Bhartiya Vidya Mandir Shoudh Pratisthan,bikaner
Prachin Kavyo Ki Roop Prampara
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प्राचीन काव्यों की रूप-परम्परा
अगरचन्द नाहटा
मन्दिर
विद्यार
TED
पीवानर
भारतीय विद्या मन्दिर शोध प्रतिष्ठान,
वोकानेर (रामस्थान)
भारतीय विद्या मन्दिर प्रन्यमाला-४
परामरामरल
धी नरोत्तमदास स्वामी प्रेम श्रे
श्री नाथूराम खडगावत प्रेम में
श्री अक्षयचन्द्र शर्मा प्रेम में
श्री शभूदयाल सकसेना
प्रथमसाकरण
भा स १८८४ [ १९६२ ई० ]
मूल्य.. पये
प्रतापक
भारतीय विद्या मदिर शोष प्रतिष्ठान,
बीकानेर
पडेशनल प्रेस, यौकानेर
आभार भारतीय विद्या मंदिर अन्यमाला के अधीन प्रकाशित श्री श्रगरचन्दजी नाहटा को 'प्राचीन काव्यों की रूप परम्परा' पुस्तक को विश पाठकों के हाथों में सौंपते हुए हमें बड़ी प्रसन्नता हो रही है। प्रतिष्ठान की शुरू से ही यह नीति रहा है कि यह मान्य विद्वानों की कृतियों को सुखपादित रूप में पाठकों के समद रखे । श्री चन्द्रदानजी चारए द्वारा सपादित 'गोगाजी चौहान री राजस्थाना गाया' का जिस प्रकार साहित्य जगत में श्रादर हशा है हमें अाशा है इसी प्रकार भा नाइटर के इन खोज पूर्ण नियों का भी पूर्ण नादर होगा। प्रतिष्ठान के भूतपूर्व अध्यक्ष श्री अक्षयचन्द्रजी शर्मा एम० ए०, साहि त्यरल के कायकाल में जिन कृतियों का सपादन और संग्रह हुना उनमें से या भी एक है। उनका मार्गदर्शन संस्था के लिये बड़ा लाभकारी सिद्ध हुन्या है। इस य प्रकाशन में राजस्थान शिक्षा विभाग एव उसक अध्यक्ष श्री जगन्नाथसिंहजी मेहता के सहयोग के लिये हम उनके बहे प्रामारी हैं। मूलच द पारोक रजिस्ट्रार भारतीय विद्या मदिर, बीकानर
दो शब्द
राजस्थानी के प्रसिद्ध विद्वान् श्री मगरच दजी नाहटा के इन
खोज-पूण साहित्यिक बिधों को पुस्तकाकार प्रकाशित करते हुये हमें वही
प्रसन्नता हो रही है।
बहुत पहले मध्येताओं का ध्यान इन निबों पी मोर चला गया
पा और कई शोध प्रवाधों के लिये ये माधार भूत सामग्री प्रस्तुत कर पाये,
यह कम गौरव की बात नहीं है ।
ऐसी महत्वपूर्ण सामग्री, विभिन पत्र पत्रिकामों में बिखरी पड़ी
रहने से शोध अध्येतानों को अधिक लाभ नहीं होता पामत विद्वान पाठक
प्रय इस नये रूप में इनस भोर मधिक लाम उठा पावेंगे ।
सत्यनारायण पारीक
मप्यक्ष
भारतीय विद्यामदिर शोष प्रतिष्ठान
भूमिका प्रस्तुत प्रप मेरे गत इक्तीस वर्षों में निये गये 'प्राचीन भापा पार्यों को रूप परम्परा" क सम्बध में लेखों का संग्रह है जो समय समय पर पत्र-पत्रिकायॊ जसे- नागरी प्रचारिणी पशिरा, हिदी मनुशीलन, सम्मलन पत्रिका, भारतीय साहित्य, कल्पना, अजन्ता, पर भारती, राजस्थानी, सयुक्त राजस्थान, वामती प्रेरणा, देवनागर, राष्ट्र- भारती, शोध पत्रिका लोक कला जन मत्य प्रकार मादि में प्रभागित होते रहे हैं। उनमें से केवल चौदह उत्कृष्ट लेखों का सक्लन प्रस्तुत दिया जा रहा है । प्रस्तुत ग्रप में चर्चित रचना प्रकारों के सम्बप में गुजराती में दो मच्चे नेम प्रकाशित हो चुक हैं । जिममें से प्रथम "गुजराती साहित्य ना स्वरूपो के लेखा मेरे विद्वान मित्र डा. मजुलाल मजमदार है । उनका ६५० पृष्ठों का यह प्रय पाचाय बुक डिपो बडोदा से सन् १९५४ में प्रकाशित हुमा है। दूसरा प्रय ' मध्यकालना साहित्य प्रकारो" डा. चन्द्रकान्त मेहता का सन् १९५८ में एन० एम० त्रिपाठी बम्बई से प्रकाशित हुमा है । हिदी साहित्य में भी इसके सम्बध में कुरा उल्लसनीय नाम हमा है। ग. रामबालू पर्मा ने हिन्दी के काम्य रूपों का अध्ययन" शोध प्रबप लिखा है। उसका सारांश भारतीय साहित्य के पक्टुवर ५६ वे अंक में प्रकाशित हुमा पा । इसी प्रकार पर भी नई घोष प्रदधों में कतिपय काव्य रूपों की पर्चा की गई है। प्रस्तुत प्रन्य के 'फागु' नामक काव्य रूप पर मेरे विद्वान मित्र मोगेलाल सांरेसर ने एक महत्वपूण सग्रह प्रस्तुत किया है । जो सन् १९५५ में प्रकाशित हुपा है । उक्त "माचीन फागु समह" नामक प्राय में ३८ रचनाए मूल रूप स छपी हैं तथा प्रन्यारम्म में फागु के साहित्य प्रकार पर भी भग्य प्रकाश डाला गया है । फागु रचना प्रकार के सम्बन्ध में विकार श्री प्रक्षयच धर्मा एम० ए० ने भी एक उल्लेखनीय लस लिखा है जो नागरी भचारिणी पत्रिका में प्रकाशित हो चुका है। रामो' रनना प्रकार के सम्बप में एक विस्तृत अध्ययन भौर कतिपय महत्वपूण रासोका साह "रास पौर रासान्वयी काम्य" नामक न्य किया गया है। यह प्रप काशी नागरी प्रधारिणी समा, काजी से प्रता शित हो चुका है। बारहमायौं' के सम्बध में डा महेद्र पण्डिया ने शोय प्राप लिखा है। विवाहला कायों" सम्बध में थी पुरुषोत्तम मेनारिया गोप कर रहे हैं । वेलि कायों का मालोचनात्मक अध्ययन १० नरेन्द्र भानावत ने अपने छोष प्रबध में किया है। 'पवाडा काय' के सम्बध में श्री उया महोत्रा ने शोध काय प्रारम्भ किया पा। उनके कई लेख मोर पाहे मर भारती में प्रकाशित हुए थे, पर व अपना शोध कार्य पूरा नहीं कर पायीं । 'क्यालो' के साबध में जयपुर निवासी ग्रो प्रभूवत्तजी ने शोध प्रबप लिखा है, यह ममी क पप्रकाशित है। 'हियालियों पोर प्रहेलिकामों' पर करदयाल घोषि- ध्यारक दोष कर रहे हैं । इसी प्रकार माय भी कई काव्य रूपों के पूणत या माशिक रूप पर कार्य हो रहा है । सन सब का यहाँ उल्लेरा सम्भव नहीं है । इस प्रपया अपप्रथम लेख मेरे सूपमळ मासन मे दिये हुए "राजस्थानी जैन साहित्य सम्बधी तीन अभिभाषणों में से मध्यम भभिमापण" का एक भा है। इस में ११७ रचना प्रकारों की नामावली देते हए ८० काव्य रूपों का सक्षिप्त विवरण दिया गया है। इन रचना प्रभारों का सर्वाधिक प्रयोग जन कपियों ने ही किया है तामियों का इस परम्परा को निभाने का श्रेय भी उन्हें ही दिया जा सकता है । जन कवियों ने एक raना प्रभार पाली front हो रचनाए निमित की है। जिन मामास प्रस्तुत प्रय के लेखों से भी अच्छी तरह मिल जाता है। बारहमानों को सस्या तो इतनी अधिक है किनकी भी देना भी सम्भव नहीं है। इसी प्रकार 'गीत' नामाव्य रूप में भी इतने उनसे लेकर स्वतत्र घोष प्रबप लिया जा सकता है। महाकवि समय सुन्दर ने भनेक गीतों का निर्माण किया है जिनका सक्षिप्त विवरण मैंने अमन्वा एक लेस में दिया है। इस प्राय में रिन राम पों की पर्चा दी गई है। अधिकाच वेठाभार जन पवियों द्वारा प्रयुक्त है। दिगम्बर जन कवियों ने इन काव्य रूपों के अतिरिक्त और भी नई काव्य रूप मपनी हिन्दी रपनामों में अपनाये हैं, जो मरी जानकारी में है, पर उसकी वर्षा इस प्रय में नहीं दीया को है। लाम्य रूपों में से मधिकार की परम्परा पपत्र पाल से गिरतर पसी भा रही है। सपा भाषा की छोटी छोटी बात की बनाए गुटका मादिग्रह प्रतियों में होने से उनकी जानकारी प्रमो तक प्रकाश में नहीं भाई है और घी ऐसो रचनामों को दोमा मष्ट भी कर युकी है। - इस प्रन्य के प्रकाशन करने का निणय तो दो-तीन वर्ष पूर्व हो गया था, पर कई कारणों से यह अब प्रकारा में पा रहा है। पूरी सावधानी बरतने पर भी कतिपय मसु- दियां रह ही गई हैं। भगले सस्करण में ही इनका सुधार सम्भव है। मुझे विश्वास है कि प्रस्तुत प्रप द्वारा पाठकों का अवश्य ही शानयन होगा। इस प्रय को प्रकाशित करके भारतीय विद्या मंदिर पोष प्रतिष्ठान ने एक उपयोगी काय दिया है। मत इस सस्था के मध्यक्ष धन्यवाद के पात्र हैं। अगरचन्द नाहटा विषयानुक्रम २० - ४६ ६४ - - ce १ प्राचीन भाषा काव्यों की विविध सजाए २ सघि सशक काव्य ३ बारहमासा सज्ञक रचनाए ४ फागु सशक काव्य ५ विवाहलो पौर मगल काव्य ६ धवल सपक रचनाए . वेलि सशक काव्य ८ रेतुमा सशक रचनाए 8. पवाड़ा सशक काव्य १० सतसनक रचनाए ११ राजस्थानी साहित्य में सवाद अन्य १२ दवावत सशक रचनाए १३ सलोका सशक रचनाए १४ स्याल सशक काव्य १५ हियाली संशक रचनाए २ - - ee १०५ - १२८ १४५ प्राचीन भाषा-काव्यो की विविध संज्ञाएँ उत्तर भारत को ममस्त ग्राघुन्धि प्रादेशिक भाषाम्रो का विकाम अपभ्रश भाषा से हुपा है । कुवयमाता के उद्धरण के अनुसार नवी ती में मोलह प्रातीय मापाए कुछ मौलिक विशेषताग्रो के माय बालचात्र के रूप में प्रचलित पी, पर पाठवी से बारहवीं शती तक अपभग ग्रथा में नान होता है कि साहित्य की भाषा सवत्र एक सी र दी गई थी। उपरे प्रातीय स्पों में प्रतर विशेष नही था। ग्यारहवीं गती में राजस्थानी भाषा के कुछ पुरयर पद्य जन प्रवघ अर्थो में मिलते हैं । मुज से सबधित पद्य इसी ममय के प्रवध मग्रहों में मौग्विन परपरा के अनु सार उनका संग्रह किया गया प्रतीत होता है । प्राचाय हेमचंद्र ने जो प्राचीन दोहे अपने ग्रप में सकलित किए हैं वे भी उनमे सौ नोमो वप पुरान तो अवश्य होंगे । प्रत उनका भी समय दमवीं ग्यारहवीं गती माना जा सकता है। उन दोहों तथा अय प्राप्त पद्यों के द्वारा अपभ्र ग म प्राचीन गजम्थानी के विकास ने सूत्र मित्र तेरहवी गती में लोकभाषा मे काफी परिवतन हा चुका था इसलिये जन विद्वानों को अपभ्रंग के साप साप तत्कालीन भाषा मे साहित्य निर्माण करना प्रापश्या प्रतीत हुपा क्योंकि अपभ्र 7 सम समय सुबोध नहीं रह गई थी और जन विद्वानों को जैन धम के उपटेगों का प्रचार एमी भाषा में ही करना था जिमे साधारण से माधारण व्यक्ति भी समझ परे । फ्लत तेरहवी तादी से राजस्थानी की रचनाएं हमें प्राप्त होने लगती है। य रचनाएं छोटो दोटी हैं और समदत मदिरों एव उत्सवों में गीत एव नृत्य के माप प्रचारित करन के उद्देश्य स रची गई हैं। नृत्य और गीत के साथ लय काव्यों के अभिनय में सुविधा नही होतो अत बडे-बडे काव्य संस्कृत प्राकृत एवं प्रपन में ही रचे जाते रहे । 'राम' मना रचनाएँ मूलन नृत्य के माप गाई जाती था 1 चौरहवी गती ता वे लकुटीराम तालकराम पाटि के नृत्य एव गीत के साथ प्रचारित होती रही एमा प्रकारो द्वारा रामों के मत म किए गए निर्देश म 1
विषयानुक्रम
४५
१ प्राधीन भाग पापों को दिपिय मार
२ सपिराम
बारहमासा संहरनार
४ रामु समाराम
१. विाहनो पोर मात काम
पर सपनाए
० देनि राम
रेनुपा समा रचनाए
८पासकाय
१० समारपनाए
११ पापानी साहित्य में संवार न्य
१२ वाद समरपनाएं
१३ मनोरा मगर रपनाए
१४ स्थान सरकार
१५ हिपानीक रपनाए
कर
१२
--
१.३
१२८
-
-
प्राचीन भाषा-काव्यो की विविध संज्ञाएँ उत्तर भारत को ममस्त प्राधुनिक प्रावि भाषामों का विवाम अपभ्रश भाषा म हुपा है । वृवलपमाला के उद्धरण के अनुसार नवी तो में मोलह प्रातीय मापाएं बुध मौलिक विशेषताओं के माय चालचाल के रूप में प्रचलित पी, पर पाठवी में बारहवीं गली तर अपभ्रश या म नान हाता है कि माहित्य की भाषा सवत्र एवं सी रुट हो गई थी। उपरे प्रातीय Fपों में अतर विगेप नहीं था। ग्यारहवी गनी में राजस्थानी भाषा के कुछ पुश्कर पद्य जन प्रबध प्रपों म मिलते हैं । मुज से मवपिन पर इमो समय के हैं। प्रबघ मग्रहों म मौखिक परपरा के अनु मार उनका मग्रह किया गया प्रतीत होना है । प्राचाय हमचद न जो प्राचीन दोह अपने आप में सनित किए हैं वे भी उनमे सौ नामी वर्ष पुरान तो अवश्य होग। प्रत उनका भी ममय दमों ग्यारहवीं ती माना जा सकता है। उन दोहों तथा अय प्राप्त पद्यों के द्वारा अपभ्र 1 मे प्राचीन गजम्यानी के विकास में मूत्र मिल जाते हैं। तेरहवी तो मे लापभाषा में काफी परिवतन हा चुका था, इसलिये जन विद्वानों को अपध्र के माय माय सबालीन भाषा म साहित्य निर्माण करना प्राय प्रनात हुपा क्योंकि अपना उम समय मुबोर नहीं रह गई थी और पन विद्वानों को जन धम व उपोगों का प्रचार ऐमी भाषा में ही करना पा जिमे साधारण स साधारण व्यक्ति भी समझ मरे । पलत तरहवी तान्दी में राजम्पानी की रचनाएँ हम प्राप्त हाने लगती हैं। य रचनाएं छोटी छोटी हैं और सघवत मदिरों एव उत्मवा में गात एव नृत्य व माय प्रचारित करन के उद्देश्य स रची गई हैं। नृत्य और गीत व साय ला कामों के अभिनय में मुविधा नहीं होनी अत बडे-बडे गाव्य मस्न पावन एवं प्रपाम हो रचे जान रह । राम' मना रचनाए मूनत नृत्य के माष गाई जाती पाचौहा गती तर वनकुटीराम ताराम पाटिक नृत्य एवं गीत के साप प्रचारित होती रही ॥मा प्रकारों द्वारा रामों के मत में दिए गए निर्देश में पार है। इस गमय में योग पाप पहरी नमी से मपेगात बरे रास रच जाने मोपोर मा उना विर बना गया। तर उना उद्देश्य सपापस्तु पाविणारारनामे गया और वम्याम्यानो मादिगा गाररसये गमय पर गुगाए जान मग । भार भी जन समाज म यह प्रपा प्ररमित है। बुध प पूर्व तर वेयर जन माम में नियमित म्पसपहर एवं गा माघाना सर्मों को गारही या जाता रहा है। गारों मब भी मा प्रभार, पर गर्गे में म होता जा रहा है। गमों द्वारा पापा ने शानों को मोग रम पामिराा माझी मगे मनिवासमा पती विसापापरिचय देने लिए प्राकृत एव गरात पाप्याधिों पोपा पाम्गनाम पपिपना सपना पहा त्रिम प्रसार गि राजस्पान में जा मुनियों को जिना व्यायान पुर' ममय पहसे ता मारवाडी भाषा महपापले पब उमी पारण समारपारी का रयान ही हो ना पा है। फिर भी गौर म जtffrपनि बम है, जन मनियों व्यापार मारवाडी में ही होते हैं और उनम रारा वाल प्रालि गार गुनाई जाती हैं । तरहापो सप्र में मात्र अधिकतर प्यास्यान मारवाड़ी म हो होन है मोर गातुर्मान्य में रात में गमय नियमित रूप से मुह मे राज रचित रामपारसायन गमको दालें गार मुनाई जाती है। पर तु समय के प्रभार मर इनमें भी हिरी म भाषण देश प्रारभ हा गया है क्योंकि इसके बिना नवनिभिनों का पारपण कम होता है और पत्ता भा निों को मोटि में नहीं समझे जाओ। स्थानण्यासी मप्र म राम प्रब भी रचे जाने है पर उनकी भावा राज स्थानीय बत्ले हिंसी प्रधान हो गई है । गुजरात में गुजराती में ममृद हो जाने के पारण माज भी राम गुजराती में ही रचे जात है। या भाषा काध्या का परिचय देने व पूर्व उनकी विविध सशामों की एए सूची प्रस्तुत की जाती है। (1) राम, (२) मधि (३) चौपाई (४) पागु (५) धमाल (९) विवाहलो, (0) पाल, () मगल (६) वेलि (१०) मनोर (११) सबाद, (१२) वा (१३) झगडो (१४) मात्रा (१५) पावनी (१६) मा (१७) बारहमामा, (१८) चौमाता (१९) पवाडा (२०) चचरी (चाचरि , (२१) जमाभिषेक (२२) पला, (२३) ती यमाला, (२४) चत्यपरिपाटी (२५) संघ वणन (२६) ढा1, (२७) ढालिया, (२८) चौतानिया, (२६) छालिया, (३०) प्रय, (३१) परित, (३२) सपथ, (३३) - - - पाग्यान, (३४) क्या, १३५) मता, (३६) बहोत्तरी, (३७) छतोमो, (३८) सनरी, (३६) बनीमी, (४०) कोमो, (४१) इक्तासा, (४२) चौबीसी, (४३) बीसी, (४) अष्टक (४५} स्तुति, (४६) स्तन, १४१) स्तोत्र (४८) गीत, (४६) सन्माय, (५०) चवदन, (५१) देववन्न, (५२) बीनती, (५३) नमस्कार, (५५) प्रभाती, (५५) मगल, (५६) साझ, (५७) बधावा, १५८) गहूनी, (५६) होयाली, (६०) गूढा, (६१) गजल, (६२)लावणी, (६३) छन, ६४) नामाणी, (६५) नपरसो, (६६) प्रवहण, (६७) पारणो, (६८) वाहण (६६) पट्टायलो, (७०) गुदिनी, (५१) हमचडी, (७२} हीच, (७३) मालाAFTET, (७४) नासमाना, (७६) रागमात्रा (७६) कुलक, (७७) पूजा, (७) गोना, (७६) पट्टाभिषेक, (00) निवारण, (८) मममधी विवाह वणन, (६२) भाम, (८३} पर, (४) मगरी, (८५) रमावलो, (८६) रमायन, (८७) म लहरी, (८८) चद्रावना, (८६) दीपन, (९०) प्रगपिया, (६१) कुनहा (२) जोड, (६३) परिकम, (२४) करपलता (६५) लेख, (२६) विरह, १९७) भूदडी, (६८) सन, (२६) प्रकाश, ११.०) होरी, (१०१) तरग, (१०२) तामिणी, (१०३) चौव (१०४) हुँडी (१०५) हरण, (१०६} पिताम, (१०७) गरवा, (१०८) बोली, (१०६) अमृतध्वनि, (११०) हारियो, (१११) रमोर, (११२) कहा, १११३) अतरणा, (११४) अहो. (११५) दोहा (११६) कु डलिया (११५) छप्पय आदि । इन समस्त ससानों का विवरण देना इस लेख में सभव नही, अन प्रधान सभामा का ही सभेर में पटाकरण किया जायगा। (१) राम-राजस्थानी एव गुमानी भाषा को बड़ी रचनायो में सबसे अधिक रास सना ही हैं । रास सना रचनामो का निर्माण प्रपत्र काल से ही प्रारभ हो जाता है । उपदेशरमानरारा और सदेशराम अपभ्र का हो रचनाएं है । इनमे से उपरेश रसायनराम का नाम उमरे पिता जिनदत्त मूरिने वेवत 'उपगरमायन' ही दिया है परतु उसके टीकाकार मूरि जी के शिष्य के यि जिनपाल उपाध्याय ने उसमें रासर' जोडकर उसे 'सायन रामसपा ने दी है। यह धमाधारण जैन जनता के लिये उपदेशक प, पिन उस समय प्रचलित परिधि को हटाने और विधि मग या प्रचार करने के उद्देश्य से पटिशारद ६० गेय पद्या में रखा गया है । टीकाकार के क्थनानुसार यह सब रागों में पाया जा सकता है । इस प्रम में अनीसवें पद्य में तामारामु प्रौर लगुडारामु नगमा दो प्रकार के रामों का उल्लेख किया गया है- मूम-तालारागु विदिति रपतिहिदिसि विलगडाराम पुरिगिहि । रोरा-तालाराममपि ददति भागमा तदानीगारपदम पिपनिकादिधमहात्यात् । दिवम प सगुहाग पुरुचरणाम्ना यानिदि तर विनाप बाागवित प्रमादयशामनार पान वात् । माशय यह है आि समय सामगि म पावर प्रादि योग राधिय गमय तालियों के साप (तार देर) रामों को गाया रोप उगमे जोहिंगा की गमावना थे वारण रात्रि में तारामा निपपरिया गया है। गी प्रसार नि म पुष्पों में स्त्रियों न साप सगुसराग परन (राहियों के गाग नृत्य परत हुए राम गान) को भी मनुषित बताया गया है । जन मन्दिरों में य दोना राग मोरही ता तर गले जाने पे पहस.१३२७ में रवित सतोत्री गम भली भांनि स्परहोजाता है- बामा सहा धमलाप साथप गुणवता। मोहर दिनह भुवति मनि हम धरता। सोपे मामारस पार भाट पत'। पना मटारस जोईला माता ॥४॥ रायिह सरोमा सिणगार सवि तेवर सेवा।। नापा धामीय रभरे तउ भापहि । गुलसित बागी मपुरि सादि शिणगुण पायता । ताल मानु घर गीत मेसु थामित्र वाजता Irel (प्रायान गुजर यायमग्रह मतक्षविरासु, पृष्ट ५२) राम मगर दूसरी अपना रचना गदेशराम है । इसके रचयिता कवि मदुल रहमान ने पोये पक्ष में हसरा नाम मनेस्य रामय पोर उनीसवें पद्य में 'सनेह रारा' दिया है, जो दोनो ही स देश रामक के अपन दा हैं। रामय 47 सस्कृत रारारा अपभ्र है। उमरा परवर्ती विकार य स्थान मे उ होर रास' हो गया। रासक का उल्नेय हपचरित (बाणभट्ट सातयी शतानी) में मिलता है। यह एक *-सं० १०० के लगमग जितेश्वर सूपिक धार जगहू रचित सम्यकरवमाई घउपई में इमका स्पष्टीकरण इस प्रकार दिया गया है-तालागसु ग्यणि नहि देइ, लठदा रासु मूलह वारेद ॥ २१ ॥ (प्रा० गु० वा यसमा पृ० ८. ) ५ 3- उपरूपक विशेष है । वाग्मट्ट और हेमचंद्र ने काव्यानुशासन मे रासक के सबध में निम्नक्ति स्पष्टीकरण क्यिा है- डाम्बिका भाण प्रस्थान भाणका भरण शिगव रामामाई हल्लीस श्रीगदित-रासक गोष्ठा प्रभुतोनि गेयानि । (वाग्मह) गेय डोम्बिका माण सस्थान शिंगक भारिएका प्रेरण रामावाद हल्लासक्रासक- गोष्ठी श्रीगदित-राग काव्यादि । (हेमचन्द्र) वाग्भट्ट + काथ्यानुशासन की वृत्ति के अनुसार ये सब डोबिकादि गेय रूपा है। पदार्थाभिनयस्वभावनि डाम्बिकादोनि गेयनि रूपाणि चिरतनैरक्तानि । इ ही मे से रासक भी एक रूपर है जिसका लक्षण इस प्रकार दिया है- अनेकनतकीयोज्य चित्रताललयावितम् । भाचतु पष्टियुगलाद्रासक मरणोद्धतम्।। अर्थात् रासक एक एसा कोमल और उद्धत गेय रूपक है जिसमें अनेक नतकियाँ होती हैं अनेक प्रकार के ताल और लय होत हैं और ६४ तब के युगल हात हैं। पीछे रास, रासु अथवा राउम गब्द प्रधानतया क्थाकायों के लिये रूढ-मा हो गया और रसप्रधान रचा रास मानी जान लगी। रास' एक छद विशेष भी है । राज स्थानी म रासा शब्द का प्रयोग लडाई भगडे या गडबड घोटाले के प्रथम भी प्रयुक्त होने लगा है । पर तु प्राचीन जन रचनाप्रो के नामो म तो रास शब्द का ही प्रयाग मिलता है, रासो का नहीं कई पुरानी रचनाओ म 'रासु' भी मिलता है । सतरहवी शताब्दी के उत्तराः एव अठारहवी शती की कुछ विनोदात्मक रचनामो मे 'रासो' और 'रासो' शब्द भी प्रयुक्त हुए हैं। उदर रासा और माक्ह रासो आदि ऐमे हो रास है। (२) सघि-अपभ्रश काध्यों के सर्गों की सना 'मधि है। भावाय हेमचद्र ने महाकाव्य की व्याख्या करते हुए लिखा है- पर्याय सरहतप्राकृतापभ्र शग्राम्यभाषानिबद्धभिनवृत्तसर्गाश्वासमध्यवस्वन्धकबध सत्सधिश दायचि पापत महाकाव्यम् । अर्थात् महाकाव्य मुख प्रतिमुखादि सधियों एव गट प्रथ को विचित्रता से युक्त होता है तथा संस्कृत महाकाव्य सगों में, प्राकृत आश्वासों मे अपभ्रश सधियो म एव ग्राम्य स्कधा में निबद्ध होता है।
६ - 'सघि शद मूलत अपभ श महाकाव्य के सर्गों के लिये ही प्रयुक्त होता था किंतु तेरहवी चौरहवी शती में वह एक सग वाले सड काव्यो के लिये भी प्रयुक्त होने लगा। अपभ्र श म जिनप्रभ सूरि मानि की सधि सज्ञक पद्रह रचनाएं मिलती हैं । साधियों की परपरा उनीसवी शती तक निरतर चलती रही । चौदहवी गती के तो दो ही राधि काय मिलन हैं किंतु सालहनी से उनीसवी तक राजस्थानी एवं गुजराती भाषा में वे पचासो का सख्या म प्राप्त हैं जिनमें राजस्थानी अधिक हैं और उनम भी खरतरगच्छीय विद्वानो के सबसे अधिक । (३) चौपाई-रास के बाद बडी रचनाप्रो म सबसे अधिक चौपाई' नामक रचनाएँ मिलती है । चौपाई या चौपई का सस्कृत रूप चतुष्पदी भी प्रयुक्त मिलता है। मूलत यह चौपाइ छदो म तिखो रचनामों का नाम था पर पीछे 'रासा' की भाति चरितका य क लिये रू' हो गया, यहा तक कि कही वही एक ही रचना की सना किसी ने चौपाई लिख दी तो दूसरे न रास । चौपाई छ- ता अपभश का यों म भी प्रयुक्त हुमा है, पर उन ग्रथों का नाम चौपाई नही रखा गया । चौदह्वी शती से राजस्थानी रचनाओं के नामा में इम सना का प्रयोग मिलने लगता है । नमिनाप चतुष्परिका, सम्यक्त्वाई चौपाई-ये दो सोलहवी शती की रचनाएँ प्राचीन गुजर का रसग्रह म प्रकाशित हैं । इनमें स दूमरी रचना म लिखा है-'हासामिसि चउपई बधु कियउ। (४५) फागु धमाल- वसत ऋतु का प्रधान उत्सव फाल्गुन महीने में होता है । उस समय नर नारी मिलकर एक दूसरे पर अबीर प्रादि डालते हैं और जल की पिचकारियो से क्रीडा करते प्रथात् फाग खेलते है। जिन में वसत नतु के उल्लास का कुछ वणन हो या जो वक्षत ऋतु म गाई जाती हैं ऐसी रचनामो को फागु सा दी गई है। इन रचनामो को यह विशेषता है कि इनमे शब्दालकार के साथ यमक बध अनुप्रास पाया जाता है। इस शली को फागु बध' कहा गया है। कुछ पद्य उदाहरणाथ उद्धत किए जात हैं- पहिलवारउ पाटण, पाटण नयर जे सउ । दोसई जिहाँ श्रीन जिणहर, मरण, र सपद ठाउ | (जैक ए गु० का यसचय, दालसरि पाग, पृ० १५१) पहिलू सरमति प्ररचीसू रचीसू वसत विलास । वीण परइ करि दाहिण, वाहण हसलु जाम ।।
पहृतीय तिहणी हिव रति, वरति पहतो यसत, दह दिसि परसह परिमल, निरमल च्या नभ भत ।।२ (प्रा० गु० दाव्य वसत बिन्नस', पृ० १५) समरवि त्रिभुवनधामणि, कामरिण सिरि सिएगा। कवियण परिण जा बरसइ सरइस अमिउ अपार ॥१॥ ( जोरापल्ला पाश्वनाथ फागु पृ० ६७) यह शली फागु सबंधी सभी रचनामा में नहीं अपनाई गई है । स्यूलमद्र फाग और पिछले मय फागो में भी यह नही है । फागु पोर धमाल दोनों ही एक प्रसग से सबंधित हैं प्रत कई रचनामों की सना किसी ने फागुती है तो किसी न घमाल । फागु और धमाल क छद एव रागिनी में भतर होगा, पर पीछे से ये दोनो नाम होतो क मायपाम गाई जानेवाली रचनामो के लिये प्रयुक्त होने लग । प्राचीन गिबर रचनायो में धमाल का प्राकृत रूप ढमाल' मी मिलता है । इघर लगभग डेढ सौ वर्षों से छाट छोटे भजन डफ और चगो पर गाए जान लगे हैं उनकी सना होरी भी पाई जाती है । फागु एव धमाल सनक रचनाएँ इनम काफी बड़ी होती थी । बहुन स “यक्ति मिल कर चग ढोल, डफ और माझ प्रादि वाद्या + साय उह गात थे, तब एक कोलाहल सा मच जाता था इससे बोलचाल में धमाल' का प्रयोग कोलाहन वा उपद्रव के पथ म भी होता है । फागु सनक रचनाएँ धमाल से अधिक प्राचीन और अधिक राम्या में मिलती हैं। स० १३५० के पासपाम स एमी रचनामो का प्रारभ हाता है। उपल ध फागु कार्यो म खरतरगच्चीय जिनाबोर मूरि का जितबद सूरि फागु सवप्रयम और सबसे प्राचीन है। अठारहवीं ताली प्रारम के खरतरगच्चीय यति राजहष द्वारा रचित नमिफाग प्रतिम कृति है । राजस्थानी एव गुजराता म फागु सना लगभग ५० (चनाएं उपल ध हुई है, जिनका परिचय जन सत्यप्रकार ( वप ११ १२ एव १४ ) में प्रकाशित है । धमाल सनक रचनाएँ ८१० ही प्राप्त हैं और वे सतरहवीं दातारी की हो अधिक हैं । (६८) विवाहलो, घवन, मगल~जिम रचना में विराह का वएन हो उम विवाहला' कहते हैं । जन कवियों ने नेमिनाय मादि तीथकरो और जनाचार्यों के मयमधी वे माथ विवाह क प्रसग को लेकर बहुत से विवाहले रच है । प्राचार्यो में लौकिक विवाह का तो काई प्रसग या नहीं, क्योकि वे ब्रह्मचारी ही रहते थे अत उमक ८ द्वारा ग्रहण किए गए व्रतो काही सयमधीम्पी क्या मान उसी के साथ उनके विवाह का वणन इन नाल्यो म रूप दे रूप म दिया गया है। उदाहरणाथ कवि सोममूति द्वारा स० १३३१ म रचित जिनश्वर सूरि सयमधी विवाह वणन रास म जिनेश्वरसूरि, जिनका बाल्यावस्था वा नाम प्रवकुमार पा जब दीक्षा लेने की तयारी परत हैं तो पहले अपनी माता स दीक्षा की अनुमति मागते हुए कहत है- इहु ससा दुहह भडा ता हउ मेलिहसु प्रतिहि ममारु HEL परिणिसु सजमसिरि वरनारी, माई माईए माझ मगह पियारो। इसके पश्चात् जब व दीक्षा ग्रहण करने व लिए गुरुत्री पास जाते हैं उस समय यान ले जान बाज वजने जीमनवार ( भोज ) हाने चवरी ( मडप ) मडने, पौर अग्नि साक्षि स सयमश्री का पाणिग्रहण करने का वणन बहुत ही सुदर रूपको साप किया गया है। यहां कुछ उद्धरण दिय जात है- कारह अभिनव ए चालिप जानउन प्रबड़ तबइ विवाहि । अप्पुरए ए धम्म चकवइ हूपउ जानह माहि ॥१६॥ कारह नमिच भारित उदाह । वाघइ वाधह जान देखि, लखमिरिण र प्रवाह ॥ १६ ॥ कुसलिहि समहि जानउन पहतिय सेड़ माझारि । उच्छयु हूयउ मइ पवरो नाचह फरफर नारि ॥२०॥ जिरणवद मरिण मुरिग पवरो देसरा पमिय रसेप। कारिय जोमवार तहि जानह हरिस भरेग ॥२१॥ सति जिणेसर नर भुपरिण, माडिउ नदि मुवेहि । वरसिहि भविय दाण जलि, जिम गपणणि मेह ॥ २२ ॥ तहि प्रगयारिय नोपजद झारपातलि पजलति । तउ सवेहि मिम्मियउ, हयलवउ सुमुहति ॥ २३ ॥ इणि परि प्रबडुवर फुया परिणइ सजम नारि। बाज नदीयतूर घण, मूख्यि घर घर बारि ॥२४॥ उपाध्याय महनदन के जिनादयमूरि विवाहला में भी ऐसा ही सुगर वरपन है है । उसमे विवाह करानेवाले जोशी का स्थान गुरुश्री को दिया गया है। ये दोनों काव्य हमार एतिहासिक जन काव्य संग्रह' मे प्रकाशित हो चुके हैं। विवाहला सनक उपलब्ध रचनात्रो में सबसे प्राचीन जिनप्रभसूरि रचित अतरग विवाह अपभ्र श भाषा में उपल ध है । यह भी माध्यात्मिक विवाह है भादिमत की पक्तिया इस प्रकार हैं- प्रारभ-पमाय पुण्ठारण तहि अहे भवियजिउ निरुवमु वरु ए। चहुविह सघु जानउत्र कीय अहे वाहण सहस सोलग ॥१॥ प्रत-इएपरि परिगए जो प्रजगि ग्रह लहह सो सिद्धिपुरि वासु । मगलिकु थोर निएप्रभ ए अहे मगलिकु चहुवीह सघ ए॥ (प्रतरग विवाह धवल वसतरागेए भरणनीय) इसकी रचना स० १३०० के प्रामपास की है और इसके बाद ही जिनेश्वर सूरि-सयमश्री रास का स्थान है । इस प्रकार चौरहवी शताब्दी से ऐसे काव्यो का निर्माण होने लगता है और बीसवी शतानी तक क्रम जारा रहता है। ऐसी जगभग ४ रचनामो का अभी तक पता चला है । विवाह में गाए जानेवाल गोता को 'घवल' वा 'मगल कहा जाता है और विवाह स्वय एक मागलिक काय माना जाता है, अत कई रचनायो म विवाह के साथ 'धवल' शब्द भी नामात पर के रूप मे व्यवहृत है, जसा कि ऊपर 'अतरग विवाह के साथ यह जुडा हुप्रा मिलता है । धवल सनक रचनामो का प्रारभ तेहरवीं शताब्दी से होता है । 'जिापति सूरि धवन गीत उपल ध रचनायो में सबसे प्राचीन है, जो हमारे ऐतिहासिक जन काव्य संग्रह मे प्रकाशित है। ऋषभदेव विवाहले को समा 'धवलबघ' दी गई है। नमिनाथ धवल, वासपूज्य धवल आदि कुछ रचनाएं घवल' संशक प्राप्त हैं । हिन्दी, राजस्थानी और बैंगला म जो 'मगल सना वाल काव्य मिलते है, वे इमी परम्परा की देन है। राजस्थानी का प्राचीन वाल्य रुक्मणी मगल' बहुत प्रसिद्ध लोक्का य है । पर इसका नामात पद 'मगल माधुनिक है । मूलत लखक ने इसकी सजा विवाहलो हा दी है । इसको सबसे प्राचीन प्रति स० १६६६ की प्रस्तुत लेखक के सग्रह में है और दो प्रतिया उसे बीसवी शती की प्राप्त हुई हैं इसका मूल स्प बहुत छोटा था,, पर तु समय समय पर इममें लोकप्रियता के कारण परिवतन परिवद्धन होत रहे । प्रकाशित १० सस्करण हमारी प्रति से कोई बद्रह वीस गुना बढ़ गया है। (E) वेलि--- राजस्थानी साहित्य में क्रिसन रुकमणो री वेलि' बहुत प्रसिद्ध प्रय है। इस सज्ञा का स्पष्टीकरण करते हुए वेलि अर्थात् लता का सुदर रूपक निम्नोक्त दो पद्यों म दिया गया है- बल्ली त यीज भागवत यायो, महिपाणी नियुदास मुख । मूल ताल जड प्ररथ मड हे मुधिर परणि चढि छांह सुख ॥२६॥ पन्न प्रक्खर दल द्वाला जस परिमल नवास ततु विधि प्रहोनिसि । मधुकर रसिक सुभगति मजरि फूल फल भुगति मिसि ॥२६२।। इस समावाली पचास रचनाओं का मुझे पता लग चुका है, जिनमे पद्रह राजस्थानी तथा दो गुजराती जनतर रचनाए ( सीतावेलि और ब्रजवलि ) हैं । हि दी में भी मनोरथ वल्लरी तुलसीदास और भगवानदास रचित नात हुई हैं। २१ रचनाएं जनों विद्वानो द्वारा रचित हैं जिनमें वाच्छा श्रावक की 'चहेगति वेलि सबस प्राचीन है । इसका समय स० १५२८ के लगभग है। इसी शताब्दी मे सीहा लावण्यसमय और सहजसु दर ने भी वेतिया बनाई । सतरहवी से उन्नीसवी शतानी तक यह पम जारी रहा । स० १८८६ के बाद इस सजा वाली कोई रचना उपल ध नही है ।* (१०) सलोका-मूलत सस्कृत श्लोक' शब्द से जनभाषा में सलोका या सिलोका शत प्रचलित हमा प्रतीत होता है । म यकाल म वर जब विवाह के लिये ससुराल जाता तो उसकी बुद्धि की परीक्षा के लिये पहले पर का साला कुछ श्लोक कहता और फिर उसकी प्रतिस्पर्धा मे वर श्लोकों द्वारा अपनी प्रतिभा का परिचय देता था। पद्रवी शती के लगभग की एक रचना हमार निजी समह म है जिसम वर ने साल को सबोधन करत हुए अपने पाराध्य देव गुरु कुलदेवी, गोत्र मातापिता, गर, उसके शासक, तुरग, तोरण आदि क वणनात्मक लोक वह है । लोक भाषा में उनकी यास्या भी है। इसके मत में वरदान एव सुखप्राप्ति के लिय गणेश और सरस्वती की प्राथना की गई है। उदाहरण के लिय विवाह मडप क या की प्राप्ति आदि के श्लोक कहकर साले का कुतूहल पूर्ण करने की सूचना वाले तीन पद्य यहा दिए जाते हैं- *उपल ध रचनाओं के सम्बध में श्री कापड़िया का लख 'चन धम प्रकाश ६५ अक २ में प्रकाशित है।
मध्यनिर्मितमनोहरवेदि प्रेक्षणादिककुतूहलपूण । गोतलोनतरणोपरगरम्य स्वगखण्ड इव मडप एप ॥८॥ श्रह) शालक । जेहन मयि चहू दिास नूनन वेहि जबरा करिउ मडित । लक्ष्मी परिउ श्रसहित, घ3री चतुर चितु चारह। प्रेक्ष्यणीय प्रमुख कुतुहल सकुलु। घरल मगल गीतगान तत्पर सु दर जन मनोहरु विचित्र पवित्र चद्रोदय सहितु सवंगखएडविनित्वरु मडपु सोमह॥5॥ तप्त ता साधुजनाय दत्त दान स्मृता पचनक्रिया च । सतीययात्रा विहिता ॥ तेन पुण्येन ल.पा भयत स्वसेय ॥ १६ ॥ अहा शालक ! मइ लिइ भवि निमलु चार भेदु तपु पौष । पारि लिया तपाचन किी भावना पूर्वाक दानु दोधउ । अनद जिनशासन सारु पच परमेष्टि नमस्कार स्मस्त्रउ श्री शनु जय गिरिनार सरोवइ त थि जाइउ। श्री वीतराग पूज्या। तीणि पुण्य करिउ महताहरी वाहण लाधी । १६॥ . तत्र नालिकरमतमेकमानय पूगगतपच तयव शासक प्रचुरताव्यसचय पूरयामि तद कौतुक यथा ॥१७॥ अहा शाला । जब किमह मुभरहद नालियर नउ सतु । अनई फाफल ना पाच सय । टायणि करइ एक मडि दियइ । तउ हउ सपलोक समतु अनेकि मलोकि करिउ श्राप । शाला न उ कुतूहलु पूरव उ ।। १७ ॥ विवाह के समय साले और वर के द्वारा सिलोक कहने की प्रथा प्राचीन है। विमन म श्री के विवाह के प्रसग में कवि लावण्यसमय ने विमलप्रबध में इसका उल्लेख इस प्रकार किया है- ग्रहता तोणि जोर लोक, सोला साला कहि नलोक । विम यांणि धमणे मामली ग्या साला ते दह निनिटली ॥४॥ खतरगच्छ के शातिसागर सूरि और जिनसमुद्र मूरि के प्रवेशोत्सव आदि के वनवाली दो रचनाए 'राजस्थानी , भाग २ में प्रकाशित हो चुकी हैं। वे भी "महो सालक' मबोधन के साप हैं प्रत वे भी उपयुक्त विवाह प्रसग में वर के द्वारा कही जाने के लिये ही बनाई गई प्रतीत होती हैं। आगे चलकर उक्त प्रथा एव तद्विषयक रचना के प्रकार म अन्तर पा गया । गुजरात के उत्तरी भाग और राजस्थान मे विवाह प्रसग में सिलोक वह जाते हैं जिहें बरातियो मे से जानकार लोग मदिर में देवी देवतापो एव वीरों के गुणों का वर्णन करते हुए विरोप ढग के साप कहकर सुनाते हैं। इन सबकी दाली रूढ़ हो गई है। राजस्थानी भाषा के छदम प 'रघुनायरूप में वनिका का दूसरा भेद सिलोको बतलाते जो उदाहरण दिया है, वह नीचे दिया जाता है। उपलब्ध सलोको में यही पाली प्रयुक्त मिलती है- दूजो मेव इणनू लोकोकत सिलोको ही कहै छ। घोल सीतापत इसाडीजी वाणी सुरनर नागा न लाग सुहारणी। सेसाजल हणमत जिमही सरसाई, बोरा प्रवरीि कोपी बडाई । धनुघररा वायफ सभिल जोपारा, पोरस भर्गो मे वधियो प्रणपारा । पुणव कर जोड जोतय फल पायो मान श्रोखावद इतरो फुरमायो॥ इस शली के जन जनेतर पचासा राजस्थानी गुजराती सिलोक प्राप्त है, जिनमे बीसो छप भी चुके हैं। अठारहवी शती से इसका रचनाक्रम चलता है और उनीसवी के भी काफी सिलोके मिलन हैं । बीसवी शती मे यह प्रथा कमजोर होने लगती है। नगरो मे सिलोका कहने की प्रथा का अ त हो गया है परतु गावों में यह अभी तक प्रचलित है। ( ११ १३ ) स वाद बार भगडो- कवि हृदय विलक्षण होता है। वह अपनी कल्पना द्वारा जिन वस्तुमा में वास्तव में कोई विवान नही उनमे भी विरोधी भावना उत्प न करके उनके मुह से अपने गुण और महत्व का और नमरे को हीनता का वरान कराता है। उन दोनों के प्रस ग के कवि की प्रतिमा का सुदर परिचय प्रस्तुत हो जाता है । ऐसी रचनायो का स ना 'सम्वाद , वाद अथवा झगडो रखी गई है। सस्कृत के 'स वादसुदर' मप में भी ऐसे नौ स वाद स वलित हैं । राजस्थानी एव गुजराती मे ऐसी लगभग तीस रचनाए प्राप्त हुई हैं जो चौदहवी शती से उनीसवी तक की है। जनेतर पवादात्मक रचनामों में बीकानेर के महाराजा रायसिंह के प्राश्रित कवि बारहठ कर का, दातार सूर रो स वाद' प्राप्त है। हिदी भाषा में भी नरहरि आदि कवियो द्वारा कई .
