Sanmati Library, Jaipur
Moksha Shastra
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kimy
fumes
Published by Shri Yathuram Premi, Propriotor-Shri Jain-Grantha
Ratankar Karyalaya, Tiravag, C. P. Tank.--Bombny.
Printed by B. R. Ghanekor, at the Nirnaya Sngar Press,
No. 23, Kolbhat Lanc, Kalbadovi Rond-Bombay.
Davaca
प्रस्तावना। La तत्त्वार्थसूत्र जिसका असली नाम मोक्षशास्त्र है हग लोगोंका परम पूजनीय और मान्य ग्रंथ है। इसे प्रत्येक जैनी पढ़ना पढ़ाना सुनना अपना परम धर्म समझते हैं । इसके एक बारके पाठ मात्रसे, एक उपवासका फल होता है। यह ग्रंथ जैसा उपयोगी है और इसमें जैनधर्मका अटूट समुद्र भरकर जो 'गागरगें सागरकी' कहावत सिद्ध की गई है, उसके कह- नेकी कोई जरूरत नहीं है। इसमें करणानुयोग, चरणानुयोग और द्रव्यानुयोगका वर्णन बड़ी गंभीरतासे किया है । इसकारण श्रीसमन्तभद्रादि बड़े २ आचार्योंने संस्कृत गाप्य और संस्कृत टीकायें रचकर बड़े विस्तारसे इसका गंभीराशय खोला है । देशभापागें भी जयपुरके विद्वद्वर्य पं० जयचंद्रजी आदिने सर्वार्थसिद्धि वगैरह संस्कृत टीकाओंकी वचनिका लिखी है, परंतु अभीतक इसकी कोई ऐसी टीका छपकर प्रकाशित नहीं हुई, जो पढ़नेवाले विद्यार्थियों तथा सर्वसाधारण जेनी भाइयोंकी समझमें सहज ही आ जावे तथा विद्यार्थियों के लिये भी पठनक्रमानुसार ऐसी कोई टीका बनी वा छपी नहीं हैं। इसकारण हमने इस त्रुटिकी पूर्ति- केलिये यह भापाटीका तैयार की है। यह टीका गादोंके दशलक्षण पर्वके दिनोंमें बांचनेके लिये भी बड़ी उपयोगी होगी। क्योंकि साधारण भाई भी इससे सूत्रोंका अर्थ बांचकर सबको R मो. समझा सकते हैं। जहांतक हो सका, इसके सर्वोपयोगी बनानेमें परिश्रम किया गया है। इसके संशोधनमें पंडित लालारामजी और वंशीधरजीने बहुत कुछ सहायता दी है इसकारण उनका हृदयसे आभार मानकर इस प्रस्तावनाको पूरी करता हूं। बम्बई-अक्षयतृतीया वीर नि० सं. २४३२ । द्वितीयावृत्तिकी सूचना-जैनधर्मके एक अच्छे विद्वानसे संशोधन कराके यह द्विती- यावृत्ति प्रकाशित की जाती है। प्रथम वार दृष्टिदोष तथा अज्ञानतासे जो भूलें रह गई थी, अबकी वार उनका संशोधन हो गया है । इति शम् । ता० १२-१०-०८ ई. पन्नालाल बाकलीवाल. तृतीयावृत्तिकी सूचना-इस आवृत्तिका संशोधन पं० मनोहरलालजी और पु. राम- प्रसादजीकी सहायता तथा सम्मतिसे किया गया है। । सहज ही समझमें आनेके लिये भाषा- शैलीमें भी यत्र तत्र परिवर्तन किया है। भाद्रपद शुक्ल ११-२४३.७ । नाथूराम प्रेमी।
. श्रीपरमात्मने नमः IAH ...----- मोक्षाशाख। वालवोधिनी भाषाटीकासहित ।। rane re- दोहा। पंचपरमपद प्रणमकरि, जिनवाणी उर धारि । मोक्षशास्त्र भापार्थसह, लिखहुँ बालहितकारि ॥१॥ आत्माका हितमोक्ष है उसके मिलनेका उपाय क्या है ? ऐसा प्रश्न होनेपर आचार्य सूत्र कहते हैं- सम्यग्दर्शनज्ञानचारित्राणि मोक्षमार्गः ॥१॥ अर्थ-(सम्यग्दर्शनज्ञानचारित्राणि) सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान और सम्यक्चारित्र इन तीनोंका मिलना (मोक्षमार्गः) मोक्षकामार्ग है अर्थात् मोक्षकी प्राप्तिका उपाय है । संशय विपर्यय १ भनिश्चितानेककोट्यवलम्बनं संशयः । जिन २ पदायोंके ज्ञानमें संशय हो उनमें समान रहनेवाले -...- ..---- एURUKUR मो. अ. १ और अनध्यवसायरहित जीवादि पदार्थोंके जाननेको सम्यग्ज्ञान कहते हैं और मिथ्यात्व कषायादिक संसारकी कारणरूप क्रियाओंसे विरक्त होनेको सम्यक्चारित्र कहते हैं । आगे सम्यग्दर्शनका लक्षण कहते हैं- तत्त्वार्थश्रद्धानं सम्यग्दर्शनम् ॥२॥ अर्थ-(तत्त्वार्थश्रद्धानं ) तत्त्व-अर्थात् वस्तुके खरूपसहित अर्थ अर्थात् पदार्थोंका [ सात तत्त्वोंका ] श्रद्धान करना (सम्यग्दर्शनं ) सम्यग्दर्शन है ॥ २ ॥ तन्निसर्गादधिगमाद्वा ॥३॥ अर्थ-(तत्) वह सम्यग्दर्शन (निसर्गात् ) खभावसे (वा) अथवा (अधिग- धर्मके दर्शनसे, तथा उनके विशेष धर्मके अदर्शनसे जो अनेक पदार्थोको अवलंबन करनेवाला ज्ञान होता है, उसको संशय कहते हैं । जैसे यह पदार्थ स्थाणु है अथवा पुरुष है। सीप है या चांदी है? ऐसा अनिश्चितरूप ज्ञान । २ समान चिह्न देखनेपर अन्य पदार्थमें अन्यपदार्थके निश्चय होनेको विपर्यय कहते हैं-जैसे रस्सीमें सर्पका निश्चित ज्ञान । १ जाननेकी इच्छाके अभावमें अनिश्चितरूप तथा विकल्परहित जो सूक्ष्म ज्ञान हो, उसको अनध्यवसाय कहते हैं । जैसे—मार्गमें चलतेसमय पावसे छूए हुए अनेक धूलि कंटक पाषाण बालू तृण आदि- कोंका स्पर्श होनेपर 'कुछ है' इसप्रकार विकल्परहित तथा अनिश्चितरूप ( जिसमें अनेक कोटियोंका अवलंबन नहीं हो, ऐसा) ज्ञान होता है, वह अनध्यवसाय है। . - मात् ) परके उपदेशसे उत्पन्न होता है अर्थात् जो सम्यग्दर्शन परके उपदेशविना अपने आप ही उत्पन्न हो, उसको तो निसर्गजसम्यग्दर्शन कहते हैं और जो अन्यके उपदेशसे उत्पन्न हो उसको अधिगमजसम्यग्दर्शन कहते हैं ॥३॥ जीवाजीवास्तववन्धसंवरनिर्जरामोक्षास्तत्त्वम् ॥ ४ ॥ अर्थ-(जीवाजीवास्रववन्धसंवरनिर्जरामोक्षाः) जीव, अजीव, आस्तव, बन्ध, संवर, निर्जरा और मोक्ष ये सात (तत्त्वं) तत्त्व हैं । चेतनालक्षण जीव है और चेतनागुण जिनमें नहीं, ऐसे पुद्गल, धर्म, अधर्म, आकाश और काल ये पांच · अजीवतच हैं । शुभअशुभक- मौके आनेके द्वारको आस्रव कहते हैं। आत्माके प्रदेशोंमें कर्मोंका प्रवेश हो जाना ( संबंध होना) बंध है । आसवोंका रुकना संवर है । आत्माके [ जीवके ] प्रदेशोंसे कौका एकदेश क्षय होना [ पृथक् होना] निर्जरा है और समस्त कर्मोंका सर्वथा पृथक् हो जाना मोक्ष है । इनका ही विशेप वर्णन इस ग्रंथके दशौं अध्यायोंमें किया गया है ॥ ४ ॥ नामस्थापनाद्रव्यभावतरतन्नयासः ॥५॥ अर्थ-(नामस्थापनाद्रव्यभावतः ) नाम, स्थापना, द्रव्य और भावसे (तत्न्यासः) उन साततत्त्वोंका तथा सम्यग्दर्शनादिकका न्यास अर्थात् लोकव्यवहार होता है ॥ गुण जाति मो. JOK द्रव्य और क्रियाकी अपेक्षा विना ही अपनी इच्छानुसार लोकव्यवहारके लिये किसी पदार्थकी संज्ञा करनेको नामनिक्षेप कहते हैं। जैसे-किसी पुरुषका नाम इंद्रराज है परन्तु उसमें इन्द्रसरीखे गुण, जाति, द्रव्य, क्रिया कुछ भी नहीं हैं। उसके माता पिताने केवल व्यवहारार्थ नाम रख लिया है । लोकमें चतुर्भुज, धनपाल, देवदत, इंद्रदत्त, जिनदत्त, हाथीसिंह, जोरावरसिंह इत्यादि नाम रख लेते हैं । गुण जाति द्रव्य क्रियाकी अपेक्षासे ये नाम नहीं रक्खे जाते, इसीको नामनिक्षेप कहते हैं ॥ १॥ धातु, काठ, पाषाण, मिट्टीके चित्रादिक तथा सतरंजकी सारआदि पदार्थोंमें हाथी घोड़ा बादशाह इत्यादि तदाकार वा अतदाकाररूपै कल्पना कर लेनेको स्थापनानिक्षेप कहते हैं। जैसे-पार्श्वनाथभगवान्की वीतरागरूप जैसीकी तैसी शान्तमुद्रायुक्त धातुपाषाणमय प्रतिमाकी [ मूर्तिकी ] प्रतिष्ठा करना । यह तदाकारस्थापना है । और सतरंजकी गोटोंमें हाथी घोड़ा वादशाह मानना, यह अतदोकार- स्थापना है । नाम निक्षेपमें पूज्य अपूज्यबुद्धि नहिं होती है, परन्तु स्थापनानिक्षेपमें होती है ॥ २ ॥ जो भूत भविष्यत् पर्यायकी मुख्यता लेकर वर्तमानमें कहना सो द्रव्यनिक्षेप है। १ जो पदार्थ जिस आकारका हो उसे वैसा ही पत्थर काष्ठ मृत्तिकादिका बनाकर उसमें उसीकी स्थापना करनेको तदाकारस्थापना कहते हैं । २ और असली पदार्थका आकार जिसमें न हो ऐसे किसी भी पदार्थमें किसीकी स्थापना ( कल्पना ) करना सो अतदाकारस्थापना है A ] God जैसे-भविष्यतमें होनेवाले राजाके पुत्रको [ युवराजको ] वर्तमानमें राजा कहना अथवा जो भूतकालमें फौजदार था उसका ओहदा चला जानेपर भी उसे फोजदार कहना, यह द्रव्य- निक्षेप है ।। ३ ।। और जिस पदार्थकी वर्तमानमें जो पर्याय हो, उसको उसीरूप कहना सो भावनिक्षेप है। जैसे-काष्ठको काठ अवस्थामें काठ कहना और कोयला होनेपर कोयला और राख होनेपर राख कहना ॥ ४ ॥ ये चारों भेद ज्ञेयके ( पदार्थके) होते हैं ॥ ५ ॥ प्रमाणनयैरधिगमः ॥६॥ अर्थ-उक्त जीवादि तत्त्वोंका तथा सम्यग्दर्शनादिकोंका (अधिगमः) ज्ञान अर्थात् खरू- पका जानना (प्रमाणनयैः) प्रत्यक्ष परोक्ष प्रमाणोंसे [ सम्यग्ज्ञानसे] और द्रव्यार्थिक पर्यायार्थिक नयोंसे होता है | जो पदार्थक सर्वदेशको कहै, जनावै, उसको प्रमाण कहते हैं और पदार्थके एकदेशको कहै-जनावै, उसको नय कहते हैं । आत्मा जिस ज्ञानकेद्वारा विना अन्यपदार्थकी सहायताके ही पदार्थको अत्यन्त निर्मल स्पष्टतया जाने, उसको प्रत्यक्षप्रमाण कहते हैं । और चक्षुरादि इन्द्रियोंकी सहायतासे तथा शास्त्रादिकसे पदार्थको एक देश निर्मल जाने, उसको परोक्षप्रमाण कहते हैं। इसीके एक भागको अनुमानप्रमाण भी कहते हैं। जो पर्यायको उदासीनरूपसे देखता हुआ द्रव्यको ही मुख्यतासे कहै सो द्रव्यार्थिकनय है और जो द्रव्यको मुख्य नहीं करके एक पर्यायको ही कहै सो पर्यायार्थिकनय है ॥६॥ मल्ल मो. ३ निर्देशखामित्वसाधनाधिकरणस्थितिविधानतः ॥७॥ अर्थ-निर्देश, खामित्व, साधन, अधिकरण, स्थिति और विधान इनसे भी जीवादिक तथा सम्यग्दर्शनादिका अधिगम (ज्ञान) होता है ॥ वस्तुखरूपके नाम मात्र कहनेको निर्देश कहते हैं । वस्तुके अधिकारीको स्वामित्व कहते हैं । वस्तुकी उत्पत्तिके कारणको साधन कहते हैं । वस्तुके आधारको अधिकरण कहते हैं । वस्तुके कालकी मर्यादाको स्थिति और वस्तुके प्रकारको [ भेद कहनेको ] विधान कहते हैं ॥७॥ सत्संख्याक्षेत्रस्पर्शनकालान्तरमावाल्पबहुत्वैश्च ॥ ८॥ अर्थ-(च) और पदार्थका सत्-अस्तित्व, संख्या-वस्तुके परिणामोंकी गणना, क्षेत्र- पदार्थका वर्तमान निवास, स्पर्शन-जिस आधारमें सर्वदा निवास रहै ऐसा अधिकरण, काल-वस्तुके ठहरनेकी मर्यादा, अन्तर-विरहकाल, भाव-पदार्थोंके औपशमिकादिरूप भाव और अल्पबहुत्व-एकवस्तुका दूसरेकी अपेक्षा थोड़ा बहुतपना, इन आठोंके खरूप जानने वा कहनेसे भी सम्यग्दर्शनादि तथा जीवादिकपदार्थोंका अधिगम [ ज्ञान ] होता है .॥८॥ अब सम्यग्ज्ञानके भेदोंको तथा खरूपको कहते हैं,- १ इनका विस्तृत कथन सर्वार्थसिद्धिआदि शास्त्रोंमें चौदह गुणस्थान चौदह मार्गणाके वर्णनमें है ।
मतिश्रुतावधिमनःपर्ययकेवलानि ज्ञानम् ॥९॥ अर्थ ( मतिश्रुतावधिमनःपर्ययकेवलानि) मति, श्रुत, अवधि, मनःपर्यय और केवल ये पांच प्रकारके (ज्ञान) ज्ञान हैं॥ जो पांच इंद्रियोंसे और मनसे पदार्थको जानै उसे मतिज्ञान कहते हैं। जो मतिज्ञानके द्वारा जाने हुए पदार्थकी सहायतासे उसी पदार्थके भेदोंको अथवा अन्यपदार्थको जानै, उसे श्रुतज्ञान कहते हैं। जो क्षेत्रकालमाव तथा द्रव्यकी मर्यादालिये रूपी पदार्थको प्रत्यक्षरूपसे जाने, उसे अवधिज्ञान कहते हैं । जो अन्यके मनमें तिठे हुए रूपी पदार्थोंको जानै, वह मनःपर्ययज्ञान है और जो समस्त द्रव्यक्षेत्रकालभावको प्रत्यक्षरूप जानै अर्थात् भूत भविष्यत् वर्तमानमें होनेवाली पदार्थोकी समस्त पर्यायौंको एक ही कालमें जाने सो केवलज्ञान है ॥९॥ तत्रमाणे ॥१०॥ अर्थ-(तत्) ऊपर कहा हुआ पांचप्रकारका ज्ञान है सो ही (प्रमाणे) प्रमाणरूप है तथा उसके दो मूल भेद हैं । भावार्थ उक्त पांचप्रकारके ज्ञान ही प्रत्यक्ष-परोक्षरूप दो प्रमाण हैं ॥ १०॥ १ श्रुतशानका लक्षण और प्रकारसे भी कहा गया ।
मो. अ. 9 ४ GURUNew आये परोक्षम् ॥११॥ 'अर्थ-(आये) आदिके दो मति और श्रुतज्ञान (परोक्षं) परोक्षप्रमाण हैं ॥ ११ ॥ प्रत्यक्षमन्यत् ॥ १२॥ अर्थ-(अन्यत् ) बाकीके अवधि, मनःपर्यय और केवलज्ञान (प्रत्यक्षम् ) प्रत्यक्ष- प्रमाण हैं ॥ १२॥ मतिः स्मृतिः संज्ञा चिन्ताभिनिवोध इत्यनर्थान्तरम् ॥ १३ ॥ अर्थ-( मतिः) मन और इन्द्रियोंसे वर्तमानकालवर्ती पदार्थको अवग्रहादिरूप जानना (स्मृतिः) अनुभवित पदार्थोंका कालान्तरमें मरण होना (संज्ञा) वर्तमानमें किसी पदा- र्थको देखकर यह वही है जो पहिले देखा था इसप्रकार जोड़रूप ज्ञान होना [ इसको प्रत्य- मिज्ञान भी कहते हैं ] (चिन्ता) किसी चिह्नको देखकर वहांपर इस चिह्नवाला अवश्य होगा' इसप्रकार विचार करना [इसको ऊहा तथा तर्क भी कहते हैं] (अभिनिबोधः) सम्मुख चिहादिक देखकर उस चिहवालेका निश्चय कर लेना [इसको खार्थानुमान भी कहते हैं ] (इति) इनको आदिलेकर प्रतिमा,बुद्धि, उपलब्धि इत्यादि सब (अनर्थान्तरम्) अर्थभेदरहित हैं अर्थात् मतिज्ञानके ही नामान्तर हैं और ये सब मतिज्ञानावरणके क्षयोपशमसे ही होते हैं ॥ १३ ॥ ४ तदिन्द्रियानिन्द्रियनिमित्तम् ॥ १४ ॥ अर्थ-(तत्) वह मतिज्ञान (इन्द्रियानिन्द्रियनिमित्तम् ) बाह्यमें पांच इन्द्रिय और मनके निमित्तसे होता है अर्थात् इसके छह बाखकारण हैं किन्तुं अंतरंगमें मतिज्ञानावरणीय कर्मका क्षयोपयशम इसका कारण है ॥ १४ ॥ अवग्रहावायधारणाः ॥१५॥ अर्थ-मतिज्ञानके अवग्रह, ईहा, अवाय और धारणा ये ४ भेद हैं । किसी वस्तुकी सत्ता (होने) मात्रको देखै अर्थात् जानै उसको दर्शन वा दर्शनोपयोग कहते हैं और दर्श- नके पश्चात् श्वेत कृष्णादिरूप विशेष जाननेको अवग्रहमतिज्ञान कहते हैं। अवग्रहके पश्चात् यह श्वेत वा कृष्ण क्या पदार्थ है? इसके विशेष जाननेकी (यह श्वेतपदार्थ वकपंक्ति होना चाहिये अथवा श्वेतधुजा देखी हो तो धुजा होना संभव है, इसप्रकार) इच्छा होनेको ईहामविज्ञान कहते हैं । ईहाके पश्चात् ही जो ईहामें ज्ञान हुआ था उसका विशेप चिह्नोंसे निश्चय होना (बकपंक्ति हो तो बकपंक्ति और ध्वजा हो तो ध्वजा) सो अवायमतिज्ञान है । और जिस ज्ञानके कारणसे जानेहुए पदार्थको कालान्तरमें नहीं भूलै सो धारणामतिज्ञान है ॥१५॥ १ वाह्य कारणों की अपेक्षासे इसके छह भेद हैं स्पार्शन, रासन, घ्राणज, चाक्षुप, श्रावण, और मानस । २ ये चारों भेद विशेपकर क्रियाके होते हैं। SAMVASNA सो चिरग्रहण है ॥९ ॥ बाहर निकले हुए प्रगटरूप पदार्थका जानना सो निःसृतग्रहण मो. ५ वहुवहुविधक्षिप्रानिःसृतानुक्तध्रुवाणां सेतराणाम् ॥ १६ ॥ अर्थ-(बहुवहुविधक्षिप्रानिःसृतानुक्तधुवाणां) बहु, बहुविध, क्षिप्र, अनिःसृत, अनुक्त और भुव इन छहप्रकारके पदार्थोंका तथा (सेतराणाम्) इनसे उलटे अल्प, एकविध. अक्षिण तथा निःसृत उक्त और अध्रुव इन छहको मिलाकर द्वादशप्रकारके पदार्थों का अवग्रह ईहादिरूप ग्रहण (ज्ञान) होता है । जैसे-एकसाथ बहुत अवग्रहादिरूपग्रहण होनासो बहुग्रहण है ॥१॥ बहुतप्रकारके पदार्थों का अवग्रहादिरूप ज्ञान होना सो बहुविधग्रहण है ॥२॥ शीघ्रतासे पदार्थका अवग्रहादिरूप ज्ञान हो जाना सो क्षिप्रग्रहण है ॥ ३॥ जलमें डूबे हुए हस्ती मनुप्यादिकका एक देश जाननेसे उस सम्पूर्ण पदार्थका अवग्रहादिरूप ज्ञान होना सोअनिःसृतग्रहण है॥ ४॥वचनसे सुने विना ही अभिप्रायसे जान लेना सो अनुक्तग्रहण है ॥ ५॥ और बहुतकालतक जित- नाका तितना निश्चलरूपसे पदार्थोंका ज्ञान होते रहना सो ध्रुवग्रहण है ॥ ६ ॥ इसीप्रकार इनसे उलटे पदार्थोंका जैसे अल्पका ज्ञान होना वा एकपदार्थका जानना सो अल्पग्रहण है।॥७॥ एकप्रकारका जानना सो एकविधग्रहण है ॥ ८॥ पदार्थका धीरे धीरे बहुत कालमें जानना ॥१०॥ यह घट है इसप्रकार शब्द सुनकर घटपटादि पदार्थोंका जानना सो उक्तग्रहण PURA VAVYA ॥१॥ और क्षणक्षणमै कमती ज्यादा होता रहै अथवा क्षणमात्रमें नष्ट हो जाय इस प्रकारके पदार्थका जानना सो अध्रुवग्रहण है ॥ १२ ॥ इसप्रकार वारह प्रकारकी अवस्थावाले पदार्थों का अवग्रह ईहा अवाय धारणारूप मतिज्ञान होता है' ॥ १६ ॥ अर्थस्य ॥ १७॥ अर्थ-पदार्थोके ये बहु आदिक बारह भेद कहे सो द्रव्यके हैं अर्थात् पदार्थके बहुआदि विशेपणसहित बारहप्रकारअवग्रहादि ज्ञान होते हैं। किसीका मत है कि जोचाक्षुपज्ञान होता है सो रूपका ही होता है, द्रव्यका नहीं, द्रन्यका तो उसके सम्बन्धसे पीछे ज्ञान होता है । इसके खंडनार्थ आचार्य महाराज कहते हैं कि- सम्बन्ध पदार्थके (द्रव्यक) साथ ही होता है-केवल गुणके साथ कभी नहीं होता है । इसकारण ही यह सूत्र रचा गया है ॥ १७ ॥ . सजिल व्यअनस्यावग्रहः ॥ १८ ॥ अर्थ-(व्यञ्जनस्य) अप्रकटरूप शब्दादिक पदार्थोंका (अवग्रहः) केवल अव- प्रहरूप ज्ञान होता है-ईहादिक अन्य तीन ज्ञान नहीं होते हैं ॥ १८ ॥ १ विपयके भेदसे बहु आदिके १२ भेद होते हैं।
मो. #a न चक्षुरनिन्द्रियाभ्याम् ॥ १९॥ अर्थ-किन्तु (चक्षुरनिन्द्रियाभ्याम् ) नेत्र और मनसे व्यञ्जन [ अप्रकटपदार्थ ] का अवग्रहज्ञान (न) नहीं होता है ॥ १९ ॥ श्रुतं मतिपूर्व बनेकद्वादशभेदम् ॥२०॥ अर्थ-(श्रुतं) श्रुतज्ञान ( मतिपूर्व) मतिज्ञानके निमित्तसे होता है सो (बनेकद्वा- दश भेदं ) दो प्रकारका है, अङ्गबाह्य और अङ्गप्रविष्ट । इनमेंसे आदिका ( अङ्गवाह्य) अनेक ( चौदह ) प्रकार तथा दूसरा ( अङ्गप्रविष्ट ) बारह प्रकारका है । अभिप्राय यह है कि श्रुतज्ञानके मूल दो भेद हैं एक द्रव्यश्चत दूसरा भावश्चत । यहां कारणकी मुख्यताको लेकर आचार्यने सूत्रमें द्रव्यश्रुतका ही कथन किया है और ऊपर कहे हुए भेदभी द्रव्यश्नुतके हैं । अंगप्रविष्ट श्रुत- ज्ञानके १ आचारांग, २ सूत्रकृतांग, ३ स्थानांग, ४ समवायांग,५व्याख्याप्रज्ञप्तिअंग, ६ ज्ञातृ- धर्मकथांग, ७ उपासकाध्ययनांग, ८ अंतकृद्दशांग,९ अनुत्तरौपपादिकदशांग,१० प्रश्नव्याकरणांग, ११ विपाकसूत्रांग, १२ और दृष्टिप्रवादअंग इसप्रकार बारह भेद हैं । अङ्गवाटके १ सामा- यिक, २ चतुर्विशस्तव, ३ वंदना, ४ प्रतिक्रमण, ५ वैनयिक, ६ कृतिकर्म, ७ दशवैकालिक, १ जब नेत्र और मनसे व्यअनका अवग्रह नहीं होता है तब इनसे ईहादिक भी नहीं नहीं हो सकते हैं। 'क्योंकि विना अवग्रह हुए ईहादिक नहीं हो सकते हैं। ६ AAVAVAJ ८ उत्तराध्ययन, ९ कल्पव्यवहार, १० कल्पाकल्प, ११ महाकल्प, १२ पुण्डरीक, १३ महापुण्ड- रीक और १४ निपिद्धिका ये चौदह भेद हैं । अंगोंका थोड़ा २ सारांश लेकर संक्षेपसे अल्पबुद्धि पुरुषोंकेवास्ते रचे हुए दशवैकालिकादि श्रुत हैं ॥ २०॥ भवप्रत्ययोऽवधिवनारकाणाम् ॥ २१ ॥ अर्थ-जो मर्यादायुक्त ज्ञान हो, उसे अवधिज्ञान कहते हैं। अवधिज्ञान दो प्रकारका है एक भवप्रत्ययअवधिज्ञान, दूसरा क्षयोपशमैनिमित्तक । इनमेंसे (भवप्रत्ययः) भक्प्रत्यय- नामका (अवधिः) अवधिज्ञान (देवनारकाणाम् ) देव और नारकी जीवोंके ही होता है ॥२१॥ क्षयोपशमनिमित्तः पड्विकल्पः शेपाणाम् ॥२२॥ अर्थ-(क्षयोपशमनिमित्तः) क्षयोपशमनिमित्तवाला अवधिज्ञान (पविकल्पः) अनुगामी, अननुगामी, वर्द्धमान, हीयमान, अवस्थित और अनवस्थित इसप्रकार छह मेदरूप १ जो देवगति और नरकगतिके (भवके) कारण उत्पन्न हो उसे भवप्रत्ययावधि कहते हैं । २ अवधिज्ञाना- वरणीय कर्मके क्षयोपशम होनेसे जो ज्ञान होता है उसको क्षयोपशमनिमित्तिक अवधिज्ञान कहते हैं। तथा सामान्यपने अवधिज्ञान १ देशावधि, २ परमावधि, ३ सर्वावधिके भेदसे तीन प्रकारका है, उसमें भवप्रत्यय अवधि देशावधि ही होता है और दूसरा तीनों ही तरहका होता है । UUUU जन्UGUGUSAPP मो. १ है सो (शेपाणा ) मनसहित सैनी जीवोंके अर्थात् सम्यग्दर्शनादि सहित मनुष्य और तिर्यंचोंके होता है । जो अवधिज्ञान अन्यक्षेत्र वा भवमें जीवके साथ जाय उसे अनुगामी, साथ नहीं जाय उसे अननुगामी, जो बढ़ता रहै उसे वर्द्धमान, घटता रहै उसे हीयमान्, एकसा उसे अवस्थित और घटता बढ़ता रहै उसे अनवस्थित अवधिज्ञान कहते हैं ॥ २२ ॥ ऋजुविपुलमती मनःपर्ययः ॥ २३ ॥ अर्थ-(मनःपर्यय) मनःपर्ययज्ञान (ऋजुविपुलमती) ऋजुमति और विपुलमति भेदसे दो प्रकारका है ॥ मनवचनकायकी सरलता रूप परके मनमें तिष्ठते हुए पदार्थको जानै उसे ऋजुमति कहते हैं । और सरल तथा वक्ररूप परके मनमें रहनेवाले पदार्थको जानै सो विपुलंमति मनःपर्यय है ॥ २३ ॥ विशुद्धप्रतिपाताभ्यां तद्विशेषः ॥ २४ ॥ अर्थ-(विशुद्ध्यप्रतिपाताभ्यां ) परिणामोंकी विशुद्धतासे और अप्रतिपातसे अर्थात् केवलज्ञान होने तक रहे उससे पहले नहीं छूटे इससे ही (तद्विशेप:) इन दोनोंमें न्यूनाधिकताका हेतु है अर्थात् ऋजुमतिमतिमनःपर्ययसे विपुलमतिमनःपर्यय उक्त दो हेतु- ओंके कारण बड़ा तथा पूज्य है ॥ २४ ॥ १ चारित्ररूपी पर्वतसे नहिं गिरना उसको अप्रतिपात कहते हैं। ७ Serena Seness M तदनन्तभागे मनःपर्ययस्य ॥ २८ ॥ अर्थ-जो रूपीद्रव्य सर्वाधिज्ञानका विषय है (तदनन्तभागे) उसका अनन्तवाँ भाग भी सूक्ष्म द्रव्य ( मनःपयर्यस) मनःपर्ययज्ञानका विषय हो सकता है ॥ २८ ॥ सर्वद्रव्यपर्यायेषु केवलस्य ॥ २९ ॥ अर्थ-(केवलस्य) केवल ज्ञानके विषयका नियम (सर्वद्रव्यपर्यायेषु) समस्त द्रव्योंकी समस्त पर्यायोंमें है । अर्थात् एक एक द्रव्यकी त्रिकालवर्ती अनंतानंत पर्याय हैं सो छहों द्रव्योंकी समस्त अवस्थाओंको केवलज्ञान युगपत् एक कालमें जानता है ॥ २९ ॥ एकादीनि भौज्यानि युगपदेकस्मिन्नाचतुर्यः ॥३०॥ अर्थ-(एकसिन् ) एक जीवमें (एकादीनि) एकको आदि लेकर (भाज्योनि) विभाग किये हुए (युगपत् ) एकसाथ (आचतुभ्यः) चार ज्ञानतक हो सकते हैं । यदि किसी जीवमें एक ज्ञान हो तो केवल ज्ञान होता है। दो ज्ञान हों तो मति और श्रुत होते हैं तीन ज्ञान हों तो मति श्रुत और अवधि ये तीन अथवा मति श्रुत और मनःपर्यय ये तीन १ अवधिज्ञानके देशावधि आदि ३ भेद हैं। उनमें सबसे सूक्ष्मविषय (एकपरमाणु) सर्वावधिका है। इससे उसीके विषयका अनन्तानन्त अविभागप्रतिच्छेदोंकी अपेक्षा भाग किया है। २ भटुं योग्यानि भाज्यानि, ये ज्ञान विभाग करने योग्य हैं। ८ .
विशुद्धिक्षेत्रखामिविषयेभ्योऽवधिमनःपर्यययोः ॥२५॥ अर्थ-(अवधिमनःपर्यययोः) अवधिज्ञान और मनःपर्यय ज्ञानमें भी (विशुद्धिक्षेत्र- खामिविषयेभ्यः) विशुद्धता, क्षेत्र, खामी और विषय इन चारोंकी विशेषतासे [ विलक्षण- तासे ] भेद ( फर्क ) होता है । अर्थात् इन दोनोंके विशुद्धता, क्षेत्रकी मर्यादा, खामी और विषय न्यूनाधिक हैं। अभिप्राय यह कि मनःपर्यय, विशुद्ध, अल्पक्षेत्र, अल्पस्वामी और सूक्ष्मविषय- वाला है, और अवधिज्ञान, अविशुद्ध, बड़ा क्षेत्र, बहुतखामी, और स्थूलविषयवाला है ॥२५॥ मतिश्रुतयोर्निवन्धो द्रव्येष्वसर्वपर्यायेषु ॥ २६ ॥ अर्थ-(मतिश्रुतयोः) मतिज्ञान और श्रुतज्ञानका (निवन्धः) विषयोंके जाननेका संबंध वा नियम (द्रव्येषु) द्रव्योंकी (असर्वपर्यायेषु) कुछ पर्यायोंमें है ।। अर्थात् मतिज्ञान और श्रुतज्ञान जीवादि छहों द्रव्योंकी समस्त पर्यायोंको नहीं जानते, थोड़ी २ पर्यायोंको ही जान सकते हैं ॥ २६॥ रूपिष्ववधेः ॥२७॥ अर्थ-(अवधे) अवधिज्ञानके विषयका नियम (रूपिपु) रूपी मूर्तीकपदार्थोमें है अर्थात् अवधिज्ञान पुद्गलद्रव्यकी पर्यायोंको ही जानता है ॥२७॥ GURUN . M होते हैं । और चार हो तो मति, श्रुत, अवधि और मनःपर्यय ये चारों ज्ञान एक साथ हो सकते हैं ॥ ३० ॥ मतिश्रुतावधयो विपर्ययश्च ॥ ३१ ॥ अर्थ-(मतिथुतावधयः) मति श्रुत और अवधि ये तीन ज्ञान (विपर्ययः च) विपर्यय भी होते हैं। अर्थात् इन पांचों ज्ञानोमसे जो कि सम्यग्ज्ञानके भेद हैं मति, श्रुत और अवधि ये तीन विपर्यय अर्थात् मिथ्याज्ञान भी होते हैं, जिनको कुमतिज्ञान कुश्रुतज्ञान और कुअवधि- ज्ञान कहते हैं । इसप्रकार तीन तो कुज्ञान, और पांच सम्यग्ज्ञान, सब मिलाकर आठ प्रकारके ज्ञान होते हैं ॥ ३१॥ ये ज्ञान कुज्ञान क्यों हैं ? ऐसा प्रश्न होनेपर हेतु और दृष्टान्त देते हैं, सदसतोरविशेषाद्यदृच्छोपलब्धेरुन्मत्तवत् ॥ ३२॥ अर्थ-(सदसतोः) सत् और असत्रूप पदार्थोंके ( अविशेषात् ) विशेषका अर्थात् भेदका ज्ञान नहिं होनेसे (यहच्छोपलब्धे.) खेच्छारूप यद्वा तद्वा जाननेके कारण (उन्मत्तवत्) उन्मत्तके समान ये मिथ्याज्ञान भी होते हैं ॥ भावार्थ-जिसप्रकार मदिरासे उन्मत्त पुरुप भार्याको माता और माताको भार्या समझता है, यह उसका मिथ्याज्ञान है। परन्तु किसी समय वह भार्याको भार्या और माताको माता कहता है, तो भी उसका वह जानना सम्यग्ज्ञान नहिं मो. अ. कहलाता है । क्योंकि उसे माता और मायाने क्या विशेषता है इसका सत्यासत्यनिर्णयरूप यथार्थ ज्ञान नहीं होता है। इसी प्रकार मिथ्यादर्शनके उदयसे शत् और अरान् पदाधान्त मेद नहीं सगझते हुए कुमति कुश्रुत और कुअवधिज्ञानवालेका यथार्थ जानना भी मिथ्याज्ञान ही है ॥ ३२.॥. नैगमसंग्रहव्यवहारर्जुसूत्रशब्दसमभिरूद्वैवंभूता नयाः ॥ ३३ ॥ अर्थ-(नैगमसंग्रहव्यवहारर्जुमूत्रशब्दसमभिवभूताः ) नैगम, संग्रह, व्यवहार, ऋजुसूत्र, शब्द, समभिरूढ और एवंभूत ये सात (नया)नय हैं ॥ वन्तुमें अनेक धर्म अर्थात् स्वभाव होते हैं, उनमेंसे किसी एक धर्मकी मुख्यता लेकर अविरोधरूप साध्य पदार्थ- को जाने, सो नय है । नयके ऊपर लिखे हुए सात भेद हैं ॥ ३३ ॥ १.जितने द्रव्य हैं, वे अपनी भूत भविष्यत् वर्तमानकालकी समस्तपर्यायोंसे अन्वयरूप अर्थात् जोड़रूप हैं-अपनी किसी भी पर्यायसे कोई द्रव्य भिन्न नहीं हैं। सो अतीत पर्यायोंका तथा भविष्यत् पर्यायोंका वर्तमानकालमें संकल्प करे ऐसे ज्ञानको तथा वचनको नैगमनय कहते हैं। जैसे- कोई पुरुष रोटी बनानेकी सामग्री इकट्ठी करता है और उससे किसीने पूछा कि क्या करते हो ? इसके उत्तरमं उसने कहा कि,-'रोटी बनाता हूं किंतु यहां अभीतक रोटी बनानेरूप पर्याय प्रगट नहिं हुई, वह केवल मात्र लकड़िये जल वगैरह रख रहा है तथापि नैगमनयसे ऐसा वचन कह सकता है कि 'मै रोटी बना रहा हूं। ९ ८ PURPORY २. जो एक वस्तुकी समस्तजातिको व उसकी समस्त पर्यायोंको संग्रहरूप करके एकखरूप कहै, उसको संग्रहनय कहते हैं । जैसे 'घट' कहनेसे सब घटोंको समझना अथवा 'द्रव्य' कहनेसे जीव अजीवादि तथा उनके भेद प्रभेदादि सबको समझना । यह संग्रहनय है। ३. जो संग्रहनयसे ग्रहण किये हुए पदार्थोंका विधिपूर्वक (व्यवहारके अनुकूल) व्यवहरण अर्थात् भेदप्रभेद करै सो व्यवहारनय है। जैसे-संग्रहनयसे ' द्रव्य' कहनेसे समस्त भेदप्र- भेदरूप द्रव्योंका सामान्यतासे ग्रहण होता है। परन्तु द्रव्य दो प्रकारके हैं, जीव और अजीव । जीव-देव नारकी मनुष्य तियेच चार प्रकारके हैं । अजीव-पुद्गल धर्म अधर्म काल आकाश ये पांच प्रकारके हैं । इस प्रकार व्यवहारके साधक जितने भेदप्रभेद हो सकें, उनको जो बतलावे-जाने सो व्यवहारनय है। ४. अतीत अनागत दोनों पर्यायोंको छोड़के वर्तमानपर्याय मात्रको ग्रहण करै सो ऋजु- सूत्रनय है। द्रव्यकी पर्याय समय समयमें परिणमती (पलटती) रहती हैं। एकसमय- वर्ती पर्यायको अर्थपर्याय कहते हैं । अर्थपर्याय ही ऋजुसूत्रनयका विषय है । ऋजुसूत्रनय वर्तमान एक समय मात्रकी पर्यायको कहता व ग्रहण करता है । अतीत अनागत समयकी पर्यायको ग्रहण नहीं करता है । १ कालके सबसे छोटे भागको एक समय कहते हैं।
