Shri Jawahar Vidyapith Binasar, Bikaner
Naree Vidroh [ Mano Vigyan ]
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नारी विद्रोह
( मनोविज्ञान)
लेखकः
श्री गुलाबरल वाजपेयी "गुलाब"
प्रमन सरसरल
ल्य !!!)
के. पी. शर्मा
विज्ञान-मन्दिर
* माताण पाड़ा लेन
कबर-नि
भीलवायजन नन
सर्वाधिकार सुरक्षित
विपय .... ११ १५. २१ २८ ३२ ३६ ... ... १ स्त्री पया है ? २ कुमारी-जीवन ३ शिक्षाका मूल्य ४ विवाह गया है ? ५ भयो पयों अनचाहतको संग? ६ फैशन ७ विधया जिन्दगी ८ राष्ट्रको जमानपर रसत ताफा आर.द.. 10 पीरांगना ११ सारथ्य १२ दाता १३ वर और गाली ११ नागरिक जीवन १५ मरिमें जमा होगा: ६७ E ५३ ६३ ७६ .... १ ... به کم १०६ नारी विद्रोह- क्यों ? 'यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता'-यहुत प्राचीन कालसे यह उक्ति प्रकाशित चली आ रही है। पर आजकल तो पूजा, देवी, देवता, रादि संज्ञानीक मानसे नाक-भौं सिकोड़नेवाले महानुभावजन इसे 'सत्यनारायणकी कमा' में लोग और कलावती की कहानोको तर समझते हैं। उनका दोष नहीं, गा तो हमारे अन्धकार युगका ही परिणाम है। अंग्रेजी भाषा हमारी गुलामी के समय हम पर 1 फरने लगी, और हम मानसिक पसे गुलाम हो गए। परिणाम हुआ कि हमारे जीवन में अग्रेजी शब्द को हमारे निकट आ गए और हमारी अपनी निधि दर जा यति यों कहना चाहिए कि अपनी निधिको हम पदनानना भूल गए। पालो परवानगे विभूषित मानाने का शब्दको अपनी father विधानपदों का प्रयोग किया । उसका प्रयोग विभिा र धारण करने लगा। (मना पाया गममना पनि::: भी वस्तुमा लिन आई सान: :: Artist: वादि। यानि for 17 का आजक वर्तमान न करने का नार काटने लोग पर 7.! :: . किन्तु हमारी प्रायः ही। ... ! अरर और दम विदेशी गुरन र निभिनाइम पदनान ना ???
[३] ठठोली किया करने थे, हमने भी उनके स्थान पर मिलाया था । अपने आधार प्राचीनकी काहीसे समझ सकते है। और यह अब यह दनाई कि इम महाशय में वही निजामे घूम रहे है ; जाने पर जाकर टकरता । उनिमें आज अनोखापन जान पाता है। नारी! फिर उसकी पूजा !! और पहा देवता रचतो American goggles (अगरीकन रंगीन चश्मा) से देखनेवाले funny' कहकर रंग पग, पूजा और दयता' शब्द पर, और पासपके बाद टकदार गर ठंग, होल गंधार दाट पशु नारी, पद नानक अधिकारी'----तुलसीदास नकाने का। मंद है, दोनों विपन बुद्धि पर। पाने की ! जा चुका -शब्दोंक पर यदि ठीक विचार किया जायनी भाष रपट हो जाएंगे। भागोर, वाहन की दादन । पूजाका ी कदापि या नटो रहा कि भारती और घंटीके दागदास सम्पादन किया जायगा। "पूजा' भन्दः अन्दर निदिन श्रद्धा और सम्मानवी भारना! मी प्रबार दया शादी मगर समता र गुग एजीभूत हो उठन । उपर्यत शिका मौन्दर्य पर जाना है मन' शब्दन । नियामसरना नों, परत गण करना, मानन्दपूर्ण जितियो प्रार करना. मला मारना, नप नारसे मुल बाबर न! ---सी अबरामी परमेशः एक मापन परमीका। नारी नरया मिला। नारदीवना विचार मापार हो उसका नारी का एक मानवीय र । नयी बार तिकी उपेनकी जा सकती। मेमन धरनेही पर : नन्द Her नमो नो माया पनि हो गया । मन्न, किन ण इस तिने का परम पुगेर नरानाम । महरिरि कही पनि मान- योगेन कार का नाम पर रोक धन: समानाबाद : ७१.२ . मात्र पर - ...- [४] । शम ही समाजका निर्माण हुआ है। नर और नारी दोनों ही उस समाजरूपी गाड़ी पहिए हैं। एक पहिएके वलपर गाड़ी नहीं चल सकती। दोनों पदियों में अविरल समानता चाहिए। एक दाहिनी ओर यदि जुड़ती है तो दूसरी बाई भोर। दोनों ही एक दूसरेके ऊपर निर्भर करते हैं। इसी प्रकार समाजमें नर और नारी दोनों हैं, दोनोंमें समानता चाहिए। एकमें किसी प्रकारको त्रुटि अपरके लिए असुविधाओंकी सृष्टि करती है, और सारा योम फिर उसी एक ही पदिएपर जा पा है। कार्यक्रममें विशंखलता आती है। व्यष्टिकी इस दशाका प्रभाव समष्टि पर पता है, और समाजमें दुर्वलताका सधार होता है। आर्थिक दृष्टिकोणसे भी मोटे तौरपर एक बड़ी मुख्य बातमें नारीका स्थान अपेक्षित है। वह है division of labour-श्रम विभाजन । परिवार में नर और नारी अपनी सामर्थ्यके अनुसार 'अर्थोपार्जन' में एक दूसरेके सहायक होते है। विभाजनमें नारीका अश अपरिहार्य है। इन तत्वोपर विचार ज्ञानके उपाकालमें ही किया गया था। और ना समोजने भानी सारी घदो और सम्मान नोरोके चरणोपर उना था। मीना सम्मानको अंजलिको 'पूजा' कहा । पालन सौर पोषण शक्ति नारी। मी- लिए ऐसे समस्त तत्वोंको नारी करने माना-पृषी, नदी, ऊस, गा! .frmi प्राति और आयाशस्ति नारी अपने ही कल्पित की गई। नाका मान प्रति किस भांति हुभा ? जिस दिन जनाको गर्नमें द्रुत माने या प्रसंगमानो मे भी जः पदार्य की तरह मानना शुरू किया, मीदिनी उगा: ET किग दिनमे गायक परियममानना के प्रति अपमान : दिनो समाज कपी गादीतीजनेती। आपकतार मेरा का प्रदान गीदिन रामपानी : आज समाजक', रारा, देशाता या पिया! दुपता ने पै गरे। शायरी, नुदान देगा. दाय: है। ये भूल गा.शिन ने ग म प , हुआ।
करता हुआ अधःपतनकी ओर जा रहा है। स्टे हुए वाक्योंको दुहराने लगे। अपने
मनलयकी पृत्ति के लिए महापुरुषोंकि वचनों का हवाला देने लगे। पूर्वोत्र चौपाईका
प्रायः उल्लेख किया जाता है। विषयान्तर होते हुए भी इसकी चर्चा कर लेना अच्छा
होगा। गोवामीजीने महाकाव्यकी रचना की। यतः उसमें विभिन्न रस, विभिन्न
पात्र, विभिन्न भावोंका एवं विविध परिस्थितियोंका दिग्दर्शन सावश्यक था। जिस
प्रसंगमें उस चौपाईका व्यवहार हुआ है. यह प्रसंग है समुद्रकी जनताका ।
चन्द्रजीको बाध्य होकर उसके लिए शर उठाना पा, और समुद्र टरकर उनसे प्रार्थना
परने लगा। यह समुद्र पान तो उच कोटिका पान नहीं था, उसमें जला थी,
अर्धान विवचन शाति अत्यन्य कि नहीं ही धी। अतः मा पात्र समाजकी तुला
क्या संभालता ? शोर जी पर भी उसने कहा था को प्रसन्न युद्धिक सनुसार महा।
मय ऐसे पानीको उत्तिका हवाला देना नी अपनी प्रसन्न युक्षिका परिचय ना ही
का जायगा। गोस्वामीजीने को नारीका सम्मान अपने मानस' में सर्वाधिक क्रिया
। राक्षस की संदोदरी और वानर पनी नारा नए का मनुचित आदर दिया।
जिस नारीने अनायाम उनको उनके मार्गका मन पर दिया, उस नारी के लिए
गौरवामीजी कदापि दुर्भावनाका पोषण कर ही नहीं सकते थे। उन्होंने जय भी
भावनापीपरसर पारे प्रसंगी। उसी सम्मान को दोन
पुरुषी पद मानेका थिए, ती यो। र दिर प्रकारको का
सार किया जाता है पर जोर' ममगार रसना उम: गाय
कपन गा पा ओक उसी पनों दिनही वापर भी मकान
परतो
GA
है
मा निकाय: म रोमाने या
न : नार' को म
नदी
भागात पाना : पुनर
की कमाई ! म. . या या
म: मरिया बरकार र
गुमा::राम, र
।
[ ६ ] जयमाला। आज शालवेत्ताजन कौमार्य' पर आलोचना करते हैं। कुमार, 'कुमारी' विवाहित, विवाहिता और विधुर तथा विधवा सबके कर्तव्य एकले हैं। अतः एकांगी विवेचन करना पापातंपूर्ग होगा। जीयनके विविध क्षेत्र में मिति प्राप करने के लिr 'संयमकी आपकता है। इसीकी शिक्षा दी जानी चाहिए दोनों को। यह नो कि नारी पक्षको इसका अनुशासन मानने के लिए बाग किया जाय और भार पर अनुशासन भंगकर मनमाना उपदव करता चले। जिस दिन समाजाको गंभीरता और आवश्यकताका अनुभव करेगा, उसी दिन पर स जार उठ जागा-और 'नारी विद्रोह' की आशंकासे रहित हो जायगा। पं० गुलाय रन वाजपेयीजी दिन्दीके पुराने पुजारिगा। अपनी वाणीकी अनना ही करते रहे है। प्रस्तुत पुस्तक नारी टिकार! भोजन इम पसके साहित्य के अभावको पूर करने का प्रसंगी उपोग लिया। arrie शक्ति' का लेखक यदि शकिती और आकति ही आ ने आमा ! VETE है इसका उचित रानादर होगा। प्रो० कमलादेवी गर्ग आवण-पूर्णिमा, २००६ एम. ए. " भव
जनता के लिये
नारी fair!
मेरे मिन चौंक उठेंगे और "विनोद' गब्द पर आपत्ति करने समझातारा-
चिोर" यो माने है-"पुरुषों के विरुद वियों की बगायत ।"
लेफिन यात ऐसी नहीं-
न नारी के बिना पुरुष रह सकता है, न नारी विना पुरुष के । दोनों का मधुर
दाम्पत्य जीवन मनुष्य की जीवन नीका पार लगा देना।
नारी थादि युग से पुरुष के साथ रही है और घरायर रहेगी। लेकिन पिछोर के
गाने या नहीं, पर पुरुष के साथ मगरे, उसे खरी खोटी सुनाये और उसके
गाम मंग्राम कसने तो दोनों की जिन्दगी न बन जायगी । मुख और शनि
हमेशा के लिए विदा लेलेंगे। लेकिन अब हमारी ग्यतन्त्रता ए। गाभाग्य-मू
उदय और उसके प्रयास की किरण गुलागी भी जता, आना और पतन को
मिटा पर यही दम लेंगी। आज भारतवर्ष की स्वाधीन जनता जाग रही ।
नारिम जाग ही पुस्तक माध मिलर नमाज में पली हरीनाजा
और जागतिक मनः। मरनी गा-समी कौर न माना
दगी रिप्रपाका जनता के मामले का करेगी। कि अन्धकार
पर भगी। अपने न यार की राष्ट्र निर्मा
।
भारत पीना मुख्य
संसार,
का मन न पचनी र पत्र
। EAR नाम पर --
पीपान करना
हमला कर मार दुलन मा
.
[ ८ ]
अब जब तक स्त्री पुरुष एक दूसरे के साथ दूध पानी को तरह घुल-मिल न जायंगे-
राष्ट्र में खून की नदियों का बहना बन्द न होगा ओर अशान्ति के हाहाकारों से
भारत की स्वर्ण भूमि मैले धूलि कणों से लिपटी रहेगी।
क्या मैं पंछ सकता हूँ, आप कैसा भविष्य चाहती हैं ? और आपको किस तरह
का जीवन पसन्द है ? भारतीय उन्नति की सम्पूर्ण लाइने रेल की पटर ही नरह
आपके सामने चुली हैं और ती पुरुष दोनों उन मागों से सफल यात्रा समान
कर सकते हैं।
मैं अपने मित्रों से पूछता -भारतवर्ष की नारी पहले क्या थी, माज नमा
है और भविष्य में उसे क्या होना नादिने ? सहयोग से पार जो काम भी माने
की तरह पानी बन जाते हैं ।
विज्ञान-मन्दिर
में आपका प्रिय मित्र
.
कलकत्ता
गुलाबरन वाजपेयी
२.अगस्त १९४२
नाग विद्रोह
.
ग्रंपयार
१०
नारी-विद्रोह
खिनी पार्वती के रूपमें। यही है नारीका गौरव, नारोकी मांदा, नारी
की सफलता। पुरुष उसे सदैव विलास ऐत्रयों में सुधारे रखे, नारीको
यह कामना कभी नहीं। उसकी तो कामना है जीवनका आदर्श नित्र ।
जिसे पति-ग्रहण करता है. समाज स्वीकार करता है. राष्ट्र गर्नसे बात
फुलाता है।
समस्त मानव-मंडलका निर्माण करती है खी। यदि कोई माता
अपने बच्चेको सिखलाती है-पढ़ो, लिखो और कर्त्तव्य पालनकर देशो
सपूत बनो तो बगेका ज्ञान दिन-दिन बढ़ता है और उसके मलित
में प्रतिभाका आकर्षक विकाश होता है।
में अपने चालिस करोड़ भाई-बहनोंसे कर रहा यदिशाम भार
तीय नारीको न पहचानंगे तो समगे कसे-वर्ग गाने का
ताओंकी पवित्रता कमी ? भक्ति किसे काते है. सपा स्या
है ? नारीने शास्त्रोंकी रसनासी है। शासन निगा दुरागीपर विजन
प्रामकी है और ज्ञान-विज्ञानकी दुनियाको नगमागसे भर दिया है।
संसारकी प्रबल-शक्ति है नारी। का. नारी ; जो गाता, पनी, कान
और कन्या रूपमें मगताकी मूर्ति है। मित्र ! पया तुमने देगा।
रहस्यमयी चांदनी ? पृथ्वीका शम्ग श्यागट, प.! ... भाग, गवमें
नारी मृत्ति । प्रेगकी बर पुण्य प्रतिमा ।
শৰ এশিদ, নবী খান না । -চাৰ্য 5ানা-
उन्हीं के कायाम । यानि विश्व में लागांव-पटियां होगी ..
टेफिन तुम्हारी आम-ज्योति जीवन का निर्माण करनी है। दिमाग
अलिब नहोला नी असा बुरे पुलती पानान कौन करता ?ri.
ओ, नागगंमार के अंष्ट पुल तुम्हारी अमर वाणी गरेको
..
--
कुमारी-जीवन में उन लड़कियोंसे कुछ कहना चाहना-जो जवान हो गयी है और आजन्म पुमारी रहना चाहती है। आजको दुनियाकी वान में वाहनाई -- जो रहस्य-रोमांचाँसे भरी । अनेकों मुशि-द्रोही भोली लड़कियों को बाकाकर लुभावने सब्ज- पाग दिग्यलाते और उन्हें धोकर चंगुलमें खींचकर कांटोंपर घसीटते है। या दिन आपके लिये सावधानी हैं। यदि आप भूट प्रमक नागपर आय न्योलकर नहीं चलनी, तो आप चारों नरफ वाई-बंदक नयार हो जाते हैं। गुमारी आप। विधानाने आपका श्रृंगार फल जैसा किया है। यदि पलको सावधानीसे देख-भाल न की जायगी, तो दरल्न असमय में ही सर जायगा। आप चीपर आई है। आप जीवनको कठिनाईयां और उनका उतरदारिन साप पर। यदि आप जिन्दगीका निर्माण नही रूप नपर लकी को भारतीय सपना आपकी गलानियोंको क्षमान करेगी। पनि जार जीवनको भारतीय नभ्यताने न टालकर चोरोप लुभा- पने फैशनमें हवाये रखना चानी है पदामिजाजोपी आंधी में उड़ी जा सोतीनिस्ट भविश्य ही आप देनी-जिल सगरमा लोभनीय पनानेको वा नसोधी, यहो आपका साना दुस्मन दन बाद । पौधा जरा होगा. इसमें पल मिलगे। लोक पल, प्रेम १२ नारी-विद्रोह फूल, मातृत्वके फूल। बारह वर्ष बादसे आपके जीवनमें परिवर्तन आरम्भ होते हैं। सौंदर्य और यौवनकी सूचना मिलती है। याने इस समय आप माता वननेकी तैयारी करती हैं। मेरे कहनेका मतल्य समझ गयों आप ? खाधीन भारतको माता बनने जा रही हैं और भारतवर्षको हर तरहसे सुखी बनाना आपका प्रधान कर्तव्य हो उठता है। आज मनुष्य जाग रहा है, समाज जाग रहा है, जातियां जाग रहो हैं और आप भी जागरणकी रोशनी में विकसित हो रही है। कृपया जीवन-संग्राममें अपने पुत्रोंको उपहार दीजिये---जिन्दगी, शिक्षा और धन-जन। -- आपके सामने जिन स्त्री-पुरुषांका झण्ड है। यदि आप उनां गुगोंको प्रशंसा करती हैं, तो आपका सन्मान सहज ही बढ़ जाता है। आप यही भाई आपके परमात्मा हैं, आपकी यही बहनें आपकी लक्ष्मी आपकी उपासनाका आधार होना चाहिये भारतवासी, जापगमें विद्रोहका वैमनस्य नहीं । एक दिन भारत आपको प्रतिष्ठा मिहागनार बैठायेगा। आप कुमारी हैं। आपको अपने संबंधी विद्या न होना चाहिये। आजकी कुमारी कलकी जीवन संगिनी है ; पम्मोही माना। यदि जीवनयं. संबंधमें आपका मान विशाल न होगा, नी भाग्नही शक्तिशाली पसे बनायेगी ? समाजका म्वाथ्य को गुग्गा ? मानता, आप शेरमपियर, मिल्टन और लीक मामें बन पात्र जानती हैं। कालिदानके नाटकांका भी आपने अच्छा अध्ययन किया है। किन्तु आप अपने जीवनक, मंबंधी बहुत कुछ अन्धकार है। दयों ? जीवन-ज्योति आपकी जय यात्रा। जो लड़कियों कहती हैं. मैं आजन्म कुमारी रहेंगी, उन्हें गर्व साधारण मदहकी निगाहोंने देखते हैं। बीको कभी न कभी पुरुपये मंत्र जाटन कुमारी-जीवन ही पड़ता है, यदि या नहीं जोड़ती नो पुरुष किनी न किसी बहाने जोड़ लेता है। योगेपकी बहुत स्त्री-लड़कियों कहती हैं -- मैं कुमारी हूँ । लेकिन उनके कुमार-जीवनकी भ्रष्ट कहानियां सर्व विदित है। सदेव पुन्मारी गहनेकी इच्छा चरित्र हीनताकी आदत है। जिसका पहला रूप मकड़ीके जालेकी नरह मुलायम होता है। बादमें वही आदन मोटी जंजीरका रूप धारणकर लेती है, और किसी भी जीवनको ध्वंस होते देर नहीं लगती। में हमेशा कुमारी रहुंगो-या, प्रनिगाकर न को श्री सुम्पी हो सयती, न कभी सुग्व शांति पा सकती है। मैं कुमारी जीवन व्यतीत करंगी, किसी भी वर्वरताकी नकल करना, भारतीय नागें लिये इससे अधिक लजाकी चान और पया हो सकती है। इन नगदकी प्रनिशा करनेवाली लकियां चाहे किननी ही हिम्मन पयों न रम्पती को सी-समाजके लिये फला। जीवन में बाधाय भी है. विपनियां भी। अनेकों शूलोंसे भग जिन्दगी। लेकिन यह सोचकर कोई लड़की विवाट न करेगी. हमसे दोनों नरपार दरवाजे बन्द हो जाते हैं। आजन्म कुमारियोंक भी, विवाहित जिन्दगियां भी। माता बनने की पच्छासे घबराना, बन पंदा पारनेकी कार काहानियां सुन-सुनकर उरना. घोर कायग्ना और माना बननेकी जिम्मेदारीसे दूर भागना है। दर अमल नारीको शोभा पल बनकर मुरमा जाने में नाही. नीले फल उत्पन्न करने । नीलिय में पहना जो सिया विवाद नाही पारनी. ये गया है। विवार प्रागतिक नियम, मुखमय शमार और गार्गको पृतना। सीका जर मानारनिहामनपर जय-निलयोना है. दापनिक अधिक पारकी निगल देवने लगी। पर्स, गरमें ही या मोदी साली जेली पटियों को जन्म देनी पानी ही पा दान देनी ---
कपना जीम
१४
नारो-विद्रो
पटेल जैसे लोहके आदी।
नारीका निर्माण मान-विज्ञानका प्रकारा
में लिख लीजिये-अपनी कमजोरिया और गतिमा गुभारने
का आकर्षक जागरण है। अगा सोपतो देगार पाइने बोला :
जब उसे जान हो जाता है-मार जहागीली वस्तु है. गरम
फिर इनका नाम नहीं करता।
76
O
शिक्षाका मूल्य भारतवर्षमं आध्यात्मिक-शिक्षाका प्रचार तेजीके साथ बढ़ रहा है। उसकी यह पतार अंधेरी जिन्दगियों में दिव्य-प्रकाश भर देगी। हमारी माता वहन और कन्यायं शिक्षा विकाशसे नवीन-स्कृति और आकर्षक-जीवन प्राप्त करेंगी। लड़कोंके जीवन मनोहर आनन्दोंसे भर जायंगे और अमीर गरीय सब अपनेको एक नया आदमी समझने लगंगे। शिक्षा सर्वत्र पूज्य है- चाहे वह अंगरेजी हो या अरवी । संगत हो या गुजगनी। महाराष्ट्री हो या बंगला ! लेकिन शिक्षाक. यह मायने नो कदापि नहीं. जो न्यानको लाड़ा बना दे-राष्ट्रको पतनके गटंग गिरा। भारतीय शिक्षा या आदर्श है जो साढ़े नीन हाथ के आदमीको अमली गनुप्य वना देती। उनका चरित्र निमल होता - जीयन मुयी । ली शिक्षा चाहे लड़कांकी हो या लड़कियोंकी । भारत चालिम फगेट आदमी आज यही शिक्षा चाहते हैं - आज की कन्या कल की आदर्श गृहिणी हो. गाठ-सरिफा. भारतीय महानिकी पुजारिणी। पाता :-रिनी भी लड़के या लड़कि. लिये भद्दीले भद्दी पानी उतनी हानिकारक ना ; जितना कि बनावटी इतिहान. नकली गजनीति और राहिले भरा उन जप. नाहित्य ! आज किसी भी सीनो पर जानना चाहिये. आदर्श-तान या शिक्षा कच्चे पढेकी नन्द में ;
है
हमारे जीवनको तोड़-फोड़ वारनेवाली न हो। भारतमा
लेकर जो कुछ जानती है ना वह गोताही नीनो पर
स्थायी सहयोग करेगी। लेकिन यदि ना आना या ग
और योगनीय नागना में अपना गौरव मममता ... "
पनिले गर. दिन अवश्य लाना।
आज बहुतने म
काजाम अंग्रेजीता सोमः शि
उममें सबसे बड़ी मूर्षका नो या Ft आणि मग
कन्याक कामकी नहीं। नी शिका भारतीय मिनार
मा प्रभावशाल दिया है
नी. इन्टे पामागग पर जानीनों
N
दान गलत रमी गानकी मी
दकिया भारतीय मिना मन
मागीय मन ।
RE: "त.