१३ प्रत्येक वरण सवादामक रचनाएँ लिखी गई हैं। {१४ १६) मातृका बावनी-कवक-- इनमे वणमाला के प्रक्षर ५२ मानते हुए से प्रारम्भ करके प्रास गिक पद्य रचे जाते हैं। ऐसी रचनामों की सशा वादनी' है । अपभ्रश से ऐमी रचनामों का प्रारम्भ होता है। इसकी प्राय सा 'करक' है। हिरो में से 'मसराक्ट' भी कहते हैं। तेरहवीं चौदहवी तादी को ऐसी चार रचनाएँ - गालिभद्र वक, दूहा मात्रिका, सम्यरत्वमाई चौपाई, मानिका चौपाई प्राचीन गुजर कापस ग्रह में प्रकाशित हैं। ये बावनी के पूर्व रूप हैं । सोलहवी शताब्दी से ऐसो रचनायो का नाम 'बावनी व्यवहृत हुमा है यद्यपि प्रादि मत म कुछ प्रय पद्य जोड़ने मे पद्यों की सरया ५५ ५७, या ६० तक पहुंच गई हैं। कुछ रचनाए मातृशक्षिरो के म पर नही रची गई, पर उनकी पद्य स या २२ से कुच ही अधिक होने पर उनको भी 'वायनी' कहा गया है। हिंदी, राजस्थानी, गुजराती तीनो भाषामा में जन कवियों द्वारा रचित पचास के नामग वावनिया हैं । भिनभिन छयों में रची होने से इनके नाम दहाबावनी सक्याबावनी, वित्तवानी, कुण्डलिया धावनी आदि रखे गए हैं और कुछ के नाम विषय के अनुसार धमबावनी, गुणवावनी इत्यादि मिलते हैं । टीकमगढ़ से प्रकाशित मधुकर पत्र मे कई वप पूद 'बावनी सनक हिदी रचनाएँ" पोषक लेस प्रकाशित हो चुका है। हिन्दी भाषा को कतिपय वावनियों, बारहखडियो, बत्तीसियों आदि का विवरण लेखा द्वारा सपादित 'राजस्थान में हस्तलिखित प्रयों की खोज', भाग ४ मे दिया गया है। इनमें पणमाता के अक्षरों का हम इस प्रकार रखा गया मिलता है-- भों (नमो सिद), मा इ ई. उ, ऊ, , ,ल, ल., ए, v प्रो, मो, मे, मो, क, ख, ग, ध, च, छ, ज, भ, ८,,,,,त, ५, ६, घ,न, प,५,६, भ, म, य,र, . ( १७ १८ ) वारमामा चौमासा- बारह महीना के ऋतु परिवान एवं विरह-माप को व्यक्त करनेवानी रचनाओं का नाम बारहमासा' है । जन भौर जनेतर दोनों प्रकार के बारहमामे सकडों की सरया में मिरते हैं। साधारणतया एक एक महीने का वगन एक एक पद्य म होने में १५-२० पद्यों में ये रचे जाते हैं। पर कई बारहमासे बहुत बड़े बड़े भी हैं जिनको पर-सपा ४६-५० मे लेर १० से ऊपर तम पहुँच गई है। प्रति वणन गारधी रचनाओं में इन बारहमायों का हा महत्वपूण स्थान है।
उपलब्ध बारहमासों मे सबसे प्राचीन 'जिनधममूरि बारह नायउ है, जिसकी पद्य-मस्या ५० है । यह तेरहवी शतादी की रचना है और पाटन की तालपत्रीय प्रति में उपलघ है । नमूने के लिये कुछ पक्तिया नीचे दी जाती है- तिहुयण मणि पूजामरिणहिं बारहनावउ धमरि नाहह । निसुरणेह सुयण । नाण सणाहह पहिलउ सावरण मिरि पुरिय ॥१॥ कुवलय दल सामल घणु इज्जइन मद्दसु पडल झरिण छज्जा । विज्जुलडो भवकिहि लवाद मरणहरू वित्यारेवि इला सु । प्रनु परेविणु कलि केका स्यु फिरि फिरि नाचहि मोरला । मेहणि हार हरिय छमिरण श्रीजरण भयउ हिप नीलबर विर्यालय नव मालइ कलिय ॥२॥ । बारहमासे नेमिनाय और स्यूलिभद्र सम्व घी अधिक मिलते हैं। इसी प्रकार चार मास का वणन करनेवाले चौमासे' भी प्राप्त हैं । (१६) पवारा- क्सिी "यक्ति के विशिष्ट कार्यो का वणन करनेवाली रचनामो को पवाडा' कहते हैं । पहनी गत्ती में हीरानः मूरि रचित विद्याविलास पवाडो' मिलता है । कुछ अ य जन पवाडे भी प्राप्त हैं पर उनकी सन्या अधिक नहीं । साइयाझूला के नागदमण अथ मे पवाडा पनगा तराउ पर मिलता है। बाद में महाराष्ट्र में पवाहों की परपरा बहुत जोरो से प्रचलित हुई पर यह सब वीर का य के लिये रूढ हो गया। राजस्थानी भाषा में पावू जी के पवाडे बहुत प्रसिद्ध है। ये पवाडे करुण एव वीर रस से सराबोर हैं। इनमे से साटी जी रो पवाडो राजस्थानी भारती' वष ३ प्रब २ मे प्रकाशित हो चुका है । इसी प्रकार कई अय पवाडे भी राजस्थानी में प्रसिद्ध हैं । ये पवाडे पड (घटनामो का दिग्शन कराने वाला चित्रपट) को दिखाते हुए गाए जाते हैं। (२०) चचरी- रास को भांति ताल एव नृत्य के साथ, विशेषत उत्सव आदि मे, गाई जानेवाली रचना को चचरी' स मा दी गई है । विक्रमोवीय के चतुर्याक में अपना भाषा के कई चचरी पद्य पाए जाते हैं, इससे इस मना की प्राचीनता का पता चलता । प्राकृत पिंगल में चचरी नामक वर भी बतलाया गया है। 'चचरी' और 'चाचरी' इमो नामातर हैं । जायसो में भी पान और होली के प्रस ग में चावरिया चावर यउल्लेख है। जिनत मूरि जी ने जिनवल्लम मरि जी की स्तुति में ४७ पों की पथरी नाम रचना अपभ्र में रवो है, जो अपभ्र काव्यनयो' में प्रकाशित है। इसके पश्चात् जिनप्रम मूरि, मोलण, जितेश्वर मूरि और एक अनान पर्ता को, ये पार चरियां चौदहवीं शती में रची गई । इनमें में सोलण वालो ३८ पद्यों की रचना प्रा. गु० वाव्यस ग्रह में प्रकाशित है।* (२१-२२) जमाभिषेक, माशतीपंदरों के जन्म के अवसर पर रहें इद्रादि देव मेशिखर पर ले जाकर स्नातक करते हैं, उस समय के भाव को प्रकाशित करनेवाली रचना को 'नमाभिपेव वा कला सज्ञा दी गई है । तीयकर की प्रतिमा को मलT मे स्नान कराते समय ये रवानाएं बोली जाती हैं। ऐसी लगभग १५ रचनाएँ चौदहवीं से सोलहवी गती तक की उपलब्ध हैं। अब उनका स्थान पीछे की बनी हुई 'नावपूजा' ने ने लिया है, अन इसका प्रचार नहीं रहा। इस विषय पर जन मध्य प्रकाश, वप १४ अक ४ में प्रो० होरामात कापडिया का 'जम्माभिसेय ने महावीर क्लस' लेख प्रकाशित है। (२३ २५) तापमाना, चत्य-परिपाटी एव स पणन--- जिम रचना मे जन तोपों को नामावली हो उसे 'तीयमाला', जिसमें एर हो स्थान वा अनेक स्थानों के जन मदिरों को पाना का अनुक्रम स बणान हो उसे 'त्य परिपारी' वा 'परिवाही' तपा जिसमें साधु-माध्या-यावर श्राविका चतुर्विध म प के साथ की गई तीर्थयात्रा का वणन हो उसे 'स पवएन' सजा दी गई है। तीयमाला ता प्राचीन भी मिलती है पर चत्य-परिपाटी चौदहवीं शतानी में ही प्राप्त है। स धयागन सतरहवी शताब्दी से अधिक रस होता है। भने स्थानों की ऐतिहासिक सामग्री ऐसी रचनात्रों में सबलिन है। कई सीपमानाएं बहुत विस्तार में लिखी गई हैं और उनमें भारत के प्राय ममी जैन तीर्थों के वणन हैं। तीर्थयात्रा वनारमा स्तवन भी छोटे बडे अनेक मिलते हैं। प्राचीन तीर्थों का ग्रह 'तीपमाला स ग्रह, पाटण पैश्य परिपारी' एक ऐसी अय बहुत सी सपनाए प्रकाशित हो चुकी हैं । प्रकाशित रचनाए हमन स गृहीत कर ली है, वे यथासमय प्रकाशित की जायगी। *विशेष द्रश्य-अपभ्रश वायत्रयी पृष्ट ११८, १४ च न सत्य प्रकाश वर्ष १२ मा ६ में प्रकाशित भी होगलाल काहिया का 'चरी'शी लेन ।
(२६ २६) दाल, ढालिया चौढालिया, छटालिया प्रादि- हम रचना के गाने की तर्ज या देगी को सना 'ढाल' है। सतरहवी शती में जब रास, चौपाई आदि की रचना लोकगीतों को देशियो म हो लगी तव इनकी समा बाल बद्ध हो गई । वह बने रामो में गताधिक ढालें पाई जाती है। चार या छ सालोंवाली छोटी रचनामो को सम्या के अनुमार चौहालिया या छटालिया वहा गया है । अनेक प्रकार यो दशियों वा तों मे रचे होने के कारण गुणसागर मूरि क हरिया रास को 'ढाल सागर भी कहा गया है । तेरहवीं से पद्रहवी गनी तक को रचना चौपाई, रामा, भास वस्तु ठवणी मानि छो म बनाई जाती थीं। प्राचीन रचनाप्रो में एक छद ये पूरे हो जाने पर एक 'कहवक का पूरा होना माना जाता था। इमी तरह जव ढालों का प्रचार हुआ तो एक ढान के प्रत में दोहा या छ- देकर उसे पूरा किया जाता था। ढालो में रची जाने के कारण रचना को 'ढालिया सपा भी दी गई है। ढालों को किस देगी के तज पर गाना चाहिए इसका निर्देश उन ढालों के प्रारम्भ में उम देगो की प्रारम्भिर पक्ति उधून करपे किया गया है । देगियों की प्रथम पक्तियो के इन उद्धरणो से सहस्रो प्राची लोकगीतों के अस्तित्व का पता चलता है । श्री देसाई ने बहुत सी रेशियों का रा ग्रह जन गुजर कविमो के परिनिष्ट रूप में प्रकाशित किया था । पर अभी इस शिला में बहुत काय दोष है । (३० ३४) प्रवध चरित्र मम्वध, पारयानक क्या- चरिन भाल्यानक और क्या प्राय एकायवाची हैं । जो न प जिसके सम्बध मे लिखा गया है उसे वहीं कहीं उसके नाम से उमका 'सम्ब व या 'प्रवध' कहा गया है। (३५४४) सतर, वहोत्तरी सतरी, छत्तीमी बत्तीसी इक्कीमी इवतीसी चौबीसी, वीमो, अष्टक आदि- ये सब नाम रवानामो के पद्यों की सस्या के सूचक है। इनमें से पई बत्तीसिया बावनी की भाति वएमाला के बत्तीस प्रसरों से प्रारम्भ होनेवाले पद्यों की भी हैं। चौवीसी भौर बीसी चोवीस तीथकरो और वीम विहरमागों के स्वप्ना के सग्रह रूप हैं। (४५ ५३, ८३) स्तुति, स्तवन स्तोत्र, गीत, सम्भाय, चत्यवदन, देवदन, वीनती, नमस्कार, पद मादि- इनम तीषकारों या अ य जन महापुरुषो के गुणों का वणन है। स्तुतिप्रधान पवनामों को स्तवन स्तुति स्तोत्र वा गात सना दी गई है। इनमें स्तुतियां चार १७ विमी वस्तु पद्योंवाली होती हैं, जि हैं 'यूई' भी कहते हैं। चैत्यवदन, मन्दिर में वदन करने की क्रिया विशेष है । वठकर स्तवन करते समय पहले चत्यवदन पढा जाता है। देववदन पद दिवसों के लिये विशेष अनुष्ठानरूप हैं । विनयप्रधान रचना को विनप्ति या वीनती कहते हैं। गेय पदों की मना गीत है। साधुनों व मतियो के गुण वणन बरनवाले तथा दुगुणा व परि हार एव सदगुणों वे स्वीकार के प्रेरणादायक गीत स्वाध्याय' या 'सम्भाय' कहलात हैं। 'पद' विशेष रूप से प्राध्यात्मिक गीता का कहते हैं । व राग रागनियों म गाए जात हैं । (५४५८) प्रभाती मगल, माझ बघावा, गहूली प्रादि- प्रात काल पाए जानेवाले गीतों को 'प्रभाती' व 'मगत' और मध्या ममय गाए जाने वालों को माम' या 'सामी' कहते हैं। प्राचार्यों व ग्रागमन पर बधाई के प में गाए जानेवाले गीतो को बधादा' वा 'बघावरणा' और प्राचार्यों के सम्मुख चावल के स्वस्निक प्रादि को गहूँनी करते समय उनके गुणवणनाति व जो गीत गाए जाते हैं उ हे 'गहूंनो' कहते हैं । (५६ ६ ) हीयाली, गूटा- जिन पत्रों का प्रथ गू हो उह 'गूठा कहते हैं । के नाम गुप्त रखते हुए नाम को स्पष्ट करने वाली विशेष बातों का वरणन जिनमें किया गया हो ऐसी रचनामा को 'होली' या हरियाली' कहते हैं। हिन्दी में इह कूट कहा जाता है । इन द्वारा बुद्धि को परीक्षा की जाती है। रामो में पति पत्नी की परस्पर गाष्ठी का जीवन प्राता है वहाँ वे हीयालियो एव गूदायों द्वारा परम्पर मनोरजन एव विनोद करते पाए जात हैं । प्राकृत सुभाषित प्रय 'यग्जानग्ग' म हीयाली वजा की पद्धति है । उमम तो हीयाली भी गूटा जैमी ही एक्पद्यवालो रचना प्रतीत होती है। परतु जन कवियों की प्रास होयालिया ५ ७ वा १० पदों तक को भी मिलती हैं। गेलहवी तालीम एमी हीयालियों का विशेष प्रकार हमा। ये माहों को सस्या में मिलती हैं । लगभग पचास तो हमारे ही मग्रह म हैं। उनम कई बड़ी सुन्दर हैं । मुनियों ने अपने नित्य के व्यवहार मे पानेवाले प्रोघा, मुहपत्ति स्थापनाचारी प्रादि से सम्बंधित होयारिया भी बनाई हैं। नानमार जी रचित गूटावावनी ग्रप हमारी पानसार प्रपावली में छप चुका है। (६१६४) गजल, लावणी छ- नीमारणी प्रादि-जन कवियो की गजल सनक रचनामों म नगरों और स्थानों का वणन है। इनकी रचावा एक विशेष प्रकार होता पा। सभी गजलें उम एक ही गली में रची गई हैं। सबम प्राचीन नगर वनात्मा गजल जटमन नाहर रचित 'लाहोर गजल' है जो म० १६८० के प्रासपाम की है । भापा जन . हि दी है। अठारहवीं और उनीसवीं शती में गजलें रचने का बहा प्रचार रहा है । लगभग चालीस गजलें मैंने सगृहीत की हैं। उनकी भाषा प्रधानतया हिती होने पर भी उनमें राजस्थानी ये गों का यवहार प्रचुरता से किया गया है। नावणी, नीसाणी और पद भी रचना के विशेष प्रकार हैं। छ द जन तीयकरा में पाश्वनाथ के अधिक मिलते हैं । वसे लोकमा य देवी देवताओं के सम्बन्ध मे तो काफी सख्या में मिलते हैं। सतरहवीं से उनीसवी गती तक इनका प्रचार अधिक रहा। लावणी अधिक प्राचीन नहीं मिलती। (६५ ६८) नवरसो प्रवहण वाहण पारणो मादि-- जिस रचना में जी रसा का वगान हो उसका नामात पद 'नवरसा मिलता है । स्थूनभद्र भोर नेमिनाथ के दो ही नवरमे नात हैं । 'प्रवहण और 'वाहण उन रचनामों के नाम हैं जिनमें जहाज में रूपक का वणन होता है । भगवार महावीर पाटि तपस्वियों के पारणे का जिसमे वणन हो ऐसी रचना को सना पारए रखी गई है। (६६७०) पट्टावली गुर्वावली- इनमे जन गच्छो की भाचाय परम्परा का इतिवृत्त स पलित किया गया है । पटट परम्परा वा गुरु परम्परा का वर्णन होने से इसका नाम पटटावाली या गुर्वावली प्रसिद्ध है । (७१७२) हमचडी हीच- तालियो से ताल देते हुए पौर स गीत की लप के साप पावों मठका देते हुए राम की भाति गोलाकार घूमते हुए जिम रचना को पुष्प गाते हैं उसे 'हीच पोर जिस स्त्रिया गाती हैं उसे हमचडी पहते है। कभी कभी पुरुष और स्त्रिया साथ साथ भी गाती हैं । इस स पावाली जन रचना दो चार ही मिलती हैं । (७३ ७५) माला मालिका, नामामाला, रागमाला प्रादि- जिन रचनामों में तीथकरों के विशेषणों वा साधुपो के नामों की माला गुपित की गई हो वह नाममाला मुनिमालिका, मादि सज्ञा दी जाती है । शील के रूपको के नामोंवाली रूपमाला स नक दो जन रचनाए सालहवीं गती की प्राप्त हैं । जिन रचनाओं में राग रागनियों के नामो को अपित किया हो उ हैं रागमाला कहा जाता है। (७६) कुलक-जिम रचना मे विमो गास्त्रीय विषय की आवश्यक बातें सक्षेप में सकलित की गई हो या किसी व्यक्ति का स क्षिप्त परिचय दिया गया हो उसको सज्ञा 'कुलक वा 'कुलउ दी गई है । प्राकृत एव अपभ्रम में सक्हो बुलक मिलते हैं जिनकी सूची सवलित करके मैंने वष ६४ अक ८, १ जनघम प्रकाश १६ । प्रकाशित की है। राजस्थानी म मोलवी सतरहवी ताब्दी के कुछ फुलक प्राप्त हैं। (७७) पूजा-जनागम रायपसेरणीय मूत्र म तीर्थंकरों की मूर्ति म सतरह प्रकार की पूजन विधि का वणन है । जबूद्वीपपह्नति मादि मे तीथकरों की जमाभिषेक विधि का विस्तृत विवरण है । म यकाल मे प्रष्ट प्रकार की पूजा का वडा प्रचार रहा। इसके स ब ध म प्राकृत भाषा में स्थान य भी मिलते हैं। उन पूजाम्रो मे से स्नात्रविधि पहले सस्कृत में की जाती थी और पीछे अपभ्र के जमाभिषेक और बा भी इसी विधि मे मम्मिलित कर दिए गए। पद्रहवी शताब्दी तक तो यही क्रम चालू रहा, पर मोलहवीं मे कवि दपाल ने तत्कालीन भाषा मे स्नानविधि की रचना की। फिर इस स नावाली अनेक पद्य रचनाएं गजस्थानी भोर गुजराती मे बनता चली गई । अष्टप्रभारी पूजा भी पहले एक एक श्लोक बोलकर कर ी जाती थी। पीछे से उसके विस्तृत वरणनवाली पूजाए भी लोकभाषा में रची गई । अय पूजामों मे भी इन पाठ प्रकारो को महत्त्व दिया गया है । सत्तरभेदी पूजा का सतरहवी शतानी मे तपागच्छीय सकलचद और सरतरगच्छीय साधुकीर्ति प्रादि न सवप्रथम लोक भाषा मे निर्माण किया। पूजामो का प्रचार त नीमवीं शताब्दी मे बडे जोरो से हुआ। फलत पचासो विविध नामोवाली पूजाप्रो का उनीसवी शती से अब तक निर्माण होता रहा है। (७८) गीता भगवद्गीता का प्रचार विगत कई नतालिया से बढता चला पा रहा है मत गीता' शम्न की लोकप्रियता से प्राकर्षित होकर कुछ जन विद्वानों ने इम नामात परवाली रचनाएं भी की हैं, जिसका कुछ परिचय मैंन 'श्रमण', वष २ अब मे गीता सनक जन रचनाए' लेख मेरिया है। (७६८०) पटटाभिषेक निर्वाण, सयमधी विवाह वणन मादि जिस रचना में जनाचार्यों के पटटाभिषेक (प्राचाय पद प्राप्ति) का वणन हो उसे 'पटटाभिषेक रास एवं जिममे उनको स्वग प्राप्ति या निर्वाण वणन हो उस 'निर्वाण तथा जिममे दीक्षा वणन की प्रधानता हो उमे 'म यमयी विवाद वरणन' सना दी गई है।
संधि सज्ञक काव्य अपभ्र भाषा उत्तर भारत को बहुत सी प्रमुख भाषापो की जननी है प्रत उन भाषामो ये समुचिन अध्ययन के लिये अपभ्र के सांगोपाग अध्ययन की अत्यात आवश्यकता है। हर की बात है कि कुछ वर्षों स विद्वाना का ध्यान इस प्रोर आकर्षित हमा है और अपभ्र माहि य के प्रवेपण अययन एव प्रकाशन का कार्य दिनोदिन प्रागे बनता जा रहा है। प्राफ्मर हीरालालजी जन का अपभ्र भाषा का बहुत अच्छा अध्ययन है । इसी प्रकार प० परमान जी के प्रवेषण मे अनेक नवीन तथा प्रमात अप- भ्रश ग्र यो का पता लगा है। बहुत दिनों मे मरी इच्छा पी कि अपभ्र पा साहित्य पर पूण प्रकाश डानने वाला इतिगम न थ तय्यार किया जाय । दो तान वष हुए मैंने उक्त दोनों विद्वानों को पत्र लिख कर अपभ्र श साहित्य का इतिहास लिखने का अनुरोध भी किया था। उत्तर में प्रोफेमर माहब ने सूचित किया कि उन्होंने रम विषय म एक विस्तृत निबंध लिख कर नागरी प्रचारिणी-पत्रिका में प्रकाशनाथ भेजा है। प. परमान दजी ने लिखा कि वे एक ऐसा न थ लिखने की तय्यारी कर रहे हैं । अत मैंने विचार किया कि इन दोनो अधिकारी विद्वाना की कृतिया प्रकाशित होने पर ही मरा कुछ लिखना उचित होगा और मैंन अपना इस मवध का शोध काय स्थगित कर दिया। इसीबीच मे शाति निकेतन म ५० हजारीप्रमाद द्विवेदी मे भेंट होन पर उहोंने अपभ्र - साहित्य पर लिखने के लिये स्नेहानुरोध किया पर तु अपभ्र श साहित्य दिगंबर जन विद्वानों का रचा हुआ ही अधिक है और मेरी ओर दिगवर साहित्य की कमी है मत इस काय को हाथ म लेना सचित प्रतीत नहीं हुआ। अभी कुछ दिन पूर्व नागरी प्रचारिणी-पत्रिका में प्रकाशित प्रोफेसर होरालाल जी का निवघ दृष्टिगत हुप्रा और विश्व भारती प्रादि पत्रिकामो में श्रीयुत रामसिंह तोमर के लेख भी पढने में पाये । इनसे पुराने विचार को नवीन प्रेरणा मिली और इम विषय में शोध का काय प्रारम्भ किया जिसके फल-स्वरूप पाच-सात निवघ लिसे गय जिनको पाठकों के मम्मुख उपस्थित करने का श्रीगणेश इस निवध द्वारा किया जा रहा है। प. परमानद जी इस विषय में क्या नवीन जानकारी देते हैं यह जाना अभी शेष है अत अभी मैं उar पाता पर प्रकाश डालू गा जिनके सम्बध में इन दोनो दिगवर विद्वानो की जानकारी बहुत सीमित होगी, अर्थात श्वेताम्बर विद्वानों के रचे हुए साहि य पर । यदि समय और सयामा ने साप दिया तो विशेष विचार भविष्य में किया जायगा। अपभ्रश साहित्य की चर्चा करते समय श्वेताम्बर विद्वानो की अपभ्रश साहित्य की महान सवा को भुलाया नहीं जा सकता। जिस प्रकार दिगवर गपकारो ने अपभ्रश के बडे-बडे महाकाव्य लिखे हैं उसी प्रकार श्वेताम्बर विद्वानो ने विविध नामा और प्रकारा थाले लघु काव्य लिखने में कौशल का परिचय दिया है । परवती ३वतावर साहित्यकारा को अपभ्रश के इस लघु-काव्य-साहित्य स बही भारी प्रेरणा मिला जिमस उनने इन विविध परम्पमा को अक्षुण्ण ही नहीं रखा कि तु व उह विकमित करने और नम नय अनक रूप देने मे समय हुए । मधिकाय को परम्परा भी एक एमी हो परम्परा है और उसी के विषय में प्रकाश डालने का प्रपल इस नियम किया जा रहा है। प्रस्तुत लेख के लिखने की प्रेरणा मुनि श्री जिनविजयजी के एक पत्र मिला जिसमें उनन लिखापा- मेरो एक विद्यापिनी, जो पा एच. डी० का प्रयास कर रही है, वह कुछ पन या प्रादि को सघि, जस मानद मधि, मावना सनि, देगी गोयम-सवि इत्यादि प्रकार के जो मधि प्रकरण हैं, उनका एक सग्रह कर रही है और सधि के स्वरूप प्रादि के विषय में गोध कर रही है। प्रमी उसने जिस किया और मापको पत्र लिखन बठा । इससे स्पुरित हुमा वि माएके पास वैमी बहुत सी कृतिया होगी । अगर हो तो भज दें ताकि उनका प्रच्छा उपयोग हो । च दनदास सधि, सुबाहु सधि प्रादि एस अनेक प्रकरण हैं । पाटण वगरह में कुछ प्रतियाँ हैं । उनको भी यथावकाश प्राप्त करने का प्रपल का गा पर इससे पहले प्रापपे पास से जल्दी सुगमता के साथ मिल सकेंगी एसो आशा म प्रापका लिख - मुनिजी का अनुमान सही निक्ला अपन म ग्रह को मूची को ध्यान से दसने पर उसम बहुत बडो मस्याम मधि काव्य प्राप्त हुने । अपभ्र या सपि काया के साथ साय अठारह- बोग परवतो सपिकाव्य भाषाक भी उपलब्ध हुए। इनवे अतिरिक्ति बीररानेर वृह नान .
भडार मादि अ या य सग्रहा में भी सधिका योकी अनेक प्रतिया विद्यमान है जिनमें से कई भक नवीन भी हैं। सधि नाम का प्रय अपभ्रश में सधि शब्द संस्कृत के सग या मध्याय के प्रय में माता है। प्राचार्य हेमचद्र लिखत है- पद्य प्राय सस्कृत प्राकृत पभ्रश ग्राम्य भाषा निबद्धभि ना त्यवृत्त सर्गाऽऽश्वास- सध्यवस्कधक बध सत्स धि समाप वचिन्योपेत महाका यम् । इससे जान पडता है कि सस्कृतक महाकाव्य सर्गों में प्राइतो महाकाय मारवाशो में, अपभ्रश के महाकाव्य स धियो में और ग्राम्यभापा के महाकाव्य अवस्कधो में विभक्त होत थे । परवर्ती कवियों न म क स घिवाल खडका पाको स पिकाव्य नाम दिया । महाका यका प्रत्यय सघि मनक कडवकों में विभक्त होता था। इन स घिका यो में मे कई कहवा में विभक्त हैं कई नहीं है। अपनश के सधि काव्य हमारी शोघ स अभी तक नीच लिखे अपभ्रा के स धिकाव्योका पता चला है (१) मनाथि-स घि कर्ता-जिनप्रभ सूरि समय-सवत १२६७ के लगभग । कथा वस्तु के लिये उत्तराध्ययन सूत्र देखना चाहिमे । माति-जस्स ज्जवि माहप्पा परमप्पा पाणिणो लहै हैति तित्थ सुपसत्थ जय जन वीर जिण-पहुणो विसमेहि विनहिउ कसाय जगडिउ हा प्रणाहु तिहुयण भमाइ जो अप्प जाप सम सुह माण्इ अप्पारामि मु मभिरमाह रायगिहि नयरि सेणीउ राठ गुरुमत्ति निवेसिय वीयराउ सो अन दिवस उजाणि पत्तु मुणि पिक्खवि पणमइ नमिय गत्तु चारु चउ सरगु गमणो दारणाइ सु धम्म पत्त पाहेउ सोलग रहारूढो जिएपह पहिलो सुहियो मणापिया सधि ॥ कडव ॥२॥ - सया (२) जीवानुशास्ति सनि कर्ता--जिनप्रभ मादि- जस्स वहाणज्जवि तव सिरि ममलक्यिा जिया हुँति सो णिच पि अरणग्यो स घो मट्टारगो जयइ ॥१॥ मोहारिहि जगडिय विसहि विनहिय तिक्ष दुक्ख-खडिय सहियह चिक ससार विरतह पसमिय चित्तह सतह देमि गुसहि निक |॥२॥ मत- इय विविह-पयारिहि विहि अणुसारिहिं भाविहि जिएपहु मणुसरहु सुत्तेण य परिहिं प्राणासु तरिहिं भवियण भव सायर तरहु ॥३१॥ जीवानुशास्ति सघि समाप्त (३) मयणरेहा सधि मणि बिस्तार-कडदक ५ कर्ता-जिनप्रम समय-सवत १२६७, प्रविन शुक्ला ६ मादि-- निस्वम-नाण निहाणो पसम पहाणो विवय सनिताको दुग्गइ दार पिहाणो जिन धम्मो जयइ सुह कामो ॥१॥ सुमरिवि जिण सासणु सुह निहि सामरणु मिरि नमि महरिसि धरिउ पणिसु सखेविहिं मयणरेह महा-सइ चरित ॥२॥ मत-मेसा महा-सईमे संघी सधीव सजम निवास ज नमि निरिसरणा सह ससक्करा खीर सजोगो ॥२॥ वरिस मासोन सुद्ध छट्रिमे सिरि सघ परपणाम लिहिय सुमाभिहिय ॥३॥ मपरपरेहा अघि समास वारह सत्तारणउमे ।
२४
(४) वयस्वामि सघि
कर्ता- वरदत (१)
मादि-मह जरा निसुलिनउ नु धरिजउ
वपरसामि मुरिणयर चरित
प्रत मुलिवर वरदत्ति जाणहर भत्ति वयरमामि- गणहर-चरिउ ।
साहिज्जहु भावि मुच्चहु पाथि नि तिहमणु निय गुण भरिउ HREn
चरिउ सुमारउ भविय पियारउ वहरमामि गणहर- चरिउ ।
जो पढइ क्यिापरु गुण रपणारु सो लहु पावइ परम पउ ।
वहरसामि सधि समाप्त ॥
(५) प्रतरग-मधि
कर्ता-- रत्नप्रभ
मादि- पएमवि दुह पडण दुरिय विहहण जगमटण जिग्ण सिद्धिहिय
मुणि क न रसायणु गुण गए भायणु प्रतरग मुरिण सघि जिय ॥१॥
राह पथि गामु भव बाम पामु बह जीव ठामु धिमपाभिरामु
दौराति जत्य अन्टि छेह बहु रोग सोग दुहु जोग गेह ।।२।।
अत- पहि प्रतह कारणु विस उत्तारणु ज गुलिमतह परणु जिम
क्य सिव सुह-सघिहि मह सुसघिहि पितणु जाणु भविय । तिम ||१८||
इति पतरग सधि समाप्त । इति नवमाधिकार ।।
(६) नमदासु दरी सपि
क्र्ता-जिनप्रम शिष्य
त
समय-सवत १३२५
आदि-प्रग्ज वि जस्म पहावो विर्यालय पावो य ऊबलिय पयाबी
वद्धमारण-तिस्थ नदउ भव- जनहि-वोहित्य ॥१॥
पणमवि पराइदह वीर जिणवह चरण कमलु सिवलच्छि कुलु
सिरि-नमयासुन्दरि गुण जल सुरसरि विपि प्रणिति लिज जम फ्लु ।।२।।
सिरि बदमाणु पुरु अस्थि नया तहिं मपद नरव धम्मपद
तहिं वराइ सु सावगु उपहसणु अपुदिण जसु मणि जिणनाह वया ॥३॥
२५ तमज वीरमइ विश्व-जाय दो पदर पुत तह २ धूम । सहदेव वीरासाभिहारण रिसिदत युक्ति गुगनारस पहाए ।।४।। अत-तेरस सय ग्रहवीसे-वरिसे सिरि जिणपहप्पमामेण प्रेसा सधी विहिया जिशिप-वयणानुमारण १७१६ श्रीनमासु दरो-महासती-स पि समाता । (७) प्रवति-मुक्माल सघि (E) स्यूनिभद्र माप विस्तार--क्व २ गाथा १३ प्रादि- मढ रहार पायारह मोहित वर मरि पदर पुर अमरनाह पिवयवि मोहिउ इय परिसु पाडलिय पुरु जदोष विक्साउ पर राजु जिय मत्त तहि नदु महावलु राज ॥११॥ मत - कोवि णिय तणु तविण मोप्स कुदि परम वण निवसमें पित कोवि घिर सवालु भवरसह साद तुप प्रास को जो वेश धार चउमासि नियमई सरस भीषण सितत तमु पूरभद्द न (४) पाया एमड जिणि मयण तु जित विप-- ऊपर उरिलखित ममस्त रचना पाटण के जन भण्डारी में हैं । इनस विवरण वहौदा गायकवाड प्रोरियट सीरिज म प्रकाशित पाटण भण्डारों के सूचीपत्र मे दिया गया है। ऊपर जो उद्धरण दिय गय हैं वे भी वही मे लिये गये हैं। इस सूचीपत्र में पृष्ठ ६८ पर अनाथि सधि और जीवानुगास्ति सधि नामक दो और सधयो के उल्लेख हैं, परन्तु उनके साथ उदारण नहीं होी मे यह नहीं बताया जा सकता दिव न. १ और २ मिन हैं या अभिने। (९) भावना-मधि विस्तार-स्वर ६ गापा ६२ पता जयरव, गिरेव सूरितिध्य मादि--- पणमदि गुण सायर मुगण-शिवायर जिण चरबीस विक्रमणि मम पडिबोहर मोह गिरोह कोइ भब्य भावप दमिणु ॥१॥ .
