Agarchand Bhairondan Sethiya Jain Parmarthik Sanstha, Bikaner
Lathisahita
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माणिकचन्द दिगम्बर जैनप्रन्थमालायाः पदिशतितमो प्रन्यः । ॐ श्रीमद्राजमलविरचिता लाटीसंहिता। साहित्यरत्न पण्डित दरवारीलाल न्यायनीषण सम्पादिता संशोधिताप। प्रकाशिका- धीमाणिकचन्द-दिगम्पर जन- ग्रन्थमाला-समितिः।। finiनमाणस.२० ..... अपमानित tষমা । - प्रकाशक नाथूराम प्रेमी, मन्त्री,- श्रीमाणिकचन्द-दिगम्बर- जैनग्रन्थमालासमिति, हीराबाग, पो० गिरगांव-बम्बई।
RAPRATA
सुप्रसिद्ध शानदानी,
जिनवाणीभक्त,
श्रीमान् लाला उम्मेदसिंह मुसद्दीलालजी
अमृतसरनिवासीकी
स्वर्गीया साध्वी धर्मपत्नीके
स्मरणार्थ।
AFESe
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ग्रन्थकर्ताका परिचय। "कवि राजमल्ल इस ग्रन्थके रचयिताके विषयमें इस प्रन्यसे और इसकी प्रशस्तिसे बहुत कुछ परिचय मिल जाता है अनुमान है कि पचाध्यायी भी इन्हीं की बनाई हुई है। इसके विषयम प्रसिद्ध साहित्यसेवी ५० जुगलकिशोरजी मुग्तारने एक लेस 'धीर नामक पत्रके वर्ष ३ अंक १२-१३ में प्रकाशित कराया है, उसकी हम यहाँ उपधृत कर देना आवश्यक समझते हैं। और पंचाध्यायी। जेन प्रन्थोंमें 'पञ्चान्यायी' नामका एक प्रसिद्ध मन्य है । यह महत्वपूर्ण पन्थ, आजसे २० वर्ष पहले प्रायः अप्रसिद्ध था-कोलापुर, अजमेर आदिके कुछ घोड़ेसेही मटारोंमें पाया जाता था और बहुत ही कम विद्वान इससे परिचित थे। शक संवत् १८२८ (वि० सं० १९६३) में गांधी नाथारंगनीने इसे कोल्हापुरके 'जैनेन्द्र मुद्रणालय में छपाकर प्रकाशित किया, तभीसे यह अन्य विद्वानोंके विशेष परिचयमें आया, विदर्य पं.गोपालदासनीने इसे अपने शिष्यों को पाया, मसनलाट- जीने इसपर भाषाटीका लिसी, और इस तरह पर समाजमें इसका प्रचार उत्तरोत्तर बड़ा । अपने नाम परसे-अन्य के आदिमें मलपदमें प्रयुक्त. हुए पंचाध्यायावय। इस विशेषण पद परसभी-यह अन्य पाँच अध्यायोंका समुदाय जान पड़ता है । परन्तु इसवन जितना उपटप है उसे अधिक से अधिक है। अध्यायके सब कह सकते है, और यह भी सकता है कि यह एक अध्याय भी पूरा नरोक्योंकि मन्यमें आया- विभागको लिये हुए कोई सन्धि नहीं है और न पांचों आया मोकोही पपित किया है। गुरमें 'पसामान्यनिरुपण' नामका एक प्रकरण प्रायः ७७० श्लोकोंमें समाप्त किया गया है, उसे यदि एक अध्याय माना जाय तो यह अन्य डेद अध्यायके करीब है और यदि अध्यायका एक अंश (प्रकरण ) माना जाय तो इसे एक अन्यायसे भी कम समझना चाहिये । बहुत करके वह प्रकरण अन्यायका एक अश ही जान पड़ता है, दूसरा-न्यनिशेषनिरूपण नामका-अंश उसके आगे प्रारम्भ किया गया है जो, ११४५ श्लोकोंके करीब होनेपर भी अधूरा है । परन्तु वह आय प्रकरण एक अंश हो या पूरा अध्याय हो- कुछ भी सही-इसमें सन्देह नहीं कि प्रकृत अन्य अधूरा है-उसमें पांच अन्याय नहीं है और इसका कारण ग्रन्थकारका उसे पूरा न कर सकना ही जान पड़ता है । मालूम होता है ग्रन्यकार महोदय इसे लिखते हुए अकालमें ही कालके गालमें चले गये हैं और इसीसे यह ग्रंथ अपनी वर्तमान स्थितिम पाया जाता है-उसपर प्रत्यकारका नाम तक भी उपलब्ध नहीं होता । अस्तु; जबसे यह अन्य प्रकट हुआ है तबसे जनना इस बातके जानने के लिये बराबर उत्कंडित है कि यह अन्य कौनसे आचार्य अथवा विद्वानका बनाया हुआ है और का बना है । परन्तु विद्वान लोग अभीतक इस विषयका कोई ठीक निर्णय नहीं कर सके और इसलिये जनता बराबर अँधेरे में ही चली जाती है। अन्यकी प्रौढता, युक्तिवादिता और विषय प्रतिपादन-कुशलताको देखते हुए, कुछ विद्वानों का इस विषयमें ऐसा सयाल रहा है कि यह मन्य शायद पुरुषार्थ- मिदयुपायादि पन्या कर्ता श्रीअमृतचन्द्राचार्यका बनाया हुभा पं. मसनलाटनी शाम्रीने तो इसपर अपना पूरा विश्वास ही प्रकट कर दिया और पंचाध्यापी-गावाटीका-ची मानी भूमिका लिस दिया "चा-यायीक कर्ता अनेकान्तप्रधानी माचार्यय अमृतपन्द्र सरि ही ४।" पानु वाम्नमें बात ऐमी नहीं है, और न अमृत चन्द्राचार्यको मन्थका कतां मानने के लिये की युनियन अधया समपं कारण है। पीत होता है । यह अन्य अमृतचन्दाचार्यमें बहुत पीका-शताभियो बादामना हुआ है और इसके इता, सोन करनेपर, 'कवि पाममा ' । .
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- किसी तरह पर मी क्षेपकवादको मिठाई हुई नहीं हो सकती, क्योंकि अन्धकारने अगले ही पयमें उसके उद्धरणको स्वयं स्वीकार तथा पारित किया है और वह पय इस प्रकार है:- उक्तगाथार्थसूत्रेऽपि प्रशमादिचतुष्टयम् । नातिरिक्तं यतोऽत्यत्र लक्षणस्योपलभणम् ।। ४६७ ।। इस पद्यपरमे यह स्पष्ट जाना जाता है कि प्रत्यकारने उक्त गापाको उधृत करके उसे अपने ग्रन्थका एक अंग बनाया है और उसके विषयका स्पष्टीकरण करने अथवा अपने कथनके माश उसके कथनका सामंजस्य स्थापित करनेका यहींसे उपक्रम किया है-अगले कई पयोमें इसी विषयकी चर्चा कीगई है-फिर उक्त गाथाको क्षेपक केसे कहा जा सकता है ? अस्तु यह तो हुआ अमृतचन्द्राचार्य द्वारा प्रकृत ग्रन्थके न रचे जाने आदि विषयक सामान्य विचार, अब ग्रन्थके वास्तविक कर्ता और उसके निमोसमयसम्बन्धी विशेष विचारको लीजिये। ऊपर यह जाहिर किया जा चुका है कि 'लाटीसंहिता' नामका मी एक ग्रंथ है । यह संस्कृत भाषामें श्रावकाचार-विषयका एक सप्तसर्गात्मक मन्थ है और इसकी पद्यसंख्या १६०० के करीब है । इस ग्रन्थ के साथ जब पचाध्यायीकी तुलनात्मक दृष्टिसे आन्तरिक जाँच की जाती है तो यह मालूम होता है कि ये दोनों ग्रन्थ एक ही विद्वानकी रचना हैं। दोनोंकी दयनशेली, लेखन-प्रणाली अथवा रचना-पद्धति एक जैसी ऊहापोहका ढंग, पदविन्यास और साहित्य मी दोनोंका समान पंचाध्यायीमें मिस प्रकार किच, ननु, अध, अपि, अर्थात, अयमर्थः, अयभावः, एक, नैवे, मवे, नाझं, न चाशदय, चेत्, नो चेत्, यतः, ततः, अत्र, तत्र, तश्या, इत्यादि शब्दोंके प्रचुर प्रयोगके साथ विषयका प्रतिपादन किया गया है, उसी तरह वह लादीसंहितामें भी पाया जाता है । संक्षेपमें, दोनों अन्य एक ही लेतनी, एक ही टाइए और एक ही टकसालके जान पड़ते हैं। इसके सिवाय, दोनों प्रन्योंमें सैकड़ों पय भी प्रायः एक ही पाये जाते हैं और उनका सलासा इस प्रकार है:- (क) टाटीसंहिताके तीसरे सर्गमें, सम्यग्दृष्टिके स्वरूपका निरूपण करते हुए, 'ननस किमतावान्। इत्यादि पर नं. ३४(मद्रितमें २७)से 'तयथा मुमासादि' इस पय ने०६०(मदिनमें५४)तक जोरपय दिये है वे वे ही हैं जो पंचाध्यायी टीकाके उत्तरार्धमें न. ३७५ से ३९९ तक और मूल प्रनिमें न०३७४से४०१तक वर्ज हैं। इसी तरह ६१ (मुदितमें५५)वें नम्बरसे १२६ मुद्रितमें ११६ नं० तक ६६ पद्य भी प्रायः वे ही है जो सटीक प्रतिमें नं०४१० से ४७६ तक और मूल प्रतिमें ४१२ से ४७९ तक पाये जाते हैं। हाँ. 'अथानुरागशब्दस्य' नामका पय नं. ४३५ (४३७) पंचाध्यायीमें अधिक है । हो सकता है कि यह लेखकोंसे छूट गया हो, लाटीसंहिताके निर्माण-समय उसकी रचना ही न हुई हो या पन्थकारने उसे लाटीसंहितामें देनेशी जरूरत ही न समझी हो। इनके सिवाय, इसी सर्गमें, नं० १६१ मुद्रितमें १५२ से १८२ मुदितमें १०३ तक के २२ पत्र और भी हैं जो पंचाध्यायी (उत्तगई) के ७२१ (७२५) से ७४२ (७५६) नम्बर तक के पदोंके माथ एकता रखते हैं। (स) टाटीसंहिताका चौथा सर्ग, जो आशीर्वाद के बाद 'ननु सुदर्श- नस्यैतत् । पसे प्रारम्भ होकर 'उन प्रभावनांगोऽपि । पद्मपर समाप्त होता है, ३२३ पोंके करीबका है । इनमेंसे नीचे लिम्बे दो पोंको छोड़कर शेष सभी पद्य पंचाध्यायीके उनरार्धमें नं० ४७७ (४८०) से ७२० (७२४) और ७४३७४७) से-२१ (२५) तक प्रायः ज्योंके त्यों पाये जाते हैं:- येनांशेन ज्ञान देनांशेनास्य बन्धनं नास्ति । येनांशेन तु रागस्तेनांशेनास्य बन्धनं भवति ।। २६८ ।। येनांशेन परिनं तेनांशेनास्य धन्धनं नास्ति । येनांशेन तुरागस्तनाशनारय बन्धनं भवति ।। २६९ ॥ ये दोनों पद्य 'पुषार्थ सिद्धपाय पन्धक पद हैं और नशे मुद्दष्टिः' नामके उस पदके बाद 'उनं च। रूपमे उरत किये गये। -. --
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(११) साथ पंचापायीके कितनेही पयोंका संशोधन भी हो जाता है, जिनकी अशुद्धियोंको तीन प्रतियों परसे सुधारनेका यत्न करनेपर भी पं० मक्ख- नलालजी सुधार नहीं सके और इसलिये उन्हें गटतरूपमेंही उनकी टीका प्रस्तुत करनी पड़ी। इन पदों से कुछ पद्य नमनेके तौरपर लाटीसंहितामें दिये हुए पाठभेदको कोष्टकमें दिखलाते हुए नीचे दिये जाते हैं- द्रव्यतः क्षेत्रतश्चापि कालादपि च भावतः । नात्राणमंशतोप्यत्र कुतस्तद्धिम (भीम) हात्मनः ॥ ५३५ ।। मार्गो (ग) मोक्षस्य चारित्रं तत्सद्भक्ति (सदृरज्ञप्ति) पुरःसरम् । माधयत्यात्मसिद्ध्यर्थ साधुरन्वर्यसंज्ञकः ।। ६६७ ।। मयमांसमधुत्यागी त्यक्तोदुम्बरपचकः । नामतः पावकः क्षान्तो (ख्यातो) नान्यथापि तथा गृही ।। ७२६॥ शेपेभ्यः क्षुत्पिपासादि पीडिनेभ्योऽशुभोदयात् । दीनेभ्यो दया (ऽभय ) दानादि दातव्यं करणार्णवै ।। ३ ।। नित्ये नैमित्तिके चैवं (त्य) जिनविम्यमहोत्सवे । शैथिल्यं नैव कर्तव्यं तत्वहरताद्विशेषतः ॥ ७३६ ।। अथातद्भर्मणः पक्षे (अर्यान्नाधर्मिणः पक्षो) नावयस्य मनागपि । धर्मपभक्षतिर्यस्मादधर्मोत्कर्ष पोप (रोप) णात् ।। ८१४ ।। इन पद्यों परसे विज्ञ पाठक सहज ही में पंचाध्याय के प्रचलित अथवा मुद्रित पाटकी अशुद्धियों का कुछ अनुभव कर सकते हैं और साथ ही टीकाको देसकर यह भी मालम कर सकत है कि इन अशुद्ध पाठोपी वजहसे उममें क्या कुछ गड़बड़ी हुई है। किसी किसी पयका पाठभेद स्वयं पन्यकर्ताका किया हुआभी जान पड़ता है, जिसका एक नमूना इस प्रकार है:- उक्तं दिव्यानमत्रापि प्रसंगाद् गुरु लक्षणम् । शेष विशेषतो वक्ष्य (जयं) तत्स्वरूप जिनागमान् ॥ १४ ॥ यहां 'ये' की जगह 'शेय' पदका प्रयोग साटीसंहिता अनुकूल जान पड़ता है, क्योंकि लाटीसहितामें इसके बाद गुरुका को
(१२)
विशेष स्वरूप नहीं बतलाया गया जिनके कथनकी 'ये। पदके द्वारा
चायायीमें प्रनिशा की गई है, और न हम पदमें किमी हृदयाय या
करस्थ सरे अन्यका नाम ही लिया है जिमई साथ उस स्वरूप कपनकी
प्रतिज्ञा-सिलाको जोड़ा जा सकता । ऐसी हालतमें यहाँ प्रत्येक प्रन्यका
अपना पाठ उसके अनुकूल है और उम प्रन्यकर्ताकी ही कृति
ममझना चाहिये।
यहां नमूने के तौर पर लाटीसंहिता के कुछ ऐसे पद्य भी उचित जानकर
उत किए जाते हैं जो पाध्यायीं नहीं - -
ननु या प्रतिमा मोक्ता दर्शनाख्या तदादिमा ।
जैनानी सास्ति सर्वेषामयादग्रतिनामपि ॥ १४४ ॥
भैयं मति तथा सुर्यगुणस्थानस्य शून्यना।
नूनं प्रतिमा यस्माद् गुणे पचमक मता ॥ १४५ ॥
तृतीयसर्गः ।
ननु प्रतनिमायामेतसामायिक प्रत ।
नदेवात्र नृतीयायां प्रतिमायां तु किं पुनः ।। ४ ।।
गरी किंतु विशेषोऽस्ति मसिसः परमागमे ।
सानिधारं तु तत्ररयादत्रातीधारयनित ॥ ५॥
पिन निकालस्य नियमानास्ति देहिनां ।
अत्र त्रिकालनियमो गुनेमलगुणादियम् ॥ ६ ॥
যা য়ামণি ষাক্তা থা কবশি।
মাসিধা অশ্বানি দাদি ।
প্রয়াঙ্কা স্নিকাংরি বাসি যা।
अगवा महानिः मानापारम्प का कमा1८॥
শামসিপি যা খিসি।
प्रशान्यव विवियन्ने गायारयांना पर्याणम् ॥ ५॥
शोभतेऽतीय संस्कारात्साक्षादाकरजो मणिः । संस्कृतानि प्रतान्यव निर्जगहेतवस्तथा ॥१०॥ सप्तमसर्ग। सारी लाटीसंहिता इसी प्रकारके उहापोहात्मक पद्यासे भरी हुई है। यहां विस्तारमयसे सिर्फ थोड़े ही पय उद्धृत किए गये हैं। इन पयोपरसे विश पाठक लाटी सहिताकी कथनशैली और उसके साहित्य आदिका अच्छा अनुभव प्राप्त कानके लिये बहुत कुछ समर्थ हो सकते हैं, और पञ्चाध्यायीके साथ तुलना करनेपर उन्हें यह मालूम हो सकता है कि दोनों मन्य एक ही लेखनीसं निकले हुए है और उनका टाइप भी एक है। पश्चाध्यायीके शुरुमें मंगलाचरण और अन्य करने की प्रतिज्ञारूपस जो चार पद्य दिये है वे इस प्रकार हैं:- पंचाध्यायावयवं मम कर्तुन्थिराजमात्मषशान् । अर्थालोकनिदानं यस्य वधस्तं स्तुवे महावीरम् ॥ १॥ शेपानपि तीर्थकराननन्तमिदानह नमामि समम । धर्माचार्याध्यापकसाधुविशिष्टान्मुनीश्वरान्वन्दे ॥२॥ जीयाजैन शासनमनादिनिधनं मुवन्धमनवधम् । यदपि ष कुमतारातीनदयं धूमभ्वजोपमं दहति ॥ ३ ॥ इति वन्दितपशगुरुः कृतमगठसलियः स एप पुनः । नाम्ना पश्चाध्यायी प्रविजानीते चिकीर्पित शास्त्रम् ॥४॥ इन पोंमें क्रमश: महाधार तापकर, शेष तीर्थकर, अनन्तसिद और आचार्य, उपाध्याय तथा साधुपदसे विशिष्ट मुनीश्वरोंकी बन्दना कर जैन शासनका जयघोष दिया गया है । और फिर अपनी इस चन्दना बियाको 'महलसलिया। बतलाते हए मन्या नामोहस पूर्वक उसके रचनेकी प्रतिज्ञा की गई है। ये ही सब बातें इमी दम तथा आशय- को लिए हुए, शन्नों अथवा विशेषणादि पदोंके पुत्र हेर फेर या कमी धेशीके साथ सटी सरिता शुरुमें भी पाई जाती हैं । यथा-
तो ITAHArtinो
माया प्रनिगाकारAN Emms
अगम्य मो गानाAARTrt TRA
मनिजा-गला मोरा नामmilam is ENE
भरता पाउ उसके अनुर र गो गे माही की
माना माहिये।
यही नमूनो तौर पर माती पर भी नि आका
उवृत किए जाते. भोगापान:--
ननु या प्रतिमा नोटा नाग्या गदादिमा ।
जैनानां मास्ति मर्यगमयादग्रनिनामपि ॥ १५ ॥
भयं मनि नया सुर्यगुणम्यानम भूत्यता।
नूनं प्रतिमा यम्मा गुणे पंगम मता ॥ १४ ॥
युतीयमर्गः।
ननु प्रतप्रतिमायामेतत्सामायिकं प्रतं ।
तदेयान तृतीयायां प्रतिमायां तु किं पुनः ॥ ४॥
सत्यं किंतु विशेषोऽस्ति प्रमिः परमागमे ।
सातिचारं तु तत्रस्यादवातीचारवर्जितं ॥५॥
किं च तत्र त्रिकालस्य नियमो नास्ति देहिनां।
अत्र निकालनियमो मुनेमलगुणादिवत् ॥ ६ ॥
तत्र हेतुवशात्क्वापि कुर्यात्कुर्यान वा क्वचित् ।
सातिचारप्रतत्वाता तथापि न प्रतक्षतिः॥ ७ ॥
अनावश्यं त्रिकालेऽपि कार्य सामायिकं च यत् ।
अन्यथा तदानिः स्यादतीचारस्य का कथा ॥८॥
अन्यत्राप्येवमित्यादि यावदेकादरा स्थितिः ।
प्रतान्येव विशिष्यन्ते नादातरं क्वचिन् ।॥ ९॥
- शोभतेऽतीय संस्कारात्साक्षादाकरजी मभिः । मंस्कृतानि ब्रतान्यष निर्जगहेतवस्तथा ॥ १० ॥ सप्तमसर्ग। सारी लाटीमंहिता इसी प्रकार के ऊहापोहात्मक पद्योसे भरी हुई है। यहाँ विम्तारभयमे सिर्फ थोडे ही पद्य उद्धृत किए गये हैं। इन पद्योंपरसे विज्ञ पाठक लाटी सहिताकी कथनशैली और उसके साहित्य आदिका अच्छा अनुभव प्राप्त करने के लिये बहुत कुछ समर्थ हो सकते है। और पयाच्यार्या साथ तुलना करनेपर उन्हें यह मालूम हो सकता है कि दोनों अन्य एक ही लेखनी से निकल गए और उनका टाइप भी एक है। पचाप्यायीके शुरुमें मगलाचरण और ग्रन्थ करने की प्रतिज्ञारूपसे जो चार पप दिये हैं वे इस प्रकार हैं:- पंचाध्यायावयषं मम कर्तुप्रन्यराजमात्मवशान् । अलोकनिदान यस्य वचस्तं स्तुवे महावीरम् ॥१॥ शेपानपि तीर्थकरानमन्तसिद्धानहं नमामि समम् । धर्माचार्याध्यापफमाधुविशिष्टान्मुनीश्वरान्वन्दे ॥ २ ॥ जीयाजेन शामनमनादिनिधनं मुवन्धमनवद्यम् । यदपि च कुमनारातीनदयं धूमध्य जोपमं दहति ॥ ३ ॥ इति मन्दिनपशगुरुः कृममगलमक्रिय' स एप पुनः । नाम्ना पश्चाध्यायी प्रतिजानीते चिफोर्पितं शास्त्रम् ॥४॥ इन पद्योंमें कमशः महावीर तीर्थकर, शेष तीर्थकर, अनन्तसिद्ध और आचार्य, उपाध्याय तथा साधुपदसे विशिष्ट मुनीश्वरोंकी बन्दना करके जैन शासनका जयघोष किया गया है । और फिर अपनी इस बन्दना क्रियाको 'मद्गलसकिया। बतलाते हुए ग्रन्थका नामोठेस पूर्वक उसके रचनेकी प्रतिज्ञा की गई है । ये ही सब बातें इसी क्रम तथा आशय- को लिए हुए, शब्दों अथवा विशेषणादि पदोंके कुछ हेर फेर या कमी के साथ साटीसंहिताके शुरुमें भी पाई जाती हैं । यथा-.
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अान्तरंगहेतुर्यपि भावः कवेर्षिशुद्धतरः हेतोस्तथापितु. माची मर्योपकारिणी पुति ॥५॥ साधिजीवमासयान विदधाति यथाधुना। कविः पूषापरायत पोटोपविधभणः॥ उ०, १६०॥ पत्तो धर्मम्वरूपोपि प्रसगात्मंगतोशवः । पविलब्धावकाशस्त विस्तरादा करिष्यति ।। ७७५ ॥ लाटीसहितामें भी प्रत्यार अपनेको 'दि । नामसे नामाहित करते और कवि रिसते है । जैमा कि ऊपर उद्धृत किए हुए पप न०६ २०७७५ (यह पप लाटीमहिला पतुर्थ सर्गम न० २७० पर दर्ज हैं) और नीचे टिम पदोपरसे प्रकट है.- ....,तपस्थितः किल करोति कवि कवित्वं । तद्धतां मयि गुणं जिनशामन प ।। १-८६ ॥ मु०८७॥ मोक सूत्रानुमारेण ययाणुमतपत्रकं । गुणधनत्रयं वक्तुमुत्महेदधुना कविः ।। ६-११७॥१.१०९॥ सो सरह और भी कितने स्थानोपा आपका 'वि' नामसे उलेस पाया जाता है, कहीं कहीं अमन्दी नामके माथ कवि-विशेषण जुड़ा हमा भी मिलता है यथा, 'सानन्दमाते कविराजमह' (५६)-और इन सब उडवोंसे यह जाना जाना कि लाटीसंहिताके कदी कवि कपसे बहुत प्रमिद्धि थी, 'कवि' उनका उपनाम अथवा पदविशेष या और वे अकेले ( एकमात्र) उसीके उस द्वारा भी अपना नामोहेस क्या करते थे। इसीमे पमाभ्यार्थी जो अभी पूरी नहीं हो पाई थी, किले 'कवि' नामसे ही आपका नामोल्लेख मिटता है । नामकी इस माननासे भी दोनों मन्य एक ही कविकी दो कृतियां मालूम होते हैं। इसमें सन्देह नहीं कि कविराजमल एक बड़े विज्ञान और सत्कषि गये हैं। कविके लिये जो यह कहा गया है कि वह नये नये संदर्भ, पिनुतनसदर्भः।
.. नई नई मौलिक रचनाएँ-सम्यार करनेमें समर्थ होना चाहिये' वह बात उनमें जरूर थी और ये दोनों अन्य उसके ज्वलंत उदाहरण जान पड़ते हैं । इन ग्रन्योंकी लेखनप्रणाली और कथनशैली अपने ढंगकी एक ही है। लाटीसंहिताकी सन्धियोम राजमलको 'स्याहादानवद्य-पद्य-य--विद्या- विशारद-विद्वन्मणि' लिखा है और ये दोनों कृतियाँ उनके इस विशेषणके बहुत कुछ अनुकूल जान पड़ती हैं । लाटीसंहिताको देखकर यह नहीं कहा जा सकता कि पंचाध्यायी उसके कतीसे भिन्न किसी और ऊँचे दर्जेके विद्वानकी रचना है । अस्तु । मैं समझता हूं, ऊपरके इन सब उल्लेखों प्रमाणों अथवा कथनसमुच्चय परसे इस विषयमें कोई सन्देह नहीं रहता कि पंचाध्यायी और लाटी- संहिता दोनों एकही विद्वानकी दो विशिष्ट रचनाएं है, जिनमेंसे एक पूरी और दूसरी अधूरी है । पूरी रचना लाटीसंहिता है और उसमें उसक फर्ताका नाम बहुत स्पररूपसे 'कविराजमल । दिया है । इसलिये पंचाध्यायीको भी 'कविराजमल्ल' की कृति समझना चाहिये, और यह बात बिलकुल ही सुनिश्चित जान पड़ती है। लाटीसहिताको कविराजमल्लने वि० सं० १६४१ में आश्विन शुक्ल दशमी रविवारके दिन बनाकर समाप्त किया है । जैसा कि उसकी प्रशस्तिके निम्नपयोंसे प्रकट है:- श्रीनृपतिविक्रमादित्यराज्ये परिणते सति । सहैकचत्वारिशद्भिरन्दानां शतपोडश ॥ २ ॥ तप्राप्यश्विनीमासे सितपक्षे शुभान्विते । दशम्यां दाशरथेः (ध) शोभने रविवासरे ॥ ३ ॥ २ एक सन्धि नमुनके तौर पर इस प्रकार है:-इति श्रीम्याद्वादानवयश्य विद्याविशारदविन्माणगान विरचितायां साडीमंदिताया साधदात्मनकामनमनःमगेना विदावकाशनम्मानण्यमण्डलायमानापा कयामत अर्गन नाम प्रथम, सग.. थावकाचारपानाम (१७) पवाल्यायीभी इमी समयके करीवकी-विक्रमी १७वीर मध्यकालकी-लिसी हुई है । उसका प्रारभ या तो साटीसंहिता पहले हो गया था और उसे धीचमें रोड टाटीसंहिता लिखी गई या लाटीसंहिताको टिसने के बाद ही, सत्सहायको पाकर, कविके उसके रचनेका भाव उत्पन हुआ है-अर्यात् यह विचार पैदा हुआ उसे अब इसी टाइप अपवा शैटीका एक ऐसा अन्धराज मीडित पाहिये जिसमें पधाशक्ति और पथावश्यता जैनधर्मका प्रायः - सार पीचर रा दिया जाय । उसीके परिणामस्वरूप पंचाप्याची प्रारम्भ हुमा जान पड़ता है और उसे 'पन्धान ' यह उपनामभी न्य आदिमें मंगलाचरणमें ही दे दिया गया है । परन्तु पैपाध्यायीका मारा पहले मानने की हालतमें यह मानना पुउ आपत्तिजनक जकर मालूम होता है कि, उसमें उन सभी पयोंकी रचना भी परटेहीसे युकी थी जो लाटीसहितामें भी समानरूपसे पाये जाते हैं और इसलिये उन्हें चापापी परसे उठाकर लाटीसंहितामें रवसा गया है । पोंकि इसके विरुदना. ध्याय में एक पद निधकारसे उपलब्ध होता है:- ननु तर (मुर) दर्शनम्यतालझणं स्वादशेपत। किमयारत्यपरं विपिक्षणं तदापनः॥४७॥ यह पप साटीसहितामें भी चतुपसर्गके शुरुमें कोटकोहसित पाठ भेदके साथ पाया जाता है। इसमें 'तददाय नः' इस वायसरा पह पूछा गया है तो उसे आज हमें बताया। इस में 'माण हमें बतलाये' (पद अप नः) इन शन्दोंका पयायापीर साधना सम्बन्ध रिधर नही रोता-पही मालूम नहीं होता कि यहाँ 'मः' (में) दादका पाध्य कौनसा ग्यनि विशेष है, क्योरि सायादी किसी ध्यति विशेष प्रभ अपचा शार्थना पर नही रिसीमा है । मन्युन इसके, लाटीसंहितामें उन दामोंका समा हप है । स्टीसा अपवालांशावतंस मंगरगोत्री साहुको पुत्र शनि पान' नाम एक शनिक विज्ञान लिये, उसो तथा साना पर रिही नई नई मोटिक रचनाएँ-तय्यार करने में समर्थ होना चाहिये' वह दात उनमें जरूर थी और ये दोनों प्रन्य उसके ज्वलंत उदाहरण जान पडते हैं। इन अन्योंकी लेसनप्रणाली और क्यनशैली अपने दंगकी एक ही है। लाटीसंहिताकी सन्धियोंमें राजमल्लको 'स्याहादानवग्र-पद-गद्य-विधा- विशारद-विद्वन्मणि' लिसा है और ये दोनों कृतियाँ उनके इस विशेषणके बहुत कुछ अनुकूल जान पड़ती हैं । लाटीसंहिताको देखकर यह नहीं कहा जा सकता कि पंचाव्यायी उसके कर्तास भिन्न किसी और ऊँचे दर्जे के निदानकी रचना है । अस्तु । मैं समझता हूं, ऊपरके इन सब उल्लेखों प्रमाणों अथवा कथनसमुच्चय परसे इस विषयमें कोई सन्देह नहीं रहता कि पंचाध्यायी और लाटी. संहिता दोनों एकही विद्वानकी दो विशिष्ट रचनाएँ हैं, जिनमेंसे एक पूरी और दूसरी अधूरी है। पूरी रचना टाटीसंहिता है और उसमें उसके कर्ताका नाम बहुत स्पररूपसे 'कविराजमल । दिया है । इसलिये पंचाध्यायीको भी 'कविराजमल' की कृति समझना चाहिये, और यह भात बिलकुल ही मुनिश्चित जान पड़ती है । लाटीसंहिताको कविराजमहने वि० सं० १६४१ में आदिन शुक्र दशमी रविवार के दिन बनाकर समाप्त किया है । जैसा कि उसकी प्रशस्ति निम्नपर्योसे प्रकट है:- श्रीनृपतिविक्रमादित्यराग्य परिणते सति । सहकपत्वारिंशद्भिरन्दानां शतपोडश ॥ २॥ तपाप्यश्विनीमासे सितपक्षे शुभान्विते । दसम्यां दाशरथेः (१) शोभने रविवासरे ॥ ३ ॥ २५% सन्धि नमन मार पर इस प्रकार पनि भोम्पाद्वादानपयाय रिसकिरविमणिगतमाविधिनायो थारावासरनाम राह महिलावा माननगमनमानामगेनादिविकागानमनगरलायमनाया मन ना प्रथम सर्गः। - कम . पापापीभीसी समय सीधी-विवमी १७ वी शतान्द माटी-मिली है। उनका प्रारभ पा सोसाटीसंहितासे F पालो गया था और उसाध रोक हाटीसहिता लिखी गई है औ- पासाटीमहिताको लिसने के बाद ही, रासहायको पाकर, कवियों उमो रचना भाव उत्पन हुआ है-अर्थात यह विचार पैदा हुआ कि उसे अब इसी साप अया दीका एक ऐसा मन्यराज मी लिखना पादिये जिसमें पचाशक्ति और यथावश्यता जैनधर्मका प्रायः सारा सार चार रस दिया जाय । उसके परिणामस्वरूप पंचाप्यापीका प्रारम्म हुआ जान पढ़ता है और उसे 'पन्यान' यह उपनामभी अन्धक आदिमें मंगलाचरण दे दिया गया है । परन्तु पंचाध्यापीका भारम्भ पाले. माननकी हटतमें यह मानना कुछ आपत्तिजन जरूर मालूम होना कि, उसमें उन सभी पयोंकी रचना मी परटेहीसे चुकी थी जो लाटीसंहिता भी समानरूपसे पाये जाते हैं और इसटिये उन्हें पंचाध्यायी पास उठाकर लाटीसहितामें रक्सा गया है । क्योंकि इसके विरुद्ध पंचा. पायों में एक पद निमकारसे उपलब्ध होता है- ननु सर (मुद) निम्यनलक्षणं स्यादशेषतः । फिमधास्त्यपरं किंचिल्लक्षणं तदाध नः ॥ ४७७॥ यह पप टाटीसंहितामें भी चतुर्थसर्गके शुरुमें कोष्टकोलेसित पाठ भेदके साथ पाया जाता है। इसमें 'तहदाय नः' इस वाक्यरतण्टके मारा यह पूछा गया है तो उसे आज हमें बतटाये । म प्रश्नमें 'आज हमें बताईय' (बद अप नः) इन शब्दोंका पंचाध्यायीक साथ कोई सम्बन्ध स्थिर नहीं रोता-यही मालूम नही रोता कि यहाँ 'नः' (में) शन्दका वाच्य कौनसा व्यक्ति विशेष है; क्योंकि पंचाध्यायी किसी व्यक्तिविशेषके प्रभ अथवा प्रार्थना पर नहीं लिसी गई है । प्रत्युत मक, लाटीसंहितामें उक्त शब्दोका सम्बन्ध सुस्पष्ट है । टाटीसरिता प्रवालवंशावतंस मंगलगोत्री साहु इदाके पुत्र संघाधिपति 'फामन' गं एक धनिक विज्ञान के लिये, उसके मन तथा प्रार्थना पर लिखी Beी - नांना मोरिक रचनाएँ-तम्यार करने में समर्थ होना चाहिये' यह बात उनमें ना थी और ये दोनों अन्य उसके ज्वलंत उदाहरण जान पाते हैं। इन न्योंकी लेमनगारी और कपनशैली अपने देगी रही है। नाहीसंहिताकी सन्धियोंमें राजमहको 'स्यादादान-पय-य-सिपा- शारद-दिन्मणि' लिसा है और ये दोनों कृतियाँ उनके इस शिष पाए अनुकूल जान पड़ती हैं । लाटीसहिताको देखकर परमकाजा माता पिंगा यायी उसके कत्तासे भिन्न किसी और अनेकानिकी रचना है । अस्तु । सम है, पर इन सर मी प्रमाणी अथवा धनममुख्य पाम में कोई सन्देह नहीं रहता कि पंचाध्यायी और लादी. मेरा पानी एकही पिवानकी को विशिष्ट स्यनाएँ हैं, जिनमें पर मरस है । पूरी प्रयना माटीमहिता है और उसमें उस पE नाम पर smit करानमत किया। इसलिये मामायीको भी 'सिनमान की कृति सामना चाहिंग, और पर पान किरीनिधित जान पड़ती है। हामरिना कानमन .. १६४१ में भाधिन छम वीfrime दिन बनाकर ममात किया । जैगा ही पनिनाद श्रीनानिधिमारिया परिणत गति। मारिद्धिावाना in || २ ॥ नवागनीमा मिनभाया। काम्या रामाय (1) शोमनाम ॥३॥ "म ४. it in M1+11 garaat पायाभी मी समय परीक्षणी-विवमी १७वी शतानीके मी- है । उगता मारम पा तो साटीसहितासे १७ पाया था और उसे पारमें टाटसरितालिसी है भोर पालामहिनामिने बाद ही, सहायको पार, कविपमें सपने भाव उत्पम आहे-मान यह विचार पैदा हुआ कि उसे अब इसी राइप अपना लिया एक ऐसा मन्दराज भी रिसमा सायनिसमें पधाशक और पचावयता जैनधर्मा प्रायः सारा सारसीपार रस दिया जाय । उसीके परिणामस्वरूप पंचाप्यापीका भारम्भमा जान पड़ता है और उसे 'न्यान' यह उपनामभी अन्यके आदि गटामाणमें ही दे दिया गया है। परन्तु पंचाध्यायीका प्रारम्भ पाल माननी में था मानना पुछ आपतिजनक जकर मालूम रोता , उसमें उन सभी पदोंकी रचना भी परलेहीसे युकी थी जो साटीमहिला भी समानापसे पाये जाते हैं और इसलिये उन्हें पंचाम्यापी पासे उटाकर साटीसहिनामें दसा गया है । क्योंकि इसके विरुद्ध पंचा- ध्या में एक पदनिप्रकारसे उपलब्ध होता है:- ननु सर (मुद) रानम्यतहक्षणं स्याशेषतः । किमयात्यपरं किंपिहरण सरदार नः ।। ४७७ ॥ पर पय हाटीमारता मी धनुयसादि शुझमें कोष्टकोहरित पाठ भेद साप पाया जाता है। इसमें 'नादापन' इस दायराष्टकारा पह पूछा गया है तो उसे आज हमें बतलाइये। इस प्रभमें 'आज रंमै बतलाइये '(बद अप नः) इन शब्दोंका पंचाध्यापक साथ कोई सम्बन्ध स्थिर नही रोता-यही मालूम नही रोता कि यहाँ 'नः' (रमें) शब्द वाच्य कौनसा व्यक्ति विशेष है; क्योंकि पंचाध्यायी किसी प्यनिविशेष प्रभ अथवा प्रार्थना पर नहीं लिपी गई है। प्रत्युत हमके, लाटीसंहितामें उन शब्दोका सम्बन्ध सुस्पष्ट है । लाटीसंहिता अबालवंशावतंस मैगलगोत्री साहु दृदाके पुत्र संघाधिपति 'फागन नामक पद धनिक विज्ञान के लिये, उसके प्रश्न तथा प्रार्थना पर लिखी Be.. .
