Acharya Shri Vinaychandra Gyan Bhandar, Jaipur

Shri Karmstav Dusara Karmgranth

Suri, Shri Mad Devendra · 2011/07

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श्रीसालाना -
गोगा मारला.
": मंडल
.

नंडार
संख्या54A
असमागा
संस्करण ऊपजा
Prat
Raja Bejo: Sing Dudhonia of Azimgini

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पुना मि
श्रीगात्मानन्द जैन
रोशन पार
मंडल

-
नंडार
संख्या.54→A
माजमार्ग)
-~-संस्करण अपनी
Rua Berns Sing Dullest et leungit
.
भापा

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MER
संख्या 54→A
जअमागा
संस्करण मजा
ग्रन्थ-क्रम.
पृ०
सूचना
निवेदन
प्रस्तावना
१३-१५
विषयसूची
বৃষি
.१७-१६
~
*१-६३
अनुवाद
परिशिष्ट
१
कोश
....."E-११६
--
मूल शर्मस्तव
-१९७-१२०

* सूचना *
इस पुस्तक के प्रारम्भ में जिन महानुभाव का फोटो है ये
जैनसमाज के श्रीमानों में से एक है। ये पाजीमगंज के
प्रतिष्ठित रईस हैं। कर्मग्रन्थ के इस अनुयाद में उनकी उदारता
का उपयोग किया गया है। एतदर्थ हम उन्हें धन्यवाद देते
है। आगे के कर्मप्रग्यों के अनुयाद तैयार हो रहे हैं तथा
छप भी रहे हैं । इस लिये जो,भगवान् महायोर की वाणी के
उपासक अपनी चञ्चल लक्ष्मी का सदुपयोग करना चाहें
यह हमें सूचना देवें जिससे कि पवित्र ग्रन्थों के सर्वप्रिय
अनुवाद कार्य में उन की लक्ष्मी का उपयोग किया जाये।
इस का मूल्य लागत से भी कुछ कम ही रखा गया है।
कागज, छपाई श्रादि सय वस्तुओं की अति अधिक महँगी
के कारण खर्च अधिक होता है। हमारा उद्देश सस्ते में धा-
मिक साहित्य का प्रचार करना है । जहाँ तक संभव है हम
अपने उद्देश की ओर पूर्ण लक्ष देते हैं।
भीमारमानंद जैन पुस्तक
प्रचारक मंडल रोशन मोहल्ला
प्रागर.

डार
संख्या 54→A
आम माग)
संस्करण मजा
निवेदन।
-
शठक ! यह दूसरे कर्मग्रन्थ का हिन्दी अनुवाद मूल तथा
छाया सहित आपकी सेवामें उपस्थित किया जाता है। पहिले
फर्मग्रन्थ के बाद दूसरे कर्म गन्थ का अध्ययन परमावश्यक है ।
क्योंकि इस के बिना पढ़े तीसरा आदि अगले कर्मग्रन्धों में
तथा कम्मपयडी, पञ्चसंग्रह धादि पाकर ग्रन्थों में प्रवेश ही
नहीं किया जा सकता। इस लिये इस कर्मग्रन्थ का भीमहत्व
यहुत अधिक है । यद्यपि इस कर्मग्रन्थ की मूल गाथायें सिर्फ
चौतीस ही हैं तथापि इतने में प्रचुर विषय का समावेश
ग्रन्थकार ने किया है। अत एव परिमाण में अन्य वडा न होने
पर भी विषय में बहुत गंभीर तथा विचारणीय है।
इस अनुचाद के प्रारंभ में एक प्रस्तावना दी हुई है जिस
में दूसरे कर्मग्रन्थ की रचना का उद्देश्य, विषय-वर्णन-शैली,
विषय-विभाग, 'कर्मस्तव' नाम रखने का अभिप्राय इत्यादि
विषय, जिन का सम्बन्ध दूसरे कर्ममन्यसे है,उन पर थोसा,पर
श्रावश्यक विचार किया गया है। पीछे गुणस्थान के सामान्य
स्वरूपके सम्बन्ध में संक्षिप्त विचार प्रगट किये गये हैं। वाद विष.
यसूची दी गई है, जिससे प्रत्यक विषय.गाधा और पृप धार
मालूम हो सकते हैं। अनन्तर शुद्धिपत्र है । तत्पश्चात् मूल,
छाया, हिंदी अर्थ तथा मायार्थ सहित 'कर्मस्तय' नामक
.

मग फर्मप्राय दाइम में योग्यस्थानों में यात्र-कभी दिये गये है। इस के याद एक परिशिष्ट जिम मयताम्गरीय- दिगम्बरीय कर्मविषयक साहित्य के कुछ समान तथा अस. मान यात उल्लिखित की हुई हैं। परिशिप के याद कोश दिया गया है.जिस में मूल दूसरे कर्मग्रंथो शब्द, अकारादि क्रममे देकर उनकी छाया तथा हिंदी अर्थ दिया गया है। अंत में गाथायें है, जो मूल मात्र याद करने वालों के लिये या उसे देखने वालों के लिये विशेष उपयोगी है। यदि इस ग्रन्थके अनुवाद में कोई त्रुटि रह गई हो तो वि. शेपदर्शी पाठकों से हम अनुरोध करते हैं फि घे कृपया उस की सूचना देयें ताकि दूसरी श्रावृत्ति में संशोधन किया जा सके निवेदक- वीरपुत्र.

नडार
ख्याः54→A
अममागा
संस्करण मजा
ॐ
प्रस्तावना।
ग्रन्थ-रचना का उद्देश्य ।
'कर्मविपाक' नामक प्रथम कर्मप्रन्थ में कर्म की मूल तथा
उत्तर प्रशातियों का वर्णन किया गया है। उस में बन्ध-योग्य,
उदय-उदारणा-योग्य और सत्तायोग्य प्रकृतियों को दी जुदी
संख्या भी दिखलाई गई है। अब उन प्रकृतियों के बन्ध की
उदय-उदीरणा की और सत्ताको योग्यता को दिखाने की,
आवश्यकता है। सो इसी अावश्यकता को पूरा करने के
उद्देश्य से इस दूसरे कर्मग्रन्ध की रचना हुई है।
विषय-वर्णन-शैली।
मंसारी जीप गिनती में अनन्त हैं। इसलिए उनमें से
एक एक व्यक्ति का निर्देश करके उन सब को बन्धादि-सम्य.
धिनी योग्यता फो दिखाना असंभव है । इसके अतिरिक्ष

...... दूसगकर्मग्रन्थ है।इस म योग्यस्थानों में यन्त्र-नकशे-भी दिये गये हैं। इस के याद एक परिशिष्ट है जिस में श्वेताम्बरीय- दिगम्यरीय कर्मविषयक साहित्य के कुछ समान तथा अस. मान बात उल्लिखित को हुई है । परिशिष्ट के बाद कोश दिया गया है.जिस में मूल दूसरे कमग्रंथके शब्द, अकारादि क्रमसे देकर उनकी छाया तथा हिंदी अर्थ दिया गया है। अंत में गाथायें हैं, जो मूल मात्र याद करने वालो के लिये या उसे देखने वालों के लिये विशेप उपयोगी हैं। यदि इस ग्रन्थके अनुवाद में कोई त्रुटि रह गई हो तो वि. शेपदी पाठकों से हम अनुरोध करते हैं कि घे कृपया उस की सूचना देये नाकि दूसरी श्रावृत्ति में संशोधन किया जा सके निये- वीरपुत्र.

डार (ख्या54-A जगमा) -संस्करण अपना (३) -- प्रत्येक गुणस्थानवी जीवों की बन्ध योग्यता को दिखाया है । इसी प्रकार उदयाधिकार में, उनकी उदय सम्बन्धिनी योग्यता को, उदीरणाधिकार में उदीरणा-सम्बन्धिनी योग्यता को और सत्ताधिकार में सत्ता-सम्बन्धिनी योग्यता को मि. खाया है। उक्त ४ अधिकारी को घटना, जिस वस्तु पर की गई है, उस वस्तु-गुणस्थान-क्रमका नाम-निर्देश भी ग्रन्थ के श्रारम्भ में ही कर दिया गया है । अतएव, इस ग्रन्थ का विषय, पांच भागों में विभाजित हो गया है। सबसे पहले, गुण- स्थान:क्रम का निर्देश भोर पोछ क्रमशः पूर्वति चार अधिकार। 'कर्मस्तव, नाम रखने का अभिप्राय । श्राध्यात्मिक विद्वानों की दृष्टि, सभी प्रवृत्तियों में प्रात्मा फी और रहती है। वे, करें कुछ भी पर उस समय अपने सामने एक ऐसा प्रादर्श उपस्थित किये होते हैं कि जिससे उन के आध्यात्मिक महत्वामिलाप पर जगतू के आकर्षण का कुछ भी असर नहीं होता। उन लोगों का अटल विश्वास होता है कि ठीक ठोक लक्षित दिशा की ओर जो जहाज चलता हैं वह, यदुन कर विघ्न बाधाओं का शिकार नहीं होता। यह विश्वास, कर्ममन्य के रचयिता प्राचार्य में भी था। इस से उन्हों ने अन्य रचना-विपरक प्रवृत्ति के समय भी महान् थादर्श को अपनी नज़र के सामने रखना चाहा | ग्रन्थकार की दृष्टि में आदर्श थे भगवान महावीर । भगवान् महावीर के जिस कर्मक्षयमा असाधारण गुण पर ग्रन्धकार मुग्ध हुए धं उस गुण को उन्होंने श्रपनी शनि द्वारा दाना चाहा 1 हम लिए प्रस्तुत प्रत्य की रचना उन्होंने अपने श्रादर्श भगवान् महावीर की स्तुति के यहान से की है । रस अन्ध में मुरप । (२) एक व्यक्ति में यधादि-सम्बन्धिनी योग्यता भी सदा एकी नहीं रहती; क्योंकि परिणाम य विचार के बदलते रहने के। कारण यन्धादि-विषयक योग्यता भी प्रतिसमय यदला करती है । अतएय प्रात्मदर्शी शास्त्रकारों ने देहधारी जीयों के १४ वर्ग किये हैं । यह वर्गीकरण, उनकी श्राभ्यन्तर गुद्धिकी उत्कान्ति-अपफ्रान्ति के आधार पर किया गया है । इसी वर्गीकरण को शास्त्रीय परिभाषा में "गुणस्थान-क्रम' कहते है । गुणस्थान का यह प्राम, ऐसा है कि जिसके १४ विभागों में सभी देहधारी जीयों का समावेश हो जाता है जिससे कि अनन्त देहधारियों की बधादि-सम्यधिनी योग्यता को १४ विभागों के द्वारा बतलाना सहज हो जाता है और एक जीव व्यक्ति की योग्यता-जो प्रतिसमय यदला करती है-उसका भी प्रदर्शन किसी न किसी विभाग के द्वारा किया जा सकता है। संसारी जीयों की प्रान्तरिक शुद्धि के तरतम भाषकी पूरी वैज्ञानिक जॉच करके गुणस्थान- कम की घटना की गई हैं। इससे यह बतलाना या समझना सहज हो गया है कि अमुक प्रकार की प्रान्तरिक अशुद्धि या शुद्धिवाला जीव, इतनी ही प्रकृतियों के यन्ध का,उदय-उदी. गणा का और सत्ता का अधिकारी हो सकता है । इस कर्म- ग्रन्थ में उक्त गुणस्थान क्रम के आधार से ही जीवों की यन्धा. दि-सम्बन्धिनी योग्यता को यतलाया है । यही इस ग्रन्थ की विपय वर्णन शैली है। । विपय-विभाग। इस ग्रन्ध के निपय के मुख्य चार विभाग हैं (१) बन्धा- धिकार (२) उदयाधिकार, (३) उदारणाधिकार और (8) सत्ताधिकार । गन्धाधिकार में गुणस्थान ऋम को लेकर नडार (ख्या547A अमागा --- संस्करण मजा भाषा mmar (५) शष्य रखा जाय, मतलय एक ही है । परन्तु इस जगह इसकी चर्चा, फेवल इसीलिए की गई है कि प्राचीन दूसरे कर्मग्रन्थ के और गोम्मटसार के दूसरे प्रकरण के नाम में कुछ भी फरक नहीं है। यह नाम की एकता, श्वेतांबर-दिगंबर श्राचार्यों के ग्रन्ध-रचना-विषयक पारस्परिक अनुकरण का पूरा प्रमाण है । यह यात ध्यान देने योग्य है कि नाम सर्वथा समान होने पर भी गोम्मटसार में तो 'स्तध' शब्द की व्याख्या बिलकुल विलक्षण है, पर प्राचीन द्वितीय कर्मप्रन्ध में तथा उसकी टीका में 'स्तव' शब्द के उस विलक्षण अर्थ की कुछ भी सूचना नहीं है । इस से यह जान पड़ता है कि यदि गोम्मटसार के यन्धोदयसब-युक्त नाम का प्राश्रय लेकर प्राचीन द्वितीय कर्मग्रन्थ का वह नाम रखा गया होता तो उसका विलक्षण श्रर्थ भी इस में स्थान पाता यह कहना पड़ता है कि प्राचीन द्वितीय कर्मग्रन्थ की रचना, गोम्मटसार से पूर्व हुई होगी। गोम्मटसार की रचना का समय, विक्रम की ग्यारहवीं शताब्दी पतलाया जाता है। प्राचीन हितीय कर्मग्रन्थ की रचना का समय तथा उसके फर्ती का नाम श्रादि शात नहीं । परन्तु उसकी टीका करने वाले श्री गोविन्दाचार्य जो श्रीदेवनाग के शिष्य थे। श्री गोविन्दाचार्य का समय भी संदेह की तह में छिपा है पर उनकी बनाई हुई टीका की प्रति-जोवि०सं०१२८८ में ताडपत्र पर लिखी हुई है-मिलती है। इस से यह निश्चित है कि उन का समय, वि० सं० १२८ से पहले होना चाहिए । यदि अनुमान से टीकाकार का समय १२ वीं शतादी माना जाय तो भी यह अनुमान करने में कोई अापत्ति नहीं कि मूल द्वितीय कर्मप्रन्ध की रचना उससे सौ-दोसौ वर्ष पद | इससे घरीन, कर्म के पधादिका है, पर याद किया गया है स्तुति के बहाने से । अतएय, प्रस्तुत प्रन्य का प्रयानुरूप माम 'कर्म- स्तष' रखा गया। ग्रन्थ-रचना का याधार । इस ग्रन्थ की रचना 'प्रार्चान कर्मस्तय' नामक दूसरे कर्म प्रन्थ के अाधार पर हुई है। उसका और इस का विषय एक हो है । भेद इतना ही है कि इस का परिमाण, प्राचीन कर्मग्रन्य से श्रल्प है। प्राचीन ५५ गाथाएँ हैं.पर इसमें ३४ जो यान प्राचीन कुछ विस्तार से कही है उसे इसमें परिमित शब्दों के द्वारा कह दिया है । यद्यपि व्यवहार में प्राचीन कर्मग्रन्थ का नाम, 'कर्मस्तव' है, पर उसके प्रारंभ की गाथा से स्पष्ट जान पड़ता है कि उसका असली नाम, 'अन्धोवयसत्त्व-युफ्त स्तव' है। यथा:- नमिऊण जियवरिंदे तिहुयणवरनाणदंसापईये । पंधुदयसंतजुत्त वोच्छामि ययं निसामेह ॥१॥ प्राचीन के आधार से बनाये गये इस कर्मग्रन्थ का 'कर्मस्तव' नाम कर्ता ने इस मन्ध के किसी भाग में उलिखित नहीं किया है, तथापि इसका 'कर्मस्तप' नाम होने में कोई संदह नहीं है। क्योंकि इसी प्रन्थ के कर्ता श्री देवेन्द्रसूरि ने अपने रच तीसरे कर्मप्राय के अन्त में 'नेयं कम्मत्ययं सोई' इस अंश से उस नाम फा कथन कर ही दिया है। 'स्तय शाद के पूर्व. में 'यन्धोदयसरव' या 'कर्म' कोरगी

डार
स्या54A
अमा)
संस्करण मजा
(७)
सपलंगेककंगेक्कंगहियार सवित्वरं ससंखे ।
वराणणसत्य थयथुइधम्मकहा होइ णियमेण ।।
(गो, कर्म. गा.)
অখান কি মিথয় ক ৪মর খাী কা বিংশ যা
संक्षप से वर्णन करनेवाला शास्त्र
स्तव' कराता है । एक
अंग का विस्तार या संप से वर्णन करनेवाला शास्त्र
स्तुति और एक अंग के किसी अधिकार का वर्णन जिसमें
है यह शास्त्र धर्मकथा' कहाता है।
इस प्रकार विषय और नामकरण दोनी तुल्यमाय होने
पर भी नामार्थ में जो मेद पाया जाता है, वह सम्प्रदाय भेद
तथा ग्रन्थ-रचना-सम्बन्धी देश-काल के भेद का परिणाम
जान पड़ता है।
गुणस्थान का संक्षित सामान्य स्वरूप ।
आत्मा की अवस्था किसी समय अक्षान पूर्ण होती है ।
यह अवस्था सय से प्रथम होने के कारण निकट है । उस
अवस्था से प्रात्मा अपने स्वाभाविक चेतना, चारित्र प्रादि
गुणों के विकास की बदौलत निकलता है, और धीरे धीरे
उन शक्तियों के विकास के अनुसार उत्क्रान्ति करता था
विकास को पूर्णकला अन्तिम इदको पहुँच जाता है।
पहली निट श्रयस्था से निकल कर, विकास को प्राखरी
भूमि की पाना ही प्रात्मा का परम सार है। इस परमसाध्य
को सिद्धि होने क प्रात्मा को एक के बाद दूसरी, दुसरी के

हो होनी चाहिए । इससे यह हो सकता है कि कदाचित् उस द्वितीय कर्मग्रन्य का ही नाम गोम्मटसार में लिया गया हो और स्वतंत्रता दिखाने के लिए 'स्तव' शद की व्याल्या यिल कुल बदल दी गई हो। अस्तु, इस विषय में कुछ भी निश्चित कहना माहस है । यह अनुमान-मृष्टि, वर्तमान लेखकों को शली का अनुकरण मात्र है। इस नवीन द्वितीय कर्मग्रन्थ के प्रणेता श्रीदेवेन्द्रसूरि का समय आदि पहले कर्म- ग्रन्थ की प्रस्तावना से जान लेना। गोम्मटसार में 'स्तव' शब्द का साङ्केतिक अर्थ इस फर्मग्रन्थ में गुणस्थान को लेकर बन्ध, उदय, उदी. गरणा और सत्ता का विचार किया है वैसे ही गोम्मटसार में भी किया है। इस कर्मग्रन्थ का नाम तो 'कर्मस्तय' है पर गांग्मटसार के उस प्रकरण का नाम 'यन्धोदयसाब-युक्त- स्तव' जो "वन्धुदयसत्तजुत् ओघादेसे थर्य चोच्छ" इस कथन से सिद्ध है (गो. कर्म गा.८७)। दोनों नामों में कोर विशेप अन्तर नहीं है। क्योंकि कर्मस्तव में जो 'कर्म' शब्द है उसी की जगह 'बन्धोदयमध्ययुक्त' शब्द रखा गया है । परन्तु 'स्तव' शब्द दोनों नामों में समान होने पर भी, उसके अर्थ में बिलकुल भिन्नता है । 'कर्मस्तय'.में 'स्तय' शब्द का मतलय स्तुति से है जो सर्वत्र प्रसिद्ध ही है पर गोम्मटसार में 'स्तय' शब्द का स्तुति अध न करके खास सांकेतिक अर्थ किया गया है। इसी प्रकार उसमें 'स्तुति' शब्द का भी पारि. भाषिक अर्थ किया है जो और कहीं दृष्टिगोचर नहीं होना। जैसे:- .

डार
ख्या54→A
यामाग)
-संस्करण मजा
सपलंगेकरूंगेक्कंगहियार सवित्थर ससंखे ।
वणणसत्यं ययथुइधम्मकदा होइ थियमेण ॥
(गो. म. गा.)
अर्थात् किसी विषय के समस्त अंगों का विस्तार या
संक्षप से वर्णन करनेवाला शास्त्र
'स्तव' कहाता है । एक
अंग का विस्तार या संक्षेप से वर्णन करनेवाला शास्त्र
स्तुति और एक अंग के किसी अधिकार का वर्णन जिसमें
है वह शास्त्र 'धर्मकथा' कहाता है।
इस प्रकार विपय और नामकरण दोनों तुल्यप्राय होने
पर भी नामाथ में जो भेद पाया जाता है, वह सम्पदाय-भेद
तथा प्राय-रचना-सम्यन्धी देश-काल के भेद का परिणाम
जान पड़ता है।
-
गुणस्थान का संक्षिप्त सामान्य स्वरूप।
आत्मा की अवस्था किसी समय अज्ञान-पूर्ण होती है
वह अयस्था सब से प्रथम होने के कारण निरुष्ट है । उस
अवस्था से प्रात्मा अपने स्वाभाविक धेतना, चारित्र आदि
गुणों के विकास की बदौलत निकलता है, और धीरे धीरे
उन शहियों के विकास के अनुसार उकान्ति करता हुश्रा
विकास की पूर्णकला अन्तिम इदको पहुँच जाता है।
पहली निरुप नवस्था से निकल कर, विकास को श्राखरी
भूमि को पाना ही पारमा का परम साध्य है। इस परम साध्य
का सिद्धि होग नक अात्मा को एक के बाद दूसरी, दुसरी के

. पाद नासरी ऐसी प्रमिक अनेक अयम्याग्री में से गुजरना पहना है। इन्ही अग्रस्थाओं की श्रेणि को 'विकास क्रम' या 'उत्क्रान्ति मार्ग' कहते है और जनशास्त्रीय परिभाषा में उस 'गुणस्थान-कम' कहते हैं । इस विकास क्रम के समय होने घाली श्रात्मा की भिन्न भिन्न अवस्थानों का संक्षेप,१४ भागों में कर दिया गया है। ये १४ भाग, गुणस्थान के नाम से प्रसिद्ध है । दिगम्यर-साहित्य में 'गुणस्थान' अर्थ में संक्षेप, श्रोध, सामान्य और जीवसमास शब्दों का भी प्रयोग देखा जाता है । १४ गुणस्थानों में प्रथम की अपेक्षा दूसरा, दूसरे की अपेक्षा तीसरा-इस प्रकार पूर्व-पूर्ववर्ती गणस्थान की अपेक्षा पर-परवती गुणस्थान में विकास की मात्रा अधिक रहती है। विकास की न्यूनाधिकता का निर्णय सात्मिक स्थिरता की न्यूनाधिकता पर अवलस्थित है । स्थिरता, समाधि, अन्तर्दृष्टि, स्वभाव-रमण, स्वोन्मुखतान सय शादी का मतलब एक ही है । स्थिरता का तारतम्य दर्शन और चारित्र-शक्ति की शुद्धि के तारतम्य पर निर्भर है । दर्शन- शक्ति का जितना अधिक विकास, जितनी अधिक निर्मलता उतना ही अधिक आविर्भाव सद्विश्वास, सद्रुचि, सदलि, सस्श्राधा या सत्याप्रह का समझिये । दर्शन-शक्ति के विका- सफे याद चारिम-शक्ति के विकास का नभ्यर आता है। जित. ना जितना चारित्र-शक्ति का अधिक विकास उतना उतना अधिक प्राविर्भाव क्षमा, संतोप, गाम्भीर्य इन्द्रिय जय धादि बारिध गुणों का होता है। जैसे जैसे दर्शन-शक्ति व वारित्र शक्ति की विशुद्धि पढ़ती जाती है, तैसे तैसे स्थिरता की मात्रा मी अधिक अधिक होती जाती है। दर्शन व चारित्र- शक्ति की घिशुद्धि का पदना-पटना, उन शक्तियों के प्रति , - व' ख्या-54-A उजामाग) संस्करण माग यन्धक (रोकनेवाले) संस्कारों की न्यूनता-अधिकता या मन्दता-तीमता पर अवलम्बित है । प्रथम तीन गुणस्थानों में दर्शन-शक्ति व चारित्र-शक्ति का विकास इसलिये नहीं होता कि उनमें उन शक्तियों के प्रतिनन्धक संस्कारों की अधिकता या तीयता है । चतुर्थ श्रादि गुणस्थानों में वे ही प्रतियन्धक संस्कार कम (मन्द) हो जाते हैं। इससे उन गुणस्थानों में शक्तियों का विकास प्रारम्भ हो जाता है। इन प्रतियन्धक (कपाय ) संस्कारों के स्थूल दृष्टि से ४ विभाग किये हैं। ये विभाग उन कापयिक संस्कारों की विपाक-शक्ति के तरतम-भाव पर प्राधित हैं । उनमें से पहला विभाग-जो दर्शन-शक्ति का प्रतिबन्धक है-उसे दर्शनमोह तथा अनन्तानुयन्धी कहते हैं। शेष तीन विभाग चारित्र-शक्ति के प्रतिबन्धक है। उनको यथाक्रम अप्रत्या- ख्यानाधरण, प्रत्याख्यानाधरण और संज्वलन कहते हैं। प्रथम विभाग की तीयता, न्यूनाधिक प्रमाण तीन गुणस्थानों ( भूमिकाओं ) तक रहती है । इस से पहले तीन गुणस्थानों में दर्शन शक्ति के प्राधिर्भाव का सम्भव नहीं होता । कपाय के उक्त प्रथम विभाग की अल्पता, मन्दता या अभाष होते हो दर्शन-शक्ति व्यक्त होती है। इसी समय मात्मा की दृष्टि खल जाती है । दृष्टि के इस उन्मेष को विवेक- ख्याति, भेषज्ञान, प्रकृति-पुरुषान्यता-साक्षात्कार और ब्रह्म- क्षान भी कहते हैं। इसी रामष्टि से प्रारमा अचेतन का भेद, असंदिग्ध रूप से जान लेता है। यह उसके विकास-क्रम की चौथो भूमिका है । इसी भूमिका से घह अन्तटि यन जाता है, और प्रारम मंदिर में वर्तमान तात्विक परमात्म-स्वरूप को देखता है। पहले की नानभूमिकामा दर्शनमोह और भगातानु- .

'" (१०) . ३ 7 । गन्धी नाम के कपाय संमागे की मालता के कारण प्रामा अपने परमात्म-भाव को देख नहीं सकता। उस समय वह हिष्टि होता है । दर्शनमोह श्रादि मन्कारी के वेग के कारण उस समय उसकी दृष्टि, इतनी अस्थिर प चंचल बन जाती है कि जिससे वह अपने में ही वर्तमान परमात्मस्वरूप या ईश्वरत्व को देख नहीं सकता । ईश्वग्त्य भीतर ही है. परन्तु है वह अत्यन्त सूनमः इमलिय स्थिर व निर्मल दृष्टि के द्वारा ही उसका दर्शन किया जा सकता है । चौथी भूमि- का या चौथ गुणस्थान को परमात्म भाव के या ईश्वरत्व के दर्शन का द्वार कहना चाहिये । और उतनी हद तक पहुँच हुये अान्मा को अन्तरात्मा कहना चाहिये । इसके विपरीत, पहली तीन भूमिकाओं में धनने के समय, श्रात्मा को पहिरात्मा कहना चाहिये । क्योकि यह उस समय बाहरी वस्तुओं में ही श्रात्मत्य की ब्रान्ति से इधर उधर दौड लगाया करता है। चौथी भूमिका में दर्शनमोह तथा अनन्तानुयन्धी संस्कारों का यंग तो नही ररता. पर चारित्र-शयित के प्रावरण भूत संस्कारी का वंग अवश्य रहता है। उनमें से अप्रत्यारयाना.. घरत संस्कार का वंग चौथी भूमिका से आगे नहीं होत इमन पाँचवी भूमिका में चारित्र शक्ति का प्राथमिक विकास होता है, जिससे उस समय प्रात्मा, इन्द्रिय-जय, यम-नियम आदि को थोड़े यहुन रूपमै फरता है-थोड़े यहुत नियम पालन के लिय सहिगु हो जाता है। प्रत्याख्यानावरण नामक संस्कार-जिनका पेग पाँची भूमिका से भागे नहीं है-उन झी चारित्र-शक्ति का विकास और भी पदता है, जिससे प्रात्मा बाहरी भोगों से हटकर पूरामंन्यासी पन जाता है । यह हुई विकास की छट्ठी भूमिका। इस भूमिका में भी चारित-शक्ति के विपक्षी 'संज्यलन' नाम के संस्कार कमी कभी ऊधम मचाने हैं, जिससे चारित्र शक्ति का . का प्रभाय MS रख्या54→A अमागा संस्करण बजाय विकाम बना ना नहीं. पर उमको शुद्धि या स्थिरता में अन्तराय इस प्रकार आते है, जिस प्रकार वायु के वेग के कारण,दिये की ज्योति की स्थिरता व अधिकता में। प्रात्मा जर संञ्यान नामक संस्कारों को याता है,तय उत्क्रान्तिपथ को साती श्रादि भूमिकाओं को लाँधकर ग्यारहवीं यारहवीं भूमिका तक पहुँच जाता है । वारही भूमिका में दर्शन-शक्ति व चारित्र-शक्ति के पिता संस्कार सर्वथा नष्ट हो जाते हैं, जिसमे उक्त दोनों शक्तियाँ पूर्ण विकसित हो जाती हैं নথৰ ৰ গুয়াম মা গা মা ল ক কাব্য श्रात्मा को स्थिरता परिपूर्ण होने नहीं पाती । यह चौदही भूमिका में सर्वथा पूर्ण बन जाता है और शरीर का वियोग होने के बाद वह स्थिरता, वह चारित्र-शक्ति अपन यथार्थ- रूपम विकसित होकर सदा के लिये एकसी रहती है। इसी को मौन कहते हैं । मोक्ष कहीं बाहर से नहीं आता । वह प्रात्मा की समय शक्तियों का परिपूर्ण व्यक्त होना मात्र है- मोक्षम्य न हि वासोऽक्लिन प्रामातरमेव च। श्रज्ञान हृदयग्रन्थिनाशो मोक्ष इति स्मृतः ।। (शिवगीता-१३.३२) यह विकास की पराकाष्ठा, यह परमारम-भाव का अभेद, यह चौथी भूमिका ( गुणस्थान ) में देखे हुये ईश्वरत्व का तादात्म्य, यह वदान्तियों का ब्रह्म-भाव, यह जीव का शिव होना, और यही उकान्ति-मार्ग का अन्तिम माध्य। इसो साध्य तक पहुँचने के लिये श्रात्मा को विरोधी संस्कारों के साथ लहते भगढ़ते. उन्हें दयाते, उत्प्रान्ति मार्ग की जिन जिन भूमिकाओं पर नाना पड़ता है, उन भूमिकाओं के क्रम को ही गणन्यान क्रम' समझना चाहिये । यह तो हुथा गुणस्थानों का सामान्य स्वरूप उन सब का विशेष स्वरूप यो प्राहुन विस्तार की माथ इसी कर्मग्रन्थ को दूसरो गाथा की व्यारया में लिख दिया गया है। निक-धीर. m (१०) नन्धी नाम के कपाय संस्कारों की प्रबलता के कारण प्रात्मा अपने परमात्म भाव को देस नहीं सकता। उस समय यह पहिष्टि होता है । दर्शनमोह श्रादि संस्कारों के वेग के कारण उस समय उसकी दृष्टि, इतनी अस्थिर यचंचल वन जाता है कि जिससे वह अपने में ही वर्तमान परमात्म स्वरूप या ईश्वरत्व को देख नहीं सकता । ईश्वग्त्व भीतर ही है. परन्तु है वह अत्यन्त सन्मः इमलिये स्थिर व निर्मल दृष्टि के द्वारा ही उसका दर्शन किया जा सकता है । चौथी भूमि- का या चौथ गुणस्थान को परमात्म भाव के या ईश्वग्न्य के दर्शन का द्वार कहना चाहिये । और उतनी हद तक पहुँच हुये आत्मा को अन्तरात्मा कहना चाहिये । इसके विपरीत, परली तीन भूमिकाओं में वर्नने के समय, प्रात्मा को बहिरात्मा करना चाहिये । क्योंकि वह उस समय बाहरी वस्तुओं में ही श्रामन्य की भ्रान्ति से इधर उधर दौड लगाया करता है । चाची भूमिका में दर्शनमोह तथा अनन्तानुयन्धी संस्कारों का वेग तो नहीं रहता, पर चारित्र शक्ति के श्रावरण भूत संस्काग का वेग श्रयश्य रहता है। उनमें से अप्रत्याग्याना.. वारा संस्कार का बैग चौथी भूमिका से आगे नहीं होत रमम पाँची भूमिका मे चारित्र शक्ति का प्राथमिक विकास होता ह, जिससे उस समय प्रात्मा, इन्द्रिय-जय, यम-नियम प्रादि को थाई बहुत रूपमे करता है-थोड़े यहुत नियम पालन के लिय सहिरा हो जाता है। प्रत्याख्यानावरण नामक संस्कार-जिनका धंग पाँची भूमिका से धागे नहीं है-उन का प्रभाव घटते ही चारित्र-शक्ति का विकास और भी घदता है, जिससे प्रात्मा याहरी भोगों से हटकर पूरा संन्यासी बन जाता है। यह हुई विकास की छुट्टी भूमिका। इस भूमिका में भी चारित्र-शक्ति के विपक्षी 'संज्वलन' नाम के संस्कार कभी कभी उधम मचाते हैं, जिससे चारित्र शक्ति का डिार ख्या54→A सामागा - संस्करण उपमा , (१२) विकाम बना तो नहीं. पर उसको शुद्धि या स्थिरता में अन्तराय इस प्रकार आते है, जिस प्रकार घायु के घेग के कारण,दिये की ज्योति को स्थिरता व अधिकता में श्रात्मा जय संज्वलन'नामके संस्कारों को दाता है,तर उत्क्रान्सिपथ की सातची श्रादि भूमिकाओं को लाँधकर ग्यारहवीं यारहवीं भूमिका तक पहुँच जाता है । बारहवीं भूमिका में दर्शन-शक्ति व चारिम-शक्ति के विपक्षी संस्कार सर्वथा नष्ट हो जाते है, जिनमे उक्त दोनों शक्नियाँ पूर्ण विकसित हो जाती है। तथापि उन अवस्था में शरीर को सम्बन्ध रहने के कारण श्रात्मा को स्थिरता परिपूर्ण होने नहीं पाती । यह चौदहवीं भूमिका में सर्वथा पूर्ण बन जाती है और शरीर का वियोग होने के बाद वह स्थिरता, यह चारित्र शक्ति अपने यथार्थ- रुपमै विकसित होकर सदा के लिये एकसी रहती है। इसी को मोक्ष कहते हैं। मोक्ष कहीं बाहर से नहीं पाता । यह ranा को नमन शक्तियों का परिपूर्ण व्यक्त होना मात्र है- मोक्षम्य न हिचासोऽस्ति न नामान्तरमेव च । अज्ञान हदयग्रन्थिनाशो मोक्ष इति स्मृतः । {शिवगीता-१३.३२) यह विकास की पराकाष्ठा, यह परमात्म-भाव का अभेद. यह चौथी भूमिका (गुणस्थान) में देखे हुये ईश्वरत्व का तादात्म्य, यह वदान्तियों का ब्रह्म-भाव, यह जीव का शिव होना, और यही उकान्ति-मार्ग का अन्तिम साध्य । इसो साध्य तक पहुँचने के लिये श्वात्मा को विरोधी संस्कारों के साथ लड़ते झगड़ते. उन्हें दवाते, उन्फ्रान्ति-मार्ग की जिन जिन भूमिकाओं पर आना पड़ता है, उन भूमिकानों के क्रम को ही 'गणस्थान म' समझना चाहिये । यह तो हुश्रा गुणस्थानों का सामान्य स्वरुप उन सब का विशेष स्वरूप धोते यदुन विस्तार की माथ इसी कर्मग्रन्थ की दूसरी गाया की व्यागया में लिख दिया गया है। निक-वीर. an -- (20) नन्धी नाम के फपाय संस्कागं की प्रबलता के कारण प्रामा अपने परमात्म-भाव को देख नहीं सकना । उस समय यह घहिदृष्टि होता है । दर्शनमोह श्रादि संस्कारों के वेग के फारण उस समय उसकी दृष्टि, इतनी अस्थिर य चंचल चन जाती है कि जिससे वह अपने में ही वर्तमान परमात्मस्वरूप या ईश्वरत्व को देख नहीं सकता । ईश्वग्त्व भीतर ही है. परन्तु है यह अत्यन्त सून्म; इसलिये स्थिर व निर्मल दृष्टि के द्वारा ही उसका दर्शन किया जा सकता है । चौथो भूमि- का या चौथ गुणस्थान को परमात्म-भाव के या ईश्वरत्व के दर्शन का द्वार कहना चाहिये । और उतनी हद तक पहुँच हुये प्रान्मा को अन्तरात्मा कहना चाहिये । इसके विपरीत, पहली तीन भूमिकाओं में वर्तने के समय, श्रात्मा को यहिरात्मा कहना चाहिये । क्योंकि यह उस समय बाहरी वस्तुओं में ही प्रात्मत्य की भ्रान्ति से इधर उधर दौड लगाया करता है। चौथी भूमिका में दर्शनमोह तथा अनन्तानुबन्धी संस्कारों का वंग तो नहीं रहता, पर चारित्र-शक्ति के प्रावरण भूत संस्कारी का घेग अवश्य रहता है। उनमें से अप्रत्याग्याना.. वररा संस्कार का वेग चौथी भूमिका से आगे नहीं होत इससे पाँचवी भूमिका में चारित्र शक्ति का प्राथमिक विकास होता है जिससे उस समय प्रात्मा, इन्द्रिय-जय, यम-नियम श्रादि को थोड़े बहुत रूपमे करता है-थोड़े बहुत नियम पालने के लिय सहिष्णु पो जाता है। प्रत्याख्यानावरण नामक संस्कार-जिनका वेग पाँची भूमिका से भागे नहीं है. उन का प्रभाय घटते ही चारित्र-शक्ति का विकास और भी बढ़ता है, जिससे प्रारमा याहरी भोगों से हटकर पूरा संन्यासी यन जाता है । यह हुई विकास की छट्ठी भूमिका। इस भूमिका में भी चारित्र-शक्ति के विपती 'संज्वलन' नाम के संस्कार दाभी कभी ऊधम मचाते है, जिससे चारित्र-शक्ति का । ।