ay
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ग
H
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AM
7 :
1
-
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शिक्षाका मूल्य १७ नुमने कितना पढ़ा-लिया ? किन रास्ते से चल रहे हो ? जो कुछ करने की-किन, लिये और क्यों ?" शिक्षा पाठशाले, मानव-उन्नतिक कारखाने हैं। वहीं राजनैतिक और सामाजिक भूपियांका निर्माण होता है। नाहित्यिकां, फलाकारों और कवियोंक कर्मक्षेत्रकी नींव बहस पड़नी है और वे स्वयं बन जाते है राष्ट्र। या सच , कि आज हमारी भाग्नीय-शिक्षाका जिंदा रूप नहीं रह गया। इसीलिये आज हमारी कलायं लुन । जीवन-विज्ञानका मोदय नष्ट। यदि शिक्षा क्षेत्रमें स्त्रियां पिछड़ी है. तो आगे आये, नवीन आत्म-ज्योनिने उनके जीवन जगमगा उंगे। नवयुवक आगे चंद-और शिक्षाकी उन्ननिमें अपना सर्वस्व न्योछावर कर दें। यदि कई दोंने शिक्षा दरवाजोपर ताले, एटका दिये हैं, तो युवक - शनिया जन ग्योल टालं.--उनके जीयन ग्वजाना कीमती धन मिलेगा। इस नमः शिक्षित व्यकिपर न किमीको अत्याचार करनेकी हिम्मत होगी, न अशिक्षिन मानाय मूर्य संतानोंको जन्म दे लवंगी। लोग फिर वैसा ही तेजवी ची प्रार करंगे-और उनके मान-मंदिग्में पुनः अचलना की रोशनी जगमगा उंगी। कोई भी लड़की कोई भी लड़का..-मिफंसाद मांमका पुतला नाही. बल्किाका भाग्य विधाता। मैं पटना -- साजर, आदमियों में जान-विज्ञानका जो गुप तेजस्वी रुप दिग्बाई ६ मा- उनमें कम कल्पना और निर भाव भर की जान छिपी है शिक्षा | शिक्षाकी चाल जोर सानपा अमंतांप। जो पद दिन मनुष्यको माटा- पुरप पना देती। मनुष्यको आलिया प्रसार करना....या शिक्षाका मन्त्र रूप मानसिक विपकी बुनियाद । चार और न्यार मनमानेकी मेशाती-राशि -- १६ नारी-विद्रोह हमारे जीवनको तोड़-फोड़ डालनेवाली न हो। स्त्री भारतीय-संस्कृतिको लेकर जो कुछ जानती है, चाहे वह थोड़ा ही क्यों न हो, पतिके साथ स्थायी सहयोग करेगी। लेकिन यदि वह आधा या गलत जानती है- और योरोपीय सभ्यतामें अपना गौरव समझती है तो वह भारतीय पतिको एक दिन अवश्य रुलाती है। आज बहुतसे स्कूल कालेजों में अंग्रेजीकी जो भ्रष्ट्र शिक्षा दी जाती है, उसमें सबसे बड़ी मूर्खता तो यह है कि वह अधिकांश भारतीय कन्याओंके कामकी नहीं। वैसी शिक्षा भारतीय स्त्रियोंके मनपर इतना भद्दा प्रभाव डालती है, कि वे घर और समाजकी भलाइयां तो समझती नहीं, उल्टे पाश्चात्य ढंगके फैशनमें पड़ जाती हैं और दुर्गुणोंको मनमें स्थान दे देती हैं। क्या इन गलत रास्तोंको रोकनेकी आपमें हिम्मत नहीं ? यदि लड़कियां भारतीय-शिक्षाकी उपासिका बन जायंगी तो मनुष्य-जीवनको उस योग्य बना देंगी-जो भविष्यके स्त्री-पुरुषोंके लिये समान रूपसे लाभदायक होगा। अव तो हमें उस युगको जीवित करना होगा, जो शिक्षाका नष्ट रूप बदल दे। आध्यात्मिक और दार्शनिक विचारोंको संसारमें फैला सके। कुशिक्षाका एकमात्र उपाय है सु-शिक्षा। अशिक्षा तो हर्गिज नहीं। विकसित शिक्षा जीवनके प्रत्येक अंगमें प्रभाव डालती है और लड़कीके माता पिता या शिक्षक उसके जीवनको गौरवपूर्ण पुस्तकालय बना देते हैं। वको लीजिये। बचेको सची शिक्षा पहले पहल उसकी माता देती है, जिसमें बच्चा अपना कर्तव्य समझे और भारतका श्रेष्ट नागरिक वन सके। आज भारतने लाखों मनुष्यों में, लाखों गांवोम, शिक्षाका घोर अन्धकार फैला है। शिक्षासे उनके जीवनमें नवीन विस्मय लाना होगा। करोड़ों मजदूर बच्चोंके मनमें शिक्षाका जागरण उत्पन्न करना होगा। जिसमें प्रत्येक बच्चेके प्रति माता पिताका रोजाना प्रश्न हो ~ आज शिक्षाका मूल्य o नुमने किनना पढ़ा-लिया ? किन गन्तले चल रहे हो ? जो कुछ, करती-किसके लिये और क्यों ?" शिक्षा पाठशाने, मानव-उन्नतिक कारखाने हैं। वहीं राजनैतिक और सामाजिक प्रपियोंका निर्माण होता है। नाहित्यिकां, फलाकारों और कवियोंक कर्मक्षेत्रकी नीव यहीं से पड़नी है और वे स्वयं बन जाते गष्ट। याह सच है कि आज हमारी भारतीय-शिक्षाका जिंदा रूप नहीं रह गया। मीलिय आज हमारी कन्यायं लुम हैं। जीवन-विज्ञानका गौंदर्य नष्ट है। यदि शिक्षा क्षेत्रमें स्त्रियां पिछड़ी हैं, तो आगे आयें, नवीन आत्म-ज्योनिसे उनके जीवन जगमगा उठंगे। नवयुवक आगे बंद- और शिक्षाको उन्ननिगं अपना सर्वस्व न्योछावर कर दें। यदि चंड यूदोंने शिक्षाक दाबाजोंपर ताले लटका दिये हैं तो युवक -शक्तियां उन ग्योल टाल--- उनके जीयनके ग्वजानामि कीमती धन मिलेगा। इस नगा शिक्षित व्यनिपर न किमीको अत्याचार करनेकी हिम्मत होगी, न अशिक्षिन मानावं मृर्ष संतानोंको जन्म दे सकेंगी। लोग फिर वैमा ही जम्बी वीर्य प्रात करंगे-और उनके ज्ञान-मंदिर में पुनः कम्बलता की रोशनी जगमगा उठंगी। कोई भी लड़की कोई भी हाड़ मानका गल्किदाका भाग्य विधाता । जे काना. -- 'आजके आदमियों में जान-विज्ञानमा जो तेजबी गप दियाई दे रहा- उनमें पाल्पना और निरः भाव मरग-उनको जदोंमें छिपी है शिक्षा । शिक्षाकी चाल और पानका असंतोय। जो एक दिन मनुप्यनी नहा- पुरुष पना देती है। मनुप्यकी अनिका प्रसार करना. --- या शिधापा मन्य रूप ! माननिक, पिपरी दुनियाद। यार और अन्याय नमनानेकी मेधावी-पति! लटका.-मिफं पुनला नहीं १८ नारी-विद्रोह एक अवसर प्राप्त प्रोफेसरकी बात याद आ गई। उनके दस वर्षका एक पुत्र था, तेरहकी कन्या। शिक्षाका उत्तम प्रबंध। बंगलेमें एक वागीचा था। जहां सांझ-सवेरे रंग-बिरंगे फूल खिलते थे। बगोंके लिये यह आनन्द-उल्लासका जीवन था। वे फूलोंके साथ खेलते, भंवरोंके साथ गाते। इससे उनका स्वास्थ्य सुन्दर होता, मनमें फुतीं आती और वे रंगीन पेन्सिलोंसे कागज पर कितने ही आकर्षक चित्र बना डालते। प्रोफेसर महोदयमें कई और चमत्कार मैंने देखे । वह अक्सर अपने साथ दोनों बच्चोंको ले जाते। कभी उन्हें मिउजियम दिखलाते, कभी चिड़ियाघर । इससे बालकोंमें ज्ञानका विकाश होता। उन्होंने बोंके लिये एक मनोरंजन-क्लवकी भी स्थापना की थी। जिसमें बहुतसे बच्चे इकत्रित होते-प्रोफेसर महोदय उन्हें मनोरंजनके तरीके समझाते और श्रेष्ट नागरिक बननेके प्रयत्न बतलाते। उनका कहना था-आजके वालक कलके श्रेष्ठ नागरिक होंगे-वे अपने घरको विश्वविद्यालय बना- यगे-जिससे उनके जीवनकी मजबूत इमारत तैयार होगी। एक दिन सांवली-संध्याको मेरे साथ टहलते हुए उन्होंने कहा- "अधिकांश मास्टर और मा-बाप सोचते होंगे-मारने पीटनेसे लड़के सही रास्तेपर चलते हैं। किन्तु मेरा अनुभव है- कठोर शासन क्षण भरके लिये चमत्कार भले ही दिखादे । किन्तु बाद में इसका परिणाम खतरनाक होता है। लड़केका मन टूट जाता है । वह सहानुभूतिकी जगह पाता है अत्याचार ; और जब बड़ा होता है, तब बन जाता है उच्याल, विद्रोही! यह दुःखकी बात है। प्रत्येक माता पिताको इस विषय में सतक रहना चाहिये। जीवनके अन्तस्तलमें वालकके महान कम लिप रहते हैं जो समय पाकर बरसाती लताकी तरह फैल जाते हैं। इसलिये बगों को जीवन-उन्नतिका विज्ञान वताना आवश्यक है। उनकी शिक्षा पालकों की मानसिक-शक्तियोंका विकाश करेगी। आजके बालक क्या चाहते हैं ? 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शिक्षाका मूल्य १६ बालक वालि- उनकी नबीयन किस ओर झकनी है ? उनकी प्रतिभा-विकाशका क्या रस्प होना चाहिये ? जरा अन्तानल नक पैठ जाइये, सब याने साफ माफ समझ में आ जायंगी और बच्चेकी बदमिजाजियों का चेहरा बद- लते देर न लगेगी। शिक्षाकी संपूर्ण जिम्मेदारी है शिक्षक पर । बालक बालिकाय नम पौधेकी नरम । शिक्षक जिधर चाहें, उन्हें मोड़ दें। काओका मन्तिष्क उनक सञ्चालनसे बने बिगड़ेगा। इसे न भूलिये- जैसे शक्तिकी आराधना बर्गर भक्तिक पूरी नहीं होती, वैसे ही सरस्वती की साधना वगैर श्रद्धाके पूर्ण नहीं होती। उस समय न कोई बालक देश पूज्य हो सकता है, न कोई या लिया मौभाग्यवती । शिक्षा मान-विहता, जीवन-निर्माण और विद्वानका गुण -नग्रना। वरमरि जलद भूमि नियराये, यथा नहिं बुध विद्या पाये। शिक्षित स्त्री चाहे गर्गय हो या अमीर.-भविष्य में ये कार्य करने होंग. जिसमें पृथ्वी नारी-जातिका गौरव बढ़ सकें। शिक्षा मिर्फ जीवनका चमत्कार ही नाही. पल्कि संसारकी आयोंका आकर्षक जुलूस है। घरमें जीना है मनुष्य : लेकिन विद्यालय में विचारोंक आदर्श सोग्यकर आगे बढ़ना । मैं शिवाजीकी नरा. मातृभूमिकी रक्षा करंगा। माात्मा गांधी या देशको जगाऊंगा। तुलमीदास जैना अगर पति नंगा। म किम्मकी कल्पनायं आजक भिन्वारी यालर फो भी पिन दिन मारन-गौरव बना देनी हैं। में पी. ए. एम. ए.। न फिली लड़कीने विवाह कांगा. न फिली की परवा मुझे। अंग्रेजी अनयनाकी ऐनी फलनाचं देव- यफोसे भी। घई विवाधियोंने मुभन्ने पारा -"में पटना डिग्री पाने लिये ।" में फाला-हिपीनी दम दामले कोई आदनी नय २० नारी-विद्रोह तक मनुष्य नहीं बन सकता, जब तक संसारके मनुष्योंकी भीड़ उसके गुणोंके सामने नतमस्तक नहीं हो जाती। डिग्री पाकर किसी दफ्तरकी कुसी संभालनेका ही नाम मनुष्यता नहीं, मनुष्यता प्राप्त होती है जीवन- निर्माण से। आप वालिका हैं। किसी स्कूल कालेजकी पढ़नेवाली । मैं आपका स्वागत करता हूं। जागो मंगलमयी देवी !-भारतवर्पके दुर्भाग्यका इतिहास मिटा दो। मिटा दो अशिक्षाकी डरावनी काली रातें। शिक्षा का आध्यात्मिक सूर्योदय होने दो। स्वर्णाक्षरों में लिख दो अपना अमर नाम, अमर इतिहास मैं तुम्हारा अभिनंदन करता हूं ! - G विवाह क्या है ? जैसे कवितामे अर्थको अलग करना असंभव है, वैसे ही बीसे पुरुपको पर ग्यना भी असम्भव । मैं पुरपकी बात काता, जवनक बा. सीके माथ घुल मिल नाई। जाना, उसकी जिन्दगी अधूरी रहती है. वह पूर्ण नहीं काली जा सकनी। जैसे लक्ष्मी नारायण और शिव पार्वती । तुम मेरी हो, मैं तुम्हारा । आपसकी या भावना आदर्श है, जीवन की माहान पृनि । गनुप्यका या मम्मिलिनमान किनी दिन सफल-नपल्या का म्प बन जाना और उस समय पुग्प एक पनीयतका समर्थक बन घंठना है। या साम्य-मिलन विवादका । पन्या घरमें गहनी । विवार, होते ही सामुगलकी यात्रा करती है। बचपनो माथी छूट जाते हैं और उसे एक नयी दुनिया में प्रवेश करना पड़ता है। उसके सामने नई जनता आनी और पेचीदा बन जाता है उसका प्रतिमान । उस समय लड़की की व्यालला पद जानी :-पतिका याम्नविर, रूप मममनेर, लिंग, उसके पवित्र प्रेमको फाचानने के लिये । किन्तु उसी लड़की की नव वचनी समान हो जाती है. जब या आपनमें एक दूसरेको पालान जाने और प्रत्येक से पुरया आरम्भ होता है. यान्तविक मल्ल-जीवन ! उस समय जिन्दगीम आनन्दक जितने पल मिले है. बाधा विष- निये जाने ही काट भी। व्याक गया। संगीन समाधी नया दिन है नारी-विद्रोह वीतने लगे। जैसे किसी जागृत देशमें पूर्णिमाकी चांदनी उदय हुई । एक विराट संसार आनन्दके झोपड़ेमें समा गया। संसारके समस्त राज्य तुच्छ हो जाते हैं-उस छोटीसी झोपड़ीके सामने । मनमें रहती है नवीन प्रेरणा। कर्ममें होता है उज्ज्वल उत्साह । किन्तु यदि उसी लड़कीसे आप सात वर्ष बाद मिले तो ?- सात वर्ष बाद, उसके जीवनमें कितने ही परिवर्तन हो जाते हैं। वह संसारयात्रामें आगे बढ़ जाती है। पतिको पूर्ण रूपसे पहचान लेती है। अनेक नये स्त्री-पुरुषोंके साथ उसका परिचय हो जाता है। इसे कहते हैं-दाम्पत्य-जीवन । सुख-दुःखके झोंके आते हैं उस जीवन में। इसीलिये कहता हूं--दाम्पत्य-जीवन-मार्गमें जितने फूल खि हैं, उतने ही कांटे भी। किन्तु फूलका आनन्द लेना तो सरल है। परन्तु कांटोंकी राहपर चलना तलवारकी धारपर दौड़ना है। दुःखी-जीवनमें आनन्दका कवित्व नहीं, करुणाके आंसू बहा करते हैं। याने यह संघर्षमय-जीवन है ? संघर्प ? - इस संघर्पसे जो घबरा गये, नीचे गिर पड़े। जिसने बहादुरी के साथ मुकाबला किया -जयमाला उसके गलेमें पड़ी। उस समय हमें बनानेवाला कसोटीपर कसकर देखता है--सोना खराब है या पीतल का मुलम्मा। मैंने नारीको हमेशा देखा है-त्याग, दया और उदारताके रूप में । जब-जब पुरुपपर विपत्तियों पड़ती हैं, नारी मिल जाती है उसके आपत्ति रूपमें देवी जैसी। दोनोंमें चुंबक शक्ति है। दोनों एक दूसरे के आकर्षणमें अपनेको खो देते हैं। उनमें एक दुसरेके प्रति आत्म- समर्पणकी भावना आ जाती है। फिर क्या होता है ? कांटोंक, वनमें किसी दिन वसंतकी बहार खिल उठती है। मानव दुर्बलताय पी जाते है दोनों विपकी तरह। आंखें बदल जाती हैं और संमारको दुःश्यमयी धरती उन्हें दिग्याई देती है सुनहरे साम्राज्य के रूपमें।
समय- विवाह क्या है? व नवयुवक कहते हैं.-"में विवाह न करूंगा"- मैं कहता हूं- "विवादले पेचीदा समस्या हल हो जाती हैं। नारी-पुरुप-जीवनका शृंगार करनी ।" आपने महान्मा-गांधी का विवाहित-जीवन देन्या है ? कम्तृरवा जैसी धर्म-पली विवाहिन-जीवनकी आदर्श है-लत्य, संयम और अहिंला की परीक्षामं महात्माजी की प्रधान सहयोगिनी थी कस्तूरवा । ऐसे ही अनेक महा-पुरपोक जीवनका श्रृंगार किया है धर्म-पत्रीयोंने । समयपर उन्हें बल दिया है, जागृति दी है, आत्म-ज्योति प्रदान किया है। आजके गुलाम-दय नदियोंकी गुलामीसे इतना मंकुचित हो गये है, कि मनुष्यने विचार शशि ग्यो दी है। उनकी प्रतिभा लुम हो गयी मामका पता नहीं। युवक-युवनियोंको शिक्षाके नामपर मानसिक पतनये. पाठ पढ़ाये जा गं है। उनके मुग्यन्ने सुन लीजिये लंबी चौड़ी वैशानिय व्याया। किन्तु मनुप्यके अन्नग्नलमें जीवन-उन्ननिक जो पिराट पीज हिप उनकी शिक्षा युवक-युवनियोंको ना दी जानी । इस गलनीका परिणाम मुनिये--बड़ी-बड़ी लड़कियों काहनी है-मंविधा, नगगी। लहकीका नारा है-विवार. यंधन और न जालमें फंसना जंजाल मोल लेगा। ऐसा पयों होता है? विवार. महान मात्रकी शिक्षाका अभाव । पर्दर पश्चिमीय सत्यनाने अधिकांश आदमियोंके दिमाग योमरे बना दिया। उनकी लापानी शिक्षा. निकम्मा मोर और बदनाम प्रेम आज अधिकतर परोको नई पनागा। न भाई-भाको देन महतान पुत्र माना- विसामो ? पा गुपप-युपनियोंकी न बनावटी प्रगनिमें पापाणजनी . । पता न? पतिमी देशोरा लाय-भोग और मुस्ति। भाग्नका गॉग्य पूर्ण Pawar २४ नारी-विद्रोह सिद्धान्त है-स्त्री-पुरुपकी मिलन-ज्योतिसे आनन्दमय कम-जीवन ब्रह्मज्ञान । विवाहके बाद हम अर्जुन जैसे राष्ट्र की हों। युवतीका हृदय युवकके अनुकूल हो। युवकका युवतीके प्रति । गृह-शृंगारकी शुरुआत यहींसे होती है। देवताओंका रहना यहीं होता है-आनन्दमय जीवन. बालक-बालिकाओंके आत्मविकाशकी शिक्षा, माता-पिताका आदर्श-प्रबंध। याद रखिये-विवाह है जीवन उन्नतिकी तपस्या। इससे शरीर और मनकी पवित्रता बढ़ती है। वर्ना काम वासनामें लिप्त रहना भार. तीय संस्कृति नहीं, बर्बर सभ्यताका विकार है। पहले भोग-विलास फिर अधिक उम्र में विवाहकी तैयारी--यह है गुलाम जीवनसे अपनेक जकड़ लेनेका सबक। ज्यादासे ज्यादा वेश्याओंको जन्म देनेकी रचना पद्धति । प्राकृतिक नियमोंका उल्लंघन कर अत्याचारोंकी सृष्टि ! पश्चिमी सभ्यता और विदेशी संस्कृतिका हमारे भारतीय जीवनपर बहुत बुरा असर पड़ा है। एक तरहकी नष्ट सभ्यताने हमारे हदयमें जड़ जमा ली है। जिसमें इतना नकलो-आकर्षण है, कि लोगों के सागा- जिक जीवन बहुत ही बुरे तरीकेसे नष्ट हो गये हैं। और साहित्यको तत्वपूर्ण-सृष्टि बंद सी हो गयी है। आप विलास रंगमें रंगी कुमारियोंको देखिये - जैसे बयूल में पीला फूल । दुर्वलता और असफलताओंसे न उनके यौवनमें उत्साह है, न मानसिक उचलता। लोग प्रगतिशीलताके नामपर महानायक दरवाजे खोल रहे हैं। सभा समितियों में गला फाइ-फाड़कर सुधारकी डोर पीट रहे हैं। लेकिन पर्दकी ओट में कुछ दूसरी ही लीलायं चलती है। इसीलिये कहता हूं-गरजनेसे बरसनेकी कीमत ज्यादा होती है। अनेकों कुमारी युवतियों पूछती है-में विशेषता कैसे प्राप्त कर ? मेरा उत्तर है, पहले दाम्पत्य जीवन मधुर बनाओ, फिर सरस्वती और लक्ष्मीके रूपमें भरदो- जीवनमें उन्चल शिक्षाका चमत्कार और धन २५ विवाद क्या है ? का अभय भंडार ! अविवाहित युवक पृछते हैं-"मैं किस राम्तेरसे चलूँ ?'-मैं कहता -~~ "पाने, विवाद करो। विवाहसे उलझी समस्या सुलझ जाती है और आदमी संकुचिन पुयंका मेढ़क न बनकर मुक्तगगनका पक्षी बन जाता है। उनका दाम्पत्य जीवन हो उठते हैं मजीय और सफल । आज में उन आदमियोंकी यान कहता है-जो धनके आईकार में जमीन पर पैर नाही रग्यते । ये जानवर जैसे काम वासनाकी पूर्तिके लिये अनेक स्त्रियोंसे विवाह कर लेते हैं। याने मुंडके मुंड नकाब पोश पहले, अबला नारीका हाथ पकड़ लेते हैं। फिर वासनापूर्ति के पश्चात उसे ढफेल देते हैं पाटाइकी चोटीसे । पया मनुप्यके लिये यह कलंक और नारी अपमानकी पर्वग्ना नहीं? भारतवर्षका गाही जबरदन कोढ़ ई-वृद्ध वियाह । वृद्धा म्पोंक, पार पर बैठा । काम तृप्रिय लिये उसे चाहिये सुंदरी युवती । वृद्धा म्पयोंके बलपर जनताकी आग्या में धूल झोंक देना । और कर लेता है किमी अल्प वयस्क लड़कोसे शादी। याने या भोली भाली जनताका जीवन ना कर उसे डाल देना दलदलमें। घुछ दिन आनन्दसे कटते है. लेकिन जब वृद्ध पनि महाशय नर्कका गाना नापते हैं, नय विधवा युपती गानस करती .. उसका वृदा पनि था. उसका जानी दुश्मन । जो ल्या फर जानेसे घटकर इसके साथ दुश्मनी पर गया और उसकी भरी जवानीको वैधव्ययी ज्याला जला डालनेकी भट्टी मुलगा गया है। जोशी-ल. नोजवानी में विवा. फार लेने. आत्मीयजनाम उनको प्रनाली से विवाहित लड़कों को मां बाप मनर, रूप में देखते है। परका मार. मानो जिन्दगीमें माफी नीलाई कने लगती है। दिल्ली न किसी दिन शुमार-मानकी मनिता भंग करनी पड़नी गुपयाको सार जप पा. विकाको पानी सीडीपर कदम सपना उन्मका संभार, पदल जाता है। पानियही पलता है. दुनिया में ।
२६ नारी-विद्रोह समाज भी उसे देखता है रहस्यमय निगाहों से। यह है कर्म जीवन । लेकिन जहां कर्म में शिथिलता आई, कर्त्तव्यका पालन जबरदस्ती किया जाता है-वहाँ एक दिन बदलेमें मिलती है-असफलता और घोर निराशा सच तो यह है, पृथ्वीमें व्याह साधना की वस्तु है, जो एक दिन संसार भरमें फैल जाता है। महापुरुषोंको देखिये, उनके गौरव पर्द में छिपी बैठी हैं उनकी जीवन संगिनियों। मर्यादा पुरुषोत्तम राम, पि टालस्टाय, महात्मा गांधी और रूजवेल्ट की पत्नी इसके श्रेष्ठ उदाहरण हैं। पत्नी प्रारम्भ से ही पतिको उत्सर्ग मार्ग पर ले जाती है और एक दिन इन्हों उत्सर्ग के द्वारा यह बन बैठती है राष्ट्र की महान देन । वह जानवरको मनुष्य और खूनी को महात्मा बना देती है। यदि कोई पत्नी अपनेमें इन गुणोंको नहीं खींच लाती तो उसका जीवन कला और पतनकी चिनगारियोंसे भर जाता है। झगड़े फिसाद और पारि- वारिक ध्वंसके नाटक आपने अनेकों देखे हैं। यदि ऐसी ही धंस लीलायं आपके जीवनमें भी चलती रही तो दाम्पत्य जीवनके लिये आपके परिवार और देशके लिये एक घातक समस्या है। एक मित्र ने कहा-"जबसे मैंने शादी को मुझे आश्चर्यजनक शांति मिली है।" एक लुटेरको कहानी है -"पहले मैं खतरनाक था। लेकिन जबसे शादीकी, लोग परेशानियोंसे बच गये” एक उन्याल, गुवकको रिपोर्ट है ---"शादीके बाद में एक बड़ी कम्पनीका संचालक बन गया और मेरी जिन्दगी मधुर बन गयी।" चाहे पुत्र हो या पुत्री-दोनों परमात्माकी स्टटिक प्रधान है। व्याहके पहले लड़के लड़कीकी सम्मनि लेना, उनमें समानता देखना, माना पिताका मुख्य कर्तव्य होना चाहिये । योग्यता, स्वास्थ्य, नौदर्य, आर्थिक स्थिति और सद्गुगों पर ध्यान देना तो बहुत ही आवश्यक है। विवाहका प्रश्न लेकर मुझसे मिलने वाले युवक युवतियोंकी मंग्या २७ पड़ विवाद क्या है? कम नहीं। मेग उनर एक ही है -“मैं विवाहका समर्थक हूं। यह भी जल्दी ही, नव जवानीक बागीचमं कदम रखने नक। यदि ऐसा नहीं, नो प्रत्येक युवक युवतीकी उम्र ग्यतरंग जाती है।" नव जवान जिन्दगीसे बच्चे सवल, स्वन्थ्य और बहुत दिनों तक जीविन रहते हैं। लेकिन जो विवाह न करने की झूठी डीगे हांकते हैं- व या नो पनिनाआफै हाथ खिलौने बन जाते हैं या चारों तरफ व्यभि- चारकी सृष्टि करते हैं । युछ ऐसे भी बदमिजाज लड़के हैं, जो विदेशांसे शादी कर लाते हैं। किन्तु जब विदेशी पत्री भारतीय जीवनका वायु- मण्डल देग्यकर झगड़े उत्पन्नकर देती है तो पति देवताकी आग्य युटती है और उनके मुंगसे निकल पड़ना है. कहां की आफत मैंने मोल ली। में सब नराः की, एक दूसरी जातियोंके साथ विवादका पक्षपानी ई, लेकिन काय. जय मांगारिक नमुद्रके दोनों प्रतिकुल किनारे अनुयल हो । दोनोंका मिलन मधुर हो। दोनों संसार सागरमें जीवन नौका सही रास्तेसे बना जानते हों। में एक नेनाकी राय अबतक नहीं भूल सका। उन्होंने विदा दिन लड़कोने या अपने घरवा शृङ्गार करना तुम्हारा धर्म है। पनिको हमेशा प्यार करना, जिनमें तलाककी नीयन न आये। दुनिया प्यारसे ही फलती फलनी । 'मीशन या नकली जिन्दगी आत्मा और परमात्मा बीच गहग परला टाल देनी । यदि दाग्यन्यका मधुर जीबन माननफ. अबतक नाही पाच मकाना प्रत्येक ग्नी पुरावको न विषयका विद्वान बनना चाहिय। चा कमी न मुलिंचे . विवापि और नष्ट आनन्दाय मंत्री और सफलताओंकी गुग. --जिन्दगी !
1 भयो क्यों अनचाहतको संग ? एक युवतीका वयान है-"मेरे हृदयमें अनेकों घाव हैं। पति देवता दुराचारी हैं। मैं उन्हें राहपर लानेके लिये जमीन आसमान एक कर रही हूं। शायद काले मेघों का जाल छिन्न भिन्न कर किसी दिन आनन्द की किरणं चमक उठेगा।" मैंने देखा-युवती की आखों से टपाटप आंसू चू रहे हैं । ऐसे कितने ही आंसू मैंने दाम्पत्य जीवन में टपकते देखे हैं। कहीं जवरदस्ती शादी के कारण सोने का संसार मिट्टी में मिल गया। कही पत्नी को पति पसंद नहीं, कहीं पति पत्नी से घृणा करता ऐसा क्यों होता हैं? मां बेटे का झगड़ा देखा है आपने ? और सास बह की ललाई ? सबके जीवन -तारों को एक ही मंकार है-"भयो क्यों अनलाइन को संग ?" मूर्खा स्त्रियोंसे आपसी झगड़े दाम्पत्य जिन्दगियों में अधिकतर झगः पंदा कर देते हैं। यदि उस समय पति बुद्धिमान हुआ तब तो गनीमत है, वो दोनों एक दुसरेके कट्टर दुश्मन बन जाते हैं। गृह युद्ध तो आज घर घर लगे हैं। आपसी अविश्वास और भीतरी चालबाजियो बढ़ रही है, एक दुसरेकी आंखोमें धूल झोंकी जाती है। यदि कही घरमें कुरुपा बहू आगयी --तो और भी आफन । विधवाओक मलिन चंदरे और अत्याचार पीड़ित त्रियोंके मन, -सबमें एक ही दर्द भरी आवाज भयो क्यों अनचाहनको नंग? आती:--"भयो क्यों अन चाहनको संग ?" किमी दिन इन यवर विचारोंका अवश्य अंन होगा और नमाजमें उज्ज्वलता जरूर बढ़ेगी। चाहे स्त्री हो या पुरुष - जब तक दोनों एक इसके अभावकी पूर्ति न करंगे-नव नक जिन्दगियोंका मफल होना मुश्किल है। पया पनि जिन चीजका भिग्यारी है. पन्नी उसकी पूर्ति नहीं कर सकनी ? और पनी जो दान चाहती है, क्या पति उसे नहीं दे सकता ? अजी, पनि अन्वेषक दि और रक्षक । उसका ग्लाद नो नभी बढ़ेगा जय ली उसे विजयकी उत्त जना दे सके। यह प्रबंध, निर्माण और निमल शासनमें पुरुपकी सहायता कर गये। यदि स्त्री किनी विवाद में शामिल नहीं होती, आपत्तियोंसे पुम्पको बचाकर सोनारिक प्रलोभनासे धनी गानी गो यर निश्चय प्रशंसाके लायक है। पुरप बहुधा पध भ्रष्ट हो जाते हैं, किन्तु सुयोग्यनारीके शाशनमें उसे रामराज्यका आनंद मिलता। आदमी पर क्यों बनाना है ? सुग्ध और शांनिम्मे रहने के लिये । यदि उनमें संदेह. भय और पार्थस्यका प्रवेश हो जाता है. ना उसकी बुनियादको कमजोर होते देर नहीं लगनी । भीतर बार दोनोंका ही प्रबन्ध उगम होना चाहिये। यदि आपने घरमें शांतिकी दीवाल का दी और अन्दर आग मुलगने लगी तो कोई घर फभी देव मन्दिर नहीं पन सना। में कनायदि आपया दाम्पत्य जीवन सुग्गी ना आपकी मोटी-मी भोपदीय चारों तरफ. उज्ज्वलमा फैल जानी । भारतीय महानि शालीनी जयनि. दिपा और ममारका मन्द मन्त्रा। जब मानवी रमना मायनी करती और मार मंत्रा. निहालनरटी गायकी। वैसे ही हमारे घरों में समान रूपमं नारी विराजमान पुरानो नो नारी पाली प्रत्येक मनुष्यको पाता दी ३० नारी-विद्रोह भागोंमें बंटी है-स्त्री और पुरुष ) यदि दोनोंके जीवनमें पूर्व और पश्चिम की झांकी है, तो एक दिन दोनोंको कहना पड़ता है- "भयो क्यों अन- चाहतको संग ?" मैं मिट्टीकी बात नहीं कहता. किन्तु मानव प्रकृति एकांत चाहती है और प्रत्येक स्त्री अपने पतिके साथ रहनेकी इच्छा रखती है। माता कस्तूरवाने महात्मा गांधीके सत्संगमें आत्मबलिदान दे दिया। दाम्पत्य सुखका इससे अच्छा उदाहरण और क्या हो सकता है ? जहां पति न है, और कुलक्षणी स्त्री है कर्कशा-मूर्ति --वहां सोनेका संसार मिट्टीमें मिल जाता है। में अनेकों विवाहित किन्तु उदास रमणियोंको देखता हूं और उनमें निवेदन करता हूं-"मनुप्यमें उदासी आती है, चिंताकी ओर ध्यान दौड़ाने से । भयभीत कल्पनाओं से। सच तो यह है, जिसने खुशियोंसे अपनेको जीत लिया --बड़ेसे बड़े राजमहल और शहर उनके कब्जेमें है।' एक असफल युवकका बयान है -- “मैं जीवनसे निराश है।"... मैं कहता हूं--"चमकते सूर्य और आशामें कोई फर्क नहीं। जहाँ आशा वहां आंधी में भी चिराग जला करते हैं।" जिस दाम्पत्य-जीवनमें अशांतिकी आग भड़कती है। जहां आनंदके फूल खिलनेकी आशा थी, वहां निराशाक कोट है, जो दाम्पत्य प्रेमका बंधन रेशम जैसा आकर्षक नहीं, फांसी के फंदे मा भयानक है। मैं उस जीवनको दर्दक. माध अध्ययन करना ---"जो व्यक्तित्वको महानता खोकर साधारण आदमी बन बैठा है।" जिदकी बात लीजिये। जिद श्री पुरुप दोनॉक लिय खराब है। यदि कोई अपनी हार मान लेना है. नो मारा भगदा समान हो जाना है, और किसीका यह कहनेका मौका नहीं मिलना-भयो नयां अन- चाहतको मंग?" एक दुसरंसे कोई यान छिपाना नो और भयानक है। चटका .. है
4
भयो फ्यों अनचाहनको संग ?
नकाब किनी भी समय उलट सकती है। फिर तो बड़े बड़े अनर्थ हो
जाते है। बगलांका संचित प्रेमकाफूर की तरह उड़ जाता है ।
सु-शिक्षाका अभाव, न्यायको न संभाल सकनेकी बीमारिया,
मानसिक पीड़ा और जीवन-उन्ननिको न समझ नकनेकी अबानना
दाग्पन्य-जीयनको मटिया मेट कर देनी है। मीन या चुप रहनेका सिद्धांत
भी ग्यनग्नाय है। क्या ही अच्छा हो, यदि एक दूसरे की गलनीका
लोग समभा दं। संसार चाहता है जगमी मुम्कुराहट । जो एक दूसरे
सहायनामें जादमा अमर कर दिया और उनके जीवन से
पिल ।
एक सूत्र में नंयुगाकर मी पुरुष संसारकी विराट शक्ति बन जात
। इसलिये एक दूसरे आत्म सम्मान किनी नरहका धा न लगना
चाहिच। एक दुसरे का आदर करना जीवनकी विजय है। यदि समभा-
दारीसे काम लिया जाय तो हर बानका फैसला म्युशी माध हो सकना
।
प्रेगको लीजिये। प्रेम दुनियाकी किनी भी वन्नुसे ज्यादा कीमती
। उसकी राजधानी में आवमीको किसी न किसी दिन प्रवेश करना
ही पड़ता है। और जो उसकी गाईग पंट जाता है. उनकी कल्याण
पुषि, कमी पायल, नही होती। बापन्य जीवन उस नमय आन्न मंचन
के माध एकाकार हो जाता . और दिमागी फार्ममें ाननी दिलची
ने जना; कि उसको नालीननांग जन गग आनन्द मिलने
लगना
गमावण मा पवित्र आर किन भाग्यशालीने न पटा होगा ?