अत- र जीव निसुणउ चचल सहाव मिलहेविणु सयल विवायभावु नवमेय परिग्गह विहव जालु स सारि इ.प सहुइ दियालु ॥२॥ निम्मलगुण भूरिहिं सिवदेवसूरिहिं पम सौसु जयदेव मुरिण किय भावरण स घो भावु सुवधी णिसुणहु अनवि धरत मरिण ।।६२।। इति श्रीमावाना स घि समाप्ता प्राप्तिस्थान- हमारे स ग्रह में स० १४६३ के लिखित गुटके में । विशेष- यह सघि जनयुग वप ४, के पृष्ठ ३१४ पर प्रकाशित भी हो चुकी है । उसी पत्रिका के पृष्ठ ४६६ पर इसके सम्बध में श्रीयुत मधुसूदन मोदी का प्रेक लेख भी प्रकाशित हुमा है। (१०) शील सधि विस्तार- गाथा ३४ का- जयगिवर सूरि शिष्य प्रादि- सिरि नेमि-जिणदह परणय-सुरिंदह पय पकय समरेवि मणि वम्मह-उरि-कोलह कय-सुह सोलह सोलह स थव करिस हउ ॥१॥ प्रत- इय सीलह स धो अश्य सुबधी जयसे, र-सूरि-सीस फय भवियह निसुणेविरणु हियइ घरेविरणु सील-म्मि उज्जम करहो । २।। इति शील-सघि समाप्त ॥ प्राप्तिस्थान- हमारे स ग्रह मे उक्त स. १४६३ के लिखित गुटके मे । (११) तप-सघि कर्ता-मोमसुदर मूरि तिघ्य-राजराज-मूरि गिष्य मत- सिरि-सोमसु दर-गुरु-पुर दर पाय पकय हमरो । सिरि विसाल-राया-मूरि-राया-चंदगच्छवसमो पय नमीय सीसइ तासु सोसइप्रस सधी विनिम्मिमा सिव सुबख कारण दुह निवारण तव उवमसिइ चम्मिमा लेखनकान स०१५०५ प्राप्ति स्थान-पाटग का भण्डार (१२) उपदेश-सधि विस्तार-गापा १४ २७ कर्ता हेमसार प्रत-उवप्रेस सधि निरमल बधि हमसार इम रिसि करए जो पढइ पढावइ सुह मणि भावइ वह सिद्धि वृद्धि लहए (१३) चउरग सघि विस्तार-- कहवक ५ विषय-चार गरणो का वरणन विशेष विवरण- पिछली तीन कृतियों का उल्लेख जन गुजर कवियो, भाग १ मे पृष्ठ ७६ भौर ८३ पर हमा है। नम्वर ११ भोर १२ को भाषा प्रपेक्षाकृत अर्वाचीन है। अपभ्र शोत्तर राजस्थानी प्रादि भाषाप्रो के सधिकाव्य अपभग की सधिकाव्यो की परंपरा को भाषा-कविया ने चालू रखा । हमारी शोध से कोई ४० ऐमी रचनामो का पता लगा है जिनकी नामावली प्राग दी जाती है। ये चौरहवी स लेकर उनीमवीं शतादी तक की हैं । चौदहवीं ताब्दी १ मानद-सधि गापा ७५ विनयचद हमारे स ग्रह में २ को गौतम सघि गाथा ७० सोरहवीं तारी ३ मृगापुत्र स घि कल्याणतिलक १५५० लग० हमारे संग्रह ४ नदन मणिहार सघि चारुचद्र १५९७ ५ उदाह राजपि सपि सयममूर्ति १५६. लग० जन गुर्जर कविमो ६ गजमुमाल मघि गाथा १५६० मूलप्रभ ८ घना स घि गाया ६५ कल्याणतिलक १५६० लग. हमारे साह सत्रहवीं ताब्दी ६ सुखदुव विपाक सय घम मेह जयपुर भण्डार १. सुवास घि पुण्यमागर मे ११ चित्रस भूति स घि गापा १०६ गुणप्रभमूरि १६(0) अश्विन : गुरु जेसलमेर में रचित " १ " . " हमारे म ग्रह २८ १६४० " हमारे स ग्रह श्रीसार १२ अजुन माली स घि नयरग जैसलमेर भण्डार १३ जिनपालित- जिनारक्षित स घि कुगललाम बृहद् ज्ञानभडार १४ हरिकेशी सधि कनकसोम १५ समति सषि गाथा १०६ गुणराज मे १६ गजसुकमाल स घि गाथा ३४ मूलावाचक १६२४ जन गुजर पविग्रो १७ चउतरण प्रकोणक स घि गाया ६१ चारिसिंह १६३१ जसलमेर भण्डार १५ भावना स घि जयमोम १६४६ हमारे स ग्रह म १६ मनापी सधि विमल विनय १६४७ २० कयना सधि गुणविनय १६५१ वहद शान भडार २१ नदिपेण संधि दानविनय १६६५ हमारे सग्रहमे २२ मृगपुन स घि सुमतिकल्लोल १६६३ बहदज्ञान भडार २३ प्रानद सधि १६८४ जेसळमेर भडार २४ केशो गोयम स घि नयरग १७ वी शताब्दी हमारे स ग्रह म २५ नमि सघि गाथा ६६ बृहद ज्ञान भार २६ महातक सघि धमप्रबोध हमारे स ग्रह म मठारहवी शताब्दी २७ कडरीक पुडरीक स घि राजसार १७०३ जेसळमेर भंडार २८ जयति स घि प्रमयमोम १७२१ माद हमारे स ग्रह मे २६ भद्रनद सधि राजलाम १७२२ श्री पूजजीका स ग्रह ३० प्रदेशी सघि कनकविलास १७२५ हमारे स ग्रह म ३१ हरिकेगी म घि सुमतिरग १७२७ ३२ चित्रस भूतिम घि गाथा ३६ नयप्रमोद १७२६ वृहद ज्ञान भडार ३३ चित्रस भूति स घि गापा १०६ गुणप्रभसूरि १७२६ जेसळमर भहार ३४ इपुकार स धि सेमो १७४५ हमारे स मह में ३५ प्रनायी सघि विनय (समुद्र) "
२६
३६ यावच्वा स धि
३७ भरत स घि
श्रीदेव १७४६
बृहद शानभडार
दे० पद्मचद्र १८ वी शताब्दी जेसळमेर भडार
३८ मृगापुत्रस घि
जिन हष
उनीसवीं शताब्दी
जेमल १८१७
३४ प्रदेशी स घि
हमारे स ग्रह
में
प्रज्ञातकाल
४० च दनबाला सधि
४१ जिनपालित
जिनरक्षित स घि
४२ सुबाहु सघि
(जिनविजयजी के
पत्र में उल्लेख)
वृहद ज्ञानभडार
मुनिशील
मेघराज
लीबडी भडार
बारहमासा सज्ञक रचनाए ऋतुनों के सौन्य को देखकर और उन पर गीतो का सजन प्राधुनिक साहित्य की देन नहीं अपितु वदिक युग की प्राचीन परपरा है । वेदों में प्रकृति का सुरम्य वणन मिलता है अथववेद में तो अनकों स्थानों पर इस प्रकार का वणन मिलता है जिनमें प्रकृति का बडा ही सुदर चित्रण हुमा है । कई एक स्थानों पर तो छ ऋतुप्रो का भी उल्लेख हुषा है । कालातर मे इही ऋतुओं में अनेकों उत्मवों त्यौहार) का समावेश करके इनकी मानता को प्रक्षुण्ण रखा गया । उन ऋतुओं और त्यौहारों पर गीत बने, काव्योंका सजन हुमा। वसे तो प्रत्येक ऋतु दो माह की और वष में १२ महीने होते हैं । इन बारह महीनों म प्रकृति वदलती रहती है। मानव और प्रकृति का प्रयोयाश्रय सम्बन्ध होने के कारण सयोग और वियोग में उसे ये प्रकृति ज य परिवतन किस प्रकार लगत है इस भाव क अनेकों वरगन साहित्य जगत मे पर मृतु वणन और बारहमासा वगन के रूप में विख्यात । डा. वासुदेवारण जी अग्रवाल ने प्रगविज्जा की भूमिका मे लिखा है कि इस अथ का १२वा पटल महत्वपूर्ण है क्योंकि इसम छ और बारह महीनो के क्रम से प्रकृति में होने वाले वृक्ष वनस्पति पुष्प 'सस्य नतु आदि व परिवतन गिनाए गये है। उदाहरण के लिए फाल्गुन महीने के सम्बध मे कहा है फाल्गुन माम म नर नारियों क मिथुन मिलकर उत्सव मनाते हैं और मुदित होते है । उस समय शीत हट जाता है और कुछ उष्णभाव पा जाता है । जिस समय आम मजरी निकलती और कोयल श करती है उस समय गाने बजाने और हसी खुशी के साथ स्त्री पुरुष प्रापानक प्रमोट में मस्त होर गावने लगते हैं झूमने लगते । स्त्री पुरुषों के मिथुन मथुन कथा प्रमगों मे लगे हुए नाना भांति से अपना महन करते है उसका नाम फाल्गुन मास है । इन ४२ इलोको को अपने साहित्य का सबसे प्राचीन बारहमासा कहा जा सकता है (पृ २४३ २४४) अग्रवाल जी ने प्रगविज्जा को सोमो शतानी की रचना माना है । इससे बारहमामा वणन की परपरा चौथी तादी तक पहुंच जाती है। श्रीयुत् नामवरसिंह के हिन्दी के विकास में अपभ्रश का योग' नामक ग्रप के हो पृष्ठ २०३ में बारहमासो की परपरा अपभ्रश से नहीं मिलती, यह हिदी की अपनी विशेषता है बतलाते हुए लिखा गया है अपभ्रश को कई प्रवृतिया बगला, मराठी, गुजराती प्रादि साहित्यो मे विशेष स्पुट हुई और हि दो मे नहीं हुई। इसी प्रकार हि दो काव्य म भी अनेक बातें जो अपभ्र का से प्रमो तक सम्बद्ध नहीं की जा सकी उदाहरण स्वरूप "बारहमासा'। अपभ्रश में सस्कृत प्रादि की तरह पट ऋतु वणन तो मिलता है, पर बारहमासा नहीं मिलता। यह हिदी को अपनी विशेषता है। वास्तव में श्रीनामवरसिंहजी का कथन सही नही है। श्वेताम्बर अपभ्रश साहित्य की ओर ध्यान न जान के कारण ही उनको इस सम्बध की जानकारी न सकी। अयथा माज मे ३३ वष पूर्व सन् १९२० मे से ट्रल लाइब्रेरी बडौदा से प्रकाशित व स्व० मोहनलाल दलाल द्वारा सम्पादित प्राचीन 'गुजर काव्य संग्रह' नामक ग्रंथ के पृष में नेमिनाथ चतुष्पदिका' सनक विनयच दसूरि की जो रचना प्रकाशित हुई है व स्तव में नेमिनाथ बारहमासा ही है । चौपाई छद मे रचे गये जाने के कारण उस सजा 'बारहमासा न देकर 'चतुष्पदिका रख दी गई है। इस रचना के प्रारभिक दो नीचे दिए जा रहे है जिससे यह स्पष्ट हो जाएगा ॥ 'सोहगसु दर घालाय नु सुमरवि सामिउ सामलय नु सखि पति राजल हि उत्तरिय धारमास सुरिग जिम वज्जरिय ॥१॥ नेमि पुमा सुपरवि गिरनारी, सिदि राजल कान कुमारी प्राविणी॥ पाणि सरपरिण बहुप मेह, गज घिरहरि सिम्झई देह। बिज्ज झवयकई सकसि जेव, नेमिहि विणू सहि सहियइ केय ॥२॥ इसके प्ररमिक पद्य मे नमिराज जी के बारहमास रचे जाने का उल्लेख है हो । दूसरे पच में श्रावण मास मे वर्षा का रणन दिया गया है। इस रचना के कुल ४० पद्य हैं जिन मे ३५ पद्यों तव में प्रापाढ मास का वरणन राजमतो के विरह रूप में पाया जाता है। मन् १९२६ में प्रकाशित स्व. मोहनलाल दलीच द देसाई व जन गुजर कविमो के प्रथम भाग में इसका विवरण (प्रादि अत) देते हुए इसे मुनि जिनविजय जी ने "जन श्वेताम्बर' पोनम स हेरल्ड में भी प्रकाशित किया था। इसके रचयिता विनयचद्र मूरि, रतनसिंह सूरि बारहमासा सज्ञक रचनाए ऋतुप्रो के सोदय को देखकर और उन पर गीतों का सजन प्राधुनिक साहित्य की देन नहीं अपितु वदिष युग की प्राचीन परपरा है । वेदों में प्रकृति का सुरम्य वन मिलता है अथववेद म तो अनकों स्थानों पर इस प्रकार का वणन मिलता है जिनमें प्रकृति का बडा ही सुदर चित्रण हुमा है। कई एक स्थानों पर तो छ नतुप्रो का भी उल्लेख हुआ है । कालातर म इही ऋतुओं में अनेकों उत्सवो त्योहारों का समावेग करके इनकी मानता को प्रक्षुण्ण रखा गया । उन ऋतुमा और त्यौहारों पर गीत धने काम्पोका सृजन हुआ। वसे तो प्रत्येक ऋतु दो माह की और वष मे १२ महीन होते हैं । इन बारह महीनों म प्रकृति बदलती रहती है । मानव और प्रकृति का प्रयो याश्रय सम्बध होने के कारण सयोग पोर वियोग में उसे ये प्रकृति जाय परिवतन किस प्रकार लगत है इस भाव क भनेको वणन साहित्य जगत मे पड ऋतु वणन और बारहमामा वणन के स्प में विख्यात हैं । डा. वासुदेवशरण जी अग्रवाल ने भगविज्जा को भूमिका मे निषा है कि इस प्रथ का १२वा पटल महत्वपूर्ण है क्योंकि इसम छ और बारह महीनो के कम स प्रकृति में होने वाले वृक्ष, वनस्पति, पुष्प “सम्य ऋतु प्रादि वे परिवतन गिनाए गये है। उनाहरण के लिए फाल्गुन महीने के सम्बध में कहा है फाल्गुन मास म नर नारियो क मिथुन मिलकर उत्सव मनाते हैं और मुदित होते है । उम समय शीत हट जाता है और कुछ उष्णमाव पा जाता है। जिस समय पान मजरी निकलती और कोयत्र र करती है उस समय गाने बजाने और हसा खुगी के साथ स्त्री पुरुष प्रापानक प्रमोट में मस्त होर साधने लगते हैं झूमने लगते । स्त्री पुरुषा के मिथुन मथुन कथा प्रमगों मे लगे हुए नाना भांति से अपना मडन करते है उसका नाम फाल्गुन मास है । इन ४२ श्लोकों को अपने साहित्य का सबसे प्राचीन बारहमासा कहा जा सकता है (पृ २४३ २४४) अग्रवाल जी ने प्रगविज्जा को चौपी शताब्दी की रचना माना है। इससे बारहमासा वगन की परपरा चौथी शताती तक पहुँच जाती है। श्रीयुत् नामवरसिंह के हिंदी के विकास में अपभ्र का योग' नामक प्रय पृष्ट २०३ में बारहमासों की परपरा अपभ्रश से नहीं मिलती, यह हिदी की अपनी विशेषता है बतलाते हुए लिखा गया है अपभ्र को कई प्रवृतियां बगला, मराठी, गुजराती प्रादि साहित्यो मे विशेष स्फुट हुई और हि दी मे नहीं हुई। इसी प्रकार हिदी काव्य में भी अनेक बातें जो अपभ्रश से प्रमो ता सम्बद्ध नहीं की जा सकी उदाहरण स्वरूप "बारहमासा'। अपभ्रश में संस्कृत मादि की तरह पट ऋतु वणन तो मिलता है, पर बारहमामा नहीं मिलता। यह हिदी को अपनी विशेषता है। वास्तव में श्रीनामवरसिंहजी का क्थन सही नही है। श्वेताम्बर अपभ्रश साहित्य की ओर ध्यान न जान के कारण ही उनको इस सम्बध की जानकारी न हो सकी। मयषा प्राज मे ३३ वष पूर्व सन् १९२० मे से ट्रल लाइब्रेरी बडौदा से प्रकाशित व स्व० मोहनलान दलाल द्वारा सम्पादित प्राचीन 'गुजर काव्य संग्रह ' नामक अप के पृष्ठ ८ में नेमिनाथ चतुष्पदिका' सनक विनयच दसूरि की जो रचना प्रकाशित हुई है वह वास्तव में नेमिनाय बारहमासा ही है । चौपाई छद में रचे गये जाने के कारण उसकी सजा 'बारहमासा' न देकर 'चतुप्पदिका' रख दी गई है। इस रवना के प्रारभिक दो पद्य नीचे दिए जा रहे है, जिससे यह स्पष्ट हो जाएगा सोहगसु दर घालापनु मुमरवि सामिड सामल नु सखि पति राजल घरि उत्तरिय बारमास सुणि जिम बजरिय ॥१॥ नेमि कुमक्ष सुमरवि गिरनारी, सिदि राजल कान कुमारी॥ प्राविणी॥ पाणि सरयरिण काय मेह, गज्जइ घिरहरि सिम्झई दे । पिज्ज झवाई सकसि जेव, नेमिहि विषु सहि सहियइ केय ॥२॥ इसके प्ररमिक पद्य मे नमिराज जी वे बारहमाम रचे जाने का उल्लेख हो । दूसरे पद्य में श्रावण मास में वर्षा का रणन दिया गया है । इस रचना के कुल ४० पध है जिन में ३५ पद्यों तक में प्रापाढ माम का वणन राजमनी के विरह रूप में पाया जाता है। मन् १९२६ में प्रकाशित स्व० माहनलाल दलीच द दसाई के जन गुजर कविनों के प्रथम भाग में इसका विवरण (प्रादि प्रत) देते हुए इमे मुनि जिनविजय जी ने "जन श्वेताम्बर' वोन स हेरल्ड में भी प्रकाशित किया था। इसके रचयिता विनयच द्र मूरि, रतनसिंह मूरि के शिष्य ५ । इनके रचित कल्पसूत्र की टोका का समय वि० स० १३२५ है इमलिए इस रचना का समय भी १४ वी शताब्दी का प्रारभ ही समझना चाहिए । इसके पश्चात सन् १९३७ म गायदुवाह मोरियटल सीरिज से प्रमाणित पहनाय प्राच्य जन भाण्डागारीय ग्रथ सूची का प्रथम भाग परना के ताड पत्रीय प्रति परिचय के रूप में प्रकाशित हुप्रा । पडित लालचद भगवानदास गाधी ने इसको वर्तमान रूप दिया । इस प्रथ के पृष्ठ १७० मे 'धम मूरि स्तुति' नामक अपभ्र | रचना की प्रारभिक नवगाथाएँ मौर मत को ४८ ५० तक की १० गाथाए उद्धृत है । वास्तव में इस रचना का नाम "बारह नावउ । है जो कि रचना के मत म लिखा मिलता है और कृति को पहनी पत्ति में भी जिसका निर्देग है। प० लालच द गायो ने भी धम सरि स्तुति के प्राग राक्टि में (बारह नावउ द्वादश मास अपभ्र श) गनों द्वारा स्पष्ट कर दिया है । अभी तक प्राप्त बारह मासा म अपभ्र श की यह रचना सवस प्रसिद्ध है। इस रचना में जिन धम सूरि की स्तुति की गई है वे बड़े प्रभाव प्राचाय थे। साकभरि क चौहान अजयपाल और विग्रहराज इनके भक्त थे । विग्रहराज ने ता इनके उपदेश से जन मन्दिर भी बनाया था। यह पाटन भहार म उपयुक्त धमसूरि स्तुति से पूर्व रविप्रभ सूरि रचित धमशेष सूरि स्तुति प्रकाशित हुई है उससे स्पष्ट है । प्रतएच इस बारहनावउ का रचनाकाल १३ वा शतादी का प्रारम्भ सुनिश्चित है और इससे बारहमासा सभक भापा का यो की परम्परा ८०० वर्ष पुरानी सिद्ध हो जाती है । जन कवियो के रचित गताधिक बारहमास मेरे स ग्रह म सुरक्षित हैं। इन धारह मासों का स्वर्गीय मोहनलाल दलीच - देसाई ने बडो लगन के साय सग्रह किया था। इनमें तीन चौपाई बारहमासे तो २२ वें तीथकर नेमीनाथ और राजीमति से सम्बधित है । दो ऋषभ देव एक पाश्वनाथ पाच स्थूनिभट अ य जनाचाय एक बारह ब्रह्म एक मूलिंबाई से सर्वा घत और कुछ सामा य बारहमामों के वणन के रूप में हैं । उनग १२ महीने में मे किसी पवि ने चत्र से किसी ने पापाट धावरण में किसी ने वशाल मिगसर से तो किसी ने फातिक और किसी ने फाल्गुन से वणन प्रारम्भ किया है । अर्थात् भिन्न भिन्न कवियों ने अपनी रुचि के अनुसार किसी ने फाल्गुन सं वणन प्रारम्भ कर दिया है। ये बारहमासे १३ गायानों से लगाकर ८० गद्यों तक के विस्तृत काय है। जन कवियों ने बारहमारे १३ वी तारी से प्रारम्भ होकर प्रत्येक पाताब्दी के मिलते है । १३ वी १ वौहदवी के २ पद्रवी के २ और सोनहनी के चार बारहमासे
मिल चुके हैं। १७ वी शताब्री से इनकी सख्या १८ वा और १६ वी ताब्दी तक बराबर
बढ़ती जाती है । बीसवी गता म यह धारा मद अवस्य पड़ जाती है पर समाप्त नहीं
होती।
१३ वीं और १४ वी के प्रारम्भ के दो जन बारहमासो का विवरण उपर दिया
गया है। इसके पश्चात १४ वीं के उत्तराद्ध का एक "नेमिनाथ वारहमासा रासो' प्रपूण
प्राप्त हुआ है जिसका रचयिता पन्हणु नामक कोई कवि है । इसके पौन सात पद्य ही मिले
है । जिनम प्रावण से पौष महीने तक का वणन पाता है । इसका एक पद्य नीचे दिया जा
कासमोर मुष मडण देवी याएसरि पाल्हणु पणमेवो ।
पदमावतिय चवसरि नमिउ, प्रधिका देवी हरवीनवउ ।
चरिउ पयास नमि जिरण के।उ, कवितु गुल धम्म निवासो।
जिम राइमइ विनोगु भयो बारहमाम पयास रासो।।
इस बारहमासे की प्रति १५ वी शताव प्रारम्भ को लिखी हुई होने से मैंन
इसका रचना समय १४ वी शतानीका उत्तराद्ध माना है। सभव है वह उममे और भी
पहले का हो।
१५ वी शताटी के उनराद्ध के कवि हीरानद सूरि का ' स्यूलिभद्र वारहमास
३० पद्यों का है जिसमें स्थूलिभद्र के रिह म कोश्या को जो अनुनाप हुमा उसका वरणन
मागणीप माम मे दिया गया है। तोमरे पद्य म २६ वें तक १२ महीनो का वणन है ।
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प्रारभिक दो पद्य इस प्रकार हैं
सरसति २ सामणि समरीईए । पामीय २ स गुरु पमाउकि।
गाइ २ सुसील सोहामीणए । पूनिभद्र २ मुनिवर राउदि ।
सरमति सामरिण ममरीइएmin
ममरीषद सरसति सगुरु प्रादि। यूलिभद्र वर्षालोय ।
सिगडाल सा पिलदेव नदन पाडलीपुर जागीयइ ।
वरस बार कोडि बारई, वेसिसु विलसी करो।
माप्त मागसिर सजा लीपर कोम होयडा गयरी ॥२॥
इही हीरानद सूरि का नेमिनाथ गारहमासा मिलता है। १५ वी के अत या १६ वो के प्रारमको एक 'नेमिसापफाग के नाम से बारह्मामा मिला है। जिसम प्रापाढ से जेठ तक के विरह का वर्णन है । स० १५३५ लिखित इमकी एक प्रति स्व० देसाई को मिली थी, जिमसे नाल कर जन युग' वष ५ पृष्ठ ४७५ में उन्होने इमे प्रकाशित किया था। उनके अनुमार इसा रचयिता 'इगर' कवि हैं भौर पद्य मस्या २६ है। हमारे संग्रह में स० १५४६ की लिखित इमी बारहमामा की प्रति है । इगम पद्यो की सरया २२ और रचयिता का नाम या ह दिया है । इसके तीन प्रारभिक पद्य नीचे उदधृत किए जाते है प्रहे तोरण बालभ प्रविण यादव कुल करवबंद । प्रहे पशुव दसि रथ वालिउ दह दसि हविछ द ॥१॥ प्रहे निसी मधारि एकली मधुरे वासर मोर । विरह सतावयि पापियो दाना हिई फठोर ॥२॥ प्रहे परि प्राषाढ उनपु गौरि नयणे नेह । गोट गाजियुन पापिर छानो वरसि न मैह ॥३। । बारहमासा काय एक तर में लोक काय है। जनता मे इसका पूर्व प्रचार रहा । जनेतर कवियों ने भी अनेक वारहमास बनाए पर उनम जन विद्वाना की तरह लिखने और सरमण को परिपाटी न रहने के कारण उनकी रचनाएं बहुत कम सुरक्षित रह सकी। प्राचीन बारहमास तो जनेतर कवियो के मिलन ही नहीं है । जैनेतर कवियों के राजस्थानी गुजराती और हिदी तीनों भाषामो साहित्य की मुझे जो कुछ जानकारी है उमके प्राधार पर मरा विचार है मि १६ वी तात्री के उत्तरा से ही वारहमासे मिलते हैं । जहा तक हिती साहित्य का प्रश्न है सभवत जायसी के पहिले किसी के बारहमासों का वपन प्राप्त नहीं है। इसी प्रकार राजस्थानी जनेतर साहित्य में भी यथास्मरण 'माधवानल कामकदला' काव्य मे सवप्रथम बारह महीनों का विरहवरान मिलता है । ये गेनों अप १६ वों के उत्तराद वे हैं । स्वत र बारहमासों की उपधि (जनतर कवियों के रचित) १७ वीं गता मे ही होती है । इन मब बारहमासों का प्रधान विषय नायिका द्वारा अपने पति के वियोग मे बारह महीनों म जो विरह दुख का अनुभव होता है उसी का व्यक्तिकरण है । कुछ काव्य (सतो प्रादि वे) इसके प्रपदात में भी रखे जा सकते हैं।
३५ मतो के रचित बारहमासो के मवध में सत माहित्य के अध्ययनशील विद्वान परशुराम चतुर्वेदी ने अपने सन काय नामक ग्रघ की भूमिका में महत्वपूर्ण विवरण दिए हैं । जसा मैंने ऊपर कहा है सोलहवी के उत्तराद्ध हिंदी में बारहमासो का वरणन मिलने लगता है और स्वत व स्प से बारमासा का य १५ वी से मिलते हैं। हिन्दी के प्राप्त बारहमामो म स करीब २० अनात बारहमासो का विवरण मैंने अपने राजस्थान में हस्त लिग्वित नया की खोज क चतुथ भाग मे दिया है जो प्रकाशित हो चुका है । इनमे कुछ जन कवियों के हैं, कुछ जनतर हिंदू और कुछ मुमलमान कवियो के भी हैं । नात हि दी बारहमासो म गग कवि वा बाररमासा स्वत व हि दो बारहमामो म सबमे प्राचीन है। गग कवि साम्राट अकबर का मा य कवि था । इसका यह बारहमासा अनूप सस्कृत पुस्तकालय की कथी लिपी में कुतुबन को मृगावती की प्रति के अन्त में लिखा मिला है। इसके पश्चात केशवदास सुदर, प, विहारी, वृ द मान प्रादि अनेक कवियो के बारह- मासे मिलते हैं, पर वे २५ ३० पद्या मे बडे नहीं है जबकि मुमलमान कवियो मे बुल्लासाह, हामद हाजी महम्मद पुरमही, अहमद खरासाह मिनमत प्रादि के बार मासो में कुछ १२२ पन्नों तक के बड़े बारहमासे भी मिले हैं । जन कवियों के हि दी म रचित बारहमासों में १८ वी शताली के मुकवि विनयचन्द्र का नेमिनाथ बारहमासा बहुत ही सु दर है इसे करीब २० वप पूव हमने श्वेताम्बर जन पत्र मे प्रकाशित किया था। इसमें भाषा का प्रवाह और प्राकृतिक दृश्यो का बगगन बहुत ही सजीव बन पाया है। जिन लक्ष्मीवद्धन केशवदाम पाटि जन कवि भी १७ वी गनी के हैं जिनके बारहमासे मिले हैं । जन कवियो में श्वेताम्बर कविया की रचनाएँ राजस्थानी या गुजराती में अधिक हैं इमलिय श्वेताम्बर कवियों के हि दो बारहमासे वम मिते हैं । दिगम्बर कवियों ने हि भाषा को अधिक अपनाया है क्योंकि उस सप्रदाय का प्रकार केद्र हिदी भाषा भाषी क्षेत्र में अधिक रहा है जब कि श्वेताम्बर मप्रदाय का प्रचार राजस्थान और गुजरात में अधिक है । दिगम्बर कवियों के हिदी बारहमामो म से कुछ जिनवाणी सग्रह आदि में प्रकाशित हो चुके है पर अभी उनका प्रयल पूर्वक मग्रह किया जाना प्रावश्यक है जिससे उनकी सरया प्रादि का ठी पता लग सके।
इही हीरानद सरि का मेमिनाय बारहमासा मिलता है । १५ वी के अत या १६ वीं के प्रारम का एक नेमिनायफाग के नाम से बारहमामा मिना है। जिसमें आपात से जेठ त के विरह का वर्णन है । स० १५३५ लिखित इमवी एक प्रति स्व० देसाई को मिती घी, जिमस नकल करक जन युग' वर्ष ५ पृष्ठ ४७५ में उन्होने इसे प्रकाशित किया था । उमो अनुमार इसा रचयिता 'इगर' कवि हैं और पद्य सख्या २६ है । हमारे स ग्रह में स० १५४६ को लिखिन इसी बारहमामा की प्रति है। इसम पद्यो की सरया २२ और रचयिता का नाम का ह दिया है । इसके तीन प्रारभिक पद्य नीचे उद्धृत किए जाते है आहे तोरण थालभ अबिरण यादव कुल करवचद । प्रहे पशुव दखि रय वालि दह दसि हुबह विछ द ॥१॥ अहे निसी प्रघारि एकली मधुरे घासर मोर । विरह सतावपि पापियो, बातम हिई कठोर ॥२॥ अहे धरि प्राधाद उनयु गौरि नयरणे नह । गौद गाजियुन पापित छानो वरसि न मह ॥३। बारहमासा काव्य एक तरह रा लोक काय है। जनता म इमका सृब प्रचार रहा । जनेतर वियो ने भी अनेक बारहमासे यनाए पर उनम जन विद्वानों की तरह लिखने और सरक्षण को परिपाटी न रहने के कारण उनको रचनाएँ बहुत कम मुरक्षित रह सकी। प्राचीन बारहमासे तो जनेतर कवियो के मिलते ही नहीं हैं । जनेतर कवियों के राजस्थानी गुजराती और हिदी तीनों भाषामो क साहित्य की मुझे जो कुछ जानकारी है समक आधार पर मेरा विचार है कि १६ वी शतादी के उत्तराम से ही बारहमासे मिलते है । जहा तक हि दी साहित्य का प्रश्न है सभवत जायसी के पहिले किसी ने बारहमासों का वणन प्राप्त नहीं है। इसी प्रकार राजस्थानी जनेतर साहित्य में भी यथास्मरण 'माधवानल कामादला' का य म भवप्रथम बारह महीनों का विरहवणन मिलता है । ये दोनों प्रय १६ वीं के उतराद्ध के हैं । स्वतत्र बारहमासों की उपलधि (जनतर कवियो वे रचित) १७ वी शतानी मे ही होती है । इन मब बारहमासों का प्रधान विषय नायिका द्वारा अपने पति के वियोग म बारह महीनो म जो विरह दुख का अनुभव होता है उसी का व्यक्तिकरण है । कुछ काव्य (सती प्राति के) इमके अपवाद म भी मे जा सकते हैं ।
सतों के रचित वारहमासो के सवध में सत माहित्य के अध्ययनशील विद्वान परशुराम चतुर्वेदी ने अपने सन का य नामक ग्रथ की भूमिका में महत्वपूर्ण विवरण दिए हैं । जसा मैंने ऊपर कहा है सोलहवी के उत्तराद्ध से हिदी मे बारहमासो का वणन मिलने लगता है और स्वतत्र रूप में बारमासा का य १७ वी से मिलते हैं । हिन्दी के प्राप्त बारहमामो म स करीब २० अनात बारहमासों का विवरण मैंन अपने राजस्थान में हस्त लिखित प्रया की खोज के चतुथ भाग मे दिया है जो प्रकाशित हो चुका है । इनमें कुछ जन कवियो के हैं, कुछ जनेतर हि दू और कुछ मुसलमान कवियो के भी हैं । ज्ञात हि नी बारहमासो म गग कवि का बारहमासा स्वत व हि दो बारहमासो म सबमे प्राचीन है । गग कवि साम्राट अकबर का मा य कवि था। इसका यह बारहमासा अनूप सस्कृत पुस्तकालय की क्थी लिपी में कुतुबन की मृगावती की प्रति के अत म लिखा मिला है। इसके पश्चात केशवदास सुदर, रूप, बिहारी, वृ द मान प्रादि अनेक कवियो के बारह- मासे मिलते हैं, पर वे २५ ३० पद्या मे बड़े नहीं है जबकि मुमलमान कवियों में वुल्लासाह, हामद काजी महम्मद, पुरमही, अहमद खरामाह मिनमत प्रादि के बार, मासो में कुछ १२२ पयो तक के बड़े बारहमासे भी मिले हैं । जन कवियों के हिन्दी म रचित बारहमासों मे १८ वी शताब्दी के मुकवि विनयचन्द्र का नेमिनाथ बारहमामा बहुत ही मु दर है इसे करीब २० वष पूर्व हमने श्वेताम्बर जन पत्र में प्रकाशित किया था। इसमें भाषा का प्रवाह और प्राकृतिक दृश्यो का वणन बहुत ही सजीव बन पाया है। जिनहष लक्ष्मीवद्धन केशयदाम प्राटि जन कवि भी १७ वी शती के हैं जिनके बारहमासे मिले हैं । जन कवियों में श्वेताम्बर कवियो की रचनाएँ राजस्थानी या गुजराती में अधिक हैं इमलिय श्वेताम्बर कवियो के हिन्दी बारहमारो वम मिने है । दिगम्बर कविगो ने हि भाषा को अधिक अपनाया है क्योकि उस सप्रदाय का प्रचार कद्र हिदी भाषा भाषी क्षेत्र में अधिक रहा है, जब कि श्वेताम्बर मप्रदाय का प्रचार राजस्थान और गुजरात में अधिक है । दिगम्बर कविया के हि दो बारहमासा में से कुछ जिनवाणी संग्रह प्रादि में प्रकगित हो चुके है पर अभी उनका प्रयत्न पूर्वक सग्रह किया जाना प्रावश्यक है जिमसे उनकी संख्या प्रादि का ठी पता लग सके।
फागु संज्ञक काव्य " प्राचाय हेमच द्र की दशीनाममाला में वसतोमव के लिय फग्गु' पार का प्रयोग पाया जाता है जो बोलचाल की भाषा में फागु या फाग के नाम से प्रसिद्ध है। वसतोत्सव सम्बधो ऋतु के अभिनव उल्लास को प्रकट करने वाले विशिष्ट वणनात्मक, T: सौष्ठव अथ-गामीय यमक और अनुप्रास प्रादि अलकारों से सुशोभित विशिष्ट गेय रचनाओं की म ना 'फागु' या फाग' दी हुई मिलती है । वस त ऋतु का प्रधान उत्सव फाल्गुन महीने मे होता है । उस समय नर नारी मिलकर परस्पर म एक दूमरे पर अबीर गुलाल प्रादि डानते हैं और जन की पिचकारियो मे क्रीडा करते हैं, उसे फाग घेलना कहते हैं । वस त नतु के उल्लास का जिसमें कुछ वणन हो या उन दिनों में जो रचना गाई जाती हो उन रचनाओं को स ना फागु दी गई है। इसकी परम्परा तो काफी प्राचीन है पर स्वतत्र कायों के रूप मे अभी १४ वीं पतारी के पूर्व की कोई रचना मही मिली । अद्यावधि उपल ध रचनानो मे सबसे प्राचीन जिनचदसूरि फागु है इसकी एकमात्र प्रति जमलमेर भण्डार से उपरध हुई है पर उसका म य माग त्रुटित था। यह रचना २५ पद्या की है पर छठे से २० पद्य के प्रग वाला पत्र नहीं मिला। जिन प्रबोधसूरि के पट्टधर जिनचद्रसूरि खरतगच्छ के प्राचार्य थे। उनका समय म० १३४१ से से १३७६ तक का है । अत यह रचना इसी बीच की है। इसम प्राचाय श्री का वएन विशेष नहीं है । वस त वणन ही प्रधान है । प्ररे वय तपियउ पेग्विवि न सहा रतिपति नाहु । अरे बोलावइ धमतु जसम्वह रितुह राउ । प्ररे प्रागए तुह बलि जीतनो गोरड करउ बालमु । अरे इसइ वचनु निसुरणेविणु, प्राण्यउ रलिय वसतु ॥२॥ अरे पाडल वालउ वेउल, सवत्री जाइ मुचकु दु। परे क्टु करणी राय चपक विहसिय विडि विदु ॥
प्ररे कमलहि कुमुदिहि सोहिया, मानस जवलि सलाय । प्ररे सोयल फोमला सुरहिया वाइ दक्षिणा वाय ॥३॥ रे पुरि पुरि प्रावुला मरिया कोइल हरखिय देह । अरे तहि हुए दुहक्ए बोलए प्रयण हवेरिय सेह ।। अरे इसइ वसतिहि हूय ए माघुसरे तियमात्र । अरे अचेतन मे पाविया, ति हु तरणी जुगलिय बात्रा यह गय रचना है, इसका उल्लेख अन्त वे पद्य इस प्रकार किया है- बीजिन चद सूरि पागिहि, गायहि जे प्रति भावि । ते बाउल पर पुरसला, विलसहि सिव सुह साधि ॥२५॥ इसकी परवर्ती रचना पूलिभद्र फागु है। जिसके रचयिता खरतर गच्चीय जिनपन सूरि हैं । जिनका समय स . १३८६ स १४०० तब वा है। इसके प्रारम्भ में स्यूलिभद्र मुनि का वणन फागुद्ध में किये जान का उल्लेख होने से इन रचनाप्नों स विशिष्ट प्रकार की सूचना मिलती है । राम "फागुबद्ध" बिगी छत और रचना के विशेष प्रकार के 'लये रूढ प्रतीत होता है । इसम ऐमी रचनाओं को प्राचीन परम्परा का प्राभास मिलना है। अर्थात इस समय तक इस छद या रात्री को अनक रचनाए बन चुकी थीं। कवि ने उनका अनुसरण किया है । इसमे वसत का वएन न होकर वर्षा का वणन बड़ा ही सु दर है । जिसका उद्धरण मैं अपने 'राजस्थानी साहित्य मे वर्षा वणन लेख मे द धुका है। स्थूलभद्र जनाचाय थे। मुनि दीक्षा लने के पूर्व कोगा वश्या व हा वै १२ वप रह चुरे थे । चतुर्मास करने के लिए वे गुरुजी स पाना लेकर को क भवन में प्राते हैं और उमको विशाला म ठहरते हैं । इसो ममय मप बरसना गुरू होता है। इस प्रस ग से कवि ने वर्षा का वणन करके फिर को 7 गार करने का विस्तृत वणन किया है। यह रचना गेय होन के साथ साथ नृत्य के सार मेली जाती थी। इसका वणन कवि ने मत ने पद्य म कर दिया है- खरतरगच्छो जिनपदमसूरि, झिप फागु रमेव । खेला नावइ चप्रमासि रहि गावेपर ।। इसी समय को प्राय रचना मनधारी गच्छीय राजापर मूरि रचित मिनाय फागु है । यह भी २७ पद्यो की है । और फागुबघि ' शली म रचे जाने का उल्लेख है। इसमे २२ वें तीथकर नमिनाय न वस त ऋतु पाने पर कृष्ण की रानियो के साथ जल कीडा आदि की उसका वरान है। प्रत में पागुरमिज्जर न स पाया जाता है। यह रचना भी नृत्य के साथ गाई जाती थी। उपयुक्त तीनो रचनाए १४ वी शताटी की हैं । काव्य का दृष्टि से भी बहुत सु दर हैं। अब १४ वी शता दी की रचनाओ पर प्रकाश डाला जाता है। इन रचनामा की एक विशिष्टता विशेषरूप स उल्लेख योग्य है कि इनमें शबालकार के साथ यमर व अनुभास की छटा रखते ही बनतो है- प्रराहिलवाडउ पाटण पाटण नपर जे दाउ, दीसह जिहा श्रीजिरणहर , मणहर सपर दाउ (जऐ म० काव्यसचय देवानसरिफाग पृ १५१) प्रहे पचचरम लगई लालीन पाली पति सुकुमार, तातइ उच्छव बहु की कोउ सुत नेसाल ॥४॥ (उपयुक्त हेमविमलसरि फाग १८७) पहिलू सरसति प्ररची रचीसू वसत विलास वीण घरइ करि दाहिण वाहप हसलु जास ॥१। पहतोय तिहणी हिव रति वरति पहुती धसत, वहदिसि परसइ परिमल, निरमल थ्या नभ प्रत ॥२॥ (प्रा० गू. काव्य 'वसत विलास पृ. १५ चारित मोह मतगज, गजपति जग जसु जस विभुवन पलिय, विमलोय यादव घस । (प्रात्मानद जम मतान्दी स्मारक प्रक नेमीश्वरचरित फागवध पृ०४७) माविय मास वसतक सत करइ उत्साह, मलयानिल वहि वायउ प्रायउ काम गिदाह ॥१७॥ ( फागुशव्या नपि) समरवि त्रिभुवन सामणि कामरिण सिरिसिणगारु , कवियरण वयरिगजा बरसइ सरसइ अमिउ अपार ॥१॥ (जीरापल्ली पावश नाथ फागु पृ. ६७) प्रवतस यह गनी पागु मम्ब पी सभी रचनामा में नही अपनाई गई है। इस शती को प्राथमिक चलभद्र फागु म भी यह नहीं है मौर पिछली गतो की अय फागण म भी सवत्र इम शनो को नहीं अपनाया गया। १५ वी शताब्दी की पागु सनक करीव १० रचनारा मिलती हैं। जो काव्य का दृष्टि से बहुत ही महत्त्वपूण हैं । इमी गतानी म अनुग्राम का प्रधानता प्रविष्ट हुई और मारणक्य मुन्दर मूरि वा ६ पद्यों जितना वहा वाच्य भी बना । १६ वी शताब्दी के प्रारम्भ में रत्नमण्डल गरिण न तो रगसागर नवरसनेमि फाग' तीन घण्टों में ११५ पद्यों का बनाया । उपल ध पागु बाध्यों में यह सबस वही और विशिष्ट रचना है । इसम सस्कृत श्लोक भी प्रचुरता म दिये हैं। "वमत विनास धान्य ता गुजरात बहुत प्रसिद्ध है। वह भी म०१५ ० के लगभग की रचना है। १६ वी ताब्दी मे १५ पाग काव्य बन और १७ वी में भी लगभग इतन हो। १८ घी के प्रारम्भ में रचित राजहप का नेमिनायफाग फागुमरक का पो म अतिम रचना । वसे लघु रचना के रूप में महागंद रचित सजय पाग और नमिफाग स० १८०५ के लगभग की है। पर ये एक तरह स होली गीत हो ममभिए । चमतोम मामु काम्यों की रचना के बाद 'घमार' काव्यों का भी निर्माण होन लगा। दिगवर सम्प्रदाय में अपभ्रम ढमाल पाई जाती है जिसका समय १६ वी नाका होगा। पर वतावर समाज म धमान मन रचनाए १७ वी ने शाम से ही अधिक मरती हैं। १८ वी ताल्ली में इनका भी प्रतिमाल प्रा जाता है और दमी तादी स होरी सनक घाटे छोट गीत विशेष ए से रचे जान । इस समय मे हिंदी भाषा का प्रकार सताबर जन कवियो में कुछ अधिक प म हासनगा। दस गय पद तो १७ वी दासानी से अधिकतर हिन्दी मे ही रचे मिलते हैं। होरी मनक गेय पों को भाषा हिंदी प्रधान है। फागु पोर घमाल को छद रागिनी एव गली में म तर होगा, पर १७ वी पाताल में जब धमाल मनक रचनामों का प्राचुय हुप्रा तो दोनों नाम एक ही रचना के लिये प्रयुक्त विय जाने लगे । जैम- मालटेद के म्यूलभद्र पाल को ही स्थूलभद्र फाग भी लिखा है। 'पा' काय मूल रूप से गैय एव हाय बाध्य थे। पर १५ १६ वी शताब्दी में जब पति पद्या वाल वह वाय विशिष्ट शनी में लिखे जाने लगे वा जनसाधारण से चे पुष दूर पहन नगे । गय स्प तो रहा होगा, पर उस साथ नृत्य का सम्बध था वह इस समय कम हा गया लगता है । घमान काय दाट और बहे दोनों प्रकार के मिलने हैं । छोटे में और बह म १०७ तक पद्य वाल मिल हैं। हारी सन पर तो पाच सात पद्यों कहा रचे गय है। जन कवियो को समय-समय पर परिवतन करना पड़ा इसका प्रधान कारण उनका लारुचि व पथ अपनी रचनामा का मल विटाना है। ज्यों ज्यों लोक रुचि चलती गया व अपना शनीबदरते। फिर भी उनको विषिष्टता सब समय कायम रही। फिर भा व लोक चिक गय वह नही गय । फागु का यों में शृगार रम का परिपाक नजर पाना है पर उन्होंने मीमा का उल्लघन नहीं दिया। और पात्र एस चुने कि तायकर प्राचाय प्रादि महापुरुषों म उन रचनाओं सम्बघ प्रविधिन्न रहे । जन पूणत ब्रह्मचारी होत हैं । अत अधिक शृ गारिम वणन करना उनके माचार विरुद्ध भा है । उ होंन मलीनता को पार जान वाली लोग रुचि को धम, भक्ति एवं भान की पार प्रवाहित दिया। उसक लिए गुलाब विवारी मादि सारे उपकरण चराग्य एवं नान क रूपक बन गय । सरल सजन मलो मिलिहो सेलाए समक्ति स्याल । ज्ञान सुगन गाव गुनोरो, वियाइम सरस खुस्थाल ॥१॥ खेलो सत हसत वसत मरो, ग्रहो मेदा सजना राग सुफाग रमत रव ॥२॥ य रचनाएं साधारण जन जनता के लिए ही बनायी हैं। मुनियों ने तो बना कर उन्हें श्रावको के हाथों में सौंप दी । धावकों न ही उन्हें गाना, वाया अभिनय पिया। उसका रस पव लाभ साधारण जनता ने ही उठाया। प्रत जनमाधारण प्रान दोल्लास प्रक्ट करान म इतरा वहा हाय रहा है । इस दृष्टि म गिष्ट माहित्य होन पर भी इनकी गणना लोक साहित्य म भी की जा सकती है । वह निमाताओं के काम की उननी नहीं। जनता के हृदय में। प्रादालिन करना ही उनका उद्देन्य रहा है। फागु काव्य जन रचन प्रो की सूची १४ वी तात्री (१) जिनचन्द मूरि फागु गा० २५ अभय जन पयालय (२) स्यूलभद्र फागु गा० २७- जिनपद्य मूरि कत्तो प्र. प्राचीन गुरुपान्य ग्रह १५ वी शताब्दी * १ नमिनाय पागु गा० २५~ राजशेखर सूरि स ० १४०५ लगभग प्र० सा० गु० २ स्थूलभद्र फागु-हलराम स. १४०६ + ३ नेमिनाय फागु- गा० १५ ममघर स ० १४३० से पूर्व - अभय जैन ग्रथालय * जम्बुग्वामी फागु- गा० ३ ० १४३० लगभग १० जन० सा०प्र० * 1 जीरावरमा पाश्वनाथ पागु गाथा ३० मेस्नन्न स. १४३२ पाश्वनाथ । ६ नेमिनाथ फागु~~ जयसोम मूरि स० १४०२ से पूर्व ७ नेमिनाथ फागु वद चरित मा ६१ माणक्य सुदर मूरि स ० १४७८३० प्रारमानन्द गतानी स्मारक प्रय ८ स्थूलभद्र फागु-- सोम सुदर सूरि स० १४०१ स० १४६५ १० देवरल सूरि फागु गा• ६५ स ० १४६८ प्र० जन ऐ० ग० स चय ११ कोतिरल मूरि फागु ए. ज० वा० स० *१२ भरतेश्वर चमवर्ती फागु गा० २० स ० १४६७ से पूर्व अभय जन ग्रन्थालय ०१३ पुरषोत्तम पाच पाण्डव फागु गा० २४ स ० १४६७ से पूव अभय जैन म थालर १४ वमत विलास- स्वतत्र प्रय ४१५ नमिनाप फागु प्रथम- कृष्णय जयसिंह मूरि प्राचीन फागु स ग्रह ४१६ नमिनाप फागु द्वितीय १७ नेमिश्वर परित पाग प्राचीन फागु म ग्रह ६ फागु- " " स० १५०२ पूच प्रकाशित १६ वीं शताब्दी १ नेमीनाथ फागु- (सुरगा विधान ) धनदेव गणि * २ नारि निरास फागु- (रगमागर नव रस) रत्नमण्डल स . १५१७ * ३ नेमी फागु- गा० ११५ रत्नमण्डन स. १५१७ के पूर्व प्रकाशित * ४ नमिनाप फागु-पप- स. १८१८ ५ मीनाप फागु- गा० २१ हूगर स० १५३५ से पूर्व ६ मोनाय फागु- गा० २२ काह स ० १५३५ से पूर्व * . मोनाप फागु गा० ५ समरा स० १५४६ से पूर्व ८ मविपन मूरि फाग~ हमधार स० १५५४ *६ अमररत्न मूरि पाग- गा० ६ अभय जन प्रयालय ०१. हेमरलसूरि फाग- गा० १. विनय चूहा प्रभय जन प्रथालय ११ पाश्वनाय फागु-० १५ समयध्वज १५५८ से पूर्व १२ पौधो पावनाय फागु- गा० २५ खेमरान १३ वसत फागु गा० १६ गुण चन्द्र मरि प्रकाशित १४ वसत गार फागु- अम्बालाल माह के पास १५ गुरावली मागु-खमहम प्र० ए० ज० का० म० १६ नेमि जिन फागु- सौमाग्य १७ रावण पा वनाय फागु गा० २१ हप कु जर अभय जन संग्रहालय १८ सुरगानिध नमि फाग- पन व गणित মাগির १६ वसन विनाम फागु ৪াশির ७२० राणपुरमन च नुमुरमादिनाम फाग प्रकाशित ०२१ स्यूलिमद फाग- मनावर ফারি २२ वाहरा काग गा०११ स १५०० लीवही में प्रतिलिपि भमय १७ वागताची मभय जनम प्रहालय १ नमि फागु- गा० ४० जयब त मूरि • २ स्थूलभद्र श्रम विलाय फागु- गा० २६ अयव त सूरि * ३ स्यूलभद्र फागु गा १०७ मालव से १६१२ * ४ नमि फागु- गा ३० कनकमाम स १६३० रणयभोर ५ नेमि फागु-या ४२ जपानवान ६ नेमि फाग-सचिगज ७ नमि फागु-विनरव + नमिफाग बध चरित गा ८२ गजमागर सूरि यि १६४५ स. नेमि राजल फागु मग्मिामा T१६७३ क नगभग १० नेमिफागु~~ गुण चित्रय स १६८१ ११ बभरण वा' मडन-गुण विजय
..२
१२ नेमि फागु- गा १३ कनक कीर्ति
१३ हीर विजय सरि फागु-
१४ वामपूज्य मनोरम फाग-- कल्याण स १६९६ धराद
१५ नेमी फागु गा ३३-जिन समुद्र स १६६७ माचोर
१६ विरह दगातुरी फागु- गा ४० राजववि
१७ नमि वस त फागु--- विद्या भूपण (दि०)
१८ प्रादिश्वर फागु-- नान भूषण (दि.)
