ है। 177 ' यदि दानकार्यमें उद्युक्त श्रावकोको इस ग्रंथका उपयोग होजाय तो हम अपना श्रम सफल समझेंगे । इति:- विनीत, I..। वर्धमान पार्श्वनाथ शास्त्री - - ( विद्यावाचस्पति .) : .. - . 17 . ग .
मा महर्पिवासुपूज्यविरचित दानशासनम् - मंगलाचरण यस्य पादाब्जसद्धाघ्राणनिर्मुक्तकल्मपाः ये भव्याः संति तं देवं जिनेंद्र मणमाम्यहम् ॥ १ ॥ अर्थ-- जिस भगवतके अक्षय अनंतगुणों के प्रदान करने में दक्ष ऐसे पादकमलोंके सुगंधको सूंघकर भव्यजन रत्नत्रयात्मक धर्मके पालन • करनेसे फर्ममलफलंकसे मुक्त होकर संसारपंकसे छूटते हैं ऐसे जिनेंद्र मगर्वतको मैं भक्तिसे नमस्कार करता हूँ ॥१॥ इस प्रकार क्षाचार्य पंथफी निर्विघ्नसमाप्तिके लिये मंगलाचरण कर आगे प्रतिज्ञाश्लोक कहते हैं:- अष्टविधदानलक्षण दानं वक्ष्ये न वारीव सस्यसपचिकारणम् । क्षेत्रोत फळतीव स्यात्सर्वत्रीपु समं सुखम् ॥ २ ॥ अर्थ-आचार्य परमेष्ठी प्रतिज्ञा करते हैं कि हम इस पंथ में दानविषयका निरूपण करेंगे। परंतु सामान्यदानका नहीं। जिसप्रकार , ठोफमें पानी बरसता है, वह सभी प्रकार भूमियोमें जाकर समी प्रकारको सायवृद्धिका कारण बन जाता है और जिस प्रकार सभी दामशासनम् . लियों में समान श्रेणीका सुख है, उस प्रकार हम दानका उद्देश नए रखना चाहते हैं, हेयोपादेयज्ञानसे युक्त दानका ही इम निरूपा करेंगे ॥२॥ ग्रंथोपदेश्य पात्र. शुद्धसदृष्टिभिः शुद्धपुण्योपार्जनलंपटैः । साई यादिमं ग्रंथं नेतरैस्तु कदाचन ॥ ३ ॥ . अर्थ-यह ग्रंथ पंचविंशति-दोषरहित शुद्ध सम्यग्दृष्टियोंको एवं पात्रापात्रके भेदको समझनेवाछे सप्तगुणों से युक्त होकर पुण्योपार्जन करनेमें तत्पर, ऐसे श्रावकों के लिये ही उपदेश देने योग्य है । अन्य दर्शनशानचारित्रसे रहित मिथ्यास्त्रियोंके साथ इस ग्रंथका विवेचन नहीं करना चाहिये ॥ ३ ॥ दत्वा द्वित्रिगुणं फरं च सकलां विष्टिं च कृत्वा मजाः। सव्यव्ययमात्तवानिचये सम्पफले निष्फले। प्रत्यन्दं बहुमुक्रियाः क्रमकृतास्ताभिश्च ताः कुर्वते । मुक्त्वा सत्क्रममुत्तमं मुखभुजी यांचंति जैनास्तथा ॥४॥ -प्रजाजन दुगुना तिगुना कर राजाको देते हुए एवं राजाकी अनेक प्रकारसे सेवा करते हुए अपनी खेतको फलवान् बनाने के लिये उसमें प्रतिवर्ष बहुत प्रयत्न करते हैं। फिर भी यह निश्चय ही नही रहता है कि उसमें सफलता ही हो । पूर्वाचार्यक्रमसे आया हुआ दान- पूजादिसे उत्पन्न सुखको छोडकर जैन भी उसी प्रकारके सावद्यजनित सुखको चाहने लगे हैं यह आश्चर्यकी बात है ॥४॥ . अर्थ- दानका लक्षण धर्मकारणपात्राय धर्मार्थ येन दीयते । यव्यं दानमित्युक्तं तद्धर्जिनपण्टितैः ॥ ५॥ 'अर्थ----आत्मीय सदोपार्जनके लिये, धर्मानुकूल गार्हस्थ्य धर्मके ३ मएविधदानलक्षण - . संचालन के लिये, अभयपरिपालन करनेवाले राजधर्मके पाटनके रिये, उपर्युक्त तीनों उद्देश्योंको सिद्ध करने योग्य पात्रोंके लिये जो द्रव्य दिया जाता है, उसे व्यवहार निक्षय धर्मको जाननेयाले विज्ञानी दान कहा है ॥५॥ दानका भेद सामान्यं दोपदं दानमुत्तमं मध्यमं सया। जघन्यं सर्वसंकीर्ण कारुण्यौचित्यमधा ॥६॥ भर्थ-दान सामान्य, दोपद, उत्तम, मध्यम, जघन्य, संकीर्ण, कारण्य और भौचित्यके भेदसे आठ प्रफारसे वर्णित है।॥ ६ ॥ सामान्यदानलक्षण राजा निजारिकृतसंगरवारणार्य । प्रस्थापित बलमिवावति सर्वमन्यः ॥ जैनोत्सवारिकृतविघ्नविनाशकेभ्यः सामान्यमुक्तमखिलं सुजनैः प्रदत्तम् ॥ ७ ॥ अर्थ--अपनी शत्रुसेनाको निवारण करनेके लिय प्रेषित अपने मित्र राजावोंकी सेनाको राजा जिस प्रकार बहुत आदर विनयफे साथ देखता है, उसी प्रकार जिनोत्सवमें उपस्थित होनेयाट विनोंको दूर करनेफे लिये साधर्मि माईयों के द्वारा दी गई सर्व प्रकारको सहायता सामान्यदान कहलाता है ॥ ७॥ पात्रभेदाननालीच्य जैनान्धर्मेक्षकानपि । सत्कृत्यानादिकं दत्तं दानं सामान्यमुच्यते ॥ ८॥ अर्थ-पात्रभेदोंका विमाग न करके, जिनोत्सवमे आये हुए नि- १ उक्तं च-मर्याद्ययंचको भूत्वाप्यवितुं स्वयलं सदा। दत्ते यथोवितं द्रव्यं दानं सामान्यमीरितं ॥
दानशासनम्
योंको एवं अन्यधर्मप्रेक्षकोंको सरकार फरके भोजनादिसे संतुर करना
सामान्यदान कहलाता है ॥४॥
दोपददानका लक्षण.
निजपापार्जितं द्रव्यं द्विजेभ्यो ददते नृपाः
तैर्नटा राजभिर्विमा दानं दोपदमुच्यते ॥ ९ ॥
अर्थ- राजा लोग अपने पापसे उपार्जित द्रव्यको ब्रह्मणोंको
दान देते हैं तथा उन पापोपार्जित द्रव्यस ये द्विज बिगड़ते हैं। इस
प्रकारके दानको दोपद् दान कहते हैं ॥९॥
उत्तमदानका लक्षण-
श्रीमाजजनेंद्रसाफल्यरूपधारिमुनीश्वरान् ।
सत्कृत्य दत्तमन्नादिदानमुत्तममीरितम् ॥ १० ॥
अर्थ--श्रीभगवान जिनेंद्र के साक्षात् रूपधारी दिगयर मुनियोंको
सरकार कर विधिप्रकार आहारादि-दान देना उत्तमदान कहलाता है॥१.
मध्यमजघन्यदान लक्षण.
दत्तं मध्यमपात्राय दानं मध्यममुच्यते ।
द्रव्यं जघन्यपात्राय जघन्यं दानमिष्यते ॥ ११ ॥
अर्थ-एकदेशवतवारी मध्यमपात्रके लिए प्रदत्तदन्य मध्पमदान
और जघन्यपात्र के लिए प्रदत्त द्रव्य जघन्यदान कहलाता है ॥११॥
संकीर्णदानका लक्षण.
जिनोत्सवसमाहूतपात्रापात्रादिकानपि ।
सत्कृत्य दत्तमन्नादि दानं संकीर्णमीरितं ॥ १२॥
अर्थ-जिनोत्सबके लिए निमंत्रित अर्थात् पंचकल्याणिकप्रतिष्टर
इत्यादि कार्योंमें बुलाए गए अथया जिनभक्तोंके विधाहादिकार्यों में
आमंत्रित पात्र, अपात्र आदिको योग्य उपचार कर आहार, वन, तांबूल
इत्पादिते साकार करना संकीर्णदान कहलाता है ॥ १२ ॥
अष्टविधदानलक्षण कारुण्यदानका लक्षण. रोगिणं निगळितं च बाधितं दण्डितं क्षुधितमपुपातितं । वहिपीडितमवत्यवेक्ष्य कारुण्यदानमिदमीरितं युधैः ॥ १३ ॥ अर्थ-रोगी, ग्लानी, बंधनबद्ध, दुःखी, दण्डित, भूखा, पानीमें गिरे हुए, अग्निमें जलते हुए मनुष्य को देखकर फरुणासे रक्षा करना उसे कारुण्यदान कहते हैं ॥ १३ ॥ औचित्यदानका लक्षण. जैनबंधुयुगसेवनातुरान्स्कंधवाहकजनानपि नीचान् । तर्पयेत्यशनी टिकाभिरौचित्यदानमिदमुक्तमाहतः ॥ १४ ॥ अर्थ-जिनेंद्र भगवंतकी सेवा करनेमें तत्पर नीच जात्युत्पन पल्लकी ढोनेवाले मनुष्योंका भोजन, तांबूल इत्यादिसे सत्कार करना औचित्यदानके रूपमें जैनाचार्योंने कहा है ॥ १४ ॥ यो राजा वधकोऽनृतो धनहरोऽन्यत्रीहरस्सस्पृहः । संतस्तद्विपयं श्रयंति न सदा नो विश्वसंतीह तं । तस्मै नो ददते धनादि च यथा तद्वद्गुणी धार्मिको । दावा दानफलान्यया खलु तथा रत्नानि भाग्यानि च ॥१५ अर्थ-जो राजा हिंसा करता हो, झूठ बोलता हो, परस्त्री और परधनफे हरण करने में आसक्त हो, लोभी हो, उस राजाके देशको सम्जन लोग आश्रय नहीं करते हैं और न उसे कोई विश्वाप्त करते है और उसे धनादिकसे सत्कार भी नहीं करते हैं। इसी प्रकार धार्मिक कहलानेवाले दानी मनघचनकायकी शुद्धिसे रहित होकर हिंसादिक क्रिया प्रवृत्त हो तो उन्हे दानका कोई फल नहीं मिल सकता है अपितु उसका ऐश्वर्य पापके कारण दिनप्रति दिन घटता ही जाता है ॥१५॥ १ यो दत्ते गायकादिभ्यः काले काले यथोचित । मात्वापवादभीया वा दानमौचित्यमीरितं ॥ - दानशासनम् कलिकालके राजा. टंका इव राजानः सुकृतशिलोच्चयविदारका एष स्युः। पुण्यं पहिजलमिव ते नंदीस्याभं विचिन्वतं पापं ॥१६॥ अर्थ-फलिफालके राजा टंकके समान होते हैं। जिस प्रकार टंक पत्थरको विदारित करता है, उसी प्रकार थे मी पुण्यरूपी शिलाको विदारित करते हैं। ये लोग कुएके जलके समान एय और नंदी जलके समान पापको अर्जन करते है अर्थात् थोडा तो पुण्य और बहुत पाप अर्जन करते हैं ॥ १६ ॥ भक्तद्वेपी खलमीतः सतृप्णो हितरुट्जरः । मोहवानाहितच्छो वा ज्वरी वा भाति भूपतिः ॥१७॥ अर्थ-पापोदयसे यह राजा भक्तोंका द्वेषी, दुर्जनोंका मित्रा लोभी, हितैषियोंका शत्रु, अज्ञानी एवं अपने अहितको चाहनेवाला एफ घरमस्त मनुष्यके समान रहता है ।। १७ ॥ और भी इसी चिपयको स्पष्ट करते हैं. यद्यद्वर्णानुसंक्रांतास्तत्तद्वर्णानुगामिनः । स्फटिका इव राजानी भासते गणिका इव ॥ १८ ॥ अर्थ-दुरदय के राजग वेश्याओं के समान होते हैं। जिस प्रकार स्फटिक जिस २ वर्णके पदार्थोसे घिरता हो उसीका अनुकरण करता है अर्थात् उसी वर्णसे दिखता है। उसी प्रकार कलिकाल के राजा जैसा रंग दीखें वैसे पलटते जाते हैं। राजावोंका हृदय . विश्वास करनेयोग्य नहीं है ॥ १८ ॥ दुर्भावास्सकपायाश्च कृतदानतपःफलाः । जीवा भवंति राजानः पापकृत्युग्यवर्द्धनाः ॥ १९॥ अर्थ-पूर्वजन्ममें जिन्होंने खोदै भाव और कषायोंसे युक्त होकर , अप्रविधदानलक्षण दान, तप इत्यादि किए हों, ऐसे जीव पापाभिवृद्धि के लिए प्राप्त पुण्य राना होकर इस भवमें उत्पन्न होते हैं ॥ १९ ॥ राजदेहका सामर्थ्य ये समतलसौषस्य भारमेव वहति ते । सारस्तंभा इवाभांति राजानः पापपुण्यकाः ॥ २० ॥ अर्थ-जिस प्रकार कोई मजबूत खंबै सातमंजिलको महलका भी भार धारण करने के लिए समर्थ होते हैं, उसी प्रकार राजदेह भी प्रजावोंके दुष्टशिष्ट व्यवहारोंमें योग देकर पुण्य-पापोंका उपार्जन करते हैं॥२०॥ आत्मकृतपुण्पशक्तिः स्वार्जितबहुपापभारवहनाय स्थात् । व्याघ्रस्य सर्वमृगपशुवधपटुता पापभारवहनायव ॥ २१ ॥ अर्थ-संपूर्ण प्राणियोको मारने में प्राप्तचातुर्य व्याघके लिए पापोपार्जन का ही कारण है, उसी प्रकार दुष्ट राजावोंके द्वारा उपार्जित पुण्य केवल पापभारको वहन करने के लिए ही होता है ॥ २१ ॥ ब्राह्मणशरीरका सामर्थ्य । रंभास्तंभा यया सोधभारमत्र व इति किं । विमा रंभीपमा रामपापभार वहंति किं ॥ २२ ॥ अर्थ--फेडेके वृक्षका खंभा क्या महल के भारको धारण कर. सकता है ? नहीं । इसी प्रकार क्या राजाफे पापके भारको साक्षण धारण कर सकते हैं? नहीं ।। २२ ॥ पोडशवर्णसुवर्ण मुरत्नसंकीलनोषितं नान्यस्मै । वोडं मुशाखभारं दक्षा विभा न पापभारं नैव ॥ २३ ॥ अर्थ-जिसप्रकार सोळहटंचका सोना रस्नोंको धारण करने के लिये योग्य होता है अर्थात् सुद्ध सोने में रन जडनेसे विशेष शोमा लाती है, अन्य 4
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दानशासन
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फापोंमें यह नहीं लिया जाता, इसी प्रकार ब्राह्मण भी शास्त्रोंके ज्ञान-
भारको वहन करनेके लिये समर्थ हैं। पापभारको धारण करने के लिये
यह योग्य नहीं है ॥ २३ ॥
शालिसस्योपमा विप्रा नित्यपुष्पक्रियान्विताः ।
राजानोऽद्विनिभास्तेषां तेऽघभार वहति किं ॥ २४ ॥
अर्थ--नित्य पुण्यक्रियामें संलग्न प्राहाण शालिसस्य (धान)
के समान है, राजालोग पहाड के समान हैं, इसलिये राजापोंक
पापभारको वे ब्राह्मण किस प्रकार धारण कर सकते हैं ? ॥ २४ ॥
शरस्त्वक्सारवन्न स्याच्छिाः खदिरवन च ।
काराचवन्न मंदारो विप्रो भूपालवन च ॥ २५ ॥
अर्थ-~जिसप्रकार लोकमें दर्भ बोसके समान नहीं हो सकता
है। सैजिनका पेड खैरके समान नहीं होसकता है। मंदारवृक्ष काराचके
समान नहीं बन सकता है। इसी प्रकार ब्राह्मण राजाके समान कभी
नहीं बन सकता है ॥ २५ ॥
कुदान स्वरुप.
पापार्पिसार्थदाता स्याद्राजा वेडान्नदातूंवत् ।
विमः पापार्थमादाता मृतिमेलि शुको यथा ॥२६॥
अर्थ-पापोपार्मित धनको दान करनेवाला राजा विषमिश्रित
बनको दान करनेवालेके समान है। उस पापधनको लेनेवाला ब्राह्मण
विषाहारपरीक्षित तोतेके समान मरणको प्राप्त करता है अर्थात् भ्रष्ट
होता है ।। २६ ॥
वस्त्रं कच्चरमनिदग्धमनवं भिन्नं नवं खण्डितम् ।
स्त्रीकोलासुभिरर्जुनं सकपटं सम्यक्परीक्ष्याधिपाः ॥
आहारादिसुभोज्यवस्तु सफलं दाने स्वमुक्तौ सदा ।
झुंजाना दुरितापितं धनमलं यच्छति चित्रं नृपाः ॥२७॥
माधिधदानलक्षण अर्थ-राजगण अपने भोगोपभोग में और बंधुयोधयोंके रक्षणमें भायंत सावधान रहते हैं । ये अपने परिमांगके लिए मधमा स्वजनों के उपयोगके योग्य, खर ब, अग्निसे जला हुआ, पुराना, नवीन अपितु खंडित, दीमक लगा हुआ, चूहेसे काटा हुआ ६८ १मम नहीं लेते हैं । चादीसे मिला हुआ सोना भी काम नहीं लेते हैं। आहारादि द्रव्योंको अपने तथा दूसरोंके उपयोगमें लेते समय अच्छी तरह परीक्षा कर लेते है । फिर भी आश्चर्य की बात यह है कि राजगण पापार्जित. द्रव्य दानमें देते है ॥ २७ ॥ प्रज्वलज्ज्वाळकं वन्दिमादाय स तृणालयं । दहन्दापयिता दानमेनोऽर्पितमिवावभौ ॥ २८ ॥ अर्थ---जो व्यक्ति इस प्रकार पापोपार्जिरा दम्यको राजासे दान दिलाता हो वह सचमुचमे जलती हुई अग्निको ले जाकर चाये मकान में डाल रहा है ऐसा समझना चाहिये ।।२८ ॥ कुदानफल. पूर्वापतोऽद्याता सहस्राधिका वहन् । शिष्टविपकुलद्रोहादाता गरछति दुर्गतिम् ॥ २९ ॥ अर्थ-शिष्टब्राह्मणोंके कुलद्रोही राजा पापार्जित धनको दान देकर पहिलेकी अपेक्षा भी सहसगुना पाप कमाकर परभयमें नरकादिदुर्गति को प्राप्त करता है ॥ २९ ॥ सहनशीलता. दृष्ट्वाशीविषदष्टदुस्स्थलमिदं पीत्वा विपं भो भिषक् । दत्वा क्ष्वेडहरौपधं विषमरं प्रोन्मूल्य मां रक्षतात् ॥ इत्यानम्रकृदृष्टिवन भव भी धर्माद्यानुरा-। वैवं वीरतरौ भवाविव सदा तेपामधीशामिव ॥ ३० ॥ अर्थ--आविषसर्पके द्वारा काटा गया मनुष्य दीनताको धारण -- दानशासन कर वैवसे जिस प्रकार कहता है कि " कृपानिधान वैद्यराज! मेरे ऊपर दया करके सर्पके द्वारा काटे हुए स्थलको आप देखकर तथा चूसकर विपहर औषधि देकर मेरी रक्षा कीजिये", आचार्य कहते है कि भो धर्मको जाननेवाले पुरुष ! तू उस प्रकार दीनता धारण न कर ! एक होशियार वैद्यके समान, रणभटके समान या सेनापतिके समान बनना सीखो। सारांश यह है कि कष्टकालमें भी दीनता धारण न कर धैर्यफे साथ उसे सहन करना चाहिये ॥३०॥ गायत्री दोपही यदुदितबलतो राजपापापितार्थ । स्वीकुर्वन्मयंदोपं हरति किल सदाध्यायता ब्राह्मणानां ।। विघ्नास्तस्थितापं तदितबलवद्दीनतायाचकत्वं । .' तज्ज फि हंति वंध्यातुजफलसदृशं नार्थिनां पुण्यदानं ॥३१॥ अर्थ-ब्राह्मणोंका गायत्री मंत्र (पंच नमस्कार-मंत्र ) सर्व दोषको दूर करनेवाला है । जिसके उदयसे यह . मनुष्य राजाके पापोपार्जित दोषको भी दूर कर सकता है। बडे २ विघ्न उससे दूर होते है । राजाके आश्रयको पाकर पापधन के लिए दीनता या याचकवृत्ति करनेमें कोई लाभ नहीं है। वह बंध्यासुतके समान कोई फल देनेवाली क्रिया नहीं है । इससे पुण्य लाभके बजाय पापका ही संचय होता है ॥३१॥ फलकच्छत्रकवचकरा इव दयालवः । निर्दोपाहारदातेव पात्रदातार उत्तमाः ॥ ३२ ॥ अर्थ-युद्धस्थानमें काममें आनेयोग्य ढाटकी मूठ, कवच, छत्रको तैयार करनेवाले जिसप्रकार दयालु होते हैं, जिस प्रकार निर्दोष आहार देनेवाला दया होता है उसी प्रकार निदोष पात्रको दयासे दान देनेवारे उत्तम दाता कहटाते है ।।३२ ॥ रजकाः फच्चरं क्षारादिविधिीमर्ययो । पूतं कुर्वति गुरवो रोजापं नाशयंत्ययैः ॥ ३३ ॥ .
भएविधवानलक्षण -- अर्थ- अर्थ-जिस प्रकार धोबी यस्त्रको मसाला, सोश इत्यादिस घोकर साफ करते हैं उसी प्रकार गुरुजन राजाके पापको पुण्योंके द्वारा दूर फरते हैं।॥ ३३ ॥ कि नीयफल्पिताहारमाहरनयुचमा यथा । तथा पापार्पितं दव्यं न गृहन्ति हिमोत्तमाः ॥ ३५ ॥ 4-क्या नीचकुलोत्पनोंके द्वारा पकाये हुए भोजनको उत्तम मनुष्य महण करते हैं ? नहीं। इसीप्रकार उत्तमद्विज -पापसे कमाये हुए द्रव्यको प्रहण नहीं करते हैं ॥ ३४ ॥ परवीनारसंधानकारिणं च यथा नृपः । सायं दापपितारं यद्यापयिष्यति दुर्गति ॥ ३५ ॥ अर्थ-धर्मात्मा राजा जिसप्रफार परस्त्रीलंपटी, अन्यायी, घोर इत्यादिको दण्ड देता है उसी प्रकार पापोपार्जित धनको दान देनेवाला ! राजा भी नरकादि दुर्गतिको प्राप्त करता है ।। ३५ ॥ पाळोप्यन्यधनादाने पापमित्युदित्ते सति । मुक्त्वा धावत्यस्पृशन्स पालामालोऽपि वस्तुहत् ॥ ३६॥ अर्थ--परपदार्थोफे प्रहण करनेमें तत्पर ऐसे बालकको मी यदि यह कादिया जाय कि छे ! यह परपदार्थ है इसफो प्रक्षण करना पार है तो वह उसको छोटकर दौडता है । ऐसी अवस्था पापाचरणसे द्रव्य कमानेवाला राजा वाटकसे भी अधिक मुर्ख है ॥ ३६॥ न वाच्छंति न श्रुष्वंति न स्मरंति यथा बुधाः। वाग्दत्तकन्या भूपाघदत्तं वित्तं तया द्विनाः ।। ३७ ॥ अर्थ-जिस प्रकार दूसराको वाग्दानपूर्वक दी हुई कन्याको उत्तम पुरुष इच्छा नहीं करते हैं और न मरण करते उसी प्रकार प्राहाण लोग राजाके पापोपार्जित धनके दानकी कमान करें॥ ३७ ।।
१२ दानशासनम् ग्राह्योर्यः सागसां राज्ञा नान्यैरन यथा तथा। धर्मापराधिनां देवपूजायोग्यो वुर्धेन च ॥ ३८ ॥ अर्थ-पाश राजायोका धन राजायोंके द्वारा ही ग्रहण करने योग्य हैं। अन्योके द्वारा नहीं । अथवा इस लोकमे धर्मापराधियोंश द्रव्य देवपूजादि कार्यमें लिया जा सकता है। अन्य उत्तम पुरुप उसे ग्रहण नहीं करें ।॥ ३८ ॥ इसन्दिए दाता और पानी प्रवृत्ति निर्दोष होनेपर ही दानको यथार्थ सिद्धि होती है । इत्यष्टविधदानलक्षणम् । १ चण्डांशोरवलोकनादिव जगद्धात्यंधकारैर्भूतं कल्याणं च सकालिक हुतभुजस्तापाद्यथा शुध्यति । तद्भानुहिमाशुकोटिसदृशप्रयततीर्थकर- धीपूजोत्सवसेवनोचितमिदं दुष्टेन दत्तं धनम् ।। किंच- सागसोर्थो नृपैस्सेव्यो न सेव्यो नृपसवकैः देवपूजोचित दीपि वित्तं नान्यस्य चौचितं ।।
दानविधिद्रव्यदासपात्रलक्षण :१३ +-+A1- . 'दानविधिद्रव्यदातृपात्रलक्षण. प्रणम्य जिनमास्त्रंतपज्ञानध्वांतभेदिनं । विध्यर्थपात्रदातॄणां वक्ष्ये लक्षणमुत्तमम् ॥ १ ॥ अर्थ--अज्ञानरूपी अंधकारको नाश करनेवाले जितेंद्रसूर्यको नमस्कार कर उत्तम दानको विधि, द्रव्य, दाता और पात्रका रक्षण कहूंगा । इस प्रकार आचार्य प्रतिज्ञा करते हैं ॥१॥ येऽन्यानन्यधनानि चान्यसुकृतान्यन्याधमन्यार्जितं । त्रैरत्नं परदृष्टिबोधचरिनं दुर्वृत्तमन्यस्य वा । दातारः समनुग्रहाय ददते दानानि चात्मक्षयम् पात्रापात्रविचारशून्यमनसः कर्माणि ते चिन्वते ।।२।। अर्थ-कोई पात्र अपात्रके विवेकरहित मनुष्य दूसरोंके प्रति अनु. महसे, दूसरोंके धनको, दूसरोके पुण्यको प्राप्त करनेके लिये, दूसरोंके दर्शन ज्ञान चारित्रको वृद्धि फैलिये, अथवा कुसंयमकी वृद्धिकेलिये, . या उनकेप्रति दया करनेकेलिये दान देता है परंतु वह सब पुण्यके लिये नहीं होता है उससे पापार्जन होता है ॥२॥ वैरं व्याधिरघं च नश्यति लसत्पुण्यं दया वर्द्धते । भूताः पंच वशीभवति रिपको मित्राणि के बंधवः सद्धर्मानुगुणास्सधर्मचरिताः के धार्मिकाः सदृशः शुदाः स्युर्मुरवी पे निजनिनेष्टार्थमदानेन के ॥ ३ ॥ अर्थ--इस लोकमें समस्त प्राणियोंको उनके मनोनुकूल इष्ट १. दानेन तिष्ठति यशांसि लोके दानेन भोगाः सुलभा नराणाम् दानेन यदया रिपवो भवति तस्मासुदानं सततं प्रदेयम् ॥ दानेन भूतानि वशीभवंति दानन राप्यपि यांति माशम् परोपि बंधुलमुपैति दानाहानं तु सर्वव्यसनानि हति ॥
दानशासनम् । पदार्योका दान देनेसे वैर और व्याधिका नाश होता है। पापका नाश और पुण्य और दयाकी वृद्धि होती है । पंचभूत वंश होते हैं। शत्रु भी मित्र हो जाते हैं, कोई बंधु बन जाते हैं। कोई धर्मकार्योमें भनुकूल बन जाते हैं, कोई धर्माचरण करने लगजाते हैं। कोई धार्मिक और सम्यग्दृष्टि बनजाते हैं। कोई अंतःकरणशुद्धवाले गुरु बम जाते हैं॥३॥ सत्पात्रदानमनघं कुरुते सुपुण्यं पापं निहंति सरुजं सकलांतरायं ॥ स्वर्गादिजातमळयं च सुखं ददाति । तस्मिन्गृहे क्षरति रत्नहिरण्यवृष्टिं ॥ ४ ॥ अर्थ-निर्दोष सत्पात्रदान पुण्यकी वृद्धि करता है, पापको नाश करता है, स्वर्गादिमें उत्पन्न अक्षय सुखको उत्पन्न करता है, इतनाही नहीं उस घरमें रत्नवृष्टि सुपर्णवृष्टिको भी करता है ॥ ४ ॥. सत्पात्रदानैर्भुवनत्रयेऽपि मोद्दीप्तकीर्तिद्युतिपूर्णलेोकान् । जैनेंद्रभक्तानभिवृद्धसौख्यान शंसति देवाश्च नरायनागाः५ अर्थ-सत्पात्रदानके द्वारा जिनका कीर्तिसूर्य तीन लोकमें फैलगया है, जिनकी जिनमक्ति वृद्धिंगत होगई है, सुख जिनका बढ़ गया है ऐसे भव्योंकी देवेंद्र चक्रवर्ति और नागेंद्र प्रशंसा करते हैं ॥५॥ शांतांन्गुप्तियुतानभग्नचरितान् जैनेषु नीचान्यथा । दातॄन्वाक्ष्य जना नमंति रिपको निर्णाशयंतः स्वयम् । नश्यति क्षितिपास्तरनभुजगाः कूरा प्रशांताशया नो पश्यन्ति हितं वदंति मनुनाः सेवा सदा कुर्वते ॥६॥ १ अशानी क्षपयेफर्म सज्जन्मशतकोटिभिः तद्शानी तु निगुप्तात्मा निहंयंतर्मुहूर्ततः ॥
दानविचिदन्यदातूपांत्रलक्षण
अर्थ-शात, गुप्तियुक्त, सुंदरचरित्र ऐसे दातावोंको देखकर
मनुष्य विनय करते हैं। शत्रु स्वयं नाशको प्राप्त होते हैं, कषायसे दूषित
राजा शांतिको प्राप्त करते हैं, शेर, सर्प सरीखे कर प्राणी प्रशांत होते
हैं और ऐसे व्यक्तिको वे क्रूर प्राणी स्पर्श भी नहीं करते हैं। मनुष्य
हितवचन बोलते हुए सदा सेवामें तत्पर रहते हैं ॥६॥
कुलाचलोत्पवनदीप केचित् ।
वर्षाचकोत्पन्ननदीव केचित् ॥
नदीव वन्या कतिचिच्च फेचित् ।
तटाकतोयोच्छुसनं यथा स्युः ॥ ७ ॥
अर्थ--कोई दाता कुलाचल पर्वतोंसे निकलनेवाली नदियों के
समान है जिनमें सदा पानी बहता रहता है, कोई दाता बरसातके
समयमें बहनेवाले नदियोंके समान है अर्थात् कुछ महिने तक ही
बरसातकी नदियां बहती हैं, और कोई दाता जंगलके नदियोके
समान है । कोई तालाब को फोडकर बहनेवाले जलके समान है ॥७॥
नदीतटद्वयोत्पन्ना यथाशरमहीक्षवः
साधावासभूताः स्युर्न परोपकृतिक्षमाः ॥ ८॥
अर्य-नदीके दोनो तट में उत्पन दर्भ और जंगली ईख सदि
दुष्ट प्राणियोंके नियास के लिये काम में आते हैं। परोपकार कर-
के काम में नहीं आसकते हैं । इसी प्रकार जो अपात्रोंको दान देते
है वे दुष्कार्योकी वृद्धि में सहायता पहुंचाते हैं, सत्पात्रोंका उपकार
नहीं करते हैं ॥८॥
पात्राणि मत्वा ददत फुटरभ्यो।
वित्तानि मिथ्यात्वमुपनति ॥
दुष्टाय दुष्टत्वमयंति मूडाः ।
पापाय येहांसि वयेत्र ते ते ॥९॥
दानशासन - - अर्थ-जो अज्ञानी.जीव मिध्यात्थियोंको योग्य पात्र समझकर दान देता हो वह मिध्यात्यकोही प्राप्त करता है, वैसही पापियोंको ; देवे तो पापको प्राप्त करता है, दुष्टफो देता हो तो दुष्टताको प्राप्त करता है, जो जैसा करे वैसा भरे यह लोकमे कहावत प्रसिद्ध है। इस लिये योग्य पात्रको देखकरही दान देना चाहिये ॥९॥ क्रोधिभ्यो लभते क्रोधं रिपुभ्यो रिपुतामपि । जारत्वमेव जारेभ्यश्चोरेभ्योरतां तथा ॥ १० ॥ अर्थ-क्रोधियोंको दान देनसे क्रोधको प्राप्त करता है शत्रुयोंको दान देनेसे वैरभावको प्राप्त करता है, जारोंको दान देकर पिटत्व और चोरोंको दान देकर चौर्यभावको प्राप्त करता है ॥१०॥ धान्यानि सर्वाण्यपि धान्यवद्भ्यो । वित्तानि दत्वाददते मजाश्च । दानानि दत्वाप्ययपुण्यवद्भ्यः पापानि पुण्यानि यथा तथैव ॥ ११ ॥ अर्थ-जिस प्रकार लोकमें धन देकर धान्यबालोंसे धान्य खरीदते हैं इसीप्रकार दानरूपी धन देकर पापियोसे पाप और पुण्या- मावोंसे पुण्य खरीदते हैं ॥ ११ ॥ • सर्चाम स्त्रीषु सौख्यं सममिति मनुते गौरिवाश्मन् स लोकः। 'सर्वोषिप्तबीज फलति बहुफलं लोफबादो न शास्त्रम् ॥ • भूगेहार्थप्रदाता पतिरिपुपुरनेता गुरुः पौरमा । मित्राणीवाद्यसंतः सुखममुखपशोपंधवः कार्पिको मे ॥ स्यादन्यासु मुखं न धर्मकुलसत्पुण्याभिवृद्धिर्न च । स्वतीयस्ति सुखं स्वधर्मकुलसत्पुण्याभिवृद्धिस्तथा ॥ स्वस्वान्याश्रितसेवकानिह धनै रक्षति भूपा यथा । स्वस्वाम्याश्रितसंघमेव सुदृशोऽप्यन्ति पुण्याय च ॥ १३ ॥ - दानविधेिय्यदाद पापरक्षण अर्थ-ज्ञानीजन परफै समान सभी नियोंमें समान सुरा है ऐसा समझता है एवं सभी भूमियों ने बोया हुआ चीज समान फटको देनेयाला है ऐसा मानता है । भूमि गृह और द्रव्यको देनेवाला मेरा स्यामी, राना, मेरा गुरु, पुरयासी, मेरे मित्रा, मो मुरादुःसाय भानेवाले मेरे बंधु इस प्रकार समझानेवाले कृषिफ अन्य रिश्याम सुप नही मानता है । उससे अपना धर्म, कुल य पुष्प का नाश होता है । इसध्यि पात्रका विचार अवश्य करना चाहिये ऐसा समझकर यह, अपनी सीमें सुस धर्म, कुल और पुण्यकी वृद्धि है ऐसा समझता है । जिस प्रकार अपने आश्रित प्रजाओंकी धनधान्यादिसे राजा रक्षा करते है उसी प्रकार जिनेंद्रमार्गके आश्रित संघकी रक्षा करना यह प्रत्येक सम्याधिका कसभ्य है उससे उनके पुण्यको पृद्धि भी होती है ॥ १२ ॥ १३ ॥ श्रीजनोत्सवाय पविमलपसंपर्सनायव दाना । दानं प्रोक्तं सरत्नत्रय शुभजनसंपुष्टये दत्तवित्तम् ॥ स्वस्यापि श्रेपसे यत्मवितत यशसे शुद्धपुण्यामनाय । स्वाधीनान्कर्तुमन्यानितरगन कृतस्यांतरायस्य घे॥१५॥ अर्थ-श्रीजैनधर्मको प्रभावनाफे लिये, निर्मटशासनको वृद्धि के लिये, रत्नत्रयधारियोंके पोषणके लिये, एवं अपने पायाणके लिप,,यशके लिये पुण्यके प्रातिके टिये, दूसरोको अपने बाधीनमें वर- नेके लिये, दूसरों के द्वारा जिनमार्ग में किये गये अंतरायोंको दूर करने के लिये दान कहा गया है, दानसे इतने उद्देश्यों की पूर्ति होती ॥ १४॥ है सापानदानका माहात्म्य. दानेन भोग दयया मुरूपं ध्यानेन मोसं तपसेप्टसिदि । सत्येन वाक्यं प्रशमेन पूजा न जन्मारमुपैति मत्तः । अर्थ-इस लोकमें गनुन्थ दानसे मोग, दयासे सुंदर रूप, पामसे १८ दानशासनम् . मोक्ष, तपसे इष्टकार्यकी सिद्धि, सत्यसे वचनशुदि, शांतिसे पूजा, और चारित्रसे संसारके अंतको प्राप्त करता है ॥ १५ ॥ दान सुभोजनके समान है. तपोऽशनं वृत्तमशेपशाफ्ता दयाज्यदुग्धं मधुरो रसः शमः ॥ ऋतं हितं ध्यानमत्तीय लोलता विभाति दानं च सुभोजनं यथा ।। अर्थ- द्वादश प्रकारफे तप करना यह आहार है, चारित्रका पालन करना यह शाकभाजी है, दया उसमें घी और दूध है, शाति मोठा रस है, सत्य उस भोजनका पथ्य है। ध्यान उस भोजन- की रुचि है। दान उसमें भी स्वर्गीय भोजनके समान है। जिस प्रकार अच्छा भोजन करनेसे मनुष्यको तात्कालिक आनंद होता है उसी प्रकार इन गुणोंके धारण करनेसे अतुल आनंद होता है।॥१६॥ मुक्षेत्रं सुतपो दयाहृदयं ज्ञानं सुवृष्टिः शमः । सस्याम्ळानकरी गुणोप्यऽविरतं सत्यं मुवर्द्धिष्णुता। दानं चीजमशेषवृत्तममलः सूर्यश्च पुण्यैपिणा- प्यतेसप्तगुणैरशेषसुकृतं संचिन्वते धार्मिकाः ॥१७॥ अर्थ-तप एक उत्तम क्षेत्र (खेत ) है, दयासे पूर्ण हृदय व ज्ञान बरसात है, सस्यों को प्रफुल्ल करनेवाला गुण शांति है, निर्दोषवचन सस्यों को बढानेवाले सूर्यकिरणों के समान है। दान उस खेतकेलिये बीज के समान है । निरतिचार चारित्र दुरितांधकारको दूर करनेवाले निर्मल सूर्यबिंब के समान है। पुण्यको चाहनेवाले धार्मिक पुरुष इन सप्तगुणोंको धारण कर सदाकाट पुण्यार्जन करते हैं।॥ १७ ॥ सत्पात्रका आदर और अनादर करनका फल. सदादरेणैव ददाति दानं । लक्ष्मीः सदा भोगकरी मनोज्ञा ॥ 11 दानविधिद्रव्यदासपात्रलक्षण अनादरेणैव सुपात्रदानं । लक्ष्मीः सदा भोगविवर्जिता स्यात् ॥ १८ अर्ध-जो व्यक्ति आदरसे सुपात्रदान देता है उसकी संपत्ति इच्छितरूपसे भोगके काम मे आती है । जो निरादर भावसे पात्र- दान देता है उसकी संपत्ति भोगके काममें नही आती है ॥१८॥ अनादरकृतं मुदानमतुलानि धत्ते सदा । फलान्यविकलानि तैरनुभवो न तस्येष्टदः ।। असाध्यरुजयायवा बहुमिपात्मभारसेवया । मुखं न लभते लसहिभवदेवषिषं यथा ॥ १९ ॥ अर्थ--यधपि अनादरभावसे दिया हुआ सुपात्रदान सभी फलोंको देनेवाला होता है परंतु उसे असाध्य रोगके कारणसे, स्वामिसेवाके कारणसे, -या और कोई कारण से सुख नहीं मिलता है। जैसे देवप्रतिमा यद्यपि चामर, छत्रादि वैभवसे सजी हुई दीखती है परंतु उस वैभषका अनुभव यह नहीं सकती है वैसे संपत्ति के प्राप्त होनेपर भी सुख नहीं मिलना यह अनादरकृत दानका फल है।॥ १९ ॥ पानदानसे दोषनाश और गुणलाभ. वातघ्नो मलमूत्रकृच्छ्रकहरो दुप्पित्तनुत्पुष्टिकृत् । मेधादिषलांगकांतिकरणः पापच्छिदनिमदः ।। दृग्ज्ञानावरणापहो बहुगुणः शीतः सुसेव्या बुधैः । गव्याघार इवाप्यदभ्रगुणदो वर्षानुवत्सादरः ॥ २० ॥ अर्थ-जिस प्रकार गायका घी यदि विधिपूर्वक सेवन किया जाय तो यह पातरोगको दूर करता है, मलमूत्र के विकारफो नष्ट करता है । पकावटको दूर करता है, पित्तोकको हटाता है, शरीरको बल देता है, मेधा-बुद्धि और शरीरकी कातिको वदाता है, प्यासको दूर करता है, अग्नि तेज करता है, दृष्टिदोष, बुद्धिविकार इत्यादि दोषोंको दूर - २० दानशासनम् . फरता है, ठण्डा है, एवं सरंजनोंसे सेव्य है उसी प्रकार जो व्यक्ति बहुत आदरपूर्वक दान देता है, उसका पापरूपी वात नाश होता है । उसका कर्ममल नष्ट होता है, उसकी तेज बुद्धि तेज होजाती है, पाप का नाश होकर पुण्यको वृद्धि होती है। ज्ञानावरण, दर्शनावरण कर्म दूर हो जाता है । यह शांत बनता है । विद्वानों द्वारा आदरणीय होता है। इस प्रकार आदरभावसे पात्रदान देने में बहुतसे गुण प्राप्त होते हैं ॥ २०॥ दया गंगेव कुल्यांवदादरः सादरो जनः । पुण्यपुरगिरिः पात्रं स्यान्नदीमाको यथा ॥ २१ ॥ अर्थ-- मनुष्य के हृदय में जो दया है वह गंगानदी के समान है । उसके हृदय का जो आदर यह नहरके समान है, घह आदरसहित मनुष्य उस नदीके उत्पन्न करनेवाला पर्वतके समान है। जो पुण्यप्रवाहको जन्म देता है । पात्र उस नदीके द्वारा जल प्राप्त करनेवाले देशोंके समान है ॥ २१ ॥ न क्रोधो न च मत्सरी न च मदो माया न कामोन नं। द्वेपो मोहसरागदर्पमदना लोभी भवेत्तस्य न ॥ सम्यक्त्ववतगुप्तिपंचसमितिप्वासक्तिरभ्यासता। नित्यं पुण्यविचारता निपुणता दानेषु यत्रादरः ॥ २२ ॥ अर्थ-जिस भव्यको दान देनेमे आदर है उसको क्रोध, मात्सर्य, मद, माया, काम, द्वेष, मोह, गर्व, विषयामिलाषा इत्यादि दोष दूषित नहीं करते हैं। परंतु सम्यक्त्व, व्रत, गुप्ति, समिति इत्यादि पुण्य- विचारोमें आसक्ति, नित्य पुण्य विषयोंका विचार करना, सर्व कार्योमें नेपुण्य इत्यादि गुण उसको प्राप्त होते हैं ।।२।। .पात्रप्रेमका फल आधयो व्याधयो न स्युवाराजादिसंभवा । जनः प्रियंवदस्तत्र यत्रास्ते सादरी जनः ॥ २३ ॥ ..
छानविधिद्रव्यदासपात्रलक्षण . अर्थ-जिस देशके मनुष्य दानादिकार्योंमें आदरयुक्त हैं उस देशमें आधि व्याधि इत्यादि नष्ट होते है । राजादिकोंके द्वारा उत्पन्न बाधा मी नष्ट होती है। मनुष्य सब प्रीतिकर वचन बोलत है ॥ २३ ॥ केदारोले शालिबीजेप्यनंता (१)। नश्यंतीवानंतकर्माणि जीवे ।। नश्यंत्यस्मिन्सादरे तं अयंति । क्षुद्रा नद्यस्ता नदीस्ताः समुद्रम् ॥ २४ ॥ अर्ध---कुाटकोफे बीज जिस भूमिमें बोया हो वहांके सर्व तृण सस्य वगैरेह नष्ट होते हैं, उसी प्रकार आदरसहित दानसे जीबके अनंतभवके कर्म भी नष्ट होते है। जिस प्रकार छोटी नदियां बड़ी नदीयोंको, बडी नदियां समुद्को जा मिलती हैं इसी प्रकार सभी पात्र घ अन्य मनुष्य उस दानीके आश्रयमें आते हैं ॥ २४ ॥ सस्या विनश्यति यदानितानि पद्माकर निर्जलमाश्रिताय ॥ अनादरं दातृजनं च भूपं भक्तास्तथा साधुजना मनाश्च ॥२५|| अर्थ-निर्जल तालाबको आश्रित सस्य जिस प्रकार नष्ट होते हैं उसी प्रकार निरादर करनेवाले दाता, राजा वगैरहका आश्रय लेनेवाले भक्त प्रजा व सजन नष्ट होते हैं ॥ २५ ॥ दानके पांच दोष. अनादरी विलंबश्व वैमुख्य चामियं वचः। पवाद्भवति संताण दामदूषणपंचकम् ॥ २६ ॥ अर्थ-पात्रके प्रति निगदर करना, देरीसे दान देना, मुनियोंको देखकर भी नहीं देखासा फरना, हितमितमधुर-वचन नहीं बोलना, दान देने के बाद पश्च त्ताप करना ये पांच दान के लिए दृषण है ॥२६॥ - २२ दानशासनम् दानके गुणपंचक. आनंदाश्रूणि रोमाणि बहुमानं प्रियं वचः । किंचानुमोदनं दानं दानभूषण पंचकम् ॥ २७ ॥ अर्थ-पात्रोंको देखकर आनंदाश्रु बहना, रोमांच होना, पात्रोंका भादर करना, प्रिय पचन वोलमा, पात्रदान के बादमें संतोष होना ये पांच दानके लिये भूषण हैं ॥ २७ ॥ इत्युत्तमपात्रसामान्यविधिः चतुर्विधदाननिरूपणे . . । चतुर्विधदाननिरूपण अभयाहारभैषज्यश्रुतभेदाच्चतुर्विधं । दानं मुधीभिरित्युक्तं भक्तिशक्तिसमाश्रितम् ॥१॥ अर्थ- -मापियों के द्वारा दान अभयदान, आहारदान, औषधदान और शास्त्रदानके.मेदसे चारप्रकारसे वर्णित है। चारों प्रकारके दान पात्रोंके प्रति भक्ति और अपनी शक्तिके अनुसार करना चाहिये ॥१॥ 'चतुर्णामिह दातृणां वरेण्योऽभयदानवान् । "तस्मादादावह वक्ष्ये तस्य दानस्य लक्षणं ॥२॥ अर्थ--चारों प्रकारके दान देने वाले दाताबो में अभयदान देनेवाला श्रेष्ठ कहलाता है । इसलिये आचार्य प्रतिज्ञा करते है कि सबसे पहिले उसी अभयदानका लक्षण कहेंगे ॥ २ ॥ भीस्वागत्य पलाय्य दुष्टमृगचोरामिनभूपादिभिः । स्वावासं स्वपुरं स्वदेशमबलान्मान्स्वपृष्ठं गतान् ॥ मा भैपीरहमप्यवामि भवतः कस्मै ममांगावधे- । नों यच्छामि किमस्ति चद्भयमितो निर्यापयिष्याम्यहम् ॥३॥ अर्थ--जो कोई व्यक्ति परराज्यसे या दूसरे स्थानसे डरकर भोगकर आया हो, दुष्ट पशु और चोरों के द्वारा, राजाके द्वारा, या शत्रुषोंके द्वारा सताया हुआ हो एवं अपने नगरमें, अपने घरमें आगया से उमको धैर्य बंधाकर कहना कि " तुम डरो मत, तुम्हारी रक्षा मैं फरूंगा, जबतक मेरा शरीर रहेगा तुम्हे किसीके द्वारा कष्ट नहीं होने दूंगा, फिर भी यदि तुम्हारे लिये कोई भय होतो मैं उनको दूर करूंगा इस प्रकार आश्वासन देकर अभयदान पालना चाहिये ॥३॥ यदैकमेकदा जीचं त्रायमाणः प्रपूज्यते । न तदा सर्वदा सर्व प्रायमाणः कथं बुधैः ॥ १ ॥ ..
, दानशासन . अर्थ -जब एक जीवको एक दफे रक्षण करनेवाला व्यक्ति विद्वा- नोंके द्वारा आदर करने योग्य होता है तब सदा सभी जीवोंको रक्षण करने वाला आदर करने के लिये क्यों योग्य महीं होगा ! अपितु अवश्य होगा ॥ ४ ॥ अभयदान परंपरासे मोक्षदायक है. यः स्थानायवर्तिनस्तनुमती योगेन रक्षत्यसौ। राजासौ सुकृती दयालुरनधः सोऽभीतिदानी गुणी ।। तेनापीतमिदं श्रुतं पहुकृतं दानं च तप्तं तपः । सर्व सत्क्रमतो निजेष्टफलदं निश्रेयसं लभ्यते ॥ ५ ॥ .. अर्थजो राजा. अपने महल, नगर और देशवासी आश्रितजनोंको मन पचन कायस रक्षा करता है वह राजा पुण्यवान् है, दयाल है, पापरहित है, गुणवान है एवं वही सच्चा अभयदानी है। सचमुचमे। उसाने सर्वशाखाको अध्ययन किया है, बहुत दान किया है, बहुत तप तपा है, वह इस प्रकारके नीतिमार्गसे चलने वाले राजाके लिये सभी ऐहिक इष्टसिद्धि होने के साथ २ मोक्षकी भी प्राप्ति होती है ।।५।। देवाद्याभयदानतोऽस्नृिपरोगावृष्टिभौतिक्षयों। जायते कुलदीपकास्कृतिनस्त्यक्त्वामृतात्यामयाः । बईताल्पमयं भवेदिह मुखी निष्कंटकोऽग्रे भने । देवो वा सकलावनीशविनुतः श्रीसार्वभौमो विभुः ॥६॥ अर्थ-जो राजा देव गुरु शाखोंके प्रति आये हुए संकटोंको दूर करता है, धर्मप्रभावनाके मार्ग में आये हुए विप्नोंको दूर करता है वह राजा इस अभयदानके फलसे, शत्रुराजावोंकी बाधा, रोग, अति- वृष्टि, अनावृष्टि, इत्यादिके भय से पीडित नही होता है, यह सचमुच में कुलदीपक है। पुण्यवान् है । कोई भी रोग उनके पास . नहीं आने पाते हैं। उसका सुख दिन प्रतिदिन निरांबाधरूपसे बढ़ता है 4 H चतुधिदाननिरूपण - इतनाही नहीं आगेके भय में यह देवगति में जाकर जन्म लेता अथवा सर्व राजावों द्वारा पूज्य पक्रयता होकर जन्म देता ॥६॥ त्यक्तास्त्रं मपलायितं.गिरिगजारु जकांतर्गत। दंष्टात्मांगलितांतपार्जुन मुदस्तोच्चध्यनं त्वद्गति ॥ योक्ति प्रणतं विमुक्तविरदं दचास्मपृष्ठं रिपी- भृत्यं देशगतं तदप्यमयदानाख्यं मुरसन्गुणः ॥ ७ ॥ : अर्थ-जिस शत्रुराजाने युदस्थानमे शस्त्रको छोड़ दिया हो, जो भाग गया हो, पर यगरह में उरसे चढ गया दो, जल में गया हो, शरण में आकर पादमें गिरता हो, अपने छत्र बगरहको समेट लिया हो, आपही गति है ऐसा कहता हो, दीनतासे युक्त यचन बोलता हो, नमस्कार किया हो, अपने पदयी पगरहको छोट चुका हो, एवं जो पीट दिखाता हो उसकी रक्षा करनी चाहिये, शो सेवककी भी रक्षा करनी चाहिये यह भी अभयदान है.॥ ७ ॥ दत्वा स्वार्यान्धलं राई दयते सागसः शिरः। तदेवामयदानं स्यात् पुण्याय फरते सदा ॥ ८॥ अर्थ--एक अपराधी राजाके द्वारा प्राणदण्डसे दण्डित किया जारहा हो, उस अवस्था मे अपने परियार, धन एवं सर्वस्व देकर मी उस अपराधी का प्राण वघाना यह भी अभयदान है, इससे पुस्य की वृदि होती है ॥ ८॥ स्वदेशपुरंगेहस्थान्येऽति समुदा मुखं । नापानि नारयस्तेषां हानि वति तानयः ॥९॥. अर्थ-जो अपने घर, नगर, देशमें रहनेवाले प्राणियोंको बहत हर्षसे रक्षा करते हैं, उनको मुख पहुंचाते हैं ऐसे अभय दानियोंको पार पाडा नहीं देता है और न उनको कोई शत्र है, उनके कोई .
दानशासनम् . -- हानि भी नहीं होती है, ये अपने आधित प्राणियोंकी रक्षा करते हैं इस लिये उनकी रक्षा उनके पुण्य सदा करते हैं इसमें कोई संदेह नहीं ॥ ९॥ कर्माण्यात्मनि दुर्द्धराणि विषमा दोषा वपुष्यासते । पाते तपदथ तानि रिपुवत्पुण्यामिवृध्या न ते ॥ एक वर्षकरी (१) प्रभो तव करणकन शस्त्रेण भो। कान्कान्हन्ति भवान् द्विपः पदपदे भीताः स्वतेजोपलात् ।। अर्थ-राजाको अभयदान करनेके लिये किस प्रकार प्रेरणा करनी चाहिये यह बात कहते हैं। हे प्रभो ! आत्मामें दुर्द्धर फर्म अनादिकालसे लगे हुए हैं, शरीर में वातपित्त कफादिक विपम दोष लगे हुए हैं। ये आत्मा और शरीरको शत्रूके समान कष्ट देते हैं। आपके पुण्यवृदि . वे आपको दुःख नहीं देते हैं । इसी प्रकार कर्मके उदयसे सर्व प्राणी त्रसित हैं। आप अपने एक शरीरसे, एक हाथ से शख लेकर किस प्राणियोंको मारेंगे उनको अभयदान दीजिये | उस अनंत युप्यतेजसे आपके शत्रु भी डरफर मित्र होजायेंगे ।।१०।। मंगानळतेजसीव कृतिनः पथ्याश्च दीपा निजाः । से चान्ये च विकुर्वते गतमहस्युर्वीपती भस्मनि । त्यक्तोणे शुनका यथा गतभयास्सशेरते ताः प्रजाः। धर्म धर्मकराच पाहि सकलान् बन्धुं स्वतेजोऽखिलं॥११॥ अर्थ-हे राजन् ! मनुष्यों के शरीर में यदि अग्नि मंद हो जाय तो शरीरके दोष विकारको प्राप्त होते है, इसी प्रकार यदि राजा तेजो- हीन हो गया तो उनके स्वजन और परजन सबके सब विकारको प्राप्त होते है; एवंच जिस प्रकार जिस भस्म में उष्णता न हो उसमें कुत्ते भी जाकर निर्भय होकर सोते हैं इसी प्रकार तेजोनि राजाके चतुर्विधाननिरूपण . प्रति प्रजायें स्वेच्छाचारपूर्वक व्यवहार करती हैं। इस लिये हे राजन् ! धर्मको और धर्मात्मावोंको तुम रक्षा करो जिस से तुम्हे संपूर्ण तेज प्राप्त हो जाय ॥ ११ ॥ उद्धार करने योग्य चीजें. जीण जिनाम्यं जिनपिंवं सुदृशं व पुस्तकं पूज्यं । पूजकमप्यधिकं स्याघदुद्धरेत्पूर्वपुण्यतः पुण्य ॥१२॥ अर्थ-जीर्ण मंदिर, जीर्ण जिनबिंब, जीर्ण रत्नत्रयधारक, जीर्ण शास्त्र, जीर्ण संयमी, एवं देवार्चक, इत्यादिका जो उद्धार करता है वह पूर्वसे भी अधिक पुण्यको प्राप्त करता है ॥ १२ ॥ अभयदानके अनेकभेद. द्वि|पं तु तटाककूपमृगसामित्रचोरानल। वडग्रामगतामयप्रभृतिकं श्रुत्वैव यत्रादितं ।। तत्रागत्य तदीयदुःखमखिलं नित्यं निवागतो। शूरोऽयं खलु यत्तदेव सफलो लोकश्चिरं जीवति ॥१३॥ अर्थ-मनुष्य तालाब में गिरने के संकटके विषय में, कुर्यमें पदा इस प्रकार, शेर वगैरहसे पकडा गया ऐसा, सर्पसे काटा गया, शत्रुयोंसे बाधित किया गया, चोरोंसे टूटा गया, आगसे जल गया, विषस भाहत हुआ अथवा कोई रोगविशेषसे पीडित हुआ इस प्रकार दो आवाज सुननेपर भी उस घटनास्थल में पहुंचकर संकटापन्न प्राणि- योंकी आपत्तियोंको दूर करें । अज्ञानीजनोंफे दुःख मिटाये यह सब अभयदान है ॥ १३॥ तदस्ति न मुखं लोके न भूतं न भविष्यति । यन्न संपद्यते सद्यो जनोरभयदानतः ॥ १४ ॥ अर्थ-जो सुख अभयदानसे प्राणियोंको प्राप्त न हुआ हो वह दानशासनम् . सुख लोकमें न हुआ, न है और न होगा अर्थात्, अभयदान से प्राणि : योंको सर्वप्रकारके सुख प्राप्त होते हैं ॥ १४ ॥ अभयदानसे मिलनेवाले लाभोंका सविस्तर विषेचन. येऽति तेजांसि निजाश्रितानां विद्वदिपज्योतिपिकादिकाना नेपामृषीणां गुणिनां कृपाणां शुलेन्दुवढदिमुपैति तेजः १५ अर्थ-जो राजा अपने आश्रित मनुष्योंका, विद्वानोका, धंद्य, ज्योतिषी आदिका, संयमियोंका, गुणियोंका एवं धर्मका तेज बढाते है एवं. रक्षा करते हैं उनके स्वयंका तेज भी शुक्लपक्षक चंद्रमांक समान बढता है ॥ १५ ॥ स्वीयानन्यजनानिवान्य वनिताः स्वस्त्रीरिव स्वं धनं । चान्यार्थानिव देवताश्च सकलाः स्वीया इव क्ष्माभृतः ।। स्वस्थानत्रयवर्तिनस्तनुमतो रक्षति सर्वान्पुरा । खी वाव्याज्जन पुण्यदुष्कृतपतिस्सर्वं त्रिशुद्धयोचित॥१६॥ 'अर्थ-पूर्यकाल में राजा अन्य प्रजापोंको अपने बंधुवोंके समान रक्षण करते थे, अपनी स्त्री के पातिव्रत्यधर्मको रक्षण करना जितना आवश्यक है उतनाही परस्त्रियो पातिव्रत्यका रक्षण करना आवश्यक समझते थे, अपने धनके समान, दूसरोंके धनका रक्षण करते थे, सर्व संप्रदायके देवोंको अपनही देव समझते थे, इसी प्रकार कोई प्रकारका. कष्ट नहीं होने देते थे, जिस प्रकार पतिव्रता खी अपने चाहे जैसे: पति हो.उसकी सेवा करती है उसी प्रकार अपने राज्यमें रहनेवाले. पुण्यात्मा पापात्माको मनवचन कायकी शुद्धिसे रक्षा करते थे। यही अभयदानका आदर्श है ॥ १६ ॥ यत्रास्ते नृपतिर्मुनिर्यदमलं तेजः प्रजानां तयो-1 पर्धा वारयतीत्यघं च कुरुते सौख्यं च पुण्यं शुभ:।।, .
चतुर्विधदाननिरूपण . यच्चास्य यथा करोति सुशां दृष्टिप्रकाशं मुखं । बाधा क्रूरभवां निवार्य शुभकृत्कर्माण्यलंकारयेत् ॥१७॥ अर्थ--जिस प्रकार सूर्यके उदय होनेपर जिनकी आंखे अग्छी हो उनको प्रकाश मिलता है । सुखका अनुभव होता है, क्रूर सर्प इत्यादि प्राणियोंकी बाधासे बच जाते हैं, अच्छे कार्य में संलग्न होते हैं। चोरी इत्यादि पापकर्मोको करनेका अवसर नहीं मिलता है इसी प्रकार जिस देशका राजा न्यायवान् एवं पराक्रमी हो, अथवा जिस राज्य में तपस्तेजसे युक्त कोई मुनि हो, उन दोनोंके सेजसे प्रजापोंका दुःख दूर होता है । उनको कोई बाधा नहीं सताती है, उनका - पाप दूर होकर पुण्यकी वृद्धि होती है एवं उस राज्यकी प्रजा. शुभकार्य में प्रवृत्त होकर सुख प्राप्त करती है ॥ १७ ॥ सद्धर्मापहृताववग्रहगतःस्याचचटाको वृपः। शून्यस्तत्तदधः प्रजा निजकरं सस्य न देत फलं ॥ धर्मान्वर्द्धय पाहि धार्मिकजनान् शुद्धान्विशुद्धाशयान् । स्वस्थानायवर्तिनोऽप्यनुदिनं क्षेत्रं यथा कार्पिकाः ॥१८॥ अर्थ-ई राजन् ! सद्धर्मका नाश होने पर प्रजाजनो में सुख शांति नहीं रहता है । जिस प्रकार सरयोत्पत्तिके आधारभूत तालाब का पानी सूखनेपर. साय होता नहीं, फिर प्रजा अपने करको नही देती है, इसलिये राज्य में सुख शांति मूल कारण धर्मका यदि नाश होता है तो दुर्भिक्ष आनेमें देरी नहीं लगती । इसलिये अपने राज्य में धर्म की वृद्धि करो, जो धर्मात्मा है, सज्जन हैं, ऐसे महल, नगर, राज्य के मनुष्योंकी रक्षा करो, जिस प्रकार किसान खेतकी रक्षा चितापूर्वक करता है उसी प्रकार अपनी प्रजाजनोंकी रक्षामें दत्तचित्त रहो॥१८॥ तातं स्वामिनमुत्तमार्यमनुज जामातरं मातरं । मातारं गुरुमित्रसेवकमरि ज्येष्ठं गुण वल्लभां ॥ . , दानशासनम् मित्र स्वामिवलं स्वांधवजन जैन च सद्धार्मिक। यास्याच्छंसति तस्य पुण्यममलं तेजोऽपि भाग्यादिकं॥१९ अर्थ-जो व्यक्ति अपने पिता, स्वामी, उत्तम मनुष्य, जमाई, माता विश्वस्त व्याक्ति, गुरु, सेवक, शत्रु, बडे पुरुष, गुणवान, स्त्री, मित्र, स्वामिसना, बंधुजन, धार्मिक जैन आदिको गुणानुरागसे प्रशंसा करता हो वस्तुतः यह पुण्यशाली है उसका भाग्य तेज वगैरह वढता. स्थैर्यादयत्वगार्यितेजस्वित्वसुरूपताः । 'सौभाग्यत्यागिभोगिस्वयशस्वित्वमरोगताः ॥ २०॥ चिरंजीवित्वमित्यादिलोकोत्तरगुणानपि । धर्मार्थकाममोक्षान्यः स बजेदभयंमदः ॥ २१ ॥ अर्थ-अभयदान देनेवाला व्यक्ति प्रत्येक कार्य में स्थिरता, शत्रु मित्रादि जनोंको वश करनेमें प्रभावक शरीर, समुद्र के समान गांभीर्य, सूर्यके समान तेज, सबको प्रसन्न करनेवाला सुंदर रूप, सौमाग्य, पात्रदानादि ' कार्य में त्यागभाव, यथेष्ट इंद्रियमुख में भोगित्व, सर्व कार्य में यशस्वी होकर कीर्ति संपादन, नीरोग शरीर एवं चिरायु आदि बहुतसे लौकिक एवं लोकोत्तर गुणोंको भी प्राप्त करता है, धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष ये चार पुरुषार्थ उसे सहज प्राप्त होते हैं ॥२०॥२१॥ धन्पराजत्तपोभाजां हित्तपूतमितोक्तयः । वर्धयति स्वतेजांसि नाशयंत्ययसंचयान् ॥ २२ ॥ अर्थ-हित, मित, मधुर वचनको बोलनेवाले राजा, तपोधन [ मुनीश्वर ] आदिका तेज बढता है, पापनाश होकर पुण्य की वृद्धि होती है ॥ २२ ॥ १ आदेयः सुभग सौम्यस्यागी भोगी यशोनिधिः॥ भवण्यमयदानेन चिरंजीवी निरामय.॥
चतुर्विधदाननिरूपण स्यात्सार्वभौमसपत्तिः सर्वजीवसुरक्षया । तस्मात्सर्वे न हंतव्यास्सागसोपि निरागसः ॥ २३ ॥ अर्थ-संपूर्ण जीवोंकी रक्षासे चक्रवर्तीका पद भी प्राप्त होता है इस लिये चाहे कोई अपराधी हो निरपराधी हो उनको मारना ना चाहिये और न कष्ट देना चाहिये ॥ २३ ॥ व्रते क्लेशकरं वचो न न हरत्यन्यार्थमुादिकं । नातिकामति यो व्रती तमखिला देवी वदंतीत्ययं ॥ ययत्तेन कृतं च तचदखिलं सत्यं फलत्यन्वहम् । सर्व मानसवाचिकांगिफमहो सयः फलं यच्छति ॥२४॥ अर्थ-जो व्यक्ति दूसरोंके साथ कटुवचनका प्रयोग नहीं करता .. है, दूसरोंके धन भूमी आदिको अपहरण नहीं करता है, साधु संय- मियोंका अविनय नहीं करता है उसे सब लोग देव कहते हैं, यह जो कुछ भी कार्य करता है उसमें उसे अवश्य सफलता मिलती है, उनके संपूर्ण मानसिक, वाचिफ और कायिक कार्य तत्क्षण फल देते हैं॥ २४ ॥ र्दियपनेसे होनेवाला नुकसान उदाहरणकेद्वारा दिखाते हैं. येऽत्र स्वाश्रितजीवयुग्ममदयन्दत्वोचितार्थान्सदा। विष्टिं कारपतीय गोपशुनरैः कार्य कृतं कारितं ।। सर्व नश्यति तस्य तेन फलति क्षेत्र न सर्व कृतं । नेप्फल्यं भवतीत्यवेत्य सुकृती सन्धिनैः पालयेत् ॥२५ अर्थ-जो व्यक्ति अपने आश्रित विपद [ नौकर चाकर ] चतु- स्पद [ गाय, भैस, बैल वगैरे आदि प्राणियोको उचित द्रव्यादि देते हुए दया नहीं करता है उनसे बराबर अपना कामही लेता रहता है र फ्लेशफरोजिन वदति न परार्थ हरति यस्तामिह चान्ये ।। देवोत्यमिति ब्रुवते नाधमतिस्तस्य सर्वसिद्धिः स्यात् ।
दानशासन उसका किया हुआ, कराया हुआ सर्व कार्य नष्ट होता है, जिस प्रकार कोई किसान अपने आश्रित जनोंको कप्ट देकर यदि खदसे फल प्राप्त करना घाइता है तो उसे फल मिलना कठिन है.उसी प्रकार अपने आश्रित जनोके प्रति दयान रखने वाले व्यक्तिको किसीभी कार्य में सफ- लता नहीं मिलती, इस लिये अपने आश्रित मनुष्योंको धन इत्यादिसे । रक्षा करनी चाहिये ॥ २५ ॥ जीवपालनसे होनेवाले लाम. ये ये पूर्वनृपालदत्तमखिलं ग्रामादिधर्मादिकं । पांत्येवं भगिनीमिवात्मतनुजामेयात्मदत्तं यथा ॥ ते भूपाच जनाः सुतद्रविणगोधान्यादिसंपत्तयो । अधिव्याधिभिरंतरेण सुखिनो जीवाते मूत्वा चिरं ॥२६॥ अर्थ- जो राजा व अन्यव्यक्ति जिस प्रकार धनादि देकर अपने 'पुत्रांके समान बहिनकी भी रक्षा करते हैं ठीक उसी प्रकार अपने पूर्व- 'जोंके द्वारा दिये गये ग्राम खेत इत्यादिके धर्मको बराबर पालन करते हैं उन राजायोंको अथवा उन व्याक्तियोंको धन धान्य श्री पुत्र इत्यादि योको समृद्धि होते हुए आधिव्याधि से रहित सुखी शरीरको प्राप्त कर चिरायु प्राप्त हो जाती है ॥ २६ ॥ १ स्वदत्तं द्विगुणं पुण्यं पूर्वदत्तानुपालनात् । पूर्वदत्तापहारेण वदत्तं निष्फलं भवेत् ।। पिधा दुहिने भगिनी च दत्तं पुत्रे हरत्यास्मन भाददानः ॥ पुनीरिवास्यां भुवि पूर्वदत्तं गृहंत आम्फे विफलं स्वदत्तं ॥ सर्याःमजा यथा पूर्वे भूयास्ते चर्तयति ताः पालयतु तथा भूपा वैद्या चा कृपिका इव ॥ पानपालनयोर्मध्ये दानाच्योनुपालनं । .. दानास्वर्गमवाप्नोति पालनादच्युतं पदं ।। . .
चतुर्विधदाननिरूपण | 1 फए . ऐशे यस्प पुराविष्टजनानोदयते च थे। दापयति न ते तत्र जीवंति मुखिननिरं ।। २७ ।। अर्थ-जो राजा अपने राज्य में प्रविष्ट प्राणियोंको नहीं देता है एवं दूसरोसे नहीं दिलाता है यह राजा एवं उसकी प्रजा मुखले जाते है ।। २७॥ नृस्त्रीगोधनधान्यपृक्षवसनाचाहत्य यस्मिन्गते । स्वस्थानान्नुपते सदानमभवत्खदं विधासे हदि । लोकोत्साहहतेश्च देवधिभवच्छेदे मुदं मा कृयाः ॥ विघ्नं मा कुरु मापि कारय महं निम्निमवाखिलं ॥२८॥ अर्थ- राजन् ! दूसरे जीवोंको फष्ट देना पाप है, उनकी खो, गाय, धन, धान्य, वृक्ष, पर इत्यादिको अपहरण करने से उनके द्वदय में बड़ा भारी धका पहुंचता है जिससे उनको भयंकर दुःख होता है, दूसरोंकी संपतिका छेद करनेसे उनका उत्साह भंग होता है, इस लिये दूसरोंको कष्ट पहुंचाने में आनंद मत , मानो, दूसरों के उत्साझमें विग्न उपस्थित मत करो, दुसरोस न करायो ताकि तुम्हारे भी सर्व कार्य निर्विघ्न हो ।॥ २८॥ 'विघ्नान्वितेनदिफसर्वकार्येप्वयंति नो सानि पुरोभिवृदि। दैव महे सर्वधिनाश हेतुपादविघ्नं कुरु भव्य युद्धया ॥ २९ ॥ अर्थ- भव्य रामन् ! ऐहिक विवाहादिकारों में यदि विप्न उपस्थित हुए तो पुरोभिवृद्धि नहीं होता है । देवता महोसमें यदि नि उपस्थित हुआ तो यह सनाशो थिये. कारम है, इस लिये ऐहिक परलौकिक कार्यों में विश्न उपस्थित म होसके ऐसा प्रयत्न करो. ॥२९॥ खान्देशान्सुननरवि च जनैर्धान्यार्थमारोग्य.। 'मेगाभिरंगना इन मुतांताभिभने नृपाः ॥
३४ दानशासनम् + . - न पट्टादीनि मणीन्यणिग्भिरिव सज्ज्ञानं वषैस्साधुभिः । स्वानीकैश्च जयंत्यरीनिव स भो पापं जय श्रावकै॥३०॥ अर्थ-जिसप्रकार देशकी रक्षा सज्जनोसे, धनधान्यको रक्षा प्रजाजनोरी, स्थास्थ्यकी रक्षा वैद्योंसे, बंधुवोंसे स्त्रीको प्राप्ति, खोसे संता- नकी प्राप्ति, वैश्योंसे वस्त्राभूषण इत्यादिकी प्राप्ति, विद्वान् साधुषोंसे ज्ञानकी प्राप्ति, "तथा शत्रुयोंकी जय अपनी सेनासे होती है इसी प्रकार उत्तम भापकोंकी रक्षा कर पापको जीतना राजाका धर्म है ॥ ३० ॥ 'जिनेंदूधर्म तेमांनि वर्दयतीह ये नराः। तमोपहार्फतेजोवत्ते भवेयुस्सतेजसः ॥ ३१ ॥ अर्थ-इस लोकमें जो व्यक्ति अपने धनके द्वारा जिनधर्मकी प्रभावना करते हैं उनका तेज - अंधकारको नष्ट करनेवाले सूर्यके समान अत्यंत उज्ज्वल होता है। उनकी कीर्ति बढ़ती है ।। ३१॥ परंपरायातजिनार्चनाविधि-प्रमाणमाचार्यपुर्विचार्य। जिनद्रधर्मोल्वणमेव कुर्वते ते धार्मिका धर्मषिचारपेशलाः ॥३२ अर्थ-जो मनुष्य परंपरासे आया हुआ जिन पूजन विधान- वगैरहको आगोस जानकर अथवा गुरूवाँसे विचारकर जिनधर्मकी प्रभावना करते है वे धार्मिक हैं। धर्मकार्योंके करने में दक्ष हैं एवं अपनी धर्मभावनासे कर्मको नाश करने के लिये समर्थ है।॥ ३२॥ १ चित्रदारशिलारूपक्विान्यर्चति येईतां । ने संति कृतिनस्तद्वन्मुनिगणधरादियत् ।। सोऽयं जिनःसुरगिरिननु पीठमेतदेतानि दुग्धजलधेः सलिलानिसाक्षात् । इंदस्वहं तव सघप्रतिकर्मयोगात्पूर्णा ततामयं न, महोत्सवनी।
चतुर्विधदाननिरूपण *३५ 'मन्वानास्त्रिदिवागतः स मघवानेवायमिंद्रो महां-1 स्तन्वाना निजबंधुर्गसहिताः श्रीजनपूजोत्सवान् । चिन्वानाः सुकृतोच्चयं निरुपम स्वर्गापवर्ग पदं ॥ धुन्वाना रजसाक्तवस्त्रमिव चात्मायोत्करंधार्मिकाः॥३३ अर्थ-जो मनुष्य पूजादि महोत्सव करानेवाले भव्यको यह साक्षात् स्वर्गलोकसे उतरा हुआ इंद्र है ऐसा समझकर अपने बंधुजनोंके साथ युक्त होकर उसके धर्मकार्यमें बहुत हर्पसे योग देते हैं वे स्वर्गाप- वर्गको देनेवाला पुण्यसंचय करते हैं एवं च उसके वलसे मलिन पत्रके मलके समान आत्मामें लिप्त पापोंके समूहको नष्ट करते हैं ॥ ३३ ॥ आहृताखिलजैनबंधुरिह तैरालोच्य देशादिमिः । प्रत्यहं सविवेक सर्वविधिभिः श्रेष्ठ दिने वोत्सव ॥ राजा बांधवभृत्यवर्गसहितो मुक्त्वच भोगद्यं । युदे शत्रुलयं करोत्यघलयं कुर्यात्स पुण्यार्जनं ॥३४॥ अर्थ-जिनमहोत्सवको करनेफे पहिले सब देशों से जैन बंधुषों-' को बुलाकर उनके साथ महोत्सवमें आनेवाले विप्नोंको निवारण करनेका उपायविचार करना चाहिये, तदनंतर मंगल महतको देखकर गजा बंधुजन, सेवक आदिसे युक्त होकर, भोगोंसे मुक्त होकर बहुत भक्तिसे जिनपूजा महोत्सय करें जिस प्रकार राजा युदमे शत्रुवोंका नाश करता है उसी प्रकार ऐसे महोत्सवोंसे पापका नाश करता है पुण्यका संपादन करता है ॥ ३४ ॥ दृष्ट्वाईन्महपत्रिका सहृदया दूतं पुरस्कृत्य तत्-! पूजार्थ परिगृह्य साधुसहितां गत्वा वहिश्चिंतनं ॥ मुक्त्वानम्य जिनान्गुरूनपि बुधान्भक्तान्निजान्बांधवान् । स्थित्वा तंत्र शुभाशयांश्च सकलान् संभावयंत स्थिरं ॥३५ अर्थ-जिस समय जिनमहोत्सबके निमंत्रणपत्र टेकर कोई दूत दानशासनम् आये तो उसका हर्षसे सन्मान करना चाहिये, एवं उस 'पूजाफे लिये योग्य सामग्री वगैरह ठेकर अपने बंधुवांधव घ, साधुसंयमियोंफे साथ मंदिरके लिये रवाना होना चाहिये । मंदिरमें जाकर बाह्य विचारको छोडकर: देव गुरु विद्वान व सुदृष्टि जीवोंका यथायोग्य नमस्कार करें एवं. एवं शुभषिचारसे युक्त होकर स्थिरचित्तसे उस शुभ महोसत्र में योग देवें ॥ ३५ ॥ जेतु शत्रुषलं व्रजामि नृपतः सेवार्थमंगं दधे । मुक्त्वैवात्मपरिग्रहं निजगुरोरग्रेऽङ्गभौगोचित । इत्यं स्वीकृतसुव्रतो रणतले निश्शंषसन्यासवां-। स्त्वं जीवात्र जिनोत्सवेषु मुभटो वर्तस्व नित्यं यथा॥३६॥ अर्थ हे आत्मन् ! जिसप्रकार युद्ध करनेके लिये रणभूमिमें जानेवाला वीर सैनिक प्रतिज्ञा करता है कि " में शत्रुसेनाको, जीतने के लिये जा रहा हूं। स्वामिसयाके लिये मेरा शरीर समर्पित है । जबतक मैं स्वामिसेवासे निवृत्त न होऊ तबतक मेरेलिये सब प्रकारके भोगोप- "भोगोंका त्याग रहे " इसीप्रकार जिनोत्सवमें जानेवाला जीव भी यह , प्रतिज्ञा करें कि " कर्मरूपी शत्रुयोंको जीतनेकेलिये जिनचल्यालयमें जारहा हूं। मैं जिनेंद्र भगवंतकी पूजाके लिये अपना शरीर अर्पण कर चुका हूं। जबतक इस पुण्णमहोत्सपसे निवृत्त नहीं होऊं तबतक मेरेलिये सर्व भोगोपभोग पदार्थोंका त्याग है" इसलिये जिन पूजामें भी वारके समान रहे ॥ ३६ ॥ योद्धारो रणरंगवीररिपुभिस्त्यक्तांगनाबादिकाः । निश्शंकादिगुणा इवाईतमहे विण्मप्रशंकादिना । नो गच्छीत पुरः प्रांति चरमं पद्भ्यां क्षिपत्येव नो-॥ नक्षते न निज स्मरति निलये जना वसनश्चिरं ॥३७॥ अर्य-जो योहा शत्रुवोंसे युद्ध करनेके लिये रणरंगमे जाते हैं ये प चतुर्विधदाननिरूपण. ३७: वापरःखी पुत्र धन आहारादिसे निशंक होकर युद्ध करते हैं। इसी- प्रकार जो श्रावक जिनपूजोत्सवो लिये मंदिरमें जायें ये मलमूत्रादिको शंकासे रहित रहें, मंदिर में व्यर्थ इधर उधर टहले नहीं, किसी पदार्थको पावसे हटाये नहीं, इधर उधर देखें नहीं, अपने इष्ट मित्रादिकोंका स्मरण नहीं करें । एवं अपने गृहकृत्य संबंधी विचारों को मनमें लावे नहीं एकाग्रचित्तसे महोत्सवमें योग देबें ॥ ३७ ॥ सर्वे वीरभटा रणांगणतले तौमुल्यमिच्छंति ये । तांबूलोदकनाळिकरकदळीसस्यादि फिचिन्न ते ।। संतुष्टाः पविचारका रिपुलयव्यापारयोधक्षमाः । श्रीजनोत्सवीक्षका अघळयव्यापारदक्षास्तथा ॥ ३८ ॥ अर्थ-वार-योद्धा युद्धस्थानमें युद्ध करने मेंही लगे रहते हैं, तामूट पानी, नारियल, केला आदि खानेकी उन्हे चिंता नहीं रहती है, इसी लिये ये संतुष्ट होकर युद्ध करते हुए शत्रुवोको नाश करने में समर्थ होते हैं, इसी प्रकार जिनमहोत्सवमें लगे हुए जीव उसी में संलग्न होकर उतने समयतक खाना पीना वगैरह सब भूल जाधे तभी थे यधार्थ रूपसे कर्मोको नष्ट करने के लिये समर्थ होते हैं। चैत्यावासगतिस्मृतेरनशनद्वंद्वस्य चोयोगतो ! बंधस्याष्टफलं लभत गमनमारंभतश्चक्रमे ।। पंक्तदशजं फलं निजगृहदानिर्गमान्मध्यतः । पक्षानन्नफलं गृहेक्षणवशान्मासोपवासोद्भवं ॥३९॥ अर्थ-भावपूर्वक जिनचल्यालयको जानेके विषयों, विचार करने मात्रसे दो उपवासका फल, सामग्री वगैरहके तैयार करने में चार उपवासफा, गमन करनेके लिय प्रारंभ करनेसे आठ उपवासका, गमन करनेसे इस उपवासका, अपने घरके द्वारसे वार निकलने में बारह ३८ दानशासनम् . उपवासका, मध्यमार्ग में पहुंचनेपर पक्षोपवासका एवं जिनमंदिरको देखनेसे मासोपवासका फल मिलता है ॥ ३९ ॥ षण्मासोत्यफलं गृहांगणगते द्वारानगे वार्षिकं । वर्षाणां शत प्रदक्षिणवशादृष्टे जिनेंद्रानने । साहसं स्तवने कृतेऽत्र लभते भक्त्याप्यनंतं फलं । निभुक्तर्न पुमान्विभावसहितः किचित्फलं च ध्रुवं ॥४०॥ अर्थ-जिनेंद्रमंदिरके अंगणमें जानेपर छह महिनेके उपवासका फल, दरवाजेके पास जानेपर वर्षांपवासका फल, प्रदक्षिणा देनेसे शत पिकासका फल, जिनेंद्र के मुखदर्शनसे हजार वर्षके उपवासका फल, भक्तिसे स्तुति करनेसे अनंत उपयासका फल नियगरी यह मनुष्य प्राप्त करता है। परंतु ये सब होने चाहिये भावभाकिसहित उसीसे इस प्रकारके सातिशय फल मिलते हैं। भक्तिरहित होनेपर कुछभी फल नहीं मिलेगा ॥४०॥ द्वादशकायोत्सर्गाः साष्टान्वितशतनमस्क्रियाः शुद्धाः । यः पुरुषः कुरुते स त्रैकाल्यादनशनत्रयं लभते ॥ ११ ॥ अर्थ--जो पुरुष शुद्ध अंतःकरणसे तीन वार प्रातः, मध्याह तथा सायंकाल में बारह कायोत्सर्ग जाप देता हो अथव एकसौ आठ दफे जाप देता हो यह तीन उपवासका फल अवश्य प्राप्त करता है ॥४१॥ राजेवारिबलं पुरात्मनृपति यः स्वस्ववीरान्भटान् । 'मार्याकंकृतिवस्त्रकर्पटमुखैरूपत्वा नियोक्तिं जयेत् ॥ जैनः कर्मबलं पुरा निजचतुःसंघ निलोकष्टदं । संमार्थेत यथोचितस्तुतिनाष्टोक्त्यर्थदाननयेत् ॥ १२॥ अर्थ-जिस प्रकार राजा अपने शत्रुसेनावोंको जीतने के पहिले अपने पक्षके राजा, वीरभट आदिमे युद्ध करने के लिये प्रार्थना करता है एवं उनको वस्त्र आभूषण इत्यादियोंसे सन्मानित करता है इसी प्रकार ।
चतुर्विधदाननिरूपण
जो व्यात कर्मवलको जीतना चाहिये ऐसा विचार रखता हो वह पहिले
देवपूजादिसत्कार्योको करनेके लिये चतुःसंघसे प्रार्थना करें एवं
चतुःसंघको स्तुति, नमन, प्रियोक्ति, एवं दान इत्यादि यथोचित उपचारों-
द्वारा सत्कार कर फिर कोंको जीत ॥ ४२ ॥
विश्नोंको दूर करनेवाला त्रिलोकमान्य होता है।
देवधर्मगुरुभूपधार्मिकग्रामविघ्न इह येन पुच्यते ।
राजनायकमनैस्स पूज्यते स्तूयते त्रिभुवनऽपि गीयते॥१३
अर्थ-जो मनुष्य देवपिन, धर्मषिन,' गुरुविभ, राजविघ्न,
धार्मिफजनविप्न, ग्रामविघ्न आदि विप्नीको दूर करता है वह इस
लोकमे राज्याधिकारियोंसे सन्मानित होता है। इतनाही नही उसकी
कीर्ति बढती है, तीन लोक में सभी उसकी प्रशंसा करते हैं ॥४३॥
लोके यथा प्रवर्तते साधुवैद्यनृपर्षयः ।
जिनोत्सवे प्रवर्तरंस्तयैव जिनधार्मिकाः
अर्थ-जिस प्रकार लोकमें जन, वैच, गजा, और मुनीश्वर
अपने उपकारको गौण रखकर निस्वार्थदृष्टिसे परोपकार परते है
उसी प्रकार धर्मात्मा श्रावक जिनपूजो सबके कार्यमें प्रवृत्ति करें ॥११
अद्य द्वेषकरं न विस्मर मनी मावीक्षि पात्रक्षण-1
प्यन्योन्यासुहरौ द्विपद्रिपुभटास्ते पापराक्ष बहिः ॥
चिंता मा कुरु धैर्यमेव यतनं युदैकचित्ती भरे-।
त्यन्योन्यानुवदत्पढ् इव जनाइशांनास्सदा जीवित[१]॥५५
अर्ध-युद्धस्थानमें भयंकर द्वेषसे युद्ध करनेवाले शत्रुवोंको प्रेरणा
करने के लिये कहते हैं कि " अरे माई ! आज तुम्हारा शनु तुम्हारे
हाथमें आया है उसको छोगे मत. उसे क्षमा नहीं करना, बराबर
उससे युद्ध करो, बाहरकी कोई चिंता मत करो, केवट युद्ध में हो
॥४४॥
.४० दानशासनम् : - , , अपना चित्त लगायो, इत्यादि, इसी प्रकार फर्मरूपीशत्रुको जीतते समय शांत चित्तसे उसे जीतनेका उपाय करना चाहिये ॥ १५॥ जिनपूजनोत्सबके लिये कौन योग्य है.? ' इंद्रोऽयं प्रेपफोऽय किमिह सुजनसंपूमिवोऽयं द्विजोऽयं । विमोऽयं ब्राह्मणोऽयं विरचितदहनप्लावकोऽयं बुधोऽयं । ज्ञात्वात्मा हक्चरित्रो द्विजनिकरमुकर्मोपदेष्टा च कर्ता । शुद्धोऽयं शिक्षकोऽयं स भवति जिनपूजोत्सवै योग्य एव ४६ अर्थ-जो पोडशाभरणको धारण कर ' इंदके समान पूजाके लिये सज्ज हुआ है, पूजासामग्री लाने ले जानेकेलिये समर्थ हो, सज्जनोंके द्वारा आदरणीय हो, त्रिवर्णमें जिसका जन्म हो, पुरुषार्थीको पूर्ण कर- ने दत्तचित्त हो, ब्राह्मण हो, स्नानसंध्या, सकलोकरण इत्यादि पवित्र क्रियावोंको जो करचुका हो, दर्शनचारित्रसे भूपित हो, त्रैवर्णिकोंको भर्मोपदेश देनेवाला हो, निर्मल विचारचाला हो, दूसरोंको शास्त्राभ्यास करानेवाला हो, वही जिनपूजा करनेके लिये योग्य है ॥ ४६॥ पूजाके भेद. भृत्यैश्च बंधुभिः पूज्यस्टैिनिनपतेः कृता । तामसी राजसी पूजा सात्विकी भवति ध्रुवं ।। ४७ ।। अर्थ सेवकोंसे जो पूजा कराई जाती है वह तामसी पूजा कह- लाती है, उसका फल न कुछ है । अपने बंधुयोंसे कराई जानेवाली पंजा राजसी कहलाती है, उसका फल अल्प है । पूज्य पुरुष जो गृहस्थाचार्य कहलाते हैं उनसे कराई जानेवारी पूजा साविकी कालाती है। इससे महान् फल मिलता है ॥ १७॥ दयादश फलान्याचा परा शतफलान्यपि, । 'तृतीया स्वर्गमोक्षथीसंगसौख्यफलान्यरं ॥ १८ ॥ . 1 ।
चतुधिधदाननिरूपण શ્રી रहता अर्थ-पहिली तामसी पूजा दसयों भाग सदोष फल देगी, दूसरी राजसी पूना सौवां भाग सदोष फल देगी, तीसरी साधिको पूजा स्वर्ग व मोक्षमीका संग कराकर अनंत सौख्यका देता है ॥ १८॥ मुक्त्वा भुत्तुपमात्मनाय समयं स्मृत्वा पनस्थासते । सन्नद्धाश्च धृतश्रियो नृपभटा जीवंति का यथा ॥ 'त्यक्त्वा लौफिकर्मागिकं मुकृतिनः कार्य तु धुत्वाये । संतुष्टया जिनभानुनैनसतमा निर्णाशयति ध्रुवं ॥४९॥ अर्थ-जिस प्रकार रणभूमिमें युद्ध करनेवाला धीरभट भूख 'प्यासफी परवाह न करके अपने स्वामिकार्य में पूर्णतया सेंटर है वही यशस्वी होता है, उसी प्रकार लौकिक व शारीरिक फको सहन कर धर्मामा लोग मन में संतोष धारण फर जिनपूजादिकार्य में संलग्न रहते हैं, ये अवश्यही जिनेद्रसूर्य के प्रतापसे . पापरूपी अंधकारको नए करते हैं ।। ४९ ॥ -शारीरे जिनलांछनं स्वपनसि श्रीजनपिंयाकृति । वक्त्रे श्रीजिनसंस्तुति मिनपसस्तत्त्वति कर्णयोः ।। अक्ष्णोः श्रीनिनपोतरावं तरं संस्थाप्य ते धार्मिकाः । ध्यायतोऽत्र जिनोत्सवेषु विमलं पुण्यं सदा चिन्यते ॥५०॥ अर्थ,पूजोत्सबमें प्रवृत्त भक्त शरीरके अवयवोंमें मानस्तम, चक्र आदि शुभलांछनोंको धारण कर, अपने मनमें श्रीजिनेंद्रबिके आकारको, मुखमें श्रीजिनस्तुति करते हुए, कानोंसे तत्वश्रवण करते हुए, आंखों से जिनपूजोत्सबको देखकर दृद्धचित्तसे ~ एकाग्रतासे श्री जिनपूजोत्सव करें तो अवश्य निर्मल पुण्यका संचय करते है ॥५०॥ १ अपिवाकृति चेतसि वपुपि सदा ऑनलक्ष्माणि यो। जनस्तोत्राणि विभ्रन चविततनु (?) गात्रापि जैनेंद्रपूजां ।। संघ संवीक्ष्य तुष्टो मय भवदुरितं जीव भो नाशय ख। धोयत्तेजसार यह दइ गव पापात्रों दुराधानाम् ।। . +7 કરે दानशासनम् M । पूनामीसितुमेत यूयमिति चाहाने शयानो वदे-। घामोद्यति चिरं प्रमुप्य पुनरुत्यायैव भूत्वा शुचिः ।। स्थित्वार्थी कुरु मेक्ति दत वसंतायुक्त्वा त्वमागच्छ भाः। लक्ष्मीलक्ष्म न कस्य लक्षणमिदं पापस्य गर्वस्य वा ५१ अर्थ---यदि किसीको किसीने पूजा देखने के लिये निमंत्रण दिया हो'कि आप आज पूजा देखने के लिये मंदिर में अवश्य भायें। तब यह लेटे २ ही उत्तर देता है कि " आयेंगे" । फिर निशंक होकर निद्रा लेता है। उठकर मलमूत्रादिसे निवृत्त होकर दूतको बुलाकर कहता है कि अरे देवदत्त ! मंदिर में जाकर कहो मैं जबतक नहीं आy. तबतक पूजा मत करो। मैं पूजा देखने के लिये आनेवाला है । आचार्य आश्चर्य करते हैं कि यह वृत्ति श्रीमतीको है अथवा पापकी है ! या गर्षकी है? ऐसे प्रमाद आचरणसे अवश्य पापबंध होता है ॥ ५॥ सद्धर्मोचितपुण्यात्संसारमुखानुपयनमितरत्स्यात् ॥ स्सर भन कुरुभव जाहि जिनमुरुसंघ दानमप्ययि नित्यं ५२ अर्थ---सद्ध पार्जित पुण्यसे संसारमुख तो मिलता है, मी- द्रियसुख भी मिलता है। इसलिये हे भव्य ! जिनेंद्रचरणको स्मरण करो । चतुःसंधकी नित्यसेवा करो । दानादि सदाचरणमें अपना'चित्त लगायो । संसारमें इस आत्माको पतन करनेवाले' पंच पार्पोको त्याग करो।। ५२ ॥ संतः शात्पन्न मिच्छति न च मद्यं तदुद्भवं ॥ धर्ममेव यथा किंचित् किंचिन्नेच्छत्ति दुष्कृतं ।। ५३ ।। अर्थ-सज्जनलोग शालीके केवल धान चाहते हैं । उससे उत्पन्न मद्यकी इच्छा उनको नहीं रहती है। इस लिये धर्मात्मा लोग जो भी कार्य करें यह पुण्योत्पादक हो उसीको करें । पापोत्पादक कार्य को वे इच्छा नहीं करते है ॥ ५३ ।। . ..
