Adarsh Library, Jaipur
Satyangh Ki Bhomika
Front matter
No text on this page.
आत्मत्याग की भूमिका
[मनोविश्लेषणात्मक सामाजिक उपन्यास]
उपन्यासकार
भगवतीप्रसाद वाजपेयो
No text on this page.
पहने मिना पिलपिलाकर हम पही; फिर पानी मोहक भगिया के तेवर में दोनो कथै उचकाकर बोली-"क्या पहा, विवाह !" विस्मय के माप वह पद भी मन्द-मन्द मुस्करा रही थी। उसमें विनोद की मात्रा कम पी, उपहाम को अधिक । पायद वह मोचनी पी--"कितनी गंता से भरी बात है-तिनी बुद्धिमता में हीन !" रापेग वृष्ट नम हो गया। उसकी समझ में नहीं पा रहा या कि उनके प्रस्ताव में ऐमी कौन-मी बात है, जो प्रमिना लिए मनोरंजन का कारण बन गयी! सब अपने विचारों को बुछ मन्तुनित करके वह बोला-"हा-हा विवाह । सच पूछो तो अब हम लोगों के मामुम इस मिया अन्य कोई मार्ग नहीं है।" इतने में अमिता सहमा पलंग में उटपर पडी हो गयो । मारी को मलवटें टोर करती करती वद मिग टेचिन के मामने पई ए ग्टून पर बंटकर अपने विगरे हुए बालों पर कपी फेरने लगी। भव उगमन में भी पा रहा था-"यति स्पष्ट हो जाय, मही पन्छा है।" पर उमर मौन ने राग का यं विचलित पर दिया। पह चौला-"वई पाश्चर्य की बात है कि इतने गम्भीर प्रश्न का तुम इम नौति उपहास कर रही हो।" ममिता ने पो रग दी। स्टूल से सटकर वह रागरे मम्मूग जागही दुई। प्रारमीपता के माप उमने राग मनका यही हुए गोपी मटों को विधिवत मंवाले हुए रहा-"विवाह कोनो में मनुष्य को स्वतन्त्र मत्ता के लिए यु के गमान चाक मममती है।
६ प्रात्मत्याग की भूमिका और तुम्हें मालूम होना चाहिये कि मरना मैं अभी नहीं चाहती।" अमिता की इस बात को सुनकर राकेश विस्मय में पड़ गया। गम्भीरता के साथ उसने उत्तर दिया---'पर वास्तव में सत्य इसके विप- रीत है। दो प्रेमी हृदय, विवाह के सूत्र में बंधकर ही, वास्तव में जीवन का अमृत पान करते हैं।" अमिता के नयनों में सहसा एक चमक उत्पन्न हो गयी। उसने जैसे चौंकते हुए उत्तर दिया-"दो प्रेमी हृदय !" और कथन के साथ उसने राकेश के गले में अपनी दोनों वाहों का हार डाल दिया। तव राकेश उसके इस निमन्त्रण की उपेक्षा न कर सका । उसने अमिता के कम्पित अधरों पर प्यार-चिह्न अंकित कर दिया । फलतः अमिता ने कुछ ऐसा संकेत कर दिया कि-! अव राकेश एक सभ्य मानव के स्तर पर लोट पाया था। अनेक प्रकार की कल्पनाएँ उसे बार-बार घेर लेती थीं। यौन-तृप्ति सम्बन्धी कई पुस्तकें पढ़ चुका था। पर जो अनुभव उसे आज हुअा था, उसके सम्मुख जैसे तुच्छ हो गया था ! प्राणों का ऐसा मधुर स्पन्दन ! तो सचमुच जीवन वड़ा प्यारा होता है ! उसका सारा व्यतीत अव फीका पड़ गया था। और भविष्य की तो वह कल्पना ही कर सकता था। लेकिन ये क्षण दोनों के बीच एक पुल के समान थे । वह उस पुल को पार कर चुका है, जो अब कभी नहीं लौटेगा । यह माना कि वह क्षणिक था, किन्तु था कितना उन्मद ! मान कि वह एक स्वप्न था, किन्तु फिर जीवन में यथार्थ क्या है ! कुछ ही मिनटों के बाद वह धरती पर आ गया। उसे ध्यान हो पाया, यदि अमिता उठकर चली गयी तो उसका प्रश्न अधूरा ही रह जायेगा। तभी उसने अमिता का हाथ पकड़ कर उसे अपनी पोर इस भांति प्रारमत्याग को भूमिका खींच लिया कि वह अपनी देहलता का सन्तुलन न सम्हाल सकी मोर उमके वक्ष पर लुढ़क गयो । पर फिर तुरन्त उठने की चेष्ठा करती हुई बोली-"हदो, तुम बड़े दुष्ट निकले !" राकेश को उसका यह कपन बड़ा प्यारा लगा । वह अपना उद्देश्य ही भूल गया । वह अपने प्रति सोचने लगा-क्या वह सदा ऐसा ही दुष्ट रहा है ? और क्या दुष्टता भी प्यार की एक संशा है ? या ऐसा कुछ है कि यदि भूखे व्यक्ति को प्रोति-भोज का निमंत्रण मिल जाय तो यह खाते समय परिणाम का ध्यान अवश्य रखेगा ? चिन्ता छोड़कर साना क्या उसके लिए स्वाभविक नहीं ? लेकिन फिर उसके मन मे याया-यह सब तो ठीक है । लेकिन हर भूप की एक सीमा होती है। इसो चिन्तन में राकेश जब शीशे के सामने पहा हुमा टाई बाँध रहा था, तो उसके मन में पाया कि प्रस्थान के पूर्व विवाह की स्वीकृति ले लेना प्रावश्यक है । अपनी इप्टदेवी को घर में स्थापित किये बिना अब वह रहेगा कैसे ? किन्तु दाई बांधकर जब यह अमिता की भोर घूम पड़ा, तो उसे यह देखकर आश्चर्य हुआ कि वह सो गयी है । मो. इस निद्रा मे कितनी शान्ति है. कितना मधुर-मधुर सोस्य ! तरल किन्तु स्निग्ध ! वह चुपचाप उसी सोफे पर बैठकर सिगरेट पीने लगा। अब वह सोच रहा था इसी भांति यदि वह भी सो गया होता, तो? प्रात काल उठने पर कोई नौकर उसे देख लेता, तो? एक मविवा- हित तरुणी के गायन-कम मे किसी अपरिचित का सोना कुछ मयं रखता तभी उसने सोचा-इस प्रकार का संकट मोल लेना ठीक नहीं। कही सेठ जी को पता चल गया तो वै गोली मार देंगे ! -~-परन्तु वह इस विवाह के पक्ष में नहीं है। ऐसी दशा में मैं क्या प्रात्मत्याग की भूमिका हूँ! अब तक मैं नारी के सम्पर्क से दूर था, किन्तु अव"अब यह म्पर्क तो जीवन का प्रश्न बन गया है। सिंह के मुंह में जब खून लग ता है तो वह सामने पड़े पशु को कभी छोड़ता है ! --तो अव इस प्रश्न का समाधान किये बिना गति नहीं है । कभी- भी कानों में कुछ विचित्र स्वर गूंज उठते हैं। दो वयस्क कुमारियां मन्द स्वर में बात करती हुई फुसफुसा रही हैं तो फिर कहती क्यों नहीं... मैं नहीं, तू ही क्यों न कह दे कि जरा ठहर जाइये, मुझे श्रीमान् से कुछ कहना है । "मैं क्यों कहूँ ? तवियत तेरी है, मिलन का स्वाद तू चखना चाहती है और आगे मुझे कर रही है। - और। --तो आज आप चले ही जायेंगे, रुकेंगे नहीं ! .."क्यों, ऐसी क्या बात है ? .. 'बात कुछ नहीं, दीदी आपको पूछ रही थीं।""पूछ रही थीं ? क्या कह रही थीं ?..'कह रही थी कि अगर वे मेरे घर आने में संकोच करते हैं, तो फिर.. और। प्रोः ! आप!.. क्यों ? मुझे नहीं आना चाहिए था? 'नहीं-नहीं मेरा यह मतलब नहीं। बात यह है कि ऐसे समय-जब ''वे...! प्रोः अच्छा तो मैं जाता हूँ। अब मैं तभी पाऊँगा जव शर्मा जी यहाँ उपस्थित होंगे। तो फिर कब ? मेरा मतलब है कि शाम को यही कोई सात वजे वे दफ्तर से लौटते हैं । "मगर मुझको तो साड़े छै की गाड़ी पकड़नी है। तो फिर तो फिर...! सोचता हूँ एक भोली नारी एकाएक परिणाम सोचे बिना जव समर्पिता वन वैठती है तो उसके सामने एक अकल्पित भविष्य होता है। लेकिन मेरा ऐसा विश्वास नहीं है। तन और मन का समर्पण परि- णाम की कल्पना किये बिना कभी सम्भव नहीं होता । मिलन के बाद वह उससे विलग होने की कल्पना मात्र से विचलित हो उठती है। जन्म- भर के समस्त वन्धन अपना अस्तित्व शिथिल कर बैठते हैं; माता-पिता, मात्मत्याग को भूमिका ६ भाई-बहन, सखो-महेली प्रादि मारे नाते अपना मोह-पास शिपिल कर देते हैं। अब यह मो समर्पिता हो चुकी है । मेरा वियोग इसे भी चन न लने देगा। मिगरेट ममानि पर मा गई । रावेग ने राखदानी में रहे को पप दिया फिर उठ कर वह अमिता के ममीप जाकर, क्षण भर अपलक नेत्रों से उपके प्रतिम सौन्दर्य का पान करता रहा । फिर उसके मस्तक पर हाय रख कर उसे जगाने की चेष्टा की। अमिता ने प्रति खोल दो। परनी वही बढी मादक निदियारी प्रमों से अत्यन्त स्नेह-दृष्टि में देवा । इस मांति देखती रही, जमे मुंह में न वह कर रेवल सपनों की भाषा से कहना चाहती है । राकेश के हृदय में निराशा का भवमाद मिट गया। वह उल्लखित म्वर में बोला--"तो अब मैं जा रहा हूँ। अमिता ने सहज ढंग मे उत्तर दिया--"जायोगे! लेकिन चाय तो पीसो।" कथन के माय ही वह उठ कर बैठ गई और एक अंगड़ाई लेकर अपने वस्त्रों को ठीक करने लगी। तभी गरेमा बोला-~-चाय ? क्या बात करती हो। रात्रि के बारह बजने वाले हैं । तुम्हारे कमरे में मुझे देखकर लोगों को पारणा क्या होगी, इसका भी कुछ ध्यान है !" अमिता के अधर कुटिल मुम्कान से खिल उठे। वह बोली-~"तुम बड़े नादान हो राकेश । तुम्हारे इस भोलेपन ने ही नो मुझे टग लिया है । प्रान तक सब मेरा माह्वान करते रहे और मैं तुम्हें । सच पूछो तो सदा मुझे ही निमन्त्रण प्राप्त होते रहे हैं, किन्तु मान तुम्हें मैने माम- पित किया यह तुम क्यों नहीं सममो?" राकेश के मन प्राण पर विश्वास की एक. गरिमा छा गई। वह वोला-"तुम्हारा समेत न सममता तो मैं तुम्हारे सम्मुख इतना दिवश कसे बनता । प्रतिदान की भाशा ने ही तो मेरे हृदय में तुम्हारे प्रति ।
आत्मत्याग की भूमिका नाग्नि प्रज्वलित की थी। जब मुझे विश्वास हो गया कि तुम मुझसे च्चा प्रेम करती हो तो मैंने भी विवाह का प्रस्ताव कर दिया ।" राकेश के कथन को बीच में ही काट कर अमिता बोली-"फिर तुम वही राग अलापने लगे। तुम मुझे समझने की चेष्टा क्यों नहीं करते ? मैं पूछती हूँ, प्रेम करने के लिए क्या विवाह आवश्यक है ? हम दोनों एक दूसरे से प्रेम करते रहें, क्या इतना काफ़ी नहीं ?" राकेश बोला-"प्रेम की अन्तिम परिणति है मिलन ।" तपाक से वह बोली-"यही मेरा भी मत है।" एकाएक राकेश को न जाने कैसा लगा । उसे प्रतीत हुआ कि यह नारी उस वर्ग के तरुणों से मिलती-जुलती है, जो भोली-भाली, निश्छल लड़कियों को प्रेम के भ्रम-जाल में फंसा कर उनका रस लूटने के पश्चात उन्हें तड़पने के लिए छोड़ देते हैं ! उसे अपने ऊपर क्रोध हो पाया। वह बोला-"यह मिलन है या वासना की पूर्ति ? सच पूछो तो यह पाप है। अमिता फिर खिलखिला उठी। वह सोफे पर बैठ गई और बोली- "क्या बात कही है राकेश कि तवियत खुश हो गई। यह वासना की तृप्ति है, अतः पाप है । और विवाह के बाद यही पुण्य हो जायगा ! एक ही वस्तु समय के अन्तर से पाप होकर भी पुण्य हो जाती है ! तुम पाप और पुण्य के झगड़े में उलझ कर वेकार का सरदर्द मत मोल लो राकेश।" राकेश गम्भीरता से बोला-"मैं ऐसा कुछ नहीं सोचता । मैं तो तुमसे केवल एक प्रश्न का उत्तर चाहता हूं। मैं सिर्फ इतना जानना चाहता हूँ कि तुम मुझ से प्रेम करती हो या नहीं।" अमिता ने भी अवसरानुसार गम्भीर बन कर कहा-"करती हूँ ! योड़ा-बहुत नहीं, परिपूर्ण हृदय और सम्पूर्ण जीवन के लिए करती हूं। और इस पावन घड़ी के बाद तो मन से, तन से, आत्मा से मात्मत्याग को भूमिका अवर्णनीय स्तर-स्तर, पतं-पतं से सच पूछो, तो प्राणों से अधिक प्यार करती हूँ।" राकेश ने झट से कहा--"मेरी समझ में नही माता कि फिर विवाह से इनकार क्यों ?" अमिता यह समझ गई कि वह उन व्यक्तियों से भिन्न है जिनको माज तक वह अपने संकेतों से उठाती-वंठाती रही। प्रतः उसने स्पष्ट करना ही उचित समभा। वह बोली-"प्रेम और विवाह दो पृथक्-पृषक वस्तुएँ हैं। इनको मलग ही क्यो नहीं रहने देते राकेदा?" एक नि:श्वास के साथ राकेश ने अपने दोनों हाय मस्तक से लगा लिए; फिर क्षण भर के बाद उसने कहा---"तो तुमने मुझे यहाँ बुलाया ही क्यों ? विवाह नही करना था तो प्रेम का नाटक यह क्यों रचा ? मेरे जीवन में विष घोल कर तुम्हें क्या प्राप्त हुमा ?" पमिता बोली-"प्रत्येक वस्तु जिससे हम प्रेम करते हैं उससे विवाह तो नहीं कर लेते। मैं कल्पना भी नहीं कर सकती कि तुम इस बात को भी नहीं समझोगे ?" राकेश के मुख पर पीडा एवं पश्चात्ताप के भाव उदित हो गये। वह उठकर खड़ा हो गया । बन्द द्वार की भोर संकेत करके बोला- "मग्छी बात है । मैं जाता हूँ जब तुम विवाह करने का निर्णय करना, तो मुझे बुला लेना ।" तत्काल प्रमिता ने कॉलवेल का बटन दबा दिया। बोली-"लगता है, इस समय तुम्हारी मन.स्थिति ठीक नही है । इस विषय पर हम लोग बाद में बातें करेंगे। माशा है कल शाम को क्लब में मिलोगे।" तभी द्वार खुला मौर एक सेविका ने प्रवेश किया। अमिता ने उसे प्रादेश दिया कि वह राकेश को बाहर पहुंचा दे। राकेश ने एक बार घूमकर अमिता की मोर देखा मोर विना कुछ कहे वह कमरे से बाहर निकल गया।
१२ आत्मत्याग की भूमिका आगे-मागे चलती हुई वृद्ध सेविका ने मन्द स्वर में कहा-"साहब हमारा इनाम ?" प्रात्मा को थोड़ा प्राघात-सा लगता प्रतीत हुआ। राकेश की तत्कालिक वुद्धि बोली-यह है अमिता का वास्तविक स्वरूप ! इसको मालूम है कि वह यहां किस हेतु प्राया था। इनाम मांगने के ढंग से इस बात का भी पता चलता है कि यह इसके लिये प्रथम अवसर नहीं। उसने प्रमुख द्वार पर पहुँचकर जेब में हाथ डाला और दस रुपये का नोट निकाल कर सेविका के हाथ में रख दिया। राकेश को अपने घर लोटने की इच्छा ही न हुई । आज जीवन में प्रथम बार उसे किसी नारी का इस सीमा तक सान्निध्य प्राप्त हुआ था। एक योर वह अपने मन में एक अभूतपूर्व आह्लाद का अनुभव कर रहा था, दूसरी ओर समाज को परम्परा के विरुद्ध किये गये आचरण का पाश्चाताप सक्रिय होकर उसके मानस को उद्वेलित करने लगा था। पाप करने के पूर्व प्रात्मा सदैव हमको चेतावनी देती है। राकेश को दु.प तो इसी बात का था कि परिणाम जानते हुए भी वह वासना के इतने प्रभाव में कैसे पा गया। एक पोर उसका मन कहता था-तुमने पाप किया है । तुम जानते थे कि नारी से सम्पर्क स्थापित करने का अर्थ ही वासना के महल में प्रवेश करना है। इसी स्थल पर दूसरी ओर उसकी बुद्धि परिस्थिति को सम्हालते हुए कह उठी- तुम्हारा ध्येय केवल देह-रस की प्राप्ति न था। तुम तो विवाह का प्राश्वासन प्राप्त करने के अन्तर ही अमिता के शयन-नाक्ष में गये थे। उसने विवाह करने से इनकार कर दिया तो इस में तुम्हारा क्या दोप?
मात्मत्याग की भूमिका किन्तु उमको प्रात्मा उमको दोष देती रही, बारम्बार वह एक धिक्कार जैसी प्रताड़ना का अनुभव करता रहा । राकेश के पास उसको अपनी प्रात्मा द्वारा लगाए गये लांछन का कोई उत्तर न पा ( उमको पारमा कहती थी-तुम को विवेक में काम लेना था । तुमको मालूम था कि विवाह के पूर्व, उम नागे में भी सम्बन्ध स्थापित करना पाप होता है जो कलानर में तुम्हारी पत्नी बनने वाली होती है। अपने संस्कारगत विचारों में खोया हुपा राकेश मड़क के मध्य में जा पहुंचा था । एकाएक कार का जोरदार हान मुन कर उमको तन्द्रा टूट गई और बपने की चेष्टा में हो वह कार की चपेट में पा गया। भाग्य की बात कि कार चालक सतर्क था। अन्यथा समाचार-पत्रों में प्रकाशित होने वाली दुर्घटनामों में वृद्धि हो जाती। किन्तु यह स्थिति थोड़ी देर ही स्थिर रहमको । उसके उपरान्त इस प्राव स्मिक प्राधान को यह सहन सका और गिरते ही प्रत हो गया। हाइवर ने तुरन कार रोक दी 1 उसके साथ कार के स्वामी नाला हरचरणसिंह भी बाहर मा गये। राकेश को अचेत देख कर उन्होंने ड्राइवर की महायता से उसे उठा कर कार की पिछली 'मोट पर लिटा दिया और हाइवर को आदेश दिया कि वह तुरन्त अस्पताल को चले। अभी कार कुछ ही दूर गयी होगी कि हवा के झकोरों से राजेश की चेतना लोट पाई। पाने को इस प्रकार कार में देख कर उसे बड़ा पाश्चर्य हुमा । पलकें उठा कर उमने एक पल के लिए सहयात्री को ध्यान से देखा और उसे पहचानने का प्रयास किया। जब वह पहचानने में असमर्थ रहा तो उसने विस्मित वाणी में पूछा--"मैं इस कार मे मा कैसे गया ? कृपया वतताइये माप कौन हैं और हम लोग कहां जा रहे हैं ?" कपन के साथ ही उसने अनुभव किया कि उसको दायों बोली और दोनों घुटनो में दर्द हो रहा है। वह उठकर बैठ गया था। 1 आत्मत्याग की भूमिका १४ साथ ही उसका ध्यान अपने सूट की ओर चला गया, जिस पर यत्र-तत्र धूल लग गई थी। लाला हरचरणसिंह अपने पंजावी लहजे में बोले-.-"तुम बीच सड़क पर थे। कार से टक्कर हो गई और तुम बेहोश हो गये। खैर, कोई बात नहीं, अभी अस्पताल में मरहम पट्टी करवा देते हैं। ज्यादा तकलीफ तो नहीं है बादशाहो ?" निश्चिन्तता से उसने कह दिया--"अरे नहीं, मामूली-सी खरोंच आ गयी है । अस्पताल चलने की ऐसी कोई आवश्यकता भी नहीं है। अच्छा हो आप मुझे यहीं उतार दें। मैं घर चला जाऊंगा।" . परन्तु लाला हरचरणसिंह ने उसके कन्धे पर हाथ रख कर, थप- थपाते हुए कहा-"दवा कर लेना जरूरी होता है। लापरवाही अच्छी नहीं होती वादशाहो।" तभी कार अस्पताल के बड़े फाटक के अन्दर मुड़ गई। प्राथमिक उपचार के बाद जव राकेश लाला जी के साथ कार के समीप पहुंचा, तो उसके मन में एक सहज संकोच उत्पन्न हो गया। उसे मन-ही-मन अपने ऊपर क्रोध पा रहा था, जिसके काण यह काण्ड हुआ। उसका विचार था कि उसको असावधानी के कारण ही यह दुर्घटना हुई जिसके फलस्वरूप केवल उसे ही नहीं, एक अन्य भद्र पुरुप को भी मुफ्त में परेशान होना पड़ा। अत: उसने लाला जी से कह दिया-"मुझे बड़ा खेद हो रहा है कि मेरे कारण आपको कष्ट उठाना पड़ा । मैंने तो पहले ही कहा था कि कोई खास चोट नहीं लगी है।" कार का दरवाजा खोलते हुए लाला जी बोले-"लेकिन सेंक जरूर लेना। अगर सूजन आ गयी तो सबेरे ददं बढ़ जायगा । चलो, मैं तुमको घर पहुंचा दूं वादशाहो।" राकेश ने इस विषय को समाप्त करने की इच्छा से कहा-"प्रब पाप और कष्ट न करें। मैं रिक्शे से चला जाऊंगा।" ।
प्रात्मत्याग की भूमिका कुछ हंसते हुए लालाजी बोले-"इम तरह काम नहीं चलेगा। सोचता हूँ मैं तुम्हारे पिताजी से क्षमा मांग कर लोटूं। तुम्हारे घर वाले भी तो परेशान होगे वादशाहो।" प्रय राकेश के मन में माया-पायी मुसीबत । ये तो हाप धोकर पीछे पड गये। लालाजी कथन के साथ ही कार में बैठ गये थे। तब राकेश ने झट से कह दिया-"मैं यहाँ भकेला ही रहता हूँ। पिताजी तथा परिवार के अन्य सदस्य गांव में रहते हैं । इसलिए"" उसके अपूर्ण वाक्य को बीच में काटकर लालाजी बोले-"तब तुम मेरे पर चलो। तुम्हारे घर में जब कोई है नहीं, तो तुम्हारी देख-भाल कौन करेगा? चलो तकल्लुफ़ की जरूरत नहीं है, बादशाहो।" राकेश के मन में पाया कि यह तो वही हुमा-गये नमाज बक्शाने और रोजे गले पड़े। कुछ चलते हुए उसने कहा-"गांव का एक नौकर रहता है। वह अंगीठो मुलगा देगा मौर में सेक लूगा । माप चिन्ता न करें।" किन्तु लालाजी न माने । उन्होंने उसका हाय पकड़ कर उसे कुछ घसीटते हुए कहा-"तुम वच्चे हो । प्रभी कुछ नहीं समझ सकोगे। लेकिन मैं अपने फर्ज को भूल जाऊं, ऐसा कैसे हो सकता है । तुमको चलना ही पडेगा । फिर अब तो हम लोगो को जान-पहिचान भी हो गयी है। साथ चलते चलते रास्ते मे जो मुलाकातें हो जाती हैं वे कभी- कभी गहरी दोस्ती में बदल जाती हैं बादशाहो।" राकेश को एकाएक कुछ न सूझा तो उसने टालने की इच्छा से कह दिया-"इस समय तो माप क्षमा करें। मैं दिन में किसी समय पापकी सेवा में मा जाऊंगा।" लालाजी कुछ गम्भीर हो गये पौर वोले 1-"अभी तो तुम मेरा नाम तक नहीं जानते, फिर मकान कैसे मालूम होगा? मुझमे बहानेवाजी नहीं चलेगी बादशाहो।"
No text on this page.
খালেন দী মুনিরা "मेरा नाम बने तो राकेश मिश्र है, लेकिन मार मुझे 'यादगाहो हो कह सरते हैं !" लालाजी ने बगल में बैठे हुए राकेश के हाय को अपने हायों में लेकर दबा दिया और कहा-"मालून होता है तुमको दुरा लग गया। क्या करूं, अपनी ऐनो कुछ प्राइन ही पड़ गयी है। वैसे मैंने जानम् कर ऐसा नहीं कहा था । पर अब से मैं तुमको तुम्हारे नाम से पुकारूंगा। तो भव मार कर दो दादगाहो।" दर्यों का प्रयास एक प्रकार से मनुष्य की प्रकृति का एक अंग बन जाता है । लाद चेष्टा और प्रपल करने पर भी मनुष्य उमे नहीं छोड़ पाता। उपर्युक्त वार में भी लाला हरचरण ने अन्त में जब अपने तकिया- कलाम का उच्चारण कर दिया तो राका अपने मन का समस्त विषाद भून कर प्रसन्नता से हंस पड़ा। ने इस प्रकार से हंसते देखकर लालाजी को तुरन्त अपनी दुर्बलता का स्मरण हो पाया। वे समझ गये, हो सकता है, उन्होंने फिर अपना तकिया-वलाम अवश्य ही वाक्य के अन्त में जोड़ दिया है। मतः पश्चाताप करने की मुद्रा में उन्होंने हाय उठाकर दोनों कान पकड़ लिये। बोले-"--- ! फिर भूल हो गयी। वैसे मैं दादा करता हूँ कि धीरे-धीरे मैं अपनी इस प्रारत को छोड़ दूंगा । लेकिन भई, नाम तो अपूरा परिचय होता है । तुम बसे क्या हो वादगाहो?" राकेगा फिर मुस्कराने लगा और माताजी ने तुरन्त ही उसकी उस मुस्कान का अयं ममन लिया तथा वार्तालाप को भंग न होने देने की दृष्टि से उन्होंने मद अपनी जीभ दांतों के बीच ने दवा कर पुनः अपने कान पकट लिये। इस ममय तक राकेग अपनी स्वामादिक मनःस्थिति में मा पुका या । उने स्वयं ही लासाडी के विचित्र व्यक्तित्व में एक अद्भुत मार-
१८
पण का भान हो रहा था ।
विनम्रता से वह बोला-"क्या मैं और क्या मेरा परिचय ! नाम
तो बता हो चुका हूं रहा काम करने का प्रश्न, तो यों समझ लीजिये कि
मैं एक वेकार आदमी हूं। वैसे वेकार भी नहीं कहा जा सकता, क्योंकि
और कुछ न सही पर वाप-दादों की कमाई को ठिकाने तो लगा ही
रहा हूँ !"
1
लालाजी बुजुर्गाने ढंग से वोले-"यह तो कुछ अच्छी बात नहीं
है । कुछ-न-कुछ तो अवश्य करना चाहिये। वैसे तुम्हारे पिताजी क्या
करते हैं बादशाहो ?"
राकेश ने वार्तालाप में रस लेते हुए कह दिया-"वे भी कुछ नहीं
करते । हाँ, दिन में एक बार घोड़े पर चढ़ कर अपने खेतों का चक्कर
अवश्य लगा पाते हैं।"
लालाजी बोले-"तो यों कहो कि खेती होती
करे यहाँ।
पुराने जमींदार मालूम होते हो वादशाहो।"
. प्रात्मत्याग की भूमिका १६ तो उसके मन में अमिता का चित्र उभर माया। किन्तु लालाजी के साथ उसको जो वार्ता हुई, उसको कुछ प्रतिक्रिया भी उन पर हुये बिना न रह सकी। विवाह और प्रेम की समस्या के साथ-साथ जीवन-यापन का प्रश्न भी अपने भाप में निहित अनेक प्रकार के संकटो और रव- धानों के साथ उठ खड़ा हुमा । परिणाम यह हुमा कि वह अपने भीतर एक नयी उलझन का अनुभव करने लगा। सोफे पर बैठते समय उसके घुटने मे तीव्र पीड़ा हुई तो वह समझा कि यह पर सूज जाने का ही प्रभाव है। एक बार मन में पाया कि अच्छा हुआ जो तालाजी उसे बलपूर्वक ले पाये, अन्यथा घर जाने पर तो वह प्रातः होते-न-होते . एक प्रकार से अपंग ही बन गया होता। इसके अतिरिक्त वहाँ का एकान्त तो मोर भी प्राण पीडक वन जाता । एक तो रात्रि मे नीद नहीं आती, दूसरे अमिता की स्मृति प्रा-मा कर सताने लगती है। और यहाँ कम-से-कम लालाजी के साहचर्य में समय तो कट हो जायगा। सभी उसे ध्यान पाया-अमिता ने कल संध्या समय क्लव में भेंट करने के लिये कहा है। अब वह सोच रहा था-याने वाले कल में ही उसके भविष्य का समस्त मुख दिपा है। एक प्रकार से राकेन को विश्वास था कि प्रमिना उससे विवाह अवश्य करेगी। क्योकि आधुनिका होने पर भी वह भारतीय सभ्यता मे पली है। और उसके लिये परम्परागत संस्कारो को छोडना दुष्कर होगा । यों तो अमिता का कथन उसे याद था-भारतीय नारी केवल एक व्यक्ति से प्रेम करती है मौर वह होता है उसका पति । अचानक लालाजी का कठोर स्वर सुन उसके विचारों को माला सम्पूर्ण होने के पूर्व ही टूट गई। लालाजी उच्च स्वर में गरजते हुये मादेश दे रहे थे-"साना बाद- में खाया जायगा। पहले एक अंगीठी में कुछ कोयले सुलगा सार ।
२० अात्मत्याग को भूमिका - साथ में रुई या कोई कपड़ा, जिससे रोका जा सके।" राकेश ने लक्ष्य किया कि बूढ़ा नौकर उत्तर में मुंह से कुछ न कहा केवल सर हिला कर, प्रादेश का पालन करने के लिये कमरे के बाहर चला गया। उच्च स्वर एवं कठोर वाणी के कारण सम्भवतः लालाजी ने उसके मुख पर छायी हुई भावनाओं की घटा से उसके मन के अन्दर उत्पन्न हुई प्रतिक्रिया को भी पढ़ लिया। वे वोले-'मैं देखता हूँ, तुम हैरान हो रहे हो। अरे मैंने इसलिये चिल्लाकर कहा कि यह बलवन्त गूंगा और बहरा है । वैसे मैं हर एक से चीखकर नहीं बोलता, वादशाहो । शंका-समाधान के पश्चात् लालाजी ने राकेश को बोलने का अवसर न देकर झट से एक प्रश्न ठोंक दिया-"अगर खाना खाये देर हुई हो, तो नारता मंगाया जाय। वैसे मैंने अभी खाना नहीं खाया है। यों भी मैं देर से ही खाता हूं। जैसा तुम कहो, वैसा इन्तजाम किया जाय । आज तुम मेरे मेहमान हो। और मेरी मान्यता है कि खातिरदारी आने वाले की इच्छानुसार होनी चाहिये। क्या ख्याल है तुम्हारा, यादगाहो ?" राकेश ने कुछ संकोच का अनुभव किया। उसके मन में पाया कि यह व्यक्ति अत्यन्त निश्छल और सरल प्रकृति का है। प्रात्मीयता एवं शिष्टाचार तो जैसे इसके रक्त में घुला हुआ है। तभी उसे ध्यान पाया कि बाघ प्रावरण के द्वारा मनुष्य को पहचानना कठिन है। फिर यह तो प्रथम भेट है। प्रब वह अपनी स्थिति से उसकी तुलना करने लगा। उसकी बुद्धि ने कहा-वह स्वयं भी बाह्याडम्बर से अपनी वास्तविक स्थिति छिपाने में सफल हो रहा है। फिर उसे अमिता का स्मरण पा गया । इसने सोचा-वह उसको भी समनने में भूल कर बैठा है। तनी लालाजी बोल पड़े-"मालूम होता है, तुम तकल्लुफ में पड़ प्रात्मत्याग को भूमिका गये हो । चलो, पहले एक पाला चाप हो जाप । फिर बाद में गाना भी पता जायगा । इमे तुम अपना ही घर समझो, और पाराम से बैठो, बादशाहो ।" लालाजी के उपर्युक्त कयन ने राकेश के पीड़ित मर्म को छू दिया । सहमा उसके नेत्र भाद्र हो उठे। निराश मन के निविड़ एकान्त में माशा की एक किरण कोष गयी। उसे प्रतीत हुआ कि उसकी समस्त समस्याओं का समाधान लाला जी के द्वारा हो जायेगा ।। इसी चिन्तन के बीच उसने कह दिया--"पाप ठहरे उमर में बड़े, में तो एक लड़के के घरावर हूँ । इसलिए मापका आग्रह टाला नहीं जा सकता। चाय तो चल ही जायगी।" लालाजी के मोटे-मोटे होठो पर मुगकान थिरक उठी। वे बी-- "बम, अपने को ऐसे ही प्रादमी पगन्द हैं जो मुझे मपना मम में । परामा समझने वाले तो संकड़ों मिलते हैं, बादशाहो !" राकेश तपाक से बोल उठा--"हाँ, इसका पुछ अनुभव तो मुझे नी है । इतनी थोड़ी-सी उमर मे ही मैंने कई उतार-चढ़ाव देखें हैं।" कयन के साथ ही उसके कण्ठ में एक नि.श्वास निकाला और वाना- वरण में लीन हो गया। व्यवहार कुमाल गाना हरचरणसिंह से उसकी मनोदशा धितीन रही। वे समझ गये कि यह व्यक्ति किसो चिन्ता से पीडित जान पडता इसके पूर्व कि वे कुछ उत्तर देते, दहकने हुए अंगारो से भरी अंगीठी लिये बूढा बलवन्त परदा हटाते हुए कमरे में पा पहुंचा । और उसने पहले राकेा के पैर के समीप ही अंगीठी रख दी, फिर उसने अपने कन्ये से उतारकर एक चुली लुंगी उसको और बढ़ा दी। लुंगी देखते राकेश का ध्यान अपने मूट को पोर चला गया । उसके मन में प्राया-इसके अतिरिक्त अन्य कोई दूसरा मूट मेरे पास नहीं है । इसकी, सुरक्षा तो करनी ही होगी। राड़ा की धून लग गयी है, . Great आत्मत्याग की भूमिका साफ़ हो जायेगी । वास्तव में यह वलवन्त बड़ा बुद्धिमान और व्यव- र कुशल है अन्यथा अगर इसकी क्रीज़ खराव हो जाती तो क्या पहन र वह क्लव जाता ? एक समस्या उत्पन्न हो जाती ? उसने कोट उतारना प्रारम्भ किया तो उसकी दृष्टि अनायास ही ऊपर उठ गयी । उसने लक्ष्य किया कि वलवन्त लालाजी से कुछ सांके तिक भापा में वार्ता कर रहा है और लाला जी का मुख चिन्ता एवं व्यथा की घनघोर घटा से आवृत हो गया है । तभी लाला जी वोल पड़े-~-"तुम बैठो, मैं अभी आता हूँ, वाद- शाहो।" कवन के साथ ही वे उठकर चले गये । अव राकेश के मन में आश्चर्य के साथ सन्देह का भी समन्वय हो गया । एक बार जिसके मन में सन्देह उत्पन्न हो जाता है, उसे प्रत्येक स्थल पर, प्रत्येक गति में और प्रत्येक कृत्य के अन्दर रहस्य-ही-रहस्य दृष्टि- गोचर होता है। प्रायः अपनी निजी भावनात्रों के अनुरूप ही वस्तुस्थिति का अर्थ समझ में आता है राकेश के मन में आया कि अगर वलवन्त बोल सकता, तो उसके माध्यम से लाला जी के रहस्य का पता लगाया जा सकता था। पैर के घुटनों में में से कुछ लाभ हुआ तो उसने अनुभव किया कि अव पीड़ा कम हो गयी। इसी संदर्भ में उसे अपने गांव के मास्टर साहब का ध्यान हो पाया जिनका कथन था, हमें सदैव सतर्क रहना चाहिये । प्रत्येक समय और परिस्थिति में स्थिर चित्त और शान्त रह कर वस्तु. स्थिति का लान उठाने का प्रयास करना हमारा धर्म है उसने निश्चय किया कि वह भी इस नयी मित्रता से लाभ उठाने का भरसक प्रयत्न करेमा । वह इन चिन्तन में इतना लिप्त था कि ।
मात्मत्याग को भूमिका २३ समय का ध्यान ही न रहा । इतने में एकाएक नारी कंठ का एक चौकार वायुमण्डल में में गूंज गया। राकेश चौंक उठा और तपाक से उठकर सड़ा हो गया। इसके पहले कि वह अपनी जिज्ञासा शान्त कर पाता, उसने देगा कि गूंगा-बहरा बलवन्त उठकर द्वार की पोर भाग रहा है । उमे इस प्रकार भागते देख कर राकेश के मन में प्रश्न उठा-यह वास्तव में बहरा है, या इसमें गद-विगेप को सुनने की क्षमता भी है । वह अतिथि की मर्यादा का बोध त्याग कर अनजाने ही बलवन्त का अनुगरण करने के लिए उठकर खड़ा हो गया । अभी वह द्वार के समीप भी न पहुंचा था कि उसकी दृष्टि ड्राइग रूम के फ़र्श पर विछी हुई कालीन से उठने धुएं पर जा पडी । बलवन्त के एकाएक उठकर भागने में अंगीठी उलट गयी थी। पर यह देप कर भी वह रुका नहीं, वरन् बत पन्त के पीछे-पीछे कमरे से बाहर निकल कर उसके पीछे-पीछे गलि. यारा, दालान और सीढी पार कर के ऊपर जा पहुंचा। एक बन्द दरवाजे के सम्मुन पहुंच कर वलवन्त एक पल के लिये एका । फिर उसने विक्षिप्त की भांति दोनों हाथों से उन बन्द द्वार पर प्रहार करना प्रारम्भ कर दिया। तब राकेना भी संज्ञाहीन, यंत्रचालित प्लास्टिक के खिलौने की भांति, उसके पीछे सहा हो गया । इतने पर भी द्वार न खुला और बलवन्त धीरे-धीरे वन्द द्वार से सरक कर फर्श पर गिर पड़ा। उसे इस प्रकार गिरता देखकर राकेश की तत्का- लिक बुद्धि ने उसे बता दिया कि यह व्यक्ति भावना के उद्रेक मोर अपनी विवमता के कारण सज्ञाहीन हो गया है । राकेग ने तुरन्त मागे बढ़कर अचेत हो रहे बलवन्त को सम्हालने की चेष्टा की । तभी एकाएक द्वार खुल गया मोर लाला जी बाहर निकल माये । राकेश कुछ इस तरह से बैठा पा कि कमरे का रहस्य उसको दृष्टि से सिन सका । उसने देख लिया कि सामने की के सहारे एक पलंग विद्या है पोर दुग्ध-धवल शंया पर कोई सो २४ आत्मत्याग की भूमिका । इसे गुप्त - जिसके सिरहाने एक युवती बैठी हुई है । वह उसका मुख न देख सका, — क्योंकि राकेश की दृष्टि की दिशा में उसकी पीठ होती थी। तभी चौंकते हुए लाला जी बोले-"तुम यहाँ कैसे आ गये? इसे पड़ा रहने दो। अभी थोड़ी देर में होश आ जायगा। चलो, नीचे चलें । यह तो रोज की पिट्टन है, बादशाहो।" पायन के साथ ही लाला जी राकेश का हाथ पकड़ कर उसे साथ ले चले। फिर सीढ़ी से उतरते हुए लाला जी एकाएक रुक गये और पीछे पाते हुए राकेश की अोर वूमकर बोले-~-"बस यही मेरे जीवन का अभिसाप है । पर इसे कोई नहीं जानता । मैं आशा करता हूँ कि तुम रक्सोगे । तुम मेरे मित्र हो और मित्र की रक्षा करना, उसकी मान-मर्यादा पर आंच न आने देना, तुम्हारा धर्म होना चाहिये । मान- वता के नाते मैं तुमसे हाथ जोड़ कर प्रार्थना करता हूँ । मेरे ख्याल से इसी में तुम्हारी भलाई भी है । अगर बलवन्त को पता चल गया कि तुम उसके पीछे ऊपर तक चले गये थे और इन रहस्य के सम्बन्ध में तुम्हें कुछ मालूम है, तो वह एक हिंस्र पशु की भांति तुम्हारा खून कर देगा!" राकेग ने देखा कि यह प्रथम अवसर है, जब लाला जी ने वाक्य के अन्त में 'यादगाग्रो' का प्रयोग नहीं किया। वह समझ गया कि लाला जी उत्तेगनावश अपने तकिया-सलाम को भूल गये हैं। अब उसके मन में लाला जी के स्वर और कथित वाक्य के अर्थ को लेकर एक भयंकर प्रतिनिया उत्पन्न हो गयी । बों साधारगा परिस्थिति में उसने इस घटना की ओर अधिक ध्यान न दिया होता । किन्तु लाला जी के कथन में उसे चुनौती की गन्ध जान पड़ी । उसका अहम् जाग उठा और उसे मैदान में टट जाने के लिये विवश करने लगा। राकोया ने अपने असंतुलित विचारों का विरोध कर संयम के साथ सधे हुए स्वर में कहा--"लगता है लाला जी, आप मुझे धमकी दे मानवाग की भूमिका २५ नाना हरचरणहि के जीवन में यह प्रयन अबसर या, अब कोई व्यनि उनके सम्मुन्द इस प्रकार बड़े होकर प्रस्तुतर की पृष्ठता कर रहा था। उन्हें इस दान का गर्व या कि उन्होंने मदव भरनी वाक- पट्टटा में ही सबको परास्त किया है । इन कारण राकंग का प्रश्न सुन कर वे किचित् पदरा गरें । एकाएक उनी मन में न पाया कि वे बसा दत्तर दें। उन्हें कुछ ऐसा की मान दृमा कि उनका प्रउिसी सामान्य व्यक्ति नहीं है । टर प्रतिना तो है ही, परिस्थिति का मानना करने की क्षमता नी है। उन्हें इन दान का भी दौर हुमा कि यह व्यवहार-कुगल होने के साप दाटु नी है। माने ही बनाये जाल में स्वतः पर जाने की मागंका में वे सनम हो गई। फिर मतर्कता के साय वे पुनः मानी तानाविक मुद्रा में मा गरें । नाय ही अपने क्यन को गम्भीरता को तारा कल के लिनन्द स्दर में इस पड़े और बोले-"तुम मुझे मुनत उनन रहे हो राकंग । मन तो वान्तर में वृन्हें इस बात का स्वभाव बताया था । दग रहते दह किनी भी मादनों को दूसरी मंजिन पर नहीं जाने देना। इनीजिए तो इन पर में उनके प्रसार कोई दूसरा नौकर नहीं टिकता। दाम्डर में ने इनीलिए तुमने यह बात कही थी जिसमें नुन उनके नाम तो कन में-कम ऐनी कुछ बात न कहो, मिन उसे शक हो डाय। किती प्रकार की धमरी देने का इरादा देरा कनई न था ।दुरा नगा हो तो मैं मान्न मांग नेता हूँ बादशाहो !" हालांकि राम साना जी का वास्तविक अनिवारजननमा या ! फिलु चिर तलालीन परिस्थिति देन कर उम इस पर्चा ने विक स्मारना चदित न ममन्च । मनमोचा इन ममद अपनी निगमा को मान रदन में ही भलाई है, दिपनमा इन मिति में सकि हमें स्त्री में निकामना है ! तुशार के प्रात पर एक बुटिल मुश्कान की छाया मुद्रित हो उठा।
आत्मत्याग की भूमिका - अतः वह वोला-"आप ठीक कहते हैं लाला जी । यों भी मैं एक शान्तिप्रिय व्यक्ति हूँ। दूसरों के मामले में टांग अड़ाने की मेरी आदत भी नहीं है।" परस्पर का तनाव अव शान्त हो चुका था। दोनों जब नीचे ड्रॉइंग रूम में पहुंचे तो कमरे में घुवा भरा हुआ था और कालीन काफ़ी मात्रा में जल चुका था। राकेश ने आगे बढ़कर लाला जी से कहा--"अरे अभी अनर्थ हो जाता ! पाइये, जल्दी से इस कालीन को उठाकर बाहर कर लें।" अब कालीन का एक छोर लाला ने पकड़ा और दूसरा राकेश ने । कालीन बाहर लॉन पर फेंक गार, उसने उत्रित अवसर देख लाला जी पर एक तीव्र प्रहार कर दिया। बोला-"अगर थोड़ी देर और हम लोग न पाते तो निश्चय ही भयानक अग्निकाण्ड हो जाता ! बड़ी कुगल हुई वा श्रापका यह रहस्य खुले विना न रहता । उस दशा में आप किससे कहते कि दूसरी मंजिल पर जाना वर्जित है, अग्निशामक दल से या उन सैकड़ों तमारावीनों से, जो अग्नि की ध्वंसलीला देखने के लिए बहुधा घटनास्थल पर एकत्र हो जाते हैं।" लाला जी के मन में स्वतः ही कुछ ऐसे विचार उठ रहे थे। राकेश के कथन के अन्दर छिपे हुए व्यंग की ओर उन्होंने ध्यान न दिया, अपितु उनके मन में उस के प्रति कृतज्ञता के भावों ने जन्म ले लिया। एक प्रकार से उन्हें लगा कि इस समय तो इसी व्यक्ति के कारण उनके रहस्य का पर्दा ढका रह सका है। भावना के उद्रेक में उन्होंने आगे बढ़कर राकेश को अपने कंठ से लगा लिया { अब प्रयु विगलित स्वर में बोले-"जीते रहो बेटा। तुमने वास्तव में मुझे मरने से बचा लिया । अगर मेरा यह राज खुल कर सहकों पर फैल जाता, तो मैं किसी को मुंह दिखाने के काबिल न रहता । अब मैं कल ही वकील साहब को बुला कर नयी वसीयत तैयार गराऊँगा 1 तुम देखोगे मैं अहनान फरामोश नहीं हूँ, बादशाहो।" .
