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Mool Gosaie - Charit

Venimadhav · 2009/09

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DO गोखामी तुलसीदासजी श्रीजानकीवल्लभो विजयते জুক্ত गोसाई-चरित (गोस्वामी तुलसीदासजीका जीवन-चरित्र) सोरठा--संतन कहेउ बुझाय, मूलचरित पुनि भाषिये । अति संछेप सोहाय, कहौं सुनिय नित पाठ हित ॥ १॥ चरित गोसाई उदार, बरनि सके न हे सहसफनि । हौं मतिमंद गंवार, किमि बरनौं तुलसी-सुजस ॥२॥ तोटक ऋपि आदि कबीवर ग्याननिधी । अवतरित भये जनु आपु विधी ।। सत कोटि बपानेउ रामकथा । तिहुँ लोकमें वांटेउ संभु जया || दस स्पंदन . वेद दसांगमयं । लुति त्रैविधि तीनिउ रानिजयं ॥ श्रीराम प्रनव चुति तत्त्व परं । निज अंसनि जुत नरदेह धरं ॥ इमि कीन्ह प्रबंध मुनीस जया । हरि कीन्ह चरित्र पवित्र तथा ॥ हनुमंत प्रनव प्रिय प्रान रसै । परतत्त्व रमै तिसु सीस लसे ॥ यहि भांति परात्पर भाव लिये । सुचि राम परत्व वपान किये ॥ मुनिराज लपे अद्भुत रचना । कपिराज सों कीन्ह इहै बँचना ।। यह गुप्त रहस्य है गोइ धरै । बिनती हमरी न प्रकास करें ।। तब अंजनि-नंदन साप दियौ । हसि कै मुनि धारन सोस कियौ ॥ १ [२] दोहा-सहनसीलता मुनि निरपि, पवनकुमार सुजान । बहु बिधि मुनिहिं प्रसंसि पुनि, दिये अभय बरदान ॥ १ ॥ कलिकाल मैं लैहहु जन्म जबै । कलि ते तव त्रान सदा करिवै । तेहि साप के कारन आदि कवी । तमपुंज निवारन हेतु रबी ॥ उदये हुलसी उदघाटिहि ते । सुर संत सरोरुह से विकसे ।। सरवार सुदेस के विप्र बड़े । सुचिगोत परासर टेक कड़े ।। सुभ थान पतेजि रहे पुरषे । तेहिते कुल नाम पड़ो झुरये ।। जमुना तट दूवन को पुरवा । बसते सत्र जातिन को कुरवा ।। सुकृती सतपात्र सुधी मपिया । रजियापुर राजगुरू मुपिया ।। तिनके घर द्वादस मास परे । जब कर्क के जीव हिमांसु चरे ॥ कुज सप्तम अट्ठम भानु तनै । अभिहित सुठि सुंदर सांझ समै । दो-पंद्रह सै चौवन बिपै, कालिंदी के तीर । स्रावन सुक्ला सत्तिमी, तुलसी धरेउ सरीर ॥ २ ॥ सुत जन्म बधाव लग्यो बजने । सजने छजने रजने गजने ॥ एक दासि कढ़ी तेहि औसर में । कहि देव बुलाहट है घर में !! सिसु जनमत रंचक रोओ नही । सो तो बोलेउरामगिरेउज्योंमहीं है। अब देषिय दंत बतीसी जमी । नहिं पोल्हड़ पांतिमै नेक कमी ।। जस बालक पांच को देषिय जू । तस जन्मतु आ निज लेपियजू || अब बूढ़ि भई भरि जन्म नहीं । सिसु ऐसो मैं देपिउ तात कहीं ॥ महरी कहती सुनि संघ धुनी । जवही सो सभय सिसुनार छुनी ।। जो लोगाइ हती कपती बकतीं । कोउ राकस जामेउ कहि झपती ॥ महराज चलिय अब वेगि घरे । समुझाइ प्रसूति को ताप हरे ॥

. [३] दो०-उठे तुरत भूगुनसमनि, सुनत चेरि के बैन । ठाढ़ प्रसूती द्वार भे, पूरित जल सों नैन ॥ ३ ॥ छंद-पूरितसलिल दृग निरपि सिसुपरिताप जुतमानस भये । मन महं पुराकृत पापको परिनाम गुन बाहिर गये ।। तब जुरै सब हित मित्त बांधव गनक आदि प्रसिद्ध जे । लागे विचारन का करिय नवजात सिसुकहं कहहिं ते॥ १ ॥ दो०-पंचन यह निरनय किये, तीन दिवस पस्चात | जियत रहै सिसु तव करिअ, लौकिक बैदिक बात ॥ ४ ॥ दसमी पर लागे ग्यारस ज्यों । घरि आइक राति गई जब त्यों ।। हुलसी प्रिय दासि सों लागि कहै । सपि प्रान-पपेरू उड़ान चहै ।। अब ही सिसु लै गवनहु हरिपुर । बसते जंह तोरिउ सास ससुर ॥ तहं जोइबि पालत्रि मोर लला | हरिजू करिहैं सपि तोर भला ।। नहिं तो ध्रुव जानहु मोरे सुये । सिसु फेंकि पंवारहिंगे भकुये ।। सपि जान न पावै कोऊ बतियां | चलि जायहु मग रतियां रतियां ॥ तेहि गोद दियो सिसु ढारस दै। निज भूपन दै दियो ताहि पटै ॥ चुपचाप चली सो गई सिसु लै । हुलसी उर सूनु वियोग फवै ।। गोहराइ रमेस महेस विधी । विनती करि रापेवि मोर निधी दो०-ब्रह्ममुहूर्त एकादसी, हुलसी तजेउ सरीर । होत प्रात अन्त्येष्टि हित, लंगे जमुना तीर ॥ ५ ॥ घरि पांच बार चढ़े मुनिआ । निज सासके पायं गही चुनिआ॥ सब हाल हवाल बताय चली । सुनि सास कहीं बहु कीन्ह भली ।। घर माहिं कलोर को दृध पिआ। विनु माय को है सिमुलेसि जिआl . [४] तंह पालन सो लगि नेह भरै । जेहि ते सिसु रीझइ सोइ करै ।। यहि भांति सों पैंसठ मास गये । सिसु बोलन डोलन जोग भये ॥ चुनिआ सुरलोक सिधार गई । डस्यो पन्नग ज्यों सो कोरार गई ।। तब राजगुरू को कहाव गयो । सुनि कै तिनहूं दुप मानि कयो । हम का करिबै अस बालक लै । जेहि पाले जो तासु करें सोइ छ । जनमेउ सुत मोर अभागो महीं । सो जिये वा मरै मोहिं सोच नहीं । दो०-चेनी पूरब जनम कर, करमविपाक प्रचंड । बिना भोगाये टरत नहिं, यह सिद्धांत अपंड ॥ ६ ॥ छं०-सिद्धांत अटळ अपंड भरि ब्रह्मड व्यापित सत जथा । जहं मुनिवरन की यह दसा तहं पामरन की का कथा । निज छति बिचारिन राप कोऊ दया हग पाछे दियो । डोलत सो बालक द्वारद्वार बिलोकितेहिविहरतहियो॥ २ ॥ सो०-बालक दसा निहारि, गौरा माई जगजननि । द्विज तिय रूप संवारि, नितहिं पवाजावहि असन ॥ ३ ॥ दुइ बत्सर बीतेउ याहि रसे । पुर लोगन कौतुक देषि कसे ॥ जिन जोह जसूस पै आय जकै । परिचय द्विज नारि न पाइ थकै ॥ चर नारि हती तहं सो परपी | जब माय षवाय लला टरषी ॥ परि पांय करी हठ जान न दे। जगदंब अदृस्य भई तब ते ॥ सिव जानि प्रिया व्रत हेतु हियो । जन लौकिक सुलभ उपाय कियो । प्रिय सिष्य अनंतानंद हते । नरहानंद सुनाम छते ॥ बसे रामसुसैल कुटी करिके । तल्लीन दसा अति प्रिय हरि के । तिन कंह भव दरसन आपु दिये । उपदेसहुँ दै कृतकृत्य किये ॥ प्रिय मानस रामचरित्र कहे। पठये तंह जंह द्विजपुत्र रहे ॥

. [५] दो०-लै बालक गवनहु अवध, विधिवत मंत्र सुनाया। मम भापित रघुपति कथा, ताहि प्रबोधहु जाय ॥ ७ ॥ जब उघरहिं अंतर दृगनि, तब सो कहिहि बनाय । लरिकाई को पैरित्रो, आगे होत सहाय ॥ ८ ॥ सो०-संभु वचन गंभीर, सुनि मुनि अति पुलकित भये । सुमिरि राम रघुबीर, तुरत चले हरिपुर तके || ४ ॥ पुर हेरि के बालक गोद लिये । द्विजपुत्र अनाथ सनाथ किये ॥ कह्यो रामबोला जनि सोच करै । पलिहैं पोसिहँ सब भांति हरै।। सो तो जानेउ दीनदयाल हरी । मम हेतु सुसंत को रूप धरी ॥ पुरलोगन केर रजाय लिये । सह बालक संत पयान किये ॥ पहुंचे जब औधपुरी नगरे । विचरे पुरबीथिन मां सगरे ।। पन्द्रह से इकसठ माघ सुदी । तिथि पंचमि औ भृगुवार उदी ।। सरजू-तट विप्रन जग्य किये । द्विजबालक कह उपबीत दिये ॥ सिपये बिनु आपुइ सो बरुआ । द्विजमंत्र सबित्रि सुउच्चरुआ ॥ विस्मयजुत पंडित लोग भये | कहे.देषत बालक बिग्य ठये ॥ दो-नरहरि खामी तब किये, संस्कार विधि पांच । राममंत्र दिय जेहि छुटै, चौरासी को नांच ॥ ९ ॥ दस मास रहे मुनिराज तहां । हनुमान सुटीला विराज जहां ।। निज सियहिं विद्या पढ़ाय रहे । अरु पानिनि-सूत्र घोपाय रहे || लघु बालक धारनसक्ति जगी | अनुरक्ति सभक्ति दिखान लगी ॥ हरपे गुनग्राम विचार हिये । पद चापत आसिप भूरि दिये ॥ जवते जनमेड तवते अवलों | निज दीन दसा कहिगो गुरुसों ॥

[६] ठक से रहिगे सुनि वाल कथा । करना उरमें उपजाइ व्यथा ॥ मुनि धीर भरे दृग नीर रहे | गुरु सिप्य दसा कबि कौन कहे ।। समुझाय बुझाय लगाय हिये । कहि भावि भलाइ प्रसांत किये ॥ हरिप्रिय रितु लाग हेमंत जत्रै । सिप संग लै कीन्ह पयान तबै ।। दो०-कहत कथा इतिहास बहु, आये सूकरपेत । संगम सरजू घाघरा, संत जनन सुप देत ॥ १० ॥ तंहवां पुनि पांचइ वर्ष बसे । तपमें जपमें सब भांति रसे || जब सिप्य सुबोध भयो पढ़ि के । मति जुक्ति प्रवीन भई गटि कै । सुधि आइ महेस सिपावन की | परतत्त्व प्रबंध सुनावन की ॥ तब मानस रामचरित्र कहे । सुनि के मुनिबालक तत्त्व गहे ॥ पुनि पुनि मुनि ताहि सुनावत भे । अति गूढ कथा समुझावत भे॥ यहि भांति प्रबोधि मुनीस भले | वसुपर्व लगे सह सिप्य चले || विनाम अनेक किये मग में | जल अन्न को पेल मच्योजग में || कतहूं सुकृतिन उपदेश करें । कतई दुपिया दुपदाप हरें ।। दो०-विचरत बिहरत मुदित मन, पहुंचे कासी धाम | परम गुरू सुस्थान पर, जाय कीन्ह विखाम !! ११ ॥ सुठि घाट मनोहर पंच पगा। गंगिया कर कौतुक केलि झगा ॥ पुनि सिद्ध सुपृष्ठ प्रतिष्ठित सो । बहुकाल जतींद्र रहे जु नमो ॥ तंहवां हते सेप सनातन जू । वपुवृद्ध वरंच जुवा मन जू ॥ निगमागम पारग ज्योति फबै । मुनि सिद्ध तपोधन जान सबै ।। तिन रोझि गये वटु पै जब ही । गुरु खामि सों सुंदर बात कही । निज सिप्यहिं देइय मोहिं मुनी ।तिसु वृत्ति दुनी नहिं ध्यान धुनी॥