मोगारा पाटिदेविये. गरमान पचा ना किया ? बाट पनिर,
सुम्पने मोदी की। गलाम मयांचा पुरावांनमक नाम नही
सेपिया करीना-भावाचल-- जीवन ली
riवियपी बोर लामी. पनी जानी है। जानकारी
३२ नारी-विद्रोह तूफानको वसंतके झोंके बना देती हैं, उस हंसी खुशीपर न कोई सम्राट शाशन कर सकता है, न कोई खजाना उसकी कीमत चुका सकता है । ईमानदारी, सचाई, साहस और प्यारसे दाम्पत्य -जीवनमें महान वल मिलता है। पति पत्नीको जिस वातमें आनंद आये और संतोप प्राप्त हो, वैसी ही सामग्रियोंका चुनाव करते रहना चाहिये । यदि ऐसा नहीं होता तो नतीजा क्या निकलता है ? राष्ट्र-पतनके रास्ते खोल दिये जाते हैं। पारिवारिक व्यक्तित्व तथा आत्म-मर्यादाका संहार होने लगता है। मैं आपको नारी-द्रोहियोंकी सूचीमें नाम लिखानेको नहीं कहता। यदि दाम्पत्य-जीवन आनन्दकी राहपर चलते हैं तो दोनोंकी आयु बढ़ जाती है और वे संसारमें बहुत दिनों तक जीवित रहते हैं। दाम्पत्य-जीवनको मधुर बनानेकी सफल सीढ़ियां निम्नलिखित हैं:- (१) दोनोंका एक सिद्धांत (२) सफलताकी साधना (३) एक दूसरेके प्रति दोनोंमें सम्मान (४) सहानुभूति (५) ऊँचे विचार (६) विपत्तिमें एक दूसरेके साथी (७) सादगी और आनन्दमय जीवन मैं कहता हूं जिन्दगीका साझीदार बनानेके पहले युवक-युवतीको खूब सावधानी के साथ चलना चाहिये। कदम-कदमपर काटे विछे हैं। सूर्य तपता है। ह्वा गर्म होती है और हम दरख्तकी छायामें खड़े हो जाते हैं। क्यों ? शांति पानेके लिये। आप ही हैं भारतकी आशा, बुद्धि और विकाश-शक्ति। आपके देश और समाजमें जागरणकी इतनी रोशनी फैली रहनी चाहिये कि स्वाधीन-भारतको जनता उससे सबक सीखे और आपसे सफलताका आशीर्वाद ले सके। . ३ -
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३४ नारी-विद्रोह नव्वे प्रतिशत मनुष्य नकली छायाका अनुभवकर प्रचंड धूपकी लपटोंमें मुलस रहे हैं।" स्त्रियां सरे बाजार अपमानितकी जाती हैं। लोग गृह युद्धको सुंदर वायु मंडल समझने लगे हैं। पृथ्वीमें एक नया फैशन फैला है। भारतीय-संस्कृतिको भूल गया है। उसे गीता रामायणसे कोई दिलचस्पी नहीं। वह रावणको प्यार करने लगा है और रामको इतिहासकी कल्पना समझने लगा है। इसीलिये मेरे जीवन पृष्ठोंमें साफ-साफ लिखा है- "आज वाजारमें घासकी कीमत है, लेकिन आदमीकी नहीं। -क्यों ?- शराव, औरत और मनुष्य-हत्याका फैशन ?" अकालके दिनोंमें भूख-प्याससे तड़प-तड़पकर मरनेवाले स्त्री-पुरुषों के वीभत्स दृश्य, नवाखाली, कलकत्ता, पंजाव कौर सिन्धकी पैशाचिक अराजकता, अन्न-वस्त्रका हाहाकार, हजारों निरपराध कन्याओं का हरण,-कितनी भयंकर तवाही है मनुष्यकी। बड़े-बड़े पूंजी-पतियों से मिलिये, आर्थिक सहायताकी वातें कीजिये - उनके संगीतकी तान है- धन मैंने कमाया है। किसीको क्यों हूँ ? और मैं भी कहता हूं-आप किसी जीवनका विकाश क्यों कर ? आपको लाखों मिल गये तो करोड़ों चाहिये। करोड़ों का बंदोवस्त हो गया तो पृथ्वी पति होनेकी प्यास । अजीव-सा है आजके मनुष्यका पैशाचिक स्प! असंतोप, निन्यानवे का चकर, मनुष्यताका पतन ! अपनी अलग डफली हैं, अगणित अलाहिदा राग,- मनुष्य तवाह न होतो क्या हो ? वह आँखों से देखता है, लेकिन उसकी घटि-शक्ति अंधी है। और जबतक उसके तीसरे नेत्र न खुलेंगे -न तो उसकी तवाही दूर होगी, न उसमें जीवन-निर्माणका महत्वपूर्ण विकाश होगा। आज अधिकांश बेवकूफ व्यक्ति फशनमय जिन्दगीको आर्ट या कला कहने लगे हैं -- जिसमें विषवृक्षके जहरीले वीज बो दिये गये है- शराव, औरत और गृहयुद्ध। मैं कहता हूं-बंदकर दो भारतकी पवित्र - है
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विधवा-जिन्दगी मैं उस युगकी कहानी नहीं लिखने बैठा हूं, जिस युगमें भारतके अपि मुनि गङ्गा किनारे लोगोंको उपदेश दिया करते थे। मैं उस युगका लेखक भी नहीं हूं, जिस युगमें भारतकी स्त्रियां तलवार चलाती थीं। मैं संवत् २००६ का आदमी हूं, जो आज भारतवर्पकी गलियोंमें चकर काट रहा है और जिसका प्रवेश पूंजीपति, मध्यम श्रेणी तथा मजदूरोंकी झोपड़ियों में है। विधवा !-कितना पवित्र और त्यागमय शब्द है। जिस देशकी विधवाओंका आदर्श था, मृत पतिकी यादगारमें अपनेको अखण्ड तपस्या में लीनकर देना, अभिलापाओं और जिन्दगीके सारे सुखोंका त्याग, प्रलोभनोंसे विरक्ति, आज उन्हीं तपस्विनी विधवाओंकी क्या दशा है ? अपमान और अत्याचार । दुःख और विपत्तियां ! उन्हें मनुष्यकी तरह जीनेका भी अधिकार नहीं। आदमीकी तरह उन्हें शांति लाभकी भी आज्ञा नहीं। मृपि युग पलट गया। मनुष्य मात्रने अपने रहन सहनमें तबदीली कर दी। किन्तु विधवाओं के सामाजिक जीवनमें किसी तरहका परिवर्तन न दिखाई दिया। आजके इस पतन-युगमें भी उन्हें ब्रह्मचर्य पालनके कठोर उपदेश दिये जाते हैं। भ्रूण हत्याओं से लोगों को प्रोत्साहन दिया जाता है कि समाजके कलंक छिपा डालो। सभी तरहके पापों पर पर्दा डाल दो और क्या कहूं ? समाजके मूल्की तरफ़ देखो, बुद्धि हीन स्त्रियों की ओर नजर दौड़ाओ- विधवा-जिन्दगी ३७ ये जंगली जीव विधवाओं को चंडालिनी और अभागिनी नामसे पुकारते हैं। आज उनके दीमक लगे इनिहानमें विधवाओं को हंसने, बोलने और पहनने ओदनकी आला नहीं। आज भी उनकी सड़ीगली पुन्नकों में लिया है.---"यदि किसी विधवाको गलन गस्तैसे चलते देग्यो तो उसे दूधकी मपग्यीकी नरा, समाजसे बाहर निकाल फको, यह विधर्मियों के पास जाती है, जाने दो। उसका जीवन वेश्याओं को घृणित सोसायटी में बीतता है, बीनने दो। लेकिन तुम दूधके धोये बने रहो । व्यभिचार करो और छिपकर ग्खूब करते रहो, मगर जब समाजके मामने आओ- जनतासे विधवा-विवाहका विरोध करो। पृछता हूं और आदमी की शहमें फिरने वाले उन जानवरों से पूछता हूं. जो गंगाजी में गोते लगाकर भीतर ही भीतर मछलियां गटकते हैं और धर्मको आडमें अधर्मी कलंकों का प्रचार करते हैं। पया जमाना नहीं बदल गया ? क्या आप उसी पि-युग चल फिर रहे हैं ? आप युद्धापेमें नौजवान सीसे विवा. फरते हैं। ऐश्वर्य भोग करते हैं। किन्तु आपकी विधवा पुत्रियां. भारतवमं आज जिनकी संख्या लाग्यों की पया वैधव्यकी जलनी भट्टियों में जीवनकी आहुति नहीं दे रही है ? क्या इन सुन्युम कलियों फो, भारतकी इन आनन्द-ज्योनियों को, आज हजारों लाग्यों नरंक कीड़े उन्हें अत्याचार व्यभिचारक कांटामें नहीं घनीट रा है ? अाज अन्नी संफड़े नवयुवक देश सेवाये. लिये अपना नवग्य न्याग रहे । मेरी उनसे प्रार्थना बोलो ! तुम्हारे परमें आग लगी है। भारतकी विधवाओं फो जलनेसे बनाओ। नहीं तो तुम्हारा घर. जिन तुम भारतवर्ष काते हो, जलकर भस्म हो जायगा। रामें आप हजारो लाग्यों आदमियों को चलने देने जागीर सेनाबारे देविये. इनमें नी. दा आयो। किन्तु में करना. एनमें आपको ऐसे कर आदमी मिलंग, जो अपनी आकाहीर.टी. प्रयोग करते हो। उनरे एक मितभी ना. मगर दिमाग, आपली ३८ नारी-विद्रोह खोखलापन मिलेगा। मैं पूछता हूं, क्या वे अपने मस्तिष्कका ठीक-ठीक प्रयोग करना जानते हैं ? आजके मनुष्यको क्या होना चाहिये ? हमने विधवाओं की आदर्श ज्योतियों को कहां तक खो दिया है ? और आज के वर्वर युगमें उनका प्रयोग किस तरीके से करना चाहिये ? सच पूछा जायतो आजका विधवा शब्द कमजोरी और परतंत्रताका सूचक है। जातीय-कलंकों के धब्वे निर्मल आकाशमें नक्षत्रों की तरह जल रहे हैं। जरा मनुष्य रूपी पशुओं को देखिये-एक तरफ वे गउओं को माता कहते हैं। दूसरी तरफ निर्दयता पूर्वक उनके स्तनों का दूध निकालकर अपने मोटे शरीरको और भी मोटा वनाते हैं। याने बच्चों का दूध खुद हजम कर जाते हैं। जरा देखिये, मनुष्य रूपी पशुओं का अन्याय पुरुष मरते समय तक विवाह करते रहते हैं और स्त्रियों को बाल विधवा होने पर भी आजन्म ब्रह्मचारिणी रहनेके लिये मजबूर किया। जाता है। नित्य सैकड़ों नव प्रसूत वालक सड़कों पर, रेलके डिब्बों में झाड़ियों नदियों और गली कूचों में, कूड़ेके ढेरमें निर्दयता पूर्वक फेके जाते हैं। जिससे उनकी अभागिनी मातायें समाजके अभिशापसे निर्वा- सित न हो सकें। अनेकों गर्भपात, भयंकर सामाजिक परिस्थितियां, क्या विधवाओं के जीवन में सर्वनाशी वायुमंडलकी सृष्टि नहीं करतीं। एक ओर उनपर अन्न वस्त्रके लिये अत्याचार किया जाता है। दूसरी ओर इस असभ्य युगमें उन्हें सीता द्रोपदी और अनुसूयाके जीवन चरित्र पढ़नेको दिये जाते हैं। और उनसे कहा जाता है-तुम भी अपना जीवन इन देवियों की तरह पवित्र वनाओ । सदाचार और संयमसे रहो। मैं पूंछता हूं, क्या इन उपदेशों में कोरी भावुकता नहीं ? क्या वेद- शास्त्र और पुराणों के उपदेश आज वाल-विधवाओं को सती सावित्री बनानेमें सफल हो रहे हैं ? क्या आजके अस्सी संकड़े पुरुप कामवासना की फुलवारियों में टहलते नहीं पाये जाते ? क्या आजकी हजारों विध- विधवा-जिन्दगी ३६ वाओं को बहकाकर उन्हें भ्रष्ट स्त्री-पुरुषों के हाथ नहीं बेचा जाता ? क्या नारी-हरणकं नमाचार आप अग्रवारों में नहीं पढ़ते ? सब तरहकी दुर्वलताओं का त्याग कीजिये और बुटकर समाजके मामने जोरदार आवाज उठाइये । आप समाज और राष्ट्रमें सिर्फ पृथ्वीका बोझ बढ़ाने के लिये ही संसार में नहीं आये, यदि आप विधवा जीवन में सुधारकी लहर बहा दंगे तो स्वाधीन-भारत आपका अत्यन्त ऋतन होगा। सन १६३१ पी मनुष्य गणना याद है आपको? उन समय भारत में स्त्रियों की संख्या १६६५५३.७३४ थी। जिनमें २१२४८४८६ विध- वायं ! -- याने प्रत्येक स्त्री में एक विधवा थी। और अब सन १६४६ का जमाना चल रहा। जहां विधवाओं की संख्या घटनेचे बजाय बढ़ती ही जाती। यहां वर्वरना ! आज यदि हिन्दू-नमाजमें कोई कलंक नो यार, है विधयाकी अनाथ-जिन्दगी। जिन आगे पीछे कोई नहीं होता और उन्हें हड़पने लिये घात लगाये बैठा रहना । गुण्डा नमाज. वेश्याओं का दल, विधर्मियों का विकृत मरिनाटकः । विधया ननारकी नबन्ने दुची आत्या है। इन वर्वाद जिन्दगियास उपकर, वाद विधवाओंका पुनर्षिया स्वामी दयानन्द विद्रोही आन्दो- लनसे किया गया। पुरचे गले विरामागर महोदयकी कृपा पुल गये। गुज आको राममोहन रायने बंद कर दिया। किन आज मक विधवाओंगी बयाालन ? पाखंडी धर्माचार्य को आग ना. चढ़ने देते। और विद्रोही सामित्रों का कदका बा देव देवकर जल राह भाग नमाज की दमनसी जिम सामालित. या पपी जागा पत्थर परमते हिवाई देत। बाजा बार देखिये। लोग किन जीने जानिकी और दोर गौ ? मला अमेरिका या कन्न. प्राय: मनो गन पुगनी भाषा नारी-विद्रोह ? तोड़कर नया जीवन धारण किया है। सोती आत्माय जाग उठी हैं। चारों ओर नवीन जागरणकी लहरे हैं। क्या स्वाधीन भारतकी वे लहरें अत्याचारोंको वहाकर हमें निर्मल जल न प्रदान करेंगी ? विधुर कौन है ? जिसकी पत्नी मर गई है। और विधवा उसे कहते हैं, जिसका पति मर गया है। तो क्या हिन्दू समाज मदारी का खेल है ? जो विधवा होना तड़पा तड़पा कर जलना और अभिशाप बना दिया जाताहै, तथा विधुर को क्वारी कन्या के साथ विवाह करने की आज्ञा दे दी जाती है। वाह रे न्याय !-जमीन फट कर समुद्र में क्यों नहीं समा जाती ? हिन्दू समाज का नया कानून तो यह बनना चाहिये-विधुर पुरुप की शादी विधवा स्त्री से ही हो । यदि कोई विधुर या विधवा ऐसा नहीं करती तो उसे कानूनन कठोर दण्ड दिया जाना चाहिये। स्त्री इधर विधवा हुई, उधर संसारिक सुखों की सूची से उसका नाम गायव । वह किसी से दिल खोल कर बातें नहीं कर सकती। वह न अव सुन्दरी है, न उसे अच्छे गहने कपड़े पहनने का अधिकार है। पति के जीवन काल में उसे रानी कहा जाता था। पति मर गया, वह भिखारिणीसे भी बदतर बना दी गई। यह कैसा अन्याय है ? फ्या विधवा जीवन पत्थरका बना होता है ? इस अन्यायके प्रति हे विधवा नारी! तुम विद्रोह करो। ऐसे अन्यायी शास्त्रोंको जला दो। विधवा भी उसी हाड़ मांसकी सृष्टि है जिस हाई मांससे ईश्वरने पुरुपकी रचनाकी है। प्राचीन भारतमें नारीने विधवाके रूपमें जो बलिदान दिये हैं, तपस्या की है, क्या उसकी कीमत आज अन्याय और अधर्मसे चुकायी जायगी ? प्राचीन युगमें पतिके न रहने पर चितामें जल मरनेकी प्रथा थी। मध्ययुगमें जव विधवायें इस कानूनसे हाहाकार करने लगी और पुरुप जवरदस्ती उनपर अत्याचार करने लगे, तब समाज भयसे कांप उठा विधवा-जिन्दगी 27. स और उसने चिनामें जल मग्नेका कानुन उठा दिया। समाजने तक न की और बाद चं को भी पयों ? उनमें पापोंको हजम करनेकी अच्छी नाकत थी । जय चितामं जल मरनेकी प्रथा ट गयी. नव आदमी द्वारा गढ़ा हुआ समाज और भी खुलकर खेलने लगा। उसने विधयाओंको मरे आम मैदान में आकर विवाह करने की आता नहीं दी। हां, इन आताका प्रचार जरूर कर दिया गया कि समाजके सामने तुम विधवा बनी रहो, तपम्याक नामपर पाग्यण्डकी माला फेरी और पराये कामुक पुरपाक नाथ, जो तुम्हें आंग्यांकी ऐयाशीम आफर्पित कर लेते हैं, गुम व्यभिचार करनी रही। जीवन मरणयः श्मशानमें दग्ध होती रही । किन्तु जब मौका लगे, उस तपस्यासे ऊंच उटनकी तुम्हारी हिम्मत न हो, पुरुप तुम्हें लोभ-लालच में फंसानेको उत्सुक हो-- तुम उनके शंतानी पंजी जकड़ जाओ। भ्रूण हत्या करो और जय कामी पुरपका मनलय निकल जाये. याद तुम्हें छोड़कर भाग जाय, तुम वेश्या पनजाओ या विधर्मियांक साथ जीवन व्यतीत बागे। नारी गौरवको, विधवा जीवनको याही गुन उपदेश देना है कलंकिन पया एम लगा के अधर्मी समाजको बदल टालनेफी नुम में हिम्मत नहीं ? यदि तो किसी से भय न करो। भय मानका नयन बड़ा दुश्मन । मैदान में आओ। तेजीये आगे बढ़ी । लोग मारते हैं। विधया जीवन नपम्यादी जिन्दगी है। उसमे भग- पानका सामन डोल जाना है और या उसे वरदान देने आ पहुंचते है। में भी नी. स्वर में बर मिलाकर याता-ri. वान र दकी है। किन्नु में ही लोगांस या भी पना-भात मी फिननी विधवा जो पाया और लागका जीवन कालीन पानी, मी हजारों विश्वाओंको जानता--जो पुरमा म्याथीं शिरंजन दान पर फराः ही हैं। वनपयो जीवन कपल करनी और पुरार उन्हें अपने मिनिमें जपत्रे लिये. उन्हें पंना पर मानेर यि आपर समाज।
४२. नारी-विद्रोह फैशनों में अपना शृङ्गार करता है। वाहरे समाज ! तुम्हारा मायावी रूप कविताके छन्दों में गाने लायक है। तुम नारी हो। हिंदू संसारकी गौरव मूर्ति । तुम्हारी साधनाने दिग्गज पुरुषोंको जन्म दिया है। यदि समाजमें भ्रष्टता फैल गयी है, लोग तुमपर अन्याय और अधर्मकी कटारें चलाते हैं तो तुम विद्रोह करो। अपने जीवन और राष्ट्रकी तरफ देखो। तुममें समाजको रास्ता दिखाने की पूर्ण शक्ति है । समाजको बदल डालनेकी ताकत है। तुम्हें जीवनकी लम्बी यात्रामें अभी बहुत दूर तक दौड़ना है। पति तो पत्नीके वियोगमें दो बूंद आंसू तक नहीं वहाता, झट दूसरी शादीकर नयी पत्नीके साथ किलोलें करता है। तुम क्यों जबरदस्ती वैधव्य जीवन व्यतीत कर मन ही मन जल रही हो ? आगे बढ़ो, पुनर्विवाह करो और नये पतिके साथ कन्धेसे कन्धा मिलाकर देशमें जागरणकी ज्योति फैलाओ। तुम्हारा समाज, तुम्हारा धर्म, तुम्हारा देश, वारंवार तुम्हारी पूजा करेगा। तुम गलतियोंको लम्बे अर्से तक देख-देखकर पश्चाताप मत करो। गलतियों से जब ज्ञान प्राप्त हो जाता है, तब सुनहरे जीवनको स्थापना होती है। मानता हूं-वीती घटनायें बदल डालनेका कोई उपाय नहीं, लेकिन भविष्य-जिन्दगीको वनाना विगाड़ना तुम्हारे हाथकी बात है। तुम्ही हो भविष्यकी जीवन ज्योति ! राष्ट्रकी महान शक्ति ! "जीती रहो और दुःख भोगती रहो।"-विधवा-जीवनको इसी सिद्धान्त पालनका उपदेश दिया जाता है। पति मर जाता है तो अस्सी फीसदी सास ननदें उसपर अत्याचार करती देखी जाती हैं। कष्टमयी यंत्रणायें देना तो उनके वांये हाथका खेल हो उठता है। वह पतिकी जायदाद में किसी तरहका अधिकार या हिस्सा भी नहीं पा सकती। क्या पुरुपोंकी ये स्वार्थमयी नीतियां स्वाधीन भारत में अब भी चलेंगी ? क्या यह न्याय है ? प्रति दिन रोना, धिकार, तिरस्कार और अपमान, क्या यही इनके भाग्यको कलंकित अपने मृत विधवा-जिन्दगी ४३ लकीर हैं? आज छोटे-बड़े शहरोमं अनेकों युवतियां रूप लावण्यका बाजार खोलकर बैठी हैं। कामी कुत्तोंक हाथ अपने शरीरको बंच रही है। जरा गहराईसे पता लगाकर देखिये-इनमें अस्सी प्रतिशत वेश्याय हमारे ही समाजकी ठुकराई हुई कुल वालाय हैं। जो अपने लोदव और सतीत्व को सरे बाजार बंच रही हैं। बहुत दिनोंसे उड़ रही है ये चिनगारिया, घरसोंसे धधक रही है ये आग। अब विधवाओंने अपनकी पहचान लिया है। यह ज्वालामुग्यी भड़केगी, फूटेगी और लमन्त पृथ्वी में हड़कंप मचाकर ही दम लेगी। सूर्य और चन्द्रमाकी उज्वलना होते हुये भी विधवाओंके मनमें चारों तरफ अंधेरा ही अंधेरा है। यदि आपके पास दिमाग, तो विधवाओं के कष्टांपर गंभीरता पूर्वक विचार कीजिये । फ्या रे दुःखिनी महिलाय हमारे समाजकी सदम्या नहीं है ? क्या इन्हें झांसीकी रानी और दुर्गावाई नहीं बनाया जा सकता ? सच तो या है. ज्यों-त्यों अशिक्षितों फे दिमागमें शिक्षाकी रोशनी फैलती जायगी-लोग मां-बहनोंकी कद्र करना सीग्यगे। साथ ही याद भी मीग्गे - नीये दुःयमें कमी महानुभूति चाहिये और मानवताको जिम्मेदारी पया है? यदि राजीसे कोई विधवा पुनर्विवाहकर लेनी है. उसे आश्श्य और योग्य सायना मिल जाती है, तो एक दिन यार अवश्य विलुपी और फर्म योगिनी बन जायगी। आप घरका नारा प्रबंध यायाम दीजिये। अन्य क-बेटियोंकी नरा. उनका भी आदर कीजिय। के चालक-बालिकाओंगो घेघर, उन्म यात्मल्य-रनमें ग्नान करने दीजिये आएरा महत्व बोगा. देशका कल्याण वा-समाजकी दिना चमक उठेगी। चदि हिन्द जानिको नानाशने पचाना गोविधवा मादागा ने नि मागमें आगे पटने दीजिये। जिन्दगीमी जोपो मजा " - ४४ नारो-विद्रोह बनानेवाले धार्मिक, साहित्यिक, सामाजिक तथा राजनैतिक आन्दोलना में भागलेने दीजिये इससे उनके जीवनको महान शांति मिलेगी और स्वाधीन भारतका आकर्षक शृंगारकर सकेंगी। प्राचीन भारतके आदमी थे तपस्वी, संयमी और मानव हितैपी। किन्तु जवसे भारतवर्पमें मुसलमान आये, अंग्रेजोंने कदम रखे, भारत का गौरव छिन्न-भिन्न हो गया। समाजिक व्यवस्थायें नष्ट हो गयीं। भ्रष्टताका प्रचार किया गया। आदमियोंपर फैशनकी चमक-दमक ला दी गयी। और उनमें इस तरहका भय भर दिया गया कि वे आलस्य के मरीज बन गये। विधवायें मनुष्य-जीवन व्यतीत करनेसे लाचारकर दी गयीं। भारतीय संस्कृति भूल गयी और पाश्चात्य सभ्यताकी नकल करनेमें लोग अपना गौरव समझने लगे। यही कारण है जो विपत्तिकी आंधियोंसे हमारा भारतवर्ष भर गया और दुःखके तूफान हमारी जिन्दगियोंको झकझोरने लगे। हिन्दू समाजमें विधवाओंकी समस्या चाहे कितनी ही बड़ी क्यों न हो ? परमात्माकी सृष्टिमें सभी दुःखोंका निवारण है, संत तुलसीदासने ठीक ही लिखा है :- "सकल पदारथ हैं जगमाही, कर्म हीन नर पावत नाहीं।" आज जब दुनिया कुत्सित जमीनपर नव जागरणके फूल खिला रही है, भ्रष्ट-दुनियाके आदमी सड़े-गले विचारोंके कांटे पैदाकर रहे हैं। क्या इस निंदनीय मनोवृत्तिका असर भविष्य-संतानोंपर नहीं पड़ेगा? और क्या वह विप हिन्दू समाजको जहरीला न बना देगा ? क्या विधवाओं की अतृप्त आहोंसे आजका समाज सड़ नहीं रहा है ? क्या उसकी दुर्गन्ध समूचे संसार में नहीं फैल रही है ? तो इसका उपाय ? - पत्नी नाशे यथा पुंसो भत नाशे तथा लियः । पुनर्विवाह कर्तव्यः कलावपि युगे तथा। (व्याघ्र पढ़) .
. विधवा-जिन्दगी ए याने कलियुगमें स्त्रीके मरनेपर जैसे पुरुपका पुनर्विवाह होता है, उसी तरह पतिके मरनेपर स्त्रियोंका भी पुनर्विवाह कर देना चाहिये। बहुत-से लोग कुकर्म करते नहीं सकुचाते। वे टट्टीकी ओट में शिकार करना चाहते है और मनुस्मृतिके उदाहरण देकर बचना चाहते हैं। मैं पूछता हूं, मनुस्मृति के नियम कब बनाये गये ? वह कौन-सा समय था ? म्वयं मनुजी और अन्य ऋपियोंका कहना है-"स्वर्ग में रहनेवाले देवता मनुप्योंके लिये हो मनुस्मृतिकी रचना हुई है।".-- जब इस शास्त्रकी रचना हुई थी- पृथ्वीमें मनुष्य धे ही नहीं। स्वर्गसे ऋपियों के मण्ड क्रमशः जमीनपर उतरे और उन्हों ने ही मनु संहिनाके अध्यायों का प्रचार करना शुरू किया। परन्तु समयके प्रवाहसे जिस ईश्वरने बंधनकी नाफन दी दि. मुनि प्रदानकी भी उसमें उदारता है। जिसका दृदय चन-मा कठोर उसमें फल सा कोमल मन भी दिया है। हमारे जो विनयी युवक गन दिन क्रांतिका सपना देख रहे हैं क्या वे अभागिनी विधवाओं को अपनी जीवन संगिनी बनाकर राष्ट्रका उपकार नहीकर सकते ? पया शिक्षित बहनं नारियों के उपकारके लिये कुछ समय नहीं बचकर सकती ? नित्य नये विष्टय हो रहे हैं। पया आजका म्यूल जो कमजोर, जाहिल और कायर है. अपने आत्म-विष्टवने समाजका मार सकता ? ददो निमल प्रकाश । बुकमाम पाले आकर्षण .. फिर तूफान, फिर महानाश । प्रकाश जिन्दगी देना . आमाको निर्मल बनाना है। अंधकार में मृत्युपा दानवी रूप ! यह न समझो मुझे अपने वैभव और पदका गी। यानी पाकर मैं दमरोंको तुच्छ समझना। या. मुटे अहंकार हैं जिन पाकर किसी भी आदमीयो मिटते देर नहीं लगती। आदीयो चार यदि पा, देवनारे दर्शनको डा रमना, नो मन्दिरको पुल बन जाय।
४६ नारी-विद्रोह जितना ही आदमी अपने आपको मिटाता है, उतना ही उसके जीवन का विकाश और निर्माण होता है। और जितना ही वह ऊँचे होने का घमण्ड करता है, उतना ही ज्यादा गढे में गिरता जाता है। जब उसे आत्म-ज्ञान हो जाता है। पत्थर हृदयको फूल बनते देर नहीं लगती। मनके तहखानेमें ज्ञानका दीपक जलाओ। उसके प्रकाशमें तुम्हें सब कुछ मिलेगा। जीवन भी, शक्ति भी ! S राष्ट्र की जमीन पर- आज मनुष्यको भूमिकम्प और तूफानसे उतना भय नहीं, जिनना आदमीसे डर है ।-- मनुष्य राम्तेमं चलता है, लेकिन चौकन्ना होकर, उसे ग्युद तो अपने ऊपर विश्वाश रहा नहीं, वह दूसरोंको भी शफकी निगाहों से देखता है। यह पयों ? आदमी चरित्रहीन है। उसके पास वीच का अभाव है और उसकी पशुता जागउठी है। इसीलिये उसके पान आर्थिक कठिनाइयां हैं। सामने अन्न वस्त्रका हाहाकार है। आदमी चूसा गया है । पीमा गया है। साहित्यिक जीवन लंगड़े बन गये. नामा- जिया जिन्दगियों में जार फैल गया । हम एक दूसरेसे नफरत करने लगे। फैसा ध्वंसमय पतन है ? याद आपको १५ अगस्त सन १६४७ की आधीरान ? एनी दिन परतंत्रताकी बेड़िया फटी, गुलामीकी जंजीर टूटी। और हम स्वतंत्र होकर राष्ट्रको जमीनपर पलने लगे। संसारफे निहास न ताकी म्यनंत्रता मारकर लेना इंनी बल नाहीं। बिना धियारकी मांनि ! नमयका चा और मुनिया मनोहर आनन्द ! राष्ट्रकी जमीन सुन्दर बन गयी. लेफिन गनुप्य अमुन्दर गया। क्यों ? चोर्यका अभाव. बल, विद्याकी लप शानि.! ---जहां मनुष्यों नागरकी तगा. विशाल और गंभीर बनना चाहिये :--पा मारे मस्तिष्क मिले निरनना निकर गये रि. एन गुर. मेदवारी रारा टरां रह है। हमने लाग्यो जातियों और कराहा निवासी ।
४८ - . नारी-विद्रोह भेद भरी रचनाएं कर डाली हैं। यह बहुत बड़ी मुसीवत हैं। और इन मुसीवतासे छुटकारा पानेके लिये हमें वीर्य धारण करना होगा। राष्ट्र की जमीनपर देवताओंकी रचना करनी होगी। वे देवता अमृत पियेंगे और कमसे कम एक हजार वर्ष तक जीवित रह सकेंगे। और देखिये- लोग रामराज्यकी भी कल्पना करने लगे हैं, सौभाग्य !-लेकिन पहले वीर्य धारण करना होगा। रामराज्य अपने आप आ जायगा। समाजकी रूढ़ियां, कुरीतियां और भ्रष्टतायें बदलनी होंगी। मनुष्य अपने आप बलवान बन बैठेगा। जिन्दगीमें आशाकी ज्योति और विश्वासका प्रकाश फैलाना होगा-आनन्दोंके ढेर अपने आप लग जायेंगे। और हम इस सिद्धान्तको वदल दंगे-कि जो चमार फुट पाथ पर बैठकर जूते सिलाई करता है, वह हमेशा चमार ही बना रहेगा। उसे राष्ट्रपति बननेका कोई हक न होगा। वीर्य रक्षा और शिक्षित ज्ञान-धर्म हमें उज्ज्वल बनायेंगे। हमारे राष्ट्रकी नींव मजबूत होगी। फिर उस दिन हमें वह दिन देखनेको नसीब न होंगे, जब कन्याकी उत्पत्ति देखकर श्मशानकी सी उदासी छा जायगी। लोग लड़कियोंका महत्त्व समझेंगे और कोई भी स्त्री सिर्फ भोग विलासकी सामग्री न समझी जायगी। कितनी भयंकर बात है कि पचास वर्षका वृद्ध, एक चौदह वर्षको कुमारी कन्याके साथ विवाह करे ? बदल दो इस तरहके निरंकुश समाज, ध्वंसकर डालो इस तरहकी अत्याचारी मनोवृत्तियां ! चना दुराचारी आदशीके फेरमें फंसकर किसी भी स्त्रोका जोवन नीरस और भार स्वल्प बन जायगा। और एक दिन उसके जीवनका नकली आदर्श-महल वालकी दीवालकी तरह ढह पड़ेगा। जहां नारी गृह लक्ष्मी थी। देवी और माताके नामसे पुकारी जाती थी, वहां उसका अपमान होने लगा। कुछ सभा सोसाइटिया - राष्ट्रको जमीन पर- ४६ हुई। कागजी प्रस्ताव पास किये गये। बस, सब समाप्त । समाजमें कोई परिवर्तन न हो सका। लड़कियोंसे झूठे वायदे किये गये कि तुम्हारी तरफी कर दी जायगी। बड़े-बड़े सञ्जबाग भी दिखलाये गये- लेकिन सब ढोलमें पोल निकली। भीतर ही भीतर रंग रेलियाका बाजार गर्म होता गया और धीरे-धीरे इन बनावटी प्रलोभनोंका मुवृत जनताको मिलता गया। इस तरह मुट्ठीभर आदमी समाज सुधारका मुलम्मा चढ़ाकर जाति, वर्ण और समाजका रक्त जोककी तरह चूसने लगे। इन माया जालोंको, इन बनावटी चेहरोंको अब महिलायं समझने लगी हैं। बनावटी विद्यालय और महाविद्यालयसे भी बढ़कर अब उन्हें चाहिये, जिन्दगीको उपर उठानेवाली विद्या-जिसमें उनकी बुद्धिका विकास हो । और दाम्पत्य-जीवनके गुण दोष देखने में वे कसोटी का काम दे सकें। एक वार द्रौपदीने श्रीकृष्णसे कहा था- “मैं सूरवीर पाण्डवोंकी निन्दा करती हूं, जो अपनी पत्नीको इस तरह दुग्यो देखते हैं ।" *श्रीकृष्णका जवाब था--"मैं तुम्हें राजरानी बनाने की प्रनिता करता है। चाहे हिमालय गिर पड़े और पृथ्वी चूर चूर हो जाय ।" फ्या स्त्रियों के सन्मानका यह उम्दा उदाहरण नहीं ? विष्णु पुराण देखिये-लिया :-“पति सूर्य है, पत्नी प्रकाश । पनि नमुद्र . पत्नी किनारा। पति युद्ध है, पनी शनि।" रामायण और महाभारत-युगकी स्त्रियां पूर्ण म्याधीन थी। मध्य. पवित्र, और बलवान । लेकिन उनकी नम्रता. मदन शीलना. और न्याग पूर्ण जीवनका लोग दुरुपयोग करने लगे। स्त्रियां गुलामीमी जंजीरों में जकर दी गयी और स्वतंत्रताकी गुरु वायुने उन्हें, वंचिनकार दिया या अंधकार देखते देखते याः गई. जाग श्री और अत्याचारों से विन्द तन कर रही हो अब उन्हें गलामी और गया । ।