२७ भारमरयाग की यूनिता प्रद राकम के मन में पाया-वो क्या वास्तव में उसने लाला जी पर विजय प्राप्त कर ली ! पल्लू वनोदत की बात नुन कर उसने मोबा-अगर लाला जी अपने माध्यम में मा विवाह अमिता के साय करा दें, तो वह वनी- यत की अपेक्षा नहीं अधिक श्रेयस्कर होगा। पल्लू रिसता और शिप्याचार के नाते उसने कह दिया- "मैंने मारा ऐसा कोई सकार नहीं किया लाला जी। यह तो मेरा नंद या। रहा वनीपत का प्रदन, नो पार यो सनम लीजिये कि चार दा नि.म्दार्य और निःशुल्क होता है। वैसे भी मेरी प्रार्थना है कि किमी दूसरे का अधिकार छीन कर, उमरी निधि मेरी झोली में न डालें। मुझे तो आपका भागीर्वाद ही चाहिये।" अब लाना जी बोले-"तुम सचमुच एक नेकदिल प्रादमी हो । वैने भी वो दुध मुझे करना है, अपने मुंह से अभी कहना नहीं चाहिये था। अच्छा पनी, अन्दर ही बैठे। मेरे तो दिल की धड़कन बढ़ गयीं वादमाहीं।" लाला जी ने मम्यूरा रात्रि राकेग से गले मारने में ही बिता दी। दिन कर के यक नदि राकेश को पहले नो अनुभव नहीं हुआ, किन्तु ज्यों-ज्यों रात्रि का अन्तिम प्रहर बीनने लगा तो उसके मन में वारम्बार अनिता के निटातन सानिम्न में विताये हुए क्षणों में जीवन-मोन की प्रपन अनुभूति के मुन प्रकरण और स्कुरण स्पन्दन और रस-बोय मरस अाते रहे । वास्तविकता नो यह थी कि उसका शरीर ही यहां विद्यमान था, हृदर तो पत्र भी कल्पना-कुन्ज में अमिता की देहलता का रसास्वादन कर रहा था। उन ममय चमकी मानसिक स्थिति ऐसी न पी कि वह लाला जी से वाक्युद्ध कर सकता। अतः अपनी मानसिक विहार स्ना को नोई विना परी मन से, उनकी बातें सुनने का बहाना स्थिर बनाये रखने के लिए बीच-बीच केवल हुंकारी भरता सरा २८ आत्मत्याग की भूमिका उघर लाला जी के लिए, उसका व्यवहार, एक आदर्श श्रोता की भांति था । वे खूब रस ले-लेकर बोल रहे थे। अन्त में एक ऐसी स्थिति भी आ गयो, जव प्रातः का हलका बुधला प्रकाश, पूर्व की खिड़की के शीनों से छन कर, कमरे में चुपचाप आ धुसा और सोफे पर लेटा हुया राकेश अपनी इच्छा के विरुद्ध अनजाने ही सो गया। राकेश का स्वयं अपना इतिहास भी कम रहस्यमय न था। अतीत के असीम गहवर में छिपे हुए व्यतीत को जान सकने की क्षमता नये लोगों में नहीं होती । नयी जगह और नये लोगों के बीच में आकर कोई भी व्यक्ति सत्य और वास्तविकता पर पर्दा डाल कर नाटक के पात्रों की भांति वेशभूपा बदल कर कुछ-का-कुछ वन सकता है । इस तथ्य को जीवन में सफलता प्राप्त करने का मूल मंत्र मानने वाला राकेश जब लंगड़ाते-लंगड़ाते हाईस्कूल हुआ तो उसने अपना गाँव और जानी-पहचानी जगह से दूर जाकर अपना नया संसार वसाने का निश्चय किया। वैसे तो गांव तथा कस्बे में, जहाँ कहीं पढ़ने जाता था, कभी उसे किनी वस्तु का अभाव न रहता था। किन्तु जो वस्तु उसे सबसे अधिक मात्म-पीड़क और अपमानजनक मालूम होती थी, वह थी उसके पिता को जीविका । उत्तके वयोवृद्ध पिता पण्डित जतगविहारी मित्र सीधे- सादे, निन्छल प्रकृति के, कुछ-कुछ रूढ़िवादी व्यक्ति थे । माता के प्रभाव से बचपन में ही उनका मुकाव भगवान के पूजा-पाठ की पोर विशेष था । और बड़े होने पर तो उसी को उन्होंने अपनी जीविका का साधन भी बना लिया था जब तक उनकी पत्नी जीवित रहीं; तभी तक वे घर में आते थे। किन्तु जब राकेश चौहद वर्ष का हुआ तो उसकी .
গননা কী পুলি माता का देहान हो गया ।पौर वन, सो दिन में पण्डित जन्त विहारी नै मन्दिर में ही राडार लिया। मन्दिर के चदाद मादि को पार से ही अब वे प्राना और राकेश का नररा-पोषण करते थे। उन्होंने कभी राकेम की रचियों के मन्नत्य में कुछ नहीं सोचा । सामध्यं के अनुसार उन्होंने उनकी प्रत्येक इच्दा सो सभूति की और कभी किसी वस्तु का प्रभाव उसे नहीं प्रतीत होने दिया इतने पर भी उनको अपनी मामा पो । राज्य के विचारानुसार सामान्य रूप से कोई प्रभाव न होता एक दात थी; पर मुविधापी तपा । जामतापों की प्रचुरता दूपरी । पाले स्कूलो दिनों में किंग जब किमो धनी-विद्याओं को समान र पाना, तो उसके मन में बड़ा क्षोभ और दुःख होता । एक दिन बाद वह धनी वर्ग के सड़कों का अनुकरण करने की पुन में टैरोलीन का मूट पहन कर स्कूल पहुंधा तो सड़को ने उसे घेर लिया। प्रामा के बहाने व भांति-भांति के व्यंग करने मो । उसके पन को ठेम तो मी, सिन्तु पएने मान के अनुसार उसमें उसने अपमान का अनुभव नहीं किया । लेकिन पर स्कूल के संस्थापक के मुथुत्र ने कह दिया- पुजारी जी ने चढ़ाव में पाया होगा, तो उसका हृदय चौकार कर उदा। ने भी उन पपने पिता का धनी न होना बहुत प्रयाता पा इस बात पाने पूर्ण रूप में जान था कि ग्राज दो मामाजिक परस्या में पुजारी का कोई उच्च स्थान प्राप्त नहीं है। इस बात को लेकर सुने कई भार मान दिला से चर्चा भी की थी। पतः पुजारी का पुत्र कह कर पर सके सहपारियों ने उसका उपहास किया, तो उसे अपने पिता का स्मरण भाग। उनका कहना था कि कोई व्यक्ति दद्धि या निर्णन नहीं होता, यह मत्र तो उसकी परिस्थितियां बना देती हैं। और बम, उमो दिन राकेा के मन में पाला-परिस्पिति और ३० प्रात्मत्याग की भूमिका अन्त में छोड़गा। एक दिन वह अपने पिता को समझा-बुझा कर कानपुर आ पहुंचा, जहां उसने चेप्टा करके एक मिल में नौकरी प्राप्त कर ली तथा जान-बूझकर, टीमटाम व दिखावे का आडम्बरपुरी जीवन प्रारम्भ कर दिया । वह अपने वेतन में से एक पैसा भी अपने पिता को भेजना दूर रहा वरन् उन्हीं से सौ-पत्रास रुपये प्रतिमास नियमित रूप से मंगवा लेता , उसने धीरे-धीरे समाज के धनीवर्ग में उठना-बैठना प्रारम्भ कर दिया। अपने खान-पान में वह आवश्यकता से अधिक एक पैसा भी नहीं व्यय करता था। मिल में काम पर जाने के लायक कपड़ों के अतिरिक्त वह बड़ी कठिनाई से दो सूट सिला सका था । किन्तु उसने अपने मिल के हेड-क्लर्क के घर पर जाकर अंग्रेजी बोलने का अभ्यास कर लिया और उन्हीं से उसने साथ-साथ सभ्य-समाज के शिण्टाचार, रहन-सहन, उठने-बैठने, खाने-पीने आदि के विपय में, ज्ञान प्राप्त किया। फिर जब उसे विश्वास हो गया कि उसके किसी व्यवहार में कहीं भी कोई त्रुटि नहीं रह गयी है, तब वह एक दिन अपने गुरू हेड-क्लर्क के आदेशानुसार क्लव में जाकर उसका सदस्य बन गया। अब उसने दो प्रकार का जीवन व्यतीत करना आरम्भ कर दिया। दिन में तो वह एक साधारण क्लर्क का जीवन व्यतीत करता, पर संध्या से अर्धरात्रि तक धनिक वर्ग के एक चिरंजीव का! उसके असाधारण व्यक्तित्य ने बहुतेरे व्यक्तियों का ध्यान अपनी ओर आकृष्ट किया । पुरुषों के अतिरिक्त उच्छसल एवं स्वच्छन्द लल- नाएँ उसकी रूप-सज्जा के नम में पड़ कर, उसके समक्ष प्रणयाभिला- पिणी वन गर्यो । किन्तु राकेश उस वर्ग के मनोविज्ञान से अपरिचित था, अतएव वह उनके संकेतों को समझ न सका । मन में रूप-यौवन के उपभोग की लिप्मा होते हुए भी वह उस नारी-वृन्द का खिलौना बनने से बच गया, जिसको आधुनिका कहते हैं और अनेक प्ररगयी होना जिनके प्रारमरयाग को भूमिका अन्तर्गत बाज का फैगन समझा जाता है । उसका मन तो बहुत उमा- हित रहता था, किन्तु उसके अन्दर भरी हुई मभ्यता व संस्कृति का मकुम वकने के पहले ही उसके पग रोक लेना। दिन बीत रहे थे। राकेश के मन में शान्ति न थी। हर ममय उसे एक दुचिन्ता बनी रहती । वह अनुभव कर रहा था कि दूसरों को मुलावा देना सामान है, किन्तु मनुष्य अपने को कैसे बहका सकता है । परदे के पौधे दिपा हुमा कठोर सत्य अपने वास्तविक रूप में उसके समक्ष चोचीसों घंटे निराबरण बड़ा अट्टहास करता रहता था। यह अपनी वास्तविक स्थिति को फभी भूल नहीं पाता था। यह जानता पा कि यह सब दिखावा क्षणिक है । इस स्थिति से पर उठने पर उसे स्था- यित्व प्रदान का साधन टूढने मौर जुटाने में उमका प्रत्येक क्षण व्यतीत होता था। तभी उपके जीवन में भमिता ने प्रवेश किया। ग्रीष्मावकाम के उपरान्त वह कारमीर से वापस पायी थी। जैसे ही उसके पडोम में रहने वाली फिरोसा से उसकी भेंट हुई, वैसे ही छुट्टियों की चर्चा के साथ- साथ मानन्दात्मक अनुभवो की गठरी हो जैसे पुल गयी। अमिता बोली-~-"भई मजा आ गया। काशमीर वास्तव में पृथ्वी का स्वर्ग है । मुझे तो ऐसा लगता है कि किसी नारी ने ही अपने मनु- । भव मे माघार पर यह बात कही होगी। काश तुम चलती तो तुम्हे पता चलता कि असली सुख कैसा होता है !" फिरोजा के नेत्रों में एक चमक-सी उत्पन्न हो गई। एक लालसा के साय वह बोली--"तब तो वहाँ तेरे बड़े ठाठ रहे होंगे !" भमिता बोली-"यों कोई खास मठ तो क्या रहे, लेकिन यहाँ से तो सब प्रन्या-ही-अच्छा था। यहां तो वही ढाक के तीन पात हैं- -- आत्मत्याग की भूमिका - हाँ जीवन-रसना का स्वाद ही बदल गया, जबकि पिताजी साथ थे। र इस तरह तू नहीं समझेगी । वहाँ हर प्रान्त के, देश-विदेश के, काले, रे, नाटे, लम्बे, हर प्रकार के नमूने देखने को मिलते थे।" फिरोजा बोली-"वस रहने दे ! मेरे ऊपर कुछ दया कर । मेरा तो इतना सुनकर ही बदन ऐंठा पा रहा है !" कथन के साथ ही वह अमिता से लिपट गई। अमिता ने भी उसे 'आलिंगन में भर लिया। दोनों कुछ क्षण तक युग-युग के प्यासे प्रेमियों की भांति एक-दूसरे को प्यार करती रहीं। फिर अमिता ने उसे अलग करके कहा -"वहां तू होती तो बड़ा आनन्द रहता।" कहती-कहती वह थोड़ी रुकी और कान के पास मुंह ले जाकर बोली-"एक दूसरे के सहारे हम जिसे चाहते उसे बंदरिया बना डालते !" फिरोजा ने नाटकीय ढंग से दुःख का प्रदर्शन करते हुए हाथ उठा कर गा दिया--- ये न थी हमारी किस्मत कि विसाले यार होता, गर और जीते रहते, ये ही इन्तजार होता।" अमिता हंस पड़ी और बोली-"अपना कुछ हाल तो वता। तूने कितने शिफार मारे? दीपू को तो ठिकाने लगा ही दिया होगा ?" फिरोजा तपास से बोली-"श्योर ! पर वह बेचारा तो एकदम खरगोश निकला । वैसे आजकल एक शेर आया हुआ है। किसी के हाथ ही नहीं लगाने देता । एकदम संन्यासी समझो।" अमिता ने गम्भीरता के साथ अपने दोनों होंठ दवा कर स्वीकारोकि के रूप में सिर हिलाया और कहा-"शेर का शिकार बड़ा खतरना होता है ! यह किती चिड़ीमार के बस का रोग नहीं। खैर, देखू तुम्हारे संन्यासी को भी ! मैने वहतेरे महात्मानों को तलवे चटा हि फिरोजा ने किचित् व्यंग्यात्मक मुद्रा बना कर कहा-"ऐसे
मात्मत्याग की भूमिका
कहाँ को तीसमार सौ है ! मेरा तो सरल है जो करे :
गलने से रही । अपना-सा मुह लेकर भाग खड़ी होलो।"
अमिता बोली-"तू मब मेरे मन में माना
को सिकार का कोई नियम भी मानून है ? पहरे पाप डाले,
फिर मचान बांधना होगा। बाद में कहीं हारा देकर
में अगर समय भधिक लगता है, तो मानन्दमनम:!"
फिरोजा ने लिपिस्टिक से रंगे हुए मान होकर
कर पपना मन प्रकट किया।
किन्तु ममिता उम मोर ध्यान न देकर निकाल र
समझाती रही।
तब फिरोजा बोली-~"ठीक है, मात्र माना हो ।
जी तो रोज पाते हैं।"
इस भांति संध्या का काम पिर से दोनों
३४ नात्मत्यांग की भूमिका रागोग पूर्ण मनोयोग से मेल रहा था। उसके मन में आज एक विशेष उल्लास था। अब तक वह पचास रुपये जीत चुका था। तभी उसे ध्यान पाया कि अगर पला में उसके भाग्य ने साप दिया होता तो उसकी जेब में कम-से-कम दस-पांन हजार की रकम अवश्य होती। अब उस पर एफ उन्माद-सा छा गया था। वह आपत्तिजनक कॉल देने लगता और भाग्य प्रत्येक वार उसके गले में विजयश्री डाल देता। उसी समय फिरोजा ने पाकर उसके पार्टनर से कहा-"मिस्टर राजू, आपको रत्नाजी बुला रही हैं । वे बाहर लॉन में खड़ी हैं।" राजू के लिए रत्ना का नाम जादू का असर रखता था । वे उसकी पूजा कारते थे और इसीलिए उनकी गणना, उसकी कृपा-कटाक्ष के लिए अपना जीवन उत्सर्ग करने वाले पाहीदों में होती थी। उस समय पेल में उन्हें ररा का अनुभव हो रहा था। विजय का लोभ भी काम न था। अतः यकायक उसकी स्थिति बड़ी दयनीय हो गयी। सभी फिरोजा ने उनके हाथ से पते ले लिये और कहा-"आपकी जगह मैं गेल रही हूँ। पाप मिलकर तुरन्त आइये । बेचारी बड़ी दुखी मालूम हो रही हैं।" इतना सुनते ही राजू महाराय अपना सन्तुलन खो बैठे और लपक- पार लॉन की पोर भाग खड़े हुए। रामेश ने इस घोर विशेष ध्यान न दिया। वह एक सिद्धहस्त जिलाती की भांति रोलता रहा। यहां तक कि फिरोज़ा का स्थान अमिता ने गहण कर लिया तो उस ओर भी उसका ध्यान नहीं गया। फिर गुछ ऐसा हुआ कि अधेड़ मिस्टर वेलान की कुर्सी पर, उन्हीं के साग, मिसेज देसाई बैठ गयीं। कुछ अन्य लपियां भी चारों ओर से मेर पारीहो गई। पदसते हुए वातावरण को देखकर राकेश को तनिक प्राश्नयं हुमा, लेकिन उस मोर उसने अधिक ध्यान नहीं दिया, क्योंकि ऐसा तो अन्य देयुलों पर नित्य ही होता था। वह अपना ध्यान पत्तों से बकने नहीं .
भारमत्याग की भूमिका ३५ देना चाहता था। वह जानता था कि एकाग्रता भंग होते है। पामा पसट जायगा । तभी पत्ते चाटती हुई अमिना बोली-"पाप बहुत अच्छा खेलते राकेश ने माप उठाकर प्रमिता की मोर देपा । उमे प्रतीत हुपा कि वह स्वप्न देख रहा है । उसके मन में पाया-~यह तो साक्षात् उर्वशी है। पहले कभी इमे नही देखा; शायद माज ही पायी है। ममिता के पड्यन्त्र के अनुसार फिरोज़ा बोल उठी-"वाकई बहुत मच्छा खेलते हैं।" तब एक सम्मिलित स्वर गूंज उठा-"वाकई खूब खेलते हैं ।" राकेश का हृदय एक.मकयनीय गर्व से फूल उठा। यह निश्चिन्त होकर खेलने लगा। परन्तु अब उसके ध्यान में अमिता का अमित सौन्दर्य और उसकी बड़ी-बडी कजरारी पाखें घूम रही थी। वह फिर मी जोत रहा था। उसे क्या मालूम था कि यह सब किमी पड्यन्त्र के विधानानुसार हो रहा है। इधर अन्य लहकिया, बीच-बीच में, राकेश को तारीफो का पुल धांध रही थीं। उधर अमिता कभी-कभी उसकेपर को भी अपने पर से दवा देती थी। राकेश जब कभी भी उसकी पोर दृष्टि उठाकर देखता, तो वह मुसकरा देती। सव राकेश की हद्गति थम जाती। उमकी सामो का उतार-चढाव प्रमहीन हो जाता । भमिता के रूप ने उसे प्रसाधारण रूप से प्रभावित कर दिया था। - उन दिन उसने बहुत सोच-विचार कर अपने को संवारा था । पाज यह बटकोले और भडकीले वस्त्रो के स्थान पर सादे मोर गुरुचिपूर्ण कपड़े पहने थी और ऊँचा, घोंसलानुमा केशविन्याम के स्थान पर उसी पीठ पर नागिन-ती दो चोटियां लहरा रही थी। उसका मनुमान या कि कृतिम मौन्दर्य के जाल से राकेग महक कर निकल भा प्रात्मत्याग की भूमिका स्वाभाविक सौन्दर्य उसे अवश्य प्रभावित करेगा। उसने इस स्थिति का पूर्ण अध्ययन किया। जव उसे निश्चय हो गया कि वह उचित प्रभाव डालने में सफल हो गयी है, तो उसने अपनी वेणी में गूंथी हुई गुलाब की कली निकाली और मसल कर मिसेज देसाई की ओर फेंक दी। यह एक गुप्त संकेत था। तभी फिरोजा बोल पड़ी-"अब दो- चार हाथ फ्लग के भी हो जायें, तो कितना अच्छा हो ! हम लोग . उसमें भी मिस्टर राकेश का रोल देखने को उत्सुक हैं।" इतने में सभी लड़कियां चिल्ला उठी.-"हम भी खेलेंगे। मेरे भी पत्ते बांट दो।" कथन के साथ ही इधर-उधर से सबने कुर्सी खींच ली। तभी अमिता ताश टेवुल पर पटककर बोली-~~-'"पलश के लायक मेरे पास पैसे नहीं हैं । तुम्हारी तरह मैं अमीर नहीं हूँ।" पलश का नाम सुन कर राकेश के मन में भी इस प्रकार की प्रति- शिया उत्पन्न हुई थी। वह परिस्थिति का समाधान नहीं कर पा रहा था। एक बार उसके मन में पाया कि वह उठ कर चल दे। किन्तु तभी अमिता के कान ने उसके बिखर कर टूटते हुए साहस को सहारा दिया। वह सुपचाप स्थिति के बदलते हुए स्वरूप को देखने लगा। अमिता को इस प्रकार के पलच के सदस्यों की प्राथिक स्थिति का शान न था । फिरोजा ने जब बताया था कि वह केवल विज रोलता है और एकाध पाला माफी पीता है, तभी यह समझ गई थी कि राकेश' को जेव कितनी बारी है। अपने कथन से उत्पन्न प्रतिक्रिया का अध्ययन करते ही वह समझ गयी कि इस सम्बन्ध में उसका अनुमान ठीक है । तब वह बोली-"मैं इसी शर्त पर खेल सकती हूँ कि सीमा तय कर ली जाय ।" अब सभी एक स्वर में बोल पड़ीं-"मंजूर है।" .अमिता की योजना के अनुरूप सब कार्य चल रहा था। फिर ताश - मात्मत्याग को भूमिका चाटे गये और राकेश के मागे नोटों का ढेर लगना प्रारम्भ हो गया। इस मांति राकेदा के संवेदनशील हृदय में अनजाने ही अमिता के प्रति कृतज्ञता भर गई । ज्यों-ज्यों वह जीतता, नोटों की री को अपने सम्मुस खींचता, नत्र उसके मन में माता-काश, इसका सहयोग प्राप्त हो सके तो एक दिन मेरी भी गृह-दशा बदल सकती है । उम समय राकेश के मन में तनिक-मा-भी भ्रम नहीं उत्पन्न इमा कि वह बलि का बकरा है जिसे सिला-पिला कर मोटा बनाया जा फिर प्रतिदिन ऐसा होने लगा। अमिता उसकी संवर्धक बन गयी पौर वह उसके पाकर्षण में खो गया । इधर उसका बैंक बैलेन्स पढ़ने लगा, उधर कॉफी के प्याले का स्थान मुरा के प्यालों ने छीन लिया । अमिता ने धीरे से एकान्त में उमसे वार्ता प्रारम्भ कर दी। फिर पनिष्टता बढ़ने लगी। जब अमिता को विश्वास हो गया कि उसके जाल को तोड़ने की शक्ति राकेश में नहीं है तो अपना अगला कदम उठाया और उसी दिन राकेश एक लम्बी रकम हार गया । हारे जुपारी की मनःस्थिति पायल गेर के समान होती है। उमने पंसा समाप्त होने पर सेल बन्द करके उठना पाहा, तो ममिता ने मागे बढ़कर रोक दिया। उसे ढाढस बंधाया मोर गेलने के लिए ऋण दिया। परन्तु पय तो उसे हारना था। योजनानुसार हारने को वारी मा गयी थी प्रमिता प्रोत्साहन के साथ रुपया देती रही और वह हारता रहा। दूसरे दिन राकेश ने बैंक से रुपया लाकर ममिता का ऋण चुका दिया । किन्तु पब उसको स्थिति सेलने लायक न थी। पर प्रमिता का पड्यंत्र प्रधूरा न था। उसने रुपया देकर उमे येलने पर विवश कर फिर हारा तो उसकी हिम्मत टूट गयी ! भवसर पाकर अमिता उमे अपने साथ बाहर लॉन प दिया यह ३८ आत्मत्याग की भूमिका और उस दिन उसने नारी के अमोघ अस्त्र का प्रयोग कर दिया। उसके को अपने हाथ में डाल कर वह नाटकीय ढंग से भाव- पूर्ण स्वर में वोली-"हार-जीत तो खेल में होती ही है । इसमें दुली होने की क्या बात है ? मैं तुम्हें दुखी नहीं देख सकती।" राकेश को प्रतीत हुआ कि उसका स्वप्न साकार हो जायगा । उसने तो पहले ही दिन से उसको अपने हृदय में बैठा दिया था। भावना के उद्रेक में वह मौन बना रहा । तभी उसके नेत्रों में अपनी आंख डाल कर वह बोली-"तुम नहीं जानते राकेश, मैं तुम्हारी पूजा करती हूँ। तुम मेरे आराध्य देव हो । मेरे मन का सन्तुलन नष्ट हो गया है। यहाँ क्लब में, तुम्हारे सान्निध्य में बीते हुए क्षणों को स्मरण करती हुई मैं अगली भेंट का स्वप्न देखती रहती हूँ । मेरा मन संवेदनशील और चिन्ताकुल हो गया है। कभी मुझे भव होता है कि तुम मुझे पसन्द करते भी या नहीं ! कभी ध्यान आता है कि मेरा साधारण रूप-रंग भला क्या भायेगा ! परन्तु मुझे अपने प्रेम पर विश्वास है। तुम्हारे मिलने का प्रश्न उठे, तो मैं अपने को हारकर भी सुखी रहूँगी !" करन के साथ ही उसने अपना सर राकेश के कन्धे पर टिका दिया और नारी की मर्यादा-सीमा तोड़ कर उसे आलिंगन में कस लिया। राकेश उसके कपटपूर्ण व्यवहार को न भांप पाया और अमिता उसे अपने मायावी प्रेम के इन्द्रजाल में फांस कर अपना मन्तव्य सिद्ध करने में सफल हो गयी। प्रातः होने से कुछ ही पूर्व राकेश सोया था। इस कारण उसर्क प्रांख नित्य की भांति अपने नियमित समय पर न खुल सकी। पिछले दिवस की थकान और नैश जागरण के कारण वह देर तक सोता रहा मात्मत्याग की भूमिका ३६ लगभग ग्यारह बजे दय उसको आप खुली तो प्रमानानुसार उसकी प्टि अपनी कलाई में बंधी हुई पड़ी की और चली गयी। मनर देर कर पहले तो वह घबरा गया मोर हाड़ा कर उठ बैठा । परन्तु ड्यूटी पर जाने का समय बीत चुका था, इसलिए वह पुन: लेट गया। अब विगत संध्या से घटनाओं का जोकर प्रारम्भ हुमा था, उनकी शोर उमका धान जा पहुंचा। थोड़ी देर के वियाम ने उमे विलामका कर दिया था। प्रब उसे मीन रंवसाय भी परेशान नहीं कर रहा था और भविष्य के प्रति उनके मन में एक सयप उशाह मौर विसस जागृत हो गया था। सोफे पर लेटे हुए ही भावी कार्यक्रम की रूपरेसा बना डाली। उमने निश्चय किया कि वह लाला जी के राज को ममार की दृष्टि से दूर रखने को चेप्टा करेगा, किन्तू स्वयं उम रहम्प को धीरे-धीरे अपने माप जान लेगा । लाला जी को नाराज करके उनकी वसीयत के नाम से वंचित हो जाना उसे मूसंता जान पनी; कि उनका विचार या कि यह उरा राहायता के द्वारा अमिता को प्राप्त करने में सफल हो जायगा। अय समस्या उत्पन्न हुई प्राफिम में उपस्थित न होने की । धुट्टी का भावेदन-पत्र दूसरे दिन देने का निश्वर करके पर सध्या के कार्य. श्रम की रूपरेना निर्धारित करने लगा। तभी उसे कमरे में किसी के चलने का स्पर मुनाई पहा मोर यह उठ कर बैठ गया । उसे जगा हुआ देखकर वलवन ने मकेत मे चाय के लिए पूछा । राकेश उमका संकेत समझ गया और उसने सर हिमा । दिया। चाय के साथ लालाजी भी पधारे । राकेश की दृष्टि में ज्यों ही उनके मुख पर पडी, ज्यों ही उसकी समझ में प्रा गया कि रात्रि का सूफान शान्त हो पुका है । लाला जी अपने स्वाभाविक मूड में थे। कमरे में प्रवेश करने के साय ही उन्होंने उससे कहा-"बडी देर ४० आत्मत्याग की भूमिका तक सोते रहते हो। मैं दो घंटे से तुम्हारे जागने की राह देख रहा जल्दी से मुंह-हाथ धोकर तैयार हो जायो बादशाहो।" लाला जी का कथन सुनते ही राकेश के मन में आया-वाह ! यह एक हो रही ! एक तो रात भर सोने नहीं दिया और अब मुझे कुम्भ- करर्ण का अवतार सिद्ध कर रहे हैं ! किन्तु उसने ऐसा कुछ न कह कर अत्यन्त विनम्रता के साथ कहा-"अभी लीजिये लाला जी, मैं यों चुटकी बजाते तैयार हो जाता हूँ।" लाला जी मुसकराते हुए बोले-हमें तो शानदार भूख लगी है। रात को तो कुछ नहीं खाया था । उसके बाद कुछ प्रोग्राम बनाया जाय । शतरंज खेलते हो वादशाहो ?" चाय का चूंट कंठ से उतारते हुए राकेश वोला-"मैं विल्कुल फ़ालतू नहीं हूँ।" कथन के साथ ही उसने बलवन्त की ओर दृष्टि फेरी । उसे अपनी ध्यान से देखते हुए पाकर राकेश ने मुंह-हाथ धोने का संकेत किया और सर पर लोटे से पानी डालकर नहाने के अभिनय द्वारा अपना मन्तव्य प्रकट कर दिया। बलवन्त ने उसे अपने साथ आने का संकेत किया। स्पष्ट था कि वह उसका प्राशय समझ गया है। राकेश को यह देख कर प्रसन्नता हुई कि वह अपना मतलव सिद्ध कर सकने में सफल हो गया । किन्तु तभी लाला ने आगे बढ़कर बलवन्त को वाथरूम की राह दिखाने का प्रादेदा दिया। बाथरूम में पहुँच कर राकेश पुन: अपने विचारों में खो गया । पाने वाली संध्या के विपय में वह सोच रहा था। तभी कपड़े उतार कर, नल के शीतल जल के नीचे भीगते हुए, उसका ध्यान अपने शरीर की मोर चला गया, तो तुरन्त ही उसे अमिता के शारीरिक-सोप्ठव का स्मरण हो पाया । उसने अपने अंगों में एक तनाव का अनुभव किया।
मात्मत्याग की भूमिका फिर वह विगन रात्रि के मुखद प्रमंग में मो गया। उसके कानों में अमिता को मगुर स्वर गहरी गूंज उद्यो-'यू मार लवली माई डियर।' उने यारपयं हृया कि उसमें ऐना कौन-मा दिप गुरा है, जिसके कारण अमिना ने यह रिमार्क पाम किया। नमी उमें ध्यान आपा वास्तव में मृन्दर नो अमिता है। लेकिन अन्ध नारी भी नो ऐमी हो सरती हैं। अभी अन्य किमी नारी को इस रूप में देखने का अवसर ही कहाँ प्रान हुआ है ! नारी का रूप और मारीरिक गठन...! उनको मोई हुई बिमामा ने करवट बदली। तुरल घ्यान आया-यह नो वासना का प्रतीक है, अन्य नारी को कामना तो दूर, उमका विचार तक पात्र है। विचारों का कोप गल गया । अनिता के इस रूप का ध्यान भी तो पास ही है । विवाह से पूर्व वह भी तो पर-ग्री है। ~किन्तु उममे तो मैं प्रेम करता हूँ, और किनी नारो से प्रेम करना पाप नहीं है। ~~उर मिना-हाँ, पाप नहीं है ! किन्तु विवाद के पूर्व देह- मिलन पाप नही तो और क्या है ? तम्हारे मन में वासना न होती तो तुम ऐमा किन प्रकार कर सकते थे? -किन्तु मैं उसमें विवाह कर लूंगा। परम्पर प्रेम न होता तो यह मुझे इतनी छुट कैसे देतो ! यह भी नो मम्भव है कि वह मेरी मानि पश्चाताप कर रही हो। रितु उसा विचार नी मिन्न है यह तो प्रेम और विवाह को पृपक वस्तु मानती है। तभी उसके मन में पाया-अध्या, गारीरिक मान्य स्थापित होने के पश्चान, अगर विवाह न हुआ तो...? म दगा में यह सम्बन्ध वासना का रिसन म्पन धारण कर सेगा? अब उमा विमान एव मम्बार वोना-~वह भी नी इस मिल अात्मत्याग की भूमिका को लेकर परेशान होगी। परिणाम की ओर ध्यान जाते ही वह स्वयं विवाह का प्रस्ताव करेगी। इस विचार के उदय होते ही वह इस भांति आश्वस्त हो गया, मानों अमावस की निविड़ अंधकारमयी रात्रि को भेद कर अकस्मात् जीयनदाता सूर्य चमकने लगा हो। उसने झट से तौलिये से बदन पोंछकर कपड़े पहनना प्रारम्भ कर दिया। फिर वाधरूप में लगे हुए शीशे में अपना मुख देखकर उसने अपनी ठुड्डी पर हाथ फेरा । मन में पाया-~-शेव कर लेता तो अच्छा था । फिर बालों में तेल लगाकर, कंधे से उन्हें संवारने लगा। वाथरूम से बाहर निकलने के पूर्व उसने अपने मुंह पर स्नो लगाया और एक बार फिर शीशे में अपनी मुख-छवि देखी और मन-ही-मन सन्तोप का अनुभव करते हुए उसने बाथरूम का द्वार खोल दिया । बाहर खड़ा हुआ बलवन्त उसकी प्रतीक्षा कर रहा था। उसे अपने पोछे पाने का संकेत कर वह भोजन-कक्ष में ले गया । वहाँ लालाजी टेबुल पर बैठे हुए प्रतीक्षा कर रहे थे। सामने प्लेटें सजी हुई थीं। नाश्ते का विराट प्रायोजन देखकर उसे जरा आश्चर्य हुआ। साथ ही उसे लगा कि सब कुछ होते हुए भी कहीं कुछ कमी अवश्य है । तभी उसे ध्यान पाया कि ऐसे समारोहों में परिवार के सभी सदस्य नियमानुसार उपस्थित रहते हैं । तभी लालाजी बोले-"वैठो बादशाहो।" कथन के साथ ही मिठाई की प्लेट लालाजी ने उसकी ओर बढ़ा दी। थोड़ा-थोड़ा चखने में ही राकेश का पेट भर गया । अव उसकी समझ में पाया कि वास्तव में भोजन-सुख क्या होता है । नारता चल रहा था और उसके मन में चिन्ता के बबण्डर उठ रहे थे। यह विचार करने लगा-एक सौ अस्सी रुपये की अपनी नौकरी में तो जीवन का वास्तविक सुख उपलब्ध नहीं हो सकता। पिताजी कव तक रुपया भेजते रहेंगे। उनकी अपनी भी तो सीमा है। फिर वे सदैव आत्मत्याग की भूमिका बैठे तो रहेंगे नहीं। पिता का ध्यान आते ही उसे पिछले सप्ताह प्राप्त उस पर का स्मरण या गया, जिसका अभी तक उत्तर उसने नहीं दिया था। गांव से आये एक वर्ष से अधिक हो गया था। यों तो वे प्रति सप्ताह निप. नित रूप से उसे पत्र लिखते थे और एकाध दिन के लिए गांव पाने का अनुरोध भी करते थे, पर राकेश खर्च का ध्यान करके सदैव यही उत्तर देता था कि नौकरी नयी होने के कारण अनी छुट्टी नही मिल पा कारण पैरों में वह इस बार उसके पिता ने लिखा था कि गठिया कष्ट अधिक है । एक बार मिल जानो तो अच्छा हो। फिर पता नहीं कि भेंट हो या न हो! वैसे तो उसे अपने पिता से कोई विशेष स्नेह नहीं था। सच पूछो तो वह उन्हे अतिरिक्त आय का एक साधनमात्र मानता था। उसका विचार था कि एक प्रकार से वे उसके हीनत्व के उत्तरदायी हैं। अगर उन्होंने पूजा-पाठ में सारा समय न गंवाकर धनोपार्जन को चाटा की होती तो भी समाज में एक धनिक-पुत्र के रूप में प्रतिष्ठित होता। पिता के प्रति उसके विचार सदैव से कुछ ऐसे ही बन गये थे। किन्तु उनके पत्र ने इस समय उसे विचलित कर दिया। उसे ध्यान पाया उच्च लोहे के सन्दूक का, जिसमे उसके पिता सपे मैट रखने थे और जितके मन्दर की झलक भी उसे कभी नहीं मिली थी। उसे विश्वास था कि उसके अन्दर कानी मालटाल है। मतः उसने सोचा कि वह शीध्र ही गांव जाने की व्बटल्या रेगा मोर पिताजी से इशारे-वारे में कहेगा कि अच्छा हो, व मोह लाग कर सब कुछ उसके हवाले कर दें, अन्यथा एकाएक दुर्घटना हो जाने पर उनके जीवन-भर की कमाई कौन जाने, किनके हडं लगे ! प्याली में केटली से चाय डालते हुए लालाजी बोले-"जिन्दगी तो तुम्हारी है ! न कोई फिकर, न ग्रम ! एक हम हैं कि कमी न ही - ४४ आत्मत्याग की भूमिका . नहीं मिलता । चाय पी लो तो चलो कहीं घूम प्रायें। क्या ख्याल बादशाहो ?" राकेश के कण्ठ से एक निःश्वास निकल गया। कुछ व्यथित स्वर में वोला--"आपको पता नहीं, पीड़ा इस संसार में हर व्यक्ति के साथ, किसी-न-किसी रूप में जुड़ी है । कितना अनोखा चक्कर है कि श्राप समझते हैं, मैं सुखी हूं और मैं समझता हूँ, आप सुखी हैं। हर व्यक्ति अपने ही दुःख को संसार का सबसे महान् कष्ट समझता है सौर सम- झता है कि उसे छोड़कर अन्य सभी लोग सुख के अगाध सागर में कल्लोल कर रहे हैं !" लालाजी बोले-'मेरी स्थिति दूसरी है । मुझे सब प्रकार का सुख प्राप्त है । वस एक यही दुःख है कि अब क्या कहूँ !" इसके बाद एक नि:श्वास लेकर कहने लगे-"मेरा मुंह वन्द है । ऐसा कुछ लगता है जैसे सीने में कैंसर हो गया हो, ज़िन्दगी में ऐसा कुछ घुन लग गया है, जिसने मुझे खोखला कर दिया हो । ग़नीमत है कि तुम्हारे साथ तो ऐसी कोई बात नहीं है। इसलिए कहता हूँ-तुम मेरा दर्द नहीं सम- झोगे, वादगाहो।" राकेश बोला-"ऐसी वात नहीं है लालाजी । संसार में सभी काम एक दूसरे के सहारे चलते हैं । हर वस्तु की एक सीमा है। समय बड़े- से-बड़े घाव भर देता है। लेकिन यह वात तो तय है कि मन में किसी बात को रखने से घुटन उत्पन्न हो जाती है। किसी का दुःख-दर्द कोई वांट तो नहीं सकता, लेकिन दूसरे की सान्त्वना से शान्ति अवश्य प्राप्त होती है।" लालाजी किंचित् आर्द्र कंठ से बोले-"यही तो दुःख की बात है फि में किसी से कुछ नहीं कह सकता। बात ही कुछ ऐसी है। छोड़ो भी, बीस साल बीत गये, अव क्या रह गया है, थोड़े दिन की जिन्दगी वची है वह भी कट जायगी। कभी-कभी यही सोचने लगता हूं काश पिसी तरह से मैं अपना फर्ज पूरा कर पाता। मगर चाय तो पियो।
४५ मात्मत्याग की भूमिका ठंडी हो रही है वादशाहो !" अपने मन को पोड़ा व्यक्त करते हुए उव उनका ध्यान राकेश के सम्मत रखे हुए प्याले की ओर गया तो वे अपनी स्वाभाविक मनस्थिति में लौट पाये और वाक्य के अंत तक पहुँचते हुए मुसकरा दिये। राकेश ने प्याला उठाकर एक सुस्की ली। तभी उसके मन में पाया कि जिस राज और फर्ज को लेकर लालाजी दुखी हैं, घनिष्ठता स्थापित होने के उपरान्त, वे स्वयं ही एक दिन उसके सम्मुख, इसी भांति चाय का माला पौते हुए वीच का पर्दा हटा देंगे। ऐसा भी सम्भव है कि जिस राज को उन्होने इतना तूल दे रखा है उसके मूल में कोई साधा- रण बात हो ! अक्सर लोग भावुकता में पड कर साधारण-सी घटना के आधार पर राई का पहाड़ बना देते हैं । चाय समाप्त करके प्याला मेज पर रखते हुए उसने अपनी समस्या को उनके समक्ष करने का निश्चय कर लिया। बोला--"मैं भी बड़ा परेशान है। बात यह है कि जब तक पिताजी का साया बना है तब तक तो कोई बात नहीं, लेकिन उसके उपरान्त पाप तो जानते ही हैं कि नी-बारी पानकल के नवयुवकों के बस की बात नहीं । इसीलिए कोई मच्छी नौकरी ढूंढने के लिए मैं यहाँ आयो हूँ।" लालाजी बोले-"नौकरी तो आगे-पीछे मिल ही जायगी। लेकिन मेरी राय में तो तुम्हें खेती करना चाहिए। उसमें बडा लाभ है । एक ट्रैक्टर खरीद लो। एक या दो ट्यूबवेल लगवा लो फिर देखो जमीन सोना उगलती है या नहीं बादशाहो !" राकेग की समझ में नहीं पाया कि वह किस प्रकार अपनी स्थिति प्रकट करे जिससे वह लालाजी की सहानुभूति का पात्र बन जाय । एक मिनट वह चुप रहा और चाय के चम्मच को उठाकर मेज पर हलके से सटखटाकर एक लोकप्रिय धुन बजाने लगा। फिर उसने ऐसा मुंह बनाया, मानो उसकी जिह्वा के नीचे कडवी हरी मिर्च का टुकड़ा मा गया हो और नाटकीय ढंग से अपने स्वर में ४६ आत्मत्याग की भूमिका - . दुःख और व्यथा भरकर उसने कह दिया-"असल में हालात कुछ ऐसे हैं जिनके कारण गांव में मेरा रहना सम्भव नहीं है। अगर पिताजी के बाद मैं वहाँ रहना भी चाहूँ तो मेरे प्राणों का भय है। फिर आप तो जानते ही हैं कि प्रारणों का मोह किसे नहीं होता।" अब लालाजी को वार्ता में रमवोध हो पाया। बोले- साफ़-साफ़ बात बतायो । शायद मैं तुम्हारी कुछ मदद कर सकूँ। मुझे तुम पराया मत समझो, वादशाहो।" लेकिन राकेश उठ खड़ा हुआ और बोला-"फिर कभी मौके से सुनाऊँगा । अभी तो मैं चलूंगा। एक मित्र के यहां जाना है । काफ़ी समय हो गया है। पौने दो बज गये।" लालाजी उठ खड़े हुए और ड्राइंगरूम की ओर चलते हुए बोले- "कितनी देर में वापस आ रहे हो बादशाहो ?" उनके स्वर की आत्मीयता से राकेश चौंक उठा 1 अनजाने ही से विस्मय के साथ निकल गया--"वापस !" लालाजी ने उसकी पीठ पर हाथ रख कर कहा-"हाँ ! घर जा कर क्या करोगे ? यहाँ तुम्हारी वजह से मेरा वक्त आसानी से कट जायगा।" अव वह वोला--"ऐसी बात नहीं है लालाजी।" लालाजी तपाक से बोले-"लोट कर पायो तब इस बारे में बातें होंगी। गाम की चाय के समय तक तो ज़रूर या जाना।" राकेग वोला-"संध्या को तो मैं क्लब में हो, चाय पीता हूँ कल किसी समय आने की चेप्टा करूँगा । मैं टेलीफोन कर दूंगा। आप चिन्ता न करें। लाला जी वोले-"कल नहीं प्राज ! अच्छा रात को खाने के वक्त तक तो फारिग हो जानोगे। इतना समझ लो.कि मैं खाना नहीं साऊँगा । और तुम्हारा इन्तजार ही करता रहूंगा।" विवगता का अभिनय करते हुए राकेश ने कह दिया-"अच्छी उसके मुख मानवाग की भूमिका बात है । मैं दस बजे तक पहुंच जाऊंगा।" राकेग ने यह सब शिष्टाचार के लिए कहा था जब कि वास्त- विकता यह थी कि उसे नाश्ते के व्यञ्जनों का स्वाद भूला नहीं था। पब वह हाथ जोड़ कर चल दिया। बुछ देर बाद तक तो वह निरुद्देश्य मड़क पर घूमता रहा। इधर कुछ दिनों में उसने अपने जीवन को ऐसे मांचे में ढाल लिया था कि उसके पास पतिरिक्त समय ही न रहता था। नियमित रूप से समय पर पागना, निरप प्रिया से निपट कर भोजन बनाना, फिर मिल जाना भोर रसके पश्चात पर माकर स्नान करना, क्लव जाना और वहाँ से टीक ग्यारह बजे वापस माना, सो जाना प्रादि सारे कार्य वह यंत्र की भोति करता था। यहाँ तक कि उसके पडोसी व गली के दुकानदार जो इसकी मादतों से परिचित थे, उसकी गतिविधियों को देख कर ही समय का अनुमान कर लेते थे। रविवार के दिन भी उसका कार्यक्रम निश्चित रहता था । उस दिन वह अपने कपड़े धोता और स्वयं ही प्रेम करता था। ऐसे व्यक्ति के लिए जब कोई व्यवधान उपस्थित हो जाता है तो उसे वहा कष्ट होता है। शृंखला को एक कड़ी भंग होते ही वह अपना सन्तुलन स्थिर रखने में असमर्थ हो जाता है । फिर कल संध्या से तो सभी कुछ गड़बड़ हो गया था अचानक उसकी दृष्टि घंटाघर की बड़ी घडी पर जा पडी । चार वज कर पांच मिनट हो गये थे। यह देखते ही उसकी तात्कालिक बुद्धि ने पहा-'घर चल कर मव क्लव चलने की तैयारी करो।' वह तुरन्त रिक्शे पर जा कर जब घर पहुंचा तो उसके मन में विधान करने की इच्छा उत्पन्न हो गई । कपडे बदलने के उपनन्न वह आत्मत्याग की भूमिका बिस्तर पर लेट गया । ज्वाही उसने यांन्त मूद कर सोने का प्रयास किया कि मन के क्षितिज पर तूफान के लक्षण प्रकट हो उठे। अमिता ने जब तक उसके जीवन में प्रवेश नहीं किया था वह पूर्ण- रूप में सन्तुष्ट था । भविष्य के प्रति भी यह एक प्रकार से निश्चित हो गया था। वेतन तथा पिता के द्वारा भेजे गये रुपयों से वह अपना व्यय सरलता से पूरा कर लेता था । फिर जब अमिता ने उसके प्रति नचि एवं प्रात्मीयता प्रकट की, तो उनके तारण्य को नारी यावश्यता जान पड़ी । अमिता को उसने अपने वर्ग की एक नाधारण लड़की समझकर ही प्रोत्साहन दिया था। वह नोचता था कि दोनों मिल कर इतना तो कमा ही लेंगे कि सहज ही जीवन यापन हो सके। क्योंकि उसकी साधारण वेश-भूपा एवं पलश के समय धन के सम्बन्ध में दिये आश्वासनों से उसे विश्वास हो गया था कि वह साधारण परिवार को उन्हीं लड़कियों की भांति है जो नौकरी करती हैं । परन्तु दो-चार दिन बाद जब अमिता के सम्बन्ध में उसे ज्ञात हुआ कि वह करोड़पति सेठ मुरली मनोहर की पुत्री है, तो उसके मन में भविष्य के प्रति दूसरे प्रकार के' भावों ने जन्म लेना प्रारम्भ कर दिया । मन-ही-मन वह सोचने लगा था कि अमिता से विवाहोपरान्त वह उसकी सम्पत्ति के उपभोग का अधि- कार भी प्राप्त कर लेगा। उसके मन में मूल रूप में केवल यही एक विचार था । जब अमिता को पूर्ण रूप से अपनी मुट्ठी में कर लेने की दृष्टि से वह वासना की भेंट चढ़ गया था। ऐसे चिन्तन में विश्राम करना उसके लिए दुष्कर हो उठा । वह उठकर बैठ गया, भट से सूट को ब्रश से साफ कर कपड़े पहने और चल दिया। उसने सोचा, घर में बैठने की अपेक्षा जल्दी से क्लव पहुँच जाने में अधिक लाभ होने की सम्भावना है। उसका अनुमान था कि अमिता के भी अतमन में ऐसा ही द्वन्द्व उठा होगा। वह भी अपनी दुर्बलता पर दुखी होगी । सम्भव है वह भी उससे मिलने को उत्कंठित होकर
No text on this page.