[७] ही ताहि पढ़ाउब बेद चहूं । अरु आगम दरसन पात छहूं । इतिहास पुरानरु काव्यकला | अनुभूत अलभ्य प्रतीक फला ॥ विद्वान महान बनाउन जू । सुनि आपु महासुप पाउन जू ।। दो०-आचारज विनती सुनत, पुलकित भे मुनिधीर । बटु बुलाय सौंपत भये, पावन गंगातीर ॥१२॥ कछु दिन रहिगेजति प्रवर, पढ़न लगो बटु भास । चित्रकूट कंह तब गये, लपि सब भांति सुपास ॥१३॥ बटु पंद्रह वर्ष तहां रहिकै । पढ़ि सास्त्र सवै महिकै गहिकै । ।। करिकै गुरु-सेवा सदय तन तै । गत देह क्रिया करि सौ मन ते ।। चले जनमथलीको त्रिपाद भरे । पहुंचे रजियापुरके बगरे । निज भौन त्रिलोकेउ टूह ढहा । कोउ जोवन जोग न लोग रहा ॥ इक भाट बपानेउ ग्राम-कथा । द्विजवंसको नास भयो जु जथा । कयौ जा दिन नाइ से राजगुरू । तब त्याग की बोलेउ बात करू ॥ तंह बैठ रह्यो तप तेज धनी । तिन साप दियो गहि नागफनी ।। 'पट मास के भीतर राजगुरू । दस वर्ष के भीतर बंस मरू । सुनिकै तुलसी मन सोक छये । करि स्राद्ध जयाविधि पिंड दये ।। दो०-पुरलोगन अनुरोधते, दियो भवन बनवाय । रहन लगे अरु कहत भे, रघुपति-कथा सुहाय ॥ १४ ॥ जमुना पर तीरमों तारिपतो । भरद्वाज सुगोत को विप्र हतो।। कतिकी दुतिया कर न्हान लगे । सकुटुम्ब सो आयउ संग सगे ।। करि मन्जन दान गये तंहवां । हुलसी-सुत बांच कथा जंहवां ॥ छत्रि व्यास बिलोकिप्रसन्न भये । सब लोगन चूझि स्वठाम गये ।। पुनि माधव मास में आय रहे । कर जोरि के सुंदर बात कहे ।।

[८] महराति जब नगिचाय रही। सपने जगदंव चेताय रही। सुभ राउर नांव बताय रही। नब ठांब ठिकान जताय रही। ही हेरत हरत आयों इते । मोहिं राषिय ही अब जाब कितै ॥ दो-मुनत दिनय संचन लगे, पुनि बोले मचाय ! व्याह बरेपी ना चहौं, अनत पधारिय पाय ॥१५॥ हिज माने नहीं धरना परिक। नहिं पाय पिये ननना कारिक। दुसरे दिन जब खोकार कियो । तब विप्र हठी जल अन्न लियो । वर जाय सोचाय के लग्न धरी । उपरोहित भनि प्रसस्त कियो । इनत पुरलगन जोग दिये । नव साज सनान बरात किये ॥ पंद्रह नै पार तिरासि विय 1 मुभ जेठ मुदी गुरु तेरस पै ॥ अविनाति लग च जिरी नंबरी । दुलहा दुल्ही की परी पंवरी ॥ ललना निलि कोहबर माहि रसीं । बरनायक पंडित नो विहंती ।। तिसरं दिन मांडवचार भयो । मुचि भगति सो दान दहनदयो । दो०-बिदा का दुलहां चले, पंडितराज महान। आये निज पुर अह किये, लोकाचार विधान ॥१६॥ पुर नारि हुरी गुरु भान गई । दुल्हा मुघ देखि निहाल भई ।। हुलसा मुत देउ नारि छटा । नुख इंदु ते धुंबट कोर हटा ॥ मन प्रान प्रियापर वार दिये । जस कौमिक मेनका दषि नये ॥ दिन रात सदा रंग राते रहैं । नुप पाते रहें ललचात रहैं || सर वर्ष पुरत्मर चात्र चये ! पल या रसकेलि में बीत गये । नहिं जाने देंआपुन जाय कहाँ ! पल एक प्रिया विनु चैन नहीं | दुपिया जननी मुप देपनो । पितु ग्राम नुआसिनि पेपनको । - [९] सह बंधु गई चुपके सो सती । वरषासन ग्राम हते जु पती ।। जब सांझ समय निज गेह गये । घर सून निहारि ससोच भये ॥ तव दासि जनायउ सौं करिकै । निज बंधु के संग गई मैकै ।। सुनते उठि कै ससुरारि चले । अति प्रेम प्रगाढ़ विसेप पले ॥ कौनिउ विधि ते सरि पार किये । पहुँचे सत्र सोबत द्वार दिये ।। छं०-दै द्वार सोवहिं लोग नींद तुराइ गोहरावन लगे। खर चीन्हि द्वार कपाट पोलीझमकिभामिनि सगबगे।। बोली बिहंसि बानी बिमल उपदेस सानी कामिनी । कस बस चले प्रेमांध ज्योंनहिं सुधि अंधेरी जामिनी ॥ ३ ॥ दो 0-हाड़ मांस को देह मम, तापर जितनी प्रीति । तिसु आधो जो रामप्रति, अवसि मिटिहि भवभीति ॥ १७ ॥ सो0-लाग वचन जिमि बान, तुरत फिरे विरमें न छिन । सोचेउ निज कल्यान,तबचित चढ़ेउजोगुरुकहेउ ॥ ५ ॥ दो०---नरहरि कंचन कामिनी, रहिये इनते दूर । जो चाहिय कल्यान निज, राम दरस भरपूर ॥१८॥ उठि दौरि मनावन सार गयो । पिछुआये रद्यौ जब भोर भयो । नहिं फेरे फिरे फिरि आयो घरे । भगिनी निज मूर्छित देप्यो परे ।। मुर्छ जु हटी उठि बोली सती । पिय को उपदेसन आइ हती ।। पिय मोर पयान कियो वन को । हो प्रान पठाउं तर्जी तनु 'कहिकै अस सो निज देह तजी । सुरलोक गई पतिधर्मध्वजी । सत पंद्रह जुक्त नवासि सरे । सुअसाढ़ बदी दसमीई परे । बुध बासर धन्य सो धन्य धरी | उपदेसि सती तनु त्याग करी ॥ - को I [१०] भयो भोर कहैं कोउ सिद्ध मुनी | परमारथबिंदक तत्त्व गुनी ॥ द्विजगेह में सारद देह धरी । रति रंग रमा रस राग हरी ॥ दो०-कोउ कह तिय की मुपनि ते, बोलेउ श्रीभगवान । मोह निवारेउ भगत कर, साहित्र सीलनिधान ।। १९ ।। हुलप्तीसुत तीरथराज गये । अरु मंजि त्रिवेनि कृतार्थ भये || ॥ गृहिवेप विसर्जन कीन्ह तहां । मुनिवेप संवारि चले फफहां ॥ गढ़ हेलि रु धेनुमती तमसा । पहुंचे रघुबीरपुरी सहसा ।। तवां चौमासक लौं बसिकै । प्रिय संत अनंत विभू रसिकै ॥ चले वेगि पुरी कंह धाम महा । बिस्राम पचीसक बीच रहा ॥ तिनमा दुइ ठाम प्रधान गुनो | बरदान रु साप की बात सुनो। घरि चारि दुबौलिमें बास किये । हरिराम कुमारहिं साप दिये ॥ सो प्रसिद्ध सुप्रेत भयो तेहिते । हरिदरसन आपु लख्यो जेहिते ॥ पुनि चार कुंवरि वरदान दियो । जिन संत सुसेवा लियो रु कियो । दो०-जगन्नाथ सुपधाम में, कछुक दिना करि बास । लिपे वाल्मीकी खकर, जब तब लहि अवकास ।। २० ।। रामेखर कंह कीन्ह पयाना | तहते द्वारावति जग जाना । बहुरि तहां ते चलि हरपाई । बदरी धामहिं पहुंचे जाई । नारायन रिषि व्यास सोहाये । दरस दिये मानस गुन गाये ॥ तह ते अति दुर्गम पथ लयऊ । मानसरोवर कह चलि गयऊ । जिय को लोभ तजै जो कोई । सो तंह जाइ कृतारथ होई॥ तह कर दिव्य संत सत्संगा | जाते होवै भवरस भंगा। दिव्य सहाय पाय मुनिराई । जात रुपाचल देपे जाई ।।

[११]
नीलाचल कर दरसन कीन्हे । परम सुजान भुसुंडिहि चीन्हे ।।
लौटि सरोवर पै पुनि आये । गिरि कैलास प्रदच्छिन लाये ।।
दो०-इमि करि तीर्थाटन सफल, निवसे भवबन जाय ।
चौदह बरिस रु मास दस, सतरह दिवस बिताय ॥ २१ ॥
टिकिके तंह चातुरमास किये । नित रामकथा कहि हर्ष हिये ।
वनवासि सुसंत सुनें नित सो । सुनि होंहि अनंदित ते चित सो ॥
वन मां इक पिप्पल रूप हतो । तिसु ऊपर प्रेत निवास छतो ॥
जल शौच गिरावहिं तासु तरे । सोइ पानिय प्रेत पियास हरे॥
जब जानेउ सो कि अहै मुनि ये । जिन बालपने मोहि साप दिये ।।
तब एक दिना सो प्रतच्छ कयो । कहिये सो करौं जस भाव अह्यो ।
हुलसीसुत बोलेउ मोरे मना । रघुनंदन दरसन को चहना ।।
सुनि प्रेत कयौ जु कथा सुनिवै । नित आवत अंजनिपूत अजै ।।
सबते प्रथमै सो तो आवहिं जू । सब लोगन पाछे सो जावहिं ज्॥
सो०-वेप अमंगल धारि, कुष्ठी को तनु जानि यहि ।
अवसर नीक विचारि, चरन गहिय हठठानि यहि ॥ ६ ॥
छं०
-हठठानि तेहि पहिचानि मुनिवर विनय बहु विधि भाषेऊ ।
पद गहि न छाड़ेउ पवनसुत कह कहहु जो अभिलापेऊ ।।
रघुबीर दरसन मोहिं कराइय मुनि कहेउ गदगद वचन ।
तुम जाइ सेवहु चित्रकूट तहां दरस पैहहु चपन ॥४॥
-श्रीहनुमंत प्रसंग यह, बिमल चरित विस्तार ।
लहेउ गोसाई दरस रस, विदित सकल संसार ॥ २२ ॥

