Agarchand Bhairondan Sethiya Jain Parmarthik Sanstha, Bikaner
Jainchitravali
Front matter
No text on this page.
श्री नेमिनाथाय नम ॥
जैन
चित्रावली
सम्पादक
-
व्या० रत्न पं० सतीशचन्द्रजी,न्यायतीर्थ,
प० कस्तूरचन्दजी, शास्त्री
प्रकाशक
दुलीचंद पन्नालाल पवार
मातिक
এণ্যগ) নাক কাথলির
८३ लोभ बीतपुर रोड,कसकता
इस चित्रावलीके चित्राको जा कोई नरुल करेगा यह
कानून के अनुसार दडका भागी होगा।
All Rghts Reserved
मरामवार १०००
बी०नि० स २४.३
ग्योछार ४)
मेरे दो शब्द पाठको । आज ऐसे रिकर समयमें जय कि कार्यालयके मालिकमा पर्गवास हो गया है, फिर भी हम एक नई चीज लेकर आपके साम्हने आते हैं। जैन समाजमे यह एक बिलकुल नई चीज है, यद्यपि इसका सम्पादनका कार्य २० बापू साहरकी देख रेखमें बहुन समयसे चल रहा था फिर भी अगर स्न०या० पन्नालालजी रहते तो यह चिनावली और भी महत्वपूर्ण होती। ग्रीष्म और शोत परीपहका डिजाइन हमारे परम मिन वा० छोटेलालजी जैनकी कृपासे वायू साहयको कोरिश धन्यवाद है। वित्रपरिचय पं० शतीशचद्रजी ५० कस्तूरचदजीने कई महीने लगातार परिश्रम करके खोजके साथ लिखने की सपा की है। इस महती कृपाके लिये हम पडितजीके कृतश है। आशा है आप भविष्य में भी इसी तरह उदारता दिसाते रहेंगे । ब्लाक यनानेका कार्य हमारे मित्र दीक्षितजीने अपनी "आइडल हाफटोन कपनी में बहुत शीघ्रतासे उत्तमतापूर्वक कर दिया है इसके लिये भी हम उन्हें धन्यवाद दिये वगर नहीं रह सक्त । अतमें "वणिक् प्रेस" के मालिकोंके प्रति भी हम कृतज्ञता प्रगट करते हुए आशा करते है कि भविष्य में आप इसी तरह हमें सहयोग देते रहेंगे। सभव है भावोंमें, कही २ भूल हुई होगी, इसके लिये पाठक कृपया हमें सूचित करनेका अवश्य ही कष्ट उठावें ताकि द्वितीयावृत्ति में ठीक कर दी जाय । निवेदक- दीपावली-२४५३ पलकत्ता] नृपेन्द्रकुमार जैन मैनेजर - चित्र--सूची १-चारुदत्त सेठ और यसतसेना १७-श्रीटा गने जपनी उगलीसे गोवर्धन २-चारूदत्त सेठ सन्यासीके जाल में पर्वतको उठा लिया। फुपसे निपल रहे हैं १८-श्रीकृष्ण मथुरा जा रहे है। ४-श्रीकृष्णकी माताके स्वप्न १६-द्रौपदी म्बयर। ५-यसुदेव कृष्णको लेकर नदके घर जा रहे हैं। २०-२१-पाडवोंकी दूत क्रीडा और उनका ६ बसुदेव कृष्णको लिये यमुनापार कर रहे हैं। बननास। ७-नन्दके घरमें श्रीहष्णका आविर्भाव । २२-द्रौपदीपर नारदका कोप। ८-सुदेव देवकीको बदलेकी कन्या दे रहे हैं। २३-श्रीकृष्ण का पराक्रम । है-कस देवकीको सन्तानको पैर पकडकर २४-आहारदान । पन्थरपर पछाड रहा है। २५-श्रीनेमनाथजीव घिर देप पूछ रहे हैं। नदकी स्त्री यशोदाकी गोदमें श्रीकृष्ण। २६-ग्रीष्म पीपह। ११-नन्दके घर श्रीकृष्णका लालनपान प्यारसे हो रहा है। २७-शीत परीपह। २८२६-वसुराजाकी राज्यसभा और १२-पूतना वध असत्यकाफल। १३-सहस्त्रदल कमल तोडनेके लिये यशोदा श्रीकृष्णको सजा कर भेजती हैं। ३०-धीटपणको मृत्यु। १५-श्रीणने सहस्रदल कमल तोडकर | ३१-३३-अष्ट कर्म चित्रावली! नागको वशमें दिया। ३४-३६-अष्ट कर्म चित्रावगे।
[१] सेठ कारुदत्त और वसन्त सेना चारुदत्त सेठको जैन समाजका ऐसा कौन व्यक्ति है जो न जानता हो । चम्पापुरी नगरीमें भानुन्त नामका पर राजा रहता था। रानीरा नाम मुभद्रा या इनके कोई पुर न होता था, फाल वश चारण मुनि पाये और सुमद्रा रानीसे कहा कि तुम्हारे पर शीघ्र ही पुत्र होगा। कुछ समय नाद तथा मुनिके कथनानुसार पुन उत्पन्न हुअा जिसरा नाम चारुदत्त रक्सा गया। चारुदत्त चन्द्रमाको तरह दिन प्रति दिन बढने लगा और अनस्थानुमार धर्म, अर्थ, क्ला, व्यापार आदिमें निपुण हो गया । इसको धर्ममें रुचि अत्यधिक रही। प्रन्थोंके अलोकनसे इसका ज्ञान इतना बढ गया कि यह मसारके सर्व कार्यको छोड़कर रात शास्त्र अध्ययनमे ही लगा रहता था। यद्यपि चामन्तका विवाह भी सार्थ नामा मामारी लड़की चित्रारतीसे हो गया था, परन्तु शास्त्राध्ययन सब व्यसनोंका वाधक है। एक दिन इसी सास सुमित्राने चारुदत्तरी मातासे कहा कि तेरा पुत्र हुआ होनेपर मी घडा मूर्य है, यह स्त्रीशी चर्चा जानता ही नहीं। तब इसी माताने व्यसनासक्त रुद्रदत्तमे कहा "जो चारुदत्तका काका या कि इसे फिमो प्रकार मी कामासक्त कगे। फिर क्या था, रुद्रदत्त चारुदत्तको वसन्त सेनाके घर ते गया । यहापर उस मङ्गलामुसी वमन्त सेनाने अपना मोहनी मत्र चारुदत्तपर डाल दिया, और ये उसपर ऐसे तह हो गये कि १२ वर्पतक घर नही आये, और माता पिता मी भूल गये। इन्ही मेठजीने १६ कोड दीनार इस मङ्गलामुग्नी सन्त मेनाके पोछे धर्वाद कर दिया जिससे कि आप सामने मना रहे हैं। कारुदत्त सेठ सन्यासीके जाल में सोतह काड दीनारोमा स्वाहा करके जब इनको स्त्रीके भी आभूपण आने लगे तर वसन्त सेनाको मा कलिङ्गसेनाने अपने घरमे बाहर निकाल दिया। ये इधर उधर भटस्ते भटकते अपने घर आये । इनके पिता भानुदत्त मुनि हो गये, और माता पतिके वियोगमे अनि दुखी हो रही थी। स्त्रीके दु सका तो कोई पारावार नी या। गना इन्ह देसकर मिलाप करने लगी। चारुदत्तने इन्हें धीर धाया और अपनी खोके बचे खुचे जेवर लेकर व्यापारके लिये परदेश निकने। रास्ते किननो आपदायें उठानी पडा। ये जिस कामको करते उसोमें नुकमान उठाना पडता। एक बार पाम सगेनी, पास जागई, घोडेपर मबार हो पूर्व दिशाको जा रहे थे कि रास्तेमे घोड़ा मर गया। फिर समुद्रमे ६ बार व्यापार निमिन यात्रा को पर शाम उत्रन हुआ। मातनी पार जहाज फट गया और एक तकडीके सहारे ममुद्रके तीरपर घातगे। वहा पास हो गजपुर नामके नगरमे एक मन्यासी रहता था, उससे इनको मुलाकात हो गई । उमने झामे पट्टीमें मुवी रस कूपिका प्रलोभन देकर लुमा लिया। ठीक ही है, धनरा लोमी क्या नहीं करता ? आप धनके लोभसे उस मायाचारी सन्यासीके पोछे जा रहे हैं। मानो इन्हें मोनह कोड दोनार फिर मिल जायगे। वही सन्यासी रस कूपमं पटक देता है तन आप गोहकोपूछ पकड़कर बाहर निकल रहे हैं। + + । ।