आत्मत्याग की भूमिका पा, जिन्हें वह आज तक कहती आ रही थी। किन्तु राकेश के जाते उसके मन में विग्रह उत्पन्न हो गया। उसका विश्वास काँप उठा। इ-रह कर उसकी आश्चर्य में डूबी आंखें, उसके मन के निविड़ एकान्त • एक याचक की पीड़ामय मुद्रा के रूप में, सुदूर क्षितिज पर टिमटिमाते बारों की भांति चमक उठती थीं। एक निःश्वास के साथ उसका नारीत्व उसे धिक्कारने लगा। आत्मा की प्रतारणा से आक्रान्त हो-होकर वह भीतर ही भीतर कांप उठी। चुपके से कोई उसके कानों में कुहुक गया-'हाय तूने प्रेम के पुजारी को ठुकरा दिया !' उसके अन्तःकरण ने. कहा-'वासना की मूर्ति न वन, प्रेम की देवी वन । वासना का पुजारी तो सम्पूर्ति के पश्चात, मूर्ति को भग्न करके उसे विसेर देता है, किन्तु प्रेमी अपनी पूजा से अमरत्व का सृजन करता है। उसका हृदय चीत्कारने लगा-'अनायास हाथ लगे हीरे को तूने इस तरह फेंक दिया! अब निरन्तर कंकड़-पत्थर में अपना सुख ढूंढना-!' उसकी बुद्धि बोल उठी-'वासना एक व्याधि है। इससे वांछनीय तृष्णा की तृप्ति नहीं होती । क्षणिक मुल.. दुख को जन्म देता है । यास्तविक सुख का उद्भव होता है, जब वासना मर जाती है।' एक के बाद दूसरा चिन उसके मानस-पटल पर उभरने और मिटने लगा । पौराणिक युग से लेकर आज तक की प्रसिद्ध प्रेम गायाएँ उसे स्मरण पायीं। पति को ही प्रेमी के रूप में देख कर और प्रेमी को ही पति मान कर ही मन-ही-मन उसे भगवान के भांति पूजने वाली नारी अव उसकी कल्पना में साकार हो उठी। अव एकाएक उसके मन में सदगृहरिणयों के सुखी जीवन में झांकी चियित होने लगी। उसके वात्सल्य और ममत्व ने अंगड़ाई लेख नेत्र गोल दिये पौर फराहते, सिसकियां भरते हुए पूछा---'कुछ तो में ग्रात्मत्याग की भूमिका भी ध्यान करो । देखो तुम्हारी इम वासना से मेरी क्या दमा हो रही है ! उन गोद को कल्पना करो जिसमें कृपा-कन्हैया की भांति एक छोटा-मा गिशु, किलकारियां भर रहा है । वह तुम्हारा अपना नन्ना मुन्ना है।" अमिता को प्रनीत हुआ जैसे किसी ने उसका प्रांचल ग्वीच लिया है। एक अत्यन्त मन्द, कोमल स्वर---'म उमके कानों में गूंज उठा। सहमा उसके कन्ट से एक ग्राह निकल पड़ी और उसने प्रश्ने नेत्र मूंद लिये । अनजाने ही उसके बाद कंठ से, उसका हृदय मयती हुई, एक प्रस्फुट ध्वनि-मेरे मुन्ने-निकल कर वातावरण में लीन हो गयी। वासना का दानव तया प्रेम का देवता दोनों अब उसके सम्मुख अपने अपने स्वरूप में पडे थे। अन्त में नारी की विजय हुई। अमिता ने निश्चय किया कि वह वामना की क्षुद्र नाटकीय जीव न बन कर प्रेम की पुजारिन बनंगी । वह राकेश के साथ विवाह करके अपने नारी जीवन को सार्थक बनायेगी। उसका अनुमत्र बोला-रूप के पुजारी तो मत्र होते हैं। मव को क्षण भर के मन की कामना होती है । फिन्तु प्रेमी नन की नती, प्रामा की पूजा करता है । गकेग को केवल तुम्हारे नन मे प्रेम नहीं है, वह तो तुममें प्रेम करता है । केवल तुमसे तुम्हारे मानम मे । तन तो केवल तुम्हारा एक अंग है । पगु और मनुष्य का अन्तर भी प्रेम पर ही भाषा- रित है । प्रेम ही क्षुद्र मानव को देवता बना देता है। तभी वागना ने अपना पक्ष प्रतिपादित करते हुए उसे समझाने की पेप्टा को-~'पागल न बन अमिता । मोच कर देस-एक खूटे में बंपा पशु और पिंजरे में वन्द पक्षी के जीवन की अपेक्षा स्वतन्त्र विवरण करने वाले एक स्वरन्द गगन विहारी के जीवन-मोस्य को समझ। पिन-पिटे जीवन की अपेक्षा नित्य नया अनुभव, प्रतिदिन नया, नित्य प्रति समरस भोजन से एक दिन विरक्ति हो जाती है । नंगे आत्मत्याग की भूमिका एवं विविधता का अपना एक अलग आनन्द है । जल्दबाजी में कहीं ऐसा कोई कदम न उठ जाय जिसके लिए जीवन भर पछताना पड़े। तू विवाह कर, अवश्य कर, लेकिन उसी को ध्येय मान कर उसमें रम मत जा। कहीं ऐसा न हो कि विवाह के चक्कर में तेरी वासनाओं की बलि चढ़ जाय । तब उसको आत्मा धिक्कारने लगी-तव तो तू सड़कों पर फिरने वाले कुत्ते और विल्ली के समान है । तब तत्काल उठ कर ड्रेसिंग टेवुल के सम्मुख जाकर खड़ी हो गयी और शीशे में अपने प्रतिविम्ब को सम्बोधन करती हुई बोली--मैं पशु नहीं हूं। मैं सिद्ध कर दूंगी कि मैं वह नारी हूँ, प्रेम की बलिवेदी पर अपने-आपको उत्सर्ग कर देना ही जिसकी परम्परा है। उनके नेत्रों में प्रात्म-विश्वास की ज्योति जगमगा उठी । अव उसके मनोमंधन का उद्देलन शान्त हो गया । ज्वार का उफ़ान उतरते ही उसे प्रेम के अलौकिक मुख की अनुभूति होने लगी। आंसू पोंचती हुई अपने ही प्रतिविम्ब से वह बोली-मैं ऐसा कुछ न जानती थी। मुझे क्षमा करो देवि ! मैं राह से भटक गयी थी। रूपा की लालिमा वातायन के पारदर्शक शीशे को पार कर उसके शयन-कक्ष में प्रा गयी । तभी सहसा अमिता ने देखा कि उस लालिमा की भटकी हुई किरण उसके प्रतिविम्ब के मस्तक पर पा टिकी है । उसे कुछ ऐसा प्रतीत हुमा, मानो सुख-सौभाग्य का कुमकुम पर भगवान ने स्वयं लगा दिया हो। पक्षियों के कलरव से गुंजित वातावरण में वह गुनगुना उठी- 'ऐ री मैं तो प्रेम दीवानी।' और वह बाथरूम के अन्दर चली गयी। कुछ क्षण वाद बाथरूम का द्वार खुला और एक सौभाग्यवती नारी की भांति एफ सद्यः स्नाता रमणी, निकल पड़ी, जिसके विखरे वालों के सिरे पर छोटे-छोटे मोती चमक रहे थे । निश्चय ही वह नारी वह उसके मस्तक -- मात्मत्याग को भूमिका अमिता न थी, जिसके नेत्रों में वासना का प्रयाह सागर लहराया करता, जिसके मुम पर लालसा की ऊप्मा लालिमा बन कर छाई रहती थी। इसके नेत्रों में तो प्रेम की स्निग्ध ज्योति यो और मुख पर तृप्ति की भलौकिक घटा और हृदय में अपरिमित उद्याम इच्छा के स्थल पर प्रेम की मधुर वंशी का नमगिक कलरव । अब उसे एक अलौकिक सुख और सन्तोप की चेतना व्याप्त हो गयी। एक बड़े टकिय टापल से अपने केरा पोछती हुई वह संध्या के मिलन का कार्यक्रम बनाने लगी। सभी पलंग के सिरहाने एक छोटे स्टून पर रखसा हुआ फोन टन- टना उठा । उसे पाश्चयं हुमा इतने सवेरे किसने मुझे याद किया। तभी उसे ध्यान पाया राकेश का । उसके मन के तट पर सहसा भाहाद की एक तरंग मा गयो । वह लपक कर फोन के पास जा पहुंची। रिमीवर उठा कर कान में लगा वह बोली-~-"मैं अमिता बोल रही तभी उस मोर से स्वर माया-"और मैं फिरोजा है।" भमिता का स्वर सण्ड-खण्ड होकर विसर गया । किंचित् वितृष्णा से वह बोली-"इतने मवेरे ! कोई सास बात है क्या ?" फिरोजा सोल्लाम बोली-"तुम्हे मुवारकवाद देने के लिए, रात भर जागी हूँ। कमाल कर दिया तुमने ।" अमिता बोली-"फिरोजा, प्राग लग गयी है।" फिरोजा वोली-"तुम्हारा जाल कमजोर था, तभी तो उसे तोडकर शिकार निकल भागा । पर तुम घबराम्रो नही । बकरे को मां कब तक सर मनायेगी। प्राज शाम को ही निपट लेगे।" प्रमिता दुपित स्वर में बोली-"तुम नही समझोगी फिरोजा, पौर जान पड़ता है एक तुम क्या, कोई नहीं नमभेगा !" कथन के साथ उसने रिसीवर रख दिया। विस्मृति के निर्जन, मनीम अन्धकारमय गहर की समाधि में प्रतीत आत्मत्याग की भूमिका को स्थापित करके, मुसमय भविष्य को अभिला।पनी अमिता आगत के निमर्म विधान को भूल गयी। आज जीवन में प्रथम बार उने प्रभु का स्मरण हो पाया और उसने मन-ही-मन योगीराज भगवान कृष्ण को नमन किया और वह अपने उद्धार की प्रार्थना करने में लीन हो गयी। राकेश के प्रस्थान के पश्चात् कुछ क्षरण लाला हरचरणसिंह वहीं खड़े रहे। भांति-भांति के विचार उनके मन में उठ रहे थे। उनकी मुद्रा क्षण-क्षरण वदल रही थी। किसी एक विचार को आते ही वे प्रसन्न हो जाते थे किन्तु जब उसी के साथ कोई शंका उत्पन्न होती तो वे चिन्तित हो उठते । बाहर जाते हुए राकेश को अपलक देख रहे थे । जब वह चौराहे के समीप जाकर दाहिनी ओर घूम गया तो अकस्मात उनके हृदय की कराह निश्वास बन कर शून्य में विलीन हो गयी । आशंका के हिंडोले में, इधर-से-उधर, डूबते-उतराते हुए, पाशा के टिमटिमाते दीपक को झंझावत के प्रचण्ड प्रकोप में प्रज्वलित रखने में संलग्न, लाला जी मर झुकाये मन्पर गति ते, निःशब्द, दवे पांव ऊपर जा पहुंचे। उन्होंने द्वार होला और अपनी पत्नी के गमीप जा खड़े हो गये । विगत रात्रि के दृश्य में और इस दृश्य में रचमान भी अन्तर न था । फिन्तु लाला जी जानते थे कि उनकी पत्नी प्रतिमा की आंखें तो बन्द हैं, पर वे अचेत नहीं हैं । अतः उन्होंने सिरहाने बैठी हुई अंजना को वाहर जाने का संकेत किया । एकान्त होते ही लाला जी के नेत्रों में प्रेम के तारे जगमगा उठे । पल भर वे अपनी रण पत्नी को अपलक देखते रहे । उनके नेत्रों में वही गुहागरात में प्रथम बार चूंघट उठाते समय थी । समय की परिधि को लांघ फर वे अतीत में लीन हो गये। अचानक स्मृतियों आतुन्ता थी जो
मात्मत्याग की भूमिका
के इन्द्रज्ञान को तोड़ कर उन्होंने अपना हाय प्रतिमा के मस्तक पर रख
दिया।
प्रनिना ने धीरे मे हाय वढा कर उनके हाथ को अपनी निदल और
कांपती हुई मंगुलियों में पकड़ लिया।
माला जी ने पूर्ण स्वर में बोले-"प्रमो।"
प्रतिमा ने धोरे में अपनी प्रोत्र इस भांति सोनी, जमे प्रातःकाल
कमल प्रस्फुटित होता है।
लाला जी प्रत्यल मधुर मित्रित् स्निग्ध स्वर में बोले-"कमी
तवियन है ?"
प्रतिमा ने धोरे में कह दिया--"ठीक है। भोजन कर लिया ?"
लाला जी बोल-"अभी चाय पी है। जानती हो किमके माथ?"
कथन के माय ही वे ममकरा उठे। इस नांति उन्होंने वातावरण
का समस्त विपाद माल हो जाने की कामना की।
एम. मुग्धा को नानि प्रतिमा ने पहले मुसकराने की चेष्टा की, फिर
धीरे में कह दिया--"नहीं।"
माला जी ने मुा कर धीरे मे ठमके कान में कह दिया--"एक
देवदूत के माय ।"
कायन के माय वे पलंग पर बैठ गये।
प्रतिमा मिचित् विस्मय के माय बोली-''क्या कहा, देवदूत !"
लाला जी उत्माह ने डोल उठे। बोले-"हो, देवदून । कल रान
को अचानक मेंट हो गयी थी। प्राज रान को वह फिर प्रायेमा ।"
गक विषाद के नाय वह वोली-"रान मे!"
करन के माय ही उमने अपना हाथ हटा लिया और पुनः आंखें
बन्द कर ली।
चिन्नु लाला जी के उल्लाम में कोई अन्तर न या। वे बोले-
"किनी दिन तुम्हें उनमें मिलाऊँगा । उमे देखते ही तुम मारा दुख भूल
जाओगी । लेकिन सोचता हूँ पहले अंजना मे मिता। दोनों...।"
प्रात्मत्याग की भूमिका - उनका वाक्य पूरा न हुआ। प्रतिमा की सिसकारियों से कमरा गूंज उठा। लाला जी ने उसको अपने निकट खींच लिया और बोले-"डरो नहीं प्रमो, सब ठीक हो जायगा।" कथन के साथ ही वे उठ कर खड़े हो गये । द्वार की ओर बढ़ कर उन्होंने अंजना को पुकारा । वे जानते थे कि अंजना के पाते ही प्रतिमा शान्त हो जायेगी। अंजना ने कमरे में प्रवेश किया, तो मां की दशा देख कर बोली- "आपने तो फिर रुला दिया !" लाला जी ने आगे बढ़ कर उसके सर पर, आशीर्वाद स्वरूप, अपना हाथ रख दिया। उसके कथन की ओर ध्यान न देकर वे बोले-"तुम्हारा कालेज कब खुल रहा है अंजू ? तुमने अपने जाने की तैयारी कर ली ?" अंजना के हृदय में फिर वही प्रश्न उठ खड़ा हुआ जिसका समाधान वह बचपन से ही नहीं कर पा रही थी। न उसके पिता इस विषय पर कुछ प्रकाश डालते थे और न मां। उसकी समझ में नहीं आता था कि जब वे दोनों उसके ऊपर अपनी जान तक न्यौछावर करते हैं तो उसे अपने से दूर क्यों रखते हैं ?" वह बोली- "आप चाहते हैं कि मैं चली जाऊँ और आप मां को इसी तरह रुलाते रहें। नहीं पिता जी, मैं नहीं जाऊँगी । यहाँ भी तो फालेज हैं । अव मैं...।" बीच में ही प्रतिमा का क्षीण किन्तु हड़ स्वर सुनाई पड़ा-"नहीं तुम जानो बेटा । मैं अव ठीक हूं।" बाप और बेटी दोनों प्रतिमा की ओर घूम पड़े। अंजना धीरे से बोली-"अच्छा मां, मैं चली जाऊँगी । तुम परेशान न होनो।" लाला जी को उसके भोले मुख पर निराशा और पीड़ा की छाया देख पड़ी। उसके स्वर में निहित वेदना भी उनसे छिपी न रही । -- पात्मत्याग की भूमिका तभी अंजना एक निःश्वास के साथ वोली-"पिता जी, अब तो मैं बढी हो गयी हूँ। अपनी देस-माल भी कर सकती हूँ । जब से होश में प्रायी हूँ, मां में अलग रही हूँ । घूमने फिरने के बहाने छुट्टियों में भी दूर- ही-दूर बनी रही हूँ। फिर भी मेरी पादत नहीं बदली । अव अलग रहने को मन ही नहीं करता।" एकाएक स्तब्य वातावरण वोझिल हो उठा और उसके स्वर मे करणा का अजस्र स्रोत निनदित होने लगा। तभी वह वरवस उल्लास के साथ वोली-"मगर तुम चिन्ता न करो मां, मैं तुम्हारी बेटी हूँ न ? मैं अपने हृदय पर पत्थर रख लूँगी । तुम चाहोगी तो आज ही चली जाऊँगी, अभी..." हृदय का रक्त उमकी खो से प्रांमू बन कर वह निकला । उसने मां की ओर से बाल धुमाकर पिता को देखा। वह एक क्षण रुकी, फिर सर नीचा दिये द्वार की ओर बढने लगी। लाला जी उसी जगह, बड़े-खड़े, एक दार्शनिक की भांति बोले- "नहीं बेटा अजू, तुम कहीं नहीं जानोगी। तुम्हे यहाँ रहना अच्छा लगता है तो यही रहो। उसमें रोने की कौन-मी बात है पगली।" अंजना को अपने कानो पर विश्वान न हुमा । एक पल तो वह चकित-विस्मित टगी-मी खडी रही । किन्तु फिर झट से दौड कर अपने पिता के पैरो पर गिर पड़ी। लालाजी ने उसे उठाकर वक्ष से लगा लिया । प्रय अंजना अबोध शिशु की भांति फूट-फूट कर रो पड़ी । लालाजी के नेत्रों मे भी वात्सल्य के मोती करने की भांति बह निकले । मा संवेदन के ये पवित्र प्रांमू पृथ्वी के अन्तराल में धधकती ज्वाला जाने कब से बुझा रहे हैं ! प्रतिमा विस्फारित नेत्रों से पिता-पुत्री के इस देख रही थी। इसी समय अचानक फिर एक हृदय-विदारका यात्मत्यांग की भूमिक से निकल पड़ी और उसका शरीर ऐंठने लगा। लालाजी अंजना को वहीं छोड़ विद्युद्गति से पलँग की ओर बढ़ गये और अंजना ने आगे बढ़कर द्वार बन्द कर लिया। तभी सीढ़ियों पर किसी के चढ़ने की पग ध्वनि सुनाई देने लगी। . से राकेश जब क्लब में पहुँचा, तो उसके परिचितों में से कोई भी वहाँ न था । अधिक भीड़-भाड़ भी न थी। केवल कुछ लोग थे, जो दो या चार की गोष्ठी यत्र-तत्र जमाये हुए थे। प्रत्येक के सामने सुरा का गिलास था, चाहे वह ताश के पत्तों पर नज़र जमाये हो या गुपचुप वार्ता में लीन हो। इस समय वहीं अधिकतर बड़े-बड़े पदाधिकारी ही पाते थे, जो दिन भर की थकान उतारने के लिए सुरा की आड़ में उद्योग- पतियों से सौदेबाजी करते थे। चंचला लक्ष्मी इस कौशल से एक की जेव फुदक कर दूसरे की जेव में पहुँच जाती थी कि दोनों भ्रष्टाचार की परिधि के वाहर ही बने रहते । उत्फुल्लमना राकेश जव घर से क्लव के लिए चला था, उस समय उसके मन में एक अटूट प्रात्म-विश्वास और उद्दाम उत्साह था। लेकिन अब धीरे-धीरे उसके मन में एक शंका जन्म ले रही थी। कदाचित् इसीलिए वह चुपचाप एक मेज़ पर बैठा हुआ शून्य दृष्टि से वातावरण को देख रहा था। उसके मन में बार-बार यही आशंका उत्पन्न हो जाती, यदि अमिता से विवाह न हुआ तो? इस प्रश्न का उसके पास एक उत्तर था तो उसका जीवन नष्ट हो जायगा। अमिता अव उसके लिए प्रेम की सम्पूर्ति मात्र न होकर, सुख और समृद्धि की राह बन गयी थी। उसका विचार था कि विवाह उससे न हुया तो किसी-न-किसी से हो ही जायगा। किन्तु क्या वह भी अपने साथ प्रचुर धन लायेगी?
प्रात्मत्याग की भूमिका यही भय उनकी उद्विग्नता का मुख्य कारण था । उसके मन को अकुलाहट जब सिगरेट के धुएँ से न शान्त हुई तो उमने सोचा कि समय काटने के लिए काफी की चुमको क्यो न लगाई जाय । भट मे उनने वेयरे को पास पाने का संकेत किया । लेकिन जब वेयरे ने ममीप पाकर अभ्यस्त रूप से पूछा-"रम या व्हिको ?" तो राकेश को प्रतीन इमा कि उसे काफी की नहीं वास्तव में नरा की आवश्यक्ता है। उसके उखडे हुए मूड को वही न केवल समाल सकती है वरन् अमिता मे वाक्युद्ध करने का साहस भी दे सकती है । अत: उसने धीरे से कह दिया-"व्हिस्की ।" फलतः बेयरा ने व्हिस्की की बोतल के साथ सोडा और गिलास लाल र सामने रख दिया और पूछा--"साथ के लिए भी कुछ लाऊँ- काजू या देस?" उनुभवी वेयरा इस तरह सैकड़ों नवयुवको को बचपन से देखता प्राजा था। वह अनाड़ी और सिलाडी का अन्तर पहचानता था। विसाठी सदैव पैग का आर्डर देता है, पर अनाड़ी केवल नाम लेता है। दमी वर्ग से इनाम भी अधिक मिलता है और वोतल में बची हुई शराब - राकेश बोला- दोनो।" राकेश ने कार्क खोल कर गिलास में मुरा उंडेली फिर वह उममे सोडा मिलाकर चुस्की लेने लगा। बीच-बीच में कभी काजू उठा कर ढूंगता, कभी चिप्स का टुकडा मुंह में रख लेता। घोरे-धीरे उसके अन्तर्मन को कसली व्याकुलता मिटने लगी और उने रस पाने लगा। कुछ ही समय में अमिता व देहरस एकाकार हो गये। मादकता इतनी गहराने लगी कि वह अपने लक्ष्य को भूल गया। पद उसके मन में केवल देहरम प्राप्ति की कामना ही गेप बची यो। राकेश मुरा पो रहा था, उसे परिणाम का बिलकुल पता न था। . .
आत्मत्याग की भूमिका अमिता ने जब फोन बन्द कर दिया तो फिरोजा का हृदय क्रोध और ईर्ष्या से भर गया । उसके दर्प साकार होकर उसे ललकारने लगे। तत्काल उसके मुंह से निकल गया-मतलव सिद्ध हो गया तो अब यह मुझसे बात भी नहीं करती, बच्चा समझती है मुझे ! अकेले-ही-अकेले सब कुछ हजम करना चाहती है। मेरा हिस्सा ही गोल कर दिया इसने ! उसे लगा कि अमिता सामने खड़ी हुई हँसती हुई कह रही है- 'लो यह रहा तुम्हारा हिस्सा ।' उसकी कल्पना में एक क्षरण के लिए राकेश पाया, फिर धीरे-धीरे उसका आकार बदलने लगा। अमिता का अट्टहास तीव्र से तीव्रतर हो चला और राकेश एक ग्राम में परिणित हो गया। फिरोजा की कल्पना ने अमिता को पहले आम चूसते देखा, फिर देखा कि उसने रसहीन आम की गुठली को धूल में फेंक दिया है । फिर उसने उसे उस ओर संकेत करते हुए भी देखा । फिर उसे प्रतीत हुआ, अमिता मुह बनाकर ठेंगा दिखाती हुई उससे कह रही है-'ले, तू भी जी भर कर खा ले, चाट ले- -चूस ले !' वह नागिन की भांति तड़प उठी। प्रतिशोध की कामना से वह पागलपन की सीमा तक जा पहुँची। अब वह अपने कोमल गद्देदार पलंग पर जलाशय से निकाल कर जलती हुई वालू पर पड़ी हुई मछली की भांति तड़पने लगी ! बचपन की सखी और आज तक के समस्त अभियानों की भागीदार अमिता के मानसिक परिवर्तन की वह कल्पना भी न कर सकी । भावना में पड़फर उसकी समझ में यही पाया कि अमिता अपनी स्वार्थ सिद्धि के लिए उसके साथ वेईमानी कर रही है ! वासना में सांगोपांग डूवी हृदयहीन नारियों के व्यावहारिक कोप में प्रेम और विवाह जैसे पवित्र शब्द अर्थहीन होते हैं। उसने स्वप्न में भी कल्पना नहीं की कि विविधता की पुजारिन अमिता प्रेम के जाल में फंस जायगी। यों तो उसने अमिता के सिवा अन्य सहेलियों को भी .
इसका अर्थ फिरोजा समझती थी । प्रतः वह उनके पास नहीं गपी मात्मत्याग की भूमिका प्रेम का नाटक रचते देखा था। उसने स्वत: भी समय-समय पर यही नाटक खेला था। वह मोचती थी सभी का ध्येय स्वार्थ सिद्धि मात्र रहा है और यही सदा रहेगा भी। निदान उसका मन अमिता से प्रतिसोय लेने के लिए व्याकुल हो उठा। वह भांति-भांति के ताने-बाने बुनने और उनके परिणामों पर विचार करने लगी। एकाएक विद्रूप भरी मुसकान उसके होठों पर नाच उठी । अपने प्रशान्त मन को स्थिर करके वह रिसीवर उठा कर निर्धारित नम्बर हायल करने लगी। पल भर मे उघर से किसी ने पूछा--"कोन बोल रहा है !" फिरोजा अपने स्वर में ससार भर की मिश्री घोल कर वोली- "मैं हूँ फिरोजा सेठजी | आप बिजी है क्या ?" सेठ मुरली मनोहर तपाक से बोले-"क्या कभी ऐसा हो सकता है, तुम फ़ोन करो और मैं कहूँ बिजी हूँ।" फिरोजा को सेठ जी के अन्तस्तल में सांस लेती हुई इच्छा का पूर्ण ज्ञान था । यों भी वह जानती थी कि अधेड़ अवस्था के पुस्पो को किस भांति नचाया जाता है। बचपन से वह अमिता से मिलने के लिए सेट जी की कोठी जाती रही है। फिर वय.सन्धि के साथ ही जब उसे पुरुषों को चितवन की भाषा पढनी आ गयी, तब से तो वह सेठजी के मन यो पहचानने लगी थी। इसके सिवा अभी कुछ ही दिन पहले उसकी सेठजी से भेंट पगा. नक एक कवि-सम्मेलन मे हो गयी तो उन्होने उसके कान में धीरे कहा था-'मुझे एक बहुत बढ़िया फिरोजा दिसा था सो मैंने तुम्हारे लिए खरीद लिया । जयपुर से जोहरी आया था। मैंने अंगूठी में जड़या दिया है। किसी दिन पाकर ले जाना।' - 1 या कर यो। किन्तु आज अमिता से बदला लेने की इच में ६२ आत्मत्याग की भूमिका सेठजी को सन्तुष्ट करने का निश्चय करके ही फ़ोन कर दिया था। अब वह बोली-"समय न हो तो रहने दीजिए। मैं फिर फ़ोन करूंगी।" फलतः फिरोज़ा अपनी इस चाल में सफल हो गयी। सेठजी तड़प उठे और बोले-"इस समय मैं विलकुल खाली हूँ.। भगवान कसम में कुछ भी काम नहीं कर रहा हूँ। तुम बोलो न, मेरे लायक कोई सेवा ?" अव फिरोज़ा कुछ रूठने के स्वर में वोली-"पाप तो भूल ही गये मुझे ! एक दिन आपने कहा था न, फिरोजा की अंगूठी के लिए।' सेठजी हर्ष विह्वल स्वर में बोले-"भगवान कसम, भई क्या कही है ! तो वस तुरन्त पा जायो । मैं तिजोरी से निकाल कर अलग रखे लेता है।" फिरोज़ा मान भरी वाणी में बोली-"जाइये, पाप बड़े वो हैं । कभी सोचा है मुझे अंगूठी लेते देख कर अमिता क्या कहेगी ? सभी सहेन्नियों से यही न कहेगी कि उसके पिता ने मुझे यह दान दिया है ! ज़रा नोचिये कि मैं भिखारी है क्या ? मैं तो आपका उपहार समझकर लेना चाहती हूँ।" सेठ जी झट बोल उठे-"वह उपहार तो है ही । मैं कब कुछ और समझ रहा हूँ।" अव सेठ जी के मन में आया, उनकी अपनी ही बेटी मार्ग का कोटा बन रही है। तभी फिरोजा वोली-"पाप मेरे यहां आ जाइये । अव्या मियां नहीं हैं। यहां मैं ही हूं अकेली।" उत्तर सुनकर सेठ जी नशे में आ गये। वे गद्गद् स्वर में बोले-"तो मैं आया, बस अभी आया । अंगूठी निकाल लूं और कहो तो एक हार भी फ़स्ट क्लास लेता पाऊँ।" सेठ जी भी कच्चे खिलाड़ी नहीं थे।
प्रात्मत्याग को भूमिका ६३ फिरोजा ने उत्तर दिया--"पाएको जूती भी मेरे मर प्रांतों पर - । मेठ जी बोले-"राम-राम । यह क्या कहने लगी तुम । अच्छा, मैं अभी प्राता है।" फथन के साथ ही उन्होंने फोन बन्द कर दिया। फिरोजा झट से टेबल के सामने जा शृंगार में संलग्न हो गयी थोड़ी देर बाद उसके शयन कक्ष में सेठ जी बैठे थे और वह उन्हीं के समीप सट कर बैठी, उनके दिये हुए हार व अंगूठी के नग की प्रशंसा कर रही थी। कभी-कभी तो वह जान-बूझकर अपना प्रौपत गिरा कर उनकी गोद में लुढ़क जाती । उसकी समझ में ही न पाता था कि उसका अचूक, अमोघ अस्त्र भाज विफल क्यों हो रहा है । सेठ जी ने पहले तो वडा उत्साह दिशामा था, किन्तु अब वे कुछ हांफने लगे । जव फिरोजा को कुछ समझ में न माया तो उसने स्वयं ही मागे पग बढ़ाने का निश्चय कर लिया । अतः उसने पलंग को मोर संकेत करके महा--"पाप पक गये है। पोड़ा विधाम पर लीजिये।" गेठ जी ने उसके लोकट ब्लाउज के अन्दर से झांकते हुए मांसल उभार की ओर दृष्टि डालकर कहा--"ठीक है । मैं पाराम से बैठा . अब फिरोजा सब समझ गयी । बोली-"आप नही लेटेंगे तो मैं यह पूछ नहीं लूंगी।" फयन के साथ ही यह स्पष्टरूप से उनकी गोद में लेट गयी। सेठ जी के हाथ वहकने लगे। वे बोले-"बुरा न मानना । मैं फिर भाऊंगा।" फिरोजा के मन में पाया कि क्यों न वह उनके मुंह पर एक शान- दार पोटा जमाती हुई कह दे--'खूसट कही का!' इतने मे अवसर अनुकूल देसकर उसने अपनी मात घेड़ दी।
૬૨ आत्मत्याग की भूमिका सेठजी को सन्तुष्ट करने का निश्चय करके ही फ़ोन कर दिया था। अब वह वोली-"समय न हो तो रहने दीजिए। मैं फिर फ़ोन करूंगी।" फलतः फिरोज़ा अपनी इस चाल में सफल हो गयी। सेठजी तड़प उठे और बोले-"इस समय में विलकुल खाली हूँ.। भगवान कसम में कुछ भी काम नहीं कर रहा हूँ। तुम बोलो न, मेरे लायक कोई सेवा ?" अव फिरोज़ा कुछ रूठने के स्वर में बोली-"आप तो भूल ही गये मुझे ! एक दिन आपने कहा था न, फिरोज़ा की अंगूठी के लिए।" सेठजी हर्प विह्वल स्वर में बोले-"भगवान कसम, भई क्या कही है ! तो वस तुरन्त आ जायो । मैं तिजोरी से निकाल कर अलग रखे लेता है।" फिरोज़ा मान भरी वाणी में बोली-''जाइये, आप बड़े वो हैं । कभी सोचा है मुझे अंगूठी लेते देख कर अमिता क्या कहेगी ? सभी सहेलियों से यही न कहेगी कि उसके पिता ने मुझे यह दान दिया है ! जरा सोचिये कि मैं भिखारी है क्या ? मैं तो अापका उपहार समझकर लेना चाहती हूं।" सेठ जी झट बोल उठे-"वह उपहार तो है ही । मैं कब कुछ और समझ रहा हूं।" अब सेठ जी के मन में पाया, उनकी अपनी ही बेटी मार्ग का कांटा बन रही है। तभी फिरोजा बोली-''आप मेरे यहां पा जाइये । अव्वा मियां नहीं हैं । यहाँ मैं ही हूँ अकेली।" उत्तर सुनकर सेठ जी नशे में आ गये। वे गद्गद् स्वर में बोले-"तो मैं आया, वस अभी आया । अंगूठी निकाल लूं और कहो तो एक हार भी फ़स्ट क्लास लेता आऊं।" सेठ जी भी कच्चे खिलाड़ी नहीं थे। ।
प्रात्मत्याग को भूमिका फिरोशा ने उत्तर दिया-"अापकी जूती भी मेरेर दोपर सेठ जी बोले-"राम-राम । यह क्या कहने लगी तुर। मन्द्र', अभी माता है।" कथन के साथ ही उन्होंने फोन बन्द कर दिया। फिरोजा झट से टेवल के सामने जामगार कल होगी। घोड़ी देर बाद उसके दायन कक्ष में बी के मरदह नन्हीं के समीप सट कर बैठी, उनके दिये हुए हार दबंगों के म को प्रमा कर रही थी। कभी-कभी तो वह बान-चुनकर अपना मंचन निराकर उनकी गोद में लुढक जाती। उसकी समझ में ही न माना या कि जाट, प्रोन्न भान विफल क्यों हो रहा है । ३० वी ने पहने दो बार दिला था, किन्तु अब वे कुछ हाँफने ल । जब निरोडा में छन । माया तो उसने स्वयं ही आने पन बढ़ाने का निम्बर करना। मतः उसने पलंग को मोर किंतु कर कहा-"प्रारक हैं। थोड़ा विधाम र नीजिये।" सेठ जी ने उसके लोकट लान के अन्दर टेर उभार की ओर दृष्टि डालर कहा-'टीक है । अब फिरोजा मदनम- मनी । दल-भार यह कुछ नहीं मूंगी।" कयन के माय ही वह सदन मंटमेंटनी। मेठ जी के हाय बढ़ाने लग । देबोले-"दृग नकदमार बाजेगा।" फिरोजा के मन में प्राया कि कान व उनादपरकर- दार चांटा जमाती हुई कह दें-'यूट कहीं का!' इतने में अदमर बनुक्ल देवकर उन प्रादी बदरी। .