नई नई मौलिक रचनाएँ-तय्यार करनेमें समर्थ होना चाहिये' वह बात उनमें जरूर थी और ये दोनों ग्रन्थ उसके ज्वलंत उदाहरण जान पड़ते हैं । इन अन्योंकी लेखनप्रणाली और कथनशैली अपने दंगकी एक ही है । लाटीसंहिताकी सन्धियोंमें राजमल्लको 'स्याहादानवय-पय-गय-विधा- विशारद-विद्वन्मणि' लिखा है और ये दोनों कृतियाँ उनके इस विशेषणके बहुत कुछ अनुकूल जान पडती हैं । लाटीसहिताको देखकर यह नहीं कहा जा सकता कि पंचाध्यायी उसके कतीसे भिन्न किसी और ॐचे दर्जेके विज्ञानकी रचना है । अस्तु । मैं समझता हूं, ऊपरके इन सब उल्लेसों प्रमाणों अथवा कथनसमुच्चय परसे इस विषयमे कोई सन्देह नहीं रहता कि पंचाध्यायी और लाटी. संहिता दोनों एकही विद्वानकी दो विशिष्ट रचनाएँ हैं, जिनमेंसे एक पूरी और दूसरी अधूरी है । पूरी रचना लाटीसंहिता है और उसमें उसके कर्ताका नाम बहुत स्पष्टरूपसे 'कविराजमह । दिया है । इसलिये पंचाध्यायीको भी 'कविराजमाल' की कृति समझना चाहिये, और यह पात बिलकुल ही सुनिश्चित जान पड़ती है। लाटीसंहिताको कविगजमलने वि० सं० १६४१ में आश्विन शु. रशमी रविवारके दिन बनाकर समाप्त किया है। जैसा कि उसकी प्रशस्तिक निम्नपयाँस प्रकट है.-- श्रीनृपनिविक्रमादित्यराज्य परिणते सति । सहकपत्यारिशदिरम्दानां शनपाइश ॥२॥ तप्राप्यश्विनीमासे सिनपा सुभान्यिते । पशम्यां दाशरथे. (A) शोभने रयियासरे ॥ ३॥ माय नमो नो पा इस प्रकार :-हनि श्रीयावादानपणाप विनिमगगमणवाचताया भारापातामाम महिलाया सामनामनमनाभगेशाविदाकमकमानगडमगपमानाय! पनाममयम.सा..
गटी बाद प्रारम हुआ है । परन माध्यापक प्रारंभ पाले
एमादी), इसमें मंदेह ना दिदा साटीसंहिता बाद महाशमें
और उस पर जनता के सामने की गई है जबकि मिहो-
दी लोपया प्राय समालो पुती थी । यही वजह है कि
उसमें किमी मन्धि, अध्याय, प्रकरणादिक या प्रेयरि नामादिककी
को पीनना सकी और निर्माणाधीन स्थिति में ही जनताको
उपराध । माटम नहीं था मोदय इसमें और किन किन
विषयोंसिना समावेशबाना पाते थे और उन्होंने अपने इस
गो पाँच मविभागा-अत्यापों का नाम सोचे-थे । निसंदेह
म पना पूरा न माना समानका बटा ही दुर्भाग्य है।
रविराजमने लाटीमहिनाकी रचना 'राट नगरके जिनालय,
बेटकरा । पावराट नगर वही जान पडता है जिसे 'गट।
भी बनी भर जो जयपुर से करीब ४० मीलके फासले पर है।
किशममय यह विगट अथवा मत्स्यदेशकी राजधानी थी और यही
परपरका
गुप्त धेगमें रहना या जाता है । 'मीमकी ,गरी' आदि
उन्धानका लोग अब भी उसी बनके बतलाते है । हाटीसहि-
ना कविन इम नगादी मुनकण्ठमे प्रशंसा करते हुए, अपने समयका
किनना वर्णन दिया और उससे मानम होता है कि यह नगर उस
ममय बड़ारी समृद्धशाली था। यहां कोई दरिद्री नजर नहीं आता था,
प्रजा परम्पर अमृया अपवापिदिपाधिश परावर्ती शंकर छिद्रान्वेषणका
भाष नही था, यह परचक्र भयमे रहिल थी, सबलोग सुशहाल तथा
धर्मात्मा धे, चोर्ग वगैग के अपराध नहीं होते थे और इससे नगर के लोग
देवानाम भी नहीं जानते थे। अकबर बादशाहका उस समय राज्य
पहाटीमहिला भी पानि परपसागत चिन्दीक अस्तित्वको अधित किया
पथा--
...पाहादि भृगेपुर पांडवानामयापि पाश्चर्यपरपंर्गका।
याबाबदालोक्य मलावारिसादपं पिमुंबन्ति महाबला पि Ivn
गई है, जिसका स्पष्ट उल्लेख संहिताके 'कथामुसवर्णन' नामके प्रथम समें पाया जाता है । फामनको संहितामें जगह जगह आशीर्वाद भी दिया गया है । उक्त पदसे ठीक पहले भी, चतुर्थसर्गका प्रारम्भ करते हुए आशीर्वादका एक पद पाया जाता है और वह इस प्रकार है:-- इदमिदं तव भो वनिजांपते भवतु भावितमान सुदर्शनं । विदितफामननाममहामते रसिकधर्मकथामु यथार्थतः ॥ १ ॥ इससे साफ जाना जाता है कि इस पद्यमें जिस व्यक्ति विशेष सम्बोधन करके आशीर्वाद दिया गया है वहीं अगले पदका प्रश्नकर्ता ओर उसमें प्रयुक्त हुए 'नः पदका वाच्य है । लाटी सहितामें प्रश्नकर्ता फामनके लिये 'नः' पदका प्रयोग किया गया है, यह बात नीचे लिखे पद्यसे और भी स्पष्ट हो जाती है:- सामान्यादवगम्य धर्म फलितं ज्ञातुं विशेषादपि । भक्त्या यस्तमपीछद् वृपरुचिर्नाम्नाधुना फामनः ।। धर्मत्वं किमथास्य हेतुरय किं साक्षात्फलं तत्वतः । स्वामित्वं किमयेति सूरिरवदत्सवं प्रणनः कविः।।७।।मु०७८॥ ऐसी हालतमें नहीं कहा जा सकता कि उक्त पद्य नं. ४७७ पंचा- ध्यायीसे उठाकर लाटीसहितामें रक्खा गया है बल्कि लाटीसंहितासे उठाकर वह पचाध्यायीमें रक्खा हुआ जानपड़ता है । साथ ही, यह भी मालूम होता है कि उक्त पद्यके उस वाक्य-खण्डमें समुचित परिवर्तन- का होना या तो छूट गया और या ग्रंथके अमी निर्माणाधीन होनेके कारण उस वक्त उसकी जरूरत ही नहीं समझी गई और इसलिये पंचाध्यायी का प्रारंभ यदि पहले हुआ हो तो यह कहना चाहिये कि उसकी रचना प्रायः उसी हद तक हो पाई थी जहाँसे आगे लाटीसंहिता पाये जाने वाले समान पोंका उसमें प्रारंभ होता है। अन्यथा, लाटीस- हिनाके कथनसबंधादिको देखते हुए, यह मानना ही ज्यादा अच्छा और अधिक संभावित जान पड़ता है कि पंपाध्यायीका लिसा जाना माटीमन्नाके बाद भारंभ हुआ है । परंतु वाध्यायीका प्रारंभ पहले माया पीछे, इसमें संदेह नहीं किया टाटीसंहिताके बाद प्रकाश आई है और उस वन जनता के सामने की गई है जबकि कामिहो- दयही लोम्यामा प्रायः समाप्त हो चुकी थी । यही पना है कि उममें गिन्धि, अन्याय, प्राणादिक या धाक नामादिक की कोई योजना नीरामकी और वह निर्माणाधीन स्थितिमें ही जनताको उपलध | मालूम नही पंधर्ता महोदय इसमें और किन किन विषयोंगा किमता ममावेश करना चाहते थे और उन्होंने अपने इस परानो पाँच महाविभागों-अन्यायों-क पया नाम सोधे-थे । निसंदेह ऐसे चाला पूरा न हो सकना समाजका पहा ही दुर्भाग्य है । कवि गजमने लाटीहिलादी रचना ‘वराट नगरके जिनालय में बटकाका । या वरार नगर वही जान पड़ता है जिसे 'राट। भी कह और जो अपगुरसे परीव ५० मीलके फासले पर हैं। किसी समय यर विराट अयथा मलयदेशकी राजधानी थी और यही पर पांडवों का गुप्त धेशमें रहना कहा जाता है । 'भीमकी हूँगा' आदि कुर स्यानों को लोग अब भी उसी पन के पतलाते हैं । लाटीसेहि- तामे कविने इस नगरी मुनकण्ठसे प्रशंसा करते हुए, अपने समयका नारा वर्णन दिया है और उससे मालूम होता है कि यह नगर उस समय पहा ही समृद्धशाली था। यहां कोई दरिदी नजर नहीं आता था, प्रजामे परस्पर अगूया अथवा पदिषादिक वगरती रोकर छिद्रान्वेषणका माव नहीं था, वह परचक्र भयसे रहित थी, सबलोग सुसराल तथा धमा थे, चोरी चोराके अपराध नहीं होते थे और इससे नगर के लोग का नाम भी नहीं जानते थे। अम्बर बादशाहका उस समय राज्य , लाटीमहिना भी कि इन पररागत चिनी के अस्तित्वको पूरित किया पा- ...गदि भूगेर परिवानामयापि धास्वरिपका । क्ष कामदालोय बलाबालादर्ष विचन्ति महायला nि -- था और वही इस नगरका स्वामी तथा भोक्ता था 1 नगर कोटसाईस युक्त और उसकी पर्वतमालामें कितनी ही ताँबे की सान थी जिनसे उस वक्त ताँचा निकाला जाता था और उसे गलागलूकर निकालनेका एक बडा मारी कारखाना भी कोट के बाहर, पासमें ही, दक्षिण दिशाकी और स्थित था । नगरमें ऊँचे स्थान पर एक सुंदर प्रोत्तुंग जिनालय- दिगंबर जैन मंदिर-था, जिसमें यशस्थम और समृद्ध कोष्ठों ( कोठों ) को लिये हुए चार शालाएँ थीं, उनके मध्यमें वेदी और वेदीके ऊपर उत्तम शिखर था । कविने इस जिनालयको वैराट नगरके सिरका मुकुट बतलाया है । साथही, यह सूचित किया है कि वह नाना प्रकारकी रंगबिरंगी चित्रावलीसे सुशोभित या और उसमें निम्रन्थ जैन साधुभी रहते थे इसी मंदिरमें बैठकर कविने लाटीसंहिताकी रचनाकी है । संभव है कि पंचाध्यायी भी यहीं लिखी गई हो। यह मंदिर साधु दूदाके ज्येठपुत्र और फामनके बड़े भाई ‘न्योता ने निर्माण कराया था; जैसा कि संहिताके निम्न पयसे प्रगट है:- तवाद्यस्य वरो मुतो यरगुणो न्योताहसंघाधिपो । येनेवग्जिनमंदिरं स्फुटमिह प्रोनुगमत्यद्भुतं । घेराटे नगरे निधाय विधिववपूजाश्च यज्ञयः कृताः । अत्रामुत्र सुखप्रदः स्वयशसः स्तंभः समारोपितः ॥७२॥ आजकाल वैराट प्राममें पुरातन वस्तु-शोधकोंके देसने योग्य जो तीन धीमें पाई जाती हैं उनमें पार्धनायका मन्दिरमा एक सास चीन है और बह संभवतः यही मन्दिर मालूम होता है जिसका कविने लाटीसंहितामें परके पिता हुमायूँ और सिनामा पापा का भी कविने उलेग किया और इन सब को 'गता' नातिके पतलाषा है। २ गटग्राम भार उनके आम पामा प्रदेश आग भी धातु मलमे आदिन है, ऐमा • भाग्ने भानी एक रिप पारे, निसा माम अगर नोव पर ना।
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(२२)
प्रतिमित हुए थे। मीति भट्टारक उम समय मौजूद मी थे और उनके
उपदेश तथा आदेशगे उन जिनालयमें कितनही चित्रों की रचना हुई
थी । वैराटनगरमें उम समय भट्टारक हेमचन्द्रकी प्रमिद्ध आम्नायको
पालनेवाले 'ताल्हू' नामके एक विद्वानी थे, जिनमें अनगृहमे कामनको
धर्मका स्वरूप जानने आदिमें कितनीही महायता मिली थी । परन्तु
उसका वह सब जानना उस वक तक प्रायः सामान्य ही था जब तक
कि कविराजमल वहां पहुंचे और उनसे धर्मका विशेष स्वरूपादे पूछा
जाकर लाटीसंहिताकी रचना कराई गई।
इस तरह पर कविराजमहने वैराट नगर, अकबर बादशाह, कायसंघी
भट्टारक वंश, फामन कुटुम्ब, स्वयं फामन और वैराट जिनालयका
कितनाही गुणगान तथा वसान करते हुए लाटीसंहिताके रचना सम्बन्धको
व्यक्त किया है । परन्तु खेद है कि इतना रम्बा लिखने परभी आपने
अपने विषयका कोई खास परिचय नहीं दिया-यह नहीं बतलाया कि
आप कहाँके रहनेवाले थे, किस हेतुसे वैगट नगर गये थे, कौनसे वंश,
जाति, गोत्र अथवा कुलमें उत्पन्न हुए थे, आपके माता पिता तथा गुरुका
क्या नाम था और आप उस समय किस पदमें स्थित थे । लाटीसंहितासे-
अ यात्मकमलमार्तण्डसेमी-इन सब बातोंका कोई पता नहीं चलता । हाँ,
लाटीसंहिताको प्रशस्तिमें एक पद्य निम्न प्रकार से जरूर पाया जाता है:-
एतेषामस्ति मध्ये गृहपरुचिमान् फामनः संघनाथ-
स्तनाश्च कारितेय सदनसमुचिता संहिता नामलाटी ।।
का गजमल वैगट नगरके निवासी नहीं थे बल्कि स्वयही क्सिी अज्ञात
कारण वश वहा पहुच गये थे, यह बात नीचे लिये पद्यसे प्रकट है, जो सहितामें
फामनका वर्णन करने दादिया गया है--
येनानन्तग्निानयानावधिना सघाधिनाभेन यद-
बमागमपशाभय नजदपः कर्न चिगदीप्मिन ॥
नारन्ये फटना रुनामद ला वाधना सत्कदिन ।
बंगटे स्वयमाग शमसाद शमादय ॥ ४५ ॥
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(२४) १६६७ में 'मतामर स्तोत्रकी संस्कृत टीश लिसी है, और दूसरे पाण्डे रायमन, जिन्होंने समयसारकी वह बालबोध भाषा टीका लिस्सी है जिसका कविवर बनारसीदासजीने अपने समयसार नाटक में उस किया है। ये लोग लाटीसंहिताके कर्ता कविराजमहसे भिन्न थे। अतः कविराजमल के प्रन्योंकी सोन करनेगळे विदानों को इस विषयका ध्यान रखना चाहिये।"
धीवीतरागाय नमः। श्रीस्याहादानयद्यपधगधविद्याविश....... राजमल्लविरचिता लाटीसंहिता। प्रथमः सर्गः। मानानन्दात्मानं नमामि तीर्थकर महावीरम् । योनि विश्वमशेपं व्यदीपि नक्षत्रमेकमिय नभसि ॥१॥ नमामि शेपानपि तीर्थनायका- ननन्तयोधादिचतुष्टयात्मनः । स्मृतं यदीयं किल नाम भंपर्ज भवेद्धि विनायगदोपशान्तये ॥२॥ प्रदुष्टकर्माष्टकविप्रमुक्तका- स्तदत्यये चाप्टगुणान्वितानिह । समाश्रय सिद्धगणानपि फुट सिद्धः पयस्तत्पदमिच्छतां नृणाम् ॥ ३॥ यस्य महावीरस्य । २ ज्ञाने। ३नारो।
(२४) १६६७ में 'मनामर स्तोत्रकी संस्कृत टीका लिसी है, और दूसरे पाण्डे रापमत, जिन्होंने समयसारकी वह यालबोध भाषा टीका लिखी है जिसका कविवर बनारसीदासजीने अपने समयसार नाटकमें उल्लेर किया है । ये लोग लाटीसंहिताके कर्ता कपिरानमनसे भिन्न थे। अतः कविराजमल के प्रन्योंकी सोन करनेवाले विद्वानों को इस विषयका ध्यान रखना चाहिये।"
ॐ धीवीतरागाय नमः। श्रीस्याद्वादानवद्यपद्यगद्यविद्याविशारदा ... राजमल्लविरचिता लाटीसंहिता। प्रथमः सर्गः। मानानन्दात्मानं नमामि तीर्थकर महापीरम् । योति विश्वमशेपं व्यदीपि नक्षत्रमेकमिव नभसि ।।१।। नमामि शेपानपि तीर्थनायका- ननन्तयोधादिचतुष्टयात्मनः । स्मृतं यदीयं किल नाम भपजं भवेद्धि विनायगदापशान्तये ॥२॥ प्रदुष्टकर्माष्टकविप्रमुक्तका- म्तदत्यये पाष्टगुणान्वितानिह । समाश्रये सिद्धगणानपि सुटं सिद्धेः पथस्तत्पदमिच्छतां नृणाम् ।।३।। १ यस्य महावीरस्य । २ हाने । करी ।
६ रदाटीसंहितायां- RARIANMA~~ दृष्ट्वात्मनः प्रतिनिधि किल शदिसासी दक्तेपणा भणममपंधिया सपन्याः ।। २९ ।। यभुः सरांसीव भयो यदन्तरे गृहानभागेपु मणित्यिपां चयाः । परागनाः संयरिताम्यराः क्षणं ययुनपान्तास्तरणानुराः पुनः ॥ ३० ॥ ययात्र कान्ता रतवेश्मनीह निवेशितादर्शशताश्मभित्ती। याला प्रतिच्छायमवेक्ष्य रूपं यथाऽकरोन्मानमनल्पसंप्रमात् ।। ३१ ॥ विचित्रचित्राणि यदीयसभमु व्यलोलिसत्कर्ममु सूत्रधारः। नूनं विलोक्यैतदकारि मद्विधिः जगत्यरं चात्मकृतार्थतां गतः ॥ ३२ ॥ यदहनामङ्गलगानकोटिभिः प्लुने मुदातोघरपबिहायसि । विधूपितागामुखधूपधूम्रके रिदानिशं राति शिवी ग्म येश्ममु ॥ ३३॥ विशन्ने नगगण्यनन्नगणितान्यासागराणासि ये सत्रापि प्रतिपत्तनं युवतयस्तारुण्यतोयोर्मयः । किन्त्यसयराङ्गनापरिलसकोणलीलायली वाणाम्बैमनुनेग्म दुर्गमतुलं यराटकं मन्मथः ॥ ३४ ॥ आसीदयत्नादपि जागरूको अगनिगीपुः कुमुमायुधध। लीलारणपुरमौर्यनादै निशादि मेराटपुरानानाम् ।। ३५ ।। अनिषिम्यम् । । वादिप्रामा। आकागे।
कयामुखवर्णनम् । यदीयहापनिषद्धपद्धती दुकूलरमामरणालंकृताः । वपूरपेत्येन्द्रधनुःशताकृति- मगादकालेऽपि विराटपत्तनम् ॥ ३६ ।। पिराटवाधीपु नवाढयोपितो गमागमाभ्यासवशानुसारिभिः । सदाननामोदमदालिनि वन रयं मधु कोऽप्यपर. सदातनः ॥ ३ ॥ पनापनापजगननाघे- धैराटहट्टाध्यमु पर्यटदिः। गते प्रचारोपि प दुर्गमोऽभून द्वारांनिधे पार इवोम्मिजालेः ॥ ३८॥ अनेकदेशीयजनेरनेकै श्चितः सरिद्रिमरितांपतियथा । सदागमिप्यनिम्पिलोपमेयता यदा स सिन्धुर्मघुरोऽभविष्यन् ।। ३९ ।। वेदाः प्रमाणं हि पठद्भिर विप्रेरनूनरिह मम्भृतोऽमौ। शुष्टाम्बरांगच चमुभिराम्य बैंराटनानावततार धाता ॥ ४०॥ उर्वी यदन्ते विपुला स्वसीम: सस्याम्हा सप्रसवेव योपित् । धान्यानि सूते विविधान्यजस रत्नानि यदा मुमुतोपमानि ।। ४१ ।। साद्राणि यत्रोपवनानि नित्यं नम्राणि भूयो मरुतेरितानि । शध्दः । २ मार्गेषु । । उहिनि पृथ्वी 1 पथा योषित समम वा लधेय उवा सस्यमसदा।
लाटीसंहितायां-- वाचालितानीय पिकस्वनायः सप्रस्रयाणीय हि पार्पदानि ॥ ४२ ॥ यस्यान्तिके कूपतडागवाप्यः सुधावलिप्तोवलकण्ठदेशाः। पंरीत्य पूर्ण प्रतिविम्वमिन्दोः स्थिता:विरजुनभसीय ताराः ॥ ४३॥ मरस्मु वापीपु कुशेशयाना कचित्सहस्राणि शतानि यत्र । वैराटसम्राज्यमुखेन्दुशोभा दृष्टुं धरित्र्याः धृतलोचनानि ॥ ४४ ॥ लोलोर्मयो यत्र जलाशयेषु क्षणं पतित्वाथ समुत्पतन्ति । मन्ये मुखं वीक्ष्य विराटराश: स्खलन्त्यनझादवलाः पदे पदे ॥ ४५ चापीकूपतडागचत्वरमठक्रीडाद्रिवाट्यादिषु भामिन्यो रमणैः सहोत्सुकतयोद्रेकाद्रमन्ते रहः तन्मन्येऽमरदम्पतीशतमिदंस्वर्गात्समुत्तीर्य यत् दृष्ट्वाश्चर्यपरंपरां मुदमगाद्वैराटपार्श्वे स्थितम् ॥ ४॥ गमागमाभ्यामटतां जनानां श्रेणी चतुर्दिक्षु चतुर्मुग्वेभ्यः । 'अत्राकरिष्यदलमेव सुरापगायाः पूरेण सा चेदभविष्यदेका ॥ ४ ॥ यंतो यहि गघरामु संस्थिताः कृषीवला: मार्भकबन्धुयोषितः । पदि सभापा योग्यानि पादानि समापनि सेक्स ३ पमन्नतिलकागदोध्यमपनानिम यं आपातन । ४ वराटनगर कयामुखवर्णनम् । मनाग्मनागन्तरमाश्रितोत्रमाः धुर्दिवाप्रामातोपमेयताम् ॥ ४८॥ घोडादिश्रृङ्गेषु च पाण्डवाना मयापि चाश्चर्यपरंपरांक्षा। यान काश्चिदालोक्य यलावलिया दर्प विमुञ्चन्ति महायला अपि ॥ ४९ ॥ जले जने नत्रमहानियोजन धनु ता ज्या निहतिर्न सम्पदाम् । रणे यती चापगुणे न संग्रही विशालता यत्र न सा विशालता ॥५०॥ दण्डोस्ति स्त्रे न किल प्रज्ञायां बन्धोऽम्ति हार न जने कचिद्ध । गन्धापहो गन्धवहोस्ति तस्करो न तस्कर कोपि परार्थसमहे ।। ५१॥ नवोढवभ्या नवसङ्गमे भयं न जातु भीनिः परचक्रिणो रणे । घग्यापहारो रवकर्मणि ध्रुवं यत्रापहारोम्त्यपरो न कश्चित् ।। ५२॥ छिद्रग्रहो मौक्तिकदामगुम्फे न मूययान्योन्यजनेषु कश्चिन् । गूने ध्वनिारय मारयेति न पालगोपालमुम्पु यत्र ।। ५३ ॥ ताम्खुलभुक्तायितिमण्डनं का भौगोपभोगे न प तत्कदाचिन् । ''पुस्तके "माधिमा थमा पनि पाठः । २ 'पुस्लो 'मा इति पाठः। - A
लाटीसंहितायां-
क्षतं नखारयोपिदने
सौध्यावलीसंहनने न यत्र ।। ५४ ॥
रागोऽघरे यत्र नितम्विनीनां
नान्यस्त्रदाराधनवञ्चनेषु।
नेत्रद्वयो रञ्जनमगनानां
पापाञ्जनं नैव जनेषु किञ्चिन् ॥ ५५ ।।।
पयोजनाले परमम्ति कण्टको
न कण्टकः कोऽपि मिथः प्रज्ञायाम्।।
नूनं सरोगो न जनोऽत्र कश्चित्
परं सरोगो यदि राजहंसः ॥५६ ।।
दरिद्रता दातृजने न यत्र
परं प्रतिमाहिणि सास्ति पारे।
नान्तस्तदाश्चर्यपरंपराणा
मापूर्यतां चेत्कविधर्मशक्तिः ॥ ५७॥.
इत्याद्यनेकैमहिमोपमानै
बराटनाना नगरं विलोक्य ।
स्तोतुं मनागात्मतया प्रवृत्तः
सानंदमारते कविराजमलः ।। ५८॥
आसीदुमसमप्रवंशविदिता या स्पर्धनीवामला
नानाभूपतिरत्नभूरिध परा जातिश्च गत्ताभिधा ।
तस्यां यायरपातिसाहिरभवनिर्जित्यशत्रून पला-
दिल्लीमण्डलमण्डितात्मयशसा पूर्णप्रतापानलः ।। ५९॥
तत्पुत्रः समजीजनन्निजकुले व्योम्नीष पण्डांशुमान्
दोर्दण्डैरिव खंहनोटमना नाम्ना हुमाहुं नृपः ।
दुर्वाये विलसत्प्रतापमहिमा पैकांतपात्राश्रिता
विण्यातो भुवि यः समुद्रपरिखापयंतभूमीधरः ।। ६० ॥
सामि गहतानि सरोगः ।
१ - कयामुग्ववर्णनम् । तत्पुत्रोऽजनि सार्वभौमसदृशः प्रोद्यत्मतापानल- ज्वालाजालमतालिकाभिरभितः प्रचालितारिखतः। श्रीमत्साहिभिरोमणिस्त्वकयरो निःशेपशेषाधिपः नानारत्नपिरोटकोटिघटितः मुग्मि पितांद्वियः ॥६॥ श्रीमहिंडीरपिण्डोपमिवमितनमः पाण्डुरासण्डकी- कृष्ट प्रयाण्डकाण्डं निजभुजयशसा मण्डपाडम्बरोऽस्मिन् । येनामी पातिमाहिः प्रतपदकयरप्रख्यविख्यातकीर्ति- जर्जीयागोताथ नाथः प्रभुरिति नगरस्यास्य चैराटनानः ॥ १२ ॥ जैनो धर्मोनवद्या जगनि विजयतयापि सन्तानवर्ती साक्षाद्दगम्बरास्ते यतय इह यथा-जातरूपाइलक्षाः । तस्मै तेभ्यो नमोस्तु त्रिसमयनियतं प्रोल्लमद्यत्मसादा- दागावद्धमान प्रतिषविरहिनो वर्तते मोक्षमार्गः ॥ ३ ॥ श्रीमति काष्ठासंघे माथुरगच्छेऽथ पुष्करे च गणे । लोहाचार्यप्रभृतो समन्वये वर्तमाने च ॥ ६४ ।। आमीत् सूरिकुमारसेनविदिन पट्टस्थभट्टारक. म्यादारनवद्यवादनखरैर्वादीभकुम्भे भनिन् । येनेदं युगयोगिभि परिभृतं सम्यग्दृगादित्रयी नानारत्नचितं यूपप्रवणं निन्येऽच पारंपरम् ।। ६५ ।। तत्पट्टेऽजनि हेमचन्द्रगणदारकोपिति काष्ठासङ्घनमोलणे दिनमणिर्मिध्यान्धकारारिजित् । यन्नामस्मृतिमात्रतोन्यगणिनो विच्छायतामागताः खद्योता इव पायवाप्युडुगणा मान्तीव भाम्पत्पुरः ॥६६॥ तत्सद्देऽभवदईतामवययः श्रीपानन्दी गी प्रैवेद्यो जिन धर्मकर्मठमनाः प्रायः मतामणी । भव्यात्मप्रतिबोधनोद्भटमतिभट्टारको पाक्पटु- यस्याचापि यश: शशाविशद जागर्ति भूमण्डले ।। ६५ ।। सिंह:1२ मीथंकपः। ३ लाटीसंहितायां- नत्प? परमाख्यया मुनियश कीर्तिश्च भट्टारको नैध्यपदमाईतं श्रुतवलादादाय निःशेषतः । मर्पिदुंग्यदधीभुतेलमरियलं पनापि याबद्रमान न्यक्त्वा जन्ममयं तदुममकरोत् कर्मशयायं तपः ।। ६८॥ तत्पऽस्त्यधुना प्रतापनिलय भिमकीर्तिमुनिः हेयादेयविचारपारुचतुरो भहारकोगांशुमान् । यस्योषधधारणादिममये पादोदविन्दूकर- जातान्येष शिगंमि धौतमलुराण्याशाम्यराणां नृणाम् ॥ ६९ ॥ ते तदानायपरंपराया मामीत्पुरो डौकनिनाम धेयः । तद्वामिन' केपिनुपामकाः म्युः मुरेन्द्रमामायुपमीयमानः ॥ ७० ॥ पापोतकवंशशंशितपदोन्नजन्माप्रमः भीमन्महालगावलाधननया दो. मुलाया भुपि । भामा डीविजापनिगमतिमारू स्पर्षशे रविः माणु माधुरितीह लोकपिदिनों पकतानो धनी ॥१॥ नम्गामनिह मूनय, कमभुरी वरिवारमशिना:- दुला करोय नाम जगमा तुरस्तिलोकारयः । সালসামিনা খাবা: लागि निजाययोगराधान: गुमा|७२।। भवाचम्म मुली कोपरगुगी यामाहमयाधिक नाधिनमन्दिर शुदमिर प्रानुक्रमममम । गटे नगर निगम माधवलयः - यशनुत्र मुगाबमम मम मागिनः ॥ १॥ , श्रीगरिपनि प्रकारकानी माना मिलीपाती লাগলগি বাসা বাঁধ।
१ --- कयामुग्पवर्णनम् । पार्याख्यायितविक्रम स्यशरणायायानधात्रीनुजां वैराटीयमहत्तरेवपि महत्मत्रायिनं यद्वचः ।। ७४ ।। उक्तभातृयुगावरोपि जननोपक्षीणहसोः क्रमान् सँवरेव गुणैर्वरस्तदुभयप्रोक्तोक्तिसंसूचितः । अन्यः कश्चिदपि प्रकर्षकरणलब्धावकाशो गुणे- नांना 'फामन' साम्यधर्मनिरतो जीयादुपतामणी ॥७५ ।। येनानन्तरिताभिधानविधिना सहाधिनायेन य- च्छमारामयशोमयं निजवपुः कतुं चिरादीप्सितम् । तन्मन्ये फलवत्तरं कृतमिद लम्ध्वाधुना मत्कविम् धेराटे स्वयमागतं शुभवशादमीशमलाइयम् ।। ७६ ।। प्रागज्ञायि महात्मनात्ममतिना यनैतदध्यक्षतः धर्मादेव मुखभितो यदसुखं प्रायोस्त्यधर्मादिति । तत्ताड्विदुपः कृपापरतया देशोपदेशद्वया- डाभट्टारकहेमचन्द्रविदिताम्राय धृतानात्मनः ।। ७ ।। मामान्यादवगम्य धर्मफलितुं ज्ञातुं विशेषादपि भक्त्या यस्तमपीपृच्छवृपचिर्नानाधुना फामन' । धर्मत्वं किमयास्य हेतुरथ किं माक्षात्फलं तत्त्यत स्वामित्व किमयेति मूरिरपदन सर्व प्रणुमः कवि ॥ ७८॥ धर्म: प्राणिदया तदर्थमय यत् मत्यप्रतादि सुटे यद्वाहत्प्रतिविम्यपूजनमत सत्पात्रदानादि यन् । सदेतुहिराप्तवागय फलं स्वर्गापवर्गप्रियो भव्यस्तत्पदभागुपासकमणे धर्म कुरुप्वादरान् ।। ७९ ॥ सत्य धर्मरमायनो यदि सदा मा शिक्षयोपमान 'स' पुलो "जनतो" इनिपातः । 1. पुस्ता " सत्कविः" निपाः' पुस्तक " माया "निपाठः विन्नु न मायः मनिमानि । r" " पुम्नक "मबावितो, इनिपार अपनसाः। "" पुस्तक यो " "सिपाटः । ६ उपमात् । A
लाटीसंहितायां-
~~~
1
मारोद्धारमिवाप्यनुमहतया स्वल्पाक्षरं मारयत् ।
आप चापि मृतिभिः सुटमनुच्छिष्टं नवीनं मह-
निर्माण परिधेहि सङ्घनृपतिः भूयोध्यवादीदिति ॥ ८॥
श्रुस्खेत्यादिवचःशतं मृदुरचिनिर्दिष्टनामा कवि
नेतुं यावदमोघतामभिमतं स्वोपक्रमायोद्यतः ।
तत्रत्यं जिनमन्दिर फविमनोदृग्गोचरं व्याहर-
तावशेति सहायतां गुरुवची द्रव्यादिलब्धानिय ॥१॥
उभेस्यतरस्थलादापढपावधिता मित्तयः
पशेम्तम्भममुद्धकोष्टघटिताः शालायतमः शुमाः ।
मध्ये स्याद्वरवैदिकोत्तमननु फूटोस्ति मन्येत्वह
वैगटस्य शिर.किरीटघटितं पैतारजनानां गृहम् ।। ८२ ॥
अनुपमारमग्न्यापूर्णवर्णावलीभि
लिंग्वितमनुजनागामर्समवस्वमारम् ।
ध्यजपमरमृगेन्द्रस्यासनावोगछत्रैः
ममयसरणशोभोदासि सदमत्र ।। ८३॥
चिचालीर्यदलीलियत्यिजगतामासष्टिसर्गक्रमा
दादेशादुपदेशनश नियतं श्रीक्षेमकीतः गुरोः ।
गुमांज्ञानवित्तिय विदुपस्ताल्पदेशादापि
वैराटम्य जिनालये लिपिकरानत्मायनामा यभूत ॥ ४ ॥
यत्र पायकमदयविनमही स्वर्गापठे पाशुना
म्यादादोपदमन्दवादविदितानिन्तिपत्राता।
निमन्याः शमिनातपानिमरतो, निर्दिधम्म्धनाः
श्रीवैराटपुराम्भनं जिनएनत्येन गंवण्यंते ।। ८५॥
पात्र यो मर्मनिरनियं सदापासिमः
वीयन्त भयमेरमानुमायनान्नादानि दानानि च ।
पूष्पन्ने जनविग्यशाप्रमुनयों यानिशं अयमे
रागिनाटय प्रतिदिन जीयारेण्या पर॥८६॥
कषानुवर्णनम् । इत्याधनेकगुणराजिविराजमान संप्रेक्षणीयमानिशं जगदीक्षणानाम् । सत्र स्थितः किल करोति कविः कषित्वं सर्द्धतामापे गुणं जिनशासनं च ॥ ८ ॥ इति श्रीस्यावादानयधपचगाविधाधिशारदविदन्मणिराजमहयि- रचितायां श्रावकाचारापरनामलाटीसहितायां सापुभी दूद्वात्मनफामनमनःसंरागारपिन्दाकाशनेक मात- पडमण्डलायमानायर्या कथामुखवर्णनं माम प्रथमः सर्गः। अथ द्वितीयः सर्गः। एतत्कथामुपरसे रसिकामणीयों दूदारमजी जयति फामननामधेयः । वैराटपहमहता महनीयकीर्ति- मोतकान्वयमयो गरिमारयुगानः ॥ १॥ म्याशीवाद। अहिंसा परमोधर्मः स्यादधर्मस्तदत्ययात् । मिदान्तः सर्वतन्त्राय सहिशेषोऽधुनोच्यते ॥१॥ मर्षमावरयोगश्य निवृतिप्रतमुध्यो। यो मपादिपरित्याग: सोनु तस्यैव पिरतरः ॥ २॥ मात सर्वतः कर्तुं मुनिरेष भमो महान् । तस्यैष मोक्षमार्गश्च भावी नाम्पस्य जानुमित अत: सारमना मम्पर पर्तव्यं तद धीधनः । हालाधे मरत्वेजोमन सूपिन्दररोपमे ॥ ४॥ हिमायनात ।
१८ लाटीसंहितायां- दुरवधानतया मोहात्प्रमादाद्वापि शोधितम् । दुःशोधितं तदेव स्याद् भयं चाशोधितं यथा ॥ २५ ॥ तस्मात्सद्रतरक्षार्थ पलदोपनिवृत्तये । आत्मम्भिः स्वहस्तैश्च सम्यगन्नादि गोषयेत् ॥ २६ ॥ यथात्मार्थ सुवर्णादिक्रयार्थी सम्यगीक्षयेत् । व्रतवानपि गृहीयादाहारं सुनिरीक्षितम् ॥ २७ ॥ मधर्मणानभिझेन साभिशेन विधर्मिणा । गोधितं पाचितं चापि नाहरेद् व्रतरक्षकः ।। २८ ।। नतु केनापि स्वीयेन सधर्मेण विधर्मिणा । शोधितं पाचितं भाज्यं सुज्ञेन स्पष्टचक्षुपा ॥ २९ ॥ मैवं यथोदितस्योचैर्विधासो व्रतहानये । अनार्यस्याप्यनार्द्रस्य संयमे नाधिकारिता ॥ ३० ॥ चलितत्वात्सीमश्चैव नूनं भावितक्षतिः । शैथिल्याद्धीयमानस्य संयमस्य कुतः स्थितिः ।। ३१ ।। शोषितस्य चिरात्तस्य न कुर्याद ग्रहण कृती। कालस्यातिक्रमाद्भूयो दृष्टिपूतं समाचरेत् ॥ ३२ ॥ केवलेनामिना पकं मिश्रितेन घृतेन वा। उपितानं न भुजीत पिशिताशनदीपवित ॥ ३३ ॥ तत्रातिकालमात्रत्व परिणामगुणात्तथा। सम्मृच्छचन्ते असाः सूक्ष्मा: ज्ञेयाः सर्वविदाज्ञया ॥ ३४ ॥ शाकपत्राणि सर्वाणि नादेयानि कदाचन। • प्रायकमांसदोपस वर्ननार्थ प्रयत्नतः ॥ ३५॥ तनावश्यं प्रसाः सूक्ष्माः केचित्स्युष्टिगोचराः । न यजन्ति कदाचित् शाकपत्राभयं मनाक् ।। ३६ ।। तस्माद्धमार्थिना नूनमात्मनो हितमिच्छता। आताम्बूलं दल सोग्यं मावकैदर्शनान्वितैः ।। ३७ ॥ मन अन्यतया । । नियाय । ३ वाभितम् । - मूटगुणाष्टकप्रतिपाटसप्तव्यसननिरोधवर्णनम् । रजन्यां भोजनं त्याग्यं नैष्ठिक-वधारिभिः । पिशिताशनदोषस्य त्यागाय महदुधमैः ।। ३८ ॥ ननु रात्रिभुक्तियागो नात्रोद्देश्यस्त्वया कचिन् । पष्टमंशकविण्यातप्रविमायामास्ते यतः ॥ ३९ ।। मत्यं सर्वात्मना तत्र निशाभोजनवर्जनम् । हेतोः किन्त्यत्र दिग्मोत्रं सिद्धं स्वानुभवागमात् ।। ४०॥ अस्ति कश्चिद्विशेषोत्र स्वल्पाभासार्थतोमहान् । मातिचारोऽत्र दिग्मात्रे तपातीचारवर्जिता ।। ४१ ।। निपिद्धमनमात्रादिस्थूलभोज्यं ते दृशः । न निपिद्धं जलाधव ताम्यूलायपि वा निशि ॥ ४२ ॥ तत्र ताम्यूलतोयादिनिषिद्ध यावदञ्जमा। प्राणान्तेऽपि न भोक्तव्यमोपधादि मनीषिणा ।। ४३ ।। न वाच्यं भोजयेदग्नं कश्चिदनिको निशि। अन्नतित्वादशक्यत्वात्पक्षमात्रात्मपाक्षिकः ॥४४॥ अस्ति तन कुलाचार' सैपा नाम्ना कुलफ्रिया । तां विना दर्शनिको न स्यानस्यानामतस्तथा ॥ ४५ ॥ मासमात्रपरित्यागादनस्तमितभोजनम् । प्रतं मर्वजधन्यम्यासदधस्तात्स्यादक्रियाः ॥ ४६ ।। नेत्यं यः पाक्षिक कश्चिद प्रताभाषादम्यवती। पक्षमात्रायलम्बी स्याहसमा नयाचरन ॥ १७ ॥ यतास्य पक्षप्राहित्वमसिद्ध षाधमम्भवान। लोपात्सयविदाक्षायाः साध्या पाशिवना कुतः ।। ४८ ॥ आज्ञा मयविदः सैव क्रियावान् श्रापको मतः । कश्चित्मर्व निकृष्टोपि न त्यजेत्म पुत्रक्रियाः ।। ४९ ॥ अन्यमात्रम् । १कम पुलाया: "श्यान्नम्यादानापनम्नया" इति पार हिन्दननामगधिषयम् ।
लाटीसंहितायां- उक्तेषु वक्ष्यमाणेषु दर्शनिकवतेपु च । सन्देहो नैव कर्तव्यः कर्तव्यो व्रतसंग्रहः ॥ ५० ॥ प्रसिद्ध सर्वलोकेस्मिन् निशायां दीपसग्निधौ । पतङ्गादि पतयेय प्राणिजातं सात्मकम् ।। ५१ ॥ नियन्ते जन्तवस्तत्र झम्पापातासमक्षतः । तत्कलेवरसम्मिश्रे तत्कुतः स्यादनामिपम् ।। ५२ ।। युक्तायुक्तविचारोपि नाति वा निशि भोजने । मक्षिका नेक्ष्यते सम्यक् का कथा मसकस्य तु ।। ५३ ॥ तस्मात्संयमवृद्धयर्थ निशायां भोजन सजेत् । शक्तितस्तचतुष्कं स्यादन्नाद्यन्यतमादि वा ॥ ५४॥ यत्रोपितं न भश्यं स्यादन्नादि पलदोपतः । आसपारिएसन्धानाथानादीनां कथात्र का ॥ ५५॥ रूपगन्धरसस्पर्शायलितं नैव भक्षयेत् । अवश्यं त्रसजीवानां निकोतानां समाश्रयात् ।। ५६ ।। धितकरसादीना भक्षणं वक्ष्यमाणत.। कालादर्वाक , ततस्तूद्ध न भयं तदभश्ययत् ।। ५७ ।। इत्येयं पलदोषस्य दिग्मानं लक्षणं स्मृतम् । फलितं भक्षणादस्य पश्यामि श्रृणुताधुना ॥ ५८ ॥ सिद्धान्त सिद्धर्मवतन् सर्वतः मर्यदेहिनाम् । मांसांशस्याशनादेव भावः संशितो भवत् ॥ ५९॥ न कदाचित् मृदुत्वं स्यायद्योग प्रतधारणे। द्रव्यती कर्मरूपस्य तच्छतरनतिकमात् ॥ ६॥ अनानिधना नूनमचिन्त्या यस्तुशक्तयः । न प्रतक्याः कुनयन् स्वभायोऽतकंगोचरः ॥ ६१ ।। अयम्कान्तोपलायएसूचीपत्तद्वयोःपृथक । अस्ति शटर्षिमावास्या मियो अन्धादिकारिणी ॥ ६२ ।। .