०१६ धममूर्ति गुरु फाग-- कमरोवर
०२. मगलकलश पाग-वाचक कनक सोम स १६४६
०२१ जिन हसगुरू नवरग फाग- पागम माणिक्य
१५वी पाताब्दी
१ नेमि फागु-गा २८ राजहप
२ फागुणमास वणन गाहमिदि विलास-म १७६३
३ अध्यात्म पाग-लामीवल्लभ प्रकाशित
१६ वी शताब्दी
१ स जम पागु- महानद म ० १८०५
२ नमि फागु--- मानद
जनत्तर फागुवाय
* १ नारायण फागु- १४६५ के पास पास
५ २ मोहिनी फागु-१६ वीं शतानी
- ३ चुपई फागु- १६ वी शतागे
४ फागुकाध्य- चतुभुज-- १६ वी शतानी
. ५ अनात कवि कृत फागु- १६ वी ताली
* ६ वाहणनू फाग-१६ वी तारी
*७ विरह देसाउरी पाग- १६ वी तादा
.८ भ्रमर गीता फाग-स १६२२
*चिहरित रचनाएं प्राचीर-फागु-सग्रह, महाराजा सयाजीराव विश्वविद्यालय,
बोदरा को पार से प्रकाशित प्रध में प्रकागित हो चुकी है।
धमाल सनक रचनाए १६ वी शताटी (१) ढमाल-दिगम्बर (२) चतन पुद्गल धमाल-बुचा (दि०) अपभ्रश १७ वीं शताब्दी (१) नेमीनाथ धमाल गा० १६-~धमाल (२) भाषाढ भूती धमाल-कनक सोम स १६३८ हमारे स ग्रह में (३) पाद्र कुमार धमाल-कना सोम स १६४४ हमारे स ग्रह मे (४) नेमि धमाल गा० २१---गुण विनय हमारे स ग्रह में (५) नेमीनाथ धमाल मा० ४६-मान तिलक हमारे स ग्रह में (६) नेमी घमाल गा० १७-जिन समुद्र सूरि (७) नेमि धमाल गा० ५-जिन समुद्र सूरि (८) नेमी राजमती धमाल गा० ३३-जिन समुद्र सूरि (९) ऋपम धमाल गा० ५-जिन समुद्र सूरि (१०) ऋपम धमाल गा०५-जिन समुद्र सरि १८वीं शतात्री (१) वस त धमाल-धम वदन हमारे स ग्रह में (२) गुरु धमाल गा० ११-नित्य विजय फर्ता (३) जिन कुशल सरि घमाल गा० ७-मान विजय (४) रत्न जयगणि धमाल हमारे स ग्रह मे (मालत्व की स्थूलिभद्र घमाल फागु में देखें) धमाल को हि दो म धमार लिखा मिलता है । अष्ट छाप के कवि न ददास गोवि ददाम आदि ने वसत एव होलो के पटा की रचना धमार के नाम से ही की है जन रचनामों म होरी रा नक रचनामो का प्रारम्भ जिन समुद्र सूरि के नमी होरी (गा०४) से होता है। १६ गता में होरी म ज्ञा वाले गीत प्रचुरता से रचे गये मोर वी में भी यह क्रम जारी रहा । भीमसी माणक नामक बम्बई के उन पुस्तक प्रकाशक ने होरी सज्ञक पदा का एक अच्छा संग्रह प्रकाशित किया है । वसे स्तवन सग्रह रत्न सागर आदि २०
अपों में भी होरी के गेय पद प्रकाशित हो है।
राजस्थान के जनेतर कविया ने भी धमाल और होरियों बनाई पर वे लिखित
रूप में नही मिली मौखिक रूप से उनका प्रचार परम्परा से चला पा रहा है। लोक
साहित्य के अतगत उनका स्थान माता है।
विवाहलो और मगल काव्य जीवन में पानद और उत्सा के अनेा प्रमग नाते हैं उनमें से विवाह का प्रसग सबसे अधिक उल्लास का प्रमग है । "से बहुत ही मगत रूप माना गया है। विवाह के समय बर और वधु + नवजीवन वा प्रारभ व मिलन का सूत्रपात होने से उनके निये तो यह आनद का महान् अवसर होता ही है पर उनके प्रतिरिक्त उन दोनों के परिवार व मभी व्यक्तियों यावत् जाति ग्राम व नगर में लोगों को भी वह प्रान नायक हाता है । ऐसे प्रसग मे मधवा स्त्रिया घवल मगल के गीन नम होना होड और उत्साह के साथ गाती हैं वह देखत ही बनता है । कइ दिन पहिने मे ही निकाह को तयारिया होनी शुरू होता है और तभी से मगन गीतों का स्वर गुन्जायमान होने लगता है । विवाह क अन तर भी वर वधू सुसगल जाते है तो मानों एक नये परिवार के साय आत्मीयता का सबध जोडते हैं । यहा उन दोनो का वहा स्वागत सत्कार होता है। वर को ससुराल वाले कई दिनो तक अपने यहा रयकर कोड (मान र मनाया) करत हैं। इस प्रकार यह प्रमग वहुत यक्तियो को बहुत दिनों तक मानददायक प्रतीत होता है। प्रतएव कनियो ने भी ऐम प्रमग का जहा कही भी उह अवसर मिना, बडे उल्लास के साप वणन किया है। प्राचीन पारयानर काम चरितनायको क विवाह के प्रमग वी चर्चा मिलती है। उममें तत्कालीन व वाहिक रीतिरिवाजो प्राति के मबध में भी अच्छी जानकारी मिल जाती है। विशेषकर लोग माषा मे पायों में विवाह प्रसग को वणन परन वाले स्वतत्र पाय भी शताधिव मिलेंगे। गुजराती राजस्थानी हिरी आदि प्रातीय भाषानों के ऐसे विवाह वगन प्रधान ' स्वतत्र का यो क सम्बध मे इन पक्तियो के लेखक ने गोध की है । लेखक को यह विषय बहुत ही रसपर लगा । मोर लखामग्रह में ऐसे २५-३० काव्य जन कवियों के रचित सगृहात हैं जो कि १४ वी गतानी से २० वी तानी तक के रचित हैं । इनकी भाषा राजस्थानी व गुजरातो है । प्राय मग्रहालयो के ऐसे जन कवियों क विवाहले कामो की सूची बनाने पर रिल जन कविया के रचित ही करीब 10 काय जानने में १ उदाहरणाय विमल ग्रघ के पूर्व ख- को गा ७८ से १६ देखें। कुछ प्राये हैं । हि दी गुजराती और राजस्थानी के मैनेतर विवाहन का या को मिलाकर इनकी सख्या १०० से भी अधिक है । यह लख के अत म दी गइ मूची में स्पष्ट है । इन सब काव्यो पर विस्तार से प्रकाश डालने पर तो एक स्वतत्र न य हा तय्यार हो मक्ता है। यहा तो हिगे और राजस्थानी के काव्यो पर प्रकाश डाला जा रग है । प्रागा है यह लेख अय विद्वानो को विशेष काय करने की प्रेरणा देगा । विवाह वरणन प्रधान काव्यो को सज्ञा विवाह के प्रसग का वरणन करने वाले काया की प्राचीन सना विवाह विवाहलो विवाहला यह सबसे प्राचीन है । दूसरी सज्ञा • मगल' है । इनम मे जैन कवियों की एव गुजराती जेनेतर कवियों की रचनामों की संज्ञा तो सबमे अधिक विवाहना, विवाहलो ही पाइ जाती है । मगर सनक का य वसे तो वगला में बहुा अधिक मिलते हैं पर वे विवाह वगन न होकर चरिताय हैं । हिदी और राजम्पानी मे जैनेतर कवियो के रचित विवाह वणन प्रधान "मगल" सज्ञक काव्य २० के करीद पाए जाते हैं । इनकी रचना १७वीं शताब्दी से प्रारभ होती है । जन कवियो की निराली सूझ और उनके रूपक विवाह काव्य जैन कवियों के विवाहल काव्य में एक बड़ी विशेषता उल्लेखनीय है कि इन कायो मे बाह्य एव पाम्यातरिक याने इय और भाव दोनों तरह के विवाहो का वरणन मिलता है । वर वधु को पति पत्नी का सम्ब घ जाडने बार विवाह का वर्णन तो सव मामा य है ही पर जन कवियों ने कुछ ऐसे विवाहते का य भी बनाय हैं जिनम वधु का म्यान स्त्री नही पर धार्मिक व्रतों के ग्रहग पो स्त्री का पक देवर भ्रती का विवाह बघ सयमी व्यक्ति से (मयम श्री नीलाकुमाग) में कराया गया है। इसे जन परिभाषा में भाव विवाह को सना दे मरते हैं । जब कि वर वधु के विवाह को द्र यविवाह कहा जाता है । यह प्राभ्या तरिक गुणों से प्रात्मा का सवध स्प विवाह न कवियों को एक अनोखी सझ है जो दूसरे किसी कवि ने भी कम हो अपनायी इम रूपक विवाह की परपरा ही वही हि के मत अधियों की रचनामों में पाई जाती है उदाहरणाय क्वीर का निम्नोक्त पट लीजिय दुलहिनी गावह मगलाचर हम परि माये हो राजा राम भरतार ।।टे। सनरत करि क मनरत फरिह पचता पर तो Xs रामदेव मोर पाहुने माये में जोयन म माती गरीर सरोवर येदी परि हूँ ब्रह्मवे उचार । रामदेव होगे भावरि लहूँ, धनि धनि भाग हमार। सुर सतीश कौतिग माए मुनिवर सहस्त्र प्रत्यासी । कहे क्योर हम नाहि चले हैं परिस एक प्रविनासी । प्रर्यात रामरूप प्रात्मा मरे घर पाहुन पाये हैं प्रत दुलहिन और भरतार के मगलापार मगलगीत गायो। मेरा तन मन उसी को अर्पित है। पचतत्व वराती रूपम माये हैं। राम रेव मेरे पाहुने मा गये हैं । मैं यौवन से मर मस्त हूँ । गरीर सरोवर रूप वेती करगी। ब्रह्मगान की जागृतिरूप वेरोच्चार मसाठ वे माप आत्माराम के हाथ में भावरे लूगी जमे भाग्य ध य हो जायेगा । ३३ कोटि देवता ८८ हजार मुनि साभीरूप होंग। अग्निागी पुरुष मुझे बहा ले चले हैं । गुरु नानक भी कहते हैं- गावह गावह धागो विवेक विचार। हमारे घर माइया जगजीवन भरताह । गुरू दुपार हमारा धोमाह जि होमा जासह मिलिपा तामानिमा तिहु लोका माहि समदु रामिग्रा है प्रायुगा धामन मानिना। विवाहलो काव्य को प्राचीन परम्परा अपभ्र मापा भारतीय अनेक उत्तर प्रा ताय भाषाओं की जननी है। वह कई पाताब्दियों तक स्वय लोक मापा रही है। पर ११वी १२वा शनाने प्रातीय लोक भापामों मे बहुत अधिक परिवतन प्रा जाने से अपभ्रा का स्थान साहित्यिक भाषा के रूप में सीमित हो गया। तेरवीं गतारी से प्रा तीय मापात्रों की स्वतत्र रचनायें मिलने लगती हैं पर वसे १४ वी शनाली तर को रचनामों में अपना का प्रभाव स्पष्ट है। विवाहला T वारहमासादि सना परवर्ती विविध प्रकार के वाव्यों की परम्पग अपभ्रग साहित्य से जुड़ी हुई है। विवाह को की उपलधि १४वीं शतानी मे होती है। उपलब्ध पायों म सब से प्राचीन विवाद वाणन काय प्रागमिर गच्चीय जिन प्रभमूरिका 'मतरग विवाह है । यह छाटा सा प्राध्यात्मिक पक विवाह काय अपभ्रश भाषा में रचा गया है। प्रादि मत के दो पद्य यहा उन्धुत किये जाने हैं- प्रारभ प्रत एमाय गुण मशु पाटण तहि, हे भवि योजिउ निरुपम वसए । घरविह मधु जात उपकीय, महे वाहण सहरा सोला (शा इणि परि परि गए जो अगि, पहे लहइ सो सिद्धि पुरि वासु । मंगलिक वीर जिणप्रभह अहे मलिकु चउघोह सघ ए॥ (प्रतरग विवाह धवल वसत रागेण भरणनीय) इस काव्य के वस त राग मे गाये जाने का निर्देश है । इस की पुटिएका मे विवाह और धवल दोनों सज्ञायें साथ ही दी हैं । विवाह प्रसग म धवल और मगल गीत गाये जात हैं इमलिये विवाहला और धवल दोनो सनामा को एक सहा मानते हुए परवर्ती रचनामा में एक ही काव्य के लिये वही धवल और कही विवाहला सा लिखी मिलती है । परवर्ती रूपा विवालो के निर्माण का प्रेरणास्रोत भी ऐसे ही काव्य रहे हैं। इसको रचना सवत् १३०० के आसपास मे हुई है और इसकी ताडपत्रीय प्रति पाटण के जन भडार म सुरक्षित है । इस प्रतरग विवाह म प्रमाद गुपस्थान को पत्तन याने नगर भविक जीव को निरूपम वर चतुर्विध सजा को जान उन और शोलागो को बाहरण का रूप दिया गया है । अत क कान म मुक्ति से विवाह कराकर सिद्धिपुरि में भविक जीव रूपी घर को पहुंचा दिया गया परवर्ती सहज सु र रचित जम्वू अनरग विवाहला इसी मी परम्परा का काव्य है। इसका परवर्ती म्पक काय स १३३१ म सोममूर्ति रचित जिनेश्वर सूरी नामक सरतर गच्छ के प्राचाय ने जन मुनि की दीक्षा ग्रहण की उसका वणन करत हुए कधि ने नीलाकुमारी या सयमधी को नया का रूपर देकर उसके साप जिनश्वर सरि का विवाह पान मिलाप सम्म ध जोडा है । वस जनमुनि प्राय लघुवय म ही दीमित हो जात है इसलिये उनके द्रव्य विवाह के प्रमग का वणन करने का अवसर का यों को नहीं मिलता क्योकि वे ब्रह्मारी ही रहते हैं । इसनिय पवियों ने भयम श्री को क या वा स्पर देकर भाव विवाह के गणन प्रसग की मृष्टि की है। चालक अवस्था में जिनेश्नरसूरि मटकार के मडारी नमिचद के पुत्र थे । उनका नाम प्रवडकुमार था। वह अपनी माता म जन मुनि को दीना ग्रहण बरन का अपना विचार प्रकर करते हुए कहते हैं- पणिसु सपमसिरि धरनारि भाई, माइए मम्भ भएह पियारी।
अर्थात् मैं यमधी के साथ विवाह परना चाहता हूँ मुझे वही प्यारी है। तन तर उन
को माता उन्हें स याम स्वीकार करन पर होने वाली कठिनाइयों का अनुभव कहती है
पर वे तो अपना निश्चय अटल रखते हुए कहा है--
"किपी न भावए विण सयममिरो" अर्थात् मुझे सयमश्री (दीया) ग्रहण के
अतिरिक्त
मी नही सुहाता ।
परणे विणु विवमिरि विवि भगहि सुरूच मारिणम् । अर्थात मैं दीक्षानी से
विवाह कर विविध प्रकार के सुखो का अनुभव करू गा । प्रत में अब कुमार का वर
बनकर खेनगर मे जिनपाति मरि के पास दीक्षा दिलाई जाती है जिसका वरान कवि ने
बडा ही सु दर किया है यथा-
अभिनव ए चालिय जान उन, प्रबड तणई योवाहि ।
प्रापुरए ए धम्मर चक्कवइ, हुयउ जानह माहि ॥१६॥
प्रावहिं श्रावहि रग भरि पच मह वयराय।
गायहि गायहि मधुर सिरि अट्टय पवयमाय ।।१७।।
अठार सह सहरह वरह जोजिम लहि सोलग ।।
चाहि चालहिं खति मुह वेहि चातुरम ॥१८॥
कारइ कार नमिचन्द्र
भारिउ उच्छाह ।
बापड़ यावइ जान देखि, लवमणि हरपु प्रवाहु ॥१६॥
कुसलिहि माहि जाउन पटुतिय खेड मज्झारि ।
उछ हूयउ प्रइ पवरो नाचहि परफर नारि ॥२०॥
जिसवइ सरिए मुणि प्रवरी देसए मिय रसेण ।
कारिये जोमवार तरि जानह हरिस भरेरा ॥२१॥
सति जणेसर घर भुणि माडिये नदि सुवेहि ।
वर सहि भविया दारण जलि, जिन गयणगरिण मेह ॥२२॥
नहि अपिया रिव मिलजए झारणा नल पजलति ।
तर मगिरि निभियउ, हयलेवर सुमुहत्तिा२३||
इणि परि प्रबडु वर कुमरो परिणा सजम नारि।
वाजइ नगेय तूर धरणा, मूडिय घर घर वारि ॥२४॥
अर्थात- भवडकुमार की अभिनव जान चली, जिसका मुखिया धमरूपी चक्रवर्ती था, पर महावत पा राजा बहे हप थे। में उसम सम्मलित मष्टप्रवचन माता स्पी सघवा स्त्रियों ने मधुर स्वर में गीत गाय । १८००० गीताप रूपी रप जोत गये । गात रूपी तेज घोडे रया म जाडे गय जो वह वग से चल । नमिचद्र भण्डारी और उनकी पली लमणी को इम जान को देख क बडा हर्प हुआ । कुल म माथ जान सेह नगर में पहुँची। वहाँ बहुत यहा उत्सव हुमा स्त्रियाँ फरफर नृत्य कर रही थी। जिनपत्ति मूरि जो के उप दश रूपी अमृत भोजन ये जान का जीमणवार दिया गया । नातिनाथ + जिनालय में दीमा विवाह को वेदिक्षा बनाई गई। पूरान लिया गया । ध्यान म्पो यग्नि प्रज्वलित की गई। गुम मुहुन ग स ग स्पो हयलवा जाग गया इस प्रकार प्रवडकुमार न म यम रूपी नारि के माप विवाह किया । खूब वाजिन बज व ध्वजा पताका फहराई । जनाचार्यों के दीमाप्रमग के वनात्मक पाठ विधात काय मिले हैं। उन सबमें इमी प्रकार सयम को क्या का रूपक कर उमम विवाह सम्पान कराया गया है। उपयुक्त विवाहने ये अन तर महमु दर न जिना य मरि विवाहमा माया जो एक सुदर काय है । इसम विवाह करान वाल जोगी का म्यान गुरुश्री को दिया गया है। ये दोनों काय जन एतिहासिक गुजर काप म प और हमार सम्पादित 'तिहासिक जन काव्य म ग्रह में प्रकाशित हो चुके हैं । इन नेनों का मध्यवर्ती एमा ही एक छोटा मा विवाहला मुनि महजगान रचित युगप्रवर जिनघर मूरि वाहना है ! जिम मैंने जन मत्य प्रका के वष १७ प्रब १२ में प्रकाशित किया है। ऐम प्रय काओं म उत्पन दिम रि विवाहला कानिरलमारि, गुणरत्नमरि मुमनिसाघुमरि पौर हेम विवाहिने हैं। ये सभी जनावार्यो , सम्र में हैं और इनका रचना समय १४ वी से १६ वी गनाती है। इनमे म उदया िदनसरि विवाहले स तत्कालीन बवाहिक रीति रिवार पति को अच्छी जानकारी मिलती है । उन्यन समरिया पाल्यावस्था का नाम राउन पा । उर विवाह करने का वहन पर हैं- दिमन सरि सयमसिरि स्वय परि बहिया बीशी सवि या परिश्थेि । अनि-अम यानो को छोह में म यमयी मे ही विवाद बईगा। फिर ५२ जोगी को बुलाया जाता है वह विवाह का लग्न मुहत देखता है । पिता के घर में उत्सव मनाना प्रारभ होता है । चारों भोर कुकुम पत्रिकाए भेजी जाती हैं । परिवार के लोग इकटठे होते हैं। धवल मगल और बघावणे गाने प्रारम होत हैं । म प रचा जाता है। बाजे बजते हैं । बटीजन विस्तावली वोलत हैं । लग्न माने पर वर को पाट पर बठाकर स्नान कराया जाता है । क्षीरोदक पहनाया जाता है, स्त्रिमें कटोरी मे च दन भर कर उबटन करती हैं । बहिन पाखों को प्रजिता, वर को मुकुट प्राति अल कार पहनाये जाते हैं । बहिन भागोप देती है । वर घोडे पर सवार होता है बहुत मे लोग उसके साप में चलते हैं । वेश्यायें नृत्य करती हैं वर के मस्तक पर छत्र प्रोर दोनो ओर चंवर हुलाये बाते है । पोषध गाला में पहुंचने पर लग्न का समय आते ही गुरू भी उन्हें प्रोधा मुहपत्रि मादि साधु का वेग देते हैं और स यमश्री के साथ विवाह जाता है । जन दीक्षाग्रहण से पूय प्राज भी स यम लेने वाले स्त्री पुरुष को तयार किया जाता है मानो वह विवाहने ही चला है। रूपक विवाहले काव्यो के अतिरिक्त जन कवियों ने तीर्थंकरों व पुराने जन महापुरुषा आदि के भी विवाहल काय नाये है जसे- आदिनाथ अजितनाय पति नाथ, सुपाश्वनाथ चद्रप्रभ नेमिनाय, पाश्वनाथ व महावीर इन तीधरो के परीब ३० विवाहले पाय मिले हैं जिनमें सबसे अधिक नेमिनाथ के विवाहले हैं। प्रयजन महापुरुषों मे अद्रिकुमार मगल कला गालिभद्र झवयवाव जम्बुकुमार के विवाहले उल्लेखनीय हैं । ये सभी १५ वो से २० वी शतानी के पूर्वाद्ध तब मे रचे गये हैं । सवत् १४१२ मे प्रारम्भ होकर स० १९२६ तक इनका रचनाकाल है इनमें सबसे अधिक विवाहले १७ वी शताब्दी में रचे गये हैं। 'धवल नामा तवाली पांच बडी व छोटी २ अनेक रचनायें ज्ञात हुई हैं। जिनमें दो जिनपति सूरि धवल गीत १३ वी शतारी के मत को हैं अवशेष १५ वी व १७ वीं के है । जनेतर वष्णव समाज म घवल घोल का प्रचार हिंदी में है । गुजरात से ही इसको अपनाया गया है । मगल' का यो का प्रारभ वगाल मे १६ वी से शुरू हो के १६ वी तक बहुत अधिक रहा । हिदी म मगल कार्यों का प्रारम्भ १७ वी शतानी में हाता है। नरहरि मोर न दाम के रुकमणी मगल हिनी के सव प्रथम मगलकाव्य है- फिर तुलसीदास के पावनीम गल ( स० १६४३ मे ) मोर जानकोमंगल रचे गये । १८ वी १६ वी मे यह वास्तव में - परम्परा ठीक से चालू रही, जो २० बी तक भी चली पाई है। प्रतिम मगलकान्य 'भवानी मगल स० १९६४ म रचित प्राप्त हमा है। भाषा में प्रसिद्ध काव्य 'कृष्ण रूकमणा वलि के प्रात के पाम स्मरण मगल शब्द मी आता है पर वलियो छदम रच जाने क कारण यह वेलि सज्ञा स हो प्रसिद्ध हुमा । इसा समय ये लोक कवि पद्मा तली का स्वमरणा विवाहलो काव्य मिलता है जिसकी सबस प्राचीन प्रति स १६६६ को लिखित हमार स ग्रह म है, मूलत यह काव्य २५०,३०० श्लोकों के प्रमाण का या पर लोकप्रिय होन स १६ वी पाताब्दा म इसमे स्थान स्थान पर बहुत से नय पच जास्कर सम्मिलित कर दिये और तभी इसकी सज्ञा मगल रखी गई। इसका प्रतिम रूप स ० १६१६ म मूडवे * शिवकरण रामरतन दरसन सम्पादित किया। उहान ११ प्रतिया को एकत्र कर उनक पाठ मे मपनी भोर स कुछ बढाकर इसे तय्यार किया यह स्वयसिद्ध है, प्रत मूल काव्य से बढते २ इसका परिमारण करीब १० गुना हो गया है । राजस्थान की जनता में इसका बहुत प्रचार रहा है। गावों में व नगर की साधारण जनता आज भी इस बडी भक्ति भाव स सुनाती हैं। भोजन मोर गृहकाय स निवृत्त होकर नरनारी इस बड़े चाव स सुनत हैं व इसकी समाधि पर भेंट पूजा चढाई जाती है, गायको को भोजनादि स सारसत्य किया जाता है। हिन्दी म विवाह वणन काव्यो की सज्ञा विवाह के साथ मिगल' भी पायी जाती है। सर्वप्रथम इस सज्ञा का प्रयोग हम पृथ्वीराज रासो म "विनय मगल" प्रस्ताव खण्ड मे पात हैं । रासो के लघुतम सस्करण म तो यह खण्ड नहीं है, पर अन्य सस्करणों मे है । वृहद् स स्करण के ४६ वे समय के रूप में यह प्रकाशित भी हो चुका है। इसमें स योगिता के जम व यौवन का घणन है । स योगिता मदन-वृद्ध ब्राह्मणी के पर पर जाती थी और उसे वह 'विनय मगल" पढाती हो। इसमें पति का गौरव, स्त्रियों की पति के प्रति प्रनय प्रम भावना और विनय की प्रासा वरिणत है। पृथ्वीराज रासो के इस प्रश को यदि प्राचीन माना जाय तो हिदी मे मगल सपर यह गवस पहली रचना वही जा सकती है। मायथा हरिहरनिवास द्विवदी के क्थनानुसार ग्वालियर के कवि विष्णुदास रचित रूकमणि मगल सबसे पहला हिदी का स्वतत्र 'मगल' काव्य है। श्री हरिहनिवास द्विवेदी ने विष्णुदास को दूगरदसिंह तामर क समकालीन बतलात हुए, इसका रचना काल स. १४६२ क लगमग माना है। उहोने जा उद्धरण दिय हैं वे राग गौरी, रागनी पूर्वी मादि गय पदो के रूप में है। इसको एक नई सो प्रति 1 सरस्वती भडार उदयपुर मे है । अनूप सस्कृत लायनेरी बीकानेर म कृष्णदास रचित वृष्ण रूकमणी रो विवाहला सदा कुवर (१) रचित सीताराम जी को स्वयंवर, रूपन्वी रचित रूक्मणी मगल, नारायण रचित ब्याहखेल, गुलराय रचित विवाहमगल और जगनद रचित 'विवाहला प्रथवा गोक्लग चरित्र की प्रतिया प्राप्त है । इनम स गोकलग विवाह का विवरण मेरे राजस्थान में हस्तलिखित हि दी ग्र पो यी खोज भाग ४ में दिया गया है। यह ऐतिहासिक काव्य है जिसम वल्लभ सम्प्रदाय क प्राचाय गाल जी के विवाह का विस्तृत वणन है। कच्छ के ब्रजभाषा प्रमो महाराव लखपत रचित शिव विवाह की प्रति राजस्थान पुरातत्व मदिर जयपुर के 'सग्रह में मुझे पास हुई की। इको पद्य मन्या ३७१ है और रचना स० १८०५ थावरण सुदी ५ को है । इस रचना का परिचय में जीवन साहित्य में द घुका हू । कच्छ में रचित दूसरा विवाह वणन जन कवि लक्ष्मीकुशल का रचित पृथ्वीराज विवाह भी उक्त जयपुर सग्रह स मिला है। इसम कच्छ के राजकुमार पृथ्वीराज का विवाह प्रसग ५२ पद्यो म वणित है । स०१८५१ क बसाव बदी १० को इसकी रचना हुई। सुप्रसिद्ध निरजनो सम्प्रदाय के प्रवतक हरिदास रचित ' ब्याहलो" हरिपुरुप जी को वाणी में छप चुका है । प्राय सत काव्यों के रूप विवाह' वणन भी प्राप्त है। इनमें स एक का उद्धरण श्री परशुराम चतुर्वेदी क सत का य न थ के पृष्ठ ६१ ६२ में दखा था। इनक स त परम्परा के पृष्ठ ५४७ म स त जग जीवन सा० शिष्य देवीदास रचित "विनोद मगल' और भक्ति मगल का उल्लख है । वसे कुछ प्राय ऐसे भी है जिनका नामात पद विवाह या मगल नहीं है पर हैं घे विवाह वणन काय ही, जसे कुजलास रचित उषा चरित्र मे उपा भनिरूद्ध के विवाह का ही वणन है । स ० १८३१ कातिक सुदी २ से ( ३ दिन में ) यह रचा गया है। खोज करने पर ऐसे विवाह वणन काव्य अनेक मिलेंगे। नामात पद चाहे चरित कथादि रखा गया हो पर वास्तव में वे लक्षण की दृष्टि से मगल का य ही हैं। हस्तनिखित हिंदी पुस्तको का स क्षिप्त विवरण भाग १ के पृष्ठ १४७ में- , नवलसिंह (प्रधान ) कृत रूपमणी मगल स . १९२५ २ हीरालाल के कमणी मगल स०१८३६ ३ रामकृष्ण चौवे प्रथम और द्वितीय के दो रूकमणी मगल ४ ठाकुरदास रचित रूकमणी मगल स. १९३७ का विवरण सन् १९११ तक की रिपोर्टो म होने को वात लिखी है। इसके बाद महिरचद, रामलाल के रूर्माण मगल का विवरण छपा है। इसके पश्चात गत ४ वर्षों में और भी अनेक मगल काव्यो का विवरण खोज रिपोटर्यो म लिया गया होगा। माय फुटकर उल्लेवो म नागरीदाग वा "स्वामी हरिदास मगल" बालकृष्ण का जानकी मगल चतुरदास का 'कृष्ण रूक्मणी विवाह' हितवृदावनदास का 'कृष्णगिरि पूजन मगला नारायणदाम कृत व्याहलो' के उल्लेख मिलता है। हिन्दी भाषा का सबस प्रतिम मगल का य चतुरभुजदास स्वामी रचित 'भवानी मगल' म १९६४ में रचा गया और यह प्रकाशित हो चुका है। एक रूकमणी मगल उस्ताद इदरमन का सन् १९२१ मे प्रकाशित हमारे स ग्रह में है। हि दी मारवाडी मिथित भाषा म बालचद तनाणी रचित "ऊखा अनिरुद्ध न्याहलो ख्याल' एव रूकमणी विवाह या मगल (गरीब पूणानर सिखवाल, मारवाड, हे हा निवासी ) के रचित, मन् १९२० के प्रकाशित हमारे स ग्रह म हैं । मगर काव्यों को सर्वाधिक्ता और लबी परपरा वगाली भाषा में मिलती है। श्री हराकुमार तिवारी लिखित "वगला और उसका साहित्य' पुस्तक पे अनुसार बगला मापा का सर्वप्रथम मगल-बाप सन् १४८१ क लगभग मालाधरवासु ने ' विजय" लिखा जिसकी प्रतिदि कृष्ण मगल या गाविद मगल नाम से भी है । उन दिनों पाचामी म देवता या उस समान पुरुप के गुण वणनात्मक कायो की समा 'विजय' या ' मही रखी जाती थी। पहल इस भय म इस पद का व्यवहार जमदेव ने किया था। 'मगल सना बाले काव्यो मे- मनमा मगल 'चडो मगल' ही प्रधान है । कवि विजयगुप्त का मनसा मगल सन् १४९५ की रचना है । उनसे पूर्ववर्ती हरिदत्त के मनसा मगल का एक ही पद मिला है । विजयगुप्त की रचना के सालभर बाद ही विश्वास ने 'मनसा मल निषा । मनसा माणे को देवी है और उमदे मगल पाध्यो की सस्या ६. से भा मधिक है । 'शीतला मगल 'मृष्टि मगन' प्रादि अन्य कई प्रत क्यानो से सम्बषित मगल काममिलने हैं। कवि जयानद और लोचनदास का चतय मगल भक्तष्ठ चतय महाप्रभु का जीवनी से सम्बंधित है। परवर्ती मनसा मगलकाव्यों में वशीवादन, पारायण व क्षीमान द क्तकादास प्रादि अनक पविया के काप प्राप्त हैं । घड़ी मगन पर लिखे गये काव्य १६ वी शतानी से मिलते हैं। सबसे प्रसिद्ध कवि करण मुकुदराम चश्वर्ती का वही मगल' है। माधवाचाय का घडी मगल सन् १५८० मलिखा गया 1१० वी १८ वी शताब्दी मे कृष्ण मगत काय भी लिख गये, जिनमें से दुखी श्यामदास का गाविद मगल' द्विज हरिदास का मुकुद मगल' मादि उल्लेखनीय हैं । 'सृष्टि मगल" 'राय मगल' कालिका मगल' 'मनना मगर' मादि कायों के सम्बध मे हसकुमार तिवारी की उक्त पुस्तक द्रष्टव्य है। हिन्दी पोर राजस्थानी के म गल' सशक पाय विवाह वणन रूप है । पर बगला म गल काव्य व्रत कयामो मोर चरित काव्यो के रूप मे हैं- यही इनका बडा मातर है। इस प्रकार राजस्थानी गुजराती, हि दो मोर बगला चार भाषामो के विवाह पौर म गल काव्यो सम्बधी अपनी जानकारी प्रस्तुत लेख मे उपस्थित करने का प्रयत्न मैंने किया है । अभी इस सम्ब घ म स्वतत्र प्रवेपण की बहुत कुछ मावश्यक्ता है । यह प्रयास तो क्वत दिशा सूचक मात्र है। भय प्रातीय भाषामो में भी ऐस काग्यो की परम्परा रही होगी उसकी खोज भी होनी चाहिए । मुझे ज्ञात जन राजस्थानी गुजराती व हिदी ग्वनामो की सूची यहा दी जा रही है । जन कवियो के रचित विवाहलो काव्य सूची अजित विवाहलाउ गा ३२ महनन्दन १५ वी शती महारह नाता विवाहलो होरानदरि १५ वी शती माशिनाप विवाहलो गा २४५ भीबो १६७५ पूब मादिनाथ विवाहलो गा १५ क्षेमराज-जसलमेर भहार १६ वी शती मादिनाय विवाहलो पभ १७ वी गती मादिनाय विवाहलो गा २५ रतनवद्र १६वी पती माद्र कुमार विवाहलउ गा ४६ सेवक १६ वी ती भाद्र कुमार विवाहलउ गा २५ देपाल १६ वी सभव है आद कुमार विवाहन गा २४ प्रज्ञात दोनों एक हो हो उपदिसूरि विवाहलउ गा २७ मनात जप्तविजयजा सग्रह १६ वी शती ऋषभदेव विवाह धवल ऋषभदेव विवाह धवल गा २७६ श्री देव १६ वी शती भतरग विवाह जिन प्रभ सूरि १४ वी प्रारभ सेवक १६वा पाती १५ वीं पाती १५ शती १८ वी शती हरदास पद्म मदिर १६८४ १७ वी क्यवना विवाहलो गा १५ देपाल कोतिरत्न सूरि विवाहलो कल्याणचद्र कृष्णविवाहलउ गुणरत्नसूरि विवालो वद्रमप्रम विवाहलउ गा ४१ उदयवघन १५७२ सहजसु दर गवू प्रतरग विवाहलो गा ३५ जवू स्वामी विवाहलो स १४८५ हीरानद सूरि जवू स्वामी विवाहलो मा १५ मनात जिन चन्द्रसूरि विवाहलो गा ३५ सहजज्ञान १४०६ जिनेश्वरसूरि विवाहलो गा ३३ सोममूर्ति १३३१ जिनोदयसूरि विवाहलो गा ४४ मेरूनदन १४३२ नेमिनाथ विवाहलो गा २२ जयसागर १५०५ नेमिनाथ विवाहलो गा २६ देपाल १६ वी शती नमिनाथ विवाहलो गा ७ धनप्रभ नेमिनाथ विवाहलो मनात नमिनाप विवाहलो धवल ढाल ४४ ब्रह्मविनयदेवमूरि स १६१५ नेमिनाथ विवाहला महिमसु दर नमिनाय विवाहला गरबाटान २२ वीरविजय स १८६० नेमिनाथ विवाहलो ऋषभ विजय १८८६ नेमिनाप विवाह देवलचद्र १९२६ पाश्वनाथ विवाहलो गा ३६६१ प्रज्ञात १४१२ ये सु ११ पाश्वनाथ विवाहलो पेयो पाश्वनाथ विवाहला क्षेमराज जसलमर भडार १६ वीं शतावरी पारवनाथ विवाहलो ढाल ४६ ब्रह्मविनयदव मूरि स १.१७ मावण पाश्वनाथ विवाहलो रगविजय सं १८९० पारवनाथ विवाहलो विजयरत्नमूरि महार १८ वगनास पिथलगच्छ गुरु विवाहलो ग्रमात मगरला विवाहल धनराज में १८० गा १७० ६० गा ४४ १५६८ लिखित १७वीं महावीर विवाहल कोतिराज १५ वी तादी महावीर विवाहलउ गा २२२ प्रशात प्रनतनाथजी भहार १७ वी वीरचरित्र विवाहलो ढाल ३७ ग्रह्मविनयदेव सूर १७वी माता सयुजय चत्यपरिपाटी विवाहलउ गाथा २५ प्रमात १५ वी शता शालिभद्र विवाहलो लक्ष्मण सातिनाथ विवाहल हषधम १६ वीं शताब्यो शांतिनाथ विवाहला पवल मानद प्रमोद १५६१ पतिनाय विवाहलउ ब्रह्मविनयदेव मूरि शातिनाय विवाहलउ सहजकोति १६७८ मुपाश्व जिन विवाहलउ धवल ३४ ब्रह्मविनयदेव सूरि स १६३२ हेम विमल मूरि विवाहलउ गा ७१ १६ वी ताब्दी सुमति साधुसूरि विवाहलउ गा ८२ लावण्य समय १६ वी शताब्दी श्री महावीर विवाहल हप सयमसूरि गुरुशिष्य ई स १५१८ शांतिनाथ विवाहलउ शाति विवाहलउ गा २७ तपोरन जनेतर गजराती कवियों के रचित विवाह काव्य मष्ट पटराणीनो विवाह दयाराम ईश्वर विवाह गोपीभान ईश्वर विवाह देवीदास छोटा ईश्वर विवाह कानुडानो विवाह अज्ञात कृपण विवाह राधाबाई गोकुलनाप जी नो विवाह महीवदास गोपीकृष्ण विवाह जीवनदास जानकी विवाह तुलसीदास वलीनो विवाह प्रज्ञात तुमसोनो विवाह मनात १६ वी मुरारि १८५७ १८७१ गिरधर प्रभाकर प्रीतम हरिदास मोतीराम प्रेमानद (वहा) प्रेमानंद (छोटा) रएछोड १७२६ दपाराम गोपाल भट्ट तुलसी विवाह तुलसी विवाह तुलसी विवाह नरसिंहना पुत्रनो विवाह नरसिंहना पुत्रनो विवाह नरसिंहना पुत्रनो विवाह नरसिंहना पुत्रनो विवाह नागर विवाह नाग्न जिती विवाह महादेव विवाह महादेव विवाह महादेव विवाह रघुनापजीनो विवाह राधा विवाह राधिका विवाह राधिका विवाह रामविवाह रामविवाह रामविवाह रुकमणी विवाह वल्लभ गोविंद रणछोड राजे पवि द्वारको इच्छाराम दिवाली बाई प्रभूराम त्रिकमदास कृष्णदास गोविदास . दयाराम " घनजी " मुक्तानद रघुनाप " माधम विठ्ठलनाथजीनो विवाह विवाह सेल मल्लन १२ विवाह खेल नारायण विवाह खेल उत्तमराम वेणीवत्सराज विवाहलउ डामर १६०७ लिखित प्रति सामलसाहनी विवाह नरसिंह सामलसाहनो विवाह वल्लभ सामलसाहनो विवाह प्राधारभट्ट शिवप्रिवाह नाकर शिवविवाह छोटम शिवविवाह रएछोड शिवविवाह जगजीवन शिवविवाह मयाराम सत्यभामा विवाह दयाराम सीता विवाह मालग सूरति विवाह दयाराम सूरति बाईनो विवाह घेलाभाई सूरति बाईनो विवाह धीरो सूरति वाईनो विवाह निभयराम हिदी के विवाह और मगल काव्य कृष्ण रूक्मणी विवाह चतुरदास कृष्ण मगल यावलो कृष्णदाम जानकी मगल तुमीदास १६४३ जानकी मंगल बालकृष्ण पावती मगल तुलसीदास १६४३ पृथ्वीराज विवाह पद ५२ लक्ष्मीकुराम स १८५१ भवानी मगल स १६५६-६४ राधा मगल মুবার स्वमरणी मगल नरहरि १७ ताब्दी चतुभुज स्वामी नददास " " . . " . स्वमपी मगल केशोराम हीरालाल ठाकुरसीदास रामकृष्ण चोवे विष्णुदत्त नवलसिंह कायस्थ रूपदेवी विष्णुदास रूकमणी व्यावलो हेरिदास निरजनी विवाह लीला (गोकुलेग विवाह) जगनन १८ वी विवाह मगल गुनराय गिव व्याह पद्य ३७३ महाराउल लखपत सं १८०७ स्वामी हरिदास मगल नागरीदास राजस्थानी के जेनेतर विवाह मगल काव्य कृष्ण रूकमणी वेलि राठोड पृथ्वीराज स्वमिणी विवाहलो मगल १६६४ से पूर्व महारे व पावती वेलि विससउ रुक्मिणी मगल उदो विवाहलो मंगल सजक का पों को परपरा बहुत हो यापर विस्तृत रही है । निस्य अनात ग्रयों को उपाप होती रहती है । विजय धमसूरि नान मदिर प्रादि में कुछ इस मूचि के अतिरिक्त प्राचीन विवाहला मिले हैं। प्राप्त व अनात काव्यों का सम्यक परिशीलन प्रावश्यक है। पदमा तेली धवल सज्ञक रचनाएं भारतीय संगीत के विकास मे जन समाज का महत्त्वपूर्ण योग रहा है उसका उचित मूल्याकन अभी नहीं हो पाया है। जन थम भारत का बहुत प्राचीन धम है और प्रारम्भ से ही इसके प्रवत्तक जन तीथकारो का यही लक्ष्य रहा है कि घम किसी जाति वर्ष या देश विशेष की सम्पत्ति नहीं वह तो प्राणी मात्र के उत्थान का विषय है। जो कि परिभाषा में कहे तो, अभ्युदय और नियस का प्रधान कारण है । इसलिए धम सम्मा किसी भी सीमा में अवरुद्ध न रखा जाकार प्राणी मात्र लिए प्रचारित किया जाना चाहिये । यह दूसरी बात है कि व्यक्ति अपनी योग्यता एवं रुचि के अनुमार ही इम मदेश को ग्रहण कर पाता है पर उसके श्रवण एव ग्रहण का द्वार तो मभी के लिए खुला रहना चाहिये । तीथकारा समवरण अति धम प्रवचन में दव दवी भर नारा ही नहीं वरन् पशु पक्षी भी सम्मिनित होते थे। तीथकारो की दिव्य ध्वनि मानव बोगिय राग म गु जायमान होती थी। इधर साधना का महान तपोवल उधर सगतीमय वारणो का माधुय, सहज ही हजारों लाखों प्राणियो के जीवन उत्थान में जादू का सा असर करता था। जन जन को बोध मिल सके, इसलिए तीथ कर फ्ध अलौकिक मान सम्पन्न होने पर भी जन- भाषा में ही उपदेश देते थे । गम्भीर से गम्भीर तत्वों का भी निरूपण उनके द्वारा सवजन सुलम सरल भाषा में किया जाता था। तीय करों के अनुयायी-जैनाचार्यों ने भी इस परम्परा को निरतर चालू रखा और इसी का परिणाम है कि भारत को प्रातीय भाषत्रों मे, जिन जिन प्रातों मे जन धम का प्रचार एव प्रमाव रहा प्रचुर जैन साहित्य उपाय होता है । लोक प्रचलित कहावतो दृष्टात कयानो और नो क्याओं का भी जनमाहित्य में खूब उपयाग हुआ है। मौत का आकषण अद्भुत है । मानव ही नहीं पशु पक्षी पेड पौधे भी उससे प्रभावित होते हैं इसलिए जन-साधारण मे पम प्रचार करने के लिए नाचार्यों ने लोक सगीत को खूब अपनाया । मेरे मम्र मतानुसार सगोत शास्त्रीय ग्रयों में जिन राग रागि नियो एव देशी सगीत की चर्चा है वह बहुत ही साधारण है । लोक संगीत को गास्त्रीय ।
