Acharya Shri Vinaychandra Gyan Bhandar, Jaipur
Shree Gnatadharma Kathanga Sootram Bhag-3
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दक्षिण भारत में जैन समाज के प्रखर नेता दानवीरशेठ स्व० श्रीमान ताराचंदजी साइन गेलडाकी जीवनझलक दक्षिण भारत के प्रवास पर आये हुए किसी भी व्यक्ति के दिलमे, मद्रास जैसे शहर के जैन समाज की शिक्षण और-वैद्यकीय सस्थाओं का सुव्यवस्थित क्रम और प्रनय देखकर आनद हुए बिना नही रह सकता । और स्वतः ही जैन समाज की दान-दिशा को इस ओर ले जाने वाले व्यक्तिके रूपमे दानवीर शेठ स्व० श्रीमान् ताराचदजी साहेब गेलड़ाका नाम व व्यक्तित्व नजरमे आये विना नहीं रहता।। मध्यम कदका इकहटा वदन, खादीकी धोती, खादीका कुरता और खादी की टोपी, पैरमे केन्वासके पादत्राण हाथमे छोटीसी लकडी-चमकती तेज आखे और ७० वर्ष की अवस्थामे भी जवानों की तेजी-ये आप के अभिन्न गुणों के सूचक थे। उनके यह सादगी अत समय तक भी कायम रही थी। सन १९३७ मे आप राजकोट पधारे थे वहा अनेक शिक्षण सस्थाओंको देखकर आपने अपने मनमे तय किया कि मैं मद्रास जाकर शिक्षाकी ऐसीही सस्थाएँ वनाउगा । उनके विचारों की पुष्टि के रूपमे श्रीमान् विरदीचदजी सा मलेचाने ५००००० रूपया दान दिया और यहाकी श्री एस एस.जैन एज्युकेशन सोसायटी की स्थापना हुई । इस सोसायटी के विकास के लिये आपने अपने व्यापार से भी-निवृत्ति ले ली और-क्रमशः इसका विकास करते रहे । इस सोसायटी के तत्वावधानमे क्रमशः प्रायमरी स्कूल, गोडिंग होम, हाईस्कूल एव काँलेज भी स्थापित हुए और आज भी सुचारु रूपसे चल रहे है । जब तक ये सस्थाएँ पूर्णरूपसे आत्म-निर्भर नहीं हुई तबतक आप सोसायटी के प्रारभ कालसे मत्री बने रहे। इतनाही नही प्रत्येक सस्था के लिये आपने दान दिया था ही-किन्तु वाराचद गेलडा जैन विद्यालयके लिये ३१००० रु का भव्य दान दिया। इसके उपरात भी २२००० रू. का और दान आपका होनेसे आप -tv મળવાનું ઠેકાણુ શ્રી અ, ભા. . સ્થાનકવાસી જૈન શાસ્ત્રોદ્ધાર સમિતિ, કે ગરેડિયા કૂવા રેડ, ગ્રીન લેજ પાસે, રાજકોટ, (સૌરાષ્ટ્ર) Published by Shri Akhil Bharat S S Juin Shastroddhara Samitin Garcdia Kuva Road, RAJKOT, (Saurashtra), W Ry, India UT ये नाम केचिदिह नः प्रथयन्त्यवक्षा, जानन्ति ते किमपि तान् मति नैप यत्नः। उत्पत्स्यतेऽस्ति मम कोऽपि समानधर्मा, कालो घय निरवधिम्पुिला च पृथ्वी ॥१॥ ST જિીત UR करते अवज्ञा जो हमारी यत्न ना उनके लिये। जो जानते है तत्व कुछ फिर यत्ल ना उनके लिये ॥ जनमेगा मुझसा व्यक्ति कोई तल इससे पायगा। है काल निरवधि विपुल पृथ्वी ध्यान में यह लायगा ॥१॥ મૃદય ૨. ૨૫=oo વિર સ વત પ્રથમ આવૃત્તિ પ્રત ૧૨૦૦ ૨૪૮૯ વિક્રમ સંવત ૨૦૧૯ ઈસવીસન શાહ મુદ્રક મણિલાલ છગનલાલ પ્રિન્ટીગ ઘી કાટ રેડ, અમદાવાદ ન પ્રભાત પ્રેસ ५ । ७८ वर्ष की आयुमें आपका पडित-मरण हुआ जो आपके यशस्वी जीवन की यशकलगी के समान था । अर्थात् यशस्वी पुरुपो के शिरोमणि थे। आपके सुपुत्र श्रीमान् भागचंदजी सा गेल्डा भी कर्मठ कार्यकर्ता है । जैन एन्ड नेशनल सोसायटी के आप सदस्य एव पदाधिकारी रह चुके है-वर्तमानमें आप सोसायटीके सभापति है । गोसेवा और पाजरापोल के कार्य के लिये आप घर २ जाकर चंदा करने में सकोच महमूस नहीं करते और विगत आठेक वर्षों से आप मद्रास पाजरापोलके मत्री है और उसका बहुत ही विकास किया है। द्वितीय पुत्र श्री नेमचदजी स्वर्गवासी हुए है किन्तु आप भी औपधालय निमित्त दस्ट करके गये है। तृतीय पुत्र श्री खुशाल्चदजी व्यापार-कुशल है और कार्य- भार सम्हाले हुए हैं। इस आगम प्रकाशन के लिये जब आपके पास डेप्यूटेशन पहुंचा तब इन सुपुत्रोंने उदारता से ५००१) रू दिये है एतदर्य धन्यवाद है। अन्य सजन भी उनका अनुकरण करे यही अभ्यर्थना है। सेक्रेट्री शास्त्रोद्धार समिति सोसायटी के पेइन (सरक्षक) बने । सन १९५६ में अन्यों को भी-कार्य संचालन का अनुमा हो एतर्थ आप नित हुए, किन्तु अव समय तक सोसा- यटी के प्रत्येक कार्य के लिये आप मलाह देते रहे और वह समान का गौरव था कि आप जैसे कुशल एव विचक्षण सलाहकार मिले। दानके प्रवाह को शुभ मार्गमे बहाने का आप का प्रयास अत्यंत अनुकरणीय रहा । और मद्रास के जैन समाजने वैदकीय राहत क्षेत्रमें "जैन मेडिकल रिलीफ सोसायटी" स्थापित की-जिसके तचापानम कई डीसपेंसरिया और एक प्रमूतिगृह चल रहा है। आप उसकी कार्य कारिणी के पदाधिकारी व सदस्य रहे। इतनाही नही आपने अपने व्यापार क्षेत्रको नहीं भूला और सैदापेट (भूदान) मे शुद्ध आयुर्वेदिक औषधलय-जिनेश्वर औषधालय खोला जिसके साथ आगे जा कर अपनी पत्नीके नाम पर रामसुरजवाई गेलडा प्रमूतिगृह भी खोला। एतदर्थ आपने अपने द्वितीय पुन स्व. नेमीचदजी की इन्छाके अनुसार अलग ट्रस्ट बना दिया है। आपने अपनी जन्मभूमि कुचेरा के लिये भी कुछ करने के विचार से वहा पर भी छात्रालय शुरू १९४२ मे करवाग और उसके मारम्भकाल से आपकी ओर से २५० मासिक सहायता उसे दी जा रही है जो अप भी चालू है । तदुपरात ताराचद गेलडा टस्ट भी आपने कायम किया जिससे कई उदीय मान जैन समाज के विद्यार्थियों की आशाओ को प्रोत्साहन दिया गया और दिया जा रहा है। उनके अदम्य उत्साह और जोश के साथ उनके दृढ मनोवल का परिचय न दिया जावे तो उनका व्यक्तित्व अधूरा रहेगा । वे अपने आप आगे बढने वाले थे । बहुत ही छोटी उम्र में उन्हों ने व्यापार किया और ताराचद गेलडा एन्ड सन्स, टी ची ज्वेलरीज एव महेन्द्र स्टोर्स आदि व्यापारिक फर्म चले। सामान्य पूजीसे लेकर वे लाखोपति बने । सामान्य शिक्षा ज्ञान के बाद भी चार भापा की जानकारी और प्रपल व्यापारिक ज्ञान आपकी विशेषता थी। आजीवन खादीनत, हाथवटी का पीसा हुआ धान और गायका द्ध-धी फठिन प्रत वे आजीवन निभाते रहे। समान-मुधारणा भीआपने कई मकारसे की।
७६१-८०५ १७ द्वितीय श्रुतस्कधका उपक्रम प्रथम वर्ग-पहला अध्ययन १८ कालीदेवीका वर्णन दूसरा अध्ययन १९ रात्रीदेवीका वर्णन तीसरा अध्ययन २० रजनी दारिका के चरित्रका निरूपण ८०६-८१० ८११-८१४ दूसरा वर्ग ८१५-८१९ २१ शुभानिशुभादि देवीयोंके चरित्रका वर्णन तीसरा वर्ग २२ अलादि देवियोंके चरित्रका वर्णन चौथा वर्ग २३ रूपादि देवियों के चरित्रका वर्णन ८२०-८२५ ८२५-८२८ पाचवा वर्ग २४ कमलादि देवियों के चरित्रका वर्णन ८२९-८२३ छडा वर्ग २५ उत्तरदिशाके इन्द्र महाकाल आदिकोंकी अग्रमडिपियों का वर्णन ८३४-८३५ सातवा वर्ग २६ सूरमभादि देवियों के चारित्रका वर्णन ८३६-८३८ आठवा वर्ग २७ चन्द्रप्रभादि देवियों के चरित्रका वर्णन ८३९-८४२ नववा वर्ग ८४२-८४५ २८ पद्मादिदेवियों के चरित्रका वर्णन दशवां वर्ग २९ कृष्णादि देवियोंके चरित्रका वर्णन ३० शास्त्र प्रशस्ति ८१६-८५१ ८५२ है . th ज्ञाताधर्मकथागसूत्रं तृतीय भा की विषयानुक्रमणिका क्रमाङ्क विषय पेज चौदहवा अध्ययन १ तेतलीपुत्र प्रधानके चारित्रका वर्णन १-६६ पंद्रहवा अध्ययन २ नदिफल के स्वरूपका निरूपण सोलहवा अध्ययन ३ धर्मरुचि अनगारके चरित्र निरूपण १३२-१८२ ४ सुकुमारिका के चरित्रका वर्णन १८३-२५१ ५ द्रौपदी के चरित्रका निरूपण २५२-२९६ ६ द्रौपदी पूजा चर्चा २९७-४२६ ७ द्रौपदी के चरित्रका वर्णन ४२७-५८५ सत्रहवा अध्ययन ८ नावसे व्यापार करने वाले वणिजोका वर्णन ५८६-५९० ९ नावके निर्यामक का दिड्मृढ होनेका कथन ५९१-५९५ १० कालिक द्वीपमें सुवर्ण आदिका वर्णन ५९५-५९६ ११ कालिक द्वीपमें हिरण्य आदिसे पोतकाभरना ५९७-६०० १२ कालिक द्वीपमे रहे आकीर्णाश्चों का वर्णन ६०१-६१९ १३ आकीर्णाश्चौके द्रष्टातको दार्टान्तिक के साथ योजना ६२०-६३७ अठारहवा अध्ययन १४ सुसमा दारिका के चारित्रका वर्णन ६३८-७०७ उन्नीसवां अध्ययन १५ पुडरीक-कडरीक मुनिके चरित्रका वर्णन ७०८-७५२ द्वितीय श्रुतस्मथ १६ द्वितीय श्रुतस्कप का मङ्गलाचरण ७५३-७६० ७६१-८०५ १७ द्वितीय श्रुतस्कंधका उपक्रम प्रथम वर्ग-पहला अध्ययन १८ कालीदेवीका वर्णन दूसरा अध्ययन १९ रात्रीदेवीका वर्णन तीसरा अध्ययन २० रजनी दारिका के चरित्रका निरूपण ८०६-८१० ८११-८१४ - दूसरा वर्ग ८१५-८१९ २१ शुभानिशुभादि देवीयोंके चरित्रका वर्णन तीसरा वर्ग २२ अलादि देवियोंके चरित्रका वर्णन चौथा वर्ग २३ रूपादि देवियों के चरित्रका वर्णन ८२०-८२५ ८२५-८२८ पाचवा वर्ग २४ कमलादि देवियों के चरित्रका वर्णन ८२९-८२३ छडा वर्ग २५ उत्तरदिशाके इन्द्र महाकाल आदिकोंकी अग्रमहिपियों का वर्णन ८३४-८३५ सातवा वर्ग २६ सूरमभादि देवियों के चारित्रका वर्णन ८३६-८३८ आठवां वर्ग २७ चन्द्रमभादि देवियों के चरित्रका वर्णन ८३९-८४२ नववा वर्ग ८४२-८४५ २८ पद्मादिदेवियों के चरित्रका वर्णन दशवां वर्ग २९ कृष्णादि देवियोंके चरित्रका वर्णन ३० शास्त्र प्रशस्ति ८१६-८५१ ८५२
તા ૧૫–૭-૬૩
ના રોજ કલાસવાર
મેમ્બરની સંખ્યા.
૨૭
ફર
૧૩૩
૫૮૬
૪૯
આદ્ય મુરબ્બીશ્રી, ૫૦૦૦ થી વધુ રકમ ભરનારા
મુરબીશ્રી, ૧૦૦૦ થી વધુ રકમ ભરનારા
સહાયક મેમ્બરે, ૫૦૦ થી વધુ રકમ ભરનારા
લાઈફ મેમ્બર, ૨૫૦ થી વધુ રકમ ભરનારા
બીજાનબરના જુના મેમ્બરે, ૧૫૦થી વધુ રકમ ભરનારા
ફેલ મેમ્બરે
૮૨૭
રૂપિયા બસો પચાસ તથા રૂપિયા પાચ-વાળા મેમ્બર લેવાનું હવે
બધ છે ફક્ત રૂ ૧૦૦૧ થી મુરબ્બીશ્રી માટે ૭૦ સીતેર જગ્યા ખાલી છે
અને આદ્ય મુરબ્બીશ્રી રૂ ૫૦૦૧ થી દાખલ કરવામાં આવે છે
મેમ્બરેની સ ખ્યા પૂરતા જ શાસ્ત્રો છપાય છે જેથી પાછળથી દાખલ
થનારને સૂત્રે મળવા મુશ્કેલ છે માટે જીજ્ઞાસુ ભાઈઓ તથા બહેને અમારી
વિનતી છે કે તેઓ મુરબ્બીશ્રી અથવા આદ્ય મુરબ્બીશ્રીમા પિતાનું નામ
જલ્દી મોકલી આપે
રાજકોટ
તા ૧૫-૭-૬૩
નમ્ર સેવક,
સાકરચદ ભાઈચંદ શેઠ
મળી
*****
आद्यमुरव्वीश्री
****
-
********************************
शेठ साहेबश्री ताराचदजी साहेव. गेलडा
मद्रास
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આમુરબ્બીશ્રીઓ
છે
?
(અ) શ્રી હરખચંદ કાલીદાસ વારિઆ
ભામહ
સારી હોવિદ જેચ દભાઈ
રાજેકેટ,
1
શેઠશ્રી શાંતિલાલ મ ગળદાસભાઈ
અમદાવાદ
(સ્પ) શેઠશ્રી વાળીભા જમણલાલ () શ્રી ગનલાલ શામળદાસ ભાવસાર
બારસી
અમદાવાદ
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આદ્યમુખીશ્રીઓ
Chi
છે
S
(અ) ને રાજીભાઈ મોહનલાલ શાહ
અમદાવાદ
આ શ્રીમાન શ્રી મુનચદજી માં
બાલિયા પાલી મારવાડ,
//
(અ) શ્રી દિનેશભાઈ કાતિલાલ શાહ
અમદાવાદ
શ્રી સિગભાઈ પાચાલાલભાઈ
અમદાવાદ
સ્વ શ્રી આત્માગમ માણેકલાલ
અમરના
આમુરબ્બીશ્રીઓ
|_|
(અ) શ્રી શામજીભાઈ વેલજીભાઈ વીરાણી
રાજકેટ
*
નમમ
*
શેઠશ્રી રામજીભાઈ શામજીભાઈ વીરાણી
રાજકોટ,
(અ) વિનોદકુમાર વીણું
રાજકોટ,
(દીક્ષા લીધા પહેલા શાસ્ત્રાભ્યાસ કરતા)
રોડથી મિશ્રી લાલજી લાલચદજી સા લુણિયા
તથા શેઠશ્રી જેમતરાજજી લાલચદજી સા
આમુરબ્બીશ્રીઓ
-
E
(અ) ઠગજીભાઈ મોહનલાલ શાહ
અમદાવાદ
અ, શ્રીમાન શ્રી મુકનચદજી મા
બાલિયા પાલી મારવાડ,
//
-
(અ) શેઠશ્રી દિનેશભાઈ કાતિલાલ શાહ
અમદાવાદ
શેઠશ્રી જેમિ ગભાઈ પાલાલભાઈ
અમદાવાદ
અનેઠશ્રી આત્મારામ માણેલાલ
અમદાવાદ
આમુરબ્બીશ્રીઓ
રઠ સાહેબ શ્રી કિશનચ દછ સાહેબ
જોહરી દિલ્હી
સ્વ. શેઠશ્રી હરિલાલ અનેપચદ શાહ
ખભાત
*
R
noun
૧ વચ્ચે બેઠેલા મોટાભાઈ શ્રીમાન
મૃતચદજી જવાહરલાલજી બરાડયા
બાજુમાં બેઠેલા મિશ્રીલાલજી
બરડિયા
૨ ઉભેલા સૌથી નાનાભાઈ પૂનમચંદ
બડિયા
શ્રી વૃજલાવ દુલભજી પારેખ
રાજકોટ,
॥ श्रीवीतरागाय नमः॥ श्रीजैनाचार्य जैनधर्मदिवाकर-पूज्यश्री-घासीलालप्रतिनिरक्तिया अनगार- धर्मामृत पिण्याख्यया व्याख्यया समलकृत श्री-ज्ञाताधर्मकथाङ्गसूत्रम् , तृतीयो भागः अथ चतुर्दशा ययन प्रारभ्यते अस्य व्यख्यायमानवतुर्दशाध्ययनस्य व्याख्यातेन त्रयोदशेना ययनेन सहाय- ममिसम्बन्धः-पूर्वस्मिन् अभ्ययने सता गुणाना गुणाभिनकमद्गुरूपदेशरूप- सामग्र्यभावे हानिमुक्ता, इहतु-तथाविधसामग्रीसद्भावे गुणसपदुपजायते, इत्यभि धीयते, इत्येव पूर्वेण सहाभिमवद्धस्यास्येदमादिसूनम्-'जइण भते इत्यादि । मूलम्-जइणं भते । समणेणं भगवया महावीरेण जाव संपत्तेण तेरसमस णायज्झयणस्त अयमढे पण्णत्ते, चोद- समस्स णं भते । णायज्झयणस्स समणेणं भगवया महा- वीरेणं जाव सपत्तेण के अहे पण्णत्ते एव खलु जवू । तेणं चौदहवा अध्ययन प्रारभ:- इस चौदहवें अध्ययन का तेरहवें अध्ययन के साथ इस प्रकार का सर्वन्ध है-तेरहवें अध्यन में जो यह बात कही गई है कि आत्मा में सम्यग्दर्शन आदि प्रकट भी हो गये, हों परन्तु यदि उन को बढाने वाली सद्गुरु आदि की उपदेश रूप मामग्री का अभाव रहे तो उन गुणों की हानि हो जाति है । इस अध्ययन में अब सूत्रकार यह स्पष्ट करेंगे कि यदि जीव को तथाविध सामग्री प्राप्त होती रहती है तो गुण सपत्ति भी बढती रहती है.-'जडण भते' इत्यादि । ચૌદમું અધ્યયન પ્રારભ- ચોદમાં અધ્યયનને તેમાં અદશ્યનની સાથે આ જાતને ન બધ છે કે તેરમા અધ્યયનમાં જે આ વાતનું સ્પષ્ટીકરણ કરવામા આવ્યુ છે કે આત્મામાં સમ્યગ્દર્શન વગેરે પ્રગટ પણ થઈ ગયા હેય છતા જે સદ્ગુરુ વગેરેની ઉપ દેશ રૂપ તેમનું વર્ધન કરનાર સામગ્રી હોય નહિ તે તે ગુણોની હાનિ થઈ જાય છે આ અદમ્યયનમાં સૂત્રકાર હવે એ જ વાત સ્પષ્ટ કરવા માગે છે કે જીવને જે તથવિધ સામગ્રી મળતી રહે છે તે ગુણ સંપત્તિ પણ વધની ગહે છે जइण भंते ' इत्यादि- .
। + जाताधर्मकपालमा फालेणं तेणं समएण तेयालपुरं नाम नगरं पमयत्रणे उजाणे कणगरहे राया । तस्स कणगरहस्स पउमावई देवी । तस्स णं कणगरहस्स तेयलिपुत्ते णाम अमच्चे सामदंड- दक्खे। तत्थ ण तेयलिपुरे कलादे नाम मूसियारदारए होत्या अड्डे जाव अपरिभूए । तस्स ण भद्दा नाम भारिया । तस्स ण कलायस्स मूसियारदारयस्स धूया, भदाए अत्या पोटिला नाम दारिया होत्था रूवेण य जोवणेण य लाव- पणेण य उकिट्टा उकिहसरीरा । तएणं पोहिला 'दारिया अन्नया कयाइ पहाया सव्वालकारविभूसिया चेडियाचक- वालसपरिवुडा उप्पि पासायवरगया आगासतलगंसिकण- गमएण तिदूसएण कीलमाणी विहरइ ॥ सू० १॥ टीका-जम्बूस्वामी पृच्छति-यदि खलु भदन्त श्रमणेन भगत्रता, महा- धीरेण यावत्समाप्तेन त्रयोदशस्य ज्ञाताध्ययनस्य अयमर्थः प्रज्ञप्त चतुर्दशस्य खलु भदन्त ! ज्ञाताध्ययनस्य श्रमणेन भगरता महागरेण यावत्सम्पाप्तेन कोऽर्थ टीकार्थ-जबू स्वामी पूछते हैं कि ( भते-जइण समणेण भगवया महावीरेण जाव सपत्तण) हे भदत! यदि श्रमण भगवान महावीरने कि जिन्होंने सिद्धिगति नाम का स्थान प्रोप्त कर लिया है (तेरसमस्स णाय- ज्झयणस्स अयम? पण्णत्ते चोदसमस्स णभते! णायज्झयणस्स समण भगवया महावीरेण जाव संपत्तेण के अहे पण्णत्त) तेरहवें ज्ञाताध्ययन का पूर्वोक्त रूप से अर्थ प्रज्ञप्त किया है-तो हे भदत | चौदहवें ज्ञाता- ध्ययन का उन्ही श्रमण भगवान महावीर ने क्या अर्थ निरूपित किया साथ-- भू स्पाभी पूछे छे (भते । जइण समणेण भगवया महा पीरेण जाव सपत्तेण) मत! श्रम समपान महावीरे-रमा सिद्ध ગતિ સ્થાનને મેળવી ચૂકયા છે (तेरसमस णायज्झयणस्स अयम? पण्णत्ते, चोदसमस्स ण भैते । णायज्झ- यणस्स समणेण भगवया महावीरेण जान सपत्तेण के अटे पण्णत्ते) તેરમા જ્ઞાતાધ્યયનને પૂર્વોક્ત રૂપે અર્થ નિરૂપિત કર્યો છે તે હે ભદતા તે અમણ ભગવાન મહાવીરે જ આ ચૌદમા જ્ઞાતાધ્યયનને શું અર્થ નિરૂપિત કર્યો છે?
भनगारधामृतार्पणो टी० अ० १४ तेतलिपुत्रप्रधानपरितवर्णनम् मक्षसः । सुधर्मा स्वामी कथयति-एव ग्वलु जम्बू! । तस्मिन् काले तस्मिन् समये तेतलिपुरं नाम नगरम् आसीत् । तत्र प्रमदवन नाम उद्यानमासीत् । तस्य नगरस्य कनकरथो नाम राजाऽसीत् । तस्य खलु कनकरयस्य गज्ञः पद्मावती नाम देवी । तस्य खल कनकरथस्य राजः तेतलिपुत्रो नाम अमात्यः 'सामदडदक्खे' साम दण्डदक्ष अन सामदण्डग्रहणाद् दानभेदयोरपि ग्रहण तेन सामदानभेददण्डात्मक- चतुर्विधोपोयनिपुण इत्यर्थः आसीत् । तत्र स्खलु तेतलिपुरे कलादो नाम 'मूसियारदारए ' भूपीकारदारका सुवर्णकारदारकः, ' मूपी' इति भूपापर्यायः, गौरादित्वादडीप यत्र सुवर्णादि है? ( एव खलु जचू । तेण कालेण तेण समएण तेयलिपुर नाम नगर पमयवणे उजाणे कणगरहे राया, । तस्स ण कणगरहम्स पउमावई देवी) श्री सुधर्मा स्वामी अव श्री जत्रू स्वामी के इस प्रश्न का उत्तर देने के अभिप्राय से कहते है-जबू! सुनो-तुम्हारे प्रश्न का उत्तर इस प्रकार से है-उस काल और उस समय में तेतलिपुर नाम का नगर था। उस में प्रमदवन नाम का उद्यान या । उस नगर के राजा का नाम कनक रय था। इस कनफरथ राजा की रानी का नाम पद्मावती देवी 'था। (तस्स ण कणगरहस्स तेयलिपुत्ते णाम अमच्चे सामदडदक्खे । तत्य पा तेयलिपुरे कलादे नाम मुसियारदारए होत्या अड्डे जोव अपरिभूए) उस कनक रय राजा का अमात्य या जिस का नाम तेतलि पुत्र था। यह साम, दान, भेद और दड इन चार प्रकार की राजनीति में विशेष, पटु निपुण था। उसी तेतलिपुर मे कल्पद नाम का (एव खलु जबू । तेण कालेण तेण समएण तेयलिपुर नाम नगर पमयवणे उजाणे कणगरहे राया। तस्स ण कणगरहस्स पउमावई देवी) થી સુધર્માસ્વામી હવે શ્રી જબૂસ્વામીને આ પ્રશ્નોના જવાબ આપવાની ઈચ્છથી કહે છે કે હું જ બૂ! સાભળો તમારા પ્રશ્નનો જવાબ આ પ્રમાણે છે કે તે કાળે અને તે સમયે તેતલિપુર નામે નગર હતું તેમાં પ્રમહવન નામે ઉઘાન હતુ તે નગરના રાજાનું નામ કનકરથ હતુ તે કનડરથ રાજાની રાણુનું નામ પદ્માવતી હતુ ' (तस्सण कणगरहस्स तेयलिपुत्ते णाम मन्चे सामदडदखे। तत्य गं तेयलिपुरे कलादे नाम मृसियारदारए होत्या अड्डे जाव अपरिभूए) તે કનકરથ રાજાને એક અમાત્ય (મંત્રી) હતું જેનું નામ તેતિલપુત્ર • હતું તે સામ, દાન, ભેદ અને દડ એ ચારે પ્રકારની નીતિમા સવિશેષ નિપુણકુશળ હતું તે તેતલિપુરમાં મલાદ નામે મૂવીકાર દારક (સેનીને પુત્રી माताधर्मकथास फालेणं तेणं समएण तेथीलपुर नाम नगरं पमयवणे उजाणे कणगरहे राया । तस्स णं कणगरहस्स पउमावई देवी। तस्स णं कणगरहस्स तेयलिपुत्ते णाम अमच्चे सामदंड- दक्खे। तत्थ ण तेयलिपुरे कलादे नाम मूसियारदारए होत्था अड्डे जाव अपरिभूए । तस्स ण भद्दा नाम भारिया । तस्स णं कलायस्स मूसियारदारयस्स धूया, भदाए अत्तया पोहिला नाम दारिया होत्था स्वेण य जोवणेण य लाव- पणेण य उकिट्टा उकिसरीरा । तएणं पोहिला दारिया अन्नया कयाइ ण्हीया सव्वालकारविभूसिया चेडियाचक्क- वालमपरिवुडा उप्पि पासायवरगया आगासतलगंसि कण- गमएणं तिंदूसएणं कीलमाणी विहरइ ॥ सू०१॥" टीका-जम्बूस्वामी पृच्छति-यदि खलु भदन्त श्रमणेन भगवता। महा- वीरेण यावत्समाप्तेन त्रयोदशस्य-ज्ञाता-ययनस्य अयमर्थः प्रज्ञप्त चतुर्दशस्य खल भदन्त ! ज्ञाताध्ययनस्य श्रमणेन भगता महागीरेण. यावत्सम्माप्तेन कोऽर्य टीकार्थ-जवू स्वामी पूछते हैं कि ( भते-जइण समणेण भगवया महावीरेण जाव सपत्तण) हे भदत! यदि श्रमण भगवान महावीरने कि जिन्होने सिद्धिगति नाम का स्थान प्रोप्त कर लिया है (तेरसमस्स णाय- झयणस्स अयम? पण्णत्ते चोदसमस्स ण भते! णायज्झयणस्स समणेण भगवया महावीरे ण जाव संपत्तण के अटे पण्णत्ते ) तेरहवें ज्ञाताध्ययन का पूर्वोक्त रूप से अर्थ प्रज्ञप्त किया है-तो हे भदत ! चौदहवें ज्ञाता- ध्ययन का उन्ही श्रमण भगवान महावीर ने क्या अर्थ निरूपित किया साथ - भूस्वामी पूछे छे । (भते । जइण समणेण भगवया महा धीरेण जाव सपत्तेण) हे महत! श्रभर लगवान महावीरे-रेमा सिर ગતિ રથાનને મેળવી ચૂકયા છે (तेरसमस णायज्झयणस्स अयम? पण्णत्ते, चोदसमस्स ण भंते ! णायज्झ यणस्स समणेण भगवया महावीरेण जान सपत्तेण के अढे पण्णत्ते) તેરમા જ્ઞાતાધ્યયનનો પૂર્વોક્ત રૂપે અર્થ નિરૂપિત કર્યો છે તે હે ભદતા તે શ્રમણ ભગવાન મહાવીરે જ આ ચૌદમા જ્ઞાતાયનને શો અર્થ નિરૂપિત કર્યો છે?
भनगारधर्मामृतपिणी टोका म० १४ तेतलिपुत्रप्रघानचरितवर्णनम् ५ चेरियाचकत्रालसपरिघुडा' चेटिकाचक्रवालसपरिटता-वेटिकादास्यस्तासा पञ्चकवाल मण्डल तेन सपरिटता सहिता दासीसमूहपरिवेष्टितेत्यर्थ., उपरिमासा- दवरगता मासादोपरिस्थिता-आकाशतले अनारतमदेशे 'छत्त' इति प्रसिद्ध कनकमयेन स्वर्णनिम्तेिन 'तिदसएण' तिन्दसकेन कन्दुकेन क्रीडन्ती र विहरति ॥ मू० १॥ मूलम् इमं च ण तेयलिपुत्ते अमचे पहाए आसखंधवरगए महया भडचडगरवदपरिक्खित्ते आसवाहणियाए णिनायमाणे कलायस्स मुसियारदारगस्स गिहस्स अदूरसामंतेण वीइव- यइ। तएण सेतेयलिपुत्ते मूसियारदारगस्स गिहस्स अदूरसामनेणं वीइवयमाणेर पोहिलंदारिय उप्पिं पासायवरगय आगासतलगंसि कणगतिदूसपणं कीलमाणी पासइ, पासित्ता पोहिलाए दारि- याए रूवे य जाव अज्झोववन्ने कोडुवियपुरिसे सदावेइ, सदावित्ता । एवं वयासी - एसा णं देवाणुप्पिया । कस्स दारिया' किं नामधेजा । तएण कोडवियपुरिसा तेयलिपुत्तं एवं वयासी-एसा ण सामी । कलायस्स मूसियारदारगस्स ध्या, भद्दाए अत्तयापोहिला नाम दारिया रूवेण यजाव उक्किट्ट- सरीरा।तएणसे तेयलिपुत्ते आसवाहणियाओपडिनियत्ते समाणे विभूसिया चेडियाचक्कवालसपरिघुडा उपि पासायवरगया आगास तलगसि कणगमएण तिंदूसएण कीलपाणी २ विहरइ ) एक दिन की यात है कि यह स्नान कर के तथा समस्त आभरणों से विभूषित हो करके अपनी दासियों के साथ प्रासाद के ऊपर छत पर सुवर्ण निर्मि- सकन्दुक (गेंद) से फ्रीडा कर रही थी। सूत्र ॥१॥ એક દિવસે તે નાન કર્યા બાદ પિતાના બધા અને ઘરેણાઓથી રાણુગારીને પિતાની દાસીઓની સાથે મહેલની ઉપરની અગાશીમા સેનાથી બનાવવામાં આવેલી દડીથી રમી રહી હતી | સત્ર "4" बाताधर्मकथा गाल्यते सा, तां करोति-साधनमामग्रीत्वेन निष्पादयति, इतिव्युत्परपा पीकार- इति सुवर्णकारे योगारूढोऽय शब्दः । ' होत्या' आसीत् । पो दि आदयो यावद- परिभूत । तस्य खलु कलादस्य मूपिकारदारकस्य दुहिता भद्राया आत्ममा पोटिला नाम दारिका आसीत् , याहि रूपेण च भाकन्या, यौवनेन च तारुण्येन चलाचण्येन च शरीरोरकप्टकान्ति विशेपेण उत्कृष्टा एक उत्कृष्टशरीरासीत् । तत' खलु पोटिला दारिका अ यदा कदाविन स्नावा सालकारविषिता मूपीकार दारक-सुवर्णकार का पुत्र-रहना था । भूपी शब्द का अर्थ सांचा है । इस मे सुवर्णादि द्रव्य पिघलाये जाते है । इस सांचे को जो बनाता है उस का नाम भूपीकार है। इस व्युत्पत्ति के अनुसार यह शब्द सुवर्णकार (सोनार ) मे योगारूढ हुआ है । यह मूषीकार दारक आढय यावत् अपरिभूत था। (तस्स ण भद्दा नाम भारिया, तस्त कलायस्स मूसियारदारयस्त धूया, भद्दाए अत्तया पोहिला नाम दारि- या होत्या, स्वेण य जोवणेण य लावण्णण य उक्किट्ठा उस्किर सरीरा) इस भूपिकार दारक कलाद -सौनी की अत्यन्त प्रिय पोहिला नाम की लडकी थी जो इस की पत्नी भद्रा को कुक्षि से उत्पन हुई धी । यह आकृति से, घौवन से एव लावण्य से-शारीरिक उत्कृष्ट काति 'से-यहुत ही अधिक मनोहर थी-अत' इस का शरीर बहुत अधिक उत्तम था। (तएण पोटिला दारिया अन्नया कयाइ ण्हाया सबालकार- રહેતે હતે મૂષી” શબ્દને અર્થ સાચે (બીબુ ) છે તેમાં સેનુ વગેરે દ્રવ્ય ઓગાળવામાં આવે છે આ સાચાને બનાવનારનું નામ મૂવીકાર છે આ વ્યુત્પત્તિને લઈને આ શબ્દ સુવર્ણકાર (સોની) માટે ગારૂઢ થઈ ગયે છે તે મૂષિકારદારક આઢય (ધનવાન) યાવત્ અપરિભૂત હતું (तस्स ण भदा नाम भारिया तस्स ण कलायस्स सियारदारयस्स ध्या भडाए अत्तया पोटिला नाम दारिया होत्था, रूवेण य जोवणेण य लावण्णणं य उक्सिट्टा उक्किट्ठसरीरा) તેં મૂષિકારદાશ્ક કલાક સોનીની ખૂબ જ વહાલી પિટ્રિલો નામે પુત્રી હતી જે તેની પતની ભદ્રાના ગભ થી ઉત્પન્ન થઈ હતી તે આકૃતિથી, યૌવનથી, કે લોવર્યશી-શરીરની ઉજવલ-કાતિથી બહુ જ મનહર હતી, એથી તેનું શરીર ખૂબ જ ઉત્તમ હતુ (तएण पोटिलादारिया अन्नयाकयाइ हाया सबलकारविभूसिया पेडिया 'चकवालसपरिवुडा उपि पासायवरगया आगासतलगसि कणगमपण हिंदुस- 'एण कीलमाणी २ विदग्द) . - समारघामृतपिणी टी० अ० १४ तेतरिपुत्रप्रधानचरितवर्णनमं रदारयस्स गिहाओ पडिनिक्खमति, पडिनिक्वमित्ता, जेणेव तेयलिपुत्ते अमच्चे तेणेव उवागच्छति, उवागच्छिता, तेयलि: पुत्तस्स अमच्चस्स एयम निवेदेति ॥ सू०. २ ॥ टीका-'इम च ण' इत्यादि । अस्मिंश्च खलु समये तेतलिपुत्रोऽमात्यः स्नात आसग्वधवरगए अश्वस्कन्धवरगत: अथारुहः 'महया भडचडगरवदपरिक्खित्ते' महाभटचटकरवृन्दपरिक्षिप्त महान्तो भटचटाराः भटसमृहाः तेषा'वृन्दैः समूहै परिक्षिप्त परिवृत' सन् 'आसवाहणियाए ' अश्ववाहनिकाय अश्ववाहनेन क्रीड- नार्य । णिज्जायमाणे निर्यान्-निर्गन्छन् कलादस्य मृपीकारदारकस्य गृहस्य असामन्तेन पार्श्वभागेन 'वीइवयह 'व्यतित्रजतिगच्छति । तत• ग्वलुस तेतलिपुत्रो मूगीकारदारकम्य गृहस्प अदूरसामन्तेन व्यनित्रजन् पोट्टिला दारिकाम् 'इम च ण तेयलि पुत्ते अमच्चे' इत्यादि । टीकार्थ-इम च ण) इसी समय (तेयलिपुत्त अमच्चे हा आमख- धवरगए महया भटचडगरवदपरिस्वित्ते आसवारणियाए णिज्जाये- माणे कलायस्स मूसियारदारगस्स गिहस्स अदुरसामतेण बीइवयह) तेलि पुत्र अमात्य स्नान से निपट कर घोड़े पर चढा हुआ घडे २ भटें समूहों के वृन्दो से घिगहोकर अश्वक्रीडा के लिये मूपीकारदारक कला- दके (सोनार) मकानके पास से निकला । (तरण से तेयलिपुत्ते मूसि- यारदारगस्स गिहस्स अदूरसामतेण वीइवयमाणे २ पोहिल दारिय उप्पिं पासायवरगय आगासतलगसि कणगतिदूसरणं कीलमाणी पासह) मूपीकार दारक कलाद के मकान के पास से होकर जाते हुए इम च ण तेयलिपु अमच्चे' इत्यादि- साथ-(इम च ण) ते मते (तेयलिपुत्ते अमच्चे ण्डाए आसखधवरगए महया भटचडगरवदपरिक्खित्ते आसवाहाणियाए णिन्जायमाणे कायस्स मूसियारदारगस्स गिहस्त अदूरसाम- तेण बीदवयइ) તેતલિપુત્ર અમાત્ય સ્થાનથી પરવારીને ઘડા ઉપર સવાર થયા અને -ત્યારપછી વિશાળ ભટે (દ્ધાએ) ના સમૂહથી વીંટળાઈને અશ્વકીડા માટે મૂષીકારદારક કલાદના ઘરની પાસે થઈને નીકળ્યા (चएण से तेयलिपुत्ते मूमियादारगस्स गिढस्स अदूरसामतेण वीइक्यमाणे२ पोटिल दारिय इप्पि पासायवरगय भागासतलगसि कणगतिंदसएण कीलमाणी पासइ) . । । + है ---- बताधर्मकार अभितरहाणिज्जे पुरिसे सदावेइ, सदावित्ता, एव वयासी- गच्छह णं तुम्भे देवाणुप्पिया । कलादस्स मूसियारदारयस्स धूयं भद्दाए अत्तय पोटिलं दारियं मम भास्यित्ताए बरेह । तएणं ते अभंतरट्टाणिज्जा पुरिसा तेतलिणा एव वुत्ता'समाणा हतुट्ठा करयलपरिग्गहिय सिरसावत्त मत्थए अर्जलिं का तहत्ति किच्चा जेणेव कलायस्स मूसियारस्स गिहे तेणेव उपा- गया । तएणं से कलाए मूसियारदारए ते पुरिसे एजमाणे पासइ, पासित्ता हट्टतुढे आसणाओ अभुट्टेइ, अब्भुटिन्ता सत्त- टुपयाई 'अणुगच्छइ, अणुगच्छित्ता, आसणेणं उवणिमंतेइ उव- णिमतित्ता, आसत्थे वीसत्थे सुहासणवरगए एवं वयासी- 'सदिसंतु ण देवाणुप्पिया ! किमागमणपओयण ? तएण ते 'अभितरट्ठाणिज्जा पुरिसा कलाय मूसियदारयं एव' वयासी- अम्हेणं देवाणुप्पिया ! तव धूय भदाए अत्तय पोहिल दारिय तेयलिपुत्तस्स भारियत्ताए वरेभो, त जइ णं जाणासि देवाणु- प्पिया । जुत्तं वा पत्त वा सलाहणिज्ज वा सरिसो सजोगो ता दिज्जउण पोटिला दारियां तेयलिपुत्तस्स, तो भण देवाणुप्पिय । किंदलामो सुक ? तएण कलाए मूसियारदारए ते अभित- रट्टाणिज्जे पुरिसे एव वयासी-एस चेव णं देवाणुप्पिया ! मम सुके, जन्न तेलिपुत्ते मम दारिया निमित्तेणं अणुग्गह करेइ । ते अभितरठणिजे पुरिसे विपुलेणं असणपाणखाइमसाइ- मेणं पुप्फवत्थ जाब मल्लालकारेण सकारेइ, सम्माणेइ, सका रिचा सम्माणित्ता पडिविसज्जेई । तएणं ते' ३ T - . . . अनगारधर्मामृतपिणी टी० अ०१४ तेतलिपुनप्रधानचरितवर्णनम् यावत्-उत्कृष्टशरीरा जस्ति । तत सलु स तेतविपुत्र अश्वमाहनिकाया: मति निवृत'-प्रत्यागत सन 'अभितरद्वाणिज्जे' अभ्यन्तरस्थानीयान् अन्तरगप्रेष्य पुरुपा श दयति, सान्दयित्सा एवमरदन-गन्तरलु यूयं देशनुप्रिया: कलादस्य मूपीकारदारस्य दृहितर भद्रारा आत्मना पोटिला दारिका मम भार्यात्वेन वृणुत । हे देवानुमिस यूय नया प्रयत पम् , यया सम्पीकारवारका स्वदुहितर मम भार्यात्वेन मद्य दयादितिनाउ । तत. खलु ते आभ्यन्तरस्थानीया पुरुषास्ते- तटिना एपमुक्ताः सन्नो हप्ट तुष्टा' करतल्परिगृहीत शिर आवर्त मस्तकेऽञ्जलि कृत्या, 'तहति' तथेति तथा ररिप्यामीति 'किचा कृत्याचीकृत्य यत्रीव कला इम का नाम पोटिला है। रूप आदि से यह बहुत ही उत्कृष्ट शरीर वाली है। (ताण से तेयलिपुत्ते आसवारणिपओ पडिनियत्त समाणे अभितरठाणिज्जे पुरिसे सद्दावेह, महावित्ता एव चयासी, गच्छदणं तम्भे देवाणुपिया ! कलादस्म मनियारदारयस्म धूय भद्दा अत्तय पोट्टिल दारिय मम मारिवत्ताग वरेत) इस के बाद वह तेतलि पुत्र अमात्य, अवचारनिका रो पीछे पर लौटा तो लौटते ही उसने अपने अन्तरग प्रेष्य एम्पो को बुराग-और तुलाकर उनसे इस प्रकार कहा- हे देवानुपियों ? तुम लोग जाओ-और मपी कार दारक कलाद की पुत्री जिसका नाम पोहिला है, जो भद्रा की कुक्षि से उत्पन्न हुई है उसे मेरी भार्गरूप से वरआओ। तात्पर्य उस का यह है कि तुमलोग वहा जाकर ऐसा प्रयत्न करो कि जिन से वह मृपीकारदारक कलाद अपनी पुत्री को पत्नी के रूप में मुझे दे देव । (तपण ते अमतरठाणिज्जा पुरिसा तेतलिणा एव वुत्ता समाणा हट्ट तुट्ठा करपल परिग्गहिय सिरसा છે તેનું નામ પદિલા છે તે રૂપ વગેરેથો ખૂબ જ ઉત્કૃષ્ટ શરીરવાળી છે (तएण से तेयलिपुत्ते आसवाहणियाओ पडिनियत्ते ममाणे अम्भितरठाणिज्जे पुरिसे सदा सावित्ता एर क्यामी गच्छह ण तुम्मे ढेवाणुप्पिया क्लादस्स मूसियारदारयस्स धूय भवाए अत्तय पोट्टिल दारिय मम भारियत्ता वरेह ) ત્યારપછી તે તેતલિપુત્ર અમાસે અશ્વવારિકાથી ઘેર પાછો આવ્યા ત્યારે આવતાની સાથે જ તેણે પોતાના-અન્તર = પ્રેષ્ઠ પુરૂષોને લાવ્યા અને બેલાવીને તેમને આ પ્રમાણે કહ્યું કે હે દેવાનુપ્રિયે ' તમે જાઓ અને મૂવી કારદારક કલાદની પુત્રી છે-કે જેનું નામ પે દિલા છે, અને જે ભદ્રાના ગભ થી ઉત્પન્ન થઈ છે–તેને ભાર્યા રૂપમાં મને આપો તાત્પર્ય આ પ્રમાણે છે કે તમે લે ત્યાં જઈને એવી નિગ કરે કે જેથી તે મૂષીકારદારફ કલાદ પિતાની પુત્રીને પત્ની રૂપમાં મને આપી દે ?
हातापायाम ८ - उपरि मासादधरगतामामाशतले कनकनिन्दसकेन फ्रीडन्ती पश्यति, दृष्ट्वा, पोधि लाया दारिकाया रूपे च योवने च लापण्ये च 'जापअनोवान्ने' यायत्-मूगिता, गृद्ध , प्रथित', अध्युपपन्न = अत्यन्नसक्ताइत्यर्य कोदुम्बिफपुरुषार शब्दयवि, शब्दयिखा, एरमवदत्-एपा खलु देवानुप्रियाः ! कम्य दारिका कि नामपेया। ततः खलु कौटुम्पिकपुरुपा तेतलिपुत्रम् एमवदन-एपा सलस्वामिन् । कलादस्य भूपीकारदारकस्य दुहिता, भद्राया आत्मजा पोटिला नाम दारिका रूपेण च से तेतलिपुत्र अमात्य ने प्रासाद के अपर छत पर सुवर्ण की कक (गेंद ) से क्रीडा करती हुइ उस पोट्टिला दारिका को देवा । (पामित्ता पोहिलाए दारियाए रुवे य जार अझोवपन्ने कोयियपुरिसे मदावेह सावित्ता एव वयासी-ऐसा ण देवाणुप्पिया कस्स दारियो ? किं नाम धैजा) देख कर वह पस पोहिला दारिका के रूप, यौवन एव लावण्य में मूर्छित, गृह, नथित धनकर उस पर अत्यन्त आसक्ति से युक्त हो गया। उसी समय उस ने कौटुम्यिकपुरुषों को बुलाया-बुलाकर उन से इस प्रकार कहा-हे देवानुप्रियो। कहो यह कन्या किसकी है और इसका नाम क्या है ? ( तएण कोडुपियपुरिसा तेयलिपुत्त एवं बयासी-एसा ण सामी! कलायस्स मूसियारदारगस्म धूया भद्दार अत्तया पोट्टिला नाम दारिया स्वेण य जाव उकिसरीरा) उन कौटु- म्पिक पुरुषों ने तेतली पुत्र से ऐसा करा-हे स्वामिन् ! यर मूषीकार दारक कलाद की पुत्री है जो भद्रा भार्या की कुक्षि से उत्पन्न हुई है। મૂષિકારદારક કલોદના ઘરની પાસે થઈને જતા તે તેતલિપુત્ર અમાત્યે મહેલના ઉપરની અગાશી ઉપર સોનાની દડીથી રમતી તે પદિલા દારિકાને જોઈ (पासित्ता पोट्टिलाए दारिआए रूवे य जाव अज्झोववन्ने कोडवियपुरिसे सदा- वेइ सदाचित्ता एवं बयासी एसा ण देवाणुप्पिया कस्स दारिया किनामधेज्जा) તે દિલા દારિકાને જોઈને તે તેને રૂપ, યૌવન અને લાવયમાં મૂચ્છિત ક, ગ્રતિ બનીને અત્યંત આસક્ત થઈ ગયે તરત જ તેણે કૌટુંબિક પુરૂષને લાવ્યા અને બેલાવીને તેણે તેઓને આ પ્રમાણે કહ્યું કે હે દેવા નુપ્રિયે ! બેલે, આ કન્યા કેની છે અને એનું શું નામ છે (तएण कोडवियपुरिमा तेयलिपुत्त एव बयासी-एसा ण सामी। कलायस्स ममियारदारगस्स धूया, भदाए अत्तया पोहिला नाम दारिया स्वेण य नाव उक्किट सरीरा) તે કૌટુંબિક પુરૂએ તેતલિપુત્રને આ પ્રમાણે કહ્યું કે હે સ્વામિન ! તે મૂષિકારદારક કલાની પુત્રી છે અને સદ્વાભાર્યાના ગર્ભથી તેને જન્મ થયે " -- भनगारधर्मामृतषिणी टी0 81०१४ तेतरि पुनमचानचरितवर्णनम् यावत्-उत्कृष्टगरीरा अस्ति । नत सलु म तेतरिपुर नपादनिकायाः मति निस्वा प्रत्यागत सन् 'अमितरद्वाणिज्जे' अभ्यन्तरस्थानीयान् अन्तरगमेष्य- पुरुपा शदयति, शन्दयित्वा परमपदद-गत लु यूय देशानुप्रिया कलादस्य मूपीकारदारकम्य दिनर भारा आत्ममा पोटिला दारिमा मम भार्यात्वेन वृणुन । हे देवानुप्रिया यय नया पयत पम् , यथा स मपीकारारक स्त्रदुहितर मम भार्यात्वेन मदा दयानिनिमायः । तत. पलु ते जाभ्यन्तरम्मानीया पुरुषास्ते. तरिना एवमुक्ताः मन्नो हप्ट तुष्टा' करतलपग्गृिहीत गिर आवर्त मस्त केऽञ्जलि कृत्या, 'तहति' तथेति तथा करिप्यामीति 'किचा' जत्वाचीकृत्य यत्रीय कला इम का नाम पोटिला है। स्प आदि से पर बहुत ही उत्कृष्ट शरीर वाली है। (तपण से तेयलि पुत्ते आसवाणिगो पडिनिवत्त ममाणे अभितरठाणिज्जे पुरिसे मद्दावेड, मदावित्ता व ययासी, गण तम्भे देवाणुप्पिया । कलादस्म मृनियारदारयस्म धृय भद्दा अत्तय पोट्टिल दारिच मम भारिपत्ताल बरेत) स के बाद वह तेतलि पुत्र अमात्य, अवचारनिका से पीछे सार लौटा तो लौटते ही उसने अपने अन्तरग प्रेग्य पुम्पो को बुललग-और गुलाकर उनसे इस प्रकार कहा- हे देवानुमियों ? तुम लोग जाओ-और मपीझार दारक कलाद की पुत्री जिमका नाम पोटिला है, जो मद्रा की कुक्षि से उत्पन्न हुई है उसे मेरी भार्गरूप से चरआओ। तात्पर्य उस का यह है कि तुमलोग वहां जाकर गेला प्रयत्न करो कि जिस से वह मृपीकारदारक कलाद अपनी पुत्री को पत्नी के रूप में मुझे दे देव । (तपण ते अम्मतगठाणिज्जा पुरिसा तेतलिणा एव चुत्ता समाणा हट्ट तुट्टो करवल परिरहिय मिरमा છે તેનું નામ પદિલા છે તે રૂપ વગેરેથી ખુબજ ઉછંદ નીવાળી છે (तएण मे तेयलिपुत्ते आमवाहणियाओ पडिनियत्ते नमाणे अमितरठाणिज्जे पुरिसे सदाट मनावित्ता एर क्यामी गाउण तुम्मे देवाणुप्पिया ' क्लादस्स मूसियारदारयस्म घृय भनाए जत्तय पोट्टिल दारिय मम भाग्यित्ताए बरेह ) ત્યા૫ડી તે તેતલિપુત્ર અમાનવ અશ્વવાદનિકાથી વેગ પાછો આ ત્યારે આવતાની સાથે જ તે પિતાના-અન્તર છે પ્રેગ્ન પુરને બોલાવ્યા અને બોલાવીને તેમને આ પ્રમાણે કહ્યું કે હે દેવાનપ્રિયે ! તમે જાઓ અને મૂવી કારરક લાદની પુત્રી છે-કે જેનું નામ પે દિલા છે, અને જે ભદ્રાના ગમેથી ઉત્પન્ન થઈ છે તેને ભાર્યા રૂપમાં મને આપો તાત્પર્ય આ પ્રમાણે છે કે તમે લેકે ત્યાં જઈને એની કેબિગ કરે કે જેથી તે મૂડીઝારદારક કલાદ પિતાની પુત્રીને પત્ની ૩પમા મને આપી દે ? .
हाताधर्मकथा दस्य मूपीकारदारकस्य गृह तर आगताः। ता सलु म काटो भूपीहारदारका तान् अभ्यन्तरस्थानीयान् पुरुपाने जमानान् पश्यति, दृष्टा रटतुष्टोऽतिशयममुदितः आसनाव अभ्युत्तिष्ठति, अभ्युत्वाय तान सम्मानयित नेपामभिग्य ममापदानि वत्त मत्थए अजलि कटु तहत्ति रिचा जेणे कायस्म मूसियारस्स गिहे तेणेव उवागया ) उस प्रकार तेतलि पुत्र के द्वारा कहे गये वे अन्तरग प्रेष्य पुरुप दृष्ट तुष्ट होते हुए वहा से निकल कर मपीकार कलाद का जहा घर था वा आये । आते समय उन्होंने तेतलि पुत्र को दोनों हाथों की अजलि यनोकर और उसे मस्तक पर रग कर नम स्कार किया और एम ओपने जैसा कहा है वैसा ही करेगे इस बात को उसे आश्वासन देकर स्वीकार किया था। (तपण से कराए मसि- पारदारए ते पुरिसे पजमाणे पासइ, पासित्ता हट्ट तुटे आसणाओ अन्भुढेइ, अन्मुद्वित्ता सत्तकृपयाइ अणुगच्छड, अणुगचित्ता आसणे ण उवणिमतेइ, उवणिमतित्ता आसत्ये पीसन्थे सुहासणवरगा राव वयासी सदिसतु ण देवोणुप्पिया। फिमागमणपओयण-तएण ते अ. भितरठाणिजा पुरिसा कलाय मसियदारय एव वयासी) जय उस भूपीकार दारककलादने उन पुरुषों को आपने घर की ओर आते हुए देखो-तो वह देखकर इष्ट तुष्ट हो अपने आमन पर से उठ बैठा-उठ (तएण ते अन्भनरठाणिज्ना पुरिसा तेतलिणा एव वुत्ता समाणा हवा करयलारिग्गहिय सिरसावत्त मत्थए अनलिं दुतहति किचा जेणे कलायस्स मूसियारस्स गिद्दे तेणेच उवागया) આ રીતે તેતલિપુત્રે જેઓને આદેશ આપ્યા છે એવા તે અતરગ પ્રેષ્ઠ પુરૂષ હુ તુષ્ટ થતા ત્યાથી રવાના થઈને મૃષીકાર કલાદનુ જ્યા ઘર હતુ ત્યા ૬ પહેચ્યા તેતલિપુત્રની પાસેથી પાછા ફરતા તેઓએ બને હાથની અ જલિ બનાવીને અને તેને મસ્તકે મૂકીને નમસ્કાર કર્યો અને અમે આપે જેમ હુકમ કર્યો છે તેને યથાવત પાલન કરીશુ આ રીતે તેમની આજ્ઞા તેઓએ સ્વીકારી (तएण से कलाए भूसियारदारए ते पुरिसे एज्नमाणे पासइ, पासित्ता इतुढे आसणाओ अभुट्टेइ, अन्भुट्टिचा सत्तवपयाइ अणुगच्छद, अणुगरिउत्ता आसणेण उवणिमतेइ, उवणिमतित्ता आसत्थे महासणवरगए एव वयासी सदिसतु ण देवाणुप्पिया । किमागमणपओयण-तएण ते अम्भितरठाणिज्ना पुरिसा कलाय मूसियदारय एर बयासी) મૂવીકારદારક કલાદે જયારે તે પુરૂને પિતાના ઘર તરફ આવતા જેના ત્યારે તે જોઈને હૃષ્ટ તુષ્ટ થઈને પોતાના આસન ઉપરથી વલે થઈ ગયે અને , - मनगारधर्मामृतर्पिणी टी० अ० १४ तेतलिपुत्रप्रधानचरितवर्णनम् गत्वा तानग्रे कृत्या स्वयम् 'अणुगच्छड' अनुगन्छति, तेपा पृष्ठवर्तीभूत्वा गच्छति, अनुगम्य, आसनेन उपनिमन्त्रयति=आसनदानेन तान् पुरुपानुपवेशयति, उपनि मन्य, आस्सस्स, विस्वस्थः एतेपाममात्यपुम्पाणा मत्कारो यथावजात इति हेतोः स्वस्थमनाः भूला सुग्वासनबरगतः स्वयमपि सकीयासने सुग्वोपविष्टः सन् एवमवदत्-सदिश तु खलु हे देशानुप्रियाः! भवता किमागमनपयोजनम् १ ततः खलु ते वाभ्यन्तरस्थानीयाः पुरुषाः फलाद मूपी कारदारकम् एवमवदन्-चय खलु देवानुप्रिय ! तब दुहितर भद्राया आत्मना पोट्टिला दारिका तेतलिपुत्रस्य भार्यात्वेन वृणुम , तद् यदि ग्खलु व 'जागसि' जानासि-मन्यसे, हे देवानुप्रिय! यद् अस्मासमेतचकन्याविषयक वाचन ' जुत्त वा ' युक्त ना उचितम् 'पत्त वा' माप्त या मनसिसलग्न वा 'सलाहगिज्ज पा' श्लाघनीय वा-प्रशसनीय वा अपिच 'सरिसो वा सजोगो' सहगो वा सयोगः तेतलिपुत्रेण सह तव कन्याया वैवाहिक कर फिर वह सात आठ डग प्रमाण आगे उन का सत्कार करने के लिये गया। वहा से उन्हें आगेकर के वह स्वय उनके पीछे २ आया। आकर के फिर उसने उन्हें आसनों पर बैठाया-बैठा कर आश्वस्त विश्वस्त होकर याद में वह स्वय दूसरे अपने आसन पर शान्ति पूर्वक पैठ गया। बैठ जाने के बाद फिर उसने इस प्रकार कहा-हे देवानुप्रि- यो ! कहिये-किस कारण से आप यहा पधारे है-आपलोगों के आने का क्या प्रयोजन है-इस प्रकार उसके पठने पर उन अभ्यन्तर स्थानीय पुरुषों ने उस सुवर्णकार के पुत्र कलाद से इस प्रकार कहा (अम्हे ण देवाणुप्पिया । तव धूय भद्दा असय पोटिल दारिय तेयलिपुत्तस्स भारियत्ताए वरेमो, त जइण जाणसि देवाणुप्पिया! जुत्त वा पत्त वा सलाहणिज वा सरिसो वा सजोगोता दिज उण पोट्टिला दारिया तेयलि ઊભું થઈને તેમના સ્વાગત માટે સાત આઠ પગલા સામે ગમે ત્યાંથી તેણે આવનારાઓને આગળ કરીને એટલે કે પિતે તેઓની પાછળ પાછળ ચાલતે ત્યા આવ્યા અને આવીને તેણે તેઓને આમને ઉપર બેસાડ્યા ત્યારપછી આશ્વસ્ત વિશ્વસ્ત થઈને તે પિતે બીજા આસન ઉપર શાતિપૂર્વક બેસી ગયે બેસીને તેણે તેઓએ વિનય પૂર્વક કહ્યું કે હે દેવાનુપ્રિયે ! બેલે, તમે શા કારણથી અહીં આવ્યા છે ? તમે શા પ્રજનથી આવ્યા છે ? આ રીતે કલાદ (સુવ- કાર) ની વાત સાંભળીને તે આથતા સ્થાનીય પુરૂએ તેને આ પ્રમાણે કહ્યું કે (अम्हेण देवाणुप्पिया ! तव धूय भदाए अत्तय पोटिल दारिय तेयलि पुत्तस्स मारियताए बरेमो, त जइण जागसि देवाणुप्पिय ! जुत्त वा पत्त वा सलादणिज्ज . १२ পাখায়মগােছর सम्बन्धो योग्यो भरतीति, यदि जानासि तसदीयता बलु पौष्ट्रिय दारिका लेत. लिपुनाय 'तो' तर्हि भण-हि, हे देवानुपिय! किं दमः खिम् सम्मानपुरस्कार भवते किं समर्पयामः । ततः खलु काटो मूपीरदारक' नाय तरम्थानीयान् पुरुपान् एवमयदत्-एतदेव खलु दवानुपियाः ! मम शुरम् , यतवलु तेतलिपुत्रो मम दारिकानिमित्तेन अनुग्रह-इया करोति । त्युका पातान अभ्यतरस्थानी पुत्तस्स तो भण देवाणुप्पिया! किं दलामो सुस्क' तण कला मूसि यार दारए ते अमितरताणिज्जे पुरिस गसी) हे देवानुप्रिय हम लोग तुम्हारी पुत्री पोटिला दारिका को कि जो भद्राफी कृक्षि से उत्पन्न हुई है तेतली पुत्र अमात्य की या भार्या बने इस रूप से चरण करने के लिये आये हुए है-तो यदि तुम हे देवानुप्रिय ! हमारी इस याचना को उचित, प्रास, और लापनीय-प्रशसनीय मानते हो और यह सम झते हो कि यह तेतलिपुत्र के माध तुम्हारी कन्या का वैवाहिक मवध योग्य है-तो पोट्टिला दारिका तेतलि पुत्र के लिये प्रदान कर दो और साथ में यह भी कह दो कि हम आपके लिये इस निमित्त क्यो सम्मान पुरस्कार देवें । इस प्रकार उन सब की ऐसी बाते सुनकर उस सुवर्ण फार पुत्र कलादने उन आये हुए अभ्यतर स्थानीय पुरुपों से इस प्रकार कहा-(एस चेष ण देवाणुप्पिया ! मम सुक्के जन्न तेलिपुत्ते- मम दारिया निमित्तण अणुग्गर करेइ, ते अम्भितरहाणिज्जे पुरिसे वा सरिसो वा सजोयो ता दिज्जउण पोट्टिला दारिया तेयलिपुत्तस्स तो भण देवाणुप्पिया ! दिलामो सुक्क तएण कलाए मूसियारदारए ते अमितरठाणिज्जे पुरिस एव वयासी) દેવાનુપ્રિય ! તમારી ભદ્રા ભાર્યાના ગર્ભથી જન્મ પામેલી તમારી પિહિલા દારિકા અમાત્ય તેટલીપુત્રની ભાર્યા થાય આ જાતની માગણી કરવા અમે તમારી પાસે આવ્યા છીએ કે દેવાનુપ્રિય ! તમે તેતલિપુત્રની માગણી ઉચિત, શ્લાઘનીય અને પ્રરા સનીય માનતા હોય તેમજ એમ પણ તમને થતુ હોય કે અમાત્ય તેતલિપુત્રની સાથે આ લગ્ન સ બધ યોગ્ય છે તે તમે અમાત્ર તેતલિપુત્રને પિહિલાદારિક આપી દે અને એની સાથે તમે અમને એમ પણ જણાવી દે કે તમને અમે એના બદલ સન્માન પુરરકારના રૂપમાં શુ આપીએ? આ રીતે તેઓ બધાની વાત સાંભળીને તે સુવર્ણકારના પુત્ર કલાદે આશ્વતર સ્થાનીય પુરૂને આ પ્રમાણે કહ્યું કે– (एस चेव ण देवाणुप्पिया ! मम सुक्के जन तेयलिपुत्ते मम दारिया - , . अनेगारधर्मामृतवपिणी टी०४० १४ तेतलिपुरप्रगानचरितवर्णनम् यान् पुरुषान् विपुलेन जशनपानखायस्थान पुप्पसगन्यमाल्यारकारेण च सत्क रोति, सम्मानयति, सत्कृत्य सम्मान्य, प्रतिविसर्जयति । तत- खलु ते भाभ्यन्तर स्थानीया पुस्पा कगदस्य मूवीकारदाररस्य गृहात प्रतिनिष्क्राम्यन्ति प्रतिक्रिम्य यत्र तेतलिपुत्रोऽमात्यस्तौगोपागाउन्ति, उपागत्य तेतलिपुत्राय नमात्याय 'एय मट्ट' एतमर्थम्-विवाहस्य स्वीकृतिरूपमर्थ निवेदयन्ति ।। मू०२ ।। विपुषेण असणपाणखाउमसाइमेण पुप्फवत्य जाव मल्लालकारेण सरकारेइ, सम्माणेड, सस्कारित्ता, सम्माणित्ता पडि विसज्जेह । तएणं ते कलायस्म मृमियारदारयस्त गिहाओ परिनिक्खमति, पडिनिक्ख- मित्ता जेणेव तेयलिपुत्ते अमच्चे, तेणेत उचागच्छति, उचागच्छित्ता तेयलिपुत्तस्स अमच्चस्स एयमट्ठ निवैलेंति ) हे देवानुप्रियो ! मेरा सन्मान पुरस्कार यही है कि जो तेतलि पुत्र दारिका के निमित्त से मेरे ऊपर ऐसी दया कर रहे है-अर्थात् मेरी पुत्री को जो वे अपनी पत्नी बनाने की चाहना कर रहे यही सत्र से बडा उन की ओर से मेरे लिये सन्मान पुरस्कार प्रदान किया जा रहा है । इस प्रकार कह कर उस कलाद ने उन अभ्यतरस्थानीय पुरुपों का विपुल अशन, पान, खाद्य, स्वाद्य से एव पुष्प, वस्त्र, गध माला एव अलकारों से खूब सत्कार किया-सन्मान किया। सत्कार ण्व सन्मान करने के बाद फिर उसने उन्हें विसर्जित कर दिया । वहा से विसर्जित होकर वे अभ्यतर स्थानीय निमित्तेण अणुग्गह करेड, ते अम्भितरद्वाणिज्जे पुरिसे विउलेण असणपाणखाइम- साइमेण पुप्फनत्थ जाप मल्लालकारेण सरकारेइ, सम्माणेट, मक्कारित्ता, सम्मा- णित्ता पडिविसज्जेइ । तएण ते कलायस्म मूसियारदारयस्स गिहाओ पडिनिक्ख- मति, पडिनिक्खमिचा जेणेव तेयलिपुत्ते अमच्चे, तेणेव उपागच्छ ति, आग-च्छित्ता तेयलिपुत्तस्स अमञ्चस्स एयमह निवेदति ) હે દેવાનુપ્રિય અમાત્ય તેતલિપુત્ર મારી દારિકાને સ્વીકારવા રૂપ ઉપર દયા બતાવી રહ્યા છે તે જ ખરેખર મારા માટે સન્માન અને પુરસ્કારની જ વસ્તુ છે એટલે કે તેઓ મારી પુત્રીને પોતાની પત્ની પત્ની તરીકે ઈચ્છી રહ્યા છે, એજ તેમના તફ઼થી મારા માટે સન્માન અને પુરસ્કાર રૂપ છે આ રીતે કહીને તે કલાદે આભ્ય તર સ્થાનેય પુરૂને વિપુલ અશન, પાન, ખાઘ, સ્વાઘથી અને પુષ્પ, વસ્ત્ર, ગધ, માળા અને અલ કારોથી ખૂબ જ સરસ રીતે સત્કાર કર્યો અને તેમનું સન્માન કર્યું સાકાર અને સન્માન કર્યા પછી તેણે તેમને વિદાય આપી ત્યારપછી તે આભ્યતર સ્થાનીય પુરૂ તે સુવર્ણ . ભાર * My Ko FT"घर से निकले और निक्ल कर जरा -पां आकर उन्होंने तेतलि पुत्र अमो टीका-ए इस पर मुसियारदार ) मूपीकार दारक ने (भमा कण किसी एक समय (सोरणमि तिहिनक्खत्तमुहुत्तमि tatttar PrS.पने साथी त्या समात्य ततलिपुत्र तो पर्मक्रया - कला ममिय": "लया क्याई TurmuTHEनमि पहा मन्त्रा- मीय माही पीबुडे सातो iii नि:, पति मोदीए नेरलीपुर amar उजागर, उवा. साने भारियत्ताए भारियत्ताए उव. महड, दूरुहिता s --- मा. मजाविता अग्गि- ... डे, करिता पोहिलाए रिडलेगं असगपाणखाइम हात्एणं से तेयलिपुत्वे पोटि- " 2. जरालाई जाच विहरेड।सू०३॥ "दो मोरहारकअवदा कदाचित् fहिना रत्तमुहुतमि' तियिनक्षत्रमुहर्ने તે જઈને તેઓએ રકતસ બ ધ સ્વીકા . १ शेरिकी चर दी। सूत्र ॥ ॥ " are rहिरदारए ' इत्यादि । १. WE ) भृषी २ (अन्नया अनगारधर्मामृतयपिणो टी०प्र० १४ तेतलिपुत्रप्रधानचरितवर्णनम पोट्टिला दारिका स्नता सर्वालङ्कारभृपिता 'सीय ' शिरिका दूरोहयति-प्रारोहयति, दूरोह्य-भारोह्य मित्तणाइ सपरिपुडे' मिनताति सपरिरत =मिरजाति स्वजनसन्दिप रिवेष्टितः, सर्वान् वैाहिरान् मभारान्-विवाहसस्कारोचित सामग्रीन गृहीत्या सकाद् गृहात् मतिनिष्क्राम्यति, प्रतिनिष्क्रम्य 'सन्धिड्डीए सद्धिया सर्पग्रकारिकया ऋदया सह 'तेयलिपुर' तेतलीपुरम्य म-यम येन निर्गच्छन् योन तेतलेह तय उपा गच्छति, उपागत्य पोटिला दारिमा तेतलिपुत्राय स्वयमेव भार्यान ददाति । तत ग्वलु तेतलिपुरोऽमात्य. पोटिला दारिका स्वभार्यात्वेन 'उप्रणीय ' उपनी- पोटिल दारिय हाय सचालकारविभृमिय मीय दुम्ड) शुभ तिथि नक्षत्र, मुहर्त में पोहिला दारिको को स्नान करा कर समस्त अलकारों से विभूपित किया और विभूपित कर के फिर उसे शिविका पर बैठा दिया-(दुरूहित्ता मित्त गाइ सपरिबुडे सातो गिहाओ पडिनिम्ग्वमइ, पडिनिकखमित्ता सब्धिड्डी तेयली पुर मज्न मज्झे ण जेणेव तेयलिस्त गिहे तेणेव उवागच्छह, उवागच्छित्ता पोटिल दारिय तेयलिपुत्तस्स सयमेव भारियत्ताए दलयइ ) बैठा कर फिर वह मित्र, ज्ञाति, स्वजन, समन्धी परिजनों से परिवेष्टित होकर एव वैवाहिक समस्त सामग्री को लेकर अपने घर से निकला । निकल कर सर्व प्रकार की अपनी ऋद्वि के साथ २ तेतलि पुर के बीच से होता हुआ जहा तेतलि का घर था वहा पहुँचा । वहा पहुँच कर उसने अपनी पुत्री पोटिला दारिका को तेतलि पुत्र को अपने आप से भार्या रूप से प्रदान कर दी । (तरण (सोहणसि तिहिनखत्तमुहत्त सि पोट्टिल दारिय पहाय सबाट कार, भूसिय - सीय दुरूहइ) . શુભ તિથિ નક્ષત્ર, મુહુર્તમાં પિદિલા દારિકાને સ્નાન કરાવીને બધી જાતના અલકારથી શણગારીને તેને પાલખીમાં બેસાડી દીધી (दुरुहिता मित्तणाइसपरिपुढे सातो गिठाओ पडिनिक्खमद, पडिनिक्स मित्ता सन्चिडीए तेयलीपुर मज्झ मज्झेण जेणेच तेयलिस्म गिहे तेणेप उवाग- च्छद, उवागरिउत्ता पोट्टिल दारिंग तेयलिपुत्तस्स सयमेव भारियत्ताप दलयइ ) બેસાડીને તે પિતાના મિત્ર, જ્ઞાતિ, સ્વજન, સ બ ધી અને પરિજનેની સાથે લગ્નની બધી સાધન સામગ્રી લઈને ઘરથી નીકળે નીકળીને તે સર્વ પ્રકારની પિતાની દ્રિની સાથે તેતલિપરની વચ્ચે થઈને જ્યા તેતલિાન ઘર . ज्ञाताधर्मकथा मलम्--तएणं कलाए मूसियारदारण अन्नया कयाई सोहणंसि तिहिनखत्तमुहुत्तसि पाहिलं दारयं पहाय सव्वा- लकारभूसियं सीय दुरूहइ, दुरुहिता मित्तणाइसंपीरबुडे सातो गिहाओ पडिनिक्खमइ, पडिनिस्वमित्ता सब्धिड्डीए तेयलीपुरं मज्झ मज्झेण जेणेव तेयलिस्लगिहे, तेणेव उवागच्छद, उवा. गच्छित्ता, पोटिल दारिय तेयलिपुत्तस्स सयमेव भारियत्ताए दलयइ । तएण तेयलिपुत्तं पोहिल दारियं भारियत्ताए उव- णीय पासइ, पासित्ता पोटिलाए सद्धि पयं दूरूहह, दूरुहित्ता सेयपीएहि कलसेहि अप्पाण मज्जावेइ, मज्जावित्ता अग्गि- होम करावेइ, करावित्ता पाणिग्गहण करेइ, करित्ता पोटिलाए भारियाए मित्तणाइ जाव परिजण विउलेणं असगपाणखाइम साइमेण पुप्फ जाव पडिविसज्जेइ। तएण से तेयलिपुत्ते पोटि- लाए भारियाए अणुरते अविरत्ते उरालाइ जाव विहरेइ॥सू०३॥ टीका-'तएण' इत्यादि, तत खलु कलादो मूपी कारदारक' अ यदा कदाचित् 'सोहणसि' शोभने शुभारहे विवाहयोग्ये 'तिहिनवत्तमुहुतमि तिथिनक्षत्रमुहूः पुरुष उस सुवर्णकार पुत्र कलाद के घर से निकले और निकल कर जहा तेतलि पुत्र अमात्य या वहा आये-वां आकर उन्हों ने तेतलि पुत्र अमो त्य को विवाह स्वीकृति रूप अर्थ की खबर दी । सूत्र ॥ २ ॥ तएण कलाए भूसियारदारए" इत्यादि । टीकार्य-(तएण) इस के बाद (मूसियारदारए ) मूषीकार दारक ने (अन्नया कयाइ) किमी एक समय (सोहणसि तिहिनखत्तनुत्तसि કાર પુત્ર કલાદના ઘરથી નીકળ્યા અને ત્યાથી જ અમાત્ય તેતલિપુત્ર હતા. ત્યાં પહોંચ્યા અમાત્ય તેતલિપુત્રની પાસે જઈને તેઓએ રકતસ બધ સ્વીકા રવા રૂપ ખબર આપી છેસૂત્ર तएण कलाए मूसियारदारए' इत्यादि- A14-(तरण ) त्या२५ (मूसियारदारए) भूषा १२ हा२है ( अन्नया २१ ॥ याइ) मे पणते अनगारधर्मामृतापिणी टी० ०४ तेनलिपुत्रप्रधानचरितवर्णनम् पुष्फजाव' पुष्पयान पुष्पपवाग्निा यान्माल्यालडागदिना सत्कारय ति, सकार्य ' पडिनिमज्जे प्रति विमर्जपति । तत' खलु स तेतलिपुत्रोऽमात्यः पोट्टिलाग भार्यायाम् ‘जणुरो' अनुरक्त' आमक्तः अपिरत्ते ' अविरक्ता अत्यन्तानुरक्त इत्यर्थ , 'उरा I जा' उपगन् पावत्-उदारान् भोगभोगान्- विषयभोगान् भुनानो विहरति । मु०२ ॥ मूलम्-तएण से कणगरहे राया रज्जे य रटे य वले य वाहणे य कोमे य कोट्ठागारे य अतेउरे य मुच्छिएजाए पुत्ते वियगेइ, अप्पेगडयाण हत्यगुलियाआ छिदइ, अप्पे- गइयाणं हत्यगुट्टए छिदड, एव पायगुलियाओ पायगुट्टएवि, कन्नसकुलीएनि, नासापुडाइ फालेड, अगमगाड वियंगेइ। तएणं तीसे पउमावईए देवीए अन्नया पुव्वरत्तावरत्तकालस- मयंसि अयमेयालय अज्झथिए५ समुप्पज्जित्था एव खल्ल क्णगरहे राया रजे य जाव पुत्ते वियगेइ, जाव अंगमगाइ वियगेइ । त जइ अह दारय पयायामि, सेय खल्लु मम त दारग कणगरहस्त रहस्तिय चेव सारक्खेमाणीए संगो- पोहिला भार्या के मित्र, जाति, स्वजन सपन्धि परिजनों का अशन, पान, ग्वाय एव स्वाट्य स्प चतुर्विध आहार से तथा पुष्प, वस्त्र यावन . माल्य अलकार आदि से सत्कार करवाया, सत्कार करवाने के बाद फिर उन सब को वहां से विदा कर दिया। इसके पश्चात् पोटिला भार्या में आसक्त एवं अनुरक्त बने हुए उम तेतलि पुत्र अमात्य ने उसके साथ पचेन्द्रिय समन्धी सुग्बो का अनुभव करने लगा। मूत्र ॥ ३॥ પોલિ ભાર્યાના મિત્ર જ્ઞાતિ, સ્વજન સ ધી અને પરિજનને અશન, પાન, ખાદ્ય અને સ્વઘ રૂપ ચ ર જાતના આહારથી તેમજ પુષ્પ, વસ્ત્ર યાત્ માલ્ય અલકાર વગેરેથી સાર કરાવડાવ્યું અને માર કરાવડાવ્યા પછી તેણે બધાને પિતાના ઘેરથી વિદાય આપી ત્યારપછી ફ્રિલા ભાર્થીમા આસક્ત અને અનુ રક્ત થયેલે તે અમાત્ય તેતલિપુત્ર તેની સાથે પચેન્દ્રિય સ બધી સુખને - - সামবার ताम् उपनयनीकता पति, दृष्ट्वा पोटिलया साढे पटक गेहति, गुरुद्य ' सेय पीएहि । श्वेतपीते - रजतसुवर्गनिर्मित. 'कलमेहि , पलसम्घटे आत्मान 'मज्जावेइ ' म जतिपयति, मज्जयित्वा अग्निसासिको विवाद इति हेतोः 'अग्गिहोम कराई 'अग्निहोम कारयति, कारयित्या 'पाणिगरण' पाणिग्रहण: विवाह करोति, त्या पोहिल्या भार्यायाः मित्तगाइ जार परिजण ' मित्र ज्ञातिस्वजनसम्बन्धिपरिजनम् विपुलेन अशनपान पायस्यायेन चतुर्विधाहारेण तेपलिपुत्त पोटिल दारिय भारियत्ता उरणीय पासा, पमित्तो पोष्टि लाए सद्धि पट्टय दुरूहड) तेतलिपुत्र अमात्य ने पोहिरा दारिका को अपनी भार्या म्प से अपने लिये प्रदान की हुई देना तो देख कर वह उस पोटिला दारिका के सार पटक पर बैठ गया। (दुहिता से करीहि कलसेहि अपाण मज्जावेड, मजाविता अग्गिहोम करावेड, करावित्ता पाणिग्गरण करेइ करिता पोहिलाप भारियाप मित्तगाइ जाप परिजण विश्लेण असण पाण खाइम साइमेण पुष्फ जाव पटिसिज्जेड । तण्ण से तेयलिपुत्ते पोटिलाग भारियाण अणुरत्त अविरत उरालाइ जाव विरेह ) बैठ कर फिर उसने रजत एव सुवर्ण से निर्मित कलशों द्वारा अपना अभिषेक कर माना। अभिषेक करवा कर " अग्नि साक्षिक विवाह होता है " इस रयाल से फिर उसने अग्नि मे होम करवाया। करवा कर बाद में उसने उस पोटिला दारिका का पाणि ग्ररण कर लिया। विवाह हो चुकने के अनन्तर फिर उस तेतलि पुत्र अमात्य ने (तएण तेयलिपुत्ते पोहिल दारिय भारियत्ताए उवणीय पासइ, पामित्ता पोहिलाए सद्धिं पट्टय दुरूहड) તેતલિપુત્ર અમાત્યે પિદિવા દારિકાને તે રી ભાર્યા રૂપમાં આપેલી જોઈને તે પોદિવા દરિમની સાથે પટ્ટક ઉપર બેસી ગયે (दुहिता सेयपीएति कलसेहि अपाण मज्जावेइ, मज्जावित्ता अग्गिडोम करावेइ करापित्ता पोटिलाए भारियाए मित्तणाई जाव परिजण विउलेण असण पाण खाइम सादमेण पुष्फ जार पडिविसज्जेइ । तएण से तेयलिपुत्त पोट्टिलाए भारियाए अणुरत्ते अविरत्ते उरालाइ जार विहरेइ) બેસીને તેણે ચાદી અને નાના કળશ વડે પિતાને અભિષેક કરાવડા અભિષેક કરાવડાવીને તેણે * અનિ સાલિક લગ્ન છે' આમ વિચારીને તેણે અગ્નિમાં હવન કરાવડાવ્યું ત્યારપછી તેણે પોદિલા દારિકાનું પાણિ ગ્રડણ કર્યું લગ્નની વિધિ પૂરી થયા બાદ અમાત્યે થાય . . . मनगारधर्मामृतवपिणी टीका म० १४ तेतलिपुत्रप्रधानवरितवर्णनम् १९ करोतीति व्यङ्गयति-बगहीनान् करोति । 'विइतेइ ' इति पाठे विकतयति छिनत्ति इत्यर्थीयोध्य । तत्मकारमाह-अप्येकेपा केपाचिनुत्पन्नाना पुत्राणा इस्तामुली. छिनचि, अप्पा केपाचित् पालाना हस्तामुष्ठान छिनत्ति । एव पादामुलिकाः पादाङ्गुष्ठान अपि, एव 'कण्णसकुलीए वि' कर्णशष्कुलीरपि-कर्णानपि तथा नासा- पुटानि च 'फालेइ ' पाटयति-छिनत्ति, इत्यर्थ । अनेन प्रकारेण एप कनकरयो राजा पालानाम् 'अगमगाइ' अगानि अगानि माग्यङ्गानि व्यङ्ग्यति-छिनत्ति । तत खलु अनेन प्रकारेण समुत्पन्नाना पुत्राणा विनाशानन्तरम् ' तीसे ' तस्याः कनकरथस्य राज्याः पद्मावत्या देव्या अन्यदा 'पुन्चरत्तावरचकालसमयसि' पूर्वरानापररात्रकालममये-रात्रः पश्चिमे भागे अयमेतद्रूप आ यात्मिकः आत्मगतो उत्पन्न हुए अपने पुत्रों को अगहीन कर देता। ( अप्पेगडयाणं हत्य गुलियाओ चिंह, अप्पेगइयाण रत्वगुट्ठए, छिंदड, एव पायगुलि- याओ पायगुष्ठए वि कन्नमस्कुली वि, नासापुडाइ फालेड, अग- मगाइ वियगेइ ) कितनेक चारकों के वह हाथो की अगुलियों को छेद देता था, कितनेक घारको के हाथो के अगूठों को- काट देता या, इमी तरह वह पैरो की अगुलियो को पैरों के अगुष्ठों को, कानों को नासा पुटों को छेद देता था। इस तरह यह कनक रथ राजा यालको के अगो का भगकर देता यो । (तएण तीसे पाउमावईए देवीए अन्नया पुचरत्तावरत्तकालसमयसि अयमेयाख्वे अज्मथिए ५ समु- प्पजित्या) इस प्रकार समुत्पन्न पुत्रो के विनाश के बाद उस कनकरथ राजो की रानी पद्मावती देवी के किसी एक ममय रात्रि के पश्चिम भाग में यह इस प्रकार का आध्यात्मिक यावत् मनोगत सकल्प उत्पन्न ( अप्पेगइयाण इत्यगुलियाओ हिंदद अप्पेगइयाण हत्यगुठए दिइ, एव पायगु- लियाओ पायगुढए नि कम्नमाकुलिए वि, नासा पुडाइ फालेइ, अगमगाइपियंगेइ) કેટલાક બાળકોની તે હાથની આંગળીઓ કપાવી ન ખાવતે હવે, કેટલાક બાળકના હાના અ ગૂઠાઓ કપાવી નખાવતે હતો, આ રીતે તે પગની આંગળીઓને, પગના અંગૂઠાને, કાન, નાકને કપાવી નખાવતે હતે આમ તે કનકરથ રાજા બાળકોના અગન તે છેદન કરવી નખાવતે હતો (तएण तीसे पाउमाईए देवीए अन्नया पुत्ररत्तापरत्तकालममयसि अयमेनारने अज्जत्थिा ५ समुपज्जित्था) આ પ્રમાણે જન્મેલા પના વિનાશ પછી તે કનરથ રાજાની રાણી પદ્માવતી દેવીને કોઈ એક સમયે રાત્રિના છેલા પહેરમાં આ જાતને આધ્યા ત્મિક યાવત્ મનોગત સંકલ્પ ઉત્પન્ન થયે કે- माताधर्मकचार वेमाणीए विहरित्तए तिकट्ठ एव सपेहेइ, संहिता तेयलि. पुत्त अमञ्च सदावेइ, महावित्ता पर वयासी एव खलु देवा- णुप्पिया । कणगरहे राया रजे य जाब वियगेड, त जइ णं अहं देवाणुप्पिया | दारगं पयायामि । तएण तुम देवाणु- प्पिया | कणगरहस्स रहस्सियं चेव अणुपुव्वेणं सारक्खे- माणे सगोवेमाणे सवड्डेहि । तएणं से दारए उम्मुकवाल भावे जोवणगमणुप्पत्ते तव य मम य भिखाभायणं भविस्सइ । तएण मे तेयलिपुत्ते पउमावईए एयमह पडि- सुणेइ, पडिसुणित्ता पडिगए ॥ सू० ४ ॥ टीका-'तएण से' इत्यादि । तत. खलु स कनारथो राना राज्ये चराष्ट्रे च-देशे वले सैन्ये च, पाहने अश्वादिषु च कोशे भाण्डारे च धान्यादीना कोष्ठागारे च अन्तः पुरे च, 'मुच्छिए ' मुच्छिता मोह प्राप्त , मृद्ध'आसक्तः प्रथिता विशेषेणासक्त', अ-पुपपन्न -सर्वथा तत्परायण , जाए २८जातान २% उत्पन्नान २ पुमान् ‘पियगेइ' व्यग यतिम्-विगतानि अङ्गानि येषा तान् व्यगान 'तएण से कणगरहे राया' इत्यादि । टीकार्य-(तएण) इसके बाद से कणगरहे राया रज्जे य रद्धेय यले य पाहणे य कोसे य कोडागारे य अतेउरे य मुच्छिा ४ ) वह कनकरथ राजा राज्य में राष्ट्र में सेन्य में अश्वादि बाहन में, धान्यादिकों के कोटागार में एव अन्तः पुर में मूति गृद अयन अनुरक्त एव अध्युपपन्न-सर्वथा तत्परायण बन गया । सो (जाए पुत्ते वियगेइ ) वएण से कणगरहे राया इत्यादि-~- (तएण) त्या२मा सार्थ-( से कणगरहे राया रज्जेय रहे य बले य पाहणे य कोहागारे य अतेउरे य मुच्छिा ४) તે કનકળ્યુ રાજા રાજ્ય રાજ્યમા, રાષ્ટ્રમા, મા, અશ્વ વગેરે વાહ નામા, ધાન્ય વગેરેની બાબતમા, કેકાગારમાં અને રણવાસમાં મૂર્ઝિત, , घ मास भने अयुपपन्न म भूर्णपणे ५२ 45 गये. मेथी ( जाए पुत्र वियगेइ) से मेला पाताना पुत्राने अगदीन जनापी हेत - . अनगारधर्मामृतपिणी टी० ० ४ तेतलिपुत्रप्रधानचरितवर्णनम् २१ 'अणुपुष्येण ' आनुपूर्येण यथाक्रमम् सरक्षन् धूपष्टयादितः सगोपायन भूपकृतो पद्रवात् त दारक 'सखड्डे' सार्द्धय, तस्य पालस्य वृद्धिमुपनय । ततः खलु स दारक' उम्मुमनालभारे' उन्मुक्त रालभाव उन्मुक्त परित्यक्तो बालमावो वाल्व येन स , 'जोधणगमणुप्पत्ते ' योपनकमनुप्राप्त प्राप्ततारुण्यः तव मम च ण सारखेमाणे सगोवेमाणे सवड्डेहिं । तएण से दारए उम्मुक्कवाल भावे जोधणगमणुप्पत्ते तव यमम य भिक्खामायण भविस्सइ तएर्ण से तेयलिपुत्ते पउमावइए एयमट्ठ पडिप्सुणेट, पडिसुणित्ता पडिगए) तो यदि मेरे यहां पुत्र उत्पन्न होता है-मैं पुत्र को उत्पन्न करती है- तो मुझे यही योग्य है कि मे राजा कनकरथ को खबर न पडे इस रूप से उसकी रक्षा करूँ-उनकी दृष्टि से -उसे बचाकर रखू-ऐसा उसने मन से विचार किया। विचार कर फिर उसने अमात्य तेतलिपुत्र को घुलाया-बुलाकर उस से ऐसा कहा-हे देवानुप्रिय ! कनकरय राजा राज्य आदि में इतना अधिक मूर्षित गृद्ध-अत्यत अनुरक्त एव अध्यु पपन यना हुआ है जो वह उत्पन्न हुए चालको को अग हीन कर देता है-उनके हाथो की अगुलियों आदि अङ्गों को काट देता है। तो हे देवा नुप्रिय ! यदि में पुत्र को उत्पन्न करती हूँ तो देवानुप्रिय तुम उसे राजा को खबर न पडे इस रूप से रक्षित करते हुए और उनकी दृष्टि से बचाते हुए क्रमश. वृद्धिंगत करो। जब वह पालक-क्रमश. सर्दित रोता हुआ बाल्यावस्था से ररित होकर यौवनावस्था वाला बन जायगा माणे सगोवेमाणे सवड्डेहिं । तएण से दारए उम्मुक्कपालभावे जोधगगमणु पत्ते तव य मम य भिक्खाभायण भविस्मद तएण से तेयलिपुत्ते पउमावइए एयमह पडिसुणेइ पडिसुणिचा पडिगए) હવે મને પુત્ર ઉત્પન્ન થવાનો જ છે, તે મને એજ એગ્ય લાગે છે કે કનકરથ રાજાને ખબર પડે નહિ તે રીતે બાળકની રક્ષા કરૂ તેમની કુદ્રષ્ટિથી તેને બચાવુ આ પ્રમાણે તેણે મનમાં વિચાર કર્યો વિચાર કરીને તેણે અમાત્ય તેતલિપુત્રને બેલા અને બેલાવીને તેને કહ્યું કે હે દેવાનુપ્રિય! રાજા કનકરથ રાજ્ય વગેરેના કામમાં આટલે બધે મૂચ્છિત, વૃદ્ધ-ખૂબજ આસક્ત અને અષ્પપપન્ન થઈ પડે છે કે તે જન્મેલા બાળકના અગ કપાવી નાખે છે તેમના હાથોની આગળીઓ વગેરે અગેને કપાવી નાખે છે જે હે દેવા નુપ્રિય! હુ પુત્રને જન્મ આપે તે દેવાનુપ્રિય તમે રાજાને ખબર પડે નહીં તેમ તેમની કુદણિથી બાળકની રક્ષા કરતા તેનું ભરણ-પોષણ કરજો, જે તે - २० নায়াগাং विचारो यावत् मनोगत सारपः, 'सगुप्पग्नित्या ' मगुपयत । सरल्पप्रार माह-एन खलु' इत्यादि-ए। खलु कनकरथी राजाराज्य र यान् उपत्यति । यावत् अङ्गानि अगानि च्यद्गयति जनेन मारण पुतिमतमारण मारयति । तदि खलु अह दारक 'पयायामि ' प्रमनयामि, सेय सलु मम त दारग रणगरहस्स रहस्सिय चेव सारखेमागीए सगावेमाणीए रिह रित्तए 'य. पलु गम त दारक कनकरथस्य 'रहस्सिय चेन' रहस्थिकमेव समेय आपद सरलत्या 'सरस्ख माणीए' सरक्षन्त्या. भूपए वादे', 'सगोमागीए' सगोपायन्त्या भूपकतोप- द्रवात विहर्तुम् , ' तिटु' इति कृत्वा इति मनसि त्या एर समेक्षते एव विचारयति सप्रेक्ष्य-निचार्य तेतलिपुत्रममात्य प्रगान शब्दयति, शब्दयित्वा एवमवदत्-एर खलु देवानुप्रिय ! कनकरयो राजा ' रज्जेय जार पियंगेइ' राज्ये च यानद् व्यगयति=राज्यादिपु च मूच्छितो जातान पुत्रान् विवाहान करोति एव तेपामगोपाङ्गानि खण्डयति। नया रोत्या पुत्रान्मारयति, तद्यदि खलु अह देवानुप्रिय ! दारफ मजनगामि । तत खलु स नरयरय रहस्यिकमेव हुआ-(एव खलु कणगरहे राया रज्जे य जार पुत्ते चियगेड, जाव अङ्ग मगाइ वियगेइ ) यह कनकरय राजा राज्य आदिमें मूर्षित गृव, अत्य. न्त अनुरक्त एव अभ्युपपन्न अत्यन्त तत्पर बन कर पुत्रों को काट देता हैं-बुरी तरह से उन्हें मार डालता है (त जह अह दारय पायायामि, सेय खलु मम त दारग कणगरहस्स रहस्सिय चेव सारक्खेमाणीए सगोवेमाणीए विररित्तए त्ति कटूटु एक सपेहेइ, सपेहिता, तेयलिपुत्त अमच्च सद्दावेइ, सदाचित्ता एव क्यासी-एव खलु देवाणुप्पिया । कण गरहे राया रज्जे य जाच वियगेइ त जहण अह देवाणुप्पिया ! दारगंप- योयोमि, तएण तुम देवाणुप्पिया! कण रहस्स रहस्मिय चेव अणुपुत्रे ( एव खलु कणगरहे राया रज्जे य जान पुत्ते वियगेइ, जान अग मगाइ वियगेइ) કનકરથ રાજા રાજ્ય વગેરેની બાબતમાં મુતિ ગૃદ્ધ, ખૂબજ આસક્ત અને અધ્યપપન્ન–અત્યન્ત તત્પર થઈને–પુત્રોને અગહીન કરાવી નાખે છે યાવત્ તેમના અને કપાવી નખાવે છે અને ખરાબ હાલતમાં તેઓને મરાવી ન ખવે છે (त जइ अह दास्य पायायामि, सेय खलु मम त दारग कणगरहस्म रह- स्सिय चेन सारखेमाणीए सगोवेमाणीए विहरित्तए त्तिर? एव सपेहेद, सपेहिता तेयलिपुत्त अमञ्च सद्दावेइ, सदाीिता एव वयासी-एव खलु देवाणुप्पिया! कणगरहे, राया रज्जे य जाप वियगेई त जपण अह देवाणुप्पिया । दारंग पया यामि, वरण तुम देवाणुप्पिया 1 कणगरहस्स रहस्सिय चेव अणुपुग्वेण सारक्खे- अनगारधर्मामृतपिणी टी० अ० १४ तेतरिपुनप्रधानचरितवर्णनम् 'अणुपुष्येण ' आनुपूर्येण यथाक्रमम् सरक्षन् धूरदृष्ट्यादिनः सगोपायन भूपकृतो पद्रवात् त दारक ' सबट्टेड' सवर्द्धय, तम्य पालस्य वृद्धिमुपनय । ततः खलु स दारक' उम्मुकपालभारे' उन्मुक्त रालभाष उन्मुक्त परित्यक्तो पालभावो पालत्व येन स', 'जोधणगमणुप्पत्ते' यौनसमनुप्राप्त प्राप्ततारुण्य. तर मम च ण सारखेमाणे सगोवेमाणे सवड्डेहिं । तगण से दारए उम्मुक्कयाल भावे जोधणगमणुप्पत्ते तव यमम य भिग्वाभायण भविस्सइ तएर्ण से तेयलिपुत्ते पउमावटए एयम पडिसुणेड, पडिसुणित्ता पडिगए) तो यदि मेरे यहां पुत्र उत्पन्न होता है-में पुत्र को उत्पन्न करती है- तो मुझे यही योग्य है कि में राजा कनकर य को ग्ववर न पडे इस रूप से उसकी रक्षा क-उनकी दृष्टि से -उसे बचाकर रखू-ऐसा उसने मन से विचार किया। विचार कर फिर उसने अमात्य तेतलिपुत्र को घुलाया-चुलाकर उस से ऐसा कहा-हे देवानुप्रिय | कनकरय राजा राज्य आदि में इतना अधिक मूर्डित गृह-अत्यत अनुरक्त एव अध्यु पपन्न बना हुआ है जो वह उत्पन्न हुए पालको को अग हीन कर देता है-उनके हाथो की अगुलियों आदि अङ्गों को काट देता है। तो हे देवा नुप्रिय | यदि में पुत्र को उत्पन्न करती हूँ तो देवानुप्रिय तुम उसे राजा को खबर न पडे इस रूप से रक्षित करते हुए और उनकी दृष्टि से उचाते हुए क्रमश. वृद्धिंगत करो। जब वह बालक-क्रमशः सर्द्धित होता हुआ बाल्यावस्था से रहित होकर यौवनावस्था वाला बन जायगा माणे सगोवेमाणे सत्रदेहिं । तएण से दारण उम्मुक्फ बालभावे जोधगगमणु पत्ते तव य मम य भिक्खाभायण भविस्मद तएण से तेयलिपुत्ते पउमावइए एयमह पडिसुणेइ पडिसुणित्ता पडिगए) હવે મને પુત્ર તત્પન્ન થવાનું જ છે, તે મને એજ એગ્ય લાગે છે કે કનકરથ રાજાને ખબર પડે નહિ તે રીતે બાળકની રક્ષા કરૂ તેમની કુદષ્ટિથી તેને બચાવુ આ પ્રમાણે તેણે મનમાં વિચાર કર્યો વિચાર કરીને તેણે અમાત્ય તેતવિપુત્રને બોલાવ્યું અને બેલાવીને તેને કહ્યું કે હે દેવાનુપ્રિય! રાજા કનકરથ રાજ્ય વગેરેના કામમાં આટલો બધે મૂછિત, વૃદ્ધ-ખૂબજ આસક્ત અને અષ્ણુપપન્ન થઈ પડે છે કે જન્મેલા બાળકોના અને કપાવી નાખે છે તેમના હાથની આંગળીઓ વગેરે અગોને કપાવી નાખે છે જે હે દેવા નુપ્રિય ! હું પુત્રને જન્મ આપે તે દેવાનુપ્રિય તમે રાજાને ખબર પડે નહીં તેમ તેમની કુદણિથી બાળકની રક્ષા કરતા તેનું ભરણ-પોષણ કરો, જે તે - माताधर्मकपास 'भिक्खाभायण' भिक्षामाननम् भिक्षाया आधारभूतो पियति । ततः खल स तेतलिपुत्र पद्मावत्याः परमर्थ प्रतिशृणोति स्पीकरोति, प्रतिश्रुत्य स्वीकृत्य पधारत्या समीगत् मतिगत स्वगृहे गतवान् ॥Fo४|| मूलम्-तएण पउमावई य देवी पोहिला य अमच्ची सय. मेव गम्भ गिण्हइ, सयमेव परिवहइ । तएण सा पउमावई नवण्ह मासाणं जाव पियदसणं सुरूव दारग पयाया, ज रयणि च णं पउमावई दारय पयाया तं रयणिं च ण पोहिला वि अमच्ची नवण्ह मासाणं विणिहायमावन्न दारिय पयाया। तएणं सा पउमावई देवी अम्मधाइ सद्दावेइ सहावित्ता एव वयासी-गच्छह णं तुमे अम्मो। तेतलिगिहे तेतलिपुत्तं अमञ्च रहस्सियं चेव सदाबह । तएणं सा अम्मधाई तहत्ति पडिसुणेइ, पाडिसुणित्ता अंतेउरस्स अवहारेण णिग्गच्छद, णिगच्छित्ता, जेणेव तेतलिस्स गिहे जेणेव तेतलिपुत्ते तेणेव उवागच्छइ, उवागच्छित्ता करयल जाव एव वयासी-एव खलु देवाणुप्पिया। पउमावई देवी सदावेइ । तएणं तेतलिपुत्तं अम्मधाईए अतिए एयम सोच्चा हट्टतुटे अम्मधाईए सद्धि साओ गिहाओ णिग्गच्छइ, णिग्गच्छित्ता अतेउरस्स अवदारेण रहस्सियं चेव अणुप्पविसइ, अणुप्पविसित्ता जेणेव पउमावई देवी तेणेव तो हमारे तुम्हारे दोनों के लिये भिक्षा पात्र-भिक्षा का आधार भूत- घन जायगा इम-प्रकार पद्मावती के इस कथन रूप अर्थ को उस तेत लिपुत्र अमात्यने स्वीकार कर लिया। और स्वीकार करके फिर वह पद्मावती देवी के पास से अपने घर पर चला आया ।। सू०४॥ બાળક આખરે માટે થઈ જશે અને બચપણ વટાવીને જુવાન થઈ જશે તે મારા અને તમારા બનેને માટે ભિક્ષાપાત્ર ભિક્ષાને આધારભૂત થઈ જશે આ રીતે પદ્માવતીના આ કથન રૂપ અને તે તેતલિપુત્ર અમાત્ય સ્વીકાર કરીને તે પદ્માવતી દેવીની પાસેથી વિદાય લઈને પિતાને ઘેર આવી ગ સ ૪ , । . अनगारधर्मामृतवर्पिणी टीका अ० १४ तेतलिपुत्रप्रधानचरितवर्णनम उवागए करयलपरिग्गहियं दसणह सिरसावत्तं मत्थए अंजलि कटु एवं वयासी-सदिसतु णं देवाणुप्पिया | ज मए कायव्वं ? तएणं पउमाबई तेतलिपुत्त एवं वयासी-एवं खल्ल कणगरहे राया जाव वियगेइ, अहं च णं देवाणुप्पिया ! दारग पयाया त तुम णं देवाणुप्पिया । एयं दारग गेण्हाहि जाव तव मम य भिक्खाभायणे भविस्सइ तिक्हु तेतलिपुत्तं दलयइ । तएणं तेतलिपुत्ते पउमावईए हत्थाओ दारग गेण्हइ गिण्हत्ता उत्त- रिज्जेणं पिहेड,पिहिता अतेउरस्त रहस्सियं अवदारेणं गिग्गच्छइ, णिग्गच्छित्ता, जेणेव सये गिहे जेणेव पोहिला भारिया, तेणेव उवागच्छइ, उवागच्छित्ता पोटिल एव वयासी-एवं खलु देवा- णुप्पिया। कणगरहे राया रजे य जाब वियगेड, अय च णं दारए कणगरहस्सपुत्ते पउमावईए अत्तए, त ण तुम देवाणुप्पिया । इम दारग कणगरहस्स रहस्सिय चेव अणुपुत्वेणं सारक्खाहि य सगोवाहि य सवड्डेहि य । तएणं एस दारए उमुक्कवालभावे तव य मम व पउमावईए य आहारे भविस्सइ त्ति कटु पोट्टि- लाए पासे णिक्खिवइ, णिक्खिवित्ता, पोहिलाओ पासाओ विनि- हायमावन्निय दारिय गेण्हइ, गेण्हित्ता उत्तरिजेण पिहेइ, पिहिता अतेउरस्स अवदारेण अणुप्पविसइ अणुप्पविसित्ता जेणेव पउ- मावई देवी तेणेव उवागच्छइ, उवागच्छित्ता पउमावई ए देवीए पासे ठावेइ, ठावित्ता जाव पडिणिग्गए । तएण तीमे पउमा- वईए अगपरियारियाओ पउमावइ देवि विणिहायमावन्न च , - . २६ प्राधकथासूत्र 'भिक्खामायण' भिसामाननम् भिसाया आधारभूनो गपियति । ततः बलु स तेतलिपुत्र पमापत्या. एकमर्थ प्रतिशृणोति-पीरीति, प्रतिश्रुत्य स्वीकृत्य पधारत्या समीयात् मतिगत पगृह गनपान |पू०८|| मूलम्-तएणं पउमावई य देवी पोटिला य अमच्ची सय. मेव गम्भ गिण्हइ, सयमेव परिवहह । तएण सा पउमावई नवण्ह मासाणं जाव पियदसणं सुस्वं दारग पयाया, ज रयणि च णं पउमावई दारय पचाया त रयणि च ण पोहिला वि अमच्ची नवण्ह मासाण विणिहायमावन्न दारिय पयाया। तएणं सा पउमावई देवी अम्मधाई मदावेइ सदायित्ता एव वयासी-गच्छह ण तुमे अम्मो। तेतलिगिहे तेतलिपुत्त अमच्च रहस्सियं चेव सदावेह । तएण सा अम्मधाई तहत्ति पडिसुणेइ, पडिसुणित्ता अतेउरस्स अवदारेण णिग्गच्छइ, णिगच्छित्ता, जेणेव तेतलिस्स गिहे जेणेव तेतलिपुत्ते तेणेव उवागच्छइ, उवागच्छित्ता करयल जाव एव क्यासी-एव खलु देवाणुप्पिया। पउमावई देवी सदावेइ । तएण तेतलिपुत्त अम्मवाईए अंतिए एयमट्ट सोच्चा हट्ठतुढे अम्मधाईए सद्वि साओ गिहाओ णिग्गच्छइ, णिग्गच्छित्ता अतेउरस्स अवदारेण रहस्सियं चेव अणुप्पविसइ, अणुप्पविसित्ता जेणेव पउमावई देवी तेणेव तो हमारे तुम्हारे दोनों के लिये भिक्षा पात्र-भिक्षा का आधार भूत- घन जायगा इम-प्रकार पद्मावती के इस कथन रूप अर्थ को उस तेत लिपुत्र अमात्यने स्वीकार कर लिया। और स्वीकार करके फिर वह पद्मावती देवी के पास से अपने घर पर चला आया ॥ सू०४॥ બાળક આખરે મોટો થઈ જશે અને બચપણ વટાવીને જુવાન થઈ જશે તે મારા અને તમારા બંનેને માટે ભિક્ષાપાત્ર શિક્ષાને આધારભૂત થઈ જશે આ રીતે પદ્માવતીને આ કથન રૂપ અને તે તેતલિપુત્ર અમાત્યે સ્વીકાર કરીને તે પદ્માવતી દેવીની પાસેથી વિદાય લઈને પોતાને ઘેર આવી ગયે સૂ ૪ - अनगारधर्मामृतवपिणो टीका 40 १४ तेतरि पुनप्रधानचरितवर्णनम् उवागए करयलपरिग्गहियं दसणह सिरसावत्त मत्थए अंजलि कटु एव वयासी-सदिसतु णं देवाणुप्पिया 1 ज मए कायव्वं ? तएणं पउमावई तेतलिपुत्त एवं वयासी-एव खल्लु कणगरहे राया जाव वियगेइ, अहं च ण देवाणुप्पिया । दारग पयाया त तुम णं देवाणुप्पिया । एय दारग गेण्हाहि जाव तव मम य भिक्खाभायणे भविस्सइ तिक्छु तेतलिपुत्तं दलयइ । तएणं तेतलिपुत्ते पउमावईए हत्थाओ दारग गेण्हइ गिण्हत्ता उत्त- रिज्जेणं पिहेड,पिहिता अतेउरस्त रहस्सिय अवदारेणं जिग्गच्छइ, णिग्गच्छित्ता, जेणेव सये गिहे जेणेव पोहिला भारिया, तेणेव उवागच्छइ, उवागच्छित्ता पोहिल एव वयासी-एवं खलु देवा- णुप्पिया। कणगरहे राया रजे य जाब वियगेड, अय च णं दारए कणगरहस्सपुत्ते पउमावईए अत्तए, त ण तुम देवाणुप्पिया । इम दारग कणगरहस्त रहस्सियं चेव अणुपुत्वेण सारक्खाहि य सगोवाहि य सवड्डेहि य । तएणं एस दारए उमुक्कवालभावे तव य मम च पउमावईए य आहारे भविस्तइ त्ति कटु पोहि लाए पासे णिविखवइ, णिक्खिवित्ता, पोटिलाओ पासाओ विनि हायमावन्निय दारिय गेण्हइ, गेण्हित्ता उत्तरिजेण पिहेइ, नि अतेउरस्स अवदारेण अणुप्पविसइ अणुप्पविमिना.
२४ . । . . HTri दारिय पासति, पासित्ता जेणे कणगरह राया तेणेव उवाग च्छति उवागच्छित्ता रियलपरिग्गहिर दमनह सिरसावत्तं म- स्थए अजलि कह एव वयाती एव सल्लु सामी ! पउमाई देवी मइल्लियं दारियं पाया । ताणं क्णगरहे राया तीसे मइल्लियाए दारियाए नीहरण करेइ, वहूणि लोइयाई मयकि- च्चाइ करेइ करित्ता कालेण विगयसोए जाए । तएण से तेत- लिपुत्ते कोडुवियपुरिसे सहावेड, सदाबित्ता, एन वरासी-खिप्पा- मेव चारगसोहण जाव ठिडवडिय, जम्हाण अम्ह एस दारए कणगरहस्स रजे जाए, त होउ ण दारए, नामेण कणगज्झए जाव भोगसमत्थे जाए ॥ सू० ५ ॥ टीका-'तएण' इत्यादि । तत खलु पद्मावती चदेवी पोटिलाच अमात्यो सममेव गर्भ गृहाति, सममेगर्भ परिवहति पारयति । तत बलु सा पद्मारती नवण्ह मामाण जाव ' नयाना मासाना नामु मासेसु व्यतीतेषु यावत् सासु 'पियदसग ' पियदर्शनम् पिय चेतोहर दर्शनमवलोकन यस्य त = दर्शकजन- चेतोहादजनक सुरूप दारक 'पयाया' प्रजाता=मजनितवती । यस्या रजन्पा च तपण परमावई य देवी' इत्यादि । टीकार्य-(तएण) इसके बाद ( पउमावई य देवी पोहिलाय अमच्ची सयमेव गम्भ गिपरह) पद्मावती देवी और पोहिला अमात्यी ने साथ ही गर्भ धारण किया। (तएण सा पठमावई नवण्ड मासाण जाव पियद सण सुरूव दारग पयाया) पद्मावती देवी ने जब नौ मास अच्छी तरह गर्भ के समाप्त हो चुके तब दर्शकजन चित्तालाद जनक अच्छे रूप शाली पुत्र को जन्म दिया। (ज रयणि च ण पउमोबई दारय पयाया तपण पउमावइ य देवी' इस्यानि- - तएण) त्या२५७। (पउमावइ य देशी पोट्टिला य अमची मयमेव गम ફિ) પદ્માવતી દેવી અને પદિલા અમાત્યીએ સાથે સાથે જ ગર્ભધારણ કર્યો (तएण सा पउमाई नावग्ह मासाण जाब पियदसण सुरूष दारग पयाया) જ્યારે નવ માત્ર સારી રીતે પસાર થઈ ગયા ત્યારે પાવતી દેવીએ જેનારાએ જોઈને પ્રસન્ન થઈ જાય એવા રૂપાળા પુત્રને જન્મ આપે .
- भनगारधर्मामृतवपिणी टी० अ० १४ तेतलिपुत्रप्रधानचरितवर्णनम् खलु पद्मावती दार प्रजाता तस्या रजन्या च स्खलु पोटिलापि अमात्यी 'नवण्ड- मासाण' नवाना मासानाम्-नयम मासेपु व्यतीतेपु 'विणिहायमावन ' निति- धातमापन्नाम्-मृताम् दारिका प्रजाता-जनितनती । 'तएण' तन खलु पुत्रजन्मा नन्तर सा पद्मावती देवी अम्मधात्री गदयति, शब्दयित्वा एवमनदत्-गच्छत खलु यूयमम्ब ! 'तेतनिगिद्दे ' तेतलिगृहे तेतलेरमात्यस्य गृहे तेतलिपुत्रममात्य रहस्थिकम् अन्यैरपरिज्ञातमेव शब्दयत-आइयत । तनः खलु सा अम्नधात्री तपेति प्रतिशृगोति, अङ्गीकरोति, मतिश्रुत्य अन्त पुरस्य ' अवदारेण ' अपद्वारेण-पृष्ठ- द्वारेण निर्गच्छति, निर्गत्य, यऔर तेतले हम् , यौव तेतलिपुत्रस्तञ्च उपा गच्छति, उपागत्य करनल यापद् अञ्जलिपुट कृत्वा एवमवादीत्-एवं खलु हे त रयणि च ण पोटिलावि अमची नवण्ह मोसाण विणिहायमावन्नं दारिय पपाया) जिस रात्रि में पद्मावती देवी ने पुन को जन्म दिया था उसी रात्रि में पोटिला अमात्यी ने भी नौ मास व्यतीत हो जाने पर एक मरी हुइ कन्या को जन्म दिया (तग्ण सा परमावई अम्मधाय सहावेह, सदायित्ता एव बयासी ग ण तुमे अम्मो । तेतलिगिहे तेतलीपुत्त अमच्च रहस्सिय चेव सद्दावेह) इम के बाद उस पद्मावती ने अम्बधात्री को बुलवाया और बुलवाकर उससे ऐसा कहा हे अम्म ! तुम तेतलि अमात्य के घर पर जाओ। और किसी को पत्ता न पड़े इस रूप से तुम तेतलि पुत्र अमात्य को बुला लाओ। (तएण सा अ ग्मधाई तहत्ति पडिणेइ पडिप्लुणित्ता अतेउरस्स अवदारेण णिग्ग- च्छइ जिग्गच्छित्ता जेणेव तेतलिस्सगिहे जेणेव तेतलिपुत्ते तेणेच उवा गच्छह, उचागचित्ता करयल जाव एवं धयामी-एव खलु देवाणुप्पिया (ज रयणिं च ण पउमाई दारय पयाया त रयणि च ण पोहिला नि अमची नवण्ह मासाण विणिहायमावन्न यारिय पयाया) જે રાત્રિએ પદ્માવતી દેવીએ પુત્રને જન્મ આપે તે જ રાત્રિએ દિલા અમાત્યીએ પણ નવ માસ પૂગ થવાથી એક મરેલી કન્યાને જન્મ આપ્યો (तएण सा पउमावई अम्मवाय सावेट, सद्दारिता एवं वयासी गच्छह ण तुमै अम्मी ततलिगिहे तेतलिपुत अमच रहस्सिय वे सदानेह) ત્યાર પછી તે પદ્માવતીએ આ બધાત્રીને બોલાવી અને બોલાવીને તેને આ પ્રમાણે કહ્યું કે હું અમ્બ ! તમે તેતલિ અમાત્યને ઘેર જાઓ અને કોઈને ખબર પડે નહિ તેમ તેતલિપુત્ર અમને તમે અહીં બોલાવી લાવે (तपण सा अम्मचाई तहत्ति पडिसणे, पडिसुगिजा जनेउरस्स अवदारण णिगच्छ जिग्गच्छित्ता जेणे ततलिस गिहे जेणे तेतलिपुत्ते तेणेव उवा- - भाताचा देशानुप्रिय ! पद्मावती देवी गान्त गन्दगति । यतः पलु तेतरिपुत्रः 'अवापि अतिए ' अम्मधाच्या भन्ति सम्पधायाः महाशात् पतमयं श्रुता इष्टतृष्टोऽन धाग्या साद्धं सकाद् गृदाद निर्गछति, निर्गत्य अन्तपुरस्य अपद्वारेण रहस्यिक- मेव-प्रच्छन्नमेव अनुपविशति, अनुमरिश्य, यो पनापती देवी तर 'आगर' उपागता समाप्तः फरवलारिगृहीत दशनख शिरसागत मन्तवलिकत्ता एवं वक्ष्यमाणप्रकारेण आदत्-' सदिसतु ' मदिशतु-आमापयतु सतु हे देवानुप्रिये ! पउमावई देवी सद्दावेह । तण्ण तेतलिपुत्ते अम्मधाई। अंनिए पयमा सोच्चा ? तुढे अम्मधाई मद्वि सामो गिहाओ णिग्गा) पना वती देवी के इस प्रकार बचन सुनकर उम अम्पधात्री ने तथेति 'कह कर उसकी आज्ञा को स्वीकार कर लिया। स्वीकार कर के फिर वह अतः पुर के अपहार से पीछे के दरवाजे से पाहिर निकली-निकल कर जहाँ तेतलि का घर और उसमें भी जहा तेतलिपुत्र था वह गई। वहा जाकर पहिले उसने तेतलिपुत्र अमात्य को दोनों हाथ जोड़ कर नमस्कार किया याद में चोली-हे देवानुप्रिय | आपको पद्मावती देवी बुला रही हैं । अम्बधात्री के मुख से इस प्रकार वचन सुन कर व तेतलि पुत्र हर्षित एव तुष्ट होता हुआ अभ्याधात्री के सार ही अपने घर से निकला। (णिग्गच्छित्ता अतेउरस्स अवहारेण रस्ति य चेव अणुप्पविसइ, अणुप्पविसित्ता जेणेच पउमावई देवी तेणेव उवागए करयलपरिग्गहिय दसणह सिरसावत्त मत्थए अजलि कट्टु एव वया गच्छइ, उवागच्छित्ता करयल जाव एव चयासी-एव खलु देवाणुप्पिया! पउमावई देवी सद्दावेइ । तएण तेतलिपुत्ते अम्मधाईए अतिए एयमह सोचा हद्वतुटे अम्म धाईए सद्धि साओ गिहाओ णिगच्छइ ) આ રીતે પદ્માવતી દેવીની વાત સાંભળીને આ બધાવીએ “તથતિ” (સારૂ) આમ કહીને તેમની આજ્ઞા સ્વીકારી લીધી સ્વીકારીને તે રણવાસના પાછલા બારણેથી બહાર નીકળી અને નીકળીને જ્યા તેતલિપુત્રનું ઘર અને તેમાં પણ જ્યા તેતલિપુત્ર અમાત્ય હતા ત્યાં પહોંચી ત્યા પહેચીને તેણે સૌ પહેલાં બને હાથ જોડીને તેતલિપુત્રને નમસ્કાર કર્યા અને ત્યારપછી તેણે કહ્યું કે હે દેવાનુપ્રિય ! તમને પદ્માવતી દેવી લાવે છે આ બધાત્રીના મુખથી આ જાતની વાત સાંભળીને તેતલિપુત્ર હર્ષિત તેમજ સ તુષ્ટ થતે આ બધાત્રીની સાથે સાથે જ તે પિતાના ઘેરથી રણવાસ તરફ રવાના થયે (णिगच्छित्वा अतेउरस्स अबदारेण रहस्सिय चेर अणुप्पविसइ अणुण्प पिसिना जेणेव पउमाई देवी तेणेव उवागप, -~-दमण सिर .
% . भनगा पपिणी टी०म० १४ तेतलिपुत्रप्रधानचरितवर्णनम् ज मए कायव्य ' यन्मया कर्तव्यम् , ततः खलु पद्मावती देवी तेतलिपुत्रमेवमय- दत् 'एव खलु कणगरहे राया वियगेह' एव खलु कनफरथो राजा व्यगर्यात हे देवाणुप्रिय ! मया पूर्वमेकथित-यत्कनकरथ उत्पन्नान्पुनान् विकृताऽङ्गान् कृत्वा मारयति । अह च खलु देवानुप्रिय ! दारक प्रजाता-जनितवती, 'त' तस्मात् कारणात् व खलु देशानुपिय ! एत दारक गृहाण यावत् तप च मम च सी संदिसतु णं देवाणुप्पिया! जमए कायव्ध ? तएणं पउमावई तेतलि पुत्तं एव वयासी-एवं ग्यलु कणगरहे राया जाव वियगेड, अह च णं देवाणुप्पिया दारग पयाया त तुम णं देवाणुप्पिया। एय दारग गेण्हाहि) चलकर वह अतः पुर के पृष्ठ भाग के द्वार से किसी को आने का पता न लगे इस रूप से वहा प्रविष्ट हुआ। प्रविष्ट होकर जहां पद्मावती देवी थी वहां गया । वहा जाफर उसने दोनों हाथ जिसमें जुडे हुए हैं और दशोनख जिसमें है ऐसी अजलिको दक्षिण तरफ से घुमाकर बाये तरफ लेजाकर और मस्तकपर अजलि को रखकर कहा-अर्थात् नम- स्कार कर पूछा हे देवानुप्रिये ! जो मुझे करने योग्य कार्य है उस के करने की आप आज्ञा दीजिये । इस के बाद पद्मावती देवी ने तेतलिपुत्र से इस प्रकार कहा-हे देवानुप्रिय ! मैंने तुमसे पहिले ही कह रक्खा है कि कनकरथ उत्पन्न हुए पुत्रों को विकृत अग बनाकर मार डालता है। और मैंने हे देवानुप्रिय । पुत्र को उत्पन्न किया है । इसलिये तुम हे देवा- सावत्त मत्यए अनलिंक्डु एव वयामी-स दिसत ण देवाणुप्पिया ! जंमए कर- णिज्ज तएण परमानीइ देवी वयामी-एस सलु कणगरहे राया जार वियगेइ अइ च ण देवानुपिया दारग पयाया त तुम णदेवाणुप्पिया ! एव दारग गेण्हादि) ત્યા પહોચીને રણવાસના પાછલા બારણેથી કેને ખબર પડે નહિ તેમ રણવાસમાં પ્રવિષ્ટ થઈ ગયે પ્રવિણ થઈને તે જ્યા પાવતી દેવી હતી ત્યા પહે ત્યા પહોચીને તેણે દશે નખ જેમા છે એવા બને હાથ જોડીને અજલિ બનાવીને તેને જમણી બાજુથી ફેરવીને ડાબી બાજુ તરફ લઈ જઈને મસ્તક ઉપર અ જલિ મૂકીને આ પ્રમાણે કહ્યુ-એટલે નમસ્કાર કરીને પૂછ્યું કે હે દેવાનુપ્રિયે! મારે લાયક જે કઈ પણ કામ હોય તે મને કહે ત્યાર પછી પદ્માવતી દેવીએ તેતલિપુત્રને આ પ્રમાણે કહ્યું કે હે દેવાનુપ્રિયા તમને મે પહેલેથી કહી રાખ્યું છે કે રાજા કનકરથ ઉત્પન્ન થયેલા પત્રને અગહીન કરી નાખે છે અને તે દેવાનુપ્રિય ! મારે પુત્ર થયે છે હે દેવા- નુપ્રિય ! એ બાળકને તમે લઈ જાઓ.
