Agarchand Bhairondan Sethiya Jain Parmarthik Sanstha, Bikaner

Utanika

Bahadur Lala · 2011/07

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उत्थानिका । की प्रथा नहीं थी। हम समझते हैं, यह दोष जनमाहित्यपर मर्यथा नहीं लगाया जावेगा, गद्यक मैकडों अन्य जैनियोंके पुम्न- कालयोंमें अब भी प्राप्य है । पद्यग्रन्थों की मी त्रुटि नहीं है, परन्तु उनम नायकाओंका आमोद प्रमोद नहीं है। केवल तत्त्वविचार और आध्यात्मिकरम की पूर्णताका उज्ज्वलप्रवाह है । ममत्र है कि, इस कारण आधुनिक कविगण उन्हें नीरम कहक समालोचना कर डालें परन्तु जानना चाहिये कि, शृगारग्म को ही ग्ममंत्रा नहीं है । जिस समय भाषामन्योंकी रचनाका प्रारंभ हुआ है, उम समय जैनियों के विलासके दिन नहीं थे। वे बडी २ आपदायें शेलकर बड़ी कठिनतासे अपने धर्मको जर्जरित अवस्था में रक्षित रख सके थे । कहीं हमारे अलौकिक-तत्त्वज्ञानका ममाग्में अभाव न हो जावे, यह चिन्ता उन्हें अहोरात्र लगी रहती थी, अतएव उनके विद्वानोंका चित्त विलास-पूर्ण-ग्रन्योंके रचनेका नहीं हुआ और वे नायकाओंके विभ्रमविलासोंको छोड़कर धर्मतत्वोंको भाषामें लिखनेकेलिये तत्पर हो गये । धर्मतत्वोंको देशभाषामें लिखने की आवश्यकता पडनेका कारण यह है कि, उस समय अविद्याका 'अंधकार बढ़ रहा था और गीर्वाणवाणी नितान्त सरल न होनेसे लोग उसे भूलने लगे थे, अथवा उसके पढ़नेका कोई परिश्रम नहीं करता था । ऐसी दशा में यदि धर्मतत्त्वोंका निरूपण देशभाषामें न होता, तो लोग धर्मशून्य हो जाते । एक और भी कारण है यह यह , हमारे आचार्यों का निरन्तर यह सिद्धान्त रहा है कि, देश काल अनुकूल प्रवृत्ति करनी चाहिये, इसलिये देशमें जिस समय मापाका प्राधान्य तथा प्राबल्य रहा है, उस समय उन्होंने भाषामें अन्योंकी रचना करके समयसूचकता व्यक्त की है। tartitutitut

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१० उत्थानिका। ताब्दीमें भाषाके चार पांच अन्य निर्मित हुए, परन्तु मायाकाव्यकी यथार्थ उन्नति सोलहवीं शताब्दीमें कही जाती है । इस शताब्दीमें अनेक उत्तमोत्तम ग्रन्थोंकी रचना हुई है। अन्वेपग करने में जाना जाता है कि, जैनियोंके भाषासाहित्यने भी इसी शताब्दीमें अच्छी उन्नति की है। पडित रूपचन्दजी, पांडे हेमराजजी, बनार- सीदासजी, भैया भगवतीदासजी, भूधरदासजी, डानतरायनी आदि श्रेष्ठ कवि भी इसी सोलहवीं और सत्रहवीं शताब्दीमें हुए हैं। इन दो शताब्दियों के पधात् बहुतसे कवि हुए हैं और अन्योंकी रचना भी मद्त हुई है, परन्तु उक्त कवियोंके तुल्य न तो कोई कवि हुए और न कोई अन्य निर्मारित हुए । सत्र पूर्यकत्रियोंके अनुक- रण करनेवाले हुए ऐगा इतिहामकारोंका मत है। हम इग विषयमें अभी तक कुछ निश्चय नहीं कर सके हैं कि अनियोंमें माषासादिस्यको नीर कसे पटी और ममे प्रथम कौन करिहुआ। और न ऐमा कोई माधन ही दिखता है कि, निममे आगे निधयकर मकेंग। क्योकि जैनियों ना इम विश्यक शोधने- थाने और आरश्यकता ममझनेवाले बहुत कम निकलेंगे और अन्य भाषामादित्य । विद्वान वैदिकमाहित्येतर साहित्यको साहित्य ही नहीं समझते । परन्तु यह निधय है कि शोध होने पर जैनमारामादित्य Frमी प्रकार निम्नश्रेणीका और पश्चाताद न गिना जायेगा। जनधर्म पाया सिपका राजपूनाना, युष्मान्त, मध्य प्रदेश, गुनगत, महाराष्ट्र और कांटक प्रान्तमें रहते हैं। हिन्दी, गुजराती, मगठी, और कानी ये चार मापाय इन प्रान्तो. की मुम्य मापायें हैं । परन्तु इन चार मायोममे प्रायः हिंदी ही एक एमी माता है, निम जैनधर्म मंगृत भारतमन्यों का अर्थ जैनमन्धरसाकरे M सरल और बोधप्रद लिखा गया है, अथवा उनके आधारसे नवीन सरल-बोधप्रद अन्य लिखे गये हैं। कर्णाटकी भाषामें अनेक जन- मन्य मुने जाते हैं, परन्तु वे समको सुलभ नहीं है। ऐसी अव- स्थामें प्रत्येक शन्तके जैनीको अपने धर्मतत्त्वोंको जानने के लिये हिन्दीका ही आश्रय लेना पड़ता है। जैनियों के आवश्यक पट्कर्मोमें शाम्बम्बाध्याय एक मुख्य कर्म है, इसलिये प्रत्येक जैनीको प्रतिदिन थोड़ा बहुत शारखत्याध्याय करना ही पड़ता है, जो हिन्दीमे ही होता । इमप्रकार जनसाहित्य और जैनियों के द्वारा हिन्दी भापाकी एक विलक्षणरीतिसे उन्नति होती है। जो जैनी धर्मतत्त्योंका घोडा भी मर्म होगा, चाहे वह किसी भी प्रान्तका हो, हिन्दीका जाननेवाला अवश्य होगा । हिन्दी प्रचारकों को यह मुनकर आपर्य होगा कि, जैनियों के एक जनमित्र नामक हिन्दी मासिकपत्रके एक हजार माहक हैं, जिनमें ५०. उत्तर भारतके और शेप ५०० गुजरात, महारापू और काटकके है । नागरीमचारिणी सभाओं और हिन्दी हितरियोंको इस और प्यान देना चाहिये। जिस जैन साहित्यसे हिन्दीकी इस प्रकार उपनि होती है, उसको अप्रकट रखने की चेष्टा करना, और उसके प्रचारमें यथोचित उत्साह और सहायता नहीं देना हिन्दी हिनपियोंको शोभा नहीं देता। जन-भाषा-माहित्य-भंडारको अनुपम रनोंसे मुमजित करनेवाले विद्वान् पायः आगरा और जयपुर इन दो स्थानों में हुए हैं। आगरे की भाषा सृजभाषा कहलाती है, और जयपुर की ढूंढारी। वृजभा. पाका परिचय देने की आवश्यकता नहीं है, क्योंकि हिन्दीकी पुरानी कारिता प्रायः इसी माषामें है, जो सबके पटन पाटनमें आती है। यह पनारसीविलास मन्य जो पाठको हायमें उपस्थित है, इसी । ** १२ उत्थानिका। भाषामें है । वृजभाषाके पास टोग जितने परिचित हैं उतने गवसे नहीं है । वृजमापाका गद्य जानने के लिये इस ग्रन्थकी आध्यात्मवधनिका और उपादाननिमित्तकी चिट्ठी पढनी चाहिये। ढूंढारी भाषा जयपुर और उसके आसपास ढूंढार देशकी भाषा है। इसमें और वृजमापामें इतना ही अन्तर है कि, ढूंढारीमें प्राकृतशन्दोंका जितना बाहुल्य रहता है, उतना जमाषामें नहीं रहता। और वृजभाषामें फारसी शब्दोंके अपभ्रंश अधिक व्यव- हत होते हैं । दूंदारी भाषाके गद्य अन्य बहुत सरल है, प्रत्येक पान्तका थोड़ी सी मी हिंदी जाननेवाला उन्हें महन ही समझ मकता है। जैनमन्थरत्वाकरमें जो स्वामिकार्तिकेयानुप्रेक्षा ग्रन्थ निकला है, उसकी टीका इसी माषामें है, पाठकगण उसे मंगा ढूंढारी मालामे परिचित हो सके हैं। मापागप लिमुनेवाले जनविद्वानोंमें प० टोडरमलजी, पं० जय- चन्द्रगयजी, पं. मगजनी, पांडे साचन्दजी, पं. मागचन्द्रजी और पथलिमनेवालोम ५० पनारमीदामजी, पं० धानतगयजी, पं० मूघर. दागजी, ५. भगवतीदागजी, पं० पृन्दावनजी, पं. देवीदासजी, पं० दौरतरामजी, पं० विहारीलालजी और मेवारामजी आदि कवियर उस्कृष्ट गिने जाते हैं। इनके बनाये हुए अन्यों के पटनम इनकी विद्वत्ता अच्छी तरह व्यक्त होती है। आशय है कि, इनमें जिमी भी करिन भगारामका अन्य नहीं बनाया । गभीमें आप्याम और तायका निम्प का आना का किया है। '. मादामजी ने कहा है, - এনাঙ্ক ग उद जग भंध भयो, म मय लोगन माज गमा वीपिना पप गीपत, विषयानक पनकी गुपगई तापर भीर र रसकाम्य, पाहा काटिप तिनकी निगा मंध भयानकी मैषियानमें, मलत है रज राम दुहाई॥ (भूधरशतक) म:मिन महामानोर मेपार थे, उन्हें आपयामिक रचनाका अतिरिक्त पर गंगारी रचना पुछ विशेष शोभा नही देती। परमारटिस शातरगयी समता गगाररम नहीं कर गमायोरिशातरमकी उपगति है, गंगारकी भयो । परन्तु सा पहनेमे पहनही समझाना चाहिये कि, इनकी करिता नय. रमनहित और वायके किमी अंगमे हीन होगी, नहीं! एक भाग्यात्ममें ही नयरमरित करके इन्होंने अपने अन्धोंको नवरम- पुनः पनाये है। कपिवर बनारसीदामजीने अपनी भात्मामें ही नर- रम परित रियादमिये- गुणपिचार रंगार, पीर उदिम उदार रुग। फरणा सम रसरीति, हास दिरद उडाद सुप॥ भटकरम दलमलन, मद्र परत तिहिं थानक । सन पिलेच पीभत्स, दन्द दुगदशा भयानक । अद्भुत अनंतपल चिंतपन, शांत सहज पैराग भूव । नयरस पिलास परफाश तय, जय मुयोधपट मगर हुप। परम आत्मावा यह नवरसयुफ अपूर्व चिंतयन विद्वानोंको अभूत- पूर्व मानन्दमय कर देता है। पाठकगग इसे एकबार अवश्य ही नाट करें।

उत्यानिका। भाषासाहित्यके विषयमें इतना ही कह कर अव यह उत्थानिका पूर्ण की जाती है। आशा है कि यह जिस इच्छासे लिखी गयी है, पाठकों के द्वारा यह किसी न किसी रूपमें फलयती होगी । पाठ- कोंके एक यार प्यानमे पढलेनमें ही हम अपनी इच्छाको फट्यती सममा मते हैं । इल्पलम् विद्वद्वरेणु- जीयानमिदं मतं शमयितुं ऋरानपीयं रूपा । भारत्या सह शीलयत्यविरतं थीः साहचर्ययतम् ॥ मात्सर्य गुणिपु स्यजन्तु पिगुनाः संतोपलीलाजुपः । सन्तः सन्तु भयन्तु च धमयिदः सर्व फयीनां जना चन्दानाड़ी-यम्बई, पिदुपा घरणगरोगहमेवी- नाथूराममेमी, दयरी (गागर) नियागी।

कविवर धनारसीदासजी।
मातृस्यामिस्यजनजनमभ्रारभार्याजनाचा
दातुं शकास्तदिह न फलं सजना यदन्ते ।।
फाचित पचनरचना येन सा ध्यस्तदोषा
यांदण्वन्तः शामितकलुग निति यान्ति सत्याः ।। ४६५
( मुभाषितरतमन्दोहे।
इस संसार में सजनजन जो फल देते है, यह माना, मामी, स्वजन,
पिता, माता, सीजनादि कोई भी देनेको समर्थ नहीं है। दोषोंको
विवंग करनेवाली उनकी यचनरचनाको सुनकर जीयधारी दानित
कटप (पापरदित) होकर निवृत्तिको प्राप्त करते है।
पाटकगण ! करियर बनारसीदासजीकी शुभफरको देनेपाली
संगी हमलोगों को प्राप्त नहीं है। क्योंकि ये अब इस योको नदी
हैं। किन्तु हमारे शुभकर्मक उदयमे उनकी निर्मल-यचन-रचना
(कविता) अप भी अगरवती होकर विधमान है, जिमग गम्पूर्ण
मांसारिक कलप (पाए) क्षय हो सके हैं। उन अक्षरोंसे करियरकी
फीति कौमुदी फेमी प्रस्फुटित हो रही है। यह उन्मल बाँदनी
आत्माका अनुभवन करनेवाले पुरुषों के हृदयमें एक अमेरिका
शीतलताका प्रवेश करती है, जिससे उन्हें संसारवी मोदमाग
उसारित नहीं करती।
जिम महाभाग्यकी पचनरपना ऐगी निर्मर और मुसहर है।
उसकी जीवनकथा जाननेकी किसको हटा न होगी। और पर
जीवनकथा रितनी सुंदर और रचिकर मदोगी। और उसके सं.
महरनेकी कितनी गावश्यक्ता नहीं है। ऐसा सोच पर हमने

कविवरबनारसीदासः। बनारसीदासजीकी जीवनकथाका शोध करना प्रारंभ किया। जिस समय बनारसीपिलामके मुद्रित करानेका विचार हुआ है, उसमें बहुत पहिले हम इस विषयक प्रयत्नमें थे। हर्षका विषय है कि हमारा थोडासा परिश्रम एक बड़े फलरूपमें फलित हो गया है । अ- धांत स्वयं कवियर बनारमीदासजीके हायका लिखा हुआ ५५ वर्षका जीवनचरिय प्राप हुआ है । इम जीवनचरित्रका नाम उन्होंने अर्द्ध- कथानक रसमा है, और ५५ वर्षके पधात् शेषजीवन-कथान लिममेकी प्रतिमा की है । परन्तु बहुत मोध करने पर भी उनके शेरजीरन के वृत्तमे हम अनभिज्ञ रहं । अकयानक में जो कुर रिमा हे, उमको हम गद्यप्रेमी पाठकोंकी प्रमन्नताकोलिये आनी आलोचनामहित यहां प्रकाश किये देते हैं। अद्भकमानक पय- बन्ध है। हम घरित्रमें उनके अनेक सुन्दर पर भी यशानमा दिये जायेंगे। साधात्य पडितों का यह एक बड़ा भारी आशेप, मारत पिकान जीवनोग्य अशा इतिहाम रिगना नहीं जानते थे। पान्त आनंम ३०० वर्ष पहिले जब पाधायगभ्यताका नाम निशान नहीं प, माग्नका एक गिग कपि अपने जीवन के ५५ वर्षका गुदान दिन गया है, इतिहागमें यह एक भायंकारी घटना है। हम निर्भय होकर कह मकर, काशिरोमणि बनारमोदामनी एक दीकी, जिन्होंने माने जीरन की ममी पर- धमका मच्छे गट शन्दीमें गुणदोनों की आलोचना की है। दोन मयेषना करना माधारण पुरुषों का कार्य नहीं है। मामादिस्य में बना मंग्टत नया मापा सायात जीरनपरिष मे गयेग्नु नतप्य पारि जैनमन्थरताकरे स्तियों के आधारमे उनमें अनेक असंभव घटनाओंका समावेश किया गया है, जिनपर एकाएक विश्वास नहीं किया जा सका । ऐसी दशामें परिपसे जो लोकोपकार होना चाहिये, यह नहीं होता। क्योंकि चरित्रका अर्थ चारित्र अधा आचरण है, और आचरणोंमें अन्तर्वास दोनोंका समावेश होना चाहिये । जिनचरित्रोंमें यह बात नहीं है, ये पूर्ण चरित्र नहीं है। कविवर बनारसीदासजीके जीवनचरि- असे भाषासाहित्यही इस एक बड़ी भारी श्रुटिकी पूर्ति होगी । क्योंकि अन्तर्गय चरित्रोंका इसमें अच्छा चिप खींचा गया है। भारंभ। पानि-शुगलपुर शीस धरि, मान अपनपो दास । आनि भगत चित जानि प्रभु, यन्दों पांस मुपास ॥ १ ॥ यह मंगलाचरण अर्धकथानकका है। कविवर पार्थनाय और मुपार्थनाथके विशेष भक्त थे, इसलिये कवितामें यत्र तत्र उक्त गिनेन्द्रद्वय की हो स्तुति दी है। आपका जन्मनाम विक्रमाजीत था, परन्तु आपके पिता जब पार्श्वनाथमुपानाथकी जन्मभूमि बनारस (काशी) की यात्राको गये थे, तब भक्तिवश पनारसी- दास नाम रखदिया था, इसका विशेष विवरण आगे दिया गया है। बनारमादानजी को भी अपने नामके कारण बनारस और उक्त जिनेन्द्रद्वयके चरणोंसे विशेषानुराग हो गया था। पनारसी- नगरी की व्युत्पत्ति देमिये आपने कैसी सुन्दर की है- १ पार्भ। २ मुगर्भ कविवरवनारसीदासः। ॥ पूर्व वंशधरोंकी कथा। मध्यभारतमें रोहतकपुर नामा एक नगर है। उसके निकट विहोली नामका एक ग्राम है । बिहोलीमें गजपूतोंकी बनी है। वहा कारणवस एक ममय किमी जैनमुनिका शुभागमन हुआ। मुनिगजक विद्वत्तापूर्ण उपदेशो और लोकोत्तर आचरणोंमे मुन्न होकर प्रमग्रामी मम्पूर्ण गजपूत नी हो गय, और- पहिरी माला मंत्रकी, पायो कुल श्रीमाल । यायो गीत पिहोलिआ. यीहोली-रमपाल । अयात नवकारमयी म प टेन श्रीमालालकी म्यारना कर र यिलिया र म । बाहोरमा कुलने गर कृति पाई .....५ । म पागत तकारक M. Itमल न म दा पहु" । गगार मनाम और नि. म. मनाम पत्र । 4.1 हिनी फासी trintentitutik 10-11 AN महाग मिल पा र पाधान। पEngi कामी. भागवान बटयान in | मानी और पाक • HR ATTER हो । माया रानमा + feat artime

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૨૨ कविवरवनारसीदामः। शाह हुमायूको परवीर ॥ १५॥ मूलदामजी उक्त नरवर नगरमें शादीमोदी बनकर गये और आना कार्य प्रतिष्टावक करने लगे। कुछ दिनके पत्रात् असार सावन मुदी ५ रविगर संवत् १६.२ को आपको एक पुत्रग्न प्राम हुमा। जिसका नाम सरगसेन रक्या। दो या पधातू पनमल नामके दूसरे पुत्रने अवतार रिया । परन्तु तीन वर्ष जीति रहके,- पनमल घनदल उहि गये, कालपयनसंजोग। मातगितालायर तये, सदि प्रातर गुनगोग ॥ १९॥ एनम के शोक को मलदामजी शेर नही मरे और संवत् ११ पुरन पर पुपकी गति को प्राप्त हो गये। मकी मामात् उनकी थी और मालक दोनों गनाप होम, मनबिनीको पनि ममार मशान मागिने लगा T-1 नमदीनान गुगरमा र मामा कार BI माया, भरगहना पागारमा कमा जापार मामिlaral का मन में भालकामिम मगा। मगर मामा, माबो गुगल मगा, बनारसीदाग मलयाग पे । ना 4.11.MAmeri गावा, Atm भARITRafigurati *मोपण, या ama aunा।

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कविवरवनारसीदासः। २.कर । पंचम भूपति शाह निजाम। छहमशाह बिराहिम नाम ॥ ३३॥ सत्तम साहिय शाह हुसेन। अहम गाजी सनितसन ॥ नयमशाह वख्यासुलतान । परती जार अमंडित मान ॥ ३४ ॥ बनारसीदागजीने जोनपुर के बादशाहों के ये : नाम हिमे है- १ मोनागाह दोगमुहम्मर ५ शाइनिजाम शाहरिराहीम (माहीम) समेत म्यागुणतान ma mai (गीतसरीमा नपुर * मानो, और ही पाया, और माम भी पाये। माम नमानी - १ माना २ नाम निजामी नारी करि- Pariyागील परागरा Frin नागरपुर नगा winiमनी कागेश। इन पानी में नो kageat HAELHI, MAHArth. -- Faralumar गाया ग TAITEM गनेशगात्री TEE TREnार "atti 11111 mit Meaning: म का नागनागिर JAN WORY. उलदीन मुदम्मामाद नाम पर बस । गीगे मुहम्मद गुगलप भाग या मुरंग गन् ०५६ (भादी सेवा ४.निधी मर गए। मुहम्मतुगलकोय नहीं था, इगरिये उसके एक सालार रजपा पर फीरोजशाहपारएक बाद हुआ । इगने सन our (मेगा)मैं बगालेसे मोठे हुए, गोमती नदी के तौरपर । भी समारग जमीन रेराकर परिमाथा, और उघ नाम भाने गरेमाई मुहम्मद तुगलको भाती नाम मलिकजोना के नामसे जोनपुर , क्योकि उसने सनमें मठिकशोनाको यह करते हुए देश या मर नान मेरे नामपर रखना। फीरोजशाद। रमान सन् ९. (भादो गुदी १५ वर ४५) ९. वर्षय होकर मरा। उसय पोना दूसरा ग्यामुद्दीन शुगलक वासभा पहराफर सन् ०५१ (फागुणबदोहे. १४४५) चे मारा गया। उस परेराभाई भयूपक उसी जगद बाद भी २. जिनहिय गन् (पाष पदी - सेर १४१७) को मर । तब समय गासिरउलदीन मुहम्मदशाह बाआ। वीरलभवत सन् ९६ (फागुण बनी। वत् १४५.) मर गया। उगरा बेग हुमायूंगगंको तल पर मार ॥ मने पीछे दो मर गरा। तब उसके भाई नासिरः उलदीन महमशाधे रपाजाजही पोरने उसकी जगह रटाया। गने पूर्वी दिदुओशक्षा हो जाना मुनहर स्याजाजहां उनके अपर मेला यही पहिना बादशाह जोनपुर हुमागमा नाम मलिक सरपर था भीर पीरो समय पोरीच दारोगा पानासिरसीन- मुहम्मदराने इमरजीर बनाएर मागासहारा सिताब दिया था भीर जब मासिरणीन मदमदशाहने इसे पूर्वी भेगा, तो मुटतात. सारंच शिपाय भी उसो दिया था, जिगम अर्थ होता है पूर्वस Moholla Marotian W nikanir.

फरिवरवनारसीदासः।
जोनपुरके शाह।
१ मुलतानउलश स्थाजाजहाने हिन्दुओंपर जीत पाकर जोनपु
रमें अपनी राजधानी स्थापित की। उसका राज्य परगने कोल
तिरहुत तक था। वह सन् ८०२ (संवत् १४५६ ॥ ५७) में मरा
उसके संतान नहीं थी, करनाल नाम , लडकेको बेटा बनायामा।यही
उसके पीछे जोनपुरका बादशाह हुआ और मुयारिकशाह नाम रपया
२ मुयारिफशाह-तुगलकांकी पादशाही दिन १ गिरती देशभर
पूरा सतम होगया। २ वर्ष पीछे सन् ८०४ (संवत् १५८५९) मे मरा।
संतान इसके भी नहीं थी, भाई तम्तपर बैन।
माहीमशाह (मुपारिकशाहका भाई) दमके समयमै दिदी तु.
गलयोंगे सैयदोंने से ली । पहिले रोया पिजर और फिर सैयद
मुहम्मदशाह पदका बादशाह हुभा । इमाहीम दोनों ही सरता
लाता रान् ८..(मवत् १९९) मर गया।
• मदम्पशाह (गुलतान इग्राहीमा बेटा) के समयमै रि-
कामाशाह मुहम्मदशाह मर गया भोर अलाउदीनगाह था।
अमीरीने उगगे नाराज होकर महादशाहको पुगया, तब भला.
उदीन पगाको हाशिम यहलोललोदीको दिली सोहर याऊं
भाग गया। परलोलगे भोर महमूदगे लडाई होती रही, निदान महमूर
गन् ११ (मेर १५१४१५) मर गया। शाम पा, भाई तन्त
५ मुहम्मदाह (महमूना माई)-गने पदलोलगेगुलरली,
पारिरलाई होने लगी और मुहम्मदशाद भपने भाइयों के बागडे
गया। ५महीने गयीभामंगशाद पारमा।
मेनगाहन भोर यायोलगे भीको युद.
मारने जोनपुर र भाने को ? वाणुको देगे.
Franiग।
• चारागार मोदी-गन् १(१५४५४) बमोस

जैनग्रन्थरताकरे २७ मरा और छोटा पेटा निजामपां दिहीमें बादशाह हुभा और मुलतान सिकंदर रहलाया। बासु उससे लड़ने गया और हारा । सिकदरने जोनपुर तो उसे फेर दिया, परन्तु मुखमे अपने हाफिम घटा दिये, जिन के जुलमोरा जोनपुर रायके भाधित राजोंने सग होकर गुलतान हुसेन- को मुलाया। यह सन् ०१५ (संवत् १५४ir) में आकर सिकंदरसे लडा, परन्तु हारकर गालेमें चला गया। सिकंदर अपने बेटे जलाल- सांजोनपुरमें बेटाकर चला गया। जलालशाद लोदी-ओबाद सन् ९२३ (मंगगर मुदी संवत् १५)ोगिकदर मरा और जलालशाहबा भाई माहीमराह दिही के तम्बर मेटा, उसने जलालशाहको निकालकर जोनपुर दरियापां. लोहानीतोदे दिया। दरियावालोहानी के समयमें पापर पादशाहने मुलतान हमा. हीमो मारकर रिटी लेती । उसी समय परियार भी मर गया। "पदादुरशाद (दरियागांश टा)-पापरे पीछे बादशाह हो गया। पयों पठानोती बादशाही शिरी जाती रही थी। बार बादशाहने काहगादे हुमायूगो भेजा, उसने बहादुरशाहको निकालकर हिमे. गो गोनपुरमें रा दिया। उसके पीछे यायायेग उसका बेटा जान. पुरमें हामि हुआ। .... "पापागणे, बोरगांपूरने, हुमायू बादशाहले पादशाही रेनेके पीछे जोनपुर से निकाल दिया और अपने टे भादिलगको जोनपु. राहामि बनाया। "मादिगांगर-११ रबीउस भार सन् १५९ (जेठ पुरी संवत् १९.) पोरवाद के मरनेपर सीमशाहायपरटा, उसने मालिसा बुलावर याना रिला दे दिया और जोनपुर से कररिया । पिर जोनपुर तक राय नहीं हुभा,पामा पो पुगसाक राम्य भी रिम रहते रहे। यह जोनपुरषा शिक्षutजिनीने नहीं देना है,

२८
कविवरबनारसीदासः।
वे यही जानते हैं कि, जोनपुर जोनाशाह (मुहम्मदनगर) ने बनाया था,
और यही मुनमुनाकर यनारसीदासनीने भी पहिलावादशाह जोना-
शाह लिसा है। यह बात कवर ३०० वा पहिले की थी, और सो
भी रिमो इविहागो आधारमे नही लिंगी थी, पुराने लोगोंगे पूरा पाण्डे
लिगो यो, उममे इतनी न होना संभव है। उन्होंने इस शिपमें
मरः गशक्ति मित्त होकर दिया।
"इते पूर्व पुरा परधान । मनके बनन मुने हम कान ।
पानी कथा ययाधुन जेम । मृगशेर नहि मागे एम" ३७८ ॥
(भयानक)
गप्रसार प्रथम बादशाह जीनाशाह नही, मिनुपौरोजगारको गम.
ना नाहिये। दूसरा जो वारशाहमा है, वह नोगेसाद यार.
पुर। यार। अपना पारमा मना है।
भीगा जा मुराहरगतान मा.वह स्यामाजद गि
मम मा गया था, मारही गाती राया गया।
भाषा -गि दोनमोहम्मदमाई,बह मुमरियार,
fम नाम करनाल पा । शायर जोनपुरका के उसे दौम्मगुरु
म्मदपत।
पांययां-धामगा, 31 पता मुबारिया
भीम ma म11
पहा-meीमामा मातीमार दी।
मानयां- शामन शिमा मगर :
मामा का मुनामा परेमा थानको
बनारसीदागनrt।
भाटलां-मागे
मायालादारी।
पारन मा या ।
मानाrera, Lungt.
Kritift Taar.cा।

जैनमन्थरनाकरे
पालक परगसेन अपने नानाके घर मुममे रहने लगा । आठ
वर्षको उमर होने पर उसने पटना प्रारम किया और घोरे ही दिनों में
हिमार किताय चिट्ठीपत्री के कार्यमें नुत्पन्न हो गया। योग्य वय होनेपर
नानाके साथ मोना चांदी और जाहिरातका प्यारार मीमने लगा
और व्यापार पुशल होनेपर सामान्तरोंमें भी आने जाने लगा। एक
दिन परगसेनने अपनी माताम मत्र टेकर नानाकी मम्मकि बिना
ही एक घोडपर मयार होकर षंगालकी और कृष कर दिया, और
यहाई मंजिलें तय करके इस्टिन स्थानपर जा पहुचा । उग गमय
मतदपनारगीदाराजी राशी विधि मिल गयी।
१जोनपुर में जो पनारगीदाराजीने जवाहिगतका व्यापार होना हिमा
१.सो भी नही है क्योंकि जोनपुर आगरे और पटने के. पीप में बहा
भारी रादर पा, भीर जय बहा पादशाही थी, उस बालो गरी
हीबाहुभा था, ४ कोसमें बसता था।
इलाहाबाद बने पीछे जोनपुर नीचे कर दिया गया था।
आईने सारी जोनपुर १९ मुहाल दिये है,
पर भी
अमलदारी जोनपुर ५ो तहगीला जिला रह गया है।
भोजपुरी रती भयर के समय कितनी थी, इसका पता जुगरा
पिये (भूगोल) जोनपुरमे मिलता। उसमें faitr, भार सादा
ने गरी आगोमाजरने पिएकसीमको माया पर
पुरन बना था भार कमीको मोम र काना
पानासीर रोगी उगोभामा हो गयी थी।
दिन माने जब उमेरा भासे ५...मा
सिनेमामी भार सय! जोनपुर र
(अ)रोया। फिरौन भागोको पलाया।

कविवरवनारमीदासः। भंगालमें सुलेमान मुलतान राज्य करता या । मुलेमान आने साले लोदीखानपर बहुत प्यार करता था, और उसे अपने पुत्रके स्थानापन्न मानता था । मुलेमानके कोई पुत्र नहीं था । उक्त लोदी- खानके दीवानका नाम धन्नाराय थीमाल या । दीवान बड़ा उदार- शील और कृपालु था। उमका आश्रयकर ५०० श्रीमाल वहां निवास करते थे । सरगसेनजी इन्हींकी सेवामें जाकर उपस्थित हुए । खरगसेनकी आयु अब मी छोटी थी। परन्तु वाक्पटुना और विचारशीलता देखके थोड़े दिन अपने आश्रितरसके दीवान साहिबने इन्हें चार परगनोंका पोतदार बना दिया । सरगमेन परगनोंमें जाके अमलदारी करने लगे।छह सात महीने के पीछे दीवान साहिबने शिख- रजीकी यागका मंघ चलाया, और कुछ दिनों में यात्रासे लौटके घर आ गये । टम दिन मामायिक करते २ उदरशूल उत्पन्न हुआ, और तत्काल ही उनका माग पनेरू रट गया। कविवर कहते हैं- पुण्यसंजोग जुरे रथपायक, माते मतंग नुरंग तयले । मानि विमा यगयो सिरमार, कियो विसतार परिग्रहलेले। यंध यदाय करी थिति पूरन, यन्त चले उठियाप अकेले । हारि हमालकी पोटसीहारिक, और दिवालकी और सेले १ मुलेमान किरानी जातिका पान या। वह हिजरीमन् १५६(संवत् ११.६से गन् १८१ (मवत् १९३०)नक वगारकामा हाफिम रहा था। उसकी राजधानी गोहमें थी, जो बगालका एक पुराना शहर या और निमारमे वगालो अब ना गोडबंगाल दवे है, और पहिले गोदेश भी कहते थे। कविरने मंच १६२५ में बंगाल रामाशाह. मुढेमानको रिगा है, सो बहुत टीक । पौडे सन् ९०३ (११) में अयरकी पोत्रने मुलमानके बेटे दाऊदमांगे यंगाला और उहीसा हीनहिया जैनमन्यरक्षाकरे बागगेन अपनी मातामे नरयरसी रितिका हात मुन चुके थे, नाहरके शरीरात होनेपर उन्हें यही बात स्मरण हो आई, ये सो पुरा जमा पूंनी गापमें थी। उगे लेकर एक दुसी दीका क्षेप पनावर यहाँमे निकल पडे । कई दिनमें मार्ग पतके गपुर में आये । माताके चरणों की पूजा की। जो कुछ अन्य था, उन्हें मार दिया और रितिकावारण पतलाया। इस समय सरगमे- नकी यय केवर १४ वर्षकी यो, मानाने आंम् भरके रो दिया । पार पर्ष जौनपुरमें रहके संवत् १९२६ में सरगरीन आगरे में व्यापार निमित्त आये । मुन्दरदास पीरिया नामक किसी च्यापारी के मोसमें व्यापार फिया । उक्त गांझीदारसे ऐमी मित्रता दुई शि, दोनोंकी प्रीति देखकर लोग दोनोंको पिता पुत्र गमझते थे। चार वर्षक गांसमें बहुतसा दन्य एकत्र किया, और पांच वर्ष माता और गुरुजनों के प्रयासे मेरठनगरके सूरदासजी. मीमालकी कन्याके साथ सरगमनका विवाह हो गया। मिराह होनेके पधात् फिर अगलपुर (आगरा) आकर व्यापार में दत्तचित्त हो गये। इसी गमय अति संवत् ११३१ में मित्रवर्य सुन्दरदामजी अपनी मार्याक सहित परलोकयात्रा कर गये, और अपने पी मात्र एक पुषी छोड गये। परगसेनजी उदारचरित्र पुरुष थे, उन्होंने अपनी ओरसे बड़े साजगाजरो नियकी पुत्रीका पिशाह कर दिया, और पंचों सम्मुग मुन्दरदासजीकी सम्पूर्ण सम्मत्ति पुत्रीको सोर दी। गरत् १६१३ में सरगमेनने आगरा छोड दिया और वेरिपुल सम्पधिक अधिकारी होकरजौनपुरमें रहने लगे। पीडे जौनपुरके प्रसिद्ध

कविवरयनाग्मीदासः ।
धनिक लाला गनदासनी अप्रगालो माय मांझमें जराहिगन का
धंदा करने लगे।
मंगर १६३५ में एक पुत्र उत्पन्न हुआ, परन्तु आठ दस
दिन जीवित रहने आनी बाट लग गया। पुपके मरनेका मागमे.
नको बहुत शोक हुमा । यो दिन पीठे पुस्लामकी इच्छागे ये
रोहनकपुरकी सनी की यात्रा करनेको मागुम्न गये। परन्तु
मा केरमै मागमें योगेंने मांग लूट लिया, एक फूटी कोरी
भी पाग में नहीं रही। दमती मही कठिनतामे गाने नगर
लेकर पायो माये । करियर कहत है-
गो हुने मांगनको त । यद फल दीनों सती भऊत ।
प्रा देणे गर गोग । नन रामु मगमलोग।
मागगन नाना मदननिपनी बड़ा हो गये थे, इमा
हाने गय कार्य मागमेनको माया पा, भौर बार
शानिमा कायान बने। मन् १४१ में शान्तिमार
माग उनका शटगा । नानासी गरेको पा
भगः1 माल में भरगमनत्री राम
महा यायको गये। प्रबीर , भारदम मोट
। और दो दिन मनी मन सामना भी दो
। hi TATTI मुंब. मयि मांग
Hit मा गया । ममममुद्र में गा गान लगे।
HTRA I.AL SAT मर होग,-
मंगनमानीमा माघमाग
मिसान।
निम्नान गरिनो पर

जैनधरमाकरे
रोद्विनि दितिय धानमारपरगसेन घरगुत भयतार।
दोनों गामपियामाजीत | गाय कामिनि मंगलगीत ।
पुष जब एह गान महीनेका हुमा, तब सरगमेन रापुटम्म पा-
नायकी यायाको काशी गये । भगवकी भावपूर्वक पूजन
बाथे उनके परमों के गमीर पुप्रको डाल दिया और प्रार्थना की -
चिरंजीयि की यह याल। तुम शरणागतके रसपाल ।
ए पालकपर की दया मप पर दास नुदाय भया ८८
मार्थना करते समय मन्दिरका पुजारी यह गा पा । उसने
थोड़ी देर कपटरूप पवनसाधने और मौनधारण करनेके पात्
कहा कि, पार्थनाय भगवानका यह मेरे ध्यान में प्रत्यक्ष दुभा है,
उसने मुग बहा हरि, इस बालककी ओर से कोई चिन्ता
करनी चाहिये । परन्तु एक कटिनता है, गो उसके लिये कहा है
जो प्रभु पार्यजन्मको गाय । सो दीजे यातकको नाया।९१॥
तो यालक धिरजीवी रेप।यह पहिलोप भयो गुर सोय॥
पुरगगेनने पुजारीके इस मायाजालको सत्य ममा लिया और
प्रसार होकर पुत्रका नाम बनारमीदाम रस दिया। यही
बनारसीदास हमारे इस परिपके नायक है।
बापाला
दरपित कर कुटुम्य पय, स्वामी पास सुपास।
एंको जनम पनारसी, यह पनारसीदास १९३६
पालक हे सार मायके माध बढ़ने लगा। मातापिताका पुर
पर नि.मीम प्रेम या एक पुत्रास मातापिताका प्रम नहीं होता!
श

कविवरयनारसीदासः। संवत् १९४८ मैं पुष संग्रहणीरोगसे ग्रसित हुआ। मातापिताके शोकका ठिकाना न रहा । ज्यों त्यों मंत्र यंग तंत्रों के प्रयोगोंसे सम. हणी अशान्ति हुई कि, शीतलाने आ घेरा । इस प्रकार १ वर्ष के लगभग मालक अतीर कष्ट में रहा । शीतला शान्त होनेपर उक्त मारककी पीठपर एक बालिकाका जन्म हुआ। संवत् १६५० में पाकने घटशालामें जाकर पांडे रूपचन्द- जीके पागविया पटना मारंम छिया । पाँडे रूपचन्दजी अध्यारम के RT और प्रसिद्ध कवि थे। उनका मनाया हुआ पंचमंगलपाठ एक हरयमाही मंठ काय्य है । सारे अनममाजमें इसका प्रभार है। जैनी मात्रको यह कठम्म रहता है । बालककी पुद्धि मात तीण थी, वह दो तीन वर्ष में ही अच्छा गुरगा हो गया। भिम समयका यह इतिहाग है, उग गमय मुगलमानों का प्रताप. पूर्व मध्यादमें था, उनके अत्याचारों के मयगे देश में मालविवाहका प्रभार शेषनागे हो रहा था। अतएप ९ वर्षकी क्यों अर्थात् मग १६५२ में मैगयारक शेट कल्यानमा उनीही कन्या के साम वाटककी गगाई का दी गई । मंगत् १९५३ में एक या मारी Ter पड़ा, लोग अनकालिये बेहाल करते बिगायि। : हम पांवाह नहीं मा । जब दुष्कार कम २ मे शान हो गया, ल म १९५४ में माघ मुदी १२ को पगारगीराम की बगान मंगवारको शुभमुहत में गाना गाम होगा। बगत लाटक पर आगम दिन गा पा भाई उमदिन मागनी एका मीर भी जम्मा, मोर मी दिनमानीने हायकी,- नानीमग्न गुतागतम, पुवा भागीन । मीनों मात्र एक दिन, मंगभान १०७॥ । More अंगमरमाकरे ३५ - परमारपिटम्पना, देश प्रगट पुगद । भारगिल पागी भय, मूढ़ न जानहि भेद ॥ १०८॥ यस समय विशद होनेरर परा पाप ही दुनदिन गुरा रदमे भाभी, उसी प्रकार अनुमार दो महीने बधू जौनपूरमें दीपकार ने मा. पवाई दुई, दियालपको पदी गई। एस. रीमा मिति भाई । जनक हारम लीपने पुतीय गुर्ण मतद, माम मात्र नदी है। on माप पुलीचा जुम्म हरियो बनारसीदास ने सा, उस पुनीपा यापरनामे बार जागीरनामे परे Tr: पुटको नाम, कुलीया जाना एनेरला जानापानी जातिय दुईपारामान दूरान देशका एक शहर जो भी शायद कस या ममीरफायुसरे बजे में है। गुस्तीच मुगाबाद नोकर थे। पुतीचमांगे पपरपासादने सन् १७ जनूशी (संपन् ११७) में शूरत री, अरगन् ११ (110) में गुजराती मेदारी दी थी। पन् १५(11)में उसे पनीर बनाया।सन् १८(मेर १४.) में फिर गुजरात भेगा भार सन् १९. (RROR राजा तोरमलो मरनेर बद दीवान बनाया गया, सो सन् १.२ (संवत् ५.camमीवीर में सन् 1... (ऐवर 110) जोनपुरभी उसी जागीर या गया।एन् ।..५ (५६) में मामाने माद दानियाल इलाहाराबारेमे भेगा, तो कुलीयताको उसरा भास शिक्षा) साप दिया। उसबेढी शाहजादेको . रि रुन् ४ (५) में भागरेशी, और सन् १(11५८) में सादार तसा कायुलोरदारी उसपे दी गई।

कवियरवनारमीठामः । सम्पूर्ण जौहरियोंको पकड़वाके बुलवाया, और एक वटा मागे नग मांगा, परन्तु उम ममय जोहारियों के पास इतना बड़ा जितना हाकिम चाहता था, कोई नग नहीं था । इमलिय बेचारे नहीं दे सके । इसपर हाकिमका क्रोध और मी उबल उटा । उसने मवको एक कोटरीम कैद कर दिये । और जब कुछ फल नहीं हुआ तव संवरे सबको कोडोंमे (दुगेमे ) पीट २ के छोड दिया । इस अत्याचारम अतिशय व्यथित होकर सम्पूर्ण जौहरियोंने मम्मतिपूर्वक नगर छोड़ दिया और सब यत्र तत्र चले गये । मगमेनजीने भी अपने परिवारसहित पश्चिमकी ओर गमन किया। हाय! उम राज्यमें कैसा अन्याय था! गंगापार कडामाणिकपुरके निकट शाहजादपुर नगर है। वहां तक आते २ मूसलाधार पानी वरमने लगा, घोर अंधकार छा गया । मार्ग कीचड़से पूर्ण हो गये, एक पैड़ चलना भी कठिन हो गया। लाचार शाहजादपुरकी मरायमें डेरा डालना पड़ा । उस सन् १०१४ (संवत् १६६२)में जहांगीर वादशाहने उसको गुज- रातमें यदल दिया, और सन् १०१६ (सवन् १६६२) में वह फिर लाहोर भेजा गया । सन् ६ जहांगीरी (संवत् १६६९) में काबुल और अफगानिस्थान के बंदोवमपर मुकर्रर होकर गया, जहां सन् १०२३ (संवन् १६७१) में मरगया। बनारमौदामजीने नो संवत् १६५५ में कुलीचांका जोनपुरमें होना टिसा है, सो सही है । क्योंकि प्रथम तो जोनपुर कुलीचांकी जागरमें ही था। दुगरे सन् १९५३ में उसकी तईनाटी भी इलाहाबाद मूर्व में हो गई थी, जिराके नीचे जोनपुर भी था।

अनमयरमाकरे --- गमपके पास पातर होर गरगंगन दीन अनायों की माई रोदन करने लगे। उन्हें ही पुष कन्या और रिपुलसम्पसिकी रक्षा अर्मभर प्रतीति होने लगी। परन्तु उदय अच्छा था । उस नगरमें फरमपन्द मामक मास्यणिक पावह एस. परमसजन पुरुष था, और गरगरोगको पहिचानका था। यह इनकी विपत्तिकी रोह पाकर दी। हुमा आया, और प्रार्थना करके परगरोनको सपरिवार अपने गृह से गा । परमपन्दने पो आमहसे अपना धनधान्यपूर्णगृह परगमेनको मोर दिया और आप मेरे गृहमें रहने लगा। परगगेनने गृहको भान्यादि प्रपुरमामयीन लेने के लिये बहुत प्रयत्र रिपे, परन्तु राचे मित्र प्रेमके आगे उनके आगृहका पुछ पल नहीं हुआ। कपिपर कहते हैं- धन परस पायस समै, जिन दीनों निजभौग । ताकी मदिमाकी कथा, मुरासों पर कौन? ॥१२८॥ शाहजादपुरमें गर्गमेन सपरिवार मुम रहने ठगे, और मिपके भगाध प्रेमका उपभोग करने लगे। पूर्व की मिति सर्व. पा भूद गये । ग भूरनेर अप्यारमके रसिया फपिवरने कहा है,- पद हुए दियो नयाप कुलीय । पद गुप शाजारपुर पीय। एकरएि या भार होय । एकाटि पुरा पुरा सम दोय ॥ जो पुरा देगे सो मुगलई। गुण भुं सोई दुग सदै॥ गुल में माने में सुपी, दुराम दुगमय दोप। मुटपुपरकी रटिम, दीस सुप दुरा दोप।

कविवरवनारसीदासः । । ज्ञानी संपति विपतिमें, रदै एकसी मांनि । ज्यों रवि ऊगत आथवत, तजैन राती कांति॥१३०॥ खरगसेनजी शाहजादपुरमें १० महीने रहकर प्रयागको जिम उस समय इलाहावास मी कहते थे और जो त्रिवेणीके तटपर बमा है, व्यापार के लिये गये । परन्तु कुटुम्बको शाहजादपुरमें ही छोड गये । उस समय अकयरका शाहजादा (जहांगीर) प्रयागमें ही रहता था। पिताके चले जानेपर इधर वनारसीदासने कौड़ियां बट्टे से खरीदकर वैचनेका व्यापार सीखना प्रारंभ किया। प्रतिदिन टके दो टके कमाना और चार छह दिन पीछे अपनी दादीके मम्मुख लाकर रखना, ऐसा नियम किया । कौडियोंकी कमाईको मोली दादी अपने पत्रिकी प्रथम कमाई ममझकर उसकी शीगनी और निकूती लाकर मतीके नामसे बाँट देती थी। दादीके भोलेपन के विषयमें कविवरने बहुत कुछ लिखा है । उसका सारांश यह है कि "हमारी दादीके मोह और मिथ्यात्वका ठिकाना नहीं था, वे मम- हनी थी, कि यह बालक (वनारमी) सती जी की कृपामे ही हुआ है। और इसी विचारमें रात्रि दिवस मना रहती थीं । रात्रिको नित्य नये २ बम देखती थीं, और उन्हें यथार्थ ममझके तदनुमार आचरण भी करती थी।" तीन महीने के पीछे मुरगसेनजीका पर आया कि, सबको लेकर फतहपुर चले आओ। ऐमा ही हुआ, दो डोटी किगयसे करके और सब सामान लेके वनारसी पिताकी आज्ञानुमार फतहपुर आ गये । फतहपुरमें दिगम्बरी ओसवाल जेनि- इलाहाबाद।

जैनमन्थरमाकरे योका पहा समूह था, उनमें घासूमाहजी मुख्य थे। पारगाह अध्यात्मके अच्छे विद्वान थे। इनके पुत्र भरतीदासजीने मनारसीदासजीका साकार किया, और एक उपम स्थान रहनको दिया। खरगसेनजीका फुटुम्ब फतहपुरमें आनन्दमे रहने लगा परन्तु पुछ दिन पीछे ही उन्होंने पत्र लिख के बनारसीदागसहित इलाहा. । पाद पुला दिया । इलाहाबादमें उस समय जवाहिरातका व्यापार अन्य घटका था। दानाशाह मरकारको जमाहिराती फरमायाको सरगमन ही पूरी करते थे। पितापुष चार महीने इलाहाबाद रहे, पक्षात् फतहपुर आके पुटुम्बसे मिले। इसी समय पर संगी कि नपापलीच आगरेको चला गया जौनपुरमें मय १ये भगयतीदासनी कविता भी करते थे, परन्तु प्रामयिलार के निर्माना नही है। क्योंकि प्रगविलागके कांके पिताका माम लालजी पा, और इनके पिता नाम पायूमाह पा । माविकाराचे कती धागराक एनेले थे, और ये जौनपुर के थे। इसके अतिरिक प्रमथिलासमयी रचना सेवन् १७५० में और यह समय ११५.पुरा इलना बा जीवन रोना गम्भवमारक समयसारके अन्त में भी एक भगपतीदासा माम भाषा,जो भाग में रखे थे, और उस विवर पाच मित्रो अन्यतय से। रूपचन्द पटिन प्रथम, यि चतुर्भुजनाम । जय भगपतीदार मर, फंपरपाल गुणधाम ॥1॥ धर्मदास ये पाचगन, xx या मोरपुरक भगवतीदाराजी दाखिर ये पारे में - x x पदमारनपदी शापानियाल तो महोबार रोटा वादा था और इलाहाबारामे १० दिनमा फुलोरखा रारा भगालोर (गायन) था।

कविवरवनारसीदासः।
प्रकार शांति है । सरगसेनजी मकुटुम्ब जौनपुर चले आये। अन्य
जौहरी आदि जो माग गये थे, वे भी भव आ गये थे, और जीन
पुर फिर ज्यों का त्यों आपाद हो गया था । सब टोग अपने
कृत्यमें लग गये, और प्राय. एक वर्षतक जौनपुरमै शान्ति रही। यह
ममय संवत् १६५६ का था। इसके योरे दिन पीछे ही एक नवीन
विपति आई!
अकबरका शाहजादा सलीमोह जो पीठे जहांगी नाम
दिल्यात हुआ, कोन्दूवनकी आभेटको निकन्टा या । कोहूयन
गौनपुर के पास है । जौनपुरके नूरम,लवान के पास इसी गम
शाहीरमान आया कि, वाहनारा तुम्हारे तरफ आ रहा है, को
ऐमा माय कगे, हिममें उसका कोन्हयनका जाना बन्द
माये । नगममुन्टगानने शाहीकरमान निरपर घटाया, और एक
पाय बनाया। जहां तहां गय मार्ग रोक दिय । राहणे
आगमन दग्यान बन्द करा दिय । गोमती नौकायें पटाना
बरगदो, और आप गढ़में जाके रेट गया। पुजोर तो बटन
दी। बन्दा गो-नवादा भेडार मोर दिया। प्रार
प्रिया टाट देमंक प्रॉन मागना प्रारम किया I पुछ गमझदार
गोंने नि मुस्तानंग प्रार्थना की, पण उमर
१९१९ नहीं आ, इमप्रिय व मोग भी भागे। और पोरेही
पाने वह महानगर र दो गया। मगगनती भी गारण
मुलीमधे जाने ( मुर्रम गत 1...(मामी गाती
RIES) भागिह बा आमा,
मामी
नाम लीग

M जैनमन्यरमाकरे - कुछ चिंतित Initia - मागवानोंके गायी हुए, और लामनपुर नामक प्राममें पौधरी लामनदासनीक आभयमे जा टहरे और रित्तिके दिन गिनने लगे। सलीम शाहादा जौनपुर के पास जा पहुचा, परन्तु अब गौ- मती उतरने देगा, और यह विमह देगा, तो हुआ और आने वकील लालवेगको नूरमसुलतान के पास भेजा । पीलने मुस्तान के पास जाकर दश पाच नर्म गर्म भातें कही और शाहजादेके पास उसे से आया । नग्मसुलतान शाहगादेके परोंपर पर गया, तबाहजादने गुनह माफ करके अभयदान दिया। मगर फिर शान्ति हो गई, भांग हुए लोग पुनः आ गये । खरग- भनजी भी ५-७ दिन लछमनपुरमें रहकर लौट आये, और अपने भवसायमें निरत हो गये। यह विपदको किया गया ! गध फल क्या हुआ! और शादनादा से मान गया ! सुजकजहांगीरी भूमिका गो हाल जहांगीर बाद- शादी युवरामास्थाका लिया है, उससे इस प्रश्नों का समाधान हो सका है। उसमें लिया है कि तारीरामहर सन् 1... (भारो प्रपदी १४ सेक्न् १९५५)को अकबर बादशाहतोदारान फतह करने के लिये गये बार अजमेरा पूरा शाहसलीमको आगारमें देकर पनाचे सर परनेशरम गये । शाहकुलीचया महरम भोर राजा मानसिंह ही नोकरी नरे पास पोली गई। गाडे नसूपाओ राशो सौंपा हुमा था, राग अपने बोटे जगतसिंहको सोरहर शाही सिरमतमें राने लगा। शादसटीमने अजमेर भार आनी पर रानाके पर भेजी भीर छ दिनों पीछे आप भी शिकार खेलते हुए, उदयपुरमे गये, जिसको राना और गया था, और सिपाहियोंधेिपदार्शमें भेजाररानाके पकाने की कोशिश करने लगे।

४२ कविवरवनारसीदासः। यहा सुशामदी और स्वार्थी लोग जो नीचे नहीं बैठा करते हैं, इनके कान भरा करते थे कि, वादशाह तो दरबनके लेनेमें लगे हैं और घद मुल्क एकाएकी हाय आनेवाला नहीं है; और वे भी वगैर लिये पीछे आनेवाले नहीं है । इसलिये हजरत जो यहासे लौटकर मागरेसे परेके आवाद और उपजाऊ परगनों को ले लें, तो दडे फायदेकी बात हो। यगालेका फिमाद भी कि जिसकी खबरें आ रही है और जो वगैर जाने राजा मानसिंहः मिटनेवाला नहीं है, जल्द दूर हो जायगा। यह बात राजामानसिंहके भी मतलबी थी, क्योंकि उसने भगा- लेको रसपालीका जिम्मा ले रस्खा या, इस बास्ते रखने भी हामें हां मिलाकर लोट चलनेकी सलाह दी। शाहसलीम इन बातोंमें रानाकी मुहिम अधूरी छोड़कर इलाहाबाद को लोट गये । जय आगरेमें पहुंचे तो वहाँका किलेदार कुलीचमां पेशवाईको आया, उम वक्त लोगोंने बहुत कहा कि, इमको पकडलेनेसे भागरेका किला जो मजानामे भरा हुआ है, सहजमें ही हाथ आता है, मगर इन्होंने कुयूल न करके उसको रुखपत कर दिया और यमुनामे उतरकर इलाहावामका रमा लिया । इनकी दादी होदेमें बैठकर इनको इम इरादेसे मना करने के लिये किलेमे उतरी थी कि, ये नामें बैठकर जलदीसे चल दिये और वे नाराज होकर लोट आई। १सकर गन् .... (वि. सावन मुदी ३ संवत् १६५७) को शाहमलीम इलाहाबाद के किलेमें पहुंचे और आगरेगे घरके बहुत परगने लेकर अपने नौकरों में जागीरमै दे दिये। विहारका मूबा कुत- पुद्दीनको दिया । जौनपुरकी सरकार लालायेगको, और काल. पांची मरकार नसीमबहादुरको दौ । धनगर दीवानने तीन साल. पायेा समाना विहारके सालिममे तहमाल करके जमा किया था, वह भी उसगे में लिया। इगगे जाना पाता है कि शाहसलीमने जो लालायेगो जो. नारदिया था, नूरमसुलतान लालायेगधे ने नहीं देता शेगा;

जैनप्रन्यरसाकरे पनारसीदासजीकी दय इस समय १४ वर्ष की हो भी, पात्यवार निकल गया था, और युवावस्थाका प्रारंभ या समय पं. देवदत्तनीके पास पढना ही उनका एक मात्र कार्य धनंजयनाममातादिई अन्य पद गुके थे। यथा--- पढी नाममाला शतदोय । भौर अनेकार मपलोय ज्योतिष भलंकार लघुपोक । पंडस्फुट शत चार लोग पौवनकाल। दुधावरपास प्रारंभ बहुत बुरा होता, अनेक लोग इस अवस्था शरीरके मदसे उन्मत्त होकर कुलकी प्रतिष्ठा मपनि सतति आदि सर का चौका लगा देते हैं। इस अवस्थामें गुरुजनों का प्रयत्न मात्र रक्षाकर सका है, अन्यथा पुरा नहीं होती। हमारे परित्र- नायक भरने माता सितारे इकलोते लडके थे, इमलिये माता, पिता और दादीका उनपर अतिशय प्रेम होना स्वाभाविक है। मो अमा- धारण प्रेमके कारण गुरुजनों पुषर जितना भय होना चाहिये, उतना पनारसीदामजीको नहीं था। फिर क्या था। तजि कुलफान लोककी साज । भयो पनारसि मासिसयाज ॥ १७० ॥ कर मासिघी धरित न धीर। दरदयन्द ज्यों शेरा फकीर फटक देश प्यानसा धरै पिता भापुनेको धन हरे। १७१ ॥ जिसपर शासटीम विसरमदाना करके गया था, फिर नूरम- गोजिरहोनेपर लालायेगोहोरत बाया होगा। पर है।

४४ कविवरवनारसीदासः । चोरै चूनी माणिक मनी। आने पान मिठाई घनी ॥ भेने पेशकशी हित पास । आप गरीय कहावै दास ॥ १७२। हमारे चरित्रनायक जिस समय इस अनगरंगमें सराबोर हो रहे थे, उसी समय जौनपुरमें सइतरगच्छीय यनि मौनु चन्द्र- जीका आगमन हुआ। यति महाराय सदाचारी और विद्वान् थे, उनके पास सेकहों श्रावक आते जाते थे। एक दिन वनारसीदा- सजी आने पिताक साय, यतिजीके पास गये । यतिजीने इन्हें मुरोध देखकर ग्रह प्रगट किया । बनारसीदास प्रतिदिन आने जाने लंगे। पीछे इतना ग्रह बढ़ गया कि, दिनमर यतिके पास ही पाठ- शालामें रहने लगे। केवल रात्रिको घर आते थे। यतिके पास पंच- संविकी रचना, अष्टौन, सामायिक, पडिकोग (प्रतिक्रमण), छन्द- शास्र, श्रुतबोध, कोष और अनेक स्फुट लोक आदि विषय कंठस्य पढे । आट मूलगुग मी धारण कर लिये, परन्तु इक नहीं हटायथा- कयहं मार शब्द उर घरै । कयहूं जाह आसिपी की। ' यति भानुचन्दजी ताम्बर थे, ऐगा जान पड़ता है। क्योंकि सहवरगर नाम्परमम्प्रदाया ही है, और अटीन मादि विश्य भी मुख्यनामे श्वेताम्बरीय है, जो कविवर ने उनके पाप से परे थे। परन्तु जान परता है कि, उस समय गिम्बर वाम्बरों में भालकलक समान मात्र नहीं था।

जैनमन्धरलाकरे
१५
पोथी एक पनाईन।
मित हजार दोदा चोपई ॥ १७८ ॥
तामें नयरस रचना लिपी।
विशेष परनन भासिनी॥
ऐसे कुफयि पनारसि भये।
मिष्या अन्य पनाये नये ॥ १७९॥
के पदना फै भासिपी, मगन दुईरसमादि ।
पानपानकी सुधि नहीं, रोजगार का नादि ॥१८०॥
विपा और अविचारूपासक इनदोनों की मयोगरूप विचित्र
भवरमें प्रमते हुए बनारसीकी आयुके दो वर्ष इस प्रकार शीघ्र ही
बीत गये। १५ वर्ष १० माह की घयमै पाउना (गौना, गुकटावा)
परने लिये उन्हें मेराशद आना । बडे ठाठबाटसे समु-
रालमें पहुंचे। समुरारके प्रेमयुक्त आदर सरकारमें एक मास बीता
गया। इतनही में पूर्व कर्म के अशुभ उदयसे पोपमासके पुरपक्षमें
मुरमहवासी पनारमीके पन्दविनिन्दित शरीरको पुष्ट राहुने आ-
पर घेर लिया, पुवारपारा मनोहरशरीर ग्लानिपूर्ण हो गया।
लोग देग २ के नाक भौंह सिकोडने लगे। विवाहिता भार्या और
शामुके अतिरिक्त सपने साथ छोड दिया । यथा-
भयो पनारसिदास तन, कुरूप सरपंग
धारदार उपजी पृथा, केश रोम भ्रयभंग ॥ १२५ ॥
विस्फोटफ भगनित भये, दस्त घरण चौरंग।
फोऊ नर साले समुर, भोजन करदिन संग॥ १२६॥

कविवरबनारसीदासः। ऐसी अशुभ दशा मा, निकट न आये कोर। सासू और विवादिता, करहिं सेय तिय दो ॥१२७॥ मेराबाद में एक नाई कुष्टरोगका धन्वन्तरि या । यह बनारसीकी टहल चाकरी और माय ही औषधि करता था। उमने दो महीने जी तोर परिश्रम करके हमारे परिप्रनायकके राममित शरीरको गंगारके गगनमयपर पुनः निर्मल प्रकाशित कर दिया । नाईको योनिन दान देकर रारम्पलाम करके बनारमदागनी घरको लौटे। परतु मागगमरने अपनी लडीकी विदाई नहीं की। पर माके.- भाय पिताके पर गदे, मा गई उर ठोकि। जगी चिरी कुर्गमकी, स्यों गुलाशा पिलोकि॥ गगन सजित मये, कुपयन कंद गनेक। मेग बहुत पनारसी, र गति दिन एक ॥ १९५॥ दश पान निके पात्, र पाटयाला में पहनको जान को मार “पाना के आगमी दिवी परी पार।" मागमनी इमीगमा यानिमिन पनि काम गये। पर महान की जानेगर बनामीदागत्री रिमगुगरको गये, भोर भामा गये। R मार पाय दो गोग गुगतनशमंग गुरुजन योग भामिनयात्रा पहरामन मा मार। पति पुत्र नो.