[ २ । कृष्णाकी माताके सात स्वमा देवकोके ६ पुत्र हुए पर देववशात ये छहों पुन देवकोसे पृथक् अन्य जगह, मद्रलपुरमें सुदृष्टि नामक सेठके यहा रहे, किन्तु यह वात देवकीको नहीं मालूम थी, इसलिये देवकी अपने पुोंकी वियोग चिन्तामे हर समय ग्रसित रहती थी। यह यात वसुदेवने जानकर देवकीमे कहा तुम उनको चिन्ता क्यों करती हो ? तुम्हारे पुन सुदृष्टि नामक सेठके घरमें अच्छी तरह हैं। यह सुन देवको पूसन्न हुई । एक समय देशको अस्वस्थावस्थामे अपने पतिको शैयापर शयन करती थी, तन रात्रिके पिछले पहरमे सात स्वप्न देसे । क्रमसे इनके नाम १ सूर्य २ चन्द्रमा ३ लक्ष्मी ४ विमान ५ अनि ६ ध्वजा और ७ रनोकी राशि हैं। इन स्वनोका फल भी इस प्रकार है। १-सूर्य देसनेसे अन्याय रूप अन्धकारका नाश करनेवाला, पूतापी पुत्र होगा। २-चन्द्र देसनेमे वह पुत्र महाकान्ति और सौन्दर्यका धारक होगा। ३- लक्ष्मी देसनेसे राज्यमिपेकके योग्य होगा। ४-विमान देसनेसे वह पुत्र देवलोफसे आवेगा। ५-अग्निके देसनेसे महा तेजधारी होगा। ६--ध्वजाको देसनेसे देवासे पूशसनीय मनुष्योका स्वामी होगा । ७-रत्नोंकी राशि देसनेसे गुणरूप रत्नोंको राशिका पुञ्ज होगा। कारागारमें कृष्णजन्म . PIC रानी देवकोने ७ स्वप्न देखे, और रानोने अपने पतिसे कहे, पतिने उन स्वप्नोंका फल बताते हुये कहा कि तुम्हारे पुत्र रन उत्पन्न होगा, आ अपने मतापसे शन ओंका नाश करनेवाला, सर्व लोक प्रिय, परम सौभाग्यवान, राज्यामिपेक योग्य, बल कान्तिका धारण करनेवाला, निर्मीक पृथ्वीका स्वामी होगा। इसप्रकार अपने पतिके सन्तोपजनक वचन सुनकर देवकोको अत्यन्त आनन्द हुआ। और कुछ दिनों बाद रानीने सर्व जोव हितकारो सन्ताप शान्त करनेवाले गर्मको धारण किया। गर्मस्थ बालक जैसे-जैसे बदता था वैसे वैसे मनुष्योंको आनन्द मी वृद्धिगत होना ना । रानी देवकोको मो अत्यन्त हप होता था । परन्तु इस गमसे राजा कसका मन दिनोंदिन येइसिन्न हाने लगा। वह पापी कस बालकके अनेक उत्तमोत्तम गुणोका विचार न कर यातकको उत्पत्तिके दिन औरमास समालने लगा। दुष्ट कसका यह ध्यान था कि कृष्ण अन्य लोगोंके समान नौमासके बाद उत्पन्न होगा, परन्तु वह उत्तम श्रमण नतमें माद्रपद शुझा द्वादशीके दिन सात मासमें ही गुम रूपसे उत्पन्न हो गये। बाराक कृण, शत्र, चक्र, गदा, पन आदि शुभ लक्षणोसे विभूपित थे। और उनका शरीर सुन्दर नोल मणिके समान दैदीप्यमान था । अतएव उत्पन्न होते हो उनने अपने शरीरको दोप्तिले देवकाका प्रसूति ग्रह देदोयमान कर दिया।
सेठिया जैन ग्रन्थालय चीकानेर. + [३] बालक श्रीकृष्णको नन्दके घर लेजाना रात्रिका समय था, घोर अन्धकार समस्त भूतलपर छा रहा था, नगर निवासी निद्रा- देवीकी गोदमे पूमोद कर रहे थे, उससमय वसुदेवजी बातक श्रीकृष्णको गोटीमें लेकर कारागारसे थाहर निस्ले, कसके सशस्त्र सिपाही सो रहे थे, उनमेंसे कोई भी जानत न था स्त्री पुरुष, पशुपक्षी आदि सभी निद्राके वशीभूत थे, वे धीरे २ नगरके फाटक्पर आये, वहापर भी वही दशा थी, जंसी कि कारागारके सशस्त्र सिपाहियोकी थी, दरवाजेके दृढ़ कपाट श्रीकृष्णके चरण स्पर्शसे मुल गये । उस समय पानी घरप रहा था । पानीकी एक बून्द पालर के एक कानम पड़ी जिससे उसे छीक आई, बोक्का शब्द राजा उग्रसेनने सुना जो कि दरवाजे के उपर बैठा था उसने शुभाशीर्वाद दिया, तुम चिरजीव रहो, तुम्हारी विननाधायें नष्ट हो, यह सुनकर वसुदेवने उग्रसेनसे पहा पूज्य यह रहम्य गोप्य है। इस देवी पुनसे तुम कारागारसे मुक्त होगे, यह शुभवचन सुन कर वसुदेव ( बलिभद्र) श्री कृष्णको लेकर चले । नंदके घरमें श्रीकृष्ण वासुदेवजीने यमुना नदीको पारकर नन्दरायके गोकुलमें पूवेश किया। जिस समय वासुदेवजी वालक श्रीकृष्णको लिये हुये गोकुलमें पहुचे ये उस समय वहा मी वही दशा थी जो निद्रादेवीके पूमारसे हो जाती है। गोप गोपी पशुपक्षी पूगाढ निद्रादेवीके वशमे सोये हुये थे। कोई भी सचेत न था, और यही दशा नन्दरायजीके घरपी थी, वसुदेवजी बालक श्रीकृष्णको लिये हुए वहापर पहुचे जहा माता यशोदाने पूभव क्यिा था, उस पूसूतीमहमें भी निद्रादेवीका एक छत्र राज्य छा रहा था, सब दासिया और गोपिया सो रही थीं और स्वय यशोदा मी निद्रामें तल्लीन थीं। निद्रादेवीने उनपर इतना पूगाढ अधिकार जमा रस्सा था कि उन्हें यह भी न मालूम हुआ कि मेरे पुन हुआ है या क्न्या। इसी समय वसुदेवजीने श्रीरपणको यशोदाजीके पास मुला दिया और प्रसूति हुई कन्यारो उठा लिया, इस पूगार वसुदेवजी कन्याको लेकर गोकुलसे लौटकर मधुरा आये, इस ममयतक मथुराके मनुष्य निद्राके वशीभूत हो रहे थे, एक भी मनुष्य सचेत नहीं हुवा था, नगरका द्वार तथा पारागारके कपाट भी उसी तरह खुल गये, तथा व्योंके त्यो यन्द हो गये। और वासुदेवजी कन्याको लेकर वन्दीमहमें आ गये और उस कन्याको देवकीको विश्वासके लिये दे दी। + + ।
