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Tatvabodh Shrishankracharyyaparnit
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॥ श्री
तत्त्वबोधः-
श्रीशंकराचार्यप्रणीतः ।
लॉरवग्रामनिवासिंपण्टि
मिहिरचन्द्रव
भाषाटीकासहित
HAI
SANAT
Ny
क्षेमराज-श्रीकृष्णदासश्रेष्टिना
मुम्बय्यां-
कटेश्वर(स्टीम्) मुद्रगयन्त्रालय
नुदायित्वा.प्रकाशितः।
-:
संवत् १९७८३ शके १८३..
वैधिकारी श्रीकटेश्वरं यन्त्रालयसाधीनाः सन्ति ।
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འདི་ཉག་སྨན་ Picgorier नात ॥श्री तत्त्वबोष श्रीशंकराचार्यप्रणीत - लॉखग्रामनिवासिपण्डित- मिहिरचन्द्रकृत- भापाटीकासमेतः। सोपं क्षेमराज-श्रीकृष्णदासश्रेष्टिना: मुम्वय्यां स्वकीये "श्रीवेंकटेश्वर" (स्टीम्) मुद्रणयन्त्रालये मुद्रयित्या प्रकाशितः। संवत् १९७८, शके १८४३. सधिकाराः प्रीवेकटेश्वर यन्त्रालयेशाधीनाः सन्ति । MeyeseeneDEOINE भूमिका। -:0: श्रीमद्वेदान्ताचार्यपरमपूज्यपादश्रीशंकराचार्यप्रणीततत्त्वबोधनामकम- तत्प्रकरणम् । एतच्च धर्मार्थकाममोक्षरूपचतुर्विधपुरुषान्तर्गतमोक्षसाघ- कवेदान्तशास्त्रमारुरुक्षोः पुरुषस्य प्रथमाधिरोहिणीति सर्वजनावगतम् ॥ एतस्य च मापारसिकसाधारण्येन प्रसिद्धिमीहमानैः क्षेमराज-श्रीकृ- ष्णदासश्रेष्टिभिर्भाषोद्धृतयेऽहमयोजिपि । मया चैतद्यथामति भाषाया- सुदृत्य विचरणोपोरर्यत इति शम् ।। लाँखग्रामनिवासी-- काशीस्थराजकीयप्रधानपाठशालापरीक्षोत्तीर्णः, पण्डितमिहिरचन्द्रशर्मा.
तत्त्वबोधः- भाषाटीकासमत १ वासुदेवेन्द्रयोगीन्द्रं नत्वा ज्ञानप्रदं गुरुम्॥मुमुक्षूणां हितार्थाय तत्त्वबो- धोभिधीयते॥१॥ नत्वा श्रीचेतनं ब्रह्म जीवित्मैकत्वसिद्धये ।। तत्त्वबोधस्य भाषायामुद्धारस्तु वितन्यते १ ॥ आरंभ करनेको इष्ट जो ग्रंथ उसकी निर्विघ्न समाप्तिके लिये और शिष्योंकी शिक्षाके अर्थ वासुदेवके स्मरणरूप और वासुदेवनामक अपने गुरुके नमस्काररूप-मंगलको करते हुए ग्रन्थ- कार-ग्रन्थके आरंभकी प्रतिज्ञा करते हैं कि ज्ञानके भली प्रकार दाता और योगी जनोंमें इंद्र
तत्त्वबोधः
जो वासुदेवेन्द्र शुरु हैं उनको नमस्कार करके
सुसुक्षुओंके हितके लिय तत्त्ववोधको कहते हैं
अर्थात् जिसके विचारसे तत्त्वांका बोध हो ऐसे
ग्रन्थकोरचते हैं-- और इन श्रुतियों में भी वासुदेव
रूपही गुरुको कहा है कि, बसे हैं भूताप्राणी जिस-
में उसे वासु और प्रकाश जो करें उसे देव कहते
हैं अर्थात् सय प्राणियोंके आश्रय और संपूर्णजग-
तके प्रकाशक ब्रह्मरूप गुरुं अथवा पूर्वोक्त ब्रारूप
जो श्रीकृष्णचन्द्र-और गुरुगीतामें भी लिखा है
कि नित्य- शुद्ध और आभासरहित-निराकार
निर्मल और नित्य वोधरूप चिदानन्द मह्मरूप
जो गुरु, उनको नमस्कार करता हूँ-गृढ जो विद्या
१ वतत्वस्मिन्भूतानीति वासुदेवः ।
२ नित्यं शुद्धं निरामासं निराकारं दिजनन् । निन्यो चिदानन्द
गुरु ब्रह्म नमाम्यहम् ॥ १॥ गूदा विद्या योगमाया देहमवानननन् ।
२५ स्वमसाशन गुरशब्देन करते ॥ २ ॥
भापाटीकारामतः। ५. वह योगमाया है और यह देह अज्ञानसे उत्पन्न इस देहमें जो स्वप्रकाश चेतनका उदय है वही गुरु शब्दसे कहाजाताहै-तात्पर्य यह है कि परब्रह्मरूप योगीजनोंके स्वामीज्ञानके दाता जो वासुदेवेन्द्र गुरु हैं उनको नमस्कार करनेके अनन्तर मुमुक्षु- ओंके हितार्थ तत्त्वबोध प्रकरणको कहते हैं।॥१॥ साधनचतुष्टयसंपन्नाऽधिकारिणां मोक्षसाधनभूत तत्त्वविवेकप्रकार वक्ष्यामः॥ मोक्षके चारों साधनोंसे युक्त जो अधिकारी उनके मोक्षका हेतु जो तत्त्वोंके विवेक (पृथकर ज्ञान)का प्रकार, उसको कहते हैं--अर्थात् पृथिवी जल.तेज वायु आकाश रूप जो पञ्च महाभूत हैं उनमें अभेदरूप (एक) प्रतीत हुआ जो सच्चि: दानन्द जगतका उपादान कारण है.वहीं जीव (६) तत्त्वबोधः- भावको तत्त्वोंकी एकतासेपा होजाता है उसका जो पञ्चभूतोंसे पृथक् ज्ञान वह जिसमे हो उस रीतिको कहते हैं। साधनचतुष्टयं किस्॥नित्यानित्य- वस्तुविवेकः ॥१॥ इहामुत्रार्थफल- भोगविरागः ॥२॥ शमादेषदसंप: तिः॥३॥ सुमुक्षुत्वं चेति ॥४॥ अबसे आगे यह ग्रन्थ शंकराचार्यजीने प्रश्न और उत्तररूपसे वर्णन किया है-प्रश्नचे चारों- साधन कौनसे हैं जिससे युक्त अधिकारियोंको मोक्ष होता है-उत्तर-पहिला साधन नित्य और अनित्यवस्तुका विवेक है अर्थात् नित्य अनित्य वस्तुका पृथक्रज्ञान है-१ । दूसरा साधन इस लोक और परलोकके जो पदार्थ और फल उनके भोगों विरागका है अर्थात् दोनो लोकोंके भोगों
:
भाषाटीकासमेतः (७)
त्यागका तीसरा साधन शम आदि जो छ:
पदार्थ हैं उनकी संपत्ति (सिद्धि) है। चौथा
साधन मुमुक्षुत्व है अर्थात् मोक्षकी अभिलापा है
४। ये चारों मुक्तिके हेतु हैं ।