डिार ख्या54→A माग संस्करण मजा - दुसरे कर्मग्रन्थ की विषय-सूची । विषय. पृष्ठ. गाथा. ...... १ ...... ..... ५ . " . " मंगलाचरण १ गुणस्थानों के नाम ३ गुणस्थान का सामान्य स्वरूप मिथ्यादिगुणस्थान का स्वरूप सासादनसम्यग्दृष्टिगुणस्थान का स्वरूप सम्यामिध्यादृष्टिगुणस्थान का स्वरूप अविरतसम्यग्दृटिगुणस्थान का स्वरूप १२ देशविरतगुणस्थान का स्वरूप १४ प्रमत्तसंयतगुणस्थान का स्वरूप अप्रमत्तसंयतगुणस्थान का स्वरूप' निवृत्तिगुणस्थान का स्वरूप अनिवृत्तियादरसंपरायगुणस्थानका स्वरूप २० धूधमसंपरायगुणस्थान का स्वरूप उपशान्तकषायतिरागछद्मस्थगुण- . " ...... . ...... , " . " ...... २२ . " स्थानका स्वरूप २२ , " জাযষীরায়ান का स्वरूप . सयोगिकेयलिगुणस्थान का स्वरूप अयोगिकेपलिगुणस्थान का स्वरूप २८

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1डार ख्या-54-A जमा) संस्करण अपना . गाथा. ~ , 7 २२-२३ A ७० विषय. पृष्ट. मुक्ष्मसम्पराय में उदय उपशान्तमोह में उदय क्षीणमोह और सयोगिकेवली में उदय ३५ अयोगिकवली मे उदय उदय-यन्त्र उदीरणाधिकार-३ उदय से उदारणा की विशेषता उदीरणा-यन्त्र सत्ताधिकार-४ मत्ता का लक्षण और पहले ग्यारह गुणधानी में प्रकृति-सत्ता अपूर्वकरण प्राटि ४ और सम्यक्त्व प्रादि ४ गुणस्थानों में मतान्तर से सत्ता क्षपकणि की अपेक्षा से सम्यक्त्व. गुणस्थान श्रादि में सत्ता अनिवृत्तिकरण के दूसरे भाग श्रादि में सत्तार सूदमसंपराय और क्षीणमोह की सत्ता ८९ सयोगी की सत्ता अयोगी की सत्ता मतान्तरसे अयोगीके चरम समयमें सत्ता५ सत्ता-यन्त्र उत्तर प्रकृतियों का बंध, उदय,उदीरणा और सत्ता-सम्बन्धी यन्त्र २५ , २८-२६ १ ३२२३३ ......... ......... - mawat (२४) गाथा. . ३ ४ 4 विषय. पृष्ट. बन्धाधिकार-१ चन्ध का लक्षण और मिथ्यात्य का प्रकृति-यन्ध सासादन का प्रकृति-वन्ध मिश्र का प्रकृति-बन्ध ३६ अधिरतसम्यग्दृष्टि और देविरति का प्रतिबन्ध ३६ प्रमस का प्रकृति-वन्ध प्रमत्त का प्रकृति बन्ध अपूर्वकरण का प्रकृति यन्ध अनिवृत्ति का प्रकृति बन्ध सूक्ष्मसंपराय का प्रकृति बन्ध उपशान्तमोह, क्षीणमोह और सयोगिकवली का प्रकृति-यन्ध ६ . ... १ ,१०-११ ४ट - ૨ घन्ध यन्त्र ५० . उदयाधिकार-२ उदय उदीरणा का लक्षण तथा मिथ्यात्व में उदय सासादन में उदय ...... १४ मिथ में उदय ...... :555 ' ...... १ ..... " . १५-१६ अविरतसम्यग्दृष्टि में उदय देशविरति में उदय प्रमत्त में उदय अप्रमत्त में उदय अपूर्वकरण और अनिवृत्ति में उदय ...... १ ...... ...... " १ १७ .

डार श्या.54→A (leveren -संस्करण जाजा Mn गाथा. - २० २२-२३ . ७४ विषय. पृष्ट. सूक्ष्मसम्पराय में उदय उपशान्तमोह में उदय क्षीणमोह और सयोगिकेवली में उदय श्रयोगिकेवली मे उदय उदय- गन्ध उदीरणाधिकार-३ उदय से उदीरणा की विशेषता उदीरणा-यन्त्र सत्ताधिकार-४ मत्ता का लक्षण और पहले ग्यारह गुणस्थानों में प्रकृति-सत्ता अपूर्वकरण आदि ४ और सम्यक्त्व प्रादि ४ गुणस्थानों में मतान्तर से सत्ता क्षपकणि की अपेक्षा से सम्यक्त्व. गुणस्थान प्रादि में सत्ता अनिवृत्तिकरण के दूसरे भाग श्रादि में सत्तार सूक्ष्मसंपराय और क्षीणमोह की सत्ता १ सयोगी की सत्ता अयोगी की सत्ता मतान्तरसे अयोगीके चरम समय में सत्ताः५ -- १ , ,३१३३ सत्ता-यन्त्र उत्तर प्रकृतियों का बंध, उदय,उदारणा और सत्ता-सम्बन्धी यन्न { 1 与的人是非 डार स्या54→A अजमार्ग) -संस्करण मजा शुद्धि-पत्र पृष्ठ. पं० १ १ .६ १६ " " ४ अशुद्धि. शुद्धि. कमाई कम्माई श्रयाधा याधा खाचं खींच संक्रमण संक्रमणकरण मिध्यात्वास० मिथ्यात्वसा० निवृत्यनिवृति निवृत्त्यनिवृत्ति विशेष को विशेषों को भिन्न भिन्न भिन्न अशुद्धि तथा शुद्धिसे।अशुद्धिवढ़ जाती है यद्यपि शुद्धि तथा अशुद्धि से मिध्वात्व मिथ्यात्वी सहते सहते सहते रेशम की बाँस की प्रन्थि की ग्रान्थ को अर्थात् अर्थात् अन्तःकरणकी क्रिया अन्तरकरणकी ८ । २० ७ " " अन्तःकरण की क्रिया शुरू अन्तरकरण की ७ १० १४ " जीयको प्रायिक जो जीयको क्षायिक

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.डार स्या.54→A जसमागा -संस्करण उपजा भापा पृ० पं० (१६) अशुद्धि. शुद्धि. ४६ कारण १ श्रो ३म कारणों क शेप १११ सप्ताशितिदेशे सप्ताशीतिर्देश एकाशितिः एफाशीतिः गुणस्थान गुणस्थान में के सम्यक्त्व सासादनसम्यक्त्य कर्म० ११७ कर्म० शेप उदय चतुरिन्द्रिय उदय चतुरिन्द्रियों पर्यन्त को होता है परन्तु एकेन्द्रिय से लेकर चतुरिन्द्रिय पर्यन्त अर्थ- १८ ॥१८॥ अतएव यारहवें चारहवें अगुर० अगुरु. लोहिनामतकर्म लोहितनामकर्म सम्यकत्वी सम्यक्त्वी चरिममेगसश्रो चरिमेगसयो पानुपूर्वी प्रानुपूर्वी ७ २० १६ .. ८२ २ १४ ऐक ... पृ० पं. (२८) अशुद्धि. अध्यवसायों का शुदि. अध्यवसायों का और दूसरा वर्ग उत्कृष्ट अध्ययसायों ३ १७ १७ भिन्न ही होते हैं , भिन्न ही होते हैं तथा प्रथम समय के जघन्य अध्ययमायों से प्रथम समय के उत्रप्टअध्यवसाय अनंतगुण विशुद्ध समझने चाहिए समझने चाहिए और प्रत्येक समय के जघन्य अभ्यवसाय सेतत्समयक उत्कृष्ट अध्यवसाय अनन्त- गुण विशुद्ध पूर्व पूर्ष सिवा सिवा तीसरे स्याभाधिक स्वाभाविक द्यपि यद्यपि ५ दुःखर दुस्यर याच बीच पमते पमत्ते शेष १६ १३ २२ ३० ૨૨ ३३ ३६ ३८ २२ ४ २५ ३१ ४६ शेप २२ ।

.डार स्या54→A अजमार्ग) - संस्करण मजा Ithilt (१६) पृ० पं० अशुद्धि. ४७ शुद्धि. कारण १ कारणों ओ३म M १२ ५४ ५ गुणस्थान में ६ " . सप्ताशितिर्देशे सप्ताशीतिदेशे एकाशितिः एकाशीतिः गुणस्थान क के सम्यक्त्व सासादनसम्यक्त्व कर्म० ११७ कर्म शेष शेप १११ उदय चतुरिन्द्रिय उदय चतुरिन्द्रियों पर्यन्त को होता है परन्तु एकेन्द्रिय से लेकर चतुरिन्द्रिय पर्यन्त अर्थ- १८ ॥१८॥ श्रतएव यारहवें चारहवें अगुर० अगुरु० लोहिनामतकर्म लोहितनामकर्म सम्यकत्वी सम्यक्त्वी चरिममेगसो चरिमेगसो श्रानुपूर्वी आनुपूर्वी ६२ ७ " - २० ७६ है ८२ २ - एक *.

- -ܪܐ डार त्या.54A माग) संस्करण मजा hle . कर्मस्तवनामक दूसरा कर्मग्रन्थ । बन्धाधिकार। सह थुणिमो वीरजिणं जह गुणाणेसु सयलकमाई । चन्दनोदीरण्यासत्तापत्ताणि सचियाणि ॥ १ ॥ (तथा स्तुमा चीरजिनं यथा गुणस्थानेषु सकलकर्माणि । बन्धोदयोदीरणासत्ताप्राप्तानि क्षपितानि ॥ १ ॥) श्रर्थ-गुणस्थानों में बन्धको, उदय को, उदीरणा को और सत्ता को प्राप्त हुये सभी कमों का क्षय जिस प्रकार भग घान् चोर ने किया, उसी प्रकार से उस परमात्मा की स्तुति हम करते हैं। भावार्थ-श्रसाधारण और वास्तविक गुणों का कथन ही स्तुति कहलाती है। सफल कर्मों का नाश यह भगवान का श्रसाधारण और यथार्थ गुण है, इससे उस गुण का कथन करना यही स्तुति है। मिथ्यात्वचादि निमित्तों से शानापरणश्रादि रूप में परिणत होकर फर्म पुलों का श्रात्मा के साथ दूध पानी के समान मिलजाना, उसे "यंध" कहने हैं।

-- Ms. स्या54A सामाग) -संस्करण सभा Jble . वैधे हुये कर्मका तप-ध्यान-श्रादि साधनों के द्वारा प्रामा से अलग हो जाना "निर्जरा" कहलाती है। - जिस वीर्य-धिशेष से कर्म, एक स्वरूप को छोड़ दूसरे सजातीय स्वरूप को प्राप्त कर लेता है, उस चाय विशेष का नाम "संक्रमण” है। इस तरह एक कर्म प्रकृति का दूसरी सजानीयकर्मप्रकृतिरूप बन जाना भी संक्रमण कहाता है। जैसे- मतिज्ञानावरणीय कर्म का श्रृतज्ञानावरणीय कर्मरूपमें बदल जाना या तज्ञानावरणीय कर्म का मतिज्ञानावरणीय कर्म रूप में बदल जाना। क्योंकि ये दोनों प्रकृतियाँ झानावरणीय फर्म का भेद होने से श्रापस में सजातीय हैं।] प्रत्येक गुणस्थान में जितनी कर्म प्रकृतियों का बन्ध हो मकता है, जितनी कर्म प्रमतियों का उदय हो सकता है, जितनी कर्म प्रकृतियों की उदीरणा की जा सकती है और जितनी कर्म प्रकृनियॉ सत्तागत हो सकती है। उनका क्रमशः घणन करना, यही ग्रन्थकार का उद्देश्य है । इस उद्देश्य को ग्रन्थकार ने भगवान महावीर की स्तुति के बहाने से इस ग्रन्थ में पूरा किया है ॥२॥ पहले गुण स्थानों को दिखाते हैं मिच्छ मासा मीसे अविश्य देसे पपत्त अपमत्त । नियष्टि अनियट्टि सुहमु वसम खीण सजोगि यजोगिगुणा।।२।। (मिथ्यावमाबादन मिश्रमविरतदेश प्रमत्तापमत्तम् । निहत्येनिवति मूक्ष्मोपशम क्षीणमयोग्यऽयोगिगुणाः।२१)

(२)
उदय काल अाने पर फर्मों में गुभाशुभ फल का भोगना,
"उदय" कहलाता
[प्रयाधा फाल व्यतीत हो चुकने पर जिस समय कर्मके फल
का अनुभव होता है, उस समय को "उदयकाल" समझना
चाहिये।
बन्ध हुये फर्म से जितने समय तक यात्मा को अवाधा
नहीं होनी-शात् शुभाशुभ फल का चेदन नहीं होता उतने
समय को "श्रयाधा काल" समझना चाहिये।
,
सभी कर्मों का प्रयाघा काल अपनी अपनी स्थिति के
अनुसार जुदा जुदा होता है। कभी तो यह श्रयाधा काल स्था.
भाविक प्रमसे ही व्यतीत होता है, और कभी अपवर्तना
करण से जल्द पूग होजाता है।
जिस वीर्यविशेष से पहले बंधे हुये कर्म की स्थिति तथा
ग्म पट जाते हैं उसको, अपवर्तना करण" समझना चाहिये।
श्रयाधा काल व्यतीत हो चुकने पर भी जो कर्मदलिक पीछे
मे उदय में लाने वाले होते हैं. उनको प्रयत्नविशेष से खींच
कर उदय प्राश दलिकों के साथ भाग लेना उस "उदारणा
कहते हैं।
बंधे हुये कर्म का अपने स्वरूप को न छोड़ कर श्रात्मा के
माश लगा रहना "गसा" कहलाती है।
[घर फर्म, निर्जरा में ग्रार संभामण से अपने स्वरूप को
छोड़ देता है।
.

डार न्या.54A माग -संस्करण अाज - ... बंधे हुये कर्मका तप-ध्यान-नादि साधनों के द्वारा आत्मा से अलग हो जाना "निर्जरा" कहलाती है। - जिस धीर्य-विशेष से कर्म, एक स्वरूप को छोड़ दूसरे सजातीय स्वरूप को प्राश कर लेता है, उस चाय विशेष का नाम "संक्रमण" है । इस तरह एक कर्म प्रकृति का दूसरी सजातीयकर्मप्रकृतिरूपवन जाना भी संक्रमण कहाना है। जैसे- मतिज्ञानावरणीय कर्म का शुतज्ञानावरणीय कर्मरूपमें बदल जाना या श्रुतज्ञानावरणीय कर्म का मतिज्ञानावरणीय कर्म रूप में बदल जाना । क्योंकि ये दोनों प्रकृतियों कानावरणीय फर्म का भेद होने से आपस में सजातीय हैं।] -- । मन्येक गुणस्थान में जितनी कर्म प्रकृनियों का बन्ध हो सकता है, जितनी कर्म प्रातियों का उदय हो सकता है, जितनी कर्म प्रकृतियों को उदीरणा की जा सकती है और जितनी कर्म प्रकृतियॉ सन्तागत हो सकती है। उनका प्रमशः यणन करना, यही ग्रन्थकार का उद्देश्य है । इस उश्य को ग्रन्थकार ने भगवान महावीर की स्तुति के बहाने से इस अन्य में पूरा किया है ॥२॥ पहले गुण स्थानों को दिखाते हैं मिच्छे सासण मीसे अविश्य देसे पपत्त अपयंत । नियहि अनियटि सुहम वसम लीगण सजोगि यजोगिगुण।।२।। (मिथ्यात्वमापादन मिश्रमविरतदेश प्रमत्ताममत्तम् । नित्यनिनि सूक्ष्मोपशमशीणमयोग्यध्योगिगुणाः॥२) - ( । श्री-गुणस्थान के १४ (चौदह ) भन है। जैसे--(१) मिथ्यापि गुणस्थान , (२) मास्यादन ( मासादन ) सम्यग्दृष्टि गुणस्थान (३) सम्यग्मिध्यापि (मिश्र) गुणम्यान (४) अविरत सम्यग्रीए गुणस्थान (५) देशयिरत गुग्णस्थान, (६) प्रमत्तसंयत गुणस्थान,(७) अप्रमत्तंसयत गुणस्थान(८) निवृत्ति (श्रपूर्वकरण),गुणस्थान(E)अनिवृलियादर सम्पराय गुणस्थान (१०) सूचमसम्पराय गुणस्थान, (१३) उपशान्त- काय पीतराग छास्थ गुणस्थान, (१२) दीरणकपाय वीत. गग-छमस्थ गुणस्थान, (१३) सयोगि फेवलि गुणस्थान और (१४) आयोगि फेवलि गुणस्थान। भावार्थ -जी के स्वरूपविशेष को (भिन्न स्वरूप को) गुग्गस्थान कहते हैं। ये स्वरूपविशेष ज्ञान दर्शन चारित्र शादि गुणों की शुद्धि तथा अशुद्धि के तरतम-भाव से होते हैं। जिस वक्त अपना प्रावरणभूत कर्म कम होजाता है,उस वक्त ज्ञान-दर्शन-चारित्र-श्रादि गुणों को शुद्धि अधिक प्रकट होती है। और जिस वक्त आचरणभूत कर्म की अधिकता हो जाती है, उस वक्त उक्त गुणों की शुद्धि कम हो जाती है, और अशु- द्धि तथा अशुद्धि से होनेवाले जीव के स्वरूप विशेष असंख्य प्रकार के होते हैं, तथापि उन सब स्वरूप-विशेषों का संक्षेप चौदह गुणस्थाना के रूप में कर दिया गया है । चौदहाँ गुणम्थान मोक्षरूप महल को प्राप्त करने के लिये सीदियों के समान है। पूर्व पूर्व गुणस्थान की अपेक्षा उत्तर २ गुण- स्थान में ज्ञान-श्रादि गुणों की शुद्धि यदती जाती है, और अशुद्धि घटती जाती है । अतएव प्रागे शगे के गुणस्थानों में अशुभ प्रकृतियों की अपेक्षा शुभ प्रहानियां अधिक याँधी जाती हैं, और शुभ प्रकृतियों का बंध भी क्रमशः रुकना जाना है। - .डार त्या.54→A जसमागा -संस्करण मजा -4 (५) मिथ्याष्टि गुणस्थान-मिथ्यात्व-मोहनीय कर्म के उदय से जिस जीव की रष्टि (श्रद्धा या प्रतिपत्ति) मिथ्या (उलटी) हो जाती है, वह जीव मिथ्यादृष्टि कदाता है-जैसे धतूरे के वीज को खानेवाला मनुष्य.सफेद चीज़ को भी पीली देखता ओर मानता है। इसी प्रकार मिथ्यात्वा जीव भी जिसमें देव के लक्षण,नहीं है उसको देव मानता है, तथा जिस में गुरु के लक्षण नहीं उसपर गुरु-युद्धि रखता है और जो धर्मों के लक्षणों से रहित है उसे धर्म समझता है । इस प्रकार के मिथ्याष्टि जोधका स्वरूप-विशेष हो मिथ्याष्टि-गुणस्थान कहाता है। प्रश्न-मिथ्यात्वी जीव के स्वरूप-विशेष को गुणस्थान कैसे कह सकते हैं? क्योंकि जब उसकी दृष्टि मिथ्या (श्रय- थार्थ ) है तब उसका स्वरूप-विशेप,मी विकृत-अर्थात् दो. पात्मक हो जाता है। " . " उत्तर-यद्यपि मिथ्यात्वी की दृष्टि सर्वथा ,यथार्थ नहीं होतो, तथापि यह किसी अंशमै यधार्य भी होती है। क्योंकि मिथ्यात्वी जीव भी मनुष्य, पशु, पक्षी-श्रादि को मनुष्य, पशु, पक्षी श्रादि रूपसे जानता तथा मानता है । इस लिये उसके स्वरूपविशेष के. गुणस्थान कहा है। जिस प्रकार सघन यादलों का श्रावरण होने पर भी. सूर्य की प्रभा सर्वथा नहीं छिपती, किन्तु कुछ न कुछ एली रहती ही है जिससे कि दिनरात का विभाग किया जा सके। इसी प्रकार मिध्यात्व मोहनीय कर्म का प्रयल उदय होने पर भी जीव का हएि-गुण सर्वथा श्रावृत नहीं होता। अतपय किसी न किमी अंश में मिथ्यात्वी की टिभी यथार्थ होती है। ।

(४. अर्थ-गुणस्थान ये. १४ (चौदाह) भेद है। जैसे--(२) मिथ्यापि गुणस्थान , (२) मास्यादन ( मासादन ) सम्यग्दादि गुणस्थान (३) सम्यग्मिध्यापि (मिश्र) गुणस्थान (४) अविरत सम्यग्रीट गुणस्थान (५) देशविरत गुणस्थान, (६) प्रमत्तसंयत गुणस्थान,(७) अप्रमत्तसयत गुणस्थान() निवृत्ति (अपूर्वकरण),गुणस्थान(६)अनिवृत्तियादर मम्पराय गुणस्थान (१०) सूचमसम्पराय गुणस्थान, (११) उपशान्त फाय वीतराग छनास्थ गुणस्थान, (१२) क्षीणकपाय धीत. गग-छमस्थ गुणस्थान, (१३) सयोगि फेवलि गुणस्थान और (१४) योगि फेवलि गुणस्थान। भावार्थ-जी के स्वरूपविशेष को (भिन्न स्वरूप को) गुणस्थान कहते हैं। ये स्वरूपविशेष शान दर्शन चारित्र थादि गुणों की शुद्धि तथा अशुद्धि के तरतम-भाव से होते हैं । जिस वक्त अपना आवरणभूत फर्म कम होजाता है,उस वक्त शान-दर्शन-चारित्र-आदि गुणों को शुद्धि अधिक प्रकट होती है। और जिस वक्त आपरणभूत कर्म की अधिकता हो जाती है, उस वक्त उक्त गुणों की शुद्धि कम हो जाती है, और अशु- द्वि तथा अशुद्धि से होनेवाले जीव के स्वरूप विशेष असंख्य प्रकार के होते हैं, तथापि उन सय स्वरूप-विशेषों का संक्षप चौदह गुणस्थानों के रूप में कर दिया गया है । चौदहीं गुणस्थान मोक्षरूप महल को प्राप्त करने के लिये सीढ़ियों के समान है। पूर्व पूर्व गुरणस्थान की अपेक्षा उत्तर २ गुण- स्थान में शान-श्रादि गुणों की शुद्धि यदती जाती है, और अशुद्धि घटती जाती है । श्रतपय मागे धागे के गुणस्थानों में अशुभ प्रकृतियों की अपेक्षा शुभ प्रकृतियां अधिक थाँधी जाती है, और शुभ प्रकृतियों का बंध भी क्रमशः एकता जाता है।

डार स्या.54A माग) - संस्करण उपज . . (७) प्रसंगवश इसी जगह श्रीपशमिक सम्यक्त्व की प्राप्ति काम लिख दिया जाता है। जीव अनादि काल से संसार में घूम रहा है, और तरह तरह के दुःखों को पाता है। जिस प्रकार पर्वत की नदी का पत्थर इधर उधर टकरा कर गोल और चीफना बन जाता है,इसी प्रकार जीव भी अनेक दुःख सहते कोमल और शुद्ध परिणामी बन जाता है। परिणाम इतना शुद्ध हो जाता है कि जिस के बल से जीव श्रायु को छोड़ शेष सात कमी की स्थिति को पल्योपमा. संख्यात भाग न्यून कोटा कोटी सागरोपम प्रमाण कर देता है। इसी परिणाम का नाम शास्त्र में यथामवृत्ति करण है। यथाप्रवृति करण से जीव रागद्वेष की एक ऐसी मजबूत गाँट, जोकि कर्करा, दृढ़ और गूढ रेशम की गांठ के समान दुर्भद है यहां तक पाता है, परन्तु उस गांठ को भेद नहीं सकता, इसी को ग्रन्धिदेश की प्राप्ति कहते हैं। यथाप्रवृत्ति करण से भव्य जीव भी अधिदेश की प्राप्ति कर सकते हैं. अर्थात् कर्मों की बहुत बड़ी स्थिति को घटा कर अन्तः कोटाकोटि सागरोपम प्रमाण कर सकते हैं, परन्तु वे रागद्धेप की दुभेद ग्रन्धिको तोड़ नहीं सकते। और भव्य जीच यथाप्रवृत्ति करण नामक परि- रणाम से भौविशेष शुद्ध-परिणाम को पा सकता है। तयां उस के द्वारा राग द्वेप की घटतम प्रन्थि को-अर्यात् राग द्वेप के प्रति दृढ़-संस्कारों को छिन्न भिन्न कर सकता है। भव्य जीव जिस परिणाम से राग द्वेष की दुर्भद ग्रन्थि को लांघ जाता है, उस परिणाम को शास्त्र में "श्रपूर्वकरण" कहते हैं। "अपूर्वकरण" नाम रखने का मतलब यह है कि इस प्रकार का परिणाम कदाचित् ही होता है, बार बार नहीं होता। श्रत एव यह परिणाम असा है। इसके विपरीत "यथाप्रवृत्ति" प्रश्न-जय मिटयानोकोमा किमोनो अंश में या हो सकती है, तब उसे सम्यग्रष्टि कामे और मानने में पाधा है? उत्तर-एफ अंश मात्र की या प्रीमि होने से जीय सम्यग्रष्टि नहीं कहाता, क्योंकि शाग्न में ऐसा कहा गया है कि जो जीव सर्वन के कहे हुये यारह अगों पर श्रद्धा रसता है परन्तु उन अगों के किसी भी एक अक्षर पर विश्वास नहीं फरता, यह भी मिथ्यारष्टि ही है। जैसे जमालि । मिथ्यात्य की अपेक्षा सम्यविन्य-जीव में विशेषता यही है कि मवंश के कथन के ऊपर सम्यक्त्वी का विश्वास अखंडित रहता है, और मिथ्यात्वी का नहीं ॥१॥ सासादन सम्यग्दृष्टि गुणास्थान-जो जीप श्रीपशमिक सभ्यपरवी है,परन्तु अनन्तानुयन्धि कपाय के उदय से सम्यक्स को छोड़ मिथ्यात्व की ओर झुक रहा है, यह जीव जय तक मिथ्यात्व को नहीं पाता तय तफ-अर्थात् जघन्य एक समय और उत्कृष्ट छः श्रावलिका पर्यन्त सासादन सम्यग्दृष्टि कहाता है और उस जीव का स्वरूप-विशेष"सासादन सम्यग्दृष्टि- गुण स्थान" कहाता है। इस गुणस्थान के समय यद्यपि जीव का भुकाय मिथ्यात्व फी और होता है, तथापि जिस प्रकार तीर खा कर उस का चमन करने वाले मनुष्य को खोर का विलक्षण स्वाद अनुभव में प्राता है, इसी प्रकार सम्यक्त्व से गिरफर मिथ्यात्व की और मुफे हुये उस जीव को भी, कुछ काल के लिये सम्यक्त्व गुण का प्रास्वाद अनुभव में पाता है। अत एव इस गुगण स्थान को "सास्वादन मम्यगृष्टिगणम्मान" भी कहने है ॥