५० नारो-विद्रोह सुयोग्य माता बनाना पड़ेगा। भारत का अंधकार दूर कर देने के लिये उसे अपने को समर्पित कर देना होगा। योरोपीय सभ्यता से नहीं, भारतीय संस्कृति के साथ । क्योंकि भारतीय आकाश में जो प्रकाश है, वह अमिट है। योरोपीय सभ्यता में जो तेज है, उसमें मुलम्मा चढ़ा दिया गया है। पौधे को जिस तरफ मुकाओगे, मुकेगा और फूले फलेगा। नारी के कोमल जीवन के लिये भी यही बात है। यदि वे आदर्श शिक्षा से शिक्षित हो जायंगी तो पुरुष जीवन भो विकसित होगा, स्त्री जीवन भी याने दाम्पत्य जीवन एक साथ मिल कर राष्ट्रका शृङ्गार करना सीखेंगे। लोग अशिक्षित जनता के हृदय में प्रवेश कर जायंगे और हमारे जीवन यौवन में नया रंग आजायगा। आज स्त्रियों में चार समस्यायें बड़ी जटिल हैं-विधवा, छुआछूत, अंध विश्वास और दुराचार । विधवा के लिये पिछले परिच्छेद में मैं बहुत कुछ लिख चुका हूं। अंधविश्वाश का मतलब है-हमारे सत्य-धर्म का विकृत रूप। जो मनुष्य के लिये अफीम के नशे की तरह है, और जिसमें बेहोश रह कर आज मनुष्य की हत्या स्वयं मनुष्य कर रहा है। छुआ छूत का हिसाव तो पूछिये नहीं । यह चीज सिर्फ चूल्हे चौके की ही घृणा नहीं रह गई -बल्कि अशिक्षित स्त्रियों में तो इसका दानवी रूप देख कर कांप उठना पड़ता है। और दुराचार अत्याचार तथा व्यभिचार की कहानियों में कहाँ तक लिखू, एक भारतीय लेखक के नाते मुझे इसका नाम पतन युग लिखना पड़ता है। ढोंग की विदेशी- लालटेनों का प्रकाश पाकर हम पतिंगे कीतरह उड़ चले और हमें सूर्य की रोशनी अच्छी न लगने लगी। मैं कहता है- उठा दो नकली दूकानों से ढोंग की नशाखोरी और ले आओ जीवन में दर्पण जैसा स्वच्छ प्रकाश। दुनिया मनुष्य की है और दुनिया की रक्षा का भार मनुप्य के कंधों पर है। उसे उठना होगा, राष्ट्रको जमीन पर-~- आगे बढ़ना होगा। मैं मानना हूं भारतवर्ष न अब वह राम है, न अयोध्या । लेकिन अनेकों जानवरों के बीच मनुष्य भी चल रहे हैं। भेड़ बकरियों में हमें सीता सावित्री के भी दर्शन मिलते हैं। विकास का नया युग आने ही वाला है। जिसमें मनुष्य मनुष्य कहलायेगा। धर्मकी जय होगी और अधर्मका नाश । अब हम अपने बीच उन मनु- प्योंको पायगे जो विद्या में वृहस्पति जैसे विद्वान, कृष्ण जैसे कर्मयोगी- कुवेर जैसे धनी और अर्जुन जैसे वीर होंगे। साहित्यसे दूर रहनेवाले कायर और कमजोर तथा दरदर भीख मांगनेवाले येवकूफोंकी अब हमें जरूरत नहीं। मानसिक और शारीरिक गुम बोमारियोंको लीजिये। अपनी वेर्दी आदतोंसे मनुष्य इन दानवी शक्तियोंका गुलाम बन गया है। आँखकी शर्मको लेकर विरले ही इन बीमारियोंकी चर्चा दृमरोंसे करते हैं। उनका यह बीमार जीवन अंतमं श्मशानकी लपटें वन जाना है और उनकी जिन्दगीमें विश्वप्रसिद्ध कोई रौनक नहीं फैलती। मान लीजिये कोई व्यापारी किसी गुम रोगका शिकार बनकर चुपचाप बिहीने में पड़ा रहता है, नो पया इससे जीवनमें कोई उन्नति हो सकती ? न नरक आदमी सिर्फ रोगी सन्तानोंकी संख्या बढ़ाते हैं और नमाज नया राष्ट्रको उनसे ज्यादा नुकसान उठाना पड़ता है। आस्वाभाविकता और चित्रकी अधिरना भी जीवनको विकट जल- भाने हैं। प्रान्तीयता और जलन नो आत्महत्याये समान है। मैं बिहारी 2. तुम वंगाली में मारवाड़ी , तुम गुजराती में महानी तुम बंगाली । सब पया ? मनुष्य पी सूर्पना. बामर्श निका पुखिका फूटा पर्यट। आदमी तो वही जो मना विषया सेवचः । एक दमर्ग जानिको देखकर गा ना करना और उसका जीवन प्राचीन चीनी मालाओंकी ना होटे पंचाला नही बल्कि आपकी मनः बिगाट और मंगलमय -- ५२ नारी-विद्रोह आज लाखों करोड़ों भारतवासियोंका नारा होना चाहियेः १. अत्याचार पीड़ित महिलाओंका उद्धार और संसारमें उनका वास्त- विक नारी रूप। २. बृद्ध विवाह बंद। ३-चाल विवाह अनर्थोकी जड़ ४-स्त्री शिक्षाकी आवश्यकता ५-स्त्री-जागरणके प्रति पुरुषका आकर्षण ६-नारी हरण करनेवाले गुंडोंको फांसीकी सजा ७ - अंध विश्वासका त्याग; इत्यादि तभी होगा मनुष्यका मंगल । प्रत्येक बालिका फूल है। उसे फुलवारी वनकर खिलने दो, घूपमें टहलने दो। धूलमें न गिर पड़े। उसे ताजी हवाको जरूरत है। उसे फूलने फलने दो। जिसमें जिन्दगीके दरख्तमें रसीले और मीठे फल लगा सकं । नारी सिर्फ खाने, पहनने और मरकर जला देनेके लिये ही संसारमें नहीं आई । उसका प्रधान कर्त्तव्य है शांति और सुख । अन्याय नहीं, न्याय। हम उसे फैशनकी तितली जैसी उड़ती नहीं देखना चाहते । हम उसे उस रूपमें देखनेको उत्सुक हैं-जो सरस्वती और लक्ष्मीके रूपमें दर्शन देकर हमारे जीवनको सार्थक बना दे। रातके वाद दिन होगा और दुनियामें जरूर चमत्कार फैलेगा समय और समुद्रको लहर नित्य आगे बढ़ती हैं। जीवनका एक क्षण भी वेकार खोना खतरेसे खाली नहीं होता। पन्द्रह मिनटमें लिफाफेकी चिट्ठी लिखता हूँ और पांच मिनट में पोस्ट कार्ड। आपको क्या पसन्द है ? लिफाफेकी चिट्ठी है या पोस्टकार्ड ? मैं स्वतंत्रताका आनंद में संसारमै जव स्वतंत्रता और सफलनाकी सड़कोपर चकर काटना हूँ, मुझ प्रत्येक हरे भरे मैदानमें फूल ग्विले दिखाई देते हैं, किन्तु गुलामी और असफलताकी कल्पना करते ही में मुद्रा बन जाता हैं और मुझे चारों तरफ नर्कये दृश्य दिखाई देते हैं। हर तरह के बंधनसे मुक्ति,-इसका नाम स्वतंत्रता। याने अन्नमय दुर्दशाओंसे निकलकर समर्थ सड़कोंपर आगे कदम बढ़ाना, शक्ति सञ्चय और आत्म-चेतनाका विकाश । राष्ट्र उन्ननिक लिये लंगठन और सहयोग। पृथ्वी भरके मनुष्य आज स्वाधीन होना चाहते हैं। न वा बनरों, द्वारा शाशित होना चाहते हैं, न उनकी इच्छा है या न्ययं यूनगंपर शाशन करें। यह वलयान पनकर स्वयं अपनी रक्षा की फिलम है लेफिन या हो तो से पटयंत्र दूसरी ही नराये चल । बीय मैक आदमी अपनेको गज़बूत बनानेमें लगे हैं। भीतर ही भीनर दांव पंच कलम किया. अस्सी सैकड़े आदमियों को कमजोर बना दें। और उनकी जान का फाट कि उनमें सर उठानेकी नापन न ग जाय। किन्तु में पटना -~-पया इन तरा पड़ांत्र दान दिनों नर. टिप. मग? मनुष्य जाग उठा। मने बाधीननाक हार गुना कर दिया। अब वा. ऐसा चमत्कार विगा कि सदिय उसकी दुद्धिर आगे । ? - - ५४ नारी-विद्रोह नत मस्तक होगा। उसका आदर्श महान आदर्श होगा। और वह भार- तीय सभ्यताकी आखिरी मंजिल तक पहुँचकर ही दम लेगा। पुरुषकी अगिनी है नारी। किन्तु पराधीनता के कारण नारियाँ अपना विकाश नकर सकीं। चीनी महिलाओंके पैर जैसे छोटे-छोटे बना दिये जाते थे, गुलामीके कारण वैसे ही स्त्रियोंको भी कुयेंकी मेंढ़की बना दिया गया। नारीको राष्ट्रकोसे अलगकर दिया गया। लेकिन अब स्वाधीन देशकी नारी,- चाहे कन्या हो, वधू, माता या बहन राष्ट्रीय कार्यों में उसे अपनी शक्ति फैलाना ही होगा। उसकी समस्त शंकायें स्वातंत्र्य-प्रकाशकी उज्ज्वल किरणोंमें ध्वंस हो जायँगी। आजकी नारीको प्रकाश चाहिये। रोशनी चाहिये, शक्ति चाहिये। उसकी साधना उसे सफल बनायेगी। अब वह पराजयसे घबराकर पीछे पैर न हटायेगी। वह आगे बढ़ेगी और ध्येय धामतक पहुँचकर ही दम लेगी। सूर्यकी स्वाधीनकिरणें उसकी आखोंमें भर देंगी-जाग- रणका नवीन गोरखधंदा। आज स्त्री समाजके अधिकांश क्षेत्रों में महान अंधकार फैला है। देहातकी अधिकांश स्त्रियाँ यह भी नहीं जानती, स्वाधीन-भारतका वास्तविक रूप क्या है ? यह काम जागृत स्त्री-पुरुषोंका है कि वे अज्ञान के अंधकारको दूर करें और अपने चारों ओर ज्ञान-विज्ञानकी रोशनी फैलने दें। अब गिरे हुये दकियानूसी खयालोंको, जिनके द्वारा समाज और व्यक्तिका बहुत बड़ा नुकसान होता है, दूरकर देनेमें ही हमारी मुक्ति है। आपको यह जानकर आश्चर्य होगा, कि जिस एटमवमके आविष्कार ने शक्तिशाली जापानको विट्रेनके सामने आत्मसमर्पणकर देने के लिये वाध्यकर दिया था, उसका आविष्कार करनेवाली हैं-एक यहूदी महिला डा० मेहनढार। आप वलिंन कैसर विलियम इन्सीय्यूटकी सभानेत्री थीं।
स्वतन्त्रताका आनन्द नारी स्वतंत्र पैदा हुई है और उसे स्वतंत्र रहनेका पूर्ण अधिकार है। स्वतंत्र न होनेसे न तो कोई उन्नतिकर सकता है, न मुग्यका भागी बनने का उसे अधिकार है। स्वतंत्रता ऊँचे उठनेका प्रधान लक्ष्य है। इस उत्थानसे मनुप्यकी समस्त चेष्टाय, उद्योग, व्यापार तथा प्रयत्न सफल होते हैं। हर आदमीको यह बात याद रखना चाहिये-"प्रकृतिके सम्पूर्ण साधन हमारे कब्जेमें हैं। वशर्ते कि मनुष्य अपनेको पहचाने और धीरज तथा साहससे काम ले ।" यदि आप किसीका भला करनेके लिये तैयार हैं तो आपकी भलाई में भी लोग अपना त्याग पसंद करेंगे। अधिक शताधियोंसे पिसी कटी छंटी और दलित जीवात्माओंमें यदि कोई नव-जीवन संचार करनेवाली संजीवनी है तो वह है स्वतंत्रता। जिसमें वह ताकत है कि उसके म्मरणसे ही गिरीसे गिरी आत्मा उन्नत होती है और उसका अनुभव फर्ता अपनेको एक नवीन और अद्भुत संसारका प्राणी समझने लगता है। तुम प्रकाशको पुत्रियां हो, भारत माताकी पृथ्वी तुम्हें देख रही है कि तुम किस तरह आगे बढ़ रही हो ? यदि किसी खीको हाहाकार- मयी पुकार आकाश-पाताल विदीर्ण नहीं कर देतो, तो में पलंगा, नारी शचिकी ओरसे किसी दिन विद्रोह होगा और या अपने में बिजली जैसी ताफत त्पन्न करेगी। आज जैसे स्वाधीन पुरप अपने अधःपतनको मटिया मेटकर देना चाहता है, कल वैसे ही वीको भी अपनी नपम्याने लग जाना पड़ेगा। अय में भारतवर्ष में नरसिंहोंगी आवश्ययना। जिनमें जन्मी प्रकाशसे भारतीय-जीपनका आकर्षक महार होगा। चलो, आगे कहीं। भारतरे मात लाग्य अर्द्ध मृतक गायोंको जोबिन पाग। गर्गव नेवाला की मेल कर उन्हें मुर पगे। नीम नवायुग आ गया। कामोरंजक रुपकी मानना नही. आगे नया फयमांगी पक्षाकर्ग।
नारी-विद्रोह जिसमें नवयुवकोंके ताजे खूनमें क्षय रोगके कीड़े न उत्पन्न हो सक। हमारे लिये आज चाहिये नया आकाश, नयी जमीन । प्रत्येक मनुष्यकी जय उसकी क्षुद्रतामें नहीं, वड़प्पनमें है। क्या में पूछ सकता हूं आप स्वतंत्र और स्वस्थ्य हैं ? ऊंचे विचार उस मैशीनो कल-पुर्जेके समान हैं, जो जीवन-मंजिलको सहजमें ही तयकर डालते हैं। कोई भी वस्तु हो, उसकी गहराई में पैठकर उसकी असलियतको ढूंढ़ निकालनेका ही नाम है-विज्ञान । जिसने किसी वस्तुकी असलियतका आविष्कार नहीं किया, समझना, उसने कुछ भी नहीं किया। यह सत्य है कि मनुष्य जिस बातको गहराईसे सोचेगा, भविष्यमें वही हो जायगा। यदि कोई सोचता है, मैं बीमार होऊँगा और मर जाऊँगा तो उसे बीमार होते देर न लगेगी और वह मर भी जायगा। जिसके मनमें एकता नहीं, जिसका मन चारों तरफके काममें घूमता रहता है, वह एक दिन अवश्य हार जायगा। आज पृथ्वीका नक्शा बदल गया है। मनुष्यको भी सिरसे पैर तक घदल जाना पड़ेगा और समयके भी आगे चलना होगा। प्राणहीन प्रचलित प्रथाओंके सामने कोई भी महान व्यक्तित्व शीश नहीं मुका सकता। हमें महान व्यक्तित्वका मंत्र देती है सबसे पहले माना। इस पृथ्वी पर जितने भी आदमी-मनुप्यके रूपमें आये हैं, माताओंने ही उनके ललाटपर विजय-तिलक लगाया है, आगे बढ़नेका आशिर्वाद दिया है। इसलिये हे नारो ! अपने उजाइ जीवनमें वसंत मृतुका उत्सव ले आओ। प्रस्तुत करो अपना उमन्वल भविष्य । तुम्हारे परिवर्तन वलपर भारतके जीवन-मरणकी समस्या निर्भर है। विलासिताका गुलाम है और वह नारी-स्वतंत्रताके हला- हलको नहीं पचा सकता तो यह ठीक है, वह नारीके सत्य शिव और यदि पुरुष स्वतन्त्रताका आनन्द ५७ सुन्दर अंशके दर्शन भी नहीं कर सकता। यदि आप भारतवासी हैं, आपके ग्वनमें भारतीय रक्तका चमत्कार है, तो वह नारीके शक्ति-रूप को अवश्य पहचानेगा। संसारके सर्वश्रेष्ट महापुरुष महात्मा गांधीने ठीक ही लिखा है-"मने स्त्रियोंको त्याग और सेवाकी सजीव मूर्ति माना है। उनकी पूजाकी है। उनमें आत्म त्याग, सेवाकी जो शक्ति और भावना है, उसे पुरुष नहीं पा सकता' यदि हमारे जीवनमें स्वनंत्रताकी तीत्र लहरे हैं तो जो कुछ जीर्ण- शीर्ण है, सब कुछ बदलकर रहेगा। संस्कार बदलेंगे, न्योहार बदल जायंगे, त्योहारोंका रूप दूसरा होगा। आज लाखों भारतवासी जीवित रहकर भी मृत-जीवन बिता रहें हैं। क्या इन अत्याचारोंको देखकर नवयुवक उत्तेजित न होंगे ? और पया इन अत्याचारोंसे मोर्चा लेने के लिये झण्डकी झण्ड पीड़ित आन्मायं परोसे न निकल पड़ेंगी ? आजका युग मरते हुये आदमियोंके संघर्षका युग है। मेरा विश्वास है, इन मृर्यताओं और सालीनताको पुरुर भी मार भगायंगे, स्त्रियां भी। भारतकी उज्ज्वल-संस्कृति कमलका वह, पल है, जिसकी हर पत्तियां ग्युशीसे नाच रही हैं। प्रत्येक भारतवासीके जीवन में हम पटकी म्यूबसूरती छिपी है। लेकिन यदि या अमानता बनने नोचकर फारू देता है, तो उसे स्थायी आनन्दके दर्शन कसे मिल सकते हैं ? मैं या पुस्तक गृहयुद्धो जमाने सन १६४६ में निग्य मा. जय ममन्त संसारके, आदमियों में दर्द भरी हलचलें मच गयी है। मनुष्य अपने योग्यले दिमागको लेकर एक दूसरेको निगल जाना चाहता है। उसने गर्वनावश अपने विकाशको भुला दिया और उनका कान गया- सिर्फ गर्भ में रहना. दुर्वन्टला. रापये लिये एक वर्मका न चूमना, सार्थकी गुलानी, साना कमाना और अंत मर जाना ! आदमियोंपे लिये जिमीने कहा : mopan - . ५८ नारी-विद्रोह "येषां न विद्या, न तपो, न दानं, ज्ञानं न शीलं, न गुणो न धर्मः, ते मृत्यु लोके भुवि भार भूता, मनुष्य रूपेण मृगाश्चरंति ।" और देखिये-संत तुलसीदास 'मनुष्य' की कितनी सुन्दर व्याख्या करते हैं- "नर समान नहिं कवनेहु देही, जीव चराचर जांचत जांचत जेही। नरक स्वर्ग अपवर्ग नसेनी, ज्ञान, विराग, भक्ति बढ़ देनी।" दोनों तरहके आदमियोंको कसौटीपर कसकर देखिये। आजका मूर्ख सत्यको छोड़कर असत्यका भक्त बन रहा है। कोई अधिकारके लिये कटता मरता है, कोई दूसरोंकी उन्नतिसे जल भुन रहा है। क्या यह सब पशुताके रूप नहीं ? सच तो यह है, कि आदमी बनने में सत्र वातोंका निचोड़ है-“संसारमें इस तरह रहे कि मृत्यु पश्चातापका कारण न बन जाय।" भारतवर्पके अर्द्ध मृतक पीड़ितोंने दुनियाको ठगनेके लिये एक वेद नियमकी रचनाकी है । वह नियम है, स्त्रियोंको वेद नहीं पढ़ना चाहिये। में पूछता हूं क्यों ? क्या ऐसे नियम स्त्रियों को गिरानेके लिये नहीं बनाये गये ? मैं कहता हूं--प्रत्येक स्त्री उन कोटिके ग्रंथ पढ़े। इससे बी विदुपी बनेगी और अंधविश्वासोंके विरुद्ध विद्रोह करेगी। तुम मौलिक और सद्गुणी भावनाओंको सींचती रहो। कुछ न कुछ अच्छा ही होकर रहेगा। हां, यह समझ लो, जो काम तुमने हाम में लिया है, उसे करनेमें पूर्ण समर्थ हो। यदि तुममें आत्म-विश्वाम मौजूद है तो तुम असंभव कार्योंको भी संभव कर दिखा सकती हो। तपस्विनी नारी! तुम मनुष्यको ले चलो-अमृत पिलाकर । वहाँ
स्वतन्त्रताका आनन्द
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मनुष्य जियेगा। याद रखो, तुम्हें भविष्यको पृथ्वी में अनेकों वीर स्त्री-
पुरुषोंके रूप देखने हैं। अपनी दुर्वलतापर विजय प्राम करो। तुममें
सिर्फ जीव ही नहीं, जीवन भी चाहिये।
यदि आप कोई लेख या कविता लिखती हैं, तो मैं आपसे कहूंगा-
आपकी रचनाओं में तलवारकी चमक चाहिये। बोलने मिठाल और
अंतरमं निर्मलता। जो वात मनमें हो, वही मुखमं भी। यही सत्य है,
और इस सत्यकी रोशनी सहस्रों सूर्यसे बढ़कर प्रकाशमयी और
बलवती है।
आज मनुष्यको सब कुछ सोयना पड़ेगा। और आदमी प्रतिकूल
नियमोंको अनुकूल सचिमं ढालना होगा। यदि मनुप्यक मनको संपूर्ण
शत्तिो जागृत हो जाती हैं और उसका दिमाग शिक्षित हो जाता है तो
वह गंभीर समुद्रकी तरह शांत हो जाता है। संत तुलसीदासजीय
शब्दोंमें-
वरसहि जलद भूमि नियराये ।
यथा नवहिं बुध विद्या पाये ।।
एक जाति, एक भाषा, एक राष्ट्र हमें चाहिये । बुद्धिमान आदमी
इन शब्दोंसे बहुत कुछ सीखते हैं और दुर्वल हदय इनको अन्नपल नाओं
से घबराते हैं। प्राचीन भारतकी भाषा एक धी । आज अनेकों टफली
it. अनेकों राग। ईपनि आदमीके जीयनपर कब्जा कर लिया है. जिनमें
वाए दूसरोंको न जलाफर खुद जल रहा है। लेकिन समझना नही ।
जब समझ जायगा. नव उसकी अग्यि न्युनंगी और वा लदो प्रेम पारने
लगेगा। पिलोको नारीफ करना बुद्धिमानी और चार आदमियों
किसीकी गलती कहने फिरना. सबसे बड़ी नादानी !
आजरे, दिनका रहस्य मममा आपने ? फिी भी आदमीफा
नगला मित्र आजका दिन । फिली भी भादमीफा दुग अमन
फलको पानीका पानार !
--
ܬܪ
नारी-विद्रोह नावके एक सूराखने केवटको भी डुवा दिया, उसकी नौकाको भी। घड़ीक़ा पैण्डूलम जहाँ बिगड़ा कि घड़ी बंद हो गयी। मेरे कहनेका मतलब है, अपनी कमजोर जंजीरकी लड़ियोंको बढ़ाते मत चलो। नहीं तो गिरोगे और ऐसा गिरोगे कि फिर कभी उठ न सकोगे ? मान लो, तुम कोई काम करने वैठी हो, तो तबतक न उठो, जबतक उसे पूरा न कर लो। या तो किसी काममें हाथ न लगाओ और यदि लगाया है, तो उसे पूरा करके छोड़ो। वह तुम्हारे सामने नये उद्योग धंधोंका मुंह खोल देगा। नवीन ज्ञानसे एक नवीन राज्यको रचना हो है। वह राज्य चाहे कैसा ही छोटा क्यों न हो, एक दिन तुम्हारे सिंहासन पर सफलताका राजतिलक करेगा। गलतियां, असफलताय और आल- स्य कभी किसीके जीवनको पूर्ण नहीं बना सकतीं। मेरा मित्र एक लोहार था। उसकी छोटीसी बांसकी दूकान थी। वह दिनभर कड़ी मेहनत करता और मुझसे बात करता जी लगाकर । कई वर्षों बाद जब मैं उससे मिला - वह एक लंबे-चौड़े कारखानेका मालिक था। मैंने उससे सफलताका रहस्य पूछा। उसने कहा-"मैं जो काम करता हूं, मन लगाकर और पूर्ण एकाग्रतासे। मुझे लोग भाग्यशाली कहते हैं और वह इसलिये कि मैं मेहनतको राहपर बराबर चलता रहता हूं।" जिसे दस आदमी मानते और आदर करते हैं। समझना, उस आदमीमें कोई न कोई चमत्कार जरूर है। जैसे शीशा साफ होनेपर उसमें मुंह दिखाई देता है, वैसे ही हार्दिक पवित्रतासे हमें बनाने वालेका प्रतिबिंब दिखाई देने लगता है। यह बात याद रखने लायक है-फल के बड़े होनेपर जैसे फूल अपने आप मुरझाकर गिर जाता है, वैसेही जहां मनुष्य मनुप्यताको पाकर सुखी हुआ - उसकी पगुता धूलमें मिल जानी है। कोई भी घर हो, अंधेरे में पड़ा हो, उसमें दीपक जलानेसे तुरंत प्रकाश स्वतन्त्रताका आनन्द हा उठता है, वैसे ही सदियांसे गुलामीमें गिरा हुआ आदमी जब अपने में व्यक्तित्व प्राप्त कर लेता है, प्रत्येक आदमी उसकी ओर आफर्पित हो जाते हैं। पारसको छूकर लोहा सोना बन जाता है। फिर चाहे उसे मिट्टीके अंदर रखिये या कूड़े में फेंक दीजिये - वह जहाँ रहेगा, सोना हो चन कर। मनुप्य साधारण नहीं, विराट शक्ति लेकर उसने पृथ्वीपर जन्म लिया है। अब उसकी रक्षा वैसी ही पुरानी जिन्दगी लेकर चलनेमें नहीं। उसे स्वयं उन्नत होकर जनताके उत्थानका नवीन संदेश देना है। हमारे विचार एक दूसरेके प्रति सहानुभूति पूर्ण होने चाहिये । हम अपने गतलबके लिये एक दूसरेकी निन्दा करते हैं। एक दुसरेको गिरानेकी चेष्टा करते हैं। यह भावनायं पशुतासे भरी हैं। असलमें हमें एक दूसरेके साथ प्रेम और सहयोग करना चाहिये । सहयोगी आदमियोंकी आंग्योंके साथ अपनी तुलना करो। हमें क्या करना और पया बनना है ? क्या आप जाननी हैं, मनके ग्यतरनाक दुश्मन. जीवनकी शनियां और आपके गुण दोष क्या है ? अच्छाई और बुराईकी गहराई में पैठकर अपने मनको तौलिये। अपने मानसिक रोगोंकी दयाका आविष्कार फीजिये। ताजा जीवन प्राप्तकर शक्तिशाली पीढ़ियां नैयार करना आपका प्रधान कर्तव्य ।
वीरांगना आज भारवर्पमें हजारमें आठ सौ स्त्रियां सड़ी गली जिन्दगी बिता रही है। उन्हें यह भी मालूम नहीं कि दुनिया नारंगीकी तरह गोल है या कलकत्तमें बिकनेवाली वादामकी वरफीकी तरह चौकोर। उन्हें इस बातका पता भी नहीं रहता कि संसारमें कहीं क्या हो रहा है ? गोरसे उनके चेहरे देखिये, जैसे गुलाबी फूल पीला होकर मुरझा गया है। उन्हें न प्राकृतिक हवा मिलती है, न ताजी रोशनी। घरों में केंद्र हैं। यदि कभी बाहर निकलनेका मौका भी मिलता है तो रास्तेमें चलती हैं जैसे निजींव । कदम आगे बढ़नेके लिये तैयार नहीं होते ! रेलगाड़ीके सफर में उन्हें देखिये ! जैसे कोई गठरी सीटपर रखी हो य निर्जीव गुड़िया ठी हो। उनकी यह हालत बनानेका अपराध किस पर है ? मैं कहूंगा- उन पुरुषों पर, जो बाहर शेर मारनेकी डींगे होकते हैं और अपने घरको चूहेका विल बनाकर रखते हैं। इन अपराधियोंने स्त्रियोंकी फुतीको आगे नहीं बढ़ने दिया। बेशर्मीका जामा पहन कर ये स्वयं अपने स्वास्थ्य -सुधारकी ओर निगाहें फेंकते रहे। लेकिन उन्होंने स्त्रियोंका स्वास्थ्य उन्नत बनानेमें हमेशा लापरवाही दिखायी। जिसमें वे राष्ट्रके प्रति उदासीन रहकर विलासी फैशनकी पुतलियां बनी रहें। इस तरह उन्होंने लियोंको परदेके जेलखानेमें बन्दकर इस कदर मड़ा डाला कि हमारी भविष्यकी संतानं कमजोर, व्यभिचारमं उतावली और माता पिताको जलानेवाली बन गयीं। गुलामी, खुशामद और गुण्डर्ड जरा वीरांगना जनके रोम रोममें समा गयी और इस भ्रष्टताका समर्थन करनेमें वे अपना गौरव समझने लगे। सबसे पहले मुसलमानोंने भारत पर अपना सिक्का जमाया। उन्होंने भारतवासियोंको कुचला, पीसा, लूटा, और जब वे सिर्फ हाड़ मासके पुतले. रह गये, अंग्रेजोंने मुसलमानोंको बर्बाद कर अपना सिफा जमा लिया । भारतवासी उसी दिनसे गुलामीकी चफीमें पीसे जाने लगे और अपनी दुर्दशासे तंग आकर उन्होंने स्त्रियांको बंद कर दिया कोठ- रियोंमें। दास दासियोंकी रचना की गयी। चारों तरफ फूटके विप चीज बोये जाने लगे लेकिन स्त्रियोंका पवित्र जीवन तो देखिये । हिन्द्र संस्कृतिकी रक्षा के बराबर करती आई । धार्मिकता, सरलता और मद- गुणोंको वे अपनेसे आज तक अलग न कर सकी । अंग्रेजोंने गुलामीकी जझीरमें सवको जकड़ लिया। खुशामदको रचना की गई और उसकी जड़को मजबूत बनानेके लिये वे और भी आगे बढ़ने लगे। उन्होंने स्त्रियोंको विलासकी पुतली बनानेका प्रचार फरना शुरू किया। लोगोंको यह बताया जाने लगा-मोहम्मद नाइयो जमानेमें अरववाले लड़कियोंको मार डाला करते थे। यह जंगली प्रथा भारतवर्ष भी फैलायी जाने लगी और इसने नबसे पहले राजपूतों और कान्यकुब्ज महणांका इतिहास कलंकित किया। नवजात कन्याओक, गार डालने की प्रथाका पता यहीसे लगना शुरू हुआ। और इन TET- कारके परिणामको तो जरा आप अग्वि ग्योलकर देखिने-आप शा और देहातों में जो मुलधाओंके गुम और प्रकट बाजार खुट गये -- क्या ये मुसलमानों और अंग्रेजोकी घातक, चालबाजियोंके नमूने नाही ? में कागा कि सील नाले कुचल दी गरि मिया धा और आग्यांक उनके पाल को पल नाहीत. गया। अब नया भाव याधीन । अव सने प्रकाश पेया। अव या मी वगना कन- -- नारी-विद्रोह कर उठ खड़ी होगी उसके आस पास बगावतका झंडा लहरा रहा होगा और वह अपमानसे क्रुद्ध होकर बगावत करेगी। क्या में पूंच सकता हूँ, लोग कमजोर और सीधी सादी गायको क्यों मारकर खा जाते हैं, लेकिन क्या वजह है, जो शेरोंकी दहाड़के सामने कोई खड़ा भो नहीं होता! हममें परिवर्तन चाहिये परिवर्तन ! विचारोंका परिवर्तन, कर्त्तव्यका परिवर्तन । सांपको नयी जिन्दगी तब मिलती है, जब वह पुरानी कंचुल छोड़ देता है। दरख्तोंमें रसीले फल तब आते हैं, जब नये पत्ते निकलते हैं। मैं समुद्रकी लहरोंको बुलाता हूं। वे आयें और प्रचण्ड लहरें लेकर आय-जिसमें स्त्रियोंकी सम्पूर्ण दुर्वलता, नग्नता और गंदर्ग का कूड़ा कर्कट उनमें वह जाय । पुराने अंधविश्वास, मनहूसियत भरे रश्मो रिवाज, स्त्रीको दुखी- बनानेवाले विचार, और अंधी कार्य प्रणालियोंने मनुष्यको उस नर्कमें ला गिराया है जहां निर्बुद्धि और नाशके सिवा और कुछ नहीं। आदमीके दर्शन सिर्फ कंकाल रूप में होते हैं।न उनमें स्वास्थ्य रह गया है, न यौवन जीवन। इस तरह भारतवर्पको नींव हिल उठी है अब उसमें नवीन शक्ति और परिवर्तनकी जरूरत है। स्त्री पुरुष और बच्चे सभीमें जान डालनेकी आवश्यकता है। जिसमें हम इतने बलवान बन जाय कि सभी तरहकी विरोधी शक्तियोंका मुकाबला कर सकें और आदर्श व्यक्तियोंकी कतारमें हमारा आकर्पक स्थान हो । आप अधिकांश महिलायोंको देखिये --उनके जीवन में आग लगी है। मन अतृप है। वे जो चाहती हैं, नहीं मिलता। उनके सुनहरे संसारको कल्पनाय नष्ट हो रही हैं। ऐसा क्यों होता है ? असंतोपकी यह आग भीतर ही भीतर क्यों सुलग रही है ? पुरुपोंको चाहिये--पत्नी इन भावोंको समझ और महिला समाजके संगठनमें उन्हें आगे बढ़ने दें। आज कोई भी शिक्षित पुम्प न्त्रीको सिर्फ अपनी कामसवानाको तूमिका वीरांगना माधन नाही, बल्कि उसे जीवन संगिनीक रूपमें देखना चाहता है। जो उसे सभी सलाह दे सके। बंदर चला सके और राज्य संचालनमें पुग्पोझी सहायिका बनकर रह सके। आपने रानी पशिनीको जीवनी अवस्य पढ़ी होगी ? लक्ष्मीबाई की राज्य संचालन शक्तिसे मी आपका परिचय होगा। उनके गौरव सन्मानसे हमारे सिर ऊंचे हैं। यदि वे ही स्त्रियां परदे की चहार दीवा- रियों में बंद होती, शिक्षाक नामपर नाक भी निकोड़ती तो क्या उनके द्वारा देशोद्धारके कार्य सुचारू रूप से संचालित हो सकते थे ? क्या दम- यंती, चिंता, तारामती इत्यादि वीराङ्गनायं कमजोर माताओंकी गोद पली थीं ? आजकी स्त्रियांनो चाहिये, वे पुरपीको आकर्षित करनेकी फैशन प्रियता छोड़ दें और जीवन का अमूल्य समय नष्ट न कर शिक्षा की ओर कदम बढ़ायं, वीर संतानों को जन्म दें। आज इसे रात में बीड़ी पं.ते हुए और सिनेमा के गंदे गीत गाते हुये दिमाग भ्रष्ट वान्टक 'नाही, राणा प्रताप जैसे वीर पुत्र चाहिये । पया आपके लिये निम्न लिखित विचार लाभ दायक नहीं ? (१) आपको कविता, नाटक, उपन्यास या काहानियां लियन की स्वतंत्रता चाहिये। (२) शिक्षा का जीवन में चमत्कार । (६) स्वास्थ्य रक्षा का उचित प्रबंध । (४) भारतीय शासन में भाग लेने का अधिकार । (५) नंकट निवारण के लिये गा-शान और उचित प्रबंध। जिससे विपत्तियों के दायरे में पंप कर कोई माननिकाल्या न कर सफे। न कोई काम अत्म-विचारा कबिन्द ! () अंगों को पता जानवरकी लावायकमा म नगी जाय। भिती. मारय कौन जिम साता मान . @ ..." ? ६६ नारी-विद्रोह विपय लुब्ध, जिसको आत्मा क्षुद्र है, जो अपने अमूल्य समय का दु:- योग कर रहा है, सांसारिक चिंताओं के काले बादल जिनके हृदयाकाश में मंडला रहे हैं वे ही हैं-दीन दुवर्ल और नकली मनुष्य । लेकिन सुखी और सफल कौन है ? जो दुख सुख को समान रूप से देखता है। दूसरों के आनन्द को अपना आनन्द मानता है। वह एक होकर भी अनेक और मनुष्य मात्र के अंतस्तल में उसका स्थान है। उसके रोग शोक और विपत्तियों के दूर करने की एक मात्र दवा है-आनन्द । बहुत से लोग अपने राष्ट्र निर्माताओं, प्रोफेसरों और वैज्ञानिकों को जानते तक नहीं। ऐसे आदमी दिमाग के बेहद कमजोर होते हैं। उपरोक्त आदमियों को देख कर शनी जाते हैं, और उनसे बात तक करने की हिम्मत नहीं पड़ती। ऐसा क्यों होता है ? उनमें साहस का क्यों अभाव है में कहंगा-गिरे हुये दिमाग का खोखलापन ! साहस से काम लीजिये। मनुष्य के अन्दर साहस की शनि. अद्भुत है। मैं एक लाइनो कोजो आफितर को अबतक नहीं भूल सका, पिछले जर्मन युद्ध में एक हिन्दुस्तानी आफिसर घायल हो गया। उसने असताल पहुंच कर सर्जन से कहा -'' मेरी बांह में गोली लगी है। कितने दिनों में अच्छा हो जाऊंगा ?" सर्जन बोला-"तीन महीने लगंगे।" “यदि वांह काट दी जाय तो ?"-हिन्दुस्तानी आफिसर का प्रश्न था---"तो में कितने दिनों बाद रणक्षेत्र में अस्थित हो सकंगा ?" "एक महीने में।" -सर्जन का कण्ठम्बर था। "आफिसर ---" तो कृपया बांह काट दीजिये।" मनन दंग रह गया। लड़ाई में उस आफिसर की बहुन आवश्य- कता थी। और वह अपनी बांह से ज्यादा लड़ाई के मैदान को प्यार " करता था।