मो. अ. १ १० ५. जो व्याकरणसंबंधी लिङ्ग, संख्या (वचन ), साधन (कारक), काल आदिकके व्यभिचारको ( दोपोंको ) दूर करके जाने वा कहै, उसे शब्दनय कहते हैं। ६. अनेक अर्थोंको छोड़ करके जो एक ही अर्थमें रुढ (प्रसिद्ध) हो, उसको जाने वा कहै, सो समभिरूढनय है । जैसे-गो शब्दके गमनआदि अनेक अर्थ होते हैं तथापि मुख्य- तासे गो नाम गाय वा बैलका ही ग्रहण किया जाता है । उसको चलते बैठते सोते सब अवस्थाओंमें सब लोग गो ही कहते हैं । यही समभिरूढनय है। ७. जिसकालमें जो क्रिया करता हो, उसको उस कालमै उसही नामसे जाने वा कहै उसे एवंभूतनय कहते हैं । जैसे देवोंके पति इंद्रको जब वह परम ऐश्वर्यसहित हो, उसी अवस्था इंद्र कहना, पूजन अभिपेकादि करते हुए. इन्द्र नहिं कहना तथा जिसकालमें वह शक्तिरूप क्रियाको करै उसी समय 'शक' कहना अन्य समयमें शक नहिं कहना । इन सातों नयोंमेंसे नेगम संग्रह और व्यवहार ये तीन नय तो द्रव्यार्थिक हैं और ऋजुसूत्र, शब्द, समभिरूढ और एवंभूत ये चार पर्यायाथिक हैं। यहां कोई संदेह करै कि-द्रव्यसंग्रह पुरुषार्थसिद्ध्युपायादिग्रन्थोंगे जो नयके निश्चय और व्यवहार दो भेद कहे वे कौनसे हैं, तो उनकेलिये कहा जाता है कि- पदार्थके निजखरूपको मुख्य करे सो तो निश्चयनय है और जो किसीप्रयोजनके वश अन्य- १० पदार्थके भावको अन्यपदार्थमें आरोपण करै अथवा परनिमित्तसे उत्पन्न हुए नैमित्तिक भावको ही वस्तुका निजभाव कहै, उसे व्यवहारनय कहते हैं । इसको उपचारनय तथा उपनय भी कहते हैं। उपर्युक्त नैगमादि सात नय द्रव्यके निजखरूपको . ही मुख्य करते हैं इसकारण नैगमादि तीन द्रव्याथिक और ऋजुसूत्रादि चार. पर्यायार्थिक इस प्रकार सातोंनय निश्चयनयके भेद हैं । और व्यवहार (उपचार). नयके सद्भूतव्यवहार असद्भूतव्यवहार और उपचरितव्यवहार ये तीन भेद हैं । जैसे जीवको रागादिक भावकर्मोंका का कहना सो सद्भूतव्यवहारनय है। क्योंकि जीवकी सत्तामें ही रागादिक भावरूप पर्याय हैं । तथा जीवको द्रव्यकर्म तथा शरीरादिक नोकर्मीका कर्ता कहना सो असद्भूतव्यवहारनय है। और घटपटादिका कर्ता कहना सो उपचरितव्यवहारनय है । निश्चय नयके भी दो भेद है, एक शुद्धनिश्चयनय और दूसरा अशुद्धनिश्चयनय ।जैसे जीवको क्षयोपशमरूप मतिज्ञानादिक चार ज्ञानोंका का कहना सो तो अशुद्धनिश्चयनय है और शुद्ध दर्शन ज्ञानका अर्थात् केवलदर्शन और केवलज्ञानका कर्ता कहना सो शुद्धनिश्चयनय है । इनका विशेष विषय और खरूप आलापपद्धति तथा नयचक्रादि ग्रंथोंसे जानना चाहिये ।। ३३ ॥ इति तत्त्वार्थाधिगमे मोक्षशास्त्रे प्रथमोऽध्यायः ॥१॥ AURA मो. अथ द्वितीयोऽध्यायो लिख्यते । १ ११ पहले सम्यग्दर्शनके लक्षणमें जीवादि साततत्त्वोंका श्रद्धान कहा था । उनमेंसे प्रथम जीवका निजभाव (खरूप ) क्या है ? ऐसा प्रश्न होनेपर आचार्य सूत्र कहते हैं; औपशमिकक्षायिको भावौ मिश्रश्च जीवस्य खतत्त्वमौदयिकपारिणामिकौ च ॥१॥ अर्थ-(जीवस्य) जीवके (औपशमिकक्षायिको) औपशमिक और क्षायिक (भावौ) भाव (च मिश्रः) और मिश्र (औदयिकपारिणामिको च) औदयिक तथा पारिणामिक भाव ये पांच भाव हैं और ये पांचों ही भाव जीवके (खतत्त्वं) निजतत्त्व वा निजभाव हैं अर्थात् ये जीवमें ही होते हैं। जैसे मलिन जलमें निर्मली वा फिटकड़ी डालनेसे कीचड़ नीचे बैठ जाता है और ऊपरसे जल निर्मल हो जाता है, उसही प्रकार कर्मोंके उपशम होनेसे ( उदय न होनेसे ) जीवके परिणाम.जो विशुद्ध हो जाते हैं उनको औपशमिकभाव. कहते हैं कमौके सर्वथा नाश होनेसे जो आत्माके अत्यंत शुद्धभाव होते हैं, उनको क्षायिकभाव कहते हैं । सर्वघाती कौके उदयाभावीक्षय होने (फल नहीं देकर झड़ जाने) वा उपशम होने तथा ११ देशघाती कौके उदय होनेसे जो भाव होते हैं उनको मिश्रभाव अथवा क्षायोपशमिक भाव कहते हैं। द्रव्यक्षेत्रकालभावरूप निमित्तसे कर्म जो अपना रस (फल) देता है उसको उदय कहते हैं । उन कोंके उदयसे जो आत्माके भाव होते हैं उनको औदयिकभाक कहते हैं । और जिनभावोंमें कर्मोकी कुछ भी अपेक्षा नहीं है उन भावोंको पारिणामिकभाव कहते हैं ॥१॥ द्विनवाटादशैकविंशतित्रिभेदा यथाक्रमम् ॥२॥ अर्थ-इन पांचों भावोंके ( यथाक्रमम् ) क्रमसे (द्विनवाटादशैकविंशतित्रिभेदाः) दो नव अठारह इक्कीस और तीन भेद हैं । अर्थात् औपशमिकभाव दो प्रकारके हैं, क्षायिकभाव नवप्रकारके हैं, मिश्रभाव अठारह प्रकारके हैं, औदयिक भाव इक्कीसप्रकारके हैं और पारि- णामिक भाव तीन प्रकारके हैं ॥२॥ सम्यक्त्वचारित्रे ॥३॥ अर्थ-औपशमिकसम्यक्त्वे और औपशमिकचारित्र ये दो औपशमिक भावके भेद हैं ॥३॥ ज्ञानदर्शनदानलामभोगोपभोगवीर्याणि च ॥ ४ ॥ (१) जो मिथ्यात्व, सम्यक्त्व, राम्यमिथ्यात्य और अनन्तानुवन्धी क्रोध मान माया लोभ इन सात प्रकृतियों के उपशमसे होता है। यह सादिमिथ्यादृष्टिकी अपेक्षा कथन है । अनादिमिथ्यादृष्टिके सम्यक्त्व और सम्यमिथ्यात्वके विना पांचप्रकृतियों के उपशमसे होता है। जा M मो. d १२ RURU . . अर्थ.--(ज्ञानदर्शनदानलाभभोगोपभोगवीर्याणि) केवलज्ञान, केवलदर्शन, क्षायिक- दान, क्षायिकलाभ, क्षायिकभोग, क्षायिकउपभोग, क्षायिकवीर्य (च) और चकारसे क्षायिकस- म्यक्त्व तथा.क्षायिकचारित्र ये नव क्षायिकभाव हैं ॥४॥ ज्ञानाज्ञानदर्शनलब्धयश्चतुस्वित्रिपञ्चभेदाः सम्यक्त्वचारित्रसंयमासंयमाश्च ॥ ५॥ अर्थ-(ज्ञानाज्ञानदर्शनलब्धयः चतुस्त्रित्रिपश्चभेदाः) मति श्रुत अवधि मनःपर्यय ये चार ज्ञान, कुमति कुश्नुत कुअवधि ये तीन अज्ञान. (कुज्ञान ), चक्षुर्दर्शन अचक्षुर्दर्शन अवधिदर्शन ये तीन दर्शन, क्षायोपशमिकदान, क्षायोपशमिकलाम, क्षायोपशमिकभोग, क्षायो- पशमिकउपभोग और क्षायोपशमिकवीर्य ये पांच लब्धि तथा (सम्यक्त्वचारित्रसंयमासं- यमाश्च ) वेदकसम्यक्त्व, सरागचारित्र और संयमासंयम ( देशव्रत ) इसप्रकार अठारह भाव क्षायोपशमिक हैं। ये सब ही भाव, आत्मामें कर्मोंके क्षयोपशमसे होते हैं ॥ ५ ॥ गतिकपायलिङ्गमिथ्यादर्शनाज्ञानासंयता- सिद्धलेश्याश्चतुश्चतुरुयेकैकैकैकषड्भेदाः ॥ ६ ॥ अर्थ--मनुष्यगति देवगति नरकगति और तिर्यंचगति ये ४ गति, क्रोध मान माया लोभ ये ४ कपाय, स्त्रीवेद पुंवेद नपुंसकवेद ये ३ लिग, मिथ्यादर्शन १, अज्ञान १, असंयम १, १२ ASSAUR असिद्धत्व १ और पीत पद्म शुक्ल कृष्ण नील कपोत ये ६ लेश्या, इस प्रकार इक्कीस औदयिकभाव हैं ॥६॥ जीवभव्याभब्यत्वानि च ॥७॥ अर्थ-(च) और (जीवभव्याभव्यत्वानि) जीवत्व भव्यत्व अभव्यत्व ये तीन (अन्य द्रव्यसे असाधारण) जीवके पारिणामिक भाव हैं ॥ ७॥ इसप्रकार जीवके सब मिलाकर ५३ भाव हैं । अब जीवका लक्षण कहते हैं- उपयोगो लक्षणम् ॥८॥ अर्थ-जीवका (लेक्षणम् ) लक्षण (उपयोगः) उपयोग है ॥ उपयोग आत्माके चैतन्य खभावको कहते हैं। इसीको आत्माका (जीवका) परिणाम परिणमन परिणति वा उप योग कहते हैं ।। ८॥ स.द्विविधोऽष्टचतुर्भेदः ॥९॥ अर्थ-(सा) वह उपयोग (द्विविधः) मूलभेदसे दो प्रकारका है पहिला ज्ञान दूसरा दर्शन । और फिर वह दो प्रकारका उपयोग क्रमसे ( अष्टचतुर्भेदः) आठ और चार प्रकारका १ आठों ही कमौके उदयसे होता है। २ व्यतिकीर्णवस्तुव्यावृत्तिहेतुर्लक्षणम्-परस्पर मिली हुई वस्तुओंमें जो उनके भेदज्ञान कराने में कारण है सो लक्षण है-जैसे अमिका लक्षण उष्णपना ।
मो. अ. AGAN १३ है अर्थात् ज्ञानोपयोगके १ मति, २ श्रुत, ३ अवधि, ४ मनःपर्यय, ५ केवल, ६ कुमति, ७ कुश्रुत, और ८ कुअवधि ऐसे आठ भेद हैं और दर्शनोपयोगके १ चक्षुदर्शन, २ अचक्षुदर्शन, ३ अवधिदर्शन, और ४ केवलदर्शन, ऐसे चार भेद हैं ॥९॥ अब जिनके उपर्युक्त ५३ भाव और उपयोग लक्षण बतलाये, उन जीवोंके भेद कहते हैं- संसारिणो मुक्ताश्च ॥ १० ॥ अर्थ-वे जीव ( संसारिणः) संसारी (च) और (मुक्ताः) मुक्त अर्थात् सिद्ध ऐसे दो प्रकारके हैं । जो कर्मसहित हैं, कोके वशीभूत हो नानाप्रकारके जन्ममरण करते हुए संसारमें संसरण वा भ्रमण करते रहते हैं उनको संसारीजीव कहते हैं और जो समस्त काँको काटकर मुक्त हो गये हैं, उनको मुक्तजीव अथवा सिद्धजीव कहते हैं ॥ १० ॥ समनस्कामनस्काः ॥११॥ अर्थ संसारीजीव समनस्क और अमनस्क दो प्रकारके हैं ॥ जिनके मन होता है उनको समनस्क (सैनी) और जिनके मन नहीं होता है उनको अमनस्क (असैनी) कहते हैं ॥११॥ संसारिणखसस्थावराः ॥ १२ ॥ (१)द्रव्यसंसरण क्षेत्रसंसरण कालसंसरण भवसंसरण और भावसंसरण-रूप पांच प्रकारके संसरण वा परावर्तन है ।
अर्थ-(संसारिणः) संसारी जीव (त्रसस्थावराः) त्रस और स्थावर दो प्रकारके हैं । द्वीन्द्रिय त्रीन्द्रिय चतुरिन्द्रिय और पंचेन्द्रिय जीवोंको बस कहते हैं और एकेन्द्रिय जीवोंको स्थावर कहते हैं ॥ १२ ॥ पृथिव्यप्तेजोवायुवनस्पतयः स्थावराः ॥ १३ ॥ अर्थ-(पृथिव्यतेजोवायुवनस्पतयः) पृथिवीकायिक अप्कायिक तेजःकायिक वायु- कायिक और वनस्पतिकायिक ये पांचप्रकारके जीव ( स्थावराः) स्थावर हैं । इनके एक ही स्पर्शन इन्द्रिय होती है । इनके दशप्राणोंमेंसे केवल इन्द्रियप्राण, कायबलप्राण, श्वासोच्छ्वास- प्राण और आयुःप्राण ये चार ही प्राण होते हैं ॥ १३ ॥ द्वीन्द्रियादयत्रसाः ॥१४॥ अर्थ-(द्वीन्द्रियादयः) द्वीन्द्रियादिक जीव (साः) त्रस हैं ॥ १४ ॥ पञ्चेन्द्रियाणि ॥ १५॥ अर्थ-सब इन्द्रियें पांच हैं ॥ १५॥ द्विविधानि ॥१६॥ १ पृथिवी ही है काय अर्थात् औदारिक शरीर जिनका सो पृथिवीकाय स्थावर जीव हैं । २ जीवविपाकी स्थावर नाम कर्मके उदयसे स्थावर होते हैं। ३ जीवविपाकी त्रसनाम कर्मके उदयसे त्रस होते हैं। - RUPT • मो. १४ है। अर्थ-वे सब इन्द्रिये दो दो प्रकारकी हैं, पहली द्रव्येन्द्रिय और दूसरी भावेन्द्रिय ॥१६ निर्वृत्त्युपकरणे द्रव्येन्द्रियम् ॥ १७ ॥ अर्थ-(द्रव्येन्द्रिय) द्रव्येन्द्रिय (निर्वृत्युपकरणे) निर्वृत्तिरूप और उपकरणरूप दो प्रकारकी है ॥ नाम कर्मके निमित्तसे जो रचनाविशेप हो, उसे निवृत्ति कहते हैं और निर्व- तिको जो सहायक हो, उसे उपकरण कहते हैं। निर्वृत्ति और उपकरण भी दो दो प्रकारके हैं एक आभ्यन्तरनिर्वृत्ति और एक बाह्यनिर्वृत्ति । आत्माके प्रदेशोंका इन्द्रियोंके आकाररूप होना सो आभ्यन्तरनिर्वृत्ति है और पुद्गलपरमाणुओंकी इन्द्रियरूप रचना होना सो बाह्यनिर्वृत्ति है। जैसे नेत्रइन्द्रियमें नेत्रइन्द्रियके आकाररूप आत्माके जितने प्रदेश मसूरके समान फैले वे आभ्यन्तरनिर्वृत्ति हैं और उसमें जितने पुद्गलपरमाणु मसूरके आकारमें परिणत हुए है. वे बाह्यनिर्वृत्ति हैं । और मसूरके आकाररूप नेत्रेन्द्रियके सफेदभाग, बाफणी, पलकेंआदि बायोपकरण हैं और इनरूप जो आत्माके प्रदेश परिणमे हैं वे आभ्यन्तर उपकरण हैं इसीप्रकार कर्णआदि इन्द्रियोमें भी जानना ॥ १७ ॥ लब्ध्युपयोगी भावेन्द्रियम् ॥ १८ ॥ अर्थ-(लन्ध्युपयोगौ) लब्धि और उपयोग ये दो (भावेन्द्रियम् ) भावेन्द्रिय हैं। जिसके होनेसे आत्मा द्रव्येन्द्रियकी रचनामें प्रवृत्ति करै ऐसी ज्ञानावरणकर्मकी क्षयोपशमरूप १४ शक्तिविशेपको लब्धि कहते हैं । और क्षयोपशमलब्धिके निमित्तसे आत्माका विपयोंके प्रति परिणमन होनेसे जो आत्मामें ज्ञान उत्पन्न होता है सो उपयोग है। जैसे-कोई जीव सुनना तो चाहै परन्तु सुननेकी क्षयोपशमरूप शक्ति नही हो, तो वह सुन नहीं सकेगा । इसलिये ज्ञानका कारण होनेसे लब्धिको इन्द्रिय मानी है और उपयोग इन्द्रियका फल वा कार्य है, इसलिये कार्यमें कारणका उपचार किया गया है । अथवा इन्द्रिये जिसप्रकार आत्माके परिचयकी हेतु हैं, उसीप्रकार उपयोग भी मुख्य हेतु है, इसकारण उपयोगको इन्द्रिय कहा है ॥ १८ ॥ स्पर्शनरसनघाणचक्षुःश्रोत्राणि ॥ १९ ॥ अर्थ-स्पर्शन (त्वचा), रसन (जीभ ), प्राण (नासिका), चक्षु (नेत्र), और श्रोत्र (कान) ये पांच इन्द्रियोंके नाम है ॥ १९ ॥ स्पर्शरसगन्धवर्णशब्दास्तदर्थाः ॥२०॥ अर्थ-( स्पर्शरसगन्धवर्णशब्दाः) स्पर्श रस गंध वर्ण और शब्द ये पांच(तदर्थाः) उक्त पांचों इन्द्रियोंके विपय वा ज्ञेय हैं । स्पर्शन इन्द्रियका विपय स्पर्श अर्थात् छूना है। रसना इन्द्रियका विषय रैस अर्थात् खाद लेना । प्राण इन्द्रियका विषय सुगन्धि दुर्गन्धि सूंघना है । १ ये पांच ज्ञानेन्द्रिय हैं-ज्ञान कराने में सहायक होनेसे । २ शीत, उष्ण, रूक्ष, सचिफण, कठोर, कोमल हलका और भारी ये स्पर्शके आठ भेद हैं । ३ तिक्त, का, कपायला, सटा और मीठा ये पांच रस हैं। म. ----- मो. अ. १५ नेत्र इन्द्रियका विपय वर्ण अर्थात् रंग है और श्रोत्रइन्द्रियका विषय शब्दोंका सुनना है ॥२०॥ श्रुतमनिन्द्रियस्य ॥२१॥ अर्थ-( अनिन्द्रियस्य) मनका विषय ( श्रुतम् ) श्रुतज्ञानगोचर पदार्थ हैं ॥ २१ ॥ वनस्पत्यन्तानामेकम् ॥ २२॥ अर्थ-(वनस्पत्यन्तानाम् ) वनस्पतिकाय है अन्तमें जिनके उन जीवोंके अर्थात् पृथिवी- कायिक अप्कायिक अग्निकायिक वायुकायिक और वनस्पतिकायिक इन पांचों प्रकार जीवोंके (एकम्) पहली स्पर्शन इन्द्रिय ही है । अर्थात् ये पांच एकमात्र स्पर्शन इन्द्रियके धारक एके- न्द्रिय जीव (स्थावरजीव ) हैं ।। २२ ॥ कृमिपिपीलिकाभ्रमरमनुष्यादीनामेकैकवृद्धानि ॥ २३ ॥ अर्थ-(कृमिपिपीलिकाभ्रमरमनुष्यादीनां) लट चिउंटी भौंरा मनुष्य आदिकके (एकै- कहानि) कमसे एक एक इन्द्रिय बढ़ती हुई है । अर्थात् लट (गिंडा) वगैरहके स्पर्शन और रसन दो इन्द्रियें हैं। चिउंटी वगैरहके स्पर्शन रसन और प्राण ये तीन इन्द्रियें हैं । भौंरा- आदि जीवोंके स्पर्शन रसन घ्राण और नेत्र ये चार इन्द्रिय हैं। तथा मनुष्य देव नारकी और गौ आदि पशुओंके पांचों ही इन्द्रिये हैं ॥ २३ ॥ १ श्रेत पीत नील अमण और कृष्ण ये पांच वर्ण है।' १५ ------- ------- MAVAS . संशिनः समनस्काः ॥ २४ ॥ अर्थ (समनस्काः) जो मनसहित हैं वे जीव (संज्ञिनः) संज्ञी हैं। जिन्हें अपने हित अहितका अथवा गुण दोषादिका विचार हो तथा शिक्षा क्रिया आलापके ग्रहण करनेरूप संज्ञा हो, उनको संज्ञीपंचेन्द्रिय कहते हैं ॥ २४ ॥ 'शंका-यदि जीव सदा मनसे ही हितादिकी प्राप्तिरूप प्रत्येक कर्म कर सकता है, तो विग्रहगतिमें जहां मन नही हैं, वहा नूतन शरीरकेलिये किसप्रकार गमन करता है । यह शंका करनेके लिये सूत्र कहते हैं, विग्रहगतौ कर्मयोगः ॥२५॥ अर्थ-(विग्रहगतौ) नया शरीर धारण करनेके लिये जो गति अर्थात् गमन होता है, उसमें ( कर्मयोगः) कार्माणयोग है अर्थात् कार्माणयोगसे ही जीव एक गतिसे दूसरी गतिमें गमन करता है ॥ २५॥ अनुश्रेणि गतिः॥ २६ ॥ अर्थ-(गतिः) जीव और पुद्गलोंका गमन (अनुश्रेणि) आकाशके प्रदेशोंकी श्रेणीका अनुसरण करके होता है। श्रेणीको (प्रदेशोंकी पंक्तिको) छोड़कर विदिशारूप गमन नहिं १ विग्रहाय शरीराय गतिर्गमनम्-नवीन शरीरके वास्ते जो गति है सो विग्रहगति कहाती है। AURUSAV.
UR मो. २ होता है ॥ भावार्थ-मृत्यु होनेपर नवीन शरीर धारण करनेके लिये जो जीवका गमन होता है, वह आकाशके प्रदेशोंकी श्रेणीमें ही होता है अन्य प्रकार नहीं । तथा जब पुद्गलका शुद्ध परमाणु एकसमयमें चौदहराजू गमन करता है, तब वह भी श्रेणीरूप गमन करता है । अन्य अवस्थामें श्रेणीरूप गमन नहीं है ॥ २६ ॥ अविग्रहा जीवस्य ॥ २७ ॥ अर्थ-(जीवस्य) मुक्तजीवकी गति (अविग्रहा) वक्रतारहित (मोड़ेरहित) सीधी होती है अर्थात् मुक्त जीव एक समयमें सीधा सात राजू ऊंचा गमन करता हुआ सिद्धक्षेत्रमें चला जाता है-इधर उधर नहीं मुंड़ता है ॥ २७ ॥ विग्रहवती च संसारिणः प्राक्चतुर्यः॥ २८ ॥ अर्थ-(च) और ( संसारिणः) संसारी जीवकी गति ( प्राक्चतुर्व्यः) चार सम- यसे पहिले २.(विग्रहवती) विग्रहवती वा मोड़ेवाली है ॥ भावार्थ- संसारी जीवकी गति एक समयमें तथा दो तीन समयमें भी होती है अर्थात् संसारी जीव दूसरे समयमें एक मोड़ा तीसरे समयमें दूसरा मोड़ा और चौथे समयमें अर्थात् चौथे समयसे पहिले तीसरा मोड़ा लेकर किसी न किसी स्थानमें नवीन शरीर धारण कर लेता है ॥ २८ ॥ १ यह विग्रहशब्द वक्रता मोड़ वा टेडका वाचक है।
एकसमयाऽविग्रहा ॥ २९ ॥ अर्थ-(अविग्रहा) मोड़ारहित गति (एकसमया) एक समय मात्र ही होती है। इसको ऋजुगति भी कहते हैं ॥ २९ ॥ एकं द्वौ त्रीन्वानाहारकः ॥३०॥ अर्थ-विग्रहगतिवाला जीव (एक) एक समयमें (द्वौ) दो समयमें (वा) तथा (त्रीन्) तीनसमयमें (अनाहारकः) अनाहारक है । औदारिक वैक्रियिक और आहारक इन तीन शरीरोंके और छह पर्याप्तियोंके योग्य पुद्गलवर्गणाके ग्रहणको आहार कहते हैं । जीव जबतक ऐसे आहारको ग्रहण नहीं करता है, तबतक उसे अनाहारक कहते हैं । जीव बहुतसे बहुत विग्रहगतिमें तीन समयतक रहता है । चौथे समयमें शरीरपर्याप्तिको ग्रहण करके आहारक हो जाता है ॥ ३० ॥ सम्मूर्छनगर्भोपपादा जन्म ॥ ३१ ॥ अर्थ (जन्म) नवीन शरीरका धारण (सम्मूर्छनगर्मोपपादा) सम्मूर्च्छन गर्भ और उपपाद ऐसा तीन प्रकारका होता है । अर्थात् संमूर्छनजन्म गर्भजन्म और उपपादजन्म १ कालाध्वनोाप्तौ। १।३।१२१। शाक० इससे निरन्तर व्याप्तकाल आधारमें द्वितीया विभक्ति है।
मो. १७ ऐसे तीन प्रकारका जन्म है ॥ अपने योग्य द्रव्य क्षेत्र काल भावकी विशेषतासे तीन लोकमें भरे हुए चारों ओरके पुद्गल परमाणुओंसे [ मातापिताके रजोवीर्यके मिलनेके विना ही] देहकी रचना होनेको सम्मूर्छनजन्म कहते हैं । स्त्रीके गर्भाशयमें माताके रज और पिताके वीर्यके संयोगसे जो जन्म होता है, उसे गर्भजन्म कहते हैं । और मातापिताके रजोवीर्यके विना देवनारकियोंके स्थानविशेषमें जो जन्म होता है, उसे उपपादजन्म कहते हैं ॥ ३१॥ सचित्तशीतसंवृताः सेतरा मिश्राश्चैकशस्तद्योनयः ॥ ३२ ॥ अर्थ-(सचित्तशीतसंवृताः) सचित्त शीत संवृत और (सेतराः) इनसे उलटी अचित, अशीत (उष्ण ), विवृत (च) और (मिश्रा) मिली हुई अर्थात् सचित्ताचित्त, शीतोष्ण और संवृतविवृत इसप्रकार ( एकशः) क्रमसे (तद्योनयः) उन सम्मूर्च्छनादि जन्मोंकी नव योनि वा उत्पत्तिस्थान हैं ॥ ३२ ॥ योनि दो प्रकारकी हैं, आकारयोनि, और गुणयोनि । उनमेंसे यहांपर गुणयोनिकी अपेक्षा भेद कहे हैं। आकारयोनिके ३ भेद शङ्खावर्त, कूर्मोन्नत, और वंशपत्र । इनमेंसे शङ्कावर्तयोनिमें गर्भ नहीं ठहरता है, कूर्मो- न्नतयोनिमें तीर्थकर, दो तरहकें चक्रवर्ती बलभद्रं तथा उनके भाइयोंके सिवाय कोई भी पैदा नही होता, और वंशपत्रयोनिमें बाकीके गर्भ जन्मवाले सब जीव पैदा होते हैं ॥ ३२ ॥ १७ जरायुजाण्डजपोतानां गर्भः ॥ ३३॥ अर्थ-(जरायुजाण्डजपोतानां) जरायुज अंडज और पोत इन तीनप्रकारके जीवोंका (गर्भः) गर्भजन्म है ॥ जो जीव जालके समान मांस और रुधिरसे व्याप्त एक प्रकारकी थैलीसे लिपटे हुए पैदा होते हैं, उनको जरायुज कहते हैं। माताके रुधिर और पिताके वीर्यसे बने हुए नखकी त्वचाके समानं कठिनसे गोलं २ आवरणको अंडा कहते हैं और अंडेसे जो उत्पन्न होते हैं, उन्हें अंडज कहते हैं। और जिनके ऊपर जरा वा अंडा कुछ भी आवरण नहीं होता है, माताके उदरसे निकलते ही जो चलने फिरने लगते हैं, उन्हें पोत कहते हैं ॥ ३३ ॥ देवनारकाणामुपपादः ॥३४॥ अर्थ (देवनारकाणाम् ) चारप्रकारके देवोंका और नारकी जीवोंका (उपपादः) उपपादजन्म होता है ॥ ३४ ॥ शेषाणां सम्मूछनम्.॥ ३५ ॥ ' अर्थ-(शेषांणां) शेपका अर्थात् गर्भ और उपपात जन्मवालोंसे बाकी रहे हुए संसारी जीवोंका ( सम्मूर्च्छनम् ) सम्मूर्च्छनजन्म है ॥ ३५ ॥ KOT मो. २ औदारिकवैक्रियिकाहारकतैजसकामणानि शरीराणि ॥ ३६॥ अर्थ-इन सब जीवोंके (शरीराणि) शरीर (औदारिकवैक्रियिकाहारकतैजसका- मणानि) औदारिक वैक्रियिक आहारक तैजस और कार्मण इस तरह पांच प्रकारके होते हैं | स्थूल अर्थात् इन्द्रियोंसे देखने योग्य शरीरको औदारिकशरीर कहते हैं। जिसमें अनेक प्रकारके स्थूल सूक्ष्म हलका भारी इत्यादि विकार होनेकी योग्यता हो, उसे वैक्रियि- कशरीर कहते हैं । सूक्ष्म पदार्थके निर्णयके लिये वा संयम पालनेके लिये प्रमत्तगुणस्थानवर्ती मुनियोंके जो प्रगट होता है, उसे आहारकशरीर कहते हैं । जिससे शरीरमें तेज होता है, उसे तैजसशरीर कहते हैं। और ज्ञानावरणादि आठ कर्मोंके समूहको कार्मणशरीर कहते हैं ।। ३६ ॥ परं परं सूक्ष्मम् ॥ ३७॥ अर्थ-(परं पर) औदारिकसे अगले अगले शरीर (सूक्ष्मम् ) सूक्ष्म हैं अर्थात् औ- दारिकसे वैक्रियिक सूक्ष्म है, वैक्रियिकसे आहारक सूक्ष्म है, आहारकसे तैजस और तेजससे कार्मणशरीर सूक्ष्म है ।। ३७ ॥ किन्तु- प्रदेशतोऽसंख्येयगुणं प्राक्तैजसात् ॥ ३८ ॥ Urv १८ CHURU अर्थ-(प्रदेशतः) प्रदेशोंकी अपेक्षा (तैजसात् प्राक्) तैजसशरीरसे पहिले २ के शरीर (असंख्येयगुण) असंख्यात गुणे . हैं अर्थात्-औदारिकशरीरमें जितने परमाणु हैं उनसे असंख्यात गुणे परमाणु वैक्रियिकशरीरमें हैं और वैक्रियिकशरीरसे असंख्यात गुणे परमाणु आहारकशरीरमें हैं.॥ ३८ ॥ अनन्तगुणे परे ॥ ३९ ॥ अर्थ-(परे) शेषके दो शरीर अर्थात् तैजस और कार्मणशरीर ( अनन्तगुणे) अन- न्तगुणे परमाणुवाले हैं अर्थात् आहारकशरीरसे अनन्तगुणे परमाणु तैजसशरीरमें हैं और तैजससे अनन्तगुणे परमाणु कार्मणशरीरमें हैं ॥ ३९ ॥ : अप्रतीपाते ॥॥४०॥ अर्थ-और ये दोनों तैजस और कार्मणशरीर अप्रतीपात हैं । अर्थात् अन्य मूर्तिमान पुद्गलादिकोंसे रुकते नही हैं । जैसे अभिके परमाणु सूक्ष्मरूप परिणमन होनेके कारण लोहके पिंडमें प्रवेश कर जाते हैं, उसी प्रकार तैजस और कार्मणशरीर भी वज्रमय पटलोंसे नहिं रुकते हैं और न अन्य किसी पदार्थको रोक सकते हैं ॥ ४० ॥ १ यहां प्रदेश शब्दका अर्थ परमाणु है।
. मो. अ. १९. अनादिसम्बन्धे च ॥४१॥ अर्थ-ये दोनों शरीर आत्मासे (अनादिसम्बन्धे) अनादि कालसे संबंध रखनेवाले हैं अर्थात् संसारी जीवोंके ये दोनों शरीर नित्य ही साथ रहते हैं (च) और सादि सम्ब. न्धवाले भी हैं ॥ ४१॥ सर्वस्य ॥४३॥ अर्थ-ये दोनों शरीर समस्त संसारी जीवोंके होते हैं ॥ १२ ॥ तदादीनि भाज्यानि युगपदेकस्साचतुर्व्यः ॥ ४२ ॥ अर्थ-(तदादीनि) इन दोनों शरीरोंको आदि लेकर (भाज्यानि) विभाजित किये हुए (एकस्य ) एक जीवके (युगपत् ) एक साथ (आ चतुर्यः) चोर शरीरतक होते हैं । अर्थात् दो शरीर हो तो तैजस और कार्मण होते हैं। तीन हों तो औदारिक तैजस और कार्मण होते हैं अथवा वैक्रियक तैजस और कार्मण ये तीन भी होते हैं परन्तु ये देव -dma १९ १ जिसके वैक्रियिक होता है उसके माहारक नहीं होता और जिसके आहारक होता है उसके वैक्रियिक नहीं होता है । इराकारण एकसमयमें पांच शरीर होना असंभव है । एक शरीरवाला भी कोई जीव नहीं हैं। UPSC
UPL
.
तथा नरक गतिमें ही होते हैं । यदि किसीके एकसाथ चार शरीर हों, तो औदारिक आहा-
रक तैजस और कार्मण होते हैं ॥ ४३ ॥
निरुपभोगमन्त्यम् ॥४४॥
अर्थ-(अन्त्यम् ) अंतका कार्मणशरीर (निरुपभोगम् ) उपभोगरहित अर्थात् इन्द्रि-
योद्वारा शब्दादिक विषयोंके उपभोगसे रहित है ॥४४॥
गर्भसम्मूर्छनजमाद्यम् ॥ ४५॥
अर्थ (गर्भसम्मूछेनजम् ) जो गर्भजन्म और सम्मूर्च्छनजन्मसे उत्पन्न होता है, सो
(आय) आदिका औदारिक शरीर है ॥ ४५ ॥
औपपादिकं वैक्रियिकम् ॥ ४६॥
अर्थ (औपपादिकम् ) जो उपपाद जन्मसे होता है वह (वैक्रियिकम् ) वैक्रियिक
शरीर है ॥ ४६॥
लब्धिप्रत्ययं च ॥४७॥
अर्थ-वैक्रियिक शरीर (लब्धिप्रत्ययं च) लब्धिसे अर्थात् तपोविशेषरूपऋद्धिप्राप्ति-
के निमित्तसे भी होता है ।। ४७ ।।
तैज़समपि ॥४८॥
मो. २ अर्थ-(अपि) तथा (तैजसम् ) तैजस शरीर भी लब्धिप्रत्यय अर्थात् ऋद्धिप्राप्त होता है ॥ ४८॥ शुभं विशुद्धमव्याघाति चाहारकं प्रमत्तसंयतस्यैव ॥ ४९ ।। अर्थ-(आहारक) आहारक शरीर ( शुभं) शुभ है अर्थात् शुभ कार्यको पैदा करता है (विशुद्धं ) विशुद्ध है अर्थात् विशुद्ध कर्मका कार्य है (च) और (अव्याधाति) व्याघातरहित है तथा (प्रमत्तसंयतस्य एव) प्रमत्तसंयत मुनिके ही होता है ॥ १९॥ नारकसम्मूछिनो नपुंसकानि ॥ ५० ॥ अर्थ-(नारकसम्मूछिनः) नारकी और सम्मूर्च्छन जीव (नपुंसकानि) नपुंसक होते हैं ॥ ५० ॥ किन्तु न देवाः ॥५१॥ अर्थ-(देवाः)चार प्रकारके देव नपुंसक (न) नहीं हैं अर्थात् देवोंमें स्त्रीवेद और पुरुपवेद दो ही होते हैं नपुंसकवेद नहीं होता है ॥ ५१ ॥ शेपास्त्रिवेदाः ॥५२॥ १ तेजस शरीर दो प्रकारका है-मिगतेजरा और अभिनतेजस । इनमेंसे यहां गिनतेजरा ही ग्रहण करना चाहिये । अमिनजरा संसारीमात्रके होता है । २ अढाइंद्वीपमें ही। २० 'अर्थ-(शेषाः) नारकी देव और सम्मूर्छनोंके अतिरिक्त गर्भज तिर्यंच और मनुष्य (त्रिवेदाः) तीनों वेदवाले अर्थात् पुरुष स्त्री और नपुंसक होते हैं ।। ५२ ।। औपपादिकचरमोत्तमदेहाऽसंख्येयवर्षायुपोऽनपवायुषः ।। ५३ ॥ अर्थ-(औपपादिकचरमोत्तमदेहाऽसंख्येयवर्षायुपः) देव, नारकी, चरमोत्तमदेह और असंख्यातवर्पकी आयुवाले भोगभूमिके जीव (अनपवण्युपः) परिपूर्ण आयुवाले होते हैं। अर्थात् किसी भी कारणसे न्यून आयु होकर उनकी अकालमृत्यु नहीं होती है ॥५३॥ इति तत्त्वार्थाधिगमे मोक्षशास्त्रे द्वितीयोऽध्यायः ॥ २॥ NROUPRONUOURam १ अन्तकी उत्कृष्ट देह धारण करनेवाले अर्थात् उसी भवमें मोक्षजानेवाले तीर्थंकरादिक । २ अपवर्त्य-ध- टनेयोग्यका है । नहीं घटने योग्य है आयु जिनका सो अनपवायुप है । URI मो. अथ तृतीयोध्यायः प्रारभ्यते। ३ २१ नि RUPAL जीवपदार्थक कथनमें उसके निजतत्त्व बतलाये जा चुके । अब उसके रहनेके स्थान जो तीन लोक हैं उनमेंसे पहिले अधोलोकका वर्णन करते हैं;- रत्नशर्करावालुकापङ्कधूमतमोमहातमप्रभा भूमयो घनाम्बुवाताकाशप्रतिष्ठाः सप्ताऽधोऽधः ॥१॥ अर्थ-(रत्नशर्करावालकापङ्कधूमतमोमहातमाप्रभाः) रत्नप्रमा, शर्कराप्रमा, बालकाप्रभा, पङ्कप्रभा, धूमप्रभा, तमःप्रभा और महातमःप्रभा ये (सप्त) सात (भूमयः) भूमियें हैं और (अधोऽधः) क्रमसे एकके नीचे दूसरी,दूसरीके नीचे तीसरी इसप्रकार नीचे २(घनाम्बुवाताका- शप्रतिष्ठा) तीन वातवलय और आकाशके आश्रय स्थिर हैं अर्थात् समस्त भूमिये घनोदधि १ इस सूत्रमें जो 'वात' शब्द आया है, वह व्याकरणके एक नियमके अनुसार समस्यन्त है । दो 'वात' शब्दोंका समास होकर उनमेंसे एकका लोप हो गया है। " वातश्च वातश्च वातौ"। इससे घनाम्बुवात (घनोदधिवात) और धनवात समझना और 'धन' शब्द सामान्य है, इसलिये उसका विशेष तनुवात भी समझना । इस तरह 'चनाम्बुवात' पदसे घनोदधिवात धनवात और तनुवात ये तीन वातवलय समझना। २१ . वातवलयके आधार हैं, घनोदधिवातवलय धनवातवलयके आधार है, धनवातवलय तनुवातवलयके आधार है और तनुवातवलय आकाशके आधार है और आकाश अपने ही आधार है ॥१॥ विशेष-रत्नप्रभा नामकी पृथिवी एक लाख अस्सी हजार योजनकी मोटी है। उसके तीन विभाग हैं। उनमेंसे १६००० योजन मोटा ऊपरका खरभाग है। उसमें चित्रा वज्रा वैडूर्य इत्यादि एक एक हजार योजनकी मोटी १६ पृथिवी हैं। इनमेंसे ऊपर नीचेकी एक एक हजार योज- नकी दो पृथिवी छोड़कर बीचकी १४ हजार योजन मोटी और एकराजू लंबी चौड़ी पृथिवीमें किनर किंपुरुष महोरग गंधर्व यक्ष भूत और पिशाच इन सात प्रकारके व्यंतर देवोंके तथा नागकु- मार विद्युत्कुमार सुपर्णकुमार अंमिकुंमार वातकुमार स्तनितकुमार उदधिकुमार द्वीपकुमार दिकुमार इन नव प्रकारके भवनवासी देवोंके निवासस्थान हैं। खरभागके नीचे चौरासी हजार योजन मोटा पंकभाग है। उसमें असुरकुमार और राक्षसोंके निवासस्थान हैं. और पंकभागके नीचे ८०००० अस्सी हजार योजन मोटा अंबहुलभाग है, उसमें प्रथम नरक है । उसके नीचे एक एक राजूका अन्तराल छोड़कर शर्कराप्रभादि ६ पृथिवी हैं। उन सबमें ही नारकि- योंके रहनेके बिल अर्थात् निवासस्थान हैं। १ रत्नप्रभादिक पृथिवियोंके नाम गुणों के अनुसार हैं स्ढी नहीं हैं । रूढ़ी नाम धम्मा, चंशा, मेघा, अंजना, अरिष्टा, मघवी और माधवी है।.२ यहां एक योजन २००० कोशका समझना चाहिये। and- ORN मो. २२ ३ वे बिल कौन २ सी पृथिवीमें कितने २ हैं, यह बतलानेके लिये सूत्रकार कहते हैं, तासु त्रिंशत्पञ्चविंशतिपञ्चदशदशत्रिपञ्चोनैक- नरकशतसहस्राणि पञ्च चैव यथाक्रमम् ॥२॥ अर्थ-( तासु) उन रत्नप्रभादि सातों पृथिवियोंमें ( यथाक्रम) क्रमसे (त्रिंशत्पश्च- विंशतिपञ्चदशदशत्रिपञ्चोनैकनरकशतसहस्राणि) तीसलाख, पच्चीसलाख, पन्द्रहलाख, देश लाख, तीनलाख, पांचकम एकलाख (च) और (पञ्च एव) पांच ही नरक हैं । अर्थात् प्रथम पृथिवीमें तीसलाख, दूसरी पृथिवीमें पच्चीस लाख, तीसरीमें पंद्रह लाख, चौथी में दश लाख, पांचवीमें तीन लाख, छट्ठीमें पांच कम एक लाख और सातवीमें पांच ही नरक हैं॥ये नरक (विले ) गोल त्रिकोण चौकोण इत्यादि अनेक प्रकारके हैं और उनमें कई एक संख्यात योजनके और कई एक असंख्यात योजनके लंबे चौड़े हैं। बिलोंके अंतरालमें चारों ओर प्रत्येक विलके पृथिवीस्कंध हैं। जैसे दोलको पृथिवीमें गाड़ देनेसे चारों तरफ पृथिवी रहती है और भीतर पोल रहती है, उसीप्रकारसे पृथिवीस्कन्धोंके वीचमें ढोलके भीतरकी पोलके समान बिले होते हैं ॥ २॥ नारकानित्यशुभतरलेश्यापरिणामदेहवेदनाविक्रियाः ॥ ३ ॥ २२ अर्थ-(नारकाः) नारकी जीव (नित्याशुभतरलेश्यापरिणामदेहवेदनाविक्रियाः) सदा ही अशुभतर लेश्यावाले, अशुभतर परिणामवाले, अशुभतर देहके धारक, अशुभतर वेदनावाले और अशुभतर विक्रिया करनेवाले होते हैं। निरन्तर अशुभ कर्मका.उदय रहनेके कारण उनके परिणामादि सदा अशुभ ही रहते हैं ॥ ३ ॥ परस्परोदीरितदुःखाः ॥ ४ ॥ अर्थ-नारकी जीव परस्पर एक दूसरेको दुःख उत्पन्न करते रहते हैं । अर्थात् कुत्तोंकी तरह निरंतर परस्पर लड़ते झगड़ते रहते हैं ॥ ४ ॥ संक्लिष्टाऽसुरोदीरितदुःखाश्च प्राक्चतुः ॥ ५॥ अर्थ-(च) तथा वे नारकी जीव (माकचतुर्थ्या) चौथे नरकसे पहिले अर्थात् पहिले दूसरे तीसरे नरक पर्यन्त (संक्लिष्टासुरोदीरितदुःखाः) अंबावरीप जातिके संक्लिष्ट परिणामवाले असुरोंके द्वारा भी दुःखी किये जाते हैं । अर्थात् जिसप्रकार इस लोकमें अनेक अज्ञानी पुरुष मेंढ़े भैंसे हाथियोंको मद्य पिलाकर परस्पर.लड़ाते है और उनकी हारजीतसे १ नरान् जीवान् काययतीति नरकस्तत्रभवाः नारकाः । जिसके स्पर्श करनेसे जीव रोने चिल्लाने लग जाते हैं वे नरक हैं । और उनमें जो पैदा होते हैं, सो नारक कहाते हैं । २ उदीरित-किया हुआ। ३ 'उदीरित- दुःखा दिया गया है, दुःख जिनको ऐसे । A मो. S २३ आनंद मानते हैं वा तमाशा देखते हैं, उसीप्रकार तीसरे नरक तकके नारकी जीवोंको, दुष्ट कौतुकी देव अवधिज्ञानसे उनके पूर्व वैरोंका सरण करा कराके परस्पर लड़ाते तथा दुःखित करते रहते हैं और आप तमाशा देखते हैं ॥५॥ तेष्वेकत्रिससदशसप्तदशद्वाविंशतित्रयस्त्रिंश- त्सागरोपमा सत्त्वानां परा स्थितिः ॥६॥ अर्थ-(तेषु) उन नरकोंमें रहनेवाले (सवानां) नारकी जीवोंकी (परा) उत्कृष्ट बड़ीसे बड़ी ( स्थितिः) आयु (. एकत्रिसप्तदशसप्तदशद्वाविंशतित्रयस्त्रिंशत्सागरोपमा ) पहिले नरकमें एक सागरकी, दूसरे नरकमें तीन सागरकी, तीसरे नरकमें सात सागरकी, चौथे नरकम दश सागरकी, पांचवेंमें सत्तरह सागरकी, छ8में बाईस सागरकी और सातवें. नरकमें तेतीससागरकी है ॥ ६ ॥ अब मध्यलोकका वर्णन करते हैं.- जम्बूद्वीपलवणोदादयः शुभनामानो द्वीपसमुद्राः ॥७॥ अर्थ- इस चित्रा पृथिवीवर (जम्बूद्वीपलवणोदादयः) जम्बूद्वीपादिक तथा लवण- समुद्रादिक ( शुभनामानः) उत्तम २ नामवाले (द्वीपसमुद्रा) द्वीप और समुद्र हैं। विशेष-सबके बीच जम्बूद्वीप है, उसके चारों तरफ लवणसमुद्र है, उसके चारों तरफ २३ boor -- AURUNG धातुकीखंड द्वीप है, उसके चारों तरफ कालोदधि समुद्र.है, उस (कालोदधि समुद्र) के चारों ओर पुष्करवर द्वीप है और उसके चारों ओर पुष्करवर समुद्र है। इसीप्रकार एक दूसरेको बेढ़े हुए अन्तके खयंभूरमणसमुद्रपर्यन्त असंख्यात द्वीप और समुद्र हैं ॥ ७॥ द्विदिविष्कम्भाः पूर्वपूर्वपरिक्षेपिणो वलयाकृतयः ॥८॥ अर्थ-प्रत्येक द्वीपसमुद्र (बलयाकृतयः) गोल चूड़ीके आकार (पूर्वपूर्वपरिक्षेपिणः) पहिले २ द्वीप तथा समुद्रको घेरे हुए. (द्विििवष्कंभा:) एक दूसरेसे दुगुणे २ विस्तारवाले हैं। अर्थात् जंबूद्वीपसे दुगुणी चौड़ाईका लवणसमुद्र है, लवणसमुद्रसे द्विगुणा धातुकी द्वीप है, धातुकी द्वीपसे द्विगुण कालोदधि समुद्र है, और कालोदधि समुद्रसे द्विगुणा. पुण्करवरद्वीप है। इसी प्रकार अगले २ द्वीपसमुद्र दुगुणे २ हैं ॥ ८॥ तन्मध्ये मेरुनामिवृत्तो योजनशतसहस्रविष्कम्भों जम्बूद्वीपः ॥९॥ अर्थ (तन्मध्ये ) उन सब द्वीप समुद्रोंके बीचमें (मेरुनाभिः) सुमेरु पर्वत है नामि जिसकी ऐंसा और (वृत्तः.) गोलाकार तथा ( योजनशतसहस्रविष्कम्भः) एक लाख योजन लंबा चौड़ा (जम्बूद्वीपः) जम्बूद्वीप है ॥ जंबूद्वीपकी परिधि तीन लाख १ सबके बीच में सुमेरु पर्वत है, इसलिये उसको नाभिकी उपमा दी गई है। OM H मो. UUUN ३ २४ सोलह हजार दोसौ सत्ताईस योजन, तीन कोश, एकसौ अठाईस धनुप, तेरह अंगुलसे कुछ अधिक है। यहां भी दो हजार कोशका योजन समझना चाहिये ॥ ९॥ भरतहैमवतहरिविदेहरम्यकहरण्यवतैरावतवाः क्षेत्राणि ॥ १०॥ अर्थ-इस जम्बूद्वीपमें ( भरतहैमवतहरिविदेहरम्यकहैरण्यवतैरावतवर्गः ) भरत, हैमवत, हरि, विदेह, रम्यक, हैरण्यवत और ऐरावत ये सात (क्षेत्राणि) क्षेत्र हैं ॥ १०॥ तद्विभाजिनः पूर्वापरायता हिमवन्महाहिमवन्निपि- धनीलरुक्मिशिखरिणो वर्पधरपर्वताः ॥ ११ ॥ अर्थ-(तद्विभाजिनः) उक्त सातौ क्षेत्रोंको विभाग करनेवाले (पूर्वापरायताः) पूर्वसे पश्चिम तक लंबे (हिमवन्महाहिमवनिपिधनीलरुक्मिशिखरिणः) हिमवान् महा- हिमवान् , निपिध, नील, रुक्मि और शिखरी ये छह (वर्पधरपर्वता) वर्पधरनामके पर्वत हैं। इस भरतक्षेत्र और हैमवत क्षेत्रके बीचमै हिमवान् पर्वत है, जिसको हिमाचल भी कहते हैं। इसीप्रकार सातों क्षेत्रोंके बीच छह पर्वत हैं, जो पकुलाचल कहलाते हैं ।। ११ ।। हेमार्जुनतपनीयवैडूर्यरजतहेममयाः ॥ १२ ॥ १ इस सूत्र के अन्तर्ग जो 'ग' शब्द है, उराफे अर्थ दो हो सकते हैं, एकसे गह मालूम होता है कि, वे २४ ha . अर्थ-हिमवान् पर्वतः सुवर्णमय अर्थात् पीतवर्णका है, महाहिमवान् सफेद चांदीके समान रंगवाला है, . तीसरा निषिधपर्वत ताये सुवर्णके समान है, चौथा नीलपर्वत वैडूर्यमय अर्थात् मयूरके कंठके समान नीले रंगका है, पांचवां रुक्मिपर्वत चांदी सदृश शुक्लवर्ण है और छट्ठा शिखरीपर्वत सोनेके समान पीत वर्णका है ॥ १२ ॥ मणिविचित्रपार्था उपरि मूले च तुल्यविस्ताराः ॥ १३ ॥ अर्थ- (मणिविचित्रपार्थाः) जिनके पार्धमाग अर्थात् पसवाड़े नानाप्रकारके रंगवाले और प्रभावाले मणियोंसे विचित्र हो रहे हैं और ( उपरि मूले) ऊपर, नीचे (च) तथा मध्यमें जो (तुल्यविस्ताराः) एकसे चौड़े दीवालके समान हैं, ऐसे वे छहों पर्वत हैं ॥१३॥ पद्ममहापद्मतिगिन्छकेशरिमहापुण्डरीकपुण्डरी- का हृदास्तेषामुपरि ॥१४॥ अर्थ-(तेषाम् ) उन पर्वतोंके ( उपरि) ऊपर (पद्ममहापअतिगिच्छकेशरिमहा- पुण्डरीकपुण्डरीकाः) पद्म महापद्म तिगिंछ केशरी महापुंडरीक और पुंडरीक ये छह (डूदा) हूद अर्थात् सरोवर हैं ।। भावार्थ-हिमवन्पर्वतपर पद्म नामका हद है, महाहिमवनपर महापद्म पर्वत, सोने चांदी आदिके हैं और दूसरेसे यह कि वे सोने चांदी आदिके रंगोंके समान रंगवाले हैं। इन दोनों अर्थोमसे हमारी समझमें दूसरा अर्थ लेना चाहिये। सर्वार्थसिद्धि टीकासे भी ऐसा ही अर्थ प्रगट होता हैं äriris मो. २५ हैं, निषिधपर तिगिंछ है, नीलपर केशरी है, रुक्मीपर महापुंडरीक है और शिखरीपर्वतपर पुंड- रीक हद है ॥ १४॥ प्रथमो योज योजनसहलायामस्तदर्द्धविष्कम्भो हृदः ॥ १५॥ अर्थ-इनमेंसे (प्रथमः) पहिला (हृदः) तालाब (योजनसहसायाम.) पूर्वसे पश्चिम तक एक हजार योजन लंबा है और (तदर्द्धविष्कम्भः) उससे आधा पांचसौ योजन उत्तर दक्षिण तक चौड़ा है ॥ १५॥ दशयोजनावगाहः ॥ १६ ॥ अर्थ-इस पद्महदकी गहराई दश योजनकी है ॥ १६ ॥ तन्मध्ये योजनं पुष्करम् ॥ १७ ॥ अर्थ-(तन्मध्ये ) उसके बीचमें ( योजनं ) एक योजनका लंबा चौड़ा (पुष्करम् ) कमल है ॥ १७॥ तद्विगुणद्विगुणा हृदाः पुष्कराणि च ॥ १८ ॥ अर्थ-( तद्विगुणद्विगुणाः ) उस पहिले तालाब और कमलसे दुगुने दुगुने लंबे चौड़े अगले अगले (हृदाः) तालाब (च) और (पुष्कराणि) कमल हैं ॥ भावार्थ-पग्रह- २५ दसे दूना महापद्म हद है और महापद्मसे दुगुणा तिगिंछ हद है । इन तीनों हदोंके बराबर ही उत्तर तरफके तीनों पर्वतोंके तीनों ह्रद हैं तथा तीनों हृदोंके कमलोंके बराबर कमल हैं ॥१८॥ तन्निवासिन्यो देव्यः श्रीहीधृतिकीर्तिबुद्धिलक्ष्म्यः पल्योपमस्थितयः ससामानिकपरिषत्काः ॥ १९॥ अर्थ-(तनिवासिन्यः) उक्त छहों कमलोंमें रहनेवाली (श्रीहीधृतिकीर्तिबुद्धिल- क्ष्म्यः) श्री ही धृति कीर्ति बुद्धि और लक्ष्मी नामकी छह (देव्यः) देवियें हैं जो कि (पल्यो- पमस्थितयः) एक पल्यकी बराबर आयुवाली और (ससामानिकपरिपत्कार.) सामानिक परिषत्क जातिक देवोंसहित निवास करती हैं । भावार्थ- सरोवरके ये ऊपर कहे हुए कमल रत्नोंके बने हुए हैं और उनकी कणिकाओंमें अतिशय उज्वल महल बने हुए हैं, जिनमें ये श्री ही आदि छह देवियां रहती हैं। सरोवरोंमें चारों ओर इन कमलोंकी आधी ऊंचाईके और भी अनेक रत्नमयी कमल हैं जिनमें रनमयी महल हैं और उनमें देवियोंके. परिवारके सामानिक और परिषत्क जातिके देव रहते हैं ॥ १९ ॥ गङ्गासिन्धुरोहिद्रोहितासाहरिद्धरिकान्तासीतासीतोदानारी- १ समाने भवः-जो एकसे ऐश्वर्यके धारणकरनेवाले हों, वे सामानिक हैं। परिषदि प्रधानाः-समामें जो प्रधान हों, वे परिषत्क अर्थात् सभासद कहाते हैं।