- माताधर्म भिक्षाभाननमिव भिक्षाभनिन, यया भिक्षाभाजनं जीपन नियति तथाऽयमपि जीवननिर्वाहको भविष्यति 'तिकटु' इति मत्वाः इत्युका तलिपुत' तेवति पुत्राय प्राकृतत्वादत्र द्वितीया ददातितेतलिपुत्रम्य हस्ते दारकार्पयति । तत. स्वक तेतलिपुत्रः परित्या हस्ताभ्यां दारक गृहाति, गृहीला उतरीयण-उत्तरीयसेन से पिहेइ' पिदधाति आच्छादयति. 'पिहिता' विधाय अन्त:-पुस्य रहस्सिा' रहस्पिप्रच्छन्न यथा स्यात्तथा अपद्वारेण मिर्गच्छनि, निर्गस्य यौव स्वका यत्र पोहिला भार्या तर उपागति, उपागत्य पोटिलामेरमवादी-एर खल हे देवानुभिये ! कनारयो राना राज्ये च यापद व्पद्यति स्वपुत्रान मारयति अय च खलु मम हस्तस्थितो दारफ कनकरयस्य पुत्रः पापत्या आत्मजो मया इञानीतः, 'त' तस्मात् कारणात् खलु हे देशानुमिरे में द्वारक 'कणगरहस्स नुभिय' इम पालक को लेलो (जाव तर ममय मियाभायणे भवि सइत्ति कटूटु तेतलिपुत्त दलयइ ) यावत् यह हमारे तुम्हारे लिये भिक्षा का भाजन हो जायगा जिस प्रकार मिक्षा भाजन जीवन निर्वाहक होता है-उसी तरह यह भी जीवन निर्वारक होवेगा इस प्रकार करकर उसमे तेतलिपुत्र के हाथमें आपने पुत्र को दे दिया । (तण्ण तेतलिपुत्ते पउमा- बई हत्याओ दारंग गेई ) तेतलिपुत्र ने भी पद्मावती देवीके रायसे पालक को ले लिया। (मिण्डित्ता उत्तरिज्जेण पिहेइ, पिहित्ता अते उर- स्सरहस्तिय अवदारेण जिग्गच्छद,णिग्गचित्ता जेणेव सरा गिहे जेणेव पोहिला भारिया-तेणेव उवागच्छइ, उद्यागच्छित्ता-पोहिल एव वयासी एव खलु देवाणुप्पिया! कणगरहे राया रज्जे य जाय वियगेइ, अम (जाव तब मम य भिक्खाभायणे भनिस्सइत्तिकट्टु तेतलिपुत्त दलयइ) એ મારા અને તમારા માટે ભિક્ષાભાજન' થશે એટલે કે જેમ ભિક્ષાનું પાત્ર જીવનને ટકાવનાર હોય છે તેમજ આ બાળક પણું જીવન નિર્વાહક થશે આ પ્રમાણે કહીને તેણે તેતલિપુત્રના હાથમાં પોતાના નવ જાત પુત્રને સોપીદીધે (तएण तेतलिपुत्ते पउमाईए हत्थाओ दारग गेण्हइ) તેતલિપુત્રે પણ પદ્માવતી દેવીના હાથમાથી બાળક લઈ લીધું (गिण्हित्ता उत्तरिज्जेण पिहेड पिहिता अतेउस्स्स रहस्सिय अवदारेण णिग्गच्छद, णिग्गन्ठित्ता जेणेन सए गिहे जेणेच मोटिला भारिया-तेणेव उवा- गच्छइ, उवागच्छित्ता, पोटिल एव पयासी, एव 'खल देवाणुप्पिया कणगरहे रापा रज्जे य जाब वियगेइ, अय च पदारए यणगरहस्सपुत्ते परमाईए अथए , अमगारधर्मामृतपिणी टीका य० १४ तेतलिपुत्रप्रधानचरितवर्णनम् रइस्सिय व 'कनारथस्य रहस्यिकमेव कनफरथो यथा न जानीयात्तथैव अणु- पुन्वेण आनुपूर्येण अनुक्रमेण तकृतोपद्रवतश्व 'सारवाहि य सरक्ष्य कनकस्थ- पद्दष्टितः संगोपाय च तत्कृतोपद्रवतः, तथा सबड्डहिय' सर्पय च-स्तन्यपानादि माऽस्य पालस्य दिमुपनय ! ततः खलु एप दारकः उन्मुक्तवालमावः तब च मम च पद्मावत्याश्च 'आहारे' आधार आधारस्वरूपो भविष्यति ' तिकटु' इतिकृत्त्वा च ण दारए कणगरहस्स पुत्ते पउमावई अत्तए, त णं तुम दारगं कणगरहस्स रहस्सियं चेच अणुपुव्वेण सारक्खाहिं य संगोवाहि य स- वड्डेहि य) लेकर फिर उसे अपने दुपट्टे से ढक लिया और ढककर प्रच्छन्न गुप्तरूप से अतः पुर के पीछे के दरवाजे से बाहर निकल गया। निकल कर जहा अपना घर और पोट्टिला भार्या थी वहा गया। वहाँ जाकर उसने पोहिला भार्या से इस प्रकार कहा-देवानुप्रिये । कनक रथ राजा राज्य आदि में इतना अधिक मूच्छित हो रहा है कि वह उत्पन्न हुए अपने पालकों को अग विच्छेद कर मार डालता है। यह जो मेरे में है वह कनक स्य राजा का पुत्र है यह पद्मावती देवी की कुक्षि से उत्पन्न हुआ है। इसलिये हे देवाणुप्रिये ! तुम इस पुत्र को कनक रय को खबर न पड़े इस तरह प्रच्छन्न रूप से क्रमशः रक्षित करती रहो-पालती रहो उसकी दृष्टि से बचाती रहो और स्तन्यपान आदि से बढाती रहो। (तएणं एस द्वारए उम्मुकपालभावे तव य त णं तुम देवाणुपिया ! इम दारगं कणगरहस्स रहस्मिय चेव अणुपुव्वेण सार- क्खाहिं य सगोवाहि य संवदेहिय) લઇને તેણે પ્રેસમાં ઢાકી દીધુ, અને ઢાકીને છુપી રીતે રણવાસના પાછલા બારણેથી બહાર નીકળી ગયે બહાર નીકળીને જ્યા પિતાનું ઘર અને દિલા ભાર્થી હતી ત્યાં ગયે ત્યાં પહોંચીને તેણે પદિલા ભાર્યાને એમ કહ્યું કે હે દેવાનુપ્રિયે ! રાજા કનકરથ રાજ્ય વગેરેની બાબતમાં એટલે બધે આસક્ત થઈ ગયે છે કે તે જન્મ પામેલા પિતાના બાળકોના અને કપાવીને મારી નાખે છે મારા હાથમાં જે બાળક છે તે પણ કનરથ રાજાને જ પુત્ર છે પદ્માવતી "દેવીના ગર્ભમાંથી આને જન્મ થયે છે એથી હે દેવાનુપ્રિય ! કનકરથ રાજાને જાણ થાય નહિ તે પ્રમાણે તમે છુપી રીતે આ પુત્રનું રક્ષણ કરતા રહે, છેષણ કરતા રહે, રાજાની કુદણિથી એને દૂર રાખતા રહે અને સ્તન્ય પાન એટલે કે દૂધ વગેરે પીવડાવીને એને માટો કરે भाताधर्मकथा इत्युक्त्या पोटिलायाः पार्थे ' गिरिसर निक्षिपतिस्थापयति, तथा पोटि लायाः पार्थात् वा 'पिणिहायमायण' विनियातमापनात दारिता गृहाति, गहीत्वा उत्तरीयेण पिदधाति, पिघाय भन्नः पुरस्य अपद्वारेण अनुमपिशति, मनु प्रविश्य यौर पद्मावती देवी तर उपागति, उपागत्य पात्याः देव्याः पार्क स्थापयति, स्थापयित्वा तापत् 'पदिगिग्गा प्रतिनिर्गत: प्रतिनिधी सया मम य पउमावईए य आहारे भविस्सात्ति फट्ट पोहिलाए पासे णि क्खिवड, मिक्खिवित्ता पोहिलाओ पासाओ चिनियमावन्नियं दारिय गेण्हइ, गेमिहत्ता उत्तरिज्जेणं पिहेद पिरिता, अंतेउग्स्स अवधारण अणुप्पविसइ) इस तरह क्रमश. पृद्धिंगत होता हुआ यह पालक जप बाल्यावस्था से रहित हो जावेगा तो हमारा तुम्हारा और पद्मावती देवी का आधार होगा, ऐसा कहकर उस तेतलिपुत्र अमात्य ने उस पुत्र को पोटिला के पास रख दिया। और पोटिला के पाम से मरी हुई कन्या को उठा लिया-उठाकर उसे अपने उत्तरियन से ढक लिया, ढंक कर फिर अतः पुर के पिछले दरवाजे से वहा आया (अणुप्परिसित्ता जेणेव पउमावई देवी तेणेव उवागच्छद, उवागच्चित्ता पउमावईए देवीए पासे ठावेइ, ठोवित्ता जाव पडिनिग्गए ) वहा आकर जहां पद्मावती देवी थी पहा पहुँचा, वहाँ पहुँच कर उसने उस मृत कन्या को पद्मावती दवी के (तएण एस दारए उम्सुक्कगलभावे तब य मम य पउमावईए य आहारे भविस्सइ त्ति कटु पोट्टिलाए, पासे णिरिववद, णिक्खिवित्ता पोटिलाओ पासाओ विनिहायमावन्निय दारिय गेण्हइ, गेव्हिचा उत्तरिज्जेगं पिहेत, पिहिचा, अतेउरस्स अवदारेण अणुप्पविसइ) અને આ રીતે અનુક્રમે માટે થતો આ બાળક જયારે બચપણ વટાવીને જુવાન થઇ જશે ત્યારે આ માટે, તમારો અને પાવતી દેવીને આધાર થશે આ પ્રમાણે કહીને તે તેતવિપુત્ર અમાત્યે તે બાળકને પિદિલાની પાસે મૂકી દીધું અને પદિલાની પાસેથી મરી ગયેલી બાળકીને ઉપાડી લીધી પાડીને તેને પિતાના ખેસથી ઢાકી દીધી અને ત્યારપછી તે રણવાસના પાછલા બારણેથી પાવતી દેવીના મહેલમાં ગયે (अणुप्पविसित्ता जेणेष पउमावई देवी तेणेव उवागन्छइ, उद्यागच्उित्ता, पउमावईए देवीए पासे ठावेइ, ठावित्ता जार पडिनिग्गए) ત્યાં જઈને જયા પાર્વતી દેવી હતી ત્યા ગયે અને ત્યાં પહોંચીને તેણે તે મરી ગયેલી બાળકીને પદ્માવતી દેવીના પડખામાં મૂકી દીધી અને ત્યા મહીને તે ત્યાંથી પાછો ફર્યો અને ત્યારપછી તે પોતાને ઘેર આવી ગયો . ममगारधर्मामृतषिणी टी० अ० १४ ते तलिपुत्रप्रधानचरितवर्णनम् गतवान् । 'तएण' तन खलु तस्याः पद्मावत्याः 'अगपडियारियाओ' रङ्गमति- चारिका' दाम्य' पद्मावतीदेवी गिनिधातमापन्ना प्राणरहितां दारिमा च पश्यन्ति, दृष्ट्वा यौव कनारयो राजा, तौर उपागन्छति, उपागत्य रतलपरिगृहीत दर्श- नख शिर आवर्त मस्तकेऽजलिं कृत्वा 'ए' = वक्ष्यमाणरीत्या अवदत्-हे स्वामिन् ! पद्मावतीदेवी 'मदल्लिया' मृता दारिका 'पयाया' प्रजाता-जनित- वती । 'तएग' इति, तन सलु दामीमुग्वान्मृतालिकाज मययगानन्तर फनफरयो राजा तस्या 'मइल्लियाए ' मृतायाः दारिफाग 'नीहरण' निर्हरण' निष्काशन 'करेइ' कगेति, कृत्वा बहूनि लौकिकानि मृतकृत्यानि करोति, कृत्वा 'कालेण' पास रख दिया। और रखकर फिर वह वहा से चल दिया चलकर अपने घर आ गया। (तपण तीसे पउमाचईए अगपरियारियाओ पउ- मावड देवि विणिहायमावन्न दारिच पासति, पासित्ता जेणेव कणगरहे राया तेणेव उवागच्छति, उवागच्छित्तो करयलपरिग्गहिय दसनह सिरसावत्त मत्या अजलिं कटु एव वयासी एव खलु सामी पउमावई देवी मइल्लिय दारिय पयाया) इसके बाद पद्मावती देवी की अगपरि- चारिकाओंने पद्मावती देवी को और मरी हुई उन कन्या को देवा देग्व कर वे सब जहा कनक रथ राजा थे वहां गई-वहा जाकर उन्होंने दो नों हाथों की अजलि बना कर और उसे मस्तक पर घुमाकर-अर्थात् नमस्कार कर इस प्रकार का हे स्वामिन ! पद्मावती देवी ने मृत कन्या को जन्म दिया है। (तरण कणगरहे राया तीसे मइल्लियाए दारियाए नीर- रण करेड,यणि लोहयाइ मयकिच्चाइ करेड करित्ता कालेण विगयसोए जाए) इस प्रकार उन के मुग्व से सुनकर कनक रथ राजाने उस मृत (तएण तीसे पउमाईए अंगपरियारियाओ पउमारइ देवि विणिहायमावन्न दारिय पासंति पासित्ता जेणेव कणगरहे राया तेणे उवागच्छति, उवागनिउत्ता करयलपरिग्गहिय दसनह सिरसावत्त मत्यए अंजलिं कटु एव वयासी-एर खलु सामी पउमावईदेवी महल्लिय दारिय पयाया) ત્યારબાદ પદ્માવતી દેવીની આ ગ–પરિચારિકાઓએ પદ્માવતી દેવી તેમજ તે મરેલી કન્યાને જોઈ જોઈને તેઓ બધી જ્યાં કનકરથ રાજા હતા ત્યા ગઈ અને ત્યાં જઈને તેણે બંને હાથેથી અ જલિ બનાવીને અને તેને મસ્તક ઉપર ફેરવીને આ પ્રમાણે કહ્યું કે હે સ્વામી ! દેવી પાવતાએ મરેલી કન્યાને જન્મ આપે છે (तएण क्णगरहे राया तीसे मइल्लियाए दारियाए नीहरण करेइ, नहूणि रोइयाइ मयकिच्चाइ करेइ करित्ता कालेणं गियसोए जाए) . " মমগা इत्युक्त्वा पोहिलायाः पायें णिकिप' निक्षिपति शापयति, तथा पोहि लायाः पार्थात् ता 'पिणिहायमारण ' चिनियातमापणागती दारिया शाति, गहीत्वा उत्तरीयेण पिदर्धाति, पिधाय भन्नः पुरस्य अपहाण अनुममिति, अनु अविश्य योर पद्मावती देवी तर उपागाति, उपागत्य पनात्या टेव्याः पार्थ स्थापयति, स्थापयित्वा तारन् 'पदिगिमा प्रतिनिर्गतः प्रतिनिवार्य स्वा मम य पउमावईए य आरारे भविस्सउत्ति फट पोहिलाए पासे णि क्खियह, णिक्खिरित्ता पोहिलाओ पासाओपिनियमावनिय दारिय गेण्इ, गेपिदत्ता उत्तरिज्जेण पिहेह पिहिता, अतेरस्स अवहारेण अणुप्पविसइ) इस तरह क्रमशः घृद्धिंगत होता हुआ यह पालक जय बाल्यावस्था से रहित हो जावेगा तो हमारा तुम्हारा और पद्मावती देवी का आधार होगा, ऐसा कहकर उस तेतलिपुत्र अमात्य ने उस पुत्र को पोहिला के पास रख दिया। और पोहिला के पाम से भरी हुई कन्या को उठा लिया-उठाकर उसे अपने उत्तरियवस्त्र से ढक लिया, ढक कर फिर अत. पुर के पिछले दरवाजे से वहा आया (अणुप्परिसित्ता जेणेव पउमावई देवी तेणेव उवागच्छह, उवागत्तिा पउमावई देवीए पासे ठाचेइ, ठोवित्ता जाच पडिनिग्गए) वहा आकर जहा पद्मावती देवी थी घरा पहुंचा, वहां पहुंच कर उसने उस मृत कन्या को पद्मावती दवी के (तरण एस दारए उम्सुक्कपालभावे तव य मम य पउमावईए य आहारे भविस्सइ त्ति कटु पोट्टिलाए, पासेणिक्खिवइ, णिक्सिवित्ता पोहिलामो पासाओ विनिहायमावनिय दारिय गेण्डइ, गेण्हित्ता उत्तरिज्जेग पिहेड, पिहिता, अतेउरस्स अवदारेण अणुप्पविसइ) અને આ રીતે અનુક્રમે મટે થતા આ બાળક જયારે બચપણ વટાવીને "જુવાન થઈ જશે ત્યારે આ માટે, તમારે અને પાવતી દેવીને આધાર થશે આ પ્રમાણે કહીને તે તેતવિપુત્ર અમાત્ય તે બાલકને પિફ્રિલાની પાસે મૂકી દીધું અને પિદિલાની પાસેથી મરી ગયેલી બાળકીને ઉપાડી લીધી ઉપાડીને તેને પોતાના ખેસથી ઢાકી દીધી અને ત્યારપછી તે રણવાસના પાછલા બારણેથી પદ્માવતી દેવીના મહેલમાં ગયા (अणुप्पविसिना जेणे पउमाबई देवी तेणेव उवामन्छइ, उबागरिउत्ता, पउमावईए देवीए पासे ठावेइ, ठावित्ता जाव पडिनिग्गए ) ત્યા જઈને જ્યા પાવતી દેવી હતી ત્યાં ગયે અને ત્યાં પહોંચીને તેણે તે મરી ગયેલી બાળકીને પદ્માવતી દેવીના પડખામાં મૂકી દીધી અને ત્યાં મૂકીને તે ત્યાંથી પાછા ફર્યો અને ત્યારપછી તે પિતાને ઘેર આવી ગયા अनगारधर्मामृतवपिणी टीका १० १४ तेतरि पुनमधानचरितवर्णनम अस्माकमेप दारकः स्नकरयरय राज्ये जात., 'त' तस्मान् भरतु खलु दारको नाम्ना ' नमध्वनः' इति । अनन्वरममौ दारका क्रमेण वृद्धि गन्छन् यावद् ' भोगसमत्ये जाए' भोगममयो जात =तारुण्य प्रात इत्यर्थ ।मु०५ ॥ मूलम्-तएणं ला पोटिला अन्नया कयाई तेतलिपुत्तस्स अणिठ्ठा ५ जाया यावि होत्था,णेच्छड य तेतलिपुत्ते पोहि लाए नाम गोत्तमवि सवणयाए, किपुणदरिसणं वा परि- भोग वा ? | तएण तीस पोटिलाए अन्नया कयाई पुव्वर- त्तावरत्तकालसमयसि इमेयारूचे अज्झस्थिए जाव समुपजि- स्था-एव खल्लु अह तेतलिस्त पुब्धि इट्टा ५ आलि इयाणि अणिट्ठा ५ जाया, नेच्छइ य तेतलिपुत्ते मम नाम जाव परिभोग वा ओहयमणसकप्पं जाव झियायइ । तएण तेत- लिपुत्ते पोहिल ओहयमणसकप्प जाव झियायमाणिं पासइ, पासित्ता एव वयासी-मा णं तुम देवाणुप्पिया । ओहयम- णसंकप्पा जाव झियाहि । तुम च णं मम महाणससि विउल असणपाणखाइमसाइम उवक्खडावेहि,उवक्खडावित्ता वहणं भारी उत्मव किया । तया भोजन आदि द्वारा मित्र ज्ञाति द्वारा प्रमुख जनों का सत्कार सन्मान करके फिर उसने उनके समक्ष इस प्रकार कहा-यह हमारा पुत्र कनक रय राजा के राज्य में उत्पन्न हुआ है-इस लिये यह "कनकध्वज इम नामसे प्रसिद्ध होवे । इस के बाद यह पुत्र क्रमश वृद्धिंगत हुआ यावत्-भोग ममर्थ हो गया-अर्थात् जवान युवा-बन गया । सू०५॥ સુધી ભારે ઉત્સવ ઉજવ્ય તેમજ ભેજન વગેરેથી મિત્ર જ્ઞાતિ વગેરે પ્રમુખ લેકેને સાકાર અને સન્માન કરીને તેણે તેની સમક્ષ આ પ્રમાણે કહ્યું કે આ અમારે પુત્ર રાજા કન-5ના રાજ્યમાં ઉતન્ન થયે છે એથી એ“કનકદ જ નામે પ્રસિદ્ધ થાય ત્યાર પછી તે કનકધ્વજ સમય પસાર થતા ધીમે ધીમે મટે થતા યાવત ગ સ થે થઈ ગયે એટલે કે જુવાન થઈ ગયું છે. સૂત્ર ૫ n सभी कालेन सम ये व्यतीते 'विगय सोप' गितगो-शोरगहनो जाता। तन' लाल स तेतलिपुत्र कौटुम्पिकपुरुषान पादयति, सदायिकता परमादन-'सिपायर' क्षिमा चारगसोहण' पारस्योवन-धन्दीजनमोपण यापमानो मानना पुत्रजन्मोत्सवनिमित्त रान कर्मचारिणां वेतनपादिना सकारमम्मानन्दन कुरुतेः इत्येवरूपामाज्ञां दत्वा सय 'हिपडिय 'यिनिपतिता गुलमर्याटान्तर्गत पुनजन्मनिंदशदिवससाध्यमहोत्सरपी मप्रिया करोति । पुनश्राशनाग्निा मित्र ज्ञातिप्रमुबान सत्कृत्य सम्मान्य त-पुरंत एर पथयति-'जम्दाण' यस्मात्सल कन्या का निर्हरण-उमशान में ले जाना-किया। निरण कर के फिर अनेक लौकिक मृतकृत्य किये। मृत कृत्य कर चुकने के पाद धीरे २ घे विगत शोक हो गये। (तएणसे तेतलिपुत्ते कोचियपुरिसे सहा- घेह, सदायित्ता एव घयासी-सिप्पामेय घारगमोहण जाच ठिइख्यि जम्हाण अम्हें पस दारए कणगरहस्मरने जाए त होउण दार नामेण कणगज्झए जाव भोगसमत्थे जाण) इस के पाद तेतलिपुत्र अमात्यने कोटुम्पिक पुस्पो को धुलाया और युलाकर उनसे इस प्रकार कहा-शोध 'ही तुम लोग चारफ शोधन करो-पन्दीजनों को मुक्त करो यावत् मानो मन का वर्द्धन, और पुत्र जन्मोत्सव के निमित्त को लेकर राज कर्म चोरिय के वेतन की वृद्धि आदि करके उनके सन्मान का वर्द्धन करो- 'इस प्रकार आज्ञा देकर स्वयं उस तेतलिपुत्र अमात्यने अपनी कुल मर्यादा के अनुसार पुत्र का जन्म होने के कारण दश दिवस तक बड़ा આ હેતે તેમના મુખથી આ વાત સાંભળીને કનકથ રાજાએ તે મરેલી "કન્યાને સ્મશાનમાં પહોંચાડી અને ત્યારબાદ તેણે મરણ પછીની ઘણી ક્રિયાઓ પૂરી કરી મરણ ક્રિયાઓને પતાવ્યા પછી રાજા કનકરથ ધીમે ધીમે શોક -રહિત થઈ ગથ तिएणें से तेतलिपुत्ते कोडु वियपुरिसे सद्दावेइ, सदाबित्ता एव वयासी- विप्पामेव चारगमोहण जाव ठिवडिये,जम्हाणं अम्ह एस दारए कमगरहस्स रज्जे जाए त होउणे दारए नामेण क्णगज्झाए जाव भोगसमत्ये जाए) ત્યારબાદ તેતલી પુત્ર અમાસે પિતાના કૌટુંબિક પુરુષને બતાવ્યા અને બેલાવીને તેમને આ પ્રમાણે કહ્યું કે–તમે લેકે સત્વરે ચારક શોધન કરે–એટલે કે જેલખાનામાથી કેદીઓને છોડી મૂકો ચાવતુ માનેન્માનનું વદ્ધન તેમજ પુત્ર જન્મોત્સવ બદલ રાજકર્મચારીઓના પગાર વગેરેની વૃદ્ધિ કરીને તેમના સ માનનું વન કરે આ રીતે ઊંટુબિક પુરુષેને આના આપીને તેતલિપુત્રે તે પિતાની કુલ મર્યાદા મુજબ પુત્ર જન્મ લેવા બદલ દશ દિવસ . . . भनगारधर्मामृतवाणी टी० म०१४ तेतलिपुतप्रधानचरितवर्णनम् तकालसमए' पूर्वरात्रापररात्रकालसमयेरा पश्चिमे भागे 'इमेयारूचे । अय मेतद्रूपा वक्ष्यमाणप्रकारः 'अज्झस्थिए जार' आध्यात्मिको यावत् मनोगत सकल्पः 'समुप्पजित्था' ममुदपद्यत, सरल्पकारमाह-ए। खलु अह 'तेतलिस्म' तेतले तेतलिपुत्रस्यामात्यस्य पूर्वम् इष्टा, कान्ता, प्रिया, मनोज्ञा, मनोऽमा 'आसिआसम् , परन्तु 'इयाणि ' इदानीम् अनिष्टा यावद्-अमनोऽमा जाता। नेच्छति च तेतलिपुनः मम नाम यारत् परिभोग वा मम नाम गोत्रमपि श्रोत नेच्छति किंपुन मम दर्शन मया सह परिभोग गा । इत्यमेपा पोटिला 'ओहय- मणसमप्पा' अपहत्तमनः सकल्पा-अपहतो-दुःखावेगवशाद् रुद्धो, मनः सकल्पो- मानसिको विचरो यस्या सा, 'जावझियायइ ' यावद् ध्यायति यावदातम्यान करोति । ततः खलु तेतलिपुत्र पोट्टिलामपहतमनः सकल्पा 'जाव झियायमाणि' या कयाइ पुन्यावरत्तकालसमयसि इमेयारूवे अजथिए जाव समुप्प- जित्था ) जन पोहिलाने अपनी तरफ तेतलि पुत्र अमात्य की इतनी अधिक उपेक्षा-अनादरता देवी तो एक दिन किसी समय उसे रात्रि के मध्यभाग में इस प्रकार का आयात्मिक यावत मनोगत सकल्प उत्पन्न हुआ-(एव खलु अह तेतलिस्स पुड्वि इट्ठा ५ आसिं, इयाणि अणिट्ठा ५ जाया नेच्छह य तेतलिपुत्ते मम नाम जाव परिभोग वा ओ हयमणसकप्पा जाव झियायइ ) में तेतलि पुत्र अमात्य के लिये पहिले इष्ट, कान्त, प्रिय, मनोज एवं मनोम थी, परन्तु इस समय मे-उन्हे अनिष्ट योवत् अमनोम बन रही हैं। वे तेतलि पुत्र अमोत्य देखने और परिभोग करने की तो यात गौन कहे मेरे नामगोत्र तक को भी सुनना पसद नहीं करते है । इस तरह वह अपहतमनसकल्प होकर पावत् अत्यत्थिए जाव समुप्पजित्था) જ્યારે અમાત્ય તેતલિપુત્રને પિટિટલા એ પોતાના પ્રત્યે આટલી બધી ઉપેક્ષા અને અનાદરતા જોઈ ત્યારે કે ઈ વખતે એક દિવસ રાત્રિના ગમાં તેના મનમાં આ જાતને આધ્યાત્મિક કાવત્ મને ગત સ૮૫ ઉત્પન્ન થા કે (एव खलु अह तेतलिस्स पुब्धि हा ५ आमि इयाणि अणिट्ठा ५ जाया नेच्छइ य तेतलिपुत्ते मम नाम जाम झियायड ) પહેલા હુ તેતલિપુત્ર અમાત્યને માટે છે, કાત, પ્રિય, મને અને મનેમ હતી પણ હમણા હુ તેમના માટેઅનિષ્ટ યાવત અમનેમ થઈ પડી છુ તેતલિ પુત્ર અમાત્ય જ્યારે મારુ નામ ગેત્ર સુદ્ધા સાભળવુ ઈચ્છતા નથી ત્યારે મારી સામે જોવાની અને મારી સાથે પરિભેગની તો વાત જ શી કરવી? આ રીતે તે પરિવા અપહત મન સક૫ થઈને યાવત આન બાન કરતી બેઠી હતી દયભા ३४ मानाकया समणमाहण जाव वणीमगाणं देयमाणो य दवावमाणी य विहराहि।तएण सा पोट्टिला तेतलिपुत्तेणं एवं वुत्तासमाणा हट्ठतुट्ठा तेयलिपुत्तस्त एयगट्ट पडिमुणित्ता, क्ल्लाकल्लि महाणससि विपूल असण जाब दवावेमाणी विहरइ ।।सू०६॥ टीका-'तएण' इत्यादि । तनः गल म पोहिला अयदा कदाविद केनापि कारणेन तेतलिपुत्रस्य अनिश, अफान्ता, अमिया, अमनोका. अमनोऽमा जाता चाप्यऽभवत् । नेच्छिन्ति च तेतलिपुनः पाहिलाया नाम गोनमपि 'सवण याए' श्रवणतायै श्रूयतेऽनेनेति श्रवगं कर्म, तस्य कर्म प्रणवा तस्य, अषण विषयोकर्तुम् इत्यर्थ किं पुन तस्या ' दरिसग या दर्शन पा तया महपरिमोग वा, वाञ्छेत् , अपितु न । तत खलु तस्याः पोहिलाया जन्यदा कदाचित पुन्चरत्नावर तण्ण सा पोटिला इत्यादि । टीकार्थ-(तएण) इसके बाद (सा पोहिला) वर प्रधानकी स्त्री पोहिला (अन्नया कयाइ) किसी समय-कोई निमित्त को लेकर-किसी भी कारण से-(तेतलिपुत्तस्स अणिट्ठा जाया यावि होत्या) तेतलिपुत्र के लिये अनिष्ट, अकान्त, अप्रिय, अमनोज्ञ एव अमनोम पन गई । (णे च्छह तेतलिपुत्त पोहिलाए नाम गोत्तमवि सवयाए किं पुणदरिसण वा परिभोग वा ) इस प्रकार वह तेतलिपुत्र उस पोटिला के नाम गोत्र तक को भी सुननो पसद नहीं करता तो फिर उसके देग्वने और परि. भोग पास जाने की तो बात ही क्या है। (तएण तीसे पोटिलाए अब तएण सा पोट्टिला इत्यादि ॥ टी--(तएण) त्या२ ५छी (सा पाहिला) ते समात्यनी पत्नी पाहिली (अ अया कयाइ ) 3 मते गमेत पारणे (तेतलिपुत्तस्स अणिट्ठा ५ जाया यावि होत्था) तेतलि पुनने भाटे मनिष्ट, मन्त, अप्रिय आमना भने અમનેમ થઈ પડી (णेच्छद तेतलिपुत्ते पोट्टिलाए नाम गोत्तमवि सपणयाए कि पुगदरिसण वा परिभोग वा ) એથી તેતલિપુત્ર અમાત્યને તેનું નામ ગલ સુદ્ધા સાભળવું પણ પસંદ પતું ન હતું ત્યારે તેને જોવાની અને તેની પાસે જવાની તે વાત જ શી ? (तएण तीसे पोहिलाए अनया कयाड पुब्यावरत्तकालममयसि इमेयारूवे ७ भनेगारधर्मामृतवपिणी टी० अ०१४ तेतलिपुत्रपघानचरितवर्णनम् सोडिला तेतलिपुत्रेण 'ए' पूर्वोक्तमकारेण उक्ता सती हएतुष्टा तेतलिपुत्रस्य एयमट्ठ' एतमर्थम् अन्नदानरूपमभिमाय पडिसुमइ' प्रतिशृणोति स्वीकरोति, डिमुणिता' प्रतिश्रुत्य-लोकृत्य, 'कलाकलि ' कल्याल्यि प्रतिदिनम् , महा- नसे विपुलम् ' असण जाव' अशन यावत् अशनपानखाद्यस्वाद्य चतुर्विधमाहार मुपस्कार्य ददती च 'दवावेमाणी' दापयन्ती च विहरति ॥ ६ ॥ मूलम्-तेणं कालेण तेणं समएणं सुव्वयाओ नामं अजाओ ईरियासमियाओजाव गुत्तवभयारिणीओ बहुस्सुयाओ बहुपरि- वाराओ पुव्वाणुपुब्बि०चरमाणागामाणुगाम दुइज्जमाणाजेणामेव तेतलिपुरे जयरे तेणेव उवागच्छति, उवागच्छित्ता, अहापडिं- रूवं उग्गहं उम्गिण्हति, उग्गिण्हित्ता, सजमेणं तवसा अप्पाणं भावेमाणिओ विहरति । तएणतासि सुव्वयाणं अजाण एगे संघा- डए पढमाए पोरिसीए सज्झाय करेइ जाव अडमाणे तेतलिस्स गिह अणुपविटे। तएणसा पोट्टिलाताओअज्जाओ एजमाणीओ पासइ,पासित्ता, हट्टतुट्टा आसणाओ अब्भुट्टेड, अव्भुट्टित्ता, वदइ, णमसइ,वदित्ता णमसित्ता,विउल असण जाव पडिलाभेइ, पडि- लाभित्ता,एव वयासी-एवं खल्लु अहं अज्जाओ तेतलिपुत्तस्स पुत्वं से दिलवाओ। इस तरह तेतलिपुत्र अमात्यने जब उस पोट्टिला से कहा-तो वह बहुत अधिक प्रसन्न एव सतुष्ट हुई। और उमने तेतलि. पुत्रकी इस यातको मान लिया। मान करके वह प्रतिदिन भोजन शाला में चारो प्रकार का आहार वनवा कर उसे श्रमण, मारण आदि जनोंके लिये स्वय देने लगी और दूसरों से दिल्याने लगी ॥ सू० ६ ॥ યાત યાચકોને પોતે આપે અને બીજાઓને હુકમ કરીને અપાવે તેતલિ પુત્ર અમાત્યે જ્યારે આ પ્રમાણે પિફ્રિલાને કહ્યું ત્યારે તે ખૂબ જ પ્રસન્ન તેમજ સતુષ્ટ થઈ ગઈ અને તેણે તેતલિપુત્રની આ વાત સ્વીકારી લીધી અને તે દરરોજ ભેજન શાળામાં ચારે જાતના આહાર બનાવડાવીને શ્રમણ બ્રાહ્મણ વગેરે ને પોતે આહાર આપવાલાગી અને બીજાઓ દ્વારા અપાવવા લાગી સૂદ , . - - - - are यावद् न्यायन्तीम् यारदातम्यान तो पश्यनि, ना समपदन्-मा खडत हे देवानुप्रिये ! अपहनमनः सम्रपा 'जार झियादि ' यापद यागम्यादातम्यान माकुरु । हे देवि च खलु मम 'महागामि ' महानसे भोजनशालापान विपुलम् ' असण जार' अशन यार=मशनपान सादिम सादिम चतुर्विधमाहारम् उवखडावेहि ' उपस्कारय, ' उपरखडापिता' उपकार्य ' महण समण मारण जाव वणीमगाणं ' बहुभ्य अमणनामग यावद् पनीपकेभ्य भ्याकेभ्यः, स्वयं देयमाणी' ददती च, अन्यैः ‘दवारेमागी' दापन्ती च निर। तत' वलु सा आर्तध्यान कर रही थी-(तरण तेतलिपुत्त पोहिल ओयमणसंकप्प जाव शियायमाणि पासह, पासित्ता वयासी माण तुम देवाणुप्पिया ओहयमणसकप्पा जाव मियाहि, तुम च ण मम महाणससि विउल असणपाण खाहम साइम उवरसडाचेहि, उचस्पटावित्ता यहण सम. ण मारण जाच वणीपगाण देयमाणी य दयावेमाणी य विराहि, तणं सा पोट्टिला तेतलीपुत्तेण एव वुत्ता समाणा रद्ध तुट्टा तेयलिपुत्सास एयमह पडिस्तुणेइ, पडिसुणित्ता कल्लाकल्लि महाणससि विपुल असण जाव दवावेमाणी विहरड) इतने मे तेतलिपुत्र ने उस अपहतमनः सकल्प होकर आर्तध्यान करती हुइ पोटिला को देग्वा-तो देखकर उसने उससे कहा-हे देवानुप्रिये तुम अपहतमन सकल्प होकर आतभ्यान मत करो-तुम तो मेरी भोजनशाला में विपुलमात्रा में अशन, पान, खादिम एच स्वादिम इस तरह चतुर्विध अहार बनवाओ धनवाकर उसे अनेक श्रमण ब्राह्मण यावत् याचकजनों के लिये स्वय दो और दूसरों (तएण तेतलिपुत्त पोटिल ओहयमणसमप्प जाव झियायमाणिं पासइ पासित्ता एव वयावी माण तुमे देवाणुपिया ओहयमणसमप्पा जाब झियाहि, तुम चण मम महागससि पिउल अमणपाण खाइम साइम उपखडावेहि, उबक्खडावित्ता बहूण समणमाहण जाव वर्णीपगाण देयमाणी य दवावेमाणी य विहराहि तएण सा पोटिला तेतलिपुत्तेण एव वुत्ता समाणा हद्वतुद्वा तेयतिपुनस्स एयमट्ठ पडिसुणेइ, 'पडिमुणित्ता कल्लाकाल्लि महागससि विपुल असण जान दवावेमाणी विहरइ) આટલામા અપહતમન સક૫ થઈને આર્તધ્યાન કરતી તે પહિલાને અમાત્ય તેતલિપુએ જોઈ અને જોઈને તેને આ પ્રમાણે કહ્યું કે-હે દેવાનુપ્રિયે! તમે અપહતમનસ ૫ થઈને આર્તદાન કરો નહિ-તમે મારી ભેજન શાળામાં જઈને પુષ્કળ પ્રમાણમા અશન, પાન, ખાદિમ અને સ્વાદિમ આમ ચાર જાતના આહાર બનાવડા અને બનાવડાવીને તેને ઘણુ ન ७ - - भनेगारधर्मामृतषिणी टी० अ०४ तेतलिपुत्रप्रधानचरितवर्णनम् पोट्टिला तेतलिपुत्रेण एव ' पूर्वोक्तमकारेण उक्ता सती हृष्टतुष्टा तेतलिपुत्रस्य 'एयमह ' एतमर्थम् अन्नदानरूपमभिप्राय 'पडिसुमई' प्रतिश्रृणोति-पीकरोति, पडि सृणित्ता' प्रतिश्रुत्य वोकृत्य, 'कलाकलिं' कल्याल्पिप्रतिदिनम् , महा- नसे विपुलम् । असण जाव' अशन यार अशनपानवावस्थाद्य चतुर्विधमाहार मुपस्कार्य ददती च 'दयावेमाणी ' दापयन्ती च विहरति ॥ ६ ॥ मूलम्-तेण कालेणं तेणं समएणं सुव्वयाओ नाम अजाओ ईरियासमियाओजाब गुत्तवभयारिणीओ पहुस्सुयाओ बहुपरि- वाराओ पुवाणुपुब्बि०चरमाणागामाणुगाम दुइज्जमाणाजेणामेव तेतलिपुरे पयरे तेणेव उवागच्छति, उवागच्छित्ता, अहापडि- रूव उग्गहं उग्गिण्हंति, उग्गिण्हित्ता, संजमेणं तवसा अप्पाणं भावेमाणिो विहरति । तएणतासिं सुव्वयाणं अजाण एगेसघा- डए पढमाए पोरिसीए सज्झाय करेइ जाव अडमाणे तेतलिस्स गिहं अणुपवितु। तएणसा पोट्टिलाताओअज्जाओ एजमाणीओ पासइ,पासित्ता, हट्टतुट्टा आसणाओ अब्भुटेड, अब्भुट्टित्ता, वदइ, णमसइ,वदित्ता णमसित्ता,विउलं असण जाव पडिलाभेइ, पडि- लाभित्ता,एव वयासी-एवं खलु अहं अज्जाओ तेतलिपुत्तस्स पुत्वं से दिलवाओ । इस तरह तेतलिपुत्र अमात्यने जय उम पोट्टिला से कहा-तो वह बहुत अधिक प्रसन्न एव सतुष्ट हुई । और उमने तेतलि- पुत्रकी इस यातको मान लिया। मान करके वह प्रतिदिन भोजन शाला में चारो प्रकार का आहार घनवा कर उसे श्रमण, माण आदि जनोंके लिये स्वय देने लगी और दूसरों से दिलवाने लगी ॥ सू० ६ ॥ થાવત્ યાચકને પોતે આપો અને બીજાઓને હુકમ કરીને અપાવે તેલિ પુત્ર અમાત્યે જ્યારે આ પ્રમાણે પિફ્રિલાને કહ્યું ત્યારે તે ખૂબ જ પ્રસન્ન તેમજ સતુષ્ટ થઈ ગઈ અને તેણે તેતલિપુત્રની આ વાત સ્વીકારી લીધી અને તે દરરોજ ભોજન શાળામાં ચારે જાતના આહારે બનાવડાવીને શ્રમણ બ્રાહ્મણ આહાર આપવાલાગી અને બીજાઓ દ્વારા અપાવવા લાગી સૂદ fe बाताममेकपा इटा ५ आसि, इयाणि अणिटा५ जान दसण वा परिभोगं वा, तं तुम्भेणं अजाओ सिक्खियाओं बहुनायाओ बहुपढियाओ बहूणि गामागर जाव आहिडह वहूर्ण राईसर जाव गिहाइ अणुपविसह, त अस्थि आइ भे अजाओ । केह कहिंचि चुन्न जोए वा मंतजोए वा कम्मणजोए वा हिय उडावणे वा काउ दुवणे वा आभिओगिए वा वसीकरणे वा कोउयकम्मे वा भूइकम्मे वा मूले कदे छल्ली वल्ली, सिलिया वा गुलिया वा ओसहे वा भेसज्जे वा उवलद्धपुब्ने वा जेणाह तेतलिपुत्तस्त पुणरवि इट्टा ५ भवेज्जामि । तएणं ताओ अज्जाओ पोदिलाए एव वुत्ताओ समाणीओ दो वि हत्थे कन्ने ठति ठवित्ता, पोटिल एव वयासी-अम्हे ण देवाणुप्पिया । समणीओ निग्गं- थिओ जाव गुत्तवभयारिणीओ, नो खलु कप्पइ अम्ह एयप्प- यारं कन्नेहि वि णिसामेत्तए, किमग पुण उवदिसित्तए वा आयरित्तए वा ? अम्हेणं तव देवाणुप्पिया । विचित्त केवलि- पन्नत्त धम्म पडिकहिज्जामो। तएण सा पोटिला ताओ अजाओ एव वयासो-इच्छामि णं अज्जाओ। तुम्ह अतिए केवलिपन्नत्त धम्म निसामेत्तए, तएण ताओ अजाओ पोहिलाए विचित्त धम्म परिकहति । तपण सा पोटिला धम्म सोच्चा निसम्म हट्टतुट्ठा एव वयासी सदहामि णं अज्जाओ | णिग्गंथ पावयण जाव से जहिय तुम्भे वयह, इच्छामि ण अह तुभ अतिए पचाणुव्वइय जाव गिहिधम्म पाडवाजत्तए, तएण M - - मनगारधर्मामृतपिणी टी०१० १४ तेतलिपुत्रप्रधानचरितवर्णनम् ता पोहिला तासि अज्जाण अतिए पचाणुव्वइय जाब गिहि- धम्म पडिवज्जड, ताओ अज्जाओ बंदइ णमसइ, वदित्ता . मंसित्ता पडिविसज्जेड । तएणं सा पोटिला समणोवासिया जाया जाव पडिलाभमाणी विहरह ॥ सू० ७ ॥ टीका--'तेण कालेणं' इत्यादि । तस्मिन् काले तस्मिन् समये सुनतानाम आर्या ईर्यासमिता यावद् गुप्तब्रह्मचारिण्यो बहुश्रुता नहुपरिवाराः 'पुत्राणुन्छि' पूर्वानुपूर्ध्या तीर्थङ्करपरम्परया विचरन्त्य 'जेगामेव' यीब तेतलिपुर नगर तौगो. पागच्छति, उपागत्य 'अहापडिरूव' यथामतिस्पम् यथाकल्पम् 'उगह ' अवग्रहम् चमत्यर्थमाज्ञाम् ' उग्गिण्डति ' अपगृहन्ति याचन्ते, अपगृह्य 'सजमेण' सयमेन सप्तदशपियन, ' तवसा' तपसा द्वादशविधेन आत्मान भावयन्त्यो तेण कालेण तेण समएण' इत्यादि । टीकार्थ-(तेणं कालेण तेण समएण) उस काल और उस समयमें (सुब्वयाओ नाम अज्जाओ ईरिया समियाओ जाव गुत्तवभयारिणीओ यजुस्याओ बहुपरिवाराओ पुव्वाणुपुब्बि०जेणामेव तेयलिपुरेणयरेतेणेव उवागच्छद) सुनता नामकी आर्या तीर्थ कर परपरा के अनुसार विहार हुह उस तेतलिपुर नगर में आई। ये ईर्यासमिति आदि पाच समितियों की पालक थी-गुप्त ब्रह्मचारिणी थीं। बहुश्रुत थी। अनेक परिवार से युक्त थीं । ( उचागच्छित्तो अहा पडिरूव उग्गह उग्गिति, अग्गिदित्ता सजमेण तवसो अप्पाण भावेमाणीओ विहरति तण्णं - करती ते कालेण तेणं समए इत्यादि । टा--(वेण कालेण वेण समए) तणे भने ते सभये (मुव्ययायो नाम अज्जाओ ईरिया समियाओ जाव गुत्ताभयारिणीभी बहुस्सु याओ बहुपरिवाराओ पुव्वाणुपुषि० जेणामेव तेतलिपुरे गयरे तेणेव उवागच्छइ) સુનતા નામની આ તીર્થકર પર પરા મુજબ વિહાર કરતી તેતલિપુર નજરમાં આવી તે ઈસમિતિ વગેરે ૫ (પાંચ) સમિતિઓનું પાલન કરનારી હતી તેમજ ગુણ બ્રહ્મચારિણે હતી તે બહુશ્રત તેમજ ઘણા પરિવારે થી વી ટળાયેલી હતી (उजागच्छित्ता अहापडिरूव उग्गह उग्गिाहति, उग्गिदित्ता मजमेणं तवमा fee जाताधर्मका इट्टा ५ आसि, इयाणि अणिट्टा५ जार दसण वा परिभोगं वा, तं तुभेणं अज्जाओ सिक्खियाओ बहुनायाओ बहुपीढयाओ बहूणि गामागर जाव आहिडह वहणं राईसर जाव गिहाइ अणुपविसह, त अस्थि आइ भे अजाओ। केह कहिचि चुन्न. जोए वा मतजोए वा कम्मणजोए वा हिय उहावणे वा काउ डवणे वा आभिओगिए वा वसीकरणे वा कोउयकम्मे वा भूइकम्मे वा मूले कदे छल्ली वल्ली, सिलिया वा गुलिया वा ओसहे वा भेसज्जे वा उवलद्धपुव्वे वा जेणाह तेतलिपुत्तस्स पुणरवि इट्टा ५ भवेज्जामि । तएणं ताओ अज्जाओ पोटिलाए एव वुत्ताओ समाणीओ दो वि हत्थे कन्ने ठति ठवित्ता, पोटिल एव वयासी-अम्हे ण देवाणुप्पिया। समणीओ निग्ग- थिओ जाव गुत्तबभयारिणीओ, नो खलु कप्पइ अम्ह एयप्प- यार कन्नेहि वि णिसामेत्तए, किमग पुण उवदिसित्तए वा आयरित्तए वा ? अम्हेणं तव देवाणुप्पिया । विचित्त केवलि- पन्नत्त धम्म पडिकहिज्जामो। तएण सा पोटिला ताओ अजाओ एव वयासो-इच्छामि णं अज्जाओ। तुम्ह अतिए केवलिपन्नत धम्म निसामेत्तए, तएणं ताओ अजाओ पोहिलाए विचित्त धम्म परिकहति । तएण सा पोहिला धम्म सोच्चा निसम्म हट्टतुट्ठा एव वयासो सरहामि णं अज्जाओ । णिग्गंथ पावयण जाव से जहिय तुम्भे वयह, इच्छामि ण अह तुब्भ अतिए पचाणुब्वइय जाव गिहिधम्म पडिवाजत्तए, तएण। 1 1 . मगारधामृतपरिणी टी० भ० ४ तेतरिपुषमघामचरितवर्णम नमस्यति, वन्दित्वा नमस्यित्वा, विपुलमशनपानखायाधरूपं चतुर्विधमाहार 'पडिलाभेइ ' प्रतिगम्भयविन्ददाति, मतिलम्म्य, एवमपदव-एप खलु अहं हे आर्याः ! तेतलिपुत्रस्य पूर्वमिष्टा, कान्ता, प्रिया, मनोज्ञा, मनोऽमा, आसम् , परन्तु 'इयाणि इदानीम् ' अणिहार जाव दंसणं परिभोर्ग वा' अनिष्टा५ यावत् दर्शन परिमोग वा साम्मत तेतलिपुत्रस्याऽहमनिष्टाअकान्ता, अमिया, अमनोज्ञा, अमनोऽमा जाता, तस्मादेप तेतलिपुत्रो मम नामगोत्रमपि श्रोतु नेच्छति, कि पुनई आर्याः ! स मम दर्शन मया सह परिभोग या कथ वाञ्छेद ? | 'त तुम्भेण मुष्टेइ ) देखकर वर पटुत अधिक प्रमन्न हुई, और अपने स्थान से उठी (अम्भुट्टित्ता वदह णमसइ, पदित्ता, णमसित्ता विउल अमण जाव पडिलाभित्ता एव चयासी) उठकर उसने उसको घदना की-नमस्कार किया । वन्दना नमस्कार करके फिर उसने उन्हें विपुल मात्रा में अशन पान आदि चतुर्विध आहार दिया और दे कर वह इस प्रकार करने लगी-(एव खल अह अज्जाओ । तेतलिपुत्तरस पुच्च इहा५ आसि, इयाणि अणिट्ठा ५ जाव दसर्ण चा परिभोग घा-स तुम्भेणं अज्जाओ सिक्खियाओ यदुनायाओ घटुपढियाओ यहणि गामागार जाव अहिं- दुइ, थपूर्ण राईसर जा गिहाइ अणुपविसह) हे आर्याओ। पहिले में तेतलिपुत्र अमात्य के लिये बहुत ही इष्ट, कान्त, प्रिय, मनोज एव मनोम थी परन्तु अब इस समय में उनके लिये अनिष्ट, अकान्त, अप्रिय, अमनोज एव अमनोम धन रही हैं। वे मेरा नाम गोत्र तक 'भी सुनना पसद नहीं करते है तो फिर मेरे साथ परिभोग करने की (अभुट्टिना बदह णमसइ, वदित्ता, णमसित्ता विउल असण जार पडिलाइ 'पडिलाभित्ता एव पयासी) ઊભી થઈને તેણે તેમને નમન કર્યા વદન અને નમન કરીને તેણે તેમને પુષ્કળ પ્રમાણમાં અસન, પાન વગેરે ચાર જાતના આહાર આપ્યા અને આપીને તે આ પ્રમાણે કહેવા લાગી કે (पव खलु अह अज्जाओ । तेतलिपुत्तस्स पुब्ध इट्टा ५ आसि, इयाणि ५ दसण पा पम्भिोग वा त तुम्भेण अज्जाओ सिक्खियाओ बहुनायाओ बहुपढि- पायो जणि गामागर जाव अहिंडइ, वहण राईसर जाव गिहाइ अणुपविसई) હે આઓ! હુ પહેલા તેતલિપુત્ર અમાત્યના માટે ખૂબ જ ઈદ, કાત, પ્રિલ, મનજ્ઞ અને મનેમ હતી પણ હવે હું તેમના માટે અનિષ્ટ, અકાત, અપ્રિય, અમને અને અમનેમ થઈ પડી છુ તેઓ મારા નામ નેત્ર સુદ્ધા સાભળવા ઈચ્છતા નથી ત્યારે મારી સામે પરિભેગ કરવાની અને મને જવાની - ४० , जाताधर्मपाल विहरन्ति । तत खलु तासा मुनतानामाांगामेका सघाटका प्रथमाया पौरुष्याम् स्वाध्याय नमूल्पठनरूप रोति, 'जार अडमाणे ' याबदटन्त्याः, याव ज्दाद 'द्वितीयस्यां पौरच्या मृत्रार्थचिन्तनरूप ध्यान करोति, उतीयस्था पौरुष्या सुव्रतामामान्य उच्चनी रमव्यमकुलेषु गृहमामुदानिकमिक्षार्थमटन इत्ययों वोध्या, तेतले हमनुमविष्टः । तत खलु सा पोटिला ताः सबाटसम्याः आर्या एजमानाः पश्यति, दृष्ट्वा, हृष्टतृष्टा आसनात् अभ्युत्तिष्ठति, अभ्युत्थाय पन्दते तासि सुनायाण अजजाणं रागे सपाइप पढमारा पोरिमी सज्झायरेड, जाव अउमाणे तेतलिस गिरं अणुपवि) वहा आ कर उन्होंने यधाकल्प ठहरने की आज्ञा मागी-मांगकर फिर वे १७ सतरर प्रकारके सयमऔर १२ बारह प्रकार के तपसे अपने आपको वामित करती हुई ठहर गई। इन सुबता आर्या का एक सघाटक था जो प्रथम पौरुपी में स्वाध्याय करता-द्वितीय पौरपीमें सूत्रार्थका चिन्तनरूप ध्यान करता और तृतीय पौरुषी में सुव्रता आर्या की आज्ञासे ऊँच नीच एव मध्यम कुलोंमें भिक्षा के लिये अटन करता । इस तरह वह सघाटक (सघाडा)तृतीय पौधीमें इन उच्चादि घरों मे भिक्षार्य अटन करता हुआ तेतलिपुत्र अमात्य के घर पर आया (तएणं सा पोट्टिला ताओ अज्जाओ एज्जमाणीओ पा सह) इतने में उस पोटिलाने उन सघाटरस्थ आर्याओ को ज्यों ही 'अपने घर पर आया हुआ देखा तो (पासित्ता हतुहा आसणाओ अ अप्पाण भावेमाणीओ विहरति तएण वासिं सुबायाण अजाण एगेसघाडए पढमाए पोरिसीए सज्झाय करेइ जाव अडमाणे तेतलिस्स गिह अणुपनिटे) ત્યાં આવીને તેમણે યથાકલ્પ (સાધુકા પ્રમાણે) રહેવાની આજ્ઞા માગી અને ત્યારપછી તે ૧૭ જાતના સ યમ અને ૧૨- જાતના તપ વડે પિતા ની જાતને વાસિત કરતા તે ત્યાં રોકાઈ સુનતા આર્યાને એક સ ઘાટક હને જે પ્રથમ પરૂવીમા સ્વાધ્યાય તે હેત, દ્વિતીય પૌરૂષીમાં સૂત્રાર્થનું ચિતન રૂપ ધ્યાન કરો અને તૃતીય પરૂષીમાં સુનતા આર્યાની આજ્ઞા મેળવીને ઊંચા, નીચા અને મધ્યમ કુળમાં ગેચરી માટે જતા હતા આ પ્રમાણે તે સ ઘાટક તૃતીય પૌરૂપમાં ઉપરોક્ત Cચા વગેરે કુળના ઘરમાં ગોચરી માટે ફરતા ફરતા ततविधुन अमात्यने त्या मान्यो (तएण सा पोटिला ताओ अनाओ एज्ज माणीमो पासइ) पहिला पारे सघाट २५ भायमान पानाने २ आया न त्यारे ते (पासित्ता हट्ठ तुट्ठा आसणाओ अभुठेह) न त म । પ્રસન્ન થઈ અને પિતાને આસનથી ઊભી થઈ --- ।
- मगारधामृतधावणी टी० म० ४ तेरिपुमधामचरितवर्णनम नमस्यति, वन्दित्वा नमस्थित्वा, विपुलमशनपानखाद्यस्वाधरूप चतुर्विधमाहार पडिलाइ ' प्रतिलम्भयविन्ददाति, प्रतिलमम्य, एवमरद-एप ग्वलु अह हे आर्याः ! तेतलिपुत्रस्य पूर्वमिष्टा, कान्ता, प्रिया, मनोज्ञा, मनोऽमा, आसम् , परन्तु 'इयाणि' इदानीम् ' अणिहार जाव दसणं परिभोग वा' अनिष्टा५ यात् दर्शन परिभोग वा-साम्मत तेतलिपुत्रस्याऽहमनिष्टाअकान्ता, अमिया, अमनोज्ञा, अमनोऽमा जाता, तस्मादेप तेतलिपुत्रो मम नामगोत्रमपि श्रोतु नेच्छति, किं पुनई आर्याः । स मम दर्शन मया सह परिभोग या कथ वाञ्छेत् ? । 'त तुम्भेण मुटेइ ) देखकर वह यहुत अधिक प्रमन्न हुई, और अपने स्थान से उठी (अन्मुहिता वदह मंसइ, घदित्ता, णमसित्ता विउल असण जाय पडिलाभित्ता एव चयासी) उठकर उसने उसको घदना की-नमस्कार किया। वन्दना नमस्कार करके फिर उसने उन्हें विपुल मात्रामें अशन पान आदि चतुर्विध आहार दिया और दे कर वह इस प्रकार करने लगी-( एव खल अह अज्जाओ! तेतरि पुत्तरस पुष्व इहा ५ आसि, इयाणि अणिहा ५ जाव दसणं या परिभोग वा-तं तुम्भेण अज्जाओ सिक्खियाओ बहुनायाओ यहपढियाओ पहणि गामागार जाव अहिं- डइ, यहण राईसर जाच गिराह अणुपविसह) हे आर्याओ! पहिले मैं तेतलिपुत्र अमात्य के लिये बहुत ही इष्ट, कान्त, मिय, मनोज एव मनोम थी परन्तु अघ इस समय में उनके लिये अनिष्ट, अकान्त, अप्रिय, अमनोज एव अमनोम धन रही हूँ। वे मेरा नाम गोत्र तक भी सुनना पसद नहीं करते हैं तो फिर मेरे साथ परिभोग करने की (अन्भुट्टित्ता वदह णमसइ वदित्ता, णमसित्ता विउल अमण जार पडिलाभेइ पडिलाभित्ता एव वयासी) ઊભી થઈને તેણે તેમને નમન કર્યા વદન અને નમન કરીને તેણે તેમને પુષ્કળ પ્રમાણમા અાન, પાન વગેરે ચાર જાતના આહાર આપ્યો અને આપીને તે આ પ્રમાણે કહેવા લાગી કે- ( एव खलु अहं अज्जाओ । तेतलिपुत्तस्स पुन इट्टा ५ आसि, इयाणि ५ दसण या पग्भिोग वा त तुभेणं अज्जाओ सिक्खियाओ बहुनायाओ बहुपढि- यामो वणि गामागर जाव अहिंडड, वहूण राईसर जाव गिहाइ अणुपविसई) હિ આઓ' હું પહેલા તેતલિપુત્ર અમાત્યના માટે ખૂબ જ ઈચ્છ, કાત, પ્રિત, મને અને મમ હતી પણ હવે હું તેમના માટે અનિષ્ટ, અકાત, અપ્રિય, અમર અને અમનેમ થઈ પડી છું તેઓ મારા નામ ગોત્ર સુદ્ધા સાભળવા છતા નથી ત્યારે મારી સામે પરિભેગા કરવાની અને મને જોવાની .
- - . HTAषा मज्जायो' इति, तत तस्मात् कारणात् यूयं खास है आर्या ! मिक्खियामो' शिसिता शिक्षा माता, 'बहुणायाभो ' पहुमाया अनेकशास्त्रज्ञाननिपुणा। 'पहपढियाओ'धापठिता' नानाविधविधाकुशलाः स्थः पुनः 'घहणि गामागर आर अडिह' पनि प्रामाकर यायव माहिण्डय-बहुपु ग्रामारनगरादिपु परि भ्रमण कुरुथ । तथा च 'यहण राईसर जाव गिहाइ अशुपषिमइ रहना राजेश्वर यावद् गृहाणि अनुमयिशथ-हे भार्या । यूय घाना राजेश्वर तलपरोष्ठि सेना. पत्यादीना गृहे प्रवेश कुरुथ, 'त' तत्-तस्मात् कारणात् 'अत्यि र मे अज्जाभो। अस्ति भाइ युप्मायमार्या ! 'भाइ' इति वाक्यालड़ारे देशी शन्दः। हे आयोः । अस्ति 'केइ कहिं चि' कोऽपि कुत्रचित-युप्माफ शानविपये 'चुननोए वा' चूर्णयोगो वा-चूर्णाना द्रव्यचूर्णानां योगः, स्तम्भनादिकर्मकारी, 'मतजोए बा' मन्त्रयोगो वा मन्त्राणां योगी व्यापारो वा वशीकरणादि मन्त्रयोग 'कम्मणजोर और देखने की उनकी पात ही क्या कहूँ इस लिये हे आर्याओ। आप सय तो शिक्षित हैं, पहुज्ञाता है-अनेक शास्त्रों के ज्ञानसे निपुण है- बहुपठित हैं-नाना प्रकार की विद्याओं में कुशल हैं-अनेक ग्राम, आकर आदि स्थानों में विहार करती रहती है, अनेक राजेश्वर आदिको के घरो में आती जोती रहती हैं (त अस्थिआइ भे अजाओ) तो हे आर्याओ! ( कहिं चि चुन्नज्जोएवा) की कोई चूर्ण योग-द्रव्य चूर्णा का स्तम्भनादि कर्मकारी योग (मतजोए वो कम्मणजोए वा हिय उड्डात्रणे का, काउड्डाचणे वा आभिओगिए वा बसीकरणे वा, कोउयकम्मे चा, भूहकम्मे चा मूले कदे छल्ली, बल्ली, सिलिया, था, गुलिया वा, ओसहे वा, भेसज्जे वा, उचलद्धपुब्वे वा जेणाह तेतलिपुत्त स्स पुणरवि इट्टा ५ भवेज्जामि) मत्र योग-वशीकरण आदिमत्रों का તે વાત જ કયા રહી? એથી હૈ આઓ તમે સૌ શિક્ષિતા છે, બહુજ્ઞાતા છે એટલે કે ઘણું શાસ્ત્રોના જ્ઞાનથી નિપુણ છે, બહુપડિતા છે–અનેક જાતની વિદ્યાઓમાં કુશળ છે, ઘણું ગામ, આકર રથમાં વિહાર કરતા રહે છે, भने । रामेश्वर वगेरेना भाडेसामा सात ४२॥ २२। छ। ( त अस्थि- आइ भे अजाओ) तो मायाम।। (केइ कहि चिचुन्नज्जोएवा) ગમે તે ચૂર્ણ ગદ્રવ્ય ચૂર્ણને સ્ત ભન વગેરેને ચોગ, (मतजोएवा कम्मणजीए या हिय उड्डावणे वा, काउद्धावणे वा अभि ओगिए वा सोकरणे वा, कोउयक्म्मे वा, भूइकम्मे वा मूले कदे छरली वल्ली सिलिया, वा गुलिया वा, ओसहे बा, मेमज्जे या उबलद्धपुब्वे वा जेणाद तेतलि पुनस्स पुणरवि इट्टा मवेज्जामि) કચાક " . . अनगारधर्मामृतवपिणी टी० अ० ४ तेतलिपुनप्रधानधरितवर्णनम् वा' कार्मणयोगो वा उच्चाटनादिकर्मयोगो वा, 'हिय उड्डावणे वा 'हृदयो- डायन ना-चित्ताकर्षकवस्तुविशेपो वा 'काउड्डायने वा' कायोडायन वा-शरीरा- करुवस्तुविशेषो या 'आभिमोगिए गा' आभियोगिको पापराभवकरणयोगो चा, 'वमोकरणे वा' शीकरण पावशीकरणयोगो वा, कोउयकम्मे वा' कौतुक- धर्म वा मीभाग्यवर्द्धकस्नानादि वा 'भूइफम्मे वा' भूतिकर्म वा मन्त्राभिमन्त्रित- भस्मगलेपण वा तया-औपपीना 'मूले ' मूलम् ‘कदे' कन्दः 'छल्ली ' त्वर 'चल्ली' लता सिलिया वा' शिलिका-तृणविशेषः, 'गुलिया' गुलिका- गुटिका 'मोसहे वा भेसज्जे वा' औषध वा भैपज्य वा, इत्यादिक वस्तुजात युष्माभिः उमलद्धपुत्रवे' उपलब्धपूर्वम्-माप्तपूर्वम् , हे आर्याः भवत्य एपु किमपि उपलब्धपूर्ग अवश्य भवेयु', तत्कृपया मह्यमर्पय, 'जेणाई' येनाहम् , यत्सेवनादह तेतलिपुत्रत्य पुनरपि इप्टा कान्ता मियामनोज्ञामनोऽमा भवेयम् । ततः खलु ता आर्याः पोट्टिलाया एवमुक्ता. सत्यो द्वारपि हस्तौ कणे स्यापयन्ति, स्थापयित्वा योग कामेण योग-उच्चाटन आदि मत्रो का योग हृदयोड्डीयन- चित्ताकर्षक वस्तु विशेप का योग, कायोड्डापन-शरीराकर्षक वस्तु विशेषका योग, आभियोगिक-पराभव करन का योग, वशीकरण- वशीकरण योग, कौतुक कर्म-सौभाग्यवर्द्धक स्नान आदि का योग, भूति कर्म-मत्रादि से अभिमत्रित भस्म के प्रक्षेपण करने रूपयोग तथा औपधियों के मूल, कद त्वक-छाल तथा लता, शिलिका-तृण विशेष गोलो, औषध-भपज्य इत्यादि वस्तुओं का योग आपके देखने में अमर आया शेगा-इस लिये कृपाकर इनमें से कोई न कोई योग आप हम अवश्य-अवश्य प्रदान करे कि जिसमे म-जिम के सेवन से मैं-तेत लिपुत्र को पुनरपि इट, कान्त, प्रिय, मनोज्ञ एव मनोम पन जाऊँ (तएण ताआ अज्जाओ पाहिलाए एक वुत्ताओसमाणाओ दावि हत्थे कन्ने ठवे ति, મત્રોગ-વશીકરણ વગેરે માત્રને વેગ-કામણગ, ઉચ્ચારણ વગેરે મને રોગ, હૃદયેહાવન-ચિત્તાકર્ષક વસ્તુ વિશેષનો ગ, આમિગિક- પરાભવ કરવાની ચેગ, વશીકરણ–વશીકરણ ગ, કૌતુકર્મસૌભાગ્યવર્ધક સ્નાન વગેરેને ગ, ભૂતિ મે–ત્ર ગેરથી અભિમંત્રિત કરીને ભસ્મ રાખેડી ) નું પ્રક્ષેપણ રૂપે વેગ તેમજ ઔષધીઓના મૂડ, કદ, ત્વક (છાલ) તેમજ લતા, રિોલિના–તૃણ વિશેષ ગોળી, ઓષધ, દૈવજન વગેરે વસ્તુઓને રોગ તારા જેવા કસ આબે જ કરો એટલા માટે તમે કૃપા કરીને એમાવા ગમે તે યોગ અને ચોક્કસ આપે કે જેના સેવનથી હું ફરી તેતવિ પતની ઈટ. કાત વિથ મન અને મનેમ થઈ જાઉ ।
- - ताधर्मकार अज्जाश्री' इति, तत-तस्मात् कारणात् यूप सल हे आर्याः ! 'मिक्खियागो' शिक्षिता शिक्षा माता, पहुणायाभो ' पहभाग अनेकशासाननिपुणा। यहपढियाओ' यापठिता' नानाविधविधाकुशलाः स्थः पुनः 'घहणि गामागर जाय अहिंडद' यानि नामाकर यायद आदिण्डय-यापु ग्रामाकरनगरादिषु परि भ्रमण कुरुथ । तथा च 'यहण राईसर जाप गिहाइ अशुपतिमइ रहना राजेपर यावद् गृहाणि अनुमपिशय-हे आर्याः ! गूय बहूना राजेश्वर तलपरश्रेष्ठि सेना- पत्यादीना गृहे प्रवेश कुरुथ, ''तत्-तस्मात् कारणात् 'अत्यि अइ मे अन्नाभो।' अस्ति आइ युप्मायमार्या ! 'थाइ' इति वाक्यालझारे देशी शब्दः। हे आयो! अस्ति 'केइ कहिं चि' कोऽपि कुत्रचिवम्युप्माफ ज्ञानविपये 'घुमजोए वा चूर्णयोगो वा-चूर्णाना द्रव्यचूर्णानां योगः, स्तम्भनादिकर्मकारी, 'मतजीए वा' मन्त्रयोगो वा मन्त्राणां योगो व्यापारो वा वशीकरणादि मन्त्रयोग 'कम्मणजोए और देखने की उनकी बात ही क्या करें इस लिये हे आर्याओ! आप सब तो शिक्षित हैं, पटुज्ञाता हैं-अनेक शास्त्रों के ज्ञानसे निपुण हैं- बहुपठित हैं-नाना प्रकार की विद्याओं में कुशल हैं-अनेक ग्राम, आकर आदि स्थानों में विहार करती रहती है, अनेक राजेश्वर आदिकों के घरों में आती जाती रहती हैं (त अधिआइ भे अजाओ) तो हे आर्याओ। (केइ कहिं चि चुन्नज्जोएवा) की कोई चूर्ण योग-द्रव्य चूर्णो का स्तम्भनादि कर्मकारी योग (मतजोए वो कम्मणजोए था रिय उड्डात्रणे वा, काउड्डावणे वा आभिओगिए वा वसीकरणे वा, कोउयकम्मे घा, भूइकम्मे चा मृले, कदे छल्ली, पल्ली, सिलिया, था, गुलिया वा, ओसहे वा, भेसज्जे वा, उवलद्धपुब्वे वा जेणाह तेतलिपुत्त स्स पुणरवि इट्टा ६ भवेज्जामि ) मत्र योग-वशीकरण आदिमत्रों का તે વાત જ કયા રહી? એથી હે આર્યાએ તમે સૌ શિક્ષિતા છે, બહુઝાતા છે–એટલે કે ઘણુ શાસ્ત્રોના જ્ઞાનથી નિપુણ છે, બહુપડિતા છે--અનેક જાતની વિદ્યાઓમાં કુશળ છે, ઘણું ગામ, આકર રથાનોમાં વિહાર કરતા રહે છે, અને ઘણું રાજેશ્વર વગેરેના મહેલેમા આવજા કરતા રહો છો ( બરિત્ર आइ में अज्जाओ) त मायामा। (केइ कहि चिचुन्नज्जोएवा) ४४ ગમે તે ચૂર્ણ ગ-દ્રવ્ય ચૂર્ણોને સ્તન વગેરેને વેગ, (मतजोएवा कम्मणजोए वा हिय उड्डावणे था, काउड्डावणे ना अभि ओगिए वा वसीकरणे वा, कोउयमम्मे वा, भूइकम्मे वा मूले कदे छल्ली बल्ली सिलिया, वा गुलिया वा, ओसद्दे वा, मेमन्जेचा उबलद्धपुव्वे वा जेणाह तेतलि पुनस्स पुणररि इटा ५ मवेज्जामि) ..- . , " - अनगारधर्मामृतवपिणी टी० अ० ४ तेतलिपुनप्रधानधरितवर्णनम् वा' कार्मणयोगो वा-उच्चाटनादिकर्मयोगो वा, 'हिय उडावणे वा 'महृदयो. डायन वा-चित्ताकर्षकवस्तुविशेपो या 'काउट्टायने वा' कायोडायन वा शरीरा- ककनस्तुविशेगो वा 'आभिभोगिए पा' आभियोगिको पापराभवकरणयोगो पा, 'यसाकरणे वा' शीकरण -वशीकरणपोगो वा, 'कोउयकम्मे वा 'कौतुक- वर्म वा-मौभाग्यवर्द्धकस्नानादि वा 'भूइकम्मे वा' भूतिकर्म पा=मन्त्राभिमन्त्रित- भस्ममोपण वा तथा-औपपीना 'मूले ' मूलम् ' कदे' कन्दः ' छल्ली ' त्वर वल्ली' लता - सिलिया वा' शिलिका-तृणविशेषः, 'गुलिया' गुलिका- गुटिका 'मोसहे वा भेसज्जे वा' औषध वा भैपज्य वा, इत्यादिक वस्तुजात युष्माभिः ‘उबलद्धपुञ्चे' उपलब्धपूर्वम्-माप्तपूर्वम् , हे आर्याः भवत्य एपु किमपि उपलब्धपूर्वा अवश्य भवेयु', तत्कृपया मद्यमर्पय, 'जेगाह' येनाहम् , यत्सेवनादह तेतलिपुत्रत्य पुनरपि इष्टा कान्ता प्रियामनोज्ञामनोऽमा भवेयम् । ततः खलु ता आर्या. पोट्टिलाया एवमुक्ता. सत्यो द्वापि हस्तो करें स्थापयन्ति, स्थापयित्वा योग कार्मण योग-उच्चाटन आदि मत्रो का योग हृदयोड्डीयन- चित्ताकर्षक वस्तु विशेष का योग, कायोडायन-शरीराकर्षक वस्तु विशेपका योग, आभियोगिक पराभव करन का योग, वशीकरण- वशीकरण योग, कौतुक कर्म-सौभाग्यवर्द्धक स्नान आदि का योग, भूति कर्म-मत्रादि से अभिमत्रित भस्म के प्रक्षेपण करने रूप योग तथा औपधियों के मूल, कद त्यक-छाल तथा लता, शिलिका-तृण विशेष गोली, औषध-भपज्य इत्यादि वस्तुओ का योग आपके देखने में अवश्य आया होगा-इस लिये कृगकर इनमें से कोई न कोई योग आप हम अवश्य-अवश्य प्रदान करे कि जिसमे म-जिम के सेवन से मैं-तेत- लिपुत्र को पुनरपि इष्ट, कान्त, प्रिय, मनोज्ञ एव मनोम घन जाऊँ (तएण ताआ अज्जाओ पाहिलाए एक्चुत्ताओसमाणाओदाविहत्थे कन्ने ठवे ति, મત્રોગ-વશીકરણ વગેરે મત્રોને ગ–કામણગ, ઉચ્ચારણ વગેરે મને યે, હૃદયેyવન-ચિત્તાકર્ષક વસ્તુ વિશેષને વેગ, આમિગિક- પરાભવ કરવાના ગ, વશીકરચ-વશીકરણ ગ, કૌતુકકમ–સૌભાગ્યવર્ધક સ્નાન વગેરેને ચેગ, ભૂમિ–ત્ર વગેરથી અભિમંત્રિત કરીને ભસ્મ ( रामेडी) नु प्रक्षेप५ ३५ याग मा मोषधीयाना भूग, ४६, (१६ (छास) તેનજ લતા, પ્રિલિકા-તૃણ વિશેષ ગેળી, ઔષધ, ભૈષજન વગેરે વસ્તુઓને ગ તમારા જેવામાં ચોકકસ આવ્યો જ હરો એટલા માટે તમે કૃપા કરીને એમાય ગામે તે યુગ મને ચેકમ આપે કે જેના સેવનથી હું ફરી તેતલિ ત, બિય, મનાજ્ઞ અને મનેમ થઈ જાઉ . marकमाल पोहिलाम् एवमवदन-पय खलु हे देवानुप्रिये श्रमण्यो निIय , वाषाभ्यन्तरपन्धि रहिता , यावद् गुप्तब्रह्मचारिण्यः, नो खलु कल्पतेऽस्मारम् 'एयप्पयार' एतत्य- कारणोरपि 'णिसामेत्तए' निशामयितु-श्रोतु न यल्पत इति पूर्वेण सम्बन्धमा 'अङ्ग इति सम्मोधने ' हे पोहिले ! किथ पुन. 'उपदिसित्तर वा' उपदेष्टुम् वा, स्वयम् 'आयरित्तए वा' आचरितु या कल्पते । न कल्पतात्पर्यः, वय खत तव हे देवानुप्रिये विचित्र केलिप्रशतं धर्म परिकथयामः । ततः सल सा पोहिला ठावित्ता पोट्टिल एच वयासी-अम्हेण देवाणुप्पिया समणीओनिग्गधीओ जाव गुत्तषभयारिणीओ, नो खलु फप्पई अम्ह एयप्पयारकन्नेहि वि निसामित्तए किमग उचदिसित्तए वा, आयरित्ता वा। अम्र ण तष देवाणुप्पिया ! विचित्त केवलिपन्नत्त धम्म पडिकरिज्जामो) इस प्रकार उस पोट्टिला के द्वारा कहीं गई उन आर्याओं ने अपने दोनों कानोंपर हाथ रख लिये-और रख कर पोहिला से इस प्रकार करने लगी। -देवानुप्रिये ! हम तो निर्ग्रन्थ अमणियाँ है, नव कोटि से पूर्ण ब्रह्मचर्यको हम पोलती हैं। हमें तुम्हारी ऐसी याते कानों से सुनना भी कल्पित नहीं हैं तो फिर हे पुत्रि ! हम इनका उपदेश तुम्हें कैसे दे सकते हैं- और स्वय भी इनका आचरण कैसे कर सकता हैं। अर्थात् इन बातों का उपदेश देना और स्वय इनको अपने आचरण में लाना यह सब हमारे कल्प के अनुसार निषिद्ध है । हम तो हे देवानुप्रिये तेरे हितके (तएण ताओ अज्जाभो पोट्टिलाए एववुत्ताओ समाणीओ दो वि हत्ये कन्ने यति, ठावित्ता पोट्टिल एर वयासी अम्हेण देवाणुप्पिया ! समणीओ निग्गथीओ जाव गुत्तवमयारिणीओ, नो ग्वलु कप्पड अम्ह एयप्पयारफन्नेहि वि निसामित्तए किमग उदिसित्तए वा, आयरित्तए ना ! अम्ह ण तब देवाणुप्पिया विचित्तं केवलिपनत्त धम्म पडिकहिज्जामो) આ પ્રમાણે પાદિલાની વાત સાંભળીને તે આર્તાઓએ પિતાના અને કાને ઉપર હાથ મૂકી દીધા અને મૂકીને એમ કહેવા લાગી હે દેવાનુપ્રિયે ! અમે તે નિગ્રંથ શ્રમણીએ છીએ નવવાડ સહિત બ્રહ્મચર્યનું અમે પાલન કરીએ છીએ કે પુત્રિ' તમારી એવી વાતે અમારા માટે કાનથી સાભળવી પણ ચગ્ય લેખાય નહિ ત્યારે તેના વિશે ઉપદેશની વાત તે સાવ અયોગ્ય જ છે અમે આ વિશે તમને કઈ પણ જાતને ઉપદેશ પણ આપી શકીએ નહીં તે પછી જાતે આનું આચરણ કેવી રીતે કરી શકીએ ? એટલે કે આ બાબ તને ઉપદેશ આપે તેમજ પોતે આનું આચરણ કરવું તે - अनगारधाममणिो टीका ०८ तेतलिपुत्रप्रधानपरितपर्णनम् ता आर्या एवनवादी-उन्छामि खलु हे आर्याः । युष्माकमन्तिके केवलिपज्ञप्त धर्म निशामयितुम् श्रोतुम् । ततः खलु सा पोट्टिला धर्म श्रुत्वा 'निसम्म ' निशम्य हृदयेनाधार्य हृष्टतुष्टा एमवादी-श्रद्दधामि खलु हे आर्या ! नैन्थ्य प्रवचन यारत् ' से ' तत् तथैव यथैतद् यूय वदथ । हे आर्याः ! 'इन्छामिण इच्छामि खल अह युष्माकमन्तिके 'पचाणुबइय जाव गिहिधम्म' पञ्चाणुप्रतिक यारत् गृहिधर्म पडिवज्जित्तए' प्रतिपत्त-स्वीकर्तुम् । अनन्तर ता आर्या एवमवा लिये विचित्र केलि प्रज्ञप्त धर्मका उपदेश कहते हैं ( सो त सुन)- (तएण सा पोहिलाताओ अज्जाओ एव वयासी इच्छामिण अज्जाओ। तुम्ह अतिम फेरि पन्नत्ते धम्म निसामेत्तए-तण्ण ताओ अज्जामो पोटिलाए विचित्तधम्म परिकति ) उनकी इस प्रकार बात सुन कर उस पोटिलाने उनसे कहा-हे आर्याओ! मैं आप लोगों के मुग्व से केवलि प्रज्ञप्त धर्म सुनना चाहती हु । पोहिला की ऐसी प्रार्थना सुन कर उन आर्याओं ने उस पोहिला के लिये विचित्र केवलि प्रजप्त धर्म सुनाया (तएण सा पोटिला धम्म सोच्चा निसम्म हट्टतुट्ठा एव वयानी ) उन के मुखसे केवलि प्रजप्त धर्म सुन कर और उसे अपने हृदयमे अवघृत कर अत्यन्त हर्षित एव सतुष्ट हुई उस पोहिलाने उनसे ऐसा कहा (सद्दरामिण अज्जाओ। णिग्गंथ पावयणं जाव से जहिय तुम्भे वयह, इच्छामि ण अह तुम्भ अतिए पचाणुव्वइय जाव गिहिधम्म पडिजि त्तए-अहासुर, तएण सा पोहिला तासिं अजाण अतिए पचाणुव्वइय મુજબ અગ્ય ગણાય છે હે દેવાનુપ્રિયે ! અમે તે તારા હિત માટે વિચિત્ર કેવળિપ્રજ્ઞસ ધર્મનો ઉપદેશ આપીએ છીએ તેને તું સાભળ (तएण सा पोटिला ताओ अज्जाओ एव वयासी इच्छामि ण अज्माओ ! तुम्हें अतिए केवलिपनत्ते धम्म निसामेत्तए-तएण ताओ अज्जाओ पोहिलाए विचितं धम्म परिकहति) તેમની આ જાતની વાત સાંભળીને તે પિદિલાએ તેમને એમ કહ્યું કે હે આર્થીઓ ! તમારા મુખથી હુ કેવળી પ્રજ્ઞસ ધમને સાભળવા ઈચ્છું છું પિદુિલાની એવી વિનતી સાભળીને તે આર્થીઓએ તેને વિચિત્ર કેવળિ પ્રજ્ઞમ धमान ५३२ माये! (तएण सा पोट्टिला धम्म सोच्या निसम्म हट्ठ-तहा एन क्यासी ) तमना भुमयी ठेपली अशा धनु अपधु शन तेन यमा ધારણ કરીને ખૂબ જ હાર્ષિત અને સંતુષ્ટ થતી તે પદ્વિલાએ તેમને એમ કહ્યું કે (सदहामिण अज्जाओ । णिग्गय पावयण जाब से जहिय तुम्भे वयह, मामि RE न अनि नाणुञ्चइयं जाव गिदिधम्म पडिवज्जित्तए-अहा- " - तामा पोटिलाम् एवमवदन-पय खलु ? देवानुप्रिये श्रमण्यो निप , पायाभ्यन्तरपन्धि रहिता, यारद् गुप्तब्रह्मचारिण्यः, नी खलु करपतेऽस्माकम् ‘पयप्पयार ' पतत्य- कारणोरपि 'णिसामेत्तए' निशामयितु श्रोत न यल्पत इति पूर्वग समन्धः । अङ्ग इति सम्बोधने' हे पोहिले किय पुन: उपदिसित्तए । 'उपदे तुम् वा, स्वयम् 'आयरित्तए वा ' आचरितु या कल्पते । न कल्पतइत्ययः, वय स्खल तव हे देवानुपिये विचित्र केलिप्रम धर्म परिफयपाः । ततः पल सा पोहिला ठावित्ता पोट्टिल एव वयासी-अम्हेण देवाणुप्पिया समणीओनिग्गयोमो जाव गुत्तयभयारिणीओ, नो खलु कप्पई अम्द एयप्पयारकन्नेहि वि निसामित्तए किमग उचदिसित्तए वा, आयरिता चा। अम्र णं तप देवाणुप्पिया 1 विचित्त केवलिपन्नत्त धम्म पडिकरिज्जामो) इस प्रकार उस पोट्टिला के द्वारा कहीं गई उन आर्याओं ने अपने दोनों कानोंपर हाथ रख लिये-और रख कर पोहिला से इस प्रकार करने लगी-रे - देवानुप्रिये । हम तो निर्ग्रन्थ अमणियाँ है, नव कोटि से पूर्ण ब्रह्मचर्यको म पालती है। हमें तुम्हारी ऐसी याते कानों से सुनना भी कल्पित नहीं हैं तो फिर हे पुत्रि ! हम इनका उपदेश तुम्हें कैसे दे सकते हैं- और स्वय भी इनका आचरण कैसे कर सकता है। अर्थात् इन बातों का उपदेश देना और स्वय इनको अपने आचरण में लाना यह सब हमारे कल्प के अनुसार निषिद्ध है । हम तो हे देवानुप्रिये ! तेरे हितके (तएण ताओ भनाओ पोट्टिलाए एचवुत्ताओ समाणीओ दो रि हत्ये कन्ने ठति, ठाविता पोट्टिल एन वयासी अम्हेण देवाणुपिया 1 समणीओ निग्गंथीओ जाव गुत्तवभयारिणीभो, नो ग्वलु कैप्पइ अम्द एयप्पयारकन्नेहि वि निसामित्तए किमग उत्रदिसित्तर था, आयरित्तए ना! अम्हण तब देवाणुप्पिया ' विवि केवलिपन्नत्त धम्म पडिक हिज्जामो) આ પ્રમાણે પિદિલાની વાત સાંભળીને તે આર્યાઓએ પોતાના અને કને ઉપર હાથ મૂકી દીધા અને મૂકીને એમ કહેવા લાગી હે દેવાનુપ્રિયે ! અમે તે નિર્ચ થ શ્રમણ છીએ નવવાડ સહિત બ્રહ્મચર્યનું અમે પાલન કરીએ છીએ તે પુત્રિ તમારી એવી વાતે અમારા માટે કાનથી સાભળવી પણ ચગ્ય લેખાય નહિ ત્યારે તેના વિશે ઉપદેશની વાત તે સાવ અજ છે અમે આ વિશે તમને કઈ પણ જાતને ઉપદેશ પણ આપી શકીએ નહીં તે પછી જાતે આનું આચરણ કેવી રીતે કરી શકીએ ? એટલે કે આ બાબ તને ઉપદેશ આવે તેમજ પોતે આનું આચરણ કરવું તે બધુ અમારા કલ્પ -- भनगामामृतपिणी का अ० ४ तलिपुत्राधानपग्निवर्णनम् मूलम्-तएणं तसे पोहिलाए अन्नया क्याई पुवरस्तावर- सपालस्मयलि बुडवजागरिय जागग्माणीए अयमेग्रारूप अध्झथिए जाव समुप्पन्न । एव खल्लु अह तयलिपुत्तस्म पुटिव इटा ५ आसि, इयाणि अणिहा ५ जाब परिभांग वा, त संय खल्लु मम सुव्वयाणं अजाणं अतिए पव्वइत्तए, एव सपेहेइ, सपेहिता, कल जाव पाउपभायाए जेणेव तेयलिपुत्ते तणेव उवागच्छइ, उवागाच्छत्ता, · कश्यलपरिग्गयि दसनह सिरसावत्त मत्थए अंजलिं क्तु एवं वयासी एव खल देवाणुप्पिया । मए सुब्वयाण अजाण अंतिए धम्मे णिसंते जाव अभणुन्नाया पव्वइत्तए । तएण तेयलिपुत्ते पाहिले एव वयासी-एव खल्लु तुमं देवाणुप्पिए । मुंडा पवइया समाणी कालमासे काल किच्चा अन्नतरेसु देवलोएसु देवत्ताए उवव- ज्जिहिसि, तं जइ णं तुम दवाणुप्पिए । मम ताओ देवलो याओ आगम्म केवलि पन्नत्ते धम्मे वादेहि, तोह विसज्जैमि, अह णं तुम मम ण सबोहेसि, तो ते ण विसज्जमि । तएण सा पोटिला तेयलिपुत्तस्स एयमट्ट पडिसुणेइ । तत. बल्लु नेत- लिपुत्ते विपुल असण४ उबक्खडावेइ, उवझवडावित्ता, मित्तणाई जाव आमतेइ, आमतिचा,, जाव सम्माणेइ, सम्माणिता, पो- टिल पहाय जाव पुरिससहस्सदाहिणि सोय दुरुइ, दुरूहित्ता । लाभेमाणी विहरह) इस प्रकार श्रमणोपामिका बनी हुई वह पोहिला निर्ग्रन्थ श्रमणजनोंकोपन निर्मन्य अमणियो को दान-चारों प्रकार का आहार देती हुई अपना समय व्यतीत करने लगी। मृ०७। , निथ II nin amanar-आ तना गाडा-24 पता - . माताधAmer दिपुः- अहामुह ' यथा सुग्व, दानुमिये ! । उत खलु सा पोहिला तासा मार्याणामतिके पश्चाणुनतिक यारद् गृहिधर्म मतिपद्यते, पुनस्ता आर्या वन्दते नमस्पति, वन्दिता नमस्थित्वा प्रविपिसनयति । ततः सा पोदिलाश्रम गोपासिका जाता, ' जान पडिलाभेमागि ' यावत् पतिलम्मयन्ती नियन्येभ्य श्रमणेभ्यः श्रमणीभ्यश्च चतुर्विधमाहार ददती विहरति । मु०७॥ जाव गिरिधम्म पडिवज्जेइ, तामओ अज्जाओ चदद, णमसह व दिसा णमसित्ता पडिविसर्जेई ) हे आर्याओ! में इस निर्ग्रन्य प्रवचन पर श्रद्धा करती है यावत् एमाँ मानती हु कि यह निर्गन्य प्रवचन जैसा आप कहती है वैमा ही है। अतः हे आओ! अय में आपके पास पचाणु व्रत मात शिक्षावन आदि रूप १२ पारहे प्रकार का गृरस्थ धर्म को धारण करना चाहती है। इम तरह पोशिला की भावना जान कर उन आर्या पो ने उससे कहा-यधा सुख देवानुप्रिये ! तुझे जिस तरह सुख हो वैसा तू कर-श्रयस्कर कार्यमें विलम्ब करना योग्य नहीं हैं-इम प्रकार उन आयोजनों, आज्ञो प्राप्त कर उस पोहिलाने उन्हीं आर्याओं के पाम से जावकधर्म पच अणु एवं मान शिक्षाप्रेनों को चारण कर लिया। इस प्रकार श्रमणोपोसिका बनी हुई उस पोटिला ने उन आर्याओं को वन्दना एव नमस्कार की-चन्दना नमस्कार करके फिर उन्हें विस जित कर दिया । (तएण सा पोहिला समणोवासिया जाया जावं पडि मुह तएण सा पोहिला तासिं-अज्जाण आतए पाणुमय जाब गिहिधम्म पडि वेज्जेइ ताओ अज्जाभी बदई, णमसइ वदित्ता णमसित्ता पडिविसज्जेइ ) હિ આઓ ! આ નિગ્રંથ પ્રવચન ઉપર હું શ્રદ્ધા કરે છું યાત આ નિથ ચન જેવું તમે કહે છે તેવું જ છે એથી હું આર્યાએ ! હવે હું તમારી પાસેથી પાચ અણુવ્રત વગેરેને ગૃહસ્થ ધર્મ ધારણ કરવા ઈચ્છું છું આ રીતે પિદિલાના વિચારે જાણન તે અધિઓએ તેને કહ્યું કે 'यथासुखम्' 2 3 डे हेवानुप्रिये । तन मा सुभ प्राH याय 4 तु ४२ સાર કામમાં વિલંબ કરવા જોઈએ નહિ આ પ્રમાણે તે આર્યાની આજ્ઞા મેળવીને તે પહિલાએ તે આર્થીઓની પાતથી શ્રાવક-ધર્મ-પાચ અણુવ્રત અને સાત શિક્ષાને ધારણ કરી લીધે આ રીતે શ્રમણે પાસિકા થઈ ગયેલી તે મહિલાએ તે આર્થીઓને વદન તે જ નામ કર્યા અને વદન તથા મૉમન કરીને તેમને વિકોય આપી ( (तरण त पाहे समाधासिया जाया जाव पहिलाभमाणी विहार) 0 शत अभयानि 434240 ते पहिलो " । मनगारधर्मामृतषिणी टी० ०४ तेतलिपुत्राधानचरितवर्णनम् रिय जागरमाणीए ' कुटुम्मनागरिका, जाग्रत्या अयमेतद्रूप, ‘अज्झथिए जाव आध्यात्मिको. यावत् माध्यामिक आत्मगतो यावन्मनोगत, सम्ल्यू समु-पन्नः । सरल्पप्रकारमाह-एव खलु अहं तेतलिपुत्रस्य पूर्वम् इष्टा कान्ता मिया मनोहा मनोऽमा आमम् , इदानीमनिप्टा, अमान्ता, अप्रिया, अमनोज्ञा, अमनोऽमा, यावत् परिभोगं वा । अस्याभिमायः-अहो मनुष्याणा मनोवृत्तेर स्थिरतो । पूर्व यस्यादम् इष्टा मान्ता प्रियाऽदिकाऽसम् , सैवाहमस्यानिष्टाऽकान्ताऽमियादिका जाताऽस्मि । अप वेवलिपुत्रो मम नाम गोनश्रुणमपि नेच्छति किं पुनर्ममदर्शन मया सह परिभोग वान्छेत् अपितु नेत्यर्थः । 'त' तत् तस्मात्कारणात् । सेय पसि ) रात्रि के पिछले भाग (कुरजागरिय-जागरमाणीप अयमेया- रूचे अज्झस्थित जाव ममुप्पन्ने ) युद्धात की, चिन्ता से जाग रही थी इस प्रकार का आध्यात्मिक यावन्मनोगत सकल्प उत्पन्न हुआ-(एव खल अह तेयलिपुत्तरस, पुब्धि इटो ५ आसि इयाणि अणिट्टा ५ जाव परिभोग वा, त सेय स्खल मम सुधयाण अजाण अतिए फाइत्तप), मैं पहिले तेतलिपुत्र को घटत ही अधिक इष्ट, कान्त प्रिय, मनोज़ एव मनोम धी-परन्तु अप मैं ऐसी नहीं रही ह-अनिष्ट आदि पन गई । और यातों की बात ही क्या है-वे तो अय मेरा मुख तक नहीं देखना चाहते है-देखो मनुष्यों की मनोवृत्ति कितनी अस्थिर है-पूर्व मैं जिसे इष्ट, कान्त, प्रिय, आदि रूप थी-अप वही में उसके लिये अ- निष्ट अप्रिय आदि पन गई है । यह तेतलिपुत्र तो मेरी नाम गोत्र तक भी सुनना नहीं चाहता है तो फिर मेरे साथ रहने की तो चाहना ही આધ્યાત્મિક યાવત મગત સંકલ્પ ઉદ્દભવે કે (एक खलु अह तेयलिपुत्तस्स पुधि इट्ठा ५ आसि इयाणि अण्डिा ५ जाउ परिभोग वा तु सेय खलु मम मुनुयाण अज्माण अतिए पलहत्तए) પહેલા હુ તેતલિપુત્રને ખૂબજ ઈઈકાત, પ્રિય, મને અને મમ હતું પણ હવે હું તેમના માટે તેવી રહી નથી અનીષ્ટ વગેરે થઈ પડી છુ મારી સાથે વાતચીતની વાત તે દૂર રહી પણ તેઓ મારૂ મો પણ જોવા માગતા નથી ખેરખર પુની મનોવૃત્તિ કેટલી બધી ચચળ હોય છે જેને પહેલા હુ ઇન્ટ, કોત, પ્રિય, વગેરેના રૂપમ હતી, હવે તેને તેજ અનિષ્ટ અવિવ વગેરે થઈ પડી છુ આ તેતલિપુત્ર મારા નામગાત્ર સુદ્ધા લાભ થવા માગતા નથી ત્યારે મને જોવાની અને મારી સાથે રહેવાની તે તેમને HI७ ५९।२भा (कुडु उजागरिय जागरमाणीअयमेयारूवे अज्ञथिए जाव समुपन्ने ) ५२-गहन्धाना दिया२३२ती cril Pी ती वारे-नो , मित्तणाइ जाव संपरिबुडे सविडिए जाव रवेणं रेयलिपुरस्स मज् मज्झेणं जेणेव सुव्ययाणं उवस्सए तेणेय उवागच्छद । पोहिला सीयाओ पच्चोरुहइ । तेतलिपुत्ते पोटिलं पुरओ का जेणेव सुव्वया अजाओ तेणेव उवागच्छइ, उवागच्छित्ता वंदर नमसइ, वदित्ता नमसित्ता एवं वयासी-एवं खल्ल देवाणुपिया। मम पोहिला भारिया इट्ठा ४, एसणं संसारभउब्धिगा जाव पव्वइत्तए, पडिच्छतु णं देवाणुप्पिया! सिस्सिणीभिक्खं अहा. सुहं मा पडिवध करेहि । तएण सा पोहिला सुब्वयाहि अज्जाहि एवंवुत्ता समाणा हट्टतुट्टा उत्तरपुरस्थिम दिसीभाग अवक्कमइ, अवक्कमित्ता सयमेव आभरणमल्लालकार ओमुयइ, ओमुइत्ता, सयमेव पचमुष्ट्रिय लोयं करेइ, करित्ता, जेणेव सुव्वयाओ तेणेव उवागन्छइ, उवागच्छित्ता चदइ, णमसइ, वदित्ता णमसित्ता, एव वयासी-आलित्ते णं भते- लोए एव जहा देवाणदा जाव एक्कारसअगाइ अहिज्जइ,बहृणि वासाणि सामन्नरियागं पाउणइ, पाउणित्ता, मासियाए संलेहणाए अत्ताणं झोसेत्ता सहि भत्ताइ अणसणाए छेदित्ता, आलोइयपडिक्कता समाहिपत्ता कालमासे कालकिच्चा अण्णतरेसुदेवलोएसु देवत्ताए उववण्णा ॥सू०८॥ टोका-'तएणं तीसे' इत्यादि । तत खलु तस्या पोट्टिलाया. 'पुत्र रतारतकालसमयसि' पूर्वरात्रापररात्र कालसमयेरात्रे पश्चिमेभागे ' कुडुब जाग तएण-'नीसे पोहिलाए' इत्यादि । टोका-(तएण) इसके बाद (तीसे पोहिलोए) उम पोडिला के जय कि वह ( अन्नया क्याइ किमी एक दिन (पुब्बारत्तकालमम 'तएण-तीस पोट्टिलालाए' इत्यादि । टी-(तएण) यार पछी (क्षीसे पाहिलाए ) पाने- यारे (अन्नया कयाइ) ४ मे हिवसे (. - यस्यादम् इप्टा, - . मनगारधर्मामृतयषिणी टी० म०१४ तेतलिपुषप्रधानचरितवर्णनम् रिय जागरमाणीए ' कुटुम्मनागरिका जाग्रत्या अयमेतद्रूप अज्यस्थिए जाव आध्यात्मिको यान आध्यात्मिक आत्मगतो यावन्मनोगत, सकल्प समुत्पन्नः । साल्पप्रकारमाह-एव खलु अहं तेतलिपुत्रस्य पूर्वम् इप्टा कान्ता मिया मनोवा मनोऽमा आमम् , इदानीमनिप्टा, अकान्ता, अप्रिया, अमनोज्ञा, अमनोऽमा यावतु परिभोग वा । अस्याभिमाग'-अहो मनुष्याणा मनोवृत्तेर स्थिरता । पूर्व कान्ता, प्रियाऽदिकाऽसम् , सैवाहमस्यानिष्टाऽकान्ताऽपियादिका जाताऽस्मि । अय. वेवलिपुत्रो मम नाम गोत्रश्रुणमपि नेच्छति किं पुनर्ममृदर्शन मया सह परिभोग वान्छेत् अपितु नेत्यर्थः । 'त' तत्-तस्मात्कारणात् ' सेय पसि ) रात्रि के पिछले भागमें (कुडाजागरिय-जागरमाणी अयमेया- रूबे अज्झत्थिर जाव ममुप्पन्ने ) पृदय की, चिन्ता से जाग रही थी इस प्रकार का आध्यात्मिक यायनमनोगत सकल्प उत्पन्न हुआ-(एव खल अह तेपलिपुत्तरस पुष्धि इष्ट ५ आसि इयाणि अणिट्ठा ५ जाव परिभोग वा, त सेय खलु मम सुव्ययाण अजाण अतिए फाइत्तए) में पहिले तेतलिपुत्र को बहुत ही अधिक इद, कान्त प्रिय, मनोज्ञ एवं मनोम थी-परन्तु अप, मैं ऐसी नहीं रही ह-अनिष्ट आदि पन गई 1 और यातो की पात ही क्या है-वे तो अघ मेरा मुख तक नही देखना चाहते हैं-देखो मनुष्यों की मनोवृत्ति कितनी अस्थिर है-पूर्व मैं जिसे इष्ट, कान्त, प्रिय, आदि रूप धी-अय वही में उसके लिये अ. निष्ट अप्रिय आदि बन गई है । यह तेतलिपुत्र तो मेरो नाम गोत्र तक भी सुनना नहीं चाहता है तो फिर मेरे साथ रहने की तो चाहना ही આધ્યાત્મિક યાવત મને ગત સકલ્પ ઉદ્દભવે કે (एक खलु अह तेयलिपुत्तस्स पुघि इट्टा ५ आसि इयाणि अभिट्ठा ५ जाउ परिभोग वा त सेय खलु मम मुच्चयाण अजाण अतिए पञ्चहत्तए ) પહેલા હુ તેતલિપુત્રને ખૂબજ ઈઝકાત, પ્રિય, મને અને મનેમ હતી પણ હવે હું તેમના માટે તેવી રહી નથી અની વગેરે થઈ પડી છુ મારી સાથે વાતચેતની વાત તો દૂર રહી પણ તેઓ મારૂ છે પણ જોવા માગતા નથી ખેરખર પુની મનોવૃત્તિ કેટલી બધી ચ ચળ હોય છે? જેને પહેલા હુ ઇન્ટ, કાત, પ્રિય, વગેરેના રૂપમાં હતી, હવે તેને તેંજ અનિષ્ટ અપ્રિય વગેરે થઈ પડી છુ આ તેતલિપુત્ર મારા નામગાત્ર સુદ્ધા સાભ વા માગતા નથી ત્યારે મને જોવાની અને મારી સાથે રહેવાની તે તેમને १५ पडामा ( कुडु उजागरिय जागरसाणीए अयमेयारूवे अशस्थिए जाव समपन्ने ) UR-Sitamin विया२०२ती capit सी ती सारे-मोती - . जातामा श्रेया उचित खलु मम मुबतानामार्याणामन्ति के मननितम्, पर समक्षते-विचार यति, सप्रेक्ष्य-विचार्य 'कल्ल जार पाउप्पभायाए ' कल्य यावत् पादुष्पमाता याम् मातः सूर्योदयसमये योन तेतलिपुनस्तत्रैव उपागरछवि उपागन्य करयल- परि० करतलपरीगृहीत मस्तकेऽअलि कृत्या एउमयदर-एव सल हे देवानमिय! मया सुनतानामार्याणामन्ति केधर्मः ‘णिसते' निशान्तः श्रुत , 'जार अभणु उसे कैसे हो सकती है। इस लिये मुझे अप यही उचित है कि में सुव्रता आर्यिका के पास प्रवजित हो जाऊँ। (एय सपेहेइ, सपेरिसा कल्ल जाव पाउपभायाए जेणेच तेलिपुत्ते तेणेच उचागच्छद) इस प्रकार जप यह विचार कर चुकी तो विचार करके फिर जर प्रात काल हुआ और सूर्य का उदय हो चुका तय जहाँ तेतलिपुत्र था वहा पहुंची (उवागच्चित्ता करयल० एव वयासी-एव खलु देवाणुप्पिया ! मए सुब्बयाण अजाणं अतिए धम्मे णिसते जाव अन्भणुन्नाया पन्चात्त, तएण तेयलिपुत्ते पोटिल एव वयोसी-एव खलु-तुम देवाणुप्पिए ! मुंडा पव्वइया समाणी कालमासे काल किच्चा अन्नयरेसु देवरोएसु देवत्ताए उववज्जिहिसि, त जहणतुम देवाणुप्पिण! मम ताओ देवली याओ आगम्म, केवलिपन्नत्ते धम्मे योहेहि तो र विसज्जेमि ) वहा जा कर उसने दोनों हाथ जोड कर उस को नमस्कार किया-बाद में वह इस प्रकार उससे कहने लगी हे देवानुप्रिय बात ऐसी है कि मैंने દરકાર જ શી હોય? એથી મને હવે એજ યોગ્ય લાગે છે કે હું સુરત આર્થિકાઓની પાસે પ્રવ્રુજિત થઈ જાઉં (एव सपेहेइ, सपेहित्ता बल्ल जाव पाउप्पभायाए जेणेव तेयलिपुत्ते तेणेव उवागच्छद) આ રીતે જ્યારે તેણે ચોક્કસ વિચાર કરી લીધું ત્યારે તે સવારે સૂર્યોદય થતા જ્યા તેતલિપુત્ર અમાત્ય હતું ત્યા પહોચી ( उवागच्छिता करयल० एव वयासी-एव खलु देवाणुप्पिया ! मए मुब याण अज्जाण अतिए धम्मे णिसते जार अब्भणुनाया पव्वइत्तए, तएण तेयलिपुत्ते पोट्टिल एव वयासी-एव खलु तुम देवाणुप्पिए ! मुडा पपइया समाणीकालमासे काल किच्चा अन्नतरेमु देवलोएसु देवत्ताए उवयजिनहिसि त जइणं तुम देवाणु प्पिए । मम ताओ देवलोयाओ आगम्म, केवलिपन्नत्ते धम्मे वोदेहि तो ह विसज्जेमि) ત્યા જઈને તેણે તેમને અને હાથ જોડીને નમસ્કાર કર્યા અને ત્યારપછી તે આ પ્રમાણે કહેવા લાગી કે હે દેવાનુપ્રિય ! મે સુવતા પાસેથી . . " अनगारधर्मामृतवपिणो टीका अ० १४ तेतलिपुत्रप्रधानचरितवर्णनम् ण्णाया पव्यइत्तए ' यावदभ्यनुज्ञाता प्रनजितुम् स धर्मों मम मनसि रुचितः तस्माद् भवताऽभ्यनुज्ञातासती प्राजितुमिच्छामीतिभावः । ततः खलु तेतलिपुत्रः पोटिला- मेवमयदत्-एव खलु व देवानुप्रिये । मुण्टा प्रजिता सती कालमासे कालं कृत्वाऽन्यतरेषु देवलोकेषु देवतया उपपत्स्यते ।'त' तदा यदि खलु व देवानु मिये ! मा ततो देवलोकादागत्य केलिप्राप्त धर्म बोधये , 'तोह ' तदाऽह त्वा 'विसज्जेमि' प्राजितुमाज्ञापयामि ! 'अहण' अथ खलु यदि खलु त्व मा ‘ण सवो- हैसि' न सोधयसि-केवलिमरूपित धर्म पोधयितु प्रतिज्ञा न करोपि 'तो' तदा ते' वा न पिसृजामिन्मनजितु नाज्ञापयामि । 'तएण' तत खलु तेतलिपुनस्य एतद्वचनश्रवणानन्तम् , सा पोहिला तेतलिपुत्रस्य 'एयमह' एतमर्थ-धर्म प्रति चोधनरूपमर्थ 'पडिमुणेइ' प्रतिशृणोति-स्वीकरोति । ततः खलु तेतलिपुत्रो विपुलमशनपानखायसाय चतुर्विधमाहारम् , ' उवक्खडावेइ' उपस्कारयति- निपादयति, 'उपरखडावित्ता' उपस्कार्य 'मित्तणाड जाव आमतेइ ' मित्रज्ञाति सुबता आर्यिका के पास धर्म का उपदेश सुना है वह धर्म मुझे बहुत ही अधिक रुचिकर प्रतीत हुआ है । इस लिये मैं आपसे आज्ञा लेकर दीक्षित होना चाहती हूँ । पोट्टिला को ऐसी यात सुन कर तेतलिपुत्रने उससे कहा-देवानुप्रिये ! वात ऐसी है कि तुम दीक्षित हो कर जय काल अवसर काल करोगी ( यह निश्चित है) अन्यतर देवलोक में देवता की पर्याय से उत्पन्न होओगी-तब यदि देवानुप्रिय मुझे वहां से आ कर तुम केवलिप्रज्ञप्त धर्म समझाओ-तो मैं तुम्हे प्रवजित होने के लिये आज्ञा दे सकता हूँ (अह ण तुम मम ण सोहेसिं तो ते ण विस ज्जेमि तएण सा पोट्टिला तेयलिपुत्तस्स एयमट्ठ पडिसुणेइ, ततः खलु तेयलिपुत्ते विपुल असण ४ उवक्डावेइ, उवक्खडावित्ता मित्तणाइ जाव ધર્મને ઉપદેશ સાભળે છે અને તે મને ગમી ગયું છે, એટલા માટે હુ તમારી આજ્ઞા મેળવીને દીક્ષા ગ્રહણ કરવા ઈચ્છું છુ પિદિલાની આ જાતને વાત સાંભળીને તેતલિપુત્રે તેને કહ્યું કે હે દેવાનુપ્રિયે ! તમે દીક્ષિત થઈને જ્યારે કાળના સમયે કાળ કરશે અને અન્યતર દેવલોકમા દેવતાના પર્યાયથી જન્મ પામશે ત્યારે જે તમે હે દેવાનુપ્રિયે ! ત્યાથી આવીને મને કેવળિ પ્રજ્ઞસ ધર્મ સમજાવે તે હું તમને અત્યારે ખુશીથી પ્રવજીત થવાની આજ્ઞા આપી શકુ તેમ છે (अह ण तुम मम णं सबोहेसि तो ते ण विसज्जेमि तएणं सा पोट्टिला तेयलि. पुत्तस्स एयमह पडिसुणेइ, तत. खलु तेतलिपुत्ते विपुल अमण ४ उपक्खडावेइ, उवक्खडाचित्ता, मित्तणाह जान आमतेइ, आमंतिता, मित्तणाइ सम्माणित्ता पोहिल - - - ६ पाताure श्रेया उचितं खलु मम मुवतानामार्याणामन्ति के मानितम्, परमपक्षते-विचार यति, सप्रेक्ष्य-विचार्य 'कल्ल जार पाउप्पमायाए ' फल्य यावत् प्रादुप्पमाता याम् मातः सूर्योदयसमये यौन तेतलिपुतस्तत्रैव उपागाउति उपागत्य करयल- परि० करतलपरीगृहीत मस्तरेऽञ्जलिं कृत्या एमपदव-ए। खल हे देवानप्रिय! मया सुत्रतानामार्याणामन्ति केधर्मः ‘णिसते' निशान्तः श्रुत , 'जार भन्मणु उसे कैसे हो सकती है । इस लिये मुझे अप यही उचित है कि में सुव्रता आर्यिका के पास प्रबजित हो जाऊँ। (पव मपेहेह, सरिता फल्ल जाव पाउप्पभायाए जेणेव तेयलिपुत्ते तेणेव उवागच्छद) इस प्रकार जप यह विचार कर चुकी तो विचार करके फिर जय प्रात काल हुआ और सूर्य का उदय हो चुका तय जहाँ तेतलिपुत्र था वहा पहुंची (उवागच्छित्ता करयल० एच वयासी-एय सलु देवोणुप्पिया | मए सुध्वयाणं अजाणं अतिए धम्मे णिसते जाव अन्भणुनाया पव्यात्त, तएण तेयलिपुत्री पोटिल एव चयोसी-एच खलु-तुम देवाणुप्पिए ! मुडा पव्वइया समाणी कारमासे काल किच्चा अन्नयरेसु देवलोण्सु देवत्ताए उववज्जिहिसि, त जइ ण तुम देवाणुप्पिण! मम ताओ देवलो याओ आगम्म, केवलिपन्नत्ते धम्मे योहेहि तोह विसज्जेमि) वहा जा कर उसने दोनों हाथ जोड कर उस को नमस्कार किया-याद में वह इस प्रकार उससे कहने लगी हे देवानुप्रिय बात ऐसी है कि मैंने દરકાર જ શી હાય ? એથી મને હવે એજ યોગ્ય લાગે છે કે હુ સુતા આર્થિકાઓની પાસે પ્રવજિત થઈ જાઉં ( एव सपेहेइ, सपेहिता कल्ल जाव पाउप्पभायाए जेणेन तेयलिपुत्ते तेणेव उवागच्छद) આ રીતે જ્યારે તેણે ચોક્કસ વિચાર કરી લીધો ત્યારે તે સવારે સૂર્યોદય થતાં જ્યા તેતલિપુત્ર અમાત્ય હતું ત્યાં પહોંચી (उवागच्छित्चा करयल० एव क्यासी-एव खलु देवाणुप्पिया ! मए सुन्न याण अजाण अतिए धम्मे णिसते जार अभणुनाया पव्वइत्तए, तएण तेयलिपुत्ते पोट्टिल एव वयासी-एव खलु तुम देवाणुप्पिए ! मुडा पन्चइया समाणीकालमासे काल किचा अनतरेसु देवलोपसु देवचाए उववन्निहिसि त जइणं तुम देवाणु प्पिए' मम वाओ देवलोयाओ आगम्म, केवलिपन्नत्ते धम्मे वोहेहि वोह विसज्जेमि) ત્યાં જઈને તેણે તેમને બંને હાથ જોડીને નમસ્કાર કર્યો અને ત્યારપછી તે આ પ્રમાણે કહેવા લાગી કે હે દેવાનુપ્રિય ! મે સુત્રતા આ 1 પાસેથી " -- - जनगारधर्मामृत्यषिणी टी० म०४ तेतलिपुत्रप्रधानपरितवर्णनम् ५३ 'दोह्य आरोह्य · मित्तणाइ जाव संपरिखुडे ' मित्रज्ञाति पारत् सपरितः मित्र- शातिस्वजनेसम्बन्धिपरिजनादिभिर्युक्तः ‘सचिट्टोए ' सर्वद्धर्थो ‘जार रवेणं' याबद्रवेण=मेर्यादिनिनादेन सह तेतलिपुरस्य म यमध्येन यौरे सुतानामुपाश्रय स्तत्रैव उपागच्छति । सा पोहिला शिक्षिकातः पचोरुहह' मत्यरोहति अवतरति। तत स तेतलिपुत्र पोहिला पुरतः कृत्वा यत्रै 'मुनता आर्या तर उपागन्छति, उपांगत्य, चन्दते नमस्यति, वन्दिता नमस्यित्वा एवमवदत्-एवं खलु हे देगनुमियाः मम पोट्टिलाभार्या इष्टा कान्ता मिया 'मनोज्ञा मनोऽमा, वर्तते, बैठा कर मित्र, जाति स्वजन सन्धी परिजनों से युक्त होकर अपनी समस्त विभूति के अनुसार गाजे बाजे के साथ तेतलिपुर नगर के बीचो- 'पीच चल कर वह जहां सुव्रता आर्यिका का उपाश्रय था वहा पहुँचा। ('पोटिला सीयाओ पच्चोसहइ, तेतरि पुत्ते पोटिल पुरओ कटु जेणेव 'सुंया अज्जाओ तेणेव उवागच्छंइ, उचागच्छित्ता,वंदद नमसड बदित्ता नमसित्ता ण्व वयासी, एव खलु देवाणुप्पिया मम पोटिला मारिया द्विा ५ एसण संसारभविग्गा जाव पव्वइत्तए पडिच्छतु ण देवाणुप्पिया! सिस्सिणीभिक्ख अहासुह मा पडियध करेहि ) पोहिला शिपिका से "उतरी-तेतलिपुत्र पोटिलाको आगे करके जहाँ सुव्रता आर्यिका थी वहां गया। जा कर उसने उनको चंदनाकी नमस्कार किया। वंदना नमस्कार करके फिर इस प्रकार कहने लगी है देवानुप्रिये ! यह मेरी पोहिला नाम की पत्नी है । यह मुझे इष्ट, कान्त, प्रिय, मनोज्ञ एवं मनोम है। इसने પાલખીમાં બેસાડીને મિત્ર, જ્ઞાતિ, વજન સબ ધી પરિજનેને સાથે લઈને તે પિતાની સમસ્ત વિભૂતિ મુજબ ગાજાવાજાની સાથે તેતલિપુર નગરની વચ્ચોવચ થઈને જ્યાં તે સુવ્રતા આર્થિક ઉપાય હતો ત્યા પહે पोहिला सीयाओ पञ्चोख्हइ, तेतलिपुत्ते पोटिल पुरओ कट्टु जेणेव सुब्बया अन्नाओ तेणे उवागच्छद, उवागरिउत्ता, वदइ, नमसइ,दित्ता नमसित्ता एव चयासी एव खेलु देनाणुप्पिया मम पोहिला भारिया इट्टा ५ ऐसण ससारभउदिबांगा जाव पञ्चइत्तए पडिच्चतुण देवाणुप्पिया! सिस्सिंणीभिख अहासुहमा पडिवर्धे करेंहि ) પિફ્રિલા પાલખીમાથી નીચે ઉતરી પડી, તેતલિપુત્ર “અમાત્ય પિહિલાને આગળ રાખીને જ્યા સુબ્રતા આર્થિક હતી ત્યાં ગમે ત્યાં જઈને તેણે તેમને વદને તેમજ નમસ્કાર કર્યા, વદરા અને નમસકાર કરીને તેણે આ પ્રમાણે કહ્યું કે હે દેવાનુપ્રિયે ! આ પોદિલા બામે મારી પત્ની છે મને એ ઈદ કાંત, પ્રિય, મને અને મનેમ છે એણે તમારી પાસેથી ધર્મનુ શ્રવણ કર્યું છે " - - " - ६५ मातापाया यांविदामन्नयति, मित्रज्ञातिस्पर्जनसम्बन्धिपरिजनान् आमंन्त्रपति, 'आमंतित्ता' आमन्य ‘जार समाणेड' यायत्-समानयति-प्रशनपानादि चतुर्बिोहारण समान्य, 'पोहिल हाय जाब पुरिमसहस्सपाहिणि सी' पोटिला स्नाता यावत् पुरुषसहस्रवाहिनी शिक्किाम् , ' दोहेइ' दोहयति-भारोहपति, 'दुरुहिता आमतेइ आमतित्ता जाव मम्माणिड, सम्माणित्ता पोटिल हाय जीव पुरिसंसहस्सवारिणि मीय दुहेत, दुरित्ता मित्ताह जाव मपरि- बुडे 'सब्बिड्डी जाव रवेण तेलि पुरस्स मज्झ मझेणं जेणेव सुव्वपॉण उर्वस्सए तेणेव उवागच्छड ) यदि तुम मुझे सयोधित नहीं करोगी अर्थात् केवलि प्रजप्त धर्म को मुझे समझाने की प्रतिज्ञा नहीं करोगी तो मैं तुम्हे दीक्षित होने की आजा नहीं दूंगा-इस प्रकार के तेतलिपुत्रके इस कथनको उस पोहिलाने स्वीकार कर लिया । अर्थात् में देवलोक में जाऊँगा तो वहा से आ कर आप को प्रतियोध दूंगी इस प्रकार जय पोहिला ने स्वीकार कर लिया। इस के घाँद तेतलिपुत्र ने 'विपुल मात्रा अनशनादि रूप चारों प्रकार का आहार निप्पन्न कराया-करवा करके 'फिर उसने अपने मित्र, ज्ञाति, आदि जनो को आमन्त्रित किया । मित्र, जाति, स्वजन सवन्धी परिजनोंको आमंत्रित करके यावत् अशन पाना 'दिरूप इस चतुर्विध आहार से उनका सन्मान करके उसने पोहिलाको स्नान करवा कर यावत् उसे 'पुरुष संहवाहिनी शिथिको पर बैठाया, हाय जाब पुरिससहस्सवाहिणि सीय दुरूहइ दुसहित्ता मित्तणाइ जॉन संपडिबुडे सविडोए जाव रवेण तेयलिपुरस्स मज्झ मज्झेण जेणेव सुव्ययाण उवस्सए तेणेव उवागच्छइ) જે તમે મને સબધશે નહિ એટલે કે જે તમે મને કેવળિ પ્રાપ્ત ધર્મને સમજાવવાની પ્રતિજ્ઞા કરશે નહિ તે તમને હું કોઈ પણ સંજોગોમાં પણ દીક્ષા સ્વીકારવાની આજ્ઞા આપીશ નહિ આ રીતે કહેવાથી પાદિયાએ તેતલિપુત્રના કથનને સ્વીકારી લીધુ એટલે કે દિવાએ તેમને આ પ્રમાણે પ્રતિજ્ઞાબદ્ધ થઈને કહ્યું કે હું દેવલોકમાં જઈશ અને ત્યાથી આવીને તમને ધર્મને બધ આપીશ આમ જ્યારે પિદિલાએ સ્વીકારી લીધુ, ત્યારપછી તેતલિપુત્રે પુષ્કળ પ્રમાણમાં અશન વગેરેને રૂપમાં ચાર જાતના આહારો બનાવડાવ્યા અને ત્યારબાદ તેણે પિતાના મિત્ર, જ્ઞાતિ, વગેરે રાજનેને આ ત્રણ આપ્યું મિત્ર, જ્ઞાતિ, વજન સબંધી પરિજનોને આમણ આપીને વાવત અને પાન વગેરે ચાર તને અહારથી તેમનું સન્માન કરીને તેણે પિદિલાને સ્નાન કરાવડાવ્યું અને ચાવત તેને પુરુષ સહસ્ત્રાહિની પોલ सा. - भनगारधामृतषिणी टी० भ०१४ तेतलिपुत्रवधानवरितवर्णनम् ५३ द्रोह्य आरोह्य · मित्तणाइ जाव सेपरिबुडे ' मित्रज्ञाति यानत् सपरितृतः मित्र- झातिस्वजनसम्पन्धिपरिजनादिभिर्युक्तः 'सन्चिट्टोए ' सर्वद्धर्या 'जार रवेण' याबद्रयेण मर्यादिनिनादेन सह तेतलिपुरस्य म यमध्येन यौन सुतानामुपाश्रय स्तत्रैव उपागच्छति । सा पोहिला शिविकातः'पंचोरुहह' प्रत्यवरोहति अवतरति । तत स तेतलिपुत्र पोहिला पुरतः कृत्वा यत्रत्र सुरता आर्या तर उपागच्छति, उपांगत्य, पन्दते नमस्यति, वन्दिला नमस्यित्वा एवमवदत्-एवं खलु हे देशानुपियाः मेम पोट्टिलाभार्या इप्टा कान्ता प्रिया मनोज्ञा मनोऽमा, वर्तते, धैठा कर मित्र, जाति स्वजन सन्धी परिजनों से युक्त होकर अपनी समरन विभूति के अनुसार गाजे बाजे के साथ तेतलिपुर नगर के बीचों- 'पीच चल कर वह जहां सुव्रता आर्यिका का उपाश्रय था वहा पहुँचा। ('पोटिला सीयाओ पच्चोरुहड, तेतरि पुत्ते पोटिल पुग्ओ कटु जेणेव 'सुव्यया अज्जाओ तेणेव उवागच्छंद, उवागच्छित्ता,वंदद नमसह वदित्ता नमसित्ता एच वयासी, एवं खलु देवाणुप्पिया मम पोहिला भारिया हवा ५ एसण ससारभविग्गा जाव पव्वइत्तए पडिच्छतु ण देवाणुप्पिया! सिस्सिणीभिक्ख अहाह मा पडियध करेहि ) पोहिला शिर्यिका से उतरी-तेतलिपुत्र पोहिलाको आगे करके जहाँ सुव्रता आर्यिका थीं वहां गया । जा कर उसने उनको चंदनाकी नमस्कार किया। वदना नमस्कार 'करके फिर इस प्रकार कहने लगी हे देवानुप्रिये यह मेरी पोहिला नाम की पत्नी है । यह मुझे इष्ट, कान्त, प्रिय, मनोज एवं मनोम है । इसने પાલખીમા બેસાડીને મિત્ર, જ્ઞાતિ, સ્વજન સ બ ધી પરિજનને સ થે લઈને તે પિતાની સમસ્ત વિભૂતિ મુજબ ગાજાવાજાની સાથે તેતલિપુર નગરની વચ્ચેવચ્ચે થઈને જ્યાં તે સુવ્રતા આર્થિકાને ઉપાશ્રય હેતે ત્યાં પહોચે (पोट्टिला सीयाओ पचोरूहइ, तेतलिपुत्ते पोट्टिल पुरओ कटु जेणेव सुब्धया अज्जाओ तेणेव उवागन्छन, उवागरिउत्ता, वदइ, नमसइ, वंदित्ता नमसित्ता एव वयासी एय खलु देवाणुप्पिया ! मम पोट्टिला भारिया इट्टा ५ एर्सण ससारभउब्धिग्गा जाव पब्वइत्तए पडिच्छतु ण देवाणुप्पिया ! सिम्सिणीभिक्ख अहासुहमा पडिवर्धकरहि) પિદિલા પાલખીમાથી નીચે ઉતરી પડી, તેતલિપુત્ર “અમાત્ય પિહિલાને આગળ રાખીને જ સુવ્રતા આર્થિક હતી ત્યાં ગમે ત્યાં જઈને તેણે તેમને "દન તેમજ નમસ્કાર કર્યો, વદના અને નમસ્કાર કરીને તેણે આ પ્રમાણે કહ્યું કે હે દેવાનુપ્રિયે ! આ પદિલા માટે મારી પત્ની છે અને એ ઈ કૌત, પ્રિય, મને અને મનેમ છે એણે તમારી પાસેથી ધર્મનું શ્રવણ કર્યું છે .
. - ५४ লাখ एपा खलु भवतीना ममीपे धर्म अगा, धर्मश्रणनितपैराग्यवशात् समारमयो द्विग्ना 'जाव पाइनए 'यार मानितम् मीता जन्म मरणेभ्यो मातीनामन्तिके प्रव्रज्या ग्रहीतुमिच्छति, तस्मात् 'पडिन्नु' भनीन्छन्तु-सीकुर्वन्तु खलु देवानु मियाः ! इमा शिष्याभिक्षाम् । सुरतार्या माह-ययामुग्यम् मा प्रतिबन्ध कुरुष्व । ततः खलु सा पोट्टिला सुनताभिरार्यामिरेवमुक्ता सती हएतटा उत्तरपौरस्स्य दिग्भागम् ईशानकोणम् अबक्राम्पति-गच्छनि, अपक्रम्य स्वयमेव आभरणमाल्या लकारमवमुञ्चति, अवमुच्य सयमेव पञ्चमुष्टिक लोच करोति, हवा यौव मुव्रता आर्यास्त उपागच्छति, उपागत्य वन्दते नमस्यति, पन्दित्ता नमस्पिला एवमय दत्-आलित्तेण भते ! लोए ' आदीतः खलु भदन्त ! लोका-हे आयें । एप कोको जन्म नरामरणादिभिर्दु खै प्रचलित., 'एच' अनेन प्रकारेण 'जहा देवाणदा' यथा देवानन्दादेवानन्देव एपाऽपि सुबतानामन्ति के प्रबजिता, यात्-एकादश अङ्गानि अधीते, बहूनि वर्षाणि श्रामण्यपर्याय पालयति, पालयित्वा मासिक्या आपके पास धर्म सुना है सो उसके प्रभाव से यह ससार भय से उद्विग्न हो कर जन्म मरण से भीत, त्रस्त हो कर आपके पास दीक्षित होना चाहती है। इसलिये हे देवानुप्रिये ! आप मेरे द्वारा दी गई इस शिष्य भिक्षाको अगीकार कीजिये । तय सुव्रता आर्यिका ने कहा- यथा सुख मा प्रतिबंध कुरुष्य-(तएण सा पोटिला-सुन्वयाहिं अबाहिं एव वुत्ता समाणा हतुहा उत्तरपुरस्थिम दिमीभार्ग अवकमइ, अवक मित्ता सयमेव आभरणमल्लालकार ओमुयइ, ओमुहत्ता सयमेव, पच मडिय लोय करेइ, करिता जेणेव सुब्वयाओ तेणेव उवागच्छद, उवा गघिउत्ता वदइ नमसइ, वदित्ता णमसित्ता एवं वयासी-अलि ण भते । रोए एव जहा देवाणदा जाव एक्कारसअगाइ अहिजह, बहुणि તેનો પ્રભાવથી એ સસારભયથી વ્યાકુળ થઈને જન્મ-મરણથી ભીત અને ત્રસ્ત થઈને તમારી પાસેથી દીક્ષા ગ્રહણ કરવા ઈચ્છે છે એટલા માટે હે દેવાનું પ્રિયે ! મારા વડે અપાતી આ શિષ્યા રૂપી ભિક્ષાને સ્વીકાર કરે ત્યારે જવાબમાં સુત્રતા આર્થિકાએ તેને કહ્યું કે કે यथासुस मा प्रतिब (तएण सा पोटिला सुनयाहिं अज्जाहिं एव वुत्ता समाणा हहतुट्टा उत्तर पुरस्थिमं दिसी भाग अवक्कमइ, अवक्कमित्ता सयमेव आभरण-मल्लालकार ओमुयइ, ओमुइत्ता सयमेव, पचमुद्विय लोय करेह, करित्ता जेणेव सुब्बयामो तेणेव उवागच्छइ, उवागच्छित्ता बदइ नममइ, बदित्ता, णमसित्ता एव वयासो- भलित्तेण भते । लोए एव नदा देवाणंदा जाव एककारसभंगाद अहिज्जइ, वाणि - , . + कुरुष्य - , जनगारधामृत पिणी टी० अ० २४ सेलिपुत्रप्रधानचरितवर्णनम् स लेखनया आत्मान जुष्टा पष्ठिं भक्तानि अनशनेन छित्त्वा, 'बालोइयपडिकता आलोचित प्रतिक्रान्ता 'समाहिपत्ता' समाधिप्राप्ता काएमासे काल कृत्वा अन्य- तरेषु देलोकेषु देवतया उपपमा । सू०८ ।। घासाणि सामनपरियाग पाउणइ, पाउणित्ता मासि याए सटेणाए अत्ताण झोसेत्ता सहिभत्ताइ अणसणाए छेदित्ता आलोदयपडियकता समारिपसा, कालमासे काल किच्चा अण्णतरेसु - देवलोएसु देवत्ताए उववण्णा) इस प्रकार सुव्रता आर्यिका के द्वारा कही गई वह-पोहिला बहुत अधिक हष्टतुष्ट हुई। बाद में वह ईशान कोणमें गई । वहां जाकर उसने अपने हाथों से शरीर पर रहे हुए आभरण, माल्य एव अल कारों को उतार दिया। उतार कर अपने आप पंचमुप्टिक देशों का लुचन किया-लुचन कर फिर वह जहां सुव्रता आर्या थीं वहां आई। आते ही उसने उन्हें वन्दना एव नमस्कार करके फिर वह इस प्रकार बोली- हे भदन्त ! यह लोक जरा मरण आदि दुःखों से प्रज्वलित हो रहा है, इस प्रकार से देवानदा की तरह यह सुव्रता आर्या के पास दीक्षित हो गई। यावत् उसने ११ अगों का अध्ययन भी कर लिया। पहुत वर्षो तक श्रामण्य पर्याय को पालन किया। प्रीतिपूर्वक अन्त में एक मास की सलेखना धारण कर ६०, भक्तों का अनशन द्वारा छेद वासाणि सामनपरियाग पाउणइ, पाउणिता मासियाए सलेहणाए अत्ताण झोसेत्ता सहि भत्ताइ अणसणाए छेदिचा आलोइयपडिक्कता समाहिपत्ता, कालमासे काल किच्चा अण्णतरेसु देवलोएमु देवत्ताए उववण्णा) આ રીતે સુવ્રતા આર્થિકા વડે આજ્ઞા અપાયેલી પિદિલા ખૂબ જ સુખ- તુષ્ટ થઈ ગઈ ત્યારપછી તે ઈશાન કેણ તરફ ગઈ અને ત્યાં જઈને તેણે પિતાના હાથથી જ શરીર ઉપરના આભરણે, માળાઓ અને અલ કારેને ઉતાર્યા અને ઉતારીને પિતાની મેળે જ પાચ મુઠી કેશેનુ લુચન કર્યું સુચન કર્યા પછી તે જ્યા સુત્રતા આર્યા હતી ત્યા આવતી રહી ત્યાં આવીને તેણે તેમને વદન અને નમસ્કાર કર્યો, પદના અને નમસ્કાર કરીને તે આ પ્રમાણે વિનતી કરવા લાગી કે હે ભદન્ત ! આ સ સાર જરા (ઘડપણ) મરણ વગેરે દુખેથી સળગી રહ્યો છે આ રીતે પિદિલા દેવાન દાની જેમ સુતા આની પાસે દીક્ષિત થઈ ગઈ અને અનુક્રમે તેણે અગિયાર અગોનું અધ્યયન પણ કરી લીધુ તે ઘણા વર્ષો સુધી શ્રાય પર્યાનું પાલન કર્યું છેવટે પ્રીતિપૂર્વક એક ચાની લેખના ધારણ કરીને અનશન વડે સાઠ ભક્તોનું છેદન કર્યું - - . जाताधार एपा खलु भवतीना समीपे धर्म श्रुपा, धर्मश्राणजनितपैराग्याशात् समारभयो द्विग्ना 'जार पाइत्तए ' यावत् मानितम् मोता जन्म मरणेभ्यो भरतोनामन्ति के प्रव्रज्या ग्रहीनुमिन्उति, तस्मात् 'पडिन्छनु ' प्रतीन्छन्तु स्वीकुर्वन्तु पलु देवानु पियाः । इमा शिष्याभिक्षाम् । सुनतार्या माइ-पयामुग्यम् मा प्रतिबन्ध कुरुष्व । तत. खलु सा पोट्टिला मुरताभिरार्या भिरेवमुक्ता सती हएतष्टा उत्तरपौरस्स्य दिग्भागम् ईशानकोगम् अबक्राम्यति गच्छति, अाक्रम्य स्वयमेव आभरणमाल्या लकारमयमुञ्चति, अवमुच्य स्वयमेव पञ्चमुष्टिक लोच करोति, कृपा योर मुत्रता आर्यास्तम उपागच्छति, उपागत्य चन्दते नमस्यति, पन्दित्ता नमस्थित्या एवमत्र दत्-'आलितेण भते ! लोए ' आदीतः खलु भदन्त ! लोका-हे आर्ये । एप लोको जन्म नरामरणादिभिर्दु खैः प्रज्वलितः, 'एव' अनेन प्रकारेण 'जहा देवाणदा' यथा देवानन्दा-देवानन्देव एपाऽपि सुबतानामन्ति के प्रवामिता, यारत्-एकादश अगानि अधीते, वहूनि वर्षाणि श्रामण्यपर्याय पालयति, पालयित्वा मासिक्या आपके पास धर्म सुना है सो उसके प्रभाव से यह ससार भय से उद्विग्न हो कर जन्म मरण से भीत, त्रस्त हो कर आपके पास दीक्षित रोना चाहती है। इसलिये हे देवानुप्रिये ! आप मेरे द्वारा दी गई इस शिष्य भिक्षाको अगीकार कीजिये । तय सुव्रता आर्यिका ने कहा- यथा सुख मा प्रतिवध कुरुष्व-(तएण सा पोहिला-सुव्वयाहिं अजादि एव वुत्ता समाणा रहतुट्ठा उत्तरपुरस्थिम दिमीभार्ग अवक्कमइ, अवक मित्ता सयमेव आभरणमल्लालकार ओमुयह, ओमुहत्ता सयमेव, पच मुहिय लोय करेह, करित्ता जेणेव सुब्वयाओ तेणेव उवागच्छद, उवा गच्छित्ता वइ नमसइ, वदित्ता णमसित्ता ण्व वयासी-अलित्ते ण भते । लेए एव जहा देवाणदा जाव एक्कारसअगाइ अहिजड, पहणि તેના પ્રભાવથી એ સંસારભયથી વ્યાકુળ થઈને જન્મ-મરણથી ભીત અને ત્રસ્ત થઈને તમારી પાસેથી દીક્ષા ગ્રહણ કરવા ઈચ્છે છે એટલા માટે હે દેવાનું પ્રિયે ! મારા વડે અપાતી આ શિષ્યા રૂપી ભિક્ષાને સ્વીકાર કરે ત્યારે ran सुनता मावि तेन ४धु है ' यथासुस मा प्रविध कुरुष्प' (तएण सा पोटिला सुब्धयाहि अजाहिं एव वुत्ता समाणा हहतुट्ठा उत्तर पुरस्थिम दिसो भाग अवक्कमइ, अवक्कमित्ता सयमेव आभरण-मल्लालकार ओमुयइ, ओमुइत्ता सयमेव, पचमुट्ठिय लोय करेइ, करिचा जेणेव सुब्धयाओ तेणेव उवागच्छइ, उवागच्छित्ता बदइ नममइ, वदित्ता. णमसित्ता एव वयासो- भलितेण भंते ! लोए एव नहा देवाणंदा जाव एक्कारसभगाइ अहिज्जइ. वहणि / .
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मनगारधर्मामृतवपिणी टीका १० १४ वेतलिपुभप्रधानचरितवर्णनम्
जाव उवणेइ, उवणिता, एवं क्यासी-एस णं देवाणुप्पिया।
कणगरहस्स रपणो पुत्ते पउमावईए अत्तए कणगज्झए नाम
कुमारे अभिसेयारिहे रायलक्खणसंपन्ने मए कणगरहस्स रन्नो
रहस्तियं सवटिए, एयं णं तुम्भे महयार रायाभिसे एणं अभि-
सिचह । सव्व च से उटाणपरियावणिय परिकहेइ । तएणं ते
ईसर० कणगज्झयं कुमार महयार रायाभिसेएणं अभिसिचंति।
तएणं से कणगज्झए कुमारे राया जाए, महया हिमवंत मलय.
वपणओ जाव रज्ज पसासेमाणे विहरइ। तएणं सा पउमा-
वई देवी कणगज्झय रायं सदावेइ, सद्दावित्ता, एवं वयासी-
एस णं पुत्ता | तव रज्जे य जाव अतेउरे य० तुम च तेतलि
पुत्तस्स अमच्चस्स पहावेण, तं तुमं ण तेयलिपुत्तं अमच्चं
आढाहि परिजाणाहि सकारेहि सम्माणेहि इत अन्भुट्टेहि, ठियं
पज्जुवासाहि, वयंतं पडिससाहेहि, अद्धासणेणं उवणिमंतेहि
भोग च से अणुउद्देहि । तएणं से कणगज्झए राया पउमावईए
देवीए तहत्ति पडिसुणेइ जाव भोगं च से अणुवड्इ ॥सू० ९॥
टीका-'तएण से ' इत्यादि । ततः खलु स फनकरथो राजा अन्यदा
कदाचित् । 'कालयम्मु गा सजुत्ते' कालवर्मेण स युक्तः= मृतश्चाप्यभवत् । तत'
'तएण से कणगरहे राया' इत्यादि ।
टीकार्थ-(तणं) इसके बाद (से कणगरहे राया अन्नया कयाइ)
वह कनकरथ राजा किसी एक दिन काल कवलित हो गया (तण्ण
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तएण से कणगरहे राया इत्यादि
Astथ-(तएण) त्या२५७ (से कणगरहे राया भन्नया कयाइ) ते ४२०
પકવલિત થઈ ગયે એટલે કે મૃત્યુ પામ્ય
हामारो मूलम्-तएण से कणगरहे सयाअन्नया कयाई कालधम्मुणम सजुत्ते यावि होत्था । तएण राईसर जाव गीहरणं करति, करित्ता, अन्नमन्न एव वयासी-एव राल देवाणुप्पिए । कणग- रहे राया रज्जे य जाब पुत्ते वियगिरथा, अम्हेणं देवाणुप्पिया। रायाहीणा रायाहिहिया रायाहीणकज्जा अय च णं तेतली अमच्चे कणगरहस्स रन्नो सबट्ठाणेसु सबभूमियासु लद्धप- चए दिन्नवियारे सव्वकज्जवट्टावए यावि होत्था, त सेय खलु अम्ह तेतलिपुत्त अमच्चं कुमारं जाइत्तपत्ति कटु अन्नमन्नस्स एयमट्ठ पडिसुणेति, पडिसुणित्ता, जेणेत्र तेतलिपुत्ते अमच्चे तेणेव उवागच्छति, उवागच्छिता, तेतलिपुत्त अमच्च एवं क्यासी-एव खल्लु देवाणुप्पिया । कणगरहे राया रज्जे य रहे य जाब वियगेइ । अम्हे यणं रायाहीणा जाव रायाहोणकज्जा, तुम च णं देवाणुप्पिया । कणगरहस्स रण्णो सम्बट्ठाणेसु जाव रज्जधुराचितए, तं जइण देवाणुप्पिया। अस्थि केइ कुमारे रायलक्खणसपन्ने अभिसेयारिहे, तणं तुम अम्ह दलाहि । जाणं अम्हे महयार रायाभिसेएणं अभिसिचामो । तएणं तेतलिपुत्ते तेसिं ईसर० एयम पडिसुणेइ, पडिसुणित्ता, कण- गज्झय कुमार पहाय जाव सस्सिरीय करेइ, करित्ता तेसि ईसर दिया। छेद कर आलोचित प्रतिक्रान्त बनी हुई यह समाधि प्राप्त रो गई और काल अवमर काल कर अन्यतर देवलोकमें देवता की पर्याय से उत्पन्न हो गई । सू. ८ ॥ છેદન કરીને આચિત પ્રતિકાત બનેલી તે સમાધિ પ્રાપ્ત થઈ ગઈ અને અવસરે કાળ કરીને અન્યતર કેવમા દેવતાના પર્યાયથી જન્મ પામીસ “” કાળ
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मनगारधर्मामृतवपिणी टीका २० १४ वेतलिपुमप्रधानवरितवर्णनम्
जाव उवणेइ, उवणित्ता, एवं क्यासी-एस ण देवाणुप्पिया।
कणगरहस्स रण्णो पुत्ते पउमावईए अत्तए कणगज्झए नाम
कुमारे अभिसेयारिहे रायलक्खणसंपन्ने मए कणगरहस्स रन्नो
रहस्तियं सवट्टिए, एयं णं तुम्भे महया२ रायाभिसेएणं अभि-
सिचह । सव्व च से उट्टाणपरियावणिय परिकहेइ । तएणं ते
ईसर० कणगज्झयं कुमारं महया२ रायाभिसेएणं अभिसिचंति।
तएणं से कणगज्झए कुमारे रायाजाए, महया हिमवंत मलया
वण्णओ जाव रज्ज पसासेमाणे विहरइ। तएणं सा पउमा-
वई देवी कणगज्झय रायं सदावेइ, सद्दावित्ता, एव वयासी-
एसणं पुत्ता | तव रज्जे य जाव अंतेउरे य० तुम च तेतलि
पुत्तस्स अमच्चस्स पहावेण, त तुमं ण तेयलिपुत्त अमच्चं
आढाहि परिजाणाहि सकारेहि सम्माणेहि इंत अब्भुट्टेहि, ठियं
पज्जुवासाहि, वयंतं पडिससाहेहि, अद्धासणेणं उवणिमंतेहि
भोग च से अणुउद्देहि । तएणं से कणगज्झए राया पउमावईए
देवीए तहत्ति पडिसुणेइ जाव भोग च से अणुवड्डेइ ॥सू० ९॥
टीका-'तएण से ' इत्यादि । ततः खलु स कनकरथो राजा अन्यदा
कदाचित् । ' काल पम्मु गा स जुत्ते' कालवर्मेण स युक्तः= मृतश्चाप्यभवत् । तत'
'तएण से कणगरहे राया' इत्यादि।
टीकार्य-(तराणं) इसके बाद ( से कणगरहे राया अन्नया कयाड)
वह कनकरथ राजा किसी एक दिन काल कवलित हो गया (तण्ण
तएण से कणगरहे राया इत्यादि
साथ-(तएण) त्यारपछी (से कणगरहे राया भन्नया कयाइ) २थ
મજા કઈ દિવસે કાલકવલિત થઈ ગયે એટલે કે મૃત્યુ પામે
, " भासामेश्याम खलु 'राईसर जार राजेश्वर यावत् राजेश्वरतलपरमाडमिककोदुम्बिकादि सार्यवाहप्रभृतयः तस्य 'णीहरणे' निहरण मृतककरप पुर्वन्ति, वा अन्यो ऽन्यमेवमयदन-एवं खलु हे देशानुमियाः । कन्कायो राना 'रज्जे य गाय इत्ते' राज्ये च यावत् पुत्रानराज्यादिपु मूर्षित उत्पन्नान् पुत्रान् 'रियगित्या' अध्यङ्गयत्-विकृताङ्गान् कृतगन् मारित नित्यर्थः । 'अम्देण' वय खलु देवानु मिया ! 'रायाहीणा' राजाधीना-राजपशातिनः, 'रायाहिहिया' राजाऽधि ठिता-राजाश्रिता इत्यर्थ', 'रायाही गफग्जा' राजाधीनकार्याः, रामामधीन कार्य राईसर जाव णीहरण फरेनि, करित्ता अन्नमन्न एव चयासी-एव स्वल्लु देवाणुप्पिए । कणगरहे राया रज्ने य जाय पुत्ते वियगित्वा ) राजेश्वर, तलवर, माडम्पिक, कौटुम्यिक, सार्धवाह आदि व्यक्तियों ने मिल कर उसका दाह सस्कार कियो । दाह संस्काररूप मृतक कृत्य करने के बाद फिर उन लोगों ने परस्पर में इस प्रकार का विचार किया। हे देवानु प्रियो ! देखो फनवरथ राजाने तो राज्य आदि में मूति रो कर उत्पन्न हुए समस्त पुत्रों को विकृत अग करके मार डोला है ( अम्हे देवाणुप्पियाराया हीणा रायाहिटिया रायाहीणफज्जा अय च ण तेत लीअमच्चे कणगरहस्स रन्नो सम्वट्ठाणेसु-सञ्चभूमियासु द्धपच्चए, दिनवियारे-सव्वकज्जवड्डाचए यावि रोत्था ) अय इस समय कोइ राजा है नही अतः हमलोगों का क्या रोगा क्यो कि हम लोग तो हे देवा नुप्रियो । राजा वशवर्ती है, राजा के आश्रित ही रहते आये हैं, हमारा (तएण राईसर जाव णीहरण करेंति, कारिचा अनमन्न एव वयासी-एव खलु देवाणुप्पिए ! कणगरहे राया रज्जे य जार पुत्ते वियगित्था) રાજેશ્વર, તલવર, માડબિક કૌટુ બિક, સાર્થવાહ વગેરે લેકેએ મળીને તેને અગ્નિ-સંસ્કાર કર્યો અગ્નિ-સંસ્કાર આદિ મૃત્યુ વિધિ પતાવીને તે લોકોએ પરસ્પર મળીને આ પ્રમાણે વિચાર કર્યો કે હે દેવાનુપ્રિયે! જુઓ, રાજા કનકરથે તે રાજ્ય વગેરેની બાબતમાં લોલુપ તેમજ મહિત થઈને ઉત્પન્ન થયેલા પિતાના બધા પુત્રના અગ કાપીને મારી નાખ્યા છે ( अम्हेण देवाणुप्पिया ! राया हीगा रायाहिहिया रायाहीण कजा, अय च ण तेतलीअमच्चे कणगरहस्स रनो सन्चट्ठाणेसु सबभूमियासु लद्धपच्चए, दि विचारे सव्वफजबड्डावए यावि होत्था) હવે અત્યારે કોઈ રાજા છે જ નહિ તે અમારી શી દશા થશે ? દેવાનુપ્રિયે ! અમે તે રાજાને વશવર્તી છીએ, રાજાને અધીન રહેવામાં જ . .
- . अनामामृतवर्षिगो टी० १० १४ सेतलिपुनप्रधानचरितवर्णनम् . येषा ते तथा, सर्वममाफ कृत्य राजाधीन वर्तते इति भावः । अयं च खलु तेतलि रमान्यः कनकरयस्य राज्ञ 'समठाणेसु' सर्वस्थानेपु-सधिविग्रहादिपु सर्वेषु कार्ये', ' सबभूमियामु' सर्वभूमिकाम = स्वाम्यमात्यगदुर्गकोपवलमुहृत्पौर- अणिरूपाष्टविधासु ' रुद्धपञ्चए 'लब्धप्रत्यय -लब्ध प्राप्त प्रत्ययो रिश्वासो यस्य सः, सालजनविश्वासपात्रमित्यदः, 'दिनवियारे' दत्तविचारः, दत्ता राजे वितीर्णः, विचार-शोभनो विचारो येन म , लोकोपकारि विचारदायक इति- भावः, ' सव्वकज्जवट्टावए ' सर्वकार्यवर्दक =राज्ये समस्तकार्यसम्पादस्थापि 'होत्या' अस्ति । 'त' तत्-तस्मात् कारगात् ' सेय' श्रेयः-उचित खलु अस्माकं तेतलिपुनममात्य कुमार जाइत्तए ' याचितुम् , अयमभिमाय -यदयममात्यो राज्ञ सफलकार्यनिर्वाहकः, अतस्तत्समीपे गत्वा कोऽपि राजलक्षणस पन्न कुमारो राजपदे स्थापनीय. ' इति वार्तालापमुपक्रम्य, समागते प्रसङ्गे, तत्पुत्रो राजपदे स्थापयितु याचनीय., 'ति' इति कृत्वा इति मनसि कृत्वा अन्यो- ऽन्यस्य एतमर्थ 'पटिसुगेति' प्रति गृण्वन्ति-स्वीकुर्वन्ति, 'पडिसणित्ता' प्रति श्रृत्य, यौव तेतलिपुत्रोऽमात्यस्तत्रैव उपागच्छन्ति, उपागत्य, एवमवदन्-एव खलु जितना भी कार्य होता है वह सब राजाधीन ही होता आया है। इस लिये तेतलिपुत्र जो अमात्य है चलो उनके पास चले क्यों कि वे ही कनकरय राजाके लिये सधिविग्रह आदि समस्त कार्यों में एव स्वामी, अमात्य, राष्ट्, दुर्ग कोश, घल, सुटत् और पौरश्रेणीरूप आठ भूमियों में विश्वसनीय थे । राजा के लिये ये ही लोकोपकारी कार्गे में सलाह दिया करते थे और ये ही राज्यमें समस्त कार्यों के संपादक हैं (त सेय खलु अम्ह तेतलिपुत्त अमच्चकुमार जादत्तए त्तिकट्टु अन्नमन्नस्स एय म पडिमुणेति, पडिसुणित्ता जेणेव तेनलिपुत्ते अमच्चे तेणेव उवाग- च्छति, उवागच्छित्ता तेतलिपुत्त अमच्च एव वयासी-एव खलु देवाणु- ટેવાઈ ગયેલા છીએ અમારા બધા કામે રજાધીન જ હોય છે એથી ચાલે આપણે સૌ મળીને અમાત્ય તેતલિપુત્રની પાસે જઈએ, કેમકે તેઓ જ રાજા કનકરથના સ ધિવિગ્રહ વગેરે બધા કામોમાં અને સ્વામી અમાત્ય, રાષ્ટ્ર દુર્ગ, કેરાબળ, સુહુત અને પૌર શ્રેણિરૂપ આઠ ભૂમિઓમા તે વિશ્વસનીય છે લોકેના હિત માટે તેતલિપુત્ર અમાત્ય જ સલાહ આપતા રહેતા હતા તેમજ રાજ્યના બધા કામને પાર પાડનારા પણ તેઓ જ છે (तसेय खलु अम्ह तेतलिपुत्त अमन्च कुमारंजाइत्तए नि कट्टु अन्नमन्नस्स एयमह पडिमुणेति, पडिमुणिचा जेणेव तेतलिपुत्ते अमच्चे तेणेव उवागच्छति, उत्तिा तलिपत्त अमच्च एव वयासो-एवं खलु देवाशुप्पिया ! कणगरहे , तापक हे देवानुप्रिय ! कनकरथो राजा राज्ये च राष्ट्रे च यापत् व्यगयति, वय च खल हे देवानुप्रिय ' राजाधीना यावद् रामाधीनकार्याः, त्वच सलु हे देशानुप्रिय ! पिया ! कणगरहे राया रजे य रहे य जार वियगेड, अम्हे य ण राया हीणा जाव रायहीणकजा, तुम च ण देवाणुप्पिया । कणगरहस्स रणो सवठ्ठाणेसु जाव रज्जधुरा चिंतए-त जइण देवाणुप्पिया । अस्थि केह कुमारे रायलस्खणसपन्ने अभिसेयारिहे, तरण तुम अम्ह दलाहि) इसलिये हमको उचित है कि हम तेतलिपुत्र अमात्य से कुमार की याचना करें। तात्पर्य इस का यह है कि ये तेतलिपुत्र अमात्य राजा के सकल कार्य निर्वाहक है-इसलिये उनके पास चलकर "कोई राज लक्षण सपन्न कुमार राजपद में स्थोपनीय है " इस पात की हम चर्चा करें। इस चर्चा के प्रसग में उनसे यह भी निवेदन करेगे कि आप अपने पुत्र की ही राज पद में स्थापित कर दीजिये। इस प्रकार का विचार उन्होंने किया। जय विचार स्थिर होचुका-तप सपने इस बात को एक मत से स्वीकार कर लिया। स्वीकार कर के फिर वे सयके सब जहा अमात्य तेतलिपुत्र थे वहा गये । वहा जाकर उन्होंने ऐसा कहा- हे देवानुप्रिय ! कनक रथ राजाने राज्य और राष्ट्र आदि में विशेष मू च्छित बनकर उत्पन्न हुए अपने समस्त पुत्रो को अगभग कर मारदाला राया रज्जे य रतु य जाब वियगेइ, अम्हे य ण देवाणुप्पिया ' कगगरहस्स रणो सबढाणेसु जाव रज्जधुराचिंतए-त जडण देवाणुप्पिया । अस्थि केइ कुमारे रायलक्खणसपन्ने अभिसेयारिहे, तण्ण तुम अम्ह दलाहिं) એથી અમને એ ઉચિત લાગે છે કે અમે તેતલિપુત્ર અમાત્યની પાસે જઈને રાજકુમારની યાચના કરીએ કારણ કે તેતલિપુત્ર અમાત્ય રાજાના બધા કામને સારી રીતે પાર પાડનાર છે, એટલા માટે તેમની પાસે જઈને રાજા થવા ચોગ્ય રાજ-લક્ષણ યુક્ત કેઈ કુમાર મળી શકે તેમ છે કે કેમ? તે વિશે ચર્ચા કરીએ આ જાતની વિચારણા કરતા કરતા અમે બધા તેમને એવી વિનતી પણ કરીશું કે તમે પિતાના પુત્રને જ રાજગાદીએ બેસાડી દે આમ તે લોકોએ મળીને વિચાર કર્યો આમ વિચાર પાકો થઈ ગયે ત્યારે સૌએ એકમત થઈને તેને સ્વીકારી લીધે સ્વીકાર કરીને તેઓ બધા ત્યાથી જયા અમાત્ય તેતલિપુત્ર હતા ત્યા ગયા, ત્યાં જઈને તેમણે તેતલિપુત્રને કહ્યું કે હું દેવાનુપ્રિયા કનકરથ રાજાએ શજ્ય અને રાષ્ટ્ર વગેરેમાં સવિશેષ મૂતિ એટલે કે મોહવશ થઇને જન્મ પામેલા પિતાના બધા જ ના અગે કાપીને ને મારી - - , - मनगारधामृतपिणी टी० अ० १४ तेतलिपुत्रप्रधानवरितवर्णनम् कनकरयस्य राज्ञः सर्वस्थानेषु यावत् ‘रज्जधुराचिंतए ' राज्यस्य धूः राज्यधुरा, तस्याश्चिन्तकः, राज्यभारनिर्वाहयामि, तद् यदि खलु देवानुप्रिय! अस्ति कोऽपि कुमारो राजलक्षणस पनः ' अभिसेयारिहे' अभिषेका? राज्याभिषेकयाग्यः, 'तण' त खलु त्वमस्मभ्य 'दलाहि' देहि 'जो' यस्मात् 'ण' त 'अम्हे' वय महता २ 'रायाभिसेएण' राज्याभिषेकेण राजयोग्येनाभिपेकेण अभि पिञ्चामः राज्ये स्थापयाम इत्यर्थः। ततः खलु तेतलिपुत्रः तेषाम् 'ईसर० ईश्वर०= ईश्वरतलपरमाडम्पिकादि सार्थबहप्रभृतीनाम् एतमर्थ 'पडिमुणेड' परिश्रृगोति= स्वीकरोति, प्रतिकृत्य स्वाकृत्य, कनक वन कुमार 'हाय सस्सिरीय ' स्नात यावत् सश्रीक, स्नात-कृतस्नानम् , यावद् मश्रीक्म्सलिङ्कारविभूपित शोभा- समन्वित च करोति, कृत्वा तेपाम् ' ईसर जार' ईश्वर यावत्-ईश्वरादीना सम्मुखे 'उपणे ' उपनयति, उपनीय परमादीद-एप खल हे देवानुमिया' है। अब इस समय राज पद में कोई नहीं है। हमलोग तो हे देवानुप्रिय । राजाधीन यावत् राजाधीन कार्य वाले हैं। और देवानुप्रिय ! कनक रथ राजा के लिये संधि विग्रह आदि समस्त स्थानों मे एव स्वामी अमा. त्य आदि आठ भूमियों में विश्वसनीय रहें हैं। राजो के लिये लोशेप. कारी कार्यो में आप सलाह देते रहे हैं । और आप ही राज्य भार के निर्वाहक है । इसलिये हमारी आपसे यह प्रार्थना है कि हे देवानुप्रिय! यदि राज्यलक्षण सपन्न कोई कुमार राज्य पद मे अभिषेक करने के योग्य होवे तो उसे आप हमें देवे । (जो ण अम्हे महयार रायाभिसे एण अभिसिंचामो। तएण तेतलिपुत्ते तेसि ईसरएयम पडिसुणेह, पडिसुगित्ता कणगझय कुमार पहाय जाव सस्मिरीय करेह, करिता तेसि ईसर जाव उवणेइ, उवणित्ता एव वयासी) कि जिससे हम उसे નાખ્યા છે. હવે અત્યારે રાજપદ માટે કોઈ રહ્યું નથી હે દેવાનુપ્રિય ! અમે લેકે તે રાજાધીન રહીને જ રહેતા આવ્યા છીએ અને હે દેવા સધિવિગ્રહ વગેરે પ્રાધા કામમાં એટલે કે સ્વામી અમાત્ય, વિગ્રહ વિગેરે તમામ કામમાં હમેશા વિશ્વાસપાત્ર રહ્યા છે, કહિતની બાબતમાં તમે રાજાને સલાહ આપતા રહ્યા છે, અને તમેજ રાજ્યના બધા કામોને પાર પાડતા આવ્યા છે એથી અમે તમને એવી વિનતિ કરીયે છીએ કે હે દેવાનુપ્રિય ! રાજ-લક્ષણવાળે અને અભિષિક્ત થઇને રાજગાદીએ બેસવા કેઈ કુમાર હોય તે તેને તમે અમને સે (जे ण अम्हे महया २ रायाभिसेएण अमिसिंचामो । तएण तेतलिपुचे तेसि ईमर एयम पडिमुणेइ, पडिसुणेत्ता कणगज्झय कुमार हाय जान सस्सिरीये करेइ, फरिचा तेसि ईसर नाव उवणेइ, उवणिता एव चयासी) નુપ્રિય ! તમે રાજા કનરથના - ६२ माताधर्माचार फनारथस्य राज्ञ पुनः पद्यापत्या देव्या आत्मन कनाचनी नाम कुमारः अभि पेकार्थी राजलक्षणसम्पन्नो मया कनफरथस्य राशो 'रहस्तिय 'रहस्थितप्रजम यथा स्यात्यो सादित , एत खलु यूय महता २ रानाभिषेकेण अभिपिश्चत । पुनः स स च 'से' तस्य 'उटाणपरियारगिय ' उत्यानपरियापनिम्म्- राज योग्य अभिपेक दारा अभिषिक्त कर राज्य में स्थापित करें। इस तरह के उन ईश्वर, तलवर, माडम्यिक आदि सार्थवार वगैरर के इस कथन रूप अर्थ को उस तेतलिपुत्र अमात्य ने स्वीकार कर लिया और स्वीकार करके कनक बज कुमार को उसने नहा बुवाकर मालकारों से विभूपित किया। विभूपिक करके फिर यह उसे उन ईश्वर तलवर आदिको के समक्ष ले आया । लाकर के उनसे उसने ऐसा करा-(एस ॥ देवानुपिया ! कणगरहस्स रणो पुत्ते पउमाईए अत्त कणगाए णाम कुमारे अभिसेयारिहे रायर स्वणसपन्ने मए कणगररस्स रण्णो रहस्सिय सड्डिएय ण तुम्मे महया मया रायाभिसेएण अभिति चह) हे देवोनुप्रियो ! यह कनफरथ राजा का पुत्र है जो पद्मावती की कुक्षि से जन्मा है। इसका नाम कनक चज कुमार है। अभिषेक के योग्य है और राजलक्षण सपन्न है। मैंने इसको कनकरथ राजा से छिपा कर पालापाषा है और वृद्धिंगत किया है। इसे आपलोग बडे भारी राजयोग्य अभिषेक के साथ राज्य में स्थापित कीजिये। (सव्व च से કે જેથી અમે તેને રાજ્યસને અભિષેક કરી શકીએ આ રીતે અમાત્ય તેતલિપુત્રે તે ઈશ્વર, તલવર, માઇબિક, સાર્થવાહ વગેરેના કથનને સ્વીકાર્યું અને સ્વીકારીને તેણે કનકજ કુમારને રનન કરાવ્યું અને ત્યારપછી બધા અલકારથી તેને શણગાર્યો ત્યારબાદ અમાત્ય તેતલિપુત્રે સુસજજ થયેલા કુમારને ઈશ્વર, તલવર વગેરેની સામે લાવ્યું અને તેઓને કહ્યું કે ( एसण देवाणुपिया ! कणगरहस्स रण्णो पुत्ते पउमावईए अत्तए कणगज्झए णाम कुमारे अभिसेयारिहे रायलरखणसपने मए कणगरहस्स रणो रहस्सिय सबट्टिए एय ण तुम्भे महया महया रायामिसेएण अभिसिंचह) હે દેવાનુપ્રિયે ! આ કનકરથ રાજાને પુત્ર છે અને પદ્માવતી દેવીના ગથી આને જન્મ થયે છે કનધ્વજ કુમાર આનું નામ છે આ કુમાર ન્યાસને બેસાડવા ચેય તેમજ રાજલક્ષણેથી યુક્ત છે રાજા કનકરને આ બાબતની જાણ નથી, એ આનુ પાલન તેમજ રક્ષણ છુપી રીતે કર્યું છે તમે ભારે મહત્સવતી સાથે આ કુમારને રાજગાદીએ બેસાડે । - - भनगारधामृतषिणी टीका म०४ तलिपुत्रप्रधानधरितवर्णनम् उत्थान जन्म, परियापनिका-जन्मानन्तरमद्यावधिका सनर्द्धनादिपरिस्थितिः, उत्थान च परियापनिका च-स्त्यानपरियापनिकम् जीरनचरित परिकथयनि । तत खलु 'ईसर०' ईसरतलबरमाडम्बिकादयः कनकधज कुमार महता २ राजाभिपेकेण अभिपिञ्चन्ति । ततः खलु स कनकध्वज कुमारो राजा जातः, स च कनकध्वजो राजा 'महया हिमवत' महाहिमवद्महाहिमसन्महामलय मन्दरमहेन्द्रसारः'-महाहिमवन्महामलयमन्दरमहेन्द्राणा सार इन सारो यस्य सः, उहाणपरियावणिय परिकहेइ, तएण ते ईसर० कणगजनय कुमार मया २ सयाभिसेएण अभिसिंचति । तएणं से कणगज्झरा कुमार राया जाए, मरया हिमयत मलय० घण्णओ जाव रजी पसासेमाणे विहरह, तएण मा पउमावई देवी कणगज्झय राय सद्दावेह, सद्दावित्ता एवं वयासी) ऐसा कहकर फिर उन तेतलि पुन अमात्य ने उस कनक वज कुमार का उत्थान-जन्म और परियापनी का जन्म से लेकर अभी तक की समस्त पालन पोपण सवर्द्धन आदि परिस्थिति रूप-जीपन चरित्र उन्हें कह सुनाया-इस के याद उन ईश्वर, तलवर, माडरिक एव कौटु म्पिक आदिकोंने कनकध्वज कुमार का बड़े जोर शोर के साथ राज्या भिषेक किया। राज्य में अभिषिक्त रोने के बाद वे कनकध्वज कुमार अब राजा बन गये। इसका सार-यल लोकमर्यादा कारी होने के कारण मश हिमवत् जैसा, यश और कीर्ति के फैलाव के कारण महामलय ( सय च से उहाणपरियारणिय परिकहेइ, तएण ते ईसर०कणगज्झयं कुमार महया २ रायाभिसेएणं अभिसिंचति । तएण से कणगज्ज्ञए कुमारे राया जाए, महया हिमवता मलय० वण्णओ जार रज्ज पसासेमाणे विहरइ, तएण सा पउमा- वई देवी कणगज्झय रायं सदावेइ, सदावित्ता एवं बयासी) આ પ્રમાણે કહીને તેતલિપુત્ર અમાત્યે તે કનકધ્વજ કુમારનું ઉત્થાન- જન્મ અને પિરિયાપનિકા એટલે કે જન્મથી માડીને અત્યાર સુધીની પિષણ સવદ્ધના વગેરેની જીવન ચરિત્ર સબધી બધી વિગત અથથી ઇતિ સુધી કહી સભળાવી ત્યારબાદ તે ઈશ્વર, તલવર, માડબિક અને કૌટુંબિક વગેરે લોકોએ કનકધ્વજ કુમારને બહુ જ મોટા પાયા ઉપર ઉત્સવ ઉજવીને રાજ્યાભિષેક કર્યો અભિષિક્ત થયા બાદ કનકધ્વજ રાજા થઈ ગયા હતા તેમનું બળ લેક મર્યાદાને રક્ષનાર હોવા બદલ મહાહિમવત જેવું હતું તેમના યશ અને કીતિ ચોમેર પ્રસરેલા હતા તેથી તે મહામલય જેવા હતા તેમજ તેઓ દૃઢ પ્રતિ- Mariपालन लोकमर्यादाकारित्वेन महाहिमवत्सर, ममतपश: कीवित्वेन महामलयतुल्य , हढानिसत्वेन वर्तव्यदिग्दर्शकत्वेन च मन्दरमहेन्दतुल्या, 'यष्णभोणक विशेष रूपेण अन्यतोऽवसेयः, 'जाब रज्ज पमासेमाणे ' यामाज्य प्रशामद् विहरति राज्य कुर्वन्नास्ते । ततः खलु सा पप्रारतीदेवी कनरवन गमान शब्दयति, शब्दयित्वा एवमवदत्-एतत् खलु हे पुत्र ! तर 'रज्जे य जाप अतेउरे य.' राज्य च यापदन्तः पुर च एनत्सव तेतलिपुनस्प प्रमानेन पर्सने 'त' तत्कार णात् त्व सलु तेलिपुरममात्य आढाहि' आदियस्व-आदर कुरुप परि जाणाहि , परिजानादिभवेक्षस्व तदनुमत्या सर्व कार्य सम्पादयेत्यर्थः सत्तारय वखादिना, सम्मानय माल्यादिना, 'इत' यन्तम् भागन्छन्तमेत तेतलिपुत्रम् 'अन्भुदेहि' अभ्युत्तिष्ठ अभ्युत्थानादिना विनय पदर्शयेत्यर्थ 'ठिय पज्जुवासादि' स्थिन पर्युपास्स सेवन, 'वयत 'यजन्त-गच्छन्तम् 'पडिसमाहेडि ' प्रतिमा धय-अनुगमनादिना प्रसादय, तथा 'अद्धामणेण उपणिमतेहि पीसनेन उपनि मन्त्रय स्वस्यासने तमुमवेषय, भोग-सुखसामग्रीरूप च 'से' तस्य अनुवर्द्धय । ततः स कनकध्वज 'पउमावईए देवीए' पपावत्या देव्याः वचन ' तहत्ति' के जमा, दृढप्रतिज्ञा वाले एवं कर्तव्य का दिग्दर्शन कराने वाले हाने के कारण मन्दर महेन्द्र-मेरू के जैसा था। और भी इन राजा के विषय का विशेष वर्णन दूमरों शास्त्रों से जान लेना चाहिये। यावत् इस तरह ये कनक वज कुमार अपने राज्य के शासन करने में तत्पर बन गये। इसके बाद उस राजमाता पद्मावतीदेवो ने उन कनकध्वज राजाको अपने पास बुलाया और बुलाकर फिर उनसे उसने इस प्रकार का-(तएण पुत्ता ! तव रजे य जाव अतेउरेय. तुमच तेतरि पुत्तस्स अमच्चस्स पहा वेण, त तुम ण तेतलिपुत्त अमच्च आढाहि,परिजाणाहि,सकारेहि,सम्मा णेहि, इत अब्भुटेरि ठिय पज्जुवासाहि, वयत पडिससाहेहि, अद्धामणेण સાવાળા અને કર્તાને બતાવનાર હોવા બદલ મન્દર મહેન્દ્ર-મેરુ જેવા હતા રાજા કનકવિજ વિશે સવિશેષ વર્ણન બીજા શાસ્ત્રોમાં વર્ણવ્યુ છે, જીજ્ઞાસુઓએ ત્યાથી જાણી લેવું જોઈએ આ પ્રમાણે તે કનકધવજ કુમાર પોતાના રાજ્યના વહીવટને સંભાળવા માટે સાવધ થઈ ગયા ત્યારપછી ૨ જમાતા પદ્મ વતીદેવીએ કનકધ્વજ રાજાને પોતાની પાસે બોલાવ્યા અને બેલાવીને તેમને આ પ્રમાણે કહ્યું કે (तएण पुत्ता ! तब रज्जे य जाव अतेउरेय तुम च तेतलिपुत्तस्स अमञ्चस्त पहावण, त तुम ण तेतलिपुत्र अमच्च आदाहि, परिजाणाहि. सक्कारेहि. Rm ! - ममगारधर्मामृतदपिणी टी० १० १५ तेतलिपुत्रप्रधानधरितवर्णनम् तथेति तथास्तु' इतिकृत्वा प्रतिभृणोति-स्वीकरोति प्रतिश्रुत्य तथैर कुर्वाण पावद् भोगं च तस्य अनुबर्द्धयति ॥ ९ ॥ उवणिमतेहि, भोगंच से अणुवड्डेहि । तएण से कणगज्झए राया पउमाव- ईश देवी तहत्तिपडिप्सुणेड.जाव भोगचसे अणुरड्डेड) हे पुत्र! यह तुम्हारी राज्य और अतः पुर तथा तुम स्वय यह जो कृल है वह सय तेतलिपुत्र अमान्य के प्रभाव से ही है इसलिये तुम तेतलिपुत्र अमात्य का आदर करते रहो, उनकी अनुमति से काम किया करो उनका वस्त्रादि द्वारा नमय २ पर सत्कार करते रहो, अभ्युत्थानादि सन्मान करते रहो और जय तेतलिपुत्र तुम्हें आते हुए दिग्वलाई दे तो तुम उठकर इनके प्रति अपना विनय प्रदर्शित किया करो। जर ये जावे-तर तुम पैठ कर इनकी सेवावृत्ति किया करो, जब ये चलने लगे तो तुम इनके पीछे २ थोड़ी दूर तक अपने महलों में पहुँचाने जाया करो, अपने बैठने के आसन पर इन्हें अर्धभाग में बैठाया करो और जो भी सुख साधनकी सामग्री है यह इनकी यढ़ा दो। इस प्रकार रोजमाता पद्मावती देवी के घचनों को “तथास्तु" कहकर कनक वज राजाने स्वीकार कर लिया। हि इत अभुढेहि ठिय पज्जुवासाहि वय त पडिससाहेहि, अद्वामणेण उवणिम तेहि, भोग च से अणुउद्देहि । तएण से कणगज्झए राया पउमाईए देवीए तहत्ति पडिमुणेइ, जाव भोग च से अणुबड्ढेइ ) હે પુત્ર? આ તમારૂ રાજ્ય રવાસ તેમજ તમે પોતે આ બધુ જે કઈ છે, તે સર્વે તેતલિપુત્ર અમાત્યને પ્રભાવથી જ છે એથી તમે તેને લિપુત્ર અમાત્યને સદા આદર કરતા રહો, દરેક કામ તેમની આજ્ઞાથી કરતા રહે, વસ્ત્રો વગેરે આપીને યથા સમયે તેમને સત્કાર કરતા રહે, તેમનુ સમાન કરતા રહો અને અમાત્ય તેતલિપુત્ર તમને આવતા દેખાય ત્યારે તમે ઉભા થઈને તેમના પ્રતિ વિનય યુક્ત થઈને વ્યવહાર કરે જ્યારે તેઓ જવા તૈયાર થાય ત્યારે તમે બેસીને તેમની સેવા કરતા રહે અને જ્યારે તેઓ ચાલવા માટે તમારે તમે તેમની પાછળ પાછળ છેડે દૂર સુધી પિતાના મહેલ માજ વિદાય આપવા માટે તેમનું અનુકરણ કરતા જાઓ તમે તેમને પિતાના આસનના અભાગ ઉપર બેસાડે અને તેમની બધી સુખસગવડની સામગ્રી માં વધારો કરી આપ આ રીતે રાજમાતા પદ્માવતી દેવીની આજ્ઞાને કનક Earn raun 'तान्तु' डीन स्वीारी दीधी, पीआर्या ५० तेमात marwथान - - . - लोकमर्यादाकारित्वेन महाहिमवत्सहन , मस्तपः कीर्तिवन महामलयतुल्य , हदप्रतिसत्वेन वर्तव्यदिग्दर्शकत्वेन च मन्दरमहेन्द्रनुत्पः, 'यणभो वर्णक विशेष रूपेण अन्यतोऽवसेयः, 'जाब रज्ज पमासेमाणे ' यारमान्य प्रशामद् विहरति राज्य कुर्वन्नास्ते । ततः खलु सा पपातीदेवी फनस्पन गनान शमति, शब्दयित्या एमपदव-एतत् खलु हे पुत्र ! तर 'रजे य जार अनेउरे य. राज्य च यावदन्त' पुर च एतत्सर्व तेतलिपुनस्प प्रमान पती'त'वकार णात् त्व खलु तेतलिपुरममात्य 'आदाहि' आदियस्प-भादर कुरुप परि जाणाहि , परिजानादि-प्रवेशस्त्र सदनुमस्पासा कार्य सम्पादयेत्पर्यः सत्कारप वस्त्रादिना, सम्मानय माल्यादिना, 'इत' यन्तम् मागन्छन्तमेत तेतलिपुत्रम् 'अन्भुदेहि ' अभ्युत्तिष्ठ अभ्युत्थानादिना विनय प्रदर्शयेत्यर्थ 'ठिय पज्जुवासादि' स्थित पर्युपास्य सेवस्त, 'चयत ' जन्त-गच्छन्तम् 'पडिसंपादेडि' प्रविसमा धय-अनुगमनादिना प्रसादय, तथा 'अद्धामणेण उपणिमतेहि' अर्धासनेन उपनि मन्त्रय स्वस्यासने तमुमवेषय, भोग-मुखसामग्रीरूप च ' से ' तस्य अनुवर्द्धय । ततः स कनकध्वज' 'पउमावईए देवीए' समारत्या देव्याः पचन तहत्ति' के जमा, दृढप्रतिज्ञा वाले एक कर्तव्य का दिग्दर्शन कराने वाले होने के कारण मन्दर महेन्द्र-मेरू के जैसा था। और भी इन राजा के विषय का विशेष वर्णन दूमरों शास्त्रों से जान लेना चाहिये। यावत् इस तरह ये कनकवज कुमार अपने राज्य के शासन करने में तत्पर बन गये। इसके पाद उस राजमाता पद्मावतीदेवो ने उन कनकध्वज राजाको अपने पास बुलाया-और बुलाकर फिर उनसे उसने इस प्रकार कहा-(तएण पुत्ता तव रजे य जाव अतेउरेय तुमच तेतलिपुत्तस्स अमच्चस्स पहा वेण, त तुम ण तेतरि पुत्त अमच्च आढाहि,परिजाणाहि,सकारेरि,सम्मा णेहि, इत अब्भुट्टेहि ठिय पज्जुवासारि, चयत पडिससाहेरि, अद्धासणेण જ્ઞાવાળા અને કોને બતાવનાર લેવા બદલ મન્દર મહેન્દ્ર-મેરુ જેવા હતા રાજા કનકવન વિશે સવિશેષ વર્ણન બીજા શાસ્ત્રોમાં વર્ણવ્યું છે, જીજ્ઞાસુઓએ ત્યાથી જાણી લેવું જોઈએ આ પ્રમાણે તે કનકધ્વજ કુમાર પિતાના રાજ્યના વહીવટને સંભાળવા માટે સાવધ થઈ ગયા ત્યારપછી ૨ જમાતા પદ્મ વતીદેવીએ કનકદેવજ રાજાને પેતાની પાસે બે લાવ્યા અને બોલાવીને તેમને આ પ્રમાણે કહ્યું કે (तएण पुत्ता ! तब रज्जे य जाब अतेउरेय तुम च तेतलिपुत्तस्स अमञ्चस्स पहावेण, त तुम ण तेतलिपुत्त अमच्च आढाहि, परिजाणाति, सक्कारेहि, सम्मा Witiहिंगो टी० म० १४ तेतलिपुत्रप्रधानचरितनिरूपणम् अन्भुट्टेइ, अणादायमाणे, अपरियाणमाणे, अणभुट्ठायमाणे, परम्मुहे संचिट्ठइ । तएणं तेतलिपुत्ते कगगझ यस्त अनलिं करेइ । तएणं से कणगज्झए राया अणाढायमाणे तुसिणीए परम्मुहे संचिठुइ । तएण तेतलिपुत्ते कणगज्झय विप्परिणयं जाणित्ता भीए जाव संजायभए एव वयासी-रुटेण मम कण- गज्झए राया हीणे णं मम कणगज्झए राया, अवज्झाए णं ममं कणगज्झए, राया त ण नजइ णं मम केणइ कुमारेण मारेहिइ त्ति कटु भीए तत्थे५ जाव सणियर पञ्चोसकाइ, पच्चो- सकित्ता, तमेव आसखध दुरूहेइ, दुरूहित्ता, तेतलिपुर मज्झ- मझेणं जेणेव सए गिहे, तेणेव पहारेत्थ गमणाए । तएणं तेतलिपुत्त जे जहा ईसर जाव पासंति, ते तहा नो आढायति नो परियाणंति नो अब्भुटुंति नो अंजलिपरिग्गह करेंति, इटाहिं जाव णो संलवति नो पुरओ य पिटुओ य पासओ य मग्गओ य समणुगच्छति । तएण तेतलिपुत्ते जेणेव सए गिहे तेणेव उवागच्छइ । उवागच्छित्ता जाविय से तत्थ बाहिरिया परिसा भवइ, त जहा-दासेइ वा पेसेइ वा भाइल्लएइ वा सावि य शं नो आढाइ नो परियाणाइ नो अब्भुट्टेइ,जाविय से अभि- तरिया परिसा भवइ, त जहा - पियाइ वा मायाइ वा जाव सुण्हाइ वा सावि य ज नो आढाइ, नो परियाणाइ, नो अब्भुटेइ । तएणं से तेतलिपुत्ते जेणेव वासघरे जेणेव लए सयणिज्जे तेणेव उवागच्छइ, उवागच्छित्ता, सयणिजांसि णिसी.