४७ जैनप्रन्यरक्षाकरे पत पड़े सो मांगें भीरा। मानहु पूत ! बड़ोंकी सीस ॥ २००॥ परन्तु गुरुजनों के वचनन्दरूप ओसके कन्के बनारसी के हदय- कमलपर उन्मतताकी प्रबल पाउके कारण का ठहरने वाले थे। पढते हुए पौरन-पयोधिक प्रवाहको क्या कोई रोक मका है। मषका रहा सुना इस कानसे मुना और उस कानमे निकाल दिया, फिर हलके के हटके हो गये । गुरुजीमे विधा पदना और इकबाज़ी करना ये दो कार्य ही उन्हें सुख के कारण प्रतीत होते थे। मति के नुमार गति हुमा करती है। कुछ दिनके पीछे मिपा पदना भी पुरा अचने लगा। टीक ही है, विधा और भविपाकी एकता सी। संच १६६० में पटना छोड़ दिया। इस संवत् में भापकी बहिनका विवाह हुमा और एक पुत्रीने जन्म लिया । पुत्री ६-७ दिन रहके पल बसी । पिदाईमें रिताको बीमार करती गई। बना- रसीदासजीको पड़ी भारी बीमारी टगी। बीम टेपने करनी पड़ी। २१ दिन वैपने और भी १.-५ सपने कराने की बात कही, और यहाँ सुपारे मारे मान जाते थे, तर एक विचित्र रग खेमा, रात्रिको पर सूना पाकर आप आपसेर पूरी चुराके उहा गये ।। माधर्य है कि वे पूरी आपको पथ्यका काम कर गई, और आर मही निरोग हो गये। इसी संवमें सरगसेनजीने एकहा री व्यापार किया, जिसमें कि सौगुना लाभ हुआ! सम्मति से घर गया। मंवत् १९६१ में एक संन्यासी देवता आये। उन्होंने को मीरा रा समाये बनारसीको फंसाने के लिये बाठ कि रस पुषी माम टिप्पणी में धीरपाई।

कविवरबनारसीदासः।
छया । जार काम कर गया। बनारमी काम किये गये। मुन्या-
मीने रंग जमारालि, मेरे पाम एक ऐमा मंत्र है कि यदि कोई
उमे एक यांना नियमी जो, तथा हिमीपर प्रगट न करे, तो
माल पीनार गृहद्वार प्रतिदिन एक सुगर्ग मुदा परी दुई पार।
सानों को दायकी बहुन भावशाना रहती है । इम करा-
दुम मंगकी पावगे उनकी लार टपक पड़ी। लंगे गन्यामीही रोग
मुना करने, डर गन्यामी लगा पटगने की बातें बनाने ।
निदान मापदमा करके मग्यामी मंत्र मीम दिया, और
ना ही ना करना प्रारंभ कर दिया ।इपर गन्यामीमी
मोहापाका नी दो ग्यारह हो गये। मर जाते २ एक ही
करिनतामे पूर्णता । प्रतःकार ही मान ध्यान करके बनारगी
महामन बी टाकान होने पर पर आये। लंग
अमीनगन, Tog ort या माक पसीधी।। गारा होती
१. गोमाकी नगिननमें मेरी नन हो गई दो, परन
एसोनिन और मही। और भी मारपनि निर पर
नाम महतो 4 TO काही भी नहीं मिली। गरमी
बार 113 1 भाग गई। मारने एकिन यह आन
41 गुरु मानती मनाई । गुरजीने मगर
Titam कहता प्रापा मगर
पिगीने मा मना माही
या । १r fan गुहये, ना पी.
ग मागी मन एमा
int, यह nिsan
HTMay (1)

जैनप्रन्यरनाकरे . है। मोले पनारसीने जोगीकी मात सिर आंखोंमे मान ली और जोगीकी सेवा सुस्पा करना शुरू कर दी। यथायोग्य भेटादि देके उसे सूत्र सतुष्ट किया। दूसरे दिनसे ही सदाशिवको पूजन होने टगी। पूज- नके पश्चात् शिर शिप-कहकर एफसीआठ बार जप भी होने लगा। पूजन और जपमें इतनी सदाहुई कि, पूजन जर किये बिना भोजन नहीं होते थे। यदि किसी कारणवश किसी दिन पूजन नहीं की जा सके, तो उसके प्रायश्रित रूप लूम्बा भोजन करने की प्रतिज्ञा धी। परन्तु प्यान रहे, यह पूजन गुमरूपसे होती थी, कोई गृहयुटुम्बी जानता भी नहीं था। अनेक दिनों यह पूजन होती रही। मयत् १६६१ में मुकीम हीरानंदजी भोसवालने शिखरमीको सघ प. टाया, गांव २ नगर २ में संघकी पत्रिकायें भेज दी। हीरानंदजी सलीम शाहजादेके जौहरी थे, अतः उम समय इनकी की प्रतिष्टा थी। सागसेनजीके पास हीरानंदजीका विशेष पत्र आया, इसलिये ये गंगा के किनारे हीरानंदजीमे मिले और हीरानंदजीक आमहसे यहाके यही यात्राको चले गये। जर यह समाचार बनारसीको लगे; तब उन्होंने पर सूना पाकर चैन की ही उड़ाना शुरू किया। रि- ताके जानेपर पूत निपुश हो गये, और नित्य परमें कलह मचाने लगे। एक दिन मंठे २ एक मुबुद्धि सूशी कि, पार्थनायकी यात्राको मलना चाहिये। मातासे आ मांगी, परन्तु जब उसने गुनी मनमुनी कर दी, तर आपने दही, दूध, घी, चावल, चना, तेल, मल और पुष्पादि पदापोंको छोड़ दिया, और प्रतिक्षा की। तक यात्रा नहीं करूंगा, तब तक ये पदार्थ भोग नहीलाऊगा। - प्रतिशोर महीने बीत गये। कार्तिकी पूर्णिमा आ गई। लोग गंगामानको और अनी पार्थनापरी यात्राको घरे,

१८
कविवरवनारमीदासः।
।
onाजार कान दर गया । बनारमी फांस लिये गये । मुन्या-
मीने रंग जमाया कि, मेरे पास एक ऐमा मंत्र है कि यदि कोई
इमे पायांतक नियमक जो तथा हिमोर प्रगट न करे, तो
मार बीतनेर गृहद्वापर प्रतिदिन एक मुर्गमुद्रा पीई पारे।
सनको दायकी बहुत भारश्याता रहती है। इस कर.
दम मारही बालम इन हो ला पापी । मग मन्यामीची से
मुथा करने, डर नमामीगा पसे टगने की बात बनाने।
निदान मारमा गन्यामी मंत्र माग लिया, कार
तना करना प्रारंभ कर दिया । इधर मन्यामीजी
मनोोग्याह हो गये । मंगाने २ एक वर्ष
कामे पातकार ही मान पान करके बनारमी
महान वही 'टागे प्रगन होने दर गृहद्वारा आये । मग
जमीन गगन, 1 मामा की थी। माया बुरी होगी
है. माना ही दिन गिननमें मेरा मन हो गई हो, अरनु
५८ को निगमली। और भी मार निरास
ना को या TA को भी नही किती गयी।
कारण। प्रापन पनि यर आर
AAP नुहोर गुनाई । मुम्बीने मग्यमी
गट क मा मन
44 ५६ जना मा. आना गादी
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भी रंग रंगी। एस तथा
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TARAM (
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-

जेनायरमाकरे है।मोरे बनारसीने भोगीलीबाल गिर रोगों में मान ली और जोगीको मेरा नाम पर दो पायोग्य भेटारि रके उसे सूत्र संद किया । गरे दिन से ही सदाशिवकी पूजन होने लगी। पून. मरे पाnिs - एमीमाठ बार जर भी होने लगा। और अपनी पसाई मन अयि पिना भोजन नही होत । पहिली वारणमी दिन पूजन नहीं की जा सरे,तो उमेरमात सापलमा भोगत करने की प्रतिज्ञा दी। परन्तु या है, यह पूरन गुमरूपसे होती थी, कोई हम्बी जानता भी नही था । अनेर दिनों यह पूजन होती रही। मयत् १९६१ में असीम हीरानंदनी भोसपालने शिमात्रीको संघ प. Een गाव २ नगार में संघषी परिये भेज दी। हीरानजी सलीम शाहजादक बाहरी, अतः उस समय इनकी पसी प्रतिर भी सरगमेनजीक पास दीपना शिष पर आया, इसलिये ये गंगा किनारे हीरानदी में मिले और होरानंदजी आमहरे बहीरे बदी यात्राको चले गये ।जब यह समाचार बनाएगीको लगे; तब उन्होंने घर सूना पाकर नकी गडी उड़ाना शुरू किया ! R- ताके भागेश पूत नियुश हो गये, और नित्य घरमें कलह मचाने लगे। एक दिनटे २ एक सुइदि मूबी कि पानायकी यात्राको चलना चाहिये। मानासे मामा मांगी, परन्तु जब उसने मुनी मनमुनी कर दी, तब आपने दही, दूध, घी, चावल, चना, तेल, ताम्बूल और पुष्पादि पदार्थोदो छोड दिया, और प्रतिशत की कि, जब तक पाया नहीं करूंगा, तब तक ये पदार्थ मोगमें नहीं सामगा। इस प्रतिभाको ६ महीने बीत गये । कार्तिक पूर्णिमा आ गई। सब लोग गंगामानको और जेनी पार्थनायकी यात्राको पठे,

५०
कविवरवनारसीदासः।
तव बनारसी भी अवसर पाकर किसीसे बिना पूछेताछे उनके साथ
हो लिये । बनारसमें पहुंच कर गंगासान पूर्वक भगवान् पार्थमु-
पार्थकी पूजन दशदिन तक बड़े हावमावसे की । स्मरण रहै कि,
सदाशिवकी पूजन वहां भी छोड नहीं दी थी, वह नियम
होती थी। यात्रा करके संखोली लिये हुए बड़े हर्षके साथ घर
आ गये । कवियरने अपने जीवनचरित्रमें सदाशिवपूजनको
उत्प्रेक्षा और आक्षेपालंकारमें इस प्रकार कहा है....
शंखरूप शिव देव, महाशंख यानारसी।
दोऊ मिले अवेय, साहिब सेवक पकसे ।। २३७१
रेलेतारके कारण जैमी आजकलकी याया सरल हो गई है, ऐसी
उस ममय नहीं थी । जो यात्रा आज १० दिनमें पूरी हो जाती है,
उस समय उममें १ वर्ष बीत जाता था । अतः मुकीम हीरानन्द.
जीका संघ बहुत दिनके पीछे टोटके आया। आते २ अनेक लोग
मर गये, अनेक बीमार हो गये, और अनेक लुट गये । खरगसे-
नजीको उदर रोगने पर दवाया । ज्यों त्यों बड़ी कठिनतामे संघक
माय अपने घर जोनपुर तक आये। जौनपुरमें सघका सरगसेनजीकी
औरगे यथोचित आतिध्यसरकार किया गया, पथात् यहीमे संघ
बिगर गया, सर लोग भाने २ माम नगरोंकी राह लग गये-
प्रकृति पहुँदिशि गयो, माप आपको होय ।
योर
रंग जमाया
नाय संभोग ज्यों, विदुर मिले नहिं कोय २२३
पशि भीग जमते धीरे २ सारथ्य साम करने लगे। हाट.
कुछ ननद उपकरण दिये और पचात् प्रगन्नतामे रहने लगे। यात्रामे
है। इसकी पूजामे महापुने जन्म लिया था, परन्तु यह दो
का

জনমালাই
पदममे अधिक मही सयमी समर बनारसीदासक पुष
दुमा पान उसकी भी बहो mgit
कातिकमें पारा TITीन अफररी
आगामें हो । पद र हिम समय जौनपुरमें भाई,
মঙ্গ, হে আলম মামা বাসায় এক
भनेर सारा तो आयाटको माई उम समय एक
ফয়ে বের না কঙ্কাই লক বাম
যাশন ল ই স দা । যা মুগন্ধী যে শখ
प्रसार माला अश्यापार र बिना पासाहत नहीं बरती थी।
गरे मुगलमानों में अपर सम प्रमापिय पान पोरे
होते थे। परि भारी राजनीति अतिशय कर कही ast
पारा उसके प्रभावकालमें दुःसी नहीं रही, यह निधय
माम उमसारसट रनायकी परलोकपासे जाना
हो गई। पारी और कोडाहत ह गया। सोगको पिपति अंह
भारपणाने टगी। सबने भानी र जमा पूंजीकी रक्षामें
विप हमारा-
पर पर दररदिप कपाट।
दरपानी नदि पेटें हाट।
पा(गाढी कई और।
नकद माल निरमरमी टीर।
-
परध देरान्त प्रतिक मुदी र १ अगत्यकारी
रात्रि हुआ पर, और सरे दिन पार उतररिया हुई थी।

५० कविवरवनारसीदासः। तन बनारसी भी अवसर पाकर किसीसे विना पूछताछे उनके साथ हो लिये । वनारसमें पहुंच कर गंगास्नान पूर्वक भगवान् पार्थनु- पार्थकी पूजन दशदिन तक बडे हावभाव की । स्मरण रहै कि सदाशिवकी पूजन वहां मी छोड नहीं दी थी, वह नियमसे होती थी। यात्रा करके संसोली लिये हुए बड़े हर्षक साय पर आ गये । कविवरने अपने जीवनचरित्रमें सदाशिवपूजनको उत्प्रेक्षा और आक्षेपालंकारमें इस प्रकार कहा है.... शंघरूप शिय देव, महाशंस यानारसी। दोऊ मिले अयेय, साहिय सेयक एकसे ॥ २३७ ॥ रेलनारके कारण जैमी आजकलको यात्रा सरल हो गई है, ऐसी उस ममय नहीं थी । जो यात्रा आज १० दिनमें पूरी हो जाती है। टम समय उसमें १ वर्ष बीत जाता या । अतः मुकीम हीरानन्द- जीका संघ बहुत दिन के पीछे सौटके आया । आते २ अनेक लोग मर गये, अनेक बीमार हो गये, और अनेक उट गये । मरगमे नजीको उदर रोगने घर दवाया । ज्यों स्यों बड़ी कठिनताम संप माय अपने घर जौनपुर तक आये। जौनपुरमें संघका सरगमेनजीको সঁ যাবিস আবিস্কার fথা সত্য, যাৰ খাই ঘ गिर गया, मब टोग आने २ माम नगरों की राह लग गये-- यो फटि घटुंदिशि गयो, आप मापको दोय । रंग अगाया माय मंजोग ज्यों, शिहुर मिले ना कोय २२॥ पर भी गलत धार २ सारथ्य साम करने लगे। हर ॐ नई पकान दिये और पश्चात् प्रगतामे रहने लगे। पापा है । इसकी पूनम महाजी पुत्रने जन्म दिया था, परन्तु यह । दो

अनमन्धरमारे
चार दिनमे अधिक मही सदरा मो समय बनारसीदागके पुत्र
दुमा पन्तु उसकी भी बड़ी गई।
भरत १९७१ कार्तिक माह मटारीन अपरकी
माइ भागमें होने पर गार शिम समय मौनपुरमै भाई,
সে বম সম মাশােয় বসি। ৪ নাম্বয়া
मक कारण एक तो माजालको माई उम समय एक
मगादका पात हो जानेपर दूसरा सपाट शान्तिता के साथ
गादासनपर नहीं बैठ पता बिना सूनसरापी हुए सपा
प्रभार माना अायाधार र विना बादसाहत नहीं करती थी।
गरे मुगलमानोंमें अपर खरीम पापिय मादा पत पोहे
होते पनि भरपरकी राजनीति अतिशय कूट कही जाती
द, परन्तु ममा उपक एमवकालमें दुःसी नहीं रही, यह निश्वय
भाग उस गावर नरनाथकी परलोकपासे मजा अनाथ
हो गई। चारों भोर कोशाहल मच गया। लोगोंको रिपचि संह
पर मप दिखाने टगी। सपने मानी २ जमा पूंजीकी रक्षा
वित हगादा-
मर पर दर दर दिये कपाट ।
दरयानी ना दाट।
दया (1) यदी का मीर।
नकद माल निरगरमी टर।
मा देदान्त कार्तिक पदी संवत् ११३ मंगलवारणी
रारि हुआ था, और दूसरे दिन बुधवार परदिया दुरे दो।

कविवरवनारसीदासः। LASuzuk भले वस्त्र अरु भूपन भले । ते सब गाढ़े धरती तले ॥ घर घर सनि विसाहे शस्त्र । लोगन पहिरे मोटे वस्त्र । ठाढो कंवल अथया खेस । नारिन पहिरे मोटे येस ॥ ऊंच नीच कोड न पहिचान । धनी दरिदी भये समान ॥ चोरि धाढ़ दीसै कहुँ नाहिं। यों ही अपमय लोग डरादि ।। २५५ ॥ यह अशान्तिकी हवा दश बारह दिन बड़े जोर शोरम चलती रही । तेरहवें दिन शान्तिसूचक बादशाही चिहियां आई और घर २ मांट दी गई। चिट्ठिया बांटते ही अशान्तिने विदा ले ली। सन्नाटा सिंच गया । घर २ जयजयकार होने लगा। जो धनी और गरीबोंका भेद उठ गया था, वह अब फिर आ इँटा । धनि- योंके यय वैष चमचमाने लगे, बेचारे दरिद्री मीस मांगते हुए नजर आने लगे । चिट्ठीमें ममाचार इस प्रकार थे- प्रयम पातशाही करी, यायनयरप जलाल । अय सालदस यासरे, कार्तिक हमओ काल । अकयरफो नन्दन यो, साहिप शाह सलेम । नगर यागरमें तसत, येटो अवर जेम ॥ २६८ ॥ १ अकवररा नाम जलालउद्दीन पा।

जैनप्रन्यरमाकरे
नाम धरायो नूरदी, जहांगीरसुलतान
फिरी दुहाई मुलकमें, जद तह परती भान ॥२६
करियर पनारसीदासजीका इदर बहुत कोमल था, ये अप
रके धर्मरक्षादि गुण मुनकर बहुत प्रशमा किया करते थे।
परकी मृत्युको राबर जिस समय जौनपुर आई, उस समय
परकी सौदीर पेठे हुए थे, मुनते ही मन्डी आ गई । शरी
सीटीसे नीचे दुलक गया. भाषा फूट गया, सून बहने लगा भाग
उसमें कपरे सराबोर हो गये। माता पिता दोरे हुए आये, पुषको
गोद में उठा लिया । पंगा करके पानीके टोटे हाक मुजा
उपशान्ति की गई पाबमें कपडा जलाके भर दिया गया।यो समयमें
भन्छे हो गये। नवीन बादशाहो तिलककी गुशी पर २ उरमय
मनाया गया। राज्यमा प्रजाने भिमारियों को बहुत सा दान दिया।
पाठकों को स्मरण रहे कि, अभी तक सदाशिवकी पूजन निरंतर
हुमा करती थी, उसमें बनारमीने कभी भूल नही की। उस दिन
एकान्तमें बैठे २ सोचने रंगे ।...
अप में गिरपो परपो मुरणाय ।
तप सिप का नदि करी सहाय!।
इस विकट दाकारा गमापान जब उनके उदयमें महुआ,
उन्होंने सदाशिवत्रीका आसन ही अन्यत्र लगा दिया, और पूनम
करना छोर दिया। बनारसीक मानारगी दयने इस समयमे ही
पपरा गाया। उनके शरीरमेंसे वाटापन भोका निपट गया
पा। युवावरपा पिराममान दी। विधादेवीने पुषावस्थारी मार्ग
उम्मनासे बहुत आगरा मचा रखा था, परन्तु संग भार

५२
कविवरवनारसीदासः।
भले वस्त्र अरु भूपन भले ।
ते सय गाढ़े धरती तले ॥
घर घर सयनि विसाहे शस्त्र ।
लोगन पहिरे मोटे यत्र ।
छाटो कंवल भयया खेस ।
नारिन पहिरे मोटे येस ॥
ऊंच नीच कोउ न पहिचान ।
धनी दरिद्री मये समान ।
चोरि घाढ़ दीसै कहुँ नाहि ।
यों दी अपमय लोग डरादि । २५५॥
यह अशान्तिकी हवा दश यारह दिन यह जोर शोरम चलती
रही । तेरहवें दिन शान्तिमचक पादशाही चिट्टियां आई और
घर २ बांट दी गई। चिहियां बांटते ही अशान्तिने विदा ले ली।
ममाटा मिच गया । घर २ जयजयकार होने लगा। जो धनी
और गरीबों का भेद उट गया था, यह अब फिर आ बेटा । धनि-
योंके यम । चमचमान हगे, बेचारे दादी भीग मांगते हुए
मजर आने लगे । चिट्ठीमें गमाचार इस प्रकार थे
प्रथम पायशादी करी, पायनयरल अलील ।
भय मालहस पास, कार्मिको काल ।
प्रकारको नन्दन पड़ी, गादिय बाद सटेम।
नगर पागर में तगत, पेटी भयर जम २१८॥
थरा नाम बन पा।

अनमन्थरमाकरे
माम धरायो नरदी, जहांगीरसुलतान ।
फिरी दुद मुलकम, स तद परती भान १२६९।।
ৰং নারীবাসীয় শকুন জীবন শা, ২ খ.
के धर्मादि गण मुनार हुन प्रशंमा किया करते थे । क.
पाकी प्रत्युकी सबर जिग समय जौनपुर माई, उस समय ये
परकी सटीर दुर थे, मुनते ही मूळ मा गई । शरीर
मीटी नीचे दुरा गया. भाभा एट गया, सून बहने लगा और
इसमें कपरे मरार हो गये। माता पिता दोरे हुए आये, पुरको
गोदमें उठाया । ऐसा करके पानी डोटे डालके भूछा
उसान्ति की गई घायमें कपडा जलाके मर दिया गयासपोरे समयमें
अहो गये। नवीन पादशाह के निउकी शुशीमें पा र उत्सर
মধা । মা মসমিয়ায় বন বা ধন বিশা।
पाटमोरो मरण है कि अभी तक मदाशिवको पूजन निरंतर
हुआ करती थी, उसमें पनारमीन कभी भूल नही की। उस दिन
शान्तम पेठे २ सोचने गे!...
जब मैं गिरपो परपो मुरक्षाय ।
तप शिप का नदि करी सहाय!
इम रिवर का समाधान जर उनके हृदय में न हुआतब
কান ষষিসী আনুন । সভা যা, সী দুস
करना दिया। पनारसीके नानारती एयने इस समय ही
पटटा गाया। उनके शीमेंसे पाटपन कभीका निकल गया
पार पावरमा निराधमान पी। रिपादेवीने युवावस्थाकी महरी
उग्मतनासे मत रागा मया रकमा या, पातु फुसंग और

ऋविषयमानीदानः। मले वस्र सम भूपन मले। ते सर गाहे घरती तले घर घर सनि रिसाहेशन। लोगन पहिरे मोटे यत्र। टाही कंबट मपया तैम । नारिन पहिरे मोटे देस। ऊंच नीच कोर न पहिचान । पनी दरिद्धी मये समान चोरि घाद दस कहुं नाहि । दोही मानय सोग दि.२५५॥ यह असान्दिको हवा दाह निरम नरें रही। दाहवें दिन शन्त्रिक बादसाही चिट्टियां मई पर २ बंट दी। विहिबारने ही लिने दिवानी। मारा निच गया। पर २ पसार होने दाबी भरोकार र गदा या दह अब र प्रसार पर- पर दम दो बार सोचा दरिद्री संगीत राम दिन मरवरा हमार - अपन पानाही करी, पारनपत्र जार। पर मादाम दाम, कार्निरमी काल परसाती नन्दन पड़ी, मादिष र मदेम । रमर गाने नमन, वटा प्रदर २१८॥ -

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कविवरवनारसीदासः । । स्वतंत्रता के कारण वह विजयताम नहीं कर सकी थी। अब सर्व- अता गृहजंजालको देसके रसूचकर हो गई थी, वेचारी कुसंगतियों मदा साथ रहनेका अपकारा नहीं था। अतएव विपादेवी अपना काम कर गई । उसने कोमल हृदयमें कोमल शान्तिरमका पीर बो दिया। कविवर बनारसीरामजीके पास अब केवल शृंगाररसा गुजाग नहीं रहा। एक दिन संध्या समय गोमती नदी पुलपर बनारमोदाम भानी मित्रमंडळीरे साप समीरमरन कर रहे थे, और सरिता ताल-तरंगोको चित्तपत्तिकी उपमा देते हुए कुछ सोच रहे थे। बगमें एक मुन्दर पोपी दब रही थी। निगग भी इस ममर मुराचार नदीकी शोभा देख रहे थे । करिवर बारही मार पारने लगे "लोगोंमे मुरा है कि, जो कोई एक बार भी बार बोलना है, वह नानिगोदके नाना दुमोका पात्र होता है। परन्तु न जाने मेरी क्या दशा होगी, जिमने झटका एक पुंज बनाके रकमा है। मैंने म पोथीम रियों के सपोरसित नगनिय हापमान रिमपितामोडी चना की है। हाय! मैंने यह अच्छा नहीं किया में तो पता भागी हो ही गुहा, अब परसग योग मी इमे पहार पm मागी होंग" । म उहीबारने करिव दयको जगमा दिया। वे मांगे आमिर नही करम, औरतीगीही मम्मी प्रीशाराम नायग गोमती उग भाइ भोर मीरम- गातार टम हीरो नीरा बन जय पाची सरमित हो गये । पोपटप मगर रहने मो, यि हाय १ र ग, पान्नु free हंग! मी मादी मागदा नदी जैनमन्धरलाफरे किया। सब लोग मन मारके अपने २ घर चले आये । कवियर भी प्रसनतासे अपने घर गये । पाठक ! एक पार विचार कीजिये, अमूल्य-रस-रखको इस प्रकार तुच्छ समझके फेंक देना और तत्काल पिरक हो जाना, क्या रसिकशिरोमणिकी मामान्य उदारता हुई। नही ! यह कार्य नही उदारहृदयता और स्वार्थत्यागका हुआ। उस दिनसे कविवरने एक नवीन अवस्था धारण की तिस दिनसों यानारसी, करी धर्मकी चाह । तजी आसिपी फासिवी, पकरी कुलकी राह । सरगसेनजी पुषका उक्त वृत्तान्त मुनकर पहुस ६र्पित हुए। उन्हें आशा हो गई फि, मेरे फुलका नाम जैमा आज तक रहा है, धैसा आगे भी रहेगा । पुरकी पूर्वावस्थासे साम्प्रत अवस्थाका मिलान कर थे चपित हो गये । निधय किया कि, कई दोष कोउन त, तजे अयस्था पाय । असे पालकफी दशा, सरण भये मिट जाय ॥२७२॥ और- उदय होत शुभकर्मके, भई भानुभकी हानि सातें तुरत पनारसी, गही धर्मपी पानि ॥ २७३ ।। घोड़ेही समयमें क्या से क्या हो गया । जो पनारमी मंमारणे एक रेशजन्यरराक रमिया थ, ही अब जिनेन्द्र के शान्तरमके पसमें हो गये । अडीग पोगके लोग तथा पुटुम्सीजन जिमको पल गरी कूषोंमें भटकने देखते थे, आज उमी पनारमीको जिन मन्दिरको भटद्रव्ययुक्त जाते देगते हैं। जिनदर्शन दिये रिना भाशि। पानिको भर्यात पास।

कविवरबनारसीदामः। मोजनके त्यागकी प्रतिमायुक्त देयत है।चदंग नियम, अन, माना- यिक, साप्याय, प्रतिक्रमणादिनाना आगार-विचार-युक देगते हैं। और देनते हैं, मच्चे हृदयमे मम्पूर्ण क्रियाओंको करते । ममावका इस प्रकार पलटना बहुन थोड़ा देमा जाना है। तय अपजसी यनारमी, अब जस भयो बिरयात ! खग्गमेनजाके दो कन्या थी, जिसमें एक तो जौनपुरने विवाही गई थी, दूसरी कुमारी थी । इस वर्ष अर्थात् मंवत् १६६४ के फाल्गुणमाममें पाटलीपुर (पटना)में किमी धनिकके पुरम उसका भी विवाह कर दिया गया । कन्याका विवाह मानन्द हो चुकनेपर इमी वर्ष- यानारसिके दूसरो भयो और सुनकीर । दिवस कैकुमें उड़ि गयो, तज पिंजरा शरीर ॥ २८०॥ इम पोतेक मरनमे खग्गसेनजीको विशेष दुःस रहा । परन्तु तीन वर्षतक पुत्रके रंग ढंग अच्छे रहे, यह देखकर उन्हें बहुत कुछ शान्तवन भी मिलता रहा । सवत् १६६७ में एक दिन स्वरगसेनजीने पुत्रको एकान्तमें बुलाके कहा "बेटा ! अब तुम मयाने हो गये । हमारा वृद्धकाल आया । पुत्रोंका धर्म है कि, योग्य-वय-प्राम होनेपर पिताकी सेवा करें, इस लिये अब तुम यह घरका सब कार्यभार समालो और हम दोनोंको रोटी विटाओ' यह सुनके पुत्र लजावनत हो रहा, उसमे कुछ कहा नहीं गया। पिनाका प्रेम देखक आंखोंमें आ भर लाया । उसी ममय पिताने अपने हायमे पुत्रको गोदमें लेके हरि- द्राका तिलक कर दिया, और घरका सब काम सोंप दिया। पीछे

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फसिग्पनारसीदामः। हृदय इन नागेंही कथा गुन शिप आया। उन्होंने कहा मार आन गतमा मार लोग यहां आनन्दगे रहो, हम अपने घा जाके मोयगे। परन्तु इतना प्यान ग्मना कि, मंरे नगरमा हा- किम आवेगा, वह पिना नागी लिये नहीं जाने देगा, इसलिंग उमे कुछ दे लेके गनी कर लेना । चौरीदार चले गये, इन हो- गोंने पानी के हाथ पैर धोये, गीले कपडम्मनो डाल दिये और प्याल विद्याकै सबके मर नियामकी चिन्ता लगे। लोगोंदी अन अपनी ही जाती थी, कि इतने में एक जबर्दम आदमी आया, और लगा डाट डपट बनलाने । तुम टोग किमके हुक्ममे यहां आय: कौन हो? यहामे अब शीत्र चले जाओ, नहीं तो अन्छा नहीं होगा। इत्यादि । इम नवीन आपत्तिम मयभीत होके चार उट मैटे, और बिना कुछ कह मुने चलने लगे। परन्तु इन लोगोंकी तत्कान दशा देखके पन्धर भी पमीजता या, नवागन्दुक तो आदमी ही था। इनके मीधेपन को देमके उसमे न रहा गया, जाते हुए टोटा लिया और अपना एक टाट विभनेको दे दिया। चौकी में जगह इतरी थोडी थी कि, सोना तो दूर रहा, चार आदमी मुमीतमे धैठ मी नहीं सकते थे । तब टाटपर नीचे तो दुनिया बनारमी तया उनके साथी मोये और ऊपर साट विछाके नवागन्तुक अपने पांव फैलाके सोया! ममय पडनेपर इतनी ही गनीमत है! यों तो रात्रि पूरी हो गई, सबरे देखा तो, वर्षा बंद हो चुकी थी, आका निसरके निर्मल हो गया था । उटके यानी २ गाड़ियोंपर आये और मार्गका मुभीता देखके गाडी चला दी। आगरा निकट आ गया । बनारसीदासजी सोचने लगे, कहां जाना चाहिये ! मार कहाँ उतराना चाहिये ? और मुझे कहां ठहरना चाहिये ! क्योंकि उन्हें ।

जैनमन्थरत्नाकरे व्यापारके लिये घरसे बाहिर निकलनेका यह पहिला ही अवमर था। निदान चित्तमें कुछ निश्चय करके गाडियों को पीछे छोड आप मोतीकटलेमें पहुंचे। आपके छोटे बहनेउ, धन्दीदासजी चांपसी. के परके पास रहते थे, उन्ही के यहां गये । पहनेऊने मालेका यथोचित सत्कार किया। दो चार दिनमें बहनेऊकी सम्मतिमे एक दूसरा मकान किराये से रिया और उसमें सब माल असमान रखके बेचना खर्चना आरंभ कर दिया । पहिले कपडा बेचके उसका हिसाम तयार किया तो, याजमुल देके कुछ घाटा रहा, पश्चात् धीव तेल पंचा, उसका भी यही हाल हुआ, केवल चार रुपया लाभमें रहे । कपडा और घी तैलकी विक्रीका रुपया हुंदीसे जौनपुर भेज दिया और सबके पीछे जवाहि- रातपर हाप लगाया । पनारसीदास च्यागारसे अभी तक एक तो प्रायः अनभिज्ञ थे, दूसरे आगरेका व्यापार! । अन्छे २ ठगा जाते है, इनकी तो बात ही क्या थी । जिस तिसको साधु असाधुकी जाच किये बिना ही आप जवाहिरात दे देते थे, और उसके साथ जहां चाहे तहां चले जाते थे। जौहरियों के लिये यह पाय बड़े धोखेका है । परन्तु अच्छा हुआ कि, रिसी लुचे टफंगेकी टि नहीं पड़ी । तो भी अशुभ कर्मका उदय पा, इजारबन्दके नारेमें कुर हटा जवाहिरात बांध लिया था, वह न मालूम कहाँ खिसककर गिर गया । माल बहुत था, इसमे चोट भी गहरी लगी, परन्तु किसीसे कुछ कहा नहीं। आपत्तिपर आपत्तियां प्रायः आती हैं। किमी कप में कुछ माणिक बंधे थे, वे डेरेमे रक्से में उन्हें पहे, कपडे ममेत ले गये!दो जगऊ पहुंची किमी शेटको मेची घी, दूसरे दिन उसका दिवाला निकल गया! एक जाऊ मुदिका थी, वह ।

६० कविवरबनारसीदासः। सडकपर गांट लगाते हुए नीचे गिर पड़ी, परन्तु जब नीचे देखा तब कुछ भी पता नहीं लगा, न जाने किस उठाईगीरेके हाथमें सफाईसे पड़ गई । इन एकपर एक आई हुई अनेक आपत्तियोंसे बनारसीका कोमलहृदय कम्पित हो गया । और संध्याको खूब जोरसे ज्यर चढ- आया। चिन्ताके कारण बीमारी यढ गई । वैद्यने दश कोरी लंघने कराई, पीछेसे पथ्य दिया। पथ्यके पश्चात् अशतिताके कारण महीने भर तक बाजारका आना जाना नहीं हुआ। इस बीचमें पिताके अनेक पत्र आये, परन्तु किमीका भी उत्तर नहीं दिया। तो भी मात छुपी नहीं रही । उत्तमचन्द जौहरी जो आपके बड़े बहनेऊ थे, उन्होंने खरगसेनजीको अपने पत्रमें लिख भेजा कि, पनारसीदास जमा पूजी सब सोके भिखारी हो गये हैं ! । इस मकरमे खरगसेनजीके घरमें रोना पीटना होने लगा । उन्होंने अपनी नीकी सम्मतिमे पनारसीको घरका मोर मांधा था, इस- लिये सीमे कलह पूर्वक कहने लगे कि "मैं तो पहिले ही जानता पाकि, पूत धूल लगायेगा, परन्तु तेरे कहनेगे तिलक किया था, उमका यह फल हुआ- कहा हमारा सय थया, भया मिशारी पूत । पूंजी मोई पहया, गया पनग गय गून ॥ ३३१ ॥ यहां बनारसीदासजी जो कुछ यस्तु पाममें थी, गो सपष २१ माने लगे, और इमनाह ग पागमें केवल दो चार टके रह गये, तब हाट बाजार का गाना भी छोर दिया । दिन प्यतीत M

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पर मृगौवनी और मधुमास्नी मार पुतकोको उरमें
पादियोको सुमन यि दो पार रसिक
पुप भी पाय माहो, और मरा हो । भोलाभोंमें एक
कावासा पा उ. पदांगे मार दीदिन दोनों बफ
र संकमाया रते थे। जर पार गाते र बहुत
दिन गये, तर एक दिन पोथी गुनकर माते हुए कारबालेको
एकान्त अगानित होने आपने पति-
मुम उभार कीन्हो याहुन, मागे मप जिन छ।
मेरे पास कार नहीं, दाम कहांसी !
गुगापती पद पनगाले कपि।
माम पुनमन जाके सुमदमान ये बार रिकम संबन
१५६. मग विमान में सरहान के पेले थे, एक
पुनुपनर रा मर गुदम्मदसायली । ये दोनों ही दिन्दी
भाविपरमरिक मुहम्मी पापतकाव्य
न्दिा एक उरी या राय मृगायतीने ३०
पो बनाया गया।गायतया जिम प्रसर दे और
योरी मगम भरी, रा र पानी का नहीं
१.पारेभाधारपर दिया गया और गादी
बल बपना प्राधा परन्तु एगावती vिहोनेरा भी
सरदारपरलतासेपूटर मरागसे रविकोपी उसे बिना
नही मानतावितिके समय नविकररित्तो इससे भाप निमाय
भालना होणानुपन गपुर शेरशाहमानिता से
महाधिन थे, ऐण समालोचक माग १५१८.१९ में
शित हुआ है, परन्तु वा हुरीन बेटा मानेमें भूल
हुई जान पratोक दोराहा आनपुरके हुनासे छ

कविवरवनारसीदासः। कचौरीवाला मला आदमी था, वह जानता था कि, बनारसीदास कोई अविश्वस पुरुष नहीं है, किन्तु एक विपत्तिका मारा हुआ व्यापारी है । उसने कहा कि, कुछ चिन्ताकी बात नहीं है । आर उधार लेते जावे, मेरे द्रव्यकी परवाह न करें, और जहां जी चाह, आ जायें। समयपर मेरा द्रव्य वसूल हो जावेगा । इस सजनकी बातका बनारसीदास और कुछ उत्तर न दे सके, और पूर्वोक्त क्रमसे दिन काटने लगे । छह महीने इसी दशामें बीत गये । एक दिन मृगावतीकी कथा सुननेको वाबीताराचन्दजी नामक एक पुरुष आये । यह रिदतमें बनारसीदासजीके श्वसुर होते थे । कयाके हो चुकनेपर उन्होंने बनारसीदासजीसे पहिचान निकालके वटा मह प्रगट किया और एकान्तमें ले जाके प्रार्थना की कि, कल प्रभातकाल सम्बन्ध नहीं था। वह शूर जातिका पठान या और उसका अगली नान फरीद, मापका हसन और दादाका इनाहीम था। इब्राहीम घोडोंका व्यापार करता था, परन्तु उसका बेटा हसन व्यापार छोडके सिपाही बना और बहुत दिनोंतकरायमल शेखावतकी नौकरी करता रहा। वहासे मुलतान सिकन्दर लोदीके अमीर नसीरखांक पास नौकर रहा । फरीद वापसे स्टकर पहिले लोदी पटानों और फिर बावरवादशाहके मुगल अमीरों के पास रहा। बावरने इसकी ओसमें फसाद देखकर पकडनेका हुक्म दिया, जिससे वह भागकर सहस्रमके जंगलों में दर मार करने लगा। फिर बिहार और बंगालेका मुक दवाते २ हुमायू बादशाहसे नहा और उनको निकालके संवत् १९९७ में हिन्दुस्थानका यादशाह बन बैटा । २ मधुमालती हमारे देसनेमें नहीं आई, इसके बनानेवाले कवि चतुर्भुजदासनिगम (कायस्य) है । इस प्रन्यकी रचना भी संवत् १६.. के लगभग हुई आन पड़ती है । मधुमालतीची लोकसंख्या १२.. है। कहते है कि, यह एक प्राचीनपतिमा पद्यबन्ध उपन्यारा है।

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६४ ऋविवग्यनारमीदाम.। माया, तब कचौरीवालेका हिमाव कर उमझे रुपया चुका दिये । कुल १४) चौदह म्पयाका जोड हुआ।पाटको ' वह कमा समय था, जब आगरे मगमे दाहग्में भी दोनोयनकी पूरी कचारियों का खर्च केवल दो रुपया मासिक या! और आज कैमा ममय है, जब उन दो रुपयोंमें एक सप्ताहकी मी गुजर नहीं होती!! मारतवासियोंको इस अंग्रेजी राज्य भी क्या वह समय फिर मिलेगा? इस मांझेके व्यापारमें दो वर्ष पूरे हो गये, पर विशेष लाम कुछ नहीं सूझा, इसमे बनारसी विषादयुक्त हुए और आगरा छोड देनेका विचार किया । जनू- साहुमे मांशका सब हिसाब किया तो, दो वर्षकी कमाई २००) निकली, और इतना ही मर्च बैठ गया । चलो छुट्टी हुई, हिमाव बराबर हो गया । कवियर कहते हैं- निकसी योयी सागर मया, । मई हींगपालेकी कथा । लेखा किया रुसतल बैठि, पूंजी गई * * में पैटि । ३६७ ॥ आगरा छोड़ के आर सैराबाद (समुराल) को जाने के विचारमें थे, कि एकदिन बाजारसे लौटते हुए सडकमें एक गठरी पड़ी हुई मिली, उसमें आठ मुन्दर मोती बंधे थे। बड़ी सुशी हुई। धनार्थी मोही- जीवको प्रसन्नता ओर कब होगी? ब? यत्नमे मोती कमरमें लगा- लिये । और दूसरे दिन राना नापने लंगे। रातिको श्वमुगठयमें पहुंचे बडे आदरसे लिये गयः सबको प्रमुन्नता हुई। ममयर मायांसे एकान्त समागम हुआ। सामान्य संयोगमे, सामान्य प्रेममे, सामान्य आन- न्दमे हमारदम्पतिका यह मयोग, प्रेम, आनन्द कुछ विटया ही था। ।

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६६ कविवरवनारसीदासः। अहाहा ! यह अन्तका वनितावदन-विनिर्गत-पद कैमा मनोहर है। ऐसे शब्द माग्यवान् पुरुषोंके अतिरिक्त अन्यपुरुषोंको सुनना नसीब नहीं होते । उस वन्दनीय नीकी तृमि इतनेहीमें नहीं हुई, उसने एकान्त पाकर अपनी माताकी गोदमें सिर रख दिया और फूट २ के रोने लगी। पतिकी आर्थिक अवस्थाके शोकमे । उसका हृदय कितना विद्ध हुआ है, सो माताको सोलके दिखलाने। लगी। बोली-"जननी ! मेरी ठज्जा अब तेरे हाय है। यदि त् साहाय्य नहीं करेगी, तो प्राणपति-सर्वस्व न जाने क्या करेंगे। वे इतने लजाल हैं कि, अपने विषयमें किसीसे याच्मा तो दूर रहै, एक अक्षर भी नहीं कह सक्त । मुझसे न जाने उन्होंने कैसे कह दिया है। उनका चिच महुत डांवाडोल है। वे न तो घर जाना चाहते हैं और न यहां रहना चाहते हैं, परन्तु यदि तू कूछ आर्थिक सहायता करेगी, तो व्यवमाय अवश्य ही करने लगेंगे।" (धन्य पति- प्रते!), पुत्रीके हृदयदुःस को जानकर माताने आवासन देते हुए आम पोडकर कहा, “बेटी ! उदाम-निराश मत हो। पास ये दोमो रूपये हैं, सो तुझे देती हैं, इससे वे आगरेको जाकर व्यापार कर सकेंगे" (धन्य जननी !) पुन, रानि हुई। दम्पनि समागम हुआ । पति परायगा सा. चीने अपने कोकिल-कण्ट विनिन्दित-सरमे लालायितनोंद्वाग पनि ही मुमुनि अवलोकन करते हुए कहा "नाय! में गुमहती Pार जौनपुर जाने के प्रचारमें नहीं होंगे, और यथार्थमें वहाँ साना इम दराने जम्छा भी नही है । मेरे कहनेमे आर मागरेको एक बार फिर जाइये! एक बार सिर उपोग कीजिये !अबकी बार अवश्य ही र मफयमनोरम होंगे। मैं दोमो माया और भी आपको

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६८ कविवरवनारमीदासः। एका रहकर जामोद प्रमोदमें मुममे कालयापन करते थे। एक दिन तीनों मित्र एक विचार होकर कोल ( अटीगढ़) की यारो गये । यहां संमारकी प्रबल-तृगाकरशीभूत होकर मगर प्रार्थी हुए- * हमको नाय! लच्छमी इंदु । लछमी जय देहो तुम तात । तय फिर करहिं तुम्हारी जाता हाय ! यह लक्ष्मी ऐसी ही वस्तु है। यह मगरमे संसारमा प्रार्थनाके बदले संसारवृद्धिकी प्रार्थना कराती है और किये हुर गुन फट-यदायक-पुण्यकर्मरूप वृक्षको इस याचना और निदानके, कुठारते काट डालती है । आज भी न जाने कितने टोग इट। कारण देवी देवताओं को मना रहे होंगे ! बम, यही प्रार्थनारक, हमारे तीनों मित्र घरको टौट आये, कोटकी यात्रा समात हुई। फाल्गुममें बालचन्दका विवाह था । बराती तयारी हुई। नित्रने बनारसीदास से साय चलनेको अतिशय आग्रह किया दिर अन्तर्दव्य मोती आदि बेचक ३२) सया पासमें किये और घराउन शानिल हो गये, नरोचमदासको मी साथ जाना पड़ा । बरावने मन स्पया खर्च हो गये । टोटके आगरे आये और सैराबादी कार्डो झारके फरोस्त कर दिया, परन्तु हिसाब किया तो मूल और प्यार देके ४)क० घारेमें रहे ! अदृष्टो कौन जानता है ! यापारकार्य निश हो चुकनेर घरको जानका दृढनिश्चय कर लिया। परन्तु निववर्य नरोत्तमदासजीने कहा- कहै नरोत्तमदास तव, रही हमारे गेह । माईसों क्या मित्रता? कपटीसों क्या नेह !४०६ जागा (यात्रा)।

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७०
कविवररनारसीदासः।
माप आने घर ले गया। तथा "म सोग मार्ग भूल गये है, रानिमा
काम कर लें, मातः आपको रास्ता बना दिया जायेगा" इस
प्रकार पचनामत कहके मंतोषित किया । सतितिर
पौधरी पर ठहर गये। माघौधरी माने शयनागारमें पलाम,
तर तीनों ने मत परकर अनेक बनाकर धारण किये और
मिहीमो मस्तक रिपुण्डोंमे मुशोभितरिये । पा-
माटी लीन्ही भूमिसो, पानी लीन्हों ताल ।
पिसीनो परयो, टीका कोन्दों माल ४२४ ॥
সানাগাং বিনাসীম খান নি। নুস শিন বা
हिमा भोगत माकर प्रणाम किया | मने गाशित
और बोरिपा नगना करके तीनों माप होगो । तीन कोम परमार
कहा की ना मिलाई, तब भौधरी तो शिष्टाचार मारे
भाटा, मोरये दोकोग करने पर फतहपुरम, वहा से
मगर इन्टाहाबाम गमग गलिया। गाता
परमोर बनानानन यि ।पमान बनारसीमनी पूमने
पनि एक पानमें मनानक
तिनको
नदीगो | Trfini Tो नारा, TET
FuTufanम प्रगान मामलनको मह ARE, Amit
Artी भी माना
मानमरमान की
RArent मोनपुर ART
1:4RE ATM बनाम । बाग
न with marte
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कविवरवनारसीदासः। किया । न जाने वेचारीकै प्राण कैसे दुःखमें छूटे होंगे। सतीसाध्वि' मैं तुम्हारी मतिका कुछ भी बदला न दे सका, क्षमा करना । इस प्रकारके उथल पुथल विचारों में मन बनारसीको नरोत्तम. दासने नाना उपदेशोंमे सचेत किया और चिट्ठी पूरी पढ़नेको कहा। तब धावलम्बन करके बनारसी आगे पढन लगे, यह लिखामा "तुम्हारी सारी अर्थात् महूकी छोटी बहिन कुंआरी है । तुम्हारी मसुरालसे एक ब्राह्मण उसकी सगाईकी बातचीत लेके आया था, मो मैंने तुमसे बिना पूछे ही शुममुहूर्त शुभदिनमें सगाई पक्की करली है। मरोसा है कि, तुम मेरी इस कृतिमे अप्रसन्न नहीं होओगे" इन द्विरूपक समाचारों को पढकर कवियरने कहा- एफयार ये दोऊ कथा । संडासी लुहारकी यथा छिनमें अगिनि छिनक जलपात। त्यों यह हर्पशोककी यात ॥ अपने गृहममारके इस प्रकार अचानक परिवर्तनसे किमको शोक-वैराग्य नहीं होता ? मयको होता है और अधिक होता है। परन्तु मेद है कि, मोहमाया -परिवेष्टित चित्तमें यह स्मशान-वैराग्य चिरकाल तक नहीं रहता । जगत्के यारस्कार्य नियमानुमार चलते ही रहते है, किमीक माने या जन्मलेनमे उनमें अन्तर नहीं आता। बनारमीदामजीकी मी यही दशा हुई । योडे दिनों तक उनका चित शोकाकुट रहा, परन्तु पीठे व्यापागदि कार्यों लिम होके ये सब भूल गये । मय ही मूल जाते हैं! इन दिनों दोनों मियाने छह मात महीने व्यापारमें पड़ी मश- इन इटाई । आवश्यकतानुसार कमी जौनपुर और कभी बनारगमें है, परन्तु निरन्ना मायने रहें । उग ममा जौनपुरका मध्यात्र पीनीरिटीपर्धा या, यह नहा बुद्धिवान, पगरमी तथा दानी

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कविवरवनारसीदासः। सूर व्यापार किया, और विपुल द्रव्य सम्पादन किया । फिर काशी और जौनपुरमें रहकर व्यापार किया, इस तरह दो वर्ष बीत गये। मागानूर नामके किमी उमरावने बाद ही सिरोपार पाया था, उसका आगमन अपने नगरोंमें मुनकर टोग घर छोड़कर जहां तहां माग रहे थे। क्योंकि आगानर बहा जालिम हाकिम मुना जाता था। हमारे दोनों मित्र भी इसी भयसे अपने गृहको आये, परन्तु जौनपुरमें देखा कि, कुटुम्बीजन पहिलेहीमे भागकर कहीं छिन रहे हैं । तन कहीं टिकाना नहीं देखकर दोनों माताके लिये भयोभ्याजीको गये, यहां भगवकी पूजनकरके चल परे, रहना योग्य नहीं समझा, इमलिये रौनाही आ गये । रोनाही धर्मनाथ भगवानका पूज्यतीर्थ है। वहां मातदिन रहकर मत्तिमार- पूर्वर पूजन अध्ययन किया, और फिर दोनों मित्र धाकी और सौट परे। मार्गमें मुना कि- आगानूर, पनारसी, और जौनपुर यीच । किया उदंगल यहुन नर, मारे कर मधमीच ॥ ४६॥ एफनाइक पर सकल, जड़िया कोटीयाल । इंसवाल गरामनर, मग जीहरी दलाल ॥४७॥ कार मार कारंरा, का यही पाय। कार राम मावसी, सबको देर सजाय । ४७१ ॥ यह मत्रा मुनी पाई मानकी हिम्मत नही पही, प्रो. गि दोनों मुरादापुरकी अंग मोट पर । बहा गरमें . RARE जैनप्रन्धरलाकरे रहे । तर तक सुना कि आगानूर आगरेकी ओर चला गया है। अतः शीघ्र ही सफर करके जौनपुर आ गये । जौनपुरमें सपलसिंहजी मोठियाका पत्र आया कि, "दोनों सांसी यहाँ चले आओ, अब पूर्वमें रहनेकी आवश्यकता नहीं है।" पाठकोंको स्मरण होगा कि, यह सबलसिंह बही हैं, जिन्होंने इन दोनोंको साशी करके व्यापारको भेजा था । इस चिट्ठीके सायमें एक गुमचिट्टी नरोत्तमदासजीके नामकी आई थी, जो उनके पिताने भेजी थी। नरोचमदासजीने चिट्ठी मनोनिमेष पूर्वक पाँची और एक दीर्घनिःश्वास लेकर अपने प्राणाधिकप्रिय मित्र बनारसीके हायमें वह चिट्ठी दे दी और पाठ करनेको कहा । पनारसी षांचने लगे, उममें लिखा था- सरगसेन यानारसी, दोऊ दुए विशेष । कपटरूप तुझसों मिले, करि धूरतका भेष॥४८१ इनके मत जो चलेगा, सो मांगेगा भीष । सातें त् एशियार रद, यही हमारी सीख ॥ ४८३ चिट्ठी पढते ही बनारसीके मुखपर कुछ शोककी छाया दिखाई दी। यह देखते ही नरोत्तम हाथ जोड़के गद्गद हो बोला “मेरे अभिशाहदय-मित्र ! संसारमें मुझे तू ही एक सभा माधव मिला है। मेरे पिताकी बुद्धि विचारित-रम्य है। वे किसी दुरके बहकाने में लगे हैं, अतः उनकी मूल धन्तव्य है। मेरा अपलविश्वास आपमें याव- चन्द्र-दिवाकर रहेगा। आप मुझपर कृपा रखें।" मित्रके इस विश- दविवेक-पूर्ण और विक्षसभापणसे मनारसी विमुग्ध-अवाक हो रहे। चितमें आनन्दकी धारा बहने लगी और उसमेंसे मंद २ शन्द निकलने लगे "यदि संसारमें मित्र हो, तो ऐसा ही हो । अहा!

कवियरवनारसीदासः। "विधिना केन सृष्टं मित्रमित्यभरद्वमम्"। एक दिन भरने मिरके गुर्गों का मनन करते हुए बनारमीदामजीने निमलिमिा पारित बनाया था। इसे निरन्तर पहा करते थे- नपान पान गुनगान मगपंतजीको, करत गुजान दिन गान अगि मानिये । रोम गेम भभिराम धर्मलीन माठों जाम, कप-धन-धाम काम म्रति पमानिपे । तीन भभिमान सात मेण देतवान, मद्धिमान गाओ जो वितान तानिये। मदिमानियान प्रान प्रीतम 'पनारमी' को, पण प्राति भयरन नाम जानिये ॥ ४४८ सोनगमे १६०३ शाम गांमकामा कर साकी मारनगा माग गये। बनारमीनाग मही जागो, with म मा नो पिता प्रागन नीको बीमारी मगन लगी थी। पुदी भी जाना की, भाना मोती रामगन गगा, परमी नही मा। मौका पा प्रत. नही होगा I मिनीत प्राणाशीही महायना'' Rel- रियोजनानासा, यिनमा रोग। प्रियी मगमे ma+' जैनमन्धरसाकरे पिके वर्गवास होनेपर १ महीने तक पुपने पितृशोक मनाया । फोर विस्मृत करने के लिये लोगोंने उन्हें अनेक शिक्षा देकर, ज्यों स्यों संतोपित किया । जीव इष्टजनों के वियोगों दुस्सी होते हैं, परन्तु निदान यह संसार है, मोहमायामें शीघ्र ही उसको भूल जाते हैं। बनारसी फिर गगबाउमें सीन हुए।पोड़े दिन पीछे साहुजीका पत्र आया कि "तुम्हारे बिना लेसा नहीं मुकेगा, अतः तुम्हें आगरेको आना चाहिये ।" साहुजीको आशानुसार बनारसीदाराजी आगरेको रयाना हुए । यात्रा, मुगटाई के न्याय और अत्याचारका करियरने अपनेपर बीता हुआ वृत्तान्त लिखा है, पाठकोंको वह रुचिकर होगा। में अपने शाहजीको आशमे एक शीघ्रगामी अश्वपर सवार होके आगरेको रवाना हुआ। पहिले दिन घेसुआ नामक गांवमें रात्रि हो जानेसे टहरना पड़ा । संयोगसे उसी दिन मागरेका एक कोठीवाल महेश्वरी अपने ६ नौकरोंके माय इसी माममें मेरे पास हो रहर गया। और भी २-३ प्रामण तथा अन्य लो. गोंका संगहो गया। सब १९ मनुष्य हो गये। सब आपसमें यह राय करके कि, आगरे तक बराबर साथ चलेंगे, दूसरे दिन पेसुभासे रेरा उठाके पल परे।ई दिन घटकर इस संघने पाटमपुरके निकट कुर्ग नामक मामकी सरायमें डेरा डाला । सर सोग अपने २ साने दानेकी चिन्तामें लगे, कोई बाजार गया, कोई अन्य कहीं गया । मधुरावासी प्राणों से एक दूप टेनेके लिये महोरके पर गया और दूसरा बाजारमें वैसे भुनाकर खापसामग्री सेके रेपर आगया। पोरी देरमें यह सयफ जिसके यहांसे विष पैसे लाया या, आ धमया और बोला कि, तू हमको धोसा देकर ।

कविवरयनारसीदासः। खोटा रुपया दे आया है। विप्रने कहा त् झूठ बोलता है, मैं चोखा देके आया हूं। वस! दो चार बार की 'मैं मैं तू तू' में बन पडी। विप्रनीने सराफको सूत्र मार जमाई । टोगोंने बीच वचाय बहुत करना चाहा, पर चौवेजी कब माननेवाले देवता ये। सराफका एक माई मदद करनेके लिये दौडा हुआ आया । पर चौवेजीके आगे लडनेमें बचाकी हिम्मत नहीं पड़ी, इसलिये एक जालभाजी सोची। टीक ही है "जो बलसे नहीं जीता जावे उमे अकलसे जीतना चाहिये।" बामणके कपडोंमें २५) २० और भी बंधै। हुए थे, उन्हें सराफके माईने खोल लिय और "ये मी सर बना- वटी तया खोटे हैं" ऐसा कहता हुआ कोतवाल के पास पहुंचा। मार्गमें चौबेके अमली रुपयोंको कहीं चला दिये और बनावटी रुपये कोतवालके सन्मुख पेश किये और बोला "दुहाई सरकार की ! नगरमें बहुतसे टग आये हुए हैं, वे इसी तरह हजारों खोटे रुपया चला रहे है। और ऐसे जबर्दस्त हैं कि, टोगोंको मारने पीटनेसे भी वाज नहीं आते । मेरे माईको मार २ के अधमुआ कर डाला है । दुहाई हुजूर ! बचाइयो !!" कोतवालने इस वणिककी रिपोर्टको नगरके हाकिमतक पहुंचाई । हाकिमने दीवान सा० को तहकीकातके लिये भेज दिया । संध्याका बक हो गया था, कोतवाल और दीवानकी मवारी सरायमें पहुंची । नगरके सैकड़ों आदमियोंकी मवारी भी मग- यमें जा जमी । बडा जमघट्ट हुआ । कोतवाल और दीवान के सामने विप्र हाजिर किये गये । इजहार होने लगे। पहिले उनके नाम ग्रामा- दि पूछे गये, फिर रुपयोंके विषयमें पूछताछ की गई। लोग नानाप्रकाः ग्की सम्मतिया देने लगे। कोई बोले टग है, कोई पाम्बडी वैषी है कोई चोले मालूम तो भले आदमीम होते हैं। कोतवाउने मत्रकी मुन मुना ।

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८० कविवरवनारसीदासः। दीवान कोतवाल बरीकी और गये । समुराठवालोंमें मंट हुई। आदर सत्कार होन ठगे। ससुरालवाले बड़े प्रतिष्ठित पुरुष थे- उनके भेट मिलापसे ही कोतवालकी साझी पूरी हो गई, वे शख सी मराये टोट आये और हमसे कहने लगे "आप सच्चे साहु हैं, हम लोगों से अपराध हुआ जो आप लोगोंको इतना कट पहुंचाया, मार कीजियेगा !" मैंने कहा आप राना हम प्रजा है। राजा प्रभाव ऐसा ही सम्बन्ध है, इसमें आपका कोई दोष नहीं है- जो हम कर्म पुरातन कियो।सो सवाय उद्यरसदियो। भावी अमिट हमारा मता।इसमें क्या गुनाह क्या खता इस प्रकार बातचीत करके दीवानादि उजित होते हुए मरने २ घर आये । मैंने एक दिन और भी मुकाम किया । छह साल सर फुलेल लेकर हाकिम, दीवान, कोतवाल सबकी भेटमें दिया । वे बहुत प्रसन्न हुए । अवसर पाकर मैंने उनसे कहा आर मगरका सराफ ठग था, हम लोग मुफ्त में फसाये गये थे । य हम लोग अपने माग्यसे बच निकले, परन्तु उस ठग विषय कुछ भी विचार नहीं किया गया । गरीन प्रालयोंके रुपये कि देना चाहिये, वे व्यर्थ ही टूट लिये गये हैं । इसार हाकिमाने लजित होते हुए कहा, हमने आपके बिना कहे ही उमको पर उनकी सरस्थाकी थी, परन्तु खेद है कि, भेद सुलनेके पहिने ही दे दोनों यहां से लापता हैं । अतः टाचारी है। हामको महेश्वरी शाह आ गये, आनन्द मंगल होने लगे । शेरके पंजेसे छुटकारा पाया, सरे ही मुम लोग घट परे। नदी के पान होते हुए विप्रयोग मार्ग आहे पड गये और लंग दाटें मारकर रोने । हमारे ये रट दिये गये, अब हम मे जीवंगे । अबको - নায়ক पिपरपरस्त हम यही प्राण दे देखेंगे। उनके इन दयायोग्य परनों से हमलोग दु.गी हो गये । दया आ गई । प्राणोंका पिलाप और नहीं मुना गया। हम दोनों (महेश्वरी-मनारमी)ने मिलके २५J रु० विनोंको देकर मंतुष्ट किया । प्राह्मण आशिप देते हुए शिक्षा हो गये । "प्राण गये अशीष दे, भय यणिक निष्पाप" इस प्रकार मुगलाई के एक राजकीय चरित्रका वर्णन ममाप्त भा। जिस समय आगरा बहुत निकर रह गया था, किसी पथि पने बनारसीदासजीको वह पत्र सपर मुनाई, जिसके मुननेके लिये ये आजन्म प्रस्तुत नहीं थे। और जिसके मुनने के लिये उनका कोमल एदय सर्वथा असमर्थ था, परन्तु आनेवाली आर- दायें बहकर नहीं आती, अचानक आ दबाती है। पथिकने कहा "तुम्हारे मित्र नरोतमका परटोक हो गया।" इसके अतिरिक्त मना- रसी और कुछ न मुन सके । उनका सुन्दर शरीर तत्काल धराशायी हो गया, विचारशक्ति पली गई, ये मूछीमें आविर्भूत हो गये । उनके माधी इस दशा में बड़े माकुल हुए, जलसेचनादि उपायोंमे उनकी मूनिवृत्ति की । मानिनिके साथ शोककी ज्वाला उनके हृदयमें धधक उटी, जिसके कारण मुंहमसे संतप्त उम्वास निकलने लगे, और नेयोंसे बाप्पस्वरूप जलधारा निकलने लगी। विषादयुक-बदन-विनिर्गत हाय मित्र! हाय मित्र! हाय मित्र! कहाँ गये' आदि पन्द मुननेवाटोंटी ओसोमसे भी दो चार मंद आंमु- ओके निकालते थे। बड़ी दुरी अवस्था हो गई। टोगोंने ज्यों यो समझा बुझाकर उन्हें आगरेमें ठिकानेपर पहुंचाया। यहां ८२ कविवरबनारसीदासः । वे अनेक दिन तक शोकाकुल रहे, बड़ी कठिनतासे मित्रशोकको विस्मृत कर सके। एक दिन आगरेमें किस लिये आये हैं ? इम यातकी चिन्ता हुई, तब साहुजीके हिसाब करनेके लिये गये । परन्तु साहुनीका शाही दरवार देखके अवाक् हो रहे । उन्होंने यणिकोंके घर ऐमा अंधाधुंध कभी नहीं देखा था । माहुजी तकिये के सहारे पड़े हैं । बन्दीजन बिग्द पद रहे है। नृत्यकारिणी छमाके भर रही है । नानाप्रकारके मुदर वादिन बन रहे हैं। मांड अपनी रंगविरंगी नकलोंमें मस हैं। और शेठजी तथा उनके सेवक सवहीमें मस्त हैं । भला! यहां इनका हिमाव कौन सुने ? और यहां इतना अवकाश किसको ? कवियर लि. ग्यत हैं, कि इम दरवारमें पैर तोड़ते २ मैंने चार महिने सो दिये । जयहिं कहें लेखेकी यात । साहु जवाब देहि परमात । .: मासी घरी छमासी जाम । दिन कैसा? यह जाने राम ॥ सूरज उदय भस्त है कहां? विषयी विषय मगन है जहां । माहुजीके अंगाशाह नामक बहनऊ (मगिनीपति) थे, जो पनामीदामके मित्र थे । इनके द्वारा बनारमीदामने बड़ी कठिन नाम अपना हिमाव माफ किया। माहुजीने कहने मुननेमे ज्यो त्यों फारकती लिम्ब दी । इम, बाद ही बनारमीदामके भाग्यका मिनाग चमका। उन्होंने माझा छोटके घर दुकान कर ली, और उसमें लवलाम उटाया। मवम् ३. फाल्गुगमाम के लगभग आगरेमें उग रोगको उत्पत्ति हुई, जो नाज मार भाग्नवर्णमें श्याम है, और जो दाम लसाधि प्रजाको मुह फा- २ निगल रहा है । जिगर आगे ." .