वीरांगना १७ । इसे कहते हैं साहस । आप चाहे जिससे वान कर। दिमागको योग्यला बना कर घबरायं नहीं। यदि आपके शरीर के अन्दर रोग है नो उसकी दवा भी आपके मन में मौजूद है। और वह दवा है साहस । जो मन में फुर्ती और सौंदर्य लाती है। में अपने सभी भाई बहनों से कहूंगा-जय नक आप किसी नक- लीफ में नहीं पड़ जाते, आपके मनको चोट नहीं लगती,-जीवन के सही कल पुजी को पहचानना मुश्किल है। यदि आदमी आगे बढ़ कर साहस से काम ले तो उसकी अनेकी मुसीबतों का अंत होजाये और दिमाग में खोखलेपन की लहरें हवा में भाप जैसी उड़ने लगे। बंदर देखा है आपने ? और बंदरों का गिरोह ? एक दिन आमको टोकरी मेरे हाथ में थी और मैं मजेमें आम ग्याता रास्ता तय कर रहा था। बंदर खांव-खांव कर मेरी ओर दौड़े। मैं घबड़ा गया. अब यया होगा ? लेकिन साहसने मेरे कानों में मंत्र फूंका यह कोरी बंदर घुड़की है। मैंने ढेले. उठाये और बंदरों का झुण्ड भाग गया। यहां यदि मैं कमजोरीसे काम लेता तो मेरी बुरी हालत होती। आम तो सब बाते. हो जाते। साथ ही में घायल भी हो जाता। और एक मजाक सुनिये- बहुतसे स्त्री पुरुप दूसरोंके दोष ढूंढ़ते रहते हैं। लेकिन अपनी गल- लियोंकी समालोचना नहीं करते। दिमागकी कमजोरीका या अन्या सुथन है। एक दिन एक रईसके घर में दावत खाने गया । कान्ययुज प्रागण । मेरे ही जिलेके रहनेवाले एक सज्जन वा मौजूद थे। वाय मायके दरवान । मुझे पहचानते धं। जब हाथ मुलाने आपली धोरसे चोले --"यनियां हिंया याच लिन्छ । जाय तुम्हार धर्म नए होगा।" मैं मुस्कुरा कर चला आया । एक महीने बाद मैंने देखा पाी सजन हलवाईकी दूपान पर बैठे हुए पृड़ियां या रहे हैं. ! मुभ देर दि. नारी-विद्रोह कर जरूरतसे ज़्यादा झमें और झटपट पैरोंसे जूते उतार कर बोले- "आवं दादा.! आव।".-मैंने नमस्कार किया। थोड़ी सी मिठाई को और सड़क पर चलता दिखाई देने लगा। खोखले दिमागका यह मजेदार नमूना है। यदि यह सनन मुझे दोपी न बताकर स्वयं अपनी समालोचना कर डोलते और बाजारको पूड़ी खाना धर्म भ्रष्ट समझते तो शायद मुझे चिकोटियां न काटते। लेकिन आदमीकी बुद्धिका गलत रास्ता -- वह स्वयं अपना दोप न देखकर दूसरों को उल्लू बनाता है। यदि आदमी अपनी समालोचना करना सीख तो उसे यह जान पाते देर न लगे.- मुझे पृथ्वीपर खड़ा होना है और वहाँके मानसिक खजानेमें अमूल्य धन भरा है। क्या मैं पूंछ सकता हूं, आप अपनी गलतियोंकी समालोचना करते हैं और आपका स्वास्थ्य कैसा है ? मानसिक बीमारियोंसे बचते रहिये और वे काम कीजिये, जो आपको आगे बढ़ानेवाले हों। भविष्य में स्वाधीन भारतके, आदमियोंकी भीड़.,आपसे अनेकों प्रश्न पूछेगी और सबको आपको सही जवाब देना होगा। कौआ कान ले गया। यह सुन कर कोयेकी तरफ न दौड़िये । अपना कान टटोलिये | कान मोजत मिलेगा। मनुष्य मात्रको स्नेहकी निगाहोंसे देखनेका नाम है - पवित्र प्रेम जो मनुप्त्र प्रेमके साथ अपना परिचय देते हैं:-वह सहज में ही दलका हृदय जीत लेते हैं। ; उस प्रेममें न राजा का भेद रहता है, न मृ. विद्वान का। वह संवमें समान भावसे रौनक वितरित करता है उसका कहना है. सबकी जय हो ! पूजा करवाले की भी, ठुकरानेवाल 1 --- की भी। मच नो यह दे, आजके मनुष्यकी दुनिया खुशामद और गया भरी है। हमारे अपनेही नामने अपराधोंक दर लगे हैं। यदि आज नंगठिन होते. एक मालाक फल बनकर रहते, ना हमारी माला प्रनु वीरांगना चरणोंपर अवश्य चढ़ती, दो और दो मिलकर चार होते हैं। यह आनंदकी दुनिया । रस्सीके टुकड़े एकमें जोड़ दीजिये, हाथी बंध जायगा। पण्डित मदनमोहन मालवीय कहा करते थे-“संघी शक्ति कलियुगे " हर आदमीके नौभाग्यका सूर्य नव उदय होता है, जब पराये अपने हो जाते हैं और उस समय मनुष्य बड़ी विपत्तिमं पड़ता है, जब अपने पराये हो जाते हैं। आज ६५ सैकड़ आदमी उपेक्षित हैं। एक दुसरेकी परवाह नहीं करता। इस लापरवाही और उपक्षागं नारी समाज नो बुरी तरहसे पिसा है। जैसे सब तरहके कुचक्र चल रहे हैं नारी समाजक विरुद्ध। दंगोंगे स्त्रियांका सबसे ज्यादा अपमान किया गया। ग्याई स्त्रियोंकी संख्या पुरुषोंसे ज्यादा रही। यह क्यों ? स्त्रियां नो बिटी बना ही दी गयी थीं, पुगप भी गीदड़ बन गये। संगठन नागकी कोई चीज नहीं रही उनमें। एक दिनकी बात है--- कलयात्त में हिन्दू-मुखलगानीका दंगा चल रहा था। आदमी गाजर मृलियोंकी तरह काट काटकार लड़कोंपर फेक जा रहे । ट्राम दौड़ रही थी-यात्रियों में पंचानवे संकई मर्द थे. पांच मैया स्त्रियां। विध- नियोंकी भीड़ने एक जगह ट्राम रोकली। मदीको घायल कर दिया और खियोंको ले भागे, लोग तमाशा देखते रहे। किनीकी हिमन न पाटी कि डटकर मुकाबला करते और शहीद हो जाते। लेकिन उनकी नकलीफ करनेको पया जरूरत ? आजये आवमीका दिमाग योग्यला। याः पर. कि पागार। लेकिन बाद क्या जियेगा. जो मरना न जानना मागिकी आधार जी समाजका यह अधःपतन मिर्प. य.ए वाचकतनी भकिन मनानी लिये घातक भी। में तलवारोंकी चमक, चाहिये। और नमाज का दर्शन । हमें जीवन चाहिये. जोनी उपयोगी या प्रदानका मरे!
नारी-विद्रोह चरित्र और शरीरिक वलकी भी हमें आवश्यकता है। यदि हम अपनी मां-बहिन और पत्नीकी रक्षा नकर सके, तो क्या हम मदोंको जीना उचित ? यदि हम मेलों-तमाशोंमें छेड़-छाड़, झाड़-फूंक, नामधारी माती. पुजारियों और गुण्डोंसे स्त्रियोंकी आत्म-मर्यादाकी रक्षा नकर सकेंगे तो हम और भी गिरते जायंगे और हममें उठनेकी ताकत न रह जायगी। क्या स्त्रियां अपने मनको निम्नलिखित उपायोंसे सुखी रत सकती हैं ?- (१) आत्मरक्षाका ध्यान हर समय हो । मनको वीरोचित बनाये। कायरोंको देखकर भाग नहीं । (२) भोजन पुष्टिकर हो। ऊंचे विचारोंसे स्वास्थ्य कायम रखना शरीरमें ताजा खून दौड़ाना है। (३) भय, घृणा, ईया जहरीली आदते हैं। रक्तकणी में इनका फैलना शरीरका नाश है। क्योंकि इनसे दूसरेका नुकसान नहीं होता, मनुष्य अपने पैरोंपर स्वयं कुल्हाड़ी मारता है। (४) दुःखकी घड़ियां दूर करना आपका सिद्धान्त होना चाहिये । जिन्दगीमें बहुत-सा अंधेरा भी है, उजेला भी। (५) निराश और उदास स्त्री-पुरुपोंसे दूर रहो, ये महान पापी है. और पाप इनका भोजनकर रहा है। यदि आप इनके पास बैठ जायंगी तो अपना रोग यह आप पर लाद दंगे। और आपको बीमार होते देर न लगेगी। (६) रोज एक नयी सहेली बनाइये। इससे आपके साथ उनकी दिलचस्पी बढ़ती जायगी। यदि आप किसीका आदर करंगी नो या भी आपका गौरव बढ़ाये विना न रहेगी। (७) बीती घटनायं न सोचिये। आजकी घटनाओंपर ध्यान दीजिये और अपने भविष्यको तगड़ा बनाइये । (2) अपना मुख अपने-ही पान रखना गैर कानूनी है। उसे दृमर्ग को भी वांटिये। वे जीवन चाहते हैं। -- है, प्रेमकी उम्र वीरांगना ७१ (६) पतिपर विश्वास कीजिये। जब कोई भी संदेह या गलत फहमी का मौका आये तो झगड़ेको चट-पट निपटा डालिये। (१०) यदि दो आदमी कहीं बानं करते हो तो छिपकर न सुनिये । दुनियामं फूल भी हैं, कांटे भी। (११) यदि कोई भदी शहका है तो न उसकी हंसी उड़ाट्ये, न वहदा प्रचार कीजिये । किसी अवगुणको विपकी तरह चूंट जाना वडापन है। (१२) बार-बार डांटने फटकारनेसे न स्त्री सुधर सकती है, न कोई युवक। जैसे पौधा सींचनेसे बढ़ता भी उसी तरह धीरे- धीरे बढ़ती जाती है। उपदेश कहकर चार बेवकूफीमें इनकी हंसी भले ही उड़ाई जाय: लेकिन हैं ये कामकी बाने। जिन्हें जरूर सीग्यना चाहिये। आप सड़कोंपर तो अक्सर चका काटते हैं । लड़कियोंको देखिये। पढ़ना शुरू नहीं हुआ कि चढ़ गया रनकी आंग्या पर चश्मा । स्वास्थ्यकी तरफ ध्यान नहीं। वस. भविष्य में कार काम- जोर धमोंकी मां बनकर दम तोड़ देती है। याद ग्य, माना और बरसात दोनों एक है:--जो फूल फलोसे पृथ्वीको जीवन दान देती है। यदि फूल मुरमा जाय तो किसका दोष ? टटीया और पालका पयों ? जिसने उसे सुन्या दिया। यदि ओरल कमजोर पार :- क्षित तो किसका अपराध ? भारतवर्ष विराट मिमिक ननिमा गुर। जिन न का जागेगा. उनमें अगले अविनामोर. माय की पाले रथी-पुरय जन्म लेंगे। लकिन कामानि नि एन मिले अत्याचार लिये जायंगी। नारी ! गुन मुनि ती बनी : भागमा जर।। 'हल कालेजकी होगी। कर नारो-विद्रोह जीवनको संचालित करो। अब तुम्हें मान लेना होगा कि संसार माने बड़ा धर्म है - सत्य। सड़कों, गलियों और पाका धूगिये। तितली युवतियोंको देखने लिये लोगोंकी आंखें चलती-फिरती रहती हैं। सिर्फ यही नहीं आया। भी कसे जाते हैं। क्या पुरुपका यह सौंदर्य-क्षेत्र दुर्दशाओंसे भरा है ? क्या उनकी यह शोचनीय हालत समाज, धर्म, अर्थ और जीवनको महानाशकी ओर नहीं खींचे लिये जाती ? क्या आप वोमरम नारी रत्नों में विशाल बल धारिणी नारीके रूप नहीं प्रकाशित कर सकते एक आदमी बार-बार यही राग अलापते हुये मुझे मिला --"किसी वीभत्स स्त्रीसे घड़ियाल बेहतर है। क्योंकि घड़ियाल किसी आदमी पकड़ लेनेर भले ही छोड़ दे, लेकिन जब ली-पुरुषको एकवार पकड़ लेनी है, उससे छुन्कार पाना असंभव हो उठता है।" नारी हृदयका ध्येय होता है कि पुरुप उसके शरीर के प्रति न.. बल्कि आत्माकी तरफ आकर्पित हो। क्योंकि वह जानती है, यौवन और सौंदर्यका आकर्षण क्षण भंगुर है । लेकिन पुरुपको जैसे नारो नालिग. नारीको वैसे ही पुरुष भो । यह सा वर्श है, जो चरित्रको पवित्र बना देता है। जिससे वह स्वयं आशीवाद तो प्राप्त करता ही है, उसे दृामगं को भी आशिर्वाद देने का हक प्राप्त हो जाता है। वह हक या ! मशीनगन या एटम बम नहीं, आत्म-बल है। मनुष्य इसीलिये बनाया गया है कि वह संसारको मुक्तिका ग बताये। हर तरफ फैल सके। मैं मानता है, यह संवर्षकी चीज है। लेकिन बगैर संघपके बुद्धि नहीं बढ़ती। यदि आप कुछ लिखना चाहती है तो खुली सड़कोपर चलें। लेखकोंका घर कालेज नहीं, बल्कि जनगार: हर जीवनका कोई न कोई कोना सौंदर्यसे जगमगा। करता है। आपके लिये यह दिल्लनम्म अध्ययन होना चाहिये कि मंच . समूह है। ।
-- वीरांगना ७३ भारतीय-संस्कृतिको हमेशा रक्षाकी गई है। किसीकी भी जिन्दगी फूलों की सेज नहीं, संघपकी कंटकित-फुलवारी है । अपना काम करते चलो- कभी न कभी उपहार स्वरूप सुन्दर और स्वादिष्ट फल जरूर मिलेंगे। मक्षात्मा गांधी लिखते हैं-"मेरे जीवन में असफलताओंका महासंग्राम चला करता था। यदि गीताके उपदेश मेरी जिन्दगीमें चमत्कार न भर देते तो आत्महत्याके सिवा दूसरा उपाय न था।" जब कोई अचानक युद्ध, आ पड़े तो उसमें भाग लेना सिर्फ पुरुषोंका ही कर्त्तव्य नहीं हो जाता-स्त्रियोंको भी उसमें हाथ बंटाना चाहिये। वर्ना देशकी रक्षा कैसे होगी ? नारीकी मोहिनी मोति जितनीही खूब- सूरत है, उतनी ही भयंकरी भी। मैं और आप, आपकी पोशाकं, धर्मतत्व, संस्कृति, भापा और नागरिक जीवन ; जरा आलोचना कर देखिये तो आप गहरे पानीमें हैं या कच्चे तालाबमें तैर रहे हैं। आत्म- विच्छेदकी घातक नीति चलाकर शासकोंने हमारे जीवन बेकार कर दिये ? फूट डालो और शासन करो,-क्या यह मनुष्यता है ? गुण्डई वढ़ गयी है । सभ्य गुण्डे धनका लालच दिग्याफर लड़कियों के विश्वास पात्र बन जाते हैं, फिर उन्हें थियेटर, संगीतालय या फिल्म कम्पनियोंमें वनावटी केंद्रफ्ट दिग्याकर मां-बापसे छीन लेते हैं और धीरे- धीरे उसे वेश्या बनाकर नारकीय जीवनमें धकेल देते हैं। लडकीको जब अपने दुर्भाग्यका ज्ञान होता है, यह अपनेको गुंडोंके पंगुना पानी ६ तो उसे दुःखदायक यंत्रणाय होती है। लेकिन आय पया ? पार दै सरकारके हाथमें। जो नागरिक जीवनका संचालन करनी ओर राष्ट्रको रोंगटे खड़े कर देनेवाली दुर्घटनाओरस जननारक्षा पर नकली ६। रिया सरकारका माध दे और गुणाय किारदान करें। वीर सिर्फ यही नही जोराय नल्यार पर पुः ना! या भी वीर जो अन्यांच और समायागेका कविता । आज सामाजिक और राजनीति दुनियर-- नारी-विद्रोह भारतवासियोंको मानना पड़ेगा-इस समय स्त्रियोंकी सैनिक शिक्षा वहुत जरूरी है। आज पुरुष भी दुर्वल हो गया है, उसकी सेविट नारी भी। कई दिन हुये मैंने स्त्रियोंकी एक छोटीसी पल्टन दे उनके एक हाथमें वन्दुक थी -दूसरीमें भैनिटी वैग। भला जिन हाथ में राखी बांधी जाती थीं, उन हाथोंमें भैनिटी बैग कहांतक शोभा सकती है ? क्या भारतकी वीर कन्या, वीर पत्नी और वीर माताका यही रूप है ? योरोपके आदमी मरते हैं असंतोपकी युद्ध ज्वालामें, और हम भारतवासी मर रहे हैं नकली चमक-दमक और फैशन में। आजका नकली मनुष्य सभ्यताका सफेद पोश है। लेकिन उसका अंदरूनी पशुवल बढ़ रहा है और नारीको देखकर अश्लोलताकी निगः फेंक रहा है। भला आपकी संतान कामुक, गुंडईके रोपसे धधकती चिन- गारी, और राष्ट्रकी ध्वंस मूर्ति न होगी तो और क्या होगा ? इंसान मनमें जो कल्पनायें करता है, जिन कल्पनाओंका उसके हृदयमें तूफान उठा करता है वह वैसा ही बन जाता है और उसकी भविष्य संतान भी उसी मार्गपर चलनेको वाध्य हो जाती है। यह जीवन-विज्ञान समझ लीजिये-साधू-संतोंका सौंदर्य उनके आत्म विश्वासमें लिया रहता है। जानवरोंका सौंदर्य उनको तन्दुरुस्तीमें और नारीका सौंदर उसकी वीर-भावनामें निखरता है। हम आज अमृतके प्यासे हैं, लेकिन वर्तन टूटा है। हमारा देश रोग: है, हम राष्ट्रकी कमर तोड़ रहे हैं। हमें जीवन दायिनी उन नमा आवश्यकता है जो अपनी ताकत भरी दवाओंसे जनताका म्यान्न आकर्षक बना सकें। आज जनताको वह दवा चाहिये --जो प्रत्यंत मनुप्यकी आत्मामें प्रवेशकर जाय और उसे ऐसी अमृतमयी घट बना दे कि उससे मनुष्य जीनेकी कला सीख जाय । और प्रसन्नतायें चारों तरफ से उसे घेर लें। आशा और अभ्युदयका युग दौड़ा चला आ रहा है। आन अंधका वीरांगना ७१ | मनुष्य रास्तेमें भटक रहा है लेकिन एक दिन संपूर्ण पृथ्यीमें जागरणका सूर्योदय होगा। और पददलित स्त्री-पुरुष नये उत्साहके साथ ऊपर उंगे। अगर तुम्हारा मन ऊंचा है, तो जीवनमें लव कुछ, सही होता जायगा। ऊंचे दर्जेके आदमी हमेशा मित्र हैं। जो आपको नित्य ऊपर उठानेका प्रकाश दंगे। आज आध्यात्मिक शक्तियां लुम ई-उनका विकाशकर एकमें मिल जाओ-लोहे के टुकड़े एकमें मिल जानेसे मजबूत हथौड़ा बन जाते हैं ! 56 से भोग रही है, तो कर्मयोगी कृष्णके चरण चिन्होंपर चलनेवा पुग को अपनी स्वास्थ्य मैंने एक दिन समुद्र देखा । विशाल फेनिल तरंगे । जैसे सफेद फूल। एक मालामें गुंथकर भारत माताके गलेका हार बन चाहते हैं। मैंने समुद्र देखा। जैसे विधाता जादूगर हों और उनकी , वाजीगरका खेल। सोचने लगा-यह वह समुद्र है। जिसे देवता ने मंथनकर उसमेंसे निकाला था - अमृत, लक्ष्मी और उर्वशी। संसार तरफ खींचनेवाली आकर्षक वस्तुयें। एक दिन वे थे, पर दिन आजके हैं। आज मनुष्यकी गलतियोंसे अमृतका एक बूंद नई दिखाई देता। उर्वशी यक्ष्मासे मर रही है। पुरुष उसकी सहायन. तक नहीं करता। आजके दुनियाकी स्त्री सूखकर कांटा होगयी है, या इतना ज्यादा मोटी होगयी है कि उसके आकर्पक रूपको पहचानना मुश्किल है। गि आदमी कहते हैं, उर्वशी सभ्य होगयी है, उसके जीवन वनमें शिक्षा फूल खिल रहे हैं। उसे विलास रंगोंमें लिप्त देखकर मुग्ध रह जानः पड़ता है। लेकिन मैं कहता हूं-कहां गया उसका रूप लावण्य ? किया । है उसका यौवन सौंदर्य ? एक दिन वे थे, एक दिन आज, नारी विचित्र पहेली बन गई है। और हम आज इस युगके सिर्फ स्त्री समाजपर ही क्यों दृष्टि मुगु पुरुषोंकी भी वैज्ञानिक दृष्टिसे नाप तौलकर डालं । पुरुपोंके शरीरमें जैसे घुन लग गया है। यदि उर्वशी यक्ष्माकी बीमारी आज नव्ये प्रतिमा पेटकी बीमारी या अन्य घातक शिकायतोंसे तंग है। आज हम भी भूल गये-श्रीकृष्ण जैसे महा पुम्प अर्जुन-रथके सारथी थे- हमें यः स्वास्थ्य भी याद नहीं रहा--श्रीकृष्णने उंगलीपर गोवर्धन पहाड़ धारण किया या। वे काले सांपके सरपर नाचे थे। सब भूल गये--याद है सिर्फ श्रीकृष्ण गोपियों के साथ प्रेम करते थे और कदंवके झूलेपर झूलते हुये वशीकरणकी बांसुरी बजाते थे। अफसोस ! अशिक्षित काम पिपासा, श्रीण पुरुषत्व, जो कुमारी जीवनको माता बननेके लिये वाध्य न करे । आज इस अविचारको लेकर मातृ गौरवको ऊपर उठानेवाली स्त्रिय मृत्युके मार्गपर अग्रसर हो रही है। व सौंदर्य चाहती हैं, खूबसूरत वचोंको प्यार करती हैं । लेकिन माना बनाना उन्हें पसन्द नहीं। वे बचोंको रूपये कमानेकी कलामं नो होशियारकर देती है. लेकिन स्वास्थ्य रक्षा कैसे करनी चाहिये, या न वे स्वयं जानती हैं, न वचोंको बता सकता है। इस तरह आज अधिकांश नारियोंकी योवन--चेतना विलासमय जिन्दगीसे नष्ट हो रही । पारवारिक जीवन भंग हो रहे हैं। अंधरा हो, दरख्तोंकी छाया और लुक छिपकर घूमने-फिरनेकी बहार, - याही बन रहा ई-नारी-जीवनका प्रधान लक्ष्य । मनुष्यका सबल स्वास्थ्य जीवनकी श्रेष्ट काविना :- आज इसे भी हम स्वीकार करनेको तैयार नहीं है। रारतों और बाजारों में घूमिये। युकानदारों में कितने ही ले महात्माओं ! के दर्शन होंगे, जिनके बदन कोद होना । उनकी चीजों पीमारियोंके कीड़े भरे रहते है। यदि आप उनकी चीजें बगदत - इसका चार मनलब हुआ- आप अपने परिवार में बीमारियां बांट से है। भिग्यारियोंसे दूर रहिये - कारण, उनकी गंदगी कोटे भाप स्वारः य जरूर नष्कर देगे। चार आप पोते हैं न ? चायको माना नाम निकाय पिट है. जो किसी न किसी बीमारी के शिकार है। कौनचापि पालिन अनेको । सर्वसाधारण होटलोपी जिन प्यातियां आप चाय पी. उनमें पीमारिचाये. पोरते। जो लत छोटेत है. कि आपकनर तो नारी-विद्रोह पता तक नहीं पा सकते। आपको तो चाय पीनेसे मतलब । स्वान जहन्नममें जाय । आपने किसी मैले होटलमें चाय पी। बीमारीक करें लेकर घर लौटे। जिन्हें आपने अपने स्त्री-बचोंमें फैला दिया: कैसा आश्चर्य! एक दिनकी घटना देखकर तो मै दंग रह गया। कुत्तेकी कार सड़ककी नाली पर पड़ी थी। उससे चार पांच हाथ दूर खोमवार कटे फल,-जैसे अनारस, केला, पपीता वगैरः बेच रहा था। सड़ लाशकी वदवूसे दिमाग फटा जा रहा था-दो घंटे बाद मैने लौटकर देखा -- कुत्तेकी लाश ज्योंकी त्यों पड़ी है, खोमचेवालेके फल आयेते ज्यादा बिक गये हैं। सड़कपर चलनेवालोंकी इतनी ज्यादा भीड़ई कि कोई किसीकी तरफ नहीं देखता-सब अपनी धुनमें मस्त चले जा से आपके स्वास्थ्यपर इसका क्या प्रभाव पड़ा ?-किसी सुयोग्य हा पूछ देखिये। इंसानका स्वास्थ्यहै-अच्छे दिमागका श्रेष्ठ खजाना। शक्ति संगर और आनंदका प्रधान सहायक । जब सम्पूर्ण शरीरमें ताजा खून दौड़न है, कार्य-शक्ति बढ़ती है। चेहरा सुन्दर और फ्रेश मालूम पड़ता प्रातःकाल और संध्याकी शुद्धवायु अत्यंत लाभदायक होती है । यद में तेल की मालिश भोजनकी पुष्टिसे दसगुना फायदेमंद है। सपा एकवारका उपवास शारीरिक मशीनोंको विश्राम देता है, जिससे आ कदम बढ़ानेमें फुर्ती बढ़ती है। उपवासका अद्भुत असर मैंने महात्मा गांधीमें देखा। एकर 'विशाल भारत के संपादक पं. बनारसी दास चतुर्वेदीके साथ में पू: महात्माजीसे मिलने गया। हम हिन्दी साहित्य सेवियोंकी ममा और हमें उसमें महात्माजीको सभापति बनाना था । उस समय बहार नेता श्री देशबन्धु दास जीवित थे। हमलोग उन्हीक मकान भवान ७६ स्वास्थ्य पुरमें जा जमे। महात्माजीने अपने मनोविनोदसे हमें खूब हँसानेके पश्चात सभापति होना स्वीकार कर लिया । सभाके दिन पंडालमें महा- त्माजी पैदल ही चल रहे थे। भीड़ बहुत ज्यादा थी। लोग एक दूसरे पर पिले पड़ते थे। महात्माजीको तकलीफोंकी रक्षाके लिये हमने कतार वांधकर रास्ता निकाला । मैंने देखा महात्माजीमें चलनेकी अद्भुत फुती है। यह बड़ी जल्दी जल्दी चल रहे थे और उनके चलनेकी फुर्तीने मुझे आश्चर्यमें डाल दिया। पूछनेपर मालूम हुआ- यह उपवासका असर है और इससे शारीरिक कार्य-शक्ति बहुत बढ़ती है। मैं आपके शहर की सड़कोंके बारेमें कहता हूँ। हमारी सड़कें फूलोंके विछौने नहीं। यहां ट्रामें दौड़ती हैं। बस, मोटर, रिक्शे और घोड़ा- । गाड़ियोंकी टेलमठेल है। कितनेही आदमी मोटरोंपर सैर करते हैं। कितने ही फुचलकर मर भी जाते हैं। पास हो विवाहकी बारात निक- लती है-पड़ोससे मुर्दा जाता है। ऐसी रहस्यमयो सड़कोंपर लोगोंका ध्यान बहुत ही कम जाता है । इसलिये स्वास्थ्य रक्षाके नाम पर मैं आपसे पुछ कहूंगा। अपने शहर में यातायात और राहगीरोंकी बेहद भीड़ रहती है। याइके खोमचेवाले कितने उदार हैं, जरा ध्यान दीजियेगा । धूप तेज है, राहगीर थके हैं। खोमचेमें लुभावने कटे फल सजे हैं। भूखे राहगीरों ने लालच बस उन्हें खरीदकर खाया । किन्तु इन खाद्यमें कितना अमृत राहता है, कितना जाहर । क्या आपने कभी इसका ख्याल किया है ? सड़कों पर असंख्य आदमी चलते हैं -- ग्योमचेवालये आस पास किमीने धूक दिया। कोई मोटर आई और बहुतसा पेट्रोलका धुआं उड़ाते आगे बढ़ गई। गई भी नमाम उड़ी, जो कटे फलों पर जा गिरी। वही फल आपने खरीदे और खाये । पर लौटे तो अपने ताजेनमें जहर लंकर। मैं कहता है-जैसे ईश्वर सर्वत्र है-मौत भी वैसेही आपके आन पान पिपर पाट रही है। जरा देखभाल कर पाजारको चीन न्याय । और ? नारी-विद्रोह स्वास्थ्यमें खराबी पैदा करनेवाली वस्तुओंसे परहेज रखिये। . स्वास्थ्यकी खरावीके ही कारण हम भारतवासियोंकी आयु सिर्फ :- की रह गयी है। जहाँ अच्छे स्वास्थ्यके कारण आस्ट्रेलियाके लोग। वर्प, इंगलैंड और जर्मनीमें ६३ तथा जापानमें ४७ वर्ष तक जीते है। भारतवर्पमें हैजा, प्लेग, मैलेरिया तथा शीतलाकी बीमारीसे लोग जल्दी जल्दी मर जाते हैं। यह क्यों ? स्वास्थ्य रक्षाकी तरफ लोगों ध्यान बहुत ही कम जाता है और लोग दीर्घ जीवन पानेमें लाचार है जाते हैं। भला बताइये तो लम्बे अर्से तक जीना किसे पसन्द नहीं ? वृद्ध दादाभाई नवरोजीका नाम तो आपने अवश्य सुना होगा। यः हमारे प्रिय भारतके एक प्रधान नेता थे। उनकी छीयासठयों की गांठके दिन एक आदमीने पूछा-"इतनी उम्र पाकर भी आप किन नियमोंके कारण इतने हृष्ट पुष्ट हैं ?" ---दादाभाईने कहा -- "मैंने, अभी तक किसी नशीली वस्तुका सेवन नहीं किया। मांस तो कभी हायसे छुआ तक भी नहीं। न कभी तम्बाखू खायी, न पो, न सूची। पास भोजनसे मैं परहेज करता हूं। अधिक मिर्च या चरफरारा खाना नही खाता । अपने तथा दूसरोंके काम हमेशा मिहनतसे किये हैं ।" पया इन नियमोंका पालन आपको दीर्घजीवन नहीं दान कर सकता ? जरा स्वास्थ्य रक्षाके नामपर इनका प्रयोग कर देखिये तो सही। प्रत्येक मनुष्यमें त्रुटियां हैं। यदि आप उनका संशोधन करते च तो आपका बड़ा उपकार हो। आपकी जिन्दगीमें जो धुन लगा है. गलतियोंका संशोधन उन घुनोंको तहस नहस कर देगा। अपना नय इतिहास बनाइये। सच तो यों है--आपके अंदर एक नये ढंगा मोटा नयी चिन्ता और नया आदर्श चाहिये। विचार कीजिये और दर विचार कीजिये। हम सब परिवर्तनकी दुनियामें जिन्दगी बसर कर रहे हैं। जहां जीवन में नित्य संघप होता है, घात प्रतिघात होते है, और आनन्दोंके रंग बिरंगे फूल खिलते हैं। कभी हम खुशीसे मुन्गा है' स्वास्थ्य ? in - । हैं-कभी दुख दर्दसे कराहने लगते हैं। किस लिये ? आजकी दुनिया का आदमी हँसी खुशी चाहता है। उसे पतझड़ पसंद नहीं, वह वसंतकी : बहारों में झूमना चाहता है। क्या आप अच्छा स्वास्थ्य लेकर यह : जीवन-विज्ञान अपने मित्रोंको सिखलायंगे ? भटकती हुई आंग्वं खोलकर चलना अपराध नहीं, मनुष्यता है । एकने नहीं, मेरे कितने ही मित्रोंने कहा है- आजकल अधिकांश स्त्री-पुरुपोंकी हालत शोचनीय है। वे मनोरंजनके नामपर जिन्दगीको गिरानेवाली फिल्में देख रहे हैं। भद्दी, अश्लील और बाजारः पुस्तक खरीद रहे हैं। रहस्य रोमांचोंको ओर दौड़ रहे हैं। वीर्य रक्षा नफर वीर्यको पानीकी तरह बहा रहे हैं। और उस दुनियामें चल रहे हैं. जो गलतियोंसे भरी है। क्या आप सदगुणोंको लेकर अवगुणोंका त्याग नहीं कर सकते ? विशाल है कर्मक्षेत्र। जिन्दगी है थोड़ी। कमजोर की मृत्यु है. वीर जीतता है। क्या आपकी यह धारणा सव बीमारियोंकी रामवाण दवा नहीं है ? मैं कहता हूं-आपका स्वास्थ्य अच्छा है। आपकी आत्मिक शक्तियां जाग रही हैं और नवीन व्यवस्थाओंके लिये आपके कदम उठ रहे हैं। हाँ, देखिये-एक बात मैं आपसे जरूर कहूंगा। आपको जय पुरसत मिले, आप सैर सपाटे को कहीं जायें ? नो 'काम' जैसा शब्द एकदम भूल जाय। यह भी भूल जायं-हमें किसीको कुछ लेना-देना है। स्वच्छन्दता पूर्वक बाग-बागीचोंकी सैर कीजिये और बा, नमन. लीजिये कि अब हमें कोई काम नहीं, हमारे सब कार्य समान हो चुके हैं। आपका स्वास्थ्य अच्छा होनेके लिये वाध्य है। मनमें नये विचार प्रपेश होने दीजिये-नयी चीजें पहनिये और खरीदिये- पारनाई आप खुशीसे मुखरा देंगे। आपकी आंग्योंके आंसू मोती जल सन्दर पन जायंगे।