.डार त्या54+A अमागा -संस्करण मना - . प्रसंगवश इसी जगह श्रीपशामिक सम्यक्त्व की प्राप्ति का क्रम लिख दिया जाता है। जीव धनादि काल से संसार में घूम रहा है, और तरह तरह के दुःखों को पाता है। जिस प्रकार पर्वत की नदी का पत्थर इधर उधर टकरा कर गोले और चीफना बन जाता है,इसी प्रकार जीव भी अनेक दुःख सहते कोमल और शुद्ध परिणामी थन जाता है । परिणाम इतना शुद्ध हो जाता है कि जिस के बल से जीवं श्रायु को छोड़ शेष सात कर्मी को स्थिति को पल्योपमा. संख्यात भाग न्यून कोटा कोटी सागरोपम प्रमाण कर देता है। इसी परिणम का नाम शास्त्र में यथाप्रवृत्ति करण है। यथाप्रवृति करण से जीव रागद्वेप की एक ऐसी मजबूत गाँठ, जोकि कर्करा, दृढ़ और गूढ रेशम की गांठ के समान दुर्भद है वहां तक पाता है, परन्तु उस गांठ को भेद नहीं सकता, इसी को प्रन्धिदेश की प्राप्ति कहते हैं। यथाप्रवृत्ति करण से श्रभव्य जीव भी ग्रन्धिदेश की प्राप्ति कर सकते हैं-अर्थात् कर्मा की बहुत बड़ी स्थिति को घटा कर अन्तः कोटाकोटि सागरोपम प्रमाण कर सकते हैं, परन्तु वे रागद्वेष को दुर्भद ग्रन्धिको तोड़ नहीं सकते। और भव्य जांच यभाप्रवृत्ति करण नामक पर णाम से भी विशेष शुद्ध-परिणाम को पा सकता है। तथा उस के द्वारा राग द्वेष की पढतम प्रन्थि को-अर्यात् राग द्वेप के अति दृढ़-संस्कारों को छिन्न भिन्न कर सकता है। भव्य जीव जिस परिणाम से राग द्वेष की दुर्भद ग्रन्धि को लांध जाता है, उस परिणाम को शास्त्र में "श्रपूर्वकरण" कहते हैं । "अपूर्वकरण" नाम रखने का मतलब यह है कि हम प्रकार का परिणाम कदाचित् ही होता है, बार बार नहीं होता। अत' एय यह परिणाम अपूर्वसा है। इसके विपरीत "यथामवृत्ति" - - करण" नामक परिणाम ती अमट्य जीयों को भी अनन्त यार श्राता है । पूर्यकरण-परिणाम से जय गग देप की प्रन्धि टूट जाती है, तय तो और भी अधिक शुद्ध परिणाम होता है । इस अधिक शुद्ध परिणाम को अनिवृत्ति करण"कहते हैं। इसे अनिवृसिकरण कहने का अभिप्राय यह है कि इस परिणाम के यल से जीप सम्यक्त्व को प्राप्त कर ही लेता है । सम्यपत्य फो प्राप्त किये विना यह निवृत्त नहीं होता-अर्यत् पीछे नहीं हटता। इस अनिवृत्तिकरण नामक परिणाम के समय धौर्य समुल्लास-अर्थात् सामर्थ्य भी पूर्व की अपेक्षा बढ़ जाता है। अनिवृत्तिफरण की स्पिति अन्तर्मुहर्त-प्रमाण मानी जाती है। अनिवृति करण की अन्तर्मुहरी प्रमाण स्थिति में से जय कई एफ भाग व्यतीत हो जाते है, और एकभागमात्र शेष रह जाता है,तय अन्तःकरण की क्रिया शुद्ध होती है। अनिवृतिकरण की अन्तर्मुहर्त प्रमाण स्थिति का अन्तिम एक भाग-जिसमें अन्तः करण की क्रिया प्रारम्भ होती है-यह भी अन्तर्मुहर्त प्रमाण ही होता है। अन्तर्मुहर्त के असंख्यात भेद है, इस लिये यह स्पष्ट है कि अनिवृत्ति करण के अन्तर्मुहर्त की अपेक्षा उसके अन्तिम भाग का अन्तर्मुहर्त जिसको अन्तर करण क्रिया काल कहना चाहिये-यह छोटा होता है। अनिवृत्ति करण के अन्तिम भाग में अन्तःकरण फी क्रिया होती है इसका मतलय यह है कि अभी जो मिथ्यात्व मोहनीय कर्म उदयमान है, उसके उन दलिकों को जो कि अनिवृत्तिकरण के याद अन्तर्मुह तक उदय में प्रानेवाले हैं, प्रागे पीछे करलेना अर्थात् अनिवृति. फरण के पश्चात् अन्तर्मुहुर्त प्रमाण काल में मिथ्यात्यमोह- नाय फर्म के जितने दलिक उदयमें प्रानयाले हों, उनमें से कुछ दलिकों को शनिवृत्तिकरण के अन्तिम समय पर्यन्त ।

,SR स्या54-A जमा) संस्करण आज उदय में श्राने वाले दलिका में स्थापित किया जाता है। और कुछ दालकों को उस अन्तर्मुहूर्त के बाद उदय में आने वाले दलिफों के साथ मिला दिया जाता है। इससे अनिवृत्तिकरण के बाद का एक अन्तर्मुहर्त प्रमाण काल ऐसा हो जाता है कि जिस में मिथ्यात्वमोहनीय कर्म का दलिक रहता ही नहीं। अतएव जिसका वाधा काल पूरा हो चुका है,ऐसे मिथ्यात्न माहनीय कर्म के दो भाग हो जाते हैं। एक भाग तो चह. जा अनिवृत्तिकरण के चरम समय पर्यन्त उदयमान रहता है, और दूसरा भाग यह जो अनिवृत्तिकरण के बाद, एक अन्तर्मुहर्त- प्रमाण काल व्यतीत हो चुकने पर उदय में श्राता है। इन दो भागों में से पहले भाग को मिथ्यात्व की प्रथम स्थिति और दूसरे भाग को द्वितीयस्थिति कहते हैं। जिस समय में अन्तर करण क्रिया शुरू होती है अर्थात् निरन्तर उदययोग्य दलिको का व्यवधान किया जाता है, उस समय से अनिवृत्तिकरण के चरम समय पर्यन्त उक्त दो भागों में से प्रथम भाग का उदय रहता है। अनिवृत्तिकरण का अन्तिम समय व्यतीत हो जाने पर मिथ्यात्व का किसी भी प्रकार का उदय नहीं रहता। क्योंकि उस वक्त जिन दलिकों के उदय की सम्भव है, वे सब दलिक, अन्तःकरण क्रिया से भागे और पीछे उदय में श्राने योग्य कर दिये जाते हैं ।अनिवृत्तिकरण के चरम समय पर्यन्त मिथ्यात्व का उदय रहता है, इस लिये उस बरत तक जीव मिथ्याधी कहलाता है । परन्तु अनिवृत्तिकरण काल व्यतीत हो चुकने पर जीचको प्रापशभिक सम्यक्त्व प्रान होता है। क्योकि उस समय मिथ्यात्वमाहनीयकर्म का विपाक और प्रदेश दोनों प्रकार से उदग नहीं होना । म लिये जीप का स्वाभाविक मम्यफचगुण व्यक्त होता है और Poli

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.डार त्या54→A असमाग) संस्करण मजा है । और तीसरा पुञ्ज तो अशुद्ध ही रह जाता है । उपशा- न्ताद्धा पूर्ण हो जाने के बाद उक्त तान (जोमें से कोई एक पुंज जीच के परिणामानुसार उदय में पाता है। यदि जीय विशुद्धपरिणामी ही रहा तो शुद्धपुल उदयगत होता है । शुद्धपुर के उदय होने से सम्यक्त्व का घात तो होता नहीं इससे उस समय जो सम्यक्त्व प्रकट होता है, वह क्षायोपश- मिक कहलाता है। यदि जीव का परिणाम न तो विल्कुल शुद्ध रहा और न बिलकुल अशुद्ध, किन्तु मिश्र ही रहा तो अर्धविशुद्ध पुंजका उदय हो पाता है। और यदि परिणाम अशुद्ध ही हो गया तब तो अशुद्ध पुञ्ज उदयगत हो जाता है, अशुद्ध पुज के उदयप्राप्त होने से जीव, फिर मिथ्याष्टि यन जाता है। अन्तर्मुहूर्त प्रमाण उपशान्त-श्रद्धा, जिसमें जीव शान्त, प्रशान्त, स्थिर और पूर्णानन्द हो जाता है, उस का जघन्य एक समय या उत्कृष्ट छः (६) श्रावलिकाय जव याफी रह जाती हैं, तब किसी किसी औपशमिक सम्यक्त्वी जीव को विन्न ा पड़ता है अर्थात् उसकी शान्ति में भङ्ग पढ़ता क्योंकि उस समय अनन्तानुबंधि फपाय का उदय हो नाता है । अनन्तानुवन्धि कषाय का उदय होते ही जीव सम्यक्त्व परिणाम का त्याग कर मिथ्यात्व की ओर मुक जाता है। और जप तक वह मिथ्यात्व को नहीं पाता तय , अर्थात् उपशान्त प्रदाफे जघन्य एक समय पर्यन्त ध्रथ या उत्कृष्ट छः श्रापलिका पर्यन्त सासादन भाव का अनुभव करता है। इसी से उस समय यह जीयें सासादन सम्यग्दृष्टि कहाता है । जिसको श्रीपशामक सम्यक्त्व प्राप्त होता है, यही सासादन सम्यग्दादि हो सकता है दूसरा नहीं ॥२॥ तक-

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.डार
स्या.54-A
अममा)
- संस्करण मजा
......................
(१३)
और उस
जो सम्यग्दृष्टि हो कर भी किसी भी प्रकार के वत को धारण
नहीं कर सकता, वह जोव अविरतसम्यग्टोप्ट,
का स्वरूपायशेष अविरतसम्यग्दाप्ट-गुणस्थान कहाता है .
अविरत जीव सात प्रकार के होते हैं। जैसे-
१-जो व्रतों को न जानते हैं, न स्वीकारने हैं और न
पालने हैं वे सामान्यतः सय लोग।
-~~-जो यतों को जानते नहीं, स्वीकारते नहीं किन्तु
पालते हैं। वे तपस्यीविशेष।
३-जो व्रतों को जानते नहीं, परन्तु स्वीकारते हैं और
स्वीकार कर पालते नहीं, ये पार्श्वस्थ नामक साधुविशेष ।
४-जिनको वताका ज्ञान नहीं है, किन्तु उनका स्वीकार
तथा पालन घरावर करते हैं, वे श्रगीतार्थ मुनि ।
५--जिनको प्रतों का ज्ञान तो है, परन्तु जो प्रती का
स्वीकार तथा पालन नहीं कर सकते, घे थेणिक, कृष्ण आदि।
६-जो प्रतों को जानते हुये भी स्वीकार नहीं कर सकते
किन्तु उनका पालन अवश्य करते हैं, ये अनुत्तरविमान
यासिदेव।
७~~-जो प्रतों को जानकर स्वीकार लेते हैं, किन्तु पीछे से
उन का पालन नहीं कर सकते, ये सविग्नपाक्षिक।
सम्यम्मान सम्यग्ग्रहण धोरसम्यपालन से ही पत सफल होते
हैं। जिन फोनतों का सम्यमान नहीं है,जोग्रतों को विधिपूर्वक
प्रहण नहीं करते और सा व्रतों का यथार्थ पालन नहीं करते,

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डार
श्या54→A
माग)
-संस्करण जाजा
...
जो सम्यग्दृष्टि हो कर भी किसी भी प्रकार के व्रत को धारण
नहीं कर सकता, वह जोव आवरतसम्यग्होप्ट,, और उस
का स्वरूपविशप अविरतसम्यग्दाद-गुणस्शन कहाता है .
अविरत जीव सात प्रकार के होते हैं। जैसे-
१-जो व्रती को न जानते हैं, न स्वीकारते हैं और न
पालते हैं ये सामान्यतः सय लोग।
२--जो व्रतो को जानते नहीं, स्वीकार नहीं किन्तु
पालते हैं। वे तपस्वीविशेष ।
३-जो प्रत्तों को जानते नहीं, परन्तु स्वीकारते हैं और
स्वीकार कर पालते नहीं, वे पार्श्वस्थ नामक साधुविशेष ।
४-जिनको प्रतोंका ज्ञान नहीं है, किन्तु उनका स्वीकार
तथा पालन बरायर करते हैं, ये अंगीतार्य मुनि ।
५-जिनको प्रतों का ज्ञान तो है, परन्तु जो प्रतों का
स्वोकार तथा पालन नहीं कर सकते, घे श्रेणिक, कृष्ण श्रादि ।
६--जो मतों को जानते हुये भी स्वीकार नहीं कर सकते
किन्तु उनका पालन अवश्य करते हैं, वे अनुत्तरधिमान
घासिदेव ।
७~-जो प्रतों को जानकर स्वीकार लेते हैं, किन्तु पीछे से
उन का पालन नहीं कर सकते, घे.सविग्नपातिक ।
सम्यशान सम्यग्ग्रहण धौरसम्यपालन से ही मत सफल होते
हैं। जिन को व्रतों का सम्यान नहीं है,जोयतों को विधिपूर्वक
ग्रहण नहीं करते और जो प्रतों का यथार्थ पालन नहीं करता
-

Minds ...

डार स्या.54→A अममा") संस्करण पजा । (१५) से पुत्र प्रादि को नहीं रोकनाः उसे " प्रतिश्रवणा नुमति" कहते हैं। पुत्र श्रादि अपने संन्धियों के पाप-कार्य प्रवृत्त होने पर, उनके अपर सिर्फ ममता रखना-अर्थात् नतो पाप-कर्मों को सुनना और सुन कर भी न उस की प्रशं. सा करना, इसे "संघासानुमति " कहते हैं । जो श्राधफ, पापजनक-श्रारंभो में किसी भी प्रकार से योग नहीं देता के. बल संघासानुमति को सेवता है, वह अन्य सव श्रावकों में . श्रेष्ठ है ॥५॥ प्रमत्तसंयतगुणस्थान जो जीव पापजनक व्यापारों से विधिपूर्वक सर्वथा निवृत्त हो जाते हैं, येही संयत (मुनि) है। संयत भी जय तक प्रमाद का सेवन करते है, तयतक प्रमत्तसंयत कहाते हैं, और उनका स्वरूपविशेष प्रमरत संयत गुणस्थान कहाता है। जो जीव संयत होते हैं, वे यहां तक सापद्य कम्मों का त्याग करते हैं कि पूर्वोक्त संवासा. नुमति को भी नहीं सेवते । इतना त्याग कर सकने का कार- ए यह है कि, छठे गुणस्थानसे लेकर भागे प्रत्याख्यानावरण कपाय का उदय रहता ही नहीं है ॥६॥ श्रप्रमत्तसंयतगुणस्थान जो मुनि निदा, विषय, कपाय विकथा-प्रादि प्रमादों को नहीं सेवते थे अप्रमत्त संयत है, और उन का स्वरूप-विशेष, जो मान-श्रादि गुणों की शुद्धि नथा अशुद्धि के तरतम-भावसे होता है, वह अप्रमत्तसंयत गुण-स्थान है। प्रमाद के सेवन से हो श्रात्मा गुणों की शुद्धि- मे गिरता है : इस लिये सात गुणस्थान से लेकर भागे के सय गुणस्थानों में वर्तमान मुनि. अपने म्यरूप में अप्र- मरन ही रहते हैं GR ३ -

ये सय घुग्णाक्षरन्याय से प्रतों को पास मी लें तथापि उस में
फलफा सम्भय नहीं है ! उन सात प्रकार के प्रयिरतों में से
पहले चार प्रकार के अधिरत-जीय तो मिण्यारधिही
है । क्यों कि उनको पताका यथार्थ ज्ञान ही नहीं है। और
पिछले तीन प्रकार के अपिरत जीय सम्यगष्टि है। क्यों
कि घेवता को यथाविधि प्रहण तथा पालन नहीं कर सकते,
नापि उन्हें यथार्थ जानते है। अधिरतसम्यग्दृषि जीयों में
भी को औपशमिफ-सम्यकवी होते हैं, कोई क्षायोपशमिका
सम्यक्त्वी होते हैं और कोई प्रायिक-सम्यकवी होते हैं।
अधिरत सम्यग्दृष्टि जीव मत-नियम को यथावत् जानते हुये
भी स्वीकार तथा पालन नहीं कर सकते क्योंकि उनको
अप्रत्याख्यानाधरण-कपाय का उदय रहता है, और यह उदय
चारित्रके ग्रहण तथा पालन का प्रतिबंधक(रोकने याला) है|
ইমানযাথান-যাযানাৰ জয় * অব
के कारण जो जीव, पाप जनक क्रियाओं से घिलकुल नहीं
किन्तु देश ( अंश) से अलग हो सकते हैं वे देशविरत या
भाधक कहलाते हैं। और उनका स्वरूप विशेष देशविरत गुण
स्थान । कोई धायक पक प्रत को ग्रहण करता है, और कोई
दो व्रत को। इस प्रकार अधिक से अधिक प्रत को पालन
करने वाले धावक ऐसे भी होते हैं जो कि पापकार्यों में अनु-
मति के सिवा और किसी प्रकार से भाग नहीं लेते अनुमति
तीन प्रकार की है जैस १ प्रतिसेवनानुमति, २-प्रतिध्वया
नुमति और ३-संघामानुमति । अपने या दूसरे के किये हुये
भोजन धादि का उपभोग करना
"प्रतिसेवनानुमति"
फहानी है । पुत्र प्रादि किसी संपन्धि के द्वारा किये गो पाप
कम्मों को केवल सुनना और सुन कर भी उन कामों के करने

.डार त्या.54A Castaus - संस्करण का - (१५) से पुत्र आदि को नहीं रोकना; उसे " प्रतिश्शवणा नुमति" कहते हैं। पुत्र प्रादि अपने संबन्धियों के पाप-कार्य में प्रवृत्त होने पर, उनके ऊपर सिर्फ ममता रखना-अर्थात् नता पाप कर्मों को सुनना और सुन कर भी न उस फी प्रशं. सा करना, इसे “संवासानुमति" कहते हैं। जो श्रावक, पापजनक-श्रारंभो में किसी भी प्रकार से योग नहीं देता के- चल संयासानुमति को सेवता है, वह अन्य सब धावको में श्रेष्ठ है 118 प्रमत्तसंयत्तगुणस्थान- जो जीव पापजनक व्यापारों से विधिपूर्वक सर्वथा निवृत्त हो जाते है, येही संयत (मुनि) हैं । संयत भी जय तक प्रमाद का सेवन करते है, तयतक प्रमत्तसंयत कहाते हैं, और उनका स्वरूपविशेष प्रमत्त संयत गुणस्थान कहाता है । जो जीव संयत होते हैं, वे यहां तक सावध कम्मों का त्याग करते हैं कि पूर्वोक्त संबासा. नुमति को भी नहीं सेवते । इतना त्याग कर सकने का कार. ण यह है कि, छटे गुणस्थानसे लेकर भागे प्रत्यास्यानावरण पाय का उदय रहता ही नहीं है ॥६॥ अप्रमत्तसंयतगुणस्थान --जो मुनि निद्रा, विषय, कपाय विकथा-श्रादि प्रमादों को नहीं सेचते वे अप्रमत्त संयत है, और उन का स्वरूप-विशेष, जो धान-श्रादि गुणों को शुद्धि तथा अशुद्धि के तरतम-भावसे होता है, यह थप्रमत्तसंयत गुण स्थान है। प्रमाद के सेवन से ही श्रात्मा गुणों की मुद्धि- मे गिरता है : इस लिये सातवें गुणस्थान से लेकर भागे के सय गुणस्थानों में वर्तमान मुनि, अपने स्वरूप में श्रम- मन हो रहने हैं।

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.डार स्या54A Createn संस्करण ऊपगा 1 न . के पांच में असंख्यात वर्ग हैं, जिनके सब अध्यवसाय मध्यम कहाते हैं । प्रथम वर्ग के जघन्य अध्यवसायों को शुद्धि की अपेक्षा अन्तिम वर्ग के उत्कृष्ट अध्यवसायों की शुद्धि अनन्त-गुण-अधिक मानी जाती है। और धीच के सब वों में से पूर्व पूर्व वर्ग के अध्यवसायों की अपेक्षा पर पर वर्ग के । अध्यवसाय, विशेष-शुद्ध माने जाते हैं । सामान्यतः इस प्रकार माना जाता है कि सम-समयवर्ती श्रध्यवसाय एक दूसरे से अनन्त-भाग-अधिक-शुद्ध, असंख्यात-भाग अधिक-शुद्ध, संख्यात-माग अधिक-शुद्ध संख्यात-गुण-अधिक-शुद्ध असंख्या- न-गुण-अधिक शुद्ध और अनन्त-गुण-अधिक-शुद्ध होते हैं। इस तरह की अधिक-शुद्धि के पूर्वोक्त अनन्त-भाग अधिक आदि छःप्रकारों को शास्त्र में 'पदस्थान' कहते हैं। प्रथम समय के अध्यवसायों की अपेक्षा दूसरे समय के अध्यवसाय भिन्न ही होते हैं, और प्रथम समय के उत्कृष्ट अध्यवसायों से दूसरे समयके जघन्य अध्यवसाय भी अनन्त-गुण-विशुद्ध होते है । इस प्रकार अन्तिम समयतक पूर्व पूर्व समय के अध्यवसायों से पर पर समय के अध्यवसाय भिन्न भिन्न समझने त्राहिये । तथा पूर्व पूर्व समय के उत्कृष्ट अध्यवसायों की अपेक्षा पर पर समय के जघन्य अध्यवसाय मी अनन्त-गुण-विशुद्ध समझने घाहिये। इस पाठचे गुणस्थान के समय जीव पाँच वस्तुओं का विधान करता है। जैसे-१ स्थितिघात, २ रसधात, ३ गुण. श्रेणि, ४ गुणसंक्रमण और अपूर्व स्थितिबंध। १---जो कर्म-दलिक प्रागे उदय में प्रानेवाले हैं, उन्हें अप पर्तना-करण के द्वारा अपने अपने उदय के नियत समयों मे हरा देना-अधात कानापरण श्रादि कमी को पड़ी स्थिति को "

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डार त्या54+A जाग) - संस्करण मजा - (१७) . के पांच में असंख्यात वर्ग है, जिन के सव अध्यवसाय मध्यम कहाते हैं । प्रथम धर्ग के जघन्य अध्ययसायों की शुद्धि की अपेक्षा अन्तिम वर्ग के उत्कृष्ट अध्यवसायों की शुद्धि अनन्त-गुण-अधिक मानी जाती है। और बीच के सब वों में से पूर्व पूर्व वर्ग के अध्यवसायों की अपेक्षा पर पर वर्ग के अध्यवसाय, विशेष-शुद्ध माने जाते हैं । सामान्यतः इस प्रकार माना जाता है कि सम-समयवर्ती अध्यवसाय एक दूसरे से अनन्त-भाग-अधिक शुद्ध, असंख्यात-भाग-अधिक शुद्ध, संख्यात-भाग-अधिक-शुद्ध संख्यात-गुण-अधिक-शुद्ध,असंत्या- त-गुण-अधिक शुद्ध और अनन्त-गुण-अधिक शुद्ध होते हैं। इस तरह की अधिक-शुद्धि के पूर्वोक्त अनन्त-भाग अधिक मादि छःप्रकारों को शास्त्र में पदस्थान' कहते हैं। प्रथम समय के अध्यवसायों की अपेक्षा दूसरे समय के अध्यवसाय भिन्न ही होते हैं, और प्रथम समय के उत्कृष्ट श्रध्यवसायों से दूसरे समयके जघन्य अध्यवसाय भी अनन्त-गुण-विशुद्ध होते हैं। इस प्रकार अन्तिम समयतक पूर्व पूर्व समय के अध्यवसायों से पर पर समय के अध्ययसाय भिन्न भिन्न समझने चाहिये । तथा पूर्व पूर्व समय के उत्कृष्ट अध्ययसार्यों की अपेक्षा पर पर समय के जघन्य अध्यवसाय भी अनन्त-गुण-विशुद्ध समझने धाहिये। इस पाठ गुणस्थान के समय जीव पाँच वस्तुओं का विधान करता है। जैसे स्थितिघात, २ रसधान, ३ गुण. थेरिण, ४ गुण संक्रमण और अपूर्व स्थितिबंध। १.जो फर्म-दलिक प्रागे उदय में लानेवाले हैं, उन्हें अप धर्तना-फरण के द्वारा अपने अपने उदय फे नियत समयों मे हटा देना-अर्थात् मानाचग्गा प्रादि फों को पनी स्थिति को . .ramanna ܙܗܪ ܝ डार स्या 54→A जममाग) - संस्करण मजा ht 1 m व ब दलिका का संक्रमण होता है । इस प्रकार जब तक गुण- संक्रमण होता रहता है तब तक पूर्व पूर्व समय में संक्रमण किये गये दलिकों से उत्तर उत्तर समय में असंख्यात गुण- अधिक दलिकों का ही संक्रमण होता है । ५-पहले की अपेक्षा अत्यन्त अल्प-स्थिति के कर्मों को याँधना "अपूर्वस्थितियन्ध" कहलाता है। ये स्थितिघात-पादि पाँच पदार्थ, यद्यपि पहले के गुण- स्थानों में भी होते हैं, तथापि पाठवें गुणस्थान में वे अपूंच ही होते हैं । क्यों कि पहले के गुणस्थानों में अध्यवसायों को जितनी शुद्धि होती है उसकी. अपेक्षा पाठवे गुणस्थान में अध्यवसायों की शुद्धि अत्यन्त अधिक होती है । अतएव पहलेके गुणस्थानों में बहुत कम स्थिति का और अतिअल्प रस का घात होता है श्राठये गुणस्थान में अधिक स्थिंति का तथा अधिक-रस का घात होता है । इसी तरह पहले के गुणस्थानों में गुणश्रेणि की काल मर्यादा अधिक होती है, तथा जिन दलिकों की गुण श्रेणि (रचना या स्थापना) की जाती है ये दलिक भी अल्प ही होते हैं; और श्राठव गुणस्थान में गुणश्रेणि-योग्य-दलिक तो बहुत अधिक होते हैं, परन्तु गुणोणि का काल-मान यहुन कम होता है। तथा पहले गुणस्थानों की अपेक्षा पाठवें गुणस्थान में गुणमंक्रमण भी बहुत कर्मों का होता है, अतएव यह अपूर्व होता है। और श्राठवें गुणस्थान में इतनी अल्प स्थिति के कर्म बाँधे जाते है फि जितनी अल्प-स्थिति के कर्म पहले के गुणस्थानों में फदापि नहीं धते । इस प्रकार उक्त स्थितिघात श्रादि पदा. थी का अपूर्व विधान होने से इस पाठवें गुणस्थान का दूम रानाम "श्रपूर्व फररण"गुग्गस्थान यह भी शास्त्र में प्रसिद्ध है। . है से ५. - **** डार स्या59→A अजमार्ग) संस्करण मजा 1. :, दूसरे धर्ग के अध्यवसाय-अनन्त-गण-विशुद्ध होने हैं। इस प्रफार नव गुणस्थान के अन्तिमसमय तक पूर्व २ ममय के अध्यवसाय-स्थान से उत्तर समय के अध्यक्षमाय स्थान को अनन्त-गुण-विशुद्ध समझना चाहिये । श्राठवें गुण स्थानक से नववे गुणस्थानक में यहो विशेषता है कि पाठवें गुणस्थानक में तो समान समगवत कालिक अनन्त जीवों के अध्यवसाय,शुद्धि के तरतम-भाव से असंख्यात वगों में विभाजित किये जा सकते हैं,परन्तु नया गुणस्थान में सम. समयवती कालिक अनन्त जीवो के अभयवसायों का समान शुद्धि के कारण एक ही वर्ग हो सकता है। पूर्व पूर्वगुणस्थान- को अपेक्षा उत्तर उत्तर गुणस्थान में कपाय के अंश यहुत कम होते जाते हैं,और कपाय की(संक्लेशकी)जितनी ही कसी हुई, उसनी ही विशुद्धि जीव के परिणामों की बढ़ जाती है। पाठवें गुणस्थान से नवक गुणस्थान में विशुद्धि इतनी अधिक हो जाती है कि उसके अध्यवसायों को भिन्नतायें आठवें गुण- स्थान के अध्यवसायों को भिन्नताओं से बहुत कम हो जाती हैं। दस गुणस्थान को अपेक्षा नपचे गुणस्थान में बादर (स्थूल ) सम्पराय ( कषाय ) उदय में पाता है । तथा नवये गुणस्थान के सम-समय-वती जीवों के परिणामों में निवृत्ति ( भिन्नता ) नहीं होती। इसी लिये इस गुणस्थान का अनि. पृत्तियादरसम्पराय" ऐसा सार्थक नाम शास्त्र में प्रसिद्ध है। नय, गुणस्थान को प्राप्त करनेवाले जीप, दो प्रकार के होते :-एफ उपशमक और दुसरे, क्षपक ! जोचारित्र मोहनीय फर्म का उपशमन करते हैं, ये उपशमक और जो - the डार स्या54→A मम माग) - संस्करण मजा भाषा सम. दूसरे घर्ग के अभ्यवसाय-अनन्त-गुण-विशुद्ध होने हैं। इस प्रकार नववे गुणस्थान के अन्तिमसमय तक पूर्व २ समय के अध्यवसाय-स्थान से उत्तर समय के अभ्यवसाय स्थान को अनन्त-गुण-विशुद्ध समझना चाहिये । श्राठय गुण स्थानक से नयचे गुणस्थानक में यहो विशपता है कि पाठव गुणस्थानक मेतो समान समयवर्ती कालिक अनन्त-: -जीवों के अध्यवसाय,शुद्धि के तरतम-भाव से असंख्यात चगों में विभाजित किये जा सकते हैं,परन्तु नय गुणस्थान में समयवती कालिक अनन्त जीपों के अध्यवसायों का समान शुद्धि के कारण एक ही वर्ग हो सकता है। पूर्व पूर्वगुणस्थान. ফী অবদা ভবন যখন ৪ স্কয়ায় ঈ অঁ যঃ फम होते जाते हैं,और कपाय की(संलशकी)जितनी ही कमी हुई, उतनी ही विशुद्धि जीव के परिणामों की यढ़ जाती है। पाठवें गुणस्थान से नवव.गुणस्थान में विशुद्धि इतनी अधिक हो जाता है कि उसके अध्यवसायों की भिन्नतायें पाठवें गुण- स्थान के अध्यवसायों को भिन्नताओं से यहुत कम हो जाती हैं। दसवें गुणस्थान को अपेक्षा नपर्व गुणस्थान में बादर (स्थूल ) सम्पराय ( कयाय) उदय में पाता है। तथा नयये गुणस्थान के सम-समय-चती जीवों के परिणामों में निवृत्ति ( भिन्नता ) नहीं होती। इसी लिये इस गुणस्थान का अनि- पृत्तिवादरसम्पराय" ऐसा सार्थक नाम शास्त्र में प्रसिद्ध है। नवच गुणस्थान को प्राप्त करनेवाले जीव, दो प्रकार के --एक उपशमक और दूसरे, क्षपक ! जोचारित्र मोहनीय फर्म फाउपशमन करते है, घे उपशमक और जो - -na

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डार स्या.54-A अमागा संस्करण मजा (२३) अभाव में इष्ट के सिवा दूसरे अर्थ का भी बोध होने लगता है। "उपशान्तकपाय-वीतराग-द्मस्थ गुणस्थान" इस नाम में १ उपशान्तकपाय, २ वीतराग और ३ छमस्थ, ये तीन वि. शेपण है। जिनमें "मस्थ" यह विशेषण स्वरूप-विशेषण है। क्योंकि उस विशेषण के न होने पर भी शेप भाग से अर्थात् उपशान्तकपाय वीतराग-गुणस्थान इतने ही नाम से इट अर्थ का (ग्यारहवें गणस्थान फा) बोध हो जाता है, और इट के अतिरिक्त दूसरे अर्थ का बोध नहीं होता । अतएव छमस्थ यह विशेपण अपने विशेष्य का स्वरूपमान जमाता है। उपशान्तकषाय और वीतराग ये दो, व्यावर्तक-विशेषण हैं; क्यों कि उनके रहने से ही इष्ट अर्थ का बोध हो सकता है, और उनके प्रभाव में इष्ट के सिवा अन्य अर्थ का भी बोध होता है। जैसे-उपशान्त कपाय इस चिशेपण के अभाव में वीतरागास्थ गुणस्थान इतने नाम से इप्ट-अर्थ के (ग्या. रहवें गुरणस्थान के) सिवा बारहवें गुणस्थान का भी योध होने लगता है । क्यों कि यारहवें गुणस्थान में भी जीव को छुन (ज्ञानाचरण-आदि धाति कर्म) तथा वीतरागत्व ( राग के उदय का श्रभाव) होता है, परन्तु 'उपशान्त कपाय' इस विशेषण के ग्रहण करने से यारहव गुणस्थान का बोध नहीं सकता; क्यों कि चारह गुणस्थान में जीव के फपाय उपशान्त नहीं होते बल्कि क्षीण हो ताते हैं । इसी तरह वीतराग इस विशेषण के अभाव में "उपशान्तकपाय छूद्मस्थ गुणस्थान" इतने नाम से चतुर्थ पंचम-श्रादि गुणस्थानों का भी बोध होने लगता है। क्यों कि चतुर्थ, पञ्चम भादि गुण- स्थामों में भी जीवके अनन्तानुबन्धी कपाय उपशान हो । ।

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.डार त्या.54+A अमा) संस्करण उपमा . (२३) अभाव में इष्ट के सिवा दूसरे अर्थ का भी बोध होने लगता है। "उपशान्तकपाय-वीतराग-छास्थ-गुणस्थान", इस नाम में १ उपशान्तकपाय, २ वीतराग और ३ छद्मस्थ, ये तीन वि. शेषण है । जिनमें "छमस्थ" यह विशेषण स्वरूप-विशेषण है। क्योंकि उस विशेषण के न होने पर भी शेष भाग से-अर्थात् उपशान्तकपाय-बीतराग-गुणस्थान इतने ही नाम से इप्ट अर्थ का (ग्यारहवें गुणस्थान का) बोध हो जाता है, और इष्ट के अतिरिक्त दूसरे अर्थ का बोध नहीं होता । अतएव छुझस्थ यह विशेपण अपने विशेष्य का स्वरूपमात्र जनाता है। उपशान्तकपाय और वीतराग ये दो, व्यावर्तक-विशेषण है; क्यों कि उनके रहने से ही इष्ट अर्थ का बोध हो सकता है, और उनके प्रभाव में इष्ट के सिवाअन्य अर्थ का भी वोध होता है। जैसे-~उपशान्त कपाय इस विशेषरण के अभाव में वीतरागमस्थ गुणस्थान इतने नाम से इप-अर्थ के (ग्या. रहये गुणस्थान के ) सिधा बारहवें गुणस्थान का भी वोध होने लगता है । क्यों कि वारवें गणस्थान में भी जीव को छुन (शानावरण-श्रादि धाति कर्म) तथा धीतरागत्व ( राग के उदय का अभाव ) होता है, परन्तु 'उपशान्त कपाय' इस विशेषण के ग्रहण करने से यारहवें गुणस्थान का योध नहीं हो सकता; क्यों कि चारहवें गुणस्थान में जीव के कपाय उपशान्त नहीं होते बल्कि क्षीण हो जाते हैं । इसी तरह चौतराग इस विशेषण के श्रमाव में "उपशान्तकपाय छद्मस्थ गुणस्थान" इतने नाम से चतुर्थ पंचम-श्रादि गुणस्थानों का भी बोध होने लगता है। क्यों कि चतुर्थ, पञ्चम श्रादि गुण- स्थानों में भी जीयक अनन्तानुवन्धी कपाय उपशान हो - -- wr 牛一 .