परिभाषानों में बाधना सम्भव नहीं। प्रमस्य स्वर लहरियों एव नाद ध्वनियों को भला कहा तक कोई वर्गीकृत कर और उनका नामकरण करे । हजारों लोक-गात और उनकी ध्वनिया जैन रचनाओं मे एव जन साधु सावियो ण्व श्रावक श्रविकानो के कठों में सुरक्षित हैं । जन रास, चौपाई आदि ग्रयो म शास्त्रीय छन्दो म से दोदा चोपाई के अतिरिक्त बहुत ही कम छ व्यवद्दत हुए हैं पर नोर गीलो वो देशिया या उनमें भरपूर प्रयोग हुपा है । एक एक राम में दम-बीम पचास और किसी किमी म नो शताधिक लाक. गोनों की देशियों अर्थात् राग रागिनिया का स्थान मिला है । प्रत्यक ढाल क प्रारम्भ म, वह ढाल जिम लोर-गीत की दशी रागिनी या तज पर गाट जानी चाहिय उम लोक गीत की पूर पक्तिया भी उद्धृत कर दी गई हैं । जिमम हजाराला गीतों की बगियो का प्रचार जन ममाज मे हुमा एवं अब तक है । ऐसी करीब ढाई हजार देगिया की एक मूची जन गुजर कविप्रा माग ३' के परिशिष्ट म प्रकागिठ हो चुकी है। मध्यकाल के लोक नृत्य एवं नाटय का भी जानकारी जन-माहित्य में ही माघिर मिलती है। पाठवी नवीं शतानी से राम चच्चरी, घवल मगल व फागु के गाने एव सेले जाने की परिपाटी जन साधारण में थी। प्मको सबम अधिक प्रादर जन विद्वानों को रचनापो मे दिया प्रा मिलता है । चौत हवों गताब्दी तक इस पद्धति का खूब प्रचार था। मनिए छोटे छोटे राम चचरी पागु प्रादि मक्डों की मस्या में जन विद्वानों के ( जन भाषा में ) रचे हुए मिलते हैं। वे जन समाज म विविध उत्मव प्रसगों में, मदिरों म गाय एव मेल जात थे । उनके इस प्रकार के उपयोग होन का उल्लेख उन रचनामों की प्रतिम पक्तिया म कवियों न म्वय किया है। दसवीं गतानी के 'उपमिति भव प्रपच क्या' नामक विश्वसाहित्य व वेजोड रूप अप मे नतालीन राम एव गीत के उाहरण प्राप्त हुए हैं । तेरहवी गाताना य पद्रवी पता तक को अपभ्र और राजस्थानी रचनाए मक्हो को पस्या मे मिलता हैं जिनके सम्बध में हिंदी गुजराती एव राजम्पानी इतिहास- पो में कुछ चर्चा भी प्रकागित हो चुकी है और मेरे भी कई - निदध प्रकाशित हो चुरे हैं। मासिक प्रम गों में धवल मगर गीर गाय जान का प्रचार तादियों से चला पा रहा है । उत्तर भारत + एमे पवन-मगर गीतों के मम्मघम मेरी जानकारी थी पर पिण भारत कर्नाटक प्रादि म भी इनका इमी नाम से प्रचार रहा है यह विहार पिएटर क कमान १२ म प्रकाशित माय मुत्यनारायण के लेप से सर्व प्रथम विदित हुप्रा । क्योकि दक्षिण भारत को भाषा उत्तर भारत के निवामियों के लिए दुरूह हैं इसलिए उधर के साहित्य संगीत क्ला की उतनी अधिक जानकारी हम लोगों को नहीं है। इसी तरह दक्षिण भारत के विद्वानो को उत्तर भारत के साहित्य स गीत एव कला क सम्बध में बहुत ही कम जानकारी है। धार्मिक प्रमगो को लेकर दोनों प्रांतों का पावागमन सम्ब ५ बराबर हो रहा है। उत्तर भारत के यात्री दक्षिण भारत के तीर्थों को यात्रा करते रहते हैं और दक्षिण भारत के लोग उतर भारत यात्रा क लिए हजारों को सख्या में पाते जाते रहते है। इसी प्रकार यापार मानि प्राय प्रमगो में भी पारस्परिक मिलन जुलन एव सम्पक होता रहता है। जन धम का प्रचार उत्तर क्षिरण दोनों प्राता में हजारों वर्षो से समान रू म रहा है इमलिए जन विद्वानों के द्वारा साहित्यिक आदान-प्रदान भी खूब होता रहा . धवल-म गल गीतो के प्रचार दोनो प्रातो में होने का प्रधान कारण भी सम्भवत जन विद्वान ही रह होंग। तरहवी चौदहवी शताब्दी म धवल गीतो का प्रचार उत्मवा गुरुयो क मागमन प्रसगों प्राटि मे विस तरह होता था इसके सम्बध में कुछ उल्लष सरतर गच्छ वृहद गुर्वावलि म प्राप्त हैं न हे उद्धृत किया जा रहा है। सवत् १२.६ म खरतर गच्छ के विद्वान् जिनपति सूरिजी का एक रोचर गास्त्राथ अतिम हिन्दू सम्राट पृथ्वीराज चौहान की सना अजमेर म हुआ था। विजय व मन तर जिनपति सूरिजी राज सभा स अपनी पौषध शाला या उपाश्रय में वापस उस समय का वरणन करते हुए गुर्वावलि मे लिखा गया है- तदनन्तर तत स्थानादुरयाय सहस्त्र सरय तुरगमाघि-पटराज पुनानुगम्यमान मएइलेश्वर कदमास प्रमुख राज प्रधान सह प्रातिया कुर्वन्त करणायामात्मीय कीर्ति शृणवत प्रभूतलावदीय मानशिषा गलत श्री पृथ्वीराजसत्के मेघाडम्बरनाम्नि छा प्रभावनायै मनकापरि प्रियमाण पुरमध्ये स्थान-स्थाने रगभरेण प्रेनणीयर निरापेधमान, दाने च यानि माणे चच्ची दीयमानाग धवलघु गीयमानेयु श्री गौतमस्वामी गएघर प्रमुख प्रवन सत्वगुणगणप्रशसन पूस विरुदावनाददन्यु महनारेषु भा प्रयवाराज सभाषा श्री जिन पतिसूरिभिर्पित पनि परमप्रभ इत्याद्यप्रतिवद्हामु त कान निष्प नासु चतुष्पदपु पठय मानास, नि स्वान सह पशषु राजादेशा नगरे शोभाया शोभिते श्री अजयमेरो वैत्यपरिपाटि पूर्वव पौषधशालाया समाता श्रा पृ.या ! पधार इसी प्रकार इनके गुरु जितव द्रमूरि जी सवत् १२२३ में दिल्ली में पधारे थे तब राजा मदनपान एवं धावकों ने प्रापा प्रवेश उत्सव मनाया था। उस उमव का वरपन करते हुए गुवालि मे लिया है श्री मदापाल महाराजोपराधादशी पूच्या श्री दिल्ली प्रति प्रथिना । वाथमा नात चतुर्विशनिपु निस्वानुयुगलापु विपदावली पठत्सु भट्टनावेधु घयलेषु दीयमानेषु, वस ता दिमागलियारोण गायत्मु गायनेषु, नत्यमानामु मतका पितेवालम्बसहस्त्र प, मम्तकोपरि धिप्रमाण छलक्ष सरय लोकेर म्यमाने श्री मदनपा7 महाराज दत्तस्तै श्री जिनचासरि भी, राजरेशान तनिकतारमादि ममें श्री योगिनीपुरे प्रदेश . जिन प्रदोष सूरि क मवत् १३४१ में जानोर पाले एवं जिनच द्रमूरि के पट्ट- स्थापना के समय में भी 'गीयमान प्रवरगीतषु, दीयमान धवन नृत्य मानासु प्रवर पुरागनासु" इन गदा म धवल दिये जाने का उल्लम्ब है। तदनन्तर म ० १३७५ में जिनकुगलम रि जी की मप यात्रा के वर्णन में मघा स्त्रियों के घरतम गल गान और चचरी दिये जाने का उल्लेख इस प्रकार लिया गया है- "अविधवमुधवाभि मुश्राविकाभिर्गीयमान धवन म गलेयु दीयमानायु पचारिषु।' स बत् १३८४ और १३६८ म सिधप्रात म जिनाला रि जी का पदापरा हुमा । चन प्रोत्सव के समय नाटक करने, नाल रामदन और गीत गाए जान का उल्लेख इस प्रकार है--- नानाविधेषु नाटकेषु दीयमानेषु नराविधवसुषवामिनारी मिस्त तालराम देव हा हा हू हू समानानेक गायना वलीमि गियमा गीतेषु गीयमानेस्व विधवमुधवा भिनारीभि सकना मालिक्य माला ज्वाला मलिल धवलपु म गलेषु ।' मवत् १३६० में जिनकुनमरि के पट्ट पर जिनपदमम रिजो की स्थापना का महोत्सव हुमा उपमें भी ताल रास दिये और घन म गल गार्य गर । यथा स्थाने स्था दीयमानेषु तालारामकेषु गीयमानेष्व विवधमुधवनारिभि वन म गरे । उपरोक्त उदरणों में मह प्रत्यात स्पर है मि तेरहवी चौरहवीं शताब्दी में उत्सवों एवं मानिस अगों के समय स्त्रियों के द्वारा घदन मगन गीत गाय जाने का राजस्थान, गुजरात एव सिंघ तक में ग्राम रिवाजा पोरसह माजी ईपों में प्रचलित है। विवाद प्रादि के समय धवल-मगल गीत पाज भी गाये जात हैं । यद्यपि
उनके स्वरूप में परिवतन हो गया है।
"धवल" वास्तव में उत्माह का प्रगट करने वाला एक मालिक गीत विशेष
है। पर वह बई रागो में गाया जाता और विविध छ । मे बसाया जाता था, इसकी
सूचना हम सगीत म यो के अतिरिक्त छ र नयों एव प्राप्त रचनामो स भली प्रहार मिल
जाती है । वारहवी शतानी के सुप्रसिद्ध कलिकाल सवज्ञ हेमच द्राचाय के छदोऽनुगासन
में धवल के कई भेद विवेचित है । माठ चरणो वाल छ चरणों वाले और चार चरणो
वाले ये तीन भेद तो छ दो की हष्टि से हैं। इनके नाम थी धवल यगोधवल कीर्ति
घवल गुण धवल भ्रमर धवल, अमर धवल उत्साह धवल दोधक धवल आदि थे।
यथा- घवलम्ष्ट पट चनुपात् ।
अप्टपारपटपाच्चतुपाच्च यवल नाम छ द ।
धवल निहेण सुपुरिसो वणिज्ज जैग तेरण सो यवलो।
घवलो वि होइ तिविहो अटठपयो छप्पयो चउपायो॥
धवलानि च सातवाहनोस्तिषु द्रष्टव्यानि । दिग्मान दाहरिष्यते ।।
तत्राष्टाह्वयोजे चिवौ सम चौ पी पवलम् ।।
तम पवलेषु मध्येडष्टाह वो धवले विषमेषु पादेषु चत्रय द्विमात्रश्च क , समेषु
पादेषु चद्वय यत्र तच्छी धवलम् ।
वस तलेखेत्यये । यथा-
खीरसमुद्दिश लवरपजलहि, कुवलय कुमुइहि ।
कालिंदी सुरसिधुजलिण, महुमहण हरिण ॥
पइलासिए सरिसर हू किरि, सो प्रजणगिरि ।
इह तुह जस सिरिधवलिउ पहु, कि पडुरु न ह॥
माघ ततीये चि । तिीये तु चि गये।
त्वोजे चातौ समे चादौ चिर्या यगोपवलम् ॥
अष्टाह वौ घरले अायततीयया पादयश्वगणनय द्विमानश्च । द्वितीय चतुर्थ
योशचगणत्रयम् । छपेषु चतुप पादेपवाजया पश्चम मातमयार्दो चगणौ तिमातश्चक
समयो षष्टाष्टमया चगणद्वय द्विमानश्चैक मतातेर चगणक्य वा यत्र तयशाधवलम ।
यपा-
जे तुह पिच्छहि वयणकमल, ससहरमडल निम्मल ।
जे विहु पालहि मिच्चकम्मु, पुहि जि निश्वमु विककमु॥
पडह्ववाद्य तुयें पादौ द्वितीये पञ्चमे
चौपे पाया च पोवा कोतिषवलम् ।।
तर पडही घवले प्रथमे चतुर्थे च पादे द्वीपरमानावेको द्विमात्र । द्विताये पञ्चमे
च पादे द्वौ चतुर्मानौ । शपे तृतीय षष्ठे च पगणद्वयात्परश्चतुर्मान पञ्चमाना या चेत्
तदा कीति अवलम् । यथा-
उक्करडा खवलउ गज्जउ चिरु जुज मरण,
उनामउ सिह सरुम लज्जउ ।
थक्क महम्भर तुढे कडढहि, अनु न तिहअरिणा
कित्तिधवल विसाउ तुह चट्टइ।
चतुरहावाज पश्चौ समे पचचाद्दस्तो वा गुणधवलम् । तत्र चतुरह्वो धवले
विषमपादयोरेक परमानौ समया पचचेम्य परो द्विमान स्निमात्रा वा चेत् तदा गुणधवलम् ।
यथा-
कहाभागा मागुलया, वह पिहला दुत्तरजलुल्लया।
तिम्व भरु वहसुगुणधवलया, जिम्य केम्बइ न हसति पिसुरणया ।।
पचता पची भ्रमर ।
अाजपादया परमान चुतुर्मावतिमात्रा समया परमान चतुर्मानौ चेत्ता भ्रमरो
धवलम्। यथा-
किति तहारि यण्णविणु, कइ अनुन वरणहि ।
मालइ मारिणवि कि भमर घत्त रह लग्गहि ।।
पचता पचचा प्रमरम् ।
प्रोजे पण्मा चतुर्मात्रत्रिमात्रा समे पण्मात्र एकचितुर्मात्री हो चेत्तदा प्रमरम्
धवलम्।
यथा- इवह तुह गुणि महिप्रव, मागु वि पह मह वाहिमठ ।
प्रमरविलासिणिगोपरा, तुह पर कित्ति निसामिमरा।।
माधयो पची प्ररपयोश्च सवधाते तो दो धामगलम् ।
श्राद्ययो प्रथमदितीययो पादयो प्रत्येक घगणश्चगणत्रय थ, अत्ययाम्मृताय
७२ ये दोनों गीत अव से २३ वर्ष पूर्व हमने प्रपन सम्पादित ऐतिहासिक जन पाव्य स यह में प्रकाशित किये थे। इनमे से साह रणय रचित थी जिनपतिमूरि धवल गीत के प्राय मि तीन पद्य नीच दिय जा रहे है- वीर जिएसर नभइ सरेसर तस पह परममिय पय कमल । युगयर जिनपतिसरि गुण गाइसो भक्तिभर हरसिहि मनिरमले ॥१॥ तिहमरण तारण सिव सुख पारण यछिय पूरण पल्पतरा। विधन विनासरण पाय परणासण, दुरित तिमिर भर सहस करो ॥२॥ पुहवि पसिद्ध सरि सूरिश्वर गम वम सपन सिरि तिला ए। इणि पलिकालहि एह जो जुगपवर जिएवइ सरि महिमा निनउ ए ॥३॥ एसे गीत और भी कई मिल हैं पर उनको धवल सना नहीं दी गई इसलिए उनकी चर्चा यहा नही की जा रही है। प्राचार्यों के नगर प्रवेश पट्टोत्सव एव प्रय धार्मिक प्रसगो म एसे गीत गाये जाते थे। वे अधिकार मौखिक रहे भोर छोटे-छोटे होने से सुरक्षित नहीं रह सक। विवाह प्रसग के साथ ता धवल मगल गीतो का खास सबध है और विवाहलो एव मगन काव्य पचासो की सस्या में उपल ध हैं जिनक सबध मे मेरे कई लख प्रकाशित हो चुक हैं । कई विवाहलो या विवाह सना का पो म धवल का नाम भी पाया जाता है। यहा ऐस ही कुछ कायो का परिचय दिया जा रहा है । ऐस का यो म सबसे पहला काव्य सवत् १३२० के लगभग का अतरग विवाह धवल अपभ्रश भाषा म रचा हा प्राप्त हुमा है । जिसको वस त राग म गान का उल्लख दिया गया है। जिन प्रभमूरि रचित इस काव्य का आदि मत इस प्रकार है- आदि- पमाय-गण ठाणुपाटणु तहिं अहे भयियजिउ निरुवमु वर ए। चविहसघु जानउन कीय महे वाहण सहस सोलग ॥१॥ सुभ परिणामु सवेग सहि अहे यर गढ़ सोहइ ते सुए। उपसमरोणि प्रावास कीउ प्रहे धमप्यान वानउ लागउ ए ॥२॥ इपिपरि परिगए जो अगि महे लहा सो सिद्धिपुरियासु । मालिक वीर जिण प्रभ ए पहे मांगलिकु चउयोह सघ ए॥ प्रतरग विवाह पघल वसत रागेन भएनीय।। चौदहवीं पे उत्तरार्द्ध या पद्रवी के प्रारम की एक घवल पाठ पद्यों को प्राप्त प्रत- - हुइ है उसका नाम क्यवन्न धवल है । इसकी प्रतिलिपि हमारे संग्रह में है। पन्द्रहवी शताबी म जयशेखरसूरि रचित नेमिनाय धवल' तेरह पद्यों को मिलती है । इसका प्रादि अत इस प्रकार है- आदि-द्वारिका धरि मयल चारु, समुद्र विजय, नरवर रणउ ए । गिवा देवी माध्यि तएउ मल्हार नमी कु वर वर परणिइ ए । उग्रपन राय तरणीय फुमारी राजल रूपि रलीयामणी ए ॥१॥ राणी राजलि तपाउ प्रानदु, कवि जण केतलउ कलवई ए। जपनय जग गुरु नमि जिरादु जिणि नेडइ जइपुरीत ए॥१॥ इति श्री जय खर सूरि सु गुरु कृता श्री नेमि नाथ पउल । इमी शतादी के सुप्रसिद्ध कवि देपाल के 'प्राद्रकुमार विवाहलउ' मे धवल नामक लोक गीत या दशी का प्रयोग हमा है । इसलिए उसका नाम भी कई प्रतियों में 'भाद्र कुमार धवल' पाया जाता है। उसका प्रादि प्रत इस प्रकार है । प्रादि- माह ए नपरइ सिंह दुवारि, पच कन्या रामती रमह ए । चिह परिण वरियला चम च्यारि, बरनवीं पामइ पचमी ए। मत अम्ह प्रिय बच्छरहावीयउ ए रमतलइ बार यरीस तू बरउ लेसालिउए । जयब त हो जेवच्छ तू भलइ ससालीयउ ए॥ इम रचना की दो प्रतिया हमार सग्रह म हैं जिनमें से एक सवत १४६३ की लिखी हुई है। सालहवीं शताब्दी में सेवक यदि रचिन 'ऋषभदेव विवाहलउ' के नाम से दो रचनाए मिलती हैं जिनमें से एक सवत १५६० में रची गई है उसमें उस रचना का नाम 'धवल' दिया गया है । 'तम पय परसादिइ गायठ धवल जिद' दूसरी रचना के प्रारम्भ में उसका नाम नापम विवाहलो दिया है पर मत में दो पद्यों में उसका नाम 'घवल' मी दिया गया है। यथा- ऐह पयल करता मारण विरोपी जेह । ऐह पवल गाई जिन माराहइ जेह नर नारी सदा ते मुगती बाइ सुखीय पाद बोलइ 'सेवक' इम सदा' यह धवल बघ विवाहली काफी बड़ा है । इमम ४४ ढाले हैं। इसका प्रचार भी बहुत हो रहा है । हमारे संग्रह में कई प्रतियां हैं। - ४ सतरहवी ता-गेम तो धवल सना वाले बहकाव्य रचे गये और वकाफी बडे बडे हैं । इनका परिचय देने से पूर्व १६ वी तानी की एक छोटी रचना नमिनाय धुल' के दो पद्य उद्धृत किय जा रहे हैं इसका राग 'भरवी' पद बध बतलाया गया है। पद्य सरया आठ है। धवल सस्कृत का अपभ्र श रूप धुल अथवा घाला हो गया और इसक बाद घौल' नाम प्रसिद्ध हुमा । गुजरात म वणव और विशेषत वल्लभ सप्रदाय में सकहो 'धौल' पद या गीत रचे गये । उनका संग्रह विवध धौल तथा पद सग्रह के दो भागों म गुजराती प्रतिलिपि म प्रकाशित हो चुका है । अब नेमिनाथ धुल व प्रादि मत पद्य दिय जा रहे हैं- श्री नेमिनाथ घुल रागु भरवो पर बध। प्रादि-सहजि सालगडी नारि मिलीम सतेवर तेवडीए। राउलडा घर बारि नेमि बुमर वर जोयती ए॥१॥ प्रत-इरण परि नेमि कुमार गुण गाइ सवि कामिणी । रापीय राजिमति भत्तार मत्रि पारितिष स्वामिणी एel इसी समय की इसी तरह को और भी कई धवलें मिलती हैं पर उन सबका परिचय देना यहा पावश्यक नहीं। जिस प्रकार राम पहल छोटे छोटे बनत थे और पद्रहवी शताब्दी से उनके प्राकार मे बढोत्तरी हुई उसी तरह भी पद्रहवी शताब्दी के प्रारम्भ तक तो छोटे छोटे गीतों के रूप में थ पर सोलहवी शताब्दी के उत्तराद से बढे बहे 'धवल चनने लग । इसका मुख्य कारण यह था कि छोटे छोटे धवल गीतो को उत्सवादि प्रसगो म स्त्रिया गाती थी। वहां लम्बे कायो को गाने का प्रवका नया पर जब रासों की तरह धवलों का बई ढालों में रचा जाना प्रारम्भ हुआ तो उत्सवादि प्रमगो के वे ज्ञेय गीत नहीं सोलहवी तादी की धवल समर दो बडी रचनामो का उल्लख पहले किया ज नुका है। इसी शताब्दी की एक मोर रचना गातिनाय विवाहलु धवल प्रबध मानद प्रमोद रोचत प्राप्त है जिसकी रचना पाटण में सवत् १५९१ में हुई। इसमे सोलहवें जन तीपकर शातिनाथ के विवाह प्रादि के जीवन प्रसगों का वणन है। इसे धवल प्रबध मौर विवाहला दोनो नाम दिये गय है । चौसठ ढालो का यह एक सु दर काय्य है । मादि छ पय इस प्रकार हैं- मोर - मादि-सरसति सामिणी हसला गामिणो मझ मनि एक उमालहुए, धवल प्रवधिहि बार भ्वतर, सुदर गाति विवाहलु ए ॥ प्रत-रचिउ सति विवाहलु धरि उमाहल, यु तु त्रिभुवन र नाहलु रे । भवभय भजन दालिद्र गजरण, वीर मेवाडा मडणु रे ॥५२॥ इद्र चउसठि करह, स्नात्र चउसठि रे, ढाल चउसठि रच्या घवलयपि । सति समरथ देवा निज पद देवा, मागु भवि तुझ पयकमल सेवा । पाटणमाहि काणुमा माहिरे, गुरू पुष्पि गाइग्रो सति माह रे । नयरस सागर भरण्द्र जेनारि नर, सुख प्रागर सपति लेह में ॥५६॥ नामि नवनिधि रे अष्ठ महासिद्धि रे, भरण पान दलहे हि द्धि ॥१७॥ कवि न इसे 'नवरम सागर' नाम दिया है इसलिए इसका साहित्यिक दृष्टि से मूल्याकान होना भी भावश्यक है । इसकी हस्तलिखित प्रति हमारे संग्रह मे भी है। सतरहवी शतानी 4 प्रारम्भ म कवि 'ब्रह्म' ने शान्तिनाथ विवाहलो-घवल और वासु पूज्य स्वामी धवल की रचना को । जिनम से प्रथम का य की प्रति हमारे सग्रह मे भी है । दोनो काव्यों के प्रादि प्रत के पद्य इस प्रकार है- प्रादि-पाराध भाविइ सतिकरण श्री सति, गुरुया गुरु व वउ, टाली मननी चति, निरिणी नामद शासन देवि सभारु सोलम जिन । वरण घयल रचिसुहरू सारु ॥१॥ प्रत-शांति जिनेसर स्वामी सोलमउगायो मन उल्लास, श्री ब्रह्म पहइ नितु सदा सारतो पूरई पास ॥२१॥ माणद प्राणी रे जग गुरु गाइयई वासुपूज्य पवल का प्रादि प्रत पद्य । प्रावि - चउमौसइ जिण चरण लागीद, यर युतदेवो पासह मागोइ । लागोह पाये मी सुगुरुनइ, घयल रचिसु, सुहामरण । प्रत-रचयउ धवल जिन चरित दवाव्यठ जागी गुरु मुखो मम । ता थिर पदउ गुण भवियरगजए जो वरतइ जिण घम इसी कवि का एक नेमिनाय घवल' चवालिस ढालो में प्राप्त है । उसका मादि मत इस प्रकार है - वेलि सज्ञक काव्य जिस प्रकार लोक साहित्य मे बहुत सी बातें प्रात पोर देश का भेद न रखते हुए सवत्र एक सो पाई जाती है उसी प्रकार शिष्ट साहित्य मे भी रचनामो की बहुत सी सनाए वालिया मादि बहुत व्यापक प्रदेश में समान रूप से पाई जाती हैं। उन मज्ञाप्रो और शलियों की एकता व समानता के सबंध में विशेष अनुसंधान कर प्रकाश डाला जाना मावश्यक है ।। समय समय पर उनमे जो परिवर्तन और प्रतर भेट हुए हैं उन पर भी सूक्ष्मता से विचार किया जाना चाहिए । उदाहरणाथ विवाहला और मगल काव्यो की परम्परा बहुत दीघकालीन और विशाल रही है । राजस्थान गुजरात और हिन्दी भाषी प्रदेशों के अतिरिक्त बगाल तक में यह परम्परा देखने को मिलती है। इस सबध म मैंन तत्सम्बधी लेस में प्रकाश डाला है। इसी प्रकार वेलि या वेलि सनक काव्या की परपरा भी राजस्थानी, गुजराती व हिंदी साहित्य में दीघकाल से चली आ रही है। इसका सक्षिप्त परिचय देना हो प्रस्तुत लख का उद्दश्य है। वेलि स क रचनामों से स्पष्ट है कि ५०० वर्षों में इस सज्ञा को खूब प्रसिद्धि रही है। राजस्थानी भाषा की सवयष्ठ कृति क्सिन रुविमणी री वेलि से तो सभी परिचित हैं। इस काव्य की लोकप्रियता का यह ज्वलत प्रमाण है कि रचना के घोडे समय बाद ही इसकी दू ढाडी मारवाडो और संस्कृत में माठ-दस टीकाएँ रची गयो और ब्रज भाषा में भी इसका पद्यानुवाद लाहौरी गोपाल दिन नौरस विलास के नाम से मिर्जा खान के लिये किया। राजस्थानी भाषा के किसी अय का प्राचीन ब्रजभाषा में होने का यह एक उदाहरण ही है । अप से जन समाज का कोई सम्बध न होने पर भी इसकी पाच छह टीकाए जन विद्वानो की रची हुई मिलती हैं जिनमें दो सस्कृत की और चार राजस्थानी की प्राध हैं। प्रस्तुत किसन रुक्मिणी री वेलि स भी पूव रचित वेलि स १ आठ दस रचनाए जन तथा जनेतर विद्वानो की उपलब्ध हैं । उनका परिचय हिंदी स सार में तो II ७६ प्रविदित ही है भोर राजस्थानी भाषा की वलि स जब जनेतर रचनाएं भी करीब १५ मिलती हैं, उनकी भी जानकारी अभी तक प्राय नही है। केवल मेरे लेख के आधार से स्वामी नरोत्तमदास जी द्वारा सम्पादित "क्मिन रुक्मिणी री वेलि" की प्रस्तावना मे १० रचनाओं के नाम ही दिये गये मिलते हैं, जबकि राजस्थानी, गुजराती और हिंदी को करीब ५० से अधिक वेलि सनक रचनायो की जानकारी मुझे प्राप्त है। उनका सक्षिप्त परिचय मागे दिया जा रहा है। वेल, वेलि या वल्लरी ये तीनों स ज्ञाएं एक ही प्रथ की पोषक हैं। पृथ्वीराज राठौड ने अपनी क्सिन रुक्मिणी री वेलि म अपनी रचना की सज्ञा वेलि रखने का कारण स्पष्ट करते हुए पद्याक २६१ स ६३ में लिखा हैं वेली तसु बोज भागयत वायउ महि पाणउ प्रियुदास मुख । मूल ताल जड प्रय मांडहइ, सु पिर करणी चढि घाह सुख ॥२६॥ पत्र प्रक्खर दल द्वाला जस परिमल मध रस ततु विधि महोनिसि । मधुकर रसिक सु प्ररय मजरी मुगती फूल फल भुगति मिसि ॥२६२ । कलि फलप वेलि वळि कामय नुका, चितामणि सोम वेलि यत्र । प्रगटित प्रयमी प्रियु सुख पनि प्रसराउलि मिसि पई मेकत्र ॥२३॥ प्रियु पेलि कि पच विध प्रसिघ प्रनाली पागम नीगम कजि अखिल । मुगति तणो नीसरणी मडी मरग लोक सोपान इल ||२६|| - यह वेलि वेलि (लता) के समान है । इमका बीज भागवत पुराण है । दास पृथ्वीराज का मुख पृथ्वी का वह स्थान है जिसमें यह बीज बोया गया । मूल पाठ इसकी डालियाँ हैं । अथ इसकी जड है । थोताओं के स्थिर (एकाग्रता से सुनने वाले) कान मडप हैं, जिनके ऊपर यह चढ़ी रहती है । मुख इसकी छाया है ॥२६॥ अपर इसके पत्त है । दोहल (पद्य) इसकी पखुड़िया है । भगवान का या इसकी सुगधी है । नवरम इसके ततु हैं । यह रात दिन बढती है भक्ति इमकी मजरी है । साहित्य रसिक इसके भ्रमर हैं । मुक्ति इसका फूल है और परमानद का भोग इसका फल है ।।२६२॥ भावाथ- कल्पना लता, कामधेनु चिंतामणि और मोमलता ये चारों पृथ्वीराज के मुख कमल से वलि के प्रक्षर समूह के रूप में एकत्र होकर इम कलियुग में पृथ्वी के ऊपर रक्ट हुई हैं ।।२९३॥
६. - यह पृथ्वीराज कृत वेलि है अथवा समस्त निगमागमो तक पहुंचाने वाली सुप्र सिद्ध पांच प्रकार की पगडही है अथवा स्वगलोक को ले जाने वाली सोपान श्रेणी है। (स्वामो नरात्तमदास जी द्वारा मपादित सस्करण से) वेलि सशक कई काव्य विवाह वणन प्रधान हैं । इसलिए प्रो० मजुलाल मजूमदार ने विवाह प्रसगों के वणन वाले काव्य को सशा वेलि मानी है। पर वास्तव में वेलि काव्यों में विवाह वणन वाले काव्य बहुत पोडे ही हैं। किसन रुक्मिणी वेलि मादि चारण कवियो की रचित इस सज्ञा वाली रचनाओं म प्रयुक्त छ- वेलियो गीत' के नाम से भी प्रसिद्ध हैं मात्रिक छदों की जाति में छोटा सागोर नामक एक छत्र है। उसके पार उपभेदों में एक वेलियो भी है उसका लक्षण बतलाते हुए कहा गया है- "मुहरावाली तुक मही मुहरामांहि मुरगत । बणे गीत हम येलियो प्राद गुरु लघु प्रत । स्वामी जी ने वेलियों का लक्षण इस प्रकार बतलाया है - 'जिसके चारो चरणों में क्रमश १६ १५१६ १५ मात्राए हो। इसकी गति वीर या पाल्हा छ के समान होती है । प्रत म 5 प्राता है।' गीत के प्रथम पद्य के प्रथम चरण म सवत्र दो मात्राए अधिक होती हैं । अर्थात प्रथम चरण १६ मात्रा के स्थान पर २+१६-१८ मात्र का होता है। (ये अतिरिक्त दो मावाए चरण के प्रारभ में अर्यात १६ मात्रा के पूर्व जुडती है चरण के अत में अर्थात १६ मात्रा के बाद नहीं जुड़ती) वास्तव मे न ता प्रो० मजुलाल मजूमदार ने जो वेलि को विवाह वणन प्रधान काव्य माना है वह लक्षण ही सवत्र मिलता और न वेलि सनक समस्त काव्यो में वेलियो गीत छद ही प्रयुक्त हुपा है । वास्तव में वेलि सना लता व अथ में लोकप्रिय हुई और अनेक कवियों ने उस नाम के प्राकप से प्रती रचनाओं को वेलि इस अत्यपद से सबोधित किया। उपलब्ध वेलि का यो में सबस अधिक रचनाए जन विद्वानों की है। उसके पश्चात चारण कवियों का स्थान पाता है और तदनन्तर हि दी व द क्यो वा फिर जनेतर गुजराती कवियों का । गुजराती म बलि के नाम दाली चार पाच रचनाए ही मिलती । जन कवियों में श्वेताम्बर कवियों की रचनाए ही अधिक हैं । दिगम्बर रवियो की लि मशक पाच रचनाएं ही मिलती है।
वैलि समर काव्यो का वर्गीकरण मापा और विषय के प्राधार पर किया जा सकता है । मापा उनकी हिंदी, गुजराती राजस्थानी तीनों हैं बहुत से काव्यों का विषय ऐतिहासिक व्यक्तियो का गुण वणन है कुछ मे देवी देवतामों की स्तुति है । कुछ पौराणिक व्यक्तियों स सर्श घत है तो कुछ जन धम से भी सषित हैं। माग दी जाने वाली रचनामों के परिषय से यह स्पष्ट हो जायगा । उपल ध साहित्य में जन कवि वाहा (१) रचित बिहुगति लि' सबस प्राचीन है। जिसका रचना कान १५२० ई० के लगभग का है। १६वी शताब्दी में सीहा लावण्य समय, महज सुन्दुर, इन श्वेताम्बरो, इसी प्रकार दिशाबरो व जनेतरों की रचना भी प्राप्त होती हैं। १७वीं शताब्दी में जन कवियों भौर चारण कवियों ने बहुत मी वेलि नामान्त पद वाली रचनाए बनायी। १८वीं व १९वीं शताग में भी यह क्रम जारी रहर । २० वीं शताब्दी की कोई उल्लेखनीय रचना गात नही है। वसे पान भी इस सज्ञावाली रचना की जाती है । 'बिहुकम' क गत कातिक २०११ के प्रक में श्री मगल मेहता रचित 'ममता येलि' नामक गद्य गीत प्रकाशित हुआ है। बिहुगति वेलि' से भी पहिले की रचना भी प्राप्त होनी चाहिए, पर जब तब उसका पना न चले वेलि मशक काव्य की परपरा पाच मी वर दीप नो सिद्ध है ही। गुजरात, राजस्थान और हिन्दी प्रधान देशो के अतिरिक्त बगाल महाराष्ट्र आदि में बैनि सना रचनाए हो तो उनकी जानकारी प्रकाश में पानी चाहिए। उपल ध व अपम रचना "चिद्गति वेलि' जन धर्म के अनुसार मनुष्य, देव, नियर भौर नारकी इन चार गनियों के दुखो का वर्णन करने वाली है। हमारे मग्रह की प्राचीन प्रति के अनुसार इसमें ११३ पद्य है । म य प्रतियों में १४२ पद्य मिलते हैं प्रारम मोर मत के कुछ पद्य नीचे दिए जा रहे हैं - दव दया पर नमि निरसन, साजन कोई विचारी। বিয়ে করায় প্রাণি যায়, স্বাধতে ৪ মাৰী । विहानु मावियों किहा तू जाति, थाइशि वरवर प्रात में सवार पराभव पेशी, मोर चेतना प्रा ममता माया नमन वासियू करारमा ! समय गोल परिमा विद्यारी मारियर ret - लख चरोसी योनी ममता मारणम जउभव लायो। एक सदा जिनवारणी उचारि प्राज प्रापणो साधो॥ प्रय प्रतियो म प्रारंभ के प भिन प्रकार के भो मिलते हैं। इस रचना म नरक गति वे दुखों का विशप वणन है इसलिए इसकी एक प्रति मे 'नरव वेदनानी वेलि' नाम भी लिखा मिलता है । अत के कुछ पद्य इस प्रकार हैं गिरणी कान जिन पूज बीजद सुगुरु यही जहमारा । भवियण थी जिश धम करता पामीसित ल्याए ॥१३२॥ ऐ बिछ गतिनि वेति विद्यारि, जे पाला जिण पारण। तेहना धरण पमल नइ पासइ हूँ वाछु गुण ठाण ॥१३॥ यद्यपि अतिम पद में वाछु 'श- चाहता हू' अथ में प्रयुक्त हुआ है पर श्री मोहनलाल दलीचद देसाई ने जन गुर्जर रवि भाग १ और ३ मे वच्या या वालो पवि की रवनाप्रो मे इस भी मम्मिलित किया है। इमी पाम पास की सिंहा कवि की दो छोटी छोटी रचनाए प्रकाशित हो चुकी हैं। जिस १५३५ की लिमित प्रति मे नवनवर जैन युग पुस्ता पाच पृष्ठ ४.७ तक में प्रकाशित किया गया है। इनमें जम्यू स्वामि वेनि १८ पद्यो को है और रहनमि वेलि १६ पद्यो की है । जैसलमेर भडार म इसी कवि की नेमियेली १५ पद्यों को देखी थी। वह उपयुक्त रहेनमि वलि से भिन्न है या ममि न प्रति पाम न होने से निश्चय रूप से नहीं कहा जा सकता। इनकी परवर्ती रचना लावण्यसमय रचित गभवलि जा ११४ पद्यो की है। इमी नाम की ४४ पचो की प य रचना भी सहज सुटर कवि की प्राप्त होती है । पृथ्वीचन्द्र गुणसागर वेलि की दो पत्रों की प्रति घरा? क भंडार मे है सभवत वह भी १६ वी माताटीको हो। १७ वी शतानी में बलि नामवाली रचाए सबसे अधिक मिलती हैं जिनको नामावली इस प्रकार है। सम्वत्प वेलि प्रबंध म. १६१४ के प्रासपास जीवपर सं० १६१६ (लिपिकाल) गातिदास स० १६२५ (लिपिकाल) स०१६२५ साधु कोति गुरगाठाणा वेलि लघु बाहु यति वेलि जरत पद वेनि पना मोम गुरु वेलि समय मुदर वृद्धगभ वेलि भट्टारक धमदास म. १६३८ से पूर्व स्यूलिभद्र मोहन वेलि जयवंत सूरि स. १६४८ नेमिराजुल बारहमासा वलि प्र० स. १६५० ये आसपास वीर बदमान जिन वेलि सक्लच द्र उपाध्याय स. १६४३ ३० के मध्य साघु कल्पलता साधु वदना मुनिवर सुर वेलि हीर विजय सूरि देशना वलि स. १६५२ के बाद ऋषभ गुण वेलि ऋपमदास स. १६६६८७ के मध्य बलभद्रवेलि सालिग स ० १६६६ (लिपिकाल) चार कपाय वेलि विद्याकीति स. १६७० के पास पास सोमजी निर्वाण वेलि स. १६७० प्रतिमाधिकार वेलि सामत स ० १६७५ (लिपिकान) रत्नावर गणि स.१६८० पचगति वेनि म.१६८३ पाश्वनाथ गुण वेलि जिनराज सरि म.१६८६ मल्लिदासनी वेलि ब्रह्मजय सागर १७ वी शती मादित्य वारनी वेल कथा वेलि सजक जैनेतर राजस्थानी रचनाए चारणादि कवियों की वेलि रचनाए भी काफी मिलती हैं पर उनका समय निश्चित नहीं फिर भी अधिकाश रचनामों का समय १७वी व १८वी गती का प्रारम्भ ही प्रतीत होता है । क्मिन रुक्मिणी वेलि के अनुकरण में प्राटा किसना कवि ने महादेव पावती वेलि की रचना की जिमको प्रति अनूप स स्कृत लाइब्रेरी में है। इन दो के प्रति रिक्त दो प्रय रचनाएं छोटी छोटी उपलप हैं। जिनका विवरण इस प्रकार है १ भाई माता जी री वेलि प्रकागित मा भारती वप ३ प्रक यह सत मह व रचित है । शिवसिंह चोयन ने इसके प्रतिम पद्य में जो म. १५७६ का उल्लेख है उमे इसका रचनाकाल माना है पर वह विचारणीय है। पारी वेलि इस नाम को दो रचनामों पो मैंने महमारती वय २ पर ३म प्राशित दिया है। उनका रचनाकाल १५वीं व १६वी शताब्ी का है। प्राय हप कीति ८२ लाख घरोसो योनी ममता, मारपस जउ भव लायो। एक सदा जिनवारणी उचारि, प्राण प्रापरणो साघो। अय प्रतियो म प्रारभ के पर भिन प्रकार के मा मिलते हैं। इस रचना में नरक गति के दुखों का विशेष वरणन है इसलिए इसकी एक प्रति म 'नरक वेदनानी वेलि' नाम भी लिखा मिलता है । अत के कुछ पद्य इस प्रकार हैं गिरो कान जिन पूज कोजइ सुगुरु यही जइ प्रारण । भविषण थी जिण घम करता पामोसि कल्याण ॥१३२॥ सिंह गतिनि वेति विचारि, जे पालइ जिण पाए। तेहना चरण कमल नइ पासइ, हूँ वाछु गुण ठाण ॥१३॥ यद्यपि अतिम पद में 'वाछु" श - चाहता हूँ" प्रथम प्रयुक्त हुआ है पर श्री मोहनलाल दलीचर देसाई ने जन गुर्जर कवि भाग १ और ३ मे वच्छा या बाछो पवि की रचनामा म इमे भी सम्मिलित किया है। इसी के पास पाम को सिंहा कवि की दो छोटी छोटी रचनाए प्रकाशित हो चुकी हैं । जिह म १५३५ की लिखित प्रति से नव नकर जैन युग पुस्तक पाच पृष्ठ ७३ से ४.७ तक में प्रकाशित किया गया है । इनम जम्बू स्वामि वेनि १८ पद्या की है और रहनेमि वेलि १६ पद्यो की है। जैसलमेर महार म इसी कवि को नमिवेली १५ पद्यों की देखो थी । वह उपमुक्त रहेनमि वेलि से भिन्न है या अभिन्न प्रति पाम न हान से निश्चय रूप से नहीं कहा जा सकता। इनकी परवर्ती रचना लावण्यसमय रचित गभवेलि हैं जो ११४ पद्यो की है। इमी नाम की ४४ पद्या की म य रचना भी सहज सुटर कवि की प्राप्त हाती है । पृथ्वीचन्द्र गुणसागर वेलि को दो पत्रो की प्रति घरात २ मडार म है समवत वह भी १६ वी गतानी की हो। १७ वी शता । में वेलि नामवाली रचनाए सबम अधिक मिलती हैं जिनकी नामावली इस प्रकार है । सम्वत्थ वेलि प्रबंध म.१६१४ के आसपास जीवधर सं० १६१६ (लिपिकाल) गातिदास स० १६२५ (लिपिकाल) पना मोम स०१६२५ साधु कोति गुगाठाया वेलि लघु वाहु बलि वेलि जइत पद वेलि . भट्टारक धमदास " " समय मुदर , वृद्धगम वेलि हप कीति गुरु वेलि म. १६३८ से पूर्व स्थूलिभद्र मोहन वेलि जयवंत सूरि स. १६४८ नेमिराजुल वारहमासा वेलि प्र० स. १६५० के आसपास वीर वद्धमान जिन वेलि सक्लचद्र उपाध्याय स.१६४३ ३० मध्य साधु कल्पलता साधु वदना मुनिवर सुर वेलि हीर विजय सूरि देशना वलि स. १६५२ के बाद ऋषभ गुण वेलि ऋपमदास स. १६६६ ८७ के मध्य बलभद्रवेलि सालिग स० १६६६ (लिपिकाल) चार कपाय वेलि विद्याकीति स. १६७० के ग्राम पास सोमजी निर्वाण वेलि स. १६७० प्रतिमाधिकार वेलि मामत स ० १६७५ (लिपिकात) रत्नाकर गणि म.१६८० पचगति वेनि म.१६८३ पाश्वनाथ गुण वेलि जिनराज सूरि म०१६८६ मल्लिदासनी वेलि ग्रह्मजय सागर १७ वी गती मादित्य वारनी वेल कथा वेलि सज्ञक जैनेतर राजस्थानी रचनाए चारणादि कवियों की वेलि रचनाए भी काफी मिलती है पर उनका समय निश्चित नही फिर भी अधिकाग रचनात्रों का समय १७वीं व १८वीं "ती का प्रारम्न ही प्रतीत होता है । क्सिन रुक्मिणी वेत्रि के अनुकरण में प्राय बिमना दिन माग्द पावती वेनि की रचना की जिमको प्रति प्रनूप स स्कृत लावेरी में है । न नार पनि रिक्त दो अय रचनाए छोटी छोटी उपन्य है। जिनका विवरण इस प्रसार है १ पाई माता जी री दलि प्रकाशित मर भारता वप ३ अर' यह सत सहदव रचित है। गिवमिह चोयर न सके प्रतिम पद में म. १५७६ का उल्लेख है उमे इसका रचनाकाल माना है पर वह विचारागीर है। रूपारेरी वैलि इम नाम को दा बनादों का नरमारती देष २ मक ३ में प्रकाशित किया है । उनका रचनाकाल १५वीं व १६वी मातीश-प्रय - ८४ गाडण चेलो रचनाएं इस प्रकार है १ किसन जी री वेल साखला दरममी रुणेचा १६०० के मासपास २ गुण पारिएक वेल चूडो दधवाडियों १७वी शती का प्रारम ३ राठौड देवीदास जतावत री वेल वारट अखो भागोत १६१३ के प्रासपास ४ राठोड रतनसी खीवावत री वेलि १६१४ पासपास ५ राणे उदयसिंह जी री वेनि पाढा क्सिना १६६० १७०० के मध्य ६ चांदा जी री वेल वीहू मेहो दुसलाखो १६२४ के बाद ७ क्सिन रुखमणिरी देलि राठउड प्रथुदास १६३०४४ के मध्य ८ त्रिपुर सुदर री वलि जसवत १६४३ लिपिकान ६ राजा रायसिंह जी री वेलि सांदू मालाजी १६५३ के मासपास १. महादेव पावती री वेलि १६७२ ११ राउ रतन री वेलि महत कल्याणदाम १६६४८८ के मध्य १२ राजा सूरसिंह जी री वेलि गाडण चेलो १६७२ १३ राव थी मालदेव जी री वेलि १४ हूगरसिंह जी री वेलि समधा १८ वी शतादी की जन रचनामों में बारह भाव वेलि जय सोम (स. १७०३ में ) रचित कई प्रतियों मे ही उमे बेनि सज्ञा दी है। अधिकार प्रतियों में नहीं है। इसके अतिरिक्त निम्नलिखित वलिया उपलब्ध हैं १ प्रवचन सार रचना वेलि वेगह जिन समुद्र सूरि २ गुणसागर पृथ्वी वेलि गुणसागर १७२४ दे अासपास ३ पह लेस्या वेलि १७३० ४ अमृत वलि सहभाय यशोविजय १७००१७३६ मध्य ५ सुजश वेलि (जस वेलडी) वाति विजय १७४५ के पासपास ६ सपह वेलि बालचद १०४५ ७ नेम राजुल वेलि चतुरविजय ८ नेमि स्नेह देलि जिनविजय 8 विक्रम वेलि मतिसुदर १. रघुनाप चरित नवरस वेनि महेसदाम १८वीं पातीचा प्रारम साह लोहट ८५ " " ११ म मनोपसिषजी री वेनि गाहर वीरमाण १७२६ में पूर्व १२ पीर गुमानासिंघ जी रो बलि १८वी शती का प्रत १६ वो शनाली की रचनाए भी बहुत सी मिलती हैं । उपलब्ध विवरण निम्न लिखित है १जीव वेलही देवीदास १८२४ के मासपास २ बीर चरित्र वेलि भान उद्योग १८२५क ३ गुम वैति वीर विजय १८६० ४ सील टेलि ५ म्यूल भद्र का रस वलि मारगक विजय १९६७ ६ नम राजिमती स्नह बलि उत्तम विजय १८७८ ७ सिद्धाचल सिद्धि लि १८८५ नेमिनाथ रस वेलि १८५६ ६ मि स्नेह बलि जिन विजय इनके मतिरित जात भ्रमर वैलि और दया वनि का उल्लेख ऐसियाटिक सामाइटी क जन प्राय की सूची में है सपा माध्यात्मिक प्रमाद वेल का उल्लस पदा या पर यह देखने में न पान स उसके रचयिता मोर रचना काल का पता नहीं है। वेलि सजक हिन्दी रचनाए हिन्दी भाषा में कबीर के बीजक में वलि नाम की एक छोटी सी रचना है, जिसमें प्रत्यक पक्ति के मत में ही रमैया राम शब्द मात है । परन्तु बीजक की प्रामाणिकवा दिग्य है मत्त स्वामी नरातमदास जी का सम्मति में कबीर के नाम स स रहोत यह पनि कबीर की रचना नहीं है। . तुलसीदाम की "मनोरय बन्नरी नामक एक रचना प्रसिद्ध है। इसी नाम की एक भय रचना मगवानदास और रामरा की बात हुई है । वृदावनवास की विलि स र माठ रचनाएँ बतलासी गमी है। इसी प्रकार घनानन्द रचित "रस केसि पल्लि" पौर वियोग देलि तपा नागरीरास रचित रायवल्लरी और कील पराग्य वल्लरी प्रसारित हो चुकी है । द्रनिधि प्रयावनी में जयपुर के महाराजा प्रतापसिंह रचित दुस हरण वेषि और दादू यथावली में दादू रचिन काया वेति अप धुकी हैं।