मृगरिपारगममननिगेनन् । नवाग्यमरिप्रिवरं परतुवाममवारणम् । धनरादिविषाणामिन्द्रियापदनान ॥ ६ ॥ उमंच। पारनुपाप गुगदोपतर्निमित्तमम्यन्तरमाइताः । अध्यागतम्य भूतगम्पन्तरं पंपलमायल ते ॥३॥ पर मांगासनालापाडय मंमिता भषेन। मम्मादमानन्ध ज्यानतो आन्तिरततोऽमुखम ॥ ४ ॥ एनन परिमाय भदाय ष मुरमुंह। सतो पिरम कार्य थायधमवदिभिः ॥ ६५ ॥ मचं सतवनम्नस्य पध्म्यतीचारपर्जनम् । यम्यागेन भवाछुट पायको मावावर्णवन ।। ६६ ॥ वकतानयुगाय माइनान्मएमुच्यते । शानाधातिहेतुत्वालयादवकारणम ॥ ६ ॥ भङ्गादिफनधनर परमारिफलं च यत । माननादतुग्न्यद्वा सर्व मघवदीरितम ।। ६८॥ एयमित्यादि यातु मुरेव मदकारकम् । नप्रिगिल त्यीमान श्रेयमे ह्यात्मना गृही ॥ ६९ ॥ दोषत्व प्राग्मतिभंगग्ननोमिध्यायबोधनम् । गगादयस्ततः फर्म तनो जन्मशता ॥ ७० ॥ गिमात्रमा व्यापान सावन्मात्रैकहतुनः । व्याग्याम्यामः पुगे ध्यामानतायसरे वयम् ।। ७ ॥ माभिक मश्रिकानां हिमांमास्क पीडनोग्यम् । प्रमिदं मर्यटोके स्यादागमेप्यपि मूचितम् ।। ७२ ।। न्यायानइक्षणे नूनं पिशिताशनदूषणम् । श्रमारना मक्षिका यम्मादामिपं तत्कलंघरम् ।। ७३ ॥ . उन्मादारणानू । सौरमधम् । तिनः । 'क' पुस्तके "दयम्" इनिराठः।
साटीमंहितायां-- किञ्च तत्र निकोतादिजीवाः संसर्गजा क्षणान् । सन्मूछिमा न मुधन्ति तत्सहं जातु व्यवन् ।। ७४ ॥ यथा पकं च शुष्कं वा पलं मुद्धं न जातुचित् । प्रामुकं न भवेत्कापि नित्यं माधारणं यतः ॥ ७५ ॥ अयमों यथानादि कारणामामुकं भवेत् । शुष्कं याप्यमिपक वा प्रासुकं न तथामिपम् ।। ७६ ॥ प्राग्यदायतीचाग सन्ति फेचिन्त्रिनागमात् । यथा पुष्परस पीत पुष्पाणामासयो यथा ॥ ७॥ उदुभ्यरफलान्येय नादयानि हगारमभिः । निल माधारणान्यय प्रसाराश्रितानि च ।।७८॥ अनोदुग्यरशदस्तु ननं स्यादुपलक्षणम् । सन माधारणाम्याग्या ये वनस्पतिकायिकाः ॥७९॥ उसंचा मूलागधारयोआ माहा नह मधदयाहा । मामुन्यमा य भगिया पनयागतकाया य ॥ ४ ॥ , गाय: ---कवनम्पलानी कदम्य या मरम्य पाशमायामा मनपान का लापरलतम चरम पति ने अनन्त जीवाः मम्मीषा निगोहना महिन' पानालय ये ल । पुनः ये काम ना अपमान II- III. Miian मले योन ने भरपीना मद, अप पीन में अपनी ना. आर्यकोदी यादयः । . मा । श्रीन जोनामा समादरः । कमो नेशन' लिगमादर । यो बीने तामा rwire बान (५ थी - E ARRYमः | argi waar Kari माननिदाय': । १५1 2 # न.१५ । ने PE":"harana hai arrail यन Aarti } enfn..माया।
मूलगुणाटकप्रतिपाटसाप्तव्यसननिरोधवर्णनम् । ३ साहारणमाहारं साहारणमाणपाणगहणं च। माहारणजीवाणं साहारणलक्सणं भणियं ।। ५॥ जत्येवमरद जीयो तत्थ दु मरणं हवे अगंताणं । घंकमह जत्थ इको धकमणं तत्थ ताण ॥६॥ मूलजा यथाप्रोक्ता फलकावाटकादयः । न भक्ष्या वयोगाद्वा रागिणाप्योपधन्छलान ।। ८०॥ सक्षणे महापाप प्राणिसन्दोहपीडनान । सर्वशाशावलादेतहनीय हगदिभिः ।। ८१ ॥ ननु फेनानुमीयत हेतुना पक्षधर्मता। प्रत्यक्षानुपलब्धित्वानीवाभावोषधार्यते ।। ८२ ।। मैवं प्रागेय प्रोक्तत्वात्म्वभायोऽतकंगोचर । तेन सर्वविदाक्षाया म्बीकर्तव्य यथोदितत् ।। ८३ ॥ नन्यस्तु सत्तदाज्ञाया पृष्ठुमीडामहे परम् । यदेकानशरीराणां भक्ष्यत्वं प्रोक्तमहता ।। ८४ ॥ १ यत्माधारणनाममंदियशस्यनन्त जीवाना उत्पन्नपथमसमये आसपोनि. मकार्यबाहारवाणायानपुदयस्कन्धाना बलामभागपरिणाम माधारणमा समकाल प भवति । नया रपयामि नलायचाहारपणापालपदरावधानो शरी परिणम इन्द्रियायानि मला घ यांनादन्द्रिपाकापरिणमनम् । आनपान पनि नकार्य प उधामनियमपण । मारणं समकाल एमति । Fध, प्रथममम योरमानामिक व आगो नियादिसमयोपनानामापनन्नानाननीपानी पूर्वपूर्वममयोत्पन्नानामनन्नानन्न नाचे आपल्यादिष : सदृशं समकार्ट चमति । तदिदं साधारणरक्षण मणितम् । नियमाइनन्तसम्यारिसमाना नापानगोद संधान दानाति निदानला जीरा निगोदा युप्पते। अथवा नियताना अनन्ताननजीवाना एका सा भूमि सेत्र निरास सामान निगोद मन् शरीर पेज ने निगोदा । लोग्रामनिशा अदा जन्म सारा अगदावार मरण पनि । २ पराधिपने जीपः मनु मरणं भवेत्र अनन्नानाम पामते यत्र एक समर्ण अनलामाम। आगमनम-जम्म । -रिपारगोषमता -
टाटीसंहितायां-
सत्यं बहुवधादन भक्ष्यत्वं नोक्तमहता।
कुतश्चित्कारणादेव नोलंध्यं जिनगासनम् ।। ८५ ।।
एवं चेत्तत्र जीवाम्ते कियन्तो यद कोविद ।
हेतोर्यदत्र सर्वरभक्ष्यत्वमुदीरितम् ।। ८६ ।।
घना गुलामख्यभागभागेकं नद्वपुः स्मृतम् ।
तत्रैकस्मिन् गरीरे स्युः प्राणिनोऽनन्तमक्षिताः ।। ८७ ।।
उक्तंच।
एयणिगोयसरीरे जीवा दव्यापमाणदो दिहा।
सिद्धेहिं अणंतगुणा सत्र्येण वितीदकालेण ॥ ७ ॥
इदमेघात्र तात्पर्य तावन्मात्रावगाहके ।
केचिन्मियोवगाहा स्युरेकीभावादियापरे ।। ८८ ।।
उक्तंच।
जंबूदीये भरहे कोसलमाकेय तग्घरायं च ।
संधंडर आवामा पुलविसरीराणि दिहंता ॥ ८ ॥
एतन्मत्वार्हता प्रोक्तमाजवंजवभीषणा।
कन्दादिलक्षणत्यागे कर्तव्या मुमतिः सती ।। ८९ ।।
रवमन्यदपि त्याज्यं यत्साधारणलक्षणम् ।
साश्रितं विशेपेण तद्वियुक्तस्य का कथा ॥ ९०॥
धारणं च केपांचिन्मूलं स्कन्धस्तथागमान् ।
खाः पत्राणि पुष्पाणि पर्वदुग्धफलानि च ।। ९१ ।।
न व्यस्तानि केपांचित्समस्तान्यथदेहिनाम् ।
नमूलानि सर्वाणि ज्ञात्वा सम्यक् परित्यजेत् ।। ९२ ॥
-माधारणास्ता मूलकाश्चाद्रकादयः।
पापप्रदाः सर्वे मलोन्मूल्या गृहियतः ॥ ९३ ॥
चपत्रपयः पर्व सुर्यमाघारणा यथा।
पार्कदुग्धं माघारणं मतम् ॥ ९४ ॥
b मुगुणायप्रतिपसननिरोधवर्शनम् । पुषसाधारणा फेषित्करीरशपादयः । पर्षमाधारणायुदण्ड साधारणामाः ॥ ९५ ॥ पालमाधारण ख्यात प्रतोदुम्बरपनम् । मायामाधारणा स्याता कुमारीपिपडफादयः ॥ ९६ ॥ मुंपलानि च मर्वेपा मृदूनि च यथागमम् । मन्ति माघारणान्यव मोनकालावधेरधः ॥ ९ ॥ माकाः माधारणा कंचित्कंचित्प्रत्येकमूर्तय । षल्य साधारणा काश्चित्काभित्रोककरः स्फुटम् ॥ ९८॥ सत्स्वरूप परिक्षाय कर्नव्या विरतिस्ततः । उत्सर्गात्मयतस्त्यागो यथाशक्त्यापवादत' ।। ९९॥ शक्तिको विरती चापि वियंकः साधुरात्मनः । निर्षियेकात्कृतं कर्म विफलं पाल्पफ्लं भवेत् ।। १० ॥ कदाचिन्मनोऽज्ञानार्दुदैवानिर्विवकिनाम् । वकवलमनर्धाय कृतं कर्म शुभाशुभाम् ॥ ११ ॥ ययात्र धेयमे केचिद्धिमा कुन्ति कर्मणि । अज्ञानात्म्वर्गहेतुन्च मन्यमाना' प्रमादिनः ।। १०१॥ मवश्यं सरकामेन भवितव्यं विकिनाम् । देशी वस्तुमरयाया शफिनो प्रतधारिणा ॥१०॥ विवेकण्यावकामोम्नि देशतो विरतावपि । आदेयं प्रामुकं योग्य नादेयं तद्विपर्ययम् ॥ १०४॥ न प म्वात्मच्छया किंचिदानमादयमेव तन् । नातं यत्सदनादेय भान्तोन्मत्तकवाक्यषन् ॥ १५॥ नग्मावत्प्रामुकं शुद्धं नुन्धहिमाकरं शुभम् । म त्यक्तुमराफ्यन प्राहा तसचिदपशः ॥ १०६५ दुषमयोगान् । २ मिनिसमाहोन । ३ मृट्टोनम् ।
लाटीसंहितायां- ANNARMea +m- M यावत्साधारणं त्याज्यं त्याग्यं यावत्रसाश्रितम् । एतत्त्याग गुणोवश्यं संग्रह स्वल्पदोपता ॥ १० ॥ ननु साधारणं यावत्तत्मवं लक्ष्यते कथम् । सत्यं जिनागमे प्रोक्तालक्षणादेव लक्ष्यते ।। १०८ ।। तल्लक्षणं यथा भङ्गे समभागः प्रजायते । तावत्साधारण शेयं शेपं प्रत्येकमेव तत् ।। १०९॥ तत्राप्यत्यल्पीकरणं योग्यं योगेषु वस्तुपु । यतस्तृष्णानिवृत्यर्थमेतत्सर्व प्रकीर्तितम् ।। ११०॥ इति संक्षेपतः ख्यातं सान्ना मूलगुणाष्टकम् । अर्थादुत्तरसंज्ञाश्च गुणा:स्युगुदमेधिनाम् ॥ १११ ॥ तांस्तानवसरे तत्र वक्ष्यामः स्वल्पविस्तरात् । इतः प्रसङ्गतो वश्ये तत्सप्तव्यसनोज्झनम् ॥ ११२ ॥ द्यूतमांससुरावेश्याखेटचौर्यपराङ्गनाः । महापापानि सप्तेति व्यसनानि त्यजेद्बुधः ॥ ११३ ।। अक्षपासादिनिक्षिप्त वित्ताजयपराजयम् । क्रियायां विद्यते यत्र सर्व द्यूतमिति स्मृतम् ।। ११४ ।। प्रसिद्ध द्यूतकर्मेदं सद्यो वन्धकर स्मृतम् । यावदापन्मयं ज्ञात्वा त्याज्यं धर्मानुरागिणा ॥ ११५ ।। तत्र यः कथाः सन्ति यूनस्यानिष्टसूचिकाः । रतास्तत्र नराः पूर्व नष्टदा धर्मसुतादयः ॥ ११६ ।। श्रूयते दृश्यते चैव द्यूतस्यैतद्विजृम्भितम् । दरिद्राः कर्तितोपाड़ा नराः प्रास्ताधिकारकाः ।। ११७ ॥ न याच्यं धूतमा स्यादेकं तद्व्यसने मना । चौर्यादि सर्वव्यसनपतिरेप न संशयः ।। ११८॥ उसागुणान् । ३ फलम् ।
मूलगुणाटवप्रनिपाठसप्तत्र्यमन निरीश्वर्णनम् । विद्यन्तंत्राप्यतीचारास्तासमा इय केन । जैतन्यान्तपि घरमार्गे लमः प्रत्यप्रयुद्धिभिः ॥ ११९ ॥ अन्यान्यस्थपया यत्र विजिगीपादयोरिति । व्यवसायाईते फर्म शतातीचार इप्यते ।। १२०॥ यथा धावयाम्यत्र यूयं पाप्यत्र धावत । पदातिरिकं गच्छयं त्वत्तो गृहामि मितम् ॥ १२१ ॥ इत्येवमादयोप्यन्ये पूतानांचारमंशिकाः । क्षपणीया क्षणादव नत्यागान्मुनरः ।। १२२ ।। मामम्य भक्षणे दोषा प्रागवान प्रपश्निता. । पुनरुक्तभयाच्या नीता नादशमीक्रयाम् ।। १२३ ।। कर्म सत्र प्रवृत्तिः स्यादासपिय॑मनं महत् । प्रवृनियंत्र म्याग्या स्यादासतम्नत्र का फया ॥ १२४ ॥ मेरेयमपि नादेयमित्युक्त प्रागिता यतः । सतोय वक्तव्यतायां पिष्टपेपणदृषणम् ॥ १२५ ।। प्राग्यदा विनेपास्ति महान यविवक्षित. । मामान्यलक्षणाभाय तदिशेपर्वतियथा ॥ १२६ ।। प्रवृत्निस्तु क्रियामानमाक्तिय॑मनं महन् । त्यवाया तत्प्रवृनी 4 का कथा मक्तिवर्जन ।। १२७ ।। तलं पहुनोतन तद्न्धोऽवद्यकारणम् । स्मृतमात्र हि तन्नाम धर्मध्वंमाय जायते ॥ १२८ ॥ पण्यत्री तु प्रसिद्धा या वित्तार्थ सेवते नरम् । तन्नाम दारिका दामी वश्या पत्तननायिका ।। १२९ ॥ वत्त्यागः मर्वतः श्रेयान श्रेयाथ यतेतां नृणाम् । मद्यमांसादिदोषान्वै नि पान त्यक्तुमिच्छताम् ॥ १३॥ आस्तां तत्मगमे दोपा दुर्गनी पतनं नृणाम । इहव नरकं नूनं वेश्याव्याससचेतसाम ।। १३१ ॥ विना । २ अधिन् । मदम् । र हानि.। ५ यत्नावताम् ।
२८ घाटीसहितायां-- APAN AAVM. NA या ग्यादन्ति पलं पियन्ति च मुगं अल्पन्ति मिथ्याययः । स्निह्यन्ति द्रविणार्थमेव विदधत्यर्थप्रतिष्ठाक्षतिम् । नीचानामपि दूरवकमनमः पापारिमका कुर्वते । लालापानमहानिशं न नरकं वेश्यां विहायाऽपरम् ॥ ९॥ रजकशिलासहशीभिः कुक्कुरकपरममानचरिताभिः । वेश्याभिर्यदिसतः कृतमिव परलोकवार्ताभिः ॥ १० ॥ प्रसिद्ध बहुभिस्तस्यां प्राप्ता दुग्यपरंपराः । श्रेष्ठिना चामदत्तन विख्यातन यथा परा: ॥ १३२॥ यावान् पापभरो यादग्दारिका दरिकर्मणः । कविनापि न वा तावान कापि वक्तुं च शक्यते ॥ १३३ ।। आस्तां च तद्रतादव चित्रकादिरजो नृणाम् । नारकादिगतिश्रान्तयेद दुख जन्मजन्मनि ॥ १३४ ।। न वाच्यमेकमेवैतत्तावन्मात्राल्पदोपतः । द्यूतादिव्यसनासक्तः कारणं धर्मध्वंसकृत् ।। १३५ ॥ मुगमत्वाद्धि विस्तारप्रयासो न कृतो मया। दोपः सर्वप्रसिद्धोत्र वायंदूकसया कृतम् ॥ १३६ ।। सन्ति तत्राप्यतीचाराश्चतुर्थप्रतवर्तिनः । निर्देश्यामो वयं तांस्तान तत्तत्रावसरे यथा ॥ १३७ ।। ख्यातः पण्याङ्गनात्यागः संक्षेपादक्षप्रत्ययात् । आखेटकपरित्यागः साधीयानिति शस्यते ।। १३८॥ अन्तर्भावोस्ति तस्यापि गुणाणुव्रतसंज्ञके । अनर्थदण्डयागाख्ये बाह्यानर्थक्रियादिवत् ॥ १३९ ॥ तत्तत्रयसरेऽवश्यं वक्ष्यामो नातिविस्तरात् । प्रमवावा तत्रापि दिग्मा पक्तुमर्हति ।। १४० ॥ , अतिवकृतया। २ अतिशयेन साथ पमिद्वन्यात् । -- मूदगुगाष्टकमतिपाटनमध्यसननिरोधवर्णनम् । ननु पानदण्डास्ति भागादन्यत्र या:क्रियाः । आत्मानन्दाय यकर्म हत्कथं म्याचविधम् ॥ ११ ॥ यया सचदन योपिदम्राभरणभोजनम् । मुग्गध सर्ववतमथावटक्रियापि च ।। १४२ ॥ मेवं सांत्रानुभागस्य यन्ध प्रमादगारयान् । प्रमादस्य निवृत्यर्थ स्मृतं प्रतकदम्ययम ।। १४३ ॥ मृचंदनवनितादी क्रियाया वा मुग्याप्तये । भोगमावा मुख वत्र हिमा स्यादा पट्टिकी ।। १४४ ।। आरपटके तु हिमाया. भावः स्यारिजन्मिनः । पथावानुयांगन भोग स्याद्वा नवा चित् ॥ १४५ ।। हिमानन्दन तनावद्रध्यानेन प्राणिनाम् । नारकस्यायुपी पन्ध, स्यानिर्दिष्टो जिनागमे ॥ १४६ ॥ ततोयश्यं हि हिंसायां भावश्वानर्थदण्डक.। त्याज्य प्रागेव मर्वेभ्य मंगेभ्य प्रयत्नतः ॥ १४७ ।। सत्रावान्तरम्पम्य मृगयाभ्यासकर्मण. । त्यागः श्रयानवय स्यादन्यथाऽमानयन्धनम् ॥ १४८।। अतीचारास्तु तत्रापि मन्ति पापानुयायिनः । यानपास्य प्रतिकापि निर्मली भवति ध्रुवम् ॥ १४९ ॥ कार्य विनापि क्रीडाथ कातुकार्थमथापि च । कर्तव्यमटन नव यापीकूपादिवममु ॥ १५ ॥ पुष्पादिवाटिकासूधर्वनेपूपवनेषु च । सरितडागक्रीडादिसरःशून्यगृहादिषु ।। १५१ ॥ गम्याधिष्ठानक्षेत्रषु गोष्ठीनप्यन्यवेममु । कारागारगृहेपूधर्मठंधु नृपवैश्मसु ।। १५२ ॥ 1 अनर्थदण्टाम्यम् । १ प्रमोट्रया । ३ चसमारिणः । ४ स पुस्तक 'मारकस्य युनांवन्धः" इनिपाठः । A
१०
लाटीसंहिताया-
.
एवमित्यादिस्थानेषु विनाकार्य न जातुचित् ।
कौतुकादिविनोदार्थ न गच्छेन्मृगयोज्झितः ।। १५३ ॥
तस्करादिविधातार्थ स्थानेषु चण्डभीरपु ।
योध्दुमुत्मुकभूपादियोग्यामु युद्धभूमिषु ॥ १५४ ॥
गीतनादविवाहादिनाट्यशालादिवेश्मए ।
हिमारम्भेषु कूपादियननेषु च कर्ममु ।। १५५ ।।
न कर्नव्या मतिधार स्वनमात्रे मनागपि ।
केयलं कर्मयन्धाय मोहस्यैतद्धि स्फूर्जितम् ॥ १५६ ।।
गन्छन्नयात्मकार्याथ गन्छे भूमि विलोकयन् ।
युगदमा दशा मम्यगोर्यासंशुद्धितिये ॥ १५७ ॥
नत्र गच्छन्न छिन्द्वद्वा तापर्णफलादिकान ।
पन्यां दोभ्यां न कुर्यात जलम्फालनकर्म प ॥१५८ ॥
गगदिपरिभपं प्रस्तभूमिकुहनम् ।
इतस्ततोऽटनं धापि क्रीडापूर्दनकर्म च । १५९ ॥
हिमोपदेशमित्यादिन कुर्वीत विचक्षणः ।
प्रारूपयामिवारूढ मयतोगधंदण्डमुः ॥१६॥
স্বাঝা মৃধার নারাননি।
अगलवाऽत्रतादीना प्रतादीनां महोदर. ॥ १६॥
अथ पायथ्यमनस्य स्याग श्रेयानिति स्मृतः ।
नृतीयाशुप्रतम्यान्नमायो पापत्र धिनः ॥ १२॥
नां यया मूत्र निर्दिष्ट पूर्वमूरिभिः ।
यासादानं सस्तयं नयविवर्जितः ।। ११३॥
यमनं गानादिः प्रालियां नहर।
यता प्रमादिना शुद्ध परित्यानुमाया ॥१६॥
मनाइयगनं ननं निषिद्ध गृह मेधिनाम ।
मंमारपीनामामुमषिमाम् ॥ १९५॥
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३२
लाटीसंहितायां-
ran
देवशाबगुरुन्नत्वा बन्धुवर्गात्ममाक्षिकम् ।
पत्नी पाणिगृहीता स्यात्तदन्या घेटिका मता ॥ १८ ॥
सत्र पाणिगृहीता या सा विधा लक्षणाद्यया।
आत्मज्ञानिः परज्ञाति: कर्मभूमडिसाधनात् ॥ १७९
परिणीतात्मज्ञानिश्च धर्मपलोति सैव च ।
धर्मकार्य हि सध्रीची यागादी शुभकर्मणि ॥ १८० ।।
सूनुस्तम्या समुत्पन्न पितुर्धर्मेधिकारवान् ।
सः पिता तु परोक्षः स्यावात्प्रत्यक्ष एवं वा ॥ १८१ ।।
स. सूनुः कर्मकार्येपि गोत्ररक्षादिलक्षणे ।
सर्वलोकाविरुद्धत्वादधिकारी नचतरः । १८२
परिणीतानात्मज्ञातियां पितृसाक्षिपूर्वकम् ।
भोगपनीति मा शेया भोगमात्रैकसाधनात ॥१८३॥
आत्मज्ञाति परशातिः मामान्य पनिता तु या ।
पाणिग्रहणशून्या चेचेटिका सुरतप्रिया ॥ ८४॥
पेटिका भोगपत्नी पयो गागमायनः ।
लौकिशोक्तिविशेपोपि न भेद पारमार्धिकः ।
भोगपत्नी निषिद्धा स्यात्मवनी धर्मदिनाम् ।
प्राणस्याविशेपेपि दोपो भेदस्य सम्भवाय ॥८६॥
अस्ति दोपविशेषोऽय जिनदृष्टय फलन ।
ये दास्याः प्रसन्न यमपापसंचय. ॥ १८ ॥
भाषेषु यदि शुगरकं हेतुः पुण्यार्जनादिषु ।
एवं वनुग्वभावत्यात्तदनात्तद्धि नश्यति ॥ १८८॥
उक्तंच।
मुनिरय हि जानाति ट्यायोगज गुणम् ।
मक्षिका धमनं कुर्यात्तहिद दिवासिनी ॥११॥
ननु यथा धर्मपल्या येव दाम्यां गिय गा।
विशेगनुपलबध कथं भेदोवधायने ॥ १८५॥
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लाटीसंहितायां- w- अम्याः मेमगरलायामिगिने नरि बैरिभिः । साराधनया दण्डो नृपादियो भोदभुषम् ॥ २०२।। फानना वरन्गेयं गृहोनेषा स्थलमणात् । पादिभिगृहीतत्याघ्रीनिमार्गानतिकमान् ॥ २० ॥ पियानो नीनिमागोंयं स्यामी स्थाजगतो नृपः । सनु यार न स्वामी नाय यामी महीपतिः ।। २०४॥ गन्मय होना मा पिसाराहनापि या। या मेमगनी भीनिजागते न नृपादितः ॥ २५॥ तन्मने विरोरी गृहीनागृहोनभदतः । मामायापनिता या पारगृहीनानागतः ॥ २०६ ।। एग परिमाय पानुभूनिगमभन । गगानागु नादिया पुद्धिधाधनशालिभिः ॥ २०७॥ निषिद्वानि मा लोकतानी गहिना। गा अंगणी सोन्याची मोकदरहितरिणाम् ।। २०८ ।। लाय या पापा पनि तृष्णापशालये। विमला ना पदोपविध्यमिनीम् ॥ २०॥ प्रानकवी नया पाभीमालामा। जापानमा नमिहामुत्र वा ॥२१॥ पालन पनगापिचन । गगाममा jिiinfoया ॥ ११ ॥ are RTR भारतीयानुदिनाम् । जान पानाaat 2014 जनमत जापानamil प्रभावानुमागामिfrom LETTER १. मान सम्माRArifigar | m॥
३ AM सम्पग्दर्शनमामान्यलक्षणवर्णनम् । वतः क्षुनविनामः स्याद्वपुःकाश्यं तनो भवेन् । ततः स्यादुद्यमाभावस्तनः स्याद्रविणक्षतिः ।। २१५ ॥ 'उपहास्यं च लोकस्मिन् ततःशिष्टेवमान्यता। इंगिते राजदण्डः स्यात्मयम्पहरणात्मकः ॥ २१६ ॥ भवद्वा मरणं मोहाइन्यत्रीलीनचेतसः । चित्रं किमत्र रोगाणामुद्भवोपि भवेद् धुवम् ।। २१७ ।। यद्वाऽमुत्रेद यदुवं यावद्यादा च दुःम्महम् । अन्यत्रीव्यमनामक्तः सर्व प्राप्नोति निश्चितम् ॥ २१८ ॥ अम्मदीयमतं घेतद्दोपवित्तादि मुश्चनि । न मुखति नथा मन्दो मानदोपोपि मधी ।। २१९ ।। इतिश्री स्याद्वादानवद्यगद्यपधविद्याविशारदविन्माणेराजमाल विरचितायां श्रावकाचारापरनाम लाटीमंहितायां मापुश्री दूदारमन फामनमनःसरोजारविन्दविकाशनकमाण्ड मण्डलायमानायां दर्शनपतिमा महाधिकारमध्ये मूलगुणा कमतिपाल मतव्यसनरोधयणनी माम द्वितीय सर्गः। अथ तृतीयः सर्गः। दूदाट्सनः फामननामधेयः स्वराधेश्मालदीपः। जीयात्रिनेशांहिसरोरहाल- रम्य कथायर्या रसिकायमः ॥१॥ त्यापदः। मम्यपरवं दुर्लभं टोके सम्यक्त्वं मोक्षसाधनम् । मानधारित्रयायं मूलं पवरोरिव ॥१॥ जाने सति । भुटा +- --
लाटीसंहितायां-
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तंदव सत्पुरुषार्थस्तदेव परमं पदम् ।
तदेव परमं ज्योति: तदेव परमं तपः ॥२॥
तदेवेष्टार्थसंसिद्धिस्तदेवास्ति मनोरयः ।
अक्षातीतं मुखं तत्स्यात्तत्कल्याणपरंपरा ॥३॥
विना येनात्र संसार भ्रमतिरम शरीरभाक् ।
भ्रमिष्यति तथानन्तं कालं भ्रमति संप्रति ॥ ४॥
अपि येन विना ज्ञानमज्ञानं स्यात्तदज्ञयत् ।
चारित्रं स्यात्कुचारित्रं तपो बालतपः स्मृतम् ॥ ५॥
अनातिविस्तरेणालं कर्म यावच्छभात्मकम् ।
सर्व तत्पुरतः सम्यक् सर्व मिथ्या तदत्ययात् ।। ६१.
