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Shri Vichar Dipak

Swami Bramhanand · 2012/08

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(श्लोकः)
पवनभोजनभोजनवाहनं
हलधरासनभूपणपासनः ।
जलदजन्मसमाश्रयजेक्षणं
गिरिसुताधवजाधवमाभजे ॥
६ पुस्तक १८६७ सय २५ तमराजनियमानुमारणाहिनमस्ति
भर प्रथस्य पुनर्मुदणाधिकारा. प्रकाशचित्रा स्यीकृताः मन्ति
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प्रस्तावना. ॐ सर्व महाशय सज्जनोंको विदित हो कि इदानीकालमें इस भारतवर्पवासि आस्तिक लोकोंमे वेदातमतका विशेषकरके प्रचार होरहा है औ विचारदृष्टि से देखें तो अन्य सर्व मतोंसें यह वेदातमतहि वेदप्रमाणयुक्त सर्वोत्तम निश्चित होवे है का- हेते अन्य जो योग मीमासा जैन बौद्धादिक मत है सो सर्वहि नानाप्रकारकी क्रियाजालकरके सकुल है तिस क्रियाजालमे सा हुया पुरुष कदाचित्भी निष्क्रिय होकरके अखड अ- कित्रिम परमानदका अनुभव नहीं करसकै है औ वेदातमार्गसें कर्ता भोक्तापनेका अभिमान दूर करके अपणे निष्क्रिय धात आत्मस्वरूपमे पुरुपकी स्थिति होवेहै इस कारणसे प्र- क्षहि इसकी सर्वोत्तमता प्रतीत होवेहै सो यद्यपि तिस वे- तमतके प्रतिपादक उपनिषत् ब्रह्मसूत्र भगवत्गीता इत्यादि हानेक सस्कृतशास्त्र जगत्में प्रसिद्ध है परतुं अल्पबुद्धिवाले सज्ञासु जनोको तिनका यथार्थ अभिप्राय जानना कठिन है हेते तिनके मूल औ भाष्यादिकोंमे अन्यमतोंके खडनमडन- वास्ते आचार्यलोकोंने अनेकप्रकारकी सूक्ष्मयुक्तिया कथन भी है तथा हिदीभाषामे जो विचारसागर वृत्तिप्रभाकरादिक

ग्रंथ है तिनमेंभी विशेषकरके खडनमडन लिखा हुया है यातें
सोभी चिरकाल प्रयासके विना अल्पमति पुरुषोंकी बुद्धिमे ठी
कठीक आरोहण होने कठिन है याते अतिसुगम अल्सविस्तार
विवादसे रहित उपयोगिमात्र सर्न वेदातसिद्धातका सारभूत
जो यह निचारदीपरनाम नवीन अथ है सो निस पुरुपको।
अपने हृदयरूप मदिरसे अज्ञानरूप अधकार दूर करनेकी
वाछा हो उसको अवश्य यह विचारदीपक अपने हाथमे ले.
करके नेत्ररूप झरोखेद्वारा अपणे हृदयरूप मदिरमें स्थापन
करना योग्य है
आगे यथामति शोधनेसेंभी जो कहि इसमे अक्षर वा मा.
त्राका व्यतिकम प्रतीत होवे तो अतमे लगेहुये शुद्धिपत्रसे)
तथा अपनी बुद्धिसे महाशयोंको स्वयमेव शोधलेना उचित
है--सो यह अथ योगक्लद्रुमादिक अथके बनानेहा
ब्रह्मानद परमहसनें निर्माण किया है सो भाई प्रभाश
वि० जटाशकरकी सहायतासे निर्णयसागरप्रेसके अधिपति
अपनी तरफ्में छापकरके प्रसिद्ध किया है इत्यल मुज्ञेषु
स्वा० ब्रह्मानंदः.

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॥ श्रीमत्परमहसब्रह्मानदस्वामी ॥

न श्रीपरमात्मने नमः श्रीविचारदीपकप्रारम्भः ना ) 'मंगलम्।। फणीन्द्रभोगामलतल्पशायिने दुरंतदुर्शयविचित्रमायिने । समस्तसवैकहृदजयायिने नमोस्तु मेशाय विमोक्षदायिने ॥१॥ मित्या पादांबुजं विष्णोरल्पधीबोधसिद्धये । भावार्थभासिनी कुर्वे भापाटीको यथामति ।। टीका-श्रीगणपतये नमः ॥ प्रारब्ध ग्रंथकी नि. स परिसमाप्तिके अर्थ शास्त्रकी आज्ञासें औ परं- वृद्धव्यवहारसे कर्तव्यताकू प्राप्त भया जो भंग- चरण तिसकू प्रथम अपने हृदयमें अनुष्ठान करके अन्य लोकोंकी प्रवृत्तिके अर्थ ग्रंथकार ग्रंथके

"
आदिमें एक श्लोककरके कथन करे हैं ॥ सो मंगल
" वस्तुनिर्देशरूप, आशीर्वादरूप औ नमस्काररूप
इस भेदसें तीन प्रकारका होवे है ॥ तिनमेंसे अपने
इष्टदेव अथवा परमात्माके केवल स्वरूपमात्रका जो
कथन है तिसकू वस्तुनिर्देशमंगल कहते हैं, 'औ जो
इष्टदेव अथवा परमात्माके स्मरणपूर्वक शिष्योंके का,
ल्याणार्थ आशीर्वादका कथन है सो आशीर्वादरूप
मंगल कहिये है । तथा इष्टदेव अथवा परमात्माके
प्रति जो नमस्कार करना है सो नमस्काररूप मंगल
कहिये है । सो तिनमेंसें तृतीय जो नमस्काररूप म.
गल है सोई इस स्थलमें करे हैं ॥ फणीन्द्र इति ।।
(फणीन्द्रभोगामलतल्पशायिने) कहिये फणीन्द्र
शेषनाग तिसके भोग कहिये शरीररुप जो नि...
श्वेत शय्या है तिसके ऊपर सर्वदा क्षीरसागरमें जी
शयन करते हैं । औ (दुरंतदुर्जेयविचित्रमापिने)
कहिये जिसका अंत लेना अत्यंत दुष्कर है औ जि.
सका यथार्थ जाननाभी अत्यंत कठिन है तथा जि.
सकी नानाप्रकारकी विचित्र शाफियां है ऐसी जो
अनिर्वचनीय अघटघटनापटीयसी अर्थात् जो वार्ता

[३] किसी प्रकारसेंभी नहीं घट सकै तिसके घटाय देनेमें कुशल मायाशक्ति है, तिसकेभी जो अधिष्ठाता पति हैं। तथा गीताके सप्तमाध्यायमें श्रीकृष्णभगवान्- जीनें अपने मुखसहि कहा "दैवी ह्येपा गुणमयी मम माया दुरत्यया" अर्थ-हे अर्जुन, यह जो त्रिगुणमयी मेरी दैवी शक्तिरूप माया है सो दुर- त्यया कहिये तिसका तरना अत्यंत कठिन है इति ॥ मूलश्लोकके प्रथम पादविषे जो कथन किया कि जो सर्वदाहि क्षीरसागरमें शेषनागकी शय्यापर शयन करते हैं सो इस कथनसें एकदेशी होनेतें भगवानकी परिच्छिन्नता सिद्ध होते है यातें अब तिस शंकाके निराकरणके अर्थ तीसरा पाद कहे हैं (समस्तसत्दै- कहृदजयायिने) कहिये यावत्मात्र जगत्में चरा- चरभूत प्राणि हैं तिन सर्वके हृदयरूप कमलविपे ग- मन करनेहारे अर्थात् तिनके अंत:करणमें अंतर्यामि- रूपसें स्थित होनेहारे ॥ यह वार्ताभी गीताके दश- माध्यायमें कथन करी है " अहमात्मा गुडाकेश स- र्वभूताशयस्थितः" अर्थ- हे गुडाकेश कहिये अ. र्जुन, मैं सर्व भूतप्राणियोंके अंत:करणमें साक्षी आ- [४] स्मारूपसें स्थित होय रहाई इति ॥ तथा (विमोक्ष. दायिने) कहिये जो अपने श्रद्धापूर्वक स्मरण करने हारे भक्तजनोंकेप्रति मोक्षपदके देनेहारे हैं, यह वा- तभी गीताके बारवें अध्यायमें कथन करी है"ते- पामहं समुद्धर्ता मृत्युसंसारसागरात् । भवामि न चिरात् पार्थ मय्यावेशितचेतसाम्" अर्थ-हे पार्थ कहिये अर्जुन, जो मेरेविपे चित्तकू एकाग्र लगाय करके मेरा स्मरण करते हैं तिन पुरुपोंका मैं शीमहि जन्ममरणरूप संसारसमुद्रसे उद्धार कर लेताहुं इति।। सो इन पूर्वोक्त सर्व विशेषणोंकरके संयुक्त जो मेश कहिये मा जो लक्ष्मी तिसके पति विष्णु भगवान् है तिनके प्रति 'नमोस्तु' कहिये ग्रंथकी निर्विघ्न प- रिसमाप्तिके अर्थ मेरी वारंवार नम्रतापूर्वक नमस्कार होवो इति ॥ तथा इस मंगलाचरणके श्लोकद्वाराहि इस ग्रंथके जो विपयनयोजनादि च्यारिं अनुबंध हैं सोभी मंथकारने सूचन किये है ॥ जैसे कि मूलश्लो- कमें जो प्रथमके दोनों पादोंसें ईश्वरके लक्षण कथन करके पुनः तीसरे पादविपे तिसहि ईश्वरकी सर्व भू- तप्राणियोंके हृदयकमलमें स्थिति कथन करी है ति- I ५ ] सकरके "तत्त्वमसि" आदि महावाक्योंकरके प्रति- पादित जो ईश्वर औ जीवकी एकता है सोई इस ग्रंथका विषय सूचन किया है । तथा पश्चात् चतुर्थ- पादविपे जो (विमोक्षदायिने) यह पद है तिसक- रके सर्व दुःखोंकी अत्यंत निवृत्ति औ निरतिशय प. रमानंदकी प्राप्तिरूप जो कैवल्यमोक्ष है सोई इस ग्रं. थका प्रयोजन सूचन किया है । तथा तहांहि चतु- र्थपादमें जो (नमोस्तु मेशाय) अर्थात् लक्ष्मीके पति भगवान्केप्रति नमस्कार होवो यह पद कथन किया है, तिसकरके आर्जवता करके उपलक्षित जो विवे- कवैराग्यादि साधनोंकरके संपन्न, मोक्षकी उत्कट इच्छावाला जिज्ञासु पुरुष है, सोई इस ग्रंथका अ- धिकारी सूचन किया है । तथा ग्रंथका औ जीवन- झकी एकताका परस्पर प्रतिपाद्यप्रतिपादकमावसंबंध है अर्थात् ग्रंथ प्रतिपादक है औ एकता प्रतिपाद्य है ॥ तथा सर्व दुःखोंकी निवृत्ति औ परमानंदकी प्राप्तिरूप जो मोक्ष है, तिसका औ अधिकारी पुरु- पका परस्पर प्राप्यमापकभावसंबंध है, अर्थात् मोक्ष प्राप्य है औ अधिकारी तिसका प्रापक है। तथा जी. .

- चब्रह्मकी एकताके ज्ञानका औ ग्रंथका परस्पर जन्य- जनकभावसंबंध है अर्थात् ज्ञान जन्य है औं ग्रंथ तिसका विचारद्वारा जनक है ॥ इत्यादि अन्यभी परस्पर संबंध जान लेने इति ॥१॥ इस प्रकारसें मंगलाचरण औ अधिकारी जनोंकी प्रवृत्तिके अर्थ ग्रंथके च्यारि अनुबंध सूचन करके अब इस ग्रंथके नाम अनुसार विचारकू दीपकरूपसें वर्णन करे हैं ॥ स. च्छास्त्रतैल इति- सच्छास्त्रतैलश्च विरागवर्तिक- श्वेतः सुपात्रश्च गुरूक्तिपावकः ॥ निर्वातहृङ्गतः प्रकाशयेत सर्वेप्सितं वस्तुविचारदीपकः ॥२॥ टीका-विचाररूप एक दीपकं है सो जैसे दी- पकमें तैल होवे है तैसेहि विचाररूप दीपकमें सत्- शास्त्र जो भगवद्गीता उपनिषदादि हैं सोई तैलस्था. नीय हैं; काहेते, जैसे तैलके विना दीपक प्रज्वलित नहि होवेहै तैसेहि सत्शास्त्रके गुरुमुखद्वारा श्रवण अथवा अपने अवलोकन किये विना विचारकी उ-

[७]
सत्ति नहि होवेहै ॥ औ जैसे दीपकमें पति होवेहै
तैसेहि विचाररूप दीपकमें विरागरूपवति है, काहेते,
जैसे चर्तिके विना एकला तैल व्यर्थ होवेहै तैसेहि
विरागके नहि होनेतें स्त्री आदिक विषयोंमें निरंतर
आसक्ति होनेते सत्शास्त्रका श्रवणादि व्यर्थ होवेहै।।
औ जैसे दीपक किसी मृत्तिकादिके पात्रमें प्रज्वलित
होवेहै तैसेहि विचाररूप दीपक चित्तरूप सुंदर पात्रमें
प्रज्वलित होवेहै; काहेतें जैसे पात्रके विना तैल औ
पति व्यर्थ होवेंहैं तैसेहि चित्तकी स्थिति औ श्रद्धा-
विना सत्शास्त्र औ विराग व्यर्थ होवे ।। औ जैसे
दीपक अनिके स्पर्श करनेते प्रज्वलित होवेहै तैसेहि
विचाररूप दीपक तत्त्ववेत्ता गुरुके वाक्यके चित्तसे
स्पर्श करनेसें प्रज्वलित होवेहै; काहे जैसे अग्निके
विना तैलादिक प्रकाश करने में समर्थ नहि होवेहैं
तैसेहि तत्ववेत्ता गुरुके वाक्यविना सत्शास्त्रादिक
ज्ञानरूप प्रकाश करनेमें समर्थ नहि होवेहैं । यह
वार्ता सामवेदकी छांदोग्यउपनिपत्में भी कथन करी
है "आचार्यवान् पुरुषो वेद" अर्थ-तिस आत्माकू
गुरुवाला पुरुपहि जानेहै इति ॥ औ जैसे दीपक वा-

[] युसे रहित स्थानमें स्थित भया सर्व वांछित वस्तुबाकू साक्षात् प्रकाश करेहै तैसेहि विचाररूप दीपक कु- संगरूप वायुसे रहित भये हृदयरूप स्थानमें स्थित भया सर्वको वांछित जो आत्मारूप वस्तु है तिसकूँ साक्षात् अर्थात् संशयविपरीतभावनासे रहित प्रकाश करेहै इति ॥ २॥ इस प्रकारसें विचारकू दीपकरू- पसें निरूपण करके अव च्यारि श्लोकोंकरके तिस विचारकी अवश्य कर्तव्यता वर्णन करे हैं। कली हीति- कलौ हि योगो न जपस्तपो व्रतं न चापि यागो न सुरार्चनं तथा ॥ प्रयाति सिद्धि दुरितमभावत- स्ततो विचारैकपरायणो भवेत् ॥३॥ टीका-'कलौ' कहिये इस कलियुगमें दुरित जो पाप है तिसके प्रभाव अर्थात् बहुलताके होने (यांगो) कहिये यम नियमादि अष्टांगरूप जो योग है सो टीकठीक सिद्धिकुं प्राप्त नहि होवेहै, काहेत पूर्व सतयुगादिकोंमें पुरुषोंकी आयु बडी होतीथी [९] औ योगविद्याके जाननेहारे योगीलोकभी बहुत हो- तेथे औ पुरुषोंके शरीरों में सामर्थ्य औ नीरोगतादि सर्व व्यवहारभी अनुकूल होताथा यातें तिस कालमें . योगकी सिद्धि शीघ्रहि होजातीथी। औ इस समयमें तो उक्त सर्व वार्तायोंके विपरीत होनेते यथार्थ ति- सकी सिद्धि नहि होवेहै । तथा (जपः) कहिये गा- यत्री आदि मंत्रोंका जो जप करना है सोभी सिद्ध नहि होवेहै; काहेते विशेषकरके इस समयमें सर्व मंत्र कीलित औ शापयुक्त होय रहे हैं ॥ तथा पार्व- तीके प्रति महादेवजीने भी कहा है "जिहा दग्धा परान्नेन हस्तौ दग्धौ प्रतिग्रहात् । परस्त्रीभिमनो दग्धं कथं सिद्धिर्वरानने " अर्थ-हे वरानने क. हिये पार्वति, कलियुगमें ब्राह्मणादिकोंकी जिव्हा तो पराये अन्न भक्षण करके दग्ध होवेहै अर्थात् दूर पित होवेहै औ हस्तौ कहिये दोनों हाथ शुभाशुभ दान लेनेकरके दग्ध होवेहैं तथा परस्त्रियोंके चिंतन करके अभ्यंतरसें मन दग्ध होवेहै तो (कथं सिद्धिः) कहिये मंत्रादिकोंकी सिद्धि किस प्रकारसे होसकै है इति । तथा (तपो) कहिये पंचाग्नितपनादिरूप जो , [१०] तप है तिसकीभी सिद्धि नहि होवेहै, काहेतें इस समयमें प्रायः पुरुष इन्द्रियारामी होय रहे है औ छोटी अवस्थामेंहि विषयासक्त होनेते शरीरमें बलके अभाव होनेतें तप करनेमें समर्थ नहि होवेहैं ।। तथा (व्रतं) कहिये कृच्छ्रचांद्रायणादि जो व्रत हैं तिन. कीभी सिद्धि नहि होवेहै, काहेतें कलियुगमें प्राण अन्नके आश्रयं रहते हैं। यह वार्ता पराशरसंहिता- मेंभी कथन करी है "कृते चास्थिगताः प्राणास्त्रे. तायां मांससंस्थिताः । द्वापरे रुधिरं यावत् कलाव- नादिषु स्थिताः" अर्थ-सतयुगमें पुरुषोंके प्राण अस्थियोंके आश्रय रहतेथे ओ त्रेतामें मांसके आ- श्रय रहतेथे औ पुनः द्वापरमें रुधिरके आश्रय रहने लगे औ अव कलियुगमें तो केवल अन्नके आश्रयहि रहते हैं ॥ आदिशब्दकरके दुग्धादिकोंका ग्रहण जान लेना इति । यातें व्रतोंकी सिद्धि नहि होवेहै औ जो केचित् श्रद्धालु पुरुप हठ करके करतेभी है तो तिनके शरीरमें प्रायः कोई न कोई रोग उत्पन्न होजावे है। तथा (यागो) कहिये अश्वमेध राजसू. यादि जो यज्ञ हैं तिनकीभी इस समयमें सिद्धि नहि होवेहै; काहे तिनके योग्य विपुल द्रव्य औ तिनके करानेहारे ऋत्विज औ तिस प्रकारकी मंत्रोंमें शक्ति इस कालमें नहि देखनेमें आये है ॥ तथा (सुरार्च नं) कहिये महादेवादि देवोंका जो पूजन है सोभी सिद्ध नहि होवेहै; काहेते प्रथम तो तिस प्रकारकी श्रद्धा होनीहि अत्यंत दुर्लभ है औ दूसरे प्रायः म. |लोकसे देवता चले गये हैं यह वार्ता अन्यस्मृति- मेंभी कथन करी है "कलौ दशसहस्रांते हरिस्त्य- श्यति मेदिनीं । तदर्थं जाह्नवीतोयं तदर्धे ग्रामदेव- ताः" अर्थ-दश हजार कलियुगके व्यतीत हो- नेसें विष्णु भगवान् पृथिवीका परित्याग करदेवेंगे औ तदर्घ कहिये तिसके अर्ध अर्थात् पांच हजार वर्ष में गंगाजी पृथ्वीका त्याग करके चलीजावेंगी त- था अढाई हजार वर्षके होनेते (मामदेवताः) क- हिये ग्रामवासी जो देवता हैं सो चले जायेंगे इति ॥ औ पापकी बहुलता तो सर्व उक्तवार्तायोंकी असि- द्धिमें हेतु जान लेनी ॥ औ जो केचित् सत्पुरुष नि. प्पापभी देखनेमें आते हैं तिनकोंभी एक दूसरेके सं- सर्गसें पापके भागी होनेते जपादिकोंकी सिद्धि नहि [ १२ ] होवेहै यह वार्ता महाभारतमें व्यासजीनेंभी कथन करीहै " असतां दर्शनात् स्पर्शात् संजल्पाच सहास- नात् । धर्माचाराः प्रहीयते सिद्ध्यति नैव मानवा:' अर्थ-पापी पुरुषोंके दर्शन औ तिनके साथ स्पर्श तथा संभाषण औ तिनके साथ बैठने करके धर्मा- चारोंकी हानि होनेतें पुरुषोंकू सिद्धिकी प्राप्ति नहि होवेहै इति ॥ याते विवेकी पुरुषकों इस कालमें तो अन्य सर्व उपायोंका परित्याग करके (विचारकपरा- यणो भवेत् ) कहिये केवल एक विचारकेहि तत्पर होना योग्य है इति ॥३॥ किंच विचारके विना यह पुरुष पशुके समान होवेहै यह वार्ता कथन करे हैं । आहारनिद्रादीति- आहारनिद्रादि समं शरीरिषु वैशेष्यमेकं हि नरे विचारणम् ।। नोज्झितः पक्षिपशूपमः स्मृत- स्तस्माद्विचारैकपरायणो भवेत् ॥ ४ ॥ टीका-आहारनिद्रादि कहिये आहार जो भो. जन करना है औ निद्रा जो शयन करना है आदि.

[१३ } शब्दसें भय मैथुनादिकोंका ग्रहण जान लेने सोपह सर्व धर्म सर्व पक्षी पशु मनुष्यादि देहधारियों में स- मानहि देखने में आते हैं परंतु तिनमेसें मनुष्यों के वल सत् असत्का जो विचार करना है सोई (वैशेष्य) कहिये विशेषता है औ जो पुरुष तिस विचारकरके शून्य है सो तो पक्षी औ पशुवोंके समानहि होवेहै। यह वार्ता हितोपदेशमेंभी कथन करी है "अहितहि- तविचारशून्यबुद्धेः श्रुतिसमयैर्वहुभिस्तिरस्कृतस्य । उ- दरभरणमात्रकेवलेच्छोः पुरुषपशोश्च पशोच को वि- शेषः" अर्थ-जिस पुरुषकी बुद्धि अपने हित औ अ- हित वस्तुके विचारकरके शून्य है औ जो वेदमें संध्या तर्पण अग्निहोत्रादि नित्यनैमित्तिक कर्मविधान कीये हैं तिन सर्व करकेभी वर्जित है औ केवल अपनेहि उदर पूर्ण करनेकी इच्छावाला है तिस पुरुषरूप पशु औ दूसरे बैलादिक पशुवों में क्या भेद है अर्थात् कु- छभी भेद नहि है इति ॥ यातैभी (विचारैकपरायणो- भवेत्) कहिये विवेकी पुरुषकों अवश्य सर्वकाल वि- चारकेहि परायण होना योग्य है इति ॥४॥ किंच विचारके विना वनमें जानेसेंभी पुरुपकुं सुखकी प्राप्ति - [१४] नहि होवेहै यह वार्ता कथन करें, ॥ विचारहीन- स्थति- विचारहीनस्य वनेऽपि बंधनं भवेदवश्यं भरतादिवद्यतः ॥ गृहेऽपि मुक्तो जनकादिवङ्गवे- ततो विचारकपरायणो भवेत् ॥ ५ ॥ टीका--(विचारहीनस्य) कहिये सत् असत्के विचारकरके हीन जो पुरुप है तिसको (वनेपि)क- हिये हिमालयादि पर्वतोंके गहन वनोंविषे चले जा- नेसेंभी जडभरत भंगीऋपि अग्नीध्र आदिकोंकी न्याई अवश्य बंधनकी प्राप्ति होवै है । औ (गृहेपि) क- हिये विचारवान् पुरुष अपने स्त्री पुत्रादिकरके संकुल गृहमें स्थित भयाभी राजाजनक प्रतर्दन अजातशत्रु आदिकॉकी न्यांई मुक्तस्वरूप हो है ॥ यातें इस प्रकार अन्वयव्यतिरेक करकेभी (विचारकपरायणो भवेत् ) कहिये विवेकी पुरुषको केवल विचारकेहि परायण होना योग्य है इति ॥५॥ किंच विचारके विना आत्मज्ञानकीभी प्राप्ति नहि होवेहै यह वार्ता कथन करे हैं ॥ पठरिवति- - [१५] पठंतु शास्त्राणि यजंतु वाध्वरै- रटंतु तीर्थानि तपंतु तापकः॥ विदंति नामानमृते विचारणं ततो विचारकपरायणो भवेत् ॥६॥ टीका-(पठंतु शास्त्राणि) कहिये चाहे यह पु- रूप न्याय मीमांसा वेदांतादि अनेक शास्त्रोंका अर्थ- सहित सम्यक् प्रकारसें अध्ययन करो औ (यजंतु वाध्वरैः) कहिये चाहे अश्वमेध राजसूयादि अनेक यज्ञोकरके विधिपूर्वक यजन करो ॥ तथा (अटंतु तीर्थानि ) कहिये चाहे काशी प्रयागादि अनेक ती- Yका प्रयलसें अटन करो ॥ तथा (तपंतु तापकः) कहिये चाहे पंचाग्नि आदि अनेक प्रकारके तापोंक- रके दीर्घ कालपर्यंत हठपूर्वक तपका आचरण करो। इत्यादि अन्यभी चाहे अनेक प्रकारके यल करो प. रंतु (विदंति नात्मानमृते विचारणं) कहिये विचार कियेते विना सो पुरुष आत्मस्वरूप नहि जान स. कहैं; काहेते नारदमुनिकों चतुर्दश विद्यायोंके अध्य- यन करनेतेभी सनत्कुमारके उपदेशजन्य विचारसें- विना आत्मपदकी प्राप्ति नहि होती भई है यह वार्ता छांदोग्य उपनिपत्में प्रसिद्ध है || तथा सौ अश्वमेध यज्ञोंकू अनुष्ठान करके इन्द्रपदवीकू प्राप्त होनेर्तेभी देवतोंके पति इन्द्रको ब्रह्माके उपदेशजन्य विचारके- विना आत्मपदकी प्राप्ति नहि होती भई है। यह वार्ताभी तहांहि प्रसिद्ध है। तथा अनेक तीर्थोके अटन करनेतेंभी मंकी ऋपिकों वसिष्ठमुनिके उपदेश- जन्य विचारसेंविना आत्मपदकी प्राप्ति नहि होती भई है यह वार्ता योगवासिष्ठके निर्वाणप्रकरणमें प्र. सिद्ध है । तथा जन्मसेंहि लेकर वनमें जायकरके अ. नेक वर्षांपर्यंत उग्र तप करनेतेंभी शुकदेवजीकू राजा जनकके उपदेशजन्य विचारसें विना आत्मपदकी प्राप्ति नहि होती भई है। यह वार्ताभी योगवासिष्ठादिक 'ग्रंथों में प्रसिद्ध है ।। यातेंभी विवेकी पुरुपकों (वि. चारकपरायणो भवेत् ) कहिये सर्वदा केवल एक वि- चारकेहि परायण होना योग्य है इति ॥६॥ इस प्रकारसे विचारकी अवश्य कर्तव्यताका निरूपण क. रके अब सो विचार किस प्रकारसे करना चाहिये इस प्रकारकी आकांक्षाके होते तिस विचारके स्व- -

। १७ ]
रूप प्रतिपादन करनेकी ग्रंथकार प्रतिज्ञा करहैं ।
तस्येति-
तस्य स्वरूपं तु समासतः स्फुटं
शास्त्रातरादन विकृप्य यलतः ॥
संदर्श्यते शिष्यगुरुपसंगतो
युक्त्या कयापीह हि योध्यते बुधैः ।।७।।
टीका-(तस्य) कहिये तिस प्रस्तुत विचारका
जो यथार्थ स्वरूप है तिसकू (शास्त्रांतरात्) कहिये
भगवद्गीता औ उपनिपत् तथा शारीरक भाप्यादि
अन्य जो चेदांतशास्त्र हैं तिनमें से प्रयत्नपूर्वक आकर्पण
करके अल्पमतियाले पुरुपोंकों सुखपूर्वक वोधके अर्थ
शिष्य औ गुरुके संवादद्वारा (समासतः) कहिये सं.
क्षेपसे स्फुट करके ग्रंथकार इस ग्रंथमें दर्शाये हैं; काहे
(युक्त्या) कहिये विद्वान् पुरुपोंका यह स्वाभाविक
धर्म होवेहै कि कोई न कोईभी युक्ति करके अज्ञानरूप
महानिद्रामें सुप्त भये जीवोंकू वोधन करना इति
॥७॥ इस प्रकारसे विचारकी प्रतिज्ञा करके अव ति-
सके विस्तारपूर्वक निरूपण करनेके अर्थ उपोद्धातकी
रीतिसे कथाका उत्थान करहैं ॥ दृष्ट्रेति-
,
२

[ १८ ] दृष्ट्वा जराजन्मविपतिसंकुलं सर्व जगञ्चांवुतरंगभंगुरम् ॥ भीतः समागम्य जनोज्झितं स्थलं कश्चिन्मुमुक्षुः समचिंतयत्त्विदम् ॥८॥ टीका-(कश्चित्) कहिये कोई एक (मुमुक्षुः) कहिये जन्ममरणरूप संसारबंधनसे मुक्त होनेकी इच्छावान् शमदमादि साधनसंयुक्त पुरुष इस चरा- चररूप सर्व जगत्वें जन्म औ जरा तथा मरण औ विपत्ति जो आध्यात्मिकादि त्रिविध ताप हैं तिनकरके सर्व तरफसें व्याप्त औ (अंबुतरंगभंगुरं) कहिये ज- लके तरंगकी न्याई क्षणभंगुर विवेकरूप नेत्रोंसें दख करके (भीतः) कहिये अत्यंत भयकू प्राप्त भया सर्व जनोंकरके रहित किसी एक एकांतस्थानमें जाय क- रके आगे कथन करी रीतिसें अपने चित्तमें (अचि. तयत्) कहिये सम्यक् प्रकारसें चिंतन अर्थात् विचार करता भया इति ॥८॥ इस प्रकारसें कथाकी उ- स्थानिका बांध करके अब जो तिसनें तहां जायकरके विचार किया तिसकू (अहो विचित्राः) इस श्लो- [१९] कसे आरंभ करके (इत्थं सुधीः) यहांपर्यंत छब्बीस श्लोकोंकरके वर्णन करह ।। अहो इति- अहो विचित्राः खलु मोहशक्तयः प्रचोदितो याभिरहं निरंतरम् ॥ जनुर्जरादुःखनिपीडितोऽपि नो कदापि पश्यामि हितं यदात्मनः ॥९॥ टीका-अहो बडी आश्चर्य औ विचित्र (मोह- शक्तयः) कहिये अज्ञानकी शक्तियां हैं कि जिनकरके सर्वदाहि प्रेरित भया में अनेक कल्पकल्पांतरोंसें जन्म- जरामरणादि नानाप्रकारके दुःखोंकरके (निपीडितः) कहिये अत्यंत पीडित भया किसी कालमेंभी (हितं यदात्मनः) कहिये अपने आत्माकी हितकारक जो वस्तु है तिसकू अबपर्यंतभी नहि देखता भया हुं अर्थात् अपने आत्माकू जन्ममरणरूप संसारबंधनस मुक्त करनेके अर्थ कोईभी उपाय नहि करता भया हुं इति ॥९॥ जो कोई ऐसे कहे कि पीछे कोई उ. पाय नहि किया तो अबहि कर लेहु तो तहां कहहै । बाल्यमिति- [ २० ] बाल्यं मया केलिकलाकलापकै- नीतं च नारीनिरतेन यौवनम् ॥ वृद्धोऽधुना किं नु करोमि साधनं मुक्तेर्वृथा मे खलु जीवितं गतम् ॥१०॥ टीका-(बाल्यं) कहिये सत्शास्त्रके विचारविषे उपयोगि विद्याके अध्ययन करनेका साधन जो वा- लावस्था थी सो तो मैंने (केलिकलाकलापकैः) क. हिये बालकोंके साथ नानाप्रकारकी क्रीडा औ कौ- तुकोंकरके व्यतीत कर दीनी औ तीर्थयात्रा तथा तप औ महात्मापुरुपोंकी सेवा करनेका साधनभूत जो यौवनावस्था थी सोभी मैनें (नारीनिरतेन) कहिये सर्वदाहि स्त्रियोंमें आसक्त होनेतें निरंतर तिनहिके चिंतन भोगविलासादिकोंकरके व्यतीत कर दीनी ॥ औ अव शक्तिसे हीन औ परतंत्रताका स्थान ओं सर्व शरीरकू शिथिल करनेहारी इस वृद्धावस्थाकू प्राप्त भया मैं संसारवंधनसे मुक्त होनेके अर्थ क्या साधन करूं? काहेतें जैसे गृहकू अग्नि लगे पीछे कूपका खोदना व्यर्थ होवे है तैसेहि वृद्धावस्थाके [२१] प्राप्त हुये पीछे जपतपादिकोंका आरंभ करना व्यर्थ होचे है अर्थात् सम्यक् प्रकारसे नहि होय स- केहैं ।। यातें (खलु) कहिये निश्चयकरके मेरा स- हि आयु (वृथागतं) कहिये वृथाहि चला गया इति ।। १० । इस प्रकारसे पश्चात्तापकरके अब पुनः कहेहैं । निद्रेति- निद्राव्यवायाशनतत्परोऽभवं नित्यं विवेकापगतो यथा पशुः ॥ नात्मानमंतःस्थमपि व्यलोकयं मे खलु जीवितं गतम्॥११॥ टीका-(निद्राव्यवायाशनतत्सरोभवं) कहिये जन्मसें लेकरके अबपर्यंत मैं सत् असत्के विचारसे शून्य भया सर्वदाहि शयन करना स्त्रीसंगम करना भोजन करना इनकेहि तत्पर होता भया हुँ (यथा पशुः) कहिये जैसे अन्य गर्दभादि पशु विवेकशून्य तिनके तत्पर हो रहेहैं औ (अंतःस्थं) कहिये अपने शरीरमेहि हृदयकमलविषे सर्वदा स्थित भया जो आत्मा है तिसकू किसी कालमेंभी ज्ञानरूप नेत्रोंक- सर्व वृथा

[२३]
रिणी) कहिये सर्व पापोंके दूर करनेहारी जो (हरेः)
कहिये नारायणके यशकी पवित्र कथा है सोभी मैंने
कवी श्रद्धापूर्वक वैठकरके नहि श्रवण करी है। जो
कोई कहे कि कथा नहि श्रवण करी तो कवी प्रया-
गादि तीर्थोंकी यात्राहि करी होगी तो तहां कहेहैं
(न तीर्थानि गतानि) कहिये अंत:करणकी शुद्धि-
द्वारा मोक्षपदके देनेहारे जो प्रयाग काशी आदि प.
वित्र प्रसिद्ध तीर्थ हैं तिनके समीपभी मैनें कवी गमन
नहि किया है ॥ यात सर्व पुरुषार्थोकरके शून्य हो.
नेतें मेरा सर्व आयु (वृथागतं) कहिये वृथाहि व्य-
तीत हो गया इति ॥ १२॥ पुनः जो कोई कहे कि
उक्त सत्संगादिक नहि किये तो कवी एकांत वैठक-
रके हरिका आराधनहि किया होगा यातें तिसकर-
केहि तेरा कल्याण हो जावेगा तो तहां कहै ।च.
तुर्भुज इति-
चतुर्भुजश्चक्रगदायुधः प्रभु-
निरंजनः सर्वभवार्तिभंजनः ।।
स्मृतः कदापीह मया न माधवो
वृथाखिलं मे खलु जीवितं गतम्॥१३॥

[ २४ ]
टीका-(चतुर्भुजः ) कहिये केयूरकटकादि भू.
पणोंकरके शोभायमान औ जानुपर्यत लंबी चतुर्भु-
जाकरके युक्त औ ( चक्रगदायुधः) कहिये चक्र औ
गदा आदिक आयुधोंके धारण करनेहारे औ (प्रभुः)
कहिये सर्व चराचर जगत्के नियंता औ अविद्यारूप
अंजनसे रहित तथा (भवार्तिभंजनः) कहिये जन्म-
मरणरूप संसारजन्य सर्व क्लेशोंके नाश करनेहारे
इस प्रकारके जो माधव कहिये लक्ष्मीके पति भग
वान् विष्णु हैं तिनका स्वममेंभी मैनें कबी स्मरण
नहि किया है कि जिस्से मेरा कल्याण हो जाता
यातें (वृथाखिलं) कहिये मेरा सर्व आयु वृथाहि
व्यतीत हो जाता भया है इति ॥१३॥ इस प्रका-
रसे पश्चात्ताप करके अब अपने बंधुजनोंकू उद्दिश्य
करके पांच श्लोकोंसे विचार करेहैं ॥ इहांगनेति-
इहांगना तातसुप्तादि बांधवैः
समागमोयं मम किं निबंधनः ।।
सदाऽचलोवांवुतरंगचंचलो
हितावहो मे किमुताहितावहः ॥१४॥

[२५ । टीका--(इह) कहिये इस संसारमें अंगना जो स्त्री है औ तात जो पिता है तथा सुत जो पुत्र हैं इत्यादि अन्य भी जो माता भ्राता भगिनी आदि बांधवलोक है सो इनके साथ यह मेरा समागम क- हिये संयोग किस निमित्तसे होय रहा है ॥ औ क्या यह समागम सर्वदा अचल रहेगा किंवा किसी का. लमें (अंबुतरंगचंचलः) कहिये जलकी लहरीके स- मान क्षणभरमें नाश हो जायेगा ॥ तथा क्या यह समागम मेरा हितकारक है किंवा (अहितावहः) कहिये अहित अर्थात् हानीके करनेहारा है इति ॥ १४ ॥ किंच ॥ इमे चेति- इमे च दारात्मजसेवकादयः समाश्रितामामथ कर्मवानिजम् ।। गतिस्तथैषां ननु का भविष्यति मयि प्रयाते परलोकमंततः ॥१५॥ टीका-(इमे) कहिये यह जो मेरी दारा क- हिये स्त्री है औ आत्मज कहिये छोटे छोटे पुत्र हैं [ २६ } तथा यह जो मेरे आज्ञाकारी भृत्य है इत्यादि अन्य भी जो मेरे अधीन जीव हैं सो सर्वहि क्या मेरेहि आश्रय होयकरके पलते हैं किंवा (अथ कर्मवानिज) 'कहिये आपो अपने प्रारब्धकर्मके आश्रयसें पल रहे हैं ।। किंच जिस कालमें मैं (अंततः) कहिये इस शरीरके अंतकालके हुये अपनी देहके सहित इन स- का परित्याग करके परलोककू चला जाऊंगा तो मेरे पीछेसें इन सर्व दीनोंकी गति कहिये क्या दशा होवेगी अर्थात् जैसे मेरे पोषण करनेहारे पिता मा. तादिकोंके मरणेसेंभी पीछेसे मैं अपने प्रारब्धकर्मक- रके आनंदपूर्वक पलता औ जीयता रहा हुं तैसेहि यहभी मेरे संन्यास लेने अथवा मरनेसे पीछे पलते औ जीवते रहेंगे। तथा अध्यात्मरामायणमेंभी कहा है "सुखस्य दुःखस्य न कोपी दाता परो ददातीति कुबुद्धिरेपा। अहं करोमीति वृथाभिमानःस्वकर्मसूत्रन- थितो हि लोकः॥" अर्थ-इस पुरुषके प्रति कोईभी दूसरा सुख या दुःखके देनेहारा नहि है जो कोई ऐसे मानता है कि अमुकनें मेरेकू सुख वा दुःख दिया है सो पुरुप बुद्धिसें हीन है तथा जो पुरुष कहता है [२७] कि यह कार्य मैने किया है सोभी तिसका वृथाहि अभिमान है; काहेते यह सर्व लोक आपो अपने प्रा. रब्धकर्मरूप सूत्रविष अथित अर्थात् परोये हुये हैं कोई किसीके आश्रय नहि है इति ॥ यातें अब इन बांधवोंके अर्थ किसी प्रकारकी चिंता करनी व्यर्थहि है इति ॥ १५ ॥ किंच ॥ पापैरिति-- पापैरनेकैस्तु यदर्थमादरा- द्वितं समानीय करोमि संव्ययम् ॥ ते बांधवा वै मम दुःखभागिनः किंवा भविष्यति गतस्स रौरवम् ॥१६॥ टीका-(यदर्थ) कहिये जिन स्त्री पुत्रादिक बं- धुजनोंके वास्ते (पापैरनेकैः) कहिये असत्यभाषण कपट छलादि अनेक पापोंकरके वित्त जो द्रव्य तिसकं जहां तहांसें लायकरके मैं अति आदरपूर्वक तिनके वस्त्रआभूपणादिकोंमें (संव्ययं) कहिये स- म्यक् प्रकारसे खर्च करताहुं सो जिसकालमें तिन पा. पोके फल भोगनेके अर्थ में रौरव नरकमें जाऊंगा तो क्या तिस कालमें (मम दुःखभागिनः) कहिये सो यह [२८] चांधव लोक मेरे दुःखके भागी होवेंगे किंवा नहि अ. र्थात् नहि होवेंगे; कातें यहां प्रत्यक्षहि जो मेरेकू अल्प ज्वरादिजन्य दुःख होवेहै तो सर्व बंधुजन समीप स्थित भयेभी तिसके घांटने अथवा निवृत्त करने में समर्थ नहि होते तो नरकमें तो कैसेहि बांट सकेंगे तथा यह वार्ता अथर्ववेदकी गर्भोपनिषत्मेंभी कथन करी है “ यन्मया परिजनस्यार्थे कृतं कर्म शुभाशुभम् । एकाकी तेन दोहं गतास्ते फलभोगिनः" अर्थ- माताके उदरविपे वालक कहता है कि हे ईश्वर, अ. पने बंधुजनोंके अर्थ जो जो शुभाशुभ कर्म पूर्वज- न्मोंधिपे मैंने किये थे तिनकरके इस कालमें मैं ए. कलाहि इस माताके नरकतुल्य गर्भमें जठरानलकरके जल रहा हुं औ जो फलके भोगनेहारे बंधुजन थे सो सर्वहि चले गये तिनसे इस कालमें मेरा को- ईभी सहायक नहि है इति ॥ यातें अव इन बंधुजनोंके अर्थ पापकर्म करनाभी व्यर्थहि है इति ॥१६॥ किंच किसी जीवका किसीके साथभी परस्पर संबंध नहि है यातेंभी नरकमें कोई दुःखका भागी नहि होवे है यह वार्ता कथन करेहैं। सायमिति- [२९] सायं समेत्यैकतरं विहंगमाः प्रातः प्रयांतीह दिशं खकां खकाम् ॥ ज्यकत्वा यथान्योन्यमगं च तं तथा सर्वे समायोति च यांति वांधवाः॥१७॥ टीका-(सायं समेत्य) कहिये जिस प्रकार सायं- कालमें सर्व दिशोंसें आय आयकरके पक्षी एक वृक्ष- पर एकत्र होयकर रात्रीपर्यंत निवास करके पुनः प्रा- त:कालके प्राप्त हुये तिस वृक्षकू तथा एक दूसरे प. क्षीकू छोडकरके (दिशं स्वका स्वकां) कहिये आपो अपनी अभिमत दिशाकू चले जाते हैं ॥ तैसेहि माता पिता स्त्री पुत्रादि सर्व बांधवलोक स्वर्ग नर- कादिरूप दिशोंसे जन्मरूप सायंकालसें लेकर प्रार- ब्धकर्मरूप रात्रीपर्यंत गृहरूप वृक्षपर एकत्र होयक- रके पुनः मृत्युरूप प्रातःकालके भयेते तिस गृहळू तथा एक दूसरे बंधुजनोंकू छोडकरके आपो अपने कर्मके अनुसार स्वर्गनरकादिरूप अभिमत दिशाकू चले जाते हैं तथा यह वार्ता अन्यत्रभी कथन करी है “ यथा काष्ठं च काष्ठं च समे यातां महोदधौ ।

[३०] समेत्य च व्यपेयातां तद्वद्भूतसमागमः॥" अर्थ-जैसे समुद्रविपे जलकी लहरियोंके वेगकरके एक किसी दिशासें औ एक किसी दिशासें आयकरके दोनों काष्ठ क्षणमात्र मिल जाते हैं औ पुनः दूसरी लहरी- के अंगकरके सो परस्पर वियोगकू प्राप्त हो जाते हैं तै- सेहि संसाररूप समुद्रविपे प्रारब्धकर्मरूप लहरियोंके वेगकरके बंधुजन मिल जाते हैं औ पुनः जब मृत्यु- रूप दूसरी लहरीका वेग होवे है तो परस्पर बिछुड जाते हैं इति ॥ यातें इनके मरने आदिमें शोच क- रनाभी व्यर्थहि है इति ॥१७॥ इस प्रकारसे विचार करके अब वैराग्यकू माप्त भया पुनः कहेहैं ॥ य- थति- यथा कपोतोऽन्नकणाभिवाञ्छया शिचं विशन्नेतिदुरंतबंधनम् ॥ कुटुंवजालेविषयाशयाऽविशं तथा विमुच्येय कथं जगत्पते ॥ १८ ॥ टीका--(यथा) कहिये जैसे अन्नक कणकोंकी अभिलापाकरके कपोतादि पक्षी (शिचं) कहिये जा- - लमें प्रवेश करनेते अतिदृढ बंधनकू प्राप्त भया पुन: अनेक प्रकारके शरीरछेदनादि क्लेशोंकू प्राप्त हो- वेहै तैसेहि मैंभी (विषयाशया) कहिये स्त्रीसंगमादि विषयोंकी आशाकरके इस कुटुंबरूप महाजालविषे प्रवेश करता भया हु सो मैं नहि जानता कि मेरी इसमें फसे हुये क्या दशा होवेगी । यातें है (जग- खते) कहिये सर्व जगत्के अधिपति अंतर्यामिन ई- श्वर मैं इस कुटुंबरूप जालसे किस प्रकार (विमु- ध्येय) कहिये मुक्त होउंगा अर्थात् छुटूंगा काहेते यह जाल बडा भारी है इससे छुटना अत्यंत दुष्कर है। तथा यह वार्ता भागवतभी कथन करी है " लोहदारुमयैः पाशैदृढबद्धोऽपि मुच्यते ।। स्त्रीधना- दिषु संसक्तो मुच्यते न कदाचन ॥" अर्थ-अज्ञानी पुरुष लोह औ काष्ठादि दृढ पाशोंकरके बद्ध हुया किसी कालमें कोई उपायकरके मुक्तभी हो जावेहै परंतु स्त्रीधनपुनादिरूप जो पाश है तिसमें फसा हुया तो कदाचित्भी मुक्त नहि हो सकैहै इति । ॥ १८॥ इस प्रकार सामान्यसें सर्व बंधुजनोंमें दोष- - [३२] दृष्टि दिखलायकरके अब पुनः द्विश्लोकोंकरके पृ. थक् स्त्रीमें दोपदृष्टिवर्णन करेंहैं ॥ इयमिति- इयं च मुक्तालिलसत्पयोधरा कणन्मणिवातनितंबमंडला ॥ विभाति रम्या ललनाऽविचारतो विचारदृष्ट्या तु कुमांसपुत्रिका ॥१९॥ दीका-(मुक्तालिलसत्पयोधरा) कहिये मोतियों- के हार पहरनेसे शोभायमान होय रहे हैं स्तन जिसके औ(मणिनात) कहिये मणियोंकी तडागी जिसके (नि- तंत्रमंडल) कहिये कटिदेशमें सुंदर झनत्कारशब्द कर रही है इत्यादि अन्यभी अनेक आभूपण औ पहादि सुंदर वस्त्रोंकरके शोभायमान जो यह ( ललना) क- हिये मेरी स्त्री है सो केवल विना विचार कियेसें (रम्या) कहिये रमणीय प्रतीत होवेह औं (विचारदृष्ट्या तु) कहिये जो इसके अयययों विचारदृष्टिसे भिन्न भिन्न करके देखें तो केवल (कुमांसपुत्रिका)कहिये एक महा अपवित्र मांसकी पुतलीहि दृष्ट आती है । तथा यह [ ३३ ] घार्ता योगवासिष्टमेंभी कथन करी है "स्वझांसरत- बाप्पांबु पृथक् कृत्वा विलोचने। समालोकय रम्यं चे- कि मुधा परिमुह्यसि" अर्थ-हे पुरुष,स्त्रीके शरीरमेंसें त्वचा मांस रुधिर पसीना लाला नेत्र इत्यादि अवय- वोंकू तुं पृथक् कहिये भिन्न भिन्नकरके देख जो इनमें क्या रमणीय औपवित्र वस्तु है नहीं तो काहेते वृथाहि अपरकी सफाई देखकरके मोहळू प्राप्त होताहै इति यातें अब इस स्त्रीभी आसक्ति करनी व्यर्थहि है इति ॥ १९ ।। किं च । एपा विति- • एपा तु बद्धालकदामभिदृढं कृष्ट्वा च हावांचितलोलवीक्षणः । मामंगना नर्तयतीह संततं नाद्यापि लज्जे कपितुल्यतां गतः ॥२०॥ टीका-(एपा) कहिये यह स्त्री मेरे (अलक- दामभिः) कहिये अपनी मनोहर अलकरूप रजु- वोंसे दृढ बांधकरके औ (हावांचित) कहिये कटा- क्षगर्भित नेत्रोंके वारंवार चंचल देखनेसे आकर्षण अर्थात् बैंचकरके सर्वदाहि (नर्त्तयति) कहिये नचा- [३४] चती रहती है जैसे वाजीगर वानरकू नचावे है अ- र्थात् यह वस्त्र चाहिये यह आभूषण चाहिये यह वस्तु गृहमें नहि है इत्यादि अनेक प्रकारके कार्योम सर्वदा भ्रमावती रहती है ॥ सो में इस प्रकारसें (कपितुल्यतां गतः) कहिये वानरकी तुल्यताकू प्राप्त भया अब वृद्धावस्थामेंभी लज्जाकू नहि प्राप्त होता हुं अहो यह क्या आश्चर्यकी यार्ता है । तात्पर्य यह। जैसे महावनविपे स्वतंत्र विचरनेहारे वानरकू किं- चित् लालच दिखलायकरके वाजीगर पकड लेवेहै औ पश्चात् सर्व आयुपपर्यंत तिसकू नचावेहै तथा म- हादीन कर देवेहै तैसेहि ब्रह्मरूप महावनविषे स्वतंत्र विचरनेहारा जो मैं था सो मेरे• संभोगरूप लालच दिखलायकरके इस स्त्रीने पकड अर्थात् अपने वशी- भूत करके सर्व आयुषपर्यंत नृत्य कराया है औ मे- रे। महादीन कर दिया है यातें अब इसके फंदसे छूटनेका अवश्य कोई उपाय करना उचित है इति ॥ २० ॥ इस प्रकारसें स्त्रीविपे दोपदृष्टि दर्शायकरके अव पुत्रमें दिखलावे है ॥ सूनुरिति- [ ३६ ] सूनुर्मयायं परिपूज्य देवता लब्धः प्रयत्नेन च वर्धितोऽधुना ।। मामेव मूढः परिशिक्षितः स्त्रिया द्वेष्टीत्यहो भाग्यविपर्ययो हि मे ॥२१॥ टीका-(मया) कहिये मैंने दुर्गाभैरवादि अनेक देवतोंका चिरकालपर्यंत विधिपूर्वक पूजन करके ति- नके प्रसादसें यह (सूनुः) कहिये कथंचित् एक पुत्र पाया है । औ (प्रयत्नेन) कहिये अति प्रयत्नसे इ. सकू पोपण करके बडा किया है अर्थात् दंतपतन शीतलादि अनेक प्रकारके रोगोंसे औपधपानादि उ- पायोंकरके इसका रक्षण कीया है। तथा अतीव क- प्टसें संचय किये हुये द्रव्यका व्यय करके इसकूप- ढाया औ विवाह किया है। परंतु यह कृतघ्न (परि. शिक्षितः स्त्रिया) कहिये अब स्त्रीकरके शिक्षित भया अर्थात् तेरा पिता मेरेकू ऐसे दुर्वचन कहता था तेरी माता मेरेकू ऐसे कहती थी इत्यादि तिसके वचनोंके पीछे लागकरके तिसके वशीभूत भया मूर्ख (नामेव द्वेष्टि)कहिये मेरेसाथहि द्वेषभाव करे है अर्थात् मेरेकू .

गृहसें बहि करके आपहि स्वामी होने चाहता है। सो अहो कहिये यह बडा आश्चर्य मेरे भाग्यका वि पर्यय कहिये उलटापना है काहेते सर्व लोक अपने मुखकेवास्ते पुत्रकी वांछा करते हैं कि वृद्धावस्थामें हमारेकू सुख देवेगा औ यह तो मेरेकू उलटा दुःख- दायक हो गया सो मानो मैंने अपने हाथसेंहि स- पंकू दुग्ध पान करायके गृहविपे पाला है । यातें अब इस पुत्रकीभी अपेक्षा करनी व्यर्थहि है। औ जो कहीं वेदमें ऐसे लिखा है कि "नापुत्रस्य गतिः" कहिये पुत्रसें रहित पुरुषकी गति कहिये कल्याण नहि होवेहै । सो यह वाक्यभी विपयासक गृहस्थ पुरुपके ऊपर है विरक मुमुक्षु पुरुषपर नहि काहेत वेदमहि पुनः दूसरे स्थलविपे लिखा है कि "नक- मणा न प्रजया धेनन त्यागेनके अमृतत्वमानशुः" अर्थ. यज्ञादि कर्म करके औ पुत्रादिरूप बहुत प्र- जाकरके तथा विपुल धनकरके कल्याण नहि होवे है किंतु त्यागकरके हि केचित् ऋपिलोक मोक्षपद प्राप्त होते भये हैं इति। तथा शुकदेव जडभरतादिक पुनके विनाहि मोक्षपदकुं प्राप्त होते भये हैं ॥

[ ३७ ] - जो केवल पुत्रसे हि कल्याण होता तो सूकरवाना- दिकोंकाभी होय जाता काहे तिनके तो मनुष्यों- सेंभी अधिक पुत्र होते हैं । यातें कल्याणके अर्थभी पुत्रकी अपेक्षा करनी व्यर्थहि है इति ॥ २१ ॥ इस प्रकारसें पुत्रविपे दोपदृष्टि दिखलायकरके अब धन- विपे दर्शाते है । अनेकयत्तरिति- अनेकयानैः समुपायं सर्वतः सदातिरक्षाक्षतिदुःखदं धनम् ॥ व्ययं कुकार्येषु करोम्यहो पदं स्वकं वकीयेन करेण हन्यते ॥ २२ ॥ टीका-प्रथम तो धनकी प्राप्तिकालमें पराधी- नतादि अनेक प्रकारके क्लेश होते हैं औ पश्चात् ति- सकी रक्षा करने में चौरका भय राजाका भय इ- त्यादि अनेक क्लेश होते हैं पुनः तिसके व्यय अथवा नष्ट हो जानेसें तो अत्यंतहि बेशकी प्राप्ति होवेहै। इस प्रकारसे (सदाप्तिरक्षाक्षतिदुःखदं) कहिये स- वंदाहि प्राप्ति औ रक्षण तथा नाश इन तीनों का- लोमेंहि क्लेशके देनेहारा जो धन है तिसकू में अनेक

[३८]
प्रकारके यल अर्थात् नोकरी व्यापारादि उपायोंसे
(समुपाय॑) कहिये संचय करके पश्चात् (कुकार्येषु)
कहिये वेश्याका नृत्य कराना परस्त्रीगमन करना इ
त्यादि कुत्सित कर्मोमेंहि सर्व व्यय करता भयाहुं सो
अहो कहिये वडे खेदकी वार्ता है मानो मैंने अपने
हाथर्सेहि अपने पादकू काटनेका उद्यम क्यिा है।
यातें अब इस धनकाभी संचय करना व्यर्थहि है
इति ॥ २२ ॥ जो धनका संचय नहि करेगा तो तेरा
भोजनादि व्यवहार किस प्रकारसें चलेगा इस प्र.
कारकी शंका होनेतें समाधान कहे है ॥जल इति-
जले स्पले योपि च शैलमस्तके
सदैव पुष्णाति जगञ्चराचरम् ॥
स मे न किं दास्यति विश्वपालको-
ऽशनं किमर्थं तु गतोमि दीनताम २३
टीका-जो परमात्मा (जले) कहिये समुद्रम
रहनेहारे योजन योजन परिमाण शरीरयाले मकर
मत्स्यादिकोंकू औ स्थले कहिये पृथिवीमें रहनेहारे
मनुष्य पशु आदिकोंकू तथा (शैलमस्तके) कहिये
-

[३९ । हिमालयादि पर्वतोंके शिखरोंपर रहनेहारे मृग पक्षी आदिकोंकू यथायोग्य अन्नादि प्रदानद्वारा सर्वदाहि पोपण करे है तथा वृक्ष वल्ली आदिक अचर जीवों. कुंभी वर्षा आदिकद्वारा पोषण करे है अपिशब्दसें पातालमें रहनेहारे नाग औ दैत्यादिकोंकू तथा अं तरिक्षमें रहनेहारे देवतोंकूभी अमृतपानादिद्वारा पोषण करेहै । इस प्रकारसें (विश्वपालकः ) कहिये सर्वहि चराचर विश्वके पालन करनेहारा जो अंत- र्यामी विश्वभर भगवान् है सो क्या मेरेकू (अशन) कहिये भोजन नहि देवेगा अर्थात् देवेहिगा ॥ तथा पांडवगीतामें शौनक ऋपिने भी कहा है "भोजनाच्छा- दने चितां वृथा कुर्वति वैष्णवाः ।। योऽसौ विश्वभरो देवः स भक्तान् किमुपेक्षते" अर्थ-वैष्णवलोक अ. र्थात् भगवत्के परायण पुरुषोंकों भोजन वस्त्रादि- कोंकी चिता करनी व्यर्थ है काहे जो भगवान सर्व चराचर विश्वकू पोषण करनेहारा है सो क्या अपने भक्तजनोंकू भोजनादि नहि देवेगा इति ॥ तथा इसी वार्तापर एक क्षुधासें आर्च भये महात्मा पुरुपर्नेभी कहा है "विश्वंभर भर त्वं मां विश्वतो वा वहिकुरु। R [४०] द्वयोरप्यसमर्थश्चेत्यज विश्वभराभिधाम्" अर्थ० हे वि- श्वंभर, तु मेरेकू भर अर्थात् पोषण कर औजो तुमेरे पो. पण करनेमें समर्थ नहि तो मेरेकू अपने विश्वसे वाहिर करदे औ जो तुं उक्त दोनों वार्ता नहि कर सकता तो अपना विश्वंभर यह नाम छोड़ दे इति ॥ यातें भी- जनादिके अर्थ काहेकों मैं (गतोस्मि दीनतां) कहिये धनी पुरुपादिकोंकी दीनता प्राप्त होप रहा हु अर्थात् अब ईश्वरके विना किसीके अधीन नहि होना च. हिये इति ॥ २३ । इस प्रकारसे धनविपे विराग दि- खलायकरके अब अपने शरीरकू उद्दिश्य करके तीन श्लोकोंसें शोच कर है। लब्ध्वेति- लब्ध्वापि देवेप्सितमानुषं वपु- नीतं समस्तं गृहकृत्यकल्पनः ।। चिंतामणि हस्तगतं विहाय चै क्रीतं मया काचदलं कुबुद्धिना ॥२४॥ टीका-देवेप्सित कहिये जिस मनुप्यदेहकी देवताभी वांछा करते हैं कि हमारे• प्राप्त हो तो हम पुरुषार्थ करके देवपदसेंभी श्रेष्ठ जो मोक्षपद है .