मो. २६ नरकान्तासुवर्णरूप्यकूलारक्तारक्तोदाः सरितस्तन्मध्यगाः ॥ २०॥ अर्थ- (तन्मध्यगाः) उक्त सातों क्षेत्रोंमें बहनेवाली (गङ्गासिन्धुरोहिद्रोहितास्या- हरिद्धरिकान्तासीतासीतोदानारीनरकान्तासुवर्णरूप्यकूलारक्तारक्तोदाः) गंगा, सिंधु, रोहित्, रोहितास्या, हरित् , हरिकान्ता, सीता, सीतोदा, नारी, नरकान्ता, सुवर्णकूला, रूप्यकूला, रक्ता और रक्तोदा ये चौदह (सरितः) नदियें हैं जो उक्त छहों सरोवरोंमेंसे निकली हुई हैं। इनमेंसे पहिले पद्महद और छढे पुण्डरीक हृदमेंसे तीन तीन अर्थात् आदि अंतकी छह नदिये निकलीं हैं और बीचके चार ह्दोंसे दो दो नदियें निकली हैं । सो भरतक्षेत्रमें गंगा और सिंधु, हैमवतमें रोहित् और रोहितास्या, हरिक्षेत्रमें हरित और हरिकांता,विदेहक्षेत्रमें सीता और सीतोदा, रम्यकक्षेत्रमें नारी और नरकांता, हैरण्यवतक्षेत्रमें सुवर्णकूला और रूप्यकूला, और ऐरावत क्षेत्रमं रक्ता और रक्तोदा इसप्रकार दो दो नदिये एक एक क्षेत्रमें बहती हैं ॥ २०॥ द्वयोर्द्वयोः पूर्वाः पूर्वगाः ॥ २१ ॥ अर्थ-एक एक क्षेत्रमें जो दो दो नदियें बहती हैं, उन (द्वयोः द्वयोः) दो दो नदि- योंके ७ युगलोंमेंसे (पूर्वाः) पहिली पहिली नदियां (पूर्वगाः) पूर्व समुद्रमें जानेवाली हैं । भावार्थ-ांगा रोहित् हरित् सीता नारी सुवर्णकूला और रक्ता ये ७ नदियें पूर्वके समुद्रमें जाकर मिलती हैं ॥ २१॥ A २६ Worry शेषास्त्वपरगाः॥ २२ ॥ अर्थ-(तु)और ( शेपाः). शेषकी.सात नदियें अर्थात् सिंधु, रोहितास्था, हरिकान्ता, सीतोदा, नरकान्ता, रूप्यकूला और रक्तोदा ये ७ नदियें ( अपरगाः) पश्चिमके समुद्रमें जाकर मिलती हैं ॥ २२॥ चतुर्दशनदीसहस्रपरिवृता गङ्गासिन्ध्वादयो नद्यः ॥ २३ ॥ अर्थ-(गङ्गासिन्ध्वादयः) गंगा सिंधु आदिक (नया) नदियें (चतुर्दशनदीसह- सपरिवृताः) चौदह चौदह हजार नदियोंके परिवार सहित हैं । अर्थात् गंगामें छोटी २ चौदह हजार नदियें आकर मिली हैं। इसीप्रकार सिन्धुमें भी चौदह हजार नदियें मिली हैं। रोहित् रोहितास्यांकी परिवारनदियें अहाईस २ हजार हैं ।. हरित और हरिकान्ताकी छप्पन्न २ हजार हैं। सीता और सीतोदाकी एक लाख बारह हजार हैं। और इससे उत्तरके तीन क्षेत्रोंकी क्रमसे दक्षिणकें तीन क्षेत्रोंके समान परिवारनदिये हैं-अर्थात् नारी नरकान्ता- १ सत्र में 'नदी' शब्दका प्रयोग दो वार आनेसे १८ वें सूत्रके 'द्विगुणद्विगुणा' पदकी अनुवृत्ति सम- झना चाहिये और 'उत्तरा दक्षिणतुल्या' सूत्रके अनुसार उत्तर दक्षिणकी रवना एकसी समझना चाहिये । इसीसे गंगासिन्धुसे रोहित रोहितास्या आदिकी दूनी २ सहायक नदियां कही हैं। AMAVAN मो. २७ . की · छप्पन्न २. हजार, सुवर्णकूला और रूप्यकुलाकी अट्ठाईस २ हजार और रक्ता रक्तोदाकी चौदह २ हजार पारिवारिक नदिये हैं ॥ २३ ॥ भरतः पडूविंशतिपञ्चयोजनशतविस्तारः पटू चैकोनविंशतिभागा योजनस ॥ २४ ॥ अर्थ-(भरतः) भरतक्षेत्र (पड़विंशतिपञ्चयोजनशतविस्तार ) दक्षिण उत्तरमें पांचसौ छन्वीस योजन (च) और (योजनस्य) एक योजनके ( एकोनविंशतिभागाः) उन्नीसवें भागमेंसे (पद) छह भाग अर्थात् रयोजन अधिक विस्तारवाला है। कुल विस्तार ५२६० योजन है ।। २४ ॥ तद्विगुणद्विगुणविस्तारा वर्षधरवर्पा विदेहान्ताः ॥ २५ ॥ अर्थ--(विदेहान्ताः) विदेहक्षेत्र तकके (वर्षधरवः) पर्वत और क्षेत्र (तद्विगुणद्वि- गुणविस्तारा) उस भरतक्षेत्रसे दुगुणे. दुगणे विस्तारवाले हैं ॥ २५॥ उत्तरा दक्षिणतुल्याः ॥ २६ ॥ अर्थ-(उत्तराः) विदेह क्षेत्रसे उत्तरके तीन पर्वत और तीन क्षेत्र ( दक्षिणतुल्याः) दक्षिणके पर्वतों और क्षेत्रोंके बराबर विस्तारवाले हैं ।। २६ ।। UPER २७ भरतैरावतयोद्धि हासौ पट्समयाभ्यासु- त्सर्पिण्यवसर्पिणीभ्याम् ॥ २७॥ अर्थ-(उत्सर्पिण्यवसर्पिणीभ्यां) उत्सर्पिणी और अवसर्पिणीरूप (पट्समयाभ्याम्) छह कालोसे (भरतैरावतयोः) भरत और ऐरावत क्षेत्रोंके मनुष्योंकी आयु काय भोगोपभोग सम्पदा वीर्य बुद्धयादिकका (वृद्धिहासौ) बढ़ना और घटना होता है। भावार्थ-उत्सर्पिणीके छह कालोंमें वृद्धि और अवसर्पिणीके छह कालोमें दिनोदिन घटी होती जाती है । अवसर्पि- णीकालके १ सुखमसुखमा, २ सुखमा, ३ सुखमदुःखमा, ४ दुःखमासुखमा, ५ दुःखमा, और ६ अतिदुःखमा ऐसे भाग हैं । इसीप्रकार उत्सर्पिणीके भी १ अतिदुःखमा, २ दुःखमा, ३ दुःखमसुखमा, ४ सुखमदुःखमा, ५ सुखमा, और ६ सुखमसुखमा ये छह भाग हैं। अवसर्पिणीका काल दश कोड़ाकोड़ी सागरका है और उत्सर्पिणीका भी दश कोडाकोड़ी सागरका है । दोनों कालोंको मिलाकर बीस कोड़ाकोड़ी सागरका एक कल्पकाल होता है पहिला सुखमसुखमा काल चार कोड़ाकोड़ी सागरका होता है, दूसरा सुखमा तीन कोड़ाकोड़ी सागरका, तीसरा सुखमदुःखमा दो कोड़ाकोड़ी सागरका, चौथा दुःखमसु- बियालीस हजार वर्ष कम एक कोड़ाकोड़ी सागरका, पांचवा दुःखमा १.सुषमं और दुषम शब्द भी सुखमदुःखमके स्थान प्रायः व्यवहृत किये गये हैं। खमा AUGUGUA E मो. २८. ३ इक्कीस हजार वर्षका और छट्ठा अतिदुःखमा भी इक्कीस हजार वर्षका होता है । इनमेंसे पहिले तीन कालोंमें उत्तम मध्यम जघन्य भोगभूमिकीसी रचना व रीति होती है और शेषके तीन कालोंमें कर्मभूमिकीसी होती है । अवसर्पिणीके इन कालोंमें क्रमसे आयुकायादि घटते रहते हैं ॥ २७ ॥ ताभ्यामपरा भूमयोऽवस्थिताः ॥२८॥ अर्थ-(ताभ्यां ) उन भरत और ऐरावतके सिवाय (अपराः ) अन्य पांच(भूमय:) पृथिवी ( अवस्थिताः) ज्योंकी त्यों नित्य हैं अर्थात् इन क्षेत्रोमें वृद्धि हास नहिं होता है ॥ २८॥ एकद्वित्रिपल्योपमस्थितयो हैमवतकहारिवर्षकदैवकुरवकाः ॥ २९॥. अर्थ: (हैमवतकहारिवर्पकदैवकुरवकाः) हिमवान् क्षेत्रके, हरि क्षेत्रके, और देवकुरु- भोगभूमिके मनुष्य तिर्यञ्च (एकद्वित्रिपल्योपमस्थितयः) क्रमसे एक दो तीन पल्यकी आयुवाले होते हैं ॥ २९ ॥ २८ (१) यहांपर जो "भूमयः" पद है, उससे यह भी जाना जाता है कि, भरत ऐरावत क्षेत्रकी भूमि भी घटती बढ़ती रहती है। ऐसा राजवार्तिकटीकामें लिखा है।
तथोत्तराः॥ ३०॥ अर्थ-(तथा) जैसे दक्षिणके क्षत्रोंकी रचना है, उसीप्रकार (उत्तरा), उत्तरके क्षेत्रोंकी है ।। अर्थात् हैरण्यवतक्षेत्रकी रचना हैमवतके तुल्य है, रम्यकक्षेत्रकी रचना हरिक्षे- त्रके तुल्य है और उत्तरकुरुकी रचना देवकुरुके समान है । इसप्रकार उत्तम मध्यम जघन्यरूप इन तीनों भोगभूमियोंके दो दो क्षेत्र हैं। पांच मेरुसंबंधी तीस भोगभूमियें हैं ॥ ३०॥ विदेहेषु संख्येयकालाः ॥ ३१ ॥ अर्थ-(विदेहेषु) पांचमेरुसम्बन्धी पांचों विदेहक्षेत्रोंमें (संख्येयकालाः) संख्यांत वर्षकी आयुवाले मनुष्य होते हैं ॥ ३१॥ भरतस्य विष्कम्भो जम्बूद्वीपस्य नवतिशतभागः ॥ ३२ ॥ अर्थ (जम्बूद्वीपस्य) एक लाख़ योजन विस्तारवाले जम्बूद्वीपका (नवतिशतभागः) एक सौ नब्बेवाँ भाग १२०( भरतस) भरतक्षेत्रका (विष्कम्भः) विस्तार है ॥ ३२॥ द्विर्धातकीखण्डे ॥३३॥ अर्थ-(धातकीखण्डे ) धातकीखंड नामके दूसरे द्वीपमें (द्विः).भरतादिक्षेत्र दो दो हैं ॥ यह धातकीखंड लवणसमुद्रको बेढ़े हुए चार लाख योजन चौड़ा है ॥ ३३ ॥ AVAUGUAVA मो. For २९ पुष्कराद्धे च ॥ ३४॥ अर्थ (पुष्करा? ) पुष्करद्वीपके आधे भाग (च) भी भरतादिक्षेत्र जम्बूद्वीपसे दूने हैं । यह पुष्करद्वीप १६ लाख योजन चौड़ा है और उसके बीचमें एक हजार बाईस योजन चौड़ा मानुपोत्तर पर्वत है। पहिलेके अर्द्ध भागमें दो दो भरतादि क्षेत्रोंकी रचना है, आगे ऐसी रचना नहीं है ॥ ३४ ॥ प्राङ्मानुपोत्तरान्मनुष्याः ॥ ३५ ॥ अर्थ-(मानुपोत्तरात ) मानुषोत्तर पर्वतसे (प्राक) पहिले अढ़ाई द्वीपमें (मनुष्या.) मनुष्य हैं । मानुपोचर पर्वतसे परेके द्वीपोंमें ऋद्धिधारक मुनि वा विद्याधरोंका [ सिवाय विग्रह गतिवाले मनुष्योंके ] सर्वथा गमन नहीं हैं और न उन द्वीपोंमें मनुष्य होते हैं॥३५॥ आर्या म्लेच्छाश्च ॥ ३६ ॥ अर्थ- मनुष्य (आर्याः) आर्य (च) और (म्लेच्छा.) म्लेच्छ इसतरह दो प्रकारके हैं। जो असि (शस्त्र धारण) मसि (लिखनेका काम) कृषि (खेती) शिल्प वाणिज्य और विद्या ( नाचना, गाना सेवा आदि ) इन छह कर्मोंसे आजीविका करते हैं, उन्हें आर्य और जो त्रसजीवोंकी संकल्पी हिंसा करके अपना उदरनिर्वाह करते हैं, उन्हें म्लेच्छ कहते हैं । आर्य दो प्रकारके हैं, एक ऋद्धिप्राप्तआर्य और दूसरे अनृद्धिप्राप्तआर्य । २९ M AAVAT जिनको बुद्धि, विक्रिया, तप, बल, औषध, रस और अक्षीण ये सात ऋद्धियां प्राप्त होती हैं, वे सात प्रकारके ऋद्धिप्राप्त आर्य होते हैं और जिनको ऋद्धि प्राप्त न हो, उन्हें अनृद्धि- प्राप्तआर्य कहते हैं । अनृद्धिप्राप्त आर्योंके क्षेत्रआर्य जातिआर्य कर्मआर्य चारित्रआर्य और दर्श- नआर्य इसप्रकार पांच भेद हैं । इनके और भी उत्तरोत्तर भेद हैं । म्लेछ भी अन्तरद्वीपज और कर्मभूमिज दो प्रकारके हैं ॥ ३६॥ भरतरावतविदेहाः कर्मभूमयोऽन्यत्र देवकुरुत्तरकुरुभ्यः ।। ३७ ॥ अर्थ-( अन्यत्र देवकुरूत्तरकुरुभ्यः) देवकुरु तथा उत्तरकुरु क्षेत्रको छोड़कर (भरतै- रावतविदेहा) पांच भरत, पांच ऐरावत, और पांच विदेह इसप्रकार पन्द्रह ( कर्मभूमयः) कर्मभूमियां हैं । जिनमें असि मसि कृपि वाणिज्य सेवा और शिल्प इन छह कौकी प्रधानता हो, उनको कर्मभूमि कहते हैं । अथवा जहां सर्वार्थसिद्धि आदिको प्राप्त करानेवाले तथा सातवें नरकको ले जानेवाले शुभ अशुभ कर्मोंका उत्कृष्ट बन्ध होता है तथा तीर्थकरत्वादि उत्तमकर्मप्रकृतियोंका बन्ध होता हो, उनको कर्मभूमि कहते हैं ॥ ३७ ।। नृस्थिती पराऽवरे त्रिपल्योमान्तर्मुहर्ते ॥ ३८ ॥ अर्थ-(पसऽवरे) उत्कृष्ट और जघन्य (नृस्थिती) मनुष्योंकी स्थिति अर्थात् आयु (त्रिपल्योपमान्तर्मुहूर्ने) तीन पल्य और अन्तर्मुहूर्त्तकी है ॥ अर्थात् उत्कृष्ट आयु तीन मो. ४ ३० पल्यकी और जघन्य अन्तर्मुहर्तकी है । मध्यके अनेक भेद हैं । मुहूर्त्तका प्रमाण दो घड़ी वा १८-मिनट है । जो दो घड़ीके भीतर भीतर हो, उसे अन्तर्मुहूर्त कहते हैं ॥ ३८॥ तिर्यग्योनिजानां च ॥३९॥ अर्थ-(च) और (तिर्यग्योनिजाना) तिर्यञ्चोंकी आयु भी उत्कृष्ट तीन पल्य और जघन्य अन्तर्मुहर्तकी है ॥ ३९ ॥ इति तत्त्वार्थाधिगमे मोक्षशास्त्रे तृतीयोऽध्यायः ॥३॥ अथ चतुर्थोऽध्यायः प्रारभ्यते । AUGUA अब क्रमानुसार ऊर्ध्वलोकका वर्णन करते हुए पहले उनमें रहनेवाले देवोंके भेद बतलाते हैं- देवाश्चतुर्णिकायाः ॥१॥ अर्थ-(देवाः) देव (चतुर्णिकायाः) चार प्रकारके हैं । अर्थात् देवोंके चार समूह हैं-भवनवासी, व्यंतर, ज्योतिप्क और वैमानिक ॥ १॥ ३० G है आदितस्त्रिषु पीतान्तलेश्याः ॥२॥ अर्थ-(आदितः) पहिलेके (त्रिषु) तीन प्रकारके देवोंमें अर्थात् भवनवासी व्यंतर और ज्योतिष्कोंमें (पीतान्तलेश्याः) पीतलेश्या तक अर्थात् कृष्ण नील कापोत और पीत ये चार ही. लेश्या हैं ॥ २ ॥ दशाष्टपञ्चद्वादशविकल्पाः कल्पोपपन्नपर्यन्ताः ॥३॥ अर्थ:-( कल्पोपपन्नपर्यन्त ) कल्पवासीपर्यन्तं इन चारों प्रकारके देवोंके क्रमसे (दशाष्टपञ्चद्वादशविकल्पा:) दश, आठ, पांच, और बारह भेद हैं ॥ अर्थात्-दश प्रकारके भवनवासी, आठ प्रकारके व्यन्तर, पांच प्रकारके ज्योतिष्क और बारह 'प्रकारके कल्पोपपन्न वा कल्पवासी देव हैं ॥ ३ ॥ इन्द्रसामानिकत्रायस्त्रिंशपारिषदात्मरक्षलोकपालानीक- प्रकीर्णकाभियोग्यकिल्बिषिकाश्चैकशः ॥ ४ ॥ अर्थ- इन चारों प्रकारके देवोंमें इन्द्र, सामानिक, त्रायस्त्रिंश, पारिषद, आत्मरक्ष, लोकपाल, अनीक, प्रकीर्णक, आभियोग्य, और किल्बिषिक, ऐसे दश भेद होते हैं। अन्य १ ऊर्यलोकके दो भेद हैं-कल्प और कल्पातीत । और जिनमें वैमानिक देव रहते हैं, वे भी स्थान भेदसे दो प्रकारके हैं । इनमेंसे कल्पोंमें पैदा (उपपन्न ) होनेवालोंके ही १२ भेद हैं-कल्पातीतोंके नहीं हैं मो . ४ देवोंमें नहिं पाई जावें, ऐसी अणिमामहिमादि अनेक ऋद्धियोंसे जो परम ऐश्वर्यको प्राप्त हो, सो इन्द्र है। जिनके स्थान आयु वीर्य परिवार भोगादिक तो इन्द्रके ही समान हों परन्तु आज्ञा ऐश्वर्य इन्द्र के समान नहीं हो, और जिनको इन्द्र अपने पिता उपाध्यायके समान बड़े गिने, उन्हें सामानिक देव कहते हैं। मंत्री पुरोहितके समान शिक्षा देनेवाले, पुत्रके समान प्रियपात्र और जिनको देखने वा वार्तालाप करनेसे इन्द्रके मनको आनंद होता है, उनको प्रायस्त्रिंश कहते हैं । जो इन्द्रकी बाह्य अभ्यन्तर और मध्यकी तीनों प्रकारकी सभाओंमें बैठनेयोग्य सभासद हैं, उन्हें पारिपद कहते हैं । इन्द्रकी सभामें जो शस्त्र धारण किये हुए इन्द्रके पीछे खड़े रहते हैं, वे आत्मरक्ष हैं । कोटपालके समान जो होते हैं, उन्हें लोकपाल कहते हैं । जो पियादा, अश्व, वृषभ, रथ, हस्ती, गन्धर्व, और नर्तकीके रूपों- को धारण करते हैं, वे अनीक हैं । प्रजाके समान प्रीतिके करनेवाले देवोंको प्रकीर्णक कहते हैं । जो सेवकोंके समान हाथी घोड़ा बाहन बनकर इन्द्रादिककी सेवा करते हैं, उन्हें आभियोग्य कहते हैं । और दूर रहनेवाले तथा इन्द्रादिक देवोंके सन्मानादिकके अनधिकारी, बाहर खड़े रहनेवाले किल्विपिक हैं । इस प्रकार (एकशः) एक एक प्रकारके देवोंके दश दश भेद हैं ॥ ४॥ - ...
अब जो व्यन्तर और ज्योतिष्कोंमे आठ आठ ही मेद हैं, सो कहते हैं- त्रायस्त्रिंशलोकपालवा व्यन्तरज्योतिष्काः ॥५॥ • अर्थ-('व्यन्तरज्योतिष्काः) व्यन्तरदेव और ज्योतिष्कदेव (त्रायस्त्रिंशलोकपा- लवा:-) त्रायस्त्रिंश और लोकपाल देवोंसे रहित हैं । अर्थात् व्यंतर और ज्योतिष्क देवोंमें ये दो भेद नहीं हैं ॥ ५॥ पूर्वयोन्द्रिाः ॥ ६ ॥ अर्थ-(पूर्वयोः) पहिलेके दो समूहोंमें अर्थात् भवनवासी और व्यन्तरोंके प्रत्येक भेदमें (द्वीन्द्राः) दो दो इन्द्र हैं ॥ भावार्थ-दश प्रकारके भवनवासी देवोंमें चमरवैरोचना- दिक वीस इन्द्र हैं और आठ प्रकारके व्यन्तरोंमें किन्नर किंपुरुषादिक सोलह इन्द्र हैं॥६॥ कायप्रवीचारा आ ऐशानात् ॥ ७॥ अर्थ-(आ ऐशानात् ) ऐशानखर्गपर्यंतके देवोंमें अर्थात् भवनवासी व्यन्तर ज्योति- ष्कोंमें और सौधर्म तथा ऐशान इन दो वर्गोंके देवोंमें (कायप्रवीचाराः) शरीरसे कामसेवन होता है, जैसे कि मनुष्यादिकोंमें ॥ ७ ॥ शेषाः स्पर्शरूपशब्दमन:प्रवीचाराः ॥८॥ अर्थ-(शेषाः) बाकी ऊपरके खर्गोंके देव' (स्पर्शरूपशब्दमन प्रवीचाराः) SA मो . अ. ४ ३२ स्पर्शकरनेसे, रूपदेखनेसे, शब्द सुननेसे, और विचारमात्रकरनेसे प्रवीचार. वा कामसेवन करने वाले हैं । भावार्थ:-सानत्कुमार और माहेन्द्र इन दो खर्गाके देवों तथा देवियोंकी कामवासना परस्पर स्पर्श करनेसे ही शान्त हो जाती है । ब्रह्म ब्रह्मोत्तर लान्तव और कापिष्ट इन चार खौके देवदेवियोंकी कामपीड़ा खाभाविकसुंदर और शृंगारादियुक्त रूपको देखनेमात्रसे ही दूर हो जाती है। शुक्र महाशुक्र सतार और सहस्रार इन चार खर्गोंके देवदेवांगनाओंकी इच्छा परस्पर गीत व प्रेममरे मधुर वचनालापादिकसे ही मिट जाती है । और आनत प्राणत आरण अच्युत इन चार खर्गोंके देवदेवियोंकी परस्पर मनमें मरण करनेसे ही कामवासना नष्ट हो जाती है ॥ ८॥ परेऽप्रवीचाराः ॥९॥ अर्थ (परे) सोलह खोंसे ( कल्प-विमानोंसे ) परेके कल्पातीत अर्थात् अच्युत खर्गसे ऊपर नव ग्रैवेयकोंके ३०९ विमान और नव अनुदिशविमान तथा पांच अनुत्तर विमान इन सबमें रहनेवाले देव (अप्रवीचाराः) कामसेवनरहित हैं । इनके कामवासना होती ही नहीं ॥ ९ ॥ अब पूर्वसूत्रमें बतलाये हुए भवनवासियोंके दश भेद कहते हैं। भवनवासिनोऽसुरनागविद्युत्सुपर्णाग्निवातस्तनितोदधिद्वीपदिक्कुमाराः॥१०॥ UUUURUS ३२ DF A अर्थ-(भवनवासिनः) भवनवासी देव ( असुरनागविद्युत्सुपर्णाग्निवातस्तनितोद- घिद्वीपदिक्कुमारा:) असुरकुमार, नागकुमार, विद्युत्कुमार, सुपर्णकुमार, अमिकुमार, वातकुमार स्तनितकुमार, उदधिकुमार, द्वीपकुमार और दिक्कुमार ऐसे दश प्रकारके हैं ॥ १०॥ अब व्यन्तरोंके आठ भेद कहते हैं,- व्यन्तराः किन्नरकिम्पुरुषमहोरगगन्धर्वयक्षराक्षसभूतपिशाचाः ॥ ११ ॥ अर्थ-(व्यन्तराः ) व्यन्तरदेव ( किन्नरकिम्पुरुपमहोरगगन्धर्वयक्षराक्षसभूतापि- शाचाः) किन्नर, किंपुरुष, महोरग, गन्धर्व, यक्ष, राक्षस, भूत और पिशाच ऐसे आठ प्रकारके हैं ॥ ११ ॥ अब ज्योतिप्क देवोंके पांच भेद कहते हैं, ज्योतिष्काः सूर्याचन्द्रमसौ ग्रहनक्षत्रप्रकीर्णकतारकाश्च ॥ १२ ॥ अर्थ (ज्योतिष्काः) ज्योतिष्कदेव ( सूर्याचन्द्रमसौ) सूर्य और चन्द्रमा (च) तथा ( ग्रहनक्षत्रप्रकीर्णकतारकाः) ग्रह, नक्षत्र और प्रकीर्णक तारे, इसतरह पाँच प्रकारके हैं.॥ १२ ॥ मेरुप्रदक्षिणा नित्यगतयो नृलोके ॥ १३ ॥ अर्थ-ये सब ज्योतिष्कदेव (नृलोके) मनुष्यलोकमें अर्थात् अढाई द्वीप और दो समुद्रोंमें मो. अ. ४ . ( मेरुप्रदक्षिणा) सुमेरुपर्वतकी प्रदक्षिणा देते हुए (नित्यगतय:) निरन्तर गमन करने वाले हैं ॥ १३॥ तत्कृतः कालविभागः॥ १४ ॥ अर्थ (कालविभागः) समयका विभाग अर्थात् घड़ी पक दिन रात्रि आदि- का व्यवहार (तत्कृतः) उन गमन करते हुए सूर्य चंद्रमादिकद्वारा सूचित होता है ॥१४॥ वहिरवस्थिताः ॥१५॥ अर्थ-(बहिः) मनुष्य लोकके बाहर जो सूर्य चन्द्रमादिक ज्योतिष्कदेव हैं, वे (अव- स्थिताः) अवस्थित हैं अर्थात् गमन नही करते हैं-जहां तहां स्थिर रहते हैं ॥१५॥ वैमानिकाः ॥ १६ ॥ अर्थ:-जिनमें रहनेसे विशेष पुण्यवन्त माने जावें, उन्हें विमान कहते हैं-और उन विमा- १ श्लोकवार्तिकठीका युक्तिद्वारा सिद्धि किया है कि, सूर्यादिक ही मेरुके आसपास प्रदक्षिणारूप भ्रमण करते हैं। । २ जंबूद्वीपमें दो सूर्य दो चंद्रमा हैं, लवणसमुद्रमें चार सूर्य और चार चंद्रमा है। धातुकी द्वीपमें १२ सूर्य और १२ चंद्रमा है, कालोदधिसमुद्रपर ४२ सूर्य और ४२ चंद्रमा है और पुष्कराईम ७२ सूर्य और ७२ चंद्रमा है। इस प्रकार अढाई द्वीपमै पांच स्थानोंपर एकसौ बत्तीरा चंद्रमा और इतने ही सूर्य हैं। ये राव ग्रह नक्षत्र तारादिगण- सहित मेरुके चारों तरफ फिरते हैं । अढाई द्वीपरो वाहरके सूर्य चंद्रमादिके सब ज्योतिष्कविमान स्थिर हैं। ३३ - R नोंमें जो रहते हैं, वे वैमानिक कहलाते हैं। सब विमान चौरासी लाख सत्तानवे हजार तेईस हैं और एक एक विमान संख्यात असंख्यात योजनों के विस्तारमें है ॥ १६ ॥ कल्पोपपन्नाः कल्पातीताश्च ।। १७॥ अर्थ-उक्त वैमानिक (कल्पोपपन्न ) एक तो कल्पोपपन्न हैं (च) और दूसरे (कल्पातीताः) कल्पातीत हैं। भावार्थ-सौधर्मादि १६ खगोंके विमानोंमें इंद्रादिक दश प्रकारके देवोंकी कल्पना होती है, इसकारण उन विमानों की कल्प संज्ञा है और जो कल्पोंमें उत्पन्न हों, उन्हें कल्पोपपत्र कहते हैं। जिन विमानों में इन्द्रादिकोंकी कल्पना नहीं है। ऐसे अवेयकादिकोंको कल्पातीत कहते हैं ॥ १७ ॥ उपयुपरि ॥१८॥ अर्थ-कल्पोंके जुगल तथा नव अवेयक, नव अनुदिश, और पांच अनुत्तर ये सब विमान क्रमसे (उपरि उपरि ) ऊपर ऊपर हैं ॥ १८ ॥ सौधमैशानसांनत्कुंमारमाहेन्द्रब्रह्मब्रह्मोत्तरलान्तवकापिष्ठशुक्रम- हाशुक्रसतारसहस्रारेश्वानतंप्राणतयोरारणाच्युतयोर्नवसु ग्रैवेयके- १ 'नव'शब्दको समास नहीं करके जुदा विभक्तिवाला कहा, इसकारण नव अनुदिशका भी सूत्रमै ग्रहण जानना चाहिये। ६ FIN GUAGU . अ. मो. ३४ षु विजयवैजयन्तजयन्तापराजितेषु सर्वार्थसिद्धौ च ॥ १९ ॥ अर्थ-वैमानिकदेव ( सौधमैशानसानत्कुमारमाहेन्द्रब्रह्मब्रह्मोत्तरलान्तवकापिष्ठशुक्र- महांशुक्रसतारसहस्रारेषु ) सौधर्म और ऐशान, सानत्कुमार और माहेन्द्र, ब्रह्म और ब्रह्मोत्तर, लान्त और कांपिष्ठ, शुक्र और महाशुक्र, सतार और सहस्रार, इन छह युगलोंमें अर्थात् १२ खर्गों में तथा (आनतप्राणतयोः) आनत और प्राणत इन दो वर्गों में तथा (आरणाच्यु. तयोः) आरण और अच्युत नामके युगलमें तथा (नवसु ग्रैवेयकेपु) नव अवेयकोंके नव पटलोंमें तथा उनसे ऊपरके नव अनुदिशके एक पटलके विमानोंमें तथा उनके ऊपर (विजयवैजयन्तजयन्तापराजितेषु ) विजय वैजयंत जयंत और अपराजित नामके विमानोंमें च) और ( सर्वार्थसिद्धौ) सर्वार्थसिद्धिमें कल्लोपपन्न और कल्पातीत संज्ञावाले देव रहते हैं ॥ १९॥ स्थितिप्रभावसुखद्युतिलेश्याविशुद्धीन्द्रियावधिविषयतोऽधिकाः ॥ २० ॥ अर्थ-( स्थितिप्रभावसुखयुतिलेश्याविशुद्धीन्द्रियावधिविषयतः ) आयु, प्रभाव, सुख, युति, लेश्याकी विशुद्धता, इन्द्रियविषय, और अवधिज्ञानका विषय ये सब विषय ऊपर ऊपरके वैमानिकोंमें ( अधिकाः) अधिक अधिक हैं ॥ २० ॥ गतिशरीरपरिग्रहाभिमानतो हीनाः ॥ २१ ॥ ३४ - अर्थ-किन्तु-(गतिशरीरपरिग्रहाभिमानत:) गमन, शरीरकी उच्चता, परिग्रह और अभिमान इन विषयोंमें ऊपर ऊपरके देव (हीनाः) हीन हैं ॥ २१ ॥ पीतपद्मशुक्ललेश्या द्वित्रिशेषेषु ॥ २२ ॥ अर्थ-(द्वित्रिशेषेषु ) दो युगलोंमें तथा तीन युगलोंमें और शेषके समस्त विमानोंमें क्रमसे (पीतपद्मशुक्ललेश्याः) पीत पद्म.और शुक्ल लेश्या होती हैं । अर्थात् सौधर्म ऐशानमें पीतलेश्या, सनत्कुमार माहेन्द्र में पीत पद्म दोनों, ब्रह्म ब्रह्मोत्तर लान्तव और कापिष्ठमें पद्मलेश्या, शुक्र महाशुक्र शतार और सहस्रार इन ४ खर्गों में पद्म शुक्ल दोनों और आनतादि शेष विमानोंमें शुक्ल लेश्या है परन्तु अनुदिश और अनुत्तर इन चौदह विमानोंमें परम शुक्ल लेश्या है ॥ २२॥ .प्राग्वेयकेभ्यः कल्पाः ॥ २३ ॥ अर्थ-(ग्रैवेयकेभ्यः) अवेयकोंसे (प्राक) पहिले २ के १६ वर्ग (कल्पाः कल्पसंज्ञावाले हैं । इनसे आगेके नव प्रैवेयकादिक कल्पातीत विमान हैं । इनमें रहनेवाले अहमिन्द्र कहलाते हैं अर्थात् वहांका प्रत्येक देव इन्द्रके समान सुख भोगनेवाला होता है ॥२३॥ १ विषयोंकी उत्कटवांछाके नहीं होनेसे ऊपर २ के देवोंमें गमनकरनेकी इच्छा कम होती है, गमनशक्ति कम नहीं समझना।
m मो. अ. ४ ३५ ब्रह्मलोकालया लौकान्तिकाः ॥ २४ ॥ अर्थ (ब्रह्मलोंकालया) जिनका ब्रह्मलोक आलय है अर्थात् जो पांचवें ब्रह्मवर्गके अन्तमें रहते हैं, वे (लौकान्तिकाः) लौकान्तिक देव हैं। ये लौकान्तिक देव एक भवावतारी हैं अर्थात् मनुष्यका एक भव धारण करके ही मोक्षको चले जाते हैं। इसकारण जिनके लोक अर्थात् संसारका अन्त होनेवाला है, उन्हें लौकान्तिक देव कहते हैं। ये विपयोंसे विरक्त, ब्रह्मचारी, द्वादशाङ्गके पाठी और अत्यन्त उदासीन होते हैं । तीर्थकर भगवान्के तपकल्या- णके आदिमें ही ये देव आते हैं । तपके सिवाय भगवान्के अन्य उत्सवोंमें ये नहीं आते॥२४॥ सारखतादित्यवहयरुणगर्दतोयतुषिताव्याबाधारिष्टाश्च ॥ २५ ॥ अर्थ-सारखत, आदित्य, वह्नि, अरुण, गर्दतोय, तुषित, अव्याबाध, और अरिष्ट ये आठ प्रकारके लौकान्तिक देव होते हैं । ये ब्रह्मस्वर्गकी आठों दिशाभोमें रहते हैं ।। २५॥ विजयादिपु द्विचरमाः ॥ २६ ॥ अर्थ-(विजयादिषु ) विजयादिक चार विमानोंके देव (द्विचरमाः) द्विचरम होते है । अर्थात् मनुप्यके दो जन्म लेकर मोक्षगामी होते हैं । सर्वार्थसिद्धिके देव एक भवावतारी होते हैं ॥ २६ ॥ औपपादिकमनुष्येभ्यः शेषास्तिर्यग्योनयः ॥ २७ ॥ ३५ SAUUURG A अर्थ-(औपपादिकमनुष्येभ्यः) देव नारकी और. मनुष्योंके अतिरिक्त (शेपाः) शेष सब जीव (तिर्यग्योनयः) तिर्यंच हैं । विशेष-इन तिर्यंचोंमेंसे जो सूक्ष्म एकेन्द्रिय जीव हैं, वे समस्त लोकमें व्याप्त हैं । लोकका कोई भी प्रदेश उनसे खाली नहीं हैं । और बादर स्थूल एकेन्द्रिय जीव पृथिवी जलादिकके आधार हैं । रहे विकलत्रय : [ द्वीन्द्रिय त्रीन्द्रिय चतुरिन्द्रिय ] और पंचेन्द्रिय तिर्यंच सो बसनाली में रहते हैं ॥२७॥ स्थितिरसुरनागसुपर्णद्वीपशेषाणां सागरोपमत्रिपल्योपमार्द्धहीनमिता ॥२८॥ अर्थ (असुरनागसुपर्णद्वीपशेषाणां) अपुरकुमार, नागकुमार, सुपर्णकुमार, द्वीपकुमार और शेष छह कुमारोंकी (स्थितिः) आयु (सागरोपमत्रिपल्योपमार्द्धहीनमिता) क्रमसे एक सागर, तीन पल्य, दो पल्य, और डेड़ पल्यकी है । अर्थात् असुरकुमारोंकी आयु एक सागरकी है, नागकुमारोंकी तीन पल्य है, सुपर्णकुमारोंकी अढाई पल्य है, द्वीपकुमारोंकी दो पल्य है और शेष रहे जो छह कुमार उनकी डेढ़ डेढ़ पल्यकी है । इस प्रकार भव- नवासी देवोंकी उत्कृष्ट आयु है ॥ २८ ॥ सौधर्मशानयोः सागरोपमेऽधिके ॥ २९॥ अर्थ-( सौधर्मशानयोः) सौधर्म और ऐशानखर्गके देवोंकी उत्कृष्ट आयु (सागरो- पमे अधिके) दो सागरसे कुछ अधिक है ॥ २९ ॥ UVA मो . अ. ४ AAVAA सानत्कुमारमाहेन्द्रयोः सप्त ॥ ३० ॥ अर्थ (सानत्कुमारमाहेन्द्रयोः) सानत्कुमार और माहेन्द्र इन दोनों खगोंके देवोंकी आयु (सप्त) कुछ अधिक सात सागरकी है ॥ ३० ॥ 'त्रिसप्तनवैकादशत्रयोदशपञ्चदशभिरधिकानि तु ॥ ३१ ॥ अर्थ-(त्रिसप्तनवैकादशत्रयोदशपञ्चदशभिः) सात सागरसे तीन, सात, नव, ग्यारह, तेरह, और पन्द्रह सागर (तु अधिकानि) अधिक आयु क्रमसे अगले छह जुगलों में है । अर्थात् ब्रह्मब्रह्मोत्तरमें दश सागरसे कुछ अधिक, लान्तव और कापिष्ठमें चौदह सागरसें कुछ अधिक, शुक्रमहाशुक्रमें सोलह सागरसे कुछ अधिक, सतार और सहस्रारमें अठारह सागरसे कुछ अधिक, आनत और प्राणतमें वीस सागरकी और आरण तथा अच्युतमें बाईस सागरकी उत्कृष्ट आयु है । सूत्रमें 'तु' शब्द होनेसे सहस्रार पर्यन्तके देवोंकी आयु कुछ कुछ अधिक कही गई है ॥ आगे अधिक नहीं है-पूरे २ सागरोंके परिमाण ही है ॥ ३१ ॥ आरणाच्युतादूद्धमेकैकेन नवसु वेयकेपु विजयादिपु सर्वार्थसिद्धौ च ॥ ३२ ॥ अर्थ (आरणाच्युतात्) आरण और अच्युत युगलसे (ऊर्द्धम्) ऊपर (नवसु ग्रैवैयक') नव प्रैवेयकोंमें, नव अनुदिशोंमें, (विजयादिषु) विजयादिक चार विमानोंमें (च) और ३६ UAR (सर्वार्थसिद्धौ)सर्वार्थसिद्धि विमानमें (एकैकेन) एक एक सागर बढ़ती आयु है ॥ अर्थात् प्रथम अवेयकमें तेईस सांगर, दूसरेमें चौवीस सागर, तीसरेमें पच्चीस सागर, चौथेमें छब्बीस सागर, पांचवेंमें सत्ताईस सागर, छट्ठमें सातवेंमें उनतीस सागर, आठवेंमें तीस सागर, नवमेंमें इकतीस सागर, नव अनुदिशोंमें बत्तीस सागर, और विजय, वैजयन्त, जयन्त, अपराजित तथा सर्वार्थसिद्धि इन पांचों विमानोंमें तेतीस सागरकी उत्कृष्ट आयु है ॥ ३२ ॥ अपरा पल्योपममधिकम् ॥ ३३॥ अर्थ-(अपरा) जघन्य आयु अर्थात् कमसे कम आयु सौधर्म और ईशान . स्वर्गमें (पल्योपमम् अधिकम् ) एक पल्यसे कुछ अधिक है ॥ ३३ ॥ परतः परतः पूर्वा पूर्वानन्तरा ॥ ३४ ॥ अर्थ--(पूर्वा पूर्वा) पहिले २ युगलकी उत्कृष्ट अ (परत: परतः) अगले अगले युगलोंमें (अनन्तरां) जंघन्य है ॥ भावार्थ-सौधर्म और ऐशान वर्गमें जो कुछ अधिक दो सागरकी उत्कृष्ट आयु है, वही सानत्कुमार और माहेन्द्र में जघन्य आयु है और जो सानत्कुमार माहेन्द्रकी कुछ अधिक सात सागरकी उत्कृष्ट आयु है, वही अगले ब्रह्म ब्रह्मोत्तर १ सर्वार्थसिद्धि शब्द जुदा कहनेका तात्पर्य यह है कि उसमें उत्कृष्ट ही आयु है जघन्यादिक भेद नहीं हैं। MMA HI VAIVAS
मो.