अनमभरमाकरे रालेगनगम हो जाते हैं हकीम लोग जवाब दे देते हैं, और बगडे शापन है।जिंग अमेसीम जैग, हिन्दीमें मरी, और गटी गुजराती में मामी कहते हैं। अनेक लोगोंका रूया है कि, ६ रोग भारतमे पहिले पहिल हुआ है, परन्तु यह उनकी भून है। इसके रोकदो प्रमाग मिलते हैं, निंग अनेक बार हो चुका है। और उममा यही मप या जो भान है। कविवरने इस विषयमें जो पाय लिमये- सम्बईक भापूर्व कमिस्नर 'मरजेम्स केम्पले'ने 'अहमदाया. दगेजेटियर' में इस दिन पहिले रस विषय सम्बन्धी अनेक उढरा येशेपकोरे जानने योग्य है। उन्होंने हिसा कि, "सी r 01 अपार वि.सं. १६०५२ लगभग महमदाबादमें देग कल रापा, ओम भागरा-दिल्ली ओरमे भाया था, और जिसका प्रारंभ १.स. में पसाबसे निधितोता है। जिस रामर गि भागरा भीर दिदी बहर मना रहा था, वहांके तत्कालीन पार- पाद जदांगीर उसमे र थहमदायादमें 3 दिनों के लिये भारते. रनके मानेके योदो दिन पीछे हरा शुभा. एनके रोपने अहमदाबादमें माना टेरा भा जमाया था। सारांश- महमदाबादमें आगरा-दिहीसे भौर भागरा-दिली पारमे रोगा और भाशा। उस समय प्रेगन पर यत्रतत्र के लगभग बता था। वर्तमान हेगकी नाई उस समय भी उसमे पनिट सम्बन्ध पाया जाता था, भयात् उस समय जाकरेगका उपाय होता था, भोये संध्या पति होती थी।" उग समय हिन्दुरपानमें जो यूरोपियन रहते थे, उन्हें भी लेगमें कंगना पा पावर कारले भौर गोरो पाप नीतिन रामाची माई तर भी एक सा बताकरता पास विश्यमें "मिक टेरी" नामक अन्यधरने निशानी

८४
कविवरवनारसीदासः।
"इस ही समय ईति विस्तरी । परी आगरे पहिली मर्य।
जहां तहां सब मागे योग । परगट मया गांठका रोग
निकस गांठि मेरे छिनमाहि । काहूकी वसाय कछु नाहि
चूहे मर वैद्य मर जाहि। भयसों लोग अन्न नहिं साहि।।"
मरीसे मयभीत होकर लोग भाग २ के दूर २ के खेड़ों और
जंगलों में जा रहे । वनारमीदासजी मी एक अजीजपुर नाम प्रानमें
एक मालग मालगुजारके यहां जाके रहने लगे। मरीकी निवृति
होनेपर वे अपने मित्र 'निहालचन्द, जीके विवाहको अमृतमर गये,
और वहांसे टोटकर फिर आगरेमें रहने लगे। माताको भी जौन
दिनकै अरसेमें सात अंग्रेजोंधी मृत्यु हो गई, लंगमें फंसनेके बाद इन
रोगियों में कोई भी २४ घटे में अधिक जीता नहीं रहा, बहुनाने
तो १२ घंटेमें ही रासा पड लिया।" सन् १६८४ में औरंगजेब
यादशाइके लदकरमें मी गने कहर मचाया था, ऐमा इतिहासमै पना
लगा है।
बनारसीदामजीके नाटकममयमार अन्यमें भीगा पता समा
है। उसमें यंघद्वारके कयनमें जगवामी जीवों के लिये कहा है-
"घरमकी यूसी नहीं उरझे भरम माहि
नाचि नाचि मर जाहिं मरी कैसे चूहे हैं।"
पाटकोंको जानना चाहिये कि, उस समय गो मरी कहते थे।
यपि महामारी (प्रा) को भी मरी कहते है, परन्तु महाका मारा
यह रंगका ही भगाधारण सा है, हवाग नहीं ।
शाम एक विशेष भेद भी है, जिसमें गांठ नही निकलती,
का सर होता है और मरके पात् मृत्यु । वैद्यक प्रधिकारी
देगको "प्रन्थि पनिशात" बतलाया है। यह असाध्य रोग है।
F--

अंगमरमा Sgth Tikenef. भीमी मगर TET STARTUtinम मा rand famirmantiमनी मार siness पानापीमाको मं.. Retrinaryर म । बहा रन mfor : म । भावारी भगिदि मन को पत्र र पर बनाया पदा- जीवि, पतपय मुंपन । iri-Mr.भाविप प्ररंगन । नाए नंदन पनपन एन । पाटिल परिसनीस, पाप कापा विपन । एप 'पनारमिदाम भनि, नि मन माना। पिनापुर-गपुर नागपुर, नि--भर पाया। ताना दिसी, मंग्ट, कर दो ए नामोदामजी परमपुज्य मागा मा गये । मंशिरो यभार ए. पु. में माताशग हो गा। में पुत्र दया भाषां दोनों विदा मांगती रोक नुगार सय ८. में मंगवाद पदीगोरम वेगाताद- जारापुर गाय विकार हो गया । जग पसार होरे शीमें पुनः मदीन मुशरोमन रही गति होती है। उसी प्रकार कीर नागरिमु न । हेवी, धीमानदिया, सुमित्रादे। ५ग । मेर। मन्दावन। ८ भनुर (मा. पपि)।

कविवरवनारसीदासः। एक वार कुटुम्बहीन होके पुनः गृहस्थ हो गये । इस प्रकार थोड- ही दिनोंमें बनारसीदामजीके संसारमें अनेक उलट फेर हुए। आगरेमें अर्थमल्लजी नामक एक मजन अध्यात्मरमके परम- रमिक थे । कविवरके साथ उनका विशेष समागम रहता था । वे कविवरकी विलक्षण काव्यशक्ति देसकर हर्षित होते थे, परन्तु उनकी कविताको अभ्यात्मकल्पनरके मारमसे हीन दम्न- कर कमी २ दु.मी भी होते थे, और निरन्तर उन्हें इस ओरको आकर्षित करनेके प्रयवमें रहते थे। एक दिन अवसर पाकर उन्हों ने पं० रायमल्लजीकृन्त वालायवोघटीकामहित नाटकसम- यसार अन्य कविवरको देकर कहा आप इसको एक वार पढ़िये और सत्यकी खोज कीजिये । कविवरने चित्त लगाकर ममयसारका पाठ करना आरंभ कर दिया । एक वार पूग पढ़ गये, पर संतोष न हुआ अत. फिर पहा । इस प्रकार वारंवार पडा और भाषार्थ मनन किया, परन्तु एकाएक आध्यात्मिक पंच समझ लेना सहज नहीं है। विना गुरूके अध्यात्मका ययार्य मार्ग नहीं भूझ मक्का । क्योंकि विलक्षणदृष्टि पुरुष मी अध्यात्ममें भूलने और चक्कर खाते देखें। जाते हैं । कविवरकी बुद्धि इस परम आध्यात्मिक प्रकाशको देख- पडित रायमलजी भाषाके बहुन प्राचीन रेसक प्रतीति होते है। प• दुलीचन्दनीने इन्हें तेरहवीं शताब्दीके लगभगका बतलाया है। रामयसार टीका, प्रवचनसार टीका, पचानिकाय टीम, पदनामत टीका, दव्यसंग्रह टीका, सिन्दूरकर टीका, एकीमा टीका, श्रावकाचार, भक्तामरक्या, भक्तामर टीच, और अध्यात्मकमल मान: आदि प्रन्यांके प्रभावशाली रचयिता है। मेक इनमेंमे किमी भी अन्यको हमने नदी देसा।

नगन्यामाकरे पर नागी, रहें पुराने गा । मियाओमहाप पोडे, और यहां तहां निमयनय होगरगामकर म सपए" बानी बहान बरिया मामी रम मममी का एक दो. में हम साह पा.- पारनीको रस मिट गयो, भयो न भातमरयाद । भां पनारसिपी दशा, जया अंरको पार ॥५९७॥ मी गमय मागे सानपपीमी, पानपतीसी, अध्यात्मर. सीमी, सियमन्दिर, आदि भनेर म्यपहागनीत मुन्दा पिताना. सीसपना दी। गप्पा समना साथ २ आपाoयताको मायाने सगी. और जेमा जिउपर हावामक्रियामोको गर्गपोटी। उन्हों में जप, तर, मामाथिक, कमण, आदि पियानोकोही पर मही छोट, सिन्तु इतनी उबगरता पारकि भगरा पदामा नैवेध (निम्मील) भी गाने मोनर चन्द्रमान, उदयफरन, और पानमलगी आदि मियोंकी भी हो गयी। चारों एकत्र ठर केपल अप्यात्मी पामा अपना काल से इस घरचा मायामरसका इतना रिपुटमयाह होता पाकि, उसमें प्रत्येक धर्म, जाति, म्यव. पारसी, उचित, अनुचित, सप्य, अयन्य सम्पूर्ण बातें बेरोक रोक माहित होती थी। इस बातको राहत तथा मुनते , उसीको गुमा किराके प्यगपूर्वर अध्यात्ममें पटानेसीश मिया करते थे। सागर यह है कि उस समय इनके जीवन का अहोरात्रिका एक मार रही बार्य हो रहा मा। हमारे जनसमाजमें उक्त मतके अनुः पापी अब भी गुतमे टोग जो लोसारके उलेपन करने को ही कपिपरपनारसीदासः। कसा कहो. भोर माने अभियाय को प्रात बनाने की मे भाग यायों को भी अपमान कहने में नहीं गुरो । म को किया है। गमशो हैं, और निप्रगति वा मों में अनुरक माग का है।ऐगे महाशगों को हम मापक के मेक्षिा की गई और भर की मरमा Thanो निगाहमारे कार और उनके मन हमारे पास नही है गरियरस दोहेमें ही का मारोहै। पान गुमापानिको माहा नोकाग- मग जर For कारीगा। कामिनाहा, ना तिना ॥ M मोम दिन भनी।पानारगी गोगा।

जनमयरमाकरे vina रियोमोन गोगा परन्तु जब अशुभके उदय का मामा, तब सहन दी यह सप पर मिट गया। और मकर शर्म R Nो गया" इमप्रकार कोषत् १९९९ तक हमारे परिपनायक. अनेकान्तयतके उगमक होकर भी एका- पानने में सपा पपा जय उदयने पसरा गाया, तब परित रूपपन्दीरा भाग आगमन हुमा । मानों आपको मा. ग्यको भला ही उन्दै आगरम सर लाई । पस्तिजीने आरको अध्यात्म एकात गेगमें प्रगित देगार गोमहमाररूप औषधो- पचार करना मारंभ कर दिया । अर्थात् आर कवियरको गोमह- सार पदाने लगे। गुणम्पानाके भनुगार शन और कियाभोंका विधान भाभी समझाते ही दयके पर गुल गये, गम्पूर्ण मंशय र माग गये और--- तप पनारसी और हि भयो। रादपादपरपति परणयो। गुनि २ रूपचन्दके पैन। पाजारी भयो दिद सेन ॥ दिदमें फाा कालिमा, हुती सरदान पीच । सोर मिटी समता भई, रहीम ऊंघन नीच ॥ दम ७-८ वर्षकै बीचमें अनेक बात नियने योग्य हो चुकी है। सो उफारगमगरण मिष्टतिल पर जाने से नहीं लिपी जा सकी, अम. अबलिंग दी जाती है। संवत् १९८४ में जहांगीर समाद काल. इंटर साहिपने जादागीरी युके पिश्य देवल इतना दिशा t,"सन् १६२. में ( 18) में जब बेटा . -- ऋविवग्बनारमीदाम । । वश हो गये, और उनकी मृत्युकं चार महीने पश्चात् शाहजहा मिहासनारूढ हुए । माह नहा जहाँगीरक बेटे थे । जहागीरन २२ वर्ष गन्यभोग किया । कामीरके मागमे उनकी अचानक मन्यु हो गई । इमी वर्ष बनाग्मीदामजीकी नीमरी मायांमे प्रथमपुत्र अब- शाहजहां और बड़ा मरदार मनावग्वा के दोनों बागी हो रह थे. जहागीर मर गया, और शाहजहा अपने बाप मनका बबर मुनने ही मागमाग मुत्र दक्षिणने उनको आया आर मन १२८ मे आगरे आकर उमने गद्दीपर बटनका दप्तहार दे दिया। अब हा कविवर लिगित ४ महीने इम बं चमे गुजर गये होंगे, और नान्न बाली रहा होगा। १ तुजुक जहांगीरीने बादशाह का मन्युरे विषय टम प्रकार नि-चा है-"मच्छी भवन, अजोल भार वरनागका मर करके वादशाह कादमीरमे लाहौर की ओरको बटे, और बीचमकलंके पहाटने एक कुतूहलजनक शिकार करनेमें आप मन टा । माटार लग हरि णोंको हकालके पहाटकी चोटीपर लाने ये नार वादगार मारव नीचेमे गोली मारने थे । हरिण गोग यावर चार पानामा नीचे तक आना था, इममे आप बड़े प्रमन्न हने थे । । पर हाय: उन बेचारे शृणजीवी जीवोसे भी क्या प्रमत्रता हाता या ) तक दिन उस देशा एक ग्यादा एक हरिणसे घरकर पहा पर गया। वह हरिण एक फचरकी ओटम इम नगह हो गया कि बादशा- नाचम उमे नहीं देख सके ये, इमलिये बह । प्यादा मारना फिर चला । परन्तु चसनेमे अभागेश पर फिमल पा । पाग हा एक वृक्ष था, उमको उसने पकड़ा परन्तु वह पिड आया । निदान उम पहाडकी चोटीमै सुकता हुआ युरी तरहमे जमान पर आ गग, भार गिरते ही प्रागहीन हो गया।कर पारे एक, जीवस ४ ॥ देगार बादशाहको या उद्वेग हुआ। वे अपने दुमा चिना - जैगप्रथरमाकरे तरित हुमा, परंतु मोहे दिन जोकर ही चल बसाफिर संवत् ८५ में दूसरा पुत्र हुआ, जो दो वर्ष जोकर उसी पथका पथिक बन गया ! संवत् ८७ में तीसरा पुर और ८९ में एक पुत्री इस प्रकार दो संतान हुए । यह पुत्री भी कोई दिनकी होकर मर गई। पुत्र दिन हुने रात चौगुने, के क्रमसे बढ़ने लगा । यविवरका शून्यगृह आनन्दकारी कलरवयुक हो गया । सूक्तिमुक्तारी, अभ्यारमय- तीगी, पक्षी, फाग, धमाल, मिन्धुचतुर्दशी, फुटकर कवित, शिव पचीसी, मायना, सहयनाम, कर्माधीमी, अष्टकगीत, वचनिका मामि कवितामोंका निर्माण भी इसी ७-८ वर्ष के बीचमें हुआ । यतिकविता निर्माण के समय वे केवल भुदरगका आम्वादन करते थे, और यह एकान्त होनेसे जिनागमके अनुकूल नहीं था, सम्हाल नहीं सके, भीर शिवार दीलतान में आ गये। थोड़ी देग्में उस प्यादेवी भगहाया मला रोटी पीटती बादशाहक पारा भाईतर उन्होंने बहुत सा नकर रपया देवर उग दुटियाको थोरी बहुत तसलीही, परन्तु मतः उनके वित्त समावी नहीं हुई। उनकी बुटियामे भी विचित्र गई। माना यमराजने इस कौतुरके मिषने उन्हें दर्शन दे दिया था। बादशाह इसी दशा थीग्मकलमे धने और धेनमें गजीरको गये। फिर बदामे समानाई पहर दिन रहे पूच या । मार्ग में प्याला मांगा, पाज्यों ही मुहसे लगाया, लाकर उलटा था पहा दौलतान पारने तर यही दशा रही। बड़ी बहनतासे रात निकगे। प्राताल कारवाग बी सरनीम भाये और हर दिन पोके भनु मान १८ मगर रान..10(कातिक पदी. संवत् १६८r) 1. वर्षकी उमरमें हिंदुस्थान, एक हिशाली मादा प्राण निरल गया । सब लोग देरावे ही रद गये।

९२
कविवरवनारसीदासः।
परन्तु उक्त सब कवितायें मी जिनागमके प्रतिकूल होंगी, ऐसी शंका
न करनी चाहिये । वे सब अनुकूल ही हुई हैं। ऐमा कविवरने
अर्द्धकथानकमें स्वयं कहा है-
सोलह सौ वानवे लों, कियो नियतरस पान ।
पैकयीमुरी सब भई, स्यादवाद परमान ।।
गोमट्टसारके पढ चुकने पर पडित रूपचन्दजोकी कृपासे जब
बनारसीके हृदयके कपाट सुरु गये, तब उन्होंने भगवत्कुन्दकुन्दा.
चार्यप्रणीत नाटकममयसार ग्रन्थका
भाषापद्यानुवाद करना
प्रारंभ मिया । भाषा माहित्यके भडाग्में यह अन्य कैमा अद्वितीय,
और अनुपम है, अध्यात्म मर्गखे कठिन विषयको कमी मरलता
और सुन्दरतामे इसमें कहा है, उमे पाटक तब ही जान सकेंगे,
जब एकबार उक्त पुस्तकका आद्यन्त पाठ कर जावेंगे। मरन् १६:३
की आधिन शुजा प्रयोदशीको यह अन्ध पूर्ण किया गया है, ऐमा
अन्यकी अन्त्यप्रशनिस प्रगट होता है।
मंवत् १६ का वह दिन कवियर के लिये बहुन गोकप्रद हुमा,
निम दिन उनके प्यारे इकलौते पुरने शरीर छोट दिया । • व.
पं एक होनहार बालकके इस प्रकार चले जाने में कम माता-
रिताको शोक न होता होगा ? भनकी मार कविया के हृदयमें गहरी
चोट बेटी, उन्हें यह मंमार भयानक दिमाई दन टगा। क्योकि
नी पालक हर मुये, रदं नाग्निर दोय ।
ज्यों सायर पनहार है, गहें हंटम होय ॥
वचार करने मगर---

X जैनग्रन्थरताकरे ९३ तत्त्यष्टि को देखिये, सत्यारथकी भांति । ज्यों जाकी परिग्रह घटे, स्यों ताको उपशांति ।। परन्तु- संसारी जान नहीं, सत्यारधकी यात । परिग्रहसों माने पिमय, परिप्रदयिन उतपात। इस प्रकार विचार करनेपर भी दो वर्ष तक कविया के मोहका उपशान्त नहीं हुआ। सवत् १६९८ में जब कि यह अदं कथानक रचा गया है, कुछ मोह उपशान्त हुआ, ऐमा कहकर हमारे परित्र नायपने कथानक पूर्वाद को पूर्ण किया है। जीयनचरित्रके अन्त में नायकके गुणदोषोंकी आलोचना करने की प्रथा है। बिना आलोचनाके चरित्र एक प्रकार अधुग ही पद- लाता है। अतएव कविवर के गुणदोषोंकी आलोचना करना अभीष्ट है। जीयनपरिक लेखकों को इस विषयमें यहा परिश्रम करना पड़ता है, परन्तु तो मी ये यथार्थ सिनेमें असमर्थ होते हैं। और अनुमानाविक मरोंसे जो थोडा बटुन लियते भी हैं, यह नायको विशेषकर पायचरित्रोंग सम्बन्ध रगता है । एगी दशा पाटक मायः गायकके अन्तचरित्रास अनभिग ही रहते हैं। परन्तु ६पकी बात है कि हमारे परिवनायक स्वयं अपने चरित्रीको निगर रस गये है, हग लिये हमको हम विषय विशेष प्रयास तथा चिन्ता करने की कोई आवश्यकता नही है । उन्होंके भक्षको हम कहा सिलकर अकथानक के चरित्रको पूर्ण बरत है। भए पनारसी कद्दों, वर्तमान गुणदोष । पिधमान पुर आगरे । सुगसो रहे सजोष ।

कविवरवनारसीदासः।
पजीवन।
पूर्वमें यह चुके है कि, करियर बनारसीदामनीकी जारी
संवत् १६९८ तककी है। इसके पश्चात् वे कब तक संगारमें है।
क्या २ कार्य किये। प्रतिक्षानुमार मानी शेष जीवनी मिली,
नहीं? अन्य नरीन मन्योंकी रचना की कि नहीं ! मारमा
प्रश्न उपस्थित होते हैं, परन्तु इनका उपर देने के लिये हमारे
निकट कोई भी माधन नहीं है। और तो क्या हम यह मीनियर
नही कर मक्ते कि, उनका देहोन्गर्ग का और किम स्थानमें ।
यह बड़े शोककी बात है।
पाठकगण जीरनचरियका गितगा भाग उपरि पाठ कर है,
उापर यति रिचार किया जाये, तो निहाय होगा, यह गमा
उनकी आलियोका मा । उम ५५ बांके औरन उन्हें पर
घोडा गमय ऐसा दिया है, निगमें थे गुगर्म हे हो।
पोई पुरुषों के जीरनमें इस प्रकार एक के पास एक, भारिमा
मानिये अरियत दुम ५५ या की गारंट २५
मोदक डानि होने पर उनके मुगका मम आगा था, मनो।
विधाताने उनके जीवन के दुम मुगमय दो सिमाग गर्ग
दिये थे और इसी लिंग करियाने इमप्रथम जीरो पर
टिमका प्रयाम दिया था। मामही कमर मुंग
ATTRanti भनेर मा मेष ।
उमरे "प्रभा" नाम भनम 27,
...पात्र भी पारी
पापायी।मपी 14 orat
मि.-५ NEngो।

जैनमन्थरमाकरे जीवनको भी उन्होंने हम लोगों के लिये लिसा हो । परन्तु यह आज दमको मार नहीं है। यह हम रोगों का अभाग्य है। शीदाम गिने में सनीयो भी माधनभूना है । क्योंकि भनेक शीदामों पर रेल जनश्रुतियों के आधार पर ही रगे जाते हैं। पिपरक जीवनको अनेक जनधुतियो प्रनारत है । परन्तु अ- नुमान माना जाता है कि सब प्रथम जीवन के पश्चात्को है, यि हम उन्हें जीवन में गम्मिलित करना टीक समझते हैं। शाहजहां पादा दरबारमें करियर बनारसीदासजीने रही राम की भी बादशाइनी कसके कारण उन्हें प्रतिदिन दरकार घिस होना पता था और महटमें जाकर भायः निर. नर सनरंज रोलना परती थी। पिर सतरंजैके बटे खिलाड़ी । पहते हैं, मादाह इनके अतिरिक्त किमी अन्य के साथ भत्तरज सेतना पसन्द ही नहीं करते थे । बादशाह जिम समय दौरपर निकरते थे, उस समय भी ये करियरको साथ में रसते तर अनेक राना और नाम गप चिढते थे, जमपे एक साधारण पनिको बादशाहकी बराबरी पर बैठा देखते थे, और अपनको उसमे नीचे । संवत् १६९८ के पधार कवियरका मोट उपशान्त होने लगा था, ऐसा बयानकमें कहा गया है। और हम जो का लिखते हैं, यह उमके भी कुछ पहिली है, जबकि, उनके बरिय और भी विशद हो रहे थे, और जर वे अष्टांग सम्परथकी धारणा पूर्णतया कर रहे थे। कहते हैं कि उस समय विधरने एक दुई प्रतिझा धारण की थी। अर्थात् उन्होंने संसारको तुच्छ समझदे यह निशय रिया थामि, में सरश्पर विवरने अनेक कवितायें जिसी।

कविवरवनारसीदासः। । जिनेन्द्रदेवके अतिरिक किसीके भी आगे मस्तक नग्न नहीं करूंगा। जब यह बात फैलते २ वादगाहके कानोंतक पहुंची, तब वे आश्चर्ययुक्त हुए परन्तु क्रोधयुक्त नहीं हुए। वे कवित्र- रके सभावसे और धर्मश्रद्धासे मठीमांति परिचित थे, परन्तु उम प्रद्धाको सीमा यहां तक पहुंच गई है, यह वे नहीं जानते थे, इसीसे विस्मित हुए । इस प्रतिनाकी परीक्षा करनेके रूपमें उस समय पादशाहको एक मसखरी सूझी । आप एक ऐमे स्यानमें बैठे, निमका द्वार बहुत छोटा था, और जिसमें विना सिर नीचा दिये दुए कोई प्रवेश नहीं कर सक्ता मा । पत्रात् करियरको एक सेर- कके द्वारा बुला भेजा । करियर द्वारपर आते ही ठिठक गये, और हुगुरकी चालाकी समशके घटमे बैठ गये । पभान् शीत ही द्वारमें पहिल पर सारके प्रवेश कर गये । इस क्रियासे उन्हें मस्तक नमन कामा पा । पादशाह उनकी इस मुद्धिमानी से बहुत प्रसन्न हुए, और हंगार बोरे, कविगज ! क्या चाहते हो । म ममय जो मांगो मिल मका है, करिने तीन यार पचनबद करके कहा, जद्दापनाह ! यह चाहता है कि आनके मात फिर कभी दमामें स्मरण न किया जाऊं! म विपिन यायनामे भादशाह नया अन्य ममम्न दरबारी जो उग गमय स्थित थे, किस तथा ननित हो रह । बादशाह हम यरन दार देनेमे बहुत दुमी हुए, और उदास होके बोल, करियर! आपने यच्छा नही या। इतना कद के अन्न पुर घले गरे, और कई दिननादा. पारमें नहीं भाये । करियर भरने भारमध्यान में सवली. न इन टगे। २ जहांगीरक दरबार में भी हमारे पहिले एक मार मौर यह बात मैनप्रन्धरनारे ९९ पर्गधी, बनारसीदास सिीको सटाम नहीं करते हैं। कहते Ir, उगममय जब उनसे सलाम करने के लिये कहा गया था, तब उन्हों ने-या कविध गदकर कहा - गतके मानी जीप, यो गुमानी ऐसो, आपय ममुर दुगदानी महा भीम है। ताको परिताप पंडियको परगट भयो, धर्मको घरया कर्म रोगको काम है। जाके परमाय मागे मागे परभाष सय, नागर नपल सुगसागरकी सीम है। संपरफो रूप धर साध शियराद पेसो, शानी पातशाह ताको मेरी तसलीम॥ २ एक बार बनारसीदासजी किसी सहकपर पुष्कभूमि देख- कर पेशान करने सगे, यह देखकर एक शाही सिराहीने जो तात्कार ही मरती हुमा भा, और जो कविराको पहिचानता नही था, पागमें आकर इन्हें पकड़ लिया और दो चार चपत (तमाचे)जा दिये । कविवरने तमाचे सहहिये, चू तक नहीं किया और चलते बने। इमर दिन शाहीदरगारमें कार्यवशात्, देवयोगमे यही सिराही उस समय हाजिर किया गया, जर कवि- बर बादशाह के निकट ही बैठे हुए थे। उन्हें देखकर बेचारे मिश- हीरे प्राण राग गये । वह समझा कि, भर मेरी मृत्यु आ पहुँची है, सर ही मने पल इस दरबारीसे सो भेटेशता करती है। आज इसी ने शिकायत करके मुझे उपस्थित कराया है। इन विचारों- यह कपित्त "नाइए समयभार" भी है।

पविखनारमीदामः। मेवार २ सपने मनागी उम्र मगहा मान गरे । पानी निमायो पुसदा गापा, गर उग दी गई. तापी कामे सदमे की Fire- माया रानी मानी तीन है. Arjunा को पोहोने में जाना है. यह मानना नोहर inने मी गम न करो मी भित हो गए Thanki!! Mahat ११ •it मनही नि मगा, ARTHA 4. नीना। • aanti anापाशी नाis ai A. 11 की Rin समय 1411 41. Tirtuोदी बिहे १३. hrs aftu writer हो गये। एक . Aamh, Eng T2121 4 4 4 १४... **-11५1

KIRTrit मा रगी सभी
जाने गरी सारी
MAR, ' या दो, म माम
Hiratilert.nifnaam
Aniruोजित माप न. पा.
men inा निरोप भरे
ar! शीनरदार' Trai'
Arm!:"f कोपरी गम'
होओ, पहा (मनुनी हो रहर पर
म.महाग! आर नाय
"हामार' होने दोय. सोये उस नदीन
मोर नहीग गत्ता ।
गममुनि भागोमें आये हुए थे. मौर
पन्दिरमेंट । म ग उनी सन बन्दनको मात
ज, और अपनी २ एम्पनुमार साय मरदी उनकी
प्रामा पिसा पने सिर परीधानी और उन्हें
होगी भाई, मंग पूजनको जाना टी नही अंपा,
शतानि पनि हो । भारत स्वयं परीक्षा
से उतर दिन उस मुनिय मन्दिरदेदारानमें एक
परोस (गाय) निकर बेठे हुए थे और सम्मुम मकान धो.
पदेश मुनरी भाव है। प्रारोसंडी मरी और एक
बाग था। उस बागमे मुनियोंदी हि भसीमानि पहुंचती थी,
भार बागमें रहने वाले पुती हि भी मुनियोर स्पष्ट
हरील्या पाली मी रविश्र उस गोचमें पहुंभ, और रोमके

करियरवनारसीदासः।
मकी गई हो गो। र किमी मुनिकट उनकी ओर
आती थी, नर वे अंगुली दिमाके उमे नितो थे। मुनियोंने
उनकी यह कृति का मार देमके मुग फेर लिया, पाला
कीगने अपनी अगुली मदकाना पद न किया। निदान मुनि.
रक्षमा मिर्जन करने को उचत हो गरे। और मकानों की ओर
मारो बोले, कोई देगो तो पागमें कोई कसर ऊपम मचा
हा है। हर शन्दों के मुनो होगा ताकि लोग मागमे देग.
को भो, कीर लम्रे २ परम गौ दो ग्यारह हो गये।
देना तो वहां कोई न था । इनागीदामजी पर महार
डा गो मागद । के मुनि महाशयोंने कहा, महात।
महा मोनो कामका कोई न पा, हमारे यहाँ के मुगीका
1 पनामीनागनी , नो हम लोगों के पनने पर
मग । मह जान के कि, या कोई मान 40
पा, मुग Tafatig. मौदामा नि
म.गदिमदन, for का गुहने.
Price नया दर्शनी का नहीं गये।
,
मामामी दुरमीरागनी गत है।
१ली माई गमा भA HIT प्रपा है,
# Rina | गोगामी की
aurat HATRA 141
गानाmuTदुमा पा, पीर
hinी IIMS में
र, 4 timent
mma था, THERE !!

ঐণমালা गोसामीजी निरे पवि ही नहीं थे, ये एक सपरिष महात्मा थे। और सजनोंसे भेट करना बनारसीरामजीका एक समार श; इस लिये भी पन्तकधाओंर विधान किया जा सकता है। यी कमिवरको जीरनी सक्त् १९९८ तककी है, और उसमें इस विषयका उोम नहीं है, तो भी दन्तस्याओमें सर्वथा तम्य नहीं है, ऐसा नहीं कहा जा सका ! एक साधारण भात ममा जीवनीमें उसरा उदयन करना भी ममय है। कहते हैं कि एकबार तुलसीदासजी बनारमीडामजीकी काव्य प्रशंसा सुनकर अपने पुछ धेनोंके साथ आगरे आये सपा कपिधरसे मिले। कई दिनों के समागमके पक्षात् वे आनी पाई १ रामायणसी एक पति भेट देकर विदा हो गये । और पार्थनापसामीकी स्तुतिमय दो तीन कवितायें जोबनारसीदासजीने भेटमें दो मी, मायमें रेत गये। इसके दो तीन वर्षरे उपरान्त जब दोनों विशेष्ठका पुन. समागम हुमा, नर रसीदाराधीने रामायण के सौन्दर्य विषयों प्रक्ष किया। जिसके उत्तर करियरने एक करिता उसी समय रघरे सुनाई- "पिराज रामायण घzमादि विराजे रामायण" (बनारमीविलास १४ १५) तुलसीदास की इस अप्यामचातुर्यको देखकर बहुत ममा हुर और बोले • आपकी करिता मुझे बहुत प्रिय दगी है," मैं उसके बदमें आपको क्या मुना! | उस दिन आग्री पानावराति पढके मैने मी एक पार्थनाय स्तोत्र बनाया था, उसे भारको ही भैर करता है। ऐमा बहके "भक्तिविरदावली" नामक एक मुन्दर करिता कविवरको अर्पण की । करिबरको उस परितासे

कविवरपनारसीदासः।
बहुत संतोष हुमा, और पीछे बहुत दिनों तक दोनों गानों
भेट गमय २ पर होती रही।
भक्तिविरदापलीकी करिता मुन्दर है, उसकी रगना गरे
हममें है। तो भी रामायण की करिताका दंग उममें नहीं है
इमरिये उस रिलीपर एकाएक भाग नहीं हो माता
पाठको जानने के लिये उसके मन्तिम दो छन्द यहां उन
किये गाने हैं-
गीतिका
पाम भी भगवान, परान उर मादि ।
गर्नुगतिमिडन तरनतारन, देश विपन विलाहि ॥
पानिपनि नहिं पार गायत, र गुपपुग कीन!
Frirant करगाम-गयोधर, महिमागमा तीन ।
दुनि दित त्रिभुपा म भूगन, जलधि भान भीर।
हिमाल उपर गोदत, महान दो गधीर ।।
हिना पारग गुगलस, पित्त यानन जागा
Fair का मजागजित, गात तुलादाग।
fuीन तुगीना fiftritic
4. पानी भाया है, और को पार एमी म है,
FRaftars ifs, यही गुणा की ही में,
प्रभाग 4.1 मी का होना मांगा
Aanामनाtit HAना और
ईमानी मामा ।

ওনাধামাধ
---
भासद रविन्तीनिहित
1, मन्ना पाठ मारो गमा, रोगक
कबोलमहीमा भीरमाये अपने मन
मा निपार पानामिल हो रहशोगोंको धाम
होगमा पाकि.मग पोदो में अधिक जोरत नही
गंदगे. पन्तु र पानामा अब घरे दो घटेमें पूर्ण
महतोग ता २ याल ने सगे मनोग
पहभाग या और गियों में अटक रहे है.
बता दमन इनके सम्मुम न होने और दोउतकी
मीनाममा महोगी. हर ना सिईन न होंगे।
(T सारमें सपने अनुसी सौ. किमीने भी रोष नहीं
किपा(मूभभालको नमस्कार) परन्तु मोगों इस तरह
भूरा-पूर्ण पिचारोरो र सहन नहीं कर सके। उन्होंने
इस योसमता निवारण ना पाहा. इमलिये एक पहिला
और गानोर लाने के ये निकम टोगों को किया।
पीठिनतर माय लोगों ने उनके हम समेतको समझा। जा
हेमनी पक्षिा आता उन्होंने नितिमिर दो छन्द मकर
यदि पर लोग अपनी भ्रको ममा गये, और
पियाको कोई परम A और धर्मामा समाकर वैयाहत्यमें
मपटीनए
कान इतमा दाप, मारि भरि मोहना।
प्रगटयो कप स्परूप, भयंत मुसोहना।
जा परजको मंत, सत्यकर मानना।
घले बनारतिदास, फर नहिं माधना ।

State
कवियरवनारसीदासः।
इम कथामे जाना जाता है जि, धिररको मृत्यु किसी ऐसे
म्यानमें हुई है, जहां उनके परिचयी नहीं थे। क्योंकि
भागर अथवा जौनपुरमें उनकी वही प्रीष्टा थी, यहाइम
प्रहारको घटना नहीं हो मरती थी।
बनारसीदामजीडी रचना।
पनामीविराम, नाटकगमयगार, नाममाता, और अ.
कपानक, ये पार अन्य करियरकी रमना प्रसिद्ध है। काया
दुसरीचन्दमी मंगृहीत मन्यों की सूची (जेनशाम माममाता) में
पनामीपनि अन्य मी आपरा मनाया हुमा हिमा है । अभी
तक हम अध्यान और बनारमीपद्धति दोनोको एक सम.
भने है, परन्तु दुलीचन्द जी हममे दो पृपा प्राय प्रतीत होते
हैं। उन्होंने बनामीपतिको जयपुर के भंडार मौना पत.
माया है। मन: हो मना है कि यह कोई दसरा मय हो, गा
भोर पाना प्रसपा है, जो यमुना नदी शालगर्भय
मोनिदो गया और प्रिमो मात
Firs मित्र भी हुए थे। पारो मारम,
मार
बमाणीपतियोमा माननने ५..fm
१, Marathi Kा म गुन भनुमान है।
wire ..साभन. म.ar
मला, रामना
mu प्राया।
मावि titt, भीगा
-rrrrrug

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१०८
कविवरबनारसीदासः।
लका निष्कलंक चन्द्रमा है। इसको रचनामें कविवरने अपन
निम अर्व शक्तिका परिचय दिया है, उसे माषासाहिल
अध्यात्मकी चरममीमा कहें तो कुछ अत्युक्ति न होगी
नाटक समयसारकी रचना आदिका मुमय पहिले लिया जा चुक
है, यहा उनके काव्यका परिचय देनेके लिये हम दो चार छन्द
उदृत करते हैं । पाठक प्यानसे पढ़ें, और देखें हमारा लिगनः
कहां तक मत्य है।
मोक्ष चलको सौन, करमको करै यौन ,
जाको रस भौन युध लोन ज्यों घुलत है।
गुणको गिरंय निरगुनको मुगम पंथ,
जाको जस कदत सुरेश कुलत है।
याही जो पक्षी सो उड़त मान गनमें,
याई विपक्षी जगमालमें गलत है।
हाक सो विमल विराटक सो विसतार,
नाटक मुनत दिप फाटक पुलत है।
कारा चित्रमा फरम पर मारी,
मायाकी गंगारी मेज चादर फलाना।
गन को चलन अगंगनमा नीद लिये,
मोहनी मगर यह सोयाकी पना
मन (मुरा
-

जैनग्रन्थरसाफरे १०९ उदै पल जोर यदै स्थासको शयद घोर, विषय मुख काजकी दौर यहै सपना । ऐसी मूढ दशामें मगन रद तिकाल, धायै भ्रमजालमें न पा रूप अपना । (३) काजयिना न पर जिय उपम, लाजपिना रन मार्टिन जूम। सीलयिना न सधै परमारप, शीलपिना मतसों न मही। नेमपिना न सबै निदचपद, प्रेमयिना रस रीति न पूछ । ध्यानपिनानभै मनकी गति, शानपिना शिषपंथ न ही। (४) रूपकी न सॉफ दिये फरमको डॉक पिये, सान दयि रहयो मिरगांक जैसे पनमें। लोचनकी दाँफसों न माने सदगुर हाक, डोल पराधीन मूढ रोके तिपनमें ।। टॉक मांसकी डलीमी तामें तीन फोक, तीनिको सो मार लिसि राख्यो कार सनमें । तासी कदै 'नाँक ताकेरापिको कर कांफ, सोकसो सरग यांधि पाकघरे मनमें । चन्द्रमा। क (टीन)। ४ (परमान- विशेष)। ५४ो। (सरया)। . KARI) मई)।

कवियरवनारसीदामः।
है नाही नाही मुहै, नाही नादि।
यह सरपंगी नयधनी, सर माने सयमादि।
.
कायास विचारि प्रीति मायाहीमें दारजीति,
लिये घठरीति जैसे धारिलकी लकरी।
गुंगुलके जोर जमे गोह गहि रहे भूमि,
स्यों ही पाय गाई पैन छांडे टेक परी॥
मोदकी मरोरमों भरमको न टोर पाये,
धार्य पहुंओर ज्यों यदायै जाल मारी।
मी दुग्युद्धि भूलि झटके रोग मुलि,
पाली हिममता जमीरनों जारी
(७)
काकी रसीली भ्रम फुटफरी कीली सील,
एघार गमुद्रात्रीमाली गुपदा है।
प्राची हानमानी मजायी निदान की।
गनी नापाची टर गांची कुरा
घामकी मदार गमती मनदार,
गया यनिमें ग्रंथनिमगा।
मंतिकी मानी रिवानी नाती निशानी,
या मदगिनी गधा कहा।

जैनमन्धरत्नाकरे
।
-
।
पाठक ! इस मन्यकी सम्पूर्ण रचना इसी प्रकारकी है। जिस
पपको देखते हैं, जी चाहता है कि, उमीको उदृत कर लें, परन्तु
इतना स्थान नहीं है, इसलिये इतने में ही संतोष करना पडता
है। भारती इटा यदि अधिक बलवती हो, तो उक्त मन्धका
एकवार आपन्त पाठ कर जाइये।
नाटफसमयसार मूल, भगरान् कुन्दकुन्दाचार्यकृत प्राकृतमन्ध
है। उसपर परमभट्टारक भीमदमृतरन्द्राचार्यकृत संस्कृत टीका
सपा कलशे हैं। और पन्ति रायमलजीत बालावबोधिनी भोपा-
रीका है। इन्हीं दोनों तीनों गानों के आययसे कविवरने इम
अपूर्व पपानुपादकी रचना की है।
३ नाममाला यह महाकीि बोधनंजयकृत नाममालाका
भाषा पचानुवाद है । शम्दोका शान करने के लिये यह एक अत्यन्त
मरल और उपयोगी मन्थ है। यह अन्य हमारे देखने में नहीं
आया । परन्तु अन्य प्रकाशक महाशयने मुजफ्फरपुरजिले के
छपरौली माम मानकों को एकबार पढ़ते हुए मुना था, परन्तु
पी प्रयत्न करने पर भी नहीं मिला । नाममालाके कुछ दोहे नाटक
समयसारमें इस प्रकार लिमे है.....
हा विपना शेमुषी, धी मेघा मति पुद्धि।
सुरति मनीरा चेतना, आशय यं विशुद्धि
१ पनि पश्चन्दजी, और एडित हेमराजजीने भी रामसारी
भासदोकानी है। पंडित रचन्दजी टीध सबसे शितूत और
बोधपरकही जाती है।
रोमुषी धिषणा प्राश, मनीषा पास्तधाशयः ॥ १..
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कृविवरसनारसीदासः ।
Y
निपुन पिसम्पन यिपुष युध, विद्याधर पिनान।
पटु भयीन पंडित गनुर, गुधी मुजन मनिमान '
फलान कोविद कुशल, गुमन दश धीमन्न ।
शाता समन प्राविद न गुनीजन मन्त ।
गाईकमान
-यह कीसकी नाका पीथा अन्य
इगो ७३ दोहा गाई है।हमने यह जीनगरिन धर्म
Tru पणे सिमा है। इसकी कीमा पनि
दमी का नहीं है, को जीनियरियो पात
MAT HE उमा किये गये है। अनुमागगे जाना जन
३. यह नगी सीमा गया है. म.
की नाई की इसमें यमकानुगारि पान मई
TERMITE पर ही इसपनेता गुप
ink 1 भी सही २ के रामारक पर बड़े मनन्।
mi
Hin-Hinगुण पाही ना. नियनका
ला, मगन Entir मो. शम
AnRIयाम
मा प्रकारहीम
भागानीRENERAPRA
ना का मामी समर

चैनप्रन्यरसाफरे उममें बहातक गफलता हुई है। इसके निर्गपसरा मार पाठकोरर ही। पति यापोंने हमारे इस परियमका चित् भी आदर दिया तो, शीघ ही धन्दारनरिलारादिपाय मन्य क्यिोंके विस्तृत सीहागमदित दृष्टिगोचर कानेवा प्रपत्र किया जायेगा। हिन्दी के माननीय पत्रमम्पादकों और गमागेरकोंमे प्रार्थना है कि ये पर इस पम्पको आपन्त-पाटपूर्वक निप्पभाष्टिमे गगालोचना करनेको कृपा करें और हम लोगोंके उमाह और हिन्दी- प्रधान रविको पदावे। पनारसीदामजीके परिष लिमन में माननीय मुंशी देवीप्रसादजी मुभिक जोपपुरमे मुसलमानी हतिहामकी बात भी बातों की सहायता मिली है. इस लिये यह माय और नमक दोनों उनके आभारी है ! पन्यमशोधन तथा जीवनचरित्रमें टिदोषमे तथा प्रमादवामे यदि कोई भून रह गई हो, तो पाटाहन्द क्षमा करें। क्योंकि- "न सर्यः सब जानाति " स्थलम् विनदरेषु । बम्बई-चन्दाबादी पिनयावनत- नाथूराम देवरी (सागर) निवासी। - प्रेमी। ८

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१ पनारसीविलास प्रन्यकी विपयानुभमणिका. ... ... ... ... ... विपपनाम पृष्ठसंख्या. १ जिनसहपनाम, +As.. २ पामुक्तावली. (स्तरहिन .inmar.. १७ ३ शानचायनी. A६१ सदनिर्णपपंचारिया ५ शट शाकापुरती नामावली.... माणाविधान. ७ पर्मकीरिधान. ८ कल्याणमेदिरस्तोत्र.rim... १२१ ९ गार्षदना.... (RAM" १. मोरपैडी. ११कर्मछत्तीसी... १२ प्यानरचीसी १४३ १२ अध्यात्मपत्तीसी. ... १४ शानपपीसी, १५० २५ शिपाचीसी... १६ भयसिंधुचतुर्दशी १७ अध्यात्मपाग(घमार) १८ सोयतिथि. १. मेरहकारिया २० भायातमगीत. (मेरे मनका याग मो मिले Arya २१ पंचपदविधान. ... ... ... ..." ... ... ... .... 14. ... .. ... .."

बनारसीविलासकी ... ... ... ... ૧૭૨ ... १७८ ... ... .... १८१ १८२ १८४ .... .... ... १८७ १८८ .... २२ मुमतिदेव्यष्टोत्तरशतनाम, २३ शारदाष्टक.... ... .... २४ नवदुर्गाविधान. २५ नामनिर्णयविधान. २६ नवरत्नकविन. २७ अप्रकारजिनपूजन. २८ दशदानविधान n-If.. २९ दाबोल. ३. पहेली. ३१ प्रभोचरदोहा. ३२ प्रभोत्तरमाला. (ivya ३३ अवस्थाटक..... ३४ पट्दर्शनाष्टक. ३५ चातुर्वण्य. ३६ अजितनाथजीके उद. ३७ शान्तिनाथजिनस्तुति. नयर ३८ नवसेनाविधान. ३९ नाटकसमयसारसिद्धान्तके पाठान्तरकलशोंका भाषानुवाद. ४० मिय्यामतयाणी. ४१ प्रसाविकफुटकरकविता. ४२ गोरखनाथके वचन. ४३ वैद्यआदिके भेद. (फुटकर कविता) ४४ परमार्थवचनिका. .... .... .... .... १९२ ... .... .... .... .... .... .... .... .... .... .... .... .... .... .... .... ....

विपयानुक्रमणिका ... ... ... .. ... ... ... ... .. ४५ उपादाननिमित्तकी चिटी. २२४ ४६ निनिधउपादानफे दोहे. ४७ राग भैरय.... ४८ राग गमफसी.(२ पद) तथा दोहा, ४९ राग शिलावल( ३ पद) २२४-२३५ ५. राग आशापरी (२ पद)... ५१ परवाईद, ५२ गग धनाभी. (२१८) २४. ५१ राग सारंग.(४ पद) ... २४१-२४२-२४३ ५४ मापदादा. (६)... ५५ राग गौरी (२६) २४४-२४५ ५६ राग की. (२ पद) ५७ परमार्थ दिलना. ५८ मार दया रटएम. .... ... ... ... ... २४६ ... .... ... ... २५० ... ... .. ... १२ अनारसीविलास महकती. ... A.. "

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.. 40 नमः श्रीवीतरागाय. जैनप्रन्धरनाकरस्थान ७ या वनारसीविलास. विषय सूचनिका. हरित मनहर. प्रथम सहमनाम सिन्दूरकरथाम, यावनीसवया वेद- निर्णय पचासिका । प्रेसटशलाका मार्गनी फरमकी प्रति- कल्याणमन्दिर साधुवन्दन मुवासिफा। पैड़ी करमईसीसी पाई ध्यानकी पत्तीसी, अध्यातम पचीसी पचीसी" ज्ञान शामिया शिवकी पचीसी भवसिन्धुकी तुरदशी, अमात- फाग निधिषोईसविलासिका ॥ १ ॥ तेरदकोठिया मेरे मनफा प्यारागीत, पंचपद विधान गुमति देवीशत है। शारदा बेड़ाई नबढेगा निर्णय नाम, गौरतन कवित शु पूजा दानंदत है । दापोले पहली मुल प्रश्नोतरमाला, अवैश्या मतान्तर दोहरा वरणत है। अजि- के छन्द शान्तिनायछन्द सेनॉनव, नाटककवित्त चार, वानी मिथ्या मत है ॥२॥ फुटकरसवैया बनाये वच गोरसके, वेद आदिभेद पररिथ वचनिका । उपादान निमित्तकी चिट्ठी तिनहीके दोहे, भैरों रामली यो विलोवल सचनिका ॥ आशंबरी बरेवा मु धनौश्री सौरंग गौरी, कॉफी ओ हिंडोलेंना मलारकी मनिका । पर उद्योत करो भव्यनके हिरमें, विरघौ ! बनारसीविलासकी रचनिका ॥ ३ ॥ दोहा. ये वरणे संक्षेपसों, नाम मेद विरतन्त । इनमें गर्मित भेद बहु, तिनकी कथा अनन्त ॥ १ ॥ महिमा जिनके वचनकी, कहै कहां लग कोय । ज्यों ज्यों मति विनारिये, त्यों त्यों अधिकी होय ॥२॥ इति विषयमूचनिका. ثالثلود•

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अथ जिनसहमनाम-
शा.
परमप परनामकर, गुरुको कामपाम ।
भिरत पो रमहाअठोलर नाम ॥ १ ॥
पेपर परमदिमा पहों, पदों मिट गुनगान ।
भाषामाइन रत. रितिरिवाद परमान ॥२॥
शारभयारी सद, अरविरक्ति जो होय।
गाम थनके करितमें, दोप न लागे फोर ॥ ३ ॥
चौपाई मात्रा
प्रथमोफारसपान । फरणामागर पानिपान ।।
प्रिभुपनाथ इंश गुणन्द । गिरातीन गुणभून अनन्द ॥१॥
गुणी गुम गुणकादप पनी । जगदिवाकर कौतूहली ।।
कमपनी फरगामय एमी । दशावतारी दीप दमी॥२॥
अगर अमूरति अरस अगोदा अचल अपापित अमर अपेद।
परम परमगुरु परमानन्द । अन्तरजामी आनंदकन्द ॥ ३ ॥
मागनाथ पायन अमलान । सील सदन निर्मल परमान ।
मापनप सप अमेय । दयारेनु अविचल आदेय ॥ ४ ॥
शीलसिन्धु निरपम निर्वाण । अविनाशी अम्पर्श अमान ।।
अमल अनादि अदीन अहोभाजनाना अगम अलोमा॥५॥

४ जैनग्रन्यरत्नाकरे अनवस्थित अध्यातमरूप । आगमरूपी अघट अनूप ।। अपट अरूपी अभय अमार। अनुभवमंडन अनघ अपार ॥६॥ विमलपूतशासन दातार । दशातीत उद्धरन उदार ॥ नभक्त पुंडरीकवत हंस । करुणामन्दिर एनविध्वंस ॥ ७ ॥ निराकार निहचे निरमान । नानारसी लोकपरमान ।। मुखधर्मी मुखज्ञ मुखपाल । सुन्दर गुणमन्दिर गुणमाल ॥८॥ दोहा. अबरवत आकाशवत, क्रियारूप करतार । केवलरूपी कौतुकी, कुशली करुणागार ॥ १२ ॥ इति ओंकार नाम प्रयमशतक ॥१॥ चौपाई. ज्ञानगम्य अध्यातमगम्य । रमाविराम रमापति रम्य ।। अप्रमाण अपहरण पुराण । अनमित लोकालोक प्रमाणा॥१३॥ कृपासिन्धु कूटस्थ अछाय । अनभव अनाम्द असहाय ॥ सुगम अनन्तराम गुणमाम । करुणापालक करुणाधाम ॥१४॥ लोकविकानी लक्षणयन्त.। परमदेव परबल अनन्त ।। दुगराध्य दुर्गस्थ दयाल । दुरारोह दुर्गम दिकपाल ॥१५॥ मत्यारय मुम्बदायक सूर । शीलशिरोमणि करुणापूर ॥ भानगर्भ चिद्रूप निधान । नित्यानन्द निगम निरजान ॥ १६ ॥ १. "विपुलगा भी पार बनारमीविलास. --- भार करता मजर मनीत । अवपु अनाकुल विश्रांतीत ॥ मंगलकारी मंगलमूल । विधामागर विगतमूल ॥ १७ ॥ नित्यानन्द विमन निरभान । धर्मधुरंधर धर्मविधान । पानी भामयान धनवान । शीनिकेतन शोधनिपान ॥१८॥ लोकनाथ सीलाधर सिद्ध । ती कृतारय महासमुन्द ।। सपमागर सपा अछेद । भरभयभजन अमृत अभेद ॥१९॥ गुणादास गुणमर गुणदाम । सपरप्रकाशक रमना गम ।। नरल पुरातन अजित विशाल । गुणनिवास गुणमह गुणपाल ॥२० रोहा. लघुरूपी लालबहरन, लोमविदारन पीर । पारावाही पीतमल, धेय धराधर धीर ॥ २१ ॥ हानगम्यनाम दितीयानक २० परिटर चिन्तामणि चिन्मय परम नेम । परिणामी चेतन परमडेम ।। विन्भूरति घेता चिद्विलास।हामणि चिन्मय चन्द्रभास ॥२२॥ चारित्रधाम रिन् रमत्कार । परनातम रूपी चिदाकार ॥ निपचिक निर्मम निराधार । निरजोग निरंजन निराकार ॥२२॥ निरभोग निरालय निराहार । नगनरकनिवारी निर्विकार । आतमा अनक्षर अमरजाद। अक्षर अषअक्षय अनादा२२॥ +- 1.रिपति भनीन ऐमा भी पाउk ख - जैनमन्थरत्नाकरे आगत अनुकम्पामय अडोल । अशरीरी अनुम्ती अलोल || विश्वभर विस्मय विश्वटेक । प्रजभूषण वजनायक विवेका२६॥ छलमंजन छायक छीनमोह । मेघापति अकलेवर अकोह ।। अद्रोह अविग्रह अग अरंक अद्रुतनिधि करुणापति अपंक २६ मुखरागि दयानिधि शीलपुंन । करुणासमुद्र करुणाप्रपुंज || वोपम व्यवसायी शिवसा निश्चल विमुक्त ध्रुव मुथिर मुख २७ जिननायक जिनकुंजर जिनेश । गुणपुंज गुणाकर मंगलेग ॥ क्षेमकर अपद अनन्तपानि । मुखपुंजशील कुलशील सानि ॥२८॥ करुणारसभोगी भवकुठार । कृषिवत कृशानु दारन तुसार । कैतवरिपु अकल कलानिधान । धिपणाधिप ध्याता ध्यानवान २९ दोदा. छपाकरोपम छलरहित, छेत्रपाल छेत्रत्र । अंतरिक्षवत गगनवत, हुत कर्माकृत यज्ञ ॥ ३०॥ इति चिन्तामगि नाम तृतीयशतक॥३॥ परिछन्द लोकांत लोकप्रमु लुप्तमुद्र । संवर मुखधारी मुखसमुद्र ॥ शिवसी गूदरूपी गरिष्ट । पलरूप योधदायक परिष्ट ॥३१॥ विद्यापति धीधव विगतयाम । धीवंत विनायक चीतकाम ।। धीरस्य शिलीद्रुम शीदभूल । लीलाविलाम जिन शारदूल ॥३२ परमारय परमातम पुनीत । त्रिपुरेश तेजनिधि अपातीत ।। तपरागि तेजकुल तपनिधान । उपयोगी उप उदोतवाना३ि३॥ चन्द्रोपम.