[१२] चित चेति चले चितकूट चितय | मन माहिं मनोरथ को उपचय ।। जब सोचहिं आपन मंद कृती । 'पग पाछ परे जु रहै न धृती॥ सुधि आवत राम स्वभाव जबै । तब धावत मारग आतुर है । यहि भांति गोसाई तहां पहुंचै । किय आसन राम सुघाटहि पै ॥ इक बार प्रदच्छिन देन गये । तंह देषत रूप अनूप भये ॥ जुग राजकुमार सु अस्व चढ़े । मृगया बन घेलन जात कढ़े ॥ छवि सो लपि के मन मोहेउ पै । अस को तनुधारि न जानि सकै ॥ हनुमंत बतायउ भेद सबै । पछिताइ रहे ललचाइल है । तब धीरज दीन्हेउ बायुतनय । पुनि होइहि दरसन प्रात समय । दो०-सुषद अमावस मौनिया, बुध सोरह से सात । जा बैठे तिसु घाट पै, बिरही होतहि प्रात ॥ २३ ॥ सो०-प्रगटे राम सुजान, कहेउ देहु बाबा मलय । सुक बपु धरि हनुमान, पढ़ेउ चेतावनि दोहरा ॥ ७ ॥ दो०-चित्रकूट के घाट पै, भइ संतन की भीर । तुलसिदास चंदन घिसें, तिलक देत रघुबीर ॥ २४ ॥ छं-रघुबीर छबि निरषन लगे बिसरी सबै सुधि देह की । को घिसै चंदन गन तैं बहि चली सरित सनेह की॥ । प्रभु कहेउ पुनि सो नाहिं चेतेउखकर चंदन के लिये । दै तिलक रुचिर ललाट पै निज रूप अंतरहित किये ॥ ५ ॥ दो०-विरह व्यथा तलफत पड़े, मगन ध्यान इकतार । रैन जगाये बायुसुत, दीन्हे दसा सुधार !॥२५॥ "

[१३]
सुक' पाठ पढ़ावत नारि नरा । करतल पर लै सुक को पिंजरा ।।
हुलसीसुत भक्ति महा महिमा । ततकालहिं छाय रही महि मां ।।
दिन एक प्रदच्छिन कामददै । पहुँचे सौमित्र पहाडिहिं पै॥
तंह खेतक सर्प पड़यो मग में | सित गात मनोहर या जग में ।
तिसु ओर त्रिलंकि गोसाई कहै । चंद्रोपम सुंदर नाग अहै ।
हरि सृष्टि विचित्र कहै न बने । निगमागम सारद सेप भने ।।
रिपि दृष्टि पड़े तिसु पाप गयो । तब पन्नग ग्यानि ललात भयो ।
मोहि छूइ कै तारिय नाथ अत्रै । छुअतेहि गयो सो भुजंग अथै ॥
योगश्रि मुनी तहं छीत भये । निज पूर्व कथा कहि बास लये ।।
दोoयह प्रभाव मुनिनाथ कर, सुनि गुनि संत सुजान ।
आवन लागे दरस हित, भीर भयो रिपिथान ॥ २६ ॥
बड़ि भीर निहारि गुफा में दुके । बहिरंतर हानि बिचारि लुके ।
मुनि आवहिं जोगि तपी रु जती । बिनु दरसन जाहिं निरास अती ॥
दरियानंद खामिहं आय रहे । निज आसन टेकि जमाय रहे ।।
लघुसंका के हेतु गोसाई कदे । कर जोरि सो खामि भये जुठ३ ॥
कहे नाथ है होत अनीति बड़ी । छमिये कहितो मम बात कड़ी ।।
लघुसंका लगे बहिरात हैं जू । सुनि साधु गिरा छिपि जात हैं ज ।।
दुप पावत सज्जन हैं तेहि ते । बिनती हौं करौं सुनिये यहि ते ॥
हौं देत मचान बंधाय अव । तेहि ऊपर आसन नाय फवै॥
करि दरसन होब निहाल सौ । सुठि संत समागम होई जवै ॥
दो०-विनती दरियानंद की, मानि सजाय मचान ।
बैठत दिन भर लहत सुष, साधक सिद्ध सुजान ॥२७॥

[१४] नित नव सत्संग उमाह बढ़े। सुचि संत हृदय रसरंग चढ़े ॥ नित नित्य बिहारहुं देषत हैं । मृगया कर कौतुक पेपत हैं । वृंदावन ते हरिवंस हितू । प्रियदास नवल निज सिप्य भृत् ॥ पठये तिन आइ जोहार किये | गुरुदत्त सुपोथि सप्रेम दिये। जमुनाष्टक राधासुधानिधि जू । अरु राधिकातंत्र महा विधि जू ।। अरु पाति दई हितहाथ लिपी । सोरह सै नव जन्माष्टमि की॥ तेहि माहिं लिषी विनती बहुरी । सोइ बात मुपागर सो कहुरी ॥ रजनी महरास की आवत जू | चित मोर सदय ललचावत जू॥ रसिकै रस म तनुत्याग चहौं । मोहि आसिप देइय कुंज लहौं । सो०-सुनि विनती मुनिनाथ, एवमस्तु इति भाषेउ । तनु तजि भये सनाथ, नित्य निकुंज प्रवेस करि ।। ८ ॥ दो०--संडीला ते आय के, बसु खामी नंदलाल । पढ़े रामरच्छा विवृति, जो भक्तन को ढाल ॥२८॥ षट मास रहै सतसंग लहै | चलती बिरियां कछु चिह्न चहै ।। दियो सालग्राम को मूर्ति भली । निज हस्त लिपित कवच औ कमली।। इमि जादव माधव बेनि उभय । चितसुप करनेस अनंद सदय ।। तपसी 'सुमुरारि उघार जती । विरही भगवंत सभागवती ॥ विभवानंद देव दिनेस मिले । अरु दच्छिन देस के खामि पिले ।। सब रंग रंगे सतसंग पगे | अहमादि कुनींद सुषुप्त जगे ॥ कहे धन्य गोसाई जु जन्म लये | लहि दरसन हौं कृतकृत्य भये ॥ हुग नीर टरै नहिं बोल सरै । सब जाहिं सप्रेम प्रमोद भरै ॥ वसु संवत साधु समागम मों | कटिगो नहिं जानि परयो किमि धों [१५] दो०-सोरह से सोरह लगै, कामद गिरि ढिग बास । सुचि एकांत प्रदेस महं, आये सूर सुदास ॥२९॥ पठये गोकुलनाथ जी, कृष्ण रंग में बोरि । हग फेरत चित चातुरी, लीन्ह गोसाई छोरि ॥ ३०॥ कवि सूर दिपायउ सागर को । सुचि प्रेम कथा नट नागर को ॥ पद द्वय पुनि गाय सुनाय रहे । पदपंकज पे सिर नाय कहे ।। अस आसिप देइय स्याम दरें । यहि कीरति मोरि दिगंत च ।। सुनि कोमल वैन सुदादि दिये । पद पोथि उठाय लगाये हिये । कहै स्याम सदा रस चापत हैं । रुचि सेवक की हरि रापत हैं। तनिको नहिं संसय है यहि मां । नुति सेप बपानत हैं महिमा ।। दिन सात रहे सतसंग पगे । पदकंज गहे जब जान लगे। गहि बांह गोसाई प्रबोध किये । पुनि गोकुलनाथ को पत्र दिये ।। लै पाति गये जब सूर कवी । उर में पधराय के स्याम छवी ॥ दो-तब आयो मेवाड़ ते, विप्र नाम सुखपाल । मीरा बाई पत्रिका, लायो प्रेम प्रवाल ॥ ३१ ॥ पढ़ि पाती उत्तर लिपे, गीत कवित्त बनाय। सब तजि हरि भजित्रो भलो, कहि दिय विप्र पठाय ॥ ३२॥ तड़के इक बालक आन लग्यो । सुठि सुंदर कंठ सोंगान लग्यो। तिसु गान पै रोझि गोसाई गये । लिपि दीन्ह तवै पद चारि नये ॥ करि कंठ सुनायउ दृजे दिना । अड़ि जाय सो नूतन गान विना ।। मिसु याहि बनावन. गीत लगे | उर भीनर मुंदर भाव जगे। जब सोरह से वसु बीस चटयो । पद जोरि नये सुचिराध गट्यो ।

[१६] तेहि रामगीतावलि नाम धरयो । अरु कृष्णगीतावलि रॉचि सरयो । दोउ ग्रंथ सुधारि लिप रुचि सों । हनुमंतहिं दीन्ह सुनाय जिसों ।। तब मारुति है कै प्रसन्न कयो । करि प्यान अवधपुर जाइ रह्यो । इमि इष्ट को आयसु पाइ चले । बिरमे सुठि तीरथराज थले ।। दो-तेहि अवसर उत्तम परब, लागो मकर नहान । जोगी तपी जती सती, जुरै सयान अजान ॥ ३३ ॥ तेहि पर्व ते पाछे गये दिन छै । बट छांह तरे जु लष्यो मुनि द्वै॥ तपपुंज दोऊ मुप कांति तपै । छवि छाम छपाकर छंद छपै ॥ करि दंडप्रनाम सुदूरहिं ते । करजोरि कै ठाढ़ भये तहिं ते ॥ मुनि सैन सों एक हंकारि लियो । अपने ढिग आसन चार दियो । तेहि टारि के भूमि में बैठि गये । परिचय निज दै परिचाय लये ।। सोइ रामकथा तंह होत रह्यो । गुरु सूकरषेत में जौन कह्यो । बिसमयजुत बूझेउ गुप्त मता । कहि जागबलिक मुनि दीन्ह बता।। हर रंचि भवानिहिं दीन्ह सोई । पुनि दीन्ह भुसुंडिहिं तत्त गोई हौं जाइ भुसुंडि ते ताहि लहेडं । भरद्वाज मुनी प्रति आइ कहेउं ।। दो०-यहि विधि मुनि परितोष लहि, पद गहि पाय प्रसाद । सुनै जुगल मुनिवर्ज कर, तहां विमल संवाद ॥ ३४ ॥ तेहि ठांव गये जब दूजे दिना । थल सून निहारु मुनीस बिना ॥ • बट छांह न सो नहिं पर्नकुटी । मन बिसमय बादेउ मर्म पुटी ॥ उर राषि उभय मुनि सोल चले | हरि प्रेरित कासि की ओर ढले । कछु दूरि गये सुधि आइ जबै । मन सोचत का करिये जु अवै ।। जो भयो सो भयो अब याहि सधै । हर दरसन कै चलिहौं अवधै ।। ..