चतुर्विधदाननिरूपण ४३ तिक्तमूलवपुःपत्रपुष्पादिश्चिभदो यथा ॥ पके मधुरता पाति कचिदंत्य शुभाशयाः ॥ ५४॥ अर्थ-जिसका जड, लता, पत्रं, पुप आदि सभी बडुये हैं अपितु अंत में फल मीठा निकटता है ऐसी काकडी जिस प्रकार है उसी प्रकार कोई २ धर्मात्मा पहिले साधारण सुखका अनुभव करने पर भी अंत में धर्म के प्रभावसे स्वर्गादिक संपत्ति का अनुभव करते है ॥५४॥ आस्तेऽभक्तो पंचको भास्कराभिमुखो यथा ॥ केचिदेव जिनेंद्रोक्तसन्मार्गाभिमुखास्तथा ॥ ५५ ॥ : अर्थ-जिस प्रकार सूर्यभक्त बंधूफ पुष्प सूर्याभिमुख होकर रहता है इसी प्रकार कोई २ भव्य जिनेंद भगवंतके द्वारा उपदिष्ट सन्मार्गके प्रति अभिमुख होकर रहते है ।। ५५ ॥ वंगसेना यथोन्निद्रा लोकांधवदर्शनात् ॥ जिनाच लोकने फेचिद्भवंति कृतिनस्तथा ॥ ५६ ।। अर्थ-वंगसेना (हाथियावृक्ष ) वृक्ष 'सूर्यबिंबके अवलोकनसे खिल जाता है इसीप्रकार कोई २ भव्य जिनपूजोत्सवको देखने से संतुष्ट होकर अपने को धन्य मानते हैं ॥ ५६ ।। केचित्संसारमुखिनः संसारावर्तवर्तिनः ॥ संसाराधितटं यांति भेका इव जलासरे ॥ ५७ ॥ अर्थ---कोई संसारसमुद्र के तरंगमें पंसे हुए जीय संसारमें सुख है ऐसा समझकर संसारसमुदके तटमें जाते हैं जिस प्रकार मेटक पानी के नल पर न जाकर तटके तरफही जाते हैं ॥ ५७ ॥ पल्पकांदोळवाहीभारोहिणो भूभुनो यथा ॥ कैचिजीवास्तथा शश्वत्स्वर्गारोहणशालिनः ॥५८॥ अर्थ--जितप्रकार राजा पहफी, झूला, घोडा, हाा इत्यादि ।
४४ दानशासनम् याहनपर चढकर आनंद करते हैं उसी प्रकार कोई जीय धर्मके प्रभावसे स्वर्गमें विमानारूढ होकर सुख भोगते हैं ॥ ५८ ॥ पूर्व मुक्तिगती महाविह [ ? ] निजज्येष्ठस्मृते जीव भोः । 'त्यक्त्वा तद्गमनं क्षणस्मृतिवशात्सर्वार्थसिद्धि गती॥ तो द्वौ पण्डुमुतानुजाविव तथा स्वान्याभिलाषी तव'। ध्याने स्याद्यदि पुत्रजन्मनि मृती पूजोत्सवऽर्थे महे ॥५९॥ अर्थ----पाण्टवपुत्र नकुल और सहदेव मुक्ति जाने के लिये पात्र धे । परंतु जिस समय उन्होंने तपश्चर्या की उस समय एक क्षणभरके लिये शत्रयों को बाधा न सहन करनेसे एवं धर्मराजका • मरणः आनेसे मुक्ति टलकर उन्हे सर्वार्थसिदी जाना पड़ा । इसलिये हे भव्य 1: तुम तप, ध्यान, जन्म, मरण, द्रव्योपार्जन, युद्धस्थान · एवं जिनपूजोत्सव आदि समयमें अपने चित्तको स्थिर रखो। प्रत्येक कार्यमे चित्तैकाग्रताकी अत्यंत आवश्यकता है ॥ ५९॥ कारुण्पार्टाभूतचित्त दयालोः क्रोधोद्रेकं कुर्वते कारयति । एते सर्वे हिंसफारसंत आहु- । स्तम्यापारा एव हिंसाक्रियाः स्युः ॥ ६० ॥ अर्थ-करुणासे जिसका चित्त द्रवीभूत होगया है ऐसे दयालु संयमि- योंके हृदयमें जो कोई क्रोधोद्रेक करते और कराते है। उनको महर्षियोने हिंसक कहा है। क्योंकि उनका यह व्यापार हिंसा ही तो है ॥६॥ साधूनां जनयंति चेतसि यदा हास्याभिमानारति- काँध कामविकारशोकरतिसत्रांसैर्जुगुप्सादिभिः । हिंमाख्यैः परुर्वचोभिरमले वलंश च ये शोभणं । वादातभानवच्च किळ ते पापांयुदेनावृताः ॥६॥ अर्थ--जो मनुप्प काग, क्रोध, हास्य, रति, भाति, शोक, भय, . । .
चतुर्विधदाननिरूपण -A-AMAP and । जुगुप्ता इत्यादिकोंफेडारा साधुयों के चित्तमे विकार उत्पन्न करते हों ये जिसप्रकार यर्षाकालमें सूर्य बादलोंसे घिरा रहता है उसी प्रकार स्थिर पापोंसे घिरे रहते है ॥ ६१ ॥ फंदः पंकऽभसोऽधो वसति पुनरसौ यस्य दण्डस्तदूर्वे । पुष्पं पंकेरुहस्येव च सुकृतिजनो भाति पुण्यायुनाशात् ।। तानुवृत्याशु खादत्यपि भगति यथा जंतवो वीजपुण्या- ..नुन्मूल्यामूलमैते यहुरितजुपोऽदत्ययप्रेरिता वै ॥६॥ अर्थ-गेटका कंद कीचड़ में रहता है, कमलनाट पानी के अंदर रहता है एवं पुप्प पानीके ऊपर रहता है। इसी प्रकार पुण्यवान् सम्जनोंकी वृत्ति है । जिस समय उरा तालाबका पानी सूख जाता है उस समय उस कमलकंदको उखाडकर दुष्टस्योग उभे खाते हैं इसी- प्रकार जिस समय पुण्यात्मावोंका पुण्यजल क्षीण क्षीण होजाता है उस समय दुष्ट लोग उनको जडसे उखाडनेके लिये प्रयत्न करते हैं। उनके सुखका नाश करते है, ऐसे लोग इस संसारमें घोर पापका बंध करते हैं ।। ६२ ।। धर्मातरायण कृतेन विघ्नं दृष्ट्वाधिगम्यव मुनीश्वरः। जैना बभूवुः सुदृशो विशुद्धा मुक्तिं गताःश्रेणिवत्प्रयांति॥ अर्थ-बडे २ मुनियोंके हाय जिन्होने द्रोह किया, उपसर्ग किया या धर्ममार्ग में अंतराय किया ऐसे बहुतसे लोग पीछे उसका पश्चा- ताप होनेपर जैनी होगये, सम्यादृष्टि होकर मुक्ति गये, एवं श्रमिकको समान जायग गी ॥६३ ॥ गर्व संत्यज संभगव नृपवईवं गुरु मंश्चि- संघ तहलवद्विरद्धचरितं त्वं नीष भो मा कुरु । बरं वंचनदुर्विवादमनघं त्यपत्वैव वायं वद । कारुण्यं कुरु भक्तिमेव विलसद्धर्मेच्छंगवावद ॥ ६४ ॥ .
४६ दानशासनम्.. - . अर्थ-हे जीव ! धर्मप्रभावनाकी इच्छासे सदाकाल त गर्व छोड, राजाके समान देव की सेवा कर, मंभिके समान गुरु की सेवा करो, सेनाके समान संघ की रक्षा कर, इसके विरुद्ध व्यवहार मत कर, वैर, गाया, वितण्डावाद मत कर, जिससे पाप न हो ऐसे वचन उच्चारण कर, सब प्राणियोंपर दया ,और सज्जनोंपर भक्ति रखो ॥६४॥ कश्चिद्धर्मप्रभावं रचपत्ति कतिचित्तं निरीक्ष्यपया। केचित्संशुद्धभावेन च मुकतचयं मानुवत्युद्धदृष्ट्या ।। पूर्ण पद्माकरं तं बहुसपननो वीक्ष्य श्रांत: श्रमः को। मीनासक्ताशयः स्याद्विगतघनरसं वांछतीवहसः कः६५ अर्यकोई धर्मप्रभावना करता है । कोई. उसे ईमावसे देखकर पापको प्राप्त करता है, कोई शुद्ध भावसे उसे देखकर पुण्यसंचय करते हैं एवं स्वादिसंपत्तिको प्राप्त करते हैं । संसारमें देखा जाता है कि ।कोई बहुत प्यासा व्यक्ति तालाबमें पानी भरा हुआ देखकर प्रसन्न होता है । मछली पकडनेवाला घीवर तालावफा पानी सूखनेपर आनंद मानता । इस लिये भिन्न २ भावोंसे भिन्न २ प्रकारके पापपुण्योंको यह मनुष्य अर्जन करता है ॥६५॥ स्थित्वा गत्वागत्य ये चैत्यगेहे, वर्तते ते स्वल्पलाभेच्छयैव । संस्थायास्थित्यैव मुक्त्वा गती द्वे. मूढाः पुग्यं नैव किंचिल्लभते ॥ ६६ ॥ अर्थ-जो जिनालय में जाकर कभी बैठत कमी इधर उधर उटकर जाते है। फिर आकर बैठते हैं ये लोग जिनालयमें जाकर भी विशेष लाभ नहीं लेना चाहते हैं। पिर चित्त से एक जगह बैठ १ दूरावगा राजभृत्या जिनपूजादिदृक्षवः । राजभोगोचिताः कांताः स्वल्पाहाराः प्रकीर्तिताः । -- 1 चतुर्विधदाननिरूपण कर जिनपूजाविधि को देखने वाले बहुत कम हैं, इस प्रकार अज्ञा- नीजन पुण्यसंचय नहीं करते हैं । ॥ ६६ ॥ केचिनंनि जिनोत्सव कुमतयोऽप्यस्मात्र थुपवनयं- तिलुतोऽत्र सं तत्स्मयेन फिल भो कुर्वन्महांतो वयम् । 'स्थानीये भवने वृषे चपुषि यो वैषम्यवृत्तिर्भवेत् । तत्कालादुपरि प्रणश्यति कृतं दानं च तत्तत्सतत् (१) ॥६७ अर्थ-कोई २ दुर्बुद्धी मनुष्य अहंकार के वश ऐसा सम्झने लगते हैं कि हम इतने बडे आदमी होते हुए भी इस जिनपूजोत्सव- को करानेवाले व्याक्ति हमसे इस उत्सवको कराने के लिये पूंछा नहीं । इस लिए इसके कार्य में विघ्न डालेंगे ऐसे दुराशय से नगरमें, घरमें धर्मकार्य में, उसके शरीरमें इत्यादि अनेक स्थानो में उस श्रावकसे वैरकर उस के उत्सव में विघ्न डालने का प्रयत्न करते हैं वे पापी हैं। उस के सर्व पुण्य नष्ट होते हैं ॥६॥ एफे विसपतीनवेक्ष्य दुरिते पुष्टिं वहस्यन्वह स्वेके दीनतयाशनं च वसनं वित्तं सदा याचितुं । एके श्रावकमानस कल्पयंत्यके शयानाः परं- चैके श्रीजिनविदत्तमनसः पुण्यं लभते ध्रुवं ॥६८] अर्थ--जिनालयमें पूजोत्सबके निमित्त गये हुए मनुष्योंमें कितने श्री श्रीमतीको प्रसन्न करनेकेलिये पापको कमानेमें संतुष्ट होते हैं, और . कोई दीनंतासे भोजन, वस्त्र, धन इत्यादिको मांगने के लिये तत्पर रहते है; और कोई प्रावकोंके चिराको कलुपित करने में तत्पर रहते हैं, एवं कोई प्रमादसे सोते रहते हैं। परंतु ऐसे भी कुछ लोग रहते हैं जो जिन. विचको ओर ही अपना मन लगाकर बैठते है वे नियमसे पुण्यसंपादन करते हैं ॥ ६८॥ .
। दानशासन . ६९॥ एकाः स्वं च पराक्रम व्यवहति दुःखं मुखं स्वीयज।। चाख्यात्यामयपापभाजनविधि दृष्ट्वा स्वयोषिज्जनं ॥ पूजामीक्षितुमसरेण ,समय प्रातः पुरं स्वं ययुः । पातास्युनिताश्च विध्नदुरितं दत्ते न कि फिफलं ॥ ६९ अर्य-कोई २ सियां जो महोत्सब देखने के लिए आती है अपने २ पक्ष नियों को देखकर उन से अपने पति के पराक्रम का वर्णन करने लगती है। उस के व्यवहार को कहती हैं। अपने सुख दुःखको कहती है । अपने को कोई रोग हुआ हो या कष्ट हुआ हो, उसे कहती है । या भोजनका समाचार कहती है, इस प्रकारको स्त्रियां पूजा महोत्सव को न देखकर प्रातःकाल होते ही अपने २ गामको चल देती हैं। इस प्रकार पुजाकार्य में विघ्न डालनेवाली स्त्रियोंको पाप क्या फल नहीं देगा?, अपितु अवश्य देगा मत्तत्वः परिवादनात्महसनात्माकर्षणः कृत्सनै दोपख्यापनभर्सनैः परयशालोपात्मकायुद्भव- जैनावर्णनयांगिराट्परिभवस्थानावमानरन- भ्युत्थानांजलिकाभिवादनमुखैस्सम्यग्गुणोद्धनैः ॥७॥ बंभ्रम्पाखिलद्दीनयोनिपु चिरं देवादिहानकधा- प्युदयोच्चकुले जिने वृषमयं लब्ध्वा सबोध वपुः । कृत्वाची सकलं च दानमपलं पधातु पूर्वी गति । गंत वाच्छसि नीव मा भज शमं धर्म दयो सर्वदा॥७१ अर्थ -इस जीयने पूर्वमें, अपने मानफपायसे, दूसरोंके तिरस्कार करनेसे, हंसी करनेसे, अपने, उत्कर्षकी चाइसे, मन पचन कायकी नीच प्रवृत्तिसे, दूसरों के दोष प्रकट करनसे, दूसरोंको भर्सना देनसे दूसरोंके कीर्ति लोपने एवं अपने कीर्ति चाहनेसे, जैन मुनविरोफे खानेपर उनको स्थान मान देकर एवं उठकर खडे होना, .. 1 - प्रणाम चतुर्विधदाननिरूपण ४९ P करना, पादस्पर्शन करना आदि क्रियायोंसे आदर न करनेसे, अच्छे गुणोंको ढकनेसे, समस्त नीच योनिमें भ्रमण करते हुए दुःख उठाया हैं । दैवसे अनेकवार उच्चकुलको प्राप्त कर भी दुराचरणसे नीचकुलमें फिर गया है । इसलिये हे जीव ! तूने 'अब उच्चकुलमें जन्म लिया है, लोकमें सबका हित करनेवाले जैन धर्मको प्राप्त किया है । एवं ज्ञानयुक्त शरीरको भी प्राप्त किया है । पूजा दान इत्यादि सत्कार्याको करनेकी पात्रताभी तुम में मौजूद है इस लिये पहिलेके समान नीच गतियों में जाने की इच्छा मत कर । शांति और दयाकी सेवा सदाकाल करते हुए अपना जन्म सफल कर ॥ ७० ॥ ७१ ॥ नेदं नंदमिदं न यो न कुपितः फर्ता दिक्षागत- । न्दादिश्रावकमानसं कलुपयन् संक्षोभयन् जायते स्वास्यात्तोज्ज्वलदीपवार्निशिखया स्नेहेच्छुराखुः स्वयं ।। स्वीयान्चाखिलदेहिनाऽपि दहसीत्यात्मीयगेहादिकं ॥७२॥ अर्थ-जो कोई भी श्रावक जिनपूजोत्सव को जाकर यहांपर कपायोद्रे कसे वह नहीं, वह नहीं " इत्यादि कषाय- पूर्ण वचन कहकर इंद्र, गुरु, श्रावक इत्यादि सबके चित्तको क्षमित करता है वह अपना तथा दूसरोंका अहित करता है । जिसप्रकार दीपकका तेल पीनेकी इच्छा रखनेवाला चूहा जलती हुई बत्तीको मुखमें लेकर जाते हुए अपने शरीरको एवं दूसरोंको जला देता है उसीप्रकार जिनपूजोत्सवके समयमें कपायके उद्रेकसे क्रोधित होनेवाला मनुष्य अपने तथा दूसरोंके हृदयमें क्षोभ उत्पन्न करते हुए अहित कर लेता है ।। ७२॥ कारुण्यात्मधिया शपंति न च न ऋध्यंति निदंति न । स्वद्रव्यार्थिजना इवानवरतं माध्यस्थमा गताः।। नो जल्पति न च स्मरति सुधियो धिक्कारवाचं कचित् । स्वप्रधिपैव धार्मिकजना निर्विघ्नपुण्याधिनः ॥७३॥ ...यह .
दानशासन AAAA अर्थ-कोई २ सजन जिनालयमें जाकर करुणादिसे किसीपर क्रोषित नहीं होते हैं। किसीको निदा नहीं करते हैं, किसीको शाप नहीं देते हैं, अपने आत्मद्रव्यको चाहनेवाले मुनियोके समान शत्रु- 'मित्रोंमें माध्यस्थमाव रखते हैं, कोई बडबड नहीं करते । बाह्य विचारोंकी चिंता नहीं करते । कभी किसीको धिकार नहीं देते हैं। ऐसे सज्जन धार्मिक है। पुण्योपार्जन करनेवाले हैं ॥ ७३ ॥ यो व्ययत्यनिशं तस्य धर्मार्थ धर्मजश्रियम् ।। श्रीलता प्रिजगवृक्षमारोहति विवर्द्धना ।। ७४ ॥ अर्थ---जो अपने धर्मसे उत्पन्न धनको धर्मके लिये व्यय करता है वह अपने संपत्तिरूपी लताको तीन लोकरूपी सबसे बड़े वृक्षपर चढाता है अर्थात् मोक्षसंपत्तिको प्राप्त करता है ॥ ७४ ॥ मिथ्याष्टिस्तु वेश्याजन इव सकलान्पुंस एवानुभूत्य । लब्धं देवार्थ वित्तं सुखमिह सततं वर्तयन्मूर्खजीवः ।। सम्यग्दृष्टिस्तु साध्वीजन इय गुरुदत्तात्मनायोक्तचित्तो। योग त्यक्त्वान्यचितो निजपतिचरणाराधनकात्मवर्गः ॥ अर्थ-इस संसार में मिध्यादृष्टि वेश्यावोंके समान सभी मनुष्योंके साथ व्यवहार कर इस शरीरके सुखके लिये द्रव्यको कमाते हैं; एवं अपनी मूर्खतासे शरीरसुखकोही सुख समझकर पापबंध करते हैं। परंतु सम्यग्दृष्टी जीव पतिव्रता स्त्रीके समान गुरुवोंके द्वारा दिये हुए व्रतोंको पालन करते हुए अपने स्वामीकी आज्ञाको शिरोधार्य करते हुए इधर उधरके विचारोंको छोडकर जिनेंद्र भगवंतकी सेवा करने में ही दत्तचित्त रहते है एवं पुण्यबंध करते हैं ।। ७५ ।। सा दत्तेधिकृतः प्रजा स च निजाधीशस्य नै धनं । स स्वामी निजभाग्यचिलमखिलं दस्वैव तं रक्षति ।। .
चतुर्विधदाननिरूपण दातेदाय स चार्मिकोऽत्र सकलद्रव्यं प्रदाताईते । स स्वामी निजभाग्यचिहमखिलं दत्त्वा सुखं रक्षति॥६॥ अर्थ-जिस प्रकार प्रजायें राजाको कर देते समय अपने प्राममे किसी छोटे अधिकारीको देती है। यह अधिकारी प्रामाधिकारीको देता है फिर वह प्रामाधिकारी अपने उपरकं अधिकारियोद्वाग राजातक पहुंचा देता है । राजा भी हितैपिता पूर्वक प्रजापोंकी रक्षा करता है । इसी प्रकार धार्मिक दासा मी संपूर्ण पूजाद्रव्यको इंद्रके ( देवार्चक ) पास भेजें इंद्र उन द्रव्योंको भगवानको सेवामें अर्पण करे। इस प्रकार परम भक्तिसे जो भगवान् जिनेंद्रकी पूजा की जाती है उससे फलरूप स्वर्गादि संपत्तिरूप सुखको यह मनुष्य प्राप्त करता है ॥७॥ हिवमिससविनयवाग्भिर्दाताखिलधार्मिकोऽजसं । शक्त्युचितधनं दत्वा कुर्यादिन्द्रस्य तस्य सत्कारं ॥७॥ अर्थ-धार्मिक दाता हित भित मधुर व विनययुक्त वचनोंसे युक होकर अपने शक्ति के अनुसार धन देकर उस देवार्चकका सत्कार करें।॥ ७७ ॥ स्नानाभ्यंगविलेपनस्यवमनस्रवपुष्पभूपापट- । श्रृंगारं वठरत्वनिष्ठुरवचः क्रोधांगसम्मर्दनम् ॥ तांबुलजिनदतधावनळतांताघ्राणकंडूनन । भ्रूविक्षेपणकामकतमिदं चत्यालये वर्जयेत् ॥ ७८ ॥ अर्थ- -स्नान करना, तेल वगैरह मड़ना, नस्यसेवन करना, मुगंधित पदार्थीका लेपन करना. पुप्पमाला वगैरह धारण करना, आमरण वगैरह धारण करना, श्रृंगार करना, ६ल्ला करना, व टुवचन कोधित होना, शरीर मलना, तांबूलसेवन करना, अंजन . लगाना, दातुन करना, नहीं चढाया हुआ इलको सूधना, खुजलाना, कहना, दानशासनम् आवकि भाएको चढाना, कामविकारसे युक्त होना, ये सब जिन , मंदिरमे निषिद्ध है अर्थात् ऐसी क्रियायें मंदिरमें नहीं करनी चाहिये ॥ ७८.11 मात्सर्य च पदाष्टकं च शपनं निर्भर्त्सनं धिकृति । निंदा दोषफरोक्तिभोजनविधि दुकामशास्त्रति । खांदोलनसंस्थितं च शयनं निद्रां च तंद्रा कलिं ॥ रागद्वेषमनारतं स सुकृती नैत्यालये वर्जयेत् ॥ ७९ ॥ अर्थ-मत्सरभाव, अष्टमद, दूसरोंको शाप देना, क्रोधभरे वचन कहना, धिक्कार देना, निंदा करना, दोषपूर्ण वचन कहना, भोजन करना, कामशाखादिकका सुनना, खाट, झूला वगैरहमें बैठना, सोना, नींद लेना, आलस करना, रागद्वेष करना एवं पूजा आदिको देखनेमें चित्त लगाना यह सब जिनमंदिरमें वर्ण्य है ॥ ७९ ॥ हास्यं नर्मपदप्रसारणकरस्फोटांगसंस्कारता- । भ्याख्यानं करताडनं क्षुतमसत्यालापनिष्ठीवनं ॥ जुभं कर्दनगात्रभंजनमवष्टंभं सदा पर्दनम् । सर्व श्रीजिनसाधुसद्मनि नृपास्थाने यथा वर्जयेत् ॥८० अर्थ-हास्य करना, सरस' कथालाप करना, पैर फैलाना, हाधको मोडकर छटकी निकालना, शरीरका संस्कार करना स्त्रीपुरुषोंके गुम रहस्यको छींकना, असत्य बोलना, थूकना, जंभाई लेना, शरीरको तोडना, टेटना, पादना आदि अयोग्य क्रियायें राजाके आस्थान में जिस प्रकार निषिद्ध है उसी प्रकार जिन मंदिर व साधुयों के स्थानमें ये क्रियायें निषिद्ध हैं ॥ ८० ॥ 1 ६ प्रष्ट करना, ताली वजाना . - चतुर्विधदाननिरूपण . राजाग्रेपि विकुर्वत परिहत्याख्याति भण्डाक्तिकाः । खुर्दते परिहासयति खलु ये नीचीस्त एवाखिलाः ॥ भण्डास्ते परिहासका इति जनाः संतः स्मरंत्यन्वहं । ये साधोस्त इवाचरति मुजनास्तषां सहक्षा इति ॥८॥ अर्थ-राजाके सामने जो विकृत आचरण करते है, परिहास करते हैं, उनको सम्जन लोग भाण्ड कहते हैं। ये नीचकुलगे उत्पन्न होते हैं । जो सभ्यताका आचरण करते है उनको सज्जन कहते हैं। इसी प्रकार जिनालय में जाकर नीचवृत्ति करनेवाले भाड ही है। नीच है । जिनालयमे सभ्यवृत्ति से रहकर जिनमक्ति करनेवाले ही भव्य पुण्य संपादन करते हैं ॥८॥ . . .१ यथा मिथ्याविनां नृणां गुणापातश्रुतिवृथा । तथा दुष्कृतवृत्तीनां पुराणश्रवणं वृथा ॥१॥ ये व्यर्थोक्तिभिरुत्कटं सहसः कोलाहलं पुर्वते । साधोति शमं मनोविकलता ध्यान मनोऽस्वस्थता ॥ अत्स्यारकुप्यत एप यत्र यतिभिधीक्ष्याखिलाः श्रायकाः || तान्कुप्यति सपुण्यभक्तिचरितद्धाश्च निम्नति ते ॥ दुष्टराजकथाफाममोधवृद्धिकरी कथा । हरकालुप्यकरी सार्षिकोत्युच्यते बुधै ॥ यस्त्रीगच्छति वसतो ताभिस्स रसं करोति संलपति ।। तामालिंगति स पुमान् निम्चः पण्डः सुखे च मूढः स्यात् । सोपानरकजना जिनालयगता गरप्रमादाच्च ये। जायते सलु सात जन्मनि सदा मातंगजाती च ॥ सम्प्रत्यंगलांमयः सति जास्ताकस्पर्शिनः श्चित्राद्यामयदु खिनो जिनगृहाविष्टा भवेयुर्धवं ॥ विना पूजोपकरणैः स्वस्यद्रव्याणि ये नराः ॥ स्थापयनि जिनाचाले ते ते म्युः पागमूर्नयः ॥ 'जलं विना या सर्वद्गल्याणां जन्म भूतले ॥ स्नेहं विना निजामार्थपुण्यानां जनन तथा॥ .
दानशासनम् स्नेहं कुर्वन्नुस्कटं संघवर्गे शुद्धस्तस्मिन्वावगाह निमनः । कुद्धानुन्मूल्येव दोषान् लभेत क्षेत्र के धान्यलाभं कुटुंबी ।। अर्थ-जिस प्रकार किसान सूखे खेतमें पानी इत्यादिका सिंचन करके एवं अनेक प्रफारसे संस्कार करके धान्यकी प्राप्ति करता है उसी प्रकार धार्मिक वर्गमें उत्कट स्नेह करके उनके शोधादिक विकारोंको शांत करना चाहिये तब जिनपूजा करानेवाले को विशिष्ट पुण्यबंध होता है ॥ ८२ ।। शालिः सज्जनयोगतोऽनमभवामधं कुर्यागाचथा। पथ्या पंचरसा मलापहरणे दग्धा मलग्राहिणी ॥ नाभिस्साधुसुयोगतो मृतमिव स्यात्साधुसंयोगतः॥ सद्भाव भज साधुतां भज जिनं साधु स्मरन्पूजय ।।८३॥ अर्थ-सज्जनोंके संसर्गसे शाली सस्यसे धान्य निकलते है। दुष्टोंके संसर्गसे मय निकलता है । पंचरस से युक्त हरडा अपहरण करने में सहकारी है । उसी को यदि जलाफर उपयोगमें लाये तो मलनिरोध में सहकारी हैं । बछनाग सरीखा विष भी योग्य संस्कार करनेवाले वैधोंको हाथ में जावे तो अमृत के समान हो जाता है.। वही यदि नीचवृत्तिवालोंके हाथमे आवे तो विषके समान उपयो है । यह सब संसर्ग का प्रभाव है । इस लिए आत्मकल्या. णकी इच्छा रखनेवाले भव्य जीव सदाकाळ शुभ परिणामों में ही अपने आत्माको लगावो, सज्जनों की संगति करो, जिनदेव, जिनमुनियों की सेवा व पूजा करो, तब तुम्हारा आत्मा उच्च बनेगा ॥ ८३ ॥ गंधाभासुमहदप्रियुगसंपत्पिवित्रीकृतं । देवेंद्रादिशिरोललाटनयनन्यासाचितं मंगलं ॥ तेषां स्पर्शनतस्त एव सकलाः पूता अभोगोचितं । भाले नेत्रयुगे च मूर्धनि तया सर्वैर्ननर्धार्यताम् ।।८४॥ मल को गमे आता चतुर्विधदाननिरूपण । मस्तक अर्थ-भगवान के चरणमें चढाये हुए गंधोदक पुष्प वगैरह भगवान्के पवित्र चरणके स्पर्श होनेसे पवित्र हो जाते हैं । अत एष देवेद्रादिके भी ललाट, नेत्रमें धारण करने योग्य हैं। उनके स्पर्श करने मात्रसे ही पूर्व में अनेक जन पवित्र होचुके हैं। इस लिये उन गंधोदक आदिको भव्यजीव सदा ललाट, नयन द्वय व मस्तकमे सदाफाल भक्तिसे धारण करें ॥ ८४ ॥ सिद्धक्षेत्रगतीच्छयैद निटिले गंधोऽचिंतो लिप्यते । दृष्टिज्ञानविशुद्धयेऽचिंतजलं दृष्टिद्वये पिच्यते ॥ ग्रह्मत्वस्यैव मृनि कुसुमं संधार्यत पूजितं । जैनस्तत्रयमेव धार्यमनिशं रत्नमयव्यक्तये ॥ ८५ ॥ अर्थ-मोक्षस्थानको प्राप्त भगवान सिदों के चरणमें चढाया आ गंध ललाटमें इसलिये लगाया जाता है कि सिद्धस्थानमें गमन शीघ्र हो । दोनों आंखोंमें गंधोदक लगानेका प्रयोजन यह है कि हमारे सम्यक्त्व व ज्ञानमें विशुद्धि होथे। मस्तकमें भगवान्को चढाया हुआ पुप्प धारण करनेका प्रयोजन यह है कि हमें आत्मतत्वकी सिद्धि हो, जैनकुलोत्पन श्रावकोंको उचित है कि सदा रत्नत्रयके प्रकट होनेके लिये उन तीनों स्थानोंमे गंध, उदक, और कुसुमको धारण करें ॥८५|| भोगेच्छयैव नादेयं गंधानुकुसुमत्रयं । मुनयो मितमादेयं प्रसादं प्रवदंति तत् ।। ८६ ॥ अर्थ-भगवान्को अर्चित गंध, कुसुम, गंधमिश्रित कुसुम मोगको इच्छासे कभी प्रहण नहीं करें, भक्तिसे प्रसाद समझ कर थोडा प्रहण करें । इसे मुनिगण प्रसाद कहते हैं ॥ ८६ ॥ शुद्धावभिषिक्तजलं सिंचेत्पूर्वांगमामपि भूरि । लिपेदचितगंधं रक्षार्थ युधि च भूतपीडायां ॥ ८ ॥ अपना दानशासनम्. - अर्थ-'प्रायश्चित्तमें शुद्धिविधानके लिये गंधोदकको . मस्तकसे लेकर कटीपर्यत गीला हो वैसा सेचन करें । भूत प्रेतादिक. ग्रहोंकी .पाडास व युद्धक्षेत्रसे रक्षाके लिये गंधोदक को लेपन करें ॥८॥ दुः पीडितमानवोत्र सुमनाश्वाश्रित्य भूपं यथा । दुष्टान्वारयितुं मुखं च सुकृतं लब्धं त्रिधा सेवते ॥ पापैः पीडितमानवोपि सुमनाश्चाश्रित्य देव गुरुं ।। पापं वारयितुं सुखं च सुकृति स्वर्गापवर्गपदं ॥८॥ अर्थ-जिस प्रकार दुष्टोंसे पीडित मनुष्य दुःखसे बचने के लिये, दुष्टोंको निवारण कर सुखकी प्राप्तिके लिये राजाके आश्रयमें जाता है एवं मन वचन कायसे उसकी सेवा करता है उसी प्रकार पापोंसे पीडित मनुष्य पापोंके व तज्जन्य दुःखोके 'निवारण के लिये एवं सुखकी प्राप्तिके लिये देव व गुरुकी मन वचन कायसे सेवा करें, देव गुरु सेवा 'का फल इस लोकमही नही परलोकमें सुखपद है, स्वर्गादिक सुखोंको अनुभव कराकर मोक्षसुखको प्रदान करनेवाला है ।। ८८ ॥ यो जीवान्स्वगृहस्थितान्न दयते स्याद्योगतोऽनारत ।। तस्यांतः सुक्तक्षयस्तमखिला पापीत्युशंति क्षितौ । लिएश्वासजतापदग्धसुकृतः पुण्याभिवृद्धि क्रियाः । सर्या निष्फलता प्रयांति वल वत्पापाभिवृद्धिः परा ८९ अर्य-जो स्वामी अपने घरमें अपने आश्रयमें रहनेवाले द्विपदचतु- प्पद जी0पर दया नहीं करता है वह सदा पापबंध करता है, उसके पुण्यका नाश होता है । इतनाही नहीं उसे लोकमें सब पापी ऐसा कहते हैं । दूसरे प्राणियोंको क्लेश पहुंचाने के कारण उनके भाइसे उसका पुण्य जलते हैं अत एव पापको वृद्धि होती है। स्वाश्रित जीवापर दया करना श्रेयस्कर है ॥ ८९ ॥ 1
चतुर्विधदाननिरूपण
inrammarAmAnur-
-vurve
राजश्वक्रमति शत्रुहनने दक्षं यथा कार्षिकाः ।
कृष्यर्थं भृति भुग्वेषानपि सदा रक्षति लोके यथा ।।
सदानुगुणं परिग्रहमिमं पांत्येव तेषामयः ।
स्याद्धर्माननुकूलरक्षणविधिविष्टिक्रियेवायदा ।। ९० ॥
अर्थ- जिसप्रकार राजा शत्रुवोंसे अपनी रक्षाके लिये समर्थ सेनाका
रक्षण करते हैं, किसान लोग कृषि के योग्य बल मनुष्य आदि
की रक्षा करते हैं उसी प्रकार धार्मिक गृहस्थोंको उचित है कि ये
धर्म के अनुकूल परिग्रहोंकी रक्षा करें अर्थात देवकार्य, राजकार्य, गाईध्य-
कार्य एवं व्यवहारकार्यको संपन्न करने के लिये अपने कुटुंबाजनोंकी
रक्षा करें, अपने आश्रित जनोपर अनुग्रह करें, यहांतक इसी उद्दे-
श्यसे गाय भैस आदिको भी पालन करें, इस प्रकार पुण्यमय उद्देश्य से
किये हुए कार्यसे पुण्यबंध होता है । इसके विरुद्ध जो आचरण करते
अर्थात् उपर्युक्त चार प्रकारके उद्देश विरुद्ध आरंभ करते हैं वे पापका
संचय करते हैं जैसे किसीको पकडकर बलात्कारसे उससे कार्य कराना
पॉपके लिये कारण होता है ।। ९० ॥
ग्रंथपुरदेशसैन्यं यस्य भवेन्नानुकूलमपि तस्य ।
पुण्यं न नार्थलाभो यशो न भूतिर्न हानिरतिभाः स्यात् ॥९१
अर्थ-जिसके लिये परिग्रह, पुर, देश, सेना आदि प्रतिकूल है
उसको पुण्यकी प्राप्ति नहीं, अतएव सुख नहीं, द्रव्यलाभ नहीं, यश
की प्राप्ति नहीं, ऐश्वर्यकी उसे प्राप्ति नहीं होसकती, प्रत्युत उनसे
उसकी हानि होती है और अतिशय भय उत्पन्न होता है। इसलिये इन
-सबको अपने अनुकूल बनानेसे गृहस्थजीवन सुखमय होता है ॥९॥ •
ग्रंथः पापागतस्ततो निस्वनोऽनन्नतोऽनिशं ।
क्रोधाग्निभ्रष्ट आदत्तं भुक्तिद्रव्यं स्वकर्तृतः ॥ १२ ॥
दानशासनम् । शत्रुणा पीडित इस ग्रंथस्तं पीडयत्यलं । स निस्ववृद्धवद्भाति तस्य लक्ष्मीनिरेत्यरं ॥ ९३ ।। अर्थ-पापोपार्जित परिग्रह, रोगोंसे, दरिद्रसे, भूखेसे, क्रोधित होकर अपहरण किया हुआ द्रव्य सदा वर्जनीय है। यह परिमह शत्रुके समान पाडा देनेवाला है। वह यदि श्रीमंत होनेपर भी पापोदयसे उसके पाप से दरिद्री वृद्धको तरुण स्त्री जिस प्रकार छोड़कर चल जाती है उसी प्रकार लक्ष्मी उसको छोड़कर चली जाती है ॥ ९२ ॥ ९३ ॥ गोवर्गगतिविधि दुर्बलकार्पिका स्यात् । ज्ञात्वेव नोऽघमिति कस्य मुरक्षारक्ष, उक्त्वेति तं प्रवितरति यथाश्रितानां ।। त्राणासमर्थनृपताखलु मुंच शीघ्रं ॥ ९४ ॥ अर्थ----जो किसान बहुत दयासे युक्त होकर गाय आदिको रक्षा करता है एवं उनको हरतरहसे सम्हालता है, बह जब उनकी रक्षा करनेमें असमर्थ हो जाय तो उस समय उन प्राणियोंको भूखे मारने इत्यादि में पाप होता है ऐसा समझकर उसे किसीको दे देता है परंतु देते समय. इतना जरूर कह देता है कि इसको अभी तक मैं बहुत प्रतिसे पालन पोषण कर रहा था, अब असमर्थ होनेसे तुमको सोंप रहा हूं इसलिये तुम इसकी अच्छी सम्हाल करना, इसे कोई कर न होने पात्र । ठीक इसी प्रकार अपने आश्रित जनोंकी रक्षामें असमर्थ राजा उनको रक्षा करने की प्रेरणा करते हुए दूसरोंको सौंप देखें । यह भी अभयदानही है ॥ ९४ ॥ भूपा भुवं पांति त एव संतस्तानेव लात्यादधते सदैव । भूपाल शब्दस्य निरुक्तिरुक्ता वीक्ष्यावबुध्यार्थमलं वदेता ९५ ---इस पृथ्वी में रहनेवाले जीवोंको न्यायनीतीसे जो रक्षा करते हैं ये ही भूप कहाते है । ये ही सरपुरुप है। ये सापुरुषोंका , । .
चतुर्विधदाननिरूपण एवं उत्तम पात्रोंका सदा आदर करते हैं इसलिये उनको भूपाट कहा है। इस प्रकार शूपाल शब्दकी निरुक्ति है । इस यातको समझफर राजावोंको अभयदानके पालन करने का आदेश दिया गया है ॥१५॥ एतेषां तु दुरधिनामययतामापत्तिभानां नृणां । दत्वा भीतिकरं विलिख्य लिखितं पदं वचः संपुटं ।। मा भैषीगणकैः पुरोऽपि जगतामुक्त्वा कृतप्रत्ययः । समदाखिलमोधवाक्स च यया लोको यथा वर्तते ॥ ९६ सामोघोपि तथा तथा विकुरुते द्रव्यातिफाक्ष्येन स । हृत्वा तविणं यदा तदखिलं निर्विश्पते तेन सा, वेडान्नात्सरतीव जंतुरमला लक्ष्मीनिरति क्षणात् ॥ तस्मादुःखफरक्रियाविचतुरैर्भव्य समालोच्यताम् ॥ ९७ अर्थ-जो दोन, पापी, संकटग्रस्त मनुष्य हैं उनका भय दूर करना चाहिये । तथा उनको लिखकर और बोलकर अभय देना चाहिये । अर्थात् तुलारा भय मैं दूर करूंगा ऐसा वचन कहकर उनको संतुष्ट करना चाहिये । परंतु ऐसा अभयवचन देकर भी यदि घह रक्षण नहीं करेगा । द्रव्यफे लोभसे संकटमस्तोका धन छीन लेगा और उसको उपभोग लेगा तो लक्ष्मी उस राजाके पास अन्यत्र जायगी। जैसे विषसे प्राणी दूर भाग जाता है इस वास्ते प्राणिओं को दुःख देनेवाले कार्य छोड देना चाहिये । हे मन्ग हो आप इनका खूब विचार कर ऐसे कार्योका त्याग कगे ॥१.६ ॥९७॥ चित्तं समनि पत्तने स्वविषणेऽपुण्यस्य यस्यान्वहं । दुर्भावोऽशनपीटना पहुविधा निर्भवेन्नारकी; दुष्टायविधिर्जनः मुजनता रोख्यने क्लिश्यते । लक्ष्मीनिर्गमनाय लक्षणमिदं संतो जुगुप्तस्य हि ॥१८॥ अर्थ-जो राजा पुण्यहाँन होगया है वह अपने दुर्भावके वशी- न रहकर ६०. दानशासनम् , ।' भूत होकर अपने चित्तमें, महटमें, नगर में एवं अपने देशमें सदा काल प्राणियोंको कष्ट पहुंचाता रहता है। अपने स्वार्थकी पुष्टिके लिये उन आश्रितजीवोंको अनेक प्रकारसे पीडा देता है यह नारकी वृत्ति है। इस प्रकारको दुष्टवृत्तिसे सज्जनलोगोंको हरतरहसे कष्ट पहुंचाया जाता है। सज्जन लोग ऐसे राजासे घृणा करते है । यह सब राजाके ऐश्वर्य उसके हायसे जानेके चिन्ह हैं ॥ ९८ ॥ ..: नाई त्वं दुष्कृतोऽहं बहुमुकृतफलस्त्वनृपोऽहं कुनारी। स्वं दाता याचिताहं त्वमरिकुलभयो भीतिरको बुधस्त्वं ॥ स्तुत्यःस्तोता विवेकी त्वमहमपि जडः श्रावणीयः सुवक्ता। त्वं स्वामी सेवकोऽहं त्वमिह भज निर्जा पुण्यवृद्धि क्षितीशा९९ अर्थ-अपने रक्षक राजाको अभयदान पाटन करने के लिये इस प्रकार प्रेरणा करें कि हे राजन् ! तुम पुण्यवान हो, मैं पापी हूं, तुम बहुतसे अच्छे आचरणोंको पालते हो, मैं दुराचारी हूं, तुम दाता हो, मैं याचक हूं, तुम शत्रुवोंको भय उत्पन्न करनेको समर्थ हो, मैं भय- भीत होने योग्य हूं, मैं मूर्ख हूं, तुम बुद्धिमान हो, तुम स्तुतिके योग्य हो, मैं स्तुति फ़रनेवाला हूं, तुम विवेकी हो, मै अविवेकी हूं, तुम सुवक्ता हो, विशेष क्या ? तुम स्वामी हो मैं सेवक हूं, तुम रक्षक हो मैं रक्ष्य है। इसलिये मेरी रक्षा करना तुम्हारा धर्म हैं । हे राजन् । तुम्हारा कर्तव्य पालन कर तुम यथेष्ट पुण्य संपादन करी ॥ ९९ ।। धर्मागां शुभान्येव कर्माणीश विशंति न । यथा संयमिनचैतेधारिष्ट्रीदिशवालयान् ॥ १० ॥ अर्थ-जिस प्रकार संयमीजन जिस घर में कुत्ता धुसगया है, जहाँ प्रसूति होगई है, कोआ जिस घरमें धुप्तगया है, चाण्डालने जिस घरमें प्रवेश किया है ऐसे घरमें प्रवेश नहीं करते हैं उसी प्रकार धर्मापराधी अर्थात् देवधर्म और राजधर्मके विरोध में चलनेमालों के घर शुभ निपा - , चतुविधदाननिरूपण . . प लक्ष्मी ये दोनों प्रवेश नहीं करती है। शुभाचरण करनेवालोंको देखफरही लक्ष्मी उनके घर जाती है, प्रत्युत ऐसे दुराचारी अशुभ क्रियावोंसे दरिद्रीही बनते हैं ॥ १० ॥ सहस्रबनभोगेऽपि बंध्यायां न तुजो यथा । तथा पापात्मके पुंसि, नोद्भवंति शुभक्रियाः ॥ १०१ ॥ अर्थ--जिस प्रकार हजारो आदमियोंके संभोग करनेपरभी बंध्या- को संतानोत्पत्ति होती नहीं इसी प्रकार पापी मनुष्योंमें किसीभी प्रकार शुभाचरण उत्पन्न नहीं होते हैं ॥ ११ ॥ सात्मवपुः शुद्धमिदं मळीमसं विमलमाहुरेवार्याः । स्यात्तदपुण्यं शवमिव विबुधैरधिगम्य वनिहदग्धं तैः १०२ अर्थ-पापक्रियावों से पापबंध होता है, मनुष्यको पुण्यकर्मसे सब कुछ प्राप्त होते हैं । इस शरीर में जबतक आत्मा रहता है तबतक मलिन होनेपरभी पवित्र माना जाता है । कोई उसे स्पर्श करनेमें घृणा नहीं करते हैं । परंतु जब पुण्यहीन होनेसे उससे आत्मा निकल जाता है तब यह शरीर अस्पृश्य माना जाता है एवं जिस शरीरको हम बडा आदर करते थे उसीको जलाते हैं । यह क्या ! यह सब पुण्यपाप फौकी महिमा है। इसलिगे गनुष्यको सदा पुण्यके साहचर्य प्राप्त करना चाहिये ॥१०२॥ तातं स्वामिनमुत्तमार्यमनुजे जामातरं मातरं । मातारं बुधमिष्टसेवक कुलज्येष्ठं गुणं वल्लभां ॥ मित्रं स्वामिवलं स्ववान्धवननं जैन जन धार्मिक । यः स्मादिति तस्य चापुरयशःश्रीस्थानवेशक्षयः ॥ अर्थ-जो मनुष्य अपने पिता, गुरु, स्वामी, उत्तम सम्जन, जमाई, माता,विद्वान, इष्ट सेवक, कुलगुरु, गाई, अपने स्त्री, मित्र, स्वामि, सेना , , दानशासनम् - . 'अपने बंधुजन, धार्मिक, इत्यादि को निंदा करता है उसकी आयु, यश संपत्ति, स्थान इतनाही नही वंशका भी नाश होता है ॥ १०३ ॥ सर्वशं परमागमं जिनमुनि दोषध्यपेतं व्रतं । यद्गोत्रं च मुरुं च निंदयति यो द्रव्यं च देवस्य यः॥ आव द्विजपाळ गोत्रजति योऽसौ कुतर्क करो। त्यल्पायुर्नरकादिदुर्गतिरभाग्यं तस्य सत्यं भवेत् ॥ १०४ अर्थ-सर्वज्ञ तीर्थकर, परमागम शास्त्र, तार्थंकरोंके प्रतिकृति ऐसे जिनमुनीश्वर, दोषरहित चारित्र एवं सदात्र, गुरु इत्यादिकी निंदा करता है एवं जिनमंदिर आदिके उपयोग में आनेवाले देवव्यको जो अपहरण करता है, ब्रह्महत्या, बालहत्या व अपने बंधुत्या जो करता है, एवं समीचीन विषयमें कुतर्क कर विसंवाद उपस्थित करता है वह अल्पायुष्यवाला होता है, एवं परभवमें नस्कादि दुर्गतीमें जाकर दुःख भोगता है। एवं पुण्यहीन होता है इसमें कोई भी संदेह नहीं है ॥ १०४॥ ये घ्नंति तेजांसि नृपाश्च येषां तेषां क्षयेत्पूर्वगिरीदुवत्तत् । निस्तेजसो दुःखमयति सद्यः श्वाप्यंतगा भूरि यथा शशाधाः अर्थ-जो राजा दूमरों के तेजको नष्ट करना चाहते है उनका तेज भी उदयाचल में प्राप्त चंद्रमाके समान निस्तेज बन जायगा, जिस प्रकार कुत्ते वगैरह पशुओके बीच में फंसे हुए खरगोश इत्यादिका जीवन संकटमय रहता है इसी प्रकार उa मासरी राजावामी जीयन सदा संकटापन समझना चाहिये ॥ १०५ ॥ विमादिननहिंसव यस्य देशे च वर्तते । तस्यावासः पुरं देशो लक्ष्मीरन्यं समाश्रये ॥ १०६ ॥ अर्थ-जिस राजाके राज्य में प्रसाहत्या 'आदि हिंसात्मक प्रति .
चतुर्विधदाननिरूपण Mu AvvvuA होती हो उस राजाके महल, नगर, देश व संपत्ति अवश्य उसको छोड़कर अन्यराजाके आश्रय करते हैं ॥ १०६॥ द्रव्यमेकमिदं सर्व क्याच्छुभाशुभसूचकं । वाद्यध्वनिरिवाभाति स्याच्छुभाशुभसूचकः ॥१०७ ।। अर्थ-जिस प्रकार वाधकी ध्वनि विवाहादि मंगलकार्यो में शुभ सूचक है और शवविहारादि में अशुभसूचक है उसी प्रकार यह संप- त्तिका सज्जनों के हाथमें जानेसे शुभकार्यों में विनिमय होता है एवं नांचोंके हाथमें जानेसे अशुभकार्योंके उपयोगमें आता है। १०७ ।। दत्तं संप्रार्थ्य वित्तं विरचयति तयोरादरेणोभयोस्स- त्पुण्यं सौख्यं सकोपं विफल करमिदं चौर्यतो मूलनांशं ॥ यव्ये वंचनेनार्जितमिदमदनं भूरिद्रव्यार्जितं चे- त्तद्वैरुप्ये च नश्येद्वयवहतिरिपुचौर्याधमर्णाग्निमूपैः:१०८ अर्थ-जो कोई दोन आकर विनयसे धार्मिक दानीसे द्रव्य की याचना करे उस समय वह दयासे उसे इच्छित पदार्थको देखें तो उसमें दोनोंको मानसिक सुख होता है, दोनोंको पुण्यकी प्राति होती है । यदि याचना करनेपर क्रोधित होकर देखें तो उस दानका फल व्यर्थ होता हैं । चोरी करके दान देवे तो मूलद्रव्यको भी लेकर जाता है। दुनियाको धोका देकर यदि कमाया हुआ द्रव्य हो तो वह दरि- द्रताको प्राप्त करता है, यदि धन प्राप्तकर फिर गर्व करे तो वह धन व्यवहार, शत्रु, चोर, नीचोका ऋण, अग्नि, दुष्ट राजा इत्यादि कारणसे नष्ट होगा ॥ १०८ ॥ यः स्यादागतवंतमन्याविषयादीरं च वारं नृपं । वैधं ज्योतिषिकादिसर्वमनुजाभिष्कासयन् मारयन् । तस्यैतद्धनमाहरन् कलुपयन् शीर्पायलिन्यासनं । धिक्कारं खल कारयसभयदानायुःकुलादिक्षयः ॥१०॥ .
दानशासनम् . F " 'अर्थ--दूसरे देशसे पीडित होकर आये हुए वीर भटोंको, वीर राजावाको, चिकित्सा प्रवीण वैयोंको, ज्योतिषियोंको, एवं और भी मनुष्योको अपने राज्यसे मारकर एवं उनके धन अपहरण करते हुए उनके चित्तमें सम्लेश उत्पन्न कर इतनाही नहीं उनको अनेक प्रकार से धिक्कार देकर निकालता है वह राजा अत्यंत पापी है। अनंत गुणोंको देनेवाला अभयदान उसका नष्ट होता है । उसके आयुका 'क्षय होता है, वंशसंपत्ति इत्यादि सबका क्षय होता है ॥ १०९ ॥ विध्नस्त्वभयदानस्य शत्रुपातितसालवत् । "तटाकभेदवन्मुख्यपर्मास्त्रक्षतवद्भवेत् ॥ ११ ॥ १, 'अर्थ---अमयदानमें विघ्न डालनेका फल इस प्रकार दुःख देता है कि जैसे कोई किले को शत्रु आकर 'घरे, अथवा भरा हुमा तालाव, टे उस प्रकार अथवा मर्मस्थानमें लगा हुआ अखके समान, अर्थात् समयदानगे विरोध करनेसे महान् दुःख प्राप्त होते हैं ॥ ११० ॥ 'स्वर्गानचितुं ददासि रिपवे गात्रं स्वयं भूपया न्युनं जातमशेषमेकविलये भृत्यमजाना न सः ॥ नाशं वेरिस जिनोत्सवस्य कुरुषे किं नुनमैतेन ते । स्वस्थानत्रयवर्जनं तव त्रिवर्षाभ्यंतरे स्याद्रुवं ॥ १११ ॥ अर्थ-हे राजन् ! तुम तुह्मारे राज्य, तुझारे नगर में स्थित सेवक वगैरह की शत्रुओंसे रक्षा करने के लिए अपने प्राणोंतकाको देनेके लिए तैयार होजातो, एवं अपने परिवारफे नष्ट होनेपर सब कुछ नष्ट हुआ ऐसा समझते हो ऐसी अवस्थामें जिनोत्सव आदि में विघ्न आनेपर उसको दूर करनेका कार्य तुह्मारा नहीं है ? । उसमें न्यूनता आनेसे तुझारे कार्यमें न्यूनता नहीं है ? धर्ममें हानि होनेपर तुममें घ तुम्हारे राज्य में हानि होता नहीं क्या? धर्ममें हानि पहुंचनेपर तीन वर्षके अंदर ही तुद्वारे राज्य नगर देशके परिवारका नाश होगा । इसलिए चतुबिधदाननिरूपण अन्य प्यारे पदाधा समान धर्मको भी प्राण जानेपर भी उसमें हानि नहीं पहुंचने देना चाहिये ।। १११ ॥ यं कुर्वति जिनोत्सवेवसरला विघ्नं दिक्षागा- । स्तनिद्रानपि संघसवकजनानन्यांस्तिरस्कृर्वते ॥ छिन्यस्ते जिनधर्ममात्ममुकृतं स्वर्गापवर्गपदं । तेषां स्त्रीमुतमित्रराज्यविभवच्छेदोऽपि संजायते ॥११२॥ अर्थ-जो कुटिल श्रावक जिनपूजाको देखने के लिए जिनमंदिर में जाकर जिनपूजामें विघ्न डालते हैं, एवं जिनपूजा देखनेको इन्छासे पानेवाले भायकोंको विन डालते हैं, एवं इंद्रके समान रहनेवाले पुरोहितोंको उनके कार्यमें विघ्न डालते हैं, एवं चतुःसंघकी सेवा करनेवाले धर्मात्माओंको बाधा पहुंचाते हैं एवं अन्यस्थानीय प्रायकोंका तिर- स्कार करते हैं यह अपने धर्म, स्वर्ग मोक्षको देनेवाले 'निर्मल • पुण्य इत्यादि सबका तिरस्कार करते हैं ऐसा समझना चाहिये अदि उनको तीन पापमंध होता है। एवंच उनके श्री, पुत्र, धन, मित्र, गग्पादिवमय आदि सब इसी पापफे कारणसे नष्ट होते हैं ॥ ११२॥ देश नष्टे धनमुखसमस्त्रार्थनाशो भवेद्वा । स्थानीये स्यात्स्वयलतनुयत्स्वावरोधादिनाशः॥ थुत्वा दृष्ट्वा रिपुजनहत राशि तूष्णी स्थितेो । धर्मोत्साहे तमधिपहते (१) सर्वनाशत्रिवत् ॥ ११३ ॥ अर्थ-राजा यदि शत्रुओंके द्वारा देशके नष्ट होनेकी बात सुनकर चुप रहता है अर्थात् प्रतीकार नहीं करता है उस अवस्था में उसके देशफे समस्त द्रव्य नष्ट होगे । यदि अपने स्थानीय राजधानीको शत्रुओंने आकर घेर लिया उस अवस्था में वह चुप रहेगा तो शत्रुसेना आकर उसकी सेना वगैरह को वश में फरटेगी। इतना ही नहीं उसके सब राज्यसंपत्तिको छीनकर अंत:पुर में रहनेगर्दा राणियोंको मी बिगा- .
दानशासनम् . डेगी । एवं धर्मकार्य में विघ्न आनेपर, धार्मिक मार्गमें संफटके उपस्थित होनेपर चुप रहेगा तो उसका तीन वर्षके अंदर सर्वनाश होजायगा । राज्य नगर देशके समान धर्मको रक्षा करना मीराजाका धर्म है ।। ११३॥ इत्वा धर्ममहोत्सव जिनपतयिं च चैत्यालयं, । - पश्चात्कारयतीद तं च तदमु यो राधस्तस्य च ॥ नो देशाधिपता भवेपितृमृतिः पुत्रस्य वर्षत्रयात् । निर्विघ्नं नियमेन सा भुवि ततः पड्वत्सराभ्यंतरे ॥११४ अर्थ-जो राजा क्रोधित होकर जिनधर्मप्रभावनाके कार्य में विघ्न डालता है, एवं जिनमंदिर, जिनबिंब आदि विनाश करता है एवं फिर उस मंदिरको बंधवाकर बिबप्रतिष्ठा करता है वह तीन वर्षके बाद राज्यच्युत होता है । एवं च तीन वर्षके बाद उसका मरण भी होगा। परंतु उसने पुनः जिनमंदिरादि बांधकर धर्मप्रभावना की जिस से उसके पुत्र छह वर्षके अंदर पुनः उस राज्यको प्राप्त करलेगा ।। यत्र यत्र जिनपिंधभजनं यः करोति खलु तस्य हानयः ॥ तत्र सत्र मरणे महाप्रणाः संभवन्ति क्रिमिदुष्टगंधिनः ।। अर्थ-~-जो कोई मनुप्प जहां जहां जिनप्रतिमाका नाश करता है वहां मरणके समय निनबिन नए करनेवाले शरीर में दुर्गंध कृमि उत्पन्न होंगे ॥ ११५॥ जिनधर्मोत्सवमंदिरधिवहतेरेव भूपतेः सा लक्ष्मीः । धावति नश्यति नगरं मरणं वर्षत्रयांतरे स्यादरिणा ११६ अर्थ-जिनधर्मोत्सव, मंदिर, जिनबिंब,इनके नष्ट करनेसे राजाकी लक्ष्मी उसको छोडकर भाग जाती है, उसका नगर नष्ट हो जाता है इतनादी नहीं शत्रुके द्वारा उसका मरण तीन वर्षके अंदर अवश्य होगा ॥ ११६ ॥ ।
चतुर्विधदानमिरूपण काले यस्य इतो महो न मुकृतस्तेनापतो चाईत-1 स्तस्याब्दप्रयतो न चाधिपतिता द्विमिःस्वकीयैरयः ॥ मृत्युः स्यान्न च सा मुतस्य कुल जस्पात्मीयभृत्यस्य वा। शत्रोधर्मविनाशकस्य खलु तदेशस्य साप्यस्थिरा ॥११७ अर्थ-जिस राजाके आधिपत्यके समयमें जिनधर्मोत्सबमें विघ्न डाला गया,उस अवस्था राजा उस यिनको दूर करने के लिये उत्साहित न हो वह पुण्यहीन हो जाता है एवं इस पापके उदयसे तीन वर्षके अंदर राज्यच्युत हो जायगा। इतना ही नहीं अपने तीत्रपापोंसे शत्रुओंके द्वारा यह मरण भी पायेगा, एवं उसके पुत्र, कुलोत्पन्न या निकट सेवक आदि किसीको राज्यारोहण करनेका भाग्य न मिटेगा । जिस प्रकार उसकी यह संपति नष्ट होनेवाली है उसी प्रकार जो शन्नु धर्ममें बाधा पहुं- चाता है उसकी मी संपत्ति नष्ट होगी । धर्मप्रभावनाफे कार्य में जो विघ्न डालेंगे उनका कभी हित नहीं हो सकता ॥११७॥ स्वामिद्रोही सयेदाशु तस्य शांतिन सर्वया ! पीताप, विरेकाय पद्धकच्छगुदे यया ॥ ११८॥ अर्थ-जो स्वामिद्रोह, गुरुद्रोह, मित्रद्रोह, धर्मदोह आदि करता है वह पापके उदयसे शीघ्र नष्ट भ्रष्ट होगा । उस पापीके लिए कोई प्रायश्चित भी नहीं है। जिस प्रकार जुलाबके औषध लेनेवाला मनुष्य काँचको जोरसे बांध टेवे तो भी कोई उपयोग नहीं उसी प्रकार ऐसे पापीको कोई मार्ग श्रेयस्कर नहीं हो सकता ॥ ११८॥ अन्यार्थोऽयद इत्युशन्ति विबुधा हर्तुलादाहन- स्तिताक्तं च पपो यथा वतिगुरुस्वार्थोऽम्लदुग्धं यया ॥ देवार्थो विषवत्स्वभाग्यविषयग्रंथार्थ सेनादिक-1 वसी मविह कृष्णपक्षशिवनिर्वाणमेति ध्रुवम् ॥११९॥ अर्थ-दुसरे का धन जो हरण करता है उस को पाता उत्पन्न ६८ दानशासनम् । होता ही है । देव के धन का हरण करना विषके समान है । यह अपना भाग्य, परिप्रह, धन सेना वैगरह का शीघ्र नाश करता है। तथा कृष्णपक्षके.चंद्रसमान स्वयं भी नष्ट होता है ॥ ११९ ॥ जिनार्थ प्रदत्तार्थे हीनत्वं यः करोति चेत् । तस्य भाग्यस्य पुण्यस्य होनत्वं सर्वथा भवेत् ॥ १२०॥ अर्थ-जिनपूजाके लिए दिए हुए द्रव्योंसे कुछ अपने लिए लेकर कुछ जिनपूजाको जो कोई देता हो उसका भाग्य व पुण्य दोनोंको अवश्य नाश होता है ॥ १२० ॥ येन ग्रामधनं जिनस्य च हृतं स्वल्पाय वर्थदं । क्रीतं दण्डितवंचितं त्वपहृतं त्र्यन्तरे यंतरे ।। तस्य स्यात्स्वविरोधताप्यपयशो तेजोभिमानक्षयो। मृत्यू रुक्च धनव्ययोऽत्र विफलास्तास्ताःकृता याः क्रियाः॥ अर्थ- जो कोई जिनमंदिरके लिए अर्पित ग्राम य धनको,अपहरण फरता हो, एवं बहुत कीमतके थोडे कीमतमें खरीदता हो, जुर्माने के रूपमें लेता हो, धोका देकर लेता हो, अथवा और किसी तरह अपहरण करता हो उस पापी व्यक्तिको उसके तीन पापादयसे तीन घडीके अंदर तीन प्रहरके अंदर, तीन दिनके अंदर, तीन पक्षके अंदर, तीनमास के अंदर, तीन अयनोंके अंदर, अथवा तीन वर्षके अंदर अपने बंधु मित्र भायी पुत्र इत्यादिसे वैर विरोध अवश्य होगा। लोकमें उसका अपवाद होगा, उसका तेज घटेगा, उसका धन नष्ट होगा, उसका मरणभी हो सकेगा विशेष क्या ? यह जो कुछ भी निया फरें उसमें उसको सफलता नहीं मिलेगी ॥१२॥ पीतं येन विषं च तस्य सकलान्यंगानि पंचेंद्रिया- । ण्यंग बुद्धिरियं च चित्तमभवनन्यानुकूळानि वा ।।
चतुर्विधदाननिरूपण . -धर्मद्रव्यविपं हृतं प्रकृरुते ददामानाकये । द्विभूपाकृतभूपतेः पुरि यात्पातास्तदास्युश्च तान् ॥१२२' अर्थ-~जो मनुष्य विपभक्षण करता है उसका सर्व शरीर, इंद्रिय, बुद्धि, चित्त आदि सर्व विषमय हो जाते हैं, ठीक उसी प्रकार- जिन मंदिरके धनरूपी विषको ग्रहण करता है यह मनुष्य पापके. उदय से दुःखी होता है उस की अवस्था ऐसी होती है जैसा आग लगे हुए धर में फंसे हुआ मनुष्य की, अथवा शत्रुओंके. द्वारा घेरा गया है राज्य जिस का ऐसे राजाके समान एवं अनेक प्रकार के संफट ऐसे पापी को उपस्थित होते हैं । १२२ ॥ भित्वा. देवपुरम विष्टजनमाहृत्य मसह्यापि ये । वेजोवयुधमान्पपौरमपि संगच्छंति तेषां पुरं ॥ देशो नश्यति राट्स्वयं च बहुधोत्पातन नाशं गतः । सर्व वस्तु पनादिकं च विलयेन्निष्कारण दोपतः ॥१२३ अर्थ-जो दुष्ट राजा जिनमंदिर इत्यादि देवस्थानोंको फोडकर 'उनके उन्नतिको सहन न कर उनके धन आदिको अपहरण करते हैं एवं उस नगर में रहनेवाले विद्वान्, पीर, वैध इत्यादि सज्जनोंको फष्ट देते हैं, उन दुष्ट राजाओं का इस पापसे राज्य नष्ट होता है। राजा स्वयं अनेक प्रकारके उत्पातों से नाशको प्रात होता है, इतना ही नही उसके संपूर्ण ऐश्वर्य अकारण नष्ट होते हैं ॥ १२३ ।। दत्वाल्पार्थ धर्मवमं गृहीत्वा धान्याध लाधुकामः कुटुंधी। अज्ञत्वात्मद्रव्यनाशात्क्षुधात पालोत्थं बीजमश्नभिवोव्यों। अर्थ---जो व्यक्ति अल्पद्रव्य देकर मंदिर के माम, खेत' आदिको खरीदता है, क्योंकि उसे उन खेतोसे धान्य इत्यादि मिटमेकी आशा है, परंतु बद यह नहीं जानता कि उसको लामसे अधिक हानि होगी यह व्यक्ति मूर्ख है। भूख लगनेपर नेपालबीज (विष को खानेवाला दानशासनम् जिस प्रकार दुःखी होता है उसी प्रकार वह व्यक्ति भी दुःखी होता है।॥ १२४ ॥ कथं चिदेकं पणमर्जयित्वा सवृदयेऽदादनदस्य दीनः ॥ मूळ न वृद्धिर्न वचो निशम्याक्रोशन्ति पापाय च पीडयति । अर्थ-बडे कष्ट से दीन आदमी थोडासा धन कमाते हैं । तथा श्रीमानके पास सूद के लिए वह धन रखते हैं परंतु कितनेक दुष्ट धनिक मूलधन भी देते नहीं तथा सूद भी देते नहीं उन का यह दुर्व्यवहार देखकर दीन आदमी दुःखमे आक्रोश करते हैं । ऐसे कार्यसे श्रीमान् लोक पापके भागीदार बनते हैं ।। १२५ ॥ योऽत्र स्वाश्रितजीवयुग्ममदयन्दत्वोचितार्थान्सदा विष्टिं कारयतीव गोपशुन कार्य कृवं कारितं ।। सर्व नश्यति तस्य तेन फळति क्षेत्र न सर्व कृतं । नेप्फल्यं भवतीत्यचेत्य सुकृती सर्वानलं पीडयेत् ॥१२६॥ अर्थ-किसान यदि अपने आश्रित द्विपद और चतुम्पद जीवोंको अन वस्त्रादिकको देकर रक्षा नहीं करता है तो उसके किया हुआ, कराया हुआ खेत वगैरह सब नष्ट होते हैं। एवं धान्य वगैरह समृद्धरूपसे उत्पन्न नहीं होंगे। इसी प्रकार जो स्वागीभपने आश्रयमें रहनेवाले द्विपद चतुष्पद प्राणियों के प्रति दया नहीं करता है, उन की रक्षा नहीं करता है उसके संपूर्ण कार्य व्यर्थ होते हैं उसको किसी भी कार्य में सफलता नहीं मिलती है, ॥ १२६ ॥ "शैलूपरिवमिव कापकृतं च सर्व । चेतोविना तनुवचःकृतकर्म सर्व ॥ १ भुक्तमपथ्यमनग्नेस्सधः संपवते यथा रोगः॥ कृतदोपार्जितवित्तं प्राणानगं च हति सद्यो यत् ॥
चतुषिधदाननिरूपण वहि विनैव बहुचर्वितवाजवान्स्या- । स्पीडां च वाथ मरणं खलु याति जीवः ॥ १२७ ।। अर्थ-जिस प्रकार डोंबारी खिलौनेका खेल विना मनके होने से उसका कोई उपयोग नहीं इसी प्रकार मायरहित कायफी चाटा आत्म- कल्याण के लिए कोई उपयोगी नहीं हैं। उदरमें अग्नि तेज न हो फिर पौष्टिक आहारोंको प्रहण करे तो वह रोगादियाधाको उत्पन्न करने पाला है एवं कदाचित् मरणका भी कारण बन सकेगा इसरिये आत्माका परिणाम शुभाशुभक्रिया में मुख्य आवश्यक है ॥ १७ ॥ ने ध्ययत्यनिशं यो ना धर्मार्थ धर्मजश्रियं । सस्प नश्यति सा शीघ्नं कृष्णपक्षहिमांशुवत् ॥ १२८ ॥ अर्थ-जो व्यक्ति धर्मसे उत्पम धनको धर्मके लिए खर्च नहीं करता है उसका धन कृष्णपक्षके चन्द्रमाके समान शीघ्र नष्ट होता है। इसलिये धर्मसे उत्पन्न धनको धर्मकार्य में ही उपयोगमें लाना चाहिये ॥ १२८॥ शप्पंतोऽस्मिन्वृषकुलगुरून्दूपयंतो घभूयु-! स्संतो दासीरतिमुखभुजस्तज्जनीस्थानभाजः॥ रत्नस्वर्णाचितधन कृते वंचका पात्र नीचाः । शुद्धो वंशोप्ययमिति नितो मुक्तिमार्गो हतस्तैः ।।१२९॥ अर्य-जो लोग इस लोकमें धर्म, धर्मात्मा, उत्तमकुटज, गुरु इत्यादि सम्जनोंकी निंदा करते हैं, व साधुओंके प्रति उदासीन मावको रखते हैं, सदा दासीओंके साथ रति करते हैं । सन व सुवर्ण के लिये १ यथा यथा निरचनृपः स्वकीयान् ।। कायस्थसरयामिति हि प्रसह्य। प्रपीड्य चित्तान्यपहस्य जीये- ॥ तथा तथा भाग्यलयं करोति ।। .
दानशासनम् अन्यको फसाते हैं एवं नीच हैं। उन लोगों ने शुद्धवंशमें जन्म लेकरभी मोक्षमार्गको मलिनही किया है ऐसा समझना चाहिये ।। १२९ ।। ii. · सगोत्रनिदा जिनयोगिनिंदा करोति यत्तस्य च सर्वदा हि । इदेव वक्त्रे क्रिमिनवदुर्बणा भवंति चाग्रे निरयं प्रयाति ॥ १३० ।। अर्थ-जो मनुष्य उत्तम गोत्र व गोत्रजोंकी निंदा करते हैं' एवं जैन मुनीश्वरोंकी निंदा करते हैं इस जन्ममें ही उनके मुखमे कोडे वगैरह पडते, बहुत ज्यादा फोडा वगैरह उठते हैं, एवं आगेके भव- में नियमसे नरक जाते हैं ॥ १३०॥ भूत्वा हिंसातुरश्चेतसि बक इव यो मानवी जैनदीक्षां। धृत्वा भंगानि कृत्वा यदपिकलतपास्तहि निंदन्शपन्स, दासीभ दिनस्योत्तरजनिपसुतोऽशेषविद्यामवीण- 1 स्तदेशाधीशकुष्ठप्रशमनकरणाल्लब्धघनत्रयैश्यः ।। १३१ ।। अर्थ-कोई मनुष्य सिा करने में तत्पर ऐसे बकके समान जैन- दीक्षा ग्रहण करके उसको दोष लगाता है तथा जो निर्दोप. दीक्षाको पालनेवाले साधुगण की निंदा फरके गालियां देता है। दासीका पति ऐसे द्विजसे उत्पन्न हुआ वह अपने देशके राजाका कुष्ठरोग नष्ट करके जो उसके द्वारा थोडासा ऐश्वर्य मिला है उसका भोग लेता है। अर्थात् कपटसे दीक्षा लेनेवाले पुरुष होनाचरण करते हुए मुनिधर्म से भ्रष्ट होते हैं ॥ १३१ ॥. यः कामार्थी धनार्थी परधनहरणोपायविन्मित्रता । चौर्यायी धुलिभस्माद्युपकरणलसद्धगरीकादिविद्भिः ॥ स्नेहं कृत्वा गृहीत्वा तदुपकरणमर्थाढ्यंगहं विचार्य । स्वष्टाय तनाव व्यवहरति स वेश्यांगसौख्याभिलापी।
चतुर्विधदाननिरूपण ' अर्थ-संसार में जो कामुक मनुष्य हैं अथवा धनकी इच्छा करने वाले हैं यह सदा दूसरोके धन को अपहरण करनेके उपाय जानने धालों के साथ मित्रता चाहते है, चोरी करने की इच्छा रखनेवाले, चोरी सहायक उपकरण भस्म इत्यादि को जाननेवाले के साथ मित्रता घाइते हैं। ऐसे लोगोंके साथ मित्रता कर उन से उपकरणोंको लेकर एवं उन से धनिकोंका घर इत्यादि को विचार कर फिर चोरी करने के लिए जाते हैं । इसी प्रकार वेश्यागमन करने की इन्छा रखनेयाले ऐसे ही दुटोंके साथ मित्रता कर उन से उसके सब उपायोंको समझकर ऐसे दुर्भागों में प्रवृत्ति करते हैं ॥ १३२ ॥ । भामिन्यां लंनिकायां स्वगृहपरिकरान्ग्रंथवित्तं च सर्व। वंचित्वाहृत्य दत्वा परिहरति भवास्तं समुल्लाल्य चैत्यं ।। सौख्यं जीवैहिक संततमनुभवतीत्यात्मधर्म विमुच्य। ग्रंयं धर्म च सर्व परिभवति ऋपैहिकामत्रिकाहे ॥१३३ अर्थ-हे जीव ! सर्ववल्लभा वश्याके अधीन होकर अपने घर से धन को चोरी कर और भी पदार्थोफो अपहरण कर उस पेक्ष्या को से जाकर देते हो, उस नांचकार्यके द्वारा अपने चित्त को भी ठग- कर ऐहिक सुखको बांछा करते हो, इहलोक और परलोकमें मुख को.देनेवाले धर्म को भूलकर सब कुछ सुखसे वंचित रहते हो, क्रोधी अपने क्रोधसे जिस प्रकार लोक को अपने विरोधी बना लेता है। उसी प्रकार घेश्यागामी अपना अहित कर लेता है ।। १३३ ॥ यंत्रास्ते वनितका तामाफ्रामति च पुंसि धनदानात् ।। अपवादात्पतिभीतेरनुमनुतेऽतो गृहे वसन्नका ॥१३॥ अर्थ-जिस घर में अकेली स्त्री रहती है। उसे देखकर कामा- १ गारोचितवित्तानि स्वसुखाय दधमाडः। सारेभ्यो गणिकाभ्यास्यु परभागाय तानि ताः ।
७४ दानशासनम् । तुर लोग भोगकी इच्छा करते हैं उसे मनाने की कोशिस करते हैं। वह स्त्री यदि न माने तो धन का लोभ देकर गनाते है। यदि उससे भी नहीं माने तो अपबाद लगाने का भय दिखाकर उसको मनाते हैं। यदि उस के ऊपर अपयाद लगने से उसे पति मार डालेगा इस फा भय रहता है, इसलिए उसे विवश होकर मानना पडता है। इस लिए अपने शीलकी रक्षा करने की इच्छा रखनेवाली स्त्रियोंको घर में अकेली न रहनी चाहिए ॥ १३४ ॥ नानग्नेरगदाशनं सुखकर वातोऽनलं भस्मनि । वा नोद्भावयतीव चोपरभुवीकोप्तं सुबीजं सदा॥ वंध्या कुलितले सुतं न जनयेज्जीवोऽयवान् सदची । गृहातीह स कश्चिदिच्छति धरा च्छायानिलामोगुणान् ।। अर्थ-जिसको अग्निमांद्य हो गया है उसे भोजन व औषधि दोनों सुखकर प्रतीत नहीं होते, राखके अंदर हया अग्निको उत्पन्न नहीं कर सकता है । असरभूमिमें बोया हुआ बीज अंकुरोपात नहीं कर सकती है । वंध्याके. गर्भ में संतानोत्पत्ति नहीं हो सकती इसी प्रकार पापीके हृदयमें गुरुवोंके द्वारा उपदिष्ट धर्मवचन स्थान नहीं पासकते। परंतु जिस प्रकार पृथ्वी जलवायु छायाके गुणको चाहती है उसी प्रकार कोई कोई मव्य गुरूपदेशको सुनने की इच्छा करते है ॥१३५॥ चौर्य शूलारोहणं सत्सहायो मंत्रः स्वर्गो देवतानां गतिश्च । कर्तुः पीडा सदृशोऽतो बभूवुः शुद्ध कार्य काल लब्धिः प्रधान । अर्थ -इस संसारमें चोरी करना, शूटमें चढना, सजनोंकी सहा- यता मिलना, मंत्रवादमें अपनी गति होना, स्वर्गलोक में जाना, मनुष्य- लोकमें देवताओंका आना, मंत्रवाद करनेवाले को स्वयं बाधा होना, सम्यग्दृष्टि होना इन सब अच्छे बुरे कार्योंके लिए मुख्यतासे काटलब्धि चतुर्विधाननिरूपण की आवश्यकता है, योग्य समयके आये विना कोई कार्य नहीं हो . सकता है ॥ १३६॥ रोगास्सत्यखिला भिषा न च विदन्शस्तीन शस्तो गद-। थेदिच्छा न च रोचते विशति नो नास्ते स्थिते तेऽगदे ॥ बदते विधुसिंधुवत्प्रतपति क्रुध्यति चाज्यम्युवत् । निस्वग्रंथिरिव मभाति च तया धोऽपि पापात्मनि ॥१३७|| अर्थ-जिस प्रकार किसी जगह रोग तो बहुत फैले हैं परंतु चहापर उन रोगोंकी अच्छी तरह कर चिकित्सा करनेवाले कोई वैद्य नहीं तब वे रोग दूर कैसे हो सकते है । कदाचित् वैध हो भी वह आयुर्वेदशास्त्र के अनुसार पूर्ण चिकित्साविषयको नहीं जानता हो, कदाचित् जानता भी हो तो उसके हस्तरक्षण अच्छे न हो अर्थात् योगायोगसे उसके हाथसे रोगी मन्छे न होते हों, कदाचित हस्तलक्षण अच्छे भी हो तो औपधि न हो, कदाचित् औषधि हो तो रोगीको औषधि लेनेकी इच्छा न हो, इछा यदि हो तो उसे वह औषधि रुचिकर न हो, कदाचित् रुचिकर हो भी वातपित्तादिक दोषों के विकार से शरीरमें औपधि प्रवेश न करें, प्रवेश करे तो भी यहांपर बहुत देरतक न रहे, वमन इत्यादि होकर बाहर आयें, कदाचित् कुछ समयतक रहें तो भी दूसरे कारणोंको पाकर गंगकी वृद्धि करें इन सब अवस्थाओंमें रोगीको आराम होना कटिन है । इन सब बातोमे सुयोग मिलनेके लिए काललब्धिकी आवश्यकता है। ठीक इसी प्रकार जिस जगह पर अधर्मवासना अधिक पैला हो, लोगोंके हृदय में अधर्मविचार विशेष करके हो, उस स्थानमें उन अधर्म विचारोको शास्त्रोपदेइ.के द्वारा दूर करनेवाले गुरु नहीं होते हैं, कदाचित् गुरु कहलानेवाले हों भी वे शास्त्रज्ञानसे शून्य रहते है । कदाचित् संपूर्ण शास्त्रोके ज्ञाता गुरुवोंके अस्तित्व हो फिर भी उनके उपदेशका प्रभाव नहीं होता हो, कदाचित् ७६ दानशासनम् , . ऐसे प्रभावक गुरु हों तो भी उनमें रत्नत्रयात्मक धर्म नहीं मिलता है, कदाचित् रत्नत्रयात्मक धर्मके उपदेश देनेवाले , गुरु मिले भी उन कर्मपीडितोंको उसे सुननेकी इच्छा नहीं होती है, कदाचित् इच्छा हो भी यह उपदेश उनको रुचता नहीं, रुचे तो भी हृदयमें प्रवेश नहीं करता है, कदाचित् हृदय में प्रवेश करे तो मी यहाँपर वह उपदेश बहुत दिनतक टिकता नहीं, कदाचित् टिक भी जाय चंद्रमासे समुद्र के बढ़ने के समान तपे हुए घी में पानीके समान, दरिद्र में ऐस्थर्य के समान अनेक दोषोंको अर्थात् द्रव्य भाव फर्माको उत्पन्न करके आत्मामें विकार उत्पन्न करते हैं उन धर्मविचारोंका नष्ट करते है। ये सब सुयोग प्राप्त होकर पापामा धर्मात्मा बने इस के लिए मुख्यतया काल- लब्धिकी अत्यंत आवश्यकता है ॥ १३७ ॥ गुरुकमोल्लंघनतत्परा ये जिनक्रमोल्लंघनतत्परास्ते तेषां न दृष्टिन गुरुन पुण्यं वृत्तं न बंधुन त एच मूढाः१३८ अर्थ---जो मनुष्य गुरुषों की परंपराको उल्लंघन करना चाहते हैं अर्थात् गुरुवों की आज्ञाको नहीं मानते है ये जिनेंद्रमगवतकी आज्ञा को ही उल्लंघन करने में तत्पर हैं ऐसा समझना चाहिए । 'उम लोगों में सम्यक्त्व नहीं है। उन को कोई गुरु नहीं, उन्हें पुण्य का बंध नहीं, चारित्र की प्राप्ति नहीं, उन का कोई बंधु नहीं विशेष क्या? वे अपना अहित कर लेने वाले मूढजन हैं ॥ १३८ ॥ निजधर्मवंशपारंपर्यागतसत्क्रम व्यतिमाम्य । यो वर्तते स उत्सक इह तेन च धर्मवंशहानि:स्यात्।।१३९ अर्थ-सर्वज्ञपरंपरासे आए हुए सन्मार्ग को उलंघन कार जो आचरण करता है वह धार्मिकमनुष्योंमे उत्सक कहलाता है । अर्थात् उस का यह विचार रहता है कि में कुछ बोटता हूँ यही चतुर्विधदाननिरूपण ७७ . आगम है, मैं जो कुछ भी करता हूं वही आचार है। इस प्रकार के उच्छृखल विचार से उस व्यक्तिद्वारा धर्म का ही नाश होता है.१३९ बाधते नृपसेवकानपि वोगात्रैश्च ये सागस । स्ते कारागृहयाध्यदण्ड्यसकळरछया भवेयुर्यथा-।। ये रत्नत्रयधारिणत्रिकरणैस्ते सागसो दुर्गती। ते वाध्या बहुदण्ड्यखण्ड्यसकलच्छेद्याश्च वध्यास्तथा ॥ अर्थ-जिस प्रकार इस लोकमें राजाके सेवकोंको भी कोई बच्चन व शरीरके द्वारा बाधा पहुंचायें तो वह राजाके अपराधी कहलाते हैं, उनको कारगृहका दण्ड मिलता हैं यहाँपर उन्हे अनेक प्रकारको बाधा दीजाती है, दण्ड दिया जाता है, समय आनेपर उनका सर्व नाश किया जाता है। इसीप्रकार जो रत्नत्रयधारी साधुवोंको मन वचन फायसे कष्ट पहुंचाते है ये अपराधी हैं, वे भी उप्त पापके कारण नरकादि दुर्गतिमें जाकर जन्म लेते है.। और वहांपर अन्य नारकी जीवोंके द्वारा उनको अनेक प्रकारसे बाधा दीजाती है। दण्ड मिलता है, , वध किया जाता है। एवं उसका सर्वनाश किया जाता है । इसलिये वीतरागी साधुवोंको कभी कष्ट न पहुंचाना चाहिये ॥ १,१० ॥. मुक्तिर्नास्ति कली वपनामिव मुक्षेत्रं जिनपिद्वयं ।., जना निस्वकृषीवला इव सदा भृत्यैश्च तत्र क्रियां । श्रेयोदामिह कारयति विमुखा दृश्वेव कालायतो ।।. राज्ञां विटिमियाफला गुफळदैनानि पूजाधनैः ॥ १४१ अर्थ-इस पंचमकामे इस भरतक्षेत्रसे मुक्ति नहीं हो सकती, जिस प्रकार कि दरिद्री कृषकको. निजका खत नहीं होता है । मुक्तिस्थानको प्राप्त करनेयोग्य . क्षेत्र जिनदेव और जिनमुनि है। उनके प्रति जो क्रिया श्रायकोंकी होनी चाहिये वह योग्यरूपसे नहीं हो पाती, पूजाप्रतिष्ठादि श्रेयस्कर क्रियाको नायक अपने - .
७८ दानशासनम् .. सेवफासे कराते हैं । अतएव सम्यक्त्वसे विमुख है। यह कालका दोष है। जिस प्रकार राजाका अपराधी सदा दुःखी रहता है उसी प्रकार यह पापात्मा भी दुःख उठाता रहता है ॥ १४१ ॥ न्यसेवाकृदपुण्यवानकलजी भिक्षार्जितद्रव्यभुक् । भूपास्थानगतागतश्च मनुजो नीचोपि पूज्यों भवेत् ।। तं. विभ्यंति निरीक्ष्य चाटुवचनं सर्वे वदंत्यावह । बाधते जिनपूजकं जडजनाः पश्यंति दासं यथा ॥१४२॥ अर्थ-नीचवृत्ति करनेवाला, पापी, नीचकुलोत्पन्न, भीख मांगने वाला व्यक्ति भी यदि राजदरबारमें आता जाता रहता है, राजाके साथ विशेष बोलता चालता रहता है तो वह नीच होनेपर भी लोकके लिए पूज्य होजाता है | सब लोग उससे इसलिए डरते हैं कि यह कुछ 'राजासे चुगलीकर हमारा अहित करेगा। इसलिए सब लोग उसकी खुशामद करते हैं। और मीठे २ बोलते हैं । परंतु बडे भाचर्यकी बात यह है कि जिनेंद्र भगवंतकी सेवा करनेवाले पुरोहितको बहुत कष्ट देते हैं, अज्ञानी जन उन्हे नौकरोंके समान देखते है । यह उचित नही है ॥ १४२॥ वेश्यादासीजनानामुपकृतिमधुना कुर्वते नो विपादं । तेषामाकूतमीपन्न खलु चे कलुपीकुर्वते भोगिनो ये ॥ सा वेश्या सौख्यदास्ते न च यदि सुखदास्तद्विरोधान्न सौख्यं मत्वैवं तैर्विरोध न च जिनभजकं नंद्रमनं तथैवं ॥ १३ ॥ अर्थ-जिस प्रकार लोक में ऐसा देखा जाता है कि जो मनुष्य वेश्यासेवन करना चाहता है यद सब से पहिले उसे वेश्या के दासीका उपकार करता है। उस दासीको कष्ट नहीं पहुंचाता है। उस के विचार में जरा भी धक्का नहीं पहुंचने देता है, यह दासी जैसे कहे वैसे ही मानता है। क्या उसे सुख देनेवाला. वेश्या है ? अथया यह दासी है।
चतुविधदाननिरूपण सुख देनेपाली यद्यपि वेश्या है तथापि उस दासीफे साथ विरोध करने से उस को वेश्या से भी ठीक सुख नहीं मिल सकेगा ऐसा समझकर उस दासीफे साथ विरोध नहीं करते हैं । परन्तु दुःख इस का है की जिनेंद्र देयके साक्षात् सेवक पुरोहितोंको आदरकी दृष्टि से देखते नहीं है। ये ये राम सेवकासति ते ते । पूज्याः सेव्या सेवका न मजानां ॥ तास्तेषामेवोपकुर्वति सेवा । भीताः प्रीता राण्मनो लब्धुकामाः ॥ १४४ ॥ अर्थ F---राजा की मर्जी को प्राप्त कर लेने की इच्छा रखने याले मनुष्य राजसेवकों को बड़े पूग्यदृष्टि से देखते हैं अर्थात् राजसेषक प्रजावोंके लिए आदरणीय हैं, ये प्रजावाके सेवक नहीं हैं । प्रजा उन राजसेवकोंको भय से स्नेहसे उपकार करती है एवं उन की सेवा करती है । यह लौकिक नीति है ॥१४४ ॥ ये ये नो देवार्चकास्संति ते ते । पूज्याः सेव्या सेवकारस्युः प्रजानां । नार्थस्तेपी ताभिर्य विनाधं । भीताः प्रीता आजुषा वा तदर्थात् ॥ १४५ ॥ अर्थ-जो भाधान्के अर्चक हैं वे सब इम श्रावकोंके लिये पूज्य हैं, उनकी सेवा करने योग्य है। परंतु पंचमफालके दौरसे प्रजायें उनकी सेवा करना छोडकर येदी सबके सेवक वनगये हैं। उनको उनकी सेवाके बदले नैवेद्यके सिवाय और कुछ मिलता भी नहीं है । जो मिलता है उसमें संतुष्ट होकर भयसे सबकी सेवा करते हैं यह काल दोष है ॥१४५ ॥ ये येऽर्चति जिनं गुरुनुपचरंत्यदत्यजास्तेऽज ते । सद्भपत्योपचरति पूजकजनाः स्युस्ता: स पुण्यं तयोः ।।
दानशासनम्
अन्योन्यानकुलयोगवशतः पापं च पापप्रदं ।
कोपाः कोपकराः शमाः शमकरा: भावाः स्युराज्यावमाः
अर्थ-जो जिनेंद्र भगवंत व जिनमुनियोंकी पूजा करते हैं ये
अहंत परमेष्ठीके प्रजा हैं, इस पंचमकामें जो उनका सत्कार करते
हैं वे पुण्यका बंध करते हैं । परस्पर अनुकूट वृत्तिसे दोनोंको
पुण्यवंध होता है । एवं एक दूसरेके अनुकूल प्रवृति न होकर
वैषम्यभाव रहे तो पापकर्मका बंध होता है - 1 क्योंकि लोकमें
देखा जाता है कि क्रोध से क्रोधी वृद्धि होती है, शांतिसे दूसरा
मनुष्य भी शांत होजाता है । जिस प्रकार अग्निमें पड़ा हुआ घी
अग्निको प्रज्वलित करने वाला है । जल में पडा हुआ घी ठण्डा होता
है, इसीप्रकारं भाव जैसें होते हैं उसी प्रकार उसकी परिणति होती
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ये धर्माणितसौख्यमप्यनुभवशा पध्वंसिनी ।
ये ज्ञातार्थगुणाश्च वन्हिवलतोऽपथ्याशिनो दुःखिनः ।।
कर्म नंति दृगईदाश्रितजना दुःकर्मसंवर्तिनः ।
सर्व पंचमकालदोपवलतो मूढा इहेवाभवन् ॥१४॥
अर्थ-जो राजा व श्रीमंत लोग पूर्वजन्म में आचरण किए हुए.