চাচ্ছি वसुदेव तथा देवकी चन्दीगृहमे बैठे हुये हैं, फाटक श्रादि पहलेको तरह यथावत् बन्द हैं। इसी समय कन्याके रोनेका शब्द पहरेदारोंको सुनाई दिया पहरेदार मचेत हुये। तत्काल उत्पन्न हुए पुत्रकी सवर गजा कसको प्राप्त हुई । राजा कस तो इस चिन्तामें निमग्न रहता ही था और समयकी प्रतीक्षा किया करता था कि वह ममय आये जब देवकीके सन्तान हो और वह मारू, बस फिर क्या था पहरेदारोंसे यह सबर सुनकर निर्दयी कस कारागारकी तरफ दौडा, और वहा आकर देखा कि यही मेरा कारा है, परन्तु उसने अपने मनमे यह भी मोचा कि यह तो कन्या है इसलिये यह तो मुझे मार न सकेगी, किन्तु इसका पति कोई राजकुमार मेरा शत्रु हो सकता है, ऐसा मनमे विचारकर अरि सशकित हो, कन्याको पत्थरसे मारनेके लिये राजा कमने कन्याके दोनो पैर पकडकर ऊपर उठा लिया है और पतयरसे मारना ही चाहता है, उधर राजा रसुदेवने “इम कन्यको न देससकनेके कारण" अपनी आसै बन्द करलो हैं और इधर देवकी राजाकसको मना कर रही है। -- श्रीकृष्णका सहस्रदल कमल तोड़ना राजा कस श्रीकृपणके मारनेके उपार्योंसे अमी शात न हुआ था, यद्यपि श्रीकृष्णसे क्सको कई बार नीचा देखना पडा था, परन्तु तोमो वह वाज न आया। उसने कृपणके मारने के लिये गोकुलके गोपोंको पाना दी कि नाग से सहमदत कमत तोडकर ताओ। उस नागदहमें महा विकराल नागकुमार देव रहता था, उसमे कोई स्नान भी नहीं कर सकता था। उस नाग- द्रहसे कमल कौन सा सकता था, क्सने यही मोचा कि इसी नाग द्वारा मेरे शत्रु का नाश होगा । जय कसका आनापत्र गोकुलमें आया, तर सभी स्त्री पुरुपोंको चिता हुई कि यह क्मत तोडने कौन जायगा। इस प्रकार गोकुराके सब गोप गोपी चिन्ता प्रस्त थे, उस समय महावती श्रीकृष्ण उस नागदहमें कूद पड़े और, महा जटीले अमिणोंको वर्षानेवाले नागके ऊपर जा पडे हुये और शीघ्र ही उसे वशमें कर लिया। यह दृश्य देखकर किनारे पर सडे मर्व गोप गोपी , पूसन्न हो रहे हैं।
कसके योद्धाओंसे कृष्णका युद्ध । क्सने समझा था कि कृष्ण सहस्रदल मत तोड न सकेंगे और यनि तोडगे तो पाणात भी हो जायगा, पर यह धारणा उसकी निर्मूत थी ! कृष्ण हमी सुशीसे सहमदल कमरा तोड ताये और गोप गोपियों के साथ किलोरा करते हुये घर आये । घरमें हरेक तरहका आनद मनाया गया, परन्तु कम इस यातको कर महन करनेवाला था, उसने उसी समय आना दी कि नन्द नन्दन प्राति समी गगाला गण यहा श्राफर मल्ल युद्ध करें। यह आज्ञा निकालकर कसने उनके पास मल्लयुद्ध करने के निमित्त एक पर भी भेज दिया। इधर दोनों भाई बरामद और श्रीकृष्ण युद्ध के लिये तैयार हो गये। पर इमी बीचमें यतमद्रने कृष्णकी मातासे यह भी कहा कि तुम अभीतक गोपियनके म्यमानको नही छोडती हो, कृष्णने अभी नहाया ही नही है" यह वचन कृष्णको बुरे लगे, और तुम मेरे माता पिता गुरु आदिको ऐसे बचन क्यो कहते हो, तब वलभद्रने कृष्णको छातीसे रागाकर सब हाल सुनाया और कहा कि क्म तुम्हारा जन्मका वैरी है, और तुम्हारे माइयो तथा बहिनोंको पत्थरसे पछाड़ २ कर मार डाता है, यह सुनते ही कृष्णका क्रोध समुद्र उमड़ उठा और कसरो मारने के लिये चले। रास्तेमं कसके श्रासुरनाग, गर्द्धव और तुरगका रूप धारण कर पाये पर कृष्णने इन सबको मार भगाया । नगरके दरमाजेपर २ मदोनमत्त हाथी थे, उनका भी मन चुर २ कर उनके दात उसाड सीधे मल्लयुद्ध भूमिमें आ गये। बरामद्रने कृष्णको क्स आदिका परिचय दिया। कसने अपने २ योद्धाओको युद्ध करने के लिये सकेत किया, जिनके नाम चाडूरी, मुष्टी थे। ये बडे भारी पहलवान, अच्छे पहतमानोंके दात सट्टे करनेवाले थे। परन्तु बलभद्र और हरिके सामने ये क्या कर मरते थे। बहुत देरतक युद्ध होता रहा। अन्तम बलभद्रने तो एक ही थप्पड़में मुष्टि नामक पहलवानको स्वर्गलोगो पहुंचा दिया और दोनों हाथोसे क्स लिया और एक ऐमा धूसा मारा कि जिसमे मु हसे सून उगलने लगा अन्तमें मु हसे सून उगलते २ उसका प्राण पखेरू भी उड़ गया। ।
स्था ध्या श्रीकृष्णजी और बलराम मथुरा जा रहे हैं। श्रीकृष्णजीकी लीला अपार है । अजमें बडे भान न्दसे गोपगोपियोंके साथ लीला करते हुए ब्रजवासियों की रक्षा करते थे। एक समय श्रीकृष्णजीसे कुमार भानुका साक्षात हुश्रा कृष्णको ब्रजवासी स्त्री पुरुषोंने यह जाना कि सचमुचमे वे मथुरा जा रहे हैं तो अपना अपना काम छोडकर स्त्रिया जेसी जिम काममें लगी थी वैसी ही उन कामों फो छोडकर श्रीकृष्णको देखने के लिये दौड़ी आई । गोप गोपिया उनका वियोग क्षण भर भी न सह सकते थे। गोपिया बयाकुल होकर अपने तन मनको भी सुध भूल गई हैं। उन्होने रथको चारों तरफसे घेर लिया है। किसीके सिरके बाल खुले हैं तो किसीकी साडी ही नीचे गिर पडी है । और कोई २ तो उनके ध्यानमे मृत्ति या चित्र रेखाके समान सही है, और कोई मूर्च्छित जमीनपर गिर पडी है। कोई इनके वियोगसे दु सी होकर हाहाकार कर रही है, कोई इन्हे रोक रही हैं, कोई यह भी कहती हैं कि है विधाता । तू दुष्ट है, तुझमे दयाका सचार भी नही जो सयोगियोंको वियोगी यनाता है। इस प्रकार विलाप करती हुई गोपियोंको छोडकर श्रीकृष्ण मथुरा पाये । - , * नारदजीका द्रौपदीफर कोष जब पाढवोंने कौरवाको हराकर अपना राज्य वापिस ले लिया। हस्तिनापुरके निवासी तथा अन्य सब प्रजागण पाइयोंकी न्याय, नीति, धर्मपरायणता और राज कुशलता देखकर इनपर इतने मुग्ध हो गये कि दुर्योधनादिकको चिरकालके लिये भूल गये। प्रजाजनक सुख, शाति, मोग उपमोग तथा अति आनन्दसे अपने दिन व्यतीत करने लगे, किसीको किसी बातकी चिन्ता न थी, सन अपने अमन चैनसे रहते थे। पाइप लोग समामे बड़ी चतुरतासे काम लेते थे, उस समय कदाचित् समामें कलह प्रिय