६४ आत्मत्याग की भूमिका बोली-"कुछ वसंत की भी खबर है। अमिता जवान हो गई । उसकी शादी क्यों नहीं कर देते ? किसी दिन विना बाजा-गाजा के नाना वन जायोगे ।" सेठ जी चौंक उठे । वोले-"क्यों, क्या हुआ ?" फिरोजा ने अब सीधा वार कर दिया--"अभी तो कुछ नहीं हुआ है लेकिन रोज दुलहिन बनने वाली तरुणी किसी भी दिन माँ बन सकती है। यों भी आप राह चलते किसी ऐरे गैरे को तो दामाद बना नहीं सकते ! मैंने इसलिए आपको बता दिया कि आपकी इज्जत कहीं चौराहे पर नीलाम न हो जाय !" सेठ जी को अपनी पुत्री से ऐसी आगा न थी। असीम क्रोध व घृणा से उनका हृदय जल उठा । वे बोले-"मैं अभी उसकी खवर लेता मारे हंटरों के उसकी खाल खींच लूंगा । तुम जानती नहीं हो फिरोजा. मैं बड़ा कट्टर आदमी हूँ।" फिरोजा बोली-"ज़रा ठण्डे दिल से काम लीजिये । मारपीट से तो वात और भी फैल जायगी । आप तो किसी बहाने उसे शाम को क्लब जाने से रोक दीजिये । वह इतनी समझदार है ही। दो-चार दिन में समझ ही जायेगी कि आपको सब कुछ मालूम हो गया है । फिर झट से उसकी शादी कर दीजिएगा।" सेठ जी बोले-"हाँ, यह तरकीव ठीक है।" अव फिरोज़ा उठकर बैठ गयी और अपने वस्त्र ठीक करके बोली- "मैं टेलीफ़ोन करूं तभी आइयेगा। नहीं तो अब्बा मियां को तो आप जानते हैं ! आपके तो बचपन के दोस्त व्हरे । गोली पहले चला देते हैं वात वाद में करते हैं । समझ में न पाया हो तो ड्राइंग रूम में टंगे हुए शेर, चीतों के मुंह से पूरा किस्सा सुन लीजिये ।" सेठ जी बोले-~-"मैं जानता हूँ। तुम जब कहो में सेवा में हाजि हो जाऊँ । वैसे कहीं और होल नाइट प्रोग्राम रक्खो तो मैं..'भई क्य बात है तुम्हारी !"
No text on this page.
आत्मत्याग की भूमिका मिस्टर भूपतलाल भी थे और राकेश के दुर्भाग्य से फिरोजा उन पर विशेप कृपा रखती थी। उसकी सहेलियों का कथन था कि वे अगर कुवारे होते तो वह उनसे विवाह कर लेती । यही मिस्टर भूपतलाल उस मिल के जनरल मैनेजर थे, जिसके दफ्तर में राकेश सैकड़ों क्लर्कों में से एक था। और फिरोजा ने भूपतलाल से ही इस अभियान में सहायता लेने का निश्चय किया । उस ससय उसे मालूम न था कि वे उसके अन्नदाता एवं भाग्य विधाता हैं । उसके ध्यान में तो केवल ऐसे सहायक की पाव- एयकता थी जिसके साथ क्लव में जाने पर उसे अकेला पाकर अन्य कोई जोंक की तरह चिपट न जाय । इस घटना के पश्चात् किसी भी सहेली पर उसे विश्वास न रहा । उसे डर था कि जिस राकेश के कारण अमिता जैसी लड़की ने घोखा दे दिया, उस पर किसी और की राल टपक गई, तो लेने के देने पड़ जायेगे ! भूपतलाल के हृदय में ईर्ष्या नाम की कोई वस्तु न थी। वे जानते धे कि वे फिरोज़ा के ऊपर एकाधिकार नहीं पा सकते । अतः किसी अन्य व्यक्ति के साथ उसका मेल-जोल या घनिष्ठता देख कर उन्हें दुःख नहीं होता था। उन्हें मालूम था कि फिरोज़ा का वास्तविक जीवन कैसा फिरोज़ा ने अपनी योजना बनाते समय परिणाम की सम्भावनाओं की ओर ध्यान नहीं दिया था। वह तो केवल राकेश के यौवन-रस का उपभोग करना चाहती थी। संध्या के समय अपने साथ भूपतलाल को लेकर जब वह क्लव पहुंची, तो उसे क्या मालूम था कि उसकी यह आकांक्षा राकेश के जीवन में एक चिनगारी का प्रवेश करके उसकी सारी सुख शान्ति को नष्ट कर देगी। भाग्य की प्रवंचना ही तो थी कि वासना को साकार मूर्ति अमिता फे हृदय में प्रेम का पावन अंकुर उत्पन्न हो गया और फिरोज़ा के मन ३७ प्रात्मत्याग को भूमिका में नारी-मुलम ईर्ष्या का । वैचारा राकेश दो पाट के बीच में पिस गया। संध्या का घुघलका वड़ रहा था । अचानक राकेश को दृष्टि सुले हुए वातायन को पार कर सुदूर अन्धकारमय टिमटिमाते नक्षत्री पर जा पड़ी । वह बैठा उन्हें निहारता रहा । सहसा उसे अन्धकारमय हृदया- काम पर आप के टिमटिमाते स्फुलिंग जगमगा उठे। उस ज्योति-पुंज कालोक से विपाद का अन्धकार दूर हो गया । सहसा पासा का संचार होते ही उसके मन में पाया -मुझे साहस 'काम लेना चाहिए। ऐसी दशा में अगर मैं धोरण छोड़ दूंगा, तो मेरा सर्वनाम निश्चित है। इसी समय उसे एक बार फिर अपने गांव के मास्टर साहब का कयन स्मरण हो पाया। वे कहा करते थे-'कभी निराश मत हो । तुम्हारे पास शक्ति का प्रथाह-अनन्त कोप है। भगवान की दी हुई वृद्धि है, हाथ-पैर हैं। मुसीवत के क्षणों में, डूबने से बचने के लिए, बुद्धि- मता के साथ, तिनके का सहारा लेकर, सुनियोजित ढंग से हाथ-पैर चलाकर, किनारे पर पहुँचने की चेप्टा करना तुम्हारा सहज मानव. धर्म है।' सभी उसने सोचा-एक ममिता से ही तो सृष्टि का अन्त नहीं है । एक राह बन्द होने पर मैं दूसरी दिशा में प्रयास करूंगा। जीवन अमूल्य है । उसी की उन्नति, संवृद्धि और सफलता अपना मुख्य ध्येय है । तू न सही और सही। सुरा के नशे और मन के उलभाव के कारण उसकी मनोदशा ऐसी न थी कि वह क्लब में प्रवेश करने वाले हर व्यक्ति की भोर ध्यान देता। ऐसी स्थिति में यह स्मामाविक था कि फिरोजा के साथ जब भूपत- लाल ने प्रवेश किया तो उसने उपर कुछ भी ध्यान नहीं दिया। पर फिरोजा ने तुरन्त ही उसे देख लिया। बोतल के - ६८ आत्मत्याग को भूमिका अकेले मेज़ पर बैठा हुआ देखकर वह समझ गई कि इस योजना में सेठ जी ने अपना योग पूरा कर दिया है। मानो साथ ही शराब की बोतल ने ही उसके कानों में चुपके से कह दिया हो, दाल में कुछ काला अवश्य है। तभी वह उसकी ओर बढ़ गई। परन्तु भूपतलाल के मन में राकेश को देखकर एक भिन्न प्रकार की प्रतिक्रिया उत्पन्न हुई। वह अफ़सर भी क्या, जिसे अफ़सरी का नशा न हो । यों तो वे बड़े लोकप्रिय व्यक्ति थे, किन्तु उनमें अन्य गुणों के साथ एक दोप भी था, वे अत्यन्त अनुशासन प्रिय थे। अपने से निम्न श्रेणी के कर्मचारी के ऊपर उनकी दया और ममता तभी तक रहती थी, जब तक वह अनुशासन की परिधि के अन्दर रहता था। राकेश को क्लब में शराब पीता देखकर उन्हें आश्चर्य हुआ। एक वर्ष की छोटी अवधि में ही वे, उसकी कार्यक्षमता के कारण उस पर इतना विश्वास करने लगे थे, कि उसे ज़िम्मेदारी का कार्य-भार निःसंकोच सौंप देते थे। उनके मन में ध्यान माया-यह व्यक्ति उनके साथ विश्वासघात कर सकता है। सम्भव है यह नाजायज़ तौर से पैसा पैदा करता हो। एक साधारण क्लर्क के पास क्लब में बैठ शराब पीने का पैसा कहां से पाया ! इन विचारों के साथ जव वे फ़िरोज़ा के साथ राकेश की टेबुल पर पहुँचे तो उन्हें उस टेवुल पर बैठने में संकोच हुग्रा । उधर राकेश भी उन्हें देखकर संकुचित हो उठा । पर उसके मन में आया-यह मिल तो है नहीं, यह तो क्लव है। यहां के समाज में सब वरावर हैं । उसे इस बात का भी ध्यान हो पाया कि ऐसे ही अवसरों के द्वारा उनके साथ घनिष्ठता स्थापित की जाती है। अतः वह अपने नौकर-मालिक के रिश्ते को भूलकर वरावरी का व्यवहार कर बैठा । फिरोज़ा ने समीप पहुंचते ही राकेश की पीठ पर अपनापन प्रदर्शित करते हुए एक घोल जमाई और कहा-"हैलो राकेश !"
भारमत्याग की भूमिका कपन के साथ ही वह सामने की कुर्सी पर बैठ गई। राकेश के मपरों पर मुमकराहट फैल गई । उसके मन में पाया कि प्रमिता भो माती ही होगी। समी उसको दृष्टि भूपतलाल पर जा पड़ी । वह शिष्टाचारवश उठ खड़ा हुमा । फिर साहस करके उसने अपना हाथ उनकी मोर बदा दिया । अभिवादन के पश्चात् वह बोला-"वैठिये सर, यह तो मेरा सौभाग्य है कि पाप यहाँ पधारे । वैसे मैंने अापको यहाँ आज पहली बार देना है।" कथन के माथ ही उसने आगे बढ़कर उनके लिए कुर्सी सरका दी। जब ये बैठ गये तो उसने मेरे को दो गिलास और लाने का संकेत किया। अफसर को उपस्थिति मात्र से वह एकदम इतना मातंकित हो गया कि उसका ध्यान भूपतलाल के भाग्नेय नेत्रो की ओर नहीं गया और न वह उनके मुख पर उत्पन्न इम भेंट की प्रतिक्रिया को ही पढ़ सका । वह एक क्षण में ही सुस्थिर हो गया और जैसे ही वेपरे ने साली गिलास लाकर मेज पर रक्ता, उसने उसमे अपनी वोतल की मुरा भरना प्रारम्भ कर दिया। इस कार्य-कलाप का उसने मन-ही-मन इतना अध्ययन कर रक्सा था कि एकाएक कोई भी यह नहीं कह सकता था कि वह सभ्य समाज के उच्चतम वर्ग का सदस्य नहीं है । उसके ढंग से सहज लापर- वाही टपाती यो । लगता था कि यह कोई विशेष या नवीन वात नहीं है। ऐसा तो नित्य ही होता रहता है । किन्तु भूपनलाल इसके विपरीत उमके विगत जीवन से परिचित थे। नौकरी का प्रावेदनपत्र उनके समक्ष प्रस्तुत करते समय स्वयं राकेश ने उनको भावना जगाने के लिए अपनी दयनीय स्थिति का वर्णन स्यिा पा। उन्हें प्रतीत हुप्रा कि मानो उनका निजी सेवक उनके माय मेज़ पर बैठ कर उन्हें गराब पीने का निमन्त्रण देने की घृष्टता कर रहा आत्मत्याग की भूमिका सहता उनका अहं जाग उठा । किन्तु परिस्थिति को ध्यान में रखते हुए उन्होंने निश्चय किया कि वे इस अपमान का प्रतिशोध अवश्य लेंगे। उन्हें प्रतीत हुआ कि क्लव में उपस्थित प्रत्येक व्यक्ति कह रहा है-देख लो यह है तुम्हारी स्थिति ! आखिर मिल में नौकर ही तो हो। जनरल मैनेजर होने से क्या होता है ! समझ लो, यही सही-सही तुम्हारा स्थान है, मालिकों के मध्य में नहीं। नौकरों को अपने वर्ग के साथ ही उठना- बैठना शोभा देता है। उनमें ऊँच-नीच का प्रश्न नहीं उठता। तभी फिरोजा वोली-"आज आप बड़े गुमसुम नज़र आते हैं । कोई साथी नहीं मिला । इससे तो अच्छा है दो-चार रवर ब्रिज ही हो जाय ; या कहो तो एकाध हाथ रमी ही वट जाय ।" भूपतलाल शराब पी रहे थे। उन्हें फ़िरोज़ा की इस दात से भी बड़ी उलझन हुई । एक अदना व्यक्ति के साथ इस मेल-जोल, आत्मीयता के इस कृत्रिम प्रदर्शन ने उनके मर्मस्वल को लिया। राकेश हंस कर बोला-"ऐसा कोई मिला ही नहीं, जिसके साथ खेलता! इसीलिए अकेला बैठा था।" फिरोज़ा ने उसकी आँखों से खेलते हुए कहा-"मैं तो पा गयी । मेरे साथ खेलिये न?" भूपतलाल को उसके इस साधारण से कथन के अन्दर छिपे हुए प्लेप का ग्राभास जान पड़ा। तभी राकेग बोला-"हम लोग तीन हैं । इनलिए रमी हो जाय ।" कथन के साथ उसने वेयरे को पुनः संकेत किया। भूपतलाल का क्रोध अपनी सीमा तोड़ने के लिए प्रस्तुत था। वे सोचते थे मेरे व्यक्तित्व का यही मूल्य है ! मुझसे पूछा भी न जाय और समझ लिया जाय कि मैं भी खेलूंगा । और ऐसा व्यवहार वह करे जो मिल के चुनाल नजदूर से भी कम वेतन भोगी क्लर्क हो । अतः वे वोले- "मुझे एक आवश्यक कार्य से जाना है । मैं तुम्हारा साथ न दे सकूँगा।"
मात्मत्याग की भूमिका उन्होंने राकेग की अपेक्षा करते हुए मोघे फिरोजा को सम्बोधन किया था। इस मांति वह सिद्ध करना चाहते थे कि राकेग का मूल्य पोर महत्व उनकी दृष्टि में कुछ नहीं है । फिरोजा तो राकेश को एकान्त में प्राप्त करने के लिए ही उन्हें माप लेकर आयी थी । उनका काम पूरा हो चुका था। यह सोच रही थी कि अब शीघ्र ही उसे लेकर क्लब से चल देना चाहिए। वर्ना भीड़ बढ़ जायगी तो भय है कि अन्य कोई मगरमच्छ इस मछली को न निगल जाय ! प्रतः वह बोली-"पन्छी बात है । मिस्टर राकेश तो यहां मेरे पास हैं हीं । वैसे मुझे इनसे काम भी है।" भूपतलाल उठ कर गड़े हो गये और निर्विकार भाव से केवल नमस्ते कहकर चल दिये। उनके जाने ही फिरोजा सक्रिय हो उठी। अपनी योजना के अनुसार उसने धीरे मे राकंग के कान में कह दिया--"मैं तुम्हारे पास एक खास काम से भाई हूँ। कल रात कुछ गड़बड़ हो गई । ममिता ने तुम्हें बुलाया है । यह मेरे घर में बैठी तुम्हारा इन्तजार कर रही है।" राकेम अपने उतावलेपन के कारण इममें किसी पड़यंत्र की गन्ध न पा मका । वैसे भी कोई व्यक्ति ऐमो स्थिति में कुछ नही भांप पाता। फिर वह तो अमिता को प्रतीक्षा कर ही रहा था । गहवडी की आशंका उसके मन में पहले से ही थी । ऐसा भी कही सम्भव है कि कोई किसी के घर में इस प्रकार जाकर लौट प्राये और किमी को पता न चले । अमिता के द्वारा इस प्रकार तुरन्त युलाये जाने में उसे मोचित्य दिखाई दिया । उसके मन में पाया-विवाह सम्बन्धी जटिल ममला क्लब में बंठ कर कैसे हल किया जा सकता है ! यह भी तपाक मे वोला-"अच्दा तो प्रब चला जाय।" फिरोजा उठकर सड़ी हो गई और वोली-''हां, हमें चलना ही होगा।" राकेश उठ कर सड़ा हो गया । फ़िरोजा का अनुसरण करते समय ७२ आत्मत्याग की भूमिका उसे प्रतीत हुआ उसकी विजय हो चुकी ! क्लव से उठकर भूपतलाल सीधे फूलवाग में जाकर एक बेंच पर बैठ गये । उनका मन अपमान की चिता पर जल रहा था । जितना अधिक वे सोचते थे, उतना ही उनके अन्दर का प्रतिक्रियाशील दानव सशक्त होता जा रहा था। इस अंतद्वन्द्व में मानव पराजित हो गया। उन्होंने क्षुद्र मानवीय आवेश में पड़कर प्रतिशोध लेने में ही अपना गौरव समझा। अव राकेश से तो अधिक फ़िरोज़ा पर उन्हें क्रोध आ रहा था । उसकी प्रकृति ही नहीं चरित्र से भी वे परिचित थे । उनकी समझ में ही न आता था कि उसे अगर उनके साथ सदा की भांति रात्रि का कार्यक्रम नहीं बनाना था, तो उन्हें निमन्त्रण देकर बुलाने का अर्थ क्या था ? उन्हें अपने ऊपर भी क्रोध आ गया। इसी फिरोजा के जाल में फैसकर केवल उसका निजी खर्च चलाने के लिए वह कितने ही उचित- अनुचित कार्य करता रहा। उनकी बुद्धि ने कहा-नारी के सौन्दर्य के मोह में फंसना ही समस्त बुराईयों की जड़ है । बड़े-बड़े विनाशकारी काण्ड इन्हीं आसक्तियों के फारण हो जाते हैं । महाभारत-द्रोपदी के कारण; राम-रावण युद्ध- सीता के कारण और ट्रॉय का विनाश-हेलेन के कारण । प्रकारान्त से देखा जाय तो नारी ही वास्तव में हमारे जीवन की संचालिका है । अपने पिछले अनुभवों के आधार पर भूपतलाल को फ़िरोज़ा की कार्य-प्रणाली का पूर्ण ज्ञान था । वे जानते थे कि वह राकेश को क्लब से बहका कर अपने शयन-कक्ष में ले जायगी । उनके मन में आज तक इस सम्बन्ध में कोई प्रतिक्रिया नहीं उत्पन्न हुई थी। पर आज इस विचार मात्र से उनका मन घृणा से भर उठा।
७३ मात्मत्याग की भूमिका न जाने क्या सोच कर वे उठ खड़े इए । उनको कार ने जब फिरोजा के बंगले में प्रवेश किया तभी सहसा उनका ध्यान भंग हुआ । उन्होंने अपने विखरे हुए विचारों को एकत्र किया । कार से उतर कर फिरोजा के कमरे की ओर चल दिये। तभी एक अन्य संयोग ने जन्म ले लिया। फिरोजा के पिता नवाब रोगन खो भी अचानक अपने कमरे से बाहर निकले और धूमकेतु की भांति भूपतलाल के मामने पड़ गये । एक ही शहर में रहने और शिकार में समान चि रखने के कारण, उन्हे एक-दूसरे से परिचित बना दिया था। अकसर ऐने अवसर आ जाते, जव तीन-चार महीने मे वे दोनों अपनी बन्दूकें लिए मुर्गवियां की ताक मे फिरते हुए सामने जा पहुंचते ये। उन पर दृष्टि पड़ते ही नवाब साहब तपाक से बोले-"अक्सा, तो जनाय भूपतलाल जी हैं। आइये साहब, फरमाइये आज इस खादिम की याद कैसमा गयी।" कथन के साथ ही उन्होंने अपना हाथ उनकी ओर बढ़ा दिया, फिर उसी भांति हाय पकडे हुए वे उन्हें अपने कमरे में लिवा गया, एक प्रकार से घसीट ले गये। नवाव रोशन सां के पूर्वज किसी समय अवध के नवाबो के यहाँ साईम रहा करते थे। उन्ही दिनो किसी बिगड़े दिल नवाब ने उनके किसी पूर्वजो को दो-चार गांव इनाम मे दिये थे। उसी आधार पर उनके वंशजो ने नवावी मिटने के साथ अपने नाम के आगे नवाव जोड़ना प्रारम्भ कर दिया। उनके सानदान मे तब से किसी ने कोई ठोस काम न कर, केवल पतंग, बटेर मे ही समय विताया। अन्त में नवाब रोशन के बावा ने अपनी जागीर वेश्या के कोठों पर लुटा दी, तो उनकी मां उनको नेकर अपने पिता के यहाँ चली आयी। नवाद रोशन के पिता ने अपने ससुर के साझे में चमड़े का काम शुरू किया और अच्छा पैसा कमाया । यह कोठी उन्हीं के पसीने से खड़ी हुई थी। ।
७४ आत्मत्याग की भूमिका । किन्तु नवाव रोशन में अपने वंश का प्रभाव अधिक था। जीवन भर उन्होंने भी कुछ न किया। वे केवल पिता का धन उड़ाते रहे। उनमें कोई दुर्गुण न था । वे केवल चार आने भर अफ़ीम खाते थे, सो भी एक वक्त । इसके लिए उनको कभी पैसों की कमी नहीं हुई । जब तक पली जीवित रही, गृह-प्रवन्ध उसी के हाथ में था, जब वह मरी तो उनकी अवस्था ऐसी न रही कि वे किसी व्यसन में फंसते । इसीलिए वे अपने जीवन में सुखी थे। फिरोजा के ऊपर उन्हें असीम प्रेम था । उसे वह अपनी मरहूम पत्नी की निशानी मानते थे । अपनी सामर्थ्य के अनुरूप उसे खर्च करने के लिए पैसे भी देते थे। लेकिन उनका ध्यान कभी उसकी कीमती साड़ियों, कपड़ों व गहनों की ओर नहीं जाता था और न कभी उन्होंने यह जानने की कोशिश की यह सब कहां और कैसे नाता है दीवानखाने में पहुँच कर नवाब रोशन गालीनता के साथ बोले- "तशरीफ़ रखिये जनाव, और फ़रमाइये, कोई शिकार का प्रोग्राम बना- कर न्योता देने के लिए तकलीफ़ फरमायी हो तो समझ लीजिये कवूल है । फ़रमाइये कब चलना है ?" कवन के साथ ही उनकी दृष्टि अपने अग्नेय अस्त्रों को अलमारी की ओर उठ गयी। जैसे उन्हें विश्वास था कि भूपतलाल शिकार का न्यौता देने ही पाये होंगे, क्योंकि इसके अतिरिक्त उनके यहाँ कोई कभी नहीं आता था । उनका कथन सुनकर भूपतलाल को हंसी आ गयी। वाप शिकारी, वेटी भी शिकारी । और वे भी शिकार के लिए ही आये हैं । वे कुछ गम्भीर होकर बोले-"जी हाँ, मैं शिकार के लिए ही हाजिर हुआ हूँ।" कथन के साथ ही उन्होंने नवाब साहब के निकट खिसक कर कुछ ऐसी मुद्रा बनाई कि जैसे किसी गूढ़ रहस्य को, गुप्त रीति से प्रकट फरने जा रहे हों । बोले-"नवाब साहब, आप तो शिकारी हैं, लेकिन ।
मात्मत्याग को भूमिका पापको मालूम है कि आपकी साहबजादी को भी शिकार का शौक हों गया है ?" नवाब रोशन चौक पड़े, लेकिन इस वाक्य के अन्दर छिपा हुमा रहस्य उनको समझ में आया। वे बोले--"मैं कुछ समझा नहीं । वमे गिकार का शौक ऐमा कुछ बुरा भी नहीं है। नये जमाने की लड- किया कुछ भी कर सकती हैं । लेकिन फिरोजा को शौक था तो मुझसे पहनी, मैं उसे अपने साथ ले जाता । वैसे भई, मैं तो लड़कियों को शिवार से दूर ही रखना पसन्द करता हूँ। ये कितनी नामाकूल बात है कि लड़कियां जंगलों में मारी-मारी फिरे !" पहले भूपतलात मुस्कराये फिर गम्भीर हो गये और बोले-"पाप नहीं समझे। यह शिकार जंगल में नहीं, यही होता है। खूखार दरिन्दों का नहीं बलि पादमियों का।" नवार रोशन ने लपक कर उनका गला पकड़ लिया और बोले- "मैं तेरा खून पी जाऊँगा।" भूपतलाल ने अत्यन्त शालीनता के माय कह दिया-"जहर पी लीजिए । लेकिन किवता अपनी लड़की के बारे में पता तो लगा लें। एक बार कम-से-कम उससे पूछ तो लें ये हीरे किसकी गरदन काट कर उसने अपने गले में पहन रखे हैं ? जवाहिरात करुड पत्थर तो हैं नहीं कि राह चलते रास्ते से उठा लिये जाएँ। मैं दावे के साथ कहता है कि अगर प्रभो ग्राप उसके कमरे में जाने की तकलीफ गवारा करें, तो मायद फिर मुझे कुछ कहने की जरूरत न पड़े। शिकार और शिकारी दोनों ही भापको यहाँ मिल जायेंगे।" नवाच रोगन क्षण भर यो ही उनके गिरहवान को अपने हाय से परड़े रहे । फिर दे एकाएक भूपतलाल को छोड़कर उठ खड़े हुए और घोले-"मैं गोली मार दूंगा उस हरामजादी की बच्ची को।" कथन के साथ ही उन्होंने अलमारो सोलो और अपनी दुनाली पर उठा तो । कारतूस को पेटो से कारतूस निकाल कर भरने लगे।
आत्मत्याग की भूमिका किन्तु भूपतलाल ने लपक कर उनका हाथ पकड़ लिया और उनके हाय से कारतूस छीन लिया। नवाब साहब ने किंचित् उच्च स्वर में कहा--"आप इस मामले में कुछ न बोलें । मैं दोनों को गोली मार दूंगा । चाहे फांसी ही क्यों न हो जाय।" भूपतलाल ने कारतूस पेटी में यथास्थान खोंस दिया धौर कहा-- "गोली मारने से कुछ भी लाभ न होगा। आप बदनामी को रोक नहीं सकेंगे। खाली वन्दूक से डरा-धमका भले दीजिये । आखिर बच्ची है, लोगों के बहकावे में आ गयी होगी। फिर जवानी के आलम में किससे ग़लती नहीं होती । पर हाँ, अव उसकी शादी कर डालिये।" फ़िरोजा को क्या मालूम था कि अमिता के लिए चली गई चाल से वह स्वयं ही मात खा जायगी ! नवाब साहब का चढ़ता हुआ पारा एकदम शून्य से भी नीचे जा गिरा। वे बोले-"ठीक है। वाक़ई में अगर वहाँ कोई और हुमा तो... ?" भूपतलाल मिल के मैनेजर थे और इस पद पर रहने वालों को प्रत्येक परिस्थिति का सामना करने और तात्कालिक निर्णय करने की आदत होती है। वे झट से वोले-"अरे उसे चोरी के जुर्म में फंसा दीजिएगा। उधर वह जमानत पर छूटेगा और इधर आप मुह बन्द करने का उससे कोई सौदा कर लीजिएगा। डर के मारे वह यों भी कुछ न कहेगा।" नवाब रोशन वोले-"आप मेरे साथ तशरीफ़ ले चलें, वर्ना मैं गुस्से में सब कुछ भूल जाऊँगा। आप तो जानते ही हैं कि मैं आधा पागल हूँ।" भूपतलाल बोले-"अच्छा चलिये, मैं भी चलता हूँ। अगर फ़िरोज़ा वापस नहीं पायी होगी, तो वहीं बैठकर इन्तजार कर लेंगे।" नवाब रोशन ने कुछ उत्तर तो न दिया, किन्तु स्वीकारोक्तिस्वरूप "७७ वात्मत्याग की भूमिका केवल सर हिला दिया। दोनों फिरोजा के कमरे की पोर बढ़ गये । पोछे-पीछे चलते हुए भूपतलाल मोच रहे थे-इस स्थिति की पल्सना मैंने नही की थी। एकान्त होते ही प्रतिमा ने लालानी को अपने निकट आने का मंकेत किया। लालाजी चुपचाप खड़े खड़े बीते हुए दिनों की भयानक विभीपिका एवं उसमे उत्पन्न परिणामों के विचार में लीन थे। उन्होंने विना कुछ सोच-विचार अंजना को दुबी देव कर उस ममय यहीं रहने के लिए आश्वासन तो दे दिया, किन्तु अब पुन. उनके मन में सदैव की मोति आकाओं का वण्डर उठ खड़ा हुआ था। वे सोच रहे थे प्राज अचानक यह परिवर्तन कैसे हो गया ! मुद्र अतीत में उन दिनो प्राज, जिनके स्मरणमात्र से, रोमांच हो जाता है, जो निश्चय उन्होंने किया था, उसे बाज मूल कर, उसके विपरीत पग उठाना थेयस्कर होगा! अंजना के सुख और प्रतिमा की मानसिक शान्ति के लिए बाज तक अपने जिस वात्सल्य को पापारण शिला से कुचल रखा था, वह अब पुनः जीवित हो गया। आज प्रथम बार प्रतिमा के संकेत पर उन्होंने ध्यान नहीं दिया। यत्यया उसके मतमात्र पर वे अपने को उत्सर्ग करने के लिए तत्पर हो जाते थे। सहसा मन में एक बाश्वासन की लहर उठी-सब ठीक हो जायगा । भगवान कितने दयालु हैं । जो भेद बीस वर्षों के लम्बे समय तक प्रकट न हुअा, वह मेरे साथ चिता की धधकती हुई अग्नि को भेंट होगा- बवास होगा। प्रगर स्पं विधाता को गट म्बीका - tra आत्मत्याग की भूमिका गये। उसका यह प्रकोप भी न होता । अनायास राकेश से इस भौति भेंट भी तो इसी बात की द्योतक है कि दुःख के दिन समाप्त रात के बाद प्रभात सुनिश्चित है, उसी प्रकार जैसे दुःस के बाद सुख । अवश्य ही मेरे सुखी होने का समय आ गया है। किन्तु तभी प्रश्न उठो जीवन में संध्या का धुधलका छाने लगा है; फिर ज्वालामुखी शान्त भी हो जाय तो उसका क्या विश्वास ! कभी किसी क्षण भी विस्फोट हो सकता है, कभी भूकम्प भी पा सकता है। यह तो एक ऐसा रोग है जो सदैव कष्ट देता रहेगा। मृत्यु भी भी जिसकी सीमा नहीं है। यह तो मेरे वाद भी चिरंतन और शाश्वत सत्य की भांति प्रलय तक जीवित रहेगा। इसका तो एक ही निदान है कि इसको समूल समाप्त कर दिया जाय । भेद को ही न रहने दिया जाय । तो क्या मैं इसको प्रकट कर दूं? विचार मात्र से उनके प्रारण कांप उठे । नहीं, जिसके लिए बीस वर्ष भट्टी में जलता रहा हूँ, लोगों के उपहास के लिए, उसको किस भांति प्रकट करूं। समय पर सक्रिय सहानुभूति आज के युग में कहाँ मिलती है ! अंजना के जिस सुख-सौख्य के लिए, यह उत्पीड़न आज तक भोगा है, उसी को नष्ट कर देना होगा। लेकिन आज ऐसा लगता है कि उसके जीवन को सुखमय बनाने के लिए सत्य की शरण लेना उचित है। वह सत्य जिसकी छाया में जीवन पलता है, जो संसार का, समाज का, इस सब के सौख्य का आधार है। तभी प्रतिमा ने अपने रुग्ण किन्तु संगीतमय स्वर में कहा-"सुनो, यहाँ पायो।" लाला हरचरणसिंह चैतन्य हो गये। आज इस स्वर में वही ऊष्मा थी, वैसा ही कम्पन था, जिसका चिन्तन उनको व्याकुल करता रहा है। मिलन के प्रथम क्षणों में सुनकर जिससे वे एकाएक संगीतमय हो उठे ।
यारमयाग की भूमिका । बाज भी उनकी हत्-तंत्री मनमना उठी, मन का मयूर वर्षा भरे बालों को देव-देख कर नृत्य करने लगा। उन्हें लगा-वसन्त आ गया, दूर अमराई में कहीं कोयल बोल उठी। वे लपक कर प्रतिमा के निकट जा पहुंचे और उसके नेत्रों में एक ज्योति देव उन्हें प्रभूतपूर्व मुख मोर शान्ति प्राप्त हुई, मानो पाधीरता के साय प्रतीक्षा करते हुए किमान को दूर क्षितिज पर वर्षा के लदे काले- काने बादलों की झलक दिखाई दे गयी हो। भावना के मावेश में भाकर वे पलंग पर बैठते-बैठते प्रेम-विहोर हो गरे, उन्होंन पली के निस्तेज पतिवर्ण कपोलों को अपने हाथों खिले हए कमत के सदृश ले लिया । सहसा प्रतिमा के मुख पर उपा की प्रथम किररा की मांति तनिक-सी लालिमा का उदय हुआ । तभी परम माहाद के साथ वे बोले--"अब तो तुम खुश हो । लो, मान मैंने तुम्हारी बात मान ली।" प्रतिमा बोली- लेकिन जी हरता है । कही लालाजी दृढ़ स्वर मे बोले-"नही प्रमो, नहीं ! डरने से काम नहीं चलेगा। प्राज तक हम लोग डरते रहे और कुछ भी नतीजा नहीं निकला। मौत की घाटी में रहते-रहते वीस बरस बीत गये।" प्रतिमा ने अपने गालों पर रखे लालाजी के हाथों के ऊपर अपने हाय रस लिए । एक निवास दवी हुई सिसकी बनकर उसके कंठ से निवन गया और सीधे लालाजी के अन्तस्तल मे वाण की भांति घस गया। वह बोली-'पता नहीं, क्या होनहार है ?" साताजी भुक और हृदय की समस्त प्रमानुभूति को अपने तपित अपरों में मंचित कर उन्होने एक प्रेम-चिह्न अपनी पत्नी के तप्त मस्तक पारित कर दिया। फिर सात्वना देने के लिए उन्होंने कहा--"दो-चार दिन में ही मैं सब टीमकर संगा। मैं पहले पूरा पता लगानी -- आत्मत्याग की भूमिका सुन ले । अगर उसे पसन्द पा गया तो मैं इस सम्बन्ध को चरितार्थ करने में जान लड़ा दूंगा।" . किन्तु उन्हें स्वयं ही अपनी योजना पर विश्वास न था। कोई पग उठाने के पूर्व उसके परिणामों का चिन्तन वे प्रायः कर लेते थे । अत: उन्होंने बात बदलने का निश्चय किया। हाथ हटाकर वे सामान्य स्थिति में बैठ गये और वोले-'तुमने दवा पो। देखो, मैं बलवन्त को बुलाता हूँ।" उन्हें क्या पता था कि दवा की शीशी की एक छोटी गिलसिया लिए अंजना कितनी देर से परदे के पीछे खड़ी हुई, इस दृश्य को देख रही है। वह जानती थी कि इस चर्चा से प्रमुख सम्बन्ध उसी का है। अन्त में जब उसने अपना नाम सुना तो उसके मन में कौतूहल जाग उठा--- मैं भी क्यों न देख-सुन लूं? किन्तु किसे ? तत्काल वह अपने पिता का अर्थ समझ गई । एकान्त में भी उसका मन बारक्त हो उठा। वय ने चुटकी ली, यौवन ने गुदगुदा दिया। आँचल से ढके वक्ष की ओर उसने दृष्टि डाली, फिर उसे और भली-भांति ढक लिया । तदनंतर उसने पर्दा हटा कर कमरे में प्रवेश करते हुए कहा- दवा का समय हो गया अम्मा, लो, चुपचाप पी लो। अभी मैं दलिया बनाकर लाती हूँ।" गिलसिया में दवा की एक खुराक निकाल कर उसने प्रतिमा की ओर बढ़ा दिया। लालाजी ने सहारे से उसका सिर तकिये से तनिक ऊँचा उठाया और अंजना के हाथ से गिलसिया लेकर पत्नी के अर्घखुले मुह में दवा डाल दी। वह खाली गिलसिया हाथ में लेकर जैसे ही चलने को उद्यत हुई, वैसे ही लालाजी बोले-"मेरे लिए एक प्याला कॉफ़ी भी बना लेना।" अंजना ने उत्तर में कहा-"अभी लाई पिताजी ।" और वह अल्हड़ मृगी की भांति कूदती हुई कमरे के बाहर निकल गई। दोनों पति-पत्नि मंत्र-मुग्ध हो उसे देखते रहे। तभी प्रतिमा ने -- भात्मत्याग की भूमिका उनके हाय को दवा दिया । उन्होंने घूम कर पत्नी को भोर देखा । प्रतिमा के नेत्रों से मांसू बह रहे थे, किन्तु वे सदा की भांति पीड़ा के न थे। एक पावन संतोप से उनका हृदय भर उठा । फिरोड़ा के यहां से लौटकर सेठ मुरली मनोहर सीधे अमिता के कमरे में जा पहुंचे। वैसे यदा कदा ही वे अपने मकान के उस हिस्से में जाते थे। जब भी वे उघर से निकले थे तो उन्होंने उसका द्वार वन्द ही पाया या । कमरे के भीतर वे कई वर्षों से नहीं गये थे। उन्हें अपने धनों से ही फुरसत नहीं थी । किन्तु जब उन्होंने अपनी प्राशा के विप. रांत उसका द्वार खुला देखा, तो वे पाश्चर्यचकित हो गये । कमरे के अन्दर पग रखते ही उन्हें प्रतीत हुआ कि वे ऐसा स्वप्न देख रहे हैं, जिसमें सम्भव भोर असम्भव का अद्भुत समन्वय है । चकिन-विस्मित-दृष्टि से उन्होंने देखा कि अमिता सिर झुकाये, प्रोसे मूंद कर भगवान कृष्ण के चित्र के सम्मुख, प्रार्थना कर रही है। वे झट वापस लौट गये और अपने कमरे में बैठ कर विचार मग्न हो गये। भव प्रश्न उठा-क्या फिरोजा ने झूठ बोला। लेकिन जो दिखाई देता है वही वस्तुत: सत्य नहीं होता। -फिर भूठ बोलने का पया लाम? -~-कुछ न कुछ बात तो अवश्य होगी। मेटजी के मन में पाया कि वे अपनी पत्नी मनोरमा से इस सम्बन्ध में बात करें। लेकिन पली के साथ उनके सम्बन्ध अच्छे न थे परती दुवंपा के कारण उन्हें उमके माय समझौता करना पड़ा - पनी के मरण प्रादीनं मन में मुरा का संचार हो उठा।
८२ प्रात्मत्याग की भूमिक , 1 -- मन में आया-ऐसी मां . की संतान से यही आशा है । अपने ड्राइव रामू के साथ मनोरमा को देख कर भी वे क्या कर सके थे ! अब तो वह रामू को एक उपपति के रूप में रक्खे हुए हैं। वह अमिता का ही पक्ष लेगी ! चोर-चोर मौसेरे भाई । लेकिन मैं अपने घर में अमिता के इस आचरण को पनपने न दूंगा विवाह के बाद वह जाने और उसका पति । मेरे मत्थे पर तो कोई कलंक न लगेगा। अच्छा, मनोरमा की भांति उसके लिए भी, मैं कोई प्रबन्ध कर तो'..? लेकिन फिरोजा तो कहती थी कि उसे नित्य नवीनता का रोग है । उफ़, अपनी पुत्री के लिए ऐसा प्रबन्ध करना कितना घृणित कार्य ! पर यथार्थ का पता कैसे लगे । क्या उससे पूछना उचित होगा ? तभी एक विचार उनके मन में पाया। उन्होंने तुरन्त चम्पा को बुलाया । जव से चम्पा का विवाह हुआ था, वह इसी घर का नमक खा रही थी। बड़े-बड़े उतार-चढ़ाव उसने देसे थे । वेतन के अतिरिक्त सदैव उसे ऊपरी प्राय रही है । पहले तो बहुत अधिक थी क्योंकि सेठ जी के सात बहनें थी किन्तु वे सब उसके यौवन काल की बातें थीं । वृद्ध हो जाने पर भी उसे काफ़ी आमदनी हो जाती थी। उसके आगे-पीछे कोई न था । रुपयों की कमी न थी। लेकिन उसकी तृष्णा नहीं मिटी घो। कोठरी में कई कनस्तर विभिन्न आकार-प्रकार के नोटों से भरे होने पर भी, जब तक वह नित्य उनमें कुछ वृद्धि न कर लेती उसे चैन न मिलता, सर में भयंकर पीड़ा होने लगती । सेठ जी के पिता से तो कभी-कभी कुछ पा जाती थी। बुढ़ापे को सन्तुष्ट करने लायक रूप- योवन तो उसके पास था, किन्तु सेठ मुरली मनोहर के चढ़ते योवन को उसका शिथिल गात न लुभा सका, फिर वे अपने पिता की अमानत का भी विचार रखते थे। जब वृद्ध चम्पा आकर उनके सम्मुख खड़ी हुई तो वे क्षरण भर उसे
।
..
मात्मत्याग की भूमिका
देखते रहे। एक विराट प्रागंन के माय उन्होंने अपनी गंजी पी जेब में
तिजोरी की चाभी निराली पोर ममीप दीवार में सुनी हुई दड़ी-मी
विजोरी मोल दी। नोटों के मोटे-मोटे बण्डल निकान पर वे बड़े मनो.
योग में अपने मामने एकत्र करने लगे।
तभी उन्होंने फिर मार उठाकर चमा की पोर देना। वे उनी
तृष्णा में परिचित थे । उमे रिसारित नेत्रों में नोटों को प्रोर पान.
पूर्वक देने की भंगिमा मे वे ममझ गये कि पृष्ठिभूमि का निर्माण हो
गया है।
उन्होंने ग्निा किसी प्रकार की भूमिका दार्थ टनने प्रश्न रिया-
"मुंह बन्द रसने के लिए तुम्हें काफी रूपया मिलता है । फिर भी लो
और लो!"
कपन के माय ही उन्होंने पहले एक महडी, फिर दूसरी उसके मुंह
को तय कर फेंक दी।
चम्पा अवाक रह गई । इतने पर भी जब उसने उन्हें तीसरी गड्डी
उठाने देवा, नो वह बोली-"मैं गंगी नहीं है।"
नेट जी बोरे- 'मो में जानता हूँ । सच-सच बतानो मुन से दिर
कर कमी पोई पर में पाता है।"
चम्पा ने धीरे में कहा-"हो ।"
रोद जी ने गक गही मोर उठाकर उनकी पोर फैली पोर पूछा---
"कोन माता है ?"
चना ने कहा-"यह मैं नहीं जानती।"
सेठ जी ने फिर एक गड्ढी और उदास दी और कहा-"निगो
पारा माना है ?"
धमा ने अपने पैरों के पास जमीन में पड़ी हुई गहियों को पोर
देवा पोर पहा-"कोई एक नहीं पाता । बदल-बदल कर विटिया
रानी मपने साय ताती हैं । लेकिन चाय पीकर सब चले जाते हैं। पार
गही पर होते हैं योर बहूरानी तो पाप जानते ही है। सति में
आत्मत्याग की भूमिका
11
कथन के साथ ही वह अपने पोपले मुंह को जरा दवा कर ही
।' करती हैन पड़ी। उसकी हंसी ने सेठ जी के मन में बम का-मा
स्फोट कर दिया। किन्तु उन्होंने कुशल व्यापारी का परिचय दिया।
यमको परिधि न लांघने दी।
शान्त स्वर में बोले-"नोट उठायो।"
चम्पा की वांछे खिल गयीं । उसने झुक कर गड्डियाँ उठा ली और
जाने की मुद्रा में सेठ जी के आदेश की प्रतीक्षा करने लगी।
जय सेठ जी ने देखा कि उसने सब गड्डियाँ उठा ली हैं तो वे
बोले-"घर रख दो।"
चम्पा पर तुपारापात-सा हुआ। उसे जीवन में कभी ऐसी निराशा
नहीं हुई थी। उसके मुख पर एक कुटिल मुसकान नृत्य कर उठी ।
उसने कहा-"यहां रख दूं।"
किन्तु उसने रक्खा नहीं।
सेठ जी बोले----"चम्पा, मैं सोचता हूँ कि तुम्हारी जुवान हमेशा
के लिए वन्द कर दूं।"
कथन के साथ ही उन्होंने अपने अत्यन्त विश्वासी सेवक को मावाज
दी-"कन्हई।"
यह कन्हई उनके निजी कक्ष के द्वार पर सदैव उपस्थित रहता
पा। वह परदा हटाकर झट अन्दर मा गया ।
सेठ जी ने लक्ष्य किया कि चम्पा का मुख अज्ञात आशंका और डर
से पीला पड़ गया है। वे बोले-"इस औरत की जुबान बन्द करना है
फन्हई । इसका गला काट दिया जाय या केवल जीभ काट लेने से काम
चल जाएगा।"
चम्पा गिड़गिड़ाती हुई सेठ जी के कदमों में झुक कर बोली
"दया करो वच्चा, मैं वादा करती हूं कि मेरा मुंह बन्द रहेगा । बड़े से
का ख्याल करो। मैं तुम्हारी मां के समान हूँ !"