धार्मिक वृत्तियोंके पुण्यसे सुखको अनुभव करते हुए उस धर्मको नष्ट
करते है ये वे अज्ञानी ठीक उसी प्रकार है जिस प्रकार' फि भनेक
भोज्यपदार्थोके गुणको जानते हुए एवं अनिके बल होनेपर भी अयोग्य
आहार को खाकर दुःखी हो जाते हैं । सम्यक्त्व गुण कर्मको नांश
करते है। परंतु खेदको बात है कि इस पंचमकालके दोपसे जिन-
धर्माश्रित मनुष्य मूर्खतासे पापकर्मकी ओर प्रवृत्ति करते हैं ॥१४७॥
चतुर्विधदाननिरूपण ८ . दुर्दीः श्रितकंटदुर्गमतरा मार्गाश्रितयंगुला । दुर्गधाश्च जडेः कृता इव जनः प्रहः कृत हितः । पुण्योगचयोपदेष्टभिरिवासस्यावनैः कापियः स्वैराचारिभिरक्षलालसनरर्धन्विोत्पत्तयः ॥ १४८ ॥ '. अर्थ-जिस प्रकार किसान लोग खेतके सत्यको काटकर अस्त व्यस्त कर देते हैं तो जानेवाले लोगोंको मार्ग नहीं मिलता है इसी प्रकार इंद्रियाभिलाषी स्वैराचारी व अज्ञानी लोगोंके द्वारा यह पवित्र जिनमार्ग मलिन किया जाता है। उन स्वेच्छाचारियोंकी कृपासे यह मार्ग अत्यंत मलिन, दुगंधयुक्त, कुरूप व कंटकमय बन जाता है। इसी प्रकार कृतज्ञ धर्मात्मा पुरुषोफे द्वारा उस मार्गफा प्रकाशन मी होता है। ये अपने उपदेशसे इस जिनधर्मको प्रभावना फर पुण्यसंचय करते हैं ॥१४८॥ ये मध्येजिनगेहमा कलई शयति साक्षारणं । मर्मोद्धाटनमद्भुतं कुमतयः कुर्वति तेऽग्रे गुरोः ॥ सद्यो न्यागतयो मिपाद्तधनाः लिएाशयास्युःप्रभोः । तेषां समनि रोगिणोऽपि सरुजां मृत्युतिमासांतरे।।१४९ ये चूति जिनालयेऽपि मदिरां दग्ध्वाप्यदत्यामिपं । ते भृत्याश्च नृपाः प्रजा अनुमता भ्रश्यंति फाफा इव । मुक्ता स्वं विहरति गेहनगरं दुधा इचारण्यगाः ।। सर्वे दण्डितपीडिता निगलिताः काराम गुप्ता जनैः।।१५० अर्थ--जो मिथ्यात्वी जिनमंदिरमें अथवा मुनियासमें फलद करते १ घेश्य पीविपमिव धुनोतीह सर्च परस्त्री-। क्ष्वेडा सद्यो हरति च सुखं शुरपुण्यं च रण्डा, भायुलक्ष्मीमपि शुभगति वंशशुद्धिं च दासी! मूढः श्रेयः शुभगतिकरीमूहकन्यामुदास्ते ॥
: दानशासनम् । अन्योन्यानकूलयोगवशतः पापं च पापमदं । कोपा कोपकराः शमाः शमकरा: भावाः स्युराज्यावमाः अर्थ-~-जो जिनेंद्र भगवंत व जिनमुनियोंकी पूजा करते हैं ये अहंत परमेष्टीके प्रजा दें, इस पंचमकामें जो उनका सत्कार करते हैं ये पुण्यका गंध करते हैं । परस्पर अनुकूलवृत्तिसे दोनोंको पुण्यबंध होता है । एवं एक दुसरेके अनुकूल प्रवृति , न होकर वैपम्पभाव रहे तो पापकर्मका बंध होता है । क्योंकि लोकमें देखा जाता है कि क्रोध से क्रोधकी वृद्धि होती है, शांतिसे दूसरा मनुष्य भी शांत होजाता है। जिस प्रकार अग्निमें पड़ा हुआ घी अग्निको प्रज्वलित करनेवाला है । जलमें पड़ा हुआ घी ठण्डा होता. है, इसीप्रकार भाव जैसें होते हैं उसी प्रकार उसकी परिणति होती है | १५६ ॥ ये धर्माणितसौख्यमप्यनुभवद्धता वृपध्वंसिनो । ये ज्ञातार्थगुणाश्च वन्हिवलतोऽपथ्याशिनो दुःखिनः ॥ कर्म नंति दृगईदाश्रितजना दुःकर्मसंवर्तिनः। सर्वे पंचमकालदोपवलतो मूढा इहेवाभवन् ॥१४॥ अर्थ-जो राजा व श्रीमंत लोग पूर्वजन्म में आचरण किए हुए. धार्मिक वृत्तियोंके पुण्यसे मुखको अनुभव करते हुए उस धर्मको नष्ट करते है ये वे अज्ञानी ठीक उसी प्रकार हैं जिस प्रकार कि अनेका भोज्यपदार्थोके गुणको जानते हुए एवं अग्निके बल होनेपर भी अयोग्य आहार को खाकर दुःखी हो जाते हैं । सम्यक्त्य गुण कर्मको मांश फरते है । परंतु खेदकी बात है कि इस पंचमकालके दोषसे जिन- धर्मानित मनुष्य मूर्खतासे पापकर्मकी ओर प्रवृत्ति करते हैं ॥१४७]] - चतुर्विधदाननिरूपण .. दुर्दर्शः श्रितकंटदुर्गमतरा मार्गाश्रितयंगुला । दुर्गधाश्च नहैः कृता इव जनः प्रोः काहितः । पुण्यायोगचयोपदेष्टभिरिवासस्यावनैः कापियः स्वैराचारिभिरक्षलाळसरधर्मान्धोत्पतयः ॥ १४८ ॥ अर्थ-जिस प्रकार किसान लोग खेतके सस्यको फाटकर प्रस्त व्यस्त कर देते हैं तो जानेयाले लोगोंको मार्ग नहीं मिलता है इसी प्रकार इंद्रियाभिलाषी स्वैराचारी व अज्ञानी लोगोंके द्वारा यह पवित्र जिनमा मलिन किया जाता है। उन स्वेच्छाचारियोंकी कृपासे यह मार्ग अत्यंत मलिन, दुगंधयुक्त, पुरूप 4 कंटफमय बन जाता है। इसी प्रकार कृतज्ञ धर्मात्मा पुरुषोंके द्वारा उस मार्गका प्रकाशन मी होती है। ये अपने उपदेशसे इस जिनधर्मको प्रभावना कर पुण्यसंचय करते हैं ॥१४८ ॥ ये मध्पेजिनगेहमा कलहं शप्यति साक्षारणं । मर्मोद्धाटनमद्भुतं कुमतयः कुति तेऽने गुरोः ॥ सयो न्पग्गतयो मिपाद्तधनाः लिटाशयास्युःममीः । तेषां समनि रोगिणोऽपि सरुमा मृत्युचिमासांतरे।।१४९ ये चूपति जिनालयेऽपि मदिरां दग्ध्वाप्पदंत्यामिपं । ते भृत्याश्च नृपाः प्रजा अनुमता भ्रश्यंति काफा इव । मुक्त्वा स्वं विहरति गेहनगरं दुष्टर इवारण्यगा। सर्वे दण्डितपीडिता निगलिताः काराम गुप्ता जनः॥१५० अर्थ--जो मिथ्यात्वी जिनमंदिरमें अथवा मुनियासमें कलह करते १ घेश्या दुपीविषमिव धुनोतीह सर्व परस्त्री-। क्ष्वेडः सयों हरति च सुखं सुद्धपुण्यं च रण्डा, भायुलक्ष्मीमपि शुभगति वंशशुचि व दासी ॥ मूहः श्रेयःशुभगतिकरीमूढकन्यामुदास्ते ५ ८२ दानशासनम् - . हैं, और दूसरोंको मर्मभेदी गालियोंको देते हैं, उनको उस तीन पापके कारण उसी समय नरकादि नाचगतियोंका बंध होता है। एवं उनकी संपत्ति चोर, दुष्टराजा, भादिके द्वारा लुट जाती है, एवं ये सदा दुःखी होते हैं। एवं उनके घरमें भयंकर बीमारी फैलती है । एवं इस पापके फारण तीन गातफे अंदर मरण भी होजाता है। इसलिए दवगुरुस्थान में पाप न करना चाहिये । जो मनुष्य जिनमंदिर व मुनिवासमें शराब पीते हैं एवं मांस पकाकर खाते है ऐसे सेवक. एवं उनको अनुमति देनेवाले राजा व प्रजा सबके सब भ्रष्ट होते हैं, अपने घर व नगरको छोडकर दुष्ट जानवरों के समान जंगलमें फिरते रहते हैं 1 इतना ही नही ये सब शत्रुराजावोंके द्वारा बाधित, दण्डित, व पीडित होते है, सदा बंदी- खानेमें रहनेवाले के समान उनको दुःख उठाना पडता ॥१४९||१५० शैलूपोऽप्यनयोऽगुणोऽयमशम क्रोधी जडो धीलघु- निर्भाग्योऽपमिति ब्रुति सुधियो दृष्ट्वा शपंत नरं । स श्रीमानुदयो गुणी स सुकृती शांतः सशिक्षोऽनघः ॥ सदृष्टिः सुदृगग्रणीस्स वियुधः श्रीजैनभक्तो भवेत् ॥१५१ अर्थ--गुणदोष को जाननेवाले विद्वान लोग योग्यायोग्य पात्रभेद को न जानकर गालियां देनेवाले मनुष्य को डोंबारी कहते हैं । यह निर्गुण है, अशांत है, घुस्सेबाज है, मूर्ख है, पापी है, नीच है, दरिदी है इत्यादि क प्रकार से कहते हैं । परंतु जो जिनभक्त हैं उन को यह श्रीमंत है, भाग्यवान है, गुणनिधान है, पुण्यामा है, शांत है, शिक्षित है, निष्पाप है, सम्यग्दृष्टि है, सम्यग्दृष्टियोंके अग्रणी है, विद्वान है इत्यादि प्रकार से प्रशंसा करते हैं ।। १५१ ॥ सस्त्रेदान्कुब्जकंगनचलितचरणान्दग्धशीपानशक्ता- वक्ताक्षात्कंपितांगाश्चयधुयुतमुखान्भारवाहान्समीक्ष्य 7 चतुर्विधदानगिकपण तद्धारान्ये स्वयं चादधति सकरुणास्तान् प्रणम्य प्रशस्या- जीवंतोऽमा यथा जीवत भुवि कृतिनो बाधकान्शंसपित्वा ।। अर्थ-प्रत्येक मनुष्य को उचित है कि यह दुःखियों के ऊपर दया करना सीखें । जो मनुष्य कोई बोजा उठाकर ले जा रक्षा हो, उस को पाना आया हो, उस के गरदन के ऊपर अधिक दबाब पड़ रहा हो, पैरसे चलने के लिए असमर्थ हो रहा हो, मस्तक में भार के उठाने से जलन पैदा हुआ हो, शरीर के अवयव कंपने लगे हो, मुख सूज गया हो, ऐसी परिस्थिति से उन से उस भार को लेकर करुणाबुद्धि से स्वयं धारण करते हैं ये सत्पुरुष है। उन्हे 'वे दुःखी जीव प्रणाम करते है । उनकी प्रशंसा करते है । नीच प्रकृति के लोग उन्हे कष्ट पहुंचा तो भी ये उन को उपकार ही किया करते हैं। निमज्जंतीव पंकांधी पतंतीय नगाग्रतः॥ शुद्धग्दोधवृत्तेभ्यो वृथा भ्रश्यति मोहिताः ॥१५३॥ अर्थ- जिस प्रकार कोई कीचड के कुए में फंस जाते हों, एवं पर्षत के ऊपर से गिरते हों उसी प्रकार संसारके मोह से फसे हुए मनुष्य व्यर्थ ही शुद्ध सम्यग्दर्शन ज्ञान चारित्र से भ्रष्ट होते हैं। संसार में मोह बडा जबर्दस्त कीचड है । उस में जो फंस जाते हैं फिर उन का उस से निकलना कठिन हो जाता है । एवं बसे पवित्र रत्नत्रय धर्म से च्युत होना पडता है जिस कारण से यह दर्घिसंसारी बन जाता है ।। १५३॥ ध्रुवांयुजातान्धिफलादयो यथा । नितांतपुण्योदयजातभूतयः॥ शिलाविलोत्पन्नकुमा यथा तथा । वृपेच पापे कतिचित्समश्रियः ॥ १५ ॥ अर्थ-नारियल के वृक्ष समुद्रके किनारे अधिकतर हुआ करते है।
दानशासनम् . समुद्र में सदा पानी रहने से उसके कारणसे उत्पन्न नारियल के वृक्षमें भी सदा फल रहता है। इसी प्रकार लोकमें ऐसे बहुत से पुण्यवान मौजूद हैं जो अपने पूर्योपार्जित अक्षय पुण्यके कारणसे प्राप्त संपत्तिसे सदा- फाल पुण्य-कार्याको वृद्धि करते है। अपनी संपत्ति घे सदा धर्म: प्रभावनाफा का कार्य करते हैं । इससे जो पुण्यका बंध होता है उसी का नाम पुण्यानुबंधी पुण्य है। परंतु ' पर्वतादि में उत्पन्न होनेवाले बहुतसे वृक्ष ऐसे हैं जिनमें कभी फल लगते हैं कभी नहीं लगते हैं। इसी प्रकार कितने ही लोक में ऐसे मनुष्य हैं जो पूर्वपुण्यके द्वारा संपत्ति फो प्राप्त कर भी कभी उसे धर्मकार्यमें और कभी पापकार्यमें लगाते हैं, उनको धर्म और पाप दोनोंमें समानवुद्धि ॥ १५४. ।। यावद्धान्यं भवति भुवि तचापदिच्छंति लोका--- स्तद्वस्पांति स्वविपयमिमं पूर्वभूपाः स्वपद्धयै ।।.. अज्ञानांधा जनमिह यथा पूतिनी नारसिंहो । द्रव्याहृत्यै निजकुलहतेभूमिपाः पीडयंति ॥ १५५ ॥ अर्थ-लोकमें किसानोंके स्वभावमें उनको जित वर्ष जितने अधिक धान्यकी उत्पत्ति होती हो उतना ही ये घाइते रहते हैं। उससे अधिक संतुष्ट होते है । धर्मात्मा राजा भी उससे अपने राज्यको ही उन्नति है ऐसा समझकर उनी अग्छी तरह रक्षा करते थे, परंतु खेद है कि आजकलके अनानसे अंधे हुए राजा उन प्रजावोंको जिस प्रकार नारसिंहने पूतिनीको पीडा देकर मार डाला उसी प्रकार अपने स्वार्थ के लिए प्रजावोंके द्रव्यको अपहरण कर उन्हे पांडा देते है। उन्हे । यह मालूम नहीं है कि उस पापके कारण उनके कुटका ही क्षय होता है ॥ १५५॥ करोऽधिकोऽभूत्फलमल्पमुा। सेवाधिका स्वल्पभृतिः कथंचित् ।।
चतुर्विधदाननिरूपण । । ..." शून्या तु सा स्वामिजनद्वये त-। नैफल्यमायांति नृपः प्रजोय: 11 १५६ ॥ अर्थ-आजकलकी परिस्थिति यह हुई है जमीनका कर सो हुआ अधिक परंतु जमीनमें उत्पन्न तो होता है कम, इसी प्रकार. सेवकोंस सेवा तो अधिया लेने लगे। परंतु उन्हे येतन तो कम देते है । इस प्रकारको वृत्तिसे उन राजा प्रजाओंमें दिनपर दिन शून्यता आती जाती है। और इससे उन राजा प्रजा व भूमिकी संपत्ति इत्यादि सब निष्फ लताको प्राप्त होते हैं ॥ १५६ ॥ विमाननात्पूज्यसतां वृषक्षयो। भवेत्स्वविश्वासवता विघातनात् । स्वतेजसो हानिरनीकतेजसा ।। प्रजापिलोपश्च निजायुपः श्रियः ॥ १५७ ॥ अर्थ-जो राजा अपने स्वार्थकेलिए अपने राज्य में रहनेवाले गुणवान् वैद्य, ज्योतिषी आदि सापुरुषोंको पीडा देकर अपने राज्यसे भगाता हो उसके धर्मकी क्षति होती है। अपने विश्वासके मंत्री पुरोहित बंधु इत्यादिके साथ विश्वासघात करनेसे अपने तेजका नाश होता है, इतनाही नहीं उसके सेनाका भी तेज नष्ट होता है। एवं उसके प्रजाका लोप होता है, स्वतः राजाके आयु व संपत्तिका भी क्षय होता है इसलिये गजाको उचित है कि प्रजावोंको फभी कष्ट न पहुंचावे ॥१५७ नात्मेवाजीविते देहे सहते रोगपीडनं । निस्वो नाजीवितः सेवाविधानं भूपतेर्मनाक् ॥ १५८॥ अर्थ-जिसप्रकार शरीरको आयु बाकी न रहनेपर जीव रोगपीडा न सहता हुआ इस शरीरको छोडकर चला जाता है इसी प्रकार जिस सेवक के सेवाके लिए कोई प्रतिफल न मिटता हो यह राजाको सेया कमी नहीं कर सकता है ॥ १५५ ॥ . । - दानशासनम् , . स्वामिद्रव्यं स्वामितामेव कुर्या-1 मृत्यद्रव्यं भृत्पता स्वामिवित्तं ॥ भृत्पग्राह्य भृत्यवित्तं न जातु । 'ग्राह्य योगैः स्वामिना भृत्य फारि ॥ १५९ ॥ अर्थ-सेयक स्वामिसेवामें तत्पर होकर परिश्रमसे जो धन माता है उसे स्वामिद्रव्य कहते हैं। ऐसा ही धन सेवकके ग्रहण करने योग्य है, ऐसे धनोंके उपार्जनसे सेवक धनवान बनकर अनेक सेवकोंका स्थामी बनता है। परंतु ऐसा न कर जो किसी तरह आटाय से काम करते हैं ये भृत्पद्रव्यके कमानेवाले कहलाते हैं, ऐसे द्रव्यसे सेवक की बना रहता है। यह यथेष्ट धनार्जन नहीं कर सकता है | स्वामीकाधन सेवक ले सकता है। परंतु भूलकर भी स्वामी सेवक के धन को ग्रहण न करें। यदि स्वामी सेवफ के घन को ग्रहण करता है तो वह स्वयं सेवक बन जाता है ।। १५९ ॥ कृत्वा नित्यनिकृष्टकर्मकरुणामुत्पाद्यतेनाशया। पत्युवित्तमुपार्जितं च यदहो येनैव पापात्मना ।। तद्वित्तं प्रभुणा न दत्तमथवा व्याजाबलादाहतं । तं नार्थ कुरुते निजेशसदृशं तद्वित्यजेत्तद्धनं ॥१६॥ अर्थ---जो सेवक पहिले बहुत वृष्ट २ सेवायोके द्वारा माटिक के हृदय में करुणा उत्पन्न करता है एवं उन से येथेष्ट धन लेता है। उस के बाद उस के हृदयमें पाप आकर अपने स्वामकि द्वारा नहीं दिया हुआ धनको भी किसी तरह धोका देकर लेने लगता है। उस स्वामीकी श्री ऐसी बातोसे घटेगी नही प्रत्युतः वह अपने स्वााके बराबर बन जायगा । परंतु उस सेवक को ऐसे कार्यासे हानियां पहुं- चेगी, इसलिए ऐसे धन को अपहरण नहीं करना चाहिए । .
चतुर्विधदाननिरूपण यः सेवकानां धनमाददाति । यो नाचकृत्यार्जितमन्यवित्तं ॥ कुर्याधनं यत्खलु तस्य तत्त-। न्नीचीपसवार्जितजीवनं च ॥ १६१ ॥ अर्थ-जो मनुष्य अपने सेवकों के धन को अपहरण करता है, एवं नीचकृत्योंसे कमाया हुआ वेश्या आदिके धनको ग्रहण करता है वह उसके फलसे इस भवमें एवं परभवमें नीचगतिमें जाकर जन्म लेता है एवं नीचोंकी सेवा करनेके जीपनको पाता है ॥१६॥ भृत्येष्वीयां भावहिंसातुरा ये । स्वेप्यन्येषु प्रीतिमाकुर्वते ते ॥ जन्मन्यग्रे स्वेपु भृत्येपु चैको । भृत्यो भूत्वैकैकजन्मन्यहो स्यात् ॥ १६२ ॥ अर्थ-जो स्वामी अपने भावोंमें मायाचार कर अपने सेवकोंमें ईर्षीभाव एवं दूसरों के सेवकोंमें प्रीति करता हो यह अपने पापके फलसे आगे एक जन्ममें अपने एक २ सेवकका वह सेवक होकर उत्पन्न होता है आश्चर्य है ॥ १६२ ।। कृतफळशेषु भृत्येषु नोपकुर्वति ये नृपाः ।। जन्मांतरेऽधिश्रीणां तु तेषां ते गृहकिकराः ॥१६॥ अर्थ- जो राजा अपने प्रेम करनेवाले सेवकोंको उपकार नहीं करते हैं वे आगेके जन्म में उन्ही सेवकोंके सेवक बनते हैं जिन्होंने अपने पुण्यसे अधिक भाग्यको प्राप्त किया है। १ नृपैर्दत्तार्थभूफन्यासर्ववस्तुसमानता। न प्राधा आददानास्ते तैः सर्वेपि निरास्ता । .
दानशासनम् ++RAM +++MAA *- भूनायेऽदृशि सेवकः मुहगहिगाही यथा जायते ।। भृत्येऽदृश्यपि भूमिपो यदि मुहचासोक्षवद्भूतः ।। भृत्योत्सर्जन गोपनोक्तिचिगमे भूपोऽनिकासिव-। नृत्यस्योपभृतेर्लये भवभवे भृत्यौप्यपुण्यक्रियः ॥ १६॥ अर्थ-राजा यदि अपिदयासी हो उसका सेवक यदि विश्वासी हो तो यह मंत्रतंत्रसे अपरिचित सेवक गारडीने पकडे हुए सर्पके समान होता है। राजा यदि विश्वासी हो तो भरी हुई गाडी को बांधा हुआ बैल के समान हो जाता है। सेवकों को रक्षण करने का वचन देकर फिर यदि उन की रक्षा राजा नहीं करता है तो उस राजा की दशा घदी होती है जैसी कि आग लगी रईकी। यह राजा इस प्रकार के पापोंसे भयभवमें पापी होकर उत्पन्न होता है ।। १६१॥ परद्रव्यापहारित्वादरिद्रो भवति धुवं । तस्मादाता परद्रव्यं न गृहाति कदाचन ॥ १६५॥ । अर्थ-परद्रव्य को अपहरण करने से मनुष्य नियम से दरिद्री बनता है। इस लिए दाता को उचित है कि वह परद्रव्य को कमी प्रहण न करें॥ १६५ ॥ स्थापितागतवित्तघ्नं देवस्वाम्यर्थवचनं । ॥ तेनेहामुत्र निःस्वःस्याद्ग्रंथः, स्वार्थापहत्त्सदा ॥ १६६ ॥ १८. अर्थ-जो मनुष्य देवद्रव्य और स्वामिद्रव्य को अपहरण करता है उस के पहिले के एवं आये हुए दोनों प्रकार के द्रव्य नष्ट होते हैं। एवं वह इस भव में एवं परभय में बहुपरिग्रही और दरिदी हो जाता है। एवं उस का धन सदा दूसरोंसे अपहृत होता है ॥ १६६ ॥ चौर्य दृष्टमिदं परैर्विकलता चित्ते भ्रमोऽक्षण्यं धत्ता । दैन्य निःमभना मुखे विरसता निस्त्राणता पादयोः।।
चतुधिदाननिरूपण AAAAAAN कंपो वणि दुःपरीपहजयः स्याद्गद्गदत्वं गले । निःक्रोधो घुघता दया विनयता चित्रं मृदुत्वं शमः १६७ अर्थ-चोरी करना अत्यंत निकृष्ट कार्य है। यदि किसीने चोरी फरते हुए देख लिया तो चोरका चित्त विकल हो जाता है, चित्तमें भ्रम उत्पन्न होजाता है | आंखो में अंधेरी आजाती है, दीनता धारण करनी पडती है, सारा शरीर प्रमाहीन होजाता है, मुख विरस हो जाता है, परोंमें निःशक्ति आजाती है, शरीर कंपने लग जाता है, अनेक प्रकारके कष्ट सहन फरने पड़ते हैं, कंठ गद्गद होजाता है, क्रोध छोडना पड़ता है, बुद्धिमत्ता आजाती है, दया भी उत्पन्न होती है, विनयशीलमी बनना पड़ता है, मार्दव एवं शांति भी धारण करना पडता है, आपर्य है ।। १६७ ॥ अनियतवृत्तं भयमे शिक्षककृतबाधने मुमुपुत्वं । चौर्यमपि चौर्यवर्जनमहो जना वर्जयेयुरिह तच्च ॥ १६८ अर्थ---चोरी करते समय चोरको बहुत भनियतवृत्ति फरनी पडती है क्यों कि उसे यह डर होता है कि मुझे कोई देख न ले, यदि कहीं पकडा गया तो फिर राजकर्मचारियोंके द्वारा दिये गये दण्डसे उसे यह इच्छा होती है कि यदि मेरेको मरण आजाय तो अच्छा है । इस लिये सज्जन लोग ऐसी चोरी को छोडते हैं ॥१६८॥ 'अर्यारागपदं सगुप्तिकमुमं शांतिच्छदं संयम-1 स्कंधं जीवचयाश्रयं पळसच्छाखं समित्यारं ॥ इष्टिमानफलं दयौधितमिदं सद्धर्मवृक्षं जनाः । सर्वे नितिदं दहति मुनयस्तेनाग्निना मूढवत् ॥ १६९॥' १ विषयविरतिमूलं संयमोहामशासं ॥ यमद्मशमपुष्पं शानलीलाफलाट्यं ।। वियुधजनशकुतः सेवितं धर्मवृक्ष । दहति मुनिरपीह स्तेनतीमानदेन ॥
दानशासनम् . अर्थ-यह जिनधर्म एक महान् वृक्षके समान है, विषय- विरति ही उस वृक्षकी जड है, गुप्तित्रय उस का पुप्प है, शांतिरूपी . पते हैं, संयमरूपी स्कंध है, धर्मरूपी शाखायें हैं । समिति ही उसका अंकुर है, सम्यग्दर्शन ज्ञान चारित्र ही जिस का फल है । दयारूपी पानी से वृद्धिंगत है, अनेक जीयों को आश्रय देने वाला है, यहांतक कि मोक्ष को भी प्रदान करनेवाला है, ऐसे धर्मरूपी महावृक्ष को अज्ञानी जन मुनि होकर भी चोरी रूपी अग्नि से जलाते हैं। खेद N मानहानिरपि वंचके सती। "पत्युरर्थयुगहानिरीपदाः [१ ॥ पंचको यदि पतिश्च तस्य यः । सर्वहानिरनिशं भवेत्पभोः ॥ १७० ।। अर्थ-लोक में यदि स्त्री पति को धोका देकर मायाचार करती है उस अवस्था में पतिपनी दोनोंका अपमान होता है । एवं धनका नाश हो जाता है। यदि पति पत्नी को धोका देकर अनीतिमार्ग में प्रवृत्ति करता है उस अवस्था में उस की सर्वानि हो जाती है। परस्त्रीगुरुदेवार्थ वृध्द्याद्यर्थ च सर्वदा ॥ न गृह्णीयान्न दद्याच्च सर्वनाशकरान्बुधः ॥ १७१ ॥ अर्थ-बुद्धिमान् मनुष्य को उचित है कि वह अपने वृद्धि के लिए परस्त्री को लेकर कभी दूसरोंको बेचने आदि कुकृत्य न करें। गुरुद्रव्य व देवद्रव्य को अपहरण कर व्याज आदि कमाने की कुचेष्टा नहीं करें। एवं स्वयं ऐसे कृाय न करें और न 'दूसरों को ऐसे द्रव्य देकर कुमार्ग की प्रवृत्ति ,करें। इस से उस का सर्वनाश होता है ।। ध्वंसयति राजधर्मो यारां द्रव्यं च सागसां सफलं । देवो धर्मो पाबद्रव्याण्यपि चांतरंगिकं पुण्यं ॥१७२।। - चतुर्विधदाननिरूपण अर्थ-मनुष्यने इस बात का विचार करना चाहिए कि लोक में राजाके अपरार्धा बाह्य ऐश्वर्य को राजा सर्व प्रकारसे नष्ट करता है। देवापराधोके बाह्य द्रव्य भी नष्ट होते हैं अंतरंग द्रव्य पुण्य मी नष्ट होता है ॥ १७२॥ देवस्वांम्पर्धहज्जीवे तृष्णा टिव सन्निना । स्यात्स्ववर्गेपु सा नित्या दरिद्रो जन्मजन्मनि ।। १७३ ।। अर्थ-जो जीव देवद्रव्य को अपहरण कर जाता है उस की तृष्णा सनिपात रोगसे पीडित रोगांकी तृपाके समान बढती दी जाती है। एवं च परिग्रहोंमें उसकी लालसा स्थिर होती जाती है। इतना ही नहीं यह जन्मजन्म में दरिद्र ही होता जाता है ॥ १७३ ॥ 'वाग्धारादत्तभूकन्यादेशनामधनादिकं । आदत्ते यो बलात्तस्य बहुहानिर्भवे भवे ॥ १७४ ॥ अर्थ--जो मनुष्य दूसरों से बचनसे अथवा जलधारा छोडफर दी हुई भूमि, कन्या, देश, प्राम, धन आदिको जबर्दस्तीसे छीन टेता हो उसको जन्मजन्ममें हानि उठानी पडती है । इसलिये परद्रव्यको कभी अपहरण करना उचित नहीं है ।। १७४ ।। प्रसह्य चार्थानतिपीड्य यः सतां । समाहरत्यौपण्यत एच तस्य ते ।। अल्पक्रयानिष्ठरकोऽथवा सदा । कुर्वति रायत्रिविधस्य च सयं ।। १७५ ॥ अर्थ-जो व्यक्ति अपने सामर्थ्यसे, बलात्कारसे अधवा बहुत कष्ट देकर सम्जनोंका धन अपहरण करता हो, एवं अधिक कीमतके पदा- १ वाग्दत्तं च मनोद धारादत्तं न दीयते । नरकान्न निवर्तते यावच्चंद्रदिवाकरी॥
२२ दानशासनम् थोको कम कीमत में खरीदता हो तथा दूसरों के प्रति सदा निष्ठुर व्यवहार करता हो उस व्यक्तिके भूत भविष्यत् वर्तमान ऐसे तीनों प्रकार के धन नष्ट होते हैं ॥ १७५ ॥ दशांशधादसिदिता मिपात् । धनं स सर्व लभते घृपार्पितं ।। नृपारिचाराग्न्यधपीवस्मृत-। र्धवेन दग्धेन धराटवी क्षयेत् ।। १७६ ॥ अर्थ-जो अपना कोप बहानेके निमित्तसे प्रजासे दशांश कर बेगे ऐसा नियम करके भी उनसे सर्वधन लेता है. तथा शत्रु रूप राजाफा, चोरका, कर्जा जिसने लिया है तथा जो विस्मृतिसे धनको छोड गये हैं ऐसे लोगों का धन ग्रहण करता है. वह राजा अग्रीस, जलो हुई भूमी के समान नष्ट होगा. इस श्लोकका अर्थ हमारे समझमें ठीक नहीं आया है । अतः अभिप्राय लिखा है ॥ १७६ ॥. बहाशाजिंतवित्तस्य सर्वस्य, विकश्यते मनः। निक्षेपार्थहरस्येवामुत्रिकाथदरस्य वा ॥ १७७ ।। अर्ध--बहुत लोभी होषार जो धन कमाता है उसके मनको इस कार्यसे बहुत दुःख उत्पन्न होता है अथवा ऐसा पुरुष सबके द्वारा पीडित किया जाता है। जिससे उसका मन, खिन्न होता है । जैसे कोई धनिक किसी का धन अपने पास रखता है तथा मांगनेपर उत्त को देता नहीं उस समय वह उसको बहुत कष्ट देता है क्योकि वह धनिक उस दीनके आगेके जीवनकाही विगाड देता है। इस श्लोकका केवल अभिप्रायमात्र लिखा है ॥ १७ ॥ यत्पीडितं वलमिवात्मपति गृहीत्या। व्याहृय शोधमरये वित्तरेत्कृतंत्रम् ॥ . ।
चतुर्विधदाननिरूपण ९३ । 1 सीतेव रावणगृहातगनान्यगेहा- । दंतु स्मरत्यनयलब्धपनं नितात ॥ १७८ । अर्थ-जो धन अन्याय व बलात्कारसे अपहरण किया गया हो यह अपने स्वामीको अनेक प्रकारके कुतंत्रसे शीघ, पकडकर शत्रुके हायमें दे देता है । जिस प्रकार बहुत कष्ट पाया हुआ सेवका स्वामी से चिढकर उसे शत्रुके हाथमें दे देता हो । एवं जिस प्रकार सती सीता रावणफे घरसे अन्य घर होनेसे छोड़कर जाना चाहती थी इसी प्रकार अन्यायोपार्जित धन दूसरेके पास जरूर चला जायगा । उससे कभी सुख नही मिल सकता ! १७८ ।। यो यहाशार्जितार्थस्सन् कुर्वन्स बहुधा पं । दोपी चांछनिय स्वास्थ्य मुक्त्वैवापथ्यमापधम् ॥१७९॥ अर्थ-जो व्याक्त अत्यंत लोमसे न्यायायाय, योग्यायोग्य विचार न करके बहुत धनको कमाता हो एवं उस पापफे उपशम के लिये अनेक धर्मकार्य करता हो सचमुचमें यह रोगीके समान है जो यात, पित्त, कफके विकारसे पीडित हो, स्वास्थ्यको इछासे औपाधिका सेवन भी करता हो हाथों अपथ्य भी करता हो ॥ १७९ ॥ । सत्पुरुषोऽर्जयति धनं पत् सकळजनष्टसाधुवृद्धथैव स्यात् तस्य धनस्य व हानि नुपहतधर्मवल सुगुप्तस्यैव ॥१८० अर्थ-साजनलोग न्यायसे जिप्त धनका उपार्जन करते हैं वह धन संपूर्ण इष्ट जन व साधु संतोकी वृद्धि के लिये कारण होता है। एवं धर्मकार्यमें उसका विनियोग होता है । उस धन की हानि कभी नहीं होती, असे कोई अपहरण भी नहीं करता, एवं धर्म कार्यों की रक्षा उससे होती है अत एव धर्मबल भी उसकी रक्षा करता है ॥ १८०॥ .
दानशासनम् MAnA . . , . देवाय संकल्प्य निजं धनं यो । दरेन तस्मै खलु तस्य दोपः ॥ करोति राजाच मिथी विवादा-1 स्तनोधात्मगलाभनाशान् ॥ १८१ ॥ अर्थ-जो व्याकि अपने धनको देवकार्य में संकल्प करके फिर उसे उस कार्य के लिये नही देता हो एवं अपने घरखर्च के लिये उप. योग में टेवा हो उसे तीन पापबंध होता है । उस पापसे उसे राजा के साथ बंधुयोंके साथ व अन्यमित्रोंके साथ विवाद होता है । लोक सब उसे निंदाको दृष्टिसे देखते है, इतनाही नहीं उसको 'सेज मंद होता है । द्रव्यका नाश होता है, धर्मकी हानि होती है, "संततिका लाम नही हो पाता है ।। १८१ ।। 'धर्मद्रव्यं दुरितहरणं यनिकायाश्रितं चे-1 दुत्पते वृषकुलहरास्तत्र जीवाच.दृष्टाः ॥ शून्ये यत्रावनिपतिगृहे चिचनेत्रातिरम्ये । निर्धूतोयद्विभवसुजना संविशंतीव भूताः ॥ १८२ ।। अर्थ-पापनाश करने के लिये समर्थ धर्मद्रव्यको अपहरण कर जो कोई अपने घरमें लेजाकर रखता हो या उसे अपने घर काम मे लेता हो उसके घरमें दुष्ट संतान उत्पन्न होती हैं। वे धर्म व कुल संस्कारको नष्ट करनेवाले होते हैं। जिसप्रकार अनेक विभावों से युक्त सुंदर राजमहल भी यदि शून्य हो जाय तो उस में भूत प्रेतादिक प्रवेश करते हैं इसीप्रकार धर्मकर्मसे शून्य ऐसे धरमें दुष्ट जीव प्रवेश करते हैं ॥ १८२॥ चेताक्लशं कृत्वैवान्नादिद्रव्यमाहरत्यपि यः । तस्य मुकृतव्ययःस्पाबत्तभंगोऽपि च ततोऽयवृद्धिश्च ।।१८३ " - .
चतुर्विघदाननिरूपण . अर्थ-जो मनुष्य दूसरोंके मनको दुःख पहुंचाकर उनके अला- दिक द्रव्योंको अपहरण करता हो एवं उससे स्वयं सुखका अनुभव कर रहा हो उसके पुण्यका नाश होता है। एवं सर्व संपत्तियों में प्रधान व्रतरूपी संपत्ति नष्ट हो जाती है, इतनाही नहीं पापकी वृद्धि होती है। इसलिये परधनको अपहरण करना उचित नहीं है।१८३॥ अन्योकाकृतभुक्तयो नृपतयो दत्वव भुक्तिव्ययं । झात्वा द्विनिगुणाधिकं धनपटं गच्छंति विद्वन्पदा ॥ संद्ववार्मिक एव शुद्धसुकृतं वांछन्वते शुद्धधी-1 तान्याळपभुक्तिभावप्रतिदिनं दद्यात्तदर्य मृदा ॥१८४ अर्थ-जिस प्रकार राजा किसी दूसरे घरमें भोजन करके माता है तो उस धरयालेको भोजनका मूल्य एवं दुगुने तिगुने धन पत्र आदि देकर चला जाता है इसी प्रकार विद्वान धावक धार्मिक व दाता हो तो उसे पुण्यप्राप्तिकी यदि इच्छा है तो दूसरों के घर में भोजन करे तो उसके बदले में कुछ न कुछ जरूर देखें ॥१८४॥ कळयत्तं कर्तृहस्तेन वित्तं योषायत्तं योषितः पाणिनैव । ग्राह्यं पुण्यं चात्महस्तेन पापं स्वेनैव स्थूचका दस्यवश्च ॥ अर्थ-घरके मालिक स्वयं व उसकी आज्ञासे दिये गये धनको ग्रहण करना चाहिये । घरमें यदि मालिक न हो तो मालिकिन स्वयं हो उसके हायसे दिये गये धन वा उसकी आज्ञासे दिये गये धनको - प्रहण करना चाहिये उसमे पुण्य होता है। ऐसा न होकर सेवकोंके हायसे गृहीत वा स्वयं अपने हाथ से गृहीत धन पापका कारण होता है। इस प्रकार स्वयं ग्रहण करनेवाले वंचक व चोर कहलाते हैं। शिथिले जिनगेहे सति सधना जैना उदासते तेपाम् । गृहधनतेजोमानप्राणादिद्दानिराशु स्यात् ॥१८६ ।। Y+ दानशासनम् - । अर्थ-जिनमंदिरके जीर्ण होनेपर उसे देखनेएर भी धनवान जैन उस से उपेक्षा करते हो, उसके उद्धारके दिये प्रयत्न नही करते हों तो उनका घर, धन, तेज, मान इतनाही नहीं प्राणादिका भी 'शीन नाश होता है ।। १८६ ॥ लेखयति यत्र यो ना सविकारांस्तस्य जिनमुनींद्रमतिमान् । नभ्यद्धनमायुहमपि सह मूलं च वीक्ष्य हृष्टस्यापि ॥१८७ ॥ अर्थ-जो मनुष्य जिनेंद्र व मुनीद्रोंके चित्रको प्रतिमा] सविकार निर्माण कराता हो उसका धन, आय, घर इत्यादि समूल नष्ट हो जाते हैं। इतना ही नहीं उन सविकार 'प्रतिमानोंको देखकर जो प्रसन्न होते हैं उनका भी धन आयु, घर इत्यादि समूल नष्ट होते हैं ॥ १८७ ॥ रागा पुरा गैरवहारिणःस- । दीर्घायुरारोग्यसुखाग्नि वृद्धाः ॥ सर्वे नृणां गौरवकारिणोऽद्य । ध्वस्तायुरारोग्यसुखाग्नयः स्युः ॥ १८८ ॥ '' अर्थ- पूर्वकालम राजा प्रजावोके दु:खोको दूर सदा दत्त चित्त रहते थे इसलिये वे दीर्घायुषी, आरोग्यवान् , सुखी व स्वस्थ होते थे। पंचमकालके राजा प्रजावोंको हरतरह दुःख देनेमें हो अपने कर्तव्यका इतिश्री समझते हैं अतएव वे अल्पायु, रोगी, दुःखी व 'अस्वस्थ होते हैं। प्रजावोंके हितनिरत रहना यह राजाका कर्तव्य हैं ।। १८८ ॥ यत्रास्थाने सदा हासी भण्डोक्तिहुगाचाम् । .: धर्मनिंदा भवेत्सर्व समूलं च विनश्यति ॥ १८९ । अर्थ-जिस राजाके आंस्थानमें ( दरबार ) सदा काल हास्य, करनेमें ।
चतुधिदाननिरूपण maamaRImmar ". भण्डयचन, परनिंदा, व धर्मनिंदा आदि दुष्कृत्य होते रहते हों उस राजाकी संपत्ति समूल नष्ट होजाती हैं ॥ १८९॥ पत्राहदासो दुष्कर्म जिनधर्मस्य दूपर्ण । साधुनिदा भवेत्सर्व सहमूलं विनश्यति ॥ १९० ॥ 'अर्थ-जिस राजाके आस्थानमें सदाकाल अट्टहास होता रहता हो, दुकाका बाजार लग रहा हो, साधुवोंकी निंदा होती रहती हो उस राजांकी संपत्ति नष्ट हो जाती है। राजा धार्मिक हो समी उसका राज्यशासन अटल रह सकता है ॥ १९०, यत्रीरकोचहरा भूपाः कायस्थाः पिशुना नराः। विश्वस्तास्तै हतासर्व सहमूळ विनश्यति ॥ १९१ ।। अर्थ-जिस राजाके शासनमें लोग अल्पकार्यके लिए महत्वपूर्ण 'कार्यों को बिगाडने के लिए तैयार होते हैं, इधर उधर चुगली करके परस्पर झगडा कराने में आनंद मानते है, अधिकारीवर्ग रिश्वत लेकर कार्य करता है, विश्वस्त ऐसे सज्जन लोग जहां सताये जाते हैं ऐसा राज्य समूल नष्ट होता है ॥ १९१ ॥ दृष्ट्वा न पश्यति युधान्ब्रुवतः सदुक्ति । श्रुत्वा श्रुणोति स जडः कटु वाग्रहीच ॥ ज्ञात्वा हिताहितजनाननिशं न वेत्ति । लक्ष्मीमहाग्रहगृहीतजनो विभाति ॥ १९२ ॥ अर्थ-लक्ष्मीरूपी महाभूतसे गृहीत अज्ञानी व्यक्ति सज्जनोंको पहिले देखनेपर भी नही देखेके समान वर्ताव करते हैं, शास्त्रोको सुननेपर भी अनसुनी कर देते हैं । अपने हित व अहितजनोंको जानकर भी नहीं जाननेके समान करते हैं, अनेक प्रकार भूतादि दुष्ट प्रोसे गृहीत व्यक्तिके समान कटुवचनका उच्चारण करते हैं। इसलिये धनके मदसे मदोन्मत्त प्राणी प्रहपीडितके समान ही हैं ॥१९२॥ - -दानशासनम् . नसते फलिसमपाश्रयाभराः किम् । योधते फनकसमाश्रयात्पुनः ॥ मन्यते जनपसमाश्रयान्न किंचित् । कुर्वति त्रिमदयुता इमे न किं तत् ॥ १९३ ॥ अर्थ-~-मनुष्य फलिकालके आश्रयसे ही किसीको देखना नहीं चाहता है, किसीको धन कनक मिलजाय तो वह मदोन्मत्त होजाता है, किसीको राज्यसत्ता व अधिकार मिलनेपर मदोन्मत्त होता है इनमें फिसीको एक साथ दूसरा कुछ भी मिले तो उनके भनर्षका कोई पार नही, ऐसी अवस्थामें कलिंकाल, फनक, राज्याश्रय ये तीनों मद एकजगह मिल जाय तो फिर ये क्या नहीं करेंगे ! सब कुछ अन्याय करनेको तैयार होंगे ॥ १९३ ।। विनः सद्यः फलति कृतिनामेव पुंसा. कृतोऽपं । नीचस्पृष्टिः फलति कृतिना सध एवं द्विभानाम् ।। क्ष्वेडः सद्यः फलति मुखिनों पनगस्येव नोऽत-- । 'स्तस्माद्विघ्नं सुकृति पुरुपो नैव कुर्यात्कदापि ॥१९४॥ अर्थ-जिसप्रकार दुष्ट सर्पके काटनेसे उसी समय विषोदेक होकर प्राणको अपाय पहुंचता है उसीप्रकार सत्पुरुपोंके मार्गमें विघ्न करनेसे उसका फल तरक्षण मिलता है, नीचलोगोंके स्पर्शन ब्राम्हणोंको उसी समय फल देता है । इसलिये सजनोंको उचित है कि वे कभी सन्मार्गमें विघ्न नहीं करें ॥ १९४ ॥ आयुर्हति रुजां करोति रिपुभिश्वोरमति न्यक्कृतिम् । • कारागारनिवेशनं निगल दुर्बधं सदा तद्धनं ।। सर्वार्थापति ततो विहरणं लोकऽपि भिक्षाटनं । दैन्पोक्ति विनति त्वधःस्थितिमही चित्रं कृतागःफलं॥१९५ भयं-बहुत आश्चर्य की बात है, राजद्रोह धर्मद्रोहकरके अर्जित . - चतुधिदाननिरूपण . । पापोंसे प्राणियोंका बडा अहित होता है। राजाके द्वारा प्राणदण्डको प्राप्त होते हैं, अगर कदाचित् प्राणनाश न भी हुआ तो अनेक प्रकारफे रोग कर देते हैं। चोर या शत्रुओं के द्वारा मरण होता है । अनेक प्रकारसे तिरस्कार प्राप्त होता है। जेल जाना पडता है; यहा घेडी पडता है, अनेक प्रकारके कष्ट मिलते हैं, उसके धनंको दूसरे लोग • • लूटके लेजाते हैं, यह भीख मांगने लगता है। दूसरोके सामने दीनता घ कातरता को धारण करता है। विशेर क्या ! उसका मारा अध:पतन होता है । यह सब उस धर्मापराधकृत पापका फल है।॥ १९५॥ सप्ताचिर्दहतीव सर्वमनिशं इत्यर्फतेजो रसं । क्ष्वेडो जीवितमामयः मुखयुग देवर्पिरामादिषु ।। दम्पत्योः कुरुते विरोधपळयं सदंधुभृत्यादिषु । प्रत्यूहः कृतकार्यलाभसमयप्विष्टान्निहंतुं क्षमः ॥ १९६ ॥ अर्थ-जो मनुष्य धर्मकार्योंमें, देयकार्योंमें घ राजकार्योंमें विघ्न करता उसका अधःपतन होता है। जिस प्रकार अग्नि सर्व पदार्थीको जलाता है उसी प्रकार यह पाप उसके सर्व कार्योको नाश करता है। जिस प्रकार मूर्यका तेज पानीको सुखा देता है उसी प्रकार उसका भी तेज नष्ट होता है । विषसे जिस प्रकार प्राणघात होता है, रोगसे जिस प्रकार मुखका नाश होता है उसी प्रकार इस अंतरायकृत पापसे उसको सुख मिलता नहीं। इतना ही नहीं उस पापके कारणसे देवर्षि, राजा, राज्याधिकारी, बंधु, भृत्य म यहांतक की परस्पर दंपतियोंमें अविनाशी विरोध उत्पन्न होता है। उसके लिए जिस जिस कार्य में भी .,' लाम होने की संभावना हो उसे वह अंतरायकृत पाप रोकता है ॥१९६॥ कारुण्यांप विशोषयन्मविमलनानं समारछादयन् । श्रद्धाने च विनाशपन्नविरतं चारित्रमुल्ययन् ॥ . .
९८ पानशासनम् । C नक्षते फलिसमपाश्रयाभराः किम् । घोधते कनकसमाश्रयात्पुनः । मन्यते जनपसमाश्रयान्न किंचित् । कुर्वति त्रिमदयुता इमे न किं तत् ।। १९३ ॥ अर्थ-मनुष्य कलिकाटफे आश्रयसे ही किसीको देखना नही चाहता है, किसीको धन कनक मिलजाय तो वह मदोन्मत्त होजाता है, किसीको राज्यसत्ता । अधिकार मिलने पर मदोन्मत्त होता है। इनमें किसीको एक साथ दूसरा कुछ भी मिले तो उनके अनर्धका फोई पार नही, ऐसी अवस्था कलिकाल, फनक, राज्याश्य ये तीनों गद एफजगह मिल जाय तो फिर ये क्या नहीं करेंगे? सब कुछ . अन्याय करनेको तैयार होगे ॥ १९३ ।। विघ्नः सद्यः फलति कृतिनामेव पुंसा, कृतोऽयं । नीचस्पृष्टिः फलति कृतिनां सद्य एवं द्विजानाम् ॥ श्वेडः सद्यः फलति मुखिना पनगस्यैव नोऽत- । स्तस्माद्विघ्नं सुकृतिपुरुषो नैव कुर्यात्कदापि ॥१९॥ अर्थ-जिसप्रकार दुष्ट सर्पके काटनेसे उसी-समय विषोदेक होकर प्राणको अपाय पहुंचता है उसीप्रकार सत्पुरुषोंके मार्गमें विघ्न करनेसे उसका फल तरक्षण मिलता है, नीचलोगोंके स्पर्शन ब्राम्हणोको उसी समय फल देता है । इसलिये सज्जनोंको उचित है कि धे' कभी सन्मार्गमें विघ्न नहीं करें ।। १९४ ॥ आयुर्हति रुजां करोति रिपुभिश्चारैति न्यक्कृतिम् । कारागारनिवेशनं निगलदुध सदा तद्धनं ।। सर्वार्थापहत्ति ततो विहरणं लोकऽपि भिक्षाटनं । दैन्योक्ति विनति वधःस्थितिमही चित्रं कृतागःफलं॥१९५ भर्य-बहुत आश्चर्यकी बात है, राजद्रोह धर्मद्रोहकरके अर्जित -; धनुपिंपदाननिरूपण . . पापोंसे प्राणियोंकायदा अहित होता है। राजाके द्वारा माणदण्टको प्राप्त होते हैं, अगर कदाचित् प्रागनाश न भी हुआ तो अनेक प्रकारफे रोग -फर देते हैं। चोर या शोफे द्वारा मरण होता है । अनेक प्रकारसे तिरस्कार प्राप्त होता है। जेल जाना पता है, यह बड़ी •परती है, अनेक प्रकारके फर मिलते हैं, उसके धनको दूसरे सोग छूटको गाते हैं, यह भीख मांगने लगता है। इसके सामने दीनता घ कातरता को धारण करता है। विशेष गया ! उसका मारी , अधःपतन होता है । यह सब उस धर्मापराधकृत पापफा है।॥ १९५॥ सप्ताचिर्दशतीव सर्वमनिशं स्पर्कतनी रसं । श्वेडो जीवितमामयः मुखयुग देवपिरामादिषु ।। दम्पत्योः कुरुते विरोधमळयं सदंधुभृत्यादिपु । प्रत्यूहः कृतफार्यलाभसमपविष्टानितुं क्षमः ॥ १९६ ॥ अर्थ-जो मनुष्य धर्मकार्योंमें, देयकायोंमें य गजकार्यों में विग्न करता हो उसका अधःपतन होता है । जिस प्रकार अग्नि सर्य पदार्थीको जलाता है उसी प्रकार यह पाप उसके सर्व कार्योको नाश करता है। जिस प्रकार मूर्पका तेज पानीको मुखा देता है उसी प्रकार उसका भी तेज नष्ट होता है । विषसे जिस प्रकार प्राणघात होता है, रोगसे जिस प्रकार मुखका नाश होता है उसी प्रकार इस अंतरायकृत पापसे उसको अग्य मिलता नहीं। इतना ही नहीं उस पाप धारणसे देवर्षि, - राजा, राज्याधिकारी, बंधु, भृत्य ग यहांतक को परस्पर दंपतियोंमें अविनाशी विरोध उत्पन्न होता है । उसके लिए जिस जिस कार्य में मी टाम होनेकी संभावना हो उसे यह अंतरायकृत पाप रोकता है॥१९६॥ कारुण्यांपु विशोषयन्प्रविमलनानं समाच्छादयन् । थद्धानं च विनाशयनविरतं चारित्रमलंघयन् ।
दानशासनम्
अर्थ--
आदेयं पविमोचयगुणगणानुन्मूळ पन्ग्राहयन् । ....
सोऽयं दुष्कृत्तरादविभाति विमळे कामे सदोदासयन् ॥
--यह पापरूपी राजा क्षारजलको गरम फरके सुखानेवाले
नीचोंके समान फरणारूपी जलको जलाता है, मेघ, सूर्यको, करण्ड
रत्नको व घडा दीपफको जिस प्रकार आछादित करता हो यह निर्मल
शानको आच्छादित करता है। विश्वासभ्रष्ट करनेवाले जार पुरुषके
समान, स्वामिमृत्य-विश्वासको नष्ट करनेवाले दुर्जनोंके समान, देहमें
आत्मबुद्धि करनेवाले रागफे समान, कपडेकी सिलाई को छुडानेवाले
धोबोके समान श्रद्धानभ्रष्ट करता है। अपने वंशगत धर्मपुण्यको नष्ट
फरानेयाली पेश्याके समान चारित्रसे भ्रष्ट करता है । गर्भकलंक करने
पाले भूतोंके समान, शिशुहत्या करनेवाली विधवाओं के समान आगे
प्राप्यपुण्यको नष्ट करता है, अच्छे डोरोको काटनेवाले चूहोंके समान,
शुद्ध तपोगुणको नष्ट करनेवाली व्यभिचारिणी स्त्रियोंके समान गुणों
को नष्ट करता है, हेयमें उपादेय व उपादेयमें हेयबुद्धि उत्पन्न करता
है। निर्मल पुण्यलाभ में सदा विप्न करता है। इसलिये देय, राज,
धर्मकार्य में कभी विघ्न नहीं करना चाहिये । १९७ ॥
विघ्नान्वितस्य नृपतविषयो,बलं च ।
ग्रंथो विनश्यति यथा कुजनस्य संगात् ॥
शास्त्रं मुवुद्धिरमला च विवेकिता च ।
कर्पूरमिश्रतिमनस्य भवेज्जनोऽयम् ॥ १२८ ॥ , ...
अर्थ- जैसे दुर्जनोंके संगतिसे शास्त्रज्ञान, सुबुटि, · विवेक
आदि सद्गुण नष्ट होते हैं उसी
प्रकार
देवधर्म-कार्यमें
विघ्न करनेवाले राजाके माधगमें रहनेवाले देश व प्रजायें, नष्ट
होती है, वह स्वयं कमिश्रित तेलको पीनेवाले के समान अपना
अहित कर लेता है ॥ १९८ ॥, .
।
6818. धतुधिदाननिरूपण . . . - सततमभयदानानिर्भयो निजितारि-। त्रिभुवनजननेत्रन्दीवरानंदचंद्रः ।। स्वजनमुरमहीनः कामिनीनां मनोमः । स. भवति परमश्रीकामिनीकांतरूपः ॥ १९० अर्थ-सदाकाल अभयदान करनेसे मनुष्य निर्भय बनता है। सर्व शत्रुवोंको जीतनेवाला होता है, तीन लोकके मनुष्यों के नेत्ररूपी नीलकमलको हर्ष उत्पन्न करनेवाले चंद्रमाके समान बन जाता है, स्वयंधु प देवों के द्वारा भी वह पूज्य व स्त्रियों के लिये कामदेयके समान सुंदररूप पन जाता है। इतना ही नहीं वह इसी अभयदानके फलसे मुक्किलक्ष्मीका पति बन जाता है।॥ १९९ ।। दयांबुसिक्तामृतसूर्यतप्ता- । मचौर्यसदोहळ शोभमानाम् ॥ सती सुरक्षावृतिकामकांक्षा । हिमालिकक्ष्मी लतिका वहती ॥ २०० ॥ अर्थ--यह अभयदानरूप उता दयाजलसे सींची गई है, मरणका अभाव अर्थात् जीवनरूपी सूर्यसे प्रकाशित हो रही है, चोरी नही करना एतत्स्वरूप दोहदसे वह पुष्ट होगयी है, प्राणियोंका रक्षण करना यही इसकी वृति है-बाड है। तथा निस्पृहतारूपी ठंडे बाटबाल की शोभा धारण करती है ॥ २० ॥ शुद्धस्याभयदानस्याहारदानस्य यरफलम् ॥ शबरः क्षत्रियो भूत्वा लोभदत्तेन चावीत् ॥ २०१॥ अर्थ-शुद्ध अभयदान व आहारदानके फलसे एक मिल्ल उसी जन्म में मरकर क्षत्रिय हुआ व लोमदत्त नामके व्यक्तिके वाय प्रत्यक्ष बोला । इसलिए अभयदान का पता अचिप है ॥ २०१॥ म दानशासनम् . . भावो देश इवान्वयः पुरमिवावासः कृतोऽभ्यर्वपु-। माता श्रीरिव सा पिता जनपकापौराः प्रजा बांधवाः॥ क्षेत्र क्षेत्रमिवात्मजा इव सुसस्यौघाः कथं तत्र भोः । कांपीति कुरुते भवाग्निजकृत प्रीति कुटुंबीया।।२०२॥ i अर्थ-हे भव्य ! संसारके प्रति मोह बढाना उचित नहीं है। यह संसार देशके समान है। अपना कुळ नगरके समान है। शरीर ." दूसरोंके द्वारा बनाया हुआ मकान के समान है, माता संपत्तिके समान व पिता राजाके समान है। बंधुजन पुरवासी प्रजात्रों के समान है। '- क्षेत्र खेतके समान है प अपने पुत्र सस्यसमूहके समान हैं। ऐसी अवस्थामें इन संहारबुद्धि के कारणोंमें क्यों प्रीति करते हो अर्थात् उपर्युक्त सभी संसारमोहको वृद्धि करनेवाले हैं। उनमें : मोह छोडना पद विवेकियों का कर्तव्य है।॥२०२॥. स्यात्पंचनतसालपंचकवृते देहेऽघराजाघृते , दुर्भावाः खलु वृत्तयो रिपुपं दृष्ट्वा पतित्वा ततः॥ ..वयुस्ते शिथिलाः पतंति तरुणीमचेभपस्पृष्टितो । नातः शुद्धिरसं व्रतं.च न बलं साध्यस्त्वयार्य ध्रुवं ॥२०३ अर्थ-पंचमहानतरूपी पंच परकोटसे रक्षित इस शरीररूपी राज्य को जब पापराजा आकर घेरते हैं, तब मिथ्यात्य, दुराचरण आदि, शत्रु राजावोंको देखकर एवं तरुणीरूपी मदोन्मत्त हाथीको देखने ,य स्पर्शसे यह सुरक्षित राज्यस्थित आत्मा अपने स्थानसे विचलित होता है एवं शिथिल होजाता है जब उसके अंतरंग शुद्धि नही रहती है और न नतमें शुद्धि रहती है और न कोई आत्मशति रहती है। इसलिये हे भव्य ! हरसमय मिध्यात्वादि दुर्भायोंसे अपनेको बचाये रखो ॥२०॥ ' या विद्या फलदा तयैव चतुरा भाग्यं लभते सदा। बासक्तिरन्यमामुपठनं तस्याःश्रुति चिंतनम् ॥ -- 31 .
चतुर्विधदाननिरूपण . . येषां संति त एव सौख्याभयं तच्चैहिकामुत्रिकं । पंचेतानि न येषु ते भुवि पुरो दीना भवेयुर्धवम् ॥२०॥ अर्थ--जो विद्या फलप्रद है या जिससे विद्वान् लोग भाग्यशाली बनते है उसी विद्यामें आसक्ति, लीनता, पठन पाठन, श्रुति व चिंतन करना उचित है अर्थात् स्वपरहित करनेवाली विद्यामें मनुष्यको आसक्त होना चाहिये, उसीमें लीन होना चाहिये उसी विधाका रातदिन पठन पाठन करते रहना चाहिये और उसीका मनन करना चाहिये । जो इस प्रकार करते हैं उनको इहलोक-परलोक संबंधी सुख मिलते हैं। ये पांच बातें जिनमें नहीं हैं उनको कोई सुख नहीं मिलता है प्रत्युत वे आगे दरिद्री होते हैं ।। २०४ ॥ स्थाने येर्दसवानिभैः स्वविपयैःपूर्णपदुर्गमै-। सिंधुग्रामवनस्सखेव वरण कुख्यहितारक्षकैः ॥ द्वास्थैः माहरिकर्व्ययागमफरीपैश्च ते रक्षितं । यत्तव्यमिवातिकंटकयुतं पुण्यं महीचावतात् ॥ २०५॥६॥ अर्थ-जिस प्रकार राजा अपने खजाने व राज्य जो बहुत आपत्ति पूर्ण है उनके रक्षाकेलिये अनेक प्रकारसे प्रयत्न करता है अर्थात् अपनी सेनासे युक्त होकर हत्ती, राज्य, आधीनस्थ राजा, दुर्गम नदी, ग्राम, धन, खाई दयाल, रक्षक हितैषी, नगरद्वार रक्षक, प्राहारिक,,बडे .२ दरवाजे, व बहुत धनका व्यय और प्राप्ति जिनसे होती है ऐसे द्वीप इन सबकी सहायता से राजा जिस प्रकार अपने खजाने की रक्षा करता है उसी प्रकार यह राजा अपने निर्मल पुण्य को भी इन सब की सतसे आपत्तियोंसे रक्षण करें । २०५॥ अभयदानमभयंकरमार्याम्सुगनिदानचतुरं सुखधाम । विदितचास्यशाकूलगेई सकलजीवनिलयं भवति ॥ अर्थ-सज्जनोत्तम पुरुष अभयदानको अभय उत्पन्न करनेवाला 1 चतुर्विधदाननिरूपण हुआ ऐसा न समझना चाहिये । यह मैंने धर्मफे लिए दो दिया, ऐसा सत्पुरुषोंको विचार करना चाहिये ।। २०९॥ धर्मोपकारिभूपेन गृहीतं यत्समं धनं । मयाय दत्तं तत्सर्व ममा ति चिंतयेत् ॥ २१०।। अर्थ-सापुरुषोंको सदा यह भावना करनी चाहिये कि मन भाज धर्मोपकारी राजाको जो कुछ भी धन दिया है और जो उसने प्राण किया है, वह पापके लिए नहीं अपितु पुण्यार्जनके लिए दिया है ऐसा विचार करना चाहिये ।। २१०॥ निनग्रामाधिपनाच यायव्यं समाहत ॥ तत्सर्व दण्डवत्तं मया जीव न चितयः ।। २११॥ अर्थ-मैने भाज अपने प्रामाधिपके लिए जो दण्डके रूप में ट्रम्य दिया है यह सब अन्यायके लिए नही दिया धर्मक लिए दिया है इसलिए उस विषय में मुझे चिंता नहीं करनी चाहिए ऐसा सापुरुष. विचार करें ॥ २११ ।। मतं समस्तै ऋपिभिर्यदाईतः । प्रभासुरात्मावनदानशासनम् ॥ मुदे सतां पुण्यधनं समर्जितुं । धनादि दद्यान्मुनये चिचार्य तत् ॥२१२॥ अर्थ-समस्त आहेत ऋषियोंके शासनके अनुसार यह दानशासन प्रतिपादित है । इसलिए पुण्यधनको कमानेकी इच्छा रखनेवाले श्रावक- उत्तम पात्रोंको देखकर उनके संयमोपयोगी धनादिक द्रव्योंको विचार कर दान देखें ।। २१२ ॥ इत्यभयदान विधि:
१०६ दानशासनम् दानशालालक्षण. प्रमणम्प जिनं भक्त्या संसंश्रृत्य गुरोर्वचः । निर्दोपपुण्यदं दानशालालक्षणमच्यते ॥१॥ -श्रीभगवान् जिनेद्रको भावशुद्धिसे नमस्कार कर एवं मन यचन फायकी शुद्धिसे सद्गुरुयों के उपदेश सुनष र, अब धागे निर्दोष व पुण्यप्रद दानशालाका स्वरूप कहेंगे , इस प्रकार आचार्य प्रतिज्ञा . फरसे है ॥ १ ॥ -- . नवीन गृहसंस्कार गोमय चूर्णबिलिप्तं शुद्धं पुण्याहवाचनाहोमाभ्याम् । 'सिक्तगंधाधुनव्यं गेहं मनिभोजनाय योग्यं स्यात् ॥ २ ॥ अर्थ-जो मकान पहिले चूना में गोबर से अछीतरह लित हो, तदनंतर पुण्याहवाचना होम आदि संस्कारके द्वारा शुद्ध करके गंधोदक से सिक्त हो, ऐसा नवीन गृह मुनिभोजन के लिये योग्य है ॥२॥ पुराणगृहसंस्कार प्रत्ने समनि सूतफोकसि कुदृक्शूद्राश्रयेऽद्यान्न चे-। गोवत्ससिकोपि गोमयंपयःसंसिक्तभित्तिच्छदिः । होमेनापि सुगंधतोयविमलं गोविट्पवित्रांगणं । तंत्रात्पदसेवकः सुदृगयं मुंजीत योगीश्वरः ॥३॥ अर्थ---सूतकी, चाण्डाल, मिथ्याधि व शूद्रोंका निवास जिसमें होगया हो ऐसे पुराने मकानमें भी बिना शुद्ध किये प्रतिक व महानति योंको भोजन नहीं लेना चाहिये । सबफे पहिले गोवरफे पानीसे दीवाल बारको गोलाकर लीपना चाहिये । फिर पुण्याहवाचनापूर्वक होम करके निर्मल गंधोदकका सेवन करना चाहिये एवं बाहरके अंग- वास्तुविधि, विमानशुद्धि.
दानशाण लक्षण १०७ णको भी गोबरसे पवित्र करना चाहिये। ऐसे घरमें महरपरमेष्टीफे चरण भक प, सम्यग्दृष्टी मुनि भोजन फरें ॥ ३ ॥ सर्वथा भादारवर्जनस्थान. मिथ्याश च मांसादां गेहे जैनाश्रये सवि। नाचात्तत्र नवे कृत्वा शुद्धेऽशुप्रतिकादयः ॥ १ ॥ अर्थ-मिथ्यादृष्टि व मद्य, मांस, मधु के सेवकों द्वारा आश्रित घरमें कोई जैनी रहता हो तो उस घरमें जैनमुनि आहार नहीं ले सकते हैं । यदि उस घरको नधीन कर पूर्वोक्त प्रकारसे होम अप्यार. पाचना आदि संस्कारोंके द्वारा शुद्ध फरें तो नतिक उसमें आहार ले सकते हैं ॥४॥ मंगलगृह. मत्यहं गोमोमोभिः पूर्णसंसिक्तचत्वरं । दृष्टिगोचरं योगिमवेशायातिमंगलं ॥ ५॥ अर्थ-जिस घरके प्रांगण प्रतिनित्य गोमयके पानीसे सिंचित हुआ दृष्टिगोचर होता हो, वह घर मुनियों के प्रवेशफे ठिये अत्यंत मंगल . सम्यक्फलितसस्यौघं मुक्षेत्रं वीक्ष्य निस्वणं । सर्व शंसति तं तच्च दातारं मुनयस्तया ॥६॥ अर्थ-जिस खेतमें अग्छ पल व सस्य हो उस खेतको देखकर • राहगीर लोग उस खेतमी व उस खेतके मालिककी प्रशंसा करते हैं, ठीक इसी प्रकार उपर्युक प्रकारफे मंगलगृह व उसके मारिक दाताको सज्जनलोग प्रशंसा करते हैं ॥६॥ पतिमुक्तिगृहं शस्तं सर्वसंकल्पवर्जितं !! यद्गृहं सर्वमखिलं रक्षेत्सर्वप्रयत्नतः ॥ अर्थ-जिप्त घरमें प्रवेश करनेसे मुनियों के चित्तमें क्षोम या अन्य १०८ दानशासनम् संकल्प न होता हो यह वर्षप्रशस्त है। उस घरफे सर्व बरतनोंको एय अन्य पाकोपकरणोंको बहुत प्रयत्न के साथ रक्षण करना चाहिये अप्रशस्त गृह. म . . चण्डालस्तकीयुक्त स्थान तोचितं गुरोः स्फुलिंगदग्धपटवद्राजयोग्यं न सर्वथा ॥ ८॥ अर्थ-जिस प्रकार भागसे जला हुआ घस राजाफे योग्य कभी नहीं हो सकता, उसी प्रकार जिसके घरमें चण्डाल व सूतकी रहते हों वहांपर भोजन करना गुरुयोंको कभी उचित नहीं है ॥८॥ गुरुवोंके आगमनकालमें सूतकियोंका कर्तव्यः तिष्ठेच्चलं विनफन प्रसूता स्त्रीव सूती । चण्डालो न विशेजनगेहचत्वरमेकदा ॥.९ ॥ .. अर्थ--जिस प्रकार प्रसूत स्त्री इधर उधर न जाकर एक जगह बैठती है उसी प्रकार सूतकियोंको भी मुनिचर्या के समय एक जगह बैठ जाना चाहिये । चण्डाल जैनियोंके मकानमें कभी प्रवेश न करें ॥९॥ गुरूणामागतो तिष्ठेत् गोप्यस्थानेऽपि मृतकी ॥ तदृष्टिविषयी भूत्वा न तिष्ठन'नमेद्वदेत् ॥१०॥ अर्थ-अपने घरमें गुरुवोंके आनेपर सूतकी व रजस्वला खी गुप्त १ स्थानमें जाकर बैठे और ऐसे स्थानमें न बैठे जहां उन गुरुवोंक दृष्टि- गोचर हो। ऐसे समय में गुरुपोंको नमस्कार नहीं करना चाहिये और न बोलना चाहिये ॥ १० ॥ देवगुरुयोग्यसेव्ये पीते पीडाज्यदुग्धदधितके ॥ तिकीकसि वत्सो गौनश्यति न भरति दुग्धं चाग्रे ॥११ अर्थ-देव गुरुवोंको सेवाके योग्य दूध, दही आदिको जो स्वयं बालेता है उसके गाय भैस आदि मरजाते हैं, कदाचित् जीवे तो भी दानशाला लक्षण AWNLAAP - MAM .. .. दूध नहीं देते अर्थात् ऐसे. द्रव्योंको हमें खाना उचित नहीं है ॥११॥ 'अशुचित्वं कुरुते यत्रीचकुले जन्म नीचमाहारं ॥ ईिसापकृत्यत्तिस्ततो भवे दुर्गतिस्थितिर्भवति ॥ १२ ॥ अर्थ--जो मनुष्य गुरुवोंके भोजनस्थान को व. देयोंके पूजन स्थानको अशुद्ध रखता है, वह आगामी भवमें 'जाफर नीच 'युलमें "जन्म लेता है, नीच आहार सेवन करनेवाला होता है, हिंसादि पंच पापोंमें रत होता है। इसी प्रकार नरकादिदुर्गतिम; भ्रमण करता रहता है ॥१२॥ चाण्डालके लिए जैनगृहमवेशनिषेध स चाण्डाळेक्षणे स्वप्ने भूतमेनोऽथवा वदेत् ॥ तत्र गई गते सघः पुण्यश्रीविपभागिव ॥ १३ ॥ अर्थ--स्वप्नमें चण्डालको देखनेपर उसका फल भूतोंका संचार व अपने शौच की हानिको बतलाना चाहिये । चण्डालफा स्पर्श हुआ तो ज्ञानहानि, उसके साथ भोजन करें तो मिथ्यात्यकी वृद्धि आदि फल होते हैं। इस प्रकार जिस चाण्डाटका दर्शन, स्पर्शन आदि स्वप्नमें भी दूपित है, वह प्रत्यक्षमें यदि किसी जैनघरमे प्रवेश करें तो उस घर की पुण्यलक्ष्मी विषबाधासे पीडितके समान विना कहे भाग जाती है।॥ १३ ॥ चाण्डालादिस्पृष्टपार्यःसैकात्सस्यं नं नश्यति ॥ मूतकोस्पृष्टवाःसेकात्तत्प्रवेशाविनश्यति ॥ १४ ॥ ''अर्थ--चाण्डालोंके हाथसे स्पृष्ट जटके सेचनसे कोई वृक्ष वगैरह नाश नहीं होते हैं। सूतकी अर्थात् रजस्वला आदिके द्वारा स्पृष्ट होनेसे वह वृक्षादिक नाश होते हैं। परंतु जैनगृह प्रवेशके विषय ' में चाहे चाण्डाल हो चाहे स्त्री हो दोनोंकी समानता है। उनके द्वारा ' प्रविष्टगृह उनको (व्रतियोंको) आहार ग्रहण करने योग्य नहीं है ॥१७॥ , दानशासनम् - . 1..... ये वसंत्यशुचौ गेहे पात्रदानादिके, कृते ॥ प्रहादिभिस्सदा तेपामाघयो व्याधयः क्षयाः ॥ १५ ॥ • : अर्थ-जो,श्रावक पात्रदानादि सत्कार्यको करनेके लिए अशुचि -गृहमें रहते है, उन लोगोंको सदाकाट भूतप्रेतादियोंसे एवं चोर . जार इत्यादि दुर्जनोंसे अनेक प्रकारके संकट उपस्थित किये जाते है। जिस कारणसे उनको सदा मानसिक चिंता व रोगबाधा बनी रहती है॥१५॥ मृतकोरिहरविण्मृत्रे नीचसंवटिते स्थळे ।। कृते सत्पात्रदानेऽस्मिन्पुराधिव्याधयोऽधिकाः ॥ १६ ॥ अर्थ--सूतक, उच्छिष्ट, मल, मूत्र व चाण्डालादिके द्वारा स्पृष्ट स्थानमें जो सत्पात्रदान देता है उसे अधिक रोगादि बाधा उपस्थित होजाती है ॥ १६ ॥ क्षेत्रमादावसंस्कृत्य पथाद्वाज पन्निव ॥ पानं गेहमसंस्कृत्वा चान्नदानालयं ब्रजेत् ॥ १७॥ अर्थ-जिस प्रकार किसान योग्य समयमें खेतका संस्कार नहीं 'करके बीज बोये तो उससे कोई उपयोग नहीं होता है उसी प्रकार अन्नदान देने योग्य क्षेत्र अर्थात् घरका संस्कार न करके यदि दान देते है तो उससे कोई फल नहीं होता है ॥ १७ ॥ संस्कृत्य क्षेत्रमेवादी पक्षादीजं वपन्निव । गेहं पात्रं च संस्कृत्य कृतदानात्सुखी भवेत् ॥ १८ ॥ अर्थ-जिस प्रकार किसान खेतको पहिले गोबर आदिसे संस्कार करके पीछ बीज बोता है तो उस खेत में सस्यवृद्धि वगैरह , अच्छीतरह होकर फल की प्राप्ति होती है जिससे किसान सुखी होता है उसी १.प्रकार दानशालाको होम पुण्याहवाचना आदिसे संस्कृत कर एवं उसमें रहनेवाले दानपात्रोंको भी शुद्ध कर उपलक्षणसे मन वचन कायको .
यानशाला लक्षण 4A - भी शुदि फर दान देखें तो यह दाता मुली होता है ॥१८॥ स्नाता धौतशिखा मुधातदशनाः पुत्रादिलोकास्पृशी-। गोविटपूतगृहेऽनिवेगितजने प्रत्यग्रमाण्डरादिभिः ।। पदमना पदुमयतना धानभिदा । स्वान्देवानिव पूजपत्ति बहुधीरसाईर्मुनीधार्षिकाः ॥१९॥ अर्थ-धार्मिक जन प्रतिनित्य दंतधायन करके, भामस्तक स्नान करें । तदनंतर पुडा आदि विना स्नान किये लोगोंका स्पर्श न करें। भरने घरफे भंगणकी गोमपसे पवित्र करें एवं उसमें इतर स्यादि लोगोंका प्रवेश नहीं होने दे। और पूर्वोक प्रकार संस्कृत रसाई घरमें संस्कृत पानोस तपार • कि हुए भोजनको अनेक प्रकारक उसाहसे मुनियोंको अर्पण करें। , इतना ही नहीं, जिस प्रकार पर अपने देवों की उपासना व भक्ति करता है उसी प्रकार मुनियों के प्रति भी भक्ति करे ॥ १९॥ .'. साधुपादरमाफी शुणि यमगण ।। ग्रहाहिवन्हिकीटाणाः प्रविशति न तद्गृहम् ॥ २० ॥ अर्थ-साधुलोफे पाइथूलसे जिस घरका अंगण पवित्र होगया हो, उस घरमें भूतपिशाचादि दुष्ट प्रहोंका प्रवेश नहीं होता है, सदिक विषैले जंतु वहां नहीं आते हैं एवं अग्नि, चोर भादिका उपद नहीं होता है । और न घरमे कोडे आदि क्षुद्र जंतुओंको हो बाधा होती है ॥२०॥ पुण्यपुत्राः प्रजायं वत्र श्रीरधवे-सदा ॥ दव्यं गृहागतं पुण्यं भूरि भूत्वा प्रवर्धते ॥ २१ ॥ • अर्थ-जिस घरमें मुनियोंका पदार्पण कुना हो उसमें पुपुत्र अर्थात् फुटकी कीर्ति बढानेवाले पुत्र उत्पन होते हैं । एवं उस घरमें - ११२. दानशासनम् । .. . . संपत्ति सदा बढती है । एवं उस घरमें : आया हुआ द्रव्य पुण्य . अत्याधिक होकर बढ़ता है ॥ २१ ॥. राजाद्यागमनोत्साहे गृहशोभा च कुर्वते । सुपात्रागमने जैनाः स्वर्गमोक्षसुखप्रद ॥ २२ ॥ अर्थ-इहलोकमें हमारे रक्षर्फ राजा आदिके आगमन के समय जिस प्रकार प्रजाजन अपने घरकी सजावट करते है, उसी प्रकार धार्मिक जन स्वर्गमोक्षको प्रदान करनेवाले सुपात्रों के आगमन के समयमें अपने घरकी सजावट वा शोभा करते हैं ॥ २२ ॥ महाय बंधागमने जनास्तदा । गृहागणदारमतीव शोभनं ॥ धनक्षपायैवं च कुर्वतहसे ।। 'बुधास्सुपात्रागमने न किंचिदाः ॥ २३ ॥ अर्थ-लोकमें विवाहादि कार्यमें जब बंधुयोंका आगमन होता है उस समय सब लोग अपने घर, अंगण आदिको खूब सजाते है इतना ही नहीं, अपने शरीरको भी सजाते हैं। परंतु यह सब संसारवृद्धि के लिए कारण है एवं इनसे धनहानिक सिवाय कोई लाभ नहीं है। परंतु खेद है कि लोग अपने घरको सापात्रोंके आगमनके समय कुछ भी नहीं करते है।॥ २३ ॥ महाय बंध्यागमने जनास्तदा । गृहांगणद्वारमतीव शोभनम् ॥ वृपं श्रियं लन्धुमयं च सद्दति । बुधास्सुपात्राममने दिवामृते ॥ २४॥ अर्थ-जिस प्रकार लोग विवाहादि कार्योफे समय बंधुओंके आ- गमनमें घरके द्वारकी शोभा करते हैं, इस प्रकार 'सुपात्रोंके भागमनके समय, धर्म, संपति; आरोग्य व स्वर्गमोक्षादिकको प्राप्त करने के लिए नहीं करते हैं । खेद है । ॥ २४ ॥ - 1 । ।
दानशीला लक्षण
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पापी स्त्रियां.
स्त्रियस्तु वंध्वागमने महोज्ज्वला:।
मुधौतवस्त्राः शुचयो महोत्सवाः॥
भवंति पात्रागमने सकचरा ।
मलीमसांगा मलिनाशयास्सदा ॥ २५ ॥ .
। अर्थ--बहुतसो त्रियां अपने घरमे बंधुओंके आगमनके वृत्तांत
पाकर न्हा धोकर स्वच्छ हो जाती है एवं अच्छे २ कपडे, गहने पहन-
कर अपने घर में कोई उत्सय हो जैसे रहती है । परन्तु खेद है कि
पात्रों के अगमके समयमें खराब कपडे पहने रक्षती । शरीरको ही
नहीं, मन को भी मैला कर लेती हैं।॥ २५ ॥
सर्वे सर्वाणि वित्तानि दीनेभ्यो ददवे महे ।।
दातारो याचकास्संति ते ते तानि पाय न॥ २६ ॥
अर्थ-लौकिककार्यों के लिए सर्वजन याचकोंके इच्छित द्रव्य
को दान देते है, उस में दातार भी है याचफ भी है। परंतु धर्म
कार्योंके लिए दातार भी नहीं, याचक भी नहीं है । कदाचित् याचक
मी हो तो दातार नहीं है ॥ २६ ॥
पुण्यवती स्त्रियां.
खियः कृतायाः सदया यहोत्सवाः ॥
मुशतवस्त्राः शुचयो महोज्ज्वलाः ॥
भवंति पात्रागमनेषु ते च ता।
मनोवचःकायविशुद्धयश्च ॥ २७ ॥
अर्थ---पुण्यवान दयाल खी पुरुष पात्रोंके आगमनमें सुंदर पत्र-
को पहननेवाली व महान उत्सवाली हो जाता है, इतना ही नहीं उन
के मनरचन काय को शुद्धि होती है । यह उन का पूर्वपुण्य व भक्ति
का फल है।॥ २७॥
११४. दानशासनम् - दानशालाकी पवित्रता. मुनिभुक्तिगृहेऽन्येषां भोजने यदितत्फलं ॥ कुण्डेबद्भाति तद्रक्षेद्गृहं स्वगृहवत्सदा ॥ २८ ॥ अर्थ-मुनियोंको आहार देने योग्य · भोजनशाला में उनके आ- हारवेडाके पहिले किसीको भोजन नहीं कराना चाहिये, यदि फरावें तो दानका फल धान्यके भूमाके समान व्यर्थ जाता है। इसलिये उस घरको अपने.घा (खी) के समान रक्षण करना चाहिये ॥२८॥ यत्यादिभुक्त्यगारेस्मिन् कृतान्य क्तिरेव चैत् ॥ यावदानं कृतं तावनष्टं भिन्नतटाकवद ॥ २९ ॥ अर्थ-मुनियोंको आहार दान देने योग्य दानशालामें यदि उनको आहार देनकै पहिले किसीने भोजन किया तो उस दातारने जितना दान दिया हो वह व व्यर्थ जाता है, जिसप्रकार तालायके फूटनेपर पानी चला जाता हो ॥ २९ ॥ 'यत्यादिभुक्त्यगारे विण्मृतलिप्तशिशी स्थिते । रोग पुग्यवतो मृत्युरपुण्यस्य शिशोर्मवेत् ॥ ३० ॥' अर्थ--मुनियोंको दान देने योग्य पवित्र दानशालामें मलमूत्रसे लिप्त यदि बालक हो तो उस बालकका अनिष्ट होता है। यदि वह चालक पुण्यवान् हो तो रोगी होता है, यदि पुण्यहीन हो तो मरण प्राप्त करता है ॥ ३० ॥ यत्यादिभुक्त्यगारे विपत्रवासस्थितियदि ॥ रोगो भवच्छिशोस्तस्यां सत्पुत्रोऽपि न जायते ।। ३१ ॥ अर्थ---पात्रदान देनेयोग्य दानशालामें यदि मलमूत्र से युक्त कपडा वगैरह हो तो बालक रोगी हो जाता है, इतना ही नहीं उस• माताके गर्भ में फिर कुलबर्वक सापुत्रोंकी उत्पत्ति, नहीं होती ॥ ३१ ॥ . .
दानशाला लक्षणा
"
.
,
शिश्वांदोळे स्थिते पात्रचित्ते विण्मृप्रसंस्मृतिः ॥
स्यात्नयैव तयोरंतरायः पुण्यश्रियोलपः ॥ ३२ ॥
अर्थ-दानशालामें या बाहर बच्चोंको सुलाने का झूला दो तो
पात्रों को उसे देखकर मल, मूत्रोंका स्मरण आजाता है, जो कि आधार
अंतरायफा कारण हैं | आदारमें अंतराय होनेसे दाता पात्र दोनोकी
पुण्यलक्ष्मी नष्ट होजाती है । ३२ ॥
तृणावृतेऽत्र सस्यानि वर्देते किं फलंति किं ?
नीचोच्छिष्टेणे गैहे पुण्पायुःश्रीतुजस्तथा ॥ ३३ ॥
अर्थ-जिस प्रकार बहुतसे घास फम वगैरहस युक्त खतमें
सस्यकी वृद्धि नहीं होती है, उसी प्रकार मल, मूत्र उच्छिष्टादिसे युक्त
अंगण, पाकगृह वगैरह जहां हो उस घरमें संपत्ति व संतानोंकी वृद्धि
नहीं होती और न पुण्य व आयुकी वृद्धि होती है ॥ ३३ ॥
मिथ्याङ्नीचविण्मूगोच्छिष्टमिश्रेऽङ्गणे गृहे ।।
क्लिश्यते श्री सपत्नीव क्षीयते दैन्यमेधते ॥ ३१ ॥
अर्थ--जिस घरमें मिध्यादृष्टि य नीचोका संसर्ग हो, मलमूत्र,
उच्छिष्ट आदिसे युक्त अंगण हो, उस घरमें संपत्ति सवतके समान खिन्न
होती हैं, एवं नाशको पाती है। दीनता बढ़ती जाती है ॥ ३ ॥
बहु व्ययंति पुत्राय कन्यादाने कुलईये ।।
भिन्नगई न कुर्वति मुनिभक्त्यै पर्द्धये ॥ ३५ ॥
अर्थ-संसारमें अपने पुत्रोके लिए, कन्यादान के लिए, और भी
संसारवर्द्धन कार्यके लिए बहुतसे द्रव्यका व्यय करते है। परंतु जिप्ससे
धर्मवृद्धि होती है ऐसे मुनिदान के लिए सर्वदोषरहित मिन्न घरका
निर्माण नहीं करने हैं ।। ३५ ।।
क्षेत्र सर्वाणि धान्यानि वतः कृषिका इव ।
नैनाः पृथग्गृहेनन्नदानं कुरुत सर्वदा ॥ ३६ ॥
११६ दानशासनम् अर्थ-जिस प्रकार किसान लोग गोबर आदिसे संस्कृत मिन खतों में भिन्न २ धान्यको बोते है, उसी प्रकार होम विधानादिसे संस्कृत दानशालीम दी जैन आहारदान देवें । यहा आदारदानके लिए - पृथक दानशाला निर्माण का यही अर्थ है कि यह शाला: अच्छी तरह संस्कृत होना चाहिये । मलमूत्र उच्छिष्ट आदिका संसर्ग नही होना चाहिए एवं खास बात यह है कि उसमें मिध्यादृष्टि भोजन नहीं करें, सम्यग्दृष्टि नतिक ही भोजन करें, ऐसे घरमें ही मुनियोंको दान देना उचित है। ।। ३६ ॥ मतं समस्तैऋषिभिर्यधाहतैः । प्रभासुरात्मावनदानशासनं ॥ मुदे सतां पुण्य धनं समर्जितुं । धनादि दद्यान्मुनये विचार्य तत् ॥ ३७॥ अर्थ -समस्त आईत ऋषियोंफे शासनके अनुसार यह दानशासन प्रतिपादित है । इसलिए पुण्यधनको कमानेकी इच्छा रखनेवाले श्रावक , 'उत्तम पात्रोंको देखकर उनके संयमोपयोगी धनादिक द्रव्योंको ' विचार कर दान देवं ॥ ३७॥ 7 इति दानशालाविधिः। .
'पात्रसेवानिधि
-
.
१॥
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--
॥
पात्रसेवाविधिः ।
प्रणम्य जिनपादाजयुगं त्रैलोक्यमंगळं ।।
वक्ष्ये मिनमुनींद्रादिपात्रसवात्मकं विधि ॥१॥
अर्थ-तीन लोककेलिये मंगलम्बम्प ऐसे श्रीजिनेंद्रभगवत्तक
'चरणकमलको नमस्कार कर जिनमुनींद्र आदि पात्रोंकी सेवाविधि इस
प्रकरणसे कहेंगे, ऐसी प्रतिज्ञा आचार्यपरमेष्ठी करते हैं ॥१
दानविधि.
नवोपचारकरणं यन्मनेरादरेण तं ।।
संतस्सद्विधिमाख्याति धान्यानविधिर्यया ॥२॥
अर्थ-जिस प्रकार आहारदानके लिए साधनभूत धान्यादिकोंके
प्राप्ति के लिए अनेक प्रकारकी विधि करनी पड़ती है अथया खेतमें
धान्यकी उत्पत्ति के लिए अनेक प्रकारकी क्रिया करनी पड़ती है।
उसी प्रकार पात्रको आदरके साथ नव प्रशारसे उपचार काना उसे
सम्जन लोग सद्विधि कहते हैं ॥२॥
दानम.म.
देशकाळागमविधि द्रव्यं पात्रक्रमो यथा ।
दान देयं तथा दावा क्षेत्र कृष्यधिपो यथा ॥३॥
अर्थ-जिस प्रकार किसान वेती करते समय देश, कार, भागम,
विधि आदि जानकर बीजको बोता है, उसी प्रकार योग्य देश, उचित
कालमें, भागमोतविधिको ध्यान में रखकर संपत द्रव्यको उत्तम पात्र
को दान देवें । सचमुचमें बही उत्तम दाता है ॥ ३ ॥
देशगुण.
देशप्रत्तिसंक्रुद्धदीपोपशमकारणम् ।।
दोपरोगहराहारो देयत्तद्देशवेदिभिः ॥ ४ ॥
दानशासनम् *********** - , -- अर्थ-जांगल, अनूप, साधारण आदि . देशके अनुसार प्रवृत्ति करना वात, पित्त, कफ आदि दोपोंके उपशमके लिए कारण है इसलिए दातावोंको उचित है कि वे देशोंके भेदको जानकर वात, पित्त, का आदिक दोषोंको एवं तदुत्पन्न रोगोंको दूर करनेवाले आधार दानमें देखें ॥ ४ ॥ कालगुण. काळ संक्रुद्धदोपोत्थरोगोपशमकारणम् ।। काळदोपहराहारो देयस्तत्कालवेदिभिः ॥५॥ अर्थ-शीत, उष्ण और वर्षाकालके अनुसार आहारप्रवृत्ति रखें तो वातपित्तादिसे उत्पन्न रोग उपशांत होते हैं। इसलिए उत्तम दातावों को उचित है कि वे कालक्रमको जानकर दोषहर आहारको दानमें देवें॥५॥ उत्तमपानदान कालक्रम.' कंगुचणजीरइलकुळमेथीशाल्यादिवपनसमयस्त्वेकः ॥ उत्तपपात्रे पोरे दातृणामन्नदानविधिरेकः स्यात् ॥ ६ ॥ अर्थ-जिस प्रकार चना, जीरा, कुलथी, मेथी, धान आदिको बोने का समय एक ही हुआ करता है, उसी प्रकार उत्तम पात्रोंकी आहारविधि भी एक ही है । और एक ही काल है ॥ ६ ॥ मध्यमपात्रदान कालक्रम. गोधूमवल्लतुचरी जोनलंतिक मुख्यवपनसमयौ च द्वौ । मध्यमपान क्षेत्रे दातॄणामन्नदानसमयी स्यावाम् ॥ ७ ॥ अर्थ-'जिप्सप्रकार गई, पावटा, तार, ज्वार, तिल, आदि धान्यों को बोनेके समय दो है, इसी प्रकार मध्यम पात्रांको आहार दान देनेके समय दो ॥ ७ ॥ शास्त्रक्रम. शास्त्रक्रममनुलंध्य संपवतत धार्मिकः ||: धर्मे दाने च मुक्ती च स क्रमःसन्मुहक् बुधः-॥ ८ ॥ -- पानसेवारिधि अर्थ--धार्मिक सम्जनोंको उचित है कि ये धर्म, दान व भोजनमें एवं लाफिक कार्यमें शास्त्रक्रमको उल्लंघन न कर प्रवृत्ति करें। शाख- कासे प्रवृत्ति करनेवाला ही सम्पादृष्टि है ॥ ८ ॥ ..., विधि गुणक्रम. यः, सर्वकालदेशेषु यद्यदाश्रित्य वर्तनं ॥ वर्तते तदनुक्रम्प हेयं हित्वा सर्वथा ॥ ९॥ हातुं न शक्यं यत्कर्म न वय योगदोपवत् । सद्भक्तिरकपायः स्यात् सुकृतिनव दोपभाक् ॥ १० ॥ । अर्थ-जिनधर्मभक्त, मंदकपायी, धार्मिक सजनको उचित है कि वे सर्व देश व कालमें जो धर्मकेलिये अनुकूल है, देश व कालके लिये अनुकूल है उसे अनुकरण कर वर्तन करें। जो बात हेप हो उसे जरूर छोडे, और जो कार्य मन वचन कायके दोषके समान छोडनेको अशक्य हो उसे न छोड़ें, परंतु यह ध्यानमें रहें कि यह धर्मके साधन हो, जिस प्रकार भक्ति के लिये अपद्रव्य, आत्मसिद्धि के लिये देह, देहरक्षण के लिये आहार, गमन केलिये याइन, धान्यफेलिये खेत, धर्म- धृद्धि के लिये दोपाच्छादन आदि बातें निंध नहीं हैं, उसी प्रकार धर्म- साधन भी ग्रहण करें, सर्वधा छोड नहीं सके तो धार्मिक जनोंकेलिये दोपास्पद नहीं है, प्रत्युत उससे पुण्यबंध होता है ॥ ९ ॥ १० ॥ द्रव्य लक्षण. पादादशीचशेपं तादाकं साधुपेयमंभः किं वा । कमुकादशर्करादि च वर्णानां संकरोऽस्ति कर्णादादौ ॥११॥ अर्थ-जिस पानी में पाद, गुद, शौच आदिकी शुद्धि मनुष्य करते हों, यह पानी साधुवोंको पीने योग्य कभी हो सकता है क्या ! नीच जाति के लोगोंके द्वारा बनाए हुए गुड, समर, दूध, दही आदि साधुनोंको आहार में देने योग्य है क्या ! कभी नहीं ! कांटादि देशमें . थानसासन +WHATHA - मिस प्रकार वर्णसंकर स्पष्ट दोष पाया जाता है। उन : समस्त दोषोंसे रहित द्रव्यको ही दान में देना चाहिए ॥ ११ ॥ स्पष्ट दोष. विद्यायत्तहातमानबुधतावृत्तादिकं चेटिका । वेश्या हंति परांगना त्रिभुवनज्ञागाशयक्षोभणं ॥ कुड्रिीचळजीवितार्थविषयग्रंथादिवस्तुक्षयं । ' ' - यत्संगारपरजन्मनी नरके पाता मवेदजसा ॥ १२॥ अर्थ--नीचौक संसर्गसे मनुष्यको विद्या, बुद्धि, कुल आदिका मद, दासत्व, वृत्तिक्षयं, संपत्ति, शक्ति, जीवन, भोग व परिग्रह आदिका क्षय होता है । दूसरोंकों उससे कष्ट पहुंचता है । इतना ही नहीं परजन्ममें वह नरकमें जाता है ॥ १२ ॥ पात्र. राजानः पालयंतीव - निजधर्माश्रितं बलं ॥ निजधर्माश्रितान्सर्वान् दययावंति धार्मिकाः ॥ १३ ॥ अर्थ-जिस प्रकार राजा अपने आश्रित सैन्यको हर तरहसे रक्षण करते हैं, उसी प्रकार धार्मिक सनोको उचित है कि वे अपने आश्रित पात्रोंको दयाबुद्धिसे रक्षण करें ॥ १३ ॥ नवधा भक्ति. पतिमाहोच्चासनपाघपूजाः। प्रणामवाक्कायमनाप्रसादाः ॥ विधाविशुद्धिश्च नवोपचाराः। कार्या मुनीनां गृहमैधिभिश्च ॥ १४ ॥ ; अर्थ-पडिगाहना, उच्च आसन देना, पादप्रक्षालन, पूजा, प्रणाम, मंन शद्धि, वचनशुद्धि, कायगुद्धि, तथा बाहारशुद्धि इस प्रकार उत्तम पात्रों का नर प्रकारसे गृहस्थ सत्कार करें ॥ १४ ॥ .
पानसेयायिधि . प्रतिग्रह. न.देन्पविधसिनिधिद्रुधेनुका । यथा ददामी वयमित्युशंति ये ।। इदं सुपात्रं सुकृतागतं न में। त्यजामि नान्यस्य ददाम्प तथा ॥ १५ ॥ अर्थ--जिस प्रकार मनुष्यकी दरिद्रताका नाश करनेवाली कोई निधि, कल्पवृक्ष व कामधेनु के मिटनेपर हर होकर यह कहते हैं कि अब हम इसे किसीको नहीं देंगे, उसी प्रकार सजन अपने पुण्यसे अपने द्वारमें आये हुए पात्रोंको देखकर हर्षित होते है, और कहते हैं कि मैं अब इसे नहीं छोडूंगा और न दूसरोके यहां जाने दूंगा। इस भक्तिविशेपसे जो आदरफे साथ पात्रको अपने द्वारपर स्वागत किया जाता है उसीका नाम प्रतिपक्षण ॥१५॥ धार्मिक . उच्चासन. गत्वाभ्युत्थाय संवीक्ष्य सत्पात्र गृहमधिना ॥ दत्तमुच्चासनं तस्मै सून्नतासनमुच्यते ॥ १६ ॥ अर्थ-धार्मिक गृहस्थ पात्रोंके आगमन को दूरसे देखकर भक्ति से उठता है। फिर उनका प्रतिग्रहण कर उन्हे विराजने को उच्च आसन देता है, यह दूसरा उपचार है ॥ १६ ॥ पाद्यपूजा. मुनिपादांयुजद्वंद्वक्षालनं पाद्यमीरितं ॥ मुनिपादार्चनं यच्च सा पूजेत्यभिधीयते ॥ १७ ॥ अर्थ --उच्चासन देनेके बाद मुनीश्वरोके पादप्रक्षाटन करनेको पाय कहते हैं । और उनकी पादपूजा करनेको पूजा कहते हैं ॥१७॥ प्रणामादिचतुष्टय. पंचांगः प्रणतिः प्रणाम इति वाक्कायासयपत्कृत स्तोत्रं संवनमुत्तम स्मरणमित्यार्या वतीह ते ॥ - १२२ वामशासनम् NAAMARA . साधुप्रत्तवचःशरीरहदयाशेपप्रसादं विधा-1 शुद्धिस्त्वाहृतिदिमेव विमला तेभ्यो लभते श्रियः ॥१८॥ अर्थ- पूजा करने के बाद पंचांगप्रणाम करें । एवं मन वचन कायकी शुद्धिसे मुनिजनोंका स्तोत्र व स्मरण करें। साधुवाँको देनेवाले आहारदानमें मन-वचन-कायकी शुद्धि प्रकट करें । एवं आहार 'शुदिको प्रकट करें। इस प्रकार नवविध उपचार शुद्धहृदय [ निष्क- पटमाव ] से जो करते हैं उनको सर्व प्रकारको संपत्ति प्राप्त होती . आहारदोष. बीजफलकंदमुलं कुण्डनशंबुकमास्थिनखरीमात्रं ॥ जत्वजिनपूयमांस ध्रुवंति दोषाश्चतुर्दशाहारे ॥ १९ ॥ अर्थ-अभक्ष्य बीज, फल, कंद, मूल, भूसा, शंख, हड्डी, नाखून, रोम, रक्त, द्वाद्रियादिक प्राणी, चर्म, पूध, मांस ये चौदह आहारमें त्याज्य है, दोष है ॥ १९ ॥ ' आहार शुद्धि. दाहसंस्कृताहतिममा गृह्णन्ति योगिनो मत्वा . ॥ रजसुधौतं वस्त्रं सौतकमिव योग्य पुरुपसव्यं स्यात् ॥ अर्थ-जिस प्रकार रजस्वलाखीके द्वारा पहने हुए वन यदि धोबी अच्छी तरह धोकर लाता है तो उत्तम पुरुषोंके द्वारा सेव्य माना जाता है, उसी प्रकार अनेक संस्कारोंसे पवित्र दाता के घर में योगिगण आहार प्रहण करते है अर्थात् आधार ग्रहण करने के लिये गृहसंस्कार की हो नहीं संस्कृत आहारकी भी जरूरत है ॥२०॥ सेवाफल. लक्ष्मी त्रिवर्गसंपत्ति धियं भूति सरस्वतम् ॥ शरीरसौष्टवं मेघां लभतेऽल्पप्रयासतः ॥ २१ ॥ अर्थ---गुरुसेवा करनेफे अल्प श्रमसे यह मनुष्य भक्रियाकलाप .