[११] तिसकू संपादन करें। यह वार्ता विष्णुपुराणमेंभी कथन करी है "गायंति देवाः किल गीतकानि ध. न्यास्तु ये भारतभूमिभागे ॥ स्वर्गापवर्गस्य च हेतु- भूते भवंति भूयः पुरुषाः सुरत्वात्" अर्थ-स्वर्गविषे देवतालोकभी इस प्रकारके गीत गायन करते हैं कि सो पुरुष धन्य हैं जो भोग औ मोक्षके साधनभूत भारतखंडमें जन्म लेते हैं किंच सो पुरुप हमारेसें- भी श्रेष्ठ है इति ॥ सो इस प्रकारके दुर्लभ मनुष्यश- रीरकू (लब्ध्यापि) कहिये प्राप्त होय करकेभी मैने सर्वहि गृहके कार्योंकी नानाप्रकारकी कल्पना- योधिपे व्यतीत कर दिया सोमानी ( कुबुद्धिना) कहिये नष्ट भयी बुद्धिवालेने मैंने अनायाससे अपने हाथमें प्राप्त भयी अमोल चिंतामणिका परित्याग क- रके तिसके बदलेमें (काचदलं) कहिये व्यर्थ काचका टुकडा मोल ले लिया ॥ तथा यह वार्ता गरुडपुरा- णमें विष्णुभगवान्ने गरुडके प्रतिभी कथन करी है "योनिशतेषु लभते किल मानुपत्वं तत्रापि दु. लभतरं खग भो द्विज त्वम् ।। यस्तत्र पालयति ला- लयतीन्द्रियाणि तस्यामृतं क्षरति हस्तगतं प्रमादात्" [१२] अर्थ-(भोखग) कहिये हे पक्षिराज, इस पुरपकू अनेक योनियोंचिपे भ्रमते भ्रमते किसी कालमें पु- ण्यके प्रभावसे मनुष्यशरीरकी प्राप्ति होवे है तिसमें भी पुनः (द्विजत्वं ) कहिये त्रैवर्णिक शरीरकी प्राप्ति होनी अत्यंत दुर्लभ है सो जो पुरुष तिसकुंभी प्राप्त होयकरके पुन: अपनी इन्द्रियोंकू विपयोंकरके पा- लन औ लालन करते हैं सो मानो तिनके हाथमें प्राप्त भया अमृत क्षरता चला जाये है इति ॥२१॥ इस प्रकारसे शरीरकी दुर्लभताका वर्णन करके अव पुनः तिसहि शरीरकी कृतघ्नता निरूपण करे है। इदमिति-- इदं सदाभ्यंगसुतैलवासितं वरांगनालिंगनलालितं मुहुः॥ हितानपानौषधिधितं वपुः कृतघ्नमंतेन समं मयैष्यति ॥ २५ ॥ टीका-(सदाभ्यंगसुतलवासितं) कहिये स- दाहि अभ्यंग औ नाना प्रकारके सुगंधयुक्त तेलों. करके सुगंधित किया हुया औ वरांगना जो यौवना- -

[ ४१ ]
वस्थाकी सुंदर स्त्रियां हैं तिनके वारंवार गाढालिंग-
नकरके ( लालितं) कहिये लाडला किया हुया
तथा (हित ) अर्थात् पथ्ययुक्त मिष्टान्न भोजनोंक-
रके औ केवडादि सुगंधयुक्त जलपानकरके तथा पु-
ष्टिकारक औषधियोंकरके (वधितं ) कहिये वृद्धिकू
प्राप्त किया हुया जो यह मेरा ( वपु) कहिये शरीर
है सो यह ऐसा कृत्तघ्न है कि नित्यप्रति उक्त सर्व
उपायोंके करनेसेंभी दिनदिन क्षीणताळूहि प्राप्त
होता जावेहै औ ( अंते ) कहिये प्राणोंके अंतकालमें
परलोकविपेभी मेरेसाथ नहि जावेगा यह वार्ता प्र-
सिद्धहि है यातें अब इस शरीरमभी आसक्ति क-
रनी व्यर्थहि है इति ॥२५॥ इस प्रकारसे शरी-
रकी कृतघ्नता वर्णन करके अव शरीरमें आसक्तिका
जो हेतु है तिसकू दिखलाये है ॥ मलीमस इति-
मलीमसेऽनात्मनि नाशशालिनि
शुचित्वमात्मत्वमवैमि नित्यताम् ।।
अनाद्यविद्यातिमिरावृतेक्षणः
किमंजनं तस्य भवेनिवर्तकम् ॥२६॥

[ ४१ ] टीका-अनादिकालके अविद्यारूप तिमिरकरके बुद्धिरूप नेत्रोंके आच्छादित होनेते (मलीमसे) क- हिये मलमूत्रादिर्कोका स्थानभूत अत्यंत मलिन जो यह मेरा शरीर है तिसविपे मैं पवित्रवुद्धि करताहुं अर्थात् मेरा शरीर गौरवर्णका औ अति सुंदर है ओ उत्तम कुलमें उत्पन्न भया है इस प्रकारसे शुचि मा. नताई तथा (अनात्मनि) कहिये इस अनात्मारूप देहविषे मैं आत्मबुद्धि करताहुं अर्थात मैं स्थूल हुँ मैं अति कृश हुं मैं अमुक जातिवान् हुं इस प्रका- रसे मानताहुं तथा (नाशशालिनि) कहिये क्षणक्ष- णप्रति परिणामी औ विनाशवान् इस शरीरमें नि- त्यबुद्धि करताहुँ अर्थात् ऐसे ऐसे कार्योंका आरंभ करताहुँ कि मानो कवीभी मरणा नहि है ॥ किंच तैसेहि स्वर्गादि अनित्य पदार्थों में नित्यबुद्धि औ अ- नर्थरूप धनमें अर्थबुद्धि औ व्यवहारप्रवृतिरूप दु:- खमें सुखबुद्धि करताहुं इस प्रकारसे सर्वत्र विपरीत- दर्शनमें हेतुभूत जो अनादि अविद्यारूप तिमिर है तिसके निवृत्त करनेहारा (किमंजन) कहिये ऐसा क्या अंजन है कि जिसके बुद्धिरूप नेत्रोंमें डालनेसे [ ४५] मेरी यथार्थदृष्टि होय जावे इति ॥ २६ ॥ इस प्रका- रसे शरीरविषे दोपदृष्टिवर्णनद्वारा अविद्याका स्वरूप निरूपण करके अब आयुपकू उद्देशकरके कहेहै ॥ क्षणं क्षणमिति- क्षणं क्षणं दीपशिखोपमा दधत् सरंधकुंभास्रवदंबुसनिभम् ॥ प्रयात्यशेष तु ममायुरुतम न सेक्षणोपीह विलोकयाम्यहो ॥२७॥ टीका-(क्षणक्षणं) कहिये जैसे दीपककी शि खा क्षणक्षणमें चंचल ऊर्ध्वकू जावेहै औ जैसे (सरं- ध्रकुंभ) कहिये छिद्रयुक्त घटमेंसें क्षणक्षणमें सर्वतर- फसे जल स्रवता जावेहै तैसेहि (ममायु) कहिये मेरे शरीरकी अमोलिक सर्व आयुपक्षणक्षणमें चली जाती है। सो मैं (सेक्षणोपि) कहिये बडेबडे नेत्रोंवाला होयकरभी तिसकी तरफ नहि देखताहुं अहो कहिये यह क्या आश्चर्यकी वार्ता है ॥ तथा यह वार्ता यो- गवासिष्ठके निर्वाणमकरणमें अपने शिष्यकेति एक [ ४४] टीका-- अनादिकालके अविद्यारूप तिमिरकरके वुद्धिरूप नेत्रोंके आच्छादित होनेतें (मलीमसे) क- हिये मलमूत्रादिकोंका स्थानभूत अत्यंत मलिन जो यह मेरा शरीर है तिसविपे मैं पवित्रबुद्धि करताहूं अर्थात् मेरा शरीर गौरवर्णका औ अति सुंदर है औ उत्तम कुलमें उत्पन्न भया है इस प्रकारसें शुचि मा- नताहुं तथा (अनात्मनि) कहिये इस अनात्मारूप देहविपे मैं आत्मबुद्धि करताहुं अर्थात् मैं स्थूल हुं मैं अति कृश हुं मैं अमुक जातिवान् हुं इस प्रका- रसे मानताहुं तथा (नाशशालिनि) कहिये क्षणक्ष- णप्रति परिणामी औ विनाशवान् इस शरीरमें नि- त्यबुद्धि करताहुं अर्थात् ऐसे ऐसे कार्योंका आरंभ करताहुं कि मानो कवीभी मरणा नहि है ॥ किंच तैसेहि स्वर्गादि अनित्य पदार्थोंमें नित्यबुद्धि औ अ- नर्थरूप धनमें अर्थबुद्धि औ व्यवहारप्रवृतिरूप दु:- खमें सुखबुद्धि करताहुं इस प्रकारसें सर्वत्र विपरीत- दर्शनमें हेतुभूत जो अनादि अविद्यारूप तिमिर है तिसके निवृत्त करनेहारा (किर्मजनं) कहिये ऐसा क्या अंजन है कि जिसके बुद्धिरूप नेत्रोंमें डालनेसे [४९ ] मेरी यथार्थदृष्टि होय जावे इति ॥२६॥ इस प्रका- रसे शरीरविपे दोपदृष्टिवर्णनद्वारा अविद्याका स्वरूप निरूपण करके अब आयुपकू उद्देशकरके कहेहै । क्षणं क्षणमिति- क्षणं क्षणं दीपशिखोपमा दधत सरंधकुंभास्रवदंबुसन्निभम् ॥ प्रयात्यशेषं तु ममायुरुतम न सेक्षणोपीह विलोकयाम्यहो ॥२७॥ टीका-(क्षणं क्षणं) कहिये जैसे दीपककी शि. खा क्षणक्षणमें चंचल ऊर्ध्वकू जावेहै औ जैसे (सरं- ध्रकुंभ) कहिये छिद्रयुक्त घटमेंसें क्षणक्षणमें सर्वतर- फसे जल स्रवता जावेहै तैसेहि (ममायु) कहिये मेरे शरीरकी अमोलिक सर्व आयुप क्षणक्षणमें चली जाती है।। सो मैं (सेक्षणोपि) कहिये बडेबडे नेत्रोंवाला होयकरभी तिसकी तरफ नहि देखताहुं अहो कहिये यह क्या आश्चर्यकी वार्ता है। तथा यह वार्ता यो- गवासिष्ठके निर्वाणप्रकरणमें अपने शिष्यकेप्रति एक मुनिनेभी कथन करीहै "आयुर्वायुविहिताचपटली- लंबांबुधभंगुरं भोगा मेघवितानमध्यविलसत्सौदाम- नीचंचलानालोला यौवनलालनाजलरयः काया क्षणा- पायवान पुत्रत्रासमुपेत्य संमृतिवशानिर्वाणमन्विष्य- ताम्" अर्थ जैसे वायुके वेगकरके एकत्र भये में घोंक समूहविषे भरा हुया जल क्षणभंगुर होवेहै तै- सैहि यह पुरुपकी आयु क्षणभंगुर है औ जैसे आका- शमें छाये हुये मेघोंमें बिजुली चंचल होयेहै तैसेहि संसारके सर्व भोग चंचल हैं औ यौवनावस्थाकी जो लालना अर्थात् विलास है सोभी (लोल) कहिये थोडे दिनोंमेंहि चलायमान हो जातेहैं औ जैसे महान- दीके जलका वेग शीघ्रहि चला जावेहै तैसेहि यह शरीर क्षणक्षणमें चला जावे या हे पुत्र, तुं इस ज. न्ममरणरूप संसारसें भयकुंप्राप्त होकरके निर्वाण जो मोक्षपद है तिसकी प्राप्तिके अर्थ यल कर इति २७ इस प्रकारसे आयुपकी क्षणभंगुरताका वर्णन करके अव तिसके विपरीत अपने निश्चयकू दिखलावे है । गता इति- [ ४७ ] गता मदीयाः पितरो यमालयं मयांति चान्येपि दिनंदिनप्रति ॥ अहं तु पश्यन्नपि तानहो शठ- स्तथापि मन्ये स्थितिमात्मनो ध्रुवाम टीका-(मदीया) कहिये मेरे जो वृद्ध पिता पितामह आदिक थे सो सर्वहि अपने अपने शरी- रोंका परित्याग करके (यमालयं) कहिये यमराजाके स्थानकं चले गये अर्थात् मृत्युकुं प्राप्त हो गये हैं तथा (प्रयांति चान्येपि) कहिये दिनदिनप्रति मा- मके निवासी दूसरे लोकभी मरमरकरके चले जाते हैं औ मैंतो (शठः) कहिये मूर्ख तिनकू नित्यप्रति अ- पने नेत्रोंसें प्रत्यक्ष देखता हुयाभी पुन: इस शरीरसें इस संसाररूप सरायविषे अपनी (ध्रुवां) कहिये निश्चित स्थिति मान रहा हुँ अहो कहिये यह क्या बडे आश्चर्यकी वार्ता है। तथा यह वार्ता महाभारतके वनपर्वविपे यक्ष औ युधिष्ठिरके सं- वादमेंभी कथन करी है "अहन्यहनि भूतानि गच्छं- [ ४८ ) तीह यमालयं ॥शेषाः स्थावरमिच्छति किमाश्चर्यमत:- परं" अर्थ० यक्षने प्रश्न किया कि हे युधिष्ठिर, इस ज- गत्में आर्थर्यवार्ता क्या है तब युधिष्ठिरनें कहा है यक्ष (अहन्यहनि) कहिये नित्यप्रति दिनदिनमें भू- तप्राणी मरमरकरके यमलोककू चले जाते हैं औ दूसरे पुरुष तिनकू अपने नेत्रोंसें देखते हुयेभी पुनः इस जगत्में अपनी स्थिरता चाहते हैं सो इससे परे अन्य क्या आश्चर्य होगा अर्थात् यही परमाश्चर्य है इति ॥ २८ ॥ इस प्रकारसे शरीरविषयक विराग दि. खलायकरके अब श्लोकद्वयकरके अपनी इन्द्रियोंकी दूटता वर्णन करेहै ॥ एत इति- एते च जिह्वेक्षणनासिकादय- चौरास्तु शश्वन्मम देहवासिनः ॥ लुपंति सर्वात्मधनं प्रमाथिनो नाद्याप्यवेक्षे मम पश्याज्ञनाम ॥२८॥ टीका--(एते) कहिये यह जो जिहा नेत्र ना- सिका आदिशब्दसे श्रोत्र त्वचा हस्त पादादिक इ. न्द्रिय हैं सो (शश्वत्) कहिये सर्वदाहि मेरे शरीर- [ ४९] विपे निवास करनेहारे चोर हैं किंच चोरोंसभी अ- धिक दुष्ट हैं काहेतें चोर जिसके आश्रय रहते हैं तिसकी प्रायः चोरी नहि करते औ यह इन्द्रियरूप चोर तो सर्वदा मेरे आश्रय रहकरके मेरीहि चोरी करते हैं सो जिस प्रकार चोर धनका आहरण करते हैं तैसेहि यह इन्द्रियरूप चोर मेरा (सर्वात्मधनं) कहिये सर्वात्मभावरूप जो धन है तिसकू आहरण करते हैं अर्थात् मेरे सच्चिदानंद परिपूर्ण नित्यशुद्धबुद्ध स्वरूपकू विस्मरण करायके तुच्छ जीवभावकू प्राप्त करनेहारे हैं किंच चोर तो किसी उपायसें शीघ्रहि वशमें आयभी जाते हैं परंतु यह इन्द्रियरूप चोर तो (प्रमाथिनः) कहिये बडे ममाथि अर्थात् क्लेश देने- हारे दुर्जय हैं किसी प्रकारसे वशमें आने अत्यंत क- ठिन हैं। तथा यह वार्ता भगवद्गीताके पष्ठाध्याय- मेभी कथन करी है "इन्द्रियाणि प्रमाथीनि हरन्ति प्रसभं मनः" अर्थ-हे अर्जुन, यह इन्द्रिय बडी दु- जय हैं काहेते यह यत्नशील पुरुषोंके मनकूभी बला- कारसें स्वस्वविपयोंकी तरफ खेचकरले जाती हैं इति ॥ तथा भागवतभी कहा है "जिद्दकतोमुमपक- [६० पंति कहितशिश्नोन्यतस्त्वगुदरं श्रवणं कुतश्चित् ॥ घ्राणोन्यतश्चपलहक्कचकर्मशक्तियः सपल्य इव गेहपति लुनंति" अर्थ~-इस पुरुषवं जिह्वा इन्द्रिय तो अपना जो रस विपय है तिसकी तरफ खेंचती है औ पिपासा अपनी तरफ खेचती है औ लिंग इ. न्द्रिय अपने विपयकी तरफ खेचती है तथा त्वचा अपने विषयकी तरफ खेंचती है औ उदर अपनी त- रफ औ श्रोत्र अपनी तरफ नासिका अपनी तरफ चपल नेत्र अपनी तरफ हस्त औ पाद अपनी तरफ खेंचते हैं इस प्रकार जैसे किसी एक पुरुपकी बहु- तसी स्त्रियां हो औ सो सर्वहि अपनी अपनी तरफ खेंचनेसे पुरुपकू क्लेश देवे तैसेहि यह इन्द्रियरूप स्त्रियां आत्मारूप पुरुपकू क्लेश देती हैं इति । सो इस प्रकारसें सर्वदा मेरे देहविपे स्थित भये भी चो. रोकू में अबपर्यंत कदाचित्भी नहि देखता भया हूँ सो (मम पश्यताज्ञतां) कहिये हे विवेकी पुरुषो, देखो यह मेरी क्या मूर्खता है इति ॥ २९ ॥ किंच पतंगेति-- - [ ५१] पतंगमीनेभमृगालयो लयं प्रयांति पंचेन्द्रियपंचगोचरैः॥ मया तु तत्पंचकमेव सेव्यते गतिर्न जाने मम का भविष्यति ॥३०॥ टीका-पतंग एक चक्षु इन्द्रियका विषय जो रूप है तिसके अर्थ दीपकमें पतित होयकर मृत्युक् प्राप्त होवे है औ मीन जो मछली है सोभी जिह्वा इन्द्रियका विषय जो रस है तिसके अर्थ लोहकुं- डीकू भक्षण करके मृत्युकुं प्राप्त होवे है तथा इम जो हस्ती है सीभी एक लिग इन्द्रियका विषय जो स्पर्श है तिसके अर्थ मिथ्याहस्तिनीके पीछे गर्तमें प. तित होयकरके नाश• प्राप्त होवे है ॥ तथा मृगजो हरिण है सोभी एक श्रोत्र इन्द्रियका विपय जो शब्द है तिसके अर्थ वीणाका शब्द मुनकरके व्याधके व. शीभूत भया मृत्युकू प्राप्त होवे है तथा अलि जो भ्रमर है सोभी एक घ्राण इन्द्रियका विषय जो सु- गंध है तिसके कारण रात्री कमलके संकुचित हो-

[ २ ]
नेते कंटकसें विद्ध भया मृत्यु प्राप्त होये है मो
इस प्रकारसे (चेन्द्रियगोचरः) कहिये पांच इन्द्रि-
योंके एक एक विपपके सेवन करनेते उफ पांघोहि
नाशकू प्राप्त होते हैं औ (मपा तु) कहिपे में तो ए.
कलाहि तिन पांच विषयोंका सर्वदा आदरपूर्वक सं.
वन करता हुं सो मैं नहि जानता कि मेरी (गतिः)
कहिये क्या दसा होयेगी। तया पर वार्ता अन्य
अभी कपन करी है "दुरंगमातंगपतंगभूगमीमा हताः
पंचभिरेव पंच । एकः प्रमादी म कर्य न हन्यते यः
सेवते पंचभिरेव पंच" अर्थ-मृग हस्ति पतंग भ्र.
मर मीन यह पांघोहि पांच विषयाँ भिर भित्र
सेग्न करके नाम पास होने हैं औ जो एकहिन
मादी पुरुष विन पांचोंका मेग्न फर है गौ किग
प्रकारमें नारा नहि प्राप्त होयेगा अपार अवश्य
होवेहिगा इति ॥10॥म प्रकार उपरीसिमें
न्द्रियोंकी दुतावा गर्णन करके और अपने मनकी
दुष्टतादि मागापरक निरपन करे है। पति-

। [ ५३ ] यथाऽहिमुंडे पतितोपि मेडकः समीहतेऽतुं मशका न चेतनः ॥ तांतकास्यांतरितः समंतत- . स्तपापि कांक्षे विषयानहो जडः॥३१॥ टीका-जैसे मेडककू सर्प पकड लेवे है औ सो मूर्ख ( अहितुंडे पतितोपि ) कहिये तिस सर्पके मु- खमें पीछले भागसें असा हुयाभी पुनः बाह्य जो म- च्छर उडते हैं तिनकू भक्षण करनेके अर्थ अपने मु- खसे ग्रहण करनेकू चाहता है तैसेहि कालरूप सर्पने जीवरूप मेडकॉकू पकडा हुया है अर्थात् जिस जिस पुरुपकी जितनी जितनी आयुष्य व्यतीत हो गई है तिसका उतना उतनाहि पीछला भाग कालरूप सर्पके मुखमें असा हुया है सो इस प्रकारसे मैं जड कहिये मूर्ख तो ( समंततः) कहिये सर्व तरफसे ग्रीवापर्यंत (अंतकास्यांतरितः) कहिये कालरूप सर्पके मुखमें असा हुयाभी पुनः विपयरूप मच्छरोंके भोगनेकी वांछा करता हु अहो कहिये यह क्या मेरे मनकी दुष्टता है इति ॥ ३१॥ इस प्रकारसें वर्णन करके [ ५४ ] अब पुनः अपने मनकी दुष्टता निरूपण करे है ।। सितं शिर इति॥ सितं शिरः संपतिता रदावली मुखं वलिवानवृतं च चक्षुषी ॥ गतप्रभे मे शिथिलायते वपु- स्तथापि चेतो युवतिं स्मरत्यहो॥३२॥ टीका-(सितं शिरः ) कहिये मेरा शिर तो सर्व बालोंकरके श्वेत हो गया है औ ( संपतिता र दावली) कहिये मुखमें स्थित जो दंतोंकी पंक्ति थी सोभी सर्वहि पतित हो गई है तथा मुसभी (बलि ब्रात) कहिये सर्व तरफसें चलियोंके समूहकरके आच्छादित हो गया है तथा दोनों नेत्रभी (गतमभे) कहिये प्रभासें हीन हो गये हैं अर्थात् तिनकरके स- म्यक् प्रकारसे पदार्थ देख नहि पड़ते हैं तथा (शिथि- लायते वपुः) कहिये शरीरके हस्तपादादिक सर्व अ वयवभी शिथिल होते जाते हैं इस प्रकारकी दशा होनेतेंभी मेरा जो चित्त है सो (युवति स्मरति) [१५] कहिये यौवनावस्थाकी सुंदर स्त्रीका स्मरण करता है अर्थात् भोगनेकों वांछता है सो अहो कहिये यह क्या बडे आश्चर्यकी वार्ता है (यहां स्त्रीशब्दसे दूसरे विषयोंकाभी ग्रहण जानना) तथा यह वार्ता एक वृद्ध सजननेंभी कथन करी है “वपुः कुजीभूतं गतिरपि तथा यष्टिशरणा विशी दंतालिः श्रवण- विकलं श्रोत्रयुगलम् ॥ शिरः शुलं चक्षुस्तिमिरपट- लैरावृतमहो मनो मे निर्लज्जं तदपि विषयेभ्यः स्पृ. हयति" अर्थशरीर तो मेरा कुबडा हो गया है औ चलनाभी यष्टिकाके आश्रयसें होवे है तथा मुखसें सर्व दांतभी पड गये हैं औ दोनों श्रोत्रोंसें शब्दभी श्रवण नहि होवे है तथा शिरके वालभी सर्व श्वेत हो गये हैं औ नेत्रभी तिमिरके पडदोंक- रके आच्छादित हो गये है तोभी अहो कहिये यह बडे आश्चर्यकी वार्ता है कि मेरा निर्लज्ज मन वि. षयोंकी वांछा करता है इति ॥ ३२ ॥ इस प्रकारसें मनकी दुष्टता निरूपण करके अब ईश्वरकी मायाकी प्रबलता दिखलाये है।। अधः शिरस्केनेति ।। ।

. [ ५६] अधःशिरस्केन दुरंतसंकटे मया यदंबाजठरे विनिश्चितम् ॥ स्मरामि नाद्यापि नदुद्धताशयो मुरारिमाया खलु दुस्तरा यतः ॥३३॥ टीका-(दुरंतसंकटे) कहिये मलमूत्र जठरानल कृमी आदिकरके पूर्ण महासंकटके स्थानभूत मा- ताके उदरविपे जिस कालमें मैं (अधःशिरस्केन) कहिये नीचैको शिर औ ऊपरकों पाद करके लटक रहा था तो तहां जो जो वार्ता मैंने निश्चय कीथी कि यहांसें बाहिर निकसकरके ऐसा ऐसा करूंगा सो मैं स्त्री आदिक विपयामें निरंतर आसक्त होनेतें विवेकसे भ्रष्ट भया (अद्यापि) कहिये अब वृद्धावस्था प्राप्त भयाभी तिस वार्ताकू स्मरण नहि करता हुं यातें (मु- रारिमाया) कहिये यह जाननेमें आवे है कि मुरारि जो भगवान् नारायण है तिनकी माया बडी दुस्तर है जिसने मेरे… इस संसारके मिथ्या व्यवहारोंमें फ- सायकरके भुलाय दिया है तथा गीतामेंभी कहा है "देवी ह्येषा गुणमयी मम माया दुरत्यया" अर्थ है [ ५७ ] अर्जुन, यह जो त्रिगुणरूप मेरी दैवीशक्ति माया है सो तिसका तरना बहुत कठिन है इति ।। माताके उदरमें स्थित भया वालक जो जो निश्य करे है सो सर्वहि अथर्ववेदकी गर्भउपनिषत्में लिखा है सो प्र- संगसे यहां संक्षेपसे दिखाये हैं।॥ तहां यह प्रकार लिखा है कि ऋतुकालमें स्त्रीपुरुषके संयोग होने जो वीर्य गर्भमें स्थित हो जाये है तो सो वीर्य एकरात्री में कि- चित् सघन हो जाये है औ पश्चात् सप्तरात्री में ज- लके बुद्धदके समान हो जाये है औ अर्धमासमें पिं- डाकार हो जाये है मासभरमें अधिक कठिन हो जावे है द्विमासमें तिसमें शिर बन जावे है तीसरे मासमें दोनों पाद निकस आते हैं चतुर्थ मासमें गुल्फ कटि उदर यह तीनों उत्पन्न होवे हैं पंचम मा. समें पृष्ठवंश होवे है औ पप्ठे मासमें मुख नासिका नेत्र श्रीत्र उत्पन्न होते हैं सप्तम मासमें तिसमें चेत- नता प्रकट होवे है अष्टम मासमें सर्व लक्षणोंकरके संपूर्ण होवे है पश्चात् नवम मासमें सर्व ज्ञानकरके संपन्न होवे है तो पश्चात् अपने सर्व पूर्वजन्म औ शु. भाशुभ कमाकू स्मरण करके अत्यंत विरागकू प्राप्त अधःशिरस्केन दुरंतसंकटे मया यदंवाजठरे विनिश्चितम् ॥ स्मरामि नाद्यापि तदुद्धताशयो मुरारिमाया खलु दुस्तरा यतः ॥३३॥ टीका-(दुरंतसंकटे) कहिये मलमूत्र जठरानल कृमी आदिकरके पूर्ण महासंकटके स्थानभूत मा. ताके उदरविपे जिस कालमें मैं (अधःशिरस्केन) कहिये नीचकों शिर औ ऊपरकों पाद करके लटक रहा था तो तहां जो जो वार्ता मैंने निश्चय कीथी कि यहांसें बाहिर निकसकरके ऐसा ऐसा करूंगा सो मैं स्त्री आदिक विषयों में निरंतर आसक्त होनेते विवेकसें भ्रष्ट भया (अद्यापि) कहिये अब वृद्धावस्था प्राप्त भयाभी तिस वार्ताकू स्मरण नहि करता हुं यातें (मु- रारिमाया) कहिये यह जाननेमें आवे है कि मुरारि जो भगवान् नारायण है तिनकी माया बडी दुस्तर है जिसने मेरेकू इस संसारके मिथ्या व्यवहारोंमें फ. सायकरके भुलाय दिया है तथा गीतामेभी कहा है "देवी ोपा गुणमयी मम माया दुरत्यया" अर्थ-हे [ ५७ } अर्जुन, यह जो त्रिगुणरूप मेरी दैवीशक्ति माया है सो तिसका तरना बहुत कठिन है इति ॥ माताके उदरमें स्थित भया वालक जो जो निश्चय करे है सो सर्वहि अथर्ववेदकी गर्भउपनिषत्में लिखा है सो प्र- संगसे यहां संक्षेपसें दिखावे हैं। तहां यह प्रकार लिखा है कि ऋतुकालमें स्त्रीपुरुपके संयोग होनेते जो वीर्य गर्भमें स्थित हो जावे है तो सो वीर्य एकरात्री में कि- चित् सघन हो जावे है औ पश्चात् सप्तरात्रीमें ज- लके बुद्बुदके समान हो जावे है औ अर्धमासमें पिं- डाकार हो जाये है मासभरमें अधिक कठिन हो जावे है द्विमासमें तिसमें शिर वन जावे है तीसरे मासमें दोनों पाद निकस आते हैं चतुर्थ मासमें गुल्फ कटि उदर यह तीनों उत्पन्न होवे हैं पंचम मा. समें पृष्ठवंश होवे है औ पष्ठे मासमें मुख नासिका नेत्र श्रोत्र उत्पन्न होवे हैं सप्तम मासमें तिसमें चेत- नता प्रकट होवे है अष्टम मासमें सर्व लक्षणोंकरके संपूर्ण होवे है पश्चात् नवम मासमें सर्व ज्ञानकरके संपन्न होवे है तो पश्चात् अपने सर्व पूर्वजन्म औ शु- भाशुभ कर्मोंकू स्मरण करके अत्यंत विरागईं प्राप्त - ४ [ ५६ अधःशिरस्केन दुरंतसंकटे मया यदंवाजठरे विनिश्चितम् ॥ स्मरामि नाद्यापि तदुद्धताशयो मुरारिमाया खलु दुस्तरा यतः ॥३३॥ टीका--(दुरंतसंकटे) कहिये मलमूत्र जठरानल कृमी आदिकरके पूर्ण महासंकटके स्थानभूत मा- ताके उदरविपे जिस कालमें मैं (अध:शिरस्केन) कहिये नीचैको शिर औ ऊपरकों पाद करके लटक रहा था तो तहां जो जो वार्ता मैंने निश्चय कीथी कि यहांसें वाहिर निकसकरके ऐसा ऐसा करूंगा सो मैं स्त्री आदिक विपयोंमें निरंतर आसक्त होनेते विवेकलें भ्रष्ट भया (अद्यापि) कहिये अव वृद्धावस्थाकू प्राप्त भयाभी तिस वार्ताकू स्मरण नहि करता हुं यातें (मु- रारिमाया) कहिये यह जाननेमें आये है कि मुरारि जो भगवान् नारायण है तिनकी माया वडी दुस्तर है जिसने मेरे… इस संसारके मिथ्या व्यवहारोंमें फ- सायकरके भुलाय दिया है तथा गीतामेंभी कहा है "देवी ह्येषा गुणमयी मम माया दुरत्यया" अर्थ-हे गुल्फ कटि उदर यह तीनों उत्पन्न हो पंचम मा- समें पृष्ठवंश होवे है औ पठे मासमें मुखानासिका नेत्र श्रोत्र उत्पन्न होवे हैं सप्तम मासमें पिसमें चेत- संपन्न होवे है तो पश्चात् अपने सर्व पूर्वजन्म औ शु. लक्षणोंकरके भाशुभ काकू स्मरण करके अत्यंत विराग प्राप्त [ ५७ ] अर्जुन, यह जो त्रिगुणरूप मेरी दैवीशक्ति माया है सो तिसका तरना बहुत कठिन है इति ॥ माताके उदरमें स्थित भया बालक जो जो निश्चय करे है सो सर्वहि अथर्ववेदकी गर्भउपनिषत्में लिखा है सो प्र- संगसे यहां संक्षेपसें दिखावे हैं। तहां यह प्रकार लिखा है कि ऋतुकालमें स्त्रीपुरुपके संयोग होने जो वीर्य गर्भमें स्थित हो जावे है तो सो वीर्य एकरात्री में किं. चित् सघन हो जावे है औ पश्चात् सप्तरात्रीमें ज- लके बुद्बुदके समान हो जावे है औ अर्धमासमें पि- डाकार हो जाये है मासभरमें अधिक कठिन हो जावे है द्विमासमें तिसमें शिर बन जावे है तीसरे मासमें दोनों पाद निकस आते हैं चेतुर्थ मासमें नता प्रकट होवे है अष्टम मासमें सर्व संपूर्ण होवे है पश्चात् नवम मासमें सर्व ज्ञानकरके [२८] भया इस प्रकार ईश्वरसे प्रार्थना करे है “पूर्वयोनि- सहस्राणि दृष्ट्वा चैव ततो मया ॥ आहारा विविधा भुक्ताः पीता नानाविधाः स्तनाः॥ जातश्चाहं मृत- श्चाहं मृतो जातः पुनः पुनः। अहो दुःखोदधौ भग्नो न पश्यामि प्रतिक्रियां । यदि योन्याः प्रमुच्येहं त- प्रपद्ये महेश्वरं ॥ यदि योन्याः प्रमुच्येहं तत्सांख्यं यो. गमभ्यसे ।यदि योन्याः प्रमुच्येहं ध्याये ब्रह्म सनात. नम्" अर्थ-हे ईश्वर, पूर्वयुगोंमें मैंने हजारोंहि नीच ऊंच योनियां देखी हैं औ अनेक प्रकारके आहार भक्षण किये हैं तथा नानाप्रकारके हजारों माताके स्तनपान किये हैं औ अनेकवार जन्मा औ मरा पुनः जन्मा मरा इस प्रकार वारंवार जन्मता मरता रहा हु सो अब इस गर्भरूप दुःखके समुद्र में डूबा हुया मैं अपने उद्धार करनेका कोई उपाय नहि देखता हुं याते है ईश्वर, जो अबके इस योनिसें बाहिर निकलूंगा तो महेश्वर जो महादेव अथवा विष्णु भगवान् है केवल तिनहिका आराधन करूंगा तथा सांख्य ओ योग- काहि अभ्यास करूंगा औ केवल सनातन जो परि- पूर्ण ब्रह्म है तिसहिका अहर्निश ध्यान करूंगा इति ।।

इस प्रकारसे प्रार्थना करता हुया सो जीव जब ग- र्भसे बाहिर आवे है तो सो सर्व ज्ञानकू भूल जावे है इसी कारणसें रुदन करेहै यह वार्ताभी तहांहि क- थन करी है "जातमात्रस्तु वैष्णयेन वायुना संस्पृष्ट- तदा न सरति जन्ममरणानि न च कर्मशुभाशुभं विन्दति' अर्थ-(जातमात्र:) कहिये माताके ग- भसे बाहिर निकसतेहि जब तिसका वैष्णव नाम बाह्य वायुके साथ सर्श होचे है तो पश्चात् सो जीव अपने पूर्वक जन्ममरण औ शुभाशुभ कर्माकू नहि स्मरण करे है अर्थात् सर्व भूल जाये है इति ॥३३॥ इस प्रकारसें गर्भका निश्चय दिखलायकरके अब ति- सके विपरीत अपना आचरण वर्णन करे है । क- रोमीति- करोमि दुष्कर्म सदा प्रयलतः फलं तु वाञ्छामि सुखं सुकर्मणः ॥ करंजमारोप्य तु केन भुज्यते फलं रसालस्य बतेयमज्ञता ॥३४॥ टीका-(सदा) कहिये जन्मसे लेकर अबए.

[१०] र्यंत में प्रयत्नपूर्वक (दुष्कर्म) कहिये कूट व्यापार प- रस्त्रीगमन इत्यादि दुःखके हेतुभूत पापकर्मोंकाहि आचरण करता रहा हु । औं तिसके विपरीत अब इस लोक औ परलोकविपे पुण्यकर्मोका फलभूत जो सुख है तिसकी वांछा करता हु सो यह वार्ता कैसे हो सकती है काहेते (करंजमारोप्य ) कहिये प्रथम करंजका वृक्ष लगायकरके पश्चात् कौन पुरुष आरके फलॉकू भक्षण करे है अर्थात् कोईभी नहि करे है यातें (बतेयमज्ञता) कहिये सो यह मेरी वडी आ- श्चर्य मूर्खता है ॥ तथा जीवन्मुक्तिप्रकरणमेंभी कहा है “पुण्यस्य फलमिच्छति पुण्यं नेच्छंति मानवाः ॥ न पापफलमिच्छति पापं कुर्वति यत्नतः" अर्थ- स्वभावसेंहि सर्व प्राणी पुण्यकर्मका फल जो सुख है तिसकी सर्वदा वांछा करते हैं औ प्रायः पुण्यका आचरण नहि करते हैं तथा पापका फल जो दुःख है तिसकू कोईभी नहि चाहता परंतु सर्वदाहि प्रय- लपूर्वक पापकर्मोंका आचरण करते हैं यह क्या आ- श्चर्यकी वार्ता है इति ॥ ३४ ॥ इस प्रकार पूर्वोक्त रीतिसें मनकी मूर्खताका निरूपण करके अब तिस मनसें परे अपने आत्माके स्वरूपकू नहि जानकरके कहे हैं । कोहमिति- कोहं कथं केन कुतः समुहतो यास्यामि चेतः क शरीरसंक्षये ॥ कि मेस्ति चेहागमने प्रयोजनं वासोत्र मे स्यात्कति वासराणि वा॥३५॥ टीका-(कोहं) कहिये मैं कौन हूँ औ किस प्रकारसे उत्पन्न भया हुँ तथा (केन) कहिये मैं किस हेतुकरके उत्पन्न भया हु औ (कुतः समुद्गतः) कहिये किस वस्तुसे उत्पन्न भया हुं तथा इस शरीरके नाश हो जानेके अनंतर यहाँसे मैं पुनः कहां जा. ऊंगा तथा (किं मेस्ति चेहागमने प्रयोजनं) कहिये इस मनुष्यलोकविपे मेरे आनेका क्या प्रयोजन था औ अब इस लोकमें (कति वासराणि) कहिये कितने दिनपर्यंत मेरा निवास रहेगा इति ॥ ३५॥ यहांप- र्यंत ग्रंथकारने मुमुक्षु पुरुषके विचाररूप व्याजकरके वेदांतशास्त्रमें आत्मज्ञानके अधिकारी पुरुपके जो जो लक्षण कथन किये हैं सो सर्वहि सूचन किये हैं।

[६२ ] जैसे कि नवम श्लोकमें जो कहा कि मैं अज्ञानकी शक्तियांकरके प्रेरित भया अवपर्यंतभी अपने आ. त्माके हितकारक वस्तुकू नहि देखता भया हुं तथा पुनः एकादशमे श्लोकविपे जो कहा है कि मैं आहा- रनिद्रादिकोंके तत्पर होयकर पशुकी न्याई विचारसें शून्य भया अपने शरीरविषेहि स्थित भये आत्माकू नहि देखता भया हु सो इत्यादिकरके ज्ञानका प्रथम साधन जो आत्मा औ अनात्माका विवेक है सो सू. चन किया है।तथा पश्चात् कुटुंब स्त्री पुत्र औ धन- विपे दोपदृष्टि निरूपणद्वारा ज्ञानका द्वितीय साधन जो इस लोक औ परलोकके भोगासे ग्लानिरूप वे. राग्य है सो सूचन किया है काहेते परलोकके स्वर्गा- दिक भोगोंकी प्राप्तिभी यहांके स्त्रीपुत्रधनादिकोंसें होवे है काहेतें स्त्रीपुत्रादिकोंकी सहायतासे धनके यज्ञादिकोंमें व्यय करनेसेंहि स्वर्गादिकोंकी प्राप्ति होवे है । तथा पुनः जिव्हादि इन्द्रियोंकी दुष्टता व- र्णन करनेसें तो भोगमात्रसेंहि चिराग दिखलाया काहेते यावत्मात्र ब्रह्मलोकपर्यंत भोग हैं सो सर्व इन्द्रियोंकरकेहि भोगे जाते हैं तथा इसहि द्वारा इ.

[१३] न्द्रियोंका दमनरूप जो दम है सोभी सूचन किया है ॥ तथा मनकी दुष्टता वर्णनद्वारा मनका निग्रह- रूप जो शम है सो सूचन किया है। तथा चौबीसके लोकविषे जो कहा है कि जो विश्वंभर परमात्मा च- राचर जगत्का पोपण करता है सो क्या मेरेकू अ. नादि नहि देवेगा इसकरके क्षुधापिपासादिक ई- द्वोंका सनरूप जो तितिक्षा है सो सूचन करी है। तथा इस समीप उक्त पैंतीसके श्लोकमें जो कहा कि मैं कौन हु औ कहांसें उत्पन्न भया हुँ इस प्रकारसें अभ्यंतरविचारद्वारा मनकी स्थिरतारूप जो समा- धान है सो सूचन किया है ॥ तथा श्रद्धा औ वि- श्वास तो आगे गुरुकी शरण जानेसेंहि सूचित होवे हैं। इस प्रकारसे शम दम श्रद्धा समाधान तितिक्षा विश्वास इन पदका समूहरूप जो ज्ञानका तीसरा साधन पदसंपत्ति है सो सूचन किया है तथा उन्नी- सके श्लोकमें जो कहा है कि है ईश्वर मैं कपोतकी न्यांई कुटुंवरूप जालमें फसा हुया किस प्रकारसे छू- दूंगा औ पुनः सताईसके श्लोकमें जो कहा कि अ- नादि अविद्यारूप तिमिरकरके मेरे ज्ञानरूप नेत्र आ- [६४ ] च्छादित हो गये हैं सो तिस तिमिरके निवृत्त करने. हारा अंजन क्या होगा इत्यादिद्वारा ज्ञानका चतुर्थ साधन 'जो मुमुक्षुता है सो सूचन करीहै । सो इस प्रकारसें अधिकारीके सर्व लक्षण सूचनकरके अब तिसके अनंतर जो गुरुकी शरण जानारूप ज्ञानका अंतरंग साधन है सोभी तिस मुमुक्षु पुरुपके व्याज- सेंहि दर्शाते हैं । इत्थमिति- इत्थं सुधीः शुद्धधिया निरंतरं संचिंतयन्नप्यगमन्न निश्चयम् ।। खिन्नांतरंगस्तु ततः समिकरो गावाभ्युवाचात्मविदांवरं गुरुम ॥३६॥ टीका-(इत्थं ) कहिये इस पूर्वोक्त भकारसें न- वम श्लोकसें आरंभकरके यहांपर्यंत सो श्रेष्ठ बुद्धि- मान् मुमुक्षु पुरुष अपनी शुद्ध बुद्धिकरके निरंतर वारंवार (संचितयन् ) कहिये विचार करता हुयाभी अपने स्वरूपके निश्चयकू नहि प्राप्त होता भया । तथा यजुर्वेदकी कठोपनिषत्में भी कहा है "नेपा त- कॅण मतिरापनेया प्रोक्तान्येनैव सुज्ञानायप्रेष्ठ"अर्थ-

हे मियतम नचकेता, यह आत्मज्ञानरूप मति केवल
अपनी बुद्धिके विचारनेसें प्राप्त नहि होवे है किंतु
तत्ववेत्ता गुरुके उपदेशद्वाराहि तिस ज्ञानकी प्राप्ति
होवे है इति ॥ तो पश्चात् सो मुमुक्षु (खिन्नांतरंगः)
कहिये चित्तमें खिन्नता• प्राप्त भया अर्थात् अति
उत्कट जिज्ञासाकरके संयुक्त भया (समित्करः) क.
हिये विधिपूर्वक हस्तोंमें भेट लेकर कोई एक (आ:
स्मविदांवरं) कहिये आत्मतत्वके जाननेहारे ज्ञानी
पुरुपोंमें श्रेष्ठ अर्थात् ब्रह्मश्रोत्रिय औ ब्रह्मनिष्ठ गु-
रुकी शरण जायकरके वक्ष्यमाण रीतिसें प्रश्न करता
भया ॥ काहेत एकला ब्रह्मश्रोत्रिय गुरु होवे औन--
ह्मनिष्ठ नहि होवे तो शिष्यफू तिसके वाक्यमें ठीक
ठीक श्रद्धा नहि होवे है औ जो ब्रह्मनिष्ठ होवे औ
श्रोत्रिय नहि होवे तो सो शिष्यके सर्व संशयोंकू स.
म्यक् प्रकारसें छेदन नहि कर सके है ।। यातें उक्त
दोनों विशेषणोंकरके संयुक्त गुरुकीहि शरणमें शि-
प्यको जाना चहिये । यह वार्ता अथर्ववेदकी मुंडक
उपनिपत्में भी कथनकरी है "तद्विज्ञानार्थ स गुरु-
मेवाभिगच्छेत् समिपाणिः श्रोत्रियं ब्रह्मनिष्ठम्"

अर्थ-जिज्ञासु पुरुपको तिस आत्माके ज्ञानकी प्राप्तिके अर्थ हस्तोंमें कुछ भेटा लेकरके ब्रह्मश्रोत्रिय औ ब्रह्मनिष्ठ गुरुकीहि शरणमें जाना चहिये इति ॥३६॥ इस प्रकारसें तिस मुमुक्षु पुरुषका गुरुके समीप गमन वर्णन करके अब ग्रंथकी समाप्तिपर्यंत तिनके संवादद्वारा वेदांतशास्त्रका सर्व रहस्य संक्षे. पसे दर्शाते हैं ॥ तहां प्रथम शिप्यके प्रश्रका उत्थान 1 शिप्य उवाच ।। भवार्णवे जन्मजरातिमिगिले तृषानले मोहविवर्तसंकुले॥ निमजतो मे किमु तारकं दृढं वदावंधो मयि चेदनुग्रहः ॥३७॥ टीका-भवार्णव इति ॥ हे (आर्तबंधो) कहिये दीन पुरुषोंके सहाय करनेहारे गुरो (भवार्णवे) कहिये यह संसाररूप एक महासमुद्र है काहेत जैसे विना जहाजसै समुद्रका तरणा अति कठिन होवे है तैसेहि इस संसाररूप समुद्रकाभी तरणा अत्यंत कठिन है।।

[१] सो जैसे समुद्रविपे जीवोंके क्लेश देनेहारे नाना प्र- कारके ग्राह मत्स्य मकरादि क्रूर जंतु सर्वदाहि रहते है तैसेहि संसाररूप समुद्र में (जन्मजरातिर्मिगिले) कहिये जन्म औ जरारूप क्रूर जंतु रहते हैं यहां जन्म जरा यह दोनों मरण शीत उष्ण क्षुधा पिपासा राग द्वेषादिकोंकेभी उपलक्षण हैं । औ जैसे समुद्र में ज- लके शोपण करनेहारा बडवानल सर्वदा रहता है तै- सेहि संसाररूप समुद्र में (तृपानले) कहिये तृष्णा- रूप वडवानल रहता है ॥ औ जैसे समुद्रविपे जलके महाचक्र होवे हैं तैसेहि संसाररूप समुद्र (मोहषि- वर्तसंकुले) कहिये अज्ञानरूप महा चक्रकरके व्याप्त होय रहा है काहेतें जैसे जलके चक्रमें पडे हुये जीव नीचेसे नीचेहि चले जाते हैं तैसेहि अज्ञानरूप च- क्रमें पडे हुयेभी नीचेसे नीचेहि चले जाते हैं अर्थात् वारंवार सर्प श्वान सूकरादि योनियोंमें भ्रमते रहते हैं सो हे भगवन् इस प्रकारके घोर संसाररूप समुद्र- विपे मैं डूबता हुया चला जाता हूं सो इसमें (कि- मुतारकं दृढं) कहिये ऐसा कौन तरनेका दृढ सा. धन है कि जिसके आश्रय होयकरके मैं इससे पार हो जाई सो (मयि चेदनुग्रहः) कहिये हे भगवन जो मेरे ऊपर आपका अनुग्रह होवे औ आप मेरेकू अधिकारी समझे तो कृपा करके इसका उत्तर मेरे प्रति कथन करो इति ।। ३७ ॥ इस प्रकारसे शिष्यका विनयपूर्वक प्रश्न श्रवण करके अब गुरु तिसका अनु- वाद करते हुये उत्तर कहे हैं। ॥ गुरुरुवाच ॥ संसारदुप्पारमहोदधौ नृणां मुंबीवदेवोर्ध्वमधश्च मजताम् ।। गोविन्दपादांबुरुहैकचिंतनं पोतं वदंतीह दृढ़ विपश्चितः ॥ ३ ॥ टीका-संसारेतिहे शिष्य इस संसाररूप दुपार कहिये अत्यंत दुस्तर महासमुद्रविपे तुंबीफलकी न्याई सर्वदाहि (निमजतां) कहिये नीचे ऊपर अर्थात् दे- वता मनुष्य पशु पक्षी सादि नाना प्रकारकी ऊंच नीच योनियोविषे भटकते हुये पुरुपोंकों केवल (गो- विंदपादांबुरुहैकचितनं) कहिये गोविंद भगवा- नके चरणकमलोंका जो एकाग्रचित्त होयकरके चिं.

६९] तन करणा है तिसहि• विद्वान लोक जहाज कहते हैं अर्थात् सोई संसार समुद्रसे पार होनेका साधन है सो यह जहाज (दृढ़) कहिये अति दृढ है अ- र्थात् मार्गमैहि किसी विमरूप यायु आदिकोंकरके टूटनेवाला नहि है औ जो भगवत्भक्तिसे रहित के वल कर्मकांडरूप जहाज है सो संसाररूप समुद्रके पार करने में समर्थ नहि होवे है । यह धार्ता अथर्व- वेदकी मुंडकोपनिषत्मेंभी कथन करी है "लवा होते अदृद्धा यज्ञरूपाः" अर्थ यह जो यज्ञादिरूप कर्म है सो अदृढ कहिये फूटे हुये अल्प नौकाके तुल्य हैं इति ॥ यात संसाररूप समुद्रके पार जानेकी इच्छा. वान पुरुषको तो अन्य सर्व उपायोंका परित्याग क रके केवल भगवत्के चरणकमलोंकाहि सर्वथा आ- श्रय करना योग्य है। तथा यह वार्ता भगवतगीता- मेंभी श्रीकृष्णजीने कथन करी है "सर्वधर्मान् परि- त्यज्य मामेकं शरणं प्रज || अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि माशुचः" अर्थ हे अर्जुन, तु मेरी भ- तिसें शून्य अन्य सर्व धर्माका परित्याग करके केवल मेरीहि शरणकुं प्राप्त होहु औ जो तुं कहे कि सर्व ܝܘ - पष्ट [७० ] धर्मोके परित्याग कर देनेसें मेरेकू प्रत्यवाय होवेगा सो यहभी शोच मत कर काहेते मैं तेरेकू सर्व पापोंसें मुक्त कर देचूंगा इति ॥ तथा अन्यत्रभी कहा है "रे चित्त चिंतय चिरं चरणो मुरारेः पारं गमिष्यसि यतो भवसागरस्य ॥ पुत्राः कलत्रमितरे नहि ते सहायाः सर्वे विलोकय सखे मृगतृष्णिकाभम्" ॥ अर्थ है चित्त, तुं चिरकालपर्यंत मुरारि जो नारायण हैं ति. नके चरणोंकाहि चिंतन कर जिससें तुं इस संसार- रूप समुद्रसे पार हो जावेगा काहेते अंतकालमें यह स्त्री पुत्र औ अन्य कुटुंबके लोक कोईभी तेरे सहा. यक नहि होवेंगे या हे सखे, इस सर्व जगत्कू तुं मृगतृष्णाके जलके समान मिथ्या देख इति ॥३८॥ इस प्रकारसे गुरुके मुखसे यथावत् उत्तर श्रवण क- रके अब पुनः शिष्य द्वितीय प्रश्न करे है। ॥ शिप्य उवाच॥ इहैव संत्यज्य गृहं सवांधवं धनं शरीरं च गतस्य देहिनः ।। भवेदमुत्रास सहायकस्तु का सुहृदेतबद वेदविविभो ।। ३ ।। .. AM .