, merपमेनचा मूलम् तएणं से पोट्टिले देवे तेतलिपुत्तं अभिक्खणं २ केवलिपन्नत्ते धम्मे संघोहेइ, नो चेव णं से तेतलिपुत्ते संबु ज्झइ । तएणं तस्स पोहिलदेवस्स इमेयारूवे अज्झथिए५ एवं खल्लु कणगज्झए राया तेतलिपुत्तं अढाइ जाव भोग च से बड्डेइ तएणं से तेतलीपुत्ते अभिक्खणं सोहिजमाणे वि धम्मे नो संबुज्झइ, त सेय खलु मम कणगज्झय रायं तेतलिपुत्ताओ विप्परिणामेत्तए तिकटु एव सपहेइ, सपेहिता, कणगज्झयं तेत- लिपुत्ताओ विप्परिणामेइ । तएणं तेतलिपुत्ते काहं हाए जात्र पायच्छित्ते आसखधवरगए वहूहि पुरिसहि सपरिवुडे साओ गिहाओ णिग्गच्छइ,णिग्गच्छित्ता जेणेव कणगज्झए राया तेणेव पहारेथए गमगाए । तएणं० तेतलिपुत्त अमञ्च जे जहा बहवे राईसरतलवर जाव पभियाओ पासति, ते तहेव आढायंति, परिजाणति, अब्भुटुंति, आढाइत्ता, परिजाणित्ता, अभुद्वित्ता, अंजलिपरिग्गहं करेंति, इटाहि कंताहि जाव वग्गूहि आल- वेमाणा य सलवेमाणा य पिटुओ य पासओ य भग्गओ य समणुगच्छति तएणं से तेतलिपुत्ते जेणेव क्णगज्झए राया तेणेव उवागच्छइ । तएणं से कणगज्झए राया तेतलिपुत्त एजमाणं पासइ, पासित्ता, नो अढाइ, नो परियाणाइ, नो स्वीकार करके फिर उन्होंने वैसा ही सब कुछ करते हुए तेतलिपुत्र अमात्य की यावत् सुख साधन सामग्री बढ़ा दी । सू०९॥ પ્રમાણે જ બધુ કરતા તેતલિપુત્ર અમાત્યની સુખસગવડ વગેરેની સામગ્રીમા વધારો કરી આપે સૂટ ૯ I - , अनगारधर्मामृतपिणी टी० म० १४ सेतलिपुत्रप्रधानचरितवर्णनम् रिए, तत्य वि से धारा ओपल्ला को मेयं सहहिस्सइ । तेतलि- पुत्तेणं पासगं गीवाए बंधेत्ता जाव रज्जू छिन्ना को मेय सदहि- स्सइ? तेतलिपुत्तेणं महइमहालयं जाव बंधित्ता अत्थाहे जाव उदगसि, अप्पामुक्के, तत्थ वि य णं थाहे जाए को मेयं सद्द. हिस्सइ १ तेतलिपुत्तेणं, सुक्कसि तणकूडसि अगणिकायं पक्खि- वित्ता अप्पामुक्को तत्थ वि से अगणिकाए विज्झाए, को मेयं सदहिस्सइ ' ओहयमणसंकप्पे जाव झियाइ ॥ सू० १० ॥ टीका-'तएण से पोहिले ' इत्यादि । तत खलु स पोट्टिलोदेवस्तेतलि- पुत्रम् 'अभिक्खग २' अभीक्ष्णम् २=पुनः पुनः केवलिप्रज्ञप्ते धर्मे समोरयति । परन्तु नो चैन खलु स तेतलिपुत्र ‘सयुज्झइ' सम्बुध्यतेपतिबोध प्राप्नोति । वतः ग्वलु तस्य पोटिलदेवस्य 'इमेयारूपे' अयमेतदूपः=पुरउच्यमानः 'नज्झ थिए । ५-आध्यात्मिकः चिन्तितः प्रार्थितः मनोगत सफल्प. समुद्र पद्यत । सकल्पप्रकारमाह-' एव खलु' इत्यादि । एक खल कनक वजो राजा तेतलि. पुत्र आद्रियते यावत् भोग च सनर्द्धयति, वत' खलु स तेतलिपुरोऽभीक्ष्ण २ मया तएण से पोहिले' इत्यादि । टीकार्य-(तएण) इसके बाद से पोहिले देवे) वह पोहिलाका जीव देव (तेतलिपुत्त अभिक्खण २ केवलिपमत्त धम्मे संयोहेइ, नो चेव ण से तेतलिपुत्ते सयुझइ) तेतलिपुत्र अमात्यको चार यार केबलिप्रज्ञप्त धर्ममें प्रतियोधित करने लगा परन्तु तेतलिपुत्र प्रतियोध को प्राप्त नहीं हुआ। (तएण तस्स पहिलदेवस्स इमेयारूवे अज्झथिए ५-एव खलु कणज्झए राया तेतलिपुत्त अढाइ, जाव भोग च स वड्डेइ, तएण से तेनलिपुत्ते अ. तएण से पोहिले इत्यादि ॥ साथ-(पएण) त्या२ ५७ (से पोट्टिले देवे) ते पाहताना यह (तेतलिपुत्त अभिक्खण २ केवलिपनचे धम्मे सबोहेइ नो चेरण से तेतलि पुत्ते संबुज्झइ) તેતલિપુત્ર અમાત્યને વારવાર કેવળિ પ્રજ્ઞપ્તધર્મમાં પ્રતિબંધિત કરવા લાગ્યું પણ તેતલિપુત્રને પ્રતિબંધ પ્રાપ્ત થશે નહિ (तएण तस्स पोट्टिलदेवस्स इमेयारूवे अज्जस्थिर ५-एव खलु यणगज्झए राया तेतलिपु च आढाइ, जाव भोग च संवड्डे, तणं से तेतलिपुत्ते अभिक्खणं
-
,
२८
भाताधर्मपाल
यइ, णिसीइत्ता, एवं वयासी-एव खलु अहं सयाओ गिहाओ
णिग्गच्छामि, त चेव जाव अभितरिया, पुरिसा नो आढाइ
नो परिजाणाइ, नो अब्भुठेइ, ते सेयं सल मम अप्पाणं जी
वीयाओ ववरोवित्तएत्तिकटु, एवंसपेहेइ, संहिता तालउडं विसं
आसगंसि पक्खिवइ, से य विसे णो संकमइ । तएणं तेतलि.
पुत्ते नीलुप्पल जाव असि खधंसि ओहरइ, तत्व विय से धारा
ओपल्ला । तएणं से तेतलिपुत्ते जेणेव असोगवणिया तेणेव
उवागच्छइ, उवागच्छित्ता पासगं गीवाए बधइ, बधित्ता अप्पाणं
मुयइ, तत्थ वि य से रज्जू छिन्ना । तएणं से तेतलिपुत्ते महइ
महालय सिल गीवाए वधइ, बंधित्ता अस्थाहमतारमपोरिसि-
यसि उदगंसि अप्पाणं मुयइ, तत्थ वि से थाहे जाए । तएणं
से तेतलिपुत्ते सुक्कंसितणकूडसि अगणिकाय पक्खिवइ, पक्खि.
वित्ता मुयइ, तत्थ वि से अगणिकाए विज्झाए। तएण से
तेतलोपुत्ते एव वयासी-सद्धेय खल्ल भो समणा वयंति, सद्धेय
खलु
भो माहणा वयति, सद्धेय खलु भो समणामाहणा वयति,
अह एगो असद्धेयं वयामि, एव खलु अहं सहपुत्तेहिं अपुत्ते
को मेय सहहिस्सेइ ? सहमित्तेहि अमित्ते, को मेय सदहिस्साई,
एव अत्थेणं दारेण दासेहिं परिजणेणं एव खलु तेतलिपुत्तेणं
अमञ्चे कणगज्झएणं रन्ना अवज्झाएणंसमाणेणं तेतलिपुत्तेणं
तालपुडगे विसे आसगसि पक्खित्ते, से वि य णो कमइ को
मेय सदहिस्सइ ? तेतलिपुत्तेणं नीलुमल जाव खपति, ओह.
.
" , मनगारधर्मामृतषिणी टी० १० १४ तेतलिपुत्रप्रधानचरितवर्णनम् रिए, तत्थ वि से धारा ओपल्ला को मेयं सदहिस्सइ । तेतलि- पुत्तेणं पासगं गीवाए वर्त्ता जाव रज्जू छिन्ना को मेयं सदहि- स्सइ? तेतलिपुत्तेणं महइमहालयं जाव वंधित्ता अस्थाहे जाव उदगति, अप्पामुक्क, तत्थ वि य णं थाहे जाए को मेयं सद्द. हिस्सइ ? तेतलिपुत्तेणं, सुक्कसि तणकूडसि अगणिकायं पक्खि- वित्ता अप्पामुक्को तत्थ वि से अगणिकाए विज्झाए, को मेयं सद्दहिस्सइ ? ओहयमणसंकप्पे जाव झियाइ ॥ सू० १०॥ टीका-'तएण से पोटिले ' इत्यादि । तत खलु स पोट्टिलोदेवस्तेतलि पुत्रम् 'अभिवण २' अभीक्ष्णम् २-पुनः पुनः केवलिपज्ञप्ते धर्मे सपोपयति । परन्तु नो चैव खलु स तेतलिपुन 'संयुज्झइ' सम्बुध्यते मतिपोध प्राप्नोति । ततः ग्वलु तस्य पोटिलदेवस्य 'इमेयारूवे' अयमेतद्रूप =पुरउच्यमानः 'जज्झ- थिए ' ५=आध्यात्मिक चिन्तितः प्रार्थितः मनोगत सकल्प. समुद्र पद्यत । सकल्पप्रकारमाह-' एव खलु' इत्यादि । एस खलु कनक बजो राजा तेतलि- पुत्र आद्रियते यावत् भोग च सरर्द्धयनि, ततः खलु स तेतलिपुगेऽभीक्ष्ण २ मया 'तएण से पोहिले ' इत्यादि । टीकार्य-(तएण) इसके बाद से पोहिले देवे) वह पोहिलाका जीव देव (तेतलिपुत्त अभिक्खा २ केवलिपनत्त धम्मे संयोहेह, नो चेव ण से तेतलिपुत्ते मयुज्झइ) तेतलिपुत्र अमात्यको चार यार केवलिप्रजप्त धर्ममें प्रतियोधित करने लगा परन्तु तेतलिपुत्र प्रतियोध को प्राप्त नहीं हुआ। (तएण तस्स पहिलदेवस्स इमेयारूवे अज्झथिए ५-एव खलु कणज्झए राया तेतलिपुत्त अढाइ, जाव भोग च स वड्डे, तएण से तेनलिपुत्ते अ- तएण से पोहिले इत्यादि । साथ-(तएण) त्या२ ५७ (से पोट्टिले देवे) तपाहिकान पर (तेतलिपुत्त अभिक्खण २ केवलिपनत्वे धम्मे सबोहेइ नो चेव ण से तेतलि पुत्ते संबुज्झइ) તેતલિપુત્ર અમાત્યને વારવાર કેવળિ પ્રાપ્તધર્મમાં પ્રતિબંધિત કરવા લાગ્યું પણ તેતલિપુત્રને પ્રતિબંધ પ્રાપ્ત થયો નહિ (तएण तस्स पोट्टिलदेवस्स इमेयारूवे अज्जस्थिए ५-एव खलु यणगज्झएँ राया तेतलिपु त आढाइ, जाव भोग च संबडे, तएणं से तेतलिपुचे अभिक्खणं .
५० साधकथासो 'सानिमाणेपि' संगो यमानोऽपि धर्मों नो सयुपतेमविवोध न प्राप्नोति । 'तं तत्रमान कारणात् श्रेयः सलु मम रनकपज रानान तेतलिपुनगइ विरि णमयितुम् तटिपुनरिपये कनक धनस्य मानसिको गायो यया पिरिणतो भये तथा कर्तु पुनितम् , उतिकता इति मनमि पिचार्य 97 समेलते विचारयति स प्रेक्ष्य कनक बज तेतलिपुत्राद् विपरिणमयति-रिपरीत करोति । ततः खलु तेतलिपुत्र 'मल्ल 'यल्ये दितीयस्मिन् दिने प्रायः 'हा जात्र पायरिउत्ते' स्नानो यावन् पायवित्त =नात कृतस्नानः याच पदन कृतालिफर्मागाकादि निमित कृतानभाग कृतकोतकमागल्यप्रायश्चित्ता-कतानि कौतुनि दुःस्वप्नादि दोपनिनारणा मपीपुण्डादीनि-मागल्यादीनि = मगरकारकागि दक्षतादीनि मायश्चित्तपदवश्यं कर्तव्यानि येन सः, 'आमरसागर' अवस्कन्ध चरगत =अश्वारूढ' बहुभि पुस्पै सपरितः स्वस्माद् गृहाद् निर्गन्छति, निर्गस्य भिक्खण २ स घोहिन्जमाणे वि धम्मे नो सयुज्झइ, त सेय चलु मम कणगज्य राय तेतलिपुत्ताओ पिप्परिणमेत्तए त्ति कटु एव सपेहेह) तब उस पोट्टिल देवको ऐमा आ यात्मिक यावत् मनोगत सकल्प उत्पन्न हुआ कनकध्वज राजा तेतलिपुत्र अमात्यका आदर करते हैं यावत् वे उनके सुग साधनकी सामग्री बढ़ा दिया है-इसलिये मेरे द्वारा पार बार प्रतियोधित करने पर भी वे धर्म में प्रतियुद्ध नही बन रहे हैं-प्रतिरोध को प्राप्त नहीं हो रहे हैं। इसलिये मुझे अय ऐसो करना चाहिये कि जिससे तेतलिपुत्र के विषय में कनकध्वज राजा का मानसिक विचार घदन जावे । इस प्रकार का विचार उस देवके मनमें जगा (सपेहिता कणगज्झय तेतलिपुत्ताओ विप्परिणामेइ, तएण तेतलिपुत्ते कल्ल हाए २ समोहिज्जमाणे नि धम्मे नो सबु-झइ, त सेय खलु मम कणगज्मय राय तेतलिपुत्ताओ विप्परिणामेत्तए ति कटु एवं सपेहेइ) ત્યારે તે દેવરૂપ પિફ્રિલાના જીવ દેવને એવો આધ્યાત્મિક યાવતું મને ગત સક૯૫ ઉભા કે રાજા કનકધવજ અપાય તેતલિપુત્રને આદર કરે છે તેઓએ તેમની બધી જાતની સુખસગવડની સામગ્રીમાં વધારે પણ કરી આપે છે, એથી મારવડે વારંવાર પ્રતિબંધિત કરવા છતાએ તેઓ ધર્મમાં પ્રતિબુદ્ધ થઈ જતા નથી એટલે કે તેમને વાર વાર પ્રેરણા આપવા છતા પ્રતિબંધ થયે નથી એટલા માટે હું હવે એ પ્રમાણે કઈક કરૂ કે જેથી રાજા કનકધ્વજના માનસિક વિચારે અમાત્ય તેતવિપુત્રને માટે પ્રતિકૂળ થઈ જાય તે દેવે મનમાં આ જાતને વિચાર કર્યો (सपेहिता पणगज्झय तेतलिपुत्ताओ विष्परिणामेइ तएण तेतलिपुत्ते कल्ले हाए जान पायच्छित्ते आसखयवरगपु, बहूदि परिसेहिं सपरितुरे, गिहाओ થાવત્ मनगरमामृतपपिणी टी0 40 1 सेतलिपुभप्रधानचरितवर्णनम् पौव कनकध्वजो राजा तौर 'पहारेत्य गमगाए' माधारयद् गमनाय-प्रस्थित वान् । तत खल तेतलिपुरममात्य 'जेनहा' ये यथान्येन प्रकारेण वहको 'राई सरतलवरजावपभियो 'राजेधरतलवर यारत्मभृतयः, राजेश्वरतत्परा यः पश्यन्ति, ते तौर तममात्यमाद्रियन्ते नमस्कारादिना परिजानन्ति शुभारमनमित्यनुमो- दयन्ति, अभ्युनिष्टन्ति अभ्युत्थान कुर्वन्ति, आदृत्य परिक्षाय, अभ्युत्थाय अञ्जलि- परिग्रह कुर्वन्ति, तथा इष्टाभिः कान्ताभि. यावत्-मियाभिमनोज्ञाभिर्मनोऽमाभिः' जाय पायच्छितं आसखधवरगए, यहिं पुरिसेहिं स परिचुडे, सामो गिहाओ, णिग्गच्छद, गिचित्ता जेणेव कणगज्झए राया तेणेच पहारेथ गमणाप, तण्ण तेतलिपुत्त अमच्चं जे जहा यहवे राईसरत लवर जाव पभियाओ पासति ते तहेव आढायति परियाणति, अम्भु- ट्रेनि) इस विचार के आते ही उस देवने कनकध्वज राजा को तेतलि पुत्र अमात्य के प्रति विपरीत परिणमादिया। जर द्वितीय दिन प्रातः काल स्नान कर पलिफर्म, कर-काकादि निमित्त अन्न का विभाग कर, कौतुक, मंगल, प्रायश्चित्त कर-दुःस्वप्न आदि दोषो को निवारण करने के लिये मपी पुण्ड्रादि और मगल कारक क्षितादि तथा प्रायश्चित्तकी तरह आवश्यक कृत्य समाप्त कर-वह तेलिपुत्र अमात्य घोडे पर बैठ कर जर अनेक पुरुषों के साथ सार अपने घर से निकला तब निकल कर वह अस ओर गया जहा कनक वज राजा थे । तेतरि पुत्र अमात्य को ज्यो ही राजेश्वर आदि को ने आता हुआ देखा तो उन्होंने पहिले तरह ही उसका आदर किया, उमके आगमन की सराहना की गिगन्छिइ णिग्गच्छित्ता जेणेव क्णगज्झए राया तेणेव पहारेन्थ गमणाए,तएण. तेतलिपुत्त अमच जे जहा वहवे राईसर तलवर जाव पभियाओ पासति ते तहेव आहायति पमियाणति, अभुति ) આ જાતને વિચાર ઉત્પન્ન થતા જ તે દેવે અમાત્ય તતનિપુત્ર ને માટે રાજા કનકબજને પ્રતિકૂળ બનાવી દીધે બીજા દિને સવાર થતા સ્નાન, બવિ કર્મ, (ક ગડા વગેરે પક્ષીઓ માટે અવભાગ અપવ) તુક, મગળ, પ્રાય શ્ચિત્ત-એટલે કે સ્ત્રમ વર્ગના દેના ઉરામન માટે મણી પુર, વગેરે તેમજ મગળ કારક દુર્વા અક્ષત (ચોખા) વગેરેથી પ્રાયશ્ચિત્ત ની આવશ્યક વિધિઓ પતાવીને ઘણા પુરુથી વીટળાઈને અમાત્ય તતવિપુત્ર ઘેડ ઉપર સવાર થઈને જ્યાં કનવજ રજા હતા ત્યા ગયે અમાત્ય તેતવિપુત્રને આ વતા જોતાની સાથે જ રાજેશ્વર વગેરે લોકોએ પહેલાની જેમ જ તેમને આદર કર્યા તે ગાનની સરાહના કરી અને બધાએ ઉભા થઈને તેમને વધાવી લીધા । की , ६० धाताधर्मकथा 'सपाहिज्नमाणेपि' संगो यमानोऽपि धर्मों नौ सयुध्यते-प्रतिपोध न प्राप्नोति । 'तं तत्रमान कारणात् श्रेयः सलु मम पनरूपज रान तेतलिाग विरि मयितुम् तरिपुरिपये कनकधनस्य मानसिमो माग गया रिपरिणतो भये तथा र्तुनितम् , तिमत्ता इति मनमि चिार्य एा समेते पिचारपति सप्रेक्ष्य कनक पज तेनलिपुत्राद् पिपरिणमयति-रिपरीत करोति । ततः खलु तेतलिपुत्र ‘मल्ल 'पल्ये द्वितीयस्मिन् दिने माय. 'हा जात्र पायन्उित्ते' स्नानो याचन् पायचित्त स्नात कृतस्ना यापन पदेन तालियापादि निमित कृतानभागःकृतकौतकमागत्यमायभिचा कतानि चौतानि दु स्वप्नादि दोपनिमारगाय मपीपुण्डादीनि मागल्यादीनि = मङ्गलकारकाणि दलितादीनि मायश्चित्तपदवश्यं कर्त्तव्यानि येन सः, 'आमरखधारगए ' अवस्कन्य- चरगतः अश्वारूढ बहुभि पुस्पै सपरिटतः स्वस्माद् गृहाद् निर्गति, निर्गस्य भिक्खण २ सयोहिजमाणे वि धम्मे नो सवुज्यइ, त सेय ग्वल मम कणगज्झय राय तेतलिपुत्ताओ विप्परिणमेत्तए त्ति कटु एव सपेहेर) तब उस पोट्टिल देवको ऐमा आ यात्मिक यावत् मनोगत संकल्प उत्पन्न हुआ कनकध्वज राजा तेतलिपुत्र अमात्यका आदर करते हैं यावत् वे उनके सुख साधनकी सामग्री वढा दिया है-इसलिये मेरे द्वारा यार पार प्रतियोधित करने पर भी वे धर्म में प्रतियुद्ध नही बन रहे हैं-प्रतिवोध को प्राप्त नहीं हो रहे हैं। इमलिये मुझे अय ऐसो करना चाहिये कि जिससे तेतलिपुत्र के विषय में कनकध्वज राजा का मानसिक विचार घदन जावे । इस प्रकार का विचार उस देवके मनमें जगा (सपेरित्ता, कणगज्झय तेतलिपुत्ताओ विप्परिणामेइ, तएण तेतलिपुत्ते कलं पाए २ संमोहिज्जमाणे पि धम्मे नो सबुझइ, त सेय खलु मम कणगज्झय राय तेतरिपुत्ताभो विप्परिणामेत्तए ति कट्टु एवं सपेहेइ) ત્યારે તે દેવરૂપ પિફ્રિલાના જીવ દેવને એ આધ્યાત્મિક યાવત મને ગત સકપ ઉભયે કે રાજા કનકધ્વજ અપાય તેતલિપુત્રને આદર કરે છે થાવત્ તેઓએ તેમની બધી જાતની સુખસગવડની સામગ્રીમાં વધારે પણ કરી આપે છે, એથી મારવડે વાર વાર પ્રતિબંધિત કરવા છતાએ તેઓ ધર્મમાં પ્રતિબુદ્ધ થઈ જતા નથી એટલે કે તેમને વાર વાર પ્રેરણા આપવા છતા પ્રતિબંધ થયે નથી એટલા માટે હું હવે એ પ્રમાણે કઈક કરૂ કે જેથી રાજા કનકવિજના માનસિક વિચારે અમાત્ય તેતલિપુત્રને માટે પ્રતિકૂળ થઈ જાય તે દેવે મનમાં આ જાતનો વિચાર કર્યો (सपेहित्ता प्रणगज्झय तेतलिपुत्ताभी विपरिणामेइ तएणं तेतलिपुत्ते कल्ले झाए जार पापच्छित्ते आसखरवरगपु, बहूदि परिसेहिं सपरितुडे, गिहाओ, - " मनगारधर्मामृतपिणी टी० अ० १४ तेतलिपुनप्रधानचरितवर्णनम् ७३ मात्रुवन् 'अपरिजाणमाणे ' अपरिजानन , तदागमनमननुमोदयन् अनभ्युत्तिष्ठन्- अभ्युत्थानाद्यन् ‘परम्मुहे' पराइमुग्व-विमुग्व सन् सतिष्ठने । ततः खलु तेतलिपुत्रः कनकधनस्य रानः स उखे जनि करोति । 'तएण' ततः खलु- तेतलिपुत्रेण गजलिकरणानन्तरमपि स कनक गो राजा जनाद्रियमाणः, अपरि- जानन् , अनभ्युत्तिष्ठन् तप्णीक परामुग्वः सतिप्ठते । तत' खलु तेतलिपुत्रः कनकवन विपरिणत-विपरीत ज्ञाता 'भीष जार सजायभए 'भीतो यावत् सजातभय , एवमदत मनस्यकथयत्-रुष्टः खलु मम मम विपये कन जो राजा, उसका कोई आदर किया-न उसके आनेकी कोई सराहना की और न उठकर उसे लिया ही। इस तरह अनादर अननुमोदन एव अनभ्यु- त्थान करते हुए वे रोजा प्रत्युत उस ओरसे अपना मुँह फेर कर बैठ गये। (तगण तेतलिपुत्ते कणगझस्स अजलिं करेइ) तेतलिपुत्र ने आते ही राजा कनकध्वज को नमस्कार किया-(तण्ण से कणगज्झए राया अणाढायमाणे तुमिणीय परम्मुहे सचिट्ठड) तो भी उन कनक ध्वज राजा ने उस अजलि करने का भी कोई आदर नहीं किया केवल चुप चाप ही विमुख बना हुआ बैठा रहा-(तएण तेतलिपुत्ते कणगज्मय विप्परिणय जाणित्ता भीर सजायभए एव चयासी) तब तेतलिपुत्र ने कनक वज राजा को विपरीत जानकर भीत (भय पाया हुओ) यावत् सजात भय होकर मनमें ऐसा विचार किया-(स्टे ण मम कपागज्मए राया) फनका वज राजा मेरे ऊपर रुष्ट हो गये हैं। (हीणे ण मम कण- આદર ન કર્યો, તેમના આવવાની સરાહના ન કરી અને ઉભા થઈને તેમને સત્કાર્યો પણ નહિ આ રીતે અનાદર, અનનુમોદન અનન્યુત્થાન કરતા તે રાજા तेभना त३ थी मी ३वीन भी गया (तएण तेतलिपुत्ते कणगझयास अजलि करेइ ) ततलिपुत्र सावताना साथे । રાજ કનકધ્વજને નમસ્કાર કર્યો (तएण से कणगज्झए राया अगाढायमाणे तुसिणीए परम्मुहे सचिट्ठइ) છતાએ રાજા કનવજે તેમના નમસ્કારને પણ ઉચિત સત્કાર કર્યો નહિ ફક્ત તેઓ ચુપચાપ ફેરવીને બેસી જ રહ્યા (तपण तेतलिपुत्ते कणगज्झय पिप्परिणय जाणिवा भीए जान सजायभए एव चयापी) ત્યારે તેતલિપુત્ર અમાત્યે રાજા કનકધ્વજને પ્રતિકળલથઈ ગયેશ (નારાજ થયેલા) જાણીને ભયભીત યાવતું સજાતભય વાળા મનમાં વિચાર ये है (रुटेण मम कणगझए रोया ) न४५४ २ion भारा ५२ नारा થના retend - पाग्भिः आलपन्त' सलपतष-ओलापसमापणे, सराप-परस्परस मारणे कुर्वन्तश्च पुरतः अग्र य पृष्टतः पश्चाभागतच, पार्थन: पार्भमागतश्र, मार्गतः= यस्मान्मार्गात् तेतरि पुनो निर्गति, तन्मार्गतम 'समणुगन्छति' समनुग- च्छन्ति । तत खलु स तेसलिपुनो परेर नापजस्त न उपागमति । ततः खलु स य नक वनो राना तेतलिपुत्रमेजमान पश्यति, दृष्ट्वा नो आट्रियते, नो परि- जानाति, नो अभ्युत्तिष्ठति । अनन्तर आणादायमाणे 'अनामिाग: स्मादरं सरने उठकर उसे लिया-(आढाहत्ता, परिजाणित्ता अन्मुहिता अजलि परिग्गर करेंनि, इहाहि फनारि जाय वहिं आल नाणा य सलवे मागा य पुरओ य पिओ य पासो य मग्गओ य समणुग ऐति तएणं से तेतलिपुत्ते जेणेच कणगज्झए राया तेणेव उवागच्छा, ताण से कणगज्झए गया तेतलिपुत्त एज्जमोण पासह, पासित्ता नो आढाइ नो परियाणाइ, नो अब डेह, अणाढायमाणे अपरियाणमाणे अणभु द्वायमाणे परम्मुहे सचिट्ठह) आदर देकर शुभागमन की अनुमोदनाकर तथा उठकर उन सपने फिर दोनों रायो की अजलि जोडकर असे नमस्कार किया । याद में इष्ट, कात यावत् प्रिय-मनोज-मनोम धाणियों से आलाप संभाषण, साप परस्पर मभाषण- करते हुए वे सबभागे, पीछे आजू पाजू रोकर जिस मार्ग से घर आरा था उसी मार्ग से उसके साथ साथ चले आये । चलते तेनलिपुत्र अमात्य जहां कनकध्वज राजा यैठे थे वहां आया। कनकावज राजा ने उन्हें आता हुआ देवा-तौभी पहिले की तरह देवकर न (अाइत्ता, परिजागिता अन्भुद्वित्ता अजलि परिगह करेंनि उहाहिं, काहि जाव वगूर्हि आलवेमाणा य सलवेमाणा य पुरओ य, पिडओ च, पासओ य, मग्गओ य, समणुगन्छति तएण से तेतलिपुत्ते जेणेत्र कणगझए राया तेणेत्र उवागच्छइ, तएण से कणगज्झए राया तेतलिपुत्त एज्जमाण पासद, पासित्ता नो आढाइ, नो परियाणाद, नो अब्भुटेइ, अणाढयमाणे अपरिवाणमाणे अणभु डायमाणे परम्मुहे सचिहइ) તેમને આદર આપીને, શુભાગમનને અનુદિત કરીને તેઓ બધા ઉભા થયા અને ત્યાર પછી મને હાથની અજળિ બનાવીને તેમને નમસ્કાર કર્યા ત્યાર બાદ ઈર, કાંત, યાવત્ પ્રિય, મનેઝ અને મનેમ વાતોથી આલાપ- સભાષણ સલાપ-પરસ્પર સ ભાષણ કરતા તેઓ સર્વે બાગળ, પાછળ અને તેમની બંને બાજુએ થઈને જે માર્ગથી તેઓ આવતા હતા તે માર્ગેથી જ તેની સાથે સાથે ચાલવા લાગ્યા તેતવિપુત્ર અમાત્ય ચાલતા ચાલતા જ્યા રાજા કનકેશ્વજ બેઠા હતા ત્યાં આવ્યા પણ કનકધ્વજ રાજાએ તે તેમને જે મને . . मनगारधर्मामृतपिणी टी० अ० १४ तेतलिपुत्रप्रधानचरितवर्णनम् माब्रुवन् 'अपरिजाणमाणे ' अपरिजानन , तदागमनमननुमोदयन् अनभ्युत्तिष्ठन्- अभ्युत्थानाधकुर्वन् 'परम्मुहे ' पराङ्मुवा-विमुग्य सन् सतिष्ठते । ततः खलु तेतलिपुत्रः सनाधनम्य राज्ञः सखे पञ्जलिं करोति । 'तएण' ततः खलु- तेवलिपुत्रेण अवलिकरणानन्तरमपि न कनक गो राजा जनाद्रियमाणः, अपरि- जानन , अनन्युत्तिष्ठन् तूष्णीक परामुग्यः सतिप्ठते । तत' खलु तेतलिपुत्रः कनकध्वज विपरिणत-विपरीत ज्ञाला ' भीग जार सजायभए' भीतो यावत् सजातभय , एनमनदत्-मनस्यकथयत्-म्प्टः खलु मममम पिपये कन जो राजा, उसका कोई आदर किया-न उमके आने की कोई सराहना की और न उठकर उसे लिया। इस तरह अनादर अननुमोदन एव अनभ्यु- त्थान करते हुए वे रोजा प्रत्युत उस ओरसे अपना मुंह फेर कर बैठ गये। (तगण तेतलिपुत्ते कणगज्झरस्स अजलिं करेड) तेतलिपुत्र ने आते ही राजा कनकध्वज को नमस्कार किया-(तएण से कणगज्झए राया अणाढायमाणे तुमिणीय परम्मुहे सचिट्ठइ ) तो भी उन कनक ध्वज राजा ने उस अजलि करने का भी कोई आदर नही किया केवल चुप चाप ही विमुग्ब बना हुआ पैठा रहा-(तएण तेतलिपुत्ते कणगप्रयं विप्परिणय जाणित्ता भी सजायभए एव चयासी) तब तेतलिपुत्र ने कनक वज राजा को विपरीत जानकर भीत (भय पाया हुओ) यावत् सजात भय होकर मनमें ऐसा विचार किया-(रुटे ण मम कणगज्झए राया) कनक वज राजा मेरे ऊपर रुष्ट हो गये हैं। (हीणे ण मम कण- આદર ન કર્યો, તેમના આવવાની સરાહના ન કરી અને ઉભા થઈને તેમને સત્કાર્યા પણ નહિ આ રીતે અનાદર, અનનુમોદન અનશ્યથાન કરતા તે રાજા तेभना तर थी मा ३२वीन में भी गया (तएण तेतलिपुत्ते कणगज्झयास अजलिं फरेइ ) तेतलिपुत्र भावतानी साथै ४ રાજા કનકધવજને નમસ્કાર કર્યો (तएण से कणगज्झए राया अणाढायमाणे तुसिणीए परम्मुई सचिसइ) છતાએ શા કનવજે તેમના નમરનારને પશુ ઉચિત સત્કાર કર્યો નહિ ફિક્ત તેઓ ચુપચાપ મફેરવીને બેસી જ રહ્યા (तग्ण तेतलिपुत्ते कणगज्झय विप्परिणय जाणित्ता भीए जार सजायभए एव पयासी) ત્યારે તેતલિપુત્ર અમાત્યે રાજા કનકધ્વજને પ્રતિકુળવથઈ ગયેલા (નારાજ થયેલા) જાણીને ભયભીત યાવત્ સજાતભય વાળા થતા વિચાર ध्या ३ (भट्टेण मम कणगन्मए राया ) नzar on भास पर नारा મનમાં - , . भाताया 'होणे' हीनः खलुप्रीतिहीनः सल ममोपरि सनक जो राजा 'अमाप अपध्यात =दुर्भारसम्पनो जात सलु मम विषये गानो रागा 'त' तत्- तस्मात् 'न नज्जई न नायते सलु पपमा केन की योन मारेण-तिगतेन मारेण 'मारेदिइ' मारयिष्यति 'तिकटु' इति कत्वाइनि शित्य भीतमस्तः यापन- प्रसितः, उद्विग्न', सजातभय मन् 'मणियन पचोगो' प्रत्ययस्वफते प्रत्यासर्पति पश्चाद्न्छनि प्रत्यासत्य, तमेव 'आसमा अयसन्न दो- इति, दह्य ' तेतलिपुर ' अब पष्ठयर्थ हितीया, तेतरिपुम्स्येत्यर्थः, मध्यम येन यौव स्वक गृह तय माधारयद् गमनार । ततः ग्यलु त तेतलिपुत्र 'जेनहा गज्झए राया) कनकध्वज राजा मेरे ऊपर प्रीति से रहित हो गये है। (अवज्माए ण मम कणगन्झा राया) कनकध्वज राजा मेरे विषय में सद्भाव रहित बन गये हैं। (त ण नजइ ण मम केण कुमारेण मारे हिइ त्ति कट्टु भीए तस्ये पूजावमणिय २ पचोमपाड ) तो न मालूम यह मुझे किस कुत्सित मरण से मरवा डाले, ऐसा विचार कर वह भीत (भययुक्त) हो गया त्रस्त यारत् सजात भयवाला यन गया। और धीरे २ वहां से पीडाहट कर चला आया-(पच्चीसभित्ता तमेव आसखध दुरुहेइ, दुरूहिता तेतलिपुर मज्झ मज्झेण जेणेव सगहे तेणेव पहारेत्य गमणाण) आकर के वह अपने उसी घोडे पर बैठकर तेतलिपुर के बीच से होता हुआ अपने घर की तरफ चल दिया (तएण तेतलिपुत्त जे जहो ईसर जाव पासति ते तहा नो आढापति, नो परिया थक गया छ (होणेण गम कणगज्झए शया) ४४५ शतना ये भा२१ 6५२ प्रेम २धो नथी (अवज्झाप ण मम मणगझर राया) 33tar મારા પ્રત્યે સદ્ગુભવના રહિત થઈ ગયા છે (त ण नज्जइ ण मम केणइ कुमारेण मारेहिइ ति कट्ट भीए तत्थे जाय सणिय २ पच्चोमक्का) તે કેણ જાણે કયારે તેઓ મને કમોતે મરાવી ન ખાવે આરીતે વિચાર કરીને તે ભયભીત થઈ ગયે, તે ત્ર— યાવત સ જાત ભયવાળો થઈ ગયો અને ધીમેધીમે ત્યાંથી પાછા ફરીને આવતો રહ્યો (पच्चीसस्मिता तमेव आसखध दुरूहेइ, दुरूहिता तेतलिपुर मज्झ मज्झेण जेणेव सए गिहे तेणेर पहारेत्थ गमणाए) ત્યાથી આવીને તે પિતાના ઘડા ઉપર સવાર થઈને તેતવિપુરની વચ્ચે થઈને પિનાના ઘર તરફ રવાના થયે तएणं तेतलिपुत्त जे जहा ईसर जार पासवि ते तहा नो + - भनगारधर्मामृतार्षिणी टी० अ०१४ तेनलिपुत्ररधानचरितवर्णनम् ६५ ये यथा ये यथास्थिताः ईमरनार 'ई वर यावत् ईश्वरतलबरमाडम्बिकादयः पश्यन्ति, 'ते तहेच ' ते तथा स्थिता व सन्तो नो आद्रियन्ने, नो परिजानन्ति, नो अभ्युत्तिष्ठन्ति, नो अञ्जलिपरिग्रह कुर्वन्ति, इष्टाभिविवाग्मिनों सलपन्ति, नो पुरतश्च पृष्ठनश्च पायाच मार्गतश्च समनुगच्छन्ति । तत खलु तेतलिपुत्रो यत्रैव सक गृह तोव उपागच्छति । यापि च ' से ' तस्य । तत्य । वर भरने माह्या परिपद् भवति, तद् यथा-'दासाइ वा ' दासाइति वा, णति, नो अमुटुंति ) मार्ग में तेतलिपुत्र को आते हुए जिन ईश्वर तल्वर, माडम्पिक आदिको ने देग्या तो उन्होंने अब पहिले की तरह न उसका आदर क्यिा न उसके आगमन की अनुमोदना की और न उसे देखकर वे उठे ही (नो अजलिपरिग्गह करेति, इवाहिं जाव णो सलवति नो पुरओ य पिडओय पोसओय मग्गओय समणुग० ) और न उसे राथ जोड कर नमस्कार ही किया। न इष्ट प्रिय वाणियों से उससे आलाप, सलोप किया, और न आजू बाजू से होकर वे उसके साय मार्ग में ही चले । (तपण तेतलिपुत्ते जेणेव सए गिहे तेणेव उवा. गच्छइ ) इस तरह चलता हुआ वह तेनतिपुत्र अमात्य अपने घर पर आ गया। उचागघिउत्ता जाबि से तत्व चारिरिया परिसा मवइ, तजही दोसेइ वा पेसेइ वा भाइलाड वा सा वि य ण नो आढाह, नो परिया- णाइ, नो अन्भुटेइ) वहा पर भी जो दास घर के काम काज करने परियाणति, नो अब्भुति ) માર્ગમા જતા તેતલિપુત્રને ઈશ્વર તલવર માડબિક વગેરે લોકોએ જો પણ કેઈએ પહેલાની જેમ તેને આદર ન કર્યો, તેના આગમનની અનુમોદના ન કરી અને તેને જોઈને તેઓ ઊભા ન થયા (नो अजलि परिग्गड करति, इट्टाहिं जाणो सलब ति नो पुरओ य पिट्टी य पासओ य मग्गओ य समणुग०) અને તેઓએ હાથ જોડીને તેને નમસ્કાર પણ ન કર્યા ઈષ્ટ, પ્રિય, વચનથી તેઓએ તેની સાથે આલાપ ન કર્યો, મલાપ ન કર્યો અને બને બાજુએ થઇને તેઓ માર્ગમાં તેની સાથે સાથે ચાલ્યા પણ નહિ ( તer तेतलिपुत्ते जेणेव सएगिहे तेणेत्र आगच्छइ ) मा प्रमाणे यात यासतो તેતલિપત્ર અમાત્ય પિતાને ઘેર આવી ગયે (उवागच्छित्ता जावि से तत्थ बाहिरिया परिसा मवड, त जहा दासेड वा पासेइ वा भाइल्लएइ वा, सा वि य ण नो आहाइ नो परिमाणाइ, न अध्भुट्ट) ત્યાં પણ જે દસે-ઘરમાં કામ કરનારા નેકર, ત્રિ—ઘરના કામ માટે . .
- . ७y भानामग्यास होणे 'हीनः खलु-प्रीतिहीन रालु ममोपरि नाजोगना 'आझाप अपध्यात =दुर्भावसम्पप्नो जात रालु मम पिये पनाहानो रागा 'न' तत्- तस्मात् 'न नजई' न नायते पलु पप मा केन कीयोन समारण-सुस्मितेन मारेण 'मारेहिइ' मारयिष्यति ' चिटु' इति कत्वाति शिशिन्य भीतमम्नः यावत्- प्रसितः, उद्विग्न', सजातभय मन् 'मणियन: 'पगोगयो।' प्रत्यास्वपते प्रत्यासर्पति पश्चाद्गन्छनि प्रत्ययमय, तमेव ' प्रामभयम्मन्न दो- इति, दह्य ' तेतलिपुर ' अत्र पठयर्थे द्वितीया, तेतरि पुरस्येत्यर्थः, मध्यम येन यौव स्वक गृह तर माधारयद् गमनात्र । तत ग्यलु त तेरिपुत्र जेजहा गज्झए राया) कनकध्वज राजा मेर ऊपर प्रीति स रहित हो गये है। (अवज्झाए ण ममं कणगज्मा राया) कनकध्वज राजा मेरे विषय में सद्भाव रहित बन गये है। (त ण नजद ण मम केणड कुमारेण मारे हिह त्ति कटु भी तत्वे पूजारमणिय • पचोमपाइ ) तो न मालूम यह मुझे किस कुत्सित मरण से मरवा डाले, ऐसा विचार कर वह भीत (भययुक्त) हो गया त्रस्त यावत् सजात भयाला यन गया। और धीरे २ वहां से पीछाट कर चला आया-(पच्चोसकित्ता तमेव आसखध दुरुहेइ, दुरुहिता तेतलिपुर मग्झ मज्झेण जेणेव सगिहे तेणेच पहारेत्य गमणाए) आफर के वह अपने उसी घोडे पर तेतलिपुर के बीच से होता हुआ अपने घर की तरफ चल दिया (तएण तेतलिपुत्त जे जहां ईसर जाव पासति ते तहा नो आढायति, नो परिया थई गया छ (हीणेण गम कणगज्झए राया) पर शतना व भा। 6५२ प्रेम रह्यो नयी (अवज्झाए ण मम कणगज्झा राया) ४४४ २ion મારા પ્રત્યે સદૂભવના રહિત થઈ ગયા છે (त ण नज्जइ ण मम केणइ कुमारेण मारेहिद त्ति कट्ट भीए तत्ये जाव सणिय २ पच्चोमक्का) તે કેણ જાણે કયારે તેઓ મને કમોતે મરાવી ન ખાવે આ રીતે વિચાર કરીને તે ભયભીત થઈ ગયે, તે ત્રસ્ત યાવત સ જાત ભયવાળે થઈ ગયે અને ધીમે ધીમે ત્યાંથી પાછા ફરીને આવતો રહ્યો (पच्चोसस्कित्ता तमेव आसखध दुरूहेइ, दुरूहित्ता तेतलिपुर मज्झ मज्झेणं जेणेव सए गिहे तेणेर पहारेत्थ गमगाए) ત્યાથી આવીને તે પિતાના ઘડા ઉપર સવાર થઈને તેતલિપુરની વચ્ચે થઈને પિનાના ઘર તરફ રવાના થયે तएणं तेतलिपुत्त जे जहा ईसर जार पासति ते तहा नो नो /1 पैठकर . . ।
- ' भनगारधर्मामृन सर्पिणी टी० म०४ तालिपुत्रप्रधानचरितवर्णनम् ये यया ये ययास्थिताः 'ईसरनार' ई-चर यावत्-ईश्वरतल्बरमाडम्पिकादयः पश्यन्ति, 'ते तहेव 'ते तथा स्थिता सन्तो नो आद्रियन्ने, नो परिजानन्ति, नो अभ्युत्तिष्ठन्ति, नो नञ्जलिपरिग्रह कुन्ति, इष्टाभिविवाग्भिनौं सम्पन्ति, नो पुरतश्च पृष्ठतच पावन मार्गतव समनुगच्छन्ति । तत खलु तेतलिपुत्रो यय सक गृह तौब पागच्छति । यापि च से' तस्य तत्थ नत्र भरने गाद्या परिषद् भवति, तद् यथा-' दासाइ वा ' दासाइनि चा, पति, नो अन्मुति ) मार्ग में तेतलिपुत्र को आते हुए जिन ईश्वर तलघर, माडम्बिक आदिको ने देखा तो उन्होंने अब पहिले की तरह न उसका आदर पिया न उसके आगमन की अनुमोदना की और न उसे देवकर वे बटेरी (नो अजलिपरिग्गह फरेति, इट्टाहिं जाव णो सलवति नो पुरओ य पिटुओघ पसिओय मग्गओय ममणुग० ) और न उसे राथ जोड कर नमस्कार ही किया। न इष्ट प्रिय वाणियों से उससे आलाप, संलाप किया, और न आजू बाजू से होकर वे उसके साय मार्ग मे ही चले । (तपण तेनलिपुत्ते जेणेव सए गिहे तेणेव उवा- गच्छड ) इस तरह चलता हुआ वह तेततिपुत्र अमात्य अपने घर पर आ गया। उचागघिउत्ता जाविसे तत्व पाहिरिया परिसा भवड, तजही दोसेड वा पेसेइ वा भाइहएइ वा सा दियण नो आढाड, नो परिया- णाह, नो अमुह ) वहा पर भी जो दास पर के कोम काज करने परियाणति, नो अब्भुति ) મામા જતા તેતલિપુત્રને ઈશ્વર તલવર માડબિડ વગેરે લોકોએ જે પણ કેઈએ પહેલાની જેમ તેને આદર ન કર્યો, તેના આગમનની અનુમોદના ન કરી અને તેને જોઈને તેઓ ઊભા ન થયા (नो सजलि परिग्गह काति, स्टाहि जारणो सलब ति नो पुरओ य पिट्टो य पासओ य मग्गओ य समणुग०) અને તેઓએ હાથ જોડીને તેને નમસ્કાર પણ ન કર્યો છે, પ્રિય, વચનથી તેઓએ તેની સાથે આલાપ ન કર્યો, એ લપ ન કર્યો અને બ ને બાજુએ થઈને તેઓ માર્ગમાં તેની સાથે સાથે ચાલ્યા પણ નહિ ( gur वेतलिपुत्ते जेणेव सएगिहे तेणेर आगइ ) At प्रमाणे यासतो यासतो તેતલિપુત્ર અમાત્ય પિતાને ઘેર આવી ગયે (उवागच्छित्ता जाधि से तत्थ नाहिरिया परिसा मवड, त जहा दासेइ वा पासेइ वा भाइल्सएद ना, सा वि य ण नो आहा नो परियाणाइ, न अन्भुटा) ત્યાં પણ જે દાદ કરનારા નેકર, પ્રિ-ઘરના કામ માટે " - ઘરમાં કામ - ७६ शाताधर्मकथानमा दासाः गृहकार्यकारिणीभृत्या, पेमारा' प्रैग्याइनिया, प्रयाः गृहकार्य फर्तमन्यत्र प्रेपणीया भृत्याः, 'माइलएति पा भाइलाइति पा, 'भाई' इनिटेगीशब्द हालिका मागिनश्चेति तदर्थः हालिका' भूमिकर्षणार्थ नियुक्ता भृत्याः, मागिना, स्वव्ययेनाऽ न्यस्य क्षेत्रे कृपि कृत्वा उपजातानस्यार्धभाग ग्राहिण , एक्यूपा या परिपत् साऽपि च एत नो आद्रियते,नो परिजानाति, नो अम्युत्तिष्ठते । याऽपि च तस्य आम्य न्तरिको परिपद् भवति, 'त जहा' तद् यथा 'पियाइ वा पिताउति ना, 'मायाइ वा' माता इति वा, 'जार मुण्डाइ वा' यानत् स्नुपाइति वा, स्नुषा -पुत्रपत्र , तचापि च परिपद् एन नो आद्रियते, नो परिजानाति, नो अभ्युत्तिष्ठति । तत खलु स तेतलिपुनो यत्रैव वासगृह यत्रैव स्वरु शयनीय तर उपागच्छति,उपागत्य, वाले नौकर प्रैष्य, घर के काम के लिये जिन्हे पात्र भेजा जाता है ऐसे भृत्य, तथा भाईल्ल-हालिक-भूमि कर्पणार्थ नियुक्त भृत्य, अथवा भागी दार-अपने व्यय से अन्य के खेत में कृषिकरके उत्पन्न अन्न के अर्ध भोग को लेने वाले चटियाजन इनरूप जो याय परिपत् थी उमने भी उसका आदर नही किया, उसके आगमन की अनुमोदना नहीं की और न वह उसके आने पर अपने अधिष्ठित स्थान से उठे। (जाविय से अभितरिया परिसा भवइ-तजहा-पियाइ चा मायाइ वा जाच सुण्हाइ 'वा सावि यण नो आढाइ, नो परियाणाइ, नो अब्भुट्टेड) इसी तरइ जो उसकी अन्तरग परिपद थी जैसे पिता माता यावत् स्नुपा-पुत्रवधू आदि जन इन्होने भी उसका आदर नहीं किया, आगमन का अ नुमोदन नहीं किया और न ये कोई भी उसके आने पर अपने स्थानसे જેઓને બહાર મોકલવામાં આવે છે તે , તથા ભાઈલ-હાળી એટલે કે ખેડવા માટે નિયુક્ત કરાયેલા ભ્રત્યે અથવા તે ભાગીદારે-કે જે 'પિતાના ખર્ચે જ બીજાના ખેતરોમાં અનાજ વાવે છે અને વળતરમા ખેતરના માલિક પાસેથી અર્ધો ભાગ મેળવે છે–એવા જે બાહ્ય પરિષત સ બ ધી લેકે હતા તેઓ એ પણ તેને આદર કર્યો નહિ, તેના આગમનને અનુમોદન આપ્યું નહિ અને ન તેના આવવા બદલ પોતાના સ્થાનેથી સત્કાર માટે તેઓ ઊભા થયા (जा वि य से जभितरिया परिसा भवइ-त जहा-पियाइ वा मायाइ वा जाव मुण्डाइ वा सा वि य ण नो जाढाइ, नो परियाणाइ, नो 'अन्भुटेइ) અને આ પ્રમાણે જ તેની અતરગ પરિષદના લોકો જેમ કે પિતા માતા યાવત્ નુષાબેટા વહુ-વગેરે લેકેએ પણ તેને આદર કર્યો નહિ, તેના મનને અનમેદન આપ્યું નહિ અને તેમાથી કઈ પણ તેના આવવા બદલ પિતાના શ્મનથી ઊભા થયા નહિ. , भाग- ७७ . अनगारधर्मामृतापिणो टोका अ० १४ तेतलिपुग्धपानचरितवर्णनप शयनीये निपीदति, निपद्य, एवमपदन-मनस्वस्थयन्-एन खलु यथा अद्य तथैवान्यस्मिन्नपि दिवसे, अह सकाद् गृहान् निर्गच्छामि, 'त चे जोव अभि- तरिया परिसा नो आहाइ, नो परियाणा: नो अम्भुट्टेड ' तदेव यावत् आभ्यन्तरिकी परिषद् नो आद्रियते, नो परिजानाति, नो अभ्युत्तिष्ठति, अस्यायमभिपाय:- पूर्वस्मिन् दिवसे राशि प्रसन्ने मा दृष्ट्वा राजेश्वरादयः सर्वे आद्रियन्ते स्म,परिजाना. न्ति स्म अभ्युत्तिष्ठन्मि स्म,अयाऽपि गृहनिर्गत मा ते तथैव सत्कारयन्तिस्म । परन्तु राति अकस्मात् अमसन्ने राजेश्वरतलपरमाडम्बिककौटुम्पिकमभृतयः तथा मदीय वाद्याभ्यन्तरा च परिपदपि सऽपि च मा नाद्रियन्ते, नो परिजानन्ति, नो उठे। (तण्ण से तेतलिपुत्ते जेणेव वासघरे जेणेव सए सयणिज्जे तेणेव उवागच्छद) इस तरह घर पर आकर वह तेतलिपुत्र अमात्य जहा अपना वासगृह और उसमें भी जता अपनी शय्या थी वहां गया (उवागघिउत्ता सयगिजसि निसीइ, णिसीइत्ता एव वयासी) वहा जाकर वह उस पर बैठ गया-और मनही मन विचार करने लगा-(एव खलु अह सयाओ गिहाओ णिग्गच्छामि, त चेव जोव अभितरिया पुरिसा नो आढाह, नो परिजाणाइ नो अन्भुटेड-तं सेय खलु मम अ. पाण जीवियाओ ववरोवित्तएत्ति बडु एव सपेहेह) पहिले के दिनों में जब मैं अपने घर से निकलतो था तो लोग-राजेश्वर आदि समस्त जन मुझ पर राजा की प्रसन्नता होने के कारण आता जाता हुआ देखकर मेरा आदर करते थे-मेरे आगमन आदि की अनुमोदन करते थे उठ- कर अपने विनय प्रदर्शित करते थे-तथा आज भी जब मै घरसे निकल (तएण से तेतलिपुत्ते जेणेन वासघरे जेणेव सए सयणिज्जे तेणेव उवागच्छइ) આ રીતે ઘેર આવીને તેતલિપુત્ર અમાત્ય જ્યા તેની રહેવાની ઓરડી भने तभा पy arn चातानी पारी ती त्या भयो (वागच्छित्ता सयणि- जसि निसीयह, णिसीइत्ता एर वयासी) त्याने ते तना ५२ मेभी गया અને મનમાં જ વિચાર કરવા લાગ્યો કે (ण्व ब्लु अह समाओ गिहाओ गिग्गच्छामि, त चेव जान अभितरिया परिसा नो आढाइ, नो परिजागाइ, नो अमुटेइ-त सेय खलु मम अप्पाण जीवि- याभो वारोवित्तए ति फट्टु एवं सपेहेइ) પહેલા જ્યારે હુ ઘેરથી બહાર નીકળતું હતું ત્યારે લકે-રાજેશ્વર વગેરે બધા લક-રાજો મારા ઉપર ખુશ હતા એટલે-આવતા જતા જોઈને મારે આદર કરતા હતા, મારા આ મિનનુ અનુમોદન કરતા હતા તેમજ ઊભા થઇને વિનય પ્રદર્શિત કરતા હતા અને આજે પણ હું જ્યારે ઘેરથી નીકળીને - - - 1 সামবার अभ्युत्तिष्ठन्ति । '' सततस्मात् पारणात् , श्रेयः ख मम आत्मान जीवि ताद् व्यपरोपयितुम् , इति हत्या, एक सप्रेक्षते, संप्रदय तारपुट पिम् ' आस- गसि' आस्येमुख प्रक्षिपति, पि नो ममाम्यतिपित्तेन नो परिणमति । वतः खलु स तेतलिपुनो नीलुप्पट जार असि 'नीलोत्पल यादसि नीलोत्पल गवलगुलिकसमप्रभ नीलोत्पल-नीलकमलम् गल-माहिप शृङ्गम् , 'गुलिक' नीलरनविशेप, तै. समा मभातेतलि कान्तिर्यस्य स त ताश यादसिम्तीक्ष्ण खड्ग 'खो' स्कन्धे-अण्ठपूछे 'ओदरर' अपहरति-निपातयति । तत्राऽपि च कर राजा के पास गया-तप भी इन सपलोगों ने पूर्ववत् मेरा आदर भादि सप कुछ किया परन्तु अकस्मात राजा के मष्ट होने पर जब मैं वहा से लौटकर वापिम अपने स्थान पर आने लगा-तो किमी ने भी मेरा आदर आदि कुछ भी सत्कार नहीं कियो । यहा तक कि जो मेरी बाह्य और आभ्यन्तर परिपद है-भीतर बाहरके नौकर चाकर एन माता पिता आदि जन है-उसने भी आज इस समय आने पर मुझे कुर नहीं समझा-अत. मुझे अब ऐसी स्थिति से मरना ही उत्तम है । इस प्रकार का उसने अपने मन में विचार किया-(सपेहिता तालउड विस आसगसि पक्खिवह, सेय विसे णो सकमह, तण्ण से तेतलिपुत्ते नीलु प्पल जाव असिं खसि ओहरद, तत्य विय से धारा ओपल्ला, तएणसे तेतलिपुत्ते जेणेव असोगवणिया तेणेव उ०) विचार करके उसने ताल पुरविप को अपने मुख मे डाला-परन्तु उसने अपना कुछ भी प्रभाव રાજાની પાસે ગયે ત્યારે પણ એ બધાએ પહેલાની જેમ જ મારો આદર વગેરે બધુ કર્યું હતું પણ ચિંતા રાજાને નારાજ થઈ જવા બદલ જ્યારે હું ત્યાંથી પાછા ફરીને પોતાને ઘેર આવવા લાગે ત્યારે કેઈએ પણ મારે આદર કે સત્કાર કર્યો નહિ મારી બાહ્ય અને આભ્ય તર પરિષદ એટલે કે બહારના નોકર-ચાકરો અને માતા પિતા વગેરે-છે તેઓએ પણ આજે અત્યારે મારા આવવા બદલ કઈ પણ કિંમત કરી નહિ એથી એવી પરિસ્થિતિમાં મારૂ મરણું જ ઉત્તમ ઉપાય છે (सपेहिता तालउड विस आसगसि पक्खिबइ, सेय विसे हो सकमद, तएण से तेतलिपुत्ते नीलुप्पल जाप अमि खसि ओहरइ, तत्यवि य से पारा ओपल्ला, तएण से तेतलिपुत्ते जेणेव असोगवणिया तेणेउ० ) આ જાતને વિચાર કરીને તેણે તાલપુટ વિષ (ઝેર १ - । ।
७१ भनगारधर्मामृतयपिणी टी० अ०१४ तेतलिपुत्रप्रधानचरितवर्णनम 'से' तस्य खड्गस्य धारा 'ओपल्ा' कुण्ठिता, 'ओपल्ल' इति देशी शब्दः तरपुटेन पिण, वण्ठे निपातितेनामिनाऽपि च तदमिलपित मरण न जातम् । ततः खलु तदनन्तर स तेतलिपुत्रो यत्रैव अशोरयनिका अगोजाटिका तीव उपागच्छति,उपागत्य पारीक ग्रीवाया पनाति, नद्धया 'ख' म 'रुइ, दुरी इति आरोहति, दुरुय. पाश वृक्षे च नाति, पद्धा आत्मान 'मुयइ ' मुञ्चति अधः पातयति । 'तत्यवि' ताऽपिएतस्मि मरणोपाय कृतेऽपि च 'से, तस्य रन्जुरिउन्ना-म यत एव पाशसुटिन । ततः सलु स तेतलिपुत्रः 'महदमहा- लय ' महातिमहतीम् अति विशाला गिला ग्रीवाया वनाति, बद्धना 'अत्था- हमतारमपोमियसि' अस्तापातागपोम्पेये-नास्ति ससार यस्य तन् जस्तारम् नहीं दिखलाया-अर्थात् वह विप रूप से परिणत नहीं हुआ। इसके पाद उस तेतलिपुत्रने नीलोत्पल गवल, गुलिक की प्रभो जैमी प्रमावाली अत्यन्त नीलवर्ण चाली-ऐसी तलवार को फि जिसकी धार यहुत तीक्ष्ण थी-अपनी गर्दन पर रखा-अर्थात् उसे गर्दन पर चलाई-परन्तु उसने भी अपना काम नहीं किया-वह भी-कुटित हो गई-हम तरह जब इन दोनों वस्तुओ से अपना अभिलपित मरण मा य नहीं हुआ-अब वह तेन- लिपुत्र जहाअशोकवनिका-अशोक वाटिका-थी वहा गया (उवागच्छित्ता पासगगीवाए व पइ) वहा जाकर उसने अपनी ग्रीवामे फदा डोला-याधा (पधित्ता अप्पाण मुयट, तत्य वि से रज्जू छिन्ना) चान्य कर फिर वह वृक्ष पर चढ़ गया और वहा से अपने आपको नीचे लटका दिया परन्तु यहा पर भी उसकी रज्जू बीच में से ट्ट गई (तपण से तेतलिपुत्ते મુખમાં નાખ્યું પણ તેણે કઈ અમર બતાવી નડિ એટલે કે તે વિય રૂપમાં પરિણમ્યું નહિ ત્યાર પછી તે તેતલિપુત્ર, નીલેમ્પલ ગવલ, ગુલિકના જેવી પ્રભાવાળી તેમજ તીકણ ધારવાળી તવવાને પિતાની ડેક ઉપર મૂકી એટલે કે તેના વડે તેણે પિતાની ડેક ઉપર ઘા કર્યો પણ તેનાથી પણ કઈ કામ થયુ નહિ એટલે કે તરવાર પણ બૂડી થઈ ગઈ હતી Ice આ કુતિ ( બૂડી ) અર્થ માટે વપરાયેલે દેશી શબ્દ છે જ્યારે આ રીતે તે બને વસ્તુઓથી તેની ઈચ્છા પૂરી થઈ નહિ એટલે કે તેનું મરણ થS રાકયુ નહિ त्यारे ते त्या अशा नि:- टि-ती त्या भयो ( घागच्छित्ता पोसग गीवाए वध ) त्या ४४२ ते पातानी 315मा समालेरवाने मान्यो (वधित्ता अप्पाण मुयइ तत्य वि से रज्जु छिन्ना ) साधीन ते वृक्ष ५२ ચઢી ગયે અને ત્યાથી પિતાની મેળે જ તે લટકી ગયો परतु ફાસાનું દેરડ વચ્ચેથી તૂટી ગયું હતું અહીં પણ -- - ७८ গলাম अभ्युत्तिष्ठति । 'त' तत्-तस्मात् पारणात् , श्रेयः ख मम आरमान जीवि ताद् व्यपरोपयितुम् , इति कथा, पर समेक्षते, संप्रदय तारपुट विपम् ' आम- गसि' आस्येन्मुखे प्रक्षिपति, पि नो मनाम्यतिपित्तेन नो परिणमति । ततः खलु स तेवलिपुतो नीलुप्पट जार असिनीलोत्पल यादमि नीलोत्पल गालगुलिकसममभ-नीलोत्पल-नीलकमलम् गार=माहिप शृगम् , 'गुरिक' नीलराविशेष, तै. समा प्रभातेतलि कान्तिर्यस्य स त ताशा यादसि तीक्ष्ण खड्ग 'खो' स्कन्धे-अण्ठम्छे 'ओहरइ' हरतिनिपातयति । तत्रापि च कर राजा के पास गया-तब भी इन सपलोगों ने पूर्ववत् मेरा आदर भादि सप कुछ किया-परन्तु अफरमान राजा के मष्ट होने पर जब मैं वहा से लौटकर वापिस अपने स्थान पर आने लगा तो किमी ने भी 'मेरा आदर आदि कुछ भी सत्कार नहीं किया। यहा तक कि जो मेरी बाह्य और आभ्यन्तर परिपद है-भीतर वाररके नौकर चाकर एर माता 'पिता आदि जन है-उसने भी आज इस ममय आने पर मुझे कुछ नहीं समझा-अतः मुझे अब ऐसी स्थिति से मरना ही उत्तम है । इस प्रकार का उसने अपने मन में विचार किया-(सपेहित्ता तालउड विस आसगसि पश्खिवइ, सेय विसे णो सकमद, ताण से तेतलिपुत्ते नील पल जाव असिं खसि ओहरद, तत्य विय से धारा ओपल्ला, तएण से तेतलिपुत्ते जेणेव असोगवणिया तेणेव उ०) विचार करके उसने ताल पुटविष को अपने मुख में डाला-परन्तु उसने अपना कुछ भी प्रभाव રાજાની પાસે ગયે ત્યારે પણ એ બધાએ પહેલાની જેમજ મારે આદર વગેરે બધુ કર્યું હતું પણ એચિંતા રાજાને નારાજ થઈ જવા બદલ જ્યારે ત્યાંથી પાછા ફરીને પિતાને ઘેર આવવા લાગે ત્યારે કે એ પણ મારા કયે નહિ મારી બાહ્ય અને આભ્ય તર પરિષદ એટલે કે બહારના નેકર-ચાકરો અને માતા પિતા વગેરે-છે તેઓએ પણ આજે અત્યારે મારા આવવા બદલ કઈ પણ કિંમત કરી નહિ એથી એની પરિસ્થિતિમાં મારૂ મરણ જ ઉત્તમ ઉપાય છે (सपेहिता तालउड विस आसगसि पविखवइ, सेय विसे णो सफमइ, तएण से तेतलिपुत्ते नीलप्पल नाव अमि खसि ओरइ, तत्यवि य से धारा ओपरला, तएण से तेतलिपुत्ते जेणेव असोगणिया तेणेवउ०) આ જાતનો વિચાર કરીને તેણે તાલપુટ વિષ (ઝેર) ને પિતાના - સ્માર સત્કાર , मनगारधर्मामृनयपिणो टी० १० १४ नेतलिपुत्रप्रधान चरितवर्णनम् दीत्-चित्त सोय मनस्येनमकथयत्-भो चित्त ! श्रमणा यद् वदन्ति तत्वलु श्रद्धेय श्रद्वा योग्य, अद्धेय खलु भोः ब्राह्मणा पदन्ति, श्रद्धव बलु भोः! श्रमण ब्राह्मणा दिन्ति । अय भाग-जात्मपरलोकाद्यर्थ प्रतिरोधक श्रमणादीना पचन श्रद्धेय भवति, अतीन्द्रियस्याप्यात्म परलोकादिरवरूपस्यानुमानादि प्रमाणविषय- तया श्रद्धाविषयत्वात् । परतु अमेरो असहायः अबधेयम् अविश्वमनीय वदामि । यद्यपि मदीय वचन सर्वथा सत्यम् , तथापि असम्भाव्यतया जनैः प्रत्येतुमशक्यम् । तदेगह-' एव खलु ' इत्यादिना 'एर खलु' मयि अश्रद्धेय यीच ही में चुन गई । इस तरह इन समस्त अनभवनों की सभवना के याद तेतलिपुत्रने अपने आपको सबोधित करते हुए मन में विचार किया-हे चित्त ! असणजन जो कहते हैं वह श्रद्धेय हे । ब्राह्मणजन जो कहते है वह श्रद्धेय है इसी प्रकार श्रमणमाहणजन जो करते है वह श्रद्धेय है। इसका भाव यह है कि आत्मा, परलोक आदि पदार्थ जो कि अतीन्द्रिय अनुमान आदि प्रमाण कि विपयनूत हो जाते है-इमलिये ये श्रद्धाके विषय बन जाते है-अतः इन अतीन्द्रिय आत्म, परलोक आदि पदार्थों को प्रतिपादित करने वाले श्रमण माण आदिकों के वचन भी श्रद्धेय रो जाते हैं, परन्तु में जो कह रहा है वह अश्रद्धेय कह रहा हूँ एक असहाय है-इसलिये-मुझे इस विषय में किसी को भी सहायता मिलने वाली नहीं है। उन श्रमण मारण आदिजनो के वचनो के सहायक तो अनुमान आदि प्रमाण है-परन्तु मेरा सहायक कोई प्रमाण ही नहीं होता है, यद्यपि में सर्वथा सत्य कहता हूँ परन्तु वह मेरा वचन अस- भवित असहाय-होने की वजह से मनुष्यो के लिये श्रद्धेय नहीं बन આ રીતે આ બધા અને ભવનની ભાવના બાદતે તલિપુત્રે પિતાની જાતને જ સબોધિત કરતા મનમાં વિચાર કર્યો કે હે ચિત્ત श्रममनाले ७४४ તે શ્રદ્ધેય છે, બ્રાહ્મણે જે કઈ કહે છે તે ધેય છે આ પ્રમાણે શ્રમણ માહણને જે કઈ કહે છે તે શ્રદ્ધય છે આનો ભાવાર્થ આ પ્રમાણે છે કે આત્મા પરેલન વગેરે પદાર્થો જેઓ કે અતીન્દ્રિય છે-તેઓ અનુમાન વગેરે પ્રમાણુના વિષયભૂત થઈ જાય છે એટલા માટે તે ૫ થૈ શ્રદ્ધાના વિષય બની જાય છે એથી આ બધા અતીન્દ્રિય આત્મ, પરલોક વગેરે પાથેનું પ્રતિપા ન કરનાર શ્રમણ માહણ વગેરેના વચને પણ શ્રદ્ધા થઈ જાય છે, પણ હું જે કઈ કહી રહ્યો છે તે અશ્રદ્ધેય કહી રહ્યો છું એક અસહાય છું એથી મને આ બાબતમાં કેઈની મદદ પણ મળી શકે તેમ નથી તે ત્રમણ માહણ વગેરેના વચનેના સહાયક તે અનુમાન વગેરે પ્રમાણે છે પણ મારા કથનનું સહાયભૂત થાય તેવું કઈ પ્રમાણ જ નથી જે કે હું જે કઈ પણ કહી રહ્યો છું તે સંપૂર્ણ રીત યથાર્થ 1 મારા તે વચને અસભવિત અસહાય હોવા બદલ . - ८० A - - - সামবার अतरस्पर्शि, अतारम् अनरणीयम् , अपौरुषेयम्=पुरुष' प्रमाण यस्य तत् पौरपेयम्- न पौरुषेयम् अपारपेयम्=पुरुषप्रमाणररितम् , एतेषां धर्मधारय , तस्मिन अतिम- म्भीरे इत्यर्थः, उदके आत्मान मुति । नत्राऽपि तस्मिन्नदऽपि च 'से' तस्य तेतलिपुत्रस्य ' याहे ' स्ताघो जातः । तत ग्यलु स तेतलिपुत्रः शुरुके तृणकूटे-तृणपुझे 'अगणिकाय ' अग्निकाय मक्षिप्य, तत्र आमान मुश्चति । तत्रापि-शुष्के तृणेऽपि सोऽग्निशयो 'पिज्झा' यिात =उपशान्त । 'तएण' ततः खलु एतस्य सर्पम्य असम्भाव्यस्य सम्भावनानन्तरम् स तेतलिपुत्र एवमवा भइमहालय सील गीवाण-पधइ यधित्ता अत्यार मनारमपोरिमियसि उदगसि अप्पाण मुयइ, तत्थ वि से थाहे जाण ) हमके याद उस तेत लिपुत्र ने एक यहत विशालकाय शिला को अपने गले में बाधा-और धाध कर अपने आपको अधार-अतार एव अपुग्प प्रमाग जल में छोड़ दिया-परन्तु वह जल भी उसके लिए रताध थार युक्त-यन गया-(तएण से तेतलिपुत्ते सुरकसि तणकृडसि अगणिकाय पस्वियह परिववित्सा मुयइ, तत्थ वि से अगणिकाए विज्झाए-तगण से तेतलिपुत्ते एख- वयासी-सद्धेय खलु भो समणा वयति सद्धेय-खलु भो मारणा व्यति, सद्धेय खलु भो समणमाणा वयति, अह एगो असद्धेय वयामि एव खलु अह सर पुत्तहिं अपुत्ते को मे सद्दहिस्सा १ सहमित्त हिं अमिते को मेय सहिस्मइ ) इसके बाद तेतलिपुत्रने शुष्क घासके ढेर में अग्नि लगाई-और उममें अपने आपको डाल दिया-परन्तु वह भी (तएण से तेतलिपुत्ते महइ महालय सिल गीवाए बधइ, वपित्ता अस्थाहमतारम पोरिसियसि उदगसि अप्पाण मुयइ, तत्य वि से थाहे जाए) ત્યાર પછી તે તેતપુત્રે એક બહુ મોટી ભારે શિવા (પથરે) ને પિતાની જાતને અથાહ–અતાર અને અપુરુષ પ્રમાણે પાણીમાં નાખી દીધી પરંતુ તે ઊડુ પાણી પણ તેના માટે થાહ વાળુ એટલે કે છીછરુ થઈ ગયું (तएण से तेतलिपुत्त सुक्कसितणकूडमि अगगिकाय पकिम्ववइ, पक्खिवित्ता मुयइ, तत्थवि से अगणिकाए विज्झाए-तएण से तेतलिपुत्ते एव वयासी सद्धेय खलु भो समणा पयति सद्येय-खलु भो माहणा यति, सद्धेय ग्यलु भो समण माहणा वयति , अह एगो असधेय वयामि एवं खलु अह सह पुत्तेहिं अपुत्ते को मेय सदहिस्सइ ? सह मित्तेहिं अमित्ते को मेय सदस्सिा) ત્યાર પછી તેતપુ સૂકા ઘાસના ઢગલામાં અગ્નિ પ્રગટાવ્યા અને પિતાની જાતને તેમાં નાખી દીધી પરંતુ ते વચ્ચેથી જ . - १ પણ !
मनगारधर्मामृतधषिणो टी० १० १४ नेतलिपुत्रप्रधानचरितवर्णनम् दीत-चित्त समोय मनस्येनमकप्रयत्-भो चित्त ! श्रमणा यद् वदन्ति तस्खलु श्रद्धेय श्रद्धा योग्य, अद्वेय गलु गोः ब्राह्मणा वदन्ति, श्रद्धव खलु भोः ! श्रमण ब्राह्मणा वदति । अय भार-जात्मपरलोकाय प्रतियोधक श्रमणादीना पचन श्रद्धेय भवति, अतीन्द्रियस्याप्यात्मपरलोकादिरवरूपस्यानुमानादि प्रमाणविषय- तया श्रद्धाविषयत्वात् । परन्तु अहमेरो असहायः अश्रद्धेयम् अविश्वसनीय वदामि । यद्यपि मदीय वचन सर्वथा सत्यम् , तथापि असम्भाव्यतया जनैः प्रत्येतुमशक्यम् । तदेवाह-एव ग्मलु' इत्यादिना — पर खलु' मयि अश्रद्धेय पीच ही में घुझ गई । इस तरह इन समस्त अनभवनों की सभवना के याद तेतलिपुत्रने अपने आपको सपोधित करते हुए मन मे विचार किया-हे चित्त ! अमणजन जो कहते है यह श्रद्धेय ह । ब्राह्मणजन जो कहते है वह श्रद्धेय है इसी प्रकार श्रमणमाहणजन जो करते है वह श्रद्धेय है। इसका भाव यह है कि आत्मा, परलोक आदि पदार्थ जो कि अतीन्द्रिय है वे अनुमान आदि प्रमाण कि विपय सूत हो जाते है-इमलिये ये श्रद्धाके विषय बन जाते हैं-अतः इन अतीन्द्रिय आत्म, परलोक आदि पदार्थों को प्रतिपादित करने वाले श्रमण मारण आदिकों के वचन भी श्रद्धेय हो जाते हैं, परन्तु में जो कह रहा है वह अश्रद्धेय कह रहा हूँ एक असहाय है-इसलिये-मुझे इस विषय में किसी को भी सहायता मिलने वाली नहीं है। उन श्रमण माण आदिजनों के वचनों के सहायक तो अनुमान आदि प्रमाण है-परन्तु मेरा सहायक कोई प्रमाण ही नहीं होता है, यद्यपि में सर्वपा सत्य कहता हूँ परन्तु वह मेग वचन अस- भवित असहाय-होने की वजह से मनुष्यो के लिये श्रद्धेय नहीं बन આ રીતે આ બધા અમ ભવનની ભાવના બાદતે તલિપુત્રે પિતાની જાતને જ સ બેષિત તા મનમાં વિચાર કર્યો કે ચિત્ત 1 શ્રમણને જે કઈ કહે છે તે કહે છે બ્રાહ્મણો જે કઈ કહે છે તે શ્રધેય છે આ પ્રમાણે છે પણ માહણને જે કઈ કહે છે તે કહે છે આનો ભાવાર્થ આ પ્રમાણે છે કે આત્મા પરલેક વગેરે પદાર્થો જેઓ કે અતીન્દ્રિય છે-તેઓ અનુમાન વગેરે પ્રમાણન વિપયભૂત થઈ જાય છે એટલા માટે તે ૫ થી શ્રદ્ધાના વિષય બની જાય છે એવી આ બધા અતીન્દ્રિય આત્મ, પરલોક વગેરે પાથોનું પ્રતિપા ને કરનાર શ્રમણ માહણ વગેરેના વચનો પણ થઈ જાય છે, પણ હું જે કઈ કહી રહ્યો છે તે અશય કહી રહ્યો છું એક અસહાય છે એવી મને આ બાબતમાં કોઈની મદદ પણ મળી શકે તેમ નથી તે શ્રમણ માહણ વગેરેના વચનના સહાયક छ પણ મારા કથનનુ સડયભૂત થાય તેવું તે પ્રમાણ જ નથી જે કે હું જે કઈ પણ કહી રહ્યો છું તે સંપૂર્ણ રીત યથાર્થ સત્ય-કહી રહ્યો છું પણ મારા તે વચને અમભવિત અસહાય હવા બદલ - તે અનુમાન વગેરે પ્રમાણે . - जाताधर्मास चघने सती यदि अमेर-अवभृत मत्यमपि पदामि, यत्-अह 'सहपुत्तेहि अपन' सहपुरैरपि अपुत्र-पुपु विद्यमानायपि भा पुत्रादित मिनारतत्वात् का 'मेय ' ममेद इद मदीय बन 'मगिरग' अदाम्यनि-प्रत्ययति, न कोऽपि, तथा अह 'सहमिहिअमित' सहमित्ररमिर मिशेषु विरामाने पपिमित्र- रहितोऽह ' को ' मेद ' मगेंद वचन श्रद्धाम्यति । पम् अनेन मारणैर अर्थेन दार दास. परिजनेन च महितोऽपि, ते रहिनोऽस्मि, इद मदीय पचन फ. अदा स्थति, अपितु न कोऽपि । 'एच' अमुना प्रकारेण स यद्यद प्रीमियत 'तेतलिपुगे' तेतलिपुत्र नामधेये खलु मयि अमात्ये कनक जेन राज्ञा ' अब शारणं समाएण' अपघ्यातेन-दुश्चिन्तकेन सता, अर्थात् कनकध्वजो राजा सकता है जैसा मैं यह सल भी कह कि में पुत्रों के विधमान शेने पर भी अपुत्र पुत्र रहित है, तो पौव मेरी इस बात को श्रद्धा से देखेगा- इसी तरह में यह करें कि मैं मित्रों के विद्यमान होने पर भी मित्र रहित हैं-तो कौन मेरे इन बचनों पर विश्वास करेगा-(एय अत्थे ण दारेण दासेहिं परिजणेण एक ग्वलु तेतलिपुत्तण अमच्चे कणगज्झएण रनाअवज्झाएण समाणेण तेतलिपुत्तेण तालपुडगे घिसे आसगसि पक्खित्ते से वि य णो कमइ को मेय सद्दहिस्मइ ? तेतलिपुत्तेण नीलुप्पल जाव खसि ओहरिण तत्व वि से धारा ओपला को मेय सदहिस्मह इस तरह अर्थ, दारा, दास, परिजन, इन से युक्त होने पर भी में इन से रहित हूँ, कौन मेरे इस बच्चन को मानेगा? अर्थान कोई नही मानेगा इसी तरह यदि में ऐसा कहूँ कि मुझे तेतलिपुत्र अमात्य के ऊपर कनक માણસ માટે શ્રદ્ધય થઈ શકે તેમ નથી જેમ કે હું અત્યારે આ જાતની સાચી વાત પણ કહ્યું કે પુત્ર હોવા છતાએ હુ પુત્ર વગરને છુ તે કે મારી આ વાતને શ્રદ્ધાની દ્રષ્ટિએ જોશે ? આ પ્રમાણે જ હુ કહુ કે મિ હે છતાએ હું મિત્ર વગર છુ તે કોણ મારે આ વાત ઉપૅર શ્રદ્ધા ધરાવશે? (एव अत्येण दारेण दासेहि परिजणेण एप सलु तेतलिपुत्तेण अमच्चे कण गज्झएण रन्ना अवज्झाएण समाणेण तेतलिपुत्तण तालपुडगे सेि आसगसि पक्खित्ते से वि य णो क्मइ, को मेय सघहिस्सइ १ तेतलिपुत्तेण नीलुप्पल जाव खधसि ओहरिए तत्थ पि से धारा ओपला को मेय सदहिस्सइ) मा शते अर्थ (धन), ह (पत्नी) हाम, प२ि०४- से डावा છતા પણ હુ એમના વગર છે મારી આ વાત ઉપર કણ વિશ્વાસ મૂકવા Rયાર થશે ? એટલે કે કોઈ પણ વિશ્વાસ કરશે જ નહિ આ રીતે જ ને હું આમ કહું કે મારા ઉપર જ ડન જ નારાજ થઈ ગયા હતા એટલા માટે , - , - में डाल मनगारधर्मामृतपिंको टीका २० १४ ते लिपुनपधानचरितवर्णनम् तेतलिपुो दुश्चिन्तको जात' इतिहेतोः, तेनलिपुत्रेण तालपुटक पिपम् 'आसगसि' आस्ये-मुखे प्रक्षिप्तम् , ' से वि य' तदपि च विष नो 'कमड न क्राम्यति-विष- स्वेन न परिणमति को जन 'मेद' ममेट मत्यमपि पचन श्रद्धास्यति न कोऽपि, तया तेतलिपुत्तेण' नीलुप्पल जान खपसि ओहरिए ' तेतलिपुत्रोण नीलोत्पल यावत् स्कन्धे उपहना तेतलिपुत्रेण नीलोत्पलगवलगुलिकपमप्रभाऽसि 'स्कन्धे कण्ठमूले ' अवहत ' प्रहतः 'तत्यति' तापि-तस्मिन् मरणोपाये कृतेऽपि च' तस्य-असेः धारा ओपल्ला-गुण्ठीभूता को ' मेद ममेद अदास्यति । एवमेव यह चूयाम् यन्मया ' तेतलिपुतण पामगं गीवाए उधेचा जाब रज्जूछिन्मा को मेय सद्दहिस्सइ' तेतलिपुत्रोण पाशक ग्रीनाया पद्-वा यावत् रज्जुउिन्ना, को ममेद श्रद्धास्पति ? तेदलिपुत्रेण अतिविशाला गिला यावद् वद् वा अस्ताधयाव- विज राजा दुश्चितक बन गये-इसलिये मने तालपुट विप मुख दिया परन्तु वह विपरूप से परिणमित नहीं हुआ । मेने विप खाया-पर मैं मरा नहीं-कौन मनुष्य मेरी इस सत्य बात को श्रद्धा की दृष्टी से देखेगा। तथा मैंने नीलोत्पल, गवल एव गुलिका की प्रभा जैसी प्रभाव वाली तीक्ष्ण तलवार अपनी गर्दन पर मरने के लिये चलाई-परन्तु वह भोटी घारवाली यन गई-कुण्ठित हो गई-उमसे मेरी गर्दन नही कटी- कौन मेरी इस यात को मानने के लिये तैयार हो सकेगा (तेतलिपुत्तेणं पासग इत्याद) इसी तरह यदि मे यह कहें कि मुझ तेतलिपुत्रने अपने गले में पाशक डाला और वृक्षपर चढकर वहा से नीचे में लटक पड़ा और फदा पीच में से टट गया तो कौन इन वचनो पर विश्वास करेगा। Kतेतलिपुत्तेणं महमहालय जाव यधित्ता अथाह जाव उदगसि अप्पा મે તાલપુ વિષ ( ઝેર ) ખાધુ હતુ પણ તે વિષના રૂપમાં પરિણત થયુ નથી એટલે કે વિષ ભક્ષણ કરવા છતાએ હુ મરણ પામ્યું નહિ આ વાત ઉપર માણસ વિશ્વાસ મૂકવા તૈયાર થશે? તેમજ નીલેમ્પલ, ગવલ અને ગુલિકાના જેવી પ્રભાવાળી તીક્ષ્ણ ધાવાળી તવારને મે મરવા માટે મારી ડોક ઉપર ઘા કર્યો પણ તે તરવાર જ બૂડી ધારવાળી થઈ ગઈ-કુતિ થઈ ગઈ–તેનાથી મારી ડોક કપાઈ નહિ મારી આ વાત ઉપર કોણ વિશ્વાસ કા તયાર થશે ? (तेतरि पुत्तेण पासग इत्यादि ) मा त ? म उ मे तेतलिपुत्र પિતાના ગળામાં ફી નાખે અને વૃક્ષ ઉપરે ચઢ વૃક્ષે ઉપર ચઢીને ત્યાથી નીચે લટકી પડો પણ ફાસે વચ્ચેથી જ તેને ગમે તે કોણ મારી આ વાત ઉપર વિશ્વાસ મૂકશે ? ( तेतलिपुत्तेण महइमहालय जाव वधिता अत्याह जाव उदगसि अप्पा मुरके, . प हाताधर्मकथा दुदके आत्मा मुक्तः, तगापि च खलु रतायो जातः, को ममेट श्रदास्यतिम्मया स्वकण्ठे महाशिला यद्धा अगाये उदके आत्मा मुक्त, परन्तु तस्मिन्नुदकेऽपि मम तलस्पर्शो जातः, इति मम पचन कः अदास्यति ? पुनश-तेतलिपुण मया शुष्के तणकटे-शृणपुजेऽग्निकाय पक्षिप्य प्रज्वलिते गम्मिन् आस्मा मुक्त, परन्तु सोऽग्निकाय 'पिआए 'विष्यात =उपशात, इत्येवलपमपि मदीय वचनं का श्रद्धास्यति ? न कोऽपि, इत्येव स तेतलिपुर. ओहयमणसकप्पे ' अपर- तमनः सकल्प भग्नोत्साह' सन् यापद् ध्यायतिम्आनध्यान करोति मू० १०॥ मुक्को,तत्थ वि ण थाहे जाए को मेय सहिस्सह तेतलिपुत्तण सुक्कसि तणकूडसि अगणिकाय पस्खिवित्ता अप्पा मुयो तत्य वि से अगणिकाए विज्झाए को मेय सद्दहिस्सह ' ओत्यमणसकप्पे जाव शियायड) मुझ तेतलिपुत्रने एक बहुत बड़ी शिला का गले में पाधी और कार में अथाह अतार अपुरुष प्रमाण जल में कूद पड़ा परन्तु वह जल कूदते री थाह घाला बन गया अथाह नहीं रहा मेरी इस सत्य पात पर भी कौन श्रद्धा करेगा। इसी तरह मुझ तेतलिपुत्रने एक घडे भारी शुष्क घास के ढेर में अग्नि लगाई और उस में अपने आप को प्रक्षिप्त कर दिया- परन्तु वह अग्नि वुझ गई उसने मुझे भस्म नहीं किया मेरी इसबात को फौन श्रद्धा रूप से स्वीकार करेगा। इस प्रकार अपहत मन संकल्प वाला बन कर-उत्साह रहित होकर वह तेतलिपुत्र अमात्य आर्तध्यान में पड़ गया ॥ सू० १०॥ तत्य पि ण थाहे जाए को मेय सदहिस्मइ । तेतलिपुत्तेण सुक्कसि तणकूडंसि अगणिकाय पविखवित्ता अप्पा मुक्को तत्थवि से आणिकाए विज्झाए को मेय सद्दहिस्सइ ? ओहयमणसकप्पे जान झियायइ ) મે તેતલિપુત્રે એક બહુ ભારે મોટી શિલા ( પથરે ) ગળામાં બાધી અને ત્યાર પછી હું અથાહ (ઊડા) અતાર અપુરુષ પ્રમાણ જેટલા પાણીમાં કૂદી ગયે પણ કૂદતાની સાથે જ પાણું થાહવાળુ (છીછરું ) થઈ ગયુ, અથાણું (ઉડુ) રહ્યું નહિ મારી આ વાત ઉપર પણ કોણ વિશ્વાસ મૂકશે ? આ પ્રમાણે જ મે તેતલિપુત્રે એક બહુ મોટા ભારે સૂકા ઘાસના ઢગલામાં અગ્નિ પ્રગટાવ્યો અને તેમા એ પિતાની જાતને ઝપવાવી દીધી પણ તે અગ્નિ ઓલવાઈ કાયે તેણે મને ભસ્મ કર્યો નહિ મારી આ વાતને કેણ શ્રદ્ધેય માનીને સ્વીકારવા તૈયાર થશે? આ રીતે તે અપડતમને સરવાળે (હતાશ) થઈને નિરુત્સાહી બની ગયે અને આધ્યાનમાં ડૂબી ગયે “ ॥ १ , भनगारधर्मामृतवपिणी टी० अ० १४ तेतलिपुत्रप्रधानचरितवर्णनम् मूलम्-तएणं से पोहिले देवे पोटिलास्व विउव्वइ, विउ- व्वित्ता, तेतलिपुत्तस्म अदूरसामंते ठिच्चा एवं वयासी-ह भो । तेतलिपुत्ता । पुरओ पवाए पिट्ठओ हत्थिभयं, दुहओ अचक्खुफासे, मज्झे सराणि परिसंति, गामे पलित्ते रन्ने झियाइ, रन्ने पलिते गामे झियाइ । आउसो तेतलिपुत्ता । कओ वयामो ?, तएणं से तेतलिपुत्ते पोट्टिलं एव वयासी- भीयस्स खलु भो | पवना सरणं, उक्कठियस्स सद्देसगमणं छुहियस्स अन्न, तिसियस्स पाणं, आउरस्स भेसज्ज, माइ- यस्स रहस्स अभिजुत्तस्स पच्चयकरणं, अद्धाणपरिसंतस्त वाहणगमणं, तरिउकामस्स पवहणकिच्चं, पर अभिउजिउ कामस्स सहायकिच्चं खतस्स दतस्स जिइदियस्स एत्तो एगमवि णं भवइ । तएण से पोहिले देवे तेयलिपुत्तं अमच्च एव वयासी-सुट्ठ णं तुम तेयलिपुत्ता। एयमह आयाणाहि त्तिकटु दोच्चपि तच्चपि एवं वयइ, वइत्ता जामेव दिस पाउन्भूए, तामेव दिस पडिगए ॥ सू० ११ ॥ टीका-'तएण से' इत्यादि । 'तएण' तत खलु तेतलिपुत्रो आर्तध्यान रते सति स पोहिलोदेव. 'पोटिलारूब' पोटिलारूप विकुर्वति क्रियशक्त्या तएण से पोहिले देवे' इत्यादि । टीकार्य-(तएण) इसके चोद (से पोहिले देवे ) उस पोटिल देवने (पोट्टिला स्व विउच्चड) पोटिला के रूप की विकुर्वणा की-अर्थात वैक्रिय शक्ति के प्रभाव से उसने पोट्टिला का रूप धारण किया (विउवित्ता 'तएण से पोट्टिले देवे' इत्यादि P-(तएण) त्या२ ५४ी (से पोट्टिले देवे) ते पाहिलवे (पोट्टिला रूव पिउबइ) पहिसाना ३५नी Agg s मेट १५ शतिना प्रभावी , - .
রাখময় दुदके आत्मा मुक्तः, तत्रापि च खलु गतागो जातः, को ममेट श्रदास्यतिन्मया स्वकण्ठे महाशिला गद्धा नगाचे उदके आत्मा मुक्त, परन्तु तस्मिनुदकेऽपि मम तलस्पर्शो जातः, इति मम पचन क' अवाम्पति ? पुनश-तेतलिपुगेण मया शुष्के तृण यूटेणपुजेऽग्निााय पक्षिप्य प्रचलिते तम्मिन् आत्मा मुक्त , परन्तु सोऽग्निकाय 'पिसाए ' विध्यात: उपशात, रत्येयम्पमपि मदीय वचनं का श्रद्धास्यति ? न कोऽपि, इत्येव स तेललिपुतः 'ओहयमणसकप्पे ' अपर- तमनः सकल्प =भग्नोत्साह' सन् यावद् ध्यायति ध्यान फरोति ॥मू० १०॥ मुस्को,तत्थरि ण याहे जाए को मेय सहिस्सह तेतलिपुत्तण सुस्कसि तणकृडसि अगणिकाय परिखवित्ता अप्पा मुयो तत्थ वि से अगणिका विज्झाए को मेय सद्दहिस्सह ? ओत्यमणसफप्पे जाप मियायइ) मुझ तेतलिपुत्रने एक बहुत बड़ी शिला का गलेमें पाधी और याद में अथाह अतार अपुरुप प्रमाण जल में कूद पडा परन्तु वह जल कूदते री थाह घाला बन गया अथाह नहीं रहा मेरी इस सन्य पात पर भी कौन श्रद्धा करेगा। इसी तरह मुझ तेतलिपुत्रने एक पढे भारी शुष्क घास के ढेर में अग्नि लगाई और उस में अपने आप को प्रक्षिप्त कर दिया- परन्तु वह अग्नि बुझ गई उसने मुझे भस्म नहीं किया मेरी इसबात को फौन श्रद्धा रूप से स्वीकार करेगा। इस प्रकार अपहत मन संकल्प वाला बन कर उत्साह रहित होकर वह तेतलिपुत्र अमात्य आर्तध्यान में पड़ गया ॥ सू० १०॥ तत्य नि ण थाहे जाए को मेय सदहिस्मइ : तेतलिपुत्तेण सुक्कसि तणकूडंसि अगणिकाय पविखवित्ता अप्पा मुक्को तत्यवि से अगणिकाए विज्झाए को मेय सद्दहिस्सइ ? ओढयमणसकप्पे जान झियायइ ) મે તેતલિપુત્રે એક બહુ ભારે મોટી શિલા (પ) ગળામાં ખાધી અને ત્યાર પછી હું અથાહ (ઊડા) અતાર અપુરુષ પ્રમાણુ જેટલા પાણીમાં કૂદી ગયે પણ કૂદતાની સાથે જ પાણે વાહવાળુ (છીછરુ ) થઈ ગયુ, અથાણું (ઉડુ) રઘુ નહિ મારી આ વાત ઉપર પણ કેણ વિશ્વાસ મૂકશે ? આ પ્રમાણે જ મે તેતલિપુત્રે એક બહુ મોટા ભારે સૂકા ઘાસના ઢગલામાં અગ્નિ પ્રગટાવ્યું અને તેમા એ પિતાની જાતને ઝપકાવી દીધી પણ તે અગ્નિ ઓલવાઈ કાયે તેણે મને ભસ્મ કર્યો નહિ મારી આ વાતને કેણ શ્રદ્ધેય માનીને સ્વીકાગ્યા તૈયાર થશે? આ રીતે તે અપહતમન સ વાળે (હતાશ) થઈને નિરુત્સાહી બની ગયે અને આધ્યાનમાં ડૂબી ગયે " ॥ ॥
८७ . -- , भनगारधर्मामृतषिणी टी० अ०१४ तेतरिपुत्रप्रधानचरितवर्णनम् मेवमवादीत् ' भो' हे पोट्टिले ! भीतस्य खलु प्राज्याशरण भानि तत्र दृष्टान्त; माह-यथा-' उवडियम्स ' उत्कण्ठिनग्य परदेशातिवाद मकस्य म्वदेशगमन, हियस्म ' क्षुषितस्य जनम् , 'तिसियम्म' पितस्य पान, 'आउरस्म आतु- रस्य-रोगिण' 'भेमन' भैपव्य 'मायिम्म'मायिकम्य-मायाविना रहस्य-गोपनम् । 'अभिजुनस्म' अभियुक्तम्य - दोपापपादयुक्तस्य ' पचयकरण = प्रत्ययकरण तग्निराफरणेन सविषये निर्दोपताप्रतीत्युत्पादनम्, 'अद्वाणपरिसतस्स' नवपरिश्रा- न्तस्य मार्गगमनपरिसिनस्य 'पाहणगमण' वाहनगमन, शकटादिना गमन ' तरि तेतलिपुत्ते पोटिल एव वधामी-भीत्तस्म ग्वलु मो पयजा-सरण-उक्क- डियस्म मदेसगमण त्रुहियस्म अन्न, तिमियस्स पाण, आउग्म्ल भेस ज्ज, माइयस्स रहस्स, अभिजुत्तस्स पच्चयकरण, अद्वाण परिसतस्स वारणगमण, तरिउफामस्स पवणफिच्च. पर अभिउ जिउकामस्स सहायकिच्चं सतस्म दनस्म जिदियस्स एत्तो एगमवि ण भवइ ) इस प्रकार पोहिला की बात सुनकर तेलिपुत्र अमात्य ने उससे ऐसा कहा हे पाहिले ! भीन (भय युक्त) के लिये प्रव्रज्या गरण भूत होती है, जैसे-परदेश वी उत्सुक व्यक्ति के लिये स्वदेश गमन शरण भूत होना है, भूखे के लिये अन्न शरण मूत होता है प्यासे के लिये पानी, आतुर रोगी के लिये भैषज्य, मायावी के लिये मायाचारी, अभियुक्त- दोपापवाद वाले के लिये दोपों के निराकरण से अपने विषय मे निर्दो- पती की प्रतीति का उत्पादन, शरण भून होता है। मार्ग प्रान्त के लिये वाहन से गमन, करना शरण भ्रत होता है, तैरने की इच्छा वाले के ( तएण से तेतलिपुत्ते पोट्टिल एव पयासी-भीतस्म खलु भो पज्जा सण उक्कडियस्स सदेसगमण छुहियरस अन्न निसियस्स पाण, नाउरस्स भेसज्ज, माइयस्स रहस्स, अभिजुत्तस्स पञ्चयकरण, अद्धाणपरिसतस्स वाहणगमण, तरिउ कामस्स सहायकिन्च सतस्स जिइदियस्स एत्तो एगमविण भवइ ) આ રીતે પિફ્રિલાની વાત સાંભળીને તેતલિપુત્ર અમાત્યે તેને કહ્યું કે હે પિદિલે! ભયભીત થયેલાને માટે પ્રવજના શરણે ભૂત હોય છે-જેમ-પરદેશમાં રહેતી ઉસુક વ્યક્તિને માટે પિતાને દેશ પાછા ફરવુ શરણ ભૂત હોય છે ભૂખ્યા ને માટે અન્ન શરણ ભૂત હોય છે આ પ્રમાણે જ તરસ્યાને માટે પાણી, આતુર- રેગ–ને માટે ભૈષજ્ય-દવા, માયાવીને માટે માયા ચરી અભિયુક્ત-દોષાપવાદ વાળાને માટે દેના નિરાકરણથી પિતાના વિશે નિર્માતાની પ્રતીતિનું ઉત્પાદન શરણભૂત હોય છે માર્ગમાં ચાલતા થાકી ગયેલાને માટે વાહનને ઉપર શરણુ ભૂત હોય છે. તરવાની ઈચ્છા ધરાવતા માણસને માટે નાવ વગેરે જલયામ र , - - সামবার धारयति, विकृर्षिया तेतरिपुत्रस्य अदरमामन्त-नाचिरे नातिनिफ्टे स्थिता एवमगादीत्-हभो तेतलिपुत्र ! 'हमो' इत्यामन्त्रणे, हे वेवलिपुत्र ! 'पुरओ पुरता=अग्रतः ' मपातःगत., अतो निर्गमनमसम्मति, पृष्ठतः इस्ति भयम् , मो प्रत्यावर्तन चासमति, 'दुहमो उभयता-उभयत-उमयोः पार्श्वयोः ' अचासुफासे' अस्पर्श अन्धकार , मज्जो' म ये-या यमास्महे तत्र सराणि शरा माणा, 'रिसति 'पर्पन्ति-निपतन्ति । 'गामे पलिते' ग्रामे मदीप्ते प्रज्वलिते सति रणे' आण्य-धन 'झिया' ध्यायति-गन्तु चिन्तयति, अरण्ये प्रदीप्ते ग्राम ध्यायनि-गनु चिन्तयति, 'आउमो तेतलिपुत्ता हे आयुष्मन् तेतलिपुत्र । ' उमओपठित्ते उभयत प्रदीप्ते उमयस्मिन् प्रचलिते वय ' कओ वयामो' कुतो नाम' कगन्छाम । तत' यलु स तेतलिपुनः पोहिला तेतलिपुत्तस्स अदूरसामते टीच्चा एच बयासी) धारण कर के वह तेतलिपुत्र के समीप गयी। वहां जाकर उसने उसमे इस प्रकार कहा-(ह भो तेतरि पुत्ता ! पुरओ पवार पिट्टभो हत्यिभय ) अरे ओ तेतलिपुत्र ! आगे प्रपात ग्वड्डा है और पीछे हाथी का भय है । (दुरओ अचक्खुफासे, मज्झे सराणि बरिसति) दोनों ओर अन्धेरा है और जहा हमलोग ठहरे हुए हैं या चाणों की वृष्टि हो रही है। (गामे पलिते रण्णो झियाइ, रन्नो पलित्ते गामे झियाइ) ग्राम में आगलगने पर मनुष्य जगल में चले जाने को सोचता है-और जगल में आग लगने पर ग्राम मे चले आने के लिये विचारता है। (आउसो तेतलि पुत्ता ! उभओ पलित्ते कओ वयामो) परन्तु जर दोनो में आग लग जावे तो हे आयुष्मन तेतलिपुत्र ! कहो! हम कहा जावे ? (तएण से तष पहिसानु ३५ पार ४यु (विउव्यित्ता तेतलिपुत्तस्स अदूरसामते ठीच्चा एव वयासी ) पा२६ शेन ते ततलिधुननी पासे 5 त्या ४४ने त तन मा प्रभार उधु है (ह भो तेतलिपुत्ता ! पुरो पवा पिढओ हथिभय ) मरे, એ! તેતલિપુત્ર! તમારી સામે પ્રપાત–ધોધ છે અને તમારી પાછળ હાથીને भय छ (दुहओ अचक्सुफासे, मज्झे सराणि परिसति ) मने त२५ मधा३ छ भने या अमे मा छामे त्या ती। वर्षी रह्या छ ( गामे पलित्ते रण्णो झियाइ रनो पलिते गामे जियाइ) गाभमा PAIN anal भाम मामा નાસી જવાને વિચાર કરે છે અને જગવમાં આગ લાગતા ગામમાં આવતા २वाना पिया२ ४२ छ ( आउसो तेतलिपुत्ता उभओ पलिते कओ पयामो ) પણ જયારે બને તરફ આગ સળગી ઉઠે ત્યારે તે આયુષ્યન્ત તેતલિપુત્ર! /1y . 'मासी, अभे या ?
८७ . . अनगारधर्मामृतवर्षिणी टी० अ०१४ तेतलिपुत्रप्रधानचरितवर्णनम् मेवमवादीत् 'भो' हे पोट्टिले ! भीतस्य खलु प्राज्याशरण भवनि तत्र दृष्टान्त- माह-यथा- उमडियम्म ' उत्कण्ठिनस्य-परदेशातिवाद मुमय पदेशगमन, 'छुडियस्म' क्षुधितस्य जन्नम् , 'तिसियम्म' पितस्य पान, 'आउरस्म आतु- रस्य-रोगिण 'भेमन' भैषज्य 'मायिम्म' मायिकस्य-मायादिनः रहस्य-गोपनम् । 'अभिजुनस्म' अभियुक्तम्य = दोपापादयुक्तस्य ' पचयकरण = प्रत्ययकरणं तनिराकरणेन स्वविषये निपितामतीत्युत्पादनम् , 'अद्वाणपरिसतस्स' अ परिश्रा- न्तस्य मार्गगमनपरिखिन्नस्य 'पाहणगमण' वाहनगमन शकटादिना गमन ' तरि तेतलिपुत्ते पोटिल ण्व वयामी-भीत्तस्म ग्वलु भो पवजा-सरण-उक्क- डियरस सदेसगमण छुहियस्म अन्न, तिसियस्स पाण, आउरस्स भेस ज्ज, माइयस्स रहस्स, अमिजुत्तस्म पन्चयकरण, अद्वाण परिसतस्स चाहणगमण, तरिउकामस्स परवणफिच्च पर अभिउ जिउकामस्त सहायफिच्च सतस्स दनस्म जिइदियस्म पत्तो एगमवि ण भवइ ) इस प्रकार पोट्टिला की बात सुनकर तेतलिपुत्र अमात्य ने उससे ऐसा कहा हे पाहिले ! भीन (भय युक्त) के लिये प्रव्रज्या शरण भूत होती है, जैसे-परदेश वर्ती उत्सुक व्यक्ति के लिये स्वदेश गमन शरण भूत होना है, भूखे के लिये अन्न शरण भूत होता है प्यासे के लिये पानी, आतुर रोगी के लिये भैपज्य, मायावी के लिये मायाचारी, अभियुक्त- दोपापवाद वाले के लिये दोपों के निराकरण से अपने विपय मे निर्दो- पता की प्रतीति का उत्पादन, शरण भून होता है। मार्ग श्रान्त के लिये वाहन से गमन, करना शरण भृत होता है, तैरने की इच्छा वाले के (तएण से तेतलिपुत्ते पोट्टिल एव पयासी-भीतस्म खलु भो पज्जा सरण उक्कडियस्म सदेसगमण छुहियस्स अन्न निसियस्स पाण, आउरस्स मेसज्ज, माइयस्स रहस्स, अभिजुत्तस्स पच्चयकरण, अद्धाणपरिसतस्स वाहणगमण, तरिउ कामस्स सहायफिच्च सतस्स जिइ दियस्स एत्तो एगमवि ण भवड ) આ રીતે પિફ્રિલાની વાત સાંભળીને તેતલિપુત્ર અમાત્યે તેને કહ્યું કે હે પદિલે! ભયભીત થયેલાને માટે પ્રવજા રાણ ભૂત હોય છે-જેમ-પરદેશમા રહેતી ઉસુક વ્યક્તિને માટે પિતાને દેશ પાછા ફરવુ શરણ ભૂત હોય છે ભૂખ્યા ને માટે અન્ન શરણ ભૂત હોય છે આ પ્રમાણે જ તરસ્યાને માટે પાણી, આતુર- ગ–ને માટે શ્રેષ-દવા, માવાવીને માટે માયા ચરી અભિયુક્ત-દોષાપવાદ વાળાને માટે દેના નિરાકરણથી પિતાના વિષે નિ પિતાની પ્રતીતિનું ઉત્પાદન શરણભૂત હોય છે માર્ગમાં ચાલતા થાકી ગયેલાને માટે વાહનને ઉપયોગ શરણભૂત હોય છે, તરવાની ઈચ્છા ધરાવતા માણસને માટે નાવ વગેરે જલયામ - - --- .
हाताधर्मग्यालम समेणं कम्मरयविकरणार अपुवकरण परिहस्स केवलवर- णाणदसणे समुप्पण्णे ॥ सू० १२ ॥ टीका- 'तपण तस्म' इत्यादि । तनः बतु गम्य तेतलिपुत्रस्य शुमेन परिणामेण जातिस्मरणम्-पूर्वभयान सम्पन्नम् । तत' ग्यलु तस्य तेतरिपुत्रम्य अयमेतद्रूप आध्यात्मिक मार्थिनः गिन्तिाः पल्पिनो मनोगतः सरम्पः समुद्रपद्यत एवं खेलु अहम् इहैव जम्बूद्वीपे द्वीपे महानिदेहे न पुलापती दिनये पुण्डरी रिण्या राजधान्या महापनो नाम राजा आसम् । ततः खलु अदम्यनिराणामन्तिके मुण्डो भूत्वा यावत् 'चौहमपुयाइ०' चतुर्दशपूणिचतुर्दशपूर्वागि अधीत वान , गहूनि पाणि ' सामनपरियाय:' श्रामण्यपर्यायरित्रपर्याय पालित तण्ण तस्स तेतलिपुत्तस्स' इत्यादि ।। टीकार्थ-(तण्ण) इसके बाद (तेतलिपुत्तस्स) तेनलिपुत्र को (सुमेण परिणामेण जाइ सरणे समुपन्ने)शुभपरिणाम से जालिस्मरण ज्ञान उत्पन्न हो गया। (तएण तस्स तेतलिपुत्तरस अयमेयारूवे अज्झथिए ५ समु प्पज्जित्था-एव सलु अह इहेव जबूद्दीवे दीचे माविदेहे चासे पोक्खला वई विजए पोडरिगिणीए रायहाणीए महापउमे नाम राया होत्था) उसके प्रभाव से उसने अपने पूर्वमद को जान लिया-उमने जाना कि में इसी जबूदीप नामके दीप मे महाविदेर क्षेत्र में पुष्कलावती विजय में पुण्डरीकिणी नामकी राजधानी मे महापद्म नाम का राजा या तएण अह थेराण अतिए मुडे भवित्ता जाव चोद्दमपुयाइ. वहृणि 'तएण तस्स तेतलिपुत्तरस' इत्यादि टाथ-(तएण) त्या२६ (तेतलिपुत्तस्स) ततलिपुत्रने (सुभेण परिणामेणं जाइ सरणे समुप्पन्ने ) शुभ परिणामयी गति भ२५ ज्ञान S५न या आयु (तएण तस्स तेतलिपुत्तस्स अयमेयारूवे अज्झस्थिए ५ समुप्पज्जित्था-एक खलु अह इहेच जबूदीवे दीवे महाविदेहे वासे पोक्खलावई विजए पोंडरिगिणीए रायहाणीए महापउमे नाम राया होत्था) તેના પ્રભાવથી તેણે પિતાના પૂર્વ ભવને જાણ લીધે તેને આ જાતનું જ્ઞાન થયું કે તે આ જ બૂઢીપ નામના કપમા મહાવિદેહ ક્ષેત્રમાં પુષ્ક લાવતી વિજ્યમાં પરીકિણી નામની રાજધાનીમાં માપ નામે રાજ હતું (तएण अह येराणअविए मुडे भवित्ता जाव चोस पुज्वाइ० यहूणि वासाणि -- अनगारधर्मामृतयषिणी टी० अ० १४ तेतलिपुत्रप्रधानचरितवर्णनम वान् । अनन्तर मासिस्या सलेखनया कालमासे काल कृत्वा ' महामुक्के कप्पे महाशुक्रे कल्पे-सप्तमे देवलोके 'दे' देव -देवत्वेनोत्पन्नः । ततः खलु अह तस्माद् देवलोकात् 'आयुक्खएण: ' आयुः क्षयेण ३ आयुर्भवस्थिति क्षयानन्त- रम् इहैव तेतलिपुरे तेतलेरमात्यस्य भद्राया माया 'दारगत्ताए ' दारसन्वेन पुरतया ' पच्चायाए ' प्रत्यायात उत्पन्नः, तत्तस्मात् श्रेयः खलु मम पूर्व- दृष्टानि-पूर्वभवपालितानि । महत्ययाइ ' महानतानि पञ्चमहानतानि स्वयमेव उपसंपद्य विहर्तुम् , एव सप्रेसते सप्रेक्ष्य स्वयमेव महाव्रतानि आरोहति-स्वीकरोति, पारुह्य, योर ममदवनम्-ध्यान तोर उपागच्छति, उपागत्य असोगवरपाय- वसिाणि सामन्नपरियाय० मासियारा मलेरणाए महामुक्के कप्पे देवे-- तएण अह ताओ देवलोयाओ आयुरवण्ण ३ इव तेतलिपुरे तेतलि स्स अमच्चस्स भद्दारा भारिपा दारगत्ताए पच्चाया) वहां मेने - विरों के पाम मुडित होकर दीक्षा धारण की थी और ग्यारह अगों को अध्ययन कर विशिष्ट तपस्या की थी अन्त में अनेक वर्षांतक श्रामण्ये पर्यायका पालन कर एक मासकी सलेखना धारण कर में काल अवमर काल कर सातवा महाशुक्र करपमेदवकी पर्यायसे उत्पन्न हो गया। वहीं की आयुष्य स्थिति भवस्थिति स्थिति के क्षयके अनन्तर में वहां से चलकर इस तेतलिपुर में तेतलि अमात्य के यहा भद्रा भार्या की कुक्षि से पुत्र रूप में अवतरित हुआ। (त सेय खलु मम पुञ्चदिट्ठाह मळ्यपाइ सयं मेव उवसपजिजत्ताण विरित्तए-एव सपेहेइ, सपेरित्ता सयमेव महन्च याइ आमहेह, आरुहिता जेणेच पसयवणे उज्जाणे तेणे उवागच्छडे, सीमन्नपरियाय० मासियाए सलेहणाए महामुक्के कप्पे देवे-तएण अह तामो देवलोयाओ आयुत वएण ३ इहेव तेतलिपुरे तेतलिस्स अमच्चस्स भदाए भारि- याए दारगत्ताए पञ्चायाए) ત્યા મે મુતિ થઈને સ્થવિરોની પાસેથી દીક્ષા ધારણ કરી હતી અને અગિયાર અગેનું અધ્યયન કરીને વિશિષ્ટ તપાસ કરી હતી વટે ઘણા વર્ષો સુધી ગ્રામર્થ્ય પર્યાયનું પાલન કરીને એક મહિનાની આલેખન ધારણ કરી અને ત્યાર પછી કાળ અવસરે કાળ કરીને માતા મહા શુક કપમાં દેવના પર્યાયથી હું જન્મ પામ્યો ત્યાની ભવસ્થિતિ ૩ (ત્રણ) ના ક્ષય થવા બદલ હુ ત્યાથી આવીને આ તેતલિપુરમા તેતલિ અમાત્યને તવા ભદ્રા ભાર્યાને ગર્ભથી પુત્ર રૂપમાં જન્મ પામ્યું ( त सेय खलु मम पुनदिदाइ महन्तयार सयमेव उपमपन्जिताण निरि एव सपेहेइ, सपेहिता सयमेव महब्धयाइ आम्हेड, आरहित्ता जेणेव पमयवणे - %D ---- ९३ प्राताधर्मकथा वस्स ' अशोकारपारपस्य-अशोकक्षम्य 'आह' अधः परिणतशिलोपरि 'मुह निसनस्स' मुखनिपण्णस्य-मुखोपविष्टम्य 'अणुचितमाणम्म ' अनुचिन्तयत - पूर्वमवे कृतमध्ययनादिक स्मरत 'पृथ्याहीयाड' पूर्वधीतानि-पूर्वमा पठितानि सामायिकादीनि चतुर्दशपूर्याणि स्वयमेर 'अभिसमन्नागयह ' अमिमगन्वागतानि ज्ञानविषयतया सजातानि । तत. सलु तस्य तेतलिपुत्रस्य मनगारस्य शुभेन परि णामेन 'नार' यावत्-प्रशस्तैरव्यवसाय, प्रशस्तागिर्ले पामि दियमानामिः 'तयावरणिज्जाण ' तदारणीयाना=ज्ञानापरणीयादीना यर्मणा 'सयोवसमेण' उवागच्छित्ता असोगवरपायवस्स अहे पुढविसिलापट्टासि सुहनि- सनस्स अणुचित्तमाणस्स पुन्वाहीयाइ सामाइयमाझ्याइ चोदसपुन्वाइ सयमेव अभिसमन्नागयाह) इसलिये अब मुझे यही उचित है कि मैं पूर्व भव में पालित किये पच महाव्रतो को अपने आप धारण करलू । ऐसा उसने विचार किया। विचार करके फिर उमने अपने आपही महानतों को धारण कर लिया। धारण करके फिर यह जहाँ प्रमदवन नामका उद्यान था वहाँ चला गाया। वहां जाकर वर अशोक वृक्ष के नीचे रक्खे हुए पृथिवी शिलापटक पर पटाकार से परिणत शिला के ऊपर-आनन्द के साथ बैठ गया और पूर्व भव में कृत अध्ययन आदि का बार२ चिन्तवन करने लगा। इस तरह विचार करते२ उसके पूर्व भव में पठित सामायिक आदि चौदह पूर्व ज्ञान के विषय भूत बन गये। (तरण तस्स तेतलिपुत्तस्स अणमारस्स सुभेण परिणामेण जोव तया- उज्जाणे तेणेव उवागच्छद, उवागच्छिता असोगवरपायपस्म अहे पुढविसिला पदृयसि सुहनिसनस्स अणुचिंतेमाणस्स पुयाहीयाइ सामाइयमाझ्याइ चोइस पुवाइ सयमेव अभिसमन्नागयाइ) એટલા માટે હવે મને એજ યોગ્ય લાગે છે કે પૂર્વ ભવમાં જે પાચ મહાવતેને મે ધારણ કરેલા તેને પોતાની મેળે જ ધારણ કરી લઉં આ રીતે તેણે વિચાર કર્યો વિચાર કર્યા બાદ તેણે પોતાની મેળે જ પાચ મહાવ્રત ધારણ કરી લીધા ધારણ કર્યા પછી તે જ્યા પ્રમદવન નામે ઉદ્યાન હતું ત્યાં જતો રહ્યો ત્યાં જઈને તે અશોક વૃક્ષની નીચે મૂકાયેલા પૃથિવી શિલા પદુક ઉપર-પટ્ટાકાર રૂપથી પરિણુત શિલા ઉપર-આનદ અનુભવતે બેસી ગયો અને પૂર્વ ભવમાં જે કઈ અધ્યયન કર્યું હતું તેનું વારંવાર ચિંતન કરવા લાગ્યો આ રીતે ચિંતન કરતા કરતા પૂર્વભવમાં ભણેલા સામાયિક વગેરે ચૌદ + પૂર્વજ્ઞાન તેને વિષયભૂત થઈ ગયા नमसित्ता भनगारधर्मामृतपिणी टीका० अ० १४ तेतलिपुत्रग्धानचरितवर्णनम् क्षशोपशमेन-उदिताना कर्मणा क्षयेण अनुदिताना कर्मणामुपशमेन=निरुद्धोदयस्वेन 'कम्मरयविकरणकर ' कर्मरजो विकरणकम् 'अपुवकरण' अपूर्वकरणम् अष्टम गुणस्थानम् पविष्टस्य तस्य केवलपरज्ञानदर्शन समुत्पन्नम् ॥०१२॥ मूलम्-तएण तेतलिपुरे नयरे अहा संनिहिएहि वाणमं- तरेहि देवेहि देवीहिय देवदुंदुभीओ समाहयाओ, दसद्धवन्ने कुसुमे निवाडिए, दिव्वे देवगीयगधव्वनिनाए कए यावि होत्था । तएणं से कणगज्झए राया इमोसे कहाए लद्धटे समाणे एव वयासी-एव खलु तेतलिपुत्ते मए अवज्झाए मुंडे भवित्ता पम्वइए, त गच्छामि ण तेतलिपुत्तं अणगार वंदामि नमसामि वदित्ता एयमट्ठ विणएणं भुजो २ खामेमि, एव संपेहेइ, सपेहिता पहाए. चाउरगणीए वरणिनाण कम्माण खओवसमेण कम्मरयविदरणकर अपुष्वकरण पविहस्स केवलवरनाणदसणे समुप्पण्णे) इस प्रकार शुभ परिणामों से यावत् प्रसस्त अयवसायों से विशुद्धमान लेश्याओ से, उसके ज्ञाना- चरणी आदि कर्मों का क्षयोपशम-उदित कर्मों का क्षय एव अनुदित फर्मो का उपशम-हो गया-सो इस के प्रभाव से वे कर्मरज को करने वाले अष्टम अपूर्व करण नामके गुणस्थान में प्राप्त हो गये। बाद में याहरवे गुणस्थान के अत में और तेरहवे गुणस्थान के प्रारभ में उन्हें केवलज्ञान और केवलदर्शन उत्पन्न हो गया ॥ १२॥ (तएण तस्स तेतलिपुत्तस्स अणगारस्स मुभेण परिणामेण जान तयावरणि- जाण कम्माण खओरसमेण कम्मरयविकरणकर अपुरकरण पविहस्स केवल- चरनागदसण समुप्पण्णे) આ રીતે શુભ પરિણમેથી, યાવત્ પ્રશસ્ત અધ્ય સાથી, વિશુદ્ધમાન લેશ્યાઓથી તેના જ્ઞાનાવરણીય વગેરે કમને ક્ષયે પશમ–ઉદિત કર્મોનો ક્ષય અને અનુદિત કર્મોને ઉપશમ થઈ ગયો એના પ્રભાવથી તેઓ કમરજને વિકરણ કરનારા અષ્ટમ અપૂર્વકરણ નામના ગુણસ્થાનમાં પ્રાપ્ત થઈ ગયા ત્યાર પછી બારમા ગુણસ્થાનના અતમાં અને તેમાં ગુણસ્થાનના પ્રારંભમાં તેમને Emજ્ઞાન અને કેવળ દર્શન ઉત્પન્ન થઈ ગયા છે. સૂત્ર १२ ॥ .
- - - - নাঘমকাথায় वस्स ' अशोकारपादपस्य अशोरक्षम्य 'अहे' अधः पणितशिलोपरि 'सुर निसनस्स' सुखनिपण्णस्य मुखोपविष्टम्य ' अणुचितमाणम्ग ' अनुचिन्तयत पूर्वमचे कृतमध्ययनादिक स्मरत 'पुण्याहीयाइ' पूर्याधीतानिपूर्वभने पठितानि सामायिकादीनि चतुर्दशपूर्वाणि स्वयमेव अभिसमन्नागप:' अमिमगन्यागतानि ज्ञानविषयतया सजातानि । तत. खलु तस्य तेतलिपुत्रस्य अनगारस्य शुभेन परि णामेन 'जाव' यावत्-प्रशस्तैरध्यरसाय', प्रशस्तागिर्लेश्यामि द्धियमानाभिः 'तयावरणिज्जाण' तदारणीयानाशानापरणीयादीनां धर्मणा ' खयोवसमेण' उवागच्छित्ता असोगवरपायवरस अहे पुढपिसिलापट्टसि सुहनि- सनस्स अणुचिंत्तमाणस्स पुन्चाहीयाइ सामाइयमाइयाइ चोद्दसपुवार सयमेव अभिसमन्नागयाइ) इसलिये अब मुझे यही उचित है कि मैं पूर्व भव में पालिन किये पच महावतो को अपने आप धारण करलू । ऐसा उसने विचार किया। विचार करके फिर उसने अपने आपही महानतो को धारण कर लिया। धारण करके फिर वह जहां प्रमदवन नामका उद्यान था वहाँ चला गाया। वहा जाफर वह अशोक वृक्ष के नीचे रक्खे हुए पृधिवी शिलापटक पर पटाकार से परिणत शिला के ऊपर-आनन्द के साथ बैठ गया और पूर्व भव में कृत अध्ययन आदि का बारर चिन्तवन करने लगा। इस तरह विचार करते२ उसके पूर्व भव में पठित सामायिक आदि चौदह पूर्व ज्ञान के विषय भृत बन गये। (तण्ण तस्स तेतलिपुत्तस्स अणगारस्स सुभेण परिणामेण जाव तया- उज्जाणे तेणेष उवागच्छद, उवागन्छित्ता असोगवरपायास्त अहे पुढविसिला पट्टयसि सुदृनिसनस्स अणुचिंत्तेमाणस्स पुनाहीयाइ सामाइयमाइयाइ चोइस पुयाइ सयमेव अमिसमन्नागयाइ) એટલા માટે હવે મને એજ એગ્ય લાગે છે કે પૂર્વ ભવમાં જે પાચ મહાવ્રતને મેં ધારણ કરેલા તેને પિતાની મેળે જ ધારણ કરી લઉં આ રીતે તેણે વિચાર કર્યો વિચાર કર્યા બાદ તેણે પિતાની મેળે જ પાચ મહાવ્રત ધારણ કરી લીધા ધારણ કર્યા પછી તે જ્યા પ્રમવન નામે ઉદ્યાન હતું ત્યાં જ રહ્યો ત્યા જઈને તે અશક વૃક્ષની નીચે મૂકાયેલા પૃથિવી શિલા પટ્ટક ઉપર-પટ્ટાકાર રૂપથી પરિણત શિલા ઉપર-આનદ અનુભવતે બેસી ગયે અને પૂર્વ ભવમાં જે કઈ અધ્યયન કર્યું હતું તેનું વારંવાર ચિંતન કરવા લાગ્યો આ રીતે ચિંતન કરતા કરતા પૂર્વભવમાં ભણેલા સામાયિક વગેરે ચૌદ પૂર્વજ્ઞાન તેને વિષયભૂત થઈ ગયા ।
- मनगारधर्मामृतयपिणी टी० म० १४ सेतलिपुत्रप्रधानचरितवर्णनम् दशावर्णानि पञ्चपर्णाणि चित्तपुष्पाणि निपातितानि-अर्पितानि, दिव्या मनो हरः गीतगन्धर्व निनादः कृतश्चापि अभवत् । ततः खलु स कनकध्वजो राजा 'इमी मे कहाए ल्ढे ममाणे ' यस्याः कथाया लण्यार्थः मया दुष्टचिन्ता विषयी नस्तेतलिपुनः अमात्य' प्रत्रज्य प्रमदपने केवलपरज्ञानदर्शनसम्पन्नो मत इति वृत्तान्ताभिज्ञः सन् एरामवादीत्-एव खलु तेतलिपुत्रो मया 'अमझाए ' अप- ध्याता दुष्टचिन्तारिपयीकृतः सन् मुण्डो भूखा पत्रमितः 'त' तत्-तम्मात् कार- णात् नमस्यित्वा 'एयम ' एतमर्य-मया कृतमपमानरूपमर्थ विनयेन भूयो भूयः 'सामेमि' क्षमयामि, एव सप्रेक्षते सप्रेक्ष्य 'पहाए ' स्नातः कृतस्नानः 'चाउ रगिणीए सेणाए ' चतुरहिण्या सेनया साई यत्रैव प्रमदान उद्यान यौव तेतलि- होत्या) या सनिहित आमन्न भृत हुए वाण, व्यन्तर देवो ने और देवियो ने आकाश में देवदुन्दुभिया यजाई । पचवर्ण के अचित्त कुसुमो की पुष्टि की । मनोहर गीत गवर्व निदान भी किया। (तरण से कण, गझए राया हमीसे कहाए लढे समाणे एव वयामी) जब यह समाचार कनक-वज राजा को ज्ञात हुआ मेरो दुष्ट विचारणा के विषय भूत बने हुए, तेतलिपुत्र अमात्य ने दीक्षित होकर प्रमदवन में केवल ज्ञान और केवलदर्शन प्राप्त कर लिया है-इस प्रकार का वृत्तान्त जप उसे मालूम पड़ा-तय उसने अपने मन में विचार किया (एव खलु तेत लि पुत्ते मए अवज्झाए मुडे भविता पवटए, त गच्यामि ण तेतलिपुत्त अणगार वदामि नमसामि, वदित्ता नमसित्ता ण्यम विणण भुज्जोर खामेमि एव सपेहेड--सपेहित्ता पहारा०चाउरगिणीए सेणा जेणेच पमय वणे उज्जाणे जेणेव तेतलिपुत्ते तेणेव उवागच्छह, उचागरिकता नलि યથા સનિહિત આસન્નભૂત થયેલા વાણવ્ય તર દેએ અને દેવીએ એ આકાશમાં દેવદુદુમિઓ વગાડી, પાચ રગના અચિત્ત પુષ્પોની વર્ષા કરી અન્ય मनात निना (नि) ५५ श्यों (तग्ण से कणग ज्ञए राया इमोसे कहाए लद्धढे समाणे एर वयासी ) क्यारे मा समायानी ! કનક વજને થઈ કે મારી દુષ્ટ વિચ રણને લીધે તેતલિપુત્ર અમાત્ય દીક્ષિત થઈને અમદવનમાં કેવળજ્ઞાન અને કેવળ દન પ્રાપ્ત કરી લીધા છે ભારે તેણે મનમાં વિચાર કર્યો કે (एव खलु तेतरिपुत्ते मए अज्झाए मुढे भनित्ता पचहए त गच्छामिण तेनलिपुत्त अणगार पदामि नमसामि, पदित्ता नमसित्ता एयमट्ट विणएण भुन्नो २ खामि ए मपेहेद-सपेहिता पहाए. चाउरगिणीए सेणाए जेणेव पमयाणे उजनायो जेणे तेतलिपुत्ते तेणेव उवागच्छा, उवागच्छित्ता तेतलिपुत्त अणगार જા মামলা 'सेणाए जेणेव पमयवणे उज्जाणे जेणेव तेतलिपुत्तं तेणेव उवागच्छइ उवागच्छित्ता तेतलिपुत्ते अणगार वदइ नमंसद वंदित्ता नमसित्ता एयमट्ट विणएण भुज्जोर खामेइ, नच्चा- सेन्ने जाव पज्जुवासई । तएणसे तेतलिपुत्ते अणगारे कण- गझयस्म रन्नो तीसे य महइमहालयाए० धम्म परिकहेइ। तएणं से कणगंज्झए राया तेतलिपुत्तस्स केवलिस्स अंतिए धम्म सोच्चा णिसम्म, पचाणुव्वइयं सत्तसिखावइयं सावग- धम्म पडिवज्जइ, पडिवज्जित्ता समणोवासए जाए जाव अहिगये जीवाजीवे । तएणं तेतलिपुत्ते केवली वहृणि वासाइ कैवलिपरियाग पाउणित्ता जावं सिद्धे । एव खलु जंवू । संमणेणं भगवयां महावीरेणं जाव सपत्तेणं चोदसमस्स । णायज्झयणस्स अयमढे पण्णत्ते तिमि ॥ सू० १३ ॥ ॥चउद्दस अज्झयणं समतं ॥ । टीका-'तएण' इत्यादि । तत खलु तेतलिपुरे नगरे 'अहासनिहिऐहि यथा सनिहितै' आसन्न. 'घाणमतरेहि 'वाणव्यन्तरे. देवै देवीमिश्च देवदुन्दुभय समाहता आकाशे देवैः देवीभिश्च देवदुन्दुभयो वादिता इत्यर्थ , दंसद्धनण्णे कुसुमे निवाडिए' दोर्द्धवर्ण कुसुम निपातितम् , अत्र जाति विक्षायामेकवचनम् । 'तएण तेतलिपुरे नयरे' इत्यादि । टीकार्थ, (तएण) इसके बाद (तेललिपुरे नयरे तेतलिपुर नगर में (अहासनिरिएहिं वाणमतरेहि देवेहिं देवीहिय देवदुदुभीओ ममायाओं, दसद्धवन्ने कुसुमे निवाडिए, दिव्ये देवगीयंगधव्यनिनाए करें यावि 'तएण तेतलिपुरे नयरे' इत्यादि- 12-(सएण) स्वार पछी ( तेतलिपुरे नयरे ) ततलिपुर नगरमा (अहा संनिहिहि वागमतरेडि देवेहिं देवीडिय देवदु दुभीभो समाहयात्री, दसद्धबन्ने कुसुमे निवाडिएं, दिव्ये देवीयर्गधचनिनीए कए यां। . . . ९ - ममगारधर्मामृतपिणी टी० ० १४ सेतलिपुत्रप्रधानचरितवर्णनम दशार्द्धवर्णानि-पञ्चवर्णाणि -चित्तपुष्पाणि निपातितानिअर्पितानि, दिव्यानो हरः गीतगन्धर्ष निनादः कृतश्चापि अभवत् । ततः खलु स कनकध्वजो राजा 'इमी से नहाए लट्टे ममाणे ' यस्याः कथाया लब्धार्थः मया दुष्टचिन्ता विषयी कृतस्तेतलिपुत्र. अमात्यः प्रव्रज्य प्रमदरने केरलवरजानदर्शनसम्पन्नो गत इति वृत्तान्ताभिज्ञः सन् एमगादी-एव खलु तेतलिपुत्रो मया 'अमज्झाए ' अप- ध्याना=दुष्टचिन्ताम्पियीकृतः सन् मुण्डो भूखा मनजितः 'त' तत्-तम्मान कार- णात् नमस्यित्वा 'एयमह' एतमर्थ-मया कृतमपमानरूपमर्थ विनयेन भूयो भूयः 'सामेमि' क्षमयामि, एव सप्रेक्षते सप्रेक्ष्य ‘हाए' स्नातः कृतस्नान. ' चाउ- रगिणीए सेणाए ' चतुरभिण्या सेनया साई यौव प्रमदपन उद्यान यौव तेतलि- होत्या) यथा सनिहित आसन्न भृत हुए वाण, व्यन्तर देवो ने और दवियों ने आकाश में देवदुन्दुभियां बजाई। पचवर्ण के अचित्त कुसुमो की वृष्टि की। मनोहर गीत गधर्व निदान भी किया। (तण्ण से कण गज्झए राया इमीसे कहा लढे समाणे एव पयामी) जब यह समाचार कनक वज राजा को ज्ञात हुआ मेरो दुष्ट विचारणा के विषय भूत बने हुए, तेतलिपुत्र अमात्य ने दीक्षित होकर प्रमदवन में केवल ज्ञान और केवलदर्शन प्राप्त कर लिया है-इस प्रकार का वृत्तान्त जप उसे मालूम पड़ा-तय उसने अपने मन में विचार किया (एवं खलु तेत लि पुत्ते मए अवज्झाए मुडे भवित्ता पन्वटए, त गच्चामि ण तेतलिपुत्त अणगार बदामि नमसामि, वदित्ता नमंसित्ता एयम विणण्ण भुजोर खामेमि एव सपेहेइ-सपेहिता पहारा०चाउरगिणीए सेणाए जेणेव पमय वणे उज्जाणे जेणेव तेतलिपुत्ते तेणेव उवागच्छह, उवागविलेनलि થયેલા વાણ તર દેવોએ અને દેવીએ એ આકાશમાં દેવદુદુમિ વગાડી, પાચ રગના અચિત્ત પુની વર્ષા કરી અ{ भनात ध निनाद (नि ) ५] य (तएण से कणगए राय इमोसे कहाए लद्धढे समाणे एर वयासी ) न्यारे मा समायारानी on in કેતક દવજને થઈ કે મારી દુષ્ટ વિચ રણને લીધે તેતલિપુત્ર અમાત્યે દીક્ષિત થઈને અમદવનમાં કેવળજ્ઞાન અને કેવળ દન પ્રાપ્ત કરી લીધા છે ત્યારે તેણે મનમાં વિચાર કર્યો કે (एव खलु तेतलिपुत्ते मए अअल्झाए मुडे भरित्ता पबदए त गच्छामिण तेनलिपुत्त अणगार वदामि नमसामि, बदित्ता नमसित्ता एयम विणएण भूज्जो २ खामेमि एप मपेहेद-सपेहित्ता हाए० चाउरगिणीए सेणाए जेणेत्र पमयपणे उनायो नेणे तेतलिपुत्ते तेणेव उवागच्छइ, उवागच्छित्ता वेतलिपुत्त अणगार યથા સ. નિહિત આસન્નભૂત पुत्रोऽनगारस्तोर उपागच्छति, उपागत्य तेतरित्रमनगार चन्दते नमस्पति, पन्दितवा नमस्यिया एमर्यसनापरायलमण पिनयेनभूयो भूयः समयति= क्षमा कारयति, तथा 'नच्यापन्ने० ' नात्यामन्ने नातिरे या पर्युपास्ते सेवा करोति । तत' खलु म तेतलिपुत्रोऽनगारः कनकपनाय राजे तस्या च पुत्त अणगार चदह, नमसह, बदित्ता नममित्ता एमयट्ट विणण्ण भुज्जो २ खामेइ नच्चामन्ने जाच पज्जुगामह) मैंने तेलि पुत्र को अपनी दुष्ट चिन्ता का विपयभूत बनाया है-सोवर मुड़ित होकर दीक्षित हो गया है। इसलिये में अप उमके पास जाऊँ और उन तेतलिपुत्र अनगार को घदना करूँ-नमस्कार करूँ । वदना नमस्कार फर में अपने द्वारा किये अपमान रूप अपराधकी पढे विनय के माय पार२ उनसे क्षमा मागू- इस प्रकार ज्योही उसने विचार किया-कि उसी समय पर उठा और स्नान किया याद में अपनी चतुरगीनी सेना के साथ जहा प्रमदधन था -उसमें जहा तेतलिपुत्र अनगार विराजमान थे वहा पहुँचा-वहाँ पहुँच कर उसने तेतलिपुत्र अनगार को वदना की नमस्कार किया। वदना नमस्कार करके फिर अपने द्वारा वृत अपमान रूप अपराध की बडे विनय के माथ यार २ उनसे क्षमा कराई और समुचित स्थान पर बैठ कर उनकी सेवा सुश्रूषा की (ताण से तेतलिपुत्ते अणगारे कणगजन घदइ, नममइ, बदित्ता नमसित्ता एगमट्ठ विगएण भुज्झो २ खामेइ नच्चासन्ने जाव पज्जुवासइ) તેતલિપુત્ર અમાત્યને મે પિતાની દુષ્ટ ચિંતાને વિષયભૂત (લક્ષ્ય ) બનાવ્યું છે તેથી જ તે મુડિત થઈને દીક્ષિત થઈ ગયો છે એટલા માટે હવે હું તેની પાસે જાઉં અને તેના પુત્ર અનગારને વદન કરૂ નમસ્કાર કરૂ વેદના અને નમસ્કાર કરીને હું મારા વડે થઈ ગયેલા આ માન રૂપ અપરાધ બદલ બહુ જ નમ્રપણે તેમની પાસેથી ક્ષમા યાચના કરૂ આ રીતે વિચાર થતાની સાથે તરત જ તે ઊભો થશે અને સ્નાન કર્યું ત્યાર પછી પિતાની ચતુરાગિણી સેનાને સાથે જ્યા પ્રમાદવન હતુ અને તેમાં પણ જ્ય, તેતલિપુત્ર અનગાર વિરાજમાન હતા ત્યા પહે એ ત્યા પહેચીને તેણે તેતલિપુત્ર અનગારને વદના કરી અને નમસ્કાર કર્યા વિના અને નમસ્કાર કરીને તેણે તેના વડે થઈ ગયેલા અપમાન રૂપ અપરાધની બહુ જ નમ્રપણે ક્ષમા માગી અને ત્યાર પછી તેણે ઉચિત સ્થાન ઉપર બેસીને તૈમની સેવા તેમજ સુશ્રુષા કરી (तएण से तेतलिपुत्ते अणगारे कणगल्झयस्स रणा वीसे य महइ महाल याए० धम्म परिकहेइ) ।
- अनगारधर्मामृतयपिणी टी० अ० १४ तेतलिपुत्रप्रधानचरितवर्णनम् 'महइमहालयाए० ' महातिमहत्या परिपदि धर्म ‘परिक हैड' परिकथयति= उपदिशति । ततः खलु स कनक पमो राजा तेतलिपुत्रस्य केवरिनोऽन्तिके धर्म श्रुत्वा निशम्य पञ्चाणुव्रतिक मतशिक्षागतिक टत्येन द्वादशविध बारमधर्म प्रतिप- घते, मतिपय श्रमणोपासको जातः । कीदृश १-अभिगत जीवा-जीवः परिज्ञात- यस्स रपणो तीसे य महामहाल पाप धम्म परिकहेइ ) इसके बाद उन तेतलिपुत्र अनगार केवली ने कनर वजराजा को उपस्थित परिपद को विशाल धर्म का उपदेश दिया-(तएण से कणज्यझा राया तेतलिपु त्तस्स केवरिस्स अतिए यम्म सोच्चा णिसम्म पचाणुब्बइय सत्तसि- क्खावइय सावगवम्म पटिचजड पटिवजित्ता स्मणोवासरा जाए जोव अहिगयजीवाजीवे । तपण तेतलिपुत्ते केवली यदृणि वासाइ केवलिप- रियाग पाउणित्ता जाव सिद्धे । एच ग्बल जन् । समणेण भगवया महा- वीरेणं जाव सपत्तेण चोदसमस्स णाय अयणरस अयम्टे पण्णत्ते त्ति बेमि ) उपदेश सुनने के बाद कनकावज राजाने तेतलि पुत्र केलि के समीपश्रुनचारित्ररूप धर्म के प्रभाव से प्रेरित होकर और उस श्रुन धर्म का अच्छी तरह हृदय से विचार कर पाच अणुव्रत एव सात शिक्षा रूप श्रावक धर्म धारण कर लिया। धारण करके वे श्रमणोपासक बन गये-यावत् जीव और अजीव तत्व का क्या स्वरूप है इसके भी वे ज्ञाता हो गये। बाद में तेतरि पुत्र केवलीने अनेक वर्षा तक केवलि ત્યાર પછી તે તેતલિપુત્ર અનગાર કેવળીએ કનકધ્વજ રાજાને તેમજ ઉપસ્થિત પરિષદને સવિસ્તર ધર્મ વિશે ઉપદેશ આપે ( तएण से रणगज्झए राया तेतलिपुत्तस्म केवलिस्स अतिए धम्म सोच्चा णिसम्म पचाणुव्वदय सत्तसिक्खावश्य सावगाम्म पडिविज्जड पडि विसज्जित्ता समणोवासए जाए जाव अहिगयजीवाजीवे । तएण तेतरिपुत्ते केलि वहूणि वासाइ केवलिपरियाग पाउणित्ता जाय सिद्धे । एव खलु जवू । समणेण भगवया महावीरेण नाम सपत्तेण चोदसमस्स णायज्झयणस्स अयमढे पण्णत्ते तिबेमिः) ઉપદે સાભળીને કનડજ રાજાએ તેતલિપુત્ર કવળિના કૃતચારિત્રરૂપ ધર્મના પ્રભાવથી પ્રેરાઈને તે થતચારિત્ર રૂપ ધર્મ વિષે મનમાં સારી રીતે વિચાર કરીને તેમની પાસેથી પાચ અણુવ્રત અને સાત શિક્ષારૂપ શ્રાવકધમ ધારણ કરી લીધો ધારણ કરીને તેઓ શ્રમણોપાસક થઈ ગયા અને યાવત્ જીવ તેમજ અજીવતત્વનુ સ્વરૂપ શું છે? તેનું પણ તેઓને જ્ઞાન થઈ ગયુ ત્યાર પછી તેતલિપુત્ર કેવળીએ ઘણા વર્ષો સુધી કેવળી પર્યાયનું પાલન કર્યું અને આમ તેઓએ યાવત સિદ્ધપદ २६ - , সামবাহ पुत्रोऽनगारस्तष उपागच्छति, उपागत्य तेतरिपुत्रमनगार चन्दने नमस्पति, पन्दिता नमस्यिमा एमर्थतापरावलक्षण पिनयनभूयो भूय समयति- क्षमा कारयति, तथा ' नच्चासन्ने० 'नात्यासन्ने नातिहरे यान पर्युपास्ते- सेवां करोति । ततः खलु म तेतलिपुत्रोऽनगारः कनकपनाय राजे तस्याचे पुत्त अणगार वदड, नमसह, वदित्ता नमित्ता पमय विणण्ण भुज्जो २ खामेइ नच्चामन्ने जाच पज्जुवामह) मैंने तेतरि पुत्र को अपनी दुष्ट चिन्ता का विपयभूत बनाया है-सो वह मुहित होकर दीक्षित हो गया है। इमलिये में अघ उमके पास जाऊँ और उन तेतलिपुत्र अनगार को वदना करूँ-नमस्कार करूँ । यदना नमस्कार कर मैं अपने द्वारा किये अपमान रूप अपराधकी पढे विनय के माय घार२ उनसे क्षमा मागू- इस प्रकार ज्योही उसने विचार किया-कि उसी समय वह उठा और स्नान किया-बाद में अपनी चतुरगीनी सेना के साथ जहा प्रमदवन था -उसमें जहा तेतलिपुत्र अनगार विराजमान ये चहा पहुँचा-वहाँ पहुँच कर उसने तेतलिपुत्र अनगार गे वदना की नमस्कार किया । वदना नमस्कार करके फिर अपने द्वारा कृत अपमान रूप अपराध की बडे विनय के माथ थार २ उनसे क्षमा कराई और समुचित स्थान पर बैठ कर उनकी सेवा सुश्रूषा की ( ताण से तेनलिपुत्ते अणगारे कणगा बदइ, नममइ, वदित्ता नमसित्ता एगम विगएण भुज्झो २ खामेइ नच्चासन्ने जाव पज्जुसइ) તેતલિપુત્ર અમાત્યને મે પિતાની દુષ્ટ ચિંતાનો વિષયભૂત (લય) બનાવ્યું છે તેથી જ તે મુડિત થઈને દીક્ષિત થઈ ગયો છે એટલા માટે હવે તેની પાસે જાઉં અને તેતલિપુત્ર અનગારને વદન કરૂ નમસ્કાર કરૂં વદના અને નમસ્કાર કરીને હું મારા વડે થઈ ગયેલા આ માન રૂપ અપરાધ બદલ બહુ જ નમ્રપણે તેમની પાસેથી ક્ષમા યાચના કરૂ આ રીતે વિચાર થતાની સાથે તરત જ તે ઊભું થયું અને સ્નાન કર્યું ત્યાર પછી પિતાની ચતુર ગિણી સેનાને સાથે જ્યા પ્રમાદવન હતુ અને તેમાં પણ જ્ય, તેતલિપુત્ર અનગાર વિરાજમાન હતા ત્યા પહેલા પહોચીને તેણે તેતલિપુત્ર અનગારને વદના કરી અને નમસ્કાર કર્યો વદના અને નમસ્કાર કરીને તેણે તેના વડે થઈ ગયેલા અપમાન રૂપ અપરાધની બહુ જ નમ્રપણે ક્ષમા માગી અને ત્યાર પછી તેણે ઉચિત સ્થાન ઉપર બેસીને તેમની સેવા તેમજ સુશ્રુષા કરી (तएण से तेतलिपृत्ते अणगारे कणगज्झयस्स रगा तीसे य महइ महाल याए० धम्म परिकहेइ) . ॥ अथ पञ्चदशमध्ययनं प्रारभ्यते ॥ . गत चतुर्दशमध्ययन सम्पति पञ्चदशमारभ्यते, पूर्वा ययनेऽपमानाद् विपय- त्यागः प्रदर्शितः, अत्र तु स जिनोपदेशाद् भवतीति प्रतिपादयिष्यतेऽतस्तस्य सद्भावेऽर्थप्राप्तिः, असद्भावत्वन प्राप्तिर्भवतीत्येव पूर्वेण सम्बन्धः तोदमा- दिसूनम्-'जइण भते ' इत्यादि । मूलम्-जइणं भते । समणेणं भगवया महावीरेणं जाव सपत्तेणं चोदसमस्स नायज्झणस्स अयम? पपणत्ते पन्नरस- मस्स णं भंते णायज्झयणस्स समणेणं भगवया महावीरेणं जाव संपत्तेण के अहे पन्नत्ते , एवं खल्लु जंवू । तेण कालेणं तेणं समएणं चपा नाम नयरी होत्था, पुन्नभद्दे चेइए जिय- सत्तू राया। तत्थ ण चपाए नयरीए धपणे णामं सत्यवाहे होत्था अड्डे जाव अपरिभूए । तीसे णं चंपाए नयरीए उत्तरपुरस्थिमे दिसीभाए अहिच्छत्ता नाम नयरी होत्था. -नन्दिफल नामका पन्द्रहग अध्यायन प्रार :- चौदहवां अध्ययन समाप्त हो चुका-अब पन्द्रहवा अध्ययन प्रारभ होता है। पूर्व अध्ययन में तेतलि प्रधान के आख्यान द्वारा अपमान से भी विषयों का त्याग कर दिया जाता है यह बात समझाई गई है। इस अध्ययन में यह विषय त्याग जिनके उपदेश से होता है यह कहा जावेगा । इस लिये उसके सझाव में अर्थ प्राप्ति और असद्भाव में अनर्थ प्राप्ति होती है इस तरह से पूर्व अ ययन के साथ इसका सबन्ध घन जाता है. जहण भते ! समणेण इत्यादि । નદિફળ નામે પંદરમું અધ્યયન પ્રારંભ ચદમ્ અધ્યયન પુરૂ થયુ છે હવે પદરમ્ અધ્યયન શરૂ થાય છે પહેલાના અધ્યયનમા તેતલિપ્રધાનના આખ્યાન વડે એ વાત સમજાવવામાં આવી છે કે અપમાનથી પણ વિયેને યાગ કરવામા આવે છે આ અધ્યયનમાં આ વિષય ત્યાગ જેમના ઉપદેરાથી થાય છે તે વિષે કહેવામાં આવશે એટલા માટે તેને સદ્ભાવમા અર્થ પ્રાપ્તિ અને અસદુભવમા અનર્થ પ્રાપ્તિ હોય છે. આ રીતે પૂર્વ અધ્યયનની સાથે અને સ બ ધ સમજી રાકાય છે 14--'जइण भवे ! समणेण' इत्यादि ।
सकलजीवाजोवतचनाऽपि जातः । ततः खलु तेतलिपुत्रः कली बहूनि वर्षाणि केवलिपर्याय पालयित्वा यापन सिद्ध मोक्ष गा । सुधर्मास्वामी माह-एव खलु हे जम्बूः । श्रमणेन भगाता महारेण चतुर्दशस्य शांताध्ययनस्य 'अयमहे' अयमर्थः पूर्वोक्तो भार प्राप्त प्रापित , 'त्ति बेमि' इति प्रवीमि भगवत्समीपे यथा श्रुत तथा वा मतिकथयामि । एतेन अध्ययनेन द. मायात यत्-माणिनो यावद् दुखं मानश च न मानुगन्ति तापइ बहुल भवोधिता अपि धर्म न स्वीकुर्वन्ति, यथा तेतलिपुः ॥ सू०१३ ॥ इति श्री-विश्वविख्यात-जगद्गल्लम-मसिद्धावपञ्चदशभापाकलितकरितक- लापालापक-मविशुद्धगयपद्यनैकग्रन्थनिर्मापक-पादिमानमर्दक-श्रीशाहूच्छ अपतिकोल्हापुरराजमदत्त-'जैनशास्त्राचार्य ' पदभूपित-कोल्हापुरराज गुरु-पालब्रह्मचारि-जैनाचार्य-जैनधर्मदिवाकर पूज्यश्री-घासीला- गतिविरचिताया 'ज्ञाताधर्मकथान' सूनस्यानगारधर्मामृतव पिण्याख्याया व्याख्यायां चतुर्दशम पयन सर्णम् ॥१४॥ पर्याय का पालन कर यारत् सिद्ध पद प्राप्त कर लिया। सुधर्मास्वामी करते हैं-हे जबू! श्रमणभगवान महावीर ने चौदहवे ज्ञाताध्ययन का यह पूर्वोक्तरूप से भाव अर्थ प्ररूपित किया है। सो जैसा मैंने उन भगवान के समीप में सुना है यह वैसा ही तुमसे कहा है । इम अध्य धन से हमें यह ज्ञान हो जाता है कि समार में तेतलिपुत्र की तरह ऐसे भी प्राणी हैं कि वे जब तक दुख और अपमान को नहीं पालते हैं तब तक अनेक बार प्रतियोपित करने पर भी-धर्म को स्वीकार नहीं करते हैं । सू० १३ ॥ श्री जैनाचार्य जैनधर्म दिवाकर पूज्य श्री घासीलालजी महाराज कृत " ज्ञाताधर्मकथाङ्गमूत्र" की अनगारधर्मामृतषिणी व्याख्याका चौदहवा अध्ययन समाप्त ॥ १४ ॥ મેળવી લીધું સુધર્મો સ્વામી કહે છે કે હે જ બૂ! શ્રમણ ભગવાન મહાવીરે ચૌદમા જ્ઞાતાધ્યયને પૂર્વોક્ત રૂપથી ભાવ-અર્થ નિરૂપિત કર્યો છે જે અર્થ છે તેઓશ્રી પાસેથી સાભળે છે તે જ તમને કહ્યો છે આ અધ્યયનથી અમને આ જાતનું જ્ઞાન થાય છે કે સ સરિમા તેતલિપુત્રની જેમ એવા પણ પ્રાણી એ છે કે તેઓ જ્યા સુધી દુખી અને અપમાનિત થતા નથી ત્યા સુધી ઘણું વખત પ્રતિષિત કરવા છતા ધર્મને સ્વીકારતા નથી . સૂત્ર શ્રી જૈનાચાર્ય ઘાસવાલજી મહારાજ કૃત જ્ઞાતાસૂત્રની અનગારધર્મામૃતવર્ષિણી व्याभ्यानु योभु अध्ययन समास ॥ १४॥ .