८६ जनेतर गुजरातो वेलि रचनाए जनेतर कषिया द्वारा रचित गुजरातो रचनामो मे "वल्लभ वैलि' एक ऐति हाशिव काव्य है जो कि वेशव रा वणव ने १७वी शतानी के उत्तराद्ध में रचा है इसमे स . १६७७ मे गोकुलनाय जी गोकुन पाए वहा तब का ऐतिहासिक वृत्तांत है। वल्लभाचाय का जम सवत् इसम १५२६ बतलाया गया है। प्रस गो का स वत् वार उल्लख इसमै महत्वपूर्ण है । वप्णव धम पतावा मासिक क पोप १६८१ क मा में यह छप मुकी है। दूसरी रचना सीता वेल पवि वजिया की है। इसके पाच कहवको म राम के साप सीता का वएन है । सीता का स्वरूप वर्णन करते हुए लिखा है सीता हप प्रलेखि धनिता करे यखान । सोता ह सुरन रघि निमि सरोवर सारग पानि । गुजरात विद्या सभा म इसको प्रति है । प्राचिन काव्य विनोद में यह छप - जीवनदास रचित थुतव ल का उल्लेख हस्तलिखित पुस्तकों की सूची में मिलता है। प्रेमानद रचित प्रजवल म प्रधानतया कृष्ण के बाल चारित्र का सरस भाषा में वान है । कवि दयाराम रचित भतवेल मे भक्तो का चरित्र पाया जाता है। रसलि नाम को एक रचना रा १७३६ को ज्ञात हुई है । स० १६०७ मे केशव किशोर रचित थोकीरतलीला में वल्लम कुल की बलि का उल्लेख मिलता है । वायिर भक्ति उत्पान है गजर पर से जानि प्रगट भी विटठल नाप नू बोनी येलि बढानि ॥११॥ प्रो द्वारकेस्वर जु कृपा करी लोनी हो अपनाय । षी यस्तमकुल को वेलि पर शव किगोर पलि जाय ॥ यहा वेलि शन का प्रथ 'भक्ति की वेलि" समझना चाहिए। उपयुक्त विवरण से स्पष्ट है कि दिगम्बर श्यताम्बर भोर जनेतर रचित वलि सजक रचनामा का प्रारम १६वी तालीस होता है । सवस मधिक रचनाए स्वताम्बर कवियों की है, जिनमें अधिकारा घाटी छोटी है । जनतर राजस्थानी रचनाओं में कृष्ण
८७
रूक्मिणो और महादेव पावती वैलि ही बडी है, बाकी सब छोटी छोटी हैं। हमीर कवि
ने स० १७८६ म नवमाला वलियो छत में रची।
दिगम्बर कवियो द्वारा रचित वेलि
दिगम्बर जैन कवियों द्वारा रचिन कई वेलि काव्यो का उल्लख जयपुर दिगम्बर ।
प्रय सूची भाग २ मे पाया जाता है। जिनमे से पचेद्रिय की वेलि ठाकुरसी कवि द्वारा
रचित स० १५८५ की सबसे पुरानी है। इसकी हस्तलिखित प्रति हमारे संग्रह मे भी है,
जिसमे रचनाकाल १५५० दिया है । प्रादि मत इस प्रकार है -
वन तरुवर फल सातु फिर, पय जीवतो सुछ द
परसरण इद्रा प्रेरियो बहु दुस सहई गय द
कवि गेल्ह सुतनु गुण घामु, जग प्रगट उकुरसी नामु ।
केरि वेलि सरस गुणगाय, चित चतुर मनुष्य समझाया।
मन मूरख सख उपाई, तिरितेण चितिन सुहाई
नहीं जम्यों रवरण पसारो, इह एक वचन स सारो।
सवत पदरे से पचासे तेरिस सुद कातिक मास ।
जिहि मन इद्रिय वसि क्यिा तिहि हरत परत जग जिया।
इसी कवि द्वारा रचित नमिराजमति वेलि और गुरण वेलि तथा गेल्ह रचित नाम
बलि का उल्लम्ब जयपुर भडार सूची में है । ये तीना रचनाए मि 1 है या अभिन्न प्रतियों के
मिलाने पर ही निश्चय हा सकता है । इसी सूची म भारत की बलि का उल्लेख है । दिल्ली
के पचायती मदिर की सूची में १४ गुण स्थान वति का उल्लख है जा यया-योति के शिष्य
ब्रह्मचारी जीवन घर रचित है । हमार संग्रह मे हर कोति रचित पचगीत वेलि भी प्राप्त
है जो संवत् १६३ में रची गयी है । पच इद्रिय वलि के साथ ही यह लिखी मिली है।
दोनों एक ही शली की है । मादि मत इस प्रकार है-
किसन जिनसर प्रादि करि, बद्ध मान जिन मत ।
नमस्कार करि सरस्वती, वरणो वेलि मन्त ।
मियामोह प्रमाद मब, इद्री विषय
योग प्रसजय सू भरे जीव निगोह जाय ।
प्रत इस में इक सिद्ध पन त, मा मिल जोति रहा गुरगवत ।
भादि-
६साय।
६५ जिहि जन जरा नहीं बोस, सुख कास मनन गमोसे । सुभ सक्त सोल तियासे, नवमी तिपि धावण मासे । भनि लोक सम्बोधन कोजे कवि हर्षकोरत गुण राजे ।। इममें सबस प्राचीन श्वेताम्बर रचना चिटुंगति वेलि की माति पार गतियो क दुखो का वणन करते हुए पचम मोक्ष गतियो के दुखों का वर्णन करते गति का वरणन है । खोजने पर, सभव है मोर भी कुछ रचनामा का पता चले। ये रचनाए छोटी छोटी हैं इसलिए उनका उल्लेख सूची पत्रो में कम ही मिलता है। इन समस्त वैलि सजक रचनामो का स्वतत्र रूप से अध्ययन किया जाना भाव श्यक है। अच्छा हो इनका एक संग्रह अप प्रकाशित किया जाए। हुए पचम मोम रेलुआ सज्ञक रचनाए प्रत्येक वस्तु की सजा का कुछ न कुछ कारण होता है । उस मना की अपनी परम्परा होती है, जिसका प्रवेपण बहा रोचक और ज्ञानवरक होता है। साहित्यिक रसनामा नामो में भी विविध प्रकार हैं। कई रचनाओं को उसके आध पद से प्रसिद्धि हो जाती है जसे "भक्तामर" कल्याण मदिर" प्रादि । कई रचनापी का नामकरण उनके विषय पर तथा कई रचनामों का पद संख्या के माधार पर । लोकभापा की रचनामों मे उनके विशेष ढाचे वण्य-विषय छन् प्रादि क आधार से सकडों सभाएँ पायी जाती हैं। से फागु विवाहलज, रास, मास, धवल, धमाल पचरी, वेलि, सवाद, सघि, पवाडा मादि संबों राजस्थानी एव गुजरातो मापा की जैन रचनाएँ पामी आती हैं। जिनमें से कुछ रचनामा का परिचय मैंने एवं प्रो. होरालाल रसिकदास कापडिया ने जैन सत्यप्रकाश जनधम प्रकाश, राजस्थानी, कल्पना प्रमण आदि में प्रकाशित किया है। ऐसी रचनामों की लगभग १२५ स ज्ञाए मैंने एकत्रित की हैं जिनमें कुछ पर अपने राजस्थान विश्वविद्यापीठ उदयपुर के सूयमल मासन मे ये हुए भापण "राजस्थानी पन साहित्य" शीर्षक में प्रकाश डाला है । यहा पर एक ऐसी अप्रसिद्ध सावापी सपना का परिचय दिया जा रहा है वि.का माज तक "जन गुजर कवियों 'पादि किसी प्र में उस्लेख देखने में नहीं भाया। बारह वर्ष हए जसलमेर के भान मण्डारों का अवलोकन करने के लिये हम मयम बार जब वहा पहुँचे तो वहा के बडे भानमार मादि को समस्त कृतियों का मतो मांति अवलोकन कर कनिपय प्राचीन स ग्रह प्रतियो में से प्राचीन राजस्थानी की रथ नामों को प्रतिलिपियां कीं। तमी सव प्रथम हमें 'रेलुमा सशक पार पाथ पनामों की उपलम्पिहुई जो सभी सरतरगच्छौष रचनायें हैं भोर उनका रचनाकाल स. १३३१ से १३८६ के बीच का है। पभी तक इस पहले भोर पोछे को किसी शताब्दी की इस सशावाली रखना हमारे जानने में नहीं भायी।
रेलुमा' स ज्ञावाली प्राप्त रचनाओं म उनके रचयिताओं ने कही भी इस नाम का प्रयोग नहा दिया है । उन रचनायो में इस सना वा उल्लेख प्रतिलेखन पुष्पिका में पाया जाता है । प्राप्त सभी रचनामो का छ- एक ही प्रकार का है, और लोकगीतो की भाति पहले पद्य के मन तर प्रत्येक गाया के बाद दुहरायी जाने वाली प्राचली पायी जाती है, इससे रेलुमा नामक किमी लोक गीत को चाल म इन गीतों का निर्माण हुमा है और इसी कारण इन रचनामो के म त मे रेलुमा सना का प्रयोग पर दिया गया है। रेलुमा को वही रेल्हुमा भी लिखा है । ये लोग गीत मूलरूप म क्या था इसका पता लगाना मावश्यक है। प्राप्त रचनामों में शालिभद्र रेलुमा' भगवान महावीर कालीन मुनिराज के स ब ध म तथा अवशिष्ट मभी खरतरगच्छाचार्यो या उनकी परम्परा से सम्बधित है। जसलमर के बहा उपाश्रय स्थित पचायती भहार म स० १४३७ वसाख शुक्ला २ खरतरगच्छाचाय जिन राजसूरिजी के उपग व्य० देदा की पुत्री माकूर श्राविका ने लिखायी हुई स्वाध्याय पुस्तिका लिखी पी जिसके प्रारभ एव मध्य के कई पत्र प्राप्त नहीं है ये रेलुमा स ज्ञक रचनाए इसी प्रति मे प्राप्त हुई है। प्राप्त रचनामो को सू इस प्रकार है १ जिनकुगलस रि रहुप्रा गा० १० जयधमगरिए पत्रा ४१२ में २ शालिभद्र रेलुमा पत्रार ४१४ म ३ गुरावलो रलुमा गा० १३ सोममूर्ति पत्राक ४३८ ४ श्री जिनच द्रसूरि रहुमा- गा०८ चारित्ररित पाक ४४० ५ जिनप्रबोध सूरि वणन (रेलुमा) गा० १० पधारन पत्रा अब यहा इन रचनाम्रो का माद्य पद दिया जाता है, जिसस इसकी रचना व घर सम्ब पी ठीक से पाठकों को परिचय मिल जायगा। श्री जिनकुशलसूरि रेल्हुमा मादि पद धनु धनु जललो मतिया घनु जयत नदेविय इत्थाय गुणसपुन्न । जाह तगर पुति अयारउ परवादय गजको सिरि जिग्णरुशल मुणिंद ॥१॥ दलि हलि गुरु गिहिमाह माल्दिया जिणकुशलमूरि गुरु सपियह । लम्मा जिन भर पारु ए अपलो ।। गा.८ जो सालिम रेलुमा प्रादि पद राजगदी उद्यानपति इमि धीर समसरिउ घन एसउ सालिभद्र। निर नियरिय मनु हापियः, विभुवनगुरु पूछियउ वदादिमु सुभद्रु ॥ १॥ तर तेय मुनि वेड पागुरिया धनु सालिभद्र विहरण पलिया निय बाणि हाथि पारिस || आचली गुबती रेलुमा प्रादि पद व-हिमग्गु जिणि पयर्ड करि सहि अणहिल पारणि बाइय जगि जसढक्क सा जिणेमरसूरिगुरुग्यणमणि भायहि जे नर ते समारह चक्क ॥१॥ नर जुगपहाण गुरुवरिय दारु निय कठि तउ तिय लोय सारू । ए मुक्तिरमणि जियु तुम्ह वटेइ । अचला।
१० 'रलुमा' स ज्ञावाली प्राप्त रचनामा म उनक रचयितानों ने कही भी इस नाम का प्रयोग नहीं किया है । उन रचनायो के इस स पापा उल्लेख प्रतिलेखन पुष्पिकाम पाया जाता है । प्राप्त सभी रचनामों का छ? एक ही प्रकार का है, और लोकगीतो की भाति पहले पद्य के अन तर प्रत्येक गाथा के बाद दुहरायो जान बाली प्राचली पायी जाती है, इससे रलुप्रा नामक किसी लोक गीत को चाल म इन गीतों का निर्माण हुना है और इसी कारण इन रचनामो के प्रत मे 'रेलुमा सज्ञा का प्रयोग कर दिया गया है । 'रेलुमा को कही रडा' भी लिखा है । य लोग गीत मूलरूप म क्या था इसका पता लगाना मावश्यक है। प्राप्त रचनामों मे गालिभद्र रलुप्रा' भगवान महावीर कालीन मुनिराज के स ब ध म तथा अवशिष्ट सभी खरतरगच्छाचार्यों या उनकी परम्परा से सम्बधित है । जसलमर के बडा उपाश्रय स्थित पचायती भडार म स ० १४३७ वसाख शुक्ला २ खरतरगच्छाचाय जिन राजसूरिजी के उपदेश य० देदा की पुत्री माकूर श्राविका ने निखायी हुई स्वाध्याय पुस्तिका लिखी थी, जिसके प्रारभ एव मध्य के कई पत्र प्राप्त नहीं है ये रेलुमा स नक रचनाए इसी प्रति मे प्राप्त हुई है। प्राप्त रचनाम्रो की सूची इस प्रकार है १ जिनकुशलस रि रल्हुमा मा० १० जयघमणि पत्राक ४१२ मे २ शालिभद्र रेलुमा पत्राक ४१८ म ३ गुरावली रलुमा गा० १३ सोममूर्ति पत्राक ४३८ ४ श्री जिनच द्रसूरि रहमा- गा०८ चारित्रगरण पत्राक ४४० ५ जिनप्रबोध सूरि वणन (रेलुमा) गा० १० पद्मारल पत्राक अब यहा इन रचनाप्रो का प्राद्य पद दिया जाता है जिसस इसको रचना व छट सम्बन्धी ठीक से पाठकों को परिचय मिल जायगा। श्री जिनकुशलसूरि रेल्हा प्रादि पद धनु धनु जरदो मनिका धनु जयत नदेविय इत्याय गुणसपुन्न । जाह तणर यूलि प्रवरिउ परवाइय गमणा सिरि जिणशल मुणिंद ||१|| इलि हलि गुरु गिदिमाह माल्दिया जिणकुशलसूरि गुरु सरियइ । लम्भह जिन भर पा ए॥ अषला।। - - गा०८ भी शानिभद्र रेलुना प्रादि पद राजगृही उद्यानपति अमि पीर समसरिउ धन इसउ सालिमद्र। नियनित सि मनु हापियर, त्रिभुवनगुरु पूछियाउ उदाविसु सुभद्र ।। तर तेथ मुनि वेड पागुरिया धनु सालिभद्र विहरण 'चलिया निय नगणि हाथि पारिस ॥२॥ श्रावली गुरली रेलपा भादि पद व हिमग्गु जिणि पथ करि सहि अपहिल पारणि बाइय जगि जसदरक सा जिणेमरसरिगुरुरयणमणि माहि जे नर ते ससारर चक्क ॥१॥ नर जुगपाण गुरुवरिय हार निय कटि तउ तिय लाय सारू । ९ मुक्तिरमणि जियु तुम्६ वटेइ ॥ अचली।
के पवाडा संज्ञक रचनाएं भारत का एक विशाल देश है। प्रारम्भ से ही यह भनेक प्रदेशा के समूह रूप में विख्यात रहा है । जन परम्परा के अनुसार इसका भारत नामकरण भ ऋषभदेव के ज्येष्ठ पुत्र भरत के नाम पर हुपा है म. ऋषभदेव ने त्यागी जीवन स्वीकार करने से पूर्व मपने अन्य ६६ पुत्रो को अपना राय बाट दिया था। उहोंने जिस जिस प्रदेश पर राज्य क्यिा वह वह प्रदश उसपे नाम से प्रसिद्ध हो गया। समय समय पर शासकों के नाम बदलते गये तथा इनकी संख्या घटती बढनी रही। जनागमो में २॥ मार्यदेशों के नाम पाए जाते हैं और बौद्ध ग्रयो मे १६ जनपदों का उल्लेख है। बसे पोटी दूर पर भी रीति रिवाज प्रादि में भिनता पाई जाती है मत प्रदेशों मे तो पारस्परिक मि नता अधिक मात्रा में पाया जाना स्वाभाविक ही है। जनागमों मे १५ प्रकार की भाषामा का भी उल्लेख है पर उनके नाम नहीं मिलत। वसे मागधी मगध देश का, शौरसनी- गूरसन (मथुरा) प्रदेश की महाराष्ट्री महाराष्ट्र की इस प्रकार भिन प्रदेशों की विशेषता को प्रधानता देकर उन प्रदेशों के नाम ही भाषानों के माम प्रसिद्ध रहे है । वि० स० ५३५ मे रचित कुवलयमाला नामक जैन अप में तत्कालीन प्रसिद्ध १८ देगी भाषा के उल्लेख के साप १६ भाषामों की विशेषतामों के उदाहरण भी दिए गये है, जो हमारी प्रान्तीय भाषामो की प्राचीन विशेषतामो पर महत्वपूण प्रकाश हालते हैं। - भारत की प्रधान प्रतीय भाषामों के क्रमिक विकास का अध्ययन करने के लिये जन साहित्य बहुत ही महत्वपूण साधन है। जनों का प्राचीन साहित्य अर्धमागधी प्राकृत म है जो कि ढाई हजार वर्ष पूर्व मगध तथा उसके पास पास के प्रदेश की भाषा थी। इसके बाद जब जन धम का प्रचार शूरसेन महाराष्ट्रादि पश्चिमी तथा दक्षिण प्रदेगों की और बढ़ने लगा तो जनाचार्यों ने इन प्रदेशों की भाषामों में भी पप रचना प्रारम्भ की। जहा तक महाराष्ट्री भाषा के विकास क्रम के अध्ययन का प्रश्न है, महा राष्ट्री प्राकृत में जन साहित्य विपुल परिमाण में पाया जाने के कारण बहुत मी उपयोगी सूचनाए इन प्रयों से मिल सकती है । पर सेन का विषय है कि महाराष्ट्री विद्वानों ने अभी तक इस ओर यथोचित ध्यान नहीं दिया है । प्राकृत के पश्चात प्रपनश भाषाएँ लोक सभा के पद पाद हई । अपभ्रपा भाषामों का प्रपिकाश साहित्य भी जन विद्वानों की ही देन है । इन ग्रयों का भी भली भाति उपयोग होना पाहिए। कुवलयमाला में महाराष्ट्री की विशेषता इस प्रकार व्यक्त की है- विष्णले गहिल्ले बल्लविटे ताप मरहटपे । पिप्र-महिला सगामे सुदर गत्तेय भोरण रोद्दे।" 4 साकृत छाया- ‘दिपल्ले गरिले उल्लपतस्तत्र महाराष्ट्रीयान् । प्रियमहिलासप्रामान सुदरगाश्य भोगिनो सैद्रान् ।।" जसा कि श्रीयुत प्रभाकरजी माचवे ने 'वल्पना' के प्रपांव में प्रकाशित अपने लेख में लिखा है प्रत्येक भाषा का अपना पशिष्टय होता है, उसकी अपनी सांस्कृतिक परम्परा होती है। परन्तु जहाँ तक भारत की प्रातीय भाषाओं का सम्बप है, उन सब में अपनी अपनी विशेषता होने पर भी सव में एक सूत्रता और सामा यता भी है। वास्तव में प्रापके ये ग बहुत हो तथ्यपूण हैं। वतमान प्रातीय भाषाओं का विकास अपभ्र 1 भाषामों से हमा है इमलिय छद, शैली, शब्दावली प्रादि की दृष्टि म ही नहीं, प्रथों के नामकरण में भी प्रातीय भाषाओं का साहित्य अपनी भाषाओं का बहुत ऋणी है । इधर दो तीन वर्षों में राजस्थानी, गुजराती, हिन्दी, बगला मादि के प्राचीन नापों के नामों पर विचार करने की मोर ध्यान गया तो यह बात और भी स्पष्ट हो गई। अपना कार समान प्रकार के प्रयों के नाम रखने की यह प्रपा पर पड़ी थी कि सब नामों के प्रत में एक ही पर (यथा रासो मगल प्रादि) जोग जाता था। इस प्रकार के नामान्त पदों में से एक का प्रचार एक प्रदेश में हुमा तो दूसरे का दूसरे प्रग में । राजस्थान एव गुजरात की सीमा मिली होने से प्राचीन राजस्थानी एव प्राचीन गुजराती एक ही भाषा के दो नाम समभिए । १५वीं राती मे इन पारस्परिक भेद कुछ स्पष्ट होन लगा था। इससे पूर्ववर्ती दोनों प्रान्तों की लोष भाषा की रचनामों में विशेष भेद नहीं है । अत नामात पों को भी एक्ता स्वामाविक ही है। फागु दिवाला, राप, चौपाई वेनि, मषि, मनोका, घमास, धवल, दावनी सशक १४ रचनाए दोनों भाषामो में पाई जाती हैं। हिदी भाषा म राम को सज्ञा रासो के रूप में प्रसिद्ध है । बसे हिन्दी में मैनासत हरिवद सत आदि सत नामात वाली रचनामों की परम्परा भी अपनश साहित्य से ही प्राई है । बगाल में मगल नामान्त वाले बहुत काय मिलते हैं तो हिदी एव राजस्थानी में भी रूखमणी मगल सशक काव्य उपलब्ध है। इसी प्रकार महाराष्ट्री साहित्य में शिवाजी महाराज के समय पवाडा नामान्त वाली रचनामों का प्रचुरता से निर्माण हुआ । मायवेजी के उपयुक्त लेख में इनके सम्ब ध में यह कहा गया है- 'बामन पडित मोर मोरोपत जसे पहिन कवियों के बाद मध्ययुगीन मराठी साहित्य को दूसरी उल्लेखनीय विशेषता है "पोवाहो' नाम वीर काव्य । इसमें युद्ध या प्रय प्रसग-विशेष के वरणन, वीरों की जीवनिया और ऐसे ही भोजस्वी विषय रहते हैं। "शाहिरों' का एक पूरा फड (दल) इसे गाता है और लदी कविता होने से उमम प्रसंगानुसार गद्य भी मा जाता है। ऐमे प्राय ३०० ऐतिहासिक पोवाडे मिलते हैं। मज्ञानदास का 'मफजल खा-वध' और तुलसीदास का तानाजी मालमुरे ये दो छत्रपति शिवाजी काल के पोवाडे बहुत विख्यात हैं । सा ४२ में ऐसे ही जनकाव्य इसी गली में लिखे गये। जनवाणी' के गत जनवरी के प्रक में प्रकाशित प्रो. महादेव सीताराम दूमरकर के "प्राचीन मराठी साहित्य' शोषक लेग में भी उपयुक्त मागय का ही वक्तव्य है। मापने लिखा है- सबसे पुराना पवाडा भगिनदास का मिलता है जो अफजल खान के वध पर लिखा गया है। पवाडों की उत्पति घम मूल है। प्रथम साधु सन्तों के चरित्रों पर बाद में जब मराठे राजनीति मे अग्रसर होने लगे तब वीर मराठी के पराक्रम मोर बहादुरी पर गीत ( पवाडे ) गाये जाने लगे। मराटा के सामाय विस्तार के साथ पवाडों का क्षेत्र भी व्यापर होता गया। प्रगिनदाम अपने कार निर्दिष्ट अफजलसा के पाडे में कहते हैं- 'यह सूरवीर पुरषों का पवाडा शूरवीर हो सुनें ।' गयाप्रसाद एड सस मागरा से प्रकाशित तथा नागयण वासुदेव गारवाले द्वारा लिखित "मराठी साहित्य का इतिहास" हाल ही में मुद्रित हुआ है। मा पृ ७० से ८७ में पवाडों के सम्बध में कुछ विशेष वणन पाया जाता है। पर उसका मार यही .
- हैद मराठी भाषा में पवाडे शिवाजी महाराज के समय से पहले प्रास नहीं है। श्री शिवाजी वालीन पवाहे भी ७८ हो उपल ध हैं। ये श्वी शती में प्रधिम ये गये। पवा- कोर गीत के रूप में होने स महाराष्टी शब्द कोशादि म पवाडे का प्रयास, प्रथ ही 'वीराच्या पराक्रमाचे विद्वानाच्या प्राद्धिमत्तेच, तसच एखाद्याचे सामथ्य गुण कौसल, इकाचे काव्यात्मक रणन, प्रशस्ति, स्तुति स्तोत्र पराक्रम कौति ' दिया जाता है। अर्थात चोरों में पराक्रम का वन करने वाले काव्य के प्रथ में पवाडाद रूढ हो गया है। यहा तक मराठी साहित्य मे पाडों को प्रचुरता, लोक प्रियता एवं प्राचीनता तथा उप पर विद्वानो के मत दिये गये। अब गुजराती एव राजस्थानी साहित्य में पया-विम प्रथम प्रयुक्त किया गया है इस पर विचार किया जायगा। स. १४५३ के चत्र सुदी १० को जाखो मणिहार रचिन हरिश्चद पुराण कपा के प्रारम्भ में दो बार 'पयडोसन व्यवहृत पाया जाता है- सुद्धि बुद्धि मति देकर रउ पसाउ ज्यू धुरि पण्डो हरिचन्द्र राउ। पर वित मत लावो यार, सत हरिचद पयडो ससार । जहाँ तक पवाडा सनक रचनाओं की प्राचीनता का सम्बन्ध है- सव प्रथम जनाचाय हीरान मूरि के स. १४८५ में रचित विद्याविलास धरित म उसे पवाहो की सजा दी गई है। विद्याविलास नारद पवाओं, हहदा भीतर प्रतराष्ट्र विष पुष्य परो तुष्टि, भाय प्रोएरो प्राणी ॥ यहाँ पवाडो र परित याव्य वे प्रथ में प्रयुक्त है। विद्याक्लिास की क्या वीर रमारमा नहीं है अपितु इम वचन के अनुसार प्रम और कौतुक रम प्रधान है। प्रत उस समय तक 'पवाडो' - वीर गीत के प्रथ में रूढ नहीं हुआ था, यह तथा- जाणी। स्पष्ट है। इस परवती उश्लप पवाडा जन पवि मानव द्वारा रचित पर पयाडो है, जिसकी रचना स . १५६५ में मागरोल वादियावार में हुई।
१८ स० १५६३ में वीरू सूजा की रचना रावजतसीरो छट" वास्तवमें पवाडा ही है । उसके पद्याप तीन और चारसो एक मे 'प्रवाहा', "प्रवाहो" शब प्रयुक्त है । (१) सोहिया प्रवास सिद्ध सोस । जम्बुमह दीप जग्गो जगीस ॥३॥ (२) काबिली पट्ट बहवट किय घोकाहर राइ घरू जइससी प्रधाडउ किय जमा जाम १७ वी शताब्दी के पद्मा तेली रचित रुक्मिणी व्यावलो की स. १६६६ की लिखी प्रति हमारे म ग्रह मे है - उसके पद्याव २३ व २४ मे पवाडा और "पुवाहह" शन का प्रयोग हुआ है- 'इणि अवतार पवाडा कोधा तेता 'सहूई जाणु । जुग अतर प्राग अवतरोया, तेहनउ पार न जाण ॥२३॥ प्रथम पुपाडा पूतना सोखी र दलीयो मुसाल । प्रहरि नई "गई दावानल दापय नइ कुलि कालि ॥२४॥ पाबू जी के पावडे की भाति निहालदे सुल्तान का विस्तृत पवाडा लोक काव्य स गृहीत किया जा चुका है, जिसका कुछ अश मरु-भारती में प्रकाशित हो चुका है।
U 'सत' संज्ञक रचनाएं विश्व में प्रकृति और प्राणियों को निमित वस्तुओं की मख्या अनन्त है। वहा रिक सुविधा के लिए उन वस्तुओं का पृषक करण मिन मिन नामों द्वारा किया जाता है। इस तरह नामों की सस्या भी असम्य हो जाती है। साहित्य की रचनामों में भी शलियो व विषय प्रादि को विभिन्नता के कारण उसके अनेक प्रकार हो जाते है। उनकी पृयक पृषक सनाए देना पावश्यक हो जता है । उनमें से बहुत से नाम तो परपरागत (सक्डों वर्ष तक रचयिताप्रो द्वारा) समाहत पाये जात हैं तो कुछ नये नामों को भी मृष्टि होती रहती है और पुरारानी सनाए मुला दी जाती हैं। हमारी प्रातीय लोक भाषाओं मे रचित रचनामो की मझाए भी मकड़ों की संख्या में हैं जिनमें से कुछ सनाए प्राकृत, सस्कृत, मपभ्र । प्रादि की प्राचीन रचनाओं के अनुकरण म रची गई हैं और कुछ लोक साहित्य से ले ली गयी हैं, नागरी प्रचारिणी पत्रिका के गत वप ५८ प्रब ४ में प्रकाशित "प्राचीन भाषा कायों की विविध समाए ' शीर्षक अपने निबध मे जन कवियों द्वारा रचित राजम्पानी और गुजराती भाषा की प्राचीन काव्य रचनाप्रो की ११५ सनामों का उल्लेख करते हुए करीव ८० रचनाओं के मम्बन्ध में सक्षेप में प्रकाश डाला गया है, इन सलामो के मतिरिक्त और भी अधिक सनामों वाली रचनाएँ मिलती हैं जो राजस्थानी और गुजराती भाषा के काव्य के नामात पद के रूप में विशेष प्रयुक्त न होकर हिंदी भाषा गायों के नामान्त पद के रूप में विशेष व्यवहृत हुई हैं | 'सत' मजा भी ममी ही है । इम नामान्त वाली प्राप्त रचनामों का परिचय कराना हो प्रस्तुत लेख का विषय है। चारहमासा, रास 'चरचरी मातृका' का (अम्बरावट) प्रादि मनाए जिम प्रकार अपभ्रा काल से हिंदी राजस्थानी गुजराती म परपरागत चलती पा रही हैं 'सल सशक" पचनापों का स्रोत अपभ्रश काल से ही पलता माया है । पत पवप्रथम इस मावाली अपभ्रा रचना का परिचय देकर फिर हिंदी काव्यों में इसकी जो परपरा रही है इसे बतलाया जावेगा। पाटण के सपवी पाहे के जन भान महार में ताडपत्राय स ग्रह प्रतियां हैं । इन में से न. ५६ में सत्तरहवीं रचना मोतासत नामक है। जिसका विवरण गायकवार १०० - - प्रोरीऐंटल मिरीज से प्रशगित पत्तनस्पप्राच्य जन भडागारीय ग्रप मूवी भाग १ के ४५ में इस प्रकार मिलता है (१७) मीतागन अपभग पत्रात ८७ म ४६ गाथा २० प्रारभ पूरवि दशरघु जरिणय म व मागपि । र"ज भरह रियावियन राय म) लशवरण सजन ।। पागि लागी मनाविय घे स्वामि मह एक प्रथराह । र (1) मुराहक ए भगए, लइले सजम भाउ । निवि दुदुहि वाजियए, चलियस सीताप्तत 1000 प्रस्तुत प्रति मीतामन रचना नरहवी चौदहा तारी की प्रतीत होनी है इस लिए मत' म ज्ञक रचनामो की परम्परा करीब मात यो पाद मौ वष गितनी प्रानीन गिद्ध होती है । इस रचना म सीता क गत सत्व तीन गुण की चचा होने मे इस रचना का नामात पर मत रखा गया है। परवर्ती रचनामों में भी हमी अय मे य' सना और जन जनेतर हिदू मुमतमान मभी पवियो न अपनायो है जिसका पता प्राग निये जान वाले काव्यो के विवरण द्वारा पाठको को भनी माति मिल जाएगा। मीता मत क परवर्ती हिदी माहित्य की 'मत मजव रचनाओं में गबस पहली रचना कवि साधा रचित मनामत है इसमें मना नाम एक मती स्त्री न अनेक प्रलो भनो मे बचकर किस प्रकार प्रपने शील की रक्षा की उगका विवरण दिया गया है। इस रचना की तीन हस्तनिखित प्रतियों की चर्चा डा० माता प्रमा गुप्त ने प्रतिका के गत जुलाई मब म की है। मद प्रथम इस रचना का पता (१) जोधपुर के राजकीय पारी की प्रति सन् १९०२ की खोज रिपाट प्रागत विवरण म हि नी जगन को मिना । (२) चनुरभुज दाम के मवुमालनी मस्करण में मना' थी कथा माक्पा क्या क स्प में पाई जाती है गौर अभी अभी प्रो० एम म प्रशारीन (३) प्राचीन प्रति का विवरण बिहार ग्मिच सामायटी के जनर ने माच जूा व अव म प्रकाशित किया है। इन तीनों पाठ समस्यायों पर हा0 माता प्रसाद गुप्त ने अपना विचार व्यक्त करते हुए लिसा है कि एक दो प्रतिये याधार में मापा के सम्म व मे निणय बरना टीव होगा। मत इस प्रयकीप्रय तीन प्रतियो की जानकारी या ना प्रावग्या मना है। नवीन जानकारी के प म प्रास प्रतियों म म प्रथम प्रनि वा विवरण प्रब से मात यप पूर्व मैंने अपन — राम्थान में हिरे हस्तलिखित ग्रथा की योन के द्वितीय भाग ने पृष्ठ ८१ म प्रकाशित किया था पर वह डा० गुप्त जी प्रवनोक्न म प्रायोगी प्रतीत होता .
- मेरा पिया गया विवरण इस प्रकार है (११) मना का सत - प्रथमहिं विनउ सिरजन हारा, अलख अगावर मया भडारू । प्रास तरि मोहि बहुत गुमाई , तोरे उर कापी वरद को नानी । शत्रु मित्र सव का समाहै, भुगत दहि काहु न विसार । फूलिज रही जगत पुरावागे, जो राता सो चला सभारी । अपन रग अाप रगराता, बूझे कौन तुम्हारी बाता। दोहा बधन माखिर मारियों, प्रको चरित न सूझि। सोवत सपनों देखियो, कान घर पछु बूझि॥ प्रत- मना मालिन निया मुलाइ, धरि भाटा वुटनो निहुरानो मुर मुहानी कस दुरदीन, कारे पोरे मुख टोका लीन ।। गदह पलानी फ ान चढाम्रो हाट हाट सब नगरी फिरानी। जो जसा कर सुनसा पावे, ग्रिन नातन का अनख न पावे। अगे दिन जा जो रहवामा दो वाय पि लुनिय पाना । दोहा सतु मना का साधिन, थिर राखा करतार । कुटनो देस निकारी, कोनी गगा क पार ।। इति मना का सत समास लेखन काल १८ वी तानी। प्रति गुटकाकार पत्र ५०॥ म ६७ पक्ति १३। प्रभर १३॥ (अभय जन प्रथा नय वि० गुटका) विशेष मालिन ने मना का सत (गाल) च्युत करने का प्रयल किया पर वह अटल रही बीच म १२ मास का वणन है। दूगरी और तासरी दो प्रतियां अनूप सस्कृत लाइब्रेरी बीकानर म है जिनका जिनका विवरण इस प्रकार है - गुरका न० ७६ (ब) मना सत रचयिता मिया साधन पत्र १० से १७ तक लिखित यह प्रति म०७२४ से २७ ता की निमित है। इसका विवरण राजस्थानी ग्रयो र प्रतगत राजम्पाना उथ सूची म छपा है । इस प्रति का न० ११७ है । प्रति प्रमी मर सामन नही है पर इमर विवरण म मालूम हाता है कि इसका पाठ मगुद सा है । - प्रति के विशेष विवरण मे लिखा गया है पुस्तक जीण अवस्था में है बहुत से पत्र खडित है, मादि और अत प्राप्त है, लिपि सुवाच्य नहीं है ! इम प्रति के पत्र ५६ से ७१ म मैना सत लिखा हुआ है । विवरण में प्रति के अगुआ पाठ के अनुमार जिस 'मिना सतमी' रचयिता 'मास धान' लिखा है। ग्वाज करने पर एक दो प्रतिया और भी मिल सकती है । प्राप्त प्रतियो के माधार स इस छोटे से ग्रथ का सुसपादित सस्करण शीघ्र ही प्रकाशित होना मावश्यक है । अप के मगलाचरण और अनूप सस्कृत लाइनरो के सूचीपत्र में 'क्र्ता मिया साधन" नाम छपा है इससे इसका रचयिता मुसलमान कवि है । डा मसकरी को प्राप्त प्रति से भी इसकी पुष्टि होती है व साप हा यह रचना १६ वी नता दो को ज्ञात होती है । अवधी भाषा को एक प्राचीन रचना होने के नात भी यह शीघ्र प्रकाशन योग्य है । सत सज्ञक तीसरी रचना - सुप्रसिद्ध प्रेमाख्यानी कविवर "जान' रचित 'सतवती सत" है । जिसका सवप्रथम विवरण सु दर न थावली, हमारे संपादित राजस्थानी भाग ३ प ४ के पृष्ठ १६ म सन् १९४० म प्रकाशित हुआ था। जिसकी अनूप सस्कृत लाइब्रेरी मे हस्तलिखित प्रतिया मिलती हैं । स० १६७८ में इसकी रचना हुई । इसकी कपा इस प्रकार है। मनसूर एक व्यापारी है । इसकी स्त्री का नाम सतवती है। वह रूपवती मोर पतिव्रता है । मनसूर अपने मित्रो के साथ व्यापार के लिए विदेश जाता है । उसकी स्त्री विरह दुखी होती है । कुछ दिन बीतने पर एक धूत ने उसके सौ दय की प्रशसा सुन कर उम अपने वश में करना चाहा, उसने आकर्षित करने के लिए एक दूती को सतवती के यहा) भेजा पर वह हार व मार खाकर लोटी । सतवती मपन शील मे मविचल रही। धूत लम्पट किसी मत्रवादी की सेवा कर उससे रूप परिवतिनी विद्या सीख लेता है और मनसूर का रूप बनाकर सतवती क यहा माता है । सतवती को सदेह होता है इसलिए कुछ दिन तक वह उम टालती रहती है । इतने में ही इसका वास्तविक पति मनसूर मा जाता है। दोनों एक दूसरे को नाली बताते हैं । समान रूप वाल होने स लोग निणय नही कर पात, याय के लिए वे राजसभा में राजा के पास पहुंचते हैं। राजा उन दोनो से मौर सतवती से इनके विवाह की तिथि लिखवा लेता है । सतवन्ती और मनसूर की तिथि एक मिलने पर धूत लम्पट को प्रापदण्ड मिलता है । हिंदुस्तानी (राजस्थान में हस्तलिखित हिदी ग्रग्यों की खोज भाग ३) भाग १५ मक १ मे कवि जान की रचनाओं का विवरण प्रकाशित हुप्रा है । उसके अनुसार इस क्या का विस्तार ५२ दोहे और चौपाई हैं। कवि जान ने इसी तरह की अय तीन सती स्त्रियो के सतीत्व रक्षा के वणन वाली रचनाए शीलवन्ती, कुलवती और तमीम प्रसारी क्रमश सवत् १६८४, १६९३ और १७०२ म बनाई हैं । जिम प्रति म यह रचनाए प्राप्त हुई है उसमें इसका नामात 'सत' नही लिखा गया प्रतीत होता है पर रचनामों के विषय और शनी को देखते हुए इनकी गणना भी सत समक काव्यों में ही होनी चाहिए। इन रचनामों की प्राय प्रतिया प्राप्त होने पर स भव है यह सजा लिखी हुई भी मिले। ४थी और ५वी "सत सशक रचना' - जन कवि भगवतीदास रचित 'वृहद् सोता सतु" और "लघु सोता सतु' है , दाना महासती सीता के सस्य का विवरण देने वाली हैं। पहली रचना स . १६८४ मे रची गयी । उसी को स क्षिप्त करके स वत् १६८४ क चत्र शुक्ला ४ मोमवार के दिन भरणा नक्षत्र मे सीहरदि शहादरा दिल्ली नगर में नाई गई। म प्राय में बारहमामा के मदोदरी सीता प्रश्नोत्तर रूप में कवि ने रावण पोर मदोदरी का चित्रण किया है । रचना सरल, हृदयग्राही व रुचिकर है। इसका विवरण 'भनेका ।' वष ५ किरण १२ के पृष्ठ १५ मे प्रकाशित है। पचायती मन्दिर दिल्ली के मरम्वती महार के गुटके म यह लिखित रूप में मिली है। उपयुक्त दोनों सोता सत के रचयिता कवि भगवतीदास बूढिया (जिला अम्बाला) के निव सी थे। ये अग्रवाल कुल के वसल गोत्रीय थे। दिल्ली के भट्टारक महेद्रमन के तिष्य थे । ये बूढिया से दिल्ली प्राकर रहने लगे थे। कुछ समय हिसार में भी रहे थे। इन रचित "अनकाय नाम माला" (स ० १६८७ दहलो में रचित) और 'मृगाक लेखा चरित्र' प्राप्त हैं । अन्तिम प्रथ की रचना स. १७०० म हिसार में हुई है। विशेष जान- पारी के लिये भनेकात वष ५ प्रक १२ और प ७ किरण ६ देखना चाहिए । मत सशक छठी रचना 'हरिचद सत' है । जो ध्यानद स द्वारा स वत् १८.. के लगभग मे रची गई है। इसका विवरण राजस्थान में हिन्दी के हस्तलिखित प्रयों की खोज के तृतीय भाग के पृष्ठ २१६ में इस प्रकार मिलता है (७८) हरिवद सत रचयिता ध्यानदास । यह तीन अध्यायों में विभाजित है। प्रथम प्रध्याय म ११६ पद्य है। द्वितीय मे १२१ और तृतीय मे १०० । दोहे १४, सोरठे २, छद ४ और चौपाईया ३२० हैं । कुल पद्य सख्या ३४० होती है। अप का विषय सरय हरिश्चन्द्र को पौराणिकपया है । इसका रचनाकाल कवि ने इस प्रकार दिया है 'उदधि । दोत कर लीजिये लेखन भार अठार" इसके अनुसार स. १८२४ या १८४२ रचनाकाल ठहरता है । नथ के प्रथम अध्याय मे राजा का राज्यत्याग और पानी मे प्रागमन, द्वितीय अध्याय मे पुन रानी व राजा का वियोग पुत्र और रानी का अग्नि गर्मा के यहा और राजा का सोम यहा निवास ! तृतीय अध्याय में रोहित का मृत्यु और शेष घटनाए हैं । सत्य हरिश्च द्र के सत्य के महात्म्य को प्रगट करने वाला होने में ही इसका नाम हरिच द चरित प्रथकार ने रखा है । कई प्रतियो मे उसका नाम हरिच द सन लिखा मिलता है । टमी प्रकार सतवती सत की कई प्रतियो म सतवती की वार्ता भी लिखा मिला है । पर वास्तव म ये सब परम्पराए एक ही परम्परा एव विषय वी हैं इसलिए इनका नामा त पद सत' ही उचित है व सही है। इस प्रकार 'सत' सनक रचनामों को परम्परा करीब ५०० वर्षों स च नती प्रतीत होती है। सत स ज्ञा शद का यवहार अनव जगह गत् प्रर्यात तक सो पद्योवाली रचना के सूचक अथ मे भी पाया जाता है । वृदावन सत् ” गार सत, विरह सत प्रादि ऐसी ही रचनाएँ है।