।
..
मारमत्याग की भूमिका ८४ पने नना की वकालत की। वह बोला--"जाने दीजिए सर. कार, पर इसके मह में कुछ न निकलेगा।" कई का यह कपन उनकी प्रामाविल था । पब उनके समक्ष क्षमा करने के अतिरिक्त कोई अन्न पारा न पा । प्रत्येर नौकर इम प्रकार के कार्य नहीं करते । उन्होंने एक मिनट तक उन दोनों को देना पोर पायु के हिमाव से वे तुरल समझ गए । काहई फे मनोमाव उगके नेत्रों में कलक रहे थे । यो: तो यह दोनों एक दूसरे में प्रेम करते हैं। सेठ जी बोले--"कन्हई, मैं जानता है कि यह एक हिगाव रो तुम्हारी औरत है । इसीलिए मैंने तुम्हें बुलाया भी, वर्ना मैं गद या किनी मोर के द्वारा इसे टिकाने लगा देश फिनी को पता भी न लगता। पर कि तुम मेरे पास मादमी हो और मैं तुम्हें दुखी नहीं देश समता, इसीलिए मैंने ऐमा छ न कर के तुम्हें युलाया है। तुम जमानत मो तो मैं इसे छोट।" पन्हई अत्यन्त गम्भीर स्वर में बोला-"मैं वादा करता हूँ कि पर इनके मुंह से पुध न निकलेगा । मे सावधानी लिए मैं एक उपाय बताता है । इगकी कोठरी में जितने कनस्तर हैं ये मव नोट पोर रेन. गारी से भरे हैं । यही हम दोनों के जीरन भर की गई है। मे माप अपने कब्जे में रम में । वग, इसी गरमी निकल जायगी। गाने को तो गरकार के यहाँ हम दोनों को मिलता ही है, मिट्टी ठिकाने लग ही पायगी । हमारे और कौन वंठा है जो पानी देगा । सेकिन सरकार यार रहे. मेरे गाने में भी एर. भेद है।" गेठ मुरली मनोहर फथन मुनकर तनिक गम्भीर हो गये। उन्हें बुद ऐमा लगा कि शीतन हिमगिला में भी एक गाता निकर रही है। पर मेरा ये महगे ऐमी धमकी गुन कर अपमान से उनका तभी कन्हई फिर बोला-"योगान हो जार, इमलिए मार भी उमे जान लें नो मच्दा है । इगी में हम नीनों की भला।
आत्मत्याग की भूमिका ते. यह भेद मेरे सीने में छिपा है । बड़े-सेठ और सेठानी तो रहे नहीं । लेकिन मैं अभी भी प्रमाण दे सकता हूं।" विरक्ति प्रदर्शित करते हुए सेठ जी बोले-"वोलो । आज मैं सब सुनने के लिए तैयार हूं।" कन्हई बोला-"चम्पा तुझे वह जगह-मालूम है जहाँ मैंने रुपयों का कलसा गाड़ा है; और उसी के नीचे प्रमाण भी गड़ा है।" सेठ जी बोले-"जब-मैं सबूत मांगू तो देना, तुम वात-बहुत करते हो कन्हई, इसीलिए मैं तुम्हारा भी मुंह बन्द करने के फेर में है।" कन्हई बोला--"अब हम दोनों के मुंह तो हमेशा के लिए वन्द हो गये ।.वस एक ही बात बतानी है, हम दोनों की ओर से आप अपनी आँख बन्द कर लें । सच पूछो तो आपके शरीर में मेरा ही खून ।" सेठ जी पर मानो वज्रपात हो गया हो ! एक पल मात्र के लिए उनके नेत्र मुंद गये। उन्होंने सदा अपनी माँ को देवी समझा और मन ही मन उनसे अत्यन्त स्नेह और प्रेम करते रहे । उनके देहान्त के बरसों वाद बाज भी उनके मन में मां के प्रति वही भाव बने थे। अचानक संसार के ऊपर से उनका विश्वास उठ गया। अब उन्होंने निश्चय किया कि वे अपने वंश की बिगड़ी हुई परम्परा को सुधारेंगे । अव सेठ जी बोले-"ज़रा अमिता को भेज दो।" दोनों समझ गये कि साक्षात्कार का समय समाप्त हो गया । अमिता जब कमरे में पाई तो उसने देखा कि सेठ जी मसनद के सहारे अांख बन्द किये लेटे हैं। अमिता को पिता द्वारा बुलाये जाने पर आश्चर्य हुआ था किन्तु खुली तिजोरी और नोटों की गड्डियाँ देख कर उसका कौतूहल चरम सीमा पर जा पहुंचा। वह बोली-"हां, पिता जी।" सेठ जी ने दिना आँख खोले कह दिया--"बैठो।" जब यह वै० गई तो वह उठे और नोटों को पुनः तिजोरी में कैद करके चाभी को अपनी गंजी की जेब में रखने के पश्चात् उन्होंने-पुकार मात्मत्याग की भूमिका कर मादेश दिया--"कन्हई ! एक प्यासा पार !" अमिता के लिए यह मय परयोगिन पा । घटनामों की मना कुछ इस भौनि तिमी हुई पो कि वह स्वयं को भी गुरपी को गुम- मान म मममयं पौ। सेट जी बोले- "देवी बेटी, मूठ बोसन ने कोई साम नहीं । निस राह पर तुम पल रही हो, यह मुझसे दिसी नहीं रही, नो पब मैंने निश्चय किया है कि तुम्हारा विवाह ही कर ₹ 1 तुम मुद मवानी हो, पढ़ी-लिंगा हो, इसलिए गादी के बाद तुम्हें मही रास्ते पर चलना है। 'उनी में मची मुग है । अयं तुम कभी कल न जाना । मैं गर्व कुछ ठीक कर दूंगा। किमी प्रकार की चिन्ता न करता जापो, म पाराम करों।" पमिता को ऐना प्रतीत पा मे किसी ने उसके गर्गर का मस्त रन घूम लिया है । उगे प्यान पाया कि राकेश ने स्वयं विवाह का प्रस्ताव किया होगा । और क्लब में प्रथम मिलन मे लेकर कल राति तक का सम्पूर्ण विवरण वतापा होगा । तभी नो पिता जी विवाह कर 'दने का निर्णय प्रकट कर रहे हैं । उमी ने सय में प्राण गम्मा को होने 'पाली नट मम्बन्ध मे बनाया होगा । मंन्च किमी की पोर प्रमिता का ध्यान भी नहीं गया । फिर इस घटनों में यह फिरोजा को में जोड़ती । वास्तव में यही उमको मनो. कामना थी, जिमको गपूर्ति इतनी मरलता से होगी, उसने कभी सोग नया। जब उठ कर जाने लगी तो उगका हृदय प्रत्यन प्रसन्न था । उसे प्रतीत हा कि उसके हृदय पर रकमा हमा पत्पर अपने पार हट गया । भविष्य की सुंगंद परिकल्पनाओं में कुलाचे भरती हुई जब यह कमरे में बाहर निकली तो उसे क्या पता था कि भविष्य तो प्रन्धकारमय गहर में उसे घमीट लिए जा रहा है। वह बाहर निकली भोर कन्हई पाय को पाना है
No text on this page.
पारमत्याग की भूमिका में सफल हो गई। उस समय तक वह काफी चतन्य हो गया था। सुरा का प्रभाव तो उस पर था, किन्तु उसे मादरता में मुप-चुप को पेतना यचेप्ट पी। पाना के विपरीत राकेश ने जब कमरे में अमिता को न देखा तो, इमे निरागा हुई पोर उमने फिरोजा मे प्रश्न किपा-"अमिता कहाँ फिरोजा को उसकी मनोदशा पर माश्चर्य हुमा । यह अपने जीवन में इस प्रकार के व्यक्ति ने पहले कभी नहीं मिली थी । उनका परिचय तो वासना के क्षुद्र, अति-मुद्र उन कोहों में पा, जो सदा अपनी तुप्पा पूरा करने के फेर में रहते थे। उने आशा थी कि एकान्त में पाकर राकेश स्वयं ही उसके ऊपर डोरे डालना प्रारम्भ करंगा, जैसा कि मन्य मभी व्यक्ति करते रहे हैं । उसने मन-ही-मन राकेश के चरित्र की प्रशंसा भी, फिर यह भी सोचा-बड़ा अनाही है ! वह कुछ मुस्करा कर बोली-"अमिता भी था जापगी । यहाँ कितनी देर इतवार करती । उसे क्या मालूम था कि तुम इतनी जल्दी आ जाओगे। अभी फ़ोन करती हूँ।" राकेश सोफे पर बैठ गया । उमने दृष्टि ठाकर कमरे का निरी- सरए प्रारम्भ कर दिया। तभी फिरोजा ने कहा--"जब तक ममिता नहीं आतो तुम्हें इन्त- जार तो करना ही है । चाय का एक दोर हो जाय या तुम्हारे लिए एक पेग रम पेश करूं।" कपन के माय ही वह उठ सड़ी हुई। मद यह उमको तीन दृष्टि में देसती हुई सोच रही थी कि मपनी स्वार्य-सिटि के लिए पर दोन सा पग उठाया जाय? राकेश बोला-"मैं शराव नहीं पीता, मेरा मतलब यह है कि मुझे उसको भारत नहीं है । साय-संग में पड़कर करब में थोड़ा पीना सीस लिया और माज अकेनेरन से पवड़ाकर मैंने सबकी देखा-देनी आत्मत्याग की भूमिका - 'आर्डर भी दे दिया । लेकिन तमने ध्यान नहीं किया कि बोतल लगभग भरी ही थी, मैंने अंधिक नहीं पी थी। मैं उसका सेवन अधिक कर ही नहीं सका । उस समय भी मैं सचेत था और इस समय भी मैं नशे में नहीं हूँ।" 'वास्तव में उसे कुछ ऐसा प्रतीत हुआ कि फ़िरोज़ा के इस कथन का अर्थ उसे शराबी सिद्ध करता है । मानव स्वभाव है कि वह अपने दुराचरण में भी औचित्य सिद्ध करके अपने दोप से मुक्ति पाने की चेष्टा करता है, इसमें उसे सफलता प्राप्त हो या न हो, कम से कम उसके हृदय में तत्काल उत्पन्न भ्रम की शान्ति तो स्थापित हो ही जाती है। किन्तु उसका कयन सुन कर फ़िरोज़ा के मन में उसके प्रति कोई श्रद्धा नहीं उत्पन्न हुई। इसके विपरीतं उसने सोचा अगर यह नशे में 'धुत होता तो उसे अधिक आसानी होती। अब वह बोली-"मैं जानती हूँ कि तुम शरावी नहीं हो । मैंने तो 'इन्तजार की परेशानी को कम करने के लिए यह प्रस्ताव किया था।" कयन के साये ही वह उसके समीप सोफे पर बैठ गई और सधे हुए अभ्यास द्वारा उसने एक सुनियोजित ढंग से साड़ी का आँचल हटा कर अपने पुष्ट-मांसल वक्ष का निखिल सौन्दर्य; जिसका आभास लोकट ब्लाऊज की परिधि के झांकते भाग से अनायास प्राप्त हो जाता था, राकेश के सम्मान में प्रस्तुत कर दिया । ज्यों ही राकेश की दृष्टि उसके वक्ष-प्रान्त पर जा पड़ी, अचानक उसकी कल्पना ने उसका सूत्र विगत रात्रि से जोड़ दिया । उसके मन में एक आकांक्षा ने जन्म ले लिया । तभी उसकी दिग्भ्रमित दृष्टि वहाँ से हंट कर दीवार के सहारे विछे हुए पलंग पर जा पड़ी । मानस-पटल पर अमिता और उसका कमनीय कलेवर चित्रित हो गया। तथा उसके नासापुट तक में अमिता के तन को सुगन्ध बोलने लगी। फिरोजा ने उसकी दृष्टि में उत्पन्न आकांक्षा की ज्योति-पुंज को देखा । उसे पलंग की ओर मग्न दृष्टि से देखते हुए वह अपनी सहज ।
No text on this page.
No text on this page.
मारमत्याग की भूमिका भी गमप देना । गोली पहले मारसा, पात गर में फरता।" नवाब रोशन बोले-"मय मापने भसली सानदानी मागियो की सी यात की है।" फिरोगा ने रोते हुए कहा-~"माफ मारो प्रग्या मिया, भापको ग्रसती हो गई है। मसल में हम एफ ड्रामे के रिहर्सल ये मालम में थे।" भूपतलाल दानिय पी भांति बोले-"फिरोजा तो अभी यम्मी है। बच्चों से कोई भूल हो जाती है तो उसे गोली तो नही मार दी जाती। फिर यह भी मुमकिन है कि उसका कहना सही हो।" नयाव रोशन के मस्तिष्क में एक नया विचार पाया। वे बोले-- "दोनों अपनी गलती मान कर, विवाह कर लें तो मैं उन्हें माफ कर सकता है।" फिर राकेग की और उन्मुस होकर कहा--"दामा में हमेशा प्रसती पेलता रहा हूँ घरपुरदार ।" भूपतलास पो प्रतीत हुमा कि वे जीती हुई वाजी हार गये हैं । यह तो ये नहीं चाहते थे। उनकी इच्छा तो प्रतियोष की थी। ऐसा प्रति. पोप जिममें राकेश को कड़ी सजा मिले। उन्होंने पंतरा यदना मोर कहा--"मगर यह तो हिन्दू है।" फिरोजा सोर रही पी-पन्या मियां का प्रस्ताव कुछ ऐमा त्रु नहीं है। अगर इतनी मल्पमात्र सजा देकर उनको सन्तोप हो जाय, तो इस माफत से छुटकारा मिले । बाद में तो तलाक का रास्ता खुला - यह वीसी-"मुझे मन्जूर है भन्दा मिया ।" कपन के साथ ही उसके मन में पाया--से भी मेरे लिए इसमें पन्छा सोहर मिलना कठिन है। पर राकेज मुस्थिर पा । प्राणों का संक्ट मिटते ही उसकी प्रपर दुटि चैठन्य हो गई । से प्रामास हुपा कि यह एक मुनियोजित पट्यत्र है । गवाव नाहर पा मागमन भी उसी का एक अंग है। नयाव माद ने पहा-"मैनेजर साहब एक जान-कजात नही ६४ आत्मत्याग की भूमिका देखता । वैसे मेरा अकीदा तो यह है कि दो दिल आपस में मिलते हैं तो सुद-ब-खुद निकाह हो जाता है । अव राकेश वोला-.-"आप लोगों को ग़लतफहमी हो गई है। यहां मैं अमिता से मिलने पाया था। उसके साथ मेरा विवाह होने वाला है।" भूपतलाल को क्रोध आ गया । वे बोले-'सेठ मुरली मनोहर की लड़की की शादी तुमसे होगी, एक मामूली क्लर्क के साथ, जिसके. घर में दो वक्त का खाना भी नसीब नहीं है ! झूठ वोलते नहीं पाती ! एका शरीफ लड़की को बदनाम कर रहा है, अावारा हुए शर्म भी कहीं का !" नवाब साहब वोले-"वाफ़ई बड़ा मक्कार प्रादगी मालूम होता है। इसी ने मेरी बेटी को बहकाया होगा।" राकेश बोला-"पाप विश्वास कीजिए मैं सच कहता हूँ।" नवाब साहब कुछ संजीदगी से बोले---"हाथ कंगन को पारसी क्या ! मैं अभी फ़ोन करके सेठ गुरली मनोहर से पूछ लेता हूँ।" इतना सुनते ही वह तपाक से बोला-~"अभी सेठजी को कुछ नहीं मालूम है । यह बात तो हम दोनों के बीच...।" उसका कथन पूर्ण भी.न हुआ था कि नवाब साहब ने आगे बढ़कर उसके गाल पर एक चांटा जोर से जड़ दिया और वे सिंहगर्जना के साथ बोले--"लड़कियों को बहका-फुसलाकर गुमराह करता है, लुच्चा कहीं का, बदमाश!" फिर वे भूपतलाल की पोर घूम कर उनसे अपनी बन्दूक छीनने लगे और उसी भांति उच्च-स्वर में बोले-"मैं गोली मार दूंगा । छोड़ो जी, बन्दूक छोड़ो। अपनी इज्जत पर डाका डालने वाले को मैं जिन्दा नहीं रहने दूंगा।" भूपतलाल बोले-"मैं यह नहीं कहता कि आप डाकू को राजा न दें किन्तु ऐसा कुछ न करें कि आप खुद फंस जाएँ । जरा धीरज रखिये। श्राप पर मुकदमा चलेगा और उसके दौरान जो बदनामी होगी उसका भात्मत्याग की भूमिका भूमिका भी तो स्थान रखें!.बेचारी फिरोजा के माथे पर जो पतंक सग जायगा । उमे पाप कभी घोन पायेंगे।" मय तक फिरोज़ा भी मानमिक रूप में पूर्ण स्वस्थ हो गई थी। डाक पोर डाके के सन्दर्भ में उसे सूट के माल का ध्यान पाया। मूत्र मिलते ही वर बोली-"पन्या नियो, मैं कुरान गरीफ की धमम माती हूँ कि मैं...। मापने तो सुद ही देगा है कि हम लोग मनग-अलग थे, और पसल में एक सीन की इमेज पर वहस कर रहे थे।" नपाय साहब बोले-"मगर इस मादमी का भरोसा किया जाय ! बटी. गनीमत हुई-कि मैं माया, वर्ना यह तो जोर-जबर्दस्ती जरूर करता। फिरो देवो.तो जरा, ये- मेठ मुरली मनोहर की लड़की को भी बदनाम कर रहा है । इमको तो ऐमो सजा मिलनी चाहिए कि फिगो की इज्जत पर डाफा, डालने वालो के लिए एक मिसाल कायम हो जाय । कौन कह सकता है कि कल यह मुझे बदनाम न करेगा।" भूपतलाल ने उन्हें भड़काने के प्रयत्न से नवाव साहब यी प्रोधाग्नि मे माहुति डाली। वे बोले-"मैं तो सोचता हूँ कि यह लड़किरों से रपये ऐंटता होगा। जरा सोचिये नयाव साब, पाज को महंगाई मे जिसगी मामदनी डेढ़-दो सौ हो, वह पलव में बैठ कर मला दाराव पी सकता है ! मुस्किल में प्रभी साल भर इसे नौकरी करते हुमा है । फाम मांगने पाया था तो रोता था। प्रव रईस वन रहा है। इसे तो पुलिम में दे देना चाहिए।" नवाव माह्व चकित स्वर में बोले-"मच्दा, ये शराब पी रहा पा! ठीक है मैं मभी पुलिस को फोन करता हूँ। मगर फिर सदनामी...?" भूपतनाल ने तुरन्त रामाधान उपस्थित किया । ये बोले- 'एफ. भाई पार० में यह लिखा देने से कि हम दोनो तो फाटक के सामने टहलते हुए शिकार का मा प्रोग्राम बना रहे थे। इतने में मार उरा-मा पादिया और फिर ये भट से मेरा पसं निकाल कर भागा तो हम
६
आत्मत्याग की भूमिका
गोगों ने पकड़ लिया। मैं गवाही दे दूंगा। ऐसे आदमी को सजा
मेलना जरूरी है।"
नवाब साहब की समझ में बात आ गयी। उन्होंने तुरन्त रमजान
को
बुलाया
और थाने फोन करने का आदेश दिया।
राकेश अपनी सफाई में चिल्लाता रहा, किन्तु किसी ने न सुना ।
फिरोजा ने इसका प्रतिवाद तो किया किन्तु दवी जुवान से । वह अपने
को इस आग की लपटों से दूर रखना चाहती थी।
जब नवाब साहब ने कमरे के वाहर चलने के लिए कहा, तो राकेश
को एक क्षीण-सी आशा किरण दिखाई दी। उसने सोचा-अगर वह
यहाँ से बाहर न निकले तो इन लोगों की योजना विफल हो जाय ।
अतः वह सोफे पर बैठ गया ।
नवाब साहब भी कम चालक न थे । वे समझ गये कि वह वाहर
क्यों नहीं जा रहा है। अत: उन्होंने भूपतलाल से कहा-"ज़रा हाथ
लगाइए मेहरवान, इस हरामजादें को धक्का देकर लॉन में डाल ही
फलतः राकेश का मन उत के तन की अपेक्षा अधिक घायल हो
सुका था। जब उसकी पीड़ा उसे सहन न हुई तो वह अचेत हो गया !
उसे पता भी न चला कि उसे कव वाहर लॉन में पहुंचाया गया, कब
पुलिस आयी और कब वह थाने पहुंचा दिया गया।
अचानक राकेश को ऐसा लगा कि कहीं दूर से कोई उसका नार
सेकर पुकार रहा है।
अव उसकी चेतना वापस पा रही थी। तन में पीड़ा की एक ग्रा
उठी और वह अर्य-चेतनावस्था में कराहने लगा। उसी के साथ उ
मस्तिष्क में भय उत्पन्न हो गया। उसे आभास हुआ कि अभी भी हा
- मात्मत्याग की भूमिका में अपनी बन्दूर लिए नवाब गाहब उगके मम्मुम गडे हैं । उमने पररा कर मासें पोली। उगे यह देखकर पाइन इपा कि वह एक व पर लेटा है और बाती हम पहने रानीप मेज पर बैठा हुमा दरोगा किमी शक्ति मे मन्द स्वर में युध यात कर रहा है । यह पौधे ने उस पति को नहीं पहचान पाया। लेकिन उगो पाम मोनते-विचारने का न तो ममय पा, न उसकी मनोदशा ही उग स्तर के अनुर प यो। अपने को पाने में पाकर उनके मन में क्षोभ और परमाद का एक प्रमुा समन्वय धा । तन की पोस भूल कर यह प्रपमान की ज्याला में जल रहा था । उमफे मन में पाया ---प्रब ग जीवन में क्या गेप रह गया है ? मगर जेन में चको पीम कर यापम भी भा गया, तो उसे भविष्य में अपने ममीप कोन पाने देगा ! मैं अपने कर्मों का फल पा रहा हूँ। नारी के रूप-जाल में फंस कर में विवेक सो बैठा । मैंने ऐमा पाप किया है कि सम्पूर्ण जीवन में रौरव नस की भीषण अग्नि में जलता रहूं तो भी मेरा प्रायश्चित पपूरा रहेगा । एक जन्म पपा, जन्म-जन्मातर तक मैं प्रायश्चित करू, तो भी मेरा उद्धार नहीं होगा। लेकिन इस अपमान कारण मेरे प्राण को नहीं निरुसे? मगर मैं मर जाऊँ तो किमी से कम-गे कम पांच न पुरानी पड़ेगी, ताने तो न सुनने पड़ेंगे। -और पिताजी को मेरी इम दमा का जब पता चलेगा तो उसके कार क्या बीतेगी.! मारा गांव कहेगा-"वाह पुजारी जी, मच्दा साना पदा रिया।" उमने फल्पना में देखा कि वह जेल मे वापम मापा है। गांव के गर-नारी के समूह में पड़ा है। मय पगात्मक पर में उनको मोर अंगुली उठा कर कह रहे है-पाइये ब्रह्मचारी जी ! हमें भी पादुका पूजा करने राप्रपर दीजिए। एक-एक फरसे उसने उन गमुदाय प्ररक अस्तिका मुरदेसा । वे गव यही है जो एक गमप उपरी ६८ आत्मत्याग की भूमिका - प्रशंसा करते थे और उसे गाँव समाज का अादर्श मानते थे। उसे लगा जैसे कोई उसके हृदय को अपने पैरों से कस कर कुचल रहा है, रौंद रहा है, मार रहा है ! उसके मुंह से एक ग्राह प्रतिध्वनित हुई और वह चीख उठा- "नहीं.."नहीं !" उसका स्वर सुनकर सब लोग उसकी ओर दौड़े। अव उसके आश्चर्य की सीमा न थी । उसके सम्मुख लाला हरचरण सिंह खड़े थे। लाला जी ने उसके समीप जाकर उसके मस्तक पर हाथ रख दिया और अत्यन्त प्रेम से वोले-"मैं जानता हूँ। तुम ऐसा काम नहीं कर सकते । दरोगाजी की भी यही राय है । दुखी न हो, भगवान की बड़ी कृपा समझो, जो तुम्हारी जेब में यह परना मौजूद था, जिस पर तुमने मेरा नाम और फोन नम्बर लिख रखा था। अब सब ठीक हो जायेगा । अभी घर चलते हैं वादशाहो।" कथन के साथ लाला हरचरण सिंह ने अपनी जेब में हाथ डाला, उसमें से पर्स निकाला । उसे खोलकर दस के पाँच नोट दरोगा जी की ओर बढ़ाते हुए उन्होंने कहा-"नवाब साहब को मैं समझा लूंगा। आप पर कोई भी आंच नहीं आने पायेगी । इसकी मिठाई मंगा कर सिपाहियों का मुंह मीठा करा दीजियेगा।" कथन के साथ ही उन्होंने नोट मेज़ पर रख दिये । दरोगा जी ने जब नोटों की झलक देखी तो उनकी आंखों में एक चमक उत्पन्न हुई, किन्तु सिपाहियों का नाम सुनकर मुंह का स्वाद विगड़ गया । वे झट बोल उठे-"मगर वो मिल के मैनेजर साहब...!" लाला हरचरण सिंह राजनीति से दूर अवश्य थे, किन्तु जीवन के पैतरों की उछाड़-पछाड़ खूब समझते थे। अब उन्होंने सौ रुपये का एक नोट निकाला । उसे पूरा खोला, फिर उलटा-पलटा कर, यत्नपूर्वक बड़े मनोयोग से चौपरता तह लगा कर, उन्होंने उस नोट को दरोगा जी की जेब में अपने हाथ से घर दिया । उसके पश्चात् वे बोले-~-"याप बच्चों मात्मत्याग की भूमिका ममना, के लिए मिटाई से लीजिएगा । मामिम्पर भूमनलाल पा प्रश्न मो जय कोई रिपोर्ट ही नही होगी, तो कोई भी पृपग पर राकेगा।" सम्पूर्ण व्यापार को राकेश धुपचाप देख रहा था । उसके मन में पाया-संसार में कृष प्रच्छे पोर पुजारमा पति भी गैप है । पौर उन्हीं के पुण्य प्रताप से यह पयोदन पमियान में भी गिर है मन्यया प्रद तक रगातल में चली जाती। फिर लालाजी जव उगे सहारा देकर मानो बार की भोर से धमे, तो यह योला-"मालाजी मेरे पर पापने बड़ी कृपा की है । लेकिन अब मुझे जाने दीजिए। मेरी मनोदशा ठीक नहीं है। पान पारन होते तो पता नहीं में किस पाट उतरता । मापने कम-मे-पम मुझे चोर नहीं दग यात को मैं अपनी मन्तिम परी तक याद रसगा।" भावना के उद्वेग से उसफा कट प्रवस्म हो गया पोर नेत्रों से जल पी धार वह निकली। माना जी को प्रांग भी गीली हो गयी। उन्होंने उसे अपने वक्षसे लगा लिया और वे बोरे-"इस घटना को भून जापो । इसके बारे में किसी गे कभी बात मत परना। प्रय मेरे साप पलो । यहाँ पर सभी चीज का नजान हो जाएगा। प्रकले दवा-दारू के लिए तुम कहाँ मारे-मारे फिरोगे । जिद नही अच्छी होती बादशाहो।" विवश होकर लालाजी के गाव गफेग को जाना पडा । राह में कवन एकही विचार पा कि यह मिल की नौकरी छोड़ दे, क्योकि यहां भूपतगाल से भेंट होने पर ये न जाने कौन-सा कदम उठायें। अधिक नहीं तो सबके मामने चोर व गिरहाट सिद्ध करने में तो कोई कसर न उठा रखगेंगे। तानाजी रासो मर क्या कहते रहे, उस मोर उसका ध्यान न गया। मौर लानानी ने भी गौर नहीं किया कि यह उनकी बातें नहीं सुन रहा है । उनने तो उनकी दृष्टि में अपने दो पायं श्रोता पहले ही प्रमाणित पर दिया था।
१०० प्रात्मत्याग की भूमिका - जब अमिता अपने कमरे में पहुंची, उस समय उसको हृदय में विचित्र प्रकार का मानन्द था। उसने सोचा-यानन्द के इस रूप की ओर तो कभी मेरा ध्यान ही न गया था। आज तक मिलन की उत्कंठा एवं प्रतीक्षा के प्रानन्द से वंचित रही । आज पता चला कि विवाह से पूर्व लड़कियों के मन में अपने भावी पति के लिए अनजाने में क्या भाव पन्न होते हैं। अब उसे ध्यान पाया कि यह कामरा, जिसे बचपन से मैंने अपना समझा, जहां के प्रत्येक करण में, मेरे सपनों की प्रतिछाया अंकित है, सदा के लिए छूट जाएगा। अव मेरा नवजीवन प्रारम्भ होगा। मैं वासना में लिप्त, झूठे भ्रम-जाल में फंसी, मृग-मरीचिका के पीछे भागती रही । पर वास्तविक सुक्षों के महल के द्वार पर राकेश ने ही मुझे पहुंचाया है। मुझे उसके अन्दर प्रवेश कर अपने सुख-संसार का निर्माण करना है । अच्छा, राकेश के परिवार में और कौन है ! उसके बारे में तो मैं कुछ भी नहीं जानती । उसने अपने या अपने परिवार के सम्बन्ध में कभी कोई चर्चा नहीं की। लेकिन मैंने पूछा ही कहाँ ? पता नहीं उसकी माँ का स्वभाव कैला है ? उसके माता-पिता का मेरे प्रति व्यव- हार कैसा होगा? तभी ध्यान आया-उहूँ ! मुझे संसार में किसी अन्य से क्या लेना देना है ! आज के युग में नारी को अपना घर-संसार पृथक् वसाने की पूरी छूट है । लेकिन यह विचार मेरे मन में क्यों आया? इसका अर्थ तो यह हुआ कि मैं एक मां से उसके पुत्र को अलग कर के, उनके वीच में दीवार बनकर खड़ी हो जाऊँ। इसमें तो किसी को सुख नहीं मिल सकता । यह परिवार का विघटन है। कल जब मेरा अपना परिवार होगा और अपने जिस पुत्र के लिए जीवन पर मैं अनन्त सुख की कामना करूंगी, जिसको देखकर में फूली-फूली फिरूंगी, खुशियां मनाऊँगी, परम सुखी होगी, अगर वही मेरा पुत्र अपनी पत्नी के कारण मेरा परित्याग करे, मुझे भूल जाय, तो उस समय, वृद्धावस्था में मुझे कितना दुख - मारमत्याग की भूमिका नहीं ! मैं अपने व्यवहार से मिद कर दूंगी कि में पाद पत्नी और मादशं यह हूँ! रामेश के परिवार का प्रत्येक सदस्य मेरा अपना होना । मैं अपने सारा मगर को अपना माता-पिता गमभूगी, उनके भाई बहन मेरे भाई-बहन होंगे। राग तो मुझ से प्रेम करता ही है । म मनी से प्यार करूंगी तथा उन्हें प्रत्येक प्रकार के प्रनिदान के लिए विग पर दूंगी । उसके कमरे में चम्पा ने जब प्रवेश किया, उस समय वह अपने गिरों में इस कदर डूबी हुई थी कि उसने उसकी उत्तेजितमाया फो और ध्यान न दिया । पुछ देर तक चम्मा यों ही पैठी रही। वृद्धा- यस्था में सभी को प्रवृत्ति पर्मोन्मुरा हो जाती है । यौवन के मद मे टुवा हमा हृदय भोग पौर लिया के पयायं का दांग पारने के बाद, पत्र जीग के वास्तविक मर्म को समझता है, तो उसके हृदय में परचाताप पधाः उठता है। मान कन्हई ने उसको जीवन रक्षा की थी। मय उनी गमझ में पूर्णरूप से पा गया था कि धन-संग्रह में पुष मुन नही है। वैसे भी एक सीमा के याद पन का महत्व कुछ नहीं रह जाता। उसने सोचा-"मैंने लालच में पड़ कर सदैव पाप दिया है। मैं प्रकार से कुटनी का कार्य करती रही हूँ। कितनो के जीवन नष्ट किये है ! सदा मने विश्वासघात किया है, और पमो भी करती रही है। मेरे भरोरो पर ही तो पड़े सेठ जी ने गयको छोड दिया पा। मुझे माग भी याद है, उन्होंने कहा था--"देख पम्पा, ये पर तेरा है। लर बच्चे सब तेरे हैं । अाज से तू ही इनको देश-भाल करेगी।" उस समय मेरे मन में मापा या~यह माना कि ये मेरी कोष से नहीं जन्मे पर मौत के बच्चे भी तो पपने ही होते हैं। -पर न जाने पर मेरे मन में लालच पंसा हमा। फलस्टर में एका पाद एक नोटी का प्रम्बार जमाने सगी। उफ्, मेरे साजन ने एका ये याद गगी को मार्ग पर चलने की प्रेरणा दी, कि मुझे उस १०२ पात्मत्याग की भूमिका -- राह को सदैव के लिये वन्द कर देना था। लेकिन मैं तो उनकी सहा- यता करती रही। पैसे के लालच में उनका मार्ग-प्रशस्त करती रही। अभी तक वही कर रही हूँ। मैंने ही इस अमिता को भी प्रकारान्तर का मार्ग दिखाया है । पर मैं रक्षक की जगह भक्षक बन गयो । मैं नारी नहीं, पिशाचिनी हूँ। सच पूछो तो सद्गति तथा परलोक की ओर मेरी कभी दृष्टि ही नहीं गई । आज मेरे पाप का घड़ा भर गया । कन्हई पुण्य-प्रताप से प्रारण- रक्षा हुई। सब कुछ जानते हुए भी सेठ जी ने मुझे ही यहां भेजा, मेरा विश्वास किया । अव में विश्वासघात नहीं करूंगी ! -कन्हई ने जो कुछ कहा, उससे तो अब मेरा दोहरा नाता स्थापित हो गया। अमिता मेरी अपनी पौत्री है। मैं उसे कुमार्ग पर न कभी चलने दूगी । जिस जगह आंख खुले, वहीं सवेरा होता है । उसके मन के उद्गार, उसकी आँखों में भादों की गरजनी-उफनती नदी की भांति उमड़ आये और उसकी उत्ताल-उन्मुक्त तरंगे वांध तोड़ कर, समस्त संसार को जल-प्लावन करने को व्याकुल हो उठी। तभी सहसा चम्पा का ध्यान, फोन करने के लिये नम्बर घुमाती हुई अमिता की ओर चला गया। उसकी आत्मा ने ऐसी कुछ प्रेरणा दी कि वह उठी और उसने जाकर फ़ोन के यन्त्र पर हाथ रख दिया । उसके इस कृत्य का अर्थ सहसा अमिता न समझ पायी उसके जीवन में यह प्रथम अवसर था, जब किसी ने ऐसा करने की धृष्टता की थी। अपने स्वभाव के अनुसार उसे क्रोध आ गया। उसने दृष्टि उठा कर चम्पा की ओर देखा । किन्तु उसके मुख पर अनजाने, नितान्त अपरिचित भावों का विकल नृत्य देख कर स्तव्य अवाक रह गयी । चम्पा ने उसके नेत्रों में छिपे विस्मय और मूक प्रश्न को देखा और समझा। वह पहले कभी ऐसा करने का विचार भी नहीं कर सकती थी। किन्तु आज स्थिति कुछ भिन्न थी । पहले वह एक सामान्य नोक- रानी थी, किन्तु इस समय वह एक जागरूक नारी थी-जो मां थी, मात्मत्याग की भूमिका दादी थी। प्रब यह सानची नहीं थी। प्रय था यात्मल्प, मन्तान के प्रति मोह. उसको मलाई की कामना, उसके हित में प्राण उत्मगं कर देने की सलका स्नेह के साय, भावना मे प्रोत्-प्रोत वाणी में पम्पा बोली- "देगो येटा, मैं तुम्हारी दादी के बरावर है। मेरे कहे का बुरा न मानना। वैसे पाहे जो तुम समझो मौर करो, मैं मना नहीं करती। तुम गुद समझदार हो।" अमिता ने जरा-सा मुसकराते हुए कहा-"मैंने भी तो तुमको गदा यही समझा है । यचपन से लेकर मान तक जब भी कोई कष्ट हमा, मैं तुम्हारे पास ही तो दौड़ी हूँ। मगर यात पया है ? तुम बहुत परेशान मासूम होती हो। मुझे यतापो, मैं उसे दूर करने की कोशिश भय पम्पा के लोन-लोग से गम्भीरता प्रस्फुटित हो रही यो । वह बोली-"येटी, जीवन में मुस सभी चाहते हैं । लेकिन नारी को सच्चा मुप सपने मन के भीतर की याहो में मिलता है। रोज नये-नये मादमी के साथ रात बिताने से मन को मुग नहीं मिलता, तन को भले ही मिल जाय । लेकिन जवानो के साथ ये तन के साथी भी टूट जाते हैं। अपनी गिरिम्ती में, अपने मादमी के प्यार में जो सुख मिलता है, उगके मागे धन-दौलत कुछ भी नहीं है ।" अमिता के मन में पाया कि यह कह दे--यही तो मेरा भी विचार है । उसने पम्पा को मधूरी बात काट कर बीच में अपनी पात कहने के लिये जैसे ही मुंह सोला कि चम्पा ने उसे चुप रहने का सकेत कर - दिया। पम्पा दर से पायें प्रोर इधर से उपर गर हिमाती हुई योमती ही रही-"नही, बीच में मुझे टोको मत । पान मैं पूरी बात पहेगी । जिस रास्ते पर तुम पल रही हो यह गसत है। पाप करने से मुरा नहीं मिसता, पापो को तो नरफ पी भाग में जलना होता है। मुम्हारी कोई १०४ आत्मत्याग की भूमिका बात अव में नहीं मानूंगी। कान खोल कर सुन लो आज से कोई भी लड़का चाय पीने के लिए तुम्हारे कमरे में न आये। अगर किसी को तुम लायीं, तो मैं उसके हाथों पर चाय के पैसे घर कर, उसे बाहर से भगा दूंगी। शायद तुम्हें मालूम नहीं कि सेठजी को भी इन बातों का पता है।" अमिता बोली-"मुझे मालूम है । तू फ़िकर न कर । अव कोई भी इस कमरे में नहीं आयेगा । अगर कोई आया भी तो वह मेरी मांग में सेन्दूर भरने के बाद ही आयेगा।" भावना के आवेग में विफल चम्पा ने अमिता को अपने सीने से लगा लिया। उसे भान हुआ कि वह अपनी पोत्री को विवाह के पश्चात विदा कर रही है। उसके नेत्रों से आंसू टपकने लगे। तव हर्प-विह्वल होकर अमिता बोली-"कल जो आये थे मिस्टर... अरे वही जिनके लिए तू चाय के साथ नमकीन मठरी लायी थी, उनको पिता जी ने पसन्द किया है । सच बताना, तुम्हें कैसे लगे।" लपना से अमिता का मुख लाल हो उठा। राकेश का नाम उसके कंठ से न निकला । वह प्रायु का भेद भूल गयी और चम्पा से सली की भांति बातें करने लगी। भाग्य की प्रवंचना ! अमिता ने राकेश को मन ही मन पति के रूम में मान लिया। पिता के संकेत से मिथ्या अर्थ लगा कर वह भ्रम में पड़ गयी। फलतः उसने अपने जीवन में ऐसा विप घोल लिया। जिससे उसे जीवन भर व्यथित, पीड़ित और कुंठित रहने की आशंका सदा पीड़ा पहुंचाती रही। लाला हरचरण सिंह के बंगले में पहुंचने पर जव राकेश कार से उतरा तो निकट से सितार के मन्द स्वरों को प्राणमयी झंकारें आकर पारमत्याग की भूमिका उसके कानों में मुधा-वन करने सगी । वह वहीं दालान में एक सम्वे के महारं सडा हो गया । उगे प्रतीत हुना, पाशा के स्वर मानो साकार हो उठे हैं । इतंत्री मोत हो उठी। उसकी दृष्टि मनायाम मामने लॉन पर जा पड़ी, जहाँ माली ने अपने कुगल हादी से प्रकृति-नटी को बड़े उत्साह से सजाया-संवारा था। उग लगा कि वे छोटे-छोटे फूलों से लदे पौधे नटसट बालको का समूह है जो यहाँ चाँदनी रात में सेलने-कूदने के लिये अपने-अपने घरों से पुपके से भाग पाये हैं। उसे अपने बचपन का स्मरण हो पाया । गांव के दे प्यारे सलोने मीठे दिन । अब उसके मन में कोई पीड़ा न थी, किसी वस्तु को कामना न थी। दूर-दूर तक फैले हुए सरसों के पोले मेत देख कर मन में केवल एक. यात भाती थी कि यह भी पोत-वस्त्र पहन कर योंही लहरा उठे। भय वह सोचने लगा -मुझ में यह परिवर्तन कैसे प्रा गया ? संमार में मुष भी नहीं बदला । सब कुछ वैसा ही है। प्रकृति नहीं वरती, मेग्नि मेरा विवेक से बदल गया ? -शुरू में ही टोकर लग गई। पता नही मैं मंजिल तक किस भौति पहचूंगा? -प्रारम्न में कुछ सफलता प्राप्त होती तो प्राशा बनती कि मैं पपने मभियान में सफल हो जाऊँगा। --मुझे अपनी भूल सुधारना होगा। एक वार गलती होना स्वाभाविक है, किन्तु उसकी पुनरावृत्ति दोष है। वह किसी भांति क्षम्य मही। उसने निश्चय किया कि वह अपने पथ को बदल देगा। तूफ़ान मोर बवंडर में बहेन्बहे पेड़ समून उसड़ जाते हैं। लेकिन कोमल लता पर कोई प्रमर नहीं होता । उसका हृदय बोला-~-तुम झूठी शान में मत आत्मत्याग की भूमिका तूफ़ान का सामना करो। सफलता स्वयं तुमको गले लगा लेगी। उसका हृदय-कमल खिल गया। सारी पीड़ा, समस्त अवसाद दूर हो गये । उसे अमिता का स्मरण आया। एक सुवास से उसका मन- प्रान्त भर गया। उसने दिवा-स्वप्न-सा देखा-वह एक पहाड़ की ढलान पर लड़- खड़ा कर गिर गया है। अनन्त कठिनाई से साथ उठ कर खड़ा हुआ है। अभी भी उसका क्षत-विक्षत शरीर स्थिर नहीं है, वह डगमगा रहा है । एक ओर असफलता का असीम गह्वर है और दूसरी ओर सफलता का उत्तुंग शिखर। अव उसके मन में पाया कि कहीं उसे दिशा भ्रम न हो जाय । इसी स्थल से सफलता की राह भी है और असफलता की भी। उसकी आत्मा चीख उठी और वह बोली-~~-मार्ग की कठिनाइयों से न डरो राकेश ! साहस के साथ परिस्थिति से लड़ो और उन्हें अपने अनुकूल बना लो। सहारे के लिये उसके कन्धे पर हाथ रक्खे लाला हरचरण सिंह भी उसके थमते ही रुक गये थे। वे समझे कि वह अपने पांवों की यन्त्रणा के कारण चलने में कठिनाई का अनुभव कर रहा है और दम लेने के लिये रुक गया है । वे भी उसी के साथ रुक गये थे। अब वे वोले- "चलो वेटा, अन्दर चलो, डरो नहीं, किसी को कुछ नहीं मालूम पड़ेगा। तुम अपने घर में पहुँच गये हो । यहाँ किसी बात का खौफ नहीं वादशा हो।" उनके सहारे धीरे-धीरे राकेश ड्रॉइंग रूम की ओर बढ़ा । वे बड़बड़ाते रहे-"मैं हर एक से वला लूगा । फ़िकर न करो। अभी डाक्टर पायेगा। पट्टी बाँध देगा। तुम देखोगे कि एक ही गोली में सारा दर्द दूर हो जायगा वादशाहो।" राकेश चौंक गया। गोली!...हाँ एक गोली में सब दर्द दूर हो जाता । मगर मेरे सीने में वह नहीं घसी । नवाब साहब ने कुछ न कह aam - ।