ܐܘܕ - . का अ० १५ नदिफलस्वरूपनिरूपणम् ऽर्थः प्राप्त : सुधर्मस्वामी कथयति-एवं खलु हे जम्मूः ! ये चम्पा नाम नगर्यासीत् । तत्र पूर्णभद्र चैत्य जितशत्रू १ चम्पाया नगर्या बन्यो नाम सार्थवाह आसीत् । स ॥ यापद् अपरिभूतः प्रभूतशक्तिशालीत्यर्थः । तस्या खल रस्त्ये दिग्भागे अहिच्छत्रा नाम नगर्यासीत् । सा कीदृशी?- मिद्धा' ऋद्धस्तिमितसमृद्धा, तत्र प्रदानभः स्पशिबहु- [= स्वपरचक्रभयरहिता, समृद्धा धनधान्यादि परिपूर्णा, परी वर्णनपाठोऽत्रवाच्य , स तु ओपपातिकमूत्रादवसेयः। न नगर्या कनककेतुर्नाम राजाऽऽसीत् । 'महया वण्णओं' 1 ज्ञानाध्ययन का क्या अर्थ निरूपित किया है। ण कालेण तेण समाण चपानाम नयरी होत्था) मी के प्रश्न के समाधान निमित्त श्री सुधर्मा स्वामी क जवू ! सुनो-तुम्हारे प्रश्न का उत्तर इस प्रकार है- “स समय में चंपा नाम की नगरी थी (पुन्नभद्दे चेइए तत्य ण चपाए नपरीए धपणे नामे सत्यवाहे होत्था भूण) पूर्णभद्र नाम का उसमें उद्यान था। जितशत्रु ममें रहता था। उसी चपा नगरी में धन्य नामका सार्थ- या। यह जन धन धान्यादि सपन्न था। एव लोकमान्य ण चपाए नयरी उत्तर पुरथिमे दिसीभाए अहिच्छत्ता त्या, रिद्वत्थिमिय समिद्धा वन्नओ-तत्यण अहिच्छत्ताए जवू ! तेण कालेण तेण समएण चपा नाम नयरी होत्था) જ બૂ સ્વામીના પ્રશ્નના સમાધાન માટે શ્રી સુધર્મા સ્વામી કે હે જ બૂ! સાભળે, તમારા પ્રશ્નનો જવાબ આ પ્રમાણે અને તે સમ ચ પા નામે નગરી હતી दए जियसत्तू राया, तत्थ ण चपाए नयरीए धण्णे नामे सत्यवाहे 1 अपरिभूए) ભદ્ર નામે ઉવાન હતુ તેમા જિતશત્રુ નામે રાજા રહેતા હ પણ તે ચપા નગરીમા જ રહેતું હતું તે જન, હતું, તેમજ લોક માન્ય પણ હતા उत्तरपुरस्थिमे दिसीभाए अहिच्छत्ता नाम नयरी न्नओ-तत्थणं अहिच्उत्ताए नयरीए कणगरेउ मी विष इस अ जावेगा अनर्थ प આવી मा। માટે १०० ताधर्मकागमा रिद्धाथमियसमिद्धा वन्नओ । तत्थ णं अहिच्छत्ताए नय. रीए कणगकेऊ नाम राया होत्था, महया बन्नओ। तस्स धण्णस्स सस्थवाहस्स अन्नया कयाइ पुव्वरत्तावरत्तकालस- मयसि इमेयारूवे अन्झथिए चिंतिए पत्थिए कप्पिए मणो- गए सकप्पे समुप्पज्जित्थासेय खल्लु मम विपुल पणियभंड. मायाए अहिच्छत्त नगरि वाणिज्जाए गमित्तए, एव संपेहेइ सपेहित्ता गणिमच४ चउनिह भड गेण्हइ, सगडीसागड सज्जेइ सज्जित्ता सगडीसागड भरेंति२ कोडुबियपुरिसे सदावेइ सहावित्ता एव वयासो-गच्छह णं तुम्भे देवाणु- प्पिया । चंपाए नगरीए सिघाडग जाव पहेसु घोसणं घोसेह ॥ सू०१॥ टीका-जम्बूस्वामी पृच्छति-यदि खलु भदन्त ! श्रमणेन भगवता महा चीरेण यावत् सिद्धिगतिमानधेय स्थान सम्प्राप्तेन चतुर्दशस्य ज्ञाताध्ययनस्य अय मर्थ =पूर्वोक्तो भावः प्रज्ञप्त' तर्हि पञ्चदशस्य ज्ञाताभ्यनस्य श्रमणेन भगवता महा टीकॉर्थ-जबूस्वामी पूछते हैं कि (जइण भते ।समणेण भगवया महा वीरेण जाव सपत्ते ण चोदसमस्स नायज्मयणस्स अयमढे पण्णत्ते पन्नर- समस्स ण भते णायज्अयणस्स समणेण भगवया महावीरेण जावसपत्ते ण के अढे पपणत्ते) भदत ! यदि श्रमण भगवान महावीर ने कि जो मोक्षप्राप्त कर चुके है चौदहवें ज्ञाताध्ययन का यह पूर्वोक्त रूप से अर्थ प्रतिपादित किया है-सो हे भदत! मुक्ति प्राप्त हुए उन्ही श्रमण भगवान જબૂ સ્વામી પૂછે છે કે- (जइण भते ! समणेण भगवया महावीरेण जार सपत्तेण चोदसमस्स नाय- झयणस्स अयम? पण्णत्ते पन्नरसमस्स ण भते णायज्झयणस्त समणेण भगक्या महावीरेण जाव सपत्तेण के य? पण्णते) હે ભદત 1 જે શ્રમણ ભગવાન મહાવીરે-કે જેઓ મોક્ષ પ્રાપ્ત કરી ચૂક્યા ચૌદમા જ્ઞાતાધ્યયનને આ પક્ત રૂપથ્થી અર્થ પ્રતિપાદિત કર્યો છે તે છે ભદત! મુક્તિ પ્રાપ્ત કરેલા તે શ્રમણ ભગવાન મહાવીરે પદરમા જ્ઞાતાધ્યયનને છે અર્થ નિરૂપિત કર્યો છે ܘܕ - - अनगारधर्मामृतषिणी टीका अ० १५ नदिफलस्वरूपनिरूपणम् वीरेण यारत्मन्माप्तेन कोऽर्थः प्रशस्त । सुधर्मस्वामी कथयति-एवं खलु हे जम्मूः ! तस्मिन् काले तस्मिन् समये चम्पा नाम नगर्वासीत् । तत्र पूर्णभद्र चैत्य जितशत्रू राजा चाभवत् । तत्र खलु चम्पाया नगर्या बन्यो नाम सार्थवाह आसीत् । स कीदृश १ इत्याह-आढयो यापद् अपरिभूतः प्रभूतशक्तिशालीत्यर्थः । तस्या खल चम्पाया नगर्या उत्तरपौरस्त्ये दिग्भागे अहिडत्रा नाम नगर्यासीत् । सा कीदृशी?- त्याह-"रिद्धत्यिमियममिद्धा' मद्धस्तिमितसमृद्धा, तत्र प्रद्धा-नभः स्पशिबहु- मासादयुक्ता, स्तिमिता = स्वपरचक्रभयरहिता, समृद्धा-धनधान्यादि परिपूर्णा, 'वण्णो' वर्णका नगरी वर्णनपाठोपाच्य , स तु औपपातिरसूत्रादवसेयः। तत्र खलु अहिन्छवार्या नगर्या कनककेतुर्नाम राजाऽऽसीत् । 'महया वण्णओं' महावीर ने पन्द्रहवें ज्ञाताध्ययन का क्या अर्थ निरूपित किया है। '(एवं खलु जबू! तेण कालेण तेण समाण चपानाम नयरी होत्था) इस प्रकार जवू स्वामी के प्रश्न के समाधान निमित्त श्री सुधर्मा स्वामी उन से कहते हैं कि जबू! सुनो-तुम्हारे प्रश्न का उत्तर इस प्रकार है- उस काल और उस समय में चंपा नाम की नगरी थी (पुन्नभद्दे चेहए जियसत्तू राया, तत्य ण चपाए नयरीए धण्णे नामे सत्यवाहे होत्या अड्डे जाव अपरिभूए) पूर्णभद्र नाम का उसमें उद्यान था। जितशत्रु नामका राजा उसमें रहता था। उसी चपा नगरी में धन्य नामका सार्थ- वाह भी रहता था। यह जन धन धान्यादि सपन्न था। एव लोकमान्य भी था। (तीसे ण चपाए नयरीए उत्तर पुरत्यिमे दिसीभाए अहिच्छत्ता नाम नयरी होत्या, रिद्धत्यिमिय समिद्धा वन्नओ-तत्यण अहिच्छत्ताए (एव खलु जवू ! तेण कालेण तेण समएण चपा नाम नयरी होत्था) આ રીતે જ બૂ સ્વામીના પ્રશ્નના સમાધાન માટે શ્રી સુધર્મા સવામી તેમને કહે છે કે હે જ બૂ! સાભળો, તમારા પ્રશ્નનો જવાબ આ પ્રમાણે છે કે તે કાળે અને તે સમયે ચપા નામે નગરી હતી (पुन्नभ चेदए जियसत्तू राया, तत्य ण चपाए नयरीए धण्णे नामे सत्थवाहे होत्था अड्डे जाव अपरिभूए) તેમાં પૂર્ણ ભદ્ર નામે ઉવાન હતું તેમાં જિતશત્રુ નામે રાજા રહે હતે ધન્ય નામે એક સાર્થવાહ પણ તે ચ૫ નગરીમાં જ રહેતું હતું તે ધન, ધાન્ય, વગેરેથી સ પન્ન હતું, તેમજ લોક માન્ય પણ હવે (तीसेण चपाए नयरीए उत्तरपुरथिमे दिसीभाए अहिच्छत्ता नाम नयरी होत्या, रिद्धथिमिय समिद्धा वन्नओ-तत्थण अहिच्छत्ताए नयरीए कणगलेउ ='नाम राया होत्था महया वन्नओ) - पाताधर्मका महा-वर्णक स च 'महयादिमातमहतमलयमहरमर्दिदसारे' महाहिमवन्माम लयमन्दरमहेन्द्रसार, इत्यादिरूपोऽत्र विजेयः। तस्य धन्यस्य साधियाहस्य अन्यदा कदाचित् पूर्वरात्रापरराजमलसमये-राने पश्चिम पहरे अयमेतद्रूप आध्यात्मिा- चिन्तितः प्रार्थितः कल्पितो मनोगतः सकल्पा-विचार समुदपयत-श्रेया उचित खलु मम पिपुल-प्रचुर 'पणियभडं' मणितमाण्ड-गणिमादिक्रय विक्रयवस्तुभाण्डम् आयाए' आदाय-गृहीत्वा अहिच्छत्रा नगरी पाणिज्याय गन्तम्, गणिमादि पण्यवस्तुनात गृहीता व्यापारायादिच्छता नगयों मया गन्तव्यमिति भावः । एष 'संपेहेह' सप्रेक्षते विचारयति, समेक्ष्य गणिम ४-गणिम धरिम मेय परिय चेत्येवरूप चर्निध भाण्ड=पण्यवस्तुजात गृहाति. गृहीत्वा 'सगडीसागड' शकटी नयरीए कणगके नाम राया होत्या, मश्या पन्नओ) उस चपा नगरी के ईशान कोण में अहिच्छत्रा नामकी नगरी धी। यह नभस्तलस्पर्शी प्रासादों से युक्त स्वचक्र और परचक्र के भयसे ररित तथा धन धान्य आदि विभव से विशेष समृद्ध थी। नगरी के वर्णन का पाठ औपपा तिक सूत्र में जैसा नगरी का वर्णन किया गया है वैसा ही यहा जनना चाहिये । उस अहिच्छत्रा नगरी में कनककेतु नामका राजा रहता था। इस राजा के वर्णन में " मया हिमवतमहतमलयमदरमहिंदसारे " इत्यादिरूप पाठ यहा लगा लेना चाहिये । (तस्स धन्नस्स सत्यवाहस्स अन्नया कयाह पुव्वरत्तावरत्तकालममयसि इमेयारूवे अज्झथिए चितिए पत्थिए, कप्पिण, मणोगए सकप्पे समुप्पजित्था-सेय खलु मम विउल पणियभडमायाए अहिच्छत्त नयरिं वाणिज्जाए गमित्तए, एव सपेहेइ, सपेहित्ता गणिमच४ चउचिह भडे गेण्डइ, सगडी सागड सज्जेह म તે ચ૫ નગરીના ઈશાન કોણમાં અહિચ્છત્રા નામનગરી હતી આકાશને સ્પર્શતા એવા ઊંચા પ્રાસાદથી આ નગરી યુક્ત હતી તેમજ સ્વચક્ર અને પરચક્ર ના ભયથી રહિત તથા ધન ધાન્ય વગેરે વૈભવથી આ નગરી સવિશેષ સમૃદ્ધ હતી પણતિક સૂત્રમાં નગરીના વિષે જેવું વર્ણન કરવામાં આવ્યું છે તેવું જ અહીં પણ જાણી લેવું જોઈએ તે અહિચ્છત્રા નગરીમા કનકકેતુ નમે રાજા रनो तो, ना पूर्ण भाटे ( महया हिमवत-महत-मलय-मदर- महिंदसारे ) वगैरे 48 48 समन्वय (तस्स धन्नस्स सत्यवाहस्स अन्नया क्याइ, पुयरत्तावरत्तकालसमयसि इमेयास्वे अज्झथिए वितिए, पत्थिए कप्पिए, मणोगए सकप्पे समुप्पज्जित्था-सैय खलु मम विउल पणियभडमायाए अहिच्छ्त्त नयरिं वाणिज्जा गमित्तए एव सपेहेर, सपेहिचा गणिम च ४ चउबिह मडे गेण्डइ सगडीसा- -- मतगारधर्मामृतगिता टी० अ० १५ नदिफलस्वरूपनिरूपणम शाकट-लघुमहन्छक्टसमूह सज्जयति, पगुणी करोति सज्जयित्वा शक्टीशाकट भरे ति, भृत्वा कौटुम्बिरपुरुषान् शब्दयति-आठयति, आहूय एपमादीद-गच्छत खलु यूय हे देवानुमिया! चम्पाया नगर्याः 'सिंघाडगजायपहेसु ' शृङ्गाटक- त्रिकचतुष्क चत्वरमहापयपयेषु घोषणाम्धोपयत । मू०१ ॥ ज्जित्ता सगडीमागड भरेइ भरित्ता कोडुचियपुरिसे महावेइ, सदावित्ता एव वयासी-गच्छहण तुम्भे देवाणुप्पिया ! चपाए नयरी सिंगाडग जाव पहेसु घोसण घोसेह) एक दिन की बात है कि उस धन्यसार्थवाह को रात्रि के पश्चिम प्रहर में यह इस प्रकार का आध्मात्मिक चिन्तित, प्रार्थित कल्पित मनोगत सकल्प उत्पन्न हुआ कि मैं गणिमादि रूप विपुल, पण्य वस्तु को लेकर व्यापार के लिये जो अहिच्छत्रा नगरी में जाऊँ तो यहुत अच्छी बात है। इस प्रकार उमने विचार किया-ऐमा विचार करके उसने गणिम, धाग्मि, मेय और परिच्छेद्य रूप चार प्रकार का भाण्ड लिया। भाण्ड लेकर फिर उमने गाड़ी और गाड़ों को तैयार करचाया-जर वे गाडी गोड़े तैयार हो चुके तब उसने उम पण्य (विक्रेय वस्तु ) को उनमें भरा-भर कर फिर उसने अपने कौटुम्बिक पुरुषों को बुलाया धुलाकर उसने ऐमा कहा-हे देवानुप्रियो । तुम लोग जाओ- और चपा नगरी के श्रृगाटक, त्रिक, चतुष्क, चत्वर, महापथ इन सब मार्गों में घोषणा कगे। क्या घोषणा करना-यह बात नीचे के सूत्र से सूत्रकार प्रदर्शित करते हैं। मू० १ ॥ सगडीसागड भरेइ, भरित्ता कोडु वियपुरिसे सद्दावेइ सहावित्ता एव वयासी गच्छदण तुम्भे देवाणुप्पिया । चपाए नयरीए सिंघाडगजाब पहेसुयोसणं घोसेह) એક દિવસે તે ધન્ય સાર્થવાહને રાત્રિના છેલા પહેરમાં આ જાતને આધ્યાત્મિક, ચિતિત, પ્રાર્થિત, કલ્પિત, મનોગત સ ક૫ ઉત્પન્ન થયો કે પુષ્કળ પ્રમાણમાં ગણિમ વગેરે વેચાણની વરતુઓ લઈને વેપાર ખેડવા માટે જે અહિચ્છત્રા નગરીમા જાઉ તે બહુ સારુ થાય આ રીતે તેણે વિચાર કર્યો આ વિચાર કરીને તેણે ગણિમ, ધરિમ, મેય અને પરિચ્છે. રૂપ ચાર પ્રકારની વસ્તુઓ વાસણમાં ભરી ચારે જાતની વસ્તુઓ વાસણમાં ભરીને તેણે ગાડી તેમજ ગાડાઓને તૈયાર કરાવ્યા જયારે ગાડી અને ગાડાઓ તૈયાર થઈ ચૂકયા ત્યારે તેણે તે વેચાણની વસ્તુઓને ગાડી અને ગાડાઓમાં મૂકી ત્યાર પછી તેણે પોતાના કૌટુંબિક પુરુષને બતાવ્યા અને બોલાવીને તેમને આ પ્રમાણે કહ્યું કે હે દેવાનુ! તમે જાઓ, અને ચ પાનગરીના ભૂગાટક, ત્રિક ચતુષ્ક ચત્વર, મહ પથ આ બધા માર્ગોમા ઘેષણ કરો ઘેષણ કરતા કહેવું તે નીચેના સૂત્ર વડે સૂત્રકાર પ્રકટ કરે છે ! સત્ર “ ૧ १०४ ताधर्मया . -- १ घोपणास्वरूपमाह-'एगलु' इत्यादि। मूलम्-एव खलु देवाणुप्पिया | धपणे सत्थयाहे विउलं पणिय मायाए इच्छइ अहिच्छत्त नयरिं वाणिजाए गमित्तए त जो णं देवाणुप्पिया | चरए वा चीरिए वा चम्मसडिए वा भिच्छुडे वा पडुरगे वा गोयमे गोव्वइए वा गिहिधम्म- चिंतए वा अविरुद्ध विस्वुङमावगरत्तपडनिग्गथप्पभिइपा- सडत्थे वा गिहत्थे वा धणेण सत्यवाहेण सद्धिं अहिच्छत्त नगरि गच्छइ तस्त. णं धपणे सत्यवाहे अच्छत्तगस्स छत्तर्ग दलाइ अणुवाहणस्स उवाहणाओदलयइ अकुडियस्त कुडियं दलगइ अपत्थयणस्त पत्थयण दलयइ अपरखेवगस्त परखेव दलयइ अंतराऽविय से पडियस्स वा भग्गलुग्गस्स साहेज्ज' दलयइ सुहसुहेण य ण अहिगन्छत्त सपावेइ तिक्दु दोच्चपि तच्चपि घोसेह घोसित्ता मम एयमाणत्तिय पच्चपिणह, तएणं ते कोडुविय पुरिसा जाव एव वयासी-हदिसुणंतु भवतो चपानगरीवत्थव्वा वहवे चरगा य जाव पच्चपिणति ॥सू०२॥ टीका-एव खलु हे देवानुमियाः धन्य' सार्थवाह पिपुलान पणितभाण्डान् आयाए,' आदाय इच्छति अहिच्छत्रा नगरी 'वाणिज्जाए' वाणिज्याय- 'एव खलु देवाणुप्पिया' इत्यादि । टीकार्थ-( एव खलु देवाणुप्पिया! धणे सत्यवाहे विउल पणिय मायाए इच्छइ'अहिच्छत्त नयरिं वाणिज्जाए मित्तए ) हे देवाणुप्रियो ! एव खलु देवाणुपिया इत्यादि । ( एव खलु देवाणुपिया धग्णे सत्यवाहे विउल पणिय मायाए इच्छ। अहिच्छत्त नयरिं वाणिज्जाए गमिचए) હે દેવાનુપ્રિયે !તમે લેકે કૃણાટક વગેરે માર્ગોમા આ જાતની વેષણ + - - , - "अनगारधर्मामृतवपिणी टोका अ० १५ नदीफलस्वरूपनिरूपणम् १०५ व्यापाराय गन्तु तत्-तस्मात् य. खलु हे देशानुप्रिया ! कोऽपि धन्येन सायचाइन सार्द्धमहिच्या नगरी 'गन्छतो' त्युत्तरेण सम्बन्धः, कोऽमौ, यस्तेन साथै गच्छे- दित्याह-'चरए ' इत्यादिना 'चरए पा' चरक -गृहस्थस्य गृहे निप्पन्नस्यौदनादे योऽग्रभागो दानार्थं पृथकृत्य स्थापते तरय भिक्षावृत्त्याग्राहक , 'चीरिए वा' चीरिकमार्गपतितशटितचीवरपरिधारक', 'चम्मखडिए वा' चर्मवण्डिकाचर्म धारक', 'भिच्छुढे पा' भिक्षोण्ड =अन्यानीतभिक्षान्नभोजी, 'पटुरगे वा' पाण्डु- राहा भस्मलिप्तशरीरः, 'गोयमे ना' गौतमपभमधिकृत्य कणभिक्षाग्राही, 'गोचइए वा' गोत्रतिमा-गोचर्यानुकारी यथा यथा गौ स्थानासनादिक्रिया फरोति तथा तथा सोऽपि करोतीति भार, 'गिहिधम्मपितए वा' गृहिधर्म- चिन्तका गृहिणोन्गृहस्थस्य धर्मो गृहिधर्मस्त चिन्तयतीति तथा, 'गृहस्थधर्मएव- श्रेयान् नान्यः । उक्तश्च- - तुम लोग शृगाटक आदि मार्गों में खडे होकर इस प्रकार की घोषणा करना-कि धन्य सार्थवाह विपुल मात्रा में पणित (विक्रय वस्तु ) को लेकर अहिच्छत्रा नगरी में व्यापार के लिये जाना चाहता है (त जो ण देवाणुप्पिया ! चरए वा चीरिए वा चम्मखडिए वो भिच्छुडे वा -परगे वा गोयमे गोव्वडए वा गिहिधम्मचिंतए वा अविरुद्धविरुद्ध बुड्ड सावगरत्तपडनिग्गयप्पभिडपासउत्थे वा गिहत्थे चा धण्णेण सत्थवा हेण सद्धि अहिच्छत्त नयरिं गच्छइ तस्म ण धण्णे सत्यवाहे अच्छत्त- गस्स छत्तग दलाइ ) इसलिये हे देवाणुप्रियो ! जो भी कोई धन्य साथ- “वाह के साथ अहिच्छत्रा नगरी जाना चाहतो हो-चाहे वह चरक हो “चीरिक रो, चर्मखडपारी हो, भिक्षोण्ड हो, पाण्डुरङ्ग हो, गौतम हो, गोबतिक हो, गृहस्थधर्म चिन्तक हो, अविरुद्व हो, विरुद्ध हो, वृद्ध- કરા કે ધન્ય સાર્થવાહ પુષ્કર પ્રમાણમાં પણિત ( વેચાણની વસ્તુઓ ) લઈને અહિચ્છત્રા નામે નગરીમાં વેપાર ખેડવા માટે જવા ઈચ્છે છે (त जो ण देवाणुप्पिया' चरए वा चीरिए वा चम्मग्वडिए वा भिन्छुडे वा पडुरगे वा गोव्वइए वा गिहिवम्मचिंतए वा अपिद्धविरुद्धवुडसावगरनपडनिग्गय पभिइ पासइत्ये वा निहत्थे वा धण्णेण मत्थवाहेण सद्धिं अहिच्छत्त नयरिं गच्छद- वस्स ण पणे सत्थवाहे अच्छत्तगस्स छत्तग दलाइ) એટલા માટે હે દેવાનુપ્રિયે ! અન્ય સાર્થવાહની સાથે જે કંઈ જવા ઈચ્છતે હેય-ભલે તે ચરક હોય, ચીરિક હોય, ચમ ખડ ધારી હોય, ભિલોડ હેય, પાડરગ હોય, તેમ હય, ગોત્રતિક હય, ગૃહસ્થ ધર્મ ચિતક હોય, m .
१०४ हाताधर्मपचार से घोपणास्वरूपमाह-पायालु' इत्यादि । मूलम्-एव खल देवाणुप्पिया | धपणे सत्यवाहे विउलं पणियं मायाए इच्छइ अहिच्छत्त नयरिं वाणिजाए गमित्तए त जो णं देवाणुप्पिया । चरण वा चीरिए वा चम्मसडिए वा भिच्छुडे वा पंडुरंगे वा गोयमे गोव्वइए वा गिहिधम्म- चिंतए वा अविरुद्ध विरुदबुखमावगरत्तपडनिग्गयप्पभिइपा- संडत्थे वा गिहत्थे वा धण्णेण सत्थवाहेण सहिं अहिच्छत्त नगरि गच्छइ तस्सा णं धपणे सत्थवाहे अच्छत्तगस्स छत्तर्ग दलाइ अणुवाहणस्स उवाहणाओ दलयइ अकुडियस्त कुडिय दलग्इ अपत्थयणस्त पत्थयण दलयइ अपरखेवगस्तपरखेव दलयइ अतराऽविय से पडियस्त वा भग्गल्लुग्गस्स साहेज्ज' दलयइ सुहसुहेण च ण अहिगन्छत्त सपावेइ तिक्टु दोच्चपि -तंच्चपि घोसेह घोसित्ता मम एयमाणत्तिय पच्चपिणह, तएण ते कोडुबिय पुरिसा जाव एवं वयासी-हदिसुणतु भवतो चंपानगरीवत्थव्वा वहवेचरगा य जाव पच्चपिणति ॥सू०२॥ टीका-एव खलु हे देवानुपिया धन्य' सार्थ राह विपुलान पणितभाण्डान् 'आयाए ' आदाय इच्छति अहिच्छत्रा नगरी 'वाणिज्जाए ' वाणिज्याय- एव खलु देवाणुप्पिया' इत्यादि । टीकार्थ-( एव खलु देवाणुप्पिया! धणे सत्यवाहे विउल पणियं मायाए इच्छइ'अहिच्छत्त नयरि वाणिजाए गमित्तए ) हे देवाणुप्रियो । एव खलु' देवाणुपिया इत्यादि ( एव खलु देवाणु पिया । घणे सत्यवाहे विउल पणिय मायाए इच्छा अहिच्छत्त नयरिं वाणिज्जाए गमित्तए ) હે દેવાનુપ્રિયે! તમે લેકે મૃગાટક વગેરે માર્ગો આ જાતની શેષણ । । 4 - "अनगारधर्मामृतापिणी टोका अ०१५ नदीफलस्वरूपनिरूपणम् १०५ व्यापाराय गन्तु तत्-तस्मात् यः खलु हे देवानुप्रिया ! कोऽपि धन्येन सायवाहेन सार्द्धमहिच्चा नगरी 'गन्छतो' त्युत्तरेण सम्बन्धः, कोऽसौ, यस्तेन साई गच्छे- दित्याह-'चरए' इत्यादिना 'चरए पा' चरक -गृहम्थस्य गृहे निष्पन्नस्यौदनादे 'योऽग्रभागो दानार्थ पृथवृत्य स्थापते तरय भिक्षावृत्याग्राहक , ' चीरिए वा' चीरिकमार्गपतितशटितपीपरपरिवारक', 'चम्मखडिए वा ' चमावण्डिका चर्म धारक', 'मिल्छुडे 'मिक्षोण्ड =अन्यानीतभिक्षानभोजी, 'पदुरगे या' पाण्डु- राग भस्मलिप्तशरीरः, 'गोयमे पा' गीतमा नृपभमधिकृत्य कणभिक्षाग्राही, 'गोवइए वा' गोत्रतिका गोचर्यानुकारी यया यथा गौः स्थानासनादिक्रियां करोति तथा तथा सोऽपि करोतीति भार, 'गिहिधम्मत्रितए वा' रोहिधर्म- चिन्तकः गृहिणो-गृहस्थस्य धर्मो गृहिधर्मस्त चिन्तयतीति तया, 'गृहस्थधर्मएव- 'श्रेयान् नान्यः' उक्तञ्च- -तुम लोग शृगाटक आदि मार्गों में बडे होकर इस प्रकार की घोषणा करना-कि धन्य सार्थवाह विपुल मात्रा में पणित (विक्रय वस्तु) को -लेकर अहिच्छत्रा नगरी में व्यापार के लिये जाना चाहता है (त जो ण देवाणुप्पिया! चरए वा चीरिए वा चम्मखडिए वा भिच्छुडे वा - परगे वा गोयमे गोब्धइए वा गिधिम्मचिंता वा अविरुद्धविरुद्ध बुड्ड सावगरत्तपडनिग्गथप्पभिडपासउत्थे वा गिहत्थे वा चण्णेणं सत्थवा- हेण सद्धिं अहिच्छत्त नयरिं गच्छद तस्म ण धपणे सत्थवाहे अच्छत्त- गस्स छत्तग दलाइ ) इसलिये हे देवाणुप्रियो । जो भी कोई धन्य सार्थ- “वाह के साथ अहिच्छन्ना नगरी जाना चाहता रो-चाहे वह चरक हो "चीरिक हो, चर्मखडधारी हो, भिक्षोण्ड हो, पाण्डुरङ्ग हो, गौतम हो, गोव्रतिक हो, गृहस्थधर्म चिन्तक हो, अविरुद्ध हो, विरुद्ध हो, वृद्ध- કરો કે ધન્ય સાર્થવાહ પુષ્કર પ્રમાણમાં પણિત ( વેચાણની વસ્તુઓ ) લઈને અહિચ્છત્રા નામે નગરીમાં વેપાર ખેડવા માટે જવા ઈચ્છે છે (त जो ण देवाणुप्पिया' चरए वा चीरिए वा चम्मन्बडिए वा भिन्छुडे वा पडुरंगे वा गोव्यइए वा गिहिधम्मचिंतए वा अविरुद्ध विरुद्धवुडसावगरत्नपडनिग्गय प्पभिड पासडत्थे वा निहत्थे वा धण्णेण सत्थवाहेण सद्धि अहिच्छत्त नयरिं गच्छद- वस्स ण ण्णे सत्थवाहे अन्उत्तगस्स छत्तग दलाइ) એટલા માટે હે દેવાનુપ્રિયે ! અન્ય સાર્થવાહની સાથે જે કઈ જવા ઈછતે હેય-ભલે તે ચરક હોય, ચીરિક હય, ચર્મ ખડ ધારી હેય, ભિક્ષેડ હોય, પાડુંરગ હેય, ગૌતમ હેય, ગેબ્રતિક હય, ગૃહસ્થ ધર્મ ચિંતક હેય, १०४ बाहाधर्माचार - घोपणास्वरूपमार-एर पलु' इत्यादि । मूलम्-एव खलु देवाणुप्पिया | धणे सत्यवाहे विउलं पणिय मायाए इच्छइ अहिच्छत्तं नयरिं वाणिजाए गमित्तए त जो णं देवाणुप्पिया । चरए वा चीरिए वा चम्मसंडिए वा भिच्छुडे वा पडुरगे वा गोयमे गोव्वइए वा गिहिधम्म- चिंतए वा अविरुद्ध विरुहवुड्ससावगरत्तपडनिग्गथप्पभिइपा- सडत्थे वा गित्थे वा धणेणं सत्यवाहेण सहि अहिच्छत्त नगरि गच्छइ तस्स. णं धणे सत्यवाहे अच्छत्तगस्स छत्तर्ग' दलाइ अणुवाहणस्स उवाहणाओ दलयइ अकुडियस्त कुडिय दलगइ अपत्थयणस्त पत्थयण दलयइ अपम्सेवगस्त परखेव दलयइ अंतराऽविय से पडियस्स वा भग्गलुग्गस्स साहेज दलयइ सुहंसुहेण य णं अहिगन्छत्त सपावेइ तिक्दु दोच्चपि - तच्चपि घोसेह घोसित्ता मम एयमाणत्तिय पच्चप्पिणह, तएणं ते कोडुबिय पुरिसा जाब एव वयासी-हदिसुणतु भवतो चंपानगरीवत्थव्वा वहवेचरगा य जाव पच्चपिणति ॥सू०२॥ टीका-एव खलु दे देवानुपियाः धन्य' सार्थवाह विपुलान् पणितभाण्डान 'आयाए.' आदाय इच्छति अहिच्छना नगरी 'वाणिज्जाए' वाणिज्याय- 'एव स्खलु देवाणुप्पिया' इत्यादि । टीकार्थ-( एव खलु देवाणुपिया! धण्णे सत्यवाहे विउल पणिय मायाए इच्छइ'अहिच्छत्त नयरि' वाणिजाण गमित्तए ) हे देवाणुप्रियो । एव खलु देवाणुप्पिया इत्यादि । ( एव खलु देवाणुपिया ! धणे सत्याहे विउल पणिय मायाए इच्छा अहिच्छत्त नार वाणिजाए गमिचए ) હે દેવાનુપ્રિયે ! તમે લેકે મૃગાટક વગેરે માર્ગોમા આ જાતની ઘોષણા + - - . मनगारधर्मामृतरविणी टीका ५० १५ नदिकलसम्पनिरूपणम् १०७ अथवा भग्गलुग्गस्स भग्नरुग्णाय भग्नाय त्रुटिनहस्तपादाद्यवयवाय रुग्णाय = रोगाकान्ताय रोगग्रस्ताय वा 'साहेज्ज ' साहाग्यम् = औषधो- पचारादि करणरूप ददाति, वया - मुख - सुखेन = मुव - सुखेन = सुवपूर्वक च तम् महिच्छत्रा नगरी ' सपावे' समापयति-पमापयिष्यतीत्यर्थः । ' तिकटु' इति कृत्वा एवमुच्चार्य द्वितीयमपि तृतीयमपि पार घोपयत, घोपयित्वा मम 'एय माणत्तिये' एतामाक्षप्तिकाम् एतद्रूपा ममाज्ञा 'पच्चप्पिगह' प्रत्यर्पयत मदुक्ता घोषणा कृत्वा पुनर्मह्य निवेदयतेत्यर्थः । ततः खलु ते कौटुम्बिफपुरुपाः 'तथाऽस्तु- सुरसुहेण अहिच्छत्त सपावेड, त्ति कटु दोच्चपि तच्चपि घोसेह) पद प्राण (जूता) रहित है तो जूना (पदत्राण ) देगा जलपानरहित होगा उसे जलपात्र देगा, कलेवा (भोजन) रहित है तो कलेवा (भोजन) देगा, शम्प लपाथेय परक द्रव्यसे रहित है तो उसे शम्पल पाथेय-भाता पूरक द्रव्य देगा, अर्थात् चलते२ वीच मार्गमे ही जिसका कलेवा (भोजन) समाप्त रो जावेगा उसे उसके योग्य द्रव्यप्रदान करेगा, मार्गके मध्यमें चलते२ यदि वह घोड़ेसे गिर गया होगा, अथवा पैदल चलते२ यदि वह पैर फिसल कर गिर गया होगा और इस तरह से उसके हाथ पैर आदि टूट गये होंगे तो उसको सार समाल करेगा-रोगी की दवाई करेगा, और घड़े आनन्द के साथ उसे अहिच्छत्रा नगरीमें पहुँचा देगा। इस प्रकार की इस घोषणा को तुम लोग दो तीन बार करना । और (घोसित्ता मम एयमाणत्तिय पच्चप्पिणह) करके फिर हमे पीछे इसकी खबर देना (तएण ते कौडुपियपुरिसा जाव एव चयामी हदि सुणतु भवतो चपा भग्गलुग्गस्स साहेज्ज दलयइ, सुह सुहेणं अहिच्छत्त सपावेइ, त्ति कटु दोच पि उच्चपि घोसेह) જેડા વગરને હશે તેને જેડા આપશે, જમવાની સગવડ હશે નહિ તેને જમવાની સગવડ કરી આપશે શ બન–પાથેય-પૂરક દ્રવ્ય વગરનો હશે તેને શ બલ-પાથેય-પૂરક દ્રવ્ય આપશે એટલે કે માર્ગમાં અધવચ્ચે ભાતુ ખલાસ થઈ ગયું હશે તેને યોગ્ય ધન આપશે માર્ગમાં અધવચ્ચે ચાલતા ચાલતા જે તે ઘોડા ઉપરથી પડી જશે અથવા પગે ચાલતા ચાલતા જે તે પગ લપસવાથી પડી જશે અને તેથી તેના હાથ પગ વગેરે ભાગી ગયા હશે તો તેની તે સુશ્રુષા કરશે-રોગની દવા કરશે અને સુખેથી તેને અહિચ્છત્રા નગરીમા પહેચા- शे मा शते तमे मे ३१ मत घोषण! उसे सने (घोसित्ता मम एयमाण त्तिय पच्चप्पिणह ) घोषणा ने अमने भा२ माया (तएण ते कोड वियपुरिसा जाव एव क्यासी इदि सुणतु भवतो चपानयरी 1 - हाताधर्मग्यालम ५ + . . "गृहाश्रमसमो धर्मों, न भूतो न भविष्यति । पालयति नराः सूग,हीरा पापडमाश्रिताः॥१॥" इत्यभिसन्धाय तथा चिन्तनशीलः, 'अपिन्द्रनिद्रामारगरत्तपडनिग्गंध- प्पभिडपासडत्ये गा' अविरुद्वपिदग्दथारफरक्ताटनिग्रन्यप्रभृतिपापण्डस्थः तत्र- अविरुद्ध अविरुद्ध विरुद्ध' परमादपीत्यविरुदग्नियवादी क्रीयादीत्ययः, परलोकाभ्युपगमात् , ' विरुद्ध' विरुद. निरुंद = विरुद्धमादोऽस्यास्तीति-अर्श आदिन्वादच , विरुद्धवादी आक्रियावादीत्यर्थः परलोमानभ्युपगमात् , 'युगमावग' वृद्धश्रावका ब्राह्मण', वृद्धाद्ध कालिको यः श्रारक. सा, भरतादिराले पूर्व श्रावकसत्वेन पश्चाद् ब्राह्मगलभाराव , ' रक्तपड' रक्तपटीरिकपत्रधारीपरि बाजा', 'णिग्गय पभिड' निर्गन्यमभृति' = सायुमभृतिरन्यः कोऽपिकपिलादि - पापण्डस्थो वा गृहस्थो वा, इति यदि एपु.यः कोऽपिगन्छेत् तस्मै खलु धन्यः सार्थवाह अच्छाकाय छारहिताय छत्रक ददाति दास्यतीति भावः, एत्र सर्वत्र विज्ञेयम् ' अणुवाहणस्त' अनुगनहे पादत्राणरहिताय ' उपाहणाओ' उपानही ददाति, अकुण्डिकाय जलपानरहिताय कुण्डिका जलपात्र ददाति । 'अपत्यय 'णस्स' अपथ्यदनाय शम्बलरहिताय 'पत्थयण ' पथ्यदन = शम्बल ददाति । 1 अपक्खेवगस्स' अप्रक्षेपकाय, प्रक्षेपकः = पूर्तिद्रव्य, तद्रहिताय मध्यमार्गे न्यून शम्मलाय प्रक्षेपफ-शम्पलपूरक द्रव्य ददाति । 'अतरारिय' अन्तराऽपि च- मार्गानरालेऽपि च 'से' तस्मै पतिताय = वाहनाद् पादादिस्खलनेन वा, वा- श्रावक रो, गैरिकवस्त्रधारी परिव्राजक हो, निर्ग्रन्थ हो, पाखडी हो, चाहे गृहस्थ हो कोई भी क्यों न हो, उसके लिये धन्य सार्थवाह यदि वह छत्ररहित है तो छत्र देगा (अणुवाहणस्स उवाहणाओ दलयइ अ कुडियस्स कुंडिय दलयह अपत्थयणस्स पत्थयण दलयइ अपक्खेवगस्स पक्खेवदलयह अतराविय से पडियस्स वा भग्गलुग्गस्मसाहेज्ज दलयइ, અવિરુદ્ધ હેય, વિરુદ્ધ હેય, વૃદ્ધ શ્રાવક હય, ગરિક વસ્ત્ર ધારી પરિવ્રાજક હોય, નિથ હેય, પાખડી હોય અને ગૃહસ્થ હોય કઈ પણ કેમ ન હોય તેના માટે જે તે છત્ર વગરને હેય તેવાને ધન્ય સાર્થવાહ છત્ર આ પશે (अणुपाहणस्म उवाहणाभो दलयर, अकुडियम्म कुडिय दलयइ अपत्थयणस्स पत्ययण दलयइ अपक्खेवगस्स पखेर दर यइ अतराऽपिय से वा - - - मनगारधर्मामृतरिणी टोका अ० १५ नदिकलसम्पनिरूपणम् १०७ अथना भग्गलुग्गरम भग्नरुग्णाय भग्नाय = त्रुटित हस्तपादाद्यवयाय रुग्णाय = रोगाकान्ताय रोगग्रस्ताय वा 'साहेज्ज ' साहाय्यम् = औषधो- पचारादि करणरूप ददाति, तथा - मुव - मुखेन = मुग्वपूर्वक च तम् महिच्छत्रा नगरी ' सपावे' समापयति-प्रापयिष्यतीत्यर्थः । तिम्टु' इति छत्वा एवमुच्चार्य द्वितीयमपि तृतीयमपि वार घोपयत, घोपयित्वा मम एय माणत्तिये' एतामाञप्तिकाम् एतद्रूपा ममाझा ' पच्चप्पिगह' प्रत्यर्पयत=मदुक्ता घोषणा कृत्वा पुनर्मद्य निवेदयतेत्यर्थः । तत' खलु ते कौटुम्बिकपुरुषाः 'तथाऽस्तु- सुरसुहेण अहिच्छत्त सपावेइ, त्ति कटु दोच्चपि तच्चपि घोसेह) पद प्राण (जूना) रहित है तो जूता (पदत्राण ) देगा जलपात्र ररित होगा उसे जलपान देगा, कलेवा (भोजन) रहित है तो कलेवा (भोजन) देगा, शम्य लपाय पूरक द्रव्यसे रहित है तो उसे शम्बल पाथेय-भाता पूरक द्रव्य देगा, अर्थात् चलते२ वीच मार्गमें ही जिसका कलेवा (भोजन) समाप्त हो जावेगा उसे उसके योग्य द्रव्यप्रदान करेगा, मार्गके मध्यमें चलते२ यदि वह घोड़ेसे गिर गया होगा, अथवा पैदल चलते२ यदि वर पैर फिसल कर गिर गया होगा और इस तरह से उसके हाथ पैर आदि टूट गये होंगे तो उसको सार समाल करेगा-रोगी की दवाई करेगा, और घड़े आनन्द के साथ उसे अहिच्छत्रा नगरीमें पहुँचा देगा। इस प्रकार की इस घोषणा को तुम लोग दो तीन बार करना । और (घोसित्ता मम एपमाणत्तिय पच्चप्पिणह ) करके फिर हमे पीछे इसकी खबर देना (तएण ते कौडचियपुरिसा जाव एव वयानी हदि सुणतु भवतो चपा मगलुग्गस्स साहेज्ज दलयइ, सुह सुहेण अहिच्छत्त सपावेइ, त्ति का दोच पि तच्चपि घोसेह) જેડા વગરનો હશે તેને જેડા આપશે, જમવાની સગવડ હશે નહિ તેને જમવાની સગવડ કરી આપશે બા-પાથેય-પૂરક દ્રવ્ય વગર હશે તેને શબલ-પાથેય-પૂરક દ્રવ્ય આપશે એટલે કે માર્ગમાં અધવચ્ચે ભાતુ ખલાસ થઈ ગયુ હશે તેને યોગ્ય ધન આપશે માર્ગમાં અધવચ્ચે ચાલતા ચાલતા જે તે ઘોડા ઉપરથી પડી જશે અથવા પગે ચાલતા ચાલતા જે તે પગ લપસવાથી પડી જશે અને તેથી તેના હાથ પગ વગેરે ભાગી ગયા હશે તે તેની તે સુશ્રુષા કરશે-રોગની દવા કરશે અને મુખેથી તેને અહિચ્છત્રા નગરીમાં પહોચા- अरी 2 शत तमे मे ३५ मत पाउरो भने (घोसित्ता मम एयमाण त्तिय पचप्पिणह ) घोषणा शन मभने म २ माया ' (तएण ते कोडुपियपुरिसा जाब एव वयासी इदि सुणतु भवतो चपानयरी - . মায়াময় इत्युक्ला चम्पानगयाँ शृङ्गाटादिमहापरपयेषु समागम्य-यमादिपु:-'इदि इत्यामन्त्रणे तेन हे लोकाः । शृण्वन्तु-मान्त:-यत् चम्पानगरी वास्तव्या. बहवः 'चरगाय जानः' इति-चरकचीरिफादयो धन्येन मार्थवाहन सार्दमहिनउत्रा नगरी गच्छन्ति तेभ्यो धन्यः सार्थवाहनादिक सनं दास्यति, मार्गे च सवलितेभ्यो रोगादिग्रस्तेभ्यश्च औषधोपचारादिना साहाय परिप्यति, सुसपूर्वकमहिन्छया: नगरी पापयिष्यतिः च, इत्यय -घोपयित्वा धन्पमार्थनाहाय पच्चप्पिणति' प्रत्यर्पयति-निवेदयन्ति ।। सू०२॥ नगरीवत्थया वत्वे चरगा य जाव पच्चप्पिति) हम प्रकार धन्यसा- र्थवाह की पात को उन कौटुम्पिक पुरुपों ने "तथास्तु" कहकर स्वीकर लिया और चपानगरी में शृगोटक आदि मापध पर्यनके समस्त मार्गों में जाकर इस प्रकार की घोपणो की, हे लोको। सुनो-जो कोई चपा नगरी का निवासी चरक आदि जन धन्य सार्यवाह के साथ अहिच्छत्रा नगरी को जाना चाहता हो उसके लिये धन्यसार्थवाह छत्रादि सब देगा तथा जो मार्ग में पतित हो जायेंगे अथवा रोगामात बन जावेंगे जनकी औषधि आदि द्वारा सहायता भी करेगा और इस तरह वह उनके लिये सकुशल अहिच्छत्रा नगरी में पहुंचा देगा-इस प्रकार की घोषणा करके उन लोगों ने इसकी खयर धन्य सार्थवाह के पास भेज दी। गृहस्थ के घर निष्पन्न हुए औदनादिक खाद्य वस्तुओं का जो सर्व प्रथम हिस्सा दानके लिये पृथक कर रख लिया जाता है, उस क्थन्वा वहवे चरगा य जाव पच्चप्पिति) આ રીતે ધન્ય સાર્થવાહની આજ્ઞાને તે કૌટુંબિક પુરુષોએ સ્વીકારી લીધી અને ચકા નગરીના શ્રગટક વગેરે મહાપથમાં જઈને આ રીતે તેઓએ ઘાષણ કરી કે હે લેકે ! સાભળે, ચપા નગરીમાં રહેનાર ચરક વગેરે ગમે त માણસ ધન્ય સાર્થવાહની સાથે અહિચ્છત્રા નગરીમાં જ તેને ધન્ય સાર્થવાહ છત્ર વગેરે બધુ આપશે, તેમજ માર્ગ કઈ પડી જશે અથવા તે મા થઈ જશે તે ધન્ય સાથવાહની તેની બરાબર માવજત કરાવીને તેની” સહાય કરશે અને તેને સકુશળ અહિચ્છત્રા નગરીમાં પહોંચાડશે આ રીતે શેષણા કરીને તે લોકેએ ધન્ય સાર્થવાહને ઘેષણનું કામ પુરૂ થઈ જવાની ખબર આપી ગૃહસ્થને ઘેર તૈયાર કરાયેલા ભાત વગેરે ખાદ્ય વસ્તુઓને જે સો પહેલા દાન માટે જૂદ કરીને રાખવામા આવે છે તે ભાગને જે ભીખ ચરિક કહે છે માર્ગમાં પડેલા ફાટેલા વસ્ત્રો જે - સાગીને લઈ જાય છે તેને . . - भमगारधर्मामृतवयिणी टी० अ० १५ नंदिफलस्वरूपनिरूपणम् हिस्से को जो भिक्षा वृत्ति से ले जाते हे उनका नाम चरिक है । मार्ग में गिरे एए फटेचिटे वस्त्र को लेकर जो परिनते हैं उनका नोम. चीरिक है । चमड़े को जो अपने पहिरने के . उपयोग में लाते हैं वे धर्म खडिक है । दूसरे के द्वारा लायी गई भिक्षा से जो अपना निर्वाह करते हैं वे भिक्षोण्ड हैं । अपने शरीर पर जो भस्म लपेटे रहते हैं वे पांडुरंग हैं। बैल को लेकर जो दूसरों के घरों से अनाज मांगते हैं ये गौतम है । दिलीप राजा की तरह जो गायकी सेवा करने में लगे रहते. है-जप वर चैठती है तब वे बैठते हैं-वह खड़ी रोती है तो वे भी खडे हो जाते हैं इत्यादि रूप से गोचर्यानकारी जो जन होते हैं वे गोव्रतिक है। गृहस्थ धर्म ही श्रेष्ठ है, इस प्रकार मान कर जो उसमें रह रहते हैं वे गृहिधर्म चिन्तक है। जैसे-गृहस्थाश्रम के समान धर्म न हुआ है और न आगे होगा ही। जो शूरवीर मनुष्य होते हैं वे ही इसे पालते हैं। पापड धर्म को पालने वाले मनुष्य शूरवीर नहीं हैं किन्तु वे तो क्लीन-नपुसक हैं। ऐसी इनकी मान्यता होती है। भविरुद्ध शब्द का अर्थ विरुद्ध नहीं रहते हैं सवका समानरूप से विनय करते हैं । विरुद्ध शब्द का अर्थ अक्रियावादी है । ये अक्रिया वादी पर- પહેરે છે તેનું નામ ચીરિક છે ચામડાને જે વસ્ત્ર તરીકે પહેરવામાં કામમાં લે છે તે ચર્મ ખડિત છે બીજાઓ વડે લાવવામાં આવેલી ભિક્ષાથી જે... પિતાનુ ઉદર પિષણ કરે છે તે ભિક્ષેડ છે પિતાના શરીર ઉપર જે રાખ ચોળે છે તે પાડુરગ છે બળદને સાથે લઈને જેઓ બીજાઓના ઘરોથી અનાજ માગે છે તેઓ ગૌતમ કહેવાય છેરાજા દિલીપની જેમ જેએ ગાયની સેવા કરવામાં વ્યસ્ત રહે છે-જ્યારે ગાય બેસે છે ત્યારે તેઓ બેસે છે, જ્યારે ગાય ઉભી થાય છે ત્યારે તેઓ પણ ઊભા થઈ જાય છે વગેરે રૂપમાં જેઓ ગચ- ત્યનુકારી જ હોય છે તેઓ ગવતિક કહેવાય છે ગૃહસ્થ ધર્મજ ખરેખર ઉત્તમ ધમ છે આમ એકમ પણે માનીને તેમા દત્ત ચિત્ત રહે છે તેઓ ગૃહિધમ- ચિંતક છે જેમકે –ગૃહસ્થાશ્રમ જે ધર્મથ નથી અને આગળ ભવિષ્યમાં થવાની સંભાવના પણ નથી જેઓ શૂરવીર માણસ હોય છે તેઓ જ આ . ધર્મનુ પાલન કરે છે પાખડ ધર્મનું પાલન કરનારા માણસે શુરવીરે નથી પણ તેઓ તે નપુંસક છે ગૃહસ્થીઓની આ જાતની માન્યતા હોય છે અવિરુદ્ધ શબ્દને અ ક્રિયાવાદી છે કેમ કે એમાં કોઈ પણ માણસથી વિરુદ્ધ આચરણ કરતા નથી તેઓ બધાની સાથે સરખી રીતે વિનયપૂર્ણ વ્યવહાર કરે છે. વિરુદ્ધ શબ્દનો અર્થ અક્રિયાવાદી છે અકિયાવાદી લેકેપરલેસ જેવી વસ્તુ .
. - . १० तामा इत्युक्ला चम्पानगर्या शृङ्गाटकादिमहापयपये समागम्य-एनमयादिपु:-'हदि । इत्यामन्त्रणे तेन हे लोकाः । शृण्वन्तु-मान्त'-पत् चम्पानगरी पास्तव्या बाबा 'चरगाय जार' इति-चरकचीरिकादयो धन्येन गार्थवाहन सादमहिन्यां नगरों, गच्छन्ति तेभ्यो धन्यः सार्थवादमादिक सौ दाम्यति, मागे च स्सलिम्यो। रोगादिग्रेस्तेभ्यश्चः औपधोपचारादिना माहाग्य करिष्यति, सुसपूर्वकमहिच्छत्री नगरी मापयिष्यति च, इत्येय घोपयित्वा धन्पमार्थनाहाय 'पन्चप्पिणति प्रत्यर्पयतिनिवेदयन्ति ॥ सू००॥ नगरीवत्यमा वरचे घरगा य जाब पच्चप्पिणति ) म प्रकार धन्यसा- र्थवाह की बात को उन कोडम्पिक पुम्पों ने "तथास्तु" कर कर स्वीकर लिया और चपानगरी में गोटक आदि महापध पर्वतके समस्त मार्गो में जाकर इस प्रकार की घोपणो की, हे लोको! सुनो-जो कोई चपा नगरी का निवासी चरक आदि जन धन्य साह के साथ अहिच्छत्रा नगरी को जाना चाहता हो उसके लिये धन्यसार्थवाह छत्रादि सब देगा तथा जो मार्ग में पतित हो जायेंगे अथवा रोगामात घन जावेंगे जनकी औषधि आदि द्वारा सहायता भी करेगा और इस तरह वह जनके लिये सकुशल अहिच्छत्रा नगरी में पहुँचा देगा-इस, प्रकार की' घोपणा करके उन लोगों ने इसकी खयर धन्य सार्थवार के पास भेज दी। गृहस्थ के घर निष्पन्न हुए औदनादिक खाद्य वस्तुओं का जो सर्व प्रथम हिस्सा दानके लिये पृथक कर रख लिया जाता है, उस वत्थव्वा वहवे चरगा य जाव पच्चप्पिति) આ રીતે ઘન્ય સાર્થવાહની આજ્ઞાને તે કૌટુંબિક પુરુષોએ સ્વીકારી લીધી અને ચ પ નગરીના શ્રાટક વગેરે મહાપથમા જઈને આ રીતે તેઓએ ઘોષણા કરી કે હે લેકે 1 સાભળે, ચ પ નગરીમાં રહેનાર ચરક, વગેરે ગમે તે માણસ ધન્ય સાર્થવાહની સાથે અહિચ્છત્રા નગરીમાં જ તેને ધન્ય- સાથે વાહ છત્ર વગેરે બધુ આપશે, તેમજ માર્ગમાં કોઈ પડી જશે અથવા તે માટે થઈ જશે તે ધન્ય સાથવાહની તેની બરાબર માવજત કરાવીને તેની સહાય કરશે અને તેને સકુશળ અહિચ્છત્રા નગરીમાં પહચાડશે આ 1.रीत, છેષણ કરીને તે લેકેએ ધન્ય સાર્થવાહને ઘેષણનું કામ પુરૂ થઈ જવાની ૮ ખબર આપી ગૃહસ્થને ઘેર તૈયાર કરાયેલા ભાત વગેરે ખાદ્ય વસ્તુઓને જે સો પહેલા દાન માટે જૂદ કરીને રાખવામા આવે છે તે ભાગને જે ભીખ ભાગીને લઈ જાય છે તેને ચરિક કહે છે માર્ગમાં પડેલા ફાટેલા વએ જે भनेगारधर्मामृतवपिणी टी० अ० १५ नंदिफलस्वरूपनिरूपणम् हिस्से को जो भिक्षा वृत्ति से ले जाते हैं उनका नाम चरिक है 1 मार्ग में गिरे हुए फटेचिटे यन्त्र को लेकर जो पहिनते हैं उनका नाम- चीरिक है। चमड़े को जो अपने पहिरने के उपयोग में लाते हैं वे धर्म खडिक है । दूसरे के द्वारा रायी गई भिक्षा से जो अपना निर्वाह करते हैं वे भिक्षोण्ड है । अपने शरीर पर जो भस्म लपेटे रहते हैं ये पांडरग हैं । वैल को लेकर जो दूसरों के घरों से अनाज मांगते हैं ये गौतम है । दिलीप राजा की तरह जो गायकी सेवा करने में लगे रहते- है-जप वर चैठती है तब वे बैठते हैं-वह खड़ी होती है तो वे भी खडे हो जाते हैं इत्यादि रूप से गोचर्यानुकारी जो जन होते हैं वे गोव्रतिक है। गृहस्थ धर्म ही श्रेष्ठ है, इस प्रकार मान कर जो उसमें रह रहते हैं वे गृहिधर्म चिन्तक है। जैसे-गृहस्थाश्रम के समान धर्म न हुआ है और न आगे होगा ही। जो शूरवीर मनुष्य रोते हैं वे ही इसे पालते है । पापड वर्म को पालने वाले मनुष्य शूरवीर नहीं हैं किन्तु वे तो क्लीय-नपुसक हैं। ऐसी इनकी मान्यता होती है। भविरुद्ध शब्द का अर्थ विरुद्द नहीं रहते हैं सबका समानरूप से विनय करते हैं। विरुद्ध शब्द का अर्थ अक्रियावादी है । ये अक्रिया चादी पर- નામ ચીરિક છે ચામડાને જે વસ્ત્ર તરીકે પહેરવામાં કામમાં લે છે તે ચર્મ ખડિત છે બીજાઓ વડે લાવવામાં આવેલી ભિક્ષાથી જે. પોતાનુ ઉદર પિષણ કરે છે તે ભિક્ષેડ છે પિતાના શરીર ઉપર જે રાખ ચળે. છે તે પારગ છે બળદને સાથે લઈને જેઓ બીજાઓના ઘરોથી અનાજ માગે છે તેઓ ગૌતમ કહેવાય છે રાજા દિલીપની જેમ જેઓ ગાયની સેવા કરવામાં વ્યસ્ત રહે છે–જ્યારે ગાય બેસે છે ત્યારે તેઓ બેસે છે, જ્યારે ગાય ઉભી થાય છે ત્યારે તેઓ પણ ઊભા થઈ જાય છે વગેરે રૂપમાં જેએ ગોચ- યૌનુકારી જ હોય છે તેઓ ગેતિક કહેવાય છે ગૃહસ્થ ધર્મજ ખરેખર-ઉત્તમ ધમ છે આમ ચક્કસ પણે માનીને તેમા દત્ત ચિત્ત રહે છે તેઓ ગૃહિધર્મ- ચિંતક છે જેમકે -ગૃહસ્થાશ્રમ જે ધર્મ થયું નથી અને આગળ ભવિષ્યમાં થવાની સંભાવના પણ નથી જેઓ શૂરવીર માણસ હોય છે તેઓ જ આ . ધર્મનું પાલન કરે છે પાખડ ધર્મનું પાલન કરનારા માણસે શુરવીરે નથી પણે તેઓ તે નપુંસક છે ગૃહસ્થીઓની આ જાતની માન્યતા હોય છે અવિરુદ્ધ શબ્દને અર્થ ક્રિયાવાદી છે કેમ કે એમાં કોઈ પણ માણસથી વિરુદ્ધ આચરણ કરતા નથી તેઓ બધાની સાથે સરખી રીતે વિનયપૂર્ણ વ્યવહાર કરે છે. વિરુદ્ધ શબ્દનો અર્થ અકિયાવાડી છે અક્રિયાવાદી લેકેછપરલોક જેવી વસ્તુમ A પહેરે છે તેનું ar . মমতা इत्युक्त्वा चम्पानगर्या शृगाटकादिमहापथपयेषु समागत्य-प्रमादिषु -'हटि' इत्यामन्त्रणे तेन हे लोकाः । शृण्वन्तु-भान्तः यत् चम्पानगरी वास्तव्या बाबा 'चरगाय जारः' इति-चरकचीरिकादयो धन्येन गार्थवाहन सादमहिन्त्रां नगरों- गच्छन्ति तेभ्यो धन्यः सार्थवाहनादिक स दास्यति, मार्गे च स्पलितेभ्यो रोगादिग्रस्तेभ्यश्च औषधोपचारादिना माहाग्य परिप्पति, सुखपूर्वकमहिच्छा - नगरी मापयिष्यति च, इत्येव घोपयित्वा धन्यमार्यपाहाय 'पन्चप्पिणति' प्रत्यर्पयतिनिवेदयन्ति ।। सू०२॥ नगरीवत्थव्या वरवे चरगा य जाव परचप्पिति) हम प्रकार धन्यसा- र्थवाह की यात को उन कौटुम्पिक पुरुपों ने "तथास्तु" करकर स्वीकर लिया और चपानगरी में ,गोटक आदि महापथ पर्यंतके समस्त मार्गों में जाकर इस प्रकार की घोपणो की, हे लोको ! सुनो-जो कोई चपा नगरी का निवासी चरक आदि जन धन्य सार्थवाह के साथ अहिच्छत्रा नगरी को जाना चाहता हो उसके लिये धन्यसार्थवाह छत्रादि सब देगा तथा जो मार्ग में पतित हो जायेंगे अथवा रोगाफ्रान्त यन जावेंगे उनकी औषधि आदि द्वारा सहायता भी करेगा और इस तरह वह उनके लिये सकुशल अहिच्छन्ना नगरी में पहुंचा देगा-इस प्रकार की' घोषणा करके उन लोगों ने इसकी खर धन्य सार्थवाह के पास, भेज दी। गृहस्थ के घर निष्पन्न हुए औदनादिक खाद्य वस्तुओं का जो सर्व प्रथम हिस्सा दानके लिये पृथक कर रख लिया जाता है, उस वत्थव्वा बहवे चरगा य जाव पच्चप्पिति) આ રીતે ધન્ય સાર્થવાહની આજ્ઞાને તે ટુ બિક પુરુએ સ્વીકારી - લીધી અને ૨ પા નગરીના શગાટક વગેરે મહાપામાં જઈને આ રીતે તેઓએ ઘોષણા કરી કે હે લેકે ' સાભળે, ચપા નગરીમાં રહેનાર ચરક વગેરે ગમે, તે માણસ ધન્ય સાર્થવાહની સાથે અહિચ્છત્રા નગરીમાં જ તેને ધન્ય, સાર્થવાહ છત્ર વગેરે બધુ આપશે, તેમજ માગમ કઈ પડી જશે અશ્વા તે માટે થઈ જશે તે ધન્ય સાથવાહની તેની બરાબર માવજત કરાવીને તેની સહાય કરશે અને તેને સંકુશળ અહિ છત્રા નગરીમાં પહચાડશે આ રીતે, ઘોષણા કરીને તે લેકેએ ધન્ય સાર્થવાહને ઘેષણનુ કામ પુરૂ થઈ જવાની - ખબર આપી ગૃહસ્થને ઘેર તૈયાર કરાયેલા ભાત વગેરે ખાદ્ય વસ્તુઓને જે સો પહેલા દાન માટે જૂદે કરીને રાખવામા આવે છે તે ભાગને જે ભીખ ભાગીને લઈ જાય છે તેને ચકિ કહે છે માર્ગમાં પડેલા ફાટેલા વસ્ત્રો જે -
भनगारधर्मामृतपिणी टोका अ० १५ नदिफलस्वरूपनिरूपणम
जणवय मज्झ मझेणं जेणेव दसग्गं तेणेव उवागच्छद उवा-
गच्छित्ता सगडीसागड मोयावेइ मोयावित्ता सत्थणिवेस करेइ
करित्ता कोडवियपुरिसे सद्दावेइ सदावित्ता एव वयासी-तुम्भे
देवाणुप्पिया। मम सत्थनिवेससि महया महया सदेणं उग्घासमाणा
२ एव वयह-एवं खलु देवाणुप्पिया । इमीस आगमियाए
छिन्नावायाए दीहमदाए अडवीए बहुमज्झदेसभाए वहवे
गंदिफला नाम रुक्खा पन्नत्ता किण्हा जाव पत्तिया पुस्फिया
फलिया हरियगरेरिजमाणा सिरीए अईव अईव उवसोभेमाणा
चिट्टति मणुण्णा बन्नेणंट जाव मणुन्ना फासेणं मणुन्ना छायाए,
त जो णं देवाणुप्पिया । तेसि नदिफलाण मूलाणि वा कद०
तय० पत्त० पुप्फ० फल० वीयाणि वा हरियाणि वा आहारेइ
छायाए वा वीसमइ तस्रणं आवाए भद्दए भवइ तओ पच्छा
परिणममाणा२ अकाले चेव जीवियाओ ववरोति, तं माणं
देवाणुप्पिया । केइ तेसि नदिफलाणं मूलाणि वा जाव छायाएं
वा वीसमउ, मा णं सेऽवि अकाले चेव जीवियाओ ववरो-
विजिस्सइ, तुभेणं देवाणुप्पिया | अन्नेसि रुक्खाण मूलाणि-
य: जाव हरियाणि य आहारेह छायासु वीसमहत्ति घोसणं
घोसेह जाव पच्चप्पिणति, तएण से धणे सत्यवाहे सगडी-
सागड जोएइ२ जेणेव नदिफला रुक्खा तेणेव उवागच्छई
उवागच्छित्ता तेसिं नदिफलाण अदूरसामने सस्थणिवेस करेइ
करिता दोच्चपि तच्चपि कोडवियपरिसे सहावेड मटावित्ता
M
to
पाताचा
मूलम्-तएणं तेसिं कोडुविय पुरिमाण अतिए एयमई
सोच्चा णिसम्म चंपानयरी वत्थव्यावहवे चरगाय जाब गिहत्या
य जेणेव धपणे सत्थवाहे तेणेव उवागच्छति तपणं से धणे
सत्थवाहे तेसिं चरगाण य जाब गिहत्थाण य अच्छत्तगस्स
छत्त' दलयइ जाव पत्थय ण दलाइ दलइत्ता एव वयासो-
गच्छह णं तुम्भे देवाणुप्पिया | चपाए नयरीए वहिया अग्गु-
जाणंसि मम पडिवालेमाणा चिट्टह, तएणं ते चरगा य जाव
गिहत्था य धणेणं सत्थवाहेणं एव वुत्ता समाणा जाव चिट्ठति,
तएणं धण्णे सत्थवाहे सोहणसि तिहिकरणनखत्तसि विउल
असणं ४ उवक्खडावेइ उवक्खडावित्ता मित्तनाइ० आमतेइ
आमंतित्ता भोयणं भोयावेइ भोयावित्ता
सगडीसागड जोयावेइ जोयावित्ता चपानगरीओ निग्गच्छद
निग्गच्छित्ता चरगा य जाव गिहत्था य सद्धि घेत्तूण णाइवि
प्पइटेहिं अद्धाणेहि वसमाणे२ सुहेहि वसहि पायरासेहि अंगं
लोक नहीं मानते हैं । वृद्धश्रावक-ब्राह्मण-अर्थ का वाचक है । क्यों कि
ये पहिले भरत चक्रवर्ती के समय में श्रावक थे-पश्चात् ब्राह्मण धन
गये इसलिये " वृद्धकालिको यः श्रावकः इस व्युत्पत्ति के अनुसार
वृद्धश्रावक शब्द ब्राह्मण अर्थ का वाची यन जाता है । वाकी अवशिष्ट
शब्दों का अर्थ स्पष्ट है । सू० २ ॥
વિશ્વાસ કરતા જ નથી વૃદ્ધ શ્રાવક-બ્રાહ્મણ અને સ્પષ્ટ કરે છે કેમ કે એ
પહેલા ભરત ચક્રવર્તીના વખતે શ્રાવક હતા ત્યાર પછી એને છ aણ થઈ
गया मेरा भाटे 'वृद्ध कालिको य श्रावक स वृद्ध श्रावक આ વ્યુત્પત્તિ
મુજબ વૃદ્ધ શ્રાવક શબ્દ બ્રાહ્મણ અર્થને વાચક થઈ જાય છે. બીજા શેષ
શબ્દોના અર્થ તે સ્પષ્ટ જ છે . સૂત્ર
आपुच्छइ आपुच्छिता
,
२" ॥
- - भनगारधर्मामृत पिणी टीका २०१६ नन्दिफलस्वरूपनिरूपणम् निग्गंथी वा जाव पव्वइए पचसु कामगुणेसु सज्जेइ सज्जित्ता जाव अणुपरियहिस्सड जहा बा ते पुरिसा ॥ सू० ३ ॥ टीका-'तएण तेर्सि' इत्यादि । तत सलु तेपा कीटुम्मिकपुरपाणा- मन्ति के एतमय पूर्वोक्तमहिन्जानगरीगमनार्यघोपणास्प भार श्रुत्वाकर्ण- विषयोकृत्य, निशम्य यथार्य चम्पानगरी पास्तव्या अदिच्छवानगरीगन्तुकामा वनश्वरकाय याद गृहस्थाश्र यौन धन्य सार्थवाह-स्तौगोपागच्छन्ति । ततः खल्ल स धन्यः सार्थवाहस्तेपा चरकागा च यावद् गृहस्थाना च मरे अच्छत्रकाय- उज ददाति यावत पथ्यदन-शम्पल ददाति, एनमानी कथयति गन्छत खलु यूप हे देवानुप्रिया. 1 चम्पाया नगर्या रहि । अगुज्जाणमि ' अग्योद्याने मा पिडिवालेमाणा' प्रतिपाल्यन्त प्रतीक्षमाणास्तिष्ठत । तन खलु ते चरकाच- -नएण मि इत्यादि:- टीकार्थ-(तएण) इसके बाद (तमि कोडुपियपुरिसाण अतिए एयमट्ट सोच्चा जिसम्म चपानगरी वत्यव्या वघे चरगाय जावनिहत्थाय जेणे धण्णे सत्यवाहे तेणेव उवागच्छनि) उन कौटुम्बिक पुरुषों के मुख से इस घोपणारूप अर्थ को सुनकर और उसे हृदय में धारणकर चपी नगरी निवानी अनेक चरक से लेकर गृहस्थ पर्यंत मनुष्य जहां धन्य सार्थवाहक था वा आये (तपण से धपणे सत्यवाहे तेसिं चरगाण य जावं गिधाण अच्छत्तगस्त छत्त दलद जाव पत्ययण दलाइ दलकत्ता एवं वयासी-गह ण'हुम्भे देवाणुप्पिया। चपाए नयरीए पारिया अ. ग्गुज्जासि मम पडिबाले 'माणा चिट्टेह) इसके बाद धन्य'सार्थवाद तएण तेसिं ' इत्यादि । साथ-( तरुण ) त्यार पछी (तेसि कोडुपिय पुरिसाण अतिए एयम सोच्चा णिसम्म चपानगरी क्त्यव्या घहवे चरगीय जाप गिहत्या य जेणेव धणे- सत्यपाहे तेणेप उपागच्छति ). તે કૌટુંબિક પુરુષને મુખથી આ શેષણરૂપ અથને- સાભળીને અને તેને હૃદયમાં ધારણ કરીને ચ પ નગરીના ઘણા ચરકથી માંડીને ગડથ સુધીના બધા માણસે ક્યા ધન્ય સાર્થવાહ હતા ત્યા આવ્યા (तएण से धो सत्याहे तेसिं चरगाण य जाव गिहत्याण अच्छत्तगस्स छत्त 'दलया. जाव पत्थयण ढलाइ. दलात्ता एव वयामी-गच्छह ण तन्मे देवाण-
-
,
-
চালাঘর্ষ
एव क्यासी-तुन्भेणं देवाणुपिया -मम सत्यानिवसति महया
• महया सद्देणं उग्घोसेमाणा२ एव वयह-एपणं देवाणुप्पिया!
गते शंदिफला रुक्खा किण्हा जाव मणुन्ना छायाए त जो गं
देवाणुप्पिया। एएसिं णदिफलाण रुरखाण मूलाणि वा कंद०
पुप्फ० तय० पत्त० फल० जाव अकाले चेव जीवियाओ बकरो.
बेइ, त-माणं तुम्भे जाव दूरे दुरेणं परिहरमाणा वीसमह, मा
ण अकाले चेव जीवियाओ ववरोविस्सइ, अन्नेसिं रुक्खाण
मूलाणि य जाव वीसमहत्तिकद्दु घोसणं जाव पञ्चप्पिणति, तस्थ
रणं. अप्पेगइया पुरिसा धण्णस्स सत्यवाहस्स एयमट्ट सइहति
पत्तियति रोयति एयनह सदहमाणा३'तेसिं नंदिफलाणं० दूर
दूरेण परिहरमाणा२ अन्नेसि रुक्खाण मूलाणिय जाव वीसमति
--तेसि णं आवाए-नो-भद्दए भवइ, तओ पच्छा' परिणममाणार
१,सुहरूवत्ताए भुज्जार परिणमति, एवामेव समणाउसो। जो
.-अम्ह निग्गंथोनिग्गी वा जावपचसु कामगुणेसु नो सजेइ नो
रजेइ से f - इहभवे चेव वहणं समणाणं अच्चणिज्जे ५ पिरलोए
नो आगच्छइ जाव वीइवइस्सइ, जहा य ते पुरिसा तत्थ ण
अप्पेगइया पुरिसा धण्णस्स सत्थवाहस्त एयमट्ठ नो सद्दहति३
घण्णस्स एयम? असदहमाणा३ जेणेव ते नदिफला तेणेव
उवागच्छति-उवागच्छित्ता तेसि नदिफलाण ,मूलाणि य जाव
-वीसमति तेसिंण-आवाए भदए भवइ तओ पच्छा परिणममाणा
जाव ववरोधोंति, एवामेव समणाउसो | जो अमन
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- - भनगारधर्मामृत पिणी टीका म.१५ नन्दिफलस्वरूपनिरूपणम् निग्गंथी वा जाव पव्वइए पचसु कामगुणेसु सज्जेइ सज्जित्ता जाब अणुपरियहिस्सा जहा बा ते पुरिसा ॥ सू० ३ ॥ टीमा-'तपण तेर्सि' इत्यादि । तत सलु तेपा कीटुम्मिंकपुरपाणा- मन्तिके एतमय पूर्वोत्तमहिनछत्रानगरीगमनार्ययोपणारूप भार श्रुत्वा-कर्ण- विषयोकृत्य, निशम्य-हृयश्वार्य चम्पानगरी पास्तव्या अहिच्छानगरीगन्तुकामा बहनश्वरकाश्च पायद गृहस्थाश्य यौन धन्य सार्थवाह-स्नत्रयोपागन्छन्ति । तता खल सधन्यः सार्थवाहस्तेपा चरकागा च यापद् गृहस्थाना च म ये अच्छाकाय. छत्र ददाति यावत् प पदन-शम्पल ददाति, परमातीत-कथयति गन्छत खलु यूय हे देवानुमिया ! चम्पाया नगर्या रहि ' अगुज्जाणमि' अग्योद्याने मां 'पडिवालेमाणा' पतिपाल्यन्त प्रतीक्षमाणास्तिष्ठन । तन खलु ते चरकाच- -'तएण तेमि इत्यादि:- टीकार्थ-(तएण) इसके याद (तसि कोडचियपुरिसाण अतिए ण्यमट्ठ सोच्चाणिसम्म चपानगरी वत्वया वहवे चरगाय जाव गिरत्याय जेणेव धण्णे सत्यवाहे तेणेव उवागच्छनि) उन कौटुम्निक पुरुषों के मुख से इस घोपणारूप अर्थ को सुनकर और उसे हृदय में धारणकर चपी नगरी निवानी अनेक चरक से लेकर गृहस्थ पर्यंत मनुष्य जहां धन्य सार्थवाहक'था वा आये (तरण से धणे सत्यवाहे तेसिं घरंगाण ये जार्य गिरस्याण अच्छत्तगस्त छत्त दलइ जाव पत्ययण दलाइ दलहत्ता एवं बयासी-गच्छह ण'तुम्भे देवाणुप्पिया । चपाए नयरीए यारिया अ- गुज्जासि मम पडिवाले 'माणा चिट्टेह) इसके बाद'धन्य सार्थवा तपण तेसिं ' इत्यादि । As -( तएण ) त्यार पछी ( तेसि मोडुपिय पुरिसाण अतिए एयम? सोच्चा णिसम्म चंपानगरी वस्यव्या पहवे चरगीय नाव गिहत्या य जेणे धण्णे सत्थपाहे तेणे आगन्छ ति )- તે કૌટુંબિક પુરુષના મુખથી આ ઘોષણા રૂપ અર્થને-સાભળીને અને તેને હૃદયમાં ધાર કરીને ચ પા નગરીના ઘણા ચરકથી માડીને ગડથ સુધીના બધા માણસો જ્યા ધન્ય સાર્થવાહ હતા ત્યાં આવ્યા (तएण से धण्यो सत्यवाहे तेसिं चरगाण य जान मिहत्थाण अच्छत्तगस्स छत्त 'दलयर, जाव पत्थयण दलाइ, दलइत्ता एव'क्यामी-गच्छह ण तुम्भे देवाण- प्पियों" चपाए नयरोए वाहिया अगलाणसिमर्म पडियालेमाणा चिहह ) ish .
तापकथास - घरकादयो यावद् गृहस्था धन्येन सार्थवादेन-एपमुक्ता स-नः 'जार' याव- भन्य सार्थ गाइ मतीक्षमाणास्तिष्ठति । तत सलु धन्यः मार्य राह' शोभने तिपि फरणनक्ष शुभदिवसे विपुलमशनादिक चतुर्विधाहारम् उपस्कारयनि-निष्पादयति उपस्कार्य मित्रज्ञातिस्वजनसम्बन्धिपरिजनान् आमन्त्रयति, भोजन मोजयतिकार ने उन चरक आदि से लेकर गृहस्थ पर्यन्त के मनुष्यों में जिसके पास छत्ता आदि नही या उसे छत्ता दिघा यावत् जिस के पास कलेवा नही था उसको कलेवा-मार्ग भोजन-दिया। पाद में उसने उन सयसे कहा हे देवानुप्रियों ! तुम यहां से चलो और मुरय उद्यान में मेरी प्रतीक्षा फरते हुए ठहरे रहो-(तपण ते घरगाय जाय मिहत्या य धण्णेण सत्य चाहेण एव चुत्ता समाणा जाच चिट्ठति, तराण धण्णे सत्यवाहे मोहणसि त्तिरिकरणनग्वत्तसि विउल असण ४ उवम्बडावेह, उचावडावित्सा मित्तनाइ० आमतेइ, आमत्तित्ता भोयण भोयावेड, भोयायित्ता आपु च्छइ, आपुच्छित्ता सगडीसागड जोयावेड, जोयवित्ता चंपानगरीओ निग्गच्छइ ) इस प्रकार धन्यसार्थवाह के द्वारा कहे गये वे चरकादि गृहस्थ पर्यन्त समस्तजन वहा से चलकर मुख्य उद्यान में गये-और धन्यसार्थवाह की प्रतीक्षा करते हुए वहां ठहर गये । धन्यसार्थवाह ने शुभ तिथि, करण, एव नक्षत्र में विपुल मात्रा में अशन आदि रूप चारों प्रकार का आहार निष्पन्न करवाया। जय आरार निष्पम हो ત્યાર પછી ધન્ય સાર્થવાહે તેઓ ચરક વગેરેથી માડીને ગૃહસ્થ સુધીના બધા માણસેમાથી જેની પાસે છત્રી વગેરે ન હતી તેને છત્રી વગેરે અને જેની પાસે માર્ગ માટેનું ભેજન ન હતું તેને ભેજન આપ્યું ત્યાર બાદ તેણે બધાને કહ્યું કે હે દેવાનુપ્રિયે! તમે અહીંથી મુખ્ય ઉદ્યાનમા જાઓ અને ત્યાં મારી પ્રતીક્ષા કરો (तएण ते चरगाय जाब गिहत्थाय धण्णेण सत्थनाहे ण एव वुत्ता समाणा जाव चिट्ट ति, तएण धण्णे सत्यवाहे सोहणसि तिहिकरणनक्खत्त सि विउल असण ४ उवक्खडवेइ, उपखडाविता मित्तणाइ आमते, आमतित्ता भोयर्ण भोयावेइ, भोयावित्ता आपुच्छइ, आपुच्छित्ता सगडीसग्गड जोयावेइ, जोयावित्ता चंपानगरीओ निग्गच्छद) આ રીતે ધન્ય સાર્થવાહ વડે આજ્ઞાપિત થયેલા ચરક ગૃહસ્થ વગેર બધા માણસે ત્યાથી મુખ્ય ઉધાનમાં ગયા અને અન્ય સાથ વાહની રાહ જોતા તેઓ ત્યાં જ રોકાયા ધન સાર્થવાહે શુભ તિથિ, કરણ, અને પુષ્કળ પ્રમાણમા અશન વગેરે રૂપ ચારે જાતના આહાર . . - A - ! भनगारधामृतवपिणी टीका अ० १५ नन्दिफलस्वरूपनिरूपणम् पति, भोजयित्वा आपुच्छइ' आएन्छति-विदेशगमनार्थमाज्ञा प्रार्थयति, आपु. उध-आज्ञा प्राप्य शकटीशाक्ट योजयति, योजयत्या चम्पा नगरीतो निर्ग उति-निस्सरति, निर्गत्य चरकान् यावत् गृहस्थांश्च सार्दै गृहीला 'नाइविपगिहि' नातिविपकृष्टेषु नातिरेषु यथोचितेषु' अद्धाणेहि' अध्वस-मार्गेपु ' वसमाणे २' वसन्-चसन् स्थाने स्थाने निवास कुनि 'सुहेहि' शुभैः-प्रशस्तै. ' वसहिपायरा- सेहिं । वसतिप्रातराशेः- निवासस्थाने प्रातःकालीनलघुभोजन सह अगजन- पदस्य अगदेशस्य मय-मध्येन यौव 'देमग्ग ' देशाग्य अङ्गदेशसीमा वर्त्तते तत्रैवोपागच्छति, उपागत्य शरटीशास्ट मोचयति, मोचयित्वा 'सत्यनिवेस' सार्थनिवेश करोति, कृत्वा कौटुम्पिकपुरुपान् शब्दयति=आहयति शब्दयित्वा- आहृय एवममादीत्-" हे देवानुपियाः ! यूय खलु मम सार्थनिवेशे महता-महत्ता शब्देन-उच्चस्वरेण उद्योपयन्तः सन्तः एवम्क्ष्यमाणप्रकारेण बदत=कथयत-- घुका-तर उसने अपने मित्र, ज्ञाति आदि परिजनोको आमत्रित किया। आमत्रित करके फिर उन सबको उसने उस चतुर्विध आहारको भोजन कराया भोजन कराके फिर उन सघसे परदेश गमन करने की उसने भाज्ञा मांगी । आज्ञाप्राप्त करके उसने गाडी और गाड़ों को जुतवाया जुतवा कर फिर वह चपा नगरी से बाहिर निकला। चरकादि गृहस्थ पर्यन्त समस्त जन को अपने साथ में ले लिया-(निग्गचिमत्ता चरगाय जाव गिहत्थाय सवि घेतण णाइविप्पगिटेहि अद्धाणेणि चसमाणेर सुहेहिं चसहिपायरासेहि अग जणवय मज्झ मज्झेण जेणेव देमर्ग तेणेव उवागच्छह, उचाच्छित्ता सगडीसागड मोयावेह मोयावित्ता सत्थणिवेस करेड करित्ता कोडुचियपुरिसे सद्दावेइ सद्दवित्ता एवं तुम्भेण देवाणुप्पिया ! मम सत्यनिवेससि मया २ આહારે તૈયાર થઈ ગયા ત્યારે તેણે પિતાના મિત્ર, જ્ઞાતિ વગેર પરિજનોને આમત્રિત કર્યો આમત્રિત કરીને તેણે બધાને ચારે જાતના આહારે જમાડ્યા ત્યાર પછી તેણે સૌની પાસેથી પરદેશ જવાની આજ્ઞા માગી આમ તેણે બધાની પાસેથી આજ્ઞા મેળવીને ગાડી તેમ જ ગાડાઓ જોતરાવ્યા અને ત્યાર પછી તે ચપા નગરી થી બહાર નીકળે તેણે ઉગાનમા રાહ જેનારા બધા ચરક ગૃહસ્થ વગેરે માણસને પણ સાથે લઈ લીધા હતા (निग्गन्छित्ता चरगाय जाव गिहत्या य सद्धिं घेत्तूग णादपिप्पगिद्धेहि अद्धाणेहिं समाणे २ महेहि वसहिपायरासे हिं अग जणवय मज्झ मज्झेण जेणेव देसम्ग तेणेव उपागच्छा, उवागन्छित्ता सगडीसागड मोयावेइ, मोयावित्ता मणिनेग रिचा कौड बियपुरिसे सद्दावेद, सदाविचा वयासी बाताधार एत्र खल हे देशानुमिया ! ' इमोसे ' अम्याः ' अगामियाप ' - ग्रामरहितायाः छिन्नवायाए ' छिमपातायाः उिन्न' आपातो = गगगमागे यत्र सा, तस्या 'जनसञ्चाररहितायाः 'दीदमदाए' दीपिाया-दी-बहुकाउगम्य! अध्यान मार्गों पर सा, तस्या:-चिरकाल लहनीयाया', एतादृश्या अटच्या बहुमध्यदेश- भागे-प्रतिमध्यभागे, एत्य ण' अत्र सलु पहको नदिफयनामक्षाः प्रना- लोकैः , कयिताः । कीदृशास्ते ? इत्याह-पिण्डा' इत्यादि-कृष्णाः प्णवर्णी, कृष्णावभासा' अतिनीलत्वेन कृष्णन्छटासम्पनाः यात्-नीलादिवर्णयुक्ता, -सण उग्धोसेमाणा२ एव वयह-पत्र पलु देवाणुप्पिया! हमीसे अगा ..मिग्राए छिनावायाए दीदमदाए अहवीप परमज्यदेमभाग यत्ये णादिक -लानाम रुरवा पन्नत्ता फिणा जाव पत्तिगा,पुफिया, फलियो हरिग्रगरेरि जमाणा मिरीए अईवर उचसोभेमाणा चिट्ठति) निफल कर नाति विम कृष्ट-यथोचित-मार्गी में ठहरता और वहारमातः कालीन कलेचा करता "हुआ वह जहा अगदेश की सीमा थी वहा पर आया। वहां आकर के उसने अपने शकटी शकटों को ढील दिया और ढील करके फिर अपने सार्थ को ठहरा दिया । ठहरा देने के पोद फिर उसने अपने कौटुम्बिक पुरुषों को बुलाया और उनसे इस प्रकार कहा-हे देवानुप्रियो ! तुम लोग हमारे सार्थनिवेश में बडे जोर २ से घोषणा करते हुए ऐसा कहो कि-हे देवानुप्रियो ! सुनो जन सचार रहित दीर्ध मार्ग चाली इस आगे की अटवी के मध्यभाग में लोग कहते है कि अनेक नदीफल नाम के " एव वयासी- तुम्भेण देवाणुप्पिया ! मम सत्य निवेससि.महया.. सद्देण उग्धोसेमाणा २ एव वयह-एव , खलु देनाणुप्पिया ! इमीसे अगामियाए छिनावायाए दीहमद्धाए, अडवीए बहुमज्ज्ञदेसभाए यहचे णदिफलानाम रुक्खा पन्नत्ता किण्वा जाव पत्तिपा, पुफिया फलिया, हरियगरेरिज्जमाणा' सिरीए अईव २ उपसोभेमागा चिट्ठति), છે કે ત્યાથી રવાના થઈને તે માર્ગમાં યથાથાને નજીક નજીકના સ્થળ ઉપર વિશ્રામ કરતે અને ત્યાં સવાર થતા જલપાન ( નાસ્તો ) વગેરે કરતે તે અગદેશની હદ ઉપર પહે તવા પહેચીને તેણે ગાડી અને ગાડાઓને છેડી મૂકયા અને ત્યા પોતાના સાર્થને રે રોક્યા પછી તેણે પિતાના કૌટુંબિક પુરુષને બોલાવ્યા અને બેલાવીને તેઓને આ પ્રમાણે કહ્યું કે હે દવાનુપ્રિયે અમારા સાથે સનિપેશમા તમે લેકે સેટેથી આ પ્રમાણેની કહે કે હે દેવાનુપ્રિયે ! સાભળે ! હવે આગળ આવનાર લાખા માર્ગવાળા નિર્જન વનમા લેકે એમ કહે છે કે તેમાં ઘણા દિફળ २ - - +- . રાષણ કરતા ।
-७ , - अनेगारधर्मामृतयपिणो टीका म० १५ नन्दिफलस्वरूपनिरूपणम् तथा-'पत्तिया ' पनिता. पहला', ' पुफिया ' पुष्पिता'-पुप्पपहला, 'फेलिया' फलिताः फलपहुला 'हरियगरेरिज्जमागा' हरितकरारज्यमाना= हेरित केन हरितवर्णेन भृश शोभमाना 'सिरीए' श्रिया हरितपल्लवादिशोमया अंतीपातीच उमगोभमानास्तिष्ठन्ति वर्तन्ते । पुन कीदृशास्ते । इत्याह-मनोझा वर्णेने, 'जाव' यावत्-गयेन, रसेन स्पर्शन, मनोज्ञा छायया, रम्यवर्णादिना रम्य छायया च युक्ता इत्यर्थ , 'त' तत्-तस्मात् नन्दियाणा सौन्दर्यादिकारण- वंशात् 'जोण' यः खलु हे देवानुमिया । तेपा नन्दिफलाना=नन्दिफलाभिधानां साणा मूलानि वा फन्दानि वा त्वचो वा, पत्राणि वा, पुष्पाणि वा, फैलानि वा, बीजानि वा, हरितानि वा 'आहारेड' आहारयति, तेपा छायायो वा वीस- मइ' विश्राम्यति तस्य ग्वलु आगाए' आपाते-पूर्व भक्षणादि समये 'भदए' पृक्ष हैं । ये घृक्ष कृष्ण वर्णवाले है और देखने पर भी अति हरित होने के कारण कृष्ण ही प्रतीत होते है । पत्र, पुष्प एच फलों से वे युक्त हैं। वेररित वर्णसे घडे सुहावने लगते ह। उनके पल्लव आदि नर हरे २ है। इससे उन की शोभा घडी नीराली बनी हुई हैं। (मणुण्णा बन्नैण ४ जाव मणुन्ना फासेण मणुन्ना याए, त जो ण 'देवाणुप्पिया तेसि नदिफलाण रुक्ग्वाण मृलोणिवा कद तय० पत्त० पुप्फ० फल० घीयाणि --वा हरियाणि चा आहारेह, जयाए वा वीसमेह, तस्स णं आवाएं महुए भवह, तओ पच्छा परिणममाणा • आकाले चेव जोवियाओं व वरी वेनि ) वर्ण, रस, गध एव स्पर्श से वे बड़े मनोज्ञ हैं । छाया भी उनकी यटी मनोन है। इस लिये हे देवानुप्रियो! जो कोई ईन की सुन्दरता आदि कारण के वशसे आकृष्ट होकर इन नदिफल वृक्षों के मूलों को कटों को छालों को, पत्रों को, फलो को बीजों को अथा हरित अकुरों નામે વૃક્ષો છે તે વૃક્ષો કૃષ્ણ વર્ણવાળા છે અને ખૂબ જ લીલા લેવાથી કૃષ્ણ વર્ણન જેવા જ લાગે છે પત્ર, પુષ્પ અને ફળથી તેઓ સમૃદ્ધ છે લીલા 'છમ હોવાથી તેઓ અત્યંત સુંદર લાગે છે તેમના પત્ર વગેરે બધા લીલા છે તેથી તેમની શોભા એકદમ અનેખી છે (मणुण्णा बन्नेग ४ जाव मणुन्ना फासेण मणुन्ना आयाए त जो ण देवाणु- प्पिया । तेसिं नदिफलाण रुक्खाण मूलाणि वा कद तय० पत्त० पुष्क०, फल० वीयाणि, वा हरियाणि वा आहारेइ, छायाए वा वीमेमइ तस्स ण आवाए मदए भवइ, तभी पच्छा परिगममाणा २ अगले चे जीवियाओ ववरोति) વર્ણ, રસ, મધ અને સ્પર્શથી તેઓ ખૂબજ મજ્ઞ છે છાયડે પણ અત્યત મને છે એટલા માટે હે દેવાનુપ્રિયે! કોઈ પણ માણસ તેમની સુદરતા વગેરે કારણથી આકર્ષાઈને તે નફિળ વૃક્ષોના મૂળને, કોને છાલને પાદડાઓને, ને, બિયાઓને અથવા તે લીલી કૂપળને ખેશે કે તેઓને - . . १२० बानाधर्मकपास यूय, खल हे देवानुमिया । मम गार्थनिवेशे महना-बहता शमन उद्घोषयन्तार एवं पदत-" एते खलु हे दानुपियाः ! ते इमो नन्दिकलासाः यदर्थ, पूर्वम् पदिष्टम् कृष्णा यात्-मनो। डायगा, तर यो सलु हे देगनुमियाः । एतेषा नन्दिफलाना पाणा मूलानि या कन्दानि का पुपागि गा, वो या, पत्रामि वा, फलानि वा, यावत्-तानि मूलान्दादीनि त जीविताद व्यपरोपपन्ति, तद मा खल यूय 'जाव' यारद-वेग मूलकन्दादीनि मा आहारयत, मा च तैपा छापा विश्राम्यत स्न्तुि तान दर-दरेण दरत पर परिरमाणा' परिहरन्त वर्जयन्त तीन वार घुलाया-बुलाकर उसने ऐसा कहा-हे देवानुप्रिया तुम मेरे साथ निवेश में जाकर जोर २ से ऐमी घोपणा करो-कि है देवानुप्रियो जिन नदिफल वृक्षों के विपत्र में परिले सूचना दी गई है-वे येही कृष्ण यावत छाया से मनोज नदि फल वृक्ष है। त जो ण देवाणुप्पियाँ! एएसिदिफलाण खाण मूलाणिवा कंद पुष्फ तय पत्तः फल जाव अकाले चेव जीवियाओ ववगेवेड, त माण तुम्भे जार दूरे दूरण परिहरमाणा वीसमर' माण अकाले चैव जीवियाओ वरोविस्सइ, में न्नेसि रुकवाण मूलाणि यजाव वीसमहत्ति कह घोमण जाव पञ्च पिणति ) इस लये हे देवानुप्रियो ! तुम लोग में से कोई भी व्यक्ति हुन नदिफलवृक्षोंके नूलोंको, कंदोंको, पुष्पों को, छालोंको, फलोंको नहीं खावे और न वह इनकी यामे विश्राम ही करे-नहीतो वह अकालमै ही कालकवलिन अर्थात् मर जावेगी हो जावेगा। इस लिये इन्हे बहुत दूर छोडकर दूसरी जगह तुम लोग विश्राम करो इससे जीवन से रहित મારા સાથે નિવેશમાં જઈને મેટેથી તમે આ પ્રમાણે ઘણું કરે કે છે દેવાનુપ્રિયે ! જે નદિફળ વૃક્ષોના વિષે પહેલા તમને જાણ કરવામા આવી હતી તે એજ કૃણ તેમજ છાયાથી મનેરૂ લાગતા નદિફળ વૃક્ષો છે (त जो ण देवाणुप्पिया ! एएसिं गादिफलाण रुक्खाण मूलागि वा कद पुष्फ० तय० पत्त० फल जाव,अकाले चेव जीवियाओ ववरोवेइ त' माणं तुम्भे जाव दूर दूरेण परिहरमाणा वीममह,माण अकाले चेव जीवियाओ ववरोविस्सइ, अन्नेसि रुक्खाण मूलाणि य जार, बीसमहत्ति कटूटु,घोसणं जाव पच्चप्पिणति) એટલા માટે હે દેવાનુપ્રિયે ! તમારામાંથી કોઈ પણ માણસ નદિફળ વૃક્ષોના મૂળને, કદને, પુને, છાલ, ફળને ખાય નહિ અને તેમની છયામાં પણ વિમા લે નહિ, નહિતર તે અકાળે જ મત 3 એમનાથી ખૂબ જ દૂર રહીને વિસામે લેશો 7 at मनगारधर्मामृतरविणी टी० १० १५ नदिफलस्वरूपनिरूपणम् सन्तोऽन्यत्र 'वीसमद, विधाम्यत-विश्राम कुरुत तेन न सलु यूय जीविताद् व्यपरोपिप्य वे, तथा-अ येषां वृक्षाणा मूलानि च यावत्-चन्दादीनि आहारयत, छायास विश्राम्यत" नि हवा पणा घोपयत, गार-ते घोपणा योपयिचा धन्यसार्थनाहाय तदा प्रत्यर्पयन्ति । तत्रालु साथै प्येके पुरुपा धन्यस्य सार्थ वाहस्य एनमर्थम् पदुपदेश अधति, प्रतिगति-रोचयन्ति, एतमय श्रद्दवाना श्रद्धाविपयिकुर्वाणाः प्रतियन्त रोचयन्त तेषा नन्दिफलक्षाणा मृलादीनि छायाँ च दूर -दूरेण-दूरतएर परिहरन्तः परिवर्जयन्तोऽन्येषा वृक्षाणा मूलानि च यावत्- कन्दादीनि आहारयन्ति, जन्यवृक्षाणा आयामु च विश्राम्यन्ति, तेषां खलु नहीं होओगे |तथा इनसे अतिरिक्त औरजो दूमरे वृक्ष हैं उनके मूलों को यावत् फन्दादिको यो ग्बाओ और उनकी छाया मे विश्राम करो। इस प्रकार की घोषणा कर दो-उन्हों ने धन्य सार्थवाह की आज्ञानुसार वैसा ही किया और इसकी उसे ग्ववर भी दे दी। (तत्य ण अप्पेग- इया पुरिसा वास्स सत्यवाहस्स ण्यम सदति, पत्तियति रोयति, एयम सद्दहमाणाइ तेसि नदिफलाण दूर दूरेण परिहरमाणा २ अं- न्नेसि रकग्वाण मृलाणि य जाव बीसमति ) वहा सार्थ में के कितने के मनुष्यों ने धन्य सार्थवाहके इस सूचना रूप अर्थको स्वीकार कर लिया। उस पर श्रद्धा जमाई उसे अपनी प्रतीति का विषय बनाया तथा उन्हें वह यात अच्छी तरह रुचि कर भी हुई । इसलिये इस बात पर श्रद्धा आदि मपन्न बने हुए उन लोगों ने उन नदि फल वृक्षों के मूलादिकों को और उनकी छाया को बरत दर से छोडकर अन्च वृक्षों के मूलादि પણ મુશ્કેલી નડશે નહિ તેમજ આ વૃક્ષો સિવાયના બીજા વૃક્ષો છે, તેમના મૂળ કદ વગેરે તમે ખાવ અને તેમના છાયડામા વિશ્રામ કરી તેઓએ ધન્યસાર્થવાહની આજ્ઞા પ્રમાણે જ ઘોષણા કરીને તેને ખબર આપી (तत्थ ण अप्पेगठया पुरिसा धण्णस्स सत्यवाहस्स एयमट्ठ सद्दहति, पत्ति- यति, रोयति, एयमट्ट सदहमाणाइ तेसिं नदिफलाण. दुर दरेण परिहरमाणा २ अन्नेमि रुक्खाण मूगाणि य जाव चीसमति ) ત્યા સર્થમાં આવેલા કેટલાક માણસોએ ધન્યસાર્થવાહની સૂચના રૂપ આ વાતને સ્વીકારી લીધી અને તેને શ્રદ્ધાની અપેક્ષાએ પિતાના હૃદયમા સ્થાન આપતા ખરેખર તેની પર પ્રતીતિ કરી લીધી તે લેકોને તે વાત રૂચિકર પણ થઈ પડી આ રીતે શ્રદ્ધાયુક્ત થયેલા તે લોકોએ તે ન દિફળ વલોના મૂળ વગેરેથી અને તેમની દયાથી ખૂબ જ દૂર રહીને બીજા વૃક્ષોને મૂળ તેમજ કટ ने माथा तथा तभनी छायामा विसामो सीधा V - में আগমখায়ণ यूय खल्ल हे देवानुगिया ! गम मानिवेशे महता-बहता शब्दन उद्योगमन्तार एवं रदत-" एते खलु हे देशानुपिया. 1 ते इमो मन्दिफामा यद, पूर्वर पदिष्टम् कृष्णा यान-गनो छायगा, तर यो सटु हे देशानुपिया. 1 एतेषी नन्द्रिफलाना पृक्षाणा मूलानि मा कन्दानि पुपागि सोपा, पत्रागि वा, फलानि वा, यावत्-तानि मूलमन्दादीनि त जीपिता पपरोपगन्ति, तत् मा खेल यूय ' जार' यावत्-तेगा मूलमन्दादीनि मा आहारयत, मा च तेषा आयात विश्राम्पत किन्तु तान दर-दरेण दत पर ' परिहरमाणा' परिहरन्त वर्जयन्द तीन बार घुलाया-धुलाकर उसने ऐसा करा-हे देवानमिया! तुम मेरे साथै निवेश में जाकर जोर २ से ऐमी घोषणा करो-कि हे देवानुप्रियो जिन नदिफल वृक्षों के विपत्र में प्ररिले सूचना दी गई है-वे यही कृष्ण यावत छाया से मनोज नदिफल वृक्ष है। त जो ण देवाणुप्पिया। एएसि गंदि फराण स्वखाण मूराणिवा कद पुष्फ तय० पत्त फल जाव अकाले चेव जीवियाओ वगेवेइ, त माण तुम्भे जाप रे रेण परिहरमाणा वीममह माण अकाले चेव जीवियाओ वरोविस्सह, न्नेसि रुकवाण म्लाणि यजाव बीसमहत्ति कटु'घोमण"जाव पञ्च प्पिणति ) इस लये हे देवानुप्रियो ! तुम लोग में से कोई भी व्यक्ति इन नदिफलवृक्षोके नूरोको, कदों को, पुष्पोंको, छालोंको, फलोंको नही खावे और न वह इनको छायामे विश्राम ही करे-नहीतो वह अकालमै कालवालिन अर्थात् मर जावेगा हो जावेगा। इस लिये इन्हे दूर छोडकर दूसरी जगर तुम लोग विश्राम करो इससे जीवन से रहित મારા સાથે નિવેશમાં જઈને મોટેથી તમે આ પ્રમાણે ઘેષણ કરો કે દેવાનુપ્રિયે ! જે નદિફળ વૃક્ષોના વિશે પહેલા તમને જાણ કરવામા આવી હતી તે એજ કૃષ્ણ તેમજ છાયાથી મનેસ લાગતા નદિફળ વૃક્ષો છે (तु जो ण देवाणुप्पिया ! एएसि णदिफलाण रुक्खाण मूलाणि वा कद पुप्फ० तय० पत्त० फल जाव अकाले चेव जीवियाओ ववरोवेइ त माण तुम्मे जाव दूर दूरेण परिहरमाणा बीममह,माण अफाले चेव जीवियाभो ववरोविस्सइ अन्नेसि रुकावाण मूलाणि य जार, बौसमहत्ति कटूटु घोसणं जाव पच्चपिणति) એટલા માટે હે દેવાનુપ્રિયે ! તમારામાંથી કોઈ પણ માણસ નદિફળ વૃક્ષોના મૂળને, કદોને, અને, છાલ, ફળને ખાય નહિ અને તેમની છાયામાં પણ વિસામો લે નહિ, નહિતર તે અકાળે જ awal * એમનાથી ખૂબ જ દૂર રહીને વિસામો લેશે તેથી ममगारधर्मामृतरविणी टी० १० १५ नदिफलस्वरूपनिरूपणम् १६ सन्तोऽन्यत्र 'बीसमह । विशाम्यत-विश्राम कुरुत तेन न सलु यूय जीविताद् व्यपरोपियवे, तया-नयेपा क्षाणा मृलानि च यावत्-न्दादीनि आहारयत, छायास विश्राम्यत" ति हा पणां योपयत, गावत्-ते पणा योपयित्वा धन्यसार्यपाहाय तदाता प्रत्यर्पयन्ति। तत्र-सलु सार्थे जप्येक पुरुषा धन्यस्य सार्थ वाहस्य एतमयम् एतदुपदेश अदधति, प्रतिगति-रोचयन्ति, एतम श्रद्दधाना= श्रद्धाविपयिकुर्वाणा' प्रतियन्त रोचयन्त तेपा नन्दिफलसाणा मृलादीनि छायाँ च दूर -दूरेण-दरतण्य परिहरन्तः परिवर्जयन्तोऽन्येपा वृक्षाणा मूलानि च यावत्- कन्दादीनि आहारयन्ति, धन्यवृक्षाणा यासु च विश्राम्यन्ति, तेषां खलु नहीं होओगे । तथा इनसे अतिरिक्त औरजो दूसरे वृक्ष हैं उनके मूलों को यावत् कन्दादिको को ग्वाओ और उनकी छाया में विश्राम करो। इस प्रकार की घोषणा कर दो-उन्हों ने धन्य सार्यवाह की आज्ञानुसार वैसा ही किया और इसकी उसे ग्वपर भी दे दी। (तत्य ण अप्पेग- इया पुरिसा वास्स सत्यवाहस्स एयम सदति, पत्तियति रोयति, एयमट्ट सहरमाणाइ तेसि नदिफलाण दूर दरेण परिहरमाणा २ अ- नेसि रकग्वाण मूलाणि य जाय धीसमति) वहा सार्थ में के कितने मनुष्यों ने धन्य सार्थवाह के इस सूचना रूप अर्थको स्वीकार कर लिया। उस पर श्रद्धा जमाई उसे अपनी प्रतीति का विषय बनाया तथा उन्हें घह बात अच्छी तरह रुचि कर भी हुई । इसलिये इस बात पर श्रद्धा आदि सपन यने हुए उन लोगों ने उन नदि फल वृक्षों के मूलादिकों को और उनकी छाया को बरत दर से छोडकर अन्न वृक्षों के मूलादि પણ મુશ્કેલી નડશે નહિ તેમજ આ વૃક્ષો સિવાયના બીજા વૃક્ષો છે, તેમના મૂળ કદ વગેરે તમે ખાવ અને તેમને છાયડામાં વિશ્રામ કરો તેઓએ ધન્યસાર્થવાહની આજ્ઞા પ્રમાણે જ ઘોષણા કરીને તેને ખબર આપી (तत्थ ण अप्पेगया पुरिसा धण्यास सत्यवाहस्स एयमट्ठ सद्दहति, पत्ति- यति, रोयति, एयमट्ट सदहमाणाइ तेसि नदिफलाण० दूर दरेण परिहरमाणा २ अन्नेमि रुपखाण मूलगाणि य जाव वीसमति ) ત્યા અર્થમાં આવેલા કેટલાક માણએ ધન્યમાર્થવાહની સૂચના રૂપ આ વાતને સ્વીકારી લીધી અને તેને શ્રદ્ધાની અપેક્ષાએ પિતાના હૃદયમાં સ્થાન આપતા બરોબર તેની ઉપર પ્રતીતિ કરી લીધી તે લેકને તે વાત રૂચિકર પણ થઈ પડી આ રીતે શ્રદ્ધાયુક્ત થયેલા તે લોકોએ તે ન દિફળ વૃક્ષોના મૃળ વગેરેથી અને તેમની દયાથી ખૂબ જ દૂર રહીને બીજા વૃક્ષોના - ખાધા તથા તેમની છાયામાં વિસામે લીધે भाते साधर्मकथा भापाते-पूर्वमाहारसमय नो भद्रक मानि-शिशिष्यादादिलाभो न भवति किन्त ततः पवाद-भक्षणविवामानन्तर परिणम्यमानानि २ रसादिरूपेण परिणतानि मूलफन्दादीदि शुभरूपतया दस्तया भूयो भूय परिणमन्ति । अथोपनय दर्शयन् सुधर्मस्वामी मा.-'एघामेये 'त्यादिना । ' एवामेव ' एवमेव अनेनैव पूर्वोक्तपारेण हे आयुधान्तः श्रमणाः ? योऽस्माक निर्ग्रन्यो गा निर्गन्थी या 'जार' यावत्-आचार्योपाध्यायानामन्ति के मुण्डा भूत्वा मनजितस्ते पामुपदेशं श्रदधानः सन् पञ्चन यामगुणेपु-शब्दादिपियेपु 'नो सज्जेइ ' नो कों को यावत् कदों को खाया और उनकी छाया में विश्राम किया। (तेसि ण आवार णो भहए भवा, तओ पच्छा परिणयमाणा २ सुह रूवत्ताए भुज्जो २ परिणमति, ण्यामेव समणाउसो जो अम्ह निग्गयो घा निग्गंथी वा जार पचसु कामगुणेसु नो सज्जेह, नो रज्जेइ, से ण इहभवे चेव यहण समणाण ४ अच्चणिज्जे परलोए नो आगच्छा, जाव वीईवयस्सइ, जहा चा ते पुरिमा) परन्तु इन पुरुपोंको उनके मूला दिकों के खाने के समय विशिष्ट स्वादादि को प्राप्तिरूप भद्रक का लाभ तो नहीं हुआ-किन्तु उसके याद जय खाये हुए उन भूलादिकों का रसादि रूप से परिणमन हुआ तय उन्हें पार २ शुभ रूप परिणमन होने से आनन्द आया और जीवन सुरक्षित रहा-अय सुधर्मास्वामी इसका उपनय ( दृष्टात के अर्थ को प्रकृति में जोडना ) दिखलाते हुए कहते हैं कि इसी तरह से हे आयुष्मन्त श्रमणो । जो हमारे निर्ग्रन्थ श्रमण एवं श्रमणियाजन हैं वे आचार्य उपाध्यायके पास मुडित होकर दीक्षिन हो जाते हैं और उनके उपदेश को श्रद्धा आदि का विषयभूत (तेसिंण आवाए णो भए भवइ, तभो पच्छा परिणममाणा २ सुहरुव- ताए भुज्जो २ परिणमति, एपामेव समगाउमो जो अम्द निग्गयोवा निग्गथी वा जाव पचमु कामगुणेमु नो सज्जेइ, नो रज्जेई से ण इहभवे चे। बहूण समणाण४ अच्चणिज्जे परलोए नो आगच्छइ, जाव वीइवयस्मइ जहा वा ते पुरिसा) તે માણસને વૃક્ષોના મૂળ કદ વગેરે ખાતી વખતે સવિશેષ સ્વાદ વગે રની અનુભૂતિ તે થઈ શકી નહિ પણ ખાધા પછી તે મૂળ કદ રસ વગેરે રૂપમાં પરિણત થયા ત્યારે તેમને સુખ મળ્યું અને સાથે સાથે તેમના જીવન પણ સુરક્ષિત રહ્યા સુધર્મા સ્વામી હવે એજ વાતને દૃષ્ટાન્તના રૂપમાં સ્પષ્ટ કરતા કહે છે કે તે આયુષ્મત શ્રમશે! આ પ્રમાણે જ જે અમારા નિથ શમણીએ, આચાર્ય તેમજ ઉપાધ્યાયની પાસે મુક્તિ થઇને, 7 है मनंगारधर्मामृतपिगी टीका म० १५ नदिफलतापनिरूपणम् १२३ स्वजते-आसक्तो भवति, 'नो रज्जेइ 'नो रज्यते नो अनुरक्तो भवति म खल इस भवएव बहूना श्रमणाना श्रमणीना बहूना साधूना साधीना मध्ये-अर्चनीय'= माननीयः सन परलोकेम्भनान्तरे नो आगच्छति-जन्म न प्राप्नोति स्न्तुि- यावत्-अस्मिन्नेव भवे चातुरन्तसमारकातार व्यतित्रनिप्यति-उलड यिष्यति, मोक्ष प्राप्स्यतीत्यर्थः 'जहा बा ते पुरिसा' यथा वाते पुरुषाः-यथा वा-येन प्रका- रेण धन्यसार्थवाहोपदेशश्रद्रया तेनन्दिपलक्षमूलकन्दादि परिवर्जनेन तरकथ- नानुमारसमाचरणशीलाः पुम्पा:-सार्थपुरुषा' मुखपूर्वकमहिच्छत्रा नगरी माप्स्यन्ति तयेत्यर्थः । अथ श्रद्धा रहितान् वर्णयति-तत्थ ण' इत्यादि। तत्र खलु सार्थे अप्ये- के ये तेचित् पुरुषाः धन्यस्य सार्थवाहस्य एतम नन्दिफलभक्षणादि निषेधरूप पनाते हुए पाच काम गुणों में-शब्दादि विषयों में आसक्त नहीं बनते हैं अनुरक्त नहीं बनते हैं वे इस भवमें ही अनेक साधु और साध्वियों के बीचमें माननीय होते हुए परलोक में जन्म से ररित हो जाते हैं- अर्थात् पुन उन्हें जन्म धारण नही करना पडता है। कारण वे इसी भव में चतुर्गति रूप इस संसार कान्तार को पार करने वाले बन जाते है-उन्हें मोक्ष प्राप्त हो जावेगा ऐसे वे तैयार हो जाते हैं। जिस प्रकार धन्य सार्थवाह के उपदेश पर श्रद्धा करने से ये सार्थ के कितनेक पुरुष नदि वृक्षों के मूलकंदादिकों का परिहार-त्याग करते हुए और उसके कथनानुसार अपना आचरण बनाते हुए सकुशल अहिच्छत्रा नगरी को प्राप्त कर लेंगे ऐसे बन गये । अब जिन्होंने धन्य सार्थवाहके वचनों पर श्रद्धा नही की-उनको क्या दशा हुई इस रात का वर्णन सूत्रकार करते हैं-(तत्थ ण अप्पेगडया पुरिमा धण्णस्म सत्यवाहस्स एय- યુક્ત થઈને પાચ કામ ગુણેમા શદાદિ વિષયે મા-અનાસક્ત રહે છે એટલે અનુરક્ત થતા નથી, તેઓ આ ભવમા જ ધણુ સાધુઓ તેમજ સાધ્વીઓની વચ્ચે સન્માનનીય થતા પરલોકમાં જન્મરહિત થઈ જાય છે એટલે કે ફરી તેઓને જન્મ થતું નથી કેમકે તેઓ આ ભવમાં જ ચતુર્ગતિ રૂપ આ કાતારને પાર કરવા લાયક સામ મેળવી લે છે તે મોક્ષ મેળવવા યોગ્ય થઈ જાય છે, જેમ ધન્યસાર્થવાહના ઉપદેશ ઉપર શ્રદ્ધા મૂકીને સાર્થના કેટલાક પુરૂએ નદિ વૃક્ષોના મૂળ કદ વગેરેને ત્યજીને તેની સૂચના મુજબ આચ રણ કરતા અહિચ્છત્રા નગરીમા પહોચી શકે તેવા થઈ ગયા હવે જે પુરૂએ ધન્યસાર્થવાહની વાત ઉપર શ્રદ્ધા મૂકી નહિ તેઓની શી હાલત થઈ તેનું વર્ણન કરતા સૂત્રકાર કહે છે- (तत्या अप्पेगइया पुरिसा धण्णस्स सत्यवाइस एयम नो सदइवि ३ સ સાર , १२५ মাসােয় नो श्रदधति नो रोचयन्ति नौ प्रतियति। ने धन्यस्य-मम् अश्रयाना रोष यन्तः, अपतियन्त यो नदिफला लामगोपागान्ति, पागत्य तेषां नन्दि फलाना मूलानि 7 यावत्-कन्दादीनि आहारयन्ति, तशा यागु न विश्राम्यन्ति तेषां खलु आपात-पू फलमक्षणादिमिरे भटक मानिम्मम्पादादिलामोमवति किन्तु 'तभी पच्चा' ततः पश्चात् फलभपणाधनन्तर परिणम्पमानासादिरूपेण मह नो महाति ३ धगम ण्यमह अमाइमाणा सणे ते नदिफना तेणेव उवागच्छिति उवागठित्ता तेसि नदिफलाण मृलाणि य जास वीसमति, तेसि ण आपाप मद्दण् भनऊ, तओ पच्छा परिणममाणा जाव वरोति ण्वामेव समणाउरगे! जो अहं निग्गयो वा निग्गयी चा जाच पन्चइए पचहु कामगुणेसु मज्जेड, मनित्ता जान अणुपरिय हिस्सइ जहा वा ते पुरिसा) वहा पर कितनेक पुरुषों ने धन्यसार्थवाह के इस कथन को कि नदिफल वृक्षो के कामुलादि नहरों साना चाहिये और न उनकी गया ती विश्राम करना चाहिये अदाकी दृष्टिसे नहीं देखा उस पर अपनी श्रद्धा नहीं जमाई, उसे अपनी रुचि का प्रतीति का विषय नहीं पनाया-वे पुरप- धन्यसार्थवाह के इस कथन को अश्र द्वेय आदि मानकर जहा पर नदिफल वृक्ष थे- वहा गये वहा जाकर उन्होंने उनके मूल कदादि कों को खाया उनकी छाया में विश्राम किया उस समय उन्हें बड़ा आनन्द आया- स्वाद जन्य कोई अपूर्व सुख मिला -किन्तु जर उनका परिपाक काल आया जब वे खाये हुए मृलकन्दादि धण्णस्त एयम अमदहमाणा 3 जेणेच ते णदिफला तेणेन उवागच्छ ति, उवा गच्छित्ता तेसि नदिफलाण मूलागि य जार वीसमति, तेसि प आनाए भइए, भवइ, तभी पच्छा परिणममाणा जाप वनरोति एवमेव समणाउसो । जो अम्ह निग्गयो वा निग्गी वा जाव पचइए पचमु कामगुणेसु सज्जेइ, सज्जित्ता जाव अणुपरियहिस्सइ, जहा या ते पुरिमा) ત્યા કેટલાક માણસેએ ધન્યસાર્થવાહના નડિફળ વૃક્ષોના કદમૂળ વગેરે ખાવા જોઈએ નહિ તેમજ તે વૃક્ષોની છાયામાં પણ વિસામો લે નહિ આ જાતના કથન પ્રત્યે શ્રદ્ધાવાન થયા નથી, તેના ઉપર વિશ્વાસ મૂકે નહિ અને પ્રતીતિપૂર્વક તેમાં પિતાની અભિરૂચી બતાવી નહિ તે માણસ ધન્યસાર્થવાહના કથન અશ્રય માનીને યા નદિફળ વૃક્ષો હતા ત્યા ગયા ત્યાં જઈને તેમણે તેમના મૂળ કદ વગેરે ખાધા અને તેમના છાયડામા વિસામે લીધે તે સમયે તે તેમને ખૂબ જ આનદ પ્રાપ્ત થયે, ફળના સ્વાદમાં અપૂર્વ સુખ મળ્યું, પણ જ્યારે તેઓની પાચન ક્રિયા થવા માડી એટલે કે ખાધે वगैरे .
- । भेनगारधर्मामृतपपिणी टीका अ० १५ नंदिफलसरूपनिरूपणम १०५ परिणाम माग्नुपन्त, सन्तः चन्दादय यावत्-तान् जीविनाद् व्यपरोपयन्ति । 'एनमेव ' एपामेन भनेनेन प्रकारेण हे आयुष्मन्त शमणाः योऽस्माक निग्रन्थों वा निर्ग्रन्थी या यावत् पत्र जितः सन पञ्चमु गामाणपु-शनादिकामभोगेषु स्व- जते, रज्यते-कामभोगासक्तो भावि यारत्-स खलु भये बहूना मण-श्रम- णीना, बहूना पारकथारिकाना म ये हिलनीयो, निन्दनीय', विसनीयो भवति, परलोकेन्च भगन्तरे चातुरन्तससारकान्तारम् अनुपर्य टिप्यति चातुर्गतिरससार एव स्थास्यति न तु मोक्ष प्राप्स्यतीत्यर्थ । येन प्रकारेण ते धन्योपदेशमश्रधानाः पुरुषाः सार्थस्थिता जना नन्दिफल वृक्षमूलकन्दादिभक्षणेन तत्रैव नियन्ते नतु- अदिच्छा नगरीं प्राप्नुवन्तीति भावः ।। मू०३ ।। मूलम्-तएण से धपणे सत्थवाहे सगडीसागड जोयावेइ जोयावित्ता जेणेव अहिच्छत्ता नयरी तेणेव उवागच्छद उवा- रसादिरूप से पणिमने लगे-तब वे सब अपने जीवन से रहित हो गये -मर गये-। इसी तरह हे आयुप्मत श्रमणो । जो हमारा निर्ग्रन्थ व निर्ग्रन्धी साध्वीजन वायत प्रबजित होकर पचकाम गुणो मे-पचड न्द्रियों के शब्दादि विषयों मे-आसक्त बन जाता है-अनुरक्त हो जाता है, वह इस भवमें अनेक श्रमण श्रमणियोंके बीच हीलनीय, निंदनीय एव खिस- नीय होता है एव वह भवान्तर में मो इस चतुर्गति रूप ससार कान्तार में ही घूमता रहेगा-मोक्ष प्राप्त नहीं करेगा। जिस प्रकार धन्य सार्थवाह के उपदेश पर श्रद्धा नहीं करने वाले सार्थ के ये फितनेक पुरुप नदिफल वृक्षों के मूलादि के खाने से वहीं पर मर गये-अहिच्छत्र नगरी नहीं जा सके ।। सू० ३ ॥ રસ વગેરે રૂપમાં પરિણત થવા લાગ્યા ત્યારે તેઓ બધા નિર્જીવ થઈ ગયા, મૃત્યુ પામ્યા આ પ્રમાણે જ હે આયુષ્મત શ્રમણ ! જે અમારા નિગ્રંથ સાધુઓ કે નિથ સદિઓ પ્રમજીત થઈને પાચ કામ ગુણોમાં અર્થાત્ પાચે ઈન્દ્રિયોના શાદિ વિષયમાં આસક્ત થઈ પડે છે-એટલે કે અનુરક્ત થઈ જાય છે, તે આ ભવમા ઘણા શ્રમણો અને ઘણું શમણુઓની વચ્ચે હલનીય, નિંદનીય, અને સિનીય હોય છે અને બીજા ભાવમાં પણ આ ચતુર્ગતિ રૂપ સ સાર-નાતારમાં જ બ્રમણ કરતું રહેશે તેને મોક્ષ પ્રાપ્ત થશે નહિ ધસાર્થવાહના ઉપદેશને શ્રદ્ધેય ન માનનારા કેટલાક માણસો જેમ નહિ ફળ વૃક્ષોને મૂળ વગેરે ખાઈને ત્યાને ત્યાજ મરણ પામ્યા, અહિચ્છત્રા નગ રમા પહોચી શકયા નહિ, તેમજ તેઓની પણ સ્થિતિ થાય છે કે સૂ ૩ . , १२५ माताधर्माचा नों श्रदधति नो रोचयन्ति नो प्रतिगति। ते धन्यस्य-निमम् अयाना अरोच यन्तः, अपतिपन्त यो मन्दिफला भानगोपागान्ति, उपागत्य तेषां नन्दि फुलाना मूलानि च यारत्-कन्दादीनि आहारयन्ति, तणायामु न विश्राम्यन्ति तेपा सलु आपाते-पूर्व फलभक्षणादिममो भद्रक मातिमापादादिलामोमाति किन्तु 'तो पन्छा' ततः पचात् फलमभणायनन्तर परिणम्यमाना रसादिरूपेण मह नो मदहति ३ धगम ण्यम असाहमाणाणे ते नदिफना तेणेव उवागछिति उपगचित्ता तेसि नदिफलाण मृलाणि य जाब वीसमति, तेसि ण आवाण महा भरड, तओ पच्छा परिणममाणा जाध वरोति ण्यामेव समणाउगे ! जो अन निग्गयो वा निग्गधी वा जाय पन्चहरा पचतु कामगुणेसु मज्जेड, मनित्ता जार अणुपरिय हिस्सइ जहा था ते पुरिसा) वहा पर कितनेक पुरुषों ने धन्यसार्थवाह के इस कथन को कि नदिफल वृक्षो के कदमूलादि नहरों खाना चाहिये और न उनकी यामें ही विश्राम करना चाहिये श्रद्धाकी दृष्टिसे नहीं देखा उस पर अपनी श्रद्धा नहीं जमाई, उसे अपनी रुचि का प्रतीति का विषय नहीं पनाया-ये पुरुप- धन्यसार्यवाह के इस कथन को अश्र- द्वेय आदि मानकर जहा पर नदिफल वृक्ष थे- वहा गये वहा जाकर उन्होंने उनके मूल कदादि कों को साया उनकी छाया मे विश्राम किया उस समय उन्हें बड़ा आनन्द आया-स्वाद जन्य कोई अपूर्व सुख मिला -किन्तु जब उनका परिपाक काल आया जय वे खाये हुए मृलकन्दादि धण्णास्स एयम अमदहमाणा ३ जेणेव ते णदिफला तेणेर उवागच्छ ति, उवा ग्रच्छित्ता तेसि नदिफलाण मूलाणि य जार वीसमति, तेसि " आपाए भए, भवइ, तो पच्छा परिणममाणा जार वरोति एवामेव समणाउसो । जो अम्ह निग्गयो वा निग्गयी वा जाव पचडए पचमु कामगुणेसु सज्जेइ, सज्जित्ता जाव अणुपरियटिस्सड, जहा या ते पुरिसा) ત્યા કેટલાક માણસોએ ધસાર્થવાહના ના દિફળ વૃક્ષોના કદમૂળ વગેરે ખાવા જોઈએ નહિં તેમજ તે વૃક્ષોની છાયામાં પણ વિસામે લે નહિ આ જાતના કથન પ્રત્યે શ્રદ્ધાવાન થયા નથી, તેના ઉપર વિશ્વાસ મૂયો નહિ અને પ્રતીતિપૂર્વક તેમના પિતાની અભિરૂચી બતાવી નહિ તે માણસ ધન્યસાર્થવાહના કથન અશ્રદ્ધેય માનીને જ્યા નદિફળ વૃક્ષો હતા ત્યા ગયા ત્યાં જઈને તેમણે તેમના મૂળ કદ વગેરે ખાધા અને તેમના છાયડામા વિસામે લીધે તે સમયે તે તેમને ખૂબ જ આનદ પ્રાપ્ત થયો, ફળના રવાદમાં અપૂર્વ સુખ મળ્યું, પણ જ્યારે તેઓની પાચન ક્રિયા થવા માંડી, એટલે કે ખા) . वा, बनगारधर्मामृतयपिणो टीका २०१५ नदिफलम्वरूपनिरूपणम टीका-'तएण से' इत्यादि । ततः खलु मध यः सार्यवाह. शाटीगारटं योजयति, योजयित्वा यौवालिच्छवा नगरी तौगोपागच्छति, उपागन्य अहिच्छ भाया नगर्या पहिः अग्योद्याने मुख्योद्याने मार्यनिवेश करोति, कृत्वा शकटी- शाक्ट मोचयति । ततः खलु स धन्य सार्थवादः 'महत्य' महाय-महामयो जनक. ' महग्ध' महाघ-महामूल्य, 'महरिह' मलाई महता योग्य 'रायरिह' राजा-राजयोग्य प्राभूत गृहाति, गीता बहुभिः पुरुपै. साई सपरित अहिच्छत्रा नगरी मन्यम येन अनुमविगति, अनुपविश्य यर्जर कनस्वेतू गजा कौवोपागच्छति, उपागत्य 'करयल जार वद्धावेड' करतल याद् वर्धयति-कर- 'तएण से धण्णे सत्यवाहे' इत्यादि ॥ टीकार्थ-(तपण) इसके बाद (से धण्णे सत्यवाहे) उस धन्यमार्थवाहने (सगडी सागड जोयावे? जोयावित्ता जेणेव अहिछत्ता णयरी तेणेव उवागच्छद) वरा से अपने गोडी और गाड़ों को जुनवाया और जुतवा कर जरा अहिच्छया नगरी थी उस ओर चल दिया। (उवागचिन्ता अरिच्छत्ताए नयरीए पहिया अगुजाणे सनिवेस करेइ ) धीरे धीरे अहिच्छत्रा नगरी में वह पहुँच गया। वहा पहुँच कर उसने बाहर रहे हुए प्रधान बगीचे में अपने सार्थ को ठहरा दिया। (करिता सगडी सागड मोयावेइ ) और वही पर अपनी गाडी और गाडों को ढील दिया। (तएण से धणे मत्यवाहे महत्य ३ रायारिह पाड गेव्हइ, गेण्हित्ता पति पुरिसेहिं सद्वि सपरिचुडे अहिच्छत्त नयरिं मज्झ मज्झे ण अणुप्पविसह, अणुप्पविसित्तो जेणेव कणगकेऊ राया तेणेव उवाग तएण से धण्णे सत्यवाहे इत्यादि- AtE-(तएण ) त्या२६ (से धण्णे सत्यवाहे ) ते धन्यसार्थ वाड (सगडी सागडं जोयावेइ जोयाबित्ता जेणे अहिच्छत्ता णपरी तेणेव उवागन्छ। ત્યાથી પિતાની ગાડીઓ અને ગાડાઓને જોતરાનીને જે તરફ અહિચ્છત્રા नगरी ती ते २५ रवाना थय। ( वागन्छित्ता अहिच्छत्ताए नयरीए पहिया अगुजाणे सस्थनिवेस करेइ ) भने धीमे धीमे अडिन्छना नारीमा પહેચી ગમે ત્યાં પહોંચીને તેણે નગરીની બહાર આવેલા પ્રધાન ઉદ્યાનમાં पोताना सार्थना मुभ नाभ्यो (करित्ता सगडीसागड मोयावेइ) भने ત્યા જ પોતાની ગાડીઓ અને ગાડાઓને છેડાવી નાખ્યા (तरण से धण्णे सत्यराहे महत्थ ३ रायरिह पाहुड गैण्हइ, गेण्डित्ता यहुहिं रिसेहिं सद्धि सपरिखुढे अहिच्छच नगरिमा मझेण अणुप्पविसइ, अणुप्पविसित्ता - गच्छित्ता अहिउत्ताए गयरीए बहिया अग्गुज्जाणे सत्यनिवेश करेइ करित्ता सगडीसागड मोयावेइ, तएण से धपणे सत्यवाहे महत्थं३ रायरिहं पाहुड गेण्हइ गेण्हित्ता बहुहि पुरिसंहिं सर्जि संपरिबुडे अहिच्छत्त नयरिं मज्य मज्झेणं अणुप्पविसइ अणुप्प- विसित्ता जेणेव कणगकेऊ राया तेणेव उवागच्छइ,उवागच्छित्ता करयल जाव वद्धावेइ, वडापित्ता तं महत्थ३ पाहुड उवणेइ, तएण से कणगकेऊ, राया हट्टतुट्ट धण्णस्स सत्यवाहस्स तं महत्थ३ जाव पडिच्छइ पडिच्छित्ता धण्ण सत्थवाह सकारेइ सम्माणेइ सकारिता सम्माणित्ता उस्सुक वियरइ २ पडिविस- ज्जेइ । तएणं से धपणे सत्याहे भडविणिमयं करेइ करित्तापडि- भड गेण्हइ गेण्हित्तासुहसुहेण जेणेपचपानयरी तेणेव उवागच्छइ उवागच्छित्ता भित्तनाइअभिसमन्नागए विउलाई माणुस्सगाई कामभोगाइं भुजमाणे विहरइ, तेण कालेण तेणं समएण थेरा- गमणं धण्णे सत्थवाहे धम्मे सोच्चा जेटुपुत्ते कुडुबे ठावेत्ता पवइए सामाइयमाइयाइ एक्कारसअगाइ वहूणि वासाणि सामण्णपरियाग पाउणइ पाउणित्ता मासियाए सं० अन्नतरेसु देवलोएसु देवत्ताए उववन्ने महाविदेहे वासे सिज्झिहिइ जाव अतं करेहिइ। एव खल्लु जंबू । समणेण भगवया महावीरेण जाव सपत्तेण पन्नरसमस नायज्झयणस्स अयमढे पण्णत्ते तिमि ॥ सू०४॥ ॥ पन्नरसमं नायज्झयण समत्त ।।
:--- . . . मनगारधर्मामृतषिणो टीका २० १५ नदिफलस्वरूपनिरूपणाम टी-'तरण से' इत्यादि । ततः खलु म धन्यः सार्यवाह शकटीशास्ट योजयति, योजयिला यचाहिच्छया नगरी तीयोपागच्छति, उपागत्य अहिच्छ पायां नगर्या रहिः अयोधाने=मुख्योद्याने सार्थनिवेश करोनि, कृत्या शकटी- शास्ट मोचपति । ततः खलु स धन्य सार्यवाहः 'मन्त्य' महार्य-महाप्रयो जनक. 'महन्ध' महा महामूल्य, ' महरिद ' मलाई महता योग्य 'रायरिह' राजा-राजयोग्य प्राभृत गृहाति, रीत्या बहुभिः पुरुपै साई सपरित अहिच्छत्रा नगरी मन्यम येन अनुरविशति, अनुपविश्य यौन निरकेतू गमा तरीयोपागच्छति, उपागत्य 'करयल जाप वद्धावेई' करतल यानद्धयनि-कर- तएण से धण्णे सत्यवाहे' इत्यादि। टीकार्थ-(तपण) इमके पाद (से धणे मत्यवाहे) उस धन्यमार्यवाहने (सगडी सागड जोयावेह जोयावित्ता जेणेव अहिउत्ता पायरी तेणेय उवागच्छद) वहा से अपने गोडी और गाडो को जुनवाया और जुतवा- कर जरा अहिच्छत्रा नगरी थी उस ओर चल दिया। (उधागउित्सा अहिच्छत्ताए नयरीए परिया अगुजाणे सत्यनिवेस करेइ ) धीरे धीरे अहिच्छत्रा नगरी में वह पहुँच गया। वहा पहुँच कर उसने थाहर रहे हरा प्रधान पगीचे में अपने सार्थ को ठहरा दिया। (करित्ता सगड़ी सागड मोयावेइ ) और वहीं पर अपनी गाडी और गाड़ों को ढील दिया। (तण से धणे सत्यवाहे महत्त्य ३ रायारिह पाड गेण्हइ, गेण्डित्ता पहिं पुरिसेहिं सति सपरिवुडे अहिच्उत्त नयरिं मज्झ मज्झे ण अणुप्पविसह, अणुप्पविसित्तो जेणेव कणगकेज राया तेणेव उवाग तएण से धण्णे सत्यवाहे इत्यादि- राय-(तएण ) त्या२६ ( से धणे सत्यवाहे ) ते धन्यसाथ पाड (सगडी सागडं जीयावेह जोयाचित्ता जेणे अहिच्छत्ता णपरी तेणेव उवागच्छद ત્યાથી પિતાની ગાડીઓ અને ગાડાઓને જોતરાવીને જે તરફ અહિચ્છત્રા नगरी ती ते 61 त२५ पाना थय। (उपागन्छित्ता अहिन्छत्ताए नयरोए पहिया अगुजाणे सत्यनिवेस करेइ ) भने धोम धाम अPि91 नगरीमा પહેચી ને ત્યા પહોચીને તેણે નગરીની બહાર આવેલા પ્રધાન ઉધાનમા पताना साना भुम नाभ्य (करित्ता सगडीसागड मोयावेइ ) भने ત્યાં જ પિતાની ગાડીઓ અને ગાડાઓને છેડાવી નાખ્યાં (वरण से धणे सत्यवाहे महत्थ ३ रापरिह पाहुड गेण्डइ, गेण्डित्ता यहुहि परिसैहिं सद्धि सपरिवुढे अहिच्छत्त नगरि मज्झ मझेण अणुप्पविमद, अणुप्पविसिचा , . ૧૨૮ MARATI तलपरिगृहीत शिरारत स म अEिAD रामान जयविजयनन्देन चर्द्धयति, पबपि रा तन्महा मार्य माई मागृतम् उपनगनिमार रामीचे स्था पपति । तत खलु म निरस्न गना तुरायो विगपंदन यो धन्यस्य सार्थहस्य तमहार्थ ३ यारत् माभू। पवित्र' प्रतीच्चनि-स्वीकरोति, प्रतीप्य धन्य मागिह सत्ताम्यनिमम्मानपति, मान्य सम्मान्य सम्मै 'उस्मृक उच्छुला-शुल्कामासन 'केनापि राजपुरपेगास्मातरीन ग्रामः' इत्येतररूपमा ज्ञापत्र पितरनिन्ददाति. वितीर्य त प्रतिनिसर्गपति । छह, उवागचित्ता करयल जानाड, बदावित्ता तमत्व ३ पाहुडं उवणेई ) इस के बाद उस धन्य सारंवार ने मरा मारक, महामूल्य एव महा पुरुषों के योग्य-मामृत-भेट यो माय में लिया, और टेकर अनेक पुरुषो के साथ २ अपिचरया नगरी में बीच से होता एभा प्रविष्ट हुआ। नगरी में प्रविष्ट होकर वह जहा कनक केतु राजा ये वहा गया वहाँ जाकर उसने राजा को दोनों हार जोड कर नमस्कार किया, और जय विजय शब्दो को उच्चारण करते हुए उन्हें बधाई दी [यधाई देकर उसने फिर राजा के समक्ष अपनी भेट रखदी । (ताण से कणगकेऊ राया ४ तुट्ट० घण्णरस सत्यवाहस्त त मात्य ३ जाब पडिच्छह पडि च्छित्ता धण्ण सत्यवाह साकारेह सम्माणेड, सफारिता सम्माणित्ता उस्लुक्क वियरह २ पडिविसम्जेइ) कनककेतु राजाने हर्पित एव सतुष्ट होकर धन्यसार्थगह की उस महार्य साधक महामृल्य राज योग्य भेट जेणेव वणगकेउ राया तणेत्र उवागच्छइ, उवागच्छिता करयल जाव बद्धावेई, बद्धावित्ता त महत्थ ३ पाहुड उवणेइ) ત્યારપછી તે ધન્યસાર્થવાહે મહાઈ સાધક બહુ કિંમતી અને મહા ફરે ને યોગ્ય ભેટ સાથે લઈને ઘણા માણસોની સાથે અહિચ્છત્રા નગરીની વચ્ચેના ભાગે (રાજમાર્ગ) થઈને નગરી પ્રવિષ્ટ થયા નગરીમાં પ્રવેશીને તે જ્યાં કનકતુ રજા હતા ત્યા ગ ત્યાં જઈને તેણે રાજાને બને હાથ જોડીને નમસ્કાર કર્યા અને જય વિજય શબ્દ ઉચ્ચારણ કરતા તેમને વધાઈ આપી વધાઈ આપ્યા પછી તેણે રાજાની સામે પિતાની ભેટ મૂકી દીધી (तएण से कणगकेऊ राया हह तु४० घण्णस्स सत्थवाहस्स त महत्थ ३ जार पडिन्छ। पडिच्छित्ता धण्ण सत्यवाह सहारेद सम्माणेइ, सरकारिता सम्मा णित्ता उस्तुक्क वियर। २ पडिपिसज्जेई) કનકકેતુ રાજાએ હર્ષિત તેમજ સંતુષ્ટ થઈને મહાઈ સાધક મહામૂલ્ય વાળી અને રાજાને માટે એગ્ય ભેટ સ્વીકારી લીધી સ્વીક- ખાદ राज पुरुप मनगारधर्मामृतवपिणी टी० अ०५नंदिफलस्वरूपनिरूपणम् ततः खल सधन्य सार्थवाहरतत्र भडविणिमय' भाण्डरिनिमय भाण्डाना- कयाणकवस्तूनां विनिमयम् आदानप्रदानं करोति, कृत्वा 'पडिभड ' प्रतिभाण्ड- विनिमयेन प्राप्त वस्तुनाव गृह्णाति, गृहीत्वाशकटीशाकटे भरति भृत्वा शकटीगाकट योजयति, योजयित्वा सुख-सुखेन सुखपूर्वक यौर चम्पानगरी-स्वनिवासस्थान तौयोपागच्छति, उपागत्य मित्रज्ञातिस्वजनसम्बन्धि परिजनै सह 'अभिसमन्नागए' अभिममन्वागत समिलितो विपुलान् मानुप्यकान कामभोगान् भुझानो विहरति । को स्वीकार कर लिया। म्वीकार करके फिर उन्हों ने धन्यसार्थवाह का सत्कार एवं सम्मान किया। सत्कार मन्मान करके "किसी भी को इन से कर नहीं लेना चाहिये इस प्रकार का शुल्क भाष विषयक आज्ञा पत्र" उसके लिये प्रदान किया और प्रदान करके बाद में उसे वहा से चिदा कर दिया। (तंण्ण से धण्णे सत्यवाहे भडचि- णिमयं करेह, करिता पडिभड गेण्हड, गेण्डित्ता सुहं सुहेण जेणेव चपा नयरी तेणेच उवागच्छड ) इसके बाद धन्यसार्थवाह ने वश रह कर अपनी भयाणक वस्तुओं का विक्रय किया और उससे प्राप्त द्रव्य से और दूसरी वस्तुओ को खरीदा । ग्वरीद कर उसने उन्हें गाडी और गाडों में भरा भरकर उन्हें जुनवाया और जुनवाकर फिर वह वहां से चपानगरी की ओर रोपिस चल दिया। (उवागच्छित्ता मित्तनाइ० अ भिमगन्नागए विउलाइ माणुस्सगाइ कामभोगाइ भुजमाणे विहरह) તેમણે ધસાર્થવાહને સત્કાર તેમજ સન્માન કર્યું સત્કાર અને સન્માન કરીને રાજાએ “ઈપણ રાજપુરૂષ તેમની પાસેથી રાજકર લે નહિ” તે પ્રમા- શેની વ્યવસ્થા કરતા તેમને મુક મીનુ આજ્ઞાપત્ર લખી આપ્યું ત્યારપછી તેને ત્યાથી જવાની આજ્ઞા આપી (तएण से धण्णे सत्यवाहे भडविणिमय करेइ, करित्ता पडिभड गेण्इ, गेण्डिता सुह सुहेण जेणेव चपानयरी तेणेव उवागच्छइ ) ત્યારબાદ ધન્યસાર્થવાહે ત્યાં રહીને પોતાની કયાર્થક વસ્તુઓને વેચી અને તેનાથી જે ધન મળ્યું તેનાથી બીજી વસ્તુઓ ખરીદી લીધી વસ્તુઓની ખરીદ કરીને તેણે બધી વસ્તુઓની ખરીદી કરીને તેણે બધી વસ્તુઓને ગાડી તેમજ ગાડાએસા ભરી અને ત્યારપછી ગાડી અને ગાડાઓને તરાવીને ત્યાથી ચ૫ નગરી તરફ પાછા રવાના થયે (उजागच्छित्ता मिचनाइ० अभिसमन्नागए विउलाइ माणुस्सुगाइ काम मोगाई जमायो विहार १० मानापर्मचारी ADDRE तस्मिन् काले तम्मिन् समये स्थरिरागमनम् । धन्यः सार्थना) धर्मभश्या पतियुद्धः सन् ज्येपुन कुटुम्ये स्थापयिता मानिन', सामायिशादीनि हाशा मान्पपीते । यद्दनि वर्षाणि बामण्यपर्याय पालयति, पालयित्वा मासिध्या सके खनया ऽऽत्मानं जुटा पष्टिं मक्तानि अनशनेन रिचा कालमामे पार कला- चपानगरी में आकर वह अपने मित्र, ज्ञाति, म्यजन, मथन्धी परिजनों से मिलो और विपुल मनुष्य भव मपाधी फाम भोगों को मोगने लगा (तेण कालेण तेण ममाण थेरागमण, धणे सत्यपाहे धम्म सोपा जेह पुत्त कुडवे ठयेत्ता पव्व, सामाध्यमाइया एफारस अगाड मणि यासाणि सामण्णपरियाग पाउणिता मासियारा सलेरणारा अबतरेसु देवलोएसु देवत्ताग उचवन्ने महाविदेहे वासे सिजिनहिह जाध अंत फरेहिह । एव ग्वलु जन् । समणेण भगवया मशवीरेणं जाव संपण पनरसमस्स नायज्झयणस्स अयमढे पाणते तिमि ) उसी काल और उसी समय में वहा पर स्थविरों का आगमन हुआ। धन्यसार्यवाह ने उनसे धर्म का व्याख्यान सुना सुनकर वर प्रतियुद्ध हो गया और प्रतियुद्ध हो करके फिर वह कुटुय में अपने ज्येष्ठ पुत्र को रखकर दीक्षित होकरके उसने सामायिक आदि ग्यारह अगोंका अध्ययन किया। अनेक वर्षों तक श्रामण्य पर्याय का पालन कर १ माल की सलेखना से ६० भक्तों का अनशन द्वारा छेदन करके काल अवसर काल करके देव ચ મા નગરીમાં આવીને તે પિતાના મિત્ર જ્ઞાતિ, સ્વજન, સબધી પરિજનેને મળે અને વિપુલ મનુષ્ય ભવના કામો ભેગવવા લાગે ( तेणं कालेण तेण समपण थेरागमण धणे सत्यवाहे धम्म सोचा जेट पुत्त कुड्डचे ठवेत्ता पवइए, सामाइयमाझ्याइ एक्कारसअगाइ वणि वासाणि सामण्णपरियाग पाउणा, पाउणित्ता मासियाए सलेहणाए अन्नतरेसु देवलोएसु देवत्ताए उवपन्ने महाविदेहे चासे सिज्झिहिद, नार अत करेहिइ । एव खलुजबू समणेण भगवया महावीरेण जाव सपत्तेण पन्नरसमस अयम पण्णत्तेत्ति बेमि) તે કાળે અને તે સમયે તે નગરીમા વિરે પધાર્યા ધન્યભાર્થવાહે તેઓના મુખથી ધર્મનુ વ્યાખ્યાન સાભળ્યું અને સાંભળીને તેને પ્રતિબોધ કે પ્રતિબુદ્ધ થઈને તેણે પિતાના કુટુંબના વડા તરીકે પિતાના મોટા પુત્રની નીમણુક કરીને દીક્ષા ગ્રહણ કરી દીક્ષા ગ્રહણ કર્યા બાદ તેણે સામાયિક વગેરે અગિયાર અગોનું અધ્યયન કર્યું અને ઘણા વર્ષો સુધી શામય પર્યાયનુ પાલન કરીને એક માસની સલેખનાથી ૬૦ ભક્તોનું અનશન વડે છેદન કરીને વખત ! - , अनगारयामृतपिणी टोको अ०१५ नदीफलस्वरूपनिरूपणम् अन्यतरेषु देवलोकेपु ' देवताए । देवतया-देवत्वेन उपपन्नः । महाविदेहे वर्षे सेत्स्पति यात्-सर्वदुःखानामन्त करिष्यति । एव खलु हे जम्बू ! श्रमणेन भग- वता महागीरेण यावत्-मिद्धिगतिनामय स्थान सम्माप्तेन पञ्चदशस्य ज्ञाताध्यय- नस्य अयमय =ोक्तो भावः पक्षप्त 'तिमि' इनि ब्रवीमि व्याख्या पूर्ववत् ।०४। इति श्री विश्वविख्यात - जगद्वल्लभ-प्रसिद्धवाचकपञ्चदशभाषाकलित- ललितकलापालापफ -मपिशुद्धगयपयनैकग्रन्थनिर्मापक-पादिमानमर्दक श्रीशाहू छत्रपतिकोल्हापुरराजप्रदत्त 'जैनशास्त्राचार्य ' पदभूपित- कोल्हापुरराजगुरु-पालब्रह्मचारि जैनाचार्य जैनधर्मदिवाकरपूज्यश्री घासीलालपतिविरचिताया श्री ज्ञाताधर्मकथासूत्रस्यानगारधर्मामृ- तवर्पिण्याख्याया व्याख्याया पञ्चदशमध्ययन समाप्त ॥१५॥ लोक में देव की पर्याय से उत्पन्न हो गया। महाविदेह क्षेत्र से यह सिद्ध अवस्था कोप्राप्त करेगा-यावत् समस्त दुःखो का अन्त करने वाला होगा इस प्रकार हे जवू ! श्रमण भगवान महावीर ने फि जो सिद्धगति नाम के स्थान को प्राप्त करचुके हैं इस पद्रवे ज्ञाताध्ययन का यह पूर्वोक्त भाव प्रज्ञाप्त किया है। ऐसा मैंने उनके मुख से सुना है सो यह पैसा तुमसे कहा है । सू० ४ ॥ श्री जैनाचार्य जैनधर्म दिवाकर श्री घासीलालजी महाराजकृत " ज्ञाता- धर्मकथासूत्र'की अनगारधर्मामृतवर्पिणी व्याख्याका पद्रहवां अध्ययन समाप्त ॥१५॥ કાળ કરીને દેવલેનમા દેવના પર્યાયથી જન્મ પાપે મહાવિદેહ ક્ષેત્રથી તે સિદ્ધ અવસ્થા પ્રાપ્ત કરશે યાવતુ બધા દુખેને તે અન્ત કરનાર થશે આ રીતે હે જ બૂ! શ્રમણ ભગવાન મહાવીરે કે જેઓએ સિદ્ધિગતિ નામના સ્થાન મેળવી લીધુ છે-આ પદરમાં જ્ઞાતધ્યયનને આ પૂર્વોક્ત ભાવ નિરૂ પિત કર્યો છે કે જે પ્રમાણે તેઓશ્રીને મુખથી સાભળ્યું છે તે પ્રમાણે જ तभा मा २४ ४यु छे ॥ सूत्र ४॥ જૈનાચાર્ય શ્રી ઘાસીલાલજી મહારાજ કૃત જ્ઞાતાધ્યયન સૂત્રની અનગારધર્મામૃતવષિણી વ્યાખ્યાનુ પદરચું અધ્યયન સમાપ્ત ૧૫ शानायर्मया - .. L । तस्मिन् काले तस्मिन् गमय शरिरागमनम् । भन्यः सागो धर्म माया मवियुद्धः सन् ज्येष्टपुत्र कुटुम्मे स्थापयित्वा मयनितः, सामायियातीनि पाशा मान्यधीते । यहनि वर्षाणि बामण्यपर्याय पालयति, पालयिता मागिन्या सले. खनया ऽऽत्मान जुष्टुवा पष्टि मक्तानि अनशनेन चा कालमासे पाल कन्चा- चपानगरी में आकर पर अपने मित्र, जाति, ग्यजन, मयन्धी परिजनों से मिली और विपुल मनुष्य भय मबन्धी काम भोगों को भोगने लगा (तेण फालेणं तेण ममण्ण थेरागमणं, धण्णे मत्थवाहे धम्म मोचा जेह पुत्त कुडवे ठवेत्ता पन्चहए, सामाध्यमाइया एफारम अगाइ पणि घासाणि सामण्णपरियाग पाणित्ता मासियारा सलेरणा अमतरेसु देवलोएस्सु देवत्ता उववन्ने महाविदेहे वासे सिमिडि जाव अंत फरेडिइ । एव खलु जवू ! समणेण भगवघा महावीरेणं जाव सपत्तेण पन्नरसमस नायज्झयणस्स अयम? पण्णते तिमि) उसी काल और उसी समय में वहा पर स्थविरों का आगमन हुआ। धन्यमार्थ वाह ने उनसे धर्म का व्याख्यान सुना सुनकर वर प्रतिवद्ध रो गया और प्रतियुद्ध हो करके फिर वह कुटुय में अपने ज्येष्ठ पुत्र को रखकर दीक्षित होकरके उसने सामायिक आदि ग्यारह अगोका अध्ययन किया। अनेक वर्षों तक श्रामण्य पर्याय का पालन कर १ मा की सलेखना से ६० भक्तों का अनशन द्वारा छेदन करके काल अवसर काल करके देव ચ પા નગરીમાં આવીને તે પિતાના મિત્ર શાંતિ, સ્વજન, સબ ધી પરિજનોને મળે અને વિપુલ મનુષ્ય ભવના કામભાગે ભેગવવા લાગ્યા ( तेणं कालेण तेण समपण थेरागमण धण्णे सत्यवाहे धम्म सोचा जेट्ट पुत्त कुडुबे ठवेत्ता पन्चइए, सामाइयमाझ्याइ एक्कारसअगाइ बहूणि वासाणि सामण्णपरियाग पाउणड, पाउणित्ता मासियाए सलेहणाए अन्नतरेसु देवलोएसु देवताए उववन्ने महाविदेहे वासे सिज्झिहिह, जाव अत करेहिइ । एव खलुजबू समणेण भगवया महावीरेण जाव सपत्तेण पन्नरसमस्म अयम पण्णत्ते चि बेमि ) તે કાળે અને તે સમયે તે નગરીમા સ્થવિરો પધાર્યા ધન્યમાર્થવાહ તેઓના મુખથી ધર્મનું વ્યાખ્યાન સાભળ્યું અને સાંભળીને તેને પ્રતિબધ થયે પ્રતિબુદ્ધ થઈને તેણે પિતાના કુટુંબના વડા તરીકે પિતાના મોટા પુત્રની નીમણુક કરીને દીક્ષા ગ્રહણ કરી દીક્ષા ગ્રહણ કર્યા બાદ તેણે સામાયિક વગેરે અગિયાર અગેનુ * અધ્યયન કર્યું અને ઘણા વર્ષો સુધી ગ્રામશ્વ પર્યાયનું પાલન કરીને એક ભાસની સ લેખનાથી ૬૦ ભક્તોનું અનશન વડે છેદન કરીને વખતે , नगरिकमाविली टी० मे०१६ धर्मरुच्यनगारवरितवर्णनम् सुकुमाल जाव तेसि णं माहणाणं इटाओ ५, विपुले माणु. स्सए जाव विहरति । तएण तेसिं माहणाण अन्नया कयाई एगयओ समुवागयाणं जाव इमेयारूवे मिहो कहासमुल्लावे समुप्पज्जित्था, एव खलु देवाणुप्पिया । अम्हं इमे विउले धणे जाव सावतेज्जे अलाहि जाव आसत्तमाओ कुलवसाओ पकाम दाउं पकाम भोत्तु पकामं परिभाएउ त सेय खल्लु अम्हं देवाणुप्पिया । अन्नमन्नस्स गिहेसु कल्लाकल्लि विउल असण पाण खाइम साइमं उवक्खडाविउ उवक्डावित्ता परिभुज- 'माणाणं विहरित्तए, अन्नमन्नस्स एयमट्ट पडिसुणेति परिसु. णित्ता कल्लाकल्लिं अन्नमन्नस्स गिहेसु विपुल असण४ उव- क्खडाति, उवक्खडावित्ता परिभुजमाणा विहरति, तएणं तीसे नागसिरीए माहणीए अन्नया भोयणवारएजाए यावि होत्था, तएण सा नागसिरी विपुल असणं उवक्खडेति उवक्खडित्ता एगं महंसालइय तित्तालाउय बहुसभारसंजुत्तं णेहावगाढ उवक्खडेइ उवक्खडित्ता एग विदुय क्रयलसि -आसाएइ आसाइत्ता त खारं कडुयं अक्खज्ज अभोज्ज विसंम्भूय जाणित्ता एवं क्यासी-धिरत्थु ण मम नागसिरीए अहन्नाए अपुन्नाए दूभगाए दूभगसत्ताए दूभगणिवोलियाए जीएणं मए'सालइए बहुसंभारसभिए नेहावगाढे -उवक्ख- डिए, सुवहुदव्वक्खए, नेहक्खए य कए, तं जइणं मम जाउयाओं जाणिस्सति तो णं मम खिसिस्सति त जाव ताव समजाउयाओ ण जाणंति ताव मम सेय एयं साल. ।
॥ अथ पोडशाध्ययनं प्रारभ्यते ॥
उक्त पञ्चदशाध्ययनम् , तर पियानोऽनयस्य कारणमिन्युपदिष्टम् इह मोड़ें
शाध्ययने तु तद्विपयनितानमनर्थस्य मूल मातीत्युच्यते, इत्येव सम्बन्धन प्रसवः
माप्तस्यास्याध्ययनस्य प्रथम सूत्रमाह--'जयण मते !' इत्यादि ।
मूलम्-जइ णं भते । समणेणं भगवया महावीरेणं जाव
सपत्तेण पन्नरसमस नायज्झयणस्त अयम? पण्णत्ते सोल.