पूछा- "कसे चुप रह गयो । नारी-विद्रोह "मैं यह कामकर डालूंगा"-आपकी आत्मामें ऐसा विश्वास चाहिये। शक्ति संचालन और शांति-स्वास्थ्यको सुंदर बनाना सुनहरी सीढ़ियां हैं, जो आपकी आंखोंको नया प्रकाश देगी और जीरन के अंधकारमय कोनेको ढूंढ़ निकालेंगी। आपके अर्द्ध मृतक जीवनमें रोशनी भी है, अन्धकार भी। कितने ही लोग यह भी नहीं जानते-मैं क्या चाहता हूं ? एक मित्र कहा--'मैं धन चाहता हूं।" लेकिन जब मैंने धन प्राप्त करनेके तर पूछे-तो वह सिटपिटा गया और कुछ न बता सका।" एक महिला वोली-"मैं संसारमें अपना नाम अमर कर जान चाहती हूं।"--जब मैंने ?,,-तो उसे कभी समाचार पत्र पढ़ते नहीं देखा । पुस्तकोंसे उसकी खास दि. चस्पी नहीं है। अभिनय कला उसे पसन्द है। लेकिन सर्वसाधारण से परिचित होना नहीं चाहतीं। क्या उसका नाम अमर होगा एक मजदूरने कहा-"रात दिन परिश्रम करके किसी तरह पूरी रोटियां खा लेता हूं। लेकिन संतोप नहीं। मुझे इतने रुपये चाथि कि मै आरामसे जिन्दगी बसर कर सकूँ।"-तीन वर्ष बाद वहीं मन. दूर फिर मिला और कहने लगा --"मैंने कपड़ेकी दुकान खोली है। भी बहुत तंग हूं। यदि अच्छी आमदनी होने लगे तो मव दुसर हो जायं। कुछ असं बाद वह अच्छा सौदागर बन बैठा। फिर भी उसकी धनकी प्यास न मिटी और लखपति होनेपर बह बिल्कुल गया बन गया। दिमाग भी उसका सिकुड़ कर छोटा सा हा गया । । एक दिन मैंने उनसे पूछा-"आपने शिक्षा कहां तक प्राप्त की है। तब हुजूर मुस्कुरा कर बोले -मैं सिर्फ अंगूठेका निशान लगाना जानता मनकी तरंगे समुद्र जैसी विशाल और गंभीर है। लेकिन यह कहा जा सकता- कब और किम उम्र पुनप या स्त्रीको दन्का होती है। हां, जीवनमें यह स्वर्ग किगण एकवार चमकनी:जार न m- स्वास्थ्य और ग्व्व चमक उठती है। जैसे अलेकजेण्डर ड्य माका पहला उपन्यास उनकी वाइस वर्पकी ही उम्र में सफल हो गया। और मिल्टनका महा- काव्य "पैराडाइज लाष्ट" उनकी ४१ वीं वर्ष की उम्रमें संसार-प्रसिद्ध हो सका। स्वास्थ्यका मनके साथ घनिष्ट सम्बन्ध है। जिसका शरीर स्वस्थ नहीं, उसका मन एकाग्र न होकर बरावर घूमता है। जैसे अभी घरमें दे तो फौरन दिल्ली या अमरीका चला गया। फिर गृहस्थीके झंझटोंमें फंसा ; फिर राजनीति, समाजवाद या कम्युनिज्म की चर्चा करने बैठ गया। यह अस्वस्थ्य जीवनकी बीमारी है, जो कभी सफल नहीं हो सकती। कमजोरी बढ़ती है और काम-वासनाकी प्यास मनमें जल्द जागृत होती है। इस काम वासनाका रूप क्या है ? यह वासना पहले आँखोंसे आरम्भ होती है। कमजोर स्त्री पुरुषोंकी आँखें एक दूसरेसे लड़ी और दोनों तरफसे वैचैनी पैदा हो गयी। यह वेचैनी आंखों के बाद रूप सौंदर्यकी उपासना करने लगती है। और दोनों नित्य नये फैशनके पुजारी बनने लगते हैं। जिसमें एक दूसरेको देखकर रीझे । एकका दूसरेके प्रति आकर्षण बढ़े। ऐसेही अनेकों उपाय काममें लाये जाने लगते हैं। यहां जो मिलनमें सफलता मिली, वह चारित्रिक पतनके मार्गपर चलकर आयुको क्षीण करने लगी। यदि दोनों न मिले तो उसमें विकार आगया। एक दूसरेके दुश्मन बन बैठे। जैसे अर्जुनने उर्वशीके प्रेमको ठुकरा दिया तो उर्वशी अर्जुनको नपुंसक कहने लगी। पया यह स्वास्थ्य और प्रेम है? नहीं, इसे मोहका उन्माद कहना चाहिये । और यह उन्माद तब रफा होता है, जब स्वास्थ्य अच्छा होता है। सड़े गले विचार और गत बातोंका पश्चाताप नव जवानको भी बूढ़ा बना देता है और मानसिक उन्नतिको सनसनी अस्सी वर्षके युद्ध में भी नवजवानी का रोच पैदा कर देती है। स्नानको लीजिये। दैनिक लान स्वास्थ्यको ताजी पुती देना है ।
- नारी-विद्रोह लेकिन जो लोग दैनिक स्नान नहीं करते, उनका जीवन तो मनान है ही जाता है। मनमें भी मूर्खताके कीड़े पैदा हो जाते हैं। इस बार की मूर्खता कभी अपने पास न आने दें। जहाँ स्वास्थ्य है, वहां आनंद है। जहां आनन्द है, वहां सौंदर्य है । संसार मात्र सौन्दर्यका । उसकी यह उपासना प्रत्येक आत्माकी अमरवाणी है। लेकिन यह सौंदर्य-प्रकाश बनावटी फैशनके शृङ्गारसे किसीको आकर्षित कर सकता | जो प्राकृतिक गुणोंसे सुन्दर है, स्वाभाविक है-आत्मार प्रकाश उसी मंदिरके परमेश्वरकी पूजा करता है। आपके आस पास यदि कोई पुस्तकालय है तो उसके सदस्य जार बन जाइये। जो पुस्तकें पढ़िये उसमें फायदेमें आनेवाली चीजों प्रयोग करते जाइये। आप जव थके हां, आराम करने लगे, या किन कप्टमें हों-पुस्तकें जरूर पढ़िये । आपकी पुस्तकें जादूघर हैं और अपने जीवन संगिनीके पश्चात सर्वश्रेष्ठ सेविका। याद रखिये, पुरुष नेतृत्व करता है, स्त्री पथ-प्रदर्शन । पुरा त्रुटियां शक्तिकी त्रुटियां हैं, स्त्रीकी त्रुटियां निर्वलताकी त्रुटिया है। पुरुष का स्वास्थ्य तीक्ष्ण होता है, स्त्रीका द्रुतगामी। पुरुष चुनाव और प्रस्तार करता है, स्त्री प्रोत्साहन देती है। पुरुप कुटुंबका मुखिया है, और में परिवारका हदय। स्त्रीके जवान रहने के क्या तरीके हैं ? मनकी पुस्तकमें लिया जाइये- (१) जमाना कैसा गुजरा ? आपने इसी उम्रमें कितने दुप मई फितने सुख - इस बात पर ध्यान न दीजिये-सिर्फ वर्तमान गति और भविष्य-उन्नतिकी राहपर चलिये। (२) अपने जीवनको दिलचस्प और मनोरंजक बनाना आर प्रधान कर्तव्य होना चाहिये। (३) विचार हमेशा ऊंचे रखिये, गिराइये नहीं । ..
स्वास्थ्य - (४) अपनेको, परिवारको, और अपने देशको सुखी बनानेकी वे आदतें डालिये जिन्हें आप रोजाना कर सके। यह नहीं कि दिन भर पलंगपर लेटी हुई उपन्यास या कहानियां पढ़कर समय वर्वाद कर दें। श्रापका प्रत्येक दिन परिश्रम और सौन्दर्यमयी दिनचर्यासे पूर्ण होना चाहिये। (५) ज्यों ज्यों आपकी मानसिक शक्ति बढ़ती जायगी, त्यों त्यों आपको नयी रोशनीके दर्शन होते जायंगे। (६) अपने आसपास की सखी सहेलियों और अन्य स्त्रियोंसे परिचय प्राप्त कीजिये। और तरक्कीके वे नियम बनाइये, जिन्हें आप और आपकी सखियां कार्य रूपमें परिणत कर सकें। (७) भोजन पर हमेशा ध्यान रखिये। मनुष्य जो खाता है, उसके रूप सौंदर्यमें वैसी ही वृद्धि होती है। मनुष्य जो खाता है, उसी हिसावसे उसका आध्यात्मिक पतन होता है। (८) सड़ी और वासी चीजें खाना क्रमशः अपनेको मौतके मुख में धकेल देना है। भोजन साफ जगह पर बैठकर कीजिये । उस स्थानका भोजन जहरीला है- जहां गंदगी रहती है और मक्खियां भनभनाया करती हैं। (8) गर्मकि दिनों को छोड़कर अन्य ऋतुओंमें दिन को सोना अच्छेसे अच्छे स्वास्थ्यको नष्ट कर देता है। (१०) मुख ढककर सोना मानसिक शक्तिके विकाशमें बाधा पहुंचाता । हवादार कमरेमें रहना बुद्धिमानी और दूसरेके जूठे बर्तनों में खाना बेवकूफी है। मनुष्य जो खाता है, उसी अनुसार उसमें बुद्धि पैदा होती है। शरीर बनता है, मन संचालित होता है। आजके अनेक स्त्री-पुरुष हिंसक और मांसाहारी हैं। यह सही है. मांस भक्षणसे कामोत्तेजना अधिक होती है, किन्तु इस उत्तेजनाका रूप क्षणिक होता है। इसके चमत्कार फैल . सकता है ८६ नारी-विद्रोह प्रतिकूल जो लोग मांस नहीं खाते-उनको उत्तेजना स्थायी होती है यह सच है कि मांसाहारी मनुष्योंका जीवन-सुख और शान्तिमय होता । यही बात अन्य खाद्य पदार्थोंके लिये भी है । पुष्टिकर खाका तरहके रोगोंको दूर करता है । स्वास्थ्य सुन्दर बन जाता है और हमारे दैनिक जीवनमें आती है-सुख और शान्ति । यदि पति पर होने एक साथ निकलकर इसके लिये पूर्ण प्रयत्न नहीं करते, अपने आगर विचार शुद्ध नहीं रखते-तो यह सोचना गलत है- उनके जीवन कोई अनोखा आज सौ में मुश्किलसे देसे पांच पुरुप मिलेंगे, जो अब पनि और अच्छे पिता कहलाने लायक हों। स्त्री-पुरुपके 'प्रेम' शब्दको मार बहुतही वीभत्स रूपसे मिट्टी पलीद हो रही है। लोग कहते हैं, अमुक प्रेमका रोग लग गया है। आश्चर्य !-'प्रेम' जैसे पवित्र शब्दकी कम भयानक छीछालेदर हो रही है। जिसे देखिये, वही लैला-मजनू बनः घूमता है । 'प्रेम' का यह वीभत्स रोग प्रायः उन कमजोर खी पुग्ने लगता है, जो या तो 'प्रेम' की वास्तविकताको समझते नहीं, या शब्दका अपमान करते हुये उसे घृणित वासनाका रूप दे चुके हैं। इसलिये जब कभी 'प्रेम' शब्दकी आवाज आपके कानों में आये -- जग उसपर गौर कीजियेगा। उसका अर्थ आपके चरित्रको गिरानेवाला है या उन्नत प्रकाश देकर आपको स्वीय जीवनकी तरफ सीन लिये जाता है। आजके घृणित 'प्रेम' की व्याख्या वासना है जो माया जन्मदायिनी नहीं, बल्कि एक तरहकी मानसिक बीमारी है। शिमका चढ़ाव-उतार ज्वारभाटेकी तरह होता है। कभी कम, कभी वेगी। वासनाकी यह बीमारी ज्यों-ज्यों बढ़ती जानी है, त्यों-त्यों मनुष्य स्मरणशक्ति कमजोर होती जाती है। विचारोंके पौधे भी टूटने लगते हैं। वासनाकी आदत अफीमके नशा जैमी प्राणघातक है। इस बी ।
वीरांगना ८७ इस तरह नष्ट होती है कि आदमी बिजलीकी बैटरी जैसा बन जाता है। उत्साहशक्ति रह नहीं जाती, और वह अकसर आत्महत्या या मरजाने- की धुनमें रहता है। यह क्या कारण है कि हम भारतवासियोंका स्वास्थ्य गत पचीस- तीस वर्षांसे बहुत ज्यादा गिर गया है। इससे पहली पीढ़ीके लोग जितने हष्ट-पुष्ट दिखाई देते थे, उतने आज क्यों नहीं-कारण साफ है। हमारे शारीरिक अत्याचार इतने ज्यादा बढ़ गये हैं, कि हममें बलवीर्यका अभाव होता जा रहा है। हमारी सन्तानं बेहद कमजोर हो रही है। हम तरह-तरहके रोगोंके हमलेसे वेचैन हैं । बुढ़ापेके लक्षण जवानीकी उम्रसे ही आने लगते हैं। प्रिय भारतवासियों, स्वास्थ्यवर्द्धनकी ओर चलो । और भारतीय-संघके जनकी माता श्रीमती अमृत कौर न शब्दोंको न भूलो--"कि भारतवर्ष में मैलेरिया और यक्ष्मा रोगसे अधिक आदमी बीमार होते और मरते हैं । हमें इसजहरको दूर करनेका उपाय निकालना चाहिये। शिशु रक्षाकी योजनायें कार्यरूपमें परिणत फरना चाहिये।" आज आपको साधारण आदमियोंकी दरिद्रता दूर करनी होगी। प्रामों और नगरोंमें चिकित्साके साधन सुगम बनाने पड़ेंगे। गनुप्यक पुष्टिकर भोजनका प्रवन्ध करना होगा, और जीवन पुस्तक में या बात लिख लेनी होगी-"वह दिन जरूर आयंगे, जब भारतवर्ष रोगीना रजाजनक अपराध ठहरा दिया जायगा। हर आदमी फमका में वर्ष जरूर जियेगा और लोगोंके मनसे रोगोंकी फलंड का धुल जायगी।" फिसीने कहा है-- "खुशी, माधुर्च और गर्ग नीलाई परका दरवाजा नहीं झांकने देते।"-. काना- कोई बीमारी नहीं। आपकी हर मुहबाट कापदं. जान माथि जगाती है।"
नारी-विद्रोह है। में आपका शरीर इश्वरका मन्दिर है, जिसमें आपके प्रभूका निकाला यह भी कहता हूं--"हर मनुष्य देवता है ।"-सोचो. मा और स्वस्थ्य-दिमागसे काम लो-जिसमें आपको यह नकार पड़े-"मैंने हृदय-देवताको खो दिया है और अब मेरा जीवन- बुझनेमें देर नहीं है।" 4 माता माता!-कितना मीठा और प्यारा शब्द है ! वड़ापनमें दस शिक्षकों, एक आचार्य, सो आचाय से एक पिता और हजार पिताओंसे बढ़कर श्रद्धामयी एक माता है। हमारी माताकी गोदमें मोहकी मन्दाकिनी बह रही हैं, जिसकी धारामें संजीवनी है। हमारी माताकी गोदमें उन सुखोंका निवास है-जो स्वर्गीय सुवासे अधिक भाग्यवान हैं- आप चाहे किसीकी बेटी हों या किसीके पुत्र- संसारकी कोई भी सन्तान, माताकी आजन्म सेवा करके भी उसके म्हणसे मुक्त नहीं होती। माताकी ममतामें साधना है और है जीवनकी सफल सिद्धि। आज हजारों लाखों नहीं, बल्कि करोड़ों लियां जीवित गाना चाहती हैं लेकिन उन्हें जिन्दा रहनेके मौके कहां दिये जाते हैं ? जग बताओ तो युद्धके कैदीके विचार ?--जो जेल नीवचीये. अन्दर मजबूत तालेमें वन्द है और किस तरहके विद्रोहकी कल्पना कर सा है ? स्त्रियाँ चहारदीवारियों के अन्दर बन्द है । वे मुक्त होने के लिये घटपटा रही हैं। उनकी आत्मायें विद्रोहिनी हो उठी है। जरा सोचिये, स्त्रियां मनुष्यकी निर्माता और जिन्दगीकी हाली । ग्रा-निष्का. व्यक्तित्व-विकाश और हमारे आसपास आनन्द्रका वायुमाल का परनेवाली, समुद्र जैसे गम्भीर शक्ति-दाधिनी ! नारी जय महान पुरुषोंको जन्म देती है संसार और सपा दान सर्वश्रेष्ठ गिना जाता है। माता । सम्पूर्ण मातासोंकी जिन्दगी राष्ट्रको वा नाता है जो बीमार गड़े समूहको भी अपने सामने नहीं टिकने देती ! संग १२ ६० नारी-विद्रोह नारीने माताकी पदवी प्राप्त कर अपने गौरवको चमकाया है। सोचिये-"हमारा समय खराब है।" बल्कि यह सोचिये खराव समयको कैसे अच्छा बना सकती हैं ?"--यह भी सोनिने "आजका प्रातःकाल मुझे उन्नतिकी सीढ़ियों पर चढ़ा रहा है।" बादलोंमें सूर्यकी रोशनी छिपी है और वह रोशनी है अगा मन । उस मनकी एकाग्र-शक्तिसे आप जो काम करंगी-उसमें आ सफलता मिलेगी। आपके मनका विश्वास यदि दृढ़ होगा तो सरला आप पर फूल बरसायेगी। अपना प्रत्येक दिन देखिये और आने समालोचना कीजिये-मैं कहांतक सफल हूं और मेरी सफलता रहस्य क्या है ? रामायण कालमें स्त्रियां घरके अन्दर बन्द न थीं। पुरुष उन्हें आदर और पवित्र निगाहोंसे देखते थे। लेकिन महाभारत कालसे नारी जातिका पतन आरम्भ हो गया। पुरुपकी निगाह गिरी और बदली। द्रौपदीको भरी सभामें बुलाकर नम करनेकी चेष्टा की जिसकी हंगी और कलंकका रूप सारे भारतवर्पमें छा गया और हम सोको अपनी काम पिपासाको मोहिनी मूर्ति समझने लगे। लेकिन मैं तो कहूंगा-एसे राष्ट्रमें आग लगा देना चाहिये जा नारीका सन्मान करना नहीं जानता। ऐसी जातिके मानसिक काम फुचल-कुचलकर मार देना चाहिये - जो सामाजिक जीवनमा तरह फैले हैं-और नारीको फूलने-फलनेका सुअवसर नहीं देते। गाः आप अपनी आदरणीया पत्नी वहन या माताका सन्मान करणार जानते तो आपको इस पृथ्वीपर रहनेका कोई अधिकार नहीं है और नारी जीवन भी उस समय व्यर्व है, यदि यह पतिका आदर वन नहीं जानती-अपने पुत्रोंको जीवन-नौका पार लगाने का नहीं बताती। नारी और पुरपके सहयोगसे सभी तरहके कार्य मिद हो ।
? चाहे यह सत्य दुर्वल-व्यक्ति स्वीकार न करें-लेकिन कल सूर्योदय होगा और उन्हें मेरी बात माननी पड़ेगी। विश्व पूज्य महात्मा गांधी अक्सर कहा करते थे- मैं केवल मर्द ही नहीं, औरत भी हूँ। मेरा आधा भाग स्त्रीका, व आधा भाग पुम्पका है। और इसलिये मैं औरत तथा मर्द दोनोंका प्रतिनिधि हूं।"पढ़ा आपने ? देखा भी होगा आपने। इसीलिये स्त्रियों के प्रति महात्माजीका विशेष आकर्षण था और स्त्रियां हजारोंकी तादाद में उनके इर्द-गिर्द दिखाई देती थीं। मैं मानाकी बात कहता हूं। माता न दिन देखती है, न रात । का बड़ी से बड़ी तकलीफ केलकर भी बचके जीवन-निर्माणमें अत्यन्त व्यान रहती है। जवान बोंका काम है, वह लीख - माता-पिताके प्रति हमारा कर्त्तव्य क्या है। उनके बुढापेके समय में किस ना, उनकी सेवाओंपर ध्यान देना चाहिये ? पैसे उनके दुख-सुबमें हाथ बंटाना चाहिये ? गृह-निर्माणके प्रति हमारी योजनाय क्या हो ? भाई-बानीको शिक्षाके मैदानमें कैसे आगे बढ़ाना चाहिये। साथ ही कार जनमा हार्दिक भावोंको भी समझे और उन्हें आगे बढ़ाते हुचे-स्वयं आगे बढ़नेको कोशिश करे। यह क्या चात है, कि श्रीमती सरोजनी नायडू यू० पी० की गार्नर बना दी गयौं ? सुभद्रा कुमारी चौहानकी कविताओंने नर्दनाक हलचल पैदा कर दी। जरा आप अपनी तरफ, देखिये और नीति- एमारे जीवन-निर्माणके क्या फायदे हैं ? क्या करने से हम नया जीवन आ सकता है ? अपने रहस्य सूंढ़िये, उनकी जांच-पड़ता किन शिक्षा अनुभव और मानसिक-शानियां आपकी जिन्दगीगे , से भर दंगी। केवल कोरी कल्पनाओंसे पर, मोगा: कीजिये और उनका व्यवहार कीजिय ! आपने दिल होगी और आपफो भविष्यमें प्रार inmary . और जय।
१२ नारी-विद्रोह समझदार वयेको मारना-पीटना था उसपर अत्याचार करनःमः पिताकी मूर्खता है। बच्चोंके जीवनका निर्माण प्रेम. सहानुभूति र सहयोगके साथ होना चाहिये। यदि ऐसा नहीं होता और माता- के साथ वचेका हमेशा संग्राम चलता रहता है, तो यह ठीक है, हा एक न एक दिन विद्रोही हो उठता है और उसे संभालना या सही सही पर लाना टेढ़ी खीर हो जाता है । अधिक प्रतिभावाले और चैतन्य बालक रातकी भयानहन के अंधकार, विजलीकी कड़क और भूत-प्रेतके मिथ्या भयसे डर जो हैं। इनसे उन्हें निभीक वननेके उपाय बताने चाहिये और चिड़िया घरके छोटे-बड़े जानवरोंको दिखाना चाहिये तथा उन्हें यह भी यान चाहिये कि तुम्हारे माता-पिता और दूसरे बड़े लोग तो इन कल्लिा श्योंसे कभी नहीं डरे। तुम्हारा डर तुम्हारी कमजोरी है और इस कमजोरीसे तुम्हें निरंतर बचना चाहिये। आज किसी भी माता, गृह-लक्ष्मी और कन्याको यह मो चाहिये कि मीठी बोलीका असर क्या है और प्रभावशाली व्यायान देनेकी कला क्या हैं ? बड़ी से बड़ी भीड़को कैसे कंट्रोल किया जा सकता है और विरोधी दलको कैसे अपने पक्षमें मिलाया जा सकता है। आर आपका व्याख्यान सुननेके लिये जनताके पास रेडियो है। आपके प्रत्येक शब्दमें असर करनेवाला जादू चाहिये। वैसा जादू भादमी मनपर क्या प्रभाव डालता है इसकी एक दिलचस्प कहानी मुनिये -- एक नवाब साहब तालायमें गलियोंका शिकार कर रहे थे। भार महालियां मारनेमें इस कदर तल्लीन थे कि संसारमें फदा क्या हो रहा है. इसका उन्हें ध्यान न था। एक मनचले शायर उनके पास पहल और बोले -- "जनाव, मछलियां मारना छोड़िये और मेरी नरफ देखिये। : आज आपको या शायरी मुनाऊंगा कि आप फट्टक उठेंगे।"
माता
नवाब साहब वराबर मछलियोंका शिकार करते रहे। उन्होंने
शायरसे फरमाया--"आप पहले कविता तो पढ़िये। यदि आपकी
कवितामें कोई चमत्कार होगा तो में खुद आपकी तरफ खिंच जाऊंगा।"
सो यह है शब्दोंका जादू । नवाब साहबकी बातोंका असर ।
आपके शब्दोंमें कुछ वैसा ही जादू चाहिये-कि सुननेवाले आपके भक्त
धन जायं और आपके व्याख्यान सुननेके लिये दौड़ पड़े। जनताकी
आवाज आपको सबसे पहले सुनना चाहिये-वह क्या चाहती है ?
उसकी मागं सही हैं या गलत । जनताकी आवाजोंकी पूर्ति किसी भी
जिन्दगीको आनन्दका मंदिर बना देती है।
संसारके बड़ेसे बड़े कर्मयोगी, योद्धा विद्वान और सुकवियोंको
लीजिये। उन्होंने मुक्तकण्ठसे नारीको स्फूर्ति दायिनीके रूपमें स्वीकार
किया है। विश्व विजयी नेपोलियन सदा अपनी माताका गुणगान
करता रहा । तुलसीदासको राम-भक्ति प्रेरिका उनकी पत्नी थी। और
रामकी लंकाकी विजय कामना सीताजीके ही कारण हुई थी।
यों ही मनमें झूठी कल्पनाओंकी अटकलें लगाना द संकल्प
फैसलेको तोड़ना है। यदि अस्सी वर्पकी उनमें किसी अपने इरादा
फर लिया कि मैं पढुंगा-तो उसकी यह कह कर ली गाना
अपराध है कि बुट्टा तोता कहीं रामनाम जपता है ? उनकी नवीन विता
ज्योति उसके भविष्य परिवारको दर्शनीय बना देती।
आप माता हैं और माताका जीवन नवीन संसारमा कला
है। वह एक नवीन दुनियाको ओर देखती और शानदार
चफित रह जाती है। जब आप अपने पेटको देव आपकवान
हो और उसके मनमें कोई रोजगार करने की पुन को
भाफिसका तर्फ बनाना मूर्खता है। यदि दो काम करना
है तो उसे कपड़ेकी दृफानफा दजाज बनाना पा..
तो आप तम हो सकती है. जद करेषी पनि जनः
नारी-विद्रोह मनोकामनाकी पूर्तिमें लग जायें। आज कितने ही नव जपान उनकी मूर्खा मातायें आत्माके विरुद्ध उनसे कार्य करानेको वाध्य कर हैं; जिसका नतीजा यह होता है, बच्चा आगे नहीं बढ़ सकता और उसका दिमाग कुयंका मेढ़क बन जाता है । आप माता हैं और साहित्यिक क्षेत्रमें आपका आना बहुत ही आर. श्यक है। आज संसारका कोई भी साहित्य स्त्रीके सहयोग दिना पुर नहीं कहा जा सकता। क्यों पूरा नहीं कहा जा सकता इसलिन त्रियोंकी अनुभूतिको मर्द सही रूपसे साहित्यमें नहीं व्यक्त कर माले। सतीका चित्र तो कोई सती स्त्री ही सुन्दर ढंगसे खींच सकती है। बता उल्लास लीजिये-माताका वात्सल्य देखिये--पुरुष-लेखक उसका सही सही वर्णन न कर पायगा और उसके विचार 'सेकेण्डहण्ड" जैसे जननी हां, यदि उन रहस्योंका उद्घाटन स्त्री करने लगे तो वे सत्य और मार- साधारणके लिये मङ्गलमय दिखाई देने लगेंगे । आजकी विदुपी कवि महादेवी वर्माको लीजिये-उन्होंने साहित्यिक दुनियामें एक नगे गुगत जन्म दिया है। और भारतवासी उनके सत्यसे अच्छा प्रकाश पार हैं। आज हमारी छिपी हुई प्रतिमायं आगे आयें, मातायं आगे बढ़ और सोती हुई बुद्धियोंको जाग्रत कर निर्माण-युगकी सहायिका बनें । आर यह समझ लेना चाहिये -देशकी आवहवासे, देशके जाग्रत समाज और देशकी शिक्षासे प्रत्येक स्त्रीके जीवनको बहुत बड़ा बल प्राम कोता है। क्या आप बता सकती हैं-इस एक वर्पके भीतर कितनी मां लाओंने साहित्यिक पुस्तकोंको रचना को है ? और क्या आप यः बता सकती हैं इस स्वाधीन भारतमें पिछड़ी हुई स्त्री जानिक भारत कसी समालोचना हो रही है ? भारतवर्षकी मी एक दिन कुल और भी और दुर्भाग्यसे आज कुछ और है। क्यों ? जरा मेरी पुग्नक के पेट पर- कर देखिये और साधारण जीवन पार कर दिव्य-जीवन लाम का फोशिश कीजिये। अगर आपके जीवन कोई बुद्धिमानी की मार है- माता ठण्डे दिलसे अपनी इच्छा पर गहराईके साथ विचार करना और आपके मनमें यदि कोई खराब आदत है तो अपनी इच्छा-शक्तियोंको विखेर देना और लापरवाहीसे कार्य करना। दर अस्ल, चीज नी यही अच्छी है, जो हमारे खिलवाड़ और भ्रमको दूर कर हृदयसे अपना काम फरनेके लिये वाध्य करे। यह जिन्दगी आपकी है, जिसे परमात्माने स्वयं आपको दिया है। आप उसमें चांदनी जैसी लुभावनी रात भी ला सकती हैं, नकी घुणा भी। आपका जीवन प्रदीप भी बन सकता है, काल रात्रिका घोर अंधकार भी। आप पया चाहती हैं ? सोचिये और आगे बढ़िये । आपकी इच्छित वस्तु आपके पास अवश्य आ जायगी। यह एक सदी इच्छाशक्ति है और इसका ज्ञान मुझे एक देहाती किसानसे प्राप्त हुआ। प्रातःकाल पांच वजेका समय था । मैं ग्युली जगाने टालने के लिये घरसे निकला। कितनी ही उ.बड़ खाबड़ जमीन पार करने बाद में एक खेतकी पगडण्डी पर चलने लगा। में भरावर चला जा रहा था। और खेतोंकी हरियालीके सिवा किसी तरफ मेरा ध्यान न था - मुझे, एक किसान मिला जो खाली पिंजड़ा लिये था। उसने तीन चालीन गजफी दूरी पर एक तीतर उसीकी तरफ दौड़ता आ रहा था। मां- इल बस मैंने पूछा---"क्यों भाई ? यह नीतर उड़कर भाग पचों का जाता है ?" ---उत्तर मिला- "पिंजड़ने इनको इतना पावर गया है कि मेरी तरफसे खुला छोड़ देने पर भी का. पार पार दि. अंदर चला आता है।" यह दे इच्छा शक्तिकी आदतका नमूना । मोमिन नाम: प. जीवन निर्माणका कानून आपके हदयी पुल ाि झार करती है स्त्री पुगपी प्रतिभाका लागि सान। भादमी अपनी शक्तियोंको अपने दिल पर करा. ५ बनने पर दूसरे प्राणीको अपने उपकारोर..