श्रीनारदजी आ गये, वहापर सघ माइयोंने उनका श्रादर विनय किया, पश्चात् नारदजी राम भवनमें गये वहापर सर्व स्त्रियोंने श्रादर किया परन्तु द्रौपदीजी अपने काममें लगी हुई थी और अपने सौन्दर्य तथा श्राभूपणोंको सम्मान रही थीं, अतएव उन्होंने नारदजीको न देख पाया, और न उनकी विनय ही की, इस महान अपमानको नारदजी न सह सके, और द्रौपदीको तिरस्कृत और नीचा दिखाने के लिये बडे क्रोध, आश्चर्य और श्राखोको लाल पीली किये हुए कुछ देर सडे रहे पश्चात वहासे चले गये। + [७] श्रीकृष्ण का पराक्रम कलह प्रिय श्रीनारदजी द्रौपदीसे गुस्सा होकर अमरकका नामकी नगरीमे आये धातुको सण्डके पूर्वार्द्ध भरतक्षेत्र है उसमें अगदेश नामक एक देश है और उसी देशमे यह नगरी है इस नगरीके पास दक्षिण समुद्र है, इस नगरीका राजा पद्मनाम था वह अत्यन्त विषयी और स्त्री लोलुप था। नारदजी इसके पास गये और द्रौपदीके रूपकी वर्णनातीत प्रशसा की। पद्मनाभका समाममक नामक देव अपनी मायासे द्रौपदीको यहा हर लाया । पद्मनामने द्रौपदीरो बहुत तलचाया और वशमे करना चाहा पर कुछ न हुआ, इधर पाण्डवगण द्रौपदीको सर जगह दृढकर थक गये तय एक दिन विचार कर रहे थे कि इसनेमें नारदनीने पदार्पण किया और कहा द्रौपदीको मैने अमरकका नामकी नगरीमें देखा है और वह नहुत दु सित है। श्रीकृष्ण और पाडव द्रौपदीको लानेके लिये तैयार हुए तथा रथोपर मवार होकर दक्षिण समुद्र पार करके अमरकका पुरीमे पहुचे, यहापर राजा पद्मनामसे युद्ध किया और द्रौपदीको लेकर समुद्र तटपर आ गये कृपणजीने इस समय समुद्रके सटपर विश्राम फिया इतनेमें पाडवगण नौकाश्रोमें सवार होकर उस पार आ गये कृष्णजी उठे और देसा कि पाण्डन नही है तय द्रौपदी सहित रथको अपनी एक मुजापर रसकर और एक बाहुसे समुद्र तैरते हुए पा रहे हैं । नारायणका पल अपार है। कीड़ा पाण्डकोकी दयूत समयकी विचिन गति है, यह अचलसे समान निश्चल, भमधीर पुरुपोंको भी विचत कर देता है। मोह ममतामें फ सफर यह जीव क्या नहीं कर समता ? अन्यायसे अन्याय अधम से अधर्म, और तो क्या नौचमे नीचतर काम भी करनेको तैयार हो जाता है। ठीक यही हास दुर्योधनमा हुआ। पाण्डवोंकी बुद्धि, विभूति दया, दाक्षिण्य, जान, धर्म प्रादि गुणोंगे देसकर दुर्योधन अपने मनमें हमेशा ईपी रखता ही था, दुर्योधनने पावोरो मारनेके लिये क्या २ उपाय न रचे, तासका महल धनवाया, भीमरो जहरपान कराया इत्यानि, परन्तु इन सब उपायोंसे पाट वो कुछ न हुमा, यल्लि दुर्योधनसे ही उल्टा नीचा देखना पड़ा, और अभी द्रौपटी म्वयम्यरम भी ऐसा ही हुआ, बस फिर क्या था दुर्योधन और जन उठा, उसमा रात दिन चिन्ता व्यक्ति परने तगी, पाराटांको सम्पत्ति देवार दुर्योपनादिन १०० माइयान मिनार उनकी मर्यादा वर- छन करनेका विचार किया तय दुर्योधनके मनी सनीने दुर्योधनसे कहा कि युधिष्ठर सत्य प्रतिज्ञा सरल स्वमावी जीव है, उसे धूत नीडामें कपटके पागाँसे जीता । यह विचार हुआ ही था कि युधि पर महाराजरो जुयो निये आमन्त्रण लिया गया। युधिष्टर महाग पाची माइया महित दुर्यो धनकै थहा पधारे और जुयेके लिये चौसर विधायी गई। कौरव पाडव जुआ खेल रहे हैं । हा। दुर । धर्माधिकारी, नोति कुशन पुरपार मा मोगति होती है। दुर्याधनो तरफमे पानी पाश फैफ रहा है, पहला दार शानोका, और दूसरा युधिधिरजोगा और फिर शानीन ही सर हाथ । मारे। अन्तमें युधिष्ठिर महाराज अपना तमाम राजपाट, गहना गुरिया, माल सजाना हाथी घोडे आदि समी यस्तुए हार गये और तो क्या अपने शरीरपर पहने हुये आभूपण कपडे लत्ते सभी हार गये और अपने स्वयम भी हार गये। तव दुर्योधनने युधिष्ठरसे कहा कि तुम सब कुछ हार गये और १२ वर्षके तिये राज्य भी हार गये इसलिये तुम १२ वर्पतक पाचों भाई द्रौपदी सहित वनमे जाकर रहो, यहा रहनेकी जरूरत नहीं, और ऐसी प्रच्छन्न रीतिमे रहो जिसमे कि हमें न मालूम पडे । ये दुर्योधन के वचन सुनकर सत्य प्रतिज्ञ युधिष्ठिर सन राज्य पाट छोडकर वनको जा रहे हैं और उनके पीछे सती द्रौपदी चिन्ता करती हुई जा रही है। द्रोपदी स्क्यम्कर - द्र पद मुताको सौन्दय और रूप तारण्य इतना अधिक था कि उसे वरण करनेके लिये अङ्ग, वग, कनिलङ्ग इत्यादि देशोंके राजकुमार घरण करनेके लिये दूत भेजते थे, इससे राजा द्रुपदने यह पिचार किया कि इसे समो राजापाके राजकुमार वरण करना चाहते हैं और एतदर्थ प्रार्थना भी करते हैं, मैं किस किसको प्रार्थना स्वीकार करू और किसको न करू और प्रार्थना भग करना अच्छा नहीं, इस लिये राजा द्रुपदने स्वयम्बरके लिये विचार किया और तदनुमार स्वयम्बर रचा गया। सय राजाओं, राजकुमारोको स्वयम्बर होनेकी सूचना दी गई और साथमें यह भी कहा कि जो राजा "चेयवन्धि हो वह कन्याको वरण करे'। यह बात सुनकर कर्ण, दुर्योधन तथा अन्य अन्य देशोंके राजा महाराजा राजा द्रुपदकी माकुन्दाकी नामकी नगरीमें आये, जहापर स्वयम्बर रचा गया था। सय राजा स्वयम्नर मडपमे आ गये तर सुरेन्द्र वर्द्धन नामक विद्याधरने गाडीव नामक धनुप समा-मण्डपके चोचमें रक्सा और कहा कि जा इस धनुपको चढावे और राधावेद्य वोधनेको समर्थ हो वह द्रौपदी पति होगा। यह घोपणा सुनकर द्रोण, करण, दुर्योधनादिक राजालोग धनुपके पास गये, पर उनमेंसे कोई उसे रचमान हिला भी न सका और न स्पश ही कर सके, तदनन्तर वीर अर्जुन धनुपके पास आये और धनुप देसा तथा स्पर्श भी किया। बाद अर्जुनने धनुष चढाया उम समय धनुपकी प्रत्यञ्चा चढनेका ऐसा श" हुआ जिससे करण दुर्योधनादिकोंके कान बधिर समान हो गये । और धनुप चढाकर कुन्तीपुत्र अजुनने निशाना व दिया, बस, उसी समय द्रौपदीने अर्जुनके सुन्दर कठमें अपने करकमलोंसे पर माता डाल दी, वर माला डालते समय अचानक मालाका तार टूट गया औ पवन झकोरेमे माला फूल पाचो भाइयोंपर पड़े, इस कारण मूर्सलोग कहने लगे कि इसने पाचाहीको वरण किया पर यह ऐसी बात नहीं है, द्रौपदी अर्जुनको ही स्त्री है और उसने अजु नको ही वर माला पहनाई है।