समस्त णं भते णायज्झयणस्स णे समणेण भगवया महा-
वीरेण जाव संपत्तेणं के अटे पण्णत्ते ?, एवं खलु जबू ।
तेणं कालेणं तेणं समएण चपानामं नयरी होत्था, तीसेणं
चपाए नयरीए पहिया उत्तरपुरस्थिमे दिसिभाए सुभूमिभागे
उजाणे होत्था, तत्थ णं चंपा नयरीए तओ माहणा भायरो
परिवसति, तं जहा सोमे सोमदत्ते सोमभूई, अड्डा जाव
अपरिभूया रिउव्वेय जाव सुपरिनिहिया, तेसि ण माहणाणं
तो भारियाओ होत्था, तजहा-नागसिरी भूयसिरी जक्खसिरी
सोलहवा अध्यन प्रारभ
पन्द्रहवा अध्यन समाप्त हो चुका-अथ सोलहवा अध्यन प्रारभ
होता है। पंद्रहवे अयन में विपयंसघ 'अनर्थ का कारण कहा गया
है-अब सोलहवे अध्यन में विषय निदान अनर्थ का कारण होता है
'यह स्पष्ट किया जायगा। इस संबन्ध से आया हुआ इस अध्ययन का
यह प्रथम सूत्र है' जइण भते ।" इत्यादि ।
સોળમુ અધ્યયન પ્રારંભ
પંદરમુ અધ્યેયન પુરૂ થાય છેહવે સેળનું અધ્યયન પ્રાંરભ થાય છે
પદરમા અધ્યયનમા વિષયસગને અનર્થનું કારણ બતાવવામા આવ્યુ છે હવે
સેળમાં અધ્યયનમાં વિષય-નિદાન અનર્થનું કારણ હોય છે, આ વાત સ્પષ્ટ
કરવામાં આવશે આ વિષયને લગતુ આ અધ્યયનનું પહેલું સૂત્ર આ છે
बहण भते इत्यादि-
11
4
।
t , भनगारधर्मामृतवपिणी टोपा अ० १६ धर्मराज्यनगारचरितवर्णनम श्रीमुधर्मास्वामी कथयति- एच खलु जा' इत्यादि ! एव स्खलु हे जम्बूः ! तस्मिन् काले तस्मिन् समये चम्पा नाम नगरी आसीत् , तस्याः खलु चम्पाया नगर्या बहिरुत्तरपीरस्त्ये दिग्भागे सुभूमिभागनामामुद्यानमासीत् , तत्र खल चम्पाया नगयों त्रयो ब्राह्मणा भ्रातरः परिवसन्ति. तद् यथा-(१) सोम., (२) सोमदत्तः, (३) सोमभूतिः, ते कि भूता:-आढया धनवन्त' यारद्-अपरिभूता., तथा-'रिउव्वेय जार' फग्वेद-यजुर्वेदमामवेदाथर्ववेदेषु सागोराङ्गेषु सुपरि- निष्टिता. 1 तेपा ग्वलु ब्राह्मणाना तिस्रोमायाँ आसन् , तद यथा-(१) नागश्री, सोलहवे ज्ञाता-यन का ह भदंत ? उन्ही श्रमण भगवान महावीरने कि जो सिद्धि गति नामक स्थान को प्राप्त हो चुके हैं क्या भाव अर्थ प्रति- पादित किया है ? इस प्रकार के जंबू स्वामी के प्रश्न का उत्तर देते हुए 'सुधर्मास्वामी उनसे करते हैं कि जबू (तेणं कालेण तेग समएण चपा नामं नयरी होत्या, तीसेण चपाल पहिया उत्तरपुरथिमे दिमिभा सु भूमिभागे उज्जाणे, होत्या, तत्व ण चपाए नयरीए तओ मारणा भाय रा परिवसति) उस काल और उस समय मे चपा नोमकी नगरी थी। उस चपा के बाहिर ईशान कोण मे सुभूमि भाग नाम का उद्यान था। उसी चपा नगरी में तीन ब्राह्मण भाइ रहते थे ( त जहा ) उनके नाम ये हैं-(सोमे सोमदत्ते सोमभूई) सोम, सोमदत्त, और मोमभूति अड्डा जाव अपरिभूया) ये सर धन धान्यादि सपन्न एवं जन मान्य (रिउच्वेय, जाध सुपरिनिट्टिया ) ये सबके सब ऋग्वेद आदि चारो वेदों મહાવીરે-કે જેઓ સિદ્ધિગતિ મેળવી ચૂક્યા છે-ળમાં જ્ઞાતાદ્યનો શે અર્થ નિરૂપિત કર્યો છે? આ રીતે જ બૂ સ્વામીના પ્રશ્નને સાભળીને સુધમાં સ્વામી તેમને ઉત્તર આપતા કહે છે કે હે જ બૂ 1 (ते ण कालेण तेण समएण चपा नाम नयरी होत्था, तीसेण चपाए वहिया उत्तरपुरथिमे दिसिभाए सभूमिभागे उज्नाणे, होत्या तत्थ ण नयरोए तओ माहणा भायरा परिवमति) તે કાળે અને તે સમયે ચપા નામે નગરી હતી તે ૨ પા નગરીની બહાર ઇશાન કોણમા મુભૂમિભાગ નામે ઉવાન હતું તે ચ પ નગરીમાં ત્રણ प्राय माया रहेता ता ( तजहा) तमना नाम मा प्रमाणे 8-(सोमे सोमदत्ते सोभूमई ) सेम, सौमहत्त, मने सोमभूति (अड्ढा जाव अपरिभूया ) तमा ऋो धनधान्य वगैरेथी सपन्न तम नमान्य 811 (रिउवय, जान सुपरिनिटिया ) तेया नये अभू वगैरे सारे सभा का तेसि.पणा न तभी भारियाभो होत्या त जहा-नागसिरी, भूपसिरी ( - पाताधमेधा इयं तित्तालाउ य बहुसंभारणेहकयं एगते गोवेत्तए अन्न सालइयं महुरालाउयं जाव नेहावगाढं उबक्सडेत्तए, एवं संपेहेइ संपेहिता त सालइय जाव गोइ, अन्न सालइयं महुरालाउयं उवरखडेइ, तेसिं माहणाणं व्हायाणं जाव सुहासणवरगयाण तं विपुलं असणं४ परिवसेइ, तएणं ते माहणा जिमियभुत्तुत्तरागया समाणा आयंता चोक्सा परम- सुइभूया सकम्मसपउत्ता जाया यावि होत्या, तरण ताओ माहणोओ पहायाओ जाव विभूसियाओ त विपुल असणं ४ आहारेति आहारित्ता जेणेव सयाइ२ गेहाइ तेणेव उवा- गच्छइ उवागच्छित्ता सकम्मतपउत्ताओ जायाओ ॥सू०१॥ टोका-श्रीजम्बूस्वामी श्रीसुधर्मस्वामिन पृच्छति-यदि खलु हे भदन्त ! हे भगवन् श्रमोन भगवता महावीरेण यावत् सिद्धिगतिनाम पेय स्थान समाप्तेन पञ्चदशस्य अयम्उक्तरूप., अर्थः प्रज्ञप्तः, पोडशस्य खलु ज्ञाताध्ययनस्य श्रमणेन भगवता महागीरेण यावत् सिद्धिगविनामधेय स्थान समारतेन कोऽर्थः प्रज्ञासः ?, • टीकार्थ-(जइण भते । समणेण भगवया महावीरेण जाध सपत्तेण पन्नरसमस्स नायज्झयणस्स अयमढे पपणत्ते सोलसमस्स ण भते? णाय ज्झयणस्सण समणेण भगवया महावीरेण जाव सात्तण के अढे पण्णते? एवं खलु जबू? ) श्री जवू स्वामी सुधर्मास्वामी से पूछते हैं कि भदत । श्रमण भगवान महावीरने जो कि सिद्वि गति नामक स्थानको प्राप्त हो चुके हैं पन्द्रहवें ज्ञानाध्ययनका यह पूर्वोक्तरूपसे अर्थ निरूपित किया है तो R-(जइण भते ! समणेण भगवया महावीरेण जाव सपत्तेणे पनरस- मस्स नायज्झयणस्स अयमढे पण्णत्ते सोलसमस्स ण भते ! णायज्झयणस्स ण समणेण भगवया महावीरेण जाच सपत्तेण के अढे पणते ? एव ग्वलु जबू!) શ્રી જબૂ સ્વામી સુધર્મા સ્વામીને પૂછે છે કે હે ભદતી શ્રમણ ભગ વાન મહાવીર કે-જે સિદ્ધિગતિ નામક સ્થાન મેળવી ચુકયા છે–પરમા સારાધ્યયનને આ પૂર્વોક્ત રૂપે અ નિરૂપિત કર્યો છે તે તે अनगारधर्मामृतषिणी N० १०१६ धर्मरच्यनगारचरितवर्णनम् मफाम दातु, प्रकाम भोक्तु मकाम परिभाजयितुम् ततः == तस्मात् श्रेय = श्रेयस्कर खलु अस्माक हे देवानुपिया ! अन्योन्यस्य = परसरस्य गृहेषु 'कलामल्लिं' कल्याफल्य प्रतिदिवस विपुल = Tहुलम् , अशन पान खाद्य स्वाधं उवक्खडाउ ' उपस्कायुपरिभुजानानां विहर्तुम् । अन्योन्यस्य परस्परस्य एत- मर्थ ते त्रयो भ्रातरो ब्राह्मणाः मतिश्रृष्पन्ति-स्वीकुर्वन्ति प्रतिश्रुत्य 'कल्लामलिं' घसाओ पफाम दाउ पजाम भोत्तु पकाम परिभाएउ-त सेय खलु अम्ह देवाणुप्पिया । अन्नमन्नस्स गिहेसु कल्हाकल्लि विउल अमण पाण साइम साहम उचरसडाविउ) हे देवानुप्रियो ! अपने पास विपुलमात्रा में, गणिम, धरिम, मेय, एव परिच्छेयरूप चारों प्रकार का धन है, यावत् पद्मराग आदिरूपस्वापत्य भी हैं, कनक,सुवर्ण,रत्न,मणिमौक्तिक आदि सब कुछ है-और वह इतना अधिक है कि सात पीढी तक भी यदि खूब दान दिया जाये, पैठ २ खूब खाया जावे-और उसका हिस्सा भाग भी कर दिया जावे-तौभी वह समाप्त नहीं हो सकता है। इसलिये हम लोगों को उचित है कि हम लोग प्रति दिन एक दूसरे के घर पर अशन, पान, वाद्य एव स्वाद्यरूप चतुर्विध आहार विपुल मात्रा में बनवाये और (उबक्खडावित्ता परिभुजमाणाण विहरित्तए) पनवा कर उस का भोजन करे। (अन्नम नम्स एयम पडिसुणेति) इस प्रकार का आपस का विचार उन्होंने एक दूसरे का स्वीकार कर लिया। जार आसत्तमाभो कुठयमोओ पकाम दाउ पाम भोत्तु पकाम परिभाएउ त सेय ग्वल्लु अम्ह देवाणुप्पिया ! अन्नमनस्म गिहेसु कल्लाकल्लिं विउल असण पाण खाइम साइम उववडाविध) હે દેવાનુપ્રિયે! આપણી પાસે પુષ્કળ પ્રમાણમાં ગણિમ, ધરિમ, મેય, અને પરિડેવ રૂપ ચારે જાતનુ ધન છે યાવત્ પરાગ વગેરે રૂપ સ્વાપત્ય પણ છે કનક સુવર્ણ, રત્ન, મણિ, મોતી, વગેરે બધુ છે અને જે કઈ છે તે એટલું બધુ છે કે સાત પેઢી સુધી પણ જે પુષ્કળ પ્રમાણમાં દાન કરવામાં આવે છતા તે ખૂટશે નહિ એથી અમને એ યોગ્ય લાગે છે કે અમે બધા દરરોજ એકબીજાને ઘેર અશન, પાન, ખાદ્ય અને સ્વાદરૂપ ચાર જાતના माला। पुष्ण प्रभावमा मनापावीये मन (स्वरसडाविचा परिभुजमाणाण विहरिशर) मनापी भास (अन्नमन्नरस एयमट्ठ परिसुणे जि) मा शत બધાએ એકમત થઈને વાત સ્વીકારી લીધી - . जाताधर्मकाणे (२) भूतश्री', (३) यक्षश्रीश्च, ताः किं भूगा:-मुकुमारपाणिपादा, यान-साङ्ग सुन्दर्यः, तेपा खल माणगानामिया कमनीया, पिपुलान मानुष्यकान पाक्द काममोगान् मुखाना हिरन्ति । ततः खलु तेषा धामणानामन्यदा यदारिदेकतः समुपागताना यावत् अब मेतपा-वदयमाणस्वरूपः, मिथ =परस्पर, फयाममाछापा बालाप: समुदप घत-एव खलु हे देवानुपियाः अस्माकमिद पूिल पन गणिमधरिममेयपरि- च्छेध भेदान्चतुर्विध यावत् 'सावतेज्जे' सापत्य - पद्मरागादिस्प वा, अत्र यावत्पदनोध्य-निम्सुवर्णरत्नादिक तथा-मौक्तिकादिक च निघते, किंभूत तदि स्याह-अलाहि ' पर्याप्त परिपूर्ण-यावत्-आसप्तमात् फुलवशात् सप्तमवणपर्यन्त के अच्छे जानकार थे। (तेसिण माहणाण तो भारियाओलोधी-त जहा-नागसिरी, भूयसिरी, जक्ससिरी, सुकुमाल जाव तेसिंग मारणाण इट्ठामो ५ पिपुले मा० जाव विररति ) इन तीनो ब्राह्मणों की तीन स्त्रिया थी। उनके नाम ये हैं।-नाग श्री, भूत श्री, और यक्ष श्री, ये सब सुकुमार करचरणवाली थी यावत् मग सुन्दर थीं। ये तीनों ब्राह्मण इनके साथ मनुष्यभव सन्धी काम भागों को भोगते हुए आनद से रहते थे । (तपण तेसिं मादणाण अन्नया कयाई एगय ओ समुवागयाण जाय इमेयाख्वे मिहो कहासमुल्लावे समुप्पज्जित्था) एक दिन की बात है कि जब ये तीनो भाई एक जगह बैठे थे तब इनका परस्पर में इस प्रकार का विचार चला-( एव खल देवाणुप्पिया। अम्ह इमे विउले धणे जाव सावतेज्जे अलाहिजाब आसत्तमाओ कुल- जस्खसिरी, सुकुमार जाव तेसि ण माहणाण इटाओ५ विपुले मा जाब विहरति) આ ત્રણે બ્રાહ્મણને ત્રણ સ્ત્રીઓ હતી તેમના નામે આ પ્રમાણે છે નાગશ્રી, ભૂતશ્રી, અને યક્ષશ્રી તેઓ ત્રણે સુકેમળ હાથ અને પગવાળી હતી અને બધા અને તેમના સુદર હતા ત્રણે બ્રાહ્મણે તેમની સાથે મનુષ્ય ભવના કામગ ભેગવતા સુખેથી રહેતા હતા (तएण तेसि माहणाण अन्नया कयाई एगयो समुवागयाण जाव इमेया- रूचे मिहो कहासमुलावे समुपज्जित्या) એક દિવસની વાત છે કે તેઓ ત્રણે ભાઈ એક સ્થાને બેઠા હતા ત્યારે તેઓ પરસ્પર આ જાતને વિચાર કરવા લાગ્યા કે- -श्व सल देवाशपिया ! मम्ई इमे-विस धणे मार, 44 पष्ठी माकृतत्वात् , जारधर्मामृतयपिणी टी० म०.६ धर्मरच्यागारचरितवर्णनम् आस्वादयति, स्वाय तत् तार कटुकमसायमभोज्य विपभूत ज्ञाता एवमवादीत- धिंगस्तु मा नागश्रियमपन्यामपुण्या दुर्भगा 'दुभासत्ताए' दुर्भगसत्वा दुर्भग-निष्फल सत्व-पल यस्याः सा ता व्यपरिलमामित्यर्थः 'भगणिनीलिए ' दुर्भगनिम्ध मुलिकानिम्पफलिका, तद्वद् दुर्भगा ताजनैरनादरणीयामित्यर्थः, जन द्वितीयार्थे 'जीए' यया खलु मया शारदिक बहुसभारद्रव्यसभृत स्नेहार- (उवक्सडित्ता एग यिदुय करयलसि आसाएड) जय वर तेयार शाक हो चुका-तय उसने उसमें से एक निन्दु मात्र शाक अपनी हथेली पर रखा और फिर उसे चावा-(आसाइत्ता त खार कडय अक्सज अभोज विसन्भूय जाणित्ता एव वयामी-घिरत्यु ण मम नागसिरीए अहन्नाए, अपुनाए दुर मगाए दुभगनता दुभगणियोलियाए जीएणःमए सालइए बहुसभारसमिए नेहावगादे उवरखडिए) चखकर उसे ज्ञात हुआ कि यह शाफ तो बहुत ग्यारा है, बहुत अधिक कडुआ है। खाने के योग्य नही है भोजन में लेने के लायक नहीं है, यह तो विप जैसा है ऐसा जानकर उसने मन ही मन विचार किया उस विचार मे उसने कहा-मुस नागश्री को धिकार है, में अधन्या और अपुण्या हैं । जनो के द्वारा आदर पाने योग्य नहीं है। मेरे इम बल को घार २ धिकार हो-मेरा यह पल बिलकुल निष्फल हे मेने जो इस शाक के बनाने में इतना उद्यम किया है वह मेरा सर्वथा निष्फल गया। जिस प्रकार नीमा ७५२ ही तरतु नु (उपसडिता एग बिदुय करयल सि आसाएइ) न्यारे શાક તૈયાર થઈ ગયુ ત્યારે તેણે તેમાથી ફક્ત એક ટીપા જેટલું શાક પિતાની- હથેળી ઉપર લઈને ચાખ્યું (आसादत्ता त खार कड्डय अक्खज्ज अभोज्ज विसब्भूर्य जाणित्ता एवं वयासी-धिरत्थु ण मम नागसिरीए अहन्नाए, अपुनाए, दुरंभगाए भगसत्ताए भगगिंगोलियाए जीएण मए सालइए बहुसभारसभिए नेहावगाढे उबक्खडिए) ચાખવાથી તેને લાગ્યું કે આ શાક તે ખૂબ જ ખારૂ છે, ખૂબ જ કડવું છે, ખાવાલાયક નથી, ભજનમા કામ લાગે તેવું નથી, આ તે ઝેર જેવું છે; આમ જાણીને તેણે પિતાના મનમા જ વિચાર કર્યો અને વિચાર કરતા તેણે પિતાની જાતને જ આ પ્રમાણે કહ્યું કે-અને-નાગશ્રી-અધિકાર છે, ખરેખર અધન્યા તેમજ અપુણ્યા શુ હુ લેકે દ્વારા આદર મેળવવા લાયક નથી મારા આ બળને વારંવાર ધિક્કાર છે, મારુ આ બળ સાવ નકામું છે શાક તૈયાર કરવામાં એટલે કે શ્રમ કર્યો છે તે બધા નકામે ગયો જેમ લીમ २२८ फल्याकल्यंम्मतिदिवसम् अन्योन्याय योपु पिपुलमगनादिसमुपस्कारयन्ति । उप स्कार्य परिभुआना पिहरन्ति । ततः गल नस्या नागश्रियो नामग्या अन्यमान कदाचिदन्यस्मिन् समये मोयणसारण माननतारक मोनायितु नियमितो दिवसी भोजनधारक जातः समायावयाप्यभनन् , ततः स सा नागश्रीः विपुलमशन पान खाप सायमुपस्करोति-निष्पादयति, उपत्य एक महन् । सालइय' सारचित--सारेण रसेन चित युक्त गढा-शारदिर-भारतमा 'तिचालाउ' तिक्तालापुक-निम्मादिवत् तिक्तरसयुक्ततुम्बीफल, उडुसमारसयुक्तम्बहुमिन अनेकविधः सभारद्रव्यैः साकादौ स्वादसुगन्धविशेपार्थ दिमेथिकाजीरमादीनि व्याघारद्रव्याणि निक्षिप्यन्ते, मिश्रित, 'हागाह' स्नेहारगाह घृतादिलावि वम् (युक्तम्) ' उपक्खडेइ ' उपस्करोति, उपस्कृत्येक विन्दुक परतले समादाय (पडिसुणित्ता कल्ला कल्लिं अन्नमन्नस्स गिहेसु विउल अमण ४ उवक्ख डावे ति) स्वीकार करके अब वे एक दूसरे के घर पर विपुल मात्रा में निप्पन्न हुए अशनादिरूप चतुर्विध आहार को ग्वाने पीने लगे। (ताण तीसे नागसिरीए मारणीय अन्नया भोयणचारए जारा थापि होत्या) किसी एक दिन नागश्री ब्रामणी की भोजन बनाने की बारी आई (तएण सा नागसिरी विउल असण ४ अवसति) मो उस दिन उसने विपुल मात्रा मे चारो प्रकार का आहार घनाया ( अवस्वडित्ता एग मर सालइय तित्तालाउअ पसभारसजुत्त शवगाढ उवक्खडेइ) आधार बनाकर फिर उसने शरदस्तु में उत्पन्न हुई अथवा रस से सरस बनी हुई तिक्तरसतुवी का शाक बनाया और उसमें स्वाद एच सुगधि के निमित्त हीग, मैथी, जीरे आदि का वधार दिया। उसे खूष अधिक घृत में छोंका था इसलिये वृत उसके ऊपर तैर रहा था। (पडिसुणित्ता कल्लारिल अन्नमानस गिहेसु विउल असण ४ उवक्खडावेंति ) સ્વીકારીને તેઓ એકબીજાને ઘેર પુષ્કળ પ્રમાણમાં અશનપાન વગેરે ચાર જાતના આહારને ખાવા-પીવા લાગ્યા (तएण वीसे नागसिरीए माहणीए अन्नया भोयणवारए जाए यावि होत्था) કે એક દિવસે નાગથી બ્રાહ્મણીને જોજન તૈયાર કરવાનો વારો આવે (तएण सा नागसिरि विउल असण ४ उवक्डे ति।) ते तसे yon પ્રમાણમાં ચારે જાતના આહાર બનાવ્યા (उवक्खडिचा एग मह सालइय तिचालाउअ बहुसंभार सजुत्त हारगाढ उपक्खडेइ) આહાર બનાવીને તેણે શરદુ ઋતુમાં ઉત્પન્ન થયેલી અથવા રસથી સરસ થયેલી તિક્તરસવાળી તુબીનું શાક બનાવ્યું અને તેમાં સ્વાદ અને સુગધીના માટે હીંગ, મેથી, જીર વગેરેને વઘારે દીધે अनेगारधर्मामृतपरिणी टी० म०.६ धर्माच्यनगारचरितवर्णनम् आस्वादयति, नस्वाय तत् क्षार कटुफमस्तावमभोज्य विपभूत ज्ञाता एवमवादीत- धिगस्तु मा नागश्रियमपन्यामपुण्यादुर्भगा 'दुभ सत्ताए' दुर्भगसत्या दुर्भग-निष्फल सत्त्व-पल यस्याः सा ता व्यर्थपरिश्रमापिन्वर्यः 'दृभगणिनोलिए' दुर्भगनिम्ब- गुलिका निम्नफलिका, तद्वद् दुर्भगा ताजनैरनादरणीयामित्यर्थः, जन द्वितीयार्थे पष्टी माकृतत्यात् , 'जीए' यया खलु मया शारदिक पहुसभारद्रव्यसभृत स्नेहाव- (उवस्खटित्ता एग बिंदुय करयलसि आसाएड ) जब वर तैयार शाक हो चुका-तय उसने उसमें से एक विन्दु मात्र शाक अपनी हथेली पर रखा और फिर उसे चखा-(आसाहत्ता त खोर कड्य अक्खन अभोज विसम्भूय जाणित्ता ण्य वयासी-विरत्यु ण मम नागसिरीए अहनाए, अपुनाए दुर भगाए दुभगसत्तारा दुभगणियोलियाए जीएण मए सालइए' यसभारसमिए नेहायगाढे उवरखडिए) चखकर उसे ज्ञात हुआ कि यर शाक तो यहुन पारा है, बहुत अधिक कडुआ है। खाने के योग्य नही है भोजन में लेने के लायक नहीं है, यह तो विष जैसा है ऐसा जानकर उसने मन ही मन विचार किया उस विचार मे उसने कहा-मुश नागश्री को धिकार है, मे अधन्या और अपुण्या है। जनों के द्वारा आदर पाने योग्य नहीं है। मेरे इम वल को पार २ धिकार हो-मेरा यह पल बिलकुल निष्फल है मैने जो इस शाक के बनाने में इतना उद्यम किया है वह मेरा सर्वथा निष्फल गया। जिस प्रकार नीम (अस्सडिता एग बिदुय करयल सि आसाएइ) न्यारे શાક તૈયાર થઈ ગયું ત્યારે તેણે તેમાથી ફક્ત એક ટીપ જેટલુ શાક પિતાની હથેળી ઉપર લઈને ચાખ્યું (आसाइत्ता त खारं कट्ठय अखज्ज अभोज्ज विसम्भूय जाणित्ता एवं वयासी-धिरत्यु ण मम नागसिरीए अहन्नाए, अपुन्नाए, दूरभगाए' भगसत्ताए भगणियोलियाए जीएण मए सालइए बहुसभारसभिए नेहावगाढे उवक्खडिए) ચાખવાથી તેને લાગ્યું કે આ શાક તે ખૂબ જ ખારૂ છે, ખુબ જ કડવું છે, ખાવાલાયક નથી, ભોજનમાં કામ લાગે તેવું નથી, આ તે ઝેર જેવું છે, આમ જાણીને તેણે પિતાના મનમાં જ વિચાર કર્યો અને વિચાર કરતા તેણે પિતાની જાતને જ આ પ્રમાણે કહ્યું કે મને-નાગશ્રીને-ધિક્કાર છે, હું ખરેખર અધન્યા તેમજ અપુણ્યા શું છે લેકે દ્વારા આદર મેળવવા લાયક નથી મારા આ બળને વારવાર ધિક્કાર છે, મારુ આ બળ સાવ નકામુ છે શાક મે શ્રમ કર્યો છે તે બધું નકામે ગયો જેમ લીમ . ઉપર ઘી તરતુ હતું तैयार ......
. तापमान गाढमुपस्कृत, तेन मुद्रज्यायः-हिनीर कादिरगनाशा, स्नेहक्षया धृतादि क्षयश्चकृतः, तत्-तस्मात् यदि सउ मा 'जाउयागो' यानाः, देवरभार्या: ज्ञास्यन्ति, 'तोण' वर्दि खलु मा खिसिस्मति' सिनियन्ति-निन्दा कोप च करिष्यन्ति, तत्-तस्मात् यान्मम यातका न जानन्ति, वान्मम श्रेया-उचित एतत् शारदिक तिक्तालापुक पगमारस्नेहकतम् एकान्ते 'गोवत्तए' गोपयियम् , अन्यत् शारदिक मधुरालायुक मधुरतम्घीफल यापद स्नेहायगादमुपस्कर्त्तम् । एव की नियौली फिसी मनुप्य की दृष्टि में आदर पाने योग्य नहीं होती है उसी प्रकार में भी जनो धारा अनादरणीय पनी है । जो मैंने शरद कालिक अथवा सरस इस तुयी फल का हिड्गु, जीरकादि द्रव्यों से युक्त और धृतादि से युक्त शाफ पनाना है (सुरहदयरसण, नेहक्खए य कए) इस के पनाने में मैंने व्यर्थ ही पत से हिड्गु जीरे मेथी आदि द्रव्य का और घृत का विनाश किया है। (त जण मम जाउयाओ जाणिस्सति, तो, ण मम सिसिस्सति) इस पात को यदि मेरी देवरानी जाने गी तो वे मेरे ऊपर गुस्सा होगी और मेरो निदा करेगी। (त जाव ताय मम जाउयाओ ण जाणति ताव मम सेय पय सालइयं तित्ता लाउय बहुसभारणेह कय एगते गोवेत्तए) इसलिये मुझे अय यही उचित है कि मैं इस शारदिक तिक्तोला के शाक को जो यहुत सभार एव घृत डालकर बनाया है किसी एकान्त स्थान में छुपाकर रख दूँ और ડાની લીંબોળી માણસોની સામે આદર મેળવવા યોગ્ય ગણાતી નથી તે પ્રમાણે હુ પj માણસે દ્વારા આદર પ્રાપ્ત કરવા લાયક રહી નથી એટલે કે હું લેકેની સામે અનાદરણીય થઈ ગઈ છુ મે શર૬ કાલિક અથવા Cબીના ફળનુ હીંગ, જીરૂ વગેરે દ્રવ્યોથી યુક્ત અને ઘી વગેરેથી યુક્ત શાક मनाप्यु छ (सुबहु दव्वक्ख ए नेहक्स ए य कए) भने तैयार ४२वामा में વ્યર્થ હીંગ, જીરૂ, મેથી વગેરે તેમજ ઘી વગેરે વસ્તુઓને દુર્વ્યય કર્યો છે (त जइण मम जाउयाओ जणिस्स ति, तो ण मम खिसिस्स ति) ने भा। દેરાણેને આ વાતની જાણ થશે તે તેઓ ચોક્કસ મારા ઉપર ગુસ્સે થશે અને મારી નિંદા કરશે (त जाव ताव मम जाउयाओ ण जाणति ताव मम सेय एय सालइय वितोलाउय बहु सभारणेहकय एगते गोवेत्तए) એથી અત્યારે મને એ જ યોગ્ય લાગે છે કે આ શારદિક તિતલાવ્યું (કડવી તુંબડી) ના શાક ને-કે જે પૂબ જ સરસ ઘી નાખીને વઘારવામાં આવ્યું છે. એક તરફ છુપાવીને મૂકી દઉં અને તેની જગ્યાએ पाहय સરસ . भनगारधर्मामृतर्वापणी टी० अ० १६ धर्मराज्यनगारचरितवर्णनम् २४ सपेक्षते-विचारयति, सप्रेक्ष्य तत् शारदिक यावद् तिक्तालावुक गोपयति कचित् समाच्छाद्य धरति अन्यत् शारदिक मधुरालासुस्मुपस्करोति रन्धयति शेशरारा दिभिः संस्करोति । तेपा ब्राह्मणानां यारत् मुखासनवरगताना निजनिजामने- सुखोपविष्टाना तद् विपुलमशन पान साध स्वाद्य परिवेपयति-नेपा भोजनावसरे भोजनपात्रो ददातीत्यर्थः । ततः खलु ते ब्रह्माणाः 'जिमियभुत्तुत्तरगया' निमित- उसके र रानपर (अन्न सालय महुरालाउय जाव नेहायगाढ उवक्ख उत्तए) दूसरी शारदिक मधुर तुंधड़ी का शाक हीग, जीरे और मैथी का बघार लगाकर घृत में तैरता हुआ बना (एव सपेहेइ, सपेहिता त सालइ य जाव गोपेइ अन्न सालइर महरालाउय उवरवडे तेसिं महणाण पायाण जाव सुदामनवरगयाण त विपुल असण ४ परिवे सेइ ) ऐसा उसने विचार किया-विचार करके उस शारदिक कडधी तुपदी के बहुत सभार एब घृत युक्त शाफ एकान्त में छुपाकर रख दिया और दूसरी शारदिक मधुर तुंबडी - का शाक हींग जीरे और मेंथी का वघार लगाकर घृत में तैरता हुआ बना लिया। इतने में वे तीनो ब्राह्मण स्नान आदि से निपट कर भोजन शाला में आकर अपने २ आसन पर शाति के साथ बैठ गये। उनके बैठते ही उसने उन्हें अशन आदिरूप चारो प्रकार का आहार वालो मे परोमा (तएण ते मारणा निमिय भुत्तुत्तरागया समाणा आयता, चोक्खा परम सुइ- मदुरालाउय जाव नेहावगाढ अक्सडेत्तए) भी शा४ि भी तू मनु ઘી ઉપર તરી રહ્યું છે એવું શાક હીંગ, જીરૂ અને મેથીમા વધારીને બનાઉં (एव सपेहेइ, सपेहिता त सालाइ य जाव गोवेइ, अन्न सालइय महुराला. उय उवरखडेइ, तेसिं माइणाणं हायाणं जाव सुहासनवरगाण त विपुल असण ४ परिवेसेइ) આ જાતનો તેણે વિચાર કર્યો, વિચાર કરીને તે શાકિ કડવી ખૂબ ડીના સરમ ઘીમા વઘારેલા શાકને એક તરફ છુપાવીને મૂકી દીધું અને બીજી શારદિક મીઠી તુંબડી-દૂધી-નું હીગ, જીરૂ અને મેથીને વઘાર કરીને ઉપર ઘી તરતું શાક બનાવ્યું એટલામાં તે તેઓ ત્રણે બ્રાહ્મણે નાન વગેરેથી પરવારીને ભોજનશાળામાં આવીને પિતાપિતાના આસન ઉપર શાતિથી બેસી ગયા તેમને બેસતા જ તેણે તેઓને અશન વગેરે રૂપ ચારે જાતને આહાર થાળીમાં પીરસ્ય गादमुपस्कृत, तेन मुद्रयामा-हिमादिमाश, क्षयवका, तन्न्तस्मात् यदि सउ मग 'नाउणामोया सास्यन्ति, 'तोग' ताई सच मग सिसिस्मति - विगिया करिष्यन्ति, तत्-तस्मात् गायनमम यातका न जानन्ति, तापमा एतत् शारदिक तिक्तालापुक बहुममारस्नेहकृतम् एकान्ते 'गोयेराव अन्यत् शारदिक मधुगलायुक मधुरतम्रीफल यापन् सोहागादमुन की नियौली फिसी मनुष्य की दृष्टि में आदर पाने योग्य है उसी प्रकार में भी जनो नारा अनादरणीर पनी । जो कालिक अथवा सरस इस तुयी फल का रिगु, जीरकादि युक्त और घृतादि से युक्त शाक पनामा है (सुरदयात, य कए) इस के पनाने में मने व्यर्थ ही बहुत से हिड्गु जीरे र द्रव्य का और घृत का विनाश किया है। (त जइण मम : जाणिस्सति, तो, ण मम सिसिस्सति) इस पात को यदि मेरी जाने गी तो वे मेरे ऊपर गुस्सा होगी और मेरो निंदा करेगी ताच मम जाउयाओ ण जाणति ताव मम सेयं एय सालइर लाउय बहुसभारणेह कय एगते गोवेत्तए) इसलिये मुझे अब य है कि मैं इस शारदिक तितोला के शाक को जो यहुत स घृत डालकर धनाया है किसी एकान्त स्थान मे छुपाकर र ડાની લીંબોળી માણસની સામે આદર મેળવવા યોગ્ય ગણતી નથી હું પણ માણસ દ્વારા આદર પ્રાપ્ત કરવા લાયક રહી નથી એ લેકેની સામે અનાદરણય થઈ ગઈ છુ મે શરદ કાલિક અ Cબીને ફળનુ હીંગ, જીરૂ વગેરે દ્રવ્યથી યુક્ત અને ઘી વગેરેથી मनायु छ (सुबहु दव्वक्स ए नेहक्स ए य कए) से तैयार વ્યર્થ હીંગ, જીરૂ, મેથી વગેરે તેમજ ઘી વગેરે વસ્તુઓને ૬૦- (त जइण मम जाउयाओ जणिस ति, तो ण मम सिसिरस ति) દેરાણીને આ વાતની જાણ થશે તે તેઓ ચેસ મારા ઉપર ગુસ્સે મારી નિંદા કરશે (तजाव ताव मम जाउयाओ ण जाणति ताव मम सेय एर वितालाउय बहु समारणेहकय एगते गोवेत्तए) એથી અત્યારે મને એ જ એગ્ય લાગે છે કે આ શારદિક લિ (કડવી બડી) ના શાક ને-કે જે ખૂબ જ સરસ ઘી નાખીને : આવ્યું છે–એક તરફ છપાવીને મૂકી દઉં અને તેની જગ્ય भनगारधर्मामृतर्वापणी टी०म० १६ धर्मरच्यनगारचरितवर्णनम् १४१ सप्रेक्षते-विचारयति, सप्रेक्ष्य तत् शारदिक याद तिक्तालावुक गोपयति कचित् समाच्छाय धरति जन्यत् शारदिक मधुरालाकुसमुस्करोति-रत्ययति शेशगारा दिभिः संस्करोति । तेपा बामणानां याद मुग्यासनवरंगताना निजनितामने- सुग्योपविष्टाना तद् विपुलमशन पान साध स्वाध परियेपयति-नेपा भोगनावसरे भोजनाने ददातीत्यर्थः । ततः खलु ते ब्रह्माणाः 'जिमियभुत्तुत्तरगया ' निमित- उसके र रानपर (अन्न सालल्य महुरालाउय जाव नेहरावगाढ अवश्ख उत्तए) दूसरी शारदिक मधुर तुघड़ी का शाक हींग, जीरे और मैंधी का घार लगाकर घृत में तैरता हुआ बनानू (एक सपेहेद, सपेदिता त सालइ य जाव गोपेड अन्न सालइर महरालाडय उयग्बडेह तेसिं मरणाण पायाण जाव सुहासनवरगयाण त विपुल असण ४ परिवे सेह) ऐसा उसने विचार किया-विचार करके इस शारदिक कउयी तुयटी के बहुत सभार एवं घृत युक्त शाक एकान्त में छुपाकर रख दिया और दूसरी शारदिक मधुर तुंबडी - का शाक हींग जीरे और मेंथी का वधार लगाकर त में तैरता हुआ बना लिया। इतने में वे तीनो ब्राह्मण म्नान आदि से निपट कर भोजन शाला में आकर अपने २ आसन पर शाति के साथ बैठ गये। उनके बैठते ही उसने उन्हें अशन आदिरूप चारो प्रकार का आहार यालो में परोमा (तएण ते मारणा जिमिय भुत्तुत्तरागया समाणा आयता, चोक्खा परम सुइ- महरालाउय जाप नेहावगा असिडेत्तए) मी शाह भी तून ઘી ઉપર તરી રહ્યું છે એવું શાક હગ, જીર અને મેથીમા વધારીને બનાઉં (एव सपेहेइ, सपेहिता त सालाइ य जाव गोवेइ, अन्नं सालक्ष्य महुराला- उय उपखडेइ, तेसिं माइणाणं व्हायाण जाव सुहासनवरगाण त पिपुल असण ४ परिवेसेड) આ જાતને તેણે વિચાર કર્યો, વિચાર કરીને તે શારદિક કડવી ખૂબ ડીના સરસ ઘી વઘારેલા શાકને એક તરફ છૂપાવીને મૂકી દીધું અને બીજી શારદિક મીઠી તુંબડી-દૂધી-નું હીગ, જીરું અને મેથીને વઘાર કરીને ઉપર થી તરતું શાક બનાવ્યું એટલામાં તે તેઓ ત્રણે બ્રાહ્મણે નાન વગેરેથી પરવારીને ભેજનશાળામા આવીને તિપિતાના આસન ઉપર શાતિથી બેસી ગયા તેમને બેસતાં જ તે તેઓને અશન વગેરે રૂપ ચારે જાતને આહાર १va तापपाने गादमुपकृत, तेन मुरादन्याया-दिशनीसहिपनाशः, स्नेहसातादि क्षयवस्तः, तत्-तस्मात् यदि खउ मा 'नाउयामो' यान, देशरमाया: ज्ञास्यन्ति, 'तोण' तहि खलु मा खिसिस्मतिसिमिपन्ति-निन्दा कोप व करिष्यन्ति, तत्-तस्मात् यारन्मम यातृका न आनन्ति, तावन्मम श्रेयः-उचित एतत् शारदिक तिक्तालाजुक बहुममारस्नेहाता एकानो 'गोवैतए' गोपयिम् , अन्यत् शारदिक मधुरालायुक मधुरतम्बीफल यापन स्नेहापगादमुपपर्तम् । एव की नियौली किसी मनुष्य की दृष्टि में आदर पाने योग्य नहीं होती है उसी प्रकार में भी जनों मारा अनादरणीय पनी है। जो मैंने शरद कालिक अथवा सरस इस तुयी फल का हिगु, जीरकादि द्रव्यों से युक्त और घृतादि से युक्त शाक पनाया है (सुपदव्याखा, नेहक्खए य कप) इस के बनाने में मने व्यर्थ ही यहुत से हिगु जीरे मेथी आदि द्रव्य का और घृत का विनाश किया है । (त जहण मम जाउयाओ जाणिस्सति, तो, ण मम सिसिस्सति) इस पात को यदि मेरी देवरानी जाने गी तो वे मेरे ऊपर गुस्सा होगी और मेरो निंदा करेगी। (त जाव ताव मम जाउयाओ ण जाणति ताच मम सेय एय सालइय तित्ता लाउय पहुसभारणेर कय एगते गोवेसए) इसलिये मुझे अव यही उचित है कि मैं इस शारदिक तिक्तोलावु के शाक को जो बहुत सभार एवं घृत डालकर बनाया है किसी एकान्त स्थान में छुपाकर रख दूं और ડાની લળી માણસની સામે આદર મેળવવા ગ્ય ગણાતી નથી તે પ્રમાણે હુ પણ માણસે દ્વારા આદર પ્રાપ્ત કરવા લાયક રહી નથી એટલે કે હું લેકની સામે અનાદરણય થઈ ગઈ છુ મે શરદુ કાલિક અથવા બીન કુળનુ હીંગ, જીરૂ વગેરે દ્રવ્યથી મુક્ત અને ઘી વગેરેથી યુક્ત શાક मनायु छ ( सुबहु दव्वक्स ए नेहक्स ए य कए) भने तेयार ४२वामा में વ્યર્થ હીંગ, જીરૂ, મેથી વગેરે તેમજ ઘી વગેરે વસ્તુઓને દુર્વ્યય કર્યો છે (त जइण मम जाउयाओ जणिस्स ति, तो ण मम खिसिरस ति) ने भारा દેરાણુને આ વાતની જાણ થશે તે તેઓ ચક્કસ મારા ઉપર ગુસ્સે થશે અને મારી નિંદા કરશે (त जाव ताव मम जाउयाओ ण जाणंति ताव मम सेय एय सालझ्य विचलाउय बहु सभारणेहकय एगते गोवेत्तए) એથી અત્યારે મને એ જ યોગ્ય લાગે છે કે આ શારદિક તિકતલાબુ (કડવી તુંબડી) ના શાક ને-કે જે ખૂબ જ સરસ ઘી નાખીને વઘારવામાં આવ્યું છે–એક તરફ છુપાવીને મૂકી દઉં અને તેની જગ્યાએ તે এক સરસ भनगारधाम परिणी 20 घ्यम्गारचरितमानम् उजाणे तेणेव उवागच्छति २ अहापडिरूवं जाव विहरति, परिसा निग्गया, धम्मो कहिओ, परिसा पडिगया, तएणं तेसिं धम्मघोसाणं थेराणं अंतेवासी धम्मरई नाम अणगारे ओराले जाव तेउलेस्से मासं मासेणं खममाणे विहरइ, तएणं से धम्मई अणगारे मासखमणपारणगंसि पढमाए पोरिसाए सज्झाय करेइ वीयाए पोरिसीए एव जहा गोयमसा. मी तहेव उग्गाहेइ उग्गाहित्ता तहेव धम्मघोसे थेरं आपुच्छइ जाव चपाए नयरीए उच्चनीयमज्झिमकुलाई जाव अडमाणे जणेव नागसिरीए माहणीए गिहे तेणेव अणुपविटे, तएण सा नागसिरी माहणी धम्मरुई एजमाण पासइ पासित्ता तस्स सालइयस्स बहुसंभारसंभियस्स हावगाढस्स तित्त- कडुयरस पट्ठवणट्टयाए हट्टतुट्ठा उट्टाए उट्टेइ उष्टित्ता जंणेव भत्तघरे तेणेव उवागच्छइ, उवागच्छित्ता त सालइय तित्त- कडुय च बहुसंभारसंभिय णेहावगाढ धम्मरुइस्स अणगा- रस्त पटिग्गहसि सव्यमेव निसिरइ, तएणं से धम्मरई अणगारे अहापजत्तमितिकटु णागसिरीए माीए गिहाओ पडिनिक्खमइ पडिनिक्खमित्ताचपाए नयरीए मज्झ मज्झेणं पडिनिक्खमइ जेणेव सुभूमिभाग उज्जाणे तेणेव उवाग- च्छइ, उवागच्छित्ता धम्मघोसस्स अदूरसामते अन्नपाण पडिलेहेइ पडिलेहिता अन्नपाण करयलसि पडिदमेड,तएणं ते धम्मघोसा थेरा सालइयरस जीव नेहापगाढस्स गयेणं " ताधर्मका भुक्तोत्तरगताः भोजनानन्तरं हिरागताः मन्तः 'आयना' आTra: कृतजुलकाः ' चोक्खा ' चोला मसालितहम्नान वाः परमपिभूताः 'सकम्मसपउत्ता' स्वकर्मसमयुक्ता =स्वस्वकार्यसलग्ना नानाप्यमान् । ततः स ताः ब्रामण्यः स्नाता यावत् खालकारविभूपितास्तद् विपुमशन पान खाए स्वायम् आहार यन्ति-आहारान्ति भुञ्जते स्म । आइत्प, यौन सपानि वरानि गृहाणि- आवासभवनानि तौयोपागन्छन्ति, उपागस्य चर्मम मयुक्ता जावा ॥ सू० १ ॥ मूलम्-तेण कालेणं तेणं समएणं धम्मघोसा नाम थेरा जाव बहुपरिवारा जेणेव चंपा नाम नयरी जेणे सुभूमिभागे भूया सकम्मसपउत्ता जाया याचि होत्या) आर जय परोसो जा चुका-तय उन सबने उसे साया पीया-और सा पीकर जन ये निपट चुके तर उन्नोंने फुल्ला आदि कर अपने मुंह का प्रक्षालन किया और हाथो को साफकर वे अपने २ कार्य में लग गये। (तण्ण ताओ माह णीओ होगाओ जाव विभूसियाओ त विपुल असण ४ आहारे ति, आहारित्ता जेणेव सयाइ-२ गेहाइ तेणेय उवागच्छति उधागच्छित्सा सकम्म सपउत्ताओ जायाओ) इसके पाद उन ब्रमणियोंने जो कि पहिले से ही स्नान कर चुकी थी और अपने शरीर को सुन्दर वेष भूषा से सुसज्जित किये हुए थी, उस विपुल अशनादिरूप चतुर्विभ- आहार को खाया-और खाकर के फिर वे अपने २ चासभवनों में चली गई-वहा जाकर अपने २ वे सब काममें लग गई ।। स्त्र १॥ (तएण, ते माहणा निमिय भुत्तुत्तरागया समाणा आयता, चोक्खा परममा भूया सफम्मसपउत्ता जाया यानि होत्था) આહાર જ્યારે પીરસાઈ ગયે ત્યારે તેઓ ત્રણે જમ્યા અને જમી પર વારીને કોગળા વગેરે કરીને હાથ મા સાફ કર્યા અને હાથ મે સાફ કરીને તેઓ ત્રણે પિતતાના કામમાં પરોવાઈ ગયા (तएण ताओ माहणीओ पहायाओ जाब विभूसियाओ त विपुल असण४ाहारिता जेणेव सयाइर गेहाइ तेणेष उवागच्छति, उवागच्छित्ता सकम्मसपउत्तामोजायाओ) ત્યારબાદ તે ધણીએએ-કેજેઓએ પહેલા નાન કરીને પિતાના શરીરને સુંદર વસ્ત્રોથી શણગાર્યું હતું તે પુષ્કળ પ્રમાણમાં બનાવવામાં આવેલે અંશન વગેરે રૂપ ચાર જાતનો આહારે કર્યો આહારથી પરવારીને તેઓ પિતાપિતાના વાસભવનમાં જતી રહી અને ત્યાં જઈને તેઓ સવે પિતાપિતાના કામાં પરોવાઈ ગઈ સૂ૦૧ -- .
मनगारधर्माम तपरिणी 0 20 ६ च्यन्गारचरितवर्णनम् उजागे तेणेव उवागच्छति २ अहापडिरूवं जाब विहरति, परिसा निग्गया, धम्मो कहिओ, परिसा पडिगया, तएण तेसिं धम्मघोसाण थेराणं अंतेवासी धम्मरुई नाम अणगारे ओराले जाव तेउलेस्से मासं मासेण खममाणे विहाइ, तएणं से धम्मई अणगारे मासखमणपारणगंसि पढमाए पोरिसाए सज्झाय करेइ चीयाए पोरिसीए एव जहा गोयमसा- मी तहेव उग्गाहेइ उग्गाहित्ता तहेब धम्मघोसे थेरं आपुच्छइ जाव चंपाए नयरीए उच्चनीयमज्झिमकुलाइं जाव अडमाणे जणेव नागसिरीए माहणीए गिहे तेणेव अणुपवितु, तएण सा नागसिरी माहणी धम्मरुई एज्जमाण पासइ पासित्ता तस्स सालइयस्त बहुसंभारसभियस्स हावगाढस्स तित्त- कड्डयस्स पट्ठवणट्टयाए हट्टतुट्ठा उट्टाए उठेइ उद्वित्ता जेणेव भत्तघरे तेणेव उवागच्छई, उवागच्छित्ता त सालइय तित्त कडुय च वहुसंभारसंभिय णेहावगाढ धम्मरुइस्स अणगा- रस्स पडिग्गहसि सब्वमेव निसिरइ, तएण से धम्मरुई अणगारे अहापज्जत्तमितिकट्ठ णागसिरीए माहणीए गिहाओ पडिनिक्खमइ पडिनिक्खमित्ता चपाए नयरीए मज्झ मज्झेणं पडिनिक्खमइ जेणेव सुभूमिभागे उज्जाणे तेणेव उवाग- च्छइ, उवागच्छित्ता धम्मघोसस्स अदूरसामते अन्नपाण पडिलेहेइ पडिलेहिता अन्नपाण करयलसि पडिदमेड, तएणं ते धम्मघोसा थेरा सालइयस्स जीव' नेहारगाढस्स गधेण १ - माधम भुक्तोचरगताः भोमनानातरं हिंगगना' गा: 'आग' मानran तनुलुका ' चोक्खा ' चोमा मानिना' परमविभूताः 'गाम्ममपउत्ता' स्वर्मसमयुक्ता पत्तशर्यसग्ना नाप्यमार । ता: सल ताः प्रामन्यः स्नाता यावत् पखालकारविभूपिताप्नद पिपुलमान पान यार सायम् आहार यत्ति आहारान्ति भुञ्जते स्म । आइत्य, यौन पानि सानि गृहाणिक आपासमानानि रामोपागन्ति, उपागत्य पार्मस प्रयुक्ता जावा ॥ ० १ ॥ मूलम्-तेणं कालेण तेणं समपण धम्मघोसा नाम थेरा जाव बहुपरिवारा जेणेव चपा नाम नयरी जेणे सुभूमिभागे भूया सकम्मसपउत्ता जाया याति होत्था) आरोर जय परोसा जा चुका-तब उन सबने उसे पाया पीया-और पापीकर जन पे निपट चुके तब उन्होंने फुल्ला आदि कर अपने मुंह का प्रक्षालन किया और हाथों को साफकर वे अपने २ कार्य में लग गये। (तपण तामो माह णीओ होगाओ जार विभूसियाओ त विपुल असण ४ आहारे ति। आहारित्ता जेणेव सयाइ-२ गेहाइ तेणेन उवागच्छति उचागच्छित्सा सम्म सपउत्ताओ जायाओ) इसके बाद उन ब्रमणियोंने जो कि पहिले से ही स्नान कर चुकी थी और अपने. २ शरीर को सुन्दर वेष भूपा से सुसज्जित किये हुए थी, उसाविपुल अशनादिरूप चतुर्विभ आहार को खाया-और खाकर के फिर वे अपने २ वासभवनों में- चली गई-वहा जाकर अपने २ वे सब काममें लग गई ॥ सूत्र १॥ ( तएण ते माहणा,निमिय भुत्तुत्तरागया समाणा आयता, चोक्खा परममुह भूयासम्मसपउत्ता,जाया यानि होत्था) આહાર જ્યારે પીરસાઈ ગયે ત્યારે તેને ત્રણે જમ્યા અને જમી પર વારીને કોગળા વગેરે કરીને હાથ સાફ કર્યા અને હાથ મેં સાફ કરીને તેઓ ત્રણે પિતતાના કામમાં પરવાઈ ગયા (तएण ताओ माहणीओ पहायाओ जाय विभूसियाओ त विपुल असणं आहारित्ता जेणेत्र सयाइर गेहाइ,तेणेव उवागच्छति, उवागच्छित्ता सम्मसपउत्ताओजायाओ) ત્યારબાદ તે બ્રાહ્મણીએ કે જેઓએ પહેલા સ્નાન કરીને પિતાના શરીરને સુદર વોથી શણગાર્યું હતુ-તે પુષ્કળ પ્રમાણમાં બનાવવામા આવેલ અશન વગેરે રૂપ ચાર જતને આધારે કર્યો આહારથી પરવારીને તેઓ પિતા પોતાના વાસભવનમાં જતી રહી અને ત્યાં જઈને તેઓ સર્વે પિતપતાના સામાં પરોવાઈ ગઈ સૂ૦૧૫ मनगारधाम तपरिणी20 WORKERध्यगारचरितवर्णनम् उज्जाणे तेणेव उवागच्छति २ अहापडिरूवं जाव विहरति, परिसा निग्गया, धम्मो कहिओ, परिसा पडिगया, तएणं तेसिं धम्मघोसाणं थेराणं अंतेवासी धम्मरई नाम अणगारे ओराले जाव तेउलेस्से मासं मासेणं खममाणे विहरइ, तएणं से धम्मरूई अणगारे मासखमणपारणगंसि पढमाए पोरिसाए सज्झाय करेइ वीयाए पोरिसीए एव जहा गोयमसा- भी तहेव उग्गाहेइ उग्गाहित्ता तहेव धम्मघोसे थेर आपुच्छइ जाव चपाए नयरीए उच्चनीयमज्झिमकुलाई जाव अडमाणे जणेव नागसिरीए माहणीए गिहे तेणेव अणुपविटे, तएण का नागसिरी माहणी धम्मरुई एज्जमाण पासइ पासित्ता तस्स सालइयस्स बहुसंभारसंभियस्स णेहावगाढस्स तित्त- कडुयस्स पट्ठवणयाए हट्टतुट्ठा उट्टाए उट्टेइ उद्वित्ता जेणेव भत्तघरे तेणेव उवागच्छद, उवागच्छित्ता त सालइय तित्त- कडुय च बहुसभारसभियं णेहावगाढ धम्मरुईस्स अणगा- रस्स पदिग्गहसि सब्वमेव निसिरह, तएणं से धम्मरुई अणगारे अहापज्जत्तमितिकट्ठणागसिरीए माहीए गिहाओ पडिनिक्खमइ पडिनिक्खमित्ताचपाए नयरीए मज्झ मज्झेणं पडिनिक्खमइ जेणेव सुभूमिभागे उज्जाणे तेणेव उवाग- च्छइ, उवागच्छित्ता धम्मघोसस्स अदूरसामते अन्नपाणं पडिलेहेइ पडिलेहिता अन्नपाण करयलसि पडिदमेड़, तएणं ते धम्मघोसा थेरा सालइयाँस जाव नेहारगाढस्स गधेण मालाममेच्या अभिभूया समाणा तओ सालइयाओ जाव नेहावगाढाओ एग बिंदुर्ण गहाय करयलसि आमापइ। तित्तगंसारं कडुय अखज्ज अभोज्जं विसभूयं जाणित्ता धम्मस्इ अणगारं एवं वयासी-जइणं तुमं देवाणुप्पिया! एव सालइय जाव नेहावगाढ आहारेसि तो णं तुम अकाले चेत्र जीवियाओ ववरोविज्जसि, त मा णं तुमं देवाणुप्पिया ! इमं सालइयं जाव आहारहि, मा णं तुम अकाले चेव जीवियाओ वव- रोविज्जेहि, त गच्छ णं तुम देवाणुप्पिया ! इमं सालइयं एगंतमणावाए अचित्ते थडिले परिटवेहि परिहवित्ता अन्न फासुय एसणिज्ज असणंपाण खाइमं साइमं पडिगहित्ता आहार आहारेहि ॥ सू० २ ॥ टीका-'तेण कालेण' इत्यादि । तस्मिन् काले तस्मिन् समये धर्मघोषा नाम स्थविग यावत्-बहुपरितारा.-पहुसाधुपरिवारेण सहिता या चम्पा नाम नगरी, यौव सुभूमिभागमुद्यान तोवोपागच्छन्ति, अत्र 'धर्मघोपा' इति बहु- वचनमादरार्थ प्रयुक्तम् , उपागत्य यथा प्रतिरूप यावन्-अवगहमवगृह्य स यमेन तेण कालेण तेण समएण इलदि। टीकार्थ-( तेण कालेण तेण समएण) उस काल और उस समय में (धम्म बोसा नाम थेरा जाव बहुपरिवारा जेणेव चपा नाम नयरी जेणेव सुभूमिभागे उज्जाणे तेणेच उवागच्छद, उवागाच्छित्ता अहापडिरूव जाव विहरति-परिमा निग्गया, धम्मो करिओ परिसा पडिगया-तण्ण तेसि धम्मघोसाण थेराण अतेवाप्ती धम्मरूई नाम अणगारे ओराले (ते ण कालेण तेण समएणं ) इत्यादि । टी-(तेण कालेण तेण समएण) ते अणे मन त समये (धम्मघोसा नाम येरा जार वहुपरिवारा जेणेर चपा नाम नयरी जेणेच मुभूमिमागे उग्जाणे तेणेव उवागन्छ।, उवागच्छिता आपडिरूव जाप विहरति परिसा निग्गपा, धम्मो कहिओ, परिसापडिगया, वएण तेसि थेराण .
- अपने मनगारधर्मामृतषिणीटी १० १६ धर्मरच्यनगारचरितवर्णनम् तुपसाऽऽरमान भावयन्तो पिरति-पासतेस्म । परिपद् निर्गता धर्गः कथित - धर्मकथा यथिता परिपत् प्रतिगता-धर्मस्था श्रवणानन्तर प्रतिनित्ता । ततः खलु तेषा धमघोषाणा स्थरिणामन्तेवासी धमरुचि मानगारः उदारः प्रधानो यावत् सक्षिप्तविपुल तेजोलेश्या-ससिमा शरीरान्त स कोचिता, रिपुला-अनेकयोजन ममितक्षेत्रस्थित वस्तुदइनसमर्था, तेजोलेशा विशिष्टतपोजन्यलब्धिविशेषो येन सः जाव तेउटेरसे माम मासेण खममाणे विहरइ) धर्म घोष नामके स्थविर यावत् अनेक परिवार से युक्त होकर जहा चपा नगरी, ओर उसमे जहां वह सुभूमिभाग नाम का उन्यान धा वहां आये। वहा आकर के उन्हों ने बरा टहरने के लिये अपने करपानुसार आज्ञा मांगी बाद मे वे वरा सयम और तप से आत्माको भावित करते हुए ठहर गये । चपानगरी के समस्त जन उनको बना ण्य धर्मक्या सुनाने के लिये वहाँ आये। उन्होंने शुतचोरित्र रूप धर्मका उपदेश दिया। उपदेश श्रवण कर परिषद २ स्थान पर पीछे गई । इसके अनन्तर उन धर्मघोष स्थविर के थतेवासी जिन नाम धर्माचि अनागार या बडे उदार प्रकृति के थे विशिष्ट तपस्याओं को किया करते थे-उसके प्रभाव से इन्हें तेजोलेश्या की प्राप्ति हो गई थी और वह तेजोलेल्या इन्होंने अपने शरीर के भीतर सक्षिप्त कर सकती थी इस तेजोलेल्या का यह स्वभाव होता है कि जय वह शरीर मे गहिर निकलती है तो अनेक पोजन प्रमित क्षेत्र में रही हुा वस्तुओ को भस्म कर देती है । नास पण की उपवास रूप तपस्या अंतेवासी धम्मरूई नाम अणगारे ओराले जाव तेउलेस्से मास मासेण सममाण विदरइ ધર્મદેવ નામના સ્થવિર પિતાના ઘણા પરિવારની સાથે જ્યા ચપ નગી અને તેમાં પણ જ્યા તે સુભુમિભાગ નામે Cઘાન હતું ત્યાં આવ્યા ત્યાં આવીને તેમણે ત્યાં રોકાવાની પોતાના આચાર મુજબ આજ્ઞા માગી ત્યાર પછી તેઓ ત્યા પિતાના આત્માને તપ અને સ યમથી ભાવિત કરતા રહેવા લાગ્યા ચ પ નગરીના બધા લકે તેમના વદન તેમજ ધર્મકથા શ્રવણ માટે ત્યાં આવ્યા તેઓશ્રીએ શ્રુતચારિત્ર રૂપ ધર્મ ઉપદેશ આપ્યો ઉપદેશ સાભળીને લે પિતાપિતાના નિવાસ સ્થાને જતા રહ્યા ત્યારપછી ધમાલ રવિના અતિવાસી-જમનું નામ ધર્મચિ અનગર હતું, જે ખૂબ જ ઉદાર પ્રકૃતિના હતા, વિશિષ્ટ તપસ્યા કરતા રહેતા હતા જેના પ્રભાવની એમણે તેરેલા મેળવી હતી અને તેને સ્થાને તેમણે પોતાના શરીરમાં જ સકેચી રાખી હતી આ વેશ્યાના પ્રભાવ આ જાતિને હૈય છે કે જ્યારે તે શરીરની બહાર નીકળે છે ત્યારે પણ એજ સુધીના ક્ષેત્રમાં મૂકેલી વાઓને ભરમ કરી નાખે છે આપની ઉપવાસ રૂપ પસ્યાથી એ २४४ पातापापा अभिभूया समाणा तओ सालइयाओ जाव नेहावगाढाओ एगं बिंदुर्ण गहाय करयलसि आसाएद । तित्तगंसार कडुयं अखज्ज अभोज विसमूयं जाणित्ता धम्मरुइ अणगार एवं वयासी-जइणं तुमं देवाणुप्पिया! एव सालश्य जाव नेहावगाढ आहारेसि तो णं तुमं अकाले चेर जीवियाओ ववरोविज्जसि, तं मा ण तुम देवाणुप्पिया ! इमं सालइय जाव आहारेहि, मा णं तुम अकाले चेव जीवियाओ वव- रोविज्जेहि, त गच्छ णं तुम देवाणुप्पिया ! इस सालइय एगंतमणावाए अञ्चित्ते थडिले परिटवेहि परिदृवित्ता अन्न फासुय एसणिज्ज असणंपाण खाइम साइम पडिगहित्ता आहार आहारेहि ॥ सू० २॥ टीका-तेण कालेण' इत्यादि । तस्मिन् काले तस्मिन् समये धर्मघोषा नाम स्थविग यावत्-पहुपरिनारा.-यहुसाधुपरिवारेण सहिता या चम्पा नाम नगरी, यौव सुभूमिभागमुद्यान वयोपागच्छन्ति, अत्र 'धर्मगोपा' इति बहु वचनमादरार्थ प्रयुक्तम् , उपागत्य यथा प्रतिरूप यावत्-अवगहमवगृह्य स यमेन तेण कालेण तेण समएण इत्यादि । टीकार्य-( तेण कालेण तेण समएण) उस काल और उस समय में (धम्म सा नाम थेरा जाव बहुपरिवारा जेणेव चपा नाम नयरी जेणेव सुभूमिभागे उज्जाणे तेणेय उवागाउद, उवागाच्छित्ता अहापडिरूव जाव विहरति-परिसा निग्गया, धम्मो करिओ परिसा पडिगया-तण्ण तेसिं धम्मघोसाण थेराण अतेवाप्ती धम्मगई नाम अणगारे ओराले ( ते ण कालेण तेण समएण ) इत्यादि । टरी-(तेण कालेण वेण समएण) ते आणे भने ते सभये (धम्मघोसा नाम थेरा जार बहुपरिवारा जेणे चपा नाम नयरी जेणेच मुभूमिमागे उज्जाणे तेणेप आगच्छन, उवागच्छित्ता अहापडिरूव जाप विहरति परिसा निग्गया, धम्मो कहिओ, परिसापडिगया, वएण तेसि - स येराण सारतियपिणी टी० अ० १६ धर्मरच्यनगारचरितवर्णनम् याव-पाया नगर्यामुच्चनीचमध्यमकुलानि यावदटन् यौर नागश्रिया वालण्या पट तत्रापिष्टः। ततः बल सा नागश्री ब्राह्मणी धर्मरुचिमनगारम् एजमानम्-आगच्छन्त 'पश्यति, दृष्ट्वा तस्य ' सालयस्स ' शारदिकस्य तिक्तकटुकस्य-तिक्तस्टुकतुम्म- फ्स्य रहुस भारस भृतस्य स्नेहारगाढस्य 'पट्टवणट्टयाए' प्रस्थापनार्थ परिष्ठा. 'पनाय हप्तृष्टा 'उहाए ' उत्यया-उत्यानक्रिया उत्तिष्ठति, उत्थाय यचैव भक्तगृह वगैवोपागच्छति, उपागत्य तद् शारदिक तिक्तकटुकतुम्बक बहुमभारसभृत स्नेहायगाड मरुचेरनगारस्य 'पडिग्गहसि' पतद्ग्रहे-पात्रे, सर्वमेव 'निसिरह' जिस प्रकार गौतम स्वानो श्री महावीर स्वामी से पूछकर आहार लेने के लिये जाते ये उसी प्रकार इन्होंने वर्मघोप स्थविर से आहार लाने के लिये आज्ञा मागी । आज्ञा प्राप्तकर ये चंपानगरी में उच्च नीच एवं मध्यमकुलो मे भ्रमण करते हुए जहाँ नागश्री ब्राह्मणी का घर या वहां गये । नागो ब्रामगी ने इन्हें ज्योही आते हुए देखा (पासित्ता तस्स सालइयस्स यह सभारसभियस्स हावगाढस्त तित्तकड्डयस्त पट्टवण- ट्ठयाए हह तुट्ठा उहाए उढेइ उहित्ता जेणेव भत्तवरे तेणेव उवागच्छद) त्योहों यह बहुपमार तभृत एव स्नेहावगाढ उसकडवी तुरडीका आहार देने के लिये उत्थान क्रिया द्वारा-उठी-अर्थात् अपने में रही हुई उठने की शक्ति से उठी और हृष्ट तुष्ट होनी हुइ जहां भोजन-गृह था वहा गइ । ( उवामच्छित्ता तं सालइयतित काय च बहुसभार सभिय णेहरा- चगाई पम्मल्याप्त अणगारस्त पडिग्गरसिं सत्यमेव निसिरइ ) वहां સ્વામીને પૂછીને આહાર લાવવા માટે નીકળતા હતા તેમજ તેઓએ પૈણ આહાર લાવવા માટે ધર્મઘોષ સ્થવિરની પાસે આજ્ઞા માગી આજ્ઞા મેળવીને તેઓ ચંપા નીમ ઉચ્ચનીચ અને મધ્યમ કુળમાં ભ્રમણ કરતા જ્યા નાગશ્રી બ્રહ્મ નુ ઘર હતુ ત્યા ગયા નાગશ્રી બ્રહ્મણીએ તેઓને અવિલાયા (पामित्ता तस्म सालइयस्त बहुसभारसभियस्स पोहानागास्त तितकडुयस्त पवणद्वयाए हनुदा उहाए उट्टेइ, उद्वित्ता जेणेव भत्तधरे तेणेव उवांगच्छह ) * ત્યારે તરત જ સરસ વઘારેલો ઘી તરને કડવી તુ બડીને આહાર આપવા માટે ઉત્થાન ક્રિયા વડે ઊભી થઈ એટલે કે પિતાનામાં રહેલી ઊભા થવાની તાકાતથી તે ઊભી થઈ અને હું તેમજ તુષ્ટ થતી જ્યા ભેજનશાળા હતી ત્યાં ગઈ (उआगच्छित्ता व सालइय तिक्तड्डय च बहुमभारसभिय हावगाह प. म्मयस्स अणगारस्स पडिग्गहसि सबमेव निसिरह) बागमपारे तया, मास-त्रिंशदोराप्रात्मकं काल मासेन मास पणेन मामोपासरूपतपः धर्मणा 'खममाणे 'क्षपयन्न्यापयन् विहरति । नन बल म घरचिरनगारो मासक्षपणपारण के प्रथमाया पीमापा 'राजा'मायाय मुत्रपाठप करोति, द्वितीयाया पौरुप्या ध्यानम् बाचिन्तनरूपण्यायनि-करोनि, यया गौतम- स्वामी, तथैव गौतमस्सामीपन तृतीयपौरपी भाजन-सामिपमापति, ममाय भाजनानि 'उग्गाहेइ' अमहावि, जयप यच धर्मघोरस्यचिम्नमोपागाउति, उपागत्य तथैव थीमहावीरस्वामीन गौतमसामिपदेश धर्मयोप स्थपिरमापृउति, से,ये अपने चिंशत अहोरात्रात्मक काल को उस समय व्यतीत कर रहे थे । अर्थात् एक महीने की तपस्या इन्होंने उस समय कर रखे थे- (तएण से धम्मम्इ अणगारे मासयमणपारणगसि पढमा पोरिसीए सज्झाय करेइ पीयारा पोरिसीए एव जहा गोयमसामी तहेव उग्गाहेइ, उगारित्ता तहेव धम्मघोस थेर आपुच्छह, जार चपाए नयरी उच्च नीय मज्झिमकुलाइ जाव अहमाणे जेणे नागसिरीए मारणीय गिहे तेणेव अणुपविहे, तण्ण सा नागसिरी मारणी धम्मस्ड एज्जमाण पासइ) ये धर्मरुचि अनगार मासक्षपण की पारणा के दिनप्रथम पौरुषी में सूत्रपाठ रुप स्वा याय, द्वितीय पौरपी में सूत्रार्य चिन्नन स्प ध्यान और तृतीय पौरुषी मे गौतम स्वामी की तरह वस्त्रपात्रों का प्रमार्जन करते । इस तरह इन्होने तृतीय पौरुपी में बन पात्रो का प्रमार्जन कर अपने पत्रों को उठाया और उठकर ये धर्मघोप स्थविर के पास गये। પિતાના ત્રિશત્ અહોરાત્રાત્મક કાળને તે સમયે પસાર કરી રહ્યા હતા એટલે કે તેઓ તે સમયે એક માસની તપસ્યા કરી રહ્યા હતા (तएण से धम्मरूइ अणगारे मासखमणपारणगसि पढमाए पोरिसीए स ज्झाय करेइ, बीयाए पोरीसए एव जहा गोयमसामो तहेव उग्गाहेड, उग्गाहित्ता तहेब धम्मघोस थेर आपुच्छइ, जाव चपाए नयरीए उच्चनीय मज्झिमकुलाइ जाच अडमाणे जेणेव नागसिरीए माहणीए गिहे तेणेव अणुपनिहे, तरण सा नागसिरी माहणी धम्मरूद एज्जमाण पासइ) ધર્મચિ અનગાર ગૌતમ સ્વામીની જેમ પ્રથમ પિયુષીમાં પાક રૂપ સ્વાધ્યાય, દ્વિતીય પૌમાં સૂવા ચિતન રૂપ ધ્યાન અને તૃતીય પડીમા વસ્ત્ર અને પાનુ પ્રમાર્જન કરતા હતા, માસક્ષપણના પિતાના પારણાના દિવસે પણ તેઓએ તૃતીય પૌરુષોમાં વસ્ત્ર-પિતાનું પ્રમાર્જન કરીને પોતાના પાત્રાને લીધા અને લઈને તેઓ ધર્મઘોષ સ્થવિરની પાસે ગૌતમ
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মাখা स्था, मास:त्रिशदोरानात्मक काल मासेन-मासपणेन मामोपचासरूपतपः पर्मणा 'खममाणे 'क्षपयन् यारयन् विहरति । ततः सलु म धर्मरुचिरनगारो मासक्षपणपारणके प्रथमाया पीमाया 'राम'पाध्याय मुत्रसाठाप करोति, द्वितीयाया पौरुप्या ध्यानम् सूनार्यचिन्तनरूप यायनि-करोनि, पर यया गौतम- स्वामी, तथैव गौतमस्वामी त उनीयपीमाया माजासाणिपमापति, प्रमार्य भाजनानि 'उग्गाहेइ' अपगृहाति, नाटन यत्रा धर्मयोपस्थतियोपागउति, उपागत्य तथैव श्रीमहावीरस्वामीन गौतमस्वामिपदेव धर्मशोष स्थविरमापन्चति, से ये अपने त्रिंशत अहोरात्रात्मक फाल को उम समय व्यतीत कर रहे थे। अर्थात् एक महीने की तपस्या इन्होंने उस समय कर रखे थे- (तएण से धम्ममइ अणगारे मासपमणपारणगसि पढमा पोरिसीए सज्झाय करेइ पीया पोरिसीए एव जता गोयमसामी तहेव उग्गाहेइ, गाहिता.तहेव धम्मघोस थेर आपुच्छ, जान चपारा नयरी उच्च नीय मज्झिमकुलाइ जाव अडमाणे जेणे नागसिरीण मारणीर गिहे तेणेच अणुपविटे, तण्ण सा नागसिरी माहणी धम्मस्इ एज्जमाण पासइ) ये धर्मरुचि अनगार मासक्षपण की पारणा के दिनप्र म पौरुषी में सूत्रपाठ रूप स्वा'याय, द्वितीय पौरपी में सूत्रार्थ चिन्नन स्प ध्यान और तृतीय पौरुपी मे गौतम स्वामी की तरह वसपात्रो श प्रमार्जन करते । इस तरह इन्होंने तृतीय पौरुपी में बन पात्रो का प्रमार्जन कर अपने पत्रों को उठाया और उठकर ये धर्मघोप स्थविर के पाम गये। પિતાના ત્રિશત્ અહરિત્રાત્મક કાળને તે સમયે પસાર કરી રહ્યા હતા-એટલે કે તેઓ તે સમયે એક માસની તપસ્યા કરી રહ્યા હતા (तएण से धम्मरूइ अणगारे मासखमणपारणगसि पढमाए पोरिसीए स ज्झाय करेइ, बीयाए पोरीसए एव जहा गोयमसामो तहेव उग्गाहेइ, उग्गादिचा तदेव धम्मघोस थेर आपुच्छइ, जाव चपाए नयरीए उचनीय मज्झिमकुलाइ जात्र अडमाणे जेयोव नागसिरीए माहणीए गिहे तेणेव अणुपनिटे, तएण सा नागमिरी माहणी धम्मख्इ एज्जमाण पासइ) ધર્મચિ અનગાર ગૌતમ સ્વામીની જેમ પ્રથમ પૌરુષીમાં પાક રૂપ સ્વાધ્યાય, દ્વિતીય પૌથ્વીમાં સ્વાર્થ ચિંતન રૂપ ધ્યાન અને તૃતીય પસીમા વસ્ત્ર અને પાત્રનુ પ્રમાર્જન કરતા હતા, માસ ક્ષપણના પિતાના પાણાના દિવસે પણ તેઓએ તૃતીય પૌરુપીમાં વસ્ત્ર-પિતાનું પ્રમાર્જન કરીને પિતાના પાત્રને લીધા અને લઈને તેઓ ધમ શેષ સ્થવિરની પાસે જેમ ગૌતમ - HTIगी टी० १० १६ धर्मरधनगारवरितवर्शनम् रुचिमनगारमेयमवदन् यदि सल व हे देनोनुमिय । एतद् शारदिकं यावत्- तिक्ताटुकतुम्बा यारत् स्नेहारगाहम् जाहारयसि-आहार करिष्यसि, तर्हि खलु समकाले एव जीविताद् व्यपरोपिष्यसे' एतदशनेन मरणमवश्य प्राप्स्यसीत्यर्थ । वत्-तस्मात् मा खलु त्वं हे देवानुप्रिय ! एतद् शारदिकं यावदाहाग्ग, मा सलु निकल कर चपानगरी के बीचो बीचसे होकर चल दिये सो जहा सुभू- मिभाग नाम का उयान था वहा आ गये | वा आकर वे अपने आ चार्य धर्मघोष स्थविर के पास आये वहा आकर उन्होंने भिक्षामें प्राप्त हुआ आहार बताया और बताने के बाद उस शारदिक कडयी तु पडी के यावत् स्नेहावगाड शाक की गध से अभिभूत होते हुए उन धर्मघोष आचार्य ने उस शारदिक यावत् स्नेहारगाढ शाफ में से एक बिन्दु मात्र को अपने हाथ की हथेली पर रख कर चखा (तित्तग खार कडुय अखज्ज अभोज्ज विसभृयं जाणित्ता धम्मरड अणगार एवं क्यासी -इण तुम देवाणुपिया। एय सालइय जाव ने हावगाह आगरेमि तो ण तुम अकोले चेव जीवियाओ ववरोविज्जसि) चवते ही " यह तिक्त हैं क्षार से युक्त है कटुक है अखाद्य एव अभोज्ज है तथा विपभूत है " ऐसा जानर धर्मरुचि अनगार से उन्होंने ऐमा कहा हे देवानु मिय } यदि तुम शारदिक कडवी तु बडो के पहु सभार सभृत एवं स्नेहारगाढ इम शाक का आहार करोगे-तो निश्चय से विना मृत्यु के નીકળીને ચપા નગરીની વચ્ચેના માર્ગથી પસાર થતા જ સુમિભાગ નામે ઉઘાન હતુ ત્યા આવ્યા ત્યાં આવીને તેઓ પિતાના આચાર્ય ધર્મષ રથરિન પામે આવ્યા અને ત્યાં આવીને તેમણે ભિક્ષામાં પ્રાપ્ત થયેલા આહારને બતાવ્યું અને બતાવીને તે શારદિક કડવી તુ બડીના સરસ વઘારેલા થી તરતા શાકની સુવાસથી અભિભૂત થતા તે ધર્મઘેર આચાયે તે શારીરિક સરસ વઘારેલા ઘી તરતા શાકને હથેળી ઉપર મૂકીને ચાખ્યું ( तत्तग खार कडुय आवज्ज अभोज्न त्रिसभूय जाणित्ता धम्मरूद अगगार एव ग्यासी-जइण तुम देवाणुप्पिया ! एय सालइय जाब नेहारगाढ आहारेसि तो तुम काले घेव जीवियाओ ववरोविज्जसि) તિકત છે, ખારૂ છે, કડવું છે, અખાદ્ય તેમજ અન્ય છે તથા વિભૂત છે” આવુ જાણુને ધર્મચિ અલગારને તેઓએ આ પ્રમાણે કહ્યું કે હે દેવાનુપ્રિય છે જે તમે શારદિક કડવી તુંબડીના સરસ રેલા વીતરતા શાકને આહાર કરશે તે ચોક્કસ તમે કમોતે મરી જશે, ચાખતા જ અને - વધી १४. हाताचार निएजति परिष्ठापयति । ततः गगनगार' 'आपना' यथा पर्याप्तम्-उदरपूर्तपे पूर्णमेतद् इति कना-प्रति मनसि रिमाव्य, नागरिया सामन्या गृहात् प्रतिनिष्कामति-निर्गति मतिनिकम्प पम्पायानगर्या मध्यम पेन प्रति- निष्काम्यति प्रतिनि' कम्य यत्री मुभूमिभागमुयान नवोपाग उति, उपागत्य धर्म घोपस्य स्यनिरस्य 'अरसामन्ते नातिदरे नातिममीपे, जनपान 'पडिलेहे। प्रति लेखयति प्रतिलेरप ननपान करतले पान स्ता मतिदर्शयति। नतःसलु ते धर्म शेषाः स्थविरास्तस्य शारदिकस्य विक्तागुम्बाम्य यापन स्नेटारगादम्य गायेनाऽमि भूतासन्तस्तस्माच्छारदिकाइ यापद् स्नेहारगाढादेक विन्दुक गृहीत्वा करतले कृत्वा आस्वादयति । तिक्तक क्षार पटुकम् अम्पाद्यमभोज्य विपभूत जावा धर्म- जाकर उसने उस शारदिक कढयी तुपसी का पद सभार सभृत एवं स्नेहावगाढ शाक धर्मरचि अनागार के पान में सप का सर डाल दिया (तएण सेधम्मरुइ अणगारे अहापज्जत्तमित्तिकटु णागसिरीए माह- णीए गिहाओ पडिनिक्खमह ) इसके पाद वे धर्मरुचि अनगार " यह उदर पूर्ति के लिये पर्याप्त है " ऐसा मन में समझ कर नागश्री ब्राह्मणी के घर से बाहर निकले पडिपिरामित्ता चपाए नयरीए मज्म मझेण पडिनिक्खमइ, जेणेच सुभूमिभागे उजजाणे- तेणेव उवागाइ, जवागच्छित्तो धम्मघोसस्स अदुरसामते अन्नपोण पडिहेड, पडिले हित्ता अण्णपाण करयलसि पन्दिसेइ, तण्ण से धम्मघोसा थेरा तस्स सालइस्स जाब नेहावगाढस्स गधेण अभिभूया समाणा ताओ साल इयाओ जाव नेहरावगाढाओ एग बिंदुग गहाय करयलसि आसाएइ) ત્યાં જઈને તેણે તે શારદિક કડવી ખૂબડીનુ પૂબ જ સરસ રીતે વઘા રેલું તેમજ ઘી તરતુ શાક લઈ આવી અને ત્યારપછી ધર્મચિ અનગારના પાત્રમાં બધુ નાખી દીધુ (तएण धम्मई अणगारे अहापज्जत्तमित्ति क्१ गागसिरीए महिणीए गिहाओ पडिनिक्खमई) ત્યારપછી તે ધર્મરુચિ અનગાર આ ઉદર પિોષણ માટે પર્યાપ્ત છે ” એવું જાણીને નાગશ્રી બ્રાહ્મણીના ઘેરથી બહાર નીકળ્યા (पडिनिवखमित्ता चपाए नयरीए मप्झ मज्झेण पडिनिरखमइ, जेणेव सुभूमि भागे उज्जाणे-तेणेव उवागन्छ, आगच्छित्ता धम्मघोसस्स अदरसामते अन्न पाण पडिलेहेइ, पडिलेहिता अण्णपाण करयलसि पडिदसइ, तएण से धम्म- घोसायेरा तस्स सालइस्स जाब नेहावगाढस्प्त गघेणं अभिभूया समाणा तो सालइयाओ जाव नेहाचगादाभो एग बिंदुग गहाय मारगी टी० अ० १६ धमरुध्यनगारचरितमानम् रुचिगनगारमेवमवदन् यदि सलु व हे देवोनुप्रिय । एतद् शारदिक यावत्-. विक्तस्टुकतुम्नक यावत् स्नेहारगाढम् पाहारयसि-आहार करिष्यसि, तर्हि खल्ल लमकाले एव जीविताद् व्यपरोपिष्यसे' एतदशनेन मरणमवश्य प्राप्त्यसीत्यर्थ । बत्तस्मात् मा खलु त्व हे देशानुप्रिय ! एतद् शारदिकं गावदाहाग्ग, मा खलु निकल कर चपानगरी के बीचो बीचसे होकर चल दिये सो जहा सुभू- मिभाग नाम का उन्धान था वहा आ गये । वहा आकर वे अपने आ- चार्य धर्मोप स्थविर के पास आये वहा आकर उन्होंने भिक्षामें प्राप्त हुआ आहार बताया और बताने के याद उस शारदिक कडी तुरडी के यावत् स्नेहावगाढ शाक की गध से अभिभूत होते हुए उन धर्मघोष आचार्य ने उस शारदिक यात् स्नेहावगाढ शाफ मे से एक बिन्दुमात्र को अपने हाथ की हथेली पर रख कर चखा (तित्तग खार काय अखज्ज अभोज्ज विसभूय जाणित्ता धम्मरह अणगार एव पयासी -इण तुम देवाणुपिया। एय सालइय जार ने हावगाह आहारेमि तो प तुम अकोले चेव जीवियाओ ववरोविज्जसि ) चयते ही " यह तिक्त हैं क्षार से युक्त है कटुक है अग्वाद्य एव अभोज्ज है तथा विषभूत है " ऐसा जानर धर्मरुचि अनगार से उन्होंने ऐमा कहा हे देवानु मिय ! यदि तुम शारदिक कडवी तु घडी के घनु सभार सभृत एवं स्नेहावगाढ इस शाक का आहार करोगे-तो निश्चय से विना मृत्यु के નીકળીને ચ પ નગરીની વચ્ચેના માર્ગથી પસાર થતા જ સુભૂમિભાગ નામે ઉઘાન હતુ ત્યા આવ્યા ત્યા આવીને તેઓ પિતાના આચાર્ય ધર્મઘોષ વિરની પાસે આવ્યા અને ત્યાં આવીને તેમણે ભિક્ષામાં પ્રાપ્ત થયેલા આહારને બતાવ્યું અને બતાવાને તે શારદિક કડવી તૂ બડીના સરસ વઘારેલા ઘી તરતા શાકની સુવાસથી અભિભૂત થતા તે ધર્મ આચાર્યો તે શારીરિક સરસ વઘારેલા ઘી તરતા શાકને હથેળી ઉપર મૂકીને ચાખ્યું (तत्तग खार कड्डय आवज्ज अभोज्न विसभूय जाणित्ता धम्मरुइ अगगार एवं वयासी-जइण तुम देवाणुप्पिया ! एय सालइय जान नेहारगाढ आहारेसि तो तुम अकाले चेव जीवियाओ ववरोविज्जसि) આ તિકત છે, ખારૂ છે, કડવું છે, અખાદ્ય તેમજ અન્ય છે તથા વિષભૂત છે” આવું જાણુને ધમરુચિ અનગારને તેઓએ આ પ્રમાણે કહ્યું કે હે દેવાનુપ્રિય! જે તમે શારદિક કડવી તૂ બડીના સરસ આહાર કરશે તે ચોક્કસ તમે કમોતે મરી જશે ચાખતા જ वधा ११० PATNA "साकारएर जीरिताद् ग्यपरोल्पामा निगर । नत्रमाद् गन्छ स्वछ त 'हे देवानुपिय । द शारदिक 'एगतमणा' पान्तेऽनापाते एकान्ते 'निर्जनस्थाने, अनापाते-मापात.-सीन्द्रियादिमाणिनां सयोगम्नजिते, अभिनेक जीपरहिते, स्थण्डिले भूमी परितोहि परिष्ठापग, परिष्ठाप्पान्यत् प्रामुकमेपणीय द्वावत्वारिंशदोपरहित, शुदम् -अशनपानखाघस्वायम् मतिगृा माहारमाहारय।०२।। मूलम्-तएणं से धम्मरुई अणगारे धम्मघोसण थेरेणं एवं वुत्ते समाणे धम्मघोसस्स थेरस्स अंतियाओ पडिनिक्संमई, पडिनिक्खमित्ता सुभूमिभागाओ उज्जाणाओ अदूरसामते थडिल्ल मरजानोगे त मा ण तु देवाणुप्पिया । इम'सालय जाप आहारहि मोण तुम अकाले चेर जीवियाओ ववरोविजहि त गच्छण तुम देवाणुप्पिया ! हम सालइयं गगनमणाया अच्चित्ते घडि पडिहवेदि, -परिहवित्ता अन्नं फासुर एसगि असण पाण ग्बाइम साइम पडि गाहेत्ता आहार आगरेहि) इमलिये हे देवानुपिय ! तुम शारदिक कडवी तुबडी के शाफ किसी एकान्न स्थानमें कि जहा होन्द्रियादि प्राणियों को सचरण नहो-और जो अचित्त हो ऐसी भूमि पर परि- ठापना कर आओ। और परिष्टापना करके फिर प्रामुक एपंणीय ४ -४२ दोपो से रहित शुद्ध अशन, पान खाद्य स्बाध रूपमरे आहार को लेकर भोजन कर लो।। सू०२॥ (त माणं तुम देवाणुप्पिया ! इम सालइय जाव आहारेहिमाण तुम अकाले वेव जीवियाओ विरोनिग्नहि त गच्छण तुम देवाणुप्पिया । इम सालक्ष्य एग तमणावाए अचित्ते यडिले 'पडिटरेडि, परिद्वपित्ता 'अ न फासुप एमणिज्ज असणं पाण खाइमें साइम पडिंगाहित्ता आहार आहारेहि ) એથી હે દેવાનુપ્રિયા તમે આ શરદિક તબડીના શાકને ખશે નહિ તેથી અકાળે તમોર મરણ પણ થશે નહિ માટે હે દેવાનુપ્રિય! તમે આ આ શારદિક કડવી ખૂબડીના શાકની કેઈપણ એકાત-નિર્જન સ્થાનમાં કે ન્યા તિનિયાદિ પ્રાણુઓનું સચરણ હોય નહિ અને જે અચિત હોય એવી ભૂમિ " ઉપર પરિછાપના કરી અને પરિબાપન કર્યા બાદ પ્રાસુક એષણીય ૪૨ થી ૨હિત શુદ્ધ અશન, પાન, ખાદ્ય-વાદ્ય રૂપ બને 'આહાર લાવી તે આહાર ગ્રહણ કરે. સત્ર mm अनगारधर्मामुतषिणी टीका० अ० १६ धर्मरुध्यनमारचरितवर्णनम् पडिलेहेइ, पडिलेहिता तओ सालाइयाओ, एग- विदुग गहेइ गहित्ता थंडिलंसि निसिरइ तो णं तस्स सालइयस्स तितक्डु- यस्रा बहुने हावगाढस्स गंधेण वहूणि पिपीलिगासहस्साणि पाउ- भूयाइ जा जहा य णं पिवीलिका आहारेइ सा तहा अकाले चेव जीवियाओ ववरोविज्जइ तएणं तस्स धम्मरुइस्स अणगा- रस्स इमेयारूवे अज्झस्थिए ५ जाव ताव इमस सालइयस्स जाब एगंमि विंदुगंमि पक्खित्तमि अणेगाई-पिपीलियासहस्साई ववरोविज्जति तं जइ णं अह एय सालइय थडिलसि सव्व निसिरामि तएणं बहूण पाणाणं ४ वहकारणं भविस्सइ, त सेय खल्लु ममेय सालइय जावगाढ सयमेव आहारेत्तए, मम चेव एएणं सरीरेणं णिज्जाउत्तिकट्ठ एव संपेहेइ सपेहित्ता मुह- पोत्तिय पडिलेहेइ, पडिलेहित्ता ससीसोवरियं काय पमज्जेइ२ तं सालइय तित्तकडुयं बहुनेहावगाढ विलमिव पन्नगमूनणं अ- प्पाणेणं सव्व सरीरकोटसि पक्खिवइ, तएणं तस्स धम्मरुइस्स त सालक्ष्य जाव नेहावगाढ आहारियस्स समाणस्स मुहुत्ततरेण परिणममाणसि सरीरगंसि वेयणापाउन्भूया उज्जला जाव दुरहि- यासा, तएण से धम्मरुची अणगारे अथामे अवले अवीरिए अपुरिसकारपरकमे आधारणिज्जमितिकटु आयारभड़ग एगंते ठवेइ ठवित्ता थडिल्ल पडिलेहेइ, पटिलहिता दभसथारगं संथारेइ सथारित्ता दव्भसंथान्ग दुरूहइ, दुरूहिता पुरस्थाभि- मुहे सपलियकनिसन्ने करंयलपरिग्गहिय एव वयासी-नमोऽत्थ -- १ wanadam "वाकालएकजीविना प्यपरोप्यायमा नियस्ता समस्माद् गन्छ खलु त 'है देवानुपिय । हद शारदिक 'पगतमणा' पातेऽनापात एकान्ते- निर्जनस्थाने, अनापाते-मापात:-दीन्द्रियादिप्राणिना सयोगस्तद्वनिते, अभिने- 'जीपरहिते, स्पण्डिले भूगी 'परिद्वोदि परिष्टापय, परिष्टाप्यान्यत् प्रारकर्मपणीय द्वाचत्वारिंशदोपरहित, शुदम्-अशनपानखापसायम् मतिगृा आहारमाहारयाम्०२॥ मूलम्-तएण से धम्मरुई अणगारे धम्मघोसेण थेरेण एवं वुत्ते समाणे धम्मघोसस्स थेरस्स अतियाओ पडिनिक्खमई, पडिनिक्खमित्ता सुमृमिभागाओ उज्जाणाओ अदूरसामते थडिल्ल मरजाओगे-(तमा ण तु देवाणुप्पिया । इम'सालय जाव आहारेहि मा ण तुम अकाले चेर जीचियाओ ववरोविजहि त गच्छण तुम 'देवाणुप्पिया 1 इम सालइय एगतमणावा अच्चित्ते घडि पडिट्ठवेदि, परिद्ववित्तो अन्न फाय एसणिज्ज असण पाण म्वाइम माइम पडि गाहेत्ता आहार आहारेदि) इमलिये हे देवानु प्रिय ! तुन शारदिक कडवी तुयडी के शाक किसी एकान्त स्थानमें कि जरा दोन्द्रियादि "प्राणियोको सचरण नहीं और जो अंचित हो ऐसी भूमि पर परि- ष्ठापना कर आओ। और परिष्टापना फरके फिर सुक एपीय ४ ४२-दोपो से रहित शुद्ध अशन, पान खाद्य स्वाध रूप दमरे आहार को लेकर भोजन कर लो॥ सू०२।। ('त माणं तुम देवाणुप्पिया ! 'इम सालइय जाव आहारहि माण तुम अकाले वेव जीवियाओ ववरोविजहि त गच्छण तुम देवाणुप्पिया इम सालइय एग तमेगावाए अञ्चित्ते यडिले पडिट्ठीहि, परिद्वपित्ता अन फासुप एमगिज्ज असणं पाण खाइम साइम पडिगाहिंता आहार आहारेहि ) એથી હે દેવાકિય! તમે આ શરદિક તુળના શાકને ખાશો નહિ તેથી અકાળે તમાંરૂ મરણ પણ થશે નહિ માટે હે દેવાનુપ્રિય! તમે આ શારદિક કડવી તુંબડીના શાકની કેઈપણ એકાત-નિર્જન સ્થાનમાં કે જ્યાં દિનિયાદિ પ્રાણીઓનુ સચરણ હોય નહિ અને જે અચિત હોય એવી ભૂમિ પર પરિણાપના કરે અને પરિણાપના કર્યા બાદ પ્રાણુક એષણીય જર દેથી રહિત શુદ્ધ’અશન, પાન, ખાદ્ય-રંવધિ રૂપ બીજો 'આહાર લાવી તે मालार म . ॥ २ ॥३॥ . Ple - ममगारधर्मामृतषिणी टी० अ० १६ धर्म रुच्यनगारचरितनिरूपणम् तिक्तकटकस्य तुम्नकस्य बहुसमारसभ्रवस्य स्नेहावगाढस्य गन्धेन बहूनि पिपीलिका- सहस्राणि मादुर्मूतानि, या यथा च 'ण' त-गारदिकस्य विक्तकटक तुम्बकस्य विन्दुक पिपीलिका आहरति, सौ तथा अफाले एव "जीवियागो ववरोपिज्जइ' जीविताद् व्यपरोप्यते-माणेभ्यो वियुज्यते म्रियते' इत्यर्थः, ततः ग्वल-पिपी लिकाविराधनमवलोक्य धर्मरुचेरनगारस्यायमेतद्रूप वक्ष्यमाणस्वरूपः आध्या मिका-५ यात्मगतः चिन्तितः स्मरणरूपः, मार्यिता अभिलापरूपः, कल्पिता फ्ल्पनारूपः, मनोगता अन्तः प्रकाशितः सकल्पो विचारः समुदपधत यदि तावदस्य शारदिकस्य यावत्-तिक्त तुम्बकस्य एकस्मिन् रिन्दुके प्रक्षिप्ते सति. अनेकानि पिपीलिकासहस्राणि 'वपरोपिज्जति' व्यपरोप्यन्ते-माणेभ्यो वियुज्यते नियन्ते । स्स पहनेहायडाढस्स गधेण पहणि पिपीलिगासहस्साणि पाउन्भूयाइ जा जहायण पिपीलिका आहारे सातहा अकाले चेव जीवियओ ववरो विज्जइ) और आकर के उन्होंने सुभूमिभाग उद्यान से न अतिदूर और न अति समीप भूमि की मतिळेखना की। प्रतिलेखना करके फिर उन्होंने उस शारदिक-तिक्तकटु-तुबडी के शाक में से एक बिन्दुमान शोक लिया और लेकर उसे भूमि पर डाल दिया। तो इतने में ही शारदिक तिक्तकडवी तुयही के उस यहुस्नेहाचगाढ शाफ की गध से वहा हजारों कीडिया एकही एकत्रित हो गई । उनमें से जिस कीढ़ीने जिस समय उसे खाया यह कीडी उसी समय वहां मर गई । (तएणं तस्स घम्मरुइयस्स अणगारस्स इमेयारूवे अज्झथिए ५-जह ताव इम- रस सालइयस्स जाय एगमि विन्दुमि पक्खित्तमि अणेगाइ पिपीलिया सहस्साणि पाउन्भूयाइ जा जायण पित्रीलिका आहारेइ सा तदा अकाले व नीमियाओ ववरोविज्जइ) અને આવીને તેમણે સુબમિભાગ ઉદ્યાનથી વધારે દૂર પણ નહિ અને વધારે નજીક પણ નહિ એવા સ્થાને ભૂમિની પ્રતિલેખના કરી પ્રતિલેખના કરીને તેઓએ તે શારદિક-તિત કડવી તૂ બડીના રાકમાથી એક ટીપા જેટલું શાક લીધું અને લઈને તે ભૂમિભાગ ઉપર નાખી દીધું નાખતાની સાથે જ ત્યા શારદિક તિક્ત-કડવી તગડીને ઘી તરતા શાકની સુવાસથી હજારે કીડીએ એકઠી થઈ ગઈ એમાંથી જે જે કીડીએ તે શાકને ખાધું હતું તે તે તરતજ ત્યા મરી ગઈ तएण तस्स धम्मरदयस्स अणगारए इमेयारूचे अज्झस्थिए ५ जइ ताव इम. स्स माल मि बिंदुगमि परिखचम्मि अणेगाइ पिपीलिया सहस्साह माताधर्मकपाल णं अरहताण जार संपत्ताणं, णमोऽत्थु णं धम्मघोसाणं थेरार्ण मम धम्मायरियाण धम्मोवएसगाणं, पुस्विपि णं मए धम्म घोसाणं थेराण अतिए सव्वे पाणाइयाए पञ्चरसाए जावजीवाए जाय परिग्गहे, इयाणिपि ण अह तेसिं चेव भगवंताण अंतियं सव पाणाइवाइ पञ्चरसामि जाव परिग्गह पच्चासामि जाव- जीवाए, जहा संदओ जाव चरिमेहि उस्सासेहि वोसिरामिति- कटु आलोइयपडिक्ते समाहिपत्ते कालगए ॥ सू० ३ ॥ टीका-तत खलु स धर्मरुचिरनगारो धर्मघोपेण स्थरिरेणैवमुक्त. सन् धर्म घोपस्य स्थविरस्यान्तिका-समोपात् प्रतिनिष्कामति, प्रतिनिरम्य सुभूमिभागो द्यानाद् अदूरसामन्ते-नानिदरे नातीसमीपे स्थण्डिल मतिलेपयति, पतिलेख्य तत स्माद् शारदिकात् निक्तकदुगत् तुम्गदेक पिन्दुक गृह्णाति, वृहीत्वा स्थण्डिले भूमो 'निसरइ' निसजतिपरिष्ठापयति । ततः खलु तस्य शरदिकस्य तएण से धम्मरुई अणगारे इ यादि । टीकार्थ-( तण्ण ) इसके बाद ( से धम्मरुई अणगारे धम्मघोसे ण थेरेण एव वुत्ते समाणे धम्मघोसस्त थेरस्स अनियाओ पटिनिम्ग्वमइ) वे धर्म रुचि अनगार धर्म घोप से इस प्रकार कहे जाने पर वर्नघोप के पास से चले आये (पडिनिकग्वमित्ता सुभूमिभागाभो उजाणाओ अदर सामते थडिल पडिलेहेह,पडिलेरित्ता नओ सालइयाओ एग बिंदुग गहेत, गरित्ता थडलसि निसिरह, तो ण तस्स सालइयस्स तित्त डुय: त एण से धम्मरूई अणगारे इत्यादि टीर्थ-(त एण) त्या२५छ। ( से धम्मलई अणगारे धम्मघोसेग थेरेण एव बुत्ते समाणे धम्मघोसस्स थेरस्स अतियाो पडिनिरखमइ) તે ધર્મરુચિ અનુગાર ધમષની આ વાત સાંભળીને તેમની પાસેથી . . આવતા ૨હ્યા (पडिनिस्खमित्ता मुभूमिभागाओ उज्जाणाओ अदूरसामते वडिल पडिले. हेड, पडिलेहिता तो सालइयाओ एग बिंदुग गहेइ, गहित्ता थडिलमि निसरइ, तो ण तस्म सालइयस्स तित्तकडुयस्स वहुनेहारगाढस्स गधेण : पिनी लिगा जनगारधर्मामृतषिणी टी० अ० १६ धर्मरुच्यनगारचरितनिरूपणम् १.१५३ तिक्तकदुकस्य तुम्बकस्य बहुसमारसंभृतस्य स्नेहावगाढस्य गन्धेन वहूनि पिपीलिका- सहस्राणि पादुर्भूतानि, या यथा च 'ण' त-शारदिकस्य तिक्तकटुक तुम्बकस्य विन्दुकं पिपीलिका आहरवि, सो तथा अकाले एव जीवियाओ ववरोविज्जई जीविताद् व्यपरोप्यते पाणेभ्यो वियुज्यते 'नियते' इत्ययः, ततः खल्ल-पिपी लिकाविराधनमवलोक्य धर्मरुचेरनगारस्यायमेतद्रूप वक्ष्यमाणस्वरूपः आध्या स्मिका-५ यात्मगतः चिन्तितः स्मरणरूपः, मार्यिता अमिलापरूपः, कल्पिता कल्पनारूपः, मनोगता अन्तः प्रकाशितः सकल्पो विचारः समुदपधत यदि तावदस्य शारदिकस्य यावत्-तिक्त तुम्बकस्य एकस्मिन् पिन्दुके प्रक्षिप्ते सति, अनेकानि पिपीलिकासहस्राणि 'ववपरोविज्जति' व्यपरोप्यन्ते-माणेभ्यो वियुज्यते म्रियन्ते । स्स पहनेहायडाढस्स गधेण पट्टणि पिपीलिगासहस्साणि पाउन्भूयाइ जा जहायण पिपीलिका आहारे सातहा अकाले चेव जीवियओ ववरो विज्जइ ) और आकर के उन्होंने सुभूमिभाग उद्यान से न अतिदूर और न अति समीप भूमि की प्रतिलेखना की। प्रतिलेखना करके फिर उन्होंने उस शारदिक-तिक्तकटु-तुपडी के शाक में से एक बिन्दुमात्र शोक लिया-और लेकर उसे भूमि पर डाल दिया। तो इतने में ही शारदिक तिक्तकडवी तुबडी के उस पहुस्नेहावगाढ शाफ की गध से वरा हजारों कीडिया एकट्ठी-एकत्रित हो गई । उनमें से जिस कीड़ीने जिस समय उसे खाया यह कीडी उसी समय वहां मर गई । (तएण तस्स घम्मरुइयस्स अणगारस्स इमेयारुवे अज्मथिए ५-जह ताव इम- रस सालइयस्स जाव एगमि बिन्दुगमि पक्खित्तमि अणेगाइ पिपीलिया सहस्साणि पाउन्भूयाइ जा जायण पिवीलिका आहारेइ सा तहा अकाले घेव नीरियाओ ववरोविज्जइ) અને આવીને તેમણે સુબમિભાગ ઉદ્યાનથી વધારે દૂર પણ નહિ અને વિધારે નજીક પણ નહિ એવા સ્થાને ભૂમિની પ્રતિલેખના કરી પ્રતિલેખના કરીને તેઓએ તે શારદિક-તિત કડવી તુંબડીના શાકમાથી એક ટીપા જેટલું શાક લીધુ અને લઈને તે ભૂમિભાગ ઉપર નાખી દીધું નાખતાની સાથે જ ત્યા શારદિક તિકત-કડવી તુંબડીના ઘી તરતા શાકની સુવાસથી હજારે કીડીઓ એકઠી થઈ ગઈ એમાંથી જે જે કીડીએ તે શાકને ખાધું હતું તે તે તરતજ ત્યા મરી ગઈ तएण तस्स धम्ममइयास अणगारस्ए इमेयारूचे अज्झथिए ५ जइ ताव इम. स्स सालडयम्म जाब एगमि बिंदुगमि पक्खिक्षम्मि अणेगाइ पित्रीलिया संहस्साइ - - . बदन्तस्माद् यदि खल्वहमेता गारदिक 'थंडिलंसि' स्थण्डिखे-भूमौ सर्व 'निसिरामि' निराजामि-परिष्ठापयामि, 'तोण 'खिलु यहां माणाना- माणाः सन्त्येपामिति माणा पाणपन्तस्तेपा, उपाभूताना जीवाना वतन्तस्माद् श्रेया श्रेयस्कर खलु ममेदं शारदिफ तिक्तरुटुकालायुकं यात्-स्नेहारगाढ स्वय- मेव आहारयितु-भोवतुम् , ममेर 'एण्ण' एतेन-तिक्तनुम्यकाबारेण ' सरीरेष शरीर खल 'णिज्जाउ' निर्यात-निर्गनु नश्यतु 'तिम्' इति कृत्वा इति मनसि निघाय एवम् भनेन प्रकारेण सप्रेसते-पुनः पुनर्विचारेण शरीरनिर्याण कन सहस्साई चवरोविति, त जइणं अह एय सालइय घडलसि सन्ध 'निसिरामि तएण पठुण पाणाण ४ वह कारण भविस्सह त सेय स्खल ममेय सालइय जाव गाढ सयमेव आहारेराए) इस तरह पिपीलिकाओ 'की विराधना ,देखकर धर्मरूचि अनगार को इस प्रकार आध्यात्मिक यावत् मनोगत सकल्प-विचार हुआ-यहा सफरपके चिन्तित, प्रार्थित, कल्पित इन तीन विशेषणों को ग्रहण कर ने के निमित्त सत्र में ५ का अक दिया है । जय इस शारदिक तिक्त कडवी तुपडी की शाक की * एक बिन्दु मात्र जमीन पर डालने पर अनेक पिपीलिका सरस्र प्राणों से वियुक्त हो जाती हैं तो मै जथ इस शारदिक तिक्त कडवी तुबी के शाकको पूरेरूपमें जमीन पर परिष्ठापित कर दंगा तो अनेक प्रणियों? के वह विराधना का कारण होगा इसलिये मुझे उचित है कि मैं ही इस शारदिक तिक्त कडवी तुबडी के इस पटुत मसालेदार एव स्नेहा षगाढ बहुत धृतसे युक्त शाक को स्वय आहार कर जाऊँ । (मम वेव एएण सरीरेण णिज्जाउत्तिकटु एवं सपेहेइ सपेहिता मुहपोत्तिय २ ववरोविज्जति, त जइण अह एय सालइय थडलसि सव्वं निसिरामि तएणं बहुर्ण पाणाण४वह कारणं भविस्सइ त सेय खलु ममेय सालय जाव गाढ सयमेव आहारत्तए આ પ્રમાણે કીડીઓની વિરાધના જોઈને ધર્મચિ અનગારને આ જાતને આધ્યાત્મિક ચાવત્ મનોગત સક૫-વિચાર-ઉદુભ અહીં સકલ્પના ચિંતિત, પ્રાર્થિત, કલ્પિત આ ત્રણે વિશેષણના ગ્રહણ માટે સૂત્રમા પન અક આપ વામાં આવ્યું છે કે જ્યારે આ શારદિક તિકત કડવી તૂ બડીના શાકના ફક્ત એક ટીપાને પૃથ્વી ઉપર નાખવાથી ઘણી કીડીઓ હજારે પ્રાણથી વિયુકત થઈ જાય છે ત્યારે હુ શારદિક કડવી તુ બડીને બધા શાકને પૃથ્વી ઉપર નાખીશ ત્યારે તે અનેક પ્રાણીઓ ૪ ની વિરાધનાનું કારણ થશે એથી મને એજ યોગ્ય લાગે છે કે હું આ શારદિક તિક્ત કડવી તુંબડીના આ સરસ મસાલાવાળા અને ઘી તરતા શાકને પોતે જ ખાઈ જા - ।
मनगारधर्मामृतषिणी टी० म० १६ धमरच्यनगारचरितवर्णनम् निश्चिनुते । सप्रेक्ष्य- मुहपोत्तिय ' मुखपोत्तिका-सदोरकमुखस्त्रिका रजोहरणं च मतिलेखयति, पतिलेख्य 'ससीसोरिय' सशीपोपरिक-चरणतलाद् मस्तकोपरि- मागर्यन्त काय-शरीर, 'पमज्जेह' प्रमार्जयति, प्रमायं तद् शारदिक तिक्तकटुक रहुसमारस भृत स्नेहावगाढ विलमिव पन्नगभूतेन आत्मना सबै शरीरकोष्ठ के उदरे प्रक्षिपति मुखस्य पार्थद्वयस्पर्शरहितमाहारयतीत्यर्थः । ततः खलु तस्य धर्मरुचेस्तद् पडिलेहेड, पडिलेहित्ता ससीसोवरिय काय पमज्जेइ पमजित्ता तं सा- लक्ष्य तित्तकड्डय वहुनेहावगाढ विलमिव पनगभूएण अप्पाणेण सर्च सरीरकोसि पक्खिवह) मेरा ही शरीर इस तिक्त कटु तुबडी के आरार से नाश होवे इस प्रकार उन्होंने अपने मनमें बार २ सोचा सोचकर अपने शरीर के निर्याण करने का उन्होंने निश्चय कर लिया। निश्चय करने के अनन्तर सदोरक मुखवत्रिका एव रजोहरण इनकी उन्होने प्रतिलेखना करके फिर वे चरण तल से लेकर मस्तकोपरिभाग पर्यन्त तक के समस्त अपने शरीर की प्रमार्जना करके उन्होंने उस शारदिक तिक्त कडवी तुयडी के बहुत मसाला से युक्त एव स्नेहावगाढ घी से युक्त समस्त शाक का आहार कर लिया-जिस प्रकार सपे जय यिल में प्रविष्ट होता है तम बिल के दोनों पर्श्वभागों को सर्श नहीं करना हुआ उसमें सोधा प्रविष्ट हो जाता है-उसी तरह वह शाक रूप सर्प भी मुख रूप पिल के दोनों पार्श्वभागों को स्पर्श नहीं करता हुआ सीधा गले से होकर पेट में चला गया । (तएणं तस्स (मम चेव एएण सरीरेण णिज्जाउत्ति कटु एव सपेहेइ, सपेदिता मुहपो- त्तिय २ पडिलेहेई, पडिलेहिता ससिसोवरिय काय पमज्जेइ पमज्जित्ता त सालय तित्ताड्डय बहुनेहावगाढ विलमिव पन्नगभूएण अप्पाणेणं सब सरीर कोसि पक्खिबई) મારૂ શરીર જ આ તિત કડવી તૂ બડીના આહારથી નષ્ટ થાય આ રીતે તેણે પિતાના મનમાં વાર વાર વિચાર કર્યો વિચારીને પિતાને શરીરને ન કરવાને તેમણે મક્કમ વિચાર કર્યા બાદ તેણે સદરક મુખવસ્ત્રિકા અને ર- હરણની તેમણે પ્રતિલેખન કરી પ્રતિલેખના કરીને તેમણે પગના તળિયાથી માંડીને મસ્તક સુધીના પિતાના આખા શરીરની પ્રાર્થના કરી ત્યારે તેમણે તે શારદિક તિકત કડવી ખૂબડીના સરસ મસાલાવાળા અને ઉપર ઘી તરતા બધા શાકને આહાર કરી લીધે જેવી રીતે સાપ જ્યારે દરમાં પ્રવેશે છે ત્યારે દરના બને પાર્શ્વભાગને સ્પર્શ કર્યા વગર તેમાં સીધે પ્રવિણ થઈ જાય છે તેમજ તે શાક રૂપી સાપ પણ મુખ રૂપી દર બને પાશ્વભાગને ર્યા વગર સીધું ગળામાં થઈને પેટમાં જતું રહ્યું बहुत - - यत्तस्माद् यदि सत्वहमेत गारदिक 'डिलसि' स्पण्डिसेम्भूमौ सर्व 'निसिरामि 'निएनामि-परिठापयामि, 'तो'रिलु यांना प्राणाना- पाणाः सन्त्येपामिति माणा-माणपन्तस्तेपा, वयाभूतानां जीवानां तत्-तस्माद् श्रेया श्रेयस्कर खलु ममेदं शारदिक विक्तपदकालापुर यात्-स्नेहारगाढ स्वय- मेव आहारयितु-भोवतम् , ममेर ' पण्ण' एतेन-तिक्तनुम्पकाहारेण ' सरीरंग शरीर खलु 'णिज्नाउ' निर्यात-निर्गनु नश्यतु 'ति' इति कृत्वा इति मनसि निधाय एवम् अनेन प्रकारेण सप्रेसते-पुन पुनर्विचारेण शरीरनिर्माण गर्नु सहस्साई ववरोविज्जति, त जाणं अहं एय सालय धंदलसि सम्म 'निसिरामि तएण पष्टुण पाणाण ४ घर कारण भविस्सह त सेय खल ममेय सालइय जाव गाढ सयमेव आहारेशण) इस तरह पिपीलिकाओ ' की विराधना देखकर धर्मरूचि अनगार को इस प्रकार आध्यारिमक यावत् मनोगत सकल्प-विचार हुआ-यहा सफरपके चिन्तित, प्रार्थित, कल्पित इन तीन विशेषणों को ग्रहण करने के निमित्त सूत्र में ५ का अक दिया है । जय इस शारदिक तिक्त कडवी तुवडी की शाक की 'एक बिन्दु मात्र जमीन पर डालने पर अनेक पिपीलिका सरस प्राणों से वियुक्त हो जाती हैं तो मैं जय इस शारदिक तिक्त कटची तुषी के शाकको पूरेरूपमें जमीन पर परिष्टापित कर देंगा तो अनेक प्रणियों? के वह विराधना का कारण रोगा इसलिये मुझे उचित है कि मैं ही इस शारदिक तिक्त कडवी तुबडी के इस यात मसालेदार एव स्नेहा षगाढ बहुत धृतसे युक्त शाक को स्वय आहार कर जाऊँ । (मम घेव एएण सरीरेण णिज्जाउत्तिकटु एवं सपेहेइ सपेहिता मुहपोत्तिय २ ववरोविज्जति, त जहण अह एय सालइय थडलसि सव्व निसिरामि तएणं बहुणं पाणाण४वह कारणं भविस्सइ त सेय खलु ममेय सालइय जाव गाढ सयमेव आहारेत्तए આ પ્રમાણે કીડીઓની વિરાધના અને ધર્મચિ અનગારને આ જાતને આધ્યાત્મિક યાત્ મને ગત સકલ્પ-વિચાર-ઉદ્ભવ્ય અહીં સકલ્પના ચિંતિત, પ્રાર્થિત, કલ્પિત આ ત્રણે વિશેષણના ગ્રહણ માટે સૂત્રમાં ૫ને અક આપ વામાં આવ્યું છે-કે જ્યારે આ શારદિક તિકત કડવી ખૂબડીના શાકના ફકત એક ટીપાને પૃથ્વી ઉપર નાખવાથી ઘણી કીડીઓ હજારે પ્રાણથી વિયુકત થઈ જાય છે ત્યારે હુ શારદિક કડવી તુંબડીના બધા શાકને પૃથ્વી ઉપર નાખીશ ત્યારે તે અનેક પ્રાણીઓ ૪ ની વિરાધનાનું કારણ થશે એથી મને એજ ચગ્ય લાગે છે કે હું આ શારદિક તિકત કડવી તુંબડીના આ સરસ મસાલાવાળા અને ઘી તરતા શાકને પોતે જ ખાઈ જાઉં ।
- , . अनगारपर्मामृतपणा टीका २० १६ धर्मरुच्यागाररितवर्णनम् मित्यर्थः, एकान्ते पाषा, स्वापरित्या पण्डिल रातार नि प्रतिवर्यात, प्रतिलेख्य दर्गव स्वाक सथारेइ सस्तृणातिमात्तृत गति सस्तीय, दर्भ- सस्तारक द्रोदनिबारोदति, दूध पौरस्त्याभिमुख पूर्वदिगभिमुरम , मपलियं- कनिमन्ने 'सपल्पक निपणापमासनमनिषि, रालपरिवीत-मोजिरहस्त तलद्वय मोऽवलिंदला एव गमागप्रमाण जामीन-त्वमास्युक्तवान् , नमोऽत्युग अग्रताण नाव सपत्ताण,- -मोऽत्युण धम्मघोसाण राग मम मायरियाग यम्मोवएमयाण" नमोऽस्तु सलु ाईदयो भगवइयो पात् ममाप्य, नमोस्तु खल धर्मशेषेभ्यः स्थगिरेभ्यो मम धर्माचार्य यो पोपडेग के य., पूर्वमपि दीक्षागरण कालेऽपि खलु मया पर्मयोपागा स्थविराणामन्ति के सर्व भागातिपात प्रत्यारपातो यामीव यावत् परिग्रहः' अत्र यावच्छन्देन-सपो मृपावाद सर्वमदत्तादान मर्च मैथुन च पत्यार यातम् , तपा-गर्व. परिग्रह' प्रत्यारपात । इदानीमपि राठ नह तेपामेव भगवतामन्ति के पापागानिपानं प्रन्यायामि या त् परिगल शास्यामि याव प्रतिलेखना की प्रतिलेखना करके फिर उसके ऊपर उन्होने दर्णस- स्तारक को चिच्या-पिकाकर फिर वे उसपर बैठकर तिर पूर्वदिशा की और मुखकर पर्यशामन से उस पर विराजमान हो गये विराजमान होकर उन्होंने अपने दोनो हाथों को जोड़ा ओर मस्तक पर उसकी अजलि रम्बार इस प्रकार अपने मन ही मन वे करने लगे- (नमोत्थुण अरिहताण जाय सत्ताण, णमोत्युण धम्मघोसाण थेराण मम धम्मायरियाण मम्मोवगागाग पुलिपि ण म चम्मचोयाण थेराण भतिए सव्ये पागाइया पच्चरबार जायजीका जार परिग्गहे श्याणि अह तेसिचेन भगवताण अतिय सम्ध पाणाइवा पन्चक्खामि जाव ભાડાને-વઝ પાત્ર વગેરેને એકાંતમાં મૂકી દીધા મૂકયા બાદ તેઓએ સસ્તા ૨ક ભૂમિની પ્રતિલેખના કરી પ્રતિલેખન કરીને તેની ઉપર તેમણે દર્ભ સસ્તા રક કર્યો દર્ભસસ્તારક પાથરીને તેઓ તેની ઉપર બેસીને પૂર્વ દિશા તરફ મુખ કરીને પર્ય નાસનથી તેની ઉપર વિરાજમાન થઈ ગયા વિરાજમાન થઈને તેઓએ પિતાના બંને હાથને જોડયા અને તેમની આ જલી બનાવીને મસ્તક પર મૂકી અને પિતાના મનમાં જ કહેવા લાગ્યા (नमोत्यु ण जरि ताण जाय गपचाण णमोत्थुण धम्मघोसाण थराण मम धम्मायारियाण धम्मोत्रएसगाण पुब्धि पि ण मए धम्मघोसाण थेराण असिए सब्द पच्चरवाए जान जीपाए जाव परिगहे, इयाणि पि अह वेसिं चेव पि .
-- शारदिफ यावत्-स्नेहारगाढम् आहारिगस्ग-मुक्तता, सो मुन्तिरेण परिण- म्यमानेमाहारे परिणाम प्राप्ते सति शरीरे वेदना प्रादुर्भुता, सा कीशी ? त्या- उज्ज्वला तीवा, यारर 'दुरहियासा' दुरध्याताम्रधिसा-अमचयर्थः । ततः खलु स धर्मरुचिरनगारो ऽस्थामा, टीनपराममः, अाला मनोपलरहितः वीर्य:- हतोत्साहः अपुरुषकारपराममा, पुरुषार्थदीनः, 'अधारणिज्जमितिका अधार पणीयमिति कत्या-धारयितुमचस्पमिद शरीरमितिमनमि रिचार्य 'भायारमडग आचारभाण्डकम्-आचागय आचारपानार्य माण्डया-माण्ठोपकरणं वस्त्रपात्रादिक अम्मरुहस्स त सालइय जाव नेहायगाद आहारियस्म ममाणस्स मुहत्त तरेण परिणममाणसि सरीरगंमि पेयणा पाउन्भूया उबलो जाव दूर- हियासा-तण से धम्ममई अणगारे अथामे अपले अवीरिए अपुरिस कमारपरकमे अधारणिज्जमित्ति कटु अपारभडग गते ठवेह, ठवि ता यडिल्ल पडिलेहेइ, पडिलेरित्ता दभसधारग सथारेइ, सधारिसा दभप्तधारग, दुरुहह, दुरुहिता पुरत्याभिमुहे सरलियकनिसन्ने कर- यल परिग्गहिय एवं चयासी) शाक उन धर्ममचि अनगार के पेट में पहुँचते ही एक मुहर्त के बाद जय वह पचने लगा तय उनके शरीर में उज्ज्वल यावत् दुरधिध्यास वेदना प्रकट हुई । इस से वे धर्मरुषि अनगार पराक्रम से हीन, मनोयल से विहिन, हतोत्साह होकर पुरु पार्थ रहित यन गये । यह शरीर अप धारण करने से अशक्य हो रहा है ऐसा जय उन्होंने प्रतीत होने लगा तय उन्होंने अपने आचारभांडक पचविध आचार पालने के लिये जो - वस्त्र- पात्रादिक ये उनको -एकान्त में रख दिया-रग्वकर फिर उन्हों ने सस्तारकभूमि की (तएण तस्स धम्ममइस्स त सालइय जाव नेहावगाह आहारियस्स समा णस्स मुहुत्ततरेण परिणममाणसि सरीरंगसि वेयणा पाउन्भूया उज्जला जाव दुरहियासा-तएण से धम्मरूई अणगारे अथामे, अपले अवीरिए अपुरिसकारपर क्कमे अधारणिज्जमित्ति कटु आयारभडग एगते ठवेइ, ठविचा थडिल्ल पडि लेहेइ, पडिलेहित्ता दुभसथारग सथारेइ, सथारिचा दम्भसथारग दुरुइइ, दुरुहित्था पुरत्याभिमुहे सपलियकनिसन्ने करयलपरिग्गहिय एव चयासी ) શાક તે ધર્મરુચિના પેટમાં પહોંચતા જ એક મુહૂર્ત પછી જ્યારે તેનું પાચન શરૂ થયું ત્યારે તેમના શરીરમાં ઉજવલ યાવત્ દરમિથ્યાસ વેદના થવા માંડી તેથી તે ધર્મરુચિ અનુગાર પરાક્રમ વગર, મોબળ વગર હૉત્સાહી થઈને પુરુષાર્થ વગુર બની ગયુ હવે આ શરીર ટકવું અશકય થઈ પડયું છે એવી જ્યારે તેઓને પ્રતીતિ થવા લાગી ત્યારે તેમણે પિ * આચાર, - मेनगारामृत पावणा टीका भ० १६ धर्मरच्यागारदरितपर्णनम् मित्यर्थः, एतान्ते सापयति, स्थापयित्वा सन्दिरा लार नमूनि प्रति टन्चर्यात, प्रतिलेख्य दर्गम स्वारक ' स थारेड' सस्तृणानिमातृत उगेनि सस्तीर्य, दर्भ- सस्तारक दृरोहनिमारोहति, दख्य पौररत्याभिमुख पूर्वदि गभिमुग्यः, 'मपलियं- फनिमन्ने 'सपल्पक निपणापमामनसनिविष्ट, रालयितीत-मोजिवहस्त तलद्वय मोऽतलि ला एव-यामागप्रमाग कामीव-समास्युक्तवान् , नमोऽत्युण भताण नाव सपत्ताण,- ----णमोऽत्युण धम्मपोसाण गग मम यमायरियाज पम्मोवएसयाण " नमोऽस्तु सलु ईदयो भगवदयो गान् गमाप्तय, नमोस्तु खलु धर्मघोपेभ्यः स्थरिया मम मीचार्य यो मोपडेगकेन्य', पूर्वमपि दाहण मालेऽपि खलु मया पर्नघोजागा स्थविराणामन्ति के सर्व भागाविपात प्रत्यायानो पानीव यावत् परिग्रहः' अत्र यावच्छन्देन-सनो मृगवाद सर्वमदत्तादान म मैथुन च मत्यारयातम्, तया-म परिग्रह प्रत्यारातः । इदानीमपि सद, नह तपामेन भगवतामन्ति का प्रामानिपान प्रत्यायामि या त परिगह मायामि याव प्रतिलेखना की प्रनिलेम्वना करके फिर उसके ऊपर उन्रोने दर्णस- स्तारक को निया-किनार फिर वे उसपर बैठकर तिर पूर्वदिशा की और मुसकर पर्यशामन से उस पर विराजमान हो गये विराजमान होकर उन्होंने अपने दोनो हाथो को जोड़ा ओर मस्तक पर उसकी अजलि रखकर इन प्रसार अपने मन ही मन के कहने लगे- (नमोत्युण अरिहताण जाय सात्ताण, णमोत्थुग धम्मघोसाण थेराण मम धम्मापरियाण पम्मोवामाग पुधिपि ण म पचोमाण राण भतिए सन्दे पागाइयाए पच्चस्त्राग जारजी जार परिग्गहे व्याणि पि अह तेसिचेन भगवताण अतिय सव्व पाणाडवार परचक्खामि जाव ભાડાને–વસ્ત્ર પાત્ર વગેરેને એકાતમા મૂકી દીધા મૂક્યા બાદ તેઓએ સસ્તા રક ભૂમિની પ્રતિલેખન કરી પ્રતિલેખના કરીને તેની ઉપર તેમણે દર્ભ સસ્તા રક કર્યો દર્ભસતાક પાથરીને તેઓ તેની ઉપર બેસીને પૂર્વ દિશા તરફ મુખ કરીને પર્ય નામનયા તેની ઉપર વિરાજમાન થઈ ગયા વિરાજમાન થઈને તેઓએ પિતાના બંને હાથને જોડયા અને તેમની આ જલી બનાવીને મસ્તક ઉપર મૂકી અને પિતાના મનમાં જ કહેવા લાગ્યા (नमोत्यु ण जरिहताण जाव गपत्ताण पामोत्युण धम्मघोसाण राण मम धम्मायारियाण धम्मोवएसगाण पुबि पि ण मए धम्मयोसाण थेगण जतिए सन्चे पाणाइवाए पच्चाग्वाए जान जीपाए जाव परिग्गहे, इयाणि पि अह तेसिं चेव werdeen ज्जोय, यथा-सान्दकामन्दकप यापचारम-रक्षामः, 'नोसिरामितिका व्युत्सृजामि-शरीर परित्यनामि' इनि कत्या 'भागोय पटिगते' आलोचितप्रति फान्ता पूर्वकृत यस्ती शारजात तदालाचित, पुनरकरणमतिमया भतिकान्तं येन स तथाभूतः समाधिमाप्त: आत्मसमाधियुक्तः फालग:मरण प्राप्त ।।०३।। मूलम्-तएण ते धम्मघोला थेरा धम्मरुडं अणगारं चिरं गय जाणित्ता समणे निग्गथे सदाति सदायित्ता एव वयासी परिग्गर पच्चस्पामि जार जीगण जहा पदओ जार परिमेरि उस्सा सेहिं चोसिरामित्ति कटु आलोहय परिश्ते समाहिपरो कालगए) यावन् मिद्विगति नामक स्थान को प्राप्त हुए अरिहन भगतो के लिये मेरा नमस्कार हो-धर्मोपदेशक मेरे धर्माचार्य श्री धर्मगोपस्थविर के लिये मेरी नमस्कार हो मैंने पहिले दीक्षा ग्रहण के समय उन धर्म गोष स्थविर के समीप ममस्त प्राणातिपात, समस्त मृपावाद, समस्त अद त्तादान, समस्त मैथुन तथा समस्त परिग्रह जीवन पर्यन्त प्रत्याख्यान कर दिया है । अब भी मैं उन्हीं भगवतो के समक्ष समस्त प्राणातिपात यावत् समस्त परिग्रह का यावज्जीव प्रत्यख्यात करता हूँ। यावत् अन्तिम श्वासोतक स्कन्दककी तरह इस शरीरका परित्याग करता हूँ। इस प्रकार मन ही मन कह कर वे धर्मरूचि अनागार आलोचित प्रति क्रान्त पनकर आस्मसमाधिमें तल्लीन होते हुए मरण प्राप्त हुवे ॥सू०३।। भगवताण अतिय सब्य पागाइझाय पच्चक्खामि जाव परिग्गह पच्चक्खामि भाव जीवाए जहा खदो जाय चरिमेदि उस्सासेहि वोमिरामित्ति कटु आलोइयपडि- क्कते समाहिपचे कालगए) ચાવત્ સિદ્ધગતિ મેળવેલા અરિહંત ભગવતેના માટે મારા નમસ્કાર છે ધર્મોપદેશક મારા ધર્માચાર્ય શ્રી ધર્મશેષ સ્થવિરના માટે મારા નમસ્કાર છે પહેલા દીક્ષા ગ્રહણ કરતી વખતે મે તે ધર્મઘોષ સ્થવિરની પાસે સમસ્ત પ્રાણા તિપાત, સમસ્ત મૃષાવાદ, સમસ્ત અદત્તાદાને સમસ્ત મૈથુને તથા સમસ્ત પરિગ્રહનું પ્રત્યાખ્યાન કર્યું હતુ અત્યારે પણ તે જ ભગવતેની સામે સમસ્ત પ્રાણાતિપાત યાવત્ સમસ્ત પરિગ્રહનુ યાવસજીવ પ્રત્યાખ્યાન કરૂ છુ નના છેલ્લા શ્વાસ સુધી રકડની જેમ આ શરીરને ત્યાગ કરૂ છુ આ રીતે પિતાના મનમાં જ કહીને તે ધર્મ-રુચિ અનગાર આચિત પ્રતિકાત થઈને “આ મસમાધિમાં તલ્લીન થતા મરણ પામ્યા છે. સૂત્ર व.