नित्यानित्यवस्तुविवेकः कः।
नित्यवस्त्वेकं ब्रह्म तस्यतिरिक्तं
सर्वमनित्यम्। अयमेव नित्या-
नित्यवस्तुविवेकः ॥
प्र०--नित्य और अनित्य वस्तुका विवेक क्या
है-३०--नित्य (सत्य) वस्तुरूप एक ब्रह्मही है
उस ब्रह्मसे भिन्न संपूर्ण जगत् अनित्य (मिथ्या
वा असत् है-यही नित्य अनित्य वस्तुका विवेक
कहाता है और यही सब कारणोंमें मुख्य है।
विरागः कः । इह स्वर्गमा
गेषु. इच्छाराहित्यम्॥
(८ तत्त्वदोषः। प्र-विराग क्या है-उ०-इस लोक और स्वर्ग आदि परलोकके भोगोंकी इच्छाका त्यागअर्थात् हृदयरों दोनों लोकोंके विषयभोगकी वासनाका उदय न होना, विराग वम्हाताई ॥ शमादिसाधनसंपत्तिः का। शमों दम उपरमस्तितिक्षा श्रद्धा समा- धानं चेति ॥ प्र०--शम आदि छः साधनोंकी संपत्ति क्या है अर्थात वेशम आदिछः साधन कौन हैं जिनसे कि संपत्ति (होना) मोक्षका हेतु है--१०--शम-दम उपरम-तितिक्षा-श्रदा--समाधान इन छः साध- नोंक होनेको शमादि पट्र संपत्ति कहते हैं ।। शसः कः । सनोनिग्रहः ॥ दमक। चक्षुरादिवायेन्द्रियनिग्रहाउपरमः कास्वधर्मानुष्ठानसेवातितिक्षा का।
भापाटीकासमेतः। शीतोष्णसुखदुःखादिसहिष्णुत्वम् ॥ श्रद्धा कीशी। गुरुवेदांतवाक्यादिषु विश्वासः श्रद्धा ॥ समाधानं किम् । चित्तैकाग्रता। प्र.-शम किसका नाम है- उ०मनके निग्रह (वशीभूत) करनेको शम कहते हैं--प्र०-दम किसकी संज्ञा है-उ०- नेत्रआदि बाबबाहरकी) इंद्रियोंके निग्रहको दम कहतेहैं--प्र०-उपरम किसको कहते हैं-उ०-अपने धर्मकाही अनुष्ठान करना यहाँ (एव) पदके लिखनेसे ग्रंथकारने यह सूचित कियाहै कि अपने धर्ममें तत्पर होकर शब्द स्पर्श आदि संपूर्ण विषयोंसे चित्तको निवृत्त कर- ना अर्थात् अन्तरात्माके विचारोंमें आरूढ होकर संपूर्ण लौकिक व्यवहारोंसे उपरत ( उदासीन) रहना इसका नाम उपर्म है:-प्रतितिक्षा या (१०) तत्त्वबोधः । वस्तु है-३०-शीत और उष्ण ( ठंढ ) और तेज और सुख दुःख और मान अपमान आदिको धीरतासे सहना अर्थात् अपनीप्रकृति के प्रतिकूल (विरुद्ध )शीन आदिकी प्राप्तिके समयमें भी निर्विकार रहना इसको तितिक्षा कहते हैं--प्र०-- श्रद्धा किसप्रकारकी होतीहै--3०-गुरु और वेदां- तके जो वाक्य हैं उनमें जो विश्वास(यथार्थवुद्धि) है उसकोही श्रद्धा कहते हैं-प्र--समाधान क्या कहाता है--उ०-चित्तकी एकाग्रताको समाधान कहते हैं अर्थात् शुरु और वेदान्तके वाक्योंको एकान्तमें बैठकर एकाग्रबुद्धिसे विचारना वा किसी अधिकारीको उपदेश करना इस चित्तकी स्थिरताको समाधान कहते हैं-यह शमआदिछ- की संपत्ति रूप तीसरा साधन मोक्षका है ।। मुमुक्षुत्वं किम् । मोक्षो मे भूयादितीच्छा॥
भाषाटीकासगेतः । (9.19. प्र--मुमुक्षुत्व किसको कहते हैं--उ०--मेरा मोक्ष हो अर्थात् संसारके दुःखोंसे मेरी निवृत्तिहों इस इच्छाका नाम सुमुक्षुता है यह संसार निवृत्त होनेकी इच्छारूप, मोक्षका चौथा कारण है। एतत्साधनचतुष्टयम् । ततस्तत्त्ववि- वेकस्याधीकारिणोभवंति॥ तत्त्ववि- वेकः कः। आत्मा सत्यस्तदन्यत् सर्व मिथ्येति ॥ येचारी मोक्षके साधन हैं--प्रथम इनकी यत्नसे सिद्धिके अनंतर --मनुष्य तत्त्वविवेकके अधिकारी होते हैं अर्थात् इन चारों साधनोंकी महिमा(बल) से तत्त्वोंसे पृथक् जो आत्मा उसको जान सकते हैं। प्र-तत्त्वविवेक किसको कहते हैं-उ०.- आत्मा (जीव ईश्वर ) सत्य है तिससे अन्य जो नामरूपात्मक जगत है वह मिथ्या है इस निश्च- यको तत्त्वविवेक कहते हैं ।
(१२) तत्त्ववीधः- आत्माकः । स्थूलसूक्ष्मकारणशरी- शहयतिरिक्तः पंचकोशातीतः सन् अवस्थात्रयसाक्षी सच्चिदानन्दस्व- रूपः सन् यस्तिष्ठति स आत्मा॥ प्र०-आत्या किसको कहते हैं-०३-स्थूल सूक्ष्म-कारण-इन तीन प्रकारके शरीरोंसे भिन्न और अन्नमय आदि पांचकोशोसे परे और जामत स्वप्न उपुतिरूप तीन अवस्थाओंका जो साक्षी (ना) होकर सत् चित् आनंदरूप टिकता है अर्थात् तीनों शरीरोंके बाहिर भीतर स्थित है वही आत्मा है। स्थूलशरीरं किम् । पंचीकृतपंचमहा- भूतैःकृतं सत्कर्मजन्य भोगायतन शरीरम् अस्ति जायते सुखदुःखादि- मापाटीकासनेता। वर्धतेविपरिणसतेअपक्षीयते विनश्य- तीति षड्डिकारवदेतत्स्थूलशरीरम् ॥ प्र०-स्थूल शरीर किसको कहते हैं-उ०पंची- करण किये पांच महाभूतोंने जो किया हो-और उत्तम कमासे उत्पन्न हो और सुख दुःख आदि भोगोंका आयतन (स्थान) हो अर्थात् जिसमें स्थित होकर जीवात्मा सुख दुखोंको भोगे-और जो शरीररूप हैं अर्थात् नाशवान् है-और होना अर्थात् वर्तमानकालमें स्थिति और मातांके गर्भसें उत्पत्ति-विपरिणाम अर्थात् क्रम २से बढनावा घटना-और अपक्षय (वृद्ध अवस्थामें थकना) और अन्त अवस्थामें नाशकी प्राप्ति--इन स्थिति आदि छः विकारोंवाला जो है यही स्थूल शरीर है। -- ५१४) धत्वबोध:- सूक्ष्मशरीरं किस् । अपंचीकृतपंच- महाभूतैः कृतं सत्कर्मजन्यू सुरवदः- खादिभोगसाधनं पंचज्ञानेन्द्रियाणि पंच कर्मेन्द्रियाणि पंच प्राणादयः मनश्चकं बुडिश्चका एवं सप्तदशक- लाभिः सह यत्तिष्ठति तत्सूक्ष्मश- रीरस् ॥ प्र० सूक्ष्म शरीर किसको कहते हैं-उस-पंची- करण नहीं किये पांच महाभूतोंसे जो कियागया हो और उत्तम कर्मसे उत्पन्न हो और सुख दुःख आदि भोगोंका साधन हो और पांच ज्ञानइन्द्रिय और पांच कर्मइन्द्रिय और प्राण आदि पांच और एक मन और एक बुद्धि इन सत्रह १७- कलाओं सहित जो टिकता है उसको सूक्ष्मशरीर कहते हैं अर्थात् इन सत्रह तत्त्वोंके समूहका सूक्ष्म शरीर नाम है।