पारमत्याग की भूमिका कर गोली मार दी होती तो कितना अच्छा होता ! परन्तु यह म्यर-लहरो जो ईश्वर का सन्देग मुना रही है, वह कैगे सुनता। वह सोफे पर सेट गया । नान: वह अपनी पीड़ा, अपमान, वातावरण सभी कुछ भूल गया। यहां तक कि वह मरने को भी भूल गया और प्रारमविभोर हो गम्पूर्ण सन्मयता के साथ स्वर्गीय संगीत मुनता रहा । लाला जी उसकी परिचर्या के लिए साधन एकत्र करते रहे और यह मो गया । कब, कैसे मोर पयो-सका भान उगे न हो सका। प्रय चम्पा माश्यम्न थी। प्रमिना स्य सेठजी से मिल कर पायी थी, दगी कारण वह भी मममी कि इसे अपने मन का मीत मिल गया है। इस बीच प्रमिता भपने भाषी जीवन सम्बन्ध में ही बातें करतो रही। उसने न तो बाहर जाने की कोई इच्छा प्रकट की मार न यह टेलीफोन के पास ही गयी। उन दोनों को सेठजी यो योजना का रंचमान भी पाभास न था। उघर अपने कमरे में सेटजी अपने या एक परिवार को दम विप्रहरी मुक्त करने के सायन ढूढ़ने में व्यस्त थे । एकाएर उन्होंने अपनी पत्नी मनोरमा को बुलाया । उसके पाते ही उन्होंने अपने हृदय को उसके गम्मुग निराकरण कप में रग दिया । बोले-"अपनी तो अन्तिम येना है मनो, जिस मानि कटनी थी, कट गई। लेकिन अब एक समस्या उत्पन्न हो गयी। अमिता विवाह योग्य हो गई है । उसके विपप में भी फुध गोचा है ?" मनोरमा को ऐमा भान मा कि वह अपने प्रारम्भिक जीवन में मा गयी जव चे दोनों उगो भौति बैठ कर पार गी याने परते पे। एक दूसरे से लड़ते, स्टने मोर मनुहारें करते। उसे याद पापा कि पहन दिनों के याद अाज सेठगी ने उसे 'मनो' कहा है।
१०६ आत्मत्याग की भूमिका तूफ़ान का सामना करो। सफलता स्वयं तुमको गले लगा लेगी. उसका हृदय-कमल खिल गया। सारी पीड़ा, समस्त अवसाद दूर हो गये । उसे अमिता का स्मरण आया। एक सुवास से उसका मन- प्रान्त भर गया। उसने दिवा-स्वप्न-सा देखा-वह एक पहाड़ की ढलान पर लड़- खड़ा कर गिर गया है। अनन्त कठिनाई से साथ उठ कर खड़ा हुआ है। अभी भी उसका क्षत-विक्षत शरीर स्थिर नहीं है, वह डगमगा रहा है । एक अोर असफलता का असीम गह्वर है और दूसरी ओर सफलता का उत्तुंग शिखर। अव उसके मन में आया कि कहीं उसे दिशा भ्रम न हो जाय । इसी स्थल से सफलता की राह भी है और असफलता की भी। उसकी आत्मा चीख उठी और वह बोली-मार्ग की कठिनाइयों से न डरो राकेश ! साहस के साथ परिस्थिति से लड़ो और उन्हें अपने अनुकूल बना लो। सहारे के लिये उसके कन्धे पर हाथ रक्खे लाला हरचरण सिंह भी उसके थमते ही रुक गये थे। वे समझे कि वह अपने पांवों की यन्त्रणा के कारण चलने में कठिनाई का अनुभव कर रहा है और दम लेने के लिये रुक गया है । वे भी उसी के साथ रुक गये थे। अब वे वोले- "चलो बेटा, अन्दर चलो, डरो नहीं, किसी को कुछ नहीं मालूम पड़ेगा। तुम अपने घर में पहुँच गये हो । यहाँ किती वात का खौफ नहीं बादशा हा ।" उनके सहारे धीरे-धीरे राकेश ड्रॉइंग रूम की ओर बढ़ा । वे बड़बड़ाते रहे-"मैं हर एक से वहला लूगा । फ़िकर न करो। अभी डाक्टर आयेगा। पट्टी वाँच देगा। तुम देखोगे कि एक ही गोली में सारा दर्द दूर हो जायगा बादशाहो।" राकेश चौंक गया। गोली!...हाँ एक गोली में सब दर्द दूर हो जाता । मगर मेरे सोने में वह नहीं घसी। नवाब साहब ने कुछ न कह ।
पात्मत्याग की भूमिका कर गोली मार दी होती तो कितना अच्छा होता ! परन्तु यह स्वर-लहरी जो ईश्वर का सन्देश मुना रही है, वह कैसे सुनता। यह सोफे पर लेट गया । शनैः शनैः यह अपनी पीड़ा, अपमान, थानावरण मभी कुछ भूल गया । यहाँ तक कि वह मरने को भी भूल गया और पारमविभोर हो सम्पूर्ण तन्मयता साथ स्वर्गीय संगीत मुनता रहा । लाला जी उसको परिचर्या के लिए साधन एकत्र करते रहे भोर वह मो गया। कर, कैसे और क्यों इसका ज्ञान उसे न हो सका। प्रय चम्पा माश्वस्त थी। अमिता स्पय सेठजी से मिल कर पायी पी, इसी कारण वह भी समझी कि इसे अपने मन का मीत मिल गया है। इस बीच प्रमिता भपने भावी जीवन के सम्बन्ध में ही दातें करती रही। उसने न तो वाहर जाने को कोई इच्छा प्रकट को और न वह टेलीफोन मे पास हो गयी। उन दोनों को सेठजी की योजना का रंचमात्र भी माभास न था। उघर मपने कमरे में सेठजी अपने वंश एवं परिवार को इस विग्रह से मुस करने के साधन टूढने में व्यस्त थे । एकाएक उन्होंने अपनी पत्नी मनोरमा को बुलाया । उसके पाते ही उन्होंने अपने हृदय को उसके सम्मुख निरावरण रूप में रख दिया । बोले-"अपनी तो अन्तिम वेला है मनो, जिस मोति फटनी थी, कट गई। लेकिन अब एक समस्या उत्पन्न हो गयी। भमिता विवाह योग्य हो गई है । उसके विषय में भी कुछ सोचा है ?" मनोरमा को ऐना भान हुमा कि वह अपने प्रारम्भिक जीवन में मा गयी जब दोनों उनी भौति बैठ कर प्यार की बातें करते पे। एक दूसरे से लडने, स्टते और मनुहार करले। उसे याद आया कि पहत दिनों से याद माज सेठनी ने उसे 'भनो' कहा है।
प्रात्गत्याग की भूमिका अवरों पर उल्लसित हास विरोर कर यह बोली-"तुमने मेरे मुह की बात छीन ली। कोई लड़का देखा है ?" सेठजी बोले-"नहीं!" मनोरमा बोली-"तो ढूढ़ना शुरू करो । अच्छा वर पेड़ की डाल तो उगता नहीं । साल-दो साल भटकना पड़ेगा। वैसे अभी जल्दी नहीं है।" मेठजी बोले-"तुग नहीं समझोगी मनो। जल्दी है और बहुत जल्दी है।" मनोरमा बोली-"क्या पाहते हो, जी ? मैं कुछ समभी नहीं।" सेठगी ने उसके हाथ पर अपना हाथ रख दिया । मन गंगा के दो किनारों का मिलन-रोतु बन गया। वे बोले-"मेरी उच्छखल प्रवृतियाँ मुझे उसमें प्रस्फुटित होना चाहती है । तुम मुझे हमेशा समझाती रहीं और में अपना मुंह माला करता रहा । जानती हो कल रात को एक लड़का उसके कमरे में पाया था। मैं जानता कि भगवान, मुझे मेरे कर्मों का फल दे रहे हैं । अगर कुछ गड़बड़ हो गया, तो हम दोनों किसी को अपना काला मुह ..? उन्होंने पाक्य को अधर में लटकता छोड़ दिया । सेठजी ने अत्यन्त पुशलतापूर्वक अमिता के कृत्यों लिए अपने को दोष दिया था। मनोरमा को लज्मा की अनुभूति हुई। उसे प्रतीत कि यह सेठजी की प्रवृत्तियों का नहीं, बल्कि उसके दुराचरण का परिणाम है। गां होकर जो श्रादर्श उराने अपने घर में स्थापित किया है उसी का अनुसरण आज उसकी पुत्री कर रही है। इस अनर्थ की जड़ तो मैं हूँ। मैं उसकी मां ..!" सफल व्यापारी होने के नाते सेठजी ना उसके मनोभावों को प्राभास अनायारा मिल गया। अव ये बोले-"जहर खाने से भी छुटकारा नहीं मिलेगा । बेचारी प्रमिता को जीवन भर अपने पाप की गठरी ठोनी पड़ेगी। कुछ समझ १०६ यारमत्याग की भूमिका में नहीं माता, क्या करू?" मनोरमा के हृदय में माता ने करपट ली। वह व्यथा भरी पाद्रवाणी में बोली-"नहीं ! कुछ तो करना ही पड़ेगा । उसको जिन्दगी खराव हो जायगी।" अब सेठ जी ने अपना अमोघ अस्त्र चला दिया। वे बोले-"इसी लिए तो तुम्हें बुलाया है । तुम तो जानती हो कि आज के युग में गर्म- पार का प्रबन्य मासानी से हो जाता है। पैसे से नर्स डाक्टर सभी गहायता मिल जाते हैं।" कथन के साथ ही उन्होंने एक बार पुनः गंजी की जेब से तिजोरी की पानी निकाली मोर उसे मनोरमा की गोद में डाल दिया । परि- स्थिति मी गम्भीरता से यह स्वय परेशान थी। उनके इस कृत्य का कुछ पर उनकी ममझ में नहीं पाया । प्रय सेट जी ने उसकी प्रासों में झांकते हुए कहा-"अब सब तुम गम्हालो । मैं तो गंगा को गोद में जा रहा हूँ । अब तो मरने के बाद ही मान्ति मिलेगी।" फपन के साथ ही ये 'हरिमोदम्' कह कर उठ सड़े हुए और कोट पह्नते हुए बोले-"मुझे माफ करना मनो, मैं तुम्हें इस मुसीबत में भफेला छोड़ कर जा रहा हूँ।" स्थिति की गम्भीरता एव परिणाम स युद्ध करने का साहस तो मनोरमा शायद एक बार करती भी, किन्तु स्वामी को प्रात्मघात के निए जाता देशकर यह छिन्न भिन्न हो गयी। उराने सेठजी का पैर पकड़ लिया और कहा-"मैं तुम्हें परने नहीं इंगो। विश्वास करो सब ठीक हो जायगा।" "?" सेठ का प्रश्न था । वह बोली-"हम लोग प्राज ही गांव चलें। वहीं किसी तरह से जल्दी-जल्दी इसका ब्याह कर दें।" "मगर महका ..?" मेठजी के स्वर से ग्रामास होता था कि उन्होंने मात्मत्यागा भूमि अपने व्यक्तित्व को भूल कर मनोरमा का नेत्रत्व स्वीकार कर लिया है। मनोरमा बोली-"मैं बताती हूं। पहले तुम बैठो तो !" सेठजी वैठ गये तो उसने बाभी को उनकी जेब में रख दिया, फिर कहा-"मेरी राय में वहां कोई न कोई लड़का मिल जायगा । वैसे छंगू लाला का मझला लड़का भी अच्छा है।" "यह सब वाद की बातें हैं। पहले तो गांव चलो। यहीं रहे तो मुझे भय है, कहीं कोई उपद्रव नहो जाय । बड़े घरों की लड़कियों के पीछे सभी लगे रहते हैं । फिर यह तो इकलौती है । मेरी जायदाद, धन- दौलत के लालच में पड़ कर न जाने वह लड़का क्या कर बैठे ! वैसे मैंने मिलने के सब रास्ते बन्द कर दिये हैं, लेकिन सयानी लड़की को घर में कैद करके तो नहीं रख सकते।" स्पष्ट था कि उन्हें गाँव जाने में कल्याण की राह दिखाई दे रही थी। अचानक गाँव जाने की तैयारी से अमिता को आश्चर्य हुआ। राकेश से उसने सम्पर्क स्थापित करने की बहुतेरी चेष्टा की, किन्तु वह न तो फ़िरोजा से मिल सकी और किसी अन्य सहेली से। फोन कट चुका था और बाहर जाने के सभी रास्ते बन्द थे। अन्त में विवश हो वह सेठजी के पास जा पहुंची और बोली- "पिता जी ! एक बार में अपनी सहेलियों से तो मिल लू । हम लोग जा रहे हैं, पता नहीं कब लौटना हो ?" सेठजी मुस्कारा कर बोले-"तुम सब से खुद कहोगी कि शादी के लिए गांव जा रही हो ? वैसे जिससे मिलने जाना चाहती हो, वह तुमसे पहले वहां पहुंच गया है । परेशान न होनों । खाना खा कर अव हम लोग चल देंगे।" अमिता के मन में राकेश के प्रति सहज श्रद्धा उत्पन्न हो उठी । वह सोचने लगी---"वास्तव में वह देवता है। रात्रि में मैंने इनकार कर --- - मानत्याग को भूमिमा दिया, तो उगने स्वयं प्रस्ताव करके मुझे माना बना दिया!' अगर मम्मुग प्रब को गिल मेप न पा । चौक पट के बाद फिर वही पड़ी पा गौ । एब मलिक पीनारदम मानि यातायरण में मान हो गया । राकेा जाग गया। लेकिन पान उसके तम्झिन मन में कोहर नहीं जागा । उमने मांगें सोनी टो देगा कि लालाजी कमरे के बाहर जा रहे हैं। कार चनने. फिरने की प्रतिपनि गुनायी पड़ी। उसके बाद गान्त वातावरण में सीरियों पर रिगी के कार नटने वा म्बर पनित होने मगा । राग ममझ गया कि पर बलयन्त कार पा रहा है । उगने संतस्तान में विगत रात्रि को मारी पटना चिकित हो उठी। सभी महगा उमरा ध्यान गिमिट पर एक विन्दु पर पेन्दिन हो गया । गैपिणी के मिरहाने बेटीएफ गहरी ! तर एक कड़ी मे गरी पो जुटने लगी। मन के बार वन पावट सेने सगे। पर उगे मपनी मां का ध्यान माया। ये भी बीमार परी भी। ताप में पारित नजर पारीर, दुग्गे मन सेकर ये प्रपने अन्तिम समय की प्रतीक्षा करती थी। उपरिचर्या में मनम दंग पर वे दुमी होती थी। कमो पहती-तू यात घोटा है चांद, तेरा प्याह देव पाती ठो यड़ा गुा मिलता । कभी कलीन पक गया होगा। तेरे कोई बहन होगी तो गाना परा देवी। मनीष्टि मनापाम गिरी के पार पाराम की घोर उठ गयी । रात्रि के निविट पन्यार से परिपूर माता पर नदारांकी प्राग-सियोनी मल रही थी!-माने उमे गदा प्यार में पारमहापा। ये प्रायः रहती-गू मरा पर है।
११२ आत्मत्याग की भूमिका माँ की कोई इच्छा पूरी नहीं हुई। ऊपर से दान्त किन्तु अन्दर से अशान्त नारी के मनोभावों को भला कौन समझ सका है ! सहसा उसे याद आया--भैयादूज के दिन वे उदास हो जाती । और उसे स्वयं भी वहन न होने का कितना दुख था । अब उसने सोचा-मेरी बहन होती तो वह भी माँ की बीमारी के समय में इसी भांति इनके सिराहने बैठती तो माँ को कितना सुख मिलता । मैं भी तो आज इतना अकेला न होता । वचपन में खेलने का सायी होता और मैं उसके जीवन में खुशियों की निधियाँ भर देता । ढूंढ़ कर सुन्दर-स्वस्थ वर से उसका विवाह रचाता। विधाता ने मुझे भाई के सुख से वंचित कर दिया । उसे प्रसन्न देखने के लिए मैं कुछ न कुछ करता? अपने हाथों से सजा कर उसे विदा करने के समय मेरी कैसी मनस्थिति होती! अव उसे याद आयो-प्रमिता । साथ ही शरीर में कुछ पीड़ा का आभास हुया । फिर प्रश्न उठा-उसने ऐसा क्यों किया ? -अच्छा, ऐसा भी तो हो सकता है कि इसमें उसका कोई भी योग न हो। उसे कुछ भी मालूम न हो । वह रोज के हिसाब से क्लब में समय पर पहुंची हो और मुझे न पाकर स्वयं इसी प्रकार की उलझनों में फंस गयी हो। मैंने गलती की । समय से पहले क्लब न जाता तो यह काण्ड न होता। लेकिन फिरोजा? उसी ने उसे संध्या की भेंट के सम्बन्ध में बताया होगा । फिरोजा ने तो नवाब साहब के संकेत करते ही विवाह की अनु- मति दे दी । तो क्या वह विवाह का प्रस्ताव करने के लिए ही मुझे अपने कमरे में ले गयी थी ? अपनी सहेली के सुहाग पर डाका डालने का इरादा था! --किन्तु मैनेजर साहव वहाँ कैसे पहुँच गये ? -वे स्वयं फिरोजा से विवाह के इच्छुक होंगे । तभी तो प्रतिस्पर्धी
मनपानी मिसा
रामा व्यहार रहे!
-उन्नोन विवाद में प्रनार का मान का मार्ग में
हटाने के लिए दर ने दास्तार किया। में मन्ये हो गये।
ममी हो दाने हैं। नी हो गया है।
पर उनले मिनरपति मात्र पाानिन में निकाल
माते हैं। निमें उनो हृदय में पान दना लंगा। में उनकी
और दी. और मित्रता में बदल दूंगा।
दाना हनिह ने वन में प्रगरिपाउने सपना देय
कर वे बोरे-"मी दक्दिन है ? रास्टर माया पा। लेकिन तुम सो
ग में । ना बनाता हूँ दादाहो।"
ग ने दे दिमालानी के गुर पर पटा दर के नाय
पार बुध माह एद मामापा चिन्ह है। कुन रात को उब वे
कपर कमरे में निकले थे, टोम गम्य निराला के वादन घारे हुए
पे। इन परिवर्तन पर पाक हमारा यह कौना--"हास्टर की कोई
जमान नहीं है । बदन में दो-माद है, गरे कटी हो जायगा ।"
मानात्री कें-"तो मागे कि पिटारी मिना दूध पी सो।
माय ददन मेगा। उपरे दाद में भोजन ग्रो। मेरिन टास्टर
को दिलाने में कोई नावान नी । मनिए दिग ही नो। मेरे को
पाराम मिलेगा बादशाहो।"
सालानी ने रिमीपर वटामा टायर पुमार नम्दर मिलाया।
रास्टरमा मानना प्रादा देरर वे निस्चिन होरर बैठ गये।
योग नेमगि बन्द रमी । उमेरे ददन में पीहाको नहरें उली
पौर नगरे मन गरी गरीचली।
परवा मोना-"मैं शिम धाग्नि है ! पर नानापा और
पापारा बादन। नाम न पाये। में प्रति तो न
पापम तिो नहीं है।"
उनी म बात पर भी मामानी पर कोई मनाब नदी परा
११४ आत्मत्याग की भूमिका लालाजी बोले-"तुम नहीं जानते । गिरते हैं शहसवार ही मैदाने जंग में। तुम बेकार की बातें न करो। मैं तुम्हारी लगन देखकर बड़ा खुश हूं । एक दिन रंग बदल जायगा । वस डटे भर रहो । अपने-आपको भगवान पर छोड़ दो, सब ठीक हो जायगा वादशाहो।" राकेश को प्रतीत हुया जैसे वह एक बदनुमा रंग में डूब गया है । एकाएक अमिता के व्यवहार का अर्थ उसकी समझ में आने लगा। विवाह के सम्बन्ध में उसके शब्द अपने वास्तविक रूप में प्रकट हुए । मन में ज्ञान-तन्तु उभरने लगे-तुमने एक पुंश्चली से सम्बन्ध स्थापित किया है। अब तुम जीवन में किसी से प्रेम नहीं कर सकते। किसी के साथ विवाह करके उसे अपना झूठा प्यार और कलंकित शरीर अर्पण करोगे ? नहीं अब तुम्हारे जीवन में नारी का प्रवेश- निषेध है । प्रेम तो एक नारी से होता है । तुम स्वच्छाचारी वन जानोगे । उसकी आत्मा का स्वर था-सदाचारी बनो। उसने निश्चय किया कि वह अपना जीवन वासना से दूर रखेगा और भविष्य में सदा स्वेच्छाचारी, आधुनिकायों एवं रवैरिणी से दूर ही रहेगा। हाँ, मैं सब कुछ भगवान पर छोड़ दूंगा। केवल इच्छा से नहीं, बल्कि अपने कर्म से संसार पर विजय प्राप्त करूँगा। मैं साधारण मनुष्य नहीं, असाधारण व्यक्ति बनूंगा। आज मुझे भर्त्सना मिली, तो कल श्रद्धा मिलेगी। उसने सोफे पर ही करवट बदली। स्थान की कमी के कारण शरीर को घुमाने में पीड़ा हुई और वह कराह उठा । वह निश्चय नहीं कर पा रहा था कि तन की पीड़ा अधिक है या मन की! उसने करवट ली और लालाजी ने अपनी राग-माला छेड़ दी। वे चोले-"जानते हो आज क्या हुआ ? मज़ा आ गया बादशाहो।" राकेश ने उनके प्रश्न का कोई उत्तर न दिया। वह मन-ही-मन बोला-हाँ जानता हूँ। भला मैं नहीं जानूंगा। आपने तो केवल प्रात्मत्याग की भूमिका सुना है । मगा आया होगा, अवश्य होगा। दूसरे को जूते परें तो गभी को मडा माना है। अपनी धुन में मगन नासाजी उमकी मनोदमा को नहीं भूले थे। वास्तव में वे चाहते थे कि उसका ध्यान बंट जाप । अत: वे बोले- "वीस साल में प्रान पहली बार तुम्हारी चाची को प्रांगों में मैंने विश्वास और उत्साह को एक ज्योति देखी । जानते हो? नहीं, तुम कुछ भी नहीं जानते ? लेकिन ऐमा पहले कभी नहीं हुआ ! मुझे तो एमा लगता है कि तुम्हारा प्रागमन मेरे लिए बड़ा गम सिद्ध हुमा बादशाही ।" राकेश के मन में वितृष्णा को कुहुक उठी। हो ! क्यों नहीं शुभ सिद्ध होगा! खूब रम लेकर मेरी दुर्दशा का वर्णन हुअा होगा! -अच्छा, तो अपने मनोरजन के लिए ही मुझे यहां लाया गया है। जिमम मब लोग देखें और मुश हो! मेरी दगा है भी ऐमी हो ! किमी पायल पशु को सहानुभूति देना भी मनोरंजक होता है । उसकी चुप्पी में लालाजी पर कोई असर नहीं पड़ा । वे अपने मन के उद्गारों में मगन थे। अब उन्होंने कहा-"मैने भी पाज कमाल कर दिया। न जागं कल से क्या हो गया है ! मैंने संजु को यहीं रोक लिया। तुम्हारी क्या राय है ? ठीक किया न ! यी०ए० काफी है। न होगा तो यहीं किसी कालेज में पढ़ लेगी। लेकिन... लेकिन जो प्राज हुअा, वह पहले भी तो हो सकता था। उहूँ, तुम बतानो ठीक है न बादशाहो।" राफेग के मन में क्षोम की लपटें प्रत्येक शब्द को जला कर भस्म कर रही थी। उसकी समझ में लालाजी का प्रत्येक गन्द व्यंग से परिपूर्ण था। उसके मन में प्राया- वह उठकर चल दे। उसने सोचा कि वह चीख उठे और संसार में घोषित कर दे कि ऐसा क्यों होता है । वह कोई दुराचारी नहीं, चोर नहीं, बल्कि एक सीधा-सादर इनसान है । जो कुछ भी प्राज हुमा है उसमें भी उसक आत्मत्याग की भूमिका नहीं है। वैसे जो कुछ कल हुआ था, उत्तमें भी उसका कोई हाथ न वा । यह तो केवल संयोग है कि वह परिस्थिति का शिकार बन गया । अव उससे चुप न रहा गया। अतः उसने कह दिया-"पहले कैसे हो जाता? होना तो आज था।" एकाएक उसके मन में आया-अगर कल रात इससे भेंट न होती या ये अपने घर न ले आये होते तो कुछ भी न होता। मैं समय से मिल जाता, वहाँ से लौटकर क्लव जाता तो फिरोजा की उपेक्षा अमिता से भेंट होती। विवाह की समस्या चाहे न सुलझती किन्तु इतना अपमान तो न होता। अब उसने व्यंग्यात्मक स्वर में कह दिया--"आपसे पहले भेंट नहीं हुई थी। नहीं तो, जो आज हुना है, वह पहले हो जाता।" लालाजी ने उसके इस कथन को साधारण अर्थ में ही ग्रहण किया। वे तो एक प्रकार से अपने अन्तर्मन से वार्ता कर रहे थे। वों की उलझी हुई गुत्थी का एक फन्दा और खुला। वे वोले-- "कितनी भूल हो गई ! जो आज किया है वही पहले करता तो भी अन्तर न पड़ता। कम-से-कम आँखों के सामने तो रहती। जो स्थिति पहले थी, वही तो आज भी है। वही अंजु है, विलकुल वही । ज़रा- सी भी तो नहीं बदली। वदल तो मैं गया हूँ। जमाना बदलता रहा, उसके रंग-ढंग बदलते रहे, पर मैंने ध्यान ही नहीं दिया। अरे, अभी तक बलवन्त नहीं आया । अव दरद कैसा है वादशाहो?" अपनी धुन में बोलते हुए शायद लालाजी को स्मरण या गया कि भावना के आवेग में वे दहक रहे हैं। मगर राकेश सोच रहा था कि यह मंजू कीन है ! उसे आश्चर्य हुआ पर उसने मौन ही रहना उचित समझा । रहस्यों की परत एक के बाद एक करके उतर रही थी। अपनी उत्कंठा के प्रदर्शन से उसे समाप्त करना उचित नहीं समभा। किन्तु उनके विचारों में एकाएक उत्पन्न परिवर्तन उसने छिपा न रह सका । वह समझ गया कि लालाजी अव सतर्क हो गये हैं। - मात्नत्याग की भूमिका ११७ उनको दृष्टि की ओर देखते हुए उसने सहज भाव में वह दिया-- "मय तो कापी ठीक हूँ।" एक मिनट में ही उसने एक आक्रामक नीति न्दिर कर प्रहार कर दिया। वह बोना-"चाचीजी की माज तवियन कनो है ! उनकी प्रों में जब विश्वास और उत्साह को ज्योति देवी है, तो हमका अर्थ तो यही हुना कि अब वे पहले से स्वस्थ हैं । मैं समनता हूँ कि आपने अंजु को भी इमीलिए रोक लिया। आपने जो कुछ पान किया है, वह पइने कभी नहीं किया ! जो कुछ पान हो रहा है, वह भी पहले नही हुना था । लालाजी, वास्तव में मेरी दगा भी यही है। मेरे जीवन में नी यह सब बाज ही हया है। विधाता ने खूब सोच-समझ कर हम दोनों की जोड़ी मिसाई है।" यह क्या जानता था कि उसका यह प्रहार निप्पल चला जायगा । सानाजी के ऊपर राजेश के कयन का उलटा प्रभाव पड़ा। वे अपना पर सम्हालते हुए उत्साहित हो उठे । उन्होने कहा--"जो घटना जिस समय होती है, वही उसका समय होता है। लो समय हो गया और ढाक्टर साहब नहीं माये । ऐसी हालत में भोजन हो जाय तो? .. क्या स्वाल है वादगाहो?" राकरा ने कुछ उत्तर न दिया। उसे नींद का नौका पा गया और दह मो गया। कार से उतर कर अमिता ने अपने गांव वाले बड़े से मकान में जब प्रवेश किया, उस समय उसे ध्यान न रहा कि मकान में केवल एक ही द्वार है और वह है प्रवेश-द्वार । अन्य सभी लोग उमो में से होकर अन्दर जाते हैं और वाहर पाते हैं। किन्तु उसके प्रवेश करने के बाद उमे मराह से फिर कभी अपनी इच्छा वाहर पाना असम्भव होगा, आत्मत्याग की भूमिका ऐसा मला वह सोच भी कैसे सकती थी ! आस-पास के दो-चार गांव में सेठजी का मकान हवेली के नाम से प्रसिद्ध था। पुराने जमाने में बने मकानों की भांति उसमें नीचे की मंजिल में कोई खिड़की न थी। दीवारें बहुत मोटी थीं जिनमें लगभग छत की ऊँचाई पर छोटे-छोटे रोशनदाननुमा छेद बने हुए थे। कई कोठ- रियों और मामरे तो ऐसे थे, जिनमें दोपहर के समय भी दीपक जलाना पड़ता था। ऊपर की मंजिल में भी कमरों से या छत से बाहर का दृश्य नहीं दिखाई देता था। तहखाना तो इतना विशाल था कि ग़दर के समय में सेठजी के प्रपितामह ने बासठ अंग्रेज़ स्त्री-पुरुपों को उसी में बड़ी सफलतापूर्वक सोलह दिन टिकाये रखा था। इसी तहखाने में एक तरह कई कोटरियां बनी हुई थीं, जिनमें इनके पूर्वज बादशाही युग में अपनी जमा एवं बहुमूल्य सामग्री रखते थे। उस युग में बड़े आदमियों के मकान का जनाना हिस्सा तो जेलखाने के अनुरूप होता था। अतः जब मनोरमा और अमिता अन्दर जा कर विश्राम करने लगी, तो सेठजी ने मरदाने भाग में आकर गद्दी संभाली और भावी कार्य-क्रम के सम्बन्ध में विचार करने लगे। मालिक के अचानक श्रागमन से सोया हुया मकान जाग उठा था। इधर से उधर नीकर-चाकर दौड़ रहे थे। सभी के मुख पर व्यस्तता का भाव था। कोई भी यह नहीं चाहता था कि एकाध दिन के लिए आया हुया मालिक उसे बेकार समझे। एकाएक उनकी दृष्टि दालान के उस भाग पर जा पड़ी, जहाँ जनाने भाग में जाने का द्वार था। उन्होंने लक्ष्य किया कि जितने भी सेवक हैं वे उस द्वार के अन्दर न तो पग रखते हैं और न दृष्टि उठाकर अन्दर की ओर देखने का प्रयास करते हैं। जो भी सामान होता है वहाँ नियुक्त नौगारानियां उसी जगह से सम्हाल लेती हैं। मर्यादा का यह बन्या उन्हें अच्छा लगा। मन में आया-चंचला नारी को लिए वन्धन प्रालयाग की निका पावसक है । कदाधित शी कारण पुरानुन काल में हम नारी को चयन में रखते थे । पर मात्र के युग की दशा "रान, राम ! तनी उन्होंने देखा कि रामू अन्दर प्रवेश कर रहा है । नौर रानियों के नध्य मानो कोई वनमानृप मा गया हो। देसद सहम गई और सभी ने अपने सर पर पड़े पल्ले को दक्ष तक लाँच लिया। महमा उन्हें रोमांच हो पाया। उसके इन प्रकार नीतर जाने का प्रर्य वे जानते थे। फिर न्ट टन्हें परिणाम का ध्यान या गया-कन मारा गांव ही नहीं, आत्मीय-दन्यु पर भी प्रकट हो जायगा कि सेठ मुरली मनोहर के घर में क्या होता है ! एक कुटिल मुसकान से उनका मुन्न आलोक्ति हो उठा। उन्होंने बाहर के मुख्य द्वार की और देवा । पहरेदारों के मर्माप कन्हई सड़ा हुमा नारिपत्र का हुक्का फूक रहा था । उन्होंने उसे पुकारा और आदेश दिया कि वह स्वयं गौवर जाय और अपने साथ रामू को रिवा साये। कन्हई को भीतर भेदने के दो मनियाय थे । एक तो वह भेद दानता या, दूसरे उसके जाने को देखकर लोग इन लोगों का जाना साधारण बात समझ लें और उन पर कुछ दिन ध्यान न दें। कन्हई के अति- रित्त, कोई अन्य व्यक्ति भी ऐसा नहीं था जिस पर वे विश्वान कर मेटनी ने के प्राने ही कन्हई को बाहर क्षेत्र दिया । फिर उमा एक मिनट तक विचारपूर मुद्रा में देन्दते रहं । जव में मनोरमा की छमछाना उसे प्राप्त हो गई थी, उसके मन में सेठी के प्रति सर्या का नाव उत्पन्न हो गया था। उने मन-ही-मन इस बात का बड़ा दुख या कि नव कुछ प्राप्त है, सभी मुत्र उपलब्ध है, किन्तु स्थिति तो एक सामान्य हाइवर की ही है । यदा कदा मनोरमा उने सपा-पना भी देली रहती थी, पर समाज में कोई म्यान न होने का दुब, दमे चैन नहीं लेने देता था। उनकी माता दी कि अगर वह सेठ न बन सके, तं आत्मत्याग की भूमिका ऐसा मला वह सोच भी कैसे सकती थी ! पास-पास के दो-चार गांव में सेठजी का मकान हवेली के नाम से प्रसिद्ध था। पुराने जमाने में बने मकानों की भांति उसमें नीचे की मंजिल में कोई खिड़की न थी। दीवारें बहुत मोटी थीं जिनमें लगभग छत की ऊंचाई पर छोटे-छोटे रोशनदाननुमा छेद बने हुए थे। कई कोठ- रियाँ और कमरे तो ऐसे थे, जिनमें दोपहर के समय भी दीपक जलाना पड़ता था। ऊपर की मंजिल में भी कमरों से या छत से बाहर का दृश्य नहीं दिखाई देता था। तहखाना तो इतना विशाल था कि गदर के समय में सेठजी के प्रपितामह ने बासठ अंग्रेज़ स्त्री-पुरुपों को उसी में बड़ी सफलतापूर्वक सोलह दिन टिकाये रखा था। इसी तहखाने में एक तरह कई कोरियां बनी हुई थीं, जिनमें इनके पूर्वज बादशाही युग में अपनी जमा एवं बहुमूल्य सामग्री रखते थे। उस युग में बड़े आदमियों के मकान का जनाना हिस्सा तो जेलखाने के अनुरूप होता था। अत: जव मनोरमा और अमिता अन्दर जा कर विश्राम करने लगी, तो सेठजी ने मरदाने भाग में आकर गद्दी संभाली और भावी कार्य-क्रम के सम्बन्ध में विचार करने लगे। मालिक के अचानक आगमन से सोया हुआ मकान जाग उठा था। इधर से उधर नौकर-चाकर दौड़ रहे थे। सभी के मुख पर व्यस्तता का भाव था। कोई भी यह नहीं चाहता था कि एकाध दिन के लिए आया हुआ मालिक उसे वेकार समझे। एकाएक उनकी दृष्टि दालान के उस भाग पर जा पड़ी, जहाँ जनाने भाग में जाने का द्वार था। उन्होंने लक्ष्य किया कि जितने भी सेवक हैं वे उस द्वार के अन्दर न तो पग रखते हैं और न दृष्टि उठाकर अन्दर की ओर देखने का प्रयास करते हैं। जो भी सामान होता है वहाँ नियुक्त नोकरानियां उसी जगह से सम्हाल लेती हैं। मर्यादा का यह बन्धन उन्हें अच्छा लगा। मन में आया -चंचला नारी के लिए बन्धन मात्नत्याग को भूमिका ११६ आवश्यक है । कदाचित इसी कारण पुरातन काल में हम नारी को बन्धन में रखते थे । पर आज के युग की दशा.."राम, राम ! तभी उन्होंने देखा कि रामू अन्दर प्रवेश कर रहा है । नौकरानियों के मध्य मानो कोई वनमानुप आ गया हो। वे सब सहम गई और सभी ने अपने सर पर पडे पल्ले को वक्ष तक खीच लिया । सहसा उन्हे रोमांच हो पाया। उसके इस प्रकार भीतर जाने का अर्थ वे जानते थे। फिर झट उन्हें परिणाम का ध्यान पा गया-कल सारा गांव ही नहीं, प्रात्मीय-बन्धु पर भी प्रकट हो जायगा कि सेठ मुरली मनोहर के घर क्या होता है ! एक कुटिल मुसकान से उनका मुख पालोकित हो उठा। उन्होंने यौहर के मुख्य द्वार की ओर देखा । पहरेदारों के समीप कन्हई खड़ा हुमा नारियल का हुक्का फूंक रहा था। उन्होंने उसे पुकारा और आदेश दिया कि वह स्वयं भीतर जाय और अपने साथ रामू को लिवा लाये। - कन्हई को भीतर भेजने के दो अभिप्राय थे । एक तो वह भेद जानता था, दूसरे उसके जाने को देखकर लोग इन लोगों का जाना साधारण याा समझ लें और उस पर कुछ विशेष ध्यान न दें। कन्हई के अति. रिक्त कोई अन्य व्यक्ति भी ऐसा नहीं था जिस पर वे विश्वास कर सकते। सेठजी ने रामू के आते ही कन्हई को बाहर भेज दिया। फिर उमको एक मिनट तक विचारपूर्ण मुद्रा में देसते रहे । जव से मनोरमा की छत्रछाया उसे प्राप्त हो गई थी, उसके मन में सेठजी के प्रति स्पर्धा का भाव उत्पन्न हो गया था। उसे मन-ही-मन इस बात का बडा दुस था कि सब कुछ प्राप्त है, सभी सुख उपलब्ध हैं, किन्तु स्थिति तो एक सामान्य ड्राइवर को ही है । यदा कदा मनोरमा उसे रुपया-पैसा भी देती रहती थी, पर समाज में कोई स्थान न होने का दुःख, उसे चैन नहीं लेने देता था । उसको प्राकक्षिा थी कि अगर वह सेठ न बन सके, तो १२० आत्मत्याग की भूमिक कम-से-कम एक अच्छा दुकानदार तो बन हीजाय । मनोरमा से उसे प्रेम था । एकाध वार उसने नौकरी छोड़ देने और स्वतन्त्र व्यवसाय प्रारम्भ करने के सम्बन्ध में उससे चर्चा भी की थी। पर मनोरमा ने सदैव विरोध किया। उसका तर्क था कि उस दशा में सेठजी उसके घर आने के अपर प्रतिवन्ध लगा देंगे और दोनों कुछ भी न कर सकेंगे क्योंकि समाज के सम्मुख सर उठा कर चलने और अवसर आने पर विद्रोह करने की क्षमता कायरों में नहीं हाती । सेठजी ने आज कांटे से कांटा निकालने का निश्चय किया। स्वाभाविक गति को मोड़कर वे अत्यन्त निलिप्त वागी में बोले- "बैठ जानो रामू । अपने हृदय की पिछले कई वर्षों से मैं एक दुविधा में हूँ। तुम तो जानते ही हो कि मेरे कोई लड़का नहीं है । उस दिशा में मेरे बाद मेरी सम्पत्ति का उत्तराधिकार मेरी पत्नी और अमिता का है।" सेठजी एक क्षण रुके और अपने कथन से उत्पन्न प्रतिक्रया का अध्ययन करने लगे। उन्होंने जान-बूझ कर 'मेरी पत्नी' शब्द का प्रयोग किया था। वे समझते थे कि रामू के मन में अगर सम्पत्ति लोभ न जगा सकेगी तो अहं अवश्य जागृत हो जायगा। उस दशा में मुख्य वस्तुस्थिति की ओर उसका ध्यान नहीं जायगा । फिर भी संशय का समूल नाश करने के लिए उन्होंने कहा-"मेरा स्वास्थ्य ठीक नहीं है । मैंने किसी को बताया नहीं, अाज तुमसे कह रहा । डाक्टरों को कैसर का शक है। वैसे भी उमर का तकाजा है, पता नहीं कब बुलावा पा जाय । इसलिए मैं इलाज के सिलसिले में विदेश जाने की सोच रहा हूँ।" रामू को शिष्टाचार तो निभाना ही था। वह बोला-"विदेश के पहले आप यहां इलाज करा लें । अव यहाँ बड़े-बड़े अस्पताल खुल गये सेठ जी ने सहज भाव से कहा-"कैसर का इलाज तो संसार में नहीं है। यह तो प्रागलेवा बीमारी है । अमिता की शादी करने के लिए स्मत्याग की भूमिका म यहां आये है । लेकिन वह तो वहां से भी हो कर हां माने का दूसरा ही मतलब था। राभू सोचने लगा-कोई खास बात जरूर है ।ले देगी योने-"बात यह है कि मेरे बाद मनोरमा की देजमा जापनी और अगर में अचानक मर गया तो बहुत-नी चिता में भस्म हो जायगी। इसलिए मैं चाहहाई लो। वैसे तो जो कुछ लेना-देना है, वह कई : मनोरमा को ब्लैकमनी के बारे में मलम सामान है उसका विवरण ने माना है। मन ! यहाँ का सब सामान तुमदेव-मन नौ । चाने दोन- पर वह तहखाने के ताले बरहोर में प्रकार से पूरा गौरस धन्दा है। कई बार कर ' में चुना है । खाम कर के जो पन्नियों में हर न हो, कोई ढूंद हो नहीं माना हसर प्रशफियां और मोहरें तीन कर रखी जाती। ने इस मकान को बेच दिया को करोड़ों को नन्दा हो जायगी। व्यापार वगैरह तो कवर दिनदा है। नगरी यहां है ।" - रामू विस्फारित नेत्रो में ध्यानक नव व मन में एक विचार उटामेश्वी के बाद दोन- आसानी से ले लेगा । उस दशा में वह न नी मंदिर वन जापगा। ..मगर सेठ दी के बाद । क्लि नन्हें का भी तो जा सकता है ! मद वह बोला-"हू जी को तो मानूप ही हैं। कान्दी को समझा दौजिए 1 में एक मामूनो डाइदा छ । परदनकर वाहर किया गया तो?" 1 -- .