- राजस्थानी साहित्य के संवाद ग्रन्थ बौद्धिक विचार प्रोर तत्व निणय के अनक साधनो म वाद विवाद का भी बड़ा प्रमुख स्थान है। वारे-वादेजायते तत्वबोध" ( वाद विवाद करने मे वास्तविक तत्व हाय लगता है ) कि तु यह वाद-विवाद जब कुछ जानने की इच्छा से किया जाता है तब ता वह उपयोगी होता है। कि तु जब केवल अपनी विद्वता का प्रदशन करने अथवा दूमरों को नीचा दिखाने के लिये वाद विवात किया जाता है, तब वह वितडावाद का रूप धारण कर लेता है। उससे किसी तत्व का निणय नहीं हो पाता। वह केवल वागजाल मर बनकर रह जाता है। जिनासा उत्पन्न होने पर उसका समाधान वरने के लिये उसने विशेषण से उसका उत्तर प्राप्त करन के लिये प्रश्नोत्तर की शली के सवाद, वैदिक युग से लेकर समस्त प्राचीन साहित्य म निर तर प्राप्त होते हैं। बौद्ध पौर जन साहित्य में घम तत्वों का निरूपण इसी प्रश्नोतरी शली में क्यिा गया है । कि तु मध्यकाल में कवियो ने विनोद के रूप मे कुछ वस्तुओं और अवस्थामों को व्यक्तिगत मानकर उनसे सवाद कराये हैं। बहुत से लेषकों ने ऐमो विरोधी वातुओ का परस्पर सवाद कराया है। जिनमें से एक ने अपने गुणो का उत्कप मौर दूसरे ने उसका खडन करके अपना महत्व स्थापित करने के सम्बध म तक दिो हैं । इस प्रकार के सवाद मूलत हमें दाशनिक प्रयो में प्राप्त होते है कि तु मध्यकाल के लेखको न कवल अपने बौद्धिक चमत्कार से कुछ वस्तुओं को वादी प्रतिवादो का रूप लेकर प्रत्यक वस्तु के महत्व, दूमरे की दृष्टि में उसके दोष और बहनेवाले को विशेषता का अत्यन्त सु दर वणन किया है। ऐसी रचनायें अधिकाश जन विद्वानों की हैं। ममन्वययादी होने के कारण इन जन विद्वानों ने अन्त में इन कल्पित पात्रों का परस्पर मेल करा दिया है । ये रचनायें छोटी होने पर भी काव्य चमत्कार की दृष्टि से अत्यत ललित हैं और कवि को सजीवनी प्रतिभा के अद्भुन उदाहरण हैं । यद्यपि इनकी परम्परा अत्यन्त प्राचीन है और माहित्य के प्राचीन ग्रंथों में प्रसगत इस प्रकार के सवाद पाये हैं। तथापि ऐसा रचनायें सोलहवी शताब्दी मे ही . स स्कृत, राजस्थानी, हिन्दी, गुजराती प्रादि भापाप्रा म प्रचुर प्रमाण में प्राप्त होने लगी हैं । स्वतत्र रचामो में विशेषत लोक भाषा में प्रचलित एक कृपण नारी स वाद हम स बत् १४३७ का लिखा हा प्राप्त हुआ है, जो अभी तक प्राप्त और शात म वाद रचनामों में सबस प्राचीन कही जा सकती है। कि तु वास्तव इस प्रकार की रचनामो का विकास सोलहवी शता दो से ही हुआ है । यद्यपि बहुतसा पूर्ववर्ती रचनामो में ऐसे स वाद बीच बीच मे ग्रथित किये मिलते हैं । जम 'राजस्थान रिसर्च सोसाइटी' फलकत्ता के राजस्थानी नामक पत्र के ( भाग ३ प्रब ) मे "भाषामा के चार प्राचीन उदाहरण' शोषक से हमने चौदहवी शताब्दी की एक रचना प्रकाशित की है जिसमें गूजरी, मालवी पूर्विनी और मराठी चार स्त्रिया अपनी अपनी बोलियो में बात चात या स वाद करती हैं। इस स वाद म सबने अपने अपने देश को विशेषता और महत्ता का प्रतिपादन किया है । यह स वाद कवि ने शत्रु जय जन तीथ पर यात्रा के लिये प्राई हुई श्राविकाओं से कराया है। इस परम्परा का प्रभाव परवर्ती जन रचनामो पर भी पडा है । मर-भारती (वष २ अब ३ ) म देपाल कवि रचित जीरापल्ली पाश्वनाथ राम हमन प्रकागित कराया है। जिसमे जीरापल्ली तीथ पर उपस्थित मालव मारवाड, सिंध, सोरठ तथा गुजरात इन पाच देशों की स्त्रिया अपने अपने देश की विशेषताओ का वणन करती है । मत म नागौर की एक प्राविका पाकर उन सबका विवाद समाप्त करके वह पूजा मे सम्मलित कर लेती है।पद्रहवी शताब्दी की राजस्थानी भाषा को यह अत्य त सुन्दर रचना है। सोलहवी शतानी से जो स्वतत्र सम्वाद रचनायें प्राप्त होने लगती है उनम तीन चार कवियो की रचनायें अत्यात रोचक हैं। जिनमें से विक्रमपचदडकथा और न दबत्तीमी मादि क रचयिता कवि नरपति का जिह्वदात स वाद और सुखड चपक स वाद स्वर्गीय मोहनलाल दलीचद देसाई के स ग्रह मे है । इनमें से दत्तजिह्वा स वाद को डाक्टर भोगीलाल साडेसरा न सम्वत् १९४७ के गुजराती रे दीपोत्सवी प्रकों में प्रकाशित किया था । यह स याद दश पद्यों म है जिसम से पाच म तो दात और जीभ ने अपनी महत्ता सिद्ध की है और पाठवें में दात ने जिह्वा स वाद विवाद शात करने को कहकर दोनो का परस्पर मेल करा दिया है। हमम परवाय रचनामों में कवि सहज सु दर का ( १५७२ १५६५ ) प्रास कान सवाद पोर यौवन जरा सवाद है, जिसम २५ छप्पय हैं। दूसरी रचना प्राख कान सवाद र बोटक पनो मे है । कथा यो है कि शत्रु जय में प्रभु का दान करते समय कान र भाख दोनों अपना अपना महत्व प्रदर्शित करते है, लितु अन्त में दोनों परस्पर मेस र लेते हैं । कयोंकि मास के द्वारा प्रभु का दशन होता है, और कान से प्रभु की भक्ति गीत सुने जात हैं। इस शताब्दी के प्रसिद्ध कवि लावण्यमय की तीन सवाद रचनायें मिलती है १) रावण मदोदरी मवाद (स. १५६२) में ६३ पद्य है । (२) कर सवाद (स० १५७५) गति नगर म ६६ पयो में रचा गया (३) गोरी सावली गीत साद ६३ पर्यों में लिखा क्या है इसमे से पहिल मे सीता हरण के पश्चात रावण को मन्दोदरी समभाती है और उनका सघाद चलता है । इसी नाम का योधर का रचा हुमा एक सवाद भी प्रकाशित हो का है जिनको प्रत्येक पक्ति में एक एक कहावत गु थी गई है। यह रचना म ० १५६५ में नागढ़ ( जीणा) में हुई। यह कवि मोढ अडालजा जाति के मंत्री महसा के पुत्र थे । कावम गुजराती समा बम्बई ने मांडन रचित प्रयोष बत्तीसी के साथ विस्तृत टिप्पणियां अहित यह सम्वाद प्रकाशित किया है। लावण्यमय की दूसरी रचना कर सवाद में प्रसग यह है कि प्रथम तीधर भाप मदेव को बारह महीने से अधिक समय तक माहार नहीं मिला। बैसाख बदी ३ (अक्षय तृतीया ) को उ हनि वार्षिक तप का पारणा करने के लिये दोनों हापों की मजला में पुरम ग्रहण किया। इसी के आधार पर कवियों ने कल्पना से दायें मोर बायें हाथ मे परम्पर सुन्दर स वाद उपस्थित किया है । दाहिना हाप अपनी विशेषता का बयान परते हुए बायें हाप से भिक्षा मांगन के लिये पाता है तब बाया साप अपनी विशेषतापों का वणन करने वाहिना हाथ को नीश खिाने का प्रयत्न करता है। अन्त मे म अापमदेव के मुख से कहलाया गया है कि सभी का अपना अपना महत्व है, भत' दोनों के मिलने से काम सिद्धि हो सकती है। यह सुनकर दोनों हाय अपना विवाद समाप्त र ऋषभदेव योगकुमार का बहराया हुप्रा शुरस दोनों हाथों को मजलि में ग्रहण करके पार करत हैं। मठारहवीं पाताब्दी कवि प्रमसोम ने यह सपाव विस्तृत रूप से रचा जिसका परिचय आगे दिया जायगा। मठठारहवीं दाताग्दी के ही सुप्रसिद्ध कवि लक्ष्मीवल्लभ ने अपनी कल्पसूम की क्स्पद्रम कनिका नामक टीका में ऋषम परिव के उपपस ग में स्कृत में रसवाद किया है। १६ वीं शताब्दी की रतनमान द्वारा रखा हा एक संवाद सुग्दर नामक सस्कृत सपा समुच्च मी रचा गया। जिसमें (१) शारदपयो म बाद (२) गांगेय निरक सरोषो पापिय मुण्डर कोई ने दोठ । पसी पाल समउ कहो, निदक मुख दीठ ॥३॥ माप प्रप्तशा प्रापरपी, करता इन्द्र नरिन । लघुता पामह लोक मह, नाA निज गुण धुन्ध ।।४।। को कहेनी म करउ तुम्हें निदा नह प्रहकार । माप प्रापरणी ठामह रहो, सह को भलउ ससार ॥५॥ कविवर को यह रचना बहुत लोकप्रिय हुई प्रतीत होती है क्योंकि इसकी भनेक हस्तलिखित प्रतियां तो हमारे स ग्रह में तथा अन्यत्र प्राप्त हैं । स० १६६२ सागानेर में १०१ पदों में यह स वाद रचा गया । इसको तत्कालीन प्रसिद्धि का एक विशिष्ट उदाहरण यह भी प्राप्त हुमा है कि स. १६६६ की माघ सुदी में कृष्णदास ने "दान शील तप भावना का रासा' बनाया । जिसकी प्रति हमारे संग्रह मे है । यह रचना हिदी पद्यों में समय सुन्दरजी के उपयुक्त स वाद के मनुकरण पर रची हुई प्रतीत होती है। इसी शताब्दी में स. १६८२ या १६८९ में कवि श्रीसार ने पलानी मे "मोती कपासिया स वाद" नामक १०३ श्लोकों का विस्तृत अप बनाया। इमवे प्रारम्भ में कवि ने लिखा है कि ऋषभदेव भगवान् शुद्ध प्रोहार की खोज करते हुए हस्तिनापुर में पधारे। उहें मोतियों के थाल से पधिनी स्त्रियों ने बधाया । उस समय मोती ने अहकार में माकर कहा कि मैं ससार में सबसे बड़ा हूँ, मेरे बरावर कोई नहीं। उसने जब अपनी लबी चौडी प्रशसा की तो कपासिये ने मोती से कहा कि अभिमान न कर मेरा महात्म्य भी सुन । फिर वह अपनी विशेषताओं का वणन करता है और दोनो का मेल हा जाता है । यह स वाद ६ सालों में है इसकी कई प्रतिया हमारे संग्रह मे हैं। इसके पश्चात् स. १६६६ किशनगढ में रचित कवि कुश नघोर का उद्यम कम स वाद ' ३८ पद्यों का है। जिसमें उत्तर प्रत्युत्तर के रूप में उद्यम मौर म ने अपनी अपनी बहाई की है । इमो शताटी के स वाद स मक कुछ पाय प्रप भी प्राप्त हैं। जिसमें राजकवि रचित रावरण मदोदरी स वाद स्वतत्र पदों के रूप में है। स. १६८९ में लूपसागर के अजतासुन्दरी स वाट रचे जाने का उल्लेख जनर गुज कविमो भाग १ पृष्ठ ५७४ में है। पर उसकी प्रति मुझे प्राप्त नहीं है प्रत उसका विशेष परिचय नहीं दिया जा सकता। "हरिणी स वाद' नामक एक माय रचना भी देखने में आई है पर इस समय सामने न होने पे उपका भी परिचय नहीं दिया जा रहा है। हमारे स ग्रह में अन्य - कई छोटी छोटी रचनाए हैं जिनमें रचनाकाल का निर्देश नहीं है पर वे सतरहवी शताम्दी की ही प्रतीत होती हैं । १६ पद्यों में मुनिशील द्वारा रचित कस्तूरी कपूर स वाद इसमें कस्तूरी मौर कपूर ने अपना अपना महत्व प्रकट किया है। २ १० पद्यों में श्री हष रचित सामू बहू विवाद - जिसमें मासू मोर बहू का विवाद परिणत है। ३ पद्यों में से कवि द्वारा रचित कृपण लक्ष्मी स वाद ४ २५ पद्यों मे दान कवि रचित काव्य जीव प्रेम स वाद जन गुजरकविप्रो प्रादि में सुधन हप कवि रचित "मदोदरी रावण स वाद 'पद्य सम्या ६४, जयवत रचित "लोचनकाजल'' म वाद पद्य १६ अजितदेव सूरि रचित "समकितशील स वाद" का भी उल्लेख मिलता है। १८ वीं पाता नी में लक्ष्मीवल्लभ रचित "भरत बाहु बल स वाद, पद्य २६, बाल चन्द्र रचित पचेन्द्रिय चौपाई १७५१ प्रागरा यशोविजय रचित समुद्र वाहण स वाद 'विनय विजय रचित" पचसमवाय स वाद (स्तवन) उदय विजय रचित समुद्रकलश स वाद १७५४ पौर अभय सोम रचित कर स वाद स. १७४७ पाखातीज इनमें से । समुद्र वाहण स वाद, पचसमवाय स वाद स्तवन प्रकाशित हो चुका है। इन दोनो के रचयिता बहुत बडे विद्वान है विषय का निरूपण बहुत सुदर हुप्रा है भाषा गुजराती है कर स वाद की प्रति हमारे स मह में है। १६ वीं शताब्दी में अमृतविजय चित "रामराजीमतो स वाद स. १८३६ में रचा गया जिसमे कई सखियों का स वाद बहा सु दर हैं स ० १८२० में विजय लन्मीसूरि ने ज्ञान दशन चारित रतन त्रय का स वाद बनाया है, इसी शताब्दी में ऋषि जयमल के शिष्य म्पच ने पचेद्रिय की सम्भाय नामक म वादात्मक रचना की थी जिसकी र पत्रों को प्रति हमारे स ग्रह में है। कार जिन स वालों का परिचय दिया गया है वे प्राय सभी जैन विद्वानों की रचनाए हैं जनतर कवियों का भी कुछ ऐसी रचनाए प्राप्त हैं उनका भी यहा निर्देश पर देना मावश्यक है। १७ वीं गतानी में बीकानेर महाराज रायसिंह जी के माधित पर कवि ने "दातार और ममका मवाद बनाया जिसकी प्रति हमारे स ग्रह में है। मारवणी मालवणी चौक" स वाद नामक एक सुदर रचना जिममे मह और मालव सम्बधी विशेपतामों का वरान वहा की स्त्रियों वे मुह स परवाया गया है जिस में राजस्थान भारती' में प्रकाशित कर चुका हू । गुरु चना स वाद ता राजस्थानी भाषा की बहुत सु दर नान वद्धन मुक्तक रचना है । एक पद्य में तीन चरण में तीन तीन बातें चेल से पूछो जती हैं और चौथे चरण में तीनों का उत्तर चेला गुरु को दे देता है । ऐसे प्रत पद्यो वा स ग्रह भी राजस्थान भारती' में प्रकाशित कर दिया है । कुछ अन्य सम्वाद -उदर मिनको सम्बाद' 'सोना गुजा सम्बाद" मादि भी मिलत है जिनमे सोना गुजा स वाद तो गद्य म लिखा हुआ प्राप्त है। हिदी म भी कवि नागरीदाम के कई वाद-तल तवोलका वादु वादु मगनदानिका ननकानका लोहे सोन का, लज्जा मुस का प्रादि अब पर दरबार के हिंदी कवि मे छा चुक हैं । अय गात हिदी वादो का परिचय निम्नोलिखित है हिदी सवाद प्रथ १ केसि गोतम सवाद दिगम्बर १० पंथी बडा भडार २ मन नान सग्राम ६४ पद्य ३ भरत बाहुबलि सम्वाद (अपभ्र श) ४ नाता कामिका विवाद ५ सुमति कुमति का झगडा ६ मन पान स ग्राम सवाराम लूणकर पाडया भडार ७ प्रामीब का भगडा " जीव म स वाद है मन शान कासवाद लालच द १० वादु लोहे सोने का (१३ म०) नरहरिदाम १७ वीं गवानी ११ नन कान का वाद (६ पद्य) अकबरी दरवार के हिदी १२ तल तगेन का वादु (८ पद्य) कवि में प्रकाशित १३ मगन दानि का वादु (१० पद्य) १४ लज्जा और भूख का वादु (१०५०) १५ सीस चरण मबार पद्य ३२ प्राग्गनाय १६ रितु समाव स वा ४० पद्य कलपति मिश्र " . ।
कुलपति मिश्र अनूप म स्कृत लाइब्रेरी . " " लूण सागर १७ सुरूप कुरूप स वाद १८ विष पियूष स वाद १६ रूप गुण स वाद ६४ पद्य २० श्यामा हिरदे स वादो ना०प्र०समा २१ स्वण मुक्ता स वाद २२ वादु गोरी सावली चतुरभुज दमोधी २३ सोने लोहे का मगहा अप उपलब्ध जैन सवाद अथ १ मजना सुदरी सवाद १६८६ २ प्रावि कान स वाद सहज सुदर ममय जनप्रथालय ३ उद्यम कम सवाद १६६८ कुशलधीर ४ बरस बाद लावण्यसमय ५ बरस बाद १७४७ अभयसोम मभय जन प्रथालय ६ कस्तूरो-कपूर स वाद मुनिशील ७काया जीव सवाद गा २५ दाम ८ कृपण-नारी सवाद गा ८ १५ वी शताग १गोरी सांवली गात ६३ लावरण समय १. जीभ-दांत गा ४१ १६४३ हीरक्लश ११ दानादि सवाल समयसुदर १२ नेमिराजमती मवाद अमृत विजय विनय विजय १७५१ बालपद्र रूपच द्र होरक्ला १३ पच समवाय सवार १४ पद्रिय पवाद १५ पदिय सवाद १६ मोता-कपामिया सवाद १. मोती वपासिया स वाट १८ यौवन जरा स वाद १६ रावण मदोदरी सवार २० १६८६ श्री सार मासुदर १५६२ लावण्य समय राजवि "
मनितो व मूरि
उदय विजय
२१ रावण मदोदरीसवाद
जिनहर्ष
२२
सुपनहप
२३ लोचन काजल स वाद
जयवत
२४ समकित गील स वाद
२५ समुद्र कलश स वाद १०५५
२६ समुद्र वाहण स वाद
यशोविजय
२० ज्ञान दान चरित्र सवार १८२८ विजयलक्ष्मीमूरि
२८ जिह्वान्दांत स वात
नरपति
२९ शुखह-चपन सवार
३० भरत बाहुबली स वाद पद्य ८६ १८वीं पता लक्ष्मीवल्लभ महिमा भक्ति भडार
बस्तास.७७
३१ रावण मदोदरीस वाद १६ वी शता
प्रकाशित
३२ दाता सूर म वार १७वीं शता शंकर कवि अभय जनप्रथालय
३३ मारवणी मालवणीस वाद १८वीं शता
प्रकगित राजस्थान भारती
इस प्रकार सासू बहू स वाद गुरु शिष्य म वाद उतर बिल्ली सवाद मोती
सोना स वाट पाटि उपलर हैं । जनेतर कवियों के भी रावण मंदोदरी सवाद, दातासूर
सवाद, मारवणी मालवणी स वाद हमारे स ग्रह में उपलय हैं।
देगाई स ग्रह
घी घर
दवावैत सज्ञक रचनाएं हिंदी भाषा मूलत मध्यप्रदेश की भाषा है और उसके विकास में मुसलमानों का भी काफी योग रहा है । जब उनका गासन यहा प्रवर्तित हो गया और प्रभाव जम गया तो उनकी भाषा प्ररबी पारसी के अनेकों शब्दों का प्रचार राज्य सपा से हिंदू जनता में भी होने लगा । इसलिए १४वी शतामीसं हम अपने प्रातीय भाषाओं के ग्रयों में परवी पारसी येशों का क्रम अधुर प्रयोग पाते हैं । इपर मुसलमानों को भी जनता मे सम्पक बढाने के लिए स्थानीय भाषा एव बोलियों को अपनाना पड़ा और इस तरह के पादान प्रदान से कुछ नये रचना प्रकारो को परम्परा भी चालू हुई । उनमें से एक प्रकार 'गजल' का है। १७वी सनाटी में नगर वणनात्मक गजल सनद रचना प्रकार का प्रादुर्भाव हा दिखाई देता है । हिंदी के कवि जटमन नाहर ने लाहोर गजन, झिगार एजन और सुन्दरी गजन सवत् १६६. के आसपास पात्र में रहकर बनाये उनके अनुकरण में भनेकों जन कवियों ने १८वी और १९वी ताली में एमी गर वनात्मक पचासौं गजलें बनादी । १९वों के उत्तराद एव २ वी मै तो चारण आदि कवियों ने भी उनका मनु करण किया। यद्यपि परबी पारसी में जो गजलें प्रसिद्ध हैं वसी शली इन नगर वना स्मक गजनों में नहीं है पर माखिर जटमल, जिसने अपने लाहोर वणन को 'गजल' की सादी है उसके सामने पजाब में वसी कुछ रचनाए अवश्य प्रचलिन होनी चाहिए। सभी तक उसकी पूर्व परम्परा का अनुसधान नहीं हो पाया इसी प्रकार फारसी का एक और रचना प्रकार १७वी शताब्दी से हिंदी में विकसित हुपा । उसकी सजा है ' दवावत'। पजाव में 'वेतों" का प्रचार तो काफी रहा है, मेरे स ग्रह में भी दो वैतें है पर "दवावत" स मा वानी जितनी भी रचनाए ममी तक प्राप्त हुई हैं वे सब राजस्थान के कवियों की हैं और विशेषता यह है कि इनको भाषा प्राप सही पोली है। फिर भी हिदी के विद्वानों को तो उनका परिचय स्वाचित ही होगा, क्योंकि अभी तक ये ममो दवावर्ते अप्रकाशित ही हैं और वे मजस्थान के भडारों में ही मिली हैं । महो शैली के इस रचना प्रकार के सम्म र म मभी तक हिन्दी स सार में मजानकारी रहना, भवोधनीय समसार इस ममात पौर नई दिशा म प्रकाश हासन के
निए यह लेख लिखा जा रहा है ।
दवावत शर का भय अभी तक मुझे उर्दू आदि के कोप न यो मे प्राप्त नहीं
हमा और न फारसी छदो सम्बधी एक महत्वपूर्ण हि दो प्रथ 'छन रत्नाकर' जो मुझे
दिल्ली के दि० जनशास्त्र भडार स मिला है उसमे हो इस रचना प्रकार का विवरण
मिला। पर यह निश्चित है कि इसकी परम्परा अरबो फारसी से ही सम्बंधित है और विशेष
सम्भव पजाव से ही इस रचना प्रकार का राजस्थान में प्रचार हा होगा। राजस्थानी
भाषा के सुप्रसिद्ध छद प्रय
रघुनाथ रूपक
में ७२ प्रकार के हिंगल गीतों के लक्षण
भोर उदाहरण दने के बाद मछ पवि ने दवावत दे दो प्रकार और उनके उदाहरण
दिये हैं । यथा
कह मोहोतर मदकवि गीत प्रयय गिनाय ।
राजहिला वणन ह दवायत' समझाय
तय मछ कवि ह तिक, दवायत विष दोय ।
एक 'सुद्ध यष होत है एक गद्य बघ' होय ॥
टीकाकार ने इसकी विशेष ध्यास्या मे लिखा है
विशेष यह कोई छ ६ नही है, जिममें मात्रामों वणों अपवा गणो का
विचार हो, यह मश्यानुप्रास मध्यानुप्रास और किसी प्रकार सानुप्रास वा यमक लिया हुमा
गय का प्रकार है। यह स स्कृत भाषा प्राकृत भाषा उद् भाषा और दो मे भी भनेक कवियों
और अथकारो द्वारा प्रयोग म माया हुमा मिलता है। माधुनिक लल्लूलालजी के प्रेम
सागर मादि प्राथों में तथा उदू के बहारद खिजा नौवतन प्रादि प्रयो म तया फारसी
के प्रयों में भी देखा जाता है । सम्भवत हिंगल वालों ने भी उनका अनुकरण किया है।
यह दवावत दो प्रकार की होती है एवं मुद्धवध प्रर्थात् पद बप जिसमे मनु
प्रास मिलाया जाता है और दूसरी गद्य वध जिममें अनुप्राम नहीं मिलाते ।
पच बद्ध दवावत का माहरण
प्रय दवावत पदवघ
प्रथम ही अयोध्या नगर जिसका यणाय ।
बार जोजन तो चौडो मोल जोजन की छाव।
चौतरफू के फलाय चौसट जोजन के फिराय ।
तिसर तले सरिता सरिज़ के घाट ।
शत उतायल सू यहे, चौसर कोसों के पाट ।
मडो की किताबू में, जिस गगा का घमाण ।
फेती बार नगरी कू, मेली निरवाण।
२ गद्य बद्ध कानदाहरण
आहे मछ इतरी कही, पद बघ नाम प्रबंध।
दयाप त फिर दूसरी, कहूँ इम गवय।
उदाहरण हाथियों के हलके समू ठारणा त खोले।
प्रेरापत साथी भद्र नातिक टोले ।
प्रत देर के दिग्गज विध्याचल ये सुजाय ।
रग रग चित्र सुदा उह के बरपाय ।
भूत को उलूमे वीर घटुक ठणक ।
बादलों की जगमपा भरे भौरों को भको भए के।
पल क्वमु लगर मारी कनय को है स ।
शायाहर के जेहर दोप माला को रूस ।
भालू के प्रारम्वर चर तरफ कू भासे ।
गसा हालर कर राखे।
धरण वरण के बिलास खेत में कायम ।
मारसो से मजुल मूखमत से मुलायम ।
वर बापू के साचे पख राउसी धाव ।
सुर तालु के झमरे सत सिपा के सिताय ।
भाउ जाउ मे चक्री निरत परवे में हर।
जग जगू में परीत, सालोतरू में पूर ।
दवावत सम्बधी छन्द प्राप, उदरण देकर प्रब हम प्राप्त दवावता का सक्षिप्त
परिचय उपस्थित कर रहे हैं।
१ उपलब्ध दवावतों म राबगे छोटा पोर पुरानो रचना "नरसिहदाप्त गोड की
दवावत'' है, जो माट मालीदास गगादास के पौत्र 1 महीं है, इसका प्रारम्भिक प्रा तो
राजपानी मे है, प्राग का पश सही बोली म है । दोना के कुन उदरण नीचे दिय जा
माहत न
११८
प्रत
प्रय दुवायत नरसिंघ दास गोड की।'
भाट मालीदास गगादास रे पोत रे कही।
धादि- होंदवाए छात हीदवाए सर, अजमेर जोधपुर मारणपुर ।
भजूवाल यश प्रसवा भरोड ढोलडी भोच महिपत्या मोड ।
मध्य- सवा मरदां जागता है, जगत ५ बखतौं जागता है।
भोमिया शनु भागता है, तरी गिरौं मालागता है।
नित दान त्यागते हैं, गो सूर वरते हैं।
असनान सझते हैं, सेवा विस्तरते हैं।
पूजा पारते हैं, दहलो वारते हैं, सहलो सिघारते हैं ।
- राज रा नरसिह जेत कवि मालीदास कहे दवावत ।
इस रचना की प्रति १८वीं शतात्री के पूर्वाद्ध की लिखी हुई अनूप सस्कृत
लायब्ररी, बीकानेर मे है अत १७वीं के अत या १८वी के प्रारम्भ की यह रचना है।
२ दूमरी रचना जन कवि राम विजय (सुप्रसिद्ध नाम रूपच द) द्वारा रचित 'जिन
सुख सूरि दवावत मजलस नामक है जो सम्वत् १७७२ म रची गई है। उसमे मजलस
मौर दवावन दोनों सज्ञाए साथ साथ दी हुई हैं। रचना बहुत छटादार है ।
प्रादि महो मामोरे यार बठी दरबार ।
स चांदनी रात, म्जलस को बात ।
कहीं कोण कोण मुलक, कारण कारण राजा देख ।
कौए कोण पातिसाह ? देखे
कोण कोण वईवान देखे।
कोण कोण महिरयान देखे ।
चारण कवि किसना जी आढा रचित 'रघुबरजम प्रकाश प्र० राजस्थान पुरातत्व मन्दिर के
पृष्ठ ८५ में दवावेत का उदाहरण तो दिया है पर लक्षण नहीं बतलाया गया है।
दवावत फिर बात दख, जुगत बचनका जाण ।
श्रौछ अधक तु असम ऐ, बौदा गद्य बराए ।
अथ दवावेत
महाराजा दशरथ के घर रामचन्द्र जनम लिया।
जिस दिन से ग्रामझ न ठदेग देवू ने हरख किया ।
दिल्ली दईवान फ्रुक्साहि सुलतान देखे । चौतोड सग्रामसिंघ दीवान देखे। जोधारण राठौर राजा प्रजित सिंह देखे। बीकारण राजा सुजान सिंह देखें। मामेर कछवाहा राजा जयसिंह देखे । जसाण जादव रावल बुधसिंह देखे। ए कसे है ? बडे सुविहान हैं, बडे महरबान हैं । बड़े सिरदार है, दडे वजदार है बडे दातार हैं । जमी प्रासमान बोधि शभु (क) अवतार हैं । श्री पूज्य जिन सखस रि पाई पाट विराजते हैं। इद्र से छाजते हैं, धम कथा कहते गाजते हैं। ३ तीसरी मजलस जा इसा शाली की है पर है बहुत विस्तृत । अभी तक प्राप्त सभी दवावतों मे यह सबसे बड़ी है । जिसका परिचय प्रागे दिया जा रहा है- राजस्थान के तपागच्छीय कवि वनक्कुशल और कु वरकुदाल दोनो गुरु शिष्य १८वी के प्रत म कच्छ- भुज पहुंचे और वहा के महाराव लखपत न इह अपना गुरु मान कर बहुत सादर के साथ वहा रख लिया। राव लखपत ने साहित्य और काव्य की शिक्षा इनसे ग्रहण कर ब्रज भाषा कुछ अप भी बनाए हैं साथ ही उसने एक ब्रज भाषा का विद्यालय भी इन जैन महात्मामो के तत्वावधान में चालू कर दिया । जिसमें रहन, खाने भादि का प्रबध राज्य को पोर से था। इस सुविधा के भाकपण से राजस्थान गुजरान और सौराष्ट्र के अनेकों छात्रों न पाकर यहा वाध्य कला मोर साहित्य शास्त्र की शिक्षा प्राप्त की। भट्टारव कनककुशल और कुवरकुशल ने ब्रज भाषा में लखपत नाम माला परसात नाम माता (फारसी शब्दो का कोश) ये दो कोश और लखपत पिंगल, गोहड पिंगल नामक छद नप, लखपत जस सिंधु नामा अलकार अप और सुदर शृगार आदि की टीकाए बाइ। महाराव लखपत का बहुत बिस्तार से सुदर वणन कुवरकुशल रचित "दवावत में मिलता है। इसकी प्रति टिप्पणीकार स्वय कुवरकुशल को लिखी हुई मुनि पुण्य विजय जी को कृपा से दखन को मिली । रचना सवत् १८०० के पास पास की है। ४ चौथी रचना 'जिन लाम सूरि दवावत' खरतर गच्छोय कवि वस्तपाल (वाचक १२० विनय भक्ति) रचित हमारे स ग्रह मे है इसवे प्रारम्भ मध्य और प्रत में कुछ पद्य भी हैं यहां यचनिया गद्य का ही कुछ उदाहरण दिया जाता है ऐसी पद्मावती माई, बडे बडे सिद्ध साधनों ने ध्याई । तारा रूप बौद्ध शासन में समाई। गौरी के रूप शवमत घालो ने गाई। जगत मे कहानी हिमाचल की जाई । जिस बात में सरस्वती हूँ का न रहा सालरा । तो और कवीश्वरों का क्या विचारा । पर जिन जिन को जसो उक्ति, प्रौर जसो गुद्धि की शक्ति । तिन मापक तुक बहुत का ही चाहिए । बडे बडे क्वीश्वरों की उक्ति देखि हिम्मत हार न बठे रहिए । यातें सब गच्छ राजन के महाराज गच्छाधिराज श्री। जिन लाभ सूरि दयावत कही गुन गाया । अपनी पविता पुनि स्वामी धम का फल पाया। जिन लाभ सूरि का समय सवत् १८०४ से १८३४ तक का है अत इस दवावत की रचना स० १८१० और १८२० के बीच की होनी सभव है । उपयुक्त चार दवावंतों में से पहली भाट कवि की है और पिछली तीनो जन कचियो की है । जन कवियो को इसके बाद की कोई रचना नहीं मिली और न किसी भाट कवि की ही । अब आगे ४ धारण कवियों की दवावतों का परिचय दिया जा रहा है। ५ चारण कवियों को दवावतो में महाराजा अजितसिंह को दवावत सवत् १७७२ में रची गई। इसकी सब प्रथम सूचना मुझे श्री सीताराम जी लालस से मिली और इसकी प्रतिलिपि राजस्थानी भाषा के प्रबल समथक कवि उदपराजजी उज्जवल से मिली । मैंने जब उह इसको नक्ल भेजने के लिए लिखा तो उहोने स्वय अपने हाथ से १६ पृष्ठो मे नरल कर तारीख २८-१-५६ को मुझे भेज दी, इसके लिए पापा मैं विशेष स्स से भाभारी हू । उसके बाद मैं अपने विद्वान डॉ. दशरथ शर्मा से दिल्ली मिला तो उनक पास हुए हस्तलिखित ३ गुरके देखे सपोगवण उन में से एक गुटके में मजितसिंह जी की दवावत मिली और दूसरे दो गुटको म भी एक एक भय दवावत प्राप्त हुई । अत तीनों गुटक मैं अपने साथ ले माया, इसके लिए मैं डा० दशरथ जी का मामारी हूँ।
सेवा प्रथ चारण कवियो में वदावत की परम्परा इमस पहले भी रही होगी पर मुझे उप नन्ध तोनों दवावतों में जायपुर के महाराजा अजितमिह जी को दवावंत ही सबसे पुरानी है । इसम प्रारम्म मध्य और मत म १२ दोहे, ३ कवित्त, और दो गाथाए भी मिलती है बाकी वएन तुकान्त गध म है । प्रारम्भ मोर अन्त इस प्रकार है। अथ दवावंत महाराजा श्री अजितसिंहजी री-~- दोहा- मन बुध मिल कोषो मतो, सिवरा माद गणेश । महाराजा अजमाल ने, शगदम्बर कहा। देवा गवाणी जपून तन स्वायत धादि दिवो, ब्रह्मा बयण विसर ॥ गणपत गुण पाम पिपल ध्याऊ । (जिन) चौरासो भय स्पा जात जात के पह जनाऊ ।। ऐसा यो पर सिथ बुध का राजा । उक्त का भम्यार मुकत का दरवाजा।। ततीस र देवता का भगवायी। द्र सा पिता माता भी दाणी भैक हो बता दृस्ति का सा पानन । जिदूर का टश मूसा सा वाहन । विवर सीना भी दरयाव सा उदर। कर ही सारसा यारहयो । ऐसा भी गणेशको प्रथम नमस्कार कोने । राजन रे राजा महाराजा श्री प्रजमाल मात कही। दूसरा नमस्कार सरस्वती कु करणा। सुमत की दाता, कुमत से हराया ॥ हस गवनी हस चाहनो देवी । पर नागरण गपद सेवी ॥ मध्य-महाराजा अजमाल भायता को भारता, मनभावता से मराला क्या पहावा, बादाणे भो राय नानाणे भो राव।
१२२
घडों की बडाई पुरषों को प्रभुताई सब सरां सुखाई,
रोझ मौज पाई महोला लिया, प्रबहल किया।
क्रोड क्रोड राकिलाए कोड दिवाली राज।
जशवत सिंह गर्जासहोत राऊ मरुधर राज ।
मत- दवावत द्वादश दोहा, तीन कवित्त दोष गाह ।
सतरह सो बहोत्तर कव दवार कह्यिाह ।।
डा दशरथ जी के गुटके के पत्रार ६१७ में लिखी हुई है द्वारकादास घधवाडिया
की कही हुई 'दावत महाराज मजितसिंह जी री' प्रति एशियाटिक सोसाइटी कलकत्ते के
संग्रह में भी है।
६ चारण कवि रचित दूसरी दवावत बीकानेर में महाराजा सरदारसिंह जी की
है । यह काफी बड़ी है। इसमे राठोडो को वंशावली स प्रारम्भ कर महाराजा सरदारसिंहजी
तक का वणन किया गया है । इसम भी प्रारम्म और मध्य में दोहा कविन दिये गये हैं।
गद्य को सज्ञा 'वचनिका दी गई है । मुझे जा गुटका प्राप्त हुमा है उसमे ३१ पत्र
के बाद २६ तक पत्र नही है । इससे प्र I का प्रा जो इसी बीच पूण होता था
वह प्राप्त नहीं हो सका अत कवि का नाम और रचना काल प्रज्ञात है ।
भोर मध्य का कुछ मश नीचे दिया जाता है
अथ दवावत महाराजा श्री १०८ सिरदारसिंह जी री लिखते-
दोहा- वदो धो गणपत विमल पापड़ सु बुध उदार ।
कमधेश्वर क जस बहु अपनी मति अनुसार ।।
वणमास के मध्यवर जुगल वरण रमजान ।
कारण त्यो सब वन के महर दोष कुलमाल ।
उद्ध गमन जुप यरण के सर वरपन पे होय ।
कुल सब हो पे भान, कुल कहे उद्धव सब कोय ॥
पण प्रथम जिह व गवर रिव कुल भूप उदार ।
जाकी
जुग जाहर जगत सग्ला पन लत सार ।
प्रथिनानी प्रवय मलख आदि पुरुष प्रखले।।
तिह नामि मम्भोजते चतुरानन उपजेश ।
प्रारम्भ
१२५
प्रय वश सूचित वचनका-
हरण गदि सुवित्रात अपहरणे ।
वर विध रवि यश वेदव्यास मुख वरणे॥
एक गत तेवीस पुस्त गिनती परवान।
जग चखक वश सुवित्रात भये जान ॥
मध्य- ५ दरह से पैंतालगे, सुघ शाख सुमेर ।
यावर बीज परपियो,
बीकानेर।
पचन का- जिस वीका ने बीस भोमिचार तोड़ कर अपना राज बघे।
फतह के निशान मरसत सये॥
पीछ राव जोधा के तिलक छत्र सुजा ने पाए।
जाको सुन दलबल सज विक्रम भी पाए ।
अस्सी हजार फौज से शव फूध किया ।
लाग तरफ दखरण से शहा लूट लिया ।।
जशमा हामी मां से दिन चढ़ पाये।
सुत मे सरसाय नेह नौक सपझाये ।
पोछ राष माजी का कहा मान लिया।
सेके पूजनीक वात्र कूच सेन
किया।
तीसरी पारणी दवावत बीकानेर के प्रसिद्ध और इतिहास लेखक सढायष
दयासास ने अपने जस रस्नाकर नामक इतिहास ग्रप मे दी है यह भी अधूरी ही मिली
है । मनूप सस्कृत लायब्रेरी में सम्भव है पूर्ण मिल जाय । इसकी रचना भी बीकानेर के
महाराजा श्री रतनसिंहजी का वणन इसमे होने से १६ वी ( उन्नीसवीं) शताब्दी के
मन्त में ही हुई है।
पादियोहा- अत विष तहां पारणं सुखद नृप अभिषेक विधान ।
चरणो नृप नृपता विमल, पद यद वैत मान ।
प्रय दवापत-गणपति वीज युध उक्त का तान।
मैं गाऊ बीकानेर पति मघवान ।।
पारए से दरा घली भारत भीम।
१२४ पगेहत परमारय । सुदाता के सोम ॥ वचनों के दरवासा सील क गगेल । तपस्या मृत्यञ्जय रावन अभिमेल ।। मध्य-जिस छभा में महाराज दे कविराध । विद्या के प्रागर जा रस के विभाय ।। पस्यप री उत्पति प्रारष्टे मात । ध्यास वरण विख्यात । गील के सदन जुत धम को मरजाद । पट भाषा जाएगर अमरु फुल प्राद । दिनकर पुराण चौथी रचना दुरगादत्त कवि की है । जिसकी स प्रथम मूचना मुझे डॉ० अचल शर्मा कयोसिस से मिली कि इसकी प्रति डा० मथुरालाल जी शर्मा के पास है । उनको मैंने दो-तीन पत्र दिये पर प्राप्त न होन से डॉ० अचल शर्मा स ही नषल मगवाई। फिर तो श्री सीताराम लालस से विदित हुआ कि इसकी हस्तलिखित प्रति उनक पास भी है श्री प्रचल शर्मा को प्राप्त नक्ल में स्थानों और यक्तियो के नाम छोड दिये गये हैं। पर उनकी सूचनानुसार यह इसरदा ठिकान स मिली है। १९वी उतगद्ध या २०वों के पूर्वाद्ध में दुर्गादत्त चारण क्सिी ठिकाने में कुछ प्राप्ति की आगा से पहुंचा, पर उसे वहा उचित पुरस्कार नहीं मिला उससे सीज कर उसने यह निदात्मक दवागेत बना दी। प्रारम्भ मे ही कवि महता है पूर्व की तरफ राजावटो देस । रो फा रवास भाडू का भेश। जिस देश मे ईसरदा नाम का गांव । बेवकूफों का वास । पूरतों का धाम । मगतू का- मोहल्ला, कगालू का कोट । होजडू का सहर,' जार का जोट, जुगलू का चयूतरा, सगलू' का रवास । कुपरमू का कोठार, अधमू का ऐयास । भूक' का भांडा, मानजावू का मुकाम । प्रनीत का अखाडा १ शहर २ रगला ३ श्रादलों ४ भूख का मष्टार ३
प्रदूतो का पाराम हराम का वाडा हाम भादू की हाट
खोटु कापमाना। परेन का पाट । विपत का बगीचा ।
बुराई का पाठ । काल का कुशाला। मरो का मेकास ।
ठगू का हिसाणा, सौदू की सराय । पाप का पुवाया।
मसतो कालाय भूतो का भण्डार । सोकोरियों का सहायक ।
साकरिणयां का दरवार रोग का रजवाडा सोग की सिरकार।
कायरू को पुटो । चोरू का प्राधार ।
मत- राजारत रयनाय से रिह हदीमय ।
देवी जिमको वेदक दाखो
दुरगादत ।
हो० अवलजी ने इसे दवा न गध का बहुत उत्तम उदाहरण बतलाते हुए लिखा
है कि इसक गद्य वयरण सगाई की अनुपम छटा है, वणन शली गद्य की प्रवृति का प्रतीक
है, इस प्रकार के गद्य स पता चलता है कि राजस्थानी गद्य म प के अनुकरण पर
भत्यानुप्रास, मध्यानुप्रास या विमो प्रय प्रकार के अनुप्रास व यमक प्रादि को छटा देखने
को मिलती है । पद्य में पाये जाने वाले प्रसिद्ध अलकार बयण सगाई इस गद्य में भी
मिलता है, जो गद्य शली की प्रवर्मा का प्रतीक है।
बारहठ दुरगादत्त रचित क्त की एक प्रति कलकत्ता की ऐसिपाटिक सोसाइटी
के संग्रह में राजस्थानी विभाग प्रति न० पी० ३६ सी. है।
उसका उदाहरण सूची पत्र में इस प्रकार दिया गया है-
बत बारहा दुरगादत से कहो-
एक रम हम सोया हु नय रवाव पाया ऐन ।
यजमाह की हर दस्त फिर वहन साग चन।
एक प्रजब एसासक कामपा परवस्त प्रादम बार।
स्यर गुलम र योच रसते पाव परत फुहार।
बारहठ दुरगारत की भय रचनाएं भी वगाल हिदी मण्डल में प्राप्त है।
एमिपाटिक मामाइटी के मह में मम दमारत रामजी थी मावानदासजी रो बारहठ
सुमारण रोपहियो' नाम रचना की प्रति भी है। सूची में उसका भादि अन्त इम
प्रबार दिया है-
१२९ अप वहा- सरसतो ब्रह्मा पुत्री दोज उपति बताई। भूप बक्षाणू रापण तणा दवायत गुण गाइ॥१॥ गवरी नदन गज यवन, घमघर उपदेस । वापार भुप्रपति गुणे रिमो देप्रण सगरेस ॥२॥ पात बोहा-भागोरप राजा का तू सौह जाएग विध। मे मति सार माहरो बुवात गुण किए ॥१॥ बगाल हिन्दी मण्डस के रजिस्टर न० ५७ में एक दवावत होने का उल्लेख है पर वह किसके द्वारा रचित है इसका विवरण सूची में नही है । इसके अतिरिक्त सरस्वती भडार उदयपुर के सह में कु वर मग्रामसिंह या महाराणा उदयसिंह की दवावत है जो मेवाही भाषा में है और प्राप्त प्रति सवत् १८६७ की लिखी हुई है। इस रचना का परिचय शोधपत्रिका वष ८मक १-२ में प्रकाशित हो चुका है । सम्भव है मधिक अनुमधान करने पर और भी कुछ ऐमी रचनाए प्राप्त हो जाय । हिन्दी पौर राजस्थानी इन दोनो भाषामों में दवाोतो का पाया जाना विशेष रूप से उल्लेखनीय है । उनम कई रचनामों मे वणन बहुत सुदर है। भाषा और शाली भी बड़ी सरस एग सजीव है। अन्य उपलब्ध दवावतों की सूची इस प्रकार है १ दवावत भीवजी विठ्ठलदासोत गौड री-- महेसदास राव- १७१५-१७१० के मध्य २ दवावत प्रखमाल देवघा री- मेहर विहारीदास- १६७४-१७३० ३ दवावस चारणकवि कविया करणीदानजी री कही ( सूरज प्रशाश में ) १०८७ (म) जोधपुर नगर वणन (मा) षष्ठ भाषामय प्रांतोल्लेख (इ) हस्ती वा (६) सरविलद खान की सनिक तयारी ४ दवावत मासिया बखतरामजी री कही ( रूपग दीवण भीमसिंह जी का में ) (म) राज्य वमव वणन (मा) मासेट वरणन ५ दवावत उदयपुर नगर वणन- माढा पिसना- ( मोविलाम छ.६७४) ६ वदावत देवीसिंह चू डावत री- मादा कृपाराम ७ दवावत महाराणा जवानसिंह जी री- मासिया तेजराम -
१२०
८ दवावत माशिया नराम रो रही ( कीरत प्रकाश में)
६. दवात स्वा सरूपदासजी री कहो- (पाहव यशेंदु परिया में)
१० दवायन डा० देवीसिंह भगतावतरी कही ( सुजानसिंह जी री बात में)
(2) सुजानसिंह जी का नखशिख वरान
स.१६१०
(मा) अश्व वरान (इ) शस्त्र वन
(६) सजना सौंदय वरणन
१ वाक्त म० भूसिंहजी र ताजेरी सवारी री- (शमूजमनाम में )
कविराज वस्तावरसिंह जी--- स. १९२१
१२ दवात राव गिरवरदान से कही (प्रय विनाय प्रकार में )
१३ भुपना भाव गैत- कविराज गुमान जी
१४ वात रामदयाल रो-प्रज्ञात*
अभी तक यह समस्या सुलझ नहीं पाई है कि ऐसी दवाओंतों की रचने की
प्रेरणा राजस्थान के कवियों को कहा से मिली और प्राथमिक रचनाएँ जद हिती प्रधान
हैं वो हिन्दी के क्षेत्र म जैसी रचनाएँ रची जानी चाहिए, पर वे पास क्यों नहीं हैं ?