४
न
युगलमें जघन्य है । इसीप्रकार अगले समस्त विमानोंमें समझना चाहिये । सर्वार्थसिद्धि
जघन्य आयु नहिं होती है ॥ ३४ ॥
नारकाणां च द्वितीयादिपु ॥ ३५॥
अर्थ-(च) और इसी प्रकार (द्वितीयादिपु) दूसरे तीसरे आदि नरकोंमें भी
(नारकाणां) नारकी जीवोंकी जघन्य आयु है। अर्थात्-रत्नप्रभा पृथिवीमें जो नारकी
जीवोंकी एक सागरकी उत्कृष्ट आयु है-वही दूसरे नरकमें जघन्य है और दूसरेकी उत्कृष्ट आयु
तीसरेंमें जघन्य है । इसीप्रकार सातों नरकोंमें जानना चाहिये ॥ ३५ ॥
दशवर्पसहस्राणि प्रथमायाम् ॥ ३६ ।।
अर्थ-(प्रथमायाँ) प्रथम नरकम सीमन्तक नाम पहिले पटलके नारकी जीवोंकी जघन्य
आयु ( दशवर्पसहस्राणि) दशहजार वर्षकी है ॥ ३६ ॥
भवनेषु च ॥ ३७॥
अर्थ-(भवनेषु) भवनवासियोंमें (च) भी जघन्य आयु दशहजार वर्षकी है॥३७॥
व्यन्तराणां च ॥ ३८ ॥
अर्थ-(व्यन्तराणां) व्यन्तर देवोंकी (च) भी जघन्यस्थिति दशहजार वर्षकी है३८
परा पल्योपममधिकम् ॥ ३९ ॥
अर्थ-व्यन्तरोंकी (परा) उत्कृष्ट आयु (पल्योपमम् अधिकम् ) एक पल्यसे कुछ अधिक है ॥ ३९ ॥ ज्योतिष्काणां च ॥ ४०॥ अर्थ (ज्योतिष्काणां) ज्योतिष्क देवोंकी (च) भी उत्कृष्ट आयु कुछ अधिक एक पल्यकी है॥ ४० ॥ तदष्टभागोऽपरा ॥४१॥ अर्थ-ज्योतिष्क देवोंकी ( अपरा) जघन्य आयु (तदष्टभागः) उस एक . पल्यके आठवें भागके बराबर है ॥ ११॥ लौकान्तिकानामष्टौ सागरोपमाणि सर्वेषाम् ॥ ४२ ॥ अर्थ-ब्रह्मवर्गके अन्तमें रहनेवाले ( सर्वेषाम् ) समस्त (लौकान्तिकानां) लौका- न्तिक देवोंकी उत्कृष्ट और जघन्य आयु ( अष्टौ सागरोपमाणि) आठ सागरकी है ॥४२॥ इति श्रीमदुमाखामिविरचिते तत्त्वार्थाधिगमे मोक्षशास्त्रे चतुर्थोऽध्यायः॥४॥ SUBRUArryy (१) यह श्रीपूज्यपादखामीकृत सर्वार्थसिद्धिका वार्तिक है । क्योंकि श्रीमहाकलङ्कदेवने "अष्टसागरोपमा लौकान्तिकाः" कहा है। UP मो. अथ पञ्चमोऽध्यायः प्रारभ्यते । अ. ... ३८ अजीवकाया धर्माधर्माकाशपुद्गलाः ॥१॥ अर्थ-(धर्माधर्माकाशपुद्गलाः) धर्म अधर्म आकाश और पुद्गल ये चार द्रव्य ( अ- जीवकायाः) अजीवकाय अर्थात् अचेतन और वहुप्रदेशी पदार्थ हैं ॥१॥ द्रव्याणि ॥२॥ अर्थ-उक्त चारों पदार्थ द्रव्य हैं अर्थात् पद द्रव्योंमेंसे ये ४ द्रव्य हैं। तीन कालमें जो अपने गुणपर्यायोंको वै अर्थात् प्राप्त होय, उसे द्रव्य कहते हैं ॥२॥ जीवाश्च ॥३॥ अर्थ-(जीवाः) जीव (च) भी द्रव्य है ।। अर्थात् जीव भी अपने गुणपर्याय सहित हैं, इस कारण इनकी भी द्रव्यसंज्ञा है ॥ ३ ॥ नित्यावस्थितान्यरूपाणि ॥४॥ अर्थ-इस अध्यायके ३९ वें सूत्रमें कहे हुए कालद्रव्यसहित ये जीव, अजीव, धर्म, (१) 'अजीवाश्च ते काया' इति कर्मधारयसमासः। USAUR ३८ --- -- amav अधर्म, और द्रव्य (नित्यावस्थितानि) नित्य हैं अर्थात् ये कभी नष्ट नहीं होते हैं और अवस्थित हैं अर्थात् संख्या घटते बढ़ते नहीं हैं । सारांश यह है कि, द्रव्य छह हैं सो कभी सात अथवा पांच नहीं होते हैं । तथा ये सब (अरूपाणि) रूपरहित अरूपी हैं । रूपिणः पुद्गलाः ॥५॥ अर्थ-किन्तु (पुद्गलाः) पुद्गलद्रव्य (रूपिणः) रूपी हैं । यद्यपि रूपीशब्दके अनेक अर्थ हैं, परतु यहां परमागमके अनुसार 'मूर्तीक' अर्थ ही समझना चाहिये ॥ ५॥ आ आकाशादेकदेकद्रव्याणि ॥६॥ अर्थ-(आ आकाशात् ) आकाशपर्यन्त (एकद्रव्याणि) एक एक द्रव्य हैं अर्थात् धर्मद्रव्य अधर्मद्रव्य और आकाश द्रव्य ये एक एक हैं। जब ये तीनों एक एक हैं, तो जीव, पुद्गल और काल इन तीनों द्रव्योंमें विना कहे भी अनेकता सिद्ध हो जाती है। सो आग- मानुसार जीवद्रव्य अनन्तानन्त है। पुद्गलपरमाणु, जीवोंसे अनन्त गुणें हैं और कालद्रव्यके अणु असंख्यात हैं ॥६॥ निष्क्रियाणि च ॥७॥ अर्थ-(च) और ये धर्म अधर्म और आकाश तीनों ही द्रव्य (निष्क्रियाणि) हलन चलनरूप क्रियासे रहित हैं ॥ बाह्याभ्यन्तर कारणसे एक क्षेत्रको छोड़कर अन्यत्र जानेको SUUN मो. GEOG ना ५ ३९ . क्रिया कहते हैं । सो ये तीनो द्रव्य लोकाकाशमें व्याप्त हैं, अनादि कालसे यहीं हैं, यहीं रहेंगे , और क्रियारहित हैं ॥७॥ असंख्येयाः प्रदेशाः धर्माधमैकजीवानाम् ॥ ८॥ अर्थ-(धर्माधर्मैकजीवानाम् ) धर्मद्रव्य अधर्मद्रव्य और एकजीवद्रव्यके (असंख्य- 'या: प्रदेशाः) असंख्यात असंख्यात प्रदेश हैं | जितने क्षेत्रको एक अविभागी ( जिससे छोटा और भाग नहीं हो सके) पुद्गलपरमाणु रोकता है, उतने क्षेत्रको एक प्रदेश कहते हैं ॥८॥ आकाशयानन्ताः ॥ ९ ॥ अर्थ:-(आकाशस्य) आकाशके (अनन्ताः) अनंत प्रदेश हैं । किन्तु लोकाकाश- के असंख्यात प्रदेश हैं ।। ९ ।। संख्येयाऽसंख्येयाश्च पुगलानाम् ॥१०॥ अर्थ--(पुद्गलानाम् ) पुद्गलोंके ( संख्येया असंख्येयाः) संख्यात असंख्यात (च) और अनन्त प्रदेश हैं । यद्यपि शुद्ध पुद्गल तो अविभागी एक परमाणु एक ही प्रदेशवाला है परन्तु पुद्गलपरमाणुओंमें मिलनविठुरन शक्ति है । इस कारण अनेक स्कन्ध दो दो परमाणु- ओंके और अनेक तीन तीन चार चार परमाणुओंके हैं । इसी प्रकार संख्यात परमाणुओंके तथा असंख्यात और अनन्त परमाणुओं के भी स्कन्ध हैं । ३० Reen AAS यहां यदि कोई प्रश्न करै कि-लोकाकाश तो असंख्यप्रदेशी है और पुद्गल अनन्तानन्त- परमाणु हैं तथा स्कन्ध अनन्त परमाणुओंके हैं, फिर वे लोकाकाशमें कैसे समाते होंगे? तो इसका समाधान यह है कि-पुद्गलोंके परिणमन दो प्रकार हैं, एक सूक्ष्मपरिणमन, और दूसरा स्थूलपरिणमन । सो जब इनका सूक्ष्मपरिणमन होता है, तब आकाशके एक ही प्रदेशमें अनन्त परमाणु आ सकते हैं । इसके सिवाय आकाशमें अवकाशदानशक्ति भी है, इसकारण यह दोष नहिं आता है ॥ १० ॥ नाणोः ॥११॥ अर्थ-(अणोः) अणु अर्थात् पुद्गलके परमाणुके (न) प्रदेश नहीं हैं अर्थात् परमा- गुके एकप्रदेशमात्रता कही है। क्योंकि परमाणुके भेदका (खंडका) अभाव है ॥ ११ ॥ लोकाकाशेऽवगाहः ॥१२॥ अर्थ----इन समस्त धर्मादिक द्रव्योंका (लोकाकाशे) लोकाकाशमें ( अवगाहा) अव- गाह अर्थात् स्थिति है. ॥ लोकाकाशसे बाहर अलोकाकाशमें अन्य कोई भी द्रव्य नहीं है। जहां तक पांच द्रव्य हैं, वहींतकके आकाशको लोकाकाश कहते हैं ॥ १२ ॥ धर्माधर्मयोः कृत्ले ॥ १३ ॥ अर्थ-(धर्माधर्मयो) धर्म और अधर्म द्रव्यका अवगाह (कृत्स्ने) समस्त लोकाका- AUGU अ. मो. US शमें है । अर्थात् जैसे तिलों में सर्वत्र तैल व्याप्त है, उसीप्रकार लोकाकाशके समस्त प्रदेशोंमें धर्म अधर्म द्रव्यके प्रदेश व्याप्त हैं ॥ १३ ॥ एकप्रदेशादिपु भाज्यः पुद्गलानाम् ॥ १४ ॥ अर्थ-(एकप्रदेशादिषु) लोकके एक प्रदेशादिकं भागोंमें ( पुद्गलानां) पुद्गल द्रव्योंका अर्थात् एक परमाणु द्विपरमाणु संख्यात असंख्यात और अनन्त परमाणुओंका अव- गाह (भाज्य:) विकल्प करना चाहिये । अर्थात् उक्त पुद्गलोंका अवगाह एक, दो आदि प्रदेशोंमें जानना चाहिये ॥ १४ ॥ असंख्येयभागादिपु जीवानाम् ॥ १५ ॥ अर्थ-(असंख्येयभागादिषु) लोकके असंख्यात भागादिमें (जीवानां) जीवोंका अवगाह है ॥ १५॥ यहां जो जीव एक छोटेसे शरीरमें होता है, वही बड़े शरीरमें कैसे व्याप्त. होता है, ऐसा प्रश्न होता है । इस लिये उसके उत्तरमें कहते हैं कि:- प्रदेशसंहारविसर्पाभ्यां प्रदीपवत्-॥ १६ ॥ अर्थ-एक जीवके प्रदेश लोकाकाशके समान हैं, तथापि वे (प्रदीपवत् ) दीपककी DURG रोशनीके समान ( प्रदेशसंहारविसर्पाभ्याम् ) प्रदेशोंमें संकोचता विस्तारताके होनेसे जैसा आधार ( आश्रय शरीर ) हो, वैसे ही संकोचविस्ताररूप प्रदेशवाले हो जाते हैं । अब प्रत्येक द्रव्यका उपकार कहते हैं- गतिस्थित्युपग्रही धर्माधर्मयोरुपकारः ॥ १७ ॥ अर्थ-जीवों और पुद्गलोंको (गतिस्थित्युपग्रहौ) गमनरूप और स्थितिरूप करना (ध- मधिर्मयो) धर्म और अधर्म द्रव्यका ( उपकारः) उपकार है । भावार्थ-जीव और पुद्ग- लोके चलने में तो धर्मद्रव्य सहकारी है और स्थिति करनेमें अधर्मद्रव्य उपकारी (सहायक) है-प्रेरक नहीं है ॥ १७॥ आकाशसावगाहः ॥ १८ ॥ अर्थ-समस्त द्रव्योंको अर्थात् जीवादि पांचों द्रव्योंको (अवगाहः) अवकाश देना अर्थात् जगह देना (आकाशस) आकाशद्रव्यका उपकार है ॥ १८ ॥ शरीरवाङ्मनःप्राणापानाः पुद्गलानाम् ॥ १९ ॥ अर्थ-(शरीरवाङ्मनःप्राणापानाः) शरीर वचन मन और श्वासोच्छ्वासादिक वनना (पुद्गलानां) पुद्गलोंका उपकार है । भावार्थ-आहारवर्गणादि पांच तरहके पुद्गलसमूहोंसे शरीर आदि बनते हैं ॥१९॥ Pennone ASIAN Auru मो. Breener ४१ PUR सुखदुःखजीवितमरणोपग्रहाश्च ॥ २० ॥ अर्थ-(च) तथा (सुखदुःखजीवितमरणोपग्रहाः) सुख दुःख, और जीना मरना ये उपकार भी पुद्गलोंके हैं। क्योंकि सुख दुःख जीना मरना भी कर्मरूप पुद्गलों के कारणसे होता है ॥ २० ॥ परस्परोपग्रहो जीवानाम् ॥ २१ ॥ अर्थ (जीवानाम्) जीवोंका (परस्परोपग्रहः) परस्पर उपकार है । अर्थात् जीब कारणवशसे एक दूसरेका सुख दुःख जीवन मरण तथा सेवा शुश्रूषा आदिसे उपकार करते हैं ॥ २१ ॥ वर्तनापरिणामक्रियाः परत्वापरत्वे च कालस्य ॥ २२ ॥ अर्थ-(च) और (कालस्य) कालके (वर्त्तनापरिणामक्रियाः) वर्तना, परिणाम, किया तथा ( परत्वापरत्वे) परत्व और अपरत्व ये पांच उपकार हैं ॥ जो दूसरेको वर्तावै, उसको वर्तना कहते हैं । यद्यपि धर्मादिक द्रव्य अपनी पर्यायपूरणार्थ स्वयं वर्तनरूप -होते हैं, तथापि उनके वर्तनमें जो बाह्य कारण है जो उनको वर्तनारूप करता है, उसको वर्तना कहते हैं । द्रव्यका ऐसा पर्याय जो कि एक धर्मका निवृत्तिरूप और दूसरे धर्मका जननरूप १ उपकार-नाम निमित्तकारणका है । जैसे विप आदि अनिष्ट पुद्गल पदार्थ जीवको दुःख और मरणके निमित्तकारण हैं। ४१ UUN हो, उसको परिणाम कहते हैं । जैसे—आत्माके क्रोधादिक और पुद्गलके वर्णादिक परिणाम हैं। जो हलनचलनादि रूप हो, वह क्रिया है । एकदेशसे दूसरे देश तक जानेको भी क्रिया कहते हैं । जैसे, गाडीका चलना, मेपोंका चलना । और बड़ा. छोटा इस व्यवहारको परत्वापरत्व कहते हैं । जैसे, यह युवा. १५ वर्षका है. और यह २० वर्षका है ऐसा जो व्यवहार है, सो. परत्वापरत्व है। ये सब वर्तनादिक कालके निमित्तसे होते हैं और इन्हींसे कालका अस्तित्व सिद्ध होता है ॥ २२ ॥ स्पर्शरसगन्धवर्णवन्तः पुद्गलाः॥ २३ ॥ अर्थ-(स्पर्शरसगन्धवर्णवन्तः) स्पर्शरसगन्धवर्णवाले (पुद्गलाः) पुद्गल द्रव्य हैं ॥ कोमल, कठोर,हलका, भारी, शीत, उष्ण, सचिकण और रूक्ष ये आठ प्रकारके स्पर्श हैं। खट्टा, मीठा, कडवा, कपायला, चिरपरा [तिक्त ] ये पांच रस हैं । सुगन्ध दुर्गन्ध ये दो गन्ध हैं। कृष्ण, नील, रक्त, पीत, श्वेत ये पांच वर्ण [ रंग ] हैं॥ २३ ॥ . शब्दबन्धसौम्यस्थौल्यसंस्थानभेदतमश्छायातपोधोतवन्तश्च ॥ २४ ॥ अर्थ-(च) तथा ये पुद्गल शब्द, बन्ध, सूक्ष्मता, स्थूलता, संस्थान, भेद, तम, छाया आतप और उद्योत सहित हैं। भावार्थ-शब्दादिक भी पुद्गलोंकी एक प्रकारकी अवस्थाएं हैं । शब्दादिकोंको जो अन्यवादी अन्यरूप मानते हैं, इस सूत्रसे उनका खण्डन होता है २४ UGUS N अ. मो. ४२ अणवः स्कन्धाश्च ॥ २५ ॥ अर्थ च) तथा पुद्गल द्रव्य (अणवः) अणु और ( स्कन्धाः) स्कन्ध इसप्रकार दो भेदरूप भी हैं। दोसे लेकर संख्यात तथा असंख्यात वा अनन्तपरमाणुओंतकके पिंडको स्कन्ध कहते हैं ॥ २५॥ भेदसङ्घातेभ्य उत्पद्यन्ते ॥ २६ ॥ अर्थ-पुद्गलोंके स्कन्ध (भेदसंघातेभ्यः) भेद और संघातसे अर्थात् बाह्य वा आभ्यन्तरिक निमित्तके टूटने वा जुड़नेसे (उत्पद्यन्ते) होते हैं । 'भेदसंघातेभ्यः' यहां बहुवचन देनेसे भेद और संघात दोनोंहीसे स्कन्ध होते हैं, ऐसा समझना चाहिये । दो आदिके संघातसे वा मिलनेसे भी नाना स्कन्ध होते हैं। और बड़े स्कन्धोंके टूटनेसे भी दो परमाणुओंतकके अनेक स्कन्ध होते हैं। तथा इसीप्रकार कितने ही स्कन्धोंका भेद होनेसे और उसी समयमें कितने ही स्कन्धोंके मिलनेसे भी स्कन्ध होते हैं ।। २६ ॥ भेदादणुः ॥ २७ ॥ अर्थ-(अणुः) अणु ( भेदात् ) भेदसे ही होता है । संघातसे नहीं होता। यहां यदि कोई (१) यह नियमार्थ सूत्र है । जो पूर्व विधिसूत्रसे अर्थसिद्धि होनेपर पुनः विधिसूत्र कहा जाता है, वह नियमसूत्र होता है। OM ४२ कहै कि, स्कन्ध संघातसे भी होता है, तो उसके समाधानके लिये आगामी सूत्र कहते हैं ॥२७॥ भेदसंघाताभ्यां चाक्षुषः ॥ २८ ॥ अर्थ-(चाक्षुषः) जो नेत्रेन्द्रियगोचर स्कन्ध होता है, वह ( भेदसंघाताभ्यां ) भेद और संघात दोनोंसे ही होता है। भावार्थ-जिन स्कन्धोंका ज्ञान इन्द्रियोंसे हो सकता सकता है, वे भेद और संघात दोनोंसे होते हैं ॥२८॥ सद्व्यलक्षणम् ॥ २९ ॥ अर्थ-(द्रव्यलक्षणम् ) द्रव्यका लक्षण (सत् ) सत् है.। अर्थात् जो सत्रूप है, वही द्रव्य है ॥ २९॥ उत्पादव्ययौव्ययुक्तं सत् ॥३०॥ अर्थ-जो (उत्पादव्ययधौव्ययुक्त) उत्पचि विनाश और मौजूदगी सहित है, वही ( सत् ) सत् है ॥ बाह्याभ्यंतर निमित्तके वशसे अपनी जातिको न छोड़कर चेतन वा अचेतन द्रव्यका एक अवस्थासे दूसरी अवस्थारूप होना उत्पत्ति वा उत्पाद है। जैसे सोनेके कुंडलोंका कड़ेरूप होना, उत्पाद है और कुंडलरूप अवस्थाका नष्ट होना, विनाश वा व्यय है। और पीलापन, भारीपन आदि अपनी जातिको लिये हुए दोनों अवस्थामें मौजूद रहना ध्रौव्य for मो. ना ४३ ५ पना है। इस तरह द्रव्य॑में उत्पाद व्यय और ध्रौव्य ये तीनों गुण एकसाथ निरन्तर रहते हैं । जिसमें ये तीनों गुण हैं, वही सत् और वही द्रव्य है ॥३०॥ तद्भावाव्ययं नित्यम् ॥ ३१ ॥ अर्थ-(वद्भावाव्ययं ) जो तद्भावरूपसे अव्यय है, सो ही (नित्यम् ) नित्य है । भावार्थ-जो पहिले समयमें था, वही दूसरे समयमें हो, उसे तद्भाव कहते हैं और जो तद्भावसे अव्यय [विनाशरहित] हो, उसीको नित्य जानना चाहिये । अभिप्राय यह कि, पदार्थके भाव वा गुंणके नाश नहीं होनेको नित्य कहते हैं । अग्निके उप्णता गुणका बना रहना अग्निका नित्य- है। सर्वथा नित्य अर्थात् कूटस्थ कोई वस्तु नहीं है । सचाकी वा द्रव्यत्वकी अपेक्षा नित्यत्व है, और पर्यायकी अपेक्षा अनित्यत्व है ॥ ३१ ॥ अर्पितानर्पितसिद्धेः ॥ ३२॥ अर्थ-जिसको मुख्य करै, सोअर्पित और जिसको गौण करै, सो अनर्पित है। इन दोनों नयोंसे वस्तुकी सिद्ध होती है। भावार्थ-वस्तुमें अनेक धर्म होते हैं। उनमेंसे वक्ता जिस धर्मको प्रयो- जनके वंशसे प्रधान करके कहै, वह अर्पित है । और प्रयोजनके विना जिस धर्मको कहनेकी इच्छा नहीं करै, वह अनर्पित है। इससे यह न समझ लेना चाहिये कि, जो धर्म कहा नहीं गया, वह वस्तुमें है. ही नहीं। नहीं, वह जरूर है, परन्तु उससमय उसके कहनेकी. मुख्यता
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OMMUMOURUG
नहीं है। क्योंकि वस्तु अनेक धर्मात्मक है । एक ही पुरुषमें पिता, पुत्र, भाई,
मामा, भानजा, श्वसुर, जामाता, आदि जो अनेक संबंध विद्यमान हैं-वे सब अपेक्षासे ही
सिद्ध होते हैं। कोई कहै यह मामा ही है, सो नहीं है । भानजेकी अपेक्षा मामा हैं-किन्तु
भानजेके पिताका वह साला है, और भानजेकी माताका भाई भी है । जिस समय मामा कहा
जाता है, उस समय उसका सालापन वा. भाईपन गौण वा अनर्पित होता है। इसीप्रकार
वस्तुमें भी अनेक धर्म भिन्न २ अपेक्षासे सिद्ध होते हैं ॥ ३२ ॥
स्निग्धरूक्षत्वाद्वन्धः ॥ ३३ ॥
अर्थ-दो आदि परमाणुओंके स्कन्धोंका (बन्धः) बन्ध (स्निग्धरूक्षत्वात् ) खिग्धत्वसे
अर्थात् चिकनाईसे और रूक्षत्वसे अर्थात् रूखेपनसे होता है ॥ ३३ ॥
न जघन्यगुणानाम् ॥ ३४ ॥
अर्थ-(जघन्यगुणानां) जघन्यगुणसहित परमाणुओंमें बन्ध (न) नहीं होता है ।
परमाणुओंमें खिग्धता वा.रूक्षताके अविभागप्रतिच्छेदको गुण कहते हैं। जिस परमाणुमें निग्धताका
वा रूक्षताका एक अविभागप्रतिच्छेद रह जाय, वह जघन्यगुणवाला है। यहां एक अविभागी
प्रतिच्छेदको जघन्य कहा है। जिसमें एक गुण खिग्धरूक्षताका हो, वह परमाणु द्वितीयादि संख्यात
असंख्यात अनन्तगुणसहित स्निग्ध परमाणु वा रूक्षपरमाणुके साथ बंधको प्राप्त नहीं होगा ॥३॥
मो. ४४ ५ गुणसाम्ये सदृशानाम् ॥ ३५ ॥ अर्थ-(सदृशानां ) सदृशोंका (गुणसाम्ये) गुणकी समानता होनेपर बंध नहीं होता ।। भावार्थ-पहले कह चुके हैं कि खिग्ध और रूसोका बंध होता है और अब निषेधप्रकरणमें सदृशोंका अर्थात् स्निग्धका स्निग्धके साथका भी ग्रहण किया है। इससे विदित होता है कि, सह- शोंका भी बंध होता है। इसी लिये निषेध किया है। तथा दो गुण निग्धोंका दो गुण रूक्षोंके साथ बंध नहीं होगा और दो गुण स्निग्धोंका दो गुण निग्धोंके साथ बंध नहीं होगा। इसी तरह और भी जानना ॥ ३५॥ द्वयधिकादिगुणानां तु ॥ ३६ ॥ अर्थ-(व्यधिकादिगुणानां तु) किंतु दो अधिक गुणवालोंका ही बंध होता है । अर्थात् बन्ध तब ही होता है, जब कि एकसे दूसरेमें दो गुण अधिक हों।जैसे चार स्निग्धगुणके साथ पांच सात आदिक खिग्ध वा रूक्ष गुणवालेका बन्ध नहीं होगा। किंतु चारके साथ छह लिग्ध वा रूक्ष गुणवालेके साथ ही बंध होगा। इसीप्रकार सात रूक्ष गुणवालेका बंध आठ दश ग्यारह आदि गुणवालेके साथ न होकर नव खिग्ध वा रूक्ष. गुणवालेके साथ ही होगा। इसीप्रकार सम- तबंधोंमें दो दो गुण अधिकवालेका ही बंध होता है ॥ ३६॥ ४४ AAR बन्धेऽधिको पारिणामिकौ च ॥ ३७॥ अर्थ-(च) और (बन्धे ) बन्ध अवस्थामें (अधिकौ) अधिक गुणसहित पुद्गल अल्पगुणसहितको (पारिणामिको) परिणमावनेवाले होते हैं । अर्थात्-अल्प गुणके धारक स्कन्ध अधिक गुणके स्कन्धरूप हो जाते हैं ॥ ३७॥ गुणपर्ययवद्व्यम् ।। ३८ ॥ अर्थ- (गुणपर्ययवत् ) गुणपर्यायवाला (द्रव्यम् ) द्रव्य होता है ॥ द्रव्यकी अनेक परिणति होनेपर भी जो द्रव्यसे भिन्न न होय-द्रव्यके साथ नित्य रहै वह तो गुण है। और जो क्रमवर्ती हो, पलटनरूप हो सो पर्याय है। द्रव्यके जितने गुण हैं, वे द्रव्यसे कभी भिन्न नहीं होते । समस्त गुणोंका समूह ही द्रव्य है । द्रव्यकी अनेक पर्याय ( अवस्थायें ) पलटते हुए भी गुण कदापि नहीं पलटते। द्रव्यके नित्य साथ रहते हैं । इसीकारण गुणोंको अन्वयी कहते हैं ॥ ३८॥ कालश्च ॥ ३९ ॥ अर्थ-और ( काला च ) काल भी द्रव्य है ॥ कालद्रव्य लोकाकाशके प्रत्येक प्रदेशमें एक २ अणुरूप भिन्न भिन्न रहता है। पुद्गलपरमाणुकी अवगाहनाके बराबर ही इसकी अवगा- हना है । यह अमूर्तीक है । इसके अणु लोकाकाशके प्रदेशोंकी बराबर असंख्यात हैं और । MAUR मो. मल अ. रत्नोंकी राशिंके समान मिन्न २ तथा निष्क्रिय हैं । उत्पादव्ययप्रौव्य तथा गुणपर्यायसहित होनेसे यह भी द्रव्य है । इसीको निश्चय कालद्रव्य कहते हैं ॥ ३९ ॥ सोऽनन्तसमयः॥४०॥ अर्थ-(सा) वह कालद्रव्य (अनन्तसमयः) अनन्तसमयवाला है । यद्यपि वर्तमान- काल एक समय मात्र है, परन्तु भूत भविष्यत् वर्चमानकी अपेक्षा अनन्त समयवाला है । समय कालकी पर्यायका सबसे छोटा अंश है। इसके समूहसे आवली घटिका इत्यादि व्यवहारकाल होते हैं । यह व्यवहारकाल निश्चयकालद्रव्यकी पर्याय है ॥ ४० ॥ द्रव्याश्रया निर्गुणा गुणाः ॥४१॥ अर्थ (द्रव्याश्रयाः)जो द्रव्यके नित्य आश्रय हों अर्थात् विना द्रव्यके आश्रयके स्वतंत्र नहीं रह सकते हों, तथा (निर्गुणाः) खयं अन्य गुणोंसे रहित हों, वे (गुणाः) गुण हैं। जैसे जीवमें अस्तित्व ज्ञानादिक गुण हैं और पुद्गलमें अचेतनत्व रूपादिक गुण हैं ॥ ४१॥ तद्भावः परिणामः ॥४२॥ अर्थ-(तद्भावः) धर्मादिक द्रव्योंके वे जिसरूप हैं, उसी रूप होनेको (परिणाम:) परिणाम वा पर्याय कहते हैं ॥ ४२ ॥ इति श्रीमदुमास्वामिविरचिते तत्त्वार्थाधिगमे मोक्षशाले पञ्चमोऽध्यायः ॥५॥ AUGUA RURen ४५ अथ षष्ठोऽध्यायः प्रारभ्यते । UPAVA कायवानाकर्म योगः ॥१॥ अर्थ-(कायवाचनाकर्म) काय वचन और मनकी क्रियाको (योगः) योग कहते हैं । अर्थात् शरीर वचन और मनके द्वारा आत्माके प्रदेशोंका सकंप होना सो योग है । योग तीन प्रकारका है. काययोग, वचनयोग और मनोयोग। वीर्यान्तरायकर्मके क्षयोपशम होनेपर औदारिकादि सात- प्रकारकी कायवर्गणाओंमेंसे किसी वर्गणाके कारण आत्माके प्रदेशोंका सकंप (चलनरूप)होनासो काययोग है । वीर्यान्तराय और मत्यक्षरादि आवरणके क्षयोपशमसे प्राप्त हुई वाग्लब्धिकी नि- कटतासे वचनरूप परिणमनके सन्मुख हुए आत्माके प्रदेशोंका हलनचलनरूप होना सो वाग्योग [वचनयोग है। और अभ्यन्तरमें वीर्यान्तराय तथा नोइन्द्रियावरणके क्षयोपशमरूप मनोलब्धिकी निकटतासे और बाह्यमें पूर्वोक्त निमित्तके अवलंबनसे मनःपरिणामके सन्मुख आत्माके प्रदेशोंका सकंप होना सो मनोयोग है । भावार्थ-कायके निमित्तसे आत्माके प्रदेशोंका चलनरूप होना काययोग है, वचनके निमित्तसे आत्मप्रदेशोंका चलना वाग्योग है और मनके निमित्तसे आत्मप्रदेशोंका चलना मनोयोग है ॥ १॥ MUMYA मो. ReUCH ur ४६ स आस्रवः ॥ २॥ अर्थ-(सः) वह योग ही (आस्रवः) कोंके आगमनका द्वाररूप आस्रव है । जिस प्रकार सरोवरमें जल आनेके द्वार [ मोखे] जल आनेके लिये कारण होते हैं, उसीप्रकार आत्माके भीमनोवचनकायरूप योगोंके द्वारा जो शुभअशुभ कर्म आते हैं, उनके आनेमें योग कारण हैं। यहां कारणमें कार्यकी संभावना करके योगोंको ही आस्रव कहा है ॥२॥ शुभः पुण्यसाशुभ: पापस ॥३॥ अर्थ-(शुभः) शुभपरिणामोंसे पैदा हुआ योग (पुण्यस्य) पुण्य प्रकृतियोंका आसव करता है और (अशुभः)अशुभ परिणामोंसे उत्पन्न हुआ योग (पापस्य) पापरूप कर्मोंका आसव करता है। जीवोंका घात करना, असत्य बोलना, परायाधन हरण करना, ईपर्याभाव रखना इत्यादि अशुभयोग हैं। इनसे पापरूप कर्मोंका ही आस्रव आगमन] होता है। और जीवोंकी रक्षा करना, उपकार करना, सत्य बोलना, पंचपरमेष्ठीकी भक्ति करना आदि शुभयोग हैं। इनसे पुण्यरूप कर्मोंका आलव होता है ॥ ३ ॥ सकषायाकपाययोः साम्परायिकापथयोः ॥४॥ अर्थ-(सकपायाकपाययो) कपायसहित और कपायरहित जीवोंके क्रमसे (साम्परा- यिकेयोपथयो) साम्परायिक आस्रव और ईर्यापथ आसव होता है । अर्थात् कपायसहित ४६ UUUU amachar Padm.
जीवोंके साम्परायिक आस्रव होता है और कषायरहित जीवोंके ईर्यापथ नामका आस्रव होता है । जो आत्माको 'कषति' अर्थात् करते हैं, वा घातते हैं, वे क्रोधादिक कषाय कहलाते हैं। संसारके कारणरूप आस्रवोंको साम्परायिकआस्रव कहते हैं। और स्थितिरहित कोंके आसंव होनेको ईर्यापैथआस्रव कहते हैं ॥ ४ ॥ इन्द्रिय कषायात्रतक्रियाः पञ्चचतुःपञ्चपञ्चविंशतिसंख्याः पूर्वस्य भेदाः॥५॥ अर्थ-(इन्द्रियकपायावतक्रियाः पञ्चचतुःपञ्चपञ्चविंशतिसंख्याः) पांच इन्द्रिय,चार कषाय, पांच अव्रत और पच्चीस क्रिया ये सब (पूर्वस्य) पहिले साम्परायिक आसवके (भेदाः) भेद हैं ॥ इनमेंसे पांचइन्द्रियें तो पहिले कही जा चुकी हैं । और क्रोधादिक कपाय तथा हिंसादिक पांच अव्रत आगे कहेंगे । पच्चीस क्रिया कहते हैं, देवगुरुशास्त्रकी पूजा भक्ति करना सम्यक्त्वक्रिया है ॥१॥ अन्य कुदेव कुगुरु कुश्रुतकी स्तुति आदि करना मिथ्यात्वक्रिया है ॥ २ ॥ कायादिकसे गमनागम- नादिरूप प्रवर्तना प्रयोगक्रिया है ॥ ३ ॥ संयमीका अविरतिके सम्मुख होना समा- दानक्रिया है ॥४॥ यापथ अर्थात् गमनके लिये जो क्रिया करना सो र्यापथक्रिया है १ उपशान्तकषाय, क्षीणकषाय, सयोगकेवली तथा अयोगकेवली गुणस्थानवालोंके ईर्यापथ आसव होता है क्योंकि वहां कपायका उदय नहीं रहता है। 9 ANVR मो. ४७ ॥५॥ क्रोधके आवेशसे जो क्रिया हो, सो प्रादोषिकी क्रिया है ॥ ६॥ दुष्टताके लिये उद्यम करना कायिकीक्रिया है ॥ ७ ॥ हिंसाके उपकरण शस्त्रादिकका ग्रहण करना आधि- करणिकी क्रिया है।॥ ८॥अपने वा परके दुःखोत्पत्तिकी जो कारण हो, सो पारितापिकी क्रिया है॥९॥ आयुइन्द्रियबलप्राणोंका वियोग करना प्राणातिपातिकीक्रिया है ॥ १० ॥ रागा- धिकताके कारण प्रमादी होकर रमणीय रूपका अवलोकन करना दर्शनक्रिया है ॥ ११ ॥ प्रमादके कारण वस्तुके स्पर्शनार्थ प्रवर्तना स्पर्शनक्रिया है ॥ १२ ॥ विषयोंके नये नये कारण मिलाना प्रात्ययिकीक्रिया है ॥ १३॥ स्त्रीपुरुषों वा पशुओंके बैठने सोने प्रवर्तनेके स्थानमें मलमूत्रादि क्षेपण करना समंतानुपातक्रिया है ॥१४॥ विना देखी शोधी भूमिपर बैठना शयन करना आदि अनाभोगक्रिया है ॥ १५॥ परके करने योग्य क्रियाको वयं करना खहस्तक्रिया है ॥ १६ ॥ पापोत्पादक प्रवृत्तिको भला समझना वा आज्ञा करना निसर्ग- क्रिया है ॥ १७॥ आलस्यसे प्रशस्तक्रिया न करना अथवा अन्यके किये हुए पापाचरणकाप्रका- श करना विदारणक्रिया है ॥ १८ ॥ चारित्रमोहके उदयसे परमागमकी आज्ञानुसार प्रवर्त- नेमें असमर्थ होकर अन्यथा प्ररूपण करना आज्ञाव्यापादिकी क्रिया है ॥ १९ ॥ प्रमादसे वा अज्ञानतासे परमागमकी उपदेश की हुई विधिमें अनादर करना अनाकांक्षाक्रिया है ॥२०॥ छेदने भेदने छोलनेआदिकी क्रियामें तत्परता होना तथा अन्यके आरंभ करने में हर्प ४७ ACCU URUNG मानना प्रारंभक्रिया है ॥ २१..॥ परिग्रहकी रक्षाके लिये प्रवृत्ति करना पारिग्राहिकी क्रिया है ॥२२॥ ज्ञानदर्शनादिकमें कपटरूप उपाय करना मायाक्रिया है॥२३॥कोई मिथ्या- त्वका कार्य करना वा करनेवालेको उस कार्यमें दृढ कर देना मिथ्यादर्शनक्रिया है.॥२४॥ संयमको घात करनेवाले कर्मके उदयसे संयमरूप नहीं प्रवर्तना अप्रत्याख्यानक्रिया है ॥ २५॥ ये पच्चीसों क्रिया साम्परायिक आसव की कारण हैं ॥५॥ तीव्रमन्दज्ञाताज्ञातभावाधिकरणवीर्यविशेषेभ्यस्त द्विशेषः ॥ ६ ॥ अर्थ-(तीव्रमन्दज्ञाताज्ञातभावाधिकरणवीर्यविशेषेभ्यः) तीवभाव, मंदभाव, ज्ञातभाव, अज्ञातभाव, अधिकरण, और वीर्य इनकी विशेषतासे ( तद्विशेषः) उस आसवमें विशेषता [ न्यूनाधिकता होती है। बाह्याभ्यंतर कारणोंसे बढ़ेहुए क्रोधादिकसे जो तीव्रतारूप परिणाम होते हैं, उनको तीव्रभाव कहते हैं । कषायोंकी मंदतासे जो मंदतारूप भाव होते हैं, उन्हें मंदभाव कहते हैं। जीवोंके घातमें ज्ञानपूर्वक प्रवृत्ति होनेको ज्ञातभाव कहते हैं । मद्यपानादिकसे अथवा इन्द्रियोंको.मोहित करनेवाले मदसे असावधानतासे गमनादिकमें प्रवृत्ति करनेको अज्ञातभाव कहते हैं । जिसके आधार पुरुषोंका प्रयोजन हो, उसको अधिकरण कहते हैं । और द्रव्यकी शक्तिके विशेषपनेको वीर्य कहते हैं । इन सबकी न्यूनाधिकतासे आस्रवों में विशेषता होती है ॥ ६॥ UMAR Pyrror .... -17 मो. Sur ४८ अधिकरणोंको स्पष्ट करनेके लिये सूत्र कहते हैं, अधिकरणं जीवाऽजीवाः ॥७॥ अर्थ-(अधिकरणं) आस्रवका आधार (जीवजीवाः) जीव और अजीव दोनो हैं ॥ ७ ॥ अव जीवाधिकरणके भेद कहते हैं, आचं संरम्भसमारम्भारम्भयोगकृतकारितानुमत- कषायविशेषैस्त्रिस्तिस्त्रिश्चतुश्चैकशः॥८॥ अर्थ-(आय) आदिका जीवाधिकरण जो है सो (संरम्भसमारम्भारम्भयोगकृतकारि- तानुमतकषायविशेषैः) संरंभ समारंभ आरंभ, मनोयोग वचनयोग काययोग कृत- कारित अनुमोदना और क्रोधमान माया लोभ रूप कषायोंके विशेषसे (एकशः)एकएकके (त्रि: त्रि:त्रिचतु) तीन तीन तीन और चार भेद होनेसे १०८ प्रकारका है। अर्थात् संरंभ समारंभ आरंभ इन तीनोंको मनवचनकायरूपतीनों योगोंसे गुणनेसे९,तथाकृत कारित और अनुमोदना इन तीनोंसे गुणनेसे २७, और क्रोध मान,माया लोम इन ४ कपायोंसे गुणनेसे १०८ भेद होते हैं। हिंसा- दिक करनेके उद्यमरूप परिणाम करना संरंभ है, हिंसादिकके साधनोंका अभ्यास करना, उनकी सा- मग्री मिलाना, समारंभहै और हिंसादिकमें प्रवृत्त हो जाना, आरंभहै । खयं करै,सोकृत है । दूसरेसे करावे, सो कारित है और दूसरेके किये कार्यकीप्रशंसा करै,सो अनुमति वा अनुमोदनाहै। 161 ४८ जैसे-१ क्रोधकृतकायसंरंभ, २ मानकृतकायसरंम, ३ मायाकृतकायसरंभ, ४ लोभकृतकायसरंभ, ५क्रोधकारित कायसंरंभ,६मानकारितकायसंरंभ, ७ मायाकारितकायसंरंभ, ८ लोभकारितकायसं- रंभ, ९ क्रोधानुमतकायसरंभ, १० मानानुमतकायसंरंभ, ११ मायानुमतकायसंरंभ, और १२ लोभानुमतकायसंरंभ; इसप्रकार बारह भेद कायसंरंभके हुए। इसीप्रकार १२ मेद वचनसरंभके और १२ भेद मनःसंरंभके मिलानेपर संरंभके ३६ भेद हुए । उनमें ३६ भेद समारंभके, और ३६ भेद आरंभके मिलानेसे सब १०८ भेद होते हैं । सूत्रमें जो च शब्द है, वह अंतरंग भेदोंके संग्रहार्थ है । प्रत्येक कषायके अनंतानुबंधी, अप्रत्याख्यानावरण, प्रत्याख्यानावरण और संज्वलन ये चार २ भेद हैं । इनसे गुणन करनेसे १३२ भेद होते हैं । इसप्रकार जीवके परिणामोंके भेदसे आस्रवोंके भी भेद होते हैं ॥ ८॥ निर्वर्तनानिक्षेपसंयोगनिसर्गा द्विचतुर्द्वित्रिभेदाः परम् ॥९॥ अर्थ-(परं) पर अर्थात् अजीवाधिकरण (निर्वनानिक्षेपसंयोगनिसर्गाः) निर्व- नाधिकरण, निक्षेपाधिकरण, संयोगाधिकरण और निसर्गाधिकरण इसप्रकार चार मेदरूप है। सो द्विचतुर्द्वित्रिमेदाः) क्रमसे दो, चार, दो और तीनभेदोंवाला है। अर्थात् निर्वर्तनादि अधिकर- १ मालामें जो १०८ दाने होते हैं, सो इन ही एकसौ आठ आरंभजनित पापासवोंको दूर करनेकेलिये अथवा इन १०८ आरंभोंको छोड़कर जाप करनेके लिये बैठना चाहिये, इस अभिप्रायसे होते हैं। GUGuru अ. GAUR मो. PURA ६ ४९ गोंके क्रमसे दो चार दो.