बनारसीपिलास. nanthan उत्पातदरण बदामधाम । मजनाथ विमार विगतनाम || परमपी पहुनामी अोप । विपहरण विडारी विगतदोषा३५}} छितिनाथ एमाघर मापाल । दुर्गम्य दयार्णव दयामाल || चतुरेव निदातम चिदानंद मुखरूप शीलनिधि नीलकन्द॥३५॥ 'रसव्यापक राजा नोनियंत । ऋषिकप महर्पि मदमहंत ।। परमेश्वर परमप्रापि प्रधान । परत्यागी प्रमर प्रतापवान ॥३६॥ গরম মনুঃ নাৰি বহমান যুগ । सर्वज्ञ सुदर्शन मदातृत । शंकर सुवासवासी अलित ॥ ३७॥ शिवसम्पुरयानी मुसनिधान । शिवपंथ शुभकर शिसापान !! असमान अंशधारी अमेय । निर्द्वन्दी निर्जड निरपशेष ॥३८॥ दोहा विमपधारी पोपमय, विधनाथ विश्वेश। अंधविमोचन पवन, बुधिनायक विषेश ॥ ३९ ॥ पनि सधन नाम अर्थ शतsxn सन्दरोड महामंत्र मंगनिदान मलहान महाजप । मोक्षवरूपी मुनिनाथ मतिमथन महातप । निम्तर निःम नियमनायक नंदीमुर । मदादानि महानि महाविस्तार मदापुर । ४०॥ ‘বিগ থাকায় ক্ষমতা কম। गुणनिकेत कमलासमूह पानीश ध्यानरत ॥

जैनग्रन्थग्नाकरे मूतिवान मूतेग मारछम मर्म उछेदक । सिंहासननायक निराश निरभयपदवेदक ॥ ११ ॥ शिवकारण शिवकरन भविक वंधव मवनागन । नीरिंग निःसमर सिद्धिशासन शिवामन ॥ महाकाज महाराज मारजित मारविहंडन । गुणमय द्रव्यखरूप दशाधर दारिदखंडन ॥ ४२ ॥ जोगी जोग अतीत जगत उद्धरन उजागर । जगतबंधु जिनराज शीलसंचय मुखसागर ॥ महाशूर मुखसदन तरनतारन तमनाशन । अगनितनाम अनंतधाम निरमद निरवासन ।। ४३ ॥ वारिजवत जलजवत पद्म उपमा पंकजवत । महाराम महधाम महायशवंत महासत ।। निजकृपालु करुणाल गोधनायक विद्यानिधि । प्रशमरूप प्रशमीश परमबोगीश परमविधि ॥१४॥ मुरसमोगी रसील समुदायकी चाल- शुमकारनशील इह सील राशि संकट निवारन । त्रिगुणातम तपतिहर परमहंसपर पंचवारन ॥ परम पदारय परमपथ, दुसमंजन दुरलक्ष । तोपी मुखपोपी मुगति, दमी दिगम्बर दक्ष ॥ १५ ॥ इति महामंत्र नाम पंचन शतक u

पनारसीक्लिास.
९
Hanuman
'AI-IN-ALILAM
परमभयो। परोक्षरूप, परमादनिकन्दन ।
परमध्यानपर परमसाधु, भगपत्ति जगवंदन ।।
निन जिनपति जिनसिंह, जगतमणि नुपकुलनायफ।
कल्पातीत कुटालरूप, इग्मय गदायक ॥ ४६॥
वारणधर्मरुप, गुणराशि रिपुंजय ।
प्रणामदन समाधिरूप, शिवकर आधुंजय ।।
रुपी प्रसन, आतमप्रमोदमय ।
निजाधीन निन्द, प्रनवेदफ व्यतीतमय ॥ १७ ॥
अपुनर्भव जिनदव सर्वतोभद्र फलिलहर ।
धर्माकर ध्यानस धारणाधिपति धीरधर ।।
त्रिपुरगर्म त्रिगुणी त्रिकाल कुशलालपपादप ।
मुखमन्दिर मुखमय अनन्तलोचन अविषादर १४८
लोकअप्रवासी त्रिकालसावी करपाकर ।
गुणामय गुणधाम गिरापति जगतप्रभाकर ॥
धीरज धारी पौतफर्म धर्मग यामधर ।
ग्नाकर गुणरमराशि रजहर रामेश्वर ॥ ४९॥
निरलिही शिवलिाधार यहुनुह अनानन ।
गुणकदम गुणरसिक रूपगुण अजिक पानन ॥
निरअंबुस निरधाररूप निजपर परकाशक ।
विगतामय निररंध संपदर बंधविनायक ॥ ५० ॥

जैनप्रन्यरत्नाकरे केवलबम धरमधनधारी । हतविमाव हतदोष हतारी ।। भविकदिवाकर मुनिमृगराना । दयासिंधु भवसिंधु जहाजा ॥२८॥ शंमु सर्वदर्शी शिवपंथी । निरावाध निःसँग निग्रन्थी ।। यती यंत्रदाहत (१) हितकारी ! महामोहबारन यलपारी॥६९ १९॥ चितसन्तानी चेतनयंशी । परमाचारी मरमविध्वंसी ॥ मदाचरण सशरण शियगामी । बहुदेशी अनन्त परिणामी1७०॥ वितयमिदारनहलपानी । प्रमवारिजवनदहनहिमानी ॥ चार चिदरित द्वन्दातीती । दुर्गरूप दुम दुर्जीती ।। ७१ ॥ गुमकारण शुभकर शुभमंत्री । जगतारन ज्योतीश्वर जंत्री ७२ दोहा. जिनपुङ्गव जिनकेहरी, ज्योतिरूप जगदीश । मुक्ति मुकुन्द महेश हर, महदानंद मुनीम ॥ ३ ॥ इति श्रीपरमप्रदोष नाय भटम शEnel मंगमहा. दुरित दलन मुसान्द । हत भीन अनीत अमन्द ।। नीलाम्पहत फोर । मनमंग अनंग अरोप ॥ ७९ ॥ हमगाम हनमोद । गुणमंचय गुणमन्दोद ॥ गुमममात्र मुन गेह हतार विगत मनेट ७५॥ घामटलन हतगोरा अगणित पर अमलालोक ॥ धृतमुधमं नहोम । मतमूग अपूग्य मोम ॥ ७६ ॥ इमरी पुन मनमा मन्द माल.. .

बनारसीविलास. ३ हिमवत इतसंताप । प्रजव्यापी विगतालाप । पुण्यस्यरूपी पूत । सुरसमिधु स्पर्य समूत ॥ ७७ ॥ समयसारथुनिथार । अविकला अत्याचार | । शालिकरन धृतशांति । फनरूप मनोहरकान्ति ॥ ७८॥ सिंहासनपर आरः । असमंजसहरन अमूह ।। लोकजयी हतलोम । कृतकर्मविजय धृनशोभ ।। ७९, ११ मृत्युंजय अनजोग ! अनुकम्प अफ अमोग । मुविधिरूप मुमतीमा । श्रीमान् मनीपाधीश ८०११ विदित विगत अवगाह । फूलकारज रूपमयाह ।। पमान गुणभान । करणापरलीलविधान ।। ८१॥ অনিঘন সাথ। রঠিক দিৱসায় {} साधिरूप माधक धनी (?) महिमा गुणमेरु महामनी (2) ८२ उनपति भुवयान | त्रिपदी त्रिपुंन विविधान !! जगजीत जगदाधार । करणागृह विपतिविदार ।। ८३॥ जगमाक्षी यरवीर । गुणगेह महागंभीर ।। अभिनंदन अभिगम । परमेपी परमोदाम ॥ ८४ ॥ दोहर सगुण पिमृती वमयी, सेमीस संबुद्ध । सकल विश्वकर्मा अभव, विधविनोमन शुद्ध ॥ ८५॥ पनि दुरितरलतमाम मरन द्वारा॥ भy १४ जैनमन्थरताकरे मंगलमला. शिवनायक शिव एव । प्रश्लेश प्रजापति देव ।। मुदित महोदय मूल । अनुकम्पा सिंधु अक्ल ॥ ८६ ।। नीरोपम गते पंक।नीरीहत निर्गतक॥ नित्य निरामय भौन । नीरन्ध निराकुल गौन ॥ ८७ ॥ परम धर्म रथ सारथी ()धृत फेरर रूप कृतारथी (१॥ परम नित्य भंडार । संघरमय संयमधार ॥८८॥ गुभी सरयगत संन । शुद्धोधन गुन सिद्धत ॥ नेयापरु नय जान । अपिगत अनंत अभिधान ॥ ८॥ कर्मनिरागण । अयभंगन गुमद अमूल ।। अरत मा अमेष । भरगमनिधि अपगमभे ॥ ९॥ यगण रजगारंट। प्रमहरमण प्रमंद ।। वरद या भातार । गदग महागनार ॥११॥ गनमगार गनगाग | नरनाय निराय निराग।। महामंय महापागि । महदयं महागनि गानि ॥२॥ महानाय महगान । मध्यापन महानिशाना गुणागार गुणाग । गुणमेस मनीर ||५ ॥ काम निग्ग । गहवागन गहा। कलम । महदी महास...॥ -TATभिगमन बनारसीविलास. - महाविभु महधयवंत । परणीधर धरणीकंत ।। मृपावंत कलिग्राम ! कारणमय फरत विराम ॥१५॥ मायावेलि गयन्द । सम्मोहतिमाहरचन्द ॥ कुमति निकन्दन फाज । दुखगजभंजन मृगराज ||२६|| परमतत्त्वसत संपदा (8)। गुणत्रिकालदर्शीसदा (1)॥ फोपदयानलनीर । मदनीरदहरणसमीर ॥ ९७ ।। भवकांतारपटार । संशयमृणालअसिधार ।। लोमशिखरनिर्यात । विपदानिशिहरणप्रभात ॥९८॥ दोहा संवररूपी शिवरमण, श्रीपति शीलनिकाय ॥ महादेव मनमथमयन, मुखमय मुखसमुदाय ॥ ९९ ।। इति धीशिवनायर नाम राम रातक॥1॥ दोहा. इति श्रीसहसाटोतरी, नाम मालिका मूल । अधिक कमर पुनरुक्ति की, फविप्रमादफी भूल ॥१००॥ परमपिंड ब्रझंडमें, रोकशिखर निवसंत । निरखि नृत्य नानारसी, मानारसी नमंत ॥ १०१ ॥ महिमा नमविलामकी, मोपर कही न जाय । यथाशक्ति फछु वरणई, नामकथन गुणगाय ॥ १०२ ॥ संक्त सोलहसो निवे, थावण मुदि आदित्य । फरनक्षम तिधि पंचमी; मगठ्यो नाम कवित्त ॥१०३ ।। इति भाषाजिनसहस्रनाम । totstatutattratebit.lthtistinute لعمل الشمعلمه HINDRA श्रीसोमप्रभाचार्यविरचिता सूक्तमुक्तावली स्वर्गीय कविवर पनारसीदासजीकृत भापासूक्तमुक्तावली. (सिंदूरकर.) धर्माधिकार। भालवितीति । सिन्दूरप्रफरस्तपः करिशिरस्मोहे कगयाटपी- दायाचिनिचयः प्रयोधदिषमप्रारम्भसूर्योदयः। मुतिरपीकुचपुम्मागुमरसः श्रेयस्तरोः पालय- मोहासः कमयो रातिमरः पार्थप्रभोः पातु यः ॥१॥ पदपद। शोमित तपगनराज, गीस मिन्दर पुग्छवि । पोधदिवम आरंभ, करण कारण उदोत रवि ॥ मंगल तरु पाटव, कपाय फातार हतारान । यहुगुणरसनिधान, मुनियमनाकमलाशन ॥ इहि विधि अनेक उपमा सहित, अरग चरण संताप दर । जिनराय पार्श्वनखज्योति भर, नमत बनारसि जोर कर ॥१॥ OuVIR

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WNLanews श्रीसोमप्रभाचार्यविरचिता सूक्तमुक्तावली तथा स्वर्गीय कविवर पनारसीदासजीकृत भापासूक्तमुक्तावली. (सिंदूरमफर.) धर्माधिकार। पार्दूलविजीरित। सिन्दूराफरलपः करिशिरामो? करायाटपी- दापार्चिर्निचयः प्रयोधदिषसप्रारम्भसूर्योदयः । मुक्तिनीयकुम्भहमरसः श्रेयस्लरो पलप- मोतासः कमयो रातिभरः पार्यप्रभोः पातु यः ॥१॥ titutettruuutst.th शोभित तपगजराज, सीस सिन्दूर पूरछवि । पोधदिवस आरंभ, करण कारण उदोत रवि ।। मंगल तरु पल्लव, कपाय कांतार हुताशन । पहुगुणरसनिधान, मुक्तिकमलाकमलाशन ॥ इहिविधि अनेक उपमा सहित, अरग परण संताप हर । जिनराय पार्धनखज्योति भर, नमत मनारसि ओर फर ॥१॥ HIA जैनग्रन्थरताकरे शार्दूलविधीडित। सन्तः सन्तु मम प्रसनमनसो वाचां विचारोद्यताः सूतेऽम्मः कमलानि तत्परिमलं वाता विनन्यन्ति किं वाभ्यर्थनयानया यदि गुणोऽस्त्यासां सतस्ते स्वयं कारः प्रयने न चेदय यशःप्रार्थना तेन क्रिम् दोघकान्तसरीमन्द। जैसे कमल सरोवर वासे । परिमल तामु पवन परकारी। त्यों कवि भापहिं अक्षर जोर। संत मुजस प्रगटहि चहुँओ जो गुणवन्त रसाल कवि, ती जग महिमा होय । जो कवि अक्षर गुणरहित, ती आदरै न कोय ॥२ दयना। निवर्गसंसाधनमन्तरेण पशोरियायुर्यिफलं नरम्य । तथापि धर्म प्रवरं यदन्ति न त यिना यद्यतोऽर्थका दोधकान्तमरीमन्द। मुपुरुप तीन पदारथ सापति । धर्म विशेष जान आराधहिं धरम प्रधान कहैं सर कोय । अर्थ काम धर्महिने होय ।। धर्म करत मंमारमुग्य, धर्म करत नियांन । धर्मपंथमाधनविना, नर नियंच ममान ॥ ३ ॥ यः प्राय दुष्प्रारमिदं नएयं धर्म न पदोन करोति मूल शाधन सलाधमाधी चिन्तामणि पातयति प्रमादा- पनारसीपिलासः कवित्त मानिक. (21मात्रा) असे पुरुष कोह धन कारण, होडत दीपदीप यह यान । आवत दाय रतनचिन्तामणि, डारत जलधि जान पापान । तसे ममत अमत भवसागर, पावत नर शरीर परधान । धर्मयश नहिं फरत 'पनारसि' खोयत वादि जनम अज्ञान । मन्दाशाम्ता। स्यणस्थाले क्षिपति सरसः पादशीचं विधत्ते पीयूपेण प्रपरफरि पादयस्वैधभारम् । चिन्तार विफिरनि करावायसोडापनार्थ यो दुपापं गमयति मुधा मयंजन्म प्रमत्तः ॥ ५ ॥ मतगण (सर्वया) ज्यों मतिहीन विवेक विना नर, साजि मताज ईधन दोवै। कंचन भाजन धूल भरे शठ, मद सुधारससरों पगधोवे ।। माहित काग उड़ावन कारण, डार महामणि मूरस रोवे । त्यों यह दुर्लभ देह पनारसि', पाय अजान अकारथ सोवै५ शालविक्रीडित। ते परत पपन्ति अपने प्रोन्मूल्य कल्पद्रुमं चिन्तारामपास्य कायशफलं स्वीकुर्वते ते जताः । विकीय दिर गिरीन्द्रसरशे कोणन्ति ते रासमें ये लाय परिहत्य धर्ममधमा धावन्ति भोगाया।

२० जैनप्रन्यरत्नाकरे कवित्त मात्रिक. (३१ मात्रा) ज्यों जरमूर उसारि कल्पतरु, वोवत मूढ़ कनकको खेत । ज्यों गजराज वेच गिरिवर सम, कूर कुबुद्धि मोल संर लेत ।। जैसे छोड़ि रतन चिन्तामणि, मूरख काचखंडमन देत । तैसे धर्म विसार 'वनारसि' धावत अधम विषयमुखहेत ॥६॥ शिखरिणी। अपारे संसारे कथमपि समासाद्य नृभयं न धर्म यः फुर्याद्विपयमुसतृष्णातरलितः । गुडन्पारावारे प्रवरमपहाय प्रयहणं स मुख्यो मूर्खाणामुपलमुपलम्धुं प्रयतते ॥ ७ ॥ सोरटा। ज्यों जल बूढ़त कोय, वाहन तज पाहन गहै । त्यो नर मूरख होय, धर्म छांदि सेवत विषय ॥ ७ ॥ द्वार गाया। शार्दूलविकीहिता भक्ति तायको गुरी जिनमत संधै च हिंसात- लेयाग्रह्मपरिग्रहयुपरमं क्रोधाधरीणां अयम् । मोजन्यं गुणिसमिन्द्रियदम दानं तपोभायनां गग्यं च पुषण नियनिषदे यद्यस्नि गन्तुं मनः ॥८॥ पग. १ गर्दभ (गया).

मनारसीबिलाम . परपर। जिन पूजा गुम्नमहु. जैनमनन बनाना । सप भक्ति आदर, जीव किसन धानः ।। इल अदस कुतील, त्याग परिग्रह परमाना। शोध मान दल लोभ जीत, मजनता ठाना । मुगिसग फरर इन्द्रिय दमा दागन नए भावजुन । गहि मन विराग इहि विधि नानो जगम नीरनमुकना। ।। पूनाधिकार । पापं लुम्पति दुर्गति दलयनि व्यापादयन्यापद पुण्यं संचित धियं पिताजुने पुग्णाति नीरोगताम । सौभाग्यं विदधाति पल्ययन प्रीति प्रमते यश. स्वर्ग पच्छति निर्गति च रचयत्याना निर्मिता ॥७॥ मात्रा मषा बन्द लोपे दुरित हो दुग सकट, आप रोग हित निनदेह । पुण्य भंडार भी जमा प्रगटे, गुमति पथमा कर मनेट । र सुद्दाग देय शोभा जग, परभव पंहु नायन सुरंगेह । कुगति मंध दलमलहि धनारगि वीलगग पूजा फल येह ॥२॥ स्पर्गरतम्य गृदाहणं सहचरी साम्राज्यलक्ष्मीः शुभा सौभाग्यादिगुणापलिपिलसति स्पैरं पपुदमनि । संसारः मुतरः शियं करतलमोरे गुटरवनसा ५. अशाभरमासनं जिनपतेः पूजां वियते जनः १०

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बनारसीविलाम
२३
जो जिन गुजम कर जग नाही. मरिमा इन्द्र को मुगलोय ।
जो जिन ध्यान करत यनारसियाव मुनि नाक गुण जोय।।२।।
गुरु अधिकार।
पशम्पदिलम् ।
भयमुने पधिप: प्रवर्नत प्रचयित्यन्यजन र निम्तः ।
स सेवितव्यः स्परिनपिणा गुर म्यय नरम्नायितु क्षमः
परम् ॥ १३ ॥
भसि उम्म।
पापपथ पग्हिर्गह धर्गह शुभपय पग ।
पर उपगार निमित्त मानहि मोक्षमग ।।
सदा अयटिन चित जु नाग्न नग्न जग।
ऐमे गुरको मेयत, भागार फरम टग ॥ १३ ॥
मालिनी।
पिदलपति कुपोध योधयत्यागमा
गुगतिगतिमार्गी पुण्यपाप व्यनक्तिः ।
भयगमपति स्याहत्यभेद गुरयों
भयजलनिधिपोतस्तं घिना नास्ति कधित् १४
परिणीनिक पर।
मिथ्यात दलन सिद्धान साधफ, मुरतिमारग जानिये ।
करनी अफरनी मुगति दुर्गनि, पुण्य पाप यसानिये ॥
संसारमागरतरनतारन गुरु जहाज विमोसिये।
जगमाहि गुरुसम कह पनारसि; और कोई न देखिये ॥१४॥

जैनग्रन्थरत्नाकरे
शिखरिणी।
पिता माता भ्राता प्रियसहचरी सूनुनिवहः
मुहृत्स्वामी माद्यत्करिमटरथाश्वः परिकरः।
निमजन्तं जन्तुं नरककुहरे रक्षितुमलं
गुरोधर्माधर्मप्रकटनपरात्कोऽपि न परः ॥१५॥
मत्तगयन्द।
मात पिता सुत बन्धु सखीजन; मीत हितू मुख कामन पीके ।
सेवक साज मतंगज वाज; महादल राज रथी रथनीके ।।
दुर्गति जाय दुखी विललाय, पर सिर आय अकैलहि जीके ।
पंथ कुपंथ गुरु ममझावत; और सगे सब स्वारथहीके ॥१५॥
शार्दूलविक्रीडित ।
कि ध्यानेन भवत्वशेषविषयत्यागैस्तपोभिः एतं
पूर्ण भावनयालमिन्द्रियजयः पर्याप्तमातागमैः।
कित्येकं भवनाशनं कुरु गुरमीत्या गुरोः शासनं
सवें येन विना विनाययलयत्स्यार्थाय नालं गुणाः।
वस्तु छन।
व्यान धारन ध्यान धारन, विष मुम्प त्याग ।
करनारम आदरन, मॅमि सेन इन्दी निरोधन ॥
ग्रन मंजम दान नप; भगति भाव गिदंत साधन ।।
ये सब काम न आवहीं, ज्या विन नायक सेन ॥
शिवमुम्म हेतु पनारमी; कर प्रतीत गुरुवेन ॥ १६॥

एनारसीविलासः A~- जिनमताधिकार। शिखरिणी। नदेष नादेयं न शुभगुरमेनं न कुगुएं न धर्म नार्म न गुपपरिणयं न विगुणम् । न एस्य नारत्यं न द्वितमदितं नापि निपुणं पिलोपन्ते खोका जिनपचनय पिरद्विताः ॥१७॥ बुंरलिया पद। देव अदेव नहीं लसै मुगुरु मुगुरनहिं मुझ । धर्म अधर्म गने नहीं; कर्म अफर्म न धूश । कर्म अफर्म न यूश; गुण र औगुण नहिं जानहिं । हित अनहित नहिं सधै; निपुणमूरख नहिं मानहिं ॥ फहत धनारसि शानदृष्टि नहिं अंध अयेयहि । अनमयनगहीन; लसै नहिं देव अदेवहि ॥ १७ ॥ शार्दूलविजीरित। मानुष्यं विफलं पदन्ति हृदयं ध्यर्थ था थोत्रयो- निर्माणं गुणदोषभेदकलना नेपामसंभायिनीम् । दुर्यारं नरफान्धकूपपतन मुक्ति थुधा दुर्लभां सायंन समयो दयारसमयो पेषां न कर्णातिथिः॥ ११ मात्रा सपा एमा ताको मनुज जनम सब निष्फल मन निष्फल निष्फल जुगकान। गुण अर दोप विचार भेद विधि; ताहि महा दुर्लभ है शान ।।

२६
जैनमन्यरलाकरे
ताको सुगम नरक दुस संकट; अगमपय पदवी निर्वान ।
जिनमतवचन दयारसगर्भित; जे न मुनत सिद्धतरसान १८
पीयूपं विग्यजलं ज्यलनपत्तेजप्तमःस्नोमय.
मित्रं शात्रययत्यज भुजगपपितामणि खोटयत्
ज्योग्मा श्रीमजपर्मयरस मनुने कारुण्यपण्यापर्ण
जैनेन्दं मतमन्यदर्शनरामं यो दुर्मतिमंग्यते ॥१॥
अंगृतको विशद नीरको पारक मानहि।
तेग निमरसम गिनहि, मियको शगु यमानहि ।।
पपमाल कहि नाग, रतन पन्था गम तुमहिं ।
पणि आता माप, इहि भान न मुसहि ॥
करणानिधान अमलानगुन; पपद पनामि जेनगन ।
परमन ममान जो मनधान, गो अगान गाम ॥१२॥
धर्म जागा निगुगुणा
निलं मामानिनि हुन मावि मितानिए ।
पेग तिनोति पुनको गुणानि गो .
नी मनमर्गनि प्रगति मायातमी ॥२॥
शुभ पम नमागे पाविना १५५ गाना।
निमम नि मा म ||
माम मरे, minit inागमा ।
पं. मी मगम: 30 ॥२॥

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२८ जैनग्रन्थरत्नाकरे ताको आय मिले सुखसंपति, कीरति रहैं तिहूं जग छाय । जिनसों प्रीत बढे ताके घट, दिन दिन धर्मबुद्धि अधिकाय ।। छिनछिन ताहि लखै शिवसुन्दर, सुरगसंपदा मिलै मुभाय । वानारसि गुनरास सघकी, जो नर भगति करै मनलाया॥२३॥ यद्भक्तेः फलमहंदादिपदवीमुख्यं कृपेः सस्यय- चक्रित्वत्रिदशेन्द्रतादि तृणवत्प्रासङ्गिकं गीयते । शक्तिं यन्महिमस्तुतौ न दधते वाचोऽपि याचस्पतेः संघः सोऽयहरः पुनातु चरणन्यासः सतां मन्दिरम् ।। जाके भगत मुकतिपदपावत, इन्द्रादिक पद गिनत न कोय ।। ज्यों कृषि करत धानफल उपजत, सहज पयार धाम भुस होय।।। जाके गुन जस जंपनकारन, मुरगुरु थकित होत मदखोय । सो श्रीसंघ पुनीत वनारसि, दुरित हग्न बिचरत भविलोय २४ अहिंसा अधिकार । क्रीडाभूः सुतस्य दुष्कृतरजःसंहारवात्या भयो- दन्वनौयंसनाग्निमेघपटली संकेतदूती श्रियाम् । निःश्रेणित्रिदिवौकसः प्रियसखी मुक्तः कुगत्यर्गला सत्त्वेपु क्रियतां कृपैव भवतु क्लेशैरशेपैः परैः ॥ २५ ॥ घनाक्षरी। मुक्रतकी खान इन्द्र पुरीकी नसैनी जान पापरजखंडनको, पौनरासि पेखिये । भवदुसपावकयुशायरेको मेघ माला, कमला मिलायवेको दूती ज्यों विशेखिये ॥

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जैनग्रन्थग्नाकरे सांपके बदन जैसे अमृत न उपजत; कालकूट खाये जैसे जीवन न जानिये ॥ कलह करत नहिं पाइये मुजम जैमैं; बाढ़तरसांस रोग नाग न वखानिये । प्राणी वघमांहिं तैसें; धर्मकी निशानी नाहि, याहीते बनारसी विवेक मन आनिये ॥ २७ ॥ शार्दूलविक्रीडित । आयुर्घतरं वपुर्वरतरं गोवं गरीयस्तरं वित्तं भूरितरं वलं बहुतरं स्वामिन्चमुचैस्तरम् । आरोग्यं विगतान्तरं त्रिजगति साध्यत्वमल्पेतरं संसाराम्बुनिधि करोति सुतरं चेतः कृपादान्तरम्। ३. मात्रा सवैया छन्द। दीरघ आयु नाम कुल उत्तम गुण संपति आनंद निवास । उन्नति विभव मुगम मवसागर; तीन मवन महिमा परकास ॥ मुजबलवंत अनंतरूप छवि; रोगरहित नित भोगविलास ।। जिनके चिचदया तिन्होंके, सब मुख हॉहि यनारसिदास ॥ सत्यवचन अधिकार। विश्वासायतनं विपत्तिदलनं देवैः कृताराधनं मुक्तेः पथ्यदनं जलाग्निशमनं व्यामोरगस्तम्भनम् । श्रेयःसंघननं समृद्धिजननं सौजन्यसंजीयनं कीतः कलियनं प्रभावभवनं सत्यं यचः पायनम् २०

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जैनप्रन्यरवाकर रोटक छन्दा कुमति कुरीत निवास, प्रीत परतीन निवारन । रिद्धसिद्धमुखहरन विपत दारिद दुख कारन । परवंचन उतपति; सहज अपराव कुलच्छन । सो यह मिथ्यावचन; नाहिं आदरत विचच्छन ॥३१॥ शार्दूलविक्रीडित। तस्याग्निर्जलमर्णवः स्थलममित्र मुगः किकराः कान्तारं नगरं गिरिगूहमहिमाल्यं मृगारिमृगः। पातालं विलमत्रमुत्पलदलं व्यालः गालो विष पीयूषं विषमं समं च वचनं सत्याञ्चितं यक्ति यः ३२ घनाक्षरी। पावकतै जल होय; वारिधते यल होय, शस्रते कमल होय; ग्राम होय बनतें । कूपते विवर होय; पर्वततें घर होय, वासवते दास होय; हितू दुरजनतें ॥ सिंघते कुरंग होय; व्याल स्वालअंग होय, विपतै पियूष होय; माला अहिफनते। विषमतें सम होय; संकट न व्याप कोय, एते गुन होय सत्य; वादीके दरसत ॥ ३२ ॥ अदचादान अधिकार। मालिनी। तममिलपति सिद्धिस्तं वृणीते समृद्धि- स्तमभिसरति कीर्तिमुंचते तं भवातिः ।

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जैनग्रन्थरत्नाकरे मरहटा छन्द। जो कीरति गोपहि, धरम विलोपहि, करहि महाअपराध । जो शुभगति तोरहि, दुरगति लोरहि, जोरहि युद्ध उपाध ।। जो संकट आनहि, दुर्गति ठानहिं, बघबंधनको गेह । सब औगुण मंडित, गहै न पंडित, सो अदत्तधन यह ॥३५॥ हरियो । परजनमनःपीडाक्रीडायनं वधभावना- भवनमवनिव्यापिन्यापल्लताधनमण्डलम् । कुगतिगमने मार्गः स्वर्गापवर्गपुरागलं नियतमनुपादेयं स्तेयं नृणां हितकालिणाम् ॥ ३६॥ (३. मात्रा) सवैया। जो परिजन संताप केलिवन; जो वध बंध कुबुद्धि निवास । जो जग विपतिलघनमंडल; जो दुर्गति मारग परकास ।। जो सुरलोकद्वार दृढ आगल; जो अपहरण मुक्तिमुखवास। सो अदत्तधन तजत साधुजन; निजहितहेत वनारसिदास ३६ शीलाधिकार. शार्दूलविक्रीडित । दत्तस्तेन जगत्यकीर्तिपटहो गोरे मपीकूर्चक- श्चारित्रस्य जलालिगुणगणारामम्य दावानलः । संकेतः सकलापदां शियपुरद्वारे कपाटो हदः शीलं येन निजं यिलुममखिलं त्रैलोक्यचिन्तामणिः ३७ -Rakalore

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३८ जनमत्यरत्नाकर प्रशमको अहित अधीरजको बाल दित; महामोहराजाकी प्रसिद्ध राजधानी है। भ्रमको निधान दुग्ध्यानको विलासवन, विपतको थान अमिमानकी निशानी है। दुरितको खेत रोग शोग उतपनि हेन; कलहनिकेत दुरगतिको निदानी है। ऐसो परिग्रह भोग सवनको त्याग जोग; आतम गवेपीलोग याही भांनि जानी है ॥ १३ ॥ पहिस्तृप्यति नेन्धनरिह यथा नाम्भोमिरम्मोनिधि- स्तबल्लोमघनो धनरपि धनजन्नुनं सतुप्यति । न त्येचं मनुते विमुच्य विमयं निःशेषमन्यं मवं यात्यात्मा तदहं मुधैय विदधाम्येनांसि भूयासिकिम् । पटपट। ज्यों नहिं अग्नि अधाय, पाय ईंधन अनेक विधि । ज्यों सरिता पन नीर; नृपत्ति नहिं होय नीरनिधि । त्यो असंख धन बढत; मूढ संतोप न मानहि । पाप करत नहि डरत; वध कारन मन आनहिं ।। परतछ विलोक जम्मन मरन, अथिर रुप संमारक्रम । समुझे न आप पर ताप गुन; प्रगट वनारसि मोह श्रम ॥४४॥ कोषाधिकार. यो मित्रं मधुनो विकारकरणे संग्राससंपादने सर्पस्य प्रतिविम्यमतदहने सप्तापिः सोदरः।

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जैनग्रन्थरवाकरे वस्तुछन्द। कलह मंडन मंडन कग्न उद्वेग । यशखंडन हित हरन, दुखविलापसंतापसाधन । दुरबैन समुञ्चरन, धरम पुण्य मारग विराधन । विनय दमन दुरगति गमन, कुमति रमन गुणलोप । ये सब लक्षण जान मुनि, तजहि ततक्षण कोप ॥ १७ ॥ यो धर्म दहति द्रुमं दय इबोमनाति नीति लतां दन्तीवेन्दुकलां विधुतुद इव क्लिभाति कति नृणाम् । स्यार्थ वायुरिवाम्बुदं विघटयत्युल्लासयत्यापदं तृष्णां धर्म इयोचितः कृतरूपालोपः स कोपः कथम् ॥ पदपद। कोप धरम धन दहै, अग्नि जिम विरम्ब बिनासहि । कोप मुजस आवरहि, राहु जिम चद गरासहि ॥ कोप नीति दलमलहि, नाग जिम लता विहंडहि । कोप काज सब हरहि, पवन जिम जलधर खंडहि ।। संचरत कोप दुख ऊपज, पढे त्रपा जिम धूपमहँ । फरुणा विलोप गुण गोप जुत, कोप निषेध महत फहँ ।। ४८॥ मानाधिकार. मन्दानान्ता। यसादाविर्भयति विततिदुस्तरापनदीनां यसिशिष्टाभिरचितगुणप्रामनामापि नास्ति ।

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४२ जनग्रन्थरत्नाकरे करिया छन्दा मान सब उचित आचार मंजन कर पवन मचार जिम धन विहंडहि । मान आदर तनय विनय लोपे सफल भुजग विष भीर जिम मरन मंडहि ॥ मानके उदित जगमाहि विनसै सुयग; कुपित मातंग जिम कुमुद खंडहि । मानकी रीति विपरीति करतूति जिम; अधमकी प्रीति नर नीत छंडहि ।। ५१ ।। वसन्ततिलका। मुष्णाति यः कृतसमस्तसमीहितार्थ संजीवनं विनयजीवितमङ्गभाजाम् । जात्यादिमानविपजं विपमं विकार तं मार्दवामृतरसन नयस्य शान्तिम् ॥ ५२ ।। (मात्रा १५) चौपाई। मान विषम विपतन संचरै। विनय विनाग वॉछितहरे ।। कोमल गुन अग्रत संजोग । विनरी मान विषम विपरोग ॥५२॥ मायाधिकार. मालिनी। कुरालजननयन्भ्यां सस्यसूयास्तसंध्यां फुगनियुपतिमालां मोहमातङ्गशालाम् ।

पनारसीविलासः ४३ दामफमनदिमानी दुर्योरामधानी प्पसनातसदायां दूरतो मुघ मायाम् ॥ ५३ ॥ रोरफ द कुदाल जननको घाँश; सत्य रविहरन सांझाथिति । गुगति युवति उरमाल; मोद कुंजर निवास छिति ॥ शम यारिज हिमराशि; पाप संताप सहायनि । अयमा खानि जग जान, तजहु माया दुस दायनि ॥ ५३ ॥ उपेन्दयना। पिधाय मायां पियिधरुपायैः परम्प ये पचनमाचरन्ति । ते पप्पयन्ति त्रिदियापपर्गमुपान्महामोइसराः स्यमेय ५४ बेशरी पद। मोह मगन माया मति सचहि। फर उपाय ओरनको यंचहि । अपनी हानि लखें नहिं सोय। मुगति हरै दुर्गति दुख होय५४ यशस्थविलम् । मायामविभ्यासपिलासमन्दिरं दुराशयो यः कुरते धनाशया। सोऽनर्थसाथै न पतन्तमीक्षते यथा विडालो लगुरुं पयः पियन् ॥ ५५ ॥ परस्मिन्द। माया अविश्वाम विलास गेह । जो करहि मूद जन धन सनेह । सो कुगति पंध नहि लखै एमातजय विलाव पय पियतजेम ५५ ४४ जैनग्रन्थरलाकरे बसन्ततिलका। मुग्धप्रतारणपरायणमुबिहीते यत्पाटवं कपटलम्पटचित्तवृत्तः । जीयत्युपप्लवमवश्यमिहाप्यरत्या नापथ्यमोजनमियामयमायती तत् ॥ ५६ ॥ अमानक उन्दा ज्यों रोगी कर कुपथ; वढावै रोग तन । सादलंपटी भयो; कहै मुझ जनम धन ।। सों कपटी कर कपट; मुगधको धन हरहि । करहि कुगतिको बंध; हरय मनमें घरहि ।। ५६॥ लोभाधिकार. शार्दूलविक्रीडित । यदुर्गामटयोमटन्ति विकट कामन्ति देशान्तरं गाहन्ते गहनं समुद्रमतनुलेशां हर्षि कुर्यते । मेवले पणं पति गजघासंघदुःसंचर सर्पन्ति प्रधनं धनान्धितधियस्ललोमविस्फुर्जितम् ५७ मनहरण। सह घोर मंकट ममुद्रकी तरंगनिमें कंप चितभीत पंयगाद धीच वनमें । टॉन कृषिकर्म जाम शर्मको न लेश कई; संकलशरूप होय; जूझ मेरे रनमें ।।

पनारसीविनासः ४५ सब निज धामको विराजि परदेश धार्थ मेरे प्रभु कृषणमलीन रहे मनमै । होले धन कारज अनारज मनुज मूद, ऐमी परतूति कर; लोभवी सगनभै ॥ ५७ ॥ मुलं मोहयिषनुमन्य गुरुताम्भोगशिपुम्भोनयः मोपाररपिः मतापतरपिच्छारत तोयदः । भीडासप्रपालेपियकाशिनः स्यनुरापनदी- सिन्धुः कीर्तिलताकलापकलभो लोभः पराभूयताम५८ पूरन प्रताप रवि, रोकयेको धारापर; सुकृति समुद्र मोखयेको कुम्भनंददै । फोप दव पायक बननको अरणि दारु, मोह विप भ्रहको; महा हद फंद है। परम विवेक निसिमणि प्रासबेको राहु कीरति लता फलाप; दलन गयंद है। फलहफो फेलिभौन आपदा नदीको सिंधु; ऐसो लोभ याहूको विपाक दुस बंद है ॥ ५८॥ बमम्तसितका निःशेपधर्मपनदादपिजम्भमाणे दुःपापभस्मनि विसर्पदकीर्तिधूमे । पा पनेरधनसमागमदीप्यमान लोभानले मालमता लमते गुणोपः ॥ ५९॥ 2tt ४६ जैनमन्यरक्षाकरे परम धरम यन दहै दुरित अंबर गति पारहि । कुयश धूम उदगरेः भूरि भय भम्म विचारहि ॥ दुम फलंग फुकरैः तरत तृया कल काहि । धन ईशन आगम: मैंजोग दिन दिन अति माहि ॥ लहलहै लोभ पायक प्रबल; पयन मोद उद्धत यंदै । दशदि उदारता आदि यातुः गुण पतंग बरा ॥ शालपित्रीहित। गातः कल्पतमा पुरः गुरगयी ने प्रयिरा गई चितारतमुस्मितं फरलल मानो निधिः निधिम् । विश्य यामपरमेय गुममाः म्यागभियो शेवगनायंगापुर विभते ॥१०॥ (माया) गाया। frin कामधन नापे. पर; पूरे कपास गुमत । अगर भंडार भरे नितामणि, तिनको गुरुभ मुरग भी मोर। नाममा को त्रिभुवनको, निनगी मिद दो निशान गदा तक गि, जिनके उदय मगन मजनाकार. for fans anim. जि तिमणिनी पारी का मणी पितः भागमा मारिजलनिरिमा गंमति frimulagati पनारसीविलासः (मात्रा) पीपाई। परु अहियदन इत्य निज डारहिं ।अगनि कुंडमे तनपर जारहि दारहि उदर करहिं विष भक्षन।पं दुष्टता न गहदि यिवक्षन ६१ पसम्वनिलका। सौजन्यमेय विदधाति पशधपं घ म्यधेपसं घ पिभयं च भयक्षयं च । दोर्जन्यमापनि यत्पुमते तदधम् धान्येऽनतं क्षिपसि सजलसेकसाध्ये ॥१२॥ मत्तगयन्द (संवया)। ज्यो कृषिकार भयो चितयातुल सो कृषिकी फरनी इम ठानें । पीज य न फर जल सिंचन पावकसों फलको थल भाने। त्यो कुमती निज सारथके हित; दुर्जनभाव हिये महि आने । संपति कारन बंध विदारन; सजनता मुखमूल न जाने ॥२॥ पूपी। पर पिभपयायता मुजनभायमाजां नृणा- मसाधुचरिताभिता न पुनरुजिताः संपदः । शयमपि शोभते सहनमायती मुन्दरं पिपाकपिरसा न तु भ्ययशुसंभया रणदता ॥६३॥ भभानरू एन्द। यर दरिद्रता होय; करत सञ्चन फला। दुराचारसौ मिले; राज सो नहिं भला ॥

१८ जैनग्रन्यरत्नाकरे ज्यों शरीर कृश सहन; सुशोभा देत है । मूज थूलता बह; मरनको हेत है ॥ ६३ ॥ मालपिजीनित। न ते परदूषणं परगुणं यात्यल्पमप्यन्यह संतो यहते परदिपु पराशधामु धसे गुचम् । यसायां न करोति नोग्दानि नयं नौचित्यमुताइय. रयुक्तोऽप्यप्रियमसमा न रचयत्नथरि सताम् ॥१४॥ पापद। नहि जने पर दोप; अल्प परगुण पदु मानहि । हृदय पर मंत्रोप; दीन लम्पि फरणा टानदि ।। उचितरीन आदरहि विमल नय नीति न हि । निज गलहन पग्दिरहि राम रनि विपय विदंडहि ॥ मदहि न कोप दुर पचन गुना सहर मधुर धुनि रणदि। कादिकवरपाल जगमाल यमि ये चरित्र मजन कक्षा गुणिगंगारिकार. धर्म पनी यातना पिनं प्रगतः पुमा. मानिनिमम्न नाममा गयो सामेधा शुना। বাসায়মন ন শ যামল यः मङ्गं गणिनां शिमुणमिति करयाणमानित मनगर (या)। मोamro धर्म विमान, मन रिना मानी उमाद। मोहानन पाया, मुधी नि भागमो भगा।

पनामीविगमः
गोपिय पदिएको मना दिन सो सपो तन दाद ।
मोमिना निमार दाट जोमन सगसी दिन चा६६५
भी।
पनि पुमति भिन्ते मो परोनि विपकिना
पिकमि र गने नानि नोति पिनीतताम् ।
प्रपति पो भने धर्म प्यपोदति दुर्गति
जनपति मृणा दिनाभीएं गुणोत्तमसंगमः ॥६६॥
मुमनि निकंद होय महा मोह मंद होय;
जगमगे मुयश रियेफ जगहियेसों ।
नीतको दिलाय रोय विनको पटाव होय;
उपजे उघाह ज्यो प्रधान पद लियेसों।
धर्मको प्रकाश होय दुर्गतिको नाश होय;
परन मगाधि ग्यो पिप रस पियसों ।
तोप परिपूर होय, दोप रष्टि दूर होय,
एते गुन होदि सत; संगत के कियेसों ॥६६॥
साईलीरित।
साधु परिकलापमापदमपार्नु पिड पथि
प्रा वालिमानां यियितुं धर्म समासेपितुम् ।
रोतुं पापविपासमाजसपितुं स्पापयाधियं
पेपं चित समीदसे गुणपतो स तदहीपुछ ॥६७॥

५० जैनमन्यरसासरे लिया। 'फोरा' ते मारग गहे, जे गुनिजनसेवंत । ज्ञानकला तिनके जगे, ते पावहिं भय अंत।। ते पावहिं भव अंत, शांत रस ते नित धारदि। ते अप आपद हरहि, परमकीरति विस्तारहिं ॥ होहि सहन जे पुरुष, गुनी पारिज के भौरा । ते गुर संपनि है, गहे ते मारग 'कारा' ॥६॥ बारिशी । दिमति महिमाम्भोजे पण्डानितरयुदयापुरे विपति दयारामे सेमशमाभूति पतति । गमिपनि कुमरपाली करदस्पनीतिलागु यः मिभिता या धेयाग निर्गुणिसंगमः ॥१८॥ मो महिमा गुन हनहि, सहिन निग पारिज पाह। पो मना महरदिपपन बिम मेप free ओमम दम लाह, दाद निगमपन हाद। जो गुम हय कहि वा निम शिमर ॥ गोपनि अमिगनगि, नगरनार मर जग। मोरगमए का, मसिना गगग ॥ १८॥ इन्दियाधिकार ortafitifsi1 भाग्मार fir गमावलले Eritra in

बनारसीविनासः
जे
पः पुण्यगुमगण्डनविधी रफूर्जकुठारापते
मुममतमुदमिन्द्रियगणं जिरया शुभयुर्भप ॥ १९ ॥
हरिगीतिका।
जगत जनको पुर्पय डारहिं, एक शिक्षित तुरगसे ।
जे दरहिं परम विवेक जीवन, काल दारुण उरगसे ॥
पुण्यक्षपठार तीखन, गुपति यत मुद्रा करें।
ते करनमुभट महार भविजन, बन सुमारग पग धेरै ॥ ६९॥
शिखरिणी।
मतिष्ठां पमिष्ठां नयति नपनि विघटय.
स्वपस्येप्यापत्ते मतिमतपसि मेम तनुते ।
पिकस्योत्सेकं चिन्तयति दोघ विपदं
पदं तदोपाणी फरणनिकुयायं कुरु परो । ७०॥
भनाक्षरी।
ये ही हैं कुगतिके निदानी दुख दोष दानी;
इनहीकी संगतसो संग मार रहिये ।
इनकी मगनतासो विमोको विनाश होय,
इनदीकी प्रीतसो अनीत पन्य गहिये ।
ये ही तपभायकों विडारे दुराचार धार,
इनहीकी तपत विवेक भूमि दहिये ।
ये ही इन्द्री सुभट इनहिं जीते सोई साधु,
इनको मिलापी सो तो महापापी काहिये ॥७॥

५२ जैनग्रन्थरलाकरे शार्दूलविक्रीडित । धत्तां मौनमगारमुज्झतु विधिप्रागल्भ्यमभ्यस्थता- मस्त्यन्तर्गणमागमश्रममुपादत्तां तपस्तप्यताम् । श्रेयःपुअनिकुञ्जमानमहायातं न चेदिन्द्रिय नातं जेतुमवैति भस्मनि हुतं जानीत सर्व ततः ७१ मौनके धेरैया गृह त्यागके करेया विधि, रीतके सधैया पर निन्दासों अपूठे हैं । विद्याके अभ्यासी गिरिकंदराके वासी शुचि अंगके अचारी हितकारी बैन छूठे हैं ।। आगमके पाठी मन लाय महा काठी मारी; कष्टके सहनहार रामाहुसों रूठे हैं । इत्यादिक जीव सब कारज करत रीते; इन्द्रिनके जीते विना सरवंग झूठे हैं ॥ ७१ ॥ धर्मध्यंसधुरीणमभ्रमरसायारीणमापत्प्रया- लमीणमशमंनिर्मितिकलापारीणमेकान्ततः । सांनीनमनात्मनीनमनयात्यन्तीन मिटे यथा- कामीनं फुपयायनीनमजयनीयमसमभात ॥ ७२ ॥ धर्मतरुमंजनको महा मत्त कुंजरमे; आपदा मंडारके भरनको करोरी है। कुमनेगरि पारः.

मगारसीविलासः सत्यशील रोकयेको पौड़ पादार जैसे; दुर्गतिके मारग पलायवेकों पोरी है। कुमति के अधिकारी कुनैपयफे विहारी; भद्रभाव ईधन जराययेको दोरी है। मृषाफे सहाई दुरभाषनाफे भाई ऐसे; विषयाभिलाषी जीव अपके अपोरी है ।। ७२ ॥ कमलाधिकार। निसं गच्छति निसगेय नितरा निद्रय विष्कम्भते चतन्यं मदिरेप पुष्यति मदं धूम्येय धोऽन्यताम् । पापल्यं घपलेप पुम्पति दयन्यालेप हा नय स्युहास फुलराजनेय कमला स्पैरं परिधाम्यति ॥७३॥ httt.tter.tri मरगया। नीचफी ओर टरे सरिता जिम, घूम यदापत नीदकी नाई। चंचलता प्रपरी चपला जिम, अंध फरै जिम धूमफी शाई तेज फर तिसना दय ज्यों मद; ज्यों मद पोषित मूढफे ताई। ये फरनूति कर फमला जग; डोलत ज्यों फुलटा विन साई ॥ दायादाः स्पृहयन्ति तस्करगणा गुणन्ति भूमीमुजो गृहन्ति समाकलप्य हुनमुग्भस्मीकरोति क्षणात् । मम्भः सापयते क्षिती पिनिदितं यक्षा परन्ते दठा- दुर्घत्तास्तनपा नयन्ति निधनं विग्याधीनं धनम् ७४

जैनमन्थरताकरे
बंधु विरोध करै निरापासर; दंडनकों नरवै छल जोये ।
पापक दाहत नीर पहायत, है गओट निशाचर दोवे ।।
भूतल रक्षित अक्ष हरै करकै दुरप्रति कुसंतति सोचे।
ये उतपात 3 धनके दिग; दामधनी कहु क्यों मुस सोवेश
नीयस्थापि चिरं घनि रययन्त्यायान्ति नीचर्नति
शधोरण्यगुणा/मनोऽपि पिपायुपैगुणोत्कीर्तनम् ।
नियन विदन्ति किंचिदशतास्यापि सेयानमे
फष्टं नि मनस्यिनोऽपि मनुजाः कुर्वन्ति वित्ताधिनः
मनाशी
नीन धनवंत साहि निरस असीस देय;
पद न विलोके यह घरन गहत है।
यह तज्ञ नर यह अपनाको पर;
पद मद लीन मह दीनता कहत है।
यह विणकोप टान यह वाको मन माने
था कुपवन रार यह पं राहत है।
मी गति पार न पियार का गुण दोष;
थरथामिनापी जीव भाय पहन है ।। ७५॥
हम निनागमणः मारियायोगिनी.
गमगांदिय
कानपिने पाए।
१.ir

मनारसीविलासः
चैतन्यं चिपसंनिधेरिप नृपामुजासययनसा
धर्मरमाननियोजनेन गुणिभिर्मा सदस्याः फलम् ७६
नीचहीकी ओरफों उमंग चलै कमला सो;
पिता सिंधु सलिलसमाव याहि दिया है।
रहे न मुथिर हे सकंटक चरन याफो;
पसी जमाहि फैजसो पद किया है ।।
जाको मिले हितसों अचेत कर डार ताहिक
विपकी पहन ताते विपफैसोहियो है।
ऐसी ठगहारी जिन घरमके पंथडारी;
फरफ मुकृति तिन याको फल लिया है 1.७६ ॥
दानाधिकार.
चारित्रं चिनुते तनोति पिनयं सानं नपत्युमति
पुष्णाति प्रशमं तपः प्रपलयरयुलासयस्यागमम् ।
पुण्यं फन्दलयस्यघं दलपति स्वर्ग ददाति कमा.
निर्याणधियमातनोति निहितं पात्रे पयित्रे धनम् ७७
मात्रा सवैपाका
चरन अखंड ज्ञान अति उज; विनय विवेक मराम अमलान।
अनप मुभाव मुहति गुन संचय, उघ अमरपद् बंध विधान
आगमगम्य रम्य तपकी रुचि उद्धत मुकति पंथ सोपान ।
ये गुण मघट होय तिनके घट जे नर देहिं सुपर्वाद दान७७

जैनप्रन्यरताकरे
दारिम्यं न तमीक्षते न भजते दौमाग्यमालम्बते
नाकीर्तिनं परामयोऽभिलपते न च्याधिरास्कन्दति
दैन्यं नाद्रियते दुनोति न दरः लिम्ति नयापदः
पात्रे यो वितरसनर्यदलनं दानं निदानं श्रियाम् ।
सो दरिद्र दल मलदि; ताहि दुर्भाग न गंजहि ।
सो न लहै अपमान; मुतो विपदा भयभंजहि ।।
तिहि न कोई दुरा देहि, तासु तन व्याधि न पहर ।
ताहि कुया परहरहि, मुमुग दीनता न कट्टर
मो लाहि उपदजगत मह, अप अनरय नामहि सर
कदै कुंवरपाल सो धन्य नर, जो गुमेत यो दरव ।
समी: कामयते मनि{गयते कीर्तिम्तमालोकते
प्रीनिवपति मयते गुभगता नीरोगतालिशति ।
भयागातिरस्युरिति पृणुने स्थगापमोगन्धिान
मुंगियानि यः प्रयच्छति पुमान्पुण्यार्यमय नित
घनाक्षरी
ताहिको मुद्रियरे रमा माफी चार की,
नंदन माप दो गुपन तादि चर।
महज मुशग पार गुग्ग गमी आये,
बार बार मुक्ति मिनि नादिमाया
नाशिको आगति अगेगा।
मंगल कामनाई मीतकर पाया

बनारसीविनाम जोईनर हो मुनेत वित्त समता ममेन, घरमके हेनको गुम्नेन धन पाने ॥ ७० ॥ मदाशरता । सम्पासमा रतिनुपरी पोतिसरयाण्टिता भी: जिग्या बुदिः परिचयपरा यत्रयमिायभूमिः। पाणी मा विश्चिकमला कामुष मुनियर साया पपति पिपुलं विनयी निय:॥ ८॥ पाती। ताकी रति कारनि दामी राम, गहमा गजलि पा आर्य । गुगनि गुना उपजे साके. घर, गो गुरलोक मादा पा ॥ ताकी टिशिय मारग, गो नियंध भायना भाव । जो नर त्याग प.पर चरा कद, विपिनी गायन धन पा1८० तपसभायाधिशार। गाईwfatirna पराजितकमलिदा पाकामदापानल. पालाजाराज पाणमामारिमाम् पाप्रापुरतमाथि पाकिसता. पूर्ण रिपि प्रथाविधि तपः पुपाल पान १ والی मो परपस पर्म, पि: मिदम गर ! यो मनमय दर दाल, मात्र संगम पार॥

जैनप्रन्यरनाकरे
स
जो प्रनड इंद्रिय मुजंग, यमन मुमंत्र यर ।
जो विमाय सतम सुपुज, संडन प्रमान कर !!
जो लब्धि वेल उपजन घट, तासु मूल दृढता महित ।
सो सुतप अंग बहुविधि दुविधि, करहि विबुधिचंछारहित ८१
यस्माद्विमपरम्परा विघटते दाम्यं मुराः कुर्वते
कामः शाम्यति दाम्यतीन्द्रियगणः कल्याणमुन्सर्पति ।
उन्मीलन्ति महर्द्धयः कलयति ध्वंसं च यः कर्मणां
स्वाधीनं त्रिदिवं शिवं च भवति साध्यं तपस्तन्न किम्।
घनाक्षरी।
जाके आदरत महा रिद्धिमों मिलाप होय,
मदन अव्याप होय कर्म वन दाहिये ।
विघन विनास होय गीरबाण दास होय,
ज्ञानको प्रकाश होय भो समुद्र थाहिये ।।
देवपद खेल होय मंगलसों मेल होय,
इन्द्रिनिकी जेल होय मोपपंथ गाहिये ।
जाकी ऐसी महिमा प्रघट कहै कौरपाल,
तिहुंलोक तिहुंकाल सो तप सराहिये ।।८२।।
कान्तारं न यथेतरो ज्यालयितुं दक्षो वाग्नि विना
दावाग्निं न यथापरः शमयितुं शको विनाम्मोधरम् ।
निष्णातः पवनं विना निरसितुं नान्यो यथाम्मोधरं
कौघ तपसा विना किमपरो हन्तुं समर्थस्तथा॥८॥

मनारसीविलासः - मतगपाद जो पर कानन दाइनकों दया पावकगों नहिं हमरो दोस। जो दवआग बुझन तक्षण; जो न अहित मेपरी ।। जो मपट नहि जोलग मारना तोला घोर घटा नदि पीम।। त्यो पटमें तपमदिना र कर्मकुलाचल और न पाम ॥८३॥ पारा নীঃ এমঘাতষেধৎঃ থানঃ মধ্য সন্তান। HARYसेकानिपुलपुलपयंसादयंमोग বধিমাঃ বিপদে। তথায়? मुहर मूल संतोष; प्रशम गुन प्रपल पे धूप । पंचाचार भाग्यशील संपति मया ॥ अमय अंग दलपुंज; देवपद पप गुमंस्ति । मुश्तभाव विस्तार; भार शिव गुफल अस्ति। परनीत पार जल शिप किया अनि उनंग दिन दिन पित। जयवंत जगत यह पतातर, पनि विहंग रोयदि गुमित ॥ ८५११ भावनापिकार। हालस्तीति नीराणेरणीकरातिमिय यामध्यपतमभो। रोषासएमियोपरोपणमियामोजामनाममन। - mahiye १.पः पादयोऽयमा पा.. मोर,

जैनमन्यग्नाकरे
विष्यग्यमियोपरक्षितितले दानाईदचांतप:-
स्वाध्यायाध्ययनादि निष्फलमनुष्टानं विना भावनाना
पसारनी छन्द।
ज्यों नीराग पुरुषके सनमुख; पुरकामिनि कटाक्ष कर ली।
ज्यों धन त्यागरहित प्रमुसेवन; कसरमें यरपा जिम टूटी।
ज्यों शिलमाहिं कमलको बोवन, पवन पकर जिम बांधियेटी।
ये करतूति होय जिम निष्फल त्यों विनमावक्रिया सब झूटी ८५
सर्व हीप्सति पुण्यमीप्सति दयां घिसत्यधं मिन्सति
फोघं दित्सति दानशीलतपसां साफल्यमादित्सति ।
कल्याणोपचयं चिकीपति भवाम्मोघलटं लिप्सते
मुक्तिनीं परिरिप्सते यदि जनस्तद्भाययेद्भावनाम् ८६
घनाक्षरी।
पूरब करम दहै; सरवन पद लहै;
गहै पुण्यपंथ फिर पापमें न आवना ।
करुनाकी कला जागे कठिन कपाय माग
लागै दानशील तप सफल मुहावना ॥
पावै भवसिंधु तट सोले मोक्षद्वार पर;
शर्म साध धर्मकी धराम करे घावना ।
एते सब काज कर अलसको अंगधरे;
चेरी चिदानंदकी अकेली एक भावना ।। ८६ ॥

درارارارارا شعار ۲ star घनारसीविलासः - पृष्ठी। पियेषयनसारिणी प्रशमशमसंजीयनी भवार्णपमहातरी मदनदायमघायलीम् । चलारागृगयागुरां गुरुकवायलाशनि पिमुक्तिपथयेपरी मशत भायना कि परः ॥ ८७ ॥ मरामके पोपवेको अग्रतकी धारासम; ज्ञानयन साचवेको नदी नीरभरी है। पंचल फरण मृग पांधयेको पागुरागी; कामदावानल नासवेको मेघ झरी है। प्रपल फपायगिरि भंजयको बम गदा, भो समुद्र तारवेको पाटी महा सरी है। मोक्षपन्य गावेको धेशरी विलायतकी, ऐसी शुद्ध भावना अखंड धार दरी ।। ८७ ॥ शितरिणी। पन नं दिन मिनषपनमभ्यस्ममम्मिा लियाका प रचितमपनी पुरामपरन् । नपरनीतं तसंघरणमपि पीण चिरतरं अपेपित भायरतुण्यपनयागमफलम् ॥ ८॥ भभाषक ९. गह पुनीत आपार, जिनागम बोपना। पर तप मंगम दान, भूमि का सोयगा । १.मी. Puzz...

६२ जैनग्रन्यरत्नाकरे ANI घनाक्षरी उन्द। जाको भोग भाव दीस कारे नागमे फन, राजको समाज दीख जसो रजकोप है। जाको परकारको चढाव घेरावंघ मुझे, विष सुख सौजको विचारै विषपोप है ।। लस यों विभूति ज्यों मसमिको विमति कहै, वनता विलासमैं विलोके दृढ दोप है । ऐसो जान त्यागै यह महिमा विरागताकी, ताहीको वैराग सही ताके बिंग मोप है ॥ ९२॥ इति २२ अधिकार समाप्तम् अय उपदेश गाया। उपेन्द्रवत्रा। जिनेन्द्रपूजा गुरुपर्युपास्तिः सत्त्वानुकम्पा शुमपात्रदानम्। गुणानुरागः श्रुतिरागमस नृजन्मवृक्षस्य फलान्यमूनि ९३ मत्तगयन्द। के परमेश्वरकी अरचा विधि, सो गुरुको उपसर्पन कीजे । दीन विलोक दया धरिये चित, प्रामुक दान मुपनहिं दीजे ॥ गाहक हो गुनको गहिये, रुचिसों जिन आगमको रस पीजे। ये करनी फरिये ग्रहमैं यस, यो जगमें नरभोफल लीजै ॥२.३|| शिखरिणी। निसंध्यं देवाची विरचय च यं प्रापय यशः श्रियः पाये यापं जनय नयमाग नय मनः ।

पनारसीविलासः
सरोधाधारीन्दलय कन्दय माणिषु दयों
जिनो सिमान्तं शृणु पृणु जयान्मुक्तिकमलाम् ।
हरिगीता पण
जो कर साप विकाल सुमरण, आस जगया विलरे।
जो मुर्न परमानहिं सुरचिसो, नीत मारग पग धेरै ।
जो निरख दीन दया मभुज, कामक्रोधादिक हरे ।
जो गुपन सम मुखेत सरचे, सादि शिवसंपति पर ।। ९४ ॥
लकिपीडित
एन्यापदपूजनं यतिजनं माया पिदित्यागर्म
दिन्या मामधर्मकर्मवधि पात्रेषु दरया धनम् ।
गत्या परतिमुत्तमम मियान्तरारिमर्श
स्मृत्या
पचनमस्मियां कुद करफाइस्थमिष्ट
बम्युन्दर
देव पुनहिं देव पूजहि, रनहिं गुरु सेव ।
परमागमावि घरदि, तजहि दुष्टसंगत नतक्षण ।
गुणि संगति आदरदि, करहिं त्याग दुर्भक्ष भक्षण |
देहि सुपात्रहिं दान नित, ज पंचनवकार ।
ये करनी जे भाचरहिं, वे पाय भवपार ॥ ९५ ॥
हारिणी।
प्रारति पथा कीर्तिर्दिशु पाकरसोरा.
भ्युदयजननी याति स्फीति पथा गुणसन्ततिः।
फलपनि यथा वृद्धि धर्मः कुकर्मतिक्षमः
पुरानमुलभे न्याय्ये कार्य तथा पथि यतनम् ॥ १६॥

जैनग्रन्यरनाकरे दोहा इन्द। गुन अरु धर्म मुथिर रहै, यश प्रताप गंभीर । कुशल वृक्ष जिम लह लहै, तिहिं मारग चल वीर!॥२६॥ शिस्तरिणी। करे साम्यस्त्यागः शिरसि गुरुपादमणमनं मुखे सत्या याणी श्रुतमधिगतं च थयणयोः । दि स्वच्छा मृत्तिर्विजयि भुजयोः पौरुपमहो विनायवयग प्रातिमहतां मण्डनमिदम् ॥ १७ ॥ कविताहन्द। यंदन विनय मुकट सिर ऊपर, मुगुरुवचन कुंडल जुगकान। अंतर विजय भुजमंडन, मुकनमाल उर गुन अमलान ।। त्याग महज कर कटक विराजत, गोभित मत्य वचन मुस पान। मगण सहि नऊ तन मंडित, यात मन्तपुरुष परधान ॥९॥ भयारण्यं मुक्त्या यदि जिगमिमुनिनगरी हदानी मा कार्यिरपयिषु यम तिम् । पतस्यायाया प्रथयति महामोलको जग दयं जग्नुयंम्मापदमपि न 'प्रामुममा नोट नीचे दिये गौन की जिम पा जग गरे जे मुजन रीत गुनवा प्रीत, मेवा माय गुरकी इस भूरारा मादक। यदिनों का जोर। गरेगा।

पनारसीस्लिामः ६७ विधाको निधी परतिय गहरे, दुर्जनकी संगतिमों पेठे मुस मोरके। सरे सोफनिन्ध काज पूजे देव दिनराज, को ले करन भिर उमंग हो। सेई जीव सुखी होय तेई मोस मुवी होय, ई होदि परम करम पन्द तोरके ॥१॥ গালিব বা স্কুল পলা বাস , कोष मान माया लोभ पारों परिहर रे।। दिर तोप गर समनासो सीरो रहु, परमको भेद सह सदमें न पर रे ।। करमको पंदा खोय मुकतिको पन्य जोय, मुकृतिको वीजचोर दुर्गतिमो र रे। रे नर ऐसो होहि पार पार कहं सोदि, नाद तो सिधार तूं निगोद तेरो घर रे ॥ २ ॥ माशा आलम त्याग जाग नर पेतन, पल सँभार मत करहु दिलंच । पनि गुरु लवलेश जगतमहि, निर विरप सीन अंप। तात तूं अंतर रिपक्ष हर, कर विलक्ष निज अक्षाकदंर । गद गुन ज्ञान बैठ पारितरय, देहु मोप मग सन्मुख र १३|| माहिती ममजजितदेपाचापडोपादि पुमणिविजयसिदाचार्यपादारविन्दे ।

६८ जैनमन्यरलाकरे मधुकरसमतां यस्तेन सोमयभेण व्यरचि मुनिपनेत्रा सूक्तिमुक्तावलीयम् ॥ ९९। कवित भन्दा जैन वंश सर हंस दिगम्बर; मुनिपति अजितदेव अति भारज | ताके पद वादीमदमंजन; प्रघटे विजयसेन आचारज ॥ ताके पट्ट भये सोमप्रम; तिन ये अन्य फियो हित कारज । जाके पटत मुनत अवधारत, हैं मुपुरुष जे पुरुष अनारजा९९ एपना सोमप्रभाचार्यममा घ लोके पम्नु प्रकाशं कुरते पातु । नथायगुरूपदेशलेशः शुभोरमयज्ञानगुणांस्ननोति ॥१०॥ भाषाग्रन्थर की ओरसे नामादि. दोहा । नाम गक्तिमुक्तावली; द्वाविंगनि अधिकार । शन भोक परमान मरा पनि प्रत्यरिमार॥१॥ वरपाल यानारसी गिर जुगल इचिव । निनादि अन्य माषाकियो, यविधि धन्द कपित ॥२॥ सोलहमे इलयानये; या प्रीपम वेगाय । मोमवार एकादी करनछत्र मिल पाम ॥३॥ ( •ান শাবলম্বা লম্বা भासा गम | भाभीमा, श्रीः अथ ज्ञानयावनी. पमारी ओंकार भारत विशद या उभयरूप, एक आतमीफ भाव एक पुदगलको। शुद्धता खभावलिये उदयो राय चिदानंद अशुद्ध विभाव ले प्रभाव जमलको ।। त्रिगुण निकाल ताते थय धुव उतपात, शाताको मुहात बात नहीं लाग सलफो। घानारसीदासजूके हृदय ओंकारवास, जैमो परकार शशि पाके शुफलको ॥ १॥ निरमल ज्ञानके प्रकार पंच नरलोक, तामें शुतज्ञान परधान कर पायो है। ताके मूल दोय रूप अक्षर अनक्षरमें, अगर अन पिंड सेनमें पतायो है ॥ बावन धरण जाके असंख्यात सनिपात, तिनिमें नृप ओंकार मचनसुदायो है। पानारसी दास अंग द्वादश विचार पामें, ऐसे ऑफार 3 पाठ सोहि आयो है ॥२॥ महामंत्र गायत्री के मुस प्रारूप मन्यो, आनम प्रदेश कोई परम प्रकाश है।

जैनमन्थरत्नाकरे तापर अशोक वृक्ष छत्रध्वज चामर सो, पवन अगनि जल वसै एक वास है। सारीके अकार तामें रुद्र रूप चितवत, महातम महावृत तामें बहु मास है। ऐसो ओंकारको अमूल चूल मूलरस, बानारसीदासजूके बदन विलास है ॥ ३ ॥ सिद्धरूप शिवरूप भेष अवभेषरूप, नररूप न्यायरुप विधिरूप पातमा । गुणरूप ज्ञानरूप ज्ञायक गंभीररूप, भोगरूप मोगीरूप सरस मुहातमा ।। एकरूप आदिरूप अगम अनादिरूप, असंख्य अनंतरूप जातिरूप जातमा । पानारसीदास द्रव्यपूजा व्यवहाररूप, शुद्धता स्वमायस्प यहै शुद्ध आतमा ॥ १ ॥ धुंधवांउ हदै भयो शुद्धता विसरि गयो, परगुणरंग रयो पर ही को रुसिया । निजनिधि निकट विकट भई नन विन, क्षणकमें मुभी सामें क्षणको दुम्पिया समधिन जल विना अपित अनादि काल, विषय कवायवदि अरणमें घुमिया । যানাল নি নি বিবি সাস্থ, मेरे माने ते नो नर मानमें गुमिया ॥५॥ .