भाषादीकासमतः। (१५) श्रोत्रं त्वक् चक्षुःरसनाघ्राणम् इति- पंच ज्ञानेन्द्रियाणि ॥ श्रोत्रस्य दिग्दे- वता। त्वचो वायुश्चक्षुषः। सूर्यः। रस- नाया वरुणः। घ्राणस्य अश्विनौ इति ज्ञानेन्द्रियदेवताः॥ श्रोत्रस्य विषयः शब्दग्रहणम् त्वचो विषयः स्पर्श- ग्रहणम्। चक्षुषोविषयः रूपग्रहणम् । रसनाया विषयःरसग्रहणम्।घ्राणस्य विषयः गंधग्रहणम् इति । श्रोत्र-त्वचा-नेत्र-रसना-प्राण-ये पांच ज्ञान' इन्द्रिय हैं-और इन पांचों में श्रोत्रका देवता दिशा है और त्वचाका देवतावायु है और नेत्रोंका देवता सूर्य हे रसना (जिह्वा) का देवता वरुण है और घाणका देवता अश्विनीकुमार हैं ये पांचों इंद्रि- योंके पृथक्पांच देवता है-और श्रौत्रका विषय (१६) तत्वोधः- शुदका ग्रहण है और त्वचाका विषय स्पर्शका ग्रहण है-और नेत्रका विषय रूपका ग्रहण है। रसनाका विषय रस (खहा आदि) का ग्रहण है और प्राणका विषय गन्धा ग्रहण है-इन पांचों विषयोंको श्रोत्र आदि पांचों ज्ञानइंद्रिय अपनेर देवताओं सहित ग्रहण करती हैं। वाक्पाणिपादपायूपस्थानीति पंच कर्मेंद्रियाणि ॥ वाचो देवता वह्निः हस्तयोरिंद्रः। पादयोर्विष्णुः। पायो- म॒त्यु उपस्थस्यप्रजापतिः इति करें- द्रियदेवताः॥ वाचो विषयःभाषणम्। पाण्योर्विषयःवस्तुग्रहणम् । पादयो- विषयः गमनम् । पायोर्विषयः मल- त्यागः उपस्थस्य विषयः आनंद इति। ताणी-हाथ-चरण-गुदा-लिङ्ग-ये पात्रकर्म- भापारीनलारामतः। (१७) इन्द्रिय हैं-इन पांचों वाणीका देवता अग्नि है- और हाथोंका देवता इन्द्र है-चरणोंका देवता विष्णु है और जुदाका देवता मृत्यु है-और लिंगका देवता प्रजापति है, ये कर्म इन्द्रियोंके देवता है--और वाणीका विषय भाषण (वोलना) ह-हाथोंझा विपय वस्तुका ग्रहण करना है-चर- गांका विषय गमन करना है-गुदाका विपय मल- का त्याग है-और लिगका विषय विषयभोगका आनंद है इन पांचों विषयोंको अपने २ देवता- ओंसे युक्त पांचों कर्मइंद्रिय ग्रहण करती हैं। कारणशरीरं किस।अनिवाच्यानाचं विद्यारूप शरीरयस्य कारणमात्रं. सत्स्वरूपाऽज्ञानं निर्विकल्पकरूपं सदस्ति तत्कारणशरीरम् ॥ प्र०कारणशरीर किसको कहते है उसली (१८) तत्वाधः-- वा झूठी कहने में जो न आवे क्योंकि झूठी कहें तो मायासे जगतकी उत्पत्तिन वनेगी-सच्ची कहे तो ज्ञानसे नष्ट न होगी-जैसे रज्जुके सर्पको मिथ्या कहें तो भय कंप आदि न होंगे और सत्य कहें तो विचारसे नाशन होगा इससे अनिर्वचनीय है इस प्रकार मायाभीअनिर्वचनीय है अर्थात् नसत्य है न झूठ है केवल भासमात्र है--और अनादि(उत्प- त्तिसे रहित) और अविद्या (अज्ञान) रूप-और स्थूलसूक्ष्म दोनों शरीरोंका जो कारणमात्र(बीज) है अपने स्वरूपका अज्ञान और निर्विकल्पकरूप जो है उस मायाको कारणशरीर कहते हैं। अवस्थात्रयं किम् । जाग्रत्स्वप्न: सुषुप्त्यवस्थाः॥ प्र०-तीन अवस्था कौनसी हैं-30-जाग्रत स्वम-सुषुप्ति ये तीन अवस्था है ।।
भाषाटीकासमेतः। (१९) जाग्रदवस्था का श्रोत्रादिज्ञानेंद्रियैः शब्दादिविषयैश्च ज्ञायते इति यत सा . जाग्रदवस्था। स्थूलशरीराभि- मानी आत्मा विश्व इत्युच्यते ॥ प्र०-जाग्रत अवस्था किसको कहते हैं- उ०-श्रवण आदि पांच इन्द्रिय और शब्द आदि पांच विषयोंसे जव जानी जांय अर्थात श्रोत्र- बचा-नेत्र-रसना-नासिका इन पांचों ज्ञानेंद्रियोंसे जिस अवस्थामें शब्द,स्पर्श, रूप रसागंध इन पांचों विपयोंका क्रमसे ज्ञान हो अर्थात् इन इंद्रि- योंके द्वारा शब्द आदि स्थूल भोगोंको जीवात्मा जिसमें भोगै-उस अवस्था समयको जाग्रत् कहते है-और स्थूल शरीरका अभिमानी जो आत्माई उसे विश्व कहते हैं और स्थूल भोगोंका भोक्ता यह विश्वरूप आत्मा अपनी जाग्रत् अवस्थासे (२०) तस्यतोष:- भिन्न है क्योंकि अवस्था मिथ्या रूप है आत्मा. चेतन रूप नित्य है। स्वप्नावस्था केति चेत्ाजाप्रददरस्था- यां यद् दृष्टं यच्छुत तजनितबारस- नया निद्रासमये यः प्रपंचः प्रतीयते सा स्वप्नावस्थासूक्ष्मशरीराभिमानी आत्मा तैजस इत्युच्यते॥ प्र०-स्वा अवस्था कौनसी है ऐसा कहोगे तो सुनो उ०-जाप्रतअवस्थामें जो देखा हो बाभुना. हो उसमें उत्पन्न हुई जो वासना आत्मामें संस्कार उससे निद्राले समय जो प्रपंच (जगत् ) प्रतीत होता है उस स्वामके समयको स्वभावस्था कहते हैं और यह स्वशावस्था सूक्ष्म शरीरमें होती है। उस सूक्ष्म शरीरके अभिमानी आत्माको तेजस कहते हैं क्योंकि वासनामयी जो भोग उनका भाषाटीमासमेतः। (२.१ निरस आत्मा तेजोरूप अपने प्रकाशसे प्रकाः हिनि और अवस्थाका साक्षी तैजस है । अतःसुषुप्त्यवस्था का । अहं किमपि न-जानामि सुखेन मया निद्रानुसू- यत इति सुषुप्त्यवस्था । कारणशरी- राभिमानी आत्मा प्राज्ञ इत्युच्यते ॥ ३०-इसके अनंतर जो सुषुप्ति अवस्था है वह कौनसी है--उ०- मैंने कुछ नहीं जाना मुझे ऐसी सुखसे निद्राका ज्ञान हुआ श्रुतिमें भी लिखा है के मैं सुखसे सोया कुछ भी न जानता भया अर्थात् आनन्दसे निद्राका अनुभव हुआ-यह अनुभव जिसकालमें होता है उसका नाम सुषुप्ति भवस्था है इसको ही कारणशरीर और आनंद- ग्य कोश कहते हैं और इस अवस्थाके अमि- १ आनन्दभुक्तोमुखः । .
प्र (२२) तत्त्वबोधः। मानी आत्माको प्राज्ञ कहते हैं अर्थात् या है। आनन्दरूपके भानसे रहित जो अज्ञान के साक्षी है और इंद्रियोंकी सहायताके बिना अपनी चेतनताले वासनामय विषयोंको भली प्रकार जानता है और भोगता है इसीसे प्राज्ञ कहाता है। श्रुतिमें भी कहा है कि आनन्दका भोक्ता चेतनरूपही सुषुप्ति अवस्था में है। पंचकोशा के। अन्नमयः प्राणमयःमः नोमयः विज्ञानमयः आनन्दमयश्चेति।। प्र०--पञ्चकोश कौनसे हैं।उ०-अन्नमय-प्राण- मय-मनोमय-विज्ञानमय-आनन्दमय . ये पां कोश हैं अर्थात् चेतनरूप जो आत्मा उसके आच्छादक हैं॥ अन्नमयः कः॥ अन्नरसेनैव भूत्वा' १ मुखमहमस्वाप्स न किंचिददिषम् ।।
मापाटीकासमेतः। (२३)
नदि प्राप्यअन्नरूपपृथिव्यां
यते तदन्नमयः कोशः स्थूल
म्॥
प्र०-अन्नसय कोश किसको कहते हैं-
उ०-अनके रससे होकर और अन्नके रससेही
बढ़कर जो अन्नरूप पृथिवीमें ही लीन(नष्ट)हो
जाय उस स्थूलशरीरको अन्नमय कोश कहतेहैं।।
प्राणमयः कः। प्राणादिपंचवायवः
वागादींद्रियपंचकं प्राणमयः॥
प्र०-प्राणमय कोश किसको कहते हैं-
उ०-प्राण-अपान-व्यान-उदान-समान ये
पांचों प्राण और वाणी आदि पांचों कर्म इन्द्रिय
यह प्राणमय कोश कहाता है और यह क्रिया-
सक्ति है क्योंकि शरीरमें जितनी क्रिया होती है
उन सबका कारण प्राणमय कोशही है।
-
(२४) तत्त्ववोधः ।
मनोमयः कोशः कः। मनश्च ज्ञाने-
द्रियपंचकं मिलित्वा · भवति स
मनोमयः कोशः॥
प्र--मनोमय कोश किसको कहते हैं--
उ०-मन और पांच ज्ञानइन्द्रियां मिलकर जो
होता है वह मनोमय कोश कहाता है और यह
इच्छाशक्ति है क्योंकि जिस. २ वस्तुकी इच्छा
आत्मामें होती है वह मनोमय कोशकेही सहा
यतासे होती है।
विज्ञानमयः ..कः । बुद्धिज्ञानेंद्रिय
पंचक मिलित्वा यो भवति स
विज्ञानमयः कोशः॥
प्रा--विज्ञानमय कोश किसको कहतेहैं-
उ०--बुद्धि और ज्ञानइन्द्रियपञ्चक, इनको
मिलाकर जो होता है वह विज्ञानमय कोश होताहै
भाषाटीकासमेतः। (२५) और यह ज्ञानशक्ति है क्योंकि आत्मामें जिस २ पदार्थका ज्ञान होताहै वह बुद्धि और ज्ञानेन्द्रि- होकीही सहायतासे होता है । आनंदमयः कः। एवमेव कारणशरीर- भूताविद्यास्थमलिनसत्त्वं प्रियादि- वृत्तिसहितं सत् आनंदमयः कोशः एतकोशपंचकम् । मदीयं शरीर मदीया प्राणाः मदीयं मनश्च मदीया 'बुद्धिर्मदीयं ज्ञानमिति स्वेनैव ज्ञायतो'. तद्यथा-मदीयत्वेन ज्ञातंकटककुंडल. गृहादिकं स्वस्माद्भिन्नं तथा पञ्च- कोशादिकं पदीयत्वेन ज्ञातमात्मा भवति॥ • प्र०-आनन्दमय कोश: किसको कहते हैं- ३०-इसी पूर्वोक्त प्रकारसे कारण शरीररूप अवि- तत्ववीध:-- यामें स्थित जो प्रिय मोद आदि वृत्तियोंसे युक्त मलिन सत्त्व है अर्थात् रजोगुण तमोगुणंसे तिर- स्कार किया सत्त्वगुण वह अभीष्ट वस्तुके देखने सुखरूप जो प्रिय और अभीष्ट वस्तुकी प्राप्तिसे उत्पन्न सुखरूप जो मोद और अभीष्ट वस्तुके भोगसे जन्य सुखरूप जो प्रमोद,इन वृत्तियोंसे युक्त हुआ आनंदमय कोश होता है और इसमें अधिक आनंद होताहै इससे इसका नामआनंदः मय है-ये पांच मोश हैं-इनको आत्मा अपने आप इस प्रकार एकतासे जानताहै कि,मेरा शरी- र है-मेरे प्राण हैं मेरा मन है मेरी बुद्धि है औ मेरा ज्ञान है तिससे जिसप्रकार मदीयतासे अर्थात् मेरे हैं इस बुद्धिसेजाने हुए कटक (कडा) कुंडर और गृहआदि अपनेसे भिन्न होनसे आत्मारूप नहीं हैं तिसी प्रकार मदीयतासे जाने हुए ये पूर्वोक्त पांच कोश भी आत्मासे भिन्न होनेस- भापाटीकासमेवः। (२७) आत्मारूपनहीं हक्योंकि आत्मा इनका साक्षी है और ये मायाके कार्य हैं। आत्मा तर्हि का सचिदानंदस्वरूपः॥ प्र०--तो कहो आत्मा कौन है उ०-सत् चित आनन्दरूप आत्मा है- सत्किम्।कालत्रयेऽपि तिष्ठतीति स- ताचिकिम्ाज्ञानस्वरूपः॥ आनंदः का सुखस्वरूपः। एवं सच्चिदानंद- स्वरूपं स्वात्मानं विजानीयात् ॥ प्र०-सत् किसको कहते हैं-30-भूत भवि- ष्यत् वर्तमानरूपतीनों कालोंमें जो एकरस टिकै, अर्थात् न्यूनाधिक भावको प्राप्त न हो उसे सत् हते हैं-प्र-चित् किसको कहतेहैं-उ०-ज्ञान- रूपको चित् कहते हैं अर्थात् जो संपूर्ण पदा- सीका ज्ञाता-साक्षी अनुभवरूप है उसे चेतन नस्वरूप आनंद कहते हैं अर्थात् दुःखसे (२८) तत्त्वबोधः। जिसका भेद (नाश) न होसके ऐसा जो सुख- रूप कूटस्थ ब्रह्म वही आनंद है। इस पूर्वोक्त तीन प्रकारका जो सच्चिदानंद ब्रह्म है उसको अपने आत्मास्वरूप जाने अर्थात अपने जीवात्मा और उसकी एकताको जानकर नामरूपात्मक जग- तको मिथ्या समझे॥ अथ चतुर्विंशतितत्त्वोत्पत्ति- प्रकारं वक्ष्यामः॥ अब मायासे उत्पन्न जो चौबीसतत्त्व हैं उनक उत्पत्तिके प्रकारको कहते हैं। ब्रह्माश्रया सत्त्वरजस्तमोगुणात्मिका माया अस्तितत आकाशः संभूतः। आकाशाहायुः। वायोस्तेजः। तेजस आपः। अद्भ्यः पृथिवी।। ब्रह्म है आश्रय (आधार वा प्रवर्तक ) जिसकी ऐसी सत्वगुण रजोगुण तमोगुणरूप माया.
भापाटोकासमतः । (२९) पात् इन तीनों गुणोंकी साल्यावस्था तुल्यस्थिति जिसको सूलप्रकृति और प्रधानभी सांख्यमत- बोले कहते हैं और अव्याकृतभी इसकाही नाम ई-यह पूर्वोत्तर है मुख्यरूप जिसका ऐसी माया सो पूर्वोक्त सच्चिदानंदरूप ब्रह्माकी इच्छाके अनुसार प्रथम आकाश उत्पन्न हुआ और आकाशसेवायु और वायुसे तेज और तेजसे जल-और जलसे 'थ्वी उत्पन्न भई-इन आकाश आदि पांचों भूतोंके मध्यमें सत्त्व गुण आदि तीनों गुण वर्त- मान हैं इससे ये भूतभी निगुणात्मक है । एतेषां पञ्चतत्वानां मध्ये आकाशस्य सात्त्विकांशाच्छोडेन्द्रियं सभूतम्। बायोः सात्त्विकांशात्त्वमिंद्रिय संयु- तस् । अग्नेः सात्त्विकांशाचक्षुरि- न्द्रियं लभूतम् । जलस्य सात्त्विकां- (३०) वत्वबोधः- शाद्रसनेंद्रियं संभूतम् । पृथिव्याः सात्किांशाद् घ्राणेंद्रियं संभूतम् । एतषां पञ्चतत्त्वानां समष्टिसात्त्वि- कांशान्मनोबुद्ध्यहंकारचित्तान्तः कर- णानि संभूतानि॥ इन पांचों तत्वोंके मध्यमें आकाशमें जोसत्व गुणका अंश है उससे श्रोत्र(कान)इद्रिय उत्पन्न हुई-और वायुमें जो सत्वगुणका अश है उसस त्वचा इद्रिय उत्पन्न भई-और अग्निमें जो सर्व गुणका अंशहै उससे चक्षुरिंद्रिय उत्पन्न हुई और जलमें जो सत्त्वगुणकाअश है उससे रसनाइंद्रिय उत्पन्न भई-और पृथ्वीमें जोसत्वगुणका अंश है, उससे प्राण इंद्रिय उत्पन्न हुई और इन पांचो तत्त्वोंका जो समष्टि सबका सत्वगुणी अंश उससे मन बुद्धि अहकारचित्त रूप चार प्रकारके अन्तः करण उत्पन्न हुआ अर्थात ऐसा अन्तः
भाषाटीकासमेतः।
करण (भीतरकी इंद्रिय) उत्पन्न हुआ जिसके
मन आदि चार भेद हैं।
संकल्पविकल्पात्मकं मनः। निश्चया-
त्मिका बुद्धिाअहंकर्ता अहंकारः॥
चिन्तनकर्तृ चित्तम् । मनसो देवता
चन्द्रमाः। बुद्धेब्रह्मा । अहंकारस्य
रुद्रः। चित्तस्य वासुदेवः॥
उन चारोंमें संकल्प विकल्प रूपको मन कहते
अर्थात् यह करने योग्य है वानहीं इस सदेहको
जो करे वह मन कहाता है और निश्चय जिसका
रूप है वह बुद्धि है अर्थात् यही करने योग्य है
यह निश्चय जिससे हो वह बुद्धि है और अहंका-
का जो कर्ता वह अहंकार है अर्थात् मैंने किया
इस अहं बुद्धिका जिसमें उदय हो वह अहंकार
कहाता है और संपूर्ण वस्तुओंकाचिंतन (स्मरण
. मुत्ववोधः- वा विचार )जो फर वह चित्त है दिवान एकही अन्तःकरण वृत्तियों (विपयों) के भेदसे भिन्न कहाता है और मनका देवता चन्द्रमा है मुद्रिका देवता ब्रह्मा है-अहंकारका देवता रुद्र है, चित्तका देवता वासुदेव है इस प्रकार पूर्वोक्त पांचों भूतोंसे पांच ज्ञानेन्द्रिय और चार अन्तःकरण ये ना पदार्थ सत्त्वगुणके अंशसे उत्पन्न हुए। एतेषां पञ्चतत्वानां मध्ये आकाश- स्य राजसांशाहागिद्रियं संभूतम् । वायोः राजसांशत्पाणींद्रियं संभ तम् ।, यते रजसांशात् पादेद्रियं संशू- तम् । जलस्य राजसांशादुपस्थेन्द्रि यं संभूतम् । पृथिव्या राजसांगा द्रगुदेन्द्रियं संभूतम् । एतेषां समष्टि- राजसांशाच प्राणाः संभूताः ॥
भापाटीकासमेतः। (३६)
इन पांचों भूतों (तत्त्वों के मध्यमें आकाशके
रजोगुणी भागसे वाणी इन्द्रिय उत्पन्न हुई और
वायुमें जो रजोगुणका अंश है उससे हस्त इंद्रिय
उत्पन्न हुई और अनिमें जोरजोगुणका अंश है
उससे चरणरूप कर्मइंद्रिय उत्पन्न हुईऔर जलके
रजोगुणी भागसे उपस्थ (लिंग) इंद्रिय उत्पन्न
हुई और पृथिवीमें जो रजोगुणका भाग है उससे
गुदा इंद्रिय उत्पन्न हुई और इन पांचों भूतोंके
समष्टि (सबका) रजोगुणक अंशले पांच प्राण
उत्पन्न हुये इस प्रकार पंच कर्मेन्द्रिय और पंच
प्राण ये दश तत्त्व रजोगुणके अंशसे उत्पन्न हुयो.