..डार या54→A cientes संस्करण मजा . अभाव में इट के सिवा दूसरे अर्थ का भी बोध होने लगता है। "उपशान्तकपाय-धीतराग-मस्थ-गुणस्थान' इस नाम में १ उपशान्तकषाय,२ वीतराग और ३ रामस्थ,ये तीन वि. शेषण हैं। जिनमें "मस्थ' यह विशेषण स्वरूप विशेषण है। क्यों कि उस विशेपण के न होने पर भी शेप भाग से-अर्थात् उपशान्तकपाय वीतराग-गुणस्थान इतने ही नाम से इष्ट बर्थ का (ग्यारह गुरग्रस्थान का ) बोध हो जाता है, और इष्ट के अतिरिक्त दूसरे अर्थ का बोध नहीं होता । अतएव छद्मस्थ यह विशेषण अपने विशेष्य का स्वरूपमात्र जमाता है। उपशान्तकपाय और चीतराग ये दो, व्यावर्तक-विशेषण हैं; क्यों कि उनके रहने से ही इष्ट नर्थ का वोध हो सकता है, और उनके अभाव में इष्ट के सिवाअन्य अर्थ का भी चौध होता है। जैसे--उपशान्त पाय इस विशेपण के अभाव में चीतरागमस्थ गुणस्थान इतने नाम से इष्ट अर्थ के (ग्या- रहब गुणस्थान के) सिधा यारहवें गुणस्थान का भी बांध होने लगता है । क्यों कि यारहवे गुणस्थान में भी जीव को बुझ { ज्ञानावरण-श्रादि घाति कर्म) तथा वीतरागत्व ( राग के उदय का अभाव ) होता है, परन्तु 'उपशान्त कपाय' इस विशेषण के ग्रहण करने से घारहये गुणस्थान फा थोध नहीं हो सकता; क्यों कि बारहवें गुणस्थान में जीव के पाय उपशान्त नहीं होते बलिक क्षीण हो जाते हैं। इसी तरह वीतराग इस विशेषण के श्रमाय में "उपशान्तकपाय छद्मस्थ गुणस्थान"इतने नाम से चतुर्थ पंचम-श्रादि गणस्थानों का भी बोध होने लगता है। क्यों कि चतुर्थ, पञ्चम धादि गुरा- स्थानों में भी जीवके अनन्तानुबन्धी काय उपशास्त हो • ।

Fast Arr. र उनी डार स्या.54A माग "संस्करण मजा - . J यक्त मी उस उस गुणस्थान को पा कर वह जीच उन उन कर्म प्रकृतियों के बन्ध को, उदय को पार उदीरणा को शुरू कर देता है। श्रद्धा-क्षय से- अर्थात् गुणस्थान का काल समाप्त हो जाने से गिरनेवाला कोई जीव छठे गुणस्थान तक पाता है,कोई पाँच गुणस्थान में, कोई चौथि गुणस्थान में और कोई दूसरे गुणस्थान में भी आता है । ' यह कहा जा चुका है कि उपशमश्रेणिवासाजीव ग्यारहवें गुणस्थान से अवश्य ही गिरता है । इसका कारण यह है कि उसी जन्म में मोक्ष की प्राप्ति सपक-श्रेणि के विना नहीं होती । एक जन्म में दो से अधिक वार उपशम-)णि नहीं की जा सकती और क्षपक श्रेणि तो एक बार ही होती है। जिसने एक बार उपशम-श्रेणि की है वह उस जन्म मेंक्षपक- श्रेरिण कर मोक्ष को पा सकता है। परन्तु जो दो चार उपशम-धेणि कर चुका है वह उस जन्म में क्षपक-श्रेणि कर नहीं सकता। यह तो हुश्रा "कर्मग्रन्थ"फा श्रीभप्राय ।परन्तु सिद्धान्त का अभिप्राय ऐसा है कि जीय एक जन्म में एक चार ही श्रेणि कर सकता है। श्रतएच जिसने एक बार उपशम-णि की है वह फिर उसी जन्म में आपक-श्रेणि नहीं करसकता। उपशम श्रेणि के प्रारम्भ का क्रम संक्षेप में इस प्रकार है- चार्थ, पाँच, छठे और सातये शृणस्थान में से किसी भी गुणस्थान में वर्तमान जीय पहले चार अनन्तानुगन्धि- कपार्यों का उपशम करता है और पोछे दर्शनमोहनीय.नि. क का उपशम करता है। इसके बाद यह जोध छटे तथा सातवे गुएस्थान में सकहो दफे पाता और जाता है पीछे । ~

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डार tahsike (uotes -संस्करण अपनी (२५) . यक्त भी उस उस गुणस्थान को पा कर वह जीव उन उन कर्म प्रकृतियों के वन्ध को, उदय को और उदारणा को शुरू कर देता है। श्रद्धा-क्षय से- श्रर्थात् गुणस्थान का काल समाप्त हो जाने से गिरनेवाला कोई जीव छठे गुणस्थान तक श्राता है,कोई पाँच गुणस्थान में, कोई चैथि गुणस्थान में श्रार कोई दूसरे गुणस्थान में भी आता है। यह कहा जा चुका है कि उपशमश्रेणिवासाजीव ग्यारहवे गुणस्थान से अवश्य ही गिरता है । इसका कारण यह है कि उसी जन्म में मोक्ष की प्राप्ति क्षपक श्रेणि के बिना नहीं होती । एक जन्म में दो से अधिक बार उपशम थेरिण नहीं की जा सकता और क्षपक श्रेणि तो एक बार ही होती है। जिसने एक बार उपशम-श्रेणि की है वह उस जन्म मैक्षपक- श्रेणि कर मोक्ष को पा सकता है। परन्तु जो दो बार उपशम-णि कर चुका है वह उस जन्म में क्षपक-श्रेणि कर नहीं सकता। यह तो दुश्रा "कर्मग्रन्य" का श्रीभप्राय । परन्तु सिद्धान्त का अभिप्राय ऐसा है कि जीव एक जन्म में एक चार ही श्रेणि कर सकता है। श्रतएच जिसने एक बार उपशमणि की है वह फिर उसी जन्म में क्षपक-श्रेणि नहीं करसकता। সুহাম- ক খামে স্কা জম মন মাষ প্রঙ্কাই-- चाय, पाँच, बठे और सातवें गुणस्थान में से किसी मो गुणस्थान में वर्तमान जीय पहले चार अनन्तानुयन्धिः कपायों का उपशम करता है और पीछे दर्शनमोहनीय नि. क को उपशम करता है। इसके बाद यह जीव छठे तथा सातवे गुणस्थान में सकड़ों दफ़ माता और जाता है पीछ

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.डार स्या 54→A अममाग) -संस्करण उपमा भाषा Paunee (२७) तथा " बीतराग"इस विशेषण के अभाव में भी क्षीणकपाय- छमस्थगुणस्थान इतना ही नाम बारहवें गुणस्थान का ही योधक नहीं होता किन्तु चतुर्थ श्रादि गुणस्थानों का भी योधक हो जाता है, क्योंकि उन गुणस्थानों में भी अनन्ता- नुवन्धि श्रादि कपायों को क्षय हो सकता है। परन्तु पीत. राग " इस विशेषण के होने से उन चतुर्थ-प्रादि गुणस्थानों का बोध नहीं हो सकता। क्योंकि उन गुणस्थानों में किसीन फिसी अंशमें राग का उदय रहता ही है। अतपत्र वीतरा- गरय असंभव है। इस प्रकार"छद्मस्थ"इस विशेषण के न रहने से भो "क्षीणकपाय वीतराग" इतना नाम यारहवें गुणस्थान के अतिरिक्त तेरहवें और चौदहवे गुणस्थान का भी योधक हो जाता है। परन्तु "छमस्थ" इस विशेषण के रहने से धारहवें गुणस्थान का ही बोध होता है। क्योंकि तेरहवे और चौदहवं गुणस्थान में वर्तमान जीव को छह (घातिकर्म नहीं होता। धारहवें गुणस्थान की स्थिति अन्तर्मुहर्त प्रमाण मानी जाती है । यारहवे गुणस्थान में वर्तमान जीव क्षपक श्रेणि घाले ही होते हैं। सपक-णि का मम संक्षेप में इस प्रकार है:- जो जीय क्षपफ-श्रेणि को करनेवाला होता है यह चौथे गुणस्थान से लेकर सात गुणस्थान तक किसी भी गुणस्थान में सबसे पहले अनन्तानुवन्धि-चतुष्क और दर्शन-निक इन सात कर्म-प्ररुतियाका क्षय करता है। और इसके बाद पाठय गुणस्थान में अप्रत्याप्यानावरण कपाय-चतुष्क तथा प्रत्यास्थानायरए-फपाय-चतुष्फ इन बाट कर्म-मरतियों के p" " เจาะ 3-464-1้น เg : : : :

डार त्या54A (reaneer maanantat- Prank---- अनुत्तरयिमानयासी देव, भगवान को शादधागन पूबकर मन से ही पूछता है। उस समय केलिभगवान उसके प्रश्न का उत्तर मन से ही देते हैं। प्रश्न करनेवाला मनःपर्यायहानीया अनुत्तरविमानवासी देव, भगवान के द्वारा उत्तर देने के लिये संगठिन किये गये मनाइयों को, अपने मनःपर्यायान से अथवा अवधिशान से प्रत्यक्ष देख लेता है। और देखकर मनो. द्रव्यों की रचना के आधारसे अपने प्रश्न का उत्तर अनुमान से जान लेता है। यलिभग उपदेश देने के लिये यमन योग का उपयोग करते हैं। और हलन चलन आदि फ्रिया- बों में फाययोग का उपयोग करते हैं ॥१३॥ थयोगिकेवलिगुणस्थान-जो फेयालिभगवान् योर्गे से रहित हैं घे अयोगि-केयली कहाते हैं तथा उन फा स्पाप-विशेष " अयोगिफेलिगुणस्थान" कशाता है। तीनों प्रकार के योग का निरोध करने से प्रयोगि- अवस्था प्रास होती है। केपलशानिभगवान, सयौगि अपस्या স জন্য বয়ঃখনন্ধ শ্রী ওঃ মাবুন रहते हैं। इसके बाद जिन संपली भगवान के घेदनीय, माम और गोभ इन तीनकोको स्थिति तथा पुरला परमाणु मायुकर्म की स्थिति तथा परमाशों की अपेक्षा अधिक होते पे फेपलसानो समुसा करते है। और समुहात के मारा पेदनीय, नाम और गोषकको स्थिति तथा परमाणुला को प्रागुफर्म की स्थिति तथा परमाणुमो के परापर कर लेते हैं। परन्तु जिन पलानियों के पदीय मावि उक्त गीग कम, स्थिति में तापमाणमों में आगुफर्म फे परायर हैं है सय .

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.डार त्या.54→A अममाग) -संस्करण ऊपजा htt - ................. (२६) -- . अनुत्तरविमानवासी देव, भगवान् को शब्द दागन पूछकर मन से ही पूछता है। उस समय केवलिभगवान उसके प्रश्न का उत्तर मन से ही देते हैं। प्रश्न करनेवाला मनःपर्यायज्ञानीया अनुत्तरविमानवासी देव, भगवान के द्वारा उत्तर देने के लिये संगठिन किये गये मनेा-द्रव्यों को, अपने मनःपर्यायशान से श्रथवा अवधिशान से प्रत्यक्ष देख लेता है। और देखकर मनो- प्रन्यों की रचना के आधारसे अपने प्रश्न का उत्तर अनुमान से जान लेता है। फेयलिभगवान् उपदेश देने के लिये वचन- योग का उपयोग करते हैं। और हलन-चलन आदि झिया. ओं में फाययोग का उपयोग करते हैं ॥१३॥ - श्रयोगिकेवलिगुणस्थान-जो फेयलिभगवान् योर्गे' से रहित हैं घे'अयोगि-फेवली कहाते है तथा उन का स्वरूप-विशेष " अयोगिकेयलिगुणस्थान" कहाता है। तीनों प्रकार के योग का निरोध करने से अयोगि- अवस्था प्राप्त होती है। केवलज्ञानिभगवान्, सयोगि-अवस्था में जघन्य अन्तर्मुहर्त तक और उत्कए कुछ कम करोड़ पूर्व तक रहते हैं । इस के बाद जिन केवली भगवान के घेदनीय, और गोत्र इन तीन को को स्थिति तथा पुगल (परमाणु ). आयुकर्म की स्थिति तथा परमाणुनों की अपेक्षा अधिक होते , घे केवलशानो समुद्धात करते है। और समुदात के द्वारा घेदनोय, नाम और गोत्र फर्म को स्थिति तथा परमाणुना फो श्रायुकर्म की स्थिति तथा परमाणुना के यरायर कर लेते हैं। परन्तु जिन फेवलज्ञानियों के घेदनीय आदि उक्त तीन फर्म, स्थिति में तथा परमाणुओं में आयुफर्म के वरायर है . नाम

སཱརཱ
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མཚན་

घेदनीय, नाम, गोत्र और श्रायुइन चार भवोपमाहि-को को दिखा कर प्रत्येक गुणस्थान में यन्ध-योग्य कर्म-प्रतियों 'तित्ययराहारग-दुग-पज्ज मिच्छंमि सत्तर-सय॥३॥ से-अर्थात् किसी खास गुणस्थान की अथवा किसी जीव. विशेष की विवक्षा किये चिनाही,बन्ध में १२० कर्म-प्रासियाँ । डार श्या54-A अमाग) -संस्करण मजा भाषा --- को गुण-श्रेणि से और श्रायुकर्म की यथास्थितश्रेणि से निर्जरा करना उसे "शैलेशीकरण" कहते हैं । शैलेशीकरण को प्राप्त करके अयोगि-केवलज्ञानी उसके अन्तिम समय में का सर्वथा क्षय कर देते हैं। और उत्त कर्मों का क्षय होते ही वे एकसमयमात्र में ऋजु-गति से ऊपर की ओर सिद्धि क्षेत्र में चले जाते हैं । सिद्धि-क्षेत्र, लोक के ऊपर के भाग में वर्तमान है। इस के आगे किसी आत्मा या पुदगल की गति नहीं होती। इसका कारण यह है कि श्रात्मा को या पुद्गल को गति करने में धर्मास्तिकाय-द्रव्य की सहायता अपेक्षित होती है। परन्तु, लोक के श्रागे-अर्थात् अलोक में धर्मास्तिकाय-द्रव्य का प्रभाव है । कर्म-मल के हट जाने से शुद्ध प्रात्मा की ऊर्च-गति इस प्रकार होती है जिस प्रकार कि मिट्टी के लेपों से युक्त तुम्बा, लेपो के हट जाने पर तलसे अपरकी और चला आता है ॥१४॥ ल गुणस्थानों का स्वरूप कहा गया । अय यन्ध के स्वरूप १० गाथाओं से दिखाते हैं:- अभिनव-कम्म-ग्गहणं, यंघो आहेण तत्थयीस-सयं । (अभिनय-कर्म-ग्रहणं पन्ध ओधेन तत्र विंशति-शतम् । तीर्थकराहारक-द्विकर्ज मिथ्यात्ये सप्तदश-शतम् ॥३॥) अर्थ-नये कर्मों के ग्रहण को पन्ध कहते हैं। सामान्यरूप .. न -- wat but । डार fansite अम मागा tos - , . को गुणा-श्रेणि से और आयुकर्म की यथास्थित श्रेणि से निर्जरा करना उसे "शैलेशीकरण" कहते हैं । शैलेशीकरण को प्राप्त करके अयोगि-केवलशानी उसके अन्तिम समय में घेदनीय, नाम, गौष और आयु इन चार भोपप्राहि-कमी का सर्वथा क्षय कर देते हैं। और उस कर्मों का क्षय होते ही ये एकसमयमान में ऋजु-गति से ऊपर की ओर सिद्धि क्षेत्र में चले जाते हैं। सिद्धि-क्षेत्र, लोक के ऊपर के भाग में धर्तमान है। इस के आगे किसी प्रात्मा या पुद्गल की गति नहीं होती। इसका कारण यह है कि श्रात्मा को या पुद्गल को गति करने में धर्मास्तिकाय-द्रव्य की सहायता अपेक्षित होती है। परन्तु, लोक के भागे-अर्थात् अलोक में धर्मास्तिकाय द्रव्य काश्रमाय है । कर्म-मल के हट जाने से शुद्ध प्रात्मा की ऊर्च गति इस प्रकार होती है जिस प्रकार कि मिट्टी के लेपों से युक्त तुम्बा, लेपों के हट जाने पर जलके तलसे ऊपरको ओर घला प्राता है ॥१४॥ गुणस्थानों का स्वरूप कहा गया। अब बन्ध के स्वरूप को दिखा कर प्रत्येक गुणस्थान में यन्ध-योग्य कर्म प्रतियों को १० गाथाओं से दिखाते हैं:- अभिनव-कम्म-गहर्ण, चंघो पोहेण तरथवीस-सयं । 'तित्थयराहारग-दुग-धज मिच्छमि सत्तर-संय॥३॥ ('अभिनय-कर्म-ग्रहणं पन्ध श्रोधेन तत्र विशति-शतम् । तीर्थराहारक-द्विक पर्ने मिथ्यात्ये सप्तदश-शतम् ॥३१) अथ नये कर्मो के महण को पन्ध कहते हैं। सामान्यरूप स-श्रर्थात् किसी खास गुणस्थान की अथवा फिसी जीय- विशेष की विवक्षा किये बिना ही,बन्ध में १२० कर्म-प्रकृतियाँ .

ONNING .डार स्पा.54→A माग -संस्करण मजा भाषा tumbini (३३) कर्म और यन्ध से जनाने के लिये कर्म-ग्रहण-मात्र को धन्ध न कह कर, गाथा में अभिनव कर्म-ग्रहण को पन्ध्र कहा है । जीय के मिथ्यात्व. श्रादि परिणामों के अनुसार कर्म-पुद्गल १२० रूपों में परिणत हो सकते हैं इसीसे १२०-कर्म-प्रकृतियाँ यन्ध योग्य मानी जाता है धपि कोई एक जीय किसी भी अवस्था में एक समय में कर्म-पुद्गलों को १२० रूपों में परिणत नहीं कर सकता अर्थात् १२० कर्म प्रकृतियों को बाँध नहीं सकता; परन्तु अनेक जीव एक समय में हीर२०कर्म-प्रकृतियों को बाँध सकते हैं।इसी तरह एक जीव भी दी जुदी अवस्था में जुदे जुदे समय सब मिला कर १२० कर्म-प्रकृतियों को भी बाँध सकता है । अतएं ऊपर कहा गया है कि किसी : खास गुणस्थानकी, और किसी खास जीध की वियना किये चिना बन्ध-योग्य कर्म-प्रकृतियाँ १२०-मानी जाती है । इसी से १२०-कर्म-प्रकृतियों के यन्त्र को सामान्य बन्ध या श्रीघ-बन्ध कहते है। वन्ध योग्य १२० कर्म-प्रकृतियाँ ये हैं:- -~~शानावरण की ५-कम-प्रकृतियाँ,जैसे:-(१)मतिज्ञाना- घरण,(२)तशानावरण,(३)श्रयधिशानांघरण,(४)मनः पर्याय- मानावरण और (५) केवलशानाचरण । २~दर्शनावरण की प्रातियाँ, जैसे:-(१) चतुर्दशना वरण,(२)अचतुर्दशनावरण,(३ श्रवधिदर्शनावरण, (१)कवाल- देशनावरण,(४)निद्रा, (६)निद्रानिद्रा,(७)प्रचला, (E) प्रचला. प्रचला और (६)स्त्यानार्द्ध। ६ - ३-वेदनीय की २-प्रतियाँ,जैसे:-(१) मानवंदनीय और (२अमात्तवेदनीय। - ----

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डार स्था54→A जममागा - संस्करण मजा blt - (३५) - संस्थाननामकर्म, वामनसंस्थाननामकर्म, कुब्जसंस्थाननाम- कर्म और हुंडसंस्थाननामकर्म ये छः संस्थाननामकर्म (७) वर्ण- नामफर्म(८) गन्धनामकर्म() रसनामकर्म (१०) स्पर्शनामकर्म (११) नरकानुपूर्वीनामकर्म, तिर्यगानुपूर्वीनामकर्म, मनुष्यानु- पूर्वानामकर्म और देवानुपूर्वांनामकर्म-ये चार आनुपूर्वी- नामकर्म (१२) शुभविहायोगतिनामकर्म और अशुभविहायोगति नामकर्म ये दो विहायोगातनामकर्म-ये ३६ भेद बारह पिएड-प्रकृतियों के हुये; क्योकि धन्धननामकर्म और संघातन- नामकर्म-इन दो पिण्ड-प्रकृतियों का समावेश शरीरनामफर्म में ही किया जाताहै ।(१)पराधात नामकर्म, (२)उपनातनामकर्म, (शउच्छासनामकर्म,(४)श्रातपनामकर्म,()उद्योतनामकर्म,(३) श्रगुरुलधुनामर्कम, (७) तीर्थकरनामकर्म (८) निमाणनाम- कर्म-ये पाठ प्रत्येकनामकर्म (१)सनामकर्म,(२)बादरनामकर्म, (३) पर्याप्तनामकर्म,(४) प्रत्येकनामकर्म, (५) स्थिरनामफर्म (६) शुभनामफर्म, (७)सुभगनामकर्म,(E)सुस्वरनामकर्म,(६) श्रादेय- नामकर्म और (१०) यशाकीर्तिनामकर्म-ये प्रसदशकनामकर्म (१)स्थायरनामकर्म,(२)सूक्ष्मनामकर्म,(३)अपर्याप्तनासकर्म, (४) साधारणनामकर्म,५) अस्थिरनामकर्म,(६) अशुभनामकर्म, (७) दुर्भगनामकर्म,(८)दुःस्वर-नामकर्म,अनादेयनामकर्म और (१०) अयशस्फीत्तिनामकर्म-ये स्थावरदशकनामकर्म । ये कुल ६७ भेद हुये। ७-गोन कर्म की दो प्रकृतियाँ. जैसे:-(१) उच्चत्रि और (२) नीचेगा। -अन्तरायकर्म की५-फर्म-प्रकृतियाँ, जैसे;-(१) दाना- स्तराय, (२) लाभान्तराय,(३)भागान्तराय, (४) उपभोगान्तराय, और () वीर्यान्तराय।

ܝܪ , डार tahlha Kranteen संस्करण जमजान (३७) 'इन १६ कर्म-प्रकृतियों का बन्धविच्छद मिथ्याष्टियणस्थान फेश्नन्त में ही हो जाता है। इस से वे १६कर्म-प्रकृतियाँ पहले गुणस्थान से आगे नहीं वाँधी जा सकती तथा तिर्यच. त्रिफ, स्त्यानाधिक, दुर्भगत्रिक अनन्तानुगन्धिकपाय- वतुष्क, मध्यमसंस्थानचतुष्क, मध्यमसंहननचतुष्क, नीव- मोत्र, उद्यातनामकर्म, अशुभविदायोगतिनामकर्म नीरस्त्रीचेद इन २५-कर्म-प्रकृतियों का बन्धविच्छेद दूसरे धुणस्थान के अन्तिम समय में ही हो जाता है । इस से दूसरे गुणस्थान से श्रागे के गुणस्थानों में उन २५-कर्म-प्रजातियों का बन्धं हो नहीं सकता। इस प्रकार पूर्वोक्त १०१-कर्म-प्रतियों में से तिर्यन्व-त्रिक श्रादि उसा२५ कर्म-प्ररुतियों के घटा देने से शेष ७६-कर्म-प्रकृतियाँ रह जाती हैं। उन ७६-फर्म-प्रकृतियों में से भी मनुप्य श्रायु तथा देव श्रायु को छोड़कर शेष ७४ कर्म- प्रकृतियों का वन्ध सभ्यगमिथ्याष्टिगुणस्थान में (तीसरे गुणस्थान में हो सकता है ॥५॥ भावार्थ नरकगति, नरक-आनुपूर्वी और नरक श्रायु- इन तीन फर्म-प्रकृत्तियों को नरकत्रिक शब्द से लेना चाहिये जातिचतुष्क शब्द का मतलव एकेन्द्रियजाति,द्वीन्द्रियजाति, श्रीन्द्रियजाति और चतुरिन्द्रियजाति इन चार जातिनामकर्मों से है । स्थावरचतुष्करामद,स्थावरनामकर्म से साधारण- नामकर्म-पर्यन्त चार कर्म-प्रकृतियों का बोधक है। घे चार प्रकृतियाँ ये है-स्थाचरनामम, सूदमनामकर्म, अपर्याप्त- नामकर्म और साधारणनामकर्म । नरक-धिक से लेकर मिध्यात्च-मोहनीय-पर्यन्त, जो-१६ की प्रतियाँ ऊपर दिखाई गई है ये अत्यन्त अशुभरूप हैं Note: 一一七七 डार स्या54A माग - संस्करण मजा ht. AVAN (३६) - ऋषभनाराचसंहनन, नाराचसंहनन, अर्धनाराचसंहनन और कालिकासंहनन । तिर्यञ्चत्रिक से लेकर स्त्रीवेदपर्यन्त जो २५-कर्म-प्र- तियाँ कार कही हुई है उन का काथ अनन्तानुवन्धि-कपा य के उदय से होता है । अनन्तानुगन्धिकपाय का उदय पहले और दूसरे गुणस्थानक में ही होता है, तीसरे आदि गुणस्थानी में नहीं । इसी से तिर्यचत्रिक-श्रादि उक्त पञ्चीस कर्म प्रकृतियाँ भी दूसरे गुणस्थान के चरमसमयपर्यन्त ही बाँधी जा सकती है,परन्तु तीसरे धादिगुणस्थानों में नहीं बाँधी जा सकती। तीसरे गुणस्थान के समय जीव का स्वभाव ही ऐसा होता है कि जिस से उस समय श्रायु का बन्ध्र होने नहीं पाता। इसी से मनुष्य-श्रायु तथा देव-नायु इन दो श्रायुओं का धन्ध भी तीसरे गुणस्थानक में नहीं होता। नरक-श्रायु तो नरकत्रिफ-आदि पूर्वोक्त १६-कर्म-प्रकृतियों में ही गिनी जा चुकी है तथा तिर्यञ्च-आयु भी तिर्यञ्चत्रिक- श्रादि पूर्वोक्त पच्चीस फर्म-प्रकृतियों में श्रा जाता है ।इस प्रकार दूसरे गुणस्थान में बन्धयोग्य जो १०१-कम-प्रकृतियाँ हैं उन में से तिर्यञ्चत्रिक-प्रादि पूर्वोक्त २५-तथा मनुष्य-श्रायु और देव-नायु कुल २७-कर्म-प्रकृतियों के घट जाने से शेप ७४ कर्म प्रकृतियाँ तीसरे गुणस्थानक में यन्धयोग्य रहती हैं ॥४॥ सम्मे सगसीर जिणायंधि, पदर नरतिग वियकसाया। उरल दुगंतो देसे, सत्तट्टी तिनक सायंतो ॥६॥ सम्यक्त्यै सप्तसप्ततिर्जिनायुर्यन्धे,वचनधिक द्वितीय कपाया श्रादारिकतिकान्ता देश. सप्तपपिस्तृतीयक्रपायान्तः ॥६॥ संघट्टि पते सोग अरइ, अधिर दुग अजस अस्माये । है । - -- है -- -- है - -- डार Webstha मागा संस्करण जाज (४१) १ -- में नहीं होता । यदि काई जोव छठे गुणस्थान में देव- श्रायु के बन्ध का प्रारम्भ कर उसे उसी गुणस्थान में पूरा कर देता है, तो उस जीव को अपेक्षा से अरति, शोक-शादि उक्त ६-फर्म-प्रकृतियाँ तथा देवधायुकुल ७-कर्म-प्रकृतियों का भी बन्ध विच्छेद छठे गुणस्थान के अन्तिम समय में माना जाता है॥७॥ जो जीव छठे गुणस्थान में देव-आयु के बन्धका प्रारम्भ कर उस उसी गुणस्थान में समाप्त किये बिना ही, सातव गुणस्थान को प्राप्त करता है अर्थात्-छठे गुणस्थान में देव- श्रायु का वध प्रारम्भ कर सातवें गुणस्थान में ही उसे समाप्त करता है,उस जीव को सातवे गुणस्थान में ५६-कर्म- प्रातियों का वध होता है। इसके विपरीत जो जीवछठे गुणस्थान में प्रारम्भ किये गये देव-श्रायु थे. वन्ध को, घठे गुणस्थान में ही समाप्त करता है-अर्थात् देव-श्रायु का वध समाप्त करने के बाद ही सातवें गुणस्थान को प्राप्त करता है उस जीव को सातवें गुणस्थान में ५७ कर्म प्रकृतियों का बन्ध होना है। क्योंकि सात गुणस्थान में प्राहारकाद्विक का बन्ध भी हो सकता है । -- - भावार्थ-चाथै गुणस्थान में सम्यक्त्व होने से तीर्थर- नामकर्म याँधा जा सकता है। तथा चोथै गुणस्थान में वर्तमान देव तथा नारक, मनुष्य-श्रायु को धाँधते हैं। और चतुर्थ गुणस्थान-यी मनुष्य तथा तिर्यञ्च देव-श्राय को बाँधते हैं। इसी तरह चौथे गुणस्थान में उन७४ फर्म-प्रकृतियों का भी पन्ध हो सकता है, जिनका कियध तीसरे गुणस्थान में होता है मत. খুব দয়ামাম-নির্যাদা ঘষাঘাবান wr v. .