आत्मत्याग की भूमिका :२२ सकता । मैंने नहीं निकाला, यह तो तुम जानते ही हो और मनो निका- लने से रही।" रामू ने गम्भीरता से कहा- "वाद में मुनीम जी वगैरह गड़- व कर सकते हैं । आप तो जानते ही हैं कि मैं अधिक पढ़ा नहीं हूं। फिर भी कामकाज मुनीम जी के हाथ में है । उस समय भी वही सम्हा- लेंगे। रूपये-पैसे का मामला व्हरा। वे तो चाहेंगे कि बहूजी को वहका कर सब कुछ लूट लें । हिसाब-किताव में उलट-फेर करते उन को कितनी देर लगती है।" सेठजी को आशा नह : थी कि रामू ने भी उस दिशा में विचार किया होगा। वे तपाक से वोले--"मैंने सब प्रवन्ध कर रखा है। मेरी वसीयत देखोगे तो सब समझ जानोगे । मैंने तुम्हें मुख्य-प्रवन्धक बनाया है । इसीलिए तो मैं यहां का भी सब तुमको सौंप रहा हूं। वैसे भी हममें और तुममें कोई अन्तर तो है नहीं । कायदे से मेरे वाद गद्दी तुम्हीं को मिलनी चाहिए।" जादू वो जो सर चढ़ कर वोले । रामू के मुंह से निकल गया-"आपका तो मैं दास हूँ।" सेठ जी ने सर हिला दिया और कहा--"दास हो जाने के बाद कोई पराया नहीं रह जाता । देखो, कार में जो लोहे का काला कैशवक्स है, उसे ले पात्रो । यहाँ की चाभियां उसी में हैं। पुराने जमाने के ताले हैं । तरह-तरह के खटकेदार । दरवाजों में भी बड़े पेंच हैं ध्यान से समझ लो।" कथन के साथ ही रामू उठ कर कार की ओर चला गया। आघ घंटे बाद जव सेठजी तहखाने से वाहर लाये, तो वे अके थे। किसी ने रामू को उनके साथ जाते नहीं देखा था और वे जानते कि उसकी चीख-पुकार भगवान के सिवा कोई नहीं सुनेगा। पुरानी जंगखायी बड़ी-बड़ी चाभी का गुच्छा कैशवाक्स में रख वे पूनः लेट गये। अब उनका ध्यान अमिता की ओर चला गया।
मात्मत्याग की भूमिका १२३ नित्य की भांति लगभग पांच बजे राकेश की अखि खुल गयी । ड्राइंग रूम में अपने को अकेला पड़ कर उसे कुछ आश्चर्य हुमा परन्तु समय की ओर ध्यान जाते ही वह समझ गया कि उसे सोया हुया देकर लालाजी भी विश्राम करने के लिए चले गये होंगे। चारों ओर स्तब्धता का साम्राज्य छाया था। प्रातःकालीन चिड़ियो के कलरव के अतिरिक्त कही से कोई शब्द, ध्वनि या खटपट भी सुनाई न दे रहा था। अब उसे ध्यान आया-अपनी नौकरी का । विश्रामदायिनी निदा ने न केवल तन को पीड़ा हर ली थी, अपितु मन भी एक सीमा तक स्वस्थ हो गया था। विगत दिवस का अवसाद केवल स्मृति के रूप में एक घाव बनकर टीस रहा था। किन्तु विवधाता के सम्मुख दराने अपने को समर्पण करने का निश्चय किया । वह उठ कर वडा गया । एकाएक उसकी आत्मा ने उसके सनक्ष एक प्रस्ताव रखा--'अपने को भूल जानरे । भावना में डूब कर जीवन नष्ट हो जाता है । दिन में तो तुम एक क्लर्क मात्र हो । फिर पाने काम पर जानो। रहा मैनेजर साहब का प्रश्न, सो तुम उनसे मिल कर स्थिति का स्पष्टीकरण प्रस्तुत कर देना । ऐसा मत सोचो कि हर व्यक्ति बुरा ही होता है। प्राज नहीं तो कर, तुम्हें उनका सामना करना ही पड़ेगा । पर ध्यान रक्खो सत्य से भाग कर मनुष्य कहाँ जा सकता है । एक बार गाँव से भाग कर यहाँ पाये । अब यहां से भागकर किसी दूसरे शहर में जाने पर भी कौन कह सकता है कि ऐसी ही कोई अन्य परिस्थिति न उत्पन्न होगी। यहां से भी भागोगे! तुम्हें तो यही पर रह कर अपनी स्थिति बनानी है।' साथ ही ध्यान आया-'अमिता ! हाँ अमिता को प्राप्त करने और अपनी प्रात्मा, हृदय और तन के कलुप को धोने के लिए भी तो यही रहना है !' उसके कण्ठ से एक निःश्वास निकल गया। फिर सहसा उसका हाय कालवेल की ओर बढ़ गया। किन्तु स्विच तक पहुँचते-पहुंचते १४ मात्मत्याग की भूमिका -- सका विचार बदल गया । सम्भव है उसे लालाजी न जाने दें! मिल से नौकरी छोड़ने का र्थ तो यही होगा कि मैं लालाजी के टुकड़ों पर निर्भर हो जाऊँ! अब राकेश ने अत्यन्त दृढ़ता के साथ क़दम उठाने का निश्चय किया । उसने जैव से फाउन्टेन पेन निकाला और वहीं डाइंग रूम में पड़े हए साकी कागज के लिफाफे को उठा कर एक ओर से काट कर फैलाया और लालाजी को सन्देश लिखने बैठ गया। कुछ क्षण तक वह सेन्टर टेवुल पर विछे हुए कागज को यों ही देखता रहा फिर उसने लिखा : आदरणीय लालाजी, छ वजने वाले हैं। आप विश्राम कर रहे होंगे। इसलिये मैं कष्ट देना उचित नहीं समझता। मेरी स्थिति तो आपसे छिपी नहीं है। मुझे सम्पूर्ण निष्ठा के साथ जीवन के प्रति अपना कर्तव्य निभाना है। इसलिये मैं जा रहा हूं। कल ड्यूटी पर नहीं गया था, लेकिन आज तो ऐसी कोई बात नहीं है जिसके कारण न जाऊँ । आप चिन्ता न करें। मेरी तवियत विलकुल ठीक है। आपके विशाल हृदय में किसी एक कोने में मेरे लिए स्थान है इस दात से मुझे बड़ा बल मिलता है । मैं आपको कभी नहीं भूल सकता । मेरे जीवन के एक संघर्षमय क्षण में आपने सहायता दी है। अब मैं स्वयं संघर्ष में कूद रहा हूँ। मैं भाग नहीं रहा हूँ । विना भेंट किये चले जाने का मुझे दुःख है । लेकिन पाप रोक न लें, इसीलिए इस समय चुपचाप जा रहा हूँ। अब मैं रविवार को संख्या को आपसे मिलने आऊँगा। पूज्यनीया चाची जी से मेरा प्रणाम कहने की कृपा करें। प्राशा है, पाप क्षमा करेंगें। सदा आपके आशीर्वाद का इच्छुक, राकेग मित्र। . - प्रात्मत्याग की भूमिका १२५ उसी जगह को छोड़कर राकेश कमरे से बाहर निकला। दरवाजे को चिपकाकर बन्द कर दिया मोर दालान पार करके लॉन में पा गया। सूर्योदय हो गया था । हलकी-हलको धूप ऊँचे-ऊँचे पेड़ों से छन कर विखरी हुई थी । उस प्रातःकालीन धूप की उप्रणता उसे सुखकर लगी। एक क्षण के लिए एक कर उसने चारो ओर दृष्टि फेरी। क्यारियों में डाल से विखरकर यत्र-तत्र पखुडियां गिरी हुई थीं। अचं-विकसित एवं पूर्णविकसित पुष्प मन्द पवन के झोंको में सहराते और नवजीवन का सन्देश प्रसार अपनी मादक मुगन्ध के रूप मे दूर-दूर तक फैला रहे थे। वह मुस्करा उठा । वह भी तो विखर गया था । तो प्राज वह पुनः विकसित होगा। यही तो प्रकृति का विधान है। स्वच्छ वायु में उसने कई वार तम्बी-लम्ची सांसे भरी। मानो वह अपने अन्तराल में उत्पन्न क्षोभ की राडाघ को स्वच्छ वायु से शुद्ध कर रहा है । फिर उसने लोहे का जालीदार फाटक खोला और सड़क पर निकल कर दृढ़ कदमो से चलने लगा। जिस रामय घर पहुंचा तो दरवाजे पर वन्द ताला पोलते समय उसे ध्यान पाया---'सालाजी को शायद यहृत दृस हो ! मैं वहां से भी तो दस बजे ड्यूटी पर पहुँच सकता था। निमिप मात्र में सभी कुछ पुनः प्रांखों के सामने से घूम गया। लालाजी की सवेदनशील सहृदयता और प्रात्मीयता के स्मरण मात्र से एक सिहरन-सी अन्तराल में थिरकी। जल से धुंधले हो पाये नेत्रो से उसने द्वार खोला और जेब से रूमाल निकाल कर पोद डाला। अन्दर आते ही वह सब कुछ भूल गया और उसने यत्रवत् दैनिक कार्य प्रारम्भ कर दिया। कपड़े बदल कर उसने स्टोव जलाया और समयाभाव का ध्यान करके भट से दो मुट्ठी चावल में अन्दाज से मूंग की दाल मिलाकर चढ़ा दिया। स्नान से निवृत होकर उसने प्रतिदिन मिल मे जाने वाले कपड़े पहने और खिचड़ी खाकर ठीक समय पर घर से निकल गया ।
पात्मत्याग की भूमिका अपनी सीट पर जाकर जब वह बैठा तो उसके चेहरे को देखकर किसी को भी विगत दिवस की घटना का तनिक भी याभास न मिला। थोड़ी देर वह यों ही फाइल उलटता-पलटता रहा । आज उसका ध्यान अपने सहधर्मियों की ओर न गया। न उसने उनके हंसी-मज़ाक में ही कोई हिस्सा लिया । मन-ही-मन वह भूपतलाल से भेंट होने की कल्पना कर रहा था । तरह-तरह के कथोपकथन की कल्पना करते-करते उसका मन किंचित् उद्विग्न हो गया । अव उसके मन में पाया कि इस संशयात्मक स्थिति को समाप्त करने का एकमेव यही रास्ता है कि वह स्वयं जाकर भूपतलाल से भेंट कर ले । दूसरा एक लाभ, जिसकी ओर उसका ध्यान चला गया, यह था कि उनके अन्य कोई कार्यवाई करने से पहले स्थिति का खुलासा हो जाने से किसी को भी कुछ पता न चलेगा। हाल में टंगी हुई घड़ी में ग्यारह बजने वाले थे। भूपतलाल के कार्यक्रम से वह परिचित था। वे दस बजे प्राते थे। कार से उतर कर सीधे मिल का निरीक्षण करते । प्रत्येक विभाग का राउण्ड करके अपने कमरे में ठीक सवा ग्यारह बजे आ जाते और बारह बजे तक डाक उसके पश्चात् वे हेडक्लर्क को बुलाकर एक बजे तक काम करने के पश्चात् लंच के लिए उठ जाते । इस वीच उनके कमरे में वही जा सकता था, जिसको वे बुलाते थे। लेकिन उसने निश्चय किया कि हेडक्लर्क के मिलने से पहले ही वह उनसे मिल लेगा । अतः वह उठकर उनके कमरे की ओर चल दिया। उसे चपरासी पहचानता था। अकसर ही कार्य-सम्बन्धी आदेशों के लिए उसे उस कमरे में जाना पड़ता था। उसने चपरासी को एक स्लिप दी और कहा कि इसे साहब जब कुर्सी पर बैठ जाएं तो डाक की फाइल देने के पहले दे देना । और वह अभ्याधियों के लिए रखी हुई बैंच पर बैठकर प्रतीक्षा करने लगा। देखते ।
प्रात्मत्याग की भूमिका १२७ जव रात को भूपतलाल अपने पलंग पर लेटे, तो उस समय उनकी मानसिक उत्तेजना शान्त हो चुकी थी। घर के स्वाभाविक वातावरण मे पाकर वे पत्नी एवं बच्चों की स्नेह-चेष्टानों में सब कुछ भूल गये । अब उनके सामने फिरोजा नहीं थी और न था राकेश । सदा मुसकराने वाली कुमुद के आकर्षण में वे लिप्त हो गये और अपने परिवार में खो गये। कमरे में खिडकी से छनकर बाहर दालान में जलते हुए बल्ब का हलका प्रकाश फैला हुआ था। उजाला न होने पर भी सब कुछ स्पष्ट दिसाई देता था। केसरिया रंग की रेशमी चादर को गले तक खीचकर जैसे ही उन्होने अपनी आँस बन्द की कि अचानक उनके कान में, बगल के कमरे से अपने छोटे भाई का, मुंह से सीटी द्वारा कोई लोकप्रिय धुन बजाता, स्वर सुनाई पड़ा। उनकी मानस-तन्द्रा-भग हो गई। अचानक उनके मानस नेत्रों के सम्मुख दो वर्ष पश्चात् लौटे हुए अमृत का चेहरा पा गया और वह धीरे से धुंधला पड़कर फिर राकेश के चेहरे में बदल गया। अब वे लेटे न रह सके। उठकर बैठ गये। अब ध्यान पाया- मैं इतने नीचे कैसे गिर गया ! कहाँ मैं, कहाँ राकेश ! बदले की भावना ने तो मुझे उसके साथ एक स्तर पर लाकर खड़ा कर दिया। जबकि मैं... एकाएक साथ के पलंग पर सोई हुई कुमुद को और उनको दृष्टि जा पड़ी। उनके मन ने उन्हें प्रतारणा प्रारम्भ किया । मन में पाया- मेरी भी तो यही दशा हो सकती है। फिरोजा का कोई भरोसा नहीं । राकेा में कम-से-कम आत्मवल की कमी नहीं । उसने विवाह के प्रस्ताव को मुक्ति का साधन मान कर भी नहीं स्वीकार किया । अव उन्हें लगा कि राकेश का कयन वास्तव में सत्य था। उसे फिरोजा ही फांस कर ले गयी होगी। मैं तो उसको नस-नस पहचानता १२८ आत्मत्याग का भूमिका हूँ। वह मुझे भी फंसा सकती है। इस प्रकार उनके मन का कलुप मिट गया। उन्होंने निश्चय किया किं भविष्य में वे सदा सतर्क रहेंगे। फिर वे उठे और कुमुद के पलंग पर जा कर लेट रहे । स्नेहमयी 'कुमुद ने करवट ली और उनके स्कन्ध पर अपना हाथ रख दिया । जब उनकी कार मिल के फाटक में प्रवेश करने लगी, उस समय उनके मस्तिष्क के किसी कोने में भी राकेश न था। नित्य की भाँति मिल का राउण्ड कर के वे अपने कमरे में आकर बैठे, तो चपरासी ने डाक-फाइल के स्थान पर वही स्लिप उपस्थित कर दिया । सहसा नियम में व्यवधान पड़ा तो एक चलता हुआ यन्त्र अचानक रुक गया । उनकी इप्टि में प्रश्न वना और जाकर चपरासी के मुख पर टिक गया। चपरासी ने उत्तर के स्थान पर उनके समक्ष डाक- फाइल रख दी और फिर वह कमरे के बाहर निकल गया । भूपतलाल ने साधारण तौर पर स्लिप पर नज़र डाली। पहले तो वे समझे कोई वाहरी मिलने वाला होगा। किन्तु पढ़ते ही वह स्लिप रजतपट बन गयी और विगत संध्या की सारी दृश्यावली चित्रित हो उठी। उन्हें ध्यान प्राया-अमृत और उसमें कितना साम्य है। समान पायु और रूपरंग । अवसर मिला होता तो यह भी विदेश से उच्च शिक्षा प्राप्त करता । अनायास अभ्यस्त अंगुलियां हिली और द्वार पर ट"न 'ट् 'न् गूंज गयी । चपरासी लपक कर परदा हटा कर अन्दर चला गया । प्रतीक्षारत राकेश के हृदय का स्पन्दन तीन से तीव्रतम हो उठा। चपरासी उसके पास आया। वह उठा और पायासहीन-सा भूपतलाल की मेज़ के समीप खड़ा हो गया, जैसे एक सूखा हुआ पत्ता जो ववण्डर के बगूले में उड़ता रहे। अचानक भूपतलाल का स्वर उसके कानो में पड़ा और उसका .
No text on this page.
१३० मात्मत्याग की भूमिका तो...! घी का स्वाद मैं नहीं जानता। कितनी शामें ट्यूशन करने में गुजार दी। जानते हैं क्यों ? जिसमें कम से कम एक शाम की रंगीनी का तो मैं अनुभव कर सकू । क्योंकि आदमी किसी न किसी भांति जीना चाहता है । अगर मेरा कोई अपराध है, तो बस इतना...।" कयन के बाद वह क्षण भर रुका और सहसा उसके मन में आया. 'पर आपको इन बातों से क्या मतलब !' एक उच्छवास उसके स्वर के साथ निकल कर वातावरण में गया। । साथ ही वह फिर बोला-"क्षमा करियेगा। मैं वहक गया था। मैं यहां केवल इतना कहने पाया था कि मेरा कोई दोप नहीं है । मिस फिरोजा खान स्वयं मुझे बहका कर ले गयी थी। जीवन में फिर कभी आप के दर्शन होंगे या नहीं, मैं नहीं जानता। लेकिन अापके हृदय में मेरे प्रति कोई भ्रांति रह गई हो तो मुझे दुख होगा। इसके अतिरिक्त मुझे कुछ नहीं कहना है।" कथन के साय राकेश मौन हो गया। भूपतलाल मंत्रमुग्ध से उसका कथन सुन रहे थे । क्षोभ और ग्लानि से उनके हृदय के समस्त तन्तु व्याकुल हो उठे । फिर भी वे संयत और सुस्थिर स्वर में बोले-"अब आप जा सकते हैं।" कथन के साथ ही उन्होंने डाक-फाइल खोल कर पत्रों को पलटना प्रारम्भ कर दिया । राकेश को निराशा भी हुई और विस्मय भी हुआ। किन्तु वह चुपचाप कमरे से उदास कदमों से चला और अपनी मेज पर आकर चुपचाप बैठ गया। अब वह नोटिस की प्रतीक्षा कर रहा था। उसे लगता था कि समय ने अपनी सामान्य गति बदल है। बार- म्बार उसकी दृष्टि दीवार में रोशनदान के ठीक नीचे टॅगी हुई गोल घड़ी पर जाती और फिर सामने खुली हुई फाइल और उसमें विखरे हुए कागजों पर पाकर अटक जाती। हेडक्लर्क 'साहव बगल में ढेर सारे कागज़ दवाए सदा की भौति । मात्मत्याग की भूमिका कन्धे उचकाते और नि:स्वर बुदबुदाते हुए पाकर अपनी कुर्सी पर बैठ गये । काग्रजों को मेज पर रक्खी हुई लकड़ी को ट्रे में पटक दिया और अपने सलवाट सिर पर हाथ फेरने लगे। उन्हें नित्य इसी भांति राकेश, इसी मुद्रा में देखता था। मानो साहब से निपटना किसी मोर्चे पर विजय प्राप्त करना है । पर प्राज राकेग के होंठों पर मुस्कराहट नहीं माई । उसने सोचा कि शायद व वायू ममी बुला कर इसे बतायें कि नोटिस टाइप हो रही है । थोड़ा-सा दस प्रकट करें। भविप्प के सम्बर में पूछे और सहानुभूति के दो शब्द प्रकट करके उसे सदा-सदा के लिए अपनी परिधि से बाहर कर दें। एकाएक 'हूटर' गूंज उठा, मशीनों की गडगडाहट बन्द हुई पोर निस्पन्द वातावरण उन्मुक्त मोर-शराबे से चमक उठा। माज राकेश उठकर कटोन तक भी नहीं गया, जहां वह इस प्रय नित्य शीशे की गिलास में चाय पीने का मादी हो चुका था । पह प्रतीक्षा कर रहा था। जो कुछ मपेक्षित है हो जाय, तो अगली दिशा की और सोचा जाय। किन्तु जव संध्या के पांच बज गये और उसे नोटिस नहीं पिती, तो उसे जरा माश्चर्य हुमा। धीरे-धीरे सभी साथो-संगी अपना काम बन्द कर के चले गये मौर यह हाल में अकेला रह गया तो उसे लगा कि भूपतलाल ने उसकी उपेक्षा की है। वह दाद है न । उसके कायन में मोर सड़क पर कुत्तों की भी...भों में क्या अन्तर है ? रात्री वीत रही थी। किन्तु अमिता की प्रांखों में नौद का नाम न था। दिन भर तो वह व्यस्त रही। गांव में आकर मपने कमरे को रहने योग्य बनाने में ही समय कट गया, पर अव निवाड़ के को हुए पलंग पर लेटो के पश्चात् उनको स्थिति मिन्न यो। मन में माता १३२ आत्मत्याग की भूमिका . भांति के विचार उठ रहे थे। उसे गांव में आने का कारण कुछ स्पष्ट न था। केवल विवाह के लिए ही प्राना तो अर्थहीन प्रतीत होने लगा। जितना अधिक वह सोचती, उतनी ही परेशानी बढ़ती जाती थी। अभी तक जितने भी विवाहादि शुभ कार्य हुए वे सब शहर से ही सम्पन्न हुए थे। उसे स्मरण पाया कि बाबा के विवाह के बाद से यहाँ पर किसी का विवाह नहीं हुआ। यहां तक कि स्वयं पिताजी का विवाह यहाँ से नहीं हुआ तो 'तो ! स्पष्ट ही इसमें कुछ रहस्य है : अब उसे अपने पिता से प्रातः हुई भेंट का स्मरण आया । राकेश का यहाँ से या पास-पास के किसी गांव से सम्बन्ध होता तो वह अवश्य बतलाता । उसे तो मेरा परिचय मालूम था। इलाके के सबसे प्रसिद्ध : और,धनी व्यक्ति को वह नहीं जानता होना, कुछ बात समझ में नहीं आती। अन्य या स्वाभाविक तौर पर परिचा के प्रथम सभा में वह कहना कि मैं भी उनी पोर का रहने वाला हूँ और तुम्हारे पिताजी के नाम से परिचित हूं अच्छा, यह सब अच नक और एकदम क्यों हुआ ? माना कि पिताजी को मालूम हो गया था । ठीक ! फिर उन्होंने बुलाकर समझा दिया। ठीक ! राकेश के साय सिाह कर देने को संकेत किया । यह भी ठीक। लेकिन फिर अचानक सब टेलीफ़ोन कटवा दिये । मुझे घर से कहीं जाने नहीं दिया । चम्पा ने पाकर टेलीफोन नहीं करने दिया । एका- एक बिना किसी पूर्व सूचना के लिए प्रस्थान कर दिया। अब मैं यहां हूँ, बिल्कुल एकान्त व अनजानी जगह में । फिर विवाह आदि में समय लगता है। यहां आने की ऐसी शीघ्रता क्यों ? अाज ही तो विवाह या नहीं। अचानक नारी की सहज अन्तःप्रज्ञा ने समाधान प्रस्तुत किया। अरी अमिता, तु कैद कर दी गयी है ।
मात्मत्य ग की भूमिका अब उसे अपने पिता के प्रत्येय कार्य-कलाप का मौचित्य स्पष्ट रूप से समझ पा गया। तभी एक प्रश्न उठा -ऐगा क्यों ? पिताजी का उद्देश...? लेकिन वास्तविकता का पता कैसे चले ? कुछ देर वह योही प्रत यी पोर टवटी लगाये रही । मन में पाया -ले, यह मिला तुझे! जीवन में जैसे ही सत्पथ पर चलने की कल्पना को, तेरे ऊपर तेरे पापों का पहाड विजली बन कर टूट पड़ा। -नो क्या यह प्रकृतिदत्त जीवन-~छोटा सौख्य पाप पर ही आधारित है ? अभी तक मैं मत्रकी दृष्टि में आदर्श थी। और माज मोड़ लेते ही में, अपने प्रियतम से दूर कर दी गयी ! -पसार तू इतना कुटिन, इतना विपात, इतना हृदयहीन क्यों है ? किन्तु पिताजी, तुम तो ऐसे हृदयहीन थे ! बचपन में कितना प्यार किया है तुमने ! मैं वही अमिता हूँ। फिर तुम क्यों बदल गये-कैसे । बदल गये? -नही ! मैं राकेश के अतिरिक्त किसी अन्य प्राणी की कल्पना भी नहीं कर सकती । मैं मर जाऊँगी ! मैंने सदा यही चाहा कि मैं एक सन्नारी वतूं। - प्रय वह लेटी न रह सकी। उटकर कमरे से बाहर निकल आमी। तारों के मन्द प्रकाश में उसे अपनी मां की प्राकृति दिसाई पडी । वे अपने कमरे के बाहर छज्जे की रेलिंग पर भुको हुई निर्जन मांगन के प्रगाढ़ अन्धकार में न जाने क्या देख रही थी। अमिता झट मां के पास जा पहुँची और बोली-"मा !" मनोरमा का स्वप्न टूट गया । उसने अमिता की ओर घूम कर उसे ध्यान से देखा और कहा-"हाँ !" वह उसकी मनोदशा को शायद समझ गई थी। अमिता ने बिना किसी प्रकार को भूमिका बौघे कह दिया--"हम । " .
१३४ मात्मत्याग की भूमिका । लोग यहाँ किस लिए आये हैं ?" मनोरमा स्वयं भी तो दोपहर से कुछ इन्हीं प्रकार के सवालों में उलझी थी। रामू को लेकर भांति-भांति के प्रश्न उसके मन में उठे थे। अपनी पति के पास से जब वह लौटी थी, उस समय एक क्षण के लिए ध्यान आया कि उसे स्वयं अपने चरित्र को सम्हालना है । किन्तु रामू से उसका केवल वासना का ही नाता हो ऐसा न था। वह तो उसे अपने सम्पूर्ण हृदय से प्यार करती थी। उसके अतृप्त नारी हृदय को जो प्रतिदान सेटजी से अपेक्षित था वह जब उसे न मिला तभी वह रामू की शरण में गई थी। बरसों से रामू ने भी एक निप्टभाव से प्रेमी एवं पति की सम्पूर्ति की थी । संध्या होते-होते वह स्वयं ही व्याकुल हो गई थी। फिर जब भोजनोपरान्त जनानी ड्योढ़ी का द्वार वाहर से बंद हो गया तो वह समझ गई कि सेटजी ने एक ले से दो शिकार मारे हैं। पुत्री के साथ-साथ उसे भी इस एकान्त में लाकर कैद कर दिया है। उसे दुःख तो इसी बात का था कि यह सुझाव उसका स्वयं का धा । साथ ही यहां से निकलने का एक एकमेव पथ भी उसे अमिता क विवाह ही समझ में आया। वह सोच रही थी कि विवाहोपरान्त दिद के समय जब वह वाहर निकलेगी, तो उसके पश्चात् भीतर कदम नई रखेगी और सेठजी की समस्त व्यूहरचना बेकार हो जायगी । इस घटर के लिए वह सेठजी से अधिक अमिता को दोप देती थी। न वह ३ प्रकार कार्य करती और न गांव पाने का प्रश्न उठता। अमिता का प्रश्न सुनकर मनोरमा ने मन्द स्वर में उत्तर दिया- "तुम्हारे विवाह के लिए।" "पर मां, वह तो वहां भी हो सकता था।" ----अमिता ने प्र मन की गुत्थी उसके सामने रख दी। मनोरमा की व्यथा ने कराह कर करवट ली। वह बोली-" तक सव प्रवन्ध होता, तब तक तो तू हम लोगों के मुंह पर का गोर देती । लडका रूंदने में कुछ समय तो लगता ही है।" - भात्मत्याग की भूमिका ममिता का हृदय रो पड़ा । वह बोली-"लेकिन मां, पिताजी ने कहा था कि वे राकेश के साय मेरा! बस तभी से मैं उन्हें अपना पति स्वीकार कर चुकी हूँ। अब मैं किसी अन्य के साथ विवाह कैसे कर सकती हूँ ?" मनोरमा को प्रतीत हमा कि उसो की लड़की उसका उपहास कर रही है । मानो इस कथन का स्पष्ट अर्थ यही है कि मैं सन्नारी हूँ मौर तुम कुलटा हो। उन्हें क्रोध आ गया। कुछ उच्च स्वर में उन्होंने कह दिया--"चल-चल ! विवाह तो वंश मौर फुल-परम्परा के अनुगार ही होता है । इसके बाद तू जाने मोर तेरा प्रादमी । तेरे पिता को तो केवल यही मालूम है कि एक लड़का रात में तेरे कमरे में पाया था। लेकिन दायी से पेट नही छिपता । मुझे सब मालूम हो गया है कि रोज रात को नये-नये लड़के तेरे कमरे में आते रहे हैं । तू मन-ही-मन हर - एक को पति स्वीकार कर लेती है। पर हर एक से कहीं विवाह होता है पगली। जा, सो जा! तेरे कारण में भी यहाँ माकर कैद हो गयी ममिता ने विनम्र स्वर में उत्तर दिया-"माँ ! तुम मा होकर भी एक बेटी के हृदय को नहीं समझती। क्या तुम्हें मालूम नहीं कि मैं राकेश के बिना नहीं जी सकती।" मनोरमा ने महज भाव से कहा-"इसमें जीने-मरने का कोई प्रश्न नहीं उठता । तुझे राकेश के साथ रहना है तो रह । विवाह हो जाने से उसमें कोई मन्तर नहीं पड़ेगा!" अमिता को लगा कि उसका पर भटक कर किसी सपं पर जा पड़ा है । वह उछल कर एक पग पीछे हट गई और बोली-"शर्म करो ममी, सुम मां होकर अपनी ही लड़की को कुगर्ग पर चलने की प्रेरणा दे रही हो ! मानती हूं कि जीवन में मैंने भूलें की हैं। लेकिन भनजाने में किया पाप मोर जानबूझ कर किये गए कर्म मे मन्तर होता है जाऊँगी, पर किसी मन्य के साथ विवाह नहीं करूंगी।" - यात्मत्याग की भूमिका ! मनोरमा बोली-~-"ऐसे मैंने बहुत देखे हैं मरने वाले ! कहते सब हैं ! मगर मरता कोई एक है । और वैसी तू नहीं है । ऐसा ही होता तो मेरा जी ऐसे ही दुखी है । मैं तुझसे बहस नहीं करना चाहती। अमिता बोली-"सबके दुख का कारण मैं हूँ ! तुमने पैदा होते ही मेरा गला क्यों नहीं घोंट दिया ? मैं पिताजी से भी कहूँगी !" मनोरमा बोली-"उन्होंने ही तो यह सब प्रवन्ध किया है। वहीं रहती तो तू और भी उपद्रव करती। सारे समाज में बात फैलती। जहाँ तेरी शादी हम लोग उचित समझेंगे, वहाँ करेगे या तेरे कहने से ही किसी को भी दामाद बना लेंगे। तू चाहे इन दीवारों से सर भी फोड़ ले, मगर उसके साथ तेरा विवाह नहीं होगा। यह बात तू अच्छी तरह से समझ ले । वैसे अव में भी सोचती हूँ कि तू न पैदा होती तो ही अच्छा था ।" शोधावेग में कुछ उत्तर न देकर अमिता पर पटकती हुई तेजी से अपने कमरे में वापस चली गई। विरहाकुल राधिका की भांति वह इधर से-उधर बड़ी देर तक कमरे में ही चक्कर काटती रही। मां के शब्दों का स्मरण पाता और उसकी भावना को तीन से तीव्रतर शिखर पर पटक देता। शनैः शनैः उसको बोध होने लगा कि उसकी सम्पूर्ण चेप्टा व्यर्थ है। जब अपनी सगी माँ के उसके प्रति ऐसे विचार हैं, तो वह किससे सहानुभूति की आशा करे ! अपने प्रति उसका मन घृणा से भर गया। तटस्थ होकर जब उसने स्थिति का अध्ययन किया तो एक ही बात उसकी समझ में आई कि उसे अपने इन पापों के लिए प्रायश्चित्त करना है, जिनका प्रयोग उसने वासना की विविध प्रकार की मांगों तथा कल्प- नागों को मिटाने के लिए किया है। उसके मन में पाया~ग्रात्मा का सुख, कलुपित तन से नहीं प्राप्त हो सकता। आज उसकी मां को उसके विगत के सम्बन्ध में सब कुछ मालूम हो गया है तो कल, जब राकेश को मालूम होगा, तो क्या उसका प्रेम भी घृणा में बदल जायगा?
. पात्मत्याग की भूमिका उसका जीवन, उसकी प्रास्था, उमका विश्वास और उसका प्रेम सब कुछ सपूर्ण जी इन-सौख्य नष्ट हो जायगा । प्रश्न उठाता क्या उस समय मैं उसकी प्रांतों में विपाद और घृणा पाकर मुखी रह सकूगी! मेरे जीवन में तो प्राग लग हो गई है, तो अब मैं पोरों का भी सुच-चैन कसे राख कर दूं? --नहीं, वह मुझे प्यार करता है। मुझे वह देवी समझता है । मैं देवो ही वनूंगी । अन्यथा मेरे जीवन का कोई महत्व नहीं ! तिल-तिल कर के बरसों घृणा और उपेक्षा का जीवन व्यतीत करने से प्यार का एक क्षण अधिक श्रेयस्वर तो है। मैं उस क्षण को अमरत्व प्रदान कहेगी । भले ही माता-पिता को दृष्टि मे मैं कुलटा रहूं। किन्तु राकेरा के हृदय में मैं ऐमी भावना को कदापि जन्म न लेने दूंगी। मुझे इस वात का गौरव तो होगा कि कम-से-कम एक व्यक्ति तो मुझे देवी मानता है । और इस सुख को मैं नष्ट न होने दूंगी ! उसके नेत्रों से प्रासू बह रहे थे। किन्तु अधरों पर अलौकिक सुस को प्राभा और दृढ विश्वास की मन्द मुसकान थी। अब वह शान्त थी। उसने सूटकेस से पाउन्टेनपेन और लेटरपंड निकाला। मेज पर बैठकर उसने पहले लम्प की बत्ती ऊंची की फिर वह पत्र लिमने बैठ गई। लाला हरचरणसिह ने ड्राइगरूम में जैसे ही प्रवेश किया, तो उनकी दृष्टि सोफे के ऊपर जा पटो। पाशा के विपरीत राकेश को न देखकर उन्हें माश्चर्य हुमा । झट ध्यान पाया कि बाथरूम चला गया होगा। - तभी उनको दृष्टि सेण्टर टेवुल के ऊपर रखे हुए बादामी कागज पर जा पही। दूर से ही उस पर कुछ लिखा देखते ही उनका कौतूहल जागा मौर उन्होंने उसे उठाकर पढ़ना प्रारम्भ कर दिया।
प्रात्मत्याग की भूमिका वे पत्र पढ़ते जाते थे और मन-ही-मन राकेश के चारित्रिक दृढ़ता के प्रति मुग्ध हो रहे थे। उनके मन का स्नेह शत-शत कंठ से उसे पाशीर्वाद दे रहा था । उसके साहस की और वास्तविकता का सामना करने की इच्छा और चल-पौरुप के विश्वास को देखकर उनके मन में श्रद्धा ने जन्म लिया। कुछ क्षरण वे खिड़की के बाहर फैले हुए दृश्य को देखते रहे । अव मन में आया-निश्चय ही यह मासाघरग व्यक्ति है । लोभ तो इसे छू नहीं गया। यह एक दिन अवश्य सफल होगा। उन्होंने घड़ी की अोर दृष्टि डाली । नौ बज रहे थे । मन में पाया कि वे उसके घर जाकर उसे ले पायें। फिर प्रश्न उठा-घर तो मालूम ही नहीं। फिर न जाने क्यों, उनके मन में पाया 'कि संध्या को मिल से जब निकले, उस समय उसे पकड़ लिया जाय । 'मिल का ध्यान आते ही उन्हें भूपतलाल का स्मरण पाया । वे उठ कर खड़े हो गये। तभी चाय के प्याले के साथ बलवन्त ने ‘कमरे में किया । उसे देखते ही उनके मन में कुछ प्राया और वे बोले- "बलवन्त, अंजू कहाँ है ?" अंजू का नाम सुनते ही बलवन्त के निष्प्रभ नेत्रों में वात्सल्य और ममता के ज्योति-पुंज प्रदीप्त हो उठे। उसने कुछ 'गों-गों' करते हुए कुछ संकेत से बताया कि वह नहा रही है । अव लालाजी पुन: वैठ गये और उससे चाय का प्याला ले एक चूंट पिया और उसे अपने निकट पाने का संकेत करके अत्यन्त मन्दस्वर मे बोले-"अंजू बड़ी हो गई है।" बलवन्त मानो उनकी बात सुन रहा था। अत्यन्त समझदारी के साथ बड़ी गम्भीर मुद्रा में सर हिलाकर कह दिया-"हाँ !" अव लालाजी बोले-"तो उसका विवाह कर देना चाहिए।" बलवन्त ने कुछ इस प्रकार की मुद्रा बनायी कि जैसे उसे आश्चर्य हो कि आज तक उसने व्ह क्यों नहीं सोचा ! विचारमन और गम्भीर मात्मत्याग की भूमिका वाणी में इस तथ्य का समर्थन करने के लिए उसने पुनः सर हिलाया। अब लालाजी ने मुंह से कुछ न कहकर, पहले सेप्टर टेवुल पर प्याला रखा फिर सोफे की ओर संकेत किया। साथ ही कुछ इस प्रकार हाथ नवाया कि वह प्रश्न बन गया-"इस लड़के राकेश के विषय में वपा राय है ? अन्जू के वर के रूप में कैसा रहेगा।" बलयन्त ने सूने सोफे की मोर देखा। कुछ देर तक वह उधर ही देखता रहा । मानो अपने मानस नेत्रों से वह राकेश को वही पर बैठा- लेटा देख रहा है। फिर उसने लालाजी के मुख पर दृष्टि डाली और स्वीकृति स्वरूप सर हिला दिया। साथ ही उसके नेत्रों में एक प्रश्न उठा और उसने फिर कुछ संकेत किया । पहले उसने कागज पर लिखने का, फिर दोनों हथेलियो को मिलाकर पुस्तक पड़ने का अभिनय किया। लालाजी उसका प्रश्न समझ गये । वे सर हिलाते हुए बोले- 'हाँ, पढ़ा-लिखा है।" अब बलवन्त ने कमरे की दीवारों को संकेत से दिखाते हुए हाप नचाया, साप ही अंगूठे को रुपया उछालने की मुद्रा बनायो। लालाजी बोले-"हां, घर-द्वार है। रपया पैसा भी है । नौकरी करता है । घर में सेटी होती है।" प्रत्येक के साथ वे सर हिलाते और सकेत भी करते जाते थे। अव बलवन्त ने सर हिलामा, तो लालाजो ममझे उसे पसन्द है । किन्तु तभी प्रश्न उठा-वह स्वीकार करेगा? उसके पिता... ? फिर वास्तविकता का भी तो पता नहीं है । उनके कंठ से एक उच्छ्वास उद्भासित हो गया । मन-ही-मन वे बोले-"एक कन्या का पिता होना अपने आप में एक अभिशाप है। फिर एक मभिशाप कन्या का पिता !" मन-ही-मन वे परमपिता जगत नियंता का स्मरण कर उठे । व उन्होंने भगवान से प्रदन किया-"किस पार का दंड दे रहे हो परम -पिता । मैंने पाप किया होगा? सम्भव है कि निर्दोष प्रतिमा ने पाप १४० प्रात्मत्याग की भूमिका किया हो ? अबोत्र अंजना ने क्या पाप किया है ? तुम्हारी सृष्टि में जन्म लेना तो पाप नहीं है ! तुम्हीं तो जन्मदाता हो, तुम्हीं कारक हो, तुम्ही कर्ता हो ! मेरी पुत्री को सुची बना दो, मैं जन्म-जन्मातर तक असहनीय दुर्दार पीड़ा का ग्रालिंगन करने के लिए प्रस्तुत है।" लाला जी के नेत्रों से ग्रांसू बह निकले । बनवन्त ने देवा और उनके हृदय के मूल रुदन को सुनकर उसका मानस भी उद्वेलित हो उठ। । व सों के संग-साथ ने सेवा भाव को भुला दिया और उसने अत्यन्त यात्मीर स्वजन की भांति लालाजी के मुख को अपने वक्ष में छिपा लिया, उनके सर एवं पीठ पर हाथ फेरने लगा। मानो वह पिता हो और लाना जी एकमात्र पुत्र । तभी अंजना पर्दा हटाकर कमरे में प्रा पहुंची। यह दृश्य देखकर वह अयसन्न रह गई। उसका चकित, विस्मित हृदय किसी अज्ञात आशंका की कल्पना से विचलित हो उठा । भीता हिरणी की भांति वह अपने पिता से जाकर लिपट गयो और अश्रु विगलित स्वर में चीख उठी-"पिताजी !" बलवन्त अलग हट गया और अपने आंसू पोंछता हुअा निशब्द पिता और पुत्रो को एकान्त में छोड़ कर बाहर चला गया । बांसू बहा देने से हृदय की व्यथा कम हो जाती है, मन का उत्पी- डन शान्त हो जाता है । पुत्री का स्वर सुन कर लाला जी चैतन्य हो गये और उनके मन में अपनी क्षणिक दुर्वलता के आवेग के कारण किंचित् क्षोभ उत्पन्न हो उठा। अविलम्ब अंजना बोली- "मेरे न जाने के कारण पार दुखी हैं क्या? पर इसमें परेशान होने की कोई बात नहीं | आप तो जानते ही हैं कि मैं सदैव नहीं नहीं कहती रही हूँ। मैं चली जाऊंगी। मेरे कारण प्रापको कोई कष्ट न होने पायेगा, इसका मैं आपको विश्वास दिलाती -- । अयोध अंजना ने लालाजी को दुख का कारण न समझा । पर यह मात्मत्याग की भूमिका . तो सत्य ही था कि वे उसी के कारण दुखी थी। लालाजी ने अत्यन्त स्नेहपूर्ण दृष्टि से मे देवा, फिर एक दिनपूर्ण मुस्कान उनके होठों पर मुद्रित हो गयी। वे बोले-"नहीं बेटी ! तू नही जायगी । मैंने ही तो तुमे रोका है । तू नहीं जानती कि मैं कितना सुखी हूँ।" अंजना का ध्यान अचानक अपनी मां की और चला गया । उसने . भयाकुल से प्रश्न किया--"तो क्या डाक्टर साहब ने अम्मा के विषय मे कुछ कहा है ? भव लाला जी हंस पड़े और बोले-"अरे नहीं पगली ! तेरा वच. पना नहीं गया।" अजना ने अपने शरीर में एक बसाय का अनुभव किया । कल से ही .उसे लगने लगा था कि अब वह वच्ची नहीं है । उसके कान मे पिता के शब्द पुन: गूंज उठे-"अंजू उसे देख ले।" प्रश्न उठा-"किमे?" निविकार मावसे चेतना शून्य राकेश परिचत रास्ते पर अपरिचिता चलता हुआ अपने घर आ पहुंचा । उसके बाह्य-व्यवहार से अन्तराल मे छिपी हुई वेदना का मामास नही होता था। द्वार बोलते समय प्रचा- नक एक उच्छवास रसके मन के अतल, अमीम गहर से निकल गयो । वह जड़ हो गया । समस्त दिवस वह अपने को किसी प्रकार नियत्रित करता रहा था। किन्तु अब प्रतीत हुप्रा कि वह टूट गया है ! नित्य के प्रतिकूल उमने चारपाई की शरण ग्रहए की। कपड़े तक नहीं बदले । योंही विना विस्तर विद्याये, परहटी साट पर, धूलि-धूसरित घिसी ऐडो वाला काला जूता पहने हो लेट गया। बोझिल वातावरण भोर भी बोझिल हो उठा। तप्त हृदय की ज्वाला एक नि.स्वाम बन कर कर से फूट पड़ी और १४२ मात्मत्याग की भूमिका अचानक वह रो पड़ा । आंसू बह कर गालों के सीमा-प्रदेश को पार करके उसके छोटे से कमरे की कच्ची भूमि को सींचने लगे । कुछ देर के बाद उसके कण्ठ से अस्फुट स्वर निकला-मुझे इस की कल्पना भी न थी। संसार इतना निर्दयी है। कुछ ही देर में सव शान्त हो गया। उसने सोचा-मैंने तो एक छोटी-सी गृहस्थी का स्वप्न देखा था। अपना एक साम्राज्य बनाने की चेप्टा की थी। एक ऐसा संसार, जिसमें किसी वस्तु का अभाव न हो। कोमल-सी पत्नी की इच्छा की थी। तभी उसे पुनः ध्यान पाया, पमिता का । मन में पाया कि चलकर उससे भेंट करना चाहिये । सम्भव है वह उसी की भांति निर्दोष हो! इतने में द्वार की कुडी खटक उठी । उसका ध्यान भंग हो गया। उसकी समझ में नहीं पाया कि उसके पास कौन आ सकता है । मकान- मालिक तो आया नहीं, उसे लेकर उपस्थित होने वाले किरायेदार के यहाँ भला मकान मालिक क्यों पाने लगा ? फिर ध्यान पाया-लालाजी तो नहीं हैं। किन्तु उनको घर नहीं । मालूम । शायद मिल से पता लेकर आये हों! पर वह तो स्वयं ही इतवार को मिलने के लिए पत्र लिखकर पाया है। तो...तो...कौन ! अरे हाँ अमिता! मैं तो भूल ही गया था। वही होगी...वही...। तभी कुंडी पुनः खटकी और वह कूद कर उठ खड़ा हुआ । अति उत्साहित और उमंग भरे मन से उसने द्वार खोल दिया। द्वार खोलते ही उसके मन में निराशा का अंधकार घिर गया। सामने सूटेड-बूटेड नवयुवक खड़ा था । उसका समवयस्क शालीनता व सौजन्य प्रतीक, साक्षात कामदेव-सा मोहक । राकेश के मन में आया-बेचारा ग़लती से मेरा द्वार खटखटा बैठा है । फिर उसने शिष्टाचार वश हाथ जोड़ दिये और पूछा-"कहिये, किसको प्रत्युत्तर में उस युवक ने हाथ जोड़ कर अभिवादन किया और पूछ रहे हैं ?"