बनारमीविलासः 43344214datatus अनुभवमानते निदान आनमान एथ्यो, सरधानपान पान छहो द्रव्यकरसें। करम उपाधि रोग लोग जोग भोग राते, भोगी धिया योगी करामाताहको तरसें ।। दुर्गनि विपाद न उाद मुर भीनयास, रमना मुशिति आतमीक मेघ बरस । यानारमीदामफ बदन रमन रम, कसरसिया हे रसको पास ॥६॥ भावरण समल विमल भयो सांके गुले, मोह आदि हने काहु काल गुनफशिमा । लीन भयो लवलागी मगन विभावत्यागी, ज्योतिके उपोत होत निज गुण पगिया । पानारसीदास निज भातम प्रकाश भय, आ ने न आदि पर ऐसे परावरिया { आस पाम दरा आदिदी भनन्त जन्य, गुग्गगयाराच सोई सरोघो रसिया ॥ ७ ॥ ही गुरसके सवादी भय से तो गुनी, तीकरति हासी अध्यातरी । पर पागुरेष प्रति वासुदेव विचार, धारणमुनिन्द्रन्द्र दीक्षि भणी ।। मार, भा.

७२
जैनग्रन्थरलाकरे
अठ्ठावीस लबधिके विविध सधैया साधु,
सिद्धिगति भये कीन्हीं सुगम अगमकी ।
वानारसीदास ऐसो अमीकुंडपिंड पायो,
तहालों पहुंच कालक्रमकी न जमकी ॥ ८॥
इतर निगोदमें विभाव ताके बहुरूप,
तामें हू समाव ताको एक अंश आवे है।
वहै अंश तेजपुंज वादर अगनि जैसें,
एकतै अनेक रस रसना बढ़ा है।
आगे जोर बन्यो प्राण चक्षु श्रोत्र नरदेह,
देह देही मिन्न दीखे भिन्नता ही मावे है।
यानारसीदास निगज्ञानको प्रकाश भयो,
शुद्धता याम किये सिद्धपद पाये है ॥९॥
उदै भयो मानु कोऊ पंथी उटयो पंथकाज,
कहे नैनतेज योरो दीप कर चहिये ।
कोऊ कोटीच्या नृप छपठांद पुरतज,
तादि हौस भई जाय ग्रामवास रहिये ।
मंगल प्रचंट तत्र काहू ऐमी इच्छा मई,
एक र निज अमवारी कान चदिये।
पानारमीदाग मिनरचन प्रकाश गुन,
और वैन मुन्यो बाद तामों ऐमी कहिये ॥१०॥

बनारसीदिलामः ऊचे वंशकी रहाई प्रीतपनों पीडिताई, गुण गरवाई पिलाई धनी फेर है। वचन विलासको निवास बन सपनाई, चतुर नागर नर मुरनको पर है ।। कीरति सराहको प्रवाह है महानदी, एतो देश उपमा सबै जग ओर है। हेरि हरि देख्यो फोऊ और न अनेगे ऐमो, घानारसीदास मसुधा गिरि मेर है ॥ ११ ॥ रीति विपरीति रंग राभ्यो परगुण रस, छायो सूठे मम ताते टूटी निधि परकी। तेरे घर फदि हे अनंत आपरंग आये, ने जो गरूरी फेरे हाय होय दरकी । कायके उपायसेती एती दस पूरै भले, निजप्रियारुठे जेती होम पूज मरकी । पानारसीदास कहे मूहको विचार या फोटोपत्र भयो पाद आसपी परकी ॥१२॥ अनु परसात नदी नाले सर जोरपडे, है माहिं मरजाद सागरके फैली। नीरके बाद मामाल हे जात, चित्रास मारपीनादी कार गेटदी।

जैनग्रन्थरलाकरे
वानारसीदास ऐसे पंचनके परपंच,
रंच न संच आवै वीर बुद्धि छैलकी ।
कछु न अनीत न क्यों प्रीति परगुणसेती,
ऐसी रीति विपरीत अध्यातमशैलकी ॥ १३ ॥
लवरूपातीत लागी पुण्यपाप प्रांति मागी,
सहज स्वभाव मोहसेनापल भेदकी ।
ज्ञानकी लबधि पाई आतमलयधि आई,
तेज पुंज कांति जागी उभग अनन्दफी ।।
राहुके विमान बढ़े कला प्रगटत पूर,
होत जगाजोत जैसे पूनमके चदकी ।
पानारसीदास ऐसे आट फर्म प्रमभेद,
सकनि संभाल देमी राजा चिदानदकी ॥ १४॥
लिखनपरत टाम टाम लोक लक्षकोटि,
ऐमो पाठ पो कछू ज्ञान ह न पहिये ।
मिथ्यामती पचि पचि शासक ममूह पो,
पंधीकलयाजे पशुचामडोल महिये ।।
दीपक संजीय दीनी चक्षुदीन ना कर,
निष्ट पहार का कबहन चरिम ।
पानारसीदाग मो नो मानक प्रकाश मये,
रियों कहा यो कामप्यो है गो परिये ॥१५॥

बनारसीविलासः एक मतपिल जैसे जलके संयोग हुने, भाजन विशेष कोट क्षण में सेदद। तसे कर्मनीरचिदानन्दकी प्रति दीम, नरनारी नपुसक विविध मुंबद । पानारसीदास अर वाको धूप याको तप, एटेत संयोग ये उपाधिनको ऐदी। पुगसफे पर विशेष जीव भेद भय, पुगत प्रसंग पिना आवम अभेद ॥१६॥ ये ही शान समद मुना गुर सादि मुन, पररस म्याद माने तो तादि मान रे। विस रिवारकी सपर रोजितादि खोज, परगुण निज गुण जाने सार जान रे॥ विषय पायक विलाय मेरे साहिए, बमल असं नादि मानेसाद थान। पानारसीदास ज्ञाता होय सोई जाने मद, मे मीन सी रीत विभिन॥१०॥ उपम करत ना स्वारकर, दार उपसको रोमदा सो! स्वास्थको मनियारको सडको, रको बन जाने धनकोसो । ''गामी पद जैनप्रन्यरत्नाकरे स्वारय भलो है जो तू स्वारथको पहिचाने, स्वारय पिठाने विन स्वारथ जहर सो । वानारसीदास ऐसे स्वारभके रंगराचे, ठोकनके स्वारयको लागत कहर सो ॥ १८ ॥ उलट पलट नट खेलत मिलत लोक, याके उलटत मय एक तान है रह्यो । अज हूँ न ठाम आये विक्रया श्रवण भावे, महामोह निद्रामें अनादि काल स्वैरयो । पानारसीदास जागे जागे तासो पनि आये, जिनपर उकति अमृत रस चैरयो । उलटि जो रोले तो तो ख्याल सो उठाय घरे, उलटिके मेले दिन सोटे म्याल हैरणे ॥ १९ कौन कान मुगप करत बप दीनपशु, जागी ना अगमम्योति केगो जश कार है। कौन कार मरिता समुद्र मरज डोई, आतम अमल होमो अनई न हरि ॥ काहे परिणाम गंकलेगाकर जीव ! पुन्या भेद किये कहुं न उपरि है। पानारगीदाग दिन शनि भगत रग, मोई भान गुने तू अगन मा नरि॥२० बनारसीविलासः ७७ Arthuram- खेलत अनन्तकाल भये पै न खेद पावै, तीन सौ तेताल राजू मापकी तलको । फेई स्वाग पर खेले यरष असंख्य कोटि फेई स्यांग फेर लाये पलफ पलकों ॥ खेलें जेते जन्तु तातें खेलने अनन्त गुणे, यानारसीदास जाने ज्योतिकी झलकमें। खेले ते पहुत ख्याल देखे तें अलप जन्तु, देखे ते भी रोल पेठे ख्याल है खलफ ॥२१॥ गुरुमुख तुपक मुयक भरे श्रुत सोर, फालफी लयधि फलपी दरम्यानकी। जामकी अगमबुद्धि जोग उपजोग शुद्धि, रंजरुअरथ ज्वाला लागी शुभ ध्यानकी॥ इत सातादल उत मोहसेना आई यन, पानारसीदास जू कुमक लोजो न्यानकी । जीव न अवश्य जाफे बन्दुककी गोली लागे, जाग न मिथ्यात जोपे गोली लागे मानकी ॥२२॥ परमें विपर पार उलट ऊरथयाट, परगुण साधे ते अनन्त काल संपको। मुषमना आदि इला पिंगलाकी सोज भई, पटचक्रयेपी गण जीत्यो मनमंयको।।

जैनग्रन्यरक्षाकरे
सुलट्यो है कमल बनारसी विशेष ताको,
मुनिवेकी इच्छा भई जिनमत अन्यको ।
ऐसे ही जुगति पाय जोगी जोग निधि साथै,
जोगनिधि साथै तो सिधावे सिद्धपथको ॥२३॥
नीच मतिहीन कहै सो तो न है केवली,
कहै कर्महीन सो तो सिद्ध परमितको ।
धियागारी घर धिया सारसुत ऐमी घरी,
मेधाके मिलापसों मथन निज चितको ।
मूरख कहैं ते सायं परम अवधिवार,
तहां न विचार का हित अनहितको ।
पानारसीदास तोसो निज ज्ञान गेह आये,
लोगनकी गारी मो मिगार समकिनको ॥ २१ ॥
चंचलता बाला वैस मौरी दे दे भूमि फिर,
पर तर ममि देसै घूमत मरमते ।
यो ही परम योगपग्णनिमंती परपंध,
ओदायर फ भाव म्ह पावे ना मरमते ।।
निजन मानाम तार्ने पनि विशेष माने,
पी पाजाय मो याही कठिन करमने ।
बानारमीदाग दिम विकल रिमाव हुटे,
बुद्धि विमगम गुने पाये म्यमाव पामने ॥२५॥

बनारसीविलासः tumn. tuteriti छत्रधार पेठो घने लोगनकी भीरभार, दीखत स्वरूप सुसनेहिनीसी नारी है। सेना चारि साजिके चिराने देश दोही फेरी, फेरसार करें मानो चीपर पसारी है ।। कहत बनारसी पजाय धौंसा पारपार, रागरस राच्यो दिन चारहीकी मारी है। सुल्यो ना खजानो न खजानचीको खोजपायो, राज खसि जायगो खजाने विन ग्वारी है ॥२६॥ जागो राय चेतन सहज दल जुरि आये, मुरे कर्मरिपुभाव मनमें उमाही । सरहद भई यात्री लोकालोक परिमाग, इन्द्रचन्द्र चितवत चोपकर चाहनी ।। पानारसीदासज्ञाता शान सेना बनि आई, आदि छते अन्त विन ऐसी ही निबाहनी । खजानची शुभध्यान भानको खजानो पूरो, सूरो आप साहिर मुथिर ऐसी साहिनी ॥२७॥ झाग उठे वामें यामें प्रोफेन फैलि रहे, त्रिवलतरंगरंग दईनमें आवना । यामें रणकार धनधान्यपरिग्रह यामें, थामें मलपंक याहि पेपद्रोह भावना ।। .

जैनमन्थरताकरे चानारसीदास वामें आकृति अनेक उठे, यहां कुलकोड योनि जाति दोष लावना । वह्यो जात जल ताम येते कविभाव उठे, आतमा बहिर तामें कहाँते स्वभावना ॥ २८ ॥ निजकाज समहीको अध्यातम शैली मांझ, मूद क्यों न खोज देस सोज औरवानमें । सदा यह लोकरीति मुनी है बनारसीजू, यचनप्रशाद नैकु ज्ञानीनके कानमें । चेरी जैसे मलिमलि धोवत चिराने पांव, परमनरंजियेको सांश ओ विहानमें । निगपांव क्यो न धोय! कोई ससी ऐमो कहे, मोसी कोऊ आलसन और न जहानमें ॥ २९ रेकरि मूरमपिराने पर टिक रयो, जान मेरे यही पर मैं भी यादी परको । पर परमारय न जान ताने अमरो, टोर बिना और टोर अपर पपरको ।। पंचकी ममायो कह परपंच पदोद, मंग्रह गम्हरियों सो तो पिट परको। पानारमीदाम मानान्दमें शिधार देण्या, पगाणी बनम मे नरको ।। ३.॥

बनारसीविलासः ठांव मृगमद मृग नाभि पुदगतगुन, विसतरको पानतें विशेष हुँदै यनमें । साहियके काज मूद अटत अनेक ठौर, तनको जो मिल माने तो तो तेरे तन ।। फंठमाहि मणि कोऊ मूरख विसरि गयो, सो तो उपसानों सांचो भयो दीन जनमें। घानारसीदास सिंह फाजको जगत फिर, सो तो काज सरे तेरे एक ही वचनमें ॥३१॥ मूल्यो तू निगोद फोऊ फाल पाय कि आयो, प्रत्येक शरीर पंच थावरमें तें धरघो। पुनि विकलिंदी इंदी पंच परकार पार, नरक तियर देव, पुनि पुनि संचरघो। घानारसीदास अब नरभव कर्म भूमि, गेटिभेद कोन्दो मोदमारगमें पे घरघो। चेतरे चतुर नर अब हूँ तू गर्यो न त ? इस अवतार आयो एते पार उत्तरपो ॥ ३२॥ ई लोण सागरमें नेक ह न रील करे, क्षारजल बसे पाके शारजल नदी । सीतवदामीतादरिकान्तारकामोतसाद, स्यादी रोप सोई स्वाद कोई कार दे नही।

૮૨ जैनमन्थरताकरे . मुमरि विभावसिंधु समता स्वभावश्रोत, यानारसी लाभ ताको प्रमणको भै नहीं। संगी मच्छ सारिसो स्वभावज्ञाता गहि राख्यो, राख्यो सोई जाने भैया कहवेको है नहीं ॥३३॥ नेननते अगम अगम याही वैननते, उलट पलट यहै फालकूट फहरी । गूल बिन पाये मूह कैसे जोग साधि आये, महज समाधिकी अगम गति गहरी ॥ अध्यातम मुन्यो सोपे सरधान ग आरे, तीसी भैया में तो यही राजनीति चहरी। पानारसीदास शाता जाप गर्भ सोई जाने, उदधि उधानने अधिक मनलहरी ॥ ३४ ॥ सत्व निजकान फयो गत्य परगुण गयो, मनकी लहर मानी से नाग कोगे। टिनको मपी लिन जी के जाप, दिनको भोगी किन गोग पाजोगे। पानागीदाग पता पूछन यश नाक, धायिक मान आ कर पाग। समग ममी भारी पईन नाही, दल पायें मनी लागे मत ॥ १५॥ atternatta बनारसीविलासः --- - - - थिर यंभ उपल विपुल ज्योति सरतीर, सता आये आपनी न कोऊ फाके दलको । मासै मतिविम्ब अम्बु वायुसों अनेक फैन, पूजतो सो दीख पैन पूजे थम यलको ।। जाकी दृष्टि पुग्गठलों चेतन न भिन्न चित, आचरणा देखे सरधान न विमलको। घानारसीदास ज्ञान आतम सुधिर गुण, डोले परजाय सो विफार फर्मजलको ।। ३६ ॥ द्रव्ययकी दोउनकी सरहद देहमात्र, भावथकी लोकपरिमाण वाफी इधिना । भाव सरहद्द याकी अलोकतें अधिकाई, ये तो शुभ काजकारी याने कालू सिधि ना ।। याफे तो अभेद ऋद्धि अमल असंड पूर, वाके सेना परदल फर निज रिपि ना। यानारसीदास दोउ मीहि देवी दुनिया में, एक दिसि तेरी विधि एक दिसि विधिना ॥३॥ धर्मदेव नरफो यचन जैसो गिरिराज, मिथ्याती वचन शुद्धारभको पटेतरो। पारस पापाण जैसे जाति एक जेलो भेद, मूरख दरम में दरश महतो ॥ महन्तको ८४ जैनग्रन्थरताकरे वानारसीदास कंकसार अन्यसार जैसे, जनमको घौस जैसो घोस मरणंतरो। अध्यातम शैली अन्य शैलीको विचार तैसो, ज्ञाताकी मुदृष्टिमाहि लागे एतो अंतरो ॥ ३८॥ नरभव पाय पाय पहु भूमि धाय धाय, पर गुण गाय गाय बहु देह धारी है । नरमप पीछे देह नरक अनेक भव, फिर नर देव नर असंख्यात मारी है ॥ एक देवमय पीछे तियच अनंत भव, पानारसी संसारनियास दुःसफारी है। क्षायफ मुमतिपाय मोह सेना पिनुराय, अप निदानंदराप शकति मभारी है ॥ ३९ ॥ पामर परण शूद्र यारा तय देह बुद्धि, भगुमको काम ताहि तातें पड़ी लाम है। वैश्यको विचार याके कछू करतूति फेर, यश्य वाग योग सोलो नादि जोगरामद।। शनी शुद्ध पानंद जैतवार काग जाये, यानारामीदारा अन् अगम अगान है। जमे याग या लोप सामें नेगी युति दोय, नगी दिलंगी किया क्रियानगो फान ५० एनारसीविलास: ८५ Assnnlan Aanand फटिक पाषाण ताहि मोतीकर माने कोऊ, धुंधची रकत कहा रतन समान है। हंस एक सेत इहां सतेको न हेत कम्, रोरी पीरी भई कहा कंचन बान है ।। भेप भगवान के समान कोऊ आन भयो, मुद्राको मंडान कहा मोक्षको मुथान पानारसीदास शाना शानमें विचार देखो, काय जोग फैसो होउ गुण परपान ॥११॥ घेदपाठचाले ना कहें विचार विना; शिव कोई मिल जान शेव गुणगावही । जैनी पर जतन जतन निजमिल जान, यानारसी कहै पारवाक धुंधधायदी ॥ पौद है. पुद्ध रूप काहू एक देशयमे, न्पायक परनहार ऊरप बनावही । छह दरगनमाहिं एतो आदि छिपि रयो, हट्यो न मिथ्यात ताने प्रगट न पारदी ।। १२॥ भेपपर कोटिक नयो लपचारागीमें, दिना गुरशान परत न शिवमायो । गुरु भगवान सूही भगवानमान्ति रे, भान्निग मुगुरभाप में पीर सारमें ।

८६ बेनग्रन्थरताकरे ALStarailer वानारसीदास ज्ञाता भगवानभेद पायो, भयो है उछाह तेरे वचन कहावमें । भेषधार कह भैया भेपहीमें भगवान, भेपमें न भगवान भगवान भावमें ॥ १३ ॥ मोक्ष चलिवेको पंथ भूले पंथ पथिक ज्यों, पंथबलहीन ताहि मुखरय सारसी। सहजसमाधि जोग साधिवको रंगभूमि, परम अगम पद पढिवेको पारसी ॥ भयमिन्यु नाग्चिको शयद धी? पोत, ज्ञानघाट पाये शुनलंगर लेझाग्मी । मकिन नननिको याक बन अंजनमे, भानमा निहारिखको भाग्मी यनारमी॥१४॥ जिनवाणी दुम्ममादि पिनपा गुमतिद्वार, निनबाद पंदरन्द चहलपहलमें। विवेक विचार उपचार ए. फम्मी कीन्हों, मिथ्यांगोफी मिटि गये ज्ञानकी गहमें ।। नीग्नी गुफलध्यान अनहद नाद नान, गान गुणमान कर गुजग महल में । वानारामीराम मध्यनायर ममामगर, अध्यातमौली चटी मोशः मदसमें ॥१५॥ मिनी.

बनारसीविलासः ८७ रसातल तले पंच गोलक अनन्त जंतु; तामें दोउ राशि अन्तरहित सरूप है। फटुक मधुर जौलो अगनित भिजवाई विष्णताभाव एफ जैसे तेलरूप है॥ जैसे फोऊ जात अंघ चौइन्द्री न कहियत, द्रव्यको विचार मूदभावको निरूप है। यानारसीदास प्रभु वीर जिन ऐसो फलो, आतम अभव्य भैया सोऊ सिद्धरुप है ॥१६॥ लक्षकोट जोरिजोरि कंचन अंचार कियो, करता में याको ये तो करे मेरी शोम को । धामधन भरो मेरे और तो न काम करू, मुख विसराम सो न पावें कई योभको ॥ ऐसो पलवंत देरा मोद गप गुशी भयो, सेनापति थाप्यो असे अदभार मोभको । पानारसीदास शाता शानमें विचार देख्यो, लोगनको लोभ लाग्यो लागे भोग लोभको१७ पायनररण ये ही पढ़त परण पारि, काह प शान पद कार दुख वंदनू । घरण भंडार पंच परण रतनसार, मोर दी भार भाववरण गुजू ॥

८८
जैनमन्थरताकरे
वरणा मिनता मुवरणमें प्रतिमामे,
मुगुण मुनत ताहि होत है अनंद ज् ।
यानारसीदास जिनवाणी वरपन कियो,
तेरी वाणी वरणाय करै य यन्द जू ॥ १८ ॥
शकचंधी सांचो शिरीमाल मिनदास मुन्यो;
ताके यंग मूलदास विरद यहायो है।
ताके वंश क्षितिमें प्रगट भयो सहगमेन,
मानारमीदाग ताके अरतार आयो है।
वीटोलिया गीत गर वतन उद्योत भयो,
आगरनगर ताहि भेटे मुरापायो है।
'यानारगी' 'पानारगी' मालक यम्मान करे,
नागो यंग नाग टाग गाम गुण गायो १ ॥३९
गुशी के मन्दिर कारचन्द गातु पटे,
कोपाल ममा जुर्ग मनभावनी ।
पानारागीटागनी वचनती यात वर्ग,
याकी कया गेगी जानाजानमनगानी ।।
गुणन पुनः गुण काग्वन दान,
पानांवर मीनिकगमान गुहानी।
पट्टी वा अायो तोिना पायो,
म मगाद भी मनमानी ॥५०॥

पगारणीविनामः मोद गोहियागीय गंदन मुंपारमाम, पाउजियारे पन्द्र पवेको पार है। विदशी दिन आयो गुट परकाय पायो, रपरा आपाः उतुंगन यह दार है। पानारगीदाम गुपयोग गुफलयाना, पारिपमधान गिरि करण रहाव है। एक. तो अरथ शुभ मारत वरणार, गरे भरप या दूजो परणाय है ।। ५१ ॥ ऐसयंत ते ताको सहज उदाररिण, आगे को पतो परदान मोहि दीजियो। उपम पुरष शिरीपनारसीदाम यश, पगम्यमाव एक प्यानों मुनीलियो ।। पयनम्यभाव विमतार फीग्यो देशदेश, अमर म्वभाव निज स्पाद रम पीजियो । पायन कवित्त ये तो मेरी मतिमान भये, इसके म्यभाव ज्ञाता गुण गहलीजियो ॥५२॥ सीधीमानारसी मामासानदायनी।

जैनप्रन्यरजाकरे अथ वेदनिर्णयपंचासिका. प्रामणि पन्न। जगतविलोचन जगतहित, जगतारण जग जाना । पन्दहु जगपूडामणी, जगनायक परधाना॥ नमहुं प्रापभम्मामीप्रमुख, जिनचीवीस महन्ता। गुरुग्ण नितराम मुरा, कई वेदपिरतन्ता ॥१॥ मनहरण । (सहोमोली) फेवीक्तिरेर अन्नर गुपत भये, जिनके सदमें अगुतरम गुरहि । अब गागुपद यजुर्वेद शाग अपर्वग, दनहीका परमाय जगन हुवा है। कान पनारगी तपापि मे कईगा का, मही गमगानका मिग्मान मुगा। मन मापन माने उगायेगे, रान गान गिर मान मादे॥२॥ नामिका, विनमानी परमान। नर अमान माननी, जी आन मोबान ॥१॥ NN.- , niti Kharel got trn.

बनारसीविलासः PramanAmarnama प्रमानाम युगादिजिन, रूप चतुर्मुख पार । समयसरण मंडानमें, वेद वखाने चार ॥४॥ घनाक्षरी। मथम पुनीत प्रथमानुयोगवेद जामें, प्रेसठशलाका महापुरुषोंकी कया है । दूजो वेद फरणानुयोग जाके गरममें, वरनी अनादि लोकालोक थिति जया है।। चरणानुयोग वेद तीसरो प्रगट जामें, मोखपथकारण आचार सिंधु मया है। चौथोवेद दरल्यानुयोग जामें दरवके, पटभेद करम उछेद सरक्या है ॥ ५॥ प्रथमद यथा:- - तीर्थकर पौवीम, फाम चौवीस मनुजतन । जिनमाता जिनपिता, सफल व्यालीसआठ गन । चक्रवर्ति द्वादश प्रमान, एकादश फर। नव प्रतिहर नव वासुदेव, नव राम गुभकर ।। कुलफर महन्त चयदह पुरुष, नव नारद इत्यादि नर । इनको चरित्र अरु गुणकथन, प्रथमवेद यह भेद पर ॥६॥ द्वितीयद पपा:- अगम अनंत अलोक, आत अनिमित अखंड सभ । असंन्यातपरदेश, पुरुषाकार लोफ नम ।।

९२
जैनमन्थरलाकरे
ऊरप स्वर्ग अधो पताल, नरलोक मध्यभुव ।
दीप असंख्य उदधि, असंस मंडलाकार भुवः ।।
तिस मध्य अदाई दीपलग, पंचमेरु सागर जुगम ।
यह मनुजक्षेत्र परिमाण छिति, सुरविद्याधरको सुगम ॥७॥
मनहरण।
सोलह गुरग नयग्रीव नव नवोचर,
पंच पंचानुपर ऊपर सिद्धशिला है।
ता ऊपर सिरक्षेत्र तहाँ हैं अनन्तसिद्ध,
एफमें अनेक कोऊ काही न मिला है।
अधोलोक पातालफी रगना अनेकविधि,
नीने सात नरकनियारा पा विला है।
इत्यादि जगतथिति काही दूनोद मादि,
गोई जीव गाने जिन मिण्यात उगिला ॥८॥
तुतीरायेद यगा-
मिग्यारनि नानी गागादन रीति भाभी,
मिश्रगुणधानककी रामी गिन करनी ।
गम्यकवचन मार को गानापरकार,
थायभानार गुन एकारा पानी ॥
परमादीनिकी किया कही अनेकर,
भाग गनिगनदी रिया ममानहरनी।
भारितामा विभाग द्वाद,
पर दोषमुभी एक मामणी यानी ॥१०॥

बनारसीविलासः 22.12 चौपाई। उपशम क्षिपक यथावत चारित । परकृत अनुमोदनकृतकारित ॥ द्विविधि त्रिविधि पनविधि आचारा । तेरह विधि सत्रह परफारा ॥११॥ दोहा। परनन संख्य असंख्यविधि, तिनके भेद अनंत । सदाचार गुणकथन यह, रतियवेद विरतंत ॥ १२ ॥ चतुर्धयेद यथा:-रूपक घनाक्षरी. जीव पुदगल धर्म, अधर्म आकाग काल, येही छहों दरप, जगतके धरनहार । एफ एक दरबमें, अनंत अनंत गुन, अनंत अनंत परजायके फरनहार ॥ एफ एफ दरमें, शकति अनंत बसै, कोऊ न जनम घरै कोऊ न मरनहार । निहरे निवेद फर्मभेद चायवेद माहि, पखाने सुगुरु मान मोहको हरनहार ॥ १३ ॥ चौपाई। येही चारवेद जगमाहिं । सर्व अन्य इनकी परछाहि ।। ज्यों ज्यों धरम भयो विच्छेद ।त्यो त्यो गुप्त भये ये वेद १५ इस छन्दमें बत्तीगवर्ण लघु गुरुके नियमरहित होते है, आ. भाउ भाउ, भाट मिलाकर एष परणमें ३३ वर्ग होते है अन्त में नियमसे लघु होता.

९४ जैनग्रन्थरलाकरे दोहा। द्वादशांगवानी विमल, गर्भित चारों वेद । ते किन कीन्हें कर भये, सो सब परनों भेद ॥ १५॥ युगलधर्म रचना फहों, कुलकर रीति वखान । ऋषभदेव ब्रह्मा कथा, सुनहु मविक पर कान ॥ १६ ॥ युगलधर्मयथा,-चौपाई। प्रथमहिं जुगलधर्म है जैसा । गुरुपरसाद कहहुँ फछु तैसा ॥ जन्महिं जुगलनारिनर दोऊ। भाई बहिन न माने कोऊ॥१७॥ दोहा। मुरसे सीरे सोमसे, यहुरागी यहुमिः । होहिं एफसे जुगल सब, फोतहली विचित्र ॥ १८ ॥ मनहरण। समहीके चिरा अतिसरलस्वभावी निरा, सबहीके विरचिए कोऊ न मुगुलिया। हिये पुण्यररापोप सहजरांतोष लिये, गुननके कोष दुमदीपफे उगलिया। कोऊ नहि लर कोऊ काहको न पन हरे, कोऊ कयहूं न करे काहकी गुगलिया । गमनामदिन संकलगातारदित गय, मुमिया सदीय पेगे जीव है जुगलिया ॥१९॥ १ रगड. बबन करनेवाला.

पनारसीविलासः ९५ भूपन नवीन दर मलहीन सपहीके, घर घर निकट फलपतरुवाटिका । नाही रागद्वेषभाव नाही संघको बहाव, नाही रोग ताप न विलोफे कोऊ नाटिका ।। विविधपरिमह सबके घर देखिये पै, फाफे न पोरि परद्वार न कपाटिका । अलपअहारी सब मृदुतनधारी सब, मुंदरअकारी सर ऐमी परिपाटिका ॥२०॥ पर पर नाटफ होहिं नित, पर घर गीत मॅगीत । कबहू कोउ न देखिये, वदनपीतं भयभीत ॥ २१ ॥ मनारण। जिनके अलप संफलप विकलप दोऊ, थोरो मुसजप अलपअहमता । जिनके न कोऊ अरि दीरप शरीर धरि, विपतिकी दशा धेरै विपति न येवता ॥ जिनके विपे बढ़ाय पत्योपमतीनआय, सबै नर राव कोऊ काइको न रोवता । मपानका भागेश भाग. १शिया पीला दोषारण्य गुग. बोलना (तिभाषि) ५मापना भिनभर मा. पीन परीभायु. ४ जैनमन्थरत्नाकरे ऐसे मद्रमानुष जुगलअवतारपाय, फरि करि मोग मरि मरि होहिं देवता ॥ २२ ॥ जिनके जनम माहि मातपिता मर जाहिं, व्यापै न वियोग दुस शोक नहिं धरना । अपने अंगूठाको अमृतरसपान कर, जिनको अपनो तन बर्द्धमान करना ।। अन्तराल जिनको असानावेदनी न होय, छींक आये अथरा जॅमाई आये मरना । जिनको शरीर सिर जाय ज्यों कपूर उड़े, ऐसो जिनवानीमें जुगलधर्म परना ॥ २३ ॥ चांपाई। जुगलयम जर लेय मरोग । पाकी काल रहे का गोरा ॥ प्रगटदिं तद्दा चतुर्दशमानी । कुलकर नाम कदायें ज्ञानी ॥२५॥ सर गुमान मवकी गति नीकी। सपशंका मेटहि सपनीमी। होहिं विधिन कन्यता ज्योन्योलकर आगम भापदि स्योत्यो। दोहा। को मनि मरि मरि जनम, हरि हरि मानि कहा। धरि परि तन मरिमरि गये, परिकरि पूरा भाय ॥२६॥ यि चादर मनु मये, का कार अन्तरकाल । तीन मान गंगुन मा, मनि अनि अरवि गार ॥२७॥ 5. :.

पनारसीविलासः पाई। रह मनुके नाव जु आने । नाभिराय चौदहें यखाने । रुदेवी तिनकी यरनारी । शीलवंत मुंदरि मुकुमारी ॥२८॥ जाके गर्भ भये अवतारी । ऋपभदेवनिन समकितधारी। तीनज्ञान संयुक्त मुहाये । अगणित नाम जगतमें गाये ॥२९॥ पभदेष कपना- दोहा। अपभदेव जे जे दशा, घरी किये जे काम । ते ते पदर्भित भये, प्रगट जगतमें नाम ॥ ३०॥ जे प्रत्याफे नाम सप, जगतमाहि विख्यात । ते गुणसों करतूनिसों, अपभदेवकी बात ॥ ३१ ।। चौपाई। जनमत नाम भयो शुभवेला । आदिपुरुप अवतार अफेला ।। मातापिता नाम जप राखा अपभकुमार जगत सव भाखा ३२ नाभि नाम राजाके जाये । नाभिकमलउत्पन्न कहाये ।। इन्द्र नरेन्द्र करें जब सेवा । तर कहिये देवनको देवा ॥३॥ वैष्णव सम्प्रदाय कल्पना की है कि श्रीजीने जर पिली पुराके पेट में रसली, तर प्रमाजीने पदके न्द गवाक्षके पत्तेपर सोतेहुये मिले, तब इनके पेट में सन्देह किया. धीरणजीने अपने पेट में इन्हें गुस जाने दिया और फिर मुहबदकर निकलने नहीं दिया, तर प्रभाजी श्रीकृष्ण नाभिमसे बमल रापन र उमरी नालमें पृथिवीमहित नाभिकमलउत्पनहलाये. - जैनप्रन्थरमाकरे M जुगलरीति तज नीति उधरता । तातें कहै सृष्टिके करता ।। असिमसिकृषियाणिनके दाता। ताकारण विधि नाम विधाता।। क्रियाविशेष रची जग जेती । जगत विरश्चि कहैं प्रभु सेती॥ जुगकी आदि प्रजा जब पालें। तब जग नाम प्रजापति ऑल ३५ दोहा। कियो नृत्य काहू समय, नटी अप्सरा वाम । जगत कह ब्रमा रचो, तिय तिलोत्तमा नाम ॥ ३६॥ चौपाई। गुरुविन भये महामुनि जय ही । नाम स्वयंभू प्रगटोतरही। ध्यानारूह परमतप साधें । परमइष्ट कह जगत अराधे ॥३७॥ भरतवंडफे प्राणी जेते । प्रजा भरतरानाके तेते । भरननरेन पमफी मासा । ताते लोक पितामह माग्वा ३८ फेयरमानरूप जय होई । तर प्रामा माप सर फोई ॥ कंचनगाभिन जग मा । नाम हिरण्यगर्भ परफामै ॥३९॥ कमलामनपर बठिक । देहि धर्म उपदेश। घमर छत्र लय जग कह । कमलाशन लोकशा ॥१०॥ चराई। भातमभूमि कप दामाये । नदि भान्मभू नाम कहा ॥ मकरजीवी रक्षा माग | नाम मापातु जग राम् ॥२१॥ १. यो अर्गन मा.

समयसरनयहिं चौमुखि दोस चतुरानन कह जगत अशीस १६ मधारबिना पेदधुनि भासै । रचना रच गणघर परगास ४२ पारवेद कहिये तब सेती । द्वादशांगकी रचना पती ।। जपनि मुनि अनतता गहिये। तर प्रमुअनंतातमा कहिये ४३ मादिनायादीधर जोई । आदि अन्तविन कहिये सोई ।। फरे जगत इनहीकी पूजा ये ही ग्रल और नहि दूजा १४ जपली जीव मृपामग दौरे । तरलो जाने वाला और ॥ जय मफिन नैननसो सूशे महा अपभदेव तम बुझे ४५ दोहा भादी पर ग्रमा भये, किये वेद जिन चार । नामभेद मतभेदसों, पदी जगतमें रार १५६ ॥ ग्रामलोक पाई। पौर उत्ति मेरे मन आप । सांचीपात सरनको भावे ।। प्रया ब्रह्मलोकको पासी । सो वृतान्त कहों परफासी॥४७॥ पुरलिया। ऊपर सब मुरलोके, मालोक अभिराम । सो सरचारथसिदि तप, पंचायतर नाम । पंचानुपर नाग, पाम एका अवतारी । तह पूर्वभव बसे, अपभाजन समक्तिधारी।। अपलोकों पये, भये प्रक्षा इदि भूपर। ताते लोफ कहान, देय प्रक्षा सप ऊपर ॥ १८॥ । INRNA ANAL जैनमन्थरत्नाकरे चौपाई। आदीश्वर युगादि शिवगामी । तीनलोकजनअंतरजामी ।। ऋषभदेव ब्रह्मा जगसारखी। जिन सब जैनधर्मविधि माती ऋपमदेवके अगनितनाऊ । कहाँ कहां ली पार न पाऊँ ।। वे अगाघ मेरी मति हीनी । तातें कथा समापत कीनी ॥ ५० पदपद। इहिविधि ब्रह्मा मये, ऋपभदेवाधिदेव मुनि । रूप चतुर्मुस धारि, करी जिन प्रगट वेदधुनि ।। तिनके नाम अनंत, ज्ञानगर्भित गुनगूझे । मैं तेते वरणये, अस्य जिन जिनके वझे ।। यह शब्दब्रह्मसागर अगम, परमब्रह्म गुणजलसहित । किमि लहै वनारसि पार पद, नर विदेक मुजबलरहित ॥५१॥ इति वेदनिर्णयपचानिन.

पनारसीविलासः -- अथ प्रेशठशलाकापुरुपोंकी नामावली. वस्तुमा नमो निनवर नमो जिनवरदेव चौवीग । नरद्वादमा पत्रपर, नव मुरुन्द नव प्रतिनारायण । नव इलयर सफल मिलि, प्रभु प्रेट शिवपयपरायण ॥ ए महंत त्रिमुवनमुकुट, परमधरमपनपाम । ज्यों मो अनुक्रम अयनरे, मोत्यो पानी नाम ॥ ॥ मोटा। कई तद्भव सिद्ध, निकटमय्य फेई पुरुष । मृपागंटि उरविद्ध, मुमति लाकापर मकल ॥२॥ अपभनिनवर अपमानिनयर भरतवीर। श्रीमजित जिनेश हुन, मगरभक्रि गमतीर्थकर । अभिनंदन गुमनि जिन, पप्रमभ मुपास श्रीपर थीपन्द्रमभु गुविधा जिन जीनार जिन पांश। भयग्रीव प्रतिहर भयो, सपा विषय गुवा ॥१॥ मोरया दरि रिष्टि जिन आय, बागुपूप जिन माराम । सारण मतिरि पाय, हलपर अपर दिष्टि तर !! विमम जिनयर विमल जिगर य RRfree १०२ जनप्रन्यरलाकरे वल धर्म स्वयंभूहरि, जिन अनंत मधु प्रतिदामोदर । वल मुमम नाम हुव, पुरुषोत्तम हरि तामु सोदर ॥ धर्म जिनेश निशुंभ प्रति, नारायण नरमेस । राम मुदर्शन नाम हुव, हरि नरसिंह नरेस ॥ ५ ॥ सोरठा। मघवनाम चक्रेश, चक्री सनतकुमार हुव । चक्री शांति नरेश, मयहु शांति जित शांतिकर ॥ ६॥ वस्तुष्छन्दा कुंयु चक्री कुंयु चक्री, कुंषु सर्वज्ञ । अर सार्वभौम हुव, अर जिनेश प्रहलाद प्रतिहरि । वलभद्र मुनंदि हुव, पुंडरीक हरि बंधु तामु घर ।। सार्वभौम मुभीम हुव, पलि प्रतिहरि अवतार । नन्दिमित्र वलदेव हित, केशव दत्तकुमार ॥ ७ ॥ सोरटा। पदम चक्रि जिन मल्लि, विजयसेन पटखंडनित । मुनिमुनत हरि अल्लि, चक्रवर्ति हरिपेण हुव ॥ ८ ॥ वस्नुधन्द। मयह रावण भयहु रापणनाम प्रतिकृष्ण । रघुनन्दन राम हुव, यामुदेव लक्ष्मण गणिजे । नमि जिनवर नेमि जिन, जरासंघ प्रतिदरि मणिजे ॥ धर्मप्रभ. २ मधुवंटम. १ सहोदर, माई (हलपर) ४ मा. ५ देवदत. जयसेन.

बनारसीविलासः हलधर पदम मुरोरि हरि, प्रयदत्त चक्रीस । पास जिनेमुर वीर जिन, ये नर तीनत्रिवीस ॥९॥ मोरहा। विभुवनमाहिं उदार, प्रेशठ पद उत्कृष्ट जिय । भाविभूल उपचार, बन्दै चरण बनारसी ॥ १० ॥ तीर्थकर नामापली-पदपद । पभ अजित संभव जिनंद, अभिनंद सुमति घर । श्रीपदमप्रभ श्रीमुपास, चन्द्रप्रभ जिनवर ।। मुविधिनाय शीतल श्रेयांसप्रभु वासुपूज्य वर । रिमल अनन्त मुधर्म शांति जिन कुंथुनाय अर ।। प्रभु महिनाय त्रिभुवनतिलक, मुनिमुमत नमि नेमि नर । पारस जिना वीरेश पद, नमति बनारसी जोर कर ॥१२॥ चनपनिनाम-दोहा। भरत सगर मधवा सनत, कुँवर शांति कुंथेश । अर मुभीम पदमारची, जय हर्षेण ब्रोश ॥ १२ ॥ प्रतिनारायण नाम दोहा। अश्वनीव तारक मधू , मेरु नि म प्रहलाद । बलिराजा रावण जरा, सन्ध मुमतिहरिवाद ॥ १३ ॥ नारायणनाम-दोहा। त्रिपिप द्विपिष्ट वयंभु पुरु,-पोचम नरसिंहेश । पुण्डरीक दोधिपति, सहमण हरिमथुरेश ॥ १४ ॥ १धीकृष्ण (९) २.२.+to+to+ १३.रादेप. प. ..

जैनप्रन्यरलाकरे
यलमद्रनाम-मोहा।
विजय अचल बल धर्मधर, सुप्रम सुदर्शन नाम ।
मुनंदि नंदिमित्रेश रघु, नाथपदम नवराम ॥ १५॥
इति श्रीटिशलाशाची नामावली
अथ मार्गणाविधान लिख्यते.
पोता
यन्दहुं देव जुगादिमिन, मुमरि मुगुरु गुममाम ।
चवदह मारगणा कहहुं, परण? यामट माग ॥१॥
चौगाई।
मम मयं हार कर्याय । दरमीन जान जोग गनि कार्य।
या मस्ति गनी वेद । इन्द्रिय महितयारभर ॥ २
प बौदह माग्गणा मार इनके यागट भेद उदार ।।
बागट मंगारी जिय माल इनहिं उलंधि होय गियराय ॥ ३॥
गंत्रम गात मग माय । मिरिभि सहारी चार काय ॥
दर मार आठविधि शान । जोग नीन गति पारिधान
पर काया पक्ष्या पर होगा पर गमपित गनीशिपदीय।
देर नीति न्द्रिय पर गाल दी गति मागद
इना नाम दधिमार वा जिनानी अनुगार ।
बगटमा म्यांग घानीयको गन्य जगमा मनी ॥६॥

एनारसीविलासः
.
असंजम रूप विशेष । देशसंजमी दूजो भेष ॥
सामायिक मुखधाम । चौथा छेदउथापन नाम ॥७॥
पद परिहारि विशुद्धि । सूक्षम सांपराय पट बुद्धि ॥
ल्यात चारित सातमा । सातों स्वांग परै आतमा ॥८॥
। अभव्य स्वाग धर दुधा । करै जीव जग नाटक मुधा।
-हारक आहारी होय । नाचें जीव स्वांग पर दोय ॥९॥
हं झोप अगनि लहलहै । कयहूं अष्ट महामद गहै ।।
नहूं मायामयी सरुप । फरहं मगन लोभ रसम ॥१०॥
र कपाय चतुर्विध भेष । पर जिय नाटक कर विशेष ॥
-हू चक्षुदर्शनसों लसै । कहुं अचक्षुदर्शनसों चखे ॥११॥
बहू अवधि दर्शन मु प्रयुज । फहं मुफेवलदरशन पुंज ।।
पर दर्शन मारगणा चारि । नाटक नटै जीव संसारि ॥ १२॥
कुमतिज्ञान मिथ्यामति लीन । कुश्रुति फुआगममें परवीन ।।
घरे विभंगा अवधि अजान । सुमति ज्ञान समकित परवान १३
मुथतिज्ञान परमागम गुणे । अवधि ज्ञान परमारथ गुणे ।।
मनपर्जय जानहिं मनभेद । केवलज्ञान प्रगट सब वेद ॥१॥
एही आठ जानके अंग । न जीव इनरुप रसंग ।।
मनोजोगमय होय कदाचि । योलै वरन जोगों राषि॥१५॥
फायजोगमय मगन म्पकीय । नाच विविधि जोग पर जीया।
मुग्गति पाय फरै सुम्पभोग । समसुखदुख नरगति संजोगा॥१६॥
पर्दुस अस्पमुम्बी तिरबर । नरक महादुख है मुरा रंग ।।
पहुंगति जम्मन मरण कलेस । नटै जीव नानारसमेस॥१७॥

जैनमन्थरलाकरे
पृथिवी काय देह निय घरै । अपकायिकमय है अवतर
अगनिकायमहिं तपत म्वमाय । वासुकायमहि कहिये वाय
वनमपती रूपी दुबमूल । लहि त्रसकाय धेरै तन थूल
पटकाया पटविधि अवतार । धरि धरि मरे अनन्ती या
परै कृष्णलेश्या परिणाम । नीललेश्यमय आतमराम ॥
फिर धारे लेश्या कापोत । सहज पीतलेश्यामय होत ॥
चेतन पदमलेश्य परिवान | करै शुफललेझ्या रसपान ।
इदिविधि पट लेश्या पद पाय । जगवामी शुभ अशुभ फमा
घर मिथ्यात्व झूट सरदहै । यमि समकित मामादन गं
सत्य असत्य मिश्र ममकाल सीध समफित शायक पा
उपमम यो धरै यहुबार । ये वेदकम्प विचार ।।
घर पट गमकिन म्याग विधानको नृत्य जिय जान अगा
सनील अमेनीए । दुविषिम्याग जिप पी अनुए
पुरषद नृण अगानि उसाद । वियरेदी कारीमादाद ।।
यनदयदाद नामवेद । नौ जीय परा विर॥
थापामादि कन्दी होय । प्रम गंगारिक इन्द्रिय दोया
Friशादिक इन्दी मीनि। भागिन्द्रिय प्रमादी
पचन्द्र देवादि । म माईट माग्गणा पर ।
बानाय मागगाAITA मंग पहा ॥
बर मागागा मा दानय शिय मा मातमे।

बनारसीविलासः दोहा। ये मासद विधि जीयक, तनसम्बन्धी भाव। तन ननबुद्धि बनारसी, मोजे मोक्ष उपाय । २८ । रविवागर मार्गणा विधान. अथ फर्मप्रकृतिविधान लिख्यते. पामशंकर पामशंकर, परमभगवान्, परब्रम अनादि गिय, अत्र अनंत गणपति विनायक । परमेश्वर परमगुर, परमपंथ उपदेशदायक। इत्यादिफ ब नाम पर, जगतपंप जिनराज । जिनके चरण यनारसी, वंदै निजदितकाज ॥१॥ नमो फेवली के बचन, नमो आतमाराम । कही कर्मपी प्रकृति सब, भिषा मिष पद नाम ॥२॥ चौपाई. (१५मात्र) एफदिम मारिधि दीस ! प्रकृति एक्सी अतालग निनके नाम भेद विस्तार । वरण९ जिनवाणी अनुरार ॥३॥ प्रथमफर्म मानावरणीय। जिन मय जीव अशानी दीप । हिनिय दर्शनापरण पहार ! जाकी ओर पलाय कारता तीजा कर्म बेदनी जान नामो निशवाय गुणहान । श्रीधा महामोद जिन मने । सो समषित र सरिता जैनमन्थरताकरे पंचम आयकरम परधान। हनै शुद्ध अवगाहममान ।। छटा नामकर्म विरतंत । करहि जीवको मूरतिवंत ॥ ६ ॥ गोत्र फर्म सातमों वसान । जासों ऊंच नीच कुल मान ॥ अष्टम अन्तराप विस्न्यात । फरै अनन्तशतिको पात ॥७॥ 'दोहा। पदी आठों फरममल, इनमें गर्भित जीव । इनहिं त्याग निर्मल मयो, सो शिवरूप सदीय ॥ ८ ॥ चौपाई। कहो कर्मतरु डाल सरीस । प्रति एकमो अदतालीस ।। मतिमानायरणी जो कर्म । मो आवरि राम मतिधर्म ॥९॥ अतिज्ञानाररणी पल जहा । गुमश्रुतशान पुरै नदि सहा ॥ प्राधिज्ञान भागरण उदोताजियको अभिमान नहि होत१० मनपरनय भावरण प्रमान । नादउप मनस्य शान || फेरलानाररणी का । ताहि गमिन कयास || ११ ।। वरणी भानावरणकी, प्रकृति पंचपरकार । अर दर्शन आवरण तर, कहहुं नागु नर डार ॥ १२ ॥ पादानागरणी बघ । जो गिय को होरि गो भए । प्रदर्शनावरण बंधेर । समद फरम ग गप न पेवा १२॥ भदिनाारण उदोन मिल अपविगंन ना हो। कालदर्श भावाण हान होय ननद १५॥ न्यानदि निदायग पर । मो पानी पियरी ।। टिटिकाको मुबाला कर मर ५५

मनारसीविलासः
निद्रानिदा उदय स्वकीय : पला उघाड़ मकै नहिं जीव ।।
पपलामचला जावतकाल । संसल अंग यहै मुग लाल १६
निदा उदय जीव दुस भरे ।उठ चाले थेठे गिरि परे
रहे आप मचलासों घुली । आधी मुद्रित आधी तुली १७
सोक्तमाहिं सुरति कह रहे । पारमार लघु निद्रा गहे ॥
इति दर्शनावरणि नवधार । कहीं येदनी द्वयपरकार ॥१८॥
दोहा।
साना करम रदोतसों, जीव विषयमुरा वेद ।
करम असावाके उदय, जिय वेदे दुग्ध खेद ॥ १९॥
दीपाई।
अब मोहिनी दुविधिगुरुभने ।इफ दरसन हक पारित हुन ।
दर्शनमोह तीन विधि दीस । पारितमोह विधान पधीय २०
प्रथम मिथ्यातमोहफी दौर । जिय सरदद औरकी और ।
दजी मिश्रमोडकी पाल । सत्य असत्य गर्दै समकाल ॥२१॥
समषितमोर तीसरी दशाकरे मलिन रामकितकी रमा !
अप कपाय सोलहविधि कहाँ नोकपाय नयविधि सरदही २२
मयाकपाय कराये कोप । जाके उदय हिमागुणोप।
द्वितियफपाय मान पर विनय विनास पर पता॥२२॥
सीजी मायारूप पाय । जाके उदय सरलता जाय ।
शोभापाय पर्समभेद। जामु उदय मेनोर उऐद ॥ २५ ॥

११२ जैनमन्यरताकरे ते तिराणवै कहूं यखान । पिंड अपिंड वियालिस जान ॥ प्रथमपिड प्रकृतीगतिनाम । मुर नर पशु नारक दुरधाम ।। मोरठा। सुरगतिमों मुर गेह, नरशरीर नरगति उदय । पशुगनिसों पशुदेह, नरकरसाचे नरक गति ॥ ४५ ॥ चौपाई। चहुंगति आनुपूरची चार । द्वितिय पिंड प्रकृती अवधार ।। मरण समय तज देद सकीय । परमय गमन करे जय जीव ॥१६ आनुपूरवी प्रहनि पिरेरि । भावीगति में आने परि॥ आनवी होय महाय । गहै जीव ननन परजाय ।। ४७ ।। मृनिय प्रति इन्द्रिय अधिकार । इग दुगतिग पदु पंच विचारा। फम्मम्मन नामा हग कान । जयाजोग जिय नाम सम्मान1८॥ तन इन्द्रिय पार जो कोय । मुम नामा हग कान न होय ॥ मी एकन्द्रिय पावर काय । म जल अगनि यनम्पति याय ॥१९॥ आक तन रगना द्वय थोक। गंग गिरोला जम्मा आफ।। इत्यादिक जो जंगम नन्न । ते हैदी कह मिदन ॥ ५० ॥ आनन गुम नाम हनुर । पुनरिका कानगर । इत्यादिक नहन्द्रिय जीव । म कानमोहन गाय ॥५१॥ सकेनन गना नागा मागिरम टी आर मा-ि40 इत्यादिक भानमगम । नगमे चोदी नाम देगन नामा ग कान । विनोदी मान ।। नर नारी शनिशग इन पार इन्द्री पर ॥ ५ ॥ ।

। বাখ মারি রং বিষ। সাংস্ক থিঙ্ক সাং। नजस फार्माण मिल पंच । औदारिक मानुप तिरजच ॥ ५४॥ वैशिय देव नारकी धरै । मुनि तरल आहारक फरै ।। सेजस पार्माण तन दोय । इनको सदा धेरै सबकोय ॥ ५५॥ मी उदय तथा तिन गही। चौथी पिंड प्रति यह कही। अय संपन मंपातन दोय । प्रकृति पंचमी छटवी मोय ॥५६॥ पंपन उदय काय पान | संपातनो दिद संधान ।। दु९फी दश ला द्वय सघ । जयाजोग काया संबंध ॥ ५७॥ सर सातमी मति परसंग । कहों तीन तन अंग उपंग ।। औदारिक यैनियक अहार ! अंग उपंग तीन तनधार ! ५८॥ दोहा। मिर नितंब उर पीट फरि, जुगल जुगल पद टेफ। आट गये तनविष, और उपग अनेक ।। ५९ ॥ तेजस फार्माण तन दोय । इनके अंग उपंग न होय ॥ पाह{ आठमी प्रति विशार । पद संस्थान रूप आकार ६० जो सवैग चार परधान मो है समचतुरस संठान ।। अपर धूल अधोगत धाम । सो निगोधपरिमंडल नाम ॥६॥ हे भूल ऊपर हम होय । साविक नाम कहा- सोय । पर सहित पर पशु बासु । कुवन अझार नाम है सामु॥२॥ लघुरूपी लघु अंग विधान सो फहिये सामान संठान । ओ रबंग असुंदर मुंड । मो संठान कहावे हुंड ।। ६३ ॥

१२४ जैनग्रन्यरलाकरे , कही आठमीप्रकृति छभेद । अब नौमी संहनन निवेद ।। है संहनन हाइको नाम । सो पविधि यभै तन धाम ॥६४॥ : बन कील कीलित संधान । ऊपरि वजपट्ट बंधान ।। अंतर हाड वनमय वाच । सो है पापभनाराच ॥६५॥ जह सब हाइ यत्रमय जोय । बजमेख सो अविचल होय ॥ ऊपर वेढरूप सामान । नाम वजनाराच वखान ॥ ६६ ॥ वन समान होहिं जहँ हाड । ऊपर वनरहित पट आइ ॥ वजरहित कीलीसों विद्ध । सो नाराच नाम परसिद्ध ॥६७ ॥ जाके हाड़ पत्रमय नाहिं । अर्द्धवेघ कीली नसमाहिं ।। ऊपर वेठबंधन नहिं होय । अर्द्धनराच कहांचे सोय ॥ ६८॥ जहां न होय यजमय हाड । नहिं पटबंधन कीली गाह ।। कीली दिन दिढ बंधन होय । नाम फीलिका कहिये सोय६९ जहां हाइसों हाइ न बंधै । अमिल परस्पर संधि न संधै ॥ ऊपर नसाजाल अरु चाम । सो सेपट संहनन नाम ॥ ७॥ ये संहनन विधि वरणई । नवमी प्रकृति समापति भई ॥ दशमी प्रकृति गमन आकाश | ताके दोय भेद परफारा १ दोहा। शुभविहाय गनिके उदय, मली चाल जिय धार । अशुभविहाय उदोतसों, ठान अशुभ विहार ॥ ७२ ।। परिछन्द। अब कहूं ग्यारमी प्रकृतिसंच । जो वरणभेद परफार पंच ॥ मित अरुण पीत दुति हरित श्याम ये वर्ण प्रतिके पंच नाग ७३

पनारमीकिगमः
यो पर्ण मानिसक, दोन । साकोरीर निह पप होत ॥
रग माम महानि वाग्मी जान।मो पंचभेद विवरण पसान
पर मर निग. सामन पाय । ग्मादय रमीनदोय काय ।
जाको यो ग ती उदोन । साफ सन सो स्वाद होत ७५
नेही मानि गंधमयो होय । दुगंध गुगन्ध फार दोय ॥
मोजीर जो मानिफर पंधाविद उदय तामु तन सोर गध७६
अर फाम नाम पीनी पानि निम कहो भाउसासा पसानि।
पीपनी रक्ष पोमल पटोर । रघु भारी शीतर सप्त बोर ||७७॥
रोदा।
मानि पीपनीफे उदय, गहे पीकनी देह ।
कभी प्रकृति उदोतमों, स्मीकाया मेह ।। ७८ ॥
पटिन उदयमों पटिन तन, मृदु उदोउ मृदु अंग।
तपतउदयमों तपतवन, शीतउदय शीतंग ॥ ७९ ॥
पररि
जह मारी नाम परकृति उदोत । वह भारी तनपर जीव होत ।।
लघुमति उदयपर जीव जोय। अति हरई काया धरै सोय८०
एपिंडप्रकृति दाचार भाखिइनहींकी पैमठ कही सासि ॥
भर अहावीम अपिष्ट टानि । तिनके गुणरूप कहो यसानिटर
जय प्रकृति अगुरुलघु उदयदेय ।तर जीव अगुरुलघु तन परेप
उपपात उदय सो अंग व्यापाजासों दुस पावे जीव आप॥८२॥