और तीन मेद हैं । निर्वर्तनाधिकरण रचना करनेवा उत्पन्न करनेको कहते हैं। यह दो प्रकारका है । शरीरसे कुचेष्टा उत्पन्न करना देहदुःप्रयुक्तनिर्वर्तनाधिकरण है। और हिंसाके उपकरण शस्त्रादिकोंकी रचना करना उपकरणनिर्वर्तनाधिकरण है। निर्वर्तनाधि- करणके मूलगुणनिवना और उत्तरगुणनिर्वर्त्तना इसप्रकार मी दो भेद हैं। शरीरमन वचन और श्वासोच्छासोंका उत्पन्न करना मूलगुणनिर्वर्तना है। और काष्ठ पुस्त अर्थात् मिट्टी पाषाणादि- से मूर्तिआदिकी रचना करना वा चित्रपटादि बनाना उत्तरगुणनिर्वनाधिकरण है। निक्षेप-नाम धरने वा रखनेका है । उसके १ सहसानिक्षेपाधिकरण, २ अनाभोगनिक्षेपाधिकरण, ३ दुःप्रमृष्टनिक्षेपाधिकरण और ४ अप्रत्यवेक्षितनिक्षेपाधिकरण ये चार भेद हैं । भयादिकसे अथवा अन्य कार्य करनेकी शीघ्रतासे पुस्तक, कमंडल, शरीर, तथा शरीरके मलादिक क्षेपनेको सहसा- निक्षेपाधिकरण कहते हैं। शीघ्रता न होनेपर भी यहां जीवजंतु हैं कि नहीं हैं ऐसा विचार नहीं कर और विना देखे ही पुस्तक कमंडलु आदि रखने डालने तथा धरनेको और योग्यस्थानमें न घरकर जहां तहां विना देखे ही रखनेको अनाभोगनिक्षेपाधिकरण कहते हैं । दुष्टतासे तथा यत्नाचारतारहित होके उपकरणादिकके रखने वा डालनेको दुःप्रमृष्टनिक्षेपाधिक- रण कहते हैं और विना देखे ही वस्तुका निक्षेपण करना अप्रत्यवेक्षितनिक्षेपाधिकरण है। संयोग-नाम जोड़ने वा मिलानेका है। संयोगाधिकरण भी दो प्रकारका है, एक उपकरणसंयोजना ४९ SUN AUGUA और दूसरा भक्तपानसंयोजना । शीतस्पर्शरूप पुस्तक कमंडलु शरीरादिककोधूपसे तपी हुई पीछीसे पोंछना शोधना उपकरणसंयोजना है। और पान भोजनको अन्य पानभोजनमें मिलांना वा परस्पर मिलाना भक्तपानसंयोजना है। निसर्गाधिकरण तीन प्रकारका है। मनोनिस- र्गाधिकरण, वामिसर्गाधिकरण और कायनिसर्गाधिकरण । दुष्टप्रकारसे मनको प्रवर्ताना मनो- निसर्गाधिकरण है। दुष्टप्रकारसे वचनको प्रवर्चाना वाग्निसर्गाधिकरण है और दुष्टप्रकारसे शरीरको हिलाना चलाना कायनिसर्गाधिकरण है । ऐसे ग्यारह प्रकारका अजीवाधिकरण हैं। जीव और अजीव इन दो अधिकरणोंके आश्रयसे कर्मोंका आगमन (आस्रव ) होता है अतएव इन दोनों अधिकरणोंके भावोंके ये सब विशेष भेद कहे गये हैं ॥ ९॥ ये सामान्य आस्रवके भेद कहे । अब ज्ञानावरणादि विशेष आस्रवोंके कारण कहते हैं, तत्रदोषनिह्नवमात्सर्यान्तरायासादनोपघाता ज्ञानदर्शनावरणयोः ॥१०॥ अर्थ (तत्प्रदोषनिह्नवमात्सर्यान्तरायासादनोपघाताः) ज्ञान तथा दर्शनके विषयमें १ प्रदोष, २ निहव, ३ मात्सर्य, ४ अंतराय,५ आसादन और ६ उपघात ये(ज्ञानदर्शनावरणयोः) ज्ञानावरण और दर्शनावरण कर्मके आस्रव होनेके कारण हैं। कोई पुरुष मोक्षके कारणभूत तत्त्वज्ञान- की प्रशंसायोग्य कथनी कर रहाहो, परन्तु उसको सुनकर ईर्षाभावसे प्रशंसा नहीं करै, या मौन रक्खै इसप्रकारके भावको प्रदोष कहते हैं।जो खयं शास्त्रोंका जानकार विद्वान्होऔर कोई पुरुषजाननेके DOUS -मो.. *५० लिये पूछ"कि,-अमुक पदार्थका खरूप क्या है" तोकह देवै कि,"मैं इस विषयको नहीं जानता" इसप्रकार शास्त्रज्ञानके छिपानेका नाम निहवभाव है । यह पढ़कर पंडित हो जायगा, तो मेरी बराबरी करेगा,इस अभिप्रायसे किसीको पढाना नहीं सोमात्सर्यभाव है। किसीके ज्ञानके अभ्यासमें विघ्न कर देना, पुस्तक, पाठक, पाठशाला स्थानादिका विच्छेद कर देना, अथवा जिस कार्यसे ज्ञानका [ विद्याका ] प्रचार होनेवाला हो, उस कार्यका विरोध करना वा बिगाड़ देना अन्तराय है। अन्यके द्वारा प्रकाशित किये हुए ज्ञानको वर्जन करना-रोक देना कि-"अभी इस विषयको मत कहो" इत्यादि भावको आसादन कहते हैं। और प्रशंसनीय ज्ञानको दूषण लगा- ना सो उपधात है । इन छह कारणोंसे यदिये ज्ञानके विषयमें हों, तौ ज्ञानावरणकर्मोंका और दर्शनके विषयमें हों, तौदर्शनावरणकर्मोंका आस्रवहोता है। यद्यपि आसव हरसमय आयुकर्म के सिवाय सातों कर्मोंका होता है, तथापि स्थिति ( कालकी मर्यादा ) बंध तथा अनुभाग ( फल- देनेकी शक्ति) बंधकी अपेक्षा विशेष कारण कहे गये हैं अर्थात् ऐसे कामोंके करनेसे ज्ञाना- वरणादि कर्मों में स्थिति तथा अनुभांगबंध अधिक होता है ॥ १० ॥ दुःखशोकतापाक्रन्दनवधपरिदेवनान्यात्मपरोभवस्थान्यसद्वेद्यस्य ॥११॥ अर्थ-(दुःखशोकतापाक्रन्दनंवधपरिदेवनानि) दुःख, शोक, ताप, आक्रंदन, बघ परिदे- वन ये(आत्मपरोभयस्थानि) आप करनेसे, अन्यको करनेसे, तथा दोनोंको एकसाथ उत्पन्न ५० AUGU करनेसे, (असदेद्यस्य) असातावेदनीय कर्मका आसव होता है । पीड़ारूप परिणामको दुःख कहते हैं। अपने उपकारक द्रव्यके वियोग [ नष्ट ] होनेपर परिणाम मलीन करना, चिंता करना, खेदरूप होना, शोक है । निंद्य कार्य करनेसे अपनी निंदा होनेपर पश्चात्ताप करना ताप है । परितापके कारण अश्रुपातपूर्वक विलाप करना वा रोना आक्रंदन है। आयु इन्द्रिय बल प्राणादिकका वियोग करना वधं है और ऐसा विलाप करना कि सुननेवालेके चिचमें दया उत्पन्न हो जाय, सोपरिदेवन है। इत्यादि अनेक कारणोंसे असाता वेदनीय कर्मका आस्रव होता है॥११॥ भूतनत्यनुकम्पादानसरागसंयमादियोगः शान्तिः शौचमिति सद्वेद्यस्य ॥१२॥ अर्थ-(भूतव्रत्यनुकम्पादानसरागसंयमादियोगः)भूतवृत्यनुकम्पा,दान, सरागसंयमादि योग, (शान्तिः) क्षमा, और (शौचम् ) शौच (इति) इस प्रकारके भावोंसे ( सवेद्यस्य) सातावेदनीय कर्मका आसव होता है। भूतोंके अर्थात् चारों गतियोंके जीवोंके और व्रतियोंके अर्थात् अहिंसाविब्रतोंके धारण करनेवालोंके दुःखको देखकर उन दुःखोंके दूर करनेरूप परिणामोंको भूतव्रत्यनुकम्पा, परके तथा अपने उपकारार्थ धन, औषधि, आहारादिक देनेको दान कोंको नष्ट करनेमें राग करनेरूप संयमको अथवा रागसहित संयमको सरागसंयम कहते हैं। उ 11 और दुष्ट १ पांचों इन्द्रियोंको और मनको वश करना संयम है।
मो. ur ५१ आदिशब्दसे. संयमासंयम, अकामनिर्जरा, बोलतपादिक समझना चाहिये । इन सबके अनिन्ध आचरणका नाम योग है । शुभ परिणामौकी भावनासे क्रोधादि कपार्योका जो अभाव सो क्षमा है और लोभके त्यागको शौच कहते हैं ॥ १२ ॥ मोहनीयकर्म दो प्रकारका है-एक दर्शनमोहनीय और दूसराचारित्रमोहनीय। इनमेंसे पहिले अनन्तसंसारके कारणखरूप दर्शनमोहनीयके आसवके कारण कहते हैं,- केवलिश्रुतसंघधर्मदेवावर्णवादो दर्शनमोहस्य ॥ १३॥ अर्थ-(केवलिश्रुतसंघधर्मदेवावर्णवादः) केवलज्ञानीका, शास्त्रका, मुनियोंके संघका, अहिंसामय धर्मका और देवोंका अवर्णाद करना ( दर्शनमोहस्य ) दर्शनमोहनीय कर्मके आस्रवका कारण है। केवलज्ञानीके क्षुधा तृपा आहार नीहारादि दोग कहना, कंवलादि वस्त्र तथा पात्रादि कहना, केवलीका अवर्णवाद है । शास्त्रमें मद्यमांसमधु आदिके सेवनका उपदेश है-वेदनासे पीड़ित के लिये मैथुनसेवन रात्रिभोजनादिक कहा है, इत्यादि दोप लगाना, शास्त्रका १ एक देशत्याग करनेको तथा विषयों में बिनाप्रयोजन ही त्याग होनेको संयमासंयम कहते हैं। २ अपने अभिप्रायसे त्याग नहीं करके पराधीनतासे गोगोपभोगका निरोध होना अकामनिर्जरा है । ३ तत्वोंके यथार्थ खरूपरी अनभिज्ञ मिथ्यारष्टीको याल और उसफेतपको वालतप कहते हैं। ४ जो दोष न हों, उनका भी होना बतलाना-निन्दा करना अवर्णवाद है। ५१ अवर्णवाद है । देहसे निर्ममत्व निर्मथ वीतराग मुनीश्वरोंके संघको अपवित्र निर्लज्जआदिकहना, संघका अवर्णवाद है । अहिंसामय जैनधर्मके सेवन करनेवाले सब असुर होते हैं अथवा होवेंगे, ऐसा कहना धर्मका अवर्णवाद है। और देवोंको मांसभक्षी, सुरापायी, भोजन कर- नेवाले, तथा मानुषीसे कामसेवनादि करनेवाले कहना, देवोंका अवर्णवाद है । इनसे दर्शन- मोहनीय कर्मका आसव होता है । १३ ।। कषायोदयात्तीव्रपरिणामश्चारित्रमोहस्य ॥ १४ ॥ अर्थ-(कपायोदयात्) द्रव्य क्षेत्र काल भावके कारण कषायोंके उदयसे (तीव्रपरिणाम) तीव्रपरिणाम होना (चारित्रमोहस्स) चारित्रमोहनीय कर्मके आसवका कारण है ॥ आत्म- ज्ञानी तपखियोंकी निंदा करना, धर्मको नष्ट करना,धर्मसाधनमें अंतराय करना, ब्रह्मचारियोंको ब्रह्मचर्य से चिगाना, देशव्रती महाव्रतियोंको व्रतोंसे चलायमान करना, मद्यमांसमधुके त्यागीको भ्रम पैदा करना, उत्तम चारित्रमें, तथा प्रतिष्ठा और यश कीर्तिमें दूपण लगाना इत्यादि तीन- परिणामोंके कार्य हैं। इन कार्योंसे चारित्रमोहनीय कर्मका. आसव होता है ॥ १४ ॥ अब आयुकर्मके आसवोंमेंसे नरकायुके आसवके कारणोंको कहते हैं, बह्वारम्भपरिग्रहत्वं नारकस्यायुषः ॥ १५॥ अर्थ (बहारम्भपरिग्रहत्वं ) बहुतआरंभ करना, और बहुत परिग्रह रखना (नारकस्य) MUMBAI VU मो. नारकीकी (आयुषः) आयुके आसवका कारण है ॥ १५॥ माया तैर्यग्योनस्य ॥१६॥ अर्थ-(माया) चारित्रमोहके उदयसे उत्पन्न हुआ कुटिलखभाव (तैयग्योनख) तियेच योनिकी आयुके आलवका कारण होता है । जो मनमें और विचारै, वचनसे और ही कहै और शरीरसे और ही प्रवृत्ति करै, उसको मायाचारी कहते हैं ॥ १६ ॥ अल्पारम्भपरिग्रहत्वं मानुषस्य ॥ १७ ॥ अर्थ (अल्पारम्भपरिग्रहत्वं) थोड़ा आरंभ करना और थोड़ा परिग्रह (तृष्णा) रखना, (मानुपस) मनुष्य आयुके आसवका कारण है ॥ १७ ॥ खभावमार्दवं च ॥१८॥ अर्थ-(स्वभावमार्दवं ) खाभाविक कोमलता (च) भी मनुप्यायुके आस्रवकी कारण है ॥ १८॥ निःशीलवतत्वं च सर्वेपाम् ॥ १९॥ अर्थ-(च) और (निम्शीलवतत्वं) दिग्वत देशत्रत आदिक सात शील तथा अहिं- सादिक पांच व्रतोंका धारण नहीं करना, (सर्वेपां) चारों गतियोंके आसवका कारण है ॥१९॥ १ तिर्यग्योनी भवः तैर्यग्योनम्-अणू । G ५२
APUR
BOX
सरागसंयमसंयमासंयमाकामनिर्जराबालतपांसि देवस्य ॥२०॥
अर्थ-(सरागसंयमसंयमासंयमाऽकामनिर्जराबालतपसि) सरागसंयम, संयमासंयम,
अकामनिर्जरा और बालतप (दैवस्य) देवायुबंधके आलवके कारण हैं। कोंके नाश करनेमें
तथा व्रतादिक शुभाचरणकरनेमें रागसहित भाव होना सरागसंयम है। त्रसहिंसाका त्यागरूप
संयम और स्थावरहिंसाका अत्याग रूप असंयम, इसप्रकार संयमअसंयम दोनों प्रकारके परिणाम
होना संयमासंयम है । पराधीनतासे क्षुधा तृषादिकीपीड़ा भोगना, मारना ताड़ना आदि सहना,
परितापादिदुःखभोगनेमें मंदकपायरूप भाव होना अकामनिर्जरा है । और आत्मज्ञानरहित तप
करनाबालतप (अज्ञानतप)है। इनसे तथा हितैषी कल्याण करनेवाले मित्रोंका संबंध करनेसे,धर्मा-
यतनोंके सेवनसे, सत्यधर्मके श्रवणसे, प्रशंसासे,औरप्रभावनादिकसे, देवायुका आसवहोताहै॥२०
सम्यक्त्वं च ॥ २१॥
अर्थ-(च) और (सम्यक्त्वं ) सम्यग्दर्शन भी देवायुका कारण है । परन्तु जुदा
कहनेसे कल्पवासी देवोंकी आयुके ही आसवका कारण है, ऐसा जानना ॥२१ ।।
योगवक्रता विसंवादनं चाशुभस्य नामः ॥ २२ ॥
अर्थ (योगवक्रता) मनवचनकायके योगोंकी वक्रता वा कुटिलता (च) और
(विसंवादनं) अन्यथा प्रवृत्ति ये (अशुभस नाना)अशुभ नामके आसवके कारण हैं ॥२२॥
GAUR मो. १३ तद्विपरीतं शुभस्य ॥ २३ ॥ अर्थ-(तद्विपरीतं) योगवक्रता और विसंवादसे विपरीत मनवचनकायकी सरलता और विसंवादका अभाव (शुभस्य) शुभनामकर्मके आलवका कारण है ।। २३ ।। दर्शनविशुद्धिर्विनयसम्पन्नता शीलवतेष्वनतीचारोऽभीक्ष्णज्ञा- नोपयोगसंवेगौ शक्तितस्त्यागतपसी साधुसमाधियावृत्यकर- णमहदाचार्यवहुश्रुतप्रवचनभक्तिरावश्यकापरिहाणिर्मार्गप्रभाव- ना प्रवचनवत्सलत्वमिति तीर्थकरत्वस्य ॥ २४ ॥ अर्थ-(दर्शनविशुद्धिः) १ पंचीस दोपरहित निर्मलसम्यक्त्व, (विनयसंपन्नता) २ दर्शन ज्ञान चारित्रमें तथा दर्शन ज्ञान चारित्रके धारकोंमें तथा देव, शास्त्र, गुरु और धर्ममें प्रत्यक्षपरोक्ष विनय करना, कपायका अभावकरके आत्माको मार्दवरूप करना, ( शीलवतेष्वनतीचारः) ३ अहिंसादि व्रतोंमें तथा उनके प्रतिपालन करनेवाले क्रोधवर्जनादि शीलोंमें निरतिचार प्रवृत्ति, रखना (अभीक्ष्णज्ञानोपयोगसंवेगौ) ४ निरन्तर तत्त्वाभ्यास करते रहना, ५संसारके दुःखोंसे भयभीत होना, (शक्तितः त्यागतपसी)६ शक्तिको नहीं छिपाकर यथाशक्ति दान करना, ७ कायक्केशादि तप करना, (साधुसमाधिः) ८ मुनियोंके विघ्न और कप्टको दूर करके उनके १ शंकाकांक्षादि आठ दोप, आठ मद, पट् अनायतन और तीन मूढता ये २५ दोप है। H ५३ संयमकी रक्षा करना, (वैयावृत्यकरणम् )९ रोगी साधुमुनिगणोंकी सेवा (टहल ) करना, (अहंदाचार्यबहुश्रुतप्रवचनभक्तिः)१० अरहंतवीतरागकी भक्ति अर्थात् गुणोंमें अनुरागरूप अर्हद्भक्ति, ११ संघमें दीक्षाशिक्षाके देनेवाले संघाधिपति आचार्योंके गुणोमें अनुरागरूप आचा- र्यभक्ति, १२ उपाध्याय महाराजके गुणोंमें अनुरागरूप बहुश्रुतभक्ति, १३ और शास्त्रके गुणोंमें अनुरागरूप प्रवचनभक्ति, (आवश्यकापरिहाणि.) १४ सामायिक, स्तवन, वंदना, प्रतिक्रमण, प्रत्याख्यान और कायोत्सर्ग इन छह आवश्यकीय क्रियाओंमें हानि नहीं करना, (मार्ग प्रभावना)१५ स्याद्वादविद्याध्ययनपूर्वक परमतके अज्ञान अंधकारको दूरकरके जैनधर्मका प्रभाव बढ़ाना व वृद्धिरूपकरना और (प्रवचनवत्सलत्वम् ) १६ साधर्मी जीवोंके साथ गऊबछड़ेके समान प्रीति करना; इसप्रकार सोलह भावनाएं (तीर्थकरत्वस) तीर्थकरप्रकृतिके आसवकी कारण हैं । इन सोलह भावनाओंमेंसे कुछ न्यून हों, तो भी तीर्थंकरप्रकृतिका आस्रव होता है । परन्तु उनमें दर्शनविशुद्धि अवश्य चाहिये ॥२४॥ परात्मनिन्दाप्रशंसे सदसद्गुणोच्छादनो- द्भावने च नीचैर्गोत्रस्य ॥ २५ ॥ अर्थ-(परात्मनिन्दाप्रशंसे) परकी निंदा और अपनी प्रशंसा करना, (च) और (सदसद्गुणोच्छादनोद्भावने) परके विद्यमान गुणोंका आच्छादन करना और अपने अवि- द्यमान गुणोंका प्रकाश करना, ये (नीचैर्गोत्रस्य) नीचगोत्रकर्मके आस्रवके कारण हैं ॥२५॥ . UUUG मो. अ. ६ ५४ तद्विपर्ययो नीचैर्वृत्त्यनुत्सेको चोत्तरस्य ॥ २६ ॥ अर्थ-(तद्विपर्ययो) नीचगोत्रके आत्रवोंके विपरीत कारण अर्थात् अपनी निंदा, परकी प्रशंसा तथा अपने गुण ढकना, परके गुण प्रकाश करना (च) और (नीचैवृत्त्यनुत्सेको)नीच प्रवृत्ति और उत्सेकतोका अभाव, ये (उत्तरस) उत्तरके अर्थात् उच्चगोत्रकर्मके आस्रवके कारण हैं ॥२६॥ विघ्नकरणमन्तरायस्य ॥ २७॥ अर्थ-(विनकरणम् ) परके दान भोगादिकमें विघ्न करना (अन्तरायस्थ) अन्तराय कर्मके आस्रवका कारण है । अर्थात् दान देने में विघ्न करनेसे दानान्तराय कर्मका आसव होता है। परके लाभमें विघ्न डालनेसे लाभान्तराय कर्मका आलव होता है। परके बलवीर्य विगाड़नेसे वीर्यान्तराय कर्मका आस्रव होता है। परके भोगके कारणोंको बिगाड़नेसे भोगा- न्तराय और उपभोगान्तराय कर्मका आस्रव होता है ॥ २७ ॥ इसप्रकार आठौं कमौके आलव होनेके प्रधान २ कारण कहे गये । विशेष कारण असं- ख्यात हैं। ५४ इति श्रीमदुमाखामिविरचिते तत्त्वार्थाधिगमे मोक्षशास्त्रे पष्ठोऽध्यायः ॥ ६॥ १ गुणमि जो बढ़े हों, उनके साथ विनयरूप रहनेको नीचत्ति कहा है । २ गुणोंमें आप बड़ा होकर मद नहीं करनेको अनुत्सेक कहते हैं। DU अथ सप्तमोऽध्यायः प्रारभ्यते । हिंसाऽनृतस्तेयाब्रह्मपरिग्रहेभ्यो विरतिव्रतम् ॥ १॥ अर्थ (हिंसाऽनृतस्तेयाब्रह्मपरिग्रहेभ्यः) हिंसा, अनृत, तेय, अब्रह्म और परिग्रह इनसे (विरतिः) बुद्धिपूर्वक विरक्त होना (व्रतम् ) व्रत है ॥ १॥ देशसर्वतोऽणुमहती ॥२॥ अर्थ-(देशसर्वतः) एकदेशहिंसादिकोंसे और सर्वप्रकारहिंसादिकोंसे विरक्त होना, क्रमसे (अणुमहती) अणुव्रत और महाव्रत हैं । भावार्थ-इन पांचों पापोंका एकदेश त्याग करना अणु- व्रत है और मनवचनकाय कृतकारितअनुमोदनासे सर्वथा त्याग कर देना महाव्रत है॥ २ ॥ MUAVOURUUUUBE १ सामान्य आस्रवका कथन करके विशेष शुभ आस्रवका कथन करने के लिये अध्यायका प्रारम्भ करते हैं। जीव, अशुभ शुभ तथा शुद्ध उपयोगवाले इसप्रकार तीन जातिके होते हैं। जबतक शुद्ध अवस्था नहीं हो, तबतक शुभ अवस्था भी ग्राह्य मानी है। २ हटना, न करना । ३ देशाश्च सर्वे चेति देशंसर्वे, देशसर्वेभ्यः इति देशसर्वतः । अणु च महत्चेति अणुमहती । देशेभ्यो हिंसानृतस्तेयाब्रह्मपरिग्रहेभ्यो विरतिरणुव्रतम् । सर्वेभ्यो हिंसानृतस्त्रेयाब्रह्मपरिग्रहेभ्यो विरतिर्महाव्रतमित्यर्थः । rwAAVA AUG मो. ७ ५५ तत्स्थैर्यार्थ भावनाः पञ्च पञ्च ॥ ३॥ अर्थ-(तत्स्थैर्यार्थ) इन ब्रतोंको स्थिर रखनेकेलिये प्रत्येक व्रतकी (पञ्च पञ्च) पांच पांच (भावनाः) भावना हैं । वारंवार चिंतवन करनेको भावना कहते हैं ॥३॥ प्रथम ही अहिंसावतकी भावना कहते हैं,- वाङ्मनोगुप्तीर्यादाननिक्षेपणसमित्यालोकितपानभोजनानि पञ्च ॥४॥ अर्थ-(वानोगुप्तीर्यादाननिक्षेपणसमित्यालोकितपानभोजनानि)वचनगुप्ति, मनो- गुप्ति, ईर्यासमिति, आदाननिक्षेपणसमिति और आलोकितपानभोजन ये (पञ्च ) पांच अहिंसा व्रतकी भावना हैं । वचनकी प्रवृत्तिको भलेप्रकार रोकना सो वचनगुप्ति है । मनकी प्रवृत्तिको भलेप्रकार रोकना सो मनोगुप्ति है । चार हाथपर्यंत पृथिवीको देखकर यज्ञाचारपूर्वक चलना सो ईर्यासमिति है। भूमिको जीवरहित देखकर वस्तुको यत्नाचारपूर्वक उठाना वा रखना वा डालना सो आदाननिक्षेपणसमिति है । आहार पानादिकमें अन्तरंगकी ज्ञानदृष्टिसे वा नेत्र- दृष्टिसे देख शोधकर भोजनपान करना सो आलोकितपानभोजन है।॥ ४॥ क्रोधलोमभीरुत्वहास्यप्रत्याख्यानान्यनुवीचि भाषणं च पञ्च ॥ ५ ॥ अर्थ-(क्रोधलोभभीरुत्वहास्यप्रत्याख्यानानि) क्रोधका त्याग, लोभका त्याग, भयका nehennenenenenement ५५ ROMICRORE PURUS त्याग, हास्यका त्याग (च) और ( अनुवीचि भाषणं) पापरहित सूत्रके अनुसार [शास्त्रा- नुसार ] बोलना, ये (पञ्च.) पांच सत्यव्रतकी भावना हैं ॥५॥ शून्यागारविमोचितावासपरोपरो- धाकरणमैक्ष्यशुद्धिसधर्माऽविसंवादाः पञ्च ॥६॥ अर्थ-(शून्यागारविमोचितावासपरोपरोधाकरणमैक्ष्यशुद्धिसधर्माविसंवादाः) खा- ली घरमें रहना, किसीके छोड़े हुए स्थानमें रहना, अन्यको रोकना नहीं, शास्त्रविहित मिक्षा- की विधिमें न्यूनाधिक नहीं करना, और सधर्मी भाइयोंसे विसंवाद नहीं करना, ये (पश्च) पांच अचौर्यव्रतकी भावना हैं ॥ ६ ॥ स्त्रीरागकथाश्रवणतन्मनोहराङ्गनिरीक्षणपूर्वरता- नुस्मरणवृष्येष्टरसखशरीरसंस्कारत्यागाः पञ्च ॥ ७ ॥ अर्थ-( स्त्रीरागकथाश्रवणतन्मनोहराङ्गनिरीक्षणपूर्वरतानुसरणबृष्येष्टरसखशरीरसं- स्कारत्यागा:) स्त्रियों में प्रीति उत्पन्न करनेवाली कथाओंके सुननेका त्याग, स्त्रियोंके मनोहर अंगोंको रागसहित देखनेका त्याग, पूर्व कालमें किये हुए विषयभोगोंके सरण कर- नेका त्याग, कामोद्दीपन करनेवाले पुष्टिकर और इन्द्रियोंको लालसा उत्पन्न करनेवाले रसोंका त्याग, और शरीरको शृंगारयुक्त करनेका-त्याग, ये ( पञ्च) पांच ब्रह्मचर्यव्रतकी भावना हैं । UGUA . ១ १६ मनोज्ञामनोज्ञेन्द्रियविपयरागद्वेपवर्जनानि पश्च ॥ ८॥ ' अर्थ-(मनोज्ञामनोजेन्द्रियविपयरागद्वेषवर्जनानि) पांचों इंद्रियोंके स्पर्श रसादिक इप्ट वा अनिष्टरूप पांचों विपयोंमें रागद्वेपका त्याग करना ( पञ्च ) परिग्रह त्यागवतकी पांच भावनाएं हैं । इन पांचों भावनाओंको भावनेसे व्रतोंकी दृढ़ता होती है ॥ ८॥ अब अहिंसादि पांचौ व्रतोंसे उलटे हिंसादिपापोंमें कैसी भावना रखना चाहिये, यह कहते हैं, हिंसादिविहामुत्रापायावयदर्शनम् ॥ ९ ॥ अर्थ-(हिंसादिपु) हिंसादि पांचों पापोंके होनेसे (इह ) इस लोकम तथा (अमुत्र) परलोकों (अपायावयदर्शनम् ) राजदण्ड पंचदण्ड आदि आपचियां तथा छेदन भेदनआदि निंघ कष्ट देखना सहना पड़ते हैं- इसप्रकार चितवन करै ॥ ९ ॥ दुःखमेव वा ॥१०॥ अर्थ-(वा) अथवा हिंसादि पांच पाप (दुःखं एव) दुःखरूप ही हैं, इसप्रकार भावना करना ।। यहां कारणमें कार्यका उपचार हिंसादि पापोंको दुःख कहा है ॥ १०॥ मैत्रीप्रमोदकारुण्यमाध्यस्थ्यानि च सत्त्वगुणाधिक- विश्यमानाविनयेषु ॥ ११ ॥ अर्थ-(मैत्रीप्रमोदकारुण्यमाध्यस्थ्यानि च) भैत्री, प्रमोद, कारुण्य और माध्यस्थ्य एन ५६ ये चार भावनाएं भीक्रमसे (सत्वगुणाधिकक्लिश्यमानाऽविनयेषु) सर्वसाधारण जीवोंमें, गुणा- धिकोमें, दुःखियोंमें और अविनयी वा मिथ्यादृष्टियोंमें करनी चाहिये । भावार्थ-सर्वसाधारणं जीवोंसे मैत्रीभाव रखना मैत्रीभावना है। जो गुणोंमें अधिक हों, उनमें प्रमोद भावना रखना अर्थात् अपनेसे अधिक विद्वानों वा धर्मात्माओंको देखते ही मुखादिकसे प्रसन्नता प्रगट करना तथा हर्पित होकर उनके गुणोंमें अनुरक्त हो भक्ति प्रगट करना प्रमोदभावना है। और रोगादिकसे पीड़ित वा दुःखित जीवोंपर करुणाबुद्धि रखना वा उनके दुःख दूर होने वा क- रनेका अभिप्राय रखना कारुण्यभावना है । और जो जीव तत्त्वार्थके उपदेशको ग्रहणकरने योग्य नहीं हों, अविनयी हों, उनमें रागद्वेषरहित मध्यस्थ भाव रखना माध्यस्थ्यभावना है ११ जगत्कायखभावौ वा संवेगवैराग्यार्थम् ॥ १२ ॥ अर्थ-(वा) अथवा (संवेगवैराग्यार्थ) संवेग और वैराग्यके लिये (जगत्कायख- भाचौ) जगत् और कायके खभावको भी वारंवार चितवन करना चाहिये ॥ १२ ॥ अब क्रमसे पांचों पापोंके लक्षण कहते हैं- प्रमत्तयोगात्प्राणव्यपरोपणं हिंसा ॥ १३॥ अर्थ-(प्रमत्तयोगात् ) प्रमादके योगसे (प्राणव्यपरोपणं) भावप्राण वा द्रव्यप्राणों- १ पांच इंद्रिय, चार कषाय, चार विकथा, रागद्वेष और निद्रा इसप्रकार १५ प्रमाद हैं। UUUU DRONAIKUNRC मो. ७ का वियोग करना (हिंसा) हिंसा है। कषायसहित भाव होनेको अर्थात् आत्माके रागद्वषरूप परिणाम होनेको प्रमत्त कहते हैं । आत्माके ज्ञान दर्शनादिक खभावोंको भावप्राण कहते हैं । श्वास उच्छवासादिकको द्रव्यप्राण कहते हैं ॥ १३ ॥ असदभिधानमनृतम् ॥ १४ ॥ अर्थ-प्रमादके योगसे (असदभिधानं ) किसी जीवको दुख देनेवाला अप्रशस्त वचन कहना ( अनृतम् ) अमृत अर्थात् असत्य है ॥ १४ ॥ अदत्तादानं स्तेयम् ॥ १५॥ अर्थ-लोमादि प्रमादोंके योगसे ( अदत्चादानं) दूसरोंके धनधान्यादिपदार्थोंका उनके विना दिये ग्रहण करना (स्तेयम् ) स्तेय अर्थात् चोरी है ॥ १५॥ मैथुनमब्रह्म ॥ १६ ॥ अर्थ-रागादि प्रमादोंके योगसे (मैथुनं ) स्त्रीपुरुषोंकी परस्पर स्पर्शनादिरूप क्रिया (अब्रह्म ) अब्रह्म अर्थात् कुशील है ॥ १६ ॥ १ पांच इन्द्रिय, तीन बल (मनोयल, वचनयल और कायवल) आयु और श्वासोच्छास ये दश द्रव्यप्राण हैं। २ असुहावना वा अहितकारी । ५७
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मूर्छा परिग्रहः ॥ १७ ॥
अर्थ-(मूर्छा) चेतनअचेतनरूप परिग्रहमें ममत्वरूप परिणाम ही (परिग्रहः)
परिग्रह है। भावार्थ-बाबमें स्त्री पुत्र दासी दास सेवक परिवार गाय भैंस हाथी घोड़ा
धन धान्य सुवर्ण रूंपा मणि मोती शय्या आसन गृह आभरण वस्त्रादिकोमें तथा अभ्यन्तर में
रागादिक परिणामोंमें, जो उपार्जन-संस्कारादिकरूप ममत्वभाव होता है, उसे मूर्छा
कहते हैं । मूर्छा ही परिग्रह है ॥ १७ ॥
निःशल्यो व्रती ॥१८॥
अर्थ (निाशल्यः) जो शल्यरहित है वही (व्रती) व्रती है । माया मिथ्यात्व और
निदान ये तीन शल्य हैं । मनमें और, वचनमें और, तथा कार्यमें और ही कुछ करै, इसको
छल कपट अर्थात् मायाशल्य कहते हैं। तत्त्वार्थका अश्रद्धान सो मिथ्यात्वशल्य है। और आगामी
कालमें विषय भोगोंकी बांछा करना सो निदानशल्य है । इन तीन शल्योंके रहते
अहिंसादिक पांच व्रत धारण करनेपर भी जीव व्रती नहीं हो सकता है। वास्तवमें व्रतोंको धारण-
कर शल्यरहित होनेपर ही व्रती होता है ।। १८ ॥
• अगार्यऽनगारश्च ॥ १९ ॥
मो. ७ ५८ अर्थ-व्रती जीव दो प्रकारके होते हैं, एक ( अगारी) गृहस्थी (च) और दूसरे (अनगारः) गृहत्यागी साधु ॥ १९॥ अणुव्रतोऽगारी ॥२०॥ अर्थ-(अणुव्रतः) अणुमात्र व्रतवाला अर्थात् जिसके एकदेश यथाशक्ति पांचों पापोंका त्याग हो, वह ( अगारी) अणुव्रतीगृहस्थ वा श्रावक कहाता है ॥ द्वीन्द्रियादिक त्रस जीवोंकी हिंसाका त्याग सो प्रथम अहिंसाणुव्रत है । लेह वैर मोह रागादिके वशसे असत्य कहने का त्याग सो द्वितीय सत्याणुव्रत है। दूसरेके विना दिये हुए पदार्थोंके ग्रणको जिससे कि उनको पीड़ा होती है और राजादिदंड देते हैं, चोरी वा चौर्य कहते हैं और उस चौर्यका छोड़ देना-त्याग करना, तृतीय अचौर्याणुव्रत है । अन्यकी ग्रहण की हुई अथवा नहीं ग्रहण की हुई (अविवाहित) स्त्रीसे रमनेका त्याग सो चतुर्थ ब्रह्मचर्याणुव्रत है । और धन धान्य दासी दासादिकका परिमाण करके शेषका त्याग करना सो परिग्रहपरिमाण पांचवाँ अणुव्रत है । इसप्रकार पांच अणुव्रतोंका धारी अणुव्रती वा श्रावक कहलाता है ।। २० ॥ OUR (१) व्रतोंके दो भेद कहे थे-१ अणुव्रत और२ महाप्रत ।"जिनके अणुव्रत हैं, सो अगाारी हैं" ऐसा कहनेसे यह सिद्ध हुआ कि जिनके महावत हैं, वे अनगार अर्थात् साधु मुनि हैं।
अब गृहस्थके जो सात शीलवत हैं, उन्हें कहते हैं- दिग्देशानर्थदण्डविरतिसामायिकोषधोपवासोपभोगपरि- भोगपरिमाणातिथिसंविभागवतसम्पन्नश्च ॥ २१ ॥ अर्थ-दिग्विरति, देशविरति, और अनर्थदंडविरति ये तीन गुणव्रत तथा सामायिक, प्रोपधोपवास, उपभोगपरिमोगपरिमाण और अतिथिसंविभाग ये चार शिक्षाबत हैं। ये सात व्रत भी गृहस्थ व्रतीको धारण करने चाहिये, अर्थात् पांच अणुव्रत और सात शीलवतोसहित १२ व्रतका धारी पूर्ण व्रतीश्रावक (व्रतप्रतिमाका धारी) कहलाता है। लोभ आरंभादिके त्यागके अभिप्रायसे पूर्वादि दिशाओंमें किसी नदी ग्राम नगर पर्वतादि तक गमनागमनका स्थान रख उससे आगे जानेका यावज्जीव त्याग करना सो दिग्नत है। और यावजीवं किए. हुए दिव्रतमेंसे और भी संकोचकर किसी ग्राम नगर गृह मुहल्लेआदि पर्यन्तका गमनागमन रखकर उससे आगे मास, पक्ष, दिन, दो दिन, चार दिन आदि कालकी मर्यादासे गमनागमनका त्याग करना सो देशव्रत है। विना प्रयोजन ही जिन कार्योंसे पापारंभ हो, उन कार्योंका त्याग करना सो अनर्थदंडवत है। जिनमें व्यर्थ ही पापबंध होता है, ऐसे अनर्थदंड पांच प्रकारके हैं।१ पापोपदेश, २ हिंसादान, ३ अपध्यान, ४ दुःश्रुति और ५ प्रमादचर्या । तिर्यंचादिकके क्लेश होनेका, वन- स्पति छेदनेका, पृथिवीके खोदने आदिका उपदेश देना, पापोपदेश अनर्थदंड है । हिंसाके SUREAUGUVAN G मो. अ. ५९ उपकरण शस्त्र, फावड़ा, कुदाल, वेड़ी, सांकल, चावुक, विष, आग्नेय, शस्त्र (तोप बन्दूक) आदि पदार्थीका दान करना हिंसादान अनर्थदंड है । अन्य जीवोंके दोष ग्रहण करनेके भाव, अन्यका धन ग्रहण करनेकी इच्छा, अन्यकी स्त्रीके देखनेकी इच्छा, तथा अन्य मनुप्य तिर्य- चोंके कलह देखनेके भाव, अन्यकी स्त्री पुत्र धन आजीविका बौरहके नष्ट होनेकी चाहना, परका अपमान अपवाद अवज्ञा चाहना इत्यादिका निरंतर ध्यान रखना-चिन्ता करना सो अप- ध्यान अनर्थदंड है । राग, द्वेष, काम, क्रोध, अभिमानके बढ़ानेवाले, हिंसाके पोपण करने- वाले, मिथ्यात्वको बढ़ानेवाले, और मंडकथा तथा युद्धकथाके कहनेवाले वेद पुराण स्मृत्यादिग्रन्थों- का श्रवण करना दुःश्रुति नामक अनर्थदंड है। और विना प्रयोजन ही जल बखेरना, अग्नि जलाना, वनस्पति छेदना, भूमि खोदना, आदिको प्रमादचर्यानामा अनर्थदंड कहते हैं । इन पांच प्रकारके अनर्थ दंडोंका त्याग करना अनर्थदंडविरति है । और तीनों संध्याओंके समय समस्त पापयोग क्रियाओंसे रहित होकर सबसे राग द्वेप छोड़ साम्यभावको प्राप्त होकर शुद्ध आत्म- खरूपमें लीन होना सामायिकवत है । प्रत्येक अष्टमी चतुर्दशीके दिन समस्त आरंभ छोड़कर विपय कपाय और चार प्रकारके आहारोंको त्यागकर धर्मकथाको सुनता हुआ सोलह पहर (पहिले दिनके दुपहरसे लगा, पारनेके दिन दो पहरतक ) व्यतीत करै, सो प्रोपधोपचास है । जो एक बार ही भोगे जाते हैं, ऐसे तांबूल भोजन पान सुगंधि आदि पदार्थ उपभोग १ यहांपर उपभोगका अर्थ एकही बार भोगमें आनेवाली वस्तुओंका है। ५ और जो अनेकबार भोगे जाते हैं, ऐसे आभरण वस्त्र गृह बाहन शय्यादि पदार्थ परिभोग हैं। कुछ भोग परिभोगोंको रखके बाकीका यमनियमरूप त्याग करना उपभोगपरिभोगप- रिमाण है। और अतिथि पुरुषोंको अर्थात् जो मोक्षके अर्थ उद्यमी संयमी और अंतरंग बहिरंगमें शुद्ध होते हैं ऐसे व्रती पुरुषोंको शुद्ध मनसे आहार औषधि उपकरण और वस्तिकाका दान करना अतिथिसंविभाग है । इसप्रकार तीन गुणव्रत और चार शिक्षाव्रत ये सात शीलवत भी गृहस्थको धारण करने योग्य हैं । इस सूत्र में जो च शब्द है, वह आगेके सूत्र में कहे हुए सल्लेखनारूप गृहस्थधर्मके शामिल करनेके लिये है ॥ २१ ॥ मारणान्तिकी सल्लेखनां जोषिता ॥ २२ ॥ अर्थ-(मारणान्तिकी) मृत्युके समय होनेवाली ( सल्लेखनां)सल्लेखनाको (जोषिता) सेवन करै । मृत्युके समय काय और कषायको क्रमसे कृश करते २ धर्मध्यानमें सावधान रहकर प्राणोंके त्यागनेको सल्लेखना कहते हैं । इसको सन्यासमरण व उत्तममरण भी कहते: हैं । गृहस्थको यह परमोपकारी शुभगतिका कारणरूप सर्वोत्तम व्रत भी प्रीतिपूर्वक सेवन करना चाहिये ॥ २२॥ १ यावज्जीव त्याग करनेको यम कहते हैं । २ किंसी नियत समय तकके लिये त्याग करनेको नियम कहते हैं। PORRORE मो. ទី ១ ६० आगे सम्पूर्ण व्रतोंके अतीचार कहेंगे, जिनमेसे पहिले सम्यक्त्वके पांच अतीचार कहते हैं,- शङ्काकाङ्क्षाविचिकित्सान्यदृष्टिप्रशंसासंस्तवाः सम्यग्दृष्टेरतीचाराः॥ २३ ॥ अर्थ-(शङ्काकांक्षाविचिकित्सान्यदृष्टिप्रशंसासंस्तवाः) शंका, कांक्षा, विचिकित्सा अन्यदृष्टिप्रशंसा, और अन्यदृष्टिसंस्तव ये पांच ( सम्यग्दृष्टेः) सम्यग्दर्शनके (अतीचाराः) अतीचार हैं । अरहंत भगवान्के परमागममें पदार्थोंका जो स्वरूप कहा है, उसमें संशय करना अथवा अपने आत्माको ज्ञाता दृष्टा अखंड अविनाशी और पुद्गलसे भिन्न जान करके भी सात प्रकारके भय करना शंका अतीचार है । इसलोक और परलोकसंबंधी भोगोंकी वांछा रखना कांक्षानामा अतीचार है । दुःखी दरिद्री रोगी इत्यादिक क्लेशसम्पन्न जीवोंको देखकर ग्लानि करना वा असमीचीन पदार्थोंको देखकर ग्लानि करना विचिकित्सा अतीचार है। मिथ्यादृष्टीके ज्ञानचारित्रादि गुणोंको मनसे प्रगट करना प्रशंसा अतीचार है । और मिथ्या- दृष्टीके छते अनछते गुणोंका वचनसे प्रगट करना संस्तवनामका अतीचार है । सम्यग्दृष्टीको ये पांच अतीचार भी छोड़ने चाहिये ॥ २३ ॥ १ व्रतको सर्वथा छोड़ देना सो तो अनानार है। और तमें दोप लगाना अतीचार है.। २ इहलोकमय, परलोकभय, मरणभय, वेदनागय, अरक्षाभय, अगुप्तभंग, और अकस्मातभग ये सातप्रकारके भय हैं। ६० BAVA yrry - व्रतशीलेषु पञ्च पञ्च यथाक्रमम् ॥ २४ ॥ अर्थ-इसीप्रकार (व्रतशीलेपु) पांच व्रत और सात शीलोंमें भी ( यथाक्रमम्) क्रमसे ( पञ्च पञ्च) पांच पांच अतीचार हैं, जिन्हें आगेके सूत्रोंमें कहते हैं ॥ २४ ॥ बन्धवधच्छेदातिमारारोपणानपाननिरोधाः ॥२५॥ अर्थ-बन्ध, वध, छेद, अतिभारारोपण और अन्नपाननिरोध ये पांच अहिंसाणुव्रतके अतीचार हैं । पशुआदि जीवोंको . बांधकर अटका रखना बंधातीचार है । लकड़ी चाबुक आदिसे पीटना वधातीचार है । कान. नासिकादि छेदकर दुखी करनाछेदातीचार है । बहुत भार ( शक्तिसे अधिक भार) लादना अतीभारारोपणातीचार है । और खानपानादिरोककर भूखा प्यासा रखना अन्नपाननिरोधातीचार है ॥ २५ ॥ मिथ्योपदेशरहोभ्याख्यानकूटलेखक्रियान्यासापहारसाकारमन्त्रभेदाः ॥२६॥ अर्थ-मिथ्या उपदेश, रहोभ्याख्यान, कूटलेखक्रिया, न्यासापहार और साकारमन्त्रमेद ये पांच सत्याणुव्रतके: अतीचार हैं ॥ परमागमसे विरुद्ध औरका और झूठा उपदेश देना मिथ्योपदेशनामका अतीचार है। स्त्रीपुरुषादिकी गुप्त वार्ताओं वा गुप्त आचरणोंको प्रगट करना रहोभ्याख्यान अतीचार है। झूठे खत स्टाम्प वगैरह लिखना कूटलेखक्रिया है । कोई मनुष्य रुपया गहना आदि धरोहर रख जावै और भूलकर थोड़ा मांग बैठे, तो उसको UU मो. बष्य " हां तुम्हारा जितना हो, उतना ले जाओ" ऐसा कहकर जितना उसने मांगा हो उतना ही देना-पूरा नहीं देना न्यासापहार अतीचार है । और किसीके मुंह आदिकी चेष्टाओंसे उसके मनका गुप्त अभिप्राय जानकर प्रगट कर देना साकारमन्त्रभेद है ॥ २६ ॥ स्तनप्रयोगतदाढ़तादानविरुद्धराज्यातिक्रमहीना- धिकमानोन्मानप्रतिरूपकव्यवहाराः ॥ २७ ॥ अर्थ-स्तेनप्रयोग, तदाहृतादान, विरुद्धराज्यातिक्रम, हीनाधिकमानोन्मान और प्रतिरूपक व्यवहार ये पांच अचौर्याणुव्रतके अतीचार हैं । चोरी करनेका उपाय बताना स्तेनप्रयोगाती- चार है । चोरीकी वस्तु मोल वा विना मोल लेना तदाहृतादान वा चौरार्थादाननामा अती चार है । राजाकी आज्ञाका लोप करके उसके विरुद्ध चलना विरुद्धराज्यातिक्रम अतीचार है। लेने देनेके बांट, तराजू, गज, पायली, बगैरह हीन अधिक रखना हीनाधिक- मानोन्मान नामका अतीचार है। अधिक मूल्यकी वस्तुमें थोड़े मूल्यकी वस्तु मिलाकर अधिक मूल्यसे बेचना अथवा धीमें अरवी, चरबी, दूधर्म पानी, आरारूट औरह मिलाकर और असली बताकर बेचना प्रतिरूपकव्यवहार नामका अतीचार है ॥ २७ ॥ परविवाहकरणेत्वरिकापरिगृहीतापरिगृहीतागम- नानङ्गक्रीड़ाकामतीनाभिनिवेशाः ॥ २८ ॥ Demone ६६ wnRan I अर्थ-परविवाहकरण, परिगृहीतेत्वरिकागमन, अपरिगृहीतेत्वरिकागमन, अनङ्गक्रीडा और कामतीवामिनिवेश ये पांच ब्रह्मचर्याणुव्रतके अतीचार हैं। दूसरोंके लड़की लड़कोंका विवाह करना वा कहकर करा देना परविवाहकरण नामका अतीचार है । दूसरेकी विवाही हुई व्यभिचारिणी स्त्रीके यहां जाना आना वा उसके साथ देन लेन वचनालापादि करना परिग्रहीते- त्वरिकागमन नामका अतीचार है । और जो वेश्यादिव्यभिचारिणी स्त्रियां अपरिगृहीत हैं अर्थात् जिनका कोई खामी नहीं है, उनसे देनलेन वार्तालापादि रखना अपरिगृहीतेत्वरिका- गमन नामका अतीचार है। कामसेवनके अंगोंको छोड़कर अन्य अंगोंसे कामक्रीड़ा करना अनंगक्रीड़ा नामका अतीचार है । और अपनी स्त्रीमें कामसेवनकी अत्यन्त अभिलाषा रखना वा कामक्रीड़ामें अतिशय मन्न रहना कामतीव्राभिनिवेप नामका अतीचार है ॥ २८ ॥ क्षेत्रवास्तुहिरण्यसुवर्णधनधान्यदासीदासकुप्यप्रमाणातिक्रमाः ॥२९॥ अर्थ-क्षेत्रवास्तु, हिरण्यसुवर्ण, धनधान्य, दासीदास और कुप्य इन पांचोंके परिमाणको उलंघन करना परिग्रहपरिमाणव्रतके पांच अतीचार हैं ॥ धान्यादि उत्पन्न होनेके स्थानका नाम क्षेत्र है । रहनेके घर मकान बगैरह वास्तु हैं । रुपया चांदी बगैरहको हिरण्य कहते हैं । सोना व सोनेके गहनोंको सुवर्ण कहते है । गौ बैल मैंस आदिको धन कहते हैं । शालि गेहूं आदि धान्य हैं । शरीर व घरकी सेवा करनेवाली स्त्रियां तथा पुरुष दासीदास हैं।