१५९ मनगारधर्मामृतवषिणी टीका १० १६ धर्मरच्यनगारचरितवर्णनम -एव खलु देवाणुप्पिया | धम्मई अणगारे मासखमण- पारणगंसि सालइयस्स जाव गाढस्साणासरणयाए वहिया निग्गए चिरगए त गच्छह णं तुम्भे देवाणुप्पिया । धम्म- रुइस्स अणगारस्त सच्चओ समंता मग्गणगवेसणं करेह, तएणं ते समणा निग्गंथा जाव पडिसुणेति, पडिसुणित्ता धम्मघोसाणं थेराणं अंतियाओ पडिनिस्खमति, पडिनि- क्खमित्ता धम्मरुइस्स अणगारस्स सव्वओ समता मग्गण- गवेसणं करेमाणा जेणेव थंडिल्लं तेणेव उवागच्छति उवा- गच्छित्ता धम्मरुइस्स अणगारस्स सरीरगं निप्पाणं निच्चेट जीवविष्पजढं पासंति पासित्ता हा हा अहो अकज्जमितिक? धम्मरुइस्स अणगारस्स परिनिव्वाणवत्तिय काउस्सग्ग करेति करित्ता घम्मरुइस्स आयारभडग गेण्हति गेण्हित्ता जेणेव धम्मघोसा थेरा तेणेव उवागच्छति उवागच्छित्ता गमणा- गमणं पडिक्कमति पडिक्कमित्ता एव वयासी-एव खल्लु अम्हे तुभ अतियाओपडिनिक्वमामोर सुभूमिभागस्स उज्जाणस्स परिपेरतेण धम्मरुइस्स अणगारस्स सव्व जाव करेमाणे जेणेव थडिल्ले तेणेव उवा०२ जाव इह हव्वमागया, त कालगए णं भते । धम्मरुई अणगारे इमे से आयारभडए, तएणं ते धम्मघोसा थेरा पुठवगए उवओग गच्छति गच्छित्ता समणे निग्गथे निग्गथीओयसदावेति सदावित्ता एव क्यासी -एव खल्लु अज्जो ! मम अतेवासी धम्मरुची नाम अणगारे Winterhaunted जोय, यथा-स्कन्दका कन्दरचन् यापच्चरम-रक्षामे, 'नोमिरामितिका युस्स.जामि-शरीर परित्यनामि' इति कत्या भागय पटिफते' आलोचितमति फान्तापूर्वकत यस्ती गारनात बदालाचित, पुनरकरणमतिया पतिकान्तं येन तथाभूतः समाधिमाप्त आत्मसमाधियुक्तः कालगताम्मरण प्राप्त ।मु०३|| मूलम्-तएण ते धम्मघोसा थेरा धम्मरुई अणगारं घिर गय जाणित्ता समणे निग्गंथे सदाति सदायित्ता एव वयासी परिगर पञ्चम्पामि जार जीपाए जहा पदओ जार चरिमेहिं उस्सा सेहिं पोसिरामित्ति कटु आलोहय पटिकते समाहिपसे कालगए) यारन् सिद्विगति नामक स्थान को प्राप्त हुप अरिहन भगवतो के लिये मेरा नमस्कार हो-धर्मोपदेशक मेरे धर्माचार्य श्री धर्मयोपस्थविर के लिये मेरी नमस्कार हो मैंने पहिले दीक्षा ग्रहण के समय उन धर्म गोष स्थविर के समीप समस्त प्राणातिपात, समस्त मृपावाद, समस्त अद तादान, समस्त मैथुन तथा समस्त परिग्रह जीवन पर्यन्त प्रत्याख्यान कर दिया है । अब भी मैं उन्हीं भगवतो के समक्ष समस्त प्राणातिपाल यावत् समस्त परिग्रह का यावज्जीर प्रत्यख्यात करता हूं। यावत् अन्तिम श्वासोतक स्कन्दककी तरह इस शरीरका परित्याग करता है। इस प्रकार मन ही मन कह कर वे धर्मरूचि अनागार आलोचित प्रति क्रान्त बनकर आत्मसमाधिमें तल्लीन होते हुए भरण प्राप्त हुवे ॥सू०३।' भगवताण अतिय सब्य पागामाय पच्चक्खामि जाव परिग्गह पच्चक्खामि जाब जीवाए जहा खदओ जाव चरिमेहिं उसासेहि वोमिरामित्ति कटु आलोइयपडि- क्कते समाहिपत्ते कालगए) યાવત્ સિદ્ધગતિ મેળવેલા અરિહંત ભગવતેના માટે મારા નમસ્કાર છે ધર્મોપદેશક મારા ધર્માચાર્ય શ્રી ધર્મઘોષ સ્થવિરના માટે મારા નમસ્કાર છે પહેલા દીક્ષા ગ્રહણ કરતી વખતે મે તે ધર્મક સ્થવિરની પાસે સમસ્ત પ્રાણ તિપાતે, સમસ્ત મૃષાવાદ, સમસ્ત અદત્તાદાને સમસ્ત મૈથુને તથા સમસ્ત પરિગ્રહનું પ્રત્યાખ્યાન કર્યું હતું અત્યારે પણ તે જ ભગવતેની સામે સમરત પ્રાણાતિપાત યાવત્ સમસ્ત પરિગ્રહોનુ વાવાજીવ પ્રત્યાખ્યાન કરૂ છુ નના છેલ્લા શ્વાસ સુધી સ્કન્દ ની જેમ આ શરીરને ત્યાગ કરું છું પિતાના મનમાં જ કહીને તે ધર્મ-રુચિ અનગાર આચિત પ્રતિકાત થઈને -આત્મસમાધિમાં તલ્લીન થતા મરણ પામ્યા # સત્ર આ રીત . ३ यागारधर्मामृतवषिणो रोका ० १६ धर्मरुच्यनगारचरितवर्णनम् शब्दयित्वा, एच-वक्ष्यमा प्रकारेण, जवादिषुः उक्तवन्तः, एव सल्लु हे देवानु- पियाः ! धर्मरुचिरनगारो मासक्षपणपारणके शारदिकस्य तिक्ताटुक्तम्बरस्य यावत् -स्नेहारगाढस्य णिसिरणट्ठयाए ' निसृजनार्थ पहिनिर्गतश्विरगतः तस्मिन् गते सति बहुतरः पाली व्यतीत इत्यर्थः । तत्-तस्माद् गच्छत खलु यूयं हे देवानु- मियाः ! धर्मरुचेरनगारस्य सर्वत' समन्ताद् मार्गणगवेषण-सम्यगन्वेषण कुरुत । तत खलु ते अमणा निर्यन्या यावत् प्रतिष्यन्ति तथा करिष्यामीत्युक्त्वा तामाझt स्वीकुर्वन्ति, प्रतिश्रुत्य धर्मयोपाणां स्थगिणामन्तिकात् प्रतिनिष्कामन्ति, प्रतिनि वघासी-एव सलु देवाणुप्पिया! चम्मरई अणगारे मासखमणपारण गति सानइयस्स जाव गाढस्स णिमिरणयाए घटिया निग्गए-चिरगए, त गच्छर ण तुम्भे देवाणुप्पिया ! धम्मरुझ्यस्त अणगास्स सव्वओ समता गवेसण करेर) श्रमण निर्ग्रन्थो को बुलाया । वुलाकर उनोंने ऐसा कहा-हे देवानुप्रियो ! धर्मरुचि अनगार आन मासखनण की पारणा के दिन शारदिक तिक्त पडुनी तुरडी का बहु सभार सभृत शाक कि जिसके ऊपर घृत तैर रहा या लाये थे-मैने उसे परिष्ठापन के लिये उन्हे आज्ञा दिया सो वे उसे परिष्टापन करने के लिये यहां से घाहिर चले गये-नये उन्हें यहुत देर हो गई-वे अभीतक नही आये इसलिये हे देवानुप्रियो । तुम लोग जाओ और धर्मसूचि अनोगार की सब तरफ चारों दिशाओं मे मार्गणा एव गवेषणा करो। (नपण ते समणा निगया जाव पडिसुणेति, पडि सुणित्ता धम्मघोसाण (समणे निग्गथे सदागति सदायित्ता एर वयासी-एव खलु देवाणुप्पिया । धम्मखई नणगार मामखमण पारणगसि सालइयस्स जान गाढस्स णिसिरणद्वयाए बहिया निग्गयाए-चिरगए, त गन्छह ण तुम्भे देवाणुप्पिया । धम्मरूइस्म अण- गारस्स सयमो समता मग्गणगवेसण करेह ) રમણ નિગ્રંથોને બોલાવ્યા બોલાવીને તેમને આ પ્રમાણે કહ્યું છે દેવાનુપ્રિયે ! ધર્મચિ અનગાર આજે માસ ખમણની પણાના દિવસે શાર દિક તિકત કડવી ખૂબડીનુ સરસ વઘારેલુ ઉપર ઘી તરતું રાક આહાર માટે લાવ્યા હતા તેઓને મે પ્રતિષ્ઠાપાનની આજ્ઞા આપી છે, તેઓ પરિણાપન માટે અહીંથી બહાર ગયા છે તેઓને બહાર ગયાને બહુ જ વખત થયો છે, હજી તેઓ આવ્યા નથી એથી હે દેવાનુપ્રિયે ! તમે લે જાઓ અને ધર્મચિ અનગારની ચોમેર માર્ગણ તેમજ ગષણ કરો (तपण ते समणा निग्गथा जार पटिमुणति, पटिमुणिचा धम्मघोसाण T35 १६० पगइभदा जाप मिणीप मान मानेणं अणिरिवत्तेण तवो फम्मेण जाव नागसिरी मारणीए गिहे अशुपविहे, तएणं सो नागसिरी माहणी जाव निसीर, तरण से धम्मलई अणगारे अहापजत्तमितिमा जाब काल अणनग्गेमाणे वि. हरति, से ण धम्मरुई अणगारे नहणि वासाणि सामन्नप- रिचाग पाउणित्ता आलोइयपडिकते समाहिपत्ते कालमासे काल किया उसोन्मजाय सनदृसि महामिाणे देव- ताए उनबन्ने, तत्य ण अजहण्णमणुकोसेणं तेतील साग- रोवमाड टिई पन्नत्ता, तत्य धम्मरुइसानि देवम्स तेत्तीसं सागरोबसाइ ठिई पण्णता से ण धम्लाई देव ताओ देवलोगाओ जाव महाविदेहे बामे सिज्झिहिड त वित्थुणं अज्जो ! णागसिरीए माहणीए अधन्नाए अपुन्नाए जाप णि बोलियाए जाए या तहारूचे साहू धम्मरुई अणगारे मास- खमणपारणगमि लालइएण जाप गाढेण ताले चेव जीवि- याओ ववरोविए ॥ सू० ४ ॥ टोका-तएणं त' इत्यादि । तत' खलु इत्तश्च ते धर्मयोपा स्थविरा धर्मर चिमगार चिर गत मारता गत ज्ञात्वा श्रमणान निम्रन्थान् शब्दयति, तपण ते मम्ममोसा येरा इत्यादि ॥ टीकार्थ-(तएण ) इसके बाद (ते धम्नघोसा थेरा) उन-धर्मघोष स्थविरने( उम्मक अगर ) धर्मचि अनगार को (चिरनय जाणित्ता) बहुत देर के गये हुए जानकर (नमणे निग्गथे सदावेंति, सहावित्ता एव तएण ते धम्मघोमा थेरा इत्यानि टी-(तण्ण) त्या२मा ( धम्मोसा थेरो) धा५ भ्यविरे (धम्म रुइ अणगार ) मयि मनमाने (चिर गय जाणित्ता) मई तथी महार ગયેલા જાણીને " - बगगारधर्मामृतषिणी टीका म०१६ धर्मरुच्यनगारचरितवर्णनम् शब्दयित्वा, एय-वक्ष्यमा प्रकारेण, पवादिपुः उक्तवन्तः, एव खलु हे देवानु- पियाः । धर्मरुचिरनगारो मासक्षपणपारण के शारदिकस्य तितकदुस्तुम्बकस्य यावत्-स्नेहावगाढस्य णिसिरणट्ठयाए ' निसृजनार्थ पहिर्निर्गतश्विरगतः तस्मिन् ।' गते सति बहुतर पालो व्यतीत इत्यर्थः । तत्-तस्माद् गन्छत खलु यूय हे देवानु- मियाः ! धर्मरुचेरनगारस्य सर्वत' समन्ताद् मार्गणगवेपणसम्यगन्चेपण फुरुतु । तत खलु ते अमणा निमुन्या यावत् प्रतियन्ति तथा परिप्यामीत्युक्त्वा तामाज्ञा स्वीकुर्वन्ति, प्रतिश्रुत्य धर्मघोषाणां स्परिराणामन्तिकात् प्रतिनिष्कामन्ति, प्रतिनि वयासी-एच ग्दलु देवाणुप्पिया ! पम्नई अणगारे मासखमणपारण गसि सालयस्स जाव गाढम्स णिमिरणयाए बहिया निग्गए-चिरगए, त गच्छर ण तुम्भे देवाणुप्पिया ! धम्मरुइयस्स अणगास्स सचओ समता गवेसण करेह ) श्रमण निर्ग्रन्यो को बुलाया । वुलाकर उनोने ऐसा कहा-हे देवानुप्रियो ! धर्मरुचि अनगार आन मामखनण की पारणा के दिन शारदिक तिक्त पडुनी तुरटी का बहु समार सभृत शाक कि जिसके ऊपर घृत तर रहा या लाये थे-मैने उसे परिष्ठापन के लिये उन्हें आज्ञा दिया मो वे उसे परिष्टापन करने के लिये यहां से घाहिर चले गये-गये उन्हें बहुत देर हो गई-वे अभीतक नहीं आये इसलिये हे देवानुप्रियो । तुम लोग जाओ और धर्मसूचि अनोगार की सर तरफ चारो दिशाओ मे मार्गणा एक गवेपणा करो। (नएण ते समणा निगया जाव पडिसुणेति, पडि सुणित्ता धम्मघोसाण ( समणे निग्गथे सदाति सदायित्ता एर वयासी-एर खलु देवाणुप्पिया ! धम्मलई नणगार मापखमणपारणगमि सालइयस्स जार गाढस्स णिसिरणट्टयाए चहिया निग्गयाए-चिरगए, त गन्छ ण तुम्भे देवाणुप्पिया | धम्मदस्म अण- गारस्स सपनो समता मग्गणगसा करेइ) શ્રમણ નિર્ચ ને બોલાવ્યા બોલાવીને તેમને આ પ્રમાણે કહ્યું- હે દેવાનુપ્રિ 1 ધર્મચિ અનગાર આજે માસ ખમણની પારણાના દિવસે શાર દિક તિત કડવી તુંબડીનુ સરસ વઘારેલુ ઉપર ઘી તરતું નાક આહાર માટે લાવ્યા હતા તેઓને મે પ્રતિષ્ઠા પાનની આજ્ઞા આપી છે, તેઓ પરિપન માટે અહીંથી બહાર ગયા છે તેઓને બહાર ગયાને બહુ જ વખત થયો છે, હજી તેઓ આવ્યા નથી એથી હે દેવાનુપ્રિયેતમે લેરો જાઓ અને ધર્મચિ અનગાની ચોમેર માર્ગણ તેમજ વેવ કરો (तपण ते समणा निगाथा जान पडिमुणति, पडिसुणित्ता धम्मघोसाण .
२६० लापमा पगइभदा जाप विणीय माम मासेण अणिभियत्तणं तयो. फम्मेणं जाव नागसिरी माहणीए गिी अणुपरिटे, तरणे सा नागलिगे माहणी जार नितीग्ट, नएण धम्मई अणगारे अापजत्तगितिफटु जान काल अणकग्वेमाणे वि- हरति, से ण धम्म अणगारे अहणि रासाणि सामन्नप- रियाग पाउणित्ता आलोइयपटिकने समाहिपत्ते कालमासे काल किवा उसामजाव सनसि महाशिमाणे देव. ताए उनबन्ने, तत्य ण अजाणमणुकांसेण तेनील साग- रोवमाइ टिई पन्नत्ता, तस्य धम्मरुससनि देवस्स तेत्तीस सागरोबसाइ ठिई पपणता से ण धम्मत देव ताओ देवलोगाओ नाव महाविदेहे यासे सिज्झिहिइ त विग्रथुणं अज्जो । णागसिरीए माहणीए अधन्नाए अपुन्नाए जान णि वोलियाए जाए ण तहारवे साहू धम्मरुई अणगारे मास- खमणपारणामि सालइएण जाव गाढेण अकाले चेव जीवि- याओ ववरोविए । सू० ४ ॥ टोग-तएण ते, इत्यादि । ततः खलु इतव ते धर्मघोपा स्थविरा धर्मरचिमनगार चिर गत बहुकालनो गत ज्ञात्वा श्रमणान निग्रन्थान् श दयति, तरण ते गम्ममोसा येरा इत्यादि ॥ टीकार्य-(तएण) इसके बाद (ते धम्नयोसा थेरा) उन-धर्मयोप स्थविरने( बम्मन अणार ) धर्मरुचि अनगार को (चिराय जाणित्ता) बहुत देर के गये जानकर (ममणे निग्गथे सदाति, सहावित्सा एव तपण ते धम्मघोमा थेग इत्यादि टी10-(तण्ण) त्या२या (धम्म मोसा थेरो) ते भा५ स्थविर (धम्म रुइ अणगार ) मयि सन-2 (चिर गय जाणिचा) मई मतथी महार ગયેલા જાણીને ममगारधर्मामृतपिणी टी० अ० १६ धर्मरच्चनगारचरितवर्णनम् इतिकृत्वा-इतिखेद कृत्वा धर्मरुचेरनगारस्य 'परिनिबाणवत्तिय ' परिनिर्वाण- मत्ययिक परिनिर्वाण मरणं तन यन्मृतशरीरस्य परिष्ठापन तदपि परिनिर्वाणमेव तदेव प्रत्ययोहेतुर्यस्य स परिनिर्माणप्रत्ययिका त तथा, मृतपरिष्ठापननिमित्तकमि- त्यर्थः कायोत्सर्ग कुर्वन्ति, कृन्वा धर्मरुचेरनगारस्याऽऽचारभाण्डक-चत्रपात्रादिक गृहन्ति गृहीत्वा यत्रैव धर्मयोपाःस्थविरास्तयोपागच्छन्ति उपागत्य गमनागमनम्। इपिथिकी प्रतिकामन्ति, प्रतिक्राम्यैवमवादिषुः एव खलु हे स्वामिन् ! वय युष्मा- कमन्तिका प्रतिनिष्कामामा प्रतिनिर्गता, प्रतिनिष्क्रम्य सुभूमिमागस्योद्यानस्य इस प्रकार कहकर उन्होंने वहीं पर मृत शरीर को वोसराने रूप कायो. सर्ग किया। (करिता० उवागच्छ० ) कायोत्सर्ग करके फिर उन्होंने उन धर्ममचि अनागार के आचार माडको को वस्त्र पात्रादिकों को उठा लिया-उठाकर वे जहा धर्मघोष स्थविर थे-वहा आये ( उवागच्छित्ता गमणागमण पडिक्कमति, पडिक्कमित्ता एव वयासी-एव खलु अम्हे- तुम अतियाओ पडि निक्खमामो २ सुभूमिमागस्स उज्जाणस्स परिपे- रतेण धम्मरुहस्स अगगारस्त सन्य जाव करेमाणे जेणेव वडिल्ले तेणेव उचा० २ जाव इह हव्वमागया, तं कालगण भत्ते ! चम्मरुई अणगारे इमे से आयारभडए-तएणं ते धम्मघोसा थेरा पुधगए उवओग गच्छति गच्छित्ता समगे निग्गंये निग्गयोओ य सदावे ति-सदावित्ता एव वयासी) आकर के उन्होंने ईपिथिक प्रतिक्रमण किया। प्रतिकनग करके फिर इस प्रकार वे कहने लगे हे स्वामिन् ! हम लोग आपके पास से यहा से गये-और जाकर सुमिभाग उद्यान की चारों રીતે કહીને તેમણે ત્યાજ મૃત શરીરને વસરાવા રૂપ કાર્યોત્સર્ગ કર્યો (कारत्ता० उवागच्छ० । अयोत्सर्ग ने तमामे धमयि मनगारना मायार ભાડકાને તેમજ વસ્ત્રોને લઈ લીધા અને લઈને જ્યા ધમષ સ્થવિર હતા ત્યા આવ્યા (उवागच्छित्ता गमगागमग पडिक्कमति, पडिमित्ता एव वयासो-एव खलु अम्हे तुभ अवियाओ पडिनिक्खमामो २ सुभूमिभागस उजाणस्त परिपेरतेगं धम्मरुइस्स अगगारस्त सब जाव करेमाणे जेणेत्र थडिल्ले तेणेन उवा० जाव इह हन-मागया त कालगएणं मते ! धम्मरुई अणगारे इमे से आयारभंडए तएणं त धम्मयोसा मेरा पुधगए उपयोग गच्छति गच्छिचा समणे निगाये निग्गयीओ य सद्दावेति-सदा वित्ता एवं क्यासी) ત્યા આવીને તેમણે ઈપથિક પ્રતિક્રમણ કર્યું પ્રતિક્રમણ કરીને તેઓ આ પ્રમાણે કહેવા લાગ્યા કે હે સ્વામિન્ ! અમે લેકે અહીંથી આપની પાસેથી ગયા અને જઇને સુમિભાગ ઉદ્યાનની ચામર ફરતા ફરતા ધરુચિ " कम्य धर्मरचेरनगारस्य सर्वत समन्वाद मार्गणगयेपणं कुर्यन्तो यौन म्याण्डिलं- स्यलं धर्मरुपेरनगारस्य काकरणस्थान सौगोपागान्ति, उपागत्य धर्मकर नगारस्य शरीरक 'निप्पाण' निमाणभागरहित, 'निन्चेट' निश्रेष्ट-चेष्टार- हित 'जयविष्पजद जीव विमस्पक्त जीरहीन पश्यन्ति, दृष्ट्वा !! अहो! इति खेदे, 'अफज्ज' अार्यम् अनिष्ट नात यधर्मरचिनगारो मृतः, तिकट्टु राण अतियाओ पटिनिरसमति, पढिनिश्पमित्ता धम्मकास्स- अणगाहस्स सन्याओ समता मग्गणगवेसण करमाणा जेणेव डिल्ल तेणेव उवागच्छति, उवागछित्ता धम्ममइस्स अणगारस्म सरीरग निप्पाण निच्चेट जीवविप्पजढ पासति, पासित्ता रा रा अकजमित्ति कट्टु धम्मरुइस्स अणगारस्स परि निव्वाणवत्तिय काउस्मग्ग-करें ति) उन निर्गन्ध श्रमणों ने अपने धर्माचार्य की इस आज्ञा को यावत् स्वीकार कर लिया। और स्वीकार करके फिर वे धर्मघोष स्थविर के पास से निकले निकल कर उन्होंने धर्मरुचि अनागार की चारों दिशाओमें सब प्रकार से मार्गणा गवेषणा की। इस तरह मार्गण गवेपणा करते हुए जहां वह स्थण्डिल था-धर्मरुचि अनागार की मृत्यु रोने का स्थान था- वहां आये वहां आकर के उन्होंने धर्मरुषि अनगोर के शरीर को प्राण- रहित, चेष्टो रहित और जीव रहित देखा। देखकर के सहसा उनके मुख से हाय हाय यह खेद सूचक शब्द निकल पड़ा वे कहने लगे यह वडा अनिष्ट हुआ-जो धर्मरूचि अनागार का देहावसान हो गया। थेराण अतियाओ पडिनिक्खमति, पडिनिक्खमिचा धण्मरुइस्स अणगारस्स सम्ब ओ समता मग्गणगवेसण करेमाणा जेणेव थडिल्ल तेणेन उवागच्छति उवाग- च्छित्ता धम्मरुहस्स अणगारस्स, सरीरग निप्पाणं निच्चे जीव विप्पनढ पासति, पासित्ता हाहा अकज्जमित्ति कटु धम्मरुइस्स अणगारस्स परिनिवाण वत्तिय काउ स्सग्ग करेंति) તે નિ ચ શ્રમણએ પિતાના ધર્માચાર્યની આજ્ઞાને સ્વીકારી લીધી અને સ્વીકારીને તેઓ ધર્મ શેષ સ્થવિરની પાસેથી નીકળીને ધમરુચિ અનગારની બધી રીતે રોમેર માગણા તેમજ ગષણ કરવા લાગ્યા ગવેષણ કરતા જ્યા તે ડિલ હતુ-ધર્મચિ અનગારના મૃત્યુનું સ્થાન હતું ત્યા આવ્યા ત્યાં આવીને તેઓએ ધમ રુચિ અનગારના શરીરને નિપ્રાણુ નિણ અને નિર્જીવ જે આ દશ્ય જોતાની સાથે જ તેઓના મુખથી હાય હાય ના ખેદ સૂચક શબ્દો નીકળી પડયા તેઓ કહેવા લાગ્યા કે આ બહુ જ બહુ થયુ છે-જમરુચિ અનગારનું - આ રીતે માગણ मरिधामृतपिणी टी० अ० १६ धर्मरध्यनगारचरितवर्णनम् इतिकृत्वा-इतिखेद कृत्वा धर्मरुचेरनगारस्य 'परिनिव्वाणवत्तिय ' परिनिर्वाण- मत्ययिक-परिनिर्वाण मरण तत्र यन्मृतशरीरस्य परिष्ठापन तदपि परिनिर्वाणमेव तदेव प्रत्ययोहेतुर्यस्य स परिनिर्माणमत्ययिकः त तथा, मृतपरिष्ठापननिमित्तकमि- स्पर्यः कायोत्सर्ग कुर्वन्ति, कन्या धर्मरुवेरनगारस्याऽऽचारभाण्डक-वनपात्रादिकं गृहन्ति गृहीत्वा यत्रैव धर्मघोपाः स्थविरास्तत्रैवोपागच्छन्ति,उपागत्य गमनागमनम्- इपिथिको प्रतिकामन्ति, प्रतिक्राम्यैवमवादिपुः एव खलु हे स्वामिन् ! वय युष्मा- कमन्तिका प्रतिनिष्कामामा प्रतिनिर्गता, प्रतिनिष्क्रम्य सुभूमिभागस्योद्यानस्य इस प्रकार कहकर उन्होंने वही पर मृत शरीर को वोसराने रूप कायो स्सर्ग किया । (करिता. उवागच्छ० ) कायोत्सर्ग करके फिर उन्होंने उन धर्ममचि अनागार के आचार भाडको को वस्त्र पात्रादिकों को-उठा लिया-उठाकर वे जहा धर्मघोष स्थविर थे-वहा आये ( उवागच्छित्ता गमणागमण पडिक्कमति, पडिक्कमित्ता एव वयासी-एव खलु अम्हे- तुम्भ अतियाओ पडि निक्खमामो २ सुभूमिभागस्स उज्जाणस्स परिपे- रतेण धम्मरहस्स अगगारस्त सच जाव करेमाणे जेणेव वडिल्ले तेणेव ज्वा०२ जाव इह हब्धमागया, तं कालगणं भत्ते ! धम्मरुई अणगारे इमे से आयारभडए -तएण ते धम्मघोसा थेरा पुग्धगए उद्योग गाउति गघिउत्ता समगे निग्गये निग्गयोओ य सदावे ति-तहावित्ता एव वयासी) आकर के उन्होंने ईपिथिक प्रतिक्रमण किया। प्रतिकाग करके फिर इस प्रकार वे कहने लगे हे स्वामिन् ! हम लोग आपके पास से यहा से गये-और जाकर सुभूमिभाग उद्यान की चारों રીતે કહીને તેમણે ત્યાજ મૃત શરીરને વસરાવા રૂપ કાર્યોત્સર્ગ કર્યો (कारत्ता उवागच्छ०) यास शन तमामे धमयि मनभाना मायार ભાડકાને તેમજ વસ્ત્રોને લલીધા અને લઈને જ્યા ધર્મશેષ સ્થવિર હતા ત્યા આવ્યા (उवागच्छित्ता गमगागमग पडिक्कमति, पडिक्कमित्ता एव वयासो-एक खलु अम्हे तुम्भ अवियाओ पडिनिक्खमामो २ मुभूमिभागस उजाणस्स परिपेरतेग धम्मरुइस्स अगगारस्स सब जाव करेमाणे जेणे थडिल्ले सेणेस उवा० जाय इह हुन्ध-मागया त कालगरणं भंते ! धम्मलई अगमारे इमे से आयारमंडए तरणं त धम्मघोसा थेरा पुषगए उपभोग गछवि गच्छित्ता समणे निगथे निग्गयीओ य सदावेंवि-सदाविचा परं क्यासी) ત્યા આવીને તેમણે ઈપયિક પ્રતિક્રમણ કર્યું પ્રતિક્રમણ કરીને તેઓ આ પ્રમાણે કહેવા લાગ્યા કે હે સ્વામિન્ ! અમે લેકે અહીંથી આપની પાસેથી ગયા અને જઇને સુમિભાગ ઉદ્યાનની ચોમેર ફરતા ફરતા ધર્મરુચિ - - फम्य धर्मरुचेरनगारस्य सर्वत ममन्ताद मागंणगयेणं कन्तिो योव स्थानिक स्थलं धर्मरुचेरनगारस्प फाल्करणस्थान तोयोपागन्ति, उपागत्य धर्मजवेर- नगारस्य शरीरक 'निपाण' निष्माण-मागरहितं, 'निन्चेट्ट' निश्रेष्ट-चेष्टार- हित 'जयपिपजद 'जीर मित्पतजीवहीन पश्यन्ति, हया हा 11 ! अहो । इति खेदे, 'अझज्ज' अकार्यम् भनिष्ट जात यधर्मचिनगारी मृतः, 'तिकट्टु' राण अतियाओ पहिनियमति, पढिनिश्पमित्ता धम्मसहस्स- अणगाएस्स सन्चाओ समता मग्गणगवेमण करेमाणा जेणेव डिल्ल तेणेव उवागच्छति, उयागछित्ता धम्ममइस्स अणगारस्म सरीरंग निप्पाण निच्चे? जीयविप्पजट पासति, पासिसा हा हा अकज्जमित्ति कट्टु धम्मरुइस्स अणगारस्म परि निव्वाणवत्तिय काउस्सग्गं-करे ति) उन निर्गन्ध श्रमणों ने अपने धर्माचार्य की इस आज्ञा को यावत् स्वीकार कर लिया। और स्वीकार करके फिर वे धर्मघोष स्थविर के पास से निकले निकल कर उन्होंने धर्मरुचि अनागार की चारों दिशाओमें सप प्रकार से मार्गणा गवेषणा की। इस तरह मार्गण गवेपणा करते हुए जहां वह स्थण्डिल था-धर्मरुचि अनागार की मृत्यु रोने का स्थान था- वहा आये वहा आकर के उन्होंने धर्मरुचि अनगोर के शरीर को प्राण- रहित, चेष्टो रहित और जीव रहित देखा । देखकर के सहसा उनके मुख से हाय हाय यह खेद सूचक शब्द निकल पड़ा वे कहने लगे यह वडा अनिष्ट हुआ-जो धर्मरूचि अनागार का देहावसान हो गया। थेराण अतियाओ पडि निक्खमति, पडिनिक्खमिचा धण्मरुइस्स अणगारस्स सब ओ समता मग्गणगवेसण करेमाणा जेणेव थडिल्ल तेणे उबागच्छति उवाग- च्छित्ता धम्मरुहस्स अणगारस्स, सरीरंग निप्पाण निच्चे जीव विप्पनढ पासति, पासित्ता हाहा अफज्जमित्ति कटु धम्मरुइस्स अणगारस्स परिनिव्वाण वत्तिय काउ स्सग्ग करेंति) તે નિર્ચ થ શ્રમણોએ પિતાના ધર્માચાર્યની આજ્ઞાને સ્વીકારી લીધી અને સ્વીકારીને તેઓ ધમષ સ્થવિરની પાસેથી નીકળીને ધર્મરુચિ અનગારની બધી રીતે રોમેર માર્ગણ તેમજ ગષણ કરવા લાગ્યા ગવેષણ કરતા જ્યા તે સ્થડિલ હતુ-ધર્મરુચિ અનગારના મૃત્યુનું સ્થાન હતું ત્યા આવ્યા ત્યા આવીને તેઓએ ધર્મરુચિ અનગારના, શરીરને નિશ્માણ નિષ્ટ અને નિર્જીવ જોયુ આ દશ્ય જોતાની સાથે જ તેઓના મુખથી હાય ! હાય! મા ખેદ સૂચક શબ્દ નીકળી પડયા તેઓ કહેવા લાગ્યા કે આ બહુ જ ખોટુ થયુ છે-અરુચિ અનગારનું " આ રીતે માર્ગણ 2-20
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- - F१६४ শাখমধ্যে परिपेरतेण' परिपर्यन्तेन चतुनिशु परिभ्रमन्तो धर्मगनगारस्य 'सन्चजाव' सर्वतः समन्ताद मार्गणगरेपण तो यार स्थापिटल तसत्रोपागामा, उपागल्प यावद् इइ हव्यमागताः ग काठगाः सलु दे गदना धर्मचिरनगारः, इमानि 'से' वस्प, भाचारभाण्डपानि । ततः स ते धर्मशेषा स्थपिरा: 'पुनगए पूर्वगतेष्टिपादान्तर्गत ताधिकार विशेष उपयोग गन्धन्ति लगयन्ति धर्म- रुचिराहारमानेतु नगयो गतस्तदा रस रहे गत ? पेनेदमाचारदत्त' मित्यादि ज्ञातु स्वकीयोपयोग नयन्तीत्यर्थ , गत्वा-समीयोपयोग लगयित्ता, अमणान् निन्यान् निम्रन्थीव शब्दयति, शब्दयित्वा एनमवादी-एर खलु ह आर्याः । ममान्तेनासी-शिष्यः, धर्मचिनीमाऽनगारः 'पगमए' मतिभिप्रकृत्या दिशाओ में फिरते २ धर्मरचि अनगार की सर्व प्रकार से मार्गण, गवे पणा करने लगे। मार्गणा, गवेपणा करते हुए हम लोग फिर उस स्थान पर पहुँचे जहा धर्मचि अनगार का शर पहा हुओ धा वहा से अभी २ हम लोग आरहे है । हे भदन ! वे धर्मरुचि अनगार कालगत हो गये है-ये उनके आचार भाण्डक वस्त्र पात्र हैं। इस के बाद उन धर्मघोष स्थविर ने दृष्टि याद के अतर्गत शुताधिकार विशेप में अपना उपयोग लगाया तो उन्हे यह ज्ञात हो गया कि जब धर्मरुचि आहार 'लेने के लिये नगरी में गये तो वे किसके घर गये, किस ने यह आहार 'उन्हें दिया इत्यादि । अपने उपयोग से इस पात को जानकर उन्होंने निर्ग्रन्थ श्रमणों और निर्गध श्रमणियों को बुलाया और बुलाकर उनसे ऐसा कहा-(एव खलु अजो मम अतेवासी, धम्मरूई, णाम અનગારની બધી રીતે માર્ગg ગવેષણ કરવા લાગ્યા માર્ગણ તેમજ ગવે પણ કરતા અમે લે તે જગ્યાએ પહોચ્યા યા ધર્મરુચિ અનગારનુ મડદુ પડ્યુ હતુ અમે લોકે અત્યારે ત્યાથી જ આવી રહ્યા છીએ હે ભદત! તે ધર્મરુચિ અનગાર મરણ પામ્યા છે તેઓશ્રીના આ આચાર ભાડા વઅપાવે છે. ત્યારપછી તે ધર્મ ઘેષ સ્થવિરે દષ્ટિવાદના અતર્ગત શતાધિકાર વિશેષમા પિતાનો ઉપયોગ લગાવ્યું તેમાથી તેઓને આ વાતની જાણ થઈ કે જ્યારે ધર્મરુચિ આહાર લાવવા માટે નગરીમાં ગયા હતા, ત્યારે તેઓ કેના ઘેર ગયા હતા, આ આહાર તેમને કોણે આપ્યું હતું વગેરે પિતાના ઉપયોગથી આ બધી વિગત જાણીને તેમણે નિર્ચ થ શ્રમણ અને નિઝ થ શ્રમણીઓને પિતાની પાસે બેલાવી અને બેલાવીને તેમને આ પ્રમાણે કહ્યું કે- (एव खलु अज्जो मम अतेवासी, धम्मई णाम अणगारे ।
भनगारधर्मामृतपिणी टी० म० १६ धर्मच्यनगारचरितवर्णनम् स्वभावेन भद्रा-शान्तः, यावद्-यापन करणादिद द्रष्टव्यम्-'पगई उनसते, पगइ-पयणु हमाणमायालोहे, मिउमदवसपण्णे, आलीणे, भदए, इति । प्रकृत्यु- पशान्त', प्रकृति प्रतनुक्रोधमानमाया लोमः, मृदु मार्दवसपन्नः, आलीनः, भद्रा, इति । निीतः 'माम मासेण' मास व्याप्य मासेन-मामक्षपणनामकेन, अनिक्षि- प्तेन अन्तरहितेन, अविश्रान्तनेत्यर्थः तप. कर्मगा विचरन् पारणकदिने यावत्- नागश्रिया ब्रामण्यागृहमनुपविष्टः, ततस्तदनन्तर सा नागश्री ब्राह्मणी यावत्- शारदिकं तिक्तालावुक 'निसिरइ ' निम्नति-पात्रे निक्षिपतिस्म । ततः धर्मरुचि- अणगारे पगइभद्दरा जाव विणीए मास मासेण अणिक्वित्तेण तवोक- म्मेण जाव नागसिरीए मारणीप गिहे अणुपविढे तएण सो नागमिरी मारणी जाव निसीरइ, तण्ण से धम्मई अणगारे अहापजत्तमित्ति कटु जाव कोल अणवकखेमाणे विहरड, सेण धम्मरुई अणगारे वहणि वासाणि सामनपरियाग पउणित्ता आलोइयपडिक्कते समाहि पत्ते कालमासे काल किच्चा उड्ड सोहम्म जाव सब्वट्ठसिद्धे महाविमाणे देवत्ताग उवचन्ने ठिई पण्णत्ता) आर्यो! सुनो घात एसी है मेरे अन्ते चासी शिष्य-धर्मरुचि अनगार स्वभाव से ही भद्र परिणामी थे। यावत् शब्द से इस पाठ का यहा सग्रर हुआ है "पगह उवसते पगइ पगणु कोरमाणमाया लोहे मिउमदवसपण्णे आलोणे भद्दए"। ये अविश्रान्त अतर रहित-मास मामखमण पारणा करते थे । आज उनके पारणा का दिन था-सो गोचरीके लिये भ्रमण करते हुए ये नागश्री ब्राह्मणीके घर . पिणीए मास मासेण अणिरिखतेण तवो कम्मेण जाव नागसिरीए माहणीए गिहे अणुपविटे तएण सा नागसिरि माहणी जाव निसीरह, तएणं से धम्मरूई अणगारे अहापज्जमित्ति कह जाव काल अणवकखेमाणे विहरइ,सेणं धम्मरूई अणगारे बहणि वासाणि सामनारियाग पउणित्ता अलोइयपडिक्कते समाहिपत्ते कालमासे कालं किचा उड्ड सोहम्म जाव सम्वट्टसिद्धे महाविमाणे देवताए उववन्ने ठिई पण्पत्ता) આર્યો! સાભળે, વાત એવી છે કે અતેવાસી શિષ્ય ધમરુચિ અનગાર સ્વભાવથી જ ભદ્ર પરિણમી હતા યાવત્ શબ્દથી અહીં આ પાઠને सअर्ड थयो -" पगइ उनसते” (पगइपयशुकोहमाणमायालोहे मिउमहल 'सपण्णे आलिणे मद्दए) तेसो भविश्रात-मत२ २डित-(निरत२) भास भभाधु કરતા રહેતા હતા આજે તેમને પારણાને દિવસ હતો, તેઓ આહાર માટે ભ્રમણ કરતા નાગશ્રી બ્રાહ્મણીના ઘેર ગયા હતા બ્રાહ્મણએ શારદિક તિકત મારા , . . १६३ जाताधबधान रनगारो यधापर्यासमितिकृत्वा धानिटत्तये पूर्णमिति मका यावत्-कालम् भवणरुखेमाणे' अननकाट्नमाणः विहरति, समलु धर्मरुपिस्नगागे बहनि वर्षाणि अमण्पपर्याय पालपित्या, आलोगित मतिमा तः समाधिप्रातः कालमासे काल कला ऊ ' सोहम्म जाव सबसिदे' सौधर्मादयो द्वादशदेश्लोकाः, त उर्ध्व नवगैरेयकानि तदुपरि यावत् सर्वार्थसिद्धे, महायिमाने देवत्वेनोपपन्न -देवमनं प्राप्तवान् । तर-तस्मिन् सर्भिसिरिमाने, सलु 'मजण्णमणुफोसेण' अअप- न्यानुत्कृष्टेन-जघन्योत्कृष्टयनितेन तत्र हि सपा देवानां स्थितिः समानेव भवति न तु न्यूनाधिककाललया विषमेतिमाः । त्रपत्रिंशन् सागरोपमानि स्थितिः ममता, वन धर्मरुचेरपि देवस्य त्रयस्त्रिंशत् सागरीपमानि स्थितिः ममता, स सल धर्मरुचि देवस्तस्माद् देवलोकाद-सथिसिद्धविमानाद् यावद् व्युत सन् यावद् महाविदेरे वर्षे सिज्झिहिद' सेत्स्पति, सिद्धि प्राप्स्यति । तत्=तस्माद् विगस्तु खलु रे पहुंचे। यावत् उसने शारदिक तिक्त कडवे तुवे की शाम उनके पात्र में योहराया वर्नरुचि अनगार ने उसको पानिवृत्ति के लिय पर्याप्ति मान कर लिया। उन धरूचि अनगारने अनेक वर्षों तक श्रमण्य पर्याय का पालन किया और पालन करके आलोचित प्रतिक्रान्त होकर वे समाघि में लीन हो गये। काल अवतर काल करके अब वे सौधन आदि १२ देवलोको से ऊपर नववेय को से मी आगे जो सर्वार्थसिद्धि नाम का विधान है कि जिसमें ३३ सागर की स्थिति है-और यह स्थिति जहा सय देवा की सनान हे उसमें ३३ सागर की स्थितिवाले देव हुए हैं। अजहण्णमणुकोसेग" जध न्य और उत्कृष्ट तेत्रीस सागरोपम की स्थिति है। से ण धम्माई देवे ताओ देवलोगाओ जाव महाविदेहे-वासे सिज्झिरिह, त घिरत्यु કડવી ખૂબડીનુ શાક તેમના પાત્રમાં વહરાવ્યું ધર્મરુચિ અનગારે તેને સુધા નિવૃત્તિ માટે પર્યાપ્ત જાણીને તેને સરકારી લીધુ તે ધર્મરુચિ અનગારે ઘણા વર્ષો સુધી આય પર્યાયનું પાલન કર્યું છે અને પાલન કરીને આચિત પ્રતિકાત થઇને તેઓ સમાધિમાં લીન થJ ગયા છે કાળ સમયે કાળ કરીને હવે તેઓ સૌધર્મ વગેરે બાર દેવકથી ઉપર નવ વેયકથી પણ આગળ જે સર્વાર્થસિદ્ધિ નામે વિમાન છે કે જેમા ૩૩ સાગરની સ્થિતિ છે અને આ સ્થિતિ જવા બધા દેવોની સરખી છે, તેઓ તેમા ૩૩ સાગરની સ્થિતિવાળા દેવ થયા છે अजहण्णमणुककासेण" ઉત્કૃષ્ટ ૩૩ સાગરોપમની સ્થિતિ છે ( सेग धम्मरूई देवे तामओ देवलोगाभो नाव महाविदहे-चासे सिझिदिन, “ - જઘન્ય અને -- . ममगारधर्मामृतषिणी ०५० १६ धर्मरुच्यनगारचरितवर्णनम् १६७ आर्याः ! नागश्रिय ब्राह्मणीमधन्यामपुण्या यावद् दुर्भग निम्वगुलिकाम् , यथा- खल्ल नागश्रिया प्रामण्या तथारूप' प्रकृतिभद्रत्वादिगुणयुक्तः साधु धर्मरुचिरनगारो मासक्षपणपारणके शारदिकेन विक्तालाबुकेन यावत् स्नेहावगादेनाऽकाल एव जीविताद् व्यपरोपितः ॥सू०४॥ मूलम्-तएणं ते समणा निग्गंथा धम्मघोसाणं थैराण आंतिए एयम8 सोचा णिसम्म चंपाए सिंघाडगतिग जाव बहुजणस्स एवमाइक्खंति-धिरत्थु णं देवाणुप्पिया । नागसिरीए माहणीए जाव किंवोलियाए जाए णं तहारूवे साहू साहरूवे सालइएणं जीवियाओ ववरोवेइ, तए णं तेसिं समणाण अतिए एयमदं सोच्चा णिसम्म वहुजणो अन्नमन्नस्स एवमाइक्खइ एव भासइ ण अनो। नागसिरीए माहणीए अधन्नाए, अपुनाए, जाव णियोलियाए जाए णं तहारूवे साह धम्मरुई अणगारे मासखमणपारणगसि सालइए णं जाव गाढेण अकाले चेव जीवियोओ ववरोविए) वे धर्मचि देव इस देवलोक से चवकर यावत् महाविदेह क्षेत्र से सिद्धिको प्राप्त करेंगे आर्यो । अधन्य, अपुण्य यावत् दुर्भग निम्यगुलिका जैसी अनादरणीय उस नागेश्री ब्राह्मणी को धिक्कार हो-कि जिसने तथारूप, प्रकृति भद्र- स्वादि गुणों से सपन्न साधु धर्मरुचि अनगार को मासखमण के परिणा के दिन शादिक तिक्त कडवी तुघी का शाक यावत् स्नेहावगाढ स्ना- कर दिया-कि जिससे वे अकाल में मरण को प्राप्त हुए ॥ स्तू. ४॥ त धिरत्थुण अज्जो ! नागसिरीए माहणीए अधनाए, अपुन्नाए, जाव णियोलि याए जाए ण तहारूवे साहू धम्मरूई अणगारे मासखमणयारणगसि सालइएण जाव गाढण अकाले चेव जीवियाओ बरोविए) તે ધર્મરુચિ દેવ તે દેવલોકથી આવીને યાવતું મહાવિદેહ ક્ષેત્રથી સિદ્ધિને મેળવશે હે આ અધન્ય, અપુણ્ય, યાવતું દુભગ નિંબગુલિ જેવી અના- દરણય તે નાગશ્રી બ્રાહ્મણને ધિક્કાર છે કે જેણે તથારૂપ, પ્રકૃતિ ભદ્રત્વ વગેરે ગુણોવાળા સાધુ ધર્મરુચિ અનગારને માસ ખમણના પારણાના દિવસે શારદિક તિકત કડવી તુંબડીનુ શાક-કે જે સરસ વઘારેલું, જેની ઉપર ઘી તરતું 4-राय, रेनेसी HD तेमान भर यमु. ॥ सून "e" || * लाया धिरत्थु णं नागसिरीए माहणीए जान जोशियाओ ववरोधिए, तएणं ते माहणा चंपाए नयरीए बहुजणस्स अंतिए एयम सोचा निसम्म आसुस्ता जाप मिसिमिसेमाणा जेणेव नागसिरी माहणी तेणेव उवागच्छंति उगच्छिता जागसिरी माहणी एव वयासी-हं भो । नागमिरी । अपस्थिय पस्थिय दुरंत पत- लक्खणे हीणपुण्णचाउदसे घिरस्थु णं तव अधन्नाए अपुन्नाए जाव णिवोलियाए जाव I तुमं तहारूवे साहू साहरू मास- खमणपारणसि सालइएणं जाव ववरोविए, उच्चावएयाहिं अकोसणाहि अक्कोसेंति उच्चावयाहिं उद्धंसणाहि उद्धसेंति उच्चावयाहि णिभत्थणाहि णिव्भस्थति उच्चावयाहि णिच्छोड- णाहि निच्छोडति तज्जेंति तालेति तज्जेता तालेत्ता सयाओं गिहाओ निज्छुभंति, तएण सा नागसिरी सयाओ गिहाओ निच्छूढा समाणी चंपाए नगरीए सिघाडगतियचउक्कचच्चर चउम्मुह० बहुजणेणं हीलिजमाणी खिसिज्जमाणी निदिजमाणी गरहिजमाणी तज्जिज्जमाणी पवहिजमाणी धिकारिजमाणी थुक्कारिजमाणी कथइ ठाणं वा निलय वाअलभमाणी२ दडि- खडनिवसणा खडमल्लयखडघडगहत्थगया फुट्टहडाहडसीसा मच्छियाचडगरेण अन्निज्जमाणमग्गागेह गेहेणं देह वलियाए वित्ति कप्पेमाणी विहरइ, तएण तीसे नागसिरीए माहणीए तम्भवसि चेव सोलस रोयायका पाउब्भूया, त जहा-सासे कासे जाणिसूल जाव कोढे, तएण सा नागमिरी माहणी ---- मनगारधर्मामृतपरिणी री० अ०१६ धर्मरच्यनगारचरितवर्णनम् सोलसहि रोयायकेहि आभिभृया समाणी अट्टदुहट्टवसहा काल- मासे काल किच्चा छहीए पुढवीए उक्कोसेणं वावीससागरो- वमट्टिइएसु नेरएसु नेरइयत्ताए उववन्ना ॥ सू० ५ ॥ टीका-'तएण ते' इत्यादि । ततः खलु ते श्रमणाः निर्ग्रन्था धर्मघोषाणां स्थविराणामन्तिके एतमर्थ श्रुत्वा निशम्य चम्पायां शृङ्गाटक-यावन्महापथेषु बहु- जनस्य एवमाख्यान्ति धिगस्तु खलु हे देवानुपियाः । नागश्रिय ब्राह्मणी यावद् दुर्भगनिम्मगुलिकाम् , यया खलु तथारुपः साधुः साधुरूपो धर्मरुचिरनगारः प्रार; दिकेन यावत्तिक्तालावुकेनजीविताव्यपरोपितः। ततः खलु तेपाश्रमणानामन्तिके 'तएण ते समणा निग्गंधा' इत्यादि । टीकार्थ-(तण्ण) इमके याद (ते समणा निग्गथा धम्मघोसा राण अंतिएएयम सोचानिसम्म चपाए सिंघाडगतिग जाव बहुजास्स एव माइक्खति-धिरत्थुणं देवाणुप्पिया! नागसिरीए जाव णियालियाए जाएंण सहारूवे साह सातवे सालइएण जीवियाओ ववरोवेइ) उन श्रमण निन्धोंने धर्मघोप स्थविर के मुख से इस समाचार को सुनकर और उसका हृदय में विचार कर चपानगरी में शृगाटक यावत् महापथो में पहुजनों से ऐसा कहा हे देवानुप्रियो ! ब्राह्मणी नागश्री को धिक्कार है यावत् निम्ब की निगोली जैसी अनादरणीय है कि जिसने तथा रूप साधु-साधुरूप धर्मरुचि अनगार को शारदिक यावत् कडबे तुम्ने का शाक देकर जीवन से रहित कर दिया है । (तएणं तेसि समणाण अं. तपण ते समणा निग्ग था ' इत्यादि, टार्थ (तएण) त्यारा (ते समणा निराथा धम्मघोसा थेराण अतिए एयमद्द सोचा निसम्म चपाए सिंघाडग़तिग जाव बहुजणास्स एव माइपखति-धिरत्युण देवाणुप्पिया ! नारा सिरीए माहणीए जाव णिवोलियाए जाए ण तहारुवे साहू साहूरूवे सालइएण जीचियाओ ववरोवेइ) તે શ્રમણ નિએ ધગશેષ સ્થવિરના મુખથી આ વાત સાંભળીને અને તેને હૃદયમાં ધારણ કરીને ચ પાનગરીમાં મૃગાક મહાપા વગેરેમાં ઘણા માણસને આ પ્રમાણે કહ્યું કે હે દેવાનુપ્રિયે બ્રાહા નાગશ્રીને ધિક્કાર છે અને તે લીમડાની લી બેળાની જેમ અનાય છે કેમકે તેણે તથારૂપ સાધુ સાધુ ૨૫ ધમ રૂચિ અનગરને શારદિક કડવી તાબડીનું શાક આપીને મારી નાખ્યા છે mms एतम शुत्वा निशम्य बहुजनोऽन्योन्यस्प-परम्पारण माग्याति-पन मारते पव मज्ञापयति, पब मरूपयति धिगस्तु पलु नागभिगा बामण्या, पया धर्माविर- नगर शारदिकेन यारद जीविताद् ध्यपरोपितः । ततः ग्यत ते प्रामणा पायो नगर्या बहुजनस्पान्तिके पतमधं श्रुत्या निशम्य, आशुरुमाली क्रोधाविष्टा: यावत् मिसमिसन्त =ोपानठेन प्रज्वलत,यशनागश्री मणी तीवीपागन्छन्ति, तिए एयमह सोचा परजणे अन्नमानस्स एवमाउरखा, एवं भासा घिरत्युणं नागसिरीए मारणीए जाय जीवियाओ धवरोविए, ताणं ते माहण चंपाए नपरीए पाजणस्स अति एयम सोच्चा निसम्म आ- सुरत्ता जाव मिसिमिसेमाणा जेणेय नागसिरी मारणी तेणेव उवाग छति) उन श्रमणजनों के मुख से इस समाचार को सुनकर और बसे हृदय में धारण करके अनेक मनुष्य आपम में इस प्रकार कहने लगे घोलने लगे प्रज्ञोपना करने लगे प्ररूपणा करने लगे कि ब्राह्मणी नागभी को धिकार है जिसने धर्मरुचि अनगार को शारदिक-तिक्त कडवे तुंवे के शाक से जीवन रहित करदिया है । इस प्रकार उन ब्राह्मणों ने तथा सोम, सोमदत्त, सोमभूति आदि ने जय चपानगरी में अनेक मनुष्यों के मुख से इस बात को सुना-तो वे सुनकर और उसे अपने २ हृदय में धारण कर इकदम क्रोध से तम तमा उठे और यावत् क्रोधानल से जलते हुए जहा नागश्री ब्राह्मणी थी वहा आये- (तएणं तेसिं समणाणं अतिए एयमह सोचा बहुजणे अनमन्नस्स एवमाइ क्खइ, एव भासद धिरत्युण नागसिरीए माहणीए जाच जीवियाओ ववरोधिए, तएण ते माहणा चपाए नयरीए बहुजणस्स अतिए एयभट्ट सोचा निसम्म आम रत्ता जाव मिसिमिसेमाणा जेणेव नागसिरी माहणी तेणेव उवागच्छति) તે શ્રમણ લેકેના મુખથી આ સમાચાર સાભળીને અને તેને હૃદયમાં ધારણ કરીને ઘણુ માણસો એકબીજાની સાથે આ રીતે વાતચીત કરવા લાગ્યા, પ્રજ્ઞાપના કરવા લાગ્યા, પ્રરૂપણ કરવા લાગ્યા કે બ્રાહ્મણી નાગશ્રીને ધિક્કાર છે જેણે ધમરુચિ અનગારને શારદિક-તિકત કડવી તુ બડીના શાકથી મારી આ રીતે તે બ્રાહ્મણોએ એટલે કે સેમ, સેમદત્ત અને સમભૂતિએ જ્યારે ચા નગરીના અનેક માણસોના મુખથી આ વાત સાંભળી ત્યારે તેઓ સાંભળીને અને તેને હૃદયમાં ધારણ કરીને એકદમ ક્રોધાવિષ્ટ થઈ ગયા અને ધાધરૂપી અગ્નિમા સળગતા ક્યા નાગી બ્રાહ્મણી હતી ત્યા આવ્યા. બાભ્યા , मंमगारधामृतपपिणी टी० म०१६ धर्मरुध्यनगारवरितवर्णनम् उपागत्य नागश्रिय ब्राह्मणीमेरमवादिपुः-उक्तमन्तः, ह भो ! नागश्रीः । अमार्थिव प्रार्थिक ! मरणामिनापिणि ! दुरन्तमान्तलक्षणे! हीनपुण्यचातुर्दशिके ' धिगस्तु खलु तव अघन्यायाः अपुण्यायाः यावद्-दुर्भगनिम्बालिकायाः, अत्र द्वितीयायें षष्ठी आपत्वात् , यया खलु त्वया तथारूपः साधु साधुल्यो धर्मरुचिरनगारो मासक्षपणपारणके शारदिकेन तिक्तालायुकेन यावद् व्यपरोपितः, 'उच्चावयाहि' उच्चावचामिः उच्चनीचाभिः ' अकोसणाहिं आक्रोशनाभिा-निन्दावः नीचा ऽसि त्वमित्यादिभिर्वचनैः 'अक्कोसति' आक्रोशन्ति-फटकारयन्ति उच्चावचामिः उद्धं सनामि दुष्कुलोत्पन्नाऽसित्यादिवचनैः, 'उद्धंसेंति' उद्धसयन्ति-कुलादि- (उवागच्छित्ता णागसिरी मारणों एव वयानी) ह भो! नागसिरी! अपत्थियपत्थिय दुरतपतलक्खणे, हीण पुण्णचाउद्दसे घिरत्युण तव अध- माए अपुन्नाए जोवणिपोलियाए जाए ण तुमे तहारूवै साह साहरूवे मास खमणपारणसि सालइएण जाव ववरोविए उच्चावण्याहिं अकोसणाहिं अकोसति उद्ध से ति) वहा आकर न्होंने नागश्री ब्राह्मणीसे कहा अरीओ नागत्री ! अरी अप्रार्थित प्रार्थके। हे दुरन्तप्रान्त लक्षणे । ओ हीन पूण्य चातुर्दशि के ! तुझ अपुण्य अधन्या को धिकार हो । तू दुर्भग निम्पगुलिका जैसी अनादरणीय है जो तूने मासखमणके पारणा के दिन घरपर आहार लेने के निमित्त आये हुए तथा रूप साधुरूप धर्मरुचि अनगार को शारदिक तिक्त कडवे तुंगे का शाक देकर जीवन से रहित कर दिया है । तू घडी नीच है इत्यादि रूप ऊँच, नीच आक्रोश निन्दा-वचनों से उन्हों ने उसे फटकारा तू नीच खानदान की (उवागच्छित्ता णागसिरी माइणी एव वयासो-ह भो ! नागसिरी | अपत्थि य पत्थिय दुरतपतलक्खणे, हीनपुण्णचाउद्दसे घिरत्थु ण तव अपनाए अपुन्नाए जाव नियोलियाए जाए ण तुमे तहारूवे साहू साहूरूवे मासखमणपारणंसि साल- इएण जार ववरोविए उच्चावएयाहिं अक्कोसणाहि अक्कोसति उद्धसे ति) ત્યાં આવીને તેમણે નાગશ્રી બ્રાહ્મણીને કહ્યું કે-કે સુઈ એ નાગશ્રી અપ્રાર્થિત પ્રોકે હે દુરત પ્રાત લક્ષણે! ઓ હનપુય ચાતુર્દશિકા તારા જેવી પાપણી અધન્યાને ધિકકાર છે તુ દુર્ભગ નિબગુલિકા (લિંબળી જેવી અનાદરણીય છે કેમકે તેણે માસ-ખમણના પારણના દિવસે ઘેર આહાર લેવા માટે આવેલા તથારૂપ સાધુ સાધુરૂપ ધર્મરુચિ અનગારને શારદિક તિકત કડવી તુ બડીનું શાક આપીને મારી નાખ્યા છે તુ સાવ નીચ છે, આમ પણ ઉચ-નીચ આક્રોષ-નિંદાના વચનેથી તેઓએ તેને ફીટકારી તું નીચ + - '१७२ गौरवात्पातयन्ति, उगानामिनिस्सनाभिः नः 'णिन्मति' निमन्स- यन्ति, उचाचामिः ‘गिनोदणार' निलोटनामिः अस्मद् हामी निस्सर इत्यादि रचने 'निच्छोडेवि ' निजीट्यन्ति = गृहादित्यागमयोती देनेन भोपयन्ति, ' तज्जेति' तर्जयन्ति 'साम्पसि पापे! त्यादिवाक्यरंगुली प्रदर्शनपूर्वक ताडनमय मदर्शयन्ति, शालेति तागन्ति चपेटादिमिः, पित्ता ताडयित्वों, स्वाद् गृहाद् निमंति' नितिपन्ति = प्रेहिनि सारयन्ति । ततस्तदनन्तर सा नागश्रीः म्याद गृहार निपटा समाणा' निसिलामती-नि सरितासंती,चम्पाया नगा शृङ्गाटक त्रिकचतुपवरचतुर्मुगमहापपयेषु यत्र यत्र है इस तरह की ऊँची नीची पाणियों से उसे भली धुरा कहा कुलादि के गौरव से उसे पतित को। (उचापयारिणिमणानि णिन्मत्यति उच्चार्वाहि णिच्छोडणाहिं निच्छोदत्ति, तज्जेंति, तालेंति, तज्जैसा तालेत्ता सयाओ गिराओ निच्छुभनि ) ऊँचे नीचे कठोर वचनों से उसका तिरस्कार किया। भले घुरे वचनो से उसे डरवाया-हमारे घर से तूं बाहिर निकले जा इत्यादि भयोत्पादक शब्दों से उसे मप दिखलाया । ओ पापिनी! तूजे मालूम पह जायगा, इत्यादि वाक्यों से - अंगुली दिखा २ कर उसे मारने का भय दिखलाया और चपेटा-चप्पैर आदि से उसे पीटा भी । और पीटपाट कर उसे उन्होंने फिर अपने घर से बाहिर निकाल दिया । (तएणं सा नोगसिरी सयाओ गिहामओ निच्छूडा समाणी पाण नगरीए सिंघाडगतिगचउँकचचरचउम्मुह. ખાનદાનની છે, આ જાતના ઉચા નીચા વચનોથી તેણે બેટી ખરી સભળાવી કેળ વગેરેનું ગૌરવથી તેણે પતિતા કહ્યું (उच्चावयाहि णिमत्यणाहि णिब्भस्थति, उच्चावयाहि णिच्छोडणाहि निच्छो डेंति, तज्जति, तालेति तज्जेत्ता तालेत्ता सयाओ गिहाओ निच्छुभति ) ઉચા નીચા વચનથી તેને તિરસ્કાર કર્યો, બેટા ખરા વચનથી તેને બીવડાવી અમારા ઘરથી તુ બહાર નીકળી જા” વગેરે ભત્પાદક વચનોથી તેણીને બીક બતાવી “એ પાપણી ! તને મજા બતાવવી દઈશું ?” વગેરે વચ તેથી સામી આગળી કરીને તેને મારી નાખવાની બીક બતાવવા લાગ્યા અને પડ લાફા વગેરેથી તેને માર પણ મા, મારપીટ કરીને તેઓએ તેને પિતાના ઘેરથી બહાર કાઢી મૂકી तएण सा नागसिरी सयाओ गिहाओ निच्छुडा समाणी चपाए नगरीए सिंघाडगतिगचठक्कचच्चरचउम्मुह० बहुजणेण . ८ भनगारधर्मान्तपिणी टीका १० १६ धर्म रुच्यनगारचरिवर्णनम् गच्छति तत्र तत्र सर्वत्र बहुजनेन होलिज्नगाणी' हील्यमाना-जात्याद्यद्धाटनेन, 'खिसिज्जमाणी'स्यमाना-परोक्षन्सनन, 'निदिज्जमाणी' नियमाना- तत्परोक्षम् ‘गरहिज्जमाणी' गहमाना-तत्समक्षमेव 'सज्जिनमाणी' तय॑माना- अङ्गुलीचालनेन भयमुत्पादयमाना 'पञ्चहिज्जमाणी' मव्ययमाना यष्यादिता- डनेन 'विकारिन्जमाणी' पिक्रियमाणा 'पुकारिज्जमाणी' युक्तियमाणा कुत्रापि परजणेण हीलिज्माणी खिसिज्जमाणी निदिजमाणी, गरहिज्जमाणी, तज्जिज्जमाणी, पञ्चहिज्जमाणी, विक्षारिजमाणी, शुक्कारिज्जमाणी, करवा ठाण दा नित्य वा अलममाणी २ दडि खडा नियमणा खंड खडमल्लय संड खंड पाउगरत्यगया फुडारड मीसा मच्च्यिाउगरेणं अन्भिज्जमागमग्गा गेह गेहेण देह लिया वित्तिकप्पेमाणी विहरह) अपने घर से बाहिरनिकल कर वह नागश्री चपानगरी के शृगाटक, त्रिक, चतुष्क, चत्वर चतुर्मुग्व महापय आदि मार्गों पर जहा २ गई, वर्धा २ सर्वत्र अनेक जनो ने उसकी “ यह नीचजाति की है " इत्या- दिरूप से हीलना की। सब के सब उसपर बहुत प्रोधित हुए सयेने उसकी परोक्ष में निंदा की । सामने सपने उसे मला बुरा कहा । अगुली संचालन पूर्वक उसे मारने पीटने का भय दिखलाया। किन्हीं २ ने उसे लकडी आदिसे मारा पीटा भी। अनेकोो उसे धिक्कारा। कितनेक जनों ने उसे देखकर उसपर थूक भी दिया। इस तरह की परिस्थिति निदिजमाणी, गहिज्जमाणी,वज्जिज्जमाणी पव्याहिज्जमाणी,पिक्कारिज्जमाणी, थुक्कारिज्जमाणी, कत्थड ठाण वा निलय वा अभिमाणी २ दडिखडा निव- सणा खडमल्लय खड खड धगहत्यगया फडाहडसीसामच्छियाचउगरेणं अभिज्जमाणमग्गा गेह गेहेणं देह पलियाए वित्ति कप्पेमाणी विहरइ ) પિતાના ઘરથી બહાર નીકળીને તે છે શ્રી ચપા નગરીના શૃંગાટક, ત્રિક, ચતુ, ચ, ચતુર્મુખ, મહાપથ વગેર માર્ગો ઉપર ક્યા ગઈ ત્યા ત્યા વધે ઘણું માએ તેની આ નીચ જાતની છે” વગેરે વચનોથી હલના કરી બધા માણસો તેની ઉપર ખૂબ જ જુએ થયા તેની ગેર હજ રીમા લેકેએ તેની ખૂબ નિંદા કરી, તેની સામે તેને બધાએ ખરી ખોટી સભળાવી, આગળી ચી ધી ચ ધીને તેની સાથે મારપીટ કરવાની બીક બતા- વવા લાગ્યા કેઈ કોઈએ તે તેને લાકડી વગેરેને ફટકો પણ માર્યો, ઘણા એએ તેને ટિકારી, કેટલાક માણસોએ તેને જોઈને તેની ઉપર મૂકી . .
- - स्थानं ग निवासा निम्य पा-मन्पाररियामार्थस्थानम् अनममाना २८ममा नुवती २, 'दढीखडनिसगा' दण्डिगण्टनियमनाम्दष्टि-तमन्मान जीर्णवसा, तस्प खण्ड, तदर नियसन-परिधान यस्पाः सा तया, 'लडमल्लपरखडपडगाव गया' खण्डगल्लफ-सण्डपटरदस्तगतामायण्डमाल मिर्ग शराबण्ड सपपर कर पानाथै घटखण्ड, तद् दय हस्तगत यस्पा सा तथा, 'अटाडाइसीसा' स्फुटितहड़ादशीपा-स्फुटित स्फुटितकेश 'एमालम् ' अययं शीर्ष शिरो यस्याः सा तथा, रिकीर्णकेशवतीत्यर्थ 'मच्छिगाचडगरेण अग्निज्जमाणमग्गा' मलिका चटकरेण अन्यीयमानमार्गा मक्षिकासमूद्देन अनुगम्यमानमार्गा शरीरवनादीना मलिनत्वान् मक्षिकास्तत्पृष्ठतो धास्तीत्यर्थ. गेह गेहेण देह वलियाए' गृह योग देहरलिफया भतिगृह देहनिहिहेतोः उदरपूर्वयमेवेत्यर्थ:-त्ति 'फापमाणी कल्प्यमाना-कुर्वाणा सती विहरति । ततस्तदनन्तर खल तस्या नागश्रिया ब्राह्मण्या स्वस्मिन् भवे एव पोडश रोगातकाः प्रादुर्भूताः, तद्यथा-(१) श्वासः, (२) कास , (३) ज्यः, 'जारकुटे ' यावत्-कृष्ठम् , (४) दाह , (५) कृतिशूलम् , (५) का सामना करती हुई वह कहीं पर भी पैठने के लिये स्थान को, और ठहरनेके लिये-विश्राम करने के लिये-जगह भी कोनरी प्राप्त करती फटे हुए जीर्ण वस्त्र के टुकडे को पहिरे हुए भिक्षा के लिये मिट्टी के खप्पर को और पानी के लिये फूटे घडे के टुकडे को हाथ में लिये हुए इधर उधर एक घर से दूसरे घर पर उदर पूर्ति के लिये फिरने लगी। इसके शिर के थाल ईधर उधर विखरे हुए रहते थे। शरीर और वस्त्रादिको के मैले कुचैले होने के कारण मक्षिकाओं का समूह इसके पीछे पीछे २ भागता रहता था। (तएण तीसे नागसिरीए मारणीए तम्भवसि व सोलसरोयोयका पाउम्भूया-त जहा सासे कासे जोणिसूले, जाव આવી પરિસ્થિતિને મુકાબલે કરતી કોઈ પણ સ્થાને બેસવાની કે રોકાવાની કે વિશ્રામ કરવાની જગ્યા તે મેળવી શકી નહિ, અને છેવટે ફાટેલા જૂના વસ્ત્રોના કકડાને વીંટાળીને ભિક્ષાના માટે માટીનું ખપ્પર અને પાણીના માટે ટી માટલીના કકડાને હાથમાં લઇને પિટ ભરવા માટે આમતેમ એક ઘરથી જીજે ઘેર ભમવા લાગી તેના માથાના વાળ આમ તેમ અસ્ત વ્યસ્ત રહેતા હતા, શરીર અને વસ્ત્રો વગેરે મેલા હોવાને લીધે માખીઓના ટેળેટેળા તેની પાછળ પાછળ ભમતા રહેતા હતા (तएण तीसे नागसिरीए माइणीए तम्भवसि चे सोलसरोयायंका पान भूया-तु जहा सासे कासे जोणिस्ले, जाव कोठे तरण सा - - - भमगारधर्मामृतषिणी टीका ४० १६ धर्म सच्यनगारचरितवर्णनम भगन्दर , (७) अर्शः, (८) योनिशूलम् , (९) दृष्टिशलम् , (१०) मूर्धशूरम् , (११) अरुचिः, (१२) अतिवेदना, (१३) कर्णवेदना, (१४) कण्ड , (१५) जलोदरम् , (१६) कुष्ठम् । ततस्तदनन्तर सा नागश्री ब्रामणी पोडशमी रोगावबैरभिभूता- सती आतंदुःखातवशा शारीरिकमानसिकदुःखमुक्ता कालमासे कालं कृत्वा षष्ठया पृथिव्याम् 'उकोसेण' उत्कृष्टता, द्वाविंशति सागरोपमस्थितिकेयु नर केषु-नरकावासेपु नारकत्वेन उपपन्ना-उत्पन्ना ।। सू०५ ।। मूलम्-सा णं तओऽणंतरंसि उव्वद्वित्ता मच्छेसु उववन्ना, तत्थ णं सस्थवज्झा दाहवकंतीए कालमासे कालं किच्चा अहे सत्तमीए पुढवीए उक्कोसाए तेत्तीस सागरोवमट्टिईएसु नेरइएसु उववन्ना, सा णं ततोऽणतरं उबढ़ित्ता दोच्चपि कोढे तएण सा नागसिरी मारिणी, सोलसहिं रोयायकेहिं अभिभूया समाणी अदुहवसहा कालमासे काल किच्चा छट्ठीए पुढचीए उक्कोसे ण यावीससागरोवमहिइएसु नर एसु नेरइयत्ताए उवचन्ना) उस नागश्री बामणी को उसी भव में ये सोलह रोगातक प्रकट हो गये-(६) श्वास (५) कास (३) ज्वर (४) दाह (५) कुक्षिशूल (६) भगन्दर (७) अर्श (८) योनिशूल (९) दृष्टिशल (१०) मूर्धशूल (११) अरूचि (१२) अक्षि- वेदना (१३) कर्णवेदना (१४) कण्डू (१५) जलोदर (१६) कुष्छ । इन १६ सोलहरोगातको से अत्यन्त दुखित हुई-शारीरिक एवं मानसिक व्य थाओं से व्यथित हुई-वह नागश्री काल अवसर कारकर छठी पृथिवी में २२ सागर की उत्कृष्ट स्थितियाले नरकावासों नरपिक को पर्यायसेमें उत्पन्न हुई ॥ सू० ५॥ सोलसहि रोयायकेहि अभिभूया समाणी अट्ट दुइवमट्टा कालमासे काल किच्चा छटीए पुढवीए उक्कोसेण वावीससागरोवमटिइएसु नेरइयत्ताए उबपना) તે નાગશ્રી બ્રાહ્મણને તેજ ભવમાં આ સોળ ગાતકો પ્રકટ થયા (1) वास (२) आस (3) ५२ (४) । (५) इक्षिशूल (1) M२ (७) म (८) योनिशुस (6) Ly4 (१०) भूधशूल (11) 24३यि (१२) અલિવેદના (1) વેદના (1) કર (૧૫) જલંદર (૧૬) કુણ આ સોળ ગાકેથી અતીવ દુખ થયેલી શારીરિક તેમજ માનસિક વ્યથાઓથી વ્યથિત થતી તે નાગશ્રી કાળ અવસરે કાળ કરીને છઠ્ઠી પૃથિવીમા બાવીસ સાગરની ઉત્થક સ્થિતિવાળા નરકાવામા રિયિકની પર્યાયથી જન્મ પામી છે સૂ ૫ mym Ramanager- जानाधर्मका मच्छेसु उववजइ, तत्थ विय ण सत्यविआ दाहवातीप दोच्चंपि अहे सत्तमी पुटलीग उनकोस तेतीसमागरोवम- ट्टिईएसु नेरइएमु उनमज्जई, सा णं तओहितो जाव उज्व- द्वित्ता तच्चपि मन्छेसु उपचन्ना नत्य पि य णं सत्ययज्झा जाव काल फिच्चा दोन्चपि छट्टीए पुटवोए उस्कोमेणं० तओऽणतर उहित्ता मच्छेसु उरगमु गब जहा गोसाले तहानेयव्य जाव रयणप्पभाओ सत्तनु उनवन्ना तओ उज्व. ट्टित्ता जाई इमाइ राहयर पिहाणाइ जाव अदुत्तरं च णं खर वायर पुढविकाइ यत्ताते तेमु अणेगसतसम्स खुत्तो ।।सू०६॥ टीका-साण' त्यानि साम्नागश्री ग्रामगी पलु तव =पठया पृथिव्या अनन्तरम् आयुर्मपस्थितिक्षये गति ' उव्यट्टित्ता' उदय-निम्मत्य मत्स्येपूत्पमा, वन खलु मत्स्यभवे सा 'सत्या' शस्त्रविद्धा 'दावरफतीए' दाव्युत्क्रा- न्या-दाहोत्पत्त्या, काठगामे कामयाऽघ मातम्या पृदिव्योमुकटतस्त्रयविंश- सागरोपमस्थिति केभु' नेहापु 'नरयिकेषु उत्पन्ना । सा सलु तत' सप्तम्या: पृथिव्याः अन तरमुवयं द्वितीयवारमपि मत्स्येयूत्पद्यते । तत्रापि च खलु शख सा ण तओ' इत्यादि। टीकार्थ-(सा) वह नागभी तोऽणतरसि) उस वी नरककी भन्न स्थिति समाप्त होने पर ( उचद्वित्ता ) व से निकली-और निकलकर (मच्छेप्सु उववन्ना तत्थण सत्यवमा दापचकतीए कालमासे काल फिच्चा अहे सत्तमीए पुढवी उकोसा तेनीस सागरोवमहिइण्ट नेरइएसु उववन्ना, सा ण ततोऽणतर उपद्वित्ता दोच्चपि मन्छेमु उवव सा ण तओ' इत्यादि-- सार्थ-(सा) ते नामश्री (त ओऽतर सि) छी २४ी लपस्थिति पूरी था I ( अद्वित्ता ) या नी भने नीजीन (मच्छेसु उववना रात्थ ण सत्याझा दाह वकतोए कालमासे काल किच्चा अहे सत्तमीए पुढवीए उक्शेमाए तत्तीस मागरोपमट्टिइएसु नेरहएसु उववक्षा - - . साण उपवजनद) , ममगारघमामृतपक्षिणीटी00 १६ धमरच्यनगारचरितवर्णनम् २७७ रिद्धा दाव्युत्क्रान्त्या द्वितीयवारमपि अधः सप्तम्या पृथिव्यामुत्कृष्टतखयस्त्रिंशत्सा. गरोपमस्थितिकेपु नैरयिकेप्पपद्यते, सा खलु ' तओहितो' तस्याः सप्तम्या: पृथिव्याः, यावद् उद्वर्त्य तच्चपि' तृतीयवारमपि मत्स्येषु उत्पन्ना । तत्रापि च खलु शस्त्रविद्धा 'जाव काल किन्चा' यापत् दाहव्युत्कान्त्या कालमासे काल कृत्या द्वितीयवारमपि पप्ठ्या पृथिव्यामुत्कृष्टतो द्वाविंशतिसागरोपमस्थितिकेषु नरकेपृत्पन्ना, सा खलु तत =पप्ठ्याः पृथिव्या अनन्तर ' उवटित्ता' उद्वल- निस्सृत्य उरःपरिसपृत्पन्नाः, तत्र शस्वच्या दाहव्युत्क्रान्त्यामुत्कृष्टतः सप्तदश- सागरोपमस्थितिकेपृत्पन्ना । एव यथा गोशरलकस्तथा ज्ञातव्यम्-गोशालकनदस्या- ज्जई ) तिर्यञ्चगति में मच्छ की पर्याय से उत्पन्न हो गई । वहां वह मत्स्य के भव में शस्त्र से चिद होकर दाह की उत्पत्ति से काल अवसर काल कर मरी सो नीचे सप्तम नरक में ३३ तेतीस सागर की उत्कृष्ट स्थितिवाले नरकावास मे नैरयिक की पर्याय से उत्पन्न हुई। वहां से निकलकर फिर वह मत्स्य की पर्याय से उत्पन्न हुई। (तत्य वि य र्ण सत्यविज्झादायक्कतीरा दोच्चपि अहे सत्तमीए पु०) वहां वह शस्त्र पुनः विद्ध होकर दाहकी व्युत्क्रान्ति से मरी और मरकर द्वितीयवार भी सप्तम नरक में (उक्कोम तेतीससांगरोवमट्टिइण्सु नेरइए उचव जइ) उत्कृष्ट-तेतीस सागर की स्थिति लेकर नैरयिक की पर्याय में उत्पन्न हुई। (सा ण तओ हिं तो जाव उववद्वित्ता तच्चपि मच्छेसु उव. वन्ना, तत्थ वि य णं सत्यज्या जाव कालं किच्चा दोच्चपि छट्ठीय पुढ- घोए उक्कोसे ण तओऽणतर उवहित्ता मच्छेसु उरएसु एव जहा गोसाले से તિર્યંચ ગતિમા મછથી પર્યાયની જન્મ પામી ત્યા તે મત્સ્યના ભવમાં શસ્ત્ર વડે વી ધાઈને દાહથી પીડાઈને કાળ અવસરે કાળ કરીને મરણ પામી અને નીચે સાતમા નરકમાં ૩૩ સાગરની ઉત્કૃષ્ટ નિગતિવાળા નરકાવાસમા નરયિકની પર્યાયથી જન્મ પામી ત્યાથી નીકળીને ફરી તે મત્સ્યના પર્યાયથી જન્મ પામી (तत्थ वि य ण सत्यविज्झा दाहवक्कतीए दोच्चपि अहे सत्तमीए पु०) ત્યા તે ફરી શસ્ત્ર વડે વિદ્ધ થઈને દાહથી પીડાઈને મરી અને મારીને बी० मत पशु से तमा न२४ा (उनकोस तेतीमसागरोवमट्टिइएसु नेरइए उव. पन्जा) ४ 33 सासनी धिति धन ने.यिनी पर्यायमा म पाभी (सा ण तोहिं तो जाप उच्चद्वित्ता तचपि मच्छेसु उपवना, तत्व वियणं सत्यवज्झा जाब काल पिच्चा दोन्चपि छवीए पुढपीए उक्कोसेण तमोऽणंवर - जाताममेकपा वर्णनं पो यमित्यर्यः, 'गारयणप्पमा गरा उसपना' याद रत्नप्रभायां सम उत्पन्ना-मयं मार-उर परिसर्पमयो नि एत्य पथम्यो धमाभाया पृषिष्या मुस्कृष्टतः सप्तदशसागरोपमस्थितिकेपुनरपिकात्पमा, तो नि मृत्य द्वितीय चारमुरम्परिसपत्पपते, तप्रापि पूर या कन्या द्वितीय परमपि पत्रम्या पृषि हा नेयब्ध जाव रयणपभाभो सत्तसु उपया, तो उपाहिला आइ ईमाइ खहायर पिताणाइ जार अदुत्तर पण परवायर पुरिफाइयत्ता ते तेसु अणेगसतसारस खुत्तो) वहां से भर स्थिति ममाप्त होते ही यह निकली-निफल फर तीसरी पार भी मत्स्य की पर्याय में उत्पन हुई । वहां शस्त्र विद्ध होकर दाह की व्युत्कान्ति से मरी मो मर कर दुयारा भी छठी ही पृथिवी में २२ पावीम सागर की उत्कृष्ट स्थिति से कर उत्पन्न हुई । वहाँ की भवस्थिति समाप्त कर जय यह वहां से निकली तो उर परिसर्प की पर्याय में उत्पन्न हुई। वहां पर भी वह शस्त्र विद्ध होकर दाह की व्युत्क्रान्ति से-उत्पत्ति से काल अवसर काल कर धूमप्रभा नाम की पचम पृथिवी में नैरयिक की पर्याय से उत्पन हुई । वहा सत्तरह सागर की उत्कृष्ट-स्थिति इसकी हुई। गोशालक की तरह इसका वर्णन जानना चाहिये । तात्पर्य इसका इस प्रकार है- १७ सागर की उत्कृष्ठस्थिति वाले पचम नरक से निकल द्वितीय चार भी वह उरः परिसर्प की पर्याय से उत्पन्न हुई । वहा से पूर्व की तरह उन्वहिता मच्छेमु उरएस एव जहा गोसाले वहा नेयच्च जाव रयणप्प भाओ सत्तसु उववन्ना, तो उन्धद्वित्ता जाइ इमाइ खहयर विहाणाड जाव अदुत्तरं, च ण खरवायरपुढविकाइयत्ता ते तेसु अणेगसतसहस्सखुत्तो) ત્યાની ભવસ્થિતિ પૂરી થતા જ તે ત્યાંથી નીકળી અને નીકળીને ત્રીજી વાર પણ માછલીના પર્યાયમાં જન્મ પામી ત્યા શસ્ત્રથી વી ધાને તથા દાહથી પીડાઈને મરણ પામી અને તે વખતે પણ છઠી પૃથિવીમા ૨૨ મગરની ઉત્કૃષ્ટ સ્થિતિ લઈને ઉત્પન્ન થઈ ત્યાની ભવરિથતિ પૂરી કરીને જ્યારે તે ત્યાંથી નીકળી ત્યારે તે ઉર પરિસર્પના પર્યાયમા જન્મ પામી ત્યા પણ તે શસ્ત્રથી વીધાઈને અને દાહથી પીડાઈને કાળ અવસરે કાળ કરીને ધૂમપ્રભા નામની પચમ પૃથિવીમા નરયિકના પર્યાયથી જન્મ પામી ત્યા ૧૭ સાગરની ઉત્કૃષ્ટ સ્થિતિ તેની થઈ ગોશાલકની જેમ આનું વર્ણન જાણી લેવું જોઈએ મતલબ આની આ છે કે ૧૭ સાગરની ઉત્કૃષ્ટ સ્થિતિવાળા પચમ નરકથી નીકળીને બીજી વખત પણ તે ઉર પરિસર્પના પર્યાયથી જન્મ પામી ત્યાથી પણ પહે- લાની જેમજ કાળ અવસરે કાળ કરીને બીજીવાર પણ આ પથિવીમા - मनगारधामृतार्पणी टीका १० १६ धर्मरच्यनगारगरिसवर्णनम् ध्यामुत्कृष्टतः मतदशसागरोपमस्थितिकेषु नैरपिके पूत्पन्ना 1 ततो नि स्मृत्य पती- यारमपि उमतिसत्पद्यते, अत्र पूर्ववत् कालं कृत्वा चतुया पङ्कप्रभायां पृयिच्यामुत्कृष्टतो - दशसागरोपमस्थितिकेषु नैरयिकेपूत्पन्ना, सतो निःसृत्य सिंहपूपयते,गगापि पूर्ववत् कालं कृत्वा द्वितीयवारमपि चतुर्था पृथिव्यामुत्कृष्टतो दरामागरोपमस्थितिकेपु नैरयिके पूत्पन्ना। ततश्चतुर्याः पृथिव्या निःसृत्य द्विती. यपारमपि रिहेपूत्पद्यते, तत्र पूर्ववत् काल कृत्वा तृतीयाया वाहुकप्रभाया पृथि व्यामुष्टत सप्तमागरोपमस्थितिकेपु नैरयिके पूत्पन्ना, ततो निः सृत्य पक्षि पूत्पद्यते, तत्र पूर्ववत् काल कृत्वा द्वितीयवारमपि तृतीयाया पृथिव्यामुस्कृष्टतः काल कर द्वितीयवार भी यह पचम पृथिवी मे १७ सागर की उत्कृष्ट स्थितिवाले नरकों में नैरयिक की पर्याय से उत्पन्न हुई। यहां की स्थिति समाप्त कर जर यह वहां से निकली-तो तीसरी बार भी यह उरः परिसों में उत्पन्न हुई । वहां से पूर्व की तरह काल कर चौथी पक प्रभा पृधिवी में कि जहा १० सागर की नैरयिको की उत्कृष्ट स्थिति है वह नैरयिक की पर्याय से उत्पस्न हुई। वहा से निकल कर यह सिंह की पर्याय में उत्पन्न हुई । पहिले की तरह वहा से भी मर कर द्वितीय चार भी यह चतुर्थ नरक में दश सागर की स्थिति वाले नरक में नैरयिक की पर्याय से उत्पन्न हुई। चतुर्थ नरक से निकल कर यह दुवोरा भी सिंह को पर्याय से उत्पन्न हुई। वहां से अपने समय पर मर कर फिर यह घालुका प्रभा नाम की तीसरी पृथिवी में सात सागर की उत्कृष्ट स्थिति लेकर नैयरिक की पर्याय में उत्पन्न हुई। वहां से निकल कर फिर यह पक्षियों के कुल मे उत्पन्न हुई । यहा से मर कर ૧૭ સાગરની ઉત્કૃષ્ટ સ્થિતિવાળા નરકમાં નરયિકના પર્યાયથી જન્મ પામી ત્યાની સ્થિતિ પૂરી કરીને જ્યારે તે ત્યાંથી નીકળી તે ત્રીજી વાર પણ તે ઉર પરિસર્ષમાં ઉત્પન્ન થઈ ત્યાથી પહેલાની જેમ કાળ કરીને ચોથી પક પ્રભા પૃથિવીમા-કે જ્યાં દશસાગરની નિરયિકેની ઉત્કૃષ્ટ સ્થિતિ છે, ત્યા નૈર ચિકની પર્યાયથી ઉત્પન્ન થઈ, ત્યાથી નીકળીને તે સિંહના પર્યાયથી જન્મ પામી પહેલાની જેમ ત્યાથી પણ મરણ પામીને બીજીવાર પણ ચતુર્થ નરકમા દશ સાગરની સ્થિતિવાળા નરકમાં રયિકના પર્યાયથી જન્મ પામી ચતુર્થ નરકથી નીકળીને તે ફરી સિંહના પર્યાયથી ઉત્પન્ન થઈ ત્યાથી મરણ પામીને ફરી તે વાલુકાપ્રભા નામની ત્રીજી પૃથિવીમા સાત સાગરની ઉત્કૃષ્ટ સ્થિતિ લઈને નૈર યિકની પર્યાયમા જન્મ પામી, ત્યાથી નીકળીને તે ફરી તે પક્ષીઓના કુળમાં ६० माया सप्तसागरोपमस्थितिकेपु नैरपिके पूत्य-ना । तवरवनीपायाः पृथिव्या नि मृत्य द्वितीयवारमपि पक्षियूत्पद्यते, तत्रापि पूर्वान् फार द्वितीयाया पृथिव्या शर्करभगायामुत्रुष्टतनिसागरोपगम्धिति नरयि पूत्पन्ना । ततो नित्य सरी- सुपेपत्पद्यते, तत्रापि गन्नध्या दाव्युत्लान्या कामासे काल हत्या द्वितीयवार- मपि द्वितीयायां पृथिव्यामुत्कृष्टतस्निगागरोपमस्थितिका नायिकेयूत्पन्ना । ततो द्वितीयायाः पृथिव्याः नि सत्य हितोपचारमपि सरीरपत्रायते, तत्रापि पूर्ववत् फाल कृत्वा मयमाया पृथिव्या रत्नप्रमायागुत्कृष्टत एमागरोपमस्थिति के नर- यिकेप्त्पन्ना, ततो निः गत्य समिपु, ततो निः प्रत्याऽसतित्पयते, ततो निः फिर यह पुनः तीसरे नरक में सात सागर की उत्कृष्ट स्थिति घाले नैर यिकों में नैरयिक फी पर्याय से उत्पन्न हुई । यहा से निकल कर पुनः यह पक्षियो के फुल में उत्पन्न हुई । यहा से मर कर फिर यह दूसरी पृथिवी जो शर्करा प्रभा है और जिसके नरकावासों में तीन सागर की उत्कृष्ट स्थिति है वहो नैरयिको की पर्याय से उतनी स्थिति लेकर उ त्पन्न हुई । वहां से निकल कर सरीसृपों में यह दाद की व्युत्क्रान्ति से मरी तो मर कर दितीय चार भी दितीय प्रथिवी के नरकावासों में तीन सागर की उत्कृष्ट स्थिति लेकर उत्पन्न हुई । द्वितीय पृथिवी से निकल कर दुबारा यह सरीसृप में उत्पन्न हुई । वहा से अपने समय पर मर कर रत्नप्रभा नामकी प्रथम पृथिवी में उत्कृष्ट एक सागर की स्थिति घाले नरकावासों में नैरपिक को पर्याय से उत्पन्न हुई। वहां की भवस्थिति समाप्त होने पर यह वश से निकलकर सजी जीवों में वहां જન્મ પામી ત્યાથી મરણ પામીને ફરી તે ત્રીજા નરકમાં ઉત્કૃષ્ટ સ્થિતિવાળા નરયિકમા નરયિકના પર્યાયથી ઉત્પન્ન થઈ ત્યાથી નીક ળીને ફરી તે પક્ષીઓના કુળમા ઉત્પન્ન થઈ ત્યાથી મરણ પામીને ફરી તે બીજી પૃથિવી જે શર્કરામભા છે અને જેના નરકાવાસમાં ત્રણ સાગરની ઉત્કૃષ્ટ શિતિ છે ત્યા નરયિકના પર્યાયથી તેટલી જ સ્થિતિ લઈને જન્મ પામી ત્યાથી નીકળીને સરીસૃપમા તે ઉત્પન્ન થઈ ત્યા શસથી વધાઈને તથા દાહથી પીડાઈને મરણ પામી અને ત્યારપછી બીજીવાર પણ બીજી પૃથિવીના વાસોમાં ત્રણ સાગર જેટલી ઉત્કૃષ્ટ સ્થિતિ લઈને ઉત્પન્ન થઈ બીજી પૃથ્વિથી નીકળીને બીજીવાર તે સરીસૃપમાં ઉત્પન્ન થઈ ત્યાથી યથા સમય મરણ પામીને રત્નપ્રભા નામની પ્રથમ પૃથ્વિમાં ઉત્કૃષ્ટ એક સાગરની સ્થિતિવાળા નરકા વાસમા નૈરયિકના પર્યાયતી ઉત્પન્ન થઈ ત્યાની ભાવસ્થિતિ પૂરી કરીને તે ત્યાથી નીકળીને સી-મા, ત્યાથી પણ મરણ પામીને સાત સાગરની न२३॥
- मगरमोहनपिणो टीका २० १६ धर्मरुच्यनगारवरितवर्णनम् १४५ मृत्य द्वित्तीयनारमपि प्रथमाया पृथिव्या पल्योपमस्याऽसर येयभागस्थितिकेषु नैरयिकेषु नैरयिकतयोत्पन्ना' इति । 'तओ उपट्टित्ता'तत उद्वर्त्य रत्नप्रभातो निः मृत्य यानि इमानि 'खह- यरविहाणाइ ' खचरविधानानि चर्मपक्ष्यादीनि भवन्ति तेषु, यावत् जयोत्तर च खलु यानीमानि खरवादरपृथिवी कायिकरिधानानि तेपु खरसादरपृथिवीकायिक- तयाऽनेकशतसहस्रकृत्वः समुत्पना ।। सू०६ ॥ मूलम्-सा णं तओऽणंतरं उच्चट्टित्ता इहेब जंबूदोवे दीवे भारहेवासे चंपाए नयरीए सागरदत्तस्स सत्थवाहस्स भहाए भारियाए कुच्छिसि दारियत्ताए पच्चायाया तएणं ला भदा सत्थवाही णवण्हं मासाणं० दारियं पयाया सुकुमालकोमलिय गयतालुयसमाण, तीसे दारियाए निव्वत्तवारसाहियाए अम्मा- पियरो इमं एयारूवं गोन्न गुणनिप्फन्न नामधेनं करेंति-जन्हा णं अम्हं एसा दारिया सुकुमाला गयतालुयसमाणा त होउणं अम्हं इमीले दारियाए नामधेज्जे सुकुमालिया, तएण तीसे दारियाए अम्मापियरो नामधेज्ज करेंति सूमालियत्ति, तएणं सा सूमालिया दारिया पंचधाई परिग्गहिया तं जहा-खीरधाईए से भी मर कर असजी जीवों मे और फिर वहा से मर कर फिर दुधारा भी प्रथम पृथिवी में १ एक पल्य के असख्यात में भाग प्रमाण स्थितिवाले नरकावासों में नैरयिक की पर्याय से उत्पन्न हुई। उस रत्न ममा पृथिवी से निकल कर फिर यह जितने ये पक्षिभेद हैं-चर्म पक्षी आदि हैं-उनमें और उनके याद जो ये सर-यादर-पृथिवीकायादि भेद है उनमें खरथादर पृथिवीकायिकरूपसे लाखों वार उत्पन्न हुई ॥सू०६॥ અને ફરી ત્યાથી મરણ પામીને બીજીવાર પણ પહેલી પૃથ્વિમાં ૧ એક પલ્યના અસ ખ્યાતમાં ભાગ પ્રમાણે સ્થિતિવાળા નરકાવાસમા નરયિકના પર્યાયથી જન્મ પામી તે રત્નપ્રભા પૃથ્વિથી નીકળીને ફરી તે જેટલા પક્ષી ભેદે છે- ચર્મ પક્ષી વગેરે છે તેમાં અને ત્યારપછી ખર-બાદર પૃથ્વિીકાય વગેરે ભેદ છે તેમાં ખર-આદર પૃવિકાયિકના રૂપમાં લાખ વાર જન્મ પામી સૂ. ૬ -
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. . मनपारधर्मामृतवषिणी टी० ५० १६ धर्मरध्यागारचरितनिरूपणम् 'पयाया' मनाता प्रजनितवती, किं भूता दारिकामित्याह- सुकुमालकोम लिय' सुकुमारकोमलाम्-अतिमृदुलाम् गजतालुकसमाना अगस्यातिकोमलतया गैजतालुनुल्यामित्यर्थः । तस्या दारिमाया 'नियत्तवारसाहियाए ' निर्दृ त्तद्वादशा विकागः सम्प्राप्तद्वादशदिवसाया. अम्मापितरौंमातापितरौ इदमेतद्रूप 'गोण' गौणं शुणेभ्य आगत-माप्त गुणनिप्पन्न=गुणवोधकं नामधेय कुरुतः कविचारयतः त्याहि यस्मात् खलु अस्माकमेपा दारिका सुकुमारा गजतालुकसमाना जाता, तद्-तस्मात् भवतु खलु अस्मा समस्या दारिकाया नामधेयं 'सुकुमारिका' इति । ततः विचारकरणानन्तर खलु तस्या दारिकाया अम्बपितरौ नामधेय कुरुतः सुकुमारिका' इति । तत खलु सा सुकुमारिका दारिका पश्चधात्रीपरिगृहीता- पञ्चसंख्यकाभिर्धात्रीमि-उपमादभिः सुरक्षिता जाता, तद् यथा-तासा पञ्चानां धानीणा नामानि दर्शयति 'खोरधाईए जाब गिरफदर ' इति । क्षीरधान्या स्तन्य- वाहिके गर्म के नौ मास तथा साढे सात दिन रात पूर्णरूप से व्यतीत हो चुके तय उसने पुत्रीको जन्म दिया । यह पुत्री अत्यन्त कोमल अग- घाली थी इसी लिये गजका तालु भाग जिस प्रकार मृदुल होता है यह वैसी ही कोमल थी। जय यह १२ यारए दिन की हो चुकी-तप इस के मातापिताने इसका 'यथा नाम तथा गुण' इस कहावतके अनुसार गुगों को लेकर नाम सस्कार करने का विचार किया। विचार करने के बाद उन्होंने इस ख्याल से कि यह हमारी पुत्री अत्यन्त सुकुमार और गज तालु का के जैसी मृदुल है अतः इसका नाम सुकुमारिका रहे (तएण तीसे दारियाए अम्मा पियरो नामधेज्ज करेति सूमालियत्ति) उस कन्या का नाम सुकुमारिका रख दिया (तएण सा सुकुमारियदारिया ભદ્રા સાર્થવાહીના ગર્ભના નવ માસ અને સાઢા સાત દિવસ રાત પૂરા થઈ ચૂકયા ત્યારે તેણે પુત્રીને જન્મ આપે આ પુત્રી અતીવ તેમળાગી હતી હાથીને તાઇવાને ભાગ જે સુકોમળ હોય છે, તે તેવીજ કમળ હતી જ્યારે તે બાર દિવસની થઈ ગઈ ત્યારે તેના માતાપિતાએ જેવું નામ તેવા ગુણવાળી એ કહેવત મુજબ ગુણોના આધારે તેને નામ સાકાર કરવાનો વિચાર કર્યો વિચાર કર્યા બાદ તેઓએ પોતાની પુત્રીની સુકોમળ દષ્ટિ સમક્ષ રાખીને એટલે કે તેઓએ આ પ્રમાણે વિચારીને કે આ મારી પુત્રી હાથીના તાળવા જેવી સુકેમળ છે માટે એનું નામ સુકુમારી રાખીએ (तएण तीसे दारियाए अम्मापियरो नामधेज्ज करेंति सूमालियति) તે કન્યાનું નામ સુમારી રાખ્યું Tomatomer जाब गिरिकंदरमालीणा इस घपकलया निव्याग निवाघायंसि जाय परिवश्वइ, तएणं मा सूमालियादारिया उम्मुधबालभावा जाव रूवेण य जोधणेण च लागणेण य उम्किहा उक्किह सरीरा जाया यावि हात्था ॥ सू० ७ ॥ टीका-सा ण तओ' इत्यादि । सागल नागश्री. नोऽन तरम् उर्ल्स जम्बूद्वीपे दीपे भारते व चम्पायानगयीं सागरदत्तस्य सार्थवादस्य भटाया मार्यायाः कुक्षौ 'पन्चायाया ' प्रत्यायावा गर्मसमागता | ततः खङमा मडा सार्थवाही नवम् मासेषु बहुमतिपूर्णणु अष्टिमेषु रानिन्दियेपु पतिकान्तेपु सत्सु दारिका 'साण तओऽणतर' इत्यादि । टोकार्थ-(सा ण तओऽणतर उहित्ता) इसके पाद वह नागश्री खर पृथवी कायिका से निकल कर (इहेव जद्दीवे दो भारहे चासे चपाए नयरीए सागरदत्तस्स सत्यवाहस्स भदाए भारिया फुच्छिसिदारियताए पृच्चायाया ) इसी जदीप नाम के द्वीप में स्थित भारतवर्ष नामके क्षेत्र में वर्तमान चपानगरी में सागरदत्त सेठ की धर्मपत्नी-भद्रा की कुक्षि में पुत्रीरूप से अवतरी (तएण सा भद्दा सत्यवाही नवण्ह मासाण दारिय पयासा सुकुमालकोमलिय गयनालुयसमाण तीसे दारियाए निवास यारिसारियाए अम्मापियरो इम एयारूप गोन्नं गुणनिष्फन्न नाम घेज्ज फरेति, जम्हाण अम्ह एसा दारिया सुकुमाला गयतालुय समाणा त होउण अम्द इमीसे दारियाए नामधेज्जे सुकुमालिया) भद्रा 'सा ण तोऽणंतर उवद्वित्ता' इत्यादि- An-(सा ण तओऽणतर उयद्वित्ता) त्या२पछी त नामश्री ५२ Yast (45थी नागीन ( इहेब जबूद्दीवे दीवे भारहे वासे चपाए नयरीए सागरद तस्स सत्यवाहस्स भदाए भारियाए कुञ्छिसि दारियत्ताए पच्चायाया) એ જ જ બૂઢીપ નામના દ્વીપમાં આવેલા ભારતવર્ષ નામના ક્ષેત્રમાં વિદ્યમાન ચ પાનગરીમા સાગરદત્ત શેઠની ધમ પત્ની ભદ્રાના ઉદરમાં પુત્રી રૂપમાં અવતરી (तएण सा भद्दा सस्थवाही नवण्ह मासाण दारिय पयाया सुकुमालकोम लिय गयतालुयसमाण तीसे दारियाए निबत्तवारिसाहियाए अम्मापियरो इम एयारूब गोन्न गुणनिष्फन्न नामधेज्ज करेंति, जम्हाण अम्ह एसा दारिया मुकु- माला गयतालयसमाणात होउण अम्ह इमीसे दारियाए सार्थ गाधर्मातषिणी टी० अ० १६ सुकुमारिकाचरितवर्णनम् भवई तो णं अहं सागरस्स दारगस्स सूमालियं दलयामि- तएणं से जिणदत्ते सत्थवाहे सागरदत्तेणं सत्थवाहेणं एवं बुत्ते समाणे जेणेव सए गिहे तेणेव उवागच्छइ उवागच्छित्ता सांग- रदारगं सदावेइ सदावित्ता एवं वयासी-एवं खलु पुत्ता | साग- रदत्ते सत्थवाहे मम एवं वयासी-एवं खलु देवाणुप्पिया ! सूमालिया । दारिया मम एगा एगजाया इट्टा त चेव तं जइ ण सागरदारए मम घरजामाउए भवइ ता दलयामि, तऍणं से सागरए दारए जिणदत्तेणं सस्थवाहेणं एवं वुत्ते समाणे तुसिणीए, तएण जिणदत्ते सत्थवाहे अन्नया कयाई सोहणंसि तिहिकरणदिवसणखत्तमुहुत्तसि विउले असंणपाणखाइमसा- इमं उवक्खडावित्ता मित्तणाइ० आमतेइ जाव सम्माणित्ता सागरं दारगं पहायं जाव सव्वालंकारविभूसिय करेइ, करिती पुरिससहस्तवाहिणि सीयं दुरूहावेइ, दुरूहावित्ता मित्तणाइ जाव सपरिवुडे सव्विड्डीए साओ गिहाओ निग्गच्छद, निग्ग- च्छित्ता चंपानयरि मझमझेण जेणेव सागरदत्तस्स गिहे तेणेव उवागच्छइ, उवागच्छित्ता सीयाओ पच्चोहावेइ, पच्चोरुहा- वित्ता सागरगं दारगं सागरदत्तस्स सस्थ० उवणेइ, तर्पण सौं- गरदत्ते सत्थवाहे विपुल असणपाणखाइमसाइम उवक्खडा- वेइ उवक्खडवित्ता जाव संम्माणेत्ता सागरगं दारगं सूमालियाए दारियाए सद्धिं पट्टय दुरूहावेइ दुरूहावित्ता सेयापीएहि कल- सेहि मज्जावेइ मनावित्ता अग्गिहोम करावेइ करा वित्ता सागर दारयं सूमालियाए दारियाएं पाणिं गिण्हावेइ ॥ सू०८॥ o से ?, तएणं ते कोडुवियपुरिसा जिणदत्तेण सत्यवाहेणं एवं वुत्ता समाणा हट्ट करयल जाय एवं चयासी-एस गं देवाणु- पिपया ! सागरदत्तस्स सस्थवाहस्त धृया भदाण अत्तया सूमा. लिया नाम दारिया सुकुमालपाणिपाया जाव उक्किट्टसरीरा तएणं से जिणदत्ते सत्थवाहे तेर्सि कोडवियाण अंतिए एयम सोचा जेणेव सए गिहे तेणेव उवागच्छइ, उवागच्छित्ता पहाय जाव मित्चनाइ परिखुडे चंपाए. जेणेव सागरदत्तस्स गिहे तेणे उवागच्छइ, तएणं सागरदत्ते सत्यवाहे जिणदत्तं सस्थवाई एज्जमाणं पासइ पासित्ता आसणाओ अभुटेइ अब्भु- द्वित्ता आसणेणं उवणिमतेइ उवणिमंतित्ता आसत्यं वसित्थं सुहासणवरगय एवं वयासी-भण देवाणुप्पिया । किमाग- मागपओयण १, तएण से जिणदत्ते सत्थवाहे सागरदत्तं सस्थवाहं एवं वयासी-एव खल्लु अह देवाणुप्पिया । तव धूयं भदाए अत्तियं सूमालिय सागरस्स भारियत्ताए वरेमि, जइ णं जाणाह देवाणुप्पिया । जुत्तं वा पत्त वा सलाहणिज वा सरिसो वा संजोगो दिजउण सूमालिया सागरस्स, तएणं देवा- णुप्पिया किं दलयामो सुक्क सुमालियाए?, तएण से सागर- दत्ते त जिणदत्त एव वयासी-एव खल्लु देवाणुप्पिया सूमालिया दारिया मम एगा एगजाया इटा जाव किमग पुण पासणयाए त नो खल्ल अह इच्छामि सूमालियाए दारियाए खणमवि विप्पओगं तजइण देवाणुप्पिया! सागरदारए मम घरजामाउए नगरमा तवर्षिणी टी० म०_१६ सुकुमारिकाचरितवर्णनम् भवइ तो णं अहं सागरस्स दारगस्स सूमालियं दलयामि- तएण से जिणदत्ते सत्थवाहे सागरदत्तेणं सस्थवाहेणं एवं वुत्ते समाणे जेणेव सए गिहे तेणेव उवागच्छइ उवागच्छित्ता सांग रदारगं सदावेइ सदावित्ता एवं वयासी-एवं खलु पुत्ता | साग- रदत्ते सत्थवाहे मम एवं वयासी एवं खल्लु देवाणुप्पिया । सूमालिया । दारिया मम एगा एगजाया इट्टा तं चैव त जइ णं सागरदारए मम घरजामाउए भवइ ता दलयामि, तएणं से सागरए दारए जिणदत्तेणं सत्थवाहेणं एवं वुत्ते समाणे तुसिणीए, तएण जिणदत्ते सत्थवाहे अन्नया कयाई सोहणसि तिहिकरणदिवसणखत्तमुहुत्तसि विउले असंणपाणखाइमसा- इम उवक्खडावित्ता मित्तणाइ० आमतेइ जाव सम्माणित्ता सागरं दारगं पहायं जाव सव्वालंकारविभूसिय करेइ, करित्ती पुरिससहस्सवाहिणि सीयं दुरूहावेइ, दुरूहावित्ता मित्तणाइ जाव सपरिवुडे सठिवड्डीए साओ गिहाओ निग्गच्छद, निग्ग- च्छित्ता चंपानयरि मझमझेणं जेणेव सागरदत्तस्स गिहे तेणेव उवागच्छइ, उवागच्छित्ता सीयाओ पच्चोहावेइ, पच्चोरुहा- वित्ता सागरगं दारगं सागरदत्तस्स सत्थ० उवणेइ, तर्पण सी- गरदत्ते सत्थवाहे विपुलं असणपाणखाइमसाइम उवक्खडा- वेइ उवक्खडवित्ता जाव सम्माणेत्ता सागरगं दारंगै सूमालियाए दारियाए सद्धिं पट्टय दुरूहावेइ दुरूहावित्ता सेयापीएहिं कल- सेहिं मज्जावेइ मज्जावित्ता अग्गिहोम करावेइ करावित्ता सागर दारय समालियाए दारियाए पाणिं गिण्हावे ॥ सू०८ ॥
. मामे टीका-'सत्य ण नपाए म्यादि। यतु गम्मायां नगा विनरत्तो नाम सार्थ राह ाढयो गायन अपरिभ्न भागीन , तस्य निनदनस्य भटा भार्या आसोत्गा फिम्भूता-मारा इटा गाद मानुपान 'पञ्चणुभवमाणा' मत्पनुभयन्ती विहरति । सस्प प जिनदत्तम्य पृनो भटाया माया आमना- आजातः, सागरो नाम दारका आगीत् स किंम्भूतः-कुमारपाणिपादः, सर्व- लक्षगसम्पन्न' यावत्-गुरूपः । तत चल ग निनदलमायाहः अपदा कदाचिन् तत्य ण चपाप' इत्पादि। टीकार्थ-(तत्य णं चपाए नयरीए जिणदत्ते नाम सत्यवाहे ओ, तस्स णजिणदत्तस्स भदा भारिया, ममाला हा जान माणुस्सए काम भोएपच्चणुभषमाणा विहरह) उम चपा नगरी में जिनदत्त नामको एक सार्थवाह रहता था जो धनधान्य आदि से विशेष परिपूर्ण एव जन मान्य था। इसकी धर्मपत्नी का नाम भद्राधा या सर्वाग सुन्दरी थी। समस्त अग और उपाग इसके पडे ही सुकुमार थे। यह अपने पतिको अत्यन्त इष्ट प्रिय थी । पति के साथ मनुष्य भव सम्बधी काम भोगों को भागती हुई यह आनद के साथ अपने समय व्यतीत किया करती थी (तस्स जिणदत्तस्त पुत्ते भदाए भारियाए अत्तए सागरए नाम दारए सुकुमाले जाव सुरूवे) भद्रा भार्या से उत्पन्न हुआ जिनदत्स सार्थवाहके एक पुत्र था-जिसका नाम सागर था। यह सुकुमाल यावत् तत्थण चपाए इत्यादि- दार्थ-(तत्थण चपाए नयरीए जिगदत्ते नाम सत्यवाहे अड्डे तस्सण जिग दत्तस्स भदा भारिया, भूमाला इट्ठा जाव माणुस्सए काममोए पच्चणुभवमाणा विहरह) या नगरीमा लत नामे से साथ वाड २डेतो तो ते धन ધાન્ય વગેરેથી સવિશેષ સન્ન તેમજ સમાજમા પૂછાતે માણસ હતું તેની ધર્મપત્નીનું નામ ભદ્રા હતુ, તે સર્વાગ સુદરી હતી તેના બધા અંગો અને ઉપાશે બહુ જ સુકેમાળ હતા, તે પોતાના પતિને બહુજ વહાલી હતી પતિની સાથે મનુષ્ય ભવના કામો ભગવતી તે સુખેથી પિતાને વખત પસાર કરી રહી હતી (तस्सणं जिणथत्तस्स पुत्ते भदाए भारियाए अत्तए सागरए नाम दारए मुकुमाले जाव सुरूवे) ભદ્રાભાર્યાથી ઉત્પન્ન થયેલે ભદ્વાભાર્યાને એક પુત્ર હતો તેનું નામ સાગર હતું તે સુકુમાર યાવતું સુદર રૂપવાન હતે.
। अनगारधर्मामृतषिणी टी० अ० १६ सुफुमारिकाचरितवर्णनम् स्वकाद् गृहात् प्रतिनिष्कामति-निर्गछति, प्रतिनिष्क्रम्य, सागदत्तस्य गृहस्य अहसामन्ते 'नातिदूरे नातिसमीपे 'बोइत्रयइ' व्यतिवनति गच्छति, 'इमचण' अस्मिन् समये सुकुमारिका दारिका स्नाताकृतस्नाना 'चेडियासघ- परिपुड़ा ' चेटिकासघपरिमृता-दासीसमूहमध्यगता, उपरि नाफाशतलके-मासाद- स्याहालिकोपरि 'कणगतेंदुसकेण' कनकतेंदुससयेन 'तेंदुसय' इतिदेशीशब्दः, सुवर्णमयकन्दुकेन 'कीलमागी २' हिरति, ततः खलु स जिनदत्तः सार्थवाहः मुकुमारिका दारिका पश्यति, दृष्ट्वा सुकुमारिकाया दारिकाया रूपे च यौवने च लावण्ये च 'जार विम्हए' यावत् विस्मिता=आश्चर्ययुक्तः सन् कौटुम्निकपुरुपान्= आज्ञाकारिण पुम्पान् शब्दयति, शब्दयित्वा एवमवादी-एपा स्खल हे देवानु- भिया. ! कस्य दारिका किंवा नामधेय ' से ' इति तस्या' १, ततः खलु ते अच्छे रूपवाला था । (तएणं से जिणदत्ते सत्यवाहे अन्नया कयाई साओ गिहाओ पडिनिक्खमह पडिनिरखमित्ता सागरदत्तस्स गिहस्स अदूर सामतेणं वीईचयई ) एक दिन जिनदत्त सार्थवाह अपने घरसे निकला और निकलकर सागरदत्तके घरके पाम से हो कर जा रहा था। (डम च ण सूमालिया दारिया पहाया चेडियासघपरिवुडा उपिआगा सतलगसि कणगतेदसएणं कीलमाणी२ विहरइ । इसी समय सुकु- मारिका दारिका नहा धो कर अपने प्रासाद् की छत पर दासी समूहके साथ २ सुवर्णमय कदुक (गेंद ) से खेल रही थी। (तपण से जिण दत्ते सत्यवाहे सूमालिय दारिय पासह पासित्ता सूमालिया दारियाए रूवेय ३ जाय विम्हए कोडविध पुरिसे सदाचेह, सद्दावित्ता एव वयासी एसण देवाणुपिया | कस्त दारिया किं वा-नामधेज्ज से ? तण्ण ते तएर्ण से जिणदत्ते सत्यवाहे अन्नया फयाई साओ गिढ़ाओ पडिनिक्खमा पडिनिक्खमित्ता सागरदत्तस्स गिहस्स असामतेण वीईवयई) એક દિવસે જનદત્ત સાર્થવાહ પિતાને ઘેરથી બહાર નીકળે અને નીકળીને સાગરદનના ઘરની પાસે થઈને જઈ રહ્યો હતો (इम च ण मूमालिया दारिया हाया चेडियासघारिबुडा उप्पि आगास- तलगसि कणगतेदसएण कीलमाणी २ विहरइ) તે વખતે સુકુમારિકા દારિકા નાન કરીને પિતાના મહેલની અગાશી ઉપર દામી સમૂહની સાથે સુવર્ણમય કર્દક (દડી) રમતી હતી (तएण से जिणदत्ते सत्यवाहे सूमालिय दारिय पासइ पासित्ता मूमालियाए दारियाए रूवेय ३ जाय विम्हए कोडनिय पुरिसे सदावेइ, सहावित्ता एव वयासी एसण देवाणप्पिया ! कस्स दारिया किं वा नामधेज्ज से तएण ते कोड विय - - टीका-'तत्य ण चंपास्याटित गनु गम्मायां नगा विनरतो नाम सार्थ राह आयो गावद् अपरिभूत आमीन् । तस्य मिनदत्तम्य भद्रा मार्ग आमोद-सा फिम्भूना-हमारा श गान मानुष्यमान 'पचणुम्भवमाना' मत्यनुभयन्ती विहरति । तस्य गठ जिनदत्तम्य पुत्रो भद्राया माया आत्मा आजातः, सागरो नाम दारका भागीत् स किम्भूतः-गुठमारपागिपाट', सर्व लक्षगसम्पन्नः यावत्-गुरूपः । तत बल म निनदत्तमामाहः अन्पदा कदाचित 'तत्य णं चपाप' इत्यादि। टीका-(तत्य ण चपा नयरी जिणदो नाम सत्यवाहे आहे, तस्स णजिणदत्तस्स भदा मारिया, ममाला हा जार माणुस्सग काम- भोपच्चणुन्भवमाणा विहरह) उस चपा नगरी में जिनदत्त नामको एक सार्थवाह रहता था जो धनधान्य आदि से विशेष परिपूर्ण एव जन मान्य था। इसकी धर्मपत्नी का नाम भद्राथा यार मग सुन्दरी थी। समस्त अग और उपाग इसके पडे ही सुकुमार थे। यर अपने पतिको अत्यन्त इष्ट प्रिय थी। पति के साथ मनुष्य भव सम्बन्धी काम भोगों को भागती हुई यह आनद के साथ अपने समय व्यतीत किया करती थी (तस्स णं जिणदत्तस्त पुत्ते भदाए भारियाए अत्तए सागरए नाम दारए सुकुमाले जाव सुरूवे) भद्रा भार्या से उत्पन्न हुओ जिनदत सार्थवाहके एक पुत्र था जिसका नाम सागर था । यह सुकुमाल यावत् तत्यण चपाए इत्यादि-- at-(तत्थण चंपाए नयरीए जिगदने नाम सत्यवाहे अड्डे तस्सण जिग दत्तस्स भद्दा भारिया, सूमाला इट्टा जाव माणुस्सए कामभोए पच्चणुन्भवमाणा विहरह) २ ५। नगरीमा नहत्त नामे मे साथ पाई तो हो त धन ધાન્ય વગેરેથી સવિશેષ સન્ન તેમજ સમાજમા પૂછાતે માણસ હતો તેની ધર્મપત્નીનું નામ ભદ્રા હતું, તે સર્વાગ સુધરી હતી તેના બધા અંગો અને ઉપાગે બહુ જ સુકોમળ હતા, તે પિતાના પતિને બહુજ વહાલી હતી પતિની સાથે મનુષ્ય ભવના કામો ભગવતી તે સુખેથી પિતાને વખત પસાર કરી રહી હતી (तस्सणं जिणथत्तस्स पुत्ते भदाए भारियाए अत्तए सागरए नाम दारए मुकुमाले जाव सुरूवे) ભદ્રાભાર્યાથી ઉત્પન્ન થયેલે ભદ્વાભાને એક પુત્ર હતું તેનું નામ સાગર હતું તે સુકુમાર યાવત્ સુ દર રૂપવાન હતા . भनगारधर्मामृतवारणी टी० अ०१६ सुफुमारिकाचरितवर्णनम् वास्तेपा कौटुम्बिकानामन्तिके एतमर्थ श्रुत्वा यत्रैव स्वक गृह तत्रैवोपागच्छति, उपागत्य स्नातो यावद् मित्रज्ञातिपरिटतश्चम्पाया नगर्या मध्ये भूत्वा यत्रैव सागर- दत्तस्य गृह तत्रैवोपागच्छति, ततस्तदनन्तरम् सागरदत्तः सर्थवाह खलु जिनदत्त सार्यवाहम् एजमानम् आगच्छन्त पश्यन्ति, दृष्ट्वाऽऽसनादुत्तिष्ठति, उत्याय 'आम गेणं उवणिमंतेह आसनेनोपनिमन्त्रयति आसन उपवेशनाथ प्रार्थयति, उपनि मन्य, आसनोपर्युपवेशनानन्तरम् आस्वस्थ मार्गश्रमापगमात् प्रान्तिरहित, विस्य- स्थ-विशेषतो विश्रान्तिमुपगतं, मुखासनवरगत-मुखेन विशिष्टासनोपविष्ट, ते अतिए एयम? सोच्चा जेणेव सए गिहे तेणेव उवागच्छह उवागच्छित्ता पहाए, जाव मित्तणाइपरिघुडे चंपाए जेणेव मागरदत्तस्स गिहे तेणेव ज्वागच्छद, तएणं सागरदत्ते सत्थवाहे जिणदत्त सत्यवाह एज्जमाणं पासइ, पासित्ता आसणाओ अम्मुठेइ, अन्भुद्वित्ता आसणेणं उपणि- मंतेइ उवणिमत्तित्ता आसत्य सुहासणवरगय एव चयासी) जिनदत्त सार्थवाहने उन कौटुम्यिक पुरुपो के मुख से जय इस अर्थ को सुना तो सुनकर वह पहिले अपने घर गया-वहां जा कर उसने स्नान किया। यावत् फिर वह अपने मित्र, जाति आदि परिजनों के साथ चपानगरी के बीच से हो कर जहां सागरदत्त का घर या वहा पहुँचा-सागरदत्तने ज्यों ही अपने घर पर आते हुए जिनदत्त सार्थवाहयो देखा - तो वह जल्दीसे अपने स्थान से उठा-और उठकर प्रकार उनसे कहने लगा जब वे यथोचित स्थान पर बैठ चुके और आस्व आप यहा धैठिये" (तएण से निणदत्ते सत्यवाहे तेर्सि कौड वियाण अतिए एयमट्ट सोच्चा- जेणेव सए गिहे तेणेव उवागच्छइ, उपागच्छित्ता पहाए, जाव मित्तणाद परिखुडे पाए. जेणेव सागरदत्तस्स गिहे तेणेव उवागच्छइ, तएण सागरदचे सत्थवाहे, जिणदत्त सत्थवाह एज्जमाण पासइ, पासित्ता आसणाओ अन्भुट्टेइ, अभुद्वित्ता आसणेण उवणिमतेइ उवणिमतित्ता आसत्य श्रीसत्थ सुहासणवरगय एव वयासी) જનદત્ત સાર્થવાહે તે કૌટુંબિક પુરૂના મુખથી આ સાભળીને સૌ પહેલા તેઓ પિતાને ઘેર ત્યાં પહોંચીને તેમણે નાન કર્યું યાવત પછી તે પિતાના મિત્ર, જ્ઞાતિ વગેરે પશ્વિનેની સાથે ચપા નગરીની વચ્ચે થઈને જ્યા સાગરદત્તનું ઘર હતું ત્યાં પહોચ્યા સાગર દર જીનદત્ત સાર્થવાહને પિતાને ઘેર આવતા જોઈને ત્વરાથી તે પિતાના આસન ઉપરથી ઊભા થઈ ગયા અને ઊભા થઈને “ તમે અહીં બેસ” વાત ગયા १९० कौटुमिपुरा निनाचन सार्वगहेनेता सतोष्टा:-अनिमुदिताः 'कर यल जार' करतापरिगृहीवं शिर आरत दानाप मस्तकेयलि कस्वा पवमत्रा दिपुर-दे देगनुप्रिया ! एपा सागरदगम्प गार्थहस्य 'घूमा 'दुहिता-पुत्री, भद्राया आत्मना गुरमारिका नाम दारिमा गुरुमारपाणिपादा यापद-सपेण च यौपनेन च लापण्येन च उत्तया उत्कष्ट शरीरा । ततः खलु स जिनदत्तः साये कोडविय पुरिमा जिणदत्तण सत्यवाहेणं ण्व युत्तासमाणा हह करयल जाव एव पयासी-सर्ण देणुप्पिया! मागरदसम्म मत्यवास्स धूया भद्दारा अत्तिया सूमालिया नाम दारिया सुकृमालपाणिपाया जाव उकिा सरीरा) सेरतो हुई उस कुमारिका दारिका को जिनदत्त मार्धवाह ने देखा-देखकर वे सुकुमारिका दारिका के रूप यौवन व लावण्य में आश्चर्यचकित हो गये और आश्चर्य से युक्त होकर उन्होंने कौटुम्बिक पुरुषों को बुलाया-बुलाकर वे उनसे इस प्रकार करने लगे हे देवान प्रियो ! यह कन्या किमकी है इसका नाम क्या है। जिनदत्त सार्थवाह के द्वारा पूछे गये उन कौटुम्पिक पुरुषों ने हर्पित रो कर और अपने दोनों हाथो जोड़ कर बडे विनय के साथ उनसे ऐसा कहा-हे देवानु- प्रिय ! यह पुत्री सागरदत्त सार्थवाहकी है। भद्रा भार्या की कुक्षि से यह जन्मी है । इसका नाम सुकुमारिका है । इसके कर चरण पडे सुकुमार हैं यावत् रूप, यौवन एव लावण्यसे यह सर्वोत्कृष्ट है और सर्वाङ्ग सुन्दरी है । (तएणं से जिणदत्ते सत्यवाहे तेसि कौडुबियाणे पुरिपा निणदत्तेण सत्याहेण एव वुत्ता समाणा हट्ट करयल जाव एव वयासी- एसण देवाणुप्पिया । सागरदत्तस्स सत्यवाहस्स धूया भद्दार अत्तिया सूमालिया नाम दारिया सुकुमालपाणिपाया जाय, उक्किसरीरा) રમતી સુકુમાર દારિકાને જનદત્ત સાર્થવાહે જઈ જઈને તેઓ સુકુમાર દારિકાના રૂપ, યૌવન અને લાવણ્યમા આશ્ચર્ય ચકિત થઈ ગયાં અને ત્યાર પછી તેમણે કૌટુંબિક પુરૂષને બોલાવ્યા અને બોલાવીને તે તેમને આ પ્રમાણે કહેવા લાગ્યા કે હે દેવાનુપ્રિયે! આ કન્યા કેની છે? એનું નામ શું છે? જીનદત્ત સાર્થવાહ વડે એવી રીતે પૂછાએલા તે કૌટુંબિક પુરૂએ હર્ષિત થઈને પિતાના બને હાથ જોડીને બહુજ વિનયની સાથે તેમને આ પ્રમાણે કહ્યું કે હે દેવાનુપ્રિય! સાર્થવાહ સાગરદનની આ પુત્રી છે ભદ્રાભાર્યાના ઉદરથી આને જન્મ થયે છે સુકુમારિકા આનું નામ છે એના હાથપગ ખૂબ જ સુકે - મળયાવત્ રૂપ, યૌન અને લાવાથી એ સર્વે , , -- मनगारधामृतषिणो टीका भ० १६ सुकुमारिकाचरितवर्णनम् १९६ पात्र = कन्या योग्योऽय मत्पुनः सागर ' इति, 'सलाहणिज्जं या ' श्लाघनीयं- मगसनीय वा 'सरिसो वा सजोगो' सदृशो या संयोगः-अय कन्यावरयो वैवा- हिक सम्बन्धः कुलेन रूपेण गुणेन वा तुल्य इति, 'तो' तर्हि 'दिज्जउ' ददातु भान् खलु सुकुमारिका दारिकां सागराय-मत्पुत्रायेतिभावः । ततः खलु हे देशानुपिय ! हि-किं दम-किं दयां, शुल्क समानार्थ द्रव्य सुकुमारिकाया दारि- कायाः ? ततः सलु स सागरदत्तः सार्थवाहस्त जिनदत्तमेवमयादीत्-एव खलु हे देवानुभिय ! सुकुमारिका दारिका ममैका एकजाता एकैनोत्पन्ना, तया-इष्टा- अनुकूला, यावत्-कान्ता ईप्सिता, प्रिया भीतिपात्रा, मनोज्ञा-मनोगता तथा- कन्या के योग्य है यह सपन्ध प्रशसनीय है, कन्या और वर का यह वैवाहिक सबन्ध कुल रूप और गुणो के अनुरूप है तो आप अपनी पुत्री सुकुमारिका को मेरे पुत्र मागर के लिये प्रदान कर दीजिये-(तएण देवाणुपिया । किं दल्यामो सुक्क सुमालियोण ? ) हे देवानुप्रिय ! साथ में यह भी करदीजिये कि सुकुमारिका दारिका के समानार्थ हम क्या द्रव्य देवें (तएण से सागरदत्ते त जिणदत्त एव वयासी- एवं ग्यतु देवाणुप्पिया ! सूमालिया दारिया मम एगा, एगजाया ईट्टा जाव किमगपुण पासणयारा त नो खलु अह इच्छामि, समालियाए दारियाण खणमवि विप्पओग त जाण देवाणुप्पिया ! सागरदारण् मम धरजामाउए भवइ, तो ण अर सागरस्त सूमालिय दलयामि ) साग रदत्तए ने जिनदत्त से तय इस प्रकार कहा-हे देवानुप्रिय । यह सुकु- मारिका पुत्री मेरे यहा एक ही लड़की है और यह एक ही उत्पन्न हुई છે, આ સ બ ધ સારો છે, કન્યા તેમજ વરને આ લગ્ન સબધ કુળ રૂપ અને ગુણેને અનુરૂપ છે તે તમે તમારી પુત્રી સુકુમારિકાને મારા પુત્ર સારને भाटे माया (एण देवाणुपिया! किं दल्यामो सुफ सुमालियाए १) हेवा- નુપ્રિય ! સાથે સાથે એ પણ અમને જણાવે કે સુકુમારી દારિકાના સમ- નાથે અમે શુ દ્રવ્ય રૂપમા આપીએ ? (तएण से सागरदत्ते त जिणदत्त एवं क्यासी एव खल्लु देवाशुप्पिया! सूमा- लिया दारिया मम एगा एग जाया इट्ठा भाव किमगपुण पासणयाए त नो खलु अह इच्छामि सूमालियाए दारियाए खणमवि विप्पओग त जइण देवाणुप्पिया ! सागरदारए मम धरजामाउए भरट, तो " अह सागरस्स दारगस्स सुमालिय दलयामि ) त्यारे सात नात्तने मा प्रभाये यु तुवानुप्रिय ! al મારિના દારિકા મારે એકની એક પુત્રી છે અને આ એક જ જન્મી છે अन्य - जिमदत्त सार्थगामेव पक्ष्यमाणपगारेणारी रे देवानमिव ! मण-अयय,दिमा. गमनमयोजनम् कम्म प्रयोगाय मागतो मपान १ ततः गरा निनदतः सार्ष वाह सागरदत्त मार्यपाहमेष-क्ष्यमाणमकारेणापायीत्-एव ग अहो देवानु मिय ! ता दुहितर-पुत्री, मटाया मात्मनां सुरुमारिकां-पुकुमारिकानाम्नी सगरस्य सगरनामकम्य मत्पुत्रस्य भार्यात्येन 'परेमि' पृणोमि पान्नामि, यदि खलु व जानीहि हे देशानुप्रिय ! 'जुत्ता' युक्त पा-योग्य पाएतद् कार्य समुचित भाति ' ति 'पत्त या' माप्त गपतन कार्य पुलमर्यादामनुमाप्त ना, स्थविश्वस्थ पन चुके-तय विशिष्ट आसन पर शाति के माध मेटे हुए उन जिनदत्त सागर से उमने इस प्रकार पूजा-मण देवाणुप्पिया। किमागमणपओयण) फरिये देवानुमिय! यहा पधारने का आपका क्या प्रयोजन है ? किस प्रयोजन से आप यहा आये है-कहिये-(तपणे से जिणदत्तसत्यवाहे सागरदत्त सत्यवार एच वयासी-एप स्सलु अब देवाणुप्पिया ! तव धूय भाग अतिय सूमालिय सागरस्स भारियसोए घरेमि जईण जाणाह देवाणुप्पिया ! जुत्त चा पत्त वा सलाहणिज्ज वा सरिसो वा सजोगो दिज्जउण समालिया सोगरस्स) जिनदत्त सार्थवा हने सागरदत्त सार्थवाहसे तय इस प्रकार करा हे देवानुप्रिय ! में आपकी सुभद्रा की कुक्षिसे उत्पन हुई सूमालिका पुत्री को अपने पुत्र सागर की भार्थी बनाना चाहता है। यदि आप इसे स्वीकार करे कि यह कार्य योग्य है-उचित है-कुल मर्यादा के अनुसार है अथवा मेरा पुत्र आपकी આ રીતે તેમને કહેવા લાગે ત્યારે તેઓ ઉચિત સ્થાને બેસી ગયા અને આરવસ્થ વિશ્વસ્થ થઈ ચૂકયા ત્યારે વિશિષ્ટ આસન ઉપર શાતિપૂર્વક બેઠવા ते नहत सार्थवाहन तेथे मा प्रमाणे ४धु-(भण देवाणुप्पिया! किमोगमण पओयण) वानुप्रिय । मता। मही पधारवानी पा मापन तु છે? કયા પ્રોજનથી આપ અહીં આવ્યા છે? (तएण से जिणदत्त सत्थवाहे सागरदत्त सत्यवाह एव वयासी-एव खल अह देवाणुप्पिया' तव धूय भदाए अतिय सूमालिय सागरस्स भारियत्ताए वरेमि जइण जाणाह देवाणुप्पिया ! जुत्त वा पत्त वा सलाहणिज्ज वा सरिसो वा सजोगी दिज्जउ ण सूमालिया सागरस्स) જનદત્ત સાર્થવાહે સાગરદન સાર્થવાહને ત્યારે આ પ્રમાણે કહ્યું કે હે દેવાનુપ્રિય ! હું તમારી સુભદ્રાના ઉદરથી જન્મ પામેલી સુમાલિકા પુત્રીને મારા પુત્ર સાગરની પત્ની બનાવવા ઇચ્છું છું આપ જે મારી માગણી ઉચિત સમ જતા કે, કુળ-મથી યંગ્ય તેમજ મારા પુત્ર તમારી भारत में 1 +- - मनगारधर्मामृतषिणी टीका म० १६ मुकुमारिकाचरितवर्णनम् १९३ पात्र= कन्या योग्योऽय मत्पुत्रः सागर ' इति, 'सलाहणिज्ज वा ' श्लाघनीयं- प्रशसनीयं वा 'सरिसो वा सजोगो' सहगो पा संयोग:-अय कन्यावरयो वा- हिक सम्बन्धः कुलेन रूपेण गुणेन वा तुल्य इनि, 'तो' तहि 'दिज्जउ' ददातु भवान् खलु सुकुमारिका दारिकां सागराय-मत्पुनायेतिमावः । ततः खलु हे देशानुमिय ! हि-किं दा-किं दद्या, शुल्क-समानार्थ द्रव्य सुकुमारिकाया दारि- कायाः १ ततः यलु स सागरदत्तः सार्थवाहस्त जिनदत्तमेवमवादी-एव खलु हे देवानुभिय ! सुकुमारिका दारिता ममै का एकजाता=एकैनोत्पन्ना, तया-इष्टा- अनुकला, यावत्-कान्ता ईप्सिता, मियाम्धीविपात्रा, मनोज्ञा-मनोगता तथा- कन्या के योग्य है यह संयन्ध प्रशसनीय है, कन्या और चर का यह वैवाहिक सबन्ध कुल रूप और गुणों के अनुरूप है तो आप अपनी पुत्री सुकुमारिका को मेरे पुत्र नागर के लिये प्रदान कर दीजिये-(तएण देवाणुपिया । किं दलयामो सुक्क सुमालियोए ?) हे देवानुप्रिय ! साथ में यह भी कढीजिये कि सुकुमारिका दारिका के समानार्थ हम क्या द्रव्य दे (तएण से सागरदत्ते तं जिणदत्त एवं वयासी- एच ग्वलु देवाणुप्पिया! सूमालिया दारिया मम एगा, एगजाया ईट्टा जाच किमगपुण पासणयाए त नो खलु अह इच्छामि, समालियाए दारियाए खणमचि चिप्पओगं त जणं देवाणुप्पिया ! सागरदारए मम धरजामाउए भवइ, तो ण अह सागरस्त स्मृमालिय दलयामि ) साग रदत्तए ने जिनदत्त से तय इस प्रकार कहा-हे देवानुप्रिय ! यह सुकु- मारिका पुत्री मेरे यहा एक ही लड़की है और यह एक ही उत्पन्न हुई છે, આ સ બ ધ સારે છે, કન્યા તેમજ વરનો આ લગ્ન સ ધ કુળ રૂપ અને શ્રેણને અનુરૂપ છે તે તમે તમારી પુત્રી સુકુમારિકાને મારા પુત્ર સાગરને भाटे माया (तरण देवाणुप्पिया ! किं दल्यामो सुक सुमालियाए १) से है- નુપ્રિયા સાથે સાથે એ પણ અમને જણા કે સુકુમારી દારિકાના સમા નાર્થ અમે શુ દ્રવ્ય રૂપમા આપીએ ? (तपण से सागरदत्ते त जिणदत्त एव वयासी एव खलु देवाणुप्पिया! सूमा लिया दारिया मम एगा एग जाया इट्ठा जाव किमगपुण पासणयाए त नो खलु अह इच्छामि सूमालियाए दारियाए खणमवि विप्पओग त जइल देवाणुप्पिया ! सागरदारए मम धरजामाउए भवद, तो ण अह सागरस्स दारगस्स सुमालिय दलयामि ) त्यारे भागते हत्तने भी प्रभारी धु वानुप्रिय ! A સુકુમારિકા દારિકા માટે એકની એક પુત્રી છે અને આ એક જ જન્મી છે - mantra हए। . मनोमा-मनसः म्यानभूता, कि पाना उदुम्मापुरपमिय दम्परपुरय केनापि इतिर भरणविषयत्येन सा दमा, शिमपुन-दर्शनविषयतया, तत् तस्माद् नो खलु अदमिच्छामि सुकुमारिकाया दारियाणा: क्षणमपि विप्रयोग- वियोगम् , तत्-तस्माद् यदि सलु हे देवानुप्रिय ! मागरदारको मम 'धरनामा उए ' मृदजामावकागृयासीनामाता मपनि होणादि सलु भार साणाप धारकाप सुकुमारिया ददामि । यतः खलु स जिनदत्तः सार्यमाः सागरदत्तेन सार्थवाहेने मुक्त सन् योर स्वकं गृहं तंगोपागच्छति, उपागस्य सगरदार- स्वपुत्र शब्दयति, शदयित्या एमादी-ए। खलु हे पुत्र ! सगारदत्तः सार्च पाहो ममम मति, सम्पावसामान्ये पाठी' एवं-ध्यमाणमयारेण अवादी- एव खलु हे देवानुभिय ! मुकुमारिका दारिका ममेका एफ जाता उटा'त चेव' है। यह मेरे लिये ईष्ट यावत् मनोम है-कान्त है, प्रिय है और मनोज है। अनुकूल होने से इष्ट, ईप्सित होने से कान्त प्रीतिपात्र रोने से मिय मनको रचने वाली शेने से मनोज्ञ मन का स्थान भूत होने से मनोज्ञ है। ज्यादा क्या कहें यह तो हमें अदुपर पुष्प के समान दर्शन दुर्लभ थी-सुनने की तो यात ही क्या । अंत में इसे देना नहीं चाहता हूँ । कारण इस सुकुमारिका दारिका के विना में एक क्षण नही रह सकता है इसलिए हे देवानुप्रिय । सागर यदि घरजमाई धन कर रहना चाहें तो मैं उन्हे यह अपनी सुकुमारिका पुत्री दे सकता है। (तएण से जिणदत्ते सत्यवाहे सागरदत्तण सत्यवाहेण एव बुत्ते समाणे जेणेच सए गिहे तेणेव उवागच्छइ उवागरिकत्ता सागरदारगं सहावेइ, सहावित्ता एव वयासी-एव खलु पुत्ता सागरदत्त सत्यवाहे मम एवं આ મને ઇષ યાત્ મનેમ છે-એટલે કે કાત છે, પ્રિય છે, અને મનોમ છે અનુકૂળ છેવા બદલ , ઈપ્સિત હોવાથી કાત, પ્રીતિપાત્ર હવા બદલ પ્રિય અને મનને ગમે એવી હેવાથી મને તથા મનને આશ્રય હેવાથી મને છે વધારે શુ કહુ ! આ તે અમને ઉદુબર પુરુષની જેમ દર્શન-દુલભ હતી સાભળવાને તે વાત જ શી કરવી છે એથી આને હુ આપવા ઈચ9તે નથી કારણ કે એના વગરે હુ ક્ષણવાર પણ રહી શકતા નથી એટલા માટે હે દેવા નુપ્રિય સાગર જે ઘર જમાઈ થઈને મારી પાસે રહેવા ઈચ્છતા હોય તે હું આ મારી સુકુમારીકા પુત્રી તેમને આપી શકે તેમ છું (तएण से जिणदत्ते सत्यवाहे सागरदत्त ण सत्यवाहे गए। बुत्ते समाणे जेणेव सर गिहे. तेणेव उवागच्छर, उवागरिछत्ता सागरदारग सदावेई, सदारित्ता एव वयामी-एव खलु पुत्ता ! सागरदत्ते सत्यवाहे मम भी 1 अनगारधर्मामृतषिणी टीका भ० १६ सुफुमारिकापरितवर्णनम् १९५ तदेव-पूर्वोक्तवर्णनमेवात्रयोध्य यात्-तस्माद् नो खल्पहमिच्छामि सुकुमारिकाया दारिकायाः क्षणमपि विप्रयोग, तत्तस्माद् यदि खलु सागरदारको मम 'घर- जामाउए ' गृहजामातका गृहवासी जामाताभवति, तर्हि ददामि । ततः खलु त सागरको दारको जिनदत्तेन तार्थ वाहेनैवमुक्तः तन् तूष्णीका मौनावलम्बी सन् सतिष्ठते । चयासी-एव खलु देवाणुप्पियो सूमालिया दारिया मम एगा एगजाया इट्ठा त चेव जडण सागरदाररा मम घरजमाउए भवद ता दलयामि) इस प्रकार सागरदत्त सार्थवहके कहे जाने पर जिनदत्त सार्थवाह जहा अपना घर था वहाँ आया-वहां आकर उसने अपने सागेर पुत्र को बुलाया । चुला कर फिर उससे उसने ऐसा कहा-हे पुत्र-साग- रदत्त सार्थवाह ने मुझसे ऐसा कहा है कि आपका पुत्र सागर यदि मेरे घर जमाई बन कर रहना चाहें तो मैं अपनी सुकुमारिका उन्हें दे सकता हैं। उनका घरजमाई बनाने का कारण यह है कि यह सुकुमारिका पुत्र पुत्री उसके एक ही पुत्री है-और एक ही उत्पन्न हुई हैं। यह उसे बहुत ही अधिक इष्ट यावत् मनोम है। इस तरह सोगरदत्त का कहा हुआ समस्त कथन जिनदत्त ने अपने पुत्र सागर को सुना दिया । इसलिये वह उसका एक क्षण भी वियोग सहन नहीं कर सकता है । अतः वह देवाणुप्पिया ! सूमालिया दारिया मम एगा एगजाया इट्ठा व चेव जइण सागर- दारए मम घरजमाउए भाइ ता दलयामि) આ રીતે નદત્ત સાર્થવાહ તેમની આ વાત સાંભળીને તે જનદત્ત સાર્થવાહ જ્યાં પોતાનું ઘર હતુ ત્યા આવ્યા. ત્યાં આવીને તેણે પોતાના સાગરપુત્રને બેલા બોલાવીને તેણે તેને આ પ્રમાણે કહ્યું કે હે પુત્ર સાગરદત્ત સાર્થવાહે મને આ પ્રમાણે કહ્યુ છે કે તમારે પુત્ર સાગર જે મારે ઘર જમાઈ રહેવા કબૂલતે હેાય તે હુ મારી પુત્રી સુકુમારિકા તેમને આપવા તૈયાર તેઓ તમને ઘર જમાઈ બનાવવા એટલા માટે ઈચ્છે છે કે સુકુ- મારિક દારિક તેમની એકની એક પુત્રી છે તે તેમને અતીવ ઈટ યાવતું મનેમ છે. આ રીતે સાગરદત્ત જે કઈ કહ્યું હતું તે બધુ તેમણે પોતાના પુત્ર સાગર આગળ રજૂ કર્યું અને છેવટે કહ્યું કે એટલા માટે જ તે એક ક્ષણ પણ પેતાની પુત્રીને વિયોગ સહી શકતું નથી તમને તે આ કારણથી જ ઘર જમાઈ બનાવવા ઇરછે છે - . पापा मनोमा-गसः म्यानभूना, कि पाना उपमिय परपुष्पं के नापि इटम् । इविश्व श्रवणविष यता सामा, विमा पुन-दर्शनविषयतया, सन्न तस्माद् नो खलु अहमिच्चामि सुगुमाग्मिाया दारिकायाः क्षणमपि विप्रयोर्ग- वियोगम् , तदन्तस्माद् यदि रालु दे देयानुप्रिय सागरदारसो मम 'घरजामा उप ' गृहनामावकामगृहयासीनामाता मपति 'ण' सिनु अई सागराप दारकाय मुकुमारिफा ददामि । रातः खलु स जिनदत्तः सार्यदः सागरदरून सार्थवाहेनेव मुक्त सन् योय सक गृह तयोपागन्छति, उपागत्य सगरदार- स्वपुत्र शब्दयति, शन्दयित्वा एमादी-पप खलु हे पुत्र ! सगारदत्तः सार्व पाहो मर्ममा मति, 'सम्बन्धसामान्ये पाठी' एवम्यक्ष्यमाणमकारेण अवादीद- एव खल हे देवानुमिय ! मुकुमारिका दारिका ममेका एक नाता इप्टा ' त चेत्र' । यह मेरे लिये ईष्ट यावत मनोम है-कान्त है, प्रिय है और मनोज है। अनुकूल होने से इष्ट, ईप्सित होने से फान्त प्रीतिपात्र रोने से मिय मनको रुचने वाली होने से मनोमन का स्थान भूत रोने से मनोज्ञ है । ज्यादा क्या कहूँ यह तो हमें उद्ययर पुष्प के समान दर्शन दुर्लभ थी-सुनने को तो पात ही क्या । अंत में इसे देना नहीं चाहता है। कारण इस सुकुमारिका दारिका के विना मैं एक क्षण भी नही रह सकता है इसलिए हे देवानुप्रिय ! सागर यदि घरजमाई धन कर रहना चाहे तो मैं उन्हें यह अपनी सुकुमारिका पुत्री दे सकता हूँ। (तएण से जिणदत्त सत्यवाहे सागरदत्तण सत्यवाहेण एव युत्ते समाणे जेणेव सए गिहे तेणेव उवागच्छ स्वाच्छिता सागरदारगं सहावेइ, सहावित्ता एव वयासी-एव खल पुत्ता सागरदत्ते सत्यवाहे मम एव આ મને ઈષ્ટ યાવત્ મનેમ છે-એટલે કે કાત છે, પ્રિય છે, અને મનેમ છે. અનુકૂળ હેવા બદલ ઈષ્ટ, ઇસિત હોવાથી કાત, પ્રીતિપાત્ર હોવા બદલ પ્રિય અને મનને ગમે એવી હોવાથી મને જ્ઞ તથા મનને આશ્રય હોવાથી મને છે વધારે શુ કહુ! આ તે અમને ઉબર પુષ્પની જેમ દર્શન-દુલભ હતી સાભળવાની તે વાત જ શી કરવી એથી આને હુ આપવા ઈ તે નથી કારણ કે એના વગર હુ ક્ષણવાર પણ રહી શકતા નથી એટલા માટે હે દેવા સુપ્રિય ! સાગર જે ઘર જમાઈ થઈને મારી પાસે રહેવા ઈચ્છતા હોય તે હું આ મારી સુકુમારીકા પુત્રી તેમને આપી શકું તેમ છું (तएण से जिणदत्ते सत्यवाहे सागरदत्त ण सत्यवाहेण एव वुत्ते समाणे जेणेव सए गिहे तेणेव उवागच्छद, उवागच्छित्ता सागरदारग सद्दावेइ, सदावित्ता एव क्यामी-एव खलु पुत्ता ! सागरदत्ते सत्यवाहे मम एक म !
भनगारधर्मामृतषिणी टीका अ०१६ सुकुमारिकापरितपर्णनम् २९५ तदेव-पूर्वोक्तवर्णनमेवानयोध्य यापद-तस्माद् नो खल्यहमिच्छामि सुकुमारिकाया दारिकायाः क्षणमपि विप्रयोग, वत्-तस्माद् यदि खलु सागरदारको मम 'घर- जामाउए ' गृहजामातृका गृहवासी जामाताभवति, तर्हि ददामि । ततः खलु त सागरको दारको जिनदत्तेन तार्यवाहेनैवमुक्तः तन् तूष्णीका मौनावलम्बी सन् सतिष्ठते । क्यासी-एव खलु देवाणुप्पियो सूमालिया दारिया मम एगो एगजाया इट्टा त चेव जइण सागरदारए मम घरजमाउरा भवइ ता दलयामि) इस प्रकार सागरदत्त सार्थवहके कहे जाने पर जिनदत्त सार्थवाह जहा अपना घर था वहाँ आया-वहां आकर उसने अपने सागर पुत्र को चुलाया । चुला कर फिर उससे उसने ऐसा कहा-हे पुत्र-साग- रदत्त सार्थवाह ने मुझसे ऐसा कहा है कि आपका पुत्र सागर यदि मेरे घर जमाई घन कर रहना चाहें तो मैं अपनी सुकुमारिका उन्हें दे सकता है। उनका घरजमाई बनाने का कारण यह है कि यह सुकुमारिका पुत्र पुत्री उसके एक ही पुत्री है-और एक ही उत्पन्न हुई हैं। यह उसे बहुत ही अधिक इष्ट यावत् मनोम है। इस तरह सोगरदत्त का कहा हुआ समस्त कथन जिनदत्त ने अपने पुत्र सागर को सुना दिया। इसलिये वह उसका एक क्षण भी वियोग सहन नहीं कर सकता है । अतः वह देवाणुपिया ! सूमालिया दारिया मम एगा एगजाया इट्टा त चेव जइणं सागर- दारए मम घरजमाउए भाइ ता दलयामि) આ રીતે જીનદત્ત સાર્થવાહ તેમની આ વાત સાંભળીને તે જનદત્ત સાર્થવાહ ક્યા પિતાનું ઘર હતુ ત્યાં આવ્યા. ત્યાં આવીને તેણે પિતાના સાગરપુત્રને બેલા બોલાવીને તેણે તેને આ પ્રમાણે કહ્યું કે હે પુત્ર! સાગરદન સાર્થવાહે મને આ પ્રમાણે કહ્યુ છે કે તમારે પુત્ર સાગર જે મારે ઘર જમાઈ રહેવા કબૂલ હોય તે હુ મારી પુત્રી સુકુમારિકા તેમને આપવા તૈયાર છુ તેઓ તમને ઘર જમાઈ બનાવવા એટલા માટે ઈચ્છે છે કે સુકુ- મારિક દારિકા તેમની એકની એક પુત્રી છે તે તેમને અતીવ ઈષ્ટ યાવતું મનેમ છે. આ રીતે સાગરદત્ત જે કઈ કહ્યું હતું તે બધુ તેમણે પોતાના પુત્ર સાગર આગળ રજૂ કર્યું અને છેવટે કહ્યું કે એટલા માટે જ તે એક ક્ષણ પણ પોતાની પુત્રીને વિગ સહી શકતે નથી તમને તે આ કારણથી જ ઘર જમાઈ બનાવવા પર છે - - . मानव मनोमा-मासः म्पानभूता, कि पाना उदयापमिय सम्मरपुरष केनापि इटम् ' इविषद श्रवणविप यत्वेन मा भा, विमा पुन-दर्शनविषयतया, तर तस्माद् नो संलु अहमिच्छामि माग्मिाया दारिकायाः क्षणमपि विप्रपोर्ग- वियोगम् , तत्-तस्माद् यदि सल हे देशानुमिप 1 मागरदारको मम 'घरजामा उर' गृहनामातका गृहपासीनामाता मयसिमोण' सल अह सागरीय दारकाय मुकुमारिका ददामि । ततः खल्लुस निनदत्तः सार्या सागरदत्तेन सार्थवाहेने मुक्त सन् यय स्यक गृह तंत्रोपागच्छवि, उपागस्य सगरदार स्वपुत्र शब्दयति, शन्दयित्वा एमादी-ए। खलु हे पुत्र ! सगारदत्तः सार्थ पाहो मम मां मति, 'सम्बन्धमामान्ये पष्ठी' एव वध्यमाणमकारेण अवादी- एव खलु हे देवानुमिय ! मुकुमारिका दारिका ममेका एक जाता इप्टा' त चेव' है। यह मेरे लिये ईष्ट यावत मनोम है-कान्त है, प्रिय है और मनोज है। अनुकूल होने से इष्ट, ईप्सित होने से कान्त प्रीतिपात्र रोने से प्रियमको पालने से मनोज का स्थान भूत होने से मनोज्ञ है । ज्यादा क्या कहूँ यह तो हमें उदुधर पुष्प के समान दर्शन दुर्लभ थी-सुनने को तो पात ही क्या । अतः मैं इसे देना नहीं चाहता हूँ । कारण इस सुकुमारिका दारिका के विना मैं एक क्षण नहीं रह सकता है इसलिए हे देवानुप्रिय । सागर यदि घरजमाई धन कर रहना चाहे तो मैं उन्हें यह अपनी सुकुमारिका पुत्री दे सकता है। (तएण से जिणदत्ते सत्यवाहे सागरदत्तण सत्यवाहणं एवं बुत्ते समाणे जेणेव सए गिहे तेणेव उवागच्छइ उचागरिउत्ता सागरदारगं सहावेइ, सदावित्ता एव क्यासी-एव खल पुत्ता ! सागरदत्ते सत्यवाहे मम एवं આ મને ઈષ્ટ યાવતું મનેમ છે-એટલે કે કાત છે, પ્રિય છે, અને મનેમ છે. અનુકૂળ હેવા બદલ ઈ, ઈતિહેવાથી કાત, પ્રીતિપાત્ર લેવા બદલ પ્રિય અને મનને ગમે એવી હોવાથી મનોજ્ઞ તથા મનો આશ્રય લેવાથી મને છે વધારે શું કહુ! આ તે અમને ઉદુબર પુષ્પની જેમ દર્શન-દુલભ હતી સાભળવાની તે વાત જ શી કરવી! એથી આને હુ આપવા ઈચ્છતા નથી કારણ કે એના વગર હુ ક્ષણવારે પણ રહી શક્તો નથી એટલા માટે હે દેવા સુપ્રિય ' સાગર જે ઘર જમાઈ થઈને મારી પાસે રહેવા ઈચ્છતા હોય તે હું આ મારી સુકુમારીકા પુત્રી તેમને આપી શકું તેમ છું (तएण से जिणदत्ते सत्यवाहे सागरदत्ते ण सत्यवाहेण एव वुत्ते समाणे जेणेव सए गिहे तेणेव उवागच्छद, उवागच्छिचा सागरदारग सद्दावेह, सदायित्ता एव पयामी-एव खलु पुचा । सागरदत्ते सस्थवाहे मम १२७ " - अवारधामृत प्रविणो टोका अ०१६ सुकुमारिकाचरितवर्णनम् सम्मानयति समान्य सागर दारक स्नात यावत् सर्वालङ्कारविभूपित कारयति, कारयित्वा पुरुपसहस्रवाहिनीं शिविकां दूरोहयति-आरोहयति, दूरोद्य मित्रज्ञाति स्वजन-सम्पन्धिभिर्यावत् परितः सर्वद्ध सफलविभवेन स्त्रकाद् गृहाद् निर्ग- च्छति, निर्गत्य चम्पाया नगर्या म यम-येन मध्येभूत्वा यत्रैव सागरदचस्य गृह तत्रयोपागच्छति, उपागत्य शिविकातः पचोरुहावेई प्रत्यवरोहयति, सागरदारक स्वपुत्र प्रत्यवतारयति, प्रत्यवरोध सागरक दारक सागरदत्तस्य सार्थवाहस्य उप नयति-ममीपमानयति । ततः खलु सागरदत्तः सार्थवादो विपुलमशन पान खा स्वाद्य-चतुर्विधमाहारम् उपस्कारयति=निप्पाढयति, उपस्कार्य यावत् = मित्रादिसहित जिनदत्तमामन्त्र्य भोजयित्वा, सत्कृत्य, समानयति, समान्य सागरक दारक सुकुमारिकया दोरिकाया साथ 'पट्टय' पटक 'दुरूहावेड ' दरोहयति-आरोहयति, दुरुह्य श्वेतपीत := सवका वस्त्रादिक से सत्कार किया सत्कार करके फिर उनका स्वागत यचानादिको द्वारा सन्मान किया-सन्मान कर के बाद में उसने अपने सागरपुत्रको स्नान कराया- 1 स्नान कराकर उसने उसे समस्त अल- कारो से विभूपित कराया । विभृपित कराकर याद में उसने उसे पुरुष सहस्रवाहिनी शिविका पर चढाया चढाकर मित्र, ज्ञाति, स्वजन सवधियो को साथ लेकर फिर वह सकल विभवके अनुसार अपने घर से निकला -निकलकर चपानगरी के बीचो बीच से होता हुआ सागरदत्त का जहाँ घर था वहाँ पहुँचा । ( उवागच्छित्ता सीयाओ पच्चोल्हायेइ, पच्चोर- हावित्ता सागरग दारग सागरदत्तस्स सत्थ० उवणेड, तएण, सागरदत्ते सत्यवाहे विपुल असणपाण खाइमसाइम उवक्खडावेइ, उवक्खडावित्ता जाव सम्माणेत्ता सागरग दारग सूमालियाए दारियाए सद्धि पदृय ડીને બધાને વસ્ત્ર વગેરે આપીને સત્કાર કર્યો, સત્કાર કરીને તેણે તેમનું સ્વાગત વચને વડે સન્માન કર્યું સન્માન કર્યા બાદ તેણે પોતાના સાગર પુત્રને સ્નાન કરાવ્યું સ્નાન કરાવીને તેણે તેને બધા અવતારેથી શણગાર્યો, શણગારીને તેણે તેને પુરૂષ-સહસ્ત્રવાહિની પાલખીમા બેસાડયે ત્યારપછી મિત્ર, જ્ઞાતિ, સ્વજન સ બ ધીઓને સાથે લઈને તે પિતાના સપૂર્ણ વૈભવની સાથે પિતાના ઘેરથી નીકળ્યો-નીકળીને ચપા નગરીની વચ્ચે થઈને તે જ્યાં સાગરદત્તનું ઘર હતું ત્યા પહે (उवागच्छित्ता सीयाओ पच्चोरुहावेइ, पच्चोरुहाविचा सागरग दारग सा. गरदत्तस्स सत्य० उवणेइ, तएण, सागरदत्ते सत्यवाहे विपुलअसणपाणखाइम साइम उवक्खडावेइ, उबक्खडाविता जाच सम्माणचा सागरग दारग सूमालियाए जाने वतः सल निनात सार्यपाही उम्पदा पदानि भोमने-धमकारले विधिकरणनक्षगगुरत मिशन पा गाय मायापारयति, निपाइपति, उपस्कार्य मित्रशातिप्रभृतिनामन्त्रगति, भागना 'नार मामाणे' गायन सम्मा नपति भोजपति, भोनगिया गादिमि मकरोति, मकस्य स्वागताननाविना तुम्हें घरजमाई पनाना पाहना । (तपणं से मागरण दारण जिणदत्ते ण सत्यवाहेणं गुत्तेममाणे तुमिणी मनिटर, ताणं जिणदत्ते सत्य घाहे अन्नया फयाइ सोहणसि तिहिकरणदियमणमुहससि विउल असण पान पाइम माइम उपपटाह, उपपडा वित्ता मित्तणाइ० आमतेड, जार मम्माणित्ता मागर दारग पाप जाव मव्या लकारविभूसिय करेह, फरित्ता परिममरस्म पारिणि सीप दुरूहावेह, दुरूहावित्ता मित्तणाइ जाय सपरिचुढे सन्धिद्वीण साओ गिताओ निग उद निगच्छित्ता चपा नयरि मज्य मन्शेण जेणे मागरदत्तस्स गिरे तेणेव उवागच्छद) जिनदत्त नागाह के हारा इस प्रकार करा पर वह सोगर दारक चुपचाप रह गया उमने कुछ भी उत्तर नहीं दिया। एक दिन जिनदत्त ने शुभ, तिधि करण, दिवस नक्षत्र मुहर्तमें विपुल मात्रा में अशन, पान, ग्वाद्य और स्वाद्यरूप चतुर्विध आहार घनवाया -धनवाकर उसने अपने मित्र ज्ञाति आदिग्न्धुओं को आमनित किया आमत्रित करके फिर उसने उन सबको भोजनकराया-मोजन कराकर (तएणं से सागरए दारए जिणदत्ते ण सत्यवाहे ण एव वुत्ते समाणे तुसि णीए सचिटइ, तएण जिणदत्ते सत्यवाहे अन्नया कयाइ सोहणसि विहिकरणदिव सणखत्तमुहूत्तसि, विउल असणपान खाइम साइम उवक्खडावेइ, उपक्खडावित्ता मित्तणाई आमतेइ, जाव सम्माणित्ता सागर दारग हाय जाव सबालकारविभू सिर्य करेइ, करित्ता पुरिससहस्सवाहिणि सीय दुरूहावेई, दुरूहाविचा मित्क्षणाई जाव सपरिवुड सन्धिड्डीए साभो गिहाओ निग्गच्छइ, निग्गच्छित्ता चपा नयरि मज्झ मज्झेण जेणेच सागरदत्तस्स गिहे तेणेव उवागच्छद) જનદત્ત સાર્થવાહ વડે આ પ્રમાણે કહેવાયેલે સાગર પુત્ર એકદમ ચુપ થઈને બેસી જ રહ્યો તેણે કઈ પણ જાતને જવાબ આપે નહિ એક દિવસ જનદત્તે શુભતિથિ, કરણ, દિવસ, નક્ષત્ર મુહુર્તમાં પુષ્કળ પ્રમાણમાં અને પાન, ખાદ્ય અને સ્વાદ રૂપ ચાર જાતને આહાર બનાવડાવ્યું બનાવડાવીને તેણે પિતાના મિત્ર, જ્ઞાતિ વગેરે કર્યા આમત્રિત કરીને તેણે તે બધા આવેલા સ બ ધીઓને જમાડયા જમા . સ બ ધીઓને આમત્રિત ममगारधामृतषविणी टी० १० १६ पुमारिकाचरितवर्णनम् मूलम्-तएण सागरदारए सूमालियाए दारियाए इम एयारूवं पाणिफास पडिसंवेदेइ से जहा नामए असिपत्तेइ वा जाव मुम्मुरेइ वा एत्तो अणिट्टतराए चैव. पाणिफासं पडिसंवेदेइ, तएणं से सागरए अकामए अवसव्वसे मुहुः तमित्तं सचिट्ठइ, तएणं से सागरदत्त संस्थवाहे सागरस्स दारगस्स अम्मापियरो मित्तणाइ० विउलेण असणपाणखा- इमसाइमं पुप्फवत्थ जाव सम्माणेत्ता पडिविसज्जइ, तएणं सागरए दारए सूमालियाए सद्धिंजेणेव वासघरे तेणेव उवाग- गच्छइ उवागच्छित्ता सूमालियाए दारियाए सद्धि तलिगंसि निवज्जइ, तर्पण से सागरऐ दारियाए सूमालियाए दारि- याए इमं एयारूव अगफास पडिसवेदेइ, से जहा नामए असिपत्तेइ वा जाव अमणामयराग चेव अगफास पच्चणु- भवमाणे विहरइ, तएणं से सागरए अगफास असहमाणे अवसव्वसे मुहुत्तमित्तं सचिटइ,तएण से सागरदारए सूमा- लियं दारियं सुहपसुत्तं जाणित्ता सूमालियाए दारियाए पासाउ उट्टेइ, उट्टित्ता जेणेव सए सयणिज्जे तेणेव उवाग- च्छइ, उवागछित्ता सयणीयसि निवज्जइ, तएणं सूमालिया दारिया तओ मुहुत्ततररस पडिबुद्धा समाणी पइव्वया पइ- मणुरत्ता पति पासे अपस्समाणी तलिमाउ उट्टेइ, उद्वित्ता जेणेव से सयणिज्जे तेणेव उवागच्छइ उवागच्छित्तीसगरस्स पासे युवज्जइ, तएण से सांगरदारए सूमालियाए दारियाए .