एतेपांपंचतत्त्वानां तामसांशात्पंची-
कृतपंचतत्त्वानि भवति । पंचीकरण
कथम् इति चेत् । एतेषां. पंचमहा-
भूतानां तामसांशस्वरूपम् एकम्
६३१) तत्त्वबोधः। एक भूतं द्विधाविभज्य एकमेकमध पृथक् तूष्णींव्यवस्थाप्य अपरमपर- मध चतुर्धा विभज्य स्वार्धमन्येषु अर्धेषु स्वभागचतुष्टयसंयोजन का- यस तदा पंचीकरणंभवति। एतेभ्यः पंचीकृतपञ्चमहाभूतेभ्यः स्थूलश- रीरं भवति एवं पिण्डब्रह्माण्डयोरैक्यं संभूतम् ॥ इन पांचों तत्त्वोंका जो तमोगुण शेप रहा हुवा अंश है उससे पञ्चीकरण किये पांचों भूत उत्पन्न होते हैं अर्थात् तमोगुणकी महिमासेमहाभूतोंका पञ्चीकरण होजाता है कदाचित् कहो कि,पञ्ची- करण किस प्रकार होताहै तो सुनो इन पांच महा भूतोंके मध्यमें जो तमोगुणका अंशरूप एक भूत है उसका दोप्रकारसे विभाग करके अर्थात् - भाषाटीकासमेतः। (३५) एक २ भूतके दो २ टुकड़े करके उनमेंसे एक २ भागको पृथक् तूष्णी (चुपचाप) स्थापन करके और दूसरे२ जो भाग हैं उनके चार भाग करके अपनेसे अन्य जो भूत हैं उनके तूष्णीं रक्खे हुए भागोंमें एक २ भागकों मिलादे इसप्रकर पञ्ची- करण होता है । इस पञ्चीकरणके करनेसे एकर भूतमें आधा भाग अपना और आधे अपनेसे अन्य चारों भूतोंके ४ भाग होते हैं इसीसे व्यास- जीने लिखा है कि अधिकतासे यह पृथिवी है यह वायु है इत्यादि कथन होता है इस प्रकार पंचीकरण किये हुए पञ्च महाभूतोंसे स्थूल शरीर होता है उसी प्रकार ब्रह्माण्ड भी उत्पन्न होता है ऐसे पिण्ड और ब्रह्माडकी एकता समझनी॥ स्थूलशरीराभिमानी जीवनामकं ब्रह्म प्रतिबिंब भवति एव जीव प्रकृत्या. वैशेष्य तद्वादरतद्वादः
(३६) तत्त्वबोधः-
स्वस्मात् ईश्वरं भिन्नत्वेन जानाति ।
अविद्योपाधिः मन् आत्मा जीर
इत्युच्यते ॥
स्थूल शरीरका अभिमानी जीव नाम ब्रह्मका
प्रतिविम्व होता है वही जीव प्रकृति (स्वभावोसे
ईश्वरको अपने भिन्न जानता है और अविधान
उपाधिसे वह आत्माजीव कहाता है अर्थात जले
जलने पूर्ण घटमें जो आकाशके मर्यका प्रतिबिंब
है वह घटके नाशसंप्रतिविवभृत मर्यापहोजाता
है इसी प्रकार जीवरूप प्रतिबिंबका आश्रय जो
माया (अज्ञान)उसके नाश होनेसे जीव भीब्रह्म
भावको प्राप्त होजाता है और ज्ञानसे पूर्व मायाके
अधीन होनसे मायाके वशीभूत होता है तिसी से
अपनेको ईश्वरसे भिन्न जानता है और मायाके
कार्य-जो स्थूल सूक्ष्म शरीर उनके संग एकतासे
भाषाटीकासमेतः। (३७) दुग्ध जलके समान एकरूप हुआविषय भोगोंके लिये नाना प्रकारके कर्मोको करता है और उन कमों के फल सुख दुःखों (स्वर्ग नरक) कोभोगता और अविद्यारूप उपाधिसे आत्माहीजीवबनता है-और रजोगुण तमोगुणकीन्यूनता सत्त्वगुणकी महिमासे प्रतीत होती है अर्थात सत्वगुण प्रधान से वह माया कहाती है और जहां सत्त्वगुण तो न्यून हो और रजोगुण तमोगुण प्रधान हो वह अविद्या अज्ञान कहाती है और उसी अंवि- द्यासे आच्छादित ढका आत्मा जोः स्थूल शरीरका अमीमनी है उसकाही.. नाम जीवहे और वह अविद्यामें ब्रह्मका प्रतिबिम्ब जीव अवि. याके नाशसे ब्रह्मरूप होजाता है । मायोपाधिःसन् ईश्वर इत्युच्यते एव- मुपाधिभेदांज्जीवेश्वरभेददृष्टिवि- (३८) तत्ववोधः- त्पर्यन्तं तिष्ठति तावत्पर्यन्तं जन्म- मरणादिरूपसंसारो न निवर्तते तस्मात्कारणान्नजीवेश्वरयोमंदबुद्धिः स्वीकार्या॥ मायारूप जिसकी उपाधि है वह ईश्वर कहा जाता है अर्थात् मायामें जो ब्रह्मका प्रतिबिंब है तिसका नाम ईश्वर है और वही जगतका कर्ताह और माया(अविद्यारूप)उपाधियोंसेशुद्ध चैतन्य रूपं परब्रह्म अपनी महिमामें स्थित होनेसे सत्य रूपहै-इसप्रकार मायाऔर अविद्यारूप उपाधिके वशसे जीव और ईश्वरके विपयजबतक भेदबुद्धि रहेगीतबतक जन्म मरणआदि रूपसंसार निवृत्त नहीं होता है तिससे जीव और ईश्वरमेंकदाचित् । भी भेदबुद्धि नहीं करनीअर्थात् जीव और ईश्व- रको भी ज्ञानके द्वारा ब्रह्मरूपही समझना।