११६
जैनग्रन्थरताकरे
परघात उदयसों होय अंग । जो कर औरको प्राण भंग ।।
उस्सासप्रकृति जब उदय देय । तव प्राणी सास उसास लेय८३
आतप उदोत तन जया भान । उद्योत उदय तन शशि समान
त्रस प्रकृति उदय धर जीव जोय । जंगम शरीरघर चले सोय८४
थावर उदोतघर प्राणघार । लहि थिर शरीर न करै विहार ।।
सूक्षम उदोत लघु देह जास। सो मारै मेरै न और पास ८५
बादर उदोत तन थूल होय । सबहीके मारे मरै सोय ॥
परजापति प्रकृति उदय करंत । जिय पूरी परजापति धरंत८६
जो प्रकृति अपर्बापत धरेय । सो पूरी परजापत न लेय ॥
प्रत्येक प्रकृति जाके उदोतसो जीव वनस्पति काय होत॥ ८७॥
जब तुचा काट फल फूल पात । जहँ वीज सहित जियराशिसात।।
जो एक देद्दमें जीव एक । सो जीवरागिकहिये प्रत्येक ।। ८८ ॥
प्रत्येक वनसपति द्विविधिजान । मुप्रतिष्ठित अप्रतिष्ठित वसान।।
जो धारै राशि अनन्तकाय । सो मुप्रतिष्ठित कहिये मुभाय ॥८९॥
जाम नहिं होय निगोदधाम । सो अप्रतिष्टित प्रत्येकनाम ॥
अव माधारणवनसपति काया सोसूच्छम वादर द्विविधि थाय९०
सूच्छम निगोद जगमें अमेय । वादर यह दूजा नामधेय ॥
परि भिन्न भिन्न कार्माण कायामिलि जीव अनन्त इकत्र आय९१
संग्रहहि एक नो कर्म देह । तिम कारण नाम निगोद एह ॥
सो पिण्ड निगोद अनन्तरास । जियान अनंतानंत माम॥२२॥

IANE पनारसीविलासः भर रहे रोकनभमें मदीव । ज्यों घड़ामादि भर रहै पीय ॥ सूक्षम अरु धादर दोय सान्न । पुनि नित्य अनित्य दुभेदभास ९३ जो गोलकरूपी पंचधाम । अहर संडर इत्यादि नाम । से सातनरको हेट जाना पुनि सकललोकनभमें वसान ॥९॥ एक निगोदारीरम, जीव अनंत अपार । धरें जन्म सर एकठे, मरहिं एक ही बार ॥ ९५॥ मरण अठारद पार कर, जनम अठारह येव । एक म्यास उभ्यासमें, यह निगोदफी टेव ॥ ९६ ॥ एक निगोदशरीरमें, पते जीव पखान । तीन फालके सिद्ध सर, एक अंश परिमान ॥ ९॥ न मिद्ध अनंतता, पटै न राशि निगोद । जैसे तैसे रहें, यह जिनवचनविनोद ॥ ९८॥ ताने पान निगोदकी, कदै कहाली कोय । माधारण प्रकृतीउदय, जिय निगोदिया होय ॥ ९९ ।। यह साधारण प्रकृतिलो, यरणी चौदह सास । याकी चौदद ले रहे, ते वरणों मुम्प भाख ॥ १०॥ पदरिया धिरमवृति उदयथिरता अभम । असिर उदोतसों अधिर अंग॥ मुगुममतिउदय शुभरीति सर्वज अगुभउदय तह अशुभपर्व १ सौभागमहति जाफे उदोत । सोमाणी सपको इष्ट होत । दुर्भागप्रकृति के उदय जीव । सपको अनिष्ट लागै सदीय ।।२।। ।

११८
जैनमन्थरनाकरे
#
जहँ मुम्वरप्रकृति उदय वखान । तहँ कंट कोकिला मधुरवान
जो दुस्वरप्रकृति उदोत धार। ताकी ध्वनियों गर्दमपुकार ॥३॥
आदेयप्रकृति जाके उदोत | ताको बहु आदर मान होत ।।
जब अनादेयको उदय होय । तब आदर मान कर न कोय |||
जसनामउदय जिस जीव पाहि। ताकी जस कीरति जगतमाहिं।।
जहँ प्रगट मालमहँ अजसरेख । तह अपजस अपकीरति विशेख ५
निर्माणचितेरा उदय आय । सब अंगपंग रचे बनाय ॥
तीर्थकरनामप्रकृति उदोत । लहि जीव तीर्थकरदेव होत ॥ ६॥
दोहा।
ये निगनवे और दग, तनसंबन्धी आन ।
मिलहिं एकसोतीन सब, होहिं नामकी वान ॥ ७ ॥
चौपाई।
नामप्रकृति संपूरण मई । पिंड अपिंड कही जो जुई।
पिण्डप्रकृति चौदह पनि रही। तिनकी पैंसठ शाखा कही ॥८॥
अट्ठाइस अपिंड वरनई । ते सब मिलि तिरानवे भई ।।
वरनों गोतकरम सातमा । जासों ऊंच नीच आतमा
ऊंचगोत उद्योत प्रवान । होय जीव उच्चकुलथान ।।
नीचगोत फलसंगति पाय | जीव नीचकुल उपजै आय॥१०॥
गोत्रकर्मकी द्वयप्रकृति, तेह कहीं वसानि ।
अतंराय अब पंचविधि, तिनकी कहों कहानि ॥ ११ ॥

बनारसीविन्दासः
अंतराय अष्टम पटमार । सो है भेद पंच परफार ॥
अन्तराय तरकी है डार । निह एक एक विवदार ॥ १२ ॥
कहाँ प्रथम निहचकी बात ! जामु उदय आतमगुण पात ॥
परगुन त्याग होहि नहिं जहां । दान अन्तराय कहि सहा १३
आतमतत्वलाभको हान । लामअन्तराई सो आन ॥
जरलों आतमभोग न होय । भोगअन्तराई है सोय ॥ १४ ॥
भारमार नबी उपयोग । सो अन्तराय उपभोग ।
अकर्मको कर न जुदा । चीरज अन्तरायका उदा ॥ १५ ॥
निहले कही पंच परफार । अब मुन अन्तराय बिहार ॥
तीवस्तु फा देय न सबै दान अन्तराई एल ॥१६॥
उद्यम कर न सपति होय । लाम अन्तराई है सोय ।।
विपयोग सामग्री ती जीव न भोग पर सकरती ४१७॥
रोग दोय के भोग न जुरे । भोगअन्तरायरल पुर १
एक भोगगामग्री सार । ताकी भोग जु पारंवार ॥१८॥
को सो कहिये उपभोग । ताहू को न जुरे संजोग ।।
यद उपभोगपातकी कथा धीरजअन्तराय सुन जथा ॥१९॥
शति, अन जीवकी कही । सो जगदशामादि दर रही।
जग शक्ति कर्मआधीन । कयह सपल कई महीन ॥२०॥
तनन्दियपल पुरन जहाँ वीरजअन्तराय हो !!
साते जगतना परवान बनय रायी भावी भगवान ॥२९॥

०
जैनमन्थरताकरे
दोहा।
Totatutatatatatatatatatatt
ये वरणी व्यवहार की, अन्तराय विधि पंच ।।
अन्तर बहिर विचारतें, । संशय रहै न रंच ॥ २२ ॥
स्यादवाद जिनके वचन, । जो माने परमान ।
सो जाने सत्र नयदशा, । और न कोऊ जान ॥ २३ ॥
सर्वघातियाकी प्रकृति, । देशघातियावान ।।
वाकी और अपातिया, । ते सब कहों वखान ॥२४॥
लज्ञानावरणी वान । केवलदरशआवरण जान ।।
पंच चौकरी तीन । प्रकृती द्वादश लीजे चीन ॥२५॥
तबंध अमत्याख्यान । प्रत्याखान चौक त्रिक जान ॥
मिथ्या मिश्रित मिय्यात। ए.इकवीस प्रकृति सर घात २६
दोहा।
वातियाकी कही । विशति एक वखान ।
वरणों छत्रीसविधि । देशपातिया वान ॥ २७ ॥
चौपाई।
लज्ञानावरणी विना | वाकी चार आवरण गिना ॥
लदरशआवरण छोड़ । याकी तीनों लीजे जोड़ ॥ २८ ॥
भेद संग्वलनकपाय । नवविधि नोकपाय समुदाय ।।
पप्रकृति मिय्यात वसान । अन्तरायकी पांचों वाना॥२९॥
ब्धीम प्रकृति सब मई । देशयातियाकी वरनई ॥
रही एकसी एक । ते सब कही पानि अतिरेक ॥३०॥

बनारसीविलासः
दोहा।
द्विविधिगोत्र द्वय वेदनी । आयु चारविधिजानि ।।
मिल तिरानवे नाम की एकोचरमत यानि ॥ ३१ ।।
चौपाई।
जे पातहिं सब आतमदर्व । ते ही कही पातिया सर्व ॥
जे । कछु पात करहिं फल नाहिं । देशपातिया ते इन माहिं ॥३२॥
जे न करहिं आनमल पात । ते अपातिया कही विख्यात ॥
अव मुन पुण्यपापके भेद । भिन्न भिन्न सम कहो निवेद ३३
एक सातादनी म्वभाव । नरफआयु विन तीनों आव ।।
ऊंचगीन भानुपगति भली । मानुपआनुरवी रली ॥ ३४ ॥
सुरगति मुरानुपूरवि जान । जात पंचेन्द्री एक यखान ।।
पंचशरीर पंच सघात । धनसदित पनसंगात ॥३५॥
अंग उपग तीनविधि भाम । विशनि वर्ण गंध रस फार ।।
पहिला समचतुरम मंटान ! समपमनाराच पसान ॥ १६॥
भली चाल आतप उग्रोत । पर परपात अगुरुत्या होत ॥
साग उसास प्रतेक प्रवान । प्रस पादर पर्यापत जान ॥२७॥
मिर शुभ शुमग सुखर आदेय । सनिर्माण तीर्थकर धेय ॥
पुण्यप्रकृतिकी अइसठ यान । पापप्रकृति अब फहो पखान३८
सर्वपातियाकी इकचीस । देशपातियाको छब्बीस ।।
ये सैतालिस माती पदी । यात्री और करहुँ जो रही ॥३०॥

१२२ जैनग्रन्थरताकरे प्रकृति असाता नीचकुल, नरकआयु गति दोय । पशु नारकि इन दुहुनकी, आनुपूरवी जोय ॥ १० ॥ चार जाति पंचेन्द्री विना । पंचसंहनन प्रथम न गिना ।। समचतुरसविन पंचप्रकार । वर्णादिक विशति परकार ॥११॥ खुरी चाल यावर उपघात । सूक्षम साधारण विख्यात ॥ अनादेय अपर्यापत दशा । दुर्भग दुस्वर अशुम अपजशा ४२ अथिरसमेत एकसो वान । ए सब पापप्रकृति परदान ।। केती बंध उदय फेतीक । तिनकी बात कहों अब टीक||१३|| दोहा। चारबंध वरणादिमें, बाकी मोलह नाहिं। एक बंधमिथ्यातमें, द्वै गर्मित इसमाहि ॥ ४४ ) तनबंधन सघातकी, प्रकृति पंचदश जान | पंच बंध दश बंध विन, ये अहाइस वान ॥ ४५ ॥ अट्ठाइसको बंध नहि, बंध एकसोवीस ।। इनमें दोय बदाइये, होहिं उदययावीस ॥ १६ ॥ चौपाई। पंध उदय विशेष यह बात । एक मिथ्यान तीन मिय्यात ।। एई दोय अधिक परनई । प्रकृति एक बाविम भर्द ॥ १७॥ अब विपशक वरनों विधि चार । पुद्गल जीव क्षेत्र भय धार । जे पुलविशारकी यान । ते यामटविधि कहों यखान ॥४८||

पनारमीबिनामः
१२३
1
पर परीर पंधर्मपान । भंग उपंग अठारह पात ।
द मंहनन हो गठान । पदिक गुण बीस पान ॥१९॥
भिर उदोन आतप निरमान । अधिर अगुरुलगु अनुभ विधाना।
माधारण मतेक. उपपान ! शुभ परपात मुबामठ यात ॥५०॥
जीव विपाक असर गनी । निविधि गोत्र द्वयविधि वेदनी ।
सर्वपान पर देशविघात । मतालीस महति विख्यात ॥५१॥
ताधिकार पार उम्याम । सूक्षम परजापत परफास ॥
अपरजापति मुम्बर गेय । दुप्पर अनादेय आदेय ॥ ५२ ॥
जग अपजस प्रम थापर यान । दुर्भग शुभग चाल इयजान ।।
इन्द्री जाति पचविधि गदी। गति पारों एती मर फही॥५३॥
दोहा।
जीयविपाफीकी कदी, प्रकृति अठत्तर और ॥
त्रिविपाफी अप फहीं, भरविवाकिनी और ॥ ५५ ॥
आनुपूरवी पार विधि, क्षेत्रविगकी जान ।
पार आयुक्तकी प्रकृति, भवपिपाफिया पान !! ५५॥
पानि अपानी विविधि कहे, पुण्य पाप द्वय चाक ।
.पप उदय दोऊ कहे, परने पार विपाक ॥५६॥
अब इन आठों फरमी, दिति जघन्य उतरष्ट ।
कहो पान संक्षेपसों, मुनों कान दे इष्ट ।। ५७ ॥
चौपाई।
शानावरणीकी मिति दी। फोडाफोडीसागरतीस ।।
यह उत्तरदशा परवान । एकमुहूर्त उपन्य पखान ॥ ५८॥

१२४
जैनग्रन्थरत्नाकरे
द्वितिय दर्शनावरणीकर्म । थिति उत्कृष्ट कहों मुन मर्म ।
कोडाकोडी तीस समुद्र । एकमुद्रतकी थिति क्षुद्र ॥ ५९॥
तीजा कम वेदनी जान । कोडाकोडीतीस बखान ।।
यह उत्कृष्ट महाथिति जोय | जयन मुहरतबारह होय ॥१०॥
चौथा महामोह परधान । थिति उत्कृष्ट कही भगवान ॥
सागरसत्तरकोडाकोडि । लघुधिति एकमुहूरत जोडि ॥६१॥
पंचम आयु कही जगदीस । उत्कृष्टी सागर तेतीस ॥
थिति जघन्य सुमुहूरतएकायों गुरु कही विचार विवेक।१६२॥
छट्टा नामकर्मथिति कहों । कोडाकोडि वीस सरदहों ।
सागर यह उत्कृष्टविधान । आठमुहूर्त जघन्य बखान ।। ६३॥
गोत्रकर्म साता सरीस । उत्कृष्टी थिति सागरवीस ॥
कोडाकोडिकाल परमान । लघुथिति आठ मुहूरनमान ॥ ६४॥
अष्टम अंतराय दुखदानि । उत्कृष्टी थिति कहों वखानि ।
सागरकोडाकोडी तीस । लघुथिति एकमुहूरत दीम ॥ ६५ ॥
वरनी आटों कर्मकी, । थिति उत्कृष्ट जघन्य ॥
वाकी मध्यम और थिति, । ते असम्यधा अन्य ॥६६॥
सर बरनी पल्योपमकाल | तथा मागरोपमकी चाल॥
कूपमरे जे रोम अपार । ते वरने नाना परकार ॥ ६७ ॥
पल्योरमके भेद अनेक । ताने यहां न वरना एक ॥
जोजन कप रोमकी पान । यही जनमतमें विख्यात ॥ ६८ ॥

पनारसीविलासः १२५ कृपया जैसी फर्छ कही । सो पल्लोपम कहिये सही । पत्योपम दश फोदाकोड़ि । सव एकत्र कीजिये जोड़ि ॥६९॥ एक सागरोपम सो फाल । यह प्रमान जिनमतकी चाल । यद सागरोपमफर क्या । रया गुनी मै वरणी तश॥ ७० ॥ आठफर्म अटतालसों, प्रकृतिभेद विस्तार । के जाने जिन फेवली, फै जाने गनधार ॥ ७१ ॥ अल्पबुद्धि जैसी मुझ पाहिं । तैसी मै परनी इसमादि ।। पंडित गुनी हसो मत कोय । अल्पमती भाषाविहोय ॥७२॥ फर्मकांड आगम अगम, यथाशति मन आन। मापा मै रचना कही, पालयोधमें जान ॥ ७३ ॥ बरसा-गीतामद यद फर्मपकृतिरिधान अविचल, नाम अन्य मुहावना । इममादि गर्भित मुपुतवेतन, गुप्त पारह भावना । जो जान भेद पसान सरददि, शद अर्थ विचारसी । सो होय कर्मविनाश निर्मल, शिवस्वरुप पनारसी॥ ७॥ दोरा संयन्न् सबहसी समय, फाल्गुणमास यसन्त । प्रानु शियासर सप्तमी, तब यह भयो सिदंत ।। ७५॥ इजिपीरातिरिधान.

१२६ जैनग्रन्थरत्नाकरे अथ कल्याणमन्दिरस्तोत्र भाषानुवाद. दोहा परमज्योति परमातमा, परमज्ञान परवीन । बंदी परमानंदमय, घट घट अंतरलीन ॥ १ ॥ दीपाई। (१५ मात्रा.) निर्भयकरन परम परघान । भवसमुद्र जलतारण जान ।। | शिवमन्दिर अपहरण अनिन्द। वन्दहुं पासचरणअरविन्द ॥२॥ कमठमानमंजन परवीर । गरिमासागर गुणगंभीर ।। मुरगुरु पार लहें नाहिं जामु । मैं अजान जंपों जस ताम्॥३॥ प्रमुखरुप अति अगम अथाह । क्यों हमसे इह होय निवाहा। ज्यो दिनअंघ उलूको पोत । कहि न सके रविकिरनउदोत ४ मोहीन जाने मनमाहि । तोउ न तुमगुण दरणे जाहिं ।। प्रलयपयोधि कर जल बौन । प्रगटहि रतन गिनै तिहि कौन५ तुम असंख्य निर्मलगुणखानि । मैं मतिहीन कहों निजवानि।। ज्यों बालक निज चांह पसार । सागरपरिमित कहे विचार ६ जो जोगीन्द्र करहिं तप खेद । तउ न जानहिं तुमगुणभेद ॥ मगतिमाव मुझ मन अभिलास च्या पंसी बोलहिं निज भास तुम जममहिमा अगम अपार । नाम प्रफ त्रिभुवन आधार ॥ आव पवन पद्मसर होय । प्रीपमतपत निवारे मोय ॥ ८॥ . १वमन. २ पप्रमरोवरकोप करक.

बनारसीविलासः १२७ GA aanakaman तुम आवत भविजन मनमाहिं । फर्मनिबंध शिथिल हो जाहि। ज्यों चंदनतरु बोलहिं मोर । हरहिं भुना लगे चहुओर ॥२॥ तुम निरखतजन दीनदयाल । संकरते छूटहिं ततकाल ॥ ज्यों पशुपेर लेहिं निशिचोर । ते तज भागहिं देखत भोर १० तू भविजन तारफ किम होह । ते चित्त धार तिरहि ले तोह ।। यह ऐसें करि जान सभाउ । तिरे मसक ज्यो गर्मितवाउ ११ जिन सब देव किये यश वाम । तें टिनमें जीत्यो सो काम || ज्यों जल कर अमिकुलहानि। पड़वानल पीपे सो पानि॥१२॥ तुम अनन्त गरुवा गुण लिये । क्योंकरभक्ति धरं निजहिये। लघुरूप तिरदि संसार । यह प्रभुमहिमा अकथ अपार १३ शोध नियार कियो मनशांति । कर्म गुभटजीते किदि भांति ॥ यह पटतर देरादु संसार । नीलक्ष ज्यों देह तुसार ॥१४॥ मुनिजनहिये कमल निज टोहि । सिमरुप समध्यावदि तोहि।। कमलफर्णिका दिन नहिं और । कमलपीज उपजनकी टौर१५ जय सुह ध्यानपरै गुनि कोय । तर विदेव परमातम होय ॥ असे पातु शिलातन त्याग । फनकम्वरूप ध जप आग १६ जाफे मन तुम करा निवास । विनस जाय पर्यो विमह सास ॥ ज्यो मान्त विच आवै कोय । विमद मूल नियारे सोय॥१७॥ फरदि विरुप जे भातम ध्यान । तुम मभावतें होय निदान ।। असनार मुधा अनुमान । पीवत विष विकारकी दान ॥१८॥ - ।

१३० जैनप्रन्यरक्षाकरे मनवांछित फल जिनपदमाहिं । मैं पूरव भव पूने नाहिं ।। माया मगन फिरयो अज्ञान। करहिं रंकजन मुह अपमान ३७ मोहतिमर छायो हग मोहि । जन्मान्तर देख्यो नाद सोहि ।। सो दुर्जन मुझ संगति गर्दै । मरमछेदके कुवचन कहें ॥ ३८॥ मुन्यो कान जम पूजे पाय । नेनन देस्यो रूप अपाय | | भक्ति हेतु न भयो रित पाव ।दुसदायक किरियारिन भाव ३९ महाराज शरणागत पाल । पतितउधारण दीनदयाल । गुमिरण करहुं नाय निनशीस । गुश दुम दूर करहु जगदीश कर्मनिकन्दनमहिमा सार । अगरणशरण गुजश गितार ।। नदि सेये प्रभु तुमरे पाय । तो गुश जन्म अफारम जाय ॥४१॥ गुरगण पन्दिन दया निधान । जगतारण जगपनि जगनान ।। दममागग्ने मोहि निकामानिर्भयपान दे गुनगशि ॥ ४२ ॥ तुम चरण कमल गुन गाय। यविधि भक्ति की मनलाय।। जन्मजन्म प्रमु पार नादि। यह मेला फल दी गोदि ॥१३॥ तोपान वेयरी पार RELA श्रीभगत, गुना जे भनिन मादि। ने निज पुण्य भंडार, गंच EिIN मणादि । गेमान जगन मग, मभु गुणगनाध्यापति। मगंगा नाग पनम गी पार ॥ यह कन्याणमन्दिा हियो, मुदगन्दी बात भारत बनारसी, मग मneu.. "म बनारसीरिलासः अथ साधुवन्दना लिख्यते. दोदा। श्रीजिनमापित भारती, मुमरि आन मुखपाठ । कहो मूल गुण साधुके, परमित विंशतिआठ ॥१॥ पंचमहामत आदरन, समति पंच परफार । मरल पंच इन्द्रिय विजय, पट अपशिफ आचार ॥२॥ भूमिशयन मंजनतजन, वसनत्याग फरलोच। एसवार लघुअमन थिति असन देतयन मोच ॥ ३ ॥ सौराई। यावर जन्तु पंच परफार । चार भेद जंगम नन पार । जो सब जीवनको रसपाल । सो मुसाधु बन्दहुं तिरकाल ॥२॥ संतत सत्य वचन मुस कहै । अथवा मोनपिरत पर रहे। मृपावाद नदि बोले रती । सो जिन मारग सोचा जती ॥५॥ कौड़ी आदि रतन परजत । पटिन अपट धनभेद अनंत ११ दप अध न फरसे जोय । तारण तरण मुनीश्वर सोय ॥६॥ पशु पंसी नर दानव देव । इत्यादिफ रमणी रति सेव ॥ तजदि निरन्तर मदन विकार । मो मुनि नम जगत हितकार ७ द्विविषि परिमददयविधि जानास असस अनन्त परवान ।। कल संगतम होप निराशासो मुनि लहै मोक्ष पदयाम ॥ ८ ॥ पोभोजन परना. PPPIPPPY

१३२
जैनग्रन्थरताकरे
अघोदृष्टि मारग अनुसरै । प्राशुक भूमि निरख पग धेरै ॥
सदय हृदय साधै शिव पंय । सो तपीश निरमय निर्गन्य ॥९॥
निरभिमान निरवद्य अदीन । कोमल मधुर दोप दुख हीन ।
ऐसे मुवचन कहै स्वभाव । सो ऋषिराज नमहुं धरि भाव १०
उत्तम कुल श्रावक संचार । तामु गेह प्राशुक आहार ।।
भुजै दोष छियालिस टाल। मुनि बंदों सुरति संभाल॥११॥
उचितवस्तु निजहित परहेत । तथा धर्म उपकरण अचेत ।।
निरख जतनसों गहै जु कोय । सो मुनि नमहुं जोर कर दोय१२
रोगविकृति पूरव आदान । नवदुवार मल अंग उठान ।
डारे प्राशुक भूमि निहार । सो मुनि नमहुं भगति उरधार १३
कोमल कर्कश हरुव समार । रुक्ष सचिकण तपत तुसार ॥
इनको परसन दुख मुग्वलहें। मो मुनिराज जिनेश्वर कहें॥१॥
आमल कटुक कपायल मिष्ट । तिक्त क्षार रस इष्ट अनिष्ट ।
इनहिं साद रति अरनि न वेव । सो ऋपिराज नमहि तिह देव१५
शुभ मुगंध नाना परकार । दुखदायक दुर्गध अपार ।।
नामा विषय गनहिं समतूल । मो मुनि जिनशासनतरुमूल १६
श्यामहरिन मित लोहित पीत । वरण विवरण मनोहर भीत।
पनिरसे तन राग विरोध । मो मुनि कर कर्ममल शोध १७
गद कुगन्दहिं समरम साद। अयश मुनत नहिं हरप विपाद ।
थुनि निंदा दोकं सम मुणे।मो मुनिराज परम पद मुशे॥१८॥

बनारसीविलासः १३३ सामारक साधै तिहुं फाल । मुशांत पंथकी करै संभाल ॥ सधुनित्रदोऊ सम गणे । सो मुनिराज करमरिपु हणे ॥१९॥ अहंत सिद्ध सूरि उपशाय । साधु पंच पद परम सहाय ।। इनके परपनमें मन लाय । तिस मुनिवरके बन्दों पाय॥२०॥ पावन पंचपरम पद इष्ट । जगतमाहिं जाने उतकिष्ट । ठाने गुणधुति पारंपार । सो मुनिराज लेहे भवपार ॥२१॥ शान क्रिया गुपधारे चित्त । दोष विलोक कर पाउित्त॥ मित प्रतिकमपक्रियारसलीन । सो मुसाधु संजम परवीना॥२२॥ भीबिनवचन रचन विसतार। द्वादशांग परमागम सार ।। निजमति मान करै साउ। सो मुनिवर बंदहुं घर भाउ२३ काउसम्गमुद्रा पर नित । मुद्धस्वरूप विचारै चित्त !! त्याग त्रिविधिजोग ममकार । सो मुनिराज नमो निरधार २५ प्राशुफ शिला उचित भूसेव । अचल अंग समभाव सचेत॥ पधिरेन अलप निद्राल । सो योगीधर व काल ॥ २५ ॥ धर्मप्यान जुत परम विचित्र । अन्तर बाहिब सहज पवित्र ।। न्दान विलेपन तजै त्रिकाल । पन्दों सो मुनि दीनदयालगा२६॥ लोकलाजविगलित भयहीन । विषयवासनारहित अदीन । नगन दिगम्बर मुद्रापार । सो मुनिराज जगत सुखकासार॥ सधन फेरा गर्भित मलकीय वस असरन्य उतपति उमुपीच। कच हुँच यह कारण बान । सो मुनि नमहुं ओरजुगपान२८ । १समीचीन प्यान.

१३४ जैनप्रन्यरत्नाकरे छुघा वेदनी उपशम हेत । रस अनरस सम्माव समेत ॥ एकवार लघु मोजन करै । सो मुनि मुकति पय पगधरे २९ देह सहारी सायन मोष । तबलों उचित कायवल पोर ॥ यह विचार थिति रेहिं अहार । सो मुनि परम परम धनवार३० जहँ जहँ नवदुवारमलपात । तहँ तहँ अमित जीव उतपात ॥ यह लस तबहिं दंतवन कानासो शिवपयसायक ऋपिराज३१ ये अट्ठाविस मूल गुण, जो पालहिं निरदोष । सो मुनि कहत वनारसी, पावै अविचल मोप ॥ ३२ ॥ इति माधुवन्दना. अथ मोक्षपेडी लिख्यते. दोहा। इक समय सचिवंतनो, गुरु अक्वै मुनमल । जो तुझ अंदरचेतना, वहै तुमाड़ी अ ॥ १ ॥ ए जिनवचन मुद्दावने, मुन चतुर उपहा । सास रोचकशिक्खनो, गुरु दीनदयता ।। इम बुझे दुघ रह्लदै, नहिं रहै मयहा। इसदा मरम न जानई, सो द्विपद वयसा ॥२॥ निमदी गिरदा पेचमा, हिरदा कलमहा। जिमना संमै विनिरसों, मुझे झटमा ।

पगारीविगतः राने जिन्दादी मिनी, अहान पुत। पास निन्दादा पहजसो, पितर दुm ||३॥ जिन्दा ए फरमदा, दुरिथा पर भाा। एक अनिए जसोदा फहराक समला। तिन्ही इस न समई, उपदेश अदा । संकरा होना, ज्यों पंद गहन !" जिन्दा ति गरसों, गुरुवपन न मला । जिन्दा आगे करन यो, ज्यो कोदोदता ।। परसे पाहन मुम्मिमें, नदि होप पहा। पोये मोज म उप्पंज, जल जाय पदहा ॥ ५ ॥ धेतन इस संसार,, तू सदा । मापे रूप पिचार, अप्पा बा | अपि पुम्यां गिरि पया, हिणिदिया । जिन्दसो मिलन विजोग दे, तिनसो क्या सहा ॥६॥ इस दुनियादी मोबसों, तू गरवगहाता । भया भार सम पुरुष, ज्यों पर विच पाहा। गुपनेका गुर मान लें, अपना घर पारी । फिरा भरमकी भोरम, तू सदन दिला ५ ॥ जोग बाबर ने किया, कर अपर महा। अंग विभूति गायके, लीनी मृग यता ॥

जैनप्रन्यरत्नाकरे है वनवासी ते तजा, परसार महला । अप्पापर न पिछाणियां, सब झूठी गहा ॥८॥ माया मिय्या अग्रसोच, ये तीनों सला। तिहु यादी करतूतसों, जियदा उरझला ।। ज्यो रुधिरादी पुट्टसो, पट दीसे लमा । रधिरानलहि पसालिये, नहिं होय उजता ॥ ९ ॥ जर लग सेरी समझमें, दोदी हल चला। मुनश पहाई लामनो, करदा एल मा ।। सबलगन म्याणा नहीं, क्या मारह का। मोर करदा पालणे, ग्यो झुनै माता ॥ १०॥ किण तू जरा किला, शिष पारा पता । भिदमका औ उशिया, उस जाल उगता ।। धेतन राजोगमें, ते टीका झाला नही गुड़ायहि आपको, लमा माता ॥ ११ ॥ जो ते दारिद मानिया, टालमटता। मओ तू मानहि गंपदा, भारदामह गहा ।। नमा कांकगा, या मोगा मार। मी नाना सपना पुरा ॥ १२॥ झोप दालमा, जोकर ! मपामार जोबना, भा, बा ॥

बनारसीविलासः १२७ लंब मझोला ठींगना, गोरा अरु कहा। सो सर नानारूप है, निह पुद्गाष्ठा ॥ १३ ॥ जो जीरण है शरपड़े, जो होय नवाला । जो मुरझावै मुफक, फुल्ला अरु फाला ।। जो पान में यह चले, पावफमैं जल्ला । सो सव नानारूप है, निहले पुद्गला ॥१४॥ एफ फर्म दीसै दुधा, ज्यों तुलदा पड़ा। हरवे तन गुरुपेतो, अध ऊरप थाहा । अशुभरूप शुभरूप है, दुहु दिशिनो पहा । धेरै दुविधि विस्तार जौं, पट विरस जटला ॥१५॥ पवन पर रे जो उडे, माटी रिच गाला । जो अकाशमें देखिये, पल रूप अचल्ला । पापी पावक पोन भू, पहुंधामै रला । सो सर नाना रूप है, निहचे पुद्गला ॥ १६ ॥ खिपरोवे सिणमें हंस, बौं मदमतयष्ठा । त्यों दुर्दुवादी मौजों, पेहोश संगष्टा ॥ इकसवीच विनोद दे, इको खलपाला । समदृष्टी सजन करे, दुईसो हलमाला ॥ १७ ॥ जाति दुईकी एफ जी, मणि पत्थर साता। जल विचार संकोच सों, कहिए नदि नाला ।।

१३८ चैनप्रन्यरत्ताकरे उस्त जलपरवाहमें, जो भौर मुरता। त्यो इस कर्म पिपारुदे, पिन ऊंना सला ॥१८॥ दुई अधिर स्वभार है, नदि कोई मटका । ऊन नीच इक राम करे, कलिकार पटका ॥ भर जरा ऊरप अयो. मिति उल पुथा। अरहर हार विहारगें, क्या जार सहा ॥ १९ ॥ पागा देवशरीरज्यो, गनौर उचला। मा पूरण कर ददि पया, फिर गर ज्यों का ॥ पुण्य पाच मेद है, यह मेरा भरा। शान किया निरोष है, जई मोग महा ॥२०॥ बानु तु माडा मोदमे, नौरोह मला । विनि प्रमाण यश नो भगा, गुरुशान मुलता ।। भा पर अंरपराई, गभीर शुभता । पाम माह पगा मई, nि E॥ २१॥ मान FREETrयो, मनि HिESTI दिदिया, अम मि पाता। म.प ना मागा, दगी दूर। भर inा, मोर पदा॥ २२ ॥ 4 मग, आया। .

बनारसीविलासः भव थिति जिनकी घटगई, तिनको यह उपदेश । हत यनारसिदास यो, मदन समुझे लेगा ।। २५ १६ अथ कर्मछत्तीसी लिख्यते. होश। परम निरंजन परमगुरु, परमपुरुष परधान । बन्दई परमसमाधिगत, मपभजन भगवान ॥ १ ॥ जिनवाणी परमाग कर, मुगुरु शीख मन मान । काक जीव अरु कर्मको, निर्णय कहीं वसान ॥ २ ॥ अगम अनंत अलोकनभ, वामें लोक अकाश । सदाफाल ताके उदर, जीर अजीव निवास ॥३॥ जीव द्रव्यपी दशा, संसारी अरु सिद्ध। पर विकल्पमजीप के, अपय अनादि असिद्ध ॥ गगन, काल, पुद्गल, परम, अरु अधर्म अभिधान । भरका पुगत द्रव्यको, कहाँ विशेष विधान ॥ ५ ॥ परमरटिसों प्रगर पुदल इव्य अनंत जड़ सण निजीय दल, रुपी मूतिरंत ॥ ६ ॥ जो विभुवन मिति देखिये, दिर जंगम साकार। पुल परयानको, है मनादि दिसा ।। ७१

नग्रन्यरत्नाकरे
अब पुलके वीसगुण, कहाँ प्रगट समुझाय ।
गर्भित और अनन्तगुण, अरु अनन्त परजाय ।। ८ ॥
श्याम पीत उज्ज्वल अरुण, हरित मिश्र बहु मांति ।
विविधवर्ण जो देखिये, सो पुद्गलकी कांति ॥ ९ ॥
आमल तिक्त कपाय कटु, क्षार मधुर रसमोग ।
ए पुद्गलके पांचगुण, पट मानहिं सबलोग ॥ १० ॥
तातो सीरो चीकनो, रुखो नरम कठोर ।
हलको अरु मारीसहज, आठ फरस गुणजोर ॥ ११ ॥
जो मुगंध दुर्गधगुण, सो पुद्गलको रूप ।
अब पुद्गल परजायकी, महिमा कहों अनूप ॥ १२ ॥
शब्द, गंध, सूक्षम, सरल, लम्ब, वक्र, लघु थूल ।
विठुरन, मिदन, उदोत, तम, इनको पुद्गल मूल ।। १३
छाया, आकृति, तेज, दुति, इत्यादिक बहु भेद ।
ए पुद्गलपरजाय सप, प्रगटहिं होय उछेद ॥१४॥
फेई शुभ केई अशुभ, रुचिर, मयानक भेष ।
सहज समाय विभाव गति, अरु सामान्य विशेष ॥१५
गर्मित पुद्गलपिंडमें, मलस अमरति देव ।
फिरै सहज मयचक्रने, यह अनादिकी टेव ॥ १६ ॥
पुलकी संगति कर, पुलहीसों प्रीति ।
पुलको आपा गणे, यह भरमकी रीति ॥ १७ ॥

बनारसीविलासः
१४१
जे जे पुद्गलकी दशा, ते निज माने हंस ।
याही भरम विभावसों, गदै फरमको वंश ॥ १८॥
ज्यों ज्यों कर्म विपाकवश, ठाने प्रमकी मौज ।
त्यो त्यो निज संपति दुरै, जुरै परिग्रह फौज ॥ १९॥
ज्यों वानर मदिरा पिये, विच्छू दंकित गात ।
भून लगे कौतुक करे, त्यो श्रमको उत्पात ॥२०॥
अम संशयकी भूलसों, लहै न सहज स्वकीय ।
फरम रोग समुझे नहीं, यह संसारी जीय ॥ २१ ॥
फर्म रोगके द्वे चरण, विषम दुईकी चाल ।
एफ फंप प्रकृती लिये, एक ऐठि असराल ॥ २२ ॥
कंपरोग है पाप पद, अफर रोग है पुण्य ।
ज्ञान रूप है आतमा, दुई रोगों शून्य ।। २३ ॥
मूरख मिष्याष्टिमों, निरखे जगकी रोग ।
दरहिं जीव सय पापों, करहिं पुण्यफी होम ॥ २४ ॥
उपजै पापविकारसों, भय तापादिक रोग ।
चिन्ता वेद विथा घी, दुरसमान सयलोग ॥ २५ ॥
उपजे पुण्यविकारमों, विषयरोग विस्तार ।
भारत रद विधायदे, गुस माने संसार ॥२६॥
दो रोग समान है, मूढ न जाने रीति ।
कंपरोगसौ गय कर, अकररोगसौ मीति ॥ २७ ॥

१४२ जैनप्रन्यरत्नाकरे ........ भिन्न २ लक्षण लखे, प्रगट दुईकी मांति । एक लिये उद्वेगता, एक लिये उपशांति ॥ २८ ॥ कच्छपकीसी सकुच है, वक्र तुरगकी चाल । अंधकारकोसो समय, कंपरोगके माल ॥ २९॥ वकरकुंदसी उमॅग है, जकरबन्दकी चाल । मकरचांदनीसी दिपै, अकररोगके माल ॥ ३० तमउदोत दोऊं प्रकृति, पुद्गलकी परजाय । मेदज्ञान विन मूढ़ मन, मटक मटक मरमाय ॥ ३१ ॥ दुई रोगको एक पद, दुहुँसों मोक्ष न होय । विनाशीक दुहुंकी दशा, बिरला वूझै कोय ॥ ३२ ॥ कोऊ गिरे पहाड़ चढ़, कोऊ वटै कूप । मरण दुहको एक सो, फहिवेको द्वै रूप ॥ ३३ ॥ मववासी दुविधा घरै, ताते लसै न एक । रूप न जाने जलधिको, कूप कोपको भेक ॥ ३१ ॥ माता दुहुंकी वेदनी, पिता दुईको मोह । दुहु वेडीसो पंधि रहे, कहवत कंचन लोह ॥ ३५ ॥ जाति दुईकी एक है, दोय कहे जो कोय । गहै आचरे सरदहै, मुरबहम है सोय ॥ ३६ ।। जाके चिन जैसी दशा, ताकी देसी दृष्टि । पंडित मय संडित करे, मूढ पढाये सृष्टि ॥ ३७॥ इति कम मोमो.

एनारसीविलासः
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अथ ध्यानबत्तीसी लिख्यते.
रोश।
शान स्वरुप अनन्त गुण, निरासाय निरुपाधि ।
अविनाशी आनन्दमय, पन्दहुं भनसमाधि ॥ १ ॥
भानु उदय दिनके समय, चन्द्र उदय निशि होत ।
दो जाके नाम में, सो गुरु सदा उदोत ॥ २॥
चौपाई। (सोटा मात्रा)
पेत पाणी सुन गुरुवाणी । अमृतरूप सिद्धांत रसानी।
परगट दोऊ नय समुझा । मरमी होय मरम सो पावें ॥३॥
वेतन बद अनादि संजोगी । आपहि करता आपहि भोगी।
शाहज समाव शनि जब जागे । तर निहफे मारग लाग १
करके देहबुद्धि जय होई । नपव्यवहार कहावै सोई ।
भेदभाव गुन पंडित झै । बाको अगम अगोचर सूझे ॥ ५॥
रथमहिं दान शील तप मावै । नय निहले विवहार लसावे ।
बरगुणत्यागबुद्धि जम होई । निहचे दान कहावै मोई ॥ ६ ॥
पत्तन निज सभावमह आये। तब सो निधयशील कहारे
कर्मनिर्जरा होय विशेष । निम्यय तर फहिये इह लेथे ॥७॥
मलरूप चेतन अम्पास । निश्चयमाव वहां परगास ।
अन सदगुरु व्यवहार बसाने । जाकी महिमा सब जगजाने र
निवभकाय शकति का दीये । सो व्यवहारी दान कहीजे ।
ननवपयाय सड़े उप नारी । कहिये सोइ शीर विवहारी॥९॥

१४४
जैनग्रन्थरताकरे
।
मनवयकाय कष्ट जब सहिये । तामों विवहारी तर कहिये ।
मनवचकाय लगनि ठहरायै । सो विवहारी भाव कहावै॥१०॥
दोहा।
दान शील तप भावना, चारों मुस दातार ।
निहचे सो निचे मिले, विवहारी विवहार ॥ ११॥
चौपाई।
अब मुन चार ध्यान हितकारी । साहि मुक्तिपंय व्यापारी ॥
मुद्रा मूरति छवि चतुराई । कलाभेप बलयेस पहाई ॥ १२ ॥
फरस परण रस गंध मुभासा । इह रूपम्सध्यानकी शासा ।।
इनकी संगति मनसा माथै। लगन सीस निन गुण आराध१३
रहे मगन सो मू: कहा। अलस लमाय शिवण पारे।
महन आदि पर पदलीजे । तिनके गुणको गुमरण कीने १५
गुणको मौन करत गुण लहिये। परमपदम्गध्यान सो कहिये ।
पंचता तन निव निरोधे । मानष्टि पदभन्तर शोधे ॥१५॥
भिन्न भिन्न जर चेतन जो गुण विरेच्च गुणमादि समोर।
यह दियध्यान मुमदाई। फर्मनिरजरा न उपाई ॥ १६ ॥
या मभार थापगों और । परगुणगों गय नाना सोर।।
लो समाधि ब्रह्ममय होई । मातीत कदा सो १७॥
दोहा।
पद साम्याग्यविधि, पानिपरिमार।
पादीत दिति मन, ध्यान भार परसा ॥१८॥

पनारसीविलासः । -- ज्ञानी शान भेद परकाये। ध्यानी होर सो ध्यान अभ्यास ॥ आत रोद कुध्यानहि त्यागे । धर्मशुकलके मारग लागै ॥१९॥ आरत ध्यान चितवन पहिये। बाकी संगति दुरगतिलहिये। इरविजोग विकलता मारो। अरि अनिष्ट संजोग दुसारी ॥२०॥ तनकी व्यथा मगन मन झरे । अम शोचकर वांछति पूरै ॥ ए रतफे चारों पाये । महा मोहरससों लपटाये ॥ २१ ॥ अब सुन रौद्र ध्यानकी सैली । जो पारो मतिगति मैसी ॥ मनटवाइसों बीच विराधे । हिये हर्षधर चोरी साथै ॥ २२ ॥ विकसित भूटवचन मुखभाले । आनंदितचितविषया राखै !! पारों रौद्र ध्यानके पाये । फर्ममन्यके हेतु बनाये ॥ २३ ॥ । आरतरीद विचारते, दुस्खचिन्ता अधिकाय । जैसे चहै तरंगिनी, महामेप जलपाय ॥२५॥ चौराई। आर्त रौद्र कुध्यान रखाने । धर्मध्यान अब सुनहु सयाने ॥ केवल भापित वाणी माने । कर्मनाशको उपम ठाने ।। २५॥ पूर्वकर्म उदय पहिचाने । पुरषाफार लोकपिति आने । चारो धर्म ध्यान पाये । जे समुशे से मारग आये ॥ २६ ॥ भर मुन र ध्यानकी याद मिटे मोदको सता जाते। जोग साथ मिदांन विचारे । आनम गुण परगुण निवारे २७ ।

११६ जैनप्रन्यरताकरे उपशम सपक श्रेणि आरोहै। पृथक्क वितर्फ आदि पद सो है॥ उपशम पंथ चढ़े नहिं कोई । क्षपापंय निर्मल मन होईसारा तर मुनि लोकालोकविकासी । रहहिं कर्मकी प्रकृति पचासी।। केवल ज्ञान लहे जग पूजा । एक वितर्फ नाम पद दूजा ॥२९॥ जिनपर आयु निकट जय आये। तहां पहपर प्रकृति सपावै॥ सूक्षम निप मनोरल छीजा। सूक्षम किया नाम पद तीगार. शक्ति अनंत तहां परकारी । सतसिन तेरह प्राति विनाशे।। पंच लघूभर परमित पेरा। अष्ट कर्मको होय निवेरा ॥३१॥ चरण भतुर्थ साध शिय पाने । विपरीत किया निचि कहा। गुरु ध्यानके चारों पाये । शक्तिपयकारण समुशाये ॥ १२ ॥ शुक्त ध्यान औषधि लगे, मिटे करमको रोग । कोरला छाई कालिमा, होत अमिगंजोग ।। ३३ •१६ परमारय पंथ गुन, अगम अनन्न पसार । कहत बनारमि अनामनि, जयागानि परयान ॥ २५ ॥ इति मानवीगी. अय अध्यातमयत्तीसी लिग्न्यने. मुद वनन गदगम को कर भागिन अंग। ो पुपारमाण मा, भाग १ ॥ min"...Pati

बनारसीविलासः
घृतपटपूरित लोकमें, धर्म अधर्म अफास ।
काल जीव पुद्गल सहित, छहों दर्वको पास ॥ २ ॥
छहों दरप न्यारे सदा, मिले न काहू कोय ।
छीर नीर ज्यों मिल रहे, चेतन पुद्गल दोय ॥ ३ ॥
चेतन पुद्गल यो मिलें, ज्यों तिलमें खलि सेल ।
प्रगट एफसे देखिये, यह अनादिको खेल ॥ ४ ॥
वह याफे रससो रमै, वह पासो लपटाय ।
चुम्पक करपे लोहफो, लोह लगै तिह धाय ॥ ५ ॥
जड़ परगट चेतन गुपत, द्विविधा लसै न कोय ।
यह दुविधा सोई लखै, जो मुविचक्षण होय ॥ ६ ॥
ज्यों सुवास फल फूलमें, दही दूध पीव ।
पावक काठ पपाणमें, त्यो शरीरमें जीव ॥ ७ ॥
फर्मस्वरूपी कर्ममें, घटाफार पटमाहि ।
गुणप्रदेश मच्छस सर,
याते परगट नाहिं ॥ ८॥
सहज शुद्ध चेतन वसै, भावकर्मफी ओट ।
द्रव्यफर्म नोर्मसों, बधी पिंडकी पोट ॥९॥
ज्ञानरूप भगवान शिव, भावकर्म चित भर्म ।
मध्यकर्म तनफारमन, यह शरीर नोकर्म ॥१०॥
ज्यो कोठीमें धान थो, चमी माहि कनत्रीच।
चमी धोय फन राखिये, कोठी धोए कीच॥ ११॥

१४८ जैनमन्थरत्नाकरे कोठी सम नोकर्म मल, द्रव्य कर्म ज्यों धान । भावकममल ज्यों चमी, कन समान भगवान ॥१२॥ द्रव्यकर्म नोकर्ममल, दोऊ पुद्गल जाल । मावकर्म गति ज्ञान मति, द्विविधि ब्रह्मकी चाल ॥१३ द्विविधि ब्रह्मकी चालसों, द्विविधि चक्रको फेर । एक ज्ञानको परिणमन, एक कर्मको घेर ॥ १४ ॥ ज्ञानचक्र अन्तर गुपत, कर्मचक्र प्रत्यक्ष । दोऊ चेतनमाव ज्यों, शुलपक्ष, तमपक्ष ॥ १५ ॥ निज गुण निज परजायमें, ज्ञानचक्रकी मूमि । परगुण पर परजायसों, कर्मचक्रकी धूमि ॥ १६ ॥ ज्ञानचक्रकी दरनिमें, सर्जग भांति सब ठार । कर्मचक्रकी नींदसों, मृपा समकी दौर ।। १७ ॥ ज्ञानचक्र ज्यों दरशनी, कर्मचक्र ज्यों अंध । ज्ञानचक्रमें निर्जरा, कर्मचक्रमें बंध ॥ २८॥ ज्ञानचक्र अनुसरणको, देव धर्म गुरु द्वार । देव धर्म गुरु जो लखें, ते पावें भवपार ।। १९ ॥ भववासी जानै नहीं, देवघरमगुरुपेद । परयो मोहके फन्दमें, कर मोक्षको सेद ॥ २० ॥ उदय मुकर्म कुकर्मके, रले चनुर्गति माहिं । निरचे वादिनदृष्टिमी, सह शिवमारग नादि ॥ २१॥ - जागते हुए

बनारसीविलासः
-
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देवधर्म गुरु है निकट, मूढ न जाने और।
बधी दृष्टि मिथ्यातसो, लखै औरफी और ॥ २२ ॥
भेषधारिफो गुरु फहै, पुण्यवन्तको देव ।
धर्म कहै कुल रीतिको, यह कुर्मकी रेप ॥ २३ ॥
देव निरंजनको कहै, धर्म वचन परवान ।
साधु पुरुषको गुरु कहै, यह मुकर्मको ज्ञान ॥ २४ ॥
जाने माने अनुभवै, करै भक्ति मन लाय ।
परसंगति आस्रव सधे, कर्मपन्ध अधिकाय ॥ २५ ॥
कर्मबंधते अम बढे, अमते लखै म बाट ।
अंधरूप चेतन रहै, विना मुमति उद्घाट ॥ २६ ॥
सहजमोह जब उपशमै, रुचै सुगुरु उपदेश ।
तव विभाव भवयिति पदै, जगै ज्ञान गुण लेश॥२७॥
शानलेश सो है मुमति, लसै मुकतिफी लीक ।
निरस अन्तराष्टिसों, देव धर्म गुरु ठीक ॥ २८ ॥
ज्यों सुपरीक्षित जौहरी, काच डाल मणि लेय ।
त्यों मुबुद्धि मारग गहै, देव धर्म गुरु सेय ॥ २९ ॥
दर्शन पारित ज्ञान गुण, देव धर्म गुरु शुद्ध ।
परसै आतम संपदा, तजै सनेह विरुद्ध ॥ ३० ॥
अरचे दर्शन देवता, चरचे चारित धर्म ।
दिद पर गुरज्ञानसों, यह मुमतिको कर्म ॥ ३१ ॥

जैनग्रन्यरत्नाकरे मुमतिकर्मत शिव सथै, और उपाय न कोय । शिवस्वरूप परकाशसों, आवागमन न होय ॥ ३२ ॥ सुमतिकर्म सम्यक्तसों, देव धर्म गुरु द्वार । फहत वनारसि तत्त्व यह, लहि पावें भवपार॥३३॥ इति श्रीअभ्यातमवत्तीसी. . अथ श्री ज्ञानपच्चीसी लिख्यते.. : सुरनर तिर्यग योनिमें, नरक निगोद मवंत । महा मोहकी नींदसों, सोये काल अनंत ॥१॥ जैसे ज्वरके जोरसों, भोजनकी रुचि जाइ । तैसें कुकरमके उदय, धर्मवचन न मुहाइ ॥२॥ लगे मम ज्वरके गये, रुचिसों लेय अहार । अशुम गये शुभके जगे, जाने धर्मविचार ॥ ३॥ जैसे पवन इकोरतें, जलमें उठे तरंग । त्यों मनसा चंचल मई, परिगद के परसंग ॥ १ ॥ वहां पवन नहिं संचरे, तहां न जल कलोल । त्यों सब परिगृह त्यागलों, मनसा होय महोल ॥५॥ ज्यों का विषधर हमे, रुचिसों नीम चपाय । त्यो तुम ममनासों मेटे, मगन विषयमुन पाय ॥ ६ ॥ यह दोहास, ग, प्रतिमें नहीं है. r

पनारसीविलासः
१५१
नीम रसन परसै नहीं, निर्विष तन जब होय ।
मोह पटे ममता मिटै, विषय न बांछ कोय ॥ ७ ॥
ज्यों सछिद्र नौका चढ़े, धूडइ अंध अदेख ।
त्यों तुम मयजलमें परे, विन विवेक पर भेख ॥ ८॥
जहां अखंडित गुण लगे, खेवट शुद्धविचार ।
आतम रुचि नौका चढे, पावहु भय जल पार ॥ ९ ॥
ज्यों अंकुश मानै नहीं, महामर गजराज ।
त्यो मन तृष्णामें फिर, गणै न काज अफाज ॥१०॥
ज्यों नर दाब उपाय, गहि आने गज साधि ।
त्यों या मनयश करनको, निर्मल ध्यान समाधि ॥११॥
तिमिररोगों नैन ज्यों, लस औरफी और ।
त्यों तुम संशयमें परे, मिथ्या मतिकी दौर ॥ १२ ॥
ज्यों औषध अंजन किये, तिमिररोग मिट जाय ।
त्यो सतगुरुउपदेशते, संशय वेग विलाय ॥ १३ ॥
जैसे सय जादय जरे, द्वारावतिकी आग।
त्यो मायामें तुम परे, कहाँ जाहुगे भाग ॥१५॥
दीपायनसों ते पचे, जे सपसी निर्मन्थ ।
सज माया समता गहो, यह मुकतिको पंथ ॥१५॥
ज्यो कुधातु के फेटों, पटपट फंचनकांति ।
पारपुण्य कर त्यो भये, मूदातम महु भौति ॥१६॥

१५२ जैनप्रन्यरत्नाकरे tatt " कंचन निज गुण नाहें तजे, वानहीनके होठ । घटघट अंतर आतमा, सहजस्वमाव उदोत ॥ १७॥ पन्ना पीट पकाइये, शुद्ध कनक ज्यों होय । त्यों प्रगटे परमातमा, पुण्यपापमलखोय ॥ १८ ॥ पर्व राहुके ग्रहणसों, सूर सोम छविछीन। संगति पाय कुसाघुकी, सजन होहिं मलीन ॥ १९॥ निंबादिक चन्दन करे, मलयाचलकी वास । दुर्जनः सज्जन मये, रहत साधुके पास ॥२०॥ जैसे ताल सदा मरे, जल आवै चहुं ओर । तैसें आस्रवद्वारसों, कर्मवंधको जोर ॥ २१ ॥ ज्यों जल आवत मंदिये, सूखे सरवर पानि । तैसे संवरके किये, कर्म निर्जरा जानि ॥ २२ ॥ ज्यों बूटी संजोगते, पारा मूर्छित होय । त्यों पुद्गलसों तुम मिले, आतमशक्ति समोय ॥२३॥ मेल खटाई मांजिये, पारा परगट रूप । शुक्लध्यान अभ्यासते, दर्शनज्ञान अनूप ॥ २४ ॥ कहि उपदेश वनारसी, चेतन अब कछु चेनु । आप वुझावत आपको, उदय करनके हेतु ॥ २५ ॥ इति श्रीज्ञानपश्चीमी. अन्यपानुकी खादसहित होनसे.

पनारसीविलासः
१५३
-
।
अथ शिवपञ्चीसी लिख्यते.
दोहा।
मविलास विकाशपर, चिदानन्द गुण्ठान ।
पन्दों सिद्धसमाधिमय, शिवस्वरूप भगवान ॥१॥
मोइ महातम नाशिनी, ज्ञान उदधिकी सीव ।
पन्दों जगतविफाशनी, शिवमहिमा शियनीय ॥२॥
चौपाई।
शिवस्वरूप भगवान अयाची । शिवमहिमाअनुमवमति सांची।
शियमहिमा जाके पर भासी । सो शिवरूप हुवा अविनासी३
जीव और शिव और न होई । सोई जीववस्तु शिव सोई॥
जीव नाम कहिये व्यवहारी। शिवस्वरूप निहचे गुणधारी ४
कर जीव जब शिवकी पूजा । नामभेदते होय न दूजा ।।
विधि विधानसों पूजा ठाने । तय शिव आप आपको जानै ५
तन मंडप मनसा जहँ पेदी। शुभलेश्या गह सहज सफेदी।।
आतमरुचि कुंडली वखानी । तहां जलहरी गुरुकी वानी ६
मावलिंग सो मूरति थापी । जो उपाधि सो सदा अन्यापी ॥
निर्गुणरूप निरंजन देवा । सगुणस्यरूप करै विधिसेवा ॥७॥
समरस जल अभिषेक करावे। उपशम रसचन्दन पसि लावै ॥
सहजानन्द पुष्प उपजावै । गुणगर्भित जयमाल चढावै ॥८॥
ज्ञानदीपकी शिखा संवार । स्याद्वाद घंटा सुनकारे ।
अगम अध्यातम चौर दुलावै । क्षायफ धूप स्वरूप जगावै ॥९॥

१५४ नग्रन्थरलाकरे निहचे दान अर्थविधि हो । सहजशील गुण अक्षत ढोवै ।। तप नेवज का रस पागै । विमलमाव फल राखइ आगै १० जो ऐसी पूजा करे, ध्यानमगन शिवलीन । शिवस्वरूप जगमें रहै, सो साधक परवीन ॥ ११ ॥ सो परवीन मुनीश्वर सोई । शिवमुद्रा मंडित जो होई ।। मुरसरिता-करुणारसवाणी । मुमति गौरि अर्द्ध वखानी॥१२॥ त्रिगुणमेद जहँ नयन विशेखा। विमलभावसमकित शशिलेखा। सुगुरु शीख सिंगी उर बांधै । नयविवहार बाघम्बर कांधै ॥१३॥ कहूं तन कैलाश कलोले। कबहुं विवेकल चंद्र डोले ॥ रुंडमाल परिणाम त्रिभंगी। मनसा चक्र फिरै सरवंगी ॥१४॥ शक्ति विति अंगछवि छाजै।तीन गुपति तिरशूल विराने । कंठ विमाव विषम विप सोहै। महामोह विषहर नहिं पोहै १५ संजम जटा सहन सुख भोगी। निहचैरूप दिगम्बर जोगी ।। ग्रा समाधिध्यान गृह साजै। तहां अनाहत डमरू पाज॥१६॥ पंच भेद शुभज्ञान गुण, पंच वदन परधान । ग्यारह प्रतिमा साधते, ग्यारह रुद्र समान ॥ १७ ॥ मंगल करन मोखपद ज्ञाता। यात शंकर नाम.विख्याता जब मिय्यामत तिमर विनाश अंघकहरण नाम परफाशे १८ इंश मद्देश असयनिधिस्वामी। सर्व नाम जग अंतरगामी ।। त्रिमुवन त्याग रमै शिवठामा फहिये त्रिपुरहरण तब नामा १०

पनारसीविलासः
।
भटफर्मसो मिद अकेला ] महारुद्र कहिये तिहि बेला ॥
मनकामना रहे नाई कोई। फामदहन कहिये तर सोई ॥२०॥
भवयासी भवनाम परावै । महादेव यह उपमा पावै ।।
आदि अन्त कोई महिं जाने शंभुनाम सर जगत यसानै २१
मोहहरण हर नाम कहीजे शिवस्वरूप शिवसाधन कीजे !!
तब फरनी निश्चयमें आवै । तर जगभंजन विरद कहावै २२
विश्वनाथ जगपति जग जाने । मृत्युंजय तम मृत्यु न माने ।
शुक्ल ध्यान गुण जर आरोहै। नाम कपूरगौर तब सोहै ॥२३॥
इदिविधि जे गुण आदरै, रहै राचि जिहँ ठाँव ।
जिह जिह मारग अनुसरै, से सब शिवफे नाव ॥२४॥
नांव जथामति फल्पना, फहूं प्रगट फहुं गूह ।
गुणी विचारै यस्तु गुण, नाँच विचारै मदः ॥ २५॥
म्ह मरम जानै नहीं, फरै न शिवसों भीति ।
पंडित लखै पनारसी, शिवमहिमा शिवरीति ॥२६॥
इति शिवपचीसी.
अथ भवसिन्धुचतुर्दशी लिख्यते.
जैसे काहू पुरुषको, पार पहुंचवे फाज ।
मारगमाहि समुद्र तहां, कारणरूप जहाज ॥१॥
तैसें सम्यकवंतको, और न कछू इलाज ।
भवसमुद्र के तरणको, मन जहाजों काज ॥२॥

जैनमन्थरताकरे मनजहाज घटमें प्रगट, मवसमुद्र घटमाहिं । मूरख मर्म न जानहीं, वाहिर खोजन जाहिं ॥ ३ ॥ भूरसहूके घटविष, जलजहाज अरु पौन । दृगमुद्रित मालीम तहँ, लसै समारै कौन? ॥१॥ कर्मसमुद्र विमाव जल, विषयकपाय तरंग । पडवागनि तृष्णा प्रवल, ममता धुनि सरवंग ॥ ५॥ भरमभंवर तामें फिरे, मनजहाज चहुं और । गिरै खिरै बूडै तिरे, उदय पवनके जोर ॥ ६ ॥ नव चेतन मालिम जगै, लखै विपाक नजूम । डार समता शृंखला, यकै भँवरकी धूम ॥ ७ ॥ मालिम सहज समुद्रको, जाने सब विरतंत । शुभोपयोग तहँ रत सम, अशुम भाव जलजंत ॥८॥ जन्तु देख नहिं मय करै, रत्न देख उच्छाह । करै गमन शिवदीपको, यह मालिमकी चाह ॥९॥ दिशि परखै गुणजंत्रसों, फेरै शकति मुखान । धरे साथ शिवदीपमुख, वादवान गुमध्यान ॥ १० ॥ चहै शुद्ध उद्धत पवन, गहै क्षिपक दिशिलीक । लहे खबर शिवदीपकी, रहै इंटिगति ठीक ॥ ११॥ मनजहाज इहिविधि चले, गेहै सिंधुजलवाट । आवै निज संपतिनिकट, पावै केवल घाट ॥ १२ ॥ कह ऐसाभी पाट है.