[१७] मंन ठीक किये मग आगु बढ़े | चलि के पुनि सुरसरि तीर कड़े। तंब तीरहि तीर चले चित दै । भइ सांझ जहां सो तहां टिकिंगै ॥ दिग वारि पुरा बिच सीतामढ़ी । तंह आसन डारत वृत्ति चढ़ी ॥ नहिं भूप न नींद बिछिप्त दसा । उर पूरब जनम प्रसंग बसा ॥ दो०-सीताबटतर तीन दिन, बसि सुकबित्त बनाय । बंदि छोड़ावत बिंध नृप, पहुंचे कासी जाय ॥ ३५॥ भगत सिरोमनि घाट पै, विप्ररोह करि बास । राम बिमल जस कहि चले, उपज्यो हृदय हुलास ॥ ३६ ॥ दिन मां जितनी रचना रचते । निसि मांहि सुसंचित ना बचते ॥ यह लोपक्रिया प्रति द्यौस सौ । करिये सो कहा नहिं बूझि पर ।। अठवें दिन संभु दिये सपना । निज बोलि में काव्य करोअपना ।। उचटी निंदिया उठि बैठु मुनी । उर पूँजि रह्यो सपने की धुनी ॥ प्रगटे सिव संग भवानि लिये । मुनि आठहु अंग प्रणाम किये। सिव भापेउ भाषा में काव्य रचो । सुरवानि के पीछे न तात पचो । सब कर हित होइ सोई करिये । अरु पूर्व प्रथा मत आचरिये ।। तुम जाइ अवधपुर वास करो । तहई निज काव्य प्रकास करो ।। मम पुन्य प्रसाद सों काव्यकला । होइहै सम साम रिचा सफला ।। सो०-कहि अस संभु भवानि, अंतरधान भये तुरत । भाग्य बपानि, चले गोसाई अवधपुर ॥ ९ ॥ दो०-जेहि दिन साहि सभान में, उदय लयो सनगान | तेहि दिन पहुंचे अवध में, श्रीगोसाई भगवान ॥ ३७॥ आपन २ [१८] सरजू करि मज्जन गव दिन में । विचरे पुलि नारन बीथिन में || एक संत मिले कहने सो लगे । थल रम्य ल महबीरी लगे। लै संग सो ठाम दिपायो भले । बट की बिटपावलि पुन्य थले ।। तिन मां बट एक बिसाल थही । तिसु मूल में वेदिका सोहि रही । तिसु ऊपर बैठ सिधासन से । एक सिद्ध प्रसिद्ध हुतासन से । थल देषि लोभायो गोसाई मना । बसिये यहि ठांव कुटीर बना ॥. जब सिद्ध के सन्निधि मों गुदरे । तजि आसन सो जय जय उचरे॥ सो को गुरु मोर निदेस दियो । तेहि कारन हौं यह बास लियो । गुरु मोर बतायउ मरम सबै । सो तो देपत हौं परतच्छ अवै ।। कु०-मम गुरु कहेउ कि करहि किन सिद्ध पृष्ठ थल बास । कछु दिन बीते कहहिंगे हरिजस तुलसीदास ॥ हरिजस तुलसीदास कहहिंगे यहि थल आई। आदि कबी अवतार बायुनंदन बल पाई।। राजराज बट रोपि दियो मरजाद समुत्तम | बसि यह ठाहर ठाटु मानि अति हित सासन मम || सो o-जब ऐहैं यहि ठाम, हुलसीसुत तिसु हेतु हित । सौंपि कुटी आराम, तन तजि ऐहहु मम निकट ॥१०॥ उपदेस गुरू मोहि नीक लग्यो । बहु जनम पुरातन पुन्य जग्यो । बसिकै रसिकै तपिकै चौरी । ही जोहत बाट रहेउं रौरी ।। अब राजिय गाजिय नाथ यहां । हौं जाब बसे गुरु मोर जहां ॥ कहिके अस बेदिका ते उतरयो । सिर नाइ सिधारेउ दूरि परयो । तह आसन मारिकै ध्यान धरयो । तिसु जोग हुतासन गात जरयो ।

[१९] यह कौतुक देपि गोसाई कहै । धनुधारि ! तेरी बलिहारि अहै ॥ निबसे तंह सौप्य सुपास लहे । दृढ़ संजम जो मम जोग गहे ॥ पय पान करें सोउ एक समय । रघुबीर भरोस न काहुक भय || जुग बत्सर बीत न बृत्ति डगो । इकतीस को संबत आई लगो।। दो०-रामजन्म तिथि बार सब, जस त्रेता मह भास । तस इकतीसा महं जुरो, जोग लग्न ग्रह रास ।। ३८ ॥ नवमी मंगलवार सुभ, प्रात समय हनुमान । प्रगटि प्रथम अभिषेक किय, करन जगत कल्यान ॥ ३९॥ हर, गौरी, गनपति, गिरा, नारद, सेप सुजान । मंगलमय आसिप दिये, रबि, कबि, गुरु गिरबान ॥४०॥ सो-यहि बिधि भा आरंभ, रामचरितमानस बिमल । सुनत मिटत मद दंभ, कामादिक संसय सकल ॥११॥ ॥ दुइ वत्सर साते क मास परे । दिन छब्बिस मांझ सो पूर करे। तैंतीस को संबत औं मगसर | सुभ द्यौस सुराम विवाहहि पर ।। सुठि सप्त जहाज तयार भयो । भवसागर पार उतारन को। पापंड प्रपंच बहावन को । सुचि सात्विक धर्मचलायन को ॥ कलि पाप कलाप नसावन को । हरि भगति छटा दरसावन को । मत वाद विवाद मिटावन को । अरु प्रेम को पाठ पढ़ायन को॥ संतन चित चाव चढ़ावन को । सज्जन उर मोद बढ़ायन को॥ हरिरस हर बस समुझावन को । सुनि संमत मार्ग मुशायन यो ।। जुत सप्त सोपान समाप्त भयो । सनगंग बन्यों सुप्रथा नयो ।

[२०]. दो-महिसुत बासर मध्य दिन, सुभ मिति तत्सत कूल । सुर समूह जय जय किये, हरषित वरपे फूल ॥ ४१ ॥ जेहि छिन यह आरंभ भो, तेहि छिन पूरेउ पूर । निरबल मानव लेपनी, पीचि लियो अति दृर ॥ ४२ ॥ 'पांच पात गनपति लिपे, दिव्य लेपनी चाल | सत, सिव, नाग, अरु धु, दिसप,लोकगये ततकाल ॥ ४३॥ सबके मानस में बसेउ, मानस. रामचरित्र । बंदन रिपि कवि पद कमल, मन क्रम बचन पवित्र || ४४ ॥ बंदों तुलसी के चरन, जिन कीन्हों जग काज ! कलि समुद्र बूड़त लष्यो, प्रगटेउ सप्त जहाज ॥ १५ ॥ परम मधुर पावन करनि, चार पदारथ दानि । तुलसीकृत रघुपति कथा, के सुरसरि रसपानि ।। ४६ ।। सो-प्रगटे श्री हनुमान, अथ सों इति लौं सव सुनै । दिये सुभग बरदान, कीरति त्रिभुवन बस करी ॥ १२ ॥ मिथिला के सुसंत सुजान हते | मिथिलाधिप भाव पगे रहते ॥ सुचि नाम रुपारुन खामि जुतो । तेहि अवसर औध में आयोहुतो ।। प्रथमै यह मानस तेई सुनै । तिनहीं अधिकारि गोसाई गुनै ।। खामि नंद सुलाल को सिष्य पुनी। तिसु नाम दलाल सुदास गुनी ।। लिषि कै सोइ पोथि स्खठाम गयो । गुरु के ढिग जाय सुनाय दयो । जमुना तट पै त्रय बत्सर लो । रसपानहिं जाइ सुनावत भो ॥ तब ते बहु संष्यक पात लिषै। कछु लोगन औ निज हाथ रिङ् ॥ - [२१] मुकुतामनि दास जु आयो हतो । हरि सयन को गीत सुनायो हतो।। तिसु भावहि पै मुनि रोझि गये । पल मों पल भाँजत सिद्धि दये ।। दो o-तब हरि अनुसासन लहे, पहुंचे कासी जाय । विखनाथ जगदंब प्रति, पोथी दियो सुनाय ।। ४७ ॥ छं०-पोथी पाठ समाप्त कै के धरे, सिवलिंग ढिग रात में । मूरप पंडित सिद्ध तापस जुरे, जत्रपट पुलेउ प्रात में || देपिन तिरपित दृष्टि ते सब जने, कीन्ही सही संकरं। दिव्यापर सों लिप्यो पढ़े धुनि सुने, सत्यं सिवं सुंदरं ॥ ६ ॥ सिव की नगरी रस रंग भरी । यह लीला जु पाटि गई सगरी ॥ हरपे नर नारि जोहारि किये । जय जय धुनि बोलि बलयां लिये || पै पंडित लोगन सोच भयो । सब मान महातम जीव गयो।। पदिहें यह पोथि प्रसादमई । तब पूछिह कौन हमें मनई ।। दल बांधि ते निंदत बागत भे । सुर बानि सराहत पागत भे ॥ कोउ प्रथ चोरावन हेतु रचे । फरफंद अनेक प्रपंच पचे ।। निधुआ सिपुआ जुग चोर गये । रपवार बिलोकि निहाल भये ॥ तेहि पूछे गोसाई ते कौन धुही । जुग स्यामल गौर धरे धनुही । सुनि वैन भरै जल नैन कहै । तुम धन्य हते हरि दरस लहै ॥ दो-तजि कुकरम तसकर तरे, दिय सब बस्तु लुटाय । जाइ धरे टोडर सदन, पोपी जतन कराय ॥ १८॥ पुनि दूसर पात लिप्यो रुचि सौ । नहित लिपि पे लिपि होनटगी। दिन दून प्रचार वढेव लपि के । सब पंडित हारे हिया शनि के ।।

i [२२] तब मिस्र बटेसर तांत्रिक ही । दुप दाह सुधीगन रोय कही । तिन मारन केर प्रयोग कियो । हठि भैरव प्रेरि पठाय दियो । हनुमत से रच्छक देपि डरे । उल्टे सुबटेसर प्रान हरे॥ तब हारि चले दल को सजि कै। मधुसूदन सरस्वति के मठ 4 ।। कहै कीन्ह प्रमान महेस सही। किसु कोटि को है सो नहिं बात कही स्रुति सास्त्र पुरान इतिहास इये । केहिके समकच्छ तिसै कहिये । जति राज कहे मंगवाउन जू । तब पोथि विलोकि वताउब जू || दो०-जति मंगाय पोथी पढ़े, उपयो परमानंद । फेरि दिये लिपि श्लोक यह, जयति सच्चिदानंद ।। ४९ ॥ श्लोक-आनन्दकानने ह्यस्मिन् जङ्गमस्तुलसीतरुः । कवितामारी भाति रामभ्रमरभूषिता ॥ १ ॥ जब पंडित आये कहे तिन ते । किन यूछिय वात सदासिवसे ।। निगमागम सान पुरान सबै । क्रम ते धरि मानस नीचे फवै ॥ जब होत बिहान घुलेउ पट तो | सब टूटि परे तेहि देपन को ।। लपि वेद के ऊपर मानसही । सब पंडित लाज गरे तितही ॥ चरनों वै पड़े चरनोदक लै । अपराध कराइ छमा घर गै॥ नदिया को सुपंडित दत्त रबी 1.सब सानबिसारद आसु कवी ।। भुनि तेहठि बाद विवाद कियो । अरु हारि विषाद बढ़ायो हियो । जब न्हान गोसाई गये मठ ते । तब मारन हेतु गयो लठ ले || हनुमंत सुरच्छक देखि भज्यो । अपनी करनी पर आपु लज्यो ।। पुनि जाइ गोसाई रिझाय लियो । बर हेतु सुधी हठ भूरि कियो । -- [२३] छं0-माँगेउ सो बर तजिये पुरी मुनि विवस भे बर के दिये। 'कासिनाथ कहि निवरत हों कवित्त बनाय दृढ़ निश्चय किये ॥ सो लिपि धरे हर मंदिरहिं प्रस्थान दच्छिन दिसि किये। सिव दै दरस समुझाइ फेरे छुभित मन धीरज दिये ॥ ७ ॥ दो०-सुनि प्रस्थान मुदित भयो, गयो दरस हित धीर । बंद भयो पट धुनि भई, कोपसहित गंभीर ॥ ५० ॥ सो-जाइ गोसाई मनाउ, पग परि बहु विधि विनय करि । पुरि महं लाइ बसाउ, ना तो होइहि नास तव ॥ १३ ॥ सुनि टोडर आय कियो विनती | मुनि मानिय सेवक की मिनती ।। प्रिय घाट असी पर भौन नयो । बनिकै सह घाट तयार भयो । बसिकै सुप सों सुप देइय जू । पदकंग सदा हम सेइय जू ॥ सुप मानि गये तेहि ठाम बसे । रघुबीर गुनावलि माहिं रसे ॥ कलि आयउ राति कृपान लिये । मुनि कहं बहुभांति सोंत्रास दिये ।। सो कहेउ जल बोरहु पोथि निजै । न तो दादिही तादिहीं चेतु अौ ॥ कहिके अस सो जु सिधारो जत्रै । मुनि ध्यान धरेउ हरि हेतु तव ।। हनुमंत कह्यो कलि ना मनिहै । मोहि बरजत वैर महा उनिह || लिखिकै विनयावलि देहु मोही । तब दंड दियाउन तात ओही ॥ दो-विदित राम विनयावली, मुनितब निरमित कीन्छ । सुनि तेहि सापी जुत प्रभू, मुनिहिं अभय कर दोन्ह ।। ५१ ॥ मिथिलापुर हेतु पयान किये । सुकृती जन को मुग्प सांति दिये ।। मुगु आसम में दिन चारि रहे। करदीन दुआ कर पाप दहे॥