पाप्रसेवाविधि , . कारण संपत्ति, जिनधर्म प्रभायनाके साधन धर्म, अर्थ, कामरूप त्रिवर्ग संपत्ति, परमागमज्ञायकबुद्धि, जिनधर्माराधक भन्योंके पोषण के लिए ऐश्वर्य, जिनवाणी, देहसौंदर्य, एकपाठादिक कुशाग्रबुद्धि आदिको प्राप्त करता है ॥ २१ ॥ मोक्षफल. एनेरप्युपचायें तर्पयंति तपोभृती ॥ सुखं स्वर्गस्य मोक्षस्य भंते ते क्रमेण च ॥ २२ ॥ अर्थ---उपर्युक्त नव प्रकारकी भक्तियोंसे युक्त होकर जो तपोनिधि मुनियोंको आहार देते हैं ये स्वर्गादिक सुखको प्राप्त करते है। इतना ही नहीं क्रमसे वे मोक्षसुखको प्राप्त करते हैं ॥ २२ ॥ मूढा नाघपरार्थलाभमनसः स्वार्थव्ययं कुर्वते । सर्वे स्वामिन एव पर्वमु सदा सेवाननेभ्योऽपि च ॥ नीत्या तद्वदयं जना न कुरुते व्यर्थव्ययं पापदं । पूर्वोपार्जितपुण्यपापमुखतोऽधामुत्रिकाथ मना ॥२३॥ अर्थ-आज भी अज्ञानी किसान लोग मालिकोसे हम लोगोंको कुछ लाभ हो इस इच्छासे उनको अनेक प्रकारको भेट ले जाकर देते हैं । पर्व-दिनोंमें अपने स्वामियोंके पास यहातक कि अपने स्वामिक सेयकों के पास भी जाकर उनको अनेक भेंट वगैरह अर्पण कर उनका आदर करते है उनको अज्ञानी नहीं फहना चाहिये । क्यों कि ऐसा करनेसे उनके स्वामी भी समयपर उनको उपकार करते हैं। इसलिये यह उनका कर्तव्य है। इसी प्रकार मोक्षपुरुषार्थ को जो प्रास करना चाहते हैं घे भी अपने दम्पके कुछ अंशको व्यय करके श्रीभगवान् जिनेंद्रकी उपासना आदि करें । पर्वदिनों मे विशेषतया भगवान् जिनेद्र एवं उनके सेवक यक्षपक्षियोंकी आराधना कर तथा अनेक प्रकारसे धर्मप्रभावना सचमुच में १२४ दानशासनम् - कर अपने द्रव्यका सदुपयोग करें । परंतु खेद है कि कितने ही लोग. पूर्वोपार्जित पुण्यसे प्राप्त द्रव्यफे होनेपर भी ऐसे शुभकार्यमें उसका व्यय नहीं करते । परंतु पापोगर्जनमें सहायक ऐसे दुराचार, मुकदमे- बाजी आदिमें व्यर्थ व्यय करते हैं ॥ २३॥ क्षेत्रादिसर्ववस्तूनां संस्कारं 'कुर्वते जनाः । तत्तदर्थ न कुर्वति तत्फलमाप्तिहेतचे ॥ २४ ॥ 'अर्थ-धान्यादिककी उत्पत्तिकैलिये खेत आदिका संस्कार मनुष्य करते हैं । धनप्राप्तिकेलिये दुकान आदिको संस्कार करते हैं । परंतु खेद है कि सबका मूलबोज 'जो पुण्यधन है जिसके फलमें "सर्व संपत्तिकी प्राप्ति है, उसके संस्कार के लिये कोई प्रयत्न नहीं करते ॥४॥" आनत्यायानुबंधि मथितयमृदु निस्सारसुचकलीयं ।'' दृष्टिनादभ्रांस्वस्तमितमुदकसंयोगतो वृष्टितो वा ॥ शुप्यत्संशोपयिष्यान्निजनलभवसस्यानि सर्वाणि नित्यं ।।.. क्षेत्रं संस्कृत्य पात्रं फलमिव कमते कार्षिको धार्मिकत्वं ॥२५॥ अर्थ-जैसे कृषकलोग क्षेत्रका 'अच्छी तरह से संस्कार करते हैं अनंतर उसमें धान्य बोते हैं इससे धान्य उनको होता है । उसी तरह पात्रको आहारदान देनेवाला 'दाता भी क्षेत्रके समान है। यह भी प्रधग · अपने को दान देने योग्य बनायेगा ती पात्रदानसे उसको फललाम होगा, अन्यथा नहीं। पानको आहार देनेवाला दाता प्रथमतः सम्पग्दर्शनके घातक ऐसे अनंतानुबंधि कपाय को अपने हृदयसे नष्ट कर देता है, सब उसके हृदयमें जो पूर्वकालमें मिथ्यात्वरूपी धान्य यह शुष्क होकर नष्ट होता है। नष्ट होनेसे वह दाता अपनेको ब्रतादिकसे संस्कृत करता है अर्थात् संस्तक्षत्रके समान वह जब अपनेको सम्य- दर्शनवनादिकसे संस्कृत करता है, तब सत्पात्रको आहारटान देकर ऊगकर अच्छा फललाभ उगा था पात्रसवापिषि . । स्वर्गमोक्षादिकफलको प्राप्त कर सकता है । जैसे खेतमें जो मृण, या अयोग्य धान्य ऊगा था यह नेत्रकी दर्शनशक्तिको विघात करनेवाली ऐसी भांधी के चलने से, खूब धूल आकाश उड जाती है और उसके साथ तृणादिक भी टूट फटकर उड जाते हैं । अधया जलवृष्टि न होने से तृणादिक शुष्क होजाते हैं और तदनंतर किसान लोग उसको निकालकर फेक देते हैं और कठिन क्षेत्रको दलके द्वारा धान्य बोनेके योग्य बनाते हैं। तब उसमें उनको फललाभ होता है। अभिप्राय यह है कि,. मिध्यारयका त्याग करके सम्यग्दर्शन और व्रतादिक धारण करनेसे दाता. सत्पात्रको आहारदान देनेके लायक हो जाता है ॥ २५ ॥ मत समस्त ऋपिभिर्यदाहते। प्रभासुरात्मावनदानशासनम् ।। मदे सतां पुण्यधनं समर्जितुं । धनादि दद्यान्मुनये विचार्य तत् ॥२६॥ अर्थ-समस्त आईत ऋषियोंके शासनके अनुसार यह दानशासन, प्रतिपादित है। इसलिए पुण्यधनको कमानेकी इच्छा रखनेवाले श्रापक उत्तम पात्रोंको देखकर उनके संयमोपयोगी धनाटिक द्रव्योंको विचार कर दान देवें ॥ २६ ॥ .. . इति पात्रसेवाविधिः।
दानशातगम् . - द्रव्यलक्षण. प्रणम्य परमात्मानं चंद्रप्रभजिनेश्वरं । पात्रभुक्त्युचिताशेपद्रव्यलक्षणमुच्यते ॥ १ ॥ अर्थ---परमामा श्रीचंदप्रभस्वामीको नमस्कार कर पात्रों के भौज- नके योग्य सर्व द्रव्योंका लक्षण इस प्रकरणमें कहेंगे ऐसी आचार्यश्री प्रतिज्ञा करते हैं ॥१॥ द्रव्यलक्षण. क्षुधातपादोपहजादयः शमं । मयांति यत्सत्परिणामहतुभिः ।। लसत्तपःस्वाध्ययनादिदि- ! दव्याणि तान्येव वदेति साधकः || अर्थ-~-जिन आहारोंसे क्षुधा तृषादिक दोप, एवं वातपित्तादिक विकारोंका उपशमन होकर शुम परिणाम उत्पन होता हो, जिनसे साधुवोंका चित्त तप, स्वाध्याय, ध्यान आदिमें बढता हो उन्होको सम्मन जन द्रव्य कहते हैं ।। २ ।। द्रव्यगुण. गोरक्त्रस्पृष्टमंभस्तिमितमनलदग्ध पलालं वरण्ड-। क्लिनं यज्जंतुदग्धावटगतमिह निस्तारकं पूतिगंधि ॥ त्यक्त्वा संपनसस्योचयक्तिमतपं कोमलं नवीनं । शुद्धं त्यक्त्वानमिधं कृषिक इष पेन्नेत्ररम्प सुवर्ण ॥३॥ अर्थ-जिस प्रकार किसान खेतमें बीज बोते समय इन बातोका स्याट रखता है कि बोने का बीज गायका खाया न हो, पानीसे भीगा म हो, अग्निसे जला न हो, भूसा न हो, गीला हुआ न हो, कीडा लगा न हो, छेद से युक्त न हो, निस्सार न हो, दुर्गधी न हो, मध्य लक्षण. १२७ ------ R और उत्तम सस्य उत्पन्न होनेके लिए योग्य हो, कोमल हो, शुद्ध हो, अन्नसहित हो, मेत्रको सुंदर दिखता हो, एयं पछ वर्णसे युक्त है। उसी प्रकार साधुयोंके लिए देनेफे माहारमें भी उपर्युक्त सभी याताका ख्याल रखें। उस प्रकार के योग्य द्रव्यको दान में देनेवाला ही प्रशस्त दाता है ॥ ३ ॥ मनुमितदम्य सर्वदम्पमनाणक वनुचितं चखादि मुक्ताग्मितं । तांशीदलपूगपालफलग मम्मामूनादिकं ॥ सर्व पर्युपितं त्वभक्ष्यवृतवा क्लिनं च पात्राय नी । दद्यात्सर्वमिदं सदा प्रवितरेत्याय फलाभुने ॥ ५ ॥ अर्थ-भोजनकालमें अनुचित समस्त द्रव्य, उपभोग कर छोटा गया पवादिक, राया तांबूल, सुपारी, फमा नारियल, फल आदि बनाकर बहुत दिन होनेसे चिगटा हुआ द्रव्य, बहुस दिनारा आदि पालोंको आहारमें न देना चाहिए। जो पदार्थ उदिष्ट खानेपाटा सेवकके लिए देनेयोग्य हैं उन पदार्थीको पात्रदानमें देना कमी योग्य हो सकता है ? नहीं ॥१॥ निषिद्रव्य विदं विवर्ण विरसं विगंध - 1 मसात्म्पमक्लिन्नमपकमधे । स्विनं सफपतीय पकं । नेत्राभियं यन्मुनये न दद्यात् ॥ ५॥ अर्थ-जो द्रव्य भौधा गया हो, वर्णविकृत हुआ हो, विरस हुआ हो, दुगंधसहित हो, शरीरप्रकृति के लिये अनुक्ट न हो, अत्यंत रुक्ष हो, पका न हो, पसीजा हो, अत्यंत पका हो, आंखों को अच्छा नहीं दिखता हो, ऐसे पदार्टीको पात्रदानमें नहीं देना चाहिये॥५॥ पर्युपित. 'दधिसर्पिःपयोभक्ष्यमायं पर्युषितं मतं । गंधवर्णरसभ्रष्टमन्पत्सर्वे विगर्दित ॥ ६ ॥ .
१२८ दानशासनम् । अर्थ-गंध, वर्ण, और रससे भ्रष्ट दही, घी दूध व अन्य पक्कान पर्युषित कहलाते हैं । ऐसे अन्य द्रव्य भी निदित है ॥ ६ ॥ ग्रामानीतं चापणक्रीतमन्नं-। चान्योद्दिष्टं देवयक्षादिसंज्ञम् ।। मिथ्याष्टिस्पृष्टमच्छिमेत- नीचाख्यातं योगिन नैव दद्यात् ॥ ७ ॥ अर्थ-जी महार दूसरे गामसे लाया हुआ हो, बाजार ( होटल ) से खरीदकर लाया हुंआ हो, दूसरोंके ( मिथ्यादृष्टि ) उद्देश्य से बनाया गया हो, गृहदेवता, यक्षदेवता भूतादिकोंको अर्पण के लिये बनाया गया हो, मिथ्याष्टियोंके द्वारा छूया हुआ हो, उच्छिष्ट हो, नीचोंके लिये बनाया गया हो, ऐसे आहारको योगियोको कभी नहीं देना चाहिये ॥ ७ ॥ पुनरुष्णीकृतं सर्व । सर्व धान्यं विरूढकं ॥ दशरागोषितं कंसे न दद्यान्मुनये घृतम् ॥ ८॥ अर्थ-फिरसे गरम किया हुआ आहारद्रव्य, अंकुर आया हुआ- सर्व एवं कांसके पात्र में रखा हुआ दस दिनका घृत यह मुनियों को आहारदानमें देनेके लिये निषिद्ध है ॥ ८॥ . धान्य, : कारण. एतदाहारभक्त्यैव चेतोऽस्वाथ्यं ततो गदाः । तपोभंगस्ततो दातांतरायो महान्भवेत् ॥ ९ अर्थ--उपर्युक्त प्रकारके सदोष आहारोंके भक्षणसे चित्तमें अस्वास्थ्य उत्पन होता है । एवं अनेक रोगादिक उत्पन्न होते हैं। और तपश्च- में विघ्न उपस्थित होता है, इतना ही नहीं, दाताको महान् अतराय कर्मका बंध होता है ॥ ९॥ १ पुनरुष्णीकृतं सर्व । क्षीरादारोदफादिकं । सर्वगजननहेतुःस्या- द्विपक्जाषितापहं ॥ "
দুঘর
MHAN
भाई
।
निषिद्धाहारदत्तफल.
स्वेशपुगादिभुक्तान्नशेप दत्तं तपोभृते ।
अपुत्रा स्यात्सपुत्रा चेत्ते स्युनर्जीवन्मताः मृताः॥१०॥
अर्थ-मुनियोंको आहार देनेके पहिले अपने पति, पुत्र,
बंधु आदिको भोजन कराकर फिर बचा हुआ आहार यदि मुनियोंको
आधारदानमें देखें तो उस वीको अत्यधिक पाप लगता है जिसके
फलसे यह अपुत्रा होती है । कदाचित् पहिली उसको पुत्र हो तो धे
जीवन्मृत होते हैं अर्थात् पागल, मूर्व, बधिर, अंधा, मूफ वगैरह
होते हैं ॥१०॥
अनतिकदत्ताहारफल.
अवतिकदत्तमुक्तिः सव्रतभंगं च पुण्यभंगं च ।
दास्या दत्ता कुर्यादातुः पुण्यस्य सद्गर्भगं ॥ ११ ॥
अर्थ--दर्शनचारित्रसे रहित अतिके द्वारा दिया हुभा अहार
प्रतमंग और पुण्यभंगके लिये कारण है । एवं दासीके द्वारा दिलाया
हुआ आहार भी दाताके पुण्य व सद्गतीका भंग करता है अर्थात्
इससे वापसंचय होता है ॥ ११ ॥
निषिद्धाहार.
जीवनांगेन कायेना- शुचिना वर्तनेन च ।
भवेदधमया चेट्या स्पृष्टमन्नं विहितं ॥ १२ ॥
अर्थ-हिंसकप्राणियोंको स्पर्श कर दिया हुआ आहार, अस्पृ.
श्यादिककी छायासे स्पृष्ट होकर दिया हुभा आहार, नीचकार्य कर
अपवित्र दशामें दिया हुआ माहार, और नीच दासीफे द्वारा स्पृष्ट
आहार मुनियों को दान में देने के लिये निषिद्ध है ॥ १२॥
दासिपक्व आहार
सीरम्लं विषमन्ने स्वर्णादायोजयन्निव ।
दास्या दापायितुर्दानं दोपायैव मजायते ॥ १३ ॥
१३० दानशासनम् .. अर्थ-दूधमें खटाई, अनमें विष, सोनेमें तांबा वगैरह के 'मिलाना जिसप्रकार दोषपूर्ण है, उसीप्रकार दासोके हाथसे दिलाया हुआ आहार दाताके लिये दोपकारक ही है ॥ १३ ॥ नीवभांडपक्वाहार दत्तं संकल्प्य नीचाना येर्भाण्डः पकमोदनम् । तैर्भाण्डैः पकमशनं न देयं यतये बुधैः ॥ १४॥ अर्थ---जिन बरतनोंमें चाण्डाल आदि नीच जातियोंको संकल्प करके भोजन पकाया जाता है उनमें पकाया हुआ अन्न मुनियों को बुद्धिमानोंद्वारा नहीं देना चाहिये अर्थात् नीचौके लिये भोजन पका- .नेके बरतनमें मुनियों के लिये आधार देने योग्य भोजन नहीं पकाना चादिये ॥ १४ ॥ अबतिक ५क्याहार अवतिकपकमन्नं यो दत्ते तस्य पुण्यधनहानिः स्यात् । संस्कृतशालिक्षेत्रे क्षुधाभिजननस्य बीजवपनं वा ॥१५॥ अर्थ---अवतीके द्वारा पकाया हुआ अन्न जो दान देता है उसके पुण्य पधनका नाश होता है। जिसप्रकार धान के खेतको संस्कार कर उसमें राई बोरे तो कोई उपयोग नहीं है ।। १५ ॥ समतामत मिथण. सवतावतयोमिश्रे गंधागंधविमिश्रवत् । नीचोत्तमविमिश्रे स्यात् तप्ताज्यनलमिश्रवत् ॥१६॥ अर्थ-भोजनादिकमें अवती और व्रतियों के मिश्र होनेपर सुगंध दुर्गधके मिश्रके समान हो जाता है। नीच और उत्तम पुरुषोंका मिश्रण तपे हुए धीमें पानी के मिश्रणके समान होता है ॥ १६ ॥ कुलीननीचोमिने भुक्त्यायैः कुलनाशनम् । यया स्याधतिनां भुक्तो मत्वा दोषाविशोधयेत् ॥१७॥ . - द्रव्यलक्षण ५ अर्थ--भोजनादिक-कार्यमें कुलीन और नीचोंका मिश्रण कुल- नाशके लिये कारण होता है । इसीप्रकार मुनियोंके आहारमें इन बातोंको दोष मानकर उनका परिहार करना चाहिये ॥ १७॥ लोहारपोः कमकायसीर्विपसिताजशालास्तूरिफा-1 ज्योतिःसूर्यतपोरसायनपयोमध्याज्ययोगाद्यया ।। दुष्टः स्पारखलंसंगताऽपि सुजनः सत्संगतो दुर्जनो। योहापायनवच पार्थमुनिवदक्षो वृषध्वंसने ॥ १८ ॥ अर्थ-लोहके साथ अग्नीका संसर्ग होनेपर आनीका कुछ नहीं बिगडता है, लोहेको टोके पडते हैं, सोना और लोहेको मिटानेपर लोहेको कुछ नहीं बिगडता है, सोना खराब होता है । विष और शक्करको मिलानेपर विपका कुछ नहीं होता है, शक्कर खराब होती है, कीचड और करतूरीको मिलानेपर कीचडका कुछ नहीं होता है कस्सूरी बिगड जाती है। सूर्यके साथ केतु, चंद्रके साथ राहु के ग्रहण होनेसे सूर्य चंद्र ही कांतिविहीन होते हैं, उन पदोंका कुछ नहीं निगडता है, रसायन और पानी के संसर्गों रसायन विकृत होता है पानीका कुछ नहीं होता, मधु और घोके संसर्गसे धी ही खरान होता है, मधुका कुछ नहीं होती। इसी प्रकार दुष्टोंक सप्तर्गस सम्मनोंका धर्मनाश होता है । दुष्टोंका कुछ नहीं विगडता है। जिस प्रकार कि द्वीपायन और पार्यमुनिका संसर्ग धर्मनाशके लिपे कारण हुआ है ॥ १८॥ यहासीदस्तपत्रवान सती दले न चामलं । शूदेण नानी ब्राह्मण्या स्मारवाण्टालो गथा सुतः ॥१९॥ अर्थ-दामाके हाधस पका हुक्षा आहार यदि कुलसी दान देवें तो यह योग्य नहीं है। जिप्त प्रकार ब्राह्मण सीम शूद्र से उत्पन्न संतान चाण्डाल्के समान है ॥ १९ ॥ . . 1* १३२ दानशासनम् 4 गृहिणीहस्तपक्वान्ने दास्या दत्ते न दोपदं । धाच्या हि रक्षिते राजपुत्र धात्रीमुतो न च ॥ २० ॥ अर्थ-पत्नी के दारा पकाया हुआ आहार यदि दासी देखें तो यह उतना दोपकर नहीं है । जिसप्रकार कि धाईके द्वारा पाला गया राजपुत्र धाईका पुत्र नहीं है राजपुत्र हो है ॥२०॥ प्रशस्तदान. गहभाण्डायोगांगसंशुध्या दीयतेऽत्र यत् । सदेव दानं कल्याण मंगलं भवनाशनम् ॥ २१ ॥ अर्थ-घर, बरतन, अन्नवस्त्रादिक, मन वचन काय संबंधी क्रिया, शरीरावयव इन सब बातोंकी शुद्धिसे जो दान दिया जाता है. वही दान कल्याण करनेवाला है। मंगल है और संसारनाशके लिये कारण है ॥ २१॥ हित मितं पक्कमपीक्षणमियं सुगंधि जिहामियहृद्यमनम्।. अनंधकारे सुवितानरम्ये-प्यधूमगेहे मुनये च दद्यात् ।। भर्य-जीवजंतु आदि पतनका भय जहां न हो ऐसे सूर्य के प्रकाश- युक्त, अंधकाररहिस एवं धूमरहित 'प्रशस्त घरमें मुनियोंके शरीरको हित, मित, योग्य रीतिसे पका हुआ, देखनमें भी अच्छा,' सुगंध, स्वादिष्ट मनोहर आहार गृहस्थ मुनियोंको दानमें देवें । कुशल गृहस्थ स्वयं इन बातोंका ख्याल रखें ॥ २२॥ कृषीवल कृतक्रियाभिरभिवर्द्धते या कृतिः ।। स्तयेव सुकृतं मजागुरुयोनृपः ' सैनिकं ॥ सधार्मिककृतैर्गुणनवविधोपचारैर्गुरौ । घृषश्च सुकृतं प्रजागुरुरपोनृपः सैनिकं ॥ २३ ॥ अर्थ-किसान खतको वृद्धिक लिय जिन २ क्रियावोंको करता . -- द्रव्यलक्षण १३३ है उनसे कृषिको वृद्धि होती है, उससे प्रजावोंके लिये उपयोग होता है । राजा उन धान्यों से प्रा व सैनिकोंका पालन करता है। इसी प्रकार धार्मिक सज्जन धर्मवृद्धि के लिये जिन नवविध उपचारों. सहित दानादिक क्रिया करते हैं उससे धर्मको वृद्धि होती है। और उस धर्मसे गुरुजन, प्रजा, राजा, सैनिक आदि सबको सुख मिलता है ॥२३॥ मतं समस्तै ऋपिभिर्यदार्हतः। प्रभासुरात्मावनदानशासनम् ॥ मुदे सतां पुण्यधनं समर्जितुं । धनादि दद्यान्मुनये विचार्य तत् ॥२४॥ अर्थ-समस्त आहेत ऋषियोंके शासनके अनुसार यह दानशासन प्रतिपादित है। इसलिए पुण्यधनको कमानेकी इच्छा रखनेवाले श्रावक उत्तम पात्रोंको देखकर उनके संयमोपयोगी धनादिक द्रव्योंको विचार कर दान देवें ॥ २४ ॥ . इति द्रव्यशोधनविधिः
दानशासनम्
अर्थ--- परीषहको जीतने में समर्थ, फर्मोंके नाश करने में , दक्ष, ध
ज्ञानध्यान और तपमें लीन उत्तमपात्र कहलाते हैं ॥ ८ ॥
प्रशांतमनसः सौम्याः प्रशांतकरणक्रियाः
प्रशांतारिमहामोहास्ते पात्रं दातुरुत्तमं ।। ९ ॥
अर्थ- शांतचित्तवाले, सौम्यस्वभाववाले, मनवचनकायकी
सरलवृत्ति रखनेवाले, मोहसे रहित साधुजन उत्तमपात्र कहलाते
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धृतिभावनया युक्तास्सत्वभावनया युताः ।
तत्वार्याहितचेतस्कास्ते पात्रं दातुरुत्तमं ।। १०॥
अर्थ-धैर्य और सात्विक भावनावोंसे युक्त, तत्वोंके मनन में
जिन्होंने अपना चित्त लगाया है, ये उत्तम पात्र कहलाते हैं ॥१०॥
परीपहजये शूराः शूरा इंद्रियनिग्रह ।
कपायविजये शूरास्ते पात्रं दातुरुत्तमं ॥ ११ ॥
अर्थ-परीपहजय, इंद्रियनिग्रह, और कषायोंको जीतने में जो
शूर हैं वे उत्तमपात्र कहलाते हैं ॥ ११ ॥
विमलज्ञानसंपन्ना वर्द्धते साधवोऽनिशं । -
फलंति नित्यमम्लाना ध्रुवांबुर्भूरुहा, यथा ॥ १२ ॥
अर्थ-निर्मल ज्ञानसे युक्त उपर्युक्त प्रकारके गुणोंसे युक्त साधु
नित्य अपने गुणोंकर वृद्धिको प्राप्त होते हैं। जिस प्रकार कि यथेष्ट
जलस्थानमें रहा हुआ वृक्ष नित्यफल देता है ॥ १२ ॥
एकाकी विहारनिपेच.
यो मध्ये यतिनां जितस्मरकपायाणां मशांतात्मना ।
तस्माते मदनादयश्च सकला दोषाःमयांति क्षयं ॥
एकाकी सहसा युवा विहरति स्वांगेच्छया यः मुखी ।
ते तं ध्नेति गिरंति साधुपदवी प्रोदासयति ध्रुवं ॥ १३॥
पानभेदाधिकारः + । . । - में अर्थ-जो साधु कामक्रोधादिक कषायोंको जीतनेवाले शांत प्रकृतिके साधुवोंके मध्यमे सदारहते है, उन साधुवोंके कामक्रोधादिक सर्व दोष नष्ट होते हैं। ऐसा न कर जो जवान साधु अपने शरीरके सुखसे, स्वेच्छाचार पूर्वक एकाकी विहार करता है उसे ये दोषपित करते हैं। साधुपदसे गिराते हैं । और नियमसे साधुपदसे उदासीनता भी उत्पन्न करते हैं ॥ १३ ॥. गुरुसेवा. भीतः मोतियुतः स युक्तिकुशलः सेवानुरागी' गुणी। धर्मोद्योगपरो विदन्पतितनूरक्षाक्रियादक्षिण: 1.5 'स्वस्वाम्याश्रयजप्रसादमहिमा शिष्यः स भृत्यो यथा । :: स्वस्वाम्यात्तविभूतितुल्यविभवं माप्नोति नित्यं गुरोः॥१४॥x ...अर्थ-जिस प्रकार भयभीत, प्रीतीस युक्त, युक्तिमें कुशल, सेवा- कार्यमें अनुरक्त, गुणवान् , न्यायपूर्ण उद्योग करनेवाला, स्वामिके शरीर- रक्षामें तत्पर, ऐसे स्वामिभक्त सेवकके प्रति संतुष्ट होकर स्वामी उस सेवकको अनेक ऐश्वर्य देता है उसी प्रकार उपर्युक्त सभी विशेषणों से युक्त होकर जो सच्चे हृदयसे गुरुसेवा करनेवाले शिष्य के प्रति गुरु भी प्रसन्न होकर अपने आश्रित शिष्यको प्रसाद के रूपमें अनेक गुणों को देते हैं ॥१४॥ गुरुके प्रति कर्तव्य. मागे तिष्ठ गुरोरोच चरमे गायन्सन्मा पठे- ग्रंथं कामविकारिणं त्वयकर मिथ्योपदिष्टं सदा रागद्वेपनिमितमात्मविभवच्छेदोचितं मा-बद ब्रूहि हि हितं मितं ! स्थितिकरं पूतं सभापूजितम् ॥१५॥ * भूहिरिपुर्वा नृपति शिवा परिभूय तान्विहाय पुनस्त । विहरतं सस्ते नंति तथा विकलचरितशिप्य दोपा.. A- पानशासनम् 1 अर्थ-हे शिष्य ! गुरुके आगे मत बैठो, और गुरुके पीछे बैठो, गुरुके सामने ग्रंथोंको गाते हुए इसते हुए मत पढो । कामविकारको उत्पन्न करनेवाले, पापकर, मिथ्या उपदेशकारक, रागद्वेषको उत्पन्न करनेवाले, आत्मकल्याणमें बाधक ग्रंथोंका उपदेश नहीं देना । सर्व प्राणियोंको हितकारक, परिमित, समाजनोंको उल्लसनीय व आदरणीय वचनोंको बोलो । यही विनीत शिष्यका धर्म है ॥ १५ ॥ जीविस्वामिसमार्यपावनवची हि त्वमाहानके । मा संतिष्ठ गुरोर्गुरोरुपरि भौस्तुल्यासनेऽग्रासने ॥ मा मा,मारमुख त्वमेव सततं नीचो यथाः वर्तते । पत्यो मास्य पुरः स्वपः शुचिकटे पादयापःस्थले ॥१६॥ अर्थ-हे शिष्य ! गुरुजी के आह्वान करनेपर जी, स्वामी, आर्य आदि पवित्र वचनोंका उच्चारण करो | गुरूके ऊपर. समान आसनपर या अप्रासनपर मत बैठो, जंभाई वगैरेह मत निकालो।नीच सेवक जिस प्रकार स्वामीके सामने सोता है, उस प्रकार गुरुके सामने सोवो मत, सोना हो तो शुद्ध चटाईपर उनके पैर के नीचे सोयो। यह शिष्य का धर्म है ॥ १६ ॥ स्वीसभापणमात्मदूषणकरं पालाननाद्वीक्षणं । तासामैव कटाक्षवीक्षणमिदं चित्तस्य वैफल्यकृत् ॥ शय्यांगांवरसंस्पृशादनुपमब्रह्मवतोच्छेदनं । ज्ञात्वा दोषमिमं स्वसाधुनिकटे संस्थीयतां निश्चलं ॥१७॥ अर्थ-- शिष्य ! जवान स्त्रियों के साथ मीठी २ बात करना यह आत्माको दूषित करने के लिये कारण होगा। उन जवान खियाके मुखको उत्सुकतासे देखना, बोर उनका फटाक्षवीक्षण 'यह चित्तमें चंचलता उत्पन करेगा। उनके शयन, [ विस्तर ] शरीर व पत्रके स्पर्शन होनेसे उत्कृष्ट ब्रह्मचर्य इतका भंग होगा । इन सब दोषोंको . .
पात्रभेवाधिकारः मच्छी तरह विचार कर अपने गुरुके पासमें निक्षल चित्तसे रहो, इसीमें तुम्हारा कल्याण है ॥ १७॥ स्यात्पंचवतसाळपंचकवृते देहेऽपराजायते । दुर्भावाः खलवृत्तयो रिपुनृपं दृष्ट्वा पतिवा ततः ॥ वयुस्ते शिथिला पर्वति तरुणीमभहवस्पृष्टिती । नान्तःशुद्धिरसंवृतिश्च न वलं साध्यस्त्वयाय हवं ॥१८॥ अर्थ-हे बस्स ! अभी पंचमहानतरूपी मजबूत परकोटको देख- कर पापराज दुर्भावरूपी सन्योंके साथ तुमसे युद्ध करने के लिए समर्थ नहीं, वह शक्तिहीन होगया है । परंतु ध्यान रहे, जब स्त्रीरूपी मदोन्मत्त हाधिनीकी दृष्टि इन परकीटोंपर ग जाय तो ये एकदम शिथिल होकर पड जायेंगे । फिर अंतरंगशुद्धि का रक्षण, व्रत य बल आदि कोई भी बात तुमसे साप्य नहीं हो सकेगी, यह निश्चित उचैरध्ययनं सगामपठनं मुंचेयुधी हास्यतां । स्वावासस्थितिमंगवीक्षणसहालापांगसंस्पर्शनं ॥ स्त्रीभिस्तत्मुतळालनं बहुपुरी जायापतिमस्तुति । होरामंत्रनिमिचभेपनचित्तद्रव्यांगसंपोपणं ॥१९॥ अर्थ-गुरूके सामने चिल्लाकर पढना, गाकर पढमा यह उचित नहीं है । एवं नियोंके आचासमें रहना, उनके सुंदर अंगोंको देखना, उनके साथ संभाषण व अंगस्पर्शन करना, उन स्त्रियोंके पुत्रोंको खिलाना, त्रियों की प्रशंसा करना, ज्योतिष, मंत्र, औषधि इत्यादि द्रव्य के साधनों से उनका पोषण करना यह सब बुद्धिमान मुनियोंके द्वारा पाप है ॥ १९ ॥ स्त्रीशय्यायां न स्त्रपेतां स्पृशेना- पी याश्चानां सा स्मरोदौसिकी। .
१४० दानशासनम् स " : . तद्योगिन्या योगिनकवासे न स्थातव्यं वाचनीयं सदा नं ॥ २०॥ अर्थ-साधुवोंको उचित है कि वे स्त्रियोंकी शय्यामें कभी सोये नदी और उसे स्पर्शन भी न करें । छोटोके साधं घोडेको बांधे तो उस घोडको कामोद्दीपन होता है उसी प्रकार एकांत में (एक जगह) अर्जिकाके साथ मुनि कभी न रहे न कोई पठन-पाठन करें ॥ २० ॥ . आर्यिकावोंके साथ मुनियोंको निवास निषेध.'' संहार्यिकाभिर्मुनिभिः स्वाध्यायोऽथ जपस्तवः ।। ने कर्तव्योऽन कर्तव्य व्रतभंगो भवेत्तदा ॥ २१ ॥ अर्थ-आर्यिकावों के साथ मुनिगण स्वाध्याय, स्तोत्र, जप वगैरह कुछ भी नहीं करें। यदि इसी पर्वाह न कर जो कोई करेंगे। उन दोनोंका व्रतभंग होता है ।। २१ ।। । एकाकी विहारसे दोप.:.:...., जारात्रीश्चुरिणो बलादनवतो भूमि ससंस्थां मंगा। गावोरीजनपाःशशांक शुनका व्याघ्रा मृगान्दर्भुगन् । सो गाश्च तरक्षको भुवि यथा आमंति बालान्मुनी- नप्येकान्मदनादयो विहरतः क्रोधादिदोषा इमे ॥२२॥ *. अर्थ-जिस प्रकार लोफमें यह देखा जाता है' एकाकी विहरण करनेवाली पतिव्रताको जारलोग अपहरण करते है, धनवानों के धनको बलात्कारसे चोर चुराते हैं, 'दुष्मृग गायोंको खा डालते हैं, "सस्य- सहित भूमिको राजा ले लेता है । शत्रुवोंको कुत्ता काटता है, शशीको शिकारी मारता है । मृगोंको व्याघ्र ‘खा डालता है, मेढकोंको सर्प निगलता है, इस प्रकार सर्वत्र आक्रमण देखा जाता है ! उसी प्रकार -- .. . 1 - पाप्रभेदाधिकारः १४१ . अनुभवशून्य बालमुनि या अनिका एकाकी होकर विहरण कर तो फाम क्रोधादिक विकार उनको चारों तरफसे आक्रमण करते हैं ॥२२॥ अभिमाननिघः राजानुमंहतो भृत्यो जनान्यस्य नश्यति । “यथा जहात्मा शिप्योऽपि गुर्वनुग्रहमात्रतः ॥२३॥ अर्थ-राजाके अनुग्रहको प्राप्त करनेवाला सेवक अभिमानी होकर लोगोंको पीडा देनेसे जिस प्रकार अपना नाश करता है, उसी प्रकार अज्ञानी शिष्य गुरुकै अनुप्रहसे मदोन्मत्त होकर अपने आमाका पतन कर लेता है ॥२३॥ . दीक्षोद्देश्य. दीक्षा गृहन्ति मनुजाः स्वकर्महरणाय च । स्वपुण्यवृद्धये केचित् केचित्संमृतिमुक्तये ॥२॥ अर्थ-संसारमें कोई मनुष्य अपने कर्मोको, नाश करने के लिए दीक्षा लेते हैं। कोई अपने पुण्यकी वृद्धिको टिए दीक्षा देते हैं। कोई संसारसे छूटनेके लिए दीक्षा देते हैं ॥ २४ ॥ विश्वजीवानुकंपावान् धर्मप्रद्योतकारकः । यथा श्रीगौतमस्वामी केचिदात्मविशुद्धये ॥२५॥ ।। . अर्य-संसारके समस्त जीवोंके प्रति अनुकंपा रखनेवाले, धर्मकी प्रभावना, करनेनाले श्रीगौतमस्वामीने जिस प्रकार आरमशुद्धि के टिए दीक्षा ली है वैसे भी कोई २ दीक्षा रेत है ॥ २५ ॥ कश्चित्स्वकुलनाशाय दुष्कृतोपार्जनाय ना। बंधुवर्गविनाशाप दीपायनमुनिर्यया ॥२६॥ 'अर्थ-कोई २ द्वौपायन मुनिके समान अपने कुटफे नाशके लिए, .. - - .
दानशासनम् पापोंके उपार्जनके लिए एवं बंधुवाका संहार करने के लिए दीक्षा लेते - . कश्चिदात्मविनाशाय निजधर्मकहानये । दुष्टमिथ्याग्रहग्रस्तः पार्थनामामुनिर्यथा ॥२७॥ अर्थ-कोई २ पार्थमुनि के समान अपने नाशके लिये, अपने धर्मके नाशकेलिये, दुष्ट मिध्यात्वरूपी भूतके वशीभूत होकर दीक्षा लेता है ॥२७॥ कधिदुच्चासनासक्तः कपायानच्छमानसः । काठागार इवाभाति प्रध्वस्तनिजवल्लभः ॥२८॥ अर्थ-कोई २ काष्टांगारके समान उच्च आसनों (पद) के लोलुपी होकर, कपायकलुषित चित्तसे, अपने स्वामीके नाश करनेकी भावनासे दीक्षा लेता है ॥ २८ ॥ देहक्लेशसहाः केचित्परोत्कर्षासहिष्णवः । नाशयंति जनान्धर्म भूपा भूत्वायजन्मनि ॥२९॥ अर्थ-कोई २ देवके क्लेशको सहन करनेवाले हैं और कोई दूसरोंके उत्कर्षको सहन करनेवाले नहीं हैं। वे आगेके जन्ममें राजा होकर प्रजा व धर्मको नाश करते हैं॥ २९ ॥ तपांसि धृत्वा कायेन हद्वाग्भ्यां नंति तानि च । वोत्खातयंतः शाल्यानि मुक्त्वा श्वेतार्जुनानि च ॥३०॥ अर्थ--कोई २ कायसे तप धारण कर वचन और मनसे, उसका नाश करते हैं । वे उसीके समान मूर्ख हैं जो खेतमें न्यर्धके घासोको काटना छोडकर.सस्योंको ही काटकर नाश करता है ॥३०॥ अन्पोन्यमत्सराः केचिन्मुनयो मुनिदूषकाः ॥ स्वामिदत्तार्थ झुंजाना इव स्वस्वामिदूषकाः ॥ ३१ ॥ .
पात्रभेदाधिकारः
.
अर्थ--कोई २ मुनि एक दूसरेके प्रति मत्सरयुक्त होकर परस्पर
एक दूसरेकी निंदा किया करते हैं जिस प्रकार कि स्वामीफे दिये हुए
धनको खाते हुए भी नीच सेवक अपने स्वामीकी निंदा करते हैं ॥३१
फैचिद्विरागिणो भूत्वा बिधानीवातिरागिणः ।
कुलालामत्रनिक्षिप्तशिखिवत्कामविहलाः ।। ३२ ॥
अर्थ-कोई २ मुनि विरागी होते ( कहलाते ) हुए मी बिंब
फलके समान अत्यंत रागी होते है। कुंभकारके मटकोंको पक करनेवाली
अनिके समान कामपीडित रहते हैं ॥ ३२ ॥
लब्ध्या राज्यपवंतीय भूपा बंधून्बलानि च ।
धृत्वा दीक्षां धनं सन्ध्या केचिताधवपोपकाः ॥ ३३ ॥
अर्थ-जिस प्रकार राजा राज्यप्राप्ति करके अपने बंधुगण और
सैन्यका रक्षण करते हैं। उसी प्रकार कोई मुनि दीक्षा धारण कर धन
कमाते हैं और बांधयों का पोषण करते हैं ॥ ३३ ॥
स्वामिद्रोहाभिनं देशं मक्त्वारिविषयं गताः ।
स्वामिद्रोहधराः केचिदशक्ता निरयं गताः ॥३४॥
अर्थ-स्वामिद्रोहके कारण जो अपने देशको छोडकर शत्रु-
राज्यमें जायें तो वहां पीडित होते हैं, इसी प्रकार कितने ही अपने
सामी व गुरूको निंदा करनेसे नरफ गये है॥ ३४ ॥
निन्दन्ति निंदयंत्येव सद्गोत्रान्साधुपुंगवान् ।
जिनरूपधराः केचित् वायुभूत्यादयो यथा ॥ ३५ ॥
अर्थ-कोई २ वायुभूति आदि मुनियोंके समान मुनि
होते हुए भी उत्तम कुलगोत्रमें उत्पन्न साधुवोंको स्वयं निंदा करते
है और दूसरोसे निंदा करते है ॥ ३५॥
१४४. दानशासनम् 41 -- ।। १९, मायया केचिदेवात्र देहसंस्कारकारकाः। आत्मघातदुर्भावा चैदिकब्राह्मणा इव ॥ ३६ ।। अर्थ- कोई २ मुनि वैदिक ब्राह्मणोंके समान ,मायाचारसे , देह- संस्कारोंको करते हैं और आत्मघात करनेवाले दुर्विचारोंको सदा मनमें लाते रहते हैं ॥ ३६॥ व्यवहृत्यान्यदेशेषु नष्ट्वा स्वराजितं धनं । {.. 'ये नरास्ते यथा केचित्स्वकायक्लेशतत्पराः ॥३७॥ अर्थ-जिस प्रकार कोई मनुष्य परदेश में व्यापार कर कमाये हुए धनको खोकर आता है, उसी प्रकार कोई २ मुनि व्यर्थ कायक्लेश कर जन्म खोते हैं ।। ३७.॥ .: कचिदूपतिक्षेत्र नित्याश्चितकृपिक्रिया: 11:17 अलब्धधान्या वर्तते यथास्युनिष्फलनियाः ॥ ३८॥ : : अर्थ--कोई २. मूर्ख किसान जो कि सदा ऊसर भूमिमें ही कृषि करता रहता है परन्तु धान्यको पाता नहीं है। उसी प्रकार फोई,.२ मुनि अन्यथारूप क्रियाओ को करनेसे यथार्थ फलको पाते नहीं ॥१८॥ सरिंभपरिभ्रष्टाः केचित्स्वोदरपूर्तये । केचिस्वर्गसुखायैव केचिदैहिकभूतये ॥ ३९ ॥ -: अर्थ-समस्त आरंभोंसे भ्रष्ट होकर कोई . २ मुनि अपने 'उदर पोषण के लिये दीक्षा लेते हैं। कोई स्वर्गसुखकी प्राप्तिके लिये और कोई ऐहिक संपत्ति की प्राप्तिके लिये दीक्षा लेते हैं ॥ ३९ ॥ दत्ते स स्यायंधा दीक्षा यो मुनिर्बहिरीत्मनः । !! काष्टांगारस्थापितथीविधरपिता यथा ॥ ४० ॥ अर्य-जो मुनि ऐसे बहिरात्मावाको विना विचार किये ही.दीक्षा दे देते हैं, यह उसी प्रकार की दीक्षा है जैसे फाटांगारको सत्यंधर राजाने राज्यश्री देदी ॥ ४० ॥ 1 14 Era .
पानभदाधिकारः दीक्षा के लिए अयोग्य पुरुष.' कोभिकोधिविरोधिनिर्दयशपन् मायाविना मानिनां । कैवल्यागमधर्मसंपवियुधावर्णानुवादात्मनाम् ॥ पंचामो वदतां स्वधर्मपमळं सद्धर्मविध्वंसिना । चित्तकेशकृतां सतां च गुरुभियान दीक्षा कचिद ।।४१ अर्थ-जो लोभी हो, कोपी हो, धर्मविरोधी हो, निर्दयतासे दूसरोंको गाली देता हो, मायावी 4 मानी हो, केवली, आगम, धर्म, संघ और देय इनपर मिथ्या दोषारोपण करता हो, " मौका आनेपर मैं निर्मल धर्म छोड़ दूंगा " ऐसा कहता दो, सद्धर्मका नाशक हो, सश्मनोंके चित्तमें क्लेश उत्पन्न करमेवाला हो उसे गुरुजन दीक्षा कमी नहीं देयें ॥ ११ ॥ स्त्रीणां भक्तिन च निजपत्तौ सेवकानां च देवे । भक्तानां सा न च गुरुजने सा न शिप्याधिकानां ॥ ताम्ते ते वा विमळसुकृतच्छिन्नकाचस्यधारा (१) । यांतीवायोभुषमिह सदा दुर्गति त मेयुः ॥४२॥ अर्थ--लोकमें जिन वियोंकी भक्ति अपने पतिपर, सेवकोंकी भक्ति स्वामीपर, भाकोंकी देवोंपर, शिष्योंकी गुरुजनोंमें यदि नहीं रहती है तो उनका जन्म व्यर्थ है । उनका पुण्यनाश होता है एवं वे नरकादि दुर्गतिको प्राप्त करते हैं ॥ ४२ ॥ सक्रिय केवळ नष्ट नष्ट वासोऽक्रियं यथा। सक्रियः पापवान् नष्टः पुमानप्यक्रियस्तया ॥४३|| अर्थ-इमेशा भोढना पगैरह कार्यमें लाया गया कंबल नष्ट होता है। तथा उपयोगमें नहीं लाया गया कपडा नष्ट होता है। उसी तरह भयोग्य आचरण करनेवाला अर्थात्-पापक्रिया करनेवाला पुरुष नष्ट १० दानशासनम् AAPK : . करनेबाले होता है। तथा क्रियां नहीं करनेवाला अर्थात् पुण्यप्राप्ति नहीं करनेवाला अउसी आदमी भी नष्ट होता है अर्थात् संसारमें भ्रमण करता है। देहे जिनगृहे गेहे पत्तन गगने भुवि । उद्भवंति यधोत्पाता. धर्ममार्गे तथा नडाः । ४४ ॥ अर्थ-देह, जिनमंदिर, घर, नगर, माकाश व भूमिमें जिस प्रकार उत्पात-अशुभ चिह्न उत्पन्न होते हैं, उसी प्रकार धर्ममार्गमें भज्ञानियोंकी उत्पत्ति होती है ॥ ४४ ॥ तभंग कृतं सर्व यद्यैस्तदहिरात्मभिः । मिथ्यर्धिधर्मनाशाभ्यां मधुपिंगळपावत् ॥ ४५ ॥ अर्थ-बहिरामा मधुपिंगल, पार्श्वमुनिके समान मिथ्याऋद्धिको प्राप्त कर धर्मनाश करनेवाले एवं अपने सर्व तपफो भंग बहिरात्मा मुनि भी होते हैं ॥ ४५ ॥ पुष्पं पुण्पवतां- वृष्टिर्चर्पयत्यतिपापिनः । मा.न स्पृशति वृष्टिः स्याद्वृतिश्च सदृशी तयोः ॥४६॥ अर्थ----पुण्यवानोंको, ही पुण्यकी दृष्टि होती है। अतिपापि- यों को ,यह पुण्य वृष्टि रपर्श नहीं करती। एवंच व्रत व सम्यग्दर्शन भी उन पापियों को स्पर्श नही करते ॥ १६ ॥ सितार्जुनादीनि च शालिसस्यैः । प्रवृद्धिमायोति यथा तथैव । कृतानि सर्वाणि तपांसि भव्यै- रभंगवृतानि भवत्यभव्यैः ॥ १७ ॥ अर्थ-जिस प्रकार खेतमें सस्योंके साथ अनेक घास भी पैदा होकर बढते है उसी प्रकार भन्योंके द्वारा भमंगवृत्तिसे किये जानेवाले लए अभव्योंके लिए भी वृद्धिके लिए होते हैं ॥ १७ ॥ HTr.
पात्रभेवाधिकारः यही स्त्रियोपि गृहन्ति भूपालतनया यथा' मुखानुभवनासक्ता अज्ञानापयरक्षणाः ॥ १८॥ 'अर्थ--मुखानुमयमें तल्लीन होनेवाले रामपुत्र मातृकुल तथा पितृ- - कुछ की शुद्धि रहित ऐसी भी सियां उपभोगनेफे ोटये अन्तःपुरमें 'रखते हैं । उसी तरह फितनेफ पुरुष जिनदक्षिा हितकर है, और पारिमाजक दीक्षा अहित कर ऐसा विचार न कर भाविसुखफी आशा से कोई भी दीक्षा धारण करते हैं । यह उनका अवियफ योग्य नही । है।॥ १८ ॥ . पथीदानोऽनिलः मुद्धी भोज्यद्रव्याणि यस्तथा । उदारयति दुष्कर्म पुण्यकर्म निवारयेत् ।। ४९ ॥ अर्थ-~यदि उदान यात कुपित हो जाय तो मोजन, द्रव्यको यमन कराता है उसी प्रकार पापकर्म पुण्यकर्म फटको भोगने . मी देता कृतपुण्योदयात्पूर्व दोषाः प्रादुर्भवेत्यरं । उत्तबीजोदयात्सर्वा उद्भवंत्यखिलाः कलाः ॥ ५० ॥ अर्थ-पुण्यके फलके उदय आने पहिले अनेक दोष प्रकट होते है । जैसे कि बोये हुए बीज उगनेके पहिले अन्य तृण सस्यादि उत्पन होते है ॥५०॥ मंदाग्नेगुरुभोजनेन विगलत्तेजा अनल्पागसा। स्वल्पायुर्विपभोजनाद्तधना नष्टाधिकारायथा ॥ निर्भाग्या नृपसेवया धृतधनाः स्वस्वाम्युदासीनतः । बुद्राया गुरुदीरयैर कतिचिनाशं गता दुर्गटिं॥५१॥ अर्थ--मंदाग्निको धारण करनेवाले कितने ही टोग गरिष्ट भोजन करके कांतिरहित होते हैं । महापाप करनेसे स्वल्पायु होते.है । आसनमरणार विक्के भोजन करनेसे नर होते
दानशासनम्
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होता है। तथा क्रियां नहीं करनेवाला अर्थात् पुण्यप्राप्ति नहीं करनेवाला
अलसी आदमी भी नष्ट होता है अर्थात् संसारमें भ्रमण करता है।
देहे जिनगृहे गेहे पत्तने गगने भुवि ।
उद्भवंति यथोत्पाता. धर्ममार्गे तथा जडाः ४४ ॥
अर्थ-देह, जिनमंदिर, घर, नगर, आकाश व भूमिमें जिस
प्रकार उत्पात-अशुभ चिह्न उत्पन्न होते हैं, उसी प्रकार धर्ममार्गमें
मज्ञानियोंकी उत्पत्ति होती है ॥ ४४॥
तपोभंग कृतं सर्व यद्यैस्तद्धहिरात्मभिः ।
मिथ्यर्षिधर्मनाशाभ्यां मधुपिंगळपावत् ॥ ४५ ॥
अर्थ-बहिरात्मा मधुपिंगल, पार्श्वमुनिके तमान मिथ्याऋद्धिको:
प्राप्त कर धर्मनाश करनेवाले एवं अपने सर्व तपको भंग करनेवाले
बहिरामा मुनि भी होते हैं ॥ ५५ ॥
पुण्यं पुण्यवता- वृष्टिपर्पयत्यतिपापिनः ।
सा न स्पृशति वृष्टिः स्याहृतिश्च सदृशी तयाः ॥४६॥
अर्थ--पुण्यवानों को. ही पुण्यकी पुष्टि होती है। अतिपादि-
योंको वह पुण्य दृष्टि रपर्श नहीं करती। एवंच व्रत व सम्यग्दर्शन।
भी उन पापियों को स्पर्श नहीं करते ॥१६॥
सितार्जुनादीनि च शालिसस्यैः ।
प्रवृद्धिमायांति यथा तथैव ।
कृतानि सर्वाणि तपांसि भव्यै-
रंभंगवृत्तीनि भवंत्यभव्यैः ॥ १७ ॥
अर्थ-जिस प्रकार खेतमें सस्योंके साथ अनेक घास भी
पैदा होकर बढ़ते हैं उसी प्रकार भन्योंके द्वारा अभंगवृत्तिसे
किये जाने वाले तप अभव्योंके लिए भी वृद्धि के लिए होते हैं ॥४७॥
पात्रभेदाधिकारः वही स्त्रियोपि गृहन्ति भूपाळतनया यथा सुखानुभवनासक्ता अज्ञातीभयरक्षणाः ॥१८॥ 'अर्थ--सुखानुभवमें तल्लीन होनेवाले राजपुत्र मातृकुल तथा पितृ- कुछ की शुद्धि रहित ऐसी भी स्त्रियां उपभोगनेके टये अन्तःपुरमें रखते हैं । उसी तरह कितनेफ पुरुष जिन दीक्षा हितकर है, और पारिव्राजक दीक्षा अहित कर ऐसा विचार न कर भाविसुखकी आशा से कोई भी दीक्षा धारण करते हैं । यह उनका अविवेक योग्य नहीं . यथोदानोऽनिलः क्रुद्धो भाज्यद्रव्याणि यस्तथा । : उद्वारयति दुष्कर्म पुण्यकर्म निवारयेत् ॥ ४९॥ अर्थ--यदि उदान वात कुपित हो जाय तो भोजन, द्रव्यको यमन कराता है उसी प्रकार पापकर्म पुण्यकर्मको फटको भोगने : महीं देता कृत पुण्योदयात्पूर्व दोपाः मादुर्भवंत्सरं । उप्तबीजोदयात्सर्या उद्भवत्यखिलाः फलाः ।। ५० ।। अर्थ-पुण्यके फलके उदय आनेके पहिले अनेफ दोष प्रकट होते है। जैसे कि बोये हुए वीज उगनेके पहिले अन्य तृण सस्यादि उत्पन होते हैं ॥ ५० ॥ मंदाग्नेगुरुभोजनेन विगळतेजा अनल्पागसा । स्वल्पायुर्विपभोजनागतधना नहाधिकाराद्यथा ॥ निर्भाग्या नृपसेवया धृतधनाः स्वस्वाम्युदासीनतः । क्रुद्धाद्या गुरुदीक्षयैव कमिचिन्नाशं गता दुर्गटिं ॥ ५१ ॥ अर्थ--मंदाग्निको धारण करनेवाले कितने ही लोग गरिष्ट भोजन करके कांतिरक्षित होते हैं । महपाप करनेसे स्वल्पायु होते हैं । आसनमरण मात्र विपके भोजन करनेसे नष्ट होते - ।
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हैं । दरिद्री लोग नष्ट देशाधिपत्यसे, भाग्यहीनलोग राजाकी सेवासे,
आजीविकाप्राप्त लोग अपने स्वामीको उदासीनतासे, नष्ट होगये और
दुर्गतिको गये। उसी प्रकार पार्श्वमुनिके समान कितने ही, पापसे
पीडित दिगंबर दीक्षा लेने के बाद भी दुर्गतिको गये । अर्थात् भाग्य-
हीन व पापी पुरुपोंको अच्छा आश्रय भी नाशके लिये भी हुआ
करता है ॥ ५१॥
विभावसंयुतमिथ्यादर्शनादिमुनीश्वरैः ।
पभूवुर्धार्मिकैधर्महानिःस्यादविचारफैः ॥ ५२ ॥
अर्थ--मिध्या विभावोंसे युक्त धार्मिक कहलानेवाले
अविचारी मुनियोंसे कितने ही बार धर्म की हानि हुई व होगी ॥५२॥
वैद्यान्विविपता रुजामधिकता 'न स्पागुणो भेपः ।
स्वस्वामिद्विपता न जीवितमघाधिक्यं च साधुद्विपाम् ।।
स्वानीकद्विषतां च धावति रमा राज्यं च यद्यद्विषां ।
लामस्तै जलं विना फलति नो भक्तिं विनानो गुणः ५३
अर्थ-जो वैयों के साथ द्वेष रखते हैं ऐसे रोगी पुरुपोंके रोग
बढ़ेगे ही। चाहे जितने औषध लेनेपर भी गुण नहीं होगा। अर्थात
उनके रोग नष्ट नहीं होंगे। जो अपने मालिक के साथ द्वेष रखते हैं चे
मूर्ख लोग अपनी उपजीविकाका नाश करते है । उसी तरह जो दुए
लोग साधुओंका द्वेष करते हैं उनको तीत्र पातकोंका नियम से बंध
होता है। जो अपने सैन्यसे द्वेष करते है ऐसे राजाओंकी लक्ष्मी और
राज्य नष्ट होता है । अभिप्राय यह है कि जो.जिस हितकार' वस्तुफा
द्वेष करता है उससे उसका फायदा नहीं होगा हानि ही होगी। जलके
विना वृक्ष न लढेगा न फल देगा। उसी प्रकार यदि हम साधुके गुणोंमें
मक्कि न करेंगे तो हमारा कल्याण नहीं होगा ऐसा समझकर उनकी
उपासना हमेशा करनी चाहिये । ऐसा इस श्लोकका अभिप्राय है ॥५३॥
पाप्रभेदाधिकारः .. भोज भोज येप्युपालन्धुकामा । दाये दायं दानिनः सानुनापा । तदोपः स्यादानपुण्यादिनाशो । जिवालील्यं स्वान्पलाभं निहंति ॥ ५ ॥ अर्थ-जो साधु भोजन करते २ श्रावककी निंदा करते हैं तथा दाता उसकी पूर्ति करते २ संतप्त होता हो तो इन दोषोंसे दान पुण्यका नाश होता है । यह साधु भी जिदालोलुपतासे अपने अन्य लाभोंको खो लेता है ॥ ५४ ॥ सत्करालवालामृतमृगमदासिक्तहमायुपूर । क्षेत्रोप्ताशेपर्फदद्रुमणलतिकाः प्राग्गुणाम त्यति ॥ दुर्भाव?प्कपापैः कृतनुतिमपसम्म पत्तपोवृद्धयो या। दुर्भावान्दुष्कपायान्मकटतरपलान्वर्धयन्ति स्फुटं ताः॥५५ अर्थ-यदि खेतको कपूर का बांध बनायें और फस्तूरिका ५ गुलाब-जलसे उसे छिडके तो मी उसमें उत्पन्न होनेवाले कंद, सस्य व लताये अपने पूर्व गुणोंको कभी नहीं छोड़ सकते। उसी प्रकार अच्छे साधुवोंके संसर्गमें रहनेपर भी जो दुर्भाव व दुमपापसे जप, स्तोत्र, ध्यान आदि करते हैं उनके थे भाव कमी छूट नहीं सकते भपितु दुर्भाव व कपायोंको बढाते ही हैं ॥ ५५ ॥ मानुल्यभ्यस्तवध्वः प्रविमलचरिताः स्तूयमानाम्साभिः । स्वाचार्याभ्यस्तशिप्याः प्रविमलचरिताः स्तूयपाना मुनादः ॥ स्युः पित्रभ्यस्तपुत्राः प्रकटितमतयो धीरवीरा रमेशाः । स्वस्वाम्प-पस्तभृत्याः प्रकटिनमतयो धीरवीरा रमेशः ॥ ५६ ॥ अर्थ-सामूके उपदेशको ठीक २ गनन इ.ग्नेवाली सती निर्मट चारित्रवाली होती है । उसे ई पतिव्रता नियां प्रशंसा करती है । . . ।
दानशासनम् ----- - भाचार्य के उपदेशके अभ्यास करनेवाले शिष्यका भी आचार पवित्र होजाता है। उसकी भी मुनिगण प्रशंसा करते हैं। पिताके उपदेश का अभ्यास करनेवाला पुत्र युद्धिमान् होकर धीर वीर व . लक्ष्मीसंपन्न होता है एवं अपने स्वामीफे उपदेशको अभ्यास करनेवाला सेवक मी बुद्धिमान् होकर धीर, वीर व लक्ष्मीसंपन्न होता है ॥ ५६ ॥ मुस्ताकंदानंतमूलानि वर्षा- काळे भूमि व्याप्नुवंतीव वहीं । ग्रीष्मे लीनांनीव केपां शोऽस्मिन् , काळे काले संळयत्युद्भवंति ॥ ५७ ॥ अर्थ-मुस्ताकंद जो अनंतकाय है, वर्षाकालमें पैदा होते हैं और प्राप्मकालमें नष्ट होते हैं, इसी प्रकार कोई सम्यग्दृष्टियों के परिणाम पुराणश्रवण, मुनिदर्शन, देवदर्शन आदि समयमें तो श्रद्धायुक्क रहते है। और अन्य क्रोधादिक उत्पत्तिके समयमें वैसे परिणाम विलय हो जाते हैं ॥ ५७ ॥ शिग्रीकंद इवाक्षयोऽवनिगतो वर्षांबुनोत्पद्यते । निष्टिन च हानिरंघ्रिव पुपोरीपद्धहिर्वा भवेत् ॥ बागस्य इतिर्न मूलविलयो मूलक्षयं मा कृथाः । सदृष्टेनिननायसैन्यहृदयक्षोभं सदा मा कुरु ॥ ५८ ।। अर्थ--परंतु गुकंद वर्षाकालमें भी उत्पन होता है और व नही रहनेपर उसे कोई हानि भी नहीं होती। अन्य समयमें भी वह नष्ट नहीं होता। कदाचित् गाय वगैरह उसे खा डाले तो भी जमीनसे बाहर निकला है उतने भागको ही खा सकती है, अंदर से मूलोच्छेदन नहीं हो सकता है.। अंदर अंकुर बना ही रहता है। इसी प्रकार बाह्य शरीरफी कुछ बाधा होनेपर भी अंतरंग सम्यग्दर्शन को मुटसे उच्छेदन नहीं होने देना चाहिए एवं . जिनेंद्रभगवंतकी
पानमैदाधिकार
१५१
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२६ता
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सेनाप रहनेवाले चतुःसंबके हृदयको कमी क्षुध नहीं करना
चाहिए ॥ ५८ ॥
यारज्जीवावधिस्वावद कृतकर्मविशेषतः ।
येथा पूगस्सुफलदस्तथा कश्चित्मुक्पुमान् ॥ ५९ ॥
अर्थ-कोई २ सुपारीके बेडके समान जबतक जीवन धारण
करेगा तबतक अपने पूर्वपुण्यफे उदयसे सम्यग्दृष्टि की बना,
है॥ ५९॥
बहुक्रिया भूरिफलोऽल्पक्रियोऽल्पफलमदः ।
निष्क्रिये सति निश्शेपसत्यक्षाः क्षयन्त्यरं ॥ ६ ॥
अर्थ-खेतमें किसान यदि बहुतसी कृषिक्रिया करता है तो
बहुत फल उसे मिलते हैं। यदि अपलिया करता है तो अल्पं फल
ही मिलते हैं । बिटकुल क्रियारहित होनेपर सर्व सस्यवृक्ष नष्ट होते
है। इसी तरह मनुष्य भी वहु क्रियावाला हो तो उसे बहुफट मिलते
है । अल्प क्रियावान् हो तो अल्पफल व निक्रिय हो तो न
कुछ फल मिलता हैं ।। ६०॥
धुवावभूतसदीजः कालोचितकृतक्रियः ।
शोधितांकरदोपोऽयं वीक्षमाणाक्षिवल्लभः ॥ ६१ ॥
रक्षकाणां ददातीव धृतसत्फलगुच्छकः ।
यथा द्रुमो दाक्षिणात्यो भाति कविरसुदृक् तया ॥ ६२॥
अर्थ---जिस प्रकार सूब पानी के स्थान में बोया हुआ, कालोचित
संस्कारों से युक्त, अंकुरदोषोंसे रहित नारियलका वृक्ष फलगुच्छोसे
युक्त होकर रक्षकोंके आंखोंको आनंद उत्पन्न करता है
उसी प्रकार कोई २ निदोष सम्यग्दृष्टि देखनेवाको पानंद उत्पन्न
करते हैं ।। ६१ ॥ ६२ ॥
दानशासनम्, 1 - प्राग्रेभैकांकुरा पश्चात् तत्र स्युर्च हबोंऽकुराः । तयका सचिराधा सा जानीयाद्बहुधापरा ॥ ६३ ।। अर्थ-जिसप्रकार केलेका अंकुर पहिले एक रहनेपर भी उससे बादमें अनेक वृक्ष होते हैं, उसी प्रकार पहिले गुरूपदेश आदि निमि- त्तसे श्रद्धान होता है तदनंतर चारित्रादिक होते हैं ॥ ६३ ॥ रंभाकंदो जलाभावात् स्वयमेव विनश्यति । यथा तथैव फेषां दृक् क्रोधादेव स्वयं क्षयेत् ॥ ६४.॥. अर्थ-जिस प्रकार गर्मीमें जलके . अभाव होनेसे केलेका कंद अपने आप नष्ट होता है, इसी प्रकार क्रोधादिक फवायरूपी उष्णतासे किसी २ का सम्यग्दर्शन अपने आप नष्ट होता है ॥६॥ मूलरंभादलच्छेदादग्रोद्भवफलक्षयः व्यवहारगंगस्य नाशे .फलहतिस्तथा ॥ ६५ ॥ अर्थ-लेके वृक्षफे मूल पत्तेको काटनेसे आगे उत्पन्न होनेवाले फलका, नाश होता है, उसी प्रकार व्यवहारसम्यग्दर्शन के नाश होनसे पारमार्थिक सम्यग्दर्शनरूपी एल नहीं मिल सकता है ॥६५॥ पुनरुत्पन्नतत्पत्रच्छेदात्फलहतिर्न वा । परमार्थगंगस्य हानिन फलहानये ॥ ६६ ॥ अर्थ-उसके पुनः उत्पन्न पत्तोंको काटनेसे जिस प्रकार फल के लिए कोई हानि नहीं है, उसी प्रकार परमार्थ सम्यादर्शनको - न कोई हानि होती है और न उसके फूलकी हानि होती है ॥६६॥ अधोमुखान्येव फलानि जाती तस्याः पुनश्चोर्ध्वमुखानि च स्युः । यथा सुदृक्पूनमयानुपायो- (१) 'प्यशेषकर्माणि निहति पश्चात् ।। ६७ ॥. . .
पायभेदाधिकारः अर्थ-ये केले के फल उत्पन्न होने के समयमें अधोमुम्री दोरी है य बादमें अर्यमुखी होते है उसी प्रकार कोई २ सम्यग्दृष्टियोको पुण्य कमानेका कोई साधन नहीं रहनेपर भी बादमें यह अष्टकौंको नाश करते हैं ॥ ६७ ॥ स्वयं फलानि पकानि तस्याः परिणती यथा । तथा च गौतमस्वामी भवेत्कश्चित्मुक्पुमान् ॥ ६८॥ अर्थ-समय आनेपर केलेके फल जिस प्रकार अपने आप पकते है उसी प्रकार कोई २ समय आनेपर गौतमस्वामी के समान सम्यग्दृष्टि बनते है॥ ६८". रंभाफलगुलुछऽस्मिन्नल्पान्यूमुखानि च । बहून्यधः पतनीव केचिज्जीचा व्रजेत्युभे ॥ ६९ ॥ अर्थ-~-फेले के गुच्छमें जिस प्रकार कुछ केले तो ऊर्ध्वमुख और बहुत से अधोमुखबाले होते हैं, इसी प्रकार बहुत संख्या सुदृष्टि सम्मादर्शनसे च्युत होते हैं ॥ ६९ ॥ पाटल्यैत्रिषु यत्र यत्र बहवो भंगा भवत्यकुरा । जायते यदि तत्र तत्र यहलास्ते स्युर्महापादपाः ॥ फेा दक्च यया तथैव बहुधा विघ्नान्विता चेत्तदा । सा दृक् नित्यमुखं ददात्यलमसंख्यातात्मिका स्याटवं १७० ॥ अर्थ--जिस प्रकार पाटलीवृक्षमें किसी कारणसे भंग हो जाय, जहां २ भंग है वहां अंकुरोत्पादन होकर बहुतसे वृक्ष उत्पन्न होते हैं। उसी प्रकार किसी २ सम्यग्दृष्टिको यदि उनके भावोंको विगाहने वाले अनेक विघ्न उपस्थित हो जाय तो वह सम्यग्दर्शन उसके मावों भेदसे असंख्यात प्रकारसे विभक्त होता है ॥ ७० ॥ सर्वागम्यशिलोच्चयोत्थतरवः संवृदिभाजो यथा ॥ निर्भा चहनिझरादचरणाः शुद्धाशया निर्मदाः ।। २० १५४ दानशासनम् निशंकादिगुणान्वितासकरुणा निर्धनिर्मत्सराः । निर्दोषोत्तमदृष्टिनिर्मळजना मोक्षं श्रयंति ध्रुवं ॥ ७१ ।। अर्थ-पर्वतपर उत्पन वृक्ष मनुष्याद्यगम्यरूप से बढ़ता है, उसी प्रकार भंगरहित, अनेक झरनोंसे गीले हुए हैं मूल जिनके ऐसे वृक्षोंके समान सञ्चारित्रशले, निस्शंकादि गुणों से युक्त, करुणासहित, घर्षणा व मसर भावनाओंसे रहित, निदोषसम्यग्दृष्टि नियमसे मोक्षको प्राप्त होते है || ७१ ॥ दुर्गनेषु कुजेवग्नी जातेऽन्योन्यमयषणात् ॥ दग्धास्त इव दृग्यक्ष क्रोधवहिर्दहेद्ध्वम् ॥ ७२ ॥ अर्थ-पहाडके वृक्षोंके समूहमें उत्पन्न भृक्ष, वृक्षोंके परस्पर वर्षणसे उत्पन्न अग्निसे जिस प्रकार जल जाता है इसी प्रकार क्रोधाग्नि से सुदृष्टिका सम्यग्दर्शन नियमसे जसता है ॥ ७२ ॥ कोधोऽग्निः सुकृतं समिट्टगानं सपिर्दया दुप्पमः । शाला कुण्डवपुः कपायनिचयास्सामाजिका दुर्वचः ॥ मंत्री होत जना विभावनिकरातयक्षकर्मधरा- । मिथ्यात्वं नृपतिः फळं बहुविधं तत्स्याभिगोदामये ॥७३॥ अर्थ- यह संसार एक महायज्ञ के समान है। क्रोध अग्नि है। पुण्य समिधा है । सम्यग्दर्शन अलाहुति है। दया आज्याहुति है यह पंचमकाल यज्ञशाला है । यह शरीर यज्ञकुण्ड है। कषायवर्ग यज्ञकर्ममें भाग लेनेवाले सामाजिक है । दुष्टवचन मंत्र है। विभाव परिणाम आहुति देनेवाले हैं या याज्ञिक पुरोहित है धर्मराज मिथ्यात्व उस यज्ञ के कर्ता राजा है। उस यज्ञका फल बहुत प्रफारसे मिलता है। निगोदको प्राप्त होने के लिये भी वह साधन है ॥७३॥ क्रोधस्वाभवनो भवक्षणशमः फोपस्तयोः कोपतः।। सद्धर्मा मधुपिंगलेन निहतस्तरिक्षयकोष से ॥ ।
पात्रभेदाधिकारः नंत्यद्यापि पुरोऽपि तत्फलमहा जैनविदं वर्तने ॥ क्रोधी हंति दृशं चितं सचरितं कोपो न तात्रयं ।।७४॥ अर्थ-भवांतरसे या दीर्घकालसे आये हुए कोपको क्रोध कहते हैं । और उत्पन्न हुए क्षणमें ही नाश होनेवालेको कोप कहते हैं । इनमें से क्रोधके कारणसे मधुपिंगल नामक मुनीश्वरने सद्धर्मका नाश किया एवं उसके अनुयायियों ने भी धर्मध्वंस किया । आज भी मधु- पिंगलके अनुयायी धर्मनाशके लिए उतारू रहते हैं । यह सब क्रोध का फल है। जिन जैनियोमें यह क्रोध रहता है उनका दर्शन, ज्ञान, चारित्ररूपी रत्नत्रय नष्ट होता है और कोप ररनत्रय का नाशक नहीं . सर्वक्लेशकरो योद्भवति ये जैनास्त इच्छाकृति । भीत्वा वाह स एतदुत्तमशमं कुर्वत्पलं ते पुरा क्रुद्ध तस्य सहायिनोऽत्र सकलाः रा भवंति ध्रुवं । मैयाग्निमवेक्ष्य कक्षमखिलाः प्लोप्यंति शैले यथा । अर्थ-पूर्वकालमें यदि किसीको वह दुःखकर क्रोध उत्पन्न होता था तो बाकीके जैनी पापके गयसे उसी समय उस शोधा हृदयों संतोष दो और यह क्षमा धारण करें इस प्रकार के उपाय करते थे। किसीवो भी एक दूसरेका अहित होने में आनंद नहीं होता था । परंतु आज फलके जैनी यदि किसीको क्रोध आवे तो उसे और भी क्रूर बननके लिये सहायक बनते है । जिस प्रकार कि नीम कालमें यदि पर्वत में कोई अग्नि लगे तो सब हिंसा- तुर होकर उसमे जंगलके जंगलको जलाते है ॥ ७५ ॥ क्रोधोऽश्वत्यवदग्निकुत्पवनवत् पित्तापहृत्पुण्यहृत् ।। नित्यं धूमदग्निवदुरितकृन्मिथ्याग्रहाकृष्टिकृत् ।।
दानशासनम् मंत्रीवाशुचिरब्धिवाडव इव श्रीहग्गिरैर्ववत् । वृत्तध्यानदवाग्निकल्लसति दुष्कर्माटवीमेघवत् १७६॥ अर्थ-जिस प्रकार अश्वत्थकी लकडोंमें भाग जल्दी लग जाती है इसी प्रकार क्रोध भी जल्दी कुपित होजाता है। वायु जिस प्रकार पित्तको नष्ट करता है उसी प्रकार क्रोध पुण्यको नष्ट करता है। नित्य धूवा उत्पन्न करनेवाले अग्निके समान सदा पापको उत्पन्न करता है । मिथ्यात्व भूतके द्वारा आकृष्ट मंत्रीके समान मिथ्यात्यको उत्पन्न करता है, समुद्र के बीचमे रहनेवाला बडवाग्निके समान है, दर्शनरूपी पर्वतको तोडनेके लिए वनके समान है। चारित्र व ध्यानको जलाने के लिए दवासिके समान हे । दुष्कर्मरूपी जंगलकी वृद्धि के लिए बरसात के समान है ।। ७६ ।। चित्रं क्रोधहुत्ताशनी तनुश्यं निश्शेषलोकांशया-। नाविश्याविचली जवादय भवनकोऽप्यनेकात्मकः ॥ पीत्वा धर्मघृतं निनार्जितमिदं पुष्णाति दक्षः सतां । 'चेतःक्लेशकरस्ततोऽभवदयं लोकोऽप्यपुंण्यक्रियः ॥७७॥ अर्थ-यह आश्चर्यकी बात है कि यह क्रोधरूपी अग्निकण संपूर्ण लोकमें प्राणियोंके मनमें प्रविष्ट होकर यह एक होनेपर भी अनेक विकाररूप होजाता है। तथा धर्मात्माओंके द्वारा कमाये हुए पुण्य घृतको पीकर और ज्यादा प्रचलित होता है और उन सम्जनोंके चित्तमें संकश बढ़ाता है। ऐसा जब संलेश बढता है तो लोकमें भी अन्याय, पाप आदि पापक्रियाये बढती हैं॥७७॥ ऋव्याधं क्षुधितं यदातिकुपितं संस्थाप्य कुर्वति ये । झानतासितपाजपाननुदिनं तस्यैव संपुष्टये । क्षात्यं गश्च तपाक्षुधाभवदहो ज्ञानं स्तवोऽप्यामिषम् : तेपां कोषसमन्वितांचिततपावलेशाय पापाय च ॥७८॥ .. .
पात्रभेदाधिकारः . । । अर्थ- क्रोधरूपी व्याघ्र जब क्षुधित व अत्यंत कुपित होजाता है तब उस व्याघ्र के काममें मुनियोंका कमाया हुआ ज्ञान, क्षमा, तप, जप आदि आजाते हैं। क्रोधी मुनि इन बातोंकी कगाई उस व्याघ्रको पुष्टिके लिये ही करते हैं । क्षमा पानी है । तप उसके लिये भूख है । ज्ञान व स्तुति यह मांस है। विशेष क्या! श्रोधी मुनियोंका तप क्लेश व पापकेलिये होता है ॥ ७८ ॥ क्रोधोङ्गेष्वपि कंपनं हृदि दृशो राग मनोविभ्रमं । सत्पुण्यामलसर्वनीतिपदधीनिष्णातयुद्धिक्षयं ॥ तृष्णापृद्धिमधर्यतामपधने पिचचरायुष्णतां । निंदामिंद्रियतापमेप न च भी कांतो विपत्तिं सदा ॥७९॥ अर्थ-क्रोध शरीरमें व हृदयमें कंप उत्पन्न करता है, आंखोंको लाल करता है, मनमें विभ्रग होता है । शुभ पुण्यको कमानमें व सर्वनीति मार्ग व अधिकारमें कुशल व्गक्तिकी बुद्धि को भी क्षीण करता है। लोमकी वृद्धि करता है । अधैर्यको बढाता है। जिस प्रकार कि गर्मियोंके दिनमें पित्तम्वर अत्यंत दाह उत्पन्न करता है । लोकमें क्रोधीकी निंदा ती है। इंद्रियों के विषयमें संताप रहता है । अनेक प्रकार की विपत्ति को उत्पन्न करता है। इसलिए बुद्धिमानोंको यह क्रोध सदा वर्दी दृवैकालयसंभव हुतवहं मूढा हरंति क्षणात् । प्रज्ञा दुष्कृतभीरवाऽपि सहसा ग्रामं दहंति स्फुट ।। दोष कालभवं सुदुर्द्धरमिम क्षेतु समर्थाश्च के। सर्वे कालजदोपजालपतिताः कर्वेति किं मंगलं ॥८॥ अर्थ-कोई अज्ञानी किसी घरमें अग्निको देखकर उसे अपहरण करते हैं, तो बुद्धिमान् पापभोर होनेपर भी क्रोधसे बदला लेने के लिए उस प्रामको ही जला डालते हैं । यह अत्यंत कठिन कालदोष है।
दानशासनम् य इसमें असली क्षमा करनेवालोंका मिलना बहुत कठिन है। सबके सब जो कालदोषके जालमें फंसे हुए हैं उनका मंगल कैसे हो सकता है या वे क्या शुम कर सकते हैं ? ॥ ८० ॥ क्रोधः स्वर्गगति इति कुरुते नारकी गति । सुहग्यधुविभूत्यायुरभिमानादिकं क्षयेत् ।। ८१ ॥ अर्थ-क्रोधकपाय मनुष्य को स्वर्ग नहीं जाने देता है, नरक गतिका बंध सरलतया करता है। यह सम्यग्दर्शन, बंधु, ऐश्वर्य, आयु, अभिमान आदिका सर्व नाश करता है ।। ८१ ।। स्त्रीविडंबनमाह भूकातमियधीरवीरनृपते धर्मार्जितश्रीपते । सम्यग्धर्मगुणच्युतः क्षपयसि प्राणान्न चित्रं शरः ॥ स्त्रीपुण्याप्य हमेव भीरबला धीरा दयालुश्च मे सम्परधर्मगुणान्वितोक्षिफणयस्त्वामेव चाकर्पति ॥८॥ अर्थ-~-उत्तम धनुष्यकी डोरीसे छूटा हुआ वाण प्राणोंको नष्ट करता है इसमें कुछ भी आश्चर्य नहीं है, वैसे उत्तम क्षमादिधर्म और निःशंकादि गुणोंसे रहित ऐसा स्त्रीका रागद्वेष उत्पन्न करनेवाला कटाक्ष प्राणोंको हरता है । हे पृथ्वीपति, प्रिय धीर धीर । राजन् ! तुम अपने मन में निश्चित समझो। धेश्या और व्यभिचारिणी स्त्रियों के कटाक्ष पुरुषको धर्म और गुणोसें भ्रष्ट करके प्राणरहित करते है। परंतु जो खी धीर दयाल, अधर्म भीरू और पवित्र विचारवाली है उसके नेत्र- कटाक्ष उत्तम धर्म और गुणोंसे युक्त होनेसे धर्माचरणसे संपत्तिको प्राप्त करनेवाले हे राजन् ! तुमको वे आकर्षण करते है । अर्थात् है राजन् ! पवित्र साध्वी आर्यिका वगैरह प्रतिक स्त्रियां प्रसन नेत्रोसे आपको देखती हैं। उनके नेत्रोमें कामविकार तिलमान भी रहता नहीं -- पात्रभेदाधिकारः 7. है। और ऐसे पवित्र नेत्रोंसे देखनेपर हे राजन् ! तुम्हारा हित ही होता , . । 'पत्रिंशद्गुणवत्प्रफुल्लचदानां मोजक्षणाद्योपिता । .. पंके जोपमसप्तविंशतिगुणोरोजद्वयप्रेक्षणात् ।। कामानापमयोगिचित्तलयकृत्तीरंथसंदर्शनात् । पूनोपार्जितपुण्यसंततिरही निर्मूल मुन्मलितः ॥ ८३ ॥ अर्थ-छत्तीस गुणोंसे युक्त ऐसे प्रसन्न मुखकालवाली स्त्रीको चायते देखनेसे, सत्ताईस गुणोंसे युक्त कमलसदृश दो स्तनों को देखने से स्त्रियोंकी कामासादृश भौहे योगिजन के चित्तको विकृत कर देता है, तब आश्चर्य है कि पूर्वोपार्जित पुण्यकर्मफा सम्स एकदम निर्मुल नष्ट होता है ।। ८३ ।। स्त्रीरुपालोकशिख्यन्तरनिहिततनुं यत्तयाविष्टचित्तं । लावण्यांभोनिमग्ने वचन सुजगदष्टं सम्मोहपाशेः ॥ बांग दुर्विकारस्मरणरचितसूच्यायविद्धाखिलोग । लोकं कामाग्निदग्धं रिपरिव भुबने पाडयत्ययह स्त्री। अर्थ-जो खीरूपरूपी अग्निके मध्यमें अपने शरीर को रख चुका है और मत्ता स्त्रीके विषयमें अपने चित्तमें सदा विचार करता रहता है, सुंदरनारूपी समुद्र के बीच इबा है, लियोके वचनरूपी ससे काटा गया है, मोहसपी पाशसे बांका गया है, और अनेक प्रकार के दुर्तिकारी माणसे जिसे सारे शरीरमे सूईके समूहसे गुमने के समान वेदना होती है, यह कामरूपी अग्नि दग्ध है । यह खी मनुष्य को शत्रुओंफे समान दुःख देती है ।। ८१ ॥ वेड त्यहिन यथाशु गरुडध्यानं विधायात्मन-1 चिता हरतीय पक्षनरुणीध्यान सुपुण्यं हरेत् ।। .
'दानशासनम् . चंद्रालोकनतोऽधिवच्च कलनालोकात्समुज्जृभते ।' , पापाब्धिः सुकृतं यथा गजेमतो नश्येत्स सिंहक्षणात् ॥८५. अर्थ-जिस प्रकार गरुढ-मंत्रका ध्यान सर्पके विषको नष्ट करता है, आत्मध्यान पापको नष्ट करता है उसी प्रकार तरणीध्यान पुण्य फा नाश करता है। चन्द्रमाको देखने से जिस प्रकार समुद्र उमड भाता है, उसी प्रकार.स्त्रियोंको देखने से पापसमुद्र उमड आता है । जिस प्रकार सिंहको देखकर हाथीका बच्चा शक्तिविहीन होजाता है उसी प्रकार त्रियोंको देखनेसे सुकृत नष्ट होता है ॥ ८५ ॥ स्वर्गोऽधःपातुकः स्वःस्थितमुखिचिवुधान्नारको दुःखिजीवा-1 य. लोकं स मयो भ्रमयति नरकं स्वर्गलोकं दिवाभाः॥ .. कांताः स्वाधःप्रदेशस्थितिकृतिचतुराः स्वाश्रितानां जनानां । स्याल्लोकाधःस्थितित्वं दधति बुधवरं दुर्गतियोपिताभ्यः ॥८६॥ अर्थ-त्रियोंका संसर्ग मनुष्यको स्वर्गसे भी , नीचे गिरानेवाला है । और उनके संसर्गसे दूर रहनेवाले नारकी भी कालांतरमें ऊपर आते है । पुरुषोंसे नीचे रहनेवाली स्त्रियां हरतरहसे पुरुषोंकी दशा नांच करने के लिये समर्थ हैं। जो स्त्रियोंके पाशमें पड गये हैं ये अवश्य लोको नीचे अपनी जगह कायम करते हैं। उनको अनेक नरकादि दुर्गति होती है ॥ ८६ ॥ कारांग मुहगंधकृत्रिवलयः शूनी च वेणी कशा । चापो भ्रः कणयाः कटाक्षवलनाःक्ष्वेडो मृक्तिः कुचौ- पुण्यापातन कंदुका पदहति पीविपासाहतिः॥ हासेनारि मतान्यपंति वनिता नीतिस्त्वमोघा भवेत् ॥८॥ अर्थ-स्त्रियोका शरीर बंदीखाने के समान है। उनके सुंदर नेत्र मनुष्यको अंधा, बनानेवाले हैं। तीन दलय हिंसाफे.स्थान है। वेणी .
पात्रभेदाधिकारः + चाबुक है । भू बाण है । कटाक्ष भालेके समान है । मृदुवचन विष है । दोनों स्तन पुण्यको गिरानेवाले गेंद हैं । उनको सुंदर चाल पित विषका अस्त्र है। वे मंदहास्य से सबको वशमें कर लेती हैं। स्त्रियोंकी नीति अमोघ है । उसे कौन पहिचान सकता है ! ॥ ८७ दुर्गत्पाविष्टजीवाः स्वकृतसकलदुःफर्मरूपं मपंचं । जानंतो शेषकर्मप्रभवफळभुजः सेर्वनिर्वगभाज: ]] तत्कर्म क्षीयतेऽजो युवतिजनवशाद्वर्धते फर्म सर्व । स्त्रीसंपर्कादरं दुर्गतिरपि यमिना योषितो दूरयाः॥८॥ अर्थ-जो जीव भनेक प्रकारकी दुर्गतियोंमें भ्रमण करते हुए अपने किए हुए कौके सर्व विषयको जानते हुए व उसके फलको अनुभव करते हुए पैराग्यको प्राप्त होजाते हैं, दिगंबर दीक्षा आदि लेते हैं, फिर भी यदि वे स्त्रियोंके प्रदेमे पड जाते हैं तो उनका वह शुभकर्म नष्ट होकर पापको वृद्धि होती है। स्त्रियोंके संसर्गसे नरक भी कई गुने अच्छा है । इसलिए आत्मकल्याणेच्छु संपमियोंको चाहिये कि वे स्त्रियोंको कोसों दूर छोडे, तभी उनका हित हो सकता . मध्यमपात्र. साणुव्रताः शुद्धदृशोऽकपायिणः । स्वस्त्रीमहटाः सदया: शुभाशयाः ॥ साधुभियाः जैनजनोपकारिण- । स्ते साधुभिर्मध्यमपात्रमीरितं ॥ ८९ ॥ अर्थ-जो अणुबतोसे युक्त हैं, शुद्धसम्पादृष्टि हैं, मंद कपायी है, स्वखीसंतुष्ट हैं, दयासहित है, शुम भायोंफर' युङ हैं, गुरुजनोंमें संतुष्टो यः स्वदारेषु पंचाणुप्रतपालकः। सम्यग्दृटिमुरी भत्तः स पात्र मध्यमं भयेत् ।। , * २१ १६२ पानशासनम् k - प्रेम रखनेवाले हैं, जैनियोंको उपकार करनेवाले हैं उनको साधुगण मध्यम पात्र कहते है ।। ८९ ॥ जिनमुनिपदाज गा मुनिवचन सुधांबुपानसंताः। जैनानुकूलवृत्तास्ते पात्रं मध्यमं ब्रुवत्याः ॥ ९० ॥ अर्थ, जिनमुनियोंके चरणरूपी कमलके लिये जो भ्रमरके समान है, मुनियोंके वचनरूपी अमृतको पीकर जो संतुष्ट होते है, जिनेंद्रके,उपदेशके अविरुद्ध आचरण रखनेवाले है, उनको सज्जन लोग मध्यम पात्र कहते है ।। ९० ॥ दोपप्रकोपशमना इव भिषजं जैनदोपविधानाः । जैनगुणोज्वळकरणास्ते पात्रं मध्यमं वत्याः ॥९॥ अर्थ---जिस प्रकार औषधि वातपित्तादिक दोपोंको शामन कर शरीरमें गुणोंकी वृद्धि करती है, उसी प्रकार जो जिनधर्म भक्तोंके दोषों को ढकनवाले हैं और उनके गुणका उद्योत करनेवाले हैं उनको • सन्जन लोग मध्यम पात्र कहते हैं ॥ ९१ ॥ दृष्ट्वा दीपिणमातरं भुवि भिषग्दोषः कृतोऽयं त्वया । मा भैपी तमामयस्त्यजति ते उक्त्वारुपनद्विपन् । दत्वैवौषधपर्थमिष्टमखिलोपायैर्दयालुर्गदम् । दापं मोचयतीह वर्तितजनाः पात्रं तया मध्यमं ॥९२ ॥ अर्थ-जिस प्रकार कोई दय लु वैद्य अपने पास आये हुए दोषी रोगीको देखकर यह कहकर क्रोधित नहीं होता है कि तुमने अमुक 'दोष किया और न उसके ऊपर द्वेष करता है, प्रायुत यह कहकर उसे भाधासन देता है कि तुम घबराओ मत, यह रोग शीघ्र दूर हो जायगा । तदनंतर योग्य भाषध व उचित उपायोंद्वारा स रोगको चिकित्सा करता है। इसी प्रकार कोई दोषी रजनके पास आये तो पात्रभेदाधिकारः Imnna उसके प्रति क्रोधित होकर तुमने अमुक दोप किया है, ऐसा कहकर फटकारना नहीं चाहिये और न उसके प्रति द्वप करना चाहिये । प्रत्युत उसके लिए उचित द्रव्यादिक देकर और संतोपसे उसके अंतरंग और बहिरंग दोषको दूर करने के लिए प्रयत्न करना चाहिये। ऐसे लोगों को मध्यमपात्र कहा है ॥ १२ ॥ सद्धर्मोद्धरणक्रियाशिचतुरा योगांद्रविजना। भूषा धार्मिकसद्विवेकिसुजना यत्रागतास्तद्वचः ।। श्रुत्वागत्य विनम्य साधुविनयं कृत्वा क्षणे चिन्वते । बुदिश्रीमुकतानि ये बुधजना भव्यास्त एवोत्तमाः ॥१३॥ अर्थ-- सर्व कल्याणकारक जिनधर्मके उद्धार करने में जो चतुर हैं ऐसे योगीद, विद्वान्, राजा, धार्मिक, भेदविज्ञानी संजन आदि जहां आवे उस समय उनके वचनको सुनते ही अपने स्थानसे उठकर उन के पास जाकर जो उन्हे नमस्कार करते हैं और विनय सेवा आदि कर बुद्धि, संपत्ति, पुण्य आदि कमाते हैं ये ही उत्तम विद्वान् हैं और ये ही भव्य है ॥१३॥ एते यत्र संति तच्च विमलं तीर्य स पुण्यापगा-1' पूरोत्पत्तिकुळाचलौघीतमिरध्वंस्यपूर्वाचलः । पूतं पुण्यकरं भयापहरणं व्याध्यादिनिर्णाशनं । सर्वे जैनजनाश्च तत्तदखिलास्तान्भावयेयुस्सदा ॥ १४ ॥ अर्थ-~-उपर्युक्त प्रकारके मुनींद्र जदापर वास करते हैं यह निर्मठ तीर्थ है। यह पुण्यरूपी नदीक उत्पन्न होने के लिये कुलाचल पर्वत है, पापरूपी अंधकार नाश करनेवाले सूर्यको उत्पत्तिकालय उदयाचल के समान हैं, पवित्र है, पुण्यकर है, सर्वभयको दूर करनेवाला है। आधिव्याधि को नाश करने वाले हैं । इसलिये सर्व धर्मभक्त वैसे मुनींद्रोंकी उपासना व भावना करते हैं ॥ ९४ .
१६४ दानशासनम् RAA जघन्य पात्रा. " . . पंचाणुव्रतरहितं सप्तव्यसनमत्तिकरणं चटुके। मुनयो वदंति पात्रं ललितोगमिव द्युगामिनं सुदृशं ॥९५ अर्थ--जो पंचायुवतसे रहित है, सतव्यसनमें प्रवृत्ति करने में चतुर है, परंतु सम्यग्दृष्टि है ऐसे ललितांगके समान स्वर्ग जानेवाले मनु- प्योंको मुनियर जघन्यपात्र कहते हैं ॥ ९५॥ धर्मकदीमावजनी बादी नैमित्तिकी तपस्वी च । पंचैते मुनिवृपभा जिनशासनदीपकाः प्रशस्ताच ॥९६॥ अर्थ-जिनधर्मी मुनीको धर्मक अथवा समयिक कहते हैं। निरतिचार महानतोको पालन करनेवाले आचार्य मुनिको दीग्रानजनी कहते हैं। वादित्यगुणसे धर्मको प्रभावना करनेवाले मुनिको वार्दा कहते है । ज्योतिःशास्त्र, मंत्रशास्त्र व निमित्तशास्त्रको जाननेवाले मुनियोंको नैमित्तिक कहते है। मूलोतर गुणोंको धारण करनेवाले वृद्ध मुनीश्वरको तपस्वी कहते हैं । ये पांच प्रकारके श्रेष्ठ मुनीश्वर जिन- शासनकी प्रभावना करनेवाले और प्रशंसनीय मुनि माने जाते हैं।।९६॥ भार्या मातरमंतरेण तरुणांगेई व्रती नोविशे-। दाविष्टे सति योषिता जगति भो निंदा भवेदन्यया ॥ साकं हासविवादनर्मधनदानादानभाषादिका- ।. न्दृष्ट्वा निंदति सनतं स विवुधोऽन्यत्रीगृई की विशेत् ।। अर्थ-जो शीलवान् पुरुष है वह अपनी पत्नी या माता जिप्त घरमें हो उसे छोडकर अन्य किसी घरमें कोई परखी अफेटी हो उस में कभी प्रवेश न करें। ऐसा प्रवेश करनेपर लोकमें उसकी निंदा होता है । और परस्त्रियों के साथ हास्य, विवाद, धनका लेनदेन, बोलना आदि भी नहीं करना चाहिये । इसे भी देखकर लोग उसकी
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पात्रभेदाधिकारः
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निंदा करते हैं । इसलिये बुद्धिमान् पुरुष पर-त्रियोंके घर क्यों प्रवेश
करेगा? ॥ ९७ ॥
ईग्दोषमनारतं न कुरुते निर्दोषटग्यान्स यः ।
पुण्यात्मा नमिताननोऽपि तरुणीवाचोऽप्यण्वक्षमी ॥
विद्वान्स्वर्गसुखादिदं व्रतमिदं निर्दोपमेधावति ।
पात्रं मध्यपपित्युशंति मुनयस्तं कर्मविध्वंसिनः ॥ ९८ !