+ सुदेव कृष्णको लेकर यमुना तटपर यमुनेन कृष्ण गोटीमें लेकर यमुना तटपर पहुंचे। यमुनाका प्रवाह इतना जोरमे चल रहा था कि उसको पार करना पडा कठिन होगया। इधर चारो तरफसे वर्षा हो रही थी। मेघ घड घड गरज रहे थे, यमुनाके प्रवाह की तुमुल ध्वनि कानोको घहरा कर रही थी, बिजलियो चमक रही थीं, अब ऐसे समयमें क्रेता क्या कर, कसे पार हों, यह विचार करहो रहे थे कि यालक रुपणके प्रताप से यमुनाका प्रवाह घट गया। अतएव वसुदेव वातक कृष्णको लेकर यमुना पार कर रहे हैं। श्रीकृष्णाकी सजाक्ट बाल श्रीकृष्ण दोजके चन्द्रमाकी तरह बढने लगे। नाना तरहको क्रीडा करते हुये माता पिसाको अपार आनद देने लगे। एक समय सहस्रदरा क्मल तोड़ने के लिये जारहे थे उनके साथी कृष्णको बुतानेके तिये सामने सहे हैं। और कृष्ण पातुर चित्त हो उनके माय जानेके लिये जल्दी कर रहे हैं। माता यशोदा उनका गृङ्गार कर रही हैं। पूतना कम राजा कसने सिद्ध की हुई सात देवियों से कहा कि कोई गुप्त रोतिसे मेरा शत्रु, वृद्धि पा रहा है, तुम उसकी अभी तलाश करो ओर निर्दय हो उसी समय मृत्युके मुरबमें पहुंचा दो। कसरी यह आज्ञा सुन ये देविया उसके शव के नाश करनेके लिये प्रयन करने लगी। एक देवीने कृष्णके मारनेके लिये पूतनाका रूप धारण किया, जिसको आरति बड़ी भयङ्कर थी। उसने अपने स्तनोंके अग्रमागमें जहर रागा लिया और कृष्णको अपना दूध पिलाने लगी। कृष्ण पहिरोसे जानते ही थे। कृष्णने अपने मुंहसे उसके स्तनके अग्रभागको इस जोरमे काटा कि वह रोने, चिटाने रागी, वही दृश्य चित्रकारने दर्शाया है। श्रीनेमिनापका ध्याहके लिये मस्त वसन्तस्तुका समय था। नगर निवासी समी आनन्दम ये वसन्त स्तुके प्रागमनमे लोगोंक मनमें स्वमानत कामदेवका सवार हो उठता है । इमलिये सर नगर निवासीजन रन कीडा करनेके लिये गये । कृष्ण मो अपनी सय रानियोंने साथ गये, तथा श्रीनमिनाथको भी लेते गये। यहाँ दो मास तर धन कीडा करते रहे। कृप्णी याज्ञासे रानियोंने नेमिनाथको रिदार पराया। ये वन मोडाके दो मास व्यतीत होते हुये कुछ देर न तगी। धाद घमन्तके ग्रीष्म ऋतु श्रागई, और तोगा- + + [ १० ] को जल क्रीडा करने की ठहरी । कृपण, नेमिनाय, रानियाँ तथा अन्य नर नारी नदीपर जल क्रीडा करनेके लिये गये । वहाँ जल क्रीडाकर सनोंने नवीन २ वस्त्राभूषणोंको पहना । नेमिनाथने भी नवीन वस्त्राभूपण पहने, और कृष्णकी स्त्री जामनतीसे नेमिनाथने कहा कि ये जलकीडाके वस्त्र धोलो, तन जामनन्ती कुपित होकर बोली, मेरे पति शस, चक्र गदा, पद्म, धारण करने वाले नाग शैय्या शायो श्रीकृष्ण हैं । आप उनके छोटे भाई है । इसलिये तुम मेरे तडकेके समान हो। तुम मुझे कैसे वस्त्र धोनेकी आज्ञा देते हो। यह यात नेमिनाथको दुरी रागी, और कहा तेरे पतिका क्या। अद्भुत कार्य है इसे तो मैं अनायासही कर सकता है, यह कहकर प्रभु नेमिनाथ राजमन्दिरमें पाये, और नागशैय्यापर चढ, शस वजाया, धनुप चढाया, तब सब लोग चकित हो गये। इधर कृष्ण समामे बैठे हुये ये सो समामे क्षोभ हो गया। इनके पराक्रमको देस वासुदेव आश्चर्यको प्राप्त हुये, और कृपणने जामनन्तीको कटु क वचन कहे । बाद श्रीकृष्णने नेमिनाथके व्याहके लिये राजमति नामक राजसुता भोजनशियोंसे माँगी। ग्रीष्मऋतु भी व्यतीत होचुकी थी और वास्तुने अपना पदार्पण कर दिया था। इसी समय श्रीनेमिकुमार घोडोके रथमे सवार होकर राजमतिसे साथ व्याह करनेके लिये जा रहे हैं। मार्गमें वाई तरफ, तृण घास, कॅस, पत्ते चरने वाले हरिणोंको तथा अन्य जीवोंको घिरा हुआ देस सारथीसे पूछ रहे है कि जीवों का क्या होगा ? ये क्यों घेरे गये हैं ? गोवईन कारण श्रीकृष्णका वाल्यकालमें ही अद्भुत पराक्रम देसकर माता यशोदाको महान् आश्चय होता था । राजा कसने पूर्व मनमें तपके प्रभावसे सात देवियोंको सिद्ध किया था उन देनियोंको कसने बुलाया और अपने शत्रु को मारनेके लिये उन्हें श्राना दी। देवियाँ शत्रु को मारनेके लिये अनेक रूप धारण करती थी, अनेक उपाय रचती थीं, लेकिन वे सब व्यर्थ थे ६ देवियाँ अपना काम कर कपणसे परास्त हो चुकी थी। सातवी देवीने कृष्णको मारनेके लिये भयकर पत्थरोंकी वर्षा प्रारम्भ की। पत्थरोंकी मारसे गोप गोपिया और गौन तथा अन्य गोकुल वासी जन क्याकुल हो उठे। सय त्राहि त्राहि करने लगे, इसी समय उनसे और तो कुछ नहीं बना,ये सीधे. कृष्णके पास आये और प्रार्थना की प्रभो । इस उपद्रवसे तो हमारी जान जा रही है, आप हमारी रक्षा करें, तव प्रतापी श्रीकृष्णने अपनी बायी मुजाकी एक अँगुलीसे गोवर्धन पर्वत उठा मब गोप, गोपी, आनन्दमें निमग्न हो गये, और सब कृष्णकी प्रशसा करने लगे। राजा कसु और मूंठका फल राजा बसु स्फटिकके सिहासनपर बैठे हुये हैं। आप इतने सत्य प्रतिज्ञ थे कि आपका स्फ टिक मयी सिहासन अधर रहता था, और इमी सिहासनपर बैठ न्याय और नीतिका विचार किया करते थे। गजा यसुको समा जुरी हुई है। सभामें नारद और पर्वत इन दो नामोके व्यक्ति भी बैठे हुये हैं। दोनोंमेंसे एक पतने कहा कि- तिया। ।