, [२४] दिन एक बसे मुनि हंसपुरा । परसी को सुहाग दिये बहुराः ।। गउघाट में राउ गंभीर घरे । दुइ बासर लो तंहवां ठहरे ।। ब्रह्मेस सुदरसन कैके चले । पुनि कांत ब्रह्मपुर मां निकले ।। संवरू. सुत मांगर ग्वाल हतो । दुहि दूध दियो सुर साधु रतो ॥ बर दीन्ह तजे चोरहाई सहूं । निरबंस न होबहुगे कबहूं । तब बेलापतार में आय रहे । तहं दास धनी निज कष्ट कहे || छं०-कहे कष्ट आपन काहि जाइहि प्रान मम पातक बयों। मूसहि षवायों भोग कहि कहि पात हरि सौं, कियों ॥ रघुनाथसिंह जानेउ दगा करि कोप सो बोलेउ मुने । नहिं पाहिं ठाकुर सामुहे मम तोपि बध निस्चय गुने ॥ ८ ॥ सो०-मुनिबर धीरज दोन्ह, कियो रसोई साधु तब । सन्मुख भोजन कीन्ह, ठाकुर लघि रिषि इमि कहेउ ॥ १४ ॥ दो-तुलसी झूठे भगत को, पति राखत भगवानः । जिमि मूष उपरोहितहिं, देत दान जजमान ॥ ५२।। निज गेह पवित्र करावन को । लै गो मुनि को बर नायक सो तह भक्त सुगोबिंद मित्र मिले । जिसु दृष्टि ते लोह धना पिचिले ॥ मुनि गांव के नांव में फेर करे । रघुनाथपुरा तिसु नाम परे।। तह ते चलिकै विचरे बिचरे । रिषि हरिहर खेतमें जा पधरे।। पुनि संगम मंजि चले ‘सपदी । नियराये बिदेहपुरी · छपदी । धरि बालिका रूप बिदेह लली | बहराय के पीर पवाय चली.।। जब जानेड मरम कहा कहिये । मन ही मन सोचि कृपा रहिये ।।

[२५] द्विज लोगन हाला के घेरिरहे । अरु आपन घोर विपत्ति कहे ।। छत सूबा नवाब बड़ो रगरी । सो तो बारहो गांव की वृत्ति हरी ।। दो-दया लागि कर्तव्य गुनि, सुमिरे वायुकुमार । दंडित करि बहुरायउ, सुपजुत द्विज परिवार ॥ ५३ ।। मिथिला ते कासी गये चालिस संवत लाग। दोहावलि संग्रह किये, सहित विमल अनुराग ॥ ५४॥ लिये बालमीकी बहुरि, इकतालिस के मांहि । मगसर सुदि सतिमी रत्री, पाठ करन हित ताहि ॥ ५५॥ माधव सित सिय जनम तिथि, व्यालिस संवत बीच । सतसैया बरनै लगे, प्रेम चारि ते सींच ।। ५६ ॥ सो०-उतरु सनीचरि मीन, मरी परी ‘कासीपुरी | लोगन है अति दीन, जाइ पुकारे रिपि निकट ॥ १५॥ लागिय नाथ गोहार अपर बल कछु न बिसाता । राएँ हरिके दास कि सिरजनहार विधाता ।। दो०-करुनामय मुनि सुनि बिथा, तंत्र कवित्त बनाय । करुनानिधि सों विनय करि, दीन्ही मरी भगाय ॥ ५७ ॥ कबि केसवदास बड़े रसिया । घनस्याम सुकुल नभ के बसिया || कवि जानि के दरसन हेतु गये । रहि बाहिर नूचन भेजि दिये ।। सुनिकै जु गोसाई कहै इतनो । कवि प्राकृत केसव आयन दो ॥ फिरिगे झट केसव सो सुनिक । निज तुच्छता आपुर ते गुनिक ॥ जब सेवक टेरेउ गे कहिये । ही मैटिही कान्दि बिनय गरिक ।

[२६] घनस्याम रहै घासिराम रहै । वलभद्र रहै बिस्राम लहै ।। रचि राम सुचंद्रिका रातिहि में । जुरै केसव जू असि घाटिहि में ।। सतसंग जमी रस रंग मची । दोउ प्राकृत दिव्य बिभूति पची ।। मिटि केसव को संकोच गयो । उर भीतर प्रीति की रीति रयो । दो०-आदिल साही राजके, भाजक दान बनेत । । दत्तात्रेय सुबिप्रवर, आये रिषय निकेत ॥ ५८॥ करि पूजा आसिष लहै, मांगे पुन्य प्रसाद । लिषित बालमीकी खकर, दिये सहित अहलाद ॥ ५९॥ अमरनाथ जोगी तिया, हरि बैरागी लीन । ताते कोपि तिनहिं रहित, कंठी माला कीन ॥ ६०॥ मच्यो कोलाहल साधु सब, आये मुनिबर पास । फेरि मिल्यो सो आसननि, रिपय कृपा अनयास ॥ ६१ ॥ आयो सिद्ध अघोरिया, अलख जगावत द्वार । छिन महँ सिद्धाई हरी, उपदेसेउ स्रुति सार ।। ६२॥ निमिषार को बिन सुधर्मरता । बनपंडि सुनाम बिमोह गला ॥ सब तीरथ लुप्तहिं चाहु थपै । तिसु हेतु सदासिव मंत्र जपै ।। इक प्रेत धना ढिग ठाढ़ भयो । बहु द्रव्य गड़ो सो दिषाई दयो । सो कह्यो धन लै सुभ काज सरो। यहि जोनि ते मोर उबार करो। मन हरषित विप्र कयो मोहि कां । चौधाम घुमायं सुतीरथ मां ।। तब कासि गुसाई के तीर चलो । तिस दरसन होय तुम्हारो भलो ।। सुष-मानि कै तै सोइ प्रेतकियो । नभ माहिं असी पर छेक छियो । ।

[२७]
जन सोर मच्यो बहु लोग जुरे । सब कौतुक देपहिं अंग फुरे ।।
निज आस्रम ते कढ़ि आयो मुनी । नम ते भयो जयजयकार धुनी ॥
दो०-दिव्य रूप धरि जान चढ़ि, प्रेत गयो हरिधाम |
तुलसी दरस प्रताप ते,.भयो विधि वाम ॥ १३ ॥
बनपंडी महि पर गिरेउ, पग छुइ कियो प्रनाम ।
मुनि सन सत्र ब्यवरा कह्यो, बसेउरसेउ तेहि ठाम || ६४ ॥
तासु विनय वस मुनि चले, तीरथ थापन काज ।
पहुंचे अवघहिं पांच दिन, तहां टिके रिपिराज ॥६५॥
दै रामगीतावलि गायक को। जे गावहिं जस रघुनायक को ।
मन बोध तिवारिहिं औध छटा । सब कंचन मय बन भूमि अटा ॥
देपरा के चले गैनाही टिके । पुनि सूकरपेत में जाय थिके ।।
सियावार सुगांव में वास लिये | तंह सीता सुकूप को पाय पिये ॥
पहुंचे लखनपुर मोद भरेः। अरु धेनुमती तट पे उतरे ॥
कडं दीनन को प्रतिपाल करें । कहुं साधुन के मन मोद भरै ।।
कहुं लखनलाल को चरित बचें । कहुं प्रेम मगन है आपु न. ।।
कहुं रामायन कल गान स. । उत्साह कोलाहल भूरि मर्च ॥
कई आरत जन को ताप हरॆ । कहुं अग्यानिन उर ग्यान धरे ॥
दो-निरधन भाट दमोदरहिं. आसिपद कवि कीन ।
लहेउ विपुल धन मान बहु, भा कविकला प्रवीन ॥६६॥
तह ते मलिहाबाद में, आप संत सिरताज ।
रामायन निज पृत दिये, अजवल्लभ भटरान॥६७॥

[२८] पुनि अनन्य माधव मिले, कोटन ग्रामहिं जाय । 'माता प्रति सिच्छा सुने, भगनि दिये बतलाय ॥ ६८॥ पुनि जाय विठूर में रैनि बसे । सरि मन्नत पांक में जाइ धसे ।। गहि बांह निकारेउ जन्दुसुता । तन तायो.जरा न रही जुबुता ।। तंह ते चलि जाय संडीले परे । गौरीसंकर गृह माथ धरे ॥ कहे या घर में ली है जनम पपा । मनसूपा स्वयं श्रीकृष्न सपा ॥ कछु काल गये सोइ जन्म धरयो । बंसीधर ताकर नाम पर्यो । कबि भी मुनिवर उपदेस कियो । पद रास सुने तनु त्याग दियो । तेहि व्योम बिमान पै जात लष्यो । हलवाई सुप्रसिद्ध प्रवीन मष्यो । सतसंगिन देपि निहाल भये । उपदेस सनातन पूर लये ॥ दो-संडीले ते मुनि चले, मग ठाकुर छितिपाल । 'नमन कियो नहिं मद मतो, तुरत भयो कंगाल ॥ ६९ । सो०-विप्रन किय अपमान, ताते ते निरधन भये । कैथन किय सनमान, सुषी भये धन वंस लहि ॥ १६॥ दो-जुरै जुलाहे भेंट धरि, लहै त्रिपुल धन धान्य । पहुंचे नैमिष बन मुनी, सर्व तंत्र सनमान्य ॥ ७० ॥ सोधि सकल तीरथ थपे; किय त्रय मास निवास । मिले पिहानी के सुकुल, संवत लगु उनचास ॥ ११ ॥ बैराबाद को सिद्ध प्रबीन घरे । मुनि आपुइ जोग ते जाइ परे॥ करि ताहि निहाल चले मिसरिष । संग में बनखंडि दुचारिक सिष ।। पुनि नाव चढ़े सुख सो बिचरे । पुर राम सुनै तुरतै उतरे ॥