अर्थ-जो शुद्ध सम्यग्दृष्टि है यह उपर्युक्त प्रकारके परस्त्रीजानित
दोषोंको कभी नहीं करता है । उसे परस्त्रियोंके मुखको देखना भी
पसंद नहीं है और न उनके पचन सुननेमें सहन होता है।
मुचमें बुद्धिमान् है । पुण्यात्मा है । ऐसे लोग स्वर्गादि संपत्तिको देने-
वाले व्रतोंको निर्दोपरूपसे पालन करते हैं । उनको सर्वकर्मको नष्ट
करनेवाले जिन मुनींद्र मध्यम पानके नामसे कहते हैं । अर्थात् गृहस्थों
के सर्वव्रतोंको निरतिचार पालन कराने के लिए शील बहुत प्रबल साधन
सच-
धर्म वर्द्धयति क्षमां रचयति क्रोधं विवादं नृणां ।
शक्त्या वा वचसा नयेन मृदुना यस्तंभयत्यन्वहं।।
धर्मच्छिद्रमुपावृणोति सफलं संघ मुदा रक्षति ।
पात्र मध्यममारुत्तमननास्तं मर्त्यमुद्यदृशम् ॥ १९ ॥
अर्थ-जो जिनधर्मकी प्रभावनाको बढाता है, क्षमा धारण करता
है, क्रोध व विधादको अपनी शक्ति के द्वारा मिरवचनसे और चतुर
नीतिसे रोक देता है। सदा धर्मके दोषको ढकनके लिए उद्यत रहता
है, सर्व जैन संघको संतोपो रक्षा करता है, उस सम्याटिको मध्यम
पात्र ऐसा उत्तम ऋपिगण कहते हैं ।। ९० ॥
जघन्यपात्र
निर्दोपसुदृशं पुंसां सर्वजीवहितैषिणं ॥
पश्यंत मालवज्जैन जघन्यं पात्रमुत्तमाः ॥ १०॥
दानशासमम् .
अर्थ-जो निर्दोष सम्यादृष्टि है, माताके समान सर्व जीवोंका हित
चाहनेवाला है, ऐसे जनको उत्तम ऋषिगण जघन्य पात्र कहते
10
। दृष्ट्वा जिनं गुरुन् जैनान्संतुष्टः स्तौति नौति यः॥
तमद्विषतं भक्त्यैव जघन्यं पात्रमारितं ॥ १०१॥
अर्थ-जो जिनेंद्र, गुरुवोंको तथा जैनबंधुओंको देखकर उनके
प्रति द्वेष न करते हुए संतोषसे भक्ति से उनकी स्तुति करता है व नमन
करता है उसे जघन्य पात्र कहा है ॥ १०१।।
अपात्र वर्णन.
देवगुरुधर्मधार्षिकशास्त्रवतविबुधषकास्तदानः ॥
ये श्रृण्वंति दयंते सततं तमुशंत्यपात्रमिति विवुधाः ॥१०२॥
'अर्थ-जो जिनदेव, जिनमुनि, धार्मिक, शास्त्र, जिनोपदिष्टवत,
विद्वान् आदिका दूषण करते हैं, उनको एवं जो उनके वचनोंको बहुत
संतोष से सुनते हैं व उन दूधकोंको अन्न वस्त्रादिफ देकर पोषण करते
है उनको अपात्र कहते हैं ॥ १०२।।
तपोधनं वक्रमित सुवृत्तं कपायिणं दुर्गतिगामिनं च ॥
वदंत्यपात्रं मुनयोऽयवृद्धिं करोति यस्त मनसैव पार्थ ॥१०॥
अर्थ-जो मुनीश्वर पार्श्वमुनिके समान जानबूझकर अपने, चारित्र-
को मलिन करते हैं, अत्यंत कषायी हैं, नरकादि दुर्गतिको जानेवाले
हैं, पापकी वृद्धि करते हैं उन्हें मुनिगण अपात्र कहते हैं ॥ १०३ ॥
धर्मापकारिणो धर्मद्वपिणो धार्मिकद्विषः ॥
कुतर्फिणापि येऽन्योन्यमपानं ते विदुर्वधाः ।। १०४ ॥
अर्थ-जो मनुष्य धर्मकार्यमें विघ्न डालनेवाले हैं। धर्मद्रोही है,
व धार्मिकमनुष्यों के साथ द्वेष रखते हैं व परस्परमें कुतर्क करते हैं
उनको अपात्र कहते है ॥ १०४ ॥
पात्रभेदाधिकारः १६७ Me पकाणां विशुद्धिर्न श्रोतृणामेव शोधनं ॥ व्याघ्रध्वनिश्रुतिर्भव्यमृगाणामिव भीतिदा ॥ १०५ ॥ - अर्थ-निंदा करनेवालोंकी शुद्धि या सुधारणा किसी तरह भी नहीं होसकती । केवल सुननेवाले अपने कानका शोधन. करसकते है अर्थात् हम निंदायुक्त वचनोंको नहीं सुनेंगे ऐसी प्रतिज्ञा सुननेवाले कर सकते है । जंगल में रहनेवाले साधुजीवोंके लिये व्यापके शद्वको मुननेकेलिये भी भय लगता है इसी प्रकार भव्यरूपी मृगोंको दुष्टजन रूपी व्याघ्रोंका वचन भी भय उत्पन्न करते है ॥ १०५ ।। । कुपात्र वर्णन. धर्मे यस्पानुरागी न न श्रृणोति गुरोर्वचः ।। परं व्रतीव वर्तेत तं कुपात्र विदुर्बुधाः ॥ १६ ॥ अर्थ-जिस मनुष्यको धर्ममें अनुराग नहीं और न गुरुवोंफे वचनको सुनता है परंतु दम्भसे अपनेको सबसे बडा व्रती व धर्मात्मा समझता है उसे मुनिगण कुपात्र कहते है. ॥ १०६ ॥ स्वधर्माचरितं चान्यधर्मवृत्तसमं च यः ॥ मनुते वर्ततेऽसौ हक्कुपात्रं तं विदुर्बुधाः ॥ १७ ॥ अर्थ-जो मनुष्य अपने धर्मका आचरण व परधर्मके आचरणको बराबरोंमें समशता है व तद्रूप आचरण करता है, उस मिध्यादृष्टिको ऋषिगण कुपात्र कहते हैं। उसको वृत्ति ठीक उसी प्रकारफी है जैसे कोई व्यभिचारिणी स्त्री पर-पुरुप व अपने पतिको पतिगावसे देख रही हो ॥ १०७ ॥ स्वकीयपात्राणि सुरक्षयतोऽन्यदीयपात्राण्यपि पालयंतः ॥ त एव सर्वेपि कुपात्रमुक्तम् पीडामुखं तेऽनुभति शश्वत् ।।
दानेशांसनम् अर्थ-जो अपने पात्रों को भी रक्षा करते हैं और मिथ्यापात्रोंका भी पोषण करते हैं उन सबको कुपात्र कहा है । वे सदा अत्यधिक दुःख भोगते हैं ॥ १०८ ॥ पुनः तीन प्रकारके पात्रोंका वर्णन. विचित्रभावैर्न यहेतुदर्शनैस्सुधर्ममार्ग प्रतिपादरति ये । मातेव शिक्षामनुबंधकारिणस्ताकार्यपात्र प्रवदंति साधवः ॥ अर्थ-अनेक प्रकारके परिणामोंसे एवं नयविवक्षाको बतलाते हुए जो धर्ममार्गका प्रतिपादन करते है, जो माताके समान योग्य हितो- पदेश देते है उन्हें साधुगण कार्यपात्र कहते है ॥ १.९॥ कार्यपात्र. प्रगल्भभृत्या वरकार्यकांविदाः प्रयोजिताः स्वाम्यनुकूलवर्तिनः । महत्सु कार्येप्नुयायिनो नरास्ताकार्यपात्र प्रवदंति साधवः ॥ अर्थ-जो सेवक अत्यंत कार्य कुशल है और स्वामी के अनुकूल वृत्ति रखनेवाले हैं एवं बढे २ कार्यमें भी अनुसरण करनेवाले हैं या साथ देनेवाले हैं उनको भी कार्यशत्र कहते हैं। कार्यपात्रों को भी दान देना चाहिये ॥ ११० ॥ . कामपाका. संभोगयोग्या ललना मनोज्ञा यदंगसंगाल्लभते मनस्सदा ॥ मुखं हपीकोद्भवसौख्यभानां ताः कामपानं प्रवंदति साधवः ।। अर्थ-जो अपनी सुंदर स्त्री संभोग करने के लिये योग्य है जिसके अंगस्पर्श करनेसे एक विशिष्ट मानसिक सुख होता है उसे ऋषिगण कामपात्र कहते हैं ॥ १११ ।। पुनः पंचविधमाह जिने जिनगुरौ संघे यस्य साधु मनोऽचलं," - वर्तत नेतरत्रासौ समयीत्युच्यते बुधः ।। ११२ ॥ .
पात्रभेदाधिकारः
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अर्थ--श्रीजिनेंद्र भगवंत, जिनगुरु प जैनसंघमें जिस भव्यफी
भक्ति अचल है, सदा उनकी सेवा करता रहता है, अन्यत्र चित्त
लगाता नहीं उसे महर्षि समयी कहते हैं ॥ ११२ ॥
साधक.
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जिनपिं जिनंगेहे जिनागमे जिनकले च यो विद्वान् ।
:.:. विशम्पयं च कुरुते स साधको मुक्तिसाधरुक्तः ॥११३
अर्थ -जो धर्मात्मा विद्वान् जिनबिंब ' आदि निर्माण करानमें,
जिनचैत्यालय आदिके करानेमें, जैनशास्त्रोंके प्रचारमें, जैनसंघको उप-
कार कराने में, एवं जिनप्रतिष्ठा आदि उत्सय करने में अपना न्यायो-
पार्जित वित्तका उपयोग करता है वह मोक्षको साधन करता है इसलिए
मोक्षसाफ महर्षि उसे सावक कहते हैं ॥ ११३ ॥
जैनानां यो भिपव्याधि निवारयति भेषजैः ॥
दद्याचस्येप्टवस्तूनि ततः स्याद्धर्मवर्द्धनम् ॥ ११४ ॥
अर्थ- जो वैद्य जनसंघके रोगियोंको औषधि देकर रोगनिवृत्ति
करता है उसे उसके इष्ट पदार्थोको देकर सत्कार करना चाहिए । उस
से धर्मकी वृद्धि होती है। धर्मात्माओंका स्वास्थ्य सदा धर्मके स्वास्थ्य
की भी वृद्धि करता है ।। ११४ ॥
1; सुमुहूर्ते मुनक्षत्रे मुलग्नेऽप्युत्सवद्वयं ॥
यःकारयति दैवज्ञस्तस्मै दयान्मनीषितं ॥ ११५ ॥
अर्थ-जो योग्य मुहूर्त, नक्षत्र व लग्नमें धर्म च धर्मात्माओंका उत्सव
निर्षिनुतया कराते हैं ऐसे ज्योतिषियोंका भी योग्य सन्मान करना
चाहिये ।। ११५ ॥
भूतमेतपिशाचादिग्रहपीडानिवारकः ।
तस्पेष्टरस्तुदातः स्यादारोग्यसखसंपरः ॥ ११६ ॥
दानशासनम् - अर्थ-जो भूत, प्रेत, पिशाच आदि प्रहके उपद्रवोंको मंत्रवाद के द्वारा निवारण करते हैं ऐसे मंत्रवादियोंको मी दान देनेवाले गृहस्थका सुख व संपत्ति बढती है ॥ ११६ ॥ ज्ञात्वा भूतभवनाविशुभाशुभफलानि यः॥ सत्यं वदति तस्यार्य दातुः.पुण्यफलं भवेत् ॥ ११७ ।। अर्थ--जो व्यक्ति नैमित्तिक शास्त्रके बलसे भूतमाविष्यद्वर्तमानके प्रशके उदयके शुभाशुभ फलको सत्यरूपसे कहता है उस दैवज्ञको जो द्रव्य दान करता है उसे पुण्यबंध होता है ॥ ११७ ॥ जिनान्यंत्राणि शांत्यर्थ क्रमेणाराधयत्यपि । स एव पुण्यपात्रं स्यात्पूजनीयः सुदृष्टिभिः ॥ ११८ ।। अर्थ-जो व्यक्ति लोकमें रोगादिक शांतिके लिए जिनधर्मसंबंधी यंत्रों को कर उसकी साराधना करता है, उसे भी पात्र समझें । भव्या- स्माओंके द्वारा वह भी आदरणीय है । .११८ ॥ द्वादशांगनिविष्टा ये सदृष्टिबसिकादयः ।। . ले पात्रं तारतम्येन प्रवदंति मुनीश्वराः ॥ ११९ ॥ 'अर्थ--जो सदृष्टि बतिक आदि ग्यारह प्रतिमामें आचरण करने वाले हैं और बारहवें अंगरूप मुनिधर्मको : पालन करनेवाले है उन सब को मुनिगण तारतम्य रूपसे पात्र ही कहते है ॥ ११९ ।। शीलेन रसितो जीवो न केनाप्यभिभूयते । महाहदनिगमस्य किं करोमि दवानलः ॥ १२० ॥ अर्थ-जो अनेक प्रकारफे उत्तम चारित्र शील आदिकसे अपनी रक्षा करते हैं उनको दबानेवाले लोफमें कोई भी नहीं है। जो व्यक्ति बड़े भारी सरोवर में डूबा हुआ है उसे जंगलको भाग क्या कर सकती ...॥१२० ॥ -- पात्रभेदाधिकारः १७१ ।।१२१॥ मतं समस्तै ऋपिभियंदाईतैः मभामुरं पाक्नदानशासनम् । मुदे सतां पुण्यधनं समर्जितुं धनानि दद्यान्मुनये विचार्य तव अर्थ-समस्त आईत ऋषियोंके शासनके अनुसार यह दानशासन प्रतिपादित है । इसलिए पुण्यधनको कमानकी इच्छा रखनेपाले श्राफ उत्तम पात्रोको देखकर उनके संयमोपयोगी धनादिक द्रव्योंको विचार कर दान देवें॥ १२१ ॥ इति पात्रलक्षणविधिः दानशासनम् - दातृलक्षणविधिः प्रणम्यादिजिनं भक्त्या करणत्रयलक्षितम् । पात्रदानफलं सम्पविक्ष्येऽहं दांतलक्षणं ।। १ ।। अर्थ-भगवान आदिनाथ स्वामीको नमस्कार कर मनोवाक्कायके शुद्धरूप लक्षणको धारण करनेवाले दाता के लक्षण व पात्रदान के फलको अच्छीतरह कहेंगे ऐसी आचार्य प्रतिज्ञा करते हैं ॥१॥ दातृलक्षण. सदा मनःखदनिदानमानान्विनोपरोधं गुणसप्तयुक्तः । त्रिकालदारपदैहिकार्थी न तं च दातारमुशंति संतः॥ अर्थ--जो व्यक्ति दानकार्यमें " 'आहां जन्मभर कमाया हुआ धन मेरे हाथसे जाता है ! इसप्रकार मनमें खेद नहीं करता है, जो दानके बदले में कुछ चाहता नहीं, अभिमान व परप्रेरणासे रहित हो कर दान देता है, और दाताके लिये सिद्धांतशास्त्रमें कहे हुए सप्त गुणोंसे युक्त है। जिसे भूत भविष्यद्वर्तमानकाल-संबंधी दातारों के प्रति श्रद्धा है व ऐहिक सुखकी इच्छा नहीं, उसे ऋषिगण उत्तम दाता कहते हैं ॥२॥ विनयवचनयुक्तः शांतिकांतानुरक्ता । नियतकरणचिः संघजातप्रसत्तिः ॥ शमितमदकपायः शांतसतिरायः । स विमलगुणशिष्टो दावलोके विशिष्टः ॥ ३ ॥ अर्थ-जो विनयवचनसे युक्त है, शांतिरूपी सीसे.अनुराग रग्वने वाला है, इंद्रियों को जितने वशमे कर लिया है, जिसे जनसंघमें प्रस. लता है, मद और कपायको जिसने शांत किया है एवं जिसके सर्व .
दातलक्षणविधिः १७३ MAMAvinv .4 अंतराय दूर हो गए हैं और अनेक निर्मल गुणोंको धारण करनेवाला है उसे उत्तमदाता कहते हैं ॥ ३ ॥ वैद्या नृप्रकृतिर्यधानलविधि ज्ञात्वैव रक्षन्ति तान् । .. सर्वेऽवादशधान्यलोभमतयः क्षेत्रं यथा कार्पिकाः ।। । गांधारार्थजना अवंति च यथा रक्षेयु:श्वराः । नित्यं स्वस्थलवर्तिनी धूपचितो धर्म च धर्माश्रितान ॥४॥ अर्थ-जिस प्रकार पेय रोगियोंकी प्रकृति ५ उदरामिको जानकर उनके योग्य औषधि वगैरह देकर उनकी रक्षा करते हैं, संपूर्ण अटा- रह प्रकारके धान्य के लोभसे जिस प्रकार किसान लोग खेतकी रक्षा करते हैं, ग्वाले लोग दूधके लिए मायकी रक्षा करते हैं, राजा लोग अपने राज्यको स्थिति के लिए मनुष्योंकी रक्षा करते हैं, इसी प्रकार धर्मात्मा दांता धर्म व धर्मात्माओंकी सदा रक्षा करते हैं। ये ही उत्तम दाता कहलाते हैं ॥ ४ ॥ सप्तगुण श्रद्धा तुष्ट्रिभक्तिर्विज्ञानमलुब्धता क्षमा शक्तिः। पस्यैते सप्तरणास्तं दातारं मशंसन्ति ॥५॥ अर्थ-जिस दाताके हृदयमें श्रद्धान, भाकि, संतोष, दानविधिका ज्ञान, लोभरादित्य, क्रोधादिक कषायोपशमरूपी क्षमा, व शक्ति इस प्रकार सप्तगुण मौजूद है उसीको उत्तम दाताके रूपसे कहते है। सप्तगुणलक्षण, श्रृंदास्तिक्यमतिस्सतुष्टिरमलानंदस्तु भक्तिप्री- । स्सेवालोलुपता विधी कुशलता विज्ञानमव्यये । थद्धा भक्तिरलोभस्वं दया शक्तिःक्षमापरा। विज्ञानं चेति सप्तैते गुणाः दातुःप्रकीर्तिताः ॥ .
दानशासनम् . + . . निमित्वमलोभताप्युपशमोत्कर्षः क्षमा सर्वदा ।। : द्रव्यत्यागविधौ न नास्तिवचनं शक्तिस्तु सप्तोदिताः ॥६॥ अर्थ-अस्तिक्य बुद्धीको श्रद्धा कहते हैं, गुरुके आगमनसे होनेवाले आनंदको संतोष कहते है, गुरुसेयाकी अभिलायाको भक्ति कहते हैं। दानविधिमें जो प्रवीणता है. उसे. विज्ञान कहते है। दानके लिये द्रव्यके व्यय करने में लोभ न करनेको अलोमत्व कहते हैं । कषायोंके उत्कर्षकै उपशमको क्षमा कहते है, द्रन्यके त्याग करनेमें सदा उत्साह व उमंगको शक्ति कहते है । इस प्रकार, दाताके ये सप्तगुण हैं ॥ ६॥ आस्तिस्यमतिः पानेष्वविकलेषु स्याहानेन फलमुत्तमं । निश्चितास्तित्वसवुद्धिरास्तिक्यमविरीरिता ॥ ७ ॥ अर्थ- --उत्तम पात्रोंको उत्तम दान देनेसे उत्तम फलकी प्राप्ति होती है एवं स्वा नरक, पुण्य पाप, बंध मोक्ष व इह पर लोक सब मौजूद है, इस प्रकारकी आस्तिक्यबुद्धिको अस्तिक्यमति या श्रद्धा कहते + श्रद्धागुण. पापोचयं मम निवारयितुं समर्थ हतुं दरिद्रमिदमाशु समर्थमेव । दातु सुपुण्यमजई रतिरद्वितीया श्रद्धेति तत्र मुनयः खलु ता वदति ॥ ८॥ अर्थ-यह पात्र मेरे पारसमूहको नाश करने के लिए सर्वथा समर्थ है और मेरी दरिद्रताको नष्ट करनेके रिए मी समर्थ है, एवं मुझे + वित्तरागो भयेद्यस्य पात्रं लब्धं मयाधुना । पुण्ययानमेवेति स श्रद्धापानिहोच्यते ॥
दावलक्षणविधिः + । . अनेक प्रकारफे पापोंसे छुडाकर पुण्यप्रदान करनेके लिए भी यही पान समर्थ है, इस प्रकार पात्रके आगमनमें अद्वितीय आनंदको प्राप्त करना इसे मुनिगण श्रद्धा नामक गुण कहते है ॥८॥ तुमिमाह. यथा चंद्रोदये जाते वृद्धिं याति पयोनिधिः ॥ सतां हृदयतोपाधिर्मनिचंद्रोदये तया ॥९॥ अर्थ--जिस प्रकार चंद्रकै उदय होनेपर समुद्र उमड आता है उसी प्रकार मुनिरूपी चंद्रके उदय होनेपर सज्जनोंके चित्तमें संतोष रूपी समुद्र उमड आता है । इसे तुष्टिगुण कहते हैं ॥९॥ १ भक्तिमाह. आभुक्ते निसन्निधौ शुभमतिः स्थित्वा विशोध्यामला- । नाहारान्परिहार्य वीक्ष्य सततं मार्जारकीटादिकान् || भुक्त्यते परिणम्य साधुहदि संतृप्तो भवेद्यः पुमान् । दाता तन्मुनिसवनेपमुदिता भक्तिश्च सा पुण्पदा ॥१०॥ अर्थ--पुण्यवान् पायक जबतक तपोवनमुनियोंका आहार हो तबतक बहुत विनय के साथ उनके पासमे खडे होकर आहारशोधन कर उनके हायमें निर्मल भोजनको देवें । सदा मुनियोंके आहारमें घिन करनेवाले मार्जारकिमिकोटादिष को पासमें नहीं आने देता है निरंतराय भोजन होनेके बाद संतुष्ट होकर तृप्त होता है। ऐसा जो निर्मल चित्तवाला श्रावक इस प्रकार की मुनिसेवा करता है उसे भक्ति कहते है, वही पुप्यप्रदान करनेवाची है। यही भक्त उत्तमदाता है ॥ १०॥ १ जिने जिनागमे सूरी तप:श्रुतपरायणे । सनावशुद्धिसंपनोऽनुरागो भक्तिरुच्यते ॥
दानशासनम्
.
मातः प्रोत्थाय दाता शुचिरपि निंजहस्तात्तपूजाचितार्थी।
गत्वा नुस्वा गुनीन्द्रान्कृतदिननियमो देवपूजां गुरूणां ॥
भुक्ति देहस्थिति तत्तदुचितमुविधांतचिकित्सा विचार्य।
लिम बंधूनिवार्वानुपचरतु जिनेंद्रीकृतीन्साधुसाधून् ॥११॥
अर्थ-~धर्मात्मा दाता प्रातःकाल 'उठकर शौचस्नानादि क्रिया
वोंसे निवृत्त होकर अपने हाथमें पूजाकेलिये योग्य सामप्रियोंको लेकर
मंदिर. जावें । वहां देवपूजा व गुरुपूजा कर, मुनींद्रोकी वंदना कर दिन-
नियमवतको ग्रहण करें एवं. उन मुनियोंकी देहस्थिति आदिको विचार
कर उनकी देहस्थितिके लिये उपयुक्त आहार व चिकित्सा आदिकी
व्यवस्था कर बहुत शीघ्र अपने बंधुवोके समान उन जिनेंद्राकारमें
रहनेवाले उन सज्जन साधु आचार्योका उपचार करें । यह उत्तम
दाताका लक्षण है ॥ ११ ॥
यद्भोगाय निज वपुणिकया दत्तं स्वभर्तुस्तदा ।
स्वादत्तं फल मेव नोत्तरंफलं बाह्यक्रियास्तन्मनः ॥
स्वीकृत्याखिलमिटवस्तु च यथा सद्दापयेत्यन्वहं ।
पात्रक्षेत्रकृतक्रियाबहु फलं दार्दिजन्मोचितं ॥ १२ ॥
अर्थ-जिस प्रकार वेश्या यह समझती है कि अमुक पुरुषक
साय भोग. करनेसे उससे मुझे मधःफलके सिवाय आगे कुछ नहीं
मिलेगा, इसलिए उसे बाह्य-क्रियाओसे रंजन करना चाहिये । पैसा
करनेपर वह पुरुष बार २ उसके पास आकर अनेक - प्रकारके इष्ट
पदार्थीको देकर उसकी इच्छापूर्ति करता है, उसी प्रकार खतमें अच्छे
फलको प्राप्त करने की इच्छा रखनेवाले किसानको भी खेतका बाह्य
संस्कार करना पडता है। ठीक उसी प्रकार अंतरंग भक्ति साध बाह्य
क्रियायोंसे युक्त होर पात्रोको दान देने से दोनों जन्मोंमें उसका फल
मिलता है ॥ १२॥
दायलक्षणापधिः + . शुद्धतं परितो विचार्य मुचं समृत्तमेकं युपं । घीय गहजिनालपपिनिकपदारस्थितं चकया । नैनो जमति यः क्रमाद्विगुणितान्दोपान्स यातिपणान् । बुद्ध्वोदास्य स नित्यपुष्पधनतेनोमानहानि क्रमात् ॥१३॥ अर्थ-जो धर्मात्मा जैनी भूसे सम्यग्दृष्टि, सी, विज्ञान आदिको गस्तेम, घरफे द्वारमें, जिनालयमें, मुनियासमें देखकर भी उसको मोगनके लिए नहीं कहता है, उसकी अनेक प्रकार के दौरसमय होते हैं। एवं इस प्रकार उदासीन होकर जो स्वयं जाकर भोजन करता उसका पुष्प, धन प मान आदि काम २ से नए होते है । साधर्मि भाईयों का अतिथि सत्कार करना यह धर्मात्माओंफा फर्तव्य है ॥ १३ ॥ विज्ञान. सात्म्यं सवतरक्षणं यदमलं सव्यं स्वसेव्याग्मित । यहुर्दोपहरं यथामयहरं यन्मानसस्थानकृत् ।। यनिद्रादिहरं पदव्ययमनुस्वाध्यायसंपत्तिकृत् । पूतं यद्मतिहस्तदत्तमरानं विज्ञाय दद्यायतेः ॥ ११ ॥ -~-उत्तम दाताको उचित है कि यह पात्रको ऐसे आहार देखें जो कि पात्रके शरीरफे लिए अनुकूल हो, अतरक्षणके दिर साधक हो, पवित्र हो, भत्य हो, भसेव्यपदार्थसे रहित हो, अनेक मिध्या. दोषोंको दूर करनेवाला हो, रोगोंका नाशक हो, मन को स्थिर करने में साधा हो, जो निद्रासादिकको गर करनेवाला हो, स्वाध्यायादि क्रियाओंमें सहायक हो, बालक सादिके द्वारा भुक व दुष्ट होनेसे अपवित्र न हो, इस प्रकार पात्रों को आधार देते समय तासंबंधी पूर्ण ज्ञान रखते हुए पात्रों के हाथमें साहार देना चाहिए ॥ १४ ॥ कंजूस दाता. पहनन्तमवेत्य यो मनसि च स्मृत्वापि सन्विस्मितः । शक्तो नो भवितव्यसाठकशताहारोहमस्यान्व २३ अर्थ- २७८ दानशासनम् ---- 1 A भूतो। वायमुदंभरिः सदनपकाहारमेकोऽप्यदन् । दीनोऽयं तमुदासयत्यपि स ना दाता न लुब्धो भवेत् ॥१५॥ अर्थ- बहुत भोजन करनेवालं पात्रको देखकर जो दाता अपने मनमें आश्चर्यचकित होकर यह विचार करता है कि मैं इसको भोजन करानेके लिये समर्थ नहीं हूं। इसे सेकडों ही सेर भन्नकी जरूरत है। उसे मैं कहांसे लाऊं ? क्या यह भूत तो नहीं है ? अथवा पेटार्थी ( भोजनम') है। मेरे घरमें पकाए हुए सर्व आहारको खिलाने पर भी इसका उदर भर नहीं सकता है । ऐसा समझकर जो दाता . पात्रोंकी उपेक्षा करते हैं वे दाता नहीं है अपितु महाकंजूस है ॥५॥ अलुब्धदाता. यावद्रोहलसंपदस्ति विमलं क्षेत्रं फलत्यद्भुतं । भूरिग्रासंवतीय गौः सरति सुक्षीरं घटापूरितं ॥ वर्ष तृप्तिकरं रसेटवसुधो यत्तात्र साहित्यकृत् । तहानं सफलं स एव सफलो दाताप्यलुब्धो पहान् ॥ १६॥ अर्थ-खेतमें यथेष्ट गोबर डालनेपर उसमें यथेष्ट धान्य वगैरह उत्पन हो सकते हैं, गायको घास घगैरे खूब खानेको देनेपर वा यथेष्ट दूध दे सकती है, वर्षा यथेष्ट पडनेपर भूमिको रसवती बना देता है । इसी प्रकार जो दाता पात्रों के लिए अनुकूल सर्व योग्य साहित्योंसे युक्त होकर दान देता है वह दान सफल है। इसका नाम दाताका अलुन्धत्व गुण है ॥ १६॥ पात्रसेघाफल. यः श्रांति, शमयत्यसौ सुकृतवान्पात्रस्य मुक्तश्रमः ।. स्वस्थो स्वास्थ्यमिहामयागतरुजचिंतामचिंतक्षुधा ? ॥ तृप्तो दोपमदोपवान्धमिर्मातांतः महष्टोऽनिशं । संक्लेश जडता मतेः शुभमतिर्वानी भवेनिर्मलः ॥ १७ ॥ .
दाहलक्षणविधिः २७९ रोगोंको दूर भर्य-जो धर्मात्मा पुण्यवान् दाता पात्रोंके श्रमको पानद्रव्यादि- कोंको देकर दूर करता हो, वह जन्मभर श्रमरहित होता है । जो पात्रको स्वास्थ्य पहुंचाता है वह स्वयं भी जन्मभर · स्वास्थ्य- युक्त हो जाता है । पात्रोंके असाता से उत्पन करनेवाला स्वयं निरोगी शरीर को प्राप्त करता है । पात्रोंकी चिंताको दूर करनेवाला स्वयं चिंतारहित, आहारादिकको देकर क्षुधा दूर करनेवाला स्वयं सुखादिकसे तृम, पात्रोंके दोपको दूर करनेवाला स्वयं निर्दोषी, उनके क्रोधादिकको शांत करनेवाला स्वयं सर्व प्रकारसे शांत, उनके संक्लेशपरिणामको दूर करनेवाला स्वयं सर्वप्रकार से संतुष्ट, एवं उनके अज्ञानको दूर करने के लिए योग्य साधनको उपस्थित करनेवाला ज्ञानी व निर्मल होता है ।। ११७ ॥ उत्तम क्षमा. * फापायोपशमोद्भवेव गुलिका शुद्धा क्षमा यात्र सा । सायंका भयमृत्युकृत्पयि गृहे क्षेपकरी शंकरी ॥ संसारांधिसेतुरैनसगिरिव्रातस्वरुस्सक्षम । संस्थाप्य स्तुवति प्रशंसति जनश्वेतस्यजसं मुदा ॥१८॥ अर्थ--जिनके हृदयमें पञ्चीस कपायोंफे उपशमसे उत्पन्न क्षमा हो वह निर्मल व उज्ज्वल मोतीके हारके समान सबके मनको आकर्षित करती है। कीमती मोतीके हारको पहनकर रहनसे घरमे या बाहर चोर यगैरहके द्वारा मृत्युका भय रहता है। रात-दिन उसकी शंका रहती है। परंतु यह क्षमा सर्वथा क्षेम व सुखको करनेवाली है, + स्पधर्मपीडामविधिय योऽयं मापापशुद्धयर्थमिह प्रवृत्तः नो चक्षमामप्यद्दमत्र पुर्या मर्यः कृतःनो वद कीशोऽन्य । स्तंभयतीम क्रोधं विकचयति च साधुहृदयकमलानि । पल्लवयति पुण्यानि क्षमया कि किन साध्यते लोके ।।
दानशासनम् .. संसाररूपी समुद्रसे पार होने के लिए वह सेतु है ।कर्मरूपी पर्यतके लिए वनदण्ड है। उस क्षमावान महापुरुषको अपने चित्त में स्थापना कर मनुष्य सदा हर्पस स्तुति करते हैं, प्रशंसा करते है ॥ १८ ॥ मृदुवचनमाह. एलामाहुरनंगककिविकृति गायति यां वीणया -1 श्रुत्या गानविदः समं नृपसदस्यालापपूर्व बुधाः ॥ सर्वेऽन्वितेऽतिचाटुवचनैर्दत्ते स चार्थान्यहून् । श्रुत्वोक्त्वा स निराकरोति च विना यांत दुरालापिनः ॥१९॥ अर्थ-बुद्धिमान् लोग राजसभामें कामक्रीडाके विषयको वर्णन करते है तो उसे एला (?) नामक सभ्यशब्दसे वर्णन करते हैं। और गायनको जाननेवाले उसे ही श्रुति अलाप पूर्वक वीणाके साथ गाते, हैं जिसे सुनकर राजा प्रसन्न होकर उन्हे प्रशंसा . करता है उन्हे अनेक पदार्थीको भेटमें देता है। परंतु जिनका स्वर अच्छा नहीं है ये यदि गावें तो उसे सुनकर राजा अप्रसन्न होता है। और उन्हे गानेसे रोकता है, और उनको कुछ भी नहीं मिलता। ये खाली हाथसे जाते है। इसलिये निष्कर्ष यह निकला कि मृदुस्वर का भी बहुत उपयोग होता है ।। १९ ।। शक्तिमाह. ये जीमंति रुचेष्टवस्तु खलु यदाता च तदापय न्यद्वांछेति तदेव नास्ति च वचोऽवक्ता न वाचा हृदा ।। कायेनापि मनो मुदा दद ददेदं वस्त्विदं संवदन् । शक्तःसोऽपिमहान्युधोऽतिसुकृती स्यादानशॉण्टोऽनघः॥ अर्थ-श्रायकको उचित है कि यह पात्रों को आहार देसे समय पात्रोंकी रचि, प्रकृति आदि बातोंको जान लें। उसे जानकर उनकी रुचिक । । - दासलक्षणविधिः अनुसार जो ये भोजन करते हो उम पदार्थीको परोसने में मन, पचन, फाय से असंतोष न करें । बराबर संतोपसे परोसनेयानोंको परोसी, परोसो ऐसा करना चाहिए, यदी बुद्धिमान है, शक्तिशाली है, पुण्य- पान् है, और दानशूर है ॥२०॥ धर्मो न स्वयमेप भावरहितः पुप्पादि यानादि वा। दत्ता यन न वाय दानफरणे मुख्यस्त भावः शुमः ॥ भावोदाटननर्तवि ललिता या प्रेक्षकाणां मना- स्याहत्यार्थचयं तु पूर्णसुकृतं दाता लभंतामयं ॥२१॥ अर्थ-कषाय, ईर्या व दिखावट के लिए किया गया भागरदित धर्माचरण धर्म ही नहीं है। दान करने में दाताका शुभमाय ही मुख्य है, उसमें अन्न पुष्पादिकोंकी मुख्यता नहीं है। जिस प्रकार राजसभा में नर्तन करनेवाली सुंदरी अपने भावों के द्वारा प्रेक्षकोंकै मनको आक- र्षितकर धनसंचय को करती है उसी प्रकार दाता भी अपने सुम भावोंके द्वारा पात्रोंकी सेवा कर अक्षय पुण्यफो संचय करें ॥ २१ ॥ दापात्रफलमाह. क्षेत्रं जनाजनःक्षेत्रावाभ्यां धान्यं यया भवेत् । दात्रा पात्रं तेन दाता द्वाभ्यां सौपदो वृपः ॥२२॥ अर्थ-खेतका संस्कार मनुष्योंसे व मनुष्योंका मस्कार देतसे और दोनों धान्यका संस्कार होता है, उसी प्रकार दाताप्ते पात्रका च पात्रसे दाताका एवं दोनोंसे सौख्य देनेवाले धर्मका संस्कार होता है ॥२२॥ सप्तगुणविवरणम् . हिनादितम जानता च शिगुना कृतोऽयं धृपः ॥ समस्तानतुधिगहुफलं भवेराम्य च । हिताहितविज्ञानता कपटिना तांदःफलं। सदा कपटिमंत्रिसेषितनृपो यथा नश्यति ॥
૨૮૨
दामशासनम्
,
धान्य प्रजाभिस्तेन स्याज्जीवत्यत्र यया जगन् ।
दात्रा पुण्यं ततः समारोग्यायुःश्रीकुलर्द्धयः ॥ २३ ॥
अर्थ-लोकमें धान्यकी उत्पत्ति किसानोंके द्वाराही की जाती है।
परंतु उसी धान्यसे लोककी सब प्रजायें जीवन व्यतीत करती है
अर्थात् किसानों के परिश्रमसे ही लोक सब जीता है, उसी प्रकार एक
भी उत्तम दाता पुण्यका संचय करें तो उस पुण्यके वलसे उसके धरमें
ही क्या राज्यमें भी क्षेग, आरोग्य, आयु, ऐश्वर्य और कुल आदिकी
वृद्धि होती है ॥ २३ ॥
देहभोग परित्यक्त्वा वृष्टि तोक्तिसंश्रुतेः ।
गत्वा क्षेत्रं वपंतीव तत्र वीज कृषीवलाः ॥ २४ ॥
पात्रागमोक्तिसंश्रुत्या ज्ञानवृष्ट्युत्यचेतसा ।
इशानन्नानि पानाणी दातारो दारादरात् ॥ २५ ॥
अर्थ-जिस प्रकार किसान लोग पानी बरसनेके समाचारको
सुनकर अपने देहसुखकी किंचित भी परवाह न करते हुए खेत
को दौडते हैं | बीज पेरते हैं, उसी प्रकार पात्रों के आगमनकै समाचार
को सुनकर एवं ज्ञानरूपी वृष्टिसे प्लावित चित्त होकर पात्रोंको इष्ट व
हितकर आहारका दान देथे ॥ २५ २५ ॥
मुमुक्षूणां क्षुधां तीवो यो निवारयतीदृशं ।
स एव मान्यो वंद्योऽसौ संसाराधित रण्डकः ॥
अर्थ--मोक्षमार्गमें रत श्रीमहर्षियोंकी तीन क्षुधाको जो उपर्युक्त
उत्तम भावोसे युक्त होकर निवारण करता है अर्थात् आहारदान देता
है पदी व्यक्ति भादरणीय है, वंदनीय है और संसाररूपी समुद्रको
पार करने के लिए सहारेके रूपमें है ॥ २६ ॥
दाखलक्षण विधिः क्षुधा कैसी है? या सदूपविनाशिनी कृशकरी कामोत्सवध्वंसिनी । पुत्रभ्राहकलत्रभेदनकरी धर्मार्थविध्वंसिनी ॥ चक्षुर्मदकरी तपःश्रुतहरी लज्जालुतानाशिनी । सा मां पीडति सर्वभूतदहनी प्राणापहारी क्षुधा ॥२७॥ अर्थ-जो शरी की सुंदरताको नष्ट करती है, शरीरको कृश करती है, कामसेवनमें उत्साहका भंग करती है, पुत्र, भाई, स्त्री आदिमें भेदभाव उत्पन्न करती है, आंखकी दृष्टिको मंद करती है, तप प ज्ञानकी दानि करती है, लज्जा व विनयका नाश करती है, एवं जो सर्व प्राणियों को रात-दिन जलाती है, इतना ही नहीं प्राणियोंके प्राण को अपहरण करनेवाली है वह क्षुधा मुझे पांडा देती है ।। २७ ।। न दैन्यात्माणानां न च हृदयहरिणस्य रतये । नदिंगानां न च करणकरिणीस्य मुदनात् ॥ विधातिः किंतु क्षतपदनचरितश्रुतविधेः । परे हेतौ मुक्तेरिह न खल्लु मुनिपु स्थितिरियम् ॥ २८ ॥ अर्थ--मुनिगण आहारमें जो प्रवृत्ति करते हैं वह दश प्राणोंकी कायरतासे नहीं, हृदयरूपी मृगके पोषणके लिए नहीं, शरीरके अवयवोंके मदसे भी नहीं, इंद्रियरूपी हाथीको संतुष्ट करनेके लिए भी नहीं है। अपि तु कामविकारका उपशम, चारित्रकी वृद्धि व ज्ञानको निर्मलताके लिए आहारमें प्रवृत्ति करते हैं । क्यों फि मुनिगणोंका एक मात्र ध्येय उत्कृष्ट स्थान जो मोक्ष है उसीकी प्राप्तिका है। वे इहलोक संबंधी सुखको नहीं चाहते है ॥२८॥ १ आहारं पचति शिखी दोषामाहारवर्जितः पचति ॥ वोपक्षयेऽपि धातन्पधति च धातुक्षय माणान् ।
दानशासनम, यज्जिहारुचि याचितपि न वचः श्रुत्वा स्त्रियो येन स-। अध्यश्वेतसि नास्य समनि सदा भुजे त्यजस्तच्छपन् । तस्मात्तद्वितयापकीर्तिरघमेव स्यादुपालं मनं । लोके मौनमनारतं सुकृतिनः कुर्युस्स पुण्यप्रदम् ॥ २९ ॥ अर्थ-आहार लेते समय सिद्धांतमें मौन धारण करनेका आदेश है। कारण कि भोजन में कोई पदार्थ उनके रसनेंद्रियको स्वादिष्ट लगे तो उसे मांगनेकी भी संभावना रहता है । कदाचित् आहार देनेवाली नौने उस पदार्थको देनेसे नकार कर दिया या वहांपर न हो तो, उस अवस्थामें मुनिके मनमें क्रोध आकर वह प्रतिज्ञा कर सकता है कि मैं इसके घरमें अब भोजन करनेके लिए कमी नहीं आऊंगा, और उस घरके मालिकको क्रोधसे अनेक प्रकारसे शाप दे सकता है । इससे दाता और पात्र दोनोंकी लोकमें अपकीर्ति, निंदा होगी एवं दोनोंको पापबंध होगा। इसलिए पुण्यवान् लोग सदा लोको पुण्यप्रदान करनेवाले मौनको धारण करते हैं जिससे उपर्युक्त किसी भी प्रकारके दोषों का संभव ही न हो ॥ २२ ।। मौनगुणमाह. मुनेः कर्म सुधर्मोपदेशनारचितं वचः । भावः स्वशुद्धात्मचिंता मौनं मुनिभिरीरितम् ॥ ३० ॥ मौनमाभिमानशरणं चित्करणं पुण्यकरणमघहरणं । देवादिवश्पकरणं क्रुद्धरणं चित्तशुद्धिसुखकरणम् ॥ ३१ ॥ आगमनविघ्नहरणं मैत्रीकरणं विवादसंहरणं । रत्नत्रयंसंरक्षणमज्ञानविनाशकरणमपि काळे ॥ ३२ ॥ अर्थ--मुनिकी क्रियाको मौन कहते हैं, धर्मोपदेशके लिए उपयोग किए वचनको भी मौन कहते हैं । अर्थात् धर्मोपदेशके लिए बोलनपर भी उससे भी पाप नहीं होता है वह मौनके समान ही है । अपने शुद्ध आमाकै विचार करना भी मौन है । इस प्रकार महर्षियोंने दीतलक्षणविधिः . - : आदेश दिया है । भोजनके समय व अन्य योग्य कालमें मौन रहने से स्वाभिमानको रक्षा होती है, ज्ञानकी उत्पत्ति होती है, पुण्यकी प्राप्ति व पापकी हानि होती है, देवादिक भी इससे वश, होते है, क्रोधका नाश होता है, चित्तमें निर्मलता व आनंदकी वृद्धि होती है । मौनसे हो आगे आनेवाले विघ्न दूर होते है, परस्पर मित्रता की वृद्धि होती है, कपायवश उत्पन्न विवाद नष्ट होते हैं, सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान घ सम्बरचारित्र की रक्षा होती है । इतना ही नहीं अज्ञानका मी नाश होता है । इस प्रकार मौनधारणसे अनेक गुणोंको प्राप्ति होती ॥३० ३१-३२॥ + शादो घृष्टिजलमभावननितः स्वच्छांभसा सीयते । तर्वचसा भरेण जनितं दुर्ज्ञानमाहन्यते ॥ मौनेनैव समंत्रकेण बलवकर्माद्रिवजेण से । . दुर्ज्ञानापहृतीक्षकैस्सुकृतिभिर्मीनं सदा घार्यताम् ॥ ३३ ॥ अर्थ-जिस प्रकार बरसातके पडनेसे उत्पन्न कीचड स्वच्छ पानी के प्रवाहसे धुल जाती है उसी प्रकार सगुणोंको नाश करनेवाले क्रोधादिक पचनासे उत्पन्न अविवेक मौनसे नष्ट होता है। अपराजितमंत्र से युक्त मौनरूपी जदण्डसे ही बलवान् कर्मरूपा पर्वत भी नष्ट होता है। इसलिये अविवेकको दूर कर सम्पाज्ञानकी प्राप्तिस आमाको प्रभावना करने की इच्छा ररानेवाले पुण्यात्मा सजन मौनको सदा धारण करें ॥ ३३ ॥ + संतोषो भाव्यते तेन वैराग्यं तेन भाव्यते । संयमः पोप्यते तेन मौनं येन विधीयते ॥ घाचंयमः पवित्राणां गुणानां सुखकारिणां सर्वेषां जायते स्थानं गुणानामिव नीरधिः ।। पाणी मनोरमा तस्य शास्त्रसंदर्भगर्भिता भादेया जावते येनं क्रियते मॉममुज्ज्वलं ॥
दानशासनम् 1 . . पत्ये या शयिता तदात्वसरसालापानुरक्तांगना- ।. न्येषां वक्त्रमवीक्ष्य वाचमनिशम्यैवान्वहं वर्तते ।। तद्वत्साधुजनो वदेदयकरं यो देवताराधना-। शेषस्तोत्रजपान्करोति सफलं प्राप्नोति चेष्टं समं ॥३४॥ अर्थ-जो पतिव्रता स्त्री अपने पतिको संतुष्ट करनेफेलिये उसके साथ अनेक प्रकारसे सरस वार्तालाप करती है व प्रेमव्यवहार करती है वही दूसरे मनुष्य सामने आयें तो आंख उठाकर भी नहीं देखती और दूसरोंके वचनको भी नहीं सुनती, इसीप्रकार धर्मात्मा सजन पुरुष सदा अपने आत्माके हितके लिये पुण्यरूपं वचनको ही बोलते हैं एवं जप, स्तोत्र,,जिनेंद्रपूजा आदि कार्य अत्यंत तल्लीन होकर · करते हैं, उनको सर्व प्रकारके इष्ट फल प्राप्त होते है ॥ ३४ ॥ जिनोक्तिरेव वक्तव्या वक्तव्या नेतरोक्तयः । तच्छिष्टवाक्कृतिौनं न मौनं पशुवत्परम् ॥ ३५ ॥ अर्थ-वीतराग परमात्मा जिनेंद भगवंतके द्वारा प्रतिपादित वचन अर्थात् शास्त्र ही बोलने व सुनने योग्य है। मिथ्यादृष्टियोंके द्वारा रचित शास्त्र न कथन करने योग्य है और न सुनने योग्य है । शिष्टोंके 'वचनको स्मरण करते रहना वह असली मौन है। बाकी नहीं बोलने- पर भी चित्तमें दुश्चिंतन करना वह पशुमौन है ॥ ३५ ॥ * जिहालील्यमृपर्नास्य सोऽयं दत्तवस्तुभिः । तपश्चापि तपोशानं ज्ञानं शंसत्ययं जनः ॥ ३६ ॥ अर्थ-जो साधु या कोई संयमी मौनपूर्वक भोजन करते है, उनके संबंध श्रायकगण कहते हैं कि इस साधुको जिहाकी लोलx पदानि यानि विद्युत चंदनीयानि:मोविदः । सर्वाणि तानि लभ्यते प्राणिना मीनकारिणा. ॥ , .
दावलक्षणविधिः पता नहीं है, जो पदार्थ देये उन्हीसे संतोषपूर्वक ये तृप्त होते हैं, इनका तप ही सचमुचमें तप है, ज्ञान ही प्रस्तुतः ज्ञान है । इत्यादि प्रकारसे लोक उनकी प्रशंसा करते है ॥ ३६ ॥ पाठांतर भुक्ती येन यदिष्टवस्तुनि मुहुः संयाचिले नास्ति चे- तत्तेऽयच्छति दातरीह सभवेत्वोधोऽन्यथा शाश्वती दत्वामं परमावयोर्मनसि कं क्लेशं च कर्ता घृधा पुग्यद्रव्य यशः शुभक्षतिरिह दातुः क्षयः पात्रतः ॥३७॥ अर्थ-भोजनके समय यदि जिहालौल्यसे किसी मध्यम पात्रने अपनी इट यस्तुफी याचना इशारा व अन्य प्रकारसे करें तो उस समय यदि यह पदार्थ घरमें नहीं हों तो गृहस्थको लाचार होकर नास्ति करना पड़ता है। उस समय अपनी इच्छाकी पूर्ति नहीं होनेसे उस पात्रको भी क्रोध आता है। दांताको भी व्यर्थ दुःख होता है । दोनों के हृदयमें मानसिक क्लेश होने से पुण्यके बजाय पापका बंध होता है, यशका नाश होता है, एवं शुभफल का भी अभाव होता है। इस प्रकार पात्रके कारणसे दाताको अनेक प्रकार से अनिष्ट परिणाम होते । भोजननिपिद्धस्थान भांटागारिकतुनवायगणिकादासीत्वरीचित्रिक- । व्याधाद्धि कीतिमालिककुलालक्षारिकाणां गृहे ।। कारादिकृषिदवंदिनटकाहारादितद्वतिनां । वी तैलिकमतकिद्वयतलाराद्यम्य नो भोजयेत् ।।३८]] अर्थ-वर्णी अर्थात् तपस्वी, प्रतिक या श्रेष्ट कुटमें उत्पन्न श्रावक को उचित है कि वह अपने आहारकी विशुद्धि के लिए भंडारी, दी, वेश्या, दासी. व्यभिचारिणी, चित्रकार, भील, मरणसंस्कार करनेवाले, ૨૮૮ दानशासनम् । गायक, माली, कुंभार, नाई, कारु+ कोळी, स्तुतिपाठक, नट, कहार इनके घरमें वा इन वृत्तियोंको धारण करनेवालोंके घरमें भोजन । म करें । इसी प्रकार तेली, वृद्धि क्षय सूतकयाले और कोतवालके यहां मी भोजन न करें ॥ ३८ दाननिषेध भूगोवाजीभकन्याघनकनकविभूषांशुकापत्रदान । हिंसादानं च सर्व भवमुखकरणं पृष्टितोयं यथा स्यात् ॥ पात्रेवेतेपु तस्माद्विरचितमपलं चान्नदानं प्रधानं । पात्रेवेतस्य दानं रचयति स नरः पंडितः खंडितावः।।३९ अर्थ-बुद्धिमान दाताको उचित है कि वह पात्रोंके लिए भूमि, गाय, घोडा, हाथी, कन्या, धन, कनक, आभरण, वस्त्र, शरीरोपभोगी पंदार्थ, हिंसाके साधक उपकरण, आदि का दान न करें। क्योंकि इन पदार्थोके दान करनेसे संसारकी ही वृद्धि होती है। जिस ग्रंकार कि बरसात के पानीसे एकेंद्रिय घास आदिकी उत्पत्ति, वृद्धि व संरक्षण होता है, उसी प्रकार इन पदार्थोंसे संसारकी ही वृद्धि होती है । इसलिए जो व्यक्ति इन बातोंको समझकर पात्रों के लिए उपयोगी प्रधान अन्नदानका प्रदान करता है, वह सचमुच में पंडित है व पापोंको खंडित कर सकता है। क्यों कि अन्नदान के पालको शासकारोंने बहुत ही अधिक बतलाया है ॥ ३९॥ . + शालिफो मालिकथैव कुंभकारस्तिलंतुदः नापितश्चेति पचते भवंति स्पृश्यकारुकाः ॥ रजकस्तक्षकश्चैवायस्कारो लोहकारकः म्वर्णकारच पंचते मयंग्यस्पृश्यकाका ॥
दाहलक्षणयिधिः : . यावा भी है- *सबस्कृतिकरं चानदानं सघः फलपदम् । सर्वदानं मुहुः कांक्षावर्द्धनं भववर्धनम् ॥ यः स्वामिशध्रुक्षयदत्तवृत्तस्संदापयन् सति तद्वधं सः। स्वामी भवेदुत्तरजन्पनीय कर्मघ्नपात्राय धनं च देयम् ॥४० अर्थ-जिस प्रकार लोकमें स्वागीफे शत्रुओंफो नाश करने में प्रवृत्त भट उस कार्य में प्रवृत्त अन्य सहायकों को भी धनादि देकर संतुष्ट करता है एवं उनका संरक्षण करता है और उत्तर जन्ममें यही सेवफ स्वामी बनजाता है, इसलिए इस पवित्र भायनासे कि अपने कर्माको नाश करनेमें यह पात्र समर्थ. है, उसे धनादिक प्रदान कर उपकार करना अपना कर्तव्य है, उपकार करें। दान देवें । शत्रुवोंके नाशकेलिए धनादिकका दान भायश्यक है । उसी- प्रकार कर्मशत्रुओंको नाश करनेकेलिए दान देना भापश्यक है।॥४०॥ भोजनांतराय. गृहरोधेऽखिलपान्यप्रशोपणे जनुपातिपशुधे । रोदनविवादनिष्ठुरवचने सावधर्मयुनि गई ॥ ११ ॥ .. * वधन वाम्पन्नवी गुर्विीमिय संस्थिताम् तस्मान युज्यते विद्भिर्भूमिदानं पादाचन ॥ बंधनाचाडनाद्दुःसं निष्यं गोर्जायते, यतः तस्मान युज्यने दातुं गोदानं भव्यदेदिभिः ॥ अग्रासोदकतो यादृरादारह्यते जवात् स्थाघवृद्धरयोचंसात्तस्य दानं न दीयते ॥ कान्यायां जायते रागो रागाफर्मनिबंधनम् । कर्मणानतसंसारी तस्मात्तद्दानयर्जतम् ।। पात्रे हिरण्याश्चितास्यागमनागमनादिषु तनिमित्तं भवेन्मृत्युस्तस्मात्तन्नैव दीयते ।
१९० दानशासनम् . । भिक्षां कर्तुं न विशेत्मविश्य तच्चत्वरे मुहुर्दातॄन् । नो वीक्षत च योगी सप्तोच्छ्वासात्परं निवर्तेत ॥ ४२ ॥ अर्थ-जिस समय योगी आहारकेलिए श्रावकोंके घरपर जावे तो यदि उनके घरका दरवाजा बंद हो, बंद न होते हुए भी योगियोंके मार्गमें कोई रुकावट हो, घरके आगनमें कोई धान्य गैरेह बिछाये गये हों, हिंसक कुत्ता बिल्ली आदि प्राणियोंको सामने बांध हो, बच्चोंको छोडकर अन्य किसीका रोना सुनने में आरहा हो, विवाद, कठोर वचन सुननेमें आरहा हो, घरके लोग हिंसादिक पाप लगे हों, ऐसे घरमें भोजनके लिए प्रवेश न करें। यदि किसी तरह प्रवेश कर गये तो दाता को बार २ नहीं देखें । सात उच्छ्वासके बाद वह लौटजावें ॥ ४१ ॥ ४२ ॥ आहारगमनके समय दया ज्याध्यात योगिनं वीक्ष्य नोपेक्षेत कदाचन । स्वायं परकीयं वा विदर्शनमथापि वा ।। ४३ ॥ अर्थ--आहारको जाते समय यदि किसी रोगसे, पीडित रोगी योगीको देखें, चाहे वह अपने संघका हो या अन्य संघका 'हो, चाहे अन्य दर्शनवाला ही हो तो भी ऐसे साधुवोंकी उपेक्षा नहीं करनी चाहिये ॥ ४३॥ चालवृद्धतपःक्षीणान्सश्रमान्व्याधितानपि । मुनीनुपरेन्नित्ये ते भवेयुस्तपःक्षमाः ॥१४॥ अर्थ-योगियोंका कर्तव्य है कि चे बालयोगी, वृद्धयोगी, तपसे क्षीणयोगी, थके हुए योगी ध रोगसे पीडित योगियोंको अंतर्बाह्योप- चारसे संरक्षण करें। ऐसे वात्सल्यको धारण करनेवाले योगी ही उत्तम तपको धारण कर सकते ॥१४॥ .
दासलक्षणविधिः , . तपासमर्थपु तपोधनेषु । त एवं कल्पावनिजा इवात्र ॥ फलंति ताभिः सुजनाः सपुण्या- । स्समस्तलोकाः मुखिनश्च तैः स्युः ॥ ४५ ॥ अर्थ-यदि इस लोकमें अनशनादि तपोको निर्दोष रूपसे आच- रण करनेवाले तपोधन हों तो वे ही भव्योंके इष्टार्थको पूर्ण करनेवाले .कल्पवृक्ष के समान हैं 1. उनके द्वारा मजनोंकी . सर्व इच्छायें पूर्ण होती है । समस्त लोकमें पुण्यमय कार्य होते हैं । एवं समस्त संसारके .प्राणी मुखी होते है ॥४५॥ प्रतीफदानमाह क्षीरं तकं दधिवृतजलं शाकमन्नं ददधः । शुष्कं पात्रं खपुरळवणं सधैर्याध्वदर्शम् ॥ जंभ बालोदकगुडसिता चुक्यलुंगं कपित्थम् । त्रीण्य द्वौ वितरति समं यस्सदाता नरः स्यात् ॥४६॥ अर्थ-जो श्रावक त्यागियोंको (पात्रोको) उनको शरीर प्रकृति आदि लक्ष्य में रखते हुए दूध, छाछ, दही, घी, जल, शाक, मुद्गादिक अन्न, उचित पात्र, शुष्क पा वगैरे, लवण, घर व धैर्य, मार्गदर्शन निवू , फच्चा नारियल का पानी, गुड, शक्कर, चिंच, माइलंग, कैध आदि पदार्थोंमें से एक दो तीन चीजों को जैसी आवश्यकता . हो, प्रदान करें, वह उत्तम दाता कहलाता है । कारण इन पदाणेक प्रदान से शरीर में स्वास्थ्य बना रहता है । स्वास्थ्यके रहने से संयम स्वाध्यायादिक में वह लग सकता है । ४६ ॥ शास्त्रं तवं व्यवहमिकृपी भोजनं स्वापिसेवा । स्नान पानं द्रविणमगदं राज्यलक्ष्मीविचारं ॥ .
दानशासनम् । . " रोगं रागं स्वयुवतिसुखं नित्यमिच्छति जैनाः । दानं पूजां कुरु कुरु न भो नोऽध वारो वदेन ॥ ४७ ॥ अर्थ-आत्मकल्याणच्छु भव्य हमेशा शास्त्रज्ञानकी अपेक्षा करते हैं । तत्त्वविचार करना चाहते हैं । लोकमें सुंदर व्यवहार चाहते हैं। इसी प्रकार कृषि, भोजन, स्वामिसेवा, स्नान, पान, धन, औषध निरातंक राज्यलक्ष्मी, रोगपरिहार, धर्मानुराग, स्वतरुणीसुख इत्यादि बातोको चाहते रहते हैं । इसलिए हे भव्य ! 'पुण्य की सिद्धि के लिए • दान व पूजा सदा करो। दान पूजाके लिए " आजका बार अन्छा नहीं कल करेंगे " इत्यादि प्रकार से टालने की कोशिस मत करो। कारण कि दान व पूजासे पुण्य की वृद्धि होती है जिससे उपर्युक्त सुखसाम- प्रियों की प्राप्ति सरलतासे होती है ॥ ४५ ॥ यावद्यावदग्रंथ एफस्य वृद्ध तार तापव्यनाशोऽघवृदिः ॥ तावत्तावद्दानपूजाभिवृदि कुर्यात्तत्पुण्याभिषादि प्रजेव ॥४८॥ : अर्थ-जबतक यह मनुष्य परिग्रहोंकी वृद्धि करता -तबतक उन-परिग्रहों के बढानेके निमित्तसे धनका नाश व पापकी वृद्धि होती है। इसलिए बुद्धिमान सजनको उचित है कि यह परिग्रहों के संग्रह के साथ २ दानपूजादिक सकार्योको भी करें। क्यों कि दान,पूजा- दिक कार्य संतानोत्पत्ति के समान पुण्यकी वृद्धि को करते है । पुण्य .. की वृद्धि होनेसे धन की प्राप्ति होती है। उससे इच्छित पदार्थको प्राप्ति होती है। वैसा न कर जो व्यक्ति केवल परिग्रहोंका संग्रह करता है, उसका द्रव्य नष्ट होता है। पाप की वृद्धि होकर पुनः धनादिककी प्राप्ति नहीं हो पाती जिससे उसे कष्ट उठाना पडता है । ४८॥ सद्यः कार्य श्वापि कार्य विदं भो जीव ज्ञात्वा संविचार्य कृत्यम् ॥ जाता है - 14 दावलक्षणविधिः १९३ . कर्तव्यं चेदीदृशं यो न कुर्यात् । पश्चाच्छद्रो नास्तिपर्याय उक्तः ।। ४९॥ अर्थ-हे जीव! यह कार्य अमी करने योग्य है, यह कल करने योग्य है, इत्यादि प्रकारसे अच्छी तरह विचार करके ही समस्त फर्तव्योंका पालन करना चाहिये । इसप्रकार कार्य विभागोंको नकर "बादमें करेंग" इस श्रेणीमें जो कर्तव्योंको ढकेलता है यह आलती है। उसके कोई कार्य नहीं होते हैं। क्यों कि बाद में करनेका अर्थ ही नास्ति है ॥ ४९ ॥ वितानाशुकवादुभिः पटुभान्याता सुरक्षन्विदन् । जित्वा तैर्निजरियुद्धमिव भी जीवत्यजनं मुदा ।। रोगे भूपतिविग्रहे रिपुभये तेजःक्षये पंधने । धर्मोद्योगकृतौ च दानमतुलं देयं बुधैस्साधये ॥ ५० ॥ अर्थ---जिस प्रकार राजा अपने आश्रितोंका संरक्षण, धन, अन्न, घन, मिष्टवचन आदिकसे करते हुए उनसे अपने रियोंको जीतता है उसी प्रकार साधुओंको रोगकी हालतमें, राजाओंकी औरसे उत्पात के समयमें, शत्रुभयमें, तेजक्षयके समयमें, बंधनके समयमें, धर्मप्रभावनाके समयमें दिल खोलकर दान देवें जिससे पुण्यकी वृद्धि होती है ॥५०॥ लोकरीति दुःखे दुःखकरोद्योग सुखे मुखफरं सदा । लोकः करोति शास्त्रेऽस्मिन्य दुक्तं तन जातचित् ॥५१॥ अर्थ-लोकमें यह परिपाटी है कि संसारीजन दुःखमें दुःखको बढानेवाली क्रियाओंको ही अधिक करते हैं। मुखकी हालतमें सुखको बढानेवाली क्रियाओंको ही करते हैं। जैनागममें ऐसे समयमें जिन , कर्तव्यों का पालन करने के लिए आदेश दिया है उसका पालन कोई नहीं करते हैं यह खेदकी बात है ॥ ५१ ॥ .
दानशासनम् . + - - साधुसंतर्पणमें बहाना घही रोगादिवाधास्ति गेहे नो घटतेऽद्य न । इन्युक्तिं वद मा जीव ! साधून संतपयः सदा ॥ ५२ ॥ अर्थ-किसी उत्तम पात्र साधुके अपने नगरमें आनेके बाद यदि आहारदान देना नहीं हो तो लोग 'बहाना करते है कि आज हमारे घरमें कोई बीमार है, आज आहार नहीं बनाया जा सकता है 'इत्यादि । आचार्य कहते हैं कि पात्रदानमें इस प्रकार बहानाबाजी करना ठीक नहीं है । साधुवोंका संतर्पण सदा करना चाहिये । यही सत्पुरुषों का कर्तव्य है ।। ५२ ॥ आहारमें वर्जनविपर्य शाठ्यं गर्वमवज्ञामधीतचरणप्रवेशवापारुष्यम् । भिक्षोभोजनसमये जीवं चासंयमं त्यजेत्परिप्लायम् ॥५३॥ अर्थ-जिस समय साधु आहारके लिए अपने घरमें आयें, उस समय दुष्टताका परित्याग करना चाहिये, गर्वको छोडना चाहिये, साधुका अनादर न करें, पैर न धोकर अंदर प्रवेश न करें, कठोर वचन न बोलें, हिंसानंदी कुत्ते बिल्ली आदि प्राणियोंको सामने न रक्खें, चंचलता का परित्याग करें। इन बातोसे साधुषोंके चित्तमें क्षोभ उत्पन्न होनेकी संभावना है । इसलिए इन बातोंको अवश्य छोडना चाहिये ।। ५३ ॥ कठोरवचनका त्याग यत्र कर्फशवचोस्ति तं नरं नाश्रयति सुगुणा यशस्यियाः । बंधुसेवकयुधास्मृतोः स्त्रियो व्याघ्रमेहमिव गोमगा इह ॥५४॥ अर्थ- जिस प्रकार व्याघ्रके गुफाका आश्रय गाय, हरिण आदि नहीं करते, उसी प्रकार जो मनुष्य कठोर पचनको बोलता है उसका आयय रत्नत्रयादिक गुण, कीर्ति व पुण्य नहीं करते हैं। इतना ही ६. - पातलक्षणविधिः -- , नहीं, बंधु-बांधव, सेवक, विद्वान्, पुत्र, स्त्रियां आदि कोई उसके आश्रयम जाते नहीं। वह सदा दुःखी रहता है ॥ ५ ॥ माहारके समय यर्य मनुष्य मिथ्याम्पनाशको गुणहरः क्षुद्वान्त्रणी दूषकः । कुष्ठी अरमना विरोधकरणफलादन: सामयः ॥ चित्री सूतकवान्मतच्युतजनो दोशी निपिद्धबिरः । स्निग्धांगोऽतिविपश्व भुक्तिसमये वा गुणम्रोः ॥५५ अर्थ-गुणवान् पुरुषोंका कर्तव्य है कि वे साधुओके आहार के समय में · मिथ्यादृष्टि, धर्मद्रोही, गुणापहारी, , पातिव्रत्यादि गुणोंसे रहित स्त्री, भूखा, व्रणी, धर्मनिंदक, कोढी, क्रूरपरिणामी, विरोधी, उच्छिष्ट खानेवाले, रोगी, श्वेतकुष्टी, सूतकी, मतभ्रष्ट, समाज- बहिष्कृत, मैले फपडेके धारक, तेलसे लिप्त शरीरयाले, नेत्रदोषी, आदिको वर्जन करें अर्थात् साधुवोंको आहारके समय उपर्युक्त प्रका- रके मनुष्य दृष्टिगोचर न हो इसका ध्यान रखें ॥ ५५ ॥ और भी वर्ण्य विषय विग्यूप्रायशुचौ जिनालयगते येनानदान कृते । साधुभ्यश्च स सप्तभन्मनि भवेनिछत्रादिकुष्ठी स च ॥ जैन गेहमृपिर्विशेन मलिनी भाण्डादिकं न स्पृशेत् । स्पृष्टे तन गृह गतेऽधिकरजो गच्छदसौ दुर्गतिम् ॥५६॥ अर्थ-गलमूत्र विसर्जनादिसे उत्पन्न अंशुचिकी अवस्थामै जिना- लयमें प्रवेश नहीं करना चाहिए । एवं उस हालतों साधुयोंको आदार दान भी नहीं देना चाहिए । यदि उस अशौचावा जिनालय में प्रवेश करें एवं माधुवोंको आहारदान देवे तो वह सात श्वेतकुष्ठादि भयंकर रोग से पीडित होता है। कोडीको सूतकीके - जन्मतक दानशासनम् . समान जिनमंदिर, व मुनिवासमें प्रवेश करने के लिए निषेध किया ग़या है एवं च वह जिनमंदिरके उपकरणोंको 'बरतन वगैरेहको बधा मुनिदानके उपकरण व बरतनोंको स्पर्श नहीं कर सकता है। यदि वह इस आदेशको आवहेलना कर जिनमंदिर व मुनिवासमें प्रवेश करें एवं उन उपकरण व बरतनों को स्पर्श करें तो वह कोढ सर्वांग व्याप्त होता है और बादमें वह नरकादि दुर्गतिको चला जाता है। इसलिए मुनिदान, जिनपूजादिकार्यों में बहुत ही पवित्रताका व्यवहार करना चाहिये ॥ ५६॥ उत्तमदात्युगललक्षण पात्रं स्वागतमुक्तमुचमवचः पत्युनिशम्यांगना । वंध्या पुत्रमहग्दृशं निधिमरा राज्यं यथा राजतुक् ॥ कब्ध्वाधत्त इति प्रमोदमतुलं सा तस्य धेनुनिधिः ।, कल्पद्रुः सदयानघा गुणवती पुण्यात्मिका देवता ॥५७|| अर्थ-जो स्त्री अपने पति के, साधुयोंको प्रतिग्रहण कर स्वागत करने के उत्तम वचनोंको सुनकर, घंध्या खी पुत्रकै पानेपर, अंधा आखाँफे पानेपर, दरिद्री निधिके मिलनेपर, राजपुत्र राज्यके मिलनेपर जिस प्रकार प्रसन्न होता है, उसी प्रकार प्रसन होती है स्त्री सामान्य बी नहीं है। कामधेनु है, निधि है, फल्पवृक्ष है, दयालु है, पापरहित है, गुणवती है, इतना ही क्यों ? वह साक्षात् पुण्यदेवता है ॥ ५७ ॥ * प्रशस्तदात्री. वीक्ष्यास्यं श्रममंगना च यतिनो वाचावलेनांना । ज्ञात्वा तत्प्रकृति प्रमरिव शिशोः कालोचितामाहतिम् ।। " . + दत्तम् चित्रिणा येन तद्दोपादधिकामयी। न्यक्कुर्वति च तं सर्वे पश्चाद्गच्छति दुर्गतिम् ॥
दातलक्षणविधिः
१९७
दत्वा तच्छ्मदोषशांतिकरणी रक्षेद्यति तं तया-।
सा लक्ष्मीः सुकृतपदा गुणकरी लोकः पवित्राकृतः५८॥
अर्थ-जिस प्रकार माता बालककी शरीरप्रकृतिको अच्छी तरह
जानती है, उसी प्रकार साधुयोंके मुखको या आवाजफे बलाबलको.
देखकर उनके शरीरके श्रम व प्रकृतिको जानटेना चाहिये। फिर उन
की प्रकृति के लिए अनुकूल, श्रमदोपांपशमनमें सहायक, संयमवर्धक
कालोचित आहारको बुद्धिमत्ता प्रदान करना चाहिये एवं उस साधु
का संरक्षण करना चाहिये । वह सती सचमुचमें लक्ष्मी है, पुण्यदा-
गिनी है । गुणोंको बढानेयाली है। एवं उसके द्वारा लोक भी पवित्र
किया जाता है ॥ ५८ ॥ .
हावैका निमागतं निहितसर्वार्थागता नौरिच ।
साक्षासिद्धरसः करागत इव स्वर्धनुरागता ॥
इत्यात्माशयजाततुष्टिललिता सा स्त्री विना तत्तपः ।
स्वाकूतस्मृतिमात्रता द्विगुणितो लब्धस्त यायो गुरोः॥५९॥
अर्थ-जो स्त्री अपने घरमें मुनियोंके आगमन होने पर ऐसा
समझती है कि सर्व संपत्तिसे भरा हुआ जहाज ही आगया है, साक्षा-
सिद्धरस ही हायमें आगया है, स्वर्गफी कामधेनु ही आगई है, वह
सती अपने पुण्यगय अभिप्रायसे संतुष्ट होती हुई, ऋषिराजफे तपश्चर्याक
प्रभावके बिना ही अपनी शुभ भावनासे ही उन मुनिराजके तपसे भी
द्विगुणित पुण्यको प्राप्त करलेती है । भावनाका फल अचित्य है ॥५९॥
.
पाघ्रशसन.
माता पुत्रमवेक्ष्य लोचनयुगापूर्ण समभ्युत्थिना ।
राजा वा कळभोऽग्रजी मम पितानंदेन वाऽत्रागतः ।।
पुण्यं पुण्यकर सुखं सुम्बकर पात्रं नसः श्राविका-1
स्सयो विघ्नहरं सत्तां हितकरं शंसन्ति संदर्शनात॥६०॥
- दानशासनम् " - इत्यादि भ अर्थ-जिस प्रकार माता अपने प्रिय पुत्रके आने पर उसे आँख भरकर देखलेता है व हर्षसे उठकर उसे लेती हुई, "मेरा राजा आगया, हाथीका बच्चा आगया, माई आया, बाप आया शोंको कहकर अपने हृदयके सातिशय आनंदको व्यक्त करती है, उसी प्रकार जिनभक्त श्रावक श्राविकायें पुण्यस्वरूप व पुण्यकारक, सुखस्वरूप व सुखकारक, सधः ही विनको दूर करनेवाले, सर्व लोकके हितकारी बंधु पात्रोंको देखकर भक्तिसे प्रशंसा करते है ॥६०॥ या प्रक्षाल्य पदद्वयं निजपतेः संप्रार्य गंधादिभि-। 'स्सा विक्षिप्य सुमं तयोर्नमति सा पुण्यानुकूळांगना ॥ सा साध्वी च पतिव्रता निजगुणद्वेषे च रागे समा। तस्मात्पर्य सुरोद्भवं, मुखमळ, निर्वाणपति क्रमात् ॥६१॥ अर्थ जो स्त्री अपने पति के चरणकमलोंको धोकर 'गंधादियोंसे पूजा करती है व वंदना करती है वह सी पुण्यवती है। साध्वी है, पतिव्रता है, उसके गुणके प्रति कोई द्वेष करें या अनुराग करें, दोनों में उसके हृदय में समान भावना है । ऐसी साधीमणिको पानेवाला पुरुष धन्य है । वह स्वर्गकी देवताओं के द्वारा भागने योग्य सुखको; यापर पाता,दै । एवं क्रमसे उसे मुक्तिलक्ष्मी भी प्राप्त होती है ।.६१. ॥:: दानकार्यमें पर्य. क्षुदितो मुखवारि गिरनशुची रोगी जुगुप्सकोऽक्षिविषः ॥ मुनिहस्तकवलदाने लुब्धो नाभीष्टवस्तुदानाज्ञः ॥ ६२ ॥ अर्थ-मुनियोंको आहारदान देते समय भूखेको, मुंहसे पानी गिरनेवाले को, अशुचीको, रोगीको, ग्लानीको, मेत्रदोषीको; लोभीको व निर्दोष व प्रकृति के अनुकूल पदार्थ देने के विषय में मुर्खकोवर्ण करना चाहिये अर्थात् ऐसे व्यक्तियोंको आहारदानके कार्य में नहीं लेना चाहिये ।। ६२ ।। . - दाटलक्षणविधिः, - . ।" - " - 'दानमें प्रशस्त. शुचिः पटुः साधुमनोनुकूलपथ्यान्नदाने निपुणोऽनुरागी॥ मुदृग्वती दप्तमनाः श्रमघ्नो भुक्तिमदाने यतिनां प्रशस्तः॥६॥ अर्थ-मन, वचन, कायसे शुद्ध दानकार्यमें निपुण साधुयों के मनके अनुकूल संयमवर्धक पथ्य आहारको देने में समर्थ, धर्मानुरागी, सम्यग्दृष्टि, प्रती, तृप्त मनवाला, साधुवोंके श्रमको दूर करनेवाला, यतियोंके आहारदान में प्रशस्त है । ६३ ।। सूनकी व माहारदान. स्नाता चतुर्थदिवसे पक्तुं योग्या-तु दानयोग्या न ।। -दत्तेऽन तु सया सा उत्तरजन्मनि च पुत्ररहिता स्यात् ।। अर्थ-रजस्वला स्त्री चौथे दिनमें स्नानसे शुद्ध होकर घरमें 'रसोई बना सकती है । वह रसोई घरवालोंके ही काम में आसकती है । वह चौथे दिन मुनिदान नहीं दे सकती । यदि इस आज्ञाको उल्लंघन कर यह दान देवे तो उत्तरभवमें संतानविहीन होती है अर्थात बंध्या होकर उत्पन्न होती है ॥ ६४ ! दत्तेऽनं सूतकी.या स्यादवीरा साग्रजन्मनि ॥ न कुर्यात्मतकी दानं पूजां दुर्गतिदुःखकृत् ॥ ६५ ॥ अर्थ-स्तकी स्त्री यदि मुनियोंको दान देवें तो वह आगे के जन्ममें पुत्रसंतानसे रहित होकर उत्पन्न होती है। इसलिए सूतको दान व देवगुरुपूजाको न करें । अन्यथा षड, नरकादिदुर्गतिको प्राप्त करती है ॥६५॥ स्वहस्तकर्तव्य. धर्षेषु स्वामिसेवायां पुत्रोत्पत्तो श्रुताद्यमे ॥ भैषज्ये भोजने दाने प्रतिहस्तं न कारयेत् ।। ६६ ॥ N २०० दानशासनम् , .. अर्थ-धर्मकार्य में, स्वामिसेषामें, पुत्रोत्पत्ति में, शास्त्र स्वाध्याय में, धौषधग्रहणमें, : भोजनमें व दानमें प्रतिहस्त व्यवहार नहीं करना चाहिये अर्यात् इन कार्यों में अपने बदले दूसरों से कार्य चलानेका प्रयत्न नहीं करना चाहिये। ये कार्य स्वतः ही करने योग्य हैं ॥६६॥ दानफल. श्रीमज्जैनमुनीश्वरेण रचिता भिक्षा हि यस्यालये । पंचाश्चर्यमिहाभवत्सवचनं तत्तच्छुते विश्रुतम् ॥ मुख्यं चाहतिदानमेव मुनयो नित्यं वदंत्युत्तमा । दातारो महदमदानममलं कुर्वत संतस्सदा ॥ ६॥ । 'अर्थ-जिस घरमें निर्मल चारित्रधारी जैनमुनियोंने आहार प्रहण किया उस वरमें पंचाश्चर्यादि हुए यह बात शालोमें सुनी जाती है। सर्व दानोमें,मुख्य *आहार दान है। इसलिए सज्जनदानियों को उिचित है कि वे सदा सर्व दानों में श्रेष्ट व पवित्र अन्नदान को सदा करें ॥६७ ॥ आहार और आदर सद्यो जार्यति सादरातिमधुरा दत्ताहतिर्या तयो- । नश्यत्याईचणो यथा जजति न ध्रौव्यांयुबच्चादरः ॥ अंतर्वापरार्थदा च सकला भावेन भावार्पिता। सद्भावाश्रितपुण्यराशिमतुलं मोद्भावयंत्यन्वहम् ॥ ६८ ॥ अर्थ-गुण्यार्जन करनेमें तत्पर श्रावकोंको उचित है कि परम आदरके साथ उत्तम पायोंको आहारदान देवें । उन दोनों । आहार. व भादर ) में आहार तो उसी समय जीर्ण होता है । परंतु आदर - . . * मुसेऽक्षि मुख्य द्रविणे च धान्य शास्त्रे च मुरयो विमला गमन दानेपु सद्य फलमभदानं लोकेषु सर्वेपुमनुप्यलोकः ॥
दानफलविचार चिरकाल तक रहता है । जिस प्रकार गाला चना मट्टीमें पड़कर एकदम नष्ट होता है, उसी प्रकार आहार जीर्णताको प्राप्त होता है। परंतु उत्पन अंकुर नष्ट नहीं होता है उसी प्रकार आदर तो नष्ट नहीं हो सकता है। मावशुद्धिके द्वारा दिया हुआ आहार अपने आरमाके लिए हितकर अंतरंग रत्नत्रयादिकको उत्पन्न करनेमें सहायक होता है व बहिरंग ऐश्वर्यादि विभूति को उत्पन्न करनेमें साधक होता है । इमलिए.बहुत आदरके साथ प्रतिदिन आहारदान देते हैं अनुपम पुण्यराशिको संचित करते हैं ॥ ६८ ॥ आघारं त्वमृतं पदंति मुधियः पीतस्स सद्धर्मव- होपान्हंति मुखं करोति दहने क्षिप्तः समस्तं दहेत् ॥ धर्मस्सद्वदयं वनेन मनसा पुण्येऽर्पितः पुण्यदः । पापे पाप उशंति नाविकमनो वार्ड्स यया वर्तते ॥१९॥ अर्थ--बुद्धिमान् लोग घृतको अमृतके नामसे कहते हैं । यदि उसे कोई पी तो सद्धर्मके समान शरीरके समस्त दोषोंका नाश फरसा है। यदि अग्निमें डाल दिया तो सबको जला भी देता है। इसी प्रकार इम धर्मको भी इस मनके द्वारा पुण्यकार्यमें उपयोग गाया तो पुण्या- जन होता है, पापकार्यमें उपयोग किया तो पापार्जन होता है, जिलाकार समुद्रमें जहाजको जुबाना या तारना यह मानिफके मनके भाधीन है अर्थात् यह अपने मनोविचारफे अनुसार कर सकता है इसीप्रकार यह मनुष्य अपने मनको भावनाके अनुसार पुण्य ५ पापका अर्जन करता है ।। ६९॥ दानमादरम्य दानं ख्यातिकरं सदा हितकर संसारसौरपाकरं । नृणां प्रीतिकरं लसवणकर लक्ष्मीकर फिकरं ॥ स्वर्गावसकरं गविक्षयकर निर्वाणसंपत्करं । वर्णायबलबुद्धिवर्धनकरं दानं यं यः ॥
२०२ दानशासनम् . . अर्थ-दामको महिमा मचित्य है, वह त्रिलोकमें कीर्ति करनेवाला है, देहात्महितको करनेवाला है, संसारमें सुखको प्रदान करनेवाला है, सबके प्रेमको संपादन कर देनेवाला है, अनेक गुणोंको प्राप्त करा देनेवाला है, संपत्तिको प्रदान करानेवाला है, इच्छित कार्यकी पूर्ति कर देनेवाला है। स्वर्गगतिको प्राप्त करानेवाला व नीच गतिका नाश करनेवाला दान है, विशेष क्या ? मोक्ष लक्ष्मीको भी प्राप्त करा- देता है, देहकांति, आयु, बल, बुद्धि आदिको बढाता है। इस प्रकारकी विशेषताओंसे युक्त दानको बुद्धिमान् लोग सदा करें ॥ ७० ॥ सद्रूपान्वयवृत्तशीलगुणसच्छिक्षामतिर्लक्षणम् । धान्यं वाहनवस्तुवित्तपितृमात्भ्राभार्यात्मज ॥ चक्रित्वं सकलं शुभं भवसुखं भुंक्त्वाएजन्मांतरें । निर्वाणं कृतिनां भवेत्तदखिलं सत्पात्रदानादिदम् ॥७॥ अर्थ-पात्रदानके फलसे यह जीव सुंदररूप, विशुद्धवंश, उत्तम चारित्र, पवित्र शील, श्रेष्ठ गुण, विशाल ज्ञान, कुशाप्रबुद्धि व शुभलक्षणोंको प्राप्त करता है । एवं धान्य, वाहन, वस्तु, धन, पिता, माता, भ्राता व पुत्र आदि सभी इष्टपरिकरोंसे सुसंपन्न रहता है। सकल चक्रित्वपदको प्राप्त करता है । इसप्रकार आठ भक्तक संसारके उत्तम सुखोंको भोगकर वह मोक्ष साम्राज्यका अधिपति बनता है॥७॥ + सौधर्मादिषु कल्पेषु मायंते पात्रदानिनः । सार्थ रमते निलेशा देवत्रीभिस्सदा नराः ॥ ७२ ।। अर्ध-सत्पात्रदानी जीव सौधर्मादि स्वीप कल्पोंमें जाकर जन्म + अपात्रदानिनः केविन्मृप्या पण्णपतिप्यपि । 'अंतीपु जायते लांगूलेकांघिमानवाः ।। सत्पाधाय प्रदत्तेऽग्ने स्वाफ्या भक्तिपूर्षफम् फुष्टिमानवाः कचिजायते भोगभूमिजाः ॥ .