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डार स्या54-A मागा संस्करण मजा में नहीं होता । यदि कोई जोव छुढे गुणस्थान में देय. श्रायु के यन्ध का प्रारम्भ कर उसे उसी गुणस्थान में पूरा कर देता है, तो उस जीव की अपेक्षा से अरनि, शोक-आदि उक्त ६-कर्म-प्रकृतियाँ तथा देवनायु कुल ७-कर्म-प्रकृतियों का भी बन्ध-विच्छेद छठे गुणस्थान के अन्तिम समय में जाता है ॥ ७ ॥ m जो जीव छठे गुणस्थान में देव-श्रायु के बन्ध का प्रारम्भ कर उसे उसी गुणस्थान में समाप्त किये बिना ही, सात गुणस्थान को प्राप्त करता है अर्थात् छठे गुणस्थान में देव- आयु का बन्ध प्रारम्भ कर सातचे गुणस्थान में ही उसे समाप्त करता है,उस जीव को सातव गुणस्थान में ५६-कर्म. प्रकृतियों का यन्ध होता है । इसके विपरीत जो जीव चव्ठे गुणस्थान में प्रारम्भ किये गये देव-श्राय के वध को, छट्ठे गुणस्थान में ही समाप्त करता है-अर्थात् देव-श्रायु का धन्ध समाप्त करने के बाद ही सातवें गुणस्थान को प्राप्त करता है उस जीव को सातवें गुणस्थान में ५८ कर्म-नहतियों का बन्ध होता है क्योंकि सातवे गुणस्थान में श्राहारकद्विक का बन्ध भी हो सकता है। भावार्थ-चौथे गुणस्थान में सम्यक्त्व होने से तीर्थकर- नामकर्म याँधा जा सकता है तथा बाथै गुणस्थान में वर्तमान देव तथा नारक, मनुष्य-बायु को बाँधते हैं। और चतुर्थ गुणस्थान-यों मनुष्य तथा तिर्यश्च देव-श्रायु को घाँधते हैं। इसी तरह चौथ गुणस्थान में उन७४ फर्म-प्रकृतियों का भी यन्ध हो सकता है,जिनका फियाध तीसरे गुणस्थान में होना है अत. एर सय मिलाकर ७७ कर्म-प्रफतियों का पन्ध चौथे गुणस्थानक

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.डार त्या54→A Chestesen -संस्करण अयजा . 1 (४३) वन्ध पञ्चम-गुणस्थान के चरम समय तक ही होता है,श्रागे के गुणस्थानों में नहीं होता क्याफि छ? आदि गुणस्थानों में उन कपायों का उदय ही नहीं है। इस लिये पाँच गुणस्थान की यन्ध-योग्य ६७ कर्म-प्रकृतियों में से, प्रत्याख्यानवरण- शोध-श्रादि उक्त चार कपायों को छोड़ कर शेष ६३ कर्म. प्रकृतियों का यन्ध छट्टे गुणस्थानक में माना जाता है। सातवें गुणस्थान को प्राप्त करनेवाले जीव दो प्रकार के होते हैं। एक तो घे जो छ? गुणस्थान में देव-श्रायु के गन्ध का प्रारम्भ कर, उसे उस गुणस्थान में समाप्त किये बिना ही सातवें गुणस्थान को प्राप्त करते हैं। और फिर सातवें गुणस्थान में ही देव-श्राय के यन्ध को समाप्त करते हैं । तथा दूसरे वे, जो देव-श्रायु के बन्ध का प्रारम्भ तथा उसकी समाप्ति दोनों छटे गुणस्थान में ही करते हैं और अनन्तर सात गुणस्थान को प्राप्त करते हैं। पहले प्रकार के जीवों को छठे गुणस्थान के अन्तिम-समय में अरवि, शोक, अस्थिर. नाम-कर्म, अशुभनाम-कर्म, अयश-कीर्तिनाम-कर्म और असातवेदनीय इन छः कर्म-प्रकृतियों का वन्धविच्छेद होता है । और दूसरे प्रकार के जीचों को छुट्टे गुणस्थान के अन्तिम समय में उक्त ६कर्म प्रकृतियाँ तथा देव-श्रायु, कुल ७ कर्म- प्रकृतियों का यन्ध -विच्छेद होता है । अतएव छठे गुणस्थान फी रन्ध-योग्य ६३-कर्म-प्रकृतियों में से अरति, शोक-श्रादि उक्त ६-फर्म प्रकृतियों के घटादेने पर, पहले प्रकार के जावों के लिये सातव गुणस्थान में यन्त्र योग्य५७-कर्म प्रकृतियाँ शेष रहताहै।और परति,शोफ प्रादि उक्तद-तथा देव-श्रायु,फुल फर्म-प्रकृतियों के घटा देने पर दूसरे प्रकार के जीवों के लिये सातवें गुणस्थान में बन्ध -योग्य ५६-कर्म-प्रकृतियाँ शेष रहती --

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.डार स्या54+A (casters - संस्करण मजा that N (४३) T वन्ध पञ्चम-गुणस्थान के चरम समय तक ही होता है,धागे के गुणस्थानों में नहीं होता; क्योंकि छटे आदि गुणस्थानों में उन कपायों का उदय ही नहीं है। इस लिये पाँचवे गुणस्थान की यन्ध-योग्य ६७ कर्म-प्रकृतियों में से, प्रत्याख्यानवरण- शोध-नादि उक्त चार कपायों को छोड़ कर शेष ६३ कर्म. प्रकृतियों का यन्ध छठे गुणस्थानक में माना जाता है । सातवे गुणस्थान को प्राप्त करनेवाले जीव दो प्रकार के होते हैं । एक तो घे जो छढे गुणस्थान में देव श्रायु के पन्ध का प्रारम्भ कर, उसे उस गुणस्थान में समाप्त किये बिना ही सातवें गुणस्थान को प्राप्त करते हैं; और फिर सातवें गुणस्थान में ही देव-प्राय के घन्ध को समाप्त करते हैं । तथा दूसरे चे, जो देव-श्रायु के यन्ध का प्रारम्भ तथा उसकी समाप्ति दोनों छ? गुणस्थान में ही करते हैं और अनन्तर सातवें गुणस्थान को प्राप्त करते हैं। पहले प्रकार के जीवों को छठे गुणरथान के अन्तिम-समय में अरवि, शोक, अस्थिर- नाम-कर्म, शुभनाम-कर्म, अयशःकीर्तिनाम-कर्म और असातवेदनीय इन छः कर्म-प्रकृतियों का बन्धविच्छेद होता है। और दूसरे प्रकार के जीवों को छठे गुणस्थान के अन्तिम समय में उक्त द-कर्म प्रकृतियाँ तथा देव-श्रायु, फुल ७ कर्म- प्रकृतियों का यन्ध-विच्छेद होता है। अतएव छठे गुणस्थान की बन्ध-योग्य ६३-कर्म-प्रकृतियों में से परति, शोफ-श्रादि उक्त ६-कर्म प्रकृतियों के घटादेने पर, पहले प्रकार के जीयों के लिये सातव गुणस्थान में बन्धयोग्य५७-कर्म प्रकृतियाँ शेष रहतीहैं। और अरति,शोफ श्रादि उक्तद-तथा देव-श्रायु,फुल कर्म-प्रकृतियों के घटा देने पर दूसरे प्रकार के जीवों के लिये सातवेंगुणस्थान में यन्ध-योग्य ५६-कर्म-प्रकृतियाँशेष रहती

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.डार त्या54A असमागा - संस्करण आगा Jbile HIMAL .... (४३) वन्ध पचम-गुणस्थान के चरम समय तक ही होता है,श्रागे के गुणस्थानों में नहीं होता; क्योंकि छट्टे आदि गुणस्थानों में उन कपायों का उदय ही नहीं है । इस लिये पाँच गुणस्थान की बन्ध-योग्य ६७ कर्म-प्रातियों में से, प्रत्याख्यानवरण- शोध-श्रादि उक्त चार कयायों को छोड़ कर शेष ६३ कर्म- प्रकृतियों का बन्ध छटे गुणस्थानक में माना जाता है । सात गुणस्थान को प्राप्त करनेवाले जीव दो प्रकार के होते हैं । एक तो ये जो छठे गुणस्थान में देव श्रायु के बन्ध का प्रारम्भ कर, उसे उस गुणस्थान में समाप्त किये विना ही सातवें गुणस्थान को प्राप्त करते हैं। और फिर सातवें गुणस्थान में ही देव-श्राय के यन्ध को समाप्त करते हैं । तथा दूसरे थे, जो देव-श्रायु के बन्ध का प्रारम्भ तथा उसकी समाप्ति दोनों छ? गुणस्थान में ही करते हैं और अनन्तर सातवें गुणस्थान को प्राप्त करते हैं। पहले प्रकार के जीवों को छठे गुणस्थान के अन्तिम-समय में अरवि, शोक, अस्थिर- नाम-कर्म, श्रशुमनाम-कर्म, अयश-कीर्तिनाम-कर्म और असातवेदनीय इन छ: फर्म-प्रकृतियों का बन्धविच्छेद होता है । और दूसरे प्रकार के जीवों को छठे गुणस्थान के अन्तिम समय में उक्त ६-कर्म प्रकृतियाँ तथा देव-श्रायु, कुल ७ कर्म- प्रकृतियों का बन्ध-विच्छेद होता है । अतएव घटे गुणस्थान की बध-योग्य ६३-कर्म-प्रकृतियों में से रति, शोक-श्रादि उफ्त ६.कर्म प्रकृतियों के घटादेने पर, पहले प्रकार के जीवों के लिये सातवें गुणस्थान में यन्धयोग्य५७-कर्म प्रकृतियाँ शेष रहतीहैं। और परति,शोक-श्रादि उक्त-तथा देव-श्रायु कुल कर्म-प्रकृतियों के घटा देने पर दूसरे प्रकार के सीवों के लिये सातवे गुणस्थान में यन्ध-योग्य ५६-कर्म-प्रकृतियाँशेष रहती - .::. . . مههء ::.

डार स्या54A माग संस्करण उपमा -- द पहले भाग के अन्त में ही हो जाता है । इस से वे दो कर्म- प्रकृतियाँ पाठव गुणस्थान के पहले भाग के धागे बाँधी नहीं जा सकतीं । तथा सुराद्विक (२) (देवगति देव श्रानुपूर्वी) पञ्चान्द्रयजाति.(३) शुभ-विहायोगात(ट) प्रसनवफ(१३)(प्रस, यादर, पयोप्त, प्रत्यक, स्थिर. शुभ, सुभग, सुस्वर और श्रा. देय), श्रौदारक शरीर के सिवा चार शरीर नामकर्म,जैसे:- चक्रियशरीरनामकर्म (१४), श्राहारक-शरीरनामकर्म (१५), तेजमशरीरनामकर्म (१६,) और कार्मण-शरीरनामकर्म (१७). श्रोदारिक अशोपान को छोड़कर दो अङ्गांपाङ्ग, बैंक्रिय-श्र. गोपाङ्ग (१८) तथा श्राहारक-अगोपाल १६) | सम- चतुरस्रसंस्थान(२०),निर्माणनामकर्म:२१),तीर्थङ्करनामकम(२२), वर्ण(२३), गन्ध(२४), रस(२५) और स्पर्शनामकर्म(२६,) अगुरुल- घुचत्तुष्पजैसे;-अगुरुलधुनामकर्म(२७)उपधातनामकर्म(२८) पराधातनामकर्म (२६), और उच्चसनामकर्म (३०) ये नाम फर्म की (३० प्रकृतियाँ पाठ गुणस्थान के छठे भाग तक ही घाँधी जाती है। इस से आगे नहीं। अतएव पूर्वोक्त ५६-कर्म । प्रकृतियों में से नाम-कर्म की इन ३०-प्रकृतियों के घटा देने पर शेष २६-कर्म प्रकृतियों का ही बन्ध पाठ गुणस्थान के सातवें भाग में होता है । हास्य, रति, जुगुप्सा और भय ना-फपाय-मोहनीयकर्मकी चार प्रकृतियों का बन्ध विच्छेद पाठ गुणस्थान के सा. तभाग के अन्तिम समय में हो जाता है । इस से उन ४ प्रकृतियों का पन्ध नववे श्रादि गुणस्थानों में नहीं है होता॥१०॥ . अतपय पूर्वोत २६-फर्म-प्रकृतियों में से हास्य-श्रादि उनक ...

। डार स्या54-A माग) -संस्करण मजा (४८) कृपायोदय का सर्वथा अभाव ही होता है। श्रतएव योग-मात्र से होनेवाला वह सात वेदनीय का बन्ध, मात्र दो समयों की स्थिति का ही होता है। , चौदहवें गुणस्थान में योग का अभाव हो जाता है, इसी से सात वेदनीय का बन्ध भी उस गुणस्थान में नहीं होता, और अयन्धकत्व अवस्था.माप्त होती है । जिन कर्म-प्रकृतियों का वध जितने कारणों से होता है, उतने कारणों के रहने तक ही, उन कर्म-प्रकृतियों का बन्ध होता रहता है । और उतने कारणों में से किसी एक कारण के कम हो जाने से भी, उन कर्म-प्रकृतियों का बन्ध नहीं होता। शेष सय कर्म- प्रशातियों को बन्ध होता है । जैसे: नरक-त्रिक-श्रादि पूक्ति १६ कर्म-प्रकृतियों का यन्ध मिथ्यात्व, अविरति, फपाय और योग, इन चार कारणों से होता है। ये चारों कारण पहले गुणस्थान के चरमसमयपर्यन्त रहते हैं इस लिये उक्त १६ कर्म प्रकृतियों का वध भी उस समयपर्यन्त हो सकता है, परन्तु पहले गुणस्थान से आगे मिथ्यात्व श्रादि उक्त चार कारणों में से मिथ्यात्व नहीं रहता, इस से नरकत्रिक-प्रादे पूर्वोत १६ कर्मप्रकृतियों का बन्ध भी पहले गुणस्थान से आगे नहीं होता और सब कर्म-प्रकृतियों का बन्ध यथासम्भव होता ही है। इस प्रकार दूसरी २ कर्म-प्रकृतियों के यन्ध का अन्त (विच्छेद) और अन्तामाय (पिच्छेदाभाय) ये दोनो, यन्ध के हेतु के पिच्छेद और विच्छेद पर निर्भर . - हैं ॥१२॥ :: वन्धाधिकार समाप्त ॥ ।

܂ܐ ܚܝܗ .डार श्या.54-A जममागा -संस्करण मजा (५१) भो३म उदयाधिकार पहले उदय और उदीरणा का लक्षण कहते हैं, अनन्तर प्रत्येकगुणस्थान में सनी २ कर्म-प्रकृतियों का उदय तथा उदीरणा होती है उनको धारह गाधानों से दिखाते हैं उदश्रो विवाग-चेयण मुदीरण मुपत्ति इह दुधीससयं । सतर-सय मिच्छे मौस-सम्म-श्राहार-जिएणुदया ॥ १३ ॥ उदयो धिपाक-घेदन मुदीरण ममाप्त इह द्वाविंशति-शतम् । सप्तदश-शतं मिथ्यात्वे मिश्र-सम्यगाहारक जिनानुदयात् १३ -- अर्थ-विपाक का समय प्राप्त होने पर ही कर्म के विपाक (फल)को भोगना उदय कहाता है।और विपाक का समय प्राप्त न होने पर कर्म फल को भोगना उसे 'उदारणा कहते हैं। उदय-योग्य तथा वीरणा-योग्य कर्म-प्रकृतियाँ१२३ हैं । उन में से ११७ कर्म-प्रकृतियों का उदय पहले गुणस्थान में हो सकता है क्योंकि १२२ में से मिश्रमोहनीय, सम्यक्रया मोहनीय,माहारक-शरीर,श्राहारक-अगोपाल और तीर्थ- करनामफर्म इन पाँच कर्म भकृतियों को उदय पहले गुणस्थान नहीं होता । १६ ॥ भावार्थ-श्रात्मा के साथ लगे हुये कर्म-दलिक, नियत. समय पर अपने शुभाशुभ फलों का जो अनुभव कराते है यह "उदय" कहाता है । कर्म-दलिकों को प्रयत्न-विशेष से खींचकर नियत-समय के पहले ही उन के गुमा- ।

Fire', • •डार स्या54→A अम माग) संस्करण मजा मापा - सुहुम-तिगायव मिच्छ मिच्छतं सासण इगार-सयं । निरयाणुपुषि-[दया अण-थावर-इन-विगल-अंतो १४ ॥ सूदम-त्रिकातप-मिथ्यं मिथ्यान्तं सास्वादन एकादशशतम् । निरयानुपूव्यंनुदया दनस्थावरकविकलान्तः॥१४॥ मासे सयमणपुच्ची-गुदयामासोदएण मीसंतो। घउसयमंजएसम्माणुपुत्यि-खेवा थिय-कसाया ॥ १५ ॥ मिशत मानुपूर्दानुदयान्मिोदयन मिश्रान्तः । चतुःशतमयते.सम्यगानुपूर्वोतपाद्वितीयकरायाः ॥ १५ ॥ मगुतिरिणु पुधिविउवट्ठ दुहग अगाइज्जदुग सतग्छनो। सगसोर देसि तिरिंगड घाउ निउज्जोय तिकसाया.॥१६॥ मनुज-तिय्यंगानुपूर्वी चैक्रियाटकंदुर्भगमनायद्विकंसप्तदशच्छेद सप्ताशितिर्देश तिर्यगत्यायन चोद्योत-तृतीय-कपाया:१६ अच्छेनो इगसी पमत्ति श्राहार-जुगल-परसंवा । योतिगा-हारग दुगछी छस्सयरि अपमहे ॥१७॥ अपच्छेद एकाशितिः प्रमत्ते श्रीहारक-युगलप्रक्षेपात्। स्त्यानमित्रिकाहारक-शिकच्छेदः पद-सप्तति रप्रमत्ते ॥१७॥ अर्थ-दूसरे गुणस्थान में १११ कर्म-प्रकृतियों का उदय होता है। क्योंकि जिन ११७ फर्म-प्रकृतियों का उदय पहले 'गुणस्थान में होता है उनमें से सूदमंत्रिक (सूक्ष्मनामकर्म,अप- र्याप्तनामकर्म और साधारणनामकर्म ) श्रातपनामकर्म मिथ्यात्वमोहनीय और नरकानुपूर्वीदन ६ कर्म-प्रकृतियों, फाउदय दूसरे गुणस्थान में वर्तमान-तीयों को नहीं होता। अनन्तानुयन्धी चार कपाय,स्थावरनामकर्म, फेन्द्रिय जानि- नामकमायिकलेन्द्रियाद्वीन्द्रिय,प्रीन्द्रिये और मनुरिन्द्रियोजाति, नामकर्म ॥१४॥और शेष भानुपूर्या तीन प्रतियन्चानुपूर्वी, मनुजानुपूर्वी और देयानुसूर्थी एन१२. कर्मचारियों का उदय .

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डार त्या.54→A अमागा संस्करण मग - - -- (५५) उक्त पाठ कर्म-प्रकृत्तियों को घटाने मे,रोष(७६)कर्म प्रकतियाँ रहती हैं। उनमें आहारकशरीरनामकर्म तथा आहारक- अगोपागनामकर्म इन दो प्रहतियों के मिलाने से कुल हुई (८१ )कर्म-प्रकृतियाँ । छठे गुणस्थान में नहीं (८१)कर्म- प्रकृतियों का उदय हो सकता है। - सातव गुणस्थान में ७६ कर्म-प्रकृतियों का उदय होता है क्योंकि पूर्वोक्ष (८१)-कर्म-प्रकृतियों में से स्त्यानिित्रक और बाहरकाद्विक इन (५) कर्म-प्रकृतियों का उदय छठे गुणस्थान के अन्तिम समय तक ही हो सकता है। श्रागे के गुणस्थानों में नहीं ॥१७॥ भावार्थ-सूक्ष्मनामर्कम-फा उदय, सूदम-जीयों को ही अपर्याप्त-नाम कर्म का उदय, अपर्याप्त जीबों को ही और साधारण नाग-फर्म अनन्त फायिफ-जीवों को ही होता है। परन्तु सूक्ष्म, अप- यप्ति और अनन्त-कायिक जीयों को न तो सास्वादन-सम्य पत्य प्राप्त होता है और न कोई सास्वादन-प्राप्त जोय, सूक्ष्म, अपर्याप्त या अनन्तकायिक रूपसे पैदा होता है। तथा श्रातप-नाम-कर्म का उदय यादर पृथिवि-कायिक जीपको ही होता है सो भी शरीर-पर्याप्ति के पूर्ण हो जाने के बाद हो: पहले नहीं। परन्तु सासादन-सम्यक्त्य को पाकर जो जीप चादर-पृथ्वी-काय में जन्म ग्रहण करते है ये शरीर-पर्या। प्ति को पूरा करने के पहले ही अर्थात् प्रातपनामकर्म के उदय का अवसर प्राने के पहले ही-पूर्वप्राप्तसास्वादन- सम्यक्त्य का यमन फर देते है अर्थात् पादर-पृथ्यो कायिक- अधों को, जय सारपादन-सभ्यपत्य का सम्भय होता है -- :: were डार या54→A (career -संस्करण जाण उक्त पाठ कर्म-प्रकृतियों को घटाने से,शेष(७६)कर्म-प्रकतियाँ रहती है। उनमें श्राहारकशरीरनामकर्म तथा श्राहारक- अड्गोपाङ्गनामकम इन दो प्रकृतियों के मिलाने से कुल हुई (८१ )कर्म-प्रकृतियाँ । छठे गुणस्थान में इन्हीं (८१)कर्म- प्रकृतियों का उदय हो सकता है। - का सात गुणस्थान में ७६ कर्म-प्रकृतियों का उदय होता है क्योंकि पूर्वोक्त (८१)-कर्म-प्रकृतियों में से स्त्यानिित्रक और बाहरकाद्विक इन (५) फर्म-प्रकृतियों का उदय छठे गुणस्थान के अन्तिम समय तक ही हो सकता है। आगे के गुणस्थानों में नहीं ॥१७॥ भावार्थ- सूक्ष्मनामर्कम-का उदय, सूक्ष्म जीयों को ही अपर्याप्त-नाम कर्म अपर्याप्त- जीवों को ही और साधारण नाम-फर्म उदय अनन्त-कायिक जीवों को ही होता है। परन्तु सूदम, अप- याप्त और अनन्त-कायिक जीयों को न तो सास्वादन-सम्प पत्व प्राप्त होता है और न कोई सास्वादन-प्राप्त-जोध, सूक्ष्म, अपर्याप्त या अनन्तकायिक रूपसे पैदा होता है। तथा श्रातप-नाम-कर्म का उदय यादरपृथिवि-कायिक जीपको ही होता है सो भी शरीर पर्याप्ति के पूर्ण हो जाने के बाद ही पहले नहीं । परन्तु सासादन-सम्यपत्य को पाफर जो जीय यादर-पृथ्वी-काय में जन्म ग्रहण करते हैं ये शरीर पर्या- प्ति को पूरा करने के पहले ही-अधात् पातपनामफर्म के उदय का अवसर आने के पहले ही-पूर्वप्राप्तसास्वादन- सम्यक्त्व का यमन कर देते हैं अर्थात् पादर-पृथ्यो कायिक- जीया को, अब सारयान-सम्यपत्य का सम्मय होता है - “多 डार स्या54-A licitater संस्करण अपजा (५५) उक्त पाठ कर्म-प्रकृतियों को घटाने मे,शेष(७६)क्रम प्रकतियाँ रहती हैं। उनमें श्राहारकशरीरनामकर्म तथा श्राहारक- अगोपागनामकर्म इन दो प्रकृतियों के मिलाने से कुल हुई (८१)कर्म-प्रकृतियाँ । छठे गुणस्थान में इन्हीं (८२)फर्म- प्रकृतियों का उदय हो सकता है। सातच गुणस्थान में ७६ कर्म-प्रकृतियों का उदय होता है क्योंकि पूर्वोक्त (८१)-कर्म-प्रकृतियों में से स्त्यानिित्रक और बाहरकादिक इन (५) कर्म-प्रकृतियों का उदय छठे गुणस्थान के अन्तिम समय तक ही हो सकता है। आगे के गुणस्थानों में नहीं ॥१७॥ . .. का म भावार्थ--सूधमनामम-का उदय, सूक्ष्म जीया को ही अपर्याप्त नाम कर्म का उदय, अपर्याप्त- जीवों को ही और साधारण नाम-कर्म अनन्त-कायिक-जीपों को ही होता है । परन्तु सूरम, अप- र्याप्त और अनन्त-कायिक जीवों को न तो सास्यादन-सम्प पत्य प्राप्त होता है और न कोई सास्वादन-प्राप्त जोय, सूक्ष्म, अपर्याप्त या अनन्तकायिक रूपसे पैदा होता है। तथा प्रातप-नाम-कर्म का उदय यादरपृथिवि कायिक जोधको ही होता है सो भी शरीर-पर्याप्ति के पूर्ण हो जाने के बाद हो; पहले नहीं। परन्तु सासादन-सम्यक्त्य को पाकर जो जीप यादर-पृथ्वी काय में जन्म ग्रहण करते है ये शरीर पर्या- प्ति को पूरा करने के पहले ही अर्थात् श्रातपनामकर्म के उदय का अवसर आने के पहले ही-पूर्वप्राप्तसास्वादन- सम्यक्त्व का यमन कर देते है अर्थात् यादर-पृथ्यो कायिक- जीयों को, जघ सारयादन-सम्यपत्य का सम्भय होता है rwad

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.डार स्या54-A असमाग -संस्करण उपज htt उक्त पाठ कर्म-प्रकृतियों को घटाने मे,शेप(७६)कर्म-प्रकतियाँ रहती हैं। उनमें श्राहारकशरीरनामकर्म तथा श्राहारक- अगोपा नामकर्म इन दो प्रकृतियों के मिलाने से कुल दुई (८१ )कर्म-प्रकृतियाँ । छठे गुणस्थान में इन्हीं (८१)कर्म- प्रकृतियों का उदय हो सकता है। . सातवे गुणस्थान में ७६ कर्म-प्रकृतियों का उदय होता है क्योंकि पूर्वोक्त (८१)-कर्म-प्रकृतियों में से स्त्यानदित्रिक और बाहरकद्विक इन (५) कर्म-प्रकृतियों का उदय छठे गुणस्थान के अन्तिम समय तक ही हो सकता है। श्रागे के गुणस्थानों में नहीं ॥१७॥ भावार्य-सूक्ष्मनामर्कम-का उदय, सूक्ष्म-जीयों को ही अपर्याप्त नाम कर्म का उदय, अपर्याप्त- जीयों को ही और साधारण-नाम-कर्म का उदय अनन्त-कायिक-जीधों को ही होता है। परन्तु सूक्ष्म, अप- प्ति और अनन्त-कायिक जीपों को न तो सास्वादन-सम्य पत्व प्राप्त होता है और न कोई सास्वादन-प्राप्त-जोध, सूक्ष्म, अपर्याप्त या अनन्तकायिक रूपसे पैदा होता है। तथा श्रातप-नाम-कर्म का उदय पादर-पृथिवि कायिक जोपको ही होता है सो भी शरीर-पर्याप्ति के पूर्ण हो जाने के बाद ही पहले नहीं। परन्तु सासादन-सम्यक्त्य को पाकर जो जीप यादर-पृथ्वी-काय में जन्म ग्रहण करते है ये शरीर-पर्या- प्ति को पूरा करने के पहले ही अर्थात् श्रातपनामकर्म के, उदय का अवसर प्राने के पहले हो-पूर्वप्राप्तसास्वादन- सम्यक्त्य का धमन कर देते हैं अर्थात् यादर-पृथ्यो कायिक- जीयों को, जय सारवादन-सम्यपत्य का सम्मय होता है * !" ܙ ܢܢ ܂ܟ .डार स्या54A असमागा संस्करण मजा चन्धि-कपाय- चतुरिन्द्रिय पर्यन्त के जीवों में, पहला या दूसरा दो ही गुणस्थान हो सकते हैं । श्रानुपूर्वी का उदय जीवों को उसी समय में होता है जिस समय कि ये दूसरे स्थान में जन्म ग्रहण करने के लिये धक्रगति से जाते हैं परन्तु तीसरे गुणस्थान में वर्तमान कोई जीव मरता नहीं है; इससे प्रानुपूर्वी-नाम-कर्म के उदयवाले जीर्थों में तीसरे गुणस्थान की सम्भावना भी नहीं की जा सकती । अतएव दूसरे गुणस्थान में जिन १११- की प्रतियों का उदय माना जाता है उनमें से अनन्तानु- -आदि पूर्वेति १२-कर्म-प्रकृतियों को छोड़ देने से ६६-कर्म-प्रतियाँ उदययोग्य रहती है । मिश्र-- मोहनीयकर्म का उदय भी तीसरे गुणस्थान में अवश्य ही होता है इसीलिये, उक्त ६६ और १ मिथ्रमोहनीय, कुल १००-कर्म-कृतियों का उदय गुएस्थान में माना जाता है। तीसरे गुणस्थान में जिन १००-कर्म-प्रकृतियों का उदय हो सकता है उन में से मिश्रमोहनीय के सिवा, शेप ६६ ही कर्म-प्रकृतियों का उदय चतुर्थगुणस्थानवी जीयों को हो सकता है । तथा चतुर्थगुणस्थान के समय सम्यक्त्व-मोहनीयकर्म के उदय का और चारों आनुपूर्वी- नामकी के उदय का सम्भव है। इसीलिये पूत और सम्यक्त्व मोहनीय-श्रादि (५), कुल १०४ कर्म-प्रकृतियों का उदय, उक्त गुणस्थान में वर्तमानजीवों को माना जाता है। . है। जब तक अप्रत्याख्यानावरण-कपायचतुष्क का उदय रहता है तय तक जीयों को पशम गुणस्थान को प्राप्ति नहीं हो सकती। इसलिये अप्रत्याख्यानाधरण कपाय-चतुष्क का उदय, पहले से चौथे तक चार गुणस्थानों में ही समझना ५-जाना पिच्छद सान ग्यारह गुणस्थ बन्ध इस म अन्त। उस गाय पालना THARTHEAT नो और जिस ममम भागनामाम्मे का गम्भ होता है उस समय বা কী শাশ্বান গণশ কা মম না। রথা মি- प्याग्य का उदय पदले गुणस्थान में ही होता है किन्तु सास्या- दम सम्पपत्य पहले गुणम्पान क समय, कदापि नहीं होता। मसे मिथ्यात्य के उदय का और सम्यक्त्य का किसी भी जोय में एक समय में होना असंभय है। इसी प्रकार नरक: प्रानुपूर्षी का उदय, यकगति से नरमें जानेयाले संघों को होता है । परन्तु उन जीयों को उस अवस्था में सास्वादन सम्यपत्य नहीं होता । इससे नरक-प्रानुपूी का उदय और सास्वादन-सम्यक्त्व इन दोनों का किसी भी जीव में एक साथ होना असम्भय है । अतपय सासादनः सम्यग्दृष्टिनामक दूसरे गुणस्थान में सूक्ष्म नामकर्म से लेकर नरक- प्रानुपूर्वीपर्यन्त ६-कर्म-प्रकृतियों के उदय का निषेध किया है, और पहले गुणस्था- न की उदययोग्य कर्म प्रकृतियों में से उक्त ६-प्रकृतियों को छोड़कर, शेष कर्म-प्रकृतियों का उदय दूसरे गुणस्थान के समय माना गया है । अनन्तानुगन्धोकपाय का उदय पहले और दूसरे गुणस्थान में ही होता है, आगे के गुणस्थानों में नहीं। तथा स्थावर नामकर्म, एकेन्द्रियजातिनामकर्म, द्वीन्द्रि- यजातिनामकर्म, श्रीन्द्रियजातिनामकर्म, और चतुरिन्द्रय- जाति-नामकर्म के उदयपाल जीयों में, तीसरे गुणस्थान से लेकर आगे का कोई भी गुणस्थान नहीं होता । क्योकि स्थावर-नामकर्म का और एकेन्द्रियजाति-नामर्कर्म का उदय एकेन्द्रिय जीयों को होता है । तथा दीन्द्रियज्ञाति-नामकर्म का उदय द्वीन्द्रियों को; श्रीन्द्रियजाति-नामकर्म का उदय श्रीन्द्रियों को और चतुरिन्द्रियजाति नामकर्म का उदय ऊपर और इसी उदर P.