ईश्वर ई और नारी - मेरो पुस्तक पढ़नेवालोंमें ऐसे नवयुवकोंकी संख्या कम ईश्वरको नहीं मानते। उनका कहना है-आपने ईश्वरको प्यों से किया ? आपकी पुस्तकों में जगह-जगह ईश्वरकी चर्चा क्यों है। अस्ल ईश्वर नामकी कोई चिड़िया जमीन या आसमानमें नहीं है। मेरा उत्तर है-"दूर जानेकी जरूरत नहीं, ईश्वर मनुष्यको में ही विराजमान है। उसकी रोशनी संसारके जर-जरमें चार है। सव संसारका ईश्वर एक है और संसारमें सब कहीं ईश्वर समः यदि मैं ईश्वरको क्षणभरके लिये भी भूल जाऊँ और उससे अ अलग समझने लगे तो कदापि जीवित नहीं रह सकता।" हमें बोलनेकी ताकत किसने दो? और हम संसारमें फिर रहे है ? फूलोंमें फळ किसने लगाये और पहाड़ोंसे झरने । पैदा किये ? आप कहेंगे-यह सब प्रकृतिका जादू है और मनुष्यको सर्वश्रेष्ठ बनाया है। मैं कहता हूं-यह सत्य है और य महासत्य है कि प्रकृतिको संपूर्ण कलाओंका संचालन करनेवा:- ईश्वर है। यदि ऐसा न होता तो रामचन्द्रको कल राजगद्दी मिलने थो और बनवास क्यों मिला ? आदमी मर जाता है, लेकिन जीवनका पता क्यों नहीं मिलता ? किसी विशेष दुर्घटनाको हमारे मुहंसे यह त्यों निकल पड़ता है---"ईश्वरकी मजी प्रेमी हर मैंने ईश्वरको न माननेवाले नास्तिकोंकी तरफ देखा। कला विशारदोंसे भी बात की, लेकिन किसी अदृश्य शनिक की बात सबको माननी हो पड़ी। एक न एक दिन सयको पड़ता है और उस दिन तो लोग भाखमारकर ईश्वरकी दोहाई है। जब आदमी किसी विपत्तिका शिकार बन जाता है।
में ईश्वर और नारी ६७ एक ऐसी नदीके जहाज पर यात्रा कर रहा था, जिसका कोई ओर छोर न था। आधी रातका सन्नाटा ; जहाज तेज रफ्तारसे चला जा रहा था। मैं केविनके अंदर सोनेके इरादे में था। लेकिन आदमियोंकी भीड़ इतनी ज्यादा थी कि सोनेकी कौन कहे-टसले मस होनेका उपाय न था। एकाएक तूफान चलने लगा और उसकी रफ्तार इतनी जल्द भयानक और तेज हो गयी कि ऐसा जान पड़ने लगा, जैसे जहाज अव डूबा,-अव डूवा !-भीड़में हाहाकार मच गया और सबकी । अग्यिोंमें सिवा ईश्वरके कोई दूसरा न दिखाई देने लगा। लोग नरा । तरहकी प्रार्थनायें करने में बेहोश हो गये। मेरी भी यही हालत थी । और ईश्वर !-ईश्वर!-करते दूसरे दिन हमारा जहाज डूबने से बच सका ! । ईश्वर दर्शनकी ऐसी कितनी ही दुर्घटनायें मनुप्यके जीवनमें आती है और । तब वह ईश्वरका अस्तित्व स्वीकार करने में जरा भी नहीं हिचकता। दुखमें सुमिरन सब करे, सुखमें करें न कोय । सुख में जो सुमिरन करे, दुख माहेको होय । आदमीकी आत्मा ईश्वर है और उसका शरीर मंदिर । किन असली बात तो यह है, आज का मनुष्य इतना त्याची हो गया है कि उसने अपनी जाति और देशके लायक ईश्वर बनाकर चार किये हैं। उनकी ईश्वरको मंदिरों, मसजिदों और गिरिजा घरों में बंद करनेकी । जो - प्राण्डसे अधिक महान है और जिसके बिना कोई धान सना की। स्वार्थी मनुष्य ईश्वर बना रहा है। और एक जाणिक काम - जातिसे घृणा करने के लिये नकली धर्माको मुष्टि करने में मार । जैसे समस्त देवालय मनुप्यकी नकली बुद्धिक नन्ने हैं। इन महिने शिवालय होते हैं, छत होती है। दीपक और मूर्ति लेकिन क्या आप बता सकते . रिस मंदिर का विशाल है ? कला आफारा सा और सामान पन को दीपक जैसे प्रकाशमान हैं ? । ।
नारी-विद्रोह
मनुष्य मिट गया और अंतमें उसने यह निश्चय किया
कल्पनाको हम जितना बनाते हैं--उतना हो उस ज्ञान साथ
की तरह मिलते जाते हैं तथा हम कल्याणमय, दयामय और र
होकर जीव मात्रसे स्नेह करने लगते हैं !
कहीं न कहीं पुरुष ईश्वर के लिये दीवाना है, की न
ईश्वरका रूप देखकर दंग है। लेकिन पुरुपसे ज्यादा नारीका .
पण ईश्वर के प्रति है। वह अपनी सांससे ज्यादा कीमत परमार
मती है। इसीलिये देव मंदिरों में, तीर्थाम, पुरुषसे ज्यादा आपको
रनोंकी भीड़ दिखाई देगी। लेकिन वह भीड़ यहाँ तक साह
तक कि ईश्वर के प्रति उसकी पूर्ण श्रद्धा, पूर्ण विश्वास है। कि
विश्वास अंध-विश्वासके रूप में पलटता गया, ईश्वरो नामपर पा
बढ़ गये। झूठ, ठगी, धूर्तता और वेवकूफीका जाल निवा
लगा। कुरीतियों और रूढ़ियोंकी दीवालें खड़ी की जाने लगी । म
पतन हो गया और नारीके साथ-ही-साथ पुरुपकी भी मृत्यु हो गयी।
आज इन्हों ठग विद्याओंने, धूर्त हथकंडोंने, मनुष्यको जीत है।
मार डाला हैं। हजारों अवला-जीवनोंको जिंदा भरण
मनुष्य के तेजस्वी जीवनको गुलाम बना डाला है। यही कारण ।
• आज हमारा भारतीय जीवन इतने भागों में विभक्त है, जितना
कोई जाति नहीं।
एक दिनकी बात है, एक महात्माजी (1) मेरे घर पधारे।
बदन बैठा "अमर जीवन” नामक पुस्तककी रचना कर रहा था।
ही पहले तो उन्होंने मेरा नाम पूछा । बादमें मुस्कुराकर बोन... भारत
संस्थाका नाम 'विज्ञान-मंदिर है। लेकिन यहां न तो मुभी देर
दिखाई देता है, न साधुओंकी चहल-पहल । मैंने कहा-
: तो हिन्दी-साहित्यका एक छोटा-सा विद्यार्थी । आदमी
मंदिर-इसीलिये मैंने अपनी संस्थाका नाम विज्ञान मंदिर
+
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। दश्वर और नारी १६ और मुझ परमात्मा रूपी आत्मासे जो वरदान मिलता है, उसे पृथ्यो भर के मनुष्यों में बांट देना। महात्माजी ! मुझे मूर्य बनाते हुये फुल चिढ़से गये। उन्होंने बहुतेर । अंध विश्वासका जाल फेंकनकी कोशिशकी, मगर मैं उनकी युत्तियोंके. फजेमें न नका। पर चले गये और कई दिनों तक उनकी छाया मूर्ति मेरी आंखों के सामने मुस्कुराती रही। सफाचट मुं. रेशमफे लच्छे जैसे धुंघराले बाल, कानमें इत्रका फाया और बदनमें लहराता हुआ रेशमका गेरुआ पुरना !-- न्यूय म्याद लेकर मगही पान दांतों के नीचे कुचल रहे थे । -बहुत दिनों के बाद पता चला, आप देहातसे कोई लड़की उड़ा लाये हैं और भारतवर्षमें उनकी सैकड़ों चेलियां है। शिष्याय है । जो गुरु महाराजकी सेवा करती हैं, उनके हाथ पैर दवाती हैं और ईश्वर तथा धर्म के नामपर महात्माजी (2) उनके साथ न मालूम क्या क्या करते हैं! कितने शर्मकी बात है कि इस तरहके चंट और लुमे महात्मा तथा साधू नामधारी हरामखोर भारतवपमें जहां तहां आवारोंकी तरह घूमते फिरते हैं। एरामका माल चाभते हैं और गंवार पुरुष तथा मूर्या खियोंको नर्ककी वातोंसे डराकर अपना उल्लू सीधा कर रहे हैं। मैं इस तरहके कितने ही धूर्त महन्तोंको जानता हूं-साधुओंको देखता हूँ, और भारत सरकारसे जोरदार शब्दों में कहता हूं.-इन जङ्गली पोंका शीघ अंत हो जाना चाहिये । पुरुप तो इनके हथकंडोंसे सावधान हो हो रहे हैं -मूर्या स्त्रियां भी आंग्य खोलें और अन्धविश्वासके इन दल प्रपंचोंको पृथ्वीपर कायम न रहने दें। इस छोरले उस छोर तक मान्तिको आग लगायं जिससे हमारे जीवन सरा सोना दनफर निकलें -और उनमें ऐसी चमक पैदा हो जिसमें ईश्वरके विश्वानका मक्षा नूर चमक रहा हो। भारतीय संस्कृतिका महान गौरव है- सर्वशक्तिमान ईश्वरकी आरा- -- -- www १०० नारी-विद्रोह धना-उसकी पूजा, उसकी उपासना। इस तरहकी आसमा प्रातःकाल और संध्या होना चाहिये। लेकिन यदि आपको समान मिलता, आप अपने काममें अधिक व्यस्त हैं और आपका ज्योतिसे प्रकाशित हो रहा है - तो मैं कहूंगा-पूजा और प्रार्थन किन भी समय की जा सकती है। गलियोंमें, सड़कोंपर, दूकानों में पुरे और कालेजोंमें। प्रार्थनाके लिये न कोई दिन है, न रात । आगन लिये न कोई समय है, न सुविधाकी जरूरत !-मनुष्यके मार्गमा आदत जीवनको सुखी और दीर्घजीवी बनानेवाली है। जो आपने चारों तरफ फैली रहती है--वह ज्योति अहंकारको जला देवः । स्वार्थको चकनाचूर और विपत्तियोंको मार भगाती है। चाहे स्त्री हो या पुरुष मनुष्यकी आत्मा उतना ही बड़ी है, जितना आकाश। बशर्ते कि उसमें मानसिक हाथ पैर फैलानेको तारो। मनुष्य खुश रहता हो, उसकी खुशी उसका खून बढ़ाती हो, उसके जीवन निर्माण करती हो। ज्यों ज्यों जीवनका निर्माण होता जायगा. परि. वर्तनकी अदृश्य लहरें उसमें अपने आप उठती जायंगी। आंखें बन्द करलो और ध्यानसे मानसिक शक्तिको गीगाreir इलाज करो। मन सदैव शीशेकी तरह स्वच्छ रहे। साफ या और दूसरोंके मनपर अच्छा असर डालती हैं। इससे आराम बढ़ता है और आप विकसित रूपसे आनन्दके आसपास विनोद आनन्द ! हां, आपका आनन्द ! सौन्दर्य वृद्धिक साधना है। आदमी क्यों अपना घर छोड़कर बाग भागीय करते हैं ? जङ्गलों, पहाड़ों और रमणीक स्थानोंपर जाते हैं ? सौन्दर्यके दर्शन हों और तबीयतके बोझ हो हो। गरम देखकर पागल हो जाते हैं, लेकिन अपने लिये आग-योनिक हैं ? हम भावमयी कविता पढ़कर मुन्ध हो जाते हैं, लेकिन जीवनकी रचना कहां करते हैं ? सौन्दर्य के प्रति आकर्षित होकर ar ? f + ईश्वर और नारी १०१ पर सुन्दर सुन्दर तस्वीरें टांगते हैं-किन्तु कितने दुर्भाग्यकी बात है, हमारी दीवारों में लोना लग गया है-सुखीं चुनेका पता नहीं-और सिर्फ दीवारोंपर ही क्यों, हमारे मन भी तो हो गये हैं कंकाल । इन कंकालोंको चाहिये-वे सौन्दर्यकी दुनियामें रहनेकी कोशिश करें। जिन्दगी अवश्य सुन्दर होगी। किसी भी स्त्री का सचा आभूपण उसका हृदय है। उसके सद्गुण और उसका चरित्र । सोने चांदी के गहने तो कदापि नहीं। यदि स्त्री का व्यक्तित्व उसकी शक्ति को बढ़ाता और उसका शृंगार करता है तो यह अच्छाई है। किंतु यदि वह असंतुष्ट होकर बदनाम रूप से घूमती है। एक विनोद को छोड़कर दूसरी दिलचस्पियों की ओर भागती है तो ऐसी कुलक्षणाओं, कर्कशाओं और बुद्धिहीना नारियों को न योग्य माताय आदर दे सकती हैं, न पुरुष। मैं एक वृद्धा के आसुओं को टपकते देखता हूं और उसकी रोमांचकर कहानी आपके सामने पेश करता हूं. वह वृद्धा! हां, वह बुढ़िया, जो आज एक बदबूदार कतवार खाने के आस- पास वैठकर पश्चाताप के आंसू बहा रही है- कहने लगी-- "बेटा ! में मर जाना चाहती हूं, लेकिन मौत भी मेरे पास आने से घृणा करती है। मैं वचपन में ही अपनी मां को छोड़कर दूर, बहुत दूर देश में भाग गयी थी। हमेशा सोने चांदी के ढेरों पर बैठी रुपये भी खूब कमाये-लेकिन गुण्डे बदमाशों ने मेरा सब धन छीन लिया। रास्ते में बैठ गयी। अधिक उम्र होने से भोजन के पैसे भी नहीं कमा सकती। मेरा अंतिम जीवन बहुत ही घृणित है और मैं स्वर्ग के सौंदर्य से गिरफर नर्क के दलदल में आ फंसी हूं। अधिक कहानी सुनने के बाद मैंने इस पुस्तक के पेजों में लिखा--- पह लगातार पचास वर्षों तक कुकर्मों में डूवी रही। उसने लगभग - " १०२. नारी-विद्रोह बारह सौ नव जवानों के चरित्र नष्ट किये जिनमें पांच सौ गुरु आवारा निकल गये! तीन सौ लड़के नशाखोरी और बुरी आ गुलाम बने तथा चार सौ युवकोंने चोरी और डरतीके अपना जेलकी हवा खाई । ओह !-हमारे राष्ट्रका, हमारे भारतवर्गका पदा दुश्चरित्रा नारीके लिये कितना बड़ा नुकसान पहुंचा। जहां आज धार सौ नवयुवकोंकी राहमें सुगन्धित फूल बिछ जाना चाहिये गा. यः कँटीले कांटे भर गये और जनताको महान कष्ट पहुंचा । इसीलिगे हूं-पशुता त्याग कर मनुप्यताकी ओर कदम बढ़ाओ - आपका जीवन आध्यात्मिक शक्तियोंको सीखने, जगाने और दिमागको उन्नत बनाने विराट स्कूल है। यदि आप आंखें खोलती हैं -हजारों लाखों स्त्री-पुरको आंखें खोलनेका ज्ञान देती हैं तो यह सत्य है, इससे आलसी-मीm कर्म-पथकी ओर अग्रसर होते हैं, कायर साहसी और उत्साही बनते हैं। संसारके सर्वश्रेष्ठ ग्रंथ रामायण और गीताको पढ़ना कभी न भूलिये यह न सोचिये, यह धार्मिक ग्रंथ हैं और इनमें कोई तत्व नहीं। इन ग्रंथोंके एक एक शब्द समुद्रकी तरह गंभीर और आकाशकी तरह बिगार हैं-जो आपको जाग्रत बनाने में विशेष सहायक सिद्ध होंगे। मैं कहता हूं-आपका जीवन अभिनय है। यह ऐसा होना चालि जिसमें अहङ्कार नहीं, स्वाभिमान हो। असत्य नहीं, मत्यकी गोतम जागृत हो। नास्तिकवादकी ओर नहीं, ईश्वर-दर्शन मार्ग का कदम बढ़ाने वाला हो। आशा जीवन है, प्रसन्नता जागरण ! सत्य प्रकाश है, अमन कार । भविष्य किसे कहते हैं और किस तरहसे हमारे स्वाधीन हीनता निर्माण होना चाहिये, आज में पृथ्वीके एक कोने में बैठकर गरि रहा हूं---और अगले पेजोंमें अधिकसे अधिक नई बात काम पेज उलटिये- -- . ..
नागरिक-जीवन . .. नागरिक जीवन क्या है ? नागरिक किसे कहते हैं ? इसका उपयोग कैसे करना चाहिये ? यहां हम इन्हीं प्रश्नोंका उत्तर दंगे । आप चाहे स्त्री हो या पुरुप । शहर, देहात या भारतवर्षके किसी भी कोनेमें आपका निवास हो। आपका कर्तव्य है, आप अपनी दिल- चस्पियोंको देखते हुये दूसरेकी दिलचस्पियोंकी तरफ सबसे पहले ध्यान दें। स्वर्णभूमि भारतमें, जन्म लिया है आपने। यहांकी सभ्यता, जलवायु और आध्यात्मिक-शक्ति संसारके आकर्पणकी वस्तु है। यहां : जैसा माधुर्य है, वैसा दूसरे देशोंमें नहीं। यहां जिस आंतरिक ज्योति का प्रभाव है, अन्यत्र उसके दर्शन नहीं होते। • आप नागरिक जीवन व्यतीत कर रही है और नागरिक जीवन पाकर संसारमें कोई भी व्यक्ति अकेला नहीं रह सकता। इसी लिये फुछ आदमियोंको लेकर वह संगठन करता है, नये समाजकी रचना फरता है और जीवन यात्रामें आगे बढ़ता है।. 'आज स्वाधीन भारतमें जीवन-परिवर्तनके इन्हीं फूलोंकी खुशबू बिखर रही है। आप सड़को और गलियों में चलती हैं। लोग घूमनेके शौकीन और. विश्वभ्रमणके : प्रेमी हैं। इसलिये आवश्यकता है, विखरे. फूलोंके साथ एक मालामें गुंध जाना । जो भारत माताके गलेकी जयमाला वने और अपनी मीठी सुगन्धसे हमारे दिल और दिमागको हमेशा ताजा बनाये रखे। आपको जानना चाहिये, हमारा और आपका पारस्परिक सहयोग जीवनको दीवारांको मजबूत बनाता है और मङ्गल भावनाओं का प्रसार करता है। जिससे जीवन निर्माणके विद्यालय तथा आर्थिक उन्नतिके १०४ नारी-विद्रोह अभेद्य किले तैयार हो जाते हैं और हम आपसो विरोधों का अन्न आखीरमें वसुधैव कुटुम्बकम् का रूप धारण कर लेते हैं। यह स्वाभाविक है, मनुष्यको चिन्ता-शक्ति विचार और THE अलग किस्मके हैं। जैसे डाकरको डाकरी पेशेमें व्यस्त राना, सरे व्यापारीको वस्त्र-व्यवसायमें लगे रहना, डाइवरका मोटर संचालन पत्रकारका अखवारी दुनियामें परिश्रम करना इत्यादि-लेकिन अपने अपने कार्योकी इन विशालताओंके भिन्न-भिन्न रूप होते हुये भी मनु आंतरिक इच्छा एकमें मिल जानेके लिये हमेशा उत्सुक रहती है। वैसे ही, जैसे छोटी-बड़ी नदियाँ अलग-अलग बहकर अन्तमें एक विशाल सागरका रूप धारण कर लेती हैं। इसीका नाम संगठन है और यह है-स्वाधीन जीयनको मापन समाजका वरदान । अब आगे बढ़नेके लिये इसके नियम बनाने आवश्यकता है। कैसे इस बुनियादकी जड़ मजबूत की जाग, गमन किस तरहकी शिक्षाकी आवश्यकता है । वह स्वतन्त्र भारत में नागरिक अधिकार प्राप्त कर सुखमय जीवन व्यतीत कर सकता है। हमारी गुलामीका जमाना बीत गया। अब हमको, . सबको, सिरसे पैर तक बदल जाना होगा। दीनोंको धन, दुको वल, अशिक्षितोंको विद्या और भूखोंको भोजन देना होगा। दाना नहीं, उन्हें अच्छे-से-अच्छे कामां पर लगा कर । राणा प्रताप oिri और अर्जुन वीर थे--केवल उनके गुण गाकर ही नहीं, बल्कि र चरण चिह्नोंपर चलकर हमें अपनेको उपर उठाना होगा। भाग राज्यके श्य खींच लाना होगा। याद रखिये, अब हम विदेशियों शोपित प्रजा नहीं, स्वाधीन भारतवर्षके जिम्मेदार नागरिक । जरा सोचिये, हम क्या थे, आज क्या और भविष्य होना है ? प्रबल इच्छाशक्ति आत्मविजयकी पनि विषय उसमें सफलता नहीं ग्राम की जा सकती। आज जीवन नागरिक-जीवन १०५ आदमीको साथी चाहिये । जैसे अलाहिदा कैदी घातक पीड़ाओंसे भरा गहना है, वैसे ही अकेला मनुष्य भी यदि वह संगठित नहीं, तो आने- बाली विपत्तियोंके चंगुलमें जकड़ा रहेगा। प्रत्येक मनुष्य-जीवन संगठित होनेके इशारे करता है। आवश्यक- ताओंकी ओर इंगित करता है। यदि आप उसकी गति रुद्ध करना चाहते हैं, तो आपका प्रयत्न कुछ वैसा ही है, जो समुद्रकी तरंगोंको रोकता है और उसके प्रवाहको बांध लेनेकी अनाधिकार चेष्टा करता है । संगठित व्यक्तिका कर्तव्य है, वह सर्वसाधारणको पढ़ा लिखाकर तेजस्वी, यशस्वी और बलवान बनाये। सर्वसाधारणके स्वास्थ्य-रक्षाकी ओर ध्यान दे। इस महानतासे साहित्यिक और राजनैतिक उन्नतिके द्वार खुल जाते हैं। हमारे लिये यही तो समय है, जब हम स्वतन्त्र-भारतकी पवित्र भूमिमें सर्वप्रिय फूल फल उत्पन्न करें। हमारी मानवता ज्यों-ज्यों उन्नत होती जायगी, हम और आप भी आगे बढ़ते जायंगे। जब आत्मा फूलकी तरह खिल उठती है, जीवनमें नयी खूवियां पैदा हो जाती हैं, आपकी बुद्धि अमर-कर्मोका अमृत पी लेती है और आप समस्त पृथ्वीके मनुष्योंको अपना ही पिता, भाई और पुत्र समझने लगते हैं। में कहता हूं, आप स्वयं खुश रहकर जिन्दा रहें और दूसरोंको जिन्दा रहनेके अच्छेसे अच्छे मौके दें। आपकी त्रुटियों, भूलों और गलतियोंका हर समय संशोधन होना चाहिये। आपकी संकुचित बुद्धि और विचार जव व्यापक हो जायंगे, तव आप संसार भरके आदमियों को फायदे पहुंचाते रहेंगे, जिसका प्रभाव जनतापर पड़ेगा और जनता भापकी भक्त वन जायगी। आदमी ज्यादा दुखी और मनहूस क्यों होता है ? इसलिये कि वह अपने जादूघर आत्माके विराट रूपको नहीं पहचानता और यह भी सममनेकी कोशिश नहीं करता, हम कहां गलती कर रहे हैं और हमारे
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नारी-विद्रोह
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दुःखोंके कारण क्या हैं ? यदि वह अपने भूलोंमें परिवर्तन का
नाइयोंको दूर करनेकी चेष्टा करता है तो इसके यह मायने ।
उन्नतिके भण्डारमें चमत्कारोंके खजाने भर रहे हैं। परिवर्तित
नवीन स्फूर्तिको जन्म देती है। प्रत्येक नागरिककी जिन्दगी
सुनहरी दुनिया है। यदि उसमें दृढ़ निश्चयको कार्यान्वित
शक्ति नहीं, लापरवाही और अवारागदी है तो हम स्वयं जाने
तो वनाते ही जाते हैं, दूसरोंको भी मूर्ख बनाने में सहायता दे रहे है
जरा सोचिये, आपके चारों तरफ सहानुभूतिकी आवा
आपकी मातृमयी पृथ्वीके हर तरफ सामाजिक, साहित्यिक और र
नैतिक विचार जगमगाते रहने चाहिये। आप नित्य एक नया
बनाइये। प्रति दिन एक नये आदमीको खुरा कीजिये --मा
आप तीन सौ पैसठ आदमियोंमें अपनी प्रसन्नतायं बांट देंगे।
जिन्दगीका लावण्य और सफलताका महामन्त्र नहीं ?
N
आप स्वाधीन हैं। राष्ट्रको ऊंचे उठानेकी बागडोर आप
है। यदि आप अपनी आदतोंको प्यारमयी बना लेते है तो
ही सर्वसाधारणके हृदयमें स्नेहपात्र बन जाते हैं। हमारे र
और अनुभव हमारे शिक्षक हैं। यदि हम दूसरोंकी जिन्दगीमा
कर स्वयं सुखी रहनेकी चेष्टा करते हैं तो हम सिवा सार
इंसान तो कभी नहीं कहे जा सकते। स्वाधीन रहकर, हमा
की कला सीखनेकी जरूरत है। वह कला, जिसमें मारे और
दारीका वसंत लहराता हो। याने जो वस्तु हमारे हाथ में का
भी लाकर हम दूसरोंको दे दें। कितना महान और tr:
स्वतन्त्र जीवन । सोचकर देखिये-आपको कहा मौन
श्यकता है, कहां बोलनेकी जरूरन ? कहां किस दयान
किसे उभाड़ना ?
नागरिक-जीवन २०७ में आजकी बात कहता हूँ । आज हम स्वाधीन भारतके नागरिक है। उन भारतके, जिल भारतवर्षकी सबसे बड़ी विशेषता यह है कि या किसीको, किसी भी वस्तुका कभी त्याग नहीं करता। वल्कि सबको अपने में मिलाकर विश्वमें आत्म-ज्योतिका विस्तार करता है। यहांके आदमी पंडित, मानी और अहंकार शून्य हैं। इसके विरुद्ध, संसारके किसी भी देश में इस तरहकी आदर्श सभ्यताके दर्शन नहीं पाये जाते । उनमें जादा देग्विये, वहां विरोधकी भावनायें हैं। घृणा, तिरस्कार और निन्दाकी दीवालं खड़ी हैं। जो मनुष्यको मनुष्यसे अलग करती हैं और अपने स्वार्थकी पूर्तिके लिये षड़यन्त्रों और कूटनीतियोंका जहर फैलाती हैं। कहीं एक जाति दूसरी जातियोंको खदेड़ रही है। कहीं मारकाट और हिंसात्मक युद्धका दौर दौरा है। लेकिन धन्य है भारतवर्ष ! - जदांकी सभ्यता समस्त जातियोंको गलेसे लगाती है और आत्मा पर- मात्माके मिलन रूपको सार्थक कर दिखाती है। याद रखिये, -- हम चाहे स्त्री हो या पुरुप,-- स्वाधीन है। आज हमपर भविष्य निर्माणकी बहुत बड़ी जिम्मेदारी आ पड़ी है। हमारे पठोर परिश्रमसे कोटि कोटि मनुष्योंका निर्माण होगा। हजारों लाखों पालक बालिकाओंके भविष्य-जीवन उज्ज्वल होंगे। अब हमारे प्रति प्रभातमें जीवन और उल्लास चाहिये। यह न भूलिये, प्रत्येक मनुष्यकी जिन्दगी रहस्यमयी कहानियोंकी विराट पुस्तक है। जिसे पढ़कर मनुष्य बहुत कुछ सीखता है। हमारी मनुप्यताके माने हैं राष्ट्र रक्षक सैनिकोंका संगठित समूह । मानो संसारमें जय-प्राप्त करने के लिये ही स्वाधीन मनुष्योंका जन्म हुआ है। और इस प्राप्तिके लिये राष्ट्रने हमारे हाथमें विजय पताका प्रदान की है-लाल, हरी और सफेद। महाशक्तियोंका सम्मलित वरदान ! याद रखिये-यों तो राष्ट्र-विकाशके अनेकों महान रूप हैं। लेकिन में निम्नलिखित रूपोंको मुख्य मानता है जैसे प्राकृतिक, १०८ 'नारी-विद्रोह सामाजिक, साहित्यिक, राजनैतिक, आर्थिक, समाचारला. " रेडियो और सिनेमा- - - (१) प्राकृतिक- यह वह स्वाधीनता है, जिसके द्वारा प्रत्येक मनुष्यका है। और वह सुख शांतिकी जिन्दगी व्यतीत कर आगे बढ़ा प्रत्येक मनुष्य प्राकृतिक कारणोंसे सामाजिक और राजनैतिक धारण करता है। जो आदमी किसी राष्ट्रके आधीन मी का तो देवता है या पशु। मनुष्य अकेला कर्त्ता नहीं रहता। उसे न किसीका साथ चाहिये। स्वाधीन मनुष्यके लिये परतन्ना पीड़ा दायक है, उतनीही इन्सानसे अलग रहनेकी उसकी मन लेकिन प्रकृति मनुष्यका संगठित रूपसे संचालन करती है। उस गान साथ यदि किसी नगर या देहातकी जनसंख्या बढ़ जाती है, जो की तकलीफोंमें बाढ़का आना भी स्वाभाविक हो उठता है जिसे मार द्वारा दूर किया जा सकता है। यह संगठन क्या है ? एकदमा मदद और राष्ट्रकी कल्याण-साधना। मैं यह दायेके साथ माता ... विना संगठनके किसी भी राष्ट्रमें जिन्दगी नहीं आती। और तिर सर्वसाधारणके सहयोगके संगठन होता भी नहीं । (२) सामाजिक:- सामाजिक स्वतन्त्रता क्या है ? दूसरोंके अधिकार पर रुकावट न डालकर अपने अभिनय प्रयोग करना। जिसमें संगठित समाजके मुख शानिका फैलाव हो सके। समाजसे अलग रहकर किमी भी व्यनिक विकाश नहीं होता। सामाजिक मुयोगों और मुविधागडोर मनुप्य अपने व्यनित्यकी उन्नति करता है। यहां यह जानना है कि मनुष्य मिर्फ अपने परिवारको रेकर होमन -- E नागरिक-जीवन १०६ रेता। उसके सामने स्त्री पुरुषों का विराट मेला लगा रहता है। यहां यदि कोई आदमी जीवनको सफल बनाना चाहता है, तो सबसे पहले उसे जीवन धारणके उपाय ढूंढ़ निकालना चाहिये और उसे राष्ट्रका ऐसा सिपाही बनना चाहिये-जो हर समय सावधान रहे और किसी भी विदेशी आक्रमणको रोक सके। साथ ही अपनी आत्मरक्षाके लिये भी हर समय नैयार रहे। कुछ ऊबे और निराशावादी स्त्री पुरुप कहते -यदि हमें जीवन निर्माणका एक है, तो हम अपने जीवनको ध्वंस भी कर सकते हैं और इस ध्वंसवादका रुप वे आत्महत्याके द्वारा सम- भाना चाहते हैं। फिन्तु राष्ट्र कहता है आत्महत्या अपराध है और मैं भी कहता हूं ---"हां, अक्षम्य अपराध । फ्योंकि राष्ट्रको आपकी हर समय आवश्यकता है।" (३) साहित्यिकः- स्वाधीन भारतके प्रत्येक स्त्री पुरुषका कर्तव्य है-- वह अपने साहित्य को देखे, पढ़े, समझे और साहित्यिक बने। विना साहित्यके जीवन- निर्माणमें सौंदर्य नहीं उत्पन्न होता और बिना सौंदर्यके जिन्दगी वैसी ही रह जाती है, जैसे गंधहीन कुसुम । साहित्य जीवनको धन्य बनाता है, साहित्य मनुप्यकी अमर कीर्ति फैलाता है, साहित्य मानसिक शक्तियोंके बढ़ानेकी उम्दा खुराक है। इससे आदमीकी जड़ता नष्ट होती है, कुबुद्धिका नाश होता है, ज्ञानमें विज्ञान का चमत्कार फैलता है.-दुनिया झुकती है, साहित्य झुकानेवाला चाहिये। आप बहुत जल्द वे दृश्य देखनेके लिये तैयार रहिये-जय भारत- पर्पके प्रत्येक नागरिक अपने साहित्यसे विशेष प्रेम रखेंगे और साहि- त्यिक बनना उनके जीवनका मुख्य उद्देश्य हो जायगा है. और साहित्य पार लगानेवाली नौका । यदि आपकी जिन्दगी ज्वी, असाहित्यिक, ईपालु हो तो अपने पहोंको उस पायुमंडलमें दाखिल न कीजिये। और उन्हें साहित्य प्रेम, .. जीवन समुद्र ११० नारी-विद्रोह PAM राष्ट्र और आशाके प्रकाशमें जीते रहने दीजिये। यति । चाहते हैं तो अपने बच्चोंके साथ मिल जाइये और जोवन निर्माणकी ओर आगे बढ़िये । क्या आप छाती तानकर खड़े होना जानते हैं। ग कुलगे कैसे। किसी भी साहित्यिकके आसपास शिक्षाकी किरणों पली जिनके प्रकाशसे चारों तरफके वायुमण्डल अपने आप पर निर्माण करते हैं। आप राय देवी प्रसाद पूर्ण केश न भूलिये- अंधकार है यहां, जहां आदित्य नहीं है। है वह मुदा देश, जहां साहित्य नहीं है। (४) राजनैतिक- राजनैतिक स्वाधीनताके बलपर सम्पूर्ण राष्ट्र मंचालित जिस राष्ट्रके प्रत्येक नागरिकको उसके अधिकार दिले जाते है। राष्ट्रकी राजनैतिक स्वाधीनता सम्पूर्ग, सफल और व्यापक है। आज स्कूल, कालेज और विश्वविद्यालयोंग जो शिक्षा, उसीसे नागरिकोंका चरित्र गठन और भविष्यका नि: आजका सुयोग्य और आदर्श विद्याथी कलमा राजनैतिक और विचारोंका भाग्य-विधाता है। प्रत्येक बालक वाटिका : बनाना, प्रत्येक व्यक्तिको स्वाध्य आपर मनियम सामाजिक स्वार्थ पूर्ति के लिये व्यक्तिगत स्वाथीका त्याग करना नागरिकको राष्ट्रपूजा है। राष्ट्र जिस माग किसी भी मा. मांग करे शीघ्र उसे स्वच्य बनाना आवश्यक! मानी : स्वाधीनता आज प्रत्येक नागरिकको चाहिय: राष्ट्र-उन्नतिका वाधक । अधिकारी नियम प्रत्येक नागरिक, आध्यात्म भावांका विकास. आम 4.