पनारसीविलासः मालिम उतर जहाजों, कर दीप को दौर । तहान जल न जहाज गति, नहिं करनी फछु औरा॥१॥ मालिमकी कालिममिटी, मालिम दोप न दोय । यह भयसिन्धुचतुर्दशी, मुनिचतुर्दशी होय ॥१४॥ इति सिन्धुपरंसी अथ अध्यातम फाग लिख्यते. अध्यातम दिन क्यों पाइये हो, परमपुरुषको रूप । मपट भंग पर मिल रखो हो, महिमा अगम अनूप ॥ भला अध्यातमविन क्यों पाइये ॥१॥ विषम विरष पूरो भयो हो, आयो सहज पसंत । प्रगटी मुरुचि सुगंधिता हो, मन मधुफर मयमंत। भला अध्यातमदिन क्यों पाइये ॥२॥ मुमति कोकिला गह गही हो, यही अपूरय वाउ। भरम फुद्दर यादरफटे हो, पट जाडो बड ताउ ।। भला अध्यातमविन क्यों पाइये ॥३॥ मायारजनी लघु भई हो, समरस दिवशशिजीत । मोहपंकफी थिति पटी हो, संशय शिशिर व्यतीत ॥ भला अध्यातमदिन क्यों पाइये ॥४॥ शुभ दल पालय लहलहे हो, होहिं अशुभ पतभार । मलिन विषय रति मालती हो, विरति बेलिविस्तार । भला अध्यातमदिन पयों पाइये ।। E

नमसरकारे
प्रति निर्मन भयो हो, शिला भमियर
नील गुमक्किा हो, मालिशग पोर ।।
मग मधासमरिन यो पाइये॥६
मी मला भगी हो, समका भानुभमन ।
माणित भयो हो, मग II मरन।
भागमा पाइये।
ARRfor ने शोर ।
पार पादरीको रि गुम भोर।।
मा गालातियो पाइये।
ATMEHARो, जागोजगार काना
माननी हो, गरमगाम ॥
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भाना मी भार बना।
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HTrifha pril ॥१.
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पनारसीविलासः १५९ -...--- दया मिठाई रसभरी हो, तप मेवा परधान । शील सलिल अति सीयलो हो, संजम नागर पान ॥ भला अध्यातमविन क्यों पाइये ॥ १३ ॥ गुपति अंग परगासिये हो, यह निलज्जता रीति । अकम कथा मुखभासिये हो, यह गारी निरनीति ।। मला अध्यातमविन क्यों पाइये ॥ १४ ॥ उद्धत गुण रशिया मिले हो, अमल विमल रसप्रेम । सुरत तरंगमह छकि रहे हो, मनसा याचा नेम ॥ मला अध्यातमविन क्यों पाइये ॥१५॥ परम ज्योति परगट भई हो, लगी होलिका आग। आठ काठ सय जरि मुझे हो, मई तताई भाग ॥ मला अध्यातमविन क्यों पाइये ॥१६॥ प्रकृति पचासी लगि रही हो, भल लेख है सोय । न्हाय धोय उज्वल भये हो, फिर तह खेल न कोय । भला अध्यातमविन क्यों पाइये ॥ १७ ॥ सहज शक्ति गुण खेलिये हो, चेत पनारसिदास । सगे सखा ऐसें कहै हो, मिट मोहदधि फास ॥ मला अध्यातमविन क्यों पाइये ॥१८॥ पास अध्यातमधमार. रTM जैनमन्यरसाकरे अथ सोलह तिथि लिख्यते. चौपाई। परिवा प्रथम फला घट जागी । परम प्रतीतिरीति रसपागी॥ प्रतिपद परम प्रीति उपजावे । वहै प्रतिपदा नाम फहावे ॥१॥ दूज दुहंधी दृष्टि पसारे । स्वपरविवेकपारणा धारे । दर्वित मावित दीस दोई । द्वय नय मानत द्वितीया होई॥२॥ तीज त्रिकाल त्रिगुण परकासे । त्रिविधिरुप त्रिभुवन आमासे। तीनों शल्य उपाधि उठेदै । त्रिधा कर्मकी परिगति भेदै ॥२॥ चोय चतुर्गतिको निरयारे । कर पकपूर चौकरी चारे चारों वेद समुशि पर आये । तर मुअनंत चतुष्टय पाये ॥४॥ पांचे पंच मुचारित पाले । पंचशानकी मुरति संमाले ॥ पांचों इन्द्रिय करे निरासा । तर पार पंचमगति यासा॥५॥ छठ एकाय सांग पर सोये ॥ रद रस मगन छ माहति हो। बब छहदरगनमें न अरुला। तब छ दयोन्यारो सूशे॥६॥ माने मातों प्रकृति विगाये । सामंग नयमों मन साये ।। त्यांग मान य्यमनविधि जेनी निर्मय र मान भयगती. आटें आट महामद भने । अष्टमिद्धिगतिमों महि ॥ अष्टकममलमूल बा । अष्टगुणाम गिद्ध कहारे ॥ ८ ॥ नामी नदरमने रगती ममकिन थर नामद गरे । এমবিধি না থায়াবি নবী পাখি

बनारसीपिलामः
दशमी दशदिशियों मन मोरे । दश प्राणनमो नाता तोरे ।।
दशविधि दान अभ्यंतर साधेादशलच्छण मुनिधर्म अराध १०
ग्यारस ग्यारह महति विना (ग्यारह प्रनिमापद परफारी।
ग्यारह रद कुलिंग पसाने । ग्यारह विया जोग जिन मान ११
पारस पारद विरति यहा। पारद विधि तपसों मन ताव।
बारहभेद भावना भाये। पारह अग जिनागम गांव ॥ १२ ॥
तेरम तेरह किया मंगाल । तेरह विपन कोटिया लि ।।
तेरहविधि संजम अवधार रह थानष जीय विचार ॥१३॥
चौरस पौदह विधा मान । पादह गुणथानक पहिचान ।।
पीपद मारगना मन आने । मौदहरज्जु लोक परयां ॥१॥
तग पन्द्रद निधि गनिलीगे। पन्द्रद पात्र परपि धन दी।
दह जोगरदित जो धरणीमो पर पत्य समायग परणी १५
पूनों पूरण माविलागी । पूर गुण पूरण परगासी ।
पूरण प्रभुना पूरणगासी । पांद गापु सुलसी वनयासी ॥१६॥
भी पोरातिविता
अथ तेरह काठिया लिख्यते.
ने पटपार पारमें, फरदि उपदय और ।
तिन्हें देश गुजरातमें, करहिं काठियांचोर ॥१॥

जैनमन्मनाकरे त्यों यह तरह काठिया, करहिं धमंडी हानि। ताने का इनकी कथा. कहहुं मिशेष यसानि ॥२॥ जा आलम दो भय, कथा कौतुक कोई । पनि अज्ञानता, अम निद्रा मई मोहे ॥३॥ प्रथम काडिया भा जाग । जामें पंन यातुको हान । प्रा घटे गुभ कर्म । मिद मुजश पिनो धर्म ॥१॥ मिति काठिया मालममा जागु उदय नाशे गाव | मादि निकित होरि गर अंग ! अंतर धर्मगगना भंग ॥१॥ टग भीगगे शोर मा । बागु पय नियत गार पारिदोय । धर्मकिपा तह रहनकोपारा भग पकाया मान । मारे पदोष मान । कोपि | सर गुमंडपम मिट जाप 31 टग पंसा मुक्या पापा FAMERA पनिमार। जामगन गमामिव धन पागना मदिरा माला टिगा । नाम दिया। मा निपा गानानिग जाय मारय MATER कोरा मानमामिमान हो ! भान, ताकिम ?..! सामान पर ममम MRATHI

-.
पनारसीविलासः
१६३
नयमा ठग आज्ञान अगाघ । जामु उदय उपजे अपराध ।।
जो अपराध पाप है सोय । जहाँ पाप तहां धर्म न होय १२
दशम फाठिया भ्रम विच्छेप । प्रमों अशुभ फरमको लेप ।।
अशुभ फर्म दुरमतिकी सानि । दुरमति फर धर्मकी हानि१३
एकादशम काठिया नींद । जासु उदय जिय यस्तु न वींद।
मन पच काय होय जड़रूप । बूड़े धर्म कर्मघनकृप ॥१४॥
ठग द्वादशम अष्टमद भार । जामें अफररोग अधिकार ॥
अकररोग अरु पिनयविरोध । वह अविनय तह धर्मनिरोध१५
तेरम चरम काठिया मोह । जो विवेकसों करे विछोह ॥
अविवेकी मानुप तिरजंच । धर्मधारणा धरै न रंच ॥१६॥
येही तेरह करम ठग । लेहिं रतन प्रय छीन ।
यातें संसारी दशा । कहिये तेरह तीन ॥ १७॥
विप्रयोदशकाठिया.
अथ अध्यातम गीत लिख्यते.
राग गौरी.
मनका प्यारा जो मिले। मेरा सहज सनेही जो मिले टेका।
ये अजोध्या आतम राम । सीता मुमति कर परणाम !
मेरा मनका प्यारा जो मिले, मेरा सहज० ॥१॥
फत मिलनको पार । समता सखीसों वह इसभाय ।।
मेरा मनका प्यारा जो मिल, मेरा० ॥२॥

१६४ नग्रन्यरत्नाकर - ... .... मै विरहिन पियके आधीन । यो तलफों ज्यों जल दिन मीन मेरा मनका प्यारा जो मिल, मेरा० ॥३ वाहिर देवू तो पिय दूर । घट देखे घटमें मर पर ।। मेरा० ॥2॥ घटमहि गुप्त रहे निरधार । वचनअगोचर मनके पार ।। मेरा० अलस अमूरति वर्णन कोय । कवघों पियको दर्शन होय ॥ मेरा० .... मुगम सुपंथ निकट है टौर । अंतर आड विरहकी दौर मेरा० जउ देखो पियकी उनहार । तन मन सर्वस डारों यार ।। मेरा० ॥८॥ होहुं मगन में दरशन पाय । ज्यों दरिया बूंद समाय ! मेरा० पियको मिलों अपनपो खोय । ओला गल पाणी ज्यों होय ।। मेरा० ॥१०॥ मैं जग हूंढ फिरी सब टोर । पियके पटतर रूप न ओर ॥ मेरा० पिय जगनायक पिय जगसार । पियकी महिमा अगम अपारा। मेरा ... .... । .... .... .... .... . ...|| १२॥

. बनारसीविलासः .... .... .... .... .... पिय मुमिरत सब दुख मिट जाहिं । भोरनिरस ज्यो चोर पलाहिं मेरा० भयभंजन पियको गुनवाद । गजगजन ज्यों केहरिनाद ॥ मेरा० ॥१४॥ भागइ भरम करत पियध्यान । फटइ तिमिर ज्यों ऊगत भान मेरा० दोप दुरइ देखत पिय ओर । नाग डरइ ज्यों बोलत मोर ॥ मेरा यसों सदा मैं पियके गाँउ । पियतन और कहां मै जाँउ ॥ मेरा० जो पिय जाति जाति मम सोइ । जातहिं जात मिले सब कोह ॥ १८ ॥ पिय मोरे पट, म पियमाहिं । जलतंरग ज्यों द्विविधा नाहिं । मेरा. पिय मो फरता मै फरतूति । पिय ज्ञानी मै ज्ञानविभूति ॥ मेरा ॥२०॥ पिय सुखसागर में मुखसीव । पिय शिवमन्दिर मै शिवनीव ।। मेरा० ॥२१॥ पिय ब्रह्मा में सरम्बति नाम । पिय मापय मो कमला नाम || ॥२२॥ मेरा० .... .... .... .... मेरा. ....

जैनग्रन्यरत्नाकरे . .... .... .... .... .... .... पिय शंकर मैं देवि मवानि ! पिय जिनवर में केवलवानि ॥ मेरा० ॥ २३॥ पिय मोगी मैं मुक्तिविशेष । पिय जोगी मैं मुद्रा मेष । मेरा० ॥२४॥ पिय मो रसिया में रसरीति । पिय व्योहारिया में परतीति ।। मेरा ॥२५॥ जहां पिय साधक तहाँ में सिद्ध । जहां पिय टाकुर तहाँ में रिद्धा। मेरा० जहां पिय राजा तहाँ मैं नीति । जहँ पिय जोद्धा तहाँ मैं जीवि मेरा० ॥२७॥ पिय गुणग्राहक मैं गुणपांति । पिय बहुनायक मैं बहुमांति ।। मेरा० ॥२८॥ जहँ पिय तहँ मैं पियके संग । ज्यों शशि हरिमें ज्योति अमंग ॥२९॥ पिय मुमिरन पियको गुणगान । यह परमारथपंथ निदान ।। मेरा० ॥३०॥ कहइ व्यवहार वनारसिनाव, चेतन मुमति सटी इकठाव ॥ मेरा० इति चेतनमुमविगीत. -.. .... मेरा० .. .... .... ७.. ....

पनारमीविलासः अथ पंचपदविधान लिग्यते. १४.3-14 नमो ध्यानधर पंचपद, पंचगु ज्ञान अराधि । पंचगुचरण चितारचित, परफर रिपुमाधि ॥ १ ॥ सापाई (१५) पन्दों भीमरदंत अधीश । पन्दो प्वयंगिद जगदी ।। पन्दों भाचारज उपाय । पन्दो साधुपुरुषक. पाय ॥ २ ॥ एपंच इष्ट आधार । इनमें देव एक गुरु पार ॥ सिद्ध देय परमिर उदार । गुरु अरईतादिक भनगार ॥३॥ सिद्ध सोई जग फर न फोह । भयो कदाच न करो। अपय अवहित अविचलधाम । निर्मल निगवार नाम । अप गुरु कहीं घार परकार । परम निधान धरमधनधार । गरमवंत शुभ कर्म गुजाग । त्रिभुयनमा पुगप पाधान ॥५॥ प्रथम परमगुरु श्रीभदंत । दितिय परमगुरु पूरि॥ हनिय परमगुरु भीउपशाय । बांधे परम गुगुर निगप ॥६॥ परम ज्ञान दर्शनभंडार । वाणी लि परम गुम्बार ॥ परम उदारिक सनधारत । परम गुपहिय राम || .॥ धगध्यान धारे उत्तए । भा धर्मदेशना लिए। धर्मनिभान धर्मगो भंग । धर्म गुरु बाधारण एम ॥ ८ ॥ पौर परय ग्यारह भंग । पट गरम जान दंगा परमो मर्भ प. गाय । पति पाम गुगुर उपशाय ॥९॥ immer Shrkig "MAR!...Unre जैनग्रन्थरत्नाकरे पट आवश्य कर्म नित करें। त्रिविधि कर्मममता परिहरें ।। विपुल करम साधे समफिती । परम सुगुरु सामानिक जती१० पंच मुपद कीजइ चितौन । दुरित हरन दुख दारिद दौन ॥ यह जप मुख्य और जप गौन । इस गुण महिमा वरणे कौन ११ दोहा। महामंत्र ये पंचपद. आराधै जो कोय । कहत वनारसिदास पद, उलट सदाशिव होय ॥ १२ ॥ इति श्रीपंचपद विधान. अथ सुमतिके देव्यष्टोत्तरशतनाम. नमो सिद्धिसाधक पुरुप, नमी आतमाराम । वरणों देवी मुमतिके, अष्टोत्तरशत नाम ॥१॥ रोड़ा छन्। मुमति सबुद्धि मुधी मुबोधनिधिसुता पुनीता । शशिवदनी सेमुपी शिवमती धिषणा सीता ।। सिद्धा संजमवती स्यादयादिनी विनीता । निरदोपा नीरजा निर्मला जगत अतीता || शीलवती शोमावती, शुचिधी रुचिरीति । शिवा मुभद्रा शंकरी, मेधा दृढ़परतीति ॥ २॥ यभागी प्रसना ब्रमरति, प्रमअधीता। पदमा पदमारती वीतरागा गुणगीता ।।

पनारसीविलास'. शिवदायिनि शीतला राधिका, रमा अजीता। समता सिद्धेश्वरी सत्यभामा निरनीता ।। कल्याणी फमला कुशलि, भवभजनी भवानि । लीलावती मनोरमा, आनन्दी मुग्वखानि ॥ ३ ॥ परमा परमेश्वरी परम पंडिता अनन्ता । असहाया आमोदवती अभया अघहता ॥ ज्ञानपती गुणवती गौमती गौरी गंगा। लक्ष्मी विद्याधरी आदि सुंदरी असंगा। चन्द्रामा चिन्ताहरणि, चिद्विद्या चिद्वेलि । चेतनवती निराकुला, शिवमुद्रा शिवकेलि ॥ ४ ॥ चिदवदनी चिप फला वसुमती विचित्रा । अर्धगी अक्षरा जगतजननी जगमित्रा ॥ अविकारा चेतना चमत्कारिणी चिदंफा। दुर्गा दर्शनवती दुरितहरणी निफलंफा ॥ धर्मधरा धीरज पनि, मोहनाशिनी वाम । जगत विकाशिनि भगवती, भरमभेदनी नाम ॥ ५ ॥ घत्तानन्द निपुणानवनीता, वितथविनीता, मुजसा भवसागरतरणी । निगमा निरपानी, दयानिधानी, यह मुबुद्धिदेवी यरणी ॥ ६॥ विधीयुमरिदेविसतर.

१७० जैनमन्थरमाकरे अथ शारदाष्टकं लिख्यते. धरणग. नमो केवल नमो केवल रूप भगवान । मुस ओंकारभुनि मुनि अर्थ गणपर विचारे । रनि आगम उपशि भविक जीन संशय निगरे॥ सो मत्यारथ शारदा तागु, मरि उर भान। इन्द भुगंगपातमें, अएक फहीं यशान ॥१॥ भुजंगप्रयात. जिनामगाता जिनेन्दा पिम्याता। विगुदपयुना नमो लोकमा|| दुगमा दुदा शंकरानी। नमोपाधीयानी ॥२॥ गुमागगानी धर्मशाला। गगनापनिनांगनी मेगमा महामोहनी मोगदानी । भाजनानी 11 ॥ सपनामा पनीतानिया। या मना माता दममाण || निन्द-मानी। नादानी !

बनारसीविलासः समाधानरूपा अनूपा अछुद्रा । अनेकान्तथा स्यादवादामुद्रा । विधा सप्तथा द्वादशाही वखानी । नमो देवि वागेश्वरी जैनवानी ॥ ५ ॥ अकोपा अमाना अदमा अलोमा। श्रुतज्ञानरूपी मतिज्ञानशोभा ॥ महापावनी भावना भव्यमानी। नमो देवि यागेश्वरी जैनवानी ॥ ६ ॥ अतीता अजीता सदा निर्षिकारा । विपैवाटिकासंडिनी राहधारा ॥ पुरापापविक्षेपकर्तृ रुपाणी। नमो देवि यागेश्वरी जैनवानी ॥७॥ अगाधा अाधा निरंभा निराशा। अनन्ता अनादीश्वरी फर्मनाशा ।। निशंका निरंका चिदंका भयानी । नमो देवि पागेश्वरी जैनयानी ।। ८ ।। अशोका मुदेका विवका विधानी । जगजन्नुमित्रा विचित्रावसानी ।। समसायलोका निरम्नानिदानी । नमो देवि वागेश्वरी जैनयानी ॥९॥ الاعلانات १७२ जैनमन्यरलाकरे पाउंट जैनगगी जैनवानी मुनहि जे जीव । जे आगम रुनिचरें चे प्रतीति मन माहिं आनदि । आधारहिं जे पुरुष समर्थ पर अर्थ जानदि ।। जे हितहेतु पनारमी, देहि धर्म उपदेश । ने गर पाहि परम मुरा, तज संमार कलेश ॥१०॥ हीशारदारक अथ नवदुर्गाविधान लिग्यते. प्रणमादि ममफिनाल आपापर, परको मार त्यागी आप गरले दे। पक. गणमा आधा गर, मानिद्विपको गुट देहे ॥ भीनमुगवान आदि छीनगी मन्न, नागुणवान निति गरी मनु । गरम निन नाम गुप, riivil arre Titril गु॥१॥ Tam, कामगार मभिमान। नामा माग, PAHE Tin" बनारमीदिलामः ज्ञानकी अवस्था दोऊ निश्चय न भेद कोऊ, ध्यपहार भेद देय देवी यह व्यग है। ऐगो साध्य साधक सरूप मूभो मोरपथ, संतनको सत्यारय मदनको टिंग है ॥२॥ जाफो भीनभवकृप मुकुट विकास, अनाचार रासभ आम्ददुति गशी है । जाफे एषः हाय परगारथ फलश दजे, दाथ त्याग पनि योहारी विधि बशी है। जाफे गुणथयण विचार यद वानी भोग. औपन भगतिरमरागों अम्मी है। मो है देवी शीतला गुमति गरी संतनको, दुरबुद्धि लोगनको रोगमप गशी ॥३॥ पसौ निकम गपभूपर उदोन भई, तर और ज्योति मुग उपर विराजी है। गुजा भई चोगुणी पायति भई गोगुणी, हजार गए भागुणी रमायसिनि हामी। मुंगसो मगल्यो गर, सरामसो भयो गर, सूप भयो एयसो पुहारी राय राजी। ऐपन पो रंगगो सो पचनो लग भयो, यानि नागभयो हामी शान साजी ॥४॥ ....

अनमन्परमाकरे दोहा। जाके परसत परममुम, दरसत दुस मिट जाहिं । महै मुमति देवी प्रगट, नगर कोट घटमाहि ॥ ५॥ यह धाप मानांदी भई, यह है भगदी विदाने भनुमरणो । यह ध्यान अगनि प्रगट भो पालामुभी, यदे मंडी मोद मदिार निदरणी ॥ यहे. अष्टमुनी गष्टकमकी शनि भने, यदे कायननी उलंप काटकरणी। पर पानी गिो मुन राणी, यो देशी गुगनि भोमानि वाणी ॥ ६ ॥ यह कामनागिनी कला काका, या प्रचारिणी गुमागेर भाग्नी । पर भगीति यो दगा दुर्गन नाही, संपनी TIER-Iनी ॥ यो, मम्मी ममीना गती, गले दिनमानी। : प्रगना मनु, योग भवन I l पनारगीस्लिामः यह सरखती हंसवाहिनी प्रगट रुप, यह भयभेदिनी भवानी शंभुषग्नी । यदे ज्ञान लण्डनमा लच्छमी विलोकियन, यह गुणरतनभंडार भारभग्नी ।। यह गंगा त्रिविधि विचारमें त्रिपथ गोनी, यद मोखसाधनको तीरथकी पानी । यद गोपी यह राधा रांध भगवान भाव, यद देवी मुमति अनेकमांनि पानी ॥ ८॥ यदि परमेश्वरी परम प्रद्धि सिदि गाय, यद जोग माया व्ययहार बार दग्नी। यह परमायनी पदम ग्यों अलेप , यदै शुभ राति मिग्यानषी कतरनी। यदे जिनमदिमा पानी निनशासनमें, यह महिन शियमहिमा अमरनी। यदै रमभोगनी वियोगमें वियोगिनी, यह देवी मुमनि अनेकांतिपरनी ॥९॥ ही धीर विधान PRAPH नपन्यानाहरे अथ नामनिर्णयविधान लिख्यते. कार दिन का समय, कमलाभार गमेन । गुणा गान.. भजीत लिन ॥१॥ जीप ममागं, अविना धि। पशि Imf भागा ॥२॥ बनन) यो गिनानी पानाको नानी नाम, पिनाशीक घास जामा नाम निमो। Tो ममी नोमानापारा॥ नादि अननो गुनग नाम, 41 नागनानी पाना मी का गुमनाम ॥ ३ ॥ in 11 informat, ARTH गई। प्रना 42 MI कम बनारसीविनामः xvN मेरा नाय भार पार है मोह भागवत धनवंत, जगतमें सदाकाल रहेगा। याही ममतामों गदि आयो है अनत नाम, आगे योनियोनिमें अनंत नाम गंगा ॥ ५॥ दोहा। योल उठे चित पाकि नर, मुनन नामकी हार । चंद शब्द मतगुरु कहें, है भमर पगार ॥ ६ ॥ जगतमें एक एक जगपे. अनेक नाम, एफ एफ नाग देखिये अनेक जनमें । या जगम और या जनग और भागे लोर, फिरता र पयायो पिरना न सनमें ॥ कोई फलपना कर जोई गाम धरै जावो, गोई जीव गोई नाम माने निई पनमें । ऐमो विरतंत लस तमो गुगुरु पद. सेरो गाग भ्रम विचार देव गनमें ॥७॥ । गाम अनेयः समीप नुय, बग अंग समोर । भाग तु अपनोद, मो भगरुपी बार ॥ ८ ॥ परासीग माल गौर परणी पर भग, गोला पोल ना गासा गुम पास १८० जैनअन्यरत्नाकरे । रोगी दारद्रपीडित पुरुष, वृद्ध नारि रसगृद्धचित । एते विडम्ब संसारमें, इन सब कह धिक्कार नित ॥ ६ ॥ प्रात धर्म चिन्तदै, सहजहित मंत्र विचार । चर चलाय चहुं ओर, देशपुर प्रजा सम्हारे ।। राग द्वेष हिय गोप, वचन अम्रत सम बोले समय ठौर पहिचान, कठिन कोमल गुण खोले ।। निज जतन करै संचय रतन, न्यायमित्र अरि सम गर्ने । रणमें निशंक है संचरै, सो नरेन्द्र रिपुदल हनै ॥ ७ ॥ कृपण बुद्धि यश हनें, कोप दृढ़ प्रीति विठोर । दंभ विध्वंसै सत्य, क्षुधा मर्यादा तोरै ॥ कुव्यमन धन छय करे, विपति थिरता पद सारद । मोह मरोरे ज्ञान, विषय शुम ध्यान विडारइ ।। अभिमान विछेद विनय गुण, पिशुनर्म गुरुता गिले । कुकलाअभ्यास नासहि मुपय, दारिदसों आदर टले ॥ ८॥ लियबल योवन समय, साधुवल शिवपथ मंवर । नृपवल तेज प्रताप, दुष्टबल वचन अदम्बर निर्धनबल मुमिलाप, दानिमेया याचस्वल। याणिजाल व्यवहार, सागरल यविवेकदल विद्या विनय उदारपर, गुणममूह ममुरल दर । परिदार म्बयल मुविचार कर, होदि एक ममना गरम ॥ २॥ .

बनारसीविनामः १८१ HAMA नरपतिमंटन नीति, पुरुषमंडन मनधीग्ज । पदितमंदन विनय, तालमरमंटन नीरज ॥ गुलतियमंटन लाज, यचनमंटन प्रमहमुए । मतिमंडन कवि धर्म, माधुगंडन गमाधियुष । भुजबलरामर्थ मंधन क्षमा, गृहपनि मटन विपुल पन । मंडन मिद्धान्त रुचि सन्त कद, कायागंडन सवेन धन ॥१॥ शानवन्त हट गंद, नियन परियार यहां विधवा पार गुमान, धनी गंवा पाय ।। पर न समझे धर्म, नारि मा अपमान । परित किया विटीन, राय दुर्बुद्धि प्रगाने ।। गुन्नयन पुरुष पुलावधिनजे, पं न गाने दिन । सन्याराधार धन रामद, ए जगमें ग्राम पिहिन ॥ ११ अथ अष्टप्रकारजिनपूजन लिग्यते. मलपारा पन्दन पुरपे, अशत करने । दीप धूप फल अर्पगुन, विगतमा पद ।।१॥ जल-मलिन पातु उयल करे, या प्रभाव साट गलसो जिपर पूजते, तर म ॥२॥ m. एप 1 " .

जैनमन्मरमारे . नन्दन-तता गीतर कर, चन्दन सीनल आर। सदनमा दिन पूजन, मिरे मोहर्मनार ॥ ३ ॥ पुष्प-पुर पुपगर, भारे मनमय की। यात पूजा पुरी, हो महनगरपीर ॥१॥ प्रसा-मनु सा पविती, नाम ग मान नाग। अनगो नि पूजा, मग गुणपर काम ॥ ५॥ नीर-परम अनदेय मिल, शाहरम सन पो।। गिगाजा नागो, निदि सुधारित दो ॥ ६ ॥ दी-II पर दोगरा, निशि दील। दीनि तो, निमशालागोन ॥ ७॥ ATT IITER गुगो, गोग। भगत नियो, कम दहन ॥ पोनी को मोगा । पानी, Aanादेग ।।।। माग, न न । पmita: मग ॥१॥ अर दादापियान दिन. गान, मापन nam TARA बनारसीविलासः अब इनको विवरण पहूं, भाषितरूप पखानि । अलखरीति अनुभवकथा, जो समझ सो दानि ॥२॥ चापाई। गो कहिये इन्दी अभिधाना । पउरा उमंग भोग पर पाना । जो इसके रसमाहिं न राना । सो सपच्छ गोदानी साँचा ॥३॥ फनक मुरंग मु अक्षर पानी। तीनों शब्द सुवर्ण कदानी।। ज्यों त्यांग वीगफी साता । सो फदिये सुवरणको दाता ॥४॥ पराधीन पररूप गरासी । यो दुईद्धि फहाये दासी। ताकी रीति तजे जर शाता। तव दासीदावार विग्याता ॥५॥ सनमन्दिर चेतन परवासी । शानदृष्टि पट अन्तरभासी । समझे यद पर है गुण मेरा । मन्दिरदान होहि तिहिं बेरा ॥६॥ अट महामद भुरके साथी । ए फुकर्म कुदशाफे हाथी । इनको त्याग फर जो कोई । गनदातार फहाथै सोई ॥ ७ ॥ मगतुरंग पर भानी दौरइ । लसे तुरंग औरम औरह । निज गको निजात पहावे । सो तुरंगको दान कहांचे ॥ ८ ॥ गविनाती गुलके गुण गाये । पुल पलिय सहुद्धि फाहा ।। पुदि अतीत धारणा फैली । पदै फलप्रदानकी सली ॥९॥ ग्रामविलारा तेल सति माया । मिथपिंड तिल नाम पराया। पिंदरप गदि विविधा मानी। द्विविधा तजे सोइ निस्दान जो पपहार अपाया होई । अन्तरभूमि कहा सोई॥ तज व्यपदार जो नियम माने । गिदानकी विधि सो जाने ।।

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१८४
जैनग्रन्यरत्नाकरे
शुकल ध्यान रथ चढे सयाना । मुक्तिपन्यको करे पयाना
रहै अजोग जोगसों यागी। वहै महारथ रथको त्यागी ।।१
ये
दशदान जु
मैं कहे, सो शिवगासनमूल ।
ज्ञानवन्त सूक्षम गहै, मूढ़ विचारै थूल ॥ १३ ॥
ये ही हित चित जानको, ये ही अहित अजान ।
रागरहित विधिसहित हित, अहित आनकी आन ?
इति दशदानविधान.
अथ दश वोल लिख्यते.
चौपाई.
जिनकी मांति कहाँ समुझाई । जिनपद कहा सुनोरे भाई
धर्म सरूप कहावे ऐसा । सो जिनधर्म वखानी जैसा ॥१
आगम कहो जिनागम सांचा । वरणों वचन और जिन वा
मत मापहुँ जिनमत समुझावहुं।ये दश चोल जथारय गायहुँ
गिन-दोहा।
सहज बन्धवंदक रहित, सहित अनन्तचतुष्ट ।
जोगी जोगअतीत मुनि, सो जिन आतम मुष्ट ॥ ३॥
जिनपद।
विधि निषेध जाने नहीं, जहें असंट रम पान ।
विमल अवम्या जो घरै, सो जिनपद परमान ॥ ५ ॥
धर्म
सदिय वम्नु अवानुमें, यथा अस्थिन जोय ।
जो म्वभाव जामे मय, धर्म कहां सोय ॥५॥

पनारमीदिनमः शिमयमं। पुरुष प्रमाण पांग, परनपीन मि। धर अर्थकी अगगना, या, भागमी दार ॥ ६ ॥ रिमभायम जहा द्रव्य पर सत्य नय, रोकालोकपिा । विवरण पर अनमय, गो जिन आगम गार ॥७॥ . पहुं मार गुदा धर. का अनक्षर भार । पुरा सत्य बनुभय उमेय, पण चार पाता॥८॥ जाकी दशा निरधारी, महिमा मा । ग्यायपारगुन मत्यमय, गो नियम ९॥ गत. भाव मतकी विपा, नि ARI गुलामासी पपि, या गती पाना ॥ to बटन देव गुमान गुर, दया जाय। पप गापित कमिया M

-भर दुस दाऊ कहा, का पंडित को मूह ||
१८८
जैनग्रन्यरत्नाकरे
प्रश्न-शद अगोचर वस्नु है, कडू हीं अनुनान ।
जैसी गुरु आगन कही, तमी कही मुजान ॥ ७
उत्तर-गब्द अगोचर कहत है, अन्दमाहिं पुनि सोय ।
स्यादवाद शैली अगम, विरला बूझ कोय ॥ ८ ॥
प्रश्न-वह अरूप है रूपमें, दुरिक क्रियो दुराव ।
में पावक काटमें, प्रगटे होत लखाव ॥९॥
उत्तर-हुतो प्रगट फिर गुपतमय, यह तो ऐसो नाहिं।
है अनादि ज्यों खानिमें, कंचन पाहनमाहि॥१०॥
इति प्रमोत्तर दोहा.
अथ प्रश्नोत्तरमाला लिख्यते.
नमत शीस गोविन्दसों, उद्धब पछत पम ।
के विधि यम के विधि नियम, कहो यथावत जेम।।१॥
समता कैसी दम कहा, कहा तितिक्षा माव
धीरज दान जु ता कहा, कहा मुमट विवसाय ॥२॥
कहा सत्यरति है कहा, सोच त्याग धन इष्ट ।
यज्ञ दक्षिणा बलि कहा, कहा दया उनकिष्ट ॥ ३ ॥
न कहा ला विद्या कहा लज्जा लक्ष्मी गूढ ।
इसने कपियों ने कहो कहा, वर्ग नरक चिंतीन ।
यह मलता है.
mocuwa
अरु कहा, धनी दरिद्री कौन ॥ ५ ॥

V बनारसीविलासः कौन पुरुष कहिये कृपण, फो ईश्वर जग माहि । ये सब प्रश्न विचार मन, फही मधुप हरिपाहि ॥६॥ नारायण उत्तर कहै, मुन उद्धव मन लाय। द्वादश यम द्वादश नियम, कहूं तोहि समुझाय ||७}} दया सत्य धिरता क्षमा, अभय अचार्य सुमीन । लाज असंग्रह असिमत, संग त्याग तियवान ॥ ८॥ हरि पूजा संतोप गुर, भक्ति होम उपकार । जप तप तीरथ द्विविधि शुचि, श्रद्धा अतिथि अदार९ सोरटा। फहे भेद पीवीस, भिरा २ यम नियगफे। रहे प्रश्न चौवीस, तिनके उपर अर गुना ॥ १० ॥ समता शान मुधारस पीजे । दम इन्द्रिनको निमद कीजे ॥ संफटसहन तितिक्षा वीरज । रसना मदन जीतवो धीरजा११॥ दान अभय जहे दंडन दीजे । तप कामनानिरोध पद्दीन । अन्तरविजयापूरता सांची। सत्यभन्न दर्शन निरवाची ॥१२॥ रतु अनरी ध्वनि जहं होई । करम अभाष शौचविध सोई। स्याग परम सन्याम विपाना । परम परम धन हा निधाना १३ व धारणा यज्ञपी करनी । दिन उपदेश दक्षिणा परनी।। प्राणायाम पोधपल अक्षा । दया अशेप जन्तुको रसा ॥१४॥ लाभ भायगुभगतिपरसाशा। विधा सो जु अविधानासा समान युकर्म मिलानि कहा । लक्ष्मी नाम निराशा पाव १५

जैनग्रन्थरताकरे
मुखदुखत्यागबुद्धि मुखरेवा। दुग्ध विषयारस मोगविशेखा ।
पंडित बंध मोक्ष जो जाने । मूरख देहादिक निज माने ॥१६॥
मारग श्रीमुख आगम भाषा । उतपय कुधी कुमन अभिलाषा
मुकृतिवासना म्बर्गविलामा । दुरित उछाह नर्क गतिवासा॥१७॥
बंधव हितू म्बर्ग गुग्प दाना । गृह मानुपी गरीर विख्याता॥
धनी सो जु गुणग्नमंडारी। सदा दरिद्री तृष्णाधारी ॥ १८॥
कृपण सो जु विपयारसलोभी । ईश्वर त्रिगुणातीत अछोभी ।।
बहुन कहां लगि कहाँ विचक्षण । गुण अफ दोष दोहुके लक्षण १९
दृष्टि मुगुन अर दोपकी, दोष काय मोय ।
गुण अफ दोष नहीं नहीं, नहाँ गुन परगट होय ॥२०॥
इति प्रभोवरपालिका, उदयग्मियाद ।
मापा कहत यनारसी, भानुगुगुरुपरमाद ।। २१ ॥
निमोनरमारिका
अथ अवस्थाप्टक लिग्न्यते.
दोहा।
चंतनाग नियननय, सरे और इकगार ।
मन विषण पामगो, प्रिविधि र प्याहार ॥ १ ॥
मा भानमा एकविर विविधिविजान ।
द्विरिधि मात्र परमातमा, परमिपि नीर यमान ॥२॥

बनारसीविलासः विधि निषेध जाने नहीं, हित अनहित नहिं सूझ । विषयमगन उन लीनता, यहै मूहकी पूज्ञ ॥ ३ ॥ जो जिनभापित सरदहै, अम संशय सब सोय । समकितवंत असंजमी, अधम विचक्षण सोय ॥ ४ ॥ वैरागी त्यागी दमी, स्यपर विवेकी होय । देशसंजमी संजमी, मध्यम पंडिन दोय ॥ ५ ॥ अप्रमाद गुण थानसों, क्षीणमोदलों दार । थेणिधारणा जो धेर, सो पंडित शिरमौर ॥ ६ ॥ जो फेयल पद आचरे, चहि सयोगिगुणथान । सो जंगम परमातमा, भवयासी भगवान ॥ ७ ॥ जिदिपदमें सयपद मगन, ज्यों जलमें जन्ट बुन्द ! सो अविचल परमातमा, निराकार निरदुन्द ॥ ८॥ रति भवरणार. ایران را ارالارد؟ अथ पदर्शनाष्टक लिख्यते. शिवमत बौद्ध रु येदमत, नैयायिफ मतदक्ष । मीमांसफमत जैनमत, पटदर्शन परतश ॥१॥ शेवमत। देव रुद्र जोगी मुगुरु, आगम शिवगुम भास । गने कालपरणति परम, यह शिवमतकी सास ॥२॥ - जैनग्रन्थरताकरे बादमत । देव वुद्ध गुरु पाथदी, जगत वस्तु छिन औध । शून्यवाद आगम मजे, चारयाक मत बोध ॥ ३ ॥ वेदान्तमत। देव ब्रह्म अद्वैत जग, गुरु वैरागी भेप । वेद अन्य निश्चय धरम, मत वेदान्तविशेष ॥ ४ ॥ न्यायमत। emamalAteriamineK जैनमत। देव जगतकरता पुरुष, गुरु सन्यासी होय । न्याय ग्रन्थ उद्यम धरम, नैयायिक मत सोय ॥ ५ ॥ मीमासकमत। देव अलख दरवेश गुरु, माने कर्म गिरंथ । धर्म पूर्वकृतफलउदय, यह मीमांसक पंथ ॥ ६ ॥ देव तीर्थकर गुरु यती, आगम केवलि बैन । धर्म अनन्त नयातमक, जो जाने सो जैन ॥ ७ ॥ ए छहमत छै भेदसों, भये छूट कछु और । प्रतिषोडस पाखंडसों, दशा च्यानवे और ॥ ८ ॥ इति पदर्शनाटक अथ चातुर्वर्ण लिख्यते. जो निश्चय मारग गहै, रहै ब्रह्म गुणलीन । अन्नदृष्टि मुस अनुमवै, सो ब्राह्मण परवीन ॥ १ ॥ TTTTTTriry बनारसीविलासः LAKAA- जो निश्चय गुण जानक, करे शुद्ध व्यवहार । जीत सेना मोहफी, सो क्षत्री भुजभार ॥२॥ जो जाने व्यवहार नय, रट व्यवहारी होय । शुभ करणीसों रम रदै, वश्य कहां सोय ॥३॥ जो मिथ्यामत आदरे, रागद्वेपफी सान । विनवियेक फरणी फरे, शद्वयर्ण सो जान ॥ १ ॥ चार भेद करतूतिौं, ऊंच नीच गुलनाम । और वर्णसंकर संघ, जे मिश्रित परिणाम ॥ ५॥ की चातुर्वर्ण अथ अजितनाथजीके छंद. गोयमगणहरपय नमो, गुमरि मुगुरु रविचन्द । मरमुति देवि प्रसादलदि, गाऊं अजित जिनन्द ॥१॥ । श्रीअयध्यापुर देश मुहायाजी। राजे सहं जितशबू रायाजी॥ राया सुधर्म निधान गुन्दर, देवि विगया तगु परे । सगु उदर विजय विमान सुरवर, स्वम सूचित अपतर । तव जन्म उत्सव करहिं पासव, मधुर धुनि गादि गुरी। भागन्द त्रिभुवन जन पनारसि, भग्य मीभवध्याएरी ॥२॥ मदियल राजिउ अजित गिनंदाजी। गज पर लछन निर्मल पंदाजी।। * १९४ जैनप्रन्यरनाकरे चन्दा उदित इश्वास वंगहि, कुमति तिमर विनासिये । सय साट चार सुचाप परिमित, देह कंचन मासिये ॥ दिढ़ पालिराज मु गहिय संजम, मुकति पय रथ साजियो । उत्पन्न केवल मुख बनारसि, अजित महियल राजियो ॥३॥ गढ़ योजनमहि रचे मुदेवाजी । अष्ट प्रतीहार करहिं सु सेवाजी ॥ सेवहिं अशोक प्रसून वरसत, दिन्यधुनि तहँ गानहीं। चामर सिंहासन प्रभामंडल, छत्र तीन विराजहीं ।। नवदेव दुंदभि सभा वारह, चौतिसों अतिशय सही। मुर असुर किन्नरगण वनारसि, रचित गढ़ योजन मही ॥४॥ लक्ष यहन्तरि पूरव आया जी। भोग सु जिनवर शिवपद पायाजी ॥ शिवपद विनायक सिद्धि दायक, कर्म महारिपु मंजनो। वरणे शिपरावाद मंडन, भविक जनमनरंजनो । सोलैसै सचर समय आश्वनि, मास सितपख वारसी । विनवत दुई कर जोर सेवक, सिरीमाल वनारसि ॥ ५ ॥ इति श्रीअजित नायके छन्द.

सनारसीविहार अथ शान्तिनाथजिनस्तुति. महम्मद गामक वाकील। संदिपरी दिन आज मुहाया मुझ भाया आया नाहिं परे। सहि एरी! मन उदधि अनन्दा मुस, फन्दा चन्दा देह घरे ।। चन्द जियां मेरा पहम सोहै, नैन कोहि सुक्स करे । जगज्योनि सुदाई कीरनिडाई, तु दुस तिमरवितान हरे । ম োবিলালী গম, স া লাল ফখি । श्रीशान्ति बिनेशनरोरमको प्रभु, आज मिला मेरी सहिए: १ सहि एरी! तू परम सयानी, पुरझानी रानी राजत्रिया। सदिएरी! तू अति मुकुमारी, वरन्यारी प्यारी माणमिया ॥ माममिया लसि रुप अचंभा, रति रंभा मन लाज रही। कलपीत रेग कौलं करि फेसारे, ये सरि तोहि न होंहि कही। अनुराग मुद्दाग भाग गुन आगरि, नागरि पुत्यहि लहिये । मिलिं या नर फन्न नरोतमको प्रभु, धन्य सयानी सहिये १२ दो। विश्वसेन कुलकमतरवि, अचिरा उर अवतार । पनुप सु चालिस फनकतन, पन्दहुं भान्ति कुमार ॥३॥ विभगी पद (1,66) गनपुर अवतार, शान्ति युमार, शिवदातारे, सुखफार । निरुपम आकार, रुचिराचार, जगदापार, जितमोर ।। पगिये, १ काल समान, ४ भायंदेश औताले.

जैनग्रन्थरत्नाकरे
कृतमरिसंहारं, महिमापार, विगतविकार, जगसारं ।
परहितसंसारं, गुणविस्तारं, जगनिस्तारं, शिवधारं !॥ ४ ॥
सकल सुरेश नरेश अरु, किन्नरेश नागेश ।
तिनिगणवन्दित चरणजुग, बन्दहुं शान्ति जिनेश ॥ ५ ॥
श्रीशान्तिजिनेश, जगतमहेशं, विगतकलेशं, भद्रेशं ।
भविकमलदिनेशं, मतिमहिशेशं, मदनमहेशं, परमेशं ।।
जनकुमुदनिशेशं, रुचिरादेशं, धर्मधरेशं, चक्रेशं ।
भवजलपोतेश' महिमनगेशं, निरुपमवेशं, तीर्थेशं ॥ ६ ॥
करत अमरनरमधुप जमु, वचन सुधारसपान ।
बन्दहुं शान्तिजिनेशयर, बदन निशेश समान ॥ ७॥
वररूप अमानं, अरितमभानं, निरुपमज्ञानं, गतमानं ।
गुणनिकरस्थानं, मुक्तिवितान, लोकनिदानं, सध्यानं ।।
भवतारनयानं, कृपानिधानं, जगतप्रधान, मतिमानं ।
प्रगटितकल्यानं, वरमहिमानं, शिवपददानं, मृगजानं ॥८||
भवसागर भयभीत बहु, भक्तलोकप्रतिपाल ।
यन्दहुं शान्ति जिनाधिपति, कुगतिलताकरवाल ॥९॥
भंजितमवजालं, जितकलिकालं, कीर्तिविशालं, जगपालं ।
गतिविजितमरालं, अरिकुलकालं, वचनरसालं, परमालं ॥
मुनिजलजमृणालं, भवभयशालं, शिवउरमालं, मुकुगालं ।
भवितरुपतमालं, त्रिभुवनपालं, नयनविशालं, गुणमालं ॥१०॥

पनारमीविलासः हीर हिमालय हंग, युन्द शरदन निशाकर । कीर्तिकान्तिपिस्तार, सार गुणगणरत्नाकर । दुःशनि मंतति धाम, फामविज्ञपिविदारण । मागमतंगजसिंह, मोहतरदलन मुगारण । धीमान्तिदेव जय जितमदन, यानारसि पन्दन चरण । भवतापहारिदिगार पदन, शान्तिदेव जय जिनकरण ।। ११ ।। इति धामानिमाय जिनक अथ नवसेनाविधान लिख्यते. बेती र प्रथमदि पनि नाम दल लेन । सासों त्रिगुण कराये मेन ॥ सेन त्रिगुण सेनागग ठीक । सेनागुषों त्रिगुण भनीक ॥१॥ कीजे विगुण पाहिनी सोह । पानि त्रिगुण पगदल दोह ।। त्रिगुण परुथनि दल परचा मागो त्रिगुण पाहा दर ॥२॥ दंद कटक दशगुण परतु, तर अहिणी मान । दयगय र पायक सहित, ये तर परक खान ॥३॥ पनि एक मतंगा एक स्थ, सीन तुग प्रधान । शुभर पंप पायर सहित, पति परम परमान १९८ जैनग्रन्यरवाकरे -- सेना । चौपाई. नव तुरंग रथ तीन सुभायक । हस्ती तीन पंचदश पायक । वल चतुरंग और नहिं लेन । यह परवान कहावै सेन ॥ ५ ॥ सेनामुस। सत्ताइस घोड़े नव हाथी । पैंतालिस पायकनर साथी । नवरथ सहित कटक जो होई । दल सेनामुख कहिये सोई ६ भनीकनी। मत्त मतङ्ग सात अरु बीस । पयन येग रथ सचाईस । अनुग एकसौ पैंतिस ठीक । हय इक्यासी सहित अनीका७॥ याहिनी आमान सन्द। इक्यासी गजराज घोरपन गाजने । इक्यासी परमान महारथ राजने ॥ तीन अधिक चालीस तुरगम दोयसो । अनुग चारसौपच वाहिनी होय सो ॥ ८॥ धमूगीता इन्द। गज दोयसैतेताल रथवर, दोयसौ तेताल । है सातसो उन्तीस परंमित, जातिवन्त रसाल ॥ जहँ मुभट मारह सौ मुपायक, अधिक दश अरु पंच । सो चमूदल चतुरंग शोमित, सहित नर तिरजच ॥ ९॥ विरूथिनी। रथ सातसे उनतीस कुंजर, सातसै उनतीस । हय एक विंशति से सतासी, चपल उन्नत सीस ॥

बनारसीविलामः छत्तीससी वलवंत पायक, अधिक पैंतालीस । सोहै यरुथनि फटफ दुर्द्धर, चटफ मुन्दर दीम॥१०॥ दंश-रोश कुंजर दोय हजार एफ मी अमी मान गनि । जेते गज तेते ममान रथराज रहे पनि ।। नवसी तिस दशहजार पायक प्रचंद पल । पैसटसे इफसट तुरंग यह दंड नाम दल ॥ ११ ॥ मक्षारिणी-पप्पय। गज इफवीय दजार, आट सो समर गर्हि । रथ इकवीस हजार, आठ सौ मघर सजहिं । एफ लास अरु नवहजार नर मुभट गुमायक । तिस उपर सीनमी अधिक पंचाम सुपाययः ।। सोहन नुरंग पेसट सहग, एगो अधिक दशा और लिय । रदिविधि अभंग चतुरंग दल, अक्षादिणी प्रमाण किय ॥१२॥ हमसेगा शिधान, अथ नाटकसमयसारसिद्धान्तके माटान्तर फलशांका भाषानुयाद. प्रथम अज्ञानी जीय पद में सदीय एक, दूसरों न और में ही करता करमको ।

२०० जैनग्रन्थरताकरे अन्तर विवेक आयो आपापर भेद पायो, भयो बोध गयो मिट मारत मरमको ! भासे छह द्रव्यनके गुण परजाय सब, नाये दुख लख्यो मुख पूरण परमको । करमको करतार मान्यो पुदगल पिंड, आप करतार भयो पातम घरमको ॥१॥ दोहा। जीव चेतना संजुगत, सदाकाल सब ठौर ताते चेतनभावको, कर्ता जीव न और ॥ २ ॥ गीतिका जे पूर्वकर्मउदयविषयरस, भोगमगन सदा हैं । आगम विषयमुख भोग वांछहिं, ते न पंचमगति लहें ॥ जिस हिये केवल वृक्ष अंकुर, शुद्ध अनुभव दीप है । किरिया सकल तज होहिं समरस, तिनहिं मोक्ष समीप है ॥३॥ कोऊ विचक्षण कहै मो हिय, शुद्ध अनुभव सोहये । मैं मावि नय परिमाण निर्मल, निराधी निरमोहये ।। समध्यान देवल माहिं केवल देव परगट मासहीं । कर प्रष्टयोग विभावपरिणति, अष्ट कर्म विनाशहीं ॥ ४ ॥ इति नाठक कला भारानुवाद.

यभारसीविलासः २०१ अथ मिथ्यामतवाणी. नारायण देवको कहें कि परनारी रत, प्रश्नाको कहै कि इन फन्या निज परी है। सिद्धको पहें कि फिर फिर अवतार धरै, शंकरको फहें याकी मारी सृष्टि मरी है। अचला कहावै मुनि सो फदें पताल गई, अनन्त पारादरूप परिके उरी है। ऐसी मिश्यामतवानी मूदनके मनमानी, पापकी कहानी दुग्वदानी दोपभरी है ॥ १ ॥ सैतान उपजे नर देवके संजोगमेती, फनकफी लंका फ अगनिमों जरी है। शास्वतो गुमेरु सो उमारि मध्यो सिन्यु, इन्द्रको कहत गौतमकी नारि घरी है। भीम डारे दायी ते अकाशम फिरि मदीव, वायस भुड अविनाशी काया करी।। ऐमी मिप्यामतवानी मुनके मनमानी, पापकी कहानी दुसदानी दोपभरी है ॥२॥ मैलकी पनाई गद्रा सो कहें गणेश भयो, सरिताको कद सूरजसो अवसरी ।

२०२
जैनग्रन्थरताकरे
द्रोपदी सतीको कहें याके पंच भरतार,
कुन्तीहको कहें पांच वार व्यभिचरी है ।
रामसे विवेकीको कहें मुगध अवतार,
डामको सँवारो सुत नाम कुशहरी है।
ऐसी मिय्यामतवानी मूदनके मनमानी,
पापकी कहानी दुखदानी दोपभरी है ॥ ३ ॥
गाथा।
कुग्गहगहगहियाणं मूढो जो देइ घन्मउवएसो ।
सो चग्मासी कुक्कर वयणमि खोइ कप्पूरं ॥ ४ ॥
इति मिथ्यामनवाणी.
अथ प्रास्ताविक फुटकर कविता लिख्यते.
मनहर।
पूरब कि पश्चिम हो उत्तर कि दक्षिण हो,
दिशि हो कि विदिश कहर तहां धाइये ।
पदिये पढ़ाइये कि गहिये गदादये कि,
नाचिये नचाइये कि गाइये गवाइये ।।
न्हाये बिन साइये कि न्हायकर साइये कि,
साय कर न्हाइये कि न्हाइये न साइये ।
जोग कीजे भोग कीजे दान दीने छीन लीजे,
जिदि विधि जाने जाहु सो विधि बताइये ॥१॥

पनारमीविलामः दिशि भी चिहिति दोऊ जगनपी मरजाद, परिये पद गहिये गुजर गाज है। नारिये मुनिए अपनाय गाइये गुधुनि, गाइये गुजन शुचि गाइये मुनाज है ॥ परको संजोग मुतो योग विष स्वाद भोग, दोजे लाज मायामो तो मरमको कान है। नते अतीत कोऊ घेतनको पुंज सोमें, ताके रूप नानवेको जानको इलाज है ।॥ २॥ ব जो ओगुण अनन्त तामे, जाफे दिये दुष्टता सो पापी परधीन है। जाके गुम मत्यवानी सोई तपको निधानी, जापी मनमा पवित्र सो तीरथयान है। जा सञ्चनपी रीति ताकी मरहीमो प्रीति, जाकी भली महिमा सो आमरणयान है। जाम है सुविधा सिद्धि ताही के अहटऋद्धि, जाको अपमरा मो तो मृतक समान है ॥ ३ ॥ फंचनभंडार पाय रंच न मगन हजे, पाय नवयोवना न एजे जोपनारसी* 1 घ पुनर में बापरे रोपार से है- * ऐमी भनिधाय सलमके बारपी, धारा मिनीप पीच पी जुनारसी।

२०४ जैनग्रन्थरताकरे काल असिघारा जिन जगत बनाए सोई, कामिनी कनक मुद्रा दुहुंको बनारमी ।। दोऊ विनाशी सदीव तूहै अविनाशीजीव, या जगत कूपबीच ये ही डोबनारसी । इनको तू संगत्याग कूपसा निकसि माग, प्राणी मेरे कहे लाग कहत बनारसी ॥ ४ ॥ (पादान्नयमक). जीवके वधैया यामविद्याके सधया दावा, नलके दधैया वन आखेटक करमी । जुआरी लवार परधनके हरनहार, चौरीके करनहार दारीक अशरमी ।। मांसके मलैया सुरापानके चलैया, परपके लखैया जिनके हिये न नरमी । रोपके गहेया परदोषके कहैया येते, पापी नर नीच निरदै महा अधरमी ॥ ५॥ मत्तगयन्द। सम्यक ज्ञान नहीं उर अन्तर, कीरतिकारण भेष बना। मौन बजे वनवाम गहें मुम्प, मान रहें तपमा तन जावें ॥ जोग अनोग कडू न विचारत, मूरख लोगनको मरमायें । फैल करें बहु जैन कया कहि, जन विना नर जैन कहावें ॥ ६॥ माईदारामत यांवर मोजमर, इनके ममय नसागरे बनारसी। this...

nite बनारसीविलासः धीरज तात क्षमा जननी, परमारथ मीत महारुचि मासी । शान सुपुत्र मुता फरणा, मति पुत्रवधू समता अतिभासी ।। उद्यम दास विवेक सहोदर, बुद्धि कलत्र शुभोदय दासी । भाव कुटुंब सदा जिनके दिग, यो मुनिको कहिये गृहवासी ॥७॥ मनहर। मानुप जनम लयो सम्यक दरश गयो, अजहूं विष विलास त्याग मन पावरे । संपति विपति आये हरप विषाद छोड़, ताही और पीठ ओद जैसी पहे मावरे ॥ भौधिति निफर आई समता सुधाह पाई, गयो है निपटि जल मिथ्यात दुवाघरे । टूटेगो फरम फास छूटैगो जगत वास, केवल उदै समीप भायो परेका घरे ॥८॥ (पादारतपमा) जामें सदा उतपात रोगनों छीजे गात, कळू न उपाय छिन छिन आयु सपनो। कीजे बहु पाप नरक दुग आपदा कलापमें विलाप ताप तपनो ॥ जामें परिगहको विपाद मिथ्या वफबाद, विभोग सुखको सबाद जैसो सपनो । ऐसो है जगतयास जैसो चपला विलास, तामें तूं मगन भयो त्याग धर्म अपनो ॥ ९॥ चिन्ता व्याप, २०६ जैनग्रन्यरत्नाकरे मत्तगयंद। पुण्य सँजोग जुरे रथ पायक, माते मतंग तुरंग तबले । मान विमी अँग यो सिरमार, कियो विस्तार परिग्रह ले ले। बंध वढाय करी थिति पूरण, अंत चले उठ आप अकेले । हारि हमालकी पोटसी डारिके, और दिवारकी मोट व्है खेले१० छप्पय है. धान यान मिष्टान, मोम मादक नवनि । लवण हिंगु घृत तैल, वनिजकारण नहिं लिजे। पशुमाला पशुवणिज, शस्त्र विक्रय न करिने । जहां निरन्तर अमि फरम, सो वणिज न किने । मधु नील लाख विप वणिज तज, कूप तलाव न सोखिये। लहिये न धरम गृह वासवस, हिंसक जीव न पोखिये ॥११॥ मुकताको म्वामी चन्द मूंगानाथ महीनन्द गोमेदक राजा राहु लीलापति शनी है । केतु लहसुनी सुरपुष्प राग देव गुरु, पन्नाको अधिप युघ शुक्र हीरा धनी है ।। याही क्रम कीजे घेर दक्षिणावरत फेर, माणिक मुमेरवीच प्रमु दिन मनी है। आठों दल आठ ओर, करणिका मध्य ठोर कोलस रूप नौ गृही अनूप बनी है ॥ १२ ॥ पालक दशाकी मरजाद दश वरस लों, वीम लों वदति तीसलों मुवि रही है ।।

मनारसीविलासः २०७ चालीस लो चतुराई पचास लो धूलताई, साठ लग लोचनकी दरि सहरही है। सत्तर लो प्रवण असी लो पुरुषत्व निन्या- नये लग इन्दिनकी शकति उमही है। सौली चित घेत एफ सौ दमोगरलो आयु, मानुप जनम ताकी प्रीथिति कही है ॥ १३ ॥ चादह विधाभोके नाम यथा- ममधान चातुरीवान, विधा हय वाहन । परम परम उपदेश, चामल बल अयगादन ।। सिद्ध रसायन फरन, साधि सप्तममुर गावन । घर संगीत प्रमान, सत्य वाभित्र पजायन ।। व्याकरण पाठ मुसयेद धुनि, ज्योतिए पर विचारचित । वेपर विधान परवीनता, इति विद्या दमाचार मित ॥ १५ ॥ एसीस पीन (जाति माम वित. शीसगर दरजी तपोली रंगवाल बाल, पाई संगतरास तेली योनी पुनिया। पंदोई कहार काडी कुलाल फलाल माली, कुंदीगर फागदी किसान पटरनियो । चिरा चिरा पारी लोग रहेंग राज, पदा एप्परपंप नाई भारनियाँ ।

२०८
जैनग्रन्थरत्नाकरे
सुनार लोहार सिकलीगर हवाईगर,
धीवर चमार एही छत्तीस पवुनियाँ ॥ १५॥
एक सौ अद्भुतालीस प्रकृति
वस्तु छन्द
सत्ततुहि सत्त्तुट्टहि तुरीय गुण थान ।
तहं तीन व्युच्छतिमई नवठाण छत्तीस जानहु ।
दशमें पुनि इक लोम वारमें सोलह खिपानहु ।
वहत्तर तेरम नसे, तेरह चौदम एपि ।
एम पैड़ि अमृताल सौ, होय सिद्ध तोडेवि ॥ १६ ॥
उप्पय।
एक जान द्वै तोरि, तीन रम चार न भासहु ।
पंच जीत पटराख, सात तज आठ विनाशहु ।
नव संभारि दश धारि, म्यारहिं बारह भावहु ।
तेरह तिर चौदहें चढ़त, पन्द्रह विलगावहु ॥
सोलहन मेटि सत्रह मजहु, अट्ठारह फहं करहु छय ।
सम गणि उनीस वीसहिं विरचि, यानारसि आनंद मय १७
तापर्य-दोहा।
शुद्ध पातमा एक जिन, राग द्वेष द्वय पंथ ।
तीन शुद्ध ज्ञानादि गुण, चारों विकया धंध ॥ १८॥
प्रबल पंच इन्द्री मुमट, पर विधि जीवनिकाय ।
जुआ आदि सातों व्यसन, अष्टकर्म समुदाय ॥ १९॥

बनारसीविलासः
मी बादि नया दा मुनिधर्मविनार ।
ग्यारह मतिमा सावकी, पारद भाग्न सार ।। २०॥
रह पाना और के. पीर गुण टानाद ।
पन्द्रद जोग शरीरके, सोसह भेद पहाइ ।। २१ ॥
मजद विधि संयम सही, जीप समाम उनीस ।
दोष मारह जान सर, पुदलफे गुण बीस ॥ २२॥
साल पुरविता.
पुरुष प्रमाने ।
।
अध गोरखनाथके वचन.
पाई।
जो भग देख भामिनी मान । लिग देस जो
को दिन विशनपुंसक जोया यह गोरा तीनों पर सोवा॥१
वो पर साग कहावे बोगी। परयासीको है अ भोगी।
अन्नरमा न परस जोई । गोरम बोले मूरस सोई ॥ २ ॥
पर अन्याद जो ज्ञान पखाने । पवन साथ परमारय माने ।
परम तत् होहिं न मरमी। यह गोरस सो महासपी ॥३॥
माया जोर है मेटाकर । माया गये कहाचे चाकर ।
माया त्याग होय जो दानी । कह गोरस सीनों अज्ञानी ॥४॥
फोमल पिंड कहावे बेला । कठिन सिंडसो ठेला पेला ।
जूना पिंड कहा बूदा । कह गोरख ए नीनों भूदा ॥ ५ ॥