अ. . २ वस्त्र, थाली, लोटा, कपास, चंदनादि कुप्य हैं । इन सबके परिमाण घटा बढ़ा लेनेसे अतीचार. होते हैं ॥ २९॥ उधिस्तिर्यग्व्यतिक्रमक्षेत्रवृद्धिस्मृत्यन्तराधानानि ॥ ३०॥ अर्थ-उर्दातिक्रम, अघोतिऽक्रम, तिर्यगतिक्रम, क्षेत्रवृद्धि और स्मृत्यंतराधान ये पांच दिनतके अतीचार हैं ॥ परिमाणसे अधिक ऊंचाईके वृक्ष पर्वतादिकोंपर चढ़ना उर्द्धातिक्रम है। परिमाणसे अधिक निचाईके कूप बावड़ीमें नीचे उतरना अघोऽतिक्रम है। बिल पर्वता- दिकी गुफाओंमें सुरंग आदिमें टेड़ा जाना तिर्यक्अतिक्रम है । परिमाण की हुई दिशाओंके क्षेत्रसे अधिक क्षेत्र बढ़ा लेना सो क्षेत्रवृद्धि अतीचार हैं। दिशाओंकी की हुई मर्यादाको मूल जाना स्मृत्यंतराधान अतीचार है ॥ ३०॥ आनयनप्रेष्यप्रयोगशब्दरूपानुपातपुद्गलक्षेपाः ॥ ३१ ॥ अर्थ-आनयन, प्रेष्यप्रयोग, शब्दानुपात, रूपानुपात और पुद्गलक्षेप ये पांच देशविरति व्रतके अतीचार हैं ॥ मर्यादासे बाहरकी वस्तुओंका मंगाना वा किसीको बुलाना आनयन अतीचार है । मर्यादासे बाहरके क्षेत्रमें आप तो न जावै किन्तु सेवकादिको भेजे सो प्रेष्यप्रयोग अतीचार है । मर्यादासे बाहरके क्षेत्रमें तिष्ठते हुए मनुप्यको खांसी वा खंखारने आदिका शब्दकरके अपना अभिप्राय समझा देना शब्दानुपात अतीचार है। ६२ GURU मर्यादासे बाहरके क्षेत्रमें तिष्ठते हुए मनुष्यको अपना रूप दिखाकर हाथके इशारोंसे समझाकर काम करा लेना रूपानुपात अतीचार है और मर्यादासे बाहर कंकर पत्थर आदि फेंककर इशारा करना पुद्गलक्षेप नामका अतीचार है ॥ ३१ ॥ कन्दर्पकौत्कुच्यमौखर्याऽसमीक्ष्या- धिकरणोपभोगपरिभोगानर्थक्यानि ॥ ३२॥ अर्थ-कंदर्प, कौत्कुच्य, मौखर्य, असमीक्ष्याधिकरण और उपभोगपरिभोगानर्थक्य ये पांच अनर्थदंडवतके अतीचार हैं ॥ रागभावकी उत्कटतासे हास्यमिश्रित मंडवचन बोलना कंदर्पा- तिचार है । रागोदयकी तीव्रतासे हास्य और अशिष्ट भंड वचन बोलना और कायसे भी निंदनीय क्रिया करना कौत्कुच्य अतीचार है । धीठतासें बहुतसा निरर्थक प्रलाप करना मौखर्य अतीचार है । प्रयोजनको विना विचारे अधिकतासे प्रवर्चन करना असमी- क्ष्याधिकरण अतीचार है। और भोगउपभोगके जितने पदार्थोंसे अपना काम चल जाता है, उनसे अधिकका संग्रह करना उपभोगपरिभोगानर्थक्य नामका अतीचार है॥ ३२ ॥ योगदुःप्रणिधानानादरस्मृत्यनुपस्थानानि ॥ ३३ ॥ अर्थ-तीनप्रकारके योगदुःप्रणिधान, अनादर और स्मृत्यनुपस्थान ये पांच सामायिकवतके अतीचार हैं । मनको अन्यथा चलायमान करना मनोदुःप्रणिधान नामका अतिचार है।
अ. मो. ६३ वचनको चलायमान करना वाग्दुःप्रणिधान नामका अतीचार है । कायको चलायमान करना कायदु प्रणिधान नामका अतीचार है । उत्साहरहित अनादरसे सामायिक करना अनादर नामका चौथा अतीचार है । और सामायिक एकाग्रताके विना चित्तकी व्यग्रतासे पाठ या क्रियाको भूल जाना स्मृत्यनुपस्थान नामका पांचवां अतीचार है ॥ ३३ ॥ अप्रत्यवेक्षिताप्रमार्जितोत्सर्गादानसंस्तरो- पक्रमणानादरस्मृत्यनुपस्थानानि ॥ ३४॥ अर्थ-अप्रत्यवेक्षित अप्रमार्जित भूमिपर मलमोचनादि करना, तथा उपकरण ग्रहण करना, तथा संथाराआदि बिछाना, व्रतका अनादर करना और स्मृत्यनुपस्थान वा भूल जाना ये पांच प्रोषधोपवासके अतीचार हैं। इस भूमिमें जीव हैं कि नहीं हैं, इसप्रकार नेत्रोंसे देखना प्रत्यवेक्षण है और कोमल उपकरणसे भूमिका शोधना बुहारना प्रमार्जन है । सो. नेत्रोंसे देखे विना व कोमल पिच्छिकादिसे शोधन किये विना भूमिपर मलमूत्र कफादिक डाल देना अप्रत्यवेक्षिता- प्रमार्जितोत्सर्ग नामका अतीचार है । इसीप्रकार देखे शोधे विना अरहंत आचार्यादिकनिकी पूजनके गंधमाल्यधूंपादि उपकरणोंको ' ग्रहण करना · वा वस्त्रपात्रादिकोंको देखे सोधेविना ही घसीटकर उठाना अप्रत्यवेक्षिताप्रमार्जितादान नामका दूसरा अतीचार है । विना देखी विना शोधी भूमिपर शयनासनकेलिये वस्त्रादिक बिछाना अप्रत्यवेक्षिताप्रमार्जितसंस्तरोपंक्रmehereverere PORoment मण नामका तीसरा अतीचार है । क्षुधातृषाकी बाधासे आवश्यकीय धर्मक्रियाओं में अनादरसे प्रवर्त्तना अनादर नामका चौथा अतीचार है। प्रोषधोपवासके दिन करनेयोग्य आवश्यकीयं धर्मक्रियाओंका भूल जाना स्मृत्यनुपस्थान नामका पांचवां अतीचार है ॥ प्रोषधोपवास करने- वालेको इन. पांच अतीचारोंका त्याग करना चाहिए ॥ ३४ ॥ सचित्तसम्बन्धसम्मिश्राभिषवदुःपक्काहाराः॥ ३५ ॥ अर्थ-सचित्त, सचित्तसंबंध, सचित्तसंमिश्र, अभिषव और दुःपक्क ऐसे पांचप्रकारके पदार्थोंका आहार करना उपभोगपरिमाणवतके पांच अतीचार हैं ॥ जीवसहित पुष्पफलादि- कोंका आहार करना सचित्ताहार नामका अतीचार है । सचित्तवस्तुसे स्पर्श हुए पदार्थोंका आहार करना सचित्तसम्बन्धाहार नामका दूसरा अतीचार है । सचित्त पदार्थसे मिले हुए पदार्थोंका आहार करना सचित्तसंमिश्राहार नामका तीसरा अतीचार है । पुष्टिकर पदार्थोंका आहार करना अभिषव नामका चौथा.अतीचार है और भलेप्रकार नहीं पके हुए पदार्थोंका आहार करना तथा जो पदार्थ कष्टसे देरसे परिपक्क ( हजम ) हों, ऐसे पदार्थोंका भोजन करना दुःपकाहार नामका पांचवाँ अतीचार है ॥ ३६ ।। सचित्तनिक्षेपापिधानपरव्यपदेशमात्सर्यकालातिक्रमाः ॥ ३६ ॥ अर्थ-सचित्तनिक्षेप, सचित्तापिधान, परव्यपदेश, मात्सर्य और कालातिक्रम ये पांच अति- IHA unee ७ नो. ३४ थिसंविभागके अतीचार हैं ।। सचित्त (जीवसहित) हरे कमलपत्रादिकोंमें रखकर आहार कराना सचित्तनिक्षेप नामका अतीचार है । सचित्त कमलपत्रादिकसे ढके हुए आहारादिका दान देना सचिचापिधान नामका अतीचार है । अन्यकी वस्तुका दान करना परव्यपदेश है । अनादरसे दान देना वा अन्यदातारसे ईभाव करके दान देना मात्सर्य नामा अतिचार है दान देनेके कालको उलंघन करके अकालमें भोजन देना कालातिक्रम नामका पांचवाँ। अतीचार है ।। ३६ ॥ जीवितमरणाशंसामित्रानुरागसुखानुवन्धनिदानानि ॥ ३७॥ अर्थ-जीविताशंसा, मरणाशंसा, मित्रानुराग, सुखानुबंध और निदान ये पांच सल्लेखना मरणके अतीचार हैं । सल्लेखना धारणकरके जीनेकी आशंसा (इच्छा) करना जीविता- शंसा नामका अतीचार है । रोगादिकके उपद्रवोंसे घबराकर मरनेकी बांछा करना मरणा- शंसा अतीचार है । मित्रोंको स्मरण करना मित्रानुराग नामका अतीचार है । पूर्व- कालमें भोगे हुए भोगोंको याद करना सुखानुबंध नामका अतीचार है । अगले जन्ममें विपयादि सुखोंके प्राप्त होनेकी वांछा करना निदान नामका अतीचार है ॥ ३७॥ अब दानका लक्षण कहते हैं, अनुग्रहार्थ खस्यातिसर्गा दानम् ॥ ३८ ॥ ६४ AVAN अर्थ-(अनुग्रहार्थम् ) अपने और परके उपकारके लिये ( खस्य) धनादिकका वा खार्थका ( अतिसर्गः) त्याग करना ( दानं) दान है ॥ दानसे जो पुण्यबंध होता है, वह तो अपना उपकार है । और जो उससे पात्रके.. सम्यग्ज्ञानादि. गुणोंकी वृद्धि होती है, सो परका उपकार है। ऐसे खपर-उपकारी आहारादिके देनेको दान कहते हैं ॥ ३८ ॥ विधिद्रव्यदातृपात्रविशेषात्तद्विशेषः ॥ ३९॥ अर्थ-(विधिद्रव्यदातपात्रविशेषात् ) विधिविशेष, द्रव्यविशेष, दातारविशेष और पात्रविशेषके कारण ( तद्विशेषः) उस दानमें भी विशेषता है । अर्थात् इन चार कारणोंसे दानके उत्तम मध्यम जघन्यआदि भेद होते हैं और उनके फल भी उत्तम मध्यम जघन्य आदि होते हैं ॥ ३९ ॥ इति श्रीमदुमास्वामिविरचिते तत्त्वार्थाधिगमे मोक्षशास्त्रे ससमोऽध्यायः ॥७॥ UW UMP अतत्त्वका श्रद्धान सो sava अथाष्टमोऽध्यायः प्रारभ्यते । ८ . 0:00 मिथ्यादर्शनाऽविरतिप्रमादकपाययोगा बन्धहेतवः ॥१॥ अर्थ-(मिथ्यादर्शनाविरतिप्रमादकपाययोगाः) मिथ्यात्व, अविरति, प्रमाद, कषाय मिथ्यात्व वा मिथ्यादर्शन है। इसके दो भेद हैं। एक गृहीतमिथ्यात्व और एक अगृहीतमिथ्या- त्व । परके उपदेश वा कुशास्त्रोंके सुननेसे जो अतत्त्वश्रद्धान हो, वह गृहीतमिथ्यात्व है और परके उपदेशादिके विना ही पूर्वोपार्जित मिथ्यात्वकर्मके उदयसे जो.अतत्त्वश्रद्धानहो, वह अगृहीत- मिथ्यात्व वा निसर्गजमिथ्यात्व है । गृहीतमिथ्यात्वके एकान्तमिथ्यात्व, विपरीतमिथ्यात्व, संशयमिथ्यात्व, विनयमिथ्यात्व और अज्ञानमिथ्यात्व इसप्रकार. पांच भेद हैं । वस्तुमें वा पदा- र्थमें जो अनेक धर्म होते हैं, उन सवको गौणकरके एक ही धर्मको मानकर केवल उसीका श्रद्धान करना एकान्तमिथ्यात्व है। सग्रंथको निग्रंथ मानना, केवलीको आहार करनेवाला मानना, स्त्रीको मोक्ष मानना, इसप्रकार उलटे श्रद्धानको विपरीतमिथ्यात्व कहते हैं। 'सम्यग्दर्शनज्ञानचारित्ररूप मोक्षमार्ग है कि नहीं,' इसप्रकारके संदेहरूप श्रद्धानको संशयमिथ्यात्व कहते हैं। समस्तप्रकारके ६५ M A देवों कुदेवों और समस्त प्रकारके दर्शनोंको एक ही मानना तथा सबकी भक्ति करना विनयमिथ्यात्व है। और हिताहितकी परीक्षारहित श्रद्धान करना अज्ञानमिथ्यात्व है । षट्कायके जीवोंकी हिंसाका त्याग नहीं करना और पांच इन्द्रियोंको तथा मनको वशमें नहीं करना, सो बारह प्रकारकी अविरति है। भावशुद्धि, कायशुद्धि, विनयशुद्धि, ईपिथशुद्धि, भैक्ष्यशुद्धि, पापनाशनशुद्धि, प्रतिष्ठापनशुद्धि और वाक्यशुद्धि, इन आठ शुद्धियोंमें तथा दशलक्षणधर्ममें उत्साहरहित परिणाम हो मन्दोद्यमी होनेको प्रमाद कहते हैं । स्त्रीकथा, राजकथा, भोजनकथा और देशकथा ये ४ विकथाएं, क्रोध मान माया लोभ ये ४ कयाय, पांच इद्रियें, निद्रा और राग इसप्रकार प्रमादके १५ भेद हैं । कषायके क्रोधमानमायालोभरूप १६ भेद और हास्य रति अरति. आदि नोकपा- योंके ९ भेद इसप्रकार सब मिलाकर २५ कषाय हैं। चार मनोयोग, चार वाग्योग, पांच काययोग, एक आहारककाययोग और एक आहारकमिश्रयोग ऐसे १५ योग हैं। इन सबसे अर्थात् मिथ्यात्व, अविरति, प्रमाद, कषाय और योगोंसें शुभाशुभ कर्मोंका बंध होता है ॥ १॥ अब बंधका खरूप कहते हैं, सकषायत्वाजीवः कर्मणो योग्यान्मुद्गलानादत्ते स वन्धः ॥२॥ अर्थ (जीवः) जीव (सकपायत्वात् ) कपायसहित होनेसे जो (कर्मणः) ककि (योग्यान्) योग्य (पुद्गलान् ) पुद्गलोंको (आदत्ते) ग्रहण करता है (सः)सो (बन्धः) SUMMAVORE U PUR मो . ८ ६६ बन्ध है। समस्त लोकमें पुद्गलोंके परमाणु भरे हैं। उनमें कार्माणवर्मणाके परमाणु.भी हर जगह मौजूद हैं । यह आत्मा जब-मनवचनकायरूप योगोंकेद्वारा सकंप वा कषायसंहित . होता है, तब वे कार्माणवर्गणाएं कर्मरूप होकर आत्मासे सम्बंध कर लेती हैं। इसीको कर्मबंध कहते हैं। उस समय कषाय यदि मंद होते हैं, तो काँका स्थितिबंध व अनुभागबंध मंद होता है और तीव्र होते हैं, तो तीव्र होता है ॥ २ ॥ प्रकृतिस्थित्यनुभागप्रदेशातद्विधयः ॥३॥ अर्थ-(प्रकृतिस्थित्यनुभागप्रदेशाः) प्रकृतिबन्ध, स्थितिबन्ध, अनुभागवन्ध और प्रदेश- बंध-ये (तद्विधयः) उस बंधकी चार विधिया हैं। प्रकृति नाम खभावका है । जैसे नीमका खभाव कटुक है और गुड़का मीग है । कर्मों में ८ प्रकारके खभावोंका वा रसोंका पड़ना प्रकृ- तिबंध है । ज्ञानावरण, दर्शनावरण, वेदनीय, मोहनीय, आयुः, नाम, गोत्र और अन्तराय ये आठ कर्म हैं । इनमेंसे ज्ञानावरणकी प्रकृति [ खभाव ] आत्माके ज्ञानको आच्छादन करनेकी है । दर्शनावरणकी प्रकृति आत्माके दर्शन अर्थात् ज्ञानके सामान्यावलोकनरूप अंशको अच्छादन करनेकी है । वेदनीयकी प्रकृति आत्मामें सुखदुःख उत्पन्न करनेकी है । मोहनीय कर्ममें मद्य धतूरे आदिके समान मोह उत्पन्न करनेकी प्रकृति है । आयुकर्मका १'प्रकृतिस्थित्यनुभवप्रदेशाः' ऐसा भी पाठ है । Garl . .. खभाव आत्माको किसी भी शरीरमें नियमित समय तक अटकानेका है। नाम कर्मका खभाव आत्माके लिये नानाप्रकारके शरीर अंगोपांगादि रचनेका है । गोत्रकर्म ऊंच नीचकुलमें उत्पन्न करनेकी प्रकृति रखता है । और अन्तराय कर्मकी प्रकृति आत्माके, वीर्य, दान, लाभ, भोगऔर उपभोगोंमें विघ्न डालनेकी है। कर्ममें इसप्रकारके खभाव होनेको प्रकृतिबंध कहते हैं। उक्त आठ प्रकारकी कर्मप्रकृतियां जो आत्माके प्रदेशोंसे बंधरूप हुई हैं, जितने कालतंक रहेंगी अर्थात् जितने समयतक अपने खभावको नहिं छोड़ेंगी, उतने समयकी मर्यादा जिससे पड़ती है, उसे स्थितिबंध कहते हैं । और जिस प्रकार बकरी गौ भैसके दूधमें थोड़ा और अधिक रस होता है, उसी प्रकार कर्मों में तीव्र मध्य मंदरूप रस (फल) देनेकी शक्ति होनेको अनुभागबंध वा अनुभवबंध कहते हैं। उक्त आठ प्रकारके कर्मोंका आत्माके प्रदेशोंसे एक क्षेत्रावगाहरूप संबंध होना प्रदेशबन्ध है । इसप्रकार बंधके १ प्रकार हैं ॥ ३॥ अब प्रकृतिबंधके मूल आठ भेद कहते हैं,- आयो ज्ञानदर्शनावरणवेदनीयमोहनीयायुर्नामगोत्राऽन्तरायाः॥४॥ अर्थ-(आद्यः) आदिका बंध अर्थात् प्रकृतिबन्ध (ज्ञानदर्शनावरणवेदनीयमोहनी- यायुर्नामगोत्रन्तराया) ज्ञानावरण, दर्शनावरण, वेदनीय, मोहनीय, आयु, नाम, गोत्र और मो. PURE ६७ अंतराय इसतरह आठप्रकारका है ॥ अर्थात्-आठप्रकारके खभाववाला है । इनगेंसे ज्ञानावरण दर्शनावरण मोहनीय और अन्तराय घातिकर्ग हैं, और शेपचार अघाति कर्म हैं ॥ ४ ॥ अब इन मूलप्रकृतियोंके उत्तरभेद ( उत्तरप्रकृतियां ) कहते हैं,- पञ्चनवयष्टाविंशतिचतुर्द्विचत्वारिंशविपञ्चभेदा यथाक्रमम् ॥ ५॥ अर्थ-आठप्रकारकी जो मूल प्रकृतियां हैं, उनके (यथाक्रम) क्रमसे (पञ्चनवद्यष्टाविंशति- चतुर्द्विचत्वारिंशद्विपञ्चभेदाः) पांच, नव, दो, अद्वाईस, चार, बियालीस, दो और पांच भेद हैं । भावार्थ-ज्ञानावरणके पांच, दर्शनावरणके नी, वेदनीयके दो, मोहनीयके अट्ठाई- स, आयुके चार, नामकर्मके बियालीस, गोत्रकर्गके दो और अन्तराय कर्मके पांच भेद हैं ॥१॥ अब ज्ञानावरणके पांच भेद कहते हैं, मतिश्रुतावधिमनःपर्ययकेवलानाम् ॥ ६ ॥ अर्थ-मतिज्ञानावरण, श्रुतज्ञानावरण, अवधिज्ञानावरण, मन.पर्ययज्ञानावरण और केवलज्ञा- नावरण ऐसे पांच भेद ज्ञानावरणप्रकृतिके हैं। आवरण नाम परदेका वा ढकनेका अथवा आड़का है। किसी मूर्तिपर कपड़ेका परदा डाल देनेसे जिसतरह उराका आकार नहीं दीख- ता है, उसीप्रकारसे आत्माग जो ज्ञानशक्ति है वह ज्ञानावरणकर्गके परदेसे ढंकी रहनेके कारण प्रगट नहीं हो सकती है । यद्यपि मतिज्ञानावरण और श्रुतज्ञानावरणके मिनित् शायो- ६७ क COM पशमसे थोड़ा बहुत ज्ञान सब जीवोंमें रहता है परन्तु बाकीके सब ज्ञानोंको उक्त पांचोंप्रकारके कर्म न्यूनाधिक रूपमें ढाँके रहते हैं । मतिज्ञानको ढकै, उसको मतिज्ञानावरण कहते हैं। श्रुतज्ञानको ढकै, उसे श्रुतज्ञानावरण कहते हैं । अवधिज्ञानको आवरण करे, उसे अवंधिज्ञा- नावरण कहते हैं । मनःपर्ययज्ञानको आच्छादन करै, उसे मनःपर्ययज्ञानावरण कहते हैं । और केवलज्ञानको आच्छादन करै, उसे केवलज्ञानावरण कर्म कहते हैं ॥ ६ ॥ चक्षुरचक्षुरवधिकेवलानां निद्रानिद्रानिद्रा- प्रचलाप्रचलाप्रचलास्त्यानद्धयश्च ॥७॥ अर्थ-(चक्षुरचक्षुरवधिकेवलाना) चक्षुर्दर्शनावरण, अचक्षुर्दर्शनावरण, अवधिदर्शनावरण और केवलदर्शनावरण ये चार (च) और ( निद्रानिद्रानिद्राप्रचलाप्रचलाप्रचलास्त्यान- गृद्धयः) निद्रा, निद्रानिद्रा, प्रचला, प्रचलाप्रचला, और स्त्यानगृद्धि ये पांच निद्राएं मिलकर नवप्रकृति दर्शनावरणकर्मकी हैं। जिसके उदयसे आत्मा चक्षुरिन्द्रियरहित एकेन्द्रिय वा विकले- न्द्रिय हो अथवा चक्षुरिन्द्रियसहित पंचेंद्रिय हो, तो भी उसके नेत्रोंमें देखनेकी सामर्थ्य नहो अर्थात् अन्धा, काना, वान्यूनदृष्टि हो, उसे चक्षुदर्शनावरणप्रकृति कहते हैं। जिसके उदयसे चक्षुके अति- रिक्त अन्य इन्द्रियोंसे दर्शन ( सामान्यज्ञान ) न हो, उसे अचक्षुर्दर्शनावरणप्रकृति कहते हैं । अवघिदर्शनसे जो सामान्य अवलोकन होता है, उसको आच्छादन करनेवाली अवधि- UAEROUS स मो. ८ ६८ दर्शनावरणप्रकृति है । केवलदर्शनद्वारा जो समस्तदर्शन नहीं होने देती है, उसे केवलदर्शनावरणप्रकृति कहते हैं। मद खेद ग्लानि दूरकरनेके लिये जो नींद ली जाती है, सो निद्रादर्शनावरणप्रकृति है । निद्रापर निद्रा आना निद्रानिद्रादर्शनावरण- प्रकृति है। निद्रानिद्रादर्शनावरणके उदयसे ऐसी निद्रा आती है कि, जीव नेत्रोंको नहीं उघाड़ सकता है। और जिससे शोक, खेद मदादिकके कारण बैठे २ ही शरीरमें विकार उत्पन्न होकर पांचों इन्द्रियोंके व्यापारका अभाव हो जाय, उसे प्रचलादर्शनावरणप्रकृति कहते हैं । इसके उदयसे जीव नेत्रोंको कुछ उघाड़े हुए ही सो जाता है, अर्थात् सोता सोता भी कुछ जानता है, बैठा २ ही घूमने लग जाता है, नेत्र गान चलाया करता है, और देखते हुए भी कुछ नहीं देखता है। जिसके उदयसे मुखसे लाला बहने लग जाय, अंग उपांग चलायमान होते रहैं, सुई आदि चुभानेसे भी चेत न होवे, उसे प्रचलाप्रचलादर्शनावरण प्रकृति कहते हैं। जिस निद्राके आनेपर मनुष्य चैतन्यसा होकर अनेक रौद्रकर्म कर लेता है और फिर वेहोश हो निद्रा छूटनेपर उसे मालूम नहीं रहता है कि मैंने क्या क्या काम कर डाले, उसे स्त्यानगृद्धिदर्शनावरणप्रकृति कहते हैं । इसप्रकार दर्शनावरणप्रकृतिके नव भेद हैं ॥७॥ सदसवेद्ये ॥ ८॥ अर्थ-(सदसवेद्ये) वेदनीयकर्म सत् और असत् भेदसे दोप्रकारका है । अर्थात्- ६८ ------ ma Fun YA एक सातावेदनीय और दूसरा असातावेदनीय ॥ जिसके उदयसे शारीरिक मानसिक अनेकप्रकार सुखरूप सामग्रीकी प्राप्ति हो, उसे सातावेदनीय कहते हैं और जिसके उदयसे दुःखदायक सामग्रीकी प्राप्ति हो, उसे असातावेदनीय कहते हैं ॥ ८॥ अब मोहनीय कर्मकी अट्ठाईस प्रकृतियोंको कहते हैं,- दर्शनचारित्रमोहनीयाकषायकषायवेदनीयाख्यास्त्रिद्विनवषोडशभेदाः सम्य- क्त्वमिथ्यात्वतदुभयान्यकषायकषायौ हास्यरत्यरतिशोकभयजुगुप्सास्त्री(नपुं- सकवेदा अनन्तानुबन्ध्यप्रत्याख्यानप्रत्याख्यानसंज्वलनविकल्पाश्चैकशः क्रोध- मानमायालोमाः ॥९॥ अर्थ-(दर्शनचारित्रमोहनीयाकषायकषायवेदनीयाख्याः) दर्शनमोहनीय, चारित्र- मोहनीय, अकषायवेदनीय , और कषायवेदनीय ये चार मोहनीयकर्म क्रमसे (त्रिद्विनव- षोडशभेदाः) तीन, दो, नव और सोलह प्रकारके हैं । जिनमेंसे दर्शनमोहनीय (सम्य- क्त्वमिथ्यात्वतदुभयानि) सम्यक्त्व, मिथ्यात्व, और सम्यग्मिथ्यात्व तीन प्रकारका है। और चारित्रमोहनीय (अकषायकषायौ) अकषायवेदनीय और कषायवेदनीय ऐसे दो प्रकारका है। फिर इनमेंसे अकषायवेदनीय तो ( हास्यरत्यरतिशोकमयजुगुप्साः स्त्रीपुंनपुंसकवेदाः) हास्य, रति, अरति, शोक, भय, जुगुप्सा, स्त्रीवेद, पुरुषवेद, और नपुंसकवेद ऐसे नव प्रकारका है Ayurvey मो. ८ (च) और कषायवेदनीय (अनन्तानुवन्ध्यप्रत्याख्यानप्रत्याख्यानसंज्वलनविकल्पाः) अनन्तानुबन्धी, अप्रत्याख्यान, प्रत्याख्यान और संज्वलनके भदोसहित (क्रोधमानमाया- लोभाः) क्रोध मान माया और लोमरूप १६ प्रकारका होता है । भावार्थ-मोहनीय कर्मके दो भेद हैं-दर्शनमोहनीय और चारित्रमोहनीय । इनमेंसे दर्शनमोहनीयके सम्यक्त्व, मिथ्यात्व, और सम्यमिथ्यात्व अर्थात् मिश्रमोहनीय ये तीन और चारित्रमोहनीयक अकपायवेदनीय और कषायवेदनीय ये दो भेद हैं। अकपायवेदनीय, हास्य, रति, अरति, शोक , भय, जुगुप्सा, स्त्रीवेद, पुरुपवेद और नपुंसकवेद ऐसे नवप्रकारका है। और कपायवेदनीय १ अनन्तानुबंधीक्रोध, २ अप्रत्याख्यानक्रोध, ३ प्रत्याख्यानक्रोध, ४ संज्वलनक्रोध, ५ अनंतानुबंधीमान, ६ अप्रत्याख्यानमान, ७ प्रत्याख्यानमान, ८ संज्वलनमान, ९ अनंतानुबन्धीमाया, १० अप्रत्याख्यानमाया, ११ प्रत्याख्यानमाया, १२ संज्वलनमाया, १३ अनन्तानुबंधीलोभ, १४ अप्रत्याख्यानलोभ,१५प्रत्याख्यानलोम और १६ संज्वलनलोभ, ऐसे सोलह प्रकारका है। १. किंचित्कपायको ईपत्कपाय वा नोकपाय वा अकपायवेदनीय कहते हैं । आत्माको कपै लेशित करे, उसे कपाय कहते हैं। यहां अकपाय शब्दका अर्थ कपायरहित नहीं है, किन्तु किंचित् कपाय है।
WRON जिसके उदयसे सर्वज्ञभाषित मार्गसे पराङ्मुखता. और तत्त्वार्थश्रद्धानमें निरुत्सुकता वा निरुद्यमता तथा हिताहितकी परीक्षामें असमर्थता होती है, वह मिथ्यात्वप्रकृति है । जब शुभप- रिणामके प्रभावसे मिथ्यात्वका रसहीनहो जाता है, और वह शक्तिके घटनेसे असमर्थहोकर आत्माके श्रद्धानको नहीरोक सकता है,अर्थात सम्यक्त्वको बिगाड़ नहीं सकता, है, तब जिसकाउदय होता है वह सम्यक्त्वप्रकृति है।और जिसके उदयसे तत्त्वोंके श्रद्धानरूप और अश्रद्धानरूप दोनों प्रकारके भाव दही गुड़के मिले हुए खादके समान मिले हुए होते हैं, उसे सम्यग्मिथ्यात्वप्रकृति कहते हैं। ये तीनों ही प्रकृतियां आत्माके सम्यक्त्वभावको घात करनेवाली हैं। जिसके उदयसे हँसी आवे, उसे हास्यप्रकृति कहते हैं। जिसके उदयसे विषयोंमें उत्सुकता वा आसक्तता हो, सो रति है । रतिसे उलटी अरति है। जिसके उदयसे सोच वा चिंता हो, सो शोक है । जिसके उदयसे उद्वेग प्रगट हो, सो भय है। जिसके उदयसे अपने दोषोंका आच्छादन करना और अन्यके कुल शीलादिकमें दोष प्रकट करना हो, अथवा अवज्ञा, तिरस्कार वा ग्लानिरूप भाव हों, सो जुगुप्सा है। जिसके उदयसे पुरुषसे रमनेकी इच्छा हो, सो स्त्रीवेद है, स्त्रीसे रमनेकी इच्छा हो, सो पुरुषवेद है। और स्त्रीपुरुष दोनोंसे रमनेके भाव हो, सो नपुंसकवेद है। १ स्त्रीपुरुष और नपुंसकोंके शरीरों में जो गुप्त अंगोंकी रचना होती है, सो तो नामकर्मके उदयसे होती और रमनेकी इच्छारूप जो कार्य होता है, सो वेदकम जनित हैं।
अ. ८ मो. 90 कषायवेदनीयके १६ प्रकार हैं। जिनमेंसे क्रोध, मान, माया, और लोभ ये चार मुख्य । जिसके उदयसे अपने और परके घात करनेके परिणाम हों, तथा परके उपकार करनेके अभावरूप भाव वा क्रूरभाव हों, सो क्रोधकषाय है । और जाति, कुल, बल, ऐश्वर्य, विद्या, रूप, तप, और ज्ञानादिकके गर्वसे उद्धतरूप तथा अन्यसे नम्रीभूत न होनेरूप परिणाम, सो मानकषाय है । अन्यको ठगनेकी इच्छासे जो कुटिलताकी जाती है, सो माया है। और अपने उपकारक द्रव्योंमें जो अभिलाषा होती है, सो लोभ है । इन चारोंमेंसे प्रत्येकके शक्तिकी अपेक्षासे तीव्रतर, तीव्र, मंद, और मंदतर ऐसे चार चार भेद हैं । अनन्त संसारका कारणजो मिथ्यात्व है, उसके साथ ही रहनेवाले परिणामोंको अनन्तानुवन्धी क्रोधमानमाया- लोम कहते हैं । अप्रत्याख्यानको अर्थात् थोड़े त्यागको जो आवरण करें-रोके, उन परिणामोंको अप्रत्याख्यानक्रोधमानमायालोम कहते हैं । और प्रत्याख्यान अर्थात् सर्व त्यागको जो आवरण करैं अर्थात् महाव्रत नहीं होने देवें, ऐसे परिणामोंको प्रत्याख्यान क्रोधमानमाया- लोभ कहते हैं। और जो संजम के साथ प्रकाशमान रहैं अथवा जिन होनेपर संजम भी प्रकाशमान हुआ करै-बाधा नहीं कर ऐसे क्रोध, मान, माया, लोभरूप परिणामोंको संज्वलनक्रोधमानमायालोम कहते हैं । इसप्रकार प्रत्येकके चार चार भेद होनेसे कषायवे- दनीयकी सोलह प्रकृति हो गई । उनमें ९ अकषायवेदनीयकी और तीन दर्शनमोहकी मिलानेसे मोहनीयकर्मकी २८ प्रकृति हुई । दर्शनमोहकी तीन प्रकृति और अनन्ता- नुबंधी क्रोध, मान, माया, लोम ये चार इसतरह ७ प्रकृति सम्यक्त्वका घात करती हैं। इनके उदय रहते सम्यक्त्व नहीं होता है, अप्रत्याख्यानरूप क्रोध, मान, माया, लोमके उदय रहते श्रावकके व्रत नहीं होते हैं, प्रत्याख्यान चौकड़ीके उदय रहते महाव्रत नहीं होते हैं और संज्वलन चौकड़ीके उदयसे यथाख्यातचारित्र नहीं होता है ॥९॥ अब आयुकर्मके चार भेद बतलाते हैं- नारकतैयेग्योनमानुषदैवानि ॥१०॥ अर्थ-नारकायु, तिर्यंचायु, मनुष्यायु और दैवायु इसतरह चार आयुकर्मकी प्रकृति हैं । जिसके सद्भावसे आत्मा नरकादिक गतियोंमें जीवे और अमावसे मरणको प्राप्त हो जाय, उसको आयुकर्म कहते हैं ॥ १०॥ अब नामकर्मकी बियालीस प्रकृति कहते हैं- गतिजातिशरीराङ्गोपाङ्गनिर्माणवन्धनसंघातसंस्थानसंहनन- स्पर्शरसगन्धवर्णानुपूर्व्यागुरुलधूपघातपरघातातपोद्योतोच्छा सविहायोगतयः प्रत्येकशरीरत्रससुभगसुखरशुभसूक्ष्मपर्याप्ति- स्थिरादेययश-कीर्तिसेतराणि तीर्थकरत्वं च ॥ ११ ॥ DAUWW A अ. ८ मो. ७१ अर्थ-( गतिजातिशरीराङ्गोपाङ्गनिर्माणबन्धनसंघातसंस्थानसंहननस्पर्शरसगन्धव- र्णानुपूर्व्यागुरुलघूपाचपरघातातपोद्योतोच्यासविहायोगतयः) गति, जाति, शरीर, अंगो- पांग; निर्माण, वन्धन, संस्थान, संहनन, स्पर्श, रस, गंध, वर्ण, आनुपूर्वी, अगुरुलघु, उपघात, परघात, आतप, उद्योत, उच्छास और विहायोगति ये इक्कीस तथा (प्रत्येकशरीरत्रससुभग- सुखरशुभसूक्ष्मपर्याप्तिस्थिरादेययश कीर्तिसेतराणि) प्रत्येकशरीर, त्रस, सुभग, सुखर,शुभ, सूक्ष्म, पर्याप्ति, स्थिर, आदेय, यश-कीर्ति ये दश तथा इनकी उलटी साधारणशरीर, स्थावर, दुर्भग, दुःखर, अशुभ, वादर, अपर्याप्ति, अस्थिर, अनादेय, और अयशस्कीर्ति ये दश, (च) और (तीर्थकरत्वं) तीर्थकरत्व, इसप्रकार १२ प्रकृति हैं ॥ ११ ॥ १। जिसके उदयसे आत्मा भवान्तरके प्रति सन्मुख होकर गमनको प्राप्त होता है, सो गतिनाम कर्म है । यह चारप्रकारका है-नरकगति, तिर्यंचगति, देवगति और मनुष्यगति। जिसके उदयसे आत्मा नरकमें जावे, उसको नरकगति नामकर्म, जिसके उदयसे तिर्यंचयोनि- में जाय, उसे तिर्यग्गति नामकर्म, जिसके उदयसे मनुष्य जन्मको प्राप्त हो, उसे मनुष्यगति- नाम कर्म और जिसके उदयसे देवपर्यायको प्राप्त हो, उसे देवगति नामकर्म कहते हैं । २ । उक्त नरकादि गतियोंमें जो अविरोधीसमानधर्मोसे आत्माको एक रूप करता है, सो जातिनामकर्म है । उसके पांच भेद-एकेंद्रियजातिनामकर्म, द्वीद्रियजाति नामकर्म, त्रीद्रि- She ७१ NAMROre यजाति नामकर्म, चतुरिंद्रियजाति नामकर्म और पंचेंद्रियजाति नामकर्म । जिसके उदयसे आत्मा एकेन्द्रियजाति होय, उसे एकेन्द्रियज़ाति नामकर्म, जिसके उदयसे द्वींद्रियजाति हो, उसे द्वींद्रियजाति, जिसके उदयसे त्रीन्द्रियजाति हो, उसे त्रीन्द्रियजाति, जिसके उदयसे चतुरिंद्रियजाति हो, उसे, चतुरिंद्रियजाति और जिसके ‘उदयसे पंचेन्द्रियजाति हो, उसे पंचेन्द्रियजाति नामकर्म कहते हैं। ३.। जिसके उदयसे शरीरकी रचना होती है, उसे शरीरनामकर्म कहते हैं । शरीर नामकर्म भी पांचप्रकारका है । १ औदारिकशरीर, २ वैक्रियिकशरीर, ३ आहारकशरीर, ४ तैजसशरीर और ५ कार्मणशरीर । जिसके उदयसे औदारिकशरीरकी रचना हो, वह औदारिकशरीर, जिसके उदयसे वैक्रियिकशरीरकी रचना हो, वह वैक्रियिकशरीर, जिसके उद- यसे आहारकशरीरकी रचनाहो, वह आहारकशरीर जिसके उदयसे तैजसशरीरकी रचना हो, वह तैजसशरीर और जिसके उदयसे कार्मणशरीरकी रचना हो, वह कार्मणशरीर नामकर्म है। ४। जिसके उदयसे अंग उपांगोंका मेद प्रगट हो, उसको अंगोपांगनामकर्म कहते हैं। मस्तक, पीठ, हृदय, बाहु, उदर, जांघ, हाथ, और, पांव इनको तो अंग कहते हैं और १ गोम्मटसारमें हृदयकी जगह नितम्ब, और जंघाओंकी जगह पांव तथा दोनों जंघाएं और दोनों भुजाएं कहीं हैं। वाहूमें हाथका समावेश किया है। OM AUGURYAN .