नागरिक-जीवन बल चाहिये। विकसित दिमाग और स्वाधीन न रहनेले राजनैलिय. क्षेत्रों में सफलता नहीं प्राप्त की जा सकती। आत्मविकाश लिये आवश्यक छुट्टियोंका होना बहुत ही जसरी । जिनमें आस- विकाशके रास्ते प्रत्येक व्यक्तिके लिये न्बुले रहें। राष्ट्रका कर्मक्षेत्र है जनताका मत । जनताके अन्तित्यपर ही सर. कारका टिके रहना संभव है, मनुप्यकी प्रगति है स्मृति देनेवाली शकिः । इससे देशका व्यवसाय वाणिज्य पनपता है। साहित्य, समा: और फलाकी उन्नति होती है। किसी तरहकी भी संकीर्ण मनोवृत्ति मान- एत्याके समान है। बीते जमानेके कुसंस्कार, गिरे हुये आचार विचार और अंधविश्वास प्रगतिके दरवाजे बन्द कर देते है और उसमें किसी को न तो फायदा पहुंच सकता है और न आत्म-ज्योनिकी किरणं गंगा फैल सकती है। आप राष्ट्रपतिको जानते हैं ? राष्ट्रपतिकी आताओंका पालन करना और राष्ट्रीय कानूनोंको मानना आपकी सफलता. आपकी कामगाती । जनताकी कल्याणमयी भावना है। जिसमें जनता काममा समर्थन होता रहे। जीवनकी श्रेष्ठ विशेपता है-- देश र जोर समय देशके लिये जीवन और संपत्ति त्याग करनेकी बार किसी ने पचा खूष कहा है :- जो भरा नहीं है भावोंसे. वानी जिनमें निमारना यह हदय नहीं है, पत्थर है. जिसमें वदेशका चार न। (५) आर्थिक :- आज आर्थिक समस्याको कार प्रतिशत भारतीय जनता गरी किन ? आदमियोंकी है. जो भयर एसोते हैं जो या दूसरे शब्दोंमें घों फरिचे-दिन भर पा : सूखी रोटियां सात है। नौकरी नाम:
११२ नारो-विद्रोह आज रुपयेकी कीमत इतनी बढ़ गयी है कि जहां चार आने काम निकलता था, वहां अब एक रुपये में भी उसकी पूर्ति नहीं हो पात । इसमें हम केवल पूंजीपतियोंके ही सर्वनाशके नारे लगाये तो यह हमारी मूर्खता है। यह न कांग्रेसियोंकी गलती है, न अन्य माननीय नेताओं की। सम्पूर्ण पड़यन्त्र तो अंग्रेजी शासनका है, जिसने हमारे रक्तको जोंक वनकर चूसा और सदियोंसे गुलामीमें डालकर हमारे मस्तिकको इस तरहसे खोखला बना डाला कि हम किसी कामके न रहे। हमारे खानदानकी पुश्तोंमें वे रोग भर दिये गये-जिनकी दवाका आविष्कार करनेके लिये हमारे पास न दिल रह गया, न दिमाग। हम दूसरों को निंदा करनेमें अपना बड़ापन समझने लगे और जीवनका कीमती समय उन कांटोंमें फंसकर बर्बाद करने लगे। एक दूसरेकी सहायता करना तो दूर रहा, हम दुर्भाग्य और गंदगीकी सृष्टि कर उस कीड़ेके समान बन गये जो परनालेमें ही जीवनका श्रेष्ठ आनन्द समझता है। अफसोस ! सदियोंके करोड़ों गुलाम-कैदी अभी अभी जेलसे छूटे हैं। क्या संसारका कोई राष्ट्र उन्हें दो दिनोंमें राज सिंहासन पर बैठा सकता है - क्या किसी जादूकी लकड़ीमें वह खूबी है, जो उसे घुमा कर एक दिन लखपती करोड़पती बना दे । आज जगह जगह हड़तालं होती हैं, बेकार व्यक्ति खूनके आंसू बहा रहे हैं। यह क्यों ? आदमीफे दिमाग की गुलामी-कमजोरी। शिक्षाका अभाव । आपसी फट । घृणा, वृद्धि और जीवनमें आत्मवलका न होना । आपको यह भूलना न चाहिये कि हम एक स्वतंत्र नागरिकको है। यतसे पहले अपने आपको देखें, अपनी लिपटी हुई बुराइयोंको मन और मानसिक विकाशकी शिक्षा हासिल करें। आप एक है। हड्डी खून और मसालेसे बने हुए आदमी। अपने पैरों के बल न हो. अपने मुंहसे खायें और उस जमीन पर रहनेकी कोशिश करें -
नागरिक-जीवन
में
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मुग्य और मादय हो। पृछना , या, नौदर्य-जिसे मिट्टी बनानेकी
कोशिश की जाती है और जो मुरमा जाना है-किन कामका ?
मनुष्य पर अत्याचागंन हाथ इटाली-लेकिन इन बातकी प्रतिमा
पग-हम अन्यायको नान नहीं करेंगे। गरजनेसे बरतनवाले बादलों
की पीसन ज्यादा होती है। आपके मुंहके शब्द घोहो. किन्तु काय
अधिक। मठी सोग न मारिचे और न अपमानने लज्जित होइये--
याः कर्मयुग है। यान बनाने और होट फाड़काने का नहीं। को अपने
मौदर्यकी कसम खाकर कानाएं-मैंने तुम्हें मिट्टीसे बनाया है और
किसी दिन मिट्टी में मिला दूंगा।
आज में शरीर नवा ग्यन चाहिये नवीन मानका अन्युट्य ।
आप झुण्टक भएर संगठिन होकर जय-यात्रार, लिये आगे कर और
मानसिक शानियांक विकाशकी और च। आप स्वाधीन जीवनका
इतिहास याहीसे रहना चाहिये। यदि मनुष्य अपने उपर शासन
फरना नीग्य जाय और अत्याचारोग मुनि, कानी आज मत्र र
असत्यको लेकर जो लायालली जागी -पर विजय मा
और एम आलोक की दुनिया में आने ।
स्वाधीन जनता सपनापी निजीर पात्र
उतर फार शीम प्रमाणित कर देनी--हिर आदमीया
आत्मवल। भोग पिलानको धामीझा
नाम:
जाते हैं। इसलिये सावधान हो। दः पिचार :
लाखों फरोंली मानव-मययको अपना बनाया कि
आज विप्लपके नाम पर सामिल
है। लेकिन इन गुनानियों का कि
न यदायेगा। आदमी अंतरको सामान
पनापार ही दम लेगा। अपनीला
फरो। पा पा और तुममें कोई प :-
-- ११४ नारो-विद्रोह विवेकको खो देना पशुता है। एक दूसरेको प्रेमको निगाहोंसे देवन और उसपर श्रद्धा करना इन्सानियत है। मनुष्य मैशीन नहीं जो उसे मैशीन बनानेकी कोशिश की जाती है। मनुष्य आदमी है और वह अपने आत्मवल द्वारा हर तरहकी गरीबी दूरकर सकता है । गालि वह बेकारीसे परेशान है, उसकी जीविकाके प्रबन्धमें अड़चन डाले जाती हैं; वह अन्न-वस्त्रकी चिन्तासे मर रहा है, तो यहां न तो राज. नोतिका मूल्य है, न सामाजिक स्वतंत्रताका कोई अर्थ । (६) समाचार पत्रः-- कलमकी ताकतका मुकाबला न चमकती तलवार कर सकती है, न संसारके बड़े-से-बड़े विद्रोह । जनताको जगाती है कलम-और कलम जिस पथका निर्माण करती है, जनता उसी तरफ झुकती है। जनता की आवाज हैं समाचार पत्र । और उसके सम्पादक कलमसे जिन विचारों के वीज बोते हैं-वे भविष्यमें अन्न-वस्त्र और सुख शान्तिकी जिन्दगी बनकर आदमीके सामने आते हैं। राष्ट्रीय सरकारको चाहिये, वह इन कलाकार साहित्यिक महारथियों की हर तरहसे सहायता करे । पूर्ण सहयोग देकर उनके साथ काम करे। मैं भारतयर्पके सुप्रसिद्ध राष्ट्रकवि 'दिनकर'जी के शब्दोंको कभी न भूलूंगा। आप कहते हैं-"साहित्य आलोक है। जब वह पृथ्वीर आता है, तब उससे उन सभी लोगोंके घर प्रकाशित होते है जिन्नत अपनी खिड़कियोंको खोल रखा है।" चौकन्ने होकर देखिये-आज हमारा साहित्य स्वाधीन, भारत वर्ष स्वाधीन है। लेकिन हम अस्सी प्रतिशत गुलाम यह भी नहीं जागो स्वाधीनता किस चिड़ियाका नाम है ? पत्रकारोंका कर्तव्य है- जना को नयी-रोशनी दें-उसे शिक्षित बनायें। किसी भी माया विचार कांटोंको फूल बना देते हैं और फलोको रसीले फल । झूठी प्रशंसा किसी भी संपादकके किये कलंक है। अन्याय और
नागरिक-जीवन
-
पक्षपात किसी भी संपादकका नाम बदनाम कर देता है। संपादक मर
जानाद लेकिन वा जिन सत्य और न्यायका आविष्कार विश्व में
फैलाना है--उनकी कभी मृत्यु नहीं होनी ।
और सुनिये-
किनी दल विशेषके समर्थन में अपनी पलमको नीचे गिरा देना राष्ट्र
की पेशानी है। यदि आप गाष्ट्रका शुमार चारते हैं--तो नरोंको
आत्म सन्मानका मुभवलर अवश्य दीजिये। बदला लेनेकी भावनायें
या घृणा पलानेकी आदनं किनी भी समय जननाका अनिष्ट कर
सकती है।
आज गानय पचों ना, मानव ?
मानवताका अनाव कम छत्रको भी ध्यसकर गयाना. आध्या-
त्मिक शक्तियों को भी। आज का अपना शाशन है। और न
शाशनमें पत्रों मुकाव राष्ट्रको अधिक-से-अधिक मजबूत बना मग
हैं। या नच है, कि आदमीको भला-बुरा बनानेका कार-गरमा-
अपयश संपादकों हाथ: । यदि पोनपाय मलयान को
गाहराईसे नहीं मोचते. इमारले पालन न घाला. गो में कांगा भार
मनुप्यकी तरलियोंके गार्गः गोजमगाशी पनीर
द्रोहियोंका माध न देना चाहिये।
आज गनुप्यो नये रनमें लगाया मंचालन ।
हर स्वी-पुरपोपे, कानाम आत्मनामा पर:
राज-गार्गमें कोई दुर्गम
पार
पर-पर हो जायगा।
समाचार-पत्रों की मानि. किमी
परम आदरणीय मता पादिर
बीमा कमानान
जद नोप मालाकि को
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- ११६ नारी-विद्रोह (७) भापण:- जनमतके संगठनमें व्याख्यान मंच और व्याल्यानदाताको काम बड़ी कीमत है। समाचार पत्रोंसे ज्यादा व्याख्यानका प्रचार होता है। क्योंकि समाचार-पत्रोंको तो शिक्षित व्यक्ति ही पड़ते हैं. लेकिन व्याख्यान शिक्षित अशिक्षित सभी तरहके व्यक्ति सुनते हैं। जिससे उन्हें चेतना मिलती है और वे अपने साथियों में इसकी चर्चा तथा समा- लोचनाके कारण बन बैठते हैं। व्याख्यानदाताका व्यक्तित्व और उसके प्रभावशाली व्याख्यान जनतामें विद्युत प्रवाहोंकी सृष्टि करते है जिससे लोग व्याख्यानदाताके समर्थक बन जाते हैं और वे उसकी दलीलों और तर्कोसे बहुत-कुछ लाभ उठा लेते हैं। कितनी सिद्धकला छिपी है भापणमें। जनता किसीका भाग सुनकर खुशीसे हंस पड़ती है, किसीके भाषणसे उसका मन उत्तेजित हो जाता है किसीके भापण उसके हृदयमें आतंक पैदा कर देते हैं। का रुलाई आ जाती है। कहीं मोह । लेकिन किसी-किसी व्याख्यानमाला के भाषण इतने रद्दी होते हैं, कि लोग ऊब जाते हैं और सभा भंगा वहांसे चले जानेका इरादा कर लेते हैं। ऐसा क्यों होता है ? कहता हूं-व्याख्यानदातामें मनोरंजक शब्दोंकी कमी, गलं मिठास अभाव और व्यक्तित्व होनताके दर्शन । यह क्या बात है, महात्मा गांधीके भाषण सुननेके लिये लागों का. नारियोंकी भोड़ हो जाती थी, आपका व्याख्यान सुनने के लिये सम. वीस आदमी भी इकट्ठा नहीं होते। जरा महात्माजीकी भाषण मी का अंदाजा लगाइये और अपनी शक्ति-हीन व्याख्यान कलाको नय. दोनोंमें जमीन आसमानका अंतर है। मैं मानता हर आदमी महात्मा गांधी या पं. जवाहरलाल नेहरू नहीं हो सकता, लेकिन को और कोशिश करनेसे कलामें चमत्कार उत्पन्न हो जाता है और की झुण्ड जनता आपके सामने आकर बैठ जाती है। www नागरिक-जीवन ११७ किसी सफल व्याख्यानदाना और सफल अभिनेताको अलग- अलग निगाहोंसे नहीं देखता। दोनों जनताके हदय में प्रवेश कर जाते हैं, दोनों आश्चर्य है और दोनोंको सर्व साधारण जनता पाने के लिये चंन रहती है। शायद कोई व्याख्यान दाता मेरे शब्दों को सुनकर पाय, विगढ़ उठ और कई-व्याख्यानदानाका दजां बहुन ऊंचा ई- आपने अभिनेताके माध उसकी तुलना पयों की ?"-तो मेरा नियंदन है,-"यदि अभिनेता जनताका हृदय है तो व्याख्यान दाना-राष्ट्र निर्माता। बल्कि इलरं शब्दोंमें यह करना चाहिये - मंजारव हर आदमी अभिनेता और या. दुनिया में एक विशाल रंगमंच । जा आदमी आते हैं और जीवन-नाटक समान कर किसी अन्य शनि लय हो जाते हैं। कोई भी फलाहो. को भी भापण। आपये. बोलनेने जाद-ला असर होना चाहिये। जिसे सुनकर जनता प्रसन्न हो और ना. कारण हुई सभा भवनका त्याग करे.- पलां नामाका भाषण मन अगा गा और उसने हमने पान-गा. सीग्दा । एक सादमीने पृटा--"हिटलर और गुमालिनी ने अपने भाषण इच्छा शशिका अच्छा प्रयोग किया। लेकिन पाहिको:" मेरा उत्तर ---"टिलर और गुलोमिनी राशि भर मापन दायरेसे पहुन आगे बद गये। दोनों का निर...... हैं और पुराने संसारको नाम पर एक नाले का नाम पे अपने बांकारको लेकर आगे बजार गिरकर चकनाचूर हो गये। सारा जमाना जानना और मा आपारी रखी पुगप न किमी समाजमा में किसी दिन लागे बदमने। न. -मांकार आदीको ना पर . wall - ११८ नारी-विद्रोह निशानी है। अहंकारसे कोई भी स्त्री-पुरुष अपने पैरोंमें आप कुमा मार लेते हैं। जिसका नतीजा यह होता है--न उन स्त्री पुरुषों को किया की जरूरत होती है, न जनतामें उनका सन्मान बढ़ता है। (८) रेडियो:- समाचार-पत्र शिक्षित स्त्री-पुरुपोंके लिये हैं। वकृता मंच बड़े-गा शहरोंके लिये। लेकिन लाखों अशिक्षित या अर्द्ध शिक्षित लोगों आगे बढ़ानेवाली यदि कोई ताकत है तो वह है रेडियो। रेडियो मार नेता और महामानव अपने सिद्धान्तोंका प्रचार संसार भर में विशा करते हैं यदि जनताका रेडियोके साथ सहयोग हो जाता है तो इससे सर्व साधारणको अच्छा बल मिलता है और मामूलीसे मामूरी आदमी भी राष्ट्र-निर्माणमें सहायता पहुंचा सकते हैं। (६) सिनेमाः- जनताको मनोरंजन और शिक्षा देनेका सर्वश्रेष्ठ साधन है सिनेमा। आज भारतवर्पमें शायद ही कोई ऐसा व्यक्ति हो जिसे सिनेमासे प्रभ न हो! क्या धनी, क्या दरिद्र सभी लोग सिनेमा देखने दौड़ते है यहां तक कि सिनेमाके नामपर दूर देहातोंसे भी लोग दौड़े आते . और "राम राज्य" तथा "भरत मिलाप" जैसी फिल्में देखकर आप मस्तक झुकाते हैं। सिनेमा दृश्य काव्य है। उसकी घटनाओंको अपनी आंबर सामने घटते देख आदमीके मनपर गहरा प्रभाव पड़ता है। लेकिन भारतवर्षकी गरीब जनतामें जहां जीवन-विकासका उत्थान होना चाहिये, वहां मानसिक पतन ही ज्यादा हुआ। इसका प्रधान कार है, वासनामयो फिल्मोंका विशेष प्रचार। बल्कि दूसरे शब्दों में गः । यह कहूंगा -यदि अंग्रेजी शासनने हमें पंगु बना दिया है ना और रद्दी फिल्मोंके प्रदर्शनने हमारे जीवनको मटियामेट कर डाला है। हमारे गृहोंका निर्माण होना चाहिये--यहां ध्वंस चा, चलने लंग? ' ܝ ܀
नागरिक-जीवन
११६
हमारे अंदर शिक्षाकी ज्योनि फैलनी चाहिये-वहां शिक्षाक नामपर
अंधकार युग आ गया। इन चित्रोंने सिर्फ बन्धका ही नुकसान नहीं
किया - बल्कि उन ग्री-पुरयांकी तादाद को भी ज्यादा बढ़ाया-जो
सर्वनाशकी ही ओर बढ़ और उन दरख्तोंकी जड़ काटने लगे-जिन्हें
मारे पूर्व पुराने बड़ी मिहनतसे नीच कर नैयार किया था। मेरी
या दलील चाहे सिनेमा संचालकों और उसके निर्माताओंको धुरी
लगे लेकिन अनुभवी जनता यह जानती है वासनामयी विकृत फिल्मों
के प्रचारसे हमारे समाज और राष्ट्रको यात बड़ी हानि पहुंची है।
सिनेमा निर्माताआंका या उपद्रव बहुत दिनोंसे चल रहा है। और
में सुप्रसिद्ध उपन्यासकार प्रेमचन्दजीके शब्दों में बार-बार फगा-कि.
अधिकांश फिल्म निगांना आज इस स्वाधीन युग में भी जनताको दूध
फे बदले शराबही पिलाते रहे हैं। पया में अपने नफल पत्र संचालकों
से नम्रता पूर्वक या प्रश्न कर सकता कि आप आये दिन जनताको
पतनपी ओर बीच ले. जानेवाली री-गरी फिल्मोप, या
विज्ञापन छापामार पचों मालामाल हो र ? और पचा में बना
भी पूछ सकता - आप इन फिल्मोय. विरोध, भावाः पयों न
उठाते ? और यदि कोई लाम. विरोधी गुटनिता र
उसके सपनों नहीं माप ?
पर दिन नेतना भया जोर पापना नामाकर
निर्माता मालामाल हो गया। जन ...परमेसनामा
गिरता और मोटे-मोटे का का एमागील !"
मुस्कुराते हरा-" जनमाने या भागा' :
जान्नममें जाय। म से cि": :
पंसानि।"
नामोदरको परे नगर
पोनि सरारे
14
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१२० नारी-विद्रोह सुनता आ रहा हूं। आज सिनेमाका यह व्यवसाय भारता प्रधान व्यापार है। और मैं उसके व्यवसाइयोंके पास अपित- अधिक पैसे भी देखना चाहता हूं लेकिन उसका यह मतलब भारतीय संस्कृतिको हत्याकी जाय । जनताका चरित्र बल गिराना जाय या उन्हें मीठा जहर पिलाकर धीरे-धीरे मारा जाय। मा. जनताको लड़खड़ानेके लिये शराव नहीं, बल्कि पुष्टिकर दूध चाहिये। जिसमें वह पर नालेमें औंधे मुंह न गिरे, बल्कि अपनेको स्वस्थ्य बनाये आज जनताको मनोरंजन भी चाहिये और जरूर चाहिये। लीन वह मनोरंजन नहीं, जिससे वासनाकी उत्तेजना वढ़े। यह मनोरंजन जो आदमीके चरित्र बलको ऊँचा उठाते हुए उसके दिल और दिमागने फूलकी खूशबू पैदा करे। आज जनताको मनोरंजक शिक्षाप्रद कार- नियां चाहिये--जिनके संवाद और गीत राष्ट्र गौरवमें रोशनी पैदा कर सकें। आज अनुभवी जनताकी आवाज है -वासनामय विता चित्रोंका प्रचार बंद हो- चंद हो-बंद हो। कोई भी छोटा मोटा परिवार भविष्यकी राष्ट्र शक्ति है। कोई भी सिनेमा या थियेटर आजके आदमीकी आत्माका आहार है । पेनमें से वीज आप वोयेंगे, यदि उसकी सिंचाई अच्छी न हुई, उसको देगनेन और व्यवस्था पर ध्यान न दिया गया तो वीजकी जीवन- अवश्य नष्ट हो जायगी। दो शब्द में आधुनिक रंगमंच या थियेटरके लिये भी कगा। आ. हमें सिनेमाकी भी जरूरत है और थियेटरकी भी। लेकिन जीव मैंने सिनेमाके लिये कही हैं-ठीक वैसी ही बात थियेटरकी दुनिया भी आती हैं। सिनेमासे कम ऊंचा स्थान थियेटरका नहीं है। कि कहीं-कहीं तो में सिनेमासे अधिक ऊंचा स्थान थियेटरफा पाई। दोनों ही हमारे नागरिक जीवनको उन्नत बनाने वाले हैं। इस में में श्री शांतारामको "अपना देश की रचनाके लिये विशेष पन्ना नागरिक-जीवन १२१ दंगा। श्री पृथ्वीराज कपुरकी "दीवार" और "पठान" के लिये बधाई दंगा और कलकत्त के श्रेष्ट नागरिक तथा सुप्रसिद्ध कलाकार श्री रणधीर साहित्यालंकारको उनकी रंगमंचकी रचना "झांसीकी रानी" और "सरदार भगतसिंह के लिये कहूंगा-आपका प्रत्येक प्रभात मंगलमय दो। आपकी सफलता स्वतंत्र जन-जीवनके लिये प्रकाशकी किरणं हैं। एमारा सिद्धान्त होना चाहिये -"हम समस्त नागरिकोंके लिये हैं, और समस्त नागरिक हमारे लिये। मनुष्यका मनुप्यके साथ संबंध होना प्रधान यस्तु है । एक दुसरेके साथ प्रीति वंधन आनंदमय सद्गुण । एससे उस साम्राज्यकी रचना होती है-जिसका नाम है-रामराज्य । और जिसके द्वारा सिर्फ भारतवर्ष ही नहीं, बल्कि विश्वमें हमारी मांग बढ़ती जाती है। समझे आप ? हमारे नागरिक जीवनका घनिष्ठ संबंध है कानून से। जहां कानून नहीं, यहाँ उच्छलता और वर्वरता है। शांतिकी जगह अराजकता और अशांति है। जिसके एकमात्र रक्षक है-प्रत्येक स्त्री- पुरप, प्रत्येक नागरिक जीवन और उनकी सतर्फ दृष्टि !
भविष्यमें क्या होगा? आज मेरी आंखाके सामने भविष्य जीवनका यह सुन्दर निहित दे रहा है जिसमें पृथ्वी मंडलके सब मनुष्य समान हैं-और के कमा प्रेम, उदारता, सहानुभूति और न्यायकी सीढ़ियों पर चढ़ रहे हैं। मेरा चित्र यह भी बताता है हम एक दूसरेके प्रति लोक आदर सन्मान बढ़ायेंगे-त्यों-त्यों एक दूसरेके निकट होते जायेंगे- आगे चलकर हमारा संसार उस परिवारके रूपमें बदल जायगा-~- किसी तरहका जातीय भेद न होगा। स्वार्थका पर्दा उठ जायगा और आदमीकी सबसे बड़ी स्वाधीनता होगी-उसके स्वतंत्र विचारोंकी। इन विचारोंके कारण मनुष्य दूसरे मनुष्यको अप्रिय न जान पड़ेगा। पार पुण्य, धर्म, अधर्म, सदाचार और व्यभिचार इत्यादिको लेकर व्यय वहस और लड़ाइयां न होंगी। लोग समयकी कीमत पहचानने और वर्तमान समयमें जैसे धनके वलपर एक आदमी अनेकों आदमियों अपना गुलाम बनाये रखता है, भविष्यमें वसा न होगा। धना कोई बल न रह जायगा। वह किसीकी व्यक्तिगत सम्पत्ति न हो बल्कि सामुहिक रूपसे उसपर सवका अधिकार होगा। मेरे चित्रमें कविताकी वे रेखायें भी हैं--जो स्पष्ट रूपसे अना हैं-आदमीकी किसी भी किस्मकी बीमारी अपराध मममी जाय। अपराध करनेवाले स्त्री-पुरुष रोगी होंगे और उनकी दवा पी जाये। कत्ल और बलवा करनेवाले रोग बहुत बड़े समझे जायंगे और मा चिकित्सा विशेष प्रेम और सावधानीसे की जायगी। जन मा सुख पहुंचानेकी इच्छा सबमें सदेव रहेगी और जिन्दगीको मार यशस्वी बनानेके लिये क्या राजनीति, क्या साहित्य और या जिक भावनाओंमें सभी स्त्री-पुरुष और बच्चे आत्मबलका प्रदर्शन जा भारतीय संस्कृति के विकाश और नारीके सद्गुणोंसे संमार शांति उत्पन्न होगी। बाहरी स्त्रियोंको लोग मा-बहन, का.
भनियम क्या होगा ?
१२३
यश माता-पिताका देवता जग्गा सम्मान करेंगे। सांसारिक काम करने
के लिये, भोजनके लिये, विनोद और विधामके लिये. अलग-अलग
स्थान इंगि और छोटे-से-छोटे कार्यामं भी लोग अपने कर्तव्यका पालन
मदाई नया ईमानदारीसे करेंगे।
मने अपने चित्रको पद ध्यानसे देखा है-और फिन्नी अदृश्य शक्ति
ने मुग बनाया है--नागरी लिपि और राष्ट्रभाषा हिन्दी विश्वभर में फैल
जायगी। गनुप्यके वंशज-नारीकी संतानं-उस्ताद और चालाक
होगी। इनका शरीर लंबा, निरोगी और चेहरा बहुत ही आकर्षक
गोमल नया स्नेहमय होगा! पुलमणी, कर्फशा और गुलटा स्त्रियां
समाजकी छातीपर विचरणकर अनाको मृष्टि पाहे भले ही कर लें.
किन्तु उनकी की याद नहोगी। लोगोंको विग्याई भी दंगी में बहन
वाम तादाद में गमगाजार निपं दम ।
आदर्श नारी अपने गुगन्य और फतच्चको पा.पानगी । उसकारा
राष्ट्रका महा गंगार होगा। पाः पुगपको मुनि और ग्वाधीनताका प्रिय
परदान देगी। जिसमें परित्र निर्माण विभाग और मारे मानने
प्रमाता, सौदर्य और मिलिग माम प्रसाद पालियों में आने दिया।
मैने या चित्रपड़ी मार, मामला ! और मेली रकम
आदमीको जिन्दगी ही नाम
अप भारतीय मान्यताका साजन! ..
तथा पा लिने पर
मानभिरापन
नियन पोरगे .
सत. सीन
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Marwari
"विज्ञान-मन्दिर" की अमर-पुस्तकें भारतवर्षकी स्वाधीन जनताके लिये जीवन और sain देनेवाली सर्वश्रेष्ठ हिन्दी पुस्तकें-जिनका प्रचार सिर्फ भारत * ही नहीं, बल्कि सम्पूर्ण एशिया और विश्वके कोने कोने फैल रहा है ! . (६ ठा संस्करण) १ आकर्षण शक्ति २ नयी रोशनी ३ स्त्री पुरुष ४ समाज-विप्लव- (४ था (४ था ... ५ कोटा (४ था संस्करण) ६ नारंगी (३रा ७ बारूद (दूसरा ८ लतिका k ६ हलाहल १० श्री गुलाबजीकी श्रेष्ठ कहानियां ११ कुंकुम 20 १२ ओट में- और भी ढेरों पुस्तक-एजेंसीके लिये लिग पता-विज्ञान-मन्दिर है, प्रामण पाहा सेन (बलरामदे मीट) काट