दानफलयियार
लेते हैं और यहां देवांगनायों के साथ शरहित होकर सदा सुख
भोगते है॥ ७२ ॥
भायव्ययविवेक
आयो वस्तु फियान्च्पयो मम विभज्यालोच्य देवाय यं ।
दानायापि गृहाय चेतसि सदा कुर्यानिमार्यव्ययं ॥
यो वर्तेत भवेती स लभते पुण्यं धनं कार्पिको।
भृत्यायेव परिग्रहाय च करायोपक्षयायात्मनः । ७३
अर्थ-धुद्धिमान किसान सदा इस बातफा विचार किया करता है
कि मेरे खेतमें उत्पन्न कितना होगा, और व्यय कितना होगा । उससे
खेती करनेवाले नौकरोंको मुझे कितना देना होगा। मेरे कुटुंबाजनोंको
कितना देना होगा। सरकारी कर कितना भरना होगा एवं बीज
भादिका खी व अन्य खर्चा कितना होगा । इत्यादि प्रकारसे आय-
व्ययको विचार कर खेती करनेसे उसे लाभ होता है । इसी प्रकार
पुण्यधनको अर्जन करनेवाला श्रायफ इस बातका विचार करें कि मुझ
आय कितना है और व्यय कितना है। मेरी संपत्तिसे देवपूजाके लिए
कितना लगाना है । दानके लिए फितना लगाना है । कुटुंबियोंके
पोषणके लिए कितना लगाना है । मुझे उसे किस प्रकार उपयोग करना
चाहिये । इत्यादि विषयको त्रियकपूर्वक समझकर धनका उपयोग करें
तो बाह्यसंपत्ति के साथ अंतरंग संपत्ति { पण्य ) भी बढती
आपव्ययमनालांच्य यो व्ययत्यनिशं स ना ।
विनश्यत्सर्वदा तस्य मुखं स्वप्नेऽपि दुर्लभम् ।। ७४ ॥
अर्थ-'जो व्यक्ति अपने आयव्ययको विचार न कर व्यय करता
जाता है यह अवश्य ही एक दिन नए होता है अर्थात् उसे दिवाला
निकाटना पड़ता है। उसे स्वप्न में मां सुख नहीं मिल सकता ॥७४||
1
है ॥७३॥
२०४ दानशासनम् - . गुरुसेवा दहति दुरितकसं जन्मबंध लुनीते । वितरति यमसिद्धिं भावद्धिं तनोति ॥ नयति जननतीरं ज्ञानराज्यं च दते । ध्रुवमिह मनुजानां वृद्धसैवैव साध्वी ।। ७५ ॥ अर्थ-- इस संसारमें जिनभक्तों के द्वारा की ई वृद्धसेवा अर्थात् गुरुजनसेवा बनाग्निके समान पापारण्यको जला देती है, दातृजनोंके जन्मबंधको नाश करती है । आजन्मव्रत धारण करनेका सामर्थ्य प्रदान करती है, भावशुदिको प्राप्त कराती हैं, विशेष क्या ? इस संसारक तारपर इस आत्माको ले जाकर ज्ञानरान्यमें आधिष्टित करती है |७५॥ असहमिह दरिद्रं मारयत्याशुलक्ष्मी- । रगद इव विशिष्टो दुष्टरोगानशेपान् ॥ गिरिमिव पविरात्मा शेषपापं निहन्ति । ध्रुवमिह मनुजानां वृद्धसेवैव साध्वी ॥ ७६ ॥ अर्थ-गुरुजनोंकी सेवाके फलसे ही असहनीय दरिद्रता भी दूर होकर लक्ष्मीको प्राप्ति होती है । अमृतौषध . जिसप्रकार : समस्त रोगोंको दूर करता है, वज्रायुध जिस प्रकार पर्वतको तोड देता है इसी प्रकार यह गुरुसेवा आत्माके समस्त पापोंको नष्ट करता है । ७६ ।। रविरिव दुरिताख्यं नाशयत्यंधकार । पटुतरजठराग्निः क्षिपमाहारदोषान् ॥ भवभवकृतकमव्यापदग्रापयादीन् । ध्रुवमिह मनुजानां वृद्धसेचैव साध्वी ॥ ७७ ।। अर्थ--यह वृद्धसैघा सूर्य के समान पापरूपी अंधकारको नष्ट करती है। तीन जठराग्नि जिस प्रकार आहारफे समस्त दोपोंका नाश दानफलविचार २०५ - करती है उसी प्रकार भयभवमें अर्जित कर्मसम्ह व तत्फलरूप दुष्ट रोगादिकोंको शीघ्र नष्ट करती है ।। ७७ ॥ निजपतिवदनाग्रे येन सेवा कृतातो'। हृदि जनितमहोऽसौ तस्य-भाग्यं ददाति ॥ अविळयमिह राजा नित्यसौख्यं च दत्त । भुमिह मनुजानां वृद्धसैवैव साध्वी ॥ ७८ ॥ अर्थ-लोकमें देखा जाता है कि किसी सेवकने स्वामीको सेवा निष्ठापूर्वक की तो स्वामी उससे प्रसन्न होता है, और उस प्रसन्नता व उत्साहसे उस सेवकको अनेक संपत्ति को प्रदान करता है । उसकी संपत्ति बढती हुई, क्रमसे वह नित्य सुखको प्राप्त कर लेता है। इसी प्रकार यदि गुरुजनोंकी सेवा की तो यदि वे प्रसन्न हो जाय तो उस प्रसन्नताके उत्साहमें वे भक्तोंको पुण्यधन प्रदान करते हैं, उसके द्वारा उस सेवककी संपत्ति बढकर क्रमशः वह निन्यसुखको प्राप्त करता है। इसलिए आत्महितैषी भव्योंको उचित है कि वे सदा गुरुसेवामें तत्पर रहें ।। ७८ ॥ वृद्ध कौन है? . . चयस्तपोज्ञानकुलैविशुदैरखंटितवारुचरित्रवर्गः । । विशुद्धपुण्यैरभिवृद्धिमेति स एव वृद्धो वयसा न वृद्धः॥७९॥ अर्थ---विशुद्ध आबाल्य अनशनादि तप, ज्ञान, कुल, अखंरित- चारित्र व विशुद्ध पुण्यके द्वारा जो बड़े हैं व बढ़ते हैं उनको वृद्ध कहते। है, उमरसे जो यूढे है उनको वृद्ध नही कहते हैं। परंतु इन बातोंसे जो बढे हैं उनको वृद्ध या गुरु कहते हैं ।। ७ ।। पो गुरुसेवा माध्वी करोति तस्यालयेऽत्र पंचाश्चर्य । अभवदिति शास्वसिद्धं कर्तव्या सर्वदा हि गुरुसेवा ।।८०॥
दानशासनम् . अर्थ----जो त्रिकरण शुद्धिपूर्वक उत्तम पात्रोंकी सेवा करता है उसके घरमें पंचाश्चर्य वृष्टि होती है यह शास्त्रसिद्ध विषय है । अतएष सदा गुरुसेवा करनी चाहिये ।। ८० ॥ धर्मेऽयुधी भे समये चतुर्थे रत्नाश्रिते शुक्तिपुटे 'सुपात्र । दत्ता सुवार्जा इव सति मुक्तास्ते दावलोकास्तु किमत्र चित्रं ॥ अर्थ-जिसप्रकार रत्नके आश्रयभूत समुद्रमें स्वाति नक्षत्रमें शरद् ऋतुमें सीपके पुटमे पडे हुए जलबिंदु मुक्का (मोती) होते हैं, उसी प्रकार रत्नत्रयके आश्रयभूत धर्मरूपी 'समुद्र में चतुर्थकालमें उत्तम पात्रमें उत्तम दातायोंके द्वारा दिये गये भाहारोंसे वे दाता मुक्त होते हैं इसमें भाश्चर्य की क्या बात है ॥ ८१ ॥ पुण्यावानदाता वित्तं नास्ति तदस्ति चेदपि मनो नो तत्तदस्तीति चे-! नास्तीपत्मुसहायता तदपि तत्सा चास्ति चेन्नास्ति यत् ।। पात्रं तत्तदपीह सा तदपि चत्संतीति यस्यानिशं ॥ सिमं भावसमुद्रपारंगतवानाहुस्तमेकं बुधाः ॥ ८२ ॥ अर्थ-लोकमें दाताके लिए उपयुक्त सभी परिवारोंका मिलना बड़ा कठिन है । दाताको यदि दान देनेकी उत्कट भावना हो तो उसकी पूर्ति के लिए कहीं धनका अभाव है, कदाचित् धन हो तो मनका अभाव रहता है । मन और धन दोनों रहनेपर उसे दूसरोंकी सहायता नहीं मिलती । कदाचित् धन हो, मन हो, दूसरोंकी सहायता भी हो तो उत्तमपात्र नहीं मिलते हैं । इसप्रकार कुछ न कुछ न्यूनता रहती है। ये सभी बातें जिस दाताको एक साथ मिलती है वह सचमुचमें धन्य है । उसे बुद्धिमान लोग संसारसागरके बिटकुल तारमें पहुंचा हुआ 'कहते हैं ॥ ८२ ॥ 4 दानफलविचार २०७ .... . । आहारदानमें सर्वदान समस्तपो दया धर्मः संयमो नियमो यमः । सर्वे तेन वितीर्यते येनाहारी वितीर्यते ॥ ८३ ॥ अर्थ-जिस दाताके द्वारा माहादान दिया जाता है उसके द्वारा समता, तप, दया, धर्म, नियम व यमरूपी संयम आदि सभी गुण दिये जाते हैं ऐसा समझना चाहिये । आहार ग्रहण करनेसे इन गुणों की वृद्धि होती है ॥ ८३ ॥ गुरुभक्तिफल गुरुपदनतेस्मुगोत्रं तदुपास्तेरसर्वसव्यता दानात् । भोगकरी श्रीः पूता कीर्तिभक्तिर्भवेद्गुरून् भजताम् ।।८४] "अर्थ-गुरुवोंके चरणमें भक्तिसे नमस्कार करनेसे उच्च गोत्रका बंध होता है। उनकी उपासना करनेसे स्वतः सबके द्वारा उपारय होता है । दानसे भोगने योग्य अठोट संपत्ति मिटती है । गुरुवोंकी पूजा करनेसे पवित्र कीर्ति, घ यथार्थ भक्ति प्राप्त होती है ॥ ८४ ॥ सम्यग्दृष्टिज्ञानचारित्रबद्भ्यो। योगिभ्यो यैर्दत्तमाहारदानम् ।। ते सदृष्टिज्ञानचारित्रवंत- स्तेषामात्मा स्याद च्युताब्दी यथार्कः ॥ ८५ ॥ अर्थ-जो दाता सम्यग्दर्शनशानचारित्रसे अलंकृत योगियोंको भाहारदान देते हैं यह स्वयं सम्यग्दर्शनज्ञानचारित्रको धारण करते हैं 1 उन दातावोंकी आत्मा मेषके आच्छादनसे रहित सूर्यविवके समान निर्मल होती हैं ॥ ८५ ॥ उत्तमदाता अपुप्पफलिनः कंटकावृतानस्यसत्फलाः । तृप्तिकदानिनः केचिदुत्तमाः पनसा यथा ।। ८६ ॥ - २०८ दानशासनम् अर्थ-कोई उत्तमदानी पनसके फटके समान रहते है । पनसके फलमें यह विशेषता है कि यह फल पहिलेसे पुष्प नहीं छोडा करता, एकदम फल होता है और फल के बाहरका भाग एकदम कांटोंसे भरा हुआ रहता है । परंतु अंदर फल बहुत व मिष्ट रहता है । एवं खानेवालोंको तृप्त कर देता है। इसी प्रकार उत्तम दाता भी रहते हैं। पनस जिस प्रकार पहिलेसे फूल छोडकर लोगोंको फल होनेकी बात प्रकट नहीं होने देता है, उसी प्रकार उत्तमदाता भी 'मैं दानी हूँ' इस प्रकार लोगोंको डिंडोरा पीटकर नहीं बतलाया करते हैं। अनेक कंटक घ आपत्तियों से घिरे रहनेपर भी दूसरोंको सफल ही देनेवाले, उपकार करनेवाले एवं पात्रों को तृप्ति करनेवाले थे दानी रहते हैं ॥ ८६ ।। सकुसुमफलवन्त आम्राः फलानि यावच्च संति तावदिमे । तरतमफलानि ददते यथा तथा दानिनो विराजते ॥८॥ अर्थ-जैसे आम्रका वृक्ष पहिले फूल छोडकर बादमें फलको छोटता है अतएव उममें अनेक प्रकारके तरतम फल होते हैं। इसी प्रकारके भी दानी लोकमें होते है ।। ८७ ॥ सत्पात्रदान फल. राजेवामलसौख्यदार्थमनिशं दत्ते च दोषान्व्यधा। मंत्रीशशु तिरस्करोति मुगुणाव्यक्तीकरोतीव सन् ॥ क्षुद्रान्यकुमतेऽवद्भिपरिवाशेषामयान्मोचय-। त्येनो भेदयतीति धर्मगुरुवन्मातेव रक्षत्ययः ॥ ८८ ॥ अर्थ-सत्पात्रदानसे उपार्जित पुण्य इस मनुष्यको राजाके समान भनेक उनम पदार्योको सदा प्रदान करता है। मंत्रीक समान दोष य चिंताको दूर करता है। सम्जनोंके समान सुगुणोंको व्यक्त करता है। सूर्य के समान शुद्रोंका तिरस्कार करता है। वैद्यके समान समस्त दानफलविचार रोगोंको दूर करता है । धर्मगुरुके समान पापको दूर करता है, विशेष स्था ? साक्षात् माताके समान संरक्षण करता है ॥ ८८ ॥ 'भूतादावपि वज्रपंजरवदध्यादौ तरंडो यथा । शीते वहिवदौष्णिके हिमगुवद्रोगेऽपि पीयूषवत् ।। ज्ञाने वागिव दर्शने तरणिवा जयं दुर्जये । कुर्याद्धावति वारि वाघविपिनं भस्पीकरोत्यग्निवत् ॥८९॥ अर्थ--सत्पात्रदान से उपार्जित पुण्यफल भूतप्रेतादिफ की बाधामें वनपंजरके समान रक्षण करता है, समुद्र में तरणसाधनफे समान बचाता है, कडक शीतमें अग्निके समान, उष्णकाटमें चंद्रके समान, रोग, अमृतके समान, ज्ञानमें सरस्वती के समान, दर्शनमे सूर्य के समान, दुर्जय युद्ध में जयलक्ष्मीके समान संरक्षण करता है । जलके समान पापोंको धो डालता है। पापरूपी जंगलको अग्निके समान जला देता . पुण्यस्थरूप. शुक्त्यंतःस्थितमुक्तव । करंडस्थितरत्नवत् ।। अब्दावृतावत्पुण्यं । कुंभातस्थितदीपयत् ।। ९० ॥ अर्थ-- वह पुण्य सीपके अंदर छिपी हुई मोतीके समान, फरण्डमें स्थित स्नके समान, वादलसे छिपे हुए सूर्यके समान, कुंभके अंदर रखे हुए दीपकके समान इस आत्मप्रदेशमें अंतर्जन होकर रहता है ॥ ९ ॥ पुण्यकी प्रवलसा. न हन्यते तथा पुण्यं दुप्कृतन.मनागपि । गाधभूमिगतैरंडवीजयच्छणिको यथा ॥ ९१ ॥ 'अर्थ:-यदि इस जीवन विपुल पुण्यका संचय किया तो उस पुण्य २१० दानशासनम् को पापकर्म नाश नहीं कर सकता है। जिस प्रकार जमीनमें थोडा खोल गया हुआ एरंड का बीज नष्ट नहीं होता है । जैसे श्रेणिक राजाने मुनियों को उपसर्ग किया तो भी उसका प.प उसके . पूर्वसंचित विपुल पुण्यके होनेसे उसका अधिक घात नहीं कर सका, उस पुण्यके बलने आगे उसने तीर्थकर प्रकृतिया बंध किया ॥ ९१ ॥ भक्तिविशेष. यापयति यापयिष्यति, साधनस्वयमेच यः पुमाननिशं । पूर्णाक्षयाकलंकाविनाभयदानवान्स मुखी ।। ९२ ॥ स्तंभयति सर्वविघ्नान् प्रजादिपीडाश्च यत्मसादेन ॥ इहपरसुखयुगमयमनुभूत्वा मुखपनंतपपि लभते ॥ ९३ ॥ अर्थ-तो श्रावक साधुओंको पात्रदान देकर स्वतः उनको भेजता है या अनेक सजनोंके साथ भक्तिसे पहुंचाता है यह पूर्ण अक्षय, अकलंक व विधनरहित अभयदानको प्राप्त करता है व सुखी होता है। जो धायक साधुवोंके मार्गमें आये हुए सर्व विघ्नोंको दूर करता है, प्रजा आदिस उपन्न पीडायों को दूर करता है, वह उस पुण्यके प्रसादसे इहरसुखको प्रकार अनंतखामक मोक्षको भी प्राप्त करता है ॥ ९२ ॥ ९३ ॥ स्वक्षेने कृषिको यथा त्वभयदागत्युक्तिभक्त्यन्वितः । स्वां भार्यामिद यापयन्निव सदा तत्चातगेहे प्रभुः ।। रामा वा निज नीवृत त्वभयदानयुक्तिभक्तिर्विना । दत्वानं स परं सुखं च लभते पात्राप दाता कयं ॥११॥ अर्थ-जिसप्रकार किसान अपने क्षेत्रमें अन्यधिक श्रद्धा व भक्तिो युक्त होकर उसके संरक्षण करनेके लिए प्रयान करता है। एवं जिसरकार कोई सजन अपनी भार्याको उसके पिताके घर बहुत सुव्य- वस्था के साथ पहुंचाता है। जिस प्रकार कोई राजा अपने प्रजार्गको दानफलविचार २११ बहुत ही आदरके साथ पालन करता है तब वे मुखी होते हैं। उसी प्रकार बहुत आदर व भाक्तिके साथ जो श्रायफ दान देते हैं ये सुखी होते है । विनामक्तिके आहारदान देने से सुखी कैसे होसकते हैं? कभी नहीं ॥ २४ ॥ अंतरायफल भिक्षाकालेन्तरायांत्रिकरणजनितान्येऽत्र कुर्वति तपा। चेतस्थी योग्यलक्ष्मी क्षपयति स च यो बाबालक्ष्मी यलाख्यां। वाक्यस्थो देहिवाचं स्थगयति सकलं जाड्यगाद्गघमौक्यं । शारीरो देहसाताकरयुवतिधनाहारभूपादिनाशम् ॥ ९५ ॥ अर्थ-साधुयोंके आहारके समयमें जो व्यक्ति मन वचन कायसे उनको मानसिक, याचिक व कायिक आघात पहुंचाते हुए विध्न करते है उनको उस पापके फलसे अनेक प्रकारसे हानि उठानी पडती है । यदि मानसिक क्षोम साधुवोंको पहुंचाया हो तो उस पापीका मानसिक सामर्थ्य व बल कम होता है। एवं बाह्यलक्ष्मी मी घट जाती है। यदि वाचनिक अंतराय हो तो उस पापीके लिए याचनिक शक्तिकी हीनता होती है । वचनमें जाड्यता [ अज्ञान ] बढता है, गद्गदता अर्धाद तोतलापना आता है । विशेष क्या ? क्रमशः मूकता ही भाती है । यदि देह- संबंधी विघ्न किया हो तो देहका सुख, स्वीसुम्प, धन, आहार, आभरण आदि का नाश हो जाता है ॥ ९५ ।। सुकृती व पापीका जीवन उप्तं कदल्पा इव कंदयुम्म सम्पन क्रियायां फलति द्रुतं तत् । दर्शन किंचित् फलपक्रियायो पापी चिरायुः मुनी गतायुः ॥ ९६ ।। , २१२ दामशासनम् , अर्थ-लोकमें देखा जाता है कि पापियोंका जीवन दीर्घ हुआ करता है, पुण्यात्मा लोग अल्पजीवी होते हैं । इसका क्या कारण प्रकृति ही ऐसी है। लोक में फेलेका वृक्ष व एक जमीकंद इस प्रकार दोनोंका बीज बोनेपर केलके वृक्षको देशकालोचित अनेक क्रियाओंके करने पर भी फल कम देता है। परंतु थोडीसी क्रिया करनेपर भी फंद अधिक फल देता है । इसी प्रकार पापियोंका जीवन अधिक होता है, पुण्यात्माओंका जीवन अल्प होता है ॥ ९६ ॥ उपकार्यपात्र स्वशामित्रकृतोपकारविधिना भृत्यांगनानां भयं । सद्यस्तत्पतिना भवैदिव सदा तत्कर्म संवर्जयेत् ।। पुष्यात्पात्रमुबंधुसेवफसतीपुत्रादिकान्मीतितो ।' नित्यं नान्यंजनाय धर्मनिपुणैर्दानं च देयं वृषात् ॥९७॥ अर्थ-लोकमें देखा जाता है कि अपने स्वामीके शत्रुओंको किसी सेवकने उपकार किया तो उससे स्वामी क्रोधित होकर अनेक प्रकारसे हानि कर सकता है। इस प्रकार का भय उन सेयकोंको. व उनकी त्रियोंको सदा रहता है। इसलिए ऐसे कार्यको कभी नहीं करना चाहिए। बुद्धिमानोंको उचित है कि सपार, अपने उत्तम बंधु, सेरका, अनाय लियां, बालक आदिका अपने धनते.पोषण करें। अन्य जनोंको देने की जरूरत नहीं ॥ ९७॥ भक्तिफल किं दुष्टाः पुरि सावधौ तलवर दोषान्यथा कुर्वते । पुष्ट्रियन पले यदीयमहसा लोकेषु नो वैरिणः ॥ राश्चांतरिताः प्रणश्यति तमः मूर्ये निरभ्र यया। भक्तिमरले जने गुरुनने यस्यारत्यचं नस्य न ॥९८॥ . -- वानफलाविचार अर्थ-यदि कोतवाल सारथ रक्षा तो नगरमें चार जार मादि दुष्टोंफा कोई भय नहीं रह सकता है, इसीप्रकार यदि यह मनुष्य विवेकी रहा तो उसके लिये दोषोंका मय नहीं रहता है। राजाने यदि अपनी प्रजा व सेनावों का संरक्षण बहुत प्रेमके साथ किया तो उसे शत्रुवोंका भय नहीं रह सकता है, क्रूर उससे दूर जाते हैं ! जिसप्रकार सूर्यके निरभ होनेपर अंधकार चला जाता है, इसी प्रकार धर्मप्रेमसे गुरुजनों के प्रति मक्ति जो मनुष्य रखता है, उसके पास पापदोप आदि नहीं ठहरते हैं ॥ ९८ ॥ देयपदार्थ राजा चौरवदन्यवित्तहरणे नानाविधोपायवान् । राजासायचिराविनश्यति बलातद्विचमेनोवहम् ॥ वयं सद्व्यवहारवृत्तिनिपुणः पूतार्थचिद्वा विदन् । वैश्यः साधुजनार्जितं हितकरं दाता स एवोत्तमः ॥९९॥ अर्थ-कलिकाल के फोई २ अविवेकी रामा प्रजायोके द्रव्योंको अपहरण करने के लिए अनेक प्रकारके उपायोंफो करते हुए चोरोंके समान आचरण करते हैं। ये राजा पापके उदयसे शीघ्र नष्ट होते हैं। उनका द्रव्य पापोर्जित है, उस दत्यको पात्र- दानादि पवित्र कार्यमें कभी महण नहीं करना चाहिये। परंतु धर्म- कार्यमें सदा उत्तमदल्यको ही ग्रहण करना चाहिये व्यार्जन करने- वाले वैश्योंको उचित है कि ये न्यायमार्गसे द्रव्यार्जन करें, सयवहार वृत्ति निपुण वैश्य होना चाहिये अर्थात् निर्दोषतास व्यापार करना चाहिये । व्यापारके लिए वह जिस सगय अन्य देश द्वीपांतर आदिम जाता है, उस समय वह अपने बंधु, बारव, पिता, पुत्र, कलत्र भारियांसे मोहका परित्याग कर दीक्षित होनेवाले साधुओके समान दीक्षित होना चाहिये । अपने गुरु के द्वारा निरूपित सद्धर्मा श्रवण कर इनके द्वारा २१४ दानशासनम् उपदिष्ट तत्वों के अनुकूल प्रवर्तन करने की तैयारी उसमें होनी चाहिये, प्रस्थानको लेकर पुरप्रवेश तक सामधिक दीक्षासे दीक्षित होना चाहिये । कहा भी है- रोगे विदेशगमने जिनोत्सवे धर्मकार्यकरणेषु । रणरामांगणगमने सुननोऽवधिदीक्षितोऽत्र भवितव्यः । रोगकी हालतमें, विदेशायाणमें, जिनोत्सबके प्रारंभमें, धर्म- कार्यके प्रारंभमें, युद्ध को जाते समय, राजमालको जाते समय, सज्जन को उचित है कि वह उस कार्यकी पूर्ति होने तक कुछ न कुछ नियम बत आदि लेवें। अपने स्वामी, गुरू, विद्वान् धार्मिकजनोंकी सेवा करने योग्य एवं पुण्यसाधक परिग्रहोंके संरक्षण करने योग्य अर्थको उपार्जन करने के लिए मनुष्यको उद्योग करना चाहिये । व्यापारदिक कार्य में जाते समय दुर्धर उपसर्ग करनेवाले चोर दुष्ट मृग सादिकके द्वारा कोई आपत्ति आयें तो उसे निराकरण करने के लिए उसे समर्थ रहना चाहिये । आवश्यकता पडे तो राजा व उनके भृत्योंको धनादि दानसे परितुष्ट करें और लोगोंको संतुष्ट करनेवाले वचनोंको बोले, अपने लिए व्यापार करने योग्य नगरमें प्रविष्ट होकर अपने हृदयमें अत्यंत दयारसपूरित भावनाओको रखते हुए सर्व व्यवहारिक जनोंके साथ अनुकूल प्रवृत्ति से व्यवहार करें। विविध विषयों को प्यानमें लेकर द्रव्योपार्जनकी वृत्ति दूरदर्शितासे काम लेवे । जिस पदार्थक लेनेसे कोई प्रकारकी हानि नहीं हो ऐसे पदार्थीका संग्रह करें। अपने वचन को दृढ़ता से साधन करें। लोकव्यवहारकोदेखें। ऐसे निर्दोष व्यवहारसे जो व्यापार करता है उसका धन पात्रोंको दान देने योग्य है। क्यों कि यह वैश्य स्वतः साधुजनोंफे समान वृत्ति रखकार धनार्जन काता, वही हितकर है [वी उत्तमदाता कहलाता ।। ९९ ॥
दानफलविवार
धर्माप्मासाकार
धर्मप्रभावनाये ये वाकायास्सहायिनः ।
तषां मियोक्तिभिश्चित्तं तर्पपेटुचितधनः ॥ १०॥
अर्थ--धर्मनभावना करने के लिए जो मन पचन कायसे व धनसे
सहायता करने है उनका प्रियवचन व उचित पोंसे साकार करना
चाहिये ॥ १० ॥
येन केन च मत्पैन धर्मकार्य प्रवर्द्धते ।
कर्तव्या सत्कृतिस्तस्य चित्तक्षाभं न कारयेत् ॥१०१
अर्थ-जो व्यक्ति धर्मकार्यकी वृद्धि करता है, उसका सकार
करना चाहिये उसके चित्तको क्षुब्ध नहीं करना चाहिये ॥१०१॥
दानफल
दत्तं दानमयाचिते सचिभवं पात्रे ददात्यद्भुतं ।
देवाद्याचितदत्तमल्पविभयं संगार्थनाजायते ॥
नीता तत्समयं मनः कलुपयनल्पेऽपि दत्ते सतां ।
निस्वं क्लेशकरं शपंतमनृतं भूपं भजत्यत्र ते ॥ १०२ ॥
अर्थ-अयाचित पत्रमें दान देनेपर उसके फलसे चक्रवर्ति
देवेंदादिक विभव प्राप्त होते हैं। याचितपात्रमें दान देनेसे अल्प
विषय प्रास होता है । यदि पाउने अधिक प्रार्थना की, दाताने दानके
समयको टालकर मनको संक्लिष्टकर दान दिया तो यह दरिद्री होता है,
धन मिले तो भी उस धनसे कष्ट हो होता है । उस मनुष्यका धन
दुष्ट गजाको सेवन करनेवाले के समान है ॥ १०२ ॥
दातुचात्सल्य
माता-पत्रीसौग्य संरक्षणाभ्यां ।
भीत्या तं जामातरं रक्षतीय ॥
दाता सद्धर्मापारमेनं ।
स्वनार्थेनानारत सजावम् ॥ १३ ॥
वानंशासनम् अर्थ-जिसप्रकार माता अपनी पुत्रीको सुखके साथ संरक्षण करने के उद्देश्यसे जगाईका रक्षण करती है, उसीप्रकार सद्धर्मको उप- कार करनेवाले समस्तजीवोंको अपने द्रव्यसे उपकार करना चाहिये ।। १०३ ॥ मिथ्यादृष्टि होनेपर भी सहकार धान्यानि लब्धं कृषिको ददाति । क्षेत्रक्रियाकारिजनाप वित्तम् ॥ 'यथा तथैवात्मपक्रिया ये । कुर्वति तेभ्यो द्रविणो विदद्यात् ॥ १०४ ॥ ' अर्थ-जिस प्रकार अष्टादश प्रकार के धान्योंको प्राप्त करने के लिए किसान लेत करनेवाले मनुष्योंको धनादिकको देता है, इसी प्रकार अपने धर्मको-को करनेवाले जो सजन है, उनको धनादिक देकर उपकार करना चाहिये ।। १०४॥ - . श्रद्धानफल 4 --- 44 निर्दोपसन्दुक्चरितं चिदंतं ग्रामीणदेयाश्च नरा दयते । सम्पमयाधां परिहार्य तस्मानिर्दोपभक्तिं कुरु अनधर्म ॥१०५ अर्थ-निर्दोष सम्यग्दर्शन व चारित्रको धारण करनेवाले भव्यकी अनेक बाधाओंको भी दूर फर प्रामीणदेवतायें, जलदेवतायें व धन- देवतायें एवं मनुष्यंगण रक्षण करते है। इसटिए हे सत्य ! जिनधर्म में विशिष्ट भक्तिको करो ॥ १०५ ।। स्वग्रामातसैनिकं च नुपनि शप्पत्यसो किं नृपो। योद्धारं शपतीह कि रिपुचरप्ट्यां क्षमाशंसति ।। चित्रं मृडजनः शपत्यनुदिनं निष्कारणं तिष्ठ भी। पुटेपु श्वसु भिक्षुकोऽपि विहरवीयर्यापु मौनी यथा ।२०६॥
दानफलविचार २२७ अर्थ-जिस प्रकार वीर राजा अपने नगरको घेरे हुए शत्रुराना व उसकी सेनाके योदायोंको गाली नहीं दिया करता है, उलटा उनकी वीरताको देखफर प्रशंसा करता है, उसी प्रकार सबको अपने आमाको न्यायवृत्तिकी ओर लेजाना चाहिये । परंतु आश्चर्य है कि मूर्ख लोग रात्रिंदिन दूसरे बंधुओंको गाली वगैरह देकर दुर्घचन कहते हैं । परन्तु बुदिमानोंको उचित है कि जिस प्रकार मुनिराजके मार्गमें जाते समय दोनों ओरसे मोटे ताजे कुत्तोंके भोंकने पर मी थे मौन धारण करते हुए जाते है, उसी प्रकार बडे पुरुषोंको ऐसी गालियों की उपेक्षा करनी चाहिये ॥ १०६॥ कुत्तेके समान कृतज्ञ रहो जीवासीत स * रात्रिजागर इव स्वस्वामिसमाप्यवं- स्तस्मिन्कुप्यति मौनवानिह भवाम् स्वस्वामिभक्तो यया। घाते तेन भषन तत्र न दशन् फप्यन् कृतज्ञो यथा भक्तः स्वामिनि जागरोऽयतिमिरे भूत्वा कृतज्ञो पे ।।१० अर्थ- सुखार्थी जीव ! तू कुत्ते के समान कृतज्ञ बनना सीख ! जिस प्रकार यह कुत्ता अपने स्वामीके मुखसे निद्रित होने के बाद स्वयं जागरण करते हुए अपने मालिकके ही नहीं अडोस-पडोसके घरको मी संरक्षण करता है। स्वामी यदि उसपर क्रुद्ध हुआ तो यह मौनधारण कर लेता है, इतना ही नदी यदि स्वामीने उसे मारा तो भी अपने स्वामीको काटता नहीं, भोंकता भी नहीं, सक्ष स्वामिमक ही बना रहता है। इसी प्रकार पापांधफाररूपी रात्रिके होते हुए धर्म व धर्मगुरुरूपी स्वामी प्रति है नीन! तू कृतज्ञ बनना सीखो । समी तुलारा कल्याण होगा॥१०७॥ * जागर्ति स्वामिवर्गऽस्मिन् निद्रितो मौनवान्भवेत् निद्रिते तत्र जानास रानिजागर इप्यते ॥ . २८ पानशासनम् । . . करणत्रयलक्षण ..., मनो राजवदाभाति यहचासत्कलावत् । x: 1. कायः सेवकवत्साहुत्रितयं दावलक्षणम् ॥१०८,1, ...अर्थ-दाताका मन राजाके समान उदार रहना चाहिये। पचनमें सच्छील सतीके समान मितभाषण रहना चाहिए । और कायमें सेवक के समान विनयवृत्ति होनी चाहिये। यही प्रशस्त दाताका लक्षण है॥१८ राजलक्षण या दातृहृदय : अस्मरन्नवदनातु.नस्ति शब्दमसूचयन् । ददामि भाति वाग्वक्ता सदा राजेच दातृहत् ॥.१०९ ॥ अर्थ-राजाका धर्म है कि यह कोई याचक आयें तो नास्ति शब्दका स्मरण कमी हृदयमें भी न करें, वचनसे न बोले, कायसे नास्तिकी सूचना न देखें। परंतु जन्मभर " ददामि" देता हूं, इसी प्रकारकी वृत्ति रक्खें । प्रशस्त-दाताका भी हृदय वैसा ही होना चाहिये ॥१०॥ दातृवचन स्वामी ददेति किं किंतु तद्विदग्ननुशन् ददद । साध्वीजन इवाभाति सर्वदा दाभाषणम् ॥ ११०॥ अर्थ--जिस प्रकार पतिव्रता स्त्री यदि परोसने के लिए बैठी तो, उसके लिए अमुक पदार्थ चाहिये ऐसा कहकर मांगमेकी आवश्यकता नहीं, है। किंतु वही सब कुछ समझकर पतिको जो चीज चाहिये परोसती है, इसी प्रकार यचन अत्यंत संयत होना. चाहिये ॥ ११० ॥ दातृकाय या या नियुक्ता सत्संवा तांता कुर्वन्मुदा सदा। {" - भासते दातृकायोऽयं सेवको भक्तिमानिह ॥ ११ ॥ x भाण्डागारिकवंदचः 'ऐमा भी पाट है । कोषाधिकारी समान (सका वचन है। अर्थात् कोपांधिकारी असे पाचकको अपन सारे बेटे उत्तम दाता भितभाषी रहता है । - -- . 1.
दानफलविचार २१९ 1: अर्थ-जिस प्रकार भक्तिमान् सेवक अपने स्वामी के द्वारा नियुक्त समी सेवावोंको बहुत मकि व संतोषसे करता है उसी प्रकार दाताका शरीर भी हो, यह सदा गुरुसेवा प्रवृत्त हो । १११ ॥ iतामसदान + पात्रापानसमाताश इह हेमादेः परीक्षाविधा- वाहूयांनुचरैरसंस्तुलमसत्कारं स पानं च यः ।।" दास्या पाचितदापितं भृतिधरैर्य हापितं चाहतं तदानं न फलं तु भाटकचितं तत्तामसाख्यं विदुः॥११२॥ अर्थ-जिस प्रकार सुपर्णकी परीक्षा न जाननेवाला अज्ञानी परीक्षा करने में असमर्थ रहता है, उसी प्रकार पात्रापात्रके भेदको न समझनेवाला मज्ञानी अपने नौकरोंके द्वारा उन पात्रों को अपने घरपर बुलवाकर स्तुतिस्तोत्र ५ नमधामक्ति आदिसे रहित होकर, दासी के द्वारा तैयार किये गए भावार को अपने नौकरोंके द्वारा दिलाता है, उस दानका कोई फल नहीं है। वह सो भाडोत्री मनुष्योंको रखकर कमाये हुए धनके समान भाडोत्री दान है, उसे महर्षिगण तामसदान कहते हैं ॥ ११२ ॥ यः शगानी न संतिष्ठेनोत्तिष्ठन्संस्थितोऽपि न । अनुत्थितः पात्रमीक्षन्स दाता गर्विती यथा ॥ ११३ ॥ अर्थ-तामसं दानी दाता गर्विष्ठ मनुपके संमान पात्रोंके भाग- + सुखी दुख न सहते दुस्खी दुसं सुखं सदा यथा ताटनमुपोयं सहते कंटकाशनः ॥ धार्मिका यदि यततं धर्मवित्तेपु पंचकाः ।। तत्रस्थाधार्मिका धर्म पहुव्याजालयंति च ॥ पात्रापात्रासमापेक्ष्यमसरकारमसानते । सासन्यरतोद्योग दानं तामसमूचिरे। 13 दानफलविचार अर्थ-जो दान साधुयोंकी प्रेरणासे किया गया,हे। एकंघटिका मात्रके लिए, साधुवोंके उपदेशसे जिसका भ्रम दूर होकर , दिया गया है। सत्पात्रों के द्वारा अनेक प्रकारसे वर्णन करनेपर, उस. वर्णनरूपी रससे जिसका अंतरंग आई ,होफर दिया गया है, पात्रों के द्वारा उपदिष्ट दयारसके कारणसे जिसका क्रोध व लोभ प्रशमित होकर दिया गया है उसे करुणाके व्यापार करनेवाले साधुजन राजसदान कहते 17 ~ r . .. भक्ति, पूजा "सायिदान' दृष्ट्वाभ्युत्थाय गत्वा मुनिपमपि परीक्ष्याशु नस्त्री यदंघी। दत्वा प्रक्षाल्य पीठं स्तुतिनतिगुणसंकीर्णनेः श्रीतिशाति ; कृत्वैषोल्लोल्प संतर्य च शुभहृदयं दत्तभक्त्या मुनींद्र- ।' स्तृप्तः स्यायेन यत्तद्रधितमभिहितं सात्विकं दानमार्यः।।११७॥ अर्थ-मुनिराजके आते ही उनको देखकर भक्तिसे उठे, उनको देखकर उनके चरणोंमें नमस्कार कर प्रतिग्रहण कर - अंदर ,ले जायें, वापर उचासन देकर पादप्रक्षालन., करें एवं, अनेक प्रकार की स्तुति, आदि करके उनफे मार्गश्रमको निवारण करें, तदनंतर उनको बहुत भक्ति से, त्रिकरण शुद्धिसे आहारदान देकर संतुष्ट करें । साधुगण उसे सात्विकदान के नामसे कहते हैं ॥ ११७ ।। उत्तमादि भेद. 'साविकमुत्तमदान मध्यमदानं तु राजसाख्यं च । सर्वेषां दानाना जघन्यदाने तु तामाख्यं स्पा ॥११८॥ अर्थ-सर्व दानोंमें उत्तम दान साविक दान, गजसदान मध्यम है, और सबसे जघन्य दान तामस दीन है ॥ ११८ ॥ साविकराजसतामसमुत्तममध्यमजघन्यदानमिदम् ॥ 'द्रव्यम्पप एकोऽत्र त्रिकरणभेदेन वन्द्वेत्रिविधम् ॥११९॥ -- ".. + २२२ दानशासनम् . - .. अर्थसात्विक, राजस व तामस जो उत्तम, मध्यम व जघन्य दानके भेदसे कहे गये हैं, उन तीनोंमें द्रव्यव्ययी तो समानता है; अर्थात् द्रव्यव्यय तीनों में होता है। परंतु तीन प्रकारक परिणामों के भेदसे उसके तीन भेद होते हैं ॥ ११९ ॥ असीमव्यवहारका फलं. देशयोगवृषादीनां वर्तन्ते येऽवधि विनां ॥ त एव नाशं गच्छंति सगरस्य सुता इव ॥ १२० ॥ । अर्थ-देश, मन वचन, काय योग, धर्म, स्वस्नी बंधुमित्र आदि के साथ जो, नीति की मर्यादाको उल्लंघन कर व्यवहार करते हैं वे सार चक्रवर्ति के पुत्रों के समान नष्ट होते हैं। अर्थात् उनको अनेक प्रकार से हानि उठानी पडती है||१२० ॥ गर्वले हानि. . मनुते तृणवल्लोकं सगर्वो निस्पृहो 'यथा ॥ स्वयं मुंचति भाग्यं च सगरस्य मुता इव ॥ १२१॥ अर्थ---अहंकारी मनुष्य निस्पृह मनुष्य के समान लोफको तृणवत् समझता है, उसकी करतूतोंसे यह स्वयं अपने भाग्यको खो देता है। जिस प्रकार सगर चक्रवर्तिके पुत्रोंको हाटत हुई । १२१ ॥ यत्रास्ते निस्पृहोऽसौ तृणमिव भुवनं बोधवे पस्स: गर्वी । पर्म देवं गुरूं,घ स्वजनपुरजनान्भूपमंहो न पुण्यम् ॥ कुप्पा अप्पः स सपः फलति परिभवं समुचिरापैः स्पक्त्वा च तस्मादम मन मनुनत्यं धर्ममार्ग स्वभावात्। अर्थ-जिस जिसप्रकार कपादियादिको वर्धन करने या छोकको एक नियमितृण समान समझता है उसी प्रकार गापुरुष - .
दानफलनिगार
भी वर्गापवर्ग सुखसाधनसमर्थ इस सोकको राणके समान मशकर,
वस. मानपाय कारण
गनप्रयामक, धर्म, मियापक
गुरु, स्यजम, पुरजन, राना, स्वयंका पाप, पुल्प, बार किसीको
भी परषाद नही करता है, वह अनेक लोगोंका माजन पनता
है, लोग उसे शाप देते हैं। राना आदिकनारा भी वा तिar
है। इसलिए भापकन्यागी पाइनेयाने भय ! इस गा परियाग
कर , स्यमापसे सद्धर्ममार्गका आश्रय करी । तभी राति
ससा ॥१२२॥
मनरदिप्त दान
मनोजतरण पो दानं फराति स नदी ननः ।
भोगाशक्ती महाभापः पंटोऽन्धनीमनी पथा ।। १२३ ॥
अर्थ-मनको भावना विना जो दान करता है समुपमें
मनुप्प नहीं है, जड है। उसकी हालत महान् भाग्यशादी रोनेपर
भी मोगने में असमर्थ श्रीमंत समान व मांगने की इग्मा पर मो
नपुंसक सांके समान है॥ १२ ॥.
मनी विनर कुरुते दानं पात्राप यः पुमान् ।
शिलास्नानमिरामाति मुवर्णकलमो यया ॥ १२४ ॥
अर्थ-मनको भावनाके बिना जो पापके लिए दान देता है पर
दाता सुवर्णकटके समान है, अर्थाद कटश होनेपर मी स्वतः
मुबर्गकष्टशके लिए उसको उपयोगिता नही है और वह नर ।
पन शिगस्नान के समान उस दाताका दान निरूपयोग ॥१२॥
मग-ययनरादेनदान
पदवःकारित दाने भाति तमदुकादिवत् ।
पया तुमरमा पस्यो मनसा पचता रिना ॥ २२५॥
२२५ दानशासनम् , T १ 16 : A .. ,' अर्थ:-मन व वचनके बिना केवल दूसरोंके कहने से - काय से ही जो दान करता है वह दाता उस चमचेके समान है जो परोसे जानेवाले रसायनों के स्वादको नहीं जानता है । जिस प्रकार तोल, मापके सेर वगैरे तुलनेवाली चीजोंके मोल को नहीं जानते उसी प्रकार उस दाताकी हालत है ॥ १२५ ॥ उपरोधापालभाद्भासत कायदानिनः ॥ संशाः पशवो भारवाहाँः केचियथा तथा ॥१२६॥ अर्थ-दृसरोंके अनुरोध से घ दूसरे निंदा करेंगे इस भयसे, जो केवल काय से दान देते हैं वे सदा क्लेश को सहन करनेवाले, भारवहन करनेवाले बैल घोडे आदि पशुओंके समान है ॥ १२६ ।। 'पात्रे शंपेव या भक्तिर्यपादान कृत चतः । । राजयोग्यगजा अश्वास्त एव स्युभवांतरे ।। १२७ ॥ अर्थ-पानोंके प्रति बिजलोके समान क्षणिक भक्ति को रखकर जो दान देते हैं वे उत्तरभय में राजाके लिए बैठने योग्य हाथी, घोडा आदि होकर उत्पन्न होते हैं ॥ १२७ ॥ न' मिनभावदत्तदान "मिनभावाक्षणे भूत्वा दानेऽगेनीकृते फेलम् । स्त्रीभावे तुम्जनौ भिमे यथान्याममुनी भवेत् ॥१२८॥ : अर्थ-यदि दान देते समय दासाने मनमें भिन्न भाव रखकर केवल फायसे दान दिया तो उसकी हालत ठीक उसी प्रकार होता है जिस. प्रकार कि पुकापति के समयमै सीने यदि मनमें पुरुष को मारना की तो यह पुत्र भी दूसरों के समान ही होता है ।। १२८ ॥ मनोवोयिना फेचिद्भासं कायदानिनः। सहशाहोंगजोम्बोमा केविनात्यहा पया ॥.. । ।
दानफलविचार ૨૨૧ । त्रिकरणशुद्धिकी आवश्यकता चित्ते भाग्यसमिच्छवापि चरितन्नाशयत्युक्तिभि- वृत्तः के मनसा वचोभिरिह के वाचैव हृदर्तनः । हृवृत्तैः कतिचिद्वचौभिरपि के वावर्तनथतसा ॥ वाग्वृत्तर्मनसापि भाग्यमपि यत् पुण्यं सुपुण्यच्छवः॥१२९॥ 11: अर्थ-संसारमें प्रत्येक मनुष्य भाग्यकी अभिलापा करते हैं । परंतु कोई मनमें भाग्यको इच्छा करते हुए भी अपमे आचरण से उस भाग्य को बिगाडते हैं । कोई अपने आचरणसे उसकी इछा करते हुए भी बचमोसे उसकी चिंगाड करते हैं । कोई वचनसे उसे चाहते हुए भी मनसे उस भाग्यको बिगाडते है । कोई हृदय व चारित्र इन दोनोंसे उसकी अपेक्षा करते हुए भी वचमसे उसको बिगाडते हैं । कोई वधगसे, उसकी अपेक्षा करें तो भी मन व वर्तनसे उसकी बिगाड करते है। इसी प्रकार पुण्यशी अपेक्षा करनेवाले सज्जन पुण्यको चित्तसे चाहने पर भी अपने आचरणोंसे उसका तिरस्कार करते है । अर्थात पापमा वृत्तिको धारण करते हैं । कोई अपने आचरणसे पुण्यकी आकांक्षा करते हुए भी यचनसे उसका घात, करते हैं। कोई वचनसे पुण्यफी अपेक्षा करें तो भी वे मनसे उस पुण्य की हानि करते हैं । कोई मन घ आचरणसे पुण्यकी अपेक्षा करते हुए भी पचनसे उस पुण्यका नाश करते हैं । कोई बचनसे उस पुण्यकी अपेक्षा करें तो भी मन व आचरण से उसको बिगाडते हैं। कोई वचन व आचरणसे उसकी अपेक्षा करते हुए भी मनसे उसको बिगाड़ते हैं। कोई मनसे उसकी अपेक्षा करते हुए भी वचन घ आचरणसे उसका नाश करते हैं । और कोई मन, बचन व काय पुण्यका अर्जन, फरें तो वे मन, पचन व कायसे ही उसका नाश भी करते हैं। त्रिकरणशुद्धिसे विकल होकर जो मी पुण्यार्जन करें यह व्यर्थ है । त्रिकरणशुद्धिपूर्वक किए गए कार्यों से ही यया पुण्यबंध व उससे सौभाग्य प्राप्त होता है॥१२९ । .
हानशासनम् +त्रिकरणशुद्धिपूर्वकदादान करणत्रयसंशुध्या कृतं दानं फलं भवेत् । तवैकल्यात्कृतं दानं विधवाप्रसवो यथा ॥ १३० ॥ । अर्थ-~मन, वचन व काय इन तीनोंको शुद्धिसे जो दान दिया जाता है यह सचमुचमें फलकारी होता है । उसकी विकलासे दिया हुआ दान व्यर्थ है । यह विधवास्त्रीको सूतिके समान है ॥१३०॥ F +त्रिकरणशुद्धिदत्तदानफ्लमन्यतम् । सरपात्रोपगत दान सुक्षेत्रगतवीजयत् । फलाय यद्यपि स्वरप तदनल्पाय कल्पते ॥ १ ॥ न्यग्रोधस्य यथा वीज स्तोकं सुक्षेनभूमिग । बहुघिरतीर्णतां याति तनहान मुपागम् ॥ २ ॥ सीधर्मादिषु कल्पेषु मुंजते स्वेप्सित सुखम् । मानघा पानदानेन मनोधापयायशुद्धितः ॥३॥ ते तस्मादेय जायते चक्रिणा घासंचक्रिणः । इक्ष्वापनादिपु गोत्रीपु पानदानगया नरा ॥ ४ ॥ फलानां यावती पृद्धिरतायती कीमुदी विदुः । लोकरयापयते त्याग सतामिया निदर्शयत् ॥ ५॥ सपदस्तीर्थकर्तृणां चक्रिणाम चक्रिणां । भजते वानिनं सर्वाः पयोधिर्मिय निम्नगाः ॥६॥ फेवलज्ञानले शान निर्वाणसुरातः सुराम् । आहाग्दानती दानं नोत्तमं विपत परम् ॥ ७ ॥ तग्गशतसटसं गोकुलं भूमिदानं, फगकरजसपा मेदिनी सागरांना ॥ सुम्युयतिसमान कोटिवन्यामदान ॥ नभवति च समान चान्नदान प्रधानम् ॥ ८ ॥ पायस्थियमाहारः कायो ज्ञानामिप्यते । मान मंधिनाशाय तमाशे पग्मं सुखम:॥ तद्भोजनं युन्मनिभुत शेपं स युद्धिमान्यांन करोति पापम् तासांह पक्रयते परोक्ष भपिना यः क्रिपतं सपः।
२२७
दानफलविचार
दाता वेश्याके समान हो
दत्वा द्रव्याप करणत्रयं प्रीति प्रकुर्वते ।
चारमुख्या यथा लोक संतः पुण्याय चाईते ॥ १३१ ॥
अर्थ-जिस प्रकार लोकमें वेश्या स्त्री द्रव्यकेलिए अपने मन, वचन,
घ कायको अपने टिपुरुषको समर्पण कर प्रेम करता है, उसीप्रकार
पुण्यार्जके लिए सज्जन दाता अपने त्रिकरणोंको पात्रको अर्पण कर
भक्ति करें ॥ १३१॥
पात्रानुसार द्रव्यपरिणमन
किंपाके विपतां सदा कटुफती कोलेऽपि माधुर्यता-!
मिक्षावम्ल कुजेऽम्लतां लवणतामभोनिधौ तिक्तता ॥
ऋषीणां भुक्तिशेषस्य भोजने स नरो भवेत्।
तुष्टिपुटियलारोग्यदीर्घायु श्रीसमन्वितः ॥ ११ ॥
सद्यः प्रीतिकरं दानं महापातकनाशनं ।.
अन्नतोयसमं दानं न भूतं न भावष्यति ॥ १२ ॥
पृथिव्यां प्रीणि रत्नानि हान्नमापः सुभापितं ।
असुखे रत्नपापाणे रत्नशब्दो निरर्थकः ॥ १३ ॥
भुक्तमसाक्षिकमफलं धुतमफलं दुबिनीतस्य ।
कृपणस्य च धनमफलं यौवनमफलं दरिद्रस्य ॥१४॥
वालेपु जीर्णातुरदुर्यलेषु भ्रष्टाधिकारेषु निराश्रयेषु ।
राजाभियुक्तप्यपरायणेषु येषां कृपा नास्ति न ते मनुष्याः॥
योऽन्तस्तप्तपरव्यथाविघटन जानात्यसौ पंडित-।'
संसारोत्तरण विवेकपटुता यस्यास्त्यसो पंडितः ॥
तत्य शाश्वतनिर्मलं च सनयं जानात्यसौ पंडितः ।
शेषाः कामचिदंयिता विषयिणः सर्वे जनाः खंडिताः॥१६
य सत्पात्रमुभुक्तिशेपममृतं भुंजीत तस्यानिशम् ।
तुष्टिः पुष्टिररोगतातिबलता दीर्घायुरहाक्षय.॥
संपापूरितता गुणैरधिकता रत्नत्रयोऽभता ।
स्यारसौख्यं शुभभावता निपुणतानिर्वाणसंपनमात्॥१७॥
२२८ दानशासनम् --- - - . - तिक्तद्री च कपायके तुवरजां यद्यद्गुणे तद्गुणा- । नप्पेकांधुजल प्रयाति च यथा पापु दत्त धनम् ॥१२२॥ अर्थ-जिसप्रकार एक ही कूएका मिष्टजल किंपाकवृक्षमें जाकर विषरूप, निबके वृक्षमे कडुआ, ईखमें माधुर्य, इमलीके वृक्षों सट्टा, समुद्रमें खारा, तीखे वृक्षमे तीखा, रुपायले वृक्षमें कषाय आदि जो जिसका जो गुण हो धारण कर लेता है। इसीप्रकार दाताके द्वारा दिये गये द्रव्य जैसा पात्र हो उस प्रकार के गुणोंको धारण करता है । इसलिए विवेकी दाताको चाहिये, कि वह पात्रभेदोंको अच्छीतरह जानकर दान देवें॥ १३२ ॥ मार्फतीवसतापाद्यथा पद्माकरव्यय लोभोऽल्पोऽय व्ययो भूरिन कुर्यात्ततो बहु ॥ १३३ ॥ अर्थ-जिस प्रकार गर्माके दिनोमें सूर्य के उष्ण किरणोसे सरोवर वगैरे सूख जाते हैं, उसीप्रकार सातिशय पुण्यके किरणोंसे लोमरूपी सरोवर सूख जाता है। इसलिए अधिक दान देकर पुण्यफी अर्जना करना चाहिये ॥ १३३ ।। शदानस्वाग शूद्रान्नं कुळनाशकं बहुवदन्विमोऽयकृत्पुण्यह- टूश्यावश्यमशेषलोकमणिकासास्वभाटोपमं । क्षेत्रमामजलाशयोपममिदं स्पृष्ट स्वचिंगृहम् नो सेव्य यदि सेव्यसवफजनो विष पच जायते ।।१३४६ अर्थ-सपूर्ण लोकको धर्माचरणमें स्थिर रहने के लिए उपदेश देनेवारा माहाण घभी सूदान, जल, तेध, मृत, नवनीतादिकया भक्षण न फरें । पर कुटनाशक है ! पापपा सचय करवाया है, पुष्पफो नष्ट करने वाला है, घेदाः मुपके स्मान अपवित्र ६, अनिष्ट पात्रके २२९ -- , -- 2 दानफलविचार समान है, गामके पॉसमें रहनेवाले शौचोपयोगी जलाशय के समान है, उनके द्वारा स्पृष्ट गृह भी ब्राह्मणके लिए प्रवेश करने योग्य नहीं है । यदि उपर्युक्त बातोंका वह ब्राह्मण सेवन करे तो यह मादाण कैसे हों सकता है ? ॥ १३४ ॥ ब्राह्मण्यस्य लयं विचारयसि जीवाय क्षयं न्यग्गति । कि नांगाय धनाय संचसि संस्थायां च संपतंस || कि कर्मास्ति न तस्य नीचनृपतेः सेवा करोप्पस्ति किं । नायं शूदगृहान्नभुक्तिरघदा पुण्याय किं योगिनाम् ॥१३५ अर्थ सदके घरमें आहार लेनेसे बामणत्यका नाश होता है और जीयको अक्षय नाचगतिकी प्राप्ति होती है, ऐसा · समझना भूल है। ३. द्विज ! तू नीच राजाकी सेवा करके शरीरपोषण करता है, धन कमाता है, ऐसे फर्म करनेसे अशुभ फर्म बंधनेसे क्या तुझे दुर्गतिकी प्राति , नहीं होगी , अवश्य होगी । अतः सच्छूद्र का लेनमें दोष नहीं है । क्यों कि वे सप्द्र त्रिवर्णमसे ही उएन हैं। अतः पाहारदान योग्य समझ कर मुनिजन उनके घरमें शुद्ध आहारको देते हैं। और वह आहार देनेवाले मुनिषर्यको और देनेवाले सदन को पुण्यके लिए कारण होता है.! पापकारण नहीं होता है ऐसा समझना चाहिए ॥ १३५ ॥ विमं दुर्गतिगामिन युधजना नीचं वंति ध्रुवम् । नीचं सद्गतिगामिनं द्विमवरं पुण्याधिकं भूमिपं ।। पापाचाररत द्विनं परिहरन्त्यत्रैव तत्संगति । कर्माण्येव विनाशयति मुनयः शूदैस्सुपुण्यार्थिभिः॥१३६॥ अर्थ-अनेक दुराचरणोसे युक्त मासणको बुद्धिमान् योग नीच कहते हैं, यह इसी भवमें नीच होता है एवं आगे भवमें मी नांच गतिको ही जाता है। इसी प्रकार सदाचरण, धर्माभ्यास आदिमें रत आहार .
२३० दानशासनम् या - । - - ऐसे शूद्रको लोग प्रशंसाी दृष्टिमे देखते हैं । इतना ही नहीं वह आगामी भवमें ब्राह्मण होगा सातिशय पुण्य के धारक राजा होगा । पापाचरण मान ब्राह्मण को इसी भवमें गुरुजन, बधुजन बहिष्कृत करते हैं जिससे उसे सत्संगति से वचित होना पडता है । पुण्यकी अपेक्षा करनेवाले व्रतादि शुभ आचरणमें मग्न मद मुनिगणोंको आहार देकर अपने कर्मों- को नष्ट करते हैं ॥ १३६ ॥ विमा धर्मचितोऽधना नृपतयश्चोरा भवंति स्म ते । वैश्यास्तत्र वृषद्याय ददते वित्तानि यत्रासते ।। शूद्रा दानपरा जिनोत्सवकरास्सद्धर्भधोरेयका-1 स्तेषां समसु अंजतेऽत्र मुनयो निर्मुक्तवंशक्रमाः ॥१३७॥ अर्थ-कालके परिवर्तन से ब्राह्मण लोग दरिद्री होगये, क्षत्रिय दुष्टनिप्रद शिष्टपरिपालन वजाय दूसरोंके धनको अन्यायसे अपह- रण करने लगे, अतएव चोर बन गये । वैश्यजन जहा रहते हैं पक्ष अपने न्यायोपार्जित वित्तसे देव धर्मके लिए द्रव्य खर्च करते हैं, परंतु सन्छुद्र सदा दानतःपर रहते हैं। अतएव उनके घरमें मुनिगण भा- हार लेते हैं ।। १३७ ॥ चातुर्ययमहत्त्व निधिदशरुद्रदिवाकरवर्णान्वितकनकसभिभाश्त्वारः ॥ शूद्रोरत्यक्षत्रियविप्राः स्युमिनमुनींद्ररक्षणयोग्याः ।।१३८ ॥ अर्थ-नयनिधि, दश, एकादशरद, बारह गर्थ इन वर्गासे युक्त सुवर्ण के समान तेज:पुंज रहनेपाले ब्राह्मण, क्षत्रिय, वय 4 सप्टन मिनमुनियोंकी रक्षा करने में समर्थ है । इतर नहीं ॥ १३८ ।। यो विमः स मुहासुधीः सुचरिती ज्ञानी पुपान्नाक्षण। संसारार्णवचारोऽनुपहतरत्नसंपत्तिपान् ।
दानफलपिचार .. । - भूदेवः मुतपोऽन्वितोऽप्यघहरः स्यादनजन्मा तत-1 बैलोक्याधिपपूजिताधिकमला देवोऽद्वितीयोऽनघः ॥१३९|| अर्थ-जो निदोष सम्यक्त्वको धारण करता है यह विष कहलाता है, और जो बुद्धिमान् सम्यक्त्व के साथ व्रताचरण भी करता है वह ब्राह्मण कहलाता है । जो सप्ताररूपी समुद्रफे टिए घडवाग्निके समान है, निर्दोष रत्नत्रयको धारण करता है वह भूदेय है । उच्च तपोंको धारण करनेवाल! जो पागेको नाश करता है, आगेफे जन्ममें वर तीनलोकके द्वारा पूजितचरणकमलयाला पूज्य देय होता है ॥१३९॥ स्वर्ग युतोका लक्षण निश्शंकता निर्भयतातिवाग्मिता । + निर्भगता वादिजनास्यभूकता ॥ संघ नतिः साधुपदेषु सेचना । रागो गुणेष्वेव दयांगिपूरामा ॥ १० ॥ ‘सत्संगो जिन पूजनं गुरुनतिर्दानप्रसंगःक्षमा । भूतिर्धार्मिकतर्पणं स्वजनसंपूजातिमधामतिः ॥ आरोग्यं कविता वचो मधुरता स्वप्नपु तथ्यं रमा-1 हाईवक्ष्म भत्कलानिपुणता स्वर्गच्युतानामिदम्॥१४॥ अर्थ--शंकाराहित्य, निर्मपता, जनमनोहर भाषण, भंगरहितवृत्त, पादिजनोंको मूक बनानका समर्थ, जैनसंघमें विनय, साधुजनों के चरण कगोंकी सेश, गुणोंमें अनुराग, प्राणियोंके प्रति दया, ससं- गति, जिनेंद्र की पूजा, मातापिता गुरु आदिका विनय, दानविधानका श्रवण, क्षमा, संपत्तिमाति, धार्मिकंजनोंका सत्कार, स्वजनोंका श्रादर, कुशाग्रबुद्धि, आरोग्य, कवितागुण, यचनका माधुर्य, स्वप्न + निर्भगता वादिजनोक्तिभंगिता इति पाटातरम् ।।
२३२ दानशासनम् -- देखनेपर फलकी निश्चिति, सातिशय सपति, कलानैपुण्य आदि बात जिन व्यक्तियों में पाई जाय घे स्वर्गसे ध्युत होकर आये हैं ऐसा समझना चाहिये । अर्थात् स्वर्गध्युत जीपोंके ये लक्षण हैं ॥ - दातावका परिणाम दाक्षिण्यादपवादत शकुनतो यात्मनापधा- चाटुक्त परिचर्यताऽनुतपनान्मानादुदासीनत । आलस्यादुपरोघवर्णनयशोदुप्पक्षपाताज्जनाः खंदात्मश्ननिमित्ततश्च ददत पानाय दानानि ते ॥१४२॥ अर्थ-लोकमें अभेक प्रकारके दरता रहते हैं । परिणाम शुद : रखकर फेवल पुण्यार्जन करने के लिए दान देनेचारे बहुत दुर्लभ ।। कोई पानों वचन उल्लवन न कर सकनेकी रिहाजसे दान देते हैं । कोई दूसरोंके अपवादक मयसे दान देते हैं, कोई शकुनके निमित्तले तो कोई मन यत्राराधनाके निमित्त, कोई प्रियवचनफे निमित्तसे, फोई सेवाको अपेक्षासे, कोई मानसे, कोई औदासी-यमावसे, कोई आलस्यमे, कोई दूसरोंके दबायसे, कोई मिथ्यापक्षपातसे, योई बडे दानियोंकी श्रेणी में नाम लिखानेके रिए अर्थात् रयातिकी अपेक्षासे और कोई मनमें दुखी होते हुए दान देते हैं । इस प्रकार अनेक पकारके अभिप्रायोको रखकर दान देते हैं ॥ १२ ॥ ३ H * अनुलोमो विनीतश्च दयारानरूचिद्दु । महसा मध्यमो यरस मानुप्यादागतो नरः॥ बताशी नव मत मायापी घ सुधाधिपः । भ्यप्नदोs7सय तिर्थ योन्यागता गर ॥ घिरता यधुजन निय सरोगता मूर्षभनेपु सग !! भतीय रोप कबुका च पाणी नरस चिन्द नरकागतस्य । .
दानफलविवार २३३ - सिष्ठत्यंहस्तरक्षी मविशति हदि कि धर्मगौस्तत्मविष्टे । तस्मिन्मृत्युभवेतस्य च बलबदघद्वीपिनो धर्मगाथ ।। इत्वा न त्वा दयंते फिमिव निजमुतासर्वथा भक्षयति । ज्ञात्वा ते धर्मगावस्तदुपजनसमा वीक्ष्य धावंति रात् ॥१४३।। अर्थ-पापरूपी व्याप्रके हृदयमें निवास करते हुए धर्मरूपी गाय उस स्थान में प्रवेश कर सकती है ? कभी नहीं । यदि, वह प्रवेश करे तो उसकी मृत्यु अवश्यमेव हो जायगी । गाय यदि व्याघ्रोकी गुफामें प्रवेश करें तो क्या वे उस गायको न खाकर अपने बच्चों के समान संरक्षण करते हैं ! कभी नहीं। ये खायेंगे ही, इस बातको जानकर वे गाय उन व्याघोंकी गुफाओंको देखकर दूरसे जिस प्रकार भागती है उसी प्रकार पापी हृदयको देखकर धर्मररूपी गाय दूरसे ही भागती हैं ॥ १४ ॥ द्वारं संश्रित्य दातुः प्रतिदिनममलाः स्वस्थिति संविहाय । ग्लानास्याः कुंषितांगा विकृततनुबचोगद्दध्वानकंठाः ॥ दीनांतीः संवदंतः कुळिशनिनदक्चंडवाचो निशम्य । व्योमात्मानो भवनः प्रतिफलितफलाः कुर्वते किं किमाशः। अर्थ-कोई कोई याचकजन दातायोंके घरके पास पहुंच कर अनेक प्रकारसे याचना करते हैं। उस समय अपने मुखको ग्लान कर, शरीरको सिकुडाकर, अपने वचनों दीनता व्यक्त करते हुए, गद्गदकंठसे तोतले शब्दोंसे याचना करते हैं । दाताने यदि मेघगर्जना के समान क्रोधमरे वचनोसे फटकारा तो भी सुन लेते है । आशा बस-युरी चीज-है, उससे मनुष्य क्या क्या नहीं करता है ।।१४४॥ याचकाय महाका है काष्टं देहि ददामि दातृवचनं कष्टं न कष्टं ददे । कष्टं याचितुराशये यहुतरः क्रोधाग्निरुज्जृम्भते । -- २३४ दानशासनम् . स्निग्धामत्र शिखीव दातृहदये नीतिस्त्वमा त्यहो (१) होनैकपुर सयेत्र कुरुते पापस्य किं किं फलम् ॥१४५! अर्थ-लोकमें दूसरों के पास जाकर "देहि" ऐसा कहना कष्ट है देताहूं यह कहना भी कष्ट है, नहीं देता हूं कहना भी कष्ट है। दात यदि देने के लिए संकोच करें तो याचक अनेक प्रकार के आशयोंको प्रकट करते हुए याचना करता है, तब दाताकी क्रोधाग्नि बढती है। जिस प्रकार अग्निपर तेल पडनेपर वह प्रज्वलित होती है, उसी प्रकार दाताका कोध बढ़ता है। एक ही व्यक्तिसे एक नगर नष्ट होता है, इस प्रकारकी कहावत है वह सत्य है, पापका फल क्या क्या नहीं होता है !॥१४५ ॥ पूर्ण पूरितमानसे, स्थित्तधृतिश्री हीयशोयुद्धयो । देण्यः पंच वसंति यस्य स नरो दतिव नो याचिता ।। शुष्कं तच्च यदाभवद्यदि तदा नियोति ता देहि वा-। रद्वारऽरुंधति दातरीह कुटवत्पापं शिखी स्यात्तयोः॥१४६॥ अर्थ-जिसप्रकार मानससरोवरमें श्री, ही, धृति, कीर्ति, बुद्धि इस प्रकार पांच देवियों का निवास है, उसी प्रकार दाताके मनरूपी मानस- सरोवरमें धृति (धर्य ) श्री ( संपत्ति ) ही ( सजा ) यश (कीर्ति ) बुद्धि (ज्ञान ) नामक पांच देरियां निवास करती हैं । यह दाता हमेशा दाता ही बना रहता है, याचक नहीं रहता है। जब यह मानस सरोवर किसी कारण से शुष्क होजाता है तो पे देषि निकट. जाती है, इसी प्रकार दाताके हृदयमें दानयुद्धि न रहे तो उपर्युक पंच देवियां भी निकल जाता है। यदि उस समय दात ने उनको रोक- नंका प्रपान न किया तो मग्नि जिस प्रकार मकानको जलाती है उस प्रकार दाता व पातको पारस्पी भग्नि जाती है। सारांश यह कि दाताको सदा अपने हायमें भृति भादि गुणोंको वारण करना चाहिये ।। १४६ ॥
दानफलपिचार २३५ दान मौमसे देखें के कुप्यंति शपंति वैरमनिशं कुर्वति चास्यालयम् । प्लोपामः प्रभुणापि मंदिरमिदं निर्णाशयामःश्रियम् ।। फेनोपाययतेन के वयमिमं मार्ग कपामस्तता । नोक्त्वा मा पदमा मनोगतधनं मानेन देयं सदा ॥१४७॥ अर्थ-दुनियामें दान देनके वचनको देकर फिर उस बचनका भंग करना यह महान् फठिन कार्य है। उस व्यक्तिका कोई विश्वास नहीं करते हैं। कोई उसके प्रति क्रोधित होते हैं, कोई गाली देते हैं, कोई सदा उसके साथ वैर बांधते हैं, कोई उसके घर को जलानेकी बात कहते हैं, कोई स्वामी के द्वारा उसके घरको नष्ट कराने की बात कहते हैं। इतना ही क्यों ? हजारों उपायोंसे उस व्यक्तिको कष्ट देनेके लिए प्रयान करते हैं। इसलिए दान देनेके धन को एकदम अविचारित होकर नहीं बोलना चाहिये । बोटनेक बाद नकार नहीं करना चाहिये । बुद्धिमान् दाताको उचित है कि वह जो कुछ भी दान देना चाहें मौनसे ही देखें ॥ १४७ ॥ दानरहितसंपत्तिकी निरर्थकता पुण्यपुत्ररहितस्य जीवितं, ज्ञान दृष्टिरहितस्य संयमाः। दानमानरहितस्य संपदोऽरण्यपुष्पपिव निष्फळाः म्युराः ॥ अर्थ-पुण्यवान्, धर्मागापुत्रसे रहित मनुष्यजीवन, ज्ञानरष्टि अर्थात् विवेकसे रहित संयम और दान व सन्मानसे रहित संपत्ति, ये सब अरण्यपुष्पके समान व्यर्थ है । दा! गनुष्प विवेकस काम नही लेता है, और अपनी संपत्तिका योग्य स्थानमें उपयोग नही करता है ! आश्चर्य है ! ॥ १४८ ॥ । * अतिश्यमप्रमादित्यं सदयत्वं सुतमता। अनक्षेच्छानुवर्तिवं संतःप्राहुस्सुमंयमं ॥
दानशासनम् मानयीयमनोवृत्ति देहसुखान्यनुभवितुं स्वीकृतदुग्रंयमवितुमर्थमशेष-1 दातुं ताम्यति नेपत्स्वागो दण्डाय परिणपाय निजादेः॥१४९॥ ऋणानुबंधात्परवित्तभुक्तिबलागतग्रंथपुरक्षणाय । व्पयत्यजसं सकलं धनं च क्लिश्नाति पुण्याय जोजनोऽयम् ॥ अर्थ-अज्ञानी मनुष्योंकी मनोवृत्ति इस प्रकार रहती है कि वे अपने देहसुखको अनुभव करने के लिए, अपने पासमें स्थित स्त्री, पुत्र, घर, थाइन आदि परिग्रहों के संरक्षणके लिए चाहे जितना धन खर्च करते हैं, उनको उसमें जरा भी दुःख नहीं होता है, अपने लिए किसी अपराधमें दण्ड हुआ तो लाखों रुपये देनेके लिए तैयार रहते हैं। अपने व अपने पुत्रों के विवाहमें लाखों रूपये फेंक देते हैं। ऋणानुबंधसे दूसरों के द्रव्य आनेपर भी उसे बलात्कारसे प्राप्त परिप्रहों के संरक्षणकेलिए ही लगाते हैं । इस प्रकार संसारवृद्धि के कार्यमें व्यय करते हुए उनको जरा भी खेद नहीं होता । अपितु धर्मकार्यके लिए, पुण्यार्जनके लिए, दान देना पटे तो बडा दुःख होता है। ॥ १४९ ।। १५० ॥ दूसरोको कर्म देनेघाला. यावत्पत्रं वसति निलयं यस्य तस्याघमर्ण-. स्तावत्पुमाः पहयखराभृत्यदासी: त्रिपास्युः ॥ तस्मिन्भिन्ने सपदि मरणं यांति ते मृत्युकाळ । पत्रं दद्यात्मकृतिपुरुषस्तानि पत्राणि भिंघात् ॥ १५१ ॥ अर्थ-जो मनुम्प दूसरोंको कर्ज देता है। उस कर्ज लेनेषान्देश जो पत्र वगैरे लिम्बालेता है, यह पत्र जबतक अपने नापर मौजूद हो तब अपनेलिए पुत्र, कलत्र, दासी, दास, बंड घोहा, आदि हरतरह की .. , दानफलबिचार २३७ HAPA 42 भवम - समृद्धि होती है। अर्थात् यह आनंदसे रहता है। परंतु जब यह पत्र फट जाय या छिन्न भिन्न होगाय तो उसका मरण ही छोजाता है। फर्ज लेनेवाला पुरुष मरण सन्मुख हो तो धर्मामा सजन उसे उस ऋण पत्रको वापिस देयें, नहीं तो फाट इलें ।। १५१ ॥ परापहरणफल येऽन्यस्य हरंति तस्य सफला ग्रंथा भवे याग्रिमे । भृत्यास्तस्यु ऋणागता निभृतयः सेवारसदा कुर्वते ।। सत्पुण्यागतजंतवः मुकृतिनां पूतं वृषं स्वं कुलम् । रक्षतीशभेददि चिधोऽस्पार्थ त्रिधा वर्जपेत् ॥१५२|| अर्थ- जो मनुष्य दूसरोंके धन की अपक्षरण करते हैं या अग्रिम भवमें उस धनके स्वामीफे यहां भृत्य धोकर पैदा होते हैं, चेतन परिमह होकर उत्पन होते हैं । उनको तबतक उनकी सेवा करनी पडती है जबतक कि वे ऋणमुक्त हो जाय। पूर्वजन्मके पुण्यसे संपत्तिको पाकर जो उत्पन्न होते हैं वे अपनी संपत्तिसे सजनोंकी, अपने पवित्र कुलकी व धर्मकी रक्षा करते हैं। इस प्रकार पुण्य व पापोंके विभागको समझकर विवेकी पुरुष परधन अपहरण करनेके कार्यको मन, वचन व कायसे वर्जन करें ॥ १५२ ।। नीचव्यवहारत्याग नीचस्पार्थ न गृहोपाधानीचाप नोत्तमः । गृहीयान्यग्धनं नीच उत्तमम्यार्थमुत्तमः ॥ १५३ ॥ अर्थ-चांटालादि नांचीको उत्तम पुरुष कर्म न देखें एवं उन नीचोंसे कर्ज लेवे भी नहीं। वे चाहालादि अपने समान जातियो? ही इस प्रकारका व्यवहार कर, एवं उत्तम पुरुष उत्तम जाति के लोगों ही व्यवहार करें॥ १५३ ॥ -- दानशासनम् ऋणनीति तोत्रे गदेऽधमर्णस्य पत्र भित्त्वा ददत्तुजा । गृहीयाल्लिखितं साधु सर्वनाशो विपर्ययात् ॥ १५४ ॥ अर्थ-जिसने कर्ज लिया है वह मनुष्य तीन व असाध्य रोगसे पीडित हो तो उसके ऋणपत्रको फाडकर उसके पुत्रसे दूसरा पत्र लिखा लेना चाहिये । ऐसा न करें तो सर्व नाश होता है ॥ १५४ ॥ ऋणदोष श्रुत्वोत्तमर्णवचनं मनुजस्तरक्षोः शृण्वन्ध्वनि मृग इवाविरतं स्खलवाक् । मूर्च्छन्ससभिपतनोत्थितलक्षणः स्या- द्विद्वान्विमुक्तपरवस्तुरिहापि पूज्यः ॥ १५५ ॥ अर्थ:-जिसने किसीसे कर्ज लिया हो तो कर्ज देनेवालेके वचन को सुनकर यह भयभीत होता है, जिस प्रकार कि व्याघ्रफी ध्वनिको सुनकर हरिण भयभीत होता है, उसी प्रकार वह भी भयभीत होता है। उसके सामने बोलते समय स्वलित वाणांस बोटता है। मूलित होता है, विशेष क्या. ! सन्निपात परीके लक्षण ही प्रकट होते हैं। ऐसी अवस्था में दूसरोसे कर्जा लेनेका जो त्याग करता है वही सचमुच में विद्वान् है और पूज्य है ॥ १५५ ।। मायानारदोष. यत्रास्ति वंचना तस्य न रत्नायार्थलाभता । विषसंति न सर्वे तं, पापदिः परा मवेत् ॥ १५६ ॥ अर्थ--जिसके हृदयमें मायाचार या पंचकत्यभाष मौजूद है उसे कभी रानत्रय, पुण्प प अर्पलाम नहीं सकता है। उसे दुनिया कोई भी विश्वास नही करते । और उसके पापी धृद्धि होती जाती है। १५६ ॥ .
दानफलपिचार २३९ दरिद्र स्मृत्वा चेतसि गोपविः क्षुदितवान संपन्नसस्यां परां। गत्वा तत्र विचारयभिव सदा वर्तेत योऽतीवक ॥ ग्रंथी दुःखकरो भवन्न मदनं नास्य व्ययायागमत् । कविना काणदोऽधमर्ण इह चान्पार्यान्हरेयुपिात्॥१५७|| अर्थ-जिसप्रकार भूखसे पीडित बैठ किती सत्यसंघम खेतको स्मरणकर जाता है | उस खेसको बा सालता है प सदा इसी प्रकारके विचार में रहता है कि मुझे और कहां तेत मिलेगा। इसी प्रकार दुःखकर परिप्रहोंको एकत्रित करनेवाला एवं उसके संरक्षण य व्ययकेलिए धन जिसके पास नहीं है ऐसा दरिद्र सदा अनेक प्रकारका बहाना बाजीकर दूसरों द्रव्यको अपहरण करता है।॥ १५७ ॥ विभावभावसे युक्त युवती श्रुत्वा पात्रमिहागतं च तरुणी पत्युर्वचस्तक्षणाद । स्फूर्मती खलु बजावत् प्रसविनीव्याधीव सा स्फटिनी। घुष्टा शूलवतीय पातितधनेवादिनी 'तन्मुखं । राहुग्रस्तरवींदुविधमिव निस्तेनोकरं निष्प्रभम् ॥१५८॥ अर्थ-घरमें यदि कर परिणामसे युक्त पानी हो तो यह पतिके द्वारा पात्रके प्रतिग्रहणके वचनको सुनकर एकदम क्रोधित होती है, बिजलीके समान गर्जती है, प्रसविनी शेरनी के समान फोटन करती है, शूलयतोके समान शद्व करती है। अपने धनके खोए हुए के समान रोती है, विशेष क्या ! उसका मुख राहुपरत चंद्र व सूर्यविबके समान निस्तेज हो जाता है ॥ १५८ ॥ •धर्मविध्वसिनी स्त्री रक्ताती कुपितानना हतशिरा या विक्षिपंती हठात् । पुत्रायचयं नदरपदयुगा पात्रं शपंती कुषा ।।
२४ 'दशनशासनम् साऽस्य स्थान्मृतिरच तस्य मुकृतं निर्मूलयंती वधुः । ज्येष्ठा दुर्गतिदायिनी गुणहरी सद्धर्मविध्वंसिनी ॥१५९॥ अर्थ-इसी प्रकार और एक प्रकारकी ती पात्रके आगमनको सुनकर आँखे लाल करलेती है, क्रोधसे मुखको पुला लेती है, शिर पीट लेती है, जबर्दस्ती बच्चे व बरतन वगैरेको इधर उधर फेंकने लगती है, चलते समय नाचनेके समान पैरफे शब्द जोर-जोरसे करती हुई चलती है, इतना ही क्यों अनंतानुबंधी क्रोधफे उदयसे उन मुनिराजों को खूब गालियां देती है। वह खो सचमुचमें स्त्री नदी, पति के लिए मृत्युफे समान है, वह आज पति के संपूर्ण पुण्यको नष्ट करती है, ज्येष्ठा है, दुर्गति प्रदान करनेवाली है, समस्त गुणोंको नाश करनेवाली है एवं सद्धर्मको विध्वंस करनेवाली है ॥ १५९ ॥ न क्षीरं दघि नो न तक्रममलो नो तंडुली नी धृतं । नो शाकं द्विद्वळं न तैललवणं नो नोपणं नधनम् ॥ भांडं नाभिनवं गृहं न शुचि न स्नाताहमन्या न में। सामउगं च विना करोमि गुरवे पाकमपत्नं कथम् ॥१६०॥ अर्थ-कोई कोई स्त्रिया आहार दान देने की इछा न हो तो बहानाबाजी करती है । घरमें दूध नही, दही नहीं, छाछ , नहीं, अच्छे चारल नही, घी नहीं, शाफमाजी नी, दाल बगैरे नहीं, नहीं, नमक नहीं, मिर्च नहीं, टकडी नही, नवीन बरतन नहीं, घर मी साफ सुथरा नहीं, मन भी स्नान नहीं किया, मुशे मदत करनेवाली दुसरी योई नहीं, इसके अलावा मुझे योग्य सामग्री भी नहीं है । ऐसी अवस्था में पात्रों को आहारदान किस प्रकार करूं । स्यादि प्रकार से कहती है ॥ १६० ॥ यदानायाजीका प्रकार मदर्ता च मुंतः पुरे न नपरों न द्रव्यमे गहे । वित्त मे न करे पुरेऽत्र अगदी नको यात्रागर्ने । . .
'दानफलबिचार
२४१
एका साश्रुरई वचस्यघवती मायाविनी चिंतिता।
गई शून्यमिदं वपुः सहदयं क्लिश्नाति लुब्धांगना ॥१६१॥
अर्थ~और कोई स्त्री इस प्रकार बहाना करती है कि मेरे पति
गाम में नहीं हैं, पुत्र भी नहीं है, मेरे लिए सहायता करनेवाले दूसरे
कोई भी नहीं है, घरमें कुछ भी सामान नहीं है, मेरे हाथमें पैसा नहीं,
यहां कोई उधार देनेवाला भी मही है, पात्रके आनेपर यहाँपर कोई
नहीं है, हा ! मेरा दुर्दैव ! इस प्रकार कहती हुई मायाचारसे लोमा
त्री अपने दृश्यमें संकेश परिणामको करती हुई रोती है । उसका हृदय
य शरीर सब कुछ शून्य है ॥ १६१ ॥
पाजानादरफल
( ! गृहागतं च यत्पात्रं यस्तिरस्कुरुते यदा ।
'; आजन्मत्रितयं तेन दुःखमेवानुभूयते ॥ १६२ ।।
अर्थ --घरपर आये हुए पात्रका जो तिरस्कार करता है, वह तीन
जन्मतकं तीन दुःखका अनुभव करता है ॥ १६२ ॥
गर्भिणी अनादर करें तो
गृहागतं पात्रमवेक्ष्य गर्भिणी ।
नाद्य स्ववारो घटते न निष्ठुरात् ।।
तस्मिन्गते स्यात्स मुतो दिवन्मना ।
जन्मत्रये दुःखमिहानुभूयते ॥ १६३ ।।
अर्थ-घरपर आये हुए पात्रको देखकर गर्मिणीको हर्ष होना
चाहिये । उसे विचार करना चाहिये कि मेरे व गर्भस्थ बालके
शुभचिहके रूपमें थे मुनिराज आये हैं। ऐसा न कर जो गर्भिणी उन
पियोका तिरस्कार करती है, उसका बालक असंज्ञी, अंधा, पागला,
बहरा आदि होकर उत्पन होता है। वह स्वतः तीन जन्मतक दुःख
अनुभव करती है ॥ १६३ ॥
दानशासनम् r अर्ध-अन्नदान 1. सद्रव्यान्नदात्री या पात्रेभ्यः सा तु निर्धनी । इहालामा व्यापिता वा क्लिएचित्ता परत्र च ॥ १६४ ॥ अर्थ-घरमें भरपूर आहारद्रव्य व धनके होते हुए मी जो स्त्री साधुओंको अर्ध पेट ही आहार खिलाकर भेजती है, यह इस भवमें हो दरिद्री हो जाती है, उसको प्राप्त होनेवाले लाभ नहीं मिलते । अनेक प्रकार के रोगोसे पीडित होती है, परमवमें भी अनेक दु.खोंको भोगती है ॥ १६४ ॥ क्रोधदत्ताहार स्वकीयचंधूनपरितl नाग्भिः पारस्य वृप्तिं च न कुर्वते ये । लिष्टाशयाः स्यु सततं दरिद्राः क्रोधेन काचिनरकं भयाता ।। अर्थ-अपमे बंधुवोंको उत्तम पचनें व आहारादिफसे, एवं साधु- वोंको मृदुवचन व आहारोंसे जो तृप्त नहीं करते हैं ये हमेशा दुःखी व दरिद्री ही रहते हैं। क्रोधसे किये हुए किसी भी कार्यका फल अच्छा नहीं हुआ करता है, पात्रके प्रति क्रोध करनेसे एफ खी नरकको गई है ॥ १६५ ॥ क्रोधेनोपकृतं च कार्यमखिलं व्यर्थ यथा जायते । क्षेत्रे मुसमुप्तवी मनिकरः संपद्यते नो यथा ॥ जनपकृतं च दानमपि सवेडा यथा शर्करा ॥ फारुण्यामनाकृतं च सफलं सार्थ भवेच्छाश्वतम् ॥१६६|| अर्थ-ई भव्य ! जिसमकार जलेर यौनको खेतमे बोनेसे उसका कोई उपयोग नहीं हुआ करता है, उसी प्रकार क्रोधसे यदि पात्रके उिये उपकार किया जाय तो यह सा व्यर्थ होता है, जिप्रकार शार में विष मिटाकर खिटाया जाय तो वह प्राणको रण करता . " दानफलविचार इसीप्रकार द्वेषसे दिया हुआ दान सफल नहीं होसकता है। करुणा आई मनस किये हुए सर्वकार्य सफल व शाश्वत होते हैं ॥१६६॥ पंक्तिभेदनफल. पंक्तिभेदे कृते येन वहग्निझुक्तिवर्जितः । भस्मकन्याधिशम्स स्याद्वन्दियत्सर्वभक्षकः ॥ १६७ ॥ अर्थ-यदि दाताने पात्रोमें अमुकपात्र मेग उपकारी है, अमुक उपकारी नहीं है इत्यादि प्रकारफे विचार से पंक्तिभेद अर्थात् आधार द्रव्यके देनेमें भेद किया तो उसके फलसे वे दंपति भामक रोगस पीडितके समान तीव्र अग्निके रहते हुए भोजन रहित होते है। भग्निके समान भक्ष्याभक्ष्य सर्व पदार्थीका भक्षण करते है ॥१६७॥ ये स्वस्वामिन्युदासीनास्त्रिकालविभवच्युताः । तथा देवे गुरौ वे स्युत्रिकालसुकृतच्युताः ॥ १६८ ॥ अर्थ-जो सज्जन अपने स्वामीकी सेवामें उदासीनता को धारण करते हैं वे त्रिकालमें भी संपत्तिको पा नहीं सकते । इसीप्रकार जो सम्जन देव व गुरुको सेवामें उदासीनताको धारण करते हैं, ये त्रिकालमें पुण्यार्जनकार्यमें च्युत होते हैं ॥ १६८ ॥ उपकारियोंका प्रकार कासरीजान्यास्वाध दत्त क्षीरं यथा पशुः । ग्रहाः के फलमादाय धर्मकार्य च कुर्वते ॥ १६९ ॥ अर्थ-जियप्रकार कापास बीजको प्रहण कर गाय भैंस वगैरे दूध देती है, एवं जिसप्रकार दूसरों को कष्ट देनेवाले भूतपिशाच फला- दिक प्रहणकर संतुष्ट होते हैं, इसप्रकार कोई २ संसारमें उपकारी - दानशासनम् . .. दत्वानाणि रत्नानि गृह्णन्काचांस्तुपं यथा । धर्मकार्याणि कुर्वति धर्मबुद्धया न कुर्वते ॥ १७० ॥ : अर्थ-जिसमकार कोई सज्जन उत्तमोत्तम रत्नोंको देकर बदले में काचके टुकडोंको लेते हैं, इसी प्रकार कोई सज्जन धर्मकार्योको तो करते हैं परंतु उसे धर्मबुद्धिसे न करके केवल ल्यातिलाभ नाके लिए करते हैं॥ १७० ॥ वंचित्वात्मपति नारान्यस्योपकुरुते यथा। तथात्मपात्रं वंचित्वैवान्येभ्यो ददतेऽत्र के ॥ १७१ ॥ अर्थ-जिस प्रकार व्यभिचारिणी स्त्री अपने पतिको ठग, करके अन्य पुरुषको उपकार करती है, उसी प्रकार कोई २ सजन , अपने उत्तम पात्रोंको आहारदान न देकर दूसरोंको दे देते है ॥ १७१ ।। दाताओंका प्रकार फेचित्तुति दानं पशव इव जनस्संयता दुर्मनस्काः । फैचिन्नित्यं च भृत्यैरिव कृषिकजनाबाधिता दुर्मनस्काः ॥ स्वामिप्याश्च फेचियुवतय इव संकुप्यमानामनस्काः । केचित्कुर्वति दानं धृतभृतिमनुना ये यथा तेऽत्र व ॥१७२।। अर्थ-कोई मनुष्योंके द्वारा बंधे हुए पशुयोंके समान मनके विचारको रखते हुए दान करते हैं। कोई नौकरोंके द्वारा बाधित कृषिकके समान हृदय रखते हुए दान करते हैं। कोई २ स्यामाके द्वारा कुपित बीके हृदय के समान विचार रखते हुए दान देते हैं । एवं कोई घेतनभोगीनीकरोंके समान दान देते हैं। इस प्रकार दान देते समय भिन्न २ प्रकारके परिणाम रहते है ॥ १७२ ।। चित्पाप्रमवेक्ष्य चाटुवचनः संतर्य यायिनः । फेचित्पात्रमवेक्ष्प सपनि चिरं भीता इवापासते ।। ।
दानफालविचार २४५ । फेचित्तद्वचनं वदंतममलं निर्भर्सयंत्यद्भुतम् । उक्त्वा दैन्यवचोऽपि तेन कतिचित्तस्यालये हि भो ॥१७॥ अर्थ-कोई धनिक सज्जन पात्रोंको देखकर उनके साथ मीठी २ बातें बनाकर चलते बनते है। कोई उन पात्रोंको देखफर कर्ज दिये हुए साहुकारके आने के समान भयभीत होकर घरमें बैठ जाते हैं। कोई निर्मल वचनको बोलनेवाले पात्रको निर्सना करते हैं। कोई दानी पात्रागमनकी सूचना देनेवाले सन्ननसे दीनताके साथ बोलते हुए पात्रको फिसी घरगें लमाने के लिए कहते है ॥ १७३ ।। एकोऽहमस्यां पुरि किंच नान्ये द्वाराग्रगेई द्रुतमेपि दृष्ट्वा । कुप्पतमेतं विबुधा वदंति मन्येऽधदाऽयं समपोऽहमन्ये ॥ १७४ ॥ अर्थ-कोई दानी अपने घर के दरवाजे पर खडे होकर पात्रों के भागमनको देखता है । यदि पात्र दूसरोंके घरको छोडकर अपने घरकी ओर जायें तो उस पात्रकी सूचना देनेवाले के प्रति यह क्रोधित होकर करता है कि " क्या इस नगरमें मैं अकेला हूं, दूसरे कोई नहीं है। क्यों दूमरेके घरको छोडकर मेरे घरकी ओर ही आते हो"। इस प्रकार उसके प्रति क्रोधित होने वाले दाताके लिए वह पापार्जन का समय है ऐसा विद्वान् लोग कहते । हम भी कहते ॥ १७ ॥ कचित्सत्पुरुषा द्विपंति कुपितान् कुष्यंति शप्यंत्यलं। केचिदुःपुरुपान्नमंति ददते शंसंति वित्तं स्वयम् ॥ पुण्याः पुण्यफरा भवंति दुरयाः पापातुरा विश्रुता । जीवंतोऽप्यगदं पिति विषमिन्छतो मृत्ति ये यथा॥१७५॥ अर्थ- कोई सापुरुषों के प्रति द्वेष करते हैं, उनके प्रति क्रुद्ध होते २४६ दानशासनम् हैं, उनको अनेक प्रकारसे + गालियां देते हैं, 'कोई दुष्टपुरुषोंको नमस्कार करते हैं, एवं उनकी प्रशंसा करते हुए स्वयं उनको धन देते है। लोकमें दो प्रकारके मनुष्य होते हैं । एक तो सदा पुण्यका अर्जन करते हैं । पुण्यमय कार्योको करते है । पापकार्टोसे उपेक्षा करते हैं । कोई सदा पापक्रिया करते हुए पापार्जन ही करते है । जिस प्रकार जीने की इच्छा रखनेवाले औषधको व मरने की इच्छा रखनेवाले विषको पीते है, इसी प्रकार लोको पुण्यार्जन व पापार्जन करते हैं । १७५ ॥ मिथ्याष्टियोंको दानदेगेका फल मिथ्याशे ये ददतेऽथ दानं शुद्धाय जैनाः सुशोऽपि तेषां । यक्षा हरंति श्रियमर्थमन्ये हग्योधवृत्तानि ळयं प्रयोति ॥१७६॥ अर्थ-शुद्धसम्यादृष्टि नैन दाता मिध्यादृष्टियोंको पुण्यार्जनके निमित्त यदि दान देते हो तो उनकी संपत्ति आदिको यक्ष अपहरण करते हैं एवं दूसरे भी उनके द्रव्यको अपहरण करते हैं । उनके रत्नत्रय भी नष्ट होते है ॥ १७६ ॥ स्वस्वाम्परिभटेभ्योऽर्थ यो दत्ते स्वामिना स च । हतो पद्धो दण्डितो वा, स्वामिद्रोहीत्यशंति तम् ॥१७॥ ! अर्थ---जो व्यक्ति अपने स्वामीके शत्रुवोंको धनादिक देकर मदत फरता है वह उसके स्वामीके द्वारा मारा जाता है, बद होता है, एवं लोकमें उसे सामिहोती कहते हैं । इसी प्रकार जो व्यक्ति गिध्याहि. योको धनादिक देकर मदत करता है या आत्मद्रोह करता है॥१७॥ भयप्रदत्त-दान देहि देहि न मुंनेऽहं वदतां दानिनो जनाः । पाळरुमलिदातार इस भांति महीतले ॥ १७८ ॥ +दागने जीयिनं इंनिशानं पुण्यं धियं धियं । करोति मूकलां मां नीवर्गानं च दुर्गतिम् । -r दानफलविचार अर्थ-कोई याचक पाकर किसी दातासे यह कहें कि मुझे दीजिये, दीजिये, मैं छोड नहीं सकता। उस हालत में उसको दान देनेवाला दाता ठीक उसी प्रकारका है जैसा कोई अपने बालक के रोग- शमनके लिए बलि देता हो ॥ १७८ ॥ व्यानरूपदाता चण्डोऽपवादभीतो यो वाचि Qध्यति चेतसि ! पाधां न कुरुते भाति पंजरस्थतरक्षुवत् ।। १७९ ।। अर्थ--जो दाता याचकोंके प्रति मन व वचनमे अत्यंत क्रुद होता है, परंतु अपवादके भयसे कोई बाधा नहीं पहुंचाता वह पंजरमें बद्ध व्याघ्रके समान है ॥ १७२ ॥ तेरण्डमापूरितसर्वलोक । नदीतटं तारयिताऽमनस्कः ।। तदंतरस्थानपि सर्वलोकान् । शपन्मकुप्यनिव दातृलोकः ॥१८॥ अर्थ-जहाजमें भरे हुए लोगोंको दयासे समुद्र या नदी के किनारे पर न पहुंचाकर उनके प्रति क्रोधित होते हुए अनेक प्रकारसे गाली देनेवाला जो नाविक रहता है, उसके समान कोई दाता रहते हैं। आये हुए पात्रोंको दयाभावसे उचित दान देकर भेजने के बजाय उनके प्रति क्रोधित होकर उनके साथ गालीगलौजका व्यवहार करते हैं यह बड़े दुःखकी बात है ॥ १८० ॥ व्याजनान्यार्थमाहत्य पुण्याय ददते नृणाम् । तैलफमिश्रायाः केचिन्निर्गेजका इव ॥ १८१ ।। अर्थ-जो लोग दूसरोंके धनको किसी बहानसे अपहरण कर धर्मकार्य के लिए देते हैं, उनका पुण्य तेल कपूरके मिश्रके समान उनकी वृचि धोत्री के समान है ॥ १८१ ।।
૨૪૮
दानशासनम्
"..
.
असेव्यानि सतूनि फलानि ददते बहु ।
यथा क्षीरिद्रुमाः केचिद्दोपयुग्दानिनस्तथा.. ॥ १८२ ॥.
'स्ववत्सपुष्टियुद्ध चैव न क्षरंति यथा नृणाम् ।
वंचक्यः पशवश्चण्ड्यः काश्वियुवतयस्तथा ।। १८३ ॥
धनवंतस्तथा कचिन्निर्था दानवर्जिताः ।
श्रीफलाः फलवतोपि यथा सेव्या न चाम्रवत् ॥ १८४ ।।
या स्त्रियो ये नरा वृद्धः स्वसेवां कारयति ताः ।
दास्या भवेयुस्ते दासास्तवृत्या जन्मजन्मनि ॥१८५॥
अर्थ--कोई दानी क्षारिद्रुमादिक वृक्षोंके समान है, क्यों कि वे
असेव्य बहुतसे फलों को प्रदान करते है, इसीप्रकार कोई दानी दोषयुक्त
अनेक द्रव्योंको दान देने के लिए रखते हैं ॥ १८२ ।।
कोई २ मायाचारिणी गायें अपने बछडेके पोषणके लिए ही
दूध को छोडती हैं, उसी प्रकार कोई २ त्रियां अपने बच्चोंके व घरके
पोषण के लिए आहार द्रव्य रखकर पात्रों के आनेपर उसके अमावको
बतलाती है ॥ १८३ ।।
तिने दी धनवान ऐसे रहते हैं धन के रहते हुए भी
दान-कार्यको नहीं करते हैं । उनका धन भी निरर्थक है। जिस प्रकार
कि घेल के वृक्ष विशेष बेल फल रहने पर भी आम समाग सुगमता
से ये फल नहीं साये जाते ॥ १८४ ॥
जो त्रियां व पुरुष अपनेसे ज्ञान वय आदियों से वृद्धजनासे सेवा
कराते हैं ये जन्मजन्ममें दास दासी होकर उत्पन्न होते हैं ॥ १८५॥
प: क्लिनात्पयनः सरा यदि भवेदत्तेऽहंसे दुर्दृशे ।
घेश्याहासकगीतिभंदभृतये देहाससौख्याप च ।।.
दुस्थाने भवनाय मूलधननिर्माशोधपापाखिल-
स्तस्यायों घटने सदा न घटने धर्माय वित्तादिकः॥१८६॥
२४९ दानफालविचार -- . T . - अर्थ-जो व्यक्ति दरिद्रताके कारण पात्रदानादिक न फरसकनेसे सदा खेदखिन्न होता रहता है, यदि उसे किसी तरह धन मिलकर श्रीमंत हुआ तो फिर यह देय, धर्म आदिको भूल जाता है। उस समय वह पापकार्य में, मिथ्याष्टियोंके लिए, वेश्या, विदूषक, गायक, भाड आदिके लिए अपने द्रव्य का व्यय करता है । एवं देह व इंदिय- "भोंगमें व्यय करता है । 'खराब स्थानोंमें, अपना घर बगैरे बनाने में व्यय करता है। उसकी क्रियायें मूलधनके ही नाशके लिए होती है । उसे चाहे तो और भी लोग फर्ज बगैरे देते हैं । परंतु धर्मके लिए धनादिककी सहायता नहीं मिलती है, अर्थात् 'लोकमें पापकार्योके लिए धन आदिकी कभी कमी नहीं होती है। परंतु धर्मकार्य, पात्रदान आदि करना हो तो · उसके लिए धन आदिकफी बडी अडचन ..रहती है.॥ १८६ मिथ्याष्टिदत्तदानफल. भुक्त्यादौ यहुपीतमंचु दहनं निर्नाशयत्युज्ज्वळम् । पचाडक्तमहाशनं गरळवत्माणान्यथा हंति यत् ।। सदृष्टिः कुशेपु पापिति तं मत्वा च दत्ते धनं । हत्त्वा दृक्मुकृतं पुनः कृतमचं संवर्य तत्स्वं क्षयेत् ॥१८७॥ अर्थ-जिस प्रकार तीत्र भूख लगे हुए व्यक्तिने यदि भोजनके पहिले यदि खूब पानी पीलिया तो तीक्ष्ण उदराग्नि एकदम नष्ट होती है, और उसके बाद पुनः अधिक भोजन किया तो उसे पचाने योग्य अग्निके न होने के कारण वह भोजन भी विषके समान होता है । इसी प्रकार जो मनुष्य मिध्यादृष्टिको भी पात्र समझकर दान देता है, यह सम्यग्दृष्टि अपने सम्यग्दर्शन पुण्यको खो लेता है, और पापकी वृद्धि करता है। एवं अपने वंश इत्यादिक विमघको नष्ट करता है ।।..१८७ ॥ । .
२५० दामंशासनम् , , दानं मिथ्यादृशे दत्तं दृष्टिं पुण्यं च नाशयेत् । साधितेऽरिपुरे शत्रुः कंटकद्रून्यपन्निव ॥ १८८॥ अर्थ-मिथ्याटिके लिए दान देनेपर वह सम्यक्त्व व पुण्यका नाश करता है । शत्रुके नगरको साधन करने के बाद शत्रुराजा जिस प्रकार कंटकवृक्षोंके बीजको बोता है उसी प्रकार मिथ्यादृष्टियोंको दान, देनेपर अपनी हानिके लिए ही कारण होगा ॥ १८८ ॥ ... मुक्त्वा निजस्वामिनव वित्ताः । शg समाश्रित्य.सभाति रास्ति (?) ॥ सायुर्विभूतिः स यथा विनश्येत् । -मुहक्तथा स्यात्कटगाश्रितय : १८९ ॥ अर्थ---जो व्यक्ति अपने स्वामीको छोडकर शत्रुबोका बधिय करता है वह अपनी हानि ही कर लेता है। और उसकी संपत्ति आ. दिक नष्ट होती है, इसी प्रकार जो सम्यग्दृष्टी जीव मिध्याहारियोंका आश्रय करता है उसकी हालत होती है।॥ १८९ ॥ ब्रह्मवते दर्शन एव नटेऽत्रातः स्थादिव लोक एषः। शाने तटाकादिविभेदयत्सङ्घचेपि सस्यादिनिनाशवच्च॥१९०॥ अर्थ-इस जीपका पदावर्यात व सम्यग्दर्शन यदि अट. हुक्षा तो लोकमें बरसात न पडनेसे जो दुर्भिक्ष फैलता है उसके समान उस की हालत होती है । जानके नष्ट होनेपर तालाब सादिफे घधिके टूटने के समान होता है । अहिंसादि व्रतों नष्ट होनेपर खेतफे सस्यादिक माशफे समान होता ॥ १९॥ एपामासां न दानचंद्रत्युक्त्वा यस्तानिवारय । । स एव सर्व पापात्मा स्पाभिस्त्री जन्मजन्मनि ॥ १९१।। अर्थ-जो व्यक्ति "अमुक पुष्प दान देने या ना रे, " । ।
दानफलाचार २५१ . " अमुक स्त्री को दान देने की इच्छा नहीं है " ऐसा कहकर दाम देनेसे रोकता है, वह पापी व्यक्ति में ये जन्म जन्मम दरिद्र होकर उत्पल होते है ॥ १९१ ॥ या स्त्री मंतशा सकळा यदा तां पीराः कपंतीह तदेव यैन । महक्चरित्रं च यदा विनष्ट कर्माणि देवाश्च, जनास्तदा । 'अर्थ-कोई खी मतपति अर्थात् विधवा होती है तो उसे पुरयासी- जन यदि दुःख देंगे तो उन पुरुषोंने अपने सम्यग्दर्शन घ चारित्र को नष्ट किया तथाउसके फलसे उनको पापकर्म, शासनदेवतायें व मनुष्य उनको मारते हैं अर्थात् उनकी अनेक प्रकारसे हानि करते है ॥१९२॥ भोक्तं मार्थितभुक्ति संस्थितं चट्टामागतं । तस्य दानांतरायः स्यायः पुमांश्च विहापयेत् ॥ १९३ ॥ अर्थ- यदि कोई भोजनके लिए बैठा हो, या भोजन के लिए निमंत्रण पाया हो तो उसको निवारण करनेवाले खी-पुरुषोंको घोर अंतरायकर्मका बंध होता है ।) १९३.॥ कार्याय बद्धमशनं कुदृशे जनाए । नीचाय तंडुलपटिं दययेव दद्यात् ।। अनं पिनात्मनिलये शगनं च मुक्ति । नो कारयेदिव फलानि च विक्रयतः ।। १९.४ ॥ 'अर्थ-अपने कार्यके निगिरसे फिसी मिध्यादृष्टिको भोजन' बंधा हो, एवं फिसी नीचफो चायल या धान्यकी यारी बंधी हो तो उनको दया भाषसे ही देना चाहिये । अर्थात् पात्र समझ कर नहीं देना चाहिये । जैन कुलोत्पन्नको छोटकर अपने घरमें दूसरोंको भोजन फराना व शयन कराना ठीक नहीं है । बीउ टिए रखे हुए पालका विक्रय करना जिस प्रकार अनुचित है, उसी प्रकार सपात्रोके दान के .