माशा है भविष्य में इस दिशा में विशेष अनुसघान होगा।
*सीमाम्यमिह सेखावत
शोधपत्रिका वर्ग १३ या ४
सलोका संज्ञक रचनाएं राजस्थान और गुजरात में विवाह के समय वर और जनतियों द्वारा सलोंके (देवी देवताओं के एक विशेष प्रकार के छद) पहने की प्रथा है । शहरों मे तो पर यह रिवाज उठता जा रहा है, पर गांवों में अब भी प्रचलित है। इसको परपरा कितनी प्राचीन है, इसका पूर्वकालीन रूप क्या था वतमान सलोषों का विकास क्ब से व किस प्रकार हुमा, इस सबंध प्रस्तुत लेख में विचार किया जा रहा है। मुनि लावण्य समय के विमल प्रबध ग्रय में इस परपरा की प्राचीनता सोलहवीं धताम्दी के पूर्व की सिद्ध होती है। इस प्रबध मे विमन मत्री के विवाह प्रसग में वर के सोरण पर पहुँचने पर साले के द्वारा प्रेरित होकर वर के श्लोक बोलने का उल्लेख इस प्रकार है पुहता तोरणि जोई लोक, सोझ्या साला कहि सलोक । विमल पाणी प्रपणे सामली, ग्या साला ते यह दिसी टली ॥१४॥ सौभाग्यवश मेरे प्रवेपण में पद्रहवीं सोलहवी सदी के प्रारम में वर के द्वारा ये सलोके किस प्रकार कहे जाते थे? इसके उदाहरण स्वरूप एक रचना मुझे प्राप्त हो गई है। इसके अनुसार १६ वीं शताब्दी में वर अपने साले को सबोधित करता हुमा प्रारभ में अपने माराध्य देव, गुरु, कुलदेवी गो, माता पिता, नगर, तत्कालीन शासक उसकी समा या परिकर एव तोरण प्रादि के वणनात्मक सलोके कहता था। प्राप्त रचना क मत में गणेश व सरस्वती को सुख देने की प्रार्थना की गई है। बीच में विवाह महप क्या की प्राणि और साले को कौतुहल पूर्ण करने आदि का उल्लेस है। इससे वतमान सलोके का जाने वाली रचनामों का पूर्व रूप मात जाता है। सलो का मूल शब्द "श्लोक है। जन भाषा में सलोका या सिलोका शब्द प्रचलित हो गया है। इसकी रचना का प्रारमिक कारण वर की शिक्षा एवं बुद्धि परीक्षा लेना रहा होगा ! जब वर विवाह के समय समुराल जाता था, तो तोरण पर उसकी पिता एव बुद्धि की परीक्षा लेने के लिए साल के द्वारा कुछ श्लोक कहे जाकर वर को कृष १२० वएनारमक एलोक कहे जाने की प्रेरणा की जाती थी और उसके उत्तर में वर कुछ श्लोकों में अपने वन मादि का परिचय देकर अपनी प्रतिभा का परिचय देता था। इस लेख में परिणत रचना के अतिरिक्त सरवरगन्य के शान्तिसागर सूरि पौर जिनसमुद्रसूरि के प्रवेश उत्सव प्रादि के वएन वाली दो रास्थानी गध की विशिष्ट रचनाए हमें भोर प्राप्त हुई पी, बिहें राजस्थानी (निराधमाला) मा० में हम प्रसारित कर चुके हैं। उनकी पत्तियों का प्रारम भी 'महो सालक " इन शब्दों के सम्बोधन द्वारा होता है । मत वै भी विवाह प्रसग में वर के द्वारा साले को सम्बोधित करके कही जान वाली लोक रसना के रूप में हो बनाई गई प्रतीत होती है। जैसलमेर के बडे ज्ञान भण्डार के फुटकर पत्रों में जिनभद्र सूरि और उन शिष्य जिनचा सूरि को वनारमक दो रचनाए हमारे अवलोकन में पाई थी। इन रचनामों का निर्माण दरों ने नहीं लिया पर जैन मुनियों ने उनके धोरण पर बोलने के लिय क्यिा होगा। सभी पर कोई रचना करने वाले नहीं हुमा करते । भत' ने ऐसी रचनाओं को याद कर लेत पे मोर रटी हुई रचनाए प्रसग पर बोलकर अपना काम निकाल लेते थे। आज भी यही होता है । अब सलोके वर स्वप नहीं रहता, जानी एव मोही, दोनों सम्बधी मन परसर सलोकों की होड लगाने हैं। यदि वर पक्ष के जानियों को पावर के कुटुम्बी जनों को सलोके नहीं पाते तो वे इसी के पात्र होते है और उहें नीचा देखना पाता है । सत्रहवी शताब्दी स.सलोमें के रचे जान की गली में तर पर गया । इस समय से ऐसे सलोकों के लिए एक रूट सा हो गया। अब सस्कृत में श्ताक रचना न को जार भाषा में ही उस रूल चली में सलो बनाए जान लगे । १८वीं शतान में यह प्रया और भी अधिक चली और १९वीं में तो जोरों से अनेकों रचनाएँ बनी । ममी तर बन जनेतर परीव सो के ऊपर सलोके मेरे जानने में पाए हैं। २० वीं शागे में भी मनको प्रलोके रचे गये और उनके कई सपह राय भी प्रकाशित हुए हैं। जन मुनियों ने इस प्रकार की रचनाओं के निर्माण में वही दिलचस्पी दिलाई। सनी रचित रचनामों का विवरण "जन-सत्य-प्रकार के प्रकों में (मरे एवं प्रो. होरालाल पाक्षिण भादि द्वारा) उपस्थित किया जा चुका है । जैनेतर सलोकों की भी मैंने एक सूची तयार की है। प्राप्त रचनाओं की सूची लेख के मन्त में दो बा रही है। मैं मलोंके राजस्थानी भाषा में हो मयि रचे गये है इससे सलोगों के रहने की प्रथा राज- पाल में ही अधिक रही प्रतीत होती है। गुजराती मापा र गलोर हे ही प्राह है। सलोरे की गली को राजस्थानी भाषा के पद-अप "रघुनाप स्पर" म गर पाय का हो एक प्रकार माना है वर्षोंकि इसमें माना ग्रादि का इतना विचार नहीं होता। ग्रह साधारण लोगों के द्वारा मयिक रचे गये है, जि शाम्प निर्माण प्रणाली एवं धन्दा का विशेष ज्ञान नहीं होता है। जन कवि विद्वान अवश्य पे, पर उहोंने भी प्रचलित पासी को ही अपनाया न मलोकों में देवी देवतामों एव वीरों के गुण वयान की ही प्रधानता है। इनको बोलने की विशेष लय है । उच्च स्वर में जब उस लय में सलोके बोले जाते हैं तो सुनने वाले लोग वही उत्सुक्ता के साथ टक्टको गाये हुए उन्हें सुनते हैं। कई सनोकों में वीर रस को प्रधानता होती है । उनके सुनने में तो हृदय कडक उठना स्वभाविक ही है, पर मप सलोकों में भी महापुरषों से सम्बघिन होने के कारण उनके परितों का धमत्कारिक वन रहता है जो लोकप्रिय होता है। रघुनाप रूपक के अनुसार यह पनिका के समान तुपात गद्य वाली रचना है । मन के तुक मिलने के कारण और शहरों की सोमितता से यह गए गली काव्य जसो ही लगती है, इसलिए इमे काध्यगत सलोका घर कह सकते है। रघुनाथ रूप में सलोकों की शली का उाहरण इस प्रकार है बोले सीतापत इसही जो वाणी, सुरमर नागा ने सारी सुहाणी ।। सेसाजल हणमत जिम सरसाई, धौरा प्रदर्श रोहीधी बाई । धनुधर रादायक समिल जोधारा, पोरस मों में अधियो प्रणपारा॥ पुषय पर जोडी जीतव फल पापो मान थी विद तगे फुरमायो। सबहवी ताब्दी से अब तक ये रचित सभी सनोने इसी पाली में रचे गये हैं। " प्राप्त सलोको को सूची १ घण्टापद सलोको विनीत विमल म १७३३ के पीछे २ भादिनाप सतोको स १७३६ से पूर्व प्रसोका सग्रह ३ विमलमेतानो सलोको गा ११७ उदयरल स १७९५ रेहा ४ श्रापभदेव सलोको जिनहप १९वीं शतानी ५ पल्याएजी मलोको गा २३ माधव समय जन प्रयासय ६ केशरियाजी रो लोका गर ११ उत्तमरद का १५५६ वर्गति सागर स पह ७ कोध चलोको प्र समायमाला ८ पदराजा रासलोपोगा ५१ नीराम ग १८१५ अपनोका स ग्रह ६ बसलमेर बढ़ती दमा रो सलोको रामचन्द्र स १८८ प्रमय जन प्रयाला १. कुाजी पनी रो सलोको ११ नेमिनाथ सलोको गा ४८ १२ स राजलाम जिनहर्ष गा ४६ " १७५४ ४ उदयरल गा १५ विनीत विमल मोती मालू " स १७१८ " २३ २४ " देवपद स १६०० प्रस्तवन सग्रह १८ गा २८ प्र श्लोका स प्रह प्र गोविद भनसाली २० नैमी राजुल सलोको कुगलविजय स १७५९ २१ पाश्वचद्र सूरि सलोको मेघराज २२ पारवनाय सलोको जोरावरमल स १८५१ गा २१ गोपाल दौलत स १८४० २५ भरत बाहुबली सलोको उदयरल प्रलोका सग्रह २६ मान सलोको प्र समाय सग्रह २० माया सलोको प्र २८ मघकुमार सलोको गा ०५ महानन्द स १८२३ २६ लोसनोको प्र लोहि ३. लोम सलोको प्रसग्माय सग्रह ३१ वासुपूज्य सलोको गा ४० ३२ विजयलक्ष्मी सूरि सलोरो जिनेद्र सागर ३३ विमल मत्री सलोको गा १११ विनीत विमल १८ वीं शतानी मलोका सपह ३४ विवेक विलास ससोको १६३० प्र लोकास प्रह ३५ पालीमा सलोको सिंह १७८१ प्र रत्नसागर उदयरल प्र सलोकास प्रह गा ४४ प्रमय जन प्रथालय ऋपि सोग प्र जन सज्म्यय सपह - स १७६० " १७८४ " " . ३९ शालिभा सलोको ४. ससेश्वरजी का सलोमा उदयरन १७५६ प्र इलोका सग्रह देवविजय ४२ शातिनाप सलोको गा ४३ मरिणविजय ४३ सिदाचल सलोको सघवी प्रमजी ममरविजय १७७० ४४ हीरविजय सूरि सलोको विद्याधर बन युग ४५ सरस्वती जी रो सलोको जनेतर सलोके १ भानो सलोको गगादास २ रणछोड नी नो सलोको सामल भट्ट १७६१ रूस्तम नां सलोको १७८१ ४ सोतराम रावण सलोको गा १६ प्रलोका संग्रह ५ शहर महादेव सलोको गा ११ ६ माधवराव जी रो सलोको गा १६ स १८५७ माघ वदी। ७ रामसापीर रो सलोको गा १२ ८ पापावत सवाईसिंह सलोको गा २६ ९ भीमसिंह जी रो सलोको गा २३ १० लक्ष्मणजी रो सलोको गा २२ ११ भरू जी रोसलोको गा ३ १९५२ अभय जैन ग्रंथालय १२ सूरजजी रो सलोको १३ रामदेवजी रो सलोको स १८१० १४ कुशलसिंह जी रो सलोको १५ ममरसिंह राठौड रो सलोको १६ बालाजी रो सलोको १७ मजीतसिंहजी रो सलोको १५ जमलजी रो सलोको १६ जामजी रो सलोको मोतीचन्द खजांधी संग्रह में २. ममरपद सुराणा रो सलोको " " " " करीब ३५-४० वर्ष पूर्व प्रतापसागर पुस्तकालय जालना स "मारवादी ध्याह में बोलने का लोका" नाम से एक पुस्तक प्रकाशित हुई है, जिसमें १८ सलाफे प्रकाशित है। उनमें से एक को छोड़कर सभी के कर्ता पूनमसिसवाल (हटा निवासी विष) है जिसने १० १९७२ से १६ तक में प्रकाषित किये हैं । केवल जाति सुधार का सलोबा रामकिशन ने 80 १६७३ जेठ वदी १३ को शोलापुर में बनाया है, वह इस सग्रह में छापा है। पूनम- पद रविष्ठ सलोगों के नाम इस प्रकार है। १ गणपति जी रो सलोको १० बाप बेटी से सलोको २ सुधार ११ वेश्या रो ३ फलोषी माता १२ लक्ष्मीनारायण ४ शकर महादेव १३ सतीमाता र रामसापीर १४ कलजुग प्रवाह ६ कृष्णमुरार ११. सीतारामजी ७ वमणी मगस १६ राम सक्षमण सलोगो कालीनागदमण सलोको १७ पञ्च समारो सलोको ६.बाप बेटी से सलोको १८ छोटे कपरी स्त्री रालोको जोधपुर से सत्री भीसमवन्द बुक्सेलर ने सनोका साह प्रमाशित किया है पर यह मेरे प्रवलोकन में नहीं माया है । भौर भी पतिपय स्वतः लोकों में संग्रह एवई 'भुकसावा बहार' मादि साह प्रपों में (समा ) प्रकाशित हुए हैं। " " " ॥
ख्याल सज्ञक काव्य सभी क्रियाओं का उद्देश्य किसी अभाव व आवश्यक्ता की पूर्ति ही होता है । कई प्रवृत्तिये पूर्व अभ्यास एव अनुकरण से की जाती है तो कई इच्छा को उत्कटता से मभावों मोर आवश्यकतानो की पूर्ति के लिए 1 कुछ प्रवृत्तिया जीवन धारण के लिये अनि वाय होती हैं तो कुछ जीवन को सरस बनाने के लिये स्वीकार की जाती हैं । नाटक, खेल मादि इसी दूसरी प्रकार की प्रवृत्ति में सम्मिलित हैं । मानव जीवन मे फत्त य हैं तो क्रीडायें नी हैं। नाटक खेल मानव जीवन को सरस बनाने के लिये बहुत आवश्यक होने से प्रत्येक व्यक्ति के लिये समान रूप से प्रिय हैं । इसलिए इसको विशुद्ध लोक-कला कहा जा सकता है । जब से मानव मे सुख दुख की अनुभूति का विकास हुमा तभी से उसमे थोडे समय के लिये भी जिनसे मनोरजन व मानन्द की प्राप्ति हो, उनको अपनाने में प्रवृत्त होना स्वा भाविम है। उपलब्ध भारतीय साहित्य में नाटय कला के सम्बन्ध में व्यवस्थित रूप से प्रकाश डालने वाले सबसे प्राचीन भरत मुनि है । उहोने नाटक की उत्पत्ति के र बध में अपने निम्नोक्त विचार नाटय गास्त्र में प्रकट किये है "सुदूर प्राचीन काल मे सत्य युग मे दुख और पीडा जसी अनुभूतियों से लोग सवधा अपरिचित थे और इनके अभाव में मानन्द सदृश्य किसी अनुभूति की भी रहें कल्पना नही थी। फलत उस युग मे पान द के साधनों की भी कोई भी मावश्यकता नहीं थी। समय ने पलटा खाया । काम मोर लोभ के वशीभूत होकर लोग पनाचारम प्रवृत्त होने लगे । ईया, क्रोधादि की भावना के कारण उनम सुख और दुख की अनुभूति होने लगी। लोगों को इस प्रकार घोहित देख कर इद्रादि देवता ब्रह्मा के पास पहुंचे और उनसे निवेदन दिया कि एक ऐसा खेल बनाइय जो पाखों से देखा जा सके और कानों से सुना भी जा सके । वेदों के द्वारा दिया हुमा उपदेश एक तो रूखा सा होता है, मत वह लोगों के हृदयों के स्पा नहीं कर पाता । दूसरे समम की कमी क कारण मृदादि उसका प्रयोग नहीं पर सकते । मत माप सभी वणों के उपयाग में माने योग्य एक नवीन पचम वेद की रचना करिये। इस पर तत्वज ब्रह्मा ने चारा वेदों का स्मरण कर धम, अथ और मोक्ष को देने. वाले इतिहास के साथ माय उपदा म युक्त लोगों को लोक व्यवहार का मादर्श सिखाने वाले नाट्य नामक वेद की रचना की जिसम सभी शास्त्रों का निष्प लिया गया था भौर जिसमें सभी शिल्पों का प्रशन मावश्यक सामग्वेद से पाठ्य (सवाद), सामवद से गीत, यजुवद से अभिनय और अथववेद से रस, इस प्रकार चारा वो स सामग्री लार नाटय धेद का निर्माण किया गया । प्रत्यक्ष ब्रह्मा से प्राविभूत होने के कारण इस कृति को पचम वैद कहा गया है। उपयुक्त विवरण से स्पष्ट है कि नारद की उत्पत्ति जन साधारण के लिये हुई पो । नाटक का उद्देश्य बतलात हुए भी भरत नै निषा है वह सर्वोदश मोर लोकहित के लिए ही है । नाटय क्ला एक प्रोर दुखात प्रमात एव गोकात के लिये विश्राम जनम एव मनोरजक होती है तो दूसरी ओर लोक मान पद्धय भी, क्योकि कोई भी पान, शिल्प विद्या, कला या याग ऐसा नहीं जिसका प्रयोग नाट्य अभिनय म न होता हो। नाटक के कई तत्व होत है। १ सवार २ गीत ३ अभिनय मोर ४ रस इससे इसका क्षेत्र कितना व्यापम है हमका भनी माति बोध हो जाता है। साहित्य, संगीत और कना इस त्रिवेणी सगम का यह अद्भुत सयोग है। प्राचीन जनागमों में भी प्राचीन मानव सस्कृति विकास का ऐसी ही क्या पाई जाती है । उनक अनुसार प्राचीन मानव युगलिक रूप से उत्पन्न होत थे, उनकी पावश्यक साए बहुत ही सीमित पी और वृक्षों के द्वारा उनका पूर्ति की जाती थी। उन वृक्षों की सजा 'कल्पवृक्ष' पाई जाती है । मान भी जिमम मनोवाच्छिा प्राप्ति होती है उसकी उपमा या विशेषता कल्पवृक्ष से दो आती है । उस समय परम्पर बलह भगडे का कोई कारण नहीं था । पौषत्रोवन एक बधो लाइन पर चल रहा था । समय ने पलटा खाया । कल्पवृक्षों की फलदार शक्ति होण होती चली गई । इधर मनुष्य की सुधा माटि मावश्यय ताए पड़ने लगी । इसो से पारस्परिक सह योर मगढा की उत्तति हुई। इपी सकान्ति बाल में भगवान ऋषमदेव का अवतार हुमा । उहोंने प्राचीन परपरा म सुधार किया और मावि तया सम्यता का विकास करने के लिय पुरषों को ७२ भौर स्त्रियों को ६४ मलाए सिसाई। अपना अप्ठा पुत्री ब्राह्मी को जिस वणमाता को frer दी उमका नाम प्राह्मी लिपि है भोर चष्ठ पुत्र भरत का नाटपरला की शिक्षा दी जिससे भरत नाटक . प्रसिद्ध हुमा । 'वसुदेव हिंडी' नामक पाचवीं पतान्दी के प्रचीन कथा पथ में इसका उल्लेख पाया जाता है। सगीत मोर नाटक मानव को ही नहीं परतु पशु जगत को भी प्रभावित करते हैं । देवों का जहाँ वणन मिलता है वहा तो मानो उनका अधिकाश समम नाटक खेल देखने में ही व्यतीत होता है ऐसा वणन पाया जाता है । वे नाटक बड़े दिश्य होते हैं और दीर्घकाल तब चलते रहते हैं। भगवान महावीर के समय उनके एक भक्त देव सूर्याम ने पामलकप्पा नगरी में भगवान महावीर के पाम भाकर बत्तीस प्रकार के नाटक खेले थे। जिनका बहुत ही सुदर वणन रायपसेणीय नामक उपाग सूत्र में सौभाग्य से सुरक्षित रह गया है । ममी सक ऐसा विशद नाटय वणन दूसरे मयों में नहीं पाया जाता । इसलिये यहा उसका सारभाग लिया जा रहा है। "सूर्याभदेव ने भगवान महावीर को वदना नमस्कार परक विनती की कि भगवन् । मापठो सवज्ञ है। भूत, भविष्य मोर वतमान के भावों, घटनामों भोर मेरी दिल्य देव धुति ऋद्धि सिद्धि सब को जानते हैं पर गौतमादि पमरण निर्ग्रयों को मैं ३२ प्रकार की नाटयकला दिसाकर अपनी भक्ति प्रदगित करने की इच्छा रखता है। महावीर मौन रहे । तब सूर्याभदेव दो तीन बार अपने वाक्यों को दुहरा कर, तीन प्रदक्षिणा देकर नाटक की तैयारी करने लगा। उसन उत्तर, पूर और ईशान कोण में जाकर क्रिया समुद्घात द्वारा एक लवा डड निकाल कर सारी सामग्री सजित की। नाटक के लिये एक गौलापार स्थान को सज्जित किया, उसके बीच में नाटकशाला सडी की। सिंहासन, छत्र मादि सभी वस्तुमो को यया स्थान सज्जित किया फिर महावीर को प्रणाम करके स्वयं उनके सामने सिंहासन पर बह गया। अपने दाहिने हाप को प्रसारित कर उसमें से समान रूप लावण्य वाले वस्त्राभूषणों से सुशोभित १०८ देव कुमारों को प्रकट किया और बायें हाप से इसी प्रकार १०८ देव कुमारियों को। फिर ४६ प्रकार के १०८-१०९ वाप पत्र और उतने ही उनके बजाने वालों को प्रकट किया। तदन्तर दयकुमार और देव कुमारियों को उसने माता दी कि महावीर एवं गोतमादि सभी निमपों को प्रणाम कर ३२ प्रकार के नाटकों का प्रदशन करो। तब ये सूर्याभ के मादेशानुसार एक पक्ति में खड़े होकर भगवान की वंदना करपे याच यत्र दजाने लगे भौर नृत्य करने लगे। उन्होंने मद और मधुर स्थर से घगीत प्रारम्भ करके नाटयशाला को गुजारित कर दिया और फिर धीवास, मातं, वर्षमान, मद्रासन, क्वश, मत्स्य भौर दपण मादि नृत्यों का प्रदर्शन किया।
इसी प्रकार पाय ३० नाट्यकलामों का प्रदान करने के बाद ३२ में प्रदशन में भगवान महावीर के पूर्ण भव प्रारम्भ कर निर्वाण तक अभिनय कर दिखाया। इस प्रसग में रायपसेरणी सूत्र में जिन नाट्यों का वणन हैं वे बडे अद्भुत हैं । उनमे से कुछ का वणन तो भरत नाटय नास्त्र में प्राता है पर कई नृत्यों की परम्परा भरत नाटय के निर्माण तक लुप्त हो गई मालूम होती है। मन्त म चार प्रकार के वाद्य तत्, वितत्, धननवकर भौर शुपिर एका चार प्रकार के संगीत उत्क्षीप्त, पादवृद्ध, मद और रोचित और चार प्रकार के नृत्य, मचित, रिचित, पारमट और भसोल और चार प्रकार के अभिनय दार्शतिक, प्रात्यतिक, सामा य, नोपनीपातनिक मोर लोक मध्यावसानिक का प्रदशन किया। अभी तक कोई भी इतना प्राचीन नाट। तो उपलब्ध नहीं हुआ इमलिए जन साधारण के प्राचीन माटों का पूर्ण रूप कहा था ? सष्ट नहीं बताया जा सकता। विक्रम सघद के प्रारम्भ के लगभग से सस्कृत के नाटकों की उपलब्धि होने लगती है। इन नाटकों में स्त्रियों के कथोपकपन प्राकृत भाषा में दिये है, इससे जन साधारण के निकटवर्ती रहने का प्रयल परिलक्षित होता है । मध्यकाल में संस्कृत नाटक तो रचे जाते ही रहे हैं, पर साधारण अनता के लिए लोक माषा में रास) पर्चरी, फागु मादि काव्य रचे जाने लगे थे, जो गेप के साथ अभिनेय भी थे। किसी मागलिक प्रसग, उत्सव, गुरुओं के प्रागमन, मन्दिरों की प्रतिष्ठादि प्रसग में जनता इह खूब रस से गाती थी भोर हटियों के खेल मौर तालियों के साथ नृत्य किया जाता था। उस समय के रचे गये प्रपों में इनका स्पष्ट उल्लेख है। बागभट्ट मौर हमचद्रसूरि ने रासक का लक्षण बतलाते हुए उसे उपरूपए बतलाया है 'होम्बिका भारण- प्रधान-धारिणा-प्रेरण-शिंगक-रामा-बीड-हल्लीसक-श्रीगदित रासक-गोष्ठी अमृतीनि मेयानि ।' इसकी वृत्ति में लिखा है कि "पदाभिनय स्वभावानि गम्बिकादीनि गेयानि रूपकाणि पिरसनरुवतानि ।' रासकका सभरप "मनेक नतको योग्य चित्र ताल सयान्वितम् । - प्राधतु पप्टि युगसाासक मसुरोटतम् ॥ प्रति जिसमें नतक्यि भनेक हो, भनेक प्रकार के वाल भोर लप हों, परन्तु जिसमें १४ तक युगल हो ऐसा कोमल और उदत गेय 'रासक है। १२वीं से १५वीं शतीतर के रास, परी, फागु अशा कायों में उनके खेले जाने का उल्लेख मिलता है । स. १३२७ के सत क्षेनि रस में लिखा है कि- "इस सहइ श्रमरणसघ साधय गुणवता। जोयह उच्छावु जिगह भुवरिण मान हरप परता। तीछे तालारस पडइ बहु भाट पढ़ता। प्रना लकुटारस जोईई तेला नाचता ॥४८॥ सविहू सरीषा सिणगार सवि तेवर सेबडा । नाचह धामीय रभरे तउ माया रहा। सुतलित वालि मधुरि सादि जिप गुण गायता। ताल मानु वयोत मेलु वाविध वाजता ॥४॥ मर्यात जनर्मादरी के उत्सव प्रसग से श्रावक प्राविका हप , साप एकत्रित होते भोर तालिया के साथ एव डांडियों के खेल के साथ रास सेल जाते। इसम स्त्रिया भी भाग लेती थी और रात्रि को भी ये बहुत देर तक खेले जाते थे। प्रत इस काय को सुविहित मार्गानुपायो मुनियों ने उचित नहीं समझा । विशेषत खरतर गच्छ के भावापों ने इसका तो निषध किया । स १३२७ में रचित सम्पक्तक माई पौपाई में भी इसका सूचन मिलता है। "तालारामु रर्याण नह देह लउडारासु मूलह पारेइ ।" अर्थात सालियों के साथ रास का सेलना रात को न किया जाये और डांडियां लकश्यिोरेरासको तो मूलत वजिन किया जाता है । फागु का य वसन्त ऋतु में विशेषत फाल्गुन या चन में खेले जाने हैं । स्मूल मार फागु में इसका स्पष्ट उल्लेख है 'सेता नाचा चत्रमासि रगिहि गावेवउ यहू। 'विवाहले" काव्यों मे भी उनके रमे जाने व खेले जाने का उल्लेख मिलता है। जिनेश्वर सूरि विवाहले में लिखा है- एह विवाहलव जे पढ़इ, जे दिया हि खेला खेलहि रण भरे' और रास सनक काव्यों में तो उसके रमने मोर सेले जाने का उल्लेख अनेक स्थानों पेपर रास में "रास रमेवर जिन मुवरिण ताल मेल ठविपाउ,' प्रभय तिलक रचित महावीर रास मे 'पमणि बारह रामुलक, लेखहि मिसव कराविउ मिनोदयमूरि पट्टाभिषेष रास में "रमठ रासु हरपि।"
रास रमे जाने का अन्तिम उल्लेस म. १४८६ में रचित उपाध्याय जयसागर के वयर स्वामी रास में मिलता है "उच्छव मगल रास रमिज ।" जैनाचार्यों के नगर प्रवेशोत्सव के समय रास एव पर्चरी के दिये जाने पोर धवल मगल गीतों के गाये जाने का उल्लेख युग प्रधानाचाय गुर्वावली में अनेकों बार किया गया है । सम्राट पृथ्वीराज की सभा शास्त्राप में विजय प्राप्त कर जिनपति सूरि पौपघशाला में पधारते हैं तब रास्ते मे चचरी दिये जाने और धवलों के गाये जाने का उल्लेख किया है 'पुर मध्ये स्पाने स्याने रगभरेण प्रेक्षणीय निप्पद्यमाने, धाने घ ध्याप्रियमाणे, चचर्या दीयमानायां, धवलेपुगोयमानेपु, स. १३३७ वीजापुर में वासुपूज्य जिनालय के महोत्सव प्रसग पर लिखा गया है स्थाने स्थान प्रमुदितमनेन दीपमानपु प्रधानरासकेषु नानाविरिण मार्गेपु गोयमानेषु विवध प्रपर घघरी यरिण गतेपु, उपयुक्त उदरणों से स्पष्ट है कि जन साधारण में जो मध्यकाल मे रास, पनि, फागु आदि रमे व सेले जाते थे वही पीछे से रमत, रामत, खेल, ख्याल के रूप में प्रगटित श्री उदयशवर गास्त्री ने देशबघु वप २ मा ७ प्रकाशित अपने लेख में लिखा है कि- ऐसा कहा जाता है कि १८वी शती के प्रारम के प्रासपास ही मागरे के इर्दै गिद एक नई कविता पाली प्रचलित हो चली थी, मागे चलकर जिसका नाम स्याल पड़ा। स्याल निश्चित हो उर्दू मोर फारसी 4 मसाले से तयार चीज पी। उसको नये नये पानकों में बांधना सवका काम नहीं होता था। मागरे में इन स्यालियों के कई दल, जिनमें सभी प्रकार लोग थे और सभी प्रकार की बदिरों वाधन वालों के गोल कभी कमी होड मी लगाने लगते थे। १५वी शताब्दी तक के रास साहित्य को देखने पर अधिकांश राम घाटे छोटे हो मिलते हैं उनका उद्देश्य पेले गाने में मुविधा रहे, यही प्रतीत होता है। प्रषिक सवे रास एक दिन में ३ एक खेल में समाप्त नहीं किये जा सकते हैं पोर सेल देखने वाले प्राय' यही चाहते हैं कि एक दिन में । वह समास हो जाय । १५वीं शताब्दी के उत्तराद से यह बडे रास रच जाने लग तब वे परित काव्य के रूप में परिणित हो गये । इस समय १३८ "इसइ सहूइ धमएसघ सावय गुणवता। जोया उच्चायु जिगह भुवरिण मनि हरप परता। तीछे तालारस पडइ बहु भाट पढ़ता। प्रना नारस जोहई खेला नाचता ॥४॥ सविहू सरीखा सिरागार सवि तेक्ड सेवडा । नाचह धामीय रभरे तउ भाषहरूमा । सुललित वारिष मधुरि सादि जिस गुण गायता। साल मानु छरगीत मेलु वाभित्र वाजता ||४|| अर्थात जना दरो के उत्सव प्रसग से थावक माविका हप के साप एनत्रित होते पोर तालियों के साप एव डांडियों के खेल के साप रास खेले जाते। इसमें स्त्रिया भी भाग लेती थी पौर रात्रि को भी ये बहुत देर तक खेले जाते । मत इस काय को सुविहित मार्गानुयायी मुनियों न उचित नहीं समझा। विपत्त खरतर गच्छ के माचार्यों ने इसका तो निषेध किया ।स. १५२७ में रचित सम्यक्तव माई चौपाई में भी इसका सूचन मिलता है। "तालारासु रर्याण नह देह लउडारासु मूतह पारे।" मर्यात ठालियों के साप रास का खेलना रात को न किया जाये और डांडियां लकड़ियों क रास की तो मूलत यजित किया जाता है । पागु काव्य बस त ऋतु में विशेषत पाल्गुन या चत्र में खेले जाने हैं । स्थूल भद्र फागु में इसका स्पष्ट उल्लेख है। 'खेला माद चत्रमासि रगिहि गावेवउ " 'विवाहले" काव्यों में भी उनके रमे जाने व खेले जाने का उल्लेख मिलता है। जिनेश्वर सूरि विवाहले में लिखा है- एह विवाहलउ जे पढ़इ, जे दिया हि खेला खेलाह रग मरे" और रास सपक कायों में तो उनके रमने भोर खेले जाने का उरलेख भनेक पानी - में है। - पेपर रात में "राम रमेवर जिन मुवणि ताल मेल दिपाउ,' पभय तिलक रचित महावीर रास में "पाणसु वीरह रालउ, सेलाह मिलव कराविड मिनोवयमूरि पट्टाभिषेक रास में ~ "रमउ रामु हरगि।"
१५वी शतादी तक के रास साहित्य कोन पर पिता राम पाट छोटे ही मिलते हैं उनका उद्देश्य ऐले बान में सुविधा रहे, यही प्रशन पधिक मी बडेबड़े रास रचे जाने लगतव से बचरितमाश्यसहित होकर रास रमे जाने का अन्तिम उस्लेखम० १४०६ में रचित उपाध्याय जयापर के चयर स्वामी रास में मिलता है "उच्छव मगल रास रमिज ।" जनाचायो नगर प्रवेशोत्सव के समय राम एव पचरी दिय जाने और धवल मगल गीतों के गाये जाने का सल्लम युग प्रधानावाय गुर्वावली में अनेकों पार किया गया है । सम्राट पृथ्वीराज को समा शाशय में विजय प्रशस पर जिनपति सूरि पोप म पधारत हैं वव रात में चचरी दिये जान भोर धवलों ये गाय जाने का उल्लेख लिया है "पुर मध्य स्थाने स्थान रगभरेण प्रेक्षणीयर निष्पधमान, दान व याप्रियमारणे, वर्षा दोपमानामा, पवलेपु गोयमानेषु, स. १७३७ योजापुर में वासुपूज्य जिनालय , महोत्सव प्रसग पर लिया गया है थाने स्थान प्रमुरितानेन अपमानेपु प्रधानरासपु, नानाविरणि मागेपु गोयमान वियप प्रयर चपरी सितेपू, उपयुक्त वदरणों से स्पष्ट है कि जन साधारण में जो मध्यकाल म रास, पर्षरि, फागु मादि रमे व खेले जात ये वही पीछे स रमत, रामत, हेम, स्याये रूप में प्रार्टिव श्री उदयावर शास्त्री न देशरयु वर्ष क ७ प्रशारित प्रपन मेम्प में निसा है fr- एसा कहा जाता है कि १८वीं शती के प्रारम क मामपाम ही भागर ५ ६ गिद एक नई कविता शनी प्रचलित हो पाती थो, पागे पलकर त्रिपुरा नाम ग्यान पड़ा। स्याल निश्चित ही उपौर फारम . मसाल मुहैयार धीर दी। समयो नय नये कपानको महापना सबका काम नहीं होता था। प्रागर में इन यात्रियों कई दम, जिनमें सभी प्रकार के लोग ये और सभी प्रकार की बनि पिन यामों ; गाण कमी कमी होड भी लगाने लगते थे। रास एक दिन में व एक सेल म समाप्त नहीं किये जाप है और पही चाहते हैं किए नि में हो वह समाप्त हो जाय } १४ जुनी - १४० से १८वी शताब्दी तर जन साधारण के खेन तमास वे रूप मे किन काव्यो का प्रचार रहा एव सेल किस प्रकार से सेल जाते थे ? इसका कोई ठीक ठिकाना नहीं है । रासकों की परम्परा रासलीला एव गर्वा इत्यादि के रूप मे प्राज भी चल रही है। लोक भाषा में रवित प्राचीन नाटक तो बहुत ही कम मिलते हैं। श्री उदयश कर गास्त्री ने ख्यालों का प्रारम्म १८वी शताब्दी व से भागरे के भासपास के प्रदेश से होना माना है पर १८वों शताब्दी के रचित स्याल संज्ञा काव्य कोई भी उपलब्ध नहीं है । सभव है वे छोटे रूप में हो मौर मौखिक प्रालित जहां तक राजस्थान मे लिखित ख्यालो के प्रचार का प्रश्न हैं मेरे ख्याल से १६वीं शताब्ग के से ही इनका प्रचार हुमा होगा। अनूप सस्कृत लाइबेरी, बीकानेर की एक हस्तलिखित प्रति मे मारवाडी में स्याल लिखा मिलता है पर वह पोडे से पधों का ही है। सभवत यह प्रति १६वीं वे उनराद्ध या २०वी के प्रारम को होगी। श्री मोतीचद जी खजांची के सग्रह में हीर रजा के तमासे की एक छोटी प्रति देखने को मिली है जो १६वी के उत्तराद्ध की है। प्रकाशित मारवाडी स्यालों में जहा तक मुझे ज्ञात हुआ है, Scotch Presbyte ran Mission व्यावर की प्रकाशित एव पादरी रोसन के सम्पादित 'मारवाडी स्यालाज' पुस्तक ही सयप्रयम है। यह पुस्तक प्रयत्न करने पर भी प्राप्त नहीं हो सकी। पर इममें प्रकाशित 'गजी जवारजो" के रयाल के कई उद्धरण 'S H kellogy के "A Grammar of the Hindi language पुस्तक में देखने को मिलते हैं । लाव पला के गताक में थी मनोहर शर्मा का 'राजस्थान के लोक नाटर स्याल" नामक एक सुदर लेख प्रकाशित हुमा है । उसमे उनके देखने में पाए हुए प्रकाशित ६६ स्यालों को नामावलि भी दी गई है। पर स्याल ता सबों को सख्या में हैं। राजस्थान के जोधपुर, भरतपुर, जयपुर, विशनगढ़, कुचामन, जसलमेर के प्रतिरिक्त न्यावर, मपुरा से ही नहीं पर मुदूर कलकत्ता बम्बई व मध्यमारत से भी राजस्थानी जनता में विक्रय के लिये बहु स रूपा स्याल प्रकाशित हुए हैं। इनमें से कइयों में उनके रचयिता का निर्देश नहीं है पर रचयिता के निर्दी वाले ख्यालों से उनके रचयिता बहुत प्रचुर सश्या में है मौर विभिन्न जाति वाले हैं सिद्ध होता है । स्थाल राजस्थानी लोक-साहित्य का एक भविमाग्य मंग है। इसमें वास्तविक रूप में सगीत है । वाद्य, नृत्य, एव गीत की त्रिवेणी में लान पसे जनमाधारणको मारमा वही ही प्रसन्न होती है । स्यालों में ये तीनों ही प्रपती विशेषता के साथ प्रयुक्त होते हैं । ये गीत नाटक राजस्थान को महाप्रायता के अनुरूप मी है। साधारण प्रादमी के लिये इनका मभिनय बहा कठिन है। इनके लिये गायक के गले में शक्ति होना जरूरी है। इसी जोर के लिये प्रत्येक गायक मय पर भावे ही सवय शारदा को बदना करते हैं। रूपाल के गायरों में गुरु के प्रति भी अपार श्रद्धा मिलेगी। वे गुरु का नाम लेफर ही प्रक्षा में नाव प्रारम्भ करते हैं । यह मगत प्रेरणा भी ख्यालों की एक विशेषता है। फिर भी खेत है कि लोक-साहित्य के माय मगों की तरह ख्यालों के प्रति भी लोगों का ध्यान कम होता जा रहा है। साहित्य शोधकों का क्लाम्य है कि हम रस घास को सूखने न दें। पर स्पालों को नया जीवन मिलना चाहिये । उनले नये नये प्रसगों का प्रयोग होना पाहिए । राजस्थान के लोगों के पास महापुरुषों का स देश पहुँचाने में ये ख्याल बड़े ही सहायक सिद्ध हो सकते हैं । वास्तव में इसी भावना का ये ख्याल निभाए भी धन मा रहे हैं। प्रत्येक युग के विशिष्ट पुरुर्षों के जीवन पर स्याल बने हैं और इनका अभिनय हुमा है। पुस्तके बदलती रही है, परन्तु अभिनय का रूप वही प्राचीन चला भा रहा है। लोक जीवन पो चा वठाने का यह एक माम साधन है। किसी देश को वास्तविक उन्नति उसरे लोग जीवन का उत्पान ही है। प्रकाशित ख्यालों की प्रकारादि कम से सूची १ अमरसिंह ---मोतीलाल १२ काको जेठूता २ मा हारो रानी १३ देसरीसिहा स्याल - फूलावक ३ अमरफार महरिको कसरी सिंह १४ सर गुलाब कास्यास ५ प्रष्टपदी १५ सरीसिंह वनोपर गर्मा ६ मारो गणपति पूनमचद १६ दुचनमल समान १७ वटपदिया। पूनमचर नान १५ तीवनी मामल दे - नानूसास व गोपिका पूनमघर १६ स्याल दोहा पाली साह ५० स्याल समासिया ११ चूने का २१ च्याल मारवाड़ी गीत - - १० सजुम मगध ५० जौहरी का ख्याल झालीराम निमल ११ जूटी खतराणी ५२ ज्यानालम मजुनारा - गगावस ५३ जाट को ख्याल गोविवराम ५४ जमल नानू २२ ख्याल सुन्दर नगीना २३ स्याल निहालवे का बडा २४ स्याल नागवे २५ ख्याल गोपीचर भरपरी २६ स्याल सालमा सवावृक्ष २७ स्याल मणियार २८.ल्याल रिसाल वेलावे २९ ख्याल रिसालू कामदे ३० च्याल काको जेठूते का ३१ ख्याल शनिश्चर का ३२ गोपी चन्द मोतीलाल ३३ गोगा चौहान ३४ गोपीषद मोतीलाल ३१ गांधी इतरफरोस मानू ३६ गुल जरीना प्रकबर ३७ गेंदपाल गजारादे ५८ चकव वैरण नानूलाल ३६ चन्द्र मलयागिरी लच्छीराम ४० चितारा चितरगी - - १५ डूगरसिंह काल्याल ५६ डूगरजी झ वारजी को ५७ ढोला मसण- ५८ ढोला सुलतान निहालदे कोल्याल ५६ तेजाजी को ख्याल ६० तेजाजी जाट को पूनमचन्द सुखवाल ६१ तारासिंह खासापरी-पूनमचव ६२ दो गोरीका बालमा ६. देवर भौजाई ६४ दयाराम पाडवी प्रहलावीराम ६५ देव नारायण चरित्र ६६ देवर भाभी का ६७ देवरानी जिठानी का ६८ दुल्लो पाडी ६६ ध्रव जी काश्याल बालूराम ७० नल दमयती ७१ नगद भौजाई-नानू ७२ नलराजा-नानू ७३ नागजी मारवा ख्याल ७४ मेनें खसम को त्यास-तेज ७५ नरसी मेहता ४१ चन्द्र प्रताप भानजी ४२ चद्र कुवर फून कुवर ४३ चत्र मुकुट ४४ चतुर छला प्रजलाल ४५ छला पनिहारी ४६ छोटा कप को ४७ छला दिलजान को ४८ छोटा बालम पूनमचन्द ४१ जगवेव ककाली नानू 4 ४१ ७६ नागजी नागवतीको ७७ निहालवे सुलतान को ७८ निहालवे मारवारीको ७६ मोटको मारवाड़ी को ८. मागौरी छला १ नावाज का-पूनमचव ८२ पठाण सहजादी-नानू २३ पचफूलारानी या स्याल मासाडाबी को-भगवानदास ८४ पराधीरमदे-पजीरा ८५ पजाबी हकीम-पूनमधद ८६ पूरण भगत-नानू ७ पूरणभगत का मारवाडी स्याल -अशीधर ८८ पासूजी राठौर-मशीधर परिणयारी सरोरेका स्याल २. पारस पीताम्बर ६१ पृप्वीराव १२ मल्लाद चरित ६३ बूदा बालम का त्यास ६४ बनलीला १०१ वचमुकुट पवमभावती -पजीरा १०१ बलजी भूरजी-ज्जू १०३ बूढो वाद-जानद १०४ भत हरि-तेजकवि १०५ भूलिया भटियारिन १०६ भवर चमेली-पूनगर व १०७ भोज भानमती १०८ भरपरी पिंगला सतवती-पूनमधर १०६ भक्त सुदामा-पूनमचव ११. मालदे हाडीरानी-मीरा १११ मूमल महेंबरे का-तेजकवि ११२ मोरध्वज को स्याल ११३ मीरा मपल-लच्छीराम ११४ मदनसेन पकिरन ११५ माघवानल काम कवला-वीरा ६५ यगड़ावत भारत का ६६ मूढा बनग का स्याल- ११६ मुकलावा बहार ११८ मवनपालजी घद्रपरी-पूनम ११८ मजकुथर-पूनमयद ११९ रूपरत्न रसफूला-पूनमचर १२० रामदेवजी का व्यावसा-पूनमय १२१ राजा लखपत-बसीराम १२२ राजा भोज-बकसीराम १२३ रोहतक वर को स्पास १२४ रामलीला को स्याल १२५ रानी निहासदे और कवर सुलतान -प० किशनलाल १२६ राता रिसाल-मालीराम १२७ राजारिसासू नोपदे-भालीराम जगन्नाप उपाध्याय ७ विक्रम सि कला ८ बनजारा २६ बटा बावस्याह सहजावो-नानू १०० बुढ़ापे के म्याहा पाल -हरिकरण १६० सुलतान मरवरण भात का-मा १२८ राय रिदमल १२६ रिसाल यालक थे १५० रामदेवजी का स्याल ११ कमणी मगल का खेल १३२ कमणी स्वपवर का खेल १३. कमरणो हरण का खेल १३४ राजा भोज भानमती १३५ रिसाल वेलादे १३६ राजा करण-प्रेमसुख भोजक १३७ राणा रतनसिंह-पुनीलाल १२८ रतन कुवर चन्द्रावल १३६ रिसाल रसवती-पूनमध व १४० रिसाल वेलावे--पूनमचव १४१ तला मजनू पाफ मोहग्यत-नानू १४२ लावहन सीताहरण १४३ विराट पक्ष भाग पहला-नानू १४ विराट पय भाग दूसरा-नानू १४५ विराट पर भाग तीसरा-नानू १४६ विराट पय भाग चौपा-नानू १४७ विक्रमादिश्य को त्याल १४८ विजयसिंह को स्याल १४९ घीरमदे सोनगरी १५० विक्रम ससिकसा-सालचर १५१ विक्रमादित्य चद्रकला-पूनमयद १५२ सोलो सतयती १५३ षवरणकुमार १५४ शाहजादे कामावरमल १५५ नंकर कैलासी १५६ श्याम सिजा इदु को १५७ सत्यनारायण व्रत कथा-पनीधर १५८ सभापय प्रयवा चोर हरण-नानू १५६ सीलकरण सुदबुद सालम्या १६१ पूरज कुवर-फतहपर १६२ सेठ सेठानी १६३ सोसह बनजारेका १६४ सोरठ बामाको ख्याल १६५ सतो हेमकुमार १५६ सुलोचना १६७ सोने लोहे के मगरको स्याल १६८ सौदागर वजीरजादी-गानू १६६ सासू बह का ख्याल १७० साहिब न सच्चा १७१ सलनान निहालो-वजीरा १७२ सीलो सातवती-गावस १७३ संघरामाजलदे-पूनमयद १७४ सुपयुध सवलगरा १७५ सोरठ मा १७६ सेठ मुनीम-नानू १७७ सहजावे का खेल १७८ सुलतान बादस्याह-मानू १७१ सहजादा मटियारी-यजी १०० सयवखा जदयाल-चॉकलर १८१ स्यामी चेला-गोविवराम १८२ सहजादी ११ हरितद्रपाबहायाल-पर १८४ हार झों-नान १५५ हेम कुवर परित १८६ हरिश्चद्र तारामती १८७ हकीम गरमी वाला १८८ हमारहठ १८९ हरिश्चन्द्र तारादे हियाली संज्ञक रचनाएं जीव अगद के लिये बौद्धिक शक्ति प्रति को एक अनुपम देन है, जीवन में पर पा पर बौदिक विकाम को पावश्यकता का अनुभव होता है । बुद्धि के विनर शारीरिक बल भी विशेष कामयाद नहीं होता व बहुत सी बातें तो बुद्धि के द्वारा ही ठीक से सम्पन हो साती है वहा शारीरिक बल कोई काम नहीं देना । जीवन में अनेक बार हम ऐसी उलमों में फस जाते हैं कि हमें क्या करना चाहिए ? इसका कोई माग नहीं सूझता। बुद्धि उग समय हमें माग प्रशित कर उतनों को सुलझाने में सहायता करती है । निस्य नमे भाविकार एवं ज्ञान विज्ञान को खोज बुद्धि के द्वारा ही सभव है । भय प्राणियों की अपेशा मानव म बुद्धि विशेष रूप से विकसित पाई जाती है । छोटे से लेकर बहे किसी भी काम में बुद्धिजीन एवं बुनिान के समान रूप से करने पर भी उसकी प्रणाली को सुदरता पीघ्रता से सुचापता एक भदापन सफलता एव विश्लता का जो भातर नजर पाता है यह बौद्धिक विकास हो तारतम्यता के कारण ही। वारदल की प्रसिद्धि, उसकी हाजिर जवाबी एव पुसायबुद्धि के कारण ही है। बन साहित्य में महाराजा श्रेणिक और उनके पुत्र अभयकुमार के चौतिक धमत्तारों के उदाहरण मिलते हैं । वन समाज के व्यापारी वा अपने नये सातो में अभयकुमार के समान बुद्धि होने की कामना प्रवित करते हैं । नदीसूत्र में चार प्रकार की सियों का विवरण मिलता है जिसके इप्टान्त में, रोहा प्रादि के कई बुझिपर दृष्टान्त टीकाकारों ने ये हैं । 'चार प्रत्येक बुद्ध चरित' में एक चितरे को लडको ने किस प्रकार निष्प गई समस्याभूलक कहानिया पहकर अपने पति (राजा) को छ महीने तक निस्य उन कहानियों एव उनमे पाई हुई मरस्यायों के परिणाम को सुनने के लिये प्रान को बाध्य किया, इसको रोचा या पाई जाती है । 'उन सध्यन मूत्र वृति' २ उमको कही हुई बौद्धिक धमकार मूषक कई कहानियों का संग्रह किया गया है, हमारे उस प्राचीन दिवस साहित्य को अधिकाधिक प्रकाश में लाना भरयन्त शश्श्या है। सिका वास्तविक उदश्य भी बौद्धिक विकास हो होता है । समुचित दौद्धिक विकास होने पर वह व्यक्ति जिम किसी क्षेत्र में काम करेगा, उसे उपस्पित रूप से १४६ संपग्न करके सफलता प्राप्त कर सकेगा । गणित-शास्त्र भी हमारी बुद्धि को तेज करने के लिये अच्छा साधन है, उसमें अनेक ऐसे सवाल माते हैं जो साधे तौर पर हल करने में बहे कठिन मालूम होते है, पर बुद्धि और गुर के द्वारा सहज ही हल किये जा सकते हैं । राजस्थान में जो गणित शिक्षा की परिपाटी प्राचीन काल से चली मा रही है वह बच्चों को बहुत शीघ्रता से लेखे और हिसाव में दक्ष बना देती है। उनकी ऊपर वाडिये इतनी सफल है कि जिस हिसाब को भग्रेजी पढा लिखा प्रथमेटिक के अनुसार घटों में हल नहीं कर सकता और उसे अनेक कागज काले करने पड़ते हैं, वह मारवाडी 'मारजामों द्वारा शिक्षित छोटे छोटे बच्चे धद मिटो में व मौखिक रूप से हो हल करके बता देते हैं । वतमान शिक्षा प्रणाली में उन सरल परिपाटियों की पूछ नहीं होने से हमारी वह विद्या दिनो दिन कमजोर हो रही है इसका भी हमें प्रचार उद्धार व विकास ठीक से करना होगा। राजस्थान में विवाह भादि के समय जामाता को सालियां ससुराल में रात्रि के समय उसकी बौद्धिक परीक्षा के लिये अनेक प्रकार की प्राहियें पहेलिये-पूछती हैं, यदि नामाता उनका ठीक से उत्तर नहीं दे पाता तो उसे नीचा देखना पडता है और सालिये मादि उसे मोंदू समझ लेती हैं। इस समय गीत गाने वाली स्त्रिया भी एक ऐसा गीत गाया करती हैं जिसमे अटपटी बातें (हियालियां) कही जाती हैं, उन समस्यामों का उत्तर जवाई से पूछा जाता है । आज कल तो हमारी कयामो म शिक्षा की कमी होने से पन प्राडियों की जानकारी बहुत सीमित ही होती है पर य जन ज्ञान महारों में लिखित रूप में सकडों की मुख्या में पाई जाती हैं । ऐमी ४०४ माडियों का एक संग्रह २० वर्ष पूर्व बीकानेर से अयोध्याप्रसाद शर्मा ने 'पाडो सग्रह' के नाम से प्रकागित किया था। खोज करने पर और भी अनेक पाहियां मिलेगी जिनके संग्रह के द्वारा हमारे बौद्धिक विकास में बड़ी सहायता मिल सकती है। ये पहेलिया विविध प्रकार की होती हैं कुछ की सजा गूढ़ा है जिसमें भाव गूढ (गुप्त) रहता है, कुछ गुरु चेलों के दोहों वे रुप में प्रसिद्ध हैं जिनमें तीन तीन बातों का उत्तर एक शव द्वारा दे दिया गया है । ऐमे दोहों का कुछ संग्रह मैंने 'राजस्थान भारती (भाग २मक १) में प्रकाशित किया था। कई सखियों से प्रश्न के रूप में भी ऐसे प्रश्न 'सउत्तरा' के नाम में पाये जाते हैं । श्रीयुत मनोहर दार्मा के राजस्थान की पहेलियों के सबंध मे कई लेख राजस्थान भारती, परता प्राति में प्रकाशित हो चुके है । इनमें लोक प्रचलित पहलियों के विविध उदाहरण संग्रहीत हैं । मतापिका, बहिल पिका, समस्यापूर्ति - भादि रचनाए भी बुद्धिवर्द्धक होती हैं। राजस्थानी लोक्यातामों में भी कई वार्ताए यही बुद्धिवद्धक होती हैं जिनमें किसी समस्या का हल बड़े विचित्र बुद्धि-कौशल से कराया जाता है। मैंने ऐसी कई लोकवाए प्रकाशित की है। जिसमें से एक का शीर्षक है 'बाप से वेदा सवाया। ऐसी मोर भी कई लोकवाए मिलती हैं उनका भी संग्रह प्रकाशित होना चाहिए। जन कवियों के रास प्रादि ग्रन्थों से यह स्पष्ट है कि प्राचीन काल में नवदम्पति एक दूसरे की बुद्धि परीक्षा और मनोरजन हा मूढा, द हिपाली पौर चौवेली मादि की वाताए कह कर किया करते थे । कवि समयसुन्दर ने 'नल दमयन्ती' चौपाई में नव- सम्पति के रात्रि के समय विनोश्वार्ता करने में प्रसग मे कहा है क्स ही बायोसी कहे दूहा गूढा पर हियासो से कहे, महानिशि करे माना। 'माययनल काम कदला' प्रवध मादि में भी दम्पति केही बातों द्वारा मनो रजन एव समयनिगमन का उल्लेख मिलता है । कवि गणपति के माधवानल प्ररथ में बहुत सी पहेलिये प्रकाशित है। जैन कवियों ने हियाली सनक ऐसी बहुत सी रचनाए की है जो मही ही समस्या मूलक होती हैं । हियाली शन्द का सबसे प्राचीन उल्लेख प्राकृत भाषा के वजालाप में देखने को मिलता है जो करीब १२ वी १३ वीं शताब्दी का है । चसमें दी हुई हिया- लियों से परवर्ती प्राचीन राजस्थानी भाषा की हियालिये कुछ भिन्न प्रकार की हैं। इससे हमें हिमाली के स्वरूप विकास की जानकारी मिल जाती है। अभी तक १६ पाताम्दी के कवि देपाल को हिमाली को ही प्राचीन ममझा जाता रहा है। पर हमारे सह १५वीं पवान्दी लिखित सुभाषित सग्रह की एक प्रति है। उसमें कुछ प्राचीन हिमालि र पहलि भी मिली है । बीकानेर के गान भार को एक स ग्रह प्रति में भी हियालिये मिसी हैं जो १४ वीं शताब्दीको रचना है। १४ वीं शताब्दी से ११ वी शतागे तक के जन कवियों के रचित हिमालि सपनों को सस्या में पास हैं जिनमें से कुछ का स ग्रह हमने परीव ३२ वर्ष पूर्व किया था पोर महाबाद से प्रकाशित बन ज्योति' नामक मामिक पत्र में करीब ४० हिपालिमें प्रकाशनाथ भेजी थी। उस पत्र के सम्बत् १९८६ वे मिगसर केक में "जैन कवियों का हियानी साहिरप" चीप हमारा सब भी रूपा या पर उसमें कविवर समयसुदर कोई हिमालि ही पति हुई कोहिपाली सनक मनायें जा कवियों की एक विशेष १४६ - बौदिक देन है मत इस लेख में से उनम से दो चार उहाहरण के रूप में प्रकाशित को जा रही हैं। जिससे उनके स्वरूप का परिचय मिल जाएगा । कसी खूबी के साथ उन्होंने किसी वस्तु के नाम निर्देश के अतिरिक्त सारी बातों का वणन करके पहितों एव श्रोताओं से उसके भावार्थ के बतलाने की माग की है यह इनके पढ़ने से विदित हो जायगा। पाठक नीचे दी हुई हियालियो से इन रचनामों का रसास्वादन करें। महाकवि समयसु दर १०वीं शतान के राजस्थाा एक प्रसिद्ध कवि हो गए है। यहां सव प्रथम उ होकी रचित दो हियालियें दी जाती हैं। (१) कहिन्यो पडित एह होयाली, तुम्हें घउ चतुर विचारी। नारी एक पण भवखर नामइ दोठी नयर मझारी रे ॥१०॥ मुख भनेक परिण जीम नहीं है नर नारी सु राधई। घरण नहीं ते हाये घालइ नाटक पाखद नाच रे ॥२॥१०॥ मन सायद परिण पानी न पीयइ प्रिपति न राति दिहाडह। पर उपगार करइ परिण परताप, अवगुण कोहि विखाइ।०॥ अवधि पाठ विवस नो पापी हिपह विमासी जोज्यो। समयमु दर कहा समझी लेज्यो, परिणते सरीखा मति होज्यो ।।४1०॥ लेखक क सग्रह में ( उत्तर चालणी) नर (२) पखी एक पनि कपनव जी हो पायो नयरि मझार। भाखडली प्रणिपालडी जो हो देखद नहिय लगार ॥१॥ हरियाली रे चतुर हरियाली रे, सुदर नर जो हो कहिग्यो हियह विमासि। साधा पाच धारण कहा जो हो कहै तेह न सावासि ॥२०॥ चांच सदा चरतो रहै जो वमन करइ माहार । राति दिवस मत रहा जो हो न चदइनरवर पार ॥३॥ell मुखउ बोलइ प्रति पण जो हो, बोल्यु नवि समझाय । नारि संघातह नेहलउ जो हो, दिन अपराध बधाय हा से परिण पषि बापटर जो हो, प्रमदा पाडयर पास । समयसु वर सहा ते भरपो जो हो, नारीत म करिए बेसास ह॥ इनिहियाली गौतद्वयम् ६. मानसिंह लखि (उचर कलम) कविवर यमसी (पमं वडन) रचित हियालो दय- भरप कहो तुम पहिलो एहनी, सखर हियालो हे सार । धतुरनर। एक पुरष का माहै परगडी, सह मारणे ससार ॥१०॥ पर विहरणो परदेसे मम भाव तुरत जाय। मंठो है पापणे परि मापदो, तो पिए घपल कहाय शाषon कोरक तो सेहन राजा है, कोई तो पहै रक । सांचौ सरत सुनाए कहे , वति तिरा गाहे रे ॥३॥०॥ पोते स्वारप सु पाँची मिले, मार भुरायो रे एह । धन तिक नर कहै श्री धमसी, जोपे तेह रे जेह ॥४॥ (उचरमन) (४) धतुर कहो तुम्हें पूपा परप दियाली एहोरे। नारी एक ममिद्ध छ, सगला पास सनेही रे ॥१॥ प्रोस बठी एकती, कर सगलाद कामो रे। रातो रस भोनी रहे घोर नहीं निज ठामोरेशच०॥ धाकर पौकीर अयू, महता राक्ष पासो रे। करम राब ने कहा, दिलस प्राप दिलासोरे ॥३०॥ मोरोति भणे भरणे, मोर पिप तिरण वारो रे। कतिपोवा धमती है, सुख बानो को सारे ॥४॥ ( उत्तर । नीम)
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