टीका-इहैवेति ॥ हे (वेदविद्धिभो) कहिये सर्व वेदके जाननेहारे भगवन् , जिस कालमें (इहैव सं. त्यज्य) कहिये मृत्युके वश भया पुरुष सहित बंधु- जनोंके अपने गृह औ धन तथा शरीरका यहांहि प. रित्याग करके परलोक• गमन करे है तो तिस का- लमें वहां तिसका (सुहृद्धत् ) कहिये मित्रकी न्याई कौन सहायक होते है सो यह कृपा करके मेरेप्रति कथन करो इति ।। ३९ । इस प्रकारसे शिष्यका प. रलोकसंबंधी प्रश्न श्रवण करके अब गुरु तिसका उत्तर कहे हैं। ॥ गुरुरुवाच ॥ वधूर्जनित्री जनकः सहोदरः सुतो धनं मित्रममुत्र गच्छता ॥ समेति साकं न सहायकोपि को विना खधर्मेण नरेण वै कचित् ॥४०॥ दीका-वधूरिति ।। हे शिष्य, (अमुत्र गच्छता) कहिये जिस कालमें यह पुरुष मरकरके परलोककू जावे है तो क्धू जो स्त्री है औ जनित्री जो माता है [ ७२ ] तथा जनक जो पिता है औ सहोदर जो भाई है तथा धन जो विपुल ऐश्वर्य है औ मित्र जो अपना सुहृद है सो इन सर्वमेंसें तिस कालमें इस पुरुषका (न सहायकोपि कः) कहिये कोईभी सहायता कर- नेहारा साथ नहि जावे है विना अपने अनुष्ठान किये हुये धर्मके अर्थात् अपना किया हुया धर्महि इस पुरुपके साथ परलोकमें सहायक जाये है। यह वार्ता मनुस्मृतिमेभी कथन करी है "नामुत्र हि सहा- यार्थ पितामाता च तिष्ठतः॥ न पुत्रदारा न ज्ञाति- धर्मस्तिष्ठति केवलः" अर्थ-पुरुपके साथ परलोकमें सहायता करनेहारा न पिता न माता न पुत्र न स्त्री न अन्य ज्ञातिके लोक कोईभी नहि होवे है किंतु केवल स्वधर्महि स्थित होवै है इति ॥ हे शिष्य, यातें परलोकमें सहायकी इच्छावान् पुरुपको सर्वदा धर्म- काहि आचरण करना योग्य है। तथा यह वार्ता तैत्तिरीय उपनिपत्मेंभी कथन करी है "धर्म चरध- मन्नि प्रमदितव्यं" अर्थ--हे पुरुष, तुं सर्वदाहि ध- मका आचरण कर धर्मसें किसी कालमेंभी प्रमाद नहि करना चाहिये इति । तथा महाभारतके अंतभी

[७३
कहा है “न जातु कामान्न भयान्न लोभाद्धर्म त्यजे-
जीवितस्यापि हेतोः ॥ धर्मो नित्यः सुखदुःखे त्यनित्ये
जीवो नित्यो हेतुरस्य त्वनित्यः" अर्थ--पुरुपकों
कदाचित्भी परस्त्री आदि विषयक कामके वशीभूत
होयकरके अथवा राजादिकोंके भयकरके अथवा
धनादिकोंके लाभकरके किंच अपने जीवनेके अर्थभी
धर्मका परित्याग नहि करना चाहिये काहेते धर्म
(नित्य) कहिये सदा संग रहनेहारा है औ सांसा-
रिक सुखदुःखभयादि तो अनित्य पदार्थ हैं औ सु-
खदुःखादिकांके हेतुभी अनित्य हैं औ जीव नित्य
कहिये अविनाशी है याते अनित्य पदार्थों के अर्थ
नित्य धर्मका परित्याग नहि करना चाहिये इति ४०
इस प्रकारसे शिष्य धर्मकी प्रशंसा श्रवण करके पुनः
प्रश्न करे है।
शिष्य उवाच ॥
धर्मस्य मार्गा बहवो महर्षिभिः
संदर्शिता भुक्तिविमुक्तिसिद्धये ॥
कस्तेषु गम्यस्तु मयात्मशुद्धये
निःशेषधर्मेकरहस्यविगुरो ॥ ४१ ॥

[७]
टीका-धर्मस्पेति ॥ हे गुरो, आपने कहा जो
इस पुरुपका परलोकमें धर्महि एक सहायक होवे है
दूसरा कोई नाहि सो (धर्मस्स) कहिये तिस धर्मके
मार्ग व्यासादि पूर्वके महर्षियाने भोग औ मोक्षकी
प्राप्तिके अर्थ अनेक प्रकारके महाभारतादिकॉमें
(संदर्शिता) कहिये सम्यक् प्रकारसे दिखलाये हैं
अर्थात् प्रतिपादन किये हैं सो हे (निःशेपधर्मकरह-
स्यवित्) कहिये सर्व धमाके रहस्यके जाननेहारे गुरो
तिनमेंसें अपने अंतःकरणकी शुद्धिके अर्थ मेरेकों का-
नसा मार्ग धर्मका ग्रहण करना चाहिये सो आप
कृपा करके मेरे प्रति कथन करो इति ॥४१॥ इस
प्रकारसें शिप्यका द्वितीय प्रश्न श्रवण करके अब
गुरु तिसका उत्तर कथन करे हैं।
॥ गुरुरुवाच ॥
वाचा च चितेन च कर्मणापि यत्
संपालनं नित्यमवेक्ष्य शास्त्रतः ।।
सत्यस्य तद्धर्ममिहोत्तमं बुधाः
प्राहुस्ततस्तं हि समाश्रयाचिरम् ॥४२॥

[७] टीका चाचेति ॥ हे शिष्य, (वाचा) कहिये वाणीकरके औं (चित्तेन) कहिये चित्तकरके तथा (कर्मणा) कहिये शरीरकरकेभी सर्वदाहि शास्त्रसे विचार करके जो सत्यका सम्यक् प्रकारसें पालन करना है तिसकूहि (बुधा) कहिये विद्वान् लोक सर्व अन्य धर्मोंसें उत्तम धर्म कथन करते हैं ।। ति- नमें जैसा देखा अथवा आप्त पुरुपके मुखसे श्रवण किया होवे तैसाहि भाषण करना औ सर्व प्राणि- योका हितकारक औ प्रिय भाषण करना काहेते जिस सत्य भाषणसें किसी प्राणिकू क्लेश प्राप्त होवे सो स- त्यभी असत्यके समान होते है यातें सत्यप्रिय औ हितकारक जो भाषण करना है सो वाचाका सत्य कहिये है। तथा चित्तकरके किसी प्राणिकाभी जो अनिष्ट चिंतन नहि करना औ सर्वके साथ सुहृद्भाव रखना है सो चित्तका सत्य कहियेहै । तथा अपने शरीर करके किसी प्राणिकोभी जो क्लेश नहि देना औं परस्त्रीगमनादि अशुभ कर्मोंका आचरण नहि करना है सो शरीरका सत्य कहिये है । तथा सत्य पालनकी सर्व धासे उत्कृष्टता महाभारतके मोक्ष- [ ७६ ] पर्वमें देवतोंके प्रति हसरूप प्रजापति भी कथन करी है "सत्यं स्वर्गस्य सोपानं पारावारस्य नौरिव । न च पावनतमं किंचित्सत्यादध्यगम क्वचित्" अर्थ हे देवतो, सत्यहि स्वर्गमें आरोहण करनेकी सीढी है औ सत्यहि संसाररूप समुद्रसें पार करनेहारी नौका है मैनें चतुर्दश भुवनोंमें ढूंढनेसेंभी सत्यसे परे अन्य पवित्र धर्म कोई नहि देखा है इति ॥ तथा अथर्ववे- दकी मुंडकोपनिषत्मेंभी कहा है "सत्यमेव जयते नानृतं सत्येन पंथा विततो देवयानः" अर्थ-सत्य- कीहि सर्वत्र जय होये है असत्यकी नहि औ सत्य- करकेहि उपासक लोक देवयानमार्गसें ब्रह्मलोककू जाते हैं इति ॥ अथवा यहां सत्यशब्दकरके ब्रह्म जा. नना काहेते "सत्यं ज्ञानमनंतं ब्रह्म" इस यजुर्वेदके वाक्यमें ब्रह्मका नामभी सत्य कथन किया है। सो वाचाकरके ब्रह्मकाहि कथन करना अर्थात् मुमुक्षु पुरुपोंके प्रति उपदेश करना औ चित्तकरके ब्रह्मकाहि वेदांतशास्त्रकी युक्तियोंकरके मनन करना तथा शरी- रकरके स्त्री आदि विपयोंका परित्याग एकांत सेव- नादि तिसके अनुसारहि व्यवहार करना सो इस [ ७७ ] प्रकारसें मनवाणी तथा शरीरकरके जो सत्यका पालन करना है सोई सर्व धर्मोंसें श्रेष्ठ धर्म है । यह वार्ता गीताभी कथन करी है "सर्व कर्माखिलं पार्थ ज्ञाने परिसमाप्यते" अर्थ हे पार्थ, कहिये अर्जुन, श्रु- तिस्मृतिविहित सर्व कर्म ब्रह्मज्ञानमें समाप्त अर्थात् अभ्यंतरहि हो जाते हैं इति ॥ यातें हे शिष्य, (त. तस्तं हि समाश्रयाचिरं) कहिये जिस कारणसें स- त्यहि सर्व धर्मोंसे श्रेष्ठ धर्म है तिस कारणसें तुं (अ- चिरं) कहिये शीघहि तिसकू आश्रय कर इति ॥४२॥ इस प्रकारसे धर्मविषयक निर्णय करके अब "तत्व- भसि" यह सामवेदकी छांदोग्यउपनिपत्का महा- वाक्य है सो इसमें तत् त्वं असि यह तीन पद हैं तिनमेंसें प्रथम तत् पद ईश्वरका वाचक है औ त्वं. पद जीवका वाचक है तथा असिपद तिन दोनोंकी एकताका वाचक है इसहिके सम्यक् प्रकारसें जान- नेका नाम ब्रह्मज्ञान है सोई जन्ममरणरूप संसारब- धनकी मुक्तिका कारण है ।। सो जवपर्यंत जिज्ञासु- पुरुषको प्रथम तत् औ त्वं पदका भिन्न भिन्न यथार्थ चोध नहि हो लेवे है तबपर्यंत तिन दोनोंकी एकता [७८] का ज्ञान होना असंभव है यात तिन दोनोंकी एक- ताकी सिद्धिके अर्थ ग्रंथकार गुरु औ शिष्यके संवा- दद्वाराहि प्रथम तिन दोनों पदोंका निरूपण करे हैं तिनमेंभी मुख्य होनेतें प्रथम सप्तदश श्लोकोंकरके तत् पदका विवेचन करे हैं ॥ तहां पूर्वोक्त धर्मका निर्णय श्रवणकरके अब शिप्य पुनः प्रश्न करे है ॥ ॥शिष्य उवाच॥ इदं जगच्चित्रचरित्रचित्रितं विनिर्मितं केन कथं कुतस्तथा । मृषाऽमृषा वापि ततो विलक्षणं भवेदधानादि किमादिमन्मने ॥ ४३ ॥ टीका- इदमिति ॥ हे मुने कहिये आत्मतत्वके मनन करनेहारे गुरो, यह जो (चित्रचरित्रचित्रितं) कहिये नानाप्रकारके विचित्र व्यवहारॉकरके संयुक्त औ चतुर्दश भुवनोंकरके शोभायमान तथा देवता म- नुष्य पशु पक्षि सर्प वृक्ष नदी समुद्रादि नानाप्रका- रके विचित्र पदार्थोकरके परिपूर्ण सर्व जगद है सो (केन विनिर्मितं) कहिये किसनें निर्माण किया [७९ है तथा किस प्रकारसे निर्माण किया है औ कुतः कहिये किस वस्तुसे निर्माण किया है। तथा (मृपा- ऽमृपाया) कहिये यह सर्व जगत् क्या सत्य है किंवा असत्य है अथवा सत्य औ असत्य दोनोंसें विलक्षण है तथा यह (जगत आदिमत्) कहिये आदिसें निर्माण किया गया है किंवा अनादिहि चला आता है। सो यह सर्वहि भिन्न भिन्नकरके मेरेप्रति कृपाकरके क- थन करो इति ॥ ४३ ॥ इस प्रकारसें जगत् विष- यमें शिप्यके पांच प्रश्न श्रवणकरके अव गुरु क्रमसे तिनका एक श्लोक करकेहि उत्तर कहे हैं। || गुरुरुवाच ॥ यः सर्वगः सर्व विदक्षरः प्रभु- याधिपस्तंतुरिवोर्णनाभितः ॥ तस्मादनिर्वाच्यमिदं मजायते वेगात्मनाचेदमनायुदाहृतम् ॥ ४४ ॥ टीका-य इति ॥ तहां जो शिष्यने प्रथम प्रश्न किया कि यह जगत् किसने निर्माण किया है ति- १ वेगशब्दोत्र प्रवाहवाचकः । वेगः प्रावाहजवयोरपीत्यमरः ॥

[८] सका उत्तर कहे हैं ।। हे शिष्य, (यः सर्वगः) कहिये जो परमात्मा सर्वत्र व्यापक है काहेते यह नियम है कि कार्यसै कारण वडा होये है सो इस ब्रह्मांडके भीतर औ वाह्य व्यापक होने परमात्मा सर्वगत है। तथा यह वार्ता श्रुतिमभी कथन करी है "आकाश- वत्सर्वगतश्च नित्यः" अर्थ सो परमात्मा आकाशकी न्याई सर्वगत औ नित्य है इति ॥ तथा जो परमात्मा (सर्ववित्) कहिये भूत भविष्य वर्तमान सूक्ष्म व्यव. हित विप्रकृष्ट सर्व पदार्थोकू करामलकवत् सर्वदा जाननेहारा है काहे यहभी नियम है कि जो कोई जिस वस्तुकू निर्माण करे है तो तिसको प्रथम तिस वस्तुका ज्ञान अवश्य होवे है या अत्यंत विस्तृत औ विचित्र चराचर जगत्का कारण होनेतें परमात्मा सर्वज्ञ है ।। तथा श्रुतिमेंभी कहा है "यः सर्वज्ञः स- विद्यस्य ज्ञानमयं तपः" अर्थ-जो परमात्मा सा- मान्य औ विशेषरूपकरके सर्वके जाननेहारा है औ जिसका ज्ञानरूपहि तप है इति ॥ तथा जो परमात्मा (अक्षरः) कहिये क्षरण जो विनाश है तिसते रहित है यह वार्ता कैवल्योपनिपत्मेंभी कथन करी है "सो- क्षरः परमः स्वराट्" अर्थ-सो परमात्मा अक्षर औ' परम स्वतंत्र है इति ॥ तथा 'प्रभु' कहिये ब्रह्मासे लेकर स्थाणुपर्यंत सर्व चराचर जगत्का नियंता सर्व- शक्तिमान् है सो हे शिष्य, सो परमात्माहि इस सर्व- जगत्कू निर्माण करे है । यह वार्ता ऋग्वेदकी ऐ- तरेयोपनिपत्में भी कथन करी है "आत्मा वा इदमेक एवान आसीन्नान्यत् किंचिन्मिपत् स ईक्षत लोका- असृजा इति स इमाल्लोकानसृजत" अर्थ-जगत्के आदि कालमें प्रथम यह सर्व एक परमात्माहि होता भया अन्य वस्तु किंचित्भी नहि था सो परमात्मा जगत्के रचनेका संकल्प करता भया तो पश्चात् सं- कल्पकरके इन सर्व लोकोंकू उत्पन्न करता भया इति॥ इस प्रकारसे प्रथम प्रश्नका उत्तर कथन करके अब सो जगत्कू किस प्रकारसें निर्माण करे है यह जो शिष्यका द्वितीय प्रश्न है तिसका उत्तर कहे हैं (मा- याधिपः) कहिये हे शिष्य, जो परमात्मा अघटघट- नापटीयसी औ अनिर्वचनीय जो मायाशक्ति है ति- सका अधिपति है अर्थात् सो परमात्मा मायाळू आ- श्रय करके इस जगत्का निर्माण करे है। यह वार्ता . ManakaMMAR [२] कृष्णयजुर्वेदकी श्वेताश्वतरोपनिपत भी कही है "मायांतु प्रकृति विद्यान्मायिनं तु महेश्वरम्" अर्थ- सर्व जगत्के निर्माणमें हेतुभूत माया है औ तिसका अधिष्ठाता परमात्मा जानना चाहिये इति ॥ तथा गीतामें कृष्णजीनेभी कहा है "प्रकृति स्वामवष्टभ्य विसृजामि पुनः पुनः॥ भूतग्राममिमं कृत्स्नमवशं प्र. कृतेर्वशात्" अर्थ-हे अर्जुन, मैं अपनी मायाशक्ति आश्रयण करके प्रकृतिके परवश भये इस सर्व भूतमा- णियोंके समूहळू वारंवार कल्पकल्पविषे निर्माण करताहुं इति ॥ इस प्रकारसे द्वितीय प्रश्नका उत्तर कहकरके अब सो किस वस्तुसे निर्माण करे है यह जो शिष्यका तृतीय प्रश्न है तिसका उत्तर कथन करे हैं (तंतुरिवोर्णनाभितः) कहिये है शिष्य, जैसे ऊर्ण- नाभिनामा जंतु बाह्य किसी वस्तुको नहि लेकरके केवल अपने शरीरसेंहि तंतुओंका विस्तार करे है तै- सेहि परमात्माभी किसी वाह्य वस्तुकी अपेक्षासें वि. नाहि इस जगत्को निर्माण करे है यह वार्ता यजुर्वे- दकी तैत्तिरीयोपनिपत्मेंभी लिखी है "सोऽकामयत मकटी.

[८३] बहु स्यां प्रजायेय तदात्मानं स्वयमकुरुत" अर्थ-ज- गत्के आदिकालमें सो परमात्मा में एकसे अनेक होयकरके उत्पन्न होवू इस प्रकारका संकल्प करके प- श्चात् सो परमात्मा अपने आपहि जगतरूप हो जाता भया इति । इस प्रकारसें तृतीय प्रश्नका उत्तर कह- करके अब यह जगत् सत्य है किंवा असत्य है अ- थवा सत्य असत्य दोनोंसे विलक्षण है यह जो शि- प्यका चतुर्थ प्रश्न है तिसका उत्तर कथन करे हैं (त- सादनिर्वाच्यमिदं प्रजायते) कहिये हे शिष्य, तिस परमात्मासे यह सर्व जगत् अनिर्वाच्य उत्पन्न होवे है अर्थात् प्रत्यक्ष प्रतीति होनेते असत्य नहि कहा जाय सकै है औ ज्ञानकालमें अभाव होनेते सत्यभी नहि कहा जाय सकै है या अनिर्वचनीय हैं। तथा पं. चदशीमें चित्रदीपचिपे विद्यारण्यस्वामिने भी कहा है "युक्तिदृष्ट्या त्वनिर्वाच्यं नासदासीदिति श्रुतेः।ना- सदासीद्विभातत्वान्नो सदासीच्च बाधनात्" अर्थ- युक्तिदृष्टिकरके तो यह जगत् अनिर्वचनीय सिद्ध होवे है काहेत "नासदासीन्नो सदासीत्" इस श्रुतिमें कहा है कि यह जगत् उत्पत्तिसें प्रथम असत् नहि था [८४ औ सत्यभी नहि था ।। सो प्रत्यक्ष प्रतीत होवे है याते असत् नहि है औ ज्ञानकालमें इसका बाध हो जावे है यातें सत्यभी नहि है इति ॥ औ वास्तव दृष्टि से देखें तो सर्व मिथ्याहि है यह वार्ताभी तहाँहि कथन करी है "तुच्छा निर्वचनीया च वास्तवी चेति सा त्रिधा। ज्ञेया माया त्रिभिर्वोधः श्रौतयोक्तिकलौ- किकैः" अर्थ-यह जगरूप माया तीन प्रकारसें जाननी चाहिये तिनमेंसे लौकिक दृष्टिसें तो सत्य है औ युक्तिसें विचार देखें तो अनिर्वनचीय सिद्ध होवे है औ वेदांतशास्त्रकी दृष्टिसें तो मृगतृष्णाका जल आकाशकी नीलता शशेके शृंगकी न्याई प्रत्यक्ष प्र- तीत होनेतेंभी मिथ्याहि है इति । इस प्रकारसे ज. गत्का मिथ्यापना सिद्ध करके अव यह जगत् आ- दिवाला है किंवा अनादि है यह जो शिष्यका पंचम प्रश्न है तिसमें प्रथमका निषेध करते हुये द्वितीय प. क्षकू अंगीकार करके उत्तर कहे हैं (वेगात्मना चेद- मनायुदाहृतम्) कहिये हे शिप्य, वेग अर्थात् प्रवाह- रूपकरके यह जगत् अनादिहि विद्वान् लोकोंने क- थन किया है । तथा यजुर्वेदकी कठोपनिषत्में भी

[५]
लिखा है "एषोश्वत्थः सनातनः" अर्थ---यह संसार-
रूप वृक्ष अनादिकालका है इति ॥ तथा ऋग्वेदके
मंत्रभागभी लिखा है "सूर्याचन्द्रमसौ धाता यथा-
पूर्वमकल्पयत् । दिवं च पृथिवीं चांतरिक्षमथो स्व"
अर्थ-जिस प्रकारसे पूर्वकल्पों में सूर्य चंद्रमा औ
आकाश पृथिवी अंतरिक्ष स्वर्गादि थे तैसेहि स्मरण
करके इस कल्पमें ब्रह्मा रचता भया है इति ॥इससें-
भी जगत् अनादि सिद्ध होवे है। तथा भगवद्गीतामें भी
कहा है "न रूपमस्येह तथोपलभ्यते नांतो नचादिन
च संप्रतिष्ठा" अर्थ-हे अर्जुन, इस जगत्रूप वृ-
क्षका रूप औ अंत आदि तथा स्थिति नहि मिलती
है इति ॥ १४ ॥ इस प्रकारसें गुरुके मुखसे यथार्थ
उत्तर श्रवण करके अब पुनः शिप्य तिसहि विपयमें
प्रश्न करे है।
॥ शिप्य उवाच ॥
खकीयमुद्दिश्य किलेतरस्य वा
प्रयोजनं किंतु विनाप्रयोजनम् ॥
विनिर्मिमीते जगदेतदीश्वरो
वदैतदज्ञानतमोनभोमणे ॥ ४५ ॥

टीका-स्वकीयमिति ॥ हे (अज्ञानतमोनभो. मणे) कहिये अज्ञानरूप तमके नाश करनेमें सूर्यके समान गुरो, आपने कहा कि इस जगत्कू ईश्वरने निर्माण किया है सो ईश्वर इस जगत्कू (स्वकीय) कहिये अपने प्रयोजनके अर्थ निर्माण करे है किंवा (इतरस्य) कहिये किसी दूसरेके अर्थ निर्माण करे है अथवा (विनाप्रयोजनं) कहिये विनाहि किसी प्र- योजनसें करे है सो (पद) कहिये यह वार्ता कृपाह- प्टिसें मेरेप्रति कथन करो इति ॥ ४५॥ इस प्रका- रसे शिष्यका प्रश्न श्रवण करके अव गुरु तिसका उत्तर कहे हैं। 11 गुरुरुवाच ॥ सदाप्नकामस्य तु नामहेतवे न चेतरस्यापि न चाप्यहेतुका । जगन्क्रियाक्रीडनमेव केवलं विभोर्वदंतीह तु वेदयादिनः ॥ ४६॥ टीकासदेति ॥ हे शिप्य, (सदाहवामस्य) कहिये ईश्वर सर्वदाहि आप्तकाम है अर्थात् तिसक् [७] किसी वस्तुकी कामना नहि है । यह वार्ता श्रुति- मेंभी कथन करी है "आप्तकामस्य का स्पृहा" अर्थ-ईश्वरको आप्तकाम होनेतें क्या इच्छा संभव है अर्थात् कोईभी नहि इति ॥ तथा गीतामेंभी क- हाहै "न मां कर्माणि लिपति न मे कर्मफले स्पृहा" अर्थ-अर्जुन, मेरेकू जगतकी उत्पत्ति स्थिति प्र- लयादि कर्म लियायमान नहि करते काहेते कि तिन कोंके फलकी इच्छासें मैं रहित हुँ इति ॥ याते हे शिष्य, ईन्चरको निस्पृह होनेतें अपने प्रयोजनके अर्थ जगत्का निर्माण नहि संभव है। तथा जो शिष्यनें कहा कि किसी दूसरेके प्रयोजन अर्थ ईश्वर निर्माण करे है तहां कहे हैं (न चेतरस्यापि) कहिये हे शिष्य, तैसेहि इतर कहिये किसी दूसरेके अर्थभी ईश्वर इस जगत्का निर्माण नहि करे है काहेते सा- भवेदकी छांदोग्य उपनिषत्में लिखा है कि "सदेव सौम्येदमन आसीदेकमेवाद्वितीय" अर्थ-उद्दालक- ऋपि कहे है हे प्रियदर्शन श्वेतकेतु, इस जगत्की उत्पत्तिसें प्रथम एक सतरूप परमात्माहि अद्वितीय था अन्य कोई दूसरा पदार्थ नहि था । यातें जग- टीका स्वकीयमिति ॥ हे (अज्ञानतमोनभो. मणे) कहिये अज्ञानरूप तमके नाश करने में सूर्यके समान गुरो, आपने कहा कि इस जगत्कू ईश्वरने निर्माण किया है सो ईश्वर इस जगत्कू (स्वकीय) कहिये अपने प्रयोजनके अर्थ निर्माण करे है किंवा (इतरस्य) कहिये किसी दूसरेके अर्थ निर्माण करे है अथवा (विनाप्रयोजनं) कहिये विनाहि किसी प्र- योजनसें करे है सो (वद) कहिये यह वार्ता कृपाह- प्टिसें मेरेप्रति कथन करो इति ॥ ४५ ॥ इस प्रका- रसे शिष्यका प्रश्न श्रवण करके अब गुरु तिसका उत्तर कहे हैं। || गुरुरुवाच ॥ सदाभकामस्य तु नात्महेतवे न चेतरस्यापि न चाप्यहेतुका ।। जगक्रियाक्रीडनमेव केवलं विभोर्वदंतीह तु वेदवादिनः ।। ४६ ।। टीका-सदेति ॥ हे शिप्य, (सदाप्तकामस्य) कहिये ईश्वर सर्वदाहि आप्तकाम है अर्थात् तिसा [८७ ] किसी वस्तुकी कामना नहि है ॥ यह वार्ता श्रुति- मेंभी कथन करी है "आप्तकामस्य का स्पृहा" अर्थ-ईश्वरको आप्तकाम होनेतें क्या इच्छा संभवे है अर्थात् कोईभी नहि इति ॥ तथा गीतामेंभी क- हाहै "न मां कर्माणि लिंपति न मे कर्मफले स्पृहा" अर्थ-हे अर्जुन, मेरेषं जगत्की उत्पत्ति स्थिति प्र- लयादि कर्म लिपायमान नहि करते काहेते कि तिन काँके फलकी इच्छासें मैं रहित हुँ इति ॥ यातें हे शिष्य, ईश्वरको निस्पृह होनेते अपने प्रयोजनके अर्थ जगत्का निर्माण नहि संभव है। तथा जो शिष्यने कहा कि किसी दूसरेके प्रयोजन अर्थ ईश्वर निर्माण करे है तहां कहे हैं (न चेतरस्यापि) कहिये हे शिष्य, तैसेहि इतर कहिये किसी दूसरेके अर्थभी ईश्वर इस जगत्का निर्माण नहि करे है काहेत सा- मवेदकी छांदोग्य उपनिषत्में लिखा है कि "सदेव सौम्येदमग्र आसीदेकमेवाद्वितीय" अर्थ उद्दालक- ऋषि कहे है हे प्रियदर्शन श्वेतकेतु, इस जगतकी उसत्तिसें प्रथम एक सत्रूप परमात्माहि अद्वितीय था अन्य कोई दूमरा पदार्थ नहि था । याते जग- ---- [८] के आदि कालमें ईश्वरसें विना दूसरेके अभाव होनेतें किसी दूसरेके अर्थभी ईश्वरका जगत्का नि- र्माण करना नहि संभव है। तथा जो शिष्यनें कहा कि विनाप्रयोजनसें निर्माण करे है तहां कहें (न चाप्यहेतुका) कहिये हे शिप्य, यह जो जगत् क्रिया अर्थात् जगत्का निर्माण करना है सो विनाप्रयोजन- सेंभी नहि संभव है काहेते यह लौकिक न्याय है कि "प्रयोजनमनुद्दिश्य मंदोपि न प्रवर्तते" अर्थ-प्रयो- जनसे विना तो अल्पबुद्धिवाला पुरुषभी किसी का- र्यमें प्रवृत्त नहि होवे है इति ।। तो सर्वज्ञ जो ईश्वर है सो तो ऐसे महत्कार्यमें कैसेहि प्रवृत्त हो सके है सो इस प्रकारसे उक्त तीनों पक्षोंके असंभव होनेते अब गुरु समाधान कहे हैं (क्रीडनमेव केवलं विभोः) कहिये हे शिष्य, यह जगत्की उत्पत्ति स्थिति प्रलय करना केवल तिस विभु परमात्माका क्रीडन अर्थात् लीलाविहार है ऐसे (वेदवादिनः) कहिये घेदके जाननेहारे व्यासादिक मुनि लोक कथन करते हैं । यह वार्ता शारीरक सूत्रोंके द्वितीयाध्यायमें व्यास मुनिनेंभी कथन करी है "लोकवतु लीलाकवल्य" अर्थ-जिस प्रकारसे इस लोकविषे राजा आदि पूर्णकाम भयेभी केवल लीलाके अर्थ शिकार खेल- नादि क्रिया करते हैं तैसेहि ईश्वरभी केवल लीलाके अर्थहि इस जगत्का निर्माणादि करे है इति ॥४६॥ इस प्रकारसे जगत्का कारण परमात्माकू श्रवण क- रके अब जगत्की स्थितिविषयक शिप्य प्रश्न करे है। ॥ शिष्य उवाच ॥ निशाकरेन्द्रार्कयमानलानिला धराधराधारनदीनदीश्वराः ॥ भयेन कस्याखिलशक्तिधारिणः सदैव भीता नियति त्यति नो॥४७॥ टीका-निशाकर इति ॥ हे गुरो, निशाकर जो चंद्रमा है औ इन्द्र जो देवताका राजा है तथा अर्क जो सूर्य है औ यम कहिये यमराज औ अनल जो अग्नि देवता है तथा अनिल जो वायु है औ धरा जो पृथिवी है तथा धराधार जो हिमालयादिक प- वैत है औ नदी जो गंगायमुनादि नदिया है तथा नदीवर जो नदियोंके पति समुद्र है सो यह सर्वहि [९.] हे भगवन् , (भयेन कस्य ) कहिये ऐसा कौन सर्व शक्तियोंके धारण करनेहारा पुरुप है कि जिसके भ- यकरके सर्वदाहि भयभीत भये आपोअपनी (नियति) कहिये मर्यादाकू नहि छोडते हैं. सो कृपाकरके मेरे- प्रति कथन करो इति ॥ १७॥ इस प्रकारसें शिष्यका प्रश्न श्रवणकरके अब गुरु तिसका उत्तर कहे हैं ।। ॥ गुरुरुवाच॥ यमीश्वराणां परमं महेश्वरं तयोद्यत वनमपि श्रुतिर्जगौ। भयेन तस्याखिलमेव कंपते यह राज्ञोनुचरादिकं जगत् ॥ ४ ॥ टीका-यमिति ।। हे शिष्य, (यमीश्वराणां परमं महेश्वरं) कहिये जिसकू ब्रह्मादि जो जगत्के ईश्वर हैं तिनकाभी परम महा ईश्वर वेद कथन करे है ।। तथा श्वेताश्वतरोपनिपत्में लिखा है "तमीश्वराणां परमं महेश्वरं तं देवतानां परमं च दैवतम् ॥ पति प- तीनां परमं परस्ताद्विदाम देवं भुवनेशमीड्यम्" अर्थ-जो परमात्मा देव ब्रह्मादि सर्व ईश्वरोंका प. रम ईश्वर है औ अग्नि आदि देवताकाभी परम दैवत है तथा कश्यप दक्षादि प्रजापतियोंकाभी पति है औ चतुर्दश भुवनोंका अधिपति औ सर्वकरके पूजनीय है तिस देवकू हम ऋपिलोक जानते हैं इति ।। तथा (उद्यतं वज्रमपि) कहिये हे शिष्य, जिसपरमात्मा वेदविपे उद्यत वज्रके समानभी कथन किया तथा यजुर्वेदकी कठोपनिपत्में कहा है "महभयं व- जमुद्यतं य एतद्विदुरमृतास्ते भवति" अर्थ-सो पर- मात्मा सर्व चराचर जगत्कों भयका हेतु अर्थात् दंड देनेहारा है औ सर्वदाहि शिरपर स्थित भये भ- यानक यत्रकी न्याई है जो पुरुष तिसकू जानते हैं सो मोक्षकू प्राप्त होवे हैं इति ॥ सो (भयेन तस्य) कहिये हे शिष्य, तिस परमात्माके भयकरकेहि (अ. सिलं) कहिये यह सूर्यचन्द्रादिकोंसें लेकर सर्व चरा- चर जगत् कांपता है जैसे इस लोकमें प्रत्यक्ष (राज्ञो- नुचरादिक) कहिये राजाके भयकरके सर्व अनुचरा- दि लोक सर्वदा कांपते हैं । यह वार्ता यजुर्वेदकी तै- त्तिरीय उपनिषत्मेंभी लिखी है "भीपारमाद्वातः पर-

[ ९२ ]
ते भीपोदेति सूर्यः भीपास्मादग्निश्चन्द्रश्च मृत्युर्धावति
पंचमः" अर्थ-इस परमात्माके भयकरके आकाशमें
वायु चलता है औ भयकरकेहि सूर्य उदय होवे है
तथा भयकरकेहि अग्नि ज्वलता है औ भयकरके
इन्द्र वर्षा करे है तथा भयकरके इनमें पंचमा मृत्यु
प्राणियोंके मारनेकों धावता है इति ॥ तथा बृहदा-
रण्यकउपनिपत्में भी लिखा है "एतस्य वा अक्षरस्य
प्रशासने गार्गि सूर्या चन्द्रमसौ विधृतो तिष्ठतः"
अर्थ-हे गागि, इस अक्षरपरमात्माकेहि शासनाविषे
स्थित भये सूर्य औं चन्द्रमा आकाशविपे भ्रमण क-
रते हैं इति ॥४८॥ इस प्रकारसें श्रुतिसंमत यथार्थ
उत्तर श्रवणकरके अब पुनः शिप्य प्रश्न करे है।
॥शिष्य उवाच ॥
जडानि कर्माणि पृथक्पृथग्जनः
कृतानि चित्राणि सदा समंततः ।
विबुद्धयकालेन तु कोऽखिलार्थवित्
फलं दयालुर्भगवन प्रयच्छति ॥ ४९ ॥

टीका-जडानीति ।। हे भगवन, इस ब्रह्मांडां- तर्गत दैत्य देव मनुष्य नाग पशु पक्षी आदि जो जीव हैं सो सर्वहि (पृथक् पृथक् ) कहिये परस्पर भिन्न भिन्न कर्म करते हैं औ (चित्राणि) कहिये तिनमें एक एक जीपके नानाप्रकारके विचित्र कर्म हो हैं औ सो सर्वहि कर्म (जडानि) कहिये जड हैं अर्थात् स्वतः किसी फलके देने में समर्थ नहि होवे है । यातें सो ऐसा कौन (अखिलार्थवित्) कहिये भूत भविष्यत् वर्तमानकै सर्व पदायाँके असंडित जाननेहारा औ दयालु पुरुष है कि जो सर्वदाहि (समततः) कहिये सर्वतरफसे तिन सर्व जीवोंके क- मौकू सम्यक् प्रकारसे भिन्न भिन्न जानकरके (का- लेन) कहिये बहुकाल पायकरके जन्मजन्मांतरों विपे तथा स्वर्गनरकादि देशांतरोंमें भिन्न भिन्न यथायोग्य जीवोंकू तिन काँका सुखदुःसादिरूप फल देव है सो कृपाकरके मेरेप्रति कयन करो इति ॥ १९ ॥ इस प्रकारसे शिप्यका कर्मविषयक प्रश्न श्रवणकरके अब गुरु तिसका उत्तर कथन करे है। न [९४ ] ॥ गुरुवाच ॥ येनेश्यते सर्वमिहांतरात्मना लोकेश्वरा यस्य निदेशकारिणः ॥ तेनाखिलं कर्मफलं मसूयते वर्षीवुना सस्पमिवाविरोधतः ॥ ५० ॥ टीका-येनेति ॥ हे शिप्य, (येनेश्यते) कहिये जो परमात्मा इस जगत्गत चराचर भूतप्राणियोंके अंतर स्थित भया अंतर्यामिरूपसे प्रेरणा करे है। यह वार्ता बृहदारण्यकोपनिपत्में भी कथन करी है "यः सर्वेषु भूतेषु तिष्ठन् सर्वेभ्यो भूतेभ्योतरोयं स- र्वाणि भूतानि न विदुर्यस्य सर्वाणि भूतानि शरीरं यः सर्वाणि भूतान्यंतरो यमयत्येपत आत्मांतर्याम्यमृतः" अर्थ-याज्ञवल्क्यमुनि कहे है हे उद्दालक, जो पर- मात्मा सर्व चराचर भूतोंमें स्थित भया सर्व भूतोंके अं- तर है औ जिसकू सर्वभूत नहि जानते हैं औ जिसका सर्वभूत शरीर हैं औ जो सर्व भूतोंकू अंतरसे प्रेरण करे हैसोई तुमारा पूछा हुया नित्य मुक्तस्वरूप अंतर्यामी परमात्मा है इति ॥ तथा गीताके अठारवे अध्यायमें [९५ ] श्रीकृष्णजीनेभी कहा है "ईश्वरः सर्वभूतानां हृद्देशे- र्जुन तिष्ठति"अर्थ-हे अर्जुन, सर्वभूतमाणियोंके हृद- यकमलमें ईश्वर स्थित होय रहा है इति॥सो हे शिप्य, इस प्रकारका जो अंतर्यामी सर्वज्ञ ईश्वर है (तेना- खिलं कर्मफलं प्रसूयते) कहिये सोई सर्व जीवोंकू कर्मोका फल भिन्न भिन्न उत्पन्न कर है अर्थात् देवे है यह वार्ता बृहदारण्यकोपनिषत्मेंभी कथन करी है "रातेतुः परायणं" अर्थ-सो परमात्माहि ध- नके दान करनेहारे पुरुषोंका परायण है अर्थात् सोई तिनके प्रति दानादिकर्मोका फल देवे है इति । तथा ईशावास्योपनिपत्मेंभी कहा है "याथातथ्यतोर्थान् व्यदधाच्छाश्वतीभ्यः समाभ्यः" अर्थ-सो परमा- स्मा निरंतरहि अनेक वर्षांसें यथायोग्य काके फल- रूप अर्थोकी व्यवस्था करे है इति ॥ ओ जो केचित् मीमांसकादि ऐसा मानते हैं कि ईश्वर कोंके फल देनेहारा नहि है किंतु कर्महि स्वतंत्र फल देवे हैं सो यह वार्ता असंभव है काहेतें कौकों जड औ त- कालविनाशिरूप होनेतें कालांतरमें फल देनेकी समर्थता नहि संभवे है । यह वार्ता पुष्पदंतगंधर्व- *.

[९६] नेभी कही है "क कर्म प्रध्वस्तं फलति पुरुषाराधन- मृते" अर्थ-तत्कालविषे विनष्ट भये कर्मविना ईश्वरके आराधन अर्थात् अनुग्रहके कहां फल देवे हैं अर्थात् कहींभी नहि इति ।। तथा शारीरकसूत्रोंमें व्यासजीनेभी कहा है "फलमत उपपत्ते" अर्थ- ईश्वरके सकाशसेंहि सर्व कर्मोका फल होवे है का- हेते (उपपत्तेः) कहिये ईश्वरमेंहि सर्वज्ञ सर्वशक्ति- मान होनेतें कमाके फलका देनापना संभव है क- माँको जड होनेतें तिनमें नहि संभव है इति ।। औं जो इस स्थलमें शिष्य इस प्रकारकी शंका करें कि गरुडपुराणादिकोंमें लिखा है कि पापपुण्य कर्मका फल यमराजा देवे है औ यज्ञादिकोंका फल वर्षादि- द्वारा इन्द्र देवे है तो तहां गुरु समाधान कहे हैं (लोकेश्वरा यस्य) कहिये हे शिष्य, जिस परमात्माके इन्द्र कुबेर यम वरुणादि जो लोकपाल है सो सर्व. हि (निदेशकारिणः) कहिये आज्ञाकारी हैं अर्थात जैसे इस लोकविपे प्रसिद्ध राजाकी आज्ञासें मंत्री आदि चौरादिकोंकू दंडादिक देवे हैं तैसेहि परमा- त्माकी आज्ञानुसारहि यमराजादिक जीवोंकू कर्मोंका [ ९७ ] फल देवे हैं स्वतंत्र नहि यातें मुख्य परमात्माहि कर्मफलका देनेहारा है।। शंका | जो उक्त रीति- ईश्वरकूहि कर्मफलका दाता मानोगे तो तिसमें वि- पमतादि दोषोंकी प्राप्ति होगी काहे किसी जी- वकू देवता बनाय देना किसी• मनुष्य किसीकू सर्प किसीकू धनी किसीकू दरिद्री इत्यादि कार्य विषमतासेंविना कैसे संभवे हैं औ जो ईश्वरमें भी विषमता भई तो तिसका ईश्वरपनाहि नहि संभवे. गा। इस प्रकारकी शिष्यकी शंका होनेतें गुरु स- माधान कहे हैं " वावुना सस्यमिवाविरोधतः" कहिये हे शिष्य, ईश्वरविषे विपमतादि दोप नहि सं- भवे हैं काहेते ईश्वर तो वाके जलकी न्याई है जैसे वर्षाका जल सर्व क्षेत्रोंविपे वरावर पडे है परंतु जिस जिस क्षेत्रचिपे जो जो यव गेहूं तंदुलादि वस्तु चोया हुया होवे है सोई सोई तिसमें उसन्न होवे है यातें तिस व जलमें कोई विपमतादि दोप नहि सं. भवे है तैसेहि ईश्वरभी कर्मोक फल देने में साधारण निमित्त होचे है आगे जिस जिस जीवका जैसा जैसा कर्म होये है तैसा तैसाहि तिसकू फल प्राप्त [९६] नेभी कही है कि कर्म प्रध्वस्तं फलति पुरुषाराधन- मृते" अर्थ-तत्कालविपे विनष्ट भये कर्मविना ईश्वरके आराधन अर्थात् अनुग्रहके कहां फल देवे हैं अर्थात् कहींभी नहि इति । तथा शारीरकसूत्रों में व्यासजीनेभी कहा है "फलमंत उपपत्ते" अर्थ- ईश्वरके सकाशसेंहि सर्व कर्मोका फल होवे है का- हेते (उपपत्तेः) कहिये ईश्वरमेंहि सर्वज्ञ सर्वशक्ति- मान् होनेतें कौके फलका देनापना संभव है क- मौको जड होनेतें तिनमें नहि संभव है इति ॥ औ जो इस स्थलमें शिप्य इस प्रकारकी शंका करे कि गरुडपुराणादिकोंमें लिखा है कि पापपुण्य कर्मका फल यमराजा देवे है औ यज्ञादिकोंका फल वर्षादि- द्वारा इन्द्र देवे है तो तहां गुरु समाधान कहे (लोकेश्वरा यस्य) कहिये हे शिष्य, जिस परमात्माके इन्द्र कुवर यम वरुणादि जो लोकपाल हैं सो सर्व- हि (निदेशकारिणः) कहिये आज्ञाकारी हैं अर्थात जैसे इस लोकविषे प्रसिद्ध राजाकी आज्ञार्से मंत्री आदि चौरादिकोंकू दंडादिक देवे हैं तैसेहि परमा- त्माकी आज्ञानुसारहि यमराजादिक जीवोंकू कौंका

[ ९७ ]
फल देवे हैं स्वतंत्र नहि यातें मुख्य परमात्माहि
कर्मफलका देनेहारा है ॥ शंका ॥ जो उक्त रीतिसे
ईश्वरकूहि कर्मफलका दाता मानोगे तो तिसमें वि-
पमतादि दोपोंकी प्राप्ति होवेगी काहे किसी जी-
वकू देवता बनाय देना किसी• मनुष्य किसीकू
सर्प किसीकू धनी किसीकू दरिद्री इत्यादि कार्य
विपमतासेंविना कैसे संभवे हैं औ जो ईश्वरमेंभी
विपमता भई तो तिसका ईश्वरपनाहि नहि संभवे.
गा। इस प्रकारकी शिष्यकी शंका होनेतें गुरु स.
माधान कहे हैं "वर्षावुना सस्यमिवाविरोधतः"
कहिये हे शिष्य, ईश्वरविपे विपमतादि दोप नहि सं.
भवे हैं काहेतें ईश्वर तो वर्षाके जलकी न्यांई है जैसे
वर्षाका जल सर्व क्षेत्रोंविषे वरावर पडे है परंतु जिस
जिस क्षेत्रविपे जो जो यव गेहूं तंदुलादि वस्तु वोया
हुया होवे है सोई सोई तिसमें उत्पन्न होवे है यातें
तिस वर्षाके जलमें कोई विपमतादि दोप नहि सं.
भवे है तैसेहि ईश्वरभी कोंके फल देने में साधारण
निमित्त होते है आगे जिस जिस जीवका जैसा
जैसा कर्म होवे है तैसा तैसाहि तिसकू फल प्राप्त

होवे है अपनी तरफसे ईश्वर कुछ नूतन फल नहि देवे है । यह वार्ता शारीरकसूत्रोंमें व्यासजीनेभी क- थन करी है "वैपम्पनघण्येन सापेक्षत्वात्तथाहि द- यति" अर्थ-ईश्वरमें विषमता औ निर्दयता आदि दोष नहि संभवे हैं काहेते (सापेक्षत्वात् कहिये जीवोंके कमौकी अपेक्षा करकेहि ईश्वर शु. भाशुभ फल देवे है इसी वार्ताकू श्रुतिभी दिखला. ती है अर्थात् कथन करती है इति ॥५०॥ इस प्र. कारसें गुरुके मुखसे युक्तियुक्त उत्तर श्रवण करके अब शिष्य पुनः प्रश्न करे है । ११ शिष्य उवाच ॥ दिवाकरो दाहकरो निशाकर- स्तडिगणश्चोडुगणस्तथानिशम् ॥ विभांति कस्यामितदीप्तिदीयिता ब्रवीतु मे संशयशैलदेवराट् ॥ ५१ ॥ टीका--दिवाकर इति ॥ हे (संशयशैलदेवराद) कहिये सर्व संशयरूप पर्वतोंके छेदन करने में इन्द्रके समान गुरो, दिवाकर जो सूर्य है औ दाहकर जो + * २ [ ९९] अग्नि है तथा निशाकर जो चंद्रमा है औ तडिद्गण जो विजुलियोंका समूह है औ उडुगण जो तारा- गण है सो यह सर्वहि (कस्यामितदीप्तिदीपिताः) कहिये ऐसा कौन पुरुप अमित प्रकाशकरके युक्त कि जिसके प्रकाशकरके सर्वदाहि प्रकाशवान् होय रहे है सो कृपाकरके मेरेप्रति कथन करो इति॥५१॥ इस प्रकारसे शिप्यका प्रश्न श्रवण करके अव गुरु तिसका श्रुतिसंमत उत्तर कथन करे हैं । || गुरुरुवाच ॥ न यत्र सूर्यो न निशाकरस्तथा न चापि विद्युज्वलनः प्रकाशते ।। श्रुती स्वयंज्योतिरुदीर्यते च यो विभाति तस्याखिलमेव तेजसा ॥२॥ टीका न यत्रेति ॥ हे शिप्य, जिसकेविपे (सूर्यो) कहिये इस सर्च ब्रह्मांडके प्रकाश करनहारा सूर्य प्र. काश नहि कर सके है औ (न निशाकरः) कहिये रात्रिक प्रकाश करनेहारा जो चन्द्रमा है सोभी म. काश नहि करसकै है तथा विद्युत् जो विजुली है

[१०० ]
सोभी प्रकाश नहि करसकती औ ज्वलन जो अग्नि
देवता है सोभी प्रकाश करने में समर्थ नहि होवे है।।
तथा (श्रुतौ स्वयंज्योतिरुदीर्यते). कहिये है शिष्य,
"तद्देवा ज्योतिषां ज्योतिरायुोपासते मृतं" "अ.
त्रायं पुरुपः स्वयंज्योतिर्भवति" इत्यादि वेदके वाक्यों
विषे जो स्वयंज्योतिस्वरूप प्रतिपादन किया है ति-
सहि परमात्माके (तेजसा) कहिये चेतनमय प्रका-
शकरके यह सूर्य चन्द्रमादि सर्व प्रकाशवान हो रहै
हैं। यह वार्ता यजुर्वेदकी कठोपनिषत्मेंभी कथन
करी है "न तत्र सूर्यो भाति न चन्द्रतारकं नेमा
विद्युतो भांति कुतोयमग्निः। तमेव भांतमनु भाति सर्व
तस्य भासा सर्वमिदं विभाति" अर्थ-तिस परमा-
स्माधिपे सूर्य नहि प्रकाशता है औ चन्द्रमाभी नहि
प्रकाशता है तथा तारागणभी नहि प्रकाशते हैं औ
विजुलियांभी नहि प्रकाशती हैं तो यह अग्नि तो के-
सेहि प्रकाश सके है कितु तिस परमात्माके प्रकाशते
हुयेके पीछेहि यह सूर्यचन्द्रमादि प्रकाशते हैं औ ति-
१ यद्यपि इस वृहदारण्यार वाक्यमें तहा जीवात्मारा प्रसग है तथापि
अभेदाभिप्रायसे यहा परमात्माका क्थन जानना

सहिके प्रकाशकरके यह सर्व चराचर जगत् प्रकाश मान हो रहा है इति ॥ तथा गीताके पंदरवें अध्या- यमेंभी कहा है " यदादित्यगतं तेजो जगद्भासयते. खिलं ॥ यञ्चंद्रमसि यच्चाग्नौ तत्तेजो विद्धि मामकम्" अर्थ-हे अर्जुन, जो तेज सूर्यमंडल में स्थित भया सर्व जगतकू प्रकाशे है औ जो तेज चन्द्रमामें स्थित भया प्रकाशे है औ जो तेज अग्निमें स्थित भया प्रका- शे है सो तूं सर्व तेज मेराहि जान इति ॥५१॥ इस प्रकारसे सूर्यचन्द्रमा आदिकोंकू नियमसें चलाना औ सर्व जीवोंकू कमौके फलका देना इत्यादिकार्योंसें परमात्माकूहि जगत्की स्थितिका कारण श्रवण करके अब शिम्य जगत्के प्रलयविषयक प्रश्न करे है। ॥शिष्य उवाच॥ सदेवनागासुरसिद्धमान जगत्समनं प्रलये लयोन्मुखम् ila विलीयते कस्य तनावनाशिनो जगत्पते—हि विपश्चित्तांपते ॥ ५३॥ टीका सदेवेति ॥ हे (विपश्चितांपते) कहिये BHARATI [१०२] सर्व विद्वानोंके पति अर्थात् श्रेष्ठ गुरो, देवता नाग दैत्य सिद्ध मनुष्यादिक चराचर भूत प्राणियोंके स. हित (जगत्सममं) कहिये यह जो चतुर्दशभुवना- त्मक संपूर्ण जगत् है सो (प्रलये) कहिये प्रलयकालमें नाशके सन्मुख भया ऐसा कौन अविनाशी औ सर्व जगत्का पति पुरुप है कि जिसके शरीरविपे (वि- लीयते) कहिये जायकरके लीन हो जाये है सो कृपा करके मेरेप्रति कथन करो इति ॥ ५३ ।। इस प्रका- रसे शिष्यका प्रश्न श्रवणकरके अब गुरु तिसका उत्तर कहे हैं। ॥ गुरुरुवाच ॥ यस्योदरेऽनंततनोर्महात्मनो ब्रह्मांडलक्षाणि परिस्फुरत्यलम् ॥ खद्योतका भांति यथा नभोगणे तस्मिन्निदं याति लयं लयेऽखिलम्॥५४॥ टीका-यस्येति ॥ हे शिष्य, (अनंततनोः) क- हिये जिस परमात्माका अनंत कहिये अंतसें रहित शरीर अर्थात् स्वरूप है। तथा यजुर्वेदकी तैत्तिरीयउ- [१०३] पनिपत्मभी कहा है "सत्यं ज्ञानमनंतं ब्रह्म अर्थ-~- सो परमात्मा सत्यरूप औ ज्ञानरूप तथा अनंतस्व. रूप है इति ।। तथा (महात्मनः) कहिये हे शिष्य, जो परमात्मा सर्वसें बडा है यह वार्ताभी कठोपनि- पत्में कही है "अणोरणीयान् महतो महीयान् " अर्थ-सो परमात्मा परमाणु शादि अत्यंत सूक्ष्मों- सेंभी सूक्ष्म है औ आकाशादि बडोंसेंभी वडा है इति ॥ तथा हे शिप्य, जिसके उदरविणे अर्थात् अ- भ्यंतर (ब्रह्मांडलक्षाणि) कहिये लाखोहि ब्रह्मांड इस प्रकारसें स्फुरण होवे हैं कि जैसे आकाशविपे रात्रि में अनेकाहि खद्योत स्फुरण होते हैं। तथा यह वार्ता योगवासिष्ठके निर्वाणप्रकरणमेंमी कथन करी है "ब्रह्मांडानां तादृशानां दूरे दूरे पुनः पुनः॥मि- थो लक्षाणि लक्षाणि कचंत्युपरमंति च" अर्थ- रामचन्द्र, तिस चिदाकाशरूप परमात्माविप किंचित् दूरदूरपर लाखोंहि तिस प्रकारके ब्रह्मांड स्फुरण होते हैं औ नाशभी होते हैं इति ॥ तथा व्यासजी- नेभी योगभाप्यमें लिखा है "पंचाशत् कोटिपरि- संख्यातास्तदेतत्सर्व सुप्रतिष्ठितसंस्थानमंडमध्ये व्यूढं ।

१०४ ] अंडं च प्रधानस्याणुरचययो यथा काशे खद्योत इति) अर्थ-जंबुआदि सप्तद्वीप औ लवणादि सप्तसमुद्र यह सर्व मिलकरके पंचास कोटि योजन पृथिवीमंड- लका विस्तार है सो यह नानाप्रकारकी रचनायुक्त सर्व विस्तार ब्रह्मांडके मध्यमें स्थित है सो सर्व ब्रह्मांडमा. याके किसीएक अवयव अर्थात् अंशमें स्थित है जैसे कि आकाशके किसी अंशमें खद्योत उडता है इति ॥ सो इस प्रकारकी मायाभी जिस परमात्माके किसी एक अंशमें रहती है तो तिसके वडेपनेकी तो क्याहि वार्ता कथन करनी है। सो हे शिप्य, ऐसा जो महान् परमात्मा देव है (तस्मिन्निदं याति लयं) कहिये तिसकेविपेहि यह सर्व चराचर जगत् प्रल- यकालमें लीन होये है। तथा यह यार्ता तैत्तिरीय उ- पनिपत्म॑भी कथन करी "यतो वा इमानि भू. तानि जायते येन जातानि जीवति यत्मयंत्यभिसं- विशंतीति तद्ब्रह्म" अर्थ-जिससे यह सर्व भूत प्राणि उत्पन्न होवे हैं औ जिसमें उत्पन्न भये सर्वदा स्थित रहते हैं औ जिसविपे पुनः प्रलयकालमें लीन होवे है सोई ब्रह्म है इति ॥ ५४॥ इस प्रकार पू.