[२९] नृप सेवक टंटा बेसाहि रहे । सब माल मता तजि राह गहे ।। सिंहराम सुनो पग दौरि गयो । करिके सु बिनयपद टेकिरह्यो । तब लौटि परे तिसु धाम बसे । हनुमंतहिं थापि तहां विलसे ॥ बंसीबन नाम धरयो बटरय । मगसर सुदि पंचमी रास रचय || वृंदावन में तंह ते जु गये । सुठि राम सुघाट पै बास लये ॥ बड़ धूम मचो सुचि संत घुरे । मुनि दरसन को नर नारि जुरे ॥ दो-खामी नाभा ढिग गये, ते किय बहु सनमान । उच्चासन पधराइ मुनि, पूजे सहित विधान ॥ ७२ ।। बिप्र संत नामा सहित, हरि दरसन के हेत । गये गोसाई मुदित मन, मोहन मदन निकेत || ७३ ॥ राम उपासक जानि प्रभु, तुरत धरे धनुबान । दरसन दिये सनाथ किय, भगत बछल भगवान || ७४ ।। बरसाने में लीला सो व्यापि गई ! मुनि आसन पै बदि भीर भई ।। कछु कृष्न उपासक द्वेप भरे । धनुवान धरे पर मोह सरे । तिनको समुझाये सुतत्त्व महा । जन को ग्रन राम न राप्यो कहां ।। सुभ दच्छिन देस ते जात हतो । हरि मूरति अवधहि थापन को ॥ बिस्राम भयो जमुनातट पै । लग्वि मूरति मोहे विन उदय ॥ सो चहो हरि विग्रह बाई थपै । बिनती किय जाइ गोसाइहिं पै।। न उठाये उठे जब सो प्रतिमा । तब थापित कीन्ह तह जिजिमा ।। तिमु नाम कौसल्यानंदन न । मुनिराज धेरै जग बंदन ॥ नंददास कनौजिया प्रेम मई। जिन सेप सनातन तौर पढ़े ॥ सिन्छा गुरु बंधु भये तहिते । अति प्रेम नमो आय मिन्द्र यहि ते॥

[३०] दो-हित सुत गोपीनाथ प्रति, महिमा अवध बपानि । जेहि नहिं ठांव ठिकान कहुं, तिनहिं वसावत आनि || ७५॥ फेरि अमनिया दिये पुनि, सपरा ताहि बताय । हलवाई वनिकन सदन, वालकृप्न दिपराय ॥ ७६ ॥ सोल-इमि लीला दरसाय, भगतन उर आनंद भरि । चित्रकूट मह जाय, किये कछुक दिन बास तहं ॥१७॥ सतकाम सुविप्र गोसाई लगे। दोच्छाहित आयो सुवृत्ति जगे ॥ लपि कामविकार न सिप्य किये । टिकिगो तह सो हठ ठानि हिये । जब राति में रानि कदंत्र लता | आइ तासु विलोकन सुंदरता ॥ तिन दीपक बाति बढ़ाइ लियो । लपिकै मुनि सुंदर सीप दियो । सो विप्र लजाइ के पाँय परयो । करिकै मुनि छोह बिकार हरयो । पुनि विप्र दरिद्र महा जलपा । मंदाकिनि इवन हेतु चला ॥ तिसु प्रान बचावन हेतु रिपय । सुठि दारिद मोच सिला प्रगटय ।। पुनि साहि पवास पठायउ जू । मुनिराजहिं दिल्ली बुलायउ जू॥ दो-चले जमुन तट नृप तिलक, साधु कियो सरनाम | राधावल्लभ भगति दिय, रीझे स्यामा स्याम ॥ ७७॥ सो०-उड़छ केसवदास, प्रेत हतौ घेरेउ मुनिहिं । उधरं विनहि प्रयास, चढ़ि विमान खरगहि गयो ।॥ १८ ॥ चरवारि के ठाकुर की दुहिता । जिसु सुंदरता पै जग मुहिता ॥ इक नारिहिं ते तिसु व्याह भयो । जब जानेउ दारुन दाह भयो । बर की जननी जनमावत ही । सो प्रसिद्ध कियो तेहि पुत्र कही ।

[३१] अनुकूलहिं साज समान कियो । जे जानत भे तिहि पूजि दियो। यहि कारन धीया भयो बहुतै । अत्र रोवत मीजत हाय सबै ॥ तिन धेरे दया लगि संत हिये । तिसु हेतु नवाहिक पाठ किये ।। बिस्रांम लगायो सो जानिय जू । तिसु सब्द प्रथम यह आनिय जू ॥ हिय,सत, अरु कीन्हरु स्याम लगा । औ राम सैल पुनि हारि परा ॥ कह मारुतसुत, जहं तहं पुन्यं । इति पाठ नवाहिक ठाम अयं ।। दो०-नारी ते नर होइ गयो, करतहि पाठ विराम | पुलकित जय तुलसी कहै, जय जय सीताराम ॥ ७८ ॥ तंह ते पंचवें दिन मुनी, पहुंचे दिल्ली जाय । पवरि पाय तुरतहिं नृपति, लिय दरबार बुलाय || ७९ ॥ दिल्लीपति बिनती करी, दिपरावहु करमात । मुकरि गये बंदी किये, कीन्हे कपि उतपात ॥ ८०॥ वेगम को पट फारेऊ, नगन भई सब बाम । हाहाकार मच्यो महल, पटको नृपहिं धाम || ८१॥ मुनिहि मुकुत ततछन किये, छमाऽपराध कराय । बिदा कीन्ह सनमान जुत, पीनस पै पधराय ।। ८२॥ चलि दिल्ली ते आये महावन में | निसि बास किये जु अहरिन में ।। इक ग्वार भगीरथ पै दुरिंगे । तेहि सिद्ध सुसंत बनावन में ॥ दसवें दिन औधहि आय रहे । भरि पाप तहां मुसनाय रहे । हरिदास सुभक्त सुगीत रयो । तेहि मां कार्ड सब्द अयुद्ध भयो । सुधराये मुनी पै न बोध भयो । निनु कानन में अवगंध भयो । सपने मुनि ते रघुबीर को । नहिं सुद्ध असुन मुभाय गो || . .. [३२] तब जाइ मुनी तिसु भाव भरो | जस गावत हो तस गाया करो ॥ मुनि बालचरित्र अनंदित है । मुनि तुष्ट किये सुपटंबर दे । दो-देव मुरारी भेंट मिलि, सहित मलूकादास । पहुँचे कासी में रिपय, किये अपंड निवास ॥ ८३ ॥ मुचि माध में गंग नहाय हते । सरि भीतर मंत्र महा जपते ।। तन वृद्ध सो कांपत रोम अड़े । गनिका रहि देखत तीर पड़े ॥ कढिके मुनि सीचेउ वस्त्र धरे । दुइ बुंद सोई गनिका पै परे । बेस्या' मन में निरवेद जगो । बहु दृस्य निरय दिपरान लगो । सब पाप प्रपंच ते दूर भगी । उपदेस ले हरिगुन गान लगी ॥ हरिदत्त सु विप्र दरिद्र महा । तिसु गंग के पार में वास रहा ॥ मुनि के ढिग आय विपत्ति कही । जस दीन दसा घर केर रही ॥ रिपि अस्तुति गंग वनाय करी । सुरसरि दै भूमि विपत्ति हरी ॥ दो-निंदक मुनि अरु भगतिपथ, मुलई साहु कलार । निधन भयउ टिकली घरे, लैगे फूंकनहार ।। ८४ ॥ तास तिया रोवत चली, मुनि ढिग नायउ सीस । सदा सोहागिन रहह तुम, मुनिवर दीन्ह असीस ।। ८५॥ विलपि कही सो निज दसा, सव मुनि लिये मँगाय । चरनामृत मुष देइकै, तुरतै दिये जियाय ॥ ८६ ॥ तेहि बासर ते मुनि नेम लिये । अरु बाहिर बैठव त्यागि दिये ॥ रहे तीन कुमार बड़े सुकृती । मुनि चरनन में तिनकी भगती ।। रिपिकेप रह्यो मनिकरनिका पें । विसुनाथ के मंदिर सांति पदै ॥ अनपुरना में दाता दीन रहै । रहनी गहनी सम साम गहै ।।

[३३] मुनि दरशन को नित आवत जू । चरनोदक लै घर जावत जू ।। पहिचानि सुप्रीति मुनी तिनकी | सुचि टेक विवेक समीचिन की । तिनके हित ही बहिरांय मुनी । दैके दरसन भितरांय पुनी ॥ सत्र दरसक बूंद चवाव करें । मुनि पै पछपात को दोप धरै ।। दिन एक परीच्छा लीन मुनी । बहिराये नहीं सोइ भाव गुनी ।। तन तीनिउ ता छिन त्यागिकिये । चरनोदक जीवन दान दिये ।। दो-सोरह से उनहत्तरो, माधव सित तिथि थीर । पूरन आयू पाइकै, टोडर तजे सरीर ॥ ८७ ॥ मीत विरह में तीन दिन, दुपित भये मुनि धीर । समुझि समुझि गुन मीत के, भरयो विलोचन नीर ॥ ८८॥ पांच मास बीते परे, तेरस सुदी कुआर | जुग सुत टोडर बीच मुनि, आंटि दिये घर बार ॥ ८ ॥ नप-सिप कर्ता आसु कवि, भीपमसिंह कनगोय । आयो मुनि दरसन कियो, त्यागेउ तन हरि जोय ॥ ९० ॥ गंग कहेउ हाथी कवन, माला जपेड सुजान । कठमलिया पंचक भगत, कहि सो गयो रिसान ।। ९१ ।। छमा किये नहिं स्राप दिय, रंगे सांति रस रंग । मारग में हाथी कियो, झपटि गंगतन भंग ॥ १२ ॥ कवि रहीम बरवै रचै, पठये मुनिवर पास । लपि तेइ सुंदर छंद में, रचना कियो प्रकास ॥१३॥ मिथिला में रचना किये, नहछू मंगल दोय । मुनि प्रांचे मंत्रित किये, सुख पावें सब कोय ॥ ९४ ।। ३ [३४] बाहु पीर व्याकुल भये, बाहुक रचे सुधीर । पुनि बिराग संदीपनी, रामाज्ञा सकुनीर ||९५॥ पूर्व रचित लघु ग्रंथननि, दोहराये मुनि धीर । लिपवाये सब आन ते, भो अति छीन सरीर ॥ ९६ ॥ जहांगीर आयो तहां, सत्तर संवत बीत । धन धरती दीवो चहै, गहे न गुनि विपरीत ॥९७ ॥ बिरबल की चर्चा भई, जो पटु बागविलास । बुद्धि पाइ नहिं हरि भजे, मुनि किय पेद प्रकास ॥ ९८ ॥ अवधपुरी को चोहड़ा, है अवधवासि प्रिय जानि । हृदय लगाये प्रेमबस, रामरूप तेहि मानि ॥ ९९ ॥ सिद्ध वृंद गिरिनार के, नभ ते उतरे आय । करि दरसन पुलकित भये, प्रस्न किये सतिभाय ॥१००॥ सो०-तुमहिं न व्यापै काम, अति कराल कारन कवन । कहिय तात सुपधाम, जोग प्रभाव कि भगति बल ॥१९॥ दो-जोग न भगति न ग्यान बल, केवल नाम अधार । मुनि उत्तर सुनि मुदित मन, सिद्ध गये गिरिनार ॥१०१॥ वैठि रहे सुनि घाट पर, जुरै लोग बहुताय । आयो भाट सुचंद्रमनि, बिनय कियो परि पाय ||१०२॥ सवैयां पन दोइक भोग बिषय अरुझान अब जो रह्यो सो न पसाइय जू अब लौं सब इंद्रिन लोग हस्यो अबातो जनि नाथ हंसाइयजू ॥