२१०
जैनग्रन्थरत्नाकरे
विन परिचय जो वस्तु विचार ध्यान अमि विनतन परजारै ।।
ज्ञानमगन विन रहै अबोला। कह गोरख सो बादश मौला ॥६॥
सुनरे वाचा चुनियाँ मुनियाँ । उलट येघसों उलटी दुनियां ।
सतगुरु कहै सहजका धंधा । वाद विवाद करे सो अंधा ॥७॥
इति गोरखनायके वचन ।
-
अथ वैद्य आदिके भेद
वैद्यलक्षण.
कर्म रोगकी प्रकृती पावै । यथायोग्य मौषधि फरमावै ।
उदय नाहिकाकी गति जाने । सो मुवैद्य मेरे मन माने ॥१॥
ज्योतिषीलक्षण.
नवरस रूप गिरह पहिचाने । यारह राशि मावना माने ।।
सहज संक्रमण साधे जोई । ज्योतिपराय ज्योतिषी सोई ॥२॥
पैगवलक्षगदोहा।
तिलक तोप माला विरति, मति मुद्रा श्रुति छाप ।
इन लक्षणों वैषणव , समुझे हरि परताप ॥ ३ ॥
जो हरि पटमें हरि लसे, हरि याना हरि पोइ ।
हरि छिन हरि मुमरन करे, विमल वैषणर सोइ ॥४॥
मुसलमानलक्षण.
जो मन मूमे आपनो, साहियक रुप होय ।
भान भुमहा गह टिकै, मुमलमान है सोय ॥५॥

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२१२
जैनग्रन्थरताकरे
माया छाया एक है, यटै पद दिनमाहिं ।
इनकी संगति जे लग, तिनहिं कहीं मुख नाहिं ॥ १६
जे मार्यासों राचिके, मनमें राखहिं वोझ ।
के तो तिनसा खर भलो, के जंगलको रोझ ॥१७॥
इस माया के कारण, और कटरावहिं सीस ।
ते
मूरख
क्यों कर सके, हरिमक्तनकी रीस ॥ १८॥
लोम मूल सब पापको, दुखको मूल सनेह ।
मूल अजीरण व्याधिको, मरणमूल यह देह ॥ १९॥
जैसी मति तैसी दशा, तैसी गति तिह पाहि ।
पशु मूरस भूपर चलहि, खग पंडित नभमाहि ॥२०॥
सम्यकदृष्टी कुक्रिया, कर न अपने वक्ष्य ।
पूरब कर्म उदोत है, रस दे जाहिं अवश्य ॥ २१ ॥
जो महंत है ज्ञानविन, फिर फुलाये गाल ।
आप मत्त और न करे, मो कलिमाहि कलाल ॥ २२ ॥
ज्यों पापक विन नहिं सरे, करे यदपि पुर दाह ।
त्यों अपराधी मित्रकी, होय मयनको चाह ॥ २३ ॥
फचर्चा जीव सदीय है, फरे कर्म एवयमेव ।
यह तन कृत्रिम देहरा, तामें थेतन देय ॥ २१ ॥
कंवलनानी कर्मी, नहिं को दिन मेम ।
देव यकृत्रिम देहरा, देव निरंजन एम ॥२५॥

बनारसीविलासः
AAA AAA
:
भूमि यान धन धान्य गृह, भाजन कुप्य अपार ।
सपनासन चीपद द्विपद, परिगह दश परफार ॥२६॥
खान पान परिधान पर, निद्रा मूत्र पुरीस।
ये पट फर्म सहि फरे, राजा रंफ सरीस ॥ २७ ॥
उचित यसन मुरचित असन, सलिल पान सुप सेन ।
मही नीति लघुनातिसों, होय सपनको पेन ॥ २८ ॥
चांश निषम
विगे दरव तंबोल पट, भील मचित्त सान।
दिशि मदार पान र पुदुए, रायन विलेपन मान ॥२९॥
सीलबन्न मन तन, अपि पद गदै न गंत ।
पिताजात नहने पिता, सनी न मारदिकत ॥२०॥
कामी तन मंडन पर, दर गर्दै अधिकार ।
जारजात मारदिपिता, असति ने भरतार1॥
ज्ञानहीन करणी करे, यो निजमन आमोद ।
ज्यो छेरी निज गुरहिने, हरी निकाय मोद ॥ १२ ॥
राजधानिस भोगये, ऐसे मूर अमान ।
महा सशिपाती करीद से शररत पान ॥ १५॥
जहें पापा सह आपदा, जर संशय तह गोग।
सतगुरु चिन भागे नहीं, दोडालिम रोग ॥२५॥
जे आमाके दास , पुरप जगतके दारा ।
भासा पासी जात की, जगत दास है सास ॥१५॥

जैनप्रन्यरत्नाकरे संसारी उद्धार तज, घरै रोक पर प्यार । शानी रोक न आदरै, करै दरम उद्धार ।। ३६ ॥ कारण कान न जो लसे, भेद अभेद न जान । यानुरूप समुझे नहीं, सो मूररा परधान ॥ ३७॥ देव पर्म गुरु मन्य मत, रल जगतमें भार । सांने सीने परसिके, इठे दीजे डार ॥ २८ ॥ भारतापगरहित, देव मुगुरु निरमंथ । पर्म दया पूरमअपर, मतमविरोधि मुमन्म ॥ ३९ ॥ मुनिक यानी अगली, जेन पर मन डी जनपनि जीयकी, जग होय सहकीक ॥ ४०॥ उगो उर सन्तुष्टता, हग दुटना न होय । म? मोहमष्टता, मदन गुएला मोय ॥ ५९॥ ही गाणीप्रमाindime . ... अथ परमार्थवननिका लिप्यते । पर भीगा नाक मर्मत गुण अनन्त यांप. एक पर गुण अगम्यान प्रदेश, पाप परेशानिये मगन মা, গণ ধবল সন গণম पापा पामा भन्न गुण अ५ पध्यायन Enान, या, पर मनन मामा. पाटील व आ. RA

पनारसीविलासः
an
२१५
अनंत अनन्त पुद्गलद्रव्यकरि संयोगित (संयुक्त) मानने ।
ताको व्यौरी,-
अन्य अन्यरूप जीवद्रव्यकी परनति; अन्य अन्यरुप
पुदलदष्पकी परनति, ताको ब्यौरी-
एक जीवद्रव्य जा भांतिकी अवस्थालिये नानाकाररूप
परिनमें सो भांति अन्य जीवसों मिले नाही । वाकी और
भाति । माहीभांति अनंतानंत स्वरूप जीवद्रव्य अनन्तानंत
स्वरूप अवस्यालिये वर्तहिं । काहु जीवद्रव्यके परिनाम
का जीवद्रष्प औरसौ मिलइ नाहीं । याही भांति एक
पुद्गल परवानू एक समयमाहिं जा भांतिकी अवस्था धरै, सो
भवस्था अन्य पुद्गल परवान द्रव्यसौं मिले नाही. ताते
पुद्गल (परमाणु) द्रन्यकी भी अन्य अन्यता जाननी ।
अय जीवद्रव्य पुद्गलगन्य एक छेत्रावगाही अनादिका.
लके, तामैं विशेष इतनौ जु जीवद्रव्य एक, पुद्गलपरवान्
न्य अनंतानंत पलाचलरुप आगमनगमनरूप अनंताफार
परिनमनरूप पंधमुक्तियतिलिये यहि ।
अय जीवदन्यकी अनन्त अवस्था ताम तीन अवस्या
मुख्य यापी । एक अशुद्ध अवस्था, एक शुद्धाशुद्ररूप
मिथ अवस्था, एक शुद्ध अवस्था, ए तीन अवस्था संसारी
जीवद्रव्यकी । संसारातीत सिद्ध अनवस्थितरूप कहिये ।
अव तीनहं अवस्थाको विचार-एक अशुद्ध निधया-

जनप्रन्यरत्नाकरे मक द्रव्य, एक मुद्धनिथयात्मक दन्य, एक मिनिध. यात्मक द्रव्य । अशुलनिश्चय द्रव्यको सहकारी अशुद्ध व्यवहार. मिश्रदगो सहकारी मित्र व्यवहार, गुरु प्रत्यको महकारी मुद्धन्यवहार । भप निधय व्यवहार को यिमरण लियते। निधय तो अभेदाप दश्य, व्यवहार द्रव्य यथास्थित भाष । परन्तु विशेष इतनी जु यावकार संसारावरया सार. (काल ध्यपहार दिये. मिद पवहारातीन कहिये, माने गु मंगार व्यपहार एका दिमायो. संगारी सो प्यादारी, माहारीमो मगा। भवमान अपापाको पियाण निल्यो। বা নিকাব ওষণা, নাম্বার ওয়ার নিশষ্য- मरदाय अगुनगगहारी। गापारी हो। मा भy গ পান। ঠাগ গগনাল সিগনা? बनियापारी । जानी शुनिभपामर गुन. मनियमो प्रयोगामार माग fim माल, ifrrrfruitी आनी HIT म..! भानमा . मानव मनाना फार काय या गि। मपारी भानी " मी अनुभवामा Ark vM बनारसीविलास: २१७ पनी कार्य नाही मानती संतो जोगद्वारफरि अपने सरूपको ध्यान विचाररूप क्रिया फरतु ६, ता कार्य करती मिथ व्यवहारी कहिए. फेरलझानी यथास्यानचारित्रक परमार शुमात्मस्वरूपफो रमनशील है ताते शुद्धष्यवहारी फदिए. ভীতি সামা বিমান বা থা নাশ করি। शुमध्यवहारकी सरहद प्रयोदशम गुनथारूमी लेहफरि पतु. दशम गुनस्थानापर्यंत जाननी । अनिद्धत्वपरिणमनस्यात् व्यवहारः। मध तीन व्ययभारको स्वरुप करे- प्रभुद व्यवदार शुभाशुभाचाररूप, शुद्धामुरव्यवहार पु. भोपयोगमिथित स्वरूपाचरनरूप,शुद्धष्यवदार अदायरूपाच- रनरूप। परन्तु विशेषदनको हतनी जो कि-गुमाया. पाचरणात्म ती सिमहविष एता है. उदा भी न्यबदार मंशा पाहिए-सो यों नाही-जान रोमारी अपायापर्यन्त ध्यपहार कदिए । संसारावरयाक मिटत प्यार भी मिटी पदिए । इह यह थापना कीनी हात सिम्यागतीत दिए । इति ध्यदारविचार समासः । भय मागमभायातमको पाए। मागम-पानुको जु विभार सो भागम फदिए । मागको जु अधिकार सो अध्यातम दिए । आगम सा अमाम स्वरूप भाव भामद्रव्य के जानने । से दोभाय संगा . দাদামি সিগান গাৰণ। বাজী চাষ -

।
२१८
जैनमन्यरक्षाकरे
कर्मपद्धति, अध्यात्मरूप शुद्धचेतनापद्धति । ताकी चोरी-
कर्मपद्धति पौद्गलीकद्रन्यरूप अथवा मावरूप, द्रव्यता
पुदलपरिणाम, भावरूप पुद्गलाकारआत्माकी अशुद्धपरि.
पतिरूप पारिणाम-ते दोऊपरिणाम आगमरूप थापे । भर
शुद्धनेतनापति गुमात्मपरिणाम सो भी प्रयरूप अथया
মাম। মে মী লীবাবা-মাখা মাং
न गुरागीय आदि अनन्तगुणपरिणाम, से दोऊ परिणाम
जयारमा जानने । आगम
अध्यात्म दुहुँ पद्धतिनि
अनन्तता माननी।
भनन्तता कहा ताको पियार
अनमनाको खपान्तरि विगारमा दे में-
वासको बीज एक हानि ही. साको चार वर्ष
rfan की नीवावरके पीजगि एक परको पाई.
मी या गो का मामिल होनहार है नमो सिमाये
सिगान याम बामनोदे. अनेछ सागा प्रामा
पालम है पर अनेट पीनाराया
मानिकी आमा बबीताप । भी और
मीना बीरे
भLT याहीमा एक
अंतीसिपमाfit
जी महारा

बनारसीविलासः न पीजनिकी मर्यादा पाइए । याही भांति अनंतताको स्व- रूप जाननौ । सा अनंतताके स्वरूपको केवलज्ञानी पुरुष भी अनन्तही देखे जाणै कहै-अनन्तको ओर अंत है ही नाही जो ज्ञानविष मासै । तातें अनंतता अनंतहीरुप प्रति भासे, या भांति आगम अध्यातमकी अनंतता जाननी. तामें विशेष इतनी जु अध्यातमको स्वरूप अनंत आगमको म्व- रूप अनंतानंतरूप, ययापना प्रयानकरि अध्यात्म एफ द्रव्या- धित । आगम अनंतानन्त पुद्गलद्रव्याधित । इन दाईको स्व. रूप सर्वथा प्रकार तो केवलगोचर, अंशमात्र मतियुतमानमा ताते सर्वथाप्रफार आगमी अध्यात्मी तो फेयली, अंशमात्र मतिश्रुतशानी, ज्ञातादेशमात्र अवधिज्ञानी मनःपर्यय ज्ञानी, ए तीनों यथावस्थित ज्ञानप्रमाण न्यूनाधिकरुप जानने । मिय्यादृष्टी जीव न आगमी न अध्यात्मीदे । काते या जु फथन मात्र तो प्रयपाठके पलकरि आगम अध्यातमको स्वरूप उपदेशमात्र फहै परन्तु आगम अध्यातमको स्वरूप सम्यक् प्रकार जाने नहीं । ताते .मट जीव न आगमी न अध्यात्मी, निवेदकत्वात् । भए र तपाज्ञानी जीयको पिरोपपणी और भी पुनी- शाता तो मोक्षमार्ग साधि जाने. मूः मोक्षमार्ग म साधि जाने काहे-याते मुनो---मूट जीव आगमपद्धतिको प्यवहार कदै अध्यात्मपद्धतिको निधय है सात आगम -

२२०
जैनप्रन्यरलारे
अंग एकान्तपनो साधिक मोक्षमार्ग दिसाचे अध्यात्म अं.
गको पयहार न जाने यह मूढदृष्टी को समाव, पाहि याही
मांति मूझे काहेत!-यात जुआगम अंग या क्रियारूप प्र.
स्वश प्रमाण है ताको सरूप माधियो मुगम । ता पापक्रिया
फरती संतो आप मा जीव मोक्षको अधिकारी माने, अ.
लग्गमिन जो अध्यात्मक क्रिया सो अंतरदृष्टिप्राय है सो
किया माजी न जाने । अन्तरराष्टिक अमावसौं अन्तर
किया दृष्टिगोगर आरे नाही, तान मिप्याष्टी जीव मोस.
मार्ग साधितो असमर्थ ।
मर गम्पनीको विचार गुनी-
सम्यग्दृष्टी कहा गो गनी--संशय विमोद सिमम ए सीन
भाग का नाही गो गम्यागष्टी । मग विमोद विभग कहा
नामटातार हिमायाद सो गुनी- यार
का परमानसी टारे। निनद नारिहर भागेपर
Hit मं? किनकी योर पुरणने आनि दिमायो । प्रत्येक
नदीनी कि यह कहा जाता है. मगही
PIT कालो बोलो-कट नादीन Hfvita
it मोग दिष्टि या नामानि ।
भी मियानी योयो ft- माया।
नही
मिनाक कानगी
मंग: मानसी नाम मन मानता

पनारसीविलासः तू पहा कहत है अथवा चुप है रहे पोले नाही गहलरूपमा । भी तीसरो पुरुष विभमरालो योल्यो कि यह तो . त्वपमान रूपो है याको सीप कौन कहै मेरी दृष्टिविकतो रूपो मझनु है सातै सर्वयाकार यह रूपो है। शो तीन पुरुष तो वा सीपको स्वरूप जान्यौ नाहीं । तात तीनों मिथ्या- यादी । अब चौथो पुरष पोल्यो कि यह तो प्रत्यक्ष प्रमान सीपको खंड है या कहा योग्यो, सीप सीप सीप, निरधार सीप, याको जुफोई और धातु काहे मो प्रत्यक्षमान आमक अथया अंध. से सम्यग्दीको स्वपरस्वरूपविष न ससैन विगोह नविभम या ष्टि है ता सम्पटी जीव अन्तरदृष्टि करि मोक्षपद्धति साधि जाने । वासभाव भारनिमितरूप माने, सो निमित नानारूप, एक कप नाही. अन्तरदृष्टिके प्रमान मो- क्षमार्ग साप. सम्पाज्ञान म्परूपाचरनकी कनिका जागे मोक्ष- मार्ग सांची। मोक्षमार्गको साधियो यह व्ययदार, शुद्धद्रव्य अक्रियारूप शो निधे । असे निश्चय व्यहारको स्वरूप सम्य- रटी आन. मूह जीव न जाने न माने । मूद जीव संधपद्धनि- को साधिकार मोक्ष कद, सो मात शाता माने नाही । फाहत पनि जु संपर्क साधते यंध संधे, मोक्ष सौ नाही । ज्ञाता जर कदाचित पद्धति विचारे तर जाने कि या पद्धतियों मेरो दन्य अनादिको पन्धसए चल्यो आयो है-अप या पद्ध- शिसी मोह नौरि बहे तो या पद्धतिको राग पूर्वको सोहे ।

२२२
जैनमयरलाकरे
नर काहे फरी। दिन मात्र भी पन्धपद्धतिविर मगन होर
नाही सो ज्ञाता अपनो स्वरूप विचारे अनुभवे ज्यादै गारे
भान करे नवधाभक्ति तप किया अपने गुलम्वरूप के सन्मुस
होकरि करे । यद शाताको आचार, माहीको नाम
मिथाहार ॥
गरपोषापारेपा ज्ञाताशीपालनातोपियारलिण्या-
हेमस्यागमा सो अपने प्रत्यकी अगुदना, शेप-विमा.
र अन्यायको रास, उपादेय--आगरग
अपने दगती अमा, साको गौरी-~-गुणगागा प्रमान
गादेपर निशानाकी दोहा मोज्यो शासकीय
RT निः पगार होगस्यो त्यो गुनगा.
नामसारी की है. गणम्यानपान ज्ञान गुणगान
पमान याना गिननी एक गुणापाकानी
अरमना गर्न RTI भान दिया अनेक
भागना प्रभारिपना
Film नी भाग भाग
९ मा silent नीलामानुगारी भानकी भाग भापता
जननी Infinीन को नाम
दमननी हा मोसमागं ?
जान पाम माली.
वामनानीmarthr.

M पनारसीविलासः २२३ शीली होद ताको नाउ ज्ञान । ता ज्ञानकी सहकारभूत निमि- तरूप नाना पकारके उदीकभाव होहि । तिन्ह उदीकभाव- नको भाता तमासगीर । न फर्ण न भोका न अवलंबी सातै कोऊ यों कहै कि या भांतिके उदीकभाव होहि सर्वथा तो फलानो गुनस्थानक कहिये सो झूठो । तिनि द्रव्यको स्वरूप सर्वथा प्रकार जान्यौ नाही। फाहेते-यात जु और गुनस्थानक निफी कौन पात चलावे फेवलीके भी उदीकभावनिकी नाना- त्यता जाननी । फेवलीके भी उदीकभाव एफसे होय नाही। फाह फेवलीको दंड कपाटरूप किया उदै होय फाइ फेवली की नाही। तो फेवलीविष भी उदकी नानात्वता है तो और गुनस्थान फकी फीन यात चलावै । ताते उदीक भावनिके भरोसे ज्ञान नाही ज्ञान स्वशक्तिमवान है । स्वपरप्रकाशक ज्ञानकी शक्ति ज्ञायक ममान ज्ञान स्वरूपाचरनरूप चारित्र यथा अनुभव प्रमान यह ज्ञाताको सामर्यपनौ। इन यातनको व्यारो फहाताई लिखिये कहां ताई कहिए। यवनातीत इन्द्रियातीत ज्ञानातीत, नाते यह विचार यहुत कहा लिखहिं । जो ज्ञाता होइगो सो योरी ही लिख्यो बहुतकरि समझेगो जो अज्ञानी होयगो सो यह चिट्ठी मुनेगो सही परन्तु समुझेगा नहीं यह-वचनिका यथाका यथा मुमतिप्रवान फेवलियचनानुमारी है। जो याहिमुणैगो समुझे. गो सरदहगो ताहि कल्याणकारी है भाग्यपमाण । इति परमार्थव निका

-
जैनग्रन्यरताकरे
अथ उपादान निमित्तकी चिट्ठी लिख्यते-
प्रथम हि कोई पूछत है कि निमित्त कहा उपादान कहा
ताको व्यौरी-निमित्त तौ संयोगरूप कारण, उपादान य.
मनुसी सहज शक्ति ।ताको व्यौरो-एक द्रव्यार्थिक निमित
उपादान, एक पर्यायार्थिक निमिचउपादान, ताको व्यौरो-
द्रव्याधिक निमित्त उपादान गुनभेदकल्पना । पर्यायार्थिक
निमिच उपादान परजोगकल्पना. ताकी चौमंगी. प्रथम ही
गुनभेद कल्पनाकी चौमंगीको विस्तार कहीं सो कैसे,-ऐसे-
मुनी-जीवद्रव्य ताके अनन्त गुन, सब गुन असहाय खा.
धीन सदाकाल । तामै दोय गुण प्रधान मुख्य यापे, तापर ची.
भंगीको विचार एक तो जीवको ज्ञानगुन दूमरो जीवको
चारित्रगुन ।
प दोनों गुण शुद्धरूप माय जानने । अशुद्ररूप भी
जानने यथायोग्य सानक मानने ताको न्योरो-इन दु.
हकी गनि न्यारी न्यारी, शक्ति न्यारी न्यारी, जाति न्यारी
न्यारी, मचा न्यारी न्यारी ताकी चोरी,-शानगुणकी ती
मान अज्ञानरूप गनि, स्वपरमवाराम शक्ति, भागम्प
तथा मिय्यात्वरूप जाति, द्रव्यममा मया, परंतु एक वि.
और इननी जुझानरूप जानिको नाग नाही, मिथ्यारयाप
जानिको नाश, सम्यग्दर्शन उपविपर्यत,यह सामान गुमती
निर्णय भयो । अब पारिय गुणको थ्योरी कई ६,---गंकले

पनारसीविलासः २२५ 1 विशुद्धरूप गति, धिरता अधिरता शक्ति, मंदी तीयरूप जाति, द्रव्यममाण सघा । परंतु एफ विशेष जु मंदताफी सिति चतुर्दशम गुणस्थानफपर्यन्त । तीयताकी स्थिति पंचम- गुणस्थानक पर्यन्त । यह तो दुहुको गुण भेद न्यारौ न्यारी कियो । अब इनकी व्यवस्था न ज्ञान चारित्रके आधीन न चारित्र ज्ञानके आधीन । दोऊ असहाय रूप यह तो मर्यादा बंध। मध धौभगीको षिचार-झानगुन निमित्त चारित्रगुण उपादान रूप ताको प्यारी- एक तो अशुद्ध निमित्त अशुद्ध उपादान दूसरो अशुद्ध निमित्त शुद्ध उपादान । तीसरो शुद्ध निमित्त अशुद्ध उपा- ३ दान, चौथो शुद्ध निमित्त शुद्ध उपादान, ताको व्यौरी- सूक्ष्मदृष्टि देइकरि एफ समयकी अवस्था द्रष्यकी लेनी समुध- यरूप मिथ्यात्व सम्यक्त्वकी यात नाही चलावनी । काहू समै जीवकी अवस्था या भांति होतु है जुजानरूप ज्ञान विशुद्ध घा- रित्र, काह समै अजानरूप ज्ञान विशुद्ध चारित्र, काहू समै जान- रूप ज्ञान संफलेस रूप पारित्र, काहू समै अजानरूप ज्ञान संकलेस चारित्र, जा समैं अजानरूप गति ज्ञानकी, संफलेसरूप गति पारिश्रफी तासमैं निमित्त उपादान दोऊ अशुद्ध । काहसमें अज्ञानरूप ज्ञान विशुद्ध रूप पारित्र तासमैं अशुद्ध निमित्त शुद्ध उपादान । काहू समैं जानरूप ज्ञान संकलेसरूप पारित्र ता. समै शुद्ध निमित्त अशुद्र उपादान । काई समें जानरूप ज्ञान

जैनमन्यरशारे
विशुद्ध रूप पारित्र तासशुभ निमित्त शुद्ध उपादान यामात
अन्य२ दशाजीवकी सदाकार अनादिरूप.ताम्यारी-मान
सर शानकी गुदना कहिए विगुनसप चारित्रकी गुमना
कहिण । अमान रूप जानकी अगुदना कहिए संडेशमा पारि
की अगुदा कहिये । अब तो रिचार मुनी.
मिया अाम्या
सम जीवको ज्ञान गुण जाण
KAR कहा गाना है! ऐमी गानामी
TT इत्यारित मोगा न्यारे प्रया प्रमाण
मगोही रहेंगे गो शान है। मग जागि,
होगी. कोई कार बहाया मोहि न ोिग?
मी जागानो भिगारष्टीको M] सो शुद्धता क.
दिए. पात गप्पा गुडना नानी गदिमा जा
मनुमान तामगा गरमा गो नियति
नीति गुना ना भी माम निint
THANE हम जान गुग भजान गया,
मी मन भाषा
tre गर पारिप गन figar I wiri
मामा म
मा REATRI 1 | #s
fema THEIR Urin.
PAT THEmain; मानकर

बनारसीविलासः २२७ 1 ज्ञान है संकलेश रूप चारित्र है तासमै बंध है तामै विशेष इतनी जु अल्प निर्जरा यह पंध, तातें मिथ्यात अयस्याविप केवल पन्य करो । अल्पकी अपेक्षा. जैसे—काहू पुरुषों नफो थोड़ो टोरी बहुत सो पुरुष टोटाउ ही कहिए । परंतु ध निर्जरा विना जीव फाहू अवस्थाविप नाही । दृष्टान्त सो-जुविशुद्धताकरि निर्जरा न होती तो एकेन्द्री जीव नि- गोद अवस्थासौं व्यवहारराशि फौनके यल आवतो. उहां तौ ज्ञान गुन अजानरूप गहलरूप है अबुद्धरूप है तातै ज्ञानगुन- को तो पल नाहीं । विशुद्धरुप चारित्रके बलफरि जीव व्यवहार राशि चढतु है. जीवद्रव्यविष फपाइकी मंदता होतु है ताकरि निर्जरा होतु है । याही मंदता प्रमान शुद्धता जाननी । अव और भी विस्तार सुनो- जानपनी ज्ञानको अरु विशुद्धता चारित्रकी दोऊ मोक्ष- मार्गानुसारी है तातें दोऊविषै विशुद्धता माननी । परन्तु विशेष इतनी जु गर्मित शुद्धता प्रगट शुद्धता नाहीं । इन दुई गुणकी गर्भित शुद्धता जयताई ग्रंथिभेद होय नाही तवताई मोक्षमार्ग न सधै । परन्तु ऊरधताको करहि अवश्य करि ही। ए दोऊ गुणफी गर्भित शुद्धता जब प्रथिभेद होइ तब इन दुईकी शिखा फ्ट तर दोऊं गुन धाराप्रपाहरूप मोक्षमार्ग- को चलहिं । ज्ञानगुनकी शुद्धताकरि ज्ञान गुण निर्मल हो- हि । चारित्र गुणकी शुद्धता करि चारित्र गुन निर्मल होह । यह फेयल ज्ञानको अंकूर, वह जयाख्यातचारित्रको अंकूर । - N- २२८ जैनमन्भरमाकरे यहां को उटेकना करतु के-कम कमोजु भागो आणानो गरु भारितकी गिगुबता दुग्यो नि । शान गाणामो सोगिरा यह हग मानी। चारित्रकी वि सामानिराक गहराम मादी समुशी-शाको समाधान,- गुनि भेगा गुममा चिरतारा परिणाम कादिम गो NEET पानको अंश है ताने विशुमनांगे गुलगा माई ।। भी ब. कमारो पोया-ग विगतमागों at की हग कगुमनामी रा नाही गुमनाम- मामा, ---10 गुन मेगा यह सो त सोपी.णिनागी म. ग.नाग 1, यह तो हम भी गाणी him भीर मामा गो गttymaln मोmfrinar. नमन गोगानमनसा भयो Antim MIt hai गाना भाई मानि मान, नाहीसा का मामा Twi ना ना नोर मन नदी समर 2014 +41. नी भाग मनात न! 4.5ो भी मादि भी १. कम, Thirt ।

पनारसीविलासः करि वर्तमानरूप मई तर पूर्ण जयाख्यान प्रगट कहायो । विशुद्धताफी जु ऊर्द्धता वह वाकी शुद्धता । और मुनि जहाँ मोक्षमार्ग साध्या तहा की कि 'गम्य- ग्दर्शनमानचारित्राणि मोक्षमार्ग: और यों भी फली कि "मानरियाभ्यां मोक्षः" साको विचार-चतुर्थ गुणम्यानकम्यु लेकरि चतुर्दशम गुणस्थानकपर्यन्त मोदामार्ग कमी तासी ब्यौरी, सम्यानप शानपारा विगुरूप पारिवभाग दोऊ पारा मोक्षमार्गको पली मु ज्ञानसों ज्ञानकी शुद्धता कियामा क्रियाकी शुद्धता । जो विशुद्धतामें शुद्धता है. सी. जयाम्यात रूप होता जो विशुद्धतामे ता न होमी सीन गुन शुद्ध होतो किया अशुद्ध रहती फेयती विष, गो यो मी नही या शुद्धता हती तारि विशुदना भई । कोई पदगो कि ज्ञानकी शुद्धताकरि मिया शुद्ध भा गोको नाही । कोऊ गुन का गुनके सारे मही राब मगहाय कप । और भी गुनि जो मियापद्धति तथा पर होली सो भगुस्ताफी एती तिमाही जु मोक्षगागपो बले साने विशुद्धतामे जपाव्यातको भार लाने पर AAPK पूरण भयो । ए भइया उपनायारे-से विरमामे पुरता मानी किमाही. बोसो ते गाती सोपहारdi कार्य मादी जोसे माही मानी सी तेरी दय पाहीutari पानयो है हम कहा करिहै जो मानी भी शामि सापारिकी पोभंगी पूरन भां।

२३०
जैनग्रन्थरताकरे
निमित्त उपादान शुद्ध अशुद्धरूप विचार-
अब पर्यायार्थिककी चौमंगी मुनी एक तो वक्ता अज्ञानी,
श्रोता भी अज्ञानी, सो तो निमिच मी अशुद्ध उपादान भी
अशुद्ध । दूसरो वक्ता अज्ञानी श्रोता ज्ञानी सो निमित्त अ.
शुद्ध और उपादान शुद्ध । तीसरो यता ज्ञानी योता अ-
ज्ञानी सो निमित्त शुद्ध उपादान अशुद्ध । चौथौ-
ज्ञानी योता भी ज्ञानी सो तो निमिच भी शुद्ध २ उपादान
भी शुद्ध । यह पर्यायाधिककी चौमंगी साधी ।
इति निमित्तउपादान शुद्धाशदम्पविचार ववनिका.
अथ निमित्तउपादानके दोहे लिख्यते ।
दोहा।
गुरुउपदेश निमित्त विन, उपादानयलहीन ।
ज्यों नर दूजे पांव दिन, चलयेको आधीन ॥ १ ॥
हाँ जान था एक ही, उपादानों कान ।
यके सहाई पौन पिन, पानीमादि जहाग ॥ २॥
दोनी दोग उत्तर
शान नन किरिया चरन, दोऊ शिवमगधार ।
उपादान निचे जहाँ, तह निमित्त प्योहार ॥ ३॥
उपादान निज गुण जहाँ, तह निमित पर होय ।
भेद भान परवान विधि, पिरला यूझे छोय ॥ ५ ॥

पनारसीविलासः २३१ उपादान पल जहँ तहाँ, नहिं निमित्तको दाव । एक चकसौ रथ चले, रविको यहै सभाय ॥५॥ संधे वस्तु असहाय जह, तहँ निमित्त है कोन । ज्यों जहाज परवाहम, तिरै सहज विन पौन ॥६॥ उपादान विधि निरवचन, है निमित्त उपदेस । यसै जु जैसे देशम, करै सु से भेस ॥ ७॥ इति निमित्त उपादानके दोहे. अथ अध्यातमपदपंक्ति लिख्यते. राग भैरप या चेतनकी सर मुधि गई। च्यापत मोहि विफलता भई, या चेतनकी टेक है बडरूप अपावन देह। तासौं रासै परमसनेह, या चेतनकी० ॥१॥ आइ मिले जन स्वास्थबंध। तिगहिं घुटंय कहे जा बंध ॥ आप अफेला जनमै मरे। सकल लोककी ममता धरै, या चेतनकी० ॥२॥ इस रागसे रेक निकाल दी जाये तो खासी १५ मात्रारी पापाई जाती है। - २३२ जैनग्रन्यरत्नाकरे होत विभूति दानके दिये। यह परपंच विचार हिये। भरमत फिरै न पावइ ठौर। ठानै मूट औरकी और, या चेतनकी० ॥ ३ ॥ बंध हेतको करे जुखेद । जाने नहीं मोक्षको भेद । मिटै सहज संसार निवास। तर मुख लहै वनारसिदास, या चेतनकी० ॥४॥ (२) राग रामकली- चेतन तू तिहुकाल अकेला, नदी नायसंजोग मिले ज्यों, त्यों कुटंबका मेला,चेतन०॥टेक ।। यह संसार असार रूप सब, ज्यों पटपेखन खेला। मुखसंपति शरीर जलवुवुद, विनशत नाही वेला, चेतन०॥१॥ मोहमगन आतमगुन भूलत, परी तोहि गलजेला। में मैं करत चहूं गति डोलत, बोलत जैसे छेला, चेतन० ॥२॥ कहत यनारसि मिथ्यामत तज, होय मुगुरुका चेला । तास यचन परतीत आन निय,होह सहज मुरमेला, चेतन० ॥३॥ बरीचा.

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बनारसीविलासः
२३३
(३)
राग रामकली।
मगन है आराधो साधो! अलख पुरुष प्रभु ऐसा ।। टेक॥
जहाँ जहाँ जिस रससौंराचे, तहाँ तहाँ तिस भेसा, मगन० ॥१॥
सहजमवान प्रवान रूपमें, संसैमें संसैसा ।
धरै चपलता चपल कहावै, लै विधानमें लै सा, मगन ॥२॥
उपम करत उद्यमी कहिये, उदयसरूप उदै सा।
न्यवहारी व्यवहार करममें, निहमें निहवे सा, मगन ॥३॥
पूरण दशा धेरै संपूरण, नय विचारमें तैसा ।
दरवित सदा असै मुखसागर,भावित उतपति खैसा, मगन०४॥
नाही कहत होह नाही सा, है कहिये तो है सा ।
एक अनेक रूप है वरता, कहाँ कहाँ लो कैसा, मगन०॥५॥
यह अपार ज्यों रतन अमोलक, बुधि विवेक ज्यों पैसा ।
कलित वचन विलास 'वनारसि' यह जैसेका तैसा,मगन०॥६॥
(१)
दोहा-
जिनपतिमा जिनसारखी, कहीं जिनागम माहि ।
पै जाफे दूपण लगे, वंदनीक सो नाहिं ॥१॥
मेटी मुद्रा अवधिसों, कुमती फियो कुदेव ।
विपन अंग जिनयिकी, तबै समकिती सेद ॥२॥

२३४
जैनग्रन्थरताकरे
• (५)
राग विसावल।
इहि विधि देव अदेवकी, मुद्रा लखलीजे,
गुन लच्छन पहिचानक, पद पूजा की ।। टेक॥
पट भूपन पहरे रहै, प्रतिमा जो कोई ।
सो गृहस्थ मायामयी, मुनिराजन होई ॥२॥
जाके तिय संगति नहीं, नहिं यसन न भूपन ।
सो छवि है सर्वशफी, निर्मल निरदूपन ॥ ३ ॥
पाम अंग जाके त्रिया, अथवा अरघंगी।
सो सो प्रगट कुदेय दे, विपी रसरंगी ॥४॥
निरद्वंदी निरपरिगदी, जोगारान ध्यानी।
मोहै मगति मिद्धकी, के फेवलज्ञानी ॥५॥
मो र भागुप लिये, कर ऊरए बाह ।
प्रगट विनोदी देपत्ता, मरिगा कार ॥६॥
भी न कर कानी करे, नदि भायुष पानी ।
मो महिमा भगवती, गिरवर निशानी ॥७॥
भोपगुती पाणी, वाहनधारी।
नमा भगुर पनी, निर गारी11८॥
मन यो मन पारी, मुनमा पानी।
वो सिम मा. मग मानन पानी ॥१॥

AUJUA MANO CHAIROL
ANUARY
-
पनारमीविलासः
ज्यों पकवान घुरेलका, विपयारस त्यों दी।
ताके लालच तू फिरे, मम मूलन यों ही, ऐ०
देह अपापन सेटकी, अपनी करि मानी।
भाषा मनसा करमकी, ते निजकर जानी में
नाव कहाति लोककी, सो ती नहिं मूले ।
जाति जगतकी फरूपना,
साम
तू भूले । ऐम.॥
मारी भूमि पहारकी, गुद्द संपति गंभ।
मगट पहेली मोहकी, तू तऊ न । ऐसें ॥
से कह निज गुनविपै, निजापि न दीनी ।
पराधीन परवानुमों, अपनायन कीनी, ऐरो० ॥६
ग्यो गृगनाभि सुवास गो,दत पर दो।
स्यों इसमें सेरा पनी, न सोजत और, गो.
करता भरता भोगता, पर सो परमादी।
ज्ञान बिना सदगुरु बिना, तू रागुशत मादी-
विकास
ऐसे यो मभु पाहये, गुन परत मानी।
ग्यो मयि मागम सादिया सरि मेलि मयानी
ज्यो रालीन रसायनी, रीति भरा।
सौ परमें परमारथी, परमार सा, से॥२

२३६
जैनमन्थरमाकरे
जैसे वैध विधा है, गुग दोष विचारे ।
में पंडित पिंडकी, रनना निरवारे, मैं ॥३॥
पिंडस्वरुप भनेत है, प्रभुरूप न कोई।
जाने माने रमि रहै, पर व्यापक सोई, ऐसें ॥४॥
भेनन लान है धनी, जड़ सउन काया।
पर न निव है, प्रम सम्मन माया, से० ॥५॥
म को, गुलिच्छन ।
गगहिये पर, भमरा उछ, ग॥६॥
गोगो न्यारिगा, धन सो मनकी है।
al मुनिम पिाकमें, अपने रम भी, ऐगें ॥ ७ ॥
मार समे पत्र भाको, दुपारमेटे ।
ATE माहिक है, तर कोहि मेरे पसें.॥८॥
लोग जापानी
न भातम गन जानि रे शानि,
माजमन मनि भानि र भानि, भातम ||
मा पनि माग
माना मालिनदीमा मानन ॥२॥
anthi 1,
मन पग मोप, भात. ॥ ३ ॥

बनारसीविलासः
रापन समफित भयो उदोत,
सय पांध्यो तीर्थकर गोत, तू आतम० ॥ ४॥
सुफल ध्यान धरि गयो सुकुमाल,
पहुँप्यो परमगति तिहँ काल, न आतम० ॥ ५॥
विद प्रहारफरि हिंसाचार,
गये मुकति निजगुण अवधार, तू आतम० ॥ ६ ॥
देवा परतछ भंगी ध्यान,
करत कीर भयो साहि समान, तू आतम० ॥७॥
कहत 'पनारसि' वारंवार,
और न तोहि छुडावनहार, तू आतम० ॥ ८ ॥
राग भासावरी।
रे मन! कर सदा सन्तोष,
जाते मिटत सम.दुखदीप, रे मन० ॥१॥
नढत परिगृह मोह यादत, अधिक तृपना होति ।
बहुत इंधन जरत जैसे, अगनि ऊंची जोति, रे मन ॥२॥
गेम लालच मूढजनसो, फहत कंचन दान ।
फरत आरत नहिं विचारत, धरम धनकी हान, रे मन० ॥३॥
नारकिनके पाइ सेवत, सकुच मानत संक।
जानकरि बस 'पनारसि' को नृपति को रंफ, रे मन० ॥५॥

२३८ जैनप्रन्यरवाकरे (१०) राग बरवा। बालम तुहुँ तन चितवन गागरि टि । अचरा गौ फहराय सरम गै छुटि, बालम ॥ ? हूं तिक रहूं जे सजनी रजनी घोर । घर करकेउ न जाने चहुदिसि चोर, बा० ॥ २ ॥ पिउ सुधियावत वनमें पैसिउ पेलि । छाडउ राज डगरिया भयउ अकेलि, वा० ॥ ३ ॥ संवरौ सारदसामिनि औ गुरु मान । कछु बलमा परमारथ करों बखान, या०॥४॥ काय नगरिया भीतर चेतन भूप । करम लेप लिपटा बल ज्योति स्वरूप, वा०॥५॥ दर्शन ज्ञान चरणमय चेतन सोय । पियरा गरुष सीकन कंचन होय, या० ॥६॥ चेतन चित अवधार मुगुरु उपदेश । कछु इक जागलि ज्योति ज्ञान गुन लेस, वा० ॥ ७ ॥ अधिररुप सब देसिसि छिन वैराग । चेतन आपुहि आप बुझाये लाग, या० ॥ ८ ॥ चेतन तुहु जनि सोवहु नींद अघोर । चार चौर पर मुमहि सरवम तोर, या० ॥९॥ चेतन तुहं वनमावत कोलकिरात । निसिदिन कर अहेर अचानक पात, या०॥ १०॥ kesatrkstatutstateardstitutetatutilatatatrnatutetitutatitute बनारसीविलासः २३९ तनहो तुई चेतदु परम पुनीत । तजहु कनक अरु कामिनि होहु नचीत ॥ ११ ॥ परेहु फरमवस चेतन ज्यों नटकीस । कोउ न तोर सहाय ाडि जगदीस ॥ १२ ॥ चेतन मूनि विचार धरहु सन्तोष । राग दोष दुर पंधन टूटत मोप ॥ १३ ॥ मोहजालमें चेतन सब जग जानि । नुहु कुवाज तुहु याझाहु सक्त भुलान ॥ १४ ॥ चेतन भयेहु अचेतन संगति पाय । चकमकमें आगी देसी नहिं जाय ॥ १५ ॥ चेतन तुहि लपटात प्रेमरस फांद । जस राखल धन तोपि विमलनिशिचांद ॥ १६ ॥ चेतन तोहि न भूल नरक दुख वास । अगनि म तरुसरिता फरवत पास ॥१७॥ पेतन जो तुहि तिरजग जोनि फिराउ । पांच पांच ठग येग तोर अब दाउ ॥ १८ ॥ देवजोनि मुख चेतन मुरग यसेर । ज्यों विन नीव धौरहर खसत न घेर ॥ १९॥ चेतन नर नन पाय पोप नाहिं तोहि । पुनि तुहु का गति होइाहे अचरज मोहि ॥ २० ।। आदि निगोद निकेतन चेतन तोर । भव अनेक फिरि आयेहु कतहु न ओर ॥ २१ ॥ stottttaint.titutni.tattattintstra.ki Tatta २४० जैनप्रन्यरलाकरे विपय महारस चेतन विष समतूल, छाइहु बेगि विचारि पापतरुमूल ॥ २२ ॥ गरभवास तुहुँ चेतन ऊरय पांव, सो दुख देख विचार घरमचित लाव ॥ २३ ॥ चेतन यह भवसागर धरम जिहाज, तिह चट बैठो छोड लोककी लाज ॥ २४ ॥ दह या दुहु अब चेतन होहु उचाट, कह या जाउ मुकतिपुरि संजम वाट |॥ २५ ॥ उपवागाय सुनायेहु चेतन चेत, कहत वनारसि थान नरोत्तम हेत ॥ २६ ॥ (११) राग धनाधी। चेतन उलटी चाल चले, जड़संगतते जड़ता व्यापी निज गुन सकल टले, चेतन० टेक ॥ १॥ हितसों विरचि- ठगनिसों राचे, मोह पिसाच छले । हँसि हँसि फंदसवारि आ- पही, मेलत आप गले, चेतन ॥२॥आये निकसि निगोद सिंधुतें, फिर तिह पंथ टले । कैसें परगट होय आग जो दवी पहारतले, चेतन० ॥ ३॥ मूले भवनम वीचि बनारसि' तुम सुरज्ञान भले । घर शुमध्यान ज्ञाननौका चरि, बैठे ते निकले, चेतन० ॥ ४॥ (१२) पुनः राग धनाधी। चेतन तोहि न नेक संमार, नस सिखलों दिढवंधन वेदे पनारसीविलासः ANMAms फोन कर निरवार, चेतनः ॥ १॥ जैसे आग पपान फाठमें सखियं न परत लगार। मदिरापान फरत मतवारो, तादि न कछू विचार, चेतन० ॥ २ ॥ ज्यों गजराज पखार आप तन, आ- पहिडारत छार । आप उगलि पाटको कीरा, तनहिं ल. पेटत तार, चेतन० ॥ ३ ॥ सहज कबूतर लोटनको सो, खु. हैन पेच अपार । और उपाय न यनै 'बनारसि' सुमरन भ- जन अधार, घेतन० ॥४॥ (१३) राग सारंग दुविधा फय जै है या मनकी दु० । कर निजनाथ निरंजन सुमिरौं, सज सेवा जन जनकी, दुविधा० ॥१॥ कब रचि- सौपी गचातक, बूंद अखयपद पनी । कर शुभध्यान, घरी समता गहि, फरं न ममता तनकी, दुविधा० ॥२॥ कर पट अंतर रहे निरन्तर, दिदता मुगुरु वचनकी । कर मुख लही भेद परमारथ, मिटै धारना पनकी, दुविधा०॥३॥ कब पर छाँड होहुँ एकाकी, लिये लालसा पनकी । ऐसी दशा होय कर मेरी, ही पलिबलि वा छनकी, दुविधा० ॥ ४ ॥ (१४) ग सारंग। दम बैठे अपनी मौनसौं । दिन दशके मदिमान जगत जन परेशममा का गटेके नीचसे तार निकालकर उससे अपने शरीर चारों ओर पोशा बनाकर आप बन्द हो जाता है।

-- २४२ जैनमन्यरत्नाकरे बोलि विगार कौनसौं, हम बैठे० ॥ १॥ गये वादर, परमारभपथपौनसौं । अब अंतरगति परचे राधारौनसों, हम वैठे०॥ २॥ प्रधर्ट महिमा, मन नहिं लागे चौनसौं । छिन न म फोके, रुचि साहिबके लौनसी, हम बैठे० ॥ ३ पाय मुखसंपति को निकसै निज भौनसों । सहज रुकी संगति, मुरझे आवागौनसौं, हम बैठे। राग मारंग बंदायनी। जगतमें सो देवनको देव । ज्ञानु चरन प- होय मुरुति स्वयमेव, जगतमें ॥१॥जो न न ममाकुल, इन्द्रीविषय म य । जनम नई माप, मिटी मरनकी देव, जगतमें० ॥२॥जा पाद नहिं विम्मय । नहि आठौं अहमे । राग नहिं जाक, नहिं निद्रा परसे, जगतम० ॥३ रोगन प्रम नहि चिना, दोष अटारद भेया मित ना प्रमुसी, करत 'बनारसि' रोग, जगतमें। पुनःग सागरमी। गिने गमायण परमादि । मरमी होय मरा , मनमानी रामरम. १ बमन-tit पनारसीविलासः मरस माने नाहि, विराजे रामायण ॥१॥ आनम राम ज्ञान गुन सामन सीता मुमति समेत । शुमपयोग यानादन्ट मंडित, पर वियफ रणखेत, विरा० ॥ २॥ ध्यान पनुप टंकार मोर मुनि, गई विषयदिनि' भाग । मह भन्म मिया. मत लेगा उटी धारणा आग, विराजे० ॥ ३ ॥ जरे अमान भाव राक्षसकुल, लो निकांछिन पर जूझे रागद्वेष ग. नापनि ना पापर, विग. दिलगत भकरण भवविधम, पुलविन मन दरपार । थकित उदार वीर पति- रावण, सेतुरंध समभाप, विराजे ॥ ५॥ भूठिन मो. दरी दुगशा, समग घरंग हनुमान । पटी पनि पर. पति सेना रे छपफगुण पान, विगजे० ॥ ६ ॥ निरखि सकति गुन मगदर्शन उदय रिभीपण दीन । फिर पारध मही रावणसी, माणभाप शिरहीन, बिग ॥७॥र विपि सकल गापरभंतर, रोय सहय. प्राम, यह विहाए रामायण, अचल निधय गम, विराज०॥८॥ भामाशा जो दातार दयानदेय दीनको मौस। यो काम भावस, १६ को सीय ॥ १ ॥ पूरे गावरात्रि २४२ जैनप्रन्यरत्नाकरे बोलि विगारे कौनसी, हम बैठे० ॥ १॥ गये विलाय भरमके बादर, परमारथपथपौनसौं । अब अंतरगति भई हमारी, परचे राधारौनसी, हम बैठे० ॥ २ ॥ प्रघटी सुधापानकी महिमा, मन नहिं लागै वौनसी । छिन न मुहायें और रस फीके, रुचि साहिबके लौनसौं, हम वैठे० ॥ ३ ॥ रहे अघाय पाय मुखसंपति को निकसै निज भानसौं । सहज भाव सदगु- रुकी संगति, मुरझै आवागौनसौं, हम बैठे० ॥ ४ ॥ राग सारंग वृंदावनी। जगतमें सो देवनको देव । जामु चरन परसें इन्द्रादिक होय मुकति स्वयमेव, जगतमें० ॥१॥ जो न छुधित न तृपित न मयाकुल, इन्द्रीविषय न येव । जनम न होय जरा नहिं , व्याप, मिटी मरनफी टेव, जगतम० ॥२॥ जाकै नहि वि- पाद नहिं विस्मय । नहिं आठौं अहमेव । राग विरोध मोह नहिं जाके, नहिं निद्रा परसेर्वे, जगतमें० ॥ ३ ॥ नहिं तन रोग न श्रम नहिं चिंता, दोप अटारह भेव । मिटे सहज जाके ता प्रमुकी, फरत 'यनारसि' सेव, जगतमें ॥५॥ . Bakrit पुनः राग सारंगदापनी। विराज रामायण पटमाहिं । मरमी होय मरम सो जाने, , सानुभवपी रामरमणमे. १ वमन-एदि. ३ मेव-पीना.

बनारसीविलासः २४३ मूरख मानै नाहि, विराजै रामायण ॥१॥आतम राम ज्ञान गुन लछमन सीता सुमति समेत । शुभपयोग पानरदल मंडित, वर विवेक रणखेत, विराजै० ॥ २ ॥ ध्यान धनुष टफार शोर मुनि, गई विषयदिति' भाग । भई भस्म मिय्या- मत लंका उठी धारणा आग, विराजै० ॥ ३ ॥ जरे अज्ञान भाव राक्षसकुल, लरे निकांछित मूर। जूझे रागद्वेष से- नापति संसै गः चाचूर, विराजे० ॥४॥ विलखत कुंभकरण भवविमम, पुलकित मन दरयाव । थकित उदार वीर महि- रावण, सेतुबंध समभाव, विराजै० ॥ ५॥ मूर्छित मंदो- दरी दुराशा, सजग चरंन हनुमान । पटरी चतुर्गति पर- पति सेना, जुटे छपकगुण वान, विरा० ॥ निरखि सकति गुन चक्रमुदर्शन उदय विभीपर, फिर फवंध मही रावणफी, प्राणभाव शिरहीन, विरा ॥ ७ ॥ इह विधि सकल साधुपटअंतर, होय सहज ग्राम, यह विवहारदृष्टि रामायण, केवल निश्चय रार विराजि०॥८॥ ३ । जिन नक भालाप, दोहा। .दू माई जो दातार दयाल है, देय दीनको भीख । सब झूठे। स्यों गुरु कोमल भायसौं, कहै मूढको सील अपूछे, भोंदू १पूनिया रायमी. ३ सम्यचारित्र. .की, परसहाय नहि २४६ जैनप्रन्यरत्नाकर लेखे । जे समाधिसी लखै अखंडित, ढक न पलक निमेस, मौदू भाई० ॥६॥ जिन आंखिनकी ज्योति प्रगट, इन आं- खिनमें मासे । तब इनहूकी मिटै विषमता, समता रस पर गास, भौंदू माई० ॥ ७ ॥ जे आंखें पूरनस्वरूप घरि, लोका- लोक लखावै । ए वे यह वह सब विकलप तजि, निरविकलप पदपाव, भोंदू माई० ॥ ८॥ राग काफी। तू भ्रम भूल ना रे पानी, तू० टेक । धर्म विसारि विषयसुख सेवत, वे मति हीन अज्ञानी, तू प्रम० ॥ १ ॥ तन धन मुत जन जीवन जोगन, डाम अनी ज्यों पानी, तू प्रम० ॥२॥ देस दगा परतच्छ 'वनारसि' ना कर होड़ विरानी, तू अम० ॥३॥ (२१) पुनः राग काफी। चिन्तामन स्वामी सांचा साहिब मेरा, शोक हरै तिहुँ लो- कको, उठ लीजतु नाम सवेरा, चिन्तामन० ॥ १ ॥ सूरसमान उदोत है,जग तेज प्रताप पनेरा। देखत मूरत मावसौं, मिट जात मिथ्यात अंधेरा, चिन्तामन स्वामी० ॥ २ ॥ दीनदयाल नि. यारिये,दुस संकट जोनि बसेरा । मोहि अमयपद दीजिये, फिर होय नहीं भवफेरा, चिन्तामन० ॥ ३॥ वित्र विराजत आगरे, बनारसीविनासः घिर धान थयो शुभवेरा ध्यान धरे विनती करे, पानारसि पंदा तेग, चिन्तामन ॥ ॥ भयानमादयक्ति। अथ परमारधहिंडोलना लिख्यते। सहज हिंडना हरस दिसोलना, मुलत चेतनराव । जहाँ धर्म फर्म मैजोग उपजत, रस स्वभाव विभाव ॥टेक ॥ ज, सुमनरूप अनूप मदिर, सुरुचि भूमि मुरंग । त शान दर्शन संभ अविचल, चरन आड अभंग ।। मरया सुगुन परजाय पिचरन, भौर विमल विवेक । व्यवहार निधय नय मुदंडी,मुमति पटली एका सहज० ॥१॥ पट फील जहां पडद्रव्य निर्णय, अभय अंग अडोल । उधम उदय मिलि देहि झोटा, शुभ अशुभ फल्लोल ॥ संवेग संपर निकट सेवक, विरत मीरे देत । आनंदकंद मुछंद सादिष, मुख समाधि समेत, सहजहिं ॥२॥ जह खिपफ उपशम घमर दारह, धर्म ध्यान यजीर । आगम अध्यातम अंगरक्षक, शान्तरस परवीर ॥ गुनथान विधि दश चार विद्या, शफतिनिधिविस्तार । संतोष मित्र खयास धीरज, सुजम खिजमतगार, सहज ॥ ३ ॥ धारना समिता क्षमा करुणा, चारसखि चहुँ ओर । निर्भरा दोऊ चतुरदासी, करहिं खिजमत जोर ।। -- २४८ जैनप्रन्यरत्नाकरे जहँ विनय मिलि सातों मुहागनि, करत धुनि झनकार । गुरुवचनराग सिद्धान्तधुरपद, ताल अरब विचार, सहब०॥४॥ श्रद्दहन सांची मेघमाला, दाम गर्जत घोर । उपदेश यो अति मनोहर, मविक चातक मोर ॥ अनुभूति दामनि दमक दीसे, गील शीत समीर । तप भेद तपत उछेद परगट, मावरंगत चीर, सहजः ॥५॥ कबहू असंख प्रदेश पूरन, करत वस्तु समाल । फयह विचार कर्म प्रकृती, एकसी अड़ताल || कबहूँ अबंध अदीन अशरन, लमत आपदि आप। काहं निरंजन नाथ मानत, करत मुमरन जाप, सहज० ॥६॥ | फयह गुनी गुन एक जानत, नियन नय निरधार । यह मुकरता करम किरिया, फहत विधि व्यरदार ॥ | कबहू अनादि अनन चिनिन, कबहु करहि उपाधि । कबह गुआनम गुणसभारत, कबहु मिद्ध समाधि, सहम० ॥७॥ दिहिमांनि गदा हिंटोल शुलत. फरन आतम कान । भवनग्नतारन दुनियाग्न, गफल मुनिमिरनान ।। जो नर विनच्छन सदयटन, करन ज्ञानपिटाग । कामोर भगति विना विविमी, नमत फागीदाम ॥ ८ ॥ पामापशेलना। At the intele tatatatatatertretelistictatataterte बनारसीविलासः २४९ RAPAR अथ मलार तथा सोरठ राग । देखो भाई ! महाविफल संसारी, दुसित अनादि मोहके फारन, राग द्वेप अम भारी, देखो भाई महाविफल संसारी॥१॥ हिसारंभ करत मुम्प समुशे, मृपा बोलि चतुर्राई । परधन हरत समर्थ फहाँथे, परिमह पढत पडाई, देखो भाई०॥ २ ॥ वचन राख काया रट रासे, मिटे न मनचपलाई। यात होत औरकी और, शुभ करनी दुखंदाई, देखो भाई० ॥ ३ ॥ जोगासन करि फर्म निरोध, आतम दृष्टि न जागे । कथनी फयत महंत फादाये, ममता मूल न त्यागै, देखो भाई॥४॥आगम वेद सिद्धान्त पाठ मुनि, हिये आटमद आने । जाति लाभ कुल पल तप विद्या, प्रभुता रूप पखाने, देखो भाई०॥५॥ जड- सौ राचि परमपद साध, आतमदानि न सूझ । विना विवेक विचार दरपके, गुण परजाय न यूझै, देखो० ॥ ६ ॥ जसवाले जस मुनि संतोप, तप याले तन सौ । गुनवाले परगुनको दोष, मतवाले मत पोपे, देखो० ॥७॥ गुरु उपदेश सहज उदयागति, मोहविकलता छूटै । फहत बना. रसि है फरनारसि, अलख अखय निधि लटे, देखो० ॥८॥ एयरपदी महार सम्पूर्ण। मुरादाई ऐगा भी पाठ २५० जैनमन्यरजाकरे . तीननये पद जो हमने संग्रह किये हैं. नयापदला मूलन बेटा जायोरे साधो, मूलन० जाने खोजकुटुंब खायोरे साधो० मूलन० ॥ टेक !| जन्मत माता माता खाई, मोहलोम दोइ माई । कामक्रोध दोइ काका साये खाई तृपनादाई, साधो० ॥१॥ पापीपापपरोसी खायो, अशुभकरम दोइ मामा । मान नगरको राजा सायो, फैल परो सयगामा, साधो० ॥ २ ॥ दुरमति दादी ..."दादो मुखदेखत ही मूओ। मंगलाचार वधाये बाजे, जब यो बार क हुओ, साधो० ॥ ३ ॥ नाम धरयो वालकको सूचो, ६. वरन कछु नाहीं। नामधरते पांडे खाये, कहत बनारसि भाई, साधो० ॥ ४ ॥ नयापद २रा राग जंगला. वा दिनको कर सोरजिय! मनमें । वा दि० टेक । वनज किया व्यापारी तूने, टांडा लादा भारीरे । ओठी पूंजी जुआ खेला, आखिर वाजी हारी रे॥ आखिर माजी हारी, करले चलनेकी तय्यारी । इकदिन डेरा होयगा वनमें, वादिन० ॥१॥ झूठे नैना उलफत वांधी, किसका सोना किसकी चांदी। इकदिन पवन चलेगी आंधी, किसकी बीवी किसकी वांदी, नाहक चित्त लगावै घनमें, वादिनः ॥२॥ मिट्टीसेती मिट्टी मिलिया, १ इस रागके पदमागे हम समझ नहीं सके। ।

पनारसीविलासः २५१ नीसे पानी । मरम्मसेती मूरग मिलियो,, ज्ञानीसे ज्ञानी । मिट्टी है सरे तनमें, वादिनः ॥ ३ ॥ फहत पनारसि ने मवि माणी, यह पद निरवानारे । जीवन मरन किया 'नाही, सिरपर काला निशाना रे । सूक्ष पडेगी बुढापेपनमें, दिन०॥४॥ नयापदरा किन गये पंच किसान हमारे । कित०॥ टेक ॥ यो बीज सेत गयो निरफल, भर गये पाद पनारे । कपटी गोसे सांझाकर, ...हुए आप विचारे ॥१॥ आप दिवाना गह पैटो लिखलिस कागद डारे । याकी निकसी पकरे दम, पांचो होगये न्यारे ॥२॥ रुकगयो कंट शबद नहि फमत, हा हा फर्मसों हारे । पानारसि या नगर न पसि. चलगये सींचनहारे ॥३॥ बनारसीपिलामके संग्रहफा. नगर आगरेमें अगरवाल आगरो जो, गर्ग गोत आगरेभे नागर नवलसा । संपनी प्रसिद्ध अभैरान राजमान नीके, पंच पाला नलनिमें भयो है फॅयलसा ।। ताके परसिद्ध लघु मोहनदे संघइन जाके जिनमारग विराजत धवलसा ।

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Utanika

Author
Bahadur Lala
Title
Utanika
File name
Utanika
Text
OCR done
Citation
1912
Published
2011/07
Publisher
Baroda, Central Library
Language
Sanskrit
Pages
362
Library
Agarchand Bhairondan Sethiya Jain Parmarthik Sanstha, Bikaner
DLI number
313759
Barcode
99999990311154.00
Scanning centre
Banasthali University
Digital publisher
Digital Library Of India
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