१०९ ] वर्वोक्त रीतिसें परमात्माकू जगत्की उत्पत्ति स्थिति औ प्रलयका कारण निरूपणकरके अब तिरा पर- मात्माके आराधन करनेसेंहि मोक्षपदकी प्राप्ति होवे है यह वार्ता तीन श्लोकोंकरके वर्णन करे है तहां शिष्य पुनः प्रश्न करे है ।। ॥ शिष्य उवाच ॥ दहास्ति देवः खलु कस्तु पूज्यतां गतः कथं तस्य भवेच पूजनम् ॥ सुपजितेनापि च तेन किं फलं भवेदिहामुत्र वदाशु मे विभो ॥ ५५ ॥ टीका-इहेति ॥ हे (विभो) कहिये आत्मस्वरू- सपे सर्वत्र व्यापकरूप गुरो, इस सर्व जगत्में सर्व दे- वतोंसें उत्कृष्ट पूजनेयोग्य कौन देव है औ 'कथं त. स्य भवेच पूजनं' कहिये तिस देवका पूजन किसम- कारसे होये है तथा तिसके विधिपूर्वक पूजन कर. नेसें (किं फर्स) कहिये इस लोक औ परलोकपिपे किस फलकी प्राप्ति होये है सो यह सर्व वार्ता मेरे कृपाकरके कथन करो इति ॥ ५५॥ इस प्रकारसें [ १०६ शिप्यके देवपूजनविषयक तीन प्रश्न श्रवणकरके अब गुरु तिनका द्विश्लोकोंकरके उत्तर कहे हैं। ॥ गुरुरुवाच ॥ यः सर्वगोऽव्यक्तवपुः स्वसंस्थिति- र्यन्मूर्तयो ब्रह्ममहेशमाधवाः ॥ सर्वेश्वरं वेदवचांसि यं जगु- देवाधिदेवं तमवेहि सन्मते ॥ ५६ ॥ टीका-य इति ॥ हे शिष्य, जो परमात्मा (स- वंगः, कहिये सर्व जगत्विपे व्यापक है । तथा यह वार्ता कृष्णयजुर्वेदकी श्वेताश्वतरोपनिपतमेंभी कथन करी है "यो देवोग्नी योप्सुयो विश्वं भुवनमाविवेश" अर्थ-जो परमात्मा देव अग्निमें है औ जो जलमें है तथा जो देव इस चराचर विश्व औ चतुर्दशभुव- नोंमें प्रवेश कीये हुये है इति ॥ तथा हे शिप्य, जो परमात्मा (अव्यक्तवपुः) कहिये अव्यक्तस्वरूप है अर्थात् स्थूल शरीरादि व्यक्तिसे रहित है । तथा मुं. डकोपनिपत्मेंभी लिखा है "दिव्यो ह्यमूर्तः पुरुषः [ १०७ ] सबाह्याभ्यंतरी ह्यजा" अर्थ-सो परमात्मारूप पु. रुप दिव्य औ अमूर्त कहिये मूर्तिसे रहित है तथा सर्व जगत्के बाह्य औ अंतरव्यापक औ अजन्मा है इति ॥ तथा जो परमात्मा (स्वसंस्थितिः).कहिये सर्वदाहि अपने स्वरूपचिपे स्थित रहता है अर्थात् किसी दूसरेके आश्रय नहि है। यह वार्ता छांदोग्यो- पनिषतर्मभी निरूपण करी है "स भगवः कस्मिन् प्रतिष्ठित इति स्वमहिम्नीति" अर्थ-नारदमुनिने स- नत्कुमारसे प्रश्न किया कि हे भगवन् , सो परमात्मा किसकेविपे प्रतिष्ठित है तो सनत्कुमारने कहा सो स. वंदा अपनी महिमा अर्थात् स्वभावमेहि स्थित रहता है दूसरे किसीमें नहि इति । तथा (पन्मूर्तयो) क- हिये जिसकी ब्रह्मा औ महादेव तथा विष्णु यह तीन मुख्य मूर्तियां हैं यहां ब्रह्मा महादेव औ विष्णु यह सूर्य शक्ति औ गणेश इनकेभी उपलक्षण हैं काहेते सूर्यादिकोंकीभी वेदविपे ईश्वरता कथन करी है। यद्यपि परमात्मा स्वभावसे सर्व मूर्तियोंसे रहित है तथापि उपासकलोकोंकी अनुग्रहके अर्थ तिसकी म. हादेवादि व्यक्तियांका स्वेच्छया निर्माण होवे है।

[१०८] तथा कैवल्योपनिपत्में भी कहा है "स ब्रह्मा स शिवः सेन्द्रः सोऽक्षरः परमः स्वरा" अर्थ-सोई ब्रह्मा है सोई शिव है सोई इन्द्र है सोई परमात्मा अविनाशी परम स्वतंत्र है इति ॥ तथा हे शिष्य, 'सर्वेश्वरं वेदव- चांसि यं जगुः' कहिये जिस परमात्मा वेदके वाक्य सर्व जगत्का ईश्वर कथन करते हैं । तथा यजुर्वेदकी श्वेताश्वतरोपनिपतमें कहा है "तमीश्वराणां परमं महे- श्वरं" अर्थ-सो परमात्माब्रह्मादिक ईश्वरोंकाभीम. हान् ईश्वर है इति ॥ सो हे (सन्मते) कहिये श्रेष्ठ बुद्धि- पाले शिप्य, इन उक्तविशेषणोंकरके युक्त जो परमात्मा है तिसहिकू तूं (देवाधिदेवं) कहिये पूजनेयोग्य सर्व देवतोंकाभी परम देव जान ॥ तथा यह वार्ताभी श्वे. ताश्वतरोपनिपतहि कथन करी है "तं देवतानां प. रमं च दैवतं" अर्थ~सो परमात्मा सर्व देवताका प. रम दैवत है इति ॥ ५६ ॥ इस प्रकारसे शिष्यके प्र. थम प्रश्नका उत्तर कथन करके अब तिस देवका पू. जन किस प्रकारसे होवे है औ तिसके पूजनेसें किस फलकी प्राप्ति होते है यह जो शिप्यके द्विप्रश्न है ति. नका गुरु उत्तर कथन करे हैं।

[१०९] ॥ गुरुरुवाच ॥ न पुष्पमालाभिरसौ न चन्दनै- ने धूपदीपादिनिवेदनैरपि ॥ प्रयाति तोपं तु मनौवुजार्पणात ततोऽचिरं मोक्षफलं प्रयच्छति ॥ ५७॥ टीका-न पुष्पमालाभिरिति ॥ हे शिष्य, सो परमात्मा देव (पुप्पमालाभिः) कहिये नानामका. रके पुष्पोंकी मालाओंके अर्पण करनेते तथा (न च- न्दनः) कहिये अनेक प्रकारके सुगंधियुक्त चंदनोंके अर्पण करने तथा (न धूपदीपादि) कहिये नाना- प्रकारके धूप औ दीपादिकोंके निवेदन करनेतेभी (तोप) कहिये संतोप अर्थात् प्रसन्नतापू प्राप्त नहि हो- है। किंतु (मनोवुजार्पणात्) कहिये है शिष्य, रा. गद्वेपादिमलकरके रहित स्वच्छ औ विवेकरूप सूर्यके प्रकाशसे खिलाया तथा प्रेमरूप सुगंधिकरके युक्त जो अपना चित्तरूप एक कमल है तिसके विधिपू. धक अर्पण करने में सो परमात्मादेय सीमहि प्रसन्न- [...] ताईं प्राप्त होवहै ।। यातें हे शिप्य, तूं चित्तरूप पुष्प. करकेहि तिस देवका पूजन कर ॥ तथा शंकराचार्य- नेभी कहाहै "गभीरे कासारे विशति विजने घोर- विपिने विशाल शेले च भ्रमति कुमुमार्थ जडमतिः। समप्यकं चैतः सरसिजमुमानाथ भवते मुखेनैव स्थातुं जन इह न जानाति किमहो" अर्थ-हे उ- मानाथ ईश्वर, आपकू समर्पण करनेयोग्य पुष्पोंके लेने अर्ध अविवेकी पुरुष निर्जनकन औ गहनताला चयिपेभी प्रवेश करतेहैं तथा विकट पर्यतपरभी आ. रोहण करतेहैं परंतु अपने समीपहि स्थित जो चित्त. रूप सुन्दर कमल है तिसकू अनायासमेहि आपके- विपे अर्पणकरके मुससें स्थित नहि होते हैं यह चडे आश्चर्यकी पाती है इति ॥ तथा योगवासिष्टके नि- ाणप्रकरणमें यसिटमुनिकेप्रति महादेवजीनेभी क- हाहै " ध्यानोपहार एवात्मा ध्यानमस्य महानं । विना तेनेतरेणायमात्मा सभ्यत एवं नो ।"अर्थ-हे वसिष्ठ, इस परमात्मादेयका ध्यानहि परम उपहार कहिये पूजनकी सामग्री है औ ध्यानदि इसका परम .

पूजन है काहेतें ध्यानसें विना इस आत्माकी प्राप्ति नहि होवेहै इति ॥ सो हे शिप्य, इसप्रकार चित्तरूप पुष्पके अर्पणरूप पूजनसे प्रसन्न भया सो परमात्मा- देव पूजन करनेहारे मुमुक्षु पुरुपकू (ततो चिरं मोक्ष. फलं प्रयच्छति) कहिये पश्चात् शीघ्रहि जन्ममरण. रूप संसारबंधनके नाशद्वारा कैवल्यमोक्षपदकी प्रा- तिरूप जो फल है तिसकू देवे है ।। तथा यह वार्ता भगवद्गीतामें श्रीकृष्णजीनेभी कथन करी है "तेपां सततयुक्तानां भजतां प्रीतिपूर्वकं । ददामि बुद्धियोग तं येन मामुपयांति ते" अर्थ-हे अर्जुन, जो पुरुष नित्यहि युक्त भये प्रीतिपूर्वक मेरा आराधन करते हैं तिनकू मैं तिस ज्ञानकू देताहुं कि जिसकरके सो शीघहि मेरे स्वरूपचिपे आय मिलते हैं इति ।।५८॥ इसमफारसे परमात्मा देवकी सर्व देवतांसें उत्कृष्टता औ तिसके पूजनका विधान औ कैवल्यमोक्षरूप फलकू श्रवणकरके अतीव उत्कंठाकुं प्राप्त भया शिष्य अब तिस देवका निवासस्थान जाननेके अर्थ- प्रश्न करे है।

॥ शिष्य उपान ॥ सलं निवासस्स गुरो फ पिद्यते सदैव देवस्य कषं च गम्यते ।। कथं भवेशस्य च दर्शनं द्रुतं ब्रवीतु मे तत्त्वशां मणिर्भपान ॥५॥ टीका-स्थलमिति ।। हे (तावाशां मणिः)क. हिये सर्व तत्ववेत्ता पुरुषों में मणिफीन्याई श्रेष्ठ गुरो, आपने जो कहा कि तिस परमात्मादेयका पूजन फ- रना चाहिये सो हे भगवन्, (स्थलं नियासरप) क. हिये तिस देवके सर्वदा फाल निवास करनेका को- नमा स्थान है फि जहां मैं जायफर पूजन कर तथा (कथं घ गम्यते) हिप तिम स्थानपि फिर प्रकारमें पहुंचना होये है तथा स्थानपर पापकरके भी पुनः तिग देयका दर्शन किस प्रकार होय मी यह सर्व पार्ता शीमहि मेरेप्रति कृपाकरको कपन करो इति ॥५८॥ इनमकारमें शिप्यके तीन प्रश्न प्रयण करके भय गुरु तिन तीनोंका एफहि टोककर उत्तर कथन कर है।

। गुरुरुवाच ॥ तस्य स्थलं भूमिगतं न चावरे पातालगं वापि सदा हृदंबुजे । जानीहि तहासमुपेत्य चेतसा पश्यति तं दिव्यदृशस्तु योगिनः ॥१९॥ टीका-तस्येति ॥ हे शिष्य, (तस्य) कहिये तिस देवके रहनेका स्थान (भूमिगतं न) कहिये नानाम- कारके पर्वत नदी समुद्रादिकोंकरके शोभायमान जो यह पृथिवीमंडल है तिसविपे नहि है औ (अवरे)क. हिये जो ऊपर आकाशविपे स्वर्ग जन तपादिक लोक हैं तिनविपेभी नहि है तथा (पातालगं) कहिये पृ. थिवीके नीचे जो तल वितल तलातलादिलोक है तिनमेंभी नहि है ।। किंतु (सदा हृदंबुजे) कहिये हे शिष्य, तिस देवका सर्वदा तुं अपने हृदयकमलमेंहि निवास जान तथा यह वार्ता यजुर्वेदके मंत्रभाग- मेंभी कथन करी है "सहस्रशीर्षा पुरुषः सहनाक्षः स. हस्रपात् । स भूमि विश्वतो वृत्वाऽत्यतिष्ठद्दशांगु- लम्" अर्थ-जिस परमात्मारूप पुरुपके अनेकहि ८.

[११] शिर औ अनेकहि चक्षु औ अनेकहि पाद हैं सो अ. पने स्वरूपसे सर्व पृथिवी अर्थात् ब्रह्मांडकू सर्वतर- फसे आच्छादितकरके पश्चात् नाभिसें दश अंगुल अपर जो हृदयकमल है तिसमें स्थित होय रहा है । तथा गीताके पंदरवें अध्यायमेंभी कहाहै "सर्वस्य चाहं हृदि संनिविष्टो मत्तः स्मृतिर्ज्ञानमपोहनं च" अर्थ- हे अर्जुन, मै सर्वभूतमाणियोंके हृदय में प्रविष्ट भया हु औ मेरेकरकेहि सर्वप्राणियोंकू सर्वपदार्थीका स्मरण, ज्ञान औ तर्क न होवेहै इति ॥ यहां यह र हस्य है ।। यद्यपि सामान्यसे सो परमात्मादेव उक्त आकाश पातालादिकोंमेंभी सर्वत्र परिपूर्ण है यह वार्ता पूर्वहि कथन करि आये हैं तथापि विशेषकरके तिसकी हृदयकमलमहि चेतनरूपसें उपलब्धि होवेहे जैसे सर्वव्यापक सूर्यके प्रकाशकी विशेषकरके दर्पणमें उपलब्धि होवेहै ।। यातें गुरुने यहां तिस परमात्माका हृदयकमलहि निवासस्थान शिप्यके प्रति कथन कियाहै इस प्रकारसे प्रथम प्रश्नका उत्तर कहकरके अब तिस स्थ किस प्रकारसे पहुंचना होये है यह जो शि- प्यका ननिय प्रश्न है तिसका गुर उत्तर कथन करे है 7 (उपेत्य चेतसा) कहिये है शिष्य, तिस परमात्मादे- वके स्थानविपे चित्तवृत्तिरूप पादोंकरके पहुंचना होवे है दूसरे किसी उपायकरके नहि काहेते यजुर्वेद- की कठोपनिषत्में लिखा है कि "मनसैवेदमाप्तव्यं नेहनानास्ति चिन" अर्थ-इस आत्माविषे यह नानापणा कोई हि है यातें केवल मनकरकेहि इसकूँ प्राप्त होना योग्य है इति ॥ इस प्रकारसे द्वितीय प्रश्नका उत्तर कहकरके अब तिस देवका दर्शन किस प्रकार से होवे है यह जो शिष्यका प्रश्न है तिसका उत्तर कहे हैं (दिव्यदृशस्तु योगिनः) कहिये है शिष्य, उक्त प्रकार से चित्तवृत्तिरूप पादकरके तहां पहुंचकर तिस परमात्मादेवकू दिव्यदृष्टिवाले जो योगीजन हैं सो (पश्यति) कहिये समाधि कालमें देखते हैं । यद्यपि परमात्माकों रूपादिकोंसेंरहित होनेते ति. सका देखना असंभव है तथापि इस वार्ता में अनेक श्रुति स्मृतियोंके प्रमाण होनेतें अवश्य समाधिका- लमें अपने हृदयकमलविषे ज्योतिरूपसें योगीलोक तिस परमात्माका दर्शन करतेहैं ॥ तथा अथर्ववेद- की मुंडकोपनिषत्में कहाहै "ततस्तु तं पश्यते नि.

[ १९९] कलं ध्यायमानः" अर्थ-तिसके अनंतर ध्यान करताहुया योगीपुरुष तिस परमात्माकू देखेंहै इति।। तथा कठोपनिपत् भी कहाहै "कश्चिद्धीरः प्रत्य. गात्मानमैक्षदावृतचक्षुरमृतत्वमिच्छन्" अर्थ को. ईएक धैर्यवान् पुरुष सर्व इन्द्रियोंकू निरोध करके मोक्षपदकी इच्छावान् भया समाधिद्वारा तिस प्रत्य- गात्माकू देखेहै इति ॥ तथा शारीरकसूत्रोंमें व्यास- जीनेभी कहाहै "अपि च संराधने प्रत्यक्षानुमाना- भ्याम्" अर्थ-समाधिकालमें योगीपुरुष तिस परमात्माका हृदयाकाशमें दर्शन करते, काहेते इस वार्ता में अनेक श्रुतिस्मृतियोंके प्रमाण हैं इति । तथा महाभारतमें भीप्जस्तपराजविपे भी कहा "ये विनिद्राजितवासाः संतुष्टाः संयतेन्द्रियाः।ज्यो- तिः पश्यति युजानास्तस्मै योगात्मने नमः" अर्ध- जिसकू निद्रासें रहित औ प्राणोंके जय करनेहारे तथा संतुष्पचित्त औ इन्द्रियजित योगीटोक समा- धिकालमें ज्योतिरूपसें देराते हैं तिस योगात्मारूप भगवान्कू मेरी नमस्कार होयो इति । अथवा योगी शब्दकरके यहां आत्मज्ञानियोंका ग्रहण जानना का.

[ ११७ ] हेते सोभी शरीर इन्द्रिय बुद्धि आदिक सर्व प्रपं. चका बाधकरके परमात्माविषे जुडतेहैं अर्थात् एकी- भावकू पाप्त होतेहै या सोभी योगी कहियेह सो हृदयाकाशमें स्थित बुद्धिवृत्तिविषे प्रतिबिवित जो चेतनरूप परमात्मा है तिसकू देखतेहै अर्थात् (तत्त्व- मसि) इत्यादि महावाक्यों के विचारजन्य वृत्तिव्या- प्तिकरके तिसका साक्षात् अनुभव करतेहै इति॥५९॥ इस प्रकार पूर्वोत्तरीतिसे यहांपर्यत जगत्की उत्पत्ति स्थिति प्रलयादिद्वारा तत् पद जो ईश्वर है तिसका तटस्थलक्षणोंकरके निरूपण किया अब द्वादश श्लो- कोंकरके त्वंपद जो जीव है तिसका विवेचन करे है। तहां पूर्वोक्तप्रकारसें बाह्यविषयक प्रश्नोंका समाधान श्रवण करके अब शिष्य अध्यात्मकविषयक प्रश्नकरेहै।। ॥ शिष्य उवाच ॥ अहं शरीरं किमु तेन्द्रियाणि वा मनोथवा माणगणोथवा मतिः ।। अथो किमेषां च समुच्चयोस्मि कि ततः पृथग्वात्मविदां शिरोमणे ॥६॥ - ALLAHALAnana

टीका-अहमिति ॥ हे (आत्मविदां शिरोमणे)
कहिये सर्व आत्मतत्वके जाननहारे पुरुषोंमें शिरो-
मणिरूप गुरो, यह जो अन्नमयकोशरूप स्थूलशरीर
है सो मैं हूं किया (इन्द्रियाणि) कहिये श्रोत्र चक्षु
आदिक जो दश इन्द्रिय हैं सो मैं हु अथवा संकल्प
विकल्पात्मक जो मन है सो मैं हु किंवा प्राण अ-
पानादि जो प्राणोंका समूह है सो मैं हु अथवा (म.
तिः) कहिये निश्चयात्मक जो बुद्धि है सो मैं हुँ किंवा
इन सर्व शरीर इन्द्रियादिकोंका जो (समुच्चय) क-
हिये समूह है सो मैं हुं अथवा (ततः पृथक् ) क-
हिये तिन सर्वसे कोई भिन्न वस्तु मैं हुँ । सो यह
वार्ता कृपा करके मेरे प्रति कथन करो इति ॥६०॥
इस प्रकारसे शिष्यका प्रश्न श्रवण करके अब गुरु
तिस प्रश्नके प्रथम पद विकल्पोंका निषेध करतेहुये
अंतके विकल्पकू अंगीकार करके उत्तर कहेहैं
{१ गुरुरुवाच ॥
शरीरमन्नि तथेन्द्रियाण्यपि
मनोपि नो प्राणगणोपि नो मतिः ॥
न चापि धीमनसि तत्समुच्चय-
स्ततोन्यमात्मानमवेहि साक्षिणम्॥६१॥

टीका-शरीरमिति ॥ हे शिष्य, (शरीरमतन्न) कहिये यह जो अन्नमयकोशरूप स्थूलशरीर है सो तुं नहि काहेते यह नियम है कि जैसा कारण होवेहै तैसाहि कार्य होवैहै सो मातापिताके रजोवीर्य औ अ- नदुग्धादि जड पदार्थोंका कार्य होनेते यह शरीर भी स्वतः जड हि है इस लिये यह तेरा स्वरूप नहि सं- भवे है || किंच यह शरीर जन्मसें प्रथम नहि था औ पुनः मरनेके अनंतर नहि रहता यातें अनित्य है औ जो यह शरीर हि तेरा स्वरूप होता तो इस जन्मसे प्रथम तेरा अभाव होनेते शुभाशुभ काँका भी अ- भाव हि होगा तो इस जन्ममें जो सुखदुःखका भोग होवेहै सो किन कर्मोंका फल है औ जो तुं कहे कि सो इस हि जन्मके कर्मोंका फल है तो यह वार्ता संभवे नहि काहेते यह वार्ता लोकविपे देख- नेमें नहि आवे है कि जो आजहि कर्म किया औ आजहि तिसका फल प्राप्त होजावे यद्यपि केचित् अति उग्र कर्माका फल इस जन्मभी होवेहै त. थापि सर्व कर्मोका नहि तथा कहीं धर्मात्मा पुरु- षोंको क्लेश औ पापात्मा पुरुपोंको सुखभोग देखने में आवे है जैसे कि पांडव औ दुर्योधनादि भये हैं यातें

[१२० }
यह सिद्ध होते है कि सर्व काँका फल इस जन्ममें
नहि होवे है किंच सर्व भूतप्राणि भरनेसे अत्यंत
भय मानते हैं सो तिनोंने सो मरणकालका दुःख
किस कालमें अनुभव कियाथा जो कहे इस हि ज.
न्ममें किया होगा तो सो वार्ता असंभव है काहे
जो इस जन्ममें मरणेका दुःख अनुभव किया होता
तो सो पुनः जीवते हि कैसे रहते ।। औ जो कहे कि
दूसरोंके देखनेसे होवे है तो विशेप विचाररहित जो
पशु पक्षी कीट पतंगादिक है तिनकू नहि होना चा.
हिये औं होये है याते पीछले जन्मोचिप तिसका अ.
नुभव किया है यह सिद्ध होके है ।। किंच जन्मता
हि पालक माताके स्तनको धावता है तो उसको कि-
सने बताया है कि इसमें दुग्ध है औ सो तेरी भु-
धाकी शांति करनेहारा है ।। किंच मरनेके अनंतर
इस शरीरका अभाव होवे है तो इस लोकधिपे किये
जो शुभाशुभ कर्म तिनका विनाहि भोगसें नाश हो-
जावेगा तो परलोकसंबंधि फलवाले यज्ञादिकांक
विधान करनेहारे जो वेद शास्त्र हैं सो सर्वहि व्यर्थ
होजावेंगे यातें हे शिप्प, यह स्थूल शरीरतुं नहि तथा

[ १२१ सामवेदकी छांदोग्योपनिषत् भी लिखा है "जी- वापेतं वाच किलेदं नियते न जीवो म्रियते" अर्थ- जीवसे रहित भया यह स्थूलशरीरहि मर जावे है जीव नहि मरता इति ।। इससेभी स्थूल शरीरसें जीव भिन्न निश्चय होवेहै ।। तथा (इन्द्रियाण्यपि) कहिये हे शिष्य, यह जो शब्दादि विषयोंके ग्रहण करणेहारी चक्षु श्रोत्रादि पांच ज्ञानेन्द्रिय औ हस्तपादादि कर्म- न्द्रिय हैं सोभी तुं नहि काहेतें गंच महाभूतोंके सत्व औ रजोगुणका कार्य होनेते सोभी शरीरकी न्याई स्वतः जडरूपहि हैं यातें सोतेरा स्वरूप नहि संभवें हैं औ जो इन्द्रियहि जीवका स्वरूप होता तो जोपुरुप अंधे बधिरे पंगु आदि इन्द्रियोंसें हीन है तिनका जीवना किस प्रकारसें होता औ सो दूसरे पुरुषोंकी न्याई चलते फिरते खाते पीते व्यवहार करते देखनेमें आते हैं यातें है शिष्य, दश इन्द्रियमी तुं नहि ॥ तथा साम- वेदकी छांदोग्योपनिषत्मेंहि यह प्रसंग लिखा है कि एक कालमें सर्व इन्द्रियां परसर विवाद करती भई एक कहे मैं श्रेष्ठ हुं दूसरी कहे मैहि श्रेष्ठ हुं तो इस वार्ताके निर्णय करने अर्थ सो सर्व ब्रह्माके पास

[ १२२ ]
जाय करके कहती भई हे भगवन् हमारेमेंसें कौन
श्रेष्ठ है तो ब्रह्माने कहा जिसके विना शरीरकी
स्थिति नहि रह सकै सोई तुमारेमेसें श्रेष्ठ जानना
तो यह वाक्य श्रवण करके तिनमेंसें प्रथम वाचा इ.
न्द्रिय शरीरसें बाहिर निकसकर एक वर्ष पीछे आय
करके कहती भई मेरेविना तुम कैसे जीते रहे तो दू-
सरी इन्द्रियोंने कहा कि जैसे गुंगा पुरुष
सर्व
खान
पानादि व्यवहार करता हुया जीता रहे है तैसे हि
हमभी जीते रहे । इसी प्रकारसें चक्षु श्रोत्रादिक सर्व
इन्द्रिय शरीरसें निकस निकस करके वर्पवर्पके पीछे
आवती भई परंतु सो शरीर नहि पतित भया औ
जब प्राणोंके सहित जीवात्मा निकसने लगा तो सो
सर्व इन्द्रियां व्याकुल हो जाती भई औ शरीर प.
तित होने लगा तो पीछे तिन सर्व इन्द्रियोंके प्रा-
र्थना करनेसें प्राणके सहित जीवात्माके स्थित हो-
नेते शरीरकी स्थिति होती भई इति ॥ किच हे शि-
प्य, यह मेरे श्रोत्र हैं औ यह मेरे नेत्र है औ यह मेरे
हाथ हैं यह मेरे पाद हैं इस प्रकारसे सर्व इन्द्रियोंकू
भिन्न भिन्न करके तुं जानता है औ जो कोई जिस

[ १२३ ] वस्तुकू जाने है सो अवश्य तिसतें भिन्न होवे है यातें भी यह दश इन्द्रिय तुं नहि ॥ तथा हे शिष्य, (म. नोपि नो) कहिये संकल्प विकल्पात्मक जो यह चं- चल मन है सोभी तुं नहि काहेते पंचमहाभूतोंके सत्व अंशका कार्य होनेते मनभी स्वतः जडहि है तथा जिस कालमें तमोगुणकी अधिकता होवे है तो तंद्रा भ्रांति निद्रा ग्लानि इत्यादि इस मनकी - त्तियां होती हैं औ जिस कालमें रजोगुणकी अधि- कता होवे है तो भोगकी औ ऐश्वर्यकी इच्छा औ कर्म करनेमें उत्साह तथा स्त्री भादि विषयों में राग इत्यादि मनकी वृत्तियां होवे हैं औ जिस कालमें सत्वगुणकी अधिकता होवे है तो शांति विराग धर्म- रुचि प्रसन्नता इत्यादि मनकी वृत्तियां होवे हैं सो इस प्रकारसें मनको प्रतिक्षण विकारि होनेते आत्म- पणा नहि संभव है काहेते अनेक श्रुतिस्मृत्तियोंविपे आत्माकू निर्विकार प्रतिपादन किया है औ यह नि- यम है कि जो विकारि वस्तु होवे है तिसका अवश्य किसी कालमें नाशभी होवे है जैसे घटादिकोंका होवे है औ आत्मा तो अविनाशी है किंच यावत् [ १२४ ॥ पर्यंत मनकी शुभाशुभ वृत्तियां हैं तिन सर्वकूहि स- वंदा अखंडित आत्मा जाने है जो आत्माभी वि- कारि होता तो कबी जानता कवी नहि जानता यातेंभी आत्मा निर्विकारहि सिद्ध होवे है मन तो अपने घटपटादि विषयोंकू कवी जाने है औ कवी नहि जाने है यातें विकारिहि सिद्ध होवे है याते हे शिप्य मनभी तुं नहि ॥ तथा हे शिष्य (मा- पगणोऽपि नो) कहिये यह जो मुखनासिकादि द्वा- रॉविपे स्थित भया अन्नजलादिकोंके भक्षण औ प. चावनादि क्रिया करनेहारा प्राण अपान व्यान स- मान उदान नाग कूर्म कृकल देवदत्त धनंजय इस भेदसें दश प्रकारका शरीरविपे प्राणसमूह है सो. भी तुं नहि काहेतें पंचमहाभूतोंके रजोअंशका कार्य होनेते प्राणभी स्वतः जडहि है। किंच जिस कालविपे पुरुष शयन करे है तो प्राण चलते रहते हैं परंतु तिस कालमें तिस पुरुपके पाससे कोई धना. दिक वस्तु चोरादि उठाय करके ले जाते हैं औ कुछ खबर नहि पडती जो प्राणहि चेतनात्मा होता तो काहेत नहि जानता या हे शिप्य, यह प्राणोंका स- [१२५ ] मूहभी तुं नहि ।। तथा (नो मतिः) कहिये हे शिष्य, शुभाशुभ कार्यके निश्चय करनेहारी जो यह बुद्धि है सोभी तुं नहि काहेतें पंच महाभूतोंके सत्वअंशका कार्य होने बुद्धिभी स्वतः जडहि है औ विकारी है काहेते जाग्रत् औ स्वप्नावस्थामें बुद्धि रहती है औ सुषुप्तिकालमें तिसका विलय हो जावे है यार्ते हे शिष्य, उत्पत्ति विनाशवाली होने बुद्धिभी तुंनहि ॥ यद्यपि मन औ बुद्धिका परस्पर विशेष भेद नहि है तथापि बुद्धि स्वामीकी न्याई कर्ता है औ मन ति- सका भृत्यकी न्यांई करण है अर्थात् कार्योंके नि- श्चय करने में साधनभूत है इस कारनसे यहां मन औ बुद्धिकुं पृथक् पृथक् कथन किया है ॥ तथा (न चापि धीमनसि तत्समुच्चयः) कहिये हे बुद्धिमान शिष्य, तिन शरीर इन्द्रिय मन प्राणादिकोंका मिल- करके एक समूहभीतुनहि है काहेते पंचमहाभूतोंके तीन गुणोंके कार्य होनेते यह शरीर इन्द्रियादि सर्व संघात स्वतः जड है औजो कोई चार्वाकादिनास्तिक लोक ऐसे कहते हैं कि यद्यपि न्यारे न्यारे पृथिवी आदि भूत जड हैं परंतु तिनके एकत्र मिलनेसें ति- नमें चेतनता उत्पन्न होवेहै जैसे पान सुपारी चूना कथ्थाके मिलानेसें लाल रंगकी उत्पत्ति होवे है सो यह वार्ता असंभव है काहेते यह नियम है कि जो एक एक जड होवे हैं सो मिलानेसेंभी जडहि रहते हैं जैसे लोकविपे प्रत्यक्षहि एक एक लकडी संचय क- रके भार बांधनेसेंभी जडहि रहे हैं। किंच तिनके मिलानेहारा कोई भिन्न चेतन पुरुप होना चाहिये जो कहो लोह औ चुंबककी न्याई आपहि मिल जाते हैं तोभी तिनकू परसर समीप रखनेवाला कोई चेतन पुरुषादि चाहिये ॥ किंच यहभी नियम है कि जो वस्तु अनेक पदार्थ जोडकरके एक निर्माण करी जाये है सो वस्तु तिनसें भिन्न अन्य किसी भोक्ता पुरुपके अर्थहि होवे है जैसे ईट काष्ठ मृ. त्तिकादिकों करके एक गृह निर्माण किया जावे है तो सो दूसरे चेतन पुरुपके अर्थहि होवे है ।। तथा यह वार्ता सांख्यसूत्रोंमें कपिलदेवजीनेभी क- थन करी है "संघातः परार्थः संहत्यकारित्वात्" अर्थ यह शरीर इन्द्रियादिरूप संघात किसी दूसरे भोक्ता पुरुपके अर्थ है काहेतें मिलकरके कार्य क- [ १२७ ] रनेवाला होनेतें इति ।। इस प्रकारसें जब शरीर इ- न्द्रियादि मेरा स्वरूप नहि है तो पीछे मैं क्या वस्तु हुं काहेतें इन शरीर इन्द्रिय प्राणादिकोंकीहि प्र- तीति होवे है इनसे परे दूसरे किसी वस्तुकीभी प्र- तीति नहि होवे है। इस प्रकारकी शिष्यकी आ- कांक्षा होनेतें अब गुरु तिसका समाधान कहेहैं (त- तोन्यमात्मानं) कहिये हे शिष्य इस शरीरसें लेकर बुद्धिपर्यंत इस संघातसे भिन्न औ इन सर्वका जो साक्षी अर्थात् प्रकाश करनेहारा आत्मा है तिसकू हि तुं अपणा स्वरूप जान अर्थात् सोई तुं है ॥ यद्यपि हे शिष्य, तुंने जो कहा कि शरीर इन्द्रिय प्राणादिक हि प्रतीत होते हैं तिनसे परे अन्य कोई वस्तु प्रतीत नहि होवेहै सो तेरा कहना ठीक है प- रंतु जिस करके यह शरीर इन्द्रिय प्राणादिकोंकी करामलकवत् भिन्न भिन्न प्रतीति होवेहै तिस वस्तुका किस प्रकारसे अभाव संभवे है ॥ सोई सर्वसें परे औ सर्वका अधिष्ठान साक्षी आत्मा तेरा स्वरूप है। तथा गीतामेंभी कहाहै "इन्द्रियाणि पराण्याहुरि- न्द्रियेभ्यः परं मनः। मनसस्तु परा बुद्धिर्यो बुद्धेः पर- " [ १२८ ] सः" अर्थ-हे अर्जुन, यह स्थूल शरीर श- ब्दादि विषयोंकी अपेक्षासें परे कहिये अभ्यंतर है औ तिन विषयोंमें इन्द्रिय परे हैं औ इन्द्रियोंसे मन अभ्यंतर है औ मनसे बुद्धि अभ्यंतर है औ तिस बु. डिसेंभी जो तिसका प्रकाशक अभ्यंतर है सोई आत्मा है इति ॥ सो तिस आत्मासे परे अन्य कोई नहि यह वार्ता कठोपनिषत्मेंभी कथन करी है "पुरुपान्नपरं किंचित् सा काष्टा सा परा गतिः अर्थ-सर्व शरीर इन्द्रिय प्राणादिकोंसें पुरुष जो आत्मा है सो परे है तिसते परे कोई दूसरा नहि औ सोई सर्वकी काठा कहिये सीमा औं परम गति है इति ॥ सो हे शिप्य, इस उक्त प्रकारसें जो मन औ बुद्धिका साक्षी आत्मा है सोई तेरा स्वरूप है तथा अन्यत्रभी गुरुशिष्यके संवादमें कहा है "को देवो यो मनो वेत्ति मनो मे दृश्यते मया । तहि देवस्त्वमे- वासि एको देव इति श्रुतिः" अर्थशिष्यने प्रश्न किया कि हे गुरो, देव कौन है तो गुरुने उत्तर दिया कि जो मनकू जानता है सोई देव है तो शिष्यने कहा कि अपने मनकू तो मैंहि जानता हूं तो पीछे [ १२९ ] गुरुने कहा तो हे शिप्य, तुं हिसो देव है काहेते "एको देवः सर्वभूतेषु गूढः" इत्यादि श्रुतियोविषे एकहि देव कथन किया है इति ॥ ६१॥ इस प्रकारसे देह इन्द्रियादिकोंसे भिन्न अपने स्वरूपकुं श्रवण करके अब तिसहिके विशेष बोधके अर्थ शिष्य पुनः प्रश्न करे है ॥ । शिप्य उवाच॥ विचेष्टते केन मनः प्रचोदित करोति केनासुगणो गमागमौ॥ वपुस्तथेदं ननु केन नीयते हृदि प्रविष्टेन गुरुत्रवीनु मे ॥ ६२ ॥ टीका-विचेष्टत इति ।। हे भगवन् , यह जो संकल्पविकल्पात्मक मन है सो (केन) कहिये किसक- रके (प्रचोदितं) कहिये प्रेरित भया निरंतर चेष्टा करे है अर्थात् नानाप्रकारके शुभाशुभ संकल्पविकल्प करे है। तथा (असुगण) जो प्राणापानव्यानादि- रूप यह प्राणोंका समूह है सोभी किसकरके प्रेरित- भया शरीरविपे अधो अर्ध्व गमनागमन करे है ॥

[ १३० तथा (वपुः) कहिये यह जो स्वतः सत्तास्फुर्तिसें र- हित जड स्थूल देह है सोभी किसकरके प्रेरितभया खानपानादि व्यवहारविपे प्रवृत्त होवे है सो हे गुरो, ऐसी क्या वस्तु हृदयदेशमें प्रविष्ट है कि जिसकरके यह मन आदिक सर्वहि प्रेरितभये स्वस्वकार्यविपे प्रवृत्त होते हैं सो कृपा करके मेरे प्रति कथन करो इति ॥ ३२॥ इस प्रकारसे शिष्यका प्रश्न श्रवण क- रके अब गुरु तिसका उत्तर कथन करे हैं। ॥ गुरुरुवाच ॥ कर्णस्य कर्ण मनसो मनः श्रुति- र्वाचं च वाचोयमसोरसुं जगौ ॥ तेनानिशं यंत्रमिवांतरात्मना संमेरितं सर्वमिदं प्रवर्तते ॥६३॥ टीका-कर्णस्येति ॥ हे शिष्य, जिसकू श्रुति जो वेद है सो (कर्णस्य कर्ण) कहिये श्रोत्रकामी श्रोत्र औ मनकाभी मन तथा वाचाकाभी चाचा औ प्राणोंकाभी प्राण कथन करे है ॥ तथा सामवेदकी केनोपनिपतमें लिखा है "श्रोत्रस्य श्रोत्रं मनसो [१३१ ] मनो यद्वाचो हवाचं स उ प्राणस्य प्राणः" अर्थ- जो आत्मा श्रोत्रकाभी श्रोत्र औ मनका मन औ वा- चाका वाचा औ प्राणोंकाभी प्राण है इति ॥ अर्थात् जो आत्मा श्रोत्रादिकोंकी श्रवणादिरूप शक्तियोंका आश्रयभूत है तिस साक्षीरूप अंतरात्माकरकेहि स. र्वदा प्रेरितभये यह श्रोत्रादिक सर्व स्वस्वक्रियाविषे प्रवृत्त होते हैं ॥ जैसे लोक विपे प्रसिद्ध नाना क- लाकरके युक्त यंत्रमध्यस्थ चेतन पुरुपकरके प्रधान- कलासे प्रेरितभया पश्चात् सर्व तरफसें चेष्टा करे है तैसेहि मध्यस्थ साक्षी आत्मा करके प्रथम प्रधान- कलारूप बुद्धि प्रेरित होवे है पश्चात् बुद्धिकरके मन प्रेरित होवे है तदनंतर मनकरके प्राण प्रेरित होते हैं पश्चात् तिनकरके चक्षु आदि इन्द्रिय प्रेरित होते हैं तदनंतर चक्षु आदिकोंकरके स्थूलशरीर प्रेरित होवे है इसमकारसें यह सर्व संघातरूप यंत्र जाग्रत् औ स्वभावस्थाविपे चलायमान रहे है औ पुनः जैसे जिस कालमें सो यंत्रस्थ पुरुष प्रधानकलाका निरोध करलेवे है तो सर्व यंत्र निश्चेष्ट होजावे है तैसेहि सुपुप्तिकालविषे बुद्धिरूप प्रधानकलाके स्वकारणभूत [ १३२ अज्ञानविषे लीन होनेतें यह संघातरूप यंत्र सर्वतर- फसे निश्चेष्ट होयकरके पड़ा रहे है पुनः तहांसे स्वप्न अथवा जाग्रत् अवस्था होनेतें प्रवृत्त होवे है इसी प्रकारसे कैवल्यमोक्षपर्यंत अनेक कल्पकल्पांतरों विपे पुनः पुनः प्रवृत्त रहे है इति ॥ ६३ ॥ इस प्रकारसे देह इन्द्रिय मन आदिकोंका प्रेरक साक्षी आत्माकू संघातसे भिन्न श्रवण करके अब साक्षी आत्मा स- वैसे असंग है औ तिसतें भिन्न सर्व संघात जड है यातें यह कर्ता भोक्तापणादिक किसके धर्म हैं प्रकारसें संशयकू प्राप्त भया शिष्य पुनः प्रश्न करे है। । शिप्य उवाच ॥ कर्तृत्वभोतृत्वमुखं किमात्मनः किं धर्मजालं मनसोथवा मतेः ॥ किंवेन्द्रियाणां किमुतासुगं भवे- देतदयालो वद मे विनिश्चितम ॥६४॥ टीका कर्तृत्वेति ॥ हे (दयालो) कहिये स्वाभा- विक दयावान गुरो, आपने जो कहा कि सर्व देह इन्द्रियादि संघातरूप यंत्रका प्रेरक साक्षी आत्मा .

[ १३३ ] है सोसाक्षी आत्मा तो "असंगोह्ययं पुरुषः" इत्यादि श्रुतियों में सर्वसंघातसे असंग निरूपण किया है औ तिसते भिन्न यह सर्वसंघात जड है यातें यह जो शु- भाशुभ कर्मादिकोंका कर्तापना औ भोक्तापनादि धर्मसमूह है सो (किमात्मनः) कहिये क्या साक्षी आत्माके हैं किंवा मनके धर्म है अथवा मति जो बुद्धि है तिसके हैं (किंवेन्द्रियाणां) कहिये अथवा श्रो. नादिक इन्द्रियोंके हैं किंवा प्राणोंके हैं अथवा इस स्थूलशरीरके हैं सौ यह वार्ता निश्चयकरके मेरेप्रति कथन करो इति ॥ ६४ ॥ इस प्रकारसे शिष्यका प्रश्न श्रवण करके अब गुरु तिसका उत्तर कथन करे हैं । ॥ गुरुरुवाच॥ कर्ता तु नात्मा न मनो न शेमुपी नैवेन्द्रियाणीह न चासवस्तथा ॥ नाहं कृतिर्नापि वपुर्विवेकिनः कारमेषां तु समुच्चयं विदुः ॥ ६५ ॥ टीकाकर्तेति ॥ हे शिष्य, (कर्ता तु नात्मा) कहिये इस शरीरविपे जो साक्षी आत्मा है सो किं.

। १३४ ] चित्भी करता नहि काहे लोकविपे जो कर्ता होवेहै सो नियमसें विकारी होवेहै औ आत्मा तो अनेक श्रुतिस्मृतियोधिपे निर्विकारहि प्रतिपादन किया है तथा भगवद्गीतामें कहा है "शरीरस्थोपि कौंतेय न करोति न लिप्यते" अर्थ-हे कौंतेय क- हिये अर्जुन, यह आत्मा सर्वदा शरीरमें स्थित भया- भी कुछ नहि करता औ किसी कर्मसें लिपायमान- भी नहि होवेहै इति ॥ औ जो कर्ता भोकादिरूप धर्म आत्माविपे स्वाभाविक होते तो तिनकी नि. वृत्ति कवी नहि होती यातें कैवल्यमोक्षके प्रतिपादक सर्व वेद औ शास्त्र व्यर्थ होते तथा यह वार्ता सुरे- श्वराचार्यनेभी कथन करी है " आत्मा कादिरूप- श्चन्माकांक्षीस्तहि मुक्ततां ।। नहि स्वभावो भावानां व्यावर्तेतीप्ण्यवद्रः॥"अर्थ-हेवादिन् ,जोआत्मा- का कर्ता भोक्तादि स्वरूपहि है तो तूं मोक्षकी आशा मतकर काहेते जिस वस्तुका जो स्वाभाविक धर्म हो- वेहै सो तिस वस्तुके नाश हुयेविना निवृत्त नहि हो. वेहै जैसे सूर्यकी उष्णताविना सूर्यके नाश हुये नि वृत्त नहि होवेहै इति । यातें हे शिष्य, आत्मा कर्ता प "

[ १३५ ]
भोक्ता नहि है ॥ तथा (न मनो) कहिये मनभी
स्वतंत्र कर्ता नहि है काहेत जड पंचमहाभूतोंका
कार्य होनेते मन स्वतः चेतनतातेंरहित है यातें का.
छलोष्टादिकोंकी न्याई जडमें स्वतः क्रिया संभवे
नहि ॥ तथा (न शेमुपी) कहिये बुद्धिभी कर्ता
नहि काहेत सोभी पंचमहाभूतोंका कार्य होनेते
स्वतः जडहि है ॥ तथा (नैवेन्द्रियाणि) कहिये
श्रोत्रादिक जो इन्द्रिय हैं सोभी कर्ता नहि काहेतें
सर्व इन्द्रियोंकी मनके अधीन चेप्दा होवेहै तो जव
मनहि जड हुया तो इन्द्रियां कहांसें चेतन हो स.
कती हैं याते इन्द्रियभी कर्ता नहि ॥ तथा (नचा-
सवः) कहिये हे शिप्य, प्राणापानादि जो पांच प्राण
हैं सोभी कर्ता नहि काहेते प्राण तो प्रत्यक्ष एक
वायुरूप स्वतः जड पदार्थ है ॥ तथा (नाहंकृतिः)
कहिये अहंकृति जो अहंकार है सोभी कर्ता नहि
काहेते अहंकारभी एक अंतःकरणकीहि वृत्तिवि-
शेष है औ सो अंत:करण पंचमहाभूतोंका कार्य हो.
नेते स्वतः जड है यातें अहंकारभी कर्ता नहि हो
सकै है (नापि वपुः) कहिये यपु जो यह स्थूल देह

[ १३६ ] है सोभी कर्ता नहि काहेतें रजोवीर्य अन्नदुग्धादि जडपदार्थोंका कार्य होनेते यहभी स्वतः जडहि है औ मरणकालमें जीवात्माके वाहिर निकस जानेर्से तो प्रत्यक्षहि इसकी जडता प्रतीत होवे है यातें स्थूल शरीरभी कर्ता भोक्ता नहि ॥ इस प्रकारसें यह सर्व पृथक् पृथक् कोईभी कर्ता भोक्ता नहि है। जो कर्ता भोक्ता इनमें कोई भी नहि तो यह नानाप्रकारकी सानपानादि क्रिया किस प्रकारसे होवे है ऐसी शिष्यकी आकांक्षा होने अव गुरु तिसका समाधान कहे हैं (कारमेषां तु समुच्चयं विदुः) कहिये हे शिष्य, उक्त देह इन्द्रिय प्राणादि- कोंका औ आत्माका जो समुच्चय कहिये समूह है अर्थात् अविवेकसें मिश्रीभाव है तिसकूहि विद्वान् तत्त्ववेत्ता लोक कर्ता भोका जानते हैं ।। तथा यह वार्ता कठोपनिपत्में भी लिखी है "आत्मेन्द्रियम- नोयुक्तं भोक्तत्याहुर्मनीषिणः" अर्थ-इन्द्रिय मन आदिकोंकरके संयुक्त भये आत्मार्केहि बुद्धिमान लोक कर्ता भोक्ता कथन करते हैं इति ॥ इस प्रका- रसे जवपर्यंत देह इन्द्रियादिकोंका भिन्न भिन्न विवे. १ [ १३७ ] चन नहि होवे है तवपर्यंतहि जीवकू शुभाशुभ कर्म लिपायमान करते हैं औ जव पूर्वोक्त प्रकारसें विवे- चन करके तिन सर्वसें अपने आत्माकू असंग अ- कर्ता अभोका दृढ निश्चय करे है तो पुनः तिस यु- रुपकू कोई शुभाशुभ कर्म लिपापमान नहि करस- कते इसी अभिप्रायकू लेकर भगवान्ने गीताके च. तुर्थाध्यायमें कहा है "हत्वापि स इमान् लोकान्न हंति न निबध्यते" अर्थ-हे अर्जुन, सो ज्ञानी पु- रुप इन तीन लोकोंकूभी हनन करनेते न तो हनन करता है औ नहि लिपायमान होता है इति" सो यद्यपि उक्त प्रकारसे दृढ निश्चयवान् पुरुपकू पाप- कर्म लिपायमान नहि करसकै हैं तथापि तिसकी पापकर्मविपे कदाचित्भी प्रवृत्ति नहि संभव है काहेते अज्ञानके वशर्ते देहादिकोंविपे अध्यास हो- नेतेहि तिनके निमित्त पुरुपकी कदाचित् निपिद्ध काविपे प्रवृत्ति होवेहै औ ज्ञानी पुरुपकों तो ज्ञा- नके प्रभावते सर्व देहादिकोविपे मिथ्यात्वबुद्धि हो. नेतें सो अध्यास नहि होवेहै यात तिसकी तिन मिथ्या देहादिकोंके अर्थ निपिद्ध कर्मविपे कदाचित्भी प्र.

[१३८ ] वृत्ति नहि संभवे है । तथा बृहदारण्यकोपनिषत्में: भी कहा है "आत्मानं चेद्विजानीयादयमस्मीति पू. रुपः। किमिच्छन् कस्य कामाय शरीरमनुसंज्वरेत्" अर्थ-जिस कालमें यह पुरुष अपने आनंदस्वरूप आत्माकू करामलकवत् अपरोक्ष अनुभव करेहै तो पश्चात् सो किसके अर्थ औ किस वस्तुकू इच्छता हुया अपने शरीरादिकोंकू प्रयास देवे है अर्थात् नहि देवे है इति ॥ किंच अन्य लोकोंके संग्रहके निमित्त भी ज्ञानी पुरुषकी निषिद्ध कर्मोविपे प्रवृत्ति नहि होवेहै तथा यह वार्ता कौपीतकी उपनिषत्की व्याख्याविषे अनुभूतिप्रकाशमें विद्यारण्य स्वामिने- भी कथन करी है " शिष्टास्त्यजंति पापिष्ठं प्रत्यक्ष नरको हि सः॥तन्निंदकस्तस्य पापं गृहीत्वा नरकं व्र- जेत् ॥ स्तोता कर्मी तु संसर्गात् स्वयमप्याचरेत्तथा। इत्थं दोपत्रयं दृष्ट्वा शिष्टाः पापं त्यजति हि" अर्थ- प्रथम तो जो पुरुष शास्त्रनिषिद्ध पापकर्ममें प्रवृत्त होवे है तिसका शिष्ट पुरुष परित्याग कर देते हैं काहेते पापिष्ठ पुरुष प्रत्यक्षहि नरकके तुल्य होवे है औ [ १३९ ] द्वितीय पापिष्ठ पुरुपकू देखकरके जो तिसकी निन्दा करते हैं सो तिसके पापके भागी होनेते नरक… प्राप्त होते हैं औ तृतीय जो पुरुष तिस पापिष्ठके अनुकूल वर्तनेहारे तिसकी स्तुति करते हैं सो आ- पभी तिसके अनुसार पापकर्ममें प्रवृत्त होनेते नरककू प्राप्त होये हैं यातें इस प्रकारसें तीन महादोपॉकू देखकरके विद्वान ज्ञानी पुरुष पापकर्मोंका दूरसेहि परित्याग कर देते हैं इति ॥ औ जो कहीं पुराणों- विषे विश्वामित्र परासर नारदादिकोंके वसिष्ठ मु. निके सौ पुत्रोंका हनन कराना मत्स्योदरीका गमन करना जहां तहां परसर द्वेष कराना इत्यादि नि- पिद्ध कर्म श्रवणमें आते हैं सो तो तिनके प्रारब्ध- कर्मके अतिवलवान होनेते हुये हैं याते उक्त वार्ता में दोप नहि संभव है इति ॥६५॥ पूर्वोक्त प्रकारसे जो आत्मा देह इन्द्रियादिकोंसें अत्यंत भिन्न अ. कर्ता औ अभोक्ता पापपुण्यसे निप है तो पुनः सो इन देहादिकोंमें किस प्रकारसे बंधायमान होते है इस अभिप्रायकू लेकर शिप्य पुनः प्रश्न करे है।

[१०] । शिप्य उवाच ॥ निवध्यतेऽयं किल केन हेतुना तथैव केनेह जनो विमुच्यते । निबंधमोक्षौ च किमामको स्मृती कृपादृष्टे वद मे समासतः ॥६६॥ टीका-निवध्यत इति ॥ हे (कृपादृष्टे) क- हिये स्वाभाविक कृपाकरके आर्द्रदृष्टिवाले गुरो, आ- पने कहा कि आत्मा देह इन्द्रियादिकोंसे भिन्न औ शुभाशुभ कर्मोकरके निर्लेप अकर्ता अभोक्ता है तो पुनः अयं कहिये यह आत्मा (केन हेतुना) कहिये किस कारणसें इन देह इन्द्रियादिकोंचिपे परवश भया बंधायमान होवे है। तथा सो इस प्रकार - धनकू प्राप्त भया पुनः तिस बंधनसे किस प्रकारसे विमुच्यते) कहिये मोक्षकू प्राप्त होवे है ॥ तथा बंध औ मोक्ष इन दोनोंका स्वरूप यथार्थ क्या है। सो यह सर्वहि कृपा करके मेरेप्रति (समासतः) क- हिये संक्षेपसें कथन करो इति ॥६६॥ इस प्रका. .

[१४] रसे शिप्यके तीन प्रश्न श्रवणकरके अब गुरु तिनका एकहि श्लोककरके उत्तर कथन करे हैं । ॥ गुरुरुवाच ॥ नियध्यतेऽयं विषयानुरागतो विरागतस्तेषु विमुच्यते द्रुतम् ॥ खभावतः संस्खलनं हि बंधनं पुनः स्थितिस्तत्र विमुक्तिरुच्यते ॥६७॥ टीका-निवध्यत इतिहे शिष्य, (अयं) कहिये यह जो प्रकृत आत्मा है सो (विषयानुरागतः) क. हिये शब्द सादि जो विषय हैं तिनमें अनुराग अर्थात् आसक्ति करनेतेहि देहादिकोंविषे बंधाय- मान होवे है ।। बो (विरागतः) कहिये हे शिष्य, जिस कालमें यह जीवात्मा तिन विपयोंसें दोपदृष्टि- पूर्वक वैराग्यकू प्राप्त होवे है तो (विमुच्यते द्रुतं) कहिये शीघहि मोक्षपदकू प्राप्त होवे है । तथा यह वार्ता अन्यत्रभी गुरुशिप्यके संवादद्वारा कथन करी है “वद्धोहि को यो विषयानुरागी को वा विमुक्तो विपये विरक्त" इस वाक्यका अर्थ ऊपर कहे अ- -- --- १४२ ] थकेसमानहि है ।। अथवा विषय शब्दकरके यहां बु- द्धिसें लेकर स्थूल देहपर्यंत पंचकोशोंका ग्रहण जा. नना काहेतें जो वस्तु जिसकरके प्रकाशित होवे है सो तिसका विषय कहिये है सो बुद्धि आदि सर्व संघातसाक्षी आत्माकरके प्रकाशित होये है यातें सो विषय कहिये है तिसमें जो अनुराग कहिये आत्मा औ अनात्माके अविवेचनपूर्वक कल्पित तादात्म्या- ध्यास है सोई आत्माके बंधनका हेतु है । यह वार्ता सांख्यसूत्रोंमें कपिलदेवजीनेभी कथन करी है "प्र. कारांतरासंभवादविवेक एव बंधः" अर्थ-नित्य- मुक्तअसंग रूप आत्माके बंधनमें अन्य कोई प्रका. रके नहि संभव होनेतें केवल जो आत्मा औ अना- स्माका परसर अविवेक है सोई बंधनका कारण है इति ॥ तथा भगवद्गीतामेभी कहा है " कारण गुणसंगोस्य सदसद्योनिजन्मसु" अर्थ-हे अर्जुन, इस आत्माका त्रिगुणों के कार्यभूत देह इन्द्रियादि- कोंकेसाथ जो संग है अर्थात् अध्यास है सोई नाना- प्रकारकी नीच ऊंच योनियोंके ग्रहणविपे हेतु है इति ॥ तथा (विरागतः) कहिये पुनः गुरु औं वे.