दानशासनम् १ 'योग्य द्रव्यको मिथ्या दृष्टियोंको प्रदान करना अनुचित है ||१९४॥ आहूय जैनान्यहिराळयेषु ये भोजयत्येवत एव सर्वे । । पापं लभतेन विशंत्ययास्तनोदासयेयुः कृतिनोऽपि जनाः॥१९५॥ अर्थ-अपने घरपर जैनियोंको बुलाकर। जो उनको 'बोहरके सामान्य घरपर भोजन कराते हैं ये पापार्जन करते हैं। पुर्णयका नाश करते हैं। पुण्यात्मा सजन जैनियोंकी उपेक्षा नहीं करते है ।।१९५॥ अशिक्षितकुदृग्भ्यो ये दानानि ददते नराः । महारण्ये भवेयुस्ते मदोन्मत्ता मतंगजाः ॥ १९६ ॥ अर्थ-जो सज्जन अशिक्षित व मिध्यादृष्टियोंको दान देते है ये उस दानके फलसे बडे मारी जंगलमें मदोन्मत्त हाथी होकर उत्पन होते हैं।॥ १९६ ॥ मो दद्यादपकारिणे च रिपवे धर्मद्विषे भीकृते । भृत्येभ्यः परिहासफाय यशसे भूपाय संगीतिने ।। नृत्ताया अपि विनोदकाय गणिकाळोकाय दुर्घत्तये । गोवृत्ताय खळाय धार्मिकजनी नै धन धर्मतः ॥१९॥ अर्थ---धार्मिक जनोंको उचित है कि ये धर्मबुद्धिसे अपकारी, शत्रु, धर्मद्वेषी, भयंकर, मृत्य, हास्यफार, स्तुतिपाठफ, राजा, गायक, नर्तक, विनोदक, वेश्याजन, दुराचरणी,' 'दृष्ट आदियों को अपने धनको न देखें । अर्थात् धर्मधुद्धिसे इनको धन देना ६ पाप, संच- यके लिए कारण है ॥१९७।। x जंगभुतिगृदानियन्तरगेदेषु भोजयम् । रायन यन फर्नव्यं कर्तव्यं सदिय या ॥ प्रहास्यप्तचौराचिरसतानां शोषणे यदि । भपपादो भगेन्नृणा न स्पदन्यमंदिरम् ॥
दानटर्विचार
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-
गांयवादकनर्तकमागधपरिहासकादिलोकेभ्यः । -
सेवार्य'दाता धनमपवादभयेनं चार्थिने दद्यात् ।। १०.८ ॥
अर्थ-गानेवाला, 'अंजानेयाटा, नर्तन करनेवालं, 'तुति करने
यासा, हास्यकार, याचक, 'आदियोंको सेवा करने के उपलक्षमें,
लोकमें अपवाद न हो इस · मयसेबी धन देना चाहिये । उनको
पात्र.समझकर दान नहीं देना चाहिये ।।.१९८ ।।
प्रमचनागाः मृणिशिक्षितास्सदा ।
सुमंत्रतंबानुगता महोरगाः।
" कुधर्मजश्रीमदमत्तमानवाः ।
समंत्रतंत्रैरपि शिक्षिता न च ।। १०८।।
अर्थ मदोन्मत्त हाथियोंको अंकुशसे यशम कर सकते हैं।
फाले सर्प मी मंत्रतंत्रोंसे अनुकूल होते हैं । परंतु कुधर्म
अर्थात् अपात्रदानादिकके फलसे उत्पन्नसंपत्तिके: मदसे। जो
मदोन्मत्त हैं .उन -पुरुषोंको कोई भी मंत्र तंत्रोंसे यशमें नहीं कर
सकते हैं।। १९९ ॥
अनियतकरणान्ये मानवस्तिर्पयंती- ।
स्पनियतकरणास्ते दृविनीता भवेयुः ।
दुरितकरणशक्ता ध्वस्तपुण्यार्थभक्ता।
नियंतकरणवृत्ताः पालनीयाः स्ववित्तः ।। २०० ॥
अर्थ-जो व्यक्ति पंचेद्रियविषयों में अनियमितवृत्ति के धारक
इंद्रिय लोलुपी असंयमियोंका पोषण करते है, ये पोपार्जन में सहायता
पहुंचाते है । इंद्रियलोलुपी व असंयमी स्वेछाचारी व अटकोक अर्जन
करने में समर्थ होते हैं । एवं पुष्प व पुण्यात्म वॉको कष्ट भी देते हैं।
इसलिए हमेशा नियतकरण-वृत्तिवाटे अर्थात् इंदियंदमन करनेवाडे
संयगियों को ही अपने द्न्यसे पोषण करना चाहिये ॥२०॥
२५६ . दानशासनम् विचार करता है, सामुद्रिक ! लक्षण 'आदिको देखता है, उन लक्षणी को देखनेके लिए उसे स्पर्श करता है। परंतु वह व्रती विवादित होनेके बाद उसे स्पर्श नहीं करता है। क्यों कि ' उसका दान दूसरोंको दे चुका है। इसी प्रकार देव व ऋषियोंको जो धन दान में दियाला "चुका उसका मन, वचन व कायसे परित्याग करें।॥ २०५ ॥ आक्रामत्यु ढकन्यां यस्तै हतारो न के पुरि । 'पौरा: निदन्ति इंतीशो दंडयंति नृपा यथा ॥ २०६॥ अर्थ-यदि ति वियाहित कन्यापर किसीने आक्रमण किया तो पुरजन उसे मारे बिना नहीं छोद सकते । पुरजन उसकी निंदा करते हैं। जिस प्रकार राजा दंड देता है उसी प्रकार उस खोका पति भी दंडं देता है । इसलिये दूसरों को दिए हुए' परद्रव्ये पर भी आक्रमण नहीं करना चाहिए । लोकमें उसकी निंदा होती हैं। पुरवासीजन उसे कोसते.।। राजा,भी दंड देता है ।। २०६ ॥ . त्रीणि गंधायुपुष्पाणि सैन्यान्येव निनाश्रितः । निनार्चिताखिलार्थेषु नान्यवस्तूनि सर्वथा ॥२०७॥ अर्थ-जिन भक्तों उपित है कि जिनेंद्रको अर्चन किए हुए 'द्रव्यों में से तीन ही पदार्थ अर्थात् गंध , उदक व पुध सेवन करने योग्य है। अन्य पदार्थोको सेरन नहीं करना चाहिये ॥ २०७॥ 1. स्वक्षेत्रोतफले हमे न प नृणां धान्यादिलाभो.यथा। सत्कारधने हृते न याणिना, लाभः स पात्रापिते ।। आदत्ते द्रविणेन पुण्यमतुलं सत्पुण्यभाजां नृणां । दत्ताहारमितापितामित्र गुना पात्रार्पितं न स्पृशेन ॥२०॥ अर्थ-जिस प्रकार लो में देखा जागा कि अपने क्षेत्रमें बोये दुरबानको यदि निकाल लिया तो उसने कोई धागादिकका साम . -- दानफलामेबार - -- - नहीं हो सकता है, किती. साने को मिश्चित करनफे लिए ईसादी का ही यदि •यापारीने अपहरण कर पिया तो उसको कोई लाभ नहीं हो सकता है । इसी प्रकार पार के लिए दिए हुए धनको पक्षण करने पर पुल पुण्यको प्राप्ति महीं हो सकती है। जो सजन शुद्ध पुष्प का अर्जन करना चाहते हैं, उनको उचित है कि जिस प्रकार दिप हुए आधारको पुन म्पर्श नहीं करते एवं दी हुई क याको पुन, प्राण नहीं करते, । उसी प्रकार पात्रोंको दिए हुए दामद्रव्यका पुन स्पर्शन करें ॥ २०८ ॥ मादचद्रव्यग्रहणनिषेध । सुक्षेत्रोप्तरगंगापनसबीहादियोजानि य ।। फि गृहाति कृपीवल स्मरति कि पीज समुप्त मम् । 'सोऽये सर्वफलानि सति मनसि स्मृत्वैव मा भवे- ॥ 'दत्तद्रव्यांदद तु सदया जैना उदयपिण ॥ २० ॥ अर्थ-माली भूमिमे वोए हुए नारियर, सुपारी, पनस, धान मादिके बीजको क्या कोई फिसाम ग्रहण करता है? कभी नहीं, यह उन के उत्तर फलों को मनमें स्मरण करते हुए सतुष्ट होता है। इसी प्रकार दवास प्रशस्स,दाताको भी उचित है कि वह दानके उत्तरफर को ध्याममें रखते हुए दिए हुए द्रव्यका पुन प्राण न करें ॥ २०९ ।। भूगोलटाफनशिशुक्स्यपदाधुनुमा यथा 1- न स्मरति न गृहामा दत्तद्रयाणि दानिनः ।। २१०॥ -निस प्रकार भूमि, गाव, तागर, नदी, समुद्र, सीप, आकाश, आ और वृक्ष परोपकार करते है और दिये हुए पदार्थको वापिस नहा लेते हैं, उसी प्रमादानी भी दिए हुए द्रव्योंको न स्मरण करते है और नामहण करते हैं ॥२१०, HE I REnr . । 1 *२५८ दानशासनम् • विशेषार्थ-भूमि---यह जमीन बहुत से प्रकारके धान्यादिकों को उत्पन्न कर दूसरोंके उपकारके लिए दिया करती है। परंतु उनको कभी वापिस नहीं लेती है, धान्योंकी उत्पत्ति के लिए स्वयं की छाती पर यह हल चलाने देती है, अनेक प्रकारसे कष्ट सहन करती है, यह ,सब किस लिए ? परोपकारके लिए। गो-जिस प्रकार गाय घास और पानीको ग्रहण कर दूध देती है, उसमें उसका कोई स्वार्य नहीं है, उसी प्रकार 'दानियोंकी वृत्ति होनी चाहिये। तटाक-तालाब अपने पानीके द्वारा समस्त खेतके सस्यों की वृद्धि में सहायता करता है, उसीप्रकार दातृजन भी अपने धनके द्वारा परोपकार करते हैं। नदी-निसप्रकार नदीसे पानी कोई ले जाकर बसे कम करें, चाहे कोई शत्रु आकर उससे पानी रोजाप, बंध बांध देखें, तो उसके साथ या चाहे जैसी अनुचितवृत्तिको धारण करनेवालोंके साथ लडसी नहीं, भिडती नहीं, अन्यथा विचार नहीं करती है, इसी प्रकार उदार हदयी दानियों की वृत्ति रहती है। समुद्र-जिसप्रकार समुद्र गंभीर रहता है, उसके पास जो रन हैं उसे कोई लेना तो मी उसकी महत्ता कोई अंतर नहीं आता है, इसी प्रकार दानियोंकी गंभीर मनोयूति रहती है। शुक्ति-सीपके अंदर पडे हुए मोतोके समान दाताजनोंकी भामा मुक्तिस्थित सिद्धफे समान तुद्र रहती है। * मेघ-जिसप्रकार बादल अयाचित होकर ही पानी बरसाती है, एवं लोकको संतुष्ट करता है उसी प्रकार दातायोफी गृत्ति रहती है। . . . . भयाषिताप्तिकरी रसायः सप्यायलीतापहरा पयोगा। हतावधान: शिशुरोऽत्रधात्रीजनो यथा वातजनस्सपास्यात् ॥
दानफलपिचार । कूप--भू, शिला, महाके खोदनेसे उत्पन कूप जिसप्रकार अमृतके समान मिट जलको प्रदान करता है, इसी प्रकार दानियोंकी वृत्ति होनी चाहिये। द्रुम-स्वयं धूपमें खड़े होकर दूसरोंको छाया प्रदान करते हुए दूसरोंके उपकारकेलिए फल छोडते हैं ऐसे वृक्षोंके समान दातावोंकी वृत्ति होनी चाहिये। दत्तद्रव्यापदणफल यो देवाचर्पितं द्रव्यं नादत्ते न च बांछति । सत्यकारधनं दत्तं मुक्त्य सेन विदुषुधाः ॥ २११ ॥ अर्थ-जो मनुष्य देव य ऋषियोंको दानमें दिए हुए द्रव्यको प्रहण नहीं करता है और न चाहता है उसने दान नहीं दिया, अपितु मुक्तिलक्ष्मी के साथ विवाह करनेके लिए संचकार धन (साही] दिया ऐसा विद्वान् लोग कहते हैं ॥ २११ ॥ दचंद्रव्यग्रहणफल येन यस्मै धनं दात्रा दत्तं तेनाहृतं पुनः । तत्सर्वमपि बंधूनामुत्सवे दत्तवस्तुवत् ॥ २१२ ॥ .. अर्य--यदि किसीको दिए हुए द्रव्यको उस दानी ने वापिस लिया तो वह दान नहीं है, बंधुओंके घरमें उप्सबके समय दी हुई सहायता है ॥ २१२ ॥ यो दत्तद्रव्यमादत्त तस्योत्तरफळ न च । उप्तबालफको दावमूढवद्धार्मिको भवेत् ॥ २१३ ।। अर्थ-जो मनुष्य दिए हुए व्यको ग्रहण करता है, उसको उस दानका उत्तर फल बिलकुल नहीं हो सकता है। उसकी हालत ठीक २६० वामशासनम्, . -- - 1) 1 उसी प्रकारकी है। जिस प्रकार कि एक मनुम्य बोए हुए नारिवलको निकालकर खाता है । उसी प्रकारका यह मूट धार्मिक है ॥ २१३॥ अन्यत्रयमहणनिषेध योऽशेपवस्तुमकरीपकर्ता तद्वस्तुलेशांशफयाचिता येत्।। शप्यत्यलाभे यदि कुप्पति मियं स एव मूर्लोन कृतिन धर्मयाह ।। अर्थ-जो सजन अपने धमते दूसरोको उपकार करता है, बदि उसने उस व्यके कुछ अंशको सपनो जिरामायन किया तो उसने दिया तो ठीक है, नहीं दिया तो उसके ऊपर मोधित होता है, गाली देता है, यही मूर्ख है, वह, साजना नहीं, धार्मिक नही । पों कि दूसरोंको दिए हुए व्यपर उसका कुरा मी अधिकार नहीं है, वातका यह विचार नहीं करता है ॥२१॥ गर्तादोऽन्पचित्त फामूलनिहितं धान्यं यथास्यत्वहम् । दारियोद्भवदुःखभाजन मनोऽन्याय, तया सेवते । यदीनारशतांशतस्करजना दत्ते पायाखिळम् । तस्मादन्यधनं च साधिपतणं धन्यो जनो न स्पृशेत् ॥११५॥ अर्थ-जिसप्रकार गाट'(भूईके समान जमीन के अंदर रहनेवाला जंतु ) कुमूली भरे हुए पायको सदा खोती, उसी प्रकार दारिद्वपके दुःख से पोटित मनुष्य अनेक उपायोंसे परमयको अपहरण करते हैं। उसका फल बहुत बुरा भोगना पटता है । जिसप्रकार एक चोरने एक शतांश द्रव्यको चौरी को तो भी राजाके द्वारा दिया हुआ दंड तो. उम से शतगुणा अधिक होता है, और उस देना ही पड़ता है। इस लिए परधनको धन्य सम्जन कभी भी स्पर्श न करें, इतना ही क्यों। जिस घासको माटिक हो उस मासको भी नदी 'देवाय गुरये रोज दचं पात्राय पद्धनं । 'दानुभिस्तथ न गावं स्वसेवेपूतीनवद ।। २१६॥ ॥ . + वागरामयिमार 1 . दाना J + ५ ॥ - मर्य-रेम, गुरु, राजा य समायोको दिये हुए पनको दाताटोग मनानकायमे प्रहण न करें, सिप्रकार भाने मेतम बाय १५ चौबको यह मरण नहीं करता ॥ २१६॥ भारलानमन्पदीयं स्व दानं या कुन्तव्यद । दावरयानि पुर्यान मागगगफलगयत् ॥ २१७ ।। अर्थ-नो गनु देसम्यको भएनेस्य रम सागर १६ पारि कारण । सरो दातृपकी हानि होती है। परजीके समान परस्यको भी महण नहीं करना पाहिये ॥११॥ देयगुगसेयाफल दरा नियफल रामामुत्साय फरुणा हदि । दचं तैरपिक वित्त देवास्तथाधिकम् ॥ २१८ ॥ अर्प-राणाके पास जाकर प्रतिमित्य नि परको भेटी दे तो उसके द्वारा यह प्रसन्न होकर हदयमें करुणा धारण कर उस मोफरको भनेक सपति प्रदान करता है। इसी प्रकार देवगुराकी सेवा करनेपर, उनके प्रसादसे मनेफ मग संपत्ति मिटती ॥२१॥ स्वस्व देवाय संपल्प स्वयमेव व्ययत्यदः । स्थानीय भवेतन्यादानवरसोऽनरि स्मरेत् ॥ २१९॥ अर्थ--जो सम्मन अपने द्वन्यको देवताकार्यके पिसाप फरक उसे अपने लिए उपयोग करता थे, उससे उसका नारा हhnt यदि कन्यादान करके भी उस याको पनिगृह में नही भरे तो निम स दो नाता ॥२१॥ दरम्यादपार देवकसितम्हारे वर नोfi । पाप पुण्यापं निर्यग्गान गन्उत्स नारसीम् ॥ २२० । - + दामाद भी २६२ दानशासनम् ३ . । अर्थ-जो मनुष्य देवसंकल्पित द्रव्यको अपहरण करता है, उसके प्रति बंधु राजा आदि उससे वैर विरोध करते हैं। उसके तेजकाक्षय होता है, रोगादिवाधा बढती है, पापकी वृद्धि होती है, पुण्यका क्षय होता है, वह तिर्यंचया नरकगतिमें जाता है ॥ २२० । प्रशंसाहतदान कृतात्मवर्णनं पात्रः श्रुत्वा हृष्टाशयांचितं ।। दानं सर्व प्रशंसाकृद्वंदिभ्यो दसदानवत् ॥ २२१ ।। अर्थ-पात्रोंके द्वारा की हुई अपनी प्रशंसा से प्रसन्न होकर दिया हुआ दान बंदीजनोंको दिए हुए दानके समान प्रशंसाकर दान है ।। २२१ ॥ निष्फलद्रव्य अत्युच्चाः पाटला स्थूला निष्फलाः कुमुमोद्भवाः । साध्वयोग्या भवेयुस्ते दातारः कतिचिधा ॥ २२२ ॥ अर्थ-जिस प्रकार पुप्पसे उत्पन पाटल वृक्ष बहुत ऊंचा, बड़ा,, होनेपर मी निष्फल हुआ करता है, इसी प्रकार किती सजन के पास घडत धन कनक रहने पर भी वह साधुके लिए अयोग्य हुना करता ३, अर्थात् पात्रदानके काममें उसका धन नहीं आता है । अतएव व्यर्थ है। २२२॥ देवादिदव्यहरणपाल देवगुर्वादिभयानां योऽर्थानपहरत्पपि। स भिन्नपद्माकरवत्स्यात्पुण्यरहिताशयः ॥ २२३।। अर्थ-जो देव, गुरु आदिभव्योंकि अर्थको अपहरण करता उसको हाउत टूटे हुए तालायके समान है । उसके हृदय में पुण्यका अभिप्राय नहीं है । अर्थात् यह पारी है ॥ २२३ ॥ * ।
दानफलविचार स्मरणकर न देनेका फल यो ददामि धनं स्मृत्वा न दत्ते स भवांतरे । वंध्यद्रुम इवामाति कर्माशक्त उदंभरिः ॥ २२४ ॥ अर्थ-जो व्यक्ति दान देता हूं ऐसा मनमें स्मरणकर पीछे उसे नदी देता को तो वह आगेफे भयमें प्यनुम (बैकारवृक्ष ) के समान बन जाता है। और उसे अपना पेट भरना भी कठिन होता है ॥२२५ ध्यातं वित्तं न दत्तं यैर्येपी कालावषिर्मुदा। ध्यात तर्न फले कार्य तेषामिष्टं न फुत्रचित् ॥ २२५ ॥ भर्थ-दूसरोंको देने के लिए विचार किये हुए धनको योग्य सम- यमें संतोष से यदि नहीं दिया तो उस शुभ विचारका कोई फल नहीं हुआ करता है, और ऐसे लोगोंको कोई विश्वास नहीं करते । अतएष उनकी इष्टसिद्धि कही भी नहीं होती है ॥ २२५ ॥ लिखितादत्तदानफल लिखित तु न दत्तं पैर्येभ्यस्तेषां पहुव्ययः । नष्टः स्यादुद्यमः सर्वः स्वात्मीयायबहुतयः ॥ २२६ ॥ अर्थ-किसी को धन देने के संबंध टिखकर देनेपर भी बादमें जो व्यक्ति नहीं देता है। उसे बहुत सर्चेका सामना करना पडता है, Ta स उद्योग नष्ट होते है और पुपका मी क्षय होता है ।।२२६ चयन कर न देनेका फल यस्तु द्रव्यं ददाम्युक्त्वा न द स भवांतरे। शाल्मीतबद्भाति निष्फलोरमवत्परः ॥ २२७ ।। अर्थ-जो व्यक्ति दान देता हूं ऐसा कहकर बादमें नहीं देता हो सो वह आगेके जन्ममें बिना प्रयोजन उपम करनेवाले शामली वृक्ष''समान-शेकर' उत्पन होता है ।। २२७ ॥
दानशासमम् - . + 1 1 -- मर्यादाक भीतर नही देना वित्त मुक्त न दत्तं यैर्येषां मागवधेर्मुदा 17.5 उक्त तैर्न फलं कार्य तेपामिष्टं न मुत्रचित् ॥ २२८ ॥ अर्थ--जो सम्जन देने की बात कहकर मुदतके अदर नहीं देते हैं उनका कहना व्यर्थ है। उहे कोई भी विश्वास नहीं करता है । अत: उनके मनोरथकी सिद्धि कहीं भी नहीं होती है ॥२२८ ॥ अयोग्यधनग्रहणफल योऽदाय दायमाहत्य वर्तते स भवेद्धनम् ।।।। 'सक्लेशो निष्फलोद्योगो मृतपुत्रांगनेशवद ॥ २२९ अर्थ-जो अंग्ने लिए प्रइण करने योग्य नहीं हैं ऐसे धनको 'अपहरण कर धनवान कहलाता ६, वह सदा दुखी रहता है। संतान के मृत होने के बाद स्त्रीका पति बने रहना जिस प्रकार निप्पल व दुखका है उसी प्रकार उसको हात ॥ २९ ॥ कृतसैवाधिक वित्त येपो दत्त पुरा च य । ते सर्वे किंफरास्तेपामधिश्रीणां भवतिर ॥२३॥ अर्थ-जो राजा वगैरे अपने सेवकों को उनकी सेनासे भी अधिक 'धन देकर सतुष्ट करते हैं या पूर्वज ममें देकर संतुष्ट किया है, वे भूल्य पुन: अपभषमें भी उन श्रीमतों के ही ईमानदार नायर होकर उत्पन्न होते हैं ॥ २३० ॥ स्मृत्वा न दत्तमुक्त्वा दत्त दल्पं समादव येन । विभिरेत होनि स्पा दानस्पायस्म सस्प नास्ति फलम् ॥२३॥ अर्य-जो व्यक्ति देनेको विचार कर नहीं देता दो, देनेकी वर्ग फरकर नहीं देता हो र दिए हुए को पुन, अपहरण,फरता हो, यह r - - दानफलविचार २६५ " पापी है, इन तीनों प्रकारोंसे उसकी हानि होती है । और उसके दान य पुण्यका क्षय होता है, एवं उसफा कोई फल नहीं है ॥ २३१ ॥ पुण्यपापभेद यथा करोतीह मुगंधपुप्पं मनोहरत्वं मुकृतं तथैव । यथा करोती कगंधपुष्पं मनोजुगुप्सा दुरितं तथैव ॥२३२॥ ... अर्थ-जिस प्रकार सुगंध पुप्प अपने सुगंधके द्वारा मनुष्य के मनको हरण कर लेता है अर्थात् मनुष्यको अच्छा लगता है उसी प्रकार. पुण्यकर्म भी मनुष्यको सुख पहुंचाता है। दुगंधपुष्प जिस प्रकार घृणा उत्पन्न करता है उसी प्रकार पापफर्म मनुष्यको दुःख पहुंचाना है ॥ २३२ ॥ दाताबोंकी शक्ति ऐसफर याचना करें यावत्पशूधसि पयोऽस्ति विहाय सर्व । पाकाय तस्य पपसोऽर्थमुपाहरंतः । गोपा इवात्र भुवि दातृजनस्य शक्ति । याचेत चित्तमधिगम्य गुणं च मर्पः ॥ २३३॥ अर्थ-जिस प्रकार ग्याले लोग गायके स्तनसे सा दूधको न निकालकर उसके अर्धमाग ही अपने कामके लिए टेते है उस प्रकार दाताबोंकी शक्ति, मनोवृत्ति व गुणको जानकर ही उनसे धनकी याचना करें ।। २३३ ॥ वा फलति न फलतीति क्षेत्रं भूपा यदा हरंति धनम् । धनमधनमजानंतो दानमिति द्रव्यमाहरंति जनाः ॥ २३४॥ अर्थ-खेतमें उत्पन भन्छा हुआ है या नहीं इस बातको न जानकर ही राजा टोग धनको वसूल कर लेते हैं। इसी प्रकार यह धनवान् है या निर्धन है यह न जानते हुए ही उन लोगोंसे याचकजन धन ।। २३४॥ ३४ दानशासनम् ." दाताके प्रति क्रोध नहीं करनेका उपदेश 'पापादेहीति कष्टुं यदि फलति वचो मुद्भवेनिष्फलं त-। हुःखं मा माच कोपं कुरु दुरितफलं जातमेतत्क्षमस्व । अक्षत्वा दातृलोकं शपति शपति किं प्राकृत नोवनीध- । :. भावल्पायैव वृष्टिः क्षरति बहुतरा विद्धि भो भावय त्वं॥२३५।। अर्थ--"देहि" इस प्रकारका यचन पापकर्मके उदयसे दी बोलना पडता है, महान् कष्ट है, यदि यह वचन सफल हुआ तो हर्ष होता है, निष्फल हुआ तो दुःख होता है। परंतु हे भव्य ! निष्फल होनेपर भी दुःख मत कर, क्रोध मत कर, यह पापकर्मके उदयसे हुआ, इस लिए क्षमा कर । यदि क्षमा न कर दातावों को गाली दें तो क्या होता है। पूर्वजन्ममें किए हुए पापके फलसे ही ये सब कुछ होते है । इस लिए विचार करो। व्यर्थ ही किसीके प्रति क्रोधित मत होवो ॥२३५।। सफलजीवन भूरि जीर्णमिदं सर्प येन साधू कृतं तदा । तस्पैव स्यात्फलं सर्वमिति चिंता प्रचिंत्तयेत् ॥ २३६ ॥ अर्थ- यह सब कुछ जीर्ण हो चुके हैं, अतः साधुषोंके योग्य नहीं है, ऐसा विचार सदा करना चाहिए उसीका जीवन सफल है ॥२३६॥ सार्यो जीर्णमिदं कृत्स्नं मुदा साधूकरोम्यहम् । स्मृत्वा न कुर्यादुक्त्वा च चिंतामिति न चिंतयेव॥२३७॥ अर्प -यह पदार्थ अत्यधिक जीर्णोचपाइसलिए साधुयों को संतोपस दे डाटता हूं इस प्रकार के विचार मनमें 4 पधन में कभी नहीं लाना चाहिए ॥ २३७ ।। प्रसादटक्षण देवाय पात्राय मिनोचितानि पार्वति वस्तूनि वरांति गेहे । सामु चै कम्यं प्रदपाच्छे प्रसाद प्रवदति अनाः ॥ २३८ । - दानफलविचार २६७ अर्थ-देव व पात्रों के लिए उपयोग में आनेवाले जितने पदार्थ घर में मौजूद हैं उन में से कुछ अंशको पहिले से दान में देना चाहिए बाकी बचे हुए को अपने उपयोग में लेना चाहिए । उसे शपिगण प्रसाद कहते हैं ॥ २३८ ॥ पुण्यात्माओंकी वृत्ति यत्राघुष्टं निशम्याप्यतिपटुवणिजो यत्र यत्रास्ति वित्तं । गत्वाहत्यापणं तत्सकलचमुचयं तत्र निक्षिप्य कृत्वा । शुल्कर्णमातिभाट्तलवरनृपदायादिचोरादिकानां । चानम्योक्त्वा चटूक्तीरिदमखिळधनं जागरूकाश्व गुप्ताः ॥२३९॥ क्रीत्वार्थे द्वारमाश्रित्य च नमितकराः कांश्च मासांश्च नीत्वा । निद्धं किंच किंच प्रशमितमनमो दीनचाटुभवाचः । सर्वव्यं गृहीत्वा व्यवहृतिनिपुणाः स्वस्खगेहं गता यै । पण्मासाद्वत्सराहा सदुपरित इवाचिन्वते यं च जैनाः ॥ २४ ॥ अर्थ-किसी स्थान में कोई बडी यात्रा-उत्सव हो, यहाँसे निम- प्रण मिले तो व्यापार कार्यमें कुशल वैश्य उसी दिनसे इधर उधर जाकर रुपये एकत्रितकर जहां जहां जो चीज उत्पन्न होती है उन को खरी- दकर उस महोत्सवके स्थानमें दुकान लगाता है । वहांपर टेक्स लेने वाले, कर्ज देनेवाले, उधार लेनेवाले, कोतवाल, राजा, राजसेवक, दायाद, चोर आदियोंसे बहुत प्रेम से बंटता है, एवं अपने धन का संरक्षण करता है, और व्यापार करता है, तदनंतर कुछ समयतक वहां रहकर अपने व्यापार से द्रव्य कमाकर छह महीने में या वर्ष में अपने स्वदेश को पहुंचता है, उसी प्रकार की वृत्ति पुण्यधनको कमा नेवाले की होनी चाहिए। बहुत उपायसे सत्कार्योको करते हुए किसी के हृदय को न दुखाकर पुण्यका अर्जन करना चाहिए ॥२३९-४०॥
२६८ दानशासनम् . देघ घ ऋपिसेवाफल जैनं विवामिहोपलेन तरुणा लोहेन चैत्यालयम् । कृत्वा मृत्तिकया च भांडमखिलं कृत्वैव लोकोचितं ।' पुण्यं लौकिककार्यमाशु लभते सर्वो जनः पामरः। . पानं स्वामिपदानुरक्तममलं संपार्य धन्यो भवेत् ॥२४॥ अर्थ - इस लोकमें दूसरे लोग जैनबिबको पत्थरसे, काष्ट से बनाकर, चैत्यालयको लोहा, 'मिट्टी, चूना आदिसे बनाकर व इतर सदुचित पात्रों को बनाकर उसके बदलमें विपुल धनको पाफर संतुष्ट होते हैं। फिर साक्षात् देव च ऋषियोंकी सेवा करनेवाले विपुल पुण्यको क्यों नहीं प्राप्त करेंगे । अवश्य ही उन देव गुरुओंके चरणोंको सेमा कर व धन्य होते हैं ॥ २४१॥ देव व गुरु आदिके प्रति दुर्यचननिषेध योऽपथ्यः सरुजो गथा समनुजो दुर्वाक्समंतुर्यथा । दुष्कर्माणि कृतानि येन स पुरा दुःखं लभेताद्भुतं ।। दुपाटादशदोपवृत्तिरहित जीवेऽपि देवे गुरौ। निर्दोपास्युरिवार सव्रतयुतास्तिष्ठति संतस्सदा ॥२४२॥ अर्थ-रोगीने यदि सपध्य किया तो उसका रोग बढता है, उसको भयंकर दुःख भोगना पड़ता है। यदि अपराधीने राजसेवकों के साप दुर्वचनका प्रयोग किया तो उससे उसको भयंकर दुःख अनुमय फरना पडता है। पूर्वजन्ममें जिसने दुष्कर्माका आचरण किया उसको पदापर दुःख भोगना पडता है । दुए रागादि अटारह दोष जिनके एक्यों नही है, ऐसे जीके प्रति-देव य गुरु निर्दोष हैं उनके प्रति दुष्ट यचोंका प्रयोग कमी नहीं करना चाहिये ॥ २४२ ॥ अन्योसे ट्रेप करमेका निषेध येन्यदिपः मुतप्रीता जीवंति स्वपरिग्रहे । तेषां न भातिनमनः स्वास्थ्य रोगादिभिर्वथा ॥२४॥ . ..
दानफलपिचार . . अर्थ-जो व्यक्ति दूसरोंका द्वेष करते हैं एवं अपने परिप्रहपर स्नेह करते हुए जीवन व्यतीत करते हैं उनका हृदय अछा नहीं है, उनका स्वास्थ्य भी रोगादियो से युक्त होने से उनका जन्म व्यर्थ है ॥२५३॥ अन्यत्रीगुणरक्षण तत्त्रीगुणमवंत्यन्ये येऽज्यस्त्रीगुणरक्षकाः। येऽन्यत्रीगुणहतारस्तत्स्त्रियोन्ये हत्यपि ॥ २४४ ॥ अर्थ-जो दूसरोंको त्रियोंके गुणको संरक्षण करते हैं उनकी खियोंके भी गुण दूसरे रक्षण करते है । जो दूसरोकी स्त्रियोंके गुणोंको अपहरण करते हैं दूसरे भी उनकी स्त्रियों के गुणोंको अपहरण करते हैं ॥२४॥ -पापरतोंको सुख नहीं मिलता है पंढा स्त्रीजनमेव राज्यमधना वृद्धाः स्त्रियो नंदना- । नारोग्यं गतजीविताष कृशो मोक्षं दिवं पापिनः । मूकास्सद्वचनं मुशास्त्रहृदयं सत्वस्वरूपं जडाः । वांछतीव जनास्मुखं मुखकरंद्रव्यं च पापक्षयाः,२४५॥ अर्थ-इस लोकमें सांसारिफ प्राणियोंकी परिपाटी है कि ये हमेशा उल्टे मार्गका अनुसरण करते हैं । नपुंसक लोग नियोंकी इच्छा करते हैं। दरिदोलोग राज्यकी कामना करते हैं, वृद्धतियां पुत्रोंको चाहती है। बिलकुल मरणसन्निकट मनुष्य स्वास्थ्यको चाहता है, मियादृष्टि- लोग मोक्षको चाहते हैं, पापीलोग स्वर्गको चाहते हैं। मूक लोग सुंदर बचनको बोलना चाहते हैं । अज्ञानी व मूर्ष शास्त्र व तत्व ज्ञानकी लालसा करते हैं। इसी प्रकार पापकार्य में संटाम सज्जन सुख व सुखकर साधनोकी अपेक्षा करते हैं । परंतु जब उनका उद्योग उल्टी दिशा पर है तो वह सुख किस प्रकार मिल सकता है ॥२४॥ फेवल्यादिको निंदाका निषेध केवल्यागमसंघदेववृपनि दादनादानतो। मर्मस्थानभवक्षतादिव सरत्यात्माप्यपुण्यो भवेत् ।
२७० दानशासनम् , . वीराक्रांतरवींदुधिमिव मंदाग्नी रुजौघो यथा ।। बर्द्रतेऽल्पपलं नृपं त्वनियते इति स्वसेना यथा ॥२४६॥ अर्थ-भगवान् केवली, निर्दोष आगम, चतुर्विध धार्मिकसंघ, चतुर्णिकायामर देव, सर्वहितकारी धर्म, इनकी निंदा करनेसे व इनके संबंध के धन का अपहरण करनेसे इस प्राणीको महान् दुःख भोगना पडता है। मर्मस्थानमें मार लगनेसे जिसप्रकार इस शरीरसे आत्मा निकल जाता है, उसीपकार यह आत्मा पुण्यरहित होता है। रादु केतुके द्वारा प्रस्त चंद्रसूर्यके मंडल के समान निस्तेज होता है, मंदाग्नि की प्रबलता होनेपर जिसप्रकार रोगका समूह बढ़ता है, हीनशक्तिवाले। घ अनियमितवृत्तिके धारक राजाको उसकी सेनादी जिसप्रकार मारती है, उप्तीप्रकार फेवल्यादिकी निंदा करनेवालोंको दुःख भोगना पडता है।॥ २४६॥ देय, गुरुके प्रति विघ्न न करनेका उपदेश विघ्नी इत्यभवच्च रावणमृतिश्वेल्लक्ष्मणेनेव तं ।' स्मृत्वा चेतसि संविचार्य विलयो येनास्प सप्रेरितः ॥ विघ्नाः स्वरिपो रिपुः सुकृतिनां चोरो यथार्थ हरे-1 द्विघ्नो यत्र भवेदविनमजनस्तेनैव नश्यत्स च ॥२७॥ अर्थ-दूसरोके पुण्य कार्य में विघ्न उपस्थित करना । परनिंदा करना यह महान् पाप बंधके लिए कारण दुआ करता है। इसी विन के कारण से लक्ष्मण के द्वारा रावण का मरण दुभा । भवितव्प टल नही सकता है। कहा रामचंद्र ! कहा रावण! को अयोध्या और पहा लंका । ददारयके कैकयौके साथ यचनबद्ध होना, रामचंद्र और सीता को यनयासके लिए मेजना, शंभुकुमारकी तपपर्या, लक्ष्मणको चंद्रहाम खड्की प्रालि, सूर्पना के द्वारा रावणका बहकना, सीताप. हरण, लांजनेयके द्वारा सीतासंदेश, रंकाप्रयाण य लदमणके द्वार - दानफलविचार - . . रावणमरण यह सब बातें विधिके वैचित्र्यको सूचित करती हैं । रावण को विघ्नका फल भोगना ही पडा । इन बातोंको विचार कर अपने शत्रुवोंके प्रति भी कोई विघ्न व अंतराय करने के लिए प्रयान न करें । पुण्यात्माओंके प्रति दुष्टजन विघ्न उपस्थित करते है जिस प्रकार कि चोर दूसरोंके द्रव्यको अपहरण करता है, परंतु यह दुष्टजन दूसरोंको विघ्न करने में स्वयं न होता है । तात्पर्य यह है कि अपनी भलाई चाहनेवाले देव, गुरु, धर्मके प्रति कोई विघ्न उपस्थित न करें ॥२४॥ विधिकी विविधता कोऽयं किं पलमस्य केऽत्र सुहृदोऽमित्राः फियंतस्सुता। दक्षाः किं क इनः स्वबांधवजनाः के तेऽधिनः पेशलाः । स्मृत्वांतक्षतिरेव फैरिति तदा तत्रैव तैः कारयेत् । साचेकैरपि नास्तिवैरमखिलेप्वेवं विधिस्तामयान् ॥२४८॥ अर्थ-विधि बहुत विचित्र है, वह मनुष्यको किस समय क्या दुःख देना है इसकी व्यवस्था पहिलसे कर लेता है, यह पहिलेसे विचार करता है यह कौन है ? इसकी शाक्त क्या है ? इसके मित्र कौन है ? घे कितने हैं, इसके शत्रु कौन है ? और कितने हैं, पुत्र रितने हैं ? और वे स्वधर्मव्यवहार कार्यमें कुशल है या नहीं ? इसके स्वामी कौन हैं ! कौन इसके बांधय है ? याचकजन कौन है ? इत्यादि बातोको विचार कर यह भी विचार करता है कि इस समय पिनसे इसका अहित हो सकता है, उनसे अहित कराता है । यदि उस समय कोई अहित करनेवाले नजर न आये दुष्ट रोगादिक बाधावोंको लाकर पटक देता है ।। २४८ ॥ धर्मकार्यों में विघ्न न करनेका उपदेश स्वस्वार्थ स्वमुतं स्वदं स्वपितरं स्यां मातरं स्वानुज । स्वां दासी स्वपशुं च हंति दहति स्वावासमेषां गदान् ॥ ।
दानशासनम् . ।" ११. आदत्तेऽर्थहरान्नृपादिभिरलान्यकारयत्यन्वहम् । 1... स्वं गेहं स्वपुरं स्वदेशमखिलं विघ्नी वृपागार्जितः ॥ २४९॥ । अर्थ-धर्मकार्यके लिए उपस्थित किया हुआ विघ्न बहुत बुरे फलको अनुभव कराता है । अपने, अपने पुत्र, अपनी भार्या, अपने पिता, अपनी माता, अपने भाई, अपनी दासी, द्विग्द चतुप्पदादि पशु, आदिको वह.मार डालता है, अपने आवास स्थानको जला डालता है। उसके घरपर अनेक भयंकर रोगोंको उत्पन्न करता है। चोरोंको प्रवेश कराता है, राजाके द्वारा अपमान कराता है, अपने घरपर, नगर में, देशमें सर्वत्र उसे कष्ट उठाना पडता है । इसलिए देव, ऋपि, धर्मकार्य में विन उपस्थित नहीं करना चाहिये ।।२४९ ! मृत्युः सर्वबलस्य नास्ति समरे फेपांचिदस्त्यंगिनां । । भुक्तानां न गदोस्ति नामयवतामंतोऽखिलास्सूनवः ।। कि जीवंति वसंति किं युवतयो भोगोचिताः किं जनाः। श्रीमंतः फिमिमे भवंति महता विघ्नन नानाविधाः ॥२५०॥ अर्थ-युद्ध में जितने जाते हैं उन सबका मरण नहीं हुआ करता है, उनमेंसे किसीका मरण होता है। भोजन करनेयाले सबको रोग नहीं हुआ करता है । किसी किसीका होता है। उत्पन्न हुए पुत्र सबके साजीने नहीं, कोई कोई जीते हैं । त्रियां सबके सब भोगोचित नही हुआ करती हैं। उनमें से कोई ही हुआ करती है। मनुष्य सबफे ' सब श्रीमंत नहीं हुआ करते हैं। कोई २ ही हुआ करते हैं। इस प्रकार देव, गुरं धर्मके प्रति किए हुए विजय अपराधके फलसे अनेक प्रकारकी विचित्रता लोकमें देखी जाती है। सदनुसार फल इस जीयको भनुमय फरना पड़ता है ॥ २५० ॥ चौरस्त्वात्मारामतं धनमरिस्तागतं इंति वा ।.. न्यानो गोनिव हकमेव कणयः सनाननफ- यथा ॥ - .
दानफलयिवार .२७३ कर , . दोपोऽत्रात्ममनोरथागतमिदं द्रव्यं सनीवादिफं।' 1 गेई चा. पुरमेव वा स्वविषयं संदापयेच्छगवे ॥२५१ ॥ अर्थ:-जिसप्रकार चोर अपने हायमें आये हुए द्रव्यको' अपहरण ले जाता है, शत्रु हायमें आये हुएको मार डालता है, व्याघ्र पशुओं समूहको मारता है, बाण सेनाजनको मारता है, उसी प्रकार पुण्यकार्य 'में किये हुए अंतरायको दोष मनुष्यफे मनोरथको मारता है अर्थात 'उसकी इंटेसिद्धि नहीं होने देता, धन अपहरण करता है। सजीव द्विपद चतुप्पदादिजीवों को मारता है, अपने घर, नगर ५ देशको शत्रुवोंके हाथमें दिलाता है, इस प्रकार अंतरायका बहुत बुरा फल होता है ॥ २५१ ॥ स्वामिन्नोऽस्ति पुरः किमस्ति विळयः केनापि द्वीपायना- स्मृत्युस्ते जलविष्णुना वददिमां श्रुत्वा तदुक्तिं तदा । द्वेषः स्वामिनि चौदपादि वदतो विष्णोर्वचस्तौ श्रुते-।। भूत्वका शबरो मुनिः खलु नयोनिग्मतस्तत्पुरात् ॥२५२।।। 'द्वारोवती सा मुनिनैव दग्धा कृष्णस्य मृत्युर्जलविष्णुनैव, विघ्नस्य वैचित्र्यमिदं मसिद्धं विनाशकाले विपरीतयुद्धिः॥२५३॥ अर्थ-कृष्णचंद्रने जाकर मुनिनायसे पूछा कि . स्वामिन् ! क्या हमारी द्वारावतीका नाश किसके द्वारा होगा ! मुनिराजने उत्तर दिया कि द्वीपायनके द्वारा द्वारावतीका नाश होगा । मेरा मरण किससे होगा, यह पुनः कृष्णने पूछा। मुनिराजने उत्तर दिया कि जलविष्णुके द्वारा होगा। इस प्रकार मुनिराजके वचनको सुनकर उन मुनि- राजोंके प्रति ही क्रुद्ध होते हुए जो वचनको कृष्णचंद्र बोल रहा था, उसे सुनकर द्वीपायन व जलविणु उस नगरसे बाहर निकल गये । उनमसे एक तो भिल्ल बनकर चला गया भोर एक मुनिदीक्षा लेकर चला गया। प्रकृति के वैचित्र्यको देखिये। - २७४ दानशासनम् द्वारावती तो अशुभ तैनसऋद्विप्राप्त उस मुनिके द्वारा ही जलगई। और कृष्णचंद्रका मरण भी उसी जलविष्णुके द्वारा ही हुआ। अंत- रायका वैचित्र्य लोक में प्रसिद्ध है, यह फल दिये विना नहीं छोड सकता। लोकमें यह उक्ति प्रसिद्ध ही है कि विनाशकालमें मनुष्यको विपरीत बुद्धि सूज्ञा करती है। मनुष्य चाहता है कुछ, होता है और कुछ, सब कुछ विधिविलसित हुआ करते हैं । उससे अघटितघटना -: विघटित होती है । इसप्रकार विचार कर मनुष्यको सदा शुभ आचरणमें प्रवृत्ति करनी चाहिये ॥ २५२-२५३ ॥ मतं समस्तै ऋपिभिर्यदाई। प्रभासुरं पावनदानशासनम् । । .....मुदे सतां पुण्यधनं समर्जितुं धनानि दद्यान्मुनये विचार्य तत् ।। २५४ ।।. अर्थ-समस्त आहेत ऋषियोंके शासनके अनुसार यह दानशासन प्रतिपादित है। इसलिए पुण्यधनको कमानेकी इच्छा रखने वाले दानी प्रायफ उत्तम पात्रोंको देखकर उनके संयमोपयोगी धनादिकद्रव्योंफो विचार . फर दान देवें ॥ २५४॥ . ४. इति करणत्रयलक्षणलक्षिताहारदानविधिः २७५ भीषधदानपिचार . औपधदानविधानम् मंगलाचरण य प्रतिमा. नत्वा जिनं जिनमुनीनखिळागमज्ञान् । वक्ष्ये मुनींद्रतनुरोगहरी चिकित्साम् ।। यूपैः कपायखलचूर्णसुफल्कपथ्य- स्तां दोपशांतिकरणपतिनां प्रकुर्यात् ॥ १॥ अर्थ-श्री जिनेंद्र भगतको एवं संपूर्णशास्त्रोंके पारगामी मुनी- श्वरोंको नमस्कारकर मुनीश्वरोंके शरीर में उत्पन्न होनेवाले रोगोंकी चिकित्साफा निरूपण करेंगे। ऋषियोंको निर्दोष औषधिको सेवन करना पड़ता है, अतः उनकेलिगे योग्य यूष, कषाय, खल, चूर्ण, कल्कोंसे शरीरके यात पित्त कफादिक दोषोंकी उपशांति करनी चाहिये । उत्कृष्टजैन . आधि पूतवचोभिरिष्टधनदानोचयित्त्वैव यः । सौचित्तीकरणं करोति खलु वैयाकृत्यमुक्तं जिन : || .. पात्राणां विमलीपधैरनुगुणः पध्यैः मुस्तैदान् । भक्त्या वत्सलतागुणेन सुकृती जैनोऽधिकःसन्स.च ॥२॥ । अर्थ-पात्रोंके मनमें सलेश परिणाम है उसे भक्तिपूर्ण मृदुवचनोंस एवं उनके योग्य संयमोपकरण व 'ज्ञानोपकरणको प्रदान कर, उनके परिणामको निर्मल बनाना उसे वैयावृत्य कहते हैं। पात्रोंको शरीरमें जो रोग है उनको उनके लिए अनुकूल पध्य, सुखकर औषधियोंको देकर भक्ति व वात्सल्यगुणसे दूर करें । उसीको उत्कृष्ट जैन कह सकते हैं ॥ २॥ वारसल्यगुण भक्तिसंपत्तिरर्थित्वमिष्टोक्तिः सक्रियाविधिः। स्वधर्मस्वसिसौचित्त- कृतिर्वात्सल्पमूचिरे ॥ ३ ॥ - .
२७६ दानशासनम्। प्रसन्न करने की - ... - सेवा अर्थ-दाताके हृदय में जो भक्ति है, उदारता है, पुण्यफलापेक्षता है, प्रियवचन है, दान देने की यथार्थविधि है एवं पात्रोंके हृदयको भावना है, उसे वात्सल्य कहते हैं ॥३॥ पुत्रस्तातं सुतमिव पिता रोगिणं माणकांता । ग्लानां भर्तीप्यनुगुणगणैर्यधुवर्गव धृत्वा ।' काश्चित्तरं दषिघृतमिदं ग्राहि निफलेक्षन् । वैयावृत्यं रचयति सदा रोगिणां योगिनांच॥४॥ 'अर्थ-जिस प्रकार पुत्र पिताकी सेवा करता है, पिता रोगी पुत्रकी परिचर्या करता है, रोगपीडित भार्याकी पति जिस प्रकार अपने बंधुवांधवों की सहायतासे रक्षा करता है, इसी प्रकार दही, दूध, घृत, निंबूफल, इक्षु आदि प्रदान करते हुए रोगी व योगियोंकी যু करें। अर्थात् योगियोंकी रोगावस्थामें हरतरहसे सेवा करनी चाहिये । आहारके समय, उनकी प्रकृति के अनुकूल भोजन प निर्दोष औषध प्रदान करना चाहिये ॥ ४ ॥.... मादरगुण. । स्वाध्याये स्वाध्यायिनि संयमिनि गुरुपु संघे च । अनतिकममौचित्यं कृतयोगः माहुरादरं विनयं ॥५॥ अर्थ-अपने साथी यतियों के साथ, अर्जिकाओं के साथ, 'गुरुषोंफे साय, संयमियोंके साथ एवं संधफे साथ औचित्यको 'उलंघन न करके व्यवहार करना उसे भादर कहते है या पिन्य करते हैं ॥५॥ यथोचितं संघमवेक्ष्य घार्षिकः करोति तोपं विनयं न जानुचित् । स पर मूर्खः स च नैव धार्मिको न न प्रती नो समयी मुक् च न । अर्थ--जो व्यक्फि संबको देखकर संतुष्ध नही दोसायं संघका विनय नहीं करता है, वही मर्व है, यह धार्मिक नदी है। [:.., .. + .
औषधदानपिचार २७७ . व्रती भी नहीं है, शास्त्रज्ञ भी नहीं है, सम्यग्दृष्टि भी नहीं है। संघका आदरं विनय करना सम्पादृष्टि भव्योंका कर्तव्य है ॥६॥ साधुओंको औषधि देनेकी विधि यावज्जीयति भपनं रसभवं पीतं तु भुक्त्वाशनं । तावत्तिष्ठति सामयो हरवि तद्रोगं विधत्तं चलम् ॥ .. भुक्त भेषजमन्नमेकसमयेऽजीर्णेपि तस्मिन्यते- । स्तद्रोगाधिकतां च कानपि गदाकुर्यात्सदा संहिताम् ॥७॥ अर्थ-आयुर्वेदशास्त्रका सामान्य नियम ऐसा है कि. जो औषध ग्रहण किया जाता है, उस औषधिका पंचन होने के बाद ही आहारको प्रहण करना चाहिये । तभी उस औषधिसे अनेक रोग दूर होते हैं एवं शरीरको बलप्रदान करता है । यदि औषधिके जीर्ण होने पहिले ही आहार ग्रहण किया तो अनेक रोग उत्पन होते हैं। जैनमुनि एकवार ही भोजन करते हैं। भोजन के समय ही औषध भी उनको लेना पडता' है, औषध और आहार एक साथ लेनेके कारणसे औषधके जीर्ण न होनेसे रोगकी वृद्धी होनेकी संभावना है वा इतर अनेक रोगोंफे उत्पन्न होने की संभावना है। इसलिए जैन साधुयोंको आहारके समय औषध देना हो तो संहिताप्रयोग करना चाहिये ॥ ७ ॥ माभक्तादि ओपधिसेवनफल. प्रातरिहौषधं वळवतामखिलामयनाशकारणं । प्रागपि भक्ततो भवति शीघ्रविपाककर मुखावहम् ।। ऊर्ध्वमथाशनादुपरि रोगगणानपि मध्यगं 1: . स मध्याशयगान्विनाशयति दत्तमिदं भिषजा विजानता ||८|| * भुक्ते मुनिस्त्वशनभेषजमेककाले । तस्मात्तदोपधफलं न हि किंचिदस्ति । जीपधं हरति तत्कुरुते वलं चा- जीर्ण रुजाधिकमतो नं रसः प्रशस्तः ॥ . . .
૨૭૮ दानशासनम् 1 - अर्थ-जिनमुनियोंकी चिकित्सा प्रवीण वैधको जानना चाहिये कि प्रातःकाल लिया हुआ औषध जिनका कोष्ठ, अग्नि व देहकी शक्ति विशिष्ट हो उनके समस्त रोगोंको नाश करता है, भोजनसे पहिले लिया हुआ औपध शीघ्र भोजनको पचाता है व सुखकर है। भोजन के बाद लिया हुआ औषध बादमें लानेवाले । सर्व रोगोंको दूर करता है । भोजनके बीचमें लिया हुआ औषध कोष्ठमध्यमें स्थित भनेक रोगोंको दूर करता है ॥ ८॥ अंतरभक्तादिफल आंतरभक्तमौषधमथानिकरं परिषीयते तथा । मध्यगते दिनस्य नियतोभयकालमुभोजनांतरे ।। औपधरोपिचालकृशवृद्धजने सहसिद्धमापधै- यमिहाशनं तदुदितं स्वगुणैश्च सभक्तनामकं ॥ ९ ॥ अर्थ-अंतरभक्त उसे कहते हैं जो सुबह शामके नियत भोजनके बीच ऐसे दिनके मध्यसमयमें सेवन किया जाता है । यह अंतरभक्त अग्निको अत्यंत दीपन करनेवाला, [ हृदय-मनको शक्ति देनेवाला पथ्य ] होता है। जो औषधोसे साधित [ काथ आदिसे तैयार किया गया या मोजनके साथ पकाया दुआ ] आहारका उपयोग किया जाता है उसे सभक्त कहते हैं | इसे औषधपियोंको [दवासे नफ- रत करनेवालोंको ] य बालक, कृश, वृद्ध, खीजनोंको देना चाहिये॥९॥ मोजनसमय विश्मूत्रे च विनिर्गत विचलिते वापी शरीरे पी। शुदेऽपीदिययाङ्मनःसुशिथिल फुक्षी अमच्याळे ॥ कासामप्पानं मति भतिदिनं ज्ञात्वा सदा देहिना- । माहारं विदधीत शाखविधिना वक्ष्यामि युक्तिनपं ॥१०॥ अर्थ-निस समय शरीरसे मलमूत्र का टीक २ निर्गमन से, अपानयायु भी बाहर घटता हो, शरीर भी व्यु हो, पांचों इंद्रिय धरानपिनार । प्रसम हो, फेन बन य मनमें शिविता भागई हो, पेट मी शम (भूफ) से व्याकुन्दिरा दो, तथा भोजन करने की या भीती, तोपही भोजन का योग्य समय जानना चाहिये। उपक की उपस्थिति को lm का stी समय वायुदानोमाननलिपिक अनुसार भोजन करें। क्षार्ग मोननामको फहेंगे ॥१०॥ भाजनयिधि. स्निग्धं यन्मधुरं च पूर्वपशनं भंगात मुक्तिकमे । मध्ये पल्लयणाम्लभक्षणयुतं पश्चात शेपानसान ॥ मात्या सात्म्पपलं मुखासनतलं स्वच्छ स्थिरस्तत्परः । सिम कोष्णमयं द्रवोत्तरतरं सर्वसाधारणम् ॥ ११ ॥ अर्थ-भोजन करने के लिये जिसपर सुखपूर्यफ चेट सके ऐसे . भासनपर स्थिरचित्त होकर अथवा स्थिरतापूर्वक बैठे । पवाद . अपनी प्रकृति प पलको विचार कर उसके अनुकूल थोडा गरम [ अधिक गरम भी महो न टण्डा हो हो ] स ऋतु के अनुकूल ऐसे आहार को, शीघ्र ही अधिक विलंब न मी हो य अत्यधिक जमी भी न हो ] उस पर गन समाकर खायें। भोजन करते समय सबसे पहिले चिकना, ५ मधुर अर्थात् हलुआ, सीर, यी, 'आदि पदायों को खाना चाहिए। तया भोजन के बीच में नमकीन, पहा आदि अर्थात् चटपटा मसालेदार पाजोंको 4 भोजनान्त में दूध भादि दूधमाप आहार साना चाहिये ॥ ११ ॥ भुक्त्वा चैदलसुमभूतमशनं सौवीरपायीभवे- । न्मय॑स्त्वादनमेवचाभ्यवरेस्तमानुपानान्वितः ॥ स्मैहानामपि चोष्णतो यदमळं पिष्टस्य शीतं जलं । पीत्वा नित्यमुखी भवत्यनुगत पानं हि माणिनाम्॥१२॥ अर्थ-भोजनमें दाटसे बनी हुई चीजोंका ही, मुल्यतया उपयोग करना २८० "दानशासनम् चाहिए। खाते वखत कांजी पीना चाहिये । भात आदि खाते समय, सक (छाच) पाना योग्य है। घी आदिसे बनी हुई चीजोंसे भोजन करते हुये, या स्नेह पीते समय, उष्ण जसका 'अनुपान करलेना चाहिये। मिट्टी से बने पदार्थोको खाते हुए ठण्डा जाल पीना उचित है। प्राणियों के हितकारक इस प्रकारके अनुपान का जो मनुष्य नित्य सेवन करता है वह नित्य सुखी होता है ॥१२॥ * पर . r.. . . L औषधिदानफल दत्तं येन सुभेपनं प्रश्मिलं. पथ्यं गुरुयां सतां । मुक्तास्तन गदास्ततोऽति विमलं चित्तं सुरत्नत्रयम् ॥ पूतं जातमखंडितं धृततपोध्यानं इतं दुप्कृतम् । लब्धं तेन समस्तमेव सहसा नित्यं सुखं लभ्यते ॥१३॥ अर्थ-जिस पुण्यवान् दाताने साधुपोंको उनके रोग, शरीरप्रकृति आदिको देखकर आहारके समय योग्य, पवित्र, पथ्यकर औषध दे दिया, उससे ये साधु रोग मुक्त होते हैं, इतना ही नहीं उनका चित्त निर्मल होता है, उससे रत्यत्रयकी विशुद्धि होती है, उससे अखंडित तप व ध्यान की सिदि होती है। दुष्कृत अर्थात् पाप नष्ट होता है। पापके न होने से ध्यानकी सिद्धि होती है, उससे नित्य सुखको थे, प्राप्त करते हैं। औपवदानके देनेवाले दाताके उस निर्मठ दानसे उस पात्रको जब साक्षात् मोक्ष मिलता है तो फिर दासाको उत्तम फल क्यों नहीं मिलेगा ।। १३ ॥ टीप -इस प्रकरण के श्लोक नं. ८.९ उमादित्याचायात कायाणकारक २० अध्याय में १८ व १९५ो । उक्त कल्याणकारका चौथ 'भप्याय १६.१७-१८ ये नोक। - औषधदानविचार વિટા . +- | ४. भेषजदानफलोदयतः स्यात्सत्वपरः सकलामयदरः । शंखरवींदुझपांकुशपनाचक्षयलक्षणकासितगात्रः॥ १४ ॥ अर्थ-औषध दानके फलसे यह मनुष्य समस्तरोगोंसे रहित होकर हष्ट पुष्ट शक्तियुक्त शरीरको प्राप्त करता है। उसके शरीरमें शंख, सूर्य, चंद्र, मत्स्य, अंकुश, कमल आदि उत्तम क्षणों चिन्ह रहते हैं, वह माग्यशाली होता है॥ १४ ॥ ''पांत्रनिदास रोग दूर नहीं होता है..... रोगों मुंचति भेपनोऽत्र भिपजा दत्तौषधेरैव सोई। पहोजस्त्वगदैर्न मुंचति पुन नाईदर्चादिभिः ।।।। 'नो रुक्साधुजनव्यथामयकृतावज्ञाभवो मुंचते । गर्भिण्यावधिपीततळविभवो तत्काललब्धीव सा ॥ १५॥ अर्थ संसारीजीयोंको योग्य वैद्यने औषध दिया तो उस औप- पिसे वह रोग दूर होता है। यदि यह रोग पात्रदूषणादिसे उत्पन्न पापसे प्राप्त हो तो वह औषधप्रदानसे दूर नहीं होता है । और यदि पात्रदान, अईत्पूजादिकी अवज्ञासे एवं साधुजनोंक रोगको देखकर भी तिरस्कार परिणामकर उत्पन्न हुआ हो तो यह औषधसे भी दूर नहीं होता है। जिस प्रकार गर्मिणीके द्वारा पीया हुआ तेल उसकी प्रसव चारित्रं दर्शनं शानं स्वाध्यायविनयो नयः ।। सर्वेऽपि विहितास्तेन दत्तं येनौपधं सतां ॥१॥ सद्वैपज्यमुदान्तः परभये मुक्तस्त्रिपीडादितो। नीरोगश्चलानलोऽतिपलवान् क्ष्वेडादियाघोडिझतः। शंखाकेंदुझपांकुशांवुजमुखाद्यभूणलक्ष्मांकितः स्यात्सरपुण्यभवप्रभाववलतो निर्मुकशत्रुः सदा ॥२॥ पात्रादिरोगमाफयं य उदासीन ईक्ष्यते ।। न चिकिरसति तस्यापि रोगोऽसाध्यो भवे भवे ॥ १ ॥ .
दानशासनम् वेदनांको दूर करता है, इसी प्रकार फाललब्धिके आनेपर की यह रोग दूर होता है ॥ १५॥ दुष्टजन भूपे सेक्कसंकुळेऽत्र धनिके ग्राममजामपके । चाकृष्टे धनहर्तरीह सशमास्तिष्टंति मौनान्विताः ॥ निजि विवदंति चोभपभवस्वात्मार्थपुण्यार्थिमि-1 स्त्वाकोशंत्यतिपयंति कुशस्तान्पापवित्तार्थिनः॥ १६ ॥ अर्थ- इस कलिकाल में काष्ठांगारफे समान मिथ्यात्वसे दूषित व्यक्ति पापसे द्रव्यार्जन, करने की इच्छासे दुष्ट राजाने, सेयकोने, . धनिकोने, गायके प्रजासंरक्षकोने या चोरोने कोई धनफा अपहरण, किया या कोई गालियां दी तो कुछ भी प्रत्युत्तर न देकर शांति धारण कर मौनसे बैठे रहते हैं। परंतु उभयभवकै हितको साधन कर देनेवाले अपने धर्मात्मा बंधुवों के साथ अकारण ही विषाद करते है । उनको गाली देते हैं। उनका दूषण करते हैं ॥ १६ ॥ श्रुत्वा ज्ञात्वा पुराणं प्रतिदिनमपि नः श्रेणिकादिमपंचं। यात्यात्मैफां गति वानृतमिदमखिलं काललब्धिमधानं ॥! ' धर्मः सर्वो पृथा स्यादिति विदितजना जनवंधूनधी । नंत्याक्रोशंति निदंति हि सफलधनं 'दंडयंत्याहरंति ॥१७॥ अर्थ-पापनिया करनेको इच्छा रखनेयाले पापी रात्रिंदिन विचार किया करते है, प्रतिदिन पुराण य शास्त्रको सुनकर य जानकर भी श्रेणिकादि अपने कर्मके अनुसार किसी गतिमें गये अर्थात् नरष में गये । इसलिए यह सब झूठा है। कारसन्धि एफ मान प्रधान है। धर्म वगैरह सर्व ध्यर्थ, ऐसा अपने अज्ञान से समझकर व्यर्थ दी बकारण अपने दिलपी बंधुवों को कोसते हैं, मारते हैं, उनकी निंदा . . .
औषधदानविचार २८३ फरते हैं, दंड देते हैं, धन अपहरण करते है । यह फालकी विचित्रता मतं समस्तै ऋपिभिर्यदाहतैः 'प्रभासुरं पावनदानशासनम् । मुदे सतां पुण्पधनं समनितुं धनानि दद्यान्मुनये विचार्य तत् ॥ १८॥ अर्थ -समस्त आईत पियोंफे शासनके अनुसार यह दानशासन प्रतिपादित है । इसलिए पुण्यधनको कमाने की इच्छा रसनेपाटे दानी भावफ उत्तम पात्रोंको देखकर उनके संयमोपयोगी धनादिकद्रव्योंकों विचार कर दान देखें ॥ १८ ॥ इत्यौपपदानविधानम् ॥ -
२८५
दानशासनम् ।
1
अथ शास्त्रदानविधानम्.
शास्त्रकी निरुक्ति
शास्वनुशिष्टौ धातुः शास्ति हितं भव्यजीवमुखहेतुं ।
शासनमिव तत्रायत इति शास्त्रमदोषमखिळदोषहरम् ॥ १॥
अर्थ -शास धातु अनुशासन अर्थ में प्रयुक्त होता है । अर्थात्
वह मन्य जीवोंके लिए सुखके हेतुभूत हितको उपदेश देता है, एवं
शासनके समान भव्य प्राणियोंकी रक्षा करता है, अत एव यह शास्त्र
समस्त मज्ञानादिक दोपको दूर करनेघाला होने से निर्दोष है ॥१॥
शाखका महत्व
.
शास्त्रादेव हि तत्वार्थ-श्रद्धानं ज्ञानमांजसम् ।
ज्ञानपूर्व हि चारित्रं धर्मः शास्त्रादिति स्थितिः ॥२॥
अर्थ-शाखोंके पटन व श्रवण करनेसे ही तत्यार्थश्रद्धान अर्थात्
सम्यग्दर्शन य निर्मलज्ञानकी प्राप्ति होती है । ज्ञानपूर्वक चारित्र होता
है। इसलिए रत्नत्रयात्मक धर्मकी स्थिति शास्त्र से ही होती है ॥२॥
धर्मप्रियायोंकी सिद्धि
दानं पूजा तपः शीलं साधुसम्यक्त्वपूर्वकम् ।
वच शाबादतः शास्त्र-मूलधर्मक्रियाखिळा ॥३॥
अर्थ-दान, पूजा, तप य शील ये सब गुण सम्यक्त्यपूर्वक
प्रात होते हैं । यह मायाप शास के थयण ५ पटन से प्राप्त होता है।
इसटिए संपूर्ण धर्मनियायें शानमूलक हा सिद्ध होता है॥३॥
केयलमानको सिथि
एकतः पदानानि पूजा शीलं तपोखिळे ।
एकतः शानदानास्पात् फेवल मानसाधनम् ॥ ४॥
..
अर्थ-धर्म, अर्थ, काम व मोक्षपुरुषार्थके उपदेश देन से टोकका
उपकार होता है । इसलिए लोकके उपकारके लिए मजन रंगशाख.
दान करते हैं एवं इसीलिए पूर्वाचार्य शास्त्रकी रचना व व्यायः
शास्त्रदानचित्रार
२८५
अर्थ--एक ही शास्त्र दानसे अन्य सभी दानोंकी सिद्धि होती है।
विशेष क्या ! केवल शाखदान से केवलज्ञानकी भी प्राप्ति होती है।
मिथ्याशाननाश
पिथ्याज्ञानतमोमूढो बंभ्रमीति भवार्णवे ।
मिथ्याज्ञानतमोध्वंसी शास्त्रज्योतिर्न चापरम् ॥ ५॥
अर्थ-मिथ्याज्ञानरूपी अंधकारसे यह मूर्ख जीव इस संसारसमुदमें
परिभ्रमण करता है । यह शान ही मिथ्याज्ञानरूपी अंधकारको दूर
करनेके लिए उज्ज्वल दीपकके समान है । अन्य कोई भी समर्थ नहीं
যন্ত্রমহ্মায়ন
शास्रमकाशने तस्मादु धर्मः प्रकाशितः ।
धर्म प्रकाशिते सर्वे पुरुषार्थाः प्रकाशिताः ॥ ६॥
अर्थ-शास्त्रके प्रकाशन करने से उससे धर्मका प्रकाशन अपने
आप होता है अर्थात् लोग धर्मके तत्वसे परिचित होते हैं । धर्ममा
प्रकाशन करनेपर समस्त पुरुषार्थ प्रकाशित होते हैं । अर्थात् समस्त
जीयोंका उपकार होता है। इसलिए शास्त्रप्रकाशन का महत्व अधिक
लोकका उपकार
... पुरुषार्थोपदेश हि लोकस्योपकृतिर्भवेत् ।।
ततोलोकोपकारार्थ शास्त्रमार्या वित्तन्वते || ७ . . .: ।
।
--
ने
.
करते हैं ॥ ७ ॥
२८६. दानशासनम् n . 1 लोफका उद्धार अपि तीर्थकरास्तीर्थमुद्धरति जगद्वितम् । अत एव हि ते पूज्याः सर्वलोकैश्च योगिभिः ॥ ८ ॥ अर्थ-इस संसारमें तीर्थकर परमेष्ठी भी द्वादशांगादिशास्त्रका उद्धार जगत्के हितके लिए ही करते हैं । इसलिए ही वे समस्त संसार के प्राणियोंसे व मुनीश्वरोंके द्वारा पूज्य होते हैं ॥ ८॥ शास्त्रप्रतिष्ठा . शास्त्रे प्रतिष्ठिते साक्षाननु धर्मः प्रतिष्ठितः। 'स्वात्मा प्रतिष्ठितो भव्यलोकवापि प्रतिष्ठितः॥९॥ अर्थ-शास्त्रको प्रतिष्ठा करनेपर साक्षात् धर्मकी स्थापना होती है। अपने आत्माको प्रतिष्ठा होती है। जिसमें भव्य लोगोंकी भी प्रतिष्ठ होती किमत्र घहुनोक्तेन धर्मः.शास्त्रात्मवर्तते । ततो धर्मार्थिनः शासमुदरंतु प्रयत्नतः ॥ १० ॥ अर्थ-इस संबंध में विशेष क्या फदेंधर्मकी प्रवृत्ति, शाखसेही होती है। इसलिए धर्मको चाहनेवाले सज्जन यत्नपूर्वक शाखफा उद्धार करें ॥ १० ॥ शास्त्रदानफल. ये संलिखतीद विलवयंति व्याख्याति श्रृण्वंति पठंति शास्त्रम् । अर्चति शंसति नपत्ति तेऽर्यान्पति शास्त्राधितटं गताः स्युः११ अर्थ-जो सन शास्त्रको लिउसे ₹, लिवाते है, व्याख्यान फरते, सुनते हैं, पढते, पूजा करते है, प्रशंसा करते है,नमस्कार करते हैं, शाके निमित्तसे दस्यका दान करते हैं, वे शाखसमुद के तटपर पहुंचते है अर्थात् समस्तसालमें पारंगरा होते हैं ॥ ११ ॥ .
फल मिलते हैं। इसीप्रकार जिनेंद्रभगवंत, धर्मप्रभावनातत्पर साधर्मी शास्त्र, शास्त्री, पुस्तक, पढनेवाले, व्याख्यानं करनेवाले, और श्रोता भादिकी सेवा भन्यजन पापके नाशकेटिए, पुण्यकी वृद्धिकेलिए, सुखकी २८७ शास्त्रदानविचार . " विद्वद्भ्यो ददते नित्यं लिखितालखितानि ते। पुस्तकान्युचितानि स्युः शास्त्रवाराशिपारगाः ॥१२॥ अर्थ:-जो सजन लिखित व अलिखित शास्त्रोंको ज्ञानोपार्जन करनेके लिए विद्वानोंको प्रदान करते हैं वे शास्त्ररूपी समुद्र के पारगामी होते हैं ॥ १२ ॥ - शास्त्र, , लिखित पुस्तकमलिखितम्बरनाराचकटगुणमंजूपाः,। ये ददवे 'ते पुरुपा जिनशास्त्रपयोधिपारगा एव स्युः ॥१३॥ अर्थ-जो सज्जन साधुसंतोंके लिए ज्ञानार्जनके साधनभूत लिखित अलिखित शास्त्र, वस्त्रवेष्टन, लोहकंटक आदि दानमें देते हैं वे शास्त्ररूपी समुद्रके पारगामी होते हैं ।। १३ ।। भक्ती राशि वृथा भवेद्बहुविधा यच्छंति सेवा यथा। सप्तांगं सफलं तथा जिनपती धर्मप्रभावोत्सुके ।। धर्मे धर्मयलये गुरुवरे साधौ सदा धार्मिफे । शास्त्रे शास्त्रिणि पुस्तकेषु पठति व्याख्यातरि श्रोतरि॥१४॥ पापं नाशयितुं सुखं च सुकृतं लन्धुं सुवोधांबुधेः । पारं गंतुमिमां रुजां जहमति इंतुं स भव्यो जनः ॥ 'वर्णाभ्यासकरे तुमा जनपती नार्थव्ययस्यावंधि । कुर्यात्क्षेत्रविधाविमास्तदुचित्ताः पूतक्रिया भक्तितः॥१५॥ अर्थ-जिसप्रकार राजाके प्रति की हुई सेवारहित भक्ति व्यर्थ होती है, यदि यही भक्ति सेशसहित की गई तो उससे अनेक प्रकारके माई, धर्म, धर्माधित स्वपर बंधुगण, गुरुजन, साधुगण, धार्मिकजन, २८८ दानशासनम् प्राप्ति के लिए, ज्ञानसमुद्रके पार जानेके लिए, समस्त रोग व अज्ञानको दूर करनेकेलिए, अवश्य करें । जिसप्रकार अपने पुत्रके विद्याभ्यास व अपनी खेतके संरक्षणकेलिए मनुष्य धनव्ययका विचार नहीं किया करता है उसी प्रकार इन पवित्र कार्योकेलिए धनव्ययकी मर्यादा नहीं रखनी चाहिये ॥ १४॥ १५ ॥ + विनयका महत्व अंकृरयति पल्लवपति व्याप्नोति पुत्रजपुद्धिः।।। बहुफलति सरसगोहळवीर्येणेलेव विनयधनदानात् ॥१६ अर्थ-जिसप्रकार जमीनमें ग्वातके डालनेसे सस्यको समृद्धि होती है, उसीप्रकार अज्ञानी बालकोंकी जडबुद्धिमें विनयरूपी धनफे प्रदान करने से वह अंकुरिक होती है, पल्लवित होती हैं। उसका विकास होता है । अतः विनयगुणको धारण करना आवश्यक है ॥ १६ ॥ शास्त्रपठनयोग्यस्थान सौधे नगे बने रम्ये मंदिरे विम स्थल । शास्त्राणि पठसां नित्यं बुद्धिरंकुरयत्यहो॥ १७ ॥ अर्थ-हे मव्य ! प्रतिनित्य महलमें, पर्वतपर, घनमें मल मूत्र उच्छिष्टादिरक्षित निर्मलस्थानमें जी. प्रतिनित्य शास्त्रका स्थाध्याय करता द, उसकी बुद्धि अंकुरित होती है, अर्थात् उसके ज्ञान में निर्मलता बढती है ॥ १७ ॥ पुस्तकादि दानफल पठतामुपदेपणां पुस्तकचिनदेवरक्षणविनः। गः कुरुते मुमनस्त्वं सम्यग्ज्ञानं स मोक्षमपि लभते ॥१८॥ + समायण न फेयली फिल फली लोपयचूडामणि- । स्तद्वाचा परमासनन्य भरतशेने जगायोतिताः॥ सदानप्रयधारिणो यतिपरास्तासां समालंयनं। सपना जिनशाक्यजननया साक्षाजिलनः पूजिता ॥ . *. . . .
शास्त्रंदानविचार, २८९ . अर्थ, जो सज्जन पदनेवाले व उपदेशदेनेवाले विद्वानोंको पुस्तक, घर, देहसंरक्षणके साधन आदिको प्रदान कर उनको 'निराकुल बनाते हैं, वे सम्याज्ञानको प्राप्त करते हैं, एवं क्रमसे मोक्षको भी प्राप्त करते है।॥ १८ ॥ गुरुभक्तिका फल निजगुरुपदसद्भक्तिर्यस्य सदा वसति युद्धर्जाट्यम् । मुगुपसादांनास्तमाऽपसरतीव सुमंतिमालभते ॥१९॥ अर्थ-जिसकी भक्ति अपने गुरुके चरणोंके प्रति सदा काल : रहती है उसको बुद्धि की जडता शीघ्र ही गुरुके प्रसादसे दूर होती है। जिसकार सूर्यके उदयसे अंधकार दूर होता है उसी प्रकार उसका अज्ञान. दूर होकर वह सुबुद्धि को प्राप्त करता है ॥ १९ ॥ irit. I., सज्जन कभी शास्त्रांध्ययन छोडते नहीं ...मा दीपनमस्ति नैव भुवने मुंचंति किं भोजनम् । रोगोऽसाध्य इहाभवयदहितं जेमंति किं लौकिकाः ॥ in 'उद्योगो चहुदोषदोपि सकलोद्योगांस्त्यजतीति किं । 11 यच्छास्रथुतिपाठमल्पमत्तयस्सतस्त्यतीति किं ॥२०॥ अर्थ-इस लोकमें पाचनशक्ति न हो तो क्या गनुरुप भोजन करना छोडते हैं ! नहीं । रोग असाध्य हुआ जानकर अपथ्यपदार्थीका सवन करते हैं । कभी नहीं । बहुतसे दोपपूर्ण उद्योगोंको जानकर समस्त उद्योगोंको "छोडते है ! कभी नहीं । इसी प्रकार अपनी बुद्धि मंद व अल्प जानते हुए भी सज्जन शास्त्रोंका श्रवण व पठनको छोडते हैं कभी नहीं ॥ २०॥ पुत्रका अज्ञान दूर करनेका उपदेश तमो निवार्य सकलमिवार्को दर्शयन्फरैः । तुजा पितेव ज्ञानार्को नीवादिद्रव्यमुल्वणम् ॥ २१ ॥ 1 .
२९. दानशासनम् . 5 । . -अर्थ--जिस प्रकार सूर्य अंधकार को दूर करके समस्त - पंदार्थीको अपने करों (किरणों) से दिखाता है, उसी प्रकार .. • ज्ञानसूर्यरूपी पिता फा कर्तव्य है कि वह अपने पुत्रका अज्ञानांधकार दूर कर अपने हायसे जीवादि द्रव्योंको स्पष्ट रूपसे दिखलाने॥ २१॥ शास्त्रदानफल खाध्यायोचितपरतुभिर्विनयचागुत्साहनानंयनै । ये बुद्धिं परिवर्धयति यतिनां रक्षति शास्त्रामृतः ।। ते साधूजिनभापितागमधरान्धर्वति शंसंति ता. नर्चत्पर्धचयैः स्तुवंति विनमत्यग्रे श्रुतशानिनः ।। २२ ॥ अर्थ-जो सजन स्वाध्यायोचिस पुस्तफ येएन आदि द्रव्योंको प्रदान कर विनयवचन, उत्साह व आनंदके द्वारा साधुवोंकी बुद्धिकी वृद्धि करते हैं, एवं .. शाररूपी अमृतसे, साधुषोंकी रक्षा, करते हैं, ये साधुवोंको जैनागमके धारक बनाते हैं, एवं जो उन साधुयोंफी भनेका प्रकार के द्रव्यों से पूजा करते हैं, प्रशंसा करते हैं य नमस्कार करते है, ये भागेके भवमें श्रुतज्ञानी होते है अर्थात् सफट श्रुतान को प्राप्त करते है ॥२२॥ जिनधिय पूजाफाल जिनरूपधरं विच सदष्यरचयति य । जिमपूजाफलं तेऽप्र लमंतऽनेकधा पुर: ॥ २३ ॥ अर्थ-जो सजन भक्तिरी जितेंद्र भगवंतफे रूपफो धारण करने पाले जिनविधी भक्ति से भनेक इसम द्रव्योंसे पूजा करते हैं, ये इसी जन्ममें साक्षात् जिनेंद्रकी पूजा दरमे के सातिशय फ.टको प्राप्त करते है। एवं भागेकै सममें अनेक प्रफारसे ऋदिसहित संपतिमा बारि फरको प्रा करते है॥ २३ ॥ .
शास्त्रदानविचार - । उन साधुसेवाफल जिनरूपधरं साधु ये स्वार्थरपति ते फलं लभते बहुधा जिनपूजाफळादिकम् ॥ २४ ॥ अर्थ-जो सज्जन जिनेंद्र भगवंतके रूपको धारण करने वाले जनसाधुवोंकी बहुत भक्ति से अपने अनेक उत्तमद्रव्योंसे पूजा करते हैं, यै उससे साक्षात् जिनेंद्रकी पूजा, पंचाश्चर्य आदिके रूपमें अनेक उत्तम फलोंको प्राप्त करते हैं ॥ २४ ॥ तद्धराजिनशास्त्राणि ये स्वायरचयति ते । कभंते विमल ज्ञानं केवलज्ञानसाधनम् ॥२५॥ , १. अर्थ-जो सज्जन लोकहितकारक पवित्रशास्त्रोंकी एवं शाखोंको धारण करनेवाले संपमियोंकी अनंक उत्तम द्रव्योंसे पूजा करते हैं, वे केवलज्ञानको प्राप्त करने योग्य निर्मलज्ञानको प्राप्त करते हैं ॥ २५ ॥ अल्पानल्पगुणियोंकी पूजा अल्पगुणानमितगुणानल्पज्ञानखिलवे दिनों मत्वा ये । उचितं सत्कारं ते पुण्यं वोधं स्वधर्मवर्धनबुध्या ॥ २६ अर्थ--जो सज्जन अल्पगुणियोंको विशिष्ट गुणी समझ कर एवं अल्पज्ञानियोंको अखिलज्ञानी समझकर धर्मवृद्धि की बुद्धिसे उचित सत्कार करते हैं ये सातिशयपुण्यको व विशिष्ट निर्मलज्ञानको प्राप्त करते है ॥ २६ ॥ अल्पानल्पज्ञानियोंकी पूजा अल्पज्ञानल्पजानल्पानल्पधियों नृपानिव सर्वान् । नृपनामानी मत्वा प्रज्ञाः कृतिनो युधाश्च पुण्यं ज्ञानम् ॥२७॥ . 1
२९२
दानशासनम् ।
AA-AMPA
,
अर्थ-लोकमें देखा जाता है कि कम संपत्ति व अधिकसंपत्तिको
धारण करनेवाले राजावोंको सत्रको राजाके नामसे.उल्लेख कर उनका
आदर, विनय . किया जाता है, इसी प्रकार अल्पज्ञानी व महाज्ञानी
साधुवोंको भेद न कर साधुवोंके नामसे उनका विनय, आदर, व भक्ति
करें तो ये सजन बुद्धिमान, विद्वान् होते हैं एवं सातिशय पुण्य व
निर्मलज्ञानको प्राप्त करते हैं ।। २७ ।
दव्यप्तहायसे विद्वान तैयार कराने का फल
सतीव दीपं प्रज्याल्य सर्वनेत्रपिता हरेन् ।
जातो येन. बुधस्तेनभन्पचित्तांधता हृता-॥ २८ ॥
अर्थ-जिस प्रकार किसी सतीने एक दीपफ लगाया उससे
अनेक लोगोंके नेत्रकी संधता दूर होकर चे पदार्थोफो देखते हैं, उसी
प्रकार कोई सज्जन अपने द्रव्यादिफको दान देकर किसी एक को
विद्वान बनाता है तो उससे भव्योंके हृदयफा अज्ञानांवफार दूर होता
है। उत्तफा श्रेय उस व्यक्ति को भी मिलता है जिसने उसे. विद्वान्
बनाने लिए सहायता दी है। इसलिए शास्त्रदानको महिमा
अपार है ॥ २८॥
दान देते समय सज्जन प्रमाण नहीं करते
सेपाय योध्द्र विदुषे तरूण्य भृत्याय सेवाकृतिलंपटाय ।
मुताक्षराभ्यासफराप चित्त-दानप्रमाणं विधान कुर्युः॥२५॥
अर्थ-बुद्धिमान व पुरुषार्थी मम्जन खेतके टिए, योद्धाफे टिंए,
विनाफे लिए, अपनी वफे लिए, सेवाकार्यमें तत्पर सेवकके लिए,
अपने पुत्रो विद्यान्यास करानेवाले के लिए, द्रव्यदान करते समय कोई
प्रमाणफा विचार नही करते हैं। दिल पीकर देते हैं । २९ ।।
नयन्यवध्यमातरिवादान्वीक्ष्य प्रालिककार ।
धनान्याददने नद्धानिको दानमाचरेत् ॥ ३०॥
शास्त्रदानविचार 1२९३ -- . अर्थ-जिसप्रकार कस्टम महसूलको लेनेवाले अधिकारी उस मार्गसे भानेवाले उत्तम, मध्यम प जघन्याधाम्य सादि पदार्टीको देखकर महसूल वसूल करते हैं। इसीप्रकार धार्मिक दानी सम्मना:मी पात्रों के भेदको, देखकर तदुचित दान देवें ॥ ३०॥ दानेहीनमनुजस्य धनान्यायाति यांति किमिपानि निस्तुनः। "शहानिरिव पुण्यनाशनं स्यादरण्यकुममानि पृथैव ॥ ३ ॥ अर्थ-जो सज्जन कभी दानक्रिया नहीं करता है, उसकी संपत्तिका आना नहीं आना दोनों बराबर है। संपत्तिं व्यर्थ ही है। जिस प्रकार पुत्रराहितकी वंशहानि होती है, उसी प्रकारं दानरहितकी पुण्यहानि होती है। उसकी संपत्ति अरण्यपुप्पके समान व्यर्थ है। ३१ ॥ विद्वानोंका अपमान न करें स्याउमैनेंद्रागांभोनिधिपरिमथनं सदिशदूपणं कृत् ।।.. तत्स्वाध्यायप्रणाशी जिनगुरुभनफावर्णवादो विरोधः ।। हिंसामायोपदेशो जिनपतिवृपसन्मार्गसम्यग्दिर्शतम् । घिरकृत्याहं प्रवेत्ता बुधपरिभवनं ज्ञान विध्वंसहेतुः ॥३२॥ अर्थ--जिनेंद्र भगवंतफे द्वारा, प्रतिपादित शास्त्ररूपी समुद्रको मंथन करना, उसके उपदेशोंका दूपण करना, स्वाध्याय करनेवालोंको अंतराय करना, देव, गुरुवोंकी उपासना करनेवालोंपर आरोप फरना च उनसे विरोध करना, हिंसा व मियाय आदि पापोंका उपदेश देना, एवं जिनधर्मके मार्गको योग्यरूपसे बतलानेवालों को धिक्कार कर मैं ही वडा विद्वान् हूं ऐसा समझकर जो विद्वानोका अपमान करता है यह उसकी क्रिया ज्ञानके. नाशके लिए कारण है ॥ ३२ ॥ + . , + जिनोक्तशास्त्रास्वाध्यायशालिनः परिभूय च ॥ . स्वाध्यायनाशो मात्सर्याच्छुद्धशानविनाशस्त ।'
दानशासनम् । +-- शास्त्र पढनेवालोंको इतर काममें लगाने का फल शास्त्राणि पठतां नित्यं प्रयोक्तारोऽन्यमुद्यमम् । मूढाः स्युरिह तेऽमुत्र हरज्ञानावृत्तयोऽधनाः ॥ ३३ ॥ अर्थ-जो सज्जन प्रतिनित्य शाब पढनेवाठोको गुरुसेया शास्त्र- स्वाध्यायसे बाह्य अन्य उद्यममें लगाते हैं वे.इसी भवौ हिताहित विधकरहित मूर्ख होते हैं। एवं. परभवमें दर्शनावरण , ज्ञानावरण से युक्त होते हैं एवं दरिद्री होकर उत्पन्न होते हैं ॥ ३३ ॥ * प्रसिद्धगुरका नाम लेना अमसिदैन गुरुणा बुधो भूत्वा महात्मना । बुधोऽभवं बुवमेवं ज्ञानरत्नं विलुपति ॥ ३४ ॥ अर्थ-अप्रसिद्ध सामान्य गुरुसे विद्वान होकर किसी लोकप्रसिद्ध बडे महात्मा गुरुसे विद्वान् हुआ हूं ऐसा कहनेवाला अपने ज्ञानरानको नष्ट करता है। ३४॥ शानसाधनापहरणफल पुस्तकालेखासक्तं तु मंजूपादीन्हरंनि ये'। भवंदज्ञानातिस्तेषां पुस्तकानि सत्परम् ॥ ३५ ॥ अर्थ-जो जन दूसरोंकी पुस्तक, रेख, येएन, टोग, पेटी शादि ज्ञानोपकरणको अपहण कर लेते हैं, उनको शानावरण'च दर्श- नावण फर्मका बंध होता है। एवं उनकी पुस्तकादिक हानसामी दहन ही नए दोती है।॥ ३५॥ मानसाधनवहनफल यदेव जिनशास्त्राणि दग्नान्यपि पर: स्वयम्। स्यात्तथव च नरफर्म ज्ञानपुष्पनाशनम् ॥ २६ ॥ • शारापाटभनि येप मोचयिवान्यमुपमम् ॥ अधीकारस्सचिवक दोपराहगिएपरम् ॥
शास्त्रदानविचार २९५ - . अर्थ---जो सम्जन शास्त्रोंको स्वयं या दूसरोंके द्वारा जलाते हैं वे.उसीप्रकारके कर्मको अनुभव करते हैं, एवं उनका ज्ञान, दर्शन, घ पुण्यका नाश होता है ।। ३६ ॥ गुरवोंके आविनयका फल शावाणां पठने श्रुती पटुतरा, बुद्धिमनीनां सतां । तान्दृष्ट्वा विनयोक्तिभक्तिविनतिर्दव्यैर्मुदं ये मुदा ।। नो कुर्वति न कारयंति तनुवाविचत्तरलं वंचकाः । 'पण्णासावधि भूरिवित्तलपनं तेयां भवेदक्षता ॥३७॥ अर्थ- --शास्त्रस्वाध्याय जहां चला है यहां, जहां शास्त्र सुनरदे हैं वहीं, एवं निर्मलबुद्धि के धारक मधुवोंके पासमें जाने के बाद यहां, जो उनको देखकर विनयपूर्ण यचन, भक्ति, विनय आदि नई करते हैं, एवं अपने द्रव्यसे व मन, पचन, फायफी विशुद्धि से उनका सत्कार नहीं करते हैं, और दूसरोते नहीं कराते हैं वे पंचक हैं। उनको उनके पापफे फल के रूपगें छह गाने के अंदर उनके धनका नाश होता है एवं उनका ज्ञान मंद होता है एवं ये विवेकाष्ट होते है ॥ ३७॥ अज्ञानी उल्लू जिनधर्मापलाकाशे उदिते शानभास्वति । चूका इयांधा नेक्षते सन्मार्ग मोक्षसाधनम् ॥ ३८ ॥ अर्थ-जिनधर्मरूपी निर्मल आकाशगें शानरूपी सूर्यके उदय होनेपर उल्लूक समान अज्ञानी जीव मोक्षसाधनसमर्थ सन्मार्गको देख नहीं सकते. हैं ॥ ३८ ॥ आगमपर मलिनयनाच्छादनफल आगमशानावाप्स्योपरि मलिनांवरादिभारारोपः । येन कृतस्तस्य महाज्ञानार्कविंचमस्तमेति तिमम् ॥ ३९ ॥ - , .
२९६ दानशासनम् . . T । अर्थ--जो. सज्जन शाल व शाल रखनेकी पेटीको मलिनवस व सोनेकी चटाई, दरी आदिसे ढकते है उनका ज्ञानमूर्य बहुत जल्दी अस्त होता है अर्थात् बुद्धि भ्रष्ट होती है .. ३९ ॥ अधिनयफल स्वासनाधःस्थले पादाधःस्थले भूतलेऽशुचौ । कंटादौ पुस्तकन्यांसादस्तगैलि चिदंशुमान् । अर्थ--आगमोंको अपने बैठने के आसन के नीचे, परके नीचे, अशाचे भूमिपर, चटाई आदिपर रखने से उनका अविनय होता है । उस अविनयीका ज्ञानसूर्य अस्त होता है ॥ १० ॥ हसंति पूढाः परिहासपंति । प्रज्ञा न चाज्ञाः स्वकृतोऽनुयोगः । 'ब्रुवंति नाग्रे च वृथा स्वदृष्टि- i सानाति ते स्वयमाप्नुयंति ॥ ४१॥ "अर्थ-अज्ञानी जीय अपनी कृतिका फल आगे क्या होगा इन बातोंको विचार नहीं करते हैं। कोई अपने हायसे गलती होनेपर भी हम बुद्धिमान् ही हैं, अज्ञ नहीं है, युक्तिशाखाविरोधि परमागमको प्रशंसा नहीं करते हैं, अपितु अनेक प्रकारकी कल्पना कर उसकी इसी उडाते हैं। दूसरों के द्वारा उस परमागमकी इसी : कराते हैं, ये ज्ञानायरणकर्मफे द्वारा बद्ध होते हैं ॥ ११ ॥i.::.. साधुजनॉफी परोक्षमें निंदा न करें ये शंसति नमंति साध्विष पुरा भक्त्या भवेगुर्मदाः । पश्चाजनजनास्त्रिरत्नसहितान्कुत्युपाभनम् ॥ शून्यग्रापनिविष्टकाष्टनिगलपतितपादो यथा । नांसन्नय नुवनमन्करगिरी दैन्यं ग्रुपन्दधीः ॥ १२ ॥ अर्थ-जी-व्या सामने, साधुजनोंको,दवार RET करता ...: । .