तब तत्त्वार्थश्नद्धानं सूत्रे सम्यक्त्वलक्षणे ।
प्रामाणिकं तदेव स्याच्छ्रुतकेयलिभिर्मतम् ॥ ७ ॥
तत्त्वं जीवास्तिकायाद्यास्तत्स्वरूपोर्थसंज्ञक ।
श्रद्धानं चानुभूतिः स्यात्तेपामेवेति निश्चयात् ॥ ८॥
सामान्यादेकमेवैतत्तद्विशेषविधेर्द्विधा ।
परोपचारसापेक्षाद्धतोद्वैतवलादपि ॥ ९॥
तद्विशेषविधिस्तावनिश्चयाब्यवहारतः ।
सम्यक्त्वं स्याद्विधा तत्र निश्चयश्चैकधा यथा ॥ १०॥
शुद्धस्यानुभवः साक्षाजीवस्योपाधिवर्जितः ।
सम्यक्त्वं निश्चयान्नूनमर्यादेकविधं हि तत् ॥ ११ ॥
उक्तंच।
दर्शनमात्मविनिश्चितिरात्मपरिज्ञानमिष्यते बोध ।
स्थितिरात्मनि चारित्रं कुत एतेभ्यो भवति बन्धः ॥ १॥
व्यवहाराच सम्यक्त्वं ज्ञातव्यं लक्षणाचथा।
जीवादि सातत्यानां भद्धानं गादमव्ययम् ॥ १२॥
मम्यग्दर्शनमामान्यलक्षणवर्णनम् । ३ ------ उक्तं च। जीवादीमद्दणं मम्मचं सेसि मधिगमो गाणं । रायादीपरिहरणं चरणं एमो हु मोक्रपहो ॥२॥ यद्वा व्यवहते पाच्यं स्थूलं मम्यक्त्वलक्षणम् । आमामागमधर्मादिश्रद्धानं दुपणोरिलतम ।। १३ ।। उन। नास्ति घाईत्परा देवो धर्मोनास्ति दयापर' । तपःपरं च नन्थ्यमेतत्सम्यक्त्वलभणम ॥ ३ ॥ तुतापि द्विधादिष्टं मम्यवत्वं लक्षणाचथा । तनिसर्गादधिगमादित्युक्तं पूर्वसूरिमि ॥ १४ ॥ निमर्गस्तु म्यभायोक्ति सोपायोधिगमो मतः । अर्थोयं शब्दमात्रग्वादर्थव मूच्यतेऽधुना ।। १५ ।। नाना मिथ्यात्वकमकमस्ति मिद्धमनादितः । मम्यक्त्योत्पत्तिवेलाया द्रव्यनम्तत्रिधा भवेत् ।। १६ ॥ अधोऽपूर्वानिवृत्त्याख्यं प्रमिदं करणत्रयम् । फरणान्तर्मुहूर्तम्य मध्ये त्रेधाम्ति नान्यदा ।। १७ ॥ उच। तण कोदवं वा पदमुवममसम्मभाव जंतेण । मिघ्यायं तु तिहा असंगगुणहीण दय्यकमा ॥४॥ विधाभूतग्य नायविरेवं मिध्यावकर्मणः । भेदाणयानुष्यं च स्यादनन्नानुबन्धिनः ॥ १८ ॥ एनत्ममुदितं प्रोक्त दर्शनं मोहममकम् । प्रागुपशममग्यवत्वं तत्मापनमो भवेत् ।। १९ ।। उनच। पदम पढमे मियदं पदम विदियं प सम्ववाली। पुण जिलाMarh. गाय मम्मचो का दाटीसहितायां- निमर्गेऽधिगमे यापि सम्यक्त्वे तुल्यकारणम् । हम्मोहसप्ताम्य स्यादुमयाभावसंज्ञकः ॥ २० ॥ उक्तचा सत्तण्हं उपसमदो उवसमसम्मो खयादुसइओय । विदिय फसाउदयादो अमंजदो होदि सम्मो सो ॥६॥ किन्नु सत्यन्तरङ्गेम्मिन् हेतावुत्पद्यते च यत । नैमार्मिक हि सम्यक्त्वं विनाशादि हेतुना ॥ २१ ॥ यत्पुनश्चान्तरहस्मिन सति तो तयाविधि । उपशादिसापेक्ष म्यादधिगमसंशकम् ॥ २२॥ या निमिसमप्राप्ति केषामिहिम्मदर्शनम् । अहतामितरेषां तु जिनमहिमदर्शनम् ॥ २३ ॥ धर्मप्रयणमे केप या देवर्द्धिर्शनम् । जानिम्मरणमे केषां यदनामिभयस्तथा ।। २४ ॥ খামাখি খয। যিশনা আইন:। मम्यश्त्यप्रथमोत्पत्तायन्तरद्रानतिक्रमाम् ॥ २५ ॥ आयना नूनमग्नि सम्याहात्मनः । जिनात भरपात्यत्र जीयामयं यथास्थितम् ।। २६ ॥ नोदिशामु विरागी जीव धायरे नगपामि । जो मादति निणुभ मम्मासी अविरदी गो ॥ ७॥ नमः किमनावानस्ति किंवाऽपन्यतः । लायन येन महाटिलनगनाभितः पुमान ।। २७॥ अगाविसमागि मनि मम्याडमान्मनः । मस्यायनादिनाभ मंशन मुटकः ॥ २८॥ सद Traveen ETutni मो॥ NAAMKARAN सम्यग्दर्शनसामान्यलक्षणवर्णनम् । ३ ९ उक्तमाक्षं सुसं झानमनादेयं दृगात्मनः । नादेयं कर्मसर्वस्वं तद्वदृष्टोपलब्धितः॥२९॥ सम्यक्त्वं वस्तुतः सूक्ष्मं फेवलमानगोचरम् । गोचरं पारपिस्वान्तपर्ययशानयोद्वयोः॥३०॥ न गोचरं मतिज्ञानभ्रुतविज्ञानयोमनाक । नापि देशायधेस्तत्र विषयानुपलब्धितः ।। ३१ ।। अस्त्यात्मनो गुणः कश्चित्मम्यक्त्वं निर्विकल्पकम् । तग्मोहोदयान्मिध्यारवादरूपमनादित ॥ ३२॥ देषात्कालादिसंलब्धौ प्रत्याममे भवार्णरे । भव्यभावविपाकाद्वा जीव' सम्यक्त्वमर्नुते ॥ ३३ ॥ प्रयत्नमन्तरेणापि दृग्मोहापशमो मवेत् । अन्तर्मुहूर्तमानं च गुणश्रेण्यननिक्रमात् ॥ ३४ ॥ अस्त्युपशममम्यक्त्वं सम्मोहोपशमाद् यथा । पुंसोऽवस्थान्तराकारं नाकारं चितिकल्पफै ।। ३५ ।। सामान्यादा विशेषाद्वा मम्यक्त्वं निर्षिकल्पकम् । सत्तारूपं पारिणामि प्रदेशेषु परं चित. ॥ ३६॥ तमोहसस्तमोनाशे तमोरेरिव रश्मिभिः । दिदा प्रमोदमासेदुःसर्वतो विमलाशया ॥ ३७॥ हम्मोहोपशमे मम्यग्रप्टेरादेव एष थे। शुद्धत्वं सर्वदेशेषु विधा बन्धापहारि यम् ॥ ३८ ॥ यथा वा मपधत्तुरपाकस्यास्तंगतस्य थे। उसो मूर्षिछतो जन्तुरटायः स्यादमूर्छितः ॥ ३९ ॥ एग्मोहग्योदयान्मूच्छावैचित्यं वा तथा प्रमः । प्रशान्त सस्य मूच्छाया नाशाम्जीवो निरामयः ।।४।। ऐन्द्रियिम् । २ भररिमन.पर्यययो। मानि बिना। . पम्नयोः परिणामि इति पाट. I • सुधरय । नियम: । (एनः इति उहेमः! ९ मनायाम् ।
लाटीमंहितायां- प्रदानादिगुणा:याचं लक्ष्म सम्यग्हगात्मनः । न सम्यक्त्वं तदेवेति सन्ति ज्ञानस्य पर्ययाः ॥४१॥ अपि चात्मानुभूतिश्च मान ज्ञानस्यपर्ययान । अर्थाद्ज्ञानं न सम्यक्त्वमस्ति चेदाहालक्षणम् ।। ४२१ यथालापो हि दुम्यो लक्ष्यते स्यूललक्षणः । वाग्मनःकायचेष्ट्राणामुत्साहादिगुणात्मकैः ॥४३॥ नन्यामानुभव माक्षात्सम्यक्त्वं यस्तुतःस्वयम् । नयंत मर्यकालम्य मिग्याप्टरमम्भवात् ॥ ४४ ॥ ने यतोऽनभिज्ञोऽमि मासामान्यविशेषयोः । अन्यनाकारमाकारलिङ्गयोस्तगयोच्यते ॥ ४५ ॥ आकारोऽयरिकल्प स्यादर्थ स्थपरगोचरः । मोपयोगी विकल्पो या ज्ञानम्येतद्धि लक्षणम् ।। ४६ ।। नाकार म्यादनाकारी यानुनी निर्विकल्पता। বানােনা নম্বল নিল ২৪ नवनि वाम्नयं मयं सामान्यं च विशेषयत् । नधिम्यादनाकर विधिमाकारमेव ना ॥ ४८ ॥ मयं मामान्यज्ञानमयागास्ति विशेषयत। यगामान्यमाका माकार विशेषभा॥४५॥ भानादिमा गुणा मयें प्रोमभाना.. मामात्याद्वा विगार मन्यनाचारलाणा. ॥५॥ नावानुमायायामिविकम्यरय वन । असम ममालेब्य मानद्वारा निहाय ॥ ५१ ।। সাধাথায় যা মাননস্থল। मात्रज्ञानमायाँ हाशानं पर पर १५ ॥ मादि मानमात्रय ज्ञान गुणधिन । गर्दा काममम्बन्धिगुणा. गेला गुणारय ॥ ३ ॥ 11. I Amar I HAI सम्यग्दर्शनसामान्यलक्षणवर्णनम् । नद्यया मुखदु म्यादिभावो जीवगुण स्वयम् । मानं तद्वदकं नून नार्यानानं मुसादिमन ॥ ५४॥ अपि मन्ति गुणा. मन्या श्रद्धानादिविकल्पकाः । उदगो लक्षणं तेषां तत्परीभाधुनोच्यते ॥ ५५ ॥ तत्रानो यथा नाम श्रद्धासचिप्रतीतयः । परणं प यथानायान्यात्तत्यार्थगोचरम् ।। ५६ ।। नत्त्वार्याभिमुग्नी युद्धि असा मात्म्यं मचिस्तथा । प्रनीतिस्तु तथेति म्याम्वीकारभरण क्रिया ।। ५७ ।। अांदाधत्रिक ज्ञानं जानम्यवार्थपर्ययान । किया वाकायतोभिर्यापार शुभकर्मसु ।। ५८ ।। व्यम्नाने समस्ना वा मष्टलक्षणं न पा। मपों वा विपभे वा मन्ति यद्वान मन्ति पा॥ ५९॥ म्वानुभूतिसनाथात्मन्ति प्रसादयो गुणा । म्यानुभूति विनाभासा नार्याचदादयो गुणा. ।। ६० ।। नग्माच्छदादय मर्वे मम्यकत्व स्थानुभूतिवत् । न मम्यक्त्वं सदाभामा मिथ्याश्रद्धादिवचित. ।। ६१ ॥ मम्यग्मियाविशेषाभ्या विना श्रद्धादिमात्रकाः। मपभषद्विपक्षेपि तित्वाद् व्यभिचारिणः ॥६॥ अर्याच्दादयः मम्यग्दृष्टिप्रदादयो यतः । मिध्याश्रद्धादयो मिथ्या नावादयो यत: ॥ ६३ ।। ननु सत्वरि श्रद्धा भामाश्रेषलभणान् । मम्यग्मिध्यापिपाभ्यां मा दिधातु दुनोऽर्थनः ।। ६४।। नेवं यत समव्यानि प्रसास्वानुभवायो । नूनं नानुपरम्धार्थे प्रशा सरविषाणवन् ।। ६५॥ विना स्वात्मानुभूति तु या पदा श्रुतमात्रत.। नस्वार्यानुगता यांचएदा नानुपलब्धितः ।। ६६ ।। मिन्ना निना।२ अरमे नि ।
लाटीसंहितायां- . श्रद्धानादिगुणा:याचं लक्ष्म सम्यग्हगात्मनः । न सम्यक्त्वं तदेवेति सन्ति ज्ञानस्य पर्ययाः ॥ ४१॥ अपि चात्मानुभूतिश्च झानं ज्ञानस्यपर्ययात् । अर्थादज्ञानं न सम्यक्त्वमस्ति चेद्राह्यलक्षणम् ॥ ४२ ॥: योल्लाघो हि दुर्लभ्यो लक्ष्यते स्थूललक्षणैः । वाग्मन कायचेष्टाणामुत्साहादिगुणात्मकैः ॥ ४३॥ नन्यात्मानुभवः साक्षात्सम्यक्त्वं वस्तुतःस्वयम् । सर्वतः सर्वकालस्य मिथ्यादृष्टेरसम्भवात् ॥ ४४ ॥ नैवं यतोऽनभिज्ञोऽसि सत्सामान्यविशेषयोः । अप्यनाकारसाकारलिङ्गयोस्तद्यथोच्यते ॥ ४५ ॥ आकारोऽर्थविकल्पःस्यादर्थःस्वपरगोचरः। मोपयोगो विकल्पो वा ज्ञानस्यैतद्धि लक्षणम् ।। ४६ ।। नाकारः स्यादनाकारो वस्तुतो निर्विकल्पता। शेपानन्तगुणानां तल्लक्षणं ज्ञानमन्तरा ।। ४७ ॥ नन्यस्ति वास्तवं सर्व सामान्यं च विशेषवत् । तत्किश्चित्स्यादनाकार किश्चित्माकारमेव तत् ॥ ४८ ॥ . मत्यं मामान्यवदज्ञानमायास्ति विशेषवत् । यत्सामान्यमनाकारं माकार यद्विशेषभाक् ॥४९॥ सानाद्विना गुणा मर्वे प्रोक्तमतक्षणालिताः। सामान्यावा विशेषाद्वा सन्त्यनाकारलक्षणाः ।।५०॥ तोयक्तुमशक्यत्वानिर्विकल्पस्य यस्तुनः । तंदुलेग्य समालेख्य ज्ञानद्वारा निरूप्यते ॥ ११ ॥ . ॥५२॥ परायाः स्वात्ममम्बन्धिगुणाः शेषाः मुम्पादयः ॥ ५३॥ , आगग्य भावः । १ सागपारित्याग पाठः।। भामना ।
सम्यानसरक्षणवर्णनम् । तया मुखदुःखादिमायो जीवगुणःस्वयम् । मानं तदक ननं नार्याशानं मुगादिमत ।। ५४ ॥ अपि मन्ति गुणाः मम्या श्रद्धानादिविकल्पकाः । जोसो लक्षणं तेषां सत्परीधाधुनोन्यते ।। ५५ ॥ तमोसो यया नाम भद्धाविनीतयः । परणं च यथामायादत्तिवार्यगोचरम् ।। ५६ ॥ नस्वार्थाभिमुयी घुद्धि श्रद्धा मात्म्यं मचिम्नया । प्रतीतिस्तु तथेति स्याल्चोकारभरणं क्रिया ॥ ५ ॥ अयांदाचनिक शान शानग्यधापर्ययार । किया वाकायचंतीभिव्यापार शुभकर्ममु ॥ १८ ॥ व्यस्नाश्ते ममता वा मालमण ने का। सपा विपक्षे वा मन्ति यदा न मन्ति था॥५५॥ स्वानुभूतिसनायामन्ति भवाश्यों गुणा. । म्वानुभूति विनामामा नार्थापासादयो गुणा ॥६॥ मरमानाय सर्वे सम्यक्त्वं स्थानुभूतिषम् । न सम्यवसामामा मिथ्याश्रमादिवचित. ॥६॥ सम्यग्मिध्याविशेषाभ्यां विना अनादिमात्रका। मफावद्विपक्षेपि शरत्वाद् व्यभिचारिण ॥६॥ अर्याध्यादयः सम्पदादयो यत । मिथ्यावादयो मिथ्या नाभांचासादयो यतः ॥ ६ ॥ मनु सस्वरपिमा भदामात्मणान् । मम्यग्मियाविशेषाभ्यां मा दिपा तोऽर्थत. ॥१४॥ नै पतः ममध्याति प्रसास्वानुभवयोः । नूनं नानुपसरपार्थे मला स्वरषिपाण॥६५॥ বিনা থামান্তৰি ধারা অনুমান। सरवायानुगता याचना मानुपतिः॥६६॥ मिना भित्र भरोगाल।
१२ लाटीसंहितायां- लब्धि स्यादविशेषाद्वा सदसतोरुन्मत्तवत । नोपलन्धिारहाख्याता तच्छेपानुपलब्धिवत् ।। ६७ ॥ ततोस्ति यौगिकी रूढि. श्रद्धा सम्यक्त्वलअणम् । अर्थादप्यविरुद्धं स्यात्पूर्ण स्वात्मानुमृतिवन् ॥ ८॥ गुणाश्चान्ये प्रसिद्धा ये सद्दष्टे प्रशमादयः । यहिदृष्टया यथा म्वं ते सन्ति मम्यक्त्वलक्षणम् ।। ६९ ।। तत्रायःप्रशमी नाम संवेगश्च गुण' क्रमान् । अनुकम्पा तथानिक्यं वक्ष्ये तल्लक्षणं यथा ॥ ७ ॥ प्रशमो विषयेपूच्चीवक्रोधादिकेषु च । लोकासंख्यातमात्रेपु स्वरूपाच्छिपिलं मन ॥ ७१ ॥ सद्यः कृतापराधेषु यद्वा जीवेषु जातुचिन् । तधादिविकाराय न बुद्धि. प्रशमो मतः ॥ ७२ ।। हेतुस्तयोदयाभाव स्यादनन्तानुगन्धिनाम । अपि शेषरुपायाणां नूनं मन्दादयोऽशन' ॥ ७३ ॥ आरम्भादि क्रिया तस्य देवाद्वा स्यादकामत. । अन्तः शुद्धः प्रसिद्धत्वामहेतु प्रशमनते. ॥ ७॥ सम्यक्त्वनाविनाभूतः प्रशमः परमो गुणः । अन्यत्र प्रशमं मन्ये प्याभामस्यात्तइत्ययात् ॥ ५॥ संवेगः परमात्माहो धर्म धर्मफले चितः। सधर्मेष्वनुरागो वा प्रीतियों परमेष्ठित् ।। ७६ ।। धर्मः सम्यस्त्वमागारमा मुद्धास्यानुभयोऽयया । तत्फले मुसमत्यभमभयं धायिक प यम् ॥ ७॥ इतरत्र पुनारागस्तहणेष्वनुरागतः । नातद्गुणांनुरागीपि निकलायात्पाद मया ।। ५८ ॥ नाभिलारी निकायन।' पापमपमान निनिकालासी ॥७९॥ रामनवन मानि पि।
सम्यादर्शनसामान्यलक्षणवर्णनम् ।
नचाराचे निपिद्धः म्यादमिलापी भोगेप्पलम् ।
सुद्धोपलब्धिमात्रपि यो भोगाभिलापवन ।। ८०॥
अर्यात्मोमिलाप म्यान्मिाया कर्मोदयात्परम ।
म्वार्थम्याक्रियामिदा नाल प्रत्यक्षतो यन ॥ ८१ ।।
कचित्तस्यापि माये नेप्रमिद्धिरहंतुन ।
अभिलापायाभावेऽपि स्वेष्टमिनिम्नुहेतुत ॥ ४ ॥
यश:धीमुतमिग्रादि सर्व कामयते जगन ।
नाम्य लाभोऽभिलापेऽपि विना पुण्योदयात्मन ॥ ८३ ।।
जरामृत्युदरिद्रादि नापि कामयत जगन् ।
सत्मयोगी पलादम्ति मतम्नत्राभादयान ॥ ८४ ।।
मंवेगो विधिरूप. म्याग्निदग्नु विशेषमान ।
स्पादियभाषशाददन नारान्तर नयां ॥ ८५॥
त्यागः मर्याभिलापस्य निर्धेदो लक्षणानथा ।
संवेगोऽन्यथवा धर्ममामिलापो न धर्मवान् ॥ ६॥
नापि धर्म क्रियामात्र मिथ्यारिहार्थत ।
निन्यं रागादिसनावात्प्रत्युताऽधमएय ६ि ॥ ८ ॥
नित्यं गगी पुष्टि. स्यास्पायचिदगगवान ।
अस्सरागोम्ति मष्टिनिय पा स्यारागवान ॥ ८॥
अनुकम्पा पाया ममत्वामहः ।
সমাখা মাখা নি:শেষ বসনা । ।
हम्मादानुपयनत्र हेतुवायोस्निपारम।
मिभ्यासानं विना न स्वाभाष पिएथा ॥॥
मिाया पत्परत माय यस्मा परजन्मिनाम।
पत्तगुरागादि मृत्युवा ओपिर्व मनाए ।॥ ११ ॥
अस्ति यायेतदमान मियाटिस्पवान ।
अशानालंदुतरामापि क्षमा इंतुंग पापरम् ॥ ५ ॥
“४४ लाटीसंहितायां- समता सर्वभूतेषु यानुकम्पा परत्र सा। अर्थत: स्वानुकम्पा स्याच्छल्यवच्छत्यवर्जनान् ॥ ९३ ॥ रागाद्यशुद्धभावानां सद्भावे बन्ध एव हि । -न बन्धस्तदसद्भाव तद्विधया कृपात्मनि ॥ ९४ ॥ आस्तिक्यं सत्त्वसद्भाव म्वतः सिद्ध गतिश्चितः । धर्मे हेतौ च धर्मस्य फले चात्मादि धर्मवित् ।। ९५ ॥ अस्त्यात्मा जीवसंज्ञो यः स्वतःसिद्धोप्यमूर्तिमान् । चेतनः स्यादजीवस्तु यावान यस्त्यचेतनः ।। ९६ ।। अम्त्यात्मानादितो पद्ध. कर्मभिः कार्मणात्मकैः । कर्ता भोता च तेपां हि तत्क्षयान्मोझभाग्भवेत् ॥ ९७ ॥ अस्ति पुण्यं च पापं च तद्धतुम्तत्फलं च वै । आस्रवाद्यास्तथा सन्ति तस्य संसारिणोऽनिशम् ॥ ९८ ॥ अन्त्येवं पर्ययादेशाद्वन्धो मानस्तु तत्फलम् । अपि शुद्धनयादेशात शुद्धः सोपि सर्वदा ॥ ९९ ॥ नयाय जीवसंहो य. स्वयंवेद्यश्चिदात्मक। मोहमन्ये तु रागाद्या हेया पीलिका अमी ॥ १० ॥ इत्यागनादिजीवादि वस्तुजातं यतोऽबिलम् । निश्चयव्यवहाराभ्यामाम्निक्यं तत्तयामतिः ॥ १०१॥ सम्यक्त्वेनाविनाभूतम्यानुभूत्येकलक्षणम् । आस्तिक्यं नाम सम्यक्त्वं मिभ्यास्तिक्यं ततोन्यया ॥ १०२॥ ये केबलशानमेकं प्रत्यक्षमर्थतः। न प्रत्यक्ष कदाचित्तच्छेपज्ञानपतुष्टयम् ॥ १०३ ॥ यदि या देशताध्यक्षमाझ्यं म्यात्ममुग्वादिषन् । म्यमवेदनप्रत्यक्षमाम्निायं मकुनर्यिन ॥ १०४॥ मत्यमाधवर्य माने परो परमंयिदि। । 'अन्य ग्यानुभूतौ तु हम्मोहोपशमादितः ॥ १० ॥ पतिः।
मम्पादनमामान्य मानम् । मात्मानुभूतिमात्र म्यादारितस्य परमो गुणः । भवन्मा वा परदाय जानमात्र परत्वर ।। १०६॥ अपिनत्र पत्य जीवादी परषग्नुनि । गाई प्रातिरस्याम्नि यथा मम्यग्हगारमन ।। १०७ ।। नयाम्नि प्रतानियां नानिमिभ्यागःगुटम् । हम्मादायोदयानत्र प्रान्ते. सहायताऽनिगम ॥ १०८ ।। मनः मिमिद सम्यग्युक्तियानुभवागमान । मम्पपन्य नाविनाभून मत्रास्तिक्य गुणो महान ॥ १५॥ उसमा मंत्री निथ्यो निदण गरदा य उपसमो भसी। वय अणुकंपा अहगुणा ति मम्मत्त ।। ८ ॥ पायार्थ मूत्रपि प्रमादिश्चमुष्टयम । नातिरिक्त यवोऽन्यत्र सभणम्योपरभणम् ।। ११०॥ अम्न्युपलक्षणं यत्तहमणग्यापिणम् । मचथास्यादिलक्ष्यम्य सक्षण घोत्तरम्य मन् ॥ १११ ।। यथा मम्यक्त्वभावग्य संवेगो रक्षणं गुण मंचोपलक्ष्यते भक्त्या पात्मल्यनाथवाईताम् ।। ११२ ॥ सत्र भफिरनासत्यं पापपुश्वेतां शमान् । वात्मल्यं तद्गुणोत्कर्षहेत मोरातं मनः ॥ ११३ ॥ भक्तिया नाम वात्सल्यं न म्यासंयगमन्तरा। मंधण हिशो रक्ष्म द्वाषेतायुपलक्षणा ॥ ११४॥ हम्मोहम्योदयाभावात्प्रसिद्धः प्रशमो गुणः । वत्रापि प्यकं बाह्याग्निन्दन पापि गईणम् ॥ ११५।। निन्दनं वत्र दुर्वाररागादौ दुष्ट कर्मणि । पश्चातापको पन्धो नापेक्ष्यो नाप्यपेक्षितः ॥ ११६ ॥ - अन्यनू ना १ मा
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५६
हाटीसहितायो-
गहणं तत्परित्यागः पञ्चगुवात्मसाक्षिक
निष्प्रमादतया नूनं शातितः कर्महानये ।।११
अर्यादेव द्वयं सूक्तं मम्यक्त्वायोपलक्षणम् ।
प्रशमग्य कपापाणामनुकाविशेषतः ।। ११८
शेपमुक्तं यथामाया सातव्यं परमागमान्।
आगमान्धेः परंपारं माग्गन्तुं शमः कयम् ।
एवमित्यादिमत्याय प्रोक सम्यक्त्यलमणम् ।
कैश्विलमणिकै: मिद्वैः प्रमिद्धं मिद्धसाधनात् ।
भवदर्शनिको नूनं सम्यक्त्वेन युतो नरः।
दर्शनप्रतिमाभासः क्रियावानपि तद्विना ॥ १२
देशतः सर्वतश्चापि क्रियारूपं प्रतादि यम् ।
सम्यक्त्वेन विना सर्वमनतं कुवपश्च तत् ॥
ततः प्रथमतोऽवश्यं माव्यं सम्यक्त्वधारिणा।
अप्रतिनाणुवतिना मुनिनायेन सर्वतः ।। १२३
ऋते सम्यक्त्वभावं यो घचे प्रतिपाक्रियाम् ।
तस्य मिथ्यागुणस्थानमेकं स्यादागमे स्मृतम् ।।
प्रेकृतोपि नरो नैव मुच्यते कर्मबन्धनात
सएव मुच्यतेऽवश्यं यदा सम्यक्त्वमशुते॥
किञ्च प्रोक्ता क्रियाप्येपा दर्शनप्रतिमात्मिका ।
सम्यक्त्वेन युता चेत्सा सद्गुणस्थानवर्तिना, ।।
तत्राप्यस्ति विशेषोऽयंतुर्यपञ्चमयोद्वयोः ।
योगाद्वा रूढ़ितश्चापि गुणस्थानविशेषयोः ४२
सैवैका क्रिया साक्षादृष्टमूलगुणात्मिका !
व्यसनाधुज्झिता चापि दर्शनेन समन्विता ।।
१पण्डिलोपि।
सम्यग्दर्शनसामान्यलक्षणवर्णनम् । ANNA एवमेय १ मा पल्यालुलापारक्रमात्परम् । बिना नियमादिनावमायने मा कुलकिया ॥ १२९ ॥ भावशून्या. प्रिया यम्मा प्रसिभ्य भवन्ति हि । नियामापलं पाम्नि म्वल्पभोगानुपहजम् ॥ १३०॥ दर्शनप्रनिमा नाम्य गुणस्थानं न पश्रमम् । केवलं पाभिकः म ग्याणम्यानादमयतः ॥ ११ ॥ विश्व मोपि त्रियामात्राकुलाचारक्रमागतान । स्वादिसम्पदानुक्त्वाकमाद्याति शिवालयम् ॥ १३२ ॥ मम्यक्त्वन बिहीनोऽपिनियमनाप्याम्झितः । योपि कुलक्रियासच. म्वर्गादिपदभाग्भवम् ।। १३३ ॥ अथ क्रियां प सामेय कुलाचारोचितां पराम् । प्रतरूपेण गृहाति सदा दर्शनिको मत ॥ १३४ ॥ दर्शनप्रतिमा चाम्य गुणग्यान च पश्रमम् । संयनासंयनास्यश्च मंयमोस्य जिनागमात् ।। १३५ ॥ हगाचेकादशान्तानां प्रतिमानामनादितः । पञ्चमेन गुणेनामा व्यातिः साधीयसी स्मृते. ।। १३६ ॥ ननु या प्रतिमा प्रोक्ता दर्शनाख्या तदादिमा । जैनानां मास्ति सर्वेपामर्थादविनापि ।। १३७ ॥ मैवं मति तथा तुर्य-गुणस्थानम्य शून्यता। नून हम्पनिमा यामागुणे पनमक मता ।। १३८ ॥ नौा दृप्रतिमामात्रमन्तु सुर्यगुणे नृणाम् । प्रवादिप्रतिमा शेषाः मन्तु पञ्चमके गुणे ॥ १३९॥ मैवं सति नियमादापतित्वं कुतोऽर्थतः। प्रवादिप्रतिमासूशेश्वमित्यानुपनतः ॥ १४० ॥ मनो विविभिनं साधु सामान्यात्सा कुलकिया। नियमेन मनाया दर्शनप्रतिमामिका ॥ १४१॥ अननयमान..
४८ टाटीसंहितायां- किञ्च मूलगुणादीनामादानेऽथापि वर्जने । समरते प्रतिमास्त्याद्या व्यस्तेसति कुलक्रिया ॥ १४२॥ यथा चैकस्य कस्यापि व्यसनस्योझने कृते। दर्शनप्रतिमा न स्यात्स्यादा साध्वी कुलक्रिया ॥ १४३ ॥ यदा मूलगुणादानं द्यूतादिव्यममोज्झनम् । दर्शनं सर्वतश्चैतत्त्रयं स्यात्प्रतिमादिमा ॥ १४४ ।। दर्शनप्रतिमायास्तु कियाया प्रतरूपतः । तस्याः कुलक्रियायाश्चाविशेपोप्यस्ति लेगतः ॥ १४५ ।। प्रमादोद्रेकतोवश्यं सदोपाःस्यात्कुलक्रियाः । निर्दोषाः स्वल्पदोषा या दर्शनप्रतिमाक्रियाः ॥ १४६ ॥ यथा कश्चिकुलाचारी द्यूतातिव्यसनोज्झनम् । कुर्यादा न यथेच्छायां कुर्यादेव हगात्मकः ॥ १४७ ॥ अथ च पाक्षिको यदा दर्शनप्रतिमान्वितः। प्रकृतं न परं कुर्याकुर्यादा वक्ष्यमाणकम् ॥ १४८ ॥ प्रामाणिकः क्रमोप्येष ज्ञातव्यो प्रतसंचये। भावना चागृहीतस्य प्रतस्यापि न दूषिका ॥ १४९ ॥ भावयेद्भावना नूनमुपर्युपरि सर्वतः । यापन्निवाणसंप्राप्तौ पुंमोवस्यान्तरं मवेत् ॥ १५० ॥ उक्तंच. जं सका तं कीरइ जं च ण सकई तदेव सदहणं । सरहणमाणो जीयो पावइ अजरामरं ठाणं ॥ ९॥ ययात्र पाक्षिकः कश्चिदर्शनप्रतिमोऽथया । उपर्युपरि शुदययं यद्यत्कुर्यात्तदुच्यते ॥ १५१ ॥ सर्वतोविरतिस्तेषां हिंसादीनां प्रतं महन् । नैतत्सागारिमिः कतुं शक्यते लिङ्गमहताम् ॥ १५२॥ व्यसनानाम् ।
- कुलाम्नायातायाताम्न सम्यग्दर्शनसामान्य लक्षणवर्णनम् । मूलोत्तरगुणाः सन्ति देशतो घेश्मयनिनाम् । तथानगारिणां न सुः मर्वनः स्युः परेऽथ ने ॥१५३ ॥ तत्र मूलगुणाश्चाष्टौ गृहिणां घनधारिणाम् । कचिदग्रनिना यस्मात्सर्वमाधारणा इमे ॥ १५४ ॥ निसर्गाचा गुणाःगुटम् । तदिनापि न यावासम्यक्त्यं च गुणोगिनाम् ॥ १५५ ॥ एतावता विनाप्यप श्रावको नास्ति नामना। किं पुनः पानिको गूढो नैष्ठिकः साधकोऽथ या ।। १५६ ।। मद्यमांसमधुत्यागी योदुम्परपश्चकम् । नामतः पावक ख्यातो नान्यथापि तथा गृही ॥१५॥ यथाशक्ति विधातव्यं गृहस्थैर्व्यसनोगानम् । अवश्यं तद्रतम्येस्नेरिच्छति धेयसी क्रियाम ॥१५८ ॥ त्यजेहोषांम्नु तत्रोकान म्प्रेऽनीपारसंझपान् । अन्यथा मद्यमांमादीन श्रावकः क ममाचोम् ॥ १५९ ॥ दान चतुर्विध देयं पात्र युद्धगाथ भद्धया । जपन्यमध्यमोत्कृष्पाग्रेभ्य प्रायफोनभैः ॥ १६० ॥ कुपामायाप्यपाधाय दान देयं यथोचितम् । पात्रघुरमा निपिर्ट स्पामिपि न पापिया ॥११॥ शेपेभ्यः क्षुत्पिपामादि पारितभ्योऽशुभोदयाम् । दीनेभ्योऽभयदानादि दातव्यं करणार्णवः ॥ १२ ॥ पूजामप्यतां कुर्याय नरप्रतिगामु प। स्वरयजनाम् मस्याप्य सिद्धानप्य येत्युः ॥१२॥ सूर्यपाध्यायसाधूनां पुरस्वात्पादयोः स्तुतिम् । प्राविधायाष्टधा पूजा विध्यात्म विगुमितः ।। १६४ ।। .RAगाने + ए. . . • पोम + भरगुण ।. उसागुणा । इत्यपि 1 टाटीमहिनायां- मन्मानादि यथाशकि कश्यप सर्मिणाम् । प्रतिनां पतरेणं या विशेषात् ब्रह्मचारिणाम् ॥ १६५ ।। नारिम्मोपि प्रतापाम्यो न निषिद्ध जिनागमे । देयं मन्मानानादि लोकानामशिरोधतः ॥ १६ ॥ जिनपैयगृहातीनां निर्माणे सावधानता। यथामधेिगास्ति दूप्या नावालेशतः ॥ १७॥ मिसानामतो चापि यत्राशि प्रतिमाः शुभा। पैगामये गरमाय द्वार प्रनिधारमुधीः ॥ १८ ॥ अपि तापारियात्रामु विषारमोशनं मनः । भारत: मनमावि मंयम न विगधयेत् ॥ १६९ ॥ नियमिलि त्यगिरिग्बमहोगा। भियं नैव कर्मध्यं तस्ततः ॥ १०॥ गगमा विक्रि विधया गृहमधिभिः । frना प्रतिमाम प्रयान्टिन ॥११॥ मा पापापनाशनः । निमगनमान का पाननिवागंतान ॥१२॥ दिग्मातीपर प्रपा परित्राम । पोलामा मार्ग मरिम् ॥ १३ ॥ if a fাসপাথাািবিলি- এলপি বাগমাথা माधी माम माणित FREERHITAमा प्रEिRTrयानमामाम्प नाम TATः। -------- सम्यग्दर्शनवर्णनम् । अथ चतुर्थः सर्गः। हुदमिदं नव भो वनिजांपते भवतु भावितभावसुदर्शनम् । विदितफामननाममहामते रसिकधर्मकथामु यथार्थतः ॥ १॥ इत्यागीदा। ननु मुदर्शनस्पतालक्षणं स्यादशेषतः। किमयास्त्यपरं किशलक्षणं तददाय नः ॥ १॥ सम्यग्दर्शनमष्टाङ्गमस्ति सिद्ध जगत्प्रये । लक्षणं च गुणवाझं शब्दाश्चैकार्यवाचकाः ॥ २ ॥ निःशहित तथा नामा निःकांश्रितमसः परम् । विचिकिमाय चापि यथादृष्टेरमूढता ॥ ३ ॥ उपदणनामाथ मुस्थितीकरणं तथा । यात्सल्यं च यथाम्नायागुणोप्यस्ति प्रभावना ॥ ४ ॥ शङ्का भीः साधम भीनिर्भयमेकाभिधा अमी। तस्या निष्कान्नितो जातो भायो निःशहितार्थतः ॥ ५॥ अर्थशादय सूत्राधे शशा न स्यान्मनीषिणाम् । मूदमान्तरितार्याः सन्ति चाम्निक्यगोचराः॥ ६ ॥ तत्र धर्मादयः मूदमाः मूक्ष्माः कालाणवोऽणवः । अस्ति मूदमत्वमेतेषां लिङ्गायाभरदर्शनान् ॥ ७॥ अन्तरिता यथा दीपसरिनाथनगाधिपा । दूरार्या भाविनोऽतीता रामरावणचक्रिणः ॥ ८॥ न म्यान्मियागो शानमेतेषां काप्यसंशयम् । संशयादय नार्वे हरमोहस्योदयात्सतः ॥९॥ इन्ट्रियः । २ अंतरिमा कारविर पदार्थः देशभियानि पलामोषु ।
साटीसहिताया- नचाशकय परोक्षास्ते सेटगोचराः कुतः। से: सह सग्निकपम्य माकिस्याप्यमम्भयात् ॥ १० ॥ अस्ति तनापि मम्यक्त्यमाहात्म्यं महतां महत् । । यदस्य जगतो ज्ञानमत्यास्तिस्यपुरस्सरम् ।। ११ ॥ नासम्भयमिदं यम्मास्वमायोऽनगोयरः । अतिशयोऽतियागाम्न योगिनां योगिशक्तिपत ॥१२॥ अस्नि पामपार यदि शान मम्यग्टगात्मनः । स्यमयदगप्रत्ययं शुद्ध मिदाम्पदोपमम् ॥ १३ ॥ यत्रानुभूयमानाऽपि मरायालमानि । मियाकविपाकादे नानुभूतिः शरीरिणाम् ॥ १४ ॥ सम्यगष्टे कुरा स्यामंदोरिन यस्तुनि। गतत्र याम्नयां भदो यातुमीनोऽनविक्रमाम ॥१५॥ अत्र नात्पमेयतमीपत्यपि यो प्रमः । शहाया मान्यपगधी मानिमियोपमायिनी ॥१६॥ ननुशाली वोपी यो farयानुमा गृणाम् । मा वादापि कुनी व्यायाम मिश्योपजीविनी ॥१७॥ अत्रात कपिः म मतभिभंगयुत । नापि पट मुष्टिय मभिः म भयेमना ॥१८॥ परमात्मानुभून पिना भीतिः मानी। मीनि पायदाना नामतरतमाग ॥ १५ ॥ मता भीग्यानुमंयाग्नि मिथ्या माशी जिनागमाग माघ भीनियाय पावती यानुभयन. ॥ २० ॥ अनि मिदं पानी भीत स्वाभपयुतः। मागम्य पारिवारिपालन भीनाम्यान ॥२१॥ ननु गन्ति पोजिमनायाग कार्यान्। বা শলপলিশনপি মা।। -naH
३
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सम्यग्दर्शनयर्णनम् ।
तत्कथं नाम निर्भीकः सर्वनो दृष्टियानपि ।
अप्यनिष्टार्थसंयोगादस्त्यभ्यभं प्रमतवान् ।। २३ ।।
सत्यं भीतोऽपि निर्भीकम्तस्वामित्याद्यभावतः।
रूपिद्रव्यं यथा चक्षुः पश्यन्नपि न पश्यति ॥ २४ ॥
मन्ति संसारिजीयानां कर्माशाश्वोदयागता. ।
मुहन रग्यन द्विपंन्तत्र तत्फलेनोपयुध्यते ॥ २५ ॥
एतेन हेतुना शानी निःशङ्को न्यायदर्शनात् ।
देशतोऽप्यत्र मूर्छाया शवाहतारमम्भयात् ॥ २६ ॥
स्वात्मसंचेतनं तस्य कीदृगस्तीति चिन्यत ।
येन फर्मापि कुर्याणी कर्मणा नोपयुज्यते ।। २७ ।।
तत्र भीनिरिहामुग्रलोके वा घेदनामयं ।
चतुर्थी भीतिरत्राणं स्यादगुमिस्तु पश्चमी ॥ २८ ।।
भौतिः स्यादा तथा मृत्यु निराकरिमकी सतः ।
मादुदेशिताधेति समेता. भीतयः स्मृताः ।। २९ ।।
नह लोकतो भीनि कन्दितं चारजन्मनि ।
इष्टार्थस्य व्ययो माभून्मा मेऽनिष्टार्थसङ्गमः ।। ३० ।।
म्याग्यतीदं धनं नो वा देवान्माभूरिटता ।
इत्याद्याधिधिवा दाधु ग्यलितेवाऽगात्मन. ॥३१॥
अर्थादमानिनो भीति निन शानिनः कचिन् ।
यतास्ति हेतुतः शेषाद्विशेषश्चानयोर्महान् ॥ ३२ ॥
अज्ञानी फर्म नोकर्म भावकर्मात्मक पपन ।
मनुनेऽदं सर्वमेवैतन्मोहादतवादयन् ॥ १३॥
विश्वाद्रिमोपि विश्व स्वं पुर्यनारमानमात्महा।
भूत्वा विश्वमयो लोके भयं नोन्हति जातुचिम् ॥ १४ ॥
तात्पर्य मर्वतोऽनित्ये कर्मणां पाकसम्भवान्।
नित्यं पुवा शरीगदी मान्लो भीतिमपैति सः॥ १५ ॥