.डार त्या.54A अज माग - संस्करण मजा blth - ८ - चतुरिन्द्रिय-पर्यन्त के जीवों में, पहला या दूसरा दो ही गुणस्थान हो सकते हैं। श्रानुपूर्वी का उदय जीवों को उसी समय में होता है जिस समय कि वे दूसरे स्थान में जन्म ग्रहण करने के लिये वक्रगति से जाते हैं । परन्तु तीसरे गुणस्थान में वर्तमान कोई जीव मरता नहीं है। इससे भानुपूर्वी नाम-कर्म के उदयवाले जीवों में तीसरे गुणस्थान की सम्भावना भी नहीं की जा सकती । श्रतएव दूसरे गुणस्थान में जिन १११. कर्म प्रकृतियों का उदय माना जाता है उनमें से अनन्तानु- चन्धि-कपाय-श्रादि पूति १२-कर्म-प्रकृतियों को छोड़ देने से १६-कर्म-प्रकृतियाँ उदययोग्य रहती हैं । मिथ- मोहनीयकर्म का उदय भी तीसरे गुणस्थान में अवश्य ही होता है इसीलिये, उक्त ६६ और १ मिश्रमोहनीय, कुल १००-कर्म-प्रकृतियों का उदय उस गुणस्थान में माना जाता है। तीसरे गुणस्थान में जिन १००-कर्म-प्रकृतियों का उदय हो सकता है उन में से मिश्रमोहनीय के सिवा, शेप १६ ही फर्म-प्रकृतियों का उदय चतुर्थगुणस्थानवती जीवों को हो सकता है । तथा चतुर्थगुणस्थान के समय सम्पयत्व मोहनीयकर्म के उदय का और चारों आनुपूर्वी- नामकमी के उदय का सम्मय है। इसीलिये पूोल और सम्यक्त्यमोहनीय आदि (५), कुल १०४ कर्म प्रकृतियों का उदय, उक्त गुणस्थान में धर्तमानजीवों को माना जाता है। - -- जर तक अप्रत्याख्यानावरण-कपाय-चतुष्क का उदय रहता है तय तक जोयों को पश्चम गुणस्थान की प्राप्ति नहीं हो सकती इसलिये अप्रत्याख्यानाधरण-कपाय-चतुष्क का उदय, पहले से चौथे तक चार गुणस्थानों में हो समझना है

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डार स्या54→A जममाग) - संस्करण मजा भाषा ...... । चतुरिन्द्रिय-पर्यन्त के जीवा में, पहला या दमदारमान हो सकते हैं । श्रानुपूर्वी का उदय जीयों को पी समय होता है जिस समय कि ये दुसरे स्थान में जन्म प्राण के लिये पक्रगति से जाते है । परन्तु नीर गुणवान । वर्तमान कोई जीव मरता नहीं है मग अानुपमा it के उदयवाले जीवों में नीमो गुणम्यान को परसायमा का नहीं की जा सकती । श्रनएव दूसरे गुणकाम में जिन कर्म-प्रकृतियों का उदय माना जाता है उनमें मनमान वन्धि-कपाय आदि पूति १२-फार्म-ग्राहनिया का देने से ६९-कर्म-प्रतियाँ उदयोग्य ना - मोहनीयकर्म का उदय भी सीर, गणराम Arun ही होता है इसीलिये, उक्त ६६ arisim, in १००-कर्म-प्रकृतियों गृणधान माना जाता है। तीसरे गुणस्थान में जिम नियों का उदय हो सकता है उन में म मिश्रमानीय गिता, शेष ६६ ही कर्म-प्रकृतियों का उदय अनुगणारणानपी जीयों को हो सकता है । तथा चतुर्थगुणरणाग या गाण सम्यक्त्व मोहनीयकर्म के उदय का और धागे आप नामका के उदय का सम्मय है। इसीलिय पूर सम्यक्त्व-मोहनीय-श्रादि (५), कुल १०४ फर्म एशियों का उदय, उक्त गुणस्थान में पर्तमानजीयों को मामा जाता है। -- जय तक अप्रत्याख्यानायरण-कपाय-चतुष्य का उपग रहता है तय तक जीयों को पञ्चम गुणस्थान की प्राप्ति गही हो सकती। इसलिये अप्रत्याख्यानाधरण-कपाय-चतुला का उदय, पहले से चौथे तक चार गुणस्थानों में ही समाना - ।

܀ ;& .डार या54A मना) - संस्करण जागा Shik म-कर्म तुरिन्द्रिय-पर्यन्त के जीवों में, पहला या दूसरा दो ही गुणस्थान सकते हैं । श्रानुपूर्वी का उदय जीवों को उसी समय में होता है जिस समय कि वे दूसरे स्थान में जन्म ग्रहण करने के लिये धनगति से जाते है । परन्तु तीसरे गुणस्थान में धर्तमान कोई जीव मरता नहीं है। इससे प्रानुपूर्वी नाम- के उदयवाले जीवों में तीसरे गुणस्थान की सम्भावना भी नहीं की जा सकती । श्रतएव दूसरे गुणस्थान में जिन १११. कर्म-प्रकृतियों का उदय माना जाता है उनमें से अनन्तानु- चन्धि-कपाय-श्रादि पूर्वोक्त १२-कर्म-प्रकृतियों को छोड़ देने से ६९-कर्म-प्रकृतियाँ उदययोग्य रहती हैं । मिश्र- मोहनीयकर्म का उदय भी तीसरे गुणस्थान में अवश्य ही होता है इसीलिये, उक्त ६६ और १ मिश्रमोहनीय, कुल १००-कर्म-प्रकृतियों का उदय गुणस्थान में माना जाता है। तीसरे गुणस्थान में जिन १००-कर्म-प्रकृतियों का उदय हो सकता है उन में से मिश्रमोहनीय के सिया, । शेष ६६ ही कर्म-प्रकृतियों का उदय चतुर्थगुणस्थानवती । जीवों को हो सकता है । तथा चतुर्थगुणस्थान के समय सम्यक्त्व-मोहनीयकर्म के उदय का और चारों आनुपूर्वी- नामकमी के उदय का सम्मय है; इसीलिये कि ६६और सम्यक्त्व-मोहनीय आदि (५), कुल १०४ कर्म प्रकृतियों का उदय, उक्त गुणस्थान में वर्तमानजीवों को माना जाता है। -- जय तक अप्रत्याख्यानायरण-कपाय-चतुष्क का उदय रहता है तय तक जोयों को पश्चम गुणस्थान की प्राप्ति नहीं हो सकती। इसलिये अप्रत्याख्यानाधरण काय-चतुल्क का उदय, पहले से चापे तक चार गुणस्थानों में ही समझना

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• “M, 33 : A

.डार स्या.54A - अममाग) -संस्करण मजा - - - (५६) उन मनुष्यों को तथा तिर्यञ्चों को, वैक्रियशरीरनाम-कर्म का तथा वैक्रिय अङ्गोपाग-नामफर्म का उदय अवश्य रहता है इसलिये, यद्यपि यह शङ्का हो सकती हैं कि पाँचत्र तथा छ? गुणस्थानकी उदय-योग्य प्रकृतियों में चैमिय-शरीर-नाम-कर्म तथा धैक्रिय-अलोपाल-नामकर्म इन दो प्रतियों की गणना क्यों नहीं की जाती है ? तथापि इस का समाधान इतना ही है कि, जिनको जन्मपर्यन्त वैफिय शरीर-नामफर्म का तथा चैक्रिय-श्रङ्गोपाङ्ग-नामक्रम का उदय रहता है उनकी (देघ तथा नारको की) अपेक्षा से ही उक्त दो प्रकृतियों के उदयफा विचार इस जगह किया गया है । मनुष्यों में और तिर्यञ्चों में तो कुछ समय के लिये ही उक्त दो प्रकृतियों का उदय हो सकता है, तो भी सब मनुष्यों और तिर्यच्चों में नहीं। इसी से मनुष्यों और तियों की अपेक्षा से पाँच तथा छठे गुणस्थान में, उक्त दो कर्म-प्रकृतियों के उदय का सम्भव होने पर भी, उस की विषक्षा नहीं की है। जिन ८७ फर्म-प्रकृतियों का उदय पाँच गुणस्थान में माना जाता है उन में से तिर्यञ्च-गति, तिर्यञ्च- गोत्र, उद्योस-नामफर्म और प्रत्याख्यानावरण-कपाय-चतुष्क इन ८ फर्म प्रकृतियों को छोडकर, शेप ७६-कर्म महतियों का उदय, छठे गुणस्थान में हो सकता है । तियञ्च-गति- श्रादि उफ्त श्राट कर्म-प्रातियों का उदय, पाँच गुयस्थान के प्रान्तम समय तक ही हो सकता है, प्राग नहीं। इस का फारण यह है कि, तिर्यञ्च गति, तियंञ्च-प्रायु मौर उद्योत- नामकर्म इन तीन प्रतियों का उदय तो तिर्यञ्चों को हो होता है परन्तु तिचा में पहले पाँच गुणस्थान ही हो सकते है. भागे के गुणस्थान नहीं । नीच नाम का उदय न ३ -श्रायु, नीच- -- .. ?" तय प्रातान उन को सा ध्यात्य का इससे मिश जीव में श्रानुपूर्वी भी मनुष्यों को पार गुमान होता है। पञ्चम- आदि गुणम्यान प्रा होने पर,मगुणों में प्रेम गुण प्रकट होने कि शिम उनमें गोत्र का उदय हो हो না লঙ্কা ও খাওয় যায় । আসা। परन्तु तिर्गच्चों को तो अपने पाय मय गुणयनों में-- স্মথান্ ঘন্টা খানা শাখৰছ নাগা কাতায় रहता है; उप-गोत्र का उदय होता ही नहीं तथा অ্যানােয় ঘৰ কথাষা কা ও অল্প বদ্ধ বসুন है तब नफ छठ गुणस्थान से लेकर आगे के किसी भी गुणस्थान की प्राप्ति नहीं होती और छ? आदि गुणस्थानों के पास होने के बाद भी प्रत्यास्थानावरणकपायों হ্মা ও হীন কঙ্কনা। ke ফাৰ বিৰাৰ-গৰি उपत आठ फर्म-प्रकृतियों के बिना जिन कर्म-प्रकृतियों কী ভয় ঃ বান বা ই ন ই ক্ষান্তাকে नामकर्म तथा पाहारक-अगोपाहगनामकर्म, ये दो प्रकृतियाँ और भी मिलानी चाहिये जिससे बेटे गुणस्थान में उदयः योग्य कर्म प्रतियाँ होती हैं। बटे गुणस्थान में प्राहारक शगैर नामर्म का तथा आहारक-अगोपादा नामकर्म का उदय उस समय पाया जाता है जिस समय किकोई चतुर्दश- पूर्वधर-मुनि, लब्धि के द्वारा आहारक-शरीर की रचना कर उसे धारण करते हैं । जिस समय कोई क्रिय-लब्धिधारी मुनि, लब्धि से चैक्रिय-शरीर को बनाकर उसे धारण करता है उस समय उसको उद्योत-नाम का उदय होता है। क्योकि शास्त्र में इस प्राशय का कथन पाया जाता है कि यति को यक्रिय-शरीर धारण करते समय और देव को उत्तर ঘঙ্গি থাকা স্বর ধ্বময় সমক্ষম জা ও होता है। अब इस जगह यह शङ्का हो सकती है कि जब औरह १ - 3 निमित्त से होनेवाला उद्योत-नामकर्म का उदय विवक्षित मे प्रमाद नहीं होता। इस प्रकार आहारक-शरीर-नामकर्म का तथा आहारक अङ्गोपाङ्ग नामकर्म का उदय, आहारक- शरीर रचनेवाले मुनि को ही होता है। परन्तु वह मुनि लब्धि का प्रयोग करनेवाला होने से अवश्य ही प्रमादी होता है। जो लब्धि का प्रयोग करता है वह उत्सुक हो ही जाता है। उत्सुकता हुई कि स्थिरता या एकाग्रता का भग हुना। एकाग्रता के भंग को ही प्रमाद कहते हैं इसलिये, आहारक. द्विक.का उदय भी छठे गुणस्थान तक ही माना जाता है। यद्यपि आहारकशरीर घना लेने के बाद कोई मुनि विशुद्ध तथापि ऐसा यहुत कम होता है इस लिये इसकी विषक्षा अध्यघसाय से फिर भी सातवे गुणस्थान को पा सकते हैं, प्राचार्यों ने नहीं की है। इसी से सातवे गुणस्थान में श्राहा. रक-द्विक के उदय को गिना नहीं है ॥१४॥ १५॥ १६ ॥१७॥ हासाइछतो छमहि अनियहियेयतिगं ॥१८॥ डार स्या54→A अममाग) -संस्करण उपजी भाषा -- (६१) वैफ्रिय शरीरियति की अपेक्षा से छठे गुणस्थान में भी उद्योत नामकर्म का उदय पाया जाता है तब पाँचवें गुणस्थान तक ही उसका उदय क्यों माना जाता है ? परन्तु इसका समाधान सिर्फ इतना ही है कि जन्म के स्वभाव से उद्योत-नामकर्म फा जो उदय होता है वही इस जगह विवक्षित है; लब्धि के नहीं है । छठे गुणस्थान में उदययोग्य जो कर्म-प्रकृतियाँ कही हुई है उनमें से स्त्यानार्द्ध-त्रिक और आहारक-द्विक इन पाँच कर्म-प्रकृतियों का उदय सातवें गुणस्थान से लेकर आगे के गुणस्थानों में नहीं होता, क्योंकि स्त्यानद्धित्रिक का उदय प्रमादरूप है, परन्तु कटेसे आगे किसी भी गुणस्थान -- संमतंतिमसंघयण तियगच्छयो यिसत्तरि अपुग्वे ।

तय प्रात भमय या उनकोस ध्यात्व का इससे मि जीव में श्रानुपूर्व होता है सम्यय भी मनुष्यों को मार गुणगान सा ही होमकता । पन्चम प्रादि गुणम्यान मार दोने पर,मनुष्यों में पंम गुण प्रकट होने कि जिस में नाच-गोत्र का उदय हो ही नहीं सकता चोर उच्च गोत्र का उदय अयश्य हो जाता है। परम्नु तिर्गन्चों को तो अपने योग्य मय गुणस्थानों में- अर्थात् पाँचों गुणस्थानों में स्वमाय से ही नीचगोत्र का उदय रहना है। उध-गोत्र का उदय होता ही नहीं । तथा प्रत्याख्यानाधरण चार कपायों का उदय जय तक रहता है तब तफ छदंठ गुणस्थान से लेकर आगे के किसी भो गुणस्थान की प्राप्ति नहीं होती और छठे आदि गुणस्थानों के प्राप्त होने के याद भी प्रत्याख्यानावरणकपायों का उदय हो नहीं सकता । इस प्रकार तिर्यञ्च गति आदि उपत आठ फर्म-प्रकृतियों के विना जिम ७-कर्म-प्रकृतियों का उदय छ? गुणस्थान में होता है उन में आहारक शरीर. नामकर्म तथा प्राहारक-अल्गोपाङ्गनामकर्म, ये दो प्रकृतियाँ और भी मिलानी चाहिये जिससे छठे गुणस्थान में उदय- योग्य कर्म-प्रकृतियाँ होती हैं । छठे गुणस्थान में आहारक शरीर-नामकर्म का तथा आहारक असगोपाम-नामकर्म का उदय उस समय पाया जाता है जिस समय कि कोई चतुर्दश- पूर्वधर मनि, लब्धि के द्वारा आहारक-शरीर की रचना कर उसे धारण करते हैं । जिस समय कोई क्रिय-लम्धिधारी मनि, लब्धि से धैक्रिय शरीर को यनाकर उसे धारण करता है उस समय उसको उद्घोत नामकर्म का उदय होता है । क्योंकि शास्त्र में इस प्राशय का कथन पाया जाता है कि यति को चैक्रिय शरीर धारण करते समय और देव को उत्तर- क्रिय शरीर धारण करते समय उद्योत-नामकर्म का उदय हाता है । अब इस जगह यह शङ्का हो सकती है कि जब और सम्या से छोर । न १ शरीर रचनबार दिईन्टरन्तुति रूप का प्रयोग करनवाना वन्न नारी होता है। जो सन्धि का प्रयोग कग्दा ६वह टन्हो ही जाता है। उत्सुकता हुइ कि स्थिरला या पक्षमता का भग हमा। पफाप्रता के भंग न ही प्रमाद कहते है इसलिये, आहारका द्विक का उदय भी हटे गुपस्यान तक ही माना जाता है। यद्यपि आहारकशरीर पना लेने के याद कोई मुनि पिराय। तयापि ऐसा यहुत कम होता है इस लिये इसकी विपदा अध्ययसाप से फिर भी सातव गुणस्थान को पा सकते प्राचार्यों ने नहीं की है। इसी से सातवे गुणस्थान में II एक-द्विक के उदय को गिना नहीं है ॥१४॥ १५॥ १६ ॥१७॥ संमतंतिमसंघयण तियगच्छो यिसत्तरि अग। हामारछतो छमहि अनियट्टियेयतिगं ॥१९॥ -- .डार स्या54→A असाग) -संस्करण मजा भाषा को प्राडोरन्ट } नही ) कही पावन न आग के : चॉद का रदय करें में प्रमाद नहींट तथा आहार 4U .डार या54→A जममागा -संस्करण मजा (६५) . सगवन्न खोरण-दुचरिमि निद्ददुगतो अचरिमि पावन्ना नारांतरायदंसण-चउछेमो सजोगि वायाला ॥२०॥ सप्तपञ्चाशत् क्षीणद्विचरमे निद्राद्विकान्तश्च चरमे पञ्चपञ्चाशत् । घानान्तरायदर्शनचतुश्छःसयोगिनि द्विचत्वारिंशत् ॥ २० ॥ अर्थ अतएव यारहवें गुणस्थान में ५७ फर्म-प्रकृतियों का उदय रहता है । ५७ कर्म-प्रकृतियों का उदय, बारहवें गुणस्थान के द्विचरम-समय-पर्यन्त अर्थात् अन्तिम समय से पूर्व के समय-पर्यन्त पाया जाता है; क्योंकि निदानौर प्रचला इन दो कर्म-प्रकृतियों का उदय, अन्तिम समय में नहीं होता। इससे पूर्वोक्त ५७ कर्म-प्रकृतियों में से निद्रा और प्रचला को छोड़कर शेष ५५ कर्म प्रकृतियों का उदय बारहवें गुणस्थान के अन्तिम समय में होता है। मानावरणकर्म की ५, अन्तरायकर्म की ५और दर्शनावरणकर्म की ४ कुल १८ कर्म-प्रकृतियों का उदय, धारहवें गुणस्थान के अन्तिम समय- पर्यन्त ही होता है; भागे नहीं। इससे यारवें गणस्थान के अन्तिम समय की उदय-योग्य ५५ कर्म-प्रकृतियों में से रक्त १४ कर्म-प्रकृतियों के घटा देने से ४१ कर्म-प्रकृतियाँ शेप रहती है । परन्तु तेरहवें गुणस्थान से लेकर तीर्थकर- नामकर्म के उदय का भी सम्भव है । इसलिये पूर्वोक्त ४१, और तीर्थकर नामकर्म, कुल ४२ कर्म-प्रकृतियों का उदय तेरहवें गुणस्थान में हो सकता है ॥ २० ॥ --- .. भावार्थ-~-जिनको अपमनाराच-संहनन का या नाराच संहनन का उदय रहना है वे उपशम-श्रेणि को होकर सकते है। उपशम-श्रेणि करनेवाले. ग्यारह गुणस्थान-पर्यन्त ही चढ़ सकते है क्योंकि क्षपकणि ना यारहय गुरुस्थान- है * का उदय नवय गुणस्थानमहाकामराःरक जाता है। अतएव गुणस्थान में घेदधिक-आदि उक्त ६ कर्म प्रकृतियों का उदय- है तो वह पहले स्त्रीयेद के, पछि पुरुष-येदके अनन्तर नपुंसक- वेदके उदय का विच्छे फरके क्रमशः संज्वलन-त्रिक के होता है तो यह सब से पहले पुरुष-पेद के, पीछे स्त्रीवेद के वाला यदि नसक है तो सबसे पहले वह नपुंसक वेद के उदय को रोकता है। इसके बाद स्त्रीवेद के उदय को तत्प- श्चात् पुरुप-वेद के उदय को रोक कर क्रमश:संज्वलन त्रिक सकता है । इनमें से संज्वलन-लोभ का उदय, दसय गुणस्थान জন ছাৰ ক মনিষা কা ও সয় গুখােম हो सकता। नया गुणस्थान के प्रारम्म में ६६ कर्मप्रवृतियों का उदय होता है। परन्तु मध्ययमायों को विशुद्धि बढ़ती ही जाती है। इससे तीन घंद और संज्यलन- दसर्ये गुणस्थान में उदय-योग्य प्रकृतिया ६० ही रहती हैं निध बिच्छेद सप्रकार होता है यदि प्राण का प्रारम्भ स्त्री करती और स उदय को रोकती है। धेणिका प्रारम्भ करनेवाला यदि पुरुष अनन्तर नपुंसकवेद के उदय को रोककर क्रमशः संज्वलन त्रिक के उदय का विच्छेद करता है। और भेणि को करने के उदय को याद कर देता है। दस गुणस्थान में ६० कर्म-प्रकृतियों का उदय हो के अन्तिम समय तक ही होता है। इसी से संज्वलन लोभ को छोड़ कर शेष ५६ कर्म प्रकृतियों का उदय ग्यारहवं गुणस्थान में माना जाता है ॥ १८ ॥१६॥ तव पातश्ना समय यात उन को सार ध्यात्य का दन सम्यप इससे मिश जोध में। श्रानुपूर्वी होता है सम्यपर विक, कुल ६कर्म प्रकृतियों सम्पर उदय न छोड़ .डार त्या.54-A जसमाग) - संस्करण मजा . .... (६५) सगवन्न खोण-दुचरिमि निद्ददुगतो अचरिमि पणयन्ना । नारातरायदसण-चउछे पो सजोगि वायाला १२० ॥ सप्तपञ्चाशत् क्षीणद्विचरमे निद्राद्विकान्तश्च चरमे पञ्चपञ्चाशत् । धानान्तरायदर्शनचतुश्च सयोगिनि द्विचत्वारिंशत् ॥ २० ॥ अर्थ-अतएव यारहवें गुणस्थान में ५७ फर्म-प्रकृतियों का उदय रहता है । ५७ कर्म-प्रकृतियों का उदय, चारहा गुणस्थान के छिचरम-समय-पर्यन्त-श्र्थात् अन्तिम समय से पूर्व के समय-पर्यन्त पाया जाता है क्योंकि निद्रा और प्रचला इन दो कर्म-प्रकृतियों का उदय, अन्तिम समय में नहीं होता। इससे पूर्वोक्त ५७ कर्म-प्रकृतियों में ले निन्द्रा और प्रचला को छोड़कर शेष ५५ कर्म-प्रकृतियों का उदय चारहा गुणस्थान के अन्तिम समय में होता है। शानावरणकर्म की ५, अन्तरायकर्म की ५और दर्शनाधरणकर्म की ४-कुल १४ कर्म-प्रकृतियों का उद्य, थारह गुणस्थान के अन्तिम समय- पर्यन्त ही होता है। श्रागे नहीं । इससे बारवें गणस्थान के अन्तिम समय की उदय-योग्य ५५ कर्म-प्रकृतियों में से उक्त १४ कर्म-प्रकृतियों के घटा देने से ४१ कर्म-प्रकृतियाँ शेप रहती है । परन्तु तेरहवें गुणस्थान से लेकर तीर्थकर- नामकर्म के उदय का भी सम्भव है । इसलिये पूर्वोक्त ४१, और तीर्थदूर-नामकर्म, कुल ४२ कर्म-प्रकृतियों का उदय तेरहवें गुणस्थान में हो सकता है ॥ २० ॥ মাথলিন প্রথমবার-বৰৰ কা যা পায় संहनन का उदय रहना है ये उपशम-2णि को ही कर सकते हैं। उपशम श्रेणि करनेवाले, ग्यारहवें गुणस्थान-पर्यन्त ही चढ़ सकते हैं क्योंकि क्षपकणि किये बिना यारय गुणस्थाग-

फर गर १२ कम प्रांगणा का पर नयय गुणस्थान में
--
Hit
-aur-w.mamta
नयातना
भमय प्रात
उन को सार
प्यात्य फा'
दन सम्यप
हमसे मि
जोय में
प्रानुपूर्व
होता है
सम्यका
और
मपय गुणगान के प्रारम्भ में ६६ कम प्रकृतियों का उदय
होता है। परन्तु मध्ययमार्यों को विशुनि पढ़ती ही जाती
है। इसमे तीन यद योर मंज्लन-त्रिक, कुल ६कर्म-प्रकृतियों
का उदय नया गुणस्थान में ही क्रमशः रुक जाता है। अतपय
दस गुणस्थान में उदय-योग्य प्रकृतियाँ ६० ही रहती हैं। नवर्षे
गुणस्थान में पेदत्रिक-आदि उक्त ६ कर्म प्रकृतियों का उदयः
विच्छेद इस प्रकार होता है यदि मंणिका प्रारम्भ स्त्री करनी
है तो वह पहले स्त्रीपेद फे, पोई पुरुष-घेदके अनन्तर नपुंसक
वेदके उदय का विच्छे करके मशः संज्वलन-त्रिक के
उदय को रोकती है।श्रेणिका प्रारम्भ करनेवाला यदि पुरुष
होता है तो यह सय से पहले पुरुष घेद के, पछि स्त्रीवेद के
अनन्तर नपुंसकवेद के उदय को रोक कर क्रमशः संज्वलन.
त्रिक के उदय का विच्छेद करता है । और श्रेणि को करने-
वाला यदि नपुंसक है तो सबसे पहले यह नपुंसक-वेद के
उदय को रोकता है। इसके यदि स्त्रीवेद के उदय को तत्प-
श्चात् पुरुष-घेद के उदय को रोक कर क्रमशः संज्वलन-त्रिक
के उदय को बन्द कर देता है।
पक
से
4
-
दसवें गुणस्थान में ६० कर्म-प्रकृतियों का उदय हो
सकता है । इनमें से संज्वलन-लोम का उदय, दस गुणस्थान
के अन्तिम समय तक ही होता है। इसी से संज्वलन-लोभ
को छोड़ कर शेष ५६ कर्म-प्रकृतियों का उदय ग्यारहवें
गुणस्थान में माना जाता है ॥ १८॥ १६ ॥

.डार स्या.54A अमाग) - संस्करण उमजा भाषा 19 सगवन्न खोर दुनोगादेययशोऽन्यतरवेदनीयम् ॥ २२ ॥ का उदय रहता है 11 गुणस्थान के द्विवरमा इन दो कर्म प्रकृति गुणस्थान के प्रालयमा ५, अन्तरायम कर्म २६, प्रथम-संहनन (वनऋषभनाराच- पर्यन्त ही होता है। कर्म २८,सुस्थरनामफर्म२६और सातवेदनीय १४ कर्म-मलिया सकती है, चौदा गुणस्थान में नहीं। अतएव और तीबद्दर मन प्रफुतियाँ चौदहशुगर वरच गुणवान माघेदनीयकर्म की सतिकतरं च त्रिंशद्व्युच्छेदः। गुयाउ गइजिणुचंति चरम-समयंता। अनुजायुगतिजिनोचमिति चरमसमयान्तः। क-द्विक (औदारिक-शरीरनामकर्म तथा- नामकर्म ) २, अस्थिर-द्विक (अस्थिर- (मकर्म )४, खगति-द्विक (शुभविहायोगति- भधिहायोगतिनामकर्म ) ६, प्रत्येक त्रिक- स्थिरनामकर्म और शुभनामकर्म ) , सम- रिमंडल, सादि, वामन,कुब्ज और हुण्ड-ये गुरुलधुचतुष्क (अमुरुलघुनामकर्म, उप- राघातनामकर्म और उच्वासनामकर्म )१६, नामकर्म, गंधनामकर्म, रसनामकर्म और ३,निर्माणनामकर्म२४, तेजसशरीरनामकर्म २५, वेदनीय-इन दो में से कोई एक ३०-ये ाँ तेरहवें गुणस्थान के अन्तिम-समय तक ही नातरायईसन्नरोप सप्तपञ्चाशत् चोरादिन शानान्तरायदर्शनबनुदान 7 सपना पूर्व के समय-पन्नास इससे पूर्वाचन २३ को छोड़कर कर्म-प्रकृतियों का रस अन्तिम समय को दरमा . क नामक है. उन्म -- . - भाषा- सहजनका समय एशन सन : मे से इन ३० कर्म-प्रकृति के घर जाने पर में रहती है। वे १२ हाँ ये हैं-सुभगनाना नामफर्म, यशः से कोई एक प्रेक धर्म, और