- . [ ११ ] "स्वर्ग चाहने वाले पुरुष "अज" द्वारा यज्ञ करें । अज शदका अर्थ चतुष्पद पशु है और यह अर्थ सर्वलोकमें प्रसिद्ध हो है। चेदका भी वाक्य है कि “अजैर्यष्ट य" अर्थात् अज बकरेसे यज्ञ फरना चाहिये। जिसमे याजिक और पशु दोनोंही स्वर्ग जाते हैं। परत इस प्रकार अपने पक्षका समर्थनकर बैठ गया। बाद नारदने इसके पक्षका सडन किया कि अज शन्दके बहुत अर्थ हैं। अज शन्दका चतुष्पद पशु करना व्यर्थ है। जिस प्रकार “हरि" शब्दके अनेक अर्थ है। कौशिक शब्दका अर्थ इन्द्र और धुप , और हरि शन्दका अर्थ इन्द्र, नारायण, सिह, बन्दर श्रादि होता है परन्तु जहा पर जैसा अर्थ अमीष्ट और समुचित, योग्य होता है, वहाँपर वैसा ही अर्थ लगाया जाता है, परन्तु इसकी बुद्धिम अज, नाम बकरेका ही प्रतिमासित हुआ है, पर यह अर्थ नहीं किन्तु यहापर अज शब्दका अर्थ 'त्रिवर्षायशालि' तिवरसे यव (जो) हैं। निवपीय यव पृथ्वीमें पैदा नहीं हो सस्ते क्योंकि ये अचित्त है, उनसे होम करना चाहिये । जिन भगवानकी पूजा यज्ञ है और पूजाके अनन्त ब्राह्मण, क्षत्री वैश्य अग्नि होम करते, हैं श्रत होमके लिये अचित्त सामिग्री चाहिये । ऐसा यज्ञ स्वर्गका कारण है । किन्तु - जीव हिंसासे स्वर्ग नहीं होता। जीव हिसा करने वाले याज्ञिकही स्वर्ग जाये तो नर्क कौन जायगा ? नरकका कारण हिसा है और स्वर्ग तथा सुखकी प्राप्तिका कारण सत्य धर्म है । कुपाया माता पुनको सुस नहीं देसाती । इस प्रकार असत्यपक्षका सएडन करनेवाले नारदकी सभी समा जन प्रशसा करने लगे । तदन तर बहुश्रु त पण्डितोंने राजा बसुसे पूछा कि राजन । आपने गुरु क्षीरकतम्बसे जैसा सुना हो वैसा सत्य कहो, तब वह मूढ़, दुष्ट बुद्धि राजाबसु गुरुका वचन जानता हुआ भी झूठ बोला, उसने कहा कि नारद युक्तिसे बोलता है सत्य नही किन्तु जो पतने कहा वह सत्य है और गुरुकी आज्ञानुसार है। ऐसा वचन मुससे निकलाही था कि राजा बसुका अधर स्फटिकका सिहासन पृथ्वीमे फँस गया यह देस सभा जन आश्चर्य कर रहे हैं। श्रीकृष्ण का परलोक गमन 1 मुनि नापसे द्वारिकापुरी जल भुनकर साफ होगई । यादवोंका कुरा भी नष्ट होगया। बान्धर, हितपी परिवारसे नियुक्त हो दोनों भाई जीवनको अाशा रस दक्षिणकी ओर चले । मार्गमे हस्तपणा नामक नगर मिता, वहा ये दोनों भाई गये, उस नगरका राजा अच्छदत था, इनका शत्रु था। कृष्णजी तो उस नगरके बनम हो रहे और बलदेवने भोजनादिकी व्यवस्था के निमित्त नगरम प्रवेश किया । नगरमें इनके रुप, बल, पराक्रमको स्मरणकर मनुष्य इनके पास इस्ट होने लगे । यह बात राजा अच्छदन्तरो भी मालूम हुई । उसने इनके मारनेके लिये सेना भेजी । इससे युद्ध हुआ और युद्धमे श्रीकृष्ण और बालरामने सबको हरा दिया, ठोकही है नारायणके सामने कॉन टिक समता है? नगरमे मोजन सामग्री लेकर विजय नामक नगरमे आये । वहापर श्रीमगनान नेमिनाथको म्मरएर अन पानादिक किया । वहाँसे चलकर कोशाम्बी नामक महावनमे श्राये। इस समय दो पहर हो चुरा था, प्रीष्मस्तु थी, सूर्यदेर अपनी प्रसर किरणोंसे भूमिको तमायमान कर रहे थे। + । " , [ १२ ] मृग, मृग तृष्णामे प्राण विसर्जन कर रहे थे। मर जङ्गलके जीन प्याससे व्याकुल हो रहे थे, उसी समय कृष्णको भी प्यासने आ सताया और प्यासके मारे व्याकुल हो उठे, तब कृष्णने बलदेवसे कहा कि मुझे प्यास लगी है। मेरे श्रोष्ठ सूम रहे हैं, तातु प्रदेश मूखा जाता है, अब आगे एक पैर भी नहीं बढाया जाता मुझे कहीं शीतत जलमिले तो अच्छा हो, यह सुन बलदेवने कहा तुम शान्ति धारण करो मैं अभी जल लाकर आपको पिसाता है। और मैं जनतक जल लेकर आता है तवतक जिन स्मरण रूप जलसे अपनी पियासको शान्त करो। यह कहकर वलदेन पानीको दूढते हुये बहुत दूर निकल गये, पर अभी तक जलका ठिकाना न मिला। इधर श्रीकृष्ण जलकी पिपासासे व्याकुल हो एक सपन वृक्षकी आयामें वाय परपर दाहिना पैर रसकर खेद दूर करनेके लिये क्षणभर विश्राम करने रागे, इतनेमे उसी समय देव योगसे जरत्कुमार वहाँ आ निकला, वह पापी 'मृगयाके लिये वनमे अकेला ही घूमता फिरता था, वह इस जगलमें इसीलिये आया था कि किसी प्रकार श्रीकृष्णकी रक्षा हो, क्योकि एक वार चारण मुनिने कहा था कि श्रीकृष्णकी मृत्यु जरत्कुमार- से होगी। यह सुनकर जरत्कुमारने सोचा कि जन मैं यहाँ द्वारिकापुरीमे ही न रहगा तो मेरे हायसे श्रीकएको मृत्यु कैसे होगी। परन्तु, दैव प्रधान है, मुनिके वाक्य असत्य नही हो सक्ते जरत्कुमार वनचरोंकी तरह, धूमता फिरता यहाँ पाया तो देसता क्या है कि एक वृक्षके नीचे ग लेटा हुआ है, ययपि ये श्रीकृष्ण ही ये, भ्रमका कारण इनका पीताम्बर हुआ, उसने समझा फे यह पीला २ वस्त्र समान हल रहा है सो सुप्त मृगका कान है । बस यह धारणा कर उसने धनुप नर पाण लगाकर चलाया तो कृष्णके चरण तलमें रागा, जिससे- पगसरा भिद गया । श्रीकृष्ण मूर्छित होगये, बाद कुछ सचेत हो कहने लगे, ओ वाण मारनेवाले । मेरे सामने तो श्रा, मैं देसू तू कौन है ? यह आवाज सुन जरत्कुमार अपने शिकारको तलाश करता हुआ शिकारके पास आया तो देखा कि यह तो श्रीकृष्ण हैं। हा । मैंने अनर्थ कर डाला, हा मैं । पापी हू, इस कार हा हा कार करने लगा। इधर पण जरत्कुमारको शिक्षा दे परतोक सिधारे। शीत परीपह शीत पडे रनि मत गौ, दाहे सब धन राय। ताल तरगनि तट विपै, ठाडे ध्यान लगाय ।। शीत परीपहका अर्थ ठडकी बाधा या कष्टको सहन करना शीत परीपह कहलाता है। शीत मधान पूम और माघ मास हैं, इन मामोंमे अत्यन्त शर्दी पड़ती है। शदीकी वजहसे सभी लोग गर्म वस्तुओका व्यवहार करते हैं, परन्तु वे असएड तप धागे, शीत परीपहको जीतने वाले मुनिराज नश्चत शीतमी कुछ भी परवाह न कर नदियोंके किनारे जाकर तपस्या कर रहे हैं। जिस समय, चारो तरफ ठडी ठडी हवा चतती है। ठडके कारण पानी जम जाता है, बुहारसे चारों शायें पूर्ण हो जाती हैं। ठहके कारण पुरुषाकी दाँतो बँध जाती है, उस ममयमे ये निर्मन्थ तुर नदी तटपर अचत हो निश्चत ध्यानमे मग्न है। + ।