लाटीसंहितार्या- सम्यग्दृष्टिः सदेकत्वं स्वं समासादयनियन् । यावत्कातिरिक्तत्वाच्युद्धमभ्येति चिन्मयम् ।। ३६ ॥ शरीरं मुखदुःखादि पुत्रपौत्रादिकं तया । अनित्यं कर्मकार्यत्वादस्वरूपमयति यः ।। ३७ ॥ लोकायं मे हि चिल्लोको नूनं नित्योस्ति मोर्थतः । नापरो लोकिको लोकस्ततो भीतिः फुनोस्ति में॥ ३८॥ आत्ममंथतनादेयं ज्ञानी ज्ञानेकतानतः । यह लोकभयान्मुक्तो मुक्ततत्कमयन्धनान् ॥ ३९ ॥ परलोक: परमात्मा भाविजन्मान्तरांशभा। मत कम्पयनामो भीनि. परलोकतास्ति सा ॥४॥ भद्रं चन्म स्थलोक मामन्मे जन्म दुर्गती। इम्यागालिनं भेत. माध्यमं पारलौकिफम् ॥ ४१ ।। मिथ्यानिवास्नि मियाभावककारणात। Harय मदनास्ति सत्ता व्यत्ययाम् ॥ ४२ ।। খবিহুনামৰা নিযামাইমি:। ममामावयगत का कर्मफलात्मकम् ।। १३ ॥ मनो नित्य भयाकान्ना बनने प्रान्तिमानित। मनु मुगणायामम्भाभार जन कुधीः । ४१ ।। अन्तरामा निभंगमाभितः। মাসিশােহি মিসসালামাস । मियाभान्निगदम्यत्र शंने पाल्यवानुन । स्था रानी नमहिमा: मांगामायायधीः ॥ ४॥ नमनपरा गाभियों नगणनग्यमा समितिला म्यापारम्पथावनारि ॥४॥ संदनागन्दा पारा ममाना पानी। मोनिः प्राग माया मा पनि ॥४॥ निभाक पर सम्यग्दर्शनवर्णनम् । - उल्लायोऽहं भविष्यामि मामून्मे घेदना क्षचित् । मूच्छेव घेदना भीतिश्चिंतनं या मुहुर्मुहुः ॥ ४९ ॥ अस्ति नूनं कुदृष्टः सा दृष्टिदोपैकहेतुतः । नीरोगस्यात्मनो ज्ञानाम्न स्यात्सा ज्ञानिनां कचित् ।। ५० ॥ पुद्गलादिन्नचिद्वानो न मे व्याधिः कुतो भयम् । ध्यापिः सर्वः शरीरस्य नामूर्तस्येति चिन्तनात् ।। ५१ ॥ स्पर्शनादीन्द्रियार्थेषु प्रत्युत्पनेषु भाषिषु । नादरो यस्य सोम्याभिर्मीको वेदनाभयान ॥ ५२ ।। च्याधिस्थानेपु नेपू सिद्धो नादरो मना । वाघाईतोः स्वसस्नेपामामयस्याविशेषतः ।। ५३ ॥ अनाणं क्षणिकान्त पक्षे चित्तक्षणादिषन् । नाशात्प्रागंशनाशस्य प्रातुमक्षमतात्मनः ।। ५४ ।। भीतिः प्रागंशनाशात्म्यादशिनाशभ्रमोन्वयात् । मिप्यामात्रैकहेनुत्वान्नून मिध्यादृशोस्ति सा ।। ५५ ॥ शरणं पर्ययस्याम्तंगतम्यापि सदन्वयम् । समनिच्छनिवासः स प्रस्नोस्त्यत्राणमाध्यसान् ।। ५६ ।। सदरष्टिन्तु चिदंशः स्वैःक्षणे नष्टे चिदात्मनि । पश्यन्न नष्टमारमानं निर्मयो प्राणभीतितः॥ ५७।। द्रव्यत. क्षेत्रतश्चापि कालादपि च मावत । नामाणमंशनोप्यत्र कुनम्तीमहात्मनः ।। ५८ ॥ हामोहरयादयाबुद्धियायकान्तादिषादिनः । तस्यैवागुमिभीतिः स्याभूनं नान्यस्य मानुषित् ॥५९ ।। अमन्नन्म सतो नाशं मन्यमानस्य देहिनः । फोऽवकाशस्ततो मुफिमिच्छातोऽगनिसावसात् ।।६।। सम्यग्दृष्टिम्तु स्वं रूपं गुर्म थे वरमुनो विदन । निर्भयोऽगुप्तितो भीवेर्भीतिदेतोरसम्मवान् ।। ६१॥ HI लाटीसहितायां-- मृत्युः प्राणात्ययः प्राणाः कायवागिन्नियं मनः। निधासोन्यासमायुश्च दौते पाक्यविसरात् ।। ६२ ।। सीतिजीवितं भूयान्मामून्म मरणं कचित् । करा लेभेन या देयादित्याधिः से तनुष्यये ।। ६३ ॥ नूनं सड़ी कुरशीनां नित्यं सत्यमानछताम् । अन्तस्तस्वकसानां सदीतिज्ञानिनां कुतः ॥ ६४॥ जीवस्य पतना प्राणा नूनं स्वास्मोपजीविनी । नाधान्मत्युरतस्तद्री कुनः स्यादिनि पश्यतः ।। ६५ ।। भकम्माजातमित्युस्याकरिमामय स्मृतम् । नयथा विगुदादीना पातापानोऽसुधारिणाम् ६५ ॥ भोलि मूंगागया मौरय माहोण्य कापि मे । यो मातमी बिनापाकुलिनचेतमाम् ॥ ६ ॥ अमराकम्मकान्तिास्ति मियायशालिगः । कुना मासोस्निीलानिमाकार . ।। ६८ ॥ निको जीप पावनतोयनारिमान । माम्पागि सनस्तद्वामिग्छन ॥ ५ ॥ का भांगाभिना सात मुख्यकिया था। मंतिनले पिप्रशमनम् ॥ ७॥ सिमरगी विणेषु य । मोगाभिदाय Raiता ॥१॥ नाति पंपिया किना। पाधिमानि किना.३॥ firf Rafarni महिने । नमुनानगाभिना ॥ बमानभिती भागांना मिला. बम म म गायनमाणमा || सम्यग्दर्शनवर्णनम् । MURARA JAN आम्तामिष्टार्थसंयोगोऽमुत्रभोगाभिलापतः । स्वार्थमाधकसंसिद्धिन स्यानामहिकापि सा ॥ ५ ॥ निस्सारं प्रस्फुरत्येप मिध्याकमैकपाकतः । जन्तोरन्मत्तवच्चापि पावातोचरगवत् ।। ७६ ॥ ननु कार्यमनुद्दिश्य न मन्दोपि प्रवर्तते । भोगाकांक्षा विना ज्ञानी तत्कथं प्रतमाचरेत् ॥ ७७ ।। नासिद्धं यन्धमात्रत्वं क्रियाया फलमद्वयम् । शुभमान गुभाया स्यादाभायाश्वानुभावहम् ।। ७८ ॥ नचाशङ्कप क्रियाप्येषा स्यादवन्धफला क्वचित् । दर्शनातिशयादेताः मरागेपि विरागवत ॥ ७९ ॥ सरागे वीतरागे या नूनमादयिकी क्रिया। अस्ति बन्धफलापश्यं मोइस्यान्यतमोदयात् ।। ८०॥ नच वाच्यं स्यात्मदृष्टिः कश्चित्प्रज्ञापराधतः । अपि बन्धफलां कुर्यातामधफलां शिश्न ।। ८१ ॥ यतः प्रज्ञाविनाभूतमम्ति सम्यग्विशेषणम् । तस्याश्वाभायतो नृनं कुतम्या दिव्यता दृश. ॥ १२॥ नेवं यत' सुसिद्ध प्रागम्ति धानिच्छत क्रिया। शुभायाश्याशुभायाध को विशेरो विशेषभाक् ॥ ८३ ॥ नन्वनिष्टार्थसंयोगरूपा सानिच्छतः क्रिया। विशिष्टेष्टार्थसंयोगरूपा सानिग्छतः कथम् ।। ८४ ।। तकिया प्रतरूपा म्यादान्नानिच्छतः रुटम् । सम्या: स्वतंत्रसिद्धत्वारिसर कर्तृत्वमर्थसान ।। ८५ ॥ नैवं यतोऽस्त्यनिष्टार्थः सर्वः कर्मोदयात्मकः । सम्मानाकांक्षते शानी यावत्कर्म परफरम् ।। ८६ ।। यत्पुनः कश्चिदिष्टार्थोऽनिष्टायः कश्चिदर्थमान । सम्म दृष्टिदोपत्वात्पीतशंसावलोफवन् ।। ८७ ॥
५८ लाटीसंहितायां- m. - दृम्मोहरयात्यये रतिः सामागतार्थदर्शिनी । तस्यानिटेमानिधार्थयुद्धिः फर्मफलात्मके ।। ८८॥ नचासिद्धमनिष्टत्वं कर्मणस्तफलम्य थ । सर्वतो दुबतुत्या युक्तिस्यानुभागमाम् ॥ ८९ ॥ अनिवार्थफलत्वात्म्यादनिहायर्या प्रक्रिया। दुपकार्यानुरूपस्य हेतोपदेशयन् ॥ ९ ॥ অথচ যত কিষায্য: মগ: লাল। प्रारी कर्मोदयादेतोग्नस्यामागम्भयो मतः ॥ ११ ॥ यावरीणमोदस्य भागमाहस्य पात्मनः । यावत्यग्नि निया नाम साययौदायिकी स्मृता ।। ९२ ॥ पोरन यथाकामं पुंगः कोरित प्रनि । न पर पौरपाभा देवापेक्षा हि पौसर ॥ ९३ ॥ मिनी निकाशितो ज्ञानी मांगोप्युदिता कियाम् ।। निजामत: ते कर्म न रागाय विरागिणाम ॥ ५४॥ AINML नाम्नि निकाश: मागायोपि जन कपिन् । दिला: कृशिरपत्र पर्शगानिस्यापि ॥ ५५ ॥ সানিধি নাফিস চলাকালীন খিনা। नानिछापामंत्र मोदी यामनिरतः ॥ ९॥ मायगुगं मोहम्मा: मनेगनि । मोड नया पाश मानिशम् ॥५॥ निमिता भाषा गुणी मरशंनाय। बन्नुका ननिमार नामनाम९८॥ अब निर्षिा गुण मग मानगुणावगंगा युnिatirl १५॥ मान्मयान्मगुमनाममना । HTTARAKा ॥
सम्पग्दर्शनवर्णनम् । ५९ निष्कान्तो विचिकित्सायाः प्रोको निर्विचिकित्सकः। गुण: सरर्शनस्योर्वक्ष्ये तलक्षणं यथा ।।१०१ ।। दुषाद्वासिते पुंसि तीत्रासाताघृणास्पदे । यन्नासूयापरं चेतः स्मृतो निर्विचिकित्मकः ।१ १०२ ।। नेतत्तन्मनस्यज्ञानमस्म्यहं मम्पदा पदम् । नासावस्मत्समो दीनो पराको विपदा पदम् ॥ १०३ ।। प्रत्युत ज्ञानमेवतस्तत्र कर्मविपाकजाः । प्राणिनः सदृशः सर्व सस्थावरयोनयः ॥१०४।। यया द्वाप की जाती शूद्रिकायास्नयोदरान् । शूद्राषभान्तितस्ता द्वौ कृतं भेदभ्रमात्मना ॥ १०५।। जले जमालपज्जीवे यावत्कर्मासुचि स्फुटम् । अहं ते पाविशेषादा नूनं कर्ममलीमसाः ।। १०६ ॥ अस्ति मदर्शनस्यसौ गुणो निर्विचिकित्सकः । यतोऽवश्य स तयास्ति तस्मादन्यत्र न कचित् ।। १०७ ।। कर्मपर्यायमात्रपु गगिण. स कुतो गुणः । सहिशेपेऽपि संमोहाद्दयोरैक्योपन्धितः ॥ १०८॥ इत्युक्तो युक्तिपूर्वोऽमौ गुण सदर्शनस्य यः। नाविभोपि दीपाय विवक्षो न गुणामये ॥ १०९।। अस्ति घामहष्टिः सा सम्यादर्शनशालिनी। ययालातमात्रं सद्भाति सदर्शनं नंरि ॥ ११॥ अतत्त्वे तत्त्वभवानं मूढीष्टः स्थलमणाम् । नास्ति मा यस्य जीवस्य विरयासः मोत्यमूदहा ॥ १११॥ अस्त्यसद्धेतुदृष्टान्तमिघ्यार्थः साधितोऽपरः। नाप्यलं तत्र मोहाय एग्मोहस्योदयक्षतेः ।। ११२।। सूक्ष्मान्तरितार्थे दर्भितेऽपि कुदृष्टिमिः । नाल्पश्रुतः समुझेत किं पुनभेदाभ्रुतः ।। ११३ ॥ मनुष्ये ।
लाटीसंहितायां- अर्थाभामपि तत्रोधः सम्यग्दृष्टेन मूढ़ता। स्थूलानन्तरितोपात्तमिण्यार्थेऽस्य कुतो नमः ।। ११४ ॥ तथा लौक्रिकी रूदिरम्ति नाना विकल्पमात् । निःसारैराश्रिता पुंभिरथानिष्टफलप्रदा ।। ११५ ।। अफला कुफला हेतुशून्या योगापहारिणी। दुस्त्याज्या लौकिका रूदि कैश्चिद्दुष्कर्मपाकतः ॥ ११६ ।। अदेवे देवयुद्धिः स्यादधर्मे धर्मधीरिह । अगुरौ गुरुबुद्धिर्या ख्याता देवविमूढता ॥११॥ कुदेवाराधनां कुर्यादैहिकश्रेयसे कुधीः । मृपालोकोपचारत्वादश्रेया लोकमूढ़ता ।। ११८ ॥ अस्ति श्रद्धानमेकेषां लोकरूढिवशादिह । धनधान्यप्रदा नूनं सम्यगाराधिताम्बिका ॥ ११९ ॥ . अपरेपि यथाकामं देवानिच्छन्ति दुर्धियः । सदोपानपि निर्दोपानिव प्रज्ञापराधतः ।। १२० ।। , नोक्तस्तेषां समुद्देश प्रमगादपि सङ्गतः । लब्धवर्णो न कुर्याद्वै निस्मारं ग्रंथविस्तरम् ॥ १२१ ।। अधर्मस्तु कुदेवानां यावानागधनोद्यमः । तैः प्रणीतेपु धर्मेपु चेष्ठा वाकायचेतनाम् ।। १२२॥ । कुगुरु: कुत्सिताचार मशल्यः सपरिप्रहः । सम्यक्त्वेन व्रतेनापि युक्तः स्यात्सद्गुरुर्यतः ॥ १२३ ॥ अबोद्देशोपि न श्रेयान्सर्वतोऽतीयविस्तरात् । आदयो विधिरत्रोक्तो नादेयोऽनुक्तएव सः॥ १२४ । । दोपो रागादिचिद्भावः स्यादावरणं च कर्म तत् । तयोरभावोस्ति निःशेषो यत्रासौ देव उच्यते ॥ १२५ ।। अन्त्यत्र फेवलं ज्ञानं क्षायिकं दर्शनं सुखम् । यीय पति सुविख्यातं सादनन्तचतुष्टयम् ॥ १२६ ।। पण्डिनः।
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सम्पासाननम् । नमामि दामि समता। अरित वायन गुलममत्र पेत् ॥ १५ ॥ मन्तुि विशेषारित प्रोकरमचयम्य । मोरामाविनामून मधमायायायम् ॥ १५४ ॥ गया यमानम्मिम नहन्यो मोहबन्धमा । तत्मत्वं मत्वमताच पार पास भये क्षय ।।१५५ ।। नाच सावायायामबागेवास्तु तलय । अंशात्माययाशात्मवंत. मश: भय । १५६ ॥ नामि मिरा व मदनकर्मणाम् । आरमोदोश्याभापारासरपगुणा स्मात् ॥ १५ ॥ मत कर्मचर्य प्रोमनि पापि सांप्रतम् । रागदपविमोहानामभाषादुरना मना ।। १५८ ॥ अथायरस सामान्यामधिशेषाटिधामतः । एकोप्यर्षिया नाण्यं पापयोगाध्यमियोध्यते ।। १५९ ॥ आचार्य स्यादुपा-याय साधुप्रेमि त्रिपागतिः । स्पुर्षिशिष्टपदारदायोपि मुनिअग ॥ १३॥ एमोनियायका विषको बहि सम । पोदारसधा कं प्रत पैक प पप्रधा ॥ ११॥ प्रयोदशविध भई पारित्रं ममतैकया। मूलोसरगुणाका संयमोपेकपा मह ॥ १६२ ।। परीपहोपसर्माण सहन प समं स्मृनम् । आहायतिविधिश्वकर्यास्थानामनाइय ॥१६॥ मागों मानाय सष्टि ज्ञानं पारिश्रमात्मनः । रत्नत्रय समं पामपि पान्तपहिरियतम् ॥ ६४॥ मो विचारणीयम् । • सुनके "सपे "नि “गुण इन पाल्याची टा विपर.
लाटीसंहितायां- प्याता ज्यानं प ध्येयभ शाता ज्ञान प शेयसात् । चतुर्विधाराधनापि तुल्या क्रोधादिजिष्णुता ॥ १६५ ॥ कियान पहुनोफेन तद्विशेषोऽवशिध्यने । विशेषाम्छेपनि शेपो न्यायादस्त्यविशेपमार ॥६६॥ आचार्योऽनादिता रूढ योगादपि निमच्यते । पत्राचार परेभ्यः म आधारति संयमी ॥१७॥ अपि छिन प्रो साधो पुनः सन्धानमिग्छतः। ताममादेशदानेन प्रायशित्त प्रयानि ॥ १६८॥ आदेशस्योपदेशेभ्य स्याद्विशेष म भेदभार । आरसे गुरुणा दल नोपदेशेष्ययं विधि ॥ १६९ ॥ ननिखानदेशी महिला प्रतधारिणाम् । दोभाचार्यण दक्षिय वीयमानासि तरिक्रपा ॥ १७ ॥ न पाय क्रिगनेऽन्येन तेन यो । मनिपा यथामायावनिनो मनागरि। (हंगकपदापि नापगोत्र कारणात् ॥ १५ मुनियाणा या गृहस्थाशरिणाम् । आशावान कनंगा पाश्रितः ॥ १२॥ नपा प्रांगद गुनिभियंकवारिमिः । मनिमम्पनिमयंग नावानिम ॥१॥ भून प्रान्तमा न रागाय nिfणाम । नामे गायनतालय सात ॥ १४॥ ननि म आरंगीन निषित । नने मनाया भागामहनामा ॥ १५ ॥ timit:ut Ali artistini या पालनाtina Mint tsim "". •81पार ka - सम्यग्दर्शनवर्णनम् । सहासंयमिभिर्लोकः संसर्ग भाषणं रतिम् । कुर्यादाचार्य इत्यकेनासो सूरिनंचाईतः ।। १७७ ।। संघसम्पोएकः सूरिः प्रोक्तः कश्चिन्मतेरिह। धर्मादशोपदेशाभ्यां नोपकारोऽपरोऽस्त्यतः ॥ १७८ ॥ यद्वा मोहात्प्रमादावा कुर्यायो लौकिकी क्रियाम् । तावत्कालं स नाचार्योऽप्यस्ति चान्नम्रतारच्युतः ॥ १७९ ॥ इत्युक्तमततपशीलसंयमादिघरो गणी । नमस्यः स गुरुः साक्षातदन्यो न गुरगणी ।। १८० ॥ उपाध्यायः स साध्योयान वादी स्याद्वादकोविदः । वाग्मी वाग्नझसर्वश: मिसान्तागमपारगः ॥ १८१ ।। कविः प्रत्यमसूत्राणां शदाधैं. मिद्धमाधनात् । गमकोऽर्थस्य माधुर्ये धुर्यो धनृत्ववर्मनाम् ।। १८२ ।। उपाध्यायम्वमित्यत्र श्रुताभ्यामोस्ति फारणम । यदध्यति स्वयं पापि शिष्यानभ्यापर्यटगुरुः ॥ १८३॥ शेपस्तत्र प्रतादीना सर्वसाधारणो विधिः । कुर्याधर्मोपदेशं स नादेश रिषत्कचिन् ॥ १८४ ।। सेपामेवाभमं लिहं सूरीणां सयमं तपः । आश्रयेत् शुद्धधारित्रं पनाचारं म मुद्धधी ॥ १८५ ॥ मूलोसरगुणानेव ययोमानाधिप। परिपझोपमर्गाणां विजयी स भवेयुवम् ।। १८६ ॥ अनानिविस्तरेणालं नूनमन्तबहिर्मुने । शुद्धषेषधरो धारो निर्धन्यः स गणापणी ॥१७॥ उपाध्यायः समास्यातो विख्यानास्ति स्वलक्षणे । अधुना माध्यते साधोलक्षणं मिटमागमात् ।। १८८ ॥ मार्ग मोक्षस्य पारिवं सहामिपुरश्मरम् । माधयस्यात्मसिदय साधुरन्वर्यसंकः ।। १८९॥
लाठीसंहितायां- -- नोंचे वाचंयमी किश्चिद्धस्तपादादिसंज्ञया । न किश्चिदर्शयेत्स्यस्थो मनसापि न चिन्तयेत् ॥१९॥ आले म शुद्धमात्मानमास्ति नुवानध परम् । स्तिमितान्नबहिर्जल्पो निस्तरङ्गाब्धिवन्मुनिः ।। १९१ ॥ नादेश नोपदेशं वा नादिशेस मनागपि । स्वर्गापवर्गमार्गस्य तद्विपक्षस्य किं पुनः ॥१९२ ।। . वैराग्यम्य परा काष्ठामधिरूढोऽधिकप्रमः। दिगम्बरो यथाजातरूपधारी दयापरः ॥ १९३ ॥ निप्रन्योन्नहिहिमन्यरुदन्थको यमी। फर्मनिर्जरक श्रेण्या नपस्वी म सपाशुचिः ॥ १९४॥ परिपहोपमर्गागरजम्यो जितमन्मयः । पपणाशुद्धिसंशुद्धः प्रत्यारयानपरायणः ॥ १९५ ।। इत्यासाने साधुः साधुगुणैः प्रितः । नमस्य श्रेयसेऽयश्य नेनरी विदुषां महान् ॥ १९६ ॥ एय मुनिया म्याना महती महतामपि । तद्विशुद्धिविशेषाम्नि क्रमासरतमात्मकः ॥ १९ ॥ प्राचार्य प्रमितास्ति दीदिशादप्रणामणीः । न्यायाना दानाध्यभात मिद यात्मन्यनत्पर ।। १९८ अधानानत्वरीयर हम्मोहानुदयात्मनः । अग्नि नमाश्निाभूनगुद्वामानुभयः गुटम् ॥ १९५॥ अग्नि देशनाना पारियावरणक्षनिः । याक्यायांन केवलं न स्यामनिवापि नातिः ॥ २०० ।। नयापि न यहियस्तु म्यानदेनुरांतुनः । अग्न्युरादाननीश धनियां तभनि: ।। २०१॥ "मोय.riदा । कामे" लि बरः।।बश्याल मन्ना। - , मा A --- सम्यग्दर्शनवर्णनम् । मंति मंग्वलनस्योरे. पर्वका देशपातिनः । सद्विपाकोन्यमन्दो वा मन्दो हेतुः ऋमायोः ।। २०२ ॥ संशास्ताविनूनं विशुद्धिस्तु सदानिः । मौपि भरतमस्यांश साप्यनेकैरनेकपा ।।२०३।। अग्नु यता न पिल्यं सत्र हेतुबशादि । समाप्येतायताधार्य मिदा नारमन्यतत्पर ।। २०४।। सत्रावस्यं विशुद्धपंशस्तपां मन्दोदयादिह । मंशांशीऽथया सीमोदयाभायं विधिः स्मृतः ॥ २०५॥ फिन्तु धादिशुद्ध पंश संशांशीय पा कचित् । सदिशुद्धर्षिशुद्ध पेश: मंठेशांशादय पुनः ॥ २०६ ।। तेषां पीत्रोदयाचावदेनायानत्र पाधकः । मर्वतश्प्रकोपी चनापराधोम्यतोपरः ।। २०७।। तगात्रेतायता नूनं शुद्धम्यानुभवच्युतिः । फर्नु न शक्यते यम्मादधारस्यन्यः प्रयोजकः ।। २०८ ॥ हेतुः शुद्धामनो ज्ञान शमो मिथ्यात्वकर्मणः । प्रत्यनीकस्तु समोरशमन्नस्य व्यत्ययान् ॥ २०९॥ दामोदेऽन्तंगते पुंसः शुद्धस्यानुभयो भवेत् । न भवेदिप्रकर. पश्चिचारित्रावरणोदयः ।। २१०॥ नयाकिञ्चित्कारश्य चारित्रावरणोदय' । इग्मोहस्य क्षतेनालमलं म्यस्य कृते च यः ।। २११ ।। कार्य चारित्रमोहय चारिपाच्च्युतिरात्मनः । नारमदृष्टस्तु दृष्टित्वान्याय्यादितरदृष्टिषन् ॥ २१२ ॥ यथा पशुः प्रसन्नं वे कम्याच दैवयोगतः । इतरत्राभवापेऽपि दृष्टाध्यक्षान्न सत्क्षतिः ॥ २१३॥ , संकेश । २ सा अपिविशुद्धिः। । वयरीत्यान् । . .
लाटीमंहितायां- कपायाणामचंद्रकश्चारित्रं तावदेव हि । नानुद्रेकः कपायाणां चारित्राच्च्युतिरात्मनः ।। २१४ ।। ततस्तेपामनुद्रेकः स्यादुदेकोऽयया स्वतः । नात्मदृष्टः क्षतिनं दृग्मोहस्योदयाहते ॥ २१५ ॥ अथ सूरिरुपाध्याय: द्वावेतो हेतुतः समौ । साधुरियात्मज्ञी शुद्धी सुद्धा शुद्धोपयोगिनी ।। २१६ ॥ नापि कश्चिद्विशेपोस्ति द्वयोम्तरतमो मिथः । नेताभ्यामन्तरुत्कर्ष साधारप्यतिशायनात् ॥ २१७ ॥ लेशतोस्ति विशेपश्चन्मिथस्तेषां वहिः कृतः । का क्षतिमूलहेतोः स्यादन्तःशुद्धिसमन्वितः ॥२८॥ नास्त्यत्र नियतः कश्चिद्युक्तिस्वानुभवागमान् । मन्दादिरुदयस्तेषां सूर्युपा-यायसाधुषु ।। २१९ ॥ प्रत्येकं बहवः सन्ति सूर्युपाध्यायसाधयः । जघन्यमध्यमोत्कृष्भवैश्वकैकशः पृथक् ॥ २२०॥ कश्चित्सूरिः कदाचिद्वै विशुद्धिं परमां गतः । मध्यमा वा जघन्यां वा स्वोचितां पुनराश्येत् ॥ २२१ ।। हेतुस्तवोदिता नानाभावांशैः सर्द्धकाः क्षणम् । धर्मादेशोपदेशादिहेतुर्नात्र वहिः कचित् ।। २२२ ।। परिपाट्यानया योज्याः पाठकाः साधवश्व ये। न विशेपो यतस्तेषां नियत शेपो विशेषमाक् ॥ २२३।। ननु धर्मोपदेशादि कर्म तत्कारणं पदिः । हेतोरभ्यन्तरस्यापि याचं हेतुहिः कचित् ॥ २२४ ।। नेवमाद्यत: सर्व वस्त्वकिश्चित्करं बहिः । तत्पदं फलवन्मोहादिच्छतोऽध्यान्तरं परम् ॥ २२५ ।। किं पुनर्गगिनस्तस्य सर्वतोनिच्छतो पहिः । चोदेशोपदेशादिस्वपद तत्फलं च यत् ॥ २२६ ।। T सम्यग्दर्शनवर्णनम् । नास्यामिदं निरीहत्वं धर्मादेशादिकर्मणि । न्यायातक्षार्थकांक्षायादा नान्यत्र जातुपिन् ।। २२७ ।। ननुनेदांविनाकर्म, कर्मनेहां विना शचित्। सामानानीदिनकर्म म्यामार्थस्तु या नवा ।। २२८ ॥ नेवं देवोरतिव्यालेरारापानीणमोदिपु । यन्याय नित्यतापत्तभवेन्मुक्केरसम्भव ॥ २२९ ।। ततोऽन्त्यन्त फतो भेदः सुदनांशागतानि । निर्षिीपारसमस्त्वेष पक्षो माभूदहि कृत' ॥ २३० ॥ किमास्ति यौगिकी दि. प्रसिधा परमागमे । पिना साधुपदं न म्याकेवलोपत्तिरजमा ॥ २३ ॥ नत्रानमिदं मम्यक माक्षात्मार्थदर्शिन। क्षणमस्ति म्वतः भेण्यामधिदस्य तत्पदम् ॥ २३२।। यतोऽपश्यं स सुरिया पाठकः श्रेण्यनेहति । कृरनचिन्नानिरोधात्मलक्षणं ध्यानमाश्रयेत् ॥ २३३ ।। सत मिदमनायासाचपदत्वं सयोरिह । नून वाघोपयोगम्य नावकाशोस्ति तत्र यन् ।। २३४ ॥ न पुनश्चरण तत्र छोपस्थापना वरम् । प्रागादाय क्षणं पसारसूरि साधुपदं भयेत् ॥ २३५ ।। एकं दिग्मानमत्रापि प्रसादुरलक्षणम् । शेष विशेषतोय तत्त्वरूपं जिनागमात् ।। २३६ ॥ धमों नीचपदादुध पदे धरवि धार्मिकम् । नत्राजवजवो नीचा पदमुथैम्तदत्ययः ॥ २३७ ॥ सम्याटमारिचारित्रं धर्मो रत्नत्रयात्मकः । सत्र मद्दर्शन मूलं हेतुरतमेतयोः ॥ २३८ ।। तत सागाररूपा वा धर्मोऽनागार एष वा। म पुरस्सरो धर्मों न धर्मस्तद्विना चिन् ॥ २३९ ॥ दिक्त् इति पाठः 'स' पुस्तके पाण्याच्याच । समारःसमारनाश:- मोक्षः । -- क लाठीसंहितायां- रूढितोधिवपुर्वाचां किया धर्मः शुमावदा । तत्रानुकूलरूपा या मनोवृतिः सहानया ॥ २४०॥ सा द्विधा म च सागारानागाराणां विशेषतः यतः क्रियाविशेषत्वानूनं धर्मो विशेषतः ।। २४१ ।। तत्र हिंसानृतस्तयाब्रह्मत्स्नपरिमहात् । । देशतो विरतिः प्रोक्तं गृहस्थानामणुप्रतम् ॥ २४२॥ यतर्मूलगुणाश्चाष्टाविंशतिमूलवत्तरोः । नात्राप्यन्यतरेणोना नातिरिक्ता कदाचन ॥ २४३ ।। मवरव समस्तैश्च सिद्ध सावन्मुनित्रतम् । न व्यस्तैव्य॑स्तमात्रं तु यावदंशत्रयादपि ॥ २४४ ॥ वंद समिर्दिदियरोधो लोचो आवसयमचेलमन्हाणं । खिदिसयणमदतवणं ठिदिभोयणमेयभत्ते च ॥ २४५ ॥ ऐते मूलगुणाः प्रोक्ताः यतीनां जनशासने लक्षाणां चतुरशीतिगुणाश्वोत्तरसंज्ञकाः ।। २४६ ।। ततः सागारधर्मोवाऽनगारो वा यथोदितः। प्राणिसंरक्षणं मूलमुभयत्राविशेषतः ॥ २४७ ॥ उक्तमस्ति क्रियारूपं व्यासागतकदम्बकम् । सर्वसावद्ययोगस्य तदेकस्य निवृत्तये ॥ २४८॥ अर्थाजेनोपदेशीयमस्त्यादेशः स एव च । सर्वसावधयोगस्य निवृत्तिमुध्यते ॥ २४९ ॥ सर्वशब्देन सत्रान्तर्बहिवर्तिपदार्यतः । प्राणोच्छेदो हि सावध सैव हिंसा प्रकीर्विता ॥ २५०॥ योगस्तत्रोपयोगी वा बुद्धिपूर्वः स उच्यते । सूक्ष्मवावुद्धिपूर्वो यः स स्मृतो योग इत्यपि ॥ २५१ ।। नानि समितयः इदियनिरोधा लोरः आक्रमकान मधेलं भलानम् । सिलिशयनं निधनभोजनं एकभनं च । ३ मिनारात् । ---
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दाटीसंहिता- - नूनं सद्दर्शनज्ञानचारित्रर्मोपद्धतिः । समस्तैरेव न व्यस्तैस्तक्ति चारित्रमात्रया ॥ २६५ सत्यं सद्दर्शनं ज्ञानं चारित्रान्तर्गतं मियः । त्रयाणामविनाभावाद् रत्नत्रयमखण्डितम् ।। २६६ ।।।। किञ्च सदर्शनं हेतुः संविधारित्रयोर्द्वयोः । सम्यविशेषणस्योथैर्यद्वा प्रत्यप्रजन्मनः ॥ २६७ ॥ अर्थोयं सति सम्यक्त्व ज्ञानचारित्रमन्न यत् । भूतपूर्व भवेत्सम्यक सूते वा भूतपूर्वकम् ॥ २६८॥ शुद्धोपलब्धिशक्तिर्यालब्धिज्ञानातिनायिनी । सा भवेत्सति सम्यक्चे शुद्धोभावोयवापि च ।। २६९ ॥ यत्पुनद्रव्यचारित्रं श्रुतज्ञानं विनापि दृ । न तदुज्ञान न चारित्रमास्ति चत्कर्मबन्धकृत् ।। २७० ॥ तेपामन्यतमोदेशो नालं दोपाय जातुचित् । मोक्षमार्गकमान्यस्य माधकानां स्मृतेरपि ॥ २७१।। यन्धो मोक्षश्व ज्ञातव्य' समामा प्रश्नकोविदः । रागांशैर्यन्ध एव स्यान्नारागांशैः कदाचन ॥ २७२ ॥ येनांशेन सुदृष्टिस्तनांशेनास्य बन्धन नास्ति । येनाशेन तु रागस्तेनांशेनास्य यन्धनं भवति ॥ २७ ॥ येनांशन तु ज्ञानं तेनशिनाभ्य बन्धनं नास्ति । येनांशेन तु रागस्तनांशेनाम्य बन्धन भयति ॥ २७४ ।। येनांशेन चारनं तेनांशेनास्य बन्धनं नास्ति। येनांशेन तु रागम्तनांशेनास्य बन्धनं भवति ॥ २७५ ॥ एको धर्मस्वरूपोपि प्रसवात्मनतोगतः। कपिलग्धावकागतं विनराता करिष्यति ।। २७६ ॥ पर्व मनं उसन्न मनपूर्व सम्यक सम् । २ स्मरणात् । । संक्षेपात् ।
सम्पादनार्णनम् ।
देषे गुरी तथा भौपिलस्वामिनी ।
स्पाताप्यमूगरष्टिः स्याम्पमा राष्टिता ॥ ९५७ ।।
सम्यक.यस्य गुणाप्येष माल दोपाप तिः ।
सम्पारष्टियतोषश्य पणा वाम समेतर ॥१७८॥
पहिणमास्ति गुण मम्यादात्मनः।
सभणादागशत्तीनामपर पदणारिक ।। २७५ ॥
भारमशगरीयकरणं पापदणम् ।
अर्यादानिपारिवभापारयल दिना॥२८॥
जानमप्येष निशेपारपोर नागरसी।
राथापि यत्नवाना पोगरयनि ।।२८॥
पहा पुगोपलधार्थमध्यमेशपिनादि ।
मक्रिया काशिरपतिमापापमोमिनाम ॥ २८९ ।।
नार्य शुसोपालपी ग्यादेशतापि प्रमारणाम ।
निष्पमालयामानमावान मा॥ १८३ ।।
रंग सेषमागोपिनाम्यपाय न वापरत ।
आमनोनुलापतागुगामागाभापतागपि ॥ १८४॥
पहागि पिनायागास्तापदणम।
अमूद गुणभेणी निर्माया गुमाभवान॥९८५ ॥
अवश्य भाषिनी तत्र निराणाम।
प्रसियूमरण पापसंख्येयगुणकमान् ॥ ८॥
म्यायामात यापनarati
सि. वोपयोगग्य मिलि पुनः पुनः ।। २८ ।।
पथा पपा विशिया:प्रशिनी।
तथा तथा नागुपंग पिपपि ॥९८८ ॥
सता भूग्नि नियाकाणे मामा खोपण।
किन्तु सेपर्सपासून पानारपि हिमाम् ॥ १८९ ॥
७२ लाटीमहिनाम- नूनं मानज्ञानचारित्रोभपद्धतिः। मममेरेषन व्यस्तम्नति पारिनमाया ॥२६॥ सय सार्शनं ज्ञानं धारिवालगत मियः । प्रयागामविनामाषाद रत्नत्रयमण्डितम् ।। २६६ ॥ कि सामानं हेतुः मंत्रिचारित्रयोदयो। माविशेषस्यामा मयमजन्मनः ॥ २७n अपाय मति मम्यक्त्ये मानधारियमत्र यत् । भूनाएं भवेन्मम्या मूते या भूतपूर्वकम् ।। २६८॥ मुसोलिभिशक्तियोलभिज्ञानातिशापिनी। मा भरत्मनि सम्परये गुभावोपचाप च ॥ २९ ॥ यानव्यपारित भूतमानं विनापिर। समान न पारित्रमान से कमभा॥२७॥ गामन्यतमाशा नानरोगय ज्ञानुपि । मामागे मायाय मापकाना २१ ॥ या मामानय ममामा नाति। गगाशेध यस्यामारगा: जापन ॥ २२॥ --- -- - नाशन गुष्टिमेनागना धन नागि भनाभन तुम्नानाम्प बन्धनं पति॥ गनाशन मान नागनाधन मानि। बनानगगमनागनाम्य साधने भनि । जननी नाशनाय ने नाग्नि। गगन गगमवाशनामधन भात .... मापनमriमामानint विuri iwari...॥
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साटीसंहितायां- नूनं मदर्शनज्ञानचारित्रोभपद्धतिः । ममम्नैरेव न व्यस्तैम्तक्ति चारिनमात्रया ॥ २६॥ सत्य सदननं ज्ञानं चारित्रान्तर्गतं मियः । प्रयाणामविनाभावाद रत्नप्रयमण्डितम् ॥ २६६ ।। किञ्च सदर्शनं हेतु. संविमारित्रयायोः । सम्यग्विशेषणस्यामि यद्वा प्रत्यप्रजन्मनः ।। २६७ ॥ अयं सति मम्यक्त्ये ज्ञानचारित्रमत्र यत् । भूतपूर्व भवेत्सम्यक मूते वा भूतपूर्वकम् ॥ २६८ ॥ शुद्धोपलश्विशक्तियोलब्धिज्ञानातिशायिनी। मा भवेत्मति सम्यक्च शुद्धोभायोथयापि च ॥ २६९ ।। यत्पुनद्रव्यचारित्र श्रुतज्ञान विनापि हः । न सशान न पारित्रमस्ति च कर्मयन्धत ॥२७॥ नेपामन्यतमोनो नालं दोपाय जातुचित् । मोनमार्गकमान्यम्य माधकाना स्मृतरपि ॥ २१॥ वन्धी मोमश ज्ञातव्य ममामा-प्रश्नकोविदः । रागांशेयन्ध एय स्यानारामा: फयापन | २७२ ।। उक्तंचा येनाशन गुष्टिनाशनाम्य यन्धनं नास्ति । यनांशेन तु रागस्तनागनाम्य यन्धन भयति ॥ २७३ ।। यनशिन तु ज्ञानं नेनाशनाय पन्धनं नास्ति। येनाशन गुरागरनेनाशनाय बन्धन भवति ।। २७४ ।। यनांशन पारनं नेतशिवाम्य अन्धनं मारिन । येनाशेन तु रागम्ननाशनाम्य पन्धन भवति ।। २७५ ॥ मी धर्मावरपापि प्रमनारमनांगतः। कपिलधारामानं विगतरामा करिष्यति ॥ १६॥ KA TET परम् । माणात मा
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७३ सम्यादर्शनवर्णनम् । देवे गुरौ तथा धर्म दृष्टिस्तत्वार्थदर्शिनी। ख्याताप्यमूढद्दष्टिः स्यादन्यथा मूढदृष्टिना ॥ २७७ ॥ सम्यक्त्यस्य गुणोप्येष नालं दोषाय लक्षिनः । मम्यग्दृष्टियतोवश्यं यथा स्थान तथेतरः ॥ २७८ ।। उपहणमत्रास्ति गुणः मम्यग्दृगात्मनः । लक्षणादात्मशक्तीनामषश्य हणादिह ।। २७९ ॥ आत्मशक्तरदावल्यकरण पापहणम् । अर्थाज्ञप्तिचारित्रभावास्यलनं हि तत् ॥२८० ।। जाननप्येप निशेषापौर नामदर्शने । तथापि यत्नवाना पौरुप प्रेरयनिय ।। २८१ ॥ यदा शुद्धोपलब्धार्थमभ्यसेदपि तदहि । सक्रिया काशिदप्यर्थात्तत्माच्यानुपयोगिनाम् ॥ २८२ ।। नायं मुद्धोपलब्धौ स्यालेशतापि प्रमादषान् । नियमादनयात्मानमाददानः समादरात् ।। २८३ ।। रमेन्द्र मेवमानोपि काम्यपध्यं न वाचरेत् । आत्मनोनुहापतामुज्झनोग्झनलापतामपि ।। २८४॥ यता सिद्ध विनायासात्स्वतस्तत्रोपरहणम् । अपमूदव्य गुणश्रेणी निर्जरायाः मुसम्भषाम् ॥ २८५ ॥ अवश्य भाविनी तन्त्र निर्जरा कृत्स्नकर्मणाम् । प्रतिसूक्ष्मक्षण यावदसंख्येयगुणक्रमात् ।। २८६ ।। न्यायादायातमेत? यावतांशेन तरिक्षती। पृद्धि शुदोपयोगस्य वृद्धिवृद्धिः पुनः पुन ।।२८७ ॥ यथा यथा विशुद्धिः म्यादिरन्तःप्रकाशिनी। तथा तथा इपीकानामुपेक्षा विषयेप्यपि ।। २८८ ॥ सतो भूम्नि क्रियाकाण मारमशतिम सोपये। किन्तु संवर्धयन्नूनं यलादपि च रष्टिमान् ॥ २८९ ।। , अक्षराशिवयम् । एमा।
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७२ लाटीमहिनायां- नूनं मदर्शनहानचारित्रैर्मोक्षपद्धतिः । समस्नरयन व्यस्तैम्तक्तिं चारित्रमात्रया ।। २६५।। सत्य मद्दर्शनं ज्ञानं चारित्रान्तर्गतं मियः । प्रयाणामविनाभावाद रत्नत्रयमस्त्रण्डितम् ॥ २६६ ॥ किञ्च सद्दर्शनं हेतु मंत्रिचारित्रयोदयोः । सम्यग्यिशेपणस्योचैयद्वा प्रत्यप्रजन्मनः ॥ २६७ ।। अर्थोय सति सम्यक्त्वे जानवारियमत्र यत् । भूतपूर्व भवेत्सम्यक मूते वा भूनपूर्वकम् ॥ २८॥ शुद्धोपलब्धिशक्तिर्यालब्धिज्ञानातिशायिनी । सा भवेत्मति सम्यकचे शुद्धीभावोथवापि च ॥ २६९ ।। यत्पुनद्रव्यचारित्र श्रुतज्ञान विनापि दछ । न नमानं न चारित्रमस्ति चयर्मयन्धकृत ॥ २७० ।। तेषामन्यतमोदेशी नालं दोपाय जातुचित् । मोक्षमार्गकमान्यस्य माधकाना मतेरपि ॥ २७१ ॥ यन्यो मोक्षध सातय ममामा प्रश्नकोविदः । रागांशैयन्ध एवं स्यामारागांभः कदाचन ॥ २७२ ।। उक्तंच. येनांशेन मुदृष्टिनाशनास्य बन्धनं नास्ति । यनांशेन तु रागस्तनांशेनाम्य बन्धनं भवति ॥ २७३ ।। येनांशेन तु शान सेनाशनाम्य पन्धनं नास्ति। येनांशेन सुरागस्तनांशेनाम्य बन्धनं भवति ॥ २४ ॥ येनांशेन परियं तेनांशेनास्य बन्धन नाम्नि । येनमिन तुरागम्ननाशनास्य बन्धनं भवति ॥ ७ ॥ पली धर्मस्वारपापि प्रमलामानोंशतः। कपिलधारकाशम् विनराजा करिष्यति ॥ २७६ ॥ मग मन भाया । २ मागात् । । संक्षा ।
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महिनाया - नून मनमानार्माभपनि । मममेनन यम्नानकि नारित्रमात्रया ॥२६॥ मन मान शान नजान्नगत मिथ । याणामधिनाभावाद नययममातम ! -६६॥ कि मरन तु मारमारपगारी मम्मामागमाचा पगप सन्मान ।। २६ || अग मान सम्मानमा यन। भाभा मा मन । नाम । - ॥ पदार 11111सपना मा भग मात मद्रामाशापनाप म ।। .. । । नजाना-माम्न कमचाग ।।." 11.4भारमा माग अनुराग माजमार्गमा परमानाN...। 4014102THIममाका । गाशेजात्रा मन । ... नामन महामनाहाना ME नाम्ना नात ...। TA AATMAmt गंगानगगननामन त ।.५ नाहान चाATT नन मात्र नागमनान वान मान । मी ममता11 nिiHe..। MIN सम्यग्दर्शनवर्णनम् । देवे गुरौ तथा धर्मे रष्टिस्तत्त्वार्थदर्शिनी । स्याताप्यमढदृष्टिः स्यादन्यथा मूढदृष्टिता ॥ २७७ ।। मम्यकयस्य गुणोप्येष नालं दोषाय लक्षितः । सम्यग्दृष्टिर्यतोवश्यं यथा स्यान्न तयेतरः ।। २७८ ।। उपधृहणमत्रास्ति गुण मम्यग्दगान्मन. । लक्षणादात्मशक्तीनामवश्यं यूहणादिह ।। २७५ ॥ आत्मशक्करदोर्वन्यकरणं चापगृहणम् । अर्थादृशातिचारित्रभावास्खलनं हि तन् ।। २८० ॥ जाननप्यप निशेषापौरुपं नात्मदर्शन । तथापि यत्नवानत्र पोम्प प्रेरयनिय ।। २८१ ॥ यद्वा शुद्धोपलब्धार्थमभ्यसेदपि तदहि । सक्रिया कानिदप्यर्थात्तत्माच्यानुपयोगिनाम् ॥ २८२ ॥ नायं शुद्धोपलब्धौ स्यालेशतोपि प्रमादवान । निष्प्रमादनयात्मानमाददान समादरान् ।। २८३ ।। रमेन्द्र मवमानोपि काम्यपध्यं न वाचरेत् । आत्मनोनुहाघतामुज्झनाझन्नल्लाघतामपि ॥ २८४ ॥ यदा मिद्ध विनायासाम्वतस्तत्रोपबृंहणम । उर्ध्वमूदध्वं गुणश्रेणी निर्जराया. मुसम्भवान् ॥ २८५ ।। अवश्य भाविनी सम्र निर्जरा कृत्स्नकर्मणाम् । प्रतिसूक्ष्मक्षण यावदसंख्येयगुणक्रमात् ॥ २८६ ॥ न्यायादायातमेतद्वै यावताशेन तस्मिती । वृद्धि शुध्दापयोगम्य वृद्धिर्वृद्धिः पुन पुनः ॥ २८७ ।। यथा यथा विशुद्धि स्याबृद्धिान्त.प्रकाशिनी। तथा तथा एपीकानामुपेक्षा विषयध्यपि ॥ २८८॥ ततो भूम्नि क्रियाकाण्डे नात्मशक्ति स टोपयेत् । . किन्तु संवर्द्धयन्नूनं यत्नादपि परष्टिमान् ॥ २८९ ॥ • अप्रैकाक्षराधिक्यम् । १ बटुक्रियासमहे । - ७२ साटासंहिनायो- A नूनं मार्शनमानपारिश्मोपद्धतिः । ममनरेव नव्यम्नेस्तहिचारिणमात्रया ॥ २५॥ मन्य मदर्शनं शानं पारिवान्तर्गतं मियः । प्रयाणामविनामावाद रत्ननयमस्पण्डितम् ॥ २६ ॥ किस मदर्शन हेतु मंपिगारियोदयोः । मम्यविशेषणस्याता प्रत्यप्रजन्मनः ॥ २६७॥ अर्थाय मनि मम्य जानकारित्रमत्र यत् । भूत भयमम्या मूर्त या भूतपूर्वकम् ॥ २६८॥ मुपलभिशक्रियालाधनातिशायिनी। मा भस्मति सम्यक यं शुद्धाभावोपवापि ॥ २६९ ॥ यायपारित भूनशानं विनाशिद । मनामान पारिग्रमात महा॥२७॥ मसामन्यनमारमा नालाय माचिस। माजमार्गमाय माकन २०१॥ वन्धी माय ममामामाकोविर यामागगाशेः कदापन ।। १७२।। वनाशेन गुष्टिनाशनाय कायन गाम्नि। मानगगननाशनाप बन्धन मति॥२७३ ॥ नाशनानानाम भने मालि। नांनगगननामनामधनं भवति. नांनी नगिनाम्गपने मानि। नाग्न सामेनागना न भ ... " मी I अमलामनीशन । मन..॥ P M .