शास्त्रदानविचार २७ हैं। नमस्कार करता है; एवं पीछेसे उन रत्नत्रयधारियों की निंदा करता है। वहं अज्ञानी 'जीय है । उसकी दीनता, भक्ति आदि ठीक उसी प्रकारकी है जैसे कोई सूने प्राममें बंधनकाप्टमें. किसीके पैरफो फसाने पर रास्ते चलनेवालोंको देखकर यह दीनताको धारण करता है, स्तुति करता है, प्रशंसा करता है, हाथ जोडता है, आदि अनेक मायाचार पूर्ण क्रिया करता है। इसी प्रकार साधुवोंकी प्रशंसा सामने फर पीछेसे निंदा करनेवाले -फी दशा है ॥ ४२ ॥ गुरुके मति'कोधका निषेध सदृष्टिं विबुधं दयालुममलं चारित्रवंतं गुरुं । ये कुप्यति शपंति चेतसि सदा प्रद्वेषमाकुर्वते ॥ तेषां सर्वधनं हरंति यदधं सज्ज्ञानमाइति तद्- ग्रस्तेऽर्क तमसा यया जगदिदं तद्वत्सचित्तो भवेत् ॥४३॥ अर्थ-- जो सम्यग्दृष्टि, विद्वान्, दयालु, निर्मल, प. चारित्रधारी अपने गुरुवोंके प्रति क्रोधित होते हैं, उनको गाली देते हैं, एवं चित्तमें सदा द्वेष करते हैं, उनके सर्व' धनको चौर आदि अपहरण करते हैं, एवं उसके ज्ञानको पापचोर नष्ट करता है । जिस प्रकार सूर्यके राहु- प्रस्त होनेपर यह लोक अंधकारसे आवृत होता है, उसी प्रकार उसके चित्तकी दशा होती है, अर्थात् अज्ञानांधफारसे आवृत होता है।॥४३॥ अन्यनिदाफल ज्ञानं पुण्यमयं श्रियं शुभपियं तेजोऽभिमानं गुणं । बंधुत्वं शपनं निति मुगतिं स्नेहं चरित्रं दृशम् ॥ 1 11फुर्यानीचगतिं परिग्रहरुजां दैन्यं विपाद सतां । मृत्यु बंधनवैरताउनमिइकद्वित्रिबंधादिकं ॥ ४१.॥ अर्थ-दूसरोंको एवं साधुवोको गाली देनेसे ज्ञान व पुण्यफा नाश होता है, पुण्यकारक परिणामोंको नाश करता है। संपत्ति, शुभवुद्धि, तेज, ।
दानशासनम् , . . अभिमान, दानादिक गुण, बंधुत्व आदि नष्ट होते हैं। प्रेम नही रहता है, चारिन व सम्यक्त्यका नाश होता है, उत्तमगति भी उसे नहीं हो सकती है। एवं उसके व्यवहारसे नरकादि नीचगतिका बंध होता है। परिषद व रोगकी वृद्धि होती है, दीनता बढ़ती है, सजनोंके हृदयमें विवाद बढता है, कदाचित् मृत्यु हो इसकी होती है। बंधन ( फारामह) वैर, ताडन सादियोंसे एक दो या सीन दुःख प्राप्त होते है। इसलिए विवेकीको उचित है कि यह दूसरोंकी निंदा न फरें और गाली न देखें ॥ ४४ ।। मूर्फीफा शाप कुछ नहीं फरसफता है.' मूर्खाणां शपन शांतं मौनिनं न च घाघवे । शपंत बाधते सत्यं रावणोक्षिसचत्रवत् ॥ ४५ ॥ अर्थ-मूर्ख मनुष्य यदि किसी शांत घ मौनीको गाली देखें तो यह गाली उस मौनीको कुछ भी हानि नहीं पहुंचा सकती है, उन्टा उस गाली देनेवालेकी ही उससे हानि होती है। जिस प्रकार रावण द्वारा छोडा हुआ चक्र उसीके मरणके लिए कारण हुआ, उसी प्रकार वह गाली उसी व्यक्तिके लिए बाधक है ॥१५॥ गाली देनेयालोके लिये प्रायश्चित नहीं है. मायथितं न शपतां शप्तानां नाघहानितः । शोधनं सर्वथा देयं श्रीतॄणां योगभेदतः ।। ४६ ॥ अर्थ-गाली देनेवालोफे दिए कोई प्रापमित नहीं है, क्यों कि गाठी नयाटोंके पापकी निचि नदी दोती है । तथापि. उनके मात्माको शोधन करमेक लिए गाली पुननेयाटोंके योग-भेदको टश्यमें रखकर प्रयास करना चाहिये ॥१६॥ -- शास्त्रदानविचार . . विना शुद्धिक दानपूजा व्यर्थ है नष्टाने प्रबलादारभुक्त्या ताबा गदा यथा। शुदि विना दानपूजास्तस्य येन कृताः क्षयाः॥४७॥ ''अर्य-उदरानिके नष्ट होनेपर गरिष्ठ भाहारके सेवन करनेसे तीनोगकी उत्पत्ति होती है, उसी प्रकार मन वचन | कायकी शुद्धि के विना दानपूजा करना व्यर्थ है,उससे अनेक अनर्थ होते हैं॥४७॥ शास्त्रादिके प्रति उदासीन न होयें. चक्रे भाग्यलय स्त्रियां तुगजनि देवेऽपि धर्म गुरौ। दौर्गत्यं द्रनिणानेषु विकयं लामस्य मूलस्य च ।। शास्त्रे शास्त्रिाणि पुस्तकेऽपि पठति व्याख्यातरि श्रोतरि । प्रेक्षानाशमिहैव तस्य यदुदासीनं करोतीति यः ॥ ४८ ॥ अर्थ-यदि राजाने अपने सेनाचनके संरक्षणमें उदासीनता की तो उसका भाग्य नष्ट होता है, अपनी स्त्रीमें मनुष्यने उपेक्षा की तो पुत्रोत्पत्ति नहीं हो सकती, देव, धर्म व गुरुवोंके प्रति अनादर किया तो दुर्गतिकी प्राप्ति होती है। धनके कमानेमें आलस्य किया तो लाभ घ मुद्दल दोनोंका नाश होता है, इसी प्रकार शास्त्र, शास्त्री, पुस्तक, ,पढनेवाले, व्याख्यान करनेवाले, श्रोताके प्रति उदासीनता धारण करें तो इस लोकमें ही उसका ज्ञान नष्ट होता है ॥ १८ ॥ शास्त्रपठननिषिद्धस्थान मूतकोच्छिष्टविणमूत्रे नीचसंवेष्टिने स्थले । शास्त्राणि पठतां नित्यं मंदबुद्धिः प्रजायते ॥ ४९ ॥ अर्थ:-जन्ममरण सूतकीसे ध उटिष्टसे स्पृष्ट स्थान में, मटमूत्रसे युक्तस्थानमें एवं चांडालादि नीच कुलोत्पन्नोंसे युक्तस्थानमें जो शाक बांचता है यह मंदधुद्धि होता है ॥ १९ ॥ ।'
दानशासनम मूर्खलोग विद्वानोंका अनादर करते हैं; लोकोपकर्तृन् कृषिकान् पोपयंति यथा नृपाः ):.: लोकोपकर्तृविबुधान्यक्कुर्वति तथा जडाः ॥५०॥ अर्थ-लोकको उपकारकरनेवाले किसानोंको जिसप्रकार राजालोग पोषण करते हैं उसी प्रकार मूर्यलोग लोकोपकार करनेवाले विद्वा- नोंका अपमान करते हैं ॥ ५० ॥ शास्त्रोपदेशकके अभिप्रायका घात न करें शास्त्रोपदेष्टुराकूतयातनादतितानवान् । श्रीतॄणां श्रुतशास्त्राणां पफवुदिश्च नश्यति ॥ ५१ ॥ 'अर्थ-शाखोपदेश देनेवालोंफे अभिप्रायको'घांत फेरने से उनको अत्यधिक दुःख होकर श्रोता व अनेकवोर शास्त्र सुनकर जो बुद्धिमान हुए हैं उनकी पक्युदि भी नष्ट होती है ॥५१॥ उपदेशफाँफे प्रति उदासीन नही होय.' यावधावदुदासीनमुपदेष्टरि फुर्वते । सावत्ताव द्विमकृष्ट निर्गच्छति सरस्वती ।। ५२ ॥ अर्थ--यह मनुष्य शाषके उपदेशको देनेवाले उपदेशकोंके प्रति जितमा २ उदासीन होता जाता है, उतना ही उससे सरस्वती दूर चली जाती है ।। ५२ ॥ उदासीनलक्षण विघ्नाटस्मृतिर्धाभ्रंशसाम्वदेपणकलम् । दुर्मेधावत्वमित्यष्टवाघोदासीनकमणम् ॥ ५३॥... अप-(१) शाख सुननों अंतराप उत्पन होना, (२) निरंतराप होनेपर मीशा अननेफी इजा न होना, (३) निरंतराय यमुन. . .
शास्त्रादानविचार तो भी जडता नेकी इच्छा होनेपर ' भी · श्रुतविषयका स्मरणामाव व बुद्धिका भ्रंश धोना, (४) निरंतराय, इच्छा, बुद्धि, स्मृति आदिके होने पर भी रोगयुक्त शरीरके होना, (५) निरंतराय, इच्छा, बुद्धि, स्मृति-वे आरोग्यके होनेपर भी गुरुशिष्योमें आपसमें द्वेष होना, (६) निरंतराय, इच्छा; युद्धि, स्मृति, आरोग्य व गुरुशिष्योमें प्रेम होनेपर भी गुरु शिष्योमें गोषिकलताका होना, (७) उपर्युक्त सभी बातोंके होने पर भी दुर्बुद्धि उत्पन्न होना, (८) कदाचित् उपर्युक्त बातोंके अर्थात मंदबुद्धि होना, ये आट बातें उदासीनताके लक्षण हैं । ये आठ-बातें संसारमें सम्यादृष्टं च विद्वानोंके प्रति की गई उदासीनतासे मनुष्यको प्राप्त होती हैं ॥ ५३ ॥" : ......... विद्वानों के अनादरसे होनेवाली दस बातें सदाचि कुतताक्षानुवृत्तिनिद्रांतंद्राजभणं विस्मृतिथ। पाठाशक्तिर्मूर्खतास्पष्टवारस्युरझानोयतमाचा विकाराः ॥५४॥ i 'अर्य-सम्यग्मार्गके उपदेश देनेवालों के प्रति क्रोधित होना, धूर्तता, इंद्रियोंके आधीन होना, . शास्त्रश्रयणके. समय निद्रा आना, मालस्य आना, जंभाई , आना, विस्मरण होना, कितनी ही पार पाठ करनेपर भी पाठ. न होना, मूर्खता, तोतली बोली, ये..दस बातें विद्वानोंके अनादरसे होती हैं, या यों. फहिये ये दस. बातें * अज्ञान भूतसे उत्पन्न विकार हैं ॥ ५४॥ अल्पचेतनका निषेध सुवानामुपदेणां दत्वाल्प हृद्यमान् ।। ये कारयन्ति नेपांच ज्ञान पुस्तादिनाशनम् ॥.५५ ।। * भूतारत्यजति बलिदानगुणेन मयं । स्यास्याः सुमंत्रिजनरक्षणदक्षमंत्रः ।। जाड्यग्रहा न पलिदानगुणेन माय । स्याज्या न दिव्यमुनिदत्तगुरुधिरतः ॥ .. . -
दानशासनम्
१- अर्थ- जो सजन अपने पुत्रोंको पढानेयाले विद्वानोंको अल्प वेत-
मकी देकर उनसे बहुंतसे उद्योग कराते हैं, उनके व उनके पुत्रों के
ज्ञान, पुस्तक आदिका नाश होता है । यदि शदसे द्रव्यनाश भी
होता है ऐसा समझना चाहिये ॥ ५५ ॥
पुस्तकादि न्यासापहरणनिषेध
न्यस्तं दत्तं पतितं विस्मृतमिह पुस्तकादि पंचित्वा ।
यो नास्ति मदति तस्य ज्ञानावरणं च दर्शनावरणम् ॥५६॥
अर्थ-जो सज्जन अपने पास दूसरोंकी रक्खी हुई, दीई, पडीई,
भूलकर सी हुई पुस्तकादिज्ञानसाधनको ठगकर 'हमारे पास नहीं है,
ऐसा कहता है उसे ज्ञानावरण व दर्शनावरणकर्मका बंध होता. है ॥५६॥
इससे शानदर्शनावरणकर्मका यंध होता है।
मानविषयस्सों ज्ञानावरण पदस्थदीप इव ।
दृशमावृणोति सर्वो हरिवपयो रविमिवाणीत्यन्दः ॥५॥
अर्थ-ज्ञान के संबंध जो मनुष्य दोष करता है उससे बनाछी-
दित दीपकके समान ज्ञानावरणफे द्वारा उसका ज्ञान भात ोता है।
इसीप्रकार दर्शनफे संबंधों जो दोप करता है उससे दर्शनावरणसे
उसकी दर्शनशक्ति आवृत होती है जिसप्रकार वसे सूर्यपिच भावत
होता है ॥ ५७॥
मिध्यारष्टि
सहरवचनसंदर्भ यो निराकुरते यदा ।
सदा पुष्टिस्तस्यापि रष्टिनापतिर्भवेत् ॥ ५८ ॥
भ--सम्माधियांके हितकारी चनांकी नो निराकरण करता
यही निपारि, उसे भी जानापरण पदमारणकर्मका बंध
होता है।॥ ५८ ॥
शास्त्रदानविचार ३०३।। + , कलिकालमें शास्त्रस्वाध्यायकी दशा शास्त्रं पठंतोन च संति ते चेत्सम्यग्दिशंतो न च संति सेऽत्र । अध्यापयंतोन च संति तेऽज्ञास्तत्तं च तान् संति विनाशयंत॥५५॥ अर्थ--इस पंचमकालमें पहिले शास्त्रको पढनेवाले ही नहीं है। पढनेवाले कदाचित् मिले तो उन शास्त्रों के गुढरहस्यको अच्छी तरह समझानेवाले नहीं हैं। वे भी मिले तो उन पढनेवाले घ प्रवचन करने- वालोंकी रक्षा कर उनसे पढयानेघाले नहीं है । कदाचित् इन सबकी प्राप्ति होजाय तो उस शास्त्रको, शास्त्र पढमेघाळे, उपदेश देनेवाले व उनको रक्षण करनेवाले सज्जनोंको पष्ट देकर नाश करनेवाले मूढजन बहुत हैं ॥ ५९॥ यावत्र मुक्क्रबुद्धिरलया तावच्च तस्याशये । किंचिच्छन्दमतिस्मुदृषमुचरितं ज्ञानं च भावः शुभः ॥ भक्तिवत्सलता विचारविनयः पुण्यं च धर्मक्रिया। ., नासीनोद्भवतीह सर्वमफलं दोपाय पाय यथा ॥६॥ अर्थ-जबतक इस मनुष्यके हृदयसे मायाचार-पूर्ण बुद्धि नष्ट नहीं होती अर्थात् निर्व्याज धर्मसेवनकी भावना नहीं आती है तबतक उसके चिचमें शुद्ध निर्मलवुद्धि, सम्यग्दर्शन, सम्यक्चारित्र, सम्यग्ज्ञान, शुमभाव, भक्ति, वात्सल्य, विनय, पुण्य और धर्मक्रिया आदि कोई भी उत्पन नहीं होती है, होनेपर भी व्यर्थ हैं। पार्श्वमुनिके समान * पक्रपरिणामसे की हुई उसको सर्व क्रियायें व्यर्थ व निष्फल हैं ॥६॥ दुराचारी विद्वानोंको कष्ट देते हैं. फे मूढाः कतिपिज़दा गनधना दुष्टामया दुःखिनो। भाग्यात्याः सुखिनः प्रमत्तमनसः कामेच्छवो गर्विताः॥ * जारचित्तमविच्छिन्नालातघद्यस्य चेतसि । शाश्वती वधुद्धिस्तन्मिथ्यावं शत्यमुच्यते ॥
.३०४: दानशासना 12 . - दुर्वचाः शमनोक्तयः कुमतयो नियत्रियां संकुधः। प्रज्ञांस्संति न संति वात्र कुदृशस्तान्मारयति ध्रुवम् ॥६१॥ .अर्थ:-संसारमें कोई : मूर्ख होते हैं। कोई अज्ञानी, कोई दरिद्री; कोई असाध्य रोगसे पीडित, कोई दुःखी, कोई भाग्यवान; कोई सुखी, कोई प्रमादी, कोई कामी, कोई अहंकारी, कोई दुराचारी, कोई शांत बोलनेवाले, कोई दुर्बुद्धि, कोई निंद्यक्रिया करनेवाले और कोई क्रोधी होते है। परंतु सन्मार्गका उपदेश देनेवाले विद्ध न होते है या नहीं यह नहीं कह सकते हैं, अर्थात् प्रशस्तमोक्षमार्गफै उपदेश देनेवाले विद्वान' बहुत कम होते हैं। यदि कोई हों तो मिध्यादृष्टि अविवेकी उनको अनेक प्रकारसे कष्ट देते हैं ॥ ६१ ॥ 1. जिनागमकी रक्षा करोः । दायादचोरकुमुतस्त्रीजालकृमिधूलितैलदानाद्यैः ।। स्याजिनशास्त्रविनाशस्तेभ्यस्ता , सर्वयत्नेन ॥२॥ अर्थ,..दायाद, चौर, कुपुत्र, दुराचारिणी सी, जल, कीडे, धूल, तेल, अग्नि मादिरो जिनागमका नाश होता है। इसलिए हे भन्यात्मन् ! इनसे जिनागमोंकी , रक्षा कर,, जिससे इस लोकों सम्यग्ज्ञानका साधन, बना रदे.॥ ६२ ।।... मतं समस्त ऋपिभिर्यदाहितः प्रभामुरं पावनदानशासनम् । सदे सतां पुण्यधनं समभिनु । धनानि दद्यान्मुनये विचार्य, सत् ॥ ६३॥ अर्थ -समस्त आईत ऋषियोंके शासन के अनुसार यह दानशासन प्रतिपादित है। इसलिए पुण्यधनको कमाने की इच्छा रखने वाले दानी यांप उत्तम पात्रोको देखकर उनके संयमोपयोगी धनादिकम्पोको विचार फर दान देखें ।। ६३ ।। इति शाखदानविधानम् । .
भावलक्षणविधानम भावलक्षणविधानम् "; राजाकेसमान पुण्यपरिकरोफो मिलाना चाहिये। यत्कर्मार्जितमुच्चयेन समुदा सत्सावधानं सदा । तं भावं च तमुद्यमं तदुचितं देशं सहायं च तम् ॥ तन्मित्रं च तमीश्वरं च तमृपि तान्सेवकांस्तस्कुळं । तं ग्रंथं च नियोज्य तच कुरुतेऽरिष्टं च भूपालबत् ॥१॥ अर्थ-जो मनुष्य यहपर पुण्यक्रियावोंको करता है उसको बहुत मानंद' व 'सावधान होकर' उन क्रियावोंको करनी चाहिए। उन क्रियायोंके योग्य भाष, उद्योग, उचितदेश, योग्य सहायता, अनुकूल मित्र, हितैषी स्वामी, निस्पृहगुरु, अनुकूलसेवक और तदनुकूल परिग्रह आदि को योग्यरूप से मिलाकर पुण्यकार्योको करना चाहिए। तभी उसमें सफलता मिलती है जैसा कि योग्य राजा राज्यकार्यमें सर्वपरि- फरोंको मिलाया करता है ॥१॥ "दुष्टोंके हृदयमें जिनमुनि आदिके प्रति दयाभाय नहीं रहता । 'जैनः पूतगुणाकरो विगुणिनो दुष्टाः कुतर्कपिणोs- प्यानंतादिकपायिणः सशफ्ना-बंधुद्वयापातिनः ॥ दाक्षिण्यं दयया गुणेन च विना ये यत्र यत्रासते । सस्नेहं सहवासवर्तनसहालापान्सदा तैस्त्यजेत् ।। अर्थ-लोकमें ऐसे कितने ही लोग हैं जिनके हृदय में जिनमुनि व विद्वानोंके प्रति कोई दाक्षिण्य नहीं है अर्थात् उन की कोई परवाह ही, उनको नहीं रहती है । इसी प्रकार उनके हृदय में कोई भी प्राणियोंके प्रति दयाभाव नहीं रहता है । इसलिए उनके हृदयमें विनयादिक गुण नहीं हुआ करते हैं। वे दूसरोंको सदा दोष ठगाते रहते हैं, सजनों के साथ कुतर्क करते हैं । अनंतानुबंधि -4 2 .
दानशासनम् आदि कपायोंसे युक्त रहते हैं, साधुजनोंको गाली देते हैं, और अपने धर्माबांधवोंको फट देते हैं। ऐसे दुष्ट जहां रहते हैं उनका सहवास पवित्र गुणोंको धारण करनेवाले जिनभक्त कभी न करें, ॥२॥ जीवानां भावभेदाः स्युः स्वादुवच्च कपायवद ।। तिक्तवत्कटुवत्केचित्कंचित्कटुवदम्लवत् ॥ ३ ॥ • रसानामिह सर्वेपामेको द्वौ वा यथा त्रयः । चत्वार इव पंचेव पडूसा इव भूतळे ॥ ४ ॥ अर्थ--जीयोंके परिणाम अनेक प्रकारके होते हैं। जिस, प्रकार. रसोंके भेद स्वादु, कषाय, तीखा, कटु, लवण, अम्टके रूपमें होते हैं. उसी प्रकार जीवके परिणामोंमें भी अनेक प्रकार के विकल्प होते -- , यथा स्निन्धी यथा रुक्षो यथा शीतो यथोष्णकः । गुरुवल्लघुवरकोचिन्मृदुवस्वरवत्सदा ॥ ५ ॥ .अर्थ-किसीका परिणाम स्निग्ध रहता है, फिसीका रूक्ष रहता ६, किसीका शीत तो किसीका उष्ण, और किसीका गुरु तो किसीका रघु रहता है। और किसीका मृदु परिणाम रहता है .और किसीका फर्फश परिणाम रहता है अर्थात् आठ प्रकारफे स्पशीफे समान जीवोंके परिणाम भी होते हैं॥५॥ सेव्यं वालबाल्पमध्यफलमेवार्कोचित कार्फट । पदं चहरिद्य विक्षिपति पत्तच्च फेगिज्जनाः ॥ सव्यं पृद्धमिवाय संस्कृतिवशात्कचिच्च कूप्मांटिक । , बालं यद्विपदी भिपजः सेपं न संस्कारतः ॥६॥ अध-माजी विद्यु,कोमल, थोडा पटोर सपा फोमलपटोर पेसो पस्याओमें भी संख्या । परंतु जब यह पूर्ण कटोर होता है सब उसे कोई भी मनु न हाता है । उसी तरह तिनेक मनुष्य, गाउ, * भावलक्षणविधानम् . तरुण व मध्य अवस्थामें सेवा योग्य होते हैं। जब वे वृद्ध होते हैं तब ये सेवा के लिए अयोग्य हो जाते हैं । अर्थात् उन के परिणाम निर्मल नहीं होते हैं। लोभादिकसे दूषित होते है इसलिए वे आदर योग्य नहीं रहते हैं। कुष्मांड फल जब पूर्ण पक हो जाता है तब उस को संस्कृत करके अर्थात शक्कर की चासनी वगैरह मिलाकर उसका सेवन करते है । परंतु जब वह बिलकुल कोमल रहता है तब उसको संस्कार करके भी खाना योग्य नहीं है । क्यों कि यह बाल्यावस्था में विषतुल्य है ऐसा वैध कहते हैं।॥ ६॥ जीवाः केचिदिवाघ चिर्भटफलं सेव्यं न संस्कारतः । सेव्य केवलमेव सेव्यमखिलं स्यावृद्धमन्तेऽमृतम् ।। केचित् पूज्यमुसव्यमेव फलमप्यूरिवं सर्वदा दोपाणां सरुजां न पथ्यमिह तपम्यभाजां सदा ॥ ७ ॥ अर्थ-कितनेक जीव कचरियाके समान सेयनीय ही होते हैं । उनके ऊपर संस्कार करने की आवश्यकता नहीं होती है । अर्थात् उनके परिणामोंमें निर्मठता संस्कारके विना ही रहती है । फचरिया जब पक जाती है तब अमृत के समान मीठो होती है । उसी तरह कितनेफ जीवोंके परिणाम अमृतके समान पूर्ण पापरहित तथा वित्त- फारक होते हैं । फट नाम का फल [ कफ डी विशेष ] नौरोग आदमी को हितकर होता है। परंतु रोगीको यह पथ्य नहीं है । उसी तरह 'कितनेक जीव सदोष लोगों सेवनाय नहीं होते हैं। यदि घे उनकी से प्रयास करेंगे तो उनका अहित होगा ॥ ७ ॥ मूलं च कायः कुसुमं फलं च चतं च जम्या परिणामकाः । रक्तं मुकणं सरसं फलं च मुस्वामिष्टं भवभेदि शीतम् ॥८॥ अर्थ:- जंबूवृक्षफा मूल, काय, पुष्प, फल ये सबके सब श्वेत हैं, परंतु यह पफत समय लार होकर फिर काला होता है। परंतु ३०८ दानशासनम् खाते समय सादिष्ट व मीठा लगता हैं। व परिणाम शीत है। इस प्रकारके परिणामको धारण करनेवाल कोई जोव होते है ।।८. सेवासमये सरसं वदनं विरसं करोति वस्त्वाखलम् । सरसं विरस वक्त्रं रुणद्धि कंठं पूरीपमूत्रं च ॥ ९ ॥ अर्थः :--उस फलको सेघन करते समय सरस मालुम होता है, परंतु मुखको विरस करता है । एवं समस्त अन्य सरस पदार्थ खाने पर भी उसे विरस कर देता है । मुखको विरस करता है। केप मलमूत्रको रोकता है ॥ ९ ॥ केचित्कंका यथा जंनुपातका मित्रभेदकाः । फेचित्कंका इवाभान्ति फैशदोपापहारिणः ॥ १० ॥ अर्थ:--कोई कंधै जिस प्रकार शिरपर रहे हुए जमादि प्राणि- योंका नाश करते हैं, इस प्रकार फोई २ मित्रोंको भेद करनेवाल होते हैं। कोई फंघ जिस प्रकार केश के दोपोंको दूर करते हैं, उसी प्रकार कोई २ मनुष्योंका परिणाम रहता है ॥ १० ॥ भदजन्तुहा फयित्सस्नेह सति फंकवत् । निस्नेहेऽपि च जन्तुघ्नस्तस्मिन्नाभिमुखः सदा ॥ ११॥ अर्य--कोई कंघा जिस प्रकार शिरपर तेलके रहनेपर जू आदि को भेद करनेवाला घ उसे नाश करनेवाटा होता है। उसी प्रकार कोई २ आयधिक स्नेह रहनेपर भी यहां भेदमाय उत्पन करते हैं उन को हानि पहुंचाते हैं। कोई कंघा तेल न रहने पर भी जंतुका नाश करता है । इसी प्रकार कोई प्रेम न रहनेपर भी दूसरोकी हानि हो फरते हैं । इस प्रकार इन लोगोंसे हमेशा दूर रहना चाहिए ॥ ११ ॥ आदत्त दीपिणां दीपान निदॉपी विपीभवत् । सदोषो रक्तं पिबति निदपि नव रक्तपाः ॥ १२ ॥ अर्थ-दमेशा दोषी ही दोषियोंके दोपको प्रहण करता .
भावलक्षणविधानम् - निर्दोषी दोषको ग्रहण करने के लिए प्रयत्न नहीं करती है । दोषी जिलौक हा दुष्ट रक्त को पीते हैं। निदोषी कभी नहीं पाते ॥ १२ ॥ १, शुष्कास्थिदशनादत्रं पियन्वेत्ति न कुक्कुरः । . .:. चिदंघ न जानन्ति पुरोऽपि यहुवेदनाम् ॥ १३ ॥ -जिस प्रकार कुत्ता सूखी हड्डीको खाते हुए अपने दोत व मुखसे निकलनेवाले रक्त को पीते हुए भी उसे नहीं जानता है, उसी प्रकार कितने ही सर्जन अपने सामने अनेक प्रकार के दुःख होने पर भी उसे नहीं जानते हैं 1॥ १३ ॥ 3 . . गेई यत्र गते शूनीह मनुजैर्घाते भपत्यदयुतं ।।। नांमुचत्स गृहप्रवेशमपि ते दण्डाहति नात्यजेत् । ते चिन्वन्त्यमेव सोऽप्यघफलं भुते यथा विष्टपे J... भुजानास्सकला भवन्ति दुरितं यन्नाशयन्त्यैहिकम् ॥१४॥ 11. अर्थ- कोई कुत्ते अपरिचित्त मनुष्यके घरगें, धुस, जाते. तब उस घरका मालिक उनको पीटता है। उस समय वे कुत्ते भोंकने लगते हैं । परगृहमें घुसनेका स्वभाव कोई कुत्ते नहीं छोडते हैं । अतः वे हमेशा दंडेसे पीटे जाते है । पीटनेवाला आदमी तथा कुत्ते दोनों ही अपने अपने कार्यसे पापसंचय ही करते हैं। उसी तरह कोई जीव प्राणियोंको दुःख देते हैं। प्राणी अपने पूर्व कृतकर्मका फल भोगते है तथा दुःख देनेवाले भी अपने इहपरलोक को बिगाडकर "पाप संचय करते हैं । इस प्रकार विचार कर जीवोंको दुखित करना योग्य नहीं है, ऐसा मनमें विचार करना चाहिये ॥ १४॥ मा कुरु शुचं कृतनप्राणिवहमधम इति बुधा येत । भवतोऽपि निकृष्टतरं दृष्ट्वा श्वान कृतज्ञनामानम् ॥१५॥ अर्थ-हे जीव ! मैं कृतज्ञप्राणियों मे अधम हूं। इस प्रकार की चिंता मत करो। तुमसे भी अधिक निकृष्ट कृतज्ञ कुत्ते को देख कर अपने मन में समाधान कर लेना चाहिए ॥१५|| -:." ।।
दानशासनम् -- . . . श्वानो जानन्ति दुर्गघं ज्ञानन क्ष्मागतं शवम् ! : की न निधानं तथा नीचा दोषान् पश्यन्ति नो गुणान् ॥१६॥ अर्थ-कुत्ता अपने ज्ञानबल से भूमिफे अंदर रखे हुए शय के दुर्गध को जान सकता है। परंतु भूमि में कोई निधि हो तो उसे नहीं जान सकता है। इसी प्रकार नीचमनुष्य दोपको ही ग्रहण कर सकते हैं । गुण को ग्रहण नहीं कर सकते ॥ १६ ॥ असन्तपदन्ति हिंसन्ति विक्रीणन्त्यामिपाशिनाम् । जावाला इव घस्तादीन् वर्तन्ते कतिचिजनाः ॥ १७॥ अर्थ-मेडिये लोग बकरे आदि को संरक्षण करते हैं, खाते हैं, मारते हैं एवं मांसभक्षकों को बेचते भी है । इस प्रकार के परिणाम के भी कोई दुष्ट रहते हैं ॥ १७॥ "स्वकीयधर्मानुगुणास्त एव'पुण्येऽधिकेऽतिमतिकृत्ताः। किंधित जानन्ति हिताहितं वं मत्तास्तु मीना इव फेचिदंत्र॥१८॥ अर्थ-कोई कोई पुरुप पूर्वजन्मके धर्माचरणसे अधिक पुण्यशाटी हो जाते हैं। परंतु ये प्रतिकूल आचरण करते है। जलम सुखसे विहरने 'पाले मस्य जैसे मत्त होकर अपना हितादित नहीं जानते हुए मरणवश होते हैं उसी तरह वे पुरुष भी अपना हिताहित नहीं जानते हैं। अन्योऽन्पलंघनविष्टिविरोधवृत्ता नित्यव्ययाः सततलून पुनर्भवाय । वित्रफम्यफसशर्करफीलपङ्कः- चर्मानुरक्तचरणा इव कंचिदत्र ॥ ॥ अर्य-जैसे कोई पुरुष आपसमें पायोस डसे सब उनके पाय यथित होते हैं। उनके नसोम दर्द होने लगता है। राणमिनके पांषोंमें विरा, मूत्र, कोट, कीचड यारसे तकलीफ साद ऐसे 'मनुष्पॉफै समान जो जीर लापसमें सिंध करते हैं उनको लोक में खो लेती, इसी प्रकार इस संसारमें कई विधेकरहित सज्जन क्षुद्र कृतांहसो यथा केचित्कर्मभारान्वहन्त्यलम् ॥२२॥ अर्थ:-कहार लोग फेवल भारको चाहते हैं या भारको जानते विशंन्त्यन्यवटं नक्तं यान्ति लोभनका यथा। "पुण्यकाळेऽतिविमुखाः पापे केचित्सुखच्छवः ॥२३॥ अर्थ-जमीन खोदने वाले मनुष्य दिनमें गड्ढा खोदते हुए नीचे जाते हैं परंतु जब रात हो जाती है तब ऊपर आते उसी तरह है, कंपकपीमें [ झूले ] रहे हुए कोई पदार्थकी अपेक्षा व परिज्ञान कितनेक पुरुष पुण्य करने के समय में पुण्य कृत्य से विमुख होकर भावलक्षणविधानम् -- द्वेषविकार से दुःख होता है तथा परलोकमें भी पापोदय से दुःखं की भोगना पडता है । अतः आपसमें द्रुप ईर्ष्या वगैरह छोडने चाहिये जिससे उभय लोकमें सुख होता है । १९ ।। ये स्वस्थानाधितास्तेपों मनाऽनुगुणवर्तिनः 'अभेदविषयासक्ताः कंचिद्वेश्याजना इच ॥२०॥ अर्थ:--जिस प्रकार वेश्या जो धन देते हैं उनके मनके अनुकूल वर्ताव करती है एवं अभेदरूपमें विषयासक्त होती है उसी प्रकार इस' संसारमें कोई २ सज्जन होते हैं ॥२०॥ वृथा मृत्युं गता मीनाः पललेशाशया यथा । विवेकरहिताः केचिद्विनष्टा ईपदाशयाः ॥ २१ ॥ अर्थ-जसे मौसके टुकडेके लोमसे मछलियां अपने प्राणको अभिप्रायके वशीभूत होकर नष्ट होते हैं ॥ २१ ॥ भारमिच्छन्ति किञ्चिन्नान्दोलनस्थितिम् । काहारा उनको नहीं है। इसी प्रकार इस संसारमें कई सज्जन कर्मार्जन करते ए कर्मभारको ही वहन करते हैं ॥२२॥ - ३१२, पानशासनम्. . A . .. पाप में तत्पर होते हैं तथा पाप करने में तत्पर , होकर उस से सुख. प्राप्ति की इच्छा करते हैं । ऐसे विचारोंसे वे इह पर लोक में हिसको नष्ट कर के दुःख को ही भोगते रहते हैं ॥२॥ स्वर्गानरं नरात्स्वर्ग कपाश्चिततपःपराः ...... कंचिन्मिथ्याशी यान्ति मुहुः शाखामृगा यथा ॥२४॥ अर्थ-कोई २ मिध्यादृष्टि तपश्चर्याके फलसे स्वर्गसे नरपर्यायको, मनुष्यपर्यायमे स्वर्गको इस प्रकार क्रमसे वार २ जाते आते.रहते हैं, जिस प्रकार कि बंदर वृक्षोंपर एक शाखासे दूसरी शाखापर कूदते, रहते हैं ॥ २४ ॥; : 17 धनध्वनिश्रुतेरेव निर्विपाः शिखिनो यथा ॥ नटन्ति निरघाः.फेचिद्धर्मोत्साहध्वनैस्तथा ॥ २५॥ अर्थ---मेघकी यान के सुनते ही जिस प्रकार मयूर निर्षिप होते है, उसी प्रकार कोई २ पापरहित हजम धर्मोत्साह को उत्पम करने वाले शब्दको सुनते ही मंदकपायी होते हैं ॥२५॥ रूपानवनिथुतेरेव पळायन्ते यथा मृगाः ।। तथा हिंसाश्रुतेरेय.पळायन्तेऽभीरवः ॥ २६ ।। अर्थ-जिस प्रकार व्याप्रफ शन्दको सुनते ही मृगगण भाग जाते हैं. सभी प्रकार हिंसाविषयको सुनसे पापभीर सम्जन: भाग जाते हैं ॥ २६ ॥ श्वानचंद्रोदयं दृष्ट्वा पपन्ते नात्यायया ॥ फचिदन्यजनं दृष्ट्वा महिपन्त्यत्यम्यया ॥ २७ ॥ अर्थ-चंदगाके उदय होते ही ईससि कुते भोकने लगते हैं, उसी प्रकार कोई २ साजन य धर्मामाभोंसे सि द्वेष करते रहते .. - भौयलक्षणविधानम् . फोई परोपदेशमें पंडित होते है. परपा प्रवदन्तोऽपि शुभाशुभफलं सदा ॥ कचित्स्वयं न जानन्ति माणिक्या: पक्षिणो यथा ॥२८॥ अर्थ- दूसरों को शुमाशुम फलको अपने शकुन से कहते हुए भी रनाय पक्षी स्वयं उस शुभाशुभ को नहीं जानते हैं। इसी प्रकार कोई परसेपदेश में पंडित रहते हैं ॥ २८ ॥ कोई चैलके तुल्य होते है. परस्त्रीसंगमासक्ताः परार्थभृतविग्रहाः ।। त्रातदेहेन्द्रियमुखाः फेचिच्च वृपभा यथा ॥ २९ ॥ अर्थ संसार में ऐसे भी कोई मनुष्प है जो बैठके समान परस्त्री- संगममें आसक्त रहते हैं, दूसरोंकी सेवामें ही सदा तत्पर रहते हैं, अपने देह प इंद्रियके सुम्खमें ही सदा मन रहते हैं ॥ २९ ॥ कोई पिंगलके तुल्य मिरवचनी होते हैं. मागच्छताध पुरतोऽध्वनि पीडनास्वी- त्येवं ब्रुवन्त इव पिङ्गलपक्षिणोऽत्र । मांसाशिनः सुवचसा परिपूजनीया, मांसाशिनोऽपि कतिचिच्छुभभापिणःस्युः ॥३०॥ अर्थ-पिंगल पक्षी अपने वचनसे कहता है कि आगे आज तुम मत जावो, मार्ग में पीडा है । मासभक्षी होने पर भी उसका वचन शकुन शास्त्रमें ग्राह्य है । इसीप्रकार इस संसार में मांसभक्षी मी'कोई मीठे वचन को बोलनेवाले होते हैं ॥ ३० ॥ कोई चिकोडतुल्य होते हैं केचित्स्वकुक्षिमृत्पर्य लोकप्टानि फलान्यपि । पातयन्तः स्वपुण्यानि चिक्रोडा इस जन्तवः ॥ ३१ ॥ अर्थ-चिक्रोड नारक जो जंतु है. वह अपने . . उदरपण के
दानशासनम्
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लिए लोगों को इष्ट ऐसे भी सर्व फलोंको गिराते रहते हैं, उसी प्रकार
इस संसार में कितने ही सम्जन पुण्यका नाश करते हैं, ॥३१ ।।
कोई सिंहके तुल्य पाप कमा लेते हैं.
गजो हतः केसरिणात्मनोऽधं भवेददन्तीव च जम्बुकाद्याः ॥
वृथा क्रुधैकः महतस्तदर्थानन्ये हरन्त्यात्मन एक पापम् ॥३२॥
अर्थ-सिंE क्रोधसे हाधीको मारता है, परंतु उसका मांस
शुगाल वगैरे प्राणी भक्षण करते हैं। सिंह गजवध पापसे लिप्त
होता है । इसीप्रकार कोई पुरुप क्रोधसे किसीको मारता है और
उस के धनादिक अन्य लोग उठा लेते हैं। हरण करते हैं। मारने
वालेको केवल पाप की ही प्राप्ति होती है ॥ ३२ ॥
कोई संकेतादिसे प्रणाम करते हैं.
सकतादनसंस्पृष्ट्या दधिराः शयिता यथा ।
मणमन्ति समनाथ नमन्ति कतिचित्तथा ॥३३॥
अर्थ-कितने ही बहरे संकेत, अंगपर्शन भादिस शयनादि क्रिया
करते हैं। उस प्रकार इस संसारमें अनेक व्यक्ति संकेतादिसे ही प्रणाम
पंदना भादि क्रिया करते हैं ॥३३॥
कोई बिल्ली के तुल्य हिंसातुर होते हैं..
स्थित्वा ध्यायन्ति मार्मारा पाविरपिलान्तिः ।
एकाग्रचिन्तया फेचियमा हिंसातुरास्तथा ॥३॥
अर्थ-अप्से मिली पहेके बिटफे बाहर बैठकर ध्यान करती है,
उसी प्रकार इस संसारमें कोई कामधितासे ब्यान करते हुए हिंसातुर
रहते हैं। ३४ ॥
फोर दिसानंदी होने
माजीरनफुलवाला दृश्यापश्यन्यानिशम् ।
पया रिसानंदिननी ध्यनक्ति सकासि ॥३५॥
भावलक्षणविधानम् । अर्थ-मार्जार नकुलादि प्राणी जिस प्रकार रात्रिंदिन एकमेकको देखकर वैरविरोधको धारण करते हैं या रात्रिंदिन हिंसा करने में ही आनंदित होते हैं, इसी प्रकार इस संसारमें कोई कोई मनुष्य भी हिंसा करनेमें ही आनंद मानते हैं ॥ ३५ ॥ कोई कर्मके तुल्य भ्रमण करते हैं. हिंसया दुर्गतिं गत्वा लब्धा हिंसत्यसन्नराः ।। उन्मन्जन्ति निमज्जन्ति कचित्कर्मा इवाम्भसि ॥ ३६ ॥ 'अर्थ-कोई हिंसाके फलसे दुर्गतिको जाकर वहां भी पुनः प्राणियों का वध कर पुनः दुर्गतिमे परिभ्रमण करते हैं। इस प्रकार जलमें कछुओके समान संसारसागरमें बराबर गोते लगाते फिरते हैं ॥३६॥ पापी उल्लूके तुल्य धर्मको देखते नहीं. "प्रकाशद्वेषिणः केचि का वा खनका इव । धर्ममार्गप्रकाशं न पश्यन्ति दुरितान्धकाः ॥३७॥ अर्थ--उल्लू व बूंस जिस प्रकार प्रकाशसे नफरत करते है उसी प्रकार कोई पापीजीव धर्ममार्गके प्रकाशको देखना नहीं चाहते हैं ॥२७॥ कोई चूहेके तुल्य विवेकहीन होते हैं. हिताहितं न जानन्तो वृपाः पश्यन्त्यहर्निशम् । सद्गुणोच्छंदिनो लोक यथा केचिद्गुणापहाः ॥३८॥ अर्थ-जिस प्रकार चूहे अपने हिताहितको, नहीं देखते, तथा उत्तम संतुओंसे निर्मित वस्रादिकोंको नष्ट करते है। इसी प्रकार कोई २ गुणको अपहरण करनेवाले पुरुष सद्गुणको नाश करते हैं एवं अपने हिताहितको नहीं देखते है ॥ ३८ ॥ कोई कौयेके तुत्य मर्मभेदी होते हैं. पश्चाद्यव्रणान् हवा खादन्त्यहीय वायसाः। केचिन्मर्माणि सर्वेषां सर्वदोघाटयन्त्यलम् ॥ ३९ ॥ PL दानशासनम् 1. अर्थ:--जिस प्रकार कौये जानवरोंके शरीर पर जखम देखकर उसे खोदने लगते हैं, खाते हैं। उसी प्रकार कोई २. जीव " दूसरोंके दुःखकी अवस्थामें भी उनके मर्मस्थलको भेदते हैं ॥३९॥ कोई मनुष्योंका नाश करते हैं कारयन्ति स्वयं पापं कैचिदाश्रित्य.भूपतीन् । माशयन्ति जनान् राज्ये छेकाः खगमृगान्यथा ॥ ४० ॥ अर्थ-कोई २ सज्जन गजाके आश्रयसे खयं पाप करते हैं, एवं दूसरोंसे -पाप कराते हैं, जैसे कोई मनुष्य पाले हुए, चतुर .पशु, पक्षीके द्वारा दुसरे पशु, पक्षीको पकडते हैं ॥ ४० ॥ फोई तृणके तुल्य होते हैं. वर्षाकाले प्रवर्धन्ते ग्रीय नश्यन्ति च स्वयम् । वृष्टयुत्पन्नणानीव फेचिज्जीवन्ति सर्वया ॥ १.१.॥ अर्थ-जिस प्रकार कोई घास बरसातमें उत्पन होते हैं एवं गरमा नष्ट होते हैं, इसी प्रकार कोई २ जीयों की हालत है। परंतु कोई २ वरसातमें उत्पन्न हुए घास सदा हो जीते हैं। उसी प्रकार किन्ही २ जीवोंका परिणाम होता है ॥४१॥ स्पृष्टा या गा: सकलाध भद्रा स्वष्टा मनस्येव भवन्ति वृद्धाः । सुरा इवामी ललनाः सक्ष्यि स्पृश्या तपासादितमानसाः स्युः ॥ ४२॥.. अर्थ-मिस प्रकार अच्छी यस गाये बैन्टों को स्पर्श प.रने मापसे मनमे ही संचार होती, इसी प्रकार कोई २ अछी लियो, अपने पति को देवकर य पर्शकर मनमें संतुष्ट होती है ।। १२ ।। पलाकारमे गरी गमग इठादाप्रमिदं गाय धावन्ति युगमा यथा ॥ प्रसमान्पासना फेचिंगान्ति मानसः । ४३ ।। - ,
दुर्यों के लिये उपकार थपकारके लिये होता है. ।।
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अर्थ--कोई मनुष्य नित्य ही भोगकी इच्छा करते हैं, स्मरण
करते हैं, परंतु भोगातरायके उदयसे उसकी प्राप्ति नहीं होती है ।
ध्यान किया करता है, उसी प्रकार उस व्यक्तिकी दाटत है॥४५॥ .
केपां चिदक्रमावानां स्यात्कृत पुण्यमंहसे ॥ १६ ॥
अर्थ---जिस प्रकार सर्प को पिलाया हुआ हितकर दूध भी रिप
ही हुमा करता है, उसी प्रकार कोई कोई दुष्टीको किया हुमा उपकार
भी अपकार के लिए हुआ करता दे, पुण्य भी पापक रूप में परिणत
भावलक्षणविधानम्
अर्थ:--जिस प्रकार कोई बैल जबर्दस्ती गायके सेवन करने के
लिए जाते हैं, उसी प्रकार फितने ही पुरुप परनियोफे प्रति जबर्दस्ती
प आसकचित्तसे प्रवृत्ति करते हैं ॥ १३ ॥
क्षेत्रे कुटाकृष्ट पृष्टेऽनन्तादयो यथैधन्ते ।
पाह्याशुद्धन तपसा येनान्तरघानि चाशु वर्धन्ते ॥४४॥
अर्थ:--जिस प्रकार उभाड खेत में वर्षाके पटने पर अनेक
सस्य विशेष उत्पन्न होते हैं, उसी प्रकार बाह्यमें अशुद्धि होनेपर तपथा
के करनेसे अतरंग में पाप की वृद्धि होती है ॥ १४ ॥
कोई कैदीफे तुल्य भोगकी इच्छा करता है
इच्छन्ति भोगान् स्परणन नित्यं
भोगान्तरायेण तपो भवेन्न ।
ध्यायन्ति फेचिन्मनुजा यथास्मिन्
काराळये शृखलिता हि चौराः ॥४५॥
भागोंकी प्राप्ति होनेसे वे तप करते हैं ऐसा नहीं समझना
जिस प्रकार कारागृहमें पड़ा हुआ चोर अपने छुटकारेका ही
,
१
चाहिये ।
हितं पयो विपायव सर्पाणामिव जायते ।
होता है।॥ ४६॥
दानशासनम् । . । - कर्म हार्जितं स किश्चिदुद्भवति स्फुटम् ॥ .. : .अकृष्टानासवणक्षेत्रपूप्तमुबीजवत् ॥ ४७ ॥ अर्थ-उपार्जित कौमसे कोई कर्म उदयमें आकर फल देते हैं, सर्व कर्म फल नही देते हैं। बोये गए सब बीजोंसे धान्य उत्पम नहीं होता है. कुछ बीज अंकुरित होकर उन थोडेसे . योडी धान्योत्पत्ति होगी ॥४७॥ प्रवृदपुण्यानि तदात्र फेचिद्धन्ति सार्थानि सीहितानि ॥ प्रवृद्धसस्यानि यथात्र मार्यो हरन्ति सार्थानि समीहितानि॥४८il अर्थ-पुण्यसे प्राप्त हुआ धनादिक पापोदयसे नष्ट होता है असे उत्पन्न हुआ धान्य धान्यमारी रोगसे नष्ट होता है । अतः प्राप्त हुए मी धनादिक पदार्थीको लोग पापोदपप्ते भोग नहीं सकते ऐसा समशकर पुण्य लोग प्राप्तिके ही कार्य हमेशा करना चाहिये ॥ ४८॥ केचित्कुर्वन्ति दानस्प विघ्नं विघ्नाननक्षमाः। • शुक्रपश्चिमकाजेंद्रचापी वृष्टिहरो यथा ॥ ४९ ॥ । ! अर्थ-किसी किसी का स्वभाव ही यह है कि दान में विप्न उपस्थित किया जाय, चे अंतराय फर्म का अर्जन करते है जिस प्रकार कि शुमामह के पश्चिम में रहने पाटा इंद्रधनुष नियम से दूर करता है, उसी प्रकार यह दान कार्य नदी होने देता है। १९॥ मुगंपिरंभोष्णजलेन मृत्यु गतेच केचिद्धरिते भविष्ट। सयं प्रयोति कमतः सुगंधिरंभामवंताव पं तु जनाः ॥ ५० ॥ अर्थ-जिस प्रफार गरम पानी सुगंधी पं.रे का पक्ष नष्ट होतात उसी प्रकार पापप्रयिष्ट होमसे यह व्यक्ति नष्ट होता है। निस प्रकार उस फेले वृक्ष की रक्षा करते हैं उसी प्रकार धर्मकी रक्षा करने के लिए प्रपान करना चाहिए ।॥ ५० ॥ वृष्टि को
भेदन करता है, उसी प्रकारचे हृदय में स्थित धर्मकी भी हालत
होती। जिस प्रकार यह मनुष्य उघरफी हाउत में औषध पीता हे
तो वह घर का भेदन करता, उसी प्रकार उस पर्म की मी हाउत
गाव. मजा पद ज्ञात्वा कृत्वा बीज वपन्त्यही।
भावलक्षणविधानम्
रेयं श्वाशित तस्य यथा कुक्षौ न तिष्ठति ।
केषां चेतसि सद्धर्मस्तथा पुण्य न तिष्ठति ॥ ५१ ॥
अर्थ-कुत्ते के द्वारा पीया दुआ घी उस के पेटमें कभी नहीं
ठहरता है। उसी प्रकार किसी किसीके हृदय में सद्धर्म तथा पुण्य कमी
नहीं ठहरता है॥५१॥
वस्त्रानान्तनिशाकान्तिलय याति यथातपे ।
धर्मेच्छा सुकृत फेषां दुस्सगात् सीयते क्रमात् ॥ ५२ ॥
अर्थ -~-वस्त्र में व्याप्त हरिद्रा का रंग धूपमें नष्ट हो जाता है, उसी
प्रकार किसी किसीके धर्म धारण करने की इ छा व पुण्य नीचसग.
'तिसे नष्ट होते हैं ॥ ५२ ।।
यथा वह्रिमुख सूतः सघो नास्ति सदृशाम्।
मिथ्याक्सृष्टिवान्द्रव्यभक्तिभिर्दगयक्षयः ॥ ५३ ॥
अर्थ-जिस प्रकार अनिमुखमें उत्पन या रक्खा हुआ पदार्थ त क्षण
नष्ट होता है, उसी प्रकार जो सम्यग्दृष्टियोंको कष्ट पहुंचा कर, मिध्या
दृष्टियोंकी उत्पत्ति में प्रेरणा, द्रव्यदान, भक्ति आदमें मदत पहुंचाता है
उस
के दर्शन व पुण्य शीघ्र नष्ट होते है ।। ५३ ॥
आमकुभे यथा तोयं सबस्तस्प विभेदछन् ।
हृद्यपके न धर्मोऽय पीतोपधमिव ज्वरे ॥ ५१ ॥
अर्थ-कचे घडे में भरा हुआ पानी जिस प्रकार शीम उसका
-
होती है ॥ ५४॥
.
तथा न कृतिन कुर्यु पुण्यबीज चपन्ति न ॥ ५५ ॥
भावलक्षणविधानम् . , 1 M - पुण्यफर पाप केचिदाखेटिनुं गत्वा शून्याहस्ता भवन्त्य हो । तेषां पुण्यकरं पापं ब्रुवन्तीह मुनीश्वराः ॥ ५८ ॥ अर्थ--कोई कोई शिकार खेलने के लिए जाते हैं, शिकार कुछ भी न मिलने पर शून्य दस्त लौटते हैं । परतु मनमें खिम नही होते हैं।' प्रेयुत हर्षित होते हैं कि आज शिकार नहीं मिला तो अच्छा हुक्षा, मेरे दायसे होनेवाली हिंसासे में बच गया, उन प्राणियोंकी भी रक्षा हुई। यद्यपि उनकी क्रिया पाप है तथावि परिणामसे पुण्य है ॥ 1.६ 'जारतादिकतिस्मृत्योर्वाधा पहुविधा भवेत् । पां पुष्पकरं पाप कर्मरूपविदो विदुः ॥ ५९ ॥ अर्थ-जारमादिदुष्कृतियों को करके जो व्यक्ति उन कृतियो से, होनेवाली बाधायोंको विचार कर पश्चाताप करते हैं । एवं उन पापोंको छोड़ते हैं तो उनका पाप पुण्यकर है, ऐसा कर्मम्वरूपको जानने वाले महर्षि कहते हैं पापकर पुण्य. 'चिना राजादियायां गज्जारस्यावति जारताम् । तस्य पापकरं पुण्यं कर्मरूपविदो विदुः ॥६० ।। अर्थ-जो व्यक्ति राजादिकी प्राधासे दूसरे जारव्यक्ति की जारता को संरक्षण करता है अर्थात् उस जारपुरुषको कोई कर नहीं होने देता है, वह पापकर पुण्य है, इस प्रकार महर्पिगण करते हैं ॥६॥ छुदाऽपवादाचेकितोऽपि यो जनो देश विदार्याशयमसमाशु' क्या पिपासु वि वर्तगे यथाप्यलक आरद्धगली दिदक्षुकः ॥ अर्थ-जो मनुष्य निदासे भययुक्त होता है तथा क्रुद्ध होता है तब कई अपनी दा सा, 'पपनी मुख फाडता है। N १९॥ . Tru ', .
३२२० : -वानशासमम् समय यह दंश करनेके लिए उद्युक्त होकर जिसने अपना मुख फाडा रे ऐसे पागल कुत्ते के समान दिखता है ॥ ६१ ॥ झंझावाते जाते पतिते करकोचये रसालानाम् । प्रपतन्ति फलानि यथा फेचिञ्च महान्तरायवन्तः स्युः ॥६२॥ अर्थ-विशिष्ट आंधी चलनेपर जिस प्रकार वृक्षसे आप्रफलादि , पतित होते हैं उसी प्रकार काई २ सम्जनोंको · अकस्मात कर्मवश. महा अंतराय उपस्थित होता है ।। ६२ ॥ स्वामिद्रोही योऽईदापहर्ता दातुः शक्ति योऽप्यविज्ञाय भोक्ता । भोज भोज तदगृहस्यापकर्ता सोऽयं क्षिप्रं याति पापं दरिद्रम्॥१३॥ अर्थ:-जो व्यक्ति स्वामिद्रोही है, देवद्रव्यको अपहरण करने यादा है, दांताकी शक्तिको न जानकर ही उससे लाभ उठाना चाहता है, किसी घरफा रोज रोज खाकर भी उसकी अपकार करता है, वह व्यक्ति शीघ्र ही तीबपापको संचय करता है एवं उसके फलसे दरि- दताको प्राप्त करता है ।। ६३ ।। जारान् ये तर्पयन्त्यस्तपां जन्मान्तरेऽत्र च । सर्वे हरगोचराः कान्ता श्या: म्युः स्वांगना इय ॥६४ ॥ अर्थ-जार पुरुषको धन देकर जो खुष करते हैं उमकी त्रिपा इस जन्म में तथा परजन्म में मानो जार पुस्प का दिया। इस प्रकार ठन के पश होती है। अर्थात जार पुटपको दान देना उसका भादर करना धगैरह कार्य करने से अपने वंशकी शुद्धि ना होती अतः जारादिक दुगचारियोंको दानादिफ नहीं देना चादिये ॥६॥ सरण्डमारित सर्वमान नदीतट तारपति प्रपति । सदन्तरस्यानिह सर्वमानवान शपत्यमी तिष्ट यथास मानिनः। अर्थ-निस में लोक दे। ऐसी नापको नापिफ नदी किनारे anा है। परंतु उसको परियोग गायी देर पुषित करेंगे तो का .
भावलक्षणविधामम् . समस्त लोगोंको नदीमें डुबा देगा । उसी तरह दान देनेवाले को उस के कार्य की प्रशंसा कर दानमें प्रवृत्त करना चाहिए। ऐसे करने से धर्मप्रभावना होगी अन्यथा धर्म का विनाश होगा । योग्य दान. देने घाले की प्रशंसा करो अथवा मौन धारण करो परंतु उसकी निंदा फरने से धर्मका नाश करनेका अकार्य होता है, ऐसा समझकर ऐसे कार्य से सदैव दूर रहो ॥६५॥ अस्मिन् गारिका सन्ति नगर वीथीपु मुष्टि है। पुण्यं वस्तुचयं हरन्ति च यथा मुष्टिपुराणश्रुते ॥ : दत्त यो नृपवत्फलं तळवरी बध्नाति दुष्ठं यथा। द्वी नायौ वसतः शुभाशुभकरौ लोके यथार्याहसि ॥६६॥ अर्य-कतरनी वगैरे चोरीके साधन लेकर राजाने स्वतः अपने कोषागारमें चोरी की थी। तब कोतवालने शोध करके राजानी चोर है ऐसा निश्चय कर उस को पकट लिया, उस समय प्रजाने कोतवालकी बहुत प्रशंसा की । उसी तरह धनादिक वस्तुओंको हम यदि मत्पात्रादि दान में लगायेंगे तो हम कोतवाल के समान पुण्यफल-स्वर्गादिक फल मिलेगा, हमारी इह लोकमें कीर्ति होगी और यदि हम हमारे धनादिकों फो असत्कार्य में विनियुक्त करेंगे तो स्वयं ही दृष्टांतमें प्रदर्शित किये राजाके समान दंडित होगे अर्थात् पापसे दुर्गतिदुख भोगेंगे । ऐसा समझकर सत्पात्रादिक को दान देना चाहिए ॥६६॥ सदा विकल दुःपरिग्रहबहुग्रहैः पीडितम् । मनोऽतिमरुदुच्चलत्सलिलवीचिवकंपयते ।। सवेल [ग] जलमयकम्पितणांगवत्कम्यने । ज्यग्ज्वलनपात्रसंकथितवारिवत्क्षुभ्यने ॥ ६७ ॥ --मन परिप्रहसे रहित होने पर भी वायुसे ऊपर उठी हुई जलनरंगके समान सदैव चंचल व शोकप्रस्त रहता है । यदि दुष्ट TI अर्थ- दानशासनम् . - परिग्रह हो तो मनुष्योंका मन बेगयुक्त जलके बीच में रहे. 'हए तण के समान बार २ चंचल होता है । और यदि परिमासमा अत्यधिक दोगया तो उस से,अग्नि पी गलासे संतप्त पात्र में स्थित उबलते हुए पानी के समान मनकी स्थिति होती है । अतः सत्पात्रमें दान देने से ही मनःशान्ति होती है-ऐसा समझकर दान कार्य मे मन को .. लगाना चाहिए ॥६७॥ न विघ्नाः सन्ति पांचित्पापिनां पापमूर्तये ।। न विनाः सन्ति केपाचिकृतिनां पुण्यमूर्तये ।।:६८ ॥ अर्थ-लोक में विप्न मंतराय किसे नहीं है अपिता अवश्य है, परंतु पुण्यशालियोंको अपने पुण्यमूर्तियफे प्रभाव से विप्ना नहीं होते हैं. व मानेपर मी.दूर होते हैं ।। ६८ ॥..। दर्शनचारिरहित शान:। निस्तक्षेत्रवृत्तिवनिमब्द इनादृशः ॥. ज्ञानं कृपिकवत्तस्य जीवितं निष्फ भवेद ॥६९।। दृष्वृित्तविहीनस्य परं ज्ञानप्रभाविनः ! :: :: जीवित निष्फलं तस्य निरर्थ क्षेत्रवृष्टिवत् ॥५०॥ अर्थ-चारित्र य दर्शनसे रहित शान पर्थ , गित प्रकार किसानको सेतीका ज्ञान होनेपर मी यदि उसने बीज नहीबाया तो वह निक। योपा सोना लि आदिको अनुकूलता नहीं मिली तो उमठा ज्ञान निमल है। उसी प्रकार दर्शन घ,चारित्रसे रहित विशिष्टज्ञानको धारण करनेवाटे प्रभावी व्यक्तिका भी जोगन निक। अतः झानार्जन के साथ श्रया. नमें दृढता व चारित्र के पालन के लिए भी प्रपान करना चाहिय६९.७० गुपयोंकी अनुमति के बिना शारिपालननिपं. ग्रामननपत्यनुमा पिना नराः कुर्वते यकार्य। ;. दानिः स्पाचेन यथा मुनुमनिमन्तरेण यदृचम् ॥७९॥ : " . ५ भावलक्षणविधानम् अर्थ-जिस प्रकार लोक में प्रामपति, व जनपतिकी अनुमतिफे लिये बिना कोई कार्य करें तो उसकी हानि होती है। उसी प्रकार स्पोकी अनुमति विना जो चारित्रको पालन करते हैं उनकी प्रानि होती है। अर्थात् व्रतग्रहणादिक गुरुसाक्षीपूर्वक ही होना चाहिये ," यद्यत्कार्यमिम जना नृपजनानु विना कुर्वते ।। नाश यान्ति पल समेत न यथा तत्तेन जीवा गुरो।। सानुमा च पिना स्वय व्रतमित्ता धर्मतर वर्तन । सम्यधर्मफप्रयान्ति न विना तीर्थेशमन्येन च ॥२॥ अर्थ-लोकमें देखा जाता है कि मनुष्य जो कार्य राजकीय पर- वानगीके बिना ही करते हैं, उससे उनकी हानि होती है, एवं उस कार्य से उन को भी फला नही , मिलता है। इसी प्रकार जीव जो व्यक्ति गुस्योंकी अनुमति उपदेश आदिके विना स्वत: ही प्रत प्रहण करते हैं उनको हानि होती हैं, वे धर्म- मापन भी कर सकते हैं। एव उनको यथेट 'पलनी मिल सकता है ! क्यों कि तीर्थकर, परमेठिोके द्वारा प्रतिपादित मार्गपर गये विना धर्मका समीचीन फल नहीं मिल सकता है ।। ७२.1 Im व्यर्थ अर्थ, स्यास्वेश्चार्यों न धर्माय न, भोगाय मनागपि ।' यस्य राजीरन व्यर्थं यथा चालेय जीवनम् ॥ ७३ ॥ अर्थ-गिन पुरुषाका धन धर्मसाधन में और भोग में , तिक मात्र भी उपयुक्त नहीं होता है। उनका जीवन गधेके जीवन के समान पर्य है । ऐसा समझकर अपने धन का स कार्यमे उपयोग करो। अन्यथा ममें और तुममें कोई अतर ही नहीं रहेगा ॥ ३ ॥ नई चौराहते लोक तमस्ये जागति स्वयम् । मुक्त्वा तदैव धावन्ति न ज्ञानाश्रयत्ययम् ॥ ७ 1 दानशासने 7 अर्थ -घर पर जिस समय चोर आयें उस समय घरयाले जगते हों तो वे चोर भाग जाते हैं, चौरी नहीं करते, इसी प्रकार विवेकसे जो मनुस्य जागृत है उसे पापरूपी चोर स्पर्श नहीं करता है ॥७॥ ये'कुर्वन्ति घर्किसुसाय सततं तैराश्रयन्ति ग्रहा- स्तं मत्फोटकमक्षिकाथ चटका देशं च काका इव ।। . गौदं मकदान्यवामनिशं दातृनिमे पाचकाः । निःशंक सुदृशं च दीनमिति से मत्वा विमुञ्चति ते ॥ ७५ ॥ अर्थ-जो पुत्रप्राप्ति के लिए बलि देते हैं । तथा प्रहाका जप पूजनादिक कार्य करते हैं। ऐसे लोगोंका याचकजन आनय करते हैं। जैसे गुउका मरकोटक, मक्षिका वगैरह प्राणी आश्रय करते हैं। परंत जो पुत्रप्राप्ति के लिए बलि देना, प्रहपूजन इत्यादिक कार्य नही करते है जो निःशंक और सम्पादृष्टि है, उनका याचफ लोग भाय नहीं करते हैं । ऐसे पुरुषोंको दीन समझकर याचा त्याग करते हैं ॥७५॥ पेऽन्यद्विषः सुतमीता जीवन्ति स्वपरिग्रहे । तेषां न भूतिर्न मन स्वास्थ्यं रोगादिभिर्वथा ॥ ७६ ॥ अर्थ-जो अपने पुत्रोंके प्रति प्रीति करते हुए, दूसरों से द्वेष करते है, सदा अपने परिमाको दी संरक्षण करना चाहते हैं, उन की संपति व्पर्ष है, उनका मन मी गटिन दे । सारथ्य भी रोगादि से संयुक्त होता है अर्थात् पे सदा अस्वस्थ रहते हैं ॥ ७६ ॥ वत्तपमुक्तवचनं निशाम्प सवारमाथित्य चिरं पसंति । दैन्पं कृतं भूरि पर्यतदयों लम्पो न मोचाथितकीरवारा 195ji अर्थ-अमुक दाता दान देता है.ऐसा वचन सुनने पर पाचक उस के द्वारका भाप टेकर दीर्घ काटतफ गाधना करते गते । और जिस वस्तु को प्राति के लिए पाचमा करते हैं पर वरंतु मी । ...
भीषलक्षणविधानम् ३९७ मिली तो फेलेके फल का आश्रय छोड देनेवाले कारके समान दाताको छोड देते है ।। ७७ ॥ नो लज्जा नाभिमानो न पटुतरमत्तिनों विवेको न बंधु- नों मित्रं नाभिजातिर्न च मुकत्तबलं न व्रतं धर्मधार्न ॥ नो देवो नो गुरु! पतिरिह पितरौ नो वधू! वचोर्धा । नायव्यार्जनं यो ग्रहिल इव स तस्पांगजनस्तचित्तः ॥ ७॥ अर्थ-जो याचक जन है उनको न लज्जा है, न अभिमान है, म तीक्ष्णतर बुद्धि है, न सिधैक है, बंधु भी नहीं दे, मित्र भी नहीं है, कुलीनता नहीं है, पुण्य नहीं, व्रत नहीं, धर्मबुद्धि नहीं, देय नही, गुरु नहीं, पति, मातापिता, खी वगैरे कोई भी नहीं है । वह काम. वेदना से पीडित चित्तवाले के समान रहता है ॥ ७८ ॥ -." सांधवो दोषमायान्ति खळसंगात्मभूतकम् ।। , शुद्धान्तो दोपमायाति जारैकसहवासतः ॥ ७९ ॥ अर्य--दुष्टोंके संगसे सज्जन मी दोषको प्राप्त होते हैं । जारों के सह- वाससे शुद्ध अंतःपुरस्त्रियां भी दोष को प्राप्त होती है ।। ७९ ॥ को वा स्त्रियो वल्लभ एव धीमान्यो गाढसंगं कुरुते स एव ।। रूपं न वृत्तं न कुलं न जातिः शाकस्य चौच्छिष्टमिवासमीसन् ॥ अर्थ-जो पुरुष स्त्रीको दृढसंमोग से खुष करता है, उसी के ऊपर, यह प्रेम करती है । वही उसका वल्लभ है। स्त्रिया रूप, चारित्र, कुल तथा मातीका विचार नहीं करती है । जैसे कोई दीन पुरुफ झूठे शासका विचार नहीं करता हुआ उसको लेता है । उसी तरह अयोग्य' खिया अयोग्य पुरुषको भी अपना वल्लम समझती है ॥ ८ ॥ दे लौफिक उत्साही ये विघ्नं कुर्वते यदि ॥ , देशगेई वरक्षोभो मृत्युी सर्वया भवेत् ।। ८१ ॥ अर्थ--जो व्यक्ति दैव कार्यमें व लौकिक फार्म में विप्न उपस्थित ३२८ । दानशासन - ॥ .. में - । 1 *- - करता है, उसके फच्से देशमें, घर पर क्षोभ उत्पन्न होता है, कदा- चित् मरण भी होता है ।। ८१ ॥ बद्धगाध्योऽन्यरभ्रेण पुलक्ष्म स्थान चकचित् ।। महादोषान्वितो जीवः पुण्यळ-माविमुचति ।।१२॥1 अर्थ जी और मनुष्य हमेशा दुसरेके दोष देखने में सरपर रहता है, उसको पुरुषका चिह प्राप्त नही होगा अर्थात् यई प्रति जन्म खा तथा नपुमक अवस्थाको प्राप्त होगा। स्वय बहुत दोषी होने से पवित्र चिह्न उस को छोट देते ॥ ८२ ॥ देवस्थानपुरेशत्व वंशपुष्पादिमर्दनम् । पापापकीर्तिमभावगुणत्रनवर्धनम् ॥ ८३ ॥ अर्थ-देवस्थानद्रोड, राजगह, यशकी पुण्यानि, पाप, अप- कीर्ति, आदि दुर्गुणों की वृद्धि को मनुष्य कभी न करे ।। ८३ ॥ देवस्थानग्रामवमादिपप नो सत्पुण्यस्यास्ति तन्मुक्तिरन्यै ।। नो चत्तास्या द्विरिवतिरेपु स्वस्यापि स्थानत्रयस्यापिनाशा अर्थ- पुष्पहीन प्राणीको देवस्थानात प, विषय 'पादि प्रत नही हो सकते है। हो सो मी दुसरे उसे डायेंगे, गदि नहीं छुडा ता दो तीन याम अपना प अपने स्थानत्रयका नारा होता है। सदृष्टिसत्कारमह वर्गमीत्युपत्या पुनस्तं न परोत्युदास्ते । यः सोऽप्पदहुम्लहानेः शिश्नाति चारमीयधनानि दत्वा । अर्थ-सम्पादृष्टी जीयोंकः स कार में परगा, इस प्रकार पचना देकर जो अक्षा फरता, उसे धनय । नास साद, हि मी होती है, धन की देकर गीत गउटा॥८५॥ क्षेत्राणि सप्तशतिनो अधिन शन्ति । तपास्तकिमना न विरति गैदए ।
मावलक्षणविधानम् सज्जन . शूद्रो गृह स्पृशति संविशति मदोपो। दोषा भवेयुरनिशं विविधः क्षयः स्यात् ॥८६॥ अर्थ-जो धनिक लोग मम क्षेत्रों में दान देते नही, उनके गेहको इतना अपवित्रा समझना चाहिए कि सूतको लोग भी उनके घर में प्रवेश करने से अधिक अपवित्र होंगे। ऐमे धनिकॉफे घर में यदि शूद प्रवेश करे तो भधिक ही दोष प्रविध होते है और ये धनिकों के घर नष्ट होते हैं ॥८६॥ ये सूतफिजनाश्च स्युः कृतिनो न स्पृशंति ते । कुलीमा अपि जायन्ते सद्वृत्ताः शीलशाकिनः ॥ ८७ ॥ 'अर्थ--जो सूतको जन पुण्यक्षेत्रका स्पर्श नहीं करते थे , कुलीन, सध्चारित्र, शीलवान होते हैं ॥ ८ ॥ पूजाके नामसे द्रव्यापहरणका दोप जिनपूजार्यमाहृत्य निष्फलो यत्कृतोद्यमः । अस्पृष्ट्या जिनपूजार्थमिष्टार्थः स्यात्कृतोपमः ।! ८८ ॥.. अर्थ- जिनपूनाके नामसे जो दूसरोंके द्रव्यको अपहरण करमे के लिए प्रयत्न करता है उससे कोई अच्छा फल नहीं मिल सकता है। क्षच्छे मावसे यदि जिनपूजाफे लिए प्रयत्न करके जिनपूजा न कर सके तो मी श्रावक इष्टा को प्राप्त करता है |॥ ८८॥ पुण्यायुषां विषाहारः परश्वधयतीव भोः। धार्यः कृतिनां सद्यो दण्डं फ्लैशं करोति सः ॥ ८९॥ . अर्थ-जिनका आयुष्य दानादि कृत्योंके करनेसे परित्रहोगया है ऐसे धनिक लोग, यदि धर्मके लिए जिसका उपयोग करना है ऐसे धनका उपयोग स्वार्थ के लिए फरेंगे तो उनका यह अफस कुल्हाडीके समान उनका नाश करेगा । अर्थात् देवद्रव्य खामेसे नरकादि दुर्गति की प्राति होती है ।। ८९॥
दानशासनम् - स्वाम्यादिद्रव्यापहरणफल. पंचना स्वामिदेवार्थे पित्राद्यर्थे करोति यः ।, सोऽसाध्यक्षयरोगीय क्रमान्मुंचति जीवनम् ॥९॥ अर्थ-स्वामिद्रम्प, देवदन्य, पित्तद्रव्य आदि में जो ठगता है पर असाध्य क्षयरोगी के समान कष्ट भोगकर क्रमसे जीवनको छोडता है अर्थात् मरता है ॥ ९० ॥ पानफे यहानेसे द्रव्यापहरणफल यः परद्रव्यमाहुत्य पात्रव्याजाच्च जीवति । इहामुत्र स जीवः स्यादिष्टिकारी यया ननः ॥ ९१ ॥ :: अर्थ-जो पात्रके बहाने से दूसरोके द्रव्यको अपहरण कर जीता है; वह इस्लोक व परलोक में एक मजूर के समान .' दुःखी जीवनको ज्यसीत करता है ॥ ११ ॥ पुण्यवान् को पापकर्म आराय नहीं करते हैं। भूचित्वतः सर्वशुभोदयः स्यादनिष्टफर्माणि न घाश्रयति ।। मुगंधिगेहं न विशंति फोटास्ततः कृतिज्ञाः शुचिता लभरन् । अर्थ-परिणामकी विशुद्धि से पुण्यकर्मका उदय होता है जिससे कि अशुभकर्म उस मनुष्य का आश्रय नहीं करते हैं । जिस प्रकार कि सुगंधि ( औषधविशेप, धर्मामा ) के घर में कोई कीटक रोगादिक प्रदा नहीं करते। इसलिए यता पुरुपोंको परिणाम में निर्मलताको प्राप्त करना चाहिए ॥ १२ ॥ अनुभपरिणामसे पापासव अनुचित्वं फरोत्पपाशुभकर्मासचे सदा । दुर्गघिमंदिरं पाटाः भविशति यथा तया ॥ ९ ॥ मध-परिणाम की शुभता सदा मम कर्मातको करती। 40 भावलक्षणविधानम् जिस प्रकार कि दुगंधयुक्त घरें आदि में कोडे आदि प्रवेश करते हैं उसी प्रकार अशुभपरिणामसे अशुम कर्म आते हैं ॥ २३ ॥ जैनमुनियों के समाधिभंगफल जिनमुनिसमाधिसमये चित्तनिरोधं करोति यस्तस्य । गेहपुरदेशनाशः स्वस्थानोच्चाटनं भवेनियमात् ॥ ९४ ॥ अर्थ--जैन मुनियोंकी समाधि के समय में जो व्यकि उनके चित्तमें क्षोम उत्पन्न करता है, उसका घर, नगर, देश आदिका नाश होता है, इतना ही नहीं अपने स्थानका उच्चाटन होता है ।। ९४ ॥ पापभीर गुरुजनोंके ससानपर नहीं भेटते आसने यत्र तिष्ठन्ति राजानो गुरयो युधाः ।। सत्र समासने जैना न सन्त्ययभीरवः ॥ ९५ ॥ अर्थ-जिस आसनपर राजा, गुरु व विद्वान् विराजमान होते है, उस आसन पर पापभीर जैन कभी नहीं बैठते है ॥ ९५॥ विदुपा गुरुणा राका साकमेकासने युधाः । तत्तुल्यधर्मरहिता न तिष्ठेयुः कदाचन ॥ १६ ॥ अर्थ-विद्वान, गुरु, प रामाके भारानपर उनके समान गुणोसे विरहित सामान्यजनोंको कभी न बैठना चाहिए ।।९६ ॥ . सरजन पापकार्यको त्याग दें त्पक्त्वाऽस्तेऽन्नमजीर्ण वा सन्निपाते च कामिनीम् ॥ : कृतीय पापकृत्यानि कपायानिव पुण्यवान् ॥ ९७ ॥ अर्थ-जिस प्रकार अजीर्ण होनेपर अन्नका, सन्निपात होनेपर त्रीका, 'पुण्ययान् व्यक्ति कपायोंका त्याग करता है उसी प्रकार सम्ज- नोंको पापकार्योका त्याग करना चाहिए ॥ १७ ॥ .
दानशासनम् -- है -- . तपश्चरणसे सुख नानकक्षणसन्निभैकजनने वाजं ? विनान्तर्बहि-। ग्रन्थं सीपमं विहाय तपसि क्षान्तः कषायोज्झितः । यो वर्तेत मुनिः स चापरिमितं काळे प्रयास विना । स्वर्गे सौख्यफरं मुखं त्वनुभवेबुदैव कुर्यासपः ॥ ९८॥ अर्थ-अत्यंत चंचल, नश्वर इस अंतरंग म बहिरंग परिमहको स्याग कर जो व्यक्ति उत्तमक्षमादिगुणोंको धारणकर, कपायोंका परित्याग कर तपश्चर्या में लीन रहता है । यह मुनि अपरिमितकाल, पर्यंत स्यगायमुखका अनुभव करता है । इस प्रकार नामकर शुद अंतःकरणसे तपश्चर्या करनी चाहिए ॥ ९८॥ उकंध-क्षणेकनिभमेफजन्मनि विनानमेवाखिलं । परिग्रहमिमं विहाय फरणत्रयाधिर्मले ।। लसत्तपसि वर्ततेऽपरिमितं च कालं मुखं । सदानुभवितुं भवेदिह विना प्रयास क्षमः ॥ ९९ ।। अर्थ-कहा भी है, क्षणभर मी जिसका भरोसा नहीं है, ऐसे परिमहको त्यागकर मन पचन कायको विशुद्धि से जो तपक्षयों करता है वह अपरिमित कालसक मुखको विना श्रमके ६ अनुभव करता है अर्थात् मोक्षलश्माको पाता है ॥९॥ भारणके भनुसार पाल मत्वा जनानाविशारदजनान् दत्वा घसंभ्यो पन । विस्मृत्पात्पगुणाय चतसि च तदोपान स्मरन्सा जनाः॥ शंसन्तागं नमन्ति घरमै काछ प पापोदया-1 द्वघोऽयं धि पातको नट इमानन्ति निदन्ति च ॥१०... अर्थ-जोमायोजन-पान गोंका सम्मान करके पन देने भावलक्षणविधानम् . परंतु उनके गुणोंको भूलकर उनके दोषोंका स्मरण करते रहते हैं। तथा उगको प्रत्यक्ष नमस्कार कर परोक्षमें उनकी निंदा करते है-ऐसे. लोगों को जो कर्मबंध होता है उसका उदय होनेपर चे मी प्रत्यक्षमें पूज्य होते हैं परंतु परोक्षनिंदाके पात्र बनते हैं। अर्थात् उनकी प्रत्यक्ष तो स्तुति होती है परंतु परोक्षमें लोग उनकी बुराई करते है। जैसा जो. आचरण करेगा पैसा फल मिलता है, यह इस लोकमा अभिप्राय समझना चाहिये ।। १०० ॥ स्वक्षेत्राको छोडनेयाला गापी है स्वकीपमुक्षेप्रयुगं विहाय दुःक्षेप्रयुग्मेऽपि च पर्तते यः। शहापात्रात्महित मुत्तं (ख) न कभेत धर्म स च पापवान् भषत् ।। अर्थ-जो व्यक्ति अपने सच्चे देव गुरुयोंकि क्षेत्रको होडकर दूसरोंके मिथ्याक्षेत्रों में प्रवृत्ति करते है थे इहपरमें मुखको , प्राप्त नहीं कर सकते, उनके हाथसे धर्माधरण भी नहीं हो सकी है, वह पापी है॥१०१॥ मातापितादिकोंकी निंदाका फल मातापिनीरुदास्ते यो धर्म संघे जिने गुरी। सोऽरिभिः स्वैः परनित्यं भवेद्वध्यो भवे भवे ॥ १०२॥. अर्थ-जो माता, पिता, धर्म, संघ, जिनदैम व गुरु आदिको भवहेलना या उपेक्षा करता है, यह भयभयमें शत्रुओंके द्वारा मारा नाता है। और सदा कष्टका अनुभव करता है॥ १० ॥ स्वदन्यफो छोडकर परद्रव्यका अपहरण न करें यत्पापागमने यदर्जितमिदं हस्तागर्न स्वं धनं । सर्व नश्पति तत्क्षणे परधनं राज्ञाहृतं सर्वदा ।। सर्वे ते युध पंचयन्ति च परः लिइनाति वित्त मवान् । क्लेशं मा कुरु मा स्पृशान्यधनमात्मद्रव्यतो जीन भी... .
३३४ दानशासनमें । . अर्थ-जिस समय पापफा उदय होता है, उस समय मनुष्य के द्वारा अर्जित व अपने पासमें स्थित धनफा नाश होता है। सर्व मनुष्य उसे ठगनेका प्रयत्न करते हैं। जिसका धन नष्ट होता है यह मनमें दुःखी होता है। ऐसे जीवोंको आचार्य उपदेश देते हैं कि भो भोले भाले जीव ! अपने मनमें दुःखी मत होवो, अपने द्रव्यसे भिम दूसरोंके - धनको स्पर्श मत करो । क्यों कि स्वतः के धन के नष्ट होने.. फा कारण ही यह है कि तुमने पूर्वमें परद्रव्य का अपहरण किया है अतः पुनः उस पापको मत करो ॥ १०३ ॥ देवव्यापहरणनिषेध येन द्रव्यमिहाहतं मिनपतेस्तस्यापि हस्तागतं : ॥ . दाय दायमि (म) येत् पुरो न लभते पाया भवेत्स्थापितम् ।। निद्रव्याकुरुते धनव्ययकरान्कृप्यादिकानुधर्मा- । स्तन श्रीपति चंद्विरिक्त इव चास्पृश्वाऽईत जीव भो॥१०४॥ अर्थ-जिसने देवदव्यका अपहरण किया, उसुकै हाथमें भाया हुआ धन भी नष्ट होता है, आगे नहीं मिलता है, फहींगाढकर रखे तो यह भी नहीं मिलता है, अदृश्य होता है । निर्धनी होनेसे वह खेती आदि उद्योगको फरता है । तथानि धनफे बिना उसमें भी कोई उपयोग नहीं होता है । अतएव हे जीव ! देवरव्यको पक्ष मत करं ॥ १०४.॥ देयगव्यादिमे या नहीं करें मनोचपुर्वाग्गृहवप्रविधिरोधर्मपां मुगादिकाना । फरोति यस्तस्य मिनार्थकेया नस्त्र प्रतिऽियविवृदिरेव ॥ अर्थ-जो व्यक्ति मन, वचन, काप य अपनी प्रतिसे पट साधर्मि सननोंका विरोध करता है यं यःम्पसे ही करता है, उससे उसकी हानि होता है। पाक्षि दोला, विशेष क्या! कदाचित् गाण रोता है ॥ १०५ ।। A . - .
भावलक्षणविधानम् . ९. देपद्रव्यापहरणका प्रत्यक्षफल देवावन्यपनाहृतेः परपुर मृत्युं गताक्रंदनात् । स्वारासे शपनाद्विवादकरणादुल्लंध्य शक्ति निजाम् ।। वृत्तेः पापचरित्रतः परिणताद्वक्रारंपायोग्रतो । मित्रद्रोहमुखात्स्वपुण्यकुलसद्भार्यायुरादिक्षयः ॥ १०६ ॥ अर्थ-देवव्यादि परदव्यके अपहरण करनेसे देखा गया है कि दूसरे स्थानमें ही, उसका मरण होता है, उसके घरपर रोते ही रहते हैं। दूसरोंको गाली देना, दूसरों के साथ झगडा करना, अपनी शक्तिको उल्लंघन कर वृत्ति रखना, पापाचरणमें मग्न होना; कपायकी उप्रताको धारण करना, मित्रद्रोइ फरना आदि बातोस पुण्य, पुल, सद्भार्या व आयु आदिका क्षय होता है ॥ १०६ ॥ हिंसा मा कुरु माऽनृतं वद चुरां मुञ्चाङ्गना मा स्पृश ।। कांक्षा मा कुरु जैनमार्गनिजसप्तक्षेत्रभुक्तिं कुरु । दुष्ट स्वामिनि सेवके शंपति च नुध्यत्यलं जीव भो। मौनीभूय निवर्त्य गच्छति यथा पुण्याय तिष्ठ समी ॥१०७॥ अर्थ-हे जीव ! हिंसा मतकर, झूठ मत बोलो, चोरी नहीं करो, नियोको-स्पर्श मत कर, परिग्रहोंकी अभिलाषाका परित्याग कर, जैन मार्ग से अपने मप्तक्षेत्रोंका अनुभव कर । जिस प्रकार दुष्ट स्वामी होने पर सेवकके ऊपर अत्यधिक क्रोधित होता है, माली देता है, परंतु शिष्ट सेवक पुण्य के लिए क्षमा धारण कर मौनसे जाता है, इसी प्रकार कर्मके परतंत्रता से तुम्हारे लिए कष्ट होनेपर मी फ्यायोद्रिक न होकर उदासीगसे अनुभव करो। तुम्हारा भला होगा । १०७.॥ संसारे दुःखमीणां केषायस्ति विशोधनम् । यद्रेदमधिगम्याहं तद्बवीम्यागमोक्तितः ।। १०८॥ . .. .
वानशासनम् . PATA . ॥ " अर्थ-संसारमें दुःख मीरुवोंकी विशुद्धि. किस प्रकार होती है । उन के भेदको मैं जानकर आगमानुसार कथन करूंगा ॥ १०८॥ !! . • जिनधर्म के अपवादको दूर करें यथागमं यथाकालं यथाशक्ति यथोचितम् । 5. • भूपाः प्रजागःशान्त्यर्थ दंड स्वीकुर्वते यथा ॥१०९॥ . जिनधर्मापवादांश्च दृष्ट्वा श्रुत्वाऽयभीरवः॥ श्रुतेहि कुर्युः संशुद्धि तारतम्येन सर्वथा ॥ ११०॥ अर्थ-जिस प्रकार राजा यथागम, यथाकाल, यथाशक्ति, यथा उचित भादि बातोंको चिनार कर प्रजावोंके पापकी शांति के लिए दंड विधानको स्वीकार करते। उसी प्रकार पापभीरू साजन जिनधर्मके अपवादों को देखकर अथवा मुनकर तारतम्यसे शास्त्रोक्तविधि से उसका शोधन फरें ॥ १०९ ११० ॥ अविभक्तोंकी शुद्धि एफैनर कृतें दोपे सर्वेपामविभागिनाम् । 'शुद्ध सम्बन्धिनां सर्वशुद्धिः स्यादेकशदितः ।। १११ ॥ अर्थ-कहीं कहीं एक व्यक्ति के दोषसे उनके सापं रहनेवाले अनेक वक्तियोंको दोष लगता है। इसलिए उस महापातको एक व्यक्तिको शुद्धि होनेपर सपका शोधन हो सकता है। यह भविमकोक टिए नियम है ॥ १११॥ विभकी शुद्धि विभक्तानां तु सपामन्तरेफनापतः ।। शुद्धिः स्पात्तस्य नान्येपासूढ़कन्या पतफात् ॥ ११२ ॥ अर्थ-विमोंके लिए सबका भिम २ पसे दी शोधन दोना चाहिये । अर्थात् जिसने पातक किया है उसीका सोधन हो दुमरों को नापकता नही३॥१२॥ . .
भामन्यविधानम् --- 3 न तत्संबंधिना-चोपो न धिक्कारोऽधने धनि । धनिसंबंधिनामंतस्तष कुवाद्विशोधनम् ॥ ११३ ॥ अर्थ-कोई गरीब पुरुषने पाप किय हो तो उसके संबंधीजनोंको सहकारी न होमेसे प्रायचिन ग्रहण करनेकी जबरत नहीं है। वह अकेला ही पापका प्रायश्चित्त करे । परंतु धन के सहायकोंने यदि पाप किया होतो धनी और उसके सहायकों को भी प्रायश्चित्त लेना आवश्यक है ।। ११३ ॥ कार्येण धर्मेण कुलेन वृत्तात्संबंधहीनाय जनाय वित्तम् । दः स्वकीय प्रतिभूरिवार्या जैनस्य दोषोपशमाय दाः ॥ ११४॥ अर्थ-कार्यसे, धर्मसे, कुलसे, चारित्रसे जो व्यक्ति पतित है, उसे अपने द्रन्यको देनेसे विशिय दोष लगता है, लोग उस क्रियाको अच्छी नजरसे ना देखते हैं। किसी साधर्मी सजनके दोपके उपसमके लिए द्रव्यका प्रदान करना चाहिये ॥ ११ ॥ राजापराधिपनु परिख भृत्यां- श्छेतुं शिरः पंधि च गच्छत एव दृष्ट्वा । दत्वां धनं सलु विमोचयत्तीव लोको जैनांचितापशमनाय धनानि दाः ॥ ११५॥ अर्थ-- अपराधी मनुष्य के छेदन करनेके लिए गजाको आज्ञा हुई तो सेवकजन उसे पकंडकर लेजाते हैं, उस मार्गमें कोई दयालु उसे देखता है तो धन देकर उसे छुडाने के लिए प्रयान करता है । उसी प्रकार अपने साधर्मियों के द्वारा अर्जितपापके शमने के लिए पनका व्यये करना चाहिये ।। ११५॥::: एके पं धनं धान्यं गां क्षेत्रं कोहलादिकम् । दत्वैवात्मपुराविष्टाजनान् पाति जिनाग्रितान् ॥ ११६ ॥ - ३३८. दानशासमम्: . अर्थ-कोई.२ धर्म, धन, धान्य, गाय, क्षेत्र गाजे बाजे आदिको प्रदान कर अपने नगरमें आये हुए साधर्मी भाईयोंका स्वागत करते हैं। [ यह स्तुत्य है ] || ११६ ॥ यावत्सूतकममस्ति तावदपि संशुद्धिर्जनानां विधि-। जनानामिह दुम॒तो सुखमृती सा स्थायथाशक्ति च । मुख्यानां गुरुभूपधार्मिकसनां शुद्धिजिनार्यादिभिः कार्या शासन वत्सलैरिव जनभूपाय दत्तं धनम् ॥११॥ अर्थ-लोक 4 शास्त्रको विधि है कि जिस प्रकार का सूतक है. उस प्रकारका शुद्धिविधान भी होना चाहिये । किसीका मरण दुर्मरण होता है, किसीका मरण सुखसमाधिपूर्वक होता है । इन सब बातोंको जानकर यथाशक्ति शुद्धि करनी चाहिये । मुख्य गुरु राजा व धार्मिक जनोंकी शुद्धि निनपूजादिकोंसे होनी चाहिये । जिस प्रकार राजाके लिए धन दिया जाता है, उसी प्रकार ऐसे समय धर्मयासलोंके द्वारा शुद्धिविधानका होना आवश्यक है ॥ ११७ ।। मुनिसत्साधुरामसदृग्वतिकादिननस्य च।.. धर्मोद्धारकरस्यापि दुर्मूतों सन्मृतावपि ॥ ११८॥ जिनभक्ताय यावन्तस्तावन्तः पुरुषाः सपा ! तद्दोपोपशमायैव शुद्धिमिति सर्वया ॥ ११९ ॥ पासनतर गुगलम्। अर्थ:---मुनि, आचार्य, सम्यग्दृषि, मतिक व धर्मोदारक आदि के दुर्मरण या सन्मरण होनेपर जितने जिनमक - सर्व समानरूप से उस दोष के उपशमके लिए शोधन करें ।। १२.१ . उऊंच-सर्वपामपिमागिनामभिहिसा दिविभकामना.1. नोटापा दुहितुर्गपा पिर मोऽप्यर्थी च. कारपेन् । .. .
भावलक्षणविधानम्
३३१
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हिंसादुर्घतिपणे च महतां धर्मापफी मां।
साकेत पतितेऽप्यति च यथा सा स्यायथाशक्तित:१२०
अर्थ--जो भव्य अविभक्त है उन सर्व को शुद्धि कही है । परंतु
वे अविभक्त नहीं हो तो उन को शुद्धि नहीं है। जिस कन्याका विवाह
हो गया है वह भिनगोत्रा हो जाने से उसके पितादिफ जैसे दोप
शुद्धिके लिए योग्य है वैसी वह नहीं है । हिंसा, दुर्मरण, दृषण लगाना,
धर्म की निंदा करना, पर्यतादिकसे गिरफर पडना इत्यादिक पातक हो
जाने पर यथाशक्ति शुदि प्रहण करके पाप से मुक्त होना चाहिए।
विमोचयन् रोगमरंभिषायथा विमांचयन् दैन्यमरं न्यो यथा ।
मृते च बंधावमुखोपशांतये यथातिदुरवं स्वजनेन मांचयन्।।१२१
अर्थ-जिस प्रकार वैध रोगको छुडाता है, राजा दीनता को
'छुडाता है, उसी प्रकार किसी बंधुका मरण होनेपर अपने । कुटुंपियोंफे
दुःखकी उपशांति के लिए उग के दुःस को दूर करते हुए शुद्धि वि-
धान करना चाहिए ॥ १२१ ॥
धनका उपयोग
नृपोऽनितार्थ निजसैन्यपुष्टये यथा प्रजार्थो नृपवप्रकर्मणे ।
निमाश्रिता नजनाघशांतये ददाति सर्वच धनं तथा जनः॥१२२
जिस प्रकार राजा द्वारा संचित धग अपनी सेनाके पोपणके लिए
है। प्रजायोंका धन राजाके संरक्षणके लिए है। उसी प्रकार जिनभक
जीवोंका धन साधमा भाईयों के पाएकी अशांति के लिए उपयोगमें आना
चाहिये । उसी प्रकारके कार्यो, सज्जन अपने धनको देते हैं ॥१२२॥
शुद्धिविधान
अनुकंपैकं रुपयति गईंकं गुरुदयैकमिति दोषस्य ।
निजगुरुदतमतधृतिरेकं भागं ततोऽतिनिर्दोषशः स्युः ॥१२॥
दानशासमा A है अर्थ-किसीर दोषको अनुकंपा ही दूर कर देती है, किसीकी शु गईगासे होता है, किसी दोषको शुद्धि अपने गुरुके द्वारा दिए हुए व के पालनसे होती है। दोष तारतम्यसे अद्धिविधानमें मो तारतम्य यदि अल्पदोष हुआ तो न्यात व अधिक दोष हुआ तो समस्त शुद्धि विधान भदोंका उपयोग करना चाहिये ॥ १२३ ॥ शाकेऽन्दे त्रियुगानिशीत्तगुयुत्तेऽतीत विषावत्सर । माय मासि च शुक्लपक्षदशमे श्रीवासुपूज्यर्पिमा । पोक्त पावनदानशासनमिदं ज्ञात्वा हितं कुर्वतां । दानं स्वर्णपरीक्षका इव सदा पात्रत्रये धार्मिकाः॥१२॥ अर्थ-श्री रामपूज्य पिने यह दानशासन नामका पविन शाख शालिवाहन शक १३४३ विपु संवत्सरके माघ शुद्ध दशम के दिन रचा। इस मंथका अभिप्राय जानफर भन्यजीष अपना हित करें। सुवर्ण परीक्षक जैसे सवा सोना प्रहण करते उसी तरह धार्मिक लोग इस ग्रंथसे ज्ञान प्राप्त कर तीन प्रकारके सत्पात्रों को दान देथे व वपना हित करें ॥ १२॥ e ॐ भद्रं भूयात् ।