मो. अ. ७२ इनके ललाटनासिकादि भागोंको उपांग कहते हैं । अंगोपांग नामकर्म तीनप्रकारका है- औदारिकशरीरांगोपांग, वैक्रियिकशरीरांगोपांग और आहारकशरीरांगोपांग ॥ ५। जिसके उदयसे अंग उपांगोंकी उत्पत्ति हो, उसे निर्माणनामकर्म कहते हैं। निर्माण नामकर्म दो प्रकारका है-एक स्थान निर्माण, दूसरा प्रमाणनिर्माण । जातिनामा नामकर्मके उदयसे जो नाक कान आदिको योग्य स्थानमें निर्माण करता है, सो तो स्थाननिर्माण- नामकर्म है और जो उन्हें योग्य लम्बाई चौड़ाई आदिका प्रमाण लिये रचना करता है, सो प्रमा- णनिर्माण है ॥ ६। जिसके उदयसे शरीरनामकर्मके वशसे ग्रहण किये हुए आहारवर्गणाके पुद्गलस्कंधोंके प्रदेशोंका मिलना हो, वह बन्धननामकर्म है । बंधननामकर्म पांचप्रकारका है-१ औदा- रिकवंधननामकर्म, २ वैक्रियिकबंधननामकर्म, ३ आहारकबंधननामकर्म, ४ तैजसवंधन नामकर्म, और ५ कार्मणबंधननामकर्म । जिसके उदयसे औदारिक बंध हो, सो औदारिकबंधन नामकर्म है। जिसके उदयसे वैक्रियिकबंध हो, वह वैक्रियिकबंधन नामकर्म है। जिसके उदयसे आहारकबंध हो, वह आहारकबंधन नामकर्म है । जिसके उदयसे तैजसबंध हो, वह तैजसबंधन नामकर्म है । और जिसके उदयसे कार्मणबन्ध हो, वह कार्मणबंध नामकर्म है। ७ । जिसके उदयसे औदारिक आदि शरीरोंका छिद्ररहित अन्योऽन्यप्रदेशानुप्रवेशरूप । ७२ संघटन ( एकता) हो, उसे संघात नामकर्म कहते हैं । संघात मी. औदारिकसंघात, वैक्रि- यिकसंघात, तेजससंघात, आहारकसंघात और कार्मणसंघात भेदसे पांच प्रकारका है। जिसके उदयसे औदारिक शरीरमें छिद्ररहित संधियाँ (जोड़) हों, वह औदारिकसंघात है। जिसके उदयसे वैक्रियिकशरीरमें संघात हो, वह वैक्रियिकसंघात है । जिसके उदयसे आहारकशरीरमें संघात हो, वह आहारकसंघात है । जिसके उदयसे तैजसशरीरमें संघात हो, वह तैजससंघात हैं और जिसके उदयसे कार्मणशरीरमें संघात हो, वह कार्मणसंघात है ॥ ८। जिसके उदयसे शरीरकी आकृति (आकार) उत्पन्न हो, उसे संस्थाननामकर्म कहते हैं । यह छह प्रकारका है-१ समचतुरस्रसंस्थान नामकर्म, २ न्यग्रोधपरिमंडलसंस्थान नामकर्म, ३ खातिसंस्थान नामकर्म, ४ कुजकसंस्थान नामकर्म, ५ वामनसंस्थान नामकर्म और ६ हुंडकसंस्थान नामकर्म । जिसके उदयसे ऊपर नीचे और मध्यमें समान विभागसे शरीरकी आकृति उत्पन्न हो, उसे समचतुरस्रसंस्थान नामकर्म कहते हैं । जिसके उदयसे शरीरका नाभिके नीचेका भाग वटवृक्षके समान पतला हो और ऊपरका स्थूल व मोटा हो, वह न्यग्रो- धपरिमंडलसंस्थान नामकर्म है । जिसके उदयसे शरीरके नीचेका माग स्थूल या मोटा हो और ऊपरका पतला हो, उसे खातिसंस्थान नामकर्म कहते हैं । जिसके उदयसे पीठके मागमें बहुतसे पुद्गलोंका समूह हो अर्थात् कुबड़ा शरीरहो, उसे कुजकसंस्थान नामकर्म कहते GO - मो. GURUR ८ ७३ हैं। जिसके उदयसे शरीर बहुत छोटा हो, वह वामनसंस्थान नामकर्म है और जिसके उदयसे शरीरके अंग उपांग कहींके कहीं, छोटे बड़े, वा संख्या न्यूनाधिक हों, इसतरह विषम बेडौल आकारका शरीर हो, उसे हुंडकसंस्थान नामकर्म कहते हैं । ९। जिसके उदयसे शरीरके अस्थिपंजरादिके (हाड़ बगैरहके) बंधनों में विशेषता हो, उसे संहनननामकर्म कहते हैं । यह छह प्रकारका है। १ वज्रवृपभनाराचसंहनन नामकर्म, २ वज्रनाराचसंहनन नामकर्म, ३ नाराचसंहनन नामकर्म, ४ अर्द्धनाराचसंहनन नामकर्म, ५ कील- कसंहनन नामकर्म, और ६ असंप्राप्तासुपाटिकासंहनन नामकर्म । नसोंसे हाड़ोंके बंधनेका नाम ऋपम वा वृषभ है । नाराच नाम कीलनेका है, और संहनन नाम हाड़ोके समूहका है । सो जिस कर्मके उदयसे वूपम ( वेष्टन) नाराच (कील) और संहनन ( अस्थिपंजर) ये तीनों ही वज्रके समान अमेय हों, उसे वज्रवृपभनाराचसंहनन नामकर्म कहते हैं । जिसके उद- यसे नाराच और संहनन तो वज्रमय हो और वृपम सामान्य हो, वह वज्रनाराचसंहनन नामकर्म है। जिसके उदयसे हाड़ तथा संधियोंके कीले तो हों, परन्तु वज्रमय न हों और वज्रमय वेष्टन भी न हो, सो नाराचसंहनन नामकर्म है । जिसके उदयसे हाड़ोंकी संधियां अर्द्धकीलित हों, अर्थात् एक तरफ तो कीलें हों दूसरी तरफ न हों, यह अर्द्धनाराचसंहनन नामकर्म है। जिसके उदयसे हाड़ परस्पर कीलित हों, सो कीलकसंहनन नामकर्म है । और ७३ जन जिसके उदयसे हाड़ोंकी संधियां तो कीलित न हों, किन्तु नसों, खायुयों और मांससे बंधी हों, वह असंप्राप्तामृपाटिकासंहनन नामकर्म है। १०। जिसके उदयसे शरीरमें स्पर्शगुण प्रगट होता है, उसे स्पर्शनामकर्म कहते हैं। यह आठ प्रकारका है-१ कर्कशस्पर्श नामकर्म, २ मृदुस्पर्श नामकर्म, ३ गुरुस्पर्श नामकर्म, ४ लघुस्पर्श नामकर्म, ५ स्निग्धस्पर्श नामकर्म, ६ रूक्षस्पर्श नामकर्म, ७ शीतस्पर्श नामकर्म, और ८ उष्णस्पर्श नामकर्म ॥ ११। जिसके उदयसे देहमें रस (खाद ) उत्पन्न हो, उसे रस नामकर्म कहते हैं। यह पांच प्रकारका है.--१ तिक्तरस नामकर्म, २ कडुरस नामकर्म, ३ कषायरस नामकर्म, ४ आम्लरस नामकर्म, और ५ मधुररस नामकर्म ॥ ..१२ । जिसके उदयसे शरीरमें गन्ध प्रगट हो, सो गन्धनामकर्म है। यह दो प्रकारका है। एक सुगंध नामकर्म दूसरा दुर्गन्ध नामकर्म ॥ १३ । जिसके उदयसे शरीरमें वर्ण ( रंग ) उत्पन्न हो, उसे वर्णनामकर्म कहते हैं। यह पांच प्रकारका है।-१ शुक्लवर्ण नामकर्म, २ कृष्णवर्ण नामकर्म, ३ नीलवर्ण नामकर्म, ४ रक्तवर्ण नामकर्म, और ५ पीतवर्ण नामकर्म ॥ १४ । पूर्वायुके उच्छेद होनेपर पूर्वके निर्माण नामकर्मकी निवृत्ति होनेपर विग्रहगतिमें SAURU DURV ܀ ८ Fen जिसके उदयसे पूर्वके तैजस कार्मण शरीरके आकारका विनाश नहीं हो, उसे आनुपूज्य नामकर्म कहते हैं। इसके चार भेद हैं-१ नरकगतिप्रायोग्यानुपूर्व नामकर्म, २ देवगति- प्रायोग्यानुपूर्व्य नामकर्म । ३ तिर्यग्गतिप्रायोग्यानुपूर्य नामकर्म, और ४ मनुष्यगतिप्रायोग्यानु- पूर्वी नामकर्म । जिस समय मनुप्य व तिर्यचकी आयु पूर्ण हो और आत्मा शरीरसे पृथक् होकर नरकभवप्रति जानेको सन्मुख हो, उस समय मार्गमें जिसके उदयसे आत्माके प्रदेश पहिले शरीरके आकारके रहते हैं, उसको नरकगतिप्रायोग्यानुपूर्दी कहते हैं । इस कर्मका उदय विहायोगतिमें ही होता है । इसी प्रकार अन्य तीनों भी समझना । इस कर्मका उदय- काल जघन्य एक समय, मध्यम दो समय, और उत्कृष्ट तीन समयमात्र है। १५ ।जिसके उदयसे जीवोंका शरीर लोहपिंडकेसमान भारीपनके कारण नीचे नहीं पड़ जाता है, और आककी रूईके समान हलकेपनसे उड़ भी नहीं जाता है, उसको अगुरुलघुनाम कर्म कहते हैं । यहाँपर शरीरसहित आत्माके संबन्धमें अगुरुलघु कर्मप्रकृति मानी गई है । अन्यद्रव्योंमें जो अगुरुलघुत्व है, वह खाभाविक गुण है ॥ १६ । जिसके उदयसे शरीरके अवयव ऐसे होते हैं कि उनसे उसीका बंधन वा घात हो जाता है, उसे उपघात नामकर्म कहते हैं ॥ ७४ GUSUAL १७ । जिसके उदयसे पैनें सींग नख वा डंक इत्यादि परको घात करनेवाले अवयव होते हैं, उसको परघात नामकर्म कहते हैं। १८ । जिसके उदयसे आतापकारी शरीर होता है, वह आताप नामकर्म है। इस कर्मका उदय सूर्यके विमानमें जो बादर पर्याप्त जीव पृथिवीकायिक मणिखरूप होते हैं, उनके ही होता है-अन्यके नहीं होता। १९ । जिसके उदयसे उद्योतरूप शरीर होता है, सो उद्योत नामकर्म है । इसका उदय चंद्रमाके विमानके पृथ्वीकायिक जीवोंके तथा आगिया ( पटवीजना जुगनू) आदि जीवोंके होता है । २० । जिसके उदयसे शरीरमें उच्छास उत्पन्न हो, सो उच्छ्वास नामकर्म है ॥ २१ । जिसके उदयसे आकाशमें गमन हो, उसे विहायोगति नामकर्म कहते हैं। यह दो प्रकारका है। जो हाथी बैलआदिकी गतिके समान सुंदर गमनका कारण होता है, वह तो प्रशस्तविहायोगति नामकर्म है । और जो ऊंट गर्दभादिकके समान असुंदर गमनका कारण होता है, सो अप्रशस्तविहायोगति नामकर्म है । मुक्त होनेपर जीवके तथा चेतनार- हित. पुद्गलके जो गति होती है, वह खाभाविक गति है। उसमें कर्मजनित कारण नहीं है। न मो. ८ ७५ २२ । जिसके उदयसे एक शरीर एक आत्माके भोगनेका कारण हो, उसे प्रत्येकशरीर नामकर्म कहते हैं। २३ । जिसके उदयसे एक शरीर बहुतसे जीवोंके उपभोगनेका कारण हो, उसे साधार- णशरीर नामकर्म कहते हैं । जिन अनन्त जीवोंके आहारादि चार पर्याप्ति, जन्म, मरण, श्वासोच्छास, उपकार और उपघात एक ही कालमें होते हैं, वे साधारण जीव हैं । जिस कालमें आहारादि पर्याप्ति जन्ममरण श्वासोच्छासको एक जीव ग्रहण करता है, उसी कालमें दूसरे भी अनंत जीव ग्रहण करते हैं । ये साधारण जीव वनस्पतिकायम होते हैं, अन्य स्थावरोंमें नहीं होते । इनके साधारणशरीरनामकर्मका उदय रहता है ।। २४ । जिसके उदयसे आत्मा द्वीन्द्रियादिक शरीर धारण करता है, सो त्रस नामकर्म है। २५ । जिसके उदयसे जीव पृथ्वी अप तेज वायु और वनस्पतिकायमें उत्पन्न होता है, सो स्थावर नामकर्म है। २६ । जिसके उदयसे अन्यके प्रीति उत्पन्न हो अर्थात् दूसरोंके परिणाम देखते ही प्रीति- रूप हो जावें, उसे सुभग नामकर्म कहते हैं । २७ जिसके उदयसे रूपादि गुणों से युक्त होनेपर भी दूसरोंको अप्रीति उत्पन्न हो, बुरा मालूम हो, उसे दुर्भग नामकर्म कहते हैं । ७५ UPER -" २८ । जिसके उदयसे मनोज्ञखरकी अर्थात् सबको प्यारे लगनेवाले शब्दकी प्राप्ति हो, उसे सुखर नामकर्म कहते हैं २९ । जिसके उदयसे अमनोज्ञखरकी प्राप्ति हो, उसे दुःखर नामकर्म कहते हैं । :३० । जिसके उदयसे मस्तक आदि अवयव सुंदर हों-देखनेमें रमणीक हो, उसे शुभ नामकर्म कहते हैं। ३१। जिसके उदयसे मस्तकादिक अवयव रमणीक नहीं हों, उसे अशुभ नामकर्म कहते हैं । ३२ जिसके उदयसे ऐसा सूक्ष्म शरीर प्राप्त हो, जो अन्य जीवोंके उपकार वा घात करनेमें कारण न हो, पृथ्वी जल अमि पवन आदिकसे जिसका घात नहीं हो, और जो पहाड़ आदिकमें प्रवेश करते हुए भी नहीं रुकै, उसे सूक्ष्मशरीर नामकर्म कहते हैं। ३३ । जिसके उदयसे. अन्यको रोकने योग्य वा अन्यसे रुकने योग्य स्थूलशरीर प्राप्त हो, उसको चादरशरीर नामकर्म कहते हैं । ३४॥ जिसके उदयसे आहारादि पर्याप्ति पूर्ण करता है, उसे पर्याप्ति नामकर्म कहते हैं। पर्याप्ति नामकर्म छह प्रकारका है। १ आहारपर्याप्ति, २ शरीरपर्याप्ति, ३ इन्द्रियपर्याप्ति, ४ प्राणापानपर्याप्ति, ५ भाषापर्याप्ति और ६ मनःपर्याप्ति । Aurna GE Vल अ. यहां यह प्रश्न हो सकता है कि, प्राणापानपर्याप्ति नामकर्मके उदयका जो उदरसे पवनका निकलना वा प्रवेश होना फल है, वही उच्छास कर्मके उदयका भी है। फिर इन दोनोंमें अन्तर क्या हुआ ? सो इसका उत्तर यह है कि इन दोनोंमें इन्द्रिय अतीन्द्रियका भेद है । अर्थात् पंचेन्द्रिय जीवोंके सर्दीगर्मीके कारण जो खास चलती है और जिसका शब्द सुन पड़ता तथा मुंहके पास हाथ ले जानेसे जो स्पर्शसे मालूम होती है, वह तो उच्छास नामकर्मके उदयसे होती है और जो समस्त संसारी जीवोंके होती है और इन्द्रियगोचर नहीं होती है, वह प्राणापानपर्याप्तिके उदयसे होती है। एकेन्द्रिय जीवोंके भाषा और मनको छोड़- कर चार, द्वीन्द्रिय त्रींद्रिय चतुरिन्द्रिय और असैनी पंचेन्द्रिय जीवोंके भाषासहित पांच और सैनी पंचेन्द्रियके छहों पर्याप्ति होती हैं। ३५ । जिसके उदयसे जीव छहों पर्याप्तियोंसे एकको भी पूर्ण नहीं कर सकै, उसे अप- योप्ति नामकर्म कहते हैं। ३६ । जिसके उदयसे रसादिक सात धातुएं और उपधातुएं अपने अपने स्थानमें स्थिरताको प्राप्त हों, दुष्कर उपवासादिक तपश्चरणसे भी अंग उपांगोंमें स्थिरता बनी रहै-रोग नहीं होवै, उसे स्थिरनामकर्म कहते हैं । रस, रुधिर, मांस, मेद, हाड़, मज्जा, और वीर्य ये सात धातुएं । वात, पित्त, कफ, शिरा, वायु, चाम, और जठरामि ये सात उपधातुएं हैं। ७६ AMAU ३७ । जिसके उदयसे किंचित् उपवासादिक करनेसे तथा किंचिन्मात्र सर्दी गर्मी लगनेसे अंगोपांग' कृश हो जॉय-धातु उपधातुओंकी स्थिरता नहीं रहै-रोग हो जावें, उसे अस्थिरनाम- कर्म कहते हैं। ३८ । जिसके उदयसे प्रभासहित शरीर हो, उसे आदेयनामकर्म कहते हैं । ३९ । जिसके उदयसे शरीर प्रभारहित हो, वह अनादेयनामकर्म है। १०। जिसके उदयसे पुण्यरूप गुणोंकी ख्याति प्रगट हो, उसे यश कीर्तिनामकर्म कहते हैं। ४१ । जिसके उदयसे पापरूप गुणोंकी ख्याति हो, उसे अयश-कीर्तिनामकर्म कहते हैं। ४२ । जिस प्रकृतिक उदयसे अचिन्त्यविभूतिसंयुक्त तीर्थकरपनेकी प्राप्ति हो, उसे तीर्थ- करत्वनामकर्म कहते हैं। इसप्रकारं नामकर्मकी ४२ प्रकृतियां हैं और इनके अवान्तरमेदोंको जोड़नेसे सब ९३ हो जाती हैं। इनमें पहिली चौदह प्रकृतियोंको पिण्ड (मेदवाली) प्रकृति कहते हैं ॥११॥ उच्चै चैश्च ॥ १२॥ अर्थ (उच्चैः) उच्चगोत्र (च) और (नीचैः) नीचगोत्र ऐसी · दो प्रकृतियां गोत्र कर्मकी हैं। जिसके उदयसे लोकपूज्य इक्ष्वाकु आदि उच्चकुलोंमें जन्म हो, उसे उच्च- १ यहां यश शब्दका अर्थ उत्तम गुण और कीर्तिशब्दका अर्थ उनकी ख्याति प्रशंसा है।
मो. PAN ८ गोत्रकर्म कहते हैं। और जिसके उदयसे निन्ध दरिद्री अप्रसिद्ध दुःखोंसे आकुलित चांडा लादिके कुलमें जन्म हो, उसे नीचगोत्रकर्म कहते हैं ।। १२ ।। अव अन्तराय कर्मकी पांच प्रकृतियोंको कहते हैं, दानलाभभोगोपभोगवीर्याणाम् ॥ १३ ॥ अर्थ-दान, लाभ, भोग, उपभोग और वीर्य इन पांच शक्तियों में विन करनेवाला अर्थात् उन्हें रोकनेवाला पांच प्रकारका अन्तराय कर्म है । जिसके उदयसे चाहै, तो भी दान नहीं कर सके, उसे दानान्तराय कर्म कहते हैं । इच्छा करते हुए भी जिसके उदयसे लाभ नहीं हो सके, उसे लाभान्तराय कर्म कहते हैं । जिसके उदयसे भोग किया चाहै, तथापि भोगनेमें समर्थ न हो, उसे भोगान्तराय कर्म कहते हैं। जिसके उदयसे उपभोग करने में समर्थ न हो, उसे उपभोगान्तराय कर्म कहते हैं । और जिसके उदयरो शरीरमें सामर्थ्य प्राप्त न हो, उसे वीर्यान्तरायकर्म कहते हैं । गंध, अतर, पुष्प, मान, ताम्बूल, अंगराग, भोजन पानादिक जो एक ही बार भोगे जाते हैं, भोग है । और शय्या, आसन, सी, आमरण, हाथी, घोड़ा आदि जो वारंवार भोगने में आते हैं, उपभोग है ॥ १३ ॥ इसप्रकार ज्ञानावरणादि आठी काँकी उत्तरप्रकृतियोंके बंधके भेद बतलाये गये। अब स्थितिबंधको कहते हैं। कर्म अपने समावको छोड़कर जितने कालतक आत्मासे जुदा नहीं होते ७७ Poeceir
हैं, उतने कालतक उनके आत्माके साथ बंधे रहनेको स्थितिबंध कहते हैं । स्थितिबंध दो
प्रकारका है, एक जघन्यस्थितिबन्ध और दूसरा उत्कृष्टस्थितिबन्ध । इनमेंसे पहिले सब कर्मोंका
उत्कृष्टस्थितिबन्ध कहते हैं,-
आदितस्तिसृणामन्तरायस्य च त्रिंशत्सागरो-
पमकोटीकोट्यः परा स्थितिः ॥ १४ ॥
अर्थ-( आदितः) आदिके (तिसृणाम् ) तीन कर्मोंकी अर्थात् ज्ञानावरण, दर्शना-
वरण और वेदनीय कर्मकी (च) और ( अन्तरायस) अन्तराय कर्मकी (परास्थितिः)
उत्कृष्टस्थिति ( त्रिंशत्सागरोपमकोटीकोव्यः) तीस कोड़ाकोड़ी सागरकी है । इस उत्कृष्ट-
स्थितिका बंध मिथ्यादृष्टी संज्ञी पंचेन्द्रिय पर्याप्तक जीवोंके होता है ॥ १४ ॥
सप्ततिर्मोहनीयस्य ॥ १५ ॥
अर्थ- (मोहनीयस) मोहनीय कर्मकी उत्कृष्टस्थिति ( सप्ततिः) सत्तर कोड़ाकोड़ी
सागरकी है ॥ १५॥
विंशतिनामगोत्रयोः ॥ १६ ॥
अर्थ-(नामगोत्रयोः) नामकर्म और गोत्रकर्मकी उत्कृष्ट स्थिति (विंशति) वीस
कोड़ाकोड़ी सागरकी है ॥ १६ ॥
. मो. अ. ८ ७८ त्रयस्त्रिंशत्सागरोपमाण्यायुपः ॥ १७ ॥ अर्थ-(आयुप.) आयुकर्मकी उत्कृष्ट स्थिति (त्रयस्त्रिंशत्सागरोपमाणि) तेतीस सागरकी है ॥ १७ ॥ आगे कर्मोंकी जघन्य (कमसे कम) स्थिति बतलाते हैं- अपरा द्वादशमुहूर्ता वेदनीयस्य ॥ १८॥ अर्थ-(वेदनीयस्य ) वेदनीय कर्मकी (अपरा) जघन्यस्थिति (द्वादशमुहूर्ताः) बारह मुहूर्तकी है ॥ १८॥ नामगोत्रयोरप्टौ ॥ १९॥ अर्थ-(नामगोत्रयोः) नामकर्म और गोत्रकर्मकी जघन्यस्थिति (अष्टौ) आठ मुहूर्तकी है ॥ १९ ॥ शेषाणामन्तर्मुहर्ता ॥ २० ॥ अर्थ-(शेपाणां)बाकीके ज्ञानावरण, दर्शनावरण, मोहनीय, अन्तराय और आयु इन पांच कर्मोंकी जघन्यस्थिति ( अन्तमुहूर्ता) अन्तर्मुहूर्त है ।। २०॥ १ दो घड़ीका, अथवा ४८ मिनिटका एक मुहूर्त होता है। २ एक मुहर्तके अर्थात् ४८ मिनटके भीतर २ के समयको अन्तर्मुहूर्त कहते हैं। ७८ इसप्रकार स्थितिबन्ध कहा गया । अब अनुभागबंधका वर्णन करते हैं, विपाकोऽनुभवः ॥२१॥ अर्थ-(विपाका ) कर्मोंका जो विपाक है अर्थात् उनमें जो फलदान शक्तिका पड़ जाना और उदयमें आकर अनुभव होने लगना है, सो (अनुभव:) अनुभव वा अनुभाग है। भावार्थ-तीव्रमन्द कषायंरूप जिसप्रकारके भावोंसे कर्मोंका आसव हुआ है, उनके अनुसार कोंकी फलदायक शक्तिकी तीव्रता मन्दता होनेको अनुभागबंध कहते हैं ।। २१ ॥ स यथानाम ॥ २२ ॥ अर्थ-(सः) वह अनुभागबंध (यथानाम) कर्मकी प्रकृतियोंके नामानुसार ही होता है। भावार्थ :प्रकृतियोंका जैसा नाम है, वैसा ही उनका अनुभव होता है। जैसे ज्ञानाव- रणका फल ज्ञानका आवरण करना है और दर्शनावरणका फल दर्शनशक्तिको रोकना है। इसी प्रकार मूलप्रकृति और उत्तरप्रकृतियोंमें जिसका जैसा नाम है, वैसी ही फलदानशक्ति है और वही अनुभव है ॥ २२ ॥ ततश्च निर्जरा ॥ २३ ॥ अर्थ-(ततः) उस अनुभवके पश्चात् उन कर्मोकी (निर्जरा) निर्जरा हो जाती है। अर्थात् कर्म हैं सो फल देकर आत्मासे पृथक् हो जाते हैं । यह निर्जरा दो प्रकारकी है। एक AUUUN मो. ८ ७९ . सविपाक निर्जरा और दूसरी अविपाक निर्जरा है। काँका उदयकाल आनेपर रस देकर अपने आप झड़ जाना, सविपाकनिर्जरा है। यह सविपाकनिर्जरा चारों गतिमें रहने- वाले समस्त संसारी जीवोंके हुआ करती है। और कर्मोके उदयकालके आये विना ही उन्हें तपश्चरणादि करके अनुदय अवस्थामें ही झड़ा देना, .अविपाकनिर्जरा है। यहां सूत्रमें 'च' आया है, सो आगे जो तपसा निर्जरा च" सूत्र कहेंगे, उस अर्थका संग्रह करनेके लिये है ॥ २३॥ आगे प्रदेशबंध कहते हैं,- नामप्रत्ययाः सर्वतो योगविशेपात्सूक्ष्मैकक्षेत्रावगाहस्थिताः सर्वात्मप्रदेशे- चनन्तानन्तप्रदेशाः॥२४॥ अर्थ-(नामप्रत्ययाः) ज्ञानावरणादिक कौकी प्रकृतियोंके कारणभूत और (सर्वतः) समस्तभवोंमें वा सब समयोंमें (योगविशेषात्) मनवचनकायकी क्रियारूप योगोंसे ( सर्वा- त्मप्रदेशेपु) आत्माके समस्त प्रदेशोंमें (सूक्ष्मैकक्षेत्रावगाहस्थिताः) सूक्ष्म तथा एक क्षेत्रा- बगाह रूप सित जो (अनन्तानन्तप्रदेशाः) अनन्तानन्त कर्मपुद्गलोंके प्रदेश हैं, उनको प्रदे- शबंध कहते हैं। भावार्थ-आत्माके योगविशेषोंके द्वारा त्रिकालमें बंधनेवाले, ज्ञानावरणादि कर्मप्रकृतियोंके कारणीभूत, तथा आत्माके. समस्त प्रदेशोंमें व्याप्त होकर कर्मरूप परिणमने ७९ UUUN योग्य, सूक्ष्म, और जिस क्षेत्रमें आत्मा ठहरा हो उसी क्षेत्रको अवगाहकर ठहरनेवाले ऐसे, अनन्तानन्त प्रदेशरूप पुद्गलस्कन्धोंको प्रदेशबन्ध कहते हैं ॥ २४ ॥ अब बंध पदार्थके अन्तर्भूत पुण्यबंध और पापबंध भी हैं, इसलिये पहिले पुण्यप्रकृतियोंको कहते हैं,- सद्वेद्यशुमायुर्नामगोत्राणि पुण्यम् ॥ २५ ॥ अर्थ-(सद्वेद्यशुभायुर्नामगोत्राणि) सातावेदनीय, शुमआयु, शुभनाम, और शुभगोत्र ये (.पुण्यम्) पुण्यरूप प्रकृतियें हैं ॥ आठ कर्मोमेंसे ज्ञानावरण, दर्शनावरण, मोहनीय और अन्तराय. इन चार कर्मोंको घातियाकर्म कहते हैं। ये चारों कर्म आत्माके अनुजीवी गुणोंको घात करते हैं, इस कारण इनको घातिया कर्म कहते हैं । और वेदनीय आयु, नाम और गोत्र ये चार कर्म आत्माके गुणोंको घात नहीं करते, इसकारण इनको अघातिया कर्म कहते हैं। घातिया कर्म तो चारों ही अशुभ.(पाप) रूप हैं । परन्तु अघातिया पुण्य और पाप दोनोंरूप हैं । उनकी ६८ अड़सठ प्रकृतियां पुण्यरूप हैं । वे इस प्रकार हैं-१ सातावेदनीय, २ तिर्यंचायु, ३ मनुण्यायु,.४ देवआयु और ५ उच्चगोत्र ये पांच और नामकर्मकी १३- १ मनुष्यगति,२ देवगति,३ पंचेन्द्रिय जाति, निर्माण, ५समचतुरस्रसंखान, ६वर्षभनारा चसंहनन, ७ मनुष्यगत्यानुपूर्वी, ८ देवगत्यानुपूर्वी, ९ अगुरुलघु,१० परघात, ११ उच्छ्वास, मो. ८ १२ आतप, १३ उद्योत, १४ प्रशस्तविहायोगति, १५ प्रत्येकशरीर, १६ त्रस, १७ सुभग, १८ सुखर, १९ शुभ, २० वादर, २१ पर्याप्ति, २२ स्थिर, २३ आदेय, २४. यशःकीर्ति, २५ तीर्थकरत्व, और २६-३० पांचशरीर, ३१-३३ तीन अंगोपांग, ३४-३८ पांच ब- धन, ३९-४३ पांच संघात, १४-५१ आठ प्रशस्त स्पर्श, ५२-५६ पांच प्रशस्तरस, ५७-५८ दो गन्ध, और ५९-६३ पांच प्रशस्तवर्ण ॥ २५ ॥ अतोऽन्यत्पापम् ॥ २६ ॥ अर्थ-(अतः) उक्त ६८ प्रकृतियोंसे (अन्यत्) और अर्थात् बाकीकी कर्मप्रकृतियें (पापम्) पापरूप अशुभ हैं । अर्थात् ज्ञानावरणकी पांच, दर्शनावरणकी नव, मोहनीयकी अट्ठाईस, अन्तरायकी पांच, असातावेदनीय, नरकायु, नीचगोत्र, नामकर्मकी पचास [जि- नमें स्पर्शादि २० अप्रशस्त भी हैं] नरकगति, तिर्यग्गति; एकेन्द्रियादि जाति चार, संस्थान पांच, संहनन पांच, नरकगत्यानुपूज्य, तिर्यग्गत्यानुपूये, उपघात, अप्रशस्तविहायोगति, स्थावर, money १ स्पर्शादिक वीस प्रकृतियां प्रशस्वरूप और अप्रशस्तरूप भी हैं । प्रशस्त तो पुण्यप्रकृतिमें और अप्रशस्त पापप्रकृतिमें ग्रहण की है। जैसे नीमके पत्तेका कटुफरस ऊंटको अच्छा लगता है पर मनुष्यादिकोंको चुरा लगता है। इसी प्रकार रूप वगैरहके भी दृष्टांत समश लेना चाहिये। ८० सूक्ष्म, अपर्याप्ति, साधारणशरीर, अशुभ, दुर्मग, अखिर, दुःखर, अनादेय, और अयशःकीर्ति, इसप्रकार सब मिलकर एक सौ प्रकृति अशुभरूप वा पापप्रकृति हैं ॥ २६॥ इति श्रीमदुमास्वामिविरचिते तत्त्वार्थाधिगमे मोक्षशानेऽष्टमोऽध्यायः॥ ८॥ अथ नवमोऽध्यायः प्रारभ्यते । आस्रवनिरोधः संवरः ॥१॥ अर्थ-(आस्रवनिरोध) आत्रवोंका निरोध करना सो (संवर) संवर है । अर्थात् कौके आनेके निमित्तरूप मन वचन कायके योगोंके तथा मिथ्यात्व और कषायादिकोंके निरोध होनेसे जो अनेक सुख दुःखोंके कारणरूप कर्मोंकी प्राप्तिका अभाव होना सो संवरहै ॥संवर दो प्रकारका है- एक द्रव्यसंवर और दूसरा भावसंवर । जो पुद्गलमय कर्मोंके आसवका रुकना सो द्रव्यसंवर है । और जो द्रव्यमय आसवोंके रोकने में कारणरूप आत्माके भावोंका होना, सो भावसंवर है ॥१॥ अब-किन २ कारणोंसे आस्रवोंका निरोध होता है सो कहते हैं,- स गुप्तिसमितिधर्मानुप्रेक्षापरीषहजयचारित्रैः॥२॥ अर्थ-(सः) वह संवर (गुप्तिसमितिधर्मानुप्रेक्षापरीपहजयचारित्रैः) तीन गुप्ति- दसप्रकार धर्म मो. योंसे, पांच समितियोंसे, बारह अनुप्रेक्षाओंके चिन्तवनसे, बाईस परीपहोंके जीतनेसे, और पांच प्रकारके चारित्र पालनेसे इस प्रकार छह कारणोंसे होता है । संसारमें रुलानेवाले प्रवृ- त्तिरूप भावोंसे आत्माकी रक्षा करनेको अर्थात् उनके न होने देनेको गुप्ति कहते हैं। किसी जीवको कुछ पीड़ा न हो जाय, इस विचारसे यनाचाररूप प्रवृत्ति करनेको समिति कहते हैं। अपने इष्ट सुखके स्थानमें जो धरै वा पहुंचा देवे, उसे धर्म कहते हैं। शरीरादि परद्रव्योंके और आत्माके स्वरूपके चिन्तवन करनेको अनुप्रेक्षा कहते हैं। क्षुधा तृपादिकी वेदना उत्पन्न होने- पर उसे काँकी निर्जराके लिये क्लेशरहित परिणामोंसे सह लेनेको परीपहजय कहते हैं । और संसार परिश्रमणकी कारणरूप क्रियाओंके त्याग करनेको चारित्र कहते हैं ॥२॥ तपसा निर्जराच ॥३॥ अर्थ (तपसा) बारह प्रकारके तप करनेसे (निर्जरा) निर्जरा (च) और संवर दोनों होते हैं । यद्यपि दशप्रकारके धर्मोंमें तप आ गया है । परन्तु समस्त प्रकारके संवरोंमें तप एक प्रधान कारण है, इसलिये इसको भिन्न कहा है । तपके प्रभावसे नये काँका संवर [निरोध ] होता है और सत्तामें रहनेवाले प्राचीन बंधनरूप कर्मोकी निर्जरा होती है । यद्यपि तपका फल स्वर्गकी वा राज्यादिककी प्राप्ति होना भी है, परन्तु प्रधानतासे समस्त कर्मोंका क्षय करके ८१ SURURU आत्माको मुक्त करना ही इसका फल है। जैसे खेती करनेका प्रधान फल तो. धान्य उत्पन्न होना ही है किंतु गौणतासे उसमें पयालआदि भी उत्पन्न हो जाते हैं ॥ ३ ॥ सम्यग्योगनिग्रहो गुतिः ॥४॥ अर्थ-(सम्यक् ) भलेप्रकार (योगनिग्रहः) मन वचन कायकी यथेच्छ प्रवृत्तिको रोकना सो (गुप्तिः) गुप्ति है । गुप्ति तीन हैं । मनोयोगको रोकना सो. मनोगुप्ति है। वचनयोगको रोकना सो वाग्गुप्ति है और काययोगको रोकना सो कायगुप्ति है ॥ ४ ॥ इयोभाषेषणादाननिक्षेपोत्सर्गाः समितयः ॥५॥ अर्थ-(ईर्यामापैषणादाननिक्षेपोत्सर्गाः) ईर्या, भाषा, एषणा, आदाननिक्षेप और उत्सर्ग ये पांच ( समितयः) समितियां हैं ॥ ऊपरके सूत्र में जो सम्यक् शब्द आया है, उसकी अनुवृत्ति इन पांचोंमें आती है । अर्थात्-सम्यगीर्या, सम्यग्भापा, सम्यगेपणा, सम्यगादाननिक्षेपण और सम्यगुत्सर्ग; समितिके ऐसे पांच सार्थक नाम हैं । जो जीवोंके उत्प- त्तिस्थानोंका ज्ञाता मुनि, सावधान होकर सूर्योदयके पश्चात् जब नेत्रोंमें विषयग्रहण करनेकी सामर्थ्य हो जाय, और मनुष्य तिर्यंचोंके चलनेसे मर्दित होकर मार्ग प्रासुक हो जाय तव आगेकी चार हाथ भूमिको भले प्रकार देखकर धीरे- २ चलता है, उस मुनिके पृथ्वीकाय, (१) जो पद (शब्द) ऊपरके सूत्रोंसे ग्रहण किये जाते हैं, वे अनुवृत्तिपद कहाते हैं।
मो. ABPSur ८२ जलकायादि जीवोंकी हिंसाके अभावसे सम्यगीर्यासमिति होती है । और हित [ परजीवोंको हिंतकारी ] मित [ थोड़ा ] संदेहरहित प्रियवचनोंका बोलना सो सम्यग्भापासमिति है। दिनमें एक बार निर्दोष आहार ग्रहण करना सो सम्यगेपणासमिति है। शरीर, पुस्तक, कम- डल आदि उपकरणोंको नेत्रोंसे देखकर और पीछीसे शोधकर ग्रहण करने स्थापन करनेरूप प्रवृत्ति रखना, सम्यगादाननिक्षेपणसमिति है । और बस स्थावर जीवोंको पीड़ा न हो, ऐसी शुद्ध जंतुरहित भूमिपर मलमूत्रादि क्षेपणकर प्रामुक जलसे शौचक्रिया करना, सम्यगु- त्सर्गसमिति है ॥ ५॥ उत्तमक्षमामार्दवावशीचसत्य- संयमतपस्त्यागाकिञ्चन्यब्रह्मचर्याणि धर्मः ॥ ६ ॥ अर्थ-(उत्तमक्षमामार्दवार्जवशौचसत्यसंयमतपस्त्यागाकिश्चन्यब्रह्मचर्याणि ) उत्तम क्षमा, उतम मार्दव, उत्तम आर्जव, उत्तम शौच, उत्तम सत्य, उत्तम संयम, उराम तप, उत्तग त्याग, उत्तम आकिश्चन्य और उत्तम वाचर्य ये दश (धर्मः )धर्म है। दुष्ट लोगोंक द्वारा तिर- स्कार, हास्य, ताड़न, मारणादि क्रोधकी उत्पत्तिके कारण उपस्थित होनेपर भी परिणामोंगें मलीनता न लानेको उत्तम क्षमा कहते हैं। उत्तग जाति, उत्तम कुल, रूप, विज्ञान, ऐश्वर्य, बलआदिके विद्यमान होते हुए भी मान [ गर्व ] नहीं करनेको उत्तम मार्दन कहते है। ८२ AMAN अथवा अन्यके द्वारा तिरस्कारादिक होनेपर भी अभिमान न करना सो उत्तम मार्दव है मनवचनकायकी कुटिलताका [ वक्रताका ] अभाव, सो उत्तम आर्जव है । अन्यके धन स्त्री आदिकपदार्थों में अभिलाषाका अभाव तथा परिणामोंको मलिन करनेवाले लोभका अभाव उत्तम शौच है । सुंदर हितंमितरूप सत्य वचन बोलना सो उत्तम सत्य है । संयम धर्म दो प्रकारका है, एक प्राणिसंयम और दूसरा इन्द्रियसंयम । ईर्यासमिति आदिकमें प्रवते हुए मुनि जीवोंकी रक्षाके लिये जो एकेन्द्रियादि प्राणियोंकी पीड़ा करनेका त्याग करते हैं, सो प्राणिसंयम है । और इन्द्रियोंके विषयोंमें रागका अभाव सो इन्द्रियसंयम है। कर्मोंको क्षय करनेके लिये अनशनादि तप करना, सो उत्तम तप है । संयमी पुरुषोंको योग्य आहारादिका देना-दान करना सो उत्तम त्याग है । आत्मखरूपसे मिन्न शरीरादिकमें ममत्वरूप परिणामोंका अभाव सो उत्तम आकिंचन्य है। अपनी तथा परकी स्त्रीके विषयमें जो रागादिरूप तथा विषय सेवनरूप भाव होते हैं, उनके अभावको और ब्रह्म [ अपनी आत्मा ] में ही रमण करनेको, उत्तम ब्रह्मचर्य कहते हैं । इसप्रकार उक्त दशं धर्म संवरके लिये धारण करना चाहिये ॥६॥ (१) चतुर्थ धर्मका नाम उत्तम शौच है, और पंचम धर्मका नाम उत्तम सत्य है । क्रोध मान माया और लोभके अभाव होनेपर क्रमसे क्षमा, मार्दव, आर्जव, और शौचधर्म प्रगट होते हैं। PRONE मो. ३ अनित्याशरणसंसारैकत्वान्यत्वाशुच्यालवसंवरनिर्जरालो- कवोधिदुर्लभधर्मखाख्यातत्त्वानुचिन्तनमनुप्रेक्षाः ॥७॥ भावार्थ- अनित्याशरणसंसारैकत्वान्यत्वाशुच्यास्रवसंवरनिर्जरालोकबोधिदुर्लभध- मखाख्यातत्त्वानुचिन्तनस्) अनित्य, अशरण, संसार, एकत्व, अन्यत्व, अशुचि, आस्त्रव, संवर, निर्जरा, लोक, वोधिदुर्लभ, और धर्मखाख्यातत्व इन बारहके खरूपको वारंवार चिन्तवन करना सो (अनुप्रेक्षाः) अनुप्रेक्षा हैं । इन्द्रियोंके विषय धन यौवन जीवितव्यआदि जलके बुदबुदोके समान अथिर हैं-अनित्य हैं-देखते २ ही नष्ट हो जानेवाले हैं; इसप्रकार चिन्तवन करना सो अनित्यानुप्रेक्षा है । जैसे बनके एकांतस्थानमें सिंहके द्वारा पकड़े हुए मृगको कोई शरण नहीं होता है, उसीप्रकार इस संसारमें कालके गालमें पड़ते हुए जीयों को भी, कोई रक्षा करनेवाला वा शरण नहीं है, इसप्रकार चितवन करना सो अशरणानुप्रेक्षा है । यह जीव निरन्तर एक देहसे दूसरी देहमें जन्म ले ले कर चतुर्गतिमें परिभ्रमण किया करता है और संसार दुःखमय है, इत्यादि संसारके खरूपका चितवन करना सो संसारानुप्रेक्षा है । जन्म जरा मरण रोग वियोगादि महादुःखोंमें अपनेको असहाय एकाकी चिन्तवन करना अर्थात् यह सोचना कि, सुखदुख सहनेमें मैं अकेला हूं, मेरा कोई साथी नहीं हैं, सो एकत्वानुप्रेक्षा है । शरीर कुटुंबादिकसे अपने खरूपको भिन्न चितवन करना सो अन्यत्वानुप्रेक्षा है । "शरीर हाड़मांस 4. ८३ मलमूत्रादिसे भरा हुआ महा अपवित्र है" इसप्रकार अपने शरीरके खरूपको चितवन करना, सो अशुचित्वानुप्रेक्षा है । मिथ्यात्व अविरत कषायादिकोंसे काँका आस्रव होता है। आस्रव ही संसारमें परिभ्रमणका कारण और आत्माके गुणोंका घातक है, इसप्रकार आस्रवके खरूपको चिन्तवन करना, सो आस्रवानुप्रेक्षा है । संवरके खरूपको चितवन करना, सो संवरानु- प्रेक्षा है । कर्मोंकी निर्जरा किस प्रकार होती है, कैसे उपायोंसे होती है इत्यादि निर्जराके खरूपको बारंबार चितवन करना, सो निर्जरानुप्रेक्षा है । लोक कितना बड़ा है, उसमें क्या क्या रचनाएं हैं, कौन २ जातिके जीवोंका कहां २ निवास है, इत्यादि लोकके खरूपको चिन्तवन करना सो लोकानुप्रेक्षा है। सम्यग्दर्शन सम्यग्ज्ञान और. सम्यक्चारित्र इस रत्नत्रयको बोधि कहते हैं । इस बोधिकी प्राप्ति होना अतिशय दुर्लभ है । इसकी दुर्लमताका बारंबार चिन्तवन करना, सो बोधिदुर्लभानुप्रेक्षा है। धर्म है सो वस्तुका खभाव आत्माका शुद्ध निर्मल खभाव ही अपना धर्म है, तथा दर्शनज्ञानचारित्ररूप वा दशलक्षणरूप वा अहिंसारूप धर्म है । इत्यादि धर्मके खरूपको बारंबार चितवन करना, सो धर्मानुप्रेक्षा है । इन बारह अनुप्रेक्षाओंके चिंतवनसे भी संवर होता है ॥७॥ मार्गाच्यवननिर्जराथे परिषोढव्याः परीषहाः॥८॥ अर्थ-(मार्गाच्यवननिर्जरा)) रत्नत्रयरूपमोक्षमार्गसे च्युत नहीं हो जावे, इस लिये मो. अ. तथा कौकी. निर्जराके लिये (परीपहा.)आगेके सूत्रमैं कही हुई बाईस परीषह (परिषोढव्या सहनी चाहिये ॥ ८॥ क्षुत्पिपासाशीतोष्णदेशमशकनाश्यारतिस्त्रीचर्यानिषद्याशय्याक्रोशवधयाच- नाऽलाभरोगत्रणस्पर्शमलसत्कारपुरस्कारप्रज्ञाऽज्ञानाऽदर्शनानि॥९॥ १ क्षुधा, २ तृषा, ३ शीत, ४ उष्ण, ५ दंशमशक, ६ नाश्य, ७ अरति, ८ स्त्री, चर्या, १० निपद्या, ११ शय्या, १२ आक्रोश, १३ वध, १४ याचना, १५ अलाभ, १६ रोग, १७ तृणस्पर्श, १८ मल, १९ सत्कारपुरस्कार, २० प्रज्ञा, २१ अज्ञान, २२ अदर्शन, इसप्रकार बाईस परीषह हैं।इन सब परीपहोंसे शरीरसंबंधी वा मनसंबंधी जो अत्यन्त पीड़ा होती है, उसे समभावोंसे.सह लेनेसे संवर ( कर्मास्लवका निरोध ) होता है । अत्यन्त क्षुधारूप अमिके प्रज्वलित होनेपर उसे धैर्यरूपी जलसे शान्त कर देना क्षुधापरीपहका विजय है। इसीप्रकार तृपाको भी सह लेना सो तृषापरीपहका जय है । शीतको सह लेनेसे शीतपरीपहका जय होता 1. ग्रीष्मऋतुकी गर्मीके दुःखोंको सह लेना, उष्णपरीपहका जीतना है । डांस मच्छर वगैरह जीवोंके काटनेकी पीड़ाकों सह लेना दंशमशकपरीपहका जीतना है। नम होना बड़ा कठिन कार्य है । नम होकर भी अपने अंगोंको विकाररूप न होने देना लज्जादिकको जीत लेना, सो नमपरीपहका जीतना है । क्षुधा तृपादिकी बाधासे संयममें अरति ८४ OURUR yourAUTA वा अरुचि होने लगे, तो उसको न होने देना-संयममें निरंतर रुचि रखनासो अरतिपरीषहका जीतना है । सुंदर स्त्रियोंके हाव भावादिकोंसे विकृत न होना, सो स्त्रीपरीषहका जीतना है मार्गमें चलते हुए खेदखिन्न न होना, सो चर्यापरीषहका जीतना है। ध्यानके लिये संकल्प किये हुए आसनसे चलायमान नहीं होना, सो निषधापरीषहका जीतना है। शास्त्रकी आज्ञानुसार शयनसे नहीं चिगना, सो शय्यापरीषहका जीतना है । अनिष्ट वचनोंको सह लेना, सो आक्रोशपरीषहका जीतना है। अपनेको मारनेवालेमें रोष नहीं करना, मारनेकी पीड़ाको सह लेना, सो वधपरीषहका जीतना है । प्राण जाते भी आहारादिकके लिये दीनतारूप प्रवृ- ति नहीं करना, सो याचनापरीषहका जीतना है । आहारादिककी प्राप्ति न होनेपर भी लाभके समान सन्तुष्ट रहना, सो अलाभपरीषहका जीतना है। नानाप्रकारके रोग होनेपर भी इलाजकी इच्छा नहीं करना-रोगजनित पीड़ाको सह लेना, सो रोगपरीषहका विजयहै। मार्गचलते समय तृण कंटक कंकरी वगैरह पावोंमें चुभनेसे उत्पन्न हुई पीडाको सह लेना सो तृणस्पर्शपरीषहका विजय है। अपने मैले शरीरको देखकर ग्लानि न करनावाखानादिक करनेकी इच्छा न करना सो मलपरीषहका जीतना है। कोई अज्ञानी पुरुष अपमान करै-सम्मान नहीं करे, तो सम्मा- नकी इच्छा न रखकर मानापमानमें समभाव रखना, सो सत्कारपुरस्कारपरीषहका जीतना है। विद्वत्ताके मदका अभाव सो प्रज्ञापरीषहका जीतना है । अपनी अज्ञानतासे अपना तिरस्कार मो. अ. ८५ UिVenue होना और अभिलाषा करनेपर भी ज्ञानकी प्राप्ति नहीं होती, ऐसे दुःखको सह लेना सो अज्ञानपरीषहका जीतना है। दीक्षा लिए बहुत दिन हो गये, मैं बड़ा तपखी हूं तो भी मुझे ऋद्धिवा अवधिज्ञानादिककी प्राप्ति नहीं हुई, ऐसी इच्छाको नहीं करना, सो अदर्शनपरीपहका जीतना है । इसप्रकार इन बाईस परीपहाँका जीत लेना भी परम संवरका कारण है ॥ ९॥ ये परीपह किन २ गुणस्थानोंमें कितनी कितनी होती हैं, सो कहते हैं, सूक्ष्मसाम्परायछमस्थवीतरागयोश्चतुर्दश ॥ १० ॥ अर्थ-(सूक्ष्मसाम्परायछमस्थवीतरागयो) सूक्ष्मसापराय नामक दशवे गुणस्थान- वालोंके तथा छद्मस्थवीतराग अर्थात् उपशान्तकपाय नामक ग्यारहवें और क्षीणकपाय नामक बारहवें गुणस्थानमें रहनेवालोंके (चतुर्दश) चौदह परीपह होती हैं । क्षुधा, तृपा, शीत, उष्ण, दंशमशक, चर्या, शय्या, वध, अलाभ, रोग, तृणस्पर्श, मल, प्रज्ञा और अज्ञान ये चौदह परीपह दशवें ग्यारहवें और बारहवें गुणस्थानमें रहनेवालोंके होती हैं ॥ १०॥ एकादश जिने ॥ ११॥ अर्थ-(जिने) तेरहवें गुणस्थानवर्ती जिनमें अर्थात् केवली भगवानके (एकादश) ग्यारह परीपह होती हैं।छिमस्थ जीवोंके वेदनीयकर्मके उदयसे क्षुधा, तृपा, शीत, उष्ण, दंशमशक, चर्या, शय्या, वध, रोग, तृणस्पर्श, और मल ये ग्यारह परीपह होती हैं । केवली भगवानके ८५
PUR
भी वेदनीयका उदय है, इसकारण उनके भी ग्यारह परीषह होती हैं । परन्तु मोहनीय क-
मैके नष्ट होनेसे वेदनीयकर्मका उदय जोर नहीं कर सकता है। अर्थात् ये ग्यारह परीषह केवलीको
कोई पीड़ा नहीं दे सकती हैं, इसलिये नहींसी हैं । वेदनीय कर्मके सद्भाव होनेसे नाम मात्र
ही कही जाती हैं॥ ११ ॥
वादरसाम्पराये सर्वे ॥ १२॥
अर्थ-(वादरसाम्पराये ) स्थूलकषायवाले अर्थात् छठे सातवें आठवें और नववें गु-
णस्थानवालोंके (सर्वे) सब परीषह होती हैं ॥ १२ ॥
ज्ञानावरणे प्रज्ञाज्ञाने ॥ १३ ॥
अर्थ-(प्रज्ञाज्ञाने) प्रज्ञापरीषह और अज्ञानपरीपह (ज्ञानावरणे) ज्ञानावरण कर्मके
उदय होनेपर होती हैं ॥ १३ ॥
दर्शनमोहान्तराययोरदर्शनालाभौ ॥ १४ ॥
अर्थ-(अदर्शनालाभौ ) अदर्शनपरीषह और अलाभपरीषह (दर्शनमोहान्तराययोः)
दर्शनमोह और अन्तराय कर्मके उदय होनेपर होती हैं । अर्थात् दर्शनमोहके उदयसे अदर्श-
नपरीपह और अन्तरायके उदयसे अलाभपरीषह होती है ॥ १४ ॥
मो. ९ ८६ • चारित्रमोहे नाग्न्यारतिस्त्रीनिषद्याक्रोशयाचनासत्कारपुरस्काराः ॥ १५ ॥ अर्थ (चारित्रमोहे) चारित्रमोहनीयके उदय होनेपर (नाम्यारतिस्त्रीनिपद्याक्रोश- याचनासत्कारपुरस्काराः) नमता, अरति, स्त्री, निषद्या, आक्रोश, याचना और सत्कारपुर- स्कार ये सात परीषह होती हैं ॥ १५॥ वेदनीये शेषाः ॥ १६ ॥ अर्थ-(शेषाः) बाकीकी क्षुधा, तृषा, शीत, उप्ण, दंशमशक, चर्या, शय्या, वध, रोग, तृणस्पर्श और मल ये ग्यारह परीपह (वेदनीये) वेदनीय कर्मके उदय होनेपर होती हैं।॥१६॥ एकादयो भाज्या युगपदेकस्मिनकोनविंशतः ॥ १७॥ अर्थ-(एकस्मिन्) एक ही जीवमें ( एकादयः) एकको आदि लेकर (युगपतू) एकसाथ (आएकोनविशते.) उन्नीस परीपह तक (भाज्या.) विभाग करना चाहिये।भावार्थ- एक जीवके एक साथ उन्नीस परीपह हो सकती हैं। क्योंकि शीतउष्णमें से एक कालमें शीत या उष्ण एक ही परीषह होगी और शय्या, चर्या, निपद्या इन तीनोंमेंसे भी एक कालमें एक ही होगी। इसतरह एक समयमें तीन परीपहोंका सबहीके अभाव होनेसे उन्नीस परीषह ही एक साथ उदय हो सकती हैं ।। १७ ॥ १ श्रुतज्ञानसंवन्धी प्रज्ञापरीपह और अवधिज्ञानावरणोदयजनित अज्ञानपरीपह ये दोनों एक काल होती हैं AUG UVAGRUARY AM ---- न अब पांचप्रकारके चारित्रका वर्णन करते हैं,- • 'सामायिकच्छेदोपस्थापनापरिहारविशुद्धिसूक्ष्मसा- म्पराययथाख्यातमिति चारित्रम् ॥ १८ ॥ अर्थ-(सामायिकच्छेदोपस्थापनापरिहारविशुद्धिसूक्ष्मसाम्पराययथाख्यातम्) सामा- यिक, छेदोपस्थापना, परिहारविशुद्धि, सूक्ष्मसाम्पराय और यथाख्यात (इति) इस प्रकार पांच प्रकारका (चारित्रम्) चारित्र है ॥ व्रतोंका धारण, समितिका पालन, कषायोंका निग्रह, मनवचनकायकी अशुभ प्रवृत्तिरूप अनर्थदंडोंका त्याग, और इन्द्रियोंका विजय जिस जीवके हो, उसीके संयम होता है । समस्त सावद्ययोगका भेदरहित जिसमें त्याग हो, उसे सामायिक चारित्र कहते हैं । प्रमादके कारण यदि कोई सावध कर्म बन जावे, तो उससे उत्पन्न हुए दोपको प्रायश्चित्त लेकर छेद देवे और आत्माको फिर व्रतधारणादिरूप संयममें धारण करै, इस क्रियाको छेदोपस्थापना चारित्र कहते हैं अथवा हिंसादिक सावध कर्मोंका विभागकरके त्याग करना सो छेदोपस्थापना चारित्र है । जीवोंकी पीड़ाका परित्याग करनेसे विशेप विशुद्धिका होना सो परिहारविशुद्धि चारित्र है । अतिसूक्ष्मकषायके उदयसे सूक्ष्मसाम्पराय गुणस्थानमें जो चारित्र हो, उसे सूक्ष्मसांपराय चारित्र कहते हैं। चारित्रमोहिनीयकके सर्वतया उपशम वा क्षय होनेसे आपका आत्मखभावमें स्थित होना सो यथाख्यातचारित्र है। UV मो. ९ ८७ अब सामायिक और छेदोपस्थापन ये दो चारित्र प्रमत्त, अप्रमत्त, अपूर्वकरण और अनिवृत्तिकरण इन चार गुणस्थानोमें होते हैं । परिहारविशुद्धिचारित्र छटे और सातवें गुणस्थानमें ही होता है । सूक्ष्मसाम्पराय चारित्र दशवें गुणस्थानमें होता है । और यथाख्यातचारित्र ग्यारहवें, बारहवें, तेरहवें और चौदहवें इन चारों गुणस्थानोंमें होता है ॥ १८ ॥ निर्जराके कारण बारह तपोंमेंसे पहिले बाह्यतपके भेद कहते हैं, अनशनावमौदर्यवृत्तिपरिसङ्ख्यानरसपरित्याग- विविक्तशय्यासनकायक्लेशा बाह्यं तपः॥ १९॥ अर्थ-(अनशनावमोदर्यवृत्तिपरिसङ्घयानरसपरित्यागविविक्तशय्यासनकायक्लेशाः) अनशन, अवमोदर्य, वृत्तिपरिसंख्यान, रसपरित्याग, विविक्तशय्यासन और कायक्लेश इसप्रकार छह (बाह्यं तपः) वाह्यतप हैं ॥ लौकिक ख्यातिलाभादिकी इच्छा नहीं करके संयमकी सि- द्धिके लिये, रागभावोंका उच्छेद करनेके लिये, कर्मोंके विनाशके लिये, ध्यान खाध्यायकी सिद्धिके लिये, इन्द्रिय वा कामके दमनके लिये, तथा जीतनेके लिये जो भोजनका त्याग करना, सो अनशन तप है। और इन्हीं प्रयोजनोंकी सिद्धि वा ध्यानकी निश्चलतादिके लिये अल्पभोजन सो अवमौदर्य तप है। ऐसी प्रतिज्ञा करके कि “एक वा पांच सात घरमें ही जाऊंगा, अथवा एक वा दो ही मुहल्लोंमें जाऊंगा, वा रास्ते तथा मैदानमें ही भोजन मिलेगा, ८७ ameroo तो लंगा, नगरमें नहीं जाऊंगा, आहारके लिये वनसे निकलना और नियमानुसार आहारकी विधि नहीं मिलनेपर वापिस वनमें आकर उपवास धारण कर लेना सो वृत्तिपरिसंख्यान तप है। इन्द्रियोंके दमनार्थ, संयमकी रक्षार्थ और लालसाके त्यागार्थ घृत, दुग्ध, तैल, गुड़, लवणा- दि रसोंका त्याग करना सो रसपरित्याग तप है । जीवोंकी रक्षार्थ, प्रासुक क्षेत्रमें, पर्वत गुफा मठ बनखंडादि ऐसे एकान्तस्थानोंमें, जहां कि ब्रह्मचर्य खाध्याय ध्यानाध्ययनादिकमें विघ्न नआवे शयन वा आसन करना, सो विविक्तशय्यासन तप है। शरीरमें ममत्व न रखके कायको क्लेशादिक करनेवाले तप करना कायक्लेश तप है। ये सब तप बाह्य द्रव्यकी अपेक्षासे होते हैं तथा बाह्यमें सवको दीखते हैं, इसकारण इनका नाम बाह्यतप है.॥ १९ ॥ अब आभ्यन्तर तपोंको कहते हैं,- प्रायश्चित्तविनयवैयावृत्त्यखाध्यायव्युत्सर्गध्यानान्युत्तरम् ॥२०॥ अर्थ-(. प्रायश्चित्तविनयवैयावृत्त्यस्वाध्यायव्युत्सर्गध्यानानि ) प्रायश्चित्त, विनय, वैयावृत्त्य, खाध्याय, व्युत्सर्ग और ध्यान ये छह (उत्तरम् ) अभ्यन्तर तप. हैं ॥ प्रमादसे लगे हुए दोषोंकी शुद्धि करना सो प्रायश्चित्त तप है । पूज्य पुरुषोंका आदर करना सो विनय तप है । मुनियोंकी सेवा टहल करना सो वैयावृत्त्य तपं है। ज्ञानाराधनमें आलस्यको त्या- SAUUUR मो. अ. गकर ज्ञानाध्ययन करना करावना उपदेश देना सो स्वाध्याय तप है। बाह्याभ्यन्तर परिग्रह का त्याग करना सो व्युत्सर्गतप है । चितविक्षेपका त्याग करना सो ध्यानतप है ॥ २० ॥ अब इन तपोंके भेद कहते हैं, नवचतुर्दशपञ्चद्विमेदा यथाक्रम प्रारध्यानात् ॥ २१॥ अर्थ-(ध्यानात् प्राक् ) ध्यानसे पहिले २ के पांच तप ( यथाक्रम) क्रमसे (न- वचतुर्दशपञ्चद्विभेदाः) नव, चार, दश, पांच, और दो भेदरूप हैं ॥ अर्थात्-नव प्रकार- का प्रायश्चित्त है, चार प्रकारका विनय है, दशप्रकारका वैयावृत्त्य है, पांचप्रकारका खाध्याय है, और दो प्रकारका व्युत्सर्ग है ॥ २१॥ अब प्रायश्चित्तके नव भेद कहते हैं,- आलोचनाप्रतिक्रमणतदुभयविवेकव्युत्सर्ग- तपश्छेदपरिहारोपस्थापनाः ॥२२॥ अर्थ-प्रायः शब्दका अर्थ 'अपराध' है,और चित्त शब्दका अर्थ 'शुद्धि करना' अपराधोंकी शुद्धिकरनेको प्रायश्चित्त कहते हैं । इसके आलोचना, प्रतिक्रमण, आलोचना और प्रतिक्रमण दोनों, विवेक, व्युत्सर्ग, तपः, छेद, परिहार, और उपस्थापना ऐसे नव भेद हैं । गुरुके निकट जाकर अपने किये हुए अपराधोंको दश प्रकारके दोपोंसे रहित स्पष्ट रीतिसे ८८ ल G प्रगट करना सो आलोचना है। मैंने जो अपराध किये हैं सो मिथ्या होहु, इस प्रकार कहना सो प्रतिक्रमण है। कोई दोष तो आलोचनामात्रसे शुद्ध हो जाता है और कोई दोष प्रति- क्रमण करनेसे शुद्ध होता है, और कोई दोष दोनोंके करनेसे शुद्ध होता है, ऐसे आलोचन और प्रतिक्रमण दोनोंके करनेको तदुभयप्रायश्चित्त कहते हैं । आहार पान वा उपकरण आदिसे अलग कर देना अर्थात् किसी नियत संमयतक आहारादिकका त्याग करा देना, सो विवेकप्रायश्चित्त है। कालका नियम करके कायोत्सर्ग करना, सो व्युत्सर्ग है । अनशनादि तप, वा उपवास, बेला, तेला पंचोपवासादि करना, सो तपःप्रायश्चित्त है । दिन, मास, संवत्सरकी दीक्षाका छेद करना, सो छेदप्रायश्चित्त है। पक्ष मासादिकके नियमसे संघसे निकाल देना, सो परिहारप्रायश्चित्त है । समस्त दीक्षाको छेदकर फिरसे नई दीक्षा देना सो उपस्थापनाप्रायश्चित्त है ॥२२॥ अब विनय नामके अभ्यन्तर तपके भेद कहते हैं,- ज्ञानदर्शनचारित्रोपचाराः॥२३॥ अर्थ-ज्ञानविनय,दर्शनविनय,चारित्रविनय और उपचारविनय इस तरह विनयके चार भेद हैं। आलस्यरहित होकर शुद्धमनसे अत्यन्त सम्मानपूर्वक जिनसिद्धान्तोंका ग्रहण अभ्यास सरणादि करना सो ज्ञानविनय है। निशंकितादि दोषरहित सम्यग्दर्शनका धारण करना सो दर्शनवि- SAज HIR .