प्रय गानम् । कई पापा का नदि पुण्यालं करित। আনাম খনামাখিনা। लम पाराई मर्यमा पुण्यमान सायापि विषाविज्ञानकोशलम् ।। ५१ ।। बिनोपन लायपि प पन्गुरम् । पुष्पामिपुण्य दिना नदि॥५२॥ तरमीमामा ' माशु पामन । रामयविनाय पिय पुण्परमायनम् ।। ५५॥ শায়খ কামনা মুবি। पुण्यदनी परिमांत समरि परिमल ।।५४ ॥ पण पर 'पुण्याय कारणं वच्मि मारप्रतम । लामो विरति प्राणुमतं गवतो महत् ॥ ५५ ॥ मनु पिरतिशदीपि साकांची प्रतवायफः। भ्यधरियन्मांत्रायः कवियः मा बदाधन.॥५६॥ हिमाया पिरति प्रोपा था पानृत्यमापगात् । पारिदिप्याता श्यामापरिमहातू ।। ५७ ।। एभ्यो दाता विरनिहियोग्यमणुप्रतम । सर्वतो पिरविनाम मुनियाार्य महानतम् ॥५८॥ मनु मारिनाम का नाम विरतिस्ततः । किशत्वं पथानायाद मे वदनां पर ।। ५९॥ हिंसा प्रमत्त्यागाः परप्राणव्यपरोपणम् । हरणादक्षिता सू लाशः पूर्वमूरिमिः ॥ ६ ॥ ' ! प्राणाः पधेन्द्रियाणीह पाम्मनोगचलत्रयम् । नियासोनामशः स्यादायुरेक दोनि च ॥ ६॥ पुण्यानम् । .. 7 लाटीसंहितायां- सम्यग्दृशाऽथ मिध्यात्वशालिनाप्यथशक्तितः । अभव्येनापि भव्येन कर्तव्यं व्रतमुत्तमम् ।। ३७ ।। यतः पुण्यक्रिया माध्वी कापि नास्तीह निष्फला। यथापात्रं यथायोग्यं स्वर्गमोगादिसत्फला ॥ ३८॥ पारंपर्येण केपांचिदपवर्गाय सकिया। पञ्चानुत्तरविमाने मुदे वेयकादिषु ।। ३९ ॥ केपांचित्कल्पवासादिश्रेयमे सागरावधि । भावनादित्रयेपूच मुधापानाय जायते ॥ ४० ॥ मानुषाणां च केषाश्चित्तीर्थङ्करपदाप्तये । चक्रित्वार्यार्द्धचक्रित्वपदसंप्राप्तिहेतवे ॥ ४१ ।। उत्तमभोगभूपूधैः मुखं कल्पतरुद्भवम् । एतत्सर्वमहं मन्ये श्रेयसः फलितं महत् ।। ४२ ।। सत्कुले जन्म दीर्घायुर्वपुर्गाढं निरामयम् । रहे सम्पदपर्यन्ता पुण्यत्यैतत्फलं विदुः ॥ ४३ ॥ साध्वी भार्या कुलोत्पन्ना भर्तुभ्छन्दानुगामिनी । सूनवः पितुराज्ञायाः मनागचलिताशयाः ॥ ४४ ॥ सधर्मभातृवर्गाश्व सानुकूलाः सुसंहताः। स्निग्धाश्चानुचरा यावदेतत्पुण्यफलं जगुः ॥ ४५ ॥ जैनधर्मे प्रतीतिश्च संयमे शुभभावना । ज्ञानशक्तिश्च सूत्रार्थे गुरवचोपदेशकाः ॥ ४६॥ सर्मिणः सहायाश्च स्पष्टाक्षरं वाकपाटवम् । सौष्ठवं चक्षुरादीनां मनीपा प्रतिभान्विता ॥ ४ ॥ मुयशः सर्वलोकेस्मिन् शरदिन्दुसमप्रभम् । शासनं स्यादनुसंध्यं पुण्यभाजा न संशयः ॥ ४८॥ विजयः स्यादरिलंसारप्रतापस्तच्छिरोनतिः । दण्डाकोऽप्यरिभ्यश्च सर्व सत्पुण्यपाकतः ॥ ४९ ॥ 'म' पाल के " विमाने " इत्यपिपाठः ।
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टाटीसंहितायां- उक्तं च। पंचवि इंदिय पाणा मण यचकायेण तिण्णिवल पाणा। आणपाणप्पाणा आउगपाणेण हुंति दह पाणा || एकाक्षे वत्र चत्वारो द्वौन्द्रियेपु पडेव ते । ज्यक्षे सप्त चतुराक्षे विद्यन्तेष्टौ यथागमात् ॥ ६२ ।। नवासंज्ञिनि पञ्चाक्षे प्राणा: संज्ञिनि ते दश । मत्त्वति किल समस्यैः कर्तव्यं प्राणरक्षणम् ॥ ६३ ॥ अत्रैकाक्षादिजीवाः स्युः प्राणशब्दोपलक्षणात । प्राणादिमत्त्वं जीवस्य नेतरस्य कदाचन ।। ६४॥ प्रसङ्गादत्र दिग्मानं वाच्यं प्राणिनि कायकम् । तत्स्वरूपं परिज्ञाय तद्रक्षा कर्तुमर्हति ॥ ६५ ॥ सन्ति जीवसमासास्ते संक्षेपाच चतुर्दश । व्यासादसंख्यभेदाश्च मन्त्यनन्ताश्च भावतः ॥ ६६ ॥ तत्र जीवो महीकायः सूक्ष्मः स्थूलश्च स द्विधा । पर्याप्तापर्याप्तकाभ्यां भेदाभ्यां स विधायया ।। ६७ ॥ प्रत्येकं तस्य भेदाः स्युश्चत्वारोपि च तद्यथा । शुद्ध भू भूमिजीवश्च भूकायो भूमिकायिकः ॥ ६॥ शुद्धा प्राणोम्झिता भूमिर्यथा स्याहग्धमृत्तिका । भूजीयोऽधैव भूमौ यो दागेष्यति गत्यन्तरान् ।। ६९ ॥ भूरेय यस्य कायोस्ति यद्वानन्यगतिर्मुयः । भूशरीरस्तदात्वेस्य सभूकाय इत्युच्यत ।। ७० ॥ भूकायिकस्तु भूमिस्थोऽन्यगतो गन्तुमुत्सुकः । स समुद्घातावम्यायां भकायिक इति स्मृतः ॥ ७१ ।। परभपि इन्द्रियाणाः मनोदयायेन प्रयापलाणाः । आनाणमाण आयुष्यमाणेन भवन्ति दश प्राणाः । .
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ঘমশন। माधारणा निगा पन्यवावा । पृमपटवाये गामेलोगेय गस्नागिर॥ ११ ॥ आपायगुबार वादग यु सरितापित। पि निष्टिनारपिमिकांनभापतिष्टिता. ।। ९२ ।। माभिता पपा प्रोना प्रागिनो मलकादय. । अनामिना यती मायभाय ॥ १३ ॥ मम्मिन शरीरपि मन्यनन्नाभ पाणिन । प्रत्येक निकांना नामा मूपु महिना ॥ ५५ ॥ तुमचा पणिगायमरी जीरा दवाषमाणदो दिहा। मिति अणतगुणा मध्येण विनीदमाग ।। पारमेतावनाय नाधम्यायवार्यन । गवस्ताक्षण कार्य भारदुंगभारभिः ।। ९५ ।। मकामजीवाना मपाहमण पधा। माम्प्रतदीन्द्रियादीना प्रसाना पच्मि टणम ॥ ९६॥ साभण यया मूत्र प्रमाःम्युन्द्रियादयः । पर्यामापामा प्रत्येक ने द्विधा मना: ॥ ९७।। कृमयादीन्द्रिया प्राणाम्रीन्द्रियाध पिपीलिकाः। प्रमिदमारार्धते भमराधनुरिन्द्रिया. ॥ ९८॥ पन्द्रिया विधा या मंमिनोऽसंशिनम्तथा। मंशिनम्तत्र पवाभा देवनारकमानुपा ॥ ५९॥ तिर्यधनत्र पनामा मंमिनोऽमशिनस्तथा । प्रत्यकं न विधा या मम्मठिमान गर्मजा ॥ १० ॥ लभ्यपयांपास्तत्र नियनी मनुनाथ ये । असंहिना भवन्येव सम्मच्छिमा न गर्भनाः ।। १०१ ॥ इति सभपतीप्यत्र जीवस्थानान्यपीस्थन् । नल्याप परियाय कर्तव्या करुणा जने' ।।१०२॥
२४
लाटीसंहितायां-
क्षुद्रभवायुरेतद्वा सर्वजधन्यमार्गमात् ।
तद्वदायुर्विशिष्टारले जीवाश्यातीव दुःखिताः ॥ ८१ ॥
उक्त च।
तिण्णिसयाठत्तीसाठाबाहिसहस्सयार मरणाई ।
अंतोमुहुत्तकाले तावदिया चेव खुद्दभया ।।
अवापर्याप्तशब्देन लभ्यपर्याप्तको मतः ।
अपर्याप्तकजीवस्तु स्यात्पर्याप्तक एव हि ।। ८२ ।।
एवं ज्ञेयं जलादीनां लक्ष्म नो देशितं मया ।
प्रन्थगौरवमीतेवी पुनरुक्तभयादपि ॥ ८३ ॥
किञ्चिदम्यादिजीवानां चतुर्गा प्रोतलक्ष्मणाम् ।
धातुचतुष्कमेतेषां संज्ञास्याग्जिनशासनात् ॥ ८४ ॥
अथ धातुचतुष्कागाः सम्भवन्त्यप्रतिष्ठिताः ।
साधारणनिकोताहैस्तैर्वनस्पतिकायिकैः ।। ८५ ॥
उक्तं च।
पुढवी आइचउण्हे तित्ययराहारदेवणिरयंगा।
अपदिद्विदा णिगोदै पदिट्टिदंगा हवे सेसा ।।
किन्तु धातुचतुष्कस्य पिण्डे सूच्यग्रमात्रके।
एकाक्षाः सन्त्यसंख्याता नानन्दा नापिसंख्यका॥८६॥.
अयमर्थः पृथिव्यादिकाये यन्नो विधीयताम् ।
तयादिपरित्यागवृत्भावपि श्रावकैः ॥ ८७ ॥
अनन्तानन्तजीवास्तु म्युर्यनमतिकायिकाः ।
पूर्ववत्तेपि सूक्ष्माश यादराश्चेति भेदतः ॥ ८८ ॥
पर्याप्तापर्याप्त काश्च प्रत्येक चेति ते द्विधा।
प्रत्येकाः साधारणाश्व विज्ञया जैनशासनात् ॥ ८९ ॥
सूक्ष्मवादरपोतापर्याप्तानां च लक्षणम् ।
सातव्यं यत्प्रागत्रैव निर्दिष्टं नातिविस्तरात ॥ ९॥
प्रमावावर्णनम् । माधारण निमन्याहा। पपपरपदये गरमग एनोनिलः ।। ९१ ।। माय गुम्वाद वादगम्युधिषित । प्रविष्टि पिमिकोनमाप्रनिष्टिग ॥१२॥ नामिना या मोला मागितो मलपादयः । नामिना पतीरमणकारयः ॥ ९ ॥ मप्रेमीयन पापि मन्त्पनन्नाभ प्राणिन । प्रायमर नियोता नाम्पु मंझिला ।। ९५ ॥ उप। ल्प भिगोयमरीरे जीपा पमाणदो दिए। मिति अनगुणा मध्येण दिलीदवाण । परमेलापातम्य नदोधायायपार्य। याला कार्य भाषामभीरभिः ॥ ९५ ॥ हममेकामजीवाना मंपाधणं पया। मारप्रतीन्द्रियादीनां साना दरिम सरणम् ॥ ९६ ॥ साधणं पपा सूत्रे त्रमा म्युन्द्रियादयः । पर्यामापर्यातकार प्रत्येक धिा मताः ॥ ९ ॥ मोहीन्द्रियाः प्राचार्यान्द्रियान पिपीलिया। प्रमियमंशकात भमराभरिन्द्रियाः ॥ ९ ॥ पग्रनिया विधा या मंझिनोऽमशिनम्तथा। मंजिनम्नत्र पाणः देवनारफमानुपाः ।। ९९॥ तियाना पसाभा. मशिनोऽगंझिनस्तथा । प्रत्येक दिघा या सामटिमा गर्भजाः ।। १०० ॥ लभ्यपर्याप्रकास्ता नियंत्रो मनुजाच ये । असंगिनी भवन्त्येव सामूचिमा न गर्भजाः ॥ १०१ ॥ इति संक्षेपतोप्यत्र जीवस्थानान्यपीकयन् । सस्वरूपं परियाय कर्नव्या करणा जनः ।। १०२॥ 4 लाटीसंहितायां- . 7 क्षुद्रभवायुरेतद्वा सर्वजघन्यमार्गमात् । .. तद्वदायुर्विशिष्टान्ते जीवाश्चातीव दुःखिताः ।। ८१ ॥ उक्तं चं। तिण्णिसयाछत्तीसाछावहिसहस्सयार मरणाई।। अंतोमुहुत्तकाले तावदिया चेव खुद्दभवा ।" ... अत्रापर्याप्तशब्देन लब्ध्यपर्याप्तको मतः । अपर्याप्तकजीवस्तु स्यात्पर्याप्तक एव हि ॥ २ ॥ एवं ज्ञेयं जलादीनां लक्ष्म नो देशितं मया । प्रन्थगोरवभीतेवी पुनरुतभयादपि ॥ ८३ ।। किचिदम्यादिजीवानां चतुर्णा प्रोक्तलक्ष्मणाम् । धातुयतुष्कमेतेपां संज्ञास्याग्जिनशासनात् ॥ ८४.॥... अथ धातुचतुष्कागाः सम्भवन्त्यप्रतिष्ठिताः ।। साधारणनिकोताहैस्तैर्वनस्पतिकायिकैः ।। ८५ ।। ।' . पुढवी आइचउण्ह तित्ययराहारदेवणिरयंगा। अपदिद्विदा णिगोदै पदिहिदंगा ये सेसा ॥' किन्तु धातुचतुष्करय पिण्डे सूच्यप्रमायके ।' एकाक्षाः सन्त्यसंख्याता नानन्दा नापिसंख्यकाः ॥ ८६ अयमर्थः पृथिव्यादिकाये यत्रो विधीयताम् । सदधादिपरित्यागभावेपि धायकैः ॥ ७॥ अनन्तानन्तजीयास्तु म्युर्यनस्पतिकायिकाः। पूर्ववत्तेपि सूक्ष्माध यादरावेति मेदतः ।। ८८ ॥ पर्यासापासकाच प्रत्येक चेति से द्विघा । प्रत्येकाः साधारणाय विशेया जैनशासनात् ।। ८९ ॥ सूक्ष्मवादरपयांतापयांप्तानां च लक्षणम् । ज्ञानस्य यस्यागौव निर्दिष्ट नातिविस्तराग ।। ९०।।
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पाटीसंहितायां--
देशशब्दोऽत्र स्यूलार्थे तथा भावाद्विवक्षितः।
कारणास्थूलहिंसादेस्यागस्यैवान दर्शनात् ॥ १२३ ॥
स्थूलत्वमाईवं स्थूलसरमादिगोचरम् ।
अतिधाराविनाभूतं सातिचारं घ साम्रयम् ।। १२४ ।।
ताया यो निवृत्तः साधावत्वमवधादिह ।
न निवृत्तस्तथा पंचस्थायरहिमया गृही ॥ १२५॥
विरताविरताख्यः म म्यादेकरिमननेहसि ।
लक्षणात्रमहिंसायास्त्यागेऽणुप्रनधारकः ॥ १२६ ॥
..
जो तसवहाउविरओ अविरओ सह यावर यहाओ।
एकममयम्हि जीयो विरदाविरदो जिणेफाई।
अन तात्पर्यमगतत्सर्यारम्भेण श्रूयताम् ।
प्रसकायघाय स्याक्रिया त्याच्या हितायती ॥ १२ ॥
क्रियायो यत्र विख्यानम्रसकायत्रो महान् ।
सात क्रियामयश्यं स सामपि परित्यजेत् ॥ १२८ ॥
अप्राप्याराने कधिवामप्रशापरापतः ।
याचिमा सकार्याय न फायां स्यायरहतिः ॥ १२९॥
अयं पां विकल्पोमः स्याना कपोलकल्पनात् ।
अर्याभासस्य धान्नेया नेयं वार्थदर्शनात् ॥ १३० ॥
नाथा मिद्धमूयार्थे दर्शिनं पूर्णप्रिमिः।
नवार्थोयं विना कार्य न कायां स्थावरातिः ॥ ११ ॥
एतन्मव विशेगनदानापमान।
नूनं ने गलितं मोहमयमामान्यमहमदात् ।। १२२॥
विध कार्य विना, हिमान यादिनिधीमना ।
रानुगुणग्याने कृतार्थत्वाद्गान्मनः ।। १३३ ।।
नदुई गोम्मटमार मिसान्ने मिसगाधने ।
मन्मू व यथाम्नायावतीने काममानम् ॥ १४ ॥
प्रमापर्णनम् । मम्मीजीपी उपद परपणंच माहदि । माददि अमम्भायं अजागमाणो गुरुगियोपा। पत्र सूर्य पवारम्य प्रदर्ण विराने गुटम् । मायायष्टीकाकारण टीकायां पटीत ।।१३५॥ टोपाध्याम्या पथा भिसीयो य सम्यग्रष्टिमाम् । उपदिष्ट वपन जिनो धापानि म ॥१३६ ॥ पधारमणाय न दुपांत्रसदिमनम् । बिना कार्य पाहत्वाप्रशमादिगुणान्वितः ॥ १३७॥ एषमित्यत्र विस्या कथितं प जिनागमे । म एपार्थो यात्रापि प्रनित्व दिनोऽर्थतः ॥ १३८ ॥ तत्पशमगुणम्याने दिमात्र मतमिग्यता। जमवायपधार्थ या क्रिया त्याग्यापिलापि ॥१९॥ ननु जलानलीयंप्रमानम्पनिक प। प्रवृत्ती समितादानां प्रमानां तत्र का कथा ॥ १४ ॥ नेपदांगल्पदोषत्वापा सयपियधनान् । नियमादनया सत्र रक्षणे यानतत्सरान ॥ १४॥ एवं पत्तर्हि कन्यादा की दोपस्तुल्यकारणान् । अशक्यपरिहारस्य नत्तत्रापि मम्भवान् ॥ १४२।। अपि तत्रात्मनिन्दादिभावम्यावश्यभाषतः । प्रमत्तयोगाचभावस्य यथावं मम्भवादपि ॥ १४३॥ जलादावपि विग्यातानसा. सन्त्युपलब्धितः । कृप्यादी व प्रसा मन्ति विस्याता क्षितिमण्डले ।। १४४ ॥ नवं यतोऽनभिज्ञामि हिमाणुमतलनणे । मतृणाभ्यवहारित्व मुंजानो द्विरदादिषन् ॥ १४५ ॥ 'पुलके "पानि "नि पा:।
टाटीसंहितामां-
देगशब्दोऽत्र स्थूलार्थे तया भावाद्विवक्षितः ।
कारणास्थूलहिंसादेस्यागम्यवान दर्शनान् ॥ १२३ ॥
स्थूलत्वमार्दवं स्थूलत्रसरक्षादिगोचरम् ।
अतिचायविनाभूतं सातिचारं १ माम्रयम् ॥ १२४ ।।
तद्यथा यो निवृत्तः म्याधावत्यसयधादिह ।
न निवृत्तस्तथा पंचस्थापरहिमया गृही ।। १२५ ।।
विरताविरताख्यः म स्यादेकस्मिन्ननेहसि ।
लक्षणात्रमहिंसायास्त्यागेऽणुनतधारकः ॥ १२६ ॥
उक्तंच।
जो तसवहाउविरओ अविरओ नह थावर यहाओ ।
एकसमयम्हि जीवो विरदाविरदो जिणेफमई ।।
अत्र तात्पर्यमेवैनत्सर्यारम्भण श्रूयताम् ।
उसकायवधाय स्याक्रिया त्याज्या हितावली ॥ १२७ ।।
क्रियायां यत्र विख्यातस्त्रसकायवघो महान् ।
तां तां क्रियामवश्यं स सर्यामपि परित्यजेत् ॥ १२८ ॥
अत्राप्यागते कश्चिदात्मप्रशापराधतः ।
कुर्याद्धिसां स्वकार्याय न कायर्या स्थावरक्षतिः ॥ १२९ ।।
अयं नेपां विकल्पो यः स्याद्वा कपोलकल्पनात् ।
अर्थाभासस्य भ्रान्तेर्वा नैवं सूत्रार्थदर्शनात ॥ १३० ॥
तद्यथा सिद्धसूत्रार्थे दर्शितं पूर्वत्रिमिः ।
तत्रार्थोयं विना कार्य न कार्या स्थावरक्षतिः ॥ १३१ ।।
एतत्सूत्र विशेषार्थेऽनवदत्तायमानकैः ।
नूनं तैः स्खलितं मोहात्मसामान्यसमक्षात् ॥ १३२॥
विध कार्य विना, हिंसा न कुर्यादितिधीमता।
दृष्टेस्तुर्यगुणस्थाने कृतार्थत्वाद्दगात्मनः ॥ १३३ ॥
तदुक्तं गोम्मटसारे सिद्धान्ते सिद्धसाधने।
तत्सून प ययाम्नायाप्रतीसै परिमसाम्प्रतम् ॥ १३४ ॥
प्रमाप्रापर्णनम् । उच. मम्माली जीवो पापयर्ण र महदि । माहादि अगम्भाष अजायमानी गुरुणियोगा। बत्र पाराय प्रदर्ण विराने एटम । नायाष्टीयापारण रीवा माटीकल ॥ १३५ ।। रोपाध्याrया पाशिजीबोय. सम्यारष्टिमान । एपदिष्ट प्रवपनं जिनो भाषानि म. ॥ १३६ ।। पकारमहणायन हुपांत्रमदिमानम् । पिना काय पाईयात्मशमादिगुणान्वित ॥ १३७ ।। एवमित्यत्र विख्यातंधित प जिनागमे । स एवार्थों यत्रापि प्रतित्वंदितोऽर्थतः ।। १३८ । तत्पशमगुणम्याने दिग्मात्र प्रतमिता। यसपाययधार्थ या क्रिया त्याग्यापित्रापि ॥१९॥ ननु जलानलोळममानम्पतिकपुष। अपना ननिताहाना प्रमानां सत्र का कथा ॥ १४॥ नप दोगल्पदापत्वायदा यियेपनान् । नियमादतया मत्र रक्षणे पानतत्परान् ॥ १४१॥ एवं चत्तहिं कृप्यादी को दोपस्नुल्यकारणात् । अाक्यपरिहारस्य तात्तत्रापि मम्मवान् ।। १४२।। अपि तवात्मनिन्दादिभावस्याषश्यभावतः । प्रमसयांगायभावस्य पथावं साभवादपि ॥ १४३॥ जलादावपि विस्यावासाः सन्त्युपलब्धितः । कृप्यादी प प्रसा. मन्ति विग्याता क्षितिमण्डले ॥ १४४ ॥ नवं यतोऽनभिशोसि हिंसापुत्रवलक्षणे । सतृणाभ्यवहारित्वं मुंजानो हिरदादिषत् ॥ १४५ ॥ पुनो "पानि " नि यार।
टाटीमंजिना- - देशगन्दोऽय स्यूलार्थे तथा मायाप्रियग्नितः । कारणास्यूलहिमादेम्यागग्यान दगंगाग ।। १२३ ।। म्यूलत्यमार्दवं म्यूलप्रमरमादिगोपरम् । अतिचाराविनाभूतं सातिपारंप मात्रयम् ।। १२४ ॥ तनाथा यो निवृत्त; म्यागायत्वमययादि। न निवृत्तस्तथा पंचम्यायरहिमया गृही ॥ १२५ ।। विरताविरताख्यः स ध्यादेकस्मिन्ननेहामि । लक्षणात्त्रमहिमायाम्त्यागेऽणुप्रनधारकः ॥ १२ ॥ उक्तचा जो तसवहाउविरओ अविरओ मह थायर यहाओ। एकसमयम्हि जीयो पिरदाविरदो जिणेकर्मा ॥ अत्र तात्पर्यमेवैनत्सर्यारम्भेण श्रूयनाम् । उसकायवधाय स्याक्रिया त्याच्या हिनायती ॥ १२७ ॥ क्रियायां यत्र विख्यातनसकायवधो महान् । तां तां क्रियामवश्यं स सर्वामपि परित्यजेत् ॥ १२८ ॥ अत्राप्याशङ्कते कश्चिदात्मप्रज्ञापरायतः । कुर्याद्धिसां स्वकार्याय न कार्या स्थावरक्षतिः ।। १२९ ॥ अयं तेषां विकल्पो यः म्याद्वा कपोलकल्पनान् । अर्थाभासस्य भ्रान्तेर्वा नैवं सूत्रार्थदर्शनात् ॥ १३० ॥ तद्यथा सिद्धसूत्रार्थे दर्शितं पूर्वसूरिमिः । तत्रार्थोयं विना कार्य न कार्या स्थावरक्षतिः ॥ १३१ ॥ एतत्सूत्र विशेपार्थेऽनवदत्तायपानकैः । नूनं तैः स्खलितं मोहात्सर्वसामान्यसङ्ग्रहात् ।। १३२ ॥ किन कार्य विना, हिंसां न कुर्यादितिधीमता। दृष्टेस्तुर्यगुणस्थाने कृतार्थत्वादृगात्मनः ।। १३३ ।। वदुक्तं गोम्मटसारे सिद्धान्ते सिद्धसाधने । तत्सूत्रं च यथाम्नायात्प्रतीत्यै पच्मिसाम्प्रतम् ॥ १३४ ॥ 1 प्रनम् । उर्मः गामा आयो पपर्ण गादपि। मारदिपम्भाव अभागमागी गुरुणियोगा। पत्र पाराय पर विराम टम । नामाष्टीपापण रायमानि ॥ १३५ ।। प्यारया पाशात्रीको सम्पाटिमार। उपदिष्ट पपन शिनी भाशामिम ॥१६॥ पारमणाव में यात्रमसिनम् । बिना गाय पाईत्वाप्रामादिगुणान्वितः ।। १३७ ।। एवमियत विप्यानपिन रजिनागमे। स एवार्थों पपत्रापि प्रति दिनोऽर्थतः ।। १३८॥ तत्पप्रमगुणम्धान दिग्मात्र प्रतमिलता। अमपाययधार्य या किया त्याग्यामिपि ॥१९॥ ननु जलानलोय॑ममानम्पतिसंपुर। अनी मनिताहाना प्रमानां सत्र का नया ॥ १४ ॥ नंग दोगल्पदापत्वा शकपयिवेपना । नियमादतया नत्र रक्षणे पानतत्परत ॥ १४१ ।। एवं पाद यादो को दोपस्तुल्यकारणान् । भाग्यपरिहारम्य तत्रापि सम्भवान् ।।१४२॥ अपि सामनिन्दादिभावायापश्यभाषत। प्रमत्तयांगायभावस्य पधाम्यं मम्भवादपि ।।१४३ ॥ मलादापि विख्यातासाः मन्त्युपलब्धितः । कृप्यादी व प्रसा मन्ति विम्याता भितिमण्डले ॥१४४॥ नव यनोऽनभिजामि हिंमाणुप्रवलक्षण । सतृणाभ्यवहारित्वं भुंजानी द्विरदादिषन् ॥ १४५ ॥ मनोपानि ति पाठः।
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प्रपनाशुमावर्णनम् । --- उचा सम्माइती जीवो उपाई पययण सदादि। सहदि असव्भायं अजाणमाणो गुस्र्वणियोगा ।। अत्र सूत्रे पकारस्य महर्ण विद्यते फुटम् । नस्यार्थष्टीकाकारेण टीकायां मकटीकृतः ॥ १३५ ।। टीका व्याख्या पथा धिग्जीयो यः सम्यारष्टिमान् । उपदिष्ट प्रवचनं जिनो भदधाति सः ॥ १३६ ।। घकारमहणादेष न कुर्यात्वसहिंसनम् । विना कार्य कृपाईत्वाप्रशमादिगुणान्वितः ।। १३७ ।। एवमित्यत्र विख्यातं कथितं च जिनागमे। स एवार्थो यद्यत्रापि प्रतित्वं हि कुतोऽर्थतः ॥ १३८॥ तत्पश्चमगुणस्थाने दिग्मात्रं मतमिठता। वसकायमचार्य या क्रिया याज्यापिलापि च ।। १३९।। ननु जलानलोय॑नसनस्पनिकेषु च । प्रवृत्ती तच्छ्रितागानां प्रसानां तत्र का कथा ॥ १४ ॥ नप दोगल्पदोषत्वाचदा शक्यविवेचनात् । निष्पमादतया तत्र रक्षणे यत्नतत्परान् ।। १४१॥ एवं सहि कृभ्यादी को दोपस्तुल्यकारणाम् । अशक्यपरिहारस्य तदत्तत्रापि मम्भवान् ।। १४२॥ अपि तत्रात्मनिन्दादिभावम्यावश्यभावतः । प्रमत्तयोगाचभावस्य यथावं सम्भवादपि ॥ १४३॥ जलादापपि विख्यावाखसाः मन्त्युपलब्धितः । कृप्यादी च प्रसा: सन्ति विख्याता क्षितिमण्डले ।। १४४ नवं यतोऽनभिज्ञोसि हिंसाणुमतलक्षणे । सतृणाभ्यवहारित्वं भुंजानो द्विरदादिवत् ॥ १४५ ॥ '' पुस्तके "पानि "नि पार।
९० टाटीसंहितार्या- . घरम्यहं लक्षणं तस्य सावधानतया श्रृणु। क्षणं प्रमादमुत्मृज्य गर्हितावद्यकारणम् ॥ १४६ ।। अणुत्वमल्पीकरणं तम गृद्धरिहार्थतः । यथावद्यस्य हिंसादेहपीकविषयस्य च ॥४७॥ कृप्यादयो महारम्भाः कूरकर्मार्जनश्माः । तक्रियानिरतो जीवः कुतो हिंमावकाशवान् ॥ १४८॥ नचाशवयं हि कृष्यादिमहारम्भे क्रिया तु या। सत्वल्पीकरणं चार्थाद्धिमाणुव्रतमिष्यते ॥ १४९ ॥ यतः स्वल्पीकृतोप्यत्र महारम्भः प्रवर्तते । महावद्यम्य हेतुत्वात्तद्वान्नाणुवती भवेत् ॥ १५०॥ अलं वा बहुनोक्तेन वावदूकतया यलम् । त्रसहिमाक्रिया त्याज्या हिंसाणुव्रतधारिणा ॥ १५१ ।। ननु त्यक्तुमशक्यस्य महारम्भानशेपतः । इच्छतः स्वल्पीकरणं कृप्यादेस्तस्य का गतिः ।। १५२ ।। अस्ति सम्यग्गतिस्तस्य साधु साधीयसी जिनः । कार्या पुण्यफलाश्लाघ्या क्रियामुत्रेह मौख्यदा ॥ १५३ ॥ यथाशक्ति महारम्भात्स्वल्पीकरणमुत्तमम् । विलम्बो न क्षणं कार्यों नात्र कार्या विचारणा ।। १५४ ॥ हेतुरस्त्यन्न पापस्य कर्मणः संवरोंशतः । न्यायागतः प्रवाहश्च न केनापि निवार्यते ॥ १५५॥ साधितं फलवन्न्यायात्प्रमाणितं जिनागमात् । युक्तः स्वानुभवाचापि कर्तव्यं प्रकृतं महत् ॥ १५६ ॥ तत्रागमो यथा सूत्रादाप्तवाक्यं प्रकीर्तितम् । पूर्वापराविरुद्धं यत्प्रत्यक्षाद्यैरवाधितम् ।। १५७ ॥ उक्तंच। • यथार्थदर्शिनः पुंसो यथादृष्टार्थवादिनः । उपदेशः परार्यों यः म इहागम उच्यते ॥
प्रथमाणुव्रतवर्णनम् । आगमः स यथा देधा हिंसादेपकर्पणम् । यमादेकं द्वितीयं तु नियमादेव केवलान् ॥ १५८ ॥ यमस्तत्र यथा यावज्जीवनं प्रनिपालनम् । देवाघोरोपसर्गेपि दुखे यामरणावधि ॥ १५९ ॥ यमोपि द्विविधो शेयः प्रथम प्रतिमान्वितः । अन्यः सामान्यमानत्वात्स्पष्टं तल्लक्षणं यथा ॥ १६०॥ यावज्जीवं प्रसानां हि हिंसादेरपकर्षणम् । सर्वतम्तक्रियायाश्वेप्रतिमारूपमुच्यते ॥ १६१ ॥ अथसामान्यरूपं तद्यदल्पीकरणं मनाक् । यावज्जीवनमप्येतद्देशतो न (तु) सर्वतः ।। १६२॥ आह कृषीवल फश्विदद्विशतं न च करोम्यहम् । शतमात्रं करिष्यामि प्रतिमास्य न कापि सा॥१६३ ।। नियमोपि विधा ज्ञेय मावधिर्जीवनावविः। महिंसाक्रियायाध यथाशक्त थपकर्षणम् ॥ १६४ ॥ सावधि स्वायुपोयावदागेव धनावधिः । ऊ ययात्मसामयं कुर्यादा न यथेच्छया ।। १६५ ॥ पुनः कुर्यात्पुनस्त्यक्त्वा पुनः कृत्वा पुनम्त्यजेत् । न त्यजेता न कुर्यादा कारं कारं करोति च ॥१६६ ।। अस्ति फश्चिदिशेपोपि द्वयोर्यमनियमयोः । नियमो हमतिमायां प्रतस्थाने यमो मतः॥ १६७ ॥ अयं भायो प्रतस्थाने या क्रियाभिमता सताम् । सो सामान्यतः कुर्वन्सामान्ययम उध्यते ॥ १६८॥ मतिमायां कियायां तु प्रागेयात्रापि सूचिता । पावनीवं हितां कुर्वन्नियमोऽनवधिः स्मृतः ॥ १६९ ।। "दुसर"नि पुल पाठ.।