[११३ ] दांतशास्त्रोक्त रीतिकरके देहादिकासे आत्माका भिन्न विवेचनकरके पश्चात् तिन देहादिकोंविपे जो अ. ध्यासकी निवृत्ति है सोई मोक्षका कारण होवे है इस प्रकारसे प्रथमके द्विमनोंका उत्तर कथनकरके अव तीसरेका करे हैं (स्वभावतः) कहिये हे शिष्य, अपने स्वभावसे जो प्रच्युत होना है अर्थात् उक्त अध्यासकरके अपने नित्यत्व मुक्तत्व सच्चिदानंदमय- खादि स्वभावकू विस्मरणकरके बद्धत्व दुःखित्व परतंत्रत्वादि देह इन्द्रियादिकोंके स्वभावोंका जो अपनेमें आरोपण कर लेना है सोई बंध कहिये है । औ (पुनः स्थितिस्तत्र ) कहिये वेदांतशाखकी युक्ति- योंसें विवेचनकरके देह इन्द्रियादिकोंके स्वभावके आरोपका परित्याग करके उक्त अपने सच्चिदानंदम- यत्वादि स्वभावमें जो फिरकरके स्थित होना है अर्थात् तिसका दृढ निश्चय करना है सोई (विमु. तिरुच्यते) कहिये मोक्षपद कहिये है ।। तथा यो. गवासिष्ठीभी कहा है "ज्ञानस्य ज्ञेयतापत्तिध इत्य- भिधीयते । तस्यैव शेयताशांतिर्मोक्ष इत्यभिधीयते" अर्थ-ज्ञानस्वरूप आत्माकू जो देहइन्द्रियादिरूप [१४४ ज्ञेयभावकी प्राप्ति है सोई बंध कहिये है औ पुन: तिसहि आत्माकी जो विवेकद्वारा देहइन्द्रियादिरूप ज्ञेयभावकी शांति हो जानी है सोई मोक्ष कहिये है इति ।। ६७ । इस प्रकारर्से सहित हेतुके बंध औ मोक्षका स्वरूप श्रवणकरके अब पुनः तिसहि जी- वात्माके विशेपबोधके अर्थ शिष्य प्रश्न करे है। ॥शिष्य उवाच ॥ जीवो विभुर्वाणुरुतापि मध्यमो नानाथवैकः किमु मध्यसंख्यकः ॥ नित्योथवा किं मलये विनश्यति सर्व तदेतत्कृपया वदाशु मे ॥ ६ ॥ का--जीव इति ॥ हे भगवन्, यह जीवात्मा :) कहिये सर्वत्र व्यापक है किंवा अणु कहिये तुल्य सूक्ष्मपरिमाणवाला है अथवा (मध्यमः) मध्यम अर्थात् कुछ नियत परिमाणवाला तथा नाना कहिये यह जीवात्माप्रति देह भिन्न होनेते अनेक है किंवा सर्व शरीरों में एकहि है अथवा (मध्यसंख्यकः) कहिये इसकी कोई नियत [ १४१] संख्या है । तथा यह जीवात्मा (नित्यः ) कहिये सर्वदा अविनाशी है किंवा देहके मरण अथवा मं- हाप्रलयविपे नाशकू प्राप्त हो जाते है । सो यह स- बेहि कृपाकरके मेरेप्रति शीघ्रही कथन करो इति ॥६८॥ यहां शिष्यके तीन प्रश्न है तिनमें प्रथम तो जीवात्माके परिमाणविषयक है औ द्वितीय तिसकी संख्या विपयक है औ तीसरा तिसकी नित्यता ओ अनित्यता विपयक है सो तिन सर्वका क्रमसें तीन श्लोकोंकरके गुरु उत्तर कथन करे है । ।। गुरुरुवाच ॥ नाणुः समस्तावयवानुगो यतो नो मध्यमोयं परिणामवर्जनात् ॥ आकाशवत्सर्वगतो हि गीयते तस्मात्त्वमेनं विभुमेव निश्चिनु ॥६॥ टीका-नाणुरिति ॥ हे शिष्य, यह जीवात्मा अ- गुके समान सूक्ष्म परिमाणवाला नहि है काहेत यतो कहिये जिस कारणसे शरीरके शिखासें लेकर पादांगुठपर्यंत ( समस्तावयवानुगः) कहिये हस्तपा.

[ १४६ दादि सर्व अवयोंचि अनुगत अर्थात् ओतप्रोत होय रहा है। जो आत्मा शरीरके सर्व अवयवों में व्यापक नहि होता तो मेरे शिरम वेदना है मेरे पादमें खेद है इस प्रकारका अनुभव एककालावच्छिन्न नहि होता औ होवे है यातें आत्मा अणुपरिमाणवा- ला नहि औ "बालायशतभागस्य शतधा कल्पितस्य चभागो जीवः स विज्ञेयः स चानंत्याय कल्प्यते॥" अर्थ शिरके वालके अग्रभागके सौ भाग करके पुनः तिनमेंसे एक भागके सौ भाग करनेंतें जितना भाग सूक्ष्म होवे है तितना भाग जीव सूक्ष्म जानना चा- हिये औ सो जीवात्मा अनंत हैं इति ॥ इत्यादि श्रु. तियोंविषे जो कहीं आत्माका सूक्ष्म परिमाण कथन किया है सो तो जीवात्माके जाग्रत्स्वमसुषुप्तिरूप तीन अवस्थाविपे गमनागमनमें मार्गभूत जो कंठसे लेकर हृदयपर्यंत हितानाम सूक्ष्म.नाडियां है तिनविप प्र- वेश होनेतें जीवात्माकाभी गौणवृत्तिमें सूक्ष्मपणा कथन किया जान लेना || तथा बृहदारण्यकउपनि- पत्में भी लिखा है "तावा अस्यैता हितानाम नाड्यो यथा केशः सहस्रधा भिन्नः" अर्थ-सो यह इस [१४७ ] . आत्माके गमनागमनविषे मार्गभूत हितानाम ना. डियां हैं जैसे शिरका बाल हजार भाग करनेसें सू. क्ष्म होवे है तैसी सूक्ष्म है इति ॥ तथा (नो मध्य- मोयं) कहिये हे शिष्य, यह आत्मा मध्यम अर्थात् शरीरकेतुल्य परिमाणवालाभी नहि है काहेतें जो शरीरकेतुल्य परिमाणवाला होता तो जो आत्मा हस्तीके शरीरविपे है औ पुनः कदाचित् प्रारब्धकर्म- करके सो चीटीके शरीरकू प्राप्त होवे तो तिसमें किस प्रकारसें समाय सके है तद्वत् चीटीका आत्मा हस्तीके शरीरमें सर्व अंगोंविषे किस प्रकारसे व्या- पक हो सके है यातें हे शिष्य, यह आत्मा मध्यम परिमाणवालाभी नहि औ जो केचित् जैनमतवाले ऐसे मानते हैं कि जब हस्तीका आत्मा चीटीके श- रीरमें प्राप्त होवे है तो तिसके अवयव न्यून हो जाते हैं औ जब चीटीका आत्मा हस्तीके शरीरमें प्राप्त होते है तो तिसके अवयव अधिक हो जाते हैं सो यह वार्ताभी असंभव है काहेते यह नियम है कि जो वस्तु परिणामी अर्थात् घटने बढनेवाली होवे है तिसका अवश्य किसी कालमें नाश होवे है औ [ १४८ आत्मा तो सर्व श्रुतिस्मृतियोंविषे अविनाशी औं प- रिणामसे रहित प्रतिपादन किया है औ जो कथ. चित् आत्माकू नाशवान् मानें तो कृतनाश औ अ- कृताभ्यागम अर्थात् इस जन्ममें किये हुये कर्मोंका भोगसे विनाहि नाश औ विनाहि किये हुये कर्मोका आगामि जन्मविषे भोग इन दोनों दोषोंकी प्राप्ति होवे है । सो इस प्रकारसे उक्त दोनॉपक्षोंके असं- भव होनेतें परिशेपसे हे शिष्य, तूं इस आत्माकू (वि. भुमेव निश्चिनु) कहिये सर्वव्यापकहि निश्चय कर का- हेते (आकाशवत्) कहिये यह आत्मा श्रुतिस्मृतियों- विपे आकाशकी न्याई सर्वगतहि गायन अर्थात् प्र. तिपादन किया है । तथा श्रुतिः "आकाशवत्सर्वग- तश्च नित्यः" अर्थ-यह आत्मा आकाशकी न्याई सर्वगत औ नित्य है इति ॥ तथा भगवद्गीतामेंभी कहा है "नित्यः सर्वगतः स्थाणुरचलोयं सनातनः" अर्थ-हे अर्जुन, यह आत्मा नित्य सर्वगत स्थाणुकी न्याई स्थिर अचल औ सनातन है इति ॥ औ जी पूर्व कथन किया कि सूक्ष्म नाडियां औ हस्ती चीटी आदिकोंके शरीरों विषे आत्माका प्रवेश होवे है सो [११] तो जैसे घट औ मंदिरादि उपाधिकरके दीपककी प्रभाका संकोच विकाश होवे है तैसेहि आत्माकी उ. पाधिरूप जो अंत:करण है तिसका प्रारब्धकर्मके व- शतें संकोचविकाशद्वारा छोटे बडे शरीरोंविषे प्र. वेश होवे है यातें आत्माकाभी गौणवृत्तिसे तिसके अनुसार प्रवेश कथन किया जावे है । इस कारणतें आत्मा सर्वव्यापीहि सिद्ध होवे है इति ॥६॥ इस प्रकारसे प्रथम प्रश्नका उत्तर कथनकरके अब जो शिष्यका संख्याविषयक द्वितीय प्रश्न है तिसका एक श्लोककरके गुरु उत्तर कहे हैं । ॥ गुरुरुवाच॥ रविर्यको निखिलाक्षिभासक- स्तथायमात्माखिलदेहदीपकः ॥ उपाधिभेदाच भवेद्यवस्थितिः प्रमाणहीना तु तृतीयकल्पना ॥ ७० ॥ दीका-रविरिति ॥ हे शिष्य, (रविर्यथा) क- हिये जैसे एकहि सूर्यभगवान् मनुष्य पशु पक्षि आ- दिक सर्व जंतुवोंके नेत्रोंकू भिन्न भिन्न प्रकाश करे -- -- " [१५० ] हैं तथा कहिये तैसेहि यह एकहि आत्मा देव दानव नर मृग पक्षि आदिक सर्व शरीरोंविषे (दीपक) कहिये प्रकाश करे है ॥ तथा यह वार्ता यजुर्वेदकी कठोपनिषत्में भी प्रतिपादन करी है "सूर्यो यथा सर्वलोकस्य चक्षुर्न लिप्यते चाक्षुषैर्बाह्यदोषैः। एकस्तथा सर्वभूतांतरात्मा न लिप्यते लोकदुःखेन बाह्यः ।। अर्थ-जिस प्रकारसें एकहि सूर्य सर्व लोकोंके ने- नोविपे स्थित भया तिन नेत्रोंके अंधत्व मंदत्वादि दोपोंसें लिपायमान नहि होवे है तैसेहि एकहि आ- त्मा सर्व भूतप्राणियोंके शरीरों विपे स्थित भया तिन शरीरोंके आध्यात्मिकादि दुःखोंसें लिपायमान नहि होवे है काहेतें जिस कारणतें बाह्य कहिये तिन शरीरोंमें स्थित भयाभी तिनसे भिन्न है इति ।। तथा गीतामेभी कहा है "यथा प्रकाशयत्येकः कृत्स्नं लो. कमिमं रविः॥ क्षेत्रं क्षेत्री तथा कृत्स्नं प्रकाशयति भारत ॥" अर्थ- हे भारत कहिये अर्जुन, जैसे ए. कहि सूर्य सर्व चराचर जगत्कू प्रकाशे है तैसेहि क्षेत्री जो साक्षी आत्मा है सो एकहि सर्व क्षेत्र क- हिये शरीरोंकू प्रकाशे है इति ॥ इस स्थलमें जो . त * [११] शिष्य ऐसी शंका करे कि जो सर्व शरीराविषे एकहि आत्मा है तो एकके बंधन हुये सर्वकू बंधन होना चाहिये औ एककी मुक्ति होनेते सर्वकी मुक्ति हो जानी चाहिये औ एकके सुखी होनेते सर्वकू सुख होना चाहिये तथा एकके दुःखी होनेते सर्वकू दुःख होना चाहिये औ एकके हृदयकी वार्ताका दूसरेकू ज्ञान होना चाहिये सो इन चार्ताओं में होता तो कु. छभी नहि यात सर्व शरीरोंमें एकहि आत्मा है यह वार्ता कैसे संभव है इस प्रकारकी शंकाके होनेते अव गुरु तिसका समाधान कहे हैं (उपाधिभेदात् ) क- हिये हे शिष्य, बंधमोक्षादिकी जो व्यवस्था है सो आत्माकी उपाधि जो अंत:करण है तिसके भेद अ- र्थात् परस्पर भिन्न औ नाना होनेते संभव है। तथा यह वार्ता मांडूक्पउपनिपत्की कारिकामें गौडपादा- चार्यनेभी कथन करी है "यथैकलिन घटाकाशे र. जोधूमादिभिर्युते । न सर्वे संप्रयुज्यते तद्वनीयाः सु. खादिभिः॥" अर्थ-जैसे एकहि आकाश अनेक घ- टोरिपे स्थित भया उपाधिकरके भिन्न भिन्न प्रतीत होये है औ जय तिन सर्व घटोमेसें एक घटमें रहने [१५२ हारा आकाश धूली अथवा धूमादिकोंकरके मलिन होवे है तो तिस कालमें दूसरे घटोंमें स्थित जो आ. काश हैं सो सर्वहि मलिन नहि होजावे है तैसेहि एकके सुखी दुःखी बद्ध मुक्त होनेतें अन्य सर्व जी- चारमा सुखदुःखादिकोंकरके लिपायमान नहि होवे है इति ॥ याते हे शिष्य, इस प्रकारसे सर्व शरीरोंवि एकहि आत्मा है वास्तविक आत्माविपे किसी प्रका- रका भेद नहि है ॥ तथा श्वेताश्वतरोपनिपतमें भी कहा है "एको देवः सर्वभूतेषु गूढः सर्वव्यापी सर्व भूतांतरात्मा" अर्थ-एकहि देव सर्वभूतप्राणियों- विपे गूढ व्यापक औ सर्वका अंतरात्मा है इति ॥ औ शिष्यनें जो पूर्व कहा था कि जीवात्माकी कोई नियत संख्या होगी अब तिसका निराकरण करें है (प्रमाणहीना तु तृतीयकल्पना) कहिये है शिप्य, आ- स्माकी कोई कोटि दशकोटि आदि नियत संख्या होवेगी यह जो तेरी तृतीय कल्पना है सो तो प्रमा- णहीना कहिये प्रमाणकरके रहित है अर्थात् तिसमें कोईभी श्रुतिस्मृतिका प्रमाण देखने में नहि आवे है याते प्रमाणकरके हीन होनेते सोभी संभवे नहि यातें [ १५३ ] सर्व शरीरोंमें एकहि आत्मा व्यापक है यह वार्ता सिद्ध भई इति ॥ ७० ॥ इस प्रकारसे आत्माकी व्या- पकता औ सर्व शरीरोंविषे एकता सिद्ध करके अब शिष्यने जो आत्मा नित्य है किंवा शरीरके नाशकाल अथवा प्रलयकालमें नाशकू प्राप्त हो जाये है यह ती- सरा प्रश्न किया था तिसका गुरु उत्तर कथन करेंहैं। । गुरुरुवाच ॥ समस्तपरत्वेकविनाशसाक्षिणो भवेद्विनाशो न कदापि केनचित् ।। लये भवेच्छेहद कस्तदाश्रय- स्ततस्त्विमं नित्यमवेहि देहिनमः ॥७१॥ टीका-समस्तवस्त्विति ॥ हे शिष्य, (समस्तव स्त्वेकविनाशसाक्षिणो) कहिये इस चराचर जगत्- विपे जो जो वस्तु जिस जिस कालमें नाशकू प्रास होवे हैं तिन सर्वका आत्मा साक्षी है अर्थात् जान. नेहारा है सो जो इस प्रकारसे सर्व वस्तुओंके बिना. शका एक साक्षी आत्मा है तिसका कदापि कहिये शरीरके पात अथवा प्रलयादि किसी कालमें भी [ १५४ (केनचित्) कहिये किसीभी शस्त्रादि निमित्तकरके विनाश नहि होवे है काहे यह आत्मा सर्वदा अ- विनाशी है। यह वार्ता बृहदारण्यकोपनिषत्में भी लिखी है "अविनाशी चारेयमात्मा" अर्थ-अरे मै- यि, यह आत्मा अविनाशी है इति ॥ तथा गीताके दूसरे अध्यायमेंभी कहा है "नैनं छिदंति शस्त्राणि नैनं दहति पावकः । न चैनं क्लेदयंत्यापो न शोषयति मारुतः ॥ अच्छेद्योयमदाडोयमक्लेद्योशोप्य एव च" अर्थ-हे अर्जुन, इस आत्माकू खङ्गादि शस्त्र छेदन नहि कर सकते औ सर्वके जलानेहारा जो अग्नि है सोभी जलाय नहि सकता तथा सर्व पदार्थोके गला- नेहारा जो जल है सोभी इसकू गलाय नहि सकता औ सर्वके शोपण करनेहारा जो वायु है सोभी इ. सकू शोपण नहि करसकता काहेतें जिस कारण यह आत्मा अच्छेद्य कहिये छेदनकर्मका विपय नहि है औ अदाह्य कहिये दहन क्रियाकामी विपय नहि है तथा अग्लेद्य कहिये गलनकर्मकाभी विषय नहि औ अशोप्य कहिये शोपणकर्मकाभी विषय नहि है इति।। ओ हे शिष्य, जो तुं कहे कि (लये भवेच्छेत्) कहिये 1 3 * [१५] कथंचित् शरीरके पात अथवा महाप्रलयकालमें इस आत्माका नाश हो जाता होगा तो तुं पता कि तिस कालमें आत्माके नाशका कौन दूसरा आश्रय कहिये अधिष्ठान होवे है काहेते विना किसी अधि- छानके किसी वस्तुका नाश नहि संभवे है औं "सा काष्ठा सा परा गतिः" इत्यादि श्रुतियों विपे सर्व वस्तु- ओंके नाशका अधिष्ठान एक आत्माहि कथन किया है यात तिस आत्माके नाशका कोई अन्य अधिष्ठान संभवे नहि ॥ किंच सर्वके विनाशकू जाननेहारे साक्षी आत्माकाभी जो नाश माने तो तिसके नाशके जाननेहारा अन्य कौन है अर्थात् कोईभी नहि सं- भवता काहेते "नान्योतोस्ति ज्ञाता" इत्यादि श्रुति. योविपे साक्षी आत्मासे भिन्न ज्ञाता पुरुषकाहि निषेध किया है यातें यह आत्मा अविनाशीहि सिद्ध होये है ॥ तथा शंकराचार्य भी उपनिषत्भाष्यमें कहा है "सर्व विनश्यद्वस्तुजातं पुरुषांतं विनश्यति । पुरुपस्तु विनाशहेत्वभावान विनश्यति" अर्थ-सर्वहि वस्तुस- मूह नाशकू प्राप्त होता होता पुरुषपर्यंत नाशकू प्राप्त होवे है औ पुरुप तो विनाशके हेनुकरके रहित होनेते [ १५६ ] नाशकू प्राप्त नहि होवे है इति ।। यातें है शिष्य, इस देहमें रहनेहारे साक्षी आत्माकू तुं (नित्यमवेहि) कहिये सर्वदा नित्य अर्थात् अविनाशी जान॥ तथा कठोपनि- पत्मेंभी कहा है "नित्योनित्यानां चेतनश्चेतनानां" अर्थ--यह आत्मा प्रकृति आदि जो नित्य पदार्थ हैं तिनसेंभी नित्य है औ बुद्धि आदि चेतनपदार्थों- सेंभी परम चेतन है इति ॥ ७१ ॥ यहां पर्यंत जी- वके तटस्थ लक्षणोंका निरूपण किया औ तिसते प्र- थम ईश्वरके तटस्थ लक्षणोंका वर्णन करि आये हैं। सो इस पूर्वोक्त प्रकारसे जीव औ ईश्वरके तटस्थ लक्षणोंकू श्रवण करके अव शिष्य तिन दोनोंके स्व. रूपलक्षणके जाननेके अर्थ पुनः प्रश्न करे है। ॥ शिप्य उवाच ॥ स्वरूपीशस्य तु किं विनिश्चित तथास्य जीवस्य च किं वपुर्भवेत् ॥ कियत्तयोरस्ति तथैव चांतरं ब्रवीतु मे तत्त्वविदांवरो भवान् ॥७२॥ टीका-स्वरूपमिति ॥ है (तत्त्वचिदांवर) क.

[ १५७ ] हिये सर्व आत्मतत्त्वके जाननेहारे पुरुषों में श्रेष्ठ गुरो, आपने जो पूर्व जगत्की उत्पति स्थिति औ प्रलयका हेतु ईश्वर कथन किया है तिसका श्रुतिस्मृतियोंविषे निश्चित भया क्या स्वरूप है तथा (अस्य जीवस्य) कहिये यह जो विभु नित्यादि लक्षणोंकरके ऊपर प्र- तिपादन किया जीवात्मा है तिसकाभी निश्चित स्व. रूप क्या है ।। तथा हे भगवन् , तिन दोनों ईश्वर ओ जीवमें (कियत् ) कहिये कितना परस्पर (अंतर) कहिये भेद है सो यह सर्वहि कृपा करके मेरेप्रति क. थन करो इति ॥ ७२ ॥ इस प्रकारसे शिष्यके तीन प्रश्न श्रवण करके अब गुरु एकहि श्लोककरके ति- नका उत्तर कथन करे हैं। । गुरुरुवाच ॥ मायायुतं ब्रह्म महेश्वरं वुधा जीवं समेतं च चदंत्यविद्यया ॥ नैवांतरं किंचिदुपाधिमंतरा सम्यग्विचारेण तयोस्तु लभ्यते ॥७३॥ टीका-मायायुतमिति ।। है शिप्य, (मायायुत)क- [१९६ नाशकू प्राप्त नहि होवे है इति ॥ यातें है शिष्य, इस देहमें रहनेहारे साक्षी आत्माकू तुं (नित्यमवेहि) कहिये सर्वदा नित्य अर्थात् अविनाशी जान॥ तथा कठोपनि- पत्मेंभी कहा है "नित्यो नित्यानां चेतनश्चेतनानां" अर्थ-यह आत्मा प्रकृति आदि जो नित्य पदार्थ हैं तिनसेंभी नित्य है औ बुद्धि आदि चेतनपदार्थों- सेंभी परम चेतन है इति ॥७१। यहां पर्यंत जी. के तटस्थ लक्षणोंका निरूपण किया औ तिसते प्र. थम ईश्वरके तटस्थ लक्षणोंका वर्णन करि आये हैं। सो इस पूर्वोक्त प्रकारसें जीव औ ईश्वरके तटस्थ लक्षणोंकू श्रवण करके अब शिप्य तिन दोनोंके स्व- रूपलक्षणके जाननेके अर्थ पुनः प्रश्न करे है। ॥ शिष्य उवाच ॥ स्वरूपमीशस्य किं विनिश्चित तथास्य जीवस्य च किं वपुर्भवेत् ।। कियनयोरस्ति तथैव चांतरं ब्रवीतु मे तत्त्वविदांवरो भवान् ॥७२॥ टीका-स्वरूपमिति ॥ हे (तत्त्वविदांवर) क.

[ ११७ ] हिये सर्व आत्मतत्त्वके जाननेहारे पुरुषों में श्रेष्ठ गुरो, आपने जो पूर्व जगत्की उत्पति स्थिति औ प्रलयका हेतु ईश्वर कथन किया है तिसका श्रुतिस्मृतियोंविषे निश्चित भया क्या स्वरूप है तथा (अस्य जीवस्य) कहिये यह जो विभु नित्यादि लक्षणोंकरके ऊपर प्र- तिपादन किया जीवात्मा है तिसकाभी निश्चित स्व. रूप क्या है। तथा हे भगवन् , तिन दोनों ईश्वर औ जीवमें (कियत् ) कहिये कितना परस्पर (अंतर) कहिये भेद है सो यह सर्वहि कृपा करके मेरेप्रति क- थन करो इति ।। ७२ ॥ इस प्रकारसें शिप्यके तीन प्रश्न श्रवण करके अब गुरु एकहि श्लोककरके ति- नका उत्तर कथन करे हैं। | गुरुरुवाच ॥ मायायुतं ब्रह्म महेश्वरं बुधा जीवं समेतं च वदंत्यविद्यया ॥ नैवांतरं किंचिदुपाधिमंतरा सम्यग्विचारेण तयोस्तु लभ्यते ॥७३॥ टीका-मायायुतमिति ॥ हे शिष्य, (मायायुत)क- [ १५८ ] हिये मायाशक्तिकरके संयुक्त जो सच्चिदानन्दस्वरूप ब्रह्म है तिसकू (बुधा) कहिये विद्वान् लोक ईश्वर कहते हैं औ (अविद्यया) कहिये सोई ब्रह्म जो अ- विद्याकरके संयुक्त है तिसकुँ जीव कहते हैं । यहां यह तापर्य है । जगत्के आदिमें एक अद्वितीय सर्व परिपूर्ण सच्चिदानंदस्वरूप ब्रह्महि था औ तिस व्र. मके किसी एक अंशमें त्रिगुणकी साम्यावस्थारूप प्रकृतिभी थी जैसे शरीरके किसी देशमें काला तिल होवे है सो जिस कालविषे तिस ब्रह्मकुं यह इच्छा भई कि (बहुस्यां प्रजायेय ) अर्थात् मैं एकसें अने- करूप होयकरके प्रकट होवू ॥ तो इस प्रकारसें न- मका सत्यसंकल्प होनेते तिसके आश्रय जो प्रकृति थी सो क्षोभकू प्राप्त होती भई तो तीनों गुण अ- पनी साम्यावस्थाका परित्याग करके न्यूनाधिकभा. वकू प्राप्त होते भये तो जिस भागमें सत्त्वगुणकी अ- धिकता औ रजोतमोकी अत्यंत न्यूनता भई तिसका नाम माया होता भया ॥ औ जिस भागमें रजोगु- १ यद्यपि पूर्वजगत् अनादिसिद्वकरिआये हैं तथापि यह कथन अध्या- रोपकी रीतिर्से जानना, [ १५९ ] णकी अधिकता औं सत्वतमोकी न्यूनता भई ति. सका नाम अविद्या होता भया । औ जिस भागमें तमोगुणकी अधिकता औ सत्त्वरजोंकी अत्यंत न्यू- नता भई तिसका नाम तमाप्रधान प्रकृति होता भया इस प्रकारसें गुणोंके न्यूनाधिकभावसे प्रकृतिके तीन भेद होते भये || सो तिनमें जो प्रथम माया थी तिसमें सत्त्वगुणकी अधिकताके कारणसें अत्यंत स्व. च्छता होनेते तिस परिपूर्ण चेतनस्वरूप ब्रह्मका प्र- तिबिंब होता भया तो पश्चात् सो प्रतिबिंब औ माया औ मायावच्छिन्न बिंबभूत ब्रह्म यह तीनों मिलकरके सर्वज्ञ सर्वशक्तिमान नित्य शुद्ध बुद्ध ज्ञानस्वरूप ई- श्वर हो जाता भया । तैसेहि प्रकृतिका दूसरा भाग जो अविद्या थी तिसमें प्रतिबिंब पडनेसे सो अवि- द्या औ तिसमें प्रतिबिंब औ अविद्यावच्छिन्न ब्रह्म यह तीनों मिलकरके अल्पज्ञ अल्पशक्तिमान बद्ध औम- लिन जीव हो जाता भया । औ जो तमाप्रधान प्रकृतिका तीसरा भाग था तिसमें तमोगुणकी अ. धिकताके कारणसें अत्यंत मलिनता होनेते ब्रह्मका प्रतिबिंब नहि पड़ा तो पश्चात् ईश्वरकी इच्छानुसार

[१६]
तिस तमाप्रधान प्रकृतिसें आकाशादि पंचमहाभू-
तोंकी उत्पत्तिद्वारा सर्व जगत्की उसत्ति होती भई ।
इस प्रकारसें ईश्वर औ जीवका स्वरूपलक्षण -
र्णन करके अब जो शिष्यने ईश्वर औ जीवमें कि-
तना परस्पर भेद है यह तीसरा प्रश्न कियाथा तिसका
उत्तर कथन करे हैं (नैवांतरं किंचिदुपाधिमंतरा)
कहिये हे शिष्य, वेदांतशास्त्रकी युक्तियोंसें सम्यक्
प्रकार विचार कर देखें तो (तयोः) कहिये तिन
ईश्वर औ जीवविषे पूर्वोक्त माया औ अविद्यारूप
उपाधिके भेदसें विना किंचित्मात्रभी अंतर कहिये
भेद नहि प्रतीत होवे है इति ॥७२॥ इस प्रकारसें अक-
स्मात् ईश्वर औ जीवकी एकता श्रवण करके अत्यंत
विस्मयकू माप्त भया शिप्य पुनः प्रश्न करे है।
॥ शिष्य उवाच ॥
कथं महाभोधितरंगतुल्ययो-
विरुद्धधर्मास्पदयोः परस्परम् ॥
भवेदिहैक्यं परमेशजीवयो-
दैतदात्मानुभवागवातिन ॥ ७४ ॥

टीका कथमिति॥हे (भवातिहन) कहिये जन्म- मरणरूप संसारजन्य दुःखके नाश करनेहारे गुरो, आ- पने जो कहा कि ईश्वर औ जीवविपे उपाधिसे विना किंचितमात्रभी अंतराय नहि है सो वार्ता कैसे सं- भवे है काहेत (महाभोधितरंगतुल्ययोः) कहिये ई- श्वर तो महासमुद्रके तुल्य है औ जीव तिसके एक तरंगके तुल्य है सो जैसे महागंभीरता उच्चै गर्जना वि. पुल विस्तार होना अनेक मकर मत्स्यादिकोंका रहना औ अनेक बडे बडे जहाजोंका चलना इत्यादि जो समुद्रके धर्म हैं ॥ औ अल्प गंभीरता अल्प शब्द होना अल्प विस्तार होना अल्प जंतुओंका रहना औ बडे बडे जहाजादिकोंका नहि चलना इत्यादि जो तरंगके धर्म हैं सो दोनों परस्पर विरुद्ध है ॥ तैसेहि सर्वज्ञपना सर्वशक्तिपना नित्य- मुक्तपना सर्वका नियंतापना स्वतंत्रपना इत्यादि जो ईश्वरके धर्म हैं । औ अल्पज्ञपना अल्पशक्तिपना ब- द्धपना पराधीनपना इत्यादि जो जीवके धर्म हैं तिन दोनोंकाभी परसर अत्यंत विरोध है । याते हे भ- गवन् , इस प्रकारसे समुद्र औ तरंगके तुल्य औ ११ [ १६२ ] अनेक परस्पर विरुद्ध धमाक स्थानभूत जो ईश्वर औ जीव हैं तिन दोनोंकी यहां एकता कैसे संभवे है सो यह वार्ता मेरे अनुभवमें नहि आवती यातें आप कृपा करके अपने अनुभवके अनुसार यथावत् मेरेप्रति कथन करो इति ॥ ७४ । इस प्रकारसे शि- प्यकी शंका होनेते अव गुरु तिसका समाधान क- थन करे हैं। ॥ गुरुरुवाच ॥ यथाब्धिता चापि तरंगता तयो- विहाय नीरक्यमिहोपलक्ष्यते ॥ अपास्य जीवेश्वरभावमीक्ष्यते तथा चिदानन्दमयं विचक्षणैः ।। ७५ ॥ टीका-यथेति ।। हे शिष्य, यद्यपि ईश्वर औ जीवकों परस्पर विरुद्ध धर्मोंकरके युक्त होनेते ति- नकी साक्षात् एकता नहि संभवे है यह तेरा कहना ठीक है तथापि भागत्यागलक्षणाकी रीतिसे तिन दो- नोंकी एकता संभव है। सो जैसे दृष्टांतमें (अ- धिता) कहिये समुद्रका महागंभीरता उगर्जना [ १६३] विपुल विस्तारादि धौके सहित जो समुद्रपेना है तिसके परित्याग कर देनेसें औ तरंगका अल्प गंभी. रता अल्प गर्जना अल्प विस्तारादि धर्मोंके सहित. जो तरंगपना है तिसकेभी परित्याग कर देनेसे प. श्चात् (नीरैक्यमिहोपलक्ष्यते) कहिये तिन दोनोंकी जलमात्र दृष्टिसें एकता संभवे है ॥ तैसेहि यहां दा- टीतम (अपास्य जीवेश्वरभाव) कहिये ईश्वरका ईश्व. रपना औ जीवका जीवपना अर्थात् ईश्वरकी माया उपाधि औ सर्वज्ञपना सर्वशक्तिपना स्वतंत्रपना आदि जो धर्म है तिनके परित्याग कर देनेसें औ जीवकी अविद्याउपाधि औ अल्पज्ञपना अल्पशक्तिपना परा- धीनपना आदि जो धर्म है तिनकेभी परित्याग कर देनेसे पश्चात् (चिदानन्दमयं) कहिये केवल सच्चि- दानंदस्वरूपमानर्से तिन दोनोंकी एकताका विच- क्षण जो विवेकी जन है सो अनुभव करते हैं यहां यह तात्पर्य है । जैसे समुद्रसें तरंग कोई भिन्न वस्तु नहि होताहै तैसेहि ईश्वरसें जीव परमार्थसे कोई भिन्न वस्तु नहि है काहेते श्रुतिमें कहा है कि "तत्सृष्ट्वा त- देवानुपाविशत्" अर्थ~सो परमात्मा शरीरसहित

[ १६४ ]
इस सर्व जगत्कू निर्माण करके पश्चात् आपहि जी-
वरूपसें तिसविपे प्रवेश कर जाता भया है इति ॥
तथा गीतामें श्रीकृष्णजीनेभी कहा है "अहमात्मा
गुडाकेश सर्वभूताशयस्थितः । क्षेत्रज्ञं चापि मां विद्धि
सर्वक्षेत्रेषु भारत॥" अर्थ- हे गुडाकेश कहिये अर्जुन,
सर्वभूत प्राणियोंके अंत:करणमें मैं स्थित होय रहा
हुँ । तथा हे भारत कहिये अर्जुन, क्षेत्ररूप सर्व शरी-
रोविषे क्षेत्रज्ञ जो साक्षी आत्मा है सो तूं मेरेकू हि
आन इति ॥ यातें जीव औ ईश्वरकी एकता तो
स्वतःसिद्धाह है परंतु केवल जानने औ न जानने-
काहि भेद है ॥ किंच "मृत्योः स मृत्युमाप्नोति य ड्रह
नानेच पश्यति ॥ अथ योन्यां देवतामुपासतेन्यो सा-
वन्योहमस्मीति न स वेद यथा पशुरेवं स देवानां"
अर्थ-जो पुरुष इस आत्मामें नाना अर्थात् भेद दे-
खता है सो (मृत्योर्मृत्यु) कहिये मरणसे दूसरे मरण
अर्थात् वारंवार नानाप्रकारकी नीच ऊंच योनि-
योंकू प्राप्त होवेहै । तथा जो पुरुप मेरेसें देव भिन्न
है औ मैं तिसतें भिन्न हुं इस प्रकारमें आत्मासे भिन्न
जानकर देवताकी उपासना करहै सो ठीक नहि जा-

[१६५ ] नता किंतु सो देवतोंका पशु कहियेहै इति ॥ इ. त्यादि अनेक श्रुतियाविये भेदकी निंदा श्रवणमें आवे है औ च्यारि वेदों में अभेदकी निंदा कहींभी श्रव. णमें नहि आवे है यातभी जीवईश्वरका अभेदहि वास्तव सिद्ध होवेहै ॥ तथा मांडूक्य उपनिपत्की कारिकामें गौडपादाचार्यनेंभी कहाहै "जीवात्मनो- रनन्यत्वमभेदेन प्रशस्यते । नानात्वं निंदते यच्च तदेवं हि समंजसम्" अर्थ-जीव औ ईश्वरकी एकता अ- भेदरूपकरकेहि वेदविषे प्रशंसित की है औ उक्त श्रु- तियोविपे तिनके भेदकी निन्दा की है यात (तदेवं) कहिये सो जीच ईश्वरकी एकता अभेदरूपर्सेहि मा- ननी योग्य है इति ॥ सो यावत् मात्र श्रुतिस्मृति- योंके वाक्य जीवईश्वरकी एकताके प्रतिपादक है तिन सर्वविष इसीप्रकारकी व्यवस्था जानलेनी ॥ सो इस उक्त प्रकारसे जीव औ ईश्वरकी एकताका जो निःसंदेह जानना है तिसका नामहि ब्रह्मज्ञान है औ सोई जन्ममरणरूप संसारबंधनकी मुक्तिका हेतु है तिसहिके यथावत् संपादन करने अर्थ शास्त्रोविये नानाप्रकारके जप तप तीर्थ यज्ञादिकोंका विधान कियाहै इस ज्ञानकी प्राप्ति होनी यहि तिन सर्व ज- पतपादिकोंका मुख्य फल है तथा गीताविपे भगवान्- नेभी कहा है "सर्व कर्माखिलं पार्थ ज्ञाने परिसमा- प्यते" अर्थ हे पार्थ कहिये अर्जुन, श्रुतिस्मृतियों करके प्रतिपादित जो यज्ञादिक कर्म है सो सर्वहि ब्रह्मज्ञानके अंतर्भूत होवेह इति ॥ यातें संसारवंध- नसे मुक्त होनेकी इच्छायाले सर्व जिज्ञासु जनोंकों उक्तप्रकारसें जीव औ ईश्वरकी एकताका दृढ नि- श्चय करना योग्य है इति ।। ७५ ॥ इस प्रकार त्रि- तालीसके श्लोकसें लेकर यहांपर्यंत तत् औ वंपदके विवेचनपूर्वक तिन दोनोंकी एकताका निरूपण किया सो तिस एकताका निःसंदेह जाननारूप जो ज्ञान है सो प्रथम अंतःकरणके शुद्ध हुयेविना कदाचित्भी सम्यक् प्रकारसे प्रादुर्भावकू नहि प्राप्त होवेहै यातें अब तिसकी शुद्धिके अर्थ शिष्य पुनः प्रश्न करेहै । यद्यपि तिस शिप्यका अंतःकरण प्रथमहि शुद्ध था काहेते विना अंतःकरणकी शुद्धिके तिसके प्रति उक्त रीतिसें गुरुका उपदेश करना नहि संभव है तथापि यह प्रश्न सर्व मुमुक्षु पुरुपोंके अर्थ साधारण जानलेना।

॥शिष्य उवाच ॥ वहूनुपायानवदन्निहर्षयो विशुद्धयेऽतःकरणस्य निश्चितान् ॥ भवेतु तेषामचिरं विशोधको महामते कस्तमुपादिशाशु मे ॥७६ ॥ दीका बहूनिति ॥ हे (महामते) कहिये ज्ञान- विज्ञानसंपन्नमतिवाले गुरो, (इह) कहिये इस लोकमें व्यास वसिष्ठादिक तत्त्ववेत्ता महिर्षि लोकोंने (अंत:- करणस्य) कहिये अंतःकरणकी शुद्धिके अर्थ निश्चय करके जपतपादि अनेक उपाय पुराणादिकोंविपे क- थन कियेहैं सो तिन सर्वका यथावत् सम्यक् प्र- कारसे इस कलिकाल औ अल्प आयुपविपे अनुष्ठान करना अत्यंत दुष्कर है यातें (तेषां) कहिये तिन सर्व उपायोंमेसें ऐसा कौन सुगम उपाय है कि जिसके अनुष्ठान करनेते (अचिरं) कहिये अनायाससे शीघ्रहि अंतःकरणकी शुद्धि होवेहै सो हे भगवन् । (तमुपा- दिशाशु मे) कहिये कृपा करके शीघ्राहि मेरेमति सो उपाय कथन करो इति ।। ७६ ॥ इस प्रकारसे शि- [ १६८ ] प्यका प्रश्न श्रवण करके अव गुरु एक श्लोक कर. केहि तिसका उत्तर कथन करेहैं । ॥ गुरुरुवाच ॥ न तीर्थयात्राभिरिदं न चाध्वर- स्तपोभिरुप्रैर्न जपर्वतैरपि ।। तथाविशुद्धत्यचिरं यथा हरे- रनन्यचेतः स्मरणेन नित्यशः ।। ७७ ।। टीका-नेति । हे शिष्य, (इदं) कहिये यह जो मस्तुत पुरुषका अंतःकरण है सो (तीर्थयात्राभिः) कहिये तैसे प्रयागादि तीथोंके अटन करनेते शीघ्र शुद्ध नहि होवे है तथा (न चाध्वरैः) कहिये अध्वर जो नाना प्रकारके अश्वमेधादिक यज्ञ हैं तिनकर- केभी तैसे शीघ्र शुद्ध ना होवे है तथा (तपोभि- रुप्रैः) कहिये पंचाग्नितपनादिरूप जो उग्र तप हैं ति. नकरकेभी तैसे शीघ्र शुद्ध नहि होये है तथा(न जपः) कहिये गायत्री आदि नाना प्रकारके पवित्र मंत्रोंके विधिवत् जप करनेसेंभी तैसे शीघ्र शुद्ध नहि होवे है तथा (तैरपि) कहिये कृच्छ्र चांद्रायणादि ना- नामकारके जो व्रत हैं तिनकरकेभी तैसे शीघ्र अंत:- करणकी शुद्धि नहि होघे है जैसे कि (हरेरनन्यचेत:- स्मरणेन) कहिये हरिः जो विष्णु भगवान् हैं तिनके नित्यप्रति अनन्यचित्त होयकरके स्मरण करनेसे होवे है तात्पर्य यह ॥ भगवत् के आराधन करनेसे सर्व पापोका शीघ्रहि विनाश होवे है पश्चात् स्वतःहि अंतःकरणकी शुद्धि होते है जैसे वस्त्रके मल दूरक- रनेते पश्चात् स्वताहि वस्त्रकी शुद्धि होवे है । तथा महाभारतके शांतिपर्वविषे भीष्मजीनेभी कहा है "किं तस्य दानः किं तीर्थैः किं तपोभिः किमध्वरः यो नित्यं ध्यायते देवं नारायणमनन्यधीः" अर्थ- जो पुरुष नित्यहि एकाग्र बुद्धिकरके नारायणका ध्यान करे है तिसको पुनः नानाप्रकारके विपुल दा-. नोंके करनेसे क्या प्रयोजन है तथा नाना प्रकारके प्रयागादि तीर्थों में स्नान करनेसेभी क्या प्रयोजन है औ नाना प्रकारके पंचाग्नितपनादि उग्र तप करनेसें- भी क्या प्रयोजन है तथा नाना प्रकारके यज्ञोंके अ- नुष्ठान करनेसेंभी क्या प्रयोजन है अर्थात् तिसको केवल नारायणके स्मरण करकेहि अंत:करणकी [ १७० ] शुद्धिद्वारा कैवल्यमोक्षकी प्राप्ति होवे है इति ॥ तथा अन्य स्मृतिमेंभी कहा है ॥ "गंगास्नानसहस्रेषु पु- करस्नानकोटिपु ॥ यत्सापं विलयं याति स्मृते नश्य- ति तद्धरौ ॥ महापातकयुक्तोपि ध्यायन्निमिपमच्युत। भूयस्तपस्वी भवति पंक्तिपावनपावना" अर्थ-गंगा- जीमें हजारवार स्नान करनेसें जो पाप नाश होवे हैं औ पुष्करजीमें कोटिवार स्नान करनेसें जो पाप नष्ट होवे है सो सर्व पाप एक क्षणमात्र हरिके स्मरण करनेमात्रसेंहि नष्ट होजावे हैं। तथा ब्रह्महत्यादिक महापापोंकरके युक्त भयाभी पुरुष जो अच्युत भग- वान्का एक निमिपमात्रभी सर्वदर ध्यान करे है तो सोभी पुनः तपस्वी औ पंक्तियोंकों पावन करनेहारे महात्मा पुरुषोंकोंभी पावन करनेहारा हो जावे है इति ॥ यातें जिस पुरुपको शीघ्र अनायाससेंहि अंत:- करणकी शुद्धि करके ज्ञान प्राप्तिद्वारा कैवल्यमोक्ष- पदकी वांछा होवे तिसको अन्य सर्व प्रयलोंका प- रित्याग करके केवल भगवत्काहि एकाग्र चित्त हो- कर आराधन करना योग्य है इति ।। ७७ । इस प्र- कारसें अंतःकरणकी शुद्धिका मुख्य उपाय श्रवण [ १७१] करके अब पूर्व कथन किया जो ब्रह्मज्ञान सो वेदांत शास्त्रकी रीतिसें तो यथार्थ मिलता है परंतु अन्य जो सांख्य योग न्यायादिक शास्त्र हैं तिनकी रीति- विशेष अंशसें विरुद्ध प्रतीत होते है इस प्रकार सं- शया प्राप्त भया शिष्य प्रमाणगत संशयके निर्णय करनेके अर्थ पुनः प्रश्न करे है । ॥ शिष्य उवाच॥ अनेकशास्त्राणि पुरर्षिपुंगवैः कृतानि सर्वाणि च युक्तिमति वै ॥ प्रमाणता तेषु तु कस्य संभवे- दशेषशास्त्रार्थविचारसारवित् ॥ ७ ॥ टीका-अनेकेति।। हे (अशेपशास्त्रार्थविचारसा. रवित्) कहिये सर्व शास्त्रोंके अर्थके विचारपूर्वक तिन सर्वका सार तत्व जाननेहारे गुरो, (पुरा) कहिये इस कलियुगके आगमनसें पूर्व अथवा इसके आदि- कालमें सर्व मपियों में श्रेष्ठ व्यास बसिह पातंजलि जैमिनी गौतमादिक महर्पियोंने जो अनेक प्रकारके भिन्न भिन्न शारीरकादि शास्त्र निर्माण किये हैं सो [ १७२ ] आपुसमें सर्वहि (युक्तिमंति) कहिये नानाप्रकारकी युक्तियोंकरके संयुक्त प्रतीत होते हैं ॥ परंतु तिनमें बहुत स्थलोंविपे परस्पर विरुद्ध पदार्थाका प्रतिपा- दन किया है यातें इस वार्ता में मेरेकू महासंशय होवे है कि तिनमेंस कौन शास्त्र प्रमाण है सो हे भगवन, (प्रमाणता तेपु तु कस्य संभवेत् ) कहिये तिन सर्व शास्त्रोंमेंसें मुख्य प्रमाणता किस शास्त्रकी है सो मेरे प्रति कृपा करके कथन करो इति ॥ ७८॥ इस प्र- कारसे प्रमाणविषयक शिष्यका प्रश्न श्रवण करके अव संक्षेपसें एक श्लोककरकेहि तिसका गुरु उत्तर कहे हैं। ।। गुरुरुवाच ॥ यद्यद्धि वेदानुगतं च युक्तिमत ततच वालोक्तमपीह गृह्यते ॥ तबाह्यमप्यंबुजजन्मनोदितं भामाण्यमायातिवचो न कहिंचित ॥७९ टीका-यद्यद्धीति ॥ हे शिष्य, (यत् यत्) क- हिये जो जो वाक्य (वेदानुगतं) कहिये वेदके अनु.

[१७३ ] कूल अर्थात् वेदके अभिप्रायसें मिलता हुया औ (यु. क्तिमत्) कहिये युक्तिपूर्वक होवे सो सो वाक्य तो बालककरकेभी कथन किया होवे तो तिसका वि- द्वान् लोक ग्रहण करते हैं औ जो (तद्वाह्य) कहिये वेदके बाह्य अर्थात् विरुद्ध औ युक्तिकरके रहित वाक्य है सो यद्यपि साक्षात् ब्रह्माभी कथन करे तो सो (कहिचित्) कहिये कदाचित्भी प्रमाणताकू नहि प्राप्त होवे है। तथा योगवासिष्ठके द्वितीय प्र. करणमेंभी कहा है (युक्तियुक्तमुपादेयं वचनं बाल- कादपि। अन्यत्तृणमिव त्याज्यमप्युक्तं पद्मजन्मना") अर्थ-हे रामचंद्र, वेदके अनुकूल युक्तिकरके युक्त जो बालकभी वचन कहे तो सो ग्रहण करने योग्य है औ तिसके विरुद्ध जो ब्रह्माभी कथन करे तो तृणकी न्याई तिसका परित्याग करना चाहिये इति ॥ तिनमें प्रथम वेद तो अपौरुषेय होनेते सर्व शंका औ दोपोंकरके रहित है यातें सो सर्वहि प्रमा- णभूत है ॥ तथा तिसके अनुकूल अन्य जो महाभा. रतादि इतिहास औ भागवतादि पुराण औ मनु या. ज्ञवल्क्यादिकृत धर्मशास्त्र तथा बाल्मीकमुनिकृत

। १७४ ]
महारामायणादि व्यासकृत शारीरकसूत्र इत्यादि
शास्त्र है सोभी सर्व प्रमाणभूत हैं । औं जो जैमिनि-
कृत पूर्वमीमांसा औ पतंजलिमुनिकृत योगसूत्र तथा
कपिलदेवकृत सांख्यसूत्र हैं सोभी विशेप अंशकरके
वेदके अनुकूल होनेते प्रमाणभूत हैं ॥ औ जो न्या-
यशास्त्र वैशेपकशास्त्र जैनशास्त्र चार्वाकशास्त्र इ.
त्यादि वेदके विरुद्ध शास्त्र हैं सो सर्वहि प्रमाणभूत
नहि हैं यद्यपि तिनविपेभी क्वचित् क्वचित् कोई कोई
अंश वेदके अनुकूल प्रतीत होवे हैं जैसे कि जैनशा-
स्त्रमें अहिंसा व्रत उपवासादिक हैं तथापि बहुत अंश
करके वेदके विरुद्ध होनेतें तिनकू प्रमाणता संभव
नहि।तथा मनुस्मृतिके द्वादशमें अध्यायविषेभी लि-
खाहै “या वेदवाह्याः स्मृतयो याश्च काश्च कुदृष्टयः
सर्वास्ता निष्फलाः प्रेत्य तमोनिष्ठा हि ताः स्मृताः॥"
अर्थ-जो जो स्मृतियां औ जो जो अन्य कुदृष्टयः।
कहिये स्वकपोलकल्पित चार्वाकादि दर्शन हैं सो स.
हि निष्फल औ प्रेत्यकहिये मरणके अंतमें नरकके
देनेहारे हैं इति ॥ याते आस्तिक मुमुक्षु पुरुपोंकों
तिन सर्वका दूरसहि परित्याग करना योग्य है।। इति

[ १७९ ] ॥ ७९ ।। इस प्रकारसे प्रमाणगत संशयका समाधान श्रवण करके अब कचित् वेदमें "ऋतेज्ञानान्न मुक्तिः" इत्यादि वाक्योंकरके केवल ज्ञानसेंहि मोक्षपदकी प्राप्ति कथन करी है औ पुनः क्वचित् "विद्ययामृ. तमसुते" इत्यादि वाक्योंकरके उपासनासेंहि मो- क्षकी प्राप्ति कथन करी है तथा पुनः क्वचित् "त्रि. कर्मकृत् तरति जन्ममृत्यु" इत्यादि वाक्योंकरके क- मौकरकेहि मोक्षकी प्राप्ति कथन करी है सो इस प्र. कारसें भिन्न भिन्न चाक्योंके प्रमाण होनेते तिनमें कौन प्रमाण है इस प्रकारसे महासंशयकू प्राप्त भया शिष्य पुनः प्रश्न करे है। ॥ शिष्य उवाच ।। उपासनाज्ञानमुतापि कर्म वा भवेदृढं किं नु विमोक्षसाधनम् ।। अथो किमेतानि समुच्चितानि वा किमन्यदप्यस्ति तदाप्तिकारणम् ॥1॥ टीका-उपासनेति ॥ हे भगवन् , सर्व दुःखोंकी अत्यंत निवृत्ति औपरमानंदकी प्राप्तिरूप जो मोक्ष है [ १७६ ] तिसकी प्राप्तिविपे दृढसाधन उपासना है किंवा ज्ञान है अथवा कर्म है अथवा (एतानि समुच्चितानि) क- हिये यह उपासना ज्ञान कर्म तीनों एकत्र मिले हुये मोक्षके साधन है अथवा इन तीनोंसें भी कोई अन्यत् कहिये भिन्नहि तिस मोक्षकी प्राप्तिका कारण है सो कृपा करके मेरेप्रति कथन करो इति ॥ ८०॥ इस प्रकारसे शिष्यका प्रश्न श्रवण करके अव गुरु ति- नका समाधान कहे हैं। ॥ गुरुरुवाच ॥ नोपासना नैव च कर्मकारणं मोक्षस्य नैवापि समुच्चयस्तयोः ॥ ज्ञानं वदंतीह तु तस्य साधनं नान्योस्ति पंथा भवरोगशांतये ॥१॥ दीका--नोपासनेति ॥ हे शिष्य, (मोक्षस्य) क- हिये विदेहकैवल्यमोक्षकी प्राप्तिका उपासना साक्षात् कारण नहि है औ (नैव च कर्म) कहिये कर्मभी सा- क्षात् साधन नहि हैं तथा (तयोः) कहिये तिन उ- पासना औ कर्मका जो परस्सर समुच्चय है सोभी मो- [१७७ ] क्षका कारण नहि है अथवा तिन दोनोंका जो ज्ञा. नसें समुच्चय है सोभी मोक्षका मुख्य साधन नहि है काहेत जैसे प्रज्वलित भया दीपक पदार्थोके प्रकाश- नेमें किसी दूसरे दीपादि प्रकाशकी अपेक्षा नहि करे है तैसेहि उत्पन्न भया ज्ञानभी मोक्षविपे किसी दू. सरेकी अपेक्षा नहि करे है सो इस कारणसे (ज्ञानं वदंति) कहिये श्रुति स्मृतियोंके वाक्य केवल ज्ञान- कूहि साक्षात् मोक्षका साधन कथन करते हैं। तथा श्वेताश्वतरोपनिपत्मेंभी कहा है "ज्ञात्वा देवं मुच्यते सर्वपाशैः" अर्थ-ज्ञानद्वारा तिस परमात्मा देवकू जानकरकेहि यह पुरुष जन्ममरणादिरूप संसारकी सर्व पाशोंसें मुक्त होवे है इति ॥ तथा स्मृतिविपेभी कहा है "ज्ञानादेव तु कैवल्यं प्राप्यते येन मुच्यते" अर्थ-ज्ञानसेंहि कैवल्यमोक्षकी प्राप्ति होवे है जिस- करके यह पुरुष संसारबंधनसे मुक्त होवे है इति ॥ तथा गीतामेभी कहा है "नहि ज्ञानेन सदृशं पवित्र- मिह विद्यते" अर्थ-हे अर्जुन, ज्ञानके समान इस लोकमें अन्य उपासनादि कोई पवित्र वस्तु नहि है इति ॥ सो हे शिष्य, इस प्रकारसे मोक्षकी प्रा- १२ [ १७८] तिविप ज्ञानहि मुख्य साधन है । यद्यपि अंताकर- णकी शुद्धि औ एकाग्रताद्वारा कर्म औ उपासना- भी मोक्षके साधन हैं तथापि सो परंपरासें साधन हैं साक्षात् नहि साक्षात् तो केवल ज्ञानहि है याते यहां केवल ज्ञानकीहिमुख्यता कथन करी है। इस प्र- कारसें प्रश्नके प्रथम अंशका उत्तर कहकरके अब जो शिप्यका यह प्रश्न है कि मोक्षकी प्राप्तिविपे कोई अन्यभी साधन है किंवा नहि तिसका उत्तर कथन करे हैं (नान्योस्ति पंथा) कहिये हे शिष्य, जन्ममर- णरूप जो महाभवरोग है तिसकी शांति अर्थात् नि- वृत्तिके अर्थ दूसरा कोई मार्ग नहि है अर्थात् पू. र्वोक्त आत्मज्ञानहि परम मार्ग है ॥ यह वार्ता न्वे- ताश्वतरोपनिपत्विपेभी कथन करी है "नान्यः पंथा विद्यतेऽयनाय" अर्थ-ज्ञानकेविना मोक्षकी प्राप्ति- विषे कोई दूसरा मार्ग नहि है इति ॥ तथा योगवा- सिष्ठभी लिखा है "ज्ञानानिर्दुःखतामेति ज्ञानाद- ज्ञानसंक्षयः ॥ ज्ञानादेव परा सिद्धिर्नान्यस्मादाम व. स्तुतः" अर्थ--हे रामचन्द्र, यह पुरुष ज्ञानसेंहि सर्व दुःखोंसे रहित होवे है औ ज्ञानर्सेहि अज्ञानका नाश [ १७९] होवे है तथा ज्ञानसेंहि परम सिद्धिरूप जो कैवल्य- मोक्ष है तिसकी प्राप्ति होवे है अन्य किसी वस्तुसें नहि इति ॥ ८१॥ इस प्रकारसे मोक्षके सर्व साध- नोमैसें ज्ञानकी मुख्य साधनताकू श्रवण करके अव तिस ज्ञानके साधन औ स्वरूपलक्षणके बोध अर्थ शिष्य पुनः प्रश्न करे है || शिष्य उवाच ॥ उपासनायाश्च तथैव कर्मणो भवेद्विवोधस्य च किंनु साधनम् ॥ स्वरूपमेषां च किमस्ति निश्चितं पृथक् पृथग्बूहि विभो समासतः ॥२॥ टीका-उपासनाया इति ॥ हे विभो कहिये आत्मस्वरूपसें सर्व व्यापक गुरो, आपने कहा जो मोक्षकी प्राप्तिविपे ज्ञानहि साक्षात् साधन है उपा- सना औ कर्म नहि ॥ सो प्रथम तिस उपासना कर्म औ विवोध जो ज्ञान है तिन तीनोंके क्या साधन हैं तथा (स्वरूपमेपां) कहिये तिनका यथार्थ स्वरूपलक्षण क्या है सो यह सर्वहि (पृथक् पृथक् ) कहिये भिन्न [ १८० भिन्न करके संक्षेपसें मेरेप्रति कथन करो इति ॥२॥ इस प्रकारसे शिष्यके दोप्रश्न श्रवण करके अब ति- नका श्लोकद्वयकरके संक्षेपसें गुरु उत्तर कथन करेहैं।। । गुरुरुवाच ॥ श्रद्धा मनःस्थैर्यमुपासनस्य वै चास्तिक्यविश्वाधिकतादि कर्मणः ॥ ज्ञानस्य वैराग्यविवेचनादिकं विज्ञा वदंतीह तु साधनं पृथक् ॥३॥ टीका-श्रद्धेति ॥ हे शिष्य, अपने इष्टदेवविपे जो परमश्रद्धा औ मनकी स्थिरता है सो यह दोनो उपासनाके साधन हैं यहां श्रद्धा औ मनकी स्थिरता यह दोनों उपासनाकी विधिका यथार्थ ज्ञान मरण- पर्यतका दृढ हठ औ चित्तमें उत्साह इत्यादिकों- केभी उपलक्षण हैं । यद्यपि मनकी स्थिरता उपास- नाके अनंतर होवे है तथापि किंचित् सामान्यसें प्र. थमभी होनी चाहिये काहेते अत्यंत चंचल मनवाले पुरुषका उपासनामें अधिकार नहि है इसी कारणते अत्यंत चंचल पुरुपके प्रति योगशास्त्ररिप " तपः- { १८१ ] स्वाध्यायेश्वरप्रणिधानानि क्रियायोगः" इस सूत्र में कृच्छ्रचांद्रायणादिरूप तप करना वेद स्मृति अथवा गायत्री आदि मंत्रोंका अहर्निश अध्ययन करना औ ईश्वरका नामोच्चारणादिरूप स्मरण करना इस प्र- कारसे पतंजलि मुनिने क्रियायोगका विधान कि- या है ॥ तथा (चास्तिक्यवित्ताधिकतादिकर्मणः) कहिये हे शिष्य, वेदके वाक्योंविपे औ स्वर्गादि लो. कोविपे जो परम आस्तिकता है औ अपने शरीरादि पोपणसे जो द्रव्यकी अधिकता है आदिशब्दसें द्वि- जातिवादि अधिकारिपणा कर्मकी विधिका यथार्थ ज्ञान होना भोग अथवा मोक्षकी इच्छा होनी इ. त्यादि यह कर्मके साधन हैं ।। तथा (ज्ञानस्य वैरा- ग्यविवेचनादिकं) कहिये इस लोक औ परलोकके विषयोंसें विराग औ सत् असत्का विवेक आदि- शब्दसें शम दम विश्वास तितिक्षादिरूप पसंपत्ति औ मोक्षकी उत्कट इच्छा तथा वेदांतशास्त्रका - मनिष्ठ गुरुमुखद्वारा श्रवण मनन निदिध्यासन तत् औ त्वंपदार्थका शोधन यह सर्व ज्ञानके साधन हैं । सो हे शिष्य, (विज्ञा वदंति) कहिये विज्ञ जो m [ १८२ तत्वदशी विद्वान् लोक हैं सो उक्त रीतिसें उपा- सना आदिकोंके भिन्न भिन्न साधन कहते हैं इति ॥ ८३ ।। इस प्रकारसे प्रथम प्रश्नका उत्तर कथन करके अब तिन उपासनादिकोंका यथार्थ स्वरूप क्या है यह जो शिष्यका द्वितीय प्रश्न है तिसका उ- त्तर कथन करे हैं। ॥ गुरुरुवाच ॥ दानाग्निहोत्रादि तु कर्मणस्तयो- पास्तेश्च चेतोर्पणमिष्टवस्तुनि ।। ब्रह्मात्मनोरैक्यविनिश्चयं बुधाः माहुर्विबोधस्य च लक्षणं पृथक् ॥४॥ टीका-दानेति ॥ हे शिप्य, (दानाग्निहोत्रादि) कहिये दान करना औ अग्निहोत्र करना आदिशब्द- करके इष्टापूर्त दत्तरूप जो तीन प्रकारके कर्म है तिन सर्वकाहि यहां ग्रहण जान लेना सो तिन तीनोंके लक्षण अन्य स्मृतिविपे कथन किये हैं "अग्निहोत्रं तपः सत्यं वेदानां चानुपालनं । आतिथ्यं वैश्वदेवं च इष्टमित्यभिधीयते ॥ वापीकूपतडागादि देवतायत- .