भाषाटीकासमंवः। (३९) ननुसाहंकारस्यकिंचिज्ज्ञस्यजीवस्य निरहंकारस्य सर्वज्ञस्येश्वरस्य तत्त्व- मसीति महावास्यात्कथमभेदबुद्धिः स्यानुभयोः विरुद्धधर्माक्रांतत्वात् ॥ कदाचित कहो कि,अहंकारसे युक्त और सर्वज्ञ जो ईश्वर हे उसकी 'तत्त्वमसि' इस महावाक्यसे कैसे अभेद बुद्धि होगी, क्योंकि दोनों विरुद्ध धर्मोंसे आक्रांत (युक्त) हैं अर्थातू जो अल्पज्ञत्वं अहंकार आदि धर्मवाला है सर्वज्ञत्व अहंकार रहित तत्त्व धर्मवाला कैसे हो सकता है ।। इति.चेन्न । स्थूलसूक्ष्मशरीराभिमा. नी त्वंपदवाच्यार्थ उपाधिविनिर्मुक्त. समाधिदशासम्पन्नं शुद्धं चैतन्यं त्वं. पदलक्ष्यार्थः॥ ऐसे मत कहो क्योंकि स्थल और सक्ष्म शरी- ४०) तत्वबोधः- रका जो अभिमानी त्वंपदका वाच्य अर्थ है और उपाधिसे रहित समाधि दशासेयुक्तजो शुद्ध चैत न्य वह त्वंपदका लक्ष्य अर्थ है अर्थात तत्त्वमसि इस महावाक्यमें तत त्वं असि-जो तीन पद हैं उनका यह अर्थ है कि वह जगत्कर्ता जो सर्वज्ञ ईश्वर हैं वहीत हे-यहां तत्पदका ईश्वरऔरत्वंप- दका जीव और असिपढ़का-है-क्रमसे अर्थ है और इस पूर्वोक्त सामान्य अर्थसे भिन्नतत्त्वमसि इस महावाक्यका विशेप यह अर्थ है किं तत्. और त्वम् पदके दोअर्थ है-एक वाच्य और दूसरा लक्ष्य-जैसे घटपदका वाच्य अर्थ गोलाकार है और लक्ष्य अर्थ-मूलकारणरूप मृत्तिका है इसी प्रकार माया और अविद्याका सम्बन्ध जिसमें है. वह तत्-और त्वंपदकावाच्य अर्थ है और मायाँ और अविद्याके सम्बन्धसे रहित जो ब्रह्म वह दोनों पदोंका लक्ष्य अर्थ है ॥ .
भापाटीकासमेतः। (४१) एवं सर्वज्ञत्वादिविशिष्टईश्वर तत्पद: वाच्यार्थाउपाधिशून्यं शुद्धचैतन्यं तत्पदलक्ष्यार्थएवं च जीवेश्वरयोः चैतन्यरूपणाऽभेदे बाधकामावः॥ इसीप्रकार- सर्वज्ञत्व आदि विशेषणों से युक्त जोईश्वर वह तत् पदका वाच्यअर्थ है और उपा- धिसे शून्य जो शुद्ध चैतन्यरूप ब्रह्म वह तत् पदका लक्ष्य अर्थ है इस प्रकार जीव और ईश्वर जोतत्पदके अर्थ है उनके चैतन्यरूप लक्ष्य अर्थ के अभेद(एकता) में कोई बाधक नहीं अर्थात् चेतन्यरूपसे जीव और ईश्वर एकहै । एवं च वेदान्तवाक्यः सद्गुरूप देशेन चसर्वेष्वपि भूतेषु येषां ब्रह्म- बुद्धिरुत्पन्ना ते जीवन्मुक्ता इत्यर्थः ननु जीवन्मुक्तः का यथा देहोऽहं (१२). तत्त्वबोधः- पुरुपोऽहं ब्राह्मणोऽहं शूद्रोऽहमस्मीति दृढनिश्चयस्तथा नाहं ब्राह्मणः नशद्रः न पुरुषः किन्तु असंगः सच्चिदानंद- स्वरूपः प्रकाशरूपः सर्वान्तर्यामी चिदाकाशरूपोऽस्मीति दृढ निश्चय- रूपाऽपरोक्षज्ञानवान् जीवन्मुक्तः ॥ इसरीतिसे वेदान्त वाक्योंकेद्वारा-श्रेष्टगुरुके उपदेशसे जिन प्राणियोंकी संपूर्ण भूतोंमें ब्रह्मबुद्धि उत्पन्नहोगई है वे जीवन्मुक्त हैं-प्र-जीवन्मुक्त किसको कहते हैं-उ०-जैसे में देहहूँ-पुरुष हूँ- ब्राह्मणहूँ-शूद्रहूँ, यह दृढ निश्चय है इसी प्रकार न मैं ब्राह्मणहूँ, न पुरुप हूँ, न शूद्र हूँ, किन्तु असंग सच्चिदानन्दस्वरूप,प्रकाशरूप, सबकाअ- न्तर्यामी चिदाकाशरूप हूँ यह दृढ निश्चयरूप अपरोक्षज्ञान जिसको है वह जीवन्मुक्त है।
भाषाटीकासमेतः। ४३) ब्रह्मेवाहमस्मीत्यपरोक्षज्ञानेन निखि- लकमवंधविनिर्मुक्तास्यात्।।कर्माणि कतिविधानि सन्तीतिचतआगामि- संचितप्रारब्धभेदेन त्रिविधानि संवि ब्रह्मही में हूँ, इस अपरोक्ष ज्ञानसे मनुष्य संपूर्ण कर्मरूप बन्धनोंसे विनिर्मुक्त होजाता है अर्थात छुट जाता है कदाचित् कहोकि-कर्म के नकारके हैं तो सुनो आगामि-संचित-प्रारब्ध- न भेदोंसे कर्म तीन प्रकारके होते हैं । ज्ञानोत्पत्त्यनंतरं ज्ञानिदेहकृतं पुण्य- पापरूपं कर्म यदस्ति तदागामीत्य- भिधीयते ॥ ज्ञानकी उत्पत्तिके अनन्तर ज्ञानीके देहका किया जो पुण्यपापरूपी कर्म है वह आगामि (४४) तत्ववांधः- कहाता है, क्योंकि वह ज्ञानकी उत्पत्तिक पीछे होता है और वह भोगने योग्यहँ ।। संचितं कर्मकिम् । अनंतकोटिजन्स- नांचीजमृतं सत् यत्कर्मजातं पूर्वा- जितं तिष्ठति तत्संचितं ज्ञेयम् ॥ प्र--संचितकर्म किसको कहते हैं-उ०-अनंत कोटि जन्मोंका वीजरूप जो काँका ममृह पूर्व संचितटिका हुआहै वह संचित जानना अर्थात अनेक जन्मोंमें किया हुआ पुण्यपाप जीवा- स्मामें-इकट्ठा रहता है। प्रारब्धकर्म किमिति चेताइदं शरी- रमुत्पाद्य इह लोके एवंसुखदुःखादिः प्रदं यत्कर्म तत्प्रारब्धं भोगेन नष्ट भवति प्रारब्धकर्मणां भोगादेव क्षय इति॥