लाठीमंदिताया- Nareneon Kiwimran उतं मम्या परिमाय गृहग्यो प्रनमाचरम् । यथाशक्ति यथाकालं पयादेश ययाययः॥ १० ॥ प्रमहिमाकियात्यागो यदि कतुं न शक्यने । प्रतस्थानाप्रहेणालं दर्भनेनेय पूर्यनाम् ११॥ प्रतस्थानक्रियां कर्तुमसक्योपि यदीमति । प्रतमन्योपि मंमोहायतामामोम्नि न मनी ।। १७२।। अलं कोलाहलेनालं कर्तव्याः यसः क्रियाः। फलमेव हि माध्यं स्मात्मरम्भेण धीमता ॥ १७३।। त्रसहिमाक्रियात्यागशब्दः स्यादुपलक्षणम् । तेन भूकायिकादश्च निःशवं नोपमध्येन् ॥ १७४ ॥ किन्तु चैकामजीवेषु भूजलादिषु पञ्चमु । अहिंमाग्रतशुद्ध पयं कर्तव्यो यत्रो महान् ।। ७५ ॥ त्रसहिमाक्रियात्यागी महारम्भं परित्यजेत् । नारकाणां गतेजि नूनं तदुःसकारणम् ॥ १६ ॥ उक्त च। मिच्छो हु महारंभो निम्मीलो तिव्यलोहसंजुत्तो। निरयाउग णियह पावमयी रुद्दपरिणामो । क्रूर कृष्यादिकं कर्म सर्वतोपि न कारयेत् । वाणिज्यायं विदेशेपु शकटादि न प्रेषयेत् ।। १७७ ॥ क्रयविक्रयवाणिज्ये क्रयेद्वस्तु प्रसोम्झिवम् । विक्रयेद्वा तथा वस्तु नूनं सावधवर्जितम् ॥ १७८ ।। वाणिज्यार्थ न कर्तव्योऽतिकाळे धान्यसंग्रहः । धृततैलगुडादीनां भाण्डागारं न कारयेत् ॥ १७९ ॥ लाक्षालोष्टक्षणक्षारशस्त्रचर्मादिकर्मणाम् । • हस्त्यश्ववृषादीनां चतुष्पदानां च यावताम् ।। १८० ।। द्विपदानां च वाणिज्यं न कुर्याद्मतवानिह । महारम्भो भवत्येव पशुपाल्यादिकमणि ॥ १८१ ॥ - । andre प्रपमानापर्णनम् । ९३ AAA HAR MA शुकपुरमाजारीकपिसिंहमृगादयः । न रक्षणीयाः म्यामित्व महाहिंसापरा यनः ॥ १८२ ॥ इत्यादिकाश यावन्त्य क्रियाश्रमपधात्मिकाः । न कर्तव्यासानां हि हिंसाणुव्रतधारिभिः ॥ १८३ ।। मसागारधर्मेषु देशशब्दोऽनुवर्तते । भनानगारयोग्याया कर्तव्यास्ता अपि कियाः॥ १८४ ।। यथा समिनयः पश मन्ति तिवश्व गुप्रयः । अहिमात्रतरक्षार्थ कर्तव्या देशवोऽपि ते ॥ १८५ ।। उहं तत्त्वार्यसूत्रेषु यत्तत्रावसरे यया । प्रतस्थर्याय कर्तव्या भावना पर पञ्च प॥१८६ ।। तत्सूत्रं यथा-"तत्स्थैर्याय भावनाः पशु पध" तत्रापि हिंसा- स्यागप्रवरभा-" वाग्मनोगुनीर्यादाननिरंपसमित्यालोकितपान भोजनानि पा" नचाशयमिमाः पञ्च भाषना मुनिगोपराः। न पुन पनीयाम्ना देशतो प्रतधारिभिः ॥ १८ ॥ यतोत्र देशाग्दो हि सामान्यादनुवर्तते । ततोऽणुशतमपु मनत्वामाव्यापको भवेत् ।। १८८१ अलं विकल्पसंकल्पः कर्तव्या भावना इमाः। अहिंसात्रतरक्षार्थ देशवोऽणुप्रतादिवत् ।। १८९ ॥ सत्र पारगुप्तिरित्युषा प्रसयाधाकरं वचः । न वक्तव्यं प्रमादा पधन्यादिसूचकम् ।। १९०॥ अवश्यंभाविकार्येपि वक्तव्यं सदेव तन् । धर्मकार्येषु वक्तव्यं या मौनं समाभयेन् ।। १९१ ।। मनोगनिर्यथानाम प्रसच्छेद न चिन्तयेत् । समुत्पपि तत्कायें जने वा सापराधिनि ॥ १९२ ॥ समामादिविधौ चिन्तां न कुर्याष्टिको प्रवी । अघ्रती पाभिक कुर्यादेवयोगात्कदाचन ॥ १९३ ।। . A लाटीसंहितायां- नैष्ठिकोऽपि यदा क्रोधान्मोहाद्वा सङ्करक्रियाम् । कुर्यात्तायतिकाले स भवेदात्मप्रताच्च्युतः ।। १९४ । महिमाक्रियायां या नापि व्यापारयन्मनः। मोहाद्वापि प्रमादाद्वा स्वामिकार्यकृतेऽपि वा। १९५ ॥ वीतरागोतधर्मेषु हिसावधं न वर्तते । रुविधर्मादिकार्येषु न कुर्यात्त्रसहिंसनम् ॥ १९६ ।। रूढिधर्मे निषिद्धा घेत्कामार्थयोस्तु का कथा । भजन्ति द्विरदा यत्र मशकाम्तन किं पुनः ।। १९७॥ हषीकार्थादिदुर्व्यानं यधनार्थ स नैष्ठिकः । चिन्तयेत्परमात्मानं स्वं शुद्धं चिन्मयं महः ॥ १९८॥ यदा पसपरमेठिस्यरूपं चिन्तयेन्मुहुः । यदा लोक्यमंस्थान जीयास्तद्वर्तिनोऽथवा ॥ १९९ ॥ जगत्कायस्वभायो या चिन्तयेसन्मुहुर्मदः । द्वादशात्राप्यनुप्रेमाः धारयेन्मनसि ध्रुवम् ॥ २० ॥ या टिचरान जिनविभ्यांश चिन्तयेत्। मुनीन दयालयांचापि तत्पूजादिविधीनपि ॥ २०१॥ इन्यायालम्यनांश्चित्त भावयेडायशुखये ।। न भाययकदाचित प्रमहिमा क्रियां प्रनि ।। २०२।। उन्टा वाग्गुमिरौय मनोगुतिस्तथैव च। अधुना कायगुपेश मेवान गृहानिग्याविण ॥ २०३।। नयादाननिषभावना.कायमंश्रिताः । मावनीया. महापारगजयजयविस्छि । २०४॥ अश्वनं यावदीपकरणं मतम् । नस्यादानं पनि शेप ममासात्ततया स्मृतः ।। २०५।। धम्या मुनिमा पिच्छका र कमः। अमरावताः पूरणानि च ॥ २०६।।
FORर्णनम् ।
यायामा पत्रकादिवान।
पमानामा मारिवानपि ॥२४॥
मनागी हालतु भोजनम्।
रामारामापिपि ॥२८॥
न्याय भदानि भोपान
निसमादाय काय पायदा ॥ २०९ ।।
हन्यो सम्पनियादी थाना प्रतिसाम्येन ।
समादाय प्यापारयायपि ॥१०॥
the ययादाने निभपापि या स्मन ।
पानादिक नमानि मिनिक्षिण।।२११॥
मिमयः पवाय मानिविनरान् ।
प्रत्यगोवत्र माना गयनोपिनाः ॥ २१२।।
मंचायतम्याय मातम्य मेधिनः ।
गमित्यो पा पाग्या युध्यने ता.मारपि ॥ २१॥
योगमिनिरग्नि पप्या गृष्मेधिना।
ज्यादादा दाण्याग्नि मार्गाऽपं गतिगोपः ।। २१४ ।।
वारा शन: मग्यायुगमा धा पुर।
निष्प्रमादी नदी गणार्याममिनिमायते ॥ २१५ ॥
किन विवामित विधयमरः ।
पाचगा मागे न गन्नध्य कदाचन ॥ २१६ ॥
नत्र विपापा सागर देशकालगतियया ।
प्रपथ्या. माधवो सन्मागावलोकिनः ॥ २१॥
निधिय प्रामुकं मार्ग परमेनाधितम् ।
योममिनिममत्र गणमपात्यथा ॥ २१८ ॥
गस्तत्रापि देवाषेपुरोमार्गप्रमाकुलः ।
नता ध्यान पुर्यायांदा पीरकर्मवत् ॥ २१९॥
९ ६ टाटीमंहितायां- वीरकर्म यथा तत्र पर्यढाद्यासनेन वा। कायोत्सर्गेण वा तिष्ठेद्योगिवद्योगमार्गवित् ।। २२० । यावत्तस्योपसर्गस्य निवृत्तिा वपुःभतिः । यद्वावधियथाकालं नीत्याऽस्तीतस्ततो गतिः ।। २२१॥ सर्वारम्भेण तात्पर्य प्रत्यक्षात्नससमुले। मार्गे पादौ न क्षेप्तव्यो व्रतिनां मरणावधि ॥ २२२॥ किञ्च रजन्यां गमनं न कर्तव्यं दीध्वनि । दृष्टिचरे शुद्धे स्वल्पे न निषिद्धा मार्गेगविः ।। २२३ ॥ अश्वाचारोहणं मार्गे न कार्य प्रतधारिणा । ईर्यासमितिसंशुद्धिः कुनःस्यात्तत्र कर्मणि ॥ २२४ ॥ इतीर्यासमितिः प्रोक्ता संक्षेपाव्रतधारिणः ।। यद्वोपासकाध्ययनान् ज्ञातव्यातीयविस्तरान् ।। २२५ ।। अप्यस्ति भाषासमितिः कर्तव्या मनवासिमिः। अवश्य देशमात्रत्वात्सर्वथा मुनिकुञ्जरैः ।। २२६ ॥ वचो धर्माभितं वाच्यं वरं मौनमथाश्रयत् । हिंसाश्रितं न तद्वाच्य भाषासमितिरिष्यते ॥ २२७ ॥ इविसंक्षेपतस्तस्या लक्षणं चात्र सूचितम् । - मृपात्यागप्रताख्याने वक्ष्यामीपत्सविस्तरात । २२८ ॥ एपणाममितिः कार्या श्रावकैधर्मवेदिभिः।. यया सागारधर्मस्य स्थितिमुनिप्रतस्य च ॥ २२९ ।। . यतो प्रतसमूहस्य शरीरं मूलसाधनम् । आहारस्तस्य मूलं स्यादेपणासमितावमौ ॥ २३ ॥ एपणासमिति ना संक्षेपालक्षणादपि । आहारशुद्धिराख्याता सर्यप्रतविशुद्धये ॥ २३१ ॥ उक्तमांसाधतीचारैवर्जितो योऽशनादिकः। स एव शुद्धो नान्यस्तु मांसातीचारसंयुतः ॥ २३२ ।।
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लाटीसंहितायां- आमगोरससंपृक्तं द्विदलान्नं परित्यजेत् । लालायाःस्पर्शमात्रेण त्वरितं बहुमूर्च्छनात् ॥ २४५ भोज्यमध्यादशेषांश्च दृष्ट्वा प्रसकलेवरान् । . यद्वा समूलतो रोम दृष्ट्वा सद्यो न भोजयेत् ॥ २४६ चर्मतोयादिसम्मिश्रात्सदोपमशनादिकम् । परिझायेशितैः सूक्ष्मैः कुर्यादाहारवर्जनम् ।। २४७ । श्रवणाद्धिंसकं शब्दं मारयामीति शब्दवत् । दग्धो मृतः स इत्यादि श्रुत्वा भोज्यं परित्यजेत् । शोकाश्रितं वचः श्रुत्वा मोहाद्वा परिदेवनम् । दीनं भयानकं श्रुत्वा भोजनं त्वरित त्यजेत् ॥,२४९ उपमानोपमेयाभ्यां तदिदं पिशितादिवत् । मनःस्मरणमात्रत्वात्कृत्स्नमन्नादिकं त्यजेत् ।। २५० । सूतकं पातकं चापि यथोक्तं जैनशासने । एपणाशुद्धिसिद्धयर्थ वर्जयेच्छावकामणीः ॥ २५१ ।। एपणासमितिःख्याता संक्षेपारसारसंग्रहात् । तनान्तराद्विशेषज्ञज्ञातव्यास्ति सुविस्तरात् ॥ २५२, अस्ति चादाननिक्षेपवरूपा समितिः स्फुटम् । यखाभरणपात्रादिनिखिलोपधिगोचराः ॥ २५३ ॥ यावन्त्युपकरणानि गृहकर्मोचितानि च । तेपामादाननिक्षेपौ कर्तव्यो प्रतिलेख्य च ॥ २५४ ॥ प्रतिष्ठापननानी च विख्याता समितिर्यया । भवत्पुर्दशद्वारा मलमूत्रादिगोचरा ।। २५५ ।। निश्च्छिद्रं प्रामुफं स्थानं सर्योपवियर्जितम् । दृष्ट्वा प्रमार्य सागारो वर्षोमूनादि निक्षिपेत् ।। २५६ अस्ति पालोकिक्षपानभोजनाख्याय पञ्च ताः । भावना भावनीया स्यादहिसाननहेतये ॥ २५५ ।।
अपमानववर्णनम् । गुदं गोधितं चापि मिदं भवादिभोजनम् । सावधानतया भूयो रमिपूतं प भोजयेत् ॥ २५८ ॥ नपानप्यवसायेन दोपेगानवधानतः । मया परं चैतन्मत्या भोग्यं न भोजयेत् ।। २५९।। तत्र यद्यपि भक्तपादि शुखमम्नीति निभितम् । वयापि दोष एव स्यात्प्रमादादिकृतो महान् ।।२६०।। मन्ति मनाप्यतीपारा पन सूत्रपि सभिताः । प्रमदिंगापरित्यांगडमणेऽणुप्रवाहये ।। ६१ ।। सत्सूत्रं यथा-यपपन्धरलेदानिभारारोपणामपाननिरोधाः । अनात यशदन सारनं यष्टिकादिभिः । प्रागेष प्रतिपिसरवारमाणिहत्या न भेयसी ।। २६२ ।। पशूनां गोमदिष्यादिडागवारणषाजिनाम् । मन्मात्रातिरिच्यं पायां न दुर्याना कशादिभि २६३ ॥ पन्धो मात्राधिको गादं दुरद मंग्लादिभि । आतताया () प्रमादाना न पुर्याायकोत्तमः ।। २६४ ॥ यो नाशारिजिनार्य काष्टमूलादिभिः कृतः । वाषन्मात्रातिरिकं तमविधेयं प्रतिमान्यिते ॥ २६५ ॥ मापराध मनुष्यादो कर्णनाशादि छेदनम् । न कुर्याइपकल्पोऽपि प्रतवानपि पचन ।। २६६ ॥ भार: काहादिलोष्ठानपूतलजलादिकम् । नेतुं क्षेत्रान्तर शितं मनुजाभधिकादिषु ।। २६७ ॥ यावयस्यास्ति सामध्य तावत्तत्रैव निक्षिपेन् । नातिरिकं ततः कापि निभिपद् प्रतधारकः ।। २६८ ।। दासीदामादित्यानां बन्धुमित्रादिप्राणिनाम् । सामध्यातिक्रमः कापि कर्तव्यो न विपक्षणेः ।। २६९।। अमपाननिरोपाख्यो प्रतोपोस्ति पत्रमः । निरश्यां वा नराणां वा गोपर स स्मृतो यया ।। २७० ।।
लाटीसंहितायां- . नराणां गोमहिष्यादितिरश्या वा प्रमादतः। तृणायनादिपातानां निराधो प्रतदोपरन् ।। २७१ ।। यहमलपितेनालं ज्ञेयं तात्पर्यमाग्रतः । सा क्रिया नैय कर्तव्या यथा प्रसरधो भवेत् ।। २७२ ॥ इत्युक्तमात्रदिग्मा सागाराहमणुमतम् । प्रसहिंसापरित्यागलक्षगं विश्वसाक्षिभिः ।। २७३ ॥ इति श्रीस्याद्वादानययगद्यपचविद्याविभरिद विद्धन्मणिराजमहल विरचितायां भावकाचारापरनाम लादीसंहितायां साधुश्री दात्मज फामन मनःसरोजारविन्दयिकासनक- मार्तण्डमण्डलायमानायां सहिंसापरित्याग प्रयमाणुव्रत वर्णनो नाम पञ्चमः सर्गः। अथ पष्ठः सर्गः। अमहिमापरित्यागलक्षणं यदणुमतम् । साधुदानोरामफामनास्यं पुनातु तन् ॥ १॥ इत्यादि। अथमपापरित्यागलभणं ग्रतमुच्यने । मवतानन्मुनीना स्यादेमतो येश्मयामिनाम् ॥१॥ प्रासा मत्रानुवृत्ति मा प्रायदयापि धीधनः । ग्राममभिधानमनृतं मयकारक.॥२॥ अमदिति हिमाफम्मभिधानं स्याहारणम् । मादानामनेकार्थत्यानियायांनुमारिणी ॥३॥ नावामदिनि सदन मृपामा ममस्यते । माचारमन्त्रभेदादा गन्नत्यानुपदनः ॥ ४ ॥ दाना विनिस्तत्र मूवमित्यनुवन्ने । प्रमवाधारं स्माषी पायंगधामना ॥५॥ - अणुक्तचतुष्यातीलसप्तकरर्णनम् । १० मरंमप्यसत्यतां याति कचिद्धिमानुपन्यवः । मयतानन वकव्यं यथा पौरादिदर्शनम् ॥ ६ ॥ असत्यं मल्यतो याति कपित्रीपस्य रक्षणान् । अघधुपा मया चोरो न दृष्टोऽम्ति यथा पनि ॥७॥ सत्रामत्यवपम्त्यागनतरक्षार्थमेय याः । भावना पश्च सूत्रोक्ता भावनीया प्रतार्षिभिः ॥ ८ ॥ वत्सूत्रं यथा क्रोपलोभभीरत्वहास्यप्रत्यारयानान्यनुषीचिभापणं चपमा यत्र शोधप्रत्याख्यानं पोपाच्य मनीषिभिः। म्वपरामिनभेदेन तपश्च द्विधोच्यते ।। ९ ।। म्वयं क्रोधेन सत्यं पान वक्तव्यं कदाचन । न च याच्यं पचम्नद्रपरेप क्रोधकारणम् ।।१०।। यथा क्रोधस्तथा मानं माया लोभस्नथव च । तपामयद्यहेतुत्व मृपावादाविशेषतः ॥ ११ ॥ हारयोम्मितं च वक्तव्यं न प हास्याधितं कचित् । तदपि द्विविध शयं स्वपरोभयभेदतः ॥ १२ ॥ स्वयं हाम्यवता भूत्वा न वक्तव्यं प्रमादतः । न च पाच्य परेषां का हास्यहेतुर्विचभणैः ।। १३ ।। हाग्योपलक्षणेनैव नोफपाया नयेति ये । पेपि त्याग्या मृषात्यागपतसंरक्षणार्षिभिः ।। १४ ॥ भीरत्वोत्पादक रौद्रं षषो धाच्यं न भावकैः । अवश्यं पन्धहेतुत्वात्तीयासातादिकर्मणाम् ॥ १५॥ श्रालोचित प वक्तव्यं न धाच्यमनालोचितम् । चोयादिविकथाख्यानं न याय्यं पापभीरणा ।। १६ ॥ , सत्यममत्यता यानि १०२ लाटीसहितायां- अनासत्यपरित्यागप्रतेऽतीचारपश्नकम् । प्रामाणिक प्रसिद्धं स्यात्सूत्रेप्युकं महर्षिभिः ॥ १७ ॥ तत्सूत्रं यथा-मिथ्योपदेशरहोभ्याख्यान फूटलेखक्रियान्या हारसाकारमन्त्रभेदाः। तत्र मिथ्योपदेशाख्यः परेषां प्रेरणं यथा । अहमेयं न यक्ष्यामि यद वं मम मन्मनात् ।। १८ ॥ रहोभ्याख्यानमेकान्ते गुह्मवातप्रकाशनम् । परेषां शहमा किश्चिद्धतोरस्त्यत्र कारणम् ।। १९॥ फूटलेगक्रिया सा स्यादपनार्य लिपिमुंपा । सा न साभाराथा तस्या पानाचारसम्भात् ॥ २०॥- किन्तु स्वल्पा यथा कधित्किभित्प्रत्यूहनिस्पृहः । संमदीयपत्रेषु मदर्भ न लिपीकृतम् ॥ २१ ।। न्यासम्याप्यपहारो यो न्यासापहार उच्यते । मापि परस्य सर्वस्यहरो नैय स्थलक्षणात् ।। २२ ।। किय कधिगया मामः कस्यचिनिनो गृहे। व्यापपित्याधनादीनि सायं ग्यानान्तरं गतः ॥२३॥ वयव म लोकानां पुरस्तादिह निन्दयात् । शृतं न मे गृह शिशितनामाऽर्थन गरदना ॥ २४ ॥ तो न्यामापहार' म मिद्धोऽनयंगूधकः । मृपात्यागनतम्यागः दोप: स्यात्मयतामहान् ॥ २५ ॥ माकारमात्रभदोषि दोशेतीधारमंशकः । नवनव्य कदाचिो नतिः श्रावकोतमः ॥२६॥ दुलंयमथं गुग्रं यलोया मनमि तिम् । विविनिमीत्या न प्रकाश्यं प्रताधिमिः ॥ २७॥ मनु पं मदीयोऽयं प्रामो दशोऽयवानरः । इत्येवं यनगम वायतमा पयः॥ २८ ॥ -
अगुवनचतुष्पातीलसमकतनम् ।
मेवं प्रमत्तयोगाटे सूत्रादित्यनुवर्तते ।
तस्यामायाप्न दोपोस्ति तदाद दोप एव हि ॥२९ ।।
एवं संध्ययहाराय स्याददोपो नयारमके।
नाभि प स्थापनायां व द्रव्ये भावे जगत्त्रये ॥३०॥
अस्ति म्तेयपरित्यागो ग्रनं पाणु तथा महत् ।
देशतः सर्वतयापि त्यागयिभ्यसम्भवान् ॥ ३१ ॥
वहरण यया स्त्र मूळ मूविशारदै ।
अदनादानं तय ग्यात्तदर्य कथ्यतेऽधुना ॥ ३२ ॥
अदत्तस्य यदादानं चौर्यमित्युच्यते पुधै।
अर्थात्म्यामिगृहीता मद्रव्ये नेनरे पुन ॥ ३३ ॥
अन्यया सर्वलोकम्मिन्ननिभ्याप्तिः पदे पदे।
अनगारे दुारा विशद्भिर्गोपुरादिपु ॥ ३४ ॥
सर्वतः सर्वविपय देशतरसगोचरम् ।
यतो सागारिणां न म्यानलादिपरिवर्तनम् ॥ ३५ ।।
देशतःस्तयमंत्यागलभणं गृहिणां प्रतम् ।
अद परतु नादेयं यस्मिन्नस्ति प्रसाश्रयः ॥ ३६॥
रक्षार्थ सस्य कर्तव्या भाषनाः पश नित्यशः।
सर्वतो मुनिनायेन देशत: आवरपि ॥ ३७॥
तत्सूत्रं यथा-शून्यागारविमोचितावास परोपरोधाकरण
मुद्धिमद्धर्माविसंवादाः पत्र।
शून्यागारेषु पावामा भूभृतां गहरादयः ।
तदिन्द्रादिविरोधेन न पासष्यमिहामुना ॥ ३८॥
किन्तु प्रा प्रार्थनामित्यं कृत्वा तत्रापि संविशेन् ।
प्रसीदाग्रत्य मो देव! पंचपर वसाम्यहम् ॥ ३९॥
निस्वामित्वेन संत्यकाः गृहाः सन्त्युदसाह्वयाः ।
प्राग्वत्रापि यसतिं न कुर्यात्कुर्यादा तथा ॥ ४०॥
१०४
साटीसंहितायां--
म्यामित्वेन वसत्यादि परैः स्यादुपरुन्धितम् ।
परोपरोधाकरणमादुः सूत्रविशारदाः ॥ ४१॥
तत्स्वामिनमनापृच्छग स्थातव्यं न गृहिनतः ।
स्थातव्यं च तमापुच्छर दीयमानं तदाशया ॥ ४२ ॥
भैक्ष्यशुद्धयविसंवादो भायनीयो प्रनार्थिना ।
सर्वतो मुनिनार्थन देशनो गृहमेधिना ।। ४३ ॥
नादेयं केनरिहत्तमन्येनातत्स्वामिना ।
तत्स्वामिनश प्रच्छन्नवृत्त्या सत्स्याददरावत ॥ ४४ ।।
आत्मधर्म सधर्मी म्यादानेनो प्रतान्यितः।
सेन कारापितं यावनिनषैत्यगृदादि यत् ॥ ४५ ॥
समापि नियसेद्धीमान भणे यायसदाशया।
तमाशामन्तरेणेह न स्थातव्यमुपेक्षया ॥ ४६॥
भावनाप यायोक पांशमात्रतः।
म्यापि च नादेयमदतं यमनादिया ॥ ४७ ।।
अत्रापि मन्तीपागः पनि सूनसम्मताः ।
साग्याःग्नेयपरित्यागतसंधिहमरे ॥ ४८ ॥
उप-"नेनप्रयोग तदाहनादान विरुणराग्यादिका
धिकमानान्मान प्रतिस्पक व्यवहारा ।
परराय प्रेरणं होमागतयं प्रनि मनीषिणा।
ननप्रयोग इन्युनतः ग्नेयातीधारमंकः ॥१९॥
अग्रेरितन केनापि दाना व्ययमाइलम् ।
ने धनधान्यादि तपाइतादानं गतम् ॥५०॥
नादय दीयमानं वा पुण्यदानन पारिता
नेयमागतम्यायामिनारमहिनैपिगा॥५॥
गमातापितमा मन्धं युपायुवतन् ।
यिने न यदा म म्यागिनायानिमः ॥५२॥
अणुव्रतचतुष्कशालातकार्णनम् ।
कर्तव्यो न कदाचित्म प्रकृयतधारिणा ।
आरताममुत्र तेनानिरिहानपरंपरा ॥ ५ ॥
मनुं मानाधिकं मान विक्रेतुं न्यूनमायकम् ।
दीनाधिकमानोन्माननामातीचारमंशकः ॥ ५४ ।।
मारम्भण त्याग्योऽयं गृहम्मन प्रसार्थिना ।
हवाकीर्तिसन्तानःस्यादमुत्र च दुपदः ॥ ५५ ।।
निभेपणं समर्थस्य महाचे पचनाशया ।
प्रविमएकनामा स्याद् व्यवहारी प्रतनता ।। ५६ ॥
स्तयत्यागतारूढेनादय प्रावकोत्तमः ।
अस्त्यतीचारमंशोपि मर्षदोपाधिपो महान् ।। ५७ ।।
उत्तातिपारनिमुक्त नृतीयवतगुतमम् ।
अपर प्रतिपान्यं स्यापरलोकगुरगतये ॥ ५८॥
चतुर्य समपर्य स्यामनं देवन्द्रपन्दितम् ।
देशतः भावरहि सर्वतो मुनिनायकः ।। ५९ ॥
देशतरतत पानि स्थितस्याश्य रागिणः ।
उदिता धर्मपत्री या सेवसेच्या नपतरा। ६०॥
प्रयतस्य रक्षार्थ पतप्याः पशभावनाः ।
महसणं यपा सूत्रे प्रोचमवापि चारतिः ।। ६१ ॥
तत्सूत्रं यथा-बारायाभषणतन्माहरा निरीक्षणपूर्वरतानु-
ग्मरण दृष्येष्टरस स्वगरीरसंस्काररयागा' पर।
प्रतिवं विटादि पम्पत्योर्षा मिषो रतिः ।
अनुरागनातायां योपिद्रागयाभुतिः ।। ६२ ॥
रतिपातु या पेष्टा पम्पत्योः मानुरागयोः ।
गारमहिपा प्रोपोगो विप्रहामः ॥
सत्याग्योऽपरम्परपा: मम्बन्धी पधारणम् ।
भीषि महारशाखादी मादेपा ब्रह्मचारिभिः॥१२॥
लाटीसंहितायां- चक्षुर्गण्डाघरपीवास्तनोदरनितम्यकान् । पश्येसन्मनोहरागनिरीक्षणमत्यादरात् ।। ६४ ॥ न कर्तव्ये सहाना भाषणं या निरीक्षणम् । कायेन मनसा याचा प्रमाणुमतभारिणा॥ ६॥ रसं माहोदयात्पूर्व सामन्याङ्गनादिभिः । सस्मरणमनीपारं पूर्वरतानुस्मरणम् ॥ ६६ ॥ ब्रह्मपर्यनस्यास्य दोषोयं सर्वतो महान् । त्यागो प्रापयोजांशुमालिना मनाचारिणा ॥ ६ ॥ पमन्न यथा मापा पयोष्टरसः स्मृतः । वीर्य द्धिकरं पाव्यस्याम्यमित्यादि पक्षणे ॥ ६८॥ स्नेहाम्यहादिस्नानानि माल्यं एक पन्दनानि । कुर्यावरणर्थमा पर प्रहातीपारदोपहर ॥ ६९।। मशरीरमरकाम्यो दोपोयं प्रक्षयारिणः । मनो मुनिना माग्यो देशको गृहमेधिभिः ॥ ७॥ मावना पानिधिा मयतो मुनिगापरा। नवागाम्हिस्थानो पर्ननीया यशन्तितः ॥१॥ मध्यनरमायतीचा पयंत्रताय ये । पनि यया मूध मूला प्रत्यावानिमिः ॥ ४२ ॥ -পিকা হিসানােমান श्रीरामभानामिनियमा.. पनि प्रभाय । गनी मोमिलायुगमे प्रगामी या ४१॥ গা মা, পাশrিia বিশ্বাস। परवर्गविवाह कायनानुमोरया ।। ७४ ।। रामाधी मा विधा प्रापयोदिता। कारिता मामला पग॥५॥ - अनुत्रानुष्यासारसाकरर्णनम् । . ताम्यां सरागवागादियपुरपर्णोऽपवा रतम् । दोपोऽतीचारसंशोऽपि प्रापर्यम्य ज्ञानये ॥६॥ दोपशानदीडशल्य. स्वनादो शुक्रविध्युतिः । विनापि कामिनीसाक्रिया वा कुत्सितोदिना ॥७॥ कामतीमाभिनिवेशा दोपातीपारसंशकः । दुन्तिपेदनाकान्तस्मरमंस्कारपीडिठ ॥ ८ ॥ मनु पारित मदुरो दुम्याग्या मानम दिया। वहीवस्य मदोत्र पदका गति ॥ ७९ ॥ एण्यते गतिरस्यास्ति वृद्ध मूत्र प्रमागिता । यथा कपिम त्याग्या नीता प्रातविया ॥८॥ पदं समन साइमनिचारविवर्जितम् । पासनीय सदाचारः रवगमोहमुयमदम् ॥ ८१ ॥ उपाधिपरिमाणस्य मद्विविधाधुनोच्यते । मति यत्रादिताना स्याद्रतानां स्थितिमन्तति ।। ८२ ।। मुनिभिः सर्वतम्त्याध्य हणमापरिपहम् । वत्संख्याहिभिः कार्या प्रमहिमादिहानये ।। ८३ ॥ अपश्यं द्रविणादीनां परिमाणं प परिमई। गृहस्थेनापि कर्तव्य हिंसातृप्योपशान्तये ॥ ८४ ।। परिमाणे को सम्माइग्मूच्छी मदर्तते । अभावान्मायास्तूसंघ मुनित्यमिव गीयते ।। ८५ ॥ तस्मादारमोचितादण्याद्दामने तदरं स्मृतम् । अनारमोचितमंकल्पाद् दासनं तनिरर्थकम् ।। ८६ ॥ अनारमोचितसाल्पाद्वासनं यन्मनोपया। कुर्युयंदा न कुयुवा दत्सई व्योमचित्रवत् ॥ ८ ॥ प्रत्यप्रजन्मनीहंदमन्त्यन्दाभाषलक्षणम् । हस्यागोपि पर केचिदुय्यते सारर्जितम् ।। ८८॥
- लाटीसंहितायां- तमोत्सगों नृपर्यायस्थितिमात्रकृते धनम् । रक्षणीयं प्रतस्थेस्तैस्त्याज्यं शेषमशेषतः ॥ ८९ ।। अपवादस्तूपात्तानां प्रतानां रक्षणं यथा ) स्यादा न स्यानु तद्धानिः संख्यातव्यस्तथोपधिः ॥ ९॥ रक्षार्थ तदनतस्यापि भावनाः पञ्च सम्मताः । भावनीयाश्च ता नित्यं यया सूपि लक्षिताः ।। ९१ ॥ तत्सूनं यथा-मनोज्ञामनोजेन्द्रियविषय रागद्वेपवर्जनानि पञ्च । इन्द्रियाणि स्फुटं पञ्च पञ्च ताद्वषयाः स्मृताः। यथास्यं तत्परित्यागभावना पञ्च नामतः ॥ ९२ ॥ पचरयेपु मनोशेपु भावना रागवर्जनम् । अमनोशेपु तेपूर्णभावना द्वेपवर्जनम् ॥ ९ ॥ अयमों यदीप्तायसंयोगोरित शुभोदयात् । मदा रागो न कर्तव्यो हिरण्याचपकर्षता ॥ ९४ ।। अथानिष्टार्थसंयोगो दुयानायते गृणाम् । सदा पो न कर्तव्यो धनसंख्यामतेमिना ।। ९५॥ इष्टानिधादिशदाय मुगमत्वान सभितः । गगडपो प्रमिती स्त' प्रयास मुगमे पृथा ॥ ९६ ॥ अत्रानीचारमना म्मु दोषा मन्याननस्य च । इदिना सूत्रहारण त्याच्या प्रनविशुद्धये ।। ९७ ॥ पर पत्रकारमुदिरण्यमुवर्णधनधान्यदासीदासयत्रमाणाति- 1 अंत्र म्यानमनिस्थानं धान्याधिशानमेव वा। गवाधागारमात्र वा वीतं याचसामना ।। ९८॥ नतानिरिक्त लोमान्मामानिनिमः । न कट्यो प्रमाणेन कुर्वतोधिनुदानाम् ।। ९९॥ .