यह सर्व कर्म [ १८३ नानि च। अन्नप्रदानमारामः पूर्तमित्यभिधीयते ॥ श- रणागतसंत्राणं भूतानां चाप्यहिंसनं । वहिदि च यद्दानं दत्तमित्यभिधीयते' अर्थ-सायंप्रातः अग्नि होत्र करना तप करना सत्य भाषण करना वेदोंका पालन करना अतिथिकी सेवा करनी वैश्वदेव करना इष्ट कहिये हैं ॥ तथा वापी कूप औ तडाग लगाना देवमंदिर बनाना अन्नक्षेत्र लगाना ब- गीचा लगाना यह सर्व कर्म पूर्त कहिये हैं ॥ तथा शरणागत जीवकी रक्षा करनी किसी भूतप्राणिकी हिंसा नहि करनी औ यज्ञकी वैदिसें बाहिर जो दान करना है यह सर्व कर्म दत्त कहिये हैं इति । इस प्र- कारसे इन सर्वका नाम कर्म है ।। तथा हे शिष्य, (इष्टवस्तुनि) कहिये विष्णु महादेवादिक जो ध्येय देव हैं तिनमेंसें जो अपना इष्ट होवे तिसविषे जो चित्तका अर्पण अर्थात् अन्य प्रत्ययके परिहारपूर्वक तैलधाराकी न्याई ध्येयाकार प्रत्ययका जो सहश प्र- वाह संपादन करना है तिसका नाम उपासना है।। तथा (ब्रह्मात्मनोरैक्यविनिश्चयं) कहिये पूर्वोक्त भा- गत्यागलक्षणाकी रीतिसें ब्रह्म औ जीवात्माकी एक- [ १८४] ताका जो दृढ निश्चय है तिसका नाम ज्ञान है। सो हे शिष्य, इस प्रकारसें बुधा जो तत्त्वदर्शी लोक हैं सो पृथक् पृथक् कर्म उपासना औ ज्ञानके लक्षण अर्थात् स्वरूप कथन करते हैं इति ॥ ८४ ॥ इस प्र- कारसे कर्म औ उपासनाके साधन औ स्वरूपलक्षण तथा तिन दोनोंसें ज्ञानकी उत्कृष्टता श्रवण करके अब परवैराग्यपूर्वक जीवन्मुक्तिके सुखकी प्राप्तिके अर्थ शिष्य पुनः प्रश्न करे है ॥ ॥ शिप्य उवाच ॥ कस्येह वृक्षस्य फले सुखासुखे शाखाश्च कास्तस्य मता महामते ॥ वीजं च मूलं च पदानि कानि किं संक्षेपतो ब्रूहि पृथक् पृथग्गुरो ॥५॥ टीका-कस्यति ॥ हे (महामते) कहिये ज्ञानवि- ज्ञानसंपन्नमतिवाले गुरो, (सुखासुखे) कहिये यह जो लोकविषे प्रसिद्ध मुख औ दुःख भोगनेमें आते है सो यह दोनों (कस्य) कहिये किस वृक्षके फल हैं औ तिस वृक्षकी विद्वान् लोकोंने शाखा कौनसी [ १८५] मानी हैं तथा तिसका मूल क्या है औ (पदानि) क. हिये तिसकी जड़ें कौनसी हैं तथा तिस वृक्षका बीज क्या है सो हे गुरो, यह सर्वहि (पृथक् पृथक्) कहिये भिन्न भिन्न करके मेरेप्रति संक्षेपसे कथन करो इति८५ इस प्रकारसे शिष्यका गुह्य प्रश्न श्रवण करके अब एक श्लोककरकेहि गुरु तिसका उत्तर कथन करे हैं। ॥ गुरुरुवाच ॥ योऽनेकजन्मार्जितवासनापदः संकल्पमूलोऽनुभवैकबीजकः ॥ धर्मेतरोत्तुंगलतोपशोभितः कर्मद्रुमस्तस्य फले सुखासुखे ॥६॥ टीका-य इति ॥ हे शिष्य, (अनुभवैकबीजका) कहिये जिसका शब्दादिक विषयोंका जो अनुभव है सोई एक चीज है काहेते जैसे प्रथम बीजके होने- तेहि पश्चात् वृक्षके जड मूल शाखादिक उत्पन्न होवे हैं तैसेहि प्रथम अनुभपके होनेतेहि पश्चात् वासना संकल्प धर्माधर्मादिक उत्पन्न होवे हैं तथा (वासना. पदः) कहिये जिसकी अनादि संसारमें अनेक जन्म- [ १८६] जन्मांतरों विपे संपादन करी हुयी जो भोगोंकी वा- सना है सोई जडें हैं काहे जैसे जडोंसे पश्चात् अं- कुरद्वारा वृक्षके मूल शाखादिक उत्पन्न होवे हैं तैसेहि वासनायासे पश्चात् संस्कारद्वारा संकल्पादिक उत्पन्न होते हैं । तात्पर्य यह ।। जैसे अंकुरकी जडोंकरके पुष्टता होवे है औ जडोंकी अंकुरकरके पुष्टता दोवे है तैसेहि वासनायोंकरके संस्कारोंकी पुष्टता होवे है औ पुनः संस्कारोंकरके वासनार्योकी पुष्टता होवे है।। इस प्रकारसे इन दोनोंका अनादिसंबंध है ॥ तथा (संकल्पमूलः) कहिये हे शिष्य, जिसका अपने स्व- रूपसे व्युत्थान हुये मनका बहिर्मुख होय करके जो संकल्प विकल्प करना है सोई मूल है काहेत जैसे वृक्षके मूलसें क्रमकरके शाखाकी उत्पत्ति होवे है तै- सेहि संकल्पकरके शुभाशुभ क्रियाद्वारा धर्माधर्मकी उत्पत्ति होवे है यह वार्ता मनुस्मृतिके दूसरे अध्याय- विपेभी कथन करी है "संकल्पमूलः कामो वै यशाः संकल्पसंभवाः ॥ ब्रतानि यमधर्माश्च सर्वे संकल्पजाः स्मृताः" अर्थ-नाना प्रकारके पदार्थोंकी इच्छारूप जो काम है तिसका मूल संकल्पहि है औ जो ज्योतिः [१८७ ] टोमादि यज्ञ हैं सोभी सर्व संकल्पसें होते हैं तथा अन्य जो व्रत नियम धर्म हैं सोभी सर्व संकल्पसेंहि होते हैं इति ॥ तथा (धर्मेतरोत्तुंगलतोपशोभितः) क- हिये हे शिष्य, धर्म औ अधर्म अर्थात् पाप औ पु. ण्यरूप (उत्तुंग) कहिये विस्तृत शाखाकरके जो शो. भायमान होय रहा है । यद्यपि पाप औ पुण्य यह दोनों संख्यासें दोहि प्रतीत होते हैं तथापि इनके अवांतर भेद अनेकहि प्रकारके हैं यातें इनको अ- नेक शाखाकी उपमा संभव है काहेते जैसे वृक्षकी शाखायोंसें फलोंकी प्राप्ति होवे है तैसहि पाप औ पुण्यसँहि सुखदुःखोंकी प्राप्ति होवे है सो हे शिष्य, इस प्रकारका जो (कर्मद्रुमः ) कहिये कर्मरूप वृक्ष है तिसहिके फल सुख औ दुःख हैं इति ॥ ८६ ।। इस प्रकारसे कर्मरूप वृक्षके सुखदुःखरूप फलोंकू श्रवण करके अब "नहि कश्चित् क्षणमपि जानु ति- छत्यकर्मकृत्" इस गीताके वाक्यमें कहा है कि कोई पुरुप एक क्षणमात्रभी कदाचित् कर्मसें विना नहि स्थित हो सके है यातें कर्मका सर्वदाहि सद्भाव हो- नेतें तिसके फल सुखदुःखोंकाभी कदाचित् नाश [ १८८ ] नहि होवेगा यातें मोक्षपदकी सिद्धि कैसे होवेगी इस प्रकारसें संशय करके आविष्ट भया शिष्य पुनः प्रश्न करे है॥ ॥ शिप्य उवाच॥ कथं नु निर्मूलनमस्य चाचिरं भवेगुरो कर्मतरोरशेषतः॥ निरुढपादस्य च भीतिदायिनो दयानिधे तद्वद मे विनिश्चितम् ॥७॥ टीका-कथामिति ॥ हे (दयानिधे) कहिये स्वाभा- विक दयाके समुद्रगुरो, आपने जो कहा कि कर्मरूप वृक्षके सुखदुःखरूप दोनों फल हैं औ मैं तिन दोनोंसें रहित भया चहिता हूं यातें (कर्मतरोः) कहिये तिस कर्मरूप वृक्षका (अशेपतः) कहिये निःशेपसें अर्थात् सहित जडा मूलके किस उपायकरके शीमहि (निर्मू- लनं) कहिये उखाडना होवे है सो हे भगवन् , यह क- मरूप वृक्ष कैसा है (निरूढपादस्य) कहिये जैसे अत्ति पुरातन महान् वृक्षकी जडें नीचे पृथिवीविपे अ. त्यंत विस्तृत होयकरके दृढ जम जाती हैं सैसेहि इम । १८९] कर्मरूप वृक्षकी वासनारूप जडें अंतःकरणरूप पृ. थिवीविपे अत्यंत दृढ करके जमी भई हैं । तथा पुनः यह कर्मरूप वृक्षकैसा है (भीतिदायिनः) क- हिये भयके देनेहारा है अर्थात् जैसे महापुरातन वृ. क्षके आश्रय होयकरके पिशाच बलहीन पुरुषोंकू भय देवे है तैसेहि कर्मरूप वृक्षके आश्रय होयकरके अ. ज्ञानरूप पिशाच विवेकरूप बलकरके हीन पुरुषोंकूज- न्ममरणादिरूप भय देवे है यातें हे भगवन्, इस क- मरूप वृक्षका जिसकरके शीहि मूलसहित छेदन हो सो उपाय कृपा करके मेरेप्रति कथन करो इति ॥ ८७ ॥ इस प्रकारसें शिष्यका प्रश्न श्रवण क- रके अब गुरु तिसका एक श्लोककरकेहि उत्तर क- थन करे हैं। ॥ गुरुरुवाच ॥ वैराग्यमेवास्य दृढं दृढाशयाः शस्त्रं वदंतीह विवेकसंशितम् ॥ तेनैनमुन्मूलय बोधवीर्यतो नान्यत्तु तत्साधनमस्ति वै कचित् [.१९० ] टीका-वैराग्यमिति ॥ हे शिष्य, (अस्य) कहिये इस कर्मरूप वृक्षके समूलसें छेदन करनेहारा पर वै- राग्यरूपहि एक दृढ शस्त्र विद्वान् लोक कथन करते हैं सो शस्त्र यद्यपि दृढभी होवे परंतु शाण करके अ- ग्रभागसें तीक्ष्ण नहि कीया होवे तो सो महावृक्षके काटनेमें समर्थ नहि हो सके है यातें (विवेकसंशितं) कोि सो वैराग्यरूप शस्त्र घेदांतशास्त्रजन्य विवेकरूप शाण करके सम्यक् प्रकारसे तीक्ष्ण किया हुया चा- हिये । यद्यपि सो दृढ औ अग्रभागसें तीक्ष्णभी होवे परंतु छेदन करनेहारे पुरुपके शरीरमें जो बल नहि होवे तोभी तिससे वृक्षका मूलसें छेदन नहि संभवे है यातें (बोधवीर्यता) कहिये आत्मस्वरूपका जो निःसंदेह हढ बोध अर्थात् ज्ञान है सोई महा- बल है यातें तिसकरकेभी मुमुक्षु पुरुपों संयुक्त होना चाहिये तथा ज्ञानकी वलरूपता केनोपनिष- तूमेंभी दिखाई है "आत्मना विन्दते वीर्य"अर्थ- आत्माके ज्ञान करकेहि यह पुरुष वलकुं प्राप्त होवे है इति ॥ सो हे शिप्य, (तेनैनं) कहिये इस उक्क कर्मरूप वृक्षकू इस प्रकारका पर वैराग्यरूप शस्त्र ह- . [-१९१.] स्तमें लेकरके (उन्मूलय) कहिये सहित जडों औ मू. लके उखाडकरके दूर डार देहु जिससे तिसका पुन: कबीभी आरोहण नहि होवे । तथा यह वार्ता गी- ताके पंदरवें अध्यायविपे भगवान्नेभी प्रतिपादन करी है "अश्वत्थमेनं सुविरूढमूलमसंगशस्त्रेण ६- ढेन छित्या" अर्थ-हे अर्जुन, यह जो (विरूढ- मूल ) कहिये सम्यक् प्रकारसे दृढतर जमे हुये मूल- वाला संसाररूप पीपलका वृक्ष है तिसकू असंग अ- र्थात् वैराग्यरूप दृढ शस्त्रसें छेदन कर इति ॥ सो हे शिष्य (नान्यत्तु तत्साधनमस्ति) कहिये उक्त क- मरूप वृक्षके समूलसें छेदन करनेके अर्थ पर वैरा- ग्यके विना दूसरा कोई कहींभी उपाय नहि है। सो इस प्रकारसें जब वृक्षकाहि मूलसें छेदन होजावें. गा तो पश्चात् तिसके फल कहांसे होवेंगे यातें हे शिष्य, पश्चात् सुखदुःखसे रहित भया तूं केवल अ- पने सच्चिदानंद सामान्यसत्तास्वरूपविपे जीवन्मुक्त भया स्थित होवेगा इति ॥ ८८॥ इस प्रकारसें जी- वन्मुक्तिसुखकी प्राप्तिविणे परवैराग्यकी मुख्य हेतुता श्रवण करके अब विषयसुखकी निंदापूर्वक आत्म- [ १९२] सुखकी प्राप्तिकी वांछा करके युक्त भया शिष्य पुनः प्रश्न करे है। ॥ शिप्य उवाच ] सुखाय लोको यतते निरंतरं सुखं च दुःखेन सदैव मिश्रितम् ॥ अमिश्रितं यनु नदाप्यते कथं तदपिनं मे वद वेदविगुरो ॥४९॥ टीका-सुखायेति ।। हे (वेदवित्) कहिये सर्व वे- दगत रहस्यके जाननेहारे गुरो, यह पशु पक्षी मनु- प्यादि लोक सर्वहि सुसप्राप्तिके अर्थ सर्वदा (यतते) कहिये नानाप्रकारके यत्न करते हैं परंतु सो जो वि. पयजन्य सुख है सो विचारदृष्टिसें देखें तो सर्वदाहि (दुःखेन मिश्रितं) कहिये दुःसकरके मिश्रित होय रहा है । यद्यपि इस लोककी अपेक्षासें स्वर्गादि लो- कॉविपे मुखकी विशेपता श्रवणमें आये है तथापि ताभी जो अपनेसें न्यून मुख भोगते है तिनकी तरफ देखकरके अभिमानकी उसत्ति होते है औ जो अपने बरावर मुख भोगते है तिनकी तरफ दे.

[१९३] खकरके चित्तमें ईर्षाकी उत्पत्ति होवे है तथा जो अ- पनेसें अधिक सुख भोगते हैं तिनकू देखकरके हृद- यमें ज्वलनता उत्पन्न होवे है इस प्रकारसे स्वर्गादि लोकोंमेंभी मानसदुःख वनाहि रहता है। किंच देवतोंमें अश्विनीकुमार वैद्य श्रवणमें आवे हैं तिससे यह अनुमान होवे है कि देवतोंमें किंचित् शारीरक दुःखभी अवश्य होता होवेगा नहि तो स्वर्गमें वै- द्योंका क्या प्रयोजनथा ॥ किंच गौतम मुनिके शा- पसे इन्द्रके शरीरमें सहस्र भग होगये थे औ चन्द्र- माके शरीरमें दक्षके शापसे क्षयीरोग हो जाता भया है इत्यादि इतिहासोंसें भी उक्त वार्ताकी सिद्धि होवे है। यातें विषयसुखको सर्वदाहि दुःखकरके मिश्रित होनेते सो सुखभी दुःखरूपहि है यह वार्ता सांख्य- सूत्रोंमें पष्ठ अध्यायविषे कपिल देवजीनेभी कथन करी है "तदपि दुःखशवलमिति दुःखपक्षे निःक्षि- पंते विवेचका:" अर्थ-प्रथम तो इस जगत्में सु- खहि अल्प है पुनः सोभी दुःखकरके शबल क- हिये मिश्रित है यातें तिसकुंभी विवेकी पुरुप दु:- खके पक्षमेहि क्षेपण करते हैं इति॥ यातें हे भगवन्, [१९४] (अमिश्रितं यन्नु) कहिये जो सुख किसी कालवि- पेभी दुःखकरके मिश्रित नहि है सो क्या है औ (तदाप्यते कथं) कहिये तिसकी प्राप्ति किस उपा- यकरके होवे है सो हे भगवन् , तिस परम सुखकी इच्छावाला जो मैं हुँ सो मेरेप्रति कृपा करके कथन करो इति ॥ ८९॥ इस प्रकारसे शिष्यका प्रश्न - वण करके अव गुरु तिसका उत्तर कथन करे हैं । ॥ गुरुरुवाच ॥ यस्यैतदानन्दमहोदधेर्लवं सर्वं भवेनिवृतमाश्रितं जगत् ॥ यत्र स्थितो वेति न दुःखमण्वपि तत्माप्यतेऽकामहतात्मवेदिना ॥ ९० ॥ टीका-यस्येति ॥ हे शिष्य, (यस्यैतदानंदमहो- दधेः) कहिये जिस आनंदके समुद्ररूप ब्रह्मके एक लघमात्रकू आश्रय करके यह सर्वहि चराचर जगत् (निवृत) कहिये आनंद• प्राप्त होय रहा है यह वार्ता बृहदारण्यकोपनिषत्मेंभी कथन करी है "ए- तस्यैवानन्दस्यान्यानि भूतानि मात्रा मुपजीवंति" [१९५] अर्थ-इसहि आनंदके समुद्ररूप ब्रह्मकी एक बिंदु- करके यह सर्व भूतप्राणी आनंदयुक्त होय रहे हैं इति ॥ तथा (यत्र स्थितः) कहिये हे शिष्य, जिस आनंदरूप ब्रह्मके विपे निर्विकल्पत्तनाधिकालम स्थित भया योगी पुरुष (अण्वपि)कहिये किंचित्मानभी दु:- खका अनुभव नहि करे है यह वार्ता भगवतगीता- मेंभी कथन करी है "यस्मिन् स्थितो न दुःखेन गु- रुणापि विचाल्यते" अर्थ-हे अर्जुन, जिस आनं. दविपे स्थित भया योगी पुनः बडे भारी दुःखकर- केभी चलायमान नहि होवे है इति ॥ यातें हे शिष्य, ऐसा विषयसुखसें विलक्षण जो ब्रह्मका सुख है सोई दुःखकरके अमिश्नित है । इस प्रकारसे प्रश्नके प्रथम अंशका उत्तर कथन करके अब जो शिष्यने पूछा था कि सो सुख किस उपायकरके प्राप्त होते है तिसका उत्तर कथन करे हैं (तत्प्राप्यतेऽकामहतात्मवेदिना) कहिये हे शिष्य, नानाप्रकारकी कामनाकरके हत क- हिये जिस पुरुषका चित्त प्रविद्ध नहि है ऐसा जो आत्मतत्त्व जाननेहारा जीवन्मुक्त ज्ञानी पुरुष है सोई तिस ब्रह्मके संपूर्ण सुखकू प्राप्त होवे है यह [१९६] वार्ता तैत्तिरीयउपनिपतमें भी प्रतिपादन करी है "श्रो- त्रियस्य चाकामहतस्य" अर्थ-इस सर्व पृथिवीमंड- लका एक चक्रवर्ती राजा होवे औ नीरोग पुष्ट औ बलिष्ठ शरीरवाला होवे तथा युवा अवस्था औ स- विद्याकरके संपन्न होवे तो तिसकूँ जो सुख प्राप्त होवे है सो एक मनुष्योंका संपूर्ण आनंद कहिये है तिसते सौ गुणा अधिक सुख गंधर्वोकू प्राप्त होते है औ तिसत सौ गुणा अधिक देवगंधर्वोकू होवे है तथा तिसते सौ गुणा अधिक पितरोंकू होवे है ओ तिसत सौ गुणा अंजानजदेवताकू होवे है ति- सतें सौ गुणा अधिक कर्मदेवतोंकू होवे है औ ति: सर्ते सौ गुणा अधिक अग्नि आदिक मुख्य देवतोंकू होवे है औ तिसतें सौ गुणा सुख देवतोंके राजा इ- न्द्रकू होवे है तथा तिसते सौ गुणा अधिक देवतोंके गुरु बृहस्पतिवू होवे है औ तिसतें सौ गुणा अधिक कश्यप दक्षादि प्रजापतियोंकू होवे है तथा तिसत सौ गुणा अधिक सुख ब्रह्माकू होवे है सो यह सर्वहि १ अजानजदेवता कर्मदेवता मुख्यदेवता यह तीन भेद स्वर्गवामी दै- वीके हैं। अधिक सुख [१९७] सुख सर्व कामनाकरके रहित जो ब्रह्मनिष्ठ औ ब्रह्म- श्रोत्रिय ज्ञानी पुरुष है तिसकू प्राप्त होचे है इति ॥ तथा यह वार्ता अन्य ग्रंथविपेभी कथन करी है "न सुखं देवराजस्य न सुखं चक्रवर्तिनः ॥ यत्सुखं वीतरा- गस्य मुनेरेकांतवासिनः" अर्थ-जो सुख एकांतमें वास करनेहारे वीतराग मुनिकू प्राप्त होवे है सो सुख चक्रवर्ती राजा औ देवतोंके राजा इन्द्रकुंभी नहि प्राप्त होवे है इति ॥ यहां यह रहस्य है । ज्ञानी पु- रुपको अपने आत्माकी सर्वव्यापकताका दृढ निश्चय होवे है तो जो आत्मा इन्द्रादिकोंके शरीरमें है ति- सकूभी सो अपणाहि आत्मा समझता है यातें जो इन्द्रादिकोंकू सुख होवे है सो ज्ञानी पुरुष तिस सु. खका भोक्ता अपने कूहि माने है ।। किंच इन्द्रादि- कोंकू अपनेतें अधिक जो ब्रह्मादिकोंका सुख है ति- सकी सर्वदाहि अभिलाषा रहती है औ ज्ञानी पुरुष सर्व अभिलाषाकरके रहित होवे है यातें तिसकू इ. न्द्रादिकोंसेंभी अधिक निरतिशय आत्मसुखकी प्राप्ति होचे है । सो हे शिष्य, जोतिस ब्रह्मानंदके अनुभव करनेकी तेरी वांछा होवे तो तुंभी सर्व कामनासें र- [१९८] हित होयकरके अपने आत्मस्वरूपविषे स्थित होहु इति ॥ ९० ॥ इस प्रकारसें परमानंदकी प्राप्तिरूप जो मोक्षका एक भाग है तिसकी प्रासिका उपाय श्रवण करके अव सर्व दुःखोंकी निवृत्तिरूप जो मो. क्षका द्वितीय भाग है तिसकीभी जीवतेहुयेहि प्रा. प्तिके अर्थ पुनः शिप्य प्रश्न करे है ॥ शिप्य उवाच ॥ तथैव दुःखापगमाय जंतवः सदा यतते सनु नैव सिद्ध्यति ॥ यदं नु किंचाखिलदुःखवर्जितं भवेद्भवांस्तत्कृपया प्रवीनु मे ॥९१ ॥ टीका-तथैवेति ॥ हे भगवन् , जिस प्रकार सर्व जीव सुखकी प्राप्तिके अर्थ यत्न करते है (तथैव) कहिये तैसेहि सर्व दुःखोंके दूरीकरणके अर्थभी सर्व भूतप्राणी यत्न करते दृष्टिमें आते हैं परंतु (सतु नैव सिद्ध्यति) कहिये अनेक प्रकारके यत करनेसेंभी तिस सर्व दुःखोंका दूरीकरणा यथावत् सिद्ध नहि होवे है । तात्पर्य यह है ॥ कि आध्यात्मिक आधि- [१९९] दैविक औ आधिभौतिक इस प्रकारसे दुःख तीन प्रकारके होवे हैं तिनमें कफ पित्तादिकोंकी विषम- तासें शरीरविपे व्याधि होनेतें जो दुःख होवे है सो आध्यात्मिक दुःख कहिये है औ अति शीत अति उष्णता अति वृष्टि अति वायुसें तथा मंगलादि नव ग्रहोंकरके जो पीडा होवे है सो आधिदैविक दुःख कहिये है। तथा सर्प व्याघ्र चोरादिकोंसें जो क्लेश होवे है सो आधिभौतिक दुःख कहिये है इन तीनों प्रकारके दुःखोंकरके सर्वहि पृथिवीमंडल व्याप्त होय रहा है औ इनकी निवृत्तिके अर्थ सर्व पुरुष यथाशक्ति सर्वदाहि उपाय करते हैं परंतु तिनकी निःशेपताक- रके निवृत्ति नहि होवे है काहेते तिनकी निवृत्तिके लौकिक साधन जो औपधादिक हैं तिनकरके प्रथम तो सर्व दुःखोंकी निवृत्ति नियमसें होतीहि नहि है औ जो कथंचित् किसी उपायसें किसी दुःखकी नि- वृत्ति होभी जावे है तो पुनः कोई कालमें तिस दुः- खका प्रादुर्भाव होवे है या औषधादिकोंसें सर्वथा सर्व दुःखोंकी निवृत्ति नहि होवे है यह वार्ता सां- ख्यसूत्रोंमें प्रथमाध्यायविपे कपिलदेवजीनेंभी कथन [२००] करी है “न दृष्टात् तसिद्धिनिवृत्तेप्यनुवृत्तिदर्श- नात् " अर्थ-आध्यात्मिकादि जो त्रिविध दुःख है तिनकी इस लोकके जो औपधादिक उपाय है ति नकरके अत्यंत निवृत्ति नहि होवे है काहेते (अनुवृ- त्तिदर्शनात्) कहिये एकरार निवृत्ति होनतेभी पुन: तिनकी उत्पत्ति देखने में आवे है इति ॥ यातें हे भ- गवन्, (अखिलदुःखजित) कहिये आध्यात्मिका- दि सर्व दुःखोंकरके रहित क्या पद है कि जिसके प्राप्त होनेतें पुरुपके सर्व दुम्सोंकी अत्यंत निवृत्ति होवे है सो (कृपया) कोि अपनी स्वाभाविक द- यालुताकरके मेरे प्रति कथन करो इति ॥९१ ॥ इस प्रकारसे शिप्यका प्रश्न श्रवण करके अब गुरु ति- सका अनुवाद करते हुये उत्तर कथन करे है। ॥ गुररुवाच ॥ महेन्द्रलोकं भुवनं स्वयंभुवो रमेशधामायि नगं पिनाकिनः ॥ मयातु पातालमपि ममुच्यते न दुःखलेशातु विनात्मसंस्थितिम ९२ [२०१] टीका महेन्द्रलोकमिति ॥ हे शिष्य, यह पुरुष चाहे (महेन्द्रलोकं) कह्येि महेन्द्रलोक जो स्वर्ग है तहांभी कोई उपायकरके चला जावे तथा चाहे (भु- धनं स्वयंभुवः) कहिये स्वयंभु जो ब्रह्मा है तिसके लोकविपेभी चला जावे चाहे (रमेशधाम) कहिये रमेश जो विष्णु भगवान हैं तिनकी निवासभूमि वै- कुंठविपेभी किसी प्रयत्न करके चला जावे तथा चाहे (नगं पिनाकिनः) कहिये पिनाकी जो महादेव हैं तिनकी निवासभूमि जो कैलास पर्वत है तहांभी किसी उपायकरके चला जावे अथवा चाहे (पाताल) कहिये बलिराजाके निवासका स्थान जो पाताल है तहांभी किसी उपायकरके चला जावे इत्यादिक अ- न्यभी जो ब्रह्मांडके भीतर अथवा वाह्य सुखदायक स्थान है तिनविषेभी किसी उपायकरके चला जावे परंतु हे शिष्य, (विनात्मसंस्थिति) कहिये अपने आ- त्मस्वरूपविये जो निर्विकल्य स्थिति है तिसके विना यह पुरुष कदाचित्भी सर्वथा दुःखके लेशसे छूट नहि सके है | काहेत तिनमें इन्द्रलोक जो स्वर्ग है तिसमें निरतिशय सुख नहि है यह वार्ता तो पूर्व [२०२] समीपहि प्रतिपादन करि आये है ॥ किंच पुराणों में श्रवणमें आये है कि जो पुरुष स्वर्गमें जाते हैं तो तिस कालमें तिनके गलेमें एक पुष्पोंकी माला पह- राई जाती है औ तिनके प्रति यह कहदिया जाता है कि जब यह माला कुमलाय जावेगी तो तिसहि कालमें तुमारा स्वर्गसे पतन हो जावेगा या तिन पुरुषोंके चित्तमें सर्वदाहि ऐसा भय बना रहता है कि नजाने किसकालमें यह माला कुमलाय जाय । तथा गीताविपे भगवान्नेभी यह वार्ता कथन करी है "क्षीणे पुण्ये मर्त्यलोकं विशंति" अर्थ-हे अ- र्जुन, जिस कालमें स्वर्गमें गये हुये पुरुषोंके पुण्य क्षीण हो जाते हैं तो पश्चात् सो पुनः इस मनुष्य- लोकमें आते हैं इति ॥ यातें हे शिष्य, स्वर्गमें जा- नेसेंभी सर्व दुःखोंकी निवृत्ति नहि होवे है । तथा जो पुरुप पंचाग्निविद्यादिक उपासना करके ब्रह्मलो- कमें जाते हैं तिनकू भोगमात्र तो ब्रह्माके समानहि प्राप्त होये है परंतु ब्रह्मामें जो जगत्की रचनादि क- रनेकी सामर्थ्य है सो तिनकू नहि प्राप्त होवे है ।। औ पुनः कल्पके अंतमें ब्रह्मलोकसेंभी केचित् उपा- [२०३] सकोंका नीचे पतन होवे है। यह वार्ता गीतामें भी कथन करी है “आब्रह्मभुवनाल्लोकाः पुनरावर्तिनो. र्जुन" अर्थ हे अर्जुन, ब्रह्मलोकसें लेकर स्वर्गादि लोकोंसें पुरुषोंकी पुनः इस लोकमें आवृत्ति होवे है इति ॥ यातें है शिप्य, ब्रह्मलोकमें जानेसेंभी सर्व दु:- खोकी निवृत्ति नहि होवे है। तथा वाल्मीकीयरा- मायणादिकोंविपे यह वार्ता प्रसिद्ध है कि विष्णु भ- गवान्के पार्पद जो जय विजय थे तिनकुंभी सनका- दिकोंका शाप होना वैकुंठसे नीचे पतन होना राक्ष- सकुलमें जन्म होना पश्चात् अनेक प्रकारके क्लेशोंसें रणभूमिमें मरना इत्यादि दुःख होते भये हैं यातें हे शिष्य, विष्णुलोकमें जानेसेंभी सर्वथा दुःखोंकी नि- वृत्ति नहि होवे है। तथा योगवासिष्टके निर्वाणप्रक- रणके पूर्वार्धमें यह प्रसंग लिखा है कि एक समय योगिनीयोंने ईपीसें पार्वतीके शरीरकू काट काट डु- कडे कर औ अग्निसे पचायकरके भोजन कर लीया तो पुनः महादेवके क्रोधके भयसें स्वस्वमुखसे एक एक अंग निकासकरके पार्वतीकू जिलाय दीया औ भा- गवतादिकोंमें लिखा है कि दक्षमजापतिके यज्ञमें जा- [२०४] यकरके पार्वतीनें क्रोधकरके अपने शरीरकू जला- यकर भस्म कर दीया । यातें हे शिप्य, इत्यादिक- वार्तायोंसें जाना जाये है कि कैलासमें जानेसेंभी स- र्वथा दुःसोंकी निवृत्ति नहि होवे है ॥ तथा भागव- तादिकोंमें श्रवणमें आवे है कि पातालमें बलिराजा अवपर्यंत बंधायमान है औ जो अन्य राक्षसलोक तहां निवास करते हैं तिनके अर्थ विष्णुभगवान्ने अपना सुदर्शन चक्र छोडा हुया है सो जव जव रा- क्षसोंकी स्त्रियां गर्भ धारण करती है तो तिन सर्व गर्भीकू सुदर्शन चक्र कच्चेहि गिराय देते है औ महा- भारतके उद्योगपर्वमें लिसा है कि पातालमें भोग- यती नाम पुरीमें जो नागलोक निवास करते है ति- नमेंसें एक नाग नित्यप्रति गरुडभगवान् अपने भ- क्षणके अर्थ भेटा लेते हैं यातें हे शिप्य, पाताललो- कमें जानेसेंभी सर्वथा दुःखोंकी निवृत्ति नहि होवे है। इसी प्रकारसें अन्य गंधर्वलोक पितृलोकादि- कोंमेंभी यथायोग्य जान लेना ॥ सो हे शिप्य, आ- स्मस्वरूपविपे जो निर्विकल्पस्थिति है सोई सर्व दु:- [२०५] खोंसे रहित पद है तिसके विना उक्त स्वर्गादि लो- कोंमें जानेसें दुःखका लेश बनाहि रहता है सर्वथा तिसकी निवृत्ति नहि होवे है तथा यह सर्व वार्ता योगवासिष्ठके स्थिति प्रकरणमें अपने पुत्रके प्रति दा- सुरमुनिनेंभी कथन करी है "यदि वर्षसहस्राणि त- पश्चरसि दारुणम् ॥ पातालस्थश्च भूस्थश्च स्वर्गस्थश्चापि तत्तव ॥ नान्यः कश्चिदुपायोस्ति संकल्पोपशमाहते" अर्थ-हे पुत्र, जो तुं पातालमें स्थित भया अथवा पृथिवीमें स्थित भया अथवा स्वर्गमें स्थित भयाभी ह- जारों वर्षपर्यंत उग्र तप करेगा तोभी तेरेकू परमसु- खकी प्राप्तिके अर्थ सर्व संकल्पोंसे रहित आत्मपदविषे स्थित होनेके सिवाय दूसरा कोई उपाय नहि है इति॥ यातें है शिष्य, सर्व दुःखोंकरके रहित एक आत्मप- दहि है यह वार्ता श्रुतिमेंभी कथन करी है "समा- धिनिधूतमलस्य चेतसो निवेशितस्यात्मनि यत्सुखं भ- वेत्॥ न शक्यते वर्णयितुं तदा गिरा स्वयं तदंतःकर- णेन गृह्यते" अर्थ-समाधिके अभ्यासकरके नि- मल भये चित्त• आत्माकेविपे स्थित करनेसे जो सुख [२०६] होवे है सो वाणीकरके कथन नहि किया जावे है किंतु तिस कालमें तिस सुखकू योगी लोक अपने अंतःकरणकरकेहि अनुभव करते हैं इति ॥ तथा गी. ताके पष्ठे अध्याय भी कहा है "प्रशांतमनसं ह्येनं योगिनं सुखमुत्तमम् ।। उपैति शांतरजसं ब्रह्मभूतमक- ल्मपम्" अर्थ-हे अर्जुन, निर्विकल्पसमाधिकालमें, प्रशांतचित्तवाले योगी पुरुषकू रजोतमोंके लेशसें र- हित केवल सच्चमय ब्रह्मभूत अनुत्तम सुखकी प्राप्ति होवे है इति ॥ यद्यपि समाधिसें व्युत्थानकालमें यो- गीकुंभी किंचित् शीतोष्णादि द्वंद्वजन्य दुःखका अ. नुभव होवे है तथापि आत्मतत्त्वके दृढाभ्यासके हो- नेतें सो योगी तिस दुःख औ तिसके शीतोप्णादि हेतु औ तिसका आश्रय शरीर औ अंतःकरण इन सर्वकू अपने स्वरूपविपे मृगतृष्णाके जलकी न्याई कल्पित माने है या तिसकू सर्वथाहि सर्व दुःखोंकी निवृत्तिपूर्वक परमानंदकी प्राप्ति होवे है ।। यद्यपि यो. गीसे विना केवल ज्ञानी पुरुषभी दुःखादिकोंकू आ- स्मस्वरूपविपे कल्पित जाने है तथापि तिसकों दृढा- भ्यासके अभाव होनेतें देहविपे अधिक अध्यास [२०७] होवे है यातें दुःखकालमें तिसकू अवश्य व्यथा होवे है ॥ यातें हे शिष्य, जो तेरेको जीवतेहि सर्वदुःखोंकी निवृत्तिकी इच्छा होय तो तुंभी निर्विकल्पसमाधिका अभ्यास कर इति ॥ ९२॥ इस प्रकारसें निर्विक- ल्पसमाधि• जीवन्मुक्तिके निरतिशयपरमानंदकी हे- तुता श्रवणकरके अब यह समाधि ज्ञानसें प्रथमाहि- कर्तव्य है किंवा ज्ञान होनेके अनंतरभी कर्तव्य है इस प्रकारसें संशयकू प्राप्त भया शिष्य पुनः प्रश्न करे है॥ ॥ शिष्य उवाच ।। ज्ञानोदयानंतरमस्य देहिनः कर्तव्यमस्तीह न किंचनापि वा। चेदस्ति किं तत्कृपया ब्रवीतु मे सम्यग्भवानागमगोप्यगोचरः॥९३॥ टीका-ज्ञानोदयानंतरमिति ॥ हे भगवन पू. र्वोक्त जीवब्रह्मकी एकताके निःसंदेह ज्ञानके उदय होनेके अनंतर प्रारब्धकर्मके क्षयपर्यंत इस शरीर- [२०८] धारी ज्ञानी पुरुषकों इस लोकमें पुनः (कर्तव्यमस्ति) कहिये किसी प्रकारका कर्तव्य शेप रहता है किंवा किंचित्मात्रभी नहि रहता काहेतें बहुत स्थलों में वे- दांतशास्त्रोंविपे श्रवणमें आये है कि ज्ञानके उदय होनेके पश्चात् पुरुपकों किंचित्मात्रभी कर्तव्य शेप नहि रहै है तथा श्वेताश्वतरोपनिपत्के भाप्यमें लि- खाहै "ज्ञानामृतेन तृप्तस्य कृतकृत्यस्य योगिनः॥ नै- वास्ति किचित् कर्तव्यमस्तिचेन स तत्ववित्"अर्थ- ज्ञानरूप अमृतकरके तृप्त जो कृतकृत्य योगी पुरुष है तिसको पुनः इस लोकविपे किचित्मात्रभी क- तव्य नहि रहे है औ जो पुनःभी रहे है तो सो य- थार्थतत्त्ववेत्ता ज्ञानी नहि है इति ॥ औ (चेदस्ति) कहिये हे भगवन् , जो ज्ञानके अनंतरभी किचित् कर्तव्य शेप रहे है तो सो कर्तव्य क्या है ॥ सो सर्व शास्त्रोंके (गोप्यगोचरः) कहिये गोप्य रहस्यके स- म्यकू प्रकारमें जाननेहारे जो आप है सो मेरेप्रति कृपाकरके कथन करो इति ॥९३ ॥ इस प्रकारसें शिप्यका प्रश्न श्रवणकरके अव गुरु तिसका अनु- वाद करते हुये उत्तर कथन करे है।

[ २०१] । गुरुरुवाच ॥ ज्ञानामृतातृप्तमतेर्विवेकिनो नैवास्ति किंचित्करणीयतां गतम् ॥ यद्यस्ति नबृत्तिनिरोध एव वै नान्याकदापीति वदंति सूरयः ॥ ९४ ॥ टीका-ज्ञानामृतातृप्तमतेरिति ॥ हे शिप्य, जी. वब्रह्मकी एकताके निःसंदेह ज्ञानरूप अमृतकरके जिस पुरुपकी सर्व तरफसें बुद्धि तृप्त होय रही है तिसको इस लोकमें पुन: किंचित्मात्रभी (करणी- यतां गतं) कहिये कार्य करनेयोग्य नहि है ॥ यह वार्ता गीताविपेभी कथन करी है "नैव तस्य कृते- नार्थो नाकृतेनेह कश्चन" अर्थ-हे अर्जुन, तिस ज्ञानी पुरुपको इस लोकमें कर्म करनेसे कुछ प्रयो- जन नहि है औ कर्मोंके नहि करनेसेंभी कुछ प्रयोजन नहि है इति ॥ काहेते "ज्ञात्वा देवं मुच्यते सर्वपाशैः ज्ञानादेव तु कैवल्यं प्राप्यते येन मुच्यते” इत्यादि श्रुतिस्मृतियोंविषे केवल ज्ञानमात्रसेंहि मोक्षपदकी प्राप्ति कथन करी है औ हे शिष्य, जो कथंचित् ज्ञान १४ [२१० ] होनेके अनंतर ज्ञानी पुरुषको सदाचारसे अथवा जीवन्मुक्तिके सुखके अर्थ कुछ कर्तव्य मानेभी तो (वृ- त्तिनिरोध एव) कहिये प्रमाणविपर्ययविकल्पादि जो चित्तकी वृत्तियां हैं तिनका जो अभ्यास करके नि- रोध करना है सोई कर्तव्य है (नान्यत्) कहिये ति- सके विना अन्य तिसको कोई कदाचित्भी कर्तव्य नहि है ऐसे (वदंति सूरयः) कहिये व्यासवसिष्ठादिक विद्वान् लोक कथन करते हैं। यहां यह तात्पर्य है। कृतोपासन औ अकृतोपासन इस भेदसें ज्ञानी द्वि- प्रकारके होवे हैं तिनमें जिसको प्रथम इस जन्मविषे देवता उपासना अथवा योगाभ्यासद्वारा पश्चात् ज्ञानकी प्राप्ति होवे है सो ज्ञानी कृतोपासन कहिये है जैसे कि राजा शिखिध्वज शुकदेवादिक हुये हैं औ जिनको केवल यज्ञादिक निष्कामकर्मोकरके अं. तःकरणकी शुद्धिद्वारा ज्ञानकी प्राप्ति होये है सो ज्ञानी अकृतोपासन कहिये है जैसे कि राजाजनक अर्जुनादिक हुये हैं तिनमें जो तो कृतोपासन है ति- नको तो चित्तवृत्तियोंका निरोध प्रथमसेंहि सिद्ध- होवे है यातें सो अनायाससे हि ज्ञानप्राप्तिके अनंतर [ २११ ] जीवन्मुक्तिके सुखका अनुभव करते हैं जैसे कि शु- कदेवादिकोंने किया है । औ जो अकृतोपासन हैं तिनको तो ज्ञान होनेके अनंतर जीवन्मुक्तिके सु. खकी प्राप्तिके अर्थ अवश्यहि चित्तकी वृत्तियोंके नि. रोधके अर्थ अभ्यास करना योग्य है. इसी कारणसें श्रुतिस्मृतियोंविपे विद्वत्संन्यासका विधान किया है जो ज्ञान होनेके अनंतर कोई कर्तव्य नहि होता तो विद्वत्संन्यासका क्या प्रयोजन था औ याज्ञवल्क्या- दिकोंने ज्ञानके अनंतर धारणभी किया है यह वार्ता बृहदारण्यकोपनिपत्में प्रसिद्धहि है ॥ किंच ज्ञानकी सप्तभूमिका वेदांतशास्त्रमें कथन करी हैं तिनमें ज्ञानकी प्राप्ति तो सत्यापत्तिनाम चतुर्थ भूमिकावि- पेहि होय जावे है औ जो तिसके अनंतर कुछ क- तव्य नहि होता तो पश्चात् ऊपरकी तीन भूमिका विधान करनेका क्या प्रयोजन था यातें इत्यादि वा- त्योंसें यह निश्चय होवे है कि ज्ञानके अनंतरभी अभ्यास कर्तव्य है। किंच ज्ञानके अनंतर अभ्यास करनेसें प्रथम श्रवणादिकोंसें जो सामान्य ज्ञान होवे है तिसको दृढता हो जावे है जो श्रवण औ मनन- [ २१२ ] मात्रसेंहि दृढ ज्ञान हो जाता तो समाधिकी प्रथमा- वस्थारूप जो निदिध्यासन है तिसका सर्व वेदांतशा- स्त्रोंमें काहे विधान किया जाता ॥ किंच श्रीकृष्णा- भगवान्के मुखसे संपूर्ण गीताकू श्रवण करके अंतमें अपने मुखसेंहि अर्जुनने कहा है "नष्टो मोहः स्मृति- लब्धा त्वत्प्रसादान्मयाच्युत" अर्थ-हे अच्युत, तु. मारे प्रसादकरके अब मेरा अज्ञान नष्ट हो गया है औ मैंने अपने स्वरूपकी स्मृतिरूप जो ज्ञान है ति- सकू पाया है इति ।। औ पश्चात् तहांहि महाभार- तके आश्वमेधिकपर्वविपे पुनः अर्जुनने कहा है कि हे भगवन् , जो युद्धभूमिविपे आपने मेरेमति ज्ञा- नोपदेश किया था सों में युद्धादिक व्यवहारोंमें आ. सक्त होनेते अब सर्वहि भूल गया हूं यातें अब मेरे- प्रति पुनः उपदेश करो तो पश्चात् तहां भगवान्ने पुनः तिसकेप्रति उत्तरगीताका उपदेश किया है। तैसेहि याज्ञवल्क्यसंहिताविपे एकवार उपदेशके भूल जानेसें गार्गीके प्रति याज्ञवल्क्यने पुनः दू. सरीवार उपदेश किया है तैसेहि व्यासजीने शुकदे- चकेप्रति द्विवार उपदेश किया औ ६ढ न भया पुनः [ २१३ तीसरीवार राजाजनकने उपदेश किया है ॥ सो इ- त्यादिक वार्तायोंसें निश्चय होवे है कि अभ्यासके विना उत्पन्न भयाभी ज्ञान लुप्त होय जावे है । तथा योगवासिष्ठके निर्वाणप्रकरणमें वसिष्ठ मुनिनेभी कहा है "अविद्योपशमस्त्वेप जातोपि भवतामिह ॥ अभ्या- सेन विना साधो न सिद्धिमुपगच्छति" अर्थ-हे साधो, कहिये सर्व पुरुषों में श्रेष्ठ रामचन्द्र, मेरे उप- देशकरके यद्यपि तुमारी अविद्याका नाश होयभी गया है परंतु अभ्याससें विना तिसकी यथावत् सिद्धि नहि होवेगी इति ॥ तथा अथर्ववेदकी परमहंसउप- निपत्में लिखा है "अथ योगिनां परमहंसानां कोयं मार्ग:" अर्थ- एक समय नारदजीने ब्रह्माके पास जायकरके प्रश्न किया कि हे भगवन् , जो पुरुप योगी औ परमहंस हैं तिनका क्या मार्ग है इति ॥ सो इस श्रुतिविपे परमहंस औ योगी इन दोनों पदोंका एक- त्राहि विधान किया है। सो हे शिष्य, इत्यादिक वार्तायोंसें यह सिद्ध भया कि अकृतोपासन पुरुपको ज्ञानके अनंतरभी चित्तवृत्तियोंका निरोध अवश्य कर्तव्य है औ इस समयमें तो प्रायः अकृतोपासनहि [११४ ] ज्ञानी होते हैं इसलिये तिन सर्वकू अभ्यास करना योग्य है इति ॥ ९४ ॥ इस प्रकारसे चित्तवृत्तियोंके निरोधकी आवश्यकता श्रवण करके अब तिनके निरोध करनेका उपाय जाननेके अर्थ पुनः शिष्य प्रश्न करे है। || शिप्य उवाच॥ इमा ध्वजाग्राग्निशिखातडित्प्रभा नदीरयाश्वत्थदलालिचंचलाः ॥ कथं निरुद्धा ननु चित्तवृतयो भवंति तन्मे वद योगिनां पते ॥ ९५॥ टीका-इमा इति ॥ हे योगिनां पते, कहिये सर्व योगियोंमें शिरोमणे गुरो, आपने कहा कि चित्तकी वृत्तियोंका निरोध अवश्य कर्तव्य है सो (इमा) कहिये यह जो चित्तकी वृत्तियां हैं सो तो जैसे ध्वजाके व- स्त्रका अग्रभाग सर्वदाहि वायुकरके चलायमान होवे है औ जैसे अग्निकी शिखा सर्वदाहि ऊर्ध्वकू क्षण- क्षणमें चलायमान होवे है तथा जैसे (तडित्प्रभा) कहिये वर्षाऋतु, आकाशविपे रिजलीकी चमक क्ष- [ २१९ ] णक्षणमें चलायमान होये है औ जैसे (नदीरय) क- हिये गंगादिक महानदीका वेग सर्वदा चलायमान होवे है तथा जैसे (अश्वत्थदल) कहिये पीपलवृ- क्षका पत्र सर्वदा चलायमान होवे है औ जैसे (अलिः) कहिये भ्रमर एक पुष्पसें दूसरेपर दूसरेसें तीसरेपर सर्वदा चलायमान होवे है तैसेहि (चंचलाः) क- हिये यह मेरे चित्तकी वृत्तियां सर्वदाहि चलायमान रहती हैं सो हे भगवन, इन चित्तकी वृत्तियोंका (कथं) कहिये किस उपायकरके निरोध होय सके है सो कृपा करके मेरेप्रति कथन करो इति ॥१५॥ इस प्रकारसे शिष्यका प्रश्न श्रवण करके अब गुरु तिसका सहित दृष्टांतके उत्तर कथन करे हैं । ॥ गुरुरुवाच ॥ यथा प्रमता वनदंतिनः क्वचित प्रयांत्युपायेन विना न निग्रहम् ॥ तथैव योगेन विना न वृतयो निरोधनं यांति ततस्तमभ्यसेत् ॥ ९६ ॥ टीका-यथेति ॥ हे शिष्य, (यथा प्रमत्ताः) क.