[ १३ ] ग्री परीपह प्रोपम ऋतु रवि तेजसे, सूसे सरवर नीर। शैल शिसर मुनि तप तपें, ठाहे अचल शरीर। ग्रीष्म शदका अर्थ गर्मा है और परीपह शन्द्रका अर्थ है कष्टोका सहन करना, अथवा केवल “सहन करना"। अब प्रीष्म परोपहसे यह मतलन निकला कि गर्मी या ग्रीष्मस्तु की वाधाको सहन करना प्रोम परोपह कहलाती है। प्रोम परोपह सहन करना माधारण काम नहीं है। जिस समय सूर्य नारायण अपनी प्रचड फिरणोंमे समस्त भूमि तलको अग्नि समान धना देते हैं। प्रचण्ड तेज धारी सूर्य देवका ही जिस समय एक क्षत्र राय रहता है। जमीन पर पर रसते ही पैर जलने लगता है, सारे जीन गर्मी से बाहर तक नहीं निकलते, धूपकी तरफ देखने से ही आसोमे चकाचौंध और ज्वाला सी उड़ने लगती हैं। रास्तोमें आना जाना छोड़ देते हैं सारे देन पशु, पक्षी, प्याससे व्याउल हो जगलमे वृक्षोकी शरण लेते हैं, पास चरनेवाल मृग मृग तृष्णा में प्राण विपर्जन करते हैं, और नदी तथा सरोनरोंके जन सुन जाते हैं, जहाँ पानीका दर्शन तक नहीं मिलता गर्भ गर्म लपटोंमे चारों तरफ सन्नाटा सा छा जाता है, उस समय भीष्म परोपह धारी महान् आत्मा, मुनिराज पर्वतकी चोटीपर जारर ध्यान कर रहे हैं, राजाश्रयास भगबान नपसको प्रहार दे रहे हैं राजा श्रेयाँस और उनका भाई सोमप्रभु मणियोंसे सुसक्षित चौकमें भोजनके लिये बैठ ही रहे थे कि इतनेमे सिद्धार्थ नामके द्वारपालने प्रभु ऋपम के आगमनको सूचना दी, कि महाराज । जगत्पति प्रभु ऋपमदेवने नगरमें प्रवेश किया है। नगर निवामी जन उनको सेवा सुथ पा तथा चरण कमलोंमें अर्थ चढ़ाते हैं। कोई नमस्कार, बन्दना करता है और मौनावलम्बी प्रभु ऋषभ देव ईया शुद्धि करते हुये चले आरहे हैं। ये दोनों माई सिद्वार्थके वचन सुन प्रति भक्ति मानसे प्रेरित होकर उठे और भगवान ऋपमदेवके सन्मुस जाकर बन्दना की। मुनिकी तीन प्रदक्षिणा देकर चरणकमलोंमे साष्टाङ्ग नमस्कार किया। बाद अति नम्रतामे कहने लगे, पूमो । पाइये, हमें आज्ञा दोजिये, हम आपके सेवक है । मौनावलम्बी प्रभु ऋपमन्य इसा कुछ भी उत्तर न अगाडी पई , इसनेमें राजा श्रेयाँसको पूर्वभरका स्मरण हुआ, और मुभी श्राहारगी विधि स्मरणकर हे भगवन । अन तिष्ठ तिष्ठ कहकर श्रादर पूर्वक गृहम तिया । उपासनपर बठाकर पाद प्रशासन किया, और मन, वचन, कायसे चरणोंकी पूजा की। तान्तर पाहार विधिके जाननेवारो राजा श्रेयाँसने इक्ष रस लेकर कहा, हे भगवान् । यह रस शुद्ध है और सम्पूर्ण दोपोंसे रहित है। हमे महया कीजिये। भगवान् शुद्धात्मा प्रतकी वृद्धि के लिये पाणिपानम आहार ले रहे हैं और राजा श्रेयाँस उन्हें आहार दे रहे है। + [ १४ ] १ ज्ञानावरणी कर्म जैसे परदा पडा मूर्ति पर ज्ञान नही होने पाता। वैसे ज्ञानावरण कर्मसे ज्ञान जीवका ढक जाता ॥ प्रथम घातिया कर्म यही है चिद्रोधक यह कहलाता। जगको इसने अज्ञ बनाया अज्ञमनुज नहि लसपाता।। २ दर्शना वर्णी ये भूपति हैं सर्व जगतके, दर्शन करते हैं सब लोग। द्वारपाल भी सूर अजय है देता नहीं दर्श सयोग ।। इसी तरह दर्शनसे सयको करदर्शनावरण निराश । चत,अधी,केवल दर्शन अरु अचक्षुका सत्यानाश ॥ ३ मोहनीय मदिरा पीकर मस्त हुये हैं भूले हे कुन गौरव मान । सुधि बुधि भूल गये सम तनको रहा न कुछ भी ज्ञान ।। मोहनीय भी गहरो मदिरा दूपित कर देतो हे प्रान । सम्यक् दर्शन ज्ञान चरणपर ताने रहती सदा कृपान॥ ४ अन्तराय दीन विप्र कुछ मांग रहा है दाता देने लगा इनाम । पर मुनीमने मना किया तर हुआन कुछ भी काम ॥ ठीक समझलो इमो तरह है अन्तराय भी कर्म महान । अन्तराय यह कर देता है जो होता हो शुभ कल्याण ॥ ५ आयु फसे हुये हैं पैर काष्ठमें इधर उधर नहि हो सकते। नष्ट हुआ स्वातन्त्र्य मनुजका फिर कुछ भी नहि कर मकते ॥ ससारी भी फंसे हुये हैं आयु जालके बन्धनमे । देव, मनुज, पशु, नरक योनिमें फिरते हैं सबके तनमे ॥ है नाम फर्म चित्रकार कुर्सीपर बेठे बना रहे है चित्र विचित्र । नाम कर्मभी देहोंको हे रचता मानो मेरे मित्र ॥ श्वेत कृष्ण अरु हलका भारो रुप रसारिक गन्ध महान । येही घेष्टन,कर्म सगठन रच देता है कर्म प्रमान।। ७ गोत्र कर्म कुम्मकार जो चाहे जैसे प्यालोका निर्माण करे । गोत्र कर्म गी उच्च नीचका उनमे जो व्यवहार करे। आत्म प्रशसा, परनिन्दासे, गोत्रकर्मका होता वन्ध । अन्य गुणोंके ढकनेसे भी होता नीच गोन सम्बन्ध ।। ८ वेदनीय कर्म मूर्य सिपाही लगा चाटने शहद लपेटो वह तलवार । मिला म्वादपर जीभ कटगई वहने लगी सूनको पार ॥ थोड़े झूठे सुरपके कारण सहता है दुसोंका मार । वेदनीयसै सुस दुस मिलता मनमे ऐमा करो विचार ॥ सतीश" ९ नारकीय दुस मार रहे हैं, पीट रहे हे एक दूसरे आपसमे । काट रहे हैं छेद रहे हैं, कुचल रहे हैं आपसमें ॥ वृक्षोके पत्तै असि जैसे देह विदारें छेदे गात । मुड भूमिपर पड़े हुये हैं, नरक दु स य देसा भ्रात। ,
जेन्द्र चित्रावली
सेठिया जैन ग्रन्थालय बीकानेर
जिनवाणी प्रचरकालय
कलकत्ता
चारुदत्त सेठ और वसन्त सेना
(At Pre
Calcuta.