अगुबतचतुप्पोलारवर्णनम् । पास्नु पखादिमामान्य तत्मेल्या प्रियता युधैः । अनीचारनिवृत्यर्थ कार्यों नातिक्रमस्तनः ॥ १०॥ हिरण्यध्यनिना प्रफ घनमौक्तिकसत्फलम् । संयां प्रमाणमाप्रेश क्षणान्मन्छा प्रतीयते ।। १०१॥ अन मुवर्णशय्दन ताम्रादिरजनादयः । संन्या पां पर्तव्या श्रेयानातिक्रमस्ततः ।। १०२ ॥ धनशदो गवायं स्यापनुप्पदवाचकः । विधय तत्परिमाण बनी नातिग्रमी बर।।१०३ ।। धान्यशब्देन मुद्रादि यावदनकदम्बकम् । प्रतं सत्परिमाणेन प्रतहानिरतिवमान् ।। १०४॥ दासकमरता दासी श्रीता वा स्वीकता मनी । सत्संग्या प्रताप कर्तव्या मानतिकमान् ।। १०५॥ पया दासी तथा दासः संख्या तस्यापि भेयसी। श्रेयानतिकमो नैव हिमातृप्णोपहणान् ।। १०६ ।। पुप्यशब्दो घृताधर्यस्नाण्डं भाजनानि वा। नेपामप्यल्पीकरणं भंयम स्यादप्रनार्थिनाम् ।। १०७॥ का: संख्याप्रतस्यास्य दोग: संक्षेपतो मया । परिहार्याः प्रयमन सम्याणुमतधारिणा ॥ १०८॥ प्रोक्त मूग्रानुसारेण यथाणुमतपत्रकम् । गुणवतत्रय वक्तुमुत्सहेदधुना कविः ।। १०९॥ दिग्देशानदण्डानां पिरतिः स्यादगुणत्रतम् । एकत्वाद्विरतेयापि त्रेधा विषयभेदसः ॥११॥ विम्विरतियथानाम दिक्ष प्राप्यादिकामु प। गमनं प्रतिजानौते कृत्यासीमानमाहतः ॥ ११ ॥ सन्यत्र विषयाः सीनः बननीयमगापगाः । अनु तानवधि कृत्वा गच्छेदान तदहिः ।। ११२॥
लाटीसंहितार्या- पूर्वम्यां दिशि गच्छामि यायद्गाम्यु केपलम् । सदाहियंपुपानेन न गन्धामि सचेतनः ।। ११३ ॥ एवं कृतप्रतिशस्य संयरः पापकर्मणः । तदहिः सर्वहिमाया अभायात्तन्मनेरिय ॥११४॥ परिपाट्यानयोदीच्या पश्चिमायां दिशि स्मृताः । मर्यादोद्धमधमापि दक्षिणस्यां विदिक्षु च ॥ ११५ ॥ सत्करणे महमेयो हिंसा तृष्णादयात्रायान् । करणीयं सतोऽपश्यं मायकैर्मतयारिभिः ।। ११६॥ मन्ति समाप्यतीचारा पनि सूचसाधिताः। मायधानतया त्याग्यारपि सद्रतसिद्धये ॥११॥ मलमूत्रं यथा T-याधनियंग्यविक्रम क्षेप्रसिरमत्यन्तरापा. नानि पयांपीपरागेहे भयंव्यतिक्रमः । अगाधभूपरावेशाद्विस्यानोऽधोयनिक्रमः ॥ ११८॥ कपिरिजोगशादौ भने दीपाध्ययनिन । कारणाद्रमनं सोमादयत्तियंग्यतिक्रमः ।। ११९॥ गया मायमिन कोश सनं याबद्रनिमम । सा माटयरशीया क्षेत्रविध दूपणम् ।। १२० ॥ स्मृतं ग्मृत्यन्नगवान शिमृनं च पुनः रमतम् । दिग्विरने म्गादनिनिमियतया ॥ ११ ॥ प्राविना देशपिनियांवकालात्मकनिमी। माया यामदिनमागर्नुपमराः ॥ १२२ ॥ दलियो गनिम्यागमया चागनयनम् । मैथुनम्य परित्यागी यहा मोनादिधारणम् ॥ १२३॥ गयान यदि हामि प्राण्यांमतिमा काजामावि गमामि त्रिशा || १२४ ॥
अणुव्रतचतुष्कशीटसमकवर्णनम् ।
यथा पा यावयाहि भूयान्मेऽनशनं महम ।
यहा सत्रापि रात्रौ च प्रमचर्य ममास्तु सन् ॥ १२५ ।।
यया या वर्षासमये चातुर्मामेऽय योगिधन् ।
इनः स्यानान गामि शापि देशान्तरे जवान् ।। १२६ ॥
परिपाट्यानया योग्या वृत्तिः स्यादविस्तरा ।
कर्दम्याप यथाशक्ति मातेव हितकारिणी ॥ १२७ ।।
पश्यानिधारमंशाः म्युर्दोषाः सूत्रोदिसा पुधैः ।
देशविरतिरूपस्य प्रतस्यापि मलपदा ॥ १२८ ।।
बसूर्य यथा-आनयनप्रेष्यप्रयोगशब्दरूपानुपातपुगलक्षेपा।
आत्म मङ्कल्पिनादेशादाहिरियतस्य परतुनः ।
आनयेतीगिते. किमिद मापनानयनं मतम् ॥ १२९ ॥
"उ फेनाप्यनुक्तेन स्वयं सचानयाम्यहम् ।
एवं पुर्विति नियोगो प्रेप्यमयोग उच्यते ॥१०॥
शब्दानुपातनामापि दोपोतीचारसंशकः ।
मंदेशकारणं दूरे सद्व्यापारफरान् प्रति ॥ १३१ ।।
दोपो रूपानुपाताख्यो मतस्यामुप्य विद्यते ।
म्वाद्गाशदर्शनं यता ममस्या पक्षुरादिना ॥ १३२ ॥
अस्ति पुल निक्षेपनामा दोपोत्र मेयमे ।
इनो वा प्रेपणं तत्र पत्रिकादमधाममाम् ॥ १३३ ॥
उक्कानीचारनिर्मुक्त स्यादेशविरतिम्रतम् ।
कर्तव्यं प्रतिनापश्यं हिंसातृष्णादिक्षानये ।। १३४ ॥
प्रतं धानर्यदण्डस्य विरतिहमधिनाम् ।
द्वादशनतरक्षाणामेनन्मूलमियाद्वयम् ॥ १३५ ।।
एकम्यानर्थदण्डस्य परित्यागी न देहिनाम् ।
अनित्यं स्यादनायामानान्यथायासकोटिभि ॥ १३६ ।।
स्वार्थ पान्यम्य संन्यासं विना फुर्याग्न कर्म सत् ।
स्वार्थवावध्यमात्रात्मा स्वार्थः सर्वो न सर्वतः ॥ १३७ ॥
--- लाटीसंहितायां-- यथानाम विनोदाथ जलादि वनक्रीडनम् । कायेन मनसा वाचा तद्भदा यहवः स्मृताः ।। १३८ ॥ कृतकारितानुमननैम्निकाल विषयं मनोवचः कार्यः । परिहत्य कर्मसकलं परमं नैष्कर्म्यमवलम्वत् ॥ १३९ ॥ दोषाः सूत्रोदिताः पञ्च सन्त्यनीचारसंज्ञकाः । अनर्थदण्डत्यागस्य व्रतस्यास्यापि पिकाः ॥ १४ ॥ तत्सूत्रं यथा-कन्दर्पकौत्कुच्यमौर्यासमीक्ष्याधिकरणोपभोग- परिभागानर्धक्यानि । अस्ति कन्दर्पनामापि दोपः प्रोक्तवतस्य यः । रागोद्रेकात्महासाहिमिश्नोवाग्योग इत्यपि ॥ १४१ ॥ दोप. कौत्कुच्यसंज्ञोस्ति दुष्कायक्रियादियुक् । परागस्पर्शनं स्वादेरादन्यागनादिपु ।। १४२ ।। मौखर्यदूपणं नाम रतप्रायं वयाशतम् । अतीव गर्हितं धाष्टोद्यद्वात्यर्थ प्रजल्पनम् ॥ १४३ ॥ असमीक्ष्याधिकरणमनस्पीकरणं हि यत् । अल्वार्थमसमीक्ष्य वस्तुनोऽनवधानतः ।। १४४ ॥ यथाहारने यायनलेनास्ति प्रयोजनम् । नेतव्यं तावदेवात्र दूषण चान्यथोदितम् ।। १४५ ॥ भुज्यते सकदेवान स्यादुपभोगसंज्ञकः । यया सचन्दनं माल्यमनपानापयादि या ॥ १४६॥ परिभोगः समाख्यातो भुज्यते यत्पुनः पुनः। यथा योपिलंकारवस्त्रागारगजादिकम् ॥ १४७ ॥ आनर्थक्यं तयोरेव स्यासंभविनाद्वयोः । अनात्मोचितसंख्यायाः फरणादपि दूपणम् । १४८॥ यथा दीन दुमाग्यो यस्लुमंख्यां चिकीर्षति । गुदाम्यशाश्वतं यावन्न गृहागि तताधिकम् ॥ १४९। . F अगुवनचतुष्कोलससकवर्णनम् । निर्दिष्टानर्थदण्डस्य विरतिनांना गुणवतम् । अाधारविनिमुफ नूनं नि.यसे भवेत् ।। १५० ।। शिक्षाप्रतानि चत्वारि सन्ति स्याद्गृहमेधिनाम् । इनस्तान्यपि वक्ष्यामि पूर्वसूत्रानतिकमात् ॥ १५१ ।। सत्सूत्रं यथा-सामायिकमोपधोपवासोपभोगपरिभोगपरिमाणा- तिथिसंविभागप्रवसम्पमा अर्थात्सामायिकः प्रोक्तः साक्षात्साम्यावलम्बनम् । सदयं व्यवहारत्यापाठः कालासनादिमान् ।। १५३ ।। तत्सूत्रं यथा- समता सर्वभूतेषु मंयमे शुभभाषना । आर्तरोपरित्यागम्नदि सामायिकयतम् ॥ १॥ वात्मातरुत्याय कुर्यादात्मादिचिन्तनम् । एकोहं गुर चिपो नाई पौलिक वपुः ॥ १५४ ॥ चिन्तनीयं सतश्चित्ते सूक्ष्म पड़ाव्यलक्षणम्! ततः संसारिणो नुक्त्वा जीवाश्चिन्या विधार्थतः ।। १५५ ॥ वत्र मंसारिणो जीवाश्चतुर्गति निवासिनः । कर्मनाकर्मयुक्तत्वाद् यायिनोऽतीय दुरिताः ॥ १५६ ॥ पूर्वकर्मोदयाद्रावस्तेषां रागादिमयुन । जायते सुद्धमझो यस्तरमाइयोस्ति कर्मणाम् ॥ १५७ ।। एवं पूर्वापरीभूतो भायश्चान्योन्यहेतुः । शक्यते न पृथक् कर्नु यावत्संसारसंशकः ॥ १५८ ।। एवं वाऽनादिसन्ताना मतिरम धनुगतो। जन्ममृन्युजरातदुःखाकान्तः स प्राणभृत् ।। १५९ ॥ सत्र कधन भव्यात्मा काटलब्धिवशादिछ । बस्नफर्मक्षयं कृत्वा संसारादि प्रमुग्यते ॥ १६० ॥ अस्ति सरसनसान पारित्राण्यत्र कारणम् । स.स. ५ लाटीसंहितायां- हेतुस्तेषां समुत्पत्ती काललन्धिः परं स्वतः ।। १६१ ॥ इत्यादि जगत्सवं वं चिन्तयेत्तन्मुहुर्मुहुः । नूनं संवेगवैराग्यवर्द्धनाय महामनिः ।। १६२ ।। । उक्तं च-जगत्कायस्वमावी या संवेगवैराग्यार्यम् । चिन्तनानन्तरं घेति चिन्तयेदात्मनी गतिम् । कोई कुतः समायानः क यास्यामि जयादितः ॥ १६३ ॥ हेयं किं किमुपादेयं मम शुद्धचिदात्मनः । कर्तव्य किं मया त्याग्यमधुना जीवनावधि ॥ १६४ ॥ इति चिन्तयतस्तस्य संवेगो जायते गुणः । मंसारमयभोगेभ्यो वैराग्यं घोपहति ।। १६५ ॥ तन. साघुसमाधिय सामायिकप्रतान्यितः। सन मामायिफ्री क्रिया कुर्याद्वा शल्यर्जितः ॥ १६ ॥ तजिनेन्द्रगुणम्नोत्रं पठेत्पद्यादिलक्षणम् । मिखानामय माधूनां कुर्यान्मोपि गुणानुतिम् ॥ १६ ॥ नमान्दारती स्तुत्या जगच्छान्तिमधीय च । आप ध्यानस्थितो भूत्या चिन्नयगादचिन्मयम् ॥१६८ ॥ नन' मम्पूर्णनां नीत्या प्यानं कालाननिक्रमात् । मंन्तुनानां यथाशक्ति नपूजा कर्तुमईनि ॥ १६९॥ म्नानं कुयांप्रयत्नेन मंशुद्धः प्रामुमोदकः । मायादौतयप्राणि दृष्टिपूनानि प्रायः ॥ १५॥ मत शन, शनेगल्या स्वमनपजिनालये। द्रव्याण्यटा जलादीनि मायगादाय भाजने ॥ ११ ॥ तत्रस्थान जिनयिम्यांध मिद्धयन्त्रान् ममयेन् । नशानचामित्रत्रयं स्यान्य समयम् ॥ १७२॥ पानपि यथानन्ति गुमानध्ययननी। अत्र मनपमानवादुनमुनापतो मया ।। १७३ ॥ ....
अगुवनचतुष्कशीटसप्तकरणनम् ।
अस्त्यत्र पञ्चधा पूजा मुख्यमाहानमात्रिका ।
प्रतिष्ठापनमज्ञाय मनिधीकरणं तथा ॥४॥
मतः पूजनमत्रास्ति सतो नाम विमर्जनम् ।
पप्रधेय ममायाता पाल्याणदायिनी ॥ १५॥
तद्विधिधात्र निर्दिष्टुमर्हमप्युपरभितः ।
स्मृत मंक्षेपसंफतानिधेश्वातीय विस्तरात् ॥ १४६ ॥
एवमित्यावश्यस्यात्कर्तव्यं प्रवधारिभिः ।
अस्ति घेदात्मसामायं कुर्यायाप्यपरं विधिम् ॥ १७॥
अयपत्यवेश्मस्थानईदिम्वादिकानपि ।
मयुपाध्यायसाधुंध पूजयेद्वक्तितो प्रती ॥ १८ ॥
सनो मुनिमुमोदीगं प्रोकं वा सारिभिः ।
धर्मस्य भवणं पुर्यादादराद शानपशुपे ॥ १७९ ।।
रहकार्य सत' इत्यांदात्मनिन्दादिमानयम् ।
ततो मध्याहिके प्राप्त भूयः कुर्याइगु विधिम् ।। १८० ॥
अतिथिमविभागस्य भावनां भावयपि ।
मध्याहादीपदाग्वै नातालापतिकमे ॥ १८॥
भोजयित्वा स्वयं यावत्मण शेते मुषाया।
पारयेदर्मभवण पूर्वादे यरत स्मृतेः ॥ १८२ ।।
उहापोहोपि कर्तव्य साई चापि मधामभिः।
अम्ति पद शानसामध्य कार्य शाखाक्लोपनम् ॥ १८॥
राहणार्य ततः पुर्याइयः मध्यावधरिह।
सतः सायंतने माने फुर्यात्मामायिकरियाम् ॥ १८४॥
रिमापराकाले जिनविम्याम् भागम्येन् ।
मनः मामापिर दुर्यान विधिना प्रती ॥१८॥
सवम रान पुर्यायपानि, पयोधिनम् ।
निशीधे पुनरत्याप यांसामादिग्गिम् ॥ १८६॥
लाटीसंहितायां- ANA rama तत्रार्द्धरात्रके पूजां न कुर्यादहतामपि । हिंसाहेतोरवश्य स्याद्रात्री पूजाविवर्जनम् ॥ १८७ ।। एवं प्रवर्तमानश्च सागारो व्रतवानिह । स्वर्गादिसम्पदो मुक्त्वा निर्वाणपदभाग्भवेत् ॥ १८८॥ सामायिकग्रतस्यापि पञ्चातीचारसंज्ञकाः । दोपाः सन्ति प्रसिद्धास्ते त्याग्याः सूत्रोदिता यथा ॥ १८९ ॥ तत्सूत्रं यथा-योगदुष्पणिधानानादरस्मृत्यनुपरथानानि । सामायिकादितोन्यत्र मनोवृत्तिर्यदा भवेत् । मनोदुष्पणिधानाख्यो दोपोतीचारसंज्ञकः ॥ १९० ।। धाग्योगोपि ततोन्यत्र हुकारादिप्रवर्तते । बचोदुष्पणिधानाख्यो दोपोतीचारसंशकः ।। १९१ ॥ काययोगस्ततोन्यत्र हस्तसंज्ञादिदर्शने । वर्तते तदतीचार. कायदुष्पणिधानकः ।। १९२ ।। यदाऽऽलस्यतया मोहात्कारणाद्वा प्रमादतः । अनुत्साहतया कुर्यात्तदाऽनादरदूषणम् ॥ १९३ ।। अस्ति स्मृत्यनुपस्थानं दूषणं प्रकृतस्य यत् । न्यून वर्णैः पदैर्वाक्यैः पठ्यते यत्प्रमादतः ॥ १९४ ॥ ज्यात सामायिक नाम प्रतं पाणुनतार्थिनाम् । अतीचारविनिर्मुसं भवेत्संसारविच्छिदे ॥ १९५॥ स्थानोपयोपयासाख्य प्रतं च परमौषधम् । जन्ममृत्युजरात विध्यंसनविचभणम् ॥ १९६ ॥ चतुद्धाशनसंन्यासो यावयामाध पोडश यितिनिरयस्थाने ने प्रोपधसंज्ञकम् ॥ १९७ ॥ कतंत्र्यं वदवश्यं स्यात्पर्पण्यां प्रोषधमतम् । अष्टम्यां च पश्यां यथारात्यपि पान्या २९८॥ पारणाहि त्रयोदश्यां मन्या कलमोजनः ।
अगुवतचनुकशीटममययनम् । -----ne 1 विष्ठस्थानं समासाचनीरागं निरवचकम् ।। १९९॥ नय निवसे रात्री जागरूती ययावलम् । प्रातरापिदिनं हस्नं धर्मभ्याननयनती ॥ २०० ।। जलपानं निपिद म्यान्मुनिषत्तत्र प्रोपधे । न निपिदाऽनिपिता म्यादस्पूिना जलादिभिः ।। २०१॥ यदा सा क्रियते पूजा न दोषाम्नि नदापि । न कियते मा मदाप्यत्र दोपा नानीह पचन ।। २ ।। एवमित्यादिव मात्वा रामि धर्मधीः कृषियोऽशन पुर्यान्मभ्या पारणादिने ।।०॥ प्रापर्य एकध्यं धारणादि दिनत्रयम् । परपोपिपिपिया प्रागिदं त्वात्मकलक ।। ६.४ ।। ग्युः प्रोपापपागम्य दोग पोदिता गगनो। निरस्याने प्रतम्यरतः सागरिरपि यमनः ।। २०५।। नारमूत्र पथा-अप्रत्यधिनाममोर्जितोरसादानमानपत्रमाणा- नादरस्गृत्यनुपरधानानि । जीवा गतिमा मन्ति पर्नध्य प्रत्यवेक्षणम् । चक्षुष्यापारमा ग्यासूातारणं यथा ॥२०६ ॥ प्रमाणन प प्रदभि योपपरणतम् । उपगीदानानाविषयं पोपदणम् ॥ २०७॥ अत्यक्षिन नत्र पपा स्यादप्रमार्जितम् । मारगर्ग एवाग्नि दोष. मोसंयमे ॥ १८ ॥ पोरमगतिपादान मानरोपमाना। नमामानी पतीपारा दोपा. मात्र प्रतापते ॥२९॥ नप: पूर्णानगरमांदनुपाहोसार । प्रोपभो पापिनायाायदापातीपाहा..! ग्यासमायरधान एवं भारत लाटीसहितायां- . अनैकाम्यं तदेव स्यालक्षणादीप लक्षणम् ।। २११ ॥ प्रोपधोपवासस्यात्र लक्षणं कथितं मया । इतः संख्योपभोगस्य परिभोगस्य चोच्यते ॥ २१२॥ निर्दिष्टं लक्षण पूर्व परिभोगोपभोगयोः । तयोः संख्या प्रकर्तव्या सागारतधारिभिः ॥ २१३॥ सन्ति तत्राप्यतीचाराः पञ्च सूत्रोदिता बुधैः । परिहायाः प्रयत्नेन श्रावकैमदिभिः ॥ २१४ ॥ तत्सूत्रं यथा-सचित्तमवन्धसन्मिाभिपवदुःपकाहाराः । चिकीर्पन्नपि तत्संख्यां सचित्तं यो न मुञ्चति । दोपः सचित्तसंज्ञस्य भवेत्संख्यात्रतस्य मः ।। २१५॥ तथाविधोपि यः कनिचेतनाधिष्ठितं च यत् । वस्तुमंख्यामकुर्वाणो भवेत्सम्बन्धपणम् ॥ २१६ ॥ मिश्रितं च मचितेन वस्तुजातं च वस्तुना । स्वीकुर्वाणोप्यतीचारं सन्मिश्राख्यं च न त्यजेत् ।। २१७ ।। आहारं स्निग्धमाहिश्च ? दुर्जरं जठराग्निना । असंख्यातवतस्तस्य दोषो दुष्पकसंज्ञकः ॥ २१८॥ उक्तानिचारनियुक्त परिमोगोपभोगयोः । संख्यावतं गृहस्थानां श्रेयसे भवति धुवम् ॥ २१९॥ अतिथिसंविभागास्यं प्रतमस्ति प्रतार्थिनाम । सर्वप्रतशिरोरनमिहामुत्र सुखप्रदम ॥ २२०॥ ईपन्न्यूने घ मध्याहे कुर्याद् द्वारावलोकनम् । दातुकामः सुपात्राय दानीयाय महात्मने ॥ २२१॥ नपात्रं त्रिविधं शेयं तत्राप्युत्कृष्टमादिमम् । द्वितीयं मध्यमं शेयं तृतीयं तु जपन्यकम् ॥ २२२ ।। उक्तंचा उत्कृष्टपात्रमनगारमणुननाढयं मध्य प्रदेन रहित मुदृशं अपत्यम् ।
+- अणुव्रतचतुष्काशीन्द्रसप्तकवर्णनम् । निदर्शनं प्रतनिकाययुतं कुपात्रं युग्मोम्मितं नरमपारमिदं हि विति। एतेप्यन्यतमं प्राप्य दान दयं यथाविधि । प्रामुकं गुदमाहारं विनयेन ममन्वितम् ॥ २२३ ।। पात्रालाभे यथापित पशानापपरो भवेत् । अधर्म विफल जन्म भूयोभूयश्च चिन्तयेत् ।। २२४ ॥ रुपायायाप्यपात्राय दान देयं यथायथम् । केवल तकृपादान देयं पात्रधिया नदि॥२२५ ।। अस्ति मूघोदितं शुद्ध पातीपारपाकम् । अनिधिमविभागार यवतरमा परित्यजेम् ॥ २२६ ॥ सतम् यथा-सचित्तनि पापिधानपरध्यपदेशमात्सर्यकार विक्रमाः। सपित पप्रपत्रादौ निभेपोऽमादिवस्तुनः । दोर मधित निभेपो भवरत्वर्थसंशक ॥ १२ ॥ अपिधानमावरणं मपित्तन पतं यदि । स्यात्मचित्तापिपानाम्यं दूपणं व्रतधारिण ॥ २९८ ।। भास्माकीनं मुमिदाम त्वं प्रयच्छति योजनम् । दोष. परोपदेशस्य करणाग्यो प्रनारमन ।। २९९ ।। प्रयाउभाममादि गर्वमुनत यदि । दूपणं लभते मोपि महामारमयंगशाम ॥ २३०॥ इपन्न्यनाथ मध्यान्दारानवालादयीयवा। तावनातोपि पालापतिशम ॥ २५॥ पारविनिर्मुक पाभ्यो दानमुत्तमम् । अतिधिर्मविभागार यत्रतं तस्य मुरगतये ॥ १९॥ पधारमशानमास्यातं स्यात्रापर। अलि मादयनामा तातो मारणात ॥२५॥ सोनि सहगनाटोमी गति पाया।
१२०
टाटीमंहितायां-
दैवादोरोपसर्गेऽपि रोगेऽसाध्यतरेऽपि च ॥ २३४ ॥
क्रमेणाराधनाशास्त्रोक्तेन विधिना प्रती।
वपुपश्च कपायाणां जयं कृत्वा तर्नु त्यजेत् ॥ २३५ ।।
धन्यास्त वीरकर्माणो ज्ञानिनस्ते प्रतावहाः।
येपां सल्लेखनामृत्युः निष्प्रत्यूहतया भवेत् ॥ २३६ ॥
दोपाः सूत्रोदिताः पञ्च सन्त्यतीचारसंक्षकाः ।
अन्त्यसल्लेखनायास्ते मंत्याज्याः पारलौकिकैः ।। २३७ ।।
तत्सूत्रं यथा-जीवितमरणाशंसा मित्रानुरागसुखानुबन्धनिदा
नानि ।
आशंसा जीविते मोहाद् यथेच्छेदपि जीवितम् ।
यदि जीव्ये वरं तावदोषोऽयं यत्समस्यते ॥ २३८ ॥
आशंसा मरणे चापि यथेच्छेन्मरणं द्रुतम् ।
वरं मे मरणं तूर्ण मुक्तः स्यां दुःखसंकटात् ।। २३९ ॥
दोपो मित्रानुरागाख्यो यग्नेच्छेन्मरणं कचिन् ।
पुरस्तान्मित्रतो मृत्युवरं पश्चान्न मे वरम् ॥ २४० ।।
दोपः मुखानुबन्धाख्यो यथावारमीह दुःखवान् ।
मृत्वापि प्रतमाहात्म्याद् भविष्येऽहं सुखी कचित् ।। २४१ ।।
दोपो निदानयन्धाख्यो यथेच्छेन्मरणं कुधीः ।
भयेयं प्रतमाहात्म्यावस्य घाताय तत्परः ।। २४२ ।।
यदि या मरणं घेच्छेन्मोहोडेकात्स मूढधीः ।
भवयं घोपकाराय मिनस्यास्य प्रतादितः ।। २४३ ॥
यदिया मरणं घेच्छेदशानाद्वा मुखाशयाः ।
भूयान्मे मनमाहाल्यात्स्वर्गधीरद्विवादिनी ।। २४४ ॥
एनोपनिनिमुक्तमन्त्यसदेवनाननम् ।
म्वगापवर्गसौख्यानां मुधापानाय जायते ॥ २४५ ॥
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१२२ लाटीसंहितायां- - तत्र हेतुबशात्कापि कुर्याकुर्यानवा क्वचित् । साविचारवतत्वादा तथापि न प्रतक्षतिः ॥७॥ अनावश्यं त्रिकालेपि कार्य सामायिक जगन् । अन्यथा प्रतहानिः स्यादतीचारस्य का कथा ॥ ८॥ अन्यत्राप्येवमित्यादि यावदेकादशस्थितिः । व्रतान्येव विशिष्यन्ते नार्थाान्तरं कचित् ॥९॥ शोभतेऽतीव संस्कारात् साक्षादाकरजो मणिः । संस्कृतानि प्रतान्येव निर्जराहेतवस्तथा ॥ १० ॥ स्यात्प्रोषधोपवासाख्या धतुर्थी प्रतिमा शुभा । कर्तव्या निर्जराहेतुः संवरस्यापि कारणम् ॥११॥ अस्त्यत्रापि समाधान वदितव्यं तदुक्तवत् । सातिचारं च तत्र स्यादत्रातीचारवर्जितम् ।। १२ ॥ द्वादशवतमध्येपि विद्यते प्रोप, व्रतम् । तदेवात्र समाख्यानं विशेषस्तु विवक्षितः ॥ १३ ॥ अवश्यमपि कर्तव्यं चतुर्थप्रतिमानतम् । कर्मकाननकोटीनामरित दावानलोपमम् ॥ १४ ॥ पञ्चमी प्रतिमा चारित प्रतं सागारिणामिह । तत्मचित्रपरित्यागलक्षणं भक्ष्यगोचरम् ॥१५॥ इतःपूर्व कदाचिद्वै सचित्तं वस्तु भक्षयेत् । इतः परं स नास्नुयात्सचित्तं तम्मलाद्यपि ॥१६॥ मक्षणेऽत्र सचित्तस्य नियमो न तु स्पर्शने । सरस्वदनादिना कृत्वा प्रामुकं यात्र भोजयेत् ॥ १७ ॥ रात्रिमतपरित्यागलक्षणा प्रतिमास्ति सा । विख्याता मंख्यया पठी सभस्थश्रायकोचिता ॥१८॥ इतःपूर्व कदापिता पयःपानादि स्यानिशि। तः परं परित्यागः सर्वथा पयतोपि तत् ।। १९ ।। '.
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१२६ लाटीसंहितायां- . सूक्ष्मं चापि न गृहीयादीपत्सावध कारणम् ।। ५७ ॥ कोपीनोपधिमात्रत्वाद् विना वाचंयमिक्रिया। विद्यते चलकस्यास्य दुर्द्धरं प्रतधारणम् ॥ ५८ ॥ तिष्ठेश्चैत्यालये संघे बने वा मुनिमन्निधौ । निरवद्ये यथास्थाने शुद्ध शून्यमठादिपु ॥ ५९॥ पूर्वोदितक्रमेणैव कृतकर्मावधावनात् । ईपन्मध्याह्नकाले वे भोजनार्थमटेरपुरे ॥ ६॥ ईर्यासमितिसंशुद्धः पर्यटेद्गृहसंख्यया । द्वाभ्यां पावस्थानीयाभ्यां हस्ताभ्यां परमभुयात् ।। ६१ ॥ दद्याद्धर्मोपदेशं च नियाज मुक्तिसाधनम् । तपो द्वादधा कुर्यात्प्रायश्चित्तादि याचरेत् ॥ ६२. क्षुल्लकः कोमलाचारः शिखासूत्राङ्कितो भरें। एकयनं सकौपीन वस्त्रपिच्छकमण्डलुम् । ।। भिक्षापात्रं च गृहीयात्कारयं यद्वाप्ययोमय एपणादोपनिर्मुक्तं भिक्षाभोजनमेकशः ॥६ और मश्रुशिरोलोग्ना शेपं पूर्वपदाचरेत् । अतीचारे समुत्पन्ने प्रायश्चित्तं समाचरेत् ॥ यथा निर्दिएकाले म भोजनार्थ प पर्यदेव पाये भिक्षा समादाय पश्चागारादिहालियात तत्राप्यन्यतमे गेहे दृष्ट्या प्रामुकमम्बुकम् । क्षणं धातिथिभागाय संप्रेक्ष्याय च भोजये देवापात्रं समासाय व्याहानं मृदस्यवम् । नरहर्ष यत्स्वयं भुंके गोयत्यादुपोषितम् किय गन्धादिद्रव्यागामुपसन्यो मधर्मिभिः अहंदिग्वादिसाधूनां पूजा काया मुतात्मना किमात्र माधकाः केमिकेचिद्गलादयाः पु
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लाटीसंहितायां- हस्ताभ्यां सूक्ष्मं चापि न गृह्णीयादीपत्सावद्यकारणम् ॥ ५७ ॥ कोपानोपधिमानत्वाद् विना वाचंयमिक्रिया । विद्यते चलकस्यास्य दुर्द्धरं व्रतधारणम् ।। ५८॥ तिष्ठेचैत्यालये संघे वने वा मुनिमन्निधौ । निरवद्ये यथास्थाने शुद्ध शून्यमठादिपु ।। ५९॥ पूर्वोदितक्रमेणैव कृतकर्मावधावनात् । ईपन्मध्याह्नकाले व भोजनार्थमटेपुरे ॥ ६ ॥ ईयर्यासमितिसंशुद्ध पर्यटेद्गृहसंख्यया । द्वाभ्यां पात्रस्थानीयाभ्यां परमभुयात् ॥ ६१॥ दद्याद्धर्मोपदेशं च नियाज मुक्तिसाधनम् । तपो द्वादधा कुर्यात्प्रायश्चित्तादि वाचरेत् ॥ १२ ॥ क्षुल्लकः कोमलाचारः शिखासूत्राङ्कितो भवेत् । एकवस्त्रं सकौपीनं वनपिच्छकमण्डलुम् ।। ६३ ॥ भिक्षापात्रं च गृह्णीयात्कास्यं यद्वाप्ययोमयम् । एपणादोपनिर्मुक्तं भिक्षाभोजनमेकशः ॥ ६४ ॥ क्षीरं श्मश्रुशिरोलोग्नां शेपं पूर्ववदाचरेत् । अतीचारे समुत्पन्ने प्रायश्चित्तं समाचरेत ॥ ६५ ॥ यथा निर्दिएकाले स भोजनार्य च पर्यटेत् । पात्र भिक्षां समादाय पञ्चागारादिहालिवन् ।। ६६ ।। तत्राप्यन्यतमे गेहे दृष्ट्वा प्रामुकमम्बुकम् । क्षणं पाविधिभागाय संप्रेक्ष्याप्यं घ भोजयेत् ॥ ६७ ।। देवात्मानं समासाद्य दद्यादानं गृहस्थवत् । तच्छप यस्वयं भुंके नोचकुर्यादुपोषितम् ॥ ६८ ॥ किन गन्धादिद्रव्याणामुपलब्धौ सधर्मिभिः । अहंदिग्यादिसाधूनां पूजा फायां मुदात्मना ॥ ६९ ॥ कियात्र माधकाः केचित्केचिद्गुदायाः पुनः ।
सामादिकादि प्रतिमावर्णनम् । । P- याणमस्थाग्यकाः केचित्मर्वे तशधारिणः ॥ ५० ॥ क्षुटकीपत्किया तेषां नात्युनं नातीय मृदुः । मध्यवर्तितं तद्वत्पध गुर्यात्ममाक्षिकम ॥१॥ अस्ति कश्चिद्विशेषोत्र साधकादिषु कारणास् । अगृहीतग्रताः कुर्युमंताभ्यास प्रताशयाः ॥ ७२ ॥ ममभ्यरवनताः फेचित् मतं गृहन्ति माहमान् । ने गृहन्ति व्रतं फेचिद् गृहे गन्छन्ति कातरा. ।। ७३ ॥ एवमित्यादि दिग्मा मया प्रोक्त गृहिवतम् । गांधकादर्श याषन् शेष ज्ञेयं जिनागमान ॥ ७४ ।। अस्त्युसरगुणे नानां सपा द्वादशधा मतम् । सूपामा प्रवक्ष्यामि देशती प्रतधारिणाम् ॥ ५५ ॥ उत्सूत्रं यथा-अनशनावमोदर्यपृतिपरिमल्यानरमपरित्याग विवित्तप्यासन फायठेशा पाहतप । माधादिचतुर्दाहारसन्यामोऽनशने मतम् । फेवलं भक्तसलिलमयमोदर्यमुच्यते ।। ७६ ॥ विचतु पञ्चपठादिवरतूनां संख्ययाऽशनम् । सादिमख्यया यता तिसम्या प्रचायते ॥ ७ ॥ मधुरादिरसानां यत्समस्त ध्यानमेव वा। परित्यागो यथाशक्ति रमत्यागः स सत्यते ॥ ७८ ॥ एकान्त विजनस्थान सरागादिदोपोजिते । शप्या यद्वासन भिन्न शय्यासनमुदीरितम ।। ९ ।। आनापनादियोगेन वीर्यपासनेन पा । वपुषःशकरण कायशः प्रीतिन ।। ८०. पोदा पाय तर प्रोनमेषमित्यादिलक्षणः । अधुना एक्ष्यतेऽस्माभिःपोदा पाम्यन्त सः ॥ ८॥ तत्पूर्व यया-प्रायश्चित्तविनयपालधापायुसर्ग:मानान्यु- १३२ टाटीसहिनायां- ज्झारू द्वितीयपुत्रस्य कलुराम्यस्य धर्मिणः । भार्या तिहुणाहि नाम्ना नाथू नाम मुतस्तयोः ॥ ३५ ॥ नाथूभाया चिताल्ही स्यात्पुत्रो रूढा तयोद्वयोः । ज्झारू चतुर्थपुत्रस्य भायर्या चुंहो ममाख्यया ॥ ३६ ॥ तयोः पुत्रस्तु गांगू स्यादात्मवंगावतसंकः । एते सर्वेपि जैनाः स्यु. कीर्त्या संघेश्वरा. स्मृताः ॥ ३७ ।। एनेपामम्तिमध्ये गृहपरुचिमान फामनः संघनाथ म्नेनोभैः कारितेयं सदनसमुचिता मंहिता नाम लाटी । श्रेयोर्थ फामनीय प्रमुदितमनमा दानमानामनाथैः स्वोपक्षाराजमलेन विदितविदुपा मापिना हेमचन्द्र ।। ३८॥ इतिश्रीवंशस्थितिवर्णनम् । यावदव्योमापगाम्भो नभसि परिगतौ पुष्पदन्तौ दियाशी यावलक्षेत्रे व दिव्या प्रभवति भरतो भारती भारतस्मिन् । सायन्मिद्धान्तमेतजयतु जिनयतेराशया ख्यातलक्ष्म तावत्त्वं फामनाग्य निगमुपलभतां जैनसंघाधिनाथः ॥ ३९ इत्याशीवादः। यायन्मेरधरापीठे यायश्चद्रदियाफरौ । धान्यमानं पुस्तायशि नन्दतु पुस्तकम् ।। ४० ॥
अन्यकर्तुः वंशवृक्षः।
T
T
जगमी
निन्दा
नाथ
Lette
भोना
कामन
मादाम
कौतू
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