[३५]
मद मोह महा पल काम अनी मम मानस ते निकसाइय जू ।
रघुनंदन के पद के सदके. तुलसी मोहि कासि बसाइय जू ॥१॥
दो०-विनय सुनत पुलकित भये, कहि रिपिराज महान ।
बसहु सुपेन इतै सदा, करहु राम गुन गान ॥१०३।।
हत्यारा ढिग आयऊ, विप्र चंद तिसु नाम |
दृर ठाढ़ बोलत भयो, राम राम पुनि राम ॥१०४॥
इष्ट नाम सुनि मगन भे, तुरत लिये उर लाय ।
आदर जुत भोजन दिये, हरपि कहे रिपिराय ॥१०५॥
तुलसी जाके मुपनि ते, धोपेहु निकसे राम ।
ताके पग की पैतरी, मोरे तन को चाम ॥१०६॥
समाचार ब्याप्यो तुरत, बीथिन बीयिन मांझ ।
ग्यानी ध्यानी विप्र भट, सुधी जुरै भइ सांझ ॥१०७||
कैसे घातक सुद्ध भो, कहिये संत महान ।
कहे जु नाम प्रताप ते, बांचहु वेद पुरान ॥१०॥
कयौं लिप्यौ तौ है सही, होत न पै विखास ।
मन माने जाते कहिय, सोइ कर्तव्य प्रकास ॥१०९||
कहे जो सिव को नादिया. गहै तास कर ग्रास ।
तब तो निस्चय उपजही, सबके मन विखास ॥११०॥
मुनि प्रसाद ऐसहि भयो, चहुं दिसि जयजयकार ।
. . . निंदक मांगे छमा सब, पग परि बारंबार ॥११॥
राम नाम दिन भर रट, लोभ विवस मुनि थान ।
साँझ समय तेहि विप्र कंह, द्रव्य देत हनुमान ॥१२॥

'- [३६] राम दरस हित कमलभव, हठेउ कहेउ मुनिराय । तर ते कूदि त्रिसूल पैं, दरस लेहु किन जाय ॥१९३|| गाडि सूल अरु विटप चढ़ि, हिम्मत हारेउ पात । लषेउ ,पछाही वीर इक, अख चढ़े मग जात ॥११४॥ पूछेउ मर्म कहेउ कथा, सो चढ़ि बिटप तुरंत । कूदेउ उर बिखास धरि, दीन दरस भगवंत ॥११५|| अंत समय हनुमत दिये, तत्त्व ग्यान को बोध । 'राम नाम ही बीज है, सृष्टि बृच्छमय प्रोध ॥११६॥ पर प्रस्थान की सुभ घड़ी, आयो निकट बिचारि । कहेउ प्रचारि मुनीस तब, आपन दसा निहारि ॥११७॥ रामचंद्र जस बरनि कै, भयो चहत अब मौन । तुलसी के मुष दीजिये, अब ही तुलसी सोन ॥११८॥ संवत सोरह से असी, असी गंग के तीर । सावन स्यामा तीज सनि, तुलसी तज्यो सरीर ॥११९॥ मूल गोसाई चरित नित, पाठ कर जो कोयं । गौरी सिव हनुमत कृपा, राम परायन होय ॥१२०॥ सोरह से सत्तासि सित, नवमी कातिक मास । . बिरच्यो यहि निज पाठ हित, बेनीमाधवदास ॥१२॥ । इति श्रीवेणीमाधवदासकृत मूल गोसाईंचरित समाप्त ।। श्रीसूगण्डिल्यगोत्रोत्सन्नपंक्तिपावनत्रिपाठीरामरक्षमणिरामदासेन तदात्मजेन च लिखितम् । मिति विजयादशमी संवत् १८४८ भृगुवासरे ।

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DETE
श्रीहरिः
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माघ १९९०
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- - गीताप्रेसकी पुस्तकें श्रीमद्भगवद्गीता -[ श्रीशांकरभाष्यका मन हिन्दी-अनुवाद] सो मूल भाग्य है और मायके सामने ही अर्थ लिखकर पढ़ने और समझनेमें सुगमता कर दी गयी है। शुति, स्मृति, इतिहामोड प्रमाणीका सरल भयं दिया गया है। पृष्ट १०१, ३ दिन, मू० साधारण मिल्ल २॥), वढ़िया जिल्द २) श्रीमद्भगवद्गीता-मूल, पदच्छेद, अन्वय, साधारण भागाटीका, टिप्पणी, प्रधान और सूचना विषय एवं त्यागसे भगवयाशि- सहित, मोटा टाइप, कपड़ेकी जिल्द, पृष्ठ ५७०, बहुरंगे ५ चित्र १३) श्रीमद्भगवद्गीता-गुजरानी टीका, भीता नम्बर दोकी तरह ११) श्रीमद्भगवद्वीता--मराठी-टोना, हिन्दीकी 1) दालीको समान, मूल्य १॥ श्रीमद्भगवद्गीता-प्रायः सभी विषय ११) बालीके समान, विशेषता यह है कि साकों सिरेपर . भावार्थ छपा हुआ है, साइज और बाहर कुछ छोटे, पृष्ठ ४६८, मृत्य ॥३), सजिल्द 111) श्रीमद्भगयटीता-गला-टीका, गीता नं. ५ की तरह 1 T०१),स. 30 श्रीमद्भगवद्गीता-कोर, साधारण भाषाटीका, टिपणी, अंधान विषय और त्यागसो भगवत् प्राप्ति नामक निवन्धसहित साइज मकोला, मोटायाइए,३१६ पृष्टकी सचित्र पुस्तकका भूम), सर गीता-मूल, मो. अक्षरवाली, सचिन, मूल्य 1-), सजिल्द गीता-साधारण भाशाटीका, पाकेट-साइज, सभी विपर 1) सालीके समान, सचिन, पृ ३१२, मूल्य ) सन्दि गीता-भापा, इसमें श्लोया नहीं हैं। अतर मोटे हैं,१चित्र, मृ.), स. गीता-मूल ताबीजी, साइन २४॥ इञ्च, सजिल्द गीता-मुल, विष्णुसहस्रनामसहित, सचिन और सशिल्द गीता-७॥४१० इञ्च साइजके दो पन्नों में सम्पूर्ण गीता-सूची (Gita-List )अनुमान २००० गीतात्रोंका परिचय श्रीश्रीविष्णुपुराण-हिन्दी-अनुवादसहित, आठ सुन्दर चित्र, एक तरफ श्लोक और उनके सामने ही अर्थ है, सारा २२४२९ आटपनी, पृष्ठ-संख्या १४८, मूल्य साधारण जिलद २॥), कपड़े રા) अध्यागबानाय सटीक, आउचित्रों से खुशोभित-एक तरफासो और उनके सामने ही अभ है, हालही में प्रकाशित हुआ है, जादी गई लेनवालीको दूसरा हरण छातक हरना पडेगा । म 11), मानद पना-पीनाप्रेस, गोरखपुर r- 4.