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SR स्या54→A समाग) -संस्करण माजी .... (६७) दुःस्वरसुस्वरसातासातैकतरं च त्रिंशदव्युच्छेदः । द्वादशायोगिनि सुभगादेययशोऽन्यतरवदनीयम् ॥ २२ ।। तसतिग परिणदि मणुयाउ गइजिणुचंति चरम-समयतो। प्रसत्रिकपञ्चेन्द्रियमनुजायुगतिजिनोचमिति चरमसमयान्तः। अर्थ-औदारिक-द्विक (ौदारिक-शरीरनामकर्म तथा- औदारिक-अङ्गोपाङ्गनामकर्म ) २, अस्थिर-द्विक (अस्थिर- नामकर्म, अशुभनामकर्म ), खगति-द्विक (शुभविहायोगति- नामकर्म और अशुभविहायोगतिनामकर्म ) ६, प्रत्येक-त्रिक- (प्रत्येकनामकर्म, स्थिरनासकर्म और शुभनामकर्म ) , सम- चतुरस्र,न्यग्रोधपरिमंडल, सादि, चामन,कुज और हुण्ड-ये छ: संस्थान १५, अगुरुलधुचतुष्क (अगुरुलघुनामकर्म, उप- धातनाभकर्म, पराघातनामकर्म और उच्चासनामकर्म )१६, वर्ण-चतुष्क (वर्णनामकर्म, गंधनामकर्म, रसनामकर्म और स्पर्शनामकर्म)२३,निर्माणनामकर्म२४, तैजसशरीरनामकर्म २५, कार्मणशरीर-नामकर्म २६, प्रथम-संहनन (वनऋषभनाराब- संहनन)२७ ॥ २१ ॥ दुःस्वरनामकर्म २८, सुस्वरनामकर्म२६और सातवेदनीय तथा असातवेदनीय-~-इन दो में से कोई एक ३०-ये तीस प्रकृतियाँ तेरहवे गुणस्थान के अन्तिम-समय तक ही उदय को पा सकती हैं, चौदहवें गुणस्थान में नहीं । अतण्य पूर्वोक्त ४२ में से इन ३० कर्म-प्रकृतियों के घर जाने पर शेप १२ कर्म-प्रकृतियाँ चौदहवेंगुणस्थान में रहती हैं। वे १२ फर्म प्रकृतियाँ ये है-सुभगनामकर्म, श्रादेयनामफर्म, यशः कीर्तिनामकर्म, वेदनीयफर्म की दो प्रकृतियों में से कोई एक प्रसत्रिक ( प्रसनामकर्म, चादरनामकर्म, और . -- । उनको ध्यात्व हमसे जाय श्राद होर १. air मोहन I amratyaपेटी कर सकते हैं Fantra Tami का उदय, दोता है। Suman Amन की योग्य कर्म प्रकृतियों n • নাগা মাননাঘর থি ७१. प्रमियों का उदय पारहरी गणस्थान में मानाजाता है।५७ कम प्रशनियों में से भी निदा का तथा प्रचलाका उनय यारह गुणगान के अन्तिम समय में नहीं होता। इस में उन दो कर्म प्रतियों को छोड़कर शेष ५५ कर्म-प्रकृतियों का उदय यारहये गणस्थान के अन्तिम समय में माना जाता मानाचगा ५ अन्नमय ५ और दर्शनाधरण ४, सय मिलाकर कम प्रतियो का उदय पारह गुणस्थान के अन्तिम समय म अांग न होना। इससे पूर्वोक्त ५५ कर्म- प्रानया में से उक्त १५ कर्म-प्रकृतियों के निकल जाने से शप कम प्रतिया रहती है । परन्तु तेरहवें गुणस्थान को प्रास वग्नवाला में जो नार्थकर होनेवाले होते हैं उनको नार्थकरनामकर्म का उदय भी हो जाता है । अतएव पूर्वोक्त ४१ श्रोर तीर्थकरनामकर्म. कुल ४२ कर्म-प्रकृतियाँ तेरहवे गणम्यान में उदय को पा सकती है ॥२०॥ . नित्युदया उरलाथिरखगइदुगपरित्ततिगलसंडाणा । अगम्लहुवन्नचउ निमिणतयकम्माइसंघयणं ॥ २१॥ नार्थीदयादादारिकास्थिरखगतिद्विकप्रत्येकनिकपट्संस्थानानि अगमलवर्णचतुष्कनिर्माणतेजःकर्मादिसंहननम् ॥२१॥ दूसरसमरसायासाएगयरं च तीस धुच्छनो। यारस अजोगि सुभगाइज्जजसन्नयरवेयणियं ॥ २२ ॥ गुणस्थान में माना जाता है॥ १८॥ १६/ डार स्या.54A माग) -संस्करण भजी bile दुःस्वरसुस्वरसातासातैकतरं च त्रिंशदव्युच्छेदः । द्वादशायोगिनि सुभगादेययशोऽन्यतरवदनीयम् ॥ २२ ॥ तसतिग परिणदि भणुयाउ गइजिणुचंति चरम-समयंतो। प्रसत्रिकपञ्चेन्द्रियमनुजायुगतिजिनोचमिति चरमसमयान्तः। अर्थ-श्रौदारिक-द्विक (श्रौदारिक-शरीरनामकर्म तथा- औदारिक-श्रङ्गोपाङ्गनामकर्म ) २, अस्थिर-द्विक (अस्थिर- नामकर्म, अशुभनामकर्म ४, खगति-द्विक (शुभविहायोगति- नामकर्म और शुभचिहायोगतिनामकर्म ) ६, प्रत्येक-त्रिक- (प्रत्येकनामकर्म, स्थिरनामकर्म और शुभनामकर्म ) , सम- चतुरस्र,न्यग्रोधपरिमंडल, सादि, वामन,कुब्ज और हुण्ड-ये छः संस्थान १५, गुरुलघुचतुष्क (अगुरुलघुनामकर्म, उप- घातनामफर्म, पराघातनामकर्म और उच्वासनामकर्म )१६, वर्ण-चतुष्क (वर्णनामकर्म, गंधनामकर्म, रसनामकर्म और स्पर्शनामकर्मी२३,निर्माणनामकर्म२४, तेजसशरीरनामकर्म २५, कार्मणशरीर नामकर्म २६, प्रथम संहनन (वनपभनाराच- संहनन)२७ ॥२१॥ दुःस्वरनामकर्म २८,सुस्वरनामकर्म२६ और सातवेदनीय तथा श्रसातवेदनीय-इन दो में से कोई एक ३०-ये तीस प्रकृतियाँ तेरहवे गुणस्थान के अन्तिम-समय तक ही उदय को पा सकती हैं, चौदहवें गुणस्थान में नहीं । यतपय पूर्वोक्त ४२ में से इन ३० फर्म-प्रकृतियों के घट जाने पर शेप १२ कर्म-प्रकृतियाँ चौदहवें गुणस्थान में रहती है । १२ फर्म प्रकृतियाँ ये है-सुभगनामकर्म, थादेयनामफर्म, यशः कीर्तिनामकर्म, वेदनीयफर्म की दो प्रकृतियों में से कोई एक असत्रिक ( प्रसनामफर्म, चादरनामफर्म, चार

away-
.
riaami'. जानिनामकर्म, मनुग भायु,
मनुष्णन नाहग्नाम मोr TIT१२ प्रकृतियाँ
কা সুপ গগ গগগাম জালাময় বন্ধ
तय श्रात
उन को
ध्यात्य
इमसे
जोष
श्राप
प
भाषा-चौदहये गुणम्मान में किसी भी जीयं को येद-
नारफर्म की दोनों प्रशानियों का जाय नहीं होता। इसलिये
जिम जीय की उन दो में में जिस प्रकृति का उदय, चौदह
गुणस्थान में रहता है उम जीयको उम प्रकृति के सिवाय
दुसर्ग प्रकृति का उदय विच्छेद ग्ह गुणस्थान के अन्तिम
समय में हो जाता है। श्रादारिक निफ-शादि उक्त तोस
प्रशनियों में से घेदनीयकर्म फी अन्यतर प्रकृति के सिवा शेष
२६ कर्म-प्रशनियाँ पुल विपादिनी (पुद्गल द्वारा पिपाक का
अनुभव कराने वाली ) हैं इनमें से सुस्परनामकर्म और
दुःस्वरनामकर्मय दो प्रकृतियाँ भाषा-पुद्गल-धिपाकिनी हैं।
इस मे जय तक धचन योग की प्रवृत्ति रहती है और भाषा-
पुलों का प्रहण तथा परिणमन होता रहता है तभी तक
उक्त दो प्रकृतियों का उदय हो सकता है। शेष २७ कर्म-
प्रकृत्तियाँ शरीर पुद्गल यिपाकिनी है इसलिये उनका भी उदय
तभी तक हो सकता है जब तक कि काययोग के द्वारा पुगलों
का ग्रहण,परिणमन और शालग्यन किया जाता है । तेरहवें
गुणस्थान के चरम समय में ही योगों का निरोध होजाता है।
अतएव पुद्गल विपाकिनी उक्त २६ फर्म-प्रशत्तियों का उदय
भी उसी समय में रुक जाता है। इस प्रकार सेरहये गुणस्थान
में जिन ४२ कर्म-प्रकृतियों का उदय हो सकता है। उनमें से
अन्यतरवेदनीय और उक्त २६ पुगल-चिपाफिनी-फल ३०
गुणस्थान में माना जाता ह॥14॥

-- डार स्या54-A अममागा -संस्करण उमजा 44 + कर्म-प्रकृतियों को घटा देने से शेष १२ कर्म-प्रकृतियाँ रहती हैं। इन१२फर्म प्रकृतियों का उदय चौदहा गुणस्थान के अन्तिम समय तक रहता है । इस के रुक जाते ही जीव, कर्म-मुक्त होकर पूर्ण-सिद्ध स्वरूप को प्राप्त कर लेता है और मोक्ष को चला जाता है।॥ २१॥ २२ ॥ " इति उदयाधिकार समाप्त। ॥ १ 4 -

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, डार श्या54A अम माग) -संस्करण मजा (७१) उदीरणाधिकार -- श्रय प्रत्येक गुणस्थान में जितनी जितनी कर्म प्रकृतियों की उदारणा हो सकती है उन्हें दिखाते हैं :- " --- उदउखुदीरणा परमपमत्ताई सगगुणेसु ॥ २३ ॥ उदय इचोदीरणा परमप्रमत्तादिसप्तगुणेषु ॥ २३ ॥ । अर्थ-~-यद्यपि उदीरणा उदय के समान है-अर्थात् जिस गुणस्थान में जितनी कर्म-प्रकृतियों का उदय होता है उस गुणस्थान में उतनी ही कर्म-प्रकृतियों की उदीरणा भी होती है । तथापि सात गुणस्थान से लेकर तेरहवें गुणस्थान-पर्यन्त सात गुणस्थानों में उदय की अपेक्षा उदारणा में कुछ विशेष है ॥ २३ ॥ उस विशेष को ही दिखाते हैं :- एसा पयडि-तिगूणा चेयरिणयाहारजुगलथागतीगं। मपुयाउ पमत्ता जोगि अणुदीरगो भगवं ॥ २४ ॥ एपा प्रकृतित्रिकोना चेदनीयाहारक-युगलस्त्यानदित्रिकम् । मनुजायुः प्रमत्तान्ता अयोग्यनुदीरको भगवान् ॥ २४ ॥ अर्थ-सातवे गुणस्थान से लेकर तेरहवें गुणस्थान- पर्यन्त, प्रत्येक गुणस्थान में उदीरणा-योग्य कर्म-प्रकृतियाँ, उदय-योग्य-फर्म-प्रकृतियों से तीन तीन कम होती हैं क्योंकि छट्टै गुणस्थान के अन्तिम समय में श्राठ फर्म-प्रकृतियों की " उदय-यन्त्र तया समय उन मा. नाम म पनि सायानिक सानासपा | nrn. पंदन पा. । मोनीप. मापुरम. मामम. गोरम. भन्तराप. इस जोर Trna ५ ६ E १०० "UvVUUUUU C3 ५ E " ६ प मिपाय म मटनम मित्र म मगित म. देशग्नि म प्रमन म अपमन में थपकरण म. अनिवृति मे मनपसम्पाय मे. पशान्तमोह में नीगा मोह म. मयोनिदेपली म. अयोगिकेवली म. - प ७२ C ७ ३ ४।४३ . . १२ . 7 ६ डार tahsin अजमागा -संस्करण मजा (७३) , उसस्थानों में ऐसे अध्ययसाब नहीं होते जिनसे कि वेदनीय- इक की तथा श्रायु की सदीरणा हो सके । इससे पासवे-श्रादि गुणस्थानों में उपय-योग्य तथा उदीरणा-योग्य म-प्रकृतियों की संख्या इस प्रकार होती है। सातवें जस्थान में उदय ७६ मकृतियों का और उदीरणा ७३ कृतियों की। आठचे गुणस्थान में उदय ७२ प्रकृतियों का और दीरणा ६६ प्रकृतियों की। नववे गुणस्थान में उदय ६६ कर्म- तियों का और उदीरणा ६३ कर्म-प्रकृतियों की सर्वे में न्य-योग्य ६० कर्म-प्रकृतियाँ और उदीरणा-योग्य ५७ कर्म- तियाँ । ग्यारहवें में उदय-योग्य ५६ कर्म-प्रकृतियाँ और औरणा-योग्य ५६ कर्म-प्रकृतियाँ । बारहवे गुणस्थान में य-योग्य ५७ कर्म-प्रकृतियाँ और उदीरणा-योग्य ५४ कर्म- तियाँ । और उसी गुणस्थान के अन्तिम समय में - य योग्य ५५ कर्म-प्रकृतियाँ और उदीरणा-योग्य ५२ कर्म- तियाँ तथा तेरा गुणस्थान में उदय-योग्य ४२ कर्म- तियाँ और उदीरणा-योग्य ३६ फर्ग-प्रकृतियाँ हैं। गुणस्थान में किसी भी कर्मको उदारणा नहीं होती; कि उदीरणा के होने में योग की अपेक्षा है. स्थान में योग का सर्वथा निरोध ही हो जाता ॥ इति ॥ उदीरणा र समाप्तः Hamar Hit سے تھی - " - नया भमय जी - Trir Min मांगे के गुणस्थानों में उन पाट कम प्रयों को नहीं होती। पाठ कर्म- प्रा.गियांगयवतीय को यो प्रतियों ( २) आहारक- ४ म्यामा त्रिफ (७) मीर मनुष्य मायु (क)। नादाय गुण भ्यान में पर्तमान अयोगियलिमगया किसी भी कमको उदीरणा नहीं करते ॥२४॥ मायाथ पदंल मयपर्यन्त छःगुणस्थानों में उदारणा योग्य कर्म प्रहानियॉ. दय योग्य कर्मप्रतियों के यरायर ही होती है। जैन-पहल गुणस्थान में उदय-योग्य तया उदीरणा योग्य पक सी मत्रह की प्रतियाँ होती है। दूसरे गुणस्थान म.कम प्रतियों का उदय तथा उदीरणा होती है। तीसरे गगम्थान में उपार उदारणादानी हीसीसौ कर्म-प्रकृतियों कति ह । चार्थ गुणस्थान में उदय १०४ कर्म-प्रकृतियों का ग्रार उतारणा भी कर्म प्रकृतियों की होती है। गणस्थान में ८७ कर्म-प्रकृतियों का उदय और ८७ कर्म- प्रज्ञानयों की उदारणा होता है। तथा छठे गुणस्थान में उदय योग्य भी ८१ कर्म-प्रकृतियाँ और उदीरणा-योग्य भी ८२ ही कम प्रशनियाँ होती है । परन्तु सातवें गुणस्थान से लकर तेरहव पर्यन्त सान गुणस्थानों में उदय-योग्य-कर्म- प्रकृतियों की तथा उदीरणा योग्य कर्म प्रकृतियों की संख्या समान नहीं है । किन्तु उदीरणा योग्य-कम-प्रकृतियाँ उदय- योग्य कर्भ प्रकृनियो से तीन तन कम होती हैं। इसका कारण यह है कि छठे गुणस्थान के अन्तिम समय में उदय. बिच्छद श्राहारकाद्वक और स्त्यानद्धित्रिक-इन पांच प्रकृनियों का ही होता है । परन्तु उदीरणा-पिच्छेद उक्त ५ प्रातियों के सिवाय वेदनीयधिक तथा मनुष्य प्रायु-इन नॉन प्रकृतियों का भी होता है । छट्टे गणस्थान से धागे के .डार स्या54→A अममागा संस्करण मजा ॥ गुसस्थानों में ऐसे अध्यवसाय नहीं होते जिनसे कि वेदनीय- द्विक की तथा श्रायु की सदीरया हो सके सासवे मादि गुणस्थानों में उदय-योग्य तथा उदीरणा-योग्य कर्म-प्रकृतियों की संख्या इस प्रकार होती है। सातवें गुणस्थान में उदय ७६ प्रकृतियों का और उदीरणा ७३ प्रकृतियों की। आठचे गुणस्थान में उदय ७२ प्रतियों का और उदारणा ६६ प्रकृतियों की। नवचे गुणस्थान में उदय ६६ कर्म- प्रकृतियों का और उदीरणा ६३ कर्म-प्रकृतियों की दसवें में उदय योग्य ६० कर्म-प्रकृतियाँ और उदीरणा-योग्य ५७ कर्म- प्रकृतियाँ । ग्यारहवें में उदय योग्य ५६ कर्म-प्रकृतियाँ और उदारणा-योग्य ५६ कर्म-प्रकृतियाँ । बारहवें गुणस्थान में उद्य-योग्य ५७ कर्म-प्रकृतियाँ और उदीरणा-योग्य ५४ कर्म- प्रकृतियाँ । और उसी गुणस्थान के अन्तिम समय में उदय योग्य ५५ कर्म-प्रकृतियाँ और उदीरणा-योग्य ५२ कर्म- प्रकृतियाँ तथा तेरा गुणस्थान में उदय योग्य ४२ कर्म- प्रकृतियाँ और उदीरणा-योग्य ३६ कर्ग-प्रकृतियाँ हैं। चौदहवें गुणस्थान में किसी भी कर्म की उवीरणा नहीं होती, क्योकि उदीरणा के होने में योग की अपेक्षा है, पर इस गुणस्थान में योग का सर्वथा निरोध ही हो जाता है ॥२४॥ ॥ इति ॥ उदीरणाधिकार समाप्तः - . नया भमय उन इस जी . THAT IT It प्रांग के गुणस्थानों में उन घाट म प्रागपा की Tirननधाठ कर्म- पांगयांगनांग को प्रशनिया (२) आहारक- १ म्याना श्रिक 3 ) और मनुष्य आयु (८)। नारय गुगाम्यान में यन्मान अयोगियलिमगया किसी भी काम की दीरणा नही करते ॥२४॥ मायाथ पदन म घटे पयंन्त छःगुणस्थानों में उदारणा योग्य कर्म प्रगनियाँ, सदय योग्य कर्मप्रतियों के यरायर ही छाती है। जैन पहले गुणस्थान में उदय-योग्य तथा उदीरणा योग्य कमी मत्रह कर्म प्रानियाँ होती है । दूसरे गुणस्थान में कम प्रतियों का उदय नया पदारणा होती। तीसरे गगम्यान म उप श्रीर उरणा दोनो हीसी सौ कर्म-अरुतियों के होते है । चौथे गणस्थान में उदय १०४ कर्म-प्रकृतियों का श्रार उरणा भी १०४ कर्म प्रकृतियों की होती है। पांचवें गणस्थान में ८७ कर्म-प्रकनियो का उदय और ८७ कर्म- प्रहातया की उदीरणा होता है। तथा छठे गुणस्थान में उदय योग्य भी कर्म-प्रकृतियाँ और उदीरणा-योग्य भी ८१ ही कर्म प्रहातियाँ हाती है । परन्तु सातवे गुणस्थान से लकर तरहय पर्यन्त सात गुणस्थानों में उदय-योग्य-कर्म- प्रतिया की तथा उदीरणा योग्य कर्म-प्रकृतियों की संख्या समान नहीं है । किन्तु उदीरणा योग्य-कर्म-प्रकृतियाँ उदय- योग्य कर्भ प्रकृतियों से तीन तीन कम होती हैं। इसका कारण यह है कि छठे गुणस्थान के अन्तिम समय में उदय. विच्छेद श्राहारकाद्वक और स्त्यानद्धित्रिक-इन पांच प्रकृतियों का ही होता है । परन्तु उदीरणा-पिच्छेद उफ्त ५ प्रकृनियों के सिवाय वेदनीयतिफ तथा मनुष्य-आयु-इन नान प्रकृतियों का भी होता है । छ? गुणस्थान से आगे के ।

डार स्या 54→A माग) सस्करण मागा भाषा 1. ज्ञायोपशमिक- प्रचरमशरीरी में १४१ कर्म- त्वी अचरम- परमशरीरी होने पर भी उसको धादि प्रतिवाटर ट्रम्मत मदिना र चादनमा क्यारिसन और गुगस्यादर इट। . --- दानमा (- (७१) १ उदीरणा-यन्त्र गुणस्थानों के माम. मूल प्रतियो. तर-प्रहतियां . D ३ ५ शानावणीय. दगंमायणीप. पेनीयाम. मोनीयकम मायुकम. नामकर्म. गोरकम. .xxxxxxxxxxxxx अन्तरायफम. ८ योष से. २२८४७२/५ मिथ्यात्य में. सास्वादन मे. ८११११११६२२५१५६२१५ मिश्र में. ८१००/१२/२२५५१२५ अविरत म. १०४५'६/२०४५५/२५ देशविस्त में. प्रमत्त मे. अप्रमत्त मे. ५ ०१४ ०४२/१५ अपूर्वकरण मे. शनिवृरिवादर में ०३६१ मन्मसम्पगय में. ५७ पशान्तमोह में. सीणमोह म. ५ प्रयोगिवेधली म. ३६ ०३८/१ भयोगिकेवली में. HD ७ ८ है A . 7 . . . . . ० स्या54A अभमाग) -संस्करण मजा (७५) सत्ताधिकार। पहले सत्ता का लक्षण कहकर,अनन्तर प्रत्येक गुणस्थान में सत्ता-योग्य कर्म-प्रकृतियों को दिखाते हैं:- सत्ता कम्माठिई बंधाई-लद्ध-अत्त-लाभाणं । संते अडयाल सयं जा उघसमु यिजिणु वियतइए ॥ २५ ॥ सत्ता करणं स्थितिवन्धादिलब्धात्मलाभानाम् । सत्यष्टाचत्वारिंशच्छुतं यावदुपशमं विजिनं द्वितीयतृतीये॥२५॥ अर्थ-कर्म-योग्य जिन पुद्गलों ने यन्ध या संक्रमणद्वारा अपने स्वरूप को (कर्मस्य को प्राप्त किया है उन कर्मों के श्रात्मा के साथ लगे रहने को सत्ता" समझना चाहिये। सत्ता- में १४८ कर्म-प्रकृतियाँ मानी जाती है । पहले गुणस्थान से लेफर ग्यारहवे गुणस्थान-पर्यन्त ग्यारह गुणस्थानों में से, दूसरे और तीसरे गुणस्थान को छोड़कर शेष नव गुणस्थानों मे १४८ कर्म-प्रकृतियों की सत्ता पाई जाती है। दूसरे तथा तीसरे गुणस्थान में १४७ कर्मप्रकृतियों की सत्ता होती है। क्योकि उन दो गुणस्थानों में तीर्थकरनामफर्म की सत्ता नहीं होती ।। २५॥ भावार्थ-यन्ध के समय जो कर्म-पुद्गल जिस कर्म. स्वरूप में परिणत होते हैं उन कर्म-पुद्गलों का उसी कर्म- स्वरूप में प्रारमा से लगा रहना यह कर्मो की "सत्ता" कहाती है। इस प्रकार उन्हीं कम-पुटलों का प्रथम स्वरूप को छोष्ट दूसरे कर्म-स्वरूप में यदल, आत्मा से लगा रहना, यह भी सत्ता" कहलाती है। प्रथम प्रकार की सचा . .

को 'या मना के नाम म और गुमर प्रकार की सत्ता. पा संमग सत्ता के नाम से पहचानना चाहिये। तयश्रा भमय उन के इमर जी स सना में ५० कर्म प्रकृमिया मागी मा उदया. বিন্ধ্য ৪ বৰ অন্য স্থােন পা বা ব্রহ नहीं की है. किन्तु उन दसों कर्म-प्रशनियों का ममावेश पाँच शगंग्नामकों में किया गया है।नया यणं, गन्ध, रस पार पशमाम कर्म की एक एक प्रति ही विवक्षित है। परन्तु इस मत्ता प्रकरण में प्राधम नथा संघातननामकर्म के पाँच पाँच भेद शरीरनामकर्म से जुड़े गिने गये है। तथापूर्ण, गन्ध, रम, श्रार स्पर्शनामकर्म को एक एक प्रकृति के स्थान में, इस जगह ५ वर्ण : गन्ध्र ५ रस. - स्पर्शनाम-कर्म गिने जान है । जैम -- १) श्रौदारिकवन्धननामकम, (२) पैफिय- वन्धननामकर्म, । ३ । श्राहारकयधननामकर्म, (४) सैजस वन्धननामकर्म और ।।। फार्मणयधननामकर्म-येपाँच वन्धननामकर्म ।। ३श्रोटारिया गंधानननामझर्ग, (२) वैक्रियसंघानमनामकर्म. ( ३ ) श्राहारसंघातमनामकर्म, (४) तजमसंघातननामगर्म श्रार कार्मणसंघातननामम,ये पाँच संघातननामकर्म । १) कृष्णनामकर्म, (२) नीलनामकर्म, (३) लोहिनामतकर्म, (४) हारिद्रनामकर्म और (५) शुक्नामकर्म- ये पांच वर्णनामकर्म ।।३) सुरभिगन्धनामफर्म और दुरभिगन्ध- नामकर्म ये दो गन्धनामकर्म १) पितरसनामकर्म,(२) कटु- परमनागकर्म, (३)कपायरसनामकर्म,(अम्लरसमामकर्म,(५) मधुररसनामकर्म~ये पांच रसनामकर्म । (१)कर्कशस्पर्शनाम- फर्म,(२) मृदुस्पर्शनामकर्म, (३) लघुम्पर्शनामकम, (४) गुयस्पर्श- नामकर्म, (५) शीतस्पर्शनामकम, (६) उप्णस्पर्शनामकर्म, (७) स्निग्धस्पर्शनामकर्म, (८) यक्षस्पर्शनासकर्म ये आठ स्पर्श- - - t tahsir अगमा) संस्करण मजा Treason- सभ्यरच से च्युत होकर, दूसरे या तीसरे गुगरथान को गुणस्थानों में से दूसरे और तीसरे गुणस्थान को छोड़ कही जाती है, सो योग्यता की अपेक्षा से समझना चाहिये। क्योकि किसी भी जांच को एक समय में दो श्रायुना से नामकर्म । इस तरह उदग्र-योग्य १२२ कर्म प्रकृत्तियों में बन्धन- नामकर्म तथा संघातन-नाम पांच पांच भेदों को मिलाने से और वर्णादिक के सामान्य चार भदों के स्थान में उक्त प्रकार से २० भेदों के गिनने से कुल १४० कर्म-प्रकृतियाँ सत्ताधिकार में होती है। इन सब कर्म-प्रकृतियों के स्वरूप को व्याख्या पहिले कर्मग्रन्थ से जान लेना चाहिये। जिसने पहले, नरक को श्रायु का बन्ध कर लिया है और पीछे से क्षायोपशमिक सत्य को पाकर उसके बल से तीर्थकरनामकर्म को भी गाँध लिया है, यह जीव नरक में जाने * কম দাশয় ক্ষা হালকা যাবে না হয় । प्राप्त करता है। ऐसे जीयको अपक्षासही, पहिले गुणस्थान में तीर्थदग्नामकर्म का मामानी जाती है। दूसरे या तोसरे गुणस्थान में वर्तमान कोई जीर, तीर्थ नामकर्म को बाँध नहीं सकता, क्योंकि उन दो गुणस्थानों में शुद्ध सम्यक्त्व हो नहीं होता जिससे कि तीर्थरनामकर्म, याँधा जा सके। इस प्रकार तीथिस्रनामधर्म को बाँध कर भी कोई जीव भान कर नहीं सकता। शव कहा गया है कि इसर और तीसरे गुणस्थान में तोहरनामकर्म को छोड़, १४७ कर्म-प्रक तियों को सत्ता हो सकती है । पहले गुणस्थान से लेकर ग्यारह गुणस्थान तक १६ कर शेष नय गुणस्थानों में १५८ कर्म-प्रकृत्तियों की सत्ता , त .. " श्र अधिक आयु की सत्ता हो नहीं सकती; परन्तु योग्यता सब ८.

जीगा-यन्त्र तय समर उन कमी की हो सकती। जिससे सामग्री मिलने पर ओ कर्म খমী যান না ক্ষা ম য গ যা দ্বা । इस प्रकार की योग्यता को सम्भव सत्ता करते है और धर्तमान फर्म को सत्ता को स्थरूप-सत्ता ॥ २५॥ चतुर्थ श्रादि गुणस्थानों में प्रकारान्तर से भी सत्ता का यसन करते हैं:- अपुयाइ चउपके भए तिरि-निरयाउ घिणु यियाल-संयं । संमाइ चसु सत्तग खयंमि इगचत्त सयमहया ॥२६॥ शपूर्धादिचतुप्फेऽनतियग्निरयायुपिना द्वाचत्वारिंशच्छतम् । सम्यगादिचतुर्यु सप्तकक्षय एकचत्वारिंशच्चतमथवा ॥२६॥ अर्थ-१४८ कर्मप्रकृतियों में से अनन्तानुबन्धि चतुष्क तथा नरक और तियंञ्चायु इन छः के सिवा शेष १४२ कर्म-प्रशातियों की सत्ता नाठवे से लेकर ग्यारहवे गुणस्थान- पर्यन्त चार गुणस्थानों में हस्ती है । तथा अनन्तानुः चतुष्क ओर दशम-निक-इन सात कर्म-प्रकृतियों का क्षय हो जाने पर शप १४१ कर्म-प्रकृतियों की सत्ता चौथे से सातवें पर्यन्त चार गुणस्थानों में हो सकती है ॥२६॥ भावार्थ--पञ्चसंग्रह का सिद्धान्त है कि "जो जीव अनन्तानुबन्धिकपाय-चतुष्क को विसंयोजना नहीं करता वह उपशम-णि का प्रारम्भ नहीं कर सकता" तथा यह।' सर्व सम्मत सिद्धान्त है कि "नरक की या तिर्यञ्च की आयु को बाँध कर जोय उपशम-णि को नहीं कर सकता"।दन. दो सिद्धान्तों के अनुसार १४ चाहिये क्योंकि जो चरम शरीरी नायिक-सम्यकस्वी है उन .डार त्या.54→A मागा . संस्करण मजा भाषा (७६) माना जाता है। क्योंकि जो जीव अनन्तानुवन्धिपापाय- चतुष्क की विसंयोजनाकर और देव श्रायु को याँध कर उपशम पि को करता है उस जीव को अष्टम प्रादि ४ गुणस्थानों मे १४२ कर्म-प्रकृतियों की सत्ता होती है । विसंयोजना, क्षय को ही कहते हैं, परन्तु क्षय और विसंयोजना में इतना ही अन्तर है फि क्षय में नष्टकर्म का फिर से सम्भव नहीं होता और विसंयोजना में होता है चौथे से लेकर सातये पर्यन्त चार गुणस्थानों में वर्तमान जो जीव, क्षायिक-सम्यकत्वी है-अर्थात् जिन्होंने अनन्तानु- बन्धिकपाय-चतुफ और दर्शन-त्रिक-इन सात कर्म-प्रक- तियों का क्षय किया है, उन की अपेक्षा से उक्त चार गुणस्थानों में १४१ कर्म-प्रकृतियों की सत्ता मानी गई है। सायिक-सम्यकत्वी होने पर भी जो चरमं शरीरी नहीं हैं- अर्थात् जो उसी शरीर से मोक्ष को नहीं पा सकते हैं किन्तु जिनको मोक्ष के लिये जन्मान्तर लेना याकी है-उन जीवों- की अपेक्षा से १४१ कर्म-प्रकृतियों की सत्ता का पक्ष समझना को मनुष्य-श्रायु के अतिरिक्त दूसरी आयु की न तो स्वरूप- सत्ता है और न सम्भय सत्ता ॥ २६ ॥ अय क्षपक जीव की अपेक्षा से सत्ता का बंणन करते हैं। खयगंतु पप्प चउमुवि पणयाल नरयतिरिसुराउविणा । सत्तगविणु अडतीसं जा अनियट्टी पढमभागो ॥ २७ ॥ दापर्फतुमाप्य चतुर्थपिपञ्चचत्वारिशन्नरकतिर्यक्मुरायुधिना सप्तकं विनाष्टाशिधावदनिवृत्तिप्रथमभागः ॥ २७ ॥ - ( त कमी को हो सकती है जिससे मामग्री मिलने पर ओकर्म अभी धनमान नहीं है उसका भी पन्ध्र यार सत्ता सके। इस प्रकार की योग्यता को सम्मय-मत्ता कहते हैं और वमान कर्म को मत्ता को म्यरूप मता ॥ २५ ॥ २ चतुर्थ श्रादि गुणस्थानों में प्रकारान्तर से भी सत्ता का घणन करत है:- अपुयाइ चउपके अण-तिरि-निरयाउ घिणु पियाल-सर्य। संमाइ चाउसु सत्तग-ग्ययंमि इगचत्त सयमहया ॥ २६ ॥ थपूर्धादिचतुक ऽतिग्निरयायुर्विना द्वाचत्वारिंशच्चतम् । सभ्यगादिचतुर्यु सप्नकक्षय एकचत्वारिंशच्छतमथवा ॥२६॥ अर्थ-१४८ कर्मप्रकृतियों में से अनन्तानुवन्धि चतुष्क तथा नरक और तियंञ्चायु- इन छः के सिवा शेप १४२ कर्म प्रकृतियों की सत्ता आठवे से लेकर ग्यारह गुणस्थान- पर्यम्न चार गुणस्थानों में होती है । तथा अनन्तानुवन्धिः चतुक और वशम-भिक-इन सात कर्म-प्रकृतियों का क्षय हो जाने पर शप १४१ कर्म-प्रकृतियों की सत्ता चौथे से सातवे पर्यन्त चार गुणस्थानों में हो सकती है ॥२६॥ भावार्थ--पञ्चसंग्रह का सिद्धान्त है कि "जो जीव अनन्तानुबन्धिकषाय-चतुष्क को विसंयोजमा नहीं करता वह उपशम-णि का प्रारम्भ नहीं कर सकता" तथा यह।' सर्व सम्मत सिद्धान्त है कि "नरक की या तिर्यञ्च की आयु को बाँध कर जीव उपशम-श्रेणि को नहीं कर सकता"। इन दो सिद्धान्तों के अनुसार १५२ कर्म-प्रकृतियों की सत्ताका पक्ष

डार
स्या54→A
असमाग)
- संस्करण मजा
Ihlit
(७६)
माना जाता है, क्योंकि जो जीव अनन्तानुवन्धिपाय-
चतुष्क की विसंयोजनाकर और देव वायु को बाँध कर उपशम-
अषि को करता है उस जीव को अष्टम श्रादि ४ गुणस्थानों
में १४२ कर्म-प्रकृतियों की सत्ता होती है । विसंयोजना, क्षय
को ही कहते हैं। परन्तु क्षय और विसंयोजना में इतना ही
अन्तर है कि क्षय में नष्टकर्म का फिर से सम्भव नहीं होता
और विसंयोजना में होता है।
चौथे से लेकर सातवे पर्यन्त चार गुणस्थानों में वर्तमान
जो जीव, क्षायिक-सम्यकत्वी हैं-अर्थात् जिन्होंने अनन्तानु
बन्धिकपाय-चतुष्क और दर्शन-त्रिक-इन सास कर्म-प्रक-
तियों का क्षय किया है, उन की अपेक्षा से उफ्त चार
गुणस्थानों में १४१ फर्म-प्रकृतियों की सत्ता मानी गई है।
सायिक-सम्यकस्वी होने पर भी जो चरमं शरीरी नहीं हैं-
अर्थात् जो उसी शरीर से मोक्ष को नहीं पा सकते हैं किन्तु
जिनको मोक्ष के लिये जन्मान्तर लेना बाकी है-टन जीवों-
की अपेक्षा से १४१ कर्म-प्रकृतियों की सत्ता का पक्ष समझना
चाहिये क्योंकि जो चरम शरीरी क्षायिक-सम्यकस्वी है उन
को
मनुष्य-श्रायु के अतिरिक्त दूसरी प्रायु की न तो स्वरूप-
सत्ता है और न सम्भय सत्ता ।। २६ ॥
श्रय क्षपफ जीव की अपेक्षा से सत्ता का पंणन करते हैं।
खवगंतु पप्प चउमुवि पणयाल नरयतिरिसुगउविण ।
सत्तगविणु प्रडतोसं जा अनियट्टी पढमभागो ॥ २७ ॥
सपकंतु प्राप्य चतुष्पपिपञ्चयत्वारिशन्नरकतियप्मुरायुविना
सप्तकं विनाष्टाशिधायदनिवृत्तिप्रथमभागः ॥ २७ ॥

कमी को दो मफती जिमस मामग्री मिलने पर जाकर्म अभी पतमान नहींउसका भी पापोर मत्ताम। इस प्रकार की योग्यता को मम्मव-मत्ता फहते हैं और धर्ममाम कर्म को सत्ता को म्यरूप सत्ता ॥२५॥ १ १ चतुर्थ श्रादि गुणस्थानों में प्रकारान्तर से भी ससा फा यमन करत है:- अपुयाइ चउक्के अण तिरि-निरयाउ पिणु यियाल-सर्य। मंमार चसु मत्तग स्वयंमि गचत्त सयमया ॥ २६ ॥ अपूर्वादिचतुप्फ ऽनतिर्यग्निरयायुर्यिना वाचत्वारिंशच्छतम् । सम्यगादिचतुर्यु सप्तक्षय एकचत्वारिंशच्छतमथवा ॥२६॥ अर्थ-१४८ कर्मप्रकृतियों में से अनन्तानुबन्धि चतुष्क तथा नरक और तियञ्चायु-इन छः के सिवा शेष १४२ कर्म-प्रकृतियों की सत्ता आठव से लेकर ग्यारह गुणरथान- पर्यन्त चार गुणस्थानों में होती है । तथा अनन्तानुवन्धिः चतुष्क और दशम-धिक-इन सात कर्म-प्रकृतियों का क्षय हो जाने पर शप १४१ कर्म-प्रकृतियों की सत्ता चौथे से सातवे पर्यन्त चार गुणस्थानों में हो सकती है ॥२६॥ भावार्थ--पञ्चसंग्रह का सिद्धान्त है कि "जो जीव अनन्तानुबन्धिकपाय-चतुष्क की विसंयोजमा नहीं करता वह उपशम-णि का प्रारम्भ नहीं कर सकता" तथा यहा' सर्व मम्मत सिद्धान्त है कि "नरक फी या तिर्यञ्च की आयु को याँध कर जीय उपशम-धेणि को नहीं कर सकता"। इन . दो सिद्धान्तों के अनुसार १५२ कर्म प्रकृतियों की सत्ता का पक्ष •डार स्या.54→A अगमा) -संस्करण मजा | (२) श्रायु फर्मप्रकृतियों की सत्ता कही हुई है; सो क्षायोपशमिक- सम्यकत्वी तथा श्रीपशमिफ-सम्यकत्यी अचरमशरीरी जीव की अपेक्षा से । और जो २६वी गाथा में १४१ कर्म- प्रकृतियों की सत्ता कही हुई है,सोक्षायिक-सम्यकत्वी अचरम. शरीरी जीव की अपेक्षा से।स्योंकि किसी भी अवरमशरीरी जीव को एक साथ सब आयुनों की सत्ता न होने पर भी उनकी सत्ता होने का सम्भव रहता ही है, इसीलिये उसको सघ आयुनों की सत्ता मानी गई है ॥ २७ ॥ अब तपश्रेणिवाले जीप की अपेक्षा से ही नव भादि गुणस्थानों में कर्म-प्रकृतियों की सत्ता दिखाई जाती है। थाचरतिरिनिरयायव दुगौणतिगेगविगलसाहारम् । सोलखो दुर्वाससयं वियसि बियतियकसायतो॥ २८ . स्थावरतिर्यग्निरयातपद्विकस्त्यानद्धिनिकै कविकलसाधारम् । पोडशक्षयो द्वाविंशतितं द्वितीयांश द्वितीयतृतीयकपायान्सः॥ 'तायाइसु चउदसतेरवारपणचतिहियसय कमनो। नपुत्थि हासछगपुंस तुरिय कोह मयमाय खो । २६ }} तृतीयादिषु चतुर्दशत्रयोदशद्वादशपदपश्चाननुत्त्र्यधिकशत क्रमशः,नपुंसकस्त्रीहास्यपदकस्तुर्यक्रोधमदमायाक्षयः॥२६॥ सुदुमि दुसय लोहन्तो खाणदुचरिममेगसी दुनिहखानो। नयनवडू चरमसमए चउदसणनाणविग्धन्तो ।। ३०॥ सूरमे द्विशतं लोमान्तः क्षीणद्विचरम एकशतं द्विनिद्राक्षयः । नवनवतिश्चरम-समये चतुर्दशनमानविनान्तः ॥ ३० ॥ पणसीर सयोगि अजोगि दुचारमे देवसगह-गंधदुगं। फासट्टयनरसतणुपंधलसंबायपानिमिणं ॥ ३१ ॥ 7 .