[ २१८] ॥ गुरुरुवाच ॥ संत्यज्य संकल्पविकल्पजालक यत्र स्थितिं याति मनांतरात्मनि ॥ योगं तमष्टांगमवेहि स भुवं वैराग्यतोऽभ्यासबलाच्च सिद्ध्यति॥९॥ टीका-संत्यज्येति॥हे शिष्य, (यत्र) कहिये जिस कालमें यमनियमादिक योगके अंगोंके दीर्घ कालप- र्यंत अभ्यास करनेसे यह संकल्पविकल्पात्मक जो मन है सो अपने सर्वहि संकल्पविकल्पोंकू संत्यज्य क- हिये परित्याग करके अंतरात्मा जो ज्योतिःस्वरूप अ- पना प्रत्यगात्मा है तिसविषे निश्चल स्थितिकू प्राप्त होवे है तिसकूहि तूं योग जान अर्थात् सर्व संक- ल्पोंका परित्याग करके अंतरात्माविषे जो मनकी ए- कान स्थिति होनी है सोई योगका लक्षण है॥ तथा यह वार्ता योगसूत्रोंमें पतंजलिऋपिनेभी प्रतिपादन करी है "योगश्चित्तवृत्तिनिरोधः" अर्थ-प्रमाणवि- पर्ययादिक जो चित्तकी वृत्तियां हैं तिनका अभ्यास करके जो निरोध करना है तिसहिका नाम योग है [ २१९ ] इति ।। इस उक्त सूत्रविपे पतंजलिने सर्व शब्दका ग्र- हण नहि किया है या किंचित् वृत्तियोंके सहित जो सविकल्पसमाधि है सोभी योग कहिये है।। औ जि- समें सर्वहि वृत्तियोंका सर्व तरफसें निरोध हो जावे है सो निर्विकल्पसमाधि कहिये है सोई योगशब्दका मुख्य अर्थ है ॥ इस प्रकारसें प्रथम प्रश्नका उत्तर कथन करके अब तिस योगके कितने अंग है यह जो शिष्यका द्वितीय प्रश्न है तिसका उत्तर क. थन करे हैं (तमष्टांग) कहिये हे शिष्य, तिस योगकू अष्ट अंगोंवाला जान सो अष्ट अंगभी पतंजलिमु- निनेहि कथन कीये हैं "यमनियमासनप्राणायामप्र- त्याहारधारणाध्यानसमाधयोप्टावंगानि" अर्थ- मनियम आसन प्राणायाम प्रत्याहार धारणा ध्यान औ समाधि इस प्रकारसें योगके अष्ट अंग हैं इति ।। तिनमें अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य, शौच, आ- जैव, क्षमा, धैर्य, मिताहार, दया, इस भेदसें यम दश प्रकारके हैं। तथा जप, तप, दान, वेदांतन- वण, आस्तिक्य, प्रत, ईश्वरपूजन, संतोप, श्रद्धा, लज्जा, इस भेदसें नियमभी दश प्रकारके हैं। तथा - " [ २२० ] आसन सर्व मिलके चौरासीलक्ष है तिनमेंसें चौ- रासी मुख्य है तिनमेंभी पुनः पद्मासन औ सिद्धा- सन यह दोनहि मुख्य है तिन दोनोंमेंसें भी पुनः सि- द्धासनकी प्रधानता है। तथा रेचक, पूरक, कुंभक, इस भेदसें प्राणायाम तीन प्रकारके हैं। तिनमें उ- दरगत वायुका वामनासापुटसें जो वाहिर परित्याग करना है तिसका नाम रेचक है औ पुनः तिस वा- ह्यगत वायुका नासापुट अथवा मुखसे जो अभ्यंतर आकर्षण करना है तिसका नाम पूरक है तथा बा- ह्यसें आकर्पण किये हुये प्राणवायुका यथाशक्ति जो उदर में स्तंभन करना है तिसका नाम कुंभक है। तथा चक्षु आदिक इन्द्रियोंकू स्वस्वविपयोंसें निवा- रण करके जो चित्तके अनुसार स्थापन करना है ति- सकुँ प्रत्याहार कहते हैं ॥ तथा जिव्हाका अग्रभाग नासाका अग्रभाग भूयोंका मध्यभाग नाभिचक्र इ. त्यादि स्थलोंविषे अन्य विषयोंसें निवारण करके चि. त्तकू पुनः पुनः जो स्थापन करना है सो धारणा क- हिये है" तथा तिस धारणावाले देशहि चित्तवृ- त्तिका जो तैलधाराकी न्याई सदृश प्रवाह होना है [ २२१ ] सो ध्यान कहिये है॥ तथा तिसहि ध्यानवाले देशमें ध्याता ध्यान ध्येयरूप त्रिपुटीके विस्मरणपूर्वक केवल ध्येय वस्तुके आकारसेंहि जो चित्तकी स्थिति होनी है तिसका नाम समाधि है। यह योगके अष्टअंगोंके संक्षेपसें लक्षण हैं ॥ सो इन सर्वके हेतु लक्षण औ फल (योगकल्पद्रुम) नामक पुस्तकविषे हमने विस्ता- रपूर्वक वर्णन किये हैं यातें जिस पुरुषकों विशेष देखनेकी वांछा होवे सो तिसमेंसें देख लेवे यहां ग्रं. थके विस्तारके भयसें नहि लिखे हैं । इस प्रकारसें द्वितीय प्रश्नका उत्तर कथन करके अब सो योग किस उपायसें निर्विघ्न सिद्धिकू प्राप्त होवे है यह जो शिष्यका तीसरा प्रश्न है तिसका उत्तर कथन करे हैं (वैराग्यतोभ्यासबलाच) कहिये हे शिष्य, सो योग (ध्रुवं ) कहिये निश्चयकरके वैराग्य औ अभ्यास इन दोनोंकरके सिद्धिकू प्राप्त होवे है यह वार्ताभी पतंज- लिमुनिने कथन करी है " अभ्यासवैराग्याभ्यां तन्नि- रोधः" अर्थ-अभ्यास औ वैराग्यकरके तिन चि- तवृत्तियोंका निरोध होवै है इति ॥ तथा भगवत्- गीतामेंभी कहा है "अभ्यासेन तु कौंतेय वैराग्येण [ २२२ ] च गृह्यते" अर्थ-हे अर्जुन, यद्यपि चित्त परम चंचल है तथापि अभ्यास औ वैराग्यकरके तिसका ग्रहण होवे है इति || तिनमें इस लोक तथा परलो- कके शब्दादिक विपयोंकी अभिलाषा ओ तिसके स्त्रीधनादिक साधनोंका जो परित्याग करना है ति- सका नाम वैराग्य है । औ योगकी सिद्धिके अर्थ यमनियमासनप्राणायामादिक योगके अंगोंकाजोवा- रंवार आवर्तन करना है तिसका नाम अभ्यास है। तथा (अभ्यासवलाच) मूलश्लोकके इस चतुर्थ पा- दविपे जो चकार है तिसकरके ईश्वरका आराधनभी- योगकी निर्विघ्न सिद्धिविपे मुख्य हेतु जान लेना। यह वार्ताभी पतंजलिनेहि कथन करी है "समाधि- सिद्धिरीश्वरप्रणिधानात्" अर्थ-ईश्वरके एकाग्र- चित्त होयकरके आराधन करनेसें समाधिकी सिद्धि होवे है इति ॥ औ जो ग्रंथके आदिमें द्वितीय श्लो. ककी व्याख्याविपे कथन करि आये हैं कि कलियु- गमें योगकी सिद्धि नहि होवे है सो तो उद्दालक वीतहल्य वसिष्ठादिकोंकी न्याई सर्व सिद्धियोंकी प्राप्तिका हेतु जो दीर्घ काल समाधिरूप योग है [ २२३ ] तिस विपयकहि निषेध जानना औ जो केवल चि. त्तवृत्तिके निरोधमात्रका उपयोगी योगाभ्यास है ति. सकी तो प्रयत्न करनेसें इस कालमेंभी सिद्धि संभवे है यातें पूर्वोक्तके साथ इस वाक्यका किंचित्भी वि- रोध नहि है।। इति ॥ ९८॥ इस प्रकारसे सर्व अं- गोंके सहित योगका लक्षण औ तिसकी सिद्धिके साधन श्रवण करके अब योगकी सिद्धि प्रारब्धकर्म- करके स्वतः हि होवे है किंवा पुरुषार्थ करनेसे होवे है इस प्रकारसें संशयकू प्राप्त भया शिप्य पुनः प्रश्न करे है॥ ॥ शिष्य उवाच ॥ किं पौरुषेणाभिमतं खकर्मणा पूर्वार्जितेनोत जनैरवाप्यते ॥ वस्वेतयोः किंच बलिष्ठमुच्यते सर्वार्थविद्रूहि यदेव निश्चितम् ॥९९॥ टीका-किं पौरुषेणेति ॥ हे ( सर्वार्थवित्) क- हिये शास्त्रोक्त सर्व पदार्थोंके जाननेहारे गुरो, इस लोकमें जो जो (अभिमतंवस्तु) कहिये मनोवांछित [ २२४ ] वस्तु पुरुपकुं प्राप्त होवे है सो सो (पारुपेण ) कहिये अपने पुरुषार्थ करनेसें प्राप्त होवे है किंवा पूजित जो प्रारब्धकर्म है तिसकरके प्राप्त होवे है ॥ तथा (एतयोः) कहिये पुरुषार्थ औ प्रारब्धकर्म इन दो- नोंमेंसें कौनसा बलवान् कहिये है अर्थात् पुरुषार्थ बलवान् है किंवा प्रारब्धकर्म बलिष्ठ है सो हे भग- वन् , इनमें जो वार्ता निश्चित होवे सोई मेरेमति करुणा करके कथन करो इति ॥ ९९॥ इस प्रका- रसें शिप्यके दो प्रश्न श्रवण करके अब तिनका स- हित दृष्टांतके एकहि श्लोकसें गुरु उत्तर कथन करे हैं । ।। गुरुरुवाच ।। नैकेन पुंसा तनयः कचिद्यथा नैवैकयावांगनयापि जन्यते ॥ संयोगमेवात्र तथैव कारणं विद्धि वमाद्यं च वलिष्ठमेतयोः॥१०॥ टीका–नेकनेति ॥ है शिप्य, इस लोकवि प्र. त्यक्षहि जैसे एकला पुरुष किसी कालमेंभी पुत्रकू

[२२५]
नहि उत्पन्न कर सके है तथा (अंगनयापि) कहिये
अंगना जो स्त्री है सोभी एकली पुत्रके उत्पन्न कर•
नेमें समर्थ नहि होवे है ॥ तैसेहि प्रारब्धकर्मकेविना
एकले पुरुषार्थसहि किसी वस्तु की प्राप्ति नहि होवे
है तथा पुरुषार्थसेंविना एकले प्रारब्धकर्मसेंभी किसी
वस्तुकी प्राप्ति नहि होवे है ॥ सो हे शिष्य, जैसे -
टांतमें पुरुष औ स्त्री दोनोंके परस्पर संयोग होने-
तेंहि पुत्रकी उत्पत्ति होवे है तैसेहि दाटीतभी पु-
रुपार्थ औ प्रारब्धके संयोगकूहि सर्व वस्तुवोंकी प्रा.
प्तिविपे तूं कारण जान ॥ औ जो तुंने प्रश्न किया
कि इन दोनोंमेंसें बलवान कौन है तहां श्रवण कर
(आद्यं च बलिष्ठमेतयोः) कहिये हे शिप्य, जैसे -
ष्टांतमें पुरुष औ स्त्री इन दोनोंमेंसें पुरुष बलवान्
होवे है तैसेहि दाटीतविपेभी प्रारब्धकर्मसें पुरुषार्थ
बलवान् है काहेतें जैसे स्त्रीकेविनाभी केवल अपने
वीर्यसेंहि पूर्व ऋपिलोकोनें पुत्र उत्पन्न किये हैं जैसे
कि व्यासजीका गंगातटपर अप्सरोंके नग्न देखनेसें
होम करनेकी लकड़ियोंपर वीर्य पतित हो गया तो
पश्चात् व्यासजीने तिन लकडियोंकू मथन करके शु-
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[२२६३ कदेवजीकू उत्पन्न किया ॥ तैसेहि भारद्वाजके वी- यके द्रोणमें पतित होनेतें द्रोणाचार्य उत्पन्न भये इ. त्यादिक अनेकहि इतिहास महाभारत भागवता- दिक पुराणोंविपे प्रसिद्ध हैं ॥ तैसेहि प्रारब्धकर्मके विनाभी केवल पुरुषार्थके वलसेंहि विश्वामित्रने ब्रा- झणपना औ नंदीगणने अमरपणा ध्रुवने अचलपणा संपादन किया है इत्यादिक इतिहासभी पुराणोंविषे प्रसिद्धहि हैं ॥ तात्पर्य यह है ॥ कि प्रारब्ध औ रुपार्थ यह दोनों अनादि होनेते बीजांकुरवत् पर- सर कार्यकारणभाववाले हैं सो तिनमेसें जो बली होचे है तिसहिकी जय होवे है ।। यह वार्ता योगवा- सिष्टमेंभी कथन करी है "द्वौ हुडाविव युद्ध्येते पुरु- पार्थी समासमौ ।। प्राक्तनश्चैहिकश्चैव शाम्यत्यत्राल्प. चीर्यवान्" अर्थ-हे रामचंद्र, जैसे दो घेटा परस्पर युद्ध करते हैं तो तिनमें जो वली होवे है तिसहिकी जय होवे है तैसेहि पूर्वकृत प्रारब्धकर्म औ यहांका पुरुषार्थ इन दोनोंमेंसें जो वली होवे है तिसकीहि १ यद्यपि शुकदेवजीकी उत्पत्ति अन्यत्र, अन्य प्रकारसेंभी श्रवणम आवे है तथापि महाभारनमें ऐसहि लिखा है।

[२२७] जय होवे है इति ॥ इसी कारण इस लोकविर्षे के. चित् कार्य बहुत प्रयत्न करनेसेंभी अंतमें सिद्ध नहि होवे हैं तो तिनमें पूर्वका प्रारब्धकर्महि बलवान प्र. तिबंधक जानना चाहिये औ केचित् कार्य यथोक्त प्रयत्न करनेसें शीघ्रहि सिद्ध हो जाते हैं तो तिनमें यहांका पुरुषार्थ वलवान् जानना चाहिये ॥ सो य- द्यपि यह उक्त वसिष्ठजीका कथन यथार्थहि है त- थापि पुरुषार्थकी सर्वत्र जय होवे है औ जो कार्य यहां पुरुषार्थ करनेसेंभी सिद्ध नहि होवे तो अबी तिसमें अपने पुरुषार्थकीहि न्यूनता जाननी चाहिये। यह वार्ताभी वसिष्ठजीनेहि कथन करी है "न तदस्ति जगत्कोशे शुभकर्मानुपातिना । यसौरुषेण शुद्धेन न समासाद्यते जनैः" अर्थ हे रामचन्द्र, ऐसी वस्तु इस जगत्मंडलमें कोई नहि है कि जो शास्त्रोक्त शुभ पुरुषार्थ करनेसे पुरुषको नहि प्राप्त होय सके है इति ।। किंच जो पुरुषार्थकी प्रधानता नहि होती तो अपनी स्वाभाविक स्थितिसे प्रयत्न करनेसें किसी पुरुषकी कदाचित्भी उन्नति नहि होती औ होती देखने में आवे है तथा पुरुषार्थके प्रतिपादक जो वेद औ [२२८] शास्त्र हैं सो सर्वहि व्यर्थ हो जावेंगे यात प्रथमोक्त रीतिसे सर्वथा पुरुषार्थहि बलिष्ठ है यह वार्ता सिद्ध भई इति ।। १० । इस प्रकार प्रसंगसें जीवन्मुक्तिके उपयोगी योगाभ्यासका लक्षण औ तिसके अंग तथा तिसकी सिद्धिविपे पुरुपार्थकी मुख्यता श्रवण करके अब पुनः विशेष वोधके अर्थ प्रकृत चेदांतविषयमेंहि शिष्य प्रश्न करे है। ॥ शिप्य उवाच ॥ सर्वत्रगं वेदवचोभिरुच्यते ब्रह्मोपलादौ तु कथं न लक्ष्यते । अस्मच्छरीरेषु यथैतदंजसा सर्वज्ञ मे ब्रूहि विवोधवृद्धये ॥ १०१ ॥ टीका-सर्वत्रगमिति ॥ हे सर्वज्ञ कहिये सर्व- शास्त्रप्रतिपादित पदार्थोके करामलकवत् स्फुट जा- ननेहारे गुरो, " सर्वं खल्विदं ब्रह्म" इत्यादि वेदके वाक्योंविपे ब्रह्म (सर्वत्रगं) कहिये सर्वत्र व्यापक कथन किया है सो जो ब्रह्म सर्वत्र एकरस बराबर परिपूर्ण है तो (अस्मच्छरीरेषु) कहिये जैसे हमारे [२२९ मनुष्य पशु पक्षि आदिकोंके शरीरोंविषे चेतनशक्ति- द्वारा ब्रह्मका लक्षणावृत्तिसें भान होवे है तैसे (उ- पलादिषु) कहिये निश्चेष्ट जो शिला भित्ति आदिक जड पदार्थ हैं तिनकेविषे ब्रह्मकी प्रतीति काहेर्ते नहि होवे है सो हे भगवन् (एतदंजसा) कहिये यह वार्ता जिस प्रकारसें मेरी बुद्धिमें शीघहि आ- रूढ हो जावे तैसे स्फुट करके बोधकी वृद्धिके अर्थ मेरेप्रति कृपा करके कथन करो इति ॥ १०१॥ इस प्रकारसे शिष्यका प्रश्न श्रवण करके अब सहित दृ- ष्टांतके गुरु तिसका उत्तर कथन करे हैं । ॥ गुरुरुवाच ॥ सामान्यतः सर्वगतापि भानुभा यवद्विशेषेण विभाति दर्पणे । ब्रह्मापि सर्वत्रगतं मतो स्फुटं नवद्विभातीत्यनुभूयते बुधैः ॥ १०२ ॥ टीका--सामान्यत इति ॥ हे शिप्य, (यद्वत्) कहिये जैसे मध्याह्नकालके सूर्यको प्रभा यद्यपि स- मानभावसें सर्वत्रहि एक जैसी प्रसृत होवे है तथापि [२३०3 (विशेषेण) कहिये अत्यंत स्वच्छ पदार्थ जो दर्पणा- दिक हैं तिनके विपेहि विशेषकरके प्रतिबिंबित होवे है अन्य काष्ठ मृत्तिकादिक मलिन पदार्थाविप नहि (तद्वत्) कहिये तैसेहि यद्यपि ब्रह्मभी सर्वत्र जगत्के बाहिर भीतर एकरस आकाशकी न्याई परिपूर्ण है तथापि पंचमहाभूतोंके सत्त्वअंशका कार्य जो अत्यंत स्वच्छ पदार्थ (मति) कहिये बुद्धि अर्थात् अंत:क- रण है तिसकेविपेहि विशेषकरके प्रतिबिंबित होते हैं शिला भित्ति आदिकोंविषे नहि काहेते पंचमहाभू- तोंके तमोअंशके कार्य होनेते शिला आदिक जड पदार्थ अत्यंत मलिन हैं इस कारणसें सो ब्रह्मका प्रतिबिंब ग्रहण नहि कर सकते ॥ यद्यपि अस्मदा- दिकोंके जो स्थूल शरीर है सोभी शिलादिकोंकी न्यांई स्वतः जडहि हैं तथापि तिनमें अंत:करणकी विशेषता है सो अस्मदादिकोंके शरीरों विपे ब्राह्मके प्रतिबिंबकरके संयुक्त अंतःकरण है या तिनमें ग- मनागमनादि क्रियाद्वारा तिस ब्रह्मकी चेतनता प्र. तीत होवे है औ शिलादिकोंमें अंत:करणके अभाव होनेतें गमनागमनादि क्रिया नहि होवे है यात ति.

[२३१] नमें ब्रह्मकी चेतनता प्रतीत नहि होवे है परंतु ब्र- झकी व्यापकता दोनोंमें समान है तिसमें किंचित्- मात्रभी न्यूनाधिकभाव नहि है। यह वार्ता पंचदशी- मेंभी कथन करी है "चेतनाचेतनभिदा कूटस्थात्म- कृता नहि ॥ किंतु बुद्धिकृताभासकृतैवेत्यवगम्यताम्" अर्थ-शिलादिक औ शरीरादिकोंमें जो चेतन औ अचेतनपनेका भेद प्रतीत होवे है सो कूटस्थात्मा जो ब्रह्म है तिसका किया हुया नहि है किंतु केवल चेतनके आभासकरके संयुक्त जो बुद्धि अर्थात् अं- ताकरण है तिसकाहि किया हुया है ब्रह्म तो सर्वत्र एकरस समान व्यापक है इति । तथा योगवा- सिष्ठमें भी कहा है "आकाशोपलकुड्यादौ सर्वत्रात्म- दशा स्थिता ॥ प्रतिबिंबमिवाद” चित्त एवात्र ह- श्यते" अर्थ--हे रामचन्द्र, आकाश, पत्थर, भित्ति आदिकोंमें सर्वत्रहि आत्माकी चेतनता स्थित है प- रंतु तिसका प्रतिबिंब केवल चित्तहि होवे है जैसे सूर्यके प्रकाशका दर्पणमें होये है इति ॥ सो हे शिष्य, यह उक्त वार्ता केवल शास्त्रसेंहि सिद्ध नहि है किंतु (अनुभूयते बुधैः) कहिये अंतःकरणमेंहि चिदाभास- जो त. [२३२] रूपसे ब्रह्म प्रतिबिंबित है इस वार्ताका वुधा त्वदर्शी ज्ञानी लोक हैं सो वृत्तिव्याप्तिरूपसे अनुभव करते हैं यह वार्ता अथर्ववेदकी मुंडकोपनिषत्मभी कथन करी है "दूरात्सुदूरे तदिहांतिके च पश्य- स्विहैव निहितं गुहायां" अर्थ-सो ब्रह्म अज्ञानी लोकोंके लिये दूरसेंभी अत्यंत दूर है औ ज्ञानी लो- कोंके लिये (अंतिके) कहिये अति समीपहि है का- हेते ज्ञानरूप नेत्रोंसें देखनेहारे तत्त्वदर्शियोंको अपनी बुद्धिरूप गुहामेंहि स्थित भया ब्रह्मदृष्टिमें अर्थात् अनुभवमें आवे है इति ॥ १०२॥ इस प्रकारसें 5- मकी सर्वव्यापकताका निर्णय श्रवण करके अव. कहीं वेदविपे - न प्रजया धनेन त्यागे- नके अमृतत्वमानशुः" अर्थ-कर्मकरके औ प्रजा- करके तथा धनकरके मुक्ति नहि होवे है किंतु के- चल त्यागकरकेहि केचित् संन्यासी लोक मोक्षकू प्राप्त होते भये हैं इति ॥ इत्यादि वाक्योंकरके के- वल संन्याससेंहि मोक्षपदकी प्राप्ति कथन करी है तथा पुनः कहीं "यावजीवमग्निहोत्रं जुहुयात् अर्थ-जवपर्यंत यह पुरुप जीवे तवपर्यत अग्निहो- न कर्मणा [२३३] त्रहि करता रहे इति ॥ इत्यादिक वाक्योंसें सर्वदा गृहविपे रहकरके कर्म करनेकाहि विधान किया है सो तिन दोनों पक्षोंमेसें कौनसा श्रेष्ठ है इस मका- रकी शंकाकरके युक्त भया शिष्य पुनः प्रश्न करे है। ॥ शिप्य उवाच ॥ परिव्रजन्नेव जनो विमुच्यते गृहेपि तिष्ठन्किमु वा दयोदधे ॥ नयोश्च किं तत्र विमोक्षदं भवे. इदैतदाम्नायवचोनुरोधतः ॥ १०३ ॥ दीका-परिवजन्निति ॥ हे (दयोदधे) कहिये स्वाभाविक दयाके समुद्र गुरो, (परिव्रजन्नेव) कहिये गृहादिकोंका परित्याग करके संन्यासाश्रमके ग्रहण करनेसेंहि नियमकरके पुरुषकी मुक्ति होवे है किंवा (गृहेपि तिष्ठन् ) कहिये स्त्री पुत्रादिक सर्व भोगके साधनोंकरके युक्त अपने गृहाश्रमविषेहि सर्वदा स्थित भये पुरुषकोभी मुक्ति होय जावे है । तथा (तत्र) कहिये तहां संन्यासाश्रम औ गृहाश्रममें तिन दोनोंकू क्या मोक्षपदके देनेहारा होवे है अ- [२३४] र्थात् मुक्त होनेके योग्य जो संन्यासी औ गृहस्थी है तिन दोनोंके किस प्रकारके आचरण होवे हैं । सो यह सर्व वार्ता (आम्नायवचोनुरोधतः) कहिये वे- दके वचनोंके अनुसार मेरेप्रति कृपाकरके कथन करो इति ।। १०३ ॥ इस प्रकारसे शिष्यके द्वि प्रश्न श्रवण करके अव तीन श्लोकोंकरके क्रमसें तिनका गुरु उत्तर कथन करे हैं। ॥ गुरुरुवाच ॥ विशेषतो न्यस्तगृहो विमुच्यते कचिगृहस्पोपि च पूर्वयात्नतः ॥ न चेह कश्चिनियमोस्ति पक्षिणोड- भवन्मृगाश्चापि यतो विवेकिनः॥१०४॥ टीका-विशेषत इति ॥ हे शिष्य, विशेषकरके तो (न्यस्तगृहो) कहिये जिस पुरुपने गृहादिकोंका परित्याग करके संन्यासका ग्रहण किया है सोई मो- क्षपदकू प्राप्त होवे है काहेतें जो संन्यासग्रहणके प्र- थम ज्ञानकी प्राप्ति नहि होवे है तो पश्चात् निश्चित होय करके ब्रह्मनिष्ठ गुरुके मुखसे वेदांतशास्त्रके श्र- [२३५] चणादिकोंकरके शीघ्रहि ज्ञानकी प्राप्ति हो जाये है औ जो प्रथम गृहविपेहि ज्ञानकी प्राप्ति होवे है तो पश्चात् संन्यासग्रहण करनेसें निर्विघ्नहि ज्ञानकी दृ- ढताद्वारा जीवन्मुक्तिकी सिद्धि होवे है इस कार- णसे संन्यासी पुरुप विशेषकरके मोक्ष• प्राप्त होने हैं ॥ यह वार्ता अथर्ववेदकी मुंडकोपनिपत्मेंभी लिखी है " वेदांतविज्ञानसुनिश्चितार्थाः संन्यासयो- गाद्यतयः शुद्धसत्त्वाःते ब्रह्मलोकेपु परांतकाले परा. मृताः परिमुच्यति सर्वे" अर्थ-वेदांतशास्त्रप्रति- पादित ज्ञानके दृढ निश्चय होनेते संन्यासाश्रमके ग्र. हण करनेसें शुद्धांत:करणवाले जो (यतयः ) कहिये संन्यासी लोक हैं सो सर्वहि शरीरपातके अनंतर प्र. मरूप जो लोक है तिसमें मुक्तस्वरूप हुये कैवल्य. मोक्षफू माप्त होवे हैं इति" तथा मनुस्मृतिमेंभी कहा है "अनेन विधिना सर्वोस्त्यक्त्वा संगान् शनैः शनैः॥ सर्वद्वंदविनिर्मुक्तो ब्रह्मण्येवावतिष्ठते" अर्थ- इस प्रकारसे विधिपूर्वक संन्यासके ग्रहणद्वारा शनै:- शनैः सर्व संगोंका परित्याग करके देहके अंतका- लमें शीतोष्णादिक सर्व द्वंद्वोंसे रहित भया पुरुप [२३६] ब्रह्ममेंहि स्थित होवे है अर्थात् विदेहकैवल्यमोक्षकू प्राप्त होवे है इति ॥ सो इत्यादिक श्रुतिस्मृतियों- विपे संन्यासी पुरुपकॉहि विशेषकरके मोक्षपदकी प्राप्ति प्रतिपादन करी है । सो यद्यपि दंडादि लिं- गधारणपूर्वक संन्यासविष ब्राह्मणकाहि मुख्याधि- कार है औ केचित् सुरेश्वराचार्यादिकोंने वैदिक सं- स्कारयुक्त क्षत्रिय औ वैश्यकाभी अधिकार माना है तथापि लिंगसे विना केवल त्यागरूप संन्यासविषे तो च्यारि वॉकाहि अधिकार है काहेतें सुलभा गार्गी आदिक स्त्रियां औ विदुरादि शूद्रभी संन्या- सी पुराणोंमें लिखे हैं ॥ तथा (क्वचित् गृहस्थोपि) कहिये है शिष्य, पूर्वजन्मविर्षे अनुष्ठान किये नि- कामकर्मरूप प्रयत्नसे किसी कालमें कोई एक गृ- हस्थ पुरुपभी वेदांतशास्त्रके श्रवणादिकोंकरके ज्ञा- नकी प्राप्तिद्वारा मुक्त हो जाये है जैसे कि राजा जनक, प्रतर्दन, अजातशत्रु आदिक पूर्व होते भये हैं । किच हे शिष्य, (न चेह कश्चिनियमोस्ति) क- हिये इस मोक्षपदकी प्राप्तिविषे संन्यासीकीहि मुक्ति होवे है दूसरेकी नहि अथवा ब्राह्मणकीहि मोक्ष होवे [२३७ ] है अन्य जातिवालेकी नहि इत्यादि कोई नियम नहि है काहेतें (यतो) कहिये जिस कारणसें (प- क्षिणो मृगाश्च ) कहिये गरुड, काक भुशुंड संपाति, जटायु आदिक पक्षी औ हनुमान, जांबवान, नं- दीगणादिक पशुभी ज्ञानसंपन्न जीवन्मुक्त पूर्व होते भये हैं ॥ यह वार्ता पुराणोंविपे प्रसिद्धहि है इति ॥ १०४ ॥ इस प्रकारसें प्रथम प्रश्नका उत्तर कथन करके अब संन्यासी औ गृहस्थीके किस प्रकारके आचरण होवे हैं यह जो शिष्यका द्वितीय प्रश्न है तिसका द्विश्लोकोंकरके उत्तर कथन करे हैं। ॥ गुरुरुवाच ॥ शवोपमं देहमिमं विलोकय- नटेदिमा यस्तु धरां गतस्मृहः ॥ असक्तचेताः समदर्शनः क्षमी शुचिर्दयालुः स विमुच्यते यतिः ॥१०४॥ टीका-शवोपममिति ॥ हे शिष्य, (यस्तु) क- हिये जो पुरुष संन्यास ग्रहण करनेते अनंतर (श- वोपमं देहमिमं) कहिये इस अपने शरीरकू शवके

[२३८]
समान देखता है अर्थात् जैसे शवविपे किसीकी
प्रीति नहि होवे है तैसेहि शरीरविषे प्रीति नहि करे
है अर्थात् शरीरके शीतोष्णादिक द्वौकी नि.
वृत्तिके अर्थभी विशेषकरके प्रयत्न नहि करे है ।। तथा
यह वार्ता परमहंसउपनिपत्मेंभी लिखी है "स्ववपुः
' कुणपमिव दृश्यते यतस्तद्वपुरपध्वस्त" अर्थ-ज्ञान
होनेके अनंतर आत्मस्वरूपविपे दृढाभ्यास होनेते
परमहंस संन्यासी पुरुष अपने शरीरकू मुरदेकी-
न्याई देखता है काहेते जिस कारण ज्ञानके प्रभा-
वसें तिस शरीरकू मृगतृष्णाके जलकी न्यांई कल्पित
जाने है इति ॥ अर्थात् शरीरके अनुकूल औ प्रति-
कुल व्यवहारमें चित्तविपे हर्प शोक नहि मानता है
जैसे कि जडभरत, दत्तात्रेय, वामदेवादिकोंने नहि
माने हैं। तथा (अदेदिमा धरां) कहिये इस पृथि-
वीका सर्वदा अटन करे है। यह वार्ताभी अथर्ववेदकी
कंठश्रुत्युपनिषत्में कथन करी है। कृशीभूत्वा ग्रामे
एकरानं नगरे पंचरात्रं चतुरो मासान् वार्पिकान
ग्रामे वा नगरे वापि वसेत्" अर्थ-संन्यासीको च.
हिये कि चान्द्रयणादिक व्रतोंसें शरीरकुं कृश करके

[२३९] पश्चात् ग्रामविपे एक रात्रि औ नगरमें पंचरानिपर्यत वास करे काहेते एकत्र अधिक निवास करनेतें कि- सीसें राग किसीसें द्वेष इत्यादि अनेक दोषोंकी उ- सत्ति होवे है औ वार्षिकान् कहिये वर्षाऋतुके चार महीनापर्यत तो ग्राम अथवा नगरविपे एकहि स्था- नमें निवास करनेमेंभी कोई दोष नहि है किंतु च. लनेसें दोप है।औ काशीआदि तीर्था में तो सर्वदाहि निवास करनेमेंभी दोष नहि है तथा शरीरमें रोग औ योगाभ्यासादिक निमित्त होनेतेंभी सर्वदा एकत्र निवासमें दोप नहि है ॥ तथा (गतस्पृहः) कहिये जो एकवार परित्याग किये हुये स्त्रीधनादिक पदा- में पुनः श्ववांतके समान जानकरके तिनकी स्पृहा कहिये अभिलापा नहि करे है काहेते प्रथम प्रैषमं- त्रादिक विधिपूर्वक त्याग किये स्त्री आदिकोंके पुनः ग्रहण करनेने महान् दोपकी प्राप्ति होवे है। यह वार्ता स्मृतिमेंभी कथन करी है “यस्तु प्रत्रजितो भूत्वा पुनः सेवेत मैथुनं ॥ पष्ठिर्वसहस्राणि विष्ठायां जायते कृमिः" अर्थ-जो पुरुष एकवार विधिपू. र्धक संन्यासका ग्रहण करके पश्चात् कदाचित् स्त्री- [२४०] संगम करे तो सो पुरुप साठहजार वर्षपर्यंत विष्ठा- विपे कृमी होकरके निवास करता है इति ॥ तथा (असक्तचेताः) कहिये देशदेशांतरोंके विचरनेसे किसी देशविपे स्थान, भिक्षा, सन्मान, पूजा, वस्त्रा. दिकोंकी विशेष अनुकूलता देखकरके तहां आसक्ति नहि करे है काहेत तिनमें आसक्ति करनेते पुन: बंधनकी प्राप्ति होवे है। यह वार्ता मनुस्मृतिक पाठे अध्यायमॅभी कथन करी है "अभिपूजितलाभांस्तु जुगुप्सेतैव सर्वशः॥ अभिपूजितलाभाभ्यां यतिर्मुक्तोपि वध्यते" अर्थ-सन्मानपूर्वक पूजन औ सुंदर च- खादिकोंके लाभोंसे संन्यासी पुरुपकों सर्वदाहि जु गुप्सा अर्थात् घृणा करनी चहिये काहेतें पूजाला भादिकोंमें आसक्त होनेते मुक्त भयाभी संन्यासी पुनः बंधनकू प्राप्त होवे है इति ॥ तथा (समदर्शन:) कहिये जो अपने शत्रुमित्रादिकोंकू बरावर दृष्टिकरके देखता है। यह वार्ता गीतामें भगवान्नेभी कथन करी है "विद्याविनयसंपन्ने ब्राह्मणे गवि हस्तिनि ।। शुनि चैव श्वपाके च पंडिताः समदर्शिनः" अर्थ- विद्या औ नम्रभावकरके युक्त ब्राह्मण औ गौमें [ २४१ ] तथा हस्तिमें औ श्वान तथा चांडालविपे जिस पुरु- पकी समदृष्टि होवे है सोई पंडित अर्थात् तत्ववेत्ता संन्यासी कहिये है इति ॥ तथा (क्षमी) कहिये स- जातीय संन्यासी अथवा अन्य दुष्ट पुरुप जो कोई निमित्तसें दंडादिसे ताडना अथवा दुष्ट वचन कथन करें तो तिन सर्वकोभी सहन करे है।यह वार्ता श्रुति- मेंभी कथन करी है (वृक्ष इव तिष्ठासेत् छिद्यमानो न कुप्येत न कंपेत) अर्थ-संन्यासी पुरुपको वृ. क्षकी न्याई स्थित होना चाहिये सो जैसे वृक्ष श- स्त्रसे काटनेसे क्रोध नहि करे है औ कंपायमानभी नहि होवे है तैसेहि संन्यासीकोभी होना चहिये इति ॥ तथा मनुस्मृतिमेभी कहाहै "अतिवादांस्ति- तिक्षेत नावमन्येत कंचन ॥ न चेमं देहमाश्रित्य वैरं कुर्वीत केनचित्" अर्थ-संन्यासीको जो कोई दुष्ट वचन कथन करे तो तिसकूँ सहन करे औ अपनी वाणी अथवा शरीरकरके किसी पुरुषकाभी अपमान नहि करे तथा इस क्षणभंगुर मनुष्यदेहके पीछे लागकरके किसीके साथ वैरभावभीनहि करे इति। तथा(शुचिः) कहिये जो शास्त्रोक्त रीतिसें शरीरके बाह्य तथा अ- [ २४२ ] भ्यंतरसें मृत् जल प्राणायामादिकोंकरके औ मेध्य खान पानादिकोंकरके सर्वदा पवित्र रहे है अर्थात् अपने तत्त्ववेत्ताके अभिमानकरके विहिताविहित वि. चारका परित्याग करके यथेष्टाचरण नहि करे है काहेते यथेष्टाचरण करनेसे लोकविपे अत्यंत निंदित होवे है । यह वार्ता पंचदशीकारनेभी कथन करी है "शुनां तत्त्वदृशां चैव को भेदोऽशुचिभक्षणे" अर्थ- जो तत्ववेत्ता ज्ञानी पुरुषभी शुभाशुभका परित्याग करके अपनी इच्छानुसार मांसादिक अपवित्र पदा- थोंका सेवन करेगे तो विष्ठादिक अपवित्र भक्षण करनेहारे श्वानादिकोंका औ तिन ज्ञानिपुरुपोंका क्या भेद होवेगा अर्थात् कुछभी नहि इति तथा (दयालु) कहिये जो सर्वभूतप्राणियोंपर स्वाभाविक दया करे है अर्थात् सर्व जीवॉकू अपने समान जानकरके कि- सीकुंभी मन, वच, कर्मकरके दुःख नहि देवे है। यह यार्ता जीवन्मुक्तिप्रकरणविषेभी कथन करी है "प्रा. णा यथात्मनोभीष्टा भूतानामपि ते तथा ।। आत्मौप- भ्येन भूतेषु दयां कुर्वेति साधवः" अर्थ-जिस प्र- कारसे अपनेकू प्राण अत्यंत प्रिय हैं तैसेहि अन्य [ ९४३ ] सर्व भूतोंकूभी प्रिय हैं यातें इस प्रकारसे जानकरके साधुपुरुप अपने समान सर्व भूतप्राणियोंपर दया करते हैं इति ॥ सो हे शिष्य, यह संक्षेपसें संन्यासीके आचरण कथन किये हैं ॥ सो इन सर्व लक्षणोंकरके युक्त जो (यतिः) कहिये संन्यासी पु- रुप है सो (विमुच्यते) कहिये शीघहि निर्विघ्न मोक्षपदकू प्राप्त होवे है ॥ यद्यपि पूर्वोक्त रीतिसें केवल ज्ञानसेंहि मोक्षकी प्राप्ति हो जावे है तथापि जैसे कोई रोगी पुरुपके रोग निवृत्त करनेहारी औ- पधिके भक्षण करनेतेभी पथ्य नहि रखनेसें सो औ- पधि रोगकी निवृत्ति करनेमें समर्थ नहि होवे है तै- सेहि ज्ञानकी प्राप्ति होनेतेभी पश्चात् जो पुरुष शास्त्रोक्त स्वस्वधर्मका आचरण नहि करते हैं तो सो ज्ञान संशय औ विपरीतभावनाकरके युक्त भया जन्ममरणरूप संसाररोगकी निवृत्ति क. रने में समर्थ नहि होवे है। यह वार्ता पराशरमुनि- नेभी कथन करी है "मणिमंत्रौपधैर्वह्निः प्रदीप्तोपि यथेंधनं ॥मदग्धुं नैव शक्तः स्यात् प्रतिवद्धस्तथैव हि ॥ ज्ञानाग्निरपि संजातः सुदीप्तः सुदृढोपि च ॥ प्रदग्धं [ २४४ ] नैव शक्तः स्यात् प्रतिवद्धस्तु कल्मपम्" अर्थ-जैसे मणि मंत्र औपधादिकोंकरके प्रतिबद्ध होनेते अग्नि प्रदीप्त भयाभी इंधनके जलानेमें समर्थ नहि होवे है तैसेहि संशयविपरीतभावना दुष्टाचारादिकोंकरके प्र. तिबद्ध होने ज्ञानरूप अग्नि यद्यपि . दृढ औ अति प्रज्वलितभी उत्पन्न हो जाये तोभी सो पापोंके दग्ध करने में समर्थ नहि होवे है इति ॥ यातें हे शिष्य, ज्ञानके होनेतेंभी शरीरपातपर्यंत अवश्यहि शास्त्रोक्त स्वस्वधर्मका आचरण करना योग्य है इति ॥१०॥ इस प्रकारसे संन्यासीके धर्मोंका संक्षेपसें निरूपण करके अब गृहस्थ के धर्म कथन करे हैं ।। ॥ गुरुरुवाच ॥ यथाप्तितुष्टोऽनृतरागवर्जितः स्वधर्मनिष्ठोऽतिथिपूजकः शुचिः ।। जितेन्द्रियो वृद्धजनानुगः क्षमी विचारशीलश्च गृहेपि मुच्यते ॥१०६॥ टीका-यथाप्तितुष्ट इति ॥ हे शिप्य, जो गृहस्थ (यथाप्तितुष्टः) कहिये अपने शारखोक्त व्यवहारसें ..

[ २४५ ] जो द्रव्यकी प्राप्ति होवे तिसहिमें संतोष अर्थात् तृप्ति माने है काहेते संतोषके अभाव होनेतेंहि लोभकरके युक्त भया पुरुष स्वधर्मका परित्याग करके नौकरी आ. दिक पराधीनतासें अत्यंत क्लेशकू प्राप्त होवे है । तथा यह वार्ता मनुस्मृतिमेंभी कथन करी है "संतोषं पर- मास्थाय सुखार्थी संयतो भवेत् ॥ संतोषमूलं हि सुखं दुःखमूलं विपर्ययः" अर्थ-सुखकी इच्छावान् पुरु- पको परम संतोपमें स्थित होयकरके व्यवहारविपे तत्पर होना चाहिये काहेतें संतोपहि सर्व सुखोंका मूल है औ तिसके विपरीत जो तृष्णा है सोई सर्व दुःखोंका मूल है इति ॥ यातें विवेकी पुरुपको सर्वदाहि अप- नेसें गरीब औ दुःखी पुरुपोंकी तरफ देखकरके तथा पराधीनतादि क्लेशोंकी तरफ देखकरके अपने चि- तमें संतोष माननाहि योग्य है । तथा अनृत जो असत्य भाषण है तिसकरकेभी रहित है काहेतें असत्य भाषण करनेके तुल्य दूसरा कोई पाप नहि है। यह वार्ताभी मनुस्मृतिमेंहि कथन करी है "न. पनो ये स्मृता लोका ये च स्त्रीबालघातिनः ॥ मि. द्रुहः कृतघ्नस्य ते ते स्युर्तृवतो मृपा" अर्थ-जिस

। २४६
गतिकू ब्रह्महत्या करनेहारे पुरुष प्राप्त होते हैं औ
जो गति स्त्री औ बालकके मारनेहारेकी होवे है
औ जो गति मित्रसें द्रोह करनेहारे औ कृतघ्न पुरु-
पकी होये है सोई गति राजदरवारादिक स्थलोंमें अ.
सत्य भापण करनेहारे पुरुपकी होवे है इति । औ
जिस स्थलमें किसी जीवके प्राणों की रक्षा होती
होये तो तहां एकवार असत्य भापण करनेसें भी
दोप नहि होवे है किंतु उलटा धर्म होवे है या वि-
वेकीपुरुषको सर्वत्र विचार करकेहि सत्य भाषण क.
रना योग्य है॥ तथा (रागवर्जितः) कहिये राग
जो स्त्रीपुत्रादिकॉविपे अत्यंत प्रीति है तिसकरकेभी
जो रहित है काहेते स्त्री आदिकोंमें अधिक स्नेह
होनेते तिनके लिये सुंदर सुंदर वस्त्र आभूपणादि-
कोंके संपादन करनेके अर्थ अधिक द्रव्यकी यांचा
होनेते संतोपका परित्याग करके अवश्य पराधीन
तादि क्लेशोंकी प्राप्ति होवेगी यातें तिनमें चित्तसे
अधिक राग नहि करना चाहिये ॥यह वार्ता गीतामे
भगवान्नेभी कथन करी है " असक्तिरनभिप्वंगः
पुत्रदारगृहादिषु" अर्थ-हे अर्जुन, मुमुक्षु पुरुषको

[ २४७ ] पुत्र स्त्री गृहादिकोंमें आसक्ति औं अत्यंत प्रेम नहि करना चहिये इति ॥ तथा जो (स्वधर्मनिष्ठः) कहिये सर्वदाहि अपने वर्णाश्रमके धर्मविपे निष्ठावान् है अर्थात् अपने धर्मसें विरुद्धाचरण करनेसें जो कबी अधिक द्रव्यकी प्राप्तिभी होवे तो तिस कार्यकू नहि करेहै ॥ औ जो विपत्तिकालमें ब्राह्मणका अपने पट्कर्मोकरके कुटुंबका पोपण नहि हो सके तो ति- सको क्षत्रिय औ वैश्यके कर्म करनेकीभी धर्मशा- स्त्रमें अनुज्ञा करी है या तिस कालमें दोष नहि है ॥ यहां धर्मनिष्ठशब्दकरके वेदाध्ययन, संध्या, तर्पण, श्राद्ध, वैश्वदेवादिक जो द्विजातिपुरु- पोंके नित्यनैमित्तिक धर्म हैं तिनमें तत्परताकाभी ग्रहण जान लेना ॥ तथा (अतिथिपूजकः) कहिये जो गृहविपे प्राप्त भये अतिथिकाभी यथाशक्ति अ- नजलादिकोंकरके सत्कार करे है काहेते अतिथिके नहि पूजनेसे गृहस्थकी महाहानी होये है । यह वा. ाभी मनुस्मृतिमहि कथन करी है " अतिथिगृहा- देव भग्नाशो विनिवर्तते ॥ स दत्वा दुष्कृतं तस्मै पुण्यमादाय गच्छति" अर्थ-जिस गृहस्थके गृहसे [ २४८] अतिथि निराश होय करके पीछे जावे है तो सो तिस गृहस्थके प्रति अपने पाप देकरके तिसके सर्व पुण्य लेकरके चला जावे है इति ॥ तथा (शुधिः) कहिये मांसभक्षण करना, मदिरापान करना, कि- सीका उच्छिष्ट भोजन करना, वासी अन्न भक्षण करना, म्लेच्छादिक नीच पुरुपोंसें स्पर्श करना, विना स्नान किये भोजन करना इत्यादिक जो अ. पवित्र व्यवहार हैं तिनसेंभी जो रहित है काहेतें "अचारप्रभवो धर्मः" इस महाभारतके वाक्यमें प्र- थम अचार होनेतेंहि सर्व धर्मोकी उत्पत्ति कथन करी है ॥ तथा जो (जितेन्द्रियः) कहिये जिह्वा उप- स्थादिक इन्द्रियोंकेभी जीतनेहारा है अर्थात् इ- न्द्रियोंके वशीभूत होयकरके शास्त्रनिपिद्ध परस्त्री- गमनादिकोंमें प्रवृत्त नहि होवेहै किंतु पूर्णमासी अ. मावस्या एकादशी आदिक शुभ दिनोंमें अपनी स्त्रीकाभी संगम नहि करेहै औ दिनमें तो भूलकर• केभी कदाचित् स्त्रीसंगम नहि करना चाहिये का- हेते दिवामैथुनका धर्मशास्त्र औ वेदमें बहुतहि दोप लिखा है । तथा (वृद्धजनानुगः) कहिये जिस [ २४९ ) कार्यका आरंभ करेहै तो प्रथम अपने पिता पिताम- हादिक वृद्ध जनोंसे पूछ लेवेहै औ जो अपने नहि होवे तो दूसरे अपने सजातियोंसें पूछ लेवेहै अथवा (वृद्धजनानुगः ) कहिये जिस प्रकारसे अपने पिता पितामहादिकोंका व्यवहार होवे तिसहिके अनुसार आपभी आचरण करेहै यह वार्ताभी मनुस्मृतिमें क- थन करी है "येनास्य पितरो याता येन याता: पितामहाः ॥ तेन यायात्सतां मार्गे तेन गच्छन्नरि- प्यति" अर्थ-जिस मार्गमें इस पुरुपके पिता औ पितामहादिक वृद्ध लोक चलते रहे होवें तिसहि मार्गमें इसकोभी चलना चाहिये काहेते तिसमें च- लनेसें इस पुरुषकी कदाचित्भी हानी नहि होवे है इति ॥सो इस श्लोकमें मनुने "सतां मार्गे" यह पद रखा है तिसकरके जो अपने पिता पितामहादिक अधर्ममें चलनेहारे होवें तो तिस मार्गका परित्याग कर देवे तिसहिमें हठ नहि करे काहेतें एक पाती. महि हठ कर लेनेसें पुरपकी उन्नति कदाचित् नहि होवे है यह वार्ता हितोपदेशमभी कही है "ता- तस्य कूपोयमिति ब्रुवाणाः क्षारं जलं कापुरुषाः [२५० ] पिवंति" अर्थ यह हमारे वापका खुदवाया हुया कूप है यातें हम तो इसहिका जलपान करेंगे दूसरे- का नहि इस प्रकारसे हठकरके मूर्ख पुरुप सर्वदा क्षारे जलकाहि पान करते हैं इति ॥ अथवा (वृद्ध- जनानुगः) कहिये विद्यावृद्ध ओ ज्ञानवृद्ध जो म. हात्मा पुरुप हैं तिनके कथनानुसार चलेहै ॥ तथा (क्षमी) कहिये जो सजातीय औं अन्य पुरुपोंकी ताडना औ दुष्ट वचनोंकोभी सहन क- रहै काहेतें क्रोध करनेते पुरुपके जपतपादिक सु. कृतोंका नाश हो जावे है ॥ यह वार्ता महा- भारतभी कथन करी है "यत्क्रोधनो यजति यद्द- दाति यद्वा तपस्तप्यति यजुहोति॥वैवस्वतस्तद्धरतेस्य सर्व मोघः श्रमो भवति हि क्रोधनस्य " अर्थ- क्रोधि पुरुष जो कुछ यज्ञादि यजन करे है अ- थवा दान करे है वा तप करे है या होम करे है सो सर्वहि यमराजा हरण कर लेचे है औ तिस क्रोधी पुरुपका सर्व परिश्रम वृथाहि होवे है इति ॥ तथा (विचारशीलश्च) कहिये जो नित्यंप्रति अष्ट प्रहरोंमेसें द्वि अथवा तीन घटिका सर्व व्यवहारोंका परित्याग [ २५१ ॥ करके एकांतस्थलमें जायकरके अपने हित औ अ. हित कार्योंका विचार करेहै तिनमें जो जो अ- पने अहितके करनेहारे अशुभ कर्म होवें तिनकू तो दिनदिनप्रति न्यून करता जावे औ जो जो हि- तके करनेहारे शुभ कर्म होवें तिनकी अधिकता क- रता जावे ॥ यह वार्ता मनुस्मृतिमेंभी कथन करी है "एकाकी चिंतयेन्नित्यं विविक्त हितमात्मनः ॥ ए काकी चिंतयानो हि परं श्रेयोधिगच्छति" अर्थ- विवेकी पुरुषको नित्यप्रति एकाकी होयकरके एकां- तस्थलमें जायकरके अपने आत्माके हितका चिंतन करना चाहिये काहेते एकाकी चिंतन करनेसें यह पुरुप परम कल्याणकू प्राप्त होते है इति ॥ यहां चि- चारशब्द वेदांतादिक सत्शास्त्रोंके विचारकाभी उ- पलक्षण जान लेना ॥ यह संक्षेपसें गृहस्थके धाँका वर्णन किया है सो हे शिष्य, जो गृहस्थ पुरुष इ. त्यादिक धर्मोंका यथावत् आचरण करे है सो (P- हेपि मुच्यते ) कहिये गृहस्थाश्रमविपे स्थित भयाभी ज्ञानकी प्राप्तिद्वारा शीघ्र निविन मोक्षपद• प्राप्त होचे है ।। यह वार्ता अन्य स्मृतिमभी कथन करी है [ २५२ ] "न्यायागतधनस्तत्त्वज्ञाननिष्ठोतिथिप्रियः ॥ श्राद्ध- कृत्सत्यवादी च गृहस्थापि विमुच्यते" अर्थ-जो पुरुष न्यायपूर्वक धर्मसे धनका उपार्जन करता है औ जीवब्रह्मकी एकताका जो तत्त्वज्ञान है तिसमें निष्ठा- वान् है तथा अपने कुलोचित श्राद्धादिक जो नित्य- नैमित्तिक कर्म हैं तिनकाभी यथाशक्ति आचरण करे है औ सत्यवादी कहिये सर्वदा सत्य भापण करे है ऐसा गृहस्थ पुरुषभी मोक्षपदकुं प्राप्त होते है इति ॥२०६॥ इस प्रकारसे यहांपर्यंत सर्व पूर्वोक्त ग्रंथसंदर्भ- करके धर्मका लक्षण ईश्वर औ जीवके तटस्थलक्षण औ स्वरूपलक्षण तथा तिन दोनोंकी एकता अंतःक- रणकी शुद्धिका उपाय औ परम सुखकी प्राप्तिविपे निर्विकल्पसमाधिकी हेतुता योगके अंग औ स्वरूप तथा पुरुषार्थ औ प्रारब्धका बलाबलभाव औ सं- न्यासी तथा गृहस्थके धर्म इत्यादि यह सर्व रहस्य श्रवण करके उत्तमाधिकारी होनेतें इतनेमेंहि सर्व संशयाँसे रहित भया शिष्य अब अपनी कृतकृत्य- ताकू सूचन करता हुया गुरुसें अनुज्ञा मांगे है।

[२५३ ] ॥शिष्य उवाच॥ शमं गतोमेऽखिलसंशयज्वरो भवन्मुखांभोजवचोमृतद्रवैः॥ वनेऽथवा किं सदने विहारिणा मया कथं स्पेयमिहाधुना गुरो॥१०७॥ टीका-शमं गत इति ॥ हे गुरो, ( भवन्मुखां- भोज) कहिये आपके मुखरूप कमलसें जो वचनरूप अमृत द्रवता भया है तिसकरके (संशयज्वरो) कहिये मेरा जो अज्ञानजन्य जीवईश्वरादिविषयक नानाम- कारके संशयरूप हृदयका ज्वर अर्थात् ताप था सो अब (अखिल) कहिये सर्वहि निःशेपकरके शांतिकुं प्राप्त हो गया है अर्थात् अब मैं सर्व संशयविपर्ययसें रहित ज्ञानकू प्राप्त होयकरके कृतकृत्य होता भया हुं सो हे भगवन, अब इस वर्तमान शरीरके शेप रहे प्रारब्धकर्मके क्षयपर्यंत मेरेको (बनेऽथवा किं सदने) काहिये हिमालयादिक पर्वतोंमें जायकरके वनमें नि- वास करना योग्य है किंवा स्त्रीपुत्रादिकोंकरके युक्त अपने तिसहि गृहविषे जायकरके निवास करना उ- [२५४ ] चित है सो इन दोनों पक्षोंमेंसें मेरेको किसका ग्र- हण करना योग्य है तथा (कथं स्थेयं) कहिये तहां चन अथवा गृहविषे निवास करके मेरेको किस प्र- कारके आचरणसें स्थित होना उचित है अर्थात् स- वंदा ध्यानमेंहि स्थित होना उचित है किंवा लौकिक व्यवहारोंमभी स्थित होना योग्य है सो कृपा करके मेरे प्रति आज्ञापन करो इति ॥ १०७ ।। इस प्रका- रमें शिष्यकी कृतकृत्यता औ प्रार्थना श्रवणकरके तथा अपने उपदेशके परिश्रमकी सफलता देखकरके अत्यंत प्रसन्नताकू प्राप्त भये गुरु अव तीन श्लोकों- करके उपदेश करते हुये तिसकुं अनुज्ञा देवे हैं ।। ॥ गुरुरुवाच । शरीरतः कर्मसमाचरन् वहि- गतांतरासक्तिरमित्रमित्रयोः ॥ समः सतां सेतुमलंघयंस्तत- स्तपोवने वा सदने रमस्व भोः॥१०॥ टीका-शरीरत इति ॥ हे शिप्य, जितनेक सं- [ २५५ ] ध्यातर्पणादि वैदिक औ क्रयविक्रय आदि लौकिक गृहस्थके कर्म हैं अथवा स्नान शौच भिक्षाटनादिक जो त्यागीके कर्म हैं तिन सर्वकू लौकिकदृष्टिसें बा- ह्यशरीरकरके सम्यक् प्रकारसे आचरण करता हुया औ (गतांतरासक्तिः) कहिये तिन कर्मों के करणेमें जो अहं कर्तापनेका अभिमानरूप आसक्ति है तिस- करके अंतरसे रहित भया तथा (अमित्रमित्रयोः समः) कहिये अपने शत्रु औ मित्रविषे समभावसें दे- खता हुया यहां शत्रुमित्रशब्दकरके साधु, मध्यस्थ, पापी, ब्राह्मण, चांडाल, श्वानादिकोंकाभी ग्रहण जान लेना तथा (सतां सेतु) कहिये पूर्वके ऋषि, मुनि आदिक सत्पुरुषोंने जो गृहस्थ अथवा त्यागीके अर्थ खानपानादिक व्यवहारों की मर्यादा बांध रखी है तिसकू ज्ञानके मदकरके नहि उलंघन करता हुया (ततः) कहिये इन उक्त लक्षणोंकरके युक्त होयकरके पश्चात् (तपोवने वा सदने रमस्व) कहिये हे शिष्य, चाहे हिमालयादिक पर्वतोंमें जायकरके तपोवनविपे अथवा (सदने) कहिये चाहे स्त्रीपुत्रादिकोंकरके युक्त [२५६ ] अपने गृहविपेहि जायकरके तुं रमण कर तिन दोनोंमें तेरी किसी प्रकारकीभी हानी नहि है। यह वार्ता योगवासिष्ठके उपशमप्रकरणमेंभी कथन करी है "वस तूत्तमभोगाढ्ये स्वगृहे वा जनाकुले॥ सर्वभोगोज्झिता भोगे सुमहत्यथवा वने नासौ कलंकमामोति हेमपंक- गतं यथा" अर्थ-हे रामचन्द्र, जिस पुरुषको आ- त्मस्वरूपका दृढ बोध भया है औ चित्तमें भोगोंकी आसक्ति नहि है सो पुरुप चाहे नाना प्रकारके स्त्री आदिक उत्तम भोगोंकरके संयुक्त औ नाना प्रका- रके बंधु, मित्र, दास दासी आदिक जनोंकरके स. र्वतरफसें व्याप्त भये अपने गृहविपे निवास करो अ. थवा सर्व भोगोंसे रहित जो महागव्हर वन है ति- समें जायकरके निवास करो परंतु सो तत्त्वदर्शी पु- रुप तिन दोनोंकरके लिपायमान नहि होवे है जैसे कीचमें पड़ा, हुया सुवर्ण कलंककू प्राप्त नहि होवे है इति ॥ १०८ ॥ इस प्रकारसे वाह्य शरीरका व्यवहार कथन करके अब'आंतरिक मनका व्यवहार कथन करे हैं।

[२५७] || गुरुरुवाच॥ मनोभ्रमं विश्वमिदं चराचरं विलोकयनात्मरतिर्गतैषणः ॥ विनिर्ममो मानमदादिवर्जित- स्तपोवने वा सदने रमस्व भोः॥१०९॥ टीका-मनोभ्रममिति ॥ हे शिष्य, ब्रह्मासें ले- करके स्थाणपर्यंत जो यह चराचर जगत् प्रतीत होय रहा है तिस सर्वकू तूं ( मनोभ्रमं) कहिये जैसे स्व- मावस्थाविषे मनके भ्रमकरके मिथ्याहि पदार्थ स- त्यकी न्याई प्रतीत होते हैं तैसेहि ( विलोकयन्) क- हिये विचारदृष्टि से देखता हुया। यह वार्ता योगवाति- कभी कथन करी है "दीर्घस्वममिमं विद्धि दीर्घ चा चित्तविभ्रम। चराचरं लय इव प्रसुप्तमिह पश्यताम्" अर्थ-हे मुमुक्षु पुरुष, इस चराचर सर्व प्रपंचकू तूं दीर्घकालके स्वमसमान अथवा दीर्घ चित्तका विभ्रम जान अथवा प्रलयकाल औ सुषुप्तिकी न्यांई सर्व त- रफसे प्रसुप्त शून्यकी न्याई देख इति ॥ तथा (आ- स्मरतिः) कहिये हे शिष्य, उक्त प्रकारसे सर्व प्रपं.