भाषाटीकासमेतः । (४५) प्र०-प्रारब्ध किसको कहतेहैं-उ०-इस शरी- रको उत्पन्न करके इस लोकमें-इस प्रकार सुख- दुःख आदिका दाता (देनेवाला)जो कर्म है वह शारब्ध कहाता है-और वह प्रारब्ध कर्मभोगसेही नष्ट होजाता है क्योंकि प्रारब्ध कर्मोंकाभोगसेही क्षय होता है यह नियम है क्योंकि इस वचनमें यह लिखा है कि किया हुआ शुभ और अशुभ कम अवश्य भोगने योग्य है-विना भोगके कोटियों कल्पोंमें भी नष्ट नहीं होता है ।। संचितं कमब्रह्मैवाहमिति निश्चया- त्मकज्ञानेन नश्यति। आगामि कर्म अपिज्ञानेन नश्यतिाकिंच आगामि- कर्मणांनलिनीदलगतजलवत ज्ञानि- नां सम्वन्धो नास्ति ॥ १ अवश्यमेव मोक्तन्यं कृतं कर्म शुभाशुभम् । नामुक्त क्षीयत की लाकोंटिशतैरपि । - (४६) तत्त्वबोधः- संचित कर्मका नाश-मेंब्रह्माही हूँ इम निश्च यात्मक ज्ञानमे होता है और आगामि कर्म भी ज्ञानसेही नष्ट होता है परन्तु ज्ञानियोंको आगागि काँका सम्बन्ध इस प्रकार नहींहोता जैसे कम- लके पत्तोंपर जलका सम्बन्ध नहीं होता। किंच ये ज्ञानिन स्तुवति भजंतिअर्च- यंति तान्प्रतिज्ञानिकृतम् आगामि पुण्यं गच्छति। ये ज्ञानिनं निन्दन्ति द्विषति दुःखप्रदानं कुर्वति तान्प्रति ज्ञानिकृतं सर्वम् आगामिक्रियमाणं यदवाच्य कर्म पापात्मक तद्गच्छति।। और ज्ञानीकी जो स्तुति-सेवा-करते हैं उनके प्रति ज्ञानका किया आगामि पुण्य जाताहै अर्थात मिलता है और जो ज्ञानीको निन्दा वैर करते हैं वा दुःख देते हैं उनके प्रति आगामिजो ज्ञानीका - भाषाटीकासमेतः। (४७) किया हुआ पापरूप कर्म है वह जाताहै-सोई- इस श्रुतिमें लिखा है कि, मित्र पुण्य कर्म और वैरी पाप कर्मोंको ग्रहण करते हैं ।। तथा चात्मवित्संसार तीर्खा ब्रह्मा- नन्दमिहैव प्राप्नोति । तरति शोक- मात्मविदिति श्रुतेः ॥ तिसी प्रकार आत्मज्ञानीसंसारसे पार होकर इस जन्ममेंही ब्रह्मानन्दको प्राप्तहोता है-सोई: श्रु- तिमें लिखाहै कि आत्मज्ञानीशोकको तरता है।। तनुं त्यजतु वा काश्यां वषचस्य गृहेऽथ वा ज्ञानसंप्राप्तिसमये मुक्तो ऽसौ विगताशय, इति स्मृतेश्च ॥ इति तत्त्वबोधप्रकरणं समाप्तम् ॥ रसुदः पुण्यकत्यांन्दुहंदः पापकन्यान् गृहन्ति ।
(१८ तत्वबोधः।- और यह स्मृति भी है कि, ज्ञानी काशीमें देहको त्यागोवा चाण्डालके घर में त्यागो परन्तु ज्ञानकी प्राप्तिके समयमें अन्तःकरणके मलोंस रहित यह मुक्तरूपही है अर्थात् ज्ञानीक मरणक लिये देश काल वस्तु-इनका नियम नहींह ॥ इति श्रीपंडितमिहिरचन्द्रकृततत्ववाद- 'भापाटीका संमप्तिा ।। r यह पुस्तक खमराज श्रीकृष्णदासने बंबई खेतवाड़ी की गली खम्बाटा लैन, निज "श्रीवेंकटेश्वर" स्टाम्प्रेसमें अपने लिये छापकर यहीं प्रकाशित किया। - पुस्तक मिलेनका ठिकाना- खेमराज श्रीकृष्णदास, "श्रीवेंकटेश्वर स्टीम्-प्रेस, मुंबई.
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. 5525 "श्रीकटवा"स्टीम-यन्त्रालयको परमोपयोग स्वच्छ शुद्ध और सस्ती पुस्तक यह विषय आज ३०1४० वर्षले अधिक हसासारत- वर्षमें प्रसिद्ध कि, इस यन्त्रालयको यी दुई मुस्ता सर्वात त्तम और सुन्दर प्रतीत तथा प्रमाणित हुई है मो इस यन ल्यमें प्रत्येक विषयको पुस्तकें जैसे-वैदिक यदा धर्मशास्त्र, न्याय, मीमांसा, छंद, ज्योतिष, को कार, चा, नाटक कोप, वैद्यक, साम्प्रदायिक स्तोत्रादि संस्कृत और हिन्दी भाषाके प्रत्येक सवसरपर विक्रीकै मतैयार रहते है। शुद्धतास्वच्छता तथा कागजकार उत्तमता और जिन्दकी बधाई देशभर में विख्यात है। इतनी. उत्तमता होनेपर.मी दाम बहुत ही सस्ते रक्खे कमोशनमी पृथक् काट दिया जाता है । ऐसी- सरलता पाठकों को मिलना भेसमवहें संस्कृत तया हिन्दी के रसितों को अवश्य अपनी २ भावश्यकतानुसार पुस्तकोंके मँगान में त्रुदिन करना चाहिये, ऐसा उत्तम, सस्ता भोर शुद्ध माट दूसरी जगह मिलना असंभव है 'सूचीपत्र : मँगा देखो। खेमराज श्रीकृष्णदास, "श्रीवेङ्कटेश्वर" स्टीम प्रेम. वेतवाडी-वंबई.
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