प्रेम-योग-सचिन, लेखक-श्रीवियोगी हरिजी, पृष्ठ १२०, बहुत मोटा एण्टिक कागज, मूल्य प्रजिल्द ११), सजिल्द . ॥) श्रीकृष्ण-विज्ञान-मर्थात् श्रीमद्भगवद्गीतांका मूलसहित हिन्दी-पद्या- नुवाद, गीताके श्लोकोंके ठीक सामने ही कवितामें अनुवाद छपा है। दो चित्र, पृष्ठ २७५, मोटा कागज, मू०), स. विनय-पत्रिका-सरल हिन्दी-भावार्थ-सहित,६चित्र, अनुवादक- श्रीहनुमानप्रसादजी पोद्दार, मू), सजिल्द भिगवतरत्न प्रह्लाद-३ रङ्गीन, ५ सादे चित्रोंसहिंत, पृष्ट ३४०, मोटे अक्षर, सुन्दर छपाई, मूल्य १) सजिल्द श्रीश्रीचैतन्य चरितावली (खण्ड)-सचिन, श्रीचैतन्यदेवकी बड़ी जीवनी | पृष्ट ३६० मू० ॥in), सजिल्द, श्रीश्रीचैतन्य-चरितावली ( खण्ड २.)--सचिन, अभी. छपी हैं। अवश्य देखें। पृष्ठ ४५०, मूल्य ३), सजिल्द श्रीमद्भागवतान्तर्गत एकादश स्कन्ध-संचित्र, सटीक, पृष्ट-४२० मूल्य केवल ) सनिल्द देवर्षि नारद-२ रंगीन, ३ सादे चित्रोंसहित, पृष्ठ २४० सुन्दर छपाई, मूल्य ), सजिल्द तत्त्व-चिन्तामणि भाग:-सचित्र, लेखक-श्रीजयदयालनी गोयन्दका, यह ग्रन्थ परम उपयोगी है। इसके मननसे धर्ममें श्रद्धा भगवान में प्रेम और विश्वास एवं नित्यके बर्तावमें सस्य. व्यवहार और सबसे प्रेम, अत्यन्त आनन्द एवं यान्तिकी- प्राप्ति होती है । पृष्ठ ३५०, मूल्य ॥३), सजिल्द तत्त्व-चिन्तामणि भाग २-सचिन, लोक और परलोकके सुख-साधनको राह बतानेवाले सुविचारपूर्ण सुन्दर-सुन्दर लेखोंका अति उत्तम संग्रह है।६०० से ऊपर पृष्ठकी पुस्तकका मूल्य प्रचारार्थ केवल ) रक्खा गया है । यह अभी छपी हैं। एक पुस्तक अवश्यं मैंगवावें । नैवेद्य-श्रीहनुमानप्रसादजी पोद्दारके २ लेख और ६ कविताओंका. सचित्र नया सुन्दर ग्रन्थ, पृ०.३१०,०), स.. in- श्रीज्ञानेश्वर चरित्र-दक्षिणा अत्यन्त प्रसिद्ध, सबसे अधिक प्रभाव * दुवारा छपनेपर मिल सकेगा पता-गीताप्रेस, गोरखपुर ... शाली मा, बीनाको गायिनी जीवनी और मनमोका गया । अबश्य पवित्र गुमन. विष्णुसहधानान-पटना हिन्दी साडिन, मामा भाग सामने ही उसापाया। निरव- पानी धिमा प्रनार विष्णुसका हो । भगवान नामक रहस्य भानन लिनदिनो मस्य) बन सका पता है। जानकार सति आगन्दाला है। श्रुनिभस्मारतीसरा-सासोको मालेगावाती, सास-खास सुतिगाका अर्थसहित संग्रा; प. पंजमें भूल भुतियाँ और उसके सामने पमें उनके अर्थ पसे गगे, मू० नुलसी दल-संन्यकत्रीहनुमानमाणी पोहार, इसमें छोटे-बड़, प्री-पप, आन्निनास्तिर, विद्वान्-गल, भक्त-झानी, गृहस्थी- त्यागी, कला और गाहिला-गेमी सयो हिगे कुछ-न-कुछ उन्नतिका मार्ग मिल सकता है। पृष्ठ २६३,राचिन्न, न.1),स० ॥2) शीनाश-चरिम-तं-हरिमझिारायण पं० करमण रामचन्द्र गांगारकर, भाषान्तरमार-१०शीतमा नासरण गर्दै। हिन्दी- माय मराकी लापनी जमीन ग, मूल्य ॥) दिनचर्या-(सचित्र ) उसनेमे सोनेत जाने बातोंका वर्णता नित्य-नाटके योग्य तोग और हित मूल्य ॥) विवेक-चूडामणि-(सानुनाद, मचिड़) पृ. २२१, ) स. 18) श्रीराम का परमहंस-(सचिव) इन प्रल एन जीवन और ज्ञानभरे उपदेशांका नंगह । ४. ५. मूल्य भारत-भारती-चिय, कवितामें पीस ...मू18), 1012) मात-पालक-गोविन्द, मोहन मादि वालपथाएँ।, भत्ता नारी-नियों में धार्मिक भाववढाने के लिहापयोगी कगार है।) भा-पश्चरज यह पाँच कथाभोंकी पुस्तक सद्गुरकाने लिये कामको ।) आदर्श भना-राजाशिविरन्तिदेव,अम्बरीप आदि कथाएँ, चिन,०) -चन्द्रिका-भगवान के प्यारे भनोंकी मोठी मीठी बाते, चित्र,०-) मना-सप्तररन-मात भोंकी मनोदर गाथा, चिन्न पृष्ट १०६ म01) भात मुस-टोट-पी-पुरूप सरके पड़ोयोग्य में समन्तिपूर्ण ग्राम) गौसा भायोग (गनिता लेखक--श्रीवियोगी हरिशी M परमार्थ-पावली-श्रीदयालजी गोयन्दका १३ कल्यागाकारी पत्रकार मारट, पृष्ट १४, एक्टिक हाराज, मलय गता-गीताप्रेम, गोरखपुर . " प माता-श्रीअरविन्दकी अंगरजी पुस्तक (Mother) का अनुवाद, मू० श्रुतिफो टेर-(सचित्र) लेखक-स्वामीजी श्रीभोलेबाबाजी, म. शानयोग-सन्त श्रीभवानीशंकरजी महाराजके ज्ञानयोगसम्बन्धी उपदेश, पृष्ठ १२५, मूल्य ॥ गजकी झाँको-लगभग ५० चित्र; भगवान् श्रीकृष्णचन्द्रकी लीला- भूगिक सौन्दर्य, माहात्म्य और विचित्रताओंका परिक्रमाके ढङ्गसे बड़ा सुन्दर वर्णन । पढ़नेले ब्रजयात्राका-सा आनन्द आता ह । भूख्म पत्र-पुष्प-सचित्र भावमय भजनोंकी पुस्तक, पृष्ठ ६६,०३), स०)। प्रबोध-सुधाकर-(सानुवाद, गचित्र) इसमें विषयभोगोंकी तुच्छता दिखाते हुए आत्मसिद्धिके उपाय बताये गये है, मूल्य ) गीता-निवन्धावली-गीताकी अनेक बातें समझनेके लिये उपयोगी है। यह गीता-परीक्षाकी मध्यमाकी पढ़ाई में रक्खी गयी है, मू)। नव-धन-ले०-श्रीहनुमानप्रसादजी पोदार, पृष्ठ ११२, मूल्य सचिन, पृ० ७२, मू० ) अपरोक्षानुभूति-मूल श्लोक भौर अर्थसहित सचिन मूल्य मनन-माला-यह भावुक मक्तोंके बड़े कामकी चीज है; मृ. ॥ चित्रकूटको झाँकी (२२ चित्र) ले-लाला सीतारामजी वी० ए. भजन-संग्रह प्रथम भाग-इसमें तुलसी, सूर, कवीरके भजन हैं न) अजन-संग्रह द्वितीय भाग-पृष्ठ १८६, मूल्य ) भजन-संग्रह तृतीय भाग-पृ० १६०, स्त्री भक्तोंके पद-संग्रह मूल्य अजन-संग्रह चतुर्थ भाग-गुसलमान भक्तों और कवियाँके पद-संग्रह ) श्रीधर्मप्रश्नोत्तरी-( नये संस्करणमें १० पृष्ठ बड़े हैं १) सच्चा सुख और उसकी प्राप्तिके उपाय -)॥ श्रीमद्भगवद्गीताके कुछ जानने योग्य विषय गीतोक्त सांख्ययोग और निष्काम कर्मयोग मनुस्मृति द्वितीय अध्याय अर्थसहित * संस्करण समाप्त हो गया। कुछ बढ़ाकर फिर छपेगा पता-गीताप्रेस, गोरखपुर ... 주주 - ... हनुमान-बाहुक-सचिा. हिन्नी- असहिल, गोन्यामा श्रीलसोबासकी की सुई हनुमानजी की प्राना है, मल्य -) आनन्दही लह-सनिन, -प्रीमनुमानप्रसादी पादार -) मनको वश करने उपाग-सचिन गीताका सुधम विषय-पालेट-साइन ईश्वर-मूल्य -)।' मुल), स. - श्रीहरिसंकीर्तनशुग). सम-नहारत-म्.-) राम्गीता मी): मीना लिाग समाज-सुधार 1) हरेरामभजन ) 'माग मटी ना सन्ध्योपासनहिन्दी • पानअलोगना श्रीप्रनमन्निप्राश) विधिमाहित ) भगवान् स्या:?-) याचार्य के सही बलिनैश्वदेवनिधि ) धर्ममा ? एक मन का अंक-) गो मा दिव्य गद " स्याग मगमन्यात) ati ) लोमनाप आधा जा विष्णुमानता }} | गजलगीता आभा पैला 4-1 -- गीताप्रेस, गोरखपुर } i । भाले सागर गौर सदानासम्बन्धी सचित्र धार्मिक मासिक पस, यागिक नग ४) ) कुछ विशेषांक रामायण -१२, निरंगे-करंगे: चिन्न सू० २३), स० ३३) अरावनामा : रंग-बिरंगे १ चित्र, मूल्य ॥४) स. १३) भना:-... पुरी गाइन्साहित, मु. ५), सजिल्द =) श्वगाया - वर्षकी पूरी फाइलसहित मू० राजिल . . :) श-) शिवाइन- ३३६, पित्र २७, मू० ३), सं० ३.) (इनो - नया साक-महसूल हमारा) न्यनस्थापक-कल्याण, गोरखपुर

चित्र
।
छोटे, बड़े, रंगीन और सादे धार्मिक चित्र
श्रीकृष्ण, श्रीराम, श्रीविष्य और श्रीशिवके दिव्य दर्शन ।
जिसको देखकर हमें भगवान् याद आचे, वह वस्तु हमारे लिये
संग्रहणीय है। किसी भी उपायसे हमें नगवान् सदा सरण होते रहे
तो हमारा धन्यभाग हो । भकों और भगवान के स्वरूप एवं उनकी
मधुर मोहिनी लीलाओंके सुन्दर दृश्य-चित्र हमारे सामने रहें तो उन्हें
देखकर थोड़ी देरके लिये हमारा मन भगवत्सरणमें लग जाता है और
हम सांसारिक पाप-तापोंको भूल जाते हैं।
ये सुन्दर चिन्न किसी अंशमें इस उद्देश्यको पूर्ण कर सकते हैं।
इनका संग्रहकर प्रेमसे जहाँ आपकी दृष्टि नित्य पड़ती हो, वहाँ घरमें,
बैठकमें और मन्दिरों में लगाइये एवं चित्रोंके बहाने भगवान्को यादकर
अपने मन-प्राणको प्रफुल्लित कीजिये । भगवान्की मोहिनी मूर्तिका
ध्यान कीजिये।
कागजका साइज १० इन्च चौड़ा, १५ इन लम्वा, सुनहरी
चित्रका ), रंगीन चित्रका मूल्य -), दोरंगके और सादे चित्रका
मूल्य )ul, यह छोटे ब्लाकोंसे ही वेल (वार्डर) लगाकर बड़े कागजों पर
छापे गये हैं।
कागजोंका साइन ॥४१० इञ्च, सुनहरीका मूल्य -), रंगीनका
मूल्य), सादेका ) मान।
इनके सिवा १८४२३, १५४२० और ५४७५ के बड़े और
छोटे चिन भी मिलते हैं
दूकानदार और धोक-खरीदारोंको कमीशन भी दिया जाता है।
चित्रोंकी सूची अलग मुफ्त मॅगवाइये।
.
पता-गीताप्रेस, गोरखपुर

सुन्दर, सचित्र कवितामय पुस्तकें ... .. विनय-पत्रिका-गोस्वामी श्रीतुलसीदासजीके ग्रन्थकी सरल हिन्दी- टीका, नवीन मंस्करण | इस बार पाटका संशोधन विशेष- रूपसे किया गया है। भावार्थमें अनेक आवश्यफ संशोधन करनेके अतिरिक्त कटिन स्थलोको समझनेके लिये परिशिष्टके ३७ पृष्ठ और जोड़ दिये गये हैं । ६ चित्र है, दाम १) सजिल्द १) श्रीकृष्ण-विज्ञान-अर्थात् श्रीमद्भगवद्गीताफा मूलसहित हिन्दी- पद्यानुवाद । दो चित्र, पृष्ठ २७५, मोटा कागज, मू० ॥) स. १) भक्त-भारती-७ चित्र, फवितामें ७ भक्तोंकी सरल, सुबोध कथाएँ, मू०)स. 12) श्रुतिकी टेर (सचित्र) लेखक-स्वामीजी श्रीभोलेबाबाजी, मू० ।) वेदान्त-छन्दापली (सचित्र) मू० ॥ मनन-माला (सचित्र) भावुक भक्तोंके फामकी चीज है, मु० ॥ भजन-संग्रह प्रथम भाग-इसमें तुलसीदारजी, सूरदासजी और कवीरजीके भजन है । म० क) दूसरा , -पृष्ठ १८९; मजके भक्तोंके भजन मू० =) तीसरा,-पृष्ठ १६०; स्त्री-भत्तोंके पदोका संग्रह ००) चौथा "-मुसलमान भत्तों और रुपियाँक पद- संग्रह । भू० 2) पाँचयाँ ,-(पत्र-पुष्प) उप रहा है। हनुमानयाहुक-सचिय, हिन्दी-अर्ध-सदित, गोस्वामी श्रीतुस्टमी- दासजीफी की हुई श्रीदनुमान्जीकी प्रार्थना है। ० ..'-)| यदा सूचीपत्र मुफ्त मगाइये। पता-गीताप्रेस, गोरखपुर । "

Mool Gosaie - Charit

Author
Venimadhav
Title
Mool Gosaie - Charit
File name
Mool Gosaie - Charit
Text
OCR done
Citation
1940
Published
2009/09
Publisher
Gorakhpur, Geeta Press
Language
Sanskrit
Pages
46
Library
Sanmati Library, Jaipur
Classification
Tulsidas - jivani
DLI number
345523
Barcode
99999990233861.00
Scanning centre
Banasthali University
Digital publisher
Digital Library Of India
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Copyright permitted
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Oe9WNYbZEqD
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