अ. मो. ८९ नग है। राम्गम्पर्शन राम्गज्ञानके भारी मंन प्रकारले नारिको पालनेवाले गुनिजनोंका नाग फानोरी सुनते ही रोगानित हो जन्तरंगगे हर्षित होगा, गवार जुलि फरगा, और गायोग चारित्र पारनेफी इन्का रसना, सो नारिणपिनय। णानादि पूज्य पुरुषोंके प्रत्यक्षा होते ही खसा होणागा, राग्गुस जागा, साथ जोसमा, गदन करना, पीले २ गगनगरना तथा जाना- गाविकके परोमा रहनेपर भी हाथ जोड़ना, गुणोंकी गहिगा करना, नारंवार सारण करना, उन- की जाज्ञानुसार ही प्रारीना सो उपचारविनग है ॥२२॥ गन नेयावरणतपके गेर महतो,--- गाना-पाध्यायतपखिशक्षग्लानगणकुल- संपराागनोज्ञानाम् ॥ २४ ॥ अर्थ-जानार्ग, उपाध्याग, तपसी, शैक्ष, ग्लान, गण, कुल, रांप, साध, और मनोज्ञ इन वशपगारले सागौनी रोना दाहल करना, सो पशप्रकारका गैगावल्य है ॥ जो प्रतारण धारण गराने, मागशिप, रागवाणकारने शासोक जानकार हो गौर गंगानार धारियोंग गत हो, यो आना। जो गतशील भागनाके गाभार हो और जिनके निकट गनिगण सासा. गगन करें, सो उपाध्याग हैं। उपवासादिक महातप करें, सो तपस्वी हैं। जो ज्ञानके अध्यगर गरनेगें तलर, गीर गत भागनादिगे निएण हो, सो शिष्य वा शैक्षा हैं। जिनका ८९ शरीर रोगादिकसे क्लेशरूप हो, सो ग्लान हैं। जो बड़े मुनियोंकी परिपाटीके हों, सो गण हैं। दीक्षा देनेवाले आचार्यके शिष्य हैं, सो कुल हैं । जो चार प्रकारके मुनिसंघके साधु हैं, सो संघ हैं। बहुत कालके दीक्षित हों, सो साधु हैं । और जिनका उपदेश लोकमान्य हो अथवा उपदेश विना ही जो लोकमें पूज्यहों प्रशंसावान् हों, सो मनोज्ञ हैं। इन दशप्रकारके साधुओंका वैयावृत्य करना अर्थात् शरीरसंबंधी व्याधि अथवा दुष्टजनोंके किये हुए उपसर्गा- दिकमें सेवा टहल करना दवाई बगैरह करना, सो दशप्रकारका वैयावृत्य है ॥२४॥ अब खाध्याय तपके भेद कहते हैं,- वाचनापृच्छनानुप्रेक्षानायधर्मोपदेशाः ॥ २५ ॥ अर्थ-वांचना, पृच्छना, अनुप्रेक्षा, आम्नाय और धर्मोपदेश ये खाध्यायके पांच भेद हैं। निर्दोष ग्रंथका तथा ग्रंथके अर्थका तथा ग्रंथ और अर्थ दोनोंका विनयवान् धर्मके इच्छुक भव्य पात्रको पढ़ाना सिखाना सुनाना, सो वाचनास्वाध्याय है । शब्दमें वा शब्दके अर्थमें जो संशय हो, उसे दूर करनेके लिये बड़े ज्ञानियोंसे विनयसहित प्रश्न करना, सो पृच्छना- खाध्याय है । गुरुजनोंकी परिपाटीसे जाने हुए अर्थको मनन करके अभ्यास करना वा बारंवार चितवन करना, सो अनुप्रेक्षाखाध्याय है । पाठको शुद्धतापूर्वक घोखना, सो HOM । मो. ९० आम्नायखाध्याय है । उन्मार्गको दूर करनेके लिये, और पदार्थों का समीचीन खरूप प्रकाश- करनेके लिये उपदेशरूप कथन करना, सो धर्मोपदेशखाध्याय है ॥ २५ ॥ अब व्युत्सर्गतपको कहते हैं,- बाह्याभ्यन्तरोपध्योः ॥ २६ ॥ अर्थ-व्युत्सर्गतप दो प्रकारका है। एक बाह्योपधित्याग, और दूसरा अभ्यन्तरोपधित्याग। धन धान्यादि बाह्यपरिग्रहका त्याग सो बायोपधित्याग तप है । और क्रोधादि अभ्यन्तर परि- ग्रहोंका त्याग सो अभ्यन्तरोपधित्याग तप है ॥ २६ ॥ अब ध्यानका खामी, लक्षण और वह कितने समय तक होता है, यह बतलाते हैं- उत्तमसंहननस्यैकाग्रचिन्तानिरोधो ध्यानमान्तर्मुहूर्तात् ॥ २७॥ अर्थ (उत्तमसंहननस) उत्तमसंहननवालेका (आअन्तर्मुहूत्तात् ) अन्तर्मुहर्तपर्यन्त (एकाग्रचिन्तानिरोधः) एकाग्र चिन्ताका निरोध करना (ध्यानम्) ध्यान है ॥ भावार्थ- छह संहननोंमेंसे पहिलेके वज्रवृपभनाराचसंहनन, वज्रनाराचसंहनन और नाराचसंहनन ये तीन उत्तम संहनन हैं। ये ही तीन संहनन ध्यानके कारण हैं । जिन पुरुषोंके ये तीन संहनन होते हैं, वे ध्यान कर सकते हैं । यह ध्यान अधिकसे अधिक अन्तर्मुहूर्तपर्यंत रहता है । मोक्ष १ व्युत्सर्ग नाम सागका है । उपधिनाम परिग्रहका है। inone ९० 3 होनेको कारणभूत वज्रवृषभनाराचसंहनन ही है । चित्तकी वृत्तिको अन्य क्रियाओंसे खींचकर एक ही ओर स्थिर करना सो एकाग्रचिन्तानिरोध वा ध्यान तप है ।। २७ ।। अब ध्यानके भेद कहते हैं,- आर्तरौद्रधयंशुक्लानि ॥२८॥ अर्थ-आध्यान, रौद्रध्यान, धर्म्यध्यान और शुक्लध्यान ऐसे चार प्रकारका ध्यान है। इनमेंसे आर्त और रौद्रध्यान अप्रशस्त हैं और धर्म्य तथा शुक्लध्यान प्रशस्त हैं ॥ २८ ॥ परे मोक्षहेतू ॥ २९॥ परे) अगले दो ध्यान अर्थात् धर्म्यध्यान और शुक्लध्यान (मोक्षहेतू) मोक्षके कारण हैं । इसी वचनसे पहिलेके दो आध्यान और रौद्रध्यान संसारके कारण हैं, ऐसा ध्वनित होता है ॥ २९ ।। अब पहिले आध्यानका लक्षण कहते हैं,- आर्तममनोज्ञस्य सम्प्रयोगे तद्विप्रयोगाय स्मृतिसमन्वाहारः॥३०॥ अर्थ-आध्यानके चार भेद हैं, उनमेंसे ( अमनोज्ञस्य) विष कटक शत्रु शस्त्रादिक अप्रिय पदार्थका ( सम्प्रयोगे) संयोग हो जानेपर (तद्विप्रयोगाय) उसके दूरकरनेके लिये अर्थ- मो. (स्मृतिसमन्वाहार-) वारंवार चिन्ता करना, विचार करना सो (आर्त्तम्) अनिष्टसंयोगज नामंका पहिला आध्यान है ॥ ३० ॥ विपरीतं मनोज्ञस्य ॥ ३१ ॥ अर्थ-(मनोज्ञस्य) स्त्रीपुत्र धनादि प्यारे पदार्थोंका (विपरीतं) पूर्वोक्तसे विपरीत चिन्तवन करना अर्थात् वियोग होनेपर उनकी प्राप्तिके लिये वारंवार चिन्ता करना, इष्टवि- योगज नामका दूसरा आर्तध्यान है ॥ ३१ ॥ वंदनायाश्च ।। ३२ ।। अर्थ-(च) और (वेदनाया:) वेदनाका अर्थात् रोगजनित पीडाका चिन्तवन करना, अधीर हो जाना, विलापादिक करना सो वेदनाजनित तीसरा आर्तध्यान है ॥ ३२ ॥ निदानं च ॥ ३३॥ अर्थ (च) और (निदान) आगामी विषय भोगादिकका निदान करना, बांछा करना और उसका विचार करते रहना सो निदान नामका चौथा आध्यान है ॥ ३३ ॥ तदविरतदेशविरतप्रमत्तसंयतानाम् ॥ ३४॥ अर्थ (तत्) वह आध्यान ('अविरतदेशविरतप्रमत्तसंयतानाम् ) मिथ्यात्व, सासा- १ यहां अविरत' शब्दसे चतुर्थगुणस्थानवर्ती नहीं, किन्तु व्रतरहित जीव (मिथ्यात्वगुणस्थानसे लेकर अविरत सम्यग्दृष्टितक) समझना चाहिये।
दन, मिश्र.और अविरत इन चार गुणस्थानवालोंके तथा पांचवें देशविरत और छठे प्रमत्तसं- यत गुणस्थानवालोंके होता है। परन्तु ऊपर कहे हुए चार प्रकारके आर्तध्यानोंमेंसे निदान नामका आध्यान प्रमत्त गुणस्थानवालोंके नहीं होता है ॥ ३४ ॥ हिंसानृतस्तेयविषयसंरक्षणेभ्यो रौद्रमविरतदेशविरतयोः ॥ ३५॥ अर्थ-(अविरतदेशविरतयोः) अविरती अर्थात् पहिले चार गुणस्थानवाले जीवोंके और देशविरती अर्थात् पांच गुणस्थानवालोंके (हिंसानृतस्तेयविषयसंरक्षणेभ्यः) हिंसा, अनृत (झूठ), स्नेय (चोरी) और विषयोंकी रक्षासे चारप्रकारका (रौद्र) रौद्रध्यान होता है । हिंसा करनेका वारंवार चिन्तवन करना, और उसमें आनन्द मानना हिंसानंदी, झूठ बोलनेका चिन्तवन करना मृषानन्दी, चोरीका चिन्तवन करना चौर्यानन्दी और परिग्रहकी रक्षाको चिन्तवन करना परिग्रहानन्दी रौद्ध्यान है ॥ ३५ ॥ 'अब 'धर्म्यध्यानके चार भेद कहते हैं, आज्ञापायविपाकसंस्थानविचयाय धर्म्यम् ॥ ३६ ॥ अर्थ (आज्ञापायविपाकसंस्थानविचयाय) आज्ञा, अपाय, विपाक और संखानके विचय अर्थात् विचारके लिये वारंवार चितवन करना सो (धर्म्यम् ) चार प्रकारका धर्म्य- ध्यान है । उपदेशदाताके अभावसे और अपनी मन्दबुद्धिसे सूक्ष्म पदार्थोंका खरूप अच्छी- K अ. मो. ९२ तरह समझमें न आवे, तो उस समय सर्वज्ञकी आज्ञाको प्रमाण मानकर गहन पदार्थका अर्थ अवधारण करना आज्ञाविचय धर्म्यध्यान है । मिथ्यादृष्टियोंके कहे हुए उन्मार्गसे ये :प्राणी कैसे फिरेंगे ! इनके अनायतनसेवाका अभाव किस प्रकार होगा ! ये कब सन्मार्गमें आवेंगे! समीचीन मार्गका तो प्रायः अभावसा हो गया है, इसप्रकार सन्मार्गके अपायका चिन्तवन करना, सो अपायविचय धर्म्यध्यान है। ज्ञानावरणादि काँका द्रव्यक्षेत्रकालभावके अनुसार जो विपाक अर्थात् फल होता है, उसका चिन्तवन करना विपाकविचय धर्म्यध्यान है। और लोकके संस्थानोंका चिन्तवन करना सो संस्थानविचय धर्म्यध्यान है । यह धर्म्यध्यान चौथे असंयत, पांचवें संयत, छटे प्रमत्तसंयत और सातवें अप्रमत्तसंयत इन चार गुणस्थानोंमें होता है. ॥ ३६॥ शुक्ले चाये पूर्वविदः ॥ ३७॥ अर्थ-अगले ३९ वें सूत्रमें पृथक्त्ववितर्कवीचार, एकत्ववितर्कवीचार, सूक्ष्म क्रियाप्रतिपाति, व्युपरतक्रियानिवर्ति ये शुक्लध्यानके चार भेद कहेंगे, उनमेंसे (आये शुक्ले) आदिके दो शुक्लध्यान (पूर्वविदः) पूर्वके जाननेवाले अर्थात् श्रुतकेवलीके होते हैं। चकारसे यह सामर्थ्य निकलती है कि श्रुतकेवलीके धर्म्यध्यान भी होते हैं ॥ ३७॥ ९२ । SCETA परे केवलिनः ॥ ३८॥ अर्थ-(.परे ) अगले सूक्ष्मक्रियाप्रतिपाति और व्युपरतक्रियानिवर्ति ये दो ध्यान (केवलिनः) सयोगकेवली और अयोगकेवलीके ही होते हैं, छमस्थके नहीं ॥ ३८ ॥ अब शुक्लध्यानके चार भेद कहते हैं,- पृथक्त्वैकत्ववितर्कसूक्ष्मक्रियाप्रतिपातिव्युपरतक्रियानिवर्तीनि ॥ ३९ ॥ अर्थ-पृथक्त्ववितर्क, एकत्ववितर्क, सूक्ष्मक्रियाप्रतिपाति और व्युपरतक्रियानिवर्ति ये शुक्लध्यानके चार भेद हैं ॥ ३९॥ अब शुक्लध्यानका अवलंबन कहते हैं, त्र्येकयोगकाययोगायोगानाम् ॥ ४०॥ उक्त चारों भेदोंमेंसे पृथक्त्ववितर्क नामका प्रथम शुक्लध्यान तो मन, वचन और काय इन तीनों योगोंके धारकके होता है। दूसरा एकत्ववितर्क नामका शुक्लध्यान तीनोंमेंसे किसी एक योगवालेके होता है। तीसरा सूक्ष्म क्रियाप्रतिपाति नामका ध्यान काययोगवालोंके ही होता है । और चौथा व्युपरतक्रियानिवर्ति नामका ध्यान अयोगकेवलीके होता है ॥४०॥ अब प्रथमके दो ध्यानोंके विशेष जाननेकेलिये सूत्र कहते हैं- . अर्थreOUSAN मो. अ. ९३ एकाश्रये सवितर्कवीचारे पूर्वे ॥४१॥ अर्थ-(पूर्व) पहिलेके दो ध्यान अर्थात् पृथक्त्ववितर्क और एकत्ववितर्क नामके दो शुक्लध्यान (एकाश्रये) एकाश्रय अर्थात् श्रुतकेवलीके आश्रय होते हैं और ( सवितर्क- वीचारे).वितर्क और वीचारसहित होते हैं ॥ ११ ॥ इस सूत्रमें वितर्क और वीचारको कोई यथासंख्य नहीं समझ लेवे, अर्थात् ऐसा न समझ- लेवे कि, पहिला सवितर्क है और दूसरा वीचार है, इसलिये कहते हैं- अवीचारं द्वितीयम् ॥ ४२ ॥ अर्थ-(द्वितीय) दूसरा शुक्लध्यान (अवीचार) वीचाररहित है। अर्थात् आदिका शुक्लध्यान तो वितर्क और वीचार दोनोंसहित है और दूसरा वितर्कसहित परन्तु वीचाररहित है ॥ १२ ॥ अब वितर्कका लक्षण कहते हैं, वितर्कः श्रुतम् ॥ ४३ ॥ अर्थ-(श्रुतम् ) श्रुतज्ञान है सो-(वितर्कः) वितर्क है । अर्थात् श्रुतज्ञानको वितर्क कहते हैं । विशेष प्रकारसे तर्क करनेको वितर्क कहते हैं । शब्द श्रवणपूर्वक ग्रहणको श्रुत- ज्ञान कहते है ॥ १३॥ ९३ o 'वीचारोऽर्थव्यअनयोगसंक्रान्तिः ॥४४॥ अर्थ (अर्थव्यञ्जनयोगसंक्रान्तिः) अर्थ,. व्यञ्जन. और योगोंकी पलटन है, सो (वीचार) वीचार है ॥ ध्येय द्रव्यको छोड़कर उसकी पर्यायका ध्यान करनेको और पर्या- यको छोड़कर द्रव्यका ध्यान करनेको अर्थसंक्रान्ति कहते हैं । श्रुतके एकवचनका अवलंबन करके अन्यका अवलंबन करनेको और उसको छोड़ दूसरेको अवलंबन करनेको व्यञ्जनसं- क्रान्ति कहते हैं। और काययोगको छोड़कर मनोयोग वा वाग्योगके ग्रहण करनेको और मनोयोग वा वाग्योगको छोड़कर काययोगके ग्रहण करनेको योगसंक्रान्ति कहते हैं। इस प्रकारके परिवर्तनको ही वीचार कहते हैं ॥ ४४ ॥ इसप्रकार बाह्याभ्यन्तरतपोंका वर्णन किया । ये दोनों तप नवीन कर्मोंका निषेध करनेके हेतु होनेसे संवरके कारण हैं और पूर्वबंधे कोंके नष्ट करनेके निमित्त होनेसे निर्जराके भी GAUR कारण हैं अब तपश्चरणादि करनेसे जो निर्जरा होना कहा है, वह समस्त सम्यग्दृष्टी जीवोंके एकसी ही होती है कि भिन्न २ होती है, यह बतलानेके लिये सूत्र कहते हैं,- सम्यग्दृष्टिश्रावकविरतानन्तवियोजकदर्शनमोहक्षपकोपशमकोपशान्त- मोहक्षपकक्षीणमोहजिनाः क्रमशोऽसङ्खयेयगुणनिर्जराः ॥ ४५ ॥ 8 मो. ९४ अर्थ- ( सम्यग्दृष्टिश्रावकविरतानन्तवियोजकदर्शनमोहक्षपकोपशमकोपशान्तमोह- क्षपकक्षीणमोहजिनाः) सम्यग्दृष्टि, श्रावक, विरत अर्थात् महाव्रतिमुनि, अनन्तानुबंधीका विसंयोजन करनेवाला, दर्शनमोहको नष्ट करनेवाला, चारित्रमोहको उपशम करनेवाला, उप- शान्तमोहवाला, क्षपकश्रेणी चढ़ता हुआ, क्षीणमोही और जिनेन्द्रभगवान इन सबके (क्रमश:) क्रमसे ( असङ्खयेयगुणनिर्जराः) असंख्यात गुणी निर्जरा होती है ॥ अर्थात् सम्यग्दृष्टिसे असंख्यातगुणी पंचमगुणस्थानवर्ती श्रावकके और श्रावकसे असंख्यातगुणी मुनिके इसप्रकार प्रत्येकके ऊपर २ बढ़ती हुई असंख्यातगुणी निर्जरा होती है ॥ ४५ ॥ अब. मुनियोंके पांच भेद कहते हैं,- पुंलाकवकुशकुशीलनिर्ग्रन्थस्नातका निर्ग्रन्थाः ॥४६॥ अर्थ (पुलाकबकुशकुशीलनिग्रन्थलातकाः) पुलाक, बकुश, कुशील, निग्रंथ, और खातक, ऐसे पांच प्रकारके (निर्ग्रन्थाः) निथसाधु हैं। जो उत्तर गुणोंकी भावनारहित हों, और मूलगुणोंमें भी किसी काल वा किसी क्षेत्रमें परिपूर्णताको प्राप्त न हों, अर्थात् कभी किसी कारण के वशसे जिनके मूलगुणोंमें भी दोष लग जाता है, उन्हें पुलाकमुनि कहते हैं । जिनके मूलगुण परिपूर्ण हों परन्तु अपने शरीर उपकरणादिकी शोभा बढ़ानेकी किंचित् इच्छा रहती हो, उनको बकुशमुनि कहते हैं । कुशील मुनि दो प्रकारके होते हैं-एक प्रतिसे- ९४ G वनाकुशील और दूसरे कषायकुशील । जिनके उपकरण और शरीरादिकसे विरक्तता न हो और मूलगुंण तथा उत्तरगुणोंकी तो परिपूर्णता हो, परन्तु उत्तर गुणोंमें कारण विशेषसे कभी कुछ विराधना आती हो, उनको प्रतिसेवनाकुशील कहते हैं। और जिन्होंने संज्वलन कपायके अतिरिक्त अन्य कषायोंको जीत लिया हो, उन्हें कषायकुशील कहते हैं । जिनके मोहकर्मके उदयका अभाव हो, और जैसे जलमें दंड ताड़नेसे लहर उठती है और शीघ्र ही विलय हो जाती है, उसी प्रकार अन्य कर्मोंका उदय मंद हो, प्रगट अनुभवमें नहिं आवे, उनको निन्थ साधु कहते हैं। और समस्त घातिया कर्मोंको नाशकरनेवाले केवली भगवान् स्नातक हैं । इसप्रकार ये पांचों ही निग्रंथ हैं ॥ १६ ॥ अब पुलाकादिक नियोंके और भी भेद कहते हैं, संयमश्रुतप्रतिसेवनातीर्थलिङ्गलेश्योपपादस्थानविकल्पतः साध्याः॥४७॥ अर्थ-(संयमश्रुतप्रतिसेवनातीर्थलिङ्गलेश्योपपादस्थानविकल्पतः) संयम, श्रुत, प्रति- सेवना, तीर्थ, लिङ्ग, लेश्या, उपपाद और स्थान इन आठ प्रकारके भेदोंसे भी पुलाकादिक मुनि (साध्या:) साधने योग्य हैं । अर्थात् उक्त आठ कारणोंसे पुलाकादि मुनियोंके और २ भी भेद होते हैं ॥ ४७ ॥ इति श्रीमदुमाखामिविरचिते तत्त्वार्थाधिगमे मोक्षशास्त्रे नवमोऽध्यायः ॥९॥ (१) उपशान्तकपाय और क्षीणकपाय गुणस्थानवती ।
अथ दशमोऽध्यायः प्रारभ्यते । अ मो. १० 18 ९५ इस अध्यायमें सप्ततत्त्वोंके वर्णनमेंसे मोक्षतत्त्वका स्वरूप कहना है । और मोक्षकी प्राप्ति केवलज्ञानपूर्वक है अर्थात् पहिले केवलज्ञान हो जाता है, तब मोक्ष होता है । इसकारण पहिले केवलज्ञानकी उत्पत्तिका कारण कहते हैं, मोहक्षयाज्ज्ञानदर्शनावरणान्तरायक्षयाच केवलम् ॥१॥ अर्थ-( मोहक्षयात् ) मोहनीय कर्मके क्षय होनेके पश्चात् अन्तर्मुहूर्तपर्यंत क्षीणकषाय नामका बारहवां गुणस्थानं पाकर (च) तत्पश्चात् (ज्ञानदर्शनावरणान्तरायक्षयात्) युगपत् [ एकसाथ ] ज्ञानावरण दर्शनावरण और अन्तरायका क्षय होनेसे (केवलम्) केवलज्ञान होता है ॥ भावार्थ-ज्ञानावरण दर्शनावरण मोहनीय और 'अन्तराय इन चार घातिया कर्मों के सर्वथा नष्ट हो जानेपर केवलज्ञानकी प्राप्ति होती है ॥ १ ॥ अब मोक्षका लक्षण क्या है और वह किस कारणसे होता है, सो कहते हैं,- बन्धहेत्वभावनिर्जराभ्यां कृत्स्स्रकर्मविप्रमोक्षो मोक्षः ॥२॥ अर्थ- (बन्धहेत्वभावनिर्जराभ्याम्) बन्धके कारणोंके नहीं रहनेसे और निर्जराके होनेसे (कृत्स्नकर्मविप्रमोक्षः) समस्त काँका अत्यन्त अभाव हो जाना, सो (मोक्षः) मोक्ष है। ९५ भावार्थ-केवलज्ञान होनेके पश्चात् वेदनीय, आयु, नाम और गोत्र इन चार अघातिया कर्मोंका नाश हो जाना अर्थात् आगामी कर्मबंधक कारणोंका अभाव, और पूर्वसंचित कर्मोंकी ससाका सर्वथा नाश हो जाना, सो ही मोक्ष है ॥२॥ अंब पुगलमयी द्रव्यकर्मकी प्रकृतियोंके नाश होनेसे ही मोक्ष होता है, या भावकर्मोंका भी नाश हो जाता है, इस प्रश्नका उत्तर देनेके लिये सूत्र कहते हैं,- औपशमिकादिभव्यत्वानां च ॥३॥ अर्थ-(च) और मोक्षजीवके (औपशमिकादिभव्यत्वानाम्) औपशमिकादि भावोंका और पारिणामिक भावोंमेंसे भव्यत्वभावका भी अभाव होता है। भावार्थ-औपशमिक क्षा- योपशमिक और औदयिक तथा भव्यत्व इन चार प्रकारके भावोंका और पुद्गलकर्मों की समस्त प्रकृतियोंका नाश होनेपर मोक्ष होता है ॥ ३॥ अन्यत्र केवलसम्यक्त्वज्ञानदर्शनसिद्धत्वेभ्यः ॥४॥ अर्थ-(केवलसम्यक्त्वज्ञानदर्शनसिद्धत्वेभ्यः) केवलसम्यक्त्व, केवलज्ञान, केवलदर्शन, और केवलसिद्धत्व इन चार भावोंके ( अन्यत्र) सिवाय अन्य भावोंका मुक्त जीवके अभाव है। यहां प्रश्न होता है कि, यदि मुक्त जीवके ये चार ही भाव अवशेष रहते हैं, तो अनन्तवी र्यादिका भी अभाव समझना चाहिये । इसका समाधान यह है कि अनन्तवीर्यादिक हैं सो AUR मो. 'अ. अनन्तज्ञान और अनन्तदर्शनसे अविनाभावीसंबंधवाले हैं अर्थात् अनन्तज्ञान और अनन्त- दर्शनके साथ-२ अनन्तवीर्य अनन्तसुखादिक भाव भी नियमसे रहते हैं। क्योंकि अनन्त सुख अनन्तवीर्य जीवमें ही होते हैं जड़में नहीं होते । जब जीवमें होते हैं, तो जीव अनन्त- ज्ञानमय-है-ज्ञानके विना जड़के सुख हो ही नहीं सकता ॥ ४ ॥ तदनन्तरमूई गच्छत्यालोकान्तात् ॥५॥ अर्थ (तदनन्तरं ) समस्त कमाँके नष्ट हो जानेके पश्चात् मुक्तजीव (आलोकान्तात्) लोकके अन्त भाग तक (ऊर्द्ध) ऊपरको (गच्छति) जाता है ।। ५॥ आगे ऊर्द्धगमनका हेतु कहते हैं, पूर्वप्रयोगादसजत्वाद्वन्धच्छेदात्तथागतिपरिणामाच ॥६॥ अर्थ-(पूर्वप्रयोगात् ) पूर्वप्रयोगसे ( असङ्गत्वात् ) असंग होनेसे (बन्धच्छेदात् ) कर्मबंधके नष्ट हो जानेसे (च) और (तथागतिपरिणामात्) तथागतिपरिणामसे अर्थात् ऊर्ध्वगमन खभावके होनेसे मुक्तजीवका ऊर्द्धगमन होता है ॥ ६ ॥ अब इन चारों कारणों के चारं दृष्टान्त देते हैं.- आविद्धकुलालचक्रवद्यपगतलेपालाचुवदेरण्डवी- जवदनिशिखावच ॥ ७॥ SOURUUUUROOPor ९६ Ur PUR अर्थ-( आविद्धकुलालचक्रवत् ) कुंम्हारके 'द्वारा घुमाये हुए चाकके समान, (व्यपगतलेपालायुवत् ) जिसपरसे मिट्टीका लेप दूर हो गया है, ऐसी तूंबीके समान, ( एरण्डवीजवत् ) एरंडके बीजके समान (च) और ( अग्निशिखावत् ) आगकी शिखाके समान मुक्त जीवका ऊर्द्धगमन होता है । ये चार दृष्टान्त पूर्वसूत्रमें दिये हुए चार हेतुओंके प्रगट करनेवाले हैं । अर्थात् जिसतरह पूर्वके प्रयोगसे दंडेके द्वारा मरे हुए घुमावसे कुम्हारका चक्र उसके घुमाना बन्द कर देने पर भी बराबर फिरता रहता है, उसी प्रका- रसे संसारी जीव मुक्ति गमनके लिये जो निरन्तर चिन्तवन किया करता है, उस संस्कारके कारण मुक्त हो जानेपर भी गमन करता है। जिसतरह मिट्टीसे लिपटी हुई तूंबी जबतक मिट्टीके कारण भारी रहती है, तबतक पानी में डूबी रहती है, परन्तु ज्यों ही उसकी मिट्टी धुल जाती है, त्यों ही वह पानीके ऊपर उतरा आती है। इसी प्रकारसे कर्मके भारसे दबा हुआ आत्मा ज्यों ही उनसे छुटकारा पाकर हलका हो जाता है, त्यों ही ऊपरको गमन करता है। जिस तरह एरंडका बीज जबतक फलके आवरणसे ढंका हुआ रहता है, तबतक तो बंधा रहता है, परन्तु ज्यों ही सूखनेपर आवरण दूर होता है, त्यों ही चिटककर ऊपरको उछलता है । इसी प्रकारसे कर्म प्रकृतियोंसे बंधा हुआ आत्मा ज्यों ही छूटता है, त्यों ही ऊपरको जाता है, और जिस तरह यहां वहांकी हवाके न होनेसे अमिकी शिखा ऊपरको ही जाती है, उसी WORK अ. १० ९७ प्रकारसे मनुष्यादिगतियोंमें लेजानेवाले कर्मोंके अभावसे जीव खभावसे ऊपरको गमन करता है । जीवका जब ऊर्द्धगमनका खभाव है,तो फिर लोकके अन्तमें ही क्यों ठहर जाता है ? अलोका- काशमें भी क्यों नहीं चला जाता है ? इसका उत्तर आचार्य महाराज देते हैं कि,- धर्मास्तिकायाभावात् ॥८॥ अर्थ-अलोकाकाशमें धर्मास्तिकायके अभाव होनेसे गमन नहीं होता है । अर्थात् धर्मादिक पांच द्रव्योंका निवास लोकाकाशमें ही है अलोकाकाशमें नहीं है और जीव और पुद्गलको गमन करनेमें सहायक धर्मद्रव्य ही होता है जिसका कि आगे अभाव है, इसलिये जीवके गमनका भी अभाव है। इसीकारण मुक्तजीव लोकके अन्तमें जाकर सिद्धस्थानमें ठहर जाता है ॥ ८॥ यदि यहां कोई प्रश्न करै कि, मुक्तजीवोंमें कुछ भेद भी है कि नहीं ? तो उसका उत्तर इस प्रकार है- क्षेत्रकालगतिलिङ्गतीर्थचारित्रप्रत्येकबुद्धवोधितज्ञानावगाहनान्तरसंख्या- ल्पवहुतत्वतः साध्याः ॥९॥ अर्थ-(क्षेत्रकालगतिलिङ्गतीर्थचारित्रप्रत्येकबुद्धबोधितज्ञानावगाहनान्तरसंख्याल्प- बहुतत्वतः) क्षेत्र, काल, गति, लिंग, तीर्थ, चारित्र, प्रत्येकबुद्ध, बोधित, ज्ञान, अवगाहना, अन्तर, संख्या और अल्पबहुतत्व इन बारह अनुयोगोंसे सिद्धोंमें भी भेद (साध्याः) साधने ९७ AURE .
UU चाहिये । अर्थात् इन कारणोंसे मुक्तजीवोंके भी भेद किये जा सकते हैं। भावार्थ-वास्तवमें तो सिद्धोंमें कोई भेद नहीं है, सब एकसे हैं, परन्तु क्षेत्रकी अपेक्षासे कि भरत विदेहआदि किस क्षेत्रसे वे मुक्त हुए हैं, कालकी अपेक्षासे-कि किस कालमें मुक्त हुए हैं, गतिकी अपेक्षासे-कि किस गतिसे मोक्ष गये हैं, लिंग की अपेक्षासे-कि तीन भावलिंगोंमेंसे किस लिंगसे क्षपकश्रेणी चढ़कर.मोक्ष पाया है, तीर्थकी अपेक्षासे-कि किस तीर्थकरके तीर्थमें मोक्षमें गये हैं वा तीर्थकर होकर मोक्ष हुए हैं या सामान्य केवली होकर हुए हैं, चारित्रकी अपेक्षासे-कि किस चारित्रसे कर्मोंसे छूटे हैं, प्रत्येकबुद्धबोधितकी अपेक्षासे-कि खयं बोधित होकर सिद्ध हुए हैं या किसीके उपदेशसे बोधित हुए हैं, ज्ञानकी अपेक्षासे- कि मतिश्रुतपूर्वक केवलज्ञान पाकर मोक्षको गये हैं या मति श्रुत अवधि या मतिश्रुत अवधि मनपर्ययपूर्वक केवली हुए हैं, अवगाहनाकी अपेक्षासे-कि अधिकसे अधिक पांचसौ धनुषके और छोटेसे छोटे साढ़ेतीन हाथके शरीरमेंसे किस शरीरसे मोक्ष हुए हैं, अन्तरकी अपेक्षासे । कि- एक मुक्त हुए जीवसे दूसरे मुक्त जीवके बीचके समयमें कितना अन्तर है, संख्यासे कि उसके साथ और कितने जीव मुक्त हुए हैं, और अल्पबहुत्वकी अपेक्षासे-कि समुद्रद्वीप आदि स्थानोंसे थोड़े बहुत कितने सिद्ध हुए हैं, इस तरह सिद्धोंमें भेदोंकी कल्पना हो सकती है। इति श्रीमदुमास्वामिविरचिते तत्वार्थाधिगमे मोक्षशास्ले दशमोऽध्यायः ॥१०॥ A AUON मो. COM अ-प्रा १८ अन्तिमप्रार्थना। अक्षरमात्रपदखरहीनं व्यंजनसन्धिविवर्जितरेफम् । साधुभिरत्र मम क्षमितव्यं को न विमुह्यति शास्त्रसमुद्रे ।। १ ।। अर्थ-यदि यह ग्रन्थ कहींपर अक्षर, मात्रा, पद, खररहित हो, तथा व्यंजन, संधि, और रेफ वर्जित हो, तो इस विषयमें सज्जन पुरुषोंको वा मुनिजनोंको मुझपर क्षमा करना चाहिये । भला, इस शास्त्ररूपी महान् समुद्रमें कौन गोते नहीं खाता है अर्थात् कौन नहीं भूलता है-भूल सबसे होती है। माहात्म्य। दशाध्याये परिच्छिन्ने तत्त्वार्थ पठिते सति । फलं स्यादुपवासस्य भापितं मुनिपुङ्गवैः ॥२॥ अर्थ-इस दशअध्यायवाले तत्त्वार्थ शास्त्रके ( भावपूर्वक ) पढ़नेसे एक उपवासके कर- नेका फल होता है, ऐसा बड़े २ मुनियोंने कहा है। HIA APHYSIRAHumum SAUGU ९८ समाप्तोऽयं ग्रन्थः GAUR Timifiniminim