…… THE .डार त्या54→A माग) संस्करण जागा- (१) थान से “या. कर्मप्रकृतियों की सत्ता कही हुई है। सो क्षायोपशमिक- सम्यकत्वी तथा श्रीपशमिय-सम्यकत्यी चरमशरीरी जीव की अपेक्षा से । और जो २६वी गाथा में १४१ कर्म- प्रकृतियों की सत्ता कही हुई है,सोक्षायिक-सम्यकत्वी अचरम. । शरीरी जीव की अपेक्षा से क्योंकि किसी भी अधरमशरीरी जीव को एक साथ सब श्रायुओं ती सत्ता न होने पर भी उनकी सत्ता होने का सम्भव रहता ही है, इसीलिये उसको सय श्रायुओं की सत्ता मानी गई है ॥ २७ ॥ - लेकर मायु, सको पायी श्रव तपकणिवाले जीव की अपेक्षा से ही नया धादि गुणस्थानों में कर्म-प्रकृतियों की सत्ता दिखाई जाती है। . -- थावरतिरिनिरयायव दुगौणतिगेगविगलसाहारम् । सोलखश्रो दुवाससयं पियसि वियतियकसायतो॥ २८ ॥ स्थावरतिर्यग्निरयाताद्विकस्त्यानदिप्रिककधिकलसाधारम् । पोडशक्षयो द्वाविंशतिशतं द्वितीयांश द्वितीयननीयकपायान्तः। तश्याइसु चउदसरयारछपणचउतिहियसय कामो। नपु इरिथ हास छग घुस तुरिय कोह मयमाय खो ॥ २६ ॥ तृतीयादिपु चतुर्दशप्रयोदशद्वादशपदपशननुस्च्यधिकशतं क्रमशः। नपुंसकस्त्रीहास्यपदकपुंस्तुर्योधमदमायाक्षयः॥२६॥ सुमि दुसय लोहन्तो खाणदुचरिममेगसनो दुनिइखम्रो। नवनवडू चरमसमर चउदंसपनाएविग्यन्तों ॥३०॥ सूरमे द्विशतं लोमान्तः क्षीणविचरम एकशनं द्विनिदातयः । नवनवतिश्चरम-समये चतुर्दशनशानविघ्नान्तः ॥ ३० ॥ पणसीइ सयोगि अजोगि दुचरिमे देवखगह-गंधदुर्ग। फासट्टयनरसतणुपंधलसंधायानिमिणं ॥ ३१ ॥ की Y १४८ उत्तरप्रकृतियों के बन्ध, उदय, उदीग्गाा और सत्ताका गुगास्थान-दर्शक यन्त्र मासे १४८ उत्तरप्रसतिया के नाम यन्धयोग्य गुणस्थान उदययोग्य गुणस्थान उदारणायोग्य गुणस्थान सत्तायोग्य गुरास्थान नंवर ३ A शानावरणीय-५ मंतिज्ञानाचरणीय। १० १२ २ श्रतमानावरणीय । १० अधिशानावरणीया १० १२ मन पर्यवज्ञाना. १२ ५ कवलशाना० १० ૨૨ दर्शनावरणीय-६ ६ चक्षुर्दशनावरणीय १२ अचतुर्दशना० १२ अवधिदर्शना० केवलदर्शना० १२ ૨૨ १० । निद्रा १समय १२ १समय पून.१२ म्यूम-१२ १६ निद्रानिद्रा २ १२ प्रचला १समय १समय म्यून.१२ स्पन-१२ १३ प्रचलाप्रथला १४ स्स्यानद्धि २ ६ इस में ७ को पूरा अदक और एक सप्तमांश, अर्थात गुलुस्थान और पाठ के सास हिस्सों में से ऐक हिस्सा समझना । इस प्रकार दुसरे थाहों में भी समझ लेना 4.66 .

डार या54→A माग) संस्करण मजा Int (८६) ० चौसेसात चौथेसेसास, ११ ० तीसरा- तीसरा-१११ १ चेदनीयकर्म-२ १५ सातवेदनीय १६ असातवेदनीय मोहनीयकर्म-२८ १७ सम्यक्त्यमोहनीय १८ मिश्रमोहनीय १६ मिथ्यात्वमोहनीय २० अनन्तानुवन्धिक्रोध २१ अनन्तानुबन्धिमान २२ अनन्तानुवन्धिमाया २३ अनन्तानुबन्धिलोभ २४ अप्रत्याख्यानावरणको २५ अप्रत्याख्यानावरणमान २६ अप्रत्याख्यानाचरणमाया २७ अप्रत्याख्यानावरणलोम २८ प्रत्याख्यानावरणकोष मान माया लोम ३२ संज्वलन क्रोध मान माया लोभ ३६ हास्य मोहनीय ३७ रति ३८ अरति ३६ शोक २ lautaro KKKxccccuNNNo. २६ ३० ३१ ३४ Arthristiatalaintainew.mirioint ३५ " भय IS N w NC is - on فرمود :

डार त्या.54→A अजमा) - संस्करण मजा भाषा . कोप. य गाया-प्रङ्क. प्राकृत. संस्कृत. हिन्दी. च और. सन्त विच्छेद. ४, ५, ६, ६) १०,१२,१४, १५,१८,१६, अंत २०,२३,२४. २८,३०. २०-अंतराय १५-अंतिम १०,२८,-स २१---अगुप्ल १०,३२,-गुरलहुचर धन्तराय अन्तरायकर्म. अन्तिम अन्न का-यापरी अंश भाग- -~-हिम्सा. कागुरुलघु अगुस्साघुनामपर्म. अगुल्लघुचतुप्फ अगुरघुनाम, उपधारनाम, परापातनाम और उदास. नामकर्म. थरितसन्य गष्टिगु०पृ०१३ अययः अगणकीर्तिनामम. श्रयोगिन् अयोगिलिगु.१०२६ अयोमिगुग्ण प्रयत १५-यजय ७-सनम २३,२४,३१-मजागि -जोगिगुण c-मडावपया " याप्टन् थाठ. सप्टापच्चागत महादन. 7 " डार tchgin अमा") - संस्करण मजा -भाषा (१०१) गा. प्रा. सं० दि. -यचंध ३-- अभिनय ७-याइ अरन्ध थभिनव प्रति अविरत २-अविरय बन्धाभाव. नया. श्रतिमोहनीय. अविरतमम्यग्दृष्टिगु० पृ०१२. असतातवेदनीय. २२-श्रसा थत्तात -यस्साय ३२,३३-शासाय २६-अहवा प्रसात यतात अथवा पक्षान्तर. आ ग्रारम्भ. २६,२६ धादि श्रादि चादय २२,३३-याइज्ज २१- -पाइसंघयण श्रादिसंहनन वगैरह. श्रादेवनामकर्म. प्रथम-बमऋपभनाराष. संहनन. श्रायुकम. ६,१६,०३-प्राउ ५-याउय ८-ग्रागडे 7 थायुस् श्रागुष्क पा+गम्- भागच्छेत् भाकृति घातप মাথঙ্গি, शाने ५-यागिर ५,१४-यायव २८-प्रापवर्ग संस्थाननाम. थापनामम. यातपनामकर्म और धोन. नामम. माहारपरी तथा घाहा- १३-मादार याहारक ، و برای پایان نامه مه . . .

डार या54→A मामा) -संस्करण मजा hit (१०३) गा. प्रा० सं २३---उदीरणा १-उदीग्णया कर्म-फल का थनुभव उदीरगा उदीरणका प्रौदार यौहारद्विा ६-उरलदुग २,२५-उत्सम औदारिकशरीरना० यौदारिकशरीर और प्रौदा- रिकाङ्गोपाङ्गनामकर्म. उपशान्तपायवीतराग- छयस्थगुणस्थान.४०२२ उपशम १६---उपसंतगुण ६---उबंग ३२-मंगतिग उपशान्तगुण उपाङ्ग उपाङ्गत्रिक थङ्गोपाङ्गनामकर्म. शौदारिकप्रगोगङ्ग,पैकि ययगोपाज और पाहा रकमगोपागनामम. २४-ऊण न्यून. २२,३३-एगपर ४--एमा ए दो में से एक, एपा यह. यो ३-योह भोघ सामान्य क म.म भनुमाम.

Annumun fia १२८ उ: और १०.1-R मादि ३८. --माहाग पादि समाचाहनाम १४१ १४.६-ग २९-गपत्तमय नंबर अपत्यागि एकेन्द्रिपनातिना एक मोमतालीस. ३०-गमय -इगमी ४-हिय-मय १४-गारसय ११-इंगंग २६ - इत्थी एस.रात एमाशाति ঢাবিন एकादशगत कसो एक. इक्यासी. एक सी एक. एक सौ ग्यारह. एक एक. स्त्रीवेद. इस जगह. स्त्री स ६ १२,२३उन्च १२-~उन्डेय ५,१६-जोय १३,१५,०३-उदय उच्छेद उद्योत उदय उच्चगोत्र. विच्छेद. ... ',२१-~-उदय १३-उदीरण उद्योत उदय-कर्म-फल का अनु- भव०२ दौरया ८. उदीरणा.रिपाक-काल प्राप्त. म होने पर भी प्रयत्न विशे. प से पिया गानेवाला प्रकार हमरे ग्रह मार डार या54→A अम माग - संस्करण उपजी 1 . , भाषा (१०३) प्रा० सं हि० -उदीरणा --उदीरण्या कम-फल का अनुभव उदीरणा उदीरगा का औदार -उरल " 43 -उरलदुग श्रीधारद्वित ५--उसम औदारिकवरीरना० औदारिकशरीर और प्रौदा- रिकाङ्गोपाङ्गनामकर्म. उपशान्तरूपायवीनगग- यस्थगुणस्थान, पृ०२२ उपशम १६---उपसंतगुण 8.-.-उबैंग ३२-मंगतिग उपचान्तगुण उपाङ्ग " उपातिक अङ्गोपाङ्गनामकर्म. सौदारिक भलोगङ्गा,वैक्रि यग्रगोपाल और पाहा रफयङ्गोपाङ्गनामकर्म. २४-ऊण न्यून. २२,३३-एगपर २४.--एसा ए एकतर एमा दो में से एक. यह. यो ३-योह थोष सामान्य क बनुगम. - 者。」 डार या 54→A असमागा -संस्करण जाजार Ihlt (१०५) गा० सं० हिं० १--गुण्ठाण १६,८--गुणसहि ग्रहण गुण गुणस्थान एकोनपष्टि प्राप्ति-सम्बन्ध. गुणस्थान. पृ० १ " उनसठ. ७,२२--च ११,२६,२७-चउ २६-चउक्क २६-चउदस १२,३०-चउदंसा चतुर . स और. चार. चतुक चार का समुदाय. चतुर्दशन् चौदह. चनुदर्शन ४दर्शनावरण-चक्षुर्दर्शना- वरण, अचतुर्दर्शनावरण, अवधिदर्शनावरण और केव- লনায चतुःसन्तति चौहत्तर. चतुःशत एक मी चार. चरम अन्तिम. ५-चउसयरि १५-चउसय १०,०३~चरम ३३,३४-धरिम चरम छ ७,१६) पप् छह. ६-छप्पन्न पटक दया समुदाय. पट्पष्चागत दम्पन. पट छठा.

མནཾ डार या54→A जसमाग) - संस्करण मजा abl (१०७) गा० प्रा. सं० हिं० २५----तइय तृतीय नृतीय रुनु तीसरा. ६,३१-तयु ३-तत्य २३,३३-तसतिग ." तत्र प्रसत्रिक गरीग्नामकर्म उस मं. असनाम, यादरनाम और पर्याप्तनामकर्म.. प्रमग्रादिप्रकृतियों पृ.४५ ६---नसनव प्रानवर उसी प्रकार तं इति वि इति १२, 3-ति १०ति ५----चि ६-तिकसाय १६-तिकसाय ०४-तिग २१-तित्थ ३-~-तित्थयर १८-तियग २६-तिपरसाय " उस को. स्वरूप-शेघर. तीन. स्वरूप-बोधक. तृतीयरुपाय प्रत्याख्यानावरण. तृतीयकपाय त्रिक तीन का समुदाय. तीर्थ तीर्थग्नामकर्म तीर्थकर त्रिक तीन का समदाय. तृतीयरुपाय प्रत्याख्यानापरणापाय. तिय तिर्यन्च. तियानि तिपच्चगतिनामकर्म. शियंगानुपूर्वी तिचमा पूर्वाना. घ्यधिक्यत एक सौ तीन. नियत तीस. " निरि २७,०८ १६-तिरिगह १६-किरणप्पी २६-निहियसय १०,२२-गीत “... ..

डार .या54→A असमाग) -संस्करण ऊपजा blit (१०१) प्रा. सं० हिं० १३,२९-दुवीस-सय ३०-दुसय १६-दुग ४---दुहगतिग २२--दूसर ३४---देविंद द्वाविंशति-शत एक सौ चाईस. द्विशत एक सौ दो. दुर्भग दुभंगनामकर्म, दुर्भगत्रिक दुर्भगनामकम, दुःत्वरनाम- कर्म और अनादेयनाम- कर्म. दुःस्वर दुःस्वरनामकर्म. देव देव. देवेन्द्र देवों का इन्द्र तथा श्रीदेवेन्द्रमरि. देशविरतगुणस्थान पृ०१४ न नघुमक नपुमकवेद. नम्-नमत नमन कगे. नरानुपूर्वी मनुष्य यानुपूर्वी. नरत्रिक नरगति, नरानुपूर्वी. देश ४,२६---नपु ३४-नमद ३४--नरयागुपुत्री ६-नरतिग २७-नरय ४-नरयतिग और नरायु नरक नरकत्रिक नरक नरकगति, नरकानुपूर्वी पोर नरका. २०,३०-नाग १२-नायनिग्ध- दमग ५,१६-निय नवनवति निन्यानये. शान सानावरण. शानविप्नदशक पाँच ज्ञानावरण पाँच अमाराय फम. नीप नीचगांप. और

، حدثه , روم
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3

डार tchgibi अमाग) -संस्करण अाजा hilik . (१०१) गा० प्रा० सं० हिं० १३,२८-दुयीस-सय ३०-दुसय १६-दुद्दग ----दुद्दगतिग २२-दूसर द्वाविंशति-शत एक सौ चाईस. द्विशत एक सौ दो. दुर्भग दुर्भगनामकर्म. दुर्भगत्रिक दुर्भगनामकर्म, दुःस्वरनाम- कर्म और यनादेयनाम- कर्म. दुःस्वरनामकर्म. देव. देवों का इन्द्र तथा श्रीदेवेन्दसरि. देशविरतगुणस्थान पृ०१४ ३४-देविंद दुःस्वर देव देवेन्द्र २,१६-देस देश -4 ४,२६-नए ३४-नमह ३४-नरअग्युपुयी ६-नरतिग नपुंसक नम्-नमत नरानुपूर्वी नरत्रिक नपुमकवेद. नमन करो. मनुष्य-यानुपूर्वी. नरगति, नरानुपूर्वी. २७-नरय ४-नरयतिग और नरायु नरक नरवत्रिक नरक नरकगति, नरकानुपूर्वी और नरकार. ३०-नवनगाह २०,३०-नाण १२-नागाविग्य. दसग ५,१६-निय नवनवति निन्यानये. ज्ञान मानावरण. মানবিলের ঘাঁৰ মাৰাৰ पाँच अन्तराय यम. नीचगोष. और

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wwantar डार या54→A मम माग - संस्करण मजा 'गा. (१०१) 910 सं० हिं० १३,२८-दुवीस-सय ३०-दुसय ४-दुहगतिग २२-दूसर द्वाविंशति-शत एक सौ बाईस. द्विशत एक सौ दो. दुर्भगनामकर्म. दुर्भगत्रिक दुर्भगनामकर्म, दुःत्वरनाम- फर्म और अनादेयनाम- कर्म. दुःस्वर दुःस्वरनामकर्म. देव देव. देवेन्द्र श्रीदेवेन्दमरि. देशविग्तगुगणस्थान पृ०१४ ३४-देविंद देवों का इन्द्र तथा २,१६-देस देश ३४-नमह ३४-नरगुपुची ६-नगतिग नमक नम्-नमत नरानुपूर्वी नरनिक नामकयेद. नमन करो. मगुप्य-यानुपूर्वी नग्गति, नरानुपूर्वी. २७-नरय ४-नरयतिग और नरायु नाक नरपत्रिक नरक नरकगति, नरकानुपूर्वी i और नरकाउ. ३०-नयनपद २०,३०-नाण १२-नागविग्य. दमग ५,१६-निय ज्ञान नवनाति निन्यानये. शानावरण. शान विन्नदशक पाँच गानापरण पाँध नाराय फर्म. नीर नीचगोर, और --வாவாவாவாம் या54→A माग - - संस्करण मजा ३ (१११) गा. प्रा. सं. हिं० ०,७--पमत्त १७,२४, २४-पयहि प्रमत्त प्रमत्तसंयतगु०पृ० १५ ३२-परित २१-परित्ततिग प्रकृति परम् प्रत्येक प्रत्येक त्रिक प्रकृति. विजपता. प्रत्येकनाम प्रत्येकनाम, धिरनाम. और शुभनामकर्म. पुरुपद. २६-पुंस सुस् ३१-फास स्पर्श १,३-चंध व स्पर्शनामकर्म. ३१-पंधण ८-रंतु २०--चायाला वन्धन पन्ध. पृ०१ पन्धननामकर्म. बन्य-यनन् द्विचत्वारिंशत् giথন बाँधता हुया. बयालीस. पारद. " द्वितीय " २२,३४-चारम २५,०८-दिर ६,१५-सिरसाय ०६-दियाल- सय १६-वितरि ३३-रिसमरि हितीमय पाय द्वाचत्वारिंशच्छत दूमग. परयारयानावरण एक सौ यातीस. द्वासप्तति पदार. " ragwamam wwcmkawan t. म भग भगान मम्मोनीर. हिगा. , भग भा गा । म 1 म मा भीतर, मनुष्य. मनुन मा .... -मग ४ ~माया " . मनुनागुरु २० -मय मनुप्य-मापु. मानकापाय. मायाकपाय. मिथ्यादृष्टिगु००५. #माया, माया, .३,१३-~मिटा निध्या ४,१४~मिच्छा २,५,१५~मीस १३,१५~मीस मिस मिश मिश्र मिध्वात्वमोहनीय सम्मगमिथ्याप्टिगु०१०१२ मिश्रमोहनीय. य च 'पुनः, फिर. - 16 रतिमोहनीय. रसनामकर्म, १६-रितहना- ऋषभनाराचद्विक ऋषभनाराचसे और नारायस. इनन. ३ मरोने १३-उदारण थ था.54→A माग - संस्करण मजा (११३) गा. प्रा. , सं० हि. २५-लद्ध -लोह लम्-लब्ध लोभ प्राप्त. लोभापाय. व इव समान. वा १०-वराय ३४-वदिप वर्ज-बर्ज वर्ण वन्द-वन्दित अथवा. वनक्षपमनाराच सं० छोड़कर वर्णनामकर्म. वन्दन किया हवा. वर्णनामकर्म. वर्णनाम, गन्धनाम, रसनाम और स्पर्शनाम- २१-वन्नचर वर्ण वर्णचतुक ३०,३४-वा फर्म. २७-वि १६-विस्वट्ठ वा अपि वैशियाप्टक ३०-विग्ध १५,२८-निगल विन निकल अथवा. भी देवगति प्रादि ८ प्रकृ. तियाँ पृ० ५४. अन्तराय. विकलेन्दिय (द्वीन्द्रिय से चतुरिन्द्रियता) मातिनामकर्म. जिननायकर्मके सिवाप. सिवाय. छोड़कर. 4. -विजिण २७,३४-रिणा ६,२६,२७-नियु १३-नियाग विजिन विगा दिना विपाक

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जार या.54→A म माग) -संस्करण मजा hit (११५) गा० प्रा. सं० हिं० २,२५--सत्ता सत्ता १०-समचउर समय समचरम समय मत्ता-श्रात्मा के साप लगे हुये कर्माका भस्तित्व. समचतुरस सं० दूसरा हिस्सा न फिया आ सके ऐमा मृन्म कान समय शत तो. २३,२४-समय १५-सय १-सयल ३१-सयोगि ५,१८,३२.संघयण ३१-संपाय ११-संजलण १६-संजलण तिग सकल सयोगिन् संहनन संघातन सप्ज्वलन सज्जलनविय ३२,२१-संठाण २५---संत ६,२६-सम्म सय. सयोगिफेवलिगु. संहनननामकर्म. संघासननामकर्म. सज्वलनकपाय. संज्वलन ग्रोप,मार श्योर माया. संस्थाननामकर्म. सत्ता. अविरतसम्यग्दृष्टिगु० पृ० १२ सम्यक्त्वमोहनीय. संस्थान सत् सम्यच १३,१५-सम्म १८-सम्मत १२,२२) सम्प सम्यक्त्व ३२,३३/-साय " २,५,१५-सासण सास्वादन सातपंदनीय. सास्वादनप्सम्यग्दृष्टि गु० २८-साहार साधारण सापारणमा

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Vahgh मागा - संस्करण मजा ~ गा० प्रा. सं. १,२५ सत्ता सत्ता...मात्मा साप लगेष्ट्रय कमीका अस्तित्व समचतुरम सं. दसरा हिस्सा न पिया सास एमा मन्म काल १०-समचउरा समचतुरन समय २३,२४~समय समय १सयल ३१मयोगि ५,१८,३२.संघयण ३१-संघाय ११~संजलय १६-संजलातिग सकल सयोगिन् संहनन सघातन सम्ज्वलन সময় सो. सय. सयोगिकवलिगु. संहनननामकर्म. संघासननामकर्म. सव्वलनापाय. संग्वलन कोष,मान और मापा. संस्थाननामकर्म, सत्ता. গবনযান্ত্রিক ३२,२१-~~-संहा २५-संत ६.२६-~-सम्म संस्थान सत् सम्यच पू०१२ सम्य सम्पत्यमोहनीय. १३,१५-सम्म १८-सम्मश सात - १-साथ २,५,१५-सासण सास्वादन सातवेदनीय. सास्वादनसम्यग्दृष्टि गुरु १०६ सापारयना. २८साहार साधारण 中M या54A माग) - संस्करण मजा htt प्रा. ० गा. २,२५ -~सत्ता १०-समचर ३.-समय समचरम समय सत्ता-मात्मा कैसाए लगे हुये काँका मस्तित्य. समचतुरम सं० दूसरा हिस्सा न किया जा सके सामन्म काल २३,२४...समय सो. शत सव. सकल सयोगिन् संहनन ३१सयोगि २.१६,३२.संघयण ११-संधाय ११-संजला १६-संजलग तिग सपातन सजवलन খলনা सयोगिफेवलिगु. सहनननामकर्म. संघातनमामकर्म, सजवलनपाय. संज्वलन कोष,मान और माया. संस्थाननामकर्म. सत्ता, নিবন্তি १२,२१-संढाय ।' संस्थान सत् सम्य सम्यच सम्परत्वमोहनीय. १३,१५-~-सम्म १९-सम्मत सातदनीय. শাহানামতি যু ३१,३३) २,५,१४-सासण । सास्वादन २८-साहार साधारण साधारलना

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पा54A गमा) संस्करण मण 'कर्मस्तव' नामक दुसरे कर्मग्रन्थ की मृलगाथायें। - तह थुणिमो वीरजिणं, जह गुणठाणेसु सयलकम्माई। पंधुदमोदीरण्या सत्तापत्ताणि सवियाणि ॥१॥ मिच्छे सास-मासे, अविरय-देसे पमत्त-अपमत्त । • नियहिअनियट्टिसुदुमु-घसमखाण सजोगिनजोगिगुणा ॥२॥ अभिनवकम्मरगहणं, बंधो श्रोहेण तरथ वीससयं । तिस्थयराहारगदुग-चज मिम्मि सतरसयं ।। ३ । नरयतिग जास्थावर-चउहुंडायवछिवटुनपुमिच्छं। सोलतो हगाहेयसय, सासरि तिरिथीणदुहगतिगं | अणममागिइसंघय-पचाउनिउज्जोयकुखगइस्थिति। पणीसंतो मीसे चउसरि दुअआउअप्रबंधा १५॥ सम्म सगलयरिजिणा-उवधि वार नरतिगायकसाया। उरलदुर्गतो देस, सचट्टी निधासायंतो ।। ६ ॥ तेवहि पमत्ते सो-ग अरह अथिरदुग अजस अरसायं। खुच्छिज्ज छुच्च सत्त च, ना सुराउं जया निढे ॥ ७ ॥ गुणसहि नपमत्ते, सुराउ पंधंतु जइ इहागन्छे । अन्नह प्रहायन्ना, जे पाहारगदुगं बंधे ॥ ८ ॥ अडयन्न अपुयाइम्मि,निहदुरांतो छपन्न पणभागे। ঘাঘরিয়া বল তল ঘি বয়া। - Pawan .. वा. . 1-निशि 1--0गा ( गा- माग एभग दिन गुपुर २८...-03 मोग शुभलियरोगनिमा. राभगनामाम. पनि और बाती. माग. सम्पानाम शु मम १४-मनिग माममम्पगपगु०१.२२ सम्मभिक मन्मनाम, थपर्याप्तमाम और साधारयनाम. सुस्वरनामकर्म. १०---हास २६---६ासद हाम्य हाम्यपरक हास्यमोहनीय. हाम्यमोहनीय आदि प्रक- तिया पृ०६२. १८-हाप्ताइक्क हाम्यादिषटक रहित. हुएहसंस्थानना० १३-उदारण Y प जार Hahah माग) Alshshri (१९६) सगपन्न खाणदुचरिमि, निदुगंतो अचरिमिक पणपन्ना। नाणंतरायदसण-घउ छेश्रो सजोगि यायाला ॥२०॥ तित्थुदया डरलाथिर-खगरटुग परित्ततिगछ संठाया। अगुरुलड्यन्नवउ निमि-गतेयकम्माइसंघयणं ॥२२॥ दूसर सुसर साया-साएगयरं च तीस बुच्छेश्रो। वारस अजोगि सुमगा- इस्लरसन्नयरवेणियं ॥ २२ ॥ तसतिग परिणदि मणुया-उगइ जिणु, ति चरमसमयंतो। उदउ दीरणा परमपमताई सगगुणम् ॥२३॥ एसा पयडितिगणा, बेयणियाहारजुगलथीणनिगं । मणुयाउ पमना, अजोगि श्रदीरगो भगयं ॥ २४॥ सत्ता कम्माए रिई, बंधाईलद्धअत्तलाभाण। संते अडयाललयं, जा उपसमु विजिणु वियतइए || २५ ।। अपुब्बाइचाउथे भरण-तिरिनिरयाउ विशु चियालसयं । सम्माइचउसु मतग-सयन्मि गवतसयमया ॥२६॥ खवगं तु पप्प उस घि, पणयाल नरयतिरिसुराउ विणा। सत्तग घिणु अइनाम, जा अनियही पदमभागो ॥ २७ ॥ धायरतिरिनिरयायच-दुग थीणतिरोग विगलसाहारं । सोलम्बी दुधीससयं, बियंसि बियतियफसायंती ॥२८॥ " पावना" इत्यपि पाठः है

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.या54→A
मा)
-संस्करण मजा
भाषा

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5I
tahstb
समाग)
- संस्करण मजा
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Shri Karmstav Dusara Karmgranth

Author
Suri, Shri Mad Devendra
Title
Shri Karmstav Dusara Karmgranth
File name
Shri Karmstav Dusara Karmgranth
Text
OCR done
Citation
1918
Published
2011/07
Publisher
Agra, Shri Aatmanand Jain Pustak Pracharak Mandal
Language
Sanskrit
Pages
208
Library
Acharya Shri Vinaychandra Gyan Bhandar, Jaipur
DLI number
313956
Barcode
99999990312118.00
Scanning centre
Banasthali University
Digital publisher
Digital Library Of India
VMLT id
OspXxgduGBa
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Shri Karmstav Dusara Karmgranth