[ १४ ] १ज्ञानाचरणी कर्म जैसे परदा पडा मृत्ति पर ज्ञान नहीं होने पाता । वैसे ज्ञानावरण कर्मसे ज्ञान जीवका ढक जाता ।। प्रथम घातिया कर्म यही है चिद्रोधक यह कहलाता। जगको इसने अज्ञ बनाया अज्ञ मनुज नहिं लसपाता।। २ दर्शना वणी ये भूपति हैं सर्प जगतके, दर्शन करते हैं सम लोग। द्वारपात भी सूर अजय है देता नहीं दर्श सयोग ।। इसी तरह दर्शनसे सपको कौदर्शनावरण निराश। चत,अवधी,केवल दर्शन अरु प्रचक्षुका सत्यानाश ।। ३ मोहनीय मदिरा पीकर मस्त हुये हैं भूले हैं कुन गौरस मान । सुधि बुधि भूल गये सब तनकी रहा न कुछ भी ज्ञान ।। मोहनीय भी गहरो मदिरादूपित कर देतो है प्रान । सम्यक दर्शन जान चरणपर ताने रहती सदा कृपान ।। ४ अन्तराय दोन विप्र कुछ मांग रहा है दाता देने लगा इनाम । पर मुनीमने मना किया तब हुभान कुत्र मी काम । ठीक समझनो इसी तरह है अन्वराय मी कर्म महान । अन्तराय यह कर देता है जो होता हो शुम कल्याण ॥ ५ आयु फसे हुये हैं पैर काठमें इधर उधर नहि हो सकते । नष्ट हुआ स्वातन्त्र्य मनुजका फिर कुछ मी नहि कर सक्ते ॥ ससारी भी फंसे हुये हे श्रायु जालके बन्धनमे । देव, मनुज, पशु, नरक योनिमें फिरते हैं सरके तनमे ।। है नाम कर्म चित्रकार कुर्सीपर बैठे बना रहे हैं चित्र विचित्र । नाम कर्मभी देहोको है रचता मानो मेरे मिन ।। नेत कृष्ण अरु हलका मारो रुप रसादिक गन्ध महान । येही घेटन,कर्म सगठन रच देता है कर्म प्रमान।। ७ गोन कर्म कुम्मकार जो चाहे जैसे प्यातोंका निर्माण करे । गोत्र कर्म भी उच्च नीचका उनमे जो व्यवहार करे। आत्म प्रशसा, परनिन्दासे, गोत्रकर्मका होता बन्ध । अन्य गुणों के ढकनेसे भी होता नीच गोन सम्बन्ध । ८ वेदनीय कर्म मूर्स सिपाही लगा चाटने शहद लपेटो वह तलवार । मिला म्वादपर जीम कटगई बहने लगी सूनको धार ।। थोडे झूठे सुसके कारण सहता है दुसोंका भार । वेदनीयसे सुख दुख मिलता मनमें ऐसा करो विचार ॥"सतीश ९ नारकीय दुस मार रहे हैं, पीट रहे है एक दूसरे पापसमे । काट रहे हैं छेद रहे हैं, कुचल रहे है आपसमें । वृक्षोके पत्ते असि जैसे देह विदारें छेदे गात । मुड भूमिपर पडे हुये है, नरक दु स य दसा भ्रात॥ . +
जैत चिनावली-
चारुदत्त सेठ सन्यासीके जालमें
Gaya Arr Press Calcutta
No text on this page.
जैन चिन्नावली
hufacts likely
श्रीकृष्णको माताके सात स्वप्न
Qara Art Press Calcutta
No text on this page.
हरिवंश पुरागा यसुदेव धोरणको लेकर नन्दके घर ले जा रहे हैं।
- हरिवंश पुराणा नन्द घरमें श्रीरणका आनिर्माय ।
ܟ
f
ܐܐܐ
-
हरिवंश पुराण
-
नन्द घरमें श्रीरका आविर्भाव।
No text on this page.
हरिवंश-पुराण
सुदेव मागे बदतरों कन्या दे रहे है।
प्राशर-निनवाया प्रचारर वायाम्य, पलता।
No text on this page.
हरिवंश पुराण
14
6
-
कमयाको सन्तानको पैर पकडकर पपर पर पधार रहे हैं।
--
No text on this page.
हरिवंश-पुराण
04
Lav
नन्दमा स्त्री यशोनाकी गादमे श्रीकृष्ण
प्रमागर-नपाणी प्रचारक यायालय, वनर चा ।
No text on this page.
हरिवंश-पुराणा
2
मा
नन्टके घर श्रीकृष्णग लालन पालन प्यारम हो रहा है।
प्रकाशक-निनवाणा प्रचारक यायालय, बालकता।
ܝܕ
जेना सोनाली
SMARAN
जिनवाणा प्रसारका कारण
श्रीकृष्णाने सहस्रदल कमल तोड़ा
yal Prets Calcutta
No text on this page.
श्रीकृष्णका मल्ल युद्ध Gay an hose, Calcutu.
No text on this page.
हरिवंश-पुराण
रोठिगा जैन गाय पीकानेर.
श्रीकृष्ण मथुरा जा रहे हैं
प्रकाश-निवाणा प्रचारव काया य, यनरता।
No text on this page.
जैन चित्रावली.
।
जिनवाणी प्रचारककामालय
कलकत्ता
Divino
द्रोपदोपर नारदका कोष
Ora Art Pres. Calcutta
No text on this page.
18102101
जिनवणी प्रचारक कार्यलय
कलकत्ता
D.K.Varma
maa
----
श्रीकरणका पराक्रम
No text on this page.
जैन कीनाक्ली
0010
लिनपालनबारकबापालप
पाण्डवोकी चूत क्रीड़ा और धनवास
O y Arte, Cact it
No text on this page.
जेन चित्राक्ली
H
जनवणीचारसर्यालय
बालवता
द्रोपदी स्वयम्बर
No text on this page.
हरिवंश पुराण वन्य श्रीकृष्णको लिये यमुना पार कर रहे हैं।
十
हरिवंश-पुराण
पूतना वध
प्रकाशक-निनवाणी प्रचारक कायारय, बलरना।
1
也
-
公
当当动到家變
长命危
आहार दान
श्रीनेमनाथ जोव घिरे देश पूछ रहे हैं
Go Art ITSE
《
No text on this page.
हरिवंश-पुराण
मेठिया कामानेर
श्रीकृष्णने अपनी उगलीमे गोवर्धन पर्वत उठा लिया।
प्राशय-निनवाणा प्रचारक वायारय, बलवत्ता ।
No text on this page.
जैन निनावली
-
जिनवाचारकका
कलकता
वसुराजाकी सभा और असत्यका फल
No text on this page.
6F 亞長
धीरपएको मृत्यु
6F 變色長石灰
No text on this page.
--
शीत परीपह
"
No text on this page.
E
He
Padhe
ग्रीष्म परीपह
No text on this page.
जैत चिन्नावली-
मोहनीयम३
acam
दर्शनावरणीय
ननवापी कार्यालय
कलदत्ता
No text on this page.
जनः नित्राक्ली- अन्तराय कर्म ४ प्रायु कर्म५ TI- नाम कर्म६ जिनवाणी प्रचारक कार्यालय कलकत्ता Dn Varms
No text on this page.
जैन चित्राक्लीन
गोत्र कर्म
वेदनीय
कर्मच
नारकीय दुःख
जिनवाणी प्रचारक कार्यालय
कलकत्ता
DNYarmos
Goa Art'te Calcutt
No text on this page.
No text on this page.