मात्मत्याग की भूमिका कहा-"राकेश जी का यही मकान है ?" राकेश विस्मय से रोमांचित हो उठा । उसके मन में पाया-चलो पन्चा हुमा कि इस स्थल पर प्रकाश का प्रभाव है, मन्यया मेरे मनो- भाव इससे छिपे न रहते। चेप्टा करते पर भी उसकी वाणी से माश्चयं प्रकट हो उठा। वह बोला- 'मेरा हो नाम राकेश है।" कपन के साथ ही वह एक मोर हो गया और शिष्टाचारदरा उखे अन्दर माने का संकेत करता हुपा बोला-"पधारिये।" युवक के अन्दर पग रखते ही उसने झट से मागे बढ़ कर शौरी का छोटा सा लेम्प जला दिया । अब राकेश ने चारों ओर दृष्टि दोढायो । उस लैम्प के मन्द प्रकाश में भी उने उम युवक को बैशने लायक कोई स्थान या प्रासन न दिखाई दिया तो उसने झट से साठ के ऊपर का विस्तर सोल दिया और किचित् गेद भरे स्वर में बोला-"विराजिये ।" साय ही उसे ध्यान माया मागन्तुक का प्रायुनिकतम सिला बहुमूल्य सूट । वह कुछ कहने जा ही रहा था कि साट पर बैठ गया मौर स्निग्यता से बोला--"मेरा नाम अमृतलाल है । पाप नहीं पहचान सकते। क्योंकि मैं एक सप्ताह पहले ही जर्मनी से पाया हूँ।" राकेश शिष्ट वाणी में बोला-"मेरा सौभाग्य है कि मापके दर्शन प्राप्त हुये। कैसे कष्ट किया ?" भमृतलाल के प्रथरों पर तरल-मुसकान तरंगित हो उठी। वह योला-"मेरी भाभी जी ने मापको बुलाया है।" विस्फारित नेत्रों से राकेश उसे देखता रह गया। फिर अचानक ध्यान पाया हो न हो ! इस ममृतलाल को अमिता ने ही भेजा होगा। सम्मतः उसने अपनी किसी प्रात्मीया से विवाह के सम्बन्ध में अपना निश्चय प्रकट किया होगा और अब मुझे निमन्त्रण प्राप्त हो रहा है । क्या संसार भर के आश्चर्य मोर चमत्कार एक साथ ही घटित होगे। परन्तु अनी उसके मन का पारचम शान्त भी हुमा पाकिद्वार पर किसी को १४४ आत्मत्याग की भूमिका . - . 'पता कैसे छाया दिखाई पड़ी। अव पुनः प्रश्न उठा-कोन हो सकता है ? . तभी स्वर पाया- 'बादशाहो ! राकेश सचमुच स्तब्ध हो उठा और आगे बढ़कर बोला-"आइये लालाजी ! धन्य भाग, कुटिया पवित्र हो गयी । , लेकिन आपको मेरा मालूम हुआ ?" लाला हरचरणसिंह भीतर पा चुके थे। उनको आते देख कर अमृतलाल खड़ा हो गया था। उसकी ओर देखते हुए लालाजी ने कहा-"तो आप . अमृतलाल हैं ! भई. इन्हीं के यहाँ से तुम्हारा पता मिला है बादशाहो।" लाला जी का मुख अमृतलाल की ओर था, जिसने अपना नाम उनके मुख से सुनकर सभ्यतावश हाथ जोड़ दिये थे और वे उत्तर दे रहे थे राकेश को। अमृतलाल ने किचित विस्मय के साथ पूछा-"जी, मेरे यहाँ से ?" लालाजी मन्द हास की विद्युच्छटा विखरते हुए बोले-"जी जनाव । देर न करो, वस चल दो। मुझे यों ही देर हो गयी है । तुम भी कमाल करते हो बादशाहो।" राकेश किंकर्तव्य विमूढ-सा खड़ा रहा । लालाजी को प्रानन्द पा रहा था। वे पुन: बोले-"जल्दी, भाई जल्दी ! वो वलवन्त है न, नाश्ता तैयार किये बैठा होगा। उहूँ, तुम तो अभी तक खड़े ही हो बादशाहो ।" राकेश ने परिस्थिति की गुत्थी का सिर हाथ में पकड़ा और झट से कह दिया-"नगर इनकी भाभी जी भी तो प्रतीक्षा कर रही हैं । पोर यह पहले आये हैं । वहां से होकर मैं आता हूं।" लालाजी बोले-"ना''ना. "वहाँ कोई इन्तज़ार कोई इन्तजार नहीं कर रहा है । मैं वाह पाया हूँ। मुझसे ज्यादा तुम्हारे ऊपर इनका हक होते भला मैं देव संकता था बादशाहो !" राकेश की समझ में ही न पा रहा था कि वह क्या करे ! भाभी ने भी एक समसा का रूप धारण कर लिया है। एक बुलाने पाया है - आत्मत्याग की भूमिका और दूसरा कह भाया है कि नहीं मायेंगें । प्रश्न उठा-इनको या मधि- कार है ? मैं अमिता के सम्मुख सम्पूर्ण संसार त्यागने को तैयार है।" लालाजी की वार्ता का रोग पूर्ण विकास पर था। वे बोले-"मैंने इनके भाई और भावन दोनों को बता दिया है कि अभी उसका शरीर इस लायक नहीं है, भला ऐसे में कोई मारा-मारा फिर सकता है ! एक बात और है । तुम क्यों जामो ? वे स्वयं क्यों न भावें ? कल संध्या को चाय पर पा रहे हैं । अब तुम चलो भी, बात समझा करो पादशाहो।" राकेश को लाला जी के कथन में एक संकेत का मामास हुमा । उसे ऐसा भान हुमा कि मानी वे कह रहे हैं कि मला लड़के वाले जाते हैं कहीं, वे लड़की वाले हैं, उनको स्वयं ही प्रस्ताव लेकर पाना चाहिये। लासाजी अपने उन्माद में केवल एक क्षण के लिये रुकते मोर फिर टूटी कड़ी जोड़ देते । किसी को बोलने का अवसर हो न मिलता। मानो उन्हें उतर की अपेक्षा ही न हो। भर वे योले-"माप भी मेरे गरोखाने पर चलिये । एक प्याला पाय तो हो जाय।" कयन के साथ हो" होकर हंस पड़े। अमृतलाल ने हाथ जोड़ कर क्षमायाचना करते हुए कहा--"मार तो क्षमा करें। मैं फिर किसी दिन माऊंगा । एक दोस्त का स्कूटर मांग ले आया हूँ। उसे वापस भी करना है और उसी के साप एक गोष्ठी में जाना भी है।" लालाजी घोले-"तो फिर क्षय रहा कि भाप मायेंगें। खुद आयेंगे या बुलाने पाना पड़ेगा ?" विनयावनत स्वर में अमृतलास ने मन्द हास के साथ कहा --"मैं स्वयं हाजिर हो जाऊंगा।" लालाजी बोले-"अच्छी बात है।" फिर राकेश को संबोषित कर बोले-"चलो भाई, देर न करो । मैं तो धवरा चला हूँ बादशाहो ।" राकेश बोला-"सिर्फ पांच मिनट ! कपड़े बदल हूं।" वमी अमृतलाल बोला-"अच्छा तो अब मुझे माना दीजि घर में जल्ली में है।"
१४६ प्रात्मत्याग की भूमिका .. राकेश बोला-"अच्छी बात है। लेकिन यह भेंट अधूरी रही। बातें होगी। श्राप से परिचय हो गया-इसे मैं अपना सौभाग्य समझता हूँ। '... अमृतलाल ने दोनों को नमस्कार किया। फिर वह चला गया । :: राकेश के मन का विकार नष्ट हो चुका था। वह प्रफुल्लता को दवा कर लालाजी से वोला-"पाप.दो मिनट वैठिये । मैं अभी तयार हो जाता हूँ। देर नहीं लगेगी। बस चुटकी बजाते ही मैं फटाफट रेडी हुप्रा-बिलकुल रेडीमेड'।" :: : कथन के साथ ही उसने अलमारी से प्लास्टिक की सावुनदानी उठायी और खूटी पर से चारखाने का लाल गमछा उतार कर कन्धे पर रक्खा । कमरे में ही एक पोर . मोरी बनी थी, लोटा-बाल्टी रखा था। वह झट से मुंह हाथ वोने वैठ गया।. लालाजी की दृष्टि से उसका परिवर्तन छिपा न रहा । एक संतोप की सांस उनके अन्तराल में उठी । प्रदर्शन पाशोभनीय न हो जाय और राकेश के मन को श्राघात न पहुंचे इसीलिये लाला जी मौन रह गये ।. राकेश अपने विचारों में मग्न था। वालों में तेल लगाने के बाद शीशे में देख-देख कर वाल संवारते समय अपनी उत्कंठा शमनःन कर सकने के कारण उसने लालाजी-से कह दिया-"आपके मा जाने से बच, गया। नहीं तो अमृतलालजी के साथ जाना ही पड़ता। वैसे ये सज्जन हैं कौन ?" लालाजी ने पूछा- "अरे, तुम नहीं जानते बादशाहो !" राकेश बोला-"जी नहीं। आज पहली बार भेंट हुई; अचानक आ धमके और कहने लगे-भाभीजी ने बुलाया है। मेरी तो कुछ समझ में ही न पाया कि ये भाभीजी हैं कौन । मैं तो उन्हें जानता नहीं।" .. , लालाजी बोले-"ये भूपतलाल का भाई है। उनकी पत्नी ने तुम्हें बुलाया था। असल में भूपतलाल को बहुत अफसोस है । मैं मिला तो बेचारे तुम्हारी बड़ी तारीफ करने लगे। सच पूछो तो तुम हो भी तारीफ के लायक, बादशाहो !" राकेश ने सोचा-'यह सव है क्या? पहले तो गरदन काट दी ।
आरमत्याग का भूमिग भौर प्रद गोंद लगा कर जोड़ रहे हैं।' फिर विचार मापा-'सचमुच क्या युग करवट ले रहा है ? संसार बदल रहा है। मेरो दृढ़ता और स्थिरता के फलस्वरूप मेरी विजय हो रही है। किन्तु प्रमिता..? सोचकर एकाएक उसका सारा उत्साह. ठंडा हो गया।' किन्तु अन्य उपाय न देख अनिच्या होने पर भी उसे लालाजी के. माय जाना पड़ा। अमिता के जाने के पश्चात् भी मनोरना वहीं खड़ी रही । भूत मोर भविष्य में उसके विचार चक्कर काटते रहे । ज्यों-ज्यों समय बीतता गया उसकी उद्विग्नता बढ़ने लगी। जव पूर्व में क्षितिज पर ऊपा की लालिमा छा गई, उस समय भी वह वहीं सड़ी यो। किन्तु उसका . मस्तिष्क अन्य था । मून्य दृष्टि से विराट अन्य की ओर देख रही थी। तमो नीचे के सण्ड में कुछ खटपट प्रारम्भ हुई। एकाएक रसोईघर, से धुवा उठने लगा। नौकरानियों ने अपना कार्य प्रारम्म किया तो सोते हुए मकान की जगहर के साथ मनोरमा का भी ध्यान टूटा । मानो वह भी सो रही थी और अब जागी हो। उसने कुछ उच्च व कठोर स्वर में चम्पा को बुलाया ! चम्पा के भाते ही उसने सेठजी को बुलवा भेजा। सेठजी स्वयं ही इस पड़ी की प्रतीक्षा कर रहे थे। उनका विचार था कि यह विस्फोटक स्थिति मनोरमा या प्रमिठा के कारण देर-सबेर अवश्य उत्पन्न होगी। इसके लिए वे तैयार थे। परन्तु उन्होंने शीघ्रता न की। कुछ देर यों ही करवटें बदलते रहे। फिर उन्होंने कन्हई को . चुनाया और कहा-"तुम तो जानते हो कि हम लोग यहां पिस लिए आये हैं ! अमिता कुछ-न-कुछ गड़बड़ करेगी । एक बात और भी है मैंने राम को कल महर भेजा था। मगर वह वापस माये वो ध्य 1 १४८. आत्मत्याग की भूमिका रखना, अब वह भीतर न जाने पाये। किसी-न-किसी बहाने से उसे बाहर ही रोक देना । आँखों से दूर रहने पर शायद मनोरमा इसे भूल सके। अब में सुखी होना चाहता हूँ। कन्हई वोला-"यह बड़ा अच्छा किया वच्चा। मैं उसको जनानी ट्योढ़ी की और कंदम न रखने दूंगा।" अव सेठजी उठे और भीतर की ओर बढ़ गये । उनको प्राता देख- कर प्रत्येक प्राणी व्यस्त हो गया। प्रांगन में पैर रखते ही सेठजी की दृष्टि मनोरमा पर पड़ी। उन्हें आशा न थी कि वह भज्जे पर खड़ी मिलेगी। वे पुराने ढंग की सीढ़ियों पर चढ़ने लगे, तो उन्हें आभास हुआ कि घुटनों में कुछ दर्द हो रहा है। कठिनाई से, होफते हुए वे ऊपर पहुंचे और मनोरमा को अन्दर पाने का संकेत कर, वे उसके कमरे में जाकर पलंग पर ढेर हो गये । आक्रमण की नीति उन्होंने पहले से ही निर्धारित कर रखी थी। अतः उसे बोलने का अवसर न देकर वे बोले-"अमिता ने कुछ उछल- कूद तो नहीं मचाई।" सेठजी का उद्देश्य सफल हुआ। मनोरमा ने एकाएक अमिता की पर्चा चल जाने के कारण, पहले रामू के विषय में कुछ पूछना उचित न समझा । वह बोली-"वह कहती है कि मैं उसी लड़के से ब्याह कहेंगी। क्या नाम है राकेश ! भला सोचने की बात है कि उसके साथ हो सकता होता तो हम लोग यहां क्यों आते ! सेठजी ने अत्यन्त कुशल अभिनेता की भांति कहा.-"सच पूछो तो वह ठीक ही कहती है । इसका मतलब तो यही है कि जो लड़का उसके कमरे में था, उसको छोड़कर वह दूसरे के साथ सम्बन्ध रखने की उसकी इच्छा नहीं है ।" मनोरमा को आभास भी न हुया कि वह मकड़ी के जाल में फंस रही है। वह मुंह विदोर कर कुछ व्यंग्यात्मक स्वर में बोली-"मैंने तो प्पप्ट कह दिया कि विवाह तो वंश-परम्परा के अनुसार ही होगा। तो वह बोली कि मैं मर जाऊँगी, पर अन्यत्र विवाह न करूंगी।"
प्रात्मत्याग की भूमिका सेठजी बोले-“वह ठीक कहती हैं। भारतीय नारी का यही मादर्श है । मैं सोचता हूँ कि इसमें हजं ही क्या है ? आजकल तो अन्तर्जातीय विवाह होने लगे हैं । कम-से-कम यह हिन्दू तो है । किसी एक का होकर रहने का सुग्य ही पोर होता है।" मानो मनोरमा के तन-बदन में याग लग गयी हो उस संगा कि उन्होंने मेरे ऊपर सोया प्रहार किया है। कोप के कारण उसका मुख तमनमाकर लाल पड़ गया और बदन कांपने लगा। वह बोली-"हाँ जी, मैं जानती हूं कि वह कितनी सती-सावित्री है। तुम क्या जानो ? मैंने मव पता लगा लिया है। न जाने कितने लड़के उसके कमरे में मा मुके हैं। रोज ही तो एक नया लड़का अपने साथ लाती भी। वेश्या यही की ! यह सी कहावत है नौ सौ चूहे खा कर।" सेठजी ने संयत भाव से उत्तर दिया-"अपनी लड़की को वेश्या फही तुम्हे लाज नहीं पाई ! मैं मानता हूँ कि उसने गलती को होगी। लेकिन प्रय तो उसे अपनी भूल का पता लग गया । वह सुघरना चाहती है । भगवान उसे सुखी रसे, बड़ी तेजस्वी लड़की है । उमे बुलाग्रो न ? अगर वह लड़का, क्या नाम है राकेदा, ठीक-ठाक हो तो उनी के साम ब्याह कर दें।" सेठजी को अमिता से ऐसी आगा न थी। उनका विचार या कि पनी को प्रभावित करने के लिए उन्हें अमिता को ऊंच-नीच समझाना पड़ेगा। वे मादा उपस्थित करके धीरे से मनोरमा के मन में ग्लानि उत्पन्न करने की चेष्टा कर रहे थे। परन्तु यहाँ प्रादर्श उपस्थित किया उसी ममिता ने । उनके मन में माया-वास्तव में राकेश के साथ इसका सम्बन्ध कर देने से प्रमिता मुसी भी होगी और सन्मार्ग पर चल निकलेगी। उस दशा में मनोरमा भी रामू को भूल जायगी। उघर मनोरमा की मनोदशा बड़ी विचित्र हो गयी । उसे माया ही न थी कि रूढ़िवाद के कट्टर पुजारी सेठजी अमिता का पक्ष सेकर उसे जीवित ही मरणासन्न कर देंगे।
१५० आत्मत्याग की भूमिका । तभी सेठजी ने उसे विचारमग्न देखकर स्वयं ही अमिता को पुकारा। एक क्षण में चम्पा ने आकर सूचना दी कि वह सो रही है, तो उन्होंने उसे जगाने का आदेश दिया। उनका विचार था कि इस समय स्थिति उनके पक्ष में है और अवसर से.पूर्ण लाभ न उठाना मूर्खता होगी। पता नहीं फिर ऊँट किस करवट बैठे । लोहा ठंडा होने पर जब कड़ा हो जाता है, तब उसे झुकाना कठिन हो जाता है । तभी चम्पा ने पाकर सूचना दी कि अमिता के कमरे का दरवाजा चन्द है और काफी आवाज देने पर भी नहीं खुला। एक अज्ञात आशंका से सेठजी का हृदय कांप उठा। मनोरमा का चेहरा पीला पड़ गया। एक अस्फुट चीत्कार उसके कण्ठ से निकल पड़ी। "उसने सचमुच कहीं...!" अधूरा कथन छोड़कर वह उठी और अमिता के कमरे की ओर दौड़ी। सेठजी ने भी उसका अनुसरण किया। दोनों दरवाजा पीटते रहे। मनोरमा के नेत्रों से वर्षा की उमड़ती नदी बन गयीं। शोर-गुल सुन कर सभी एकत्र हो गए। कन्हई ने पहले तो नीचे से देखा । फिर वह दौड़ कर ऊपर आ गया और अपने वृद्ध शरीर का समस्त वल लगा कर कन्धे से द्वार को उखाड़ फेंकने में जुट गया। परन्तु पुराने जमाने का का दरवाजा टस से मस न हुआ । सेठजी ने चिल्ला कर आदेश दिया--"कुल्हाड़ी लामो और दर- वाजा तोड़ दो।" सारे नौकर-चाकर फट पड़े । कुल्हाड़े पर कुल्हाड़े चले और अन्त में महारथी योद्धा की भांति द्वार का वक्ष विदीर्ण हो गया ! अन्दर दृष्टि पड़ते ही मनोरमा चेतना शून्य होकर गिर पड़ी। सभी चीत्कार कर उठे सेठजी की दृष्टि, पलंग पर तिरछी पड़ी अमिता पर जा पड़ी। उन्होंने आगे बढ़ कर कहा-"बेटी तूने अपने पिता पर भी भरोसा न किया।" कन्हई ने बढ़ कर न पकड़ा होता तो.वे शायद धरती पर गिर जाते। ।
मात्मत्याग की भूमिका १५१ सेठजी ने तुरन्त अपने को सम्हाल लिया मौर पलंग के निकट जा कर उसे देखा। समीप पड़ी हुई छोटी-सी साली शोशी पर दृष्टि पड़ते ही वे चैतन्य हो बोले-"इसे अस्पताल से चलने का प्रबन्ध करो। जल्दी करो। मोटर में लिटा दो।" मन-ही-मन वे भगवान का स्मरण कर लगे। * लाला हरचरणसिंह के पोधे सोढ़ी पर चढते हुये विस्मित राकेश] का हृदय पासा भौर शंका के ज्वार-भाटे में उतर रहा था कि प्रभू की लीला अपरंपार है । कल इतना अपमानित हुमा, तो माज सभी मुझे सर खिों पर बैठा रहे है । भूपतलाल ने अपने भाई को भेजा । लाला जी अपने भाप अपना भेद खोल रहे हैं । इसका मतलब तो यह हुमा कि मव भमिता की पारी है । इसका भी सन्देश पाना चाहिए । उसे क्या मालूम था कि सन्देश क्या होगा । मनुष्य को इसका कहीं पता रहता तमो लालाजी ने द्वार से पर्दा हटाकर उसे अन्दर पाने का संकेत किया । कल्पना के घिरौंदे से निकल कर वह वास्तविक जगत में मा गया । दृष्टि उठाकर उसने देखा कि सब कुछ वैसा ही है, केवल बीच में एक मेज और है, जिस पर नाना प्रकार के चाय के संगी साथी सजे है । अव वह भागे बढ़ा मोर उसने प्रतिमा के चरण स्पर्श कर लिए। प्रतिमा ने मृदुल स्वर में प्राशीर्वाद देते हुए कहा-"जीते रहे बेटे । सदा सुखी रहो।" लावाजी बोले-"तुमने अपनी चाची को सूब पहबाना । देखा, मैंने कहा न था कि भाजकल बड़ी विचित्र वातें हो रहीं हैं ! मैं समझता हूँ कि चार दिन में तुम उन्हे उठाकर खड़ा कर दोगे। सच पूछो तो मैं इनकी रोनी सूरत देखकर घबरा जाता था। अब कल से बात ही निराली है सब तुम्हारा कमाल है यादशाहो।" " १५२ मात्मत्याग की भूमिका । राकेश मुसकराने लगा । कुर्सी पर बैठता हुआ वह बोला-'सब भगवान की कृपा है । सच मानो चाचीजी, मुझे तो ऐसा लगता है कि मैं भटक कर विछड़ गया था और अब आपको पाकर मानो में अपनी सगी मां को पा गया हूं।" प्रतिमा के अधर कमल की भांति खिल उठे । दन्तावलि की मुक्ता- छटा बिखेरती हुई वे बोली-"मैं न जाने कब से तुम्हारी राह देख रही थी । तुम पहले आ जाते, तो मेरा दुख पहले ही समाप्त हो जाता।" राकेश उत्तर भी न दे पाया था कि अंजना ने कमरे में प्रवेश किया। उसके हाथों में गरम पकौड़ियों की प्लेट थी। मेज पर रखते हुए उसने राकेश की ओर देखा और नमस्कार की मुद्रा में हाथ जोड़ दिया । राकेश को ऐसा प्रतीत हुआ कि यही तो है, जिसकी मैं कल्पना करता था, छोटी गुड़िया-सी । लालाजी ने उसकी प्रतिक्रिया देखी । यद्यपि वास्तविकता का प्राभास किसे प्राप्त होता है ? चमकते हुए पीतल से सोने का भ्रम हो जाता है । लाला जी ने भी उसकी आँखों में चमक देखकर समझा कि बात बन गयी। वे तपाक से वोले-"ये है मंजू ! मेरी बेटी । पूरा नाम है अंजना । वी० ए० पास किया है। पर है बड़ी शैतान बादशाहो।" राकेश ने अंजना का संकोच देखा तो वड़ा भला लगा। उसके नम- स्कार के प्रत्युत्तर में वह उमंग से लहरा कर बोला-"खुश रहो वहन । खूब शैतानी करो। विश्वास रक्खो तुम्हारा भाई हमेशा तुम्हारा पक्षलेगा।' प्रतिमा के मन की प्रतिक्रिया अभी तक उसके मुख पर न झलकी थी। वह मन में सोच रही थी कि चलो अच्छा ही है। कम से कम उसे भाई का प्राश्रय तो मिला। किन्तु लाला जी के मन की निराशा उनकी आंखों में परिलक्षित हो उठी। वे विचार में पड़ गये और बोले-"अंजू जा कर वलवन्त को भेज । चाय तो लाये और तू गरमागरम पकौड़ी निकाल ।" उसके जाते ही लालाजी कुर्सी खींच कर राकेश के सम्मुख बैठ गये और बोले-"अंजू के विषय में तुम्हारी क्या राय है बादशाहो ?"
আশয়ায় কী সুমিকা राकेश उनके मभिप्राय कौन समझा। उसने साधारण तौर पर, किन्तु उत्साह के साथ कह दिया-"यहत पच्छी लड़की है। भग- धान करे सदा सुखी रहे और बड़ी उमर पाये और देश का गौरव बढ़ामै । यव लालाजी ने कहा-"इसी लड़की के कारण बड़ी परेशानी रहती है । जानते तो हो कि माता-पिता के लिए कन्या का भार कितना दुखदायी होता है । लेकिन बादशाहो, देश गौरव बढ़ाने की बात तुमने अपने माशीर्वाद में खूब कही। मुझे वही सुनी हुई। काश हम सत्र प्रतिक्षण इस बात का ध्यान रखकर चलते।" राकेश तपाक से बोला-"चलेंगे तालाजी चलेंगे । मात्र कार में चिन्ता करते हैं। और हां इससे विवाह करके कोई भी अपने को धन्य मानेगा । जिस घर में जायगी, वह नन्दन-कानन वन जायत ।" लालानी नै स्पष्ट रूप से प्रस्ताप कर दिग-- 'हम लोगी की इच्छा है कि तुम इगे स्वीकार कर लो।" राकेश ने स्वप्न में भी कल्पना न की थी कि लाला जी ऐमा प्रस्ताव करेंगे। उसके मन में माया-प्रमिता से भेंट न होती तो वास्तव में इससे चढ़ कर दूसरी पली को कल्पना भी को नही जा सकती थी। पर एक नारी में सम्बन्ध स्थापित करने के पश्चात मव यह प्रस्ताव ! फिर उस लड़की के साथ जिसको एक बार वहन कहा । छि ऐसा विचार करना भी पाप है ! कुछ गम्भीरता के साथ उसने उत्तर दिया--"लालाजी अंजू मेरी यहन है । मोर बहन केवल वहन होती है।" प्रतिमा बोली-"बेटा तुम नहीं जानते दि हम लोग कितनी माशा लगाये थे । मोचती हूं-उसका हाय कौन पड़ेगा । यह तो ममागिन हतप्रभ, राकेश एकाएक कोई उत्तर न दे सका। घय लाला जी बोले-"तुम तो जानते हो कि एक राज हमारी जिन्दगी में छिपा है ? तुम्हारे एक संकेत पर हमारा जीवन सुखी हो सकता है।"
प्रात्मत्याग की भूमिका अचानक राकेश के नेत्रों में अमृतलाल का सौम्य, शान्त मुख उभर प्राया । वह बोला-"इसका विवाह में तय करूँगा । मैंने वर द्रुक लिया है।" दुखी स्वर में लालाजी वोले-"इससे विवाह कौन करेगा।" एक मिनट वे मौन रहे । फिर अतीत में डूबा हुआ उनका स्वर गुंज उठा । राकेश को प्रतीत हुआ, मानो कोई व्यक्ति बहुत दूर से कातर वाणी में चीत्कार कर रहा है। लालाजी कह रहे थे-"वटवारे की बात है। पिण्डी से हम लोग किसी भांति जान वचा कर लाहौर पहुंचे। तो मैं अपने बचपन के दोस्त के घर टिक गया। बलवन्त ने मना भी किया। किन्तु मैं अभागा न माना और उस रात को मेरा दोस्त पशु बन गया । पाशुविक वल के आगे विवश व्यक्ति क्या कर सकता है। उसने अपने नौकरों की सहायता से मेरे और वलवन्त के हाथ-पैर बांध दिये । फिर 'फिर क्या कहूं बेटा, यों समझ लो कि तभी अंजू का जन्म हुआ। बलवन्त की तो सुनने-बोलने की शक्ति जाती रही और ये उस दिन से ऐसे ही पड़ी रहती हैं । मैं अभागा मर कर भी न मर सका ! रोज रात को न जाने कैसे उसी समय ये चीख पड़ा करती हैं।" राकेश ने स्थिति की गम्भीरता को समझा। उसने हद स्वर में कहा-"आप बेकार दुखी होते हैं। इस राज़ को सदैव के लिये अपने सीने में दफ़ना दे । यों भी अगर पहले किसी से कह देते तो इतनी पीड़ा न सहन करनी पड़ती।" लाला जी बोले-"अपना दुःख नहीं है, बेटा । दुःख तो अंजू का है।" राकेश बोला-"उसे क्यों दुःस होगा ? आपने उसे जन्म नहीं दिया तो क्या हुआ, पाला तो है । पुत्री न सही, धर्म-पुत्री तो है । आप मन में उसे धर्म-पुनी ही मानिये । संसार की दृष्टि में तो वह आपकी पत्नी की पुत्री होने के नाते आपकी ही मानी जायगी। अनिष्टकारक सत्य से वह झूठ फिर भी अच्छा जिससे किसी का कल्याण हो ।" तभी प्रतिमा की सिसको से वातावरण गूज उठा । राकेश उठाः प्रात्यापाग की भूमिका मौर चमनं प्रतिमा के मस्तक पर हाय रख दिया। फिर वह उसके बहते हुए पांमू को पॉटन समा। मब वह बोला-धीरत रक्सो चाची । अपने चैटे पर ती दिदवान करो । मैं वास करता हूँ कि पानी बहन की गादी ऐमी धूम से करूंगा कि लोग देवने रह पापणे ! आपको मालूम नहीं, मेरो वही इच्छा थी कि मेरे एक छोटो दहन होडी, तो उमका में व्याह रचाता । अपने हाय से सरा संवार कर दिदा करता भव में..." फिर प्रधूरा दाक्य छोड़कर यह साना वी को और मुम होकर वोला--"लाला जी, अमृतलाल के विषय में पानी क्या वर है ? सड़का तो हमें बहुत पसन्द पाया । पढ़ा-लिया है। मरे घाब, रमनी रिटर्न है।" इतने में योग में मनुष्य के कलाना एवं प्रपलों से परे, दरवन्त ने पाकर एक विद्धिटिंग का राकेग के सम्मुख रख दिया। राकेग ने उमे देवा और उनका मुख दल बनल की नाति दिल उठा। यह बोला-"लीजिरे माहब, माप इनको कहते हैं। जानते हैं कौन साहब हैं ? श्रीमान् अमन लाल जी । ल समर में भगवान को मानता, तो वह मो मिल जाने । माप भी देख लीजिये पाची जी। मनी मना कर देता हूं।" फिर उमने बसन्यत मे कहा--"यहीं लिदा साम्रो।" सालाजी ने भी संक्त कर दिया। बलदन में दलाने गया तो राय ने जोर से पुकारा-"यंत्र ! यहाँ मानी।" साथ ही उसने नालाजी से वह दिया- दोनों एक दूसरे को देख लें, तो अच्छा है।" यंत्र और अमृतलास ने लगभग एक माय मरे में प्रवेश किया। एक ने पूर्व के द्वार से पा रस्ता, दूसरे ने दक्षिण में । दिन्नु दृष्टि दोनों को एक साथ ही एक दूसरे पर का पड़ी और दोनो का ही मुमानग्या से लाल हो गया। दातावररा को भूलकर दोनों ने एक दूसरे को देखा और साथ ही अभिवादन के लिये हाय जोड लिये।
आत्मत्याग की भूमिका - - सभी की दृप्टि इन दोनों पर थी। राकेश का अन्तर्मन बोला लो हाय मिलामो प्यारे, काम बन गया ! अव वह बोला-"पायो भाई ! बड़ी उमर है तुम्हारी। हम लोग तुम्हारी ही बातें कर रहे थे।" अमृतलाल ने झट कह दिया-"जल्दी चलिये। सेठ मुरली मनो- हर प्रतीक्षा कर रहे हैं।" राकेश के सम्मुख अमिता का प्रश्न इस समय प्रमुख न था। यह -सुनकर वह समझा कि वे विवाह के लिये तैयार हैं। अत: वह बोला- "चाय तो पी लो । अंजू, जा जरा गरम चाय तो ले या।" अमृतलाल दुविधा में पड़ गया । वह बोला-"फ़िरोजा जी का फ़ोन आया था। भाई साहब तो वहाँ चल दिवे और मुझे यहाँ भेजा है । आप जल्दी चलें।" अनजान स्थान पर एकाएक दुख भरा संवाद देते उसे संकोच हो रहा था। पर राकेमा था कि उसके ऊपर कुछ असर ही नहीं होता था । उसे कुछ उद्विग्न एवं जल्दी मचाते देख कर राकेश वोला-"देखो भाई ! जल्दी न मचानो। इस समय सेठजी को, भाई साहव को सवको छोड़ कर मेरी समस्या के ऊपर ध्यान दो। वात ऐसी है कि मैं चाहता हूँ, तुम्हारी कुछ सेवा करूं!" अमृतलाल की कुछ भी समझ में न आया। उतने चतुर्दिक दृष्टि फेरो तो देखा कि सभी की उत्सुक दृष्टि उसी के ऊपर केन्द्रित हैं । 'एकाएक उसके मुंह से निकल गया--"मैं कुछ समझा नहीं।" राकेश मुसकराता हुआ बोला-"मेरी एका वहन हैं अंजना । अभी जो यहाँ थी, मैं चाहता हूं कि उसका विवाह हो जाय । और मेरी समझ में तुम दोनों की जोड़ी बहुत उत्तम होगी।" अमृतलाल भाग्य को विडम्बना देस कार मन-ही-मन रो पड़ा। बात उसके मन की थी। इनकार वह कर नहीं सकता था, किन्तु अमिता के सम्बन्ध में कुछ कह भी नहीं पाता था । वह धीरे से बोला-"पाप चलिये भी।" - मात्मत्याग की भूमिका राका बोला--"पहले मेरी समस्या का समाधान हो जाय तो मैं चलं । गुण-शील, पढ़ाई-लिसाई सव में 'ए वन' है। देव तो तुम चुरे ही हो। लेन-देन में लालाजी कुछ कोई-कमर नहीं उठा रखममें।" नभी पर्दे के पीछे खड़ी हुई अंजना भगवान से अपना-मुस-सौभाग्य' मांग की। चाय की फेटली और प्याला हाय में था और सांग रोक कर निर्णय की प्रतीक्षा मनप्राण में । अमृतलाल ने अन्य उपाय न देख धीरे से कह दिया--"मुझे मापी भाशा शिरोधार्य हैं लेकिन इस विषय में माप भाई साहब में बात करें।" कथन के साथ ही उसने झुक कर राकेश का धरण स्पर्श करना चाहा । लेकिन राकेश ने उसे बीच में ही रोक कर अपने या से लगा लिया मोर कहा-"सदैव सुखी रहो।" अमृतलाल ने सोवा-दो वर्ष विदेश में रहकर भी मैं पोंगा रहा। सारा शरीर कोप रहा है। फिर वह बोला-"मगर माप जल्दी करिये। भस्पताल में राव प्रापकी प्रतीक्षा कर रहे हैं ," मन राकेम के चकित होने की पारी थी। यह नोला-"मस्पतान' लालाजी बोले-"क्या मतलब है येटा ?" अमृतलाल ने प्रत्यन्त दुखी स्वर में कहा-"प्रमिता !" राकेश लगभग चीखता हुमा बोला-"क्या हुमा भमिता को ?" अमृतलाल के नेत्रों से ग्रामू टपक रहे थे। यह बोला-"हम गोगो को सदैव के लिए छोड़े जा रही है।" राकेश पर मानो वयपात हुमा । उसे प्रतीतहमा कि उसके गंसार में भाग लग गयी है और वह उसमें जला जा रहा है। उसके हृदय में दुख का सागर उमड़ पड़ा, लेकिन उमकी एक बूंद भी उसके नेत्रों को कोर की राह न पा सकी । एक उच्छ पास उसने कण्ठ रो निकाल कर बोझिल वातावरण में लीन हो गया। भगवान तेरी लीला ! उसके मन में पाया-सत्पथ पर चलना स्तिना दुप्पर है ! वागना के.पंक में डब जाता, तो कुछ भी न होता । कोरड़ से निकल १५८ आत्मत्याग की भूमिका की चेप्टा में अपने संसार को आग लगा बैठा। लालाजी ने आगे बढ़ कर उसके कन्धे पर हाथ रख दिया। राकेश उठ कर खड़ा हो गया और कमरे के बाहर चल दिया। लालाजी उसके साथ थे और अमृतलाल पीछे । तभी अंजना भीतर आयी और प्रतिमा के समीप जाकर बोली- "अच्छे लोगों को भगवान दुख क्यों देता है ?" प्रतिमा ने उसे खींच कर वक्ष से लगा लिया। --- अस्पताल में सेठजी का प्रभाव सर्वत्र दृष्टिगोचर होता था । प्रत्येक डॉक्टर, नर्स कम्पाउन्डर इधर से उधर दौड़ रहा था। नगर के प्रमुख उद्योगपति की विपत्ति में साथ देने वालों की भी कमी न थी । किन्तु सभी के मुख पर केवल चिन्ता ही न थी। वे लोग आपस में बाज की सामाजिक व्यवस्था के अन्तर्गत रूढ़िवादिता का स्थान और उसका मूल्य ढूढ़ रहे थे । सवको पता था कि समय के अनुसार चलने में ही कल्याण है । साथ ही उनकी दृष्टि शंकित मन से सुसंवाद सुनने की प्रतीक्षा में इमरजेन्सी वॉर्ड की ओर उठ जाती थी। जिसको समाचार मिलता, वही दौड़ा चला आता ! इधर उधर दर्जनों कारें और स्कूटर खड़े थे। कोई कह रहा था-देखा, रूढ़िवाद का दानव किस गति से मानवता का खून पी रहा है। दूसरा उत्तर दे रहा था-बलिदान की भूखी क्रान्ति के बिना ऐसे जीर्ण-जर्जर किन्तु पाशविक वृत्तियों के.पोपक समाज क ध्वंस कभी सम्भव नहीं है । यदि अमिता का प्राणान्त कहीं हो गया, तो उसकी उज्ज्वल परिणाम तुम देख लोगे । मैं तो कहता हूं ऐसा भी एक दिन पा सकता है, जब विवाह के सम्बन्ध में अनुचित हस्तक्षेप संतति हत्या के समान जघन्य पाप समझा जायगा। तभी लालाजी की कार रुकी । तो फाटक के समीप खड़े प्रतीक्षारत आत्मत्याग की भूमिका . कन्हई को दृष्टि ममृतलाल पर जा पही। उसने मागे बढ़कर पूछा- "भैया माये?" अमृतलाल ने पीछे की सीट पर लालाजी के साथ बैठे हुए राकेश की ओर संकेत कर दिया। कन्हई ने मुंह से कुछ न कहा। पर नेत्रों पर अंगोया लगाते हुए भागे बढ़कर एक पत्र राकेदा को मोर बढ़ा दिया । राकेश ने देखा कि लिफाफे पर उसका नाम है भोर प्रेषक के स्थान पर तीन प्रक्षर जगमगा रहे हैं-ममिता । कराहते हृदय से उसने बिलकुल निर्विकार भाव से पत्र निकाला भौर पढ़ना प्रारम्भ कर दिया। पत्र में लिखा था :- "प्रिय राकेश, तुम मिले और मैंने एक स्वप्न देना । सब मानो मेरा संसार बदल गया। पर हाय मन के मौत के साथ मुस की दो पड़ी भी न, विता पाई थी कि नियति ने राह में काट विमेर दिये ! तुम्हारी प्रतीक्षा करने जा रही है। सायना पूर्ण हो गई. तो भेंट होगी । मन्यथा में जन्मजन्मान्तर तक तुम्हारी प्रतीक्षा करूंगी। तुम दुधी न होना। फिरोजा कहती यो-'तुम संन्यासी हो।' सांसारिक मोह तुम्हें नहीं सतायेगा। बस, यही बात मुझे सदा शान्ति देती रहेगी। कभी-कभी याद तो कर लिया करना । करोगे ना? मगर देखो, याद करते क्षण कभी पांखों में प्रामू न पाने देना नहीं तो मुझे अपार दुःन होगा। अब क्या बता! मैंने स्वप्न देखा था कि मरणपर्व के समय तुम मेरे समीप होगे। मैं अपने देवता की गोद में सर रखकर बड़ी शान्ति से चिरनिहा में लीन हो जाऊँगी । पर ऐसा सम्भव न था। फिर भी एक इच्छा है, पूरी करोगे? हो सके तो मेरी चिता को अपने हाथ से प्रज्ज्वलित कर देना । सम्भव है, तुम्हारे पावन स्पर मेरो पावन मात्मा मुक्त हो जाय ! ।
१६० आत्मत्याग की भूमिका विदा दो मेरे देवता, मेरा भाग्य ही धोखा दे गया ! मुझ अभागिन को सेवा का अवसर ही न मिला। तुम जानते हो, मैंने अपने समस्त हृदय से, प्राणों के स्पन्दन से, अपने लोम-लोम से तुम्हें देवता मान कर पूजा है । तो अव ऐसा आशी- दि दो कि अगले जन्म में मैं तुम्हारी सेवा का पूर्ण अवसर पाऊँ । तुम्हारी प्रतीक्षा में, जो तुम्हारे स्पर्श मात्र से धन्य हो गई, अमिता।" राकेश का हृदय चीत्कार कर उठा। उसके नेत्रों से अर्घ प्रवाहित हो रहे थे । वह धीरे से कार का द्वार खोल कर नीचे उतरा । एक बार उसने अस्पताल के विशाल भवन पर दृष्टि डाली। फिर वह.चीस उठा-"नहीं"नहीं...!" विक्षिप्त की भांति उपस्थित जन-समुदाय दौड़ता हुआ इमरजेन्सी वॉर्ड में जा पहुंचा। प्रापरेशान थियेटर का द्वार खोलते ही उसने देखा कि अमिता माप- दान टेबुल पर लेटी हुई है। एकाएक वह चीख उठा-"मुझे छोड़कर न जामो अमिता!" समीप खड़े हुए सेठजी उसे पहचान गये। उन्होंने आगे बढ़कर उसकी पीठ पर हाथ फेरते हुए कह दिया-"अब धवराने की कोई बात नहीं है । सब ठीक हो गया है । थोड़ी देर में होश भी पा जायगा।" किन्तु राकेश के कान के परदे से ये शब्द तो टकराये अवश्य पर वह उत्तर न दे सका । मानसिक आवेग के उद्रेक से वह स्वयं चेतना- यून्य हो धरती पर गिर पड़ा। और वह को भूलकर
No text on this page.