[२८] चकू मिथ्या जानकरके सर्व बाह्य विषयोंसें चित्तका आकर्षण करके अपणे प्रत्यगात्मस्वरूपमेंहि प्रीति क- रता हुया।यह वार्ता मुंडकोपनिषत्में भी कथन करी है "आत्मक्रीड आत्मरतिः क्रियावानेप ब्रह्मविदांव- रिष्ठः" अर्थ-जो पुरुष अपने आत्मामेंहि क्रीडावाला औ आत्मामेंहि प्रीतिवाला तथा आत्मामेंहि क्रिया- वाला होवे है सोई सर्व ब्रह्मवेत्ता पुरुषोंसें श्रेष्ठ होये है इति ॥ तथा (गतैपणः) कहिये वित्तपणा, पुत्रपणा, लोकपणा इस प्रकारसे तीन प्रकारकी जो एपणा अर्थात् वासना है तिसकाभी परित्याग करता हुया तथा (विनिर्ममो) कहिये किसी बाह्य पदार्थ अथवा अपने शरीरविपेभी ममतासे रहित भयां तथा (मा- नमदादिवर्जितः) कहिये जाति विद्यादिकोंका जो अभिमान औ मद है तिसकरके भी रहित भया आदिशब्दसे काम क्रोध लोभ मोहादिकोंकाभी ग्र- हण जान लेना सो हे शिप्य, इन सर्व लक्षणोंकरके युक्त होयकरके पश्चात् तपोवनमें अथवा अपने गृह- विहि दोनेमेसें जहां तेरी इच्छा होवे तहांहि तुंजा- यकरके रमण कर इति ॥१०९॥ इस प्रकारसे मनके [२६९] व्यापारको निरूपण करके अब सर्व ग्रंथका मुख्य रह- स्य कथन करते हुये गुरु उपदेशकी समाप्ति करे हैं। "गुरुरुवाच ॥ अहं हरिः सर्वमिदं च तन्मयं ततोन्यदासीन्न भविष्यति कचित् ।। इमं दृढ़ निश्चयमंतरास्थित- स्तपोवने वा सदने रमख भोः॥११०॥ टीका-अहं हरिरिति ॥ हे शिष्य, (अहं हरिः) कहिये मैं साक्षात् सच्चिदानंद नारायणस्वरूप हूं का- हेते जवपर्यत यह अधिकारी पुरुष प्रथम अपने… नारायणरूप नहि निश्चय करे है तवपर्यंत तिपकू ना- रायणकी प्राप्ति नहि होवे है। यह वार्ता योगवा- सिष्ठके उपशमप्रकरणमेंभी प्रतिपादन करी है "ना विष्णुः कीर्तयेद्विष्णुं ना विष्णुर्विष्णुमर्चयेत् । ना विष्णुः संस्मरेद्विष्णुं ना विष्णुविष्णुमाप्नुयात्" अर्थ- जबपर्यंत उपासक पुरुष प्रथम स्वयं विष्णुरूप नहि होय लेवे तबपर्यंत विष्णुका कीर्तन नहि करे औ ज- बपर्यंत स्वयं विष्णु नहि होय लेवे तवपर्यंत विष्णुका

[२९.]
पूजनभी नहि करे तथा जवपर्यंत प्रथम स्वयं विष्णु-
रूप नहि होय लेवे तवपर्यंत विष्णुका स्मरणभी नहि
करे तथा जबपर्यंत स्वयं विष्णुरूप नहि होय लेवे है
तवपर्यंत विष्णुकुं प्राप्तभी नहि होवे है इति ॥ किंच
"यासुदेवः सर्वमिति" इस प्रकारसें सर्व जगत्कुं
जो नारायणरूपसें देखना है सोई सर्वसें उत्तम परा-
भक्ति कहिये है तो इस प्रकारसें जब सर्व जगहि
नारायणरूप हुया तो पीछे सो उपासक तिसतें भिन्न
कहां रहा औ जो फिरभी भिन्न रहा तो तिसने सर्व
जगत्कू नारायणरूप नहि जाना औ जो सर्व जगत्
नारायणरूप नहि जाना तो उत्तम भक्ति नहि भई
यातें विष्णुके उपासक पुरुपोंकों अपनेकुंभी विष्णुरू-
पहि जानना चाहिये ॥ तथा "सर्वमिदं च तन्मयं"
कहिये हे शिष्य, यह जो चराचर जगत् देखने के
श्रवणमें आवेहै सोभी सर्व नारायणरूपहि है ।। यह
वार्ता श्रुतिमभी कथन करी है "यायत्किचित् जगत्
सर्व दृश्यते श्रूयतेपिया॥अंतर्बहिश्च तत्सर्वं व्याप्य ना.
रायणः स्थितः" अर्थ-यावत् मात्र यह जगत् दे.
खने औं श्रवणमें आये है सो तिस सर्वकू अंतर औं

[२६] बाह्यसें व्याप्यकरके नारायण स्थित होय रहे हैं इति॥ तथा विष्णुपुराणमें पराशरमुनिने मैत्रेयके प्रतिभी कहा है "ज्योतीपि विष्णुर्भुवनानि विष्णुर्वनानि वि- ष्णुगिरयो दिशश्च ॥ नद्यः समुद्राश्च स एव सर्व यदस्ति यन्नास्ति च विप्रवर्य" अर्थ है विप्रवर्य मैत्रेय, या- वत्मात्र सूर्य चन्द्रमा ध्रुव शुक्रादिक आकाशमंड- लमें ज्योतियां हैं सो सर्वहि विष्णुरूप हैं औ यावत्- मात्र भूर्भुवःस्वरादिक चतुर्दश भुवन है सोभी स. हि विष्णुरूप हैं तथा यावत्मात्र सुमेरु हिमालया- दिक पर्वत हैं सोभी सर्वहि विष्णुरूप हैं औ यावत्- मात्र पूर्व पश्चिमादिक दिशा हैं सोभी सर्व विष्णुरूप हैं तथा यावत्मात्र गंगायमुनादिक नदियां हैं सोभी सर्व विष्णुरूप हैं तथा याचतूमान क्षारोद क्षीरोदा- दिक समुद्र हैं सोभी सर्व विष्णुरूप हैं अर्थात् कहाँ- पर्यंत वर्णन करें (यदस्ति) कहिये इस जगत्मात्रमें जो वस्तु प्रत्यक्ष हैं औ जो अप्रत्यक्ष हैं सो सर्वहि विष्णुरूप हैं इति ॥ तथा हे शिष्य, (ततोन्यदासीन) कहिये तिस नारायणके विना दूसरी कोई. वस्तु इस कालसें प्रथमभी नहि होती भई है औ न इस कालमें है [२६२] औ न आगे होवेहिगी अर्थात् भूत भविष्यत् औ वर्त- मान कालमें एक नारायणहि नानाप्रकारके पदा- कि आकारसें प्रतीत होवे है॥ तथा यह वार्ता नारायणोपनिपत्मेंभी कथन करी है "नारायण ए. चेदं सर्वं यद्भूतं यच्च भाव्यं"अर्थ--यह सर्व जगत् ना रायणहि है औ जो भूत तथा भाव्य कहिये भविष्यत् वस्तु है सोभी सर्व नारायणहि है इति ॥ यहां नारा- यण औ निर्गुण ब्रह्मके विपे कोई भेदकी शंका नहि करणी चाहिये काहेतें जिस कारणसें ब्रह्महि स्थूलमति- वाले भक्तोंके अनुग्रहके अर्थ नारायणकी व्यक्तिसें प्र- तीत होवे है । यह वार्ता अथर्ववेदकी रामपूर्वतापनी उपनिषत्मेंभी कथन करी है "चिन्मयस्याद्वितीयस्य निष्कलस्याशरीरिणः । उपासकानां कार्यार्थ ब्रह्मणो रूपकल्पना" अर्थ-सच्चिदानंदमय अद्वितीय नि- कल औ शरीरसें रहित जो परब्रह्म है तिसकी उपा- सक लोकोंके अर्थहि चतुर्भुज विष्णु आदिक व्य. क्तिकी कल्पना अर्थात् निर्माण होवे है इति ॥ तथा सामवेदकी तलयकारोपनिषत्मभी "ब्रह्म ह देवेभ्यो विजिग्ये" इत्यादिकरके लिखा है कि असुरों औ दे. यतोंके युद्ध में ब्रह्मने देवता जय दिया तो पश्चात् [२६३] सो देवता ब्रह्माकू नहि जानकरके अपनेसेंहि असु- रोकू जय किया मान करके अभिमानकू प्राप्त होते भये तो पश्चात् तिस वार्ताकू जानकर तिनके मदके दूर करणद्वारा तिनके ऊपर अनुग्रहके अर्थ सो ब्रह्म तिन देवतोंके सन्मुख तेजोमय यक्षस्वरूपसे प्रकट होता भया इति ॥ तथा कृष्णावतारमें भगवाननें अ- पने मुखसहि कहा है "ब्रह्मणो हि प्रतिष्ठाहममृतस्या- व्ययस्य च" अर्थ-हेअर्जुन, मोक्षरूप औ निर्विकार ब्रह्मकी जो प्रतिष्ठा कहिये स्थिति है सोभी मैहि हुँ अर्थात् जिसवं वेदांति लोक ब्रह्मा कहते हैं सो मैंहि हुं इति॥यातें नारायणमें औं ब्रह्ममें किंचित्मानभी भेद नहि है। सो हे शिष्य, मैं औ यह सर्व जगत् ना. रायणरूप है औ तिसतें भिन्न कोई वस्तुनहिहै इस उक्त प्रकारका जो निश्चयहै तिप्स निश्चयविपेतूं सर्वदा अपने हृदयमै दृढ स्थित भया पश्चात् चाहे तपोवनमें अथवा (सदन) कहिये अपने गृहविषेहि जायकरके रमण कर तो तूं सर्वथाहि मुक्तस्वरूप है काहेते इस उक्त प्रका- रके निश्चयवान् पुरुपको पुनः जन्ममरणरूप संसा- रकी प्राप्ति नहि होवे है। यह वार्ता विष्णुपुराणमें भी [२६४] कथन करी है "अहं हरिः सर्वमिदं जनार्दनी नान्य- ततः कारणकार्यजातं। ईदृङमनो यस्य नतस्य भूयो भ- वोद्भवा द्वंद्वगदा भवंति" अर्थ-मैं हरि हुँ ओ यह चराचर सर्व जगत्भी जनार्दनरूप है तिसके विना दूसरा कोई कारणकार्यरूप पदार्थसमूह नहि है इस प्रकारसें जिस पुरुपके मनमें दृढ निश्चय होये है (तस्य) कहिये तिसको पुनः जन्ममरणके अभाव हो- नेते पश्चात् शीतोष्ण क्षुधापिपासादिक द्वंद्वजन्य बाधा कदाचित् नहि होचे है इति ॥ अर्थात् जैसे नदीका जल समुद्र में जायकरके अपने नाम औ रूपका परि- त्याग करके समुद्के साथ एकीभावकू प्राप्त हो जावे है तैसेहि सो तत्त्वदर्शी पुरुप अपने नामरूपका परि- त्याग करके वर्तमान शरीरके पात होनेते सच्चि- दानंदमय नारायणके साथ एकीभाव प्राप्त होवे है ॥ तथा यह वार्ता मुंडकोपनिषत्मभी कथन करी है "यथा नद्यः स्पंदमानाः समुद्रेस्तं ग- च्छंति नामरूपे विहाय तथा विद्वान्नामरूपाद्विमुक्तः परात्परं पुरुपमुपैति दिव्यम्" अर्थ-जैसे गंगादिक यहती हुई नदियां अपने नाम औ रूपका परित्याग

[२६५]
करके समुद्र में जायकरके लीन हो जाती हैं तैसेहि
तत्त्ववेत्ता पुरुष नामरूप उपाधिसे रहित भया शरी-
रके अंतकालमें प्रकृतिसे परे जो दिव्य पुरुष ब्रह्म
है तिसविषे लीन हो जावे है इति ॥ इस प्रकारकी
गति जिन पुरुषोंकी होवे है तिनहिका इस संसारमें
जन्म लेना सफल होवे है औ सोई पुरुष धन्यवा-
दके योग्य होवे हैं । यह वार्ता अन्यत्रभी कथन करी
है "कुलं पवित्रं जननी कृतार्था वसुंधरा पुण्यवती
च तेन । अपारसंवित् सुखसागरेस्मिन् लीनं परे ब्रह्मणि
यस्य चेतः"अर्थ-जिस पुरुषका अपार ज्ञान औ
आनंदके समुद्ररूप ब्रह्मविषे चित्त लीन होवे है तिस
पुरुषका सर्वहि कुल पवित्र हो जाये है औ तिसकी
जननी जो माता है सोभी कृतार्थ हो जावे है तथा
सो पुरुष जहां जहां गमन करे है तहां तहां तिसके
चरणोंके सर्शसें वसुंधरा जो पृथिवी है सोभी पावन
होजावे है किंच जो जो पुरुष तिसके दर्शन स्पर्शन
सेवादि करणेवाले होवे हैं सोभी कृतार्थ हो जाते हैं
इति ॥ ११॥ इस प्रकारसे ग्रंथकार शिष्य औ गु.
रुके व्याजसें प्रश्नोत्तरद्वारा सर्व वेदांतशास्त्रका संक्षे.

[२९१] पो रहस्य प्रतिपादन करके अव तिनके प्रसंगकी स- माप्ति करते हुये ग्रंथका उपसंहार करे हैं । ततः समभ्यय॑ गुरुं मुहुर्मुहुः प्रणम्य चैवामुदिताशयोऽगमत् ॥ सुखेप्सुरेकांतनिकेतनं ततः परं पदं त्यत्ततनुर्जगाम वै ॥१११ ॥ टीका-तत इति ॥ (ततः) कहिये उक्त तीन श्लोकोंकरके दृढ निश्चय कथनपूर्वक गुरुके अ- नुज्ञा देनेके अनंतर सो मुमुक्षु पुरुष (मुहुर्मुहुः) क- हिये अति आदरसे वारंवार गुरुकी पुष्पचंदनादि- कोसे विधिपूर्वक पूजन औ स्तुति करके तथा पुनः पुनः दंडवत् प्रणाम औ प्रदक्षिणा करके (आमुदि- ताशयः) कहिये ब्रह्मविद्याकी प्राप्ति होनेते मनविपे अतीव हर्ष· प्राप्त भया । यद्यपि गुरुने तपोवन औ गृहविपे निवास करणेकी समानहि अनुज्ञा करी थी परंतु सो (सुखेप्सुः) कहिये निर्विकल्प समाधिद्वारा जीवन्मुक्तिके सुखकी इच्छा करता हुया (एकांतनि- केतन) कहिये किसी पर्वतकी गुहादिक निर्जन स्था.

[२६७] नकू चला जाता भया । ततः कहिये तहां कुछकाल जीवन्मुक्तिके सुखकू अनुभव करके पश्चात् शरीरके प्रारब्धकोंके क्षीण होनेते (त्यक्ततनुः) कहिये स्थूल सूक्ष्म औ तिन दोनोंका कारणभूत जो अविद्यारूप शरीर है तिन तीनों शरीरोंका परित्याग करके (प- रंपदं जगाम) कहिये सर्व ज्ञानियोंका निवासभूत जो सच्चिदानंदस्वरूप परब्रह्मपद है तिसकू प्राप्त होता भया । सो यह ज्ञानी पुरुपकों कहिं देशांतरमें जायकरके ब्रह्मकी प्राप्ति नहि होवे है किंतु जिस स्थानविपे तिसके शरीरका पात होवे है तहांहि ति- सकी पुर्यष्टकाके भेदन होनेते सर्व व्यापक ब्रह्मके साथ एकीभाव होय जावे है जैसे घटके फूटनेसें घ- टाकाशकी तहांहि महाकाशके साथ एकता होय जावे है ।। तथा यह वार्ता यजुर्वेदकी बृहदारण्यकोपनिषत्- मेंभी कथन करी है "न तस्य प्राणा उत्क्रामत्यत्रैव स- मवलीयते" अर्थ-तिस ज्ञानी पुरुषके मरणकालमें शरीरसे बाहिर प्राणोंका गमन नहि होवे है किंतु त. होहि तिनका विलय होवे है इति ॥ तथा मुंडको- पनिपत्में भी कहा है “गताः कलाः पंचदशप्रतिष्ठा [२७०] चारदीपक नाम पुस्तक है सो मानो एक दीपक है सो जैसे कोई श्रद्धालु पुरुष दीपक निर्माण करके मंदिरमें जायकर अपने इष्टदेवके प्रति अर्पण करे है तैसेहि इस विचाररूप दीपककू निर्माण करके ब- ह्मानंद नामक परमहंसने (मनोविप्वालये) कहिये जिज्ञासुपुरुपोंका शुद्ध मनरूप जो विष्णु भगवान्का मंदिर है तिसमें भगवत्की प्रसन्नताके अर्थ अर्पण किया है काहेतें जैसे देवमंदिरमें दीपकके अर्पण क. रनेसें तिसके प्रकाशकरके सर्व पुरुपोंकों देवताका अ- परोक्ष दर्शन होवे है तैसे हि इस विचाररूप दीपकके मनरूप मंदिरमें अर्पण करणेसें सर्व मुमुक्षु पुरुषोंको सच्चिदानंदस्वरूप विष्णुभगवान्का आत्मस्वरूपसें अ- परोक्ष दर्शन होवे है या सर्व मुमुक्षु पुरुषोंको अव. श्यमेव आधोपांत विचार करके अपने मनरूप मंदि- रमें इस विचाररूप दीपकको प्रज्वलित करना योग्य है इति ॥११३ ॥ इति श्रीमत्परमहंस स्वामिब्रह्मान- न्दविरचितो भावार्थभासिनीनामभापाटीकासमेतो विचारदीपकः संपूर्णः ॥ हरिः ॐ ॥

अथ श्रीहरिस्तोत्रप्रारंभः। भुजंगप्रयातं छन्दः जगज्जालपालं कचत्कंठमालं शरच्चन्द्रभालं महादैत्यकालम् ॥ नभो नीलकायं दुरावारमायं सुपद्मासहायं भजेहं भजेहम् ॥१॥ सदांभोधिवासं गलत्पुष्पहासं जगत्सन्निवासं शतादित्यभासम् ।। गदाचक्रशस्त्रं लसत्पीतवस्त्रं हसच्चारुवनं भजेहं भजेहम् ॥२॥ रमाकंठहारं श्रुतिवातसारं जलांतर्विहारं धराभारहारम् ।। चिदानन्दरूपं मनोज्ञस्वरूपं धृतानेकरूपं भजेहं भजेहम् ॥ ३॥ जराजन्महीनं परानन्दपीनं समाधानलीनं सदैवानवीनम् ॥

[२]
जगजन्महेतुं सुरानीककेतुं
"त्रिलोककसेतुं भजेहं भजेहम् ॥ ४॥
कृताम्नायगानं खगाधीशयानं
विमुफेनिदानं हतारातिमानम् ॥
स्वभक्तानुकूलं जगवृक्षमूलं
निरस्तार्तशूलं भजेहं भजेहम् ॥ ५॥
समस्तामरेशं द्विरेफाभकेशं
जगद्वियलेशं हृदाकारादेशम् ॥
सदादिव्यदेहं विमुक्ताखिलेहं
मुवैकुंठगेहं भजेहं भजेहम् ॥ ६ ॥
सुरालीवलिष्ठं त्रिलोकीवरिष्ठ
गुरूणां गरिष्ठं स्वरूपकनिष्ठम् ।।
सदा युद्धधीरं महावीरवीर
भयांभोधितीरं भजेहं भजेहम् ॥ ७ ॥
रमावामभाग तालमनागं
कृताधीनयागं गतारागरागम् ।।
मुनीन्द्रः मुगीतं गुरः परीत
गुणधरतीतं भजेहं भजेहम् ॥ ८॥

[३] इदं यस्तु नित्यं समाधाय चित्तं पठेदष्टकं कष्टहारं मुरारेः॥ स विष्णोर्विशोकं ध्रुवं याति लोकं जराजन्मशोकं पुनर्विन्दते नो ॥९॥ इति श्रीपरमहंसस्वामिब्रह्मानन्दविरचितं श्रीहरिस्तोत्रं संपूर्णम् ॥ अथ श्रीहरिनामाष्टकम् । वसंततिलका छन्दः। श्रीकेशवाच्युत मुकुन्द रथांगपाणे गोविन्द माधव जनार्दन दानवारे ॥ नारायणामरपते त्रिजगन्निवास जिह्वे जपेति सततं मधुराक्षराणि ॥१॥ श्रीदेवदेव मधुसूदन शाईपाणे दामोदरार्णवनिकेतन कैटभारे ॥ विश्वंभराभरणभूपितभूमिपाल जिढे जपेति सततं मधुराक्षराणि ॥२॥ १८ श्रीपालोचन गदाधर पानाभ पमेश पनपद पावन पापाणं ॥ पीतांबरांवररचे रुचिरायतार जिद जति गलतं मधुराक्षराणि ॥ ३ ॥ श्रीवांत पांमुभधरातिहरानपाणे विप्नी त्रिविक्रम महीधर धर्ममेती ।। पटयाम घगुधाधिप यामुदय जि जति मततं मधुराक्षराणि ॥ ४ ॥ श्रीनारमिद नरमांतक फांतमूने सक्ष्मीपते गम्टयाइन पशापिन् । शिप्रणाशन गुपेश किरीटमर्माले जिई पनि मनतं मधुराक्षराणि ॥ ५ ॥ श्रीयामलांछन गुरपंभ संगपाण बन्यांतयारिधिविहार हरे मुरारे ।। पा यसमय यसभुगादिदय जिद जपनि मननं मधुराणि ॥ ६ ॥ श्रीगम रावणरिपी रपुरागी मीतापने दशरथारमन राजगिः ॥

[५] सुग्रीवमित्र मृगवेधन चापपाणे जिह्वे जपेति सततं मधुराक्षराणि ॥७॥ श्रीकृष्ण वृष्णिवर यादव राधिकेश गोवर्धनोद्धरण कंसविनाश शौरे ॥ गोपाल वेणुधरपांडुसुतैकबंधी जिह्वे जति सततं मधुराक्षराणि ॥ ८ ॥ इत्यष्टकं भगवतः सततं नरो यो नामांकितं पठति नित्यमनन्यचेताः ॥ विष्णोः परं पदमुपैति पुनर्न जातु मातुः पयोधररसं पिबतीह सत्यम् ॥९॥ इति श्रीपरमहंसस्वामिब्रह्मानन्दविरचितं श्रीहरिनामाष्टकं संपूर्णम् ॥ अथ श्रीहरिशरणाष्टकम्। वसंततिलका छन्दः। ध्येयं वदति शिवमेव हि केचिदन्ये शक्ति गणेशमपरे तु दिवाकरं वै ।।

रूपैस्तु तैरपि विभासि यतस्त्वमेव
तस्मात्यमेव शरणं मम शंखपाणे ॥१॥
नो सोदरो न जनको जननी न जाया
नैवात्मजो न च कुलं विपुलं बलं वा ॥
संदृश्यते न किल कोपि सहायको मे
तस्मात्यमेव शरणं मम शंखपाणे ॥ २ ॥
नोपासिता मदमपास्य मया महांत-
स्तीर्थानि चास्तिकधिया नहि सेवितानि ।।
देवार्चनं च विधिवन्न कृतं कदापि
तस्मात्वमेव शरणं मम शंखपाणे ॥३॥
दुर्वासना मम सदा परिकर्पयंति
चित्तं शरीरमपि रोगगणा दहंति ॥
संजीवनं च परहस्तगतं सदैव
तस्मात्वमेव शरणं मम शंखपाणे ॥४॥
पूर्व कृतानि दुरितानि मया तु यानि
स्मृत्वाखिलानि हृदयं परिकंपते मे ।।
ख्याता च ते पतितपावनता तु यस्मात्
तस्माचमेव शरणं मम शंखपाणे ॥५॥

[७] दुःखं जराजननजं विविधाश्च रोगाः काकश्वसूकरजनिर्निरये च पातः॥ ते विस्मृतेः फलमिदं विततं हि लोके तस्मात्त्वमेव शरणं मम शंखपाणे ॥६॥ नीचोपि पापवलितोपि विनिंदितोपि यात्तवाहमिति यस्तु किलैकवारम् तं यच्छसीश निजलोकमिति व्रतं ते तस्मात्त्वमेव शरणं मम शंखपाणे ॥ ७॥ वेदेषु धर्मवचनेषु तथागमेषु रामायणेपि च पुराणकदंबके वा ॥ सर्वत्र सर्वविधिना गदितस्त्वमेव तस्मात्त्वमेव शरणं मम शंखपाणे ॥८॥ इति श्रीपरमहंसस्वामिब्रह्मानदविरचितं श्रीहरिशरणाष्टकं संपूर्णम् ॥

[८] अथ श्रीदीनबंध्वष्टकम् । वसंततिलका छन्दः। यस्मादिदं जगदुदेति चतुर्मुखाचं यस्मिन्नवस्थितमशेपमशेपमूले ॥ यत्रोपयाति विलयं च समस्तमंते दृग्गोचरो भवतु मेऽध स दीनबंधुः ॥ १॥ चक्रं सहस्रकरचारकरारविन्दे गुर्वी गदा दरवरश्च विभाति यस्य ।। पक्षीन्द्रपृष्ठपरिरोपितपादपद्मो दृग्गोचरो भवतु मेऽध स दीनबंधुः ॥२॥ येनोवृता वसुमती सलिले निमग्ना नग्ना च पांडवयधूः स्थगिता दुकूलः ॥ संमोचितो जलचरस्य मुखाद्गजेन्द्रो दृग्गोचरो भवतु मेऽद्य स दीनबंधुः ।।३।। यस्यादृष्टिचशतस्तु मुराः समृद्धि कोपक्षणेन दनुजा विलयं प्रति ॥

[९]
भीताश्चरति च यतार्कयमानिलाद्या
दृग्गोचरो भवतु मेऽद्य स दीनबंधुः ॥४॥
गायति सामकुशला यमर्ज मखेषु
ध्यायति धीरमतयो यतयो विविक्ते॥
पश्यंति योगिपुरुषाः पुरुपं शरीरे
दृग्गोचरो भवतु मेऽद्य स दीनबंधुः ॥५॥
आकाररूपगुणयोगविवर्जितोपि
भक्तानुकंपननिमित्तगृहीतमूर्तिः ।।
यः सर्वगोपि कृतशेपशरीरशय्यो
दृग्गोचरो भवतु मेऽद्य स दीनबंधुः॥६॥
यस्यांघ्रिपंकजमनिद्रमुनीन्द्रवृन्दै-
राराध्यते भवदवानलदाहशांत्यै ॥
सर्वापराधमविचित्य ममाखिलात्मा
दृग्गोचरो भवतु मेऽद्य स दीनबंधुः ॥ ७॥
यन्नामकीर्तनपरः श्वपचोपि नूनं
हित्वाखिलं कलिमलं भुवनं पुनाति ॥
दग्ध्वा ममाघमखिलं करुणेक्षणेन
दृग्गोचरो भवतु मेऽद्य स दीनबंधुः ॥ ८॥

[१०] दीनबंध्वष्टकं पुण्यं ब्रह्मानन्देन भापितम् ॥ यः पठेत्प्रयतो नित्यं तस्य विष्णुः प्रसीदति ॥२॥ इति श्रीपरमहंसस्वामिब्रह्मानन्दविरचितं श्रीदीनवंध्वष्टकं संपूर्णम् ॥ अथ श्रीगोविन्दायकम्। शिखरिणी छन्दः। चिदानन्दाकारं श्रुतिसरससारं समरसं निराधाराधारं भवजलधिपारं परगुणम् ॥ रमाग्रीवाहारं ब्रजवनविहारं हरनुतं सदा तं गोविन्दं परमसुखकंदं भजत रे॥१॥ महांभोधिस्थानं स्थिरचरनिदानं दिविजपं सुधाधारापानं विहगपतियानं यमरतम् ।। मनोज्ञं सुज्ञानं मुनिजननिधानं ध्रुवपदं सदा तं गोविन्दं परमसुखकंदं भजत रे ॥२॥ धिया धीरैर्येयं श्रवणपुटपेयं यतिवर- महावाक्यज्ञेयं त्रिभुवनविधेयं विधिपरम् ।।

मनोमानामेयं सपदि हदि नेयं नवतनुं
सदा तं गोविन्दं परमसुखकंदं भजत रे ॥३॥
महामायाजालं विमलवनमालं मलहरं
सुभालं गोपालं निहतशिशुपालं शशिमुखम् ।।
कलातीतं कालं गतिहतमरालं मुररिपुं
सदा तं गोविन्दं परमसुखकंदं भजत रे ॥ ४॥
नभोविंबस्फीतं निगमगणगीतं समगति
सुरौघे संप्रीतं दितिजविपरीतं पुरिशयम् ।।
गिरां पंथातीतं स्वदितनवनीतं नयकर
सदा तं गोविन्दं परमसुखकंदं भजत रे ॥५॥
परेशं पद्मेशं शिवकमलजेशं शिवकरं
द्विजेशं देवेशं तनुकुटिलकेशं कलिहरम् ।।
खगेशं नागेशं निखिलभुवनेशं नगधरं
सदा तं गोविन्दं परमसुखकंदं भजत रे ॥ ६ ॥
रमाकांतं कांतं भवभवभयांतं भवसखं
दुराशांतं शांतं निखिलहृदि भांतं भुवनपम् ।।
विवादांतं दांतं दनुजनिचयांतं सुचरितं
सदा तं गोविन्दं परमसुखकंदं भजत रे ॥७॥

[ १२ ]
जगज्ज्येष्ठ श्रेष्ठं सुरपतिकनिष्ठं ऋतुपति
बलिष्ठं भूयिष्ठं त्रिभुवनवरिष्ठं वरवहम् ॥
स्वनिष्ठं धर्मिष्ठं गुरुगुणगरिष्ठं गुरुवरं
सदा तं गोविन्दं परमसुखकंदं भजत रे ॥८॥
गदापाणेरेतदुरितदलनं दुःखशमनं
विशुद्धात्मा स्तोत्रं पठति मनुजो यस्तु सततम् ।।
स भुक्त्वा भोगांचं चिरमिह ततोऽपास्तवृजिनो
वरं विष्णोः स्थानं प्रजति खलु वैकुंठभुवनम् ९
इति श्रीपरमहंसस्वामिब्रह्मानन्दविरचितं
श्रीगोविन्दाष्टकं संपूर्णम् ॥
अथ श्रीगोपालाप्टकम् ।
मत्तमयूरं छन्दः।
यस्माद्विश्वं जातमिदं चित्रमतर्प
यस्मिन्नानन्दात्मनि नित्यं रमते वै॥
यत्रांत संयाति लयं तदशेष
तं गोपालं संततकालं प्रति वन्दे ॥१॥

यस्याज्ञानाजन्मजरारोगकदंव ज्ञाते यस्मिन्नश्यति तत्सर्वमिहाशु ॥ गत्वा यत्रायाति पुनर्नो भवभूमि ते गोपालं संततकालं प्रति वन्दे ॥२॥ तिष्ठन्तर्यो यमयत्येतदजन्नं यं कश्चिन्नो वेद जनोप्यात्मनि संतम् ।। सर्व यस्येदं च वशे तिष्ठति विश्वं ते गोपालं संततकालं प्रति वन्दे ॥३॥ धर्मोऽधर्मेणेह तिरस्कारमुपैति काले यस्मिन्मत्स्यमुखैश्वारुचरित्रः ।। नानारूप: पातितदायोवनिबिंब ते गोपालं संततकालं प्रति वन्दे ॥४॥ प्रणायामस्तसमस्तेन्द्रियदोपा रुद्धा चित्तं यं हृदि पश्यंति समाधी । ज्योतीरूपं योगिजनामोदनिमग्ना- स्तं गोपालं संततकालं प्रति वन्दे ॥५॥ भानुश्चन्द्रश्चोडुगणफय हुताशी यस्मितवाभाति तडिद्यापि कदापि ।

[ १२ ]
जगज्ज्येष्ठं श्रेष्ठं सुरपतिकनिष्ठं ऋतुपति
बलिष्ठं भूयिष्ठं त्रिभुवनवरिष्ठं वरवहम् ॥
स्वनिष्ठं धर्मिष्ठं गुरुगुणगरिष्ठं गुरुवरं
सदा तं गोविन्दं परमसुखकंदं भजत रे ॥८॥
गदापाणेरेतहुरितदलनं दुःखशमनं
विशुद्धात्मा स्तोत्रं पठति मनुजो यस्तु सततम् ।।
स भुक्त्वा भोगौघं चिरमिह ततोऽपास्तवृजिनो
चरं विष्णोः स्थानं व्रजति खलु वैकुंठभुवनम् ९
इति श्रीपरमहंसस्वामिब्रह्मानन्दविरचितं
श्रीगोविन्दाष्टकं संपूर्णम् ॥
अथ श्रीगोपालाष्टकम्।
मत्तमयूरं छन्दः।
यस्माद्विश्वं जातमिदं चित्रमतर्य
यस्मिन्नानन्दात्मनि नित्यं रमते वै॥
यत्रांते संयाति लयं चैतदेशेष
तं गोपालं संततकालं प्रति वन्दे ॥१॥

यस्याज्ञानाजन्मजरारोगकदंब ज्ञाते यस्मिन्नश्यति तत्सर्वमिहाशु॥ गत्वा यत्रायाति पुनों भवभूमि तं गोपालं संततकालं प्रति वन्दे ॥२॥ तिष्ठन्तर्यो यमयत्येतदजस्रं यं कश्चिन्नो चेद जनोप्यात्मनि संतम् ॥ सर्व यस्येदं च वशे तिष्ठति विश्वं तं गोपालं संततकालं प्रति वन्दे ॥३॥ धर्मोऽधर्मेणेह तिरस्कारमुपैति काले यस्मिन्मत्स्यमुखैश्चारुचरित्रः ॥ नानारूपैः पातितदायोवनिबिंब तं गोपालं संततकालं प्रति वन्दे ॥४॥ प्रणायामैर्ध्वस्तसमस्तेन्द्रियदोपा रुद्धवा चित्तं यं हृदि पश्यति समाधौ ।। ज्योतीरूपं योगिजनामोदनिमग्ना- स्तं गोपालं संततकालं प्रति वन्दे ॥५॥ भानुश्चन्द्रश्चोडुगणश्चैव हुताशी यस्मिन्नैवाभाति तडिच्चापि कदापि ॥

[ १४ ] यद्भासा चाभाति समस्तं जगदेतत् तं गोपालं संततकालं प्रति वन्दे ॥ ६॥ सत्यं ज्ञानं मोदमवोचुनिंगमा यं यो ब्रह्मेन्द्रादित्यगिरीशाचितपादः॥ शेतेऽनंतोऽनंततनावंबुनिधौ य- स्तं गोपालं संततकालं प्रति वन्दे ॥ ७ ॥ शैवाः प्राहुर्य शिवमन्ये गणनाथं शक्तिं चैकेक च तथान्ये मतिभेदात् ।। नानाकारै ति य एकोऽखिलशक्ति- स्तं गोपालं संततकालं प्रति वन्दे ॥ ८॥ श्रीमद्गोपालाष्टकमेतत् समधीते भत्त्या नित्यं यो मनुजो वै स्थिरचेताः ॥ हित्वा तूर्ण पापकलापं स समेति पुण्यं विष्णोर्धाम यतो नैव निपातः ॥ ९ ॥ इति श्रीपरमहंसस्वामिब्रह्मानन्दविरचितं श्रीगोपालाष्टकं संपूर्णम् ॥

[१५] अथ श्रीरमापत्यष्टकम्। तोटकं छन्दः। जगदादिमनादिम पुरुज शरदंबरतुल्यतनुं वितनुम् ॥ धृतकंजरथांगगदं विगदं प्रणमामि रमाधिपतिं तमहम् ॥१॥ कमलाननकंजरतं विरतं हृदि योगिजनैः कलितं ललितम् ।। कुजनैः सुजनरलभं सुलभ प्रणमामि रमाधिपति तमहम् ॥ २॥ मुनिवृन्दहृदिस्थपदं सुपदं निखिलाध्वरभागभुजं सुभुजम् ॥ हृतवासवमुख्यमदं विमदं प्रणमामि रमाधिपति तमहम् ॥३॥ हतदानवहप्तबलं सुबलं स्वजनास्तसमस्तमलं विमलम् ।।

समपास्तगजेन्द्रदरं सुदरं
प्रणमामि रमाधिपतिं तमहम् ॥ ४॥
परिकल्पितसर्वकलं विकलं
सकलागमगीतगुणं विगुणम् ॥
भवपाशनिराकरणं शरणं
प्रणमामि रमाधिपतिं तमहम् ॥५॥
मृतिजन्मजराशमनं कमनं
शरणागतभीतिहरं दहरम् ॥
परितुष्टरमाहृदयं सुदर्य
प्रणमामि रमाधिपति तमहम् ॥ ६॥
सकलावनिबिंबधरं स्वधरं
परिपूरितसर्वदिशं सुदृशम् ॥
गतशोकमशोककरं सुकर
प्रणमामि रमाधिपतिं तमहम् ॥ ७॥
मथितार्णवराजरसं सरसं
ग्रथिताखिललोकहदं सुहृदम् ॥
प्रथिताद्भुतशक्तिगणं सुगणं
प्रणमामि रमाधिपतिं तमहम् ॥८॥

[ १७ ] सुखराशिकरं भवबंधहरं परमाष्टकमेतदनन्यमतिः॥ पठतीह तु योऽनिशमेव नरी लभते खलु विष्णुपदं स परम् ॥ ९॥ इति श्रीपरमहंसस्वामिब्रह्मानन्दविरचितं श्रीरमापत्यष्टकं संपूर्णम् ॥ अथ श्रीरामाष्टकम् । प्रमाणिका छन्दः। कृतार्तदेववंदनं दिनेशवंशनंदनम् ॥ सुशोभिभालचंदनं नमामि राममीश्वरम् ॥१॥ मुनीन्द्रयज्ञकारकं शिलाविपत्तिहारकम् ।। महाधनुर्विदारकं नमामि राममीश्वरम् ॥२॥ स्वतातवाक्यकारिणं तपोवने विहारिणम् ॥ करेपुचापधारिणं नमामि राममीश्वरम् ॥३॥ कुरंगमुक्तसायकं जटायुमोक्षदायकम् ॥ प्रविद्धकीशनायकं नमामि राममीश्वरम् ॥४॥ चापति छैदः.

[१८]
एवंगसंघसंमति निवद्धनिम्नगापतिम् ॥
दशास्यवंशसंक्षतिं नमामि राममीश्वरम् ॥५॥
विदीनदेवहर्पणं कपीप्सितार्थवर्पणम् ॥
स्वबंधुशोककर्षणं नमामि राममीश्वरम् ॥६॥
गतारिराज्यरक्षणं प्रजाजनार्तिभक्षणम् ।।
कृतास्तमोहलक्ष्मणं नमामि राममीश्वरम् ॥७॥
हृताखिलाचलाभरं स्वधामनीतनागरम् ॥
जगत्तमोदिवाकरं नमामि राममीश्वरम् ॥८॥
इदं समाहितात्मना नरो रघूत्तमाष्टकम् ॥
पठन्निरंतरं भयं भवोद्भवं न विन्दते ॥ ९ ॥
इति श्रीपरमहंसस्वामिब्रह्मानंदविरचितं
श्रीरामाष्टकं संपूर्णम् ॥
अथ श्रीकृष्णाष्टकम् ।
प्रमाणिका छन्दः ।
चतुर्मुखादिसंस्तुतं समस्तसात्वतानुतम् ॥
हलायुधादिसंयुतं नमामि राधिकाधिपम् ॥१॥

[१९] बकादिदैत्यकालक सगोपगोविपालकम् ॥ मनोहरासितालकं नमामि राधिकाधिपम् ॥२॥ सुरेन्द्रगर्वगंजनं विरिचिमोहभंजनम् ॥ ग्रजांगनानुरंजनं नमामि राधिकाधिपम् ॥३॥ मयूरपिच्छमंडनं गजेन्द्रदंतखंडनम् ॥ नृशंसकंसदंडनं नमामि राधिकाधिपम् ॥४॥ प्रदत्तविप्रदारकं सुदामधामकारकम् ॥ सुरगुमापहारकं नमामि राधिकाधिपम् ॥५॥ धनंजयाजयावहं महाचमूक्षयावहम् ॥ पितामहव्यथापहं नमामि राधिकाधिपम्॥६॥ मुनीन्द्रशापकारणं यदुप्रजापहारणम् ॥ धराभरावतारणं नमामि राधिकाधिपम् ॥७॥ सुवृक्षमूलशायिनं मृगारिमोक्षदायिनम् ॥ स्वकीयधामयायिनं नमामि राधिकाधिपम्।। इदं समाहितोहितं वराष्टकं सदा मुदा ॥ जपानो जनुर्जरा दितोद्रुतं प्रमुच्यते ॥ ९ ॥ इतिश्रीपरमहंसस्वामिब्रह्मानंदविरचितं श्रीकृष्णाष्टकं संपूर्णम् ॥ १९ [२०] अथाभिलाषाष्टकम् । शिखरिणी छंदः। कदा पक्षीन्द्रांसोपरि गतमजं कंजनयनं रमासंश्लिष्टांगं गगनरुचमापीतवसनम् ॥ गदाशंखांभोजारिवरकरमालोक्य सुचिरं गमिष्यत्येतन्मे ननु सफलतां नेत्रयुगलम् ॥१॥ कदा क्षीराध्यतः सुरतरुवनांतर्मणिमये समासीन पीठे जलधितनयालिंगिततनुम् ।। स्तुतं देवैनित्यं मुनिवरकदंबरभिनुतं स्तवैः संस्तोप्यामि श्रुतिवचनगर्भः सुरगुरुम्॥ कदामामाभीतं भवजलधितस्तापसतर्नु गता रागं गंगातटगिरिगुहावाससदनम् ॥ लपंतं हे विष्णो सुरवररमेशेति सततं समभ्येत्योदारं कमलनयनो वक्ष्यति वचः॥३॥ कदा मे हृत्पद्मे भ्रमर इव पद्मे प्रतिवसन् सदा ध्यानाभ्यासादनिशमुपहूतो विभुरसौ ॥

[२१] स्फुरज्योतीरूपो रविरिष रमासेव्यचरणी हरिप्यत्यज्ञानाजनिततिमिरं तूर्णमखिलम् ॥ ४ ॥ कदा मे भोगाशा निबिडभवपाशादुपरतं तपः शुद्ध बुद्ध गुरुवचनतोदरचपलम् ॥ मनो मौनं कृत्वा हरिचरणयोश्चारु सुचिरं स्थिति स्थाणुमायां भवभयहरं यास्यति पराम् ॥५॥ कदा मे संरुद्धाखिलकरणजालस्य परितो जिताशेषप्राणानिलपरिकरस्य प्रजपतः॥ सदोंकारं चित्तं हरिपदसरोजे धृतवतः समेप्यत्युलासं मुहुरखिलरोमावलिरियम् ॥६॥ कदा प्रारब्धांते परिशिथिलतां गच्छति शनै: शरीरे चाक्षौघेप्युपरतवति प्राणपवने ॥ प्रजत्यूचं शश्वन्मम बदनकंजे मुहुरहो करिष्यत्यावासं हरिरिति पदं पावनतमम् ॥ ७॥ कदा हित्वा जीर्णा त्वचमिव भुजंगस्तनुमिमां चतुर्बाहुश्चक्रांबुजदरकरः पीतवसनः ।। घनश्यामो दूतैर्गगनगतिनीतो नतिपरै- मियामीशस्यांतिकमखिलदुःखांतकमिति ॥८॥ इति श्रीमत्परमहंसस्वामिब्रह्मानंदविर- चितमभिलाषाष्टकं संपूर्णम् ॥

[ २२ ] अथ श्रीवेदव्यासाप्टकम् । द्रुतविलंवितं छन्दः । कलिमलास्तविवेकदिवाकर समवलोक्य तमोवलितं जनम् ॥ करुणया भुवि दर्शितविग्रहं मुनिवरं तमहं सततं भजे ॥१॥ भरतवंशसमुद्धरणेच्छया स्वजननीवचसा परिनोदितः॥ अजनयत्तनयत्रितयं प्रभु- मुनिवरं तमहं सततं भजे ॥२॥ मतिबलादि निरीक्ष्य कलौ नृणां लघुतरं कृपया निगमांबुधेः॥ समकरोदिह भागमनेकधा मुनिवरं तमहं सततं भजे ॥३॥ सकलधर्मनिरूपणसागरं विविधचित्रकथासमलंकृतम् ॥

[ २३ ] व्यरचयच्च पुराणकदंबकं मुनिवरं तमहं सततं भजे ॥४॥ श्रुतिविरोधसमन्वयदर्पणं निखिलवादिमतांध्यविदारणम् ॥ ग्रथितवानपि सूत्रसमूहकं मुनिवरं तमहं सततं भजे ॥ ५ ॥ यदनुभाववशेन दिवं गतः समधिगम्य महास्त्रसमुच्चयम् ॥ कुरुचमूमजयदिजयो दुतं मुनिवरं तमहं सततं भजे ॥६॥ समरवृत्तविबोधसमीहया कुरुवरेण मुदा कृतयाचनः॥ सपदि सूतैमदादमलेक्षणं मुनिवरं तमहं सततं भजे ॥७॥ वननिवासपरौ कुरुदंपती सुतशुचा तपसा च विकर्पितो॥ मृततनूजगणं समदर्शयन् मुनिवरं तमहं सततं भजे ॥८॥ १ विजयोर्जुन:- २ कुरुवरेण धृतराष्ट्रेन- ३ सूत संजय.

[ २४ ] व्यासाप्टकमिदं पुण्यं ब्रह्मानन्देन कीर्तितम् ।। यः पठेन्मनुजो नित्यं स भवेच्छास्त्रपारगः ॥९ इति श्रीपरमहंसस्वामिब्रह्मानंदविरचितं श्रीवेद- व्यासाप्टकं संपूर्णम् । अथ भगवत्प्रातःस्मरणम् । वसंततिलकाछन्दः। प्रातः स्मरामि फणिराजतनौ शयानं नागामरासुरनरादिजगन्निदानम् ।। वेदैः सहागमगणरुपगीयमानं कांतारकेतनवतांपरमं निधानम् ॥१॥ प्रातर्भजामि भवसागरवारिपारं देवर्षिसिद्धनिवर्विहितोपहारम् ॥ संदृप्तदानवकदंवमदापहारं सौंदर्यराशिजलराशिसुताविहारम् ॥२॥ प्रातर्नमामि शरदंवरकांतिकांतं पादारविन्दमकरन्दजुपां भवांतम् ॥

[२६]
नानावतारहतभूमिभर कृतांत
पाथोजकंबुरथपादकर प्रशांतम् ॥ ३ ॥
श्लोकनयमिदं पुण्यं ब्रह्मानन्देन कीर्तितम्
यः पठेत्यातरुत्थाय सर्वपापैः प्रमुच्यते ॥५॥
इति श्रीपरमहंसस्वामिब्रह्मानंदविरचित
श्रीभगवत्प्रातःस्मरणं संपूर्णम् ।
अथ श्रीकृष्णार्तिः।
जय माधव मधुसूदन जय करुणासिंधो
जय भवभीतिविनाशन शरणागतबंधो॥
जय देव जय देव ॥ टेक॥
वंदे कमलेशानं विनतासुतयानम्। हरिविनता
जगदेकांतनिदानं कृतसुरगणमानम् ॥
जय देव जय देव ॥१॥
दुस्तरमायाजालं शोभितवनमालं हरिविधृत.
श्यामलकुंचितवालं त्रिभुवनजनपालम् ॥
जय देव जय देव ॥२॥

[ २६ ] सागरजापरिवार कौस्तुभमणिहारमाहरिकौस्तुभ० वृन्दारण्यविहारं निगमागमसारम् ॥ जय देव जय देव ॥३॥ ब्रह्मानंदविकाशं पूरितसकलाशम्। हरिपूरित. दानवपूगविनाशं खंडितभवपाशम् ॥ जय देव जय देव ॥ ४ ॥ इति श्रीपरमहंसस्वामिब्रह्मानंदविरचिता श्रीकृष्णातिः संपूर्णा ॥ अथ संस्कृतगानपदम् । भगवंतमनंतमज भज रे॥ मनसा विपयेषु रतिं त्यज रे ।। भगवंत टेक।। मुतदारधनादि विहाय चलं ॥ गुरुमात्मविदं शरणं ब्रज ॥१॥ भगवंत शृणु शास्वरहस्यकथाविमलाः॥ हृदये गतमोहमलं मृज रे ॥ २॥ भगवंत. निखिलं जगदेतदवेहि मृपा॥ परमात्मनि नित्यमति सृजरे ॥३॥ भगवंत.

[२७] परिहाय मनोभ्रमजालमिदं हरिमेकमुदारमते यज रे॥४॥ भगवंत. इति श्रीपरमहंसस्वामिब्रह्मानंदविरचितं संस्कृत- गानपदं संपूर्णम् । अथ भाषागानपदम् । ख्याल नाम हरीका दिलसे प्यारे कवी भुलाना ना चहिये पाकर नरका बदन रतनको खाक मिलाना ना चहिये । देक॥ सुंदर नारी देख पियारी मनको लुभाना ना चहिये जलतिअगन में जान पतंग- समान समाना ना चहिये विनजाने परिणाम कामको हाथ लगाना ना चहिये

[२८]
कोई दिनका ख्याल कपटका
जाल विछाना ना चहिये ॥१॥
यह मायाबिजलीका चमका
मनको जमाना ना चहिये
विछडेगा संयोग भोगका
रोग लगाना ना चहिये
लगे हमेशा रंग संग दु-
जनके जाना ना चाहिये
नदीनावकी रीत किसीसें
प्रीत लगाना ना चहिये ॥ २॥
वांधवजनके हेत पापका
खेत जमाना ना चहिये
अपणे पादपर अपणे करकर
चोट लगाना ना चहिये
अपणा करणा भरणा दोप
किसीपर लाना ना चाहिये
अपणी आंख है मंद चंदको
दो वतलाना ना चहिये ॥३॥

[ २९ ] करणा जो शुभ काज आज कर देर लगाना ना चहिये कल जाने क्या हाल कालको दूर पिछाना ना चहिये दुर्लभ तनको पाय जाय विष- योंमें गमाना ना चहिये भवसागरमें नाव पाव च- करमें डुबाना ना चहिये ॥ ४ ॥ दारादिक सब गेर फेर तिन- में अटकाना ना चहिये करी वमनके ऊपर फिर कर दिल ललचाना ना चहिये जान आपनो रूप कूपगृह- में लटकाना ना चहिये पूरे गुरुको खोज मझवका- बोझ उठाना ना चहिये ॥५॥ वचा चाहे पापनसें मनसें मौत भुलाना ना चहिये [३०] जो है सुखकी लाग तो कर सब त्याग फिराना ना चहिये जो चाहे तुं ज्ञान विषयके वाण विधाना ना चहिये जो है मोक्षकी आस संगकी पाश फसाना ना चहिये ॥६॥ परमेश्वर है तनमें बनमें सोज न जाना ना चहिये कस्तूरी है पास मिरगको घास मुंघाना ना चाहिये कर सतसंग विचार निहार कवी विसराना ना चहिये विनसतजनसें कोटिजतनसें परपद पाना ना चहिये ॥७॥ आतममुखको भोग भोगमें फिर भटकाना ना चहिये पाई जिसको सांड छोड तिम- को सलसाना ना चाहिये [३१3 यह जग स्वप्ना जान ध्यानसे मनको डुलाना ना चहिये ब्रह्मानंदको हेर फेर भवमें भरमाना ना चहिये ॥८॥ इति श्रीपरमहंसस्वामिब्रह्मानंदविरचितमष्टपदख्याल समाप्तम्॥

अथ शुद्धिपत्रम् । पक्ति 0 शुद्धम् शाखातरादन कहेहै ४ १७ १९ २१ २२ २३ ६ १४ अशुद्ध शास्त्रातरादत्र कहेहै कहेहै कहेहैं कहेहै करेहै करेहै कहेहै करेहै कपितुल्यता दीपशिखोपमा जावेहै दिश्लोकोकरके द्वितीय नचाबरे कहेहै करेहै करेहै कहेहै करेहै कपितुल्यता दीपशिखोपमा जावेहै विश्लोकरके तृतीय नांवरे ३३ १ ७४ १२

er
Survar
१
२०२
२२० ।
२२०
२४२
[२]
विशुद्धत्यचिरं
करिआयेहै
दोनहि
भूवोंका
करेगे
दोनेमेसें
विशुद्धत्यचिरं
करिआयेहै
दोनोंहि
ध्रुवोंका
करेंगे
दोनोंमेसें
१०

Shri Vichar Dipak

Author
Swami Bramhanand
Title
Shri Vichar Dipak
File name
Shri Vichar Dipak
Text
OCR done
Citation
1814
Published
2012/08
Publisher
Mumbai.,nirnay Sagar Press
Language
Sanskrit
Pages
316
Library
Bharatiya Vidya Bhavan Library, Mumbai
DLI number
311520
Barcode
99999990320399.00
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Banasthali University
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