१९ IWARomar-RRIM- रामतसौवर्ण फलश - परिपूर्णपटेनानि = निपगति, मउयिता अमिहो फारयति, कारयित्वा माग पारसगुरुमारिकामा दारिकाया पाणिग्राहगतिम् ८॥ दुरुहायेह, दुरूपायित्ता सेयोपीहि फलसेटि मज्जाड, मज्जावित्ता अग्गिहोम फरोह, फरायित्ता सागर दारय ममालिया दारियाए पाणि गिण्हावेइ) वहा पहुँचकर उसने अपने पुत्र सागर को पालावी से नीचे उतारा और उतारकर सागरदस सार्थयाह के पास उसे लेापा 1 साग रदत्त सार्थवार ने भी पहिलेसे हो रिपुलमात्रा में अशन, पान, ग्वाच एव स्वान्यरूप चतुर्विध आहार पार करयालियो था सो उमसे मित्रादि सहित जिनदत्त सार्थवाह को आनद के माय पिलाया पिलाकर सबका सत्कार किया सन्मान किया । सत्कार सन्मान करने के बाद फिर सागरदत्तने सागर दारक को अपनी पुत्री सुकुमारिका के साथ एक पहक पर बैठाया-पैठाकर सुपर्ण चांदी के कलशोंसे उनका अभिषेक कराया अभिपेक हो जाने के याद अग्निहोम कराया 'अग्निरोम जप हो चुका तब सागरदत्तने अपनी पुत्री सुकुमारिका का सागर के राध में हस्तमिलाप किया-अर्थात् लग्न कर दिया ।। सू०८ ॥ दारियाए सदि पट्टय, दुरूहावेइ, दुरूहावित्ता सेयापीएहि कलसेहि मज्जावे, मज्जावित्ता अग्गिहोम करावेइ, फरावित्ता सागरदारय समालियाए दारियार पाणि गिण्हावे) ત્યાં પહોંચીને તેણે પિતાના પુત્ર સાગરને પાલખીમાથી નીચે ઉતાય અને ઉતારીને સાગરદત્ત સાર્થવાહની પાસે લઈ ગયે પણ પહેલેથી જ પુષ્કળ પ્રમાણમા અશન, પાન, ખાદ્ય અને પદ્ય રૂપ ચાર જાતને આહાર તૈયાર કરાવીને રાખ્યો હતો તેણે મિત્ર વગેરે લેકની સાથે જનદત્ત સાર્થવાહને આનદની સાથે જમાડયા અને ત્યારપછી તેણે સૌને સત્કાર તેમજ સન્માન કર્યું સત્કાર અને સન્માન કર્યા બાદ સાગરદને સાગર દારકને પિતાની પુત્રી સુકુમારિકાની સાથે એક પટ્ટક ઉપર બેસાડે બેસાડીને મિના-ચાદીને કળશેથી તેમને અભિષેક કરાવડા અભિષેકનુ કામ પર થયા બાદ તેણે અચિહેમ કરા અશ્ચિમની વિધિ પૂરી થઈ ગઈ ત્યારે સાગરદને પિતાની પુત્રી સુકુમારિકાને સાગરની સાથે હસ્તમેળાપ કરાવી દીધે એટલે કે લગ્ન કરાવી દીધા સૂ ૮ છે સાગરદન સાર્થવાહે . ममगार धर्मामृतपरिणी री० १० १६ पुमारिकाचरितवर्णनम् मूलम्-तएण सागरदारए सूमालियाए दारियाए इम एयारूवं पाणिफास पडिसंवेदेइ से जहा नामए असिपत्तेइ वा जाव मुम्मुरेइ वा एत्तो अणि?तराए चेव० पाणिफास पडिसंवेदेइ, तएणं से सागरए अकामए अवसव्वसे मुहु- तमित्तं सचिट्ठई, तएणं से सागरदत्ते संस्थवाहे सागरस्स दारगरस अम्मापियरो मित्तणाइ० विउलेण असणपाणखा- इमसाइमं पुप्फवत्थ जाव सम्माणेत्ता पडिविसजइ, तएणं सागरए दारए सूमालियाए सद्धिं जेणेव वासघरे तेणेव उवाग- गच्छइ उवागच्छित्ता सूमालियाए दारियाए सद्धि तलिगंसि निवज्जइ, तर्पण से सागरए दारियाए सूमालियाए दारि- याए इमं एयारूव अंगफासं पडिसवेदेइ, से जहा नामए असिपत्तेइ वा जाव अमणामयराग चेव अगफास पच्चणु- भवमाणे विहरइ, तएणं से सागरए अगफास असहमाणे अवसव्वसे मुहुत्तमित्तं सचिट्ठइ,तएण से सागरदारए सूमा- लिय दारिय सुहपसुत्तं जाणित्ता सूमालियाए दारियाए पासाउ उट्टेइ, उहित्ता जेणेव सए सयणिज्जे तेणेव उवाग- च्छइ, उवागच्छित्ता सयणीयसि निवज्जइ, तएणं सूमालिया दारिया तओ मुहुत्ततरस्स पडिवुद्धा समाणी पइव्वया पइ- मणुरत्ता पति पासे अपस्समाणी तंलिमाउ उठेइ, उद्वित्ता जेणेव से सयणिज्जे तेणेव उवागच्छइ उवागच्छित्तीसगरस्स पासे णुवज्जइ, तएण से सागरदारए सूमालियाएदारियाए Home २०० . . , दुच्चपि इमं एया अंगफासं पडिसंद जार अकामए अवसव्वसे मुहत्तमित्तं संचिट्टइ, तएणं से सागरदारण सूमा- लियं दारियं सुहपमुत्तं जाणित्तासयणिज्जाओ उट्टेड उट्टिता वासघरस्स दार विहाडेइ विहाडित्ता मारामुस्के विव काए जामेव दिसिं पाउभूए तामेव दिसि पडिगए ॥ सू०९॥ टीका-'वएणं ' इत्यादि । ततः ग्यल सागरदारसः गुमारिसाया दारि काया इममेतमूप-पक्ष्यमाणमकार पाणिम्पर्श करम्पर्य प्रतिसदयति अनुभवति, पीदृशः स परस्पर्य इवि राष्टान्तमा-से नहानामए' इत्यादि । तद यपा नामस्म्यया टान्तम्-रष्टान्त प्रदर्शयति-'असिपत्तदशा' इत्यादि । असि पत्रमिति गा=असिपत्र-खनः, यथा खाधारायाः स्पर्शः सोहमशस्यस्तद्वद सुक मारिका दारिकायाः करस्पर्श प्रतिसवेधत इति भारः । 'आर मुग्मुरे इ वा. यावत् मुर्मुरेति या=अत्र यावत् फरणादिद योभ्यम्-परपत्तेइ वा सुरपत्तेह वा 'तएण सागरदारए' इत्यादि । टीकार्थ-(तएण) इसके याद-अर्थात् सागरदारकने जय हस्तमिलाप किया तथ (सागरदारण) उस सागर को (सूमालिया दारियाग) सुकु मारिकादारिकाका (पागिपास) वह हस्तका स्पर्श (इम एयास्त्र पडिसवे देह ) इस प्रकार से रगा ( से जहा नाम असिपत्तड पाजाव मुम्मुरे. इवा, एत्तो अणिहतराए चेव० पाणिफास पडिसवेदेह ) जैसे वह असिपत्र तलवार का स्पर्श हो यावत् अग्निकणमिश्रित भस्म का स्पर्श हो । यहा यावत् शब्दसे " कर पत्ते " वा खुर पत्तइवा, कलम चीरिया 'तएण सागरदारए' इत्यादि ટીકાર્ચ–(તor) ત્યારપછી એટલે કે સાગરદારકે જ્યારે હસ્તમેળાપ કર્યો ત્યારે (सागरदारए) ते सारने (सूमाल्यिाए दारियाए) सुभार शिना (पाणि पास) ते सायना २५श (इमएया स्व पडिसवेदेइ) मा प्रमाणे साये। 3 ( से जहा नामए असि पत्तेइ वा जाव मुम्मुरेइ वा, एतो अणिट्ठत्तराए चेव पाणिफास पडिसदे) જાણે તે અસિપત્ર-તરવાર–ને સ્પર્શ ન હોય, યાવત્ અગ્નિકનું મિશ્રિત ભસ્મને સ્પર્શ ન હોય અહીં “યાવત” શબ્દથી (करपत्तेइ वा खुरपचेइ वा, कलबचीरियापत्तेइ वा सत्ति - मनगारधर्मामृतषिणी री०म०१६ सुकुमारिफाचरितवर्णनम् पलंघचीरियापत्तेह वा सत्तिअग्गेइ वा कोतग्गेइ वा तोमरग्गेइ वा मिडिमालग्गेइ वा सूचिकलावएइ वा विच्छुयडकेड वा करिकन्यूइ वा इगालेइ वा मुम्सुरेइ वा अच्चीइ वा जालेड वा आलाएइ पा सुद्धागणीइ वा भवेयास्वेसिया?, नो इणद्वे समटे, करपत्रमिति वा क्षुरपत्रमिति वा कदम्बचीरिकापत्रमिति वा शक्त्यग्रमिति चा कुन्तानमिति या तोमराग्रमिति वा भिन्दिपाराग्रमिति वा वृश्चिक्दश इति वा फपिकच्छुरिति वा अहार इति मा मुर्मुर इति वा अचिरिति वा ज्यालेति वा, अलातमिति वा शुद्धाग्निरिति या भवेदेतद्रूप -स्यात् ', नायमर्थः समर्थ', इति । तत्र करपत्र- क्रकचं ' करवत् ' इति प्रसिद्ध क्षुरपनम्' उस्तरा' इति प्रसिद्धम् , कदम्पची- रिकापत्रम्-कदमची रिका-तृणविशेष , अम्या अग्रभागोऽतितीक्ष्णो भवति तस्य पत्र, शक्ति शस्त्रविशेपा-निशुल वा तस्या अग्रभागः स्व कुन्तः ' भाला' इति मसिद्ध शवविशेषः, तदग्रभागः, तोमरम्म्याण विशेषस्तदग्रभाग', मिन्दिपाला- शखविशेषः सूचीकलापकं सूचीसमूहस्तस्याग्रभागः, वृश्चिकदशा-वृश्चिक कण्टका, कपिकच्छुः-खर्जुकारी बनस्पतिविशेषः, अङ्गारः मालारहितोऽग्नि , मुर्मुर' अग्नि- पत्तेह वा, सत्ति अग्गेडवा कोनग्गेइवा तोमरग्गेइ वा, भिडिमालग्गे वा सूचिकलावएडवा विच्छुय डहवा कवि कच्छूइया इगालेइ वा मुम्मुरे वो अच्चोइ वा जालेइ वा आलाइ वा सुद्धागणीइ वा भवेयारू वेसिया ? नो इणटे सम?) कर पत्र-कर वत, सुर पत्र-उस्तरा कदम्बचीरिका पत्र छुहिया घास-जिसका अग्रभाग अधिक तीक्ष्ण होतो है शक्ति-अग्र -शक्ति-त्रिशूल अथवा आयुधविशेप का अग्रभाग कुन्तान भाले की नोफ तोमराग्र-वाण की अनी भिन्दिपाल-शस्त्र विशेप-का अग्रभाग- सूची कलापका अग्रभाग-यिच्छु का डक कपिकच्छु-करेच-जिसके स्पर्श होनेपर खुजली आती है-ज्वाला रहित अग्नि, मुर्मुर-अग्निकणमिश्रित तोमरग्गेइ वा मिडिमालग्गे वा सूचिकलावएड ना पिच्छुय डकेइ वा, रविकच्छुइ वा इगालेइ था, मुम्मुरेइ वा अच्चोइ वा जालेइ वा, आलाइ वा सुद्धागणीइ या भवेयारवे सिया? नो इण सम?) કરપત્ર-કરવત, સુરપત્ર કદ બચરિકા પત્ર-કચ્છરિકા કે જેને અગ્રભાગ એકદમ તી હોય છે, શકિત--અશક્તિ –ત્રિશૂળ અથવા આયુધ विशेष AARTI, -मालानी ell, मरा-तीनी ll, AE4TA- વિશેષને અગ્રભાગ, સૂચકલાપનો અગ્રભાગ, વીને ડખ, કવિષ્ણુ-કવચ- જેના સ્પર્શથી ખજવાળ આવે છે, જવાળા રહિત અગ્નિ, મુમુર-અગ્નિકણ મિશ્રિત ભીમ, અર્ચિ-લાકડાઓથી સળગતી જવાળા, વાળા-લાકડા વગરની मो, . , मानामा दुच्चपि इमं एया अंगफास पडिसंदेड जार अकामए अवसव्वसे मुहत्तमित्तं संचिट्टर, तएण मे सागरदारणसूमा. लियं दारियं मुहपसुत्तं जाणित्तासयणिज्जाआं उठेइ उद्वित्ता वासघरस्स दार विहाडेइ विहाडित्ता मारामुरके पिव काए जामेव दिसि पाउभूपु तामेव दिति पडिगए । सू०९।। टीका-'वएणं ' इत्यादि । ततः पल सागरदारकः गुहमारिकाया दारि काया इममेतपक्ष्यमाणमसर पाणिम्पर्श-परम्परा पतिसरेदयति भनुभवति, पीशः स परस्पर्गः इति सस्टान्तमाघ-से नहानामए' इत्यादि । तर यथा नामम् यया दृष्टान्तम्-दृष्टान्त प्रदर्शयति-'असिपद ' इत्यादि । असि- पत्रमिति वा असिपत्र-खनः, यथा साधारायाः स्पर्शः सोऽमरास्यस्तद्वत् सुरु मारिका दारिसायाः परस्पर्श प्रतिसवेधत इति भारः 'जार मुग्मुरे इ वा. यावत् मुर्मुरेति वा=अत्र यावत् करणादिद योध्यम्-'परपचेड या पुरपत्तेइ वा 'तएण सागरदारए' इत्यादि । टीकार्थ-(तएण) इसके याद-अर्थात् सागरदारकने जय हस्तमिलाप किया तय (सागरदारण) उस सागर को (सूमालियारा दारियाग) सुकु- मारिफादारिकाका (पागिपास) वह हस्तका स्पर्श (इम एपाल्व पडिसवे देह ) इस प्रकार से लगा ( से जहा नाम अतिपत्तेइ पाजार मुम्मुरे- इवा, एतो अणि?तराए चेव० पाणिफास पडिसवेदेह ) जैसे वह असिपत्र तलवार का स्पर्श रो यावत् अग्नि कणमिश्रित भस्म का स्पर्श हो । यहा यावत् शब्दसे " कर पत्तेह" वा खुर पत्तेइवा, कलर चीरिया 'तएण सांगरदारए' इत्यादि ટીકાર્થ–(તor) ત્યારપછી એટલે કે સાગરદારકે જયારે હસ્તમેળાપ કર્યો ત્યારે (सागरदारए) ते सा१२२ (सूमाल्यिाए दारियाए) मार रिजन (पाणि पास) त सायना २५ (इमएया स्व पडिसवेदेइ) मा प्रमाणे साये। 3 ( से जहा नामए असि पत्तेइ वा जाव मुम्मुरेइ वा, एतो अणित्तराए चेव पाणिफास पडिसवेदेइ) જાણે તે અસિપત્ર–તરવારને સ્પર્શ ન હોય, યાવત્ અગ્નિકણ મિશ્રિત ભસ્મને સ્પર્શ ન હોય અહીં “યાવત’ શબ્દથી (करपचेइ वा खुरपत्तेइ वा, कलवचीरियापत्तेइ वा सत्ति कोतग्गे। . वा.
मनारियर्मामृतदिगो टी० १० १६ सुकुमारिकायरितवर्णनम् रिजनाथ पिपुलेनाशनपानखापस्यायेन पुष्परखगन्धमाल्यालङ्कारेण सत्करोति समानयति सत्कृत्य समान्य प्रतिनिसर्जयति = प्रस्थापयति । ततः खलु सागरको दारकः सुकुमारिकया साधं यौन वासगृह-शयनगृहं तत्रैवोपागन्छति उवागत्य सुकुमारिकया दारिकया सातलिमसि तलिमे देशीयोऽयशब्दः तल्पे-शयनीये 'निवजड ' निपीदति । ततः खलु स सागरदारकः सुकुमारिकाया दारिकाया इममेतमदूपमगरपशं प्रतिसवेदयति-तद् यथानामक-तत् मतिसवेदन दष्टान्तोपन्या- सपूर्वक प्रदर्श्यते--असिपत्र पा यापद अमनोमतरमेन सुकुमारिकाया अगस्पर्श अम्मापियरो मित्तगाइ० विउटेण असण पाणखाहम माइम पुफ्फवत्थ जाव सम्माणेत्ता पडिविसज्जति) अतः वह सागर उसमें अभिलापा से रहित बन गया। फिर भी वा विवश होकर यह कुछ समय तक ठहरा रहा । सागरदत्त सार्यवाह ने सागर दारक के मातापिता का तथा उसके मित्र, ज्ञाति स्वजन, सपन्थी परिजनो का विपुल अरान, पान, खाद्य और स्वायरूप चतुर्विध आहार से ए पुष्प वस्त्र, गन्ध, माला तथा अलकार से खूब सत्कार किया-सन्मान किया। सत्कार सन्मान करके फिर उसने सपको अपने यहां से विदा कर दिया । (तण्णं सागरए दारए सूमालियाए सद्धिं जेणेव वासगिहे तेणेव उवागच्छह उपगच्छिता सूमालिगाए दारियाए सद्वि तलिगसि निवज्जइ, तण्ण से सागरए दारए सूमालिया दारिया इम एयाख्य अगफास पडि- सवेदेइ से जानामए असि पत्तेइवा जाव अमणामयरागचेच अगफास गरदत्ते सत्यवाहे सागरस्स दारगरस अम्मापियरो मित्तणाइ० विउलेग अमण पाण खाइम साइम पुप्फरत्य जाच सम्माणेता पडिविसज्जति) એટલા માટે તે સાગર તેના અભિવાષાથી રહિત બની ગયો છતાએ તે ત્યા લાચાર થઈને ચેડા વખત સુધી ના સાગરદન સાર્થવાહે સાગર દારકના માતાપિતાને તેમજ તેના મિત્ર, જ્ઞાતિ, સ્વજન, સબ ધી પરિજનને વિપુલ અશન, પાન, ખાદ્ય અને સ્વાદ્ય રૂપ ચાર જાતના આહારથી અને પુષ્પ વસ્ત્ર, ગધ, માળા તેમજ અલકારે બહુ સત્કાર અને સન્માન કર્યું સત્કાર તેમજ સન્માન કરીને તેણે સૌને પિતાને ત્યાંથી વિદાય કર્યા (तएण सागरए दारए सूमालियाए सद्धि जेणेव बाप्तगिहे तेणेव उवागच्छा आगच्छित्ता सूमालियाए दारियार सद्धि तलिगसि निरज्जइ, तपर्ण से सागरए दारए भूमालियाए दारियाए इम एयारूप अगफास पडिमवेदे से जा नामए ... अतिपत्ते जा-जाव अमगामयराग चे अपकास पच-मबमाणे विहर वएणं . पणमिश्रितमस्म अवि-पन शिपमानाग - मा, आमा যমুক্ত, হতামিঃ rিcখায়'। এবিধি-বাবা গাঁ इव सुसमरिफायाः परम्पर्टी भयेस्यामिपि नागरी समर्थ भय दृष्टा तमा फरस्पर्श साम्य माप्तुं न समाना की त्या 'पो भणिद्वतराए मेवा' एतस्माद् असिपारदीना स्पर्शदनिष्टतरक, अपान्तरण पा-भत्पन्तक मनीय ए, अप्रियतरक एय-प्रतिराजनयाय अमनो विशयेन मनो विकृतियारा अमनौमतरफए अतिभयेन मनामनिरपर पति, ठमेवम्भूत पाणिस्पर्श मुकुमारिकादारियायाः फरम्पर्श भविसदयति अनुमति । तत् खल ससागरदारका कामका-निरमिलापः 'अपराचसे अपम्पमा अपगतस्यानन्यः पियशः सन् महतमात्र-स्तोककाल सतिष्ठते (ततः खलु स सागरदत्तः सार्थवाह सागरम्य दासस्य अपापितरी मिसाविसजनममन्धिप भस्म अर्चि-इन्धन प्रतिपद्ध ज्याला, ज्याला-धन से रहित ज्वाला अलात-उल्मुक शुद्धाग्नि-रोहपिण्डस्थ अग्नि । इन असिपत्र से लेकर शुद्धअग्नि पर्यन्त पदार्थी का स्पर्श जैसा रोता है वैसा ही सुकुमारिका के कर का स्पर्श हो सकता था-परन्तु यहा या अर्थ समर्थित नहीं है -अर्थात् उसके सुकुमारिका के कर स्पर्श में इन दृष्टान्तों के स्पर्श को समानता नहीं मिल सकती है क्यों कि वह स्पर्श तो उनके स्पर्श से भी अधिक अनिष्टतर हीधा, अकान्ततरक ही था-अत्यन्त अक्मनीय था, अप्रिय तरकही था अत्यन्त दुःखजनक ही था, अमनोज्ञतरक ही था -अत्यन्त मनो विकृतिजनक ही था, अमनोमतरक ही था-अस्पन्न मनः प्रतिकूल ही था। (तएण से सागरए अकाम अवसव्वसे मुहृत्तमित्त सचिट्ठइ, तएण से सागरदत्ते सत्यवाहे सागरस्स दारगरस જવાળા, અલાત-ઉમુક, શુદ્ધ અગ્નિ-લોપિંડસ્થ અગ્નિ-આટલી વસ્તુઓનું ગ્રહણ કરવું જોઈએ આ અસિપત્રથી માંડીને શુદ્ધ અગ્નિ સુધીના પદાર્થોને જે જાતને સ્પર્શ હોય છે તે જ સુકુમારિકાના હાથને પણ સ્પર્શ હતો પણ હકીકતમા તો આ વસ્તુઓની સમાનતા પણ તેના તહણ સ્પર્શની સાથે કરી શકાય તેમ નથી કેમકે તેના હાથને પશે તે ઉકત વસ્તુઓના સ્પર્શ કરતા પણ વધારે અનિછતર હતો, અકાતરક હતું, અતીવ અકમનીય હતો, અપ્રિયતરક હો, અત્યત દુખજનક હતું, અમને મરક હસે, ખૂબજ મને * વિકૃતિજનક હતું, અમનેમ તરક હતા, બહુ જ મન પ્રતિકૂળ હતું (तएण से सागरए अकामए अपसबसे मुहनमित्त समिता एण से सा मनारधर्मातदिगी टी० भ० १६ सुकुमारिकायरितवर्णनम् रिजनांश्च पिपुलेनाशनपानखायबायेन पुप्पवस्त्रगन्यमाल्यालङ्कारेण सत्करोति समानपनि सत्कृत्व समान्य प्रतिविसर्जयति = प्रस्थापयति । ततः खलु सागरको दारकः मुकुमारिफया साधं यौन वासगृह-शयनगृहं तत्रैवोपागच्छति उवामत्य सुकुमारिकया दारिफया साध तलिमसि तलिमे देशीयोऽयशब्दः तल्पे--शयनीये 'निवज्जड ' निपीदति । तत' खलु स सागरदारकः सुकुमारिकाया दारिकाया इममेतमदूपमद्गस्पर्श प्रतिसचेदयति-तद् यथानामा-तत् मतिसवेदन दष्टान्तोपन्या- सपूर्वक प्रदयते-असिपत्र वा यावद अमनोमतरमेन सुकुमारिकाया अगस्पर्श अम्मापियरो मित्तलाइ० विउदेण असण पाणखाहम साइम पुफ्फवस्थ जाव सम्माणेत्ता पडिविसज्जति) अतः वह सागर उसमें अभिलापा से रहित बन गया। फिर भी वहा विवश होकर यह कुछ समय तक ठहरा रहा । सागरदत्त सार्थवाह ने सागर दारक के मातापिता का तथा उसके मित्र, ज्ञाति स्वजन, संबन्धी परिजनो का विपुल अशन, पान, खाद्य और स्वाद्यरूप चतुर्विध आहोर से एवं पुष्प वस्त्र, गन्ध, माला तथा अलकार से खूब सत्कार किया-सन्मान किया। सत्कार सन्मान करके फिर उसने सपको अपने यहा से विदा कर दिया । (तण्णं सागरए दारए सूमालियाए सद्धिं जेणेव वासगिहे तेणेव उवागच्छद उवागच्छिता सूमालियारा दारिपाए सद्धि तलिगसि निवज्जइ, तरण से सागरए दारए सूमालियाए दारिया इम एयारुव अगफास पडि- सवेदेइ से जहानामए असि पत्तेइवा जाव अमणामयरागचेव अगफास गरदत्ते सत्यमाहे सागरस्स दारगस्स अम्मापियरो मित्तगाइ० विउलेग असण पाण खाइम साइम पुप्फरत्य जाच सम्माणेता पडिविसज्जति) એટલા માટે તે સાગર તેના અભિવાષાથી રહિત બની ગયો છતાએ તે ત્યા લાચાર થઈને થોડા વખત સુધી રોકા સાગરદત્ત સાર્થવાહે સાગર દારકના માતાપિતાને તેમજ તેના મિત્ર, જ્ઞાતિ, વજન, સબ ધી પરિજનને વિપુલ અશન, પાન, ખાદ્ય અને સ્વાદ રૂપ ચાર જાતના આહારથી અને પુષ્પ વસ્ત્ર, મધ, માળા તેમજ અલકારોથી બહુ સત્કાર અને સન્માન કર્યું સત્કાર તેમજ સન્માન કરીને તેણે સૌને પિતાને ત્યાંથી વિદાય કર્યા (वएण सागरए दारए सूमालियाए सद्धिं जेणेव वासगिहे तेणेव उवागच्छा उवागच्छिता सूमालियाए दारियाए सद्धिं तलिगसि निरज्जइ, एणं से सागरए दारए सूमालियाए दारियाए इस एयारून अगफास पडिस वेदेड़ से जा नामए -सिपने ना नाव अमगाम्पराग वेध आमास पञ्चगु भवमाणे विहरइ वएणं २०४ - मपत्नुमान विहरति । समापन ग सागरदारपसम्णा अगममरमानोऽपस शम्भरगा साना, मन गुमात्र मतिष्ठों का गनु म मागरदारका सुकुमारिको दारिका पुग्यमगृत माया गुमारिकागदारिकायाः पात उत्तिष्ठति, उत्थाय यत्रैव सागपनी नौगोपागमति, उपाय शयनीये, “निबाना' निषीदति स्पपितीत्यर्थः । तत गलु गुमारिका दागिनो मुन्तिरे पति- पुदानागरिता सति पनियता 'पदमगुरगा' प्रत्यनुत्ता पति प्रपनुरागिणी, पाचे पतिमपश्यन्ती ' नलिमाउ 'तल्या शयनीयाद् उनिष्ठिति, उत्याय यत्र पच्चणुभरमाणे विरतण से माग गफाम अमरमाणे अव सबसे मुहत्तमित्त मगिट्टः) इसके पाद मागग्दारक सुकुमारिका के साथ जहा वासगृह-शयन पर-या वहाँ गया राजाकर वर उस सुक मारिकाके साध२ क शप्यापर बैठ गया पिट जाने पर उसमागरदारक को सुकुमारिका दारिकामा अगार्श इमलसे प्रनीत आजैसे मानो असिपत्र आदिका स्पर्श हो । इन अमिपत्र (पदगको यावत्) आदिको के स्पर्श से भी उसका यह अगस्पर्श यावत् अमनामतरक ही था। इस 'प्रकार का उसका अगस्पर्श अनुभाता हुआ वर सागरदारक विवश यनकर वहा कुछ समय तक ठहरी याद में जब उससे सहन हुआ तो । (तरण से सागरदारए सूमालिय दारिय सुरपसुत्त जाणित्ता सूमालियाए दरियाए पालाउ उठेह, उद्वित्तां जेणेव सए सय णिज्जे तेणेव उवागच्छइ, उवागउित्ता सयणीयसि निवज्जइ, तण्ण समालिया दारिया तओ मुहत्ततरस्स पडियुद्धा समाणी पइव्वया पा से सागरए अगफास असहमाणे अवसन्यसे मुहृत्तमित्त सचिट्ठइ) ત્યારપછી સાગર દારક સુકુમારિકાની સાથે જ્યા વાસગ્રહ-શયનઘર હતું ત્યા ગયે, ત્યાં જઈને તે સુકુમારિકાની સાથે એક શખ્યા ઉપર બેસી ગયે બેઠા બાદ તે સાગર દારકને સુકુમારિકા દારિકાને અગસ્પર્શ એવા પ્રકારને જણાયે કે તે અસિપત્ર તરવાર વગેરેને સ્પર્શ ન હોય! અસિપત્ર વગેરે કરતા પણ તેને અગ સ્પર્શ યાવત અમને મરક હતે આ રીતે તેના અગ સ્પશને અનુભવ સાગર તારક લાચાર થઈને ત્યા થોડા વખત સુધી રકા અને ત્યારબાદ જ્યારે તેને તે સ્પર્શ અસહ્ય થઈ પડે ત્યારે (तएण से सागरदारए स्मालिय दारिय मुदपयुत्त जाणिचा सूमालिया दारियाए पासाउ उद्देइ, उद्विचा जेणेव सए सयणिज्जे तेणेव उवागच्छद, आ मच्छित्ता सपणीयसि निवज्जइ, तएण सूमालिया । नहीं मनगारधर्मामृत पपिणी टी० भ० १६ सुकुमारिकाचरितवर्णनम् २०५ से' तस्य शयनीयं तयोपागच्छति उपागत्य सागरदारकस्य पार्थे (निवज्नई) निपीदति-स्वपिति । ततः खलु स सागरदारकः मुकुमारिकाया दारिकाया 'दुच्चपि ' द्वितीयारमपि इममेतद्रूपम् पूर्वोक्तमकारसम् अगस्पर्श प्रतिसवेदयति यावद्-अकामकोऽपस्वपशो मुहर्तमात्र सतिष्ठति, ततः खलु स सागरदारक: सुकुमारिका ढारिका मुखप्रसुप्ता ज्ञात्वा शयनीयात्-गग्यात उत्तिष्ठति, उत्थाय वासगृहस्य-शयनगृहस्य द्वार 'विद्याडेड ' बिाटयति = उद्धाटयति विघाटय मारामुक्के विव काए' मारामुक्त इव काफः-मार्यन्ते प्राणिनो यस्या सा मारा मणुरत्ता पति पासे अपस्समाणी तलिमाउ उद्वेइ उद्वित्ता उवागच्छह ) वह सागरदारक उस सुकुमारिका दारिका को सुखसे सोई हुई जानकर उस सुकुमारिका दारिका के पास से उठ बैठा-और उठकर जहां अपनी शय्या थी वहाँ चला गया। वहां आकर उस पर पड़ गया इतने मे ही एक मुहर्त के बाद वह पति में अनुरक्त यनी हुई पतिव्रता सुकुमारिका दारिका जग गई और अपने पास पति को न देखकर अपने पलग से उठ थैठी । उठकर यह जहा सांगरदारक का पलग था वहा गई। (उवागच्छित्ता सागरस्स पासे णुवज्जइ ) वहा जाकर वह उसके पास सो गई । (तएण से सागरदारए सुमालियाए दारियाए दुच्चपि इम एयाख्वं अगफासं पडिसवेदेइ जाव अकामए अवसवसे मुहुत्त मित्त सचिट्ठइ, तएण से सागरदारए सूमालिय दारिय सुहपमुत्त पडियुद्धा समाणी पइन्वया पइमणुरत्ता पत्तिपासे अपस्समाणी तलिमाउ उद्वेद उद्वित्ता आगज्छद) તે સાગર દારક તે સુકુમારિકા દારિકાને સુખેથી સૂતેલી જાણીને તેની ‘પાસેથી ઉઠ, અને ઉઠીને જ્યા પિતાની સધ્યા હતી ત્યાં જતો રહ્યો ત્યાં જઈને તે તેની ઉપર પડી ગયે એટલામાં એક મુહૂર્ત પછી પતિમા અનુરકત બનેલી પતિવ્રતા સુકુમારિકા દારિકા જાગી ગઈ અને પોતાની પાસે પતિ ન જોતા પિતાની શય્યા ઉપરથી ઉઠી અને બેઠી ગઈ ત્યારપછી તે ઉઠીને જ્યા સાગર ४॥२४नी शल्या ती त्या ७ (वाछित्ता सागरस्स पासे णुवज्जइ) જઈને તે તેના પડખામા સૂઈ ગઈ (तएण से सागरदारए सूमालियाए दारियाए दुच्चपि इम एयारून अंगफास पडिसवेदेइ जाप कामए अवसबसे मुहुत्तमित्त सचिट्टइ,तएण से सागरदारए स्मा लिएरियं मुहपसुत्त जाणिवा सयगिजाभो उद्देइ,उद्विचा वासघरस्स दार विशbout प्रयत्नुगार हिरति। नागलुग सागरातमा भागममामानोऽपस T=भरगा स्थानका , गा गुमान गनिटी गल ग सागरदारका सुकुमारिका दारिका गुममगुप्त मा गुमारिकामा दारिकायाः पार्थत उतिष्ठति, उत्थाय यौन सा अपनीयं ततोपागति, उपागप सपनाये, निमग्ना' निपीदति सपितीत्यर्थः । ता: पल गुरुमारिक दागिनो मन्विरे पति- युद्धा-नागरिता राति पवित्रता परमगुरगा' प्रमनुता सपति मत्पनुरागिनी, पार्थे पतिमपश्यन्ती गरिमाउ ' तन्गाव-शयनीयाद उनिप्टिति, उयाय यत्र पच्चणुन्भमाणे चिराण से सागा अगफाम अमहमाणे अब सब्यसे मुहत्तमित्त मविटा) इसके बाद मागरदारक सुस्मारिका के साथ जहा वासगृह-शयन पर-पाच गया पहा जाकर वह उस सक मारिकाके साथR 7 शय्यापर पेठ गया ये जाने पर उसमागरदारक को सुकुमारिका दारिकाका अगर इमरूपसे प्रतीत हुआ-जैसे मानो असिपत्र आदिका स्पर्श हो । इन अमिपत्र (महगको यात) आदिको के स्पर्श से भी उसका वह अगस्पर्श यावन् अमनामतरक ही धा। इस प्रकार का उसका अगस्पर्श अनुभवता हुआ वर सागरदारक विवश पनकर वहा कुछ समय तक ठहरी याद में जय उससे सहन नही हुआ तो । (तएण से मागरदारए सूमालिय दारिय सुरपसुस जाणित्ता सूमालियाए दरिया पामाउ उद्देड, उद्वित्तां जेणेव सए सय णिज्जे तेणेव उवागच्छद, उवागच्छित्ता सयणीयसि निवज्जइ, तएण समालिया दारिया तओ मुहत्ततरस्स पडिबुद्धा समाणी पइन्धया पर से सागरए अंगफास असहमाणे अवसव्यसे मुहुत्तमित्त संचिट्ठइ) ત્યારપછી સાગર દારક સુકુમારિકાની સાથે જ્યા વાસગૃહ-શયનઘર હતુ ત્યા ગયે, ત્યાં જઈને તે સુમારિકાની સાથે એક શમા ઉપર બેસી ગયે બે બાદ તે સાગર દારકને કુમારિક દાંરિકાને અગપ એવા પ્રકારને જણાયે કે તે અસિપત્ર તરવાર વગેરેને સ્પર્શ ન હોય! અસિપત્ર વગેરે કરતા પણ તેને આગ ૫ યાવિત અમને મારક હતે આ રીતે તેના અગપશને અનુભવતા સાગર પારક લાચાર થઇને ત્યા વખત સુધી રકા અને ત્યારબાદ જ્યારે તેને તે સ્પર્શ અસહ્ય થઈ પડે ત્યારે (तएण से सागरदारए सूमालिप दारिय मुहपमुत्त जाणिता सूमालियाए दारियाए पासाउ उद्देइ, उहित्वा जेणेव सए समणिग्जे तेणेव उवागच्छइ, उ गच्छित्ता सयणीयसि निवनइ, तएण सूमालिया - nim - २०६ मनगारधर्मामृतवाणी टी० ० १९ सुकुमारिकाचरितपर्णनम् से ' तस्य शयनीय तनयोपागन्छति उपागत्य सागरदारकस्य पार्श्वे (निवजई) निपीदति-स्वपिति । ततः खलु स सागरदारका सुकुमारिकाया दारिकाया 'दुच्चपि ' द्वितीयवारमपि इममेतद्रूपम् पूर्वोक्तपकारसम् अगस्पर्श प्रतिसवेदयति यावद्-अकामकोऽपस्वयशो मुहूर्तमात्र सतिष्ठति, ततः खलु स सागरदारका सुकुमारिका दारिका सुसप्रसुप्ता ज्ञात्वा शयनीयात्-शग्यात उत्तिष्ठति, उत्थाय वासगृहस्य शयनगृहस्य द्वार 'विहाडेड' विघाटयति = उद्घाटयनि विघाटय मारामुक्के विकाए ' मारामुक्त इव काका-मार्यन्ते पाणिनो यस्या सा मारा मणुरत्ता पति पासे अपस्समाणी तलिमाउ उठेइ उद्वित्ता उवागच्छद) वह सागरदारक उस सुकुमारिका दारिका को सुखसे सोई हुई जानकर उस सुकुमारिका दारिका के पास से उठ बैठा-और उठकर जहा अपनी शय्या थी वहां चला गया। वहां आकर उस पर पड़ गया इतने मे ही एक मुहर्त के बाद वह पति में अनुरक्त बनी हुई पतिव्रता सुकुमारिका दारिका जग गई और अपने पास पति को न देखकर अपने पलग से उठ बैठी । उठकर वह जरा सागरदारक का पलग था वहा गई। (उवागउित्ता सागरस्स पासे गुवज्जह ) वहा जाकर वह उसके पास सो गई । (तण्ण से सागरदारए सुमालियाए दारियाए दुच्चपि इम एयारूच अगफास पडिसवेदेइ जाव अकामए अवसधसे मुहुत्त- मित्त सचिट्ठइ, तएण से सागरदारए सूमालिय दारिय सुहपसुत्त पडिबुद्धा समाणी पइन्धया पइमणुरत्ता पत्तिपासे अपस्समाणी तलिमाउ उद्वेइ उद्वित्ता आगज्छ।) તે સાગર દારક તે સુકુમારિક દારિકાને સુખેથી સૂતેલી જાણીને તેની પાસેથી ઉઠ, અને ઉઠીને ત્યા પિતાની શય્યા હતી ત્યાં જ રહ્યો ત્યા જઈને તે તેની ઉપર પડી ગયે એટલામા એક મુહૂર્ત પછી પતિમા અનુરક્ત બનેલી પતિવ્રતા સુકુમારિકા દારિકા જાગી ગઈ અને પિતાની પાસે પતિ ન જોતા પિતાની શય્યા ઉપરથી ઉઠી અને બેઠી ગઈ ત્યારપછી તે ઉઠીને જ્યાં સાગર १२७नी शय्या ती त्या ४ (वान्छित्ता सागरस्स पासे गुवज्जइ) ni જઈને તે તેના પડખામા સૂઈ ગઈ (तएण से सागरदारए समालियाए दारियाए दुच्चपि इम एयारून अंगफास पडिसवेदेइ जाव अकामए अवसबसे मुहूत्तमिच सचिट्टइ,तएण से सागरदारए समा लिय दारिय सुहपसुत्त जाणिवा सयगिजामो उद्देइ,उद्वित्ता यासपरस्स दार विहान २०६ बालापा शुना यम्यान, तस्याको निम्गाकार:-माग मा.कपुरपादावत: नियुक्त मिटिगा काको यया गती निर्गति , यस्सा पत्र दिया मादुर्भूतस्वामेर दिन मतिगतः ॥ ३०॥ मूलम्-तएर्ण सूमालिया दारिया तओ मुहुनंतरस्स पडिबुझा पइवया जाव अपासमाणी मणिनाओ उघड सागरस्स दारियाए सवओ समता मग्गणगसणं करमाणीर वासघ रस्स दार विहाडियं पासइ पासित्ता एवं पयासी-गए से जाणित्ता सयणिज्जामो उठेह, उहिता वासघरसर दार विहाढेई, विहाहेत्ता मारामुरके रिका जामेय दिमि पाउन्भू तामेव दिसिं पडिगए) सागरदारक को सुकुमारिका दारिका का अगरराग दुवा राभी वैसा ही पूर्वोक्तरूप से अनुमय में आपा-अन. उसके पास सोने की इच्छा न रोने पर भी चर वियशहोकर कुछ समय तक उसके पास सोता रहा-जर वह अच्छी तरह सो गइ-तब वह उसे सुरा प्रसुतजा नकर उसके पास से उठो-और उटकर उसने उस पास गृह के दरवाजे को खोला सोलकर जिस प्रकार 'मारामुक्त' फाफ पढ़े वेगसे निकलता है -उसी तरह यह भी पहुत जल्दी वहा से निकलकर जिस दिशा से प्रकट हुआ था-उसी दिशा तरफ चोपिस चला गया। जिस मे प्राणी मारे जाते हैं उसका नाम मारा-शना- वधस्थान है। इस मारा से निकला हुआ अथवा मारनेवाले पुरुप के हाथ से छटा हुआ-ऐसे ये दो अर्थ “ मारमुक्त" इस शब्द के हो सकते है। सू. ९ हेई,विहाडित्ता मारामुक्के विव काए जामेव दिसि पाउन्भूए तामेदिसि पडिगए) સાગર દારકને સુકુમારિકાને બીજીવારને અગ સ્પર્શ પણ પહેલાની એમજ લાગે એટલા માટે તેની પાસે સૂવાની ઈચ્છા ન હોવા છતએ તે વિવશ થઈને ડીવાર સુધી તેની પાસે પડી રહ્યો જ્યારે સારી રીતે સૂઈ ગઈ ત્યારે તે તેને સુખેથી સૂતી જાણીને તેની પાસેથી ઉઠે અને ઉઠીને તેણે તે વાસગ્રહના બારણાને ઉઘાડયું ઉઘાડીને જેમ મારા-મુક્ત કાગડે જલદી નીકળી જાય છે તેમજ તે પણ બહુ જ ત્વરાથી ત્યાંથી નીકળીને જે દિશા તરફથી આ હતું તે જ દિશા તરફ પાછો જતો રહે જે સ્થાને પ્રાણીઓ મારી નાખવામા આવે છે તેનું નામ भास" (स्थान) छ આ “મારા થી છૂટીને આમ બે અર્થો “મારમુક્ત” શબ્દના થઈ શકે છે કે સત્ર ૬ એ .
२०७ मनगारधर्मामृतवपिणी टी० म०,१६ सुकुमारिकाचरितवर्णनम् सागरे तिकटु ओयमणसंकप्पा जाव झियायइ, तएणं सा भद्दा सत्थवाही कल्लं पाउ० दास चेडियं सदाबेइ सदावित्ता एवं वयासी-गच्छह णं तुम देवाणुप्पिए । वहुवरस्स मुह- धोवणियं उवणेहि, तएण सा दासचेडी भद्दाए एवं वुत्ता समाणी एयमह तहत्ति पडिसुणति, मुहधोवणिय गेण्हइ गेण्हित्ता जेणेव वासघरे तेणेव उवागच्छइ उवागच्छित्ता सूमालियं दारियं जाव झियायमाणि पासइ पासित्ता एवं वयासी - किन्नं तुम देवाणुप्पिया । ओहयमणसकप्पा जाव झियाहिसि', तएणं सा सूमालिया दारिया तं दास- चेडी एवं वयासी-एवं खलु देवाणुप्पिया | सागरए दारए मम सुहपसुत्तं जाणित्ता मम पासाओ उद्वेइ उद्वित्ता वास- घरदुवार अवगुणइ जाव पडिगए तएण तओ अह मुहुत्तं- तरस्स जाव विहाडियं पासामि, गए ण से सागरएत्तिकटु ओहयमण जाव झियायामि, तएण सा दासचेडी सूमालि- याए दारियाए एयमट्ट सोच्चा जेणेव सागरदचे तेणेव उवा- गच्छइ उवागच्छित्ता सागरदत्तस्स एयम निवेएइ, तएणं से सागरदत्ते दासचेडीए अतिए एयमट्ट सोच्चा निसम्म आसुरुत्ते जेणेव जिणदत्तस्स सत्थवाहस्स गिहे तेणेव उवाग- च्छइ उवागच्छित्ता जिणदत्तं एव वयासी-किण्णं देवाणु- पिया | एव जुत्तं वा पत्तं वा कुलाणुरूत्र वा कुलसरिसं वा जन्न सागरदारए सूमालियं दारिय अदिट्टदोस पइवयं २०८ तापमेयर विप्पजहाय इहमागओबहहि सिजणियाहि य कंटणियाहि य उवालभइ, ताणं जिणदत्ते सागरदत्तस्स एयमह सोचा जेणेव सागरण दारए तेणेव उरागद उवागच्छित्ता साग- रयं दारय एवं वयासी-द?ण पुत्ता ! तुमे कय सागरदत्तस्स गिहाओ इह हव्यमागते, तेणं तं गच्छह णं तुमं पुत्ता ! एवमवि गए सागरदत्तस्स गिहे, तएणं से सागरए जिणदत्तं एव वयासी-अवि आइ अह ताओ | गिरिपडणं वा तरुप डणं वा मरुप्पवायं वा जलप्पवेस वा जलगप्पवेसं वा विसभक्खणं वा सत्थोवाडण वा वेहाणस वा गिद्धापिट्ट वा पवज वा विदेसगमण वा अन्भुवगच्छिन्नामि नो खल्लु अहं सागरदत्तस्त गिहंगच्छिज्जा, तएण से सागरदत्ते सत्थवाहे कुड्डतरिए सागरस्स एयम निसामेइ निसामित्ता लजिए विलीए विड्डे जिणदत्तस्स गिहाओ पडिनिक्खमइ पडिनि- क्खमित्ता जेणेव सए गिहे तेणेव उवागच्छइ, उवागच्छित्ता सुकुमालिय दारिय सदावेइ सदावित्ता अके निवेसेड़ निवे- सित्ता एव वयासी-किपण तुम पुत्ता | सागरएण दारएणं मुक्का १, अहणं तुम तस्स दाहामि जस्स णं तुम इट्टा जावं मणामा भविस्ससित्ति सूमालिय दारिय ताहि इट्टाहि वग्गूहि समासासेइ समासासित्ता पडिविसज्जेइ ॥ सू० १० ॥ टीका-तएण ' इत्यादि । तता-तन्निर्गमनानन्तर खलु सुकुमारिका दारिका तनो मन्विरे प्रतिबुद्धा जागरिता सतो पतिव्रता यावत् पतिमपश्यन्ती .
. . पामित्ता राव अनगारधर्मामृतवपिणी टीका अ० १६ सुकुमारिकाचरितवर्णनम् २०९ शयनीयात् गच्यात उत्तिष्ठति, उत्थान सागग्स्स दारकस्य सर्वतः समन्ताद मार्ग णगवेपण कुनैतीर वासगृहस्य-शयन्स्य द्वार विवाटितम् उद्घाटित पश्यति, दृष्ट्वा एवमयादीत-गतः स सागरना, इति कृपा 'ओहयमणसमप्पा' थप तमनः सरुल्ला नष्टमोरमा, यामा ध्यायति आर्त यान करोतिस्म । ततस्तदन न्तर भद्रा सार्यवाही ' मल्ल 'कल्ये द्वितीय दिवसे प्रादुः प्रभातायां रजन्या यावत् तेजसा ज्वलतिब्दीप्यमाने मर्ये उदिने दामचेटी-दामपुती शब्दयति, शदयित्वा 'तएण समालिआ दारिया' इत्यादी । टीकार्य-(तराण) उसके बाद समालिया दारिचा) सुकृमारिका दारिका (तओ मुहत्ततरस्स पडिबुद्वा पडदया जाव अपासमाणो ) एक मुहर्त के बाद जग पडी-सो उम पतिव्रता ने वहा अपने परिको जप नही देखा तप (सयणिज्जाओ उद्देइ, सागरस्स दारगस्स मव्यामोसमता मम्मण गवेसण गरेमाणी २ वासवरम्स दार विहोडिय पामड, वयासी) पलग से उठी उठकर उसने सागर दारक की वही पर सब और घार मार्गण गवेपणा की- । जब उसने शयन गृह के दरवाजे को उचड़ा हुआ देस-रुव उसे विचार आया कि (गये से सागरे त्ति कटु ओयमणसकपा जाव नियायइ, ताण सा महा सत्यवाही कल्ल पाउ० दासचेडिय समावेह ) कि सागर चले गये है। इस प्रकार अप- हतमनासकल्प होकर वह विचार में पड गई, इतने मे भद्रा सार्थवा (तएण सूमालिया दारिया इत्यादि- टीडी4-( तएण ) त्यारा (सूमालिया दारिया ) सुसरि हा२ि७ (तओ मुहुततरस्स पडिसुद्धा पइया जाव अपासमाणी ) ४ मुहूत पछी જાગી ગઈ તે પતિવ્રતાએ ત્યા પોતાના પતિને જ્યારે જોયા નહિ ત્યારે ( सयणिज्जाभो उढेड, सागरस्स दारगस्स सपओ समता मग्गणगवेसण करेमाणी २ वासघरस्म दार विहाडिय पासइ, पासित्ता एव क्यासी) વાગ્યા ઉપરથી ઊભી થઈ અને ત્યારપછી તેણે ત્યાજ આસપાસ મેર સાગર દારકની માર્ગણા-ગવેષણા કરી જ્યારે તેણે શયનગૃહના બારણને ઉઘાડેલું જોયું ત્યારે તેને વિચાર આવ્યું કે (गए से सागरे तिकटु ओहयमणमाप्पा जाव झियापड, ताणं मा भदा सस्थवाही कल पाउ दामचेडिय सद्दावे) સાગર જતા રહ્યા છેઆ રીતે અપહત મન સ કલ્પવાળી લઈને તે तारणार विप्पजहाय इहमागओवरहि सिजणियाहि य टणियाहि य उवालभइ, तगणं जिणदत्ते सागरदत्तस्स एयमह सोचा जेणेव सागरए दारए तेणे उवागद उपागन्छित्ता साग- रयं दारयं एवं वयासी-दगुण पुत्ता ! तुमे कयं सागरदत्तस्स गिहाओ इहं हव्यमागते, तेणं तं गच्छह णं तुमं पुचा ! एवमवि गए सागरदत्तस्स गिहे, तपणं से सागरए जिणदत्तं एव वयासी-अवि आद अह ताओ ! गिरिपडणं वा तरुप डण वा मरुप्पवाय वा जलप्पवेस वा जलणप्पवेस वा विसभक्षण वा सत्थोवाडण वा वेहाणसं वा गिहापिट्ट या पवज वा विदेसगमण वा अभुवगच्छिन्नामि नो खलु अहं सागरदत्तस्स गिहं गच्छिज्जा, तएण से सागरदत्ते सत्थवाहे कुड्डतरिए सागरस्स एयम निसामेइ निसामित्ता लजिए विलीए विड्डे जिणदत्तस्स गिहाओ पडिनिक्खमइ पडिनि- क्खमित्ता जेणेव सए गिहे तेणेव उवागच्छइ, उवागच्छित्ता सुकुमालिय दारिय सदावेइ सहावित्ता अके निवेसेइ निवे- सित्ता एव वयासी-किण्णं तुम पुत्ता ! सागरएण दारएणं मुक्का ?, अहंणं तुम तस्स दाहामि जस्स णं तुम इहा जावं मणामा भविस्ससित्ति सूमालिय दारिय ताहि इटाहि वग्गूहि समासासेइ समासासित्ता पडिविसज्जेइ ॥ सू० १०॥ टीका--'तएण' इत्यादि । तता तन्निर्गमनानन्तर खलु सुकुमारिका दारिका ततो सहन्विरे प्रतियुद्धाजागरिता सतो पवित्रता यावत् पतिमपश्यन्ती अनगारधर्मामृतवपिणी टीका अ० १६ सुकुमारिकाचरितवर्णनम् २०२ शयनीयात्-गव्यात उत्तिष्ठति, उत्थान सागरस्स टास्कस्य सर्वतः समन्ताद् मार्ग णगवेपण कुती वासगृहस्य-शयास्य द्वार विवाटितम् उद्घाटित पश्यति, दृष्ट्वा एवमवादी-गतः स सागरना, इति कृरा 'ओहयमणसम्प्पा' पद तमनः सकल्पाम्नष्टमोरथा, यानर ध्यायति आर्त यान करोतिस्म । उतरवदन न्तर भद्रा सार्थवाली मल्ल 'कल्ये-द्वितीयदिरसे प्रादुः प्रभातायां रजन्या यावत् तेजसा ज्वलतिब्दीप्यमाने गये उदिते दायचेटी-दामपुत्रीं शब्दयति, शब्दयित्वा तएण समालिआ दारिया' इत्यादी । टीकार्य-(तण्ण) इसके बाद (मालिया दारिचा) सुकुमारिका दारिका (तओ मुहुन्ततरस्स पडिवुढा पडवया जाव अपासमाणो ) एक मुहूर्त के बाद जग पडी-सो उस पतिव्रता ने वहा अपने पनिको जप नही देखा तप (सयणिज्जाओ उट्टेड, सागरस्स दारगस्स मचाओ समता मगगण गवसण फरेमाणी २ वास परस्म दार विटोडिय पामड, पालिता एव चयासी) पलग से उटी उठकर उसने सागर दार की वही पर सर और चार मार्गण गवेपणा की-। जब उसने शपन गृह के दरवाजे को उचड़ा हुआ देर ।-तब उसे विचार आया कि ( गये से सागरे त्ति कटु ओत्यमणसकपा जाय प्रियायइ, तएण सा भदा सत्यवाही कल्ल पाउ० दासचेडिय समावेइ ) कि सागर चले गये हैं। इस प्रकार अप- हतमनासकल्प होकर वह विचार में पड़ गई, इतने मे भद्रा सार्थवा (तएण सूमालिया दारिया इत्यादि- टी14-( तरुण ) त्याRI (सूमालिया दारिया ) सुजुरक्षा हारि (तओ मुहुततरस्स पडिसुद्धा पइवया जाव अपासमाणी ) ४ मुडूत पछी જાગી ગઈ તે પતિવ્રતાએ ત્યા પિતાના પતિને જ્યારે જોયા નહિ ત્યારે (सयणिज्जाओ उद्वेड, सागरस्स दारगस्स सपओ समता मग्गणगवेसण करेमाणी २ पासघरस्स दार विहाडिय पासइ, पासित्ता एव वयासी) શયા ઉપરથી ઊભી થઈ અને ત્યારપછી તેણે ત્યાજ આસપાસ ચોમેર સાગર દારકની માર્ગણા-ગણું કરી જ્યારે તેણે શયનગૃહના બારણાને ઉઘાડેલું જોયું ત્યારે તેને વિચાર આવ્યું કે (गए से सागरे तिकटूट ओहयमणमाप्पा जाब झियायह, ताणं मा भदा सत्यवाही कह पाउ दामचेडिय सदावे) સાગર જતા રહ્યા છેઆ રીતે અપહત મન સ ફત્પવાળી થઈને તે विप्पजहाय इहमागओ बहति विज्ञणियाहि य टणियाहि य उबालभइ, तपणं जिणदत्ते सागरदत्तस्स एयमह सोच्चा जेणेव सागरए दारए तेणेच उपागच्छद यागन्छित्ता साग- रयं दारय एवं वयासी-दृढणं पुत्ता! तुमे कय सागरदत्तस्स गिहाओ इह हव्यमागते, तेणं तं गच्छह णं तुमं पुत्ता ! एवमवि गए सागरदत्तस्स गिहे, तपणं से सागरए जिणदत्त एवं वयासी-अवि आइ अह ताओ ! गिरिपडणं वा तरुप डण वा मरुप्पवायं वा जलप्पवेसं वा जलगप्पवेस वा विसभक्खणं वा सत्थोवाइण वा वेहाणस वा गिद्वापिट्ट या पवज वा विदेसगमणं वा अन्भुवगच्छिन्नामि नो खल अहं सागरदत्तस्स गिहं गच्छिज्जा, तएण से सागरदत्ते सत्थवाहे कुड्डतरिए सागरस्स एयम निसामेइ निसामित्ता लजिए विलीए विड्डे जिणदत्तस्स गिहाओ पडिनिक्खमइ पडिनि- क्खमित्ता जेणेव सए गिहे तेणेव उवागच्छइ, उवागच्छित्ता सुकुमालिय दारिय सदावेइ सहावित्ता अके निवेसेइ निवे. सित्ता एव वयासी-किण्णं तुम पुत्ता । सागरएण दारएणं मुक्का , अहंणं तुम तस्स दाहामि जस्स णं तुम इट्टा जाव मणामा भविस्ससित्ति सूमालिय दारिय ताहि इट्टाहि वग्गूहि समासासेइ समासासित्ता पडिविसज्जेइ ॥ सू० १० ॥ टीका-'तएण' इत्यादि । ततः तन्निर्गमनानन्तर खलु सुकुमारिका दारिका बतो मुहूर्वान्तरे प्रतिजुदा-जागरिता सतो पवित्रता यावत् पतिमपश्यन्ती -- - - अनगराधर्मामृतवाणी टीका० अ० १६ सुकुमारिकाचरितवर्णनम् २११ हे देवानुप्रिये ! हे मुकुमारिके ! किं-कुतः खलु लम् गपातमनः सकल्पा यावद ध्यायसि ?, ततस्तदनन्तर सा सुकुमारिका दारिका ता दामचेटीमेवमयादीत्-हे देशानुप्रिये ! एव खलु सागरको दारको मा सुसमसुप्ता ज्ञात्वा मम पादुत्तिष्ठति, उत्याय वासगृहद्वारम् ' अवगुणइ ' जागुणयति अपारणोति उद्घाटयति, 'यावत् प्रतिगत ' यस्याः एव दिशः प्रादुर्भूतस्तामेव दिश प्रतिगत । ततस्तदनन्तर खलु 'तओ' ततो मुहूर्तान्तरेऽह यानत्-प्रतियुद्धा सती सागरदारकमपश्यन्ती शयना दुनिष्ठामि, उत्थाय तम्य मार्गणगवेपण कुर्वती नासगृहस्य द्वार विराटित पश्यामि गतः खलु स सागरसः' इति कृत्वा इति हेतोरहम् अपटतमनः माल्पा यावद्- चिता मग्न देखा-देखकर उसने उससे पूछा कि हे देवानुप्रिये ! क्या कारण है जो आप अपहतमन' सकल्पा होकर चिन्ता मग्न बनी हुई हो' इस दासचेटी के प्रश्नको सुनकर उस सुकुमारिका ने उस से कहा-देवानुप्रिये-सुनो-सागरदारक मुझे सुप प्रलुप्त जानकर मेरे पास से उठे और उठकर चासगृह के दरवाजे को गोलकर जहा से आये थे वशं चले गये है। (ता ण तओ अह मुहत्ततरस्म जाव विहाडिय पासामि गएण से सागरण त्तिकह ओत्यमाण जाव शियायामि, तए ण सा दामचेडी सूमालिया दारियाए एयमट्ठ मोच्चा जेणेव लागरदत्ते तेणेव उवागच्छह ) उसके बाद ज्योही में जगी-तो मैंने जब सागर दारक को अपने पास नहीं देग्वा-तो में शय्या से उठ बैठी-और उठकर मेने उनकी यही पर सर तरफ मार्गण गवे- पणाकी उसमे मेने वासगृह के दरवाजे उघडा पाया-तत्र में समझ જઈને તેણે સુકુમારિકા દારિતાને ચિંતામાં ગમગીન જોઈ જોઈને તે તેને પૂછ્યું કે હે દેવાનુપ્રિયે ! શા કારણથી તમે અપહત મન સ ૯૫ા થઈને ચિતામાં બેઠા છે? દાસટીના પ્રશ્નને સાભળીને તે સુકુમારિકાએ તેને કહ્યું- કે દેવાનુપ્રિયે ! સાભળો, સાગર દાર મને સુખેથી સૂતી જાણીને મારી પાસેથી ઉભા થયા અને ઉભા થઈને વાસગૃહના બારણાને ઉઘાડીને જ્યાથી આવ્યા હતા, ત્યાં જતા રહ્યા છે (तएण तओ अह मुहुत्ततरस्म नाव पिदाडिय पासामि गएण से सागरए ति कट्टु ओइयमण जान झियायामि, तएण सा दासचेडी, समालियाए दारियाए एयम सोच्चा जेणेव सागरदत्ते तेणेव उवागन्छड) ત્યાર પછી જ્યારે હું જાગી ત્યારે મે સાગર દારક ને મારી પાસે જે નહિં, હું શા ઉપર ઉઠૉ અને બેઠી થઈ ગઈ અને ત્યાર પછી મે અહીં જ તેમની બધે માર્ગ–ગવેષણ કરી મે જ્યારે વાસગૃહના બારાને ઉઘાડુ જોયુ કે તેઓ ચાલ્યા ગયા છે આ વિચારથી જ હુ અપહત । . Acet एसगादीन- देशानुपिये ! गगनस' गावरम्ग मायो' ममीपे मुधोगिय ' गुमानिकांदनानानिमाणेरि' उपनयन्माषय । ततः राल सा बामोटी भद्रगा गाभागा प्रपमुक्तागणी 'यमद' पतमर्थम्- एतद्वयन गया अनुकग पनिमोनि, मनिथुप' मुगिय' मुम्ब धावनियां साति, ग्रीला गयासमोरागनि, उपगन्य सामारिका दारिकामेकाकिनी या पागनी-मार्ग यान पश्यति दृष्ट्वा एमादीन- हीने यिनीय दिन प्रातः काल ते दामपुत्री को बुलाया (महावित्ता बयासी गच्या ण तुम देवाणुपिपरपरस्म मुरघोणिर उवणेहि तएण सादामचेही महाग र युत्ता नमाणी पमह तात्ति परि सुणति मुत्योपणिय गण्डद, उपगचित्ता, समालिय दारिय जाब झियायमाणिं पाम, पासिता गय यामी-किन तुम देवाणुप्पिया! ओरमणमकप्पा जान शियाहिनि ? तण मा मृमालिया दारिया त दासचेटी एव चयामी-17 पलु देवाणुप्पिया मागरण दारए मर्म सुहपसुत्त जणिता मम पासोओ उद्देइ, उद्वित्ता वासघरदुवार अवगु णह, जाव पडिगए) धुलाकर उससे ऐसा कहा कि हे देवाणु प्रिय 'नूजा, और यधूवर के पास इस दन्त धावन आदिरूप मुग्य धापनिका को लेजा भद्रा के इस कथन को उस दासचेटी ने " तहत्ति" कहकर स्वीकार कर लिया और मुख धावनीको को ले लिया और लेकर फिर वह जहा वासगृह था-वहा गई । वहा पहुँचकर उसने सुकमारिका दारिका कों ચિંતામાં ગમગીન થઈ ગઈ એટલામા બીજા દિવસે સવારે ભદ્રાસાર્થવાહીએ દાસપુત્રીને બેલાવી (सदावित्ता एव वयासी गच्छह ण तुम देवाणुप्पिए । वहुवरस्म मुहधोवणिय उवणेहि, तएणं सा दासचेडी भद्दाए एउवुत्ता समाणी एयम तहत्ति पदिमुणति मुहयोवणिय गेण्हइ, गेण्डित्ता जेणेष वासघरे तेणेव आगच्छड, उवागच्छित्चा, सूमालिय दारिय जाव झियायमाणि पासइ पासित्ता एव वयासी-फिन्न तुम देवाणुप्पिया ओहयमणसक्रप्पा जाव झियाहिसि? तएण सा भूमालिया दारिया त दासवेडी एव चयासी-एव खलु देवाणुप्पिया! सागरए दारए मम सुहपसुत्त जणित्ता मम पासाओ उट्टेइ, उद्वित्ता वासघरदुवार अगुणइ, जाव पडिगए) બોલાવીને તેને આ પ્રમાણે કહ્યું કે હે દેવાનુપ્રિયે ! તુ વરવધુની પાસે આ દતધાવન વગેરે મુખધાવનિકા લઈ જા ભદ્રાના આ કથનને સાભળીને તે દાસીએ તહતિ” કહીને તેને સ્વીકારી લીધું અને મુખપાવનિકા (દાતણ) ને લઈ લીધુ અને લઇને તે જ્યા વામગૃહ હતુ ત્યા ગઈ ત્યા , अनगारधर्मामृतवपिणी टी० ० १६ सुकुमारिकाचरितवर्णनम् २१३ विमहायम्त्यरत्या इहागतः कथमेतद् युक्तं, यत् निर्दोपा सुकुमारिका निहाय सागरदारकोऽत्र समायात इति । एव पहोभिः 'खिज्मणियाहि य' खेदनिकामि- खेदपूर्णाभिस्तया ' स्टणियादि य 'स्टणियाभिव देगीयोऽय गन्दः, रोदनक्रि- यायुक्ताभिः वाग्भिः उपालभते सागरदत्तो जिनदत्तस्य उपालम्भ रोतीत्यर्थः । रात खलु जिनदत्तः सार्थवाह सागरदत्तस्य सार्थवाहम्यान्तिके एतमर्थ श्रुत्वा निशभ्य यत्रैव सागरदारकस्तत्रैवोपागच्छति, उपागत्य सागरक दारकं स्वपुत्रमेव- वक्ष्यमाणमकारेण अवादी-हे पुत्र ! त्वया खलु दुष्टुशोभन कृतम् यत्-साग- रदत्तस्य सार्थहस्य गृहादिह हव्यमागतः, तत्-तस्माद् गन्छ खलु व हे पुत्र ! एवमपि यथास्थितस्तर सागग्दत्तस्य सार्थवाहस्य गृहम् । सागरदारको जिनदत्तं सार्थवाहमेवमवादीत्-हे तात ! अपि-निश्चयेन — आइ' इति वाक्यालकारे अह दारिय अदिट्टदोस पदयय विप्पजहाय इह मागओ यहिं खिज्जणियाहि य रुणियाहि य उबालभड ) हे देवानुप्रिय ! क्या पर धान योग्य है- अथवा कुलमर्यादा के लायक है, या कुल की योग्यता के अनुसार है या कुल को शोभित करे ऐसी है, जो सागरदारक विना किमी दोपके देखे-पतिव्रता सुकुमारिका दारिका को छोड़कर यहा आ गया है इस प्रकार अनेक खेदपूर्ण एच रोदनक्रिया युक्त वचनोंसे सागरदत्तने अपने सरधी जिनदत्तको ठपका-उलाहना दिया। (नगणंजिणदत्ते सागरदत्तस्स ज्यम? सोच्चा जेणेव सागरए दारए तेणेच उवागच्छह, उवागघिउत्ता सागरय दारय एवषयासी-दृहुण पुत्ता तुमे कय,सागरदत्तस्स गिटाओ इह हन्चमागए, तेण त गच्छह ण तुम पुत्ता ! एचमविगए, सागरदत्तरस गिहे, तएण से मागरए जिणदत्त एव वयासी-अवि आइ अह ताओ! હે દેવાનુપ્રિય ! શુ આ વાત વાજબી છે ? કુળ મર્યાદાને લાયક છે ? અથવા તે કુળની ચોગ્યતા મુજબ છે ? કુળને શોભાવનારી છે? કે જે સાગર દારક કોઈ પણ જાતના દેવ જોયા વગર પતિવ્રતા સુકુમારીના દારિકાને ત્યજીને અહીં આવી ગયા છે. આ રીતે મનને દુભાવનારા તેમજ ગળગળા થઈને રડતા રડતા ઘણા વચનથીસાગર પિતાના વેવાઈ જિનદત્તને ઠપકો આ (तएण जिणदत्ते सागरदत्तम्स एयमह सोचा जेणेच सागरए दारए तेणेव उवागच्छड, उवागच्छित्ता सागरय दारय एप ग्यामी-दुट्ठण पुत्ता तुमे कय सागरदत्तस्स गिहामो इह हन्बमागए, तेण त गच्छठ ण तुम पुत्ता । एवमविगए, सागरदत्तस्स गिहे, तएण से सागरए जिणदत्त एव वासी-अवि आइ अह Recenamanelewane Home- #মাথায় आर्तध्यानभ्यायामि । ततः पातु सा रागोटी मारिजागा रिकाया अन्तिके एतमर्थ श्रुत्वा, नगर सागर सागा गुमारिकाया पिता, तशैवोपा गच्छति, उपागलप त सागरदरीतमय गिरोदयति । ततस्तदनन्तर स सागरदत्ता सार्यवाहो दासचेटयामन्ति के परामर्ष श्रुत्वा निशम्य आशुप्ता जीघ्र क्रोधाविष्टः सन यत्रैव निनदत्तस्य मार्यवाहस्य गृह संयोपागन्नति, उपआगत्य जिनदत्त सार्थवाहमेवमादीन-हे देवानुमिय निथ सतु पय युक्तम्-पिन वा माप्त- कुलमर्यादामनुभाप्त या कुलानुरप-लयोग्यतानुकूल ना फुलपग-कुलगाम्यापन चा, यत् सलु सागरी दारस: गुमारिका सारिकामदीपा-निदोपा पतित्रता गई कि वे चले गये है हम विचार से में अपरतमनः सरप होकर आर्त योन-चिता-मे पड़ रही है । इस प्रकार सुकुमारिका की बात सुनकर वर दासचेटी पटुत सोच विचार करके वहा से सागरदत्त के पास आई । ( उबागच्छित्ता सागरदत्तस्स एयम निवेण्ड-तण्ण से मागरदत्ते दासचेडीए अतिए एयम मोच्चा निसम्म आसुरत्ते जेणेव जिणदत्तस्स सत्यवाहस्स गिहे तेणेव उवागह-ज्याच्उित्ता जिणदत्त एव वयासी) वहीं आफर उसने सगरदत्त से इस बात को कहा-। इस तरह दासचेटी के मुग्व से इस पोत को सुनकर और उसे हृदय में धारण कर सागरदत्त बहुत अधिक-युद्ध हुआ और उसी समय जहा जिनदत्त सार्यवाह का घर था वहा गया । वहा जाकर उसने जिनदत्त से इस प्रकार कहा-(किण्ह देवाणुप्पिया ! एव जूत्त वा पत्त वा कुलाणुरूव वा कुलसरिस वा जन्न सागरदारए समालिय મન સંકલ્પ થઈને આર્તધ્યાન-ચિંતા-મા પડી છુ આ રીતે સુકુમારીકાની વાત સાભળીને તે દાસ ચેટી ખૂબજ વિચાર કરીને ત્યાથી સાગરદત્તની પાસે ગઈ उवागच्छित्ता सागरदत्तस्य एयमह निवेएइ-तएण से सागरदत्ते दासचेडीए अतिए एयमट्ट सोचा निसम्म आसुरुत्ते जेणेन जिणदत्तस्स सत्यवाहस्स गिहे तेणे उपागच्छइ-आगच्छित्ता जिणदत्त एव वयासी) ત્યા આવી ને તેણે સાગરદત્તને આ વાત કરી આ રીતે દાસ ચેટીના મુખથી બધી વિગત સાભળીને અને તેને હૃદયમાં ધારણ કરીને સાગર દત્ત અત્યંત ગુસ્સે થયે અને તરત જ ક્યા જિનદત્ત સાર્થવાહનું ઘર હતુ ત્યા ગયે ત્યાં જઈને તેણે જિનદત્ત સાર્થવાહને આ પ્રમાણે કહ્યું કે (किण्ण देवाणुप्पिया ! एव जुत्त वा पत्त वा कुलाणुरुष वा कुलसरिस वा जन्न सागरदारए ममालिथ दरियं अदिदोस पइवय विप्पजहाय इहभागी बहूईि खिज्नणियाहि य रुदृणियाहि य उवालभ३ ) थनगारधर्मामृतवपिणी टी० १० १६ सुकुमारिकाचरितवर्णनम् २२३ विमहाय-त्यक्त्वा इहागत:-कथमेत्तद् युक्त, यत् निर्दोपा सुकुमारिका निहाय सामरदारकोऽत्र समायात इति । एव वहीभिः 'खिज्जणियाहि य खेदनिकामि= खेदपूर्णाभिस्तथा 'स्टणियाहि य 'स्टणियाभिश्च देशीयोऽय शब्दः, रोदनक्रि- यायुक्ताभिः वाग्भिः उपालभते सागरदत्तो जिनदत्तस्य उपालम्भ करोतीत्यर्थः । तत खलु जिनदत्तः सार्थाह सागरदत्तस्य सार्थवाहस्यान्तिके एतमर्थ श्रुत्वा निशभ्य यत्रैव सागरदारकस्तत्रैवोपागच्छति, उपागत्य सागरक दारक स्चपुत्रमेव वक्ष्यमाणप्रकारेण अवादीत्-हे पुत्र ! त्वया खलु दुष्टु-अशोभन कृतम् यत्-साग- रदत्तस्य सार्थवाहरय गृहादिह हव्यमागतः, तत्तस्माद् गन्छ खलु व हे पुत्र! एवमपि यथास्थितस्तथैव सागरदत्तस्य सार्थवाहस्य गृहम् । सागरदारको जिनदत्तं सार्थवाहमेवमवादीत्-हे तात ! अपि-निश्चयेन आइ' इति वाक्यालकारे अह दारिय अदिट्टदोस पइवय विप्पजहाय इह मागओ वहहिं खिज्जणियाहि य रुट्टणियाहि य उचालभइ ) हे देवानुप्रिय ! क्या यर बात योग्य है- अथवा कुलमर्यादा के लायक है, या कुल की योग्यता के अनुसार है या कुल को शोभित करे ऐसी है, जो सागरदारक विना किसी दोषके देखे-पतिव्रता सुकुमारिका दारिका को छोड़कर यहा आ गया है इस प्रकार अनेक खेदपूर्ण एव रोदनक्रिया युक्त वचनोंसे सागरदत्तने अपने सबधी जिनदत्तको ठपका-उलाहना दिया। (नएणं जिणदत्ते सागरदत्तस्स ण्यम सोच्चा जेणेच सागरए दारए तेणेव उवागच्छइ, उवागच्छित्ता सागरय दारय एवषयासी-दुहुण पुत्ता तुमे कय,सागरदत्तस्स गिहाओ इह हव्यमागए, तेण त गच्छह ण तुम पुत्ता ! एवमविगए, सागरदत्तस्स गिहे, तएण से मागरए जिणदत्त एव वयासी-अवि आह अह ताओ! હે દેવાનુપ્રિય! શું આ વાત વાજબી છે? કુળ મર્યાદાને લાયક છે? અથવા તે કુળની ગ્યતા મુજબ છે? કુળને શોભાવનારી છે? કે જે સાગર દારક કઈ પણ જાતના દેવ જોયા વગર પતિવ્રતા સુકુમારીકા દારિકાને ત્યજીને અહીં આવી ગયો છે ? આ રીતે મનને દુભાવનારા તેમજ ગળગળા થઈને રડતા રડતા ઘણા વચનેથી સાગત પિતાના વેવાઈ જિનદત્તને ઠપકો આપ્યો (तएण जिणदत्ते सागरदत्तस्स एयमह सोचा जेणेन सागरए दारए तेणेव उवागच्छइ, उवागच्छित्ता सागरय दारय एव वयासी-दुण पुत्ता तुमे कय सागरदत्तस्स गिहागो इह हन्धमागए, तेण त गच्छह ण तुम पुत्ता ! एवमरिगए, सागरदत्तस्स गिहे, तएण से सागरए जिणदत्त एव वगासी-अवि आइ अह मेmhra - १४ मलाया ताया गिरिपतन ग पान या गापपान निगरदेशगमन मा जम् प्रपात पागाधनले पतन पा, चलनवादग्नी प्रवेश या पिमक्ष वा, 'सत्योपाडण 'रामारपाटन TETRधारण ना, हाणम वा हायस पा पाण्ठे पाशरग्रहण का, तया-.ट-21 पनं मया गोष्ट्रा दीना कलेपरे प्रवेशितस्य गरीरस्थ गारगर्मिग ज्या प्रवज्या , टिश गिरिपडण चा तमपण चा मनपवाय वारपयेम पाारणप्पवेस वा विसमस्षण वा सत्योपाउण वा पेशागम का निदापिट्ट वा परग्ज वा विदेसगमण चा अन्भुवगछिनामि. नो पल्लु अर मागरदत्तस्न गिह गच्छिन्ना) जिनदत्त सागरदत्त के हम उलाहन रूप अबको सुन फरके जरा सागरदारक था वहां गया-पां जाकर उसने मागर दारक से इस प्रकार कहा-हे पुत्र ! यर तुमने अच्छा नहीं किया-जो तुम सागरदत्त के घर से यहा इतने जरदी आ गये । इमलिये हे वेटा। तुम जैसे यहा धैठे हो वैसे ही सागरदत्त के घर चले जाओ। तम सागरदारकने अपने पितो जिनदत्त से इस प्रकार कहा-पिताजी ! में आपकी आज्ञा से पर्वत से गिरना स्वीकार कर सकता हूँ, वृक्ष से नीचे पड़जाना स्वीकारकर सकता-मरुप्रपात-निर्जलप्रदेश में जाना अगीकारकर सकता है, अगाधजल में हुसकर मरसता है तथा जलती हुई अग्नि में प्रवेश करना, विषकाभक्षण करना, शस्त्र से शरीर का ताओ। गिरिपडण वा तरुपडणं या मरूप्पनाय वा जलप्पवेस वा जल्णप्पवेस वा विसभक्खण वा सत्थोबाडण वा वेदाणस वा गिद्धापि हवा परज्न वा विदेसगमण चा अभुवगच्छिज्जामि, नो खलु अह सागरदत्तस्स गिह गच्छिज्जा) જિનદત્ત સાગરદત્તના આ ઠપકાને સાભળીને જ્યા ત્યાં ગયો અને ત્યાં જઈને તેણે સાગર દારકને આ પ્રમાણે કહ્યું કે હે પુત્ર! તમે આ જે કઈ કર્યું છે, તે સારુ ન કહેવાય તમે સાગરદત્તના ઘેરથી આવતા રહ્યા આ ઠીક નથી એથી હે બેટા! તમે અત્યારે જેવી સ્થિતિમાં છે તેવી જ સ્થિતિમાં સાગરદત્તને ઘેર જતા રહે ત્યારે સાગર દારકે પિતાના પિતાને આ પ્રમાણે કહ્યું કે હે પિતાશ્રી ! તમારી આ પર્વત ઉપરથી નીચે ગબડી પડવું સ્વીકારી શકુ છુ, વૃક્ષ ઉપરથી નીચે પડી જવું સ્વીકારી શકુ છુ, મરુખપત-નિર્જળ પ્રદેશમાં જવું સ્વીકારી શકુ છુ, ઊંડા પાણીમાં ડૂબીને મરી શકુ છુ, તેમજ સળગતા અગ્નિમાં પ્રવેશવુ, વિષનું ભક્ષણ કરવું, શસ્ત્રનાઘાથી શરીર ને કાપવું, સાગર દારક હતા આટલા જ્ઞાથી भणा मनगारधर्मामृतबरिणी टी० म०१६ सुकुमारिकाचरितवर्णनम १५ गमन वा अभ्युपगच्छामि-स्वीकरोमि किंतु खलु-निश्चयेन मागरदत्तस्त्र सार्थवाहस्य यहे नवगच्छामि । ततस्तदा-स सागरदत्तः सार्यवाहः कुडयान्नरित - गितिव्य- वधानेन स्थितः सागरस्य दारकस्य एतमर्थम्-उक्त पचन निशामरति शृणोति, निशाम्य लज्जित सय, गीडितः परतः 'ढेि 'पिटादेशीयोज इन्द्रः खप- रतोलज्जितः, जिनदत्तम्प गृहात् प्रतिनिप्तामति-निर्गच्छति । प्रतिनिष्कम्य यौव स्वक गृह तगोपागच्छति, उपागत्य सुकुमारिका दारिका शब्दयति, शब्द- यित्वा अङ्के-उत्सदे 'निवेसेड शिवेगपति- उपवेशयति, निवेश्य एमादी-हे पुत्री निकेन कारणेन सलु त माग ण दारकेण 'मुका' मुक्ताम्यता ? | . . विदारण करना गले में फासी लगाकर मरजाना, गज, उष्ट्र आदि के मृतकलेवर मे मैं अपने आपको विष्ट करार उस शरीरको तयुद्धि की कल्पना से गृद्ध पक्षियों द्वारा भक्षण करवाना स सत्र में स्वीकार कर सकता, इमी तरह दीक्षागृरण करना अबका विदेश में चलेजाना भी स्वीकारकर सकता हूँ-परन्तु मैं सागरदत्त के घरजानास्वीकार नही कर सकता हूँ। अर्थात् येस पूर्वोक्त आपकी आज्ञा मुझे विना किसी सकोचके या विचारके माय है परन्तु सागरदत्तके घरजाना मुझे मान्य नहीं है । (तण्ण से सागरदत्ते सत्यवाहे कुडुतरिए सोगरम्स ण्यम नि सामेइ, निसामित्तालज्जिए, चिली, विढे जिनदत्तस्स गिहाओ पटिनि- कावमइ पडिनिवमित्ताजेणेवसागिहे तेणेव उवागच्छह, उवागच्छित्ता सुकमालियंदारिय सदावेइ, सद्दाबित्ता अकेनिवेसेह, निवेसित्ता एघ क्यासी, किण्ण तुम पुत्ता सागरएण दारएण मुक्का? अह ण तुम तस्स - ભેરવીને મરવુ, હાથી ઊટ વગેરેના મરેલા શરીરમાં પ્રવેશ કરી મારા શરી રને મૃતબુદ્ધિની કલ્પનાથી ગીધ પક્ષીઓને ખવડાવવુ આ બધુ હુ સ્વીકારી શકુ તેમ છે, તેવી જ રીતે દીક્ષા ગ્રહણ કરવી અથવા તે પરદેવામા જતા રહેવુ પણ હું સ્વીકારી શકુ છુ પણ હુ સાગરદત્તના ઘેર જવું સ્વીકારવા તૈયાર નથી એટલે કે આ બધી ઉપરની તમારી આજ્ઞાઓ મને કોઈ પણ જાતના વિચાર કર્યા વગર માન્ય છે, પણ સાગદત્તને ત્યાં જવું માન્ય નથી (तएण से सागरदत्ते सत्यवाहे कुडतरिए सागरस्स एयमट्ठ निमामेड, निसामित्ता लज्जिए, रिलीए, विड्डे, जिनदत्तम्म गिहाओ पडिनिक्वमइ, पडि निक्खमित्ता जेणेन सए गिहे तेणेव उनागद, उनागन्उित्ता सुकुमालिय दारिय सदावेड, समाविना के निसेइ, निवेसित्ता एव वयाती किण पुत्ता' सागरपण दारएण ४ setor ताशया गिरिपतन रामपान पामरमपात निगमन या जम्भपात पाअगाधनले पतन पा, जलाशयनी मग या विषमक्षगं वा, 'सत्योपाडण गावापाटन TET रिण या पदाणम वा' बेहायस मा कण्ठे पाशरण , तपा-यापन पनि मया गोष्ट्रा दीना कलेवरे मवेगितस्य गरीरस्थ मृारमा माग, या प्रवच्या पा, विदन गिरिपडण या तमपण या मनापवाया जालपम या सलगपवेस या चिम भरवण या सत्योचाउण वा पेसाणम वा निद्रापिट्ट वा पवाज वा विदेसगमण वा अन्भुनरिटमामि, नो पटुअरमागरदत्तस्न गिह गच्छिज्जा ) जिनदत्त सागरदत्त के इम उलारने रूप अर्थ को सुन करके जरा सागरदारक था वहा गया- वजाकर उमने सागर दारक से इस प्रकार कहा-दे पुत्र ! यर तुमने अच्छा नहीं किया-जो तुम सागरदत्त के घर से यहा इतने जल्दी आ गये । इमलिये है बेटा! तुम जैसे यहा पैटे हो वैसे ही सागरदत्त के घर चले जाओ । तम सागरदारकने अपने पिता जिनदत्त से इस प्रकार करा-पितोजी ! मैं आपकी आज्ञा से पर्वत से गिरना स्वीकार कर सकता है, वृक्ष से नीचे पड़जाना स्वीकारकर सकता-मरुप्रपात-निर्जलप्रदेश में जाना अंगीकारकर सकता हूँ, अगाधजल में पूरकर मरसता हूँ तथा जलती हुई अग्नि में प्रवेश करना, विपकामक्षण करना, शस्त्र से शरीर का ताओ। गिरिपडण वा तरुपडणं वा मरुप्पाय या जलप्पयेस वा जलणप्पवेस वा रिसभरवण वा मत्थोवाडण वा वेहाणस वा गिद्धापि हवा पवन वा विदेसगमण चा अभुवगच्छिज्जामि, नो खलु अह सागरदत्तस्त गिह गच्छिज्जा) જિનદત્ત સાગરદત્તના આ ઠપકાને સાભળીને ન્યા ત્યા ગયે અને ત્યાં જઈને તેણે સાગર દારકને આ પ્રમાણે કહ્યું કે હે પુત્ર! તમે આ જે કઈ કર્યું છે, તે સારુ ન કહેવાય તમે સાગરદત્તના ઘેરથી આટલા જલ્દી આવતા રહ્યા આ ઠીક નથી એથી હે બેટા! તમે અત્યારે જેવી સ્થિતિમાં છે તેવી જ સ્થિતિમા સાગરદત્તને ઘેર જતા રહે ત્યારે સાગર દારકે પોતાના પિતાને આ પ્રમાણે કહ્યું કે હે પિતાશ્રી ! તમારી આ સાથી હુ પર્વત ઉપરથી નીચે ગબડી પડવું સ્વીકારી શકુ છુ, વૃક્ષ ઉપરથી નીચે પડી જવું સ્વીકારી શકુ છુ, મરુખપત-નિર્જળ પ્રદેશમાં જવું સ્વીકારી શકુ છુ, ઊંડા પાણીમા ડૂબીને મરી શકુ છુ, તેમજ સળગતા અનિમા પ્રવેશવુ, વિષનું ભક્ષણ કરવું, શસ્ત્રનાદાથી હારીર ને કાપવું, સાગર દારક હતા વાળમાં अनगारधर्मामृतषिणी टी० अ० १६ सुकुमारिकाचरितवर्णनम् जाव अन्निजमाणमग्ग, तएण से सागरदत्ते कोडुवियपुरिसे सहावेइ सहावित्ता एवं दयासी--तुम्भे ण देवाणुप्पिया । एय दमगपुरिस विउलेण जमणपाणखाइमसाइम पलोभेहि पलोभित्ता गिह अगुप्पवेसेह अणुप्पवेसित्ता खडगमल्लग खडघडग ते एगते एडेह एडित्ता अलकारियकम्म कारह कारित्ता प्रहाय कयवलि० जाव सवालकारविभूसिय करेह करित्ता मणुषणं असणपाणखाइमसाइम भोयावेह भोया- वित्ता मम अतिय उवणेह, तएण कोडवियपुरिसा जाब पडिसुणेति पडिसुणित्ता जेणेव से दमगपुरिसे तेणेव उवा गच्छद्र उवागच्छित्ता तं दमग असण उवप्पलोभेति उवप्प- लोभित्ता सय गिह अणुपवेसिति अणुपवेसित्ता त खडगम- ल्लग खडगघडग च तस्स दद्मगपुरिसस्स एगते एडति, तएण से दमगे तसि खडमल्लगंसि खडघडगंसि य एगते एडिज्नमाणसि मयार सद्देण आरसइ, तएण से सागरदत्ते तस्स दमगपुरिस्त त महयार आरसियसद्द सोचा निलम्म कोडुवियपुरिसे एव वयासी-किण्ण देवाणुपिया। एस दमगपुरिसे महया महया सद्देण आरसइ ? तएण ते कोडु- वियपुरिसा एव वयासी-एस णं सामी । तसिखडमल्लगमि खडघडगसि एगते एडिजमाणसि महया महया सदेण आरसह, तएण से सागरदत्ते सत्थ० ते कोडुविवपुरिस एव वयासी-मा ण तुभे देवाणुपिया ! एयस्त दमगरस त मापकचालक मह खलु सादास्यामि गम्य गरमिग-भिपिता माना मिया मनोसा मनोमा मनोगता भविष्यनि, हिमारिता दारिक नामिनिष्ठामियाग्मि' 'समागासेह' समाचास पनि गमाभाग पीमिजयनिम्ममापनि ॥ १०॥ मूलम्-तपण से मागरदरी एग महं दमगपुरिस पासइ दडिसडनिबसणसङगमालगघटगहत्थगयं मच्छियामहस्सेहि दहामि जस्स ण तुम इहाजार मणामा मम्मिमित्ति समालिय दारिय ताहिं महाहि पनि ममामासे, मग नासित्ता पडिनिसह) वारी भित्ति के पीछे छुपा हा नागरदत्त मार्थवार मागर-के उन पचनो को सुन रहा था । सो सुनकर के स्पय यहा लजित एभा तथा दूसरोंसे भी उसे घड़ी शर्म आई इस तग स और पर से लजाना हुआ वह जिन दत्त के घर से बाहर निकल गया। और जाकर अपने घर पहुंचा। वहा पहुंच कर उसने अपनी पुत्री सुमारिका दारिमा को बुलाया -गुलाने पर जय पर आ गई तप उसे उसने अपनी गोदी में बैठा लिया पैठानेके बाद फिर उसने उमसे पूछा घेटी। मागरने तुम्हें फिस कारण से छोड़ दिया है मैं तुम्हे उसी के द्गा । कि जिम के लिये तुम अच्छी तरह इष्टा, कान्ता, मिया, मनोजा एव मनोमा होओगी, इस प्रकार उसने सुकुमारिका दारिका उन२ इष्ट वचनों द्वारा अच्छी तरह आश्वासन दिया-धैर्य धाया-और आश्वासन देकर उसे विसर्जित करदिया सू०१० मुक्का ' अह ण तुम तस्स दाहामि जस्सण तुम इट्टा जाा मणामा भविस्ससित्ति समालिय दारिय ताहिं इटाहिं वन्यूहि समासासेइ, समासासित्ता पडिविसज्जेइ) ત્યા જ ભીંતની પાછળ છુપાઈને માગરદન સાર્થવાહ સાગરની તે બધી વાતને સાભળી રહ્યો હતે સાંભળી તે બહુજ લજિજત થયે તેમજ બીજા એથી પણ તે ખૂબ જ લજિત થયે આ રીતે “જાતે” અને બીજાઓથી લજાતે તે જિનદત્તના ઘેરથી બહાર નીકળી ગયો અને નીકળીને પિતાને ઘેર પહેર્યો ત્યાં જઈને તેણે પિતાની પુત્રી સુકુમારિક દારિકાને બોલાવી જ્યારે તે સુક્રમારિકા દારિકા આવી ગઈ ત્યારે તેને પિતાના મેળામાં બેસાડી લીધી બેસાડીને તેણે તેને પૂછ્યું કે બેટી ! શા કારણથી સાગરે તને ત્યજી છે? તને તે પુરુષને જ આપીશ કે જેના માટે તુ સારી રીતે ઈટા, કાતા પ્રિયા, મનેઝા અને મનમાં થશે આ રીતે તેણે સુકુમાર દારિકાને પિતાના ઈષ્ટ વચ નથી સારી રીતે આશ્વાસન આપ્યું અને ત્યાર પછી તેને વિદાય આપી न 10॥
अनगारधर्मामृतवपिणी टी० अ० १६ सुकुमारिकाचरितवर्णनम् जाव अन्निजमाणमग्गं, तएण से सागरदत्ते कोडवियपुरिसे सहावेइ सदावित्ता एव दयासी--तुम्भ णं देवाणुप्पिया । एवं दमगपुरिस विउलेण जमणपाणखाइमसाइस पलोभेहि पलोभित्ता गिह अणुप्पवेमेह अणुप्पवेसित्ता खडगमल्लग खडघडग ते एगते एडेह एडित्ता अलकारियकम्म कारह कारिता पहाय कयवलि० जाव सव्वालकारविभृसिय करेह करित्ता मणुषणं असणपाणखाइमसाइम भोयावेह भोया- वित्ता मम अतिय उवणेह, तएण कोडुवियपुरिसा जाब पडिसुणेति पडिसुणित्ता जेणेव से दमगपुरिसे तेणेव उवा गच्छद उवागच्छित्ता त दमग असण उवप्पलोभेति उवप्प- लोभित्ता सय गिह अणुपवेसिति अणुपवेसित्ता त खडगम- ल्लग खडगघडग च तस्स दमगपुरिसस्स एगते एडति, तएण से दमगे तसि खडमल्लगंसि खडघडगंसि य एगते एडिज्जमाणसि मयार सद्देण आरसइ, तएण से सागरदत्ते तस्स दमगपुरिरास्त तं महयार आरसियसद्द सोचा निलम्म कोडुबियपुरिसे एव वयासी-किण्णं देवाणुप्पिया। एस दमगपुरिसे महया महया सदेण आरसइ ? तएणं ते कोडु- वियपुरिसा एव वयासी-एस ण सामी । तसिखडमल्लगम्मि खंडघडगसि एगते एडिजमाणसि महया महया सदेण आरसइ, तएण से सागरदत्ते सत्थ० ते कोडुवियपुरिस एव वयासी-मा ण तुम्भे देवाणुपिया ! एयस्स दमगस्स त ।
संड जाव एडेड पासे ठप जहाणं पत्तिय भवा, ते पि तहेर ठविति. ताणं ते फोटुबियपुरिसा तस्स दमगरस अलंकाश्विरम्म करेंति करित्ता सयपागसासापागेहि तिलहि अब्भगेति अभंगिग समाणे सुरमिगधुव्यदृणेणं गाय उन्ध- हिति२ उसिणोदगेणं गादगेण सीतोदगेण पहाणेति पम्हल सुकुमाल गंधकासाइयाए । गागराइ लूहति लूहित्ता हमल- क्खणं पट्टसाडगं परिहति परिहित्ता सवालकारविभूसियं करेंति करिता विउल असणपाणखाइमसाइमं भोयाति भोयावित्ता सागरदत्तस्स उवणेति, तएण पागरदते सूमा- लिय दारिय पहाय जाव सव्वालकारविभूसियं करिता त दमगपुरिस एव वयासी-देवाणुप्पिया। मम धूया इट्टा एय णं अह तव भारियत्ताए दलामि भद्दियाए भद्दओ भवि- जासि, तएण से दमगपुरिसे सागरदतस्स एयमह पडिसु- *ति पडिसुणिता सूमालियाए दारियाए सद्धिं वासघर अणुपविसइ अणुपविसित्ता सूमालियाए दारियाए सद्धि तलिमलि निवज्जइ, तएण से दमगपुरिसे सूमालियाए इम एयारूव अगफास पडिसवेदेइ, सेसं जहा सागरस्स जाव सयणिजाओ अब्भुट्टेइ अब्भुट्टित्ता वासघराओ निग्गच्छइ निग्गच्छित्ता खंडमल्लग खडघडगं च गहाय मारामुक्के विव काए जामेव दिस पाउन्भूए तामेव दिस पडिगए, तएण सा सूमालिया जाव गएणं से दमगपुरिसे त्तिक? ओहय- मण जाव झियाइ ॥ सू० ११ ॥ , . अनगारधर्मामृतावणी टी० म० १६ सुकुमारिफाचरितवर्णनम् टीका-'तरण से ' इत्यादि । ततस्तदनन्तर खलु स सागरदत्त सार्थमा होऽन्यदा-अन्यस्मिन् कस्मिश्चित् काले 'उपि आगासतलगसि' उपरि आमा- शवल्के भासादोपरिभागे , सुहनिसणे ' सुखेनोपविष्ट', राजमार्गमरलोकमानः २ तिष्ठति । तत खलु स सागरदत्त एक महान्त ' दमगपुरिस' द्रमनपुरुष दमग' इति देशीयः शब्दः दरिद्रपुरुप पश्यति, किम्भूतम् ? इत्याह-'दडिखंड निवसण' दण्डिग्यण्डनिवसनन्दण्डि-कृतसन्धान जीर्णवस्त्र तस्य खण्ड तदेव निव सन परिधानवस्त्र यस्य स दण्डिखण्डनिवसनस्तम्, वया-, खडमल्लग घडगहत्थगय खण्डमल्लघटकहस्तगत= खण्डमल्लम-खण्डशराब स्कुटितशराव भिक्षापात्र, तथा खण्डघटकच-खण्डरूपो घट' स्कुटितस्य घटस्य भागः स एव जल्पात्र, एतद् द्वय हस्तगत यस्य तम्, 'मच्छियामहस्सेहिं जाव अन्निज्जमाणमग्ग' मक्षिकास इस वित् अन्वीयमानमार्ग, शरीरवस्त्रादेर्मलिनत्वात् तत्पृष्ठतो मक्षिका आप 'तएण से सागरदत्ते' इत्यादि । टीकार्य-(तएण से सागरदत्त)इसके बाद सागरदत्तने किसी एक समय " उप्पि आगालतलगसिं" अपने प्रासाद के ऊपर सुख पूर्वक बैठी हुई स्थिति में राजमार्ग का अवलोकन करते समय ( एग मह दमगपुरिस पासह ) एक अत्यत दरिद्र पुरूप को देखा ( दडिखडनिवसण खंडगम ल्लगघडगहत्यगय मच्छियासहस्सेहिं जाव अनिज्जमाणमग्ग) जो जीर्णवस्त्र के जुड़े हुए चिथडे को पहिने था और जिसके हाथ में खड- मल्लकथा-फुटा हुआ मिट्टि के खप्पर था - तथा पानी पीने के लिये फुटे हुए घट का एक खप्पर या । हजारो मक्खिया जिसके पीछे पीछे, शरीर और वस्त्रो के मलिन होने से भिन्न २ करती हुई उड़ रही तएण से सागरदत्ते' इत्यादि । 10-(तएण मे सागरदत्ते) त्या२ मा साग२६ मे मत (उपि आगा सतलगसिं) पाताना भडसनी ५२ सुमेथी मेसीन भागनु मोइन:रता तो त्यारे ते (एग मह दमगपुरिस पासइ) 25 ५४ Pि-3011-Y५ने यो (दडिखडनिवसण खडगमल्लगाडगहत्यगय मन्च्यिासहस्सेहिं जाव अनिज्जमा- णमग ) ते ना वरना थीथा। परेता હતા અને તેના હાથમા ખ ડમલ્લક હતુ ” એટલે કે ફુટી ગયેલા માટીના વાસણુને એક કકડે હતે. તેમજ પાણી પીવા માટે કુટેલી માટલીનું એક ખપ્પર હતુ હજારો માખીઓ તેની પાછળ પાછળ-શરીર અને વસ્ત્રોની ભલીનતાને લીધે ઉડી રહી હતી, - - २२० আমাখা तन्तीत्यर्थः । ततः ग ग गागरदा मामिरपाल गन्यति, गदागिता मादीत् हे देशानुमियाः ! य ग गा मा पुगनपुगा, पिपुलेन अन्न नपानसाधवान मलोगयत मलोप गृहमनमोगा, अनुप्रोग्य बरकमला खण्डगराव खडटक-मानीयपान से' सम्पदामापुरपस्य एकान्ते-एकान्त स्थाने । एदेह । निक्षेपयत, निक्षप्प मनसारिकफर्म = कैशनसरोदनादिक नापितादिमिः पारयत, यायित्वा स्नात उतररियर्माण यापन् सालङ्कार- थी । (तए ण से सागरदत्ते कोदपियरिस सदानेह, महावित्ता एवं वयासी-तुम्भे ण देणुप्पिया! य दमगपुरिम रिउलेण अमणपाण- सोहम साइम पलोमेह, पलोभित्ता गिह अणुपयेसेट, अणुपवेसित्ता खडगमल्लग ग्वडघटगत गते पढेर पहिता अंकारिकम्म कारेह कारिता हाय करायलि० जाय मन्चालकारविभूसिर करेस करित्ता मणु पण असणपाणपाहममाइम भोयाचेह, मोयोवित्ता मम अतियउवणेह) इसके पाद सागरदत्तने आजाकारी पुरुषों को बुलाया। चुलाकर उसने इस प्रकार कहा देवानुप्रियो। तुम लोग इस दरिद्र पुरुपको पिपुल अशन, पान,खाद्य और स्वायरूप चतुर्विध आहारका प्रलोभन दो-प्रलोभन देकर फिर इसे घर में भीतर फरलो । जन यर घरके भीतर हो जावेगा तब तुमलोग इसके ये खडमल्ल (फटी लगोटी ) और खडघटक इससे छुड़ा कर किसी एकान्त-सुरक्षित स्थान में रखयो । बाद में नापित (नाई ) को बुलाकर इसके सुन्दर ढग से पाल घनवाओ नखआदि जो वढ़ रहे (तएण से सागरदत्ते कोड्डवियपुरिसे सद्दावेइ, सदायित्ता एर वयासी-तुम्भेण देवा नुप्पिया! एय दमगपुरिस विउलेण असणपाणखाइमसाइम पलोभेइ,पलोभित्ता गिह अनुप्पवेसेह, अणुप्पवेसित्ता खडगमल्ल्ग खड धडगत एग ते एढेह, एडित्ताअल कारिकम्म कारेह कारित्ताण्हाय कयालिजाब सव्वालकारविभूसिय करेह करित्ता मणुण्ण असणपाणखाइमसाइम भोयावेह, भोयावित्ता मम अतिय उवणेह) ત્યારપછી સાગરદત્ત આજ્ઞાકારી પુરૂષને બોલાવ્યા માલાવીને તેમને આ પ્રમાણે કહ્યું- હે દેવાનુપ્રિયે ! તમે લેકે આ દરિદ્ર પુરૂષને પુષ્કળ પ્રમા ણમા અશન,પાન, ખાદ્ય અને સ્વાદ્ય રૂપ ચાર જાતના આહારની લાલચ આપ લાલચ આપીને તેને ઘરની અંદર બોલાવી લે ત્યારે તે ઘરમાં આવી જાય ત્યારે તમે તેની પાસેના ખડમલ અને ખડઘટક લઈને તેને એકાત સુરક્ષિત સ્થાનમાં મૂકી દો. ત્યારપછી હજામને બોલાવીને તેના સરસ રીતે વાળ કપાવી નાખે અને વધી ગયેલા નખ વગેરેને કપાવી નાખે તેને સ્નાન . ત્યા? - अनंगारधर्मामृतपिंणी टीका अ० १६ सुकुमारिकाचरितवर्णनम २२१ विभूपित कुरुत कृत्वा ' मणुण्ण ' मनोज-रुचिरम् अशनपानखाद्यस्वाध भोजयत भोजयित्वा ममान्तिक-समीपमुपनयत । ततः खलु कौटुम्पिकपुरुषा यावत्-प्रति- शृण्वन्ति= तयाऽस्तु ' इति कृत्वा तदाज्ञा स्वीकुर्वन्ति मतिश्रुत्य यौव स द्रमकपु रुपा गपुरुषः, तत्रोपागच्छति, उपागत्य त द्रमा रुचिरेण विपुलेनाशनादिना मलोभयन्ति मलोभ्य स्पफ गृहमनुप्रवेगयन्ति, अनुप्रवेश्य त खण्डकमलक खण्डक- घटक च तस्य द्रमापुरुपस्पैकान्ते ' एडति' निक्षेपयन्ति, तत खल्लु स दमक तस्मिन् खण्डमल्लके खण्ड पटके व एकान्ते ।' एडिज्जमाणसि' निक्षेप्यमाणे सति महता २ शब्देन 'आरसइ' आक्रन्दति । ततः खलु स सागरदत्तस्तस्य द्रमापुरुपस्व त महान्त 'आरसियइ सद्द 'आफन्दनशन्द श्रुत्वा निशम्य कौटु हैं उन्हें कटवाओ । उमके पश्चात् इसे स्नान कराओ। बाद मे इससे पशु पक्षी आदिको अनादिका भागरूप पलिकर्म आदिकरवाओ-जब यह पलिकर्म आदिकर चुके तर तुमलोग इसे समस्त अलकारो से विभूषित करो, विभूपित करके फिर इसे मनोज्ञ अशन, पान, खाद्य, एव स्वाद्यरूप चतुर्विध आहार खिलाओ-खिलाकर के बाद में फिर हमारे पास इसे ले आओ। (तएण कोड बियपुरिसा जाव पडि- सुणेति, पडिसुणित्ता, जेणेव से दमगपुरिसे तेणेव उवागच्छड, उवाग छित्ता त दमग असण उवप्पलोभति, उपप्पलोभित्ता सय गिह अणुपवेसिति अणुपचिसित्ता, त खडमल्लग खडगघडग च तस्स दम- गपुरिसस्स एगते एउंति, तएण से दमगे तसि खडमल्लगसि, खड धटगसि य एगते एडिजमाणसि मया २ सद्देणं आरसइ, तएण से सागरदत्ते तस्स दमगपुरिसस्म त मया२ आरमियसह सोच्चो કરા સ્નાન કરાવ્યા બાદ તેના હાથેથી પશુ-પક્ષી વગેરેને અન્ન વગેરેને ભાગ આપવા રૂપ બલિકર્મ કરાવડાવે જ્યારે બલિકની વિધિ પતી જાય ત્યારે તમે લેકે એને બધી જાતના અલકારોથી શણગારે શણગારીને તેને भनाश, सशन, पान, माध સ્વાદ્ય રૂપ ચાર જાતના આહારે જમાડો જમાડયા પછી તેને અમારી પાસે લઈ આવો (तएण कोडुपियपुरिसा जार पडिसुति, पडिसुणित्ता जेणेन से दमग- पुरिसे तेणेव आगच्छद यागनित्ता त दमग असण उपप्पलो ते उबप्पलो- भित्ता सयांगह जणुपवेसिति, अणुपविसिचा, त खडगमल्लग खडगधडग च तस्स दमगपुरिसस्स एगते एडेति तरण से दगगे ससि खउमल्लगसि, खडघड- गसि य एगते एडिज्नमाणसि महया २ सहेण भारराइ, तप से सागरदत्ते तस्स दमगपुरिसस त महयार आरसिय सद सोमानिसम्म कोवियरिसे एच वयासी) - २२० भागाधर्मकपा तन्तीत्यर्थः । तत पट म मागग्दा गामापा शपति, गदापिसा एमपादीत के देगापिगाः ! ग ग गा माप मापुगग पिपुलेन अश नपानवास्थान प्रयोगया प्रलो- हमनुमोगा, अनुप्रोग्य यंरकमला खण्डगराव खण्डघटक यानीयपान से' तम्प मापुरुषस्य मान्ने एकात स्थाने ' एदेह । निश्पयत, निक्षेप्य मलकासिम - केशनसरोदनादिक नापितादिमिः काग्यत, यायिया स्नात हतालियर्माण यावन् सलिधार- थी। (तण मे सागरदत्ते फोटुपियपुरिसे महाड, मागवित्ता एव वयासी-तुम्भे ण देवाणुपिया! पय दमगपुरिम विउलेणं अमणपाण सोहम साइम पलोमेठ, पलोभित्ता गिह अणुपसेर, अणुपवेमित्ता खडगमल्लग पडघदगत गते ण्डेर हित्ता अलकारिकम्म कारेह कारित्ता हाय कययलि० जाय मन्चलकारविभूसिय करेत करिसा मणु पण असणपाणपाइमसाइम भोयावेट, भोयोपित्ता मम अनियउवणेह) इसके याद सागरदत्तने आजाकारी पुरुपों को बुलाया। बुलाकर उसने इस प्रकार कहा देवानुप्रियो। तुम लोग इस दरिद्र पुरुपको विपुल अशन, पान,खाद्य और स्वाद्यरूप चतुर्विध आहारका प्रलोभन दो-प्रलोभन देकर फिर इसे घर में भीतर फरलो । जब यह घरके भीतर हो जावेगा तष तुमलोग इसके ये खडमल्ल (फटी लगोटी ) और खडघटक इससे छुड़ा कर फिमी एकान्त-सुरक्षित स्थान में रखो। बाद में नापित (नाई ) को बुलाकर इसके सुन्दर ढग से याल घनवाओ नखआदि जो वढ़ रहे (तएण से सागरदत्ते कोडुपियपुरिसे सद्दायेइ, सदायित्ता एप वयासी-तुम्भेण देवा नुप्पिया! एय दमगरिस विउलेण असणपागखाइमसाइम पलोभेइ,पलोभित्ता गिइ अनुप्पवेसेह, अणुप्पवेसित्ता खडगमल्लगखड धडगत एग ते एडेह, एडित्ताअल कारिकम्म कारेह कारिताण्हाय कयालिजाव सबालकारविभूसिय करेह करिता मणुण्ण असणपाणखाइमसाइम भोयावेह, भोयारित्ता मम अतिय उवणेह) ત્યારપછી સાગરદત્ત આજ્ઞાકારી પુરૂષોને બોલાવ્યા બોલાવીને તેમને આ પ્રમાણે કહ્યું–કે હે દેવાનુપ્રિયે ! તમે લેકે આ દરિદ્ર પુરૂષને પુષ્કળ પ્રમા ણમા અશન,પાન, ખાદ્ય અને સ્વાદ્ય રૂપ ચાર જાતના આહારની લાલચ આપ લાલચ આપીને તેને ઘરની અંદર બોલાવી લે ત્યારે તે ઘરમાં આવી જાય ત્યારે તમે તેની પાસેના ખડમલ્લ અને ખડઘટક લઈને તેને એકાત સુરક્ષિત સ્થાનમાં મૂકી દે ત્યારપછી હજામને બોલાવીને તેના સરસ રીતે વાળ કપાવી નાખે અને વધી ગયેલા નખ વગેરેને કપાવી નાખે ત્યારપછી તેને સ્નાન - अनगारधर्मामृतपिणी टीका अ० १६ सुकुमारिकाचरितवर्णनम् २२१ विभूपित कुरुत कृत्वा ' मगुण्ण ' मनोज-रुचिरम् अशनपानखायस्वाध भोजयत भोजयित्वा ममान्तिक-समीपमुपनयत । ततः खलु कौटुम्पिकपुरुपा यावत्-' -मति- शृण्वन्ति=' तथाऽस्तु ' इति कृत्वा तदाज्ञा स्त्रीकुर्वन्ति प्रतिश्रुत्य यत्रैव स द्रमकपु रुपा रङ्कपुरुषः, तत्रैवोपागच्छति, उपागत्य त द्रमा रुचिरेण विपुलेनाशनादिना पलोभयन्ति प्रलोभ्य स्वक गृहमनुप्रवेशयन्ति, अनुमवेश्य त खण्डकमलक खण्डक- घटक च तस्य द्रमकपुरुपस्यैकान्ते ' एडति ' निक्षेपयन्ति, तत खलु स द्रमक- सस्मिन् खण्डमल्लके खण्ड चटके च एकान्ते । 'एडिज्जमाणसि' निक्षेप्यमाणे सति महता २ शब्देन 'आरसइ' आक्रन्दति । ततः खलु स सागरदत्तस्तस्य द्रमपुरुषस्व त महान्त 'आरसियइ सद्द ' आक्रन्दनशन्द श्रुत्वा निगम्य कौटु- हैं उन्हें कटवाओ । उसके प्रश्चात् इसे स्नान कराओ। बाद मे इससे पशु पक्षी आदिको अनादिका भागरूप बलिकर्म आदिकरवाओ-जब यह पलिकर्म आदिकर चुके तब तुमलोग इसे समस्त अलंकारो से विभूषित करो, विभूपित करके फिर इसे मनोज अशन, पान, खाद्य, एव स्वाद्यरूप चतुर्विध आहार खिलाओ-ग्विलाकर के बाद में फिर हमारे पास इसे ले आओ। (तएण कोटुनियपुरिसा जाव पडि- सुणेति, पडिसुणित्ता, जेणेव से दमगपुरिसे तेणेव उवागच्छइ, उवाग चित्ता त दमगं असण उवप्पलोभेति, उवप्पलोभित्ता सयं गि अणुपवेसिति अणुपविसित्ता, त खडमल्लग खडगघडग च तस्स दम- गपुरिसस्स एगते एडेंति, तराण से दमगे तसि खडमर लगसि, खड धटगसि य एगते एडिजमाणसि मया २ सद्देणं आरसइ, तएण से सागरदन्ते तस्स दमगपुरिसस्स त मह्या२ आरमियसद सोच्ची કરાવે સ્નાન કરાવ્યા બાદ તેના હાથેથી પશુ-પક્ષી વગેરેને અન વગેરેને ભાગ આપવા રૂપ બલિકર્મ કરાવડાવે જ્યારે બલિકર્મની વિધિ પતી જાય ત્યારે તમે લોકે એને બધી જાતના અલ કારોથી શણગારે શણગારીને તેને મનેશ, અાન, પાન, ખાદ્ય અને સ્વાદ્ય રૂપ ચાર જાતના આહારે જમાડો જમાડયા પછી તેને અમારી પાસે લઈ આવે (तएण कोडवियपुरिसा जाव पडिसुणेति, पडिसुणित्ता जेणेन से दमग- पुरिसे तेणेव उवागच्छद उवागच्छित्ता त दमग असण उचप्पलो ते उपप्पलो- भित्ता सयागेह अणुपवेसिति, अणुपविसित्ता, त खडगमल्लग खडगधडग च तस्स दमगपुरिसस्स एगते एडेंति तएण से दमगे तसि खडमल्लगसि, खडपड- गसि य एगते एडिज्नमाणसि महया २ सद्देण आरसइ, तएण से सागरदत्ते तस्स दमगपुरिसस्म त मइयार आरसिय सद्द सोचा निसम्म कोइवियपुरिसे एव वयासी) १६ মাথা धिकपुरपाने रमादीन-६ वेगनुमिया: 'fन यारणेन ग्यलु पय द्रमा पुग्यो महता २ देन भारसगिम्भारदति ? मग ते पौम्बिामगान मदन-एप खलु दे रवामिन ! तरिमानदपक गटांमान्ने निक्षय- माणे महता भन्देन आरमनिम्मानन्दीतः गलुग मागग्दनः सार्थवार स्तान् कौटुम्पिकपुरुषान् एवमत्राटोन- देशानुप्रिया. ! मा सलु युग पतस्य निसम्म कोरियपुरिसे व घगामी) मम प्रकार को उन कोटुम्पिक ने सागरदत्त सेट की इस आशा फो अनछी सरा स्वीकार लिया और स्वीकार कर या जाकर उनाने उम दमक को अमान पान आदिरूप चतुर्विध आहार से पार २ लुमाया लुमाकर ने उसे अपने घर तक ले आये और अंत में अपने घर में उसे प्रारापा। बाद में उन लोगोंने उस दमक पुरुप के फटे हुए मिट्टी के दीपक के बड को, तथा झूटे हुए घटे के सप्पर को उससे लेकर किसी सुरक्षित स्थान में रख दिया। जब उस दमकपुरुपो अपने सडमल्लक फटी लगोटी) को और खडघटकको अपने से लेकर एकान्त स्थानमें रखा जाता हुआ देखा-तो यह जोर जोरसे रोने लगा-उसके उस रोनेकी आमाजको सुनकर और उसे अपने चित्त में धारण कर सागरदत्तने कौटुम्पिक पुरुपो से इस प्रकार कहा-(किण्ण देवाणुप्पियो ! एमदनगपुरिसे मया २ सदेणं आरसह ३ तण ते कौड चियपुरिसा ण्व बयासी एसण सामी ! तसिं खडमल्लगसि खडबडगसि एगते एडिब्जमाणसि मया २ सद्देण જાતની સાગરદત્તની આજ્ઞાને તે કૌટુંબિક પુરૂએ સારી રીતે સ્વીકારી લીધી સ્વીકાર્યા બાદ તેઓ દૃદ્ધિ માણસની પાસે ગયા ત્યાં જઈને તેમણે તેને બોલાવ્યો અને અશન, પાન વગેરે રૂપ ચાર જાતના આહારની વાર વાર લાલચ આપી લલચાવીને તેઓ તેને ઘર સુધી લઈ આવ્યા અને છેવટે તેને ઘરમાં દાખલ કરી દીધું ત્યારપછી તે લેકેએ તે દરિદ્ર માણસની પાસેથી ફૂટેલા માટીના વાસણને કટક તેમજ ફૂટેલા માટલાના ખપ્પરને લઈને સુરક્ષિત સ્થાને મૂકી દીધું. જ્યારે તે દરિદ્ર માણસે પિતાના ખડમલકને અને ખેડઘટકને પોતાની પાસેથી છીનવીને એકાત રામા મૂક્તા જોયુ ત્યારે તે મેટેથી ઘાટા પાડીને રડવા લાગ્યા તેના રડવાના અવાજને સાભળીને અને તેને પોતાના ચિત્તમાં ધારણ કરીને સાગરને કૌટુંબિક પુરૂષોને આ પ્રમાણે કહ્યું (किण्ण देवाणुप्पिया ! एस दमगपुरिसे महया २ सदेण आरसइ, तएण ते कोड वियपुरिसा एव वयासी एसग सामी तसि खडमल्लगसि खडघडगसि एगते एडिज्जमाणसि महया २ सदेण आरसर, तरण से मा २२३ . मनापारधर्मामृतषिणी टीका अ०१६ सुकुमारिकाचरितवर्णनम् द्रमकपुरुषस्य तत् ग्वण्डमल्लक ग्वण्डघटक यावत्-एकान्ते 'एडेड ' निक्षेपयत अस्य परोक्षे मा स्थापयतेत्यर्थ , स्न्तुि पाश्चे स्थापयत, यथा खलु ' पत्तिय ' प्रत्ययः- विश्वामो भवति । तेऽपि कोटम्पिकपुरुपास्तथैव स्थापयन्ति । तत खलु ते कौटु- आरसह, तरुण से सागरदत्त सत्यवाहे ते कोडुपिय पुरिसे ण्व वयासी) हे देवानुभियो! क्या कारण है जो यह दसन पुरूप जोर २ से रो रहा है ? तर उन कौटुम्पिक पुरुषों ने ऐसा कहा कि हे स्वामिन् ! इसने ज्योही अपने खडमल्लक को और घटखड को लेकर एक ओर सुरक्षित स्थान में रखे जाते हुए देग्या वैसे ही यह बडे जोरर से रोने लगा है। ऐसा सुनकर मागरदत्त ने उन कौटुम्पिक पुरुषो से इस प्रकार कता- (माण तुम्भे देवाणुप्पिया ! एरस्त दमगस्म त पट जाव ण्डेह, पासे ठवेह, जाण पत्तिय भवइ, तेवि तहेब ठवेति, तण्ण ते कोड विय पुरिसा तस्स दमगसा अलकारियकम्म करेनि, करिता सपोग सहस्सपागेहिं तिल्लेहि अ०भनेति, अमगिए समाणे सुरभिगधुव्य- दृणेण गाय उध्वहिति, २ उरिणोदगेण गधोद्गेण सीतोदगेण व्हावेति) हे देवानुप्रियो ! तुम लोग इस दमक पुरुप के फूटे हुए मिट्टी के दीपक के खड फो और फूटे हुए घडे के खप्पर को इससे लेकर परोक्ष में- अदृश्य स्थान में-मत रखो किन्तु इस के पास में ही-समक्षरखो, जिससे इसे अपनाविश्वास बना रहे । इस प्रकार सागरदत्त की बात कोड पिय पुरिसे एव एव वयासी) હે દેવાનુપ્રિયે ! શા કારણથી આ દરિદ્ર માણસ મેટેથી ઘાટા પાડી પાડીને રડી રહ્યો છે? ત્યારે તે કૌટુંબિક પુરૂએ આ પ્રમાણે કહ્યું કે હું વામિન ! પિતાના ખડમલ્લક અને ખ ઘટકને તેની પાસેથી લઇને બીજા સુરક્ષિત સ્થાને લઈ જતા જોઈને આ દરિદ્ર માણસ મોટેથી રડવા લાગે છે આ પ્રમાણે સાભળીને સાગરદસ્ત કૌટુંબિક પુરૂને આ પ્રમાણે કહ્યું કે- (माण तुम्भे देवाणुप्पिया ! एयस्स दमगस्स त खड जार एडेह पासे उबेह, जहाण पत्तिय भवइ, ते वि तदेव ठवेंति, तएण ते कोडु पियपुरिसा तस्स दमगस्म अलकारियफम्म करेंति, करित्ता सयपागसहस्मपागेहिं तिल्लेहि अ०भर्गति अन्भगिए समाणे सुरभिगधुन्चट्टणेण गाय उच्चहिनि २ उसिं णोदगेण गधोदगेण सीतोदगेण ण्डावेंति ) હે દેવાનુપ્રિયે ! તમે લોકે આ દરિદ્ર પુરૂષના ફૂટેલા માટીના દીપકના કટકાને અને કૂટેલા ઘડાના ખપ્પરને એની પાસેથી લઈને દૂર એકાતમાં મૂકશે નહિ પણ એની પાસે જએની સામે જ મૂકી છે જેથી એને વિશ્વાસ રહે - 13-14 सामया निकपुरपाने मराठीत देशानुप्रिया पारर्णन गड पग मापुमो महता २ शब्देन भारराति भारति ? 1 ने कोम्बिापुरता म मरदन्-आप खलु देसामिा! तरिमा दगडटते निशेष्य- माणे महता २ शब्देन भाररातिप्रान्दति । तागलु गागागादत्त मार्यवार स्तान् कौडम्पिय पुरुषान् मयान-शानुप्रिया ! गा सल गुग पतरस निसम्म कोरियपुरिसे पर घगामी ) म प्रकार को उन कोटुम्पिक ने सागरदत्त सेठ की हम आजा को अमली तर स्वीकार लिया और स्वीकार कर वहा जाकर उन्होंने उस दमक को अशन पान आदिरूप चतुर्विध आतार से पार २ तुमाया लुमाकर वे उसे अपने घर तक ले आये और अत में अपने घर में उसे प्रवेश कराया। पाद में उन लोगोंने उस दमक पुम्प के फटे हुए मिट्टी के दीपक के पड को, तथा फूटे हुए घटे के सप्पर को उससे लेकर किसी सुरक्षित स्थान में रख दिया। जब उस दमकपुम्पने अपने सहमत्लफ.फटी लगोटी) को और खडघटकको अपने से लेकर एकान्त स्थानमें रखा जाता हुआ देखा-तो वर जोर जोरसे रोने लगा-उसके उस रोने की आवाजको सुनकर और उसे अपने चित्त में धारण कर सागरदत्तने कौटुम्पिक पुम्पो से इस प्रकार कहा-(किण्ण देवाणुप्पिया ! एसदमगपुरिसे मया २ सद्देण आग्सइ ३ तएण ते कौड पियपुरिसा एव वयासो एसण सामी ! तसिं खडमरलगसि खडबडगसि एगते एडिज्जमाणसि महया २ सद्देण જાતની સાગરદત્તની આજ્ઞાને તે કૌટુંબિક પુરૂએ સારી રીતે સ્વીકારી લીધી સ્વીકાર્યા બાદ તેઓ દરિદ્ર માણસની પાસે ગયા ત્યાં જઈને તેમણે તેને બોલાવ્યું અને અશન, પાન વગેરે રૂપ ચાર જાતના આહારની વાર વાર લાલચ આપી લલચાવીને તેઓ તેને ઘર સુધી લઈ આવ્યા અને છેવટે તેને ઘરમાં દાખલ કરી દીધો ત્યારપછી તે લોકોએ તે દરિદ્ર માણસની પાસેથી ફૂટેલા માટીના વાસણને કટકે તેમજ ફૂટેલા માટલાના ખપ્પરને લઈને સુરક્ષિત સ્થાને મૂકી દીધું જ્યારે તે દરિદ્ર માણસે પિતાના ખડમતકને અને ખડઘટકને પિતાની પાસેથી છીનવીને એના સ્થાનમાં મૃતા જોયું ત્યારે તે ભેટેથી ઘાટા પાડીને રડવા લાગ્યું તેના રડવાના અવાજને સાંભળીને અને તેને પિતાના ચિત્તમાં ધારણ કરીને સાગરદને કૌટુંબિક પુરૂને આ પ્રમાણે કહ્યું (किण्ण देवाणुप्पिया ! एस दमगपुरिसे महया २ सहेण आरसइ, तएण ते कोड पियपुरिसा एव वयासी एसण सामी ' तसि खडमल्लगसि खडघडगसि एगते एडिज्जमाणसि महया २ सद्देण आरसइ, तएण से सागरदत्ते सत्यवाहे ते ! भनगारधर्मामृतपरिणी टोका अ० १६ सुकुमारिकाचरितवर्णनम् रुक्षयित्वा 'हंसल्करण ' इसलक्षण = हसस्वरूप तदिव शुक्ल स्वरूप यस्य तत् । पसाडग' पदृशाटर क्षोमवस्त्र परिहेति' परिधापयन्ति परिधाप्य सर्वालंकार- विभूपित कुर्वन्ति, कृत्वा विपुलमशनपानखाद्यस्वाद्य भोजयन्ति, भोजयित्वा सागरदत्तस्योपनयन्ति । ततः खलु सागरदत्तः सुकुमारिका दारिमा स्नाता यावत्- सर्वालङ्कारभूषिता कृत्वा ते द्रमकपुरुषम् एव वक्ष्यमागमकारेण आदीत्-हे देवानुपिय ! एपा खलु मम दुहिता इष्टा, एता खलु अह तब भार्यात्वेन ददामि पट्टसाडगं परिऐति, परिहित्ता सव्वालकारविभूसियं करेंति, करिता विउल असनपाणसाइमसाइम भोयानि, भोयावित्तो सागरदत्तस्स उवणेति) जब शारीरिक प्रत्येक अवयव ठीक २ अच्छी तरह से पोंछाजा चुका-तय फिर उन्होने सि चिह्नवाला अथवा हँस के जैसा शुभ्रपदृशाटक-क्षौमवत्र उसको पहिराया। क्षौमवस्त्र पहिराकर फिर उसको विपुल, अशन, पान, खाद्य एव स्वाद्यरूप चतुर्विध आहार का भोजन कराया। भोजन कराकर फिर वे उमको सागरदत्त के पास ले गये (तएण सागरदत्त मृमालिय दारिय हाय जाव सव्यालकार विभू सिय करित्ता त दमगपुरिस एव वयासी-एसण देवाणुप्पिया! मम धूया दहा एय ण जह तव भारियत्साए दलामि) सागरदत्त ने अपनी सुकुमारिका दारिका को स्नान कराकर यावत् समस्त अल कारो से विभूपित करके उम दमक पुरुप से इस प्रकार कहा-हे देवानुप्रिय यह मेरी लड़की है । और मुझे बहुत ही अधिक इष्ट, प्रिय, कान्त (लहित्ता हसरकखणपट्ट साडग परिहति, परिहित्ता सव्वालकारविभूसिय करे ति, करिता रिउल सनपाणसाइमसाटम भोयाति,भोयापित्ता,सागरदत्तस्स उवणेति) જ્યારે શરીરના બવા અને સરસ રીતે લુછાઈ ગયા ત્યારે તેઓએ હસચિત્રિત અથવા તે હગ જેવુ સ્વચ્છ ધોળું પટ્ટરાટક લૌમ વસ્ત્ર પહેરાવ્યું લીમ વસ્ત્ર પહેરાવીને તેને વિપુલ અશન, પાન, ખાદ્ય અને સ્વાદ્ય રૂપ ચાર જતના આહારે જમાડયા જમાડયા પછી તેઓ તેને સાગરદત્તની પાસે લઈ ગયા (तएण सागरदत्ते ममालिय दारिय हाय जार सध्याल कारगिभूसिय करिता त दमगपुरिस एव वयासी-एसण देवाणुप्पिया । मम धूया इट्टा एय ण अइ तब भारियत्ताए दलामि) નાગદત્ત પિતાની સુકુમારિકા દારિકાને સ્નાન કરાવીને યાવત્ બધી જતના અલકારોથી શણગારીને તે દરિદ્ર માણસને આ પ્રમાણે કહ્યું કે હે દેવાણિય ! આ મારી પુત્રી છે અને મને બહુ જ ઈટ, પ્રિય, કાત, મને २२४ मानापमान धिमपुमास्ताप गरम्परापय मारिताकानिमारपिमा मत पाक माघपस्निलगानि गर्न गति । भगतिः गा गुरभिगोद्वर्तनेन- सुगन्धिपिष्टोन गात्रानि, गोहन गोदकेन शीतोदकेन स्नपयन्ति, पमित्या 'पालगुकमागामाया' प.मरममारगर- फायिकया NEFIT,मती मद्रोमणा मा गुहमारा गया कपाण रक्ता साटी शायिका नया गालागि 'दासी' क्षति-प्रोगपति, सुन कर उन आदेशकारी पुरुषों ने पैमा ही फिग-अर्थात उसके मल्लक पद और पदमर दोनो गोही उसके ममल उनोने ग्ग दिया। इमके पाद उन कादम्पिक पुरषोंने उपदमा पुरुषका भालकारिक कर्म फरवाया । अप उनका अन्जी तरह अलकारिकफर्म निप्पन हो चुका- तर उसके बाद उम दमक पुरुष के शरीर की उन लोगों ने शतपाक और मरन पाकवाले तैल से मालिश की मालिश करने के पश्चात् , सुगन्धि पिष्टक-सुगधितपिटी-से उसके शरीर का उपटन किया उम सुगधित पिटी को उसके शरीर पर रगड़ २ कर मरा इससे जो उसके शरीर पर मल जमा हुआ या वह चिकनारट के मबन्ध से उस पिटीद्वारा निकल गया। जब उनके शरीर का उदर्तन हो चुका-तर फिर उन लोगों ने उसे उष्णोदक से गंवोदक से, एच शीतोदक से स्नान कराया। स्नान कराकर बाद में उसका शरीर (पम्हलसुकुमारगधकासाइयाए गाथाइ लहति ) पल्मल-रूऍवाली-मृदुरोमयुक्त-सुकुमार-नरम, हुई ट्वाल से-अगोडी-से-तौलिया से पोंडा । (हित्ता हसलक्षण આ રીતે સાગરદત્તની વાત સાંભળીને તે આજ્ઞાની પુરૂએ તે પ્રમાણે જ કર્યું એટલે કે તેના મલકખડ અને ઘટખડને તેની સામે જ મૂકી દીધા ત્યારપછી તે કૌટુંબિક પુરૂએ તે દરિદ્ર માણસના વાળ અને નખ કપાવ્યા જ્યારે આકામ સરસ રીતે પુરૂ થઈ ગયું ત્યારે તેઓએ દરિદ્ર માણસના શરીરને શતપાક અને સહસ્ત્રપાકવાળા તેલથી માલિશ કર્યા બાદ સુગ બિપિષ્ટ સુગંધિત પીઠી-તેના શરીરે ચોળીને ઉપટન કર્યું એથી તેના શરીર ઉ૫ર જેટલો મેલ હતું તે પીડીની સ્નિગ્ધતાને લીધે સાફ થઈ ગયે જયારે તેના શરીરે પીઠી ચળાઈ ગઈ ત્યારે તે લોકોએ તેને ગરમ પાણીથી, સુવાસિત પાણીથી અને ઠંડા પાણીથી સ્નાન કરાવ્યું સ્નાન કરાવ્યા બાદ તેના शरीरने (पम्हल सुकुमार गध कोसाइयाए गायाइ लहति ) ५६मस-३ वाटापाणी સુકમળ, નરમ ૨ગીન ટુવાલથી લૂછ્યું रंगी . सनगारधर्मामृतवपिणी टोका अ० १६ सुकुमारिकाचरितवर्णनम २२५ रूसयित्वा 'हसल्वरूण' इसलक्षण = हमस्वरूप तदिव शुक्ल स्वरूप यस्य तत् । पहसाडगं' पशाटर-सोमवस्त्र परिति' परिधापयन्ति परिधाप्य सर्यालंकार विभूपित कुर्वन्ति, कृत्वा विपुलमशनपानखाद्यस्वाद्य भोजयन्ति, भोजयित्वा सागरदत्तस्योपनयन्ति । ततः खलु सागरदत्तः सुकुमारिका दारिमा स्नाता यावत्- सर्वालङ्कारभूपिता कृत्वा त द्रमापुरुषम् एवम्वक्ष्यमाणप्रकारेण आदीत्-हे देवानुप्रिय ! एपा खलु मम दुहिता ष्टा, एता खलु अह तव भार्यात्वेन ददामि पदृसाडगं परिऐति, परिहित्ता सव्वालकारविभूसियं करेंति, करिता विउल असनपाणगाइमसाइम भोयानि, भोयावितो सागरदत्तस्स उवणेति) जय शारीरिक प्रत्येक अवयव ठीक २ अच्छी तरह से पोछाजा चुका-तब फिर उन्होने सि चिह्नवाला अथवा हँस के जैसा शुभ्रपशाटक-क्षौमवन उसको पहिराया। क्षौमवस्त्र पहिराकर फिर उमको विपुल, अशन, पान, खाद्य एव स्वाद्यरूप चतुर्विध आहार का भोजन राया। भोजन कराकर फिर वे उमको सागरदत्त के पास ले गये (तएण सागरदत्त मृमालिय दारिय पहाय जाव सचालकार विभू सिय करित्ता त दमगपुरिम एव वयासी-एसण देवाणुप्पिया! मम धूया इहो एय ण अह तव भारियत्ताए दलामि ) सागरदत्त ने अपनी सुकुमारिका दारिका को स्नान कराकर यावत् समस्त अल कारो से विभूपित करके उस दमक पुरुप से इस प्रकार कहा-हे देवानुप्रिय। यह मेरी लड़की है । और मुझे बहुत ही अधिक इष्ट, प्रिय, कान्त (सूहित्ता हसल्कवण पट्ट साडग परिहति, परिहिता,मबालकारविभूमिय करेति, करिता विउल असनपाणसाइमसाइम भोयाति,भोयाश्चिा,सागरदत्तस्स उवणेति) જ્યારે શરીરના બવા અને સરસ રીતે લુછાઈ ગયા ત્યારે તેઓએ હ સચિત્રિત અથવા તે હમ જેવું ૩૭ ધોળું પટ્ટરાટક ક્ષમ વસ્ત્ર પહેરાવ્યું લીમ વસ્ત્ર પહેરાવીને તેને વિપુલ અગન, પાન, ખાદ્ય અને સ્વાદ્ય રૂપ ચાર જતના આહારો જમાડયા જમાયા પછી તેઓ તેને સાગરદત્તની પાસે લઈ ગયા (तएणं सागरदत्ते मृमालिय दारिय ण्डाय जाच सध्यालकारविभूसिय करिता त दमगपुरिस एव चयासी-एसण देवाणुप्पिया । मम धूया इटा पय ण ा तब भारियताए दलगमि) સાગરદત્તે પિતાની સુકુમારિકા ટાનિકાને સ્નાન કરાવીને યાવત બધી જાતના અલકારોથી શણગારીને તે દરિદ્ર માણસને આ પ્રમાણે કહ્યું કે કે દેવાધિ ! આ મારી પુત્રી છે અને મને બહુ જ ઈટ, પ્રિય, કાત, મને এখাঁকা . भरियाप गहिया भागारियानामनिमदो भाग्यशाली भविष्यसि । रातः खल स इमपपुरुषः गागर गम्यतमय पविणोनिमीरगति, प्रतिश्रुत्स सुबुमारिकया दारिपणा साधं पाराग्रामनप्रतिनि, यामारिणयादासिया सार्थ 'तलिंगसि' तरये गयनीये जीजनिपीडति उपशिति । गत' गल मद्रमक पुरुष सुकुमारिवाया इम-पूर्वोक्तम् ITET स्पा अनपर्श पटिग्रेटे प्रतिसवेदयनि-प्रत्यनुगपति शेप यथा सागरस्य शेपवर्णन मागस्टार गोध्यम्, यावत्-भत्र याच्दादिद दृष्टव्यम्-अगिपत्रादीना स्पांदप्यनिष्टतर तदा स्पर्श ज्ञात्वा सागरदारपद् टमप पुपोऽपि नांगमारिया मुवमगुप्ता मात्रा, शयनीयादतिष्ठति, अभ्युत्थाय वामगृहाद निर्गति, निर्गन्य स उम्रफुटि मनोज्ञ एवं मनोम है । मैं अपनी इम पुत्री को तुम्हें तुमारी भायों के रूप में प्रदान करता हूँ (भदिया भाभो भविजमि, ताण से दमग पुरिसे सागरदत्तस्म यम पति०२ समारिया दारियाण सनि वास घर अणुपचिसइ, अणुपचिसित्ता समारियाए गगरिया महि तलिगसि निवजह ) इस भाग्यशालिनी से तुम भी भाशाली यनजाओगे। दमकपुरप ने सोगरदत्त के इस फायनरूप अर्थ को अगीकार करलिया, और फिर चर उस सुकुमारिका दारिका के साथ चासगृर में प्रविष्ट हुआ। वहा जाकर वह उस सुकुमारिका दारिका के साथ साथ एक ही पल गपर-रैठ गया-सोगया (तगण से टमगपुरिसे सूमालिया इम एयारूप अगफास पडि सवेदेड,सेम जहा सागरम जाव सयणिज्जाओ अन्मुद्देइ, अन्भहित्ता वासघराओ निग्गच्छद, निग्गचित्ता खडमल्लग અને મનોમ છે હુ મારી આ પુત્રીને તમને તમારી પત્નીના રૂપમાં આપું છું भदियाए भद्दऔ भपिज्जसि, तएण से दमगपुरिसे सागरदत्तस्स एयम पडि०२ सूमालियाए दारियाए सद्धिं वासघर अणुपविसइ, अणुपविसित्ता सुमालियाए दारियाए सद्धि तल्गिसि निपज्जइ) આ ભાગ્યશીવાથી તમે પણ ભાગ્યશાળી થઈ જશે તે દરિદ્ર પુરૂષ સાગરદત્તની એ વાતને સ્વીકારી લીધી અને ત્યારબાદ તે સુકુમારિકા દારિકાની સાથે વાસગૃહમાં પ્રવિણ થયે ત્યાં જઈને તે દરિદ્ર માણસ સુકુમારિકા દારિ કાની સાથે એક જ શમ્યા ઉપર બેસી ગયે (तएण से दमगपुरिसे सूमालियाए इम एयारूव अगफास पडिसवेदेइ, सेस जहा सागरस्म जार मयणिज्जाश्री अब्भुटेड, अभुद्वित्ता वासघराओ निग्ग छइ निग्गच्छित्ता खडमल्ल्ग वडघडग च गहाय म , , - - मनारयस्तियपिणी टी० अ० १६ सुकुमारिकाचरितवर्णनम् तमिक्षापान , खण्डवटम-स्फुटितपानीयपान च गृहीत्वा 'मारासुरके विन काए' मारामुक्तइस काका मारा-शूना प्राणिपधरपान ततो मुक्तः निःपूतः कारु इक अथवा-माराद्-मारकरुपात् तटीयहस्तादित्वर्थ. मुक्त-पिच्छुटित काम इव शीघतया यम्या एक दिशः प्रादुर्भूतस्वामेर दिश मतिगतः । ततः खलु सा सुकु मारिका याबद्-ततो मुहृत्तान्तर प्रतियुद्धा सती पतिमपश्यन्ती शयनीयादुत्तिष्ठति, उत्थाय दमकपुरूपस्य मार्गणगवेपण कुर्वाणा वामगृहस्य द्वार पिघाटित पश्यति सडपडग च गहाय मारामुर के दिन का जामेव दिस पाउन्भू तामेव दिम पडिगए) उस समय उन दमक पुरुप को उस सुकुमारिका दारिका का यह पूक्ति तथा पूक्ति स्वरूपाला अगस्पी अनुभव मे आया। शेप वर्णन सागरदारककी तरह जानना चाहिये । इस तरह यह दमक पुरुप भी अमिपत्रादिकों के स्पर्श से भी अधिक अनिष्ट उसके अग- स्पर्श को जानकरके, सागरदारक की तरह, सुग्व प्रसुप्त उस सुकुमारिका दारिका को जान उसे छोड़ने के लिये पलग से उठा और उठकर उस वास घर से पारिर निकला-निकल कर खउमर लक-फूटे एमिक्षापत्र को तया खडपट-फूटे ए पानी पीने के पात्र को-लेकर वयस्थान से अथवा मारक पुरुप के हाथ से मुक्त मुए काफकी तरह वह बहुत जल्दी जहा से आया या उसी ओर चलदिया (तरण सा सूमालिया जाय गएणं से दमगपुरिसे त्ति कटु ओयमण जाव झियायह ) इसके घोडोदेर बाद वह सुकुमारिका दारिका जगी और पतिको अपने पास न दिस पाउभूए तामे दिम पडिगए) તે વખતે તે દરિદ્ર માણસને સુકુમારિકા દારિકાના અગેને પર પહેલા વર્ણન કરવામાં આવ્યા પ્રમાણેને કઠેર જ લાગે (અહીં સાગરદારક જેવું જ વર્ણન સમજી જવું જોઈએ) આ રીતે તે દક્તિ માણસ પણ તરવારના સ્પર્શ કરતા પણ વધારે અનિષ્ટકર તેને સ્પર્શ જાણીને સાગર દારકની જેમ જ સુખેથી સૂઈ ગયેલી તે સુકુમારિકા દારિકાને જોઈને, તેને ત્યાગ કરવા માટે પલગ ઉપરથી ઊભા થયા અને ઊભે થઈને વાગગૃહની બહાર નીકળ્યો અને નીક- ળીને ખડમલકટેલા ભિક્ષાપાત્ર તેમજ ખડઘક-ફૂટેલા પાણી પીવા માટેના પાત્રને લઈને વધસ્થાનથી અથવા તે માક (હિંસક) પુરૂષના હાથથી મુક્ત થયેલા કાગડાની જેમ તે ત્વરાથી જ્યાથી તે આવ્યા હો તે તરફ જ જતો રહ્યો (तएण सामालिया जाव गएण से दमगपुरिसे चि कटु ओदमग जाब झियायइ) ઘોડા વખત પછી તે સુકુમારિકા દારિકા જાગી અને પતિને પોતાની પાસે ન જોઇને rokutte - जाताधर्मपात्र 'मदियाप गहिश्यामाग्यामिविभागो माग्यमानी मरियम | रातः खल्ल समय पुरुषः गागरात पविगोसिपीगेनि, प्रतिश्रुत्य सुरुमारिफ्या दारिषगा सा पासमान, घामारिणयादारिया सा 'वलिंगसि तत्य-गयनीय मीनिपनि उपसिनानगल सद्रमक पुरुष सुरमारिवाया इमोक्तम् UTTोक्तम्पर पम् भरपy पटिमदे' प्रतिसंवेदयति-मत्यनुमपति शेप यथा सागस्पोपपर्णन मागग्दामाद्योध्यम् , यावत्-अन यायच्दादिर ट्रपच्यम्-अमिपत्रादीनां पादपनिष्टतर तदा स्पर्श शात्या सागरदामात् द्रमय पुस्पोऽपि ता गुमारिका मुखमगुप्ता नान्ना, शयनीयादतिष्ठति, अभ्युत्थाय रामगृहाद निर्गति, निर्गत्य साटम्टाफुटि मनोज्ञ एवं मनोम है । मैं अपनी इम पुत्री को तुम्ने नुमारी भार्या के रूप में प्रदान करता हूँ (भदिया भाओ भविन्तसि, तणं से दमग पुरिसे सागरदत्तस्म ण्यम पटि०२ समारिया दारिया सद्धि वास घर अणुपरिसइ, अणुपचिसित्ता समारियाए रिया सद्धि तरिगंसि निचज्जइ ) इस भाग्यशालिनी से तुम भी भाग्यशाली पनजाओगे। दमकपुरप ने सोगरदत्त के इस कवनस्प अर्थको अगीकार करलिया, और फिर वह उस सुकुमारिका दारिका के साथ चासगृह मे प्रविष्ट हुआ। वहा जाकर वह उस सुकुमारिका दारिका के साथ साथ एक ही पल ग पर-बैठ गया-मोगया (तपणं से दमगपुरिसे सूमालियाए इम एयास्व अगफास पडि सचैदेड,सेम जहा सागररस जाव सयणिज्जाओ अम्भुट्टेइ, अन्भुट्टित्ता वासघराओ निग्गच्छइ, निग्गचित्ता खडमल्लग અને મનેમ છે હું મારી આ પુત્રીને તમને તમારી પત્નીના રૂપમાં અપું છુ भदियाए भद्दओ भविज्जसि, तएण से दमगपुरिसे सागरदत्तस्स एयमट्ट पहि० २ सूमालियाए दारियाए सद्धिं वासघर अणुपविसद, अणुपचिसित्ता मुमालियाए दारियाए सद्धि तल्गिसि निरज्जइ) આ ભાગ્યશીલાથી તમે પપુ ભાગ્યશાળી થઈ જશો તે દરિદ્ર પુરૂષ સાગરદત્તની એ વાતને સ્વીકારી લીધી અને ત્યારબાદ તે સુકુમારિકા દ્વારિકાની સાથે વાસગૃહમાં પ્રવિણ થયે ત્યાં જઈને તે દરિદ્ર માસ સુકુમારિકા દારિ કાની સાથે એક જ શય્યા ઉપર બેસી ગયે (तएण से दमगपुरिसे गमालियाए इम एयारूप अगफास पडिसवेदेइ, सेस जहा सागरस्स जार सयणिज्जानो अब्भुटे, अन्भुद्वित्ता वासघराओ निग्ग छइ निग्गच्छित्ता खडमल्लग खडघडगं च गहाय मारामुक्के, भनगारधर्मामृतपिणी टी० भ० १६ सुकुमारिकाचरितवर्णनम् तेजसा ज्वलति सूर्ये-उदिते दासवेटी शब्दयति, शब्दयित्वा एवमवादीद-यावत सागरदत्तस्यैतमय निवेदयति, अत्र यावच्छन्देन पूर्वस्त्रोक्तवर्णनमनुमन्येयम् , तथा- बधूवरयोर्मुखधावनिकामुपनयेति । एवमुक्तासती दासचेटी वासगृहमुपागत्य सुकु मारिकामार्तध्यान ध्यायन्ती पश्यति, दृष्ट्वा एवमगादीव-हे देवानुप्रिये । किं खलु त्वम् अपहतमन सकल्पा ध्यायसि ? ततः मुकुमारिका ता दासचेटीमेवमया दीत-स द्रमागुरुपो मा मुरामसुप्ता ज्ञात्वा मम पा_दुत्थार निर्गतः, ततोमुहूर्ता- न्तरेऽहमुत्थाय तमपश्यन्ती गतः स द्रमकपुरुप , इति कृत्वाऽऽत-यान ध्यायामि सद्दावेइ, सहावित्ता एव वयासी जाव सागरदत्तस्स एयम निवेदेइ) सुकुमारिका दारिकाकी माता उस भद्रा ने द्वितीय दिन जब प्रातः काल हो गया था और सूर्य उदित हो चुका या-तर अपनी दासचेटी को बुलाया-बुलाकर उससे ऐसा कहा-यहा यावत् शब्द से यह पूर्वसूत्र गत वर्णन जोड़लेना चाहिये जैसे, भद्राने बुलाकर उससे ऐसा कहा कि तू वधू और घर के लिये यह मुख धोने की सामग्री दतौन आदि -लेजा जन भद्रा ने उससे ऐसा कहा तर वह दासचेटी वासगृह में गई -और वहां जाकर उसने सुकुमारिका को आर्तध्यान करती हुई देखा तय देखकर उसने उससे ऐसा कदा-देवानुप्रिये । क्या कारण है जो अपरतमनः संकल्प होकर तुम आर्त यान कर रही हो-तप सुकुमा रिका दारिका ने उस दासचेटी से इस प्रकार कहा-वह दमक पुरुष मुझे यहा सुख प्रसुप्त जान छोडकर चला गया है । जब मै थोडी देरयाद उठी तो मैने उसे अपने पास नहीं देखा, वासभवन का द्वार खुला हुआ वित्ता, एव वयासी जाव सागरदत्तस्स एयमह निवेदेइ) सुभारिता हाशिनी भाता ભદ્રાએ બીજા દિવસે જ્યારે સવાર થઈ ગયું અને સૂર્ય ઉદય પામે ત્યારે તેણે દાસીને બેલાવી અને બેલાવીને આ પ્રમાણે કહ્યું-અહીં યાવત્ શબ્દથી પહેલાના સૂત્રની જેમ જ વર્ણન સમજી લેવું જોઈએ જેમકે ભદ્રાએ તેને બોલાવીને આ પ્રમાણે કહ્યું કે વધુ અને વરના મુખ પ્રક્ષાસન માટે દાતણ વગેરે લઈ જ જ્યારે ભદ્રાએ તેને આ પ્રમાણે કહ્યું ત્યારે તે દાસી વાસગૃહમાં ગઈ અને ત્યાં જઈને તેણે સુકુમારિકા દારિકાને આર્તધ્યાન કરતી જોઈ ત્યારે આ પ્રમાણે તેની હાલત જોઈને તેણે કહ્યું કે હે દેવાનુપ્રિયે ! શા કારણથી તમે અપહતમન સકલ્પ થઈને આધ્યાન કરી રહ્યા છે ત્યારે સુકુમાર દારિકાએ તે દામીને આ પ્રમાણે કહ્યું–કે તે દરિદ્ર માણસ મને અહીં સુખેથી સૂતેલી છેડીને જતો રહ્યો છે ત્યારે થોડા વખત પછી હુ જાગી ત્યારે મેં તેને મારી પાસે જ નહિ અને એ વાસગૃહના બારણાને પણ ખુદ - ૨૧૮ भातापकपा दृष्ट्वा परमादीत् ' इति हता, भाहगमन माया यापद-आध्यान ध्यायति ।। गु० ११ ॥ मूलम्-तएणं सा भद्दा काल पाउ० दासडि सदावेइ सदा- वित्ता एवं वयासी जाव सागरदत्तस्स एयमह निवेदेइ, तएणं से सागरदत्ते तहेब संभते समाणे जेणेर वासहरे तेणेव उवा गच्छइ उवागच्छित्ता सूमालिय दारिय अनिवेसेइ निवेसित्ता एवं वयासी-अहो ण तुम पुत्ता ! पुरा पोराणा णं जाव पञ्चणु- भवमाणी विहरसि त मा ण तुम पुत्ता । ओहयमण जाव झियाहि तुम ण पुत्ता मम महाणससि विपुल असण४ जहा पुहिला जाव परिभाएमाणी विहराहि, तएण सा सुमालिया दारिया एयम पडिसुणेइ पडिसुणित्ता माहणससि विपुल असणं जाव दलमाणो विहरइ ॥सू०११ ।। टीका-'तएण सा' इत्यादि । ततः खलु सा भद्रा सार्थवाही=मुकुमारिका दारिकाया जननी 'कल्ल' कन्ये द्वितीयदिवसे प्रादुः प्रभाताया रजन्या यावद- देखकर पल ग से उठी । उठकर उसने उस दमकपुरुपकी मार्गणा एव गवेषणा की। उसमें उसने वासगृह के द्वार को सुला हुआ देखा । देख कर उसने विचारा कि वह दमक पुरूप अब चला गया है । ऐसा सोचकर वह अपहत मन. सकल्प होकर यावत् आत यान करने लगी॥सू०११॥ तएण सा भद्दा कल्ल ' इत्यादि । टीकार्थ-(तएण) इसके बाद (सा भद्दा कल्लं पाउ० दासचेडिं શષ્યા ઉપરથી ઊભી થઈ ઊભી થઈને તેણે તે દરિદ્ર માણસની શોધ ખેળ કરી તેણે વિચાર કર્યો કે તે દરિદ્ર માણસ તે જ રહ્યો છે આ રીતે વિચાર કરીને તે અપહતમન સ૫ા થઈને યાવત્ આર્તધ્યાનમાં ડૂબી ગઈ છે સૂત્ર ૧૧ છે इत्यादि पार्थ-(तएण) त्यारा (सा भद्दा कल्ल पाउ० दासचेडि. 'तरण सा भद्दा कल्ल , भनगारधर्मामृतावणी टी० अ० १६ सुकुमारिकाचरितवर्णनम् तेजसा चलति सूर्य-उदिते दासवेटी शब्दयति, शब्दयित्वा एक्मवादी-यावत् सागरदत्तस्यैवमयं निवेदयति, अत्र याच्छन्देन पूर्वस्त्रोक्तवर्णनमनुमन्येयम् , तथा- वधूवरयोमुखधावनिकामुपनयेति । एवमुक्तासती दासचेटी वासगृहमुपागत्य सुकु मारिकामातध्यान ध्यायन्ती पश्यति, दृष्ट्वा एवमगदीद-हे देवानुप्रिये ! किं खलु त्वम् अपहतमन सकल्पा ध्यायसि ? ततः सुकुमारिका ता दासचेटीमेरमया दीत्-स द्रमकगुरुपो मा मुसप्रसुप्ता ज्ञाला मम पार्थादुत्थार निर्गतः, ततोमुहर्ता- न्तरेऽहमुत्याय तमपश्यन्ती 'गतः स द्रमपुरुप , इति कृत्वाऽऽत यान ध्यायामि सद्दावेह, सदाबित्ता एव घयासी जाव सागरदत्तस्स एयमट्ट निवेदेइ) सुकुमारिका दारिकाफी माता उस भद्रा ने द्वितीय दिन जय प्रातः काल हो गया था और सूर्य उदित हो चुका या-तर अपनी दासचेटी को घुलाया-धुलाकर उससे ऐसा कहा-यहां यावत् शब्द से यह पूर्वसूत्र गत वर्णन जोडलेना चाहिये जैसे, भद्राने वुलाकर उससे ऐसा कहा कि तू वधू और वर के लिये यह मुख धोने की सामग्री दतौन आदि -लेजा जन भद्रा ने उससे ऐसा कहा तब वह दासचेटी चासगृह में गई -और वहाँ जाकर उसने सुकुमारिका को आर्तध्यान करती हुई देखा तय देखकर उसने उससे ऐसा कहा-देवानुप्रिये । क्या कारण है जो अपर तमनः संकल्प होकर तुम आर्त यान कर रही हो-तय सुकुमा रिका दारिका ने उस दासचेटी से इस प्रकार कहा-वह दमक पुरुष मुझे यहा सुख प्रस्तुप्त जान छोडकर चला गया है । जय मै थोडी देरवाद उठी तो मैने उसे अपने पास नहीं देखा, चासभवन का दोर खुला हुआ वित्ता, एव वयासी जाव सागरदत्तरस एयम निवेदेइ) सुमारानी माता ભદ્રાએ બીજા દિવસે જ્યારે સવાર થઈ ગયું અને સૂર્ય ઉદય પામે ત્યારે તેણે દાસીને બોલાવી અને બેલાવીને આ પ્રમાણે કહ્યું–અહીં ચાવતું, શબ્દથી પહેલાના સૂત્રની જેમ જ વર્ણન સમજી લેવું જોઈએ જેમકે ભદ્રાએ તેને બોલાવીને આ પ્રમાણે કહ્યું કે વધુ અને વરના મુખ પ્રશાસન માટે દાતણ વગેરે લઈ જા જ્યારે ભદ્રાએ તેને આ પ્રમાણે કહ્યું ત્યારે તે દાસી વાસગૃહમાં ગઈ અને ત્યાં જઈને તેણે સુકુમારિકા દારિકાને આધ્યાન કરતી જોઈ ત્યારે આ પ્રમાણે તેની હાલત જોઈને તેણે કહ્યું કે હે દેવાનુપ્રિયે ! શા કારણથી તમે અપહરમન સંકલ્પ થઈને આર્તધ્યાન કરી રહ્યા છે ત્યારે સુકુમાર દારિકાએ તે દાસીને આ પ્રમાણે કહ્યુકે તે દરિદ્ર માણસ મને અહીં સુખેથી સૂતેલી છેડીને જતો રહ્યો છે જ્યારે થોડા વખત પછી હુ જાગી ત્યારે મેં તેને મારી પાસે જે નહિ અને મે વાસગ્રહના બારણાને પણ પુત્ર . ३० HEART वत. सा दासचेटी सागरदाय साथ ग गीपणाम निपदगतीति योगना पोम्पावत 31 मामा ने राम्रान्त उद्विग्नः सन् या पामगृहतगोपागजति, उपागत्य यामारिया दाग्विाम निपश्यति, निवेश्य मादीन-हो मायर्ग पल हे मुनि पुग' पुरा भिवेषु ' पोराणाण ' पुरानागमतीमाली, या-भत्र या उसनेद योध्यम्-'दुगिगाणं दुप्पाप नाग पहा पापण माग पाग फरवित्ति देसा तब म समझ गई कि घर यहा से चरा गया है। इस प्रकार में चिन्ता में पड़ रही हैं। सुकुमारिग फोम पास को सुनकर दामोटी ने उगी समय यता से वापिस आकर मागरदत्त को इन पान की खपर दी-" इस प्रकार यह परत पाठ यदा लगा लेना चाहिये-(तरण से सागरदत्त तदेव सभते ममाणे जेणेय वामारे तेणेव उनागच्या उवागचित्ता समालिय दारिय अके निवेसेड, निमित्ता पर धपासी, अहोण तुम पुत्ता पुरा पोरागाण जार पच्चणुमयमागी विहरमित माण तुमं पुत्ता ओरयमण जाच शियारि-तुम ण पुत्ता मम माणससि विपुल असण४ जहा पुटिला जार परिभाषमाणो विहराहि) इसके बाद वह साग रदत्तपहिले जैसा उद्विग्नचित्त होकर जहावासगृह या चरा गया। वहां जा कर उसने सुकुमारिकादारिकाको अपनी गोद में बैठा लिया और बैठाकर कहने लगा-हेपुत्रि! तुमने पहिले भयोंमें जो दुधीर्णदुप्पराकान्त, (कठिन ताईसे भोगने योग्य यकृत ज्ञानावरणीय आदि अशुभ कर्म उपार्जित જોયુ ત્યારે મને એકસપણે ખાત્રી થઈ ગઈ કે તે અહીંથી ચાલ્યા ગયા છે ચિંતામાં પડી છુ સુકુમારિકાની આ વાત સાંભળીને દાસીએ તરત જ સાગરદત્તને ખબર આપી આ રીતે અહી પહેલા પાઠ જાણી લે જોઈએ तएण से सागरदत्ते तहेव समते समाणे, जेणेप वासहरे तेणेत्र उवागच्छद,उवाग छित्ता सूमालिय दारिय अ के निवेसेइ,निवेसित्ता एव वयासी अहो ण तुम पुत्ता ! पुरा पोराणाण जाव पञ्चणुभवमाणी विहरसि त माण तुम पुत्ता ओहयमग जात्र "झियाहि-तुम ण पुत्ता मम महाणससि विपुल असण ४ जहा पुट्टिला जाब परिभाए माणी विहराहि) ત્યારપછી સાગરદત્ત પહેલાની જેમ વ્યાકુળ ચિત્તવાળા થઈને જયા વાસ ગૃહ હતુ ત્યાં આવ્યો ત્યાં આવીને તેણે સુકુમારિક દારિકાને પિતાના ખેળામાં બેસાડી લીધી અને બેસાડીને કહેવા લાગ્યા કે હે પુત્રિ! તે પહેલા ભવમાં જે કઈ દુર્ણ, દુષ્પરાક્રાત અને કૃતજ્ઞાનાવરણીય વગેરે, મેં ઉપા આ રીતે मनगारचमानयरिणी टी० अ० १६ सुकुमारिकाचरितवर्णनम बिसेस' इति-दुचीर्णाना-दुश्चरिताना बामनोजनित मृपावादादिकर्मणामित्यर्थः, किं भूताना तेपा' दुष्पराक्रान्ताना-कायिकानां पाणिहिंसाऽदत्तादानादीना, कृताना मकृतिस्थित्यनुभागपदेशभेदेन बद्धाना पापाना=अशुभाना कर्मणा ज्ञानावरणी- यादीना पापकम्-अशुभ, फातिविशेषम् , प्रत्यनुभवन्ती वेदयन्ती विहरसि== पतसे तत्-तस्माद् मा खलु त्व हे पुनि ! अपहतमनाम फ्ल्पा याद् ध्याय- आर्त यान मा कुरु इत्यर्थः, व खलु हे पृत्रि ! मम महाणस सि' महानसे- पाशालाया पिपुलमशन पान खाय स्वाध यथा पोट्टिला यावत् परिभाजयन्ती श्रमणादिभ्यः परिभाग कुर्वती — विकराहि ' विहर-निष्ठ । ततः खलु सा सुकु- किये-प्रकृति, स्थिति, अनुभाग और प्रदेश घपके भेदसे यांधे है-उन्हीं पुराने अशुभ ज्ञानावरणीय आदि कर्मों के तुम अशुभ फल विशेष को इस समय भोग रही हो । पूर्व भदों में जो पाप किये हे वेही यहां" "पुराण" शब्द से गृहीत हुए हैं। पाप शन्द यहा अशुभ ज्ञानावर. णीय आदि कर्मों का बोधक है। ये अशुभ मानावरणीय आदि कर्म जीच अशुभ मन, वचन और काय की प्रवृत्ति से जन्य मृपावाद आदि क्रियाओ से, तथा प्राणिहिंसा, अदत्तादान आदि कुकृत्यों से पाधता है। वांधते समय इनमें प्रकृति, स्थिति अनुभाग और प्रदेश यधरूप विभाग हो जाता है। अधिक स्थिति और अधिक अनुभाग वध इनमें सक्लेश परिणामी से पडता है। इसलिये हे पुत्रि । तुम अपहतमन. सकल्प होकर यावत् आर्तव्यान मत करो। तुम तो मेरी भोजन शाला में चतुर्विध आर तैयार करा कर पोहिला की तरह श्रमण आदि ર્જિત કર્યા હતા-પ્રકૃતિ, સ્થિતિ, અનુભાગ અને પ્રદેશ બ ધના ભેદથી બાવ્યા છે અત્યારે તે તેજ પહેલાના અશુભ જ્ઞાનાવરણીય વગેરે કર્મોના અશુભ ફળ વિશેષને ભોગવી રહી છે પૂર્વ ભવમાં જે પપ કરવામાં આવ્યા હોય તેને मला પુરાણ " શબ્દથી ગ્રહણ કરવામાં આવ્યા છે અહીં પાપ બાદ અશુભ જ્ઞાનાવરીય વગેરે કર્મોને સ્પષ્ટ કરે છે આ બધા અશુભ જ્ઞાનાવરણીય વગેરે કર્મો જીપ અશુભ-મન, વચન, અને કાયની પ્રવૃત્તિથી જન્ય મૃષાવાદ વગેરે ક્રિયાઓથી તેમજ પ્રાપુઓ ની હિંસા, અદત્તાદાન વગેરે કુકર્મોથી બાંધે છે બાપતી વખતે એએમાં પ્રકૃતિ, સ્થિતિ, અનુભાગ અને પ્રદેશ બ ધરૂપ વિભાગ થઈ જાય છે અધિક પિતિ અને અધિક અનુભાગ બધ તેઓમા સ શ પરિ- શુમેથી પડે છે એથી હે પુત્ર! તમે અપડુત મન સક ૫ થઈને યાવત - श . ततः सा दासोटी सागरदपत्य सागस मोपमा निदगतीति योनना योध्या । वत रा3 गागादET 'मम' राभात उद्विग्नः सन् योर वामगृह तगोपागति, उपागत्य गुमारित दाशाम नियति, निवेश्य एमवादीन-भही ! याय पल पुमि । 'पुरा' पूरा-पूर्वमवेषु ' पोराणाण ' गुगणानाग्मतीकाल नाना, यान्भा गार उदनेद योध्यम्-'दुनिष्णाण दुप्पणवाग पहा पासन म पाग फरविनि देसा तप में समझ गई कि पर गारा से चला गया है। इस प्रकार मैं चिन्ता में पड़ रही है। सुकुमारिमा को म पाल को सुनकर दामचेटी ने उसी समय यता से चापिम आकर मागग्दत्त को इस पान की खपर दी-" इस प्रकार यह पूक्ति पाठ या लगा लेना चाहिये-(तएण से सागरदत्त तहेच सभते समाणे जेणेव चामहरे तेणेच उवागड़ा पवागचित्ता समालिय दारिय अके निवेसेड, निमित्ता एव चयामी, अरोण तुम पुत्ता पुरा पोरागाण जार पच्चणुम्भरमागी विहरसित माण तुम पुत्ता ओरयमण जार झियारि-तुम ण पुत्ता मम महाणससि विपुल असण४ जहा पुहिला जार परिमाण्माणो पिटराहि) इसके बाद वह साग रदत्त पहिले जैसा उद्विग्न चित्त होकर जहा यासगृह या वहा गया। यहां जा कर उसने सुकुमारिकादारिकाको अपनी गोद में बैठा लिया और थैठाकर कहने लगा-हेपुत्रि । तुमने परिले भगों में जो दुश्चीर्ण दुप्पराकान्त, (कठिन ताईसे भोगने योग्य एच कृन ज्ञानावरणीय आदि अशुभ कर्म उपार्जित જોયુ ત્યારે મને ચોક્કસપણે ખાત્રી થઈ ગઈ કે તે અહીંથી ચાલ્યા ગયે છે રીતે ए ચિંતામાં પડી છ સુકુમારિકાની આ વાત સાંભળીને દાસીએ તરત જ સાગરદત્તને ખબર આપી આ રીતે અહીં પહેલા પાઠ જાણી લેવું જોઈએ तएणं से सागरदत्ते तहेर सभते समाणे, जेणे यासहरे तेणेव उवागच्छइ,उवाग छित्ता सूमालिय दारिय अके निवेसेइ,निवेसित्ता एवयासी अहो ण तुम पुत्ता! पुरा पोराणाणं जाव पचणुब्भमाणी विहरसिं तमाण तुम पुत्ता ओहयमण जावं झिपाहि-तुम ण पुत्ता मम महाणससि विपुल असण ४ जहा पुट्टिला जाव परिभाए माणी विहराहि) ત્યારપછી સાગરદત્ત પહેલાની જેમ વ્યાકુળ ચિત્તવાળો થઈને જ્યાં વાસ ગૃહ હતું ત્યાં આવ્યું ત્યાં આવીને તેણે સુકુમારિકા દારિકાને પેતાને ખોળામાં બેસાડી લીધી અને બેસાડીને કહેવા લાગ્યા કે હે પુત્રિ ! તે પહેલા ભવમાં જે કઈ દશ્રીણું, દુષ્પરાક્રાત અને કૃતજ્ઞાનાવરણીય વગેરે મેં ઉપા मा मनगारधर्मामृतषिणी दी० अ० १६ सुकुमारिकाचरितवर्णनम् पिसेस ' इति-दुचीणांना-दुश्चरिताना वामनोजनित मृपावादादिकर्मणामित्यर्थः, कि भूताना तेपा' दुष्पराकान्ताना-कायिकाना पाणिहिंसाऽदत्तादानादीना, कृतानां प्रकृतिस्थित्यनुभागप्रदेशभेदेन बद्धाना पापाना-अशुभाना कर्मणा ज्ञानावरणी- यादीना पापरम्-अशुभ, फलवृत्तिविशेषम् , प्रत्यनुभवन्ती वेदयन्ती विहरसि- तसे तत्-तस्माद् मा खलु व हे पुत्रि ! अपहतमनःम कल्पा याद् ध्याय- आर्त यान मा कुरु इत्यर्थः, व खलु हे पृनि ! मम 'महाणस सि ' महानसे- पाकशालाया विपुलमशनं पान खाद्य स्वाद्य यथा पोट्टिला यावत परिभाजयन्ती श्रमणादिभ्यः परिभाग कुर्वती 'विहराहि' निहर-तिष्ठ । ततः खलु सा सुकु- किये-प्रकृति, स्थिति, अनुभाग और प्रदेश वधके भेदसे यांधे है-उन्हीं पुराने अशुभ ज्ञानावरणीय आदि कर्मों के तुम अशुभ फल विशेष को इस समय भोग रही हो। पूर्व भदों में जो पाप किये हैं वेती यहा" पुराण" शब्द से गृहीत हुए हैं। पाप शब्द यहां अशुभ ज्ञानावर- णीय आदि कर्मों का योधक है। ये अशुभ ज्ञानावरणीय आदि कर्म जीव अशुभ मन, वचन और काय की प्रवृत्ति से जन्य मृपावाद आदि क्रियाओ से, तथा प्राणिहिंसा, अदत्तादान आदि कुकृत्यों से गधता है। बांधते समय इनमें प्रकृति, स्थिति अनुभाग और प्रदेश यधरूप विभाग हो जाता है। अधिक स्थिति और अधिक अनुभाग वर इनमें सक्लेश परिणामो से पड़ता है। इसलिये हे पुत्रि । तुम अपहतमनः सकल्प होकर यावत् आर्तध्यान मत करो। तुम तो मेरी भोजन शाला में चतुर्विध आहार तैयार करा कर पोटिला की तरह श्रमण आदि જિત કર્યા હતા-પ્રકૃતિ, સ્થિતિ, અનુભાગ અને પ્રદેશ બ ધના ભેદથી બાધ્યા છે અત્યારે તે તેજ પહેલાના અશુભ જ્ઞાનાવરણીય વગેરે કર્મોના અશુભ ફળ વિશેષને ભેગવી રહી છે પૂર્વ ભવમાં જે પાપ કરવામાં આવ્યા હોય તેને सही ॥ પુરાણ ” શબ્દથી ગ્રહણ કરવામાં આવ્યા છે અહીં પાપ શબ્દ અશુભ જ્ઞાનાવરણીય વગેરે કર્મોને સ્પષ્ટ કરે છે. આ બધા અશુભ જ્ઞાનાવરણીય વગેરે કર્મો જીવ અશુભ-મન, વચન, અને કાયની પ્રવૃત્તિથી જન્ય મૃષાવાદ વગેરે કિયાએથી તેમજ પ્રાણીઓની હિંસા, અદત્તાદાન વગેરે કુકર્મોથી બાંધે છે બાપની વખતે એમાં પ્રકૃતિ, સ્થિતિ, અનુભાગ અને પ્રદેશ બ વરૂપ વિભાગ થઈ જાય છે અધિક સ્થિતિ અને અધિક અનુભાગ બાધ તેઓમાં સકશ પરિ- થાથી પડે છે એથી હે પુત્ર! તમે અપાત મન સક પ થઈને યાવત . - तामेचा मारिका दारिका एनार्य मनिगोतियोररोनि, मश्रित्य महान पिपुरमा नपानसाय ग्याप यावर 'दमाणी 'ददी विदरनि आग म || १०१२॥ मूलम्-तेण कालेण तेणं सनाणं गोवालियाओ अजाओ पहुस्सुयाओ एवं जहेब तेयलिणाए. सुव्वयाओ तहेर सनोप्स ड्ढाओ तहेव संघाडओ जार अणुपढेि तहेब जाव सूमालिया पडिलाभित्ता एच वयासी-एवं सल्लु अजाओ । अह सागरस्स अणिहा जाव अमणामा नेउइ णं सागरग मम नाम वा जाव परिभोगं वा, जस्स २ दियणं दिजामि तस्त २ दियणे अणिटा जाव अमणामा भवामि, तुम्भे य णं अजाओ । बहु- नायाओ एव जहा पुहिला जाव उवलद्धे जे ण अह सागरस्त दारियाए इट्ठा कता जाव भवेजामि, अजाओ तहेव भणंति तहेव साविया जाया चिता तहेव सागरदत्त सत्यवाहं आपु- च्छइ जाव गोवालियाणं अतिए पव्वइया, तएण सा सूमा- जनों के लिये वितरण करती रहो (तपण सा स्मालिया दारिया एय मट्ठ पडिसुणेइ पडिसुणिता माणससि विपुल असण जार दलमाणी विहरइ) इस तरह पिता सागरदत्त के समझाने पर उम सुकुमारिका दारिका ने अपने पिता के इस कथन को स्वीकार कर के यह महानस भोजन शाला में निष्पन्न चतुर्विध आहार को श्रमणादि जनों के लिये वितरण भी करने लगी। सूत्र १२॥ આર્તધ્યાન કરીશ નહિ તુ મારી ભેજન શાળામાં ચાર તૈયાર કરાવડાવીને પિહિલાની જેમ શ્રમણ વગેરે જનને આપતી હે (तएण सा सूमालिया दारिया एयमह पडिमुणेड, पडिमुणित्ता महाणससि विपुल असण जाव दलमाणी निहरइ) આ રીતે પિતા સાગરદન વડે સમજાવવામાં આવેલી તે સુકમા કાએ પિતાના પિતાના કથનને સ્વીકારી લીધું અને સ્વીકારીને તે ભેજનશાળામાં સવાર થયેલા ચારે જાનના આડારને શ્રમણ વગેરેને આપવા है જાતને આહાર દારિ સ ૧૨ - मनगारधर्मामृतषिनी टी०१० ११ सुकुमारिकाधरितपर्णनम् २३३ लिया अजा जाया ईरियासमिया जाव गुत्तवंभयारिणी बहहिं चउत्थछट्टम जाव विहरइ, तएणं सा सूमालिया अज्जा अन्नया कयाइ जेणेव गोवालियाओ अजाओ तेणेव उवाग- च्छइ उवागच्छित्ता बदइ नमसइ वदित्ता नमंसित्ता एववयासी- इच्छामि णं अज्जाओ तुम्भेहि अभणुन्नाया समाणी चंपाओ वाहि सुभूमिभागस्स उज्जाणस्स अदूरसामंते छठंछट्टेणं अणि. क्खित्तेणं तवोकम्मेणं सूराभिमुही आयावेमाणा विहरित्तए, तएण ताओ गोवालियाओ अज्जाओ सूमालिय एवं वयासो- अम्हे ण अज्जे । समणीओ निग्गंधीओ ईरियासमियाओ जाव गुत्तवभयारिणीओ नो खल्लु अम्ह क्प्पइ वहिया गामस्स जाव सपिणवेसस्स वा छह२ जाब विहरित्तए, कप्पइ ण अम्ह अतो उक्स्सयस्स विइपरिविखत्तस्स सघाडिवद्धियाए णं समतल पइयाए आयावित्तए, तएणं सा सूमालिया गोवालियाए एय- मह नो सदहइ नो पत्तियइ नो रोएइ एयमढे अ०३ सुभूमि- भागस्स उज्जाणस्त अदूरसामतेछट्ट छट्टेणं जाव विहरइ ॥सू०१३॥ टीका-'तेण कालेण' इत्यादि । तस्मिन् काले तस्मिन् समये 'गोवा- लियाओ अज्जाओ' गोपालिकामगोपालिकानाम्न्यः आर्या साध्यः, 'बहुस्सु- याओ' रहुश्रुता श्रुतपारगामिन्य , एवम् अनेन प्रकारेण यथैव ' तेतरिणाए' तेतलिज्ञाते चतुर्दशे तेतलिपुत्राध्ययने वर्णिताः ' सुचयानो' मुनता मुव्रता. 'तेण कालेण तेण ममएण' इत्यादि। टीकार्थ-(तेण कालेण-तेण समण्ण) उम काल और उस समय में (गोवालियाओ अलाओ बहुस्सुयाओ एव जहेव तेयलिणाए सुच्चयाओ तेण कालेण-तेण समएण इत्यादि- टी-( तेण कारेण -वेण समएण) ते णे भने ते समये (गोगाठियाभो अन्जाओ बहुस्सुयायो एर जहेन तेयलिणाए मुख्याभो . ३०
बाताप पवार
मारिका दारिका एनार्थ प्रनिगारिम्पोररोति, मनिश्रुप महानमे पिपुरमा
नपानखाय खाय या 'दन्माणी 'पदती शिवरति आस्रो म || स०१२॥
मूलम्-तेणं कालेणं तेणं सगाणं गोवालियाओ अजाओ
बहुस्सुयाओ एवं जहेव तेयरिणाम सुव्वयाओ तहेर समोस
डाओ तहेब संघाडओ जान अणुपनिढे तहेव जान सूमालिया
पडिलाभित्ता एव पयासी-ए सल अजाओ ! अह सागरस्स
अणिहा जाव अमणामा नेच्छइ णं सागरण मम नाम वा जाव
परिभोग वा, जस्स २ वि य णं दिजामि तस्स २ वि य गं
अणिट्ठा जाव अमणामा भवामि, तुम्भे य णं अजाओ । बहु-
नायाओ एव जहा पुहिला जाव उवलढे जे णं अह सागरस्स
दारियाए इट्टा कता जाव भवेजामि, अज्जाओ तहेव भणंति
तहेव साविया जाया चिता तहेव सागरदत्त सत्थवाहं आपु-
च्छइ जाव गोवालियाणं अतिए पव्वइया, तएणं सा सूमा
जनों के लिये वितरण करती रहो (तपण सा सूमालिया दारिया एय
मट्ट पडिसुणेइ पडिसुणित्ता माणससि विपुल असण जाप दलमाणी
विहरइ) इस तरह पिता सागरदत्त के समझाने पर उम सुकुमारिका
दारिका ने अपने पिता के इस कथन को स्वीकार कर के यह महानस
भोजन शाला में निप्पन्न चतुर्विध आहार को श्रमणादि जनों के लिये
वितरण भी करने लगी। सूत्र १२ ॥
આર્તધ્યાન કરીશ નહિ તુ મારી ભજન શાળામાં ચાર
તૈયાર કરાવડાવ પિદિલાની જેમ શ્રમણ વગેરે જનોને આપતી હે
(तएण सा सूमालिया दारिया एयम पडिमुणेइ, पटिमुणिचा महाणससि
विपुल असण जाव दलमाणी विहरइ)
આ રીતે પિતા સાગરદન વડે સમજાવવામાં આવેલી તે સુકુમક
દારિ
કાએ પિતાના પિતાના કથનને સ્વીકારી લીધું અને સ્વીકારીને તે ભેજનશાળામા
તૈયાર થયેલા ચારે જાતના આહારને જમણ વગેરેને આપવા લા
જાતના
આહાર
मनगारधर्मामृतापनी टी०० १६ सुफुगारिकाचरितवर्णनम् लिया अजा जाया ईरियासमिया जाव गुत्तवंभयारिणी बहूहि चउत्थछट्टम जाव विहरइ, तएणं सा सूमालिया अज्जा अन्नया कयाइ जेणेव गोवालियाओ अज्जाओ तेणेव उवाग- च्छइ उवागच्छित्ता वंदइ नमसइ वदित्ता नमंसित्ता एवंवयासी- इच्छामि णं अज्जाओ। तुम्मेहि अभणुन्नाया समाणी चंपाओ वाहि सुभूमिभागस्स उज्जाणस्ल अदूरसामंते छठंछट्टेणं अणि- क्खित्तेणं तवोकम्मेणं सूराभिमुही आयावेमाणा विहरित्तए, तएण ताओ गोवालियाओ अज्जाओ सूमालिय एवं वयासी- अम्हे ण अज्जे । समणीओ निग्गंथीओ ईरियासमियाओ जाव गुत्तवंभयारिणीओ नो खल्लु अम्ह कप्पइ बहिया गामस्स जाव सपिणवेसस्स वा छ8२ जाव विहरित्तए, कप्पइ ण अम्ह अतो उक्स्सयस्स विइपरिविखत्तस्स संघाडिवद्धियाए णं समतल पइयाए आयावित्तए, तएणं सा सूमालिया गोवालियाए एय- मट्ट नो सद्दहइ नो पत्तियइ नो रोपइ एयमट्ट अ०३ सुभूमि- भागस्स उज्जाणस्त अदूरसामतेछट्ट छट्टेणं जाव विहरइ ॥सू०१३॥ टीका- तेण कालेण' इत्यादि । तस्मिन् काले तस्मिन् समये 'गोवा- लियाओ अज्जाओ' गोपालिगम्योपालिकानाम्न्यः आर्या: साध्व्यः, 'बहुस्मु- याओ' रहुश्रुता =युतपारगामिन्य , एवम् अनेन प्रकारेण यथैव ' तेतरिणाए' तेतलिज्ञाते-चतुर्दशे तेतलिपुत्राध्ययने वर्णिताः ‘सुन्चयाभो' सुनता-सुव्रता- 'तेण कालेण तेण समएण' इत्यादि ।। टीकार्थ-(तेण कालेण-तेण समण्ण) उस काल और उस समय में (गोवालियाओ अजाओ यहुस्सुयाओ एव जहेच तेयलिणाए सुब्वयाओ तेण कालेण-तेण समएण ' इत्यादि- री-(तेण कालेण-तेण समएण ) ते अणे मन त समये (गोनालियाओ अजाओ नहुस्सुयायो एर जहेव तेयलिणाए मुपयाभो - - २0 सामान नाम्य साध्यः, गहेर गमोगलागो' म ममणा=गुसनापद गोपालिकाः समागवा' । 'तीय संघाउमो गांव मणक्यासवाटको यापर अनुप निष्ट गोपालिकानागाणागेर पायगारा पारिशमा रहेऽनुमष्टिः । तथे यारत् सामारिका ता मागां मानादिना प्रतिसम्म्य परमाणका रेण आदीत्-दे आयो ! म ह गागरम्प दारयानिष्टा यात अकान्ता अप्रिपा अमनोगा अमनोमा मन' मि, मेति गल साग रको मम नाम का गोत्र श्रोतुम् , किं पुनर्यान गया मा परिगोग ग, यत्र मम नामाऽपि श्रीतु नेच्छति तत्र का मार्ग परिमोगस्य, तु तेन सर्वथा परि, स्यक्तेति भावः । अपि च यस्मै यम्मे पलु ' दिजामि' दीप-समिा प्रदत्ता भगमि, तस्य तस्यापि च खलु अनिष्टा याद अमनोमा मनः पतिला मवामि, हे आर्याः । यूयं च खलु 'बहुनापागो' पहनाताः सानाविशययुक्ताः, 'एवं तहेव समोमडाओ तहेव सपाओ जार अणुपविटै तहेर जाव समा लिया पडिलभित्ता पयासी) गोपालिका नामकी आपिका जो श्रुत पारगामिनी थी इस प्रकार से कि जिस प्रकार से तेतलि प्रधान नामक चौदहवे अध्ययन में सुनता माध्ची चणित हुई है-धी-वै उसी तरह से वा आई। इनका एक सगाटा था, यावत् सुरुमारिका के घर में गोचरी के लिये प्रवेश किया। सुकुमारिका ने बड़ी भक्ति के साथ उन्हें आहार पानी दिया और देकर वह फिर इस प्रकार से उनसे कहने लगी--(एबग्वल अजाओ! अह सागरस्स अणिट्टा, जाच अम णामा, नेच्छा ण सागरण मम नाम वाजाय परिभोग वा जस २ वि यण दिजामि तस्स-तस्स वि य ण अणिहा, जाच अमणामा भवामि तुम्भे य ण अजाओ! बहुनागाओ, एव जहा पुहिला जाव उवलद्धे तहेव समोसड्डाओ तहेय सघाडो जाव अणुपविढे तहेर जाव सूमालिया पडि लभित्ता एव वयासी) ગપાલિકા નામે આર્થિકા કે જે યુત પારગામિની હતી તેતલીયાન નામના ચૌદમાં અધ્યયનની સુનતા સાધ્વી જેવી હતી તેવી જ તે પણ હતી સુવ્રતા સાધ્વીની જેમ જ તે વાવ સુકુમારિકાના ઘેર તે ગોચરી માટે ગઈ સુકુમારિકાએ ખૂબ જ ભકિત-ભાવથી તેમને આહારપાડું આપ્યું અને આપને તે તેમને આ પ્રમાણે કહેવા લાગી- ( एव खलु अज्जाओ अह सागरस्स अणिवा, जाव अमणामा नेच्छइ ण सागरए मम नाम वा जाव परिभोग वा जस्स २ पि यण दिज्जामि तस्स तस्स विय ण अणिवा, जान अमणामा भवामि तुम्भे य ण . , १ " - - , मागाधर्मामृतवषिणो टी० अ० १६ सुमारिकानिरूपगम् यथा पोहिल याद् उपलब्धम् अयमर्थः-यण तेनलिपुत्रभोर्या पोहिला समई- वशीकरणोपायमदर्शनार्य सुत्रता साधी पृच्छनिस्म, तथा-सुकुमारिका दारिका गोपारिका मघाटक पृष्ठपती, ताश चूर्णयोगादिसमुपलय-ज्ञात पिम् ? येनाह सागरम्य दारफस्येष्टा सान्ता यावद् भवेय जार्यास्तथैर भणन्ति यथा पोट्टिलि जे ण र नागररत दारगस्स ट्ठा कता जाव भवेज्जामि, अज्जाओ तहे व मगति, तहेव माविधा जाया, तहेव चिंता, तहेव सागरदत्त सत्य- चार आतुरुड जाव गोवालियाण अनिण पब्बडा) हे आर्याओं। में अपने पति सागर दारक के अनिष्ट नो यावत् अकान्त अप्रिय अमनोज्ञ एव अमनोम मनः प्रतिकूल बनी हुई है । वे मेरा नाम गोत्र कुछ भी सुनना नहीं चाहते है। तो फिर उनके साथ परिभोग करने की तो बात ही क्या है। मुझे तो उन्होंने सर्वथा ही गेड दी है। अपिच-मेरे पिता मुझे जिस २ व्यक्ति के लिये देते ह-मैं उस २ व्यक्ति के लिये भी जनिष्ट आदि बन जाती है। हे आओ! आप तो बहु- श्रुत ह अनेक शास्त्रो की ज्ञाता है-ज्ञान के अतिरार से सपन्न है। इस प्रकार उस सुकुमारिका ने पोहिला की तरह अपने पति को वश में करने के विषय में उनसे उपाय पूछा पोटिलाने अपने पति तेतलिपुत्र को वश में करने को पहिले जैसे सुव्रता साध्वी के सगटेसे उपाय पूछा था और कहा आपको यदि कोई ऐसा चूर्ण आदि का प्रयोग उपलब्ध एप जहा पुटिला जान उपलदे जेग अह सागरस्स दारगस्त इट्ठा कता जाव भवेज्जामि, अन्जाओ तहे। भगति, तहेर सानिया जाया, तहेव विता, तदेव सागरदत्त सत्ताइ जापुन्छ। जाव गोवालियाण अतिए पपइया) હે આર્થીઓ ! મારા પતિ સાગદાર માટે હું અનિષ્ટ થઈ ગયેલી છુ ચાવત્ અકાત, અપ્રિય, અમનેસ અને અમનેમ થઈ ચૂકી છુ તેઓ મારા નામ ગોત્ર કઈ પણ સાભળવા ઈચ્છતા નથી ત્યારે તેમની સાથે પરિભોગ કરવાની તો વાત જ શી કરવી તેઓએ મને એકદમ જ જે છેડી દીધી છે અને મારા પિતાએ મને જે જે માણસને આપે છે તે બધા માટે પણ હું અનિષ્ટ વગેરે થઈ જાઉં છું હે આર્યાએ! તમે તે બહુશ્રુત છે, ઘણા શાસ્ત્રોને જાણે છે, જ્ઞાન સપન્ન છે આ રીતે પિટ્ટિયાની જેમ જ સુકુમારિકા દારિ- કાએ પણ પતિને વશમાં કરવા માટેના ઉપાયની પૂછપરછ કરી પિદિલાએ પિતાના પતિ તેતશિપુને વશમાં કરવા માટે પહેલા સુનના સાધ્વીના ઘા શથી જેમ ઉપાય પૂછયા હતા તેમજ તેણે પણ તેમને કહ્યું કે-જે એ " २६ पानाचा फया पृष्टा मुमतायाः सगटफस्थिताः मा“गतामोचन , तया गोपालिका सपाटरयाः आर्या गणनिति सी न । 'डेर गापिणा जाया' तयन মাহি নানা=ণীলা বন যামাবিজা বিবি খাবি নারা। গৰ चिन्ता-पोहिलापदेव पगाभग्रज्या ग्रहीतु न्यिा गामारिकाया मनसि पाहू भूता । सुरुमारिका सागरदन सार्यपपितर परम्पया स्वपति पोटिला, तद् आपति, यापद् गोरियानामन्ति मननितान्द्रीय गृहीतरती । ततः खलु सा सुकुमारिका आर्या सापी जाता सा किना-यासमिना याइ गुप्त हो भी यता दीजिये कि निमसे में अपने पति सागरदारक को इष्ट, कान्त यावत् मनोम पनजाऊ। गोलिका के सघाडे की इन आर्याओं ने सुकुमारिका फो, पोहिला को सुबना सा पी की तरह समझाया-वह उसी तररसे श्राविका पन गई । पोहिला की तरह इस सुकुमारिका ने भी पाद में दीक्षा देने का मन में विचार किया। पोहिलाने जिस तरह अपने पति से आज्ञा लेकर दीक्षा धारण की थी-उसी प्रकार इस सुकुमारिका ने भी अपने पिता सागरदत्त से पूछकर गोपालिका आर्या के समीप दीक्षा धारण कर ली। (तण्ण सा सूमालिया अन्ना जाया ईरिया समिया जार गुतयभयारिणी यहहिं घउत्थ छट्ठम जाव विहरइ, तएण सा सूमालिण अजा अन्नया कयाइ जेणेव गोवालिया अजाओ तेणेव उवाग) इस तरह वह सुकुमा रिका आर्या बन गई। वह ईर्यासमिति आदि का पालन करने लगी કેઈ ચૂર્ણ વગેરેને પ્રવેગ મળી શકે તે પણ મને બતાવી દો કે જેથી મારા પતિ સાગરદારકના માટે ફરી ઈચ્છ, કાત, યાવતું મનેમ થઈ જાઉ ગપાલિકા સ ઘાડાની તે આર્થીઓએ-અવતા-સાધ્વીએ જેમ પદિલાને સમ જાવી તેમજ સમજાવી અને છેવટે તે શ્રાવિકા બની ગઈ પદિલાની જેમજ તે સુકુમારિકાએ પણ ત્યારપછી દીક્ષા લેવાને મનમાં મક્કમ વિચાર કરી લીધો પિદિલાએ જેમ પિતાના પતિની આજ્ઞા લઈને દીક્ષા ધારણ કરી હતી તેમજ સુકુમારિકાએ પણ પિતાના પતિ સાગરદત્તને પૂછીને પાલિકા આર્યોની પાસેથી દીક્ષા ધારણ કરી લીધી (तएण सा सूमालिया अज्जा जाया इरिया जाव गुत्तवभयारिणी बहूहि चउत्थ छट्टम जाब विहरह, तएण सा सूमालिया अज्जा अन्नया कयाइ जेणेव गोवालियाओ अज्जाओ तेणेव उवागच्छइ) ' આર્યા થઈ ગઈ, તે ઈથ સમિતિ વગેરેનું પાલન મહાવતની રક્ષા આ રીતે કરવા લાગી, २३७ - मेनगारधर्मामृतवर्षिणी टी० अ०१६ सुकुमारिकाचरितवर्णनम् ब्रह्मचारिणी सा रहुभिवतुर्थपप्ठाप्टमभक्तैर्या पत्-तप कर्मभिरात्मान भावयन्ती विहरतिभाम्तेस्म । तनः खल्ल सा नुकुमारिका आर्या अन्यदा कदाचिद् यत्रै गोपालिका आर्यास्तोवोपागच्छति उपागत्य चन्दते नमस्यति, पन्दित्वा नमस्यित्वा एयमवादीत् हे आर्या ! इच्छामि खलु युष्माभिरभ्यनुज्ञाता सती चम्पानगर्या वहिः सुभूमिभागस्योद्यानस्यादूरसामन्ते = नातिदूरे नातिनिकटे पष्ठपप्ठेन-पप्ठभक्तानन्तर पुन पष्ठभनतेन अणिरिखतेण ' अनिप्तेिन =अविश्रान्तेन-अन्तररहितेन, तप.कर्मणा ' सुराभिमुही' सूर्याभिमुग्वी ' या वेमाणी' आतापयन्ती-आतापना कुर्वती विहर्तुम् ' इति । ततस्तदनन्तर ता गोपालिका आर्याः सुकुमानिझामार्यामेवमादिपुः-हे आर्ये ! क्य स्खल अमण्यो और नौ कोटी ब्रह्मचर्य से महाव्रत की रक्षा करने लगी। अनेक चतुर्थ, पष्ठ, अष्टम, भक्त आदि तपस्याओं से अपने आपको भावित भी करने लगी। एक दिन की बात है कि वह सुकुमारिका आर्या साध्वी-जता गोपालिका आर्या विराज मान थी वहा गई-( उवाग- च्छित्ता वइ, नमसइ, वदित्ता नमंसित्ता पर बयासी, इन्गमि ण अ- ज्जाओ! तुम्भेहिं अन्मणुनाया समाणी चपाओ याहिं सुभूमिभागस्स उजाणस्स अदूर सामते छट्ट छ?ण अणिक्खित्ते णं तवोकम्मे ण सरा भिमुही आयावेमाणी विहरित्तए) वहां जाकर उसने उन्हें बदना की, नमस्कार किया' वदना एव नमस्कार कर फिर वह इस- प्रकार कहने लगी-हे भगत ! मे आप से आजा प्राप्त कर चपा नगरी से पाहिर सुभूमिभाग नाम के उद्यान के समीप अतररहित छट्ट छ? को तपस्या से सूर्याभिमुखी होकर आतापना करना चाहती हैं। (तएण ताओ गोवालियाओ अजाओ सूमालिय एव चयासी-अम्हण ચતુથ, પક, અષ્ટમ ભક્ત વગેરે તપસ્યાઓથી પિતાને ભાવિત પણ કરવા લાગી એક દિવસની વાત છે કે તે સુકુમારિકા આર્યા સાધ્વી જ્યા પાલિકા मार्या शिरमान ती त्या ७ (आगच्उित्ता व दह, नम सइ, व दित्ता, नम. सिचा एष वयासी, इच्छामि ण अज्जाओ ! तु भेहिं अन्भणुन्नाया समाणी च पाओ वाहि सुभूमिभागस्स उज्जाणरस अदूरसामते छ? छटेण अणिक्सित्तेणं सवो फम्मेण सूराभिमुही आयावेमाणि विहरित्तए) त्याने तेथे तभने पहना નમસ્કાર કર્યા વદના તેમજ નમસ્કાર કરીને તેણે આ પ્રમાણે કહ્યું કે હે ભરત! આપની આજ્ઞા મેળવીને હુ ચપા નગરીમા બહાર સુભૂમિભાગ નામના ઉદ્યાનની પાસે અતર રહિત છઠ્ઠ છઠ્ઠની તપસ્યા કરતા સૂર્યાભિમુખી થઈને આતાપના કરવા ઈકુ છુ (वएण वाओ गोवालियाओ अजाओ सूमालिय ema मेचा फया पृष्टा मुमनायाः सराटकस्थिताः सा नामकीनन् , नयर गोपालिका सपाटस्था' आर्या भणनितिन ।' मागिमा जाया तश्व श्राविका जाता=पोहिल यन् गामारिका दारिशापि श्रागिा जाता तथेत्र चिता-पोहिलापदेव पधान माया गी3 fron गुमारिफाया मनमि मातु भूता । सुरुमारिका मागरदा सागापितर नया-गया सपति पोटिंग, तद् आपति, यावद् गोगविनामनिक मानिनादीया गृहीतती । ततः खल सा सुकुमारिका आर्यामाधी नाता मा कि भूना-यासमिना याद् गुप्त हो तो भी पता दीजिये फि निमसे मैं अपने पनि सागरदारक को इष्ट, कान्त यावत् मनोम पनजाऊ। गोलिका के सघाटे की इन आर्याओं ने सुकुमारिका को, पोहिला को सुनता साची की तरह समझाया-वर उसी तररसे श्रारिमा पन गई। पोहिला की तरह इस सुकुमारिका ने भी पाद में दीक्षा लेने का मन में विचार किया। पोहिलाने जिस तरह अपने पति से आज्ञा लेकर दीक्षा धारण की थी-उसी प्रकार इस सुकुमारिका ने भी अपने पिता सागरदत्त से पूछ कर गोपालिका आर्या के समीप दीक्षा धारण कर ली। (तराग सा सूमालिया अजा जाया ईरिया समिया जार गुत्तमभयारिणी यहर्हि चउत्थ छट्ठम जाव चिहरड, तएण सा समालिण अजा अन्नया कयाइ जेणेव गोवालिया अजाओ तेणेव उवागETE ) इस तरह वह सुकुमा रिका आर्या बन गई। वह ईर्यासमिति आदि का पालन करने लगी કેઈ ચૂર્ણ વગેરે પ્રવેગ મળી શકે તે પણ મને બતાવી દે કે જેથી હું મારા પતિ સાગરદારકના માટે ફરી ઇષ્ટ, કાત, યાવતું મનેમ થઈ જાઉં પાલિકા સ ઘાડાની તે આર્યોએ સુતા-સાધ્વીએ જેમ પિહિલાને સમ જાવી તેમજ સમજાવી અને છેવટે તે શ્રાવિકા બની ગઈ પિદિલાની જેમજ તે સુકુમારિકાએ પણ ત્યારપછી દીક્ષા લેવાને મનમા મકકમ વિચાર કરી લીધો પિદિલાએ જેમ પિતાના પતિની આજ્ઞા લઈને દીક્ષા ધારણ કરી હતી તેમજ મુમારિકાએ પણ પિતાના પતિ સાગરદત્તને પૂછીને ગરપાલિકા આયની પાસેથી દીક્ષા ધારણ કરી લીધી (तएण सा स्मालिया अज्जा जाया इरिया जार गुत्तवभयारिणी बहूहि चउत्य छहम जाब विहरइ, तएण सा समालिया अज्जा अन्नया कयाइ जेणेव गोवालियाओ अज्जाओ तेणेव उवागच्छद) આ રીતે સુકુમારિકા આયી થઈ ગઈ, તે ઈર્યો સમિતિ વગેરેનું પાલન કરવા લાગી અને નવકેટથી બ્રહ્મચર્ય મહાવતની રક્ષા मनगारधर्मामृतमर्पिणी टी० अ० १६ सुकुमारिकाचरितवर्णनम् २३७ ब्रह्मचारिणी सा बहुभिश्चतुर्थपप्ठाप्टमभक्तैर्या रत्-तप कर्मभिरात्मान भावयन्ती विहरति-भास्तेस्म । ततः खलु सा सुकुमारिका आर्या अन्यदा कदाचिद् यौन गोपालिका आर्यास्तत्रोपागच्छति उपागत्य वन्दते नमस्यति, चन्दित्वा नमस्यित्वा ग्यमवादीत् हे आर्या ! इन्छामि खलु युप्माभिरभ्यनुज्ञाता सती चम्पानगर्या वहिः मुभूमिभागस्योधानस्यादूरसामन्ते = नातिदूरे नातिनिकटे पष्ठपप्ठेन-पप्ठमक्तानन्तर पुन पष्ठभरतेन ' अणिक्खित्तेण ' अनिलिप्तेन =अविश्रान्तेन-अन्तररहितेन, तप.कर्मणा ' मुराभिमुही' सूर्याभिमुग्वी ' या वेमागो। भातापयन्ती-आतापना कुर्वती विहर्तुम् । इति । ततस्तदनन्तर ता गोपालिका आर्याः सुकुमानिझामार्यामेवमादिषु.-हे आर्ये ! क्य स्खलु श्रमण्यो और नौ कोटी ब्रह्मचर्य से महाव्रत की रक्षा करने लगी। अनेक चतुर्थ, पष्ठ, अष्टम, भक्त आदि तपस्याओं से अपने आपको भावित भी करने लगी। एक दिन की बात है कि वह सुकुमारिका आर्या साध्वी-जहा गोपालिका आर्या विराज मान थी बहा गई-(उवाग- च्छित्ता वदह, नमसह, वदित्ता नमसित्ता एव वयासी, इच्छामि ण अ- ज्जाओ ! तुन्भेहिं अमणुनाया समाणी चपाओ याहिं सुभूमिभागस्स उजाणस्स अद्र सामते घट्ट छठेण अणिक्खित्ते णं तवोफम्मे ण मुरा भिमुही आयावेमाणी विहरित्तए ) वहा जाकर उसने उन्हें बदना की, नमस्कार किया ! वदना एव नमस्कार कर फिर वह इस- प्रकार कहने लगी-हे भदत ! मे आप से आजा प्राप्त कर चपा नगरी से पाहिर सुभूमिभाग नाम के उद्यान के समीप अतररहित छ? छ? को तपस्या से सूर्याभिमुखी होकर आतापना करना चाहती हैं। (तएण ताओ गोवालियाओ अजाओ सूमालिय एव ययासी-अम्हेण ચતુર્થ, પઇ, અષ્ટમ ભક્ત વગેરે તપસ્યાઓથી પિતાને ભાવિત પણ કરવા લાગી એક દિવસની વાત છે કે તે સુકુમારિકા આયા સાધ્વી જ્યા ગપાલિકા भार्या विमान ती त्या ७ (आगच्छित्ता व दइ, नम सइ, य दित्ता, नम- सित्ता एष वयासी, इच्छामि ण अज्जाओ ! तु भेहिं अभणुन्नाया समाणी च पाओ बाहिं सुभूमिमागरस उजाणरस अदूरसामते छट्ठ छट्टेण अणिक्सित्तेणं वो फम्मेण सूराभिमुही आयावेमाणि विहरित्तए) त्या न तेथे तभने १६नाश નમસ્કાર કર્યા વદના તેમજ નમન્કાર કરીને તેણે આ પ્રમાણે કહ્યું કે હે ભદત ! આપની આજ્ઞા મેળવીને હુ ચપા નગરીમા બહાર સુભૂમિભાગ નામના ઉદ્યાનની પાસે અતર રહિત છઠ્ઠ છઠ્ઠની તપસ્યા કરતા સૂર્યાભિમુખી થઈને । छि (वएण ताओ गोवालियाओ अग्जाओ सूमालियं k- Tana - . निय गिरिधागांगमिपुजा', गा-TATA रिप स्म., नस्माद् नो खलु गफ - परिणा' यति-ग्रामाद गा रानिवभाद् पप्ठ पाठेन ' जारनिरिगप' यार मिला प्रामाद पदि पदो गाजीना स्थिति शीलगादिशारण मातीति भारिपते रालु अम्मारम् 'ता अन्तः अभ्यन्तर 'उस्सयस' उपाययस्य-उगतेः, शिम्भूतस्य 'पितिपरि विखत्तस्स' पृतिपरिसिप्तम्य-मित्यादिना सा. समाधास्य, 'माडिटियाए' सद्घाटिका प्रतिपदापा-मतिपदशाटिकायाः मर्यवाऽनुमाटिनगात्राया त्यर्थ 'समतलपइयाए ' समतपदिकाया =भृमो समतलया स्थापित परणयुगलाया आयात्तिए' आतापयितुम् आतापना कत्रं यत्पते इति पूणि मम्पन्नः । ततः अज्जे ! समणीभा निन्गीआइरियासमियामो जान गुत्तषभचारि णीओ,नो सलु अम्ह कप्पायरियागामस्त जारसणिवेसम्म वा ४० जाय पिररित्त) इस प्रकार सुकुमारिका साधी का कथन सुनकर गोपारिफा आर्या ने उस सुकुमारि का आर्या से इस प्रकार कहा हे आयें ! हम लोग निम्र-य श्रमणिया है । ईर्या आदि समितियो का पालन करती हैं । और नी कोटि से नामचर्य की रक्षा करती है । इस लिये हम लोगो को ग्राम से यावत् सनिवेश से बाहिर रह कर पष्ठ षष्ठ को तपस्या करना यावत् सूर्याभिमुखी होकर आतापन योग धारण करना कल्पित नहीं है । कारण-प्रामादि के पाहिरी प्रदेश में साध्वियों का रहना शीलभग आदि का निमित्त पन जाता है। (कप्पड़ ण अम्ह अंतो उवस्सयस्स विइपरिक्खित्तस्स सघाडियद्धियाए ण समतल पड़ याए आयावित्त ) हमें तो यही कल्पित है कि हम लोग उपाश्रय एव वयासी-अम्हेण अज्जे ! समणोओ निग्गथीओईरिया सामियाओ जाव गुत्त बभचारिणीओ, नो खलु अम्ह कप्पइ बहिया गामरस जाय सण्णिवेसरस वा छ? जाव विहरित्तए ) 0 रीत सुभारि साध्वीनु यन साजी गोपाल આર્યાએ સુકુમારિકા આર્યાને આ પ્રમાણે કહ્યું કે આ ! આપણે નિચ થ શમણીએ છીએ ઈર્યા વગેરે સમિતિઓનું પાલન કરીએ છીએ, અને નવ કેટિથી બ્રહ્મચર્યનું રક્ષણ કરીએ છીએ એથી આપણે ગામથી થાવત સનિશથી બહાર રહીને પણ વર્ષની તપસ્યા કરવી યાત્ સૂર્યાભિમુખી થઈને આતપન ગ ધારણ કર કલ્પિત નથી કારણ કે-ગામ વગેરેથી બહારના પ્રદે शमा सानीमाये रखेषु शासन गरेनु निमित्त as on (कप्पा ण अम्ह अतो उवस्मयस्स विहपरिस्खित्तस्स सपाहियदियाए ण समतलपड्याए आया વિજ્ઞ9) આપણુને તે એ જ કપિત છે કે આપણે શીત, के .
, - मागारधर्मामृनवषिणी टी० अ० १६ सुफुमारिकाचरितनिरूपणम् खल्ल सा सुपुमारिका गोपारिवानामार्याणामेतमयं नो श्रद्दधाति 'नो पनियइ नो मत्येति-नो विश्वसिति, 'नो रोएइ ' नो रोचते, एतमर्थम् अश्रदधाना अपत्यिन्ती, अरोचमाना सति समूमिभागम्य उद्यानग्य अदृरसामन्ते पष्ट-पाठेन यावत्-तप रर्मणा गर्याभिमुखी भूत्वा-आतापना कुर्वती विहरति । सू० १३ ॥ मूलम्-तत्थ णं चंपाए ललिया नाम गोट्ठी परिवसइ, नरवइ दिण्णवियारा अम्मापिइनिययनिप्पिवासा वेसबिहा- रक्यनिकेया नाणाविहअविणयप्पहाणा अड्डा जाव अपरि- भूया, तत्थण चपाए देवदत्ता नामंगणिया होत्था सुकुमाला जहा अंडणाए, तएणं तीसे ललियाए गोट्टीए अन्नया पच गोट्ठिलगपुरिसा देवदत्ताए गणियाए सद्धिं सुभृमिभागम्स कि जो भित्ति आदि से सय तरफ से परिक्षिप्त है भीतर ही अपने शरीर को शाटिका से अच्छी तरह सवृत्त करती हुई और भूमि पर दोनों चरणो को घरावर स्थापित कर आतापना ले ( ताण सा समारिया गोवारियाए एमट्टनो सहएइ, नो पत्तियइ नो गएइ एयम अ० ३ सुभूमिभागस्स उज्जाणस्स अदूरसामते छ? उट्टेण जाव विहरइ ) इस गोपालिका आर्याके कथन ऊपर उत्स सुकुमारिका आर्या श्रद्धा नही जमी उस पर उसे विश्वास नहीं आया, वह उसे रुचों नही । इस तरह वह उसे अश्रद्धा अप्रतीति और अरुचि का विपय पनाती हुई सुभूमिभाग नामक उद्यान के पास पष्ट पष्ठ की तपस्या करती हुई वह सूर्याभिमुख होकर आतापना करने लगी ।। सू० १३ ॥ પરિક્ષિત ઉપાશ્રયની અંદર જ પિતાના શરીરને શાટિકા-સાડી ના શી રીતે ઢાકીને અને ભૂમિ ઉપર બને ચરણને બરાબર સ્થાપિત કરીને આપના ये (तण्ण सा सूमाल्यिा गोवालियाए एयमट्ट नो सदहइ नो पत्ति नो रोएइ, एयम? अ० ३ सुभूमिभागास उज्जाणम्स जदूरसामते दुण जाव વિદ) ગે પાલિકા આયના કથન ઉપર સુકુમાર આર્યાને શ્રદ્ધા થઈ નહિ, તેના ઉપર તેને વિશ્વાસ થશે નહિ તે તેને ગમ્યુ પણ નહિ આ રીતે તે તે કથન પ્રત્યે અશ્રદ્ધા, અપ્રતીતિ અને અરુચિ ધરાવતી સુભૂમિભાગ નામના ઉદ્યાનની પાર્ગે વર્ષ થઇની તપસ્યા કરતી સૂર્યાભિમુખી થઈને આતાપના કરવા લાગી છેસૂત્ર ૧૩ | को ematureaun+Anandane - २८ লাগে। निकपः ईतियोगमितिका, गा1-HTA रिपः म., तस्माद् नौ ग्पल भस्माफ - परिया' पति-प्रामाद गारद सनिवंगाद् पप्ठ पाठेन 'जागरितए याद पिग ग्रामादे पदि महगे माध्वीना स्थितिः शीलभारिशारण गातीति भाःतमन्यते यलु मारम् 'तो' अन्तः अभ्य तर 'उमा' आमयाय, शिम्भूनस्य 'पितिपरि क्वित्तस्स' पृति परिसिमस्य-मित्यादिना नः समानस्य, साडिदियाए' सद्गाटिका पतिपदागा प्रतिपदशाटिकायाः मथाऽनुदाटिनगात्रामा प्रत्यर्थ 'समतलपइयाए ' समतलपदिकाया भूमो समतलाया स्थापित चरणयुगलाया आयारित्तए' जातारयितुम् आतापना कर पल्पते प्रति पूर्वण मम्बन्धः । ततः अज्जे ! समणीमा निग्गयोआ इरियासमियामो जार गुत्तरमचारि णीओ,नो सलु अम्म कप्पायरियागामस्तसारमणिवेसस्म वा उद० जाव चिहरित्तए) इस प्रकार सुकुमारिका साधी का कथन सुनकर गोपारिफा आर्या ने उस सुकुमारिका आर्या से उस प्रकार कहा है आयें । हम लोग निम्रय श्रमणिया है। ईयां आदि समितियो का पालन करती हैं । और नौ कोटि से नामचर्य की रक्षा करती है । इस लिये हम लोगो को ग्राम से यावत् मनिवेश से थाहिर रह कर पष्ठ षष्ठ की तपस्या करना यावत् सूर्याभिमुखी होकर आतापन योग धारण करना कल्पित नहीं है । कारण -प्रामादि के पारिरी प्रदेश में साध्वियों का रहना शीलभा आदि का निमित्त पन जाता है। (कप्पइ ण अम्ह अंतो उवस्सयस विइपरिक्खित्तस्स सघाडियद्धियाए ण समतल पड़ याए आयावित्तण ) हमें तो यही कल्पित है कि हम लोग उपाश्रय के एव पयासी-अम्हेण अम्जे । समणीओ निग्गधीओईरिया सामियाओ जाव गुत्त धभचारिणीओ, नो खलु अम्ह कापइ बहिया गामरस जाप सणिवसास वा छट्ट जाव विहरित्तए ) मा रीते सुभारि सावान थन सामान पनि આર્યાએ સુકુમારિકા આર્યોને આ પ્રમાણે કહ્યું કે આર્યો ! આપણે નિગ્રંથ શ્રમણીએ છીએ ઈર્યા વગેરે સમિતિઓનું પાલન કરીએ છીએ, અને નવ કેટિથી બ્રહ્મચર્યનું રક્ષણ કરીએ છીએ એથી આપણે ગામથી યાવત સન્નિવેશથી બહાર રહીને કઈ પણની તપસ્યા કરવી યાવતું સૂર્યાભિમુખી થઈને આપન ગ ધારણ કરે કલ્પિત નથી કારણ કે-ગામ વગેરેથી બહારના પ્રદે શમાં સાધ્વીઓએ રહેવુ શીલભગ વિગેરેનું નિમિત્ત થઈ જાય છે (૪ अम्ह अतो उवस्सयस विपरिस्खिचस्स सवामिदियाए ण समतलपड्याए आया वित्तए) मापनेता से पित, आप नीत यामर of मनगारधामृतथापिणा टीफा अ० १६ सुकुमारिकाचरितवर्णनम् वेश्याविहारकृतनिकेता - वेश्यागृहकृतनिवासा, तथा-' नाणाविहअविणयप्प- हाणा' नानाविधाऽविनयप्रधाना, तया-माढया धनधान्यसम्पन्ना, यावद् अपरि- भूता=परैरनभिभूता, आसीत् । ता र लु चम्पाया नगयीं देवदत्ता नाम 'गणिया' गणिकान्वेश्या, आसीत् , सा किम्भूतेत्याह-मुकुमारपाणिपादा, चतुप्पष्टिकला. विशारदा 'जहा अडणाए ' यथा अण्डशाते अण्डनामके तृतीये ज्ञाता ययने यथाऽस्यावर्णन तद्वदिह बोध्यम् । ततः सलु तस्या ललिताया गोष्ठ्या अन्यदा- अन्यस्मिन् कस्मिश्वित्ममये, पञ्च ' गोहिल्गपुरिसा' गोष्ठिकपुरुषा-मण्डलीपुरुषाः समानय यस्का इत्यर्थः देशदत्तयागणिकयामार्य सुभूमिभागस्योद्यानस्योद्यानश्रिय= उद्यानगोभा मत्यनुभवन्तो विहरन्ति । तत्र खलु एको गोष्ठिकपुरुषो देवदत्ता नाणाविह अविणयप्पलाणा, अड्डा जाव अपरिभूया) इसने अपनी सेवासे राजाको प्रसन्न कर रखा था-लो उसकी कृपा से यह बिलकुल स्वच्छद थे। अपने माता पिता आदि कुटुम्बी जनो की यह परवाह नहीं किया करते थे-उनको इन पुरुषों से बिलकुल भय नही था। वेश्याओं के घर में पडे रहना-यही इनका एक काम थी। अनेक प्रकार के अविनय प्रधान रूप अनाचारों का सेवन करना यही उनका काम था। पैसे की-द्रव्यको उनके- पाम कमी नही थी। कोई इनको कुछ कह सुन नहीं सकता था । (तत्थ का चपाए देवदत्ता नाम गणिया होत्या, सुकुमाला, जता अडणाण, तरण तीसे लरियाए गोट्टीए अन्नया पच गोहिल्लगपुरिसा देवदत्ताए गणियाए सद्धिं सुभूमिभागस्स उज्जा. णस्स उज्जाणसिरिं पच्चणुभयमाणा विहरति ) उसी चपा नगरी में जाव अपरिभूया ) ते भी तानी वाथी राजन प्रसन्न ४२सो तो તેમની કૃપાથી તે મડળી એકદમ સ્વચ્છ દપણું આચરતી હતી પિતાના માતા પિતા વગેરે કુટુંબી લેવી પણ તેઓ દરકાર કરતા ન હતા તેઓને આ વડીલેની કોઈપણ જાતની બીક હતી નહિ, વેશ્યાઓના ઘેર પડયા રહેવુ ફક્ત એજ એમનું એક માત્ર કામ હતું અનેક પ્રકારના અવિનયપૂર્ણ આચરણે કરવા એજ તેઓના જીવનનું મુખ્ય કામ હતું ધનની તેઓની પાસે ખેટ હતી નહિ કેઈપણ નાગરિકની એટલી પણ તાકાત નહોતી કે તેઓ તેમને કઈ પણ કહે! (नत्य ण च ॥ दे दत्ता नाम गणिया होत्या, सुकुमाला, जहा अडणाए, तरण तीसे ललियाए गोडीए मन्नया पच गोहिल्गपुरिसा देवदत्ताए गणियाए सदि सुभूमिभागस्स उजागरस उजनाणसिरिं पच्चणुभवमाणा विहर ति) ते २२ ५ 6
मानाचा
उजाणस्स उजाणसिरिं पञ्चभमाणा विहरति, तरथ णे
एगे गोहिलगपुरिस देवदत्तं गणियं उन्छंगे धरइ एगे पिट्ठओ
आयपत्त धइ एगे पुप्फपुरयं गा एगे पाप गाड एगे
घामरुसेव करेइ ताण मा समालिया अजा देवदत्तं गणिय
तेहिं पंचर्हि गोहिष्टपुरिसहिं सम् िउरालाई माणुस्सगाई
भोगभोगाइ भुंजमाणी पासइ ताण ती इमेयारूपेसंकप्पे
समुप्पज्जित्था-अहो इमाइस्थिया पुरा पोराणाणं कम्माणं
जाव विहग्इ, तं जाणं केइ इमस्स सुचरियरस तव.
नियमचभचेतासम्म पहाणे फलवित्तिरिममे अस्थि तो
णं अहमवि आगमिस्मेणं भागहणेणे इमेयारूपाइ उरा-
लाइ जाव विहरिज्जामि त्तिरह नियाणं करेइ करित्ता
आयावणभूमिओ पचोरुहइ ।सू० १४॥
टीका-' तत्थ ण चपाप' इत्यादि । तत्र खलु चम्पाया नगयां ललिता
नाम्नी 'गोट्ठी' गोष्टी मण्डली परिवसति किं भूतो सा गोष्ठीत्याइ-'नरवइदिग्ग
नियारा' नरपतिदत्तविचारा नरपतिना दत्तो विचार. समतिर्यस्यै सा तथा सेवा
दिना सन्तुष्टान्नरपतेर्लब्धस्वतन्त्रता, तया - ' अम्मापिइनिययनिष्पिवासा'
अम्बापितृनिजानि पिपासामा तापित्रादि निरपेक्षा, 'सरिहारकय निकेया'
तत्य ण चपाए ललिया नाम ' इत्यादि ।
टीकार्य-(तत्य ण चपाए ललिया नाम गोही परिवसइ) उस
चपानगरीमें 'ललिता' इस नामकी गोष्ठी-मडली-रहती थी । ( नरवई
दिण्णवियारा, अम्मापिइ नियय निप्पिवासा वेसविहोरकथनिकेया,
,
तस्थण चपाए ललिया नाम' इत्यादि-
२४ार्थ-(तत्यण
चपाए ललिया नाम गोही परिवसइ) ते या
नगदीमा 'लिता' नाम भजी २ती ती (नरवइ, दिण्णवियारा
अम्मापिड निययनिप्पिासा, वेसविहारफयनिकेया, नाणाविहअविणयपहाणा, अड्डा
भनगारातियपिणी टीका अ० १६ सुरुमारिकाचरितवर्णनम् पुस्तौ सामुदारानगेष्टान् भोगान् मुजाना-पुर्वीं पश्यति, ततस्तरवाः मुझुमा रिझाया जयमेतदय अस्यमाणम्वरूपः संरल =पिचारः समुत्पद्यत-अहो ! खलु घ सो पर्वमवे 'पोरागाण' पुरागानाम्-पुरातनाना मचिताना कर्मा पुश्कर्म गा पाकगृत्तिविशेष सत्यनुमान्ती विहरनि तत्-तस्मात् कारणाद् यदि सलु कोऽप्यस्य नुचरितम्य तपोनिनमब्रह्मचर्षवामस्य रल्याण इप्टः शुभ- रूप , फगृत्तिविशेषः अस्ति, 'तो' तर्हि खलु अमपि नागमिस्सेण' नागामिया भवनहणेन इमान् एतद्रूपान् उदारान् भोगान् यामद् भुनाना — विड- उस पर चमर होरे। इस तरर से उस सुकुमारिका आर्या ने उन मडली के पाच पुरुषों के माय उस टेवदत्ता गणिका को उदार मनुष्य भव सपन्धी काम भोगों को नोगते हुए देग्या । (तएण तीसे इमेया- स्वे सकप्पे सनुपन्जिया-अहोण इमा इत्यिया पुरा पोराणाण कम्माषा जाब विहरह) ता उम सुकुनारिका आर्या को इस प्रकार का यह विचार उत्पन्न आ-जहो! इम स्त्री ने पूर्वभव में जो पुण्य कर्न कमाये हैं उन्हीं पुराने पुण्य कर्मों के यारत् फवृत्ति विशेष को यह भोग रही है । (त जइण के इमस्त सुचरियस्समय नियमभचेरवासस्स काणे फलवित्तिविलेसे अस्थि तो ण अहह्मवि आगमिस्संग भवग्गणेण इमे रारूवाइ उसलाइ जाप विहानामि, तिकटू नियाग करेड, करिता आयावगभूमिओ पच्चोल्हइ ) इसलिये यदि इन पालिन तप, नियम एवं ब्रह्म व्रतो का कोई शुभरूप फल यात्त विशेष है तो में भी आगामी भब में इसी तरह के उदार प्रनु य भव सम्म धी काम भोगों ઢળ્યા આ રીતે તે સુકુમારિ આર્યોએ મંડળીના પાચે માણસની સાથે તે દેવદત્તા ગણિકાને ઉદાર મનુષ્યભવના કામો सागवता नया (तरण तीसे इमेयाने सकप्पे समुप्पज्जित्या- अहो ण इमा इथिया पुरा पोराणाण कम्माण जाब विहरइ) त्यारे ते सुमार भार्याने या न पिया CE- ભજો કે અહે? આ સ્ત્રીએ પૂર્વભવમા જે પુણ્યકર્મ કર્યા છે તેમને લીધે જ એટલે કે તે જ પૂવભવના પુય-કમેના યાવતું ફળવિદોષને આ ભોગવી રહી छ ( त जइ ण केइ इमरस सुवरियस वर नियम मिचेरयाप्तस्म कल्लाणे फल वित्तिविसेसे अयि तो ण अहनरि आगमित्से ण भरगइगे ण इभेयारूलाइ उरा लाइ जाव विहरिज्नामि, ति कट्टु नियाण करेइ, फरित्ता आपरावगभूमिओ पन्चोरुहा) मा मा भास વડે આચરવામાં આવેલ તપ, નિયમ અને બ્રહ્મચર્ય વ્રતનુ શુભ ફળ છે તે હું પનું આવતા ભવમાં આ જાતના જ ઉદાર સબધી કામગીને જોવુ આ પ્રમાણે વિચાર કરીને તેણે નિદાન " मारमा गणिकागुत्सरे धरति एप 'पिभो' : 'माया' आपात्र धाति, एफः 'पुष्पपूरयं' पर पुष्पामा गनापि '' सपति, पर: पादौ-अत्तयादिनाशयति । 1- 'गागराताना पामरपीजन फरोति । तत' पलु मा मारिश भार्या गतिमान पाभिगी एक देवदत्ता नाम की एक गणिका तो पायाम लामों में निष्णात धी। सफे राध र आदि मपी अपयर पारन की अधिक सुकुमार थे। मयूर अर नाम के तृतीय शाताध्ययन में उमरा जैसा घर्णन किया गया है-धैमा ही वर्णन सपा गांवानना चाहिये । एक समय की पात है कि गोष्ठी के ५, रुप कितने ममान परसवाड़े थे देवदत्ता गणिका के साथ उस सममिभाग पान में आये-और चहा की उद्यान की शोभा का निरीक्षण करते इधर-उधर घूमने लगे-(तत्ध ण एगे गोहिल्ग पुरिसे देवदत्त गणि उच्छगे धरह, रागे पिट्टओ आयवत धरेह, गगे पुष्फपय गण्ड, एगे पाए रगड, एगे चामरुवखेच परेइ, तपण सा समारिया अजजा देवदत्त गणिय तेहिं पहिं गोठिल्लगपुरिसेहि सद्धिं उगला माणुस्स गाइ भोगभोगाइ भुज माणी पासह) वा एक उस मंडली के पुस्प ने देवदत्ता गणिका को अपनी गोदी मे बैठाया, एक दूसरे-मटली के पुरप ने उसके पीछे से उमके ऊपर छत्तो ताना, एक तीसरे पुरुपने उसके निमित्त पुष्पों की रचना रची, चौथे पुरुप ने उसके दोनों पैरों में मादुर लगाया पाचवे ने નગરીમા દેવદત્તા નામે એ ગણિકા રહેતી હતી તે ૬૪ કળાઓમા નિપુણ હતી, તેને હાથ–પગ વગેરે બધા અને અતીવ સુકોમળ હતા મયૂરી આડ નામના ત્રીજા અધ્યયનમાં દેવદત્તાનુ જેવું વર્તન કરવામાં આવ્યું છે તેવું અહી પણ જાણી લેવું જોઈએ એક દિવસની વાત છે કે ગાડી–મડળીના પાચ માણસ કે જેઓ સરખી ઉંમરવાળા હતા–દેવદત્તા ગણિકાની સાથે તે સુભૂમિભાગ ઉદ્યાનમાં ગયા અને ત્યાની ઉદ્યાન શોભાનું નિરીક્ષણ કરતા આમ तेम १२१८ या (तत्थण एगे गोदिल्लगपुरिसे देवदत्त गणिय उच्छो धरइ, एगे पिटुओ आयवत्त धरेइ, एगे पुप्फपूरय रएइ, एगे पाए रएइ, एगे चामरुक्खे व करेइ तएण सा सूमालिया अगा देवदत्त गणिय नहिं पचहि गारिपुरि सेहि सद्धि उरालाइ माणुस्सगाइ भागभोगाइ भुजमाणी पासइ) त्या ते भ3 ળીના એક માણસે દેવદત્તા ગણિકાને પિતાના ખોળામાં બેસાડી બીજા માણસે તેની ઉપર છત્રી તા, ત્રીજા માને તેના માટે પુષ્પો ની રચના કરી, ચોથા માણસે તેના પગમાં લાલ રંગ લગા, પાચમાં માણસે તેના ઉપર ચામર જ વર્ણન संपेहेइ मेनगारधर्मामृतपिणी टीकाअ० १६ सुकुमारिकानिरूपणम् माणीए इमेयारूवे अज्झस्थिए जाव समुप्पज्जित्था, जयाणं अह अगारवासमझे वसामि तया णं अह अप्पवसा, जया णं अह मुंडे भवित्ता पव्वइया तया णं अहं परवसा, पुलिव च णं ममं समाणीओ आढायति२ इयाणि नो आदतिर त सेयं खल्ल मम कल्ल पाउ० गोवालियाण अतियाओ पडिनिक्खमित्ता पाडिएक उवस्सय उपसंपज्जित्ताण विहरित्तए तिकटु एव संपेहिता कल्ल पा० गोवालियागं अज्जाणं अंतियाओ पडिनिक्खमइ पडिनिक्खमित्ता पडिएकं उवस्सय उसपज्जि- नाणं विहरइ, तएणं सा सूमालिया अज्जा अणोहट्टिया अनिवारिया सच्छदमई अभिक्खण अभिक्खणं हत्थे धोवेइ जाव चेएइ तत्थ वि य णं पासत्था पासत्यविहारो ओसण्णा ओसागविहारी कुसोलार संसत्तार बहूणि वासाणि सामण्ण- परियागं पाउणइ अद्धमासियाए सलेहणाए तस्स ठाणस्स अणालोइयअपडिकंता कालमासे काल किच्चा ईसाणे कप्पे अण्णयरसि विमाणसि देवगणियत्ताए उबवण्णा, तत्थेगइयाण देवीणं नव पलिओवमाई ठिई पपणत्ता, तत्थ णं सूमालियाए देवीए नव पलिओवमाई ठिई पन्नत्ता । सू० १५ ।। टीका--'तएण सा' इत्यादि । ततः खलु सा सुकुमारिका आर्या सरीर 'तएण सा सूमालिया अजा' इत्यादि । टीकार्थ-(तएण) इस के बाद (सामूमालियाए अज्जा सरीर घसा तएण सा सूमालिया अज्जा' इत्यादि- (तरण) त्या२५७ (सा सुमालिया अज्जा सरीरपउवा जाया पावि २४४ - ताधकथा रिज्जामिति बटु' विदरामिति कत्या 'निगाण ' निदान करोति, कत्ता आतापनभूमिवः प्रत्यारोपति-भावापना परिपनी॥१०१४॥ मूलम्-तएणं सा सूमालिया अज्जा सरीरवउसा जाया यावि होत्था, अभिक्षण अभिक्सणंर हत्थे धोवेइ पाए धोवेर सांसं धोत्रेड मुहं धोइ थपंतगड धोवेइ करसंतराइ धोवेइ गोज्झतराइ धोवेइ जत्थ णं ठाणं वा सेज वा निसीहियं वा चेएइ तत्थ वि च णं पुव्यामेव उदएणं अब्भुखइत्ता तओ पच्छा ठाणं वा३ चेइए, तएणं ताओ गोवालियाओ सूमालियं अज एव वयासी-एव खल्ल देवाणुप्पिया। अजे अम्हे सम- णीओ निग्गंधीओ ईरियासमियाओ जाव चभचेरधारिणीओ नो खल्लु कप्पइ अम्हं सरीरवाउसियाए होत्तए, तुम च णं अजे ! सरीरवाउसिया अभिक्खणं अभिक्खण हत्थे धोवेसि जाव चेएसि, तं तुम णं देवाणुप्पिए । तस्स ठाणस्स आलो- एहि जाव पडिवज्जाहि, तएण सा सूमालिया गोवालियाणं नो आढाइ नो परिजाणइ अणाढायमाणी अपरिजाणमाणी विहरइ, तएण ताओ अज्जाओ सूमालिय अज्जं अभिक्खणं अभिक्खणं अभिहीलति जाव परिभवति, अभिक्खणं अभिक्खण एयमह निवारैति, तएणं तीए सूमा लियाए समणीहिं निग्गंथीहि हीलिज्जमाए जाव वारिज्ज- को भोगू । ऐसा विचार कर उसने निदान घध किया और करके फिर वह आतापन भूमि से आतापना लेकर अपने स्थान आगई ।। सू०१४॥ બધ કર્યો અને કરીને તે આતાપન ભૂમિથી આતાપના લઈને પિતાના સ્થાને अज्जाणं एयमट्ठ આવી ગઈ છે સૂત્ર ૧૪ છે मनपारचौमाविगी टीकामा १६ सुकुमारिकानिरूपणम् माणीए इमेयावे अज्झस्थिए जाव समुप्पज्जित्था, जयाणं अह अगारवासमझे वसामि तया णं अह अप्पवसा, जया णं अहं मुंडे भवित्ता पव्वइया तया णं अहं परवसा, पुव्यि च णं मम समाणीओ आढायति२ इयाणि नो आढति२ त सेयं खल्ल मम कल्ल पाउ० गोवालियाणं अतियाओ पडिनिखमित्ता पाडिएक उवस्सयं उक्सपज्जित्ताण विहरित्तए तिकटु एव संपेहेइ संपेहित्ता कलं पा० गोवालियाणं अजाणं अंतियाओ पडिनिक्खमइ पडिनिस्खमित्ता पडिएकं उवस्सय उवसपज्जि- नाणं विहरइ, तएण सा सूमालिया अज्जा अणोहट्टिया अनिवारिया सच्छदमई अभिक्खण अभिक्खणं हत्थे धोवेइ जाव चेएइ तत्य वि य णं पासत्या पासत्वविहारो ओसण्णा ओसण्गविहारी कुसीलार संसत्ता२ वहूणि वासाणि सामण्ण- परियागं पाउणइ अद्धमासियाए सलेहणाए तस्स ठाणस्स अणालोइयअपडिकंता कालमासे काल किच्चा ईसाणे कप्पे अण्णयरसि विमाणसि देवगणियत्ताए उबवण्णा, तत्थेगइयाणं देवीणं नव पलिओवमाई ठिई पपगत्ता, तत्थ णं सूमालियाए देवीए नव पलिओवमाई ठिई पन्नत्ता ॥ सू० १५ ॥ टीका-'तएण सा' इत्यादि । ततः खलु सा सुकुमारिका आर्या 'चरीर तएपा सा सूमालिया अजा' इत्यादि ।। टीकार्थ-(तएण) इस के बाद (सा सूमालियाए अज्जा सरीर परसा तएण सा सूमालिया अज्जा' इत्यादि -(तरण) त्या२५४ी ( सा सूमालिया अम्जा सरीरयउता जाया पावि . .
२४४ रिज्जामिति पहिरामि 'निक.पानिपाणं ' निदान परीति, कन्या भावापनभूमिव' प्रत्यारोदति भावापना पति १४॥ मूलम्-तएण सा सूमालिया अज्जा सरीरबउसा जाया यावि होत्था, अभिक्षण अभिक्खणर हत्थे धोवेड पाए धोवेइ सांसं धोवेड मुह धोवेद धर्णनगड धोवेड कम्सतराई धोवेड गोज्झतराइ धोवेइ जत्थ ण टाणं वा सेज वा निसीहियं वा चेएइ तत्थ वि य णं पुष्यामेव उदएणं अभुक्खइत्ता तओ पच्छा ठाणं वा३ चेइए, तएण ताओ गोवालियाओ सूमालिय अज एव वयासी-एव खल्ल देवाणुप्पिया। अजे अम्हे सम- णीओ निग्गंधीओ ईरियासमियाओ जाव वभत्रधारिणीओ नो खल्लु कप्पइ अम्हं सरीरवाउसियाए होतए, तुम च णं अजे ! सरीरवाउसिया अभिक्खण अभिक्खणं हत्थे धोवेसि जाव चेएसि, तं तुम ण देवाणुप्पिए । तस्स ठाणस्स आलो- एहि जाव पडिवज्जाहि, तएण सा सूमालिया गोवालियाणं अज्जाणं एयम8 नो आढाइ नो परिजाणइ अणाढायमाणी अपरिजाणमाणी विहरइ, तएण ताओ अज्जाओ सूमालियं अज्जं अभिक्खणं अभिक्खणं अभिहीलति जाव परिभवति, अभिक्खणं अभिक्खण एयमह निवारेति, तएणं तीए सूमा लियाए समणीहिं निग्गंथीहिं हीलिज्जमाणाए जाव वारिज्ज- को भोगू । ऐसा विचार कर उसने निदान वध किया और करके फिर वह आतापन भूमि से आतापना लेकर अपने स्थान आगई ॥ सू०१४॥ બધ કર્યો અને કરીને તે આતાપન ભૂમિથી આતાપને લઈને પિતાના સ્થાને આવી ગઈ છે સૂત્ર ૧૪ છે . . भागारधामृगचरिणी टीका १० १६ सुकुमारिकाचरितनिरूपणम् २४७ तता सलु गोपारिमा आयोः सुकुमारिकामार्शमेवमत्रादिपुः एस दलु हे देवानुपिये ! आयें ! ३य श्रमण्य -तपस्विन्यः निन्थ्यः नागाभ्यन्तरग्रन्थि- रदिताः ईमिता यापद गुप्तब्रह्मचर्यधारिण्य' स्म', नो सलु बातेमाल सरीसाउसिगाए ' शरीपशिश हत्तए' भवितुम् इति त्व च खल हे आर्ये । शरीरसाइशिका जाता अमोण-पुन पुनरतिगयेन हत्तौ धामि प्रक्षालयसि, यावत्-स्थान वा शल्या वा म्यान्यायभूमि वा जलेनाभ्युक्ष्य 'एसि' चेतयसि सानाटिक करोपीत्यर्थः । तत्-तस्मात् स्व सलु हे देवानु पिये ! तत् स्थानम् ' आलोहि ' आलोचय, तिचार महाशयेत्यर्थः । यादव 'पडियनाहि प्रतिपय प्रायश्चित्त स्वीकुरु' इत्यर्थः । ततः खलु सा सुख- लिका आर्या ने उस सुजमारिका ओर्या से कहा-(एच सल देवाणुप्पि- या! अज्जे अम्हे समणीओ निग्गंधीओ ईरियोलमियाओ जाय यभचेर धारिणिओ, नो ग्वलु कप्पइ अन्ह सरीरयाउलिया होत्त, तुमच णं अज्जे मरीर नाउसिया, अभिवण २ हत्ये धोबेसि, जाव चेसि) हे देवानुप्रिय! हम आणि निर्जन्य अमणिया है। ईर्या आदि पांच समि- नियोंदा पालन करती हैं। नौलोटि ब्रह्मचर्य सस्लिमोवतको पालन करती ह। अत. हम लोगों को अपने शरीर के सस्कार करने में परा- यण पनना धल्पित नहीं हैं। हे आयें! तुम शरीर संस्कार करने में परायण बन चुकी हो। यार २ तुम हायो को धोनी हो यावत् स्शनको शव्या को, और स्वाध्याय भूमि को परिले से ही पानी से धोकर नियत फरती रो (त तुम ण देवाणुप्पिए । तस्स ठाणस्म आलोएनि, जाव पडिवज्जाहि ) इस लिये हे देवानुप्रिये ! तुम उस स्थान की आगेचना करो-अपने अतिचारों को प्रकाशित करो पावत् उनका प्रायश्चित्त लो। सुमारित मायान मा प्रभारी छु ३-(प खलु दवाणुपिया । अग्ने अम्हे समणीओ निग्गयीओ ईरियाममियाओ जाव उभचे धारिणिो ने सलु वापर अम्हे मरीरवाउसियाए होत्तए, तुम च ण अब्जे सरीग्याउसिया, अभिवण २ हत्थे धोवेसि जार चामि) व नुप्रिये ! १ मयि नियम એ છીએ, ઈર્યા વગેરે પાચ સમિતિઓનું અને પાલન કરીએ , નવ કોટિવી બ્રહ્મચર્ય મહાવ્રત કા કરીએ છીએ એવા પિતાના પારને સત્કાર કરે એ આપણા માટે એગ્ય ગણાય નકિ હે આ 1 તમે રાત્રીના સરકા રમા પરાયણ બની ચૂકી છે તમે વારવા હાથને ધુએ છે યાવત્ સ્થાનને, શધ્ધાને અને સ્વાધ્યાયભૂમિને પહેલેથી જ પાણીથી ઘેઈને નક્કી કરી લે છે ( त तुम देवाणुप्पिए ! तरस ठाणस आलोहि, जाव परिवग्नाहि ) al - - - . - घउसासरीवाना शरीरममाया ना गणमान, जमीदाग २ पुनः पुनः सो पार' धारति माली, पाही भापति सीग' गोप-शिर' धापति, गुरधापति, गराइमरामि धारति कागद' मा न्तराणि पानि, 'गोगा गुशान्तरामिगपपदेश भाति, यत्र पठाण वा 'म्यानम्-उपवेशनार्य स्थान जाग्या निसीरियामधे. धिकी स्वा-यायभूमि या 'चेपड' घेतयति-गेनि, तत्रापि च गउ पूमिगोदकेन अभुक्खाचा' अभ्युक्ष्य अमिपिन, ना पचात् 'ठाण या 'सान या भय्या वा नेपेधिरी चेएइ' चेतपति-परोति । जाया यानि होत्या-अभिसण २ पत्ये पोह, पाप धोवेड, मीस धोवेह, मुह धोयेह, थणतराइ धोयेइ, करातरा घोवेर, गोजमतराइ धोवेइ) वह सुकुमारिका आर्या शरीर सस्कार करने में भी तत्पर बन गई। चार २ यह ध योने लगी, पैर धोने लगी, शिर धोन लगी, मुग्य धोने लगी, स्तनातरों को धोने रगी, कक्षाओं को धोने लगी और गुख प्रदेश को धोने लगी। (जत्य ण ताण वा संज्न बा मिसीहिय वा चेएइ तत्थ वियण पुयामेव उदएणअभुस्खइत्तो तओ पच्छा ठाण घा ३ चेएइ, तरण ताओ गोवालियाओ अलाओ समालिय अज एव पयासी) इसी तरह वह जतां अपना पैठने के लिये स्थान बनाती, शग्या-पाथरती, स्वाभ्याय स्थान करती, वहा भी वह पहिले से ही उसे जल से सींच देती-तब जाकर वहां वह अपना स्थान, रा था एवं स्वाध्याय भूमि नियत करती। इस प्रकार की परिस्थिति देख कर गोपा होत्या-अभिक्खण २ हत्थे धोवेइ, पाए धावेह, सीस धोवेइ, मुह धोवेइ, थणराइ धोवेइ, कसतराइ धोवेइ गोज्झतराइ धोवेइ) ते सुमारि सार्या शरीर-स २४१ રના કામમાં પરોવાઈ ગઈ વાર વાર હાથ દેવા લાગી, પગ ધવા લાગી, માથે છેવા લાગી, મુખ દેવા લાગી, સ્તન વચ્ચેના સ્થાનને ધેવા લાગી,બગોને धोi asl, मने गुस स्थानाने पापा जी (जस्वर्ण ठाण वा सेज्जवा निसी हिय वा चेएह तस्यवि य णं पुव्यामेव उदएण अन्मुक्खइत्ता तो पच्छा ठाण षा ३ चेएइ वए ण ताओ गोवालियाओ अज्जाओ सूमालिय अज्ज एव बयासी) આ પ્રમાણે જ તે જ પોતાનું બેસવાનું સ્થાન નક્કી કરતી, કે પથારી પાથરતી અથવા તે સ્વાધ્યાય માટે બેસવાનું સ્થાન નક્કી કરતી ત્યા પહેલેથી જ તે રસ્થાનને પાણું છાટતી હતી અને ત્યારપછી તે ત્યા પિતાનું સ્થાન-શપ્યા અને સ્વાધ્યાય થાન નક્કી કરતી હતી આ જાતની પરિસ્થિતિ જોઈને ગોપાલિકા . त २४९ - अनगारधर्मामृतपषिणी टीका भ० १६ सुकुमारिकाचरितवर्णनम् भूतः, यदा-यावत् काल खलु अहमगारवासम ये वमामि, तदा तावत् काल खल्लह ' अप्पासा' आत्मवशा बाधीना आसम् , यदा खल्वह मुण्डा भूत्वा प्रमजिता तदा खरवह परयशा पराधीना जाता । 'पुब्धि ' पुरा पूर्वस्मिन् काले च खलु 'मम'मा अमण्यः 'आहायति' २ आदि पन्त, तथा परिजानन्ति, इदानीं नो आनियन्ते नो परिजानन्ति, 'त' तत्-तस्मात् श्रेयः खलु मम कल्ये प्रादुर्भुत भभातया रजन्या यावज्ज्वलति सूर्ये अभ्युदते गोपालिकानामार्याणामन्तिात् मतिनिष्क्रम्य 'पाडिएक ' पार्थक्य-पार्थक्याश्रय पृथग्भूतम् अन्धमित्यर्थः 'उब- यह आध्यात्मिक यावत् मनोगत सकल्प उत्पन्न हुआ-(जयाण अम्ह आगारचासमझे चसामि तयाण अह अप्पयसा जयाण अह मुडे भवित्ता पच्चष्टया तयाण अह परवसा, पुचि च ण मम समणीओ आढायंति, इयाणि णो आदति २ तं सेय खलु मम करल पोउगोवालि- याणं अतियाओ पडिनिक्खमित्ता पडिण्क्क उवस्सयं उसपज्जित्तार्ण विहरित्तए ति कटु एव सपेहेड ) जर तक मे घर में रही तब तक स्वाधीन रही-और अय जब से मुंडित होकर प्रवजित हुई है तब से पराधीन बन रही है। पहिले ये श्रमणिया मेरा आदर करती थी-मेरी घात मानती थी परन्तु अयतो कोई भी न मेरा नादर करती है-और न मेरी पात ही मानती है। इस लिये सुडो अब यही उचित होगा कि दूसरे दिन जय प्रातः काल होने पर सूर्य प्रकाश से चमकने लगे- तव में गोपालिको आर्या के पास रो निकल कर किसी दूसरे भिन्न उपा में રોક ટેસ્ટ કરી ત્યારે તેને આ વાતને આધ્યાત્મિક યાવતું મને ગન અકલ્પ नव्या ( जयाण अम्ह आगारवासमझे वमामि तयाण अह अप्पसा जयाण अह मुझे भवित्ता पव्वइया तयाण अह परवसा पुचि च ण मम समणीओ आटाय ति, इयाणि णो आढति • त सेय सलु मम पाउ० गोवालियाण अति याओ पडिनिक्खमित्तो पडिक्क उपस्सय उवसपज्जित्ताण विहरित्तए त्ति कटु एप सपेहेइ) rया सुधी हु घरमा २ही त्या सुधी स्वाधीन २8 ५६ यारथी સુડિત થઈને પ્રત્રજીત થઈ છું ત્યારથી પરાધીન થઈ ગઈ છુ શ્રમણ એ મારે આદર કરતી હતી, મારી વાત માનતી હતી પણ અત્યારે તે કોઈ પણ મારે આદર નથી કરતુ અને મારી વાત પણ માનતુ નથી તેથી મારે માટે એ જ ઉચિત છે કે બીજે દિવસે સવારે સૂર્ય ઉદય ગોપાલિકા આર્યોની પાસેથી નીકળીને કે બીજા ઉપાશ્રયે જતી तना ते विचार या (सपेहिता) बियार ४शन त (कल्लपा० પહેલા આ પામતા જ नो बालापर्मचा मारिका आर्या गोपालिकानामार्याणामेनम नो भाडाद' नाहियते, नो परिजानी गाने ध्यान न ददानि । अनादिगमाणा=नार करती. अपरि जानाना-पानमददाना पिडरति आहो । ' ग्लनाः गोपालि आर्या: मुकुमारिकामानिमीक्षण=पुनः पुनरमिदी- विगति निति यावत् परि भान्ति । अभीक्ष्ण=पुनः पुनः, 'एपगडंपनमर्गम् उक्तमा शरीरशोमाकरण जलमक्षेपादिक निवारयन्ति अनियन्तिनगलती सम्याः सुकुमारि फाया श्रमीभिर्निग्रन्यीमिः हील्यमानाया याद गार्यमाणागा अपगेतभूपा- वक्ष्यमाणस्वस्प' आध्यात्मिको यात्मनोगतः सपम्पो-रिवारसममुपधत पार (तरण सा समालिया गोवालियाण अजाण यण्ट नो आढाइ, परिजाणाइ, अणादायमाणी, अपरिजाणमाणी, विहरह) सुकुमारिका आर्या ने गोपालिका आर्य के हम कान रूप अर्थको आदर की दृष्टि से नही देग्या, उनके वचनों पर उसने कुछ भी ध्यान नही दिया। इस तरह उनके वचनो का अनादर और उन पर धरान नारी देती हुई वह ररने लगी (ताणं ताओ अजाओ समालिय अजज अभिरखण २ ण्यम निवारेंति, तण तीसे लूमालिया समीति निग्गयीरि हीलि जाणीए जाव वारिज्जमाणीप इमेयाख्वे अजमविण जाव समुप्पज्जि स्था ) इस के पश्चात् उन गोपालि का आर्या ने उस सुकुमारिका की बार २ अवहेलना की, उस पर वे गुस्सा भी हुई उमझी निंदा भी की यावत् उसका तिरस्कार भी किया। यार २ से शरीर की शोभा करने से और जल का सिंचन करने से रोका । तर उसे इस प्रकार का હે દેવાનુપ્રિયે! તમે તે સ્થાનની આલોચના કરો-પિતાના અતિચારને પ્રક शित ४२॥ यावतू तन! भाटे प्रायश्चित्त ! (तएण सा सुमालिया गोवालियाण अनाण एयम? नो आढाइ, नो परिवाणाइ, अणादायमाणो, अपरिजाणमाणी, विहरइ) सुभारि मार्या गोवानि मायो। मायन३५ मथ ने भारती દષ્ટિથી જ નહિ, તેમના વચને ઉપર તેણે કઈ પણ વિચાર કર્યો નહિ આ રીતે તેમના વચનને અનાદર અને તે પ્રત્યે બેદરકાર થઈને તે પિતાને मत ५सार ४२१। an (तएण नाओ अज्जाओ सूमालिय अज अभिवण २ एयम? निवारे ति, तएण तीसे सूमालियाए समणीहि निग्गयोहि हीलिजमा णी जाव वारिज्जमाणीए इमेयाम्वे अन्जथिए जार समुप्पन्जित्था) या२५४ी તે પાલિકા આર્યાએ તે એકમારિક આર્યાનો વારવાર અવહેલના કરી, તેની તરફ તેમણે ગુસ્સે પણ બતાવ્યું, તેના નિદા કરી ચાવતું તેને તિરસ્કાર પણ કર્યો તેને વારંવાર શરીરને શોભાવવા બદલ તેમજ જળનું , आर्या Hea
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. . साधर्मपाल सप' उपाश्रयम् उपपय चिमितिका पर गंप्रेक्ष्य पणे मार्भुतभमा- ताया रजन्या यायमलनिय उति निनोपालिकानामार्याणामन्तिा प्रति निजामति, मतिनिधमा पाठिप मार्यय-यगतमन्यमुपाश्रयमुपसपथ खल विहरति-आम्त सा। तवः खलु ना गुरुमारिका भार्या ' गगोहिया' जगप्पष्टिका अपवारर रहिता-उपगला भविनयगीति यापन ' अनिवाग्यिा' अनिवार्या दुर्निवारा, 'सच्छदई ' सदमतिः-गास्त्रिधर्मानुगेधरदितमा, अभीग-पुनः पुन - ईस्तो धावति-मक्षालयगि गावद स्थान पाया पानपेधिरी वा जलेनाम्युक्ष्य घेतयति-स्थानादिक करोतीत्यर्थः। तत्रापि च खलु पार्थम्या, पार्धम्यपिहारिणी, श्रय मे चली जाऊँ इस प्रकार का उमने विचार किया (महिला) ऐसा विचार करके (करल पा० गोवालियाण अजाण) दसरे ही दिन, प्रातः काल जर सूर्योदय रोगया-तम वह गोपालिका आर्या के (अति- याओ) पास से (पडिनिस्वमित्ता) निकल कर-(परिक) भिष, दूसरे (ज्यस्सय) उपाश्रय फो (उसपज्जिताण विएरह) प्राप्तकर, वहा रहने लगी-अर्थात् दुसरे उपाश्रय में चली आई। (तण्ण सा सूमालिया अज्जा अणोहटिया अनिवारिया सच्उदमई अभिरखण अभिक्खण हत्थे धोवेइ जाव चेण्इ) घरा घर सुकुमारिका आर्या विना, किसी रोक टोक के स्वच्छद पनकर रहने लगगई। वहां उसे कोई रोकने वाला रहा नहीं-सो जो मन में आया वह करने लगगई-इस, तरह वह चोरित्र धर्म के भाय से रहित यन गई । यार २ अपने हाथों को धोती यावत् स्थान, शय्या, और स्वाध्याय की भूमि को धोकर वरा गोत्रालियाण अज्ज्ञाण ) भार पिसे सवारे न्यारे सूय य पाभ्या त्यारे ते पालि भार्याना (अतियाओ ).. पासपी (पडिनिक्समित्ता) नीतीन (पडिएक) भी ( उवस्सय) पाश्रयने ( उयसपजित्ताण विरइ ) भगवान त्या २७१। ail, मेट in S५श्रयमा ती ही ( त एण सा सूमालिया अज्जा अणोट्टिया अनिवारिया सच्छदमई अभिस्खण हत्थे धोवेइ जाव चेएड) त्या તે સુકુમારિકા આર્યા કેઈપણ જાતની રોક ટેક વગર સ્વચ્છતાપૂર્વક રહેવા લાગી ત્યા તેને કઈ રોક-ટોક કરનાર હતું નહિ એટલે જે પ્રમાણે તેની ઇરછા થતી તે પ્રમાણે જ તે આચરતી હતી આ રીતે તે ચારિત્ર ધર્મના ભાવથી રહિત બની ગઈ વાર વાર તે પિતાના હાથને ધોતી હતી યાવત્ સ્થાન, પથારી અને સ્વાધ્યાયના સ્થાનને જોઈને ત્યાં પિતાનું સ્થાન નક્કી કરતી હતી भनगारधर्मामृनयषिणी टीका १० १६ सुकुमारिकाचरितवर्णनम् २५१ अवसन्ना, अवमनरिवारिणी, कुशीना गीलविहारिणी, समता, ससक्तविहारिणी, बहूनि वर्षाणि गामण्ययपर्याय पालयवि, पालयित्वा अर्धमामिक्या सलेखनया उस्य स्यानस्याऽनालोचिता जातिकान्ता कालमासे काल कृत्वा, ईशाने कल्पेऽन्यत मस्मिन् विमाने माथुर्यादि नाचनाममये आचार्याणा विमानसख्याया विस्मरणेन निश्चयाभावादन्यतमस्मिनित्युक्तम् , देवगणितया उपपना! तोकैकासा- देवीना नवपल्योपगानि भितिः प्रसप्ता ।। सु० १५ ।। “अपना स्थान नियत करती । इस प्रकार (तत्थ विय ण पासत्था पासस्थ विहारी, ओसग्गा ओसपणविहारी कुमीलार ममत्तार यहणि वासाणि सामण्णपरियोग पाउणE ) वहा उम सुकुमारिका ने पावस्था पार्थस्य वितरिणी, अक्सन्ना, अवसन्न विहारिणी,कुशीला,कुशील विहारिणी, समक्ता, ससक्त विहारिणी बनकर अनेक वर्षों तक श्रामण्य पर्याय का पालन किया (पाणित्ता अमासियाण) पालन करके पर अर्धमास की सलेखना धारण कर (कालपोत ) अपनी मृत्यु के अवसर (काल फिच्चा ) पर मरी-सो मरकर (अणालोइय अपडिक्कता) अपने पापों की अनालोचना करने से वह प्रतिक्रान्त नहीं बन सकने के कारण (ईसाणे कप्पे ) ईशानकल्प में ( अण्णयरसि विमाणसि ) किसी एक विमान में ( देवगणियत्ता उववण्णा) देवगणिका के रूप में उत्पन्न हुई। (तत्धेगडयाण देवीण नवपलिओवमाइ ठिई पण्णत्ता, तत्यण सूमा- लियाए देवीए नव पलिओवमाई ठिह पण्णत्ता) बहा कितनिक देवियों या शत (तत्थ वि च ण पासत्था पासस्थविहारी ओसण्णा ओसण्णविहारी कुसीलाऽससत्ता २ टूणि वासाणि सामण्णपरियाग पारणइ) त्या त મારિકાએ પાવા, પાર્થસ્થ વિહાgિણી, અવસના, અવસગ્ન વિહારિણી, કુશીલા, કુશીલ વિહારિણી, રસકતા, સ સત વિહારિણી થઈને ઘણા વર્ષો सुधी श्राभएय दिनु पास यु (पाउणित्ता अद्धमासियाए) पान शन ते अभाभिडनी समता पा२५ उरीन (कालमासे) पोताना भृत्यु अणे (काळ किच्चा) ते भर पाभी मने भ२९५ पाभीने (अणालोइय अपडिकता) પિતાના પાપની આલોચના ન કરવાથી પ્રતિકાત ન બની શકવાના કારણે તે (ईसाणे कापे) शान ४६५मा (अण्णयर सि विमाणसि ) से निभा नमा ( देवगणियत्ताए उववण्णा) याना ३५मा म पाभी (तत्ये गइयाण देवी ण नवपलिओवमाइ ठिई पण्णत्ता, तत्थण सूमालियाए देवीए नव पलिश्रोतमार लिई पण्णता) त्या 32ी हेवामानी स्थिति नर पक्ष्योपननी है
२५२
रपणो चुल
जाताममेचा
मूलम्-तेणं कालेण तेण समगणं इहेन जघुद्दीवे भारहे वासे
पंचालेसु जणवएमु कपिटपुरे नाम नयरे होत्या, वन्नओ तत्व
णं दुवए नामं राया होत्या, पन्नओ, तस्त णं चुलणीदेवी
धट्ठज्जुणे कुमारे जुवराया, ताणं सा
सूमालियादेवी ताओ
देवलोयाओ आउत्खपणंजाय घइत्ता इहेब जंबुदोरे होवे भारहे
वासे पंचालेसु जणवएसु कपिल्लपुरे नयरे दुपयस्त
जीए देवीप कुच्छिसि दारियत्ताए पचायाया, तपण सा चुल.
णीदेवी नवण्ह मासाण जाव दारियं पयाया, तएणं सा तीसे
दारियाए निव्वत्तवारसाहियाए इम ण्याख्व गोणं गुणणिफणे
नामधेनं जम्हाण। एस दारिया दुवयस्स
रण्णो धूया चुलणीए
देवीए अत्तया त होउ णं अम्ह इमीसे दारियाए नामधिज्जे
दोवई, तएणं तीसे अम्मापियरो इम एयारूव गुण्ण गुणनि
प्फन्न नामधेज्ज करिति दोवई, तएण सा दोवई दारिया पंच
धाइपरिग्गहिया जाय गिरिकदरमणि इव चपगलया निवाय
की स्थिति नौ पल्योपम की कही गई है-सो इस सुकमारिकादेवी की
वहा नौ पल्योपम की स्थिति हुई । यहा जो " किसी एक विमान में"
ऐसा अनिश्चयात्मक पदआयो है उसका तात्पर्य यह है कि माधुर्यादि
वाचना के समय में आचार्यों को विमान सख्या का विस्मरण हो जाने
से उसका निश्चय नही रहा । अतः ऐसा कहा गया है । सू० १५ ।।
વામાં આવી છે તે તે સુકુમારિકા દેવીની પણ ત્યા નવપપમની સ્થિતિ
થઈ અહી જે “કેઈ એક વિમાનમા” આ જાતનુ અનિશ્ચયાત્મક પદ આવ્યું
છે તેનું કારણ આ પ્રમાણે છે કે માથર્યાદિ વાચનાના સમયે આચાર્યોને વિમાન
સખ્યાનું વિસ્મરણ થઈ જવાથી તે વિશે નિશ્ચય રો નહિ એથી આ પ્રમાણે
કહેવામા આવ્યુ છે કે સૂત્ર ૧૫ છે
२५३ भनगराधर्मामृतवर्षिणी टीका० म० १६ द्रौपदीचरितवर्णनम् निव्वाघायंसिसुहंसुहेणं परिवड्डइ । तएणं सा दोबई रायवरकन्ना उम्मुक्कवालभावा जाव उकिसरीरा जाया जावि होत्था,तएणं तं दोबई रायवरकन्नं अण्णया कयाई अंतेउरियाओ पहायं जाव विभूसिय कति करित्ता दुवयस्स रपणोपाएवंदिउं पेसति तएण सा दोवइ राय जेणेव राया तेणेव उवागच्छइ उवा- गच्छित्ता दुवयस्स रण्णो पायग्गहण करेइ, तएणं से दुवए राया दोवइ दारिय अके निवेसेइ निवेसित्ता दोबइए रायवर- कन्नाए रूवेण य जोवणेण य लावणेण य जायविम्हए दोवइ रायवरकन्नंएव वयासी-जस्सणं अह पुत्ता। रायस्स वा जुवरायस्स वा भारियत्ताए सयमेव दलइस्सामि तत्थ ण तुम सुहिया वा दुक्खिया वा भविज्जासि, तएण मम जावजीवाए हिययडाहे भविस्सइ, तं ण अहं तव पुत्ता । अज्जयाए सयंवर विरयामि, अज्जयाए ण तुम दिण्णसयवरा जपणं तुम सयमेव रायं वा जुवराय वा वरेहिसि से ण तव भत्तारे भविस्तइ तिकटु ताहिं इटाहिं जाव आसासेइ आसासित्ता पडिविसज्जेइ ॥ सू० १६॥ टीका-तेण कालेण ' इत्यादि । तस्मिन् काले तस्मिन् समरे इहैव जम्बूद्वीपे भारते वर्षे पञ्चालेषु जनपदेषु काम्पिल्यपुर-काम्पिल्यपुरनामक नगर तेण कालेण तेण समएण' इत्यादि ।। टीकार्य (तेण कालेण तेण समएण) उस काल और उस समय में (इहेव जघुद्दीवे भारहे वासे पचालेतु जणवएतु कपिलपुरे नाम नयरे होत्या) इसी जदीप में भारत वर्ष में पांचाल जनपद तेण कालेण तेण समएणं इत्यादि- 21stथ-(तेण फालेण तेण समएण) ते ॥णे मने ते सभये (इहेव जबुद्दीवे भारहेवासे पचालेसु जणवएसु कपिल्लपुरे नाम नयरे होत्था) मा भूद्वीपमा मा२qभा पाया पहा पित्यपुर नाभे न तु (वनओ) मा નગરનું વર્ણન ઔપપાતિક સૂત્રમા કરવામા આવ્યુ છે ત્યાથી પાઠકએ જાણું - में - - ५४ मामाकपा गासीत् । पर्गक रप नगरस्य वर्णनीपपाविम्याद बोध्यम् । नत्र स्वच मुपो नाम राजाऽसी , गुमनी नानी की मार्याजमान , न पुत्रः घट्ट ज्जुणे' धृष्घुम्नो नाम मारो गारामोडगा । उतः खलु गा एकमारिका देशी गम्माद बलोकादाय आयग यावत्- घ्युत्ता उदैव जमीपे जीपे भारत र्षे पगाले जनपरेषु गाभियपूरे नगरे गुपदस्य राम=उन्पा रेयाः कुसौ दारिरातया=पुत्रीत्येन ' पगायाया' प्रया याताम्मगुत्पन्ना । तत पर सा चल्नीदेवी नगना मांगानां पहमतिपणाना यापन दारिता पुरी मनाता प्रमानितवती । नत बलु गा तम्या दारिकाया कापिल्यपुर नाम का नगर था । (यनओ) म नगर का वर्णन औष पातिक सत्र में दिया गया है मोप में जान लेना चाहिये। (नत्य ण दुवए नाम राया होत्या वनओनस्म ण चुरणोदेयी, घहजुणे कुमार जुवराया, तण मा ममालिया देवी तामओ दवलोयाभो आउवण जान चइत्ता इहेव जद्दीने दीये, मारने वासे पचालेख जणचएम कपि ल्लपुरे नगरे दुवयस्स रण्णो घुलणी देवीए कुञ्चिसि दारियत्साए पच्चाघाया) चराके राजाका नाम, दुपद था । राजाका वर्णन भी पहिले जैसा ही जानना चाहिये ।, इस की रानी का नाम उलनीदेवी था। • कुमार का नाम धृष्टगुम्न धा-यर युवराज था । वर सुकुमारिका आर्या का जीव उस दूसरे ईशान देवरोक से आयु आदि क्षय हो जाने के कारण चवकर इसी जवूद्वीप नाम के दीप में भरत क्षेत्र में, पाचाल जनपद में कॉपित्यपुर नगर में द्रुपद राजा की चुलनीदेवी की कुक्षि में पुत्री रूपसे अवतरित हुआ। (तएण सा चुलणीदेवी नवण्ह मासाण जाव aga ( तत्थ ण दुवए नाम राया होत्या, वन मो, तस्सण चुलणी देवी धद्वज्जुणे कुमारे, जुवराया, तएण सा सूमालिया देवी ताओ देवलोयाओ आ उक्खएण जाव चइत्ता इहेव ज बुद्दीवे दीवे भारहे वासे पचालेसु जणवएसु कपिल्ल पुरे नयरे दुवयस्स रण्णो चुरणीए देवीए कुन्छिसि दारियत्ता पायाया) त्याना રાજાનું નામ કુપદ હતું પાજાનું વર્ણન પણ ઔપપાતિક સૂત્રમા વણિત કોણિક રાજાની જેમજ જાણું લેવું જોઈએ તેની રાણીનું નામ ચુલની દેવી હતું તેના પુત્રનું નામ ધૃષ્ટદ્યુમ્ન હતુ ઇષ્ટદ્યુમ્ન યુવરાજ હરે, સુકુમારિક આર્યાને જીવ તે બીજા દેવલોકથી આયુ વગેરે ક્ષય થવા બદલ અને આજ જેબૂદ્વીપ નામના દ્વીપમા, ભરત ક્ષેત્રમા, પાશ્ચાત્ય જનપદમા, કાપિડયપુર નગરમાં પદ सननी युआनी हेवीनपुत्री ३३ अवतरित थयो ( त एण सा चुरणी - - - - . 8 . भनगारधर्मामृतपपिणी टी० ५० १६ झोपदीचरितवर्णनम् २५५ 'निबत्तवारसाहियाए' नित्तद्वादशाहिकाया द्वादशेऽहनि समाप्ते इदमेतद्रूप नाम कृतवती यस्मात् ग्बल एपा दारिका अपदस्य राशो 'धृया ' दुहिता-पुनी चुलन्या देव्या' अत्तिया' आत्मजा-अनजाता, तस्माद् भवतु खल्वस्माकमस्या दारिकाया नामधेय 'द्रौपदी' इति । तत. खलु तस्या अम्बापितरौ उममेतद्रूप गोण-गुणमाप्त गुणनिष्पन्न-गुणसपन्न, नामधेय कुरुतः। ततः सा द्रोपदी दारिका पञ्चधात्रीभिर्यापद् गिरिकन्दरमालीने चम्परता निनिनियाघाते सुख- मुखेने परिवर्धते स्म। दारिय पराया तएण सा तीसे दारिया निन्वत्तयारसाहिया इमण्या रूप गोण गुणणिफण नामधेज्ज जम्हाण एस दारिया दुवयस्स रण्णो धूया वुलणी देवीए अत्तया त होउण-अम्ह इमीसे दारिया नामधिज्जे दोवई ) गर्भ के जब नौ मास अच्छी तरह समाप्त हो चुके तप, चुलनी- देवी ने एक पुत्री को जन्म दिया। पुत्री को उत्पन्न हुए १२ वां दिन लगा-तय चुलनी माताने उसको इस रूप से गुणनिष्पन्न नामरक्खा क्यों कि यह द्रुपदराजा की पुत्री है और मुझ चुलनी के उदर से उत्पन्न हुई है। इसलिये इस हमारी कन्या को नाम दुपदी रशेडम तरह के विचार- से (तीसे अम्म्म पियरो) माता पिता ने उसका (इम एयारुव गुण्ण गुणनिष्फन्न नामघेज करिति दोवई ) इस तरह का गुणनिष्पन्न नाम द्रौपदी रख दिया । ( तण्ण ) इसके बाद-(सा दोवई दारिया पचधाह परिग्गहिया जाव गिरिकदरमल्लीणइव चपगलया निवानिव्याघायसि सुह सुहेण परिवड्डे ) वह द्रोपदी ढारिका पाच धायमानाओं से मुक्त देवी नवण्ह मामाण जाव दोरिय पयाया तएण सा तीसे दारियाए निबत्तवार साहियाए इम एयाच गोण गुणणिप्फवण्ण नामधेन्ज जम्माण एस दारिया दुवयंस्स रणो धूया चूरणीए देवीए अत्तया त होउण अन्ह इमी से दारियार नामधिज्जे दोवई ) ममना नभास या संपू ५ समा थया त्यारे ચૂલેની દેવીએ એક પુત્રીને જન્મ આપ્યો પુત્રીના જેન્મ પછી જ્યારે અગિ થર દિવસ પૂરા થયા અને બારમો દિવસ શરૂ થયો ત્યારે ચુલની માતાએ વિચાર કર્યો કે દુપદ રાજાની આ કન્યાપુત્રી છે અને મારા ગર્ભથી જન્મ પામી છે આ પ્રમાણે અનું નામ દ્રૌપદી રખીએ તે સારૂ આમ વિચારીને (नोसे अम्मापियरों) मातापितामे (इम एयारूव गुण्ण गुणनि'फन्न नाम घेज करिति' दोबई ) २ ते ते न्यानु गुण नियन्न नाम दीपी पाउयु (तएण ) त्या२५ (सा दोपई दारिता पंचवाइपरिगादिया जाव गिरिकंदर मातीण इव त पगलया निसायनिख्वाधारागि मत गरेm : नि।
- - २५४ भाताचा मासीत् , पर्णका अस्प नगरस्य वर्णनोपानिमा योग्यम् । तत्र सरु मुपदो नाम राजाऽऽसीत् , गुरुनी नाम्नी भी मामा , नाम पुत्रः 'पट्ठ ज्जुणे' धृष्टद्युम्नो नाम मारो पररानोगान् । ततः खलु गा एकमारिका देवी तम्मा देश्लोकादाय शयेग यापद- युवा उदैव गीप डीपे भारत पाले जनपदेषु काम्पित्यपुरे नगरे अपदस्य राशनुमन्या या. कुक्षौ दारिणतया-पुत्रीयन 'पशायाया' प्रया यातामुत्पना । तत गर मा चुग्नीदेवी नमाना मामानां पहमतिपर्णाना यान दारिया पुर्वी मनाताअगनितपती । नत' पलु गा तम्या दारिकाया कापिल्यपुर नाम का नगर था। (चन्नओ) मनगर का वर्णन औप पातिक सूत्र में किया गया है मोवा में जान रेना चारि । (नत्य ण दुचए नाम राया होन्या वन्नओ तस्म ण चुरणोदेयी, घहजुणे कुमारे जुवराया, ताण मा ममालिया दयी ताओ दवलोयाओ आउवाण जाय चहत्ता इहेव जपुदीचे दीये, भाररे चासे पचालेसु जणवएसु कपि ल्लपुरे नगरे दुवयस्म रणो घुलणी देवी कृतिसि दारियसाए पच्चायापा) यहाके राजाका नाम दुपद था। राजाका वर्णन भी पहिले । जैसा ती जानना चाहिये । इस की रानी का नाम , उलनीदेवी था। । कुमार का नाम धृष्टद्युम्न था-यर युवराज था । वर सुकुमारिका आर्या का जीव उस दूसरे ईशान देवलोक से आयु आदि क्षय हो जाने के कारण चवकर इसी जबूढीप नाम के दीप में भरत क्षेत्र में, पाचाल जनपद में कापिल्यपुर नगर में द्रुपद राजा की चुलनीदेवी की कुक्षि में पुत्री रूपसे अवतरित हुआ। (तएण सा चुलणीदेवी नवण्ह मासाण जाव देनमे (तत्थ ण दुवए नाम राया होत्या, वन्नमो, तस्सण चुलणी देवी धद्वज्जुणे कुमारे, जुवराया, तएण सा सूमालिया देवी ताओ देवलोयाओ आ उक्खएण जाव चइत्ता इहेव ज बुद्दीवे दीवे भारहे वासे प चालेसु जणवएमु कपिल्ल पुरे नयरे दुवयस्स रण्णो चुरणीए देवीए कुन्छिमि दारियत्ता पच्छायाया) त्याना રાજાનું નામ કુપદ હતુ રાજાનું વર્ણન પણ ઔપપાતિક સૂત્રમાં વર્ણિત કોણિક - રાજાની જેમજ જાણી લેવું જોઈએ તેની રાષ્ટ્રનું નામ ચુલની દેવી હતું તેના પુત્રનું નામ ધૃષ્ટદ્યુમ્ન હતુ પૃષ્ટદ્યુમ્ન યુવરાજ હવે, સુકુમારિકા આર્યાને જીવ છે તે બીજા દેવકથી આયુ વગેરે ક્ષય થવા બદલ ચવીને આજે જ બૂઢીપ નામના દ્વિપમા, ભરતક્ષેત્રમા, પાચાય-જનપદમા, કાપિપુર નગરપદ २१नी युनी वीना २मा पुत्री ३५ मतरित थयो ( त एणं मा चुदणी . - 14 तएण से अनगारधर्मामृतषिणी टी० अ० १६ द्रौपदीचरितवर्णनम् २५७ निवेगयति, निवेश्य द्रौपद्या राजघरसन्यायो रूपेण च योवनेन च लारण्येन च 'जायविमए' जातविस्मय आश्चर्य प्राप्तः स द्रुपदो द्रौपदी राजवरकन्या मेवमवादी-हे पुनि ! यस्य खलु अह राज्ञो वा युवराजस्य वा भार्यात्वेन स्वय मेव दास्यामि, तत्र खलु त्व सुखिता वा दुःखिता का भविष्यसि, तत खलु मम 'जाव जीवाए ' यानज्जीव 'हिययडाहे ' हदयदाहः-मनोदुःख भविष्यति । दुवए राया दोवड दारिय अके निवेसेइ, निवेसित्ता, दोवईए रायवरकन्नाए स्वेण य जोवणेण लावण्णेण य जायविम्हाए दोवड, रायवरकन्न एच वयासी) सो वह राजवर कन्या द्रौपदी जहा द्रुपद राजा था वहा आई। वहा आकर उसने बदना करने के लिये द्रुपद राजा के घोही दोगे पैरों को पकड़ा कि इतने में उस द्रुपद राजाने उस द्रौपदी दारिका को अपनी गोद में बैठा लिया। द्रौपदी के बैठते ही वह राजा उस राजवर कन्या द्रौपदी के रूप, यौवन और लावण्य से विशेष विस्मित हुआ-सो विस्मित होकर उसने उस राजवर कन्या द्रौपदी से इस प्रकार कहा-(जस्स ण अह पुत्तो । रायस्स वा जुधरायस्स चा भारि- यत्ताए सयमेव दलइस्लामि,तत्य ण तुम सुहिया वा दृक्खिया वा भवि जासि तएण मम जाव जीवाए दिययडाहे भविस्मड) हे पुनि ! मैं स्वय तुम्ह जिस राजा को, अथवा युवराज को भार्या के रूप में दंगा वहां तुम सुखी और दुःश्वी दोनो भी हो सकती हो। तो इससे मुझे यावज्जीव हृदय दाह-मानसिक दु.ग्व रहेगा। (त ण अह पुत्ता से दुवए राया दोवइ दारिय अके निवेसेइ, निवेसित्ता, दोवईए रायवरकन्नाए रूवेण य जोव्वणेण य लावण्णेण य जायविम्हए दोवइ रायवरकन्न एव बयासी) તે રાજવર કન્યા દ્રૌપદી જ્યા રાજા દ્રુપદ હતા ત્યા ગઈ ત્યાં જઈને તેણે કુપદ રાજાને વદન કરવા માટે બને પગ પકડયા ત્યારે તેઓએ દ્રૌપદી દારિ- કાને પિતાના ખોળામાં બેસાડી દ્રૌપદી જ્યારે મેળામાં બેસી ગઈ ત્યારે રાજા તે રાજવર કન્યા દ્રૌપદીના રૂપ, યૌવન અને લાવણ્યથી સવિશેષ વિસ્મિત થશે અને વિસ્મિત થઈને તેણે તે રાજવર કન્યા દ્રૌપદીને આ પ્રમાણે કહ્યું– (जरस ण अह पुत्ता! रोयस्स वा जुवरायस्स वा भारियत्ताए सवमेव दलइस्सामि, तत्थण तुम मुहिया वा दुक्सिया वा भरि जासि तएण मम जाव जीवाए हिय याहे भविस्सइ) युति तने शान युपराने मायाना ३५मा આપીશ ત્યા તું સુખી પણ થઈ શકે તેમ છે અને દુખી પણ તેથી મને . !
के तन खल सा दीपदी रामयरमगा उन्मुक्ता भाषा गार फष्टा, उमर शरीरा जाता चाप्यमम् । ततः गनु ना श्रीपती राजारान्यामन्गदा कदाविद 'ओ उरिगाभो' शान्त पुग्श्यि =अना: पुरवनिन्यः नियः स्नाता यावन्-वत्रा फकारविभूषितां कन्ति का पदम्य राम पाटी पन्दित । पमंनि ' प्रेषयन्ति, वतः सलु मा द्रौपदी राजवरसन्या या मुपदो राजा तगोपागच्छति, उपागत्य मुपदस्य रामः पादग्रहण करोति, तनः खलु म पटोगमा द्रौपदी टारिकामहे होकर इस तरह पलने पुपने लगी किसिम त गिरि की कदरा के प्रदेशमें उत्पन हुई चपलता वापरहित निमपहर स्थान में आनन्द के साथ परतो पुपती है । (तएण मा दोवई राययरका उम्मुक्कपाल भावा, जाव उक्किसरीरा जाया यायि होत्या, ताण त दोवा रापप- रकन्नं अण्णया फयाई अते उरियाओ हाय जाव विभूसिय करेंति, फरित्ता दुवयस्स रणो पाए वदिउ पेसति) यह राजयर पन्या द्रौपदी पालभाव रहित होकर जप योयन अवस्था चालीरो थुकी तप इस शरीर में लायण्य फी चमक से विपय सौन्दर्य आ गया-अत: उस समय यह विशेषरूप से उत्कृष्ट शरीर वाली पनगई। किसीrक दिन की बात है कि अत. पुर को स्त्रियों ने द्रौपदी को स्नान कराकर यावत् वनाल कार से विभूपित किया-और विभूपित कर के द्रुपद राजा की चरण वंदना करने के लिये भेज दिया (तपण सा दोवइ राय० जेणेव दुवए रापा तेणेव उवागच्छइ, उवागच्छित्ता, दुययस्स रणो पायागरण करे । દારિકા પાચ પાયમાતાઓથી યુક્ત થઈને આ પ્રમાણે લાલિત પાલિત થવા માડી જેમકે પર્વતની કદરાના પ્રદેશમા ઉપન્ન થયેલી ચપકલતા નિર્વાત, नि३५द्रव स्थानमा सुपेयी भारी थती न डाय 1 (६एण सा दोबई रायवर कन्ना उम्मुक्कालभावा जाव उकिटुसरीरा जाया यानि होत्या, तएण त दोवई रायवरकन्न अण्णया कयाई अवे उरियाओ पहाय जाव विभूसिय करे ति करिता दुवयस्स रण्णो पाए व दिन पेस ति) ते सप२ न्या, द्रौपदी भयप टावीत જ્યારે યુવાવસ્થા સંપન્ન થઈ ગઈ ત્યારે તેના શરીરમાં લાવયના ચમકથી સવિશેષ સૌ દઈ દીપી ઉઠયુ તેથી તે વખતે તે વિશેષ રૂપથી ઉત્કૃષ્ટ શરીર વાળી થઈ ગઈ હતી કે એક દિવસની વાત છે કે રણવાસની સ્ત્રીઓએ દ્રોપ દીને સ્નાન કરાવ્યું યાવત્ વસ્ત્રાલ કારેથી વિભૂષિત કરી અને વિભૂષિત કરીને दु५६ रानी य२ १६। ४२१॥ भाटे भली (तएण मा दोबइ राय जेणेष दुवए राया वेगेर उवागच्छइ, उवागच्छित्ता, दुवयस्न रण्णो पार वपण २५७ " . - भनगारधर्मामृतवपिणी टी० १० १६ द्रौपदीचरितवर्णनम् निवेशयति, निवेश्य द्रौपद्या राजपरकन्यायर्या रुपेण च यौवनेन च लागण्येन च 'जायविह्मए' जातविस्मया आश्चर्य माप्त. स द्रुपदो द्रौपदी राजवरकन्या मेवमवादी-हे पुत्रि ! यस्य खलु अह राज्ञो वा युवराजस्य या भार्यात्वेन स्वय मेव दास्यामि, तत्र खलु व सुसिता वा दुःखिता या भविष्यसि, तत. खलु मम जाव जीवाए ' यावज्जीव 'हिययडाहे' हदयदाहः-मनोदुःख भविष्यति । तएण से दुवए राया दोवड दारिय अके निवेसेड, निवेसित्ता, दोवईए रायवरकन्नाए स्वेण य जोधणेण य लावण्णेण य जायविम्हाए दोवड, रायवरकन्न एव वयासी) सो वह राजवर कन्या द्रौपदी जहा द्रुपद राजा था बहा आई। वहा आकर उसने वदना करने के लिये द्रुपद राजा के ज्योंही दोनो पैरो को पकड़ो कि इतने मे उम द्रुपद राजाने उस द्रौपदी दारिका को अपनी गोदमें बैठा लिया। द्रौपदी के बैठते ही वह राजा उस राजवर कन्या द्रौपदी के रूप, यौवन और लावण्य से विशेष विस्मित हुआ-सो विस्मित होकर उसने उस राजवर कन्या द्रौपदी से इस प्रकार कहा-(जस्स ण अह पुत्तो ! रायस्स वा जुवरीयस्स वा भारि- यत्ता सयमेव दलइस्सामि,तत्य ण तुम सुहिया वा दृक्खिया चा भवि- जासि तएण मम जाव जीवाए दिययडाहे भविस्मड) हे पुत्रि ! मैं स्वयं तुम्हे जिस राजा को, अथवा युवराज को भार्या के रूप में दंगा वहां तुम सुखी और दुःखी दोनो भी हो सकती हो। तो इमसे मुझे यावज्जीव हृदय दाह-मानसिक दुव रहेगा। (न ण अह पुत्ता ! से दुवए राया दोवइ दारिय अके निवेसेइ, निवेसित्ता, दोवईए रायवरकन्नाए रूवेण य जोवणेण य लावण्णेण य जायविम्हए दोवइ रायवरकन्न एव वयासी) તે રાજવર કન્યા દ્રૌપદી જ્યા રાજા દુપદ હતા ત્યા ગઈ ત્યાં જઈને તેણે કુપદ રાજાને વદન કરવા માટે બને પગ પકડયા ત્યારે તેઓએ દ્રૌપદી દારિ. કાને પિતાના ખોળામાં બેસાડી દ્રૌપદી જ્યારે ખેાળામાં બેસી ગઈ ત્યારે રાજા તે રાજવર કન્યા દ્રૌપદીના રૂપ, યૌવન અને લાવણ્યથી વિશેષ વિસ્મિત થશે અને વિસ્મિત થઈને તેણે તે રાજવર કન્યા દ્રૌપદીને આ પ્રમાણે કહ્યું– (जरस ण अह पुत्ता । रोयरस वा जुपरायस्स ना भास्थित्ताए सवमेव दुलइस्सामि, तस्थण तुम मुहिया वा दुक्सिया वा भविग्जासि तएण मम जाब जीवाए हिय यदाहे भविस्सइ) : बुद्रितने राजने युपराने लायांना ३५॥ આપીશ ત્યા તું સુખી પણ થઈ શકે તેમ છે અને દુખી પણ તેથી મને .
माधर्मशास्त्र तन ग्पस मा द्रौपदी गनयर या उनाताभारा यार काटा, उत्तष्ट शरीरा जाना चाप्यमम् । ततः गनु नां प्रीपदी रानगरान्यामन्यदा याविद् 'ओ उरियाभो' आन्त पुग्गिय =1: पुश्पनिम्पा नियः ग्नानां यार-वमा फकारविभूपिता कुन्ति कन्या भुपदम्य राम पानी नन्दित 'पेमति 'प्रेषयन्ति, ततः खलु सा द्रौपदी राजमरकन्या गप पदो रामा तगोपागसति, उपागत्य गुपदस्य राज्ञः पादग्रहण करोति, तनः ग्बल सदुपटी गजा द्रौपदी दारिकामले होकर इम तरह पलने पुपने लगी कि जिम सर गिरि की करा के प्रदेशमें उत्पन हुई चपफलता नारस्ति निमा स्थान में आनन्द के साथ पर तो पुपती है । (तएण मा दोबई राययरका उम्मुकामाल भावा, जाव उरिफट्टसरीरा जाया यायि होत्या, तण्ण त दोबा रायन रफन्न अण्णया कयाई अते उरियाओ पहाय जाव विभूसिय करेंति, करित्ता दुचयस्स रपणो पा वदिउ पेसति ) यह राजवर कन्या द्रौपदी पालभाव रहित होकर जप यौवन अवस्था वाली रो चुकी तय इस के शरीर में लावण्य की चमक से विपय सौन्दर्य आ गया-अतः उस समय यह विशेषरूप से उत्कृष्ट शरीर वाली पनगई। किसी कि दिन की यात है कि अत. पुर को स्त्रियों ने द्रौपदी को स्नान कराकर यावत् बबाल कार से विभूपित किया और विभूपित कर के द्रुपद राजा की चरण वंदना करने के लिये भेज दिया (ताण सा दोवह राय० जेणेव दुवए राया तेणेव उवागच्छद, उवागच्छित्ता, दुवयास रणो पायागरण करेइ, દારિકા પાચ પાયમાતાઓથી યુક્ત થઈને આ પ્રમાણે લાલિત પાલિત થવા માડી જેમકે પર્વતની કદરાના પ્રદેશમાં ઉત્પન્ન થયેલા ચપલા નિર્વાત, नि३५द्रय स्थानमा सुमेथी मोटी यती न डाय ! (एण सा दोवई रायवर कन्ना उम्मुक्कयालभावा जाव उकिदुसरीरा जाया यावि होत्या, तएण त दोवई रायवरकन्न अण्णया कयाई अवे उरियाओ व्हाय जाव विभूसिय करे ति करिता दुवयस्स रणो पाए व दिउ पेस ति) ते २०१२ ४-या, द्रौपदी भयप पटावीन જ્યારે યુવાવસ્થા સંપન્ન થઈ ગઈ ત્યારે તેના શરીરમાં લાવયના ચમકથી સવિશેષ સૌદ દીપી ઉઠું તેથી તે વખતે તે વિરોષ રૂપથી ઉત્કૃષ્ટ શરીર વાળી થઈ ગઈ હતી કે એક દિવસની વાત છે કે રણવાસન સ્ત્રીઓએ કપ દીને સ્નાન કરાવ્યું થાવ વલ કારેથી વિભૂષિત કરી અને વિભૂષિત કરીને दु५६ शनी यर १६४ा ४२१। भाट मौसी (तएण या दोवड राय जेणेव दुवए राया तेणेव उवागच्छइ, उवागच्छित्ता, दुवयस्म रणो पार - तपण मा २५७ + अनगारधर्मामृतवपिणी 1० अ० १६ द्रौपदीचरितवर्णनम् निवेगयति, निदेश्य द्रौपद्या राजवरसन्यायो रूपेण च यौवनेन च लापण्येन च जायविमए' जातविस्मया आश्चर्य प्राप्तः स द्रुपदो द्रौपदी राजवरकन्या मेचमवादीत्-हे पुत्रि । यस्य खलु अह राज्ञो वा युवराजस्य या भार्यात्वेन स्वय मेव दास्यामि, तत्र खलु व सुखिता वा दुःखिता ना भविष्यसि, तत खलु मम 'जाब जीवाए ' यानज्जीव ' हिययडाहे ' हदयदाह:-मनोदुःख भविष्यति । तएण से दुवए राया दोवड दारिय अके निवेसेड, निवेसित्ता, दोवईए रायवरकन्नाए स्वेण य जोव्वणेण य लावण्णेण य जायविम्हए दोवड, रायवरकन्न एव चयासी) सो वह राजवर कन्या द्रौपदी जहा द्रुपद राजा था वहां आई। वहा आकर उसने पदना करने के लिये द्रुपद राजा के ज्योंही दोनो पैरो को पकड़ा कि इतने में उम द्रुपद राजाने उस द्रौपदी दारिका को अपनी गोद में बैठा लिया। द्रौपदी के बैठते ही वह राजा उस राजवर कन्या द्रौपदी के रूप, यौवन और लावण्य से विशेष विस्मित हुआ-सो विस्मित होकर उसने उस राजवर कन्या द्रौपदी से इस प्रकार कहा-(जस्स ण अह पुत्तो! रायस्स वा जुवरोयरस वा भारि- यत्ताए सयमेव दलइस्सामि,तत्य ण तुम सुहिया वा दृक्खिया वा भवि- ज्जासि तरण मम जाव जीवाए दिययडाहे भविस्मह) हे पुत्रि में स्वयं तुम्हे जिस राजा को, अथवा युवराज को भार्या के रूप में दूँगा वहां तुम सुखी और दुःवी दोनो भी हो सकती हो। तो इससे मुझे यावज्जीव हृदय दाह-मानसिक दुग्व रहेगा। (तं ण अह पुत्ता से दुवए राया दोवइ दारिय अ के निवेसेइ, निवेसित्ता, दोवईए रायवरकन्नाए रूवेण य जोव्यणेण य लावण्णेण य जायविम्हए दोवइ रायवरकन्न एव वयासी) તે રાજવર કન્યા દ્રૌપદી જ્યા રાજા દ્રુપદ હતા ત્યા ગઈ ત્યાં જઈને તેણે કુપદ રાજાને વદન કરવા માટે બને પગ પકડયા ત્યારે તેઓએ દ્રૌપદી દારિ- કાને પિતાના ખોળામાં બેસાડી દ્રૌપદી જ્યારે ખેાળામાં બેસી ગઈ ત્યારે રાજા તે રાજવર કન્યા દ્રૌપદીના રૂપ, યૌવન અને લાવયથી સવિશેષ વિસ્મિત થો અને વિસ્મિત થઈને તેણે તે રાજવર કન્યા દ્રૌપદીને આ પ્રમાણે કહ્યું– (जस्स ण अह पुत्ता । रोयरस वा जुवरायस्स या भारियत्ताए सवमेव दलइस्लामि, तत्थण तुम सुहिया वा दुक्सिया वा भरिग्जासि तएण मम जार जीवाए हिय याहे भविस्सइ) हे युति તને જે રાજાને કે યુવરાજને ભાન રૂમ પણ થઈ શકે તેમ છે અને દુખી પણ તેથી મને -- - माधीश त्यातली २५८ HTARNमंबा मतदतस्मात् पल्पद है पुत्रि ! र अनया' अपामा-पु दिवसेषु अन्पेषु दिनेषु इत्यर्थः स्वयंवर ययामि-पारगामि माया मम्पदिवसेच मनुस 'दिग्णसयपरा' दत्तमयरामप्रियते इति यरस, पन्यगा म्पय रतः म्यवर, स दत्त कन्याया पिप्रादिना गम्प दिलायरा मरिष्यतीनि गापः । 'दत्तस्त्रय वरा' इनिपद ब्यानमाण पर्यात- जण तुम' इत्यादि । य गलु व स्वयमेव रा जान वा युवराज पा रिप्यसि, स सलु उपभा भरियति' इविकला-रत्यु- पत्वा तामिरिष्यामिविर पाभिरापासपति, गावाम्य प्रनिधिमर्जयति ।। मू०१६। मूलम्-तएण से दुवण राया दूयं सदावेइ सदावित्ता एवं वयासी-गच्छ ण तुम देवाणुप्पिया । वारवइ नयरि तत्थ ण तुम कण्ह वासुदेवं समुदविजयपामोरखे दस दसारे बलदेव- पामुक्खे पचमहावीरे उग्गसेणपामोक्से सोलसरायसहस्से पज्जुण्णपामुक्खाओ अधुट्टाओकुमारकोडीओसवपामोरखाओ अज्जयाए सयवर विरयामि, अजयाए ण तुम दिण्ण सयवरा जपण तुम सयमेव राय वा जुवराय वा वरेहिसि सेण तव भत्तारे भविस्सइ त्ति कटु ताहिं उद्याहिं जाच आसासेइ, असासित्ता पटिविसज्जेह) इस लिये हे पुत्रि ! मैं थोडे ही दिनों में तुम्हारा स्वयवर करवाने वाला हूँ। तुम इन दिनों मे दत्तस्वयवरा हो जाओगी, सो तुम जिस राजाको या युवराज को अपनी इच्छानुसार वरोगी वही तेरा भर्ता बन जायगा । इस तरह कहकर राजा ने अपनी पुत्री को इष्ट आदि विशेषणो वाली वाणी से आश्वासित किया और फिर आश्वासित करके उसे वहां से भेज दिया। मू०१६॥ वन पर्यन्त 4 थया ४२शे ( त ण अह पुत्ता ! अज्जयाए सयवर विर यामि, अज्जयाए ण तुम दिण्णसयवरा जण्ण तुम सयमेव राय वा जुवराय या वरेहिसी से ण तर भत्तारे भविस्सइ, ति कद ताहिं इटाहिं जाव आसासेइ आसासित्ता पडिविसज्जेइ) पुत्रि! था। पिसेमा ४ g तमारा भाटे સ્વય વર કરવાને છું ત્યારે તુ સ્વયંવરમા દત્ત સ્વય વરા થઈ જશે જે રાજા કે યુવરાજને તું તારી પસંદગી આપશે તેજ તારો પતિ થશે આ પ્રમાણે કહીને રાજાએ પિતાની પુત્રીને ઈ વગેરે વિશેષણોથી યુક્ત વચને વડે આશ્વાસનથી આશ્વાસિત કરીને તેને ત્યાંથી વિદાય કરી # સત્ર-૧૬ २५९ भनगारधर्मामृतषिणी टी० अ० १६ द्रौपदीचरितवर्णनम् सहि दुईतसाहस्सीओ वीरसेणपामोक्खाओ इक्वीसं वीरपुरिस- साहस्सीओ महसेणपामोक्खाओ छप्पन्नं वलवगसाहस्सीओ अन्ने य वहवे राईसरतलवरमाडंवियकोडुवियडभसिटिसेणा- वइसत्थवाहपभिइओ करयलपरिग्गहिय दसनह सिरसावत्त अंजलि मत्थए कटु जएण विजएण वद्धावेहि वद्धावित्ता एव वयाहि-एव खलु देवाणुप्पिया | कपिल्लपुरे नयरे दुवयस्स रणो धूयाए चुल्लणीए देवीए अत्तयाए धट्टज्जुणकुमारस्स भगिणीए दोवईए रायवरकपणाए सयवरे भविस्सड त ण तुम्भे देवाणुप्पिया । दुवयं राच अणुगिण्हेमाणा अकालपरि- हीणं चेव कपिल्लपुरे नयरे समोसरह, तएण से दूए करयल जाव कडु दुवयस्स रण्णो एयमट्ट पडिसुणेति पडिसुणित्ता जेणेव सए गिहे तेणेव उवागच्छइ उवागच्छित्ता कोडुवियपुरिसे सहावेइ सद्दावित्ता एव वयासी-खिप्पामेव भो देवाणुप्पिया। चाउग्धंट आसरह जुत्तामेव उवटुवेह जाव उवटवेति, उवट्ठवित्ता से दूए पहाए जाव अलकार० सरीरे चाउग्घंट आसरह दुरुहइ दुरुहिता बहहि पुरिसेहि सन्नद्ध जाव गहियाऽऽउह पह- रणेहि सद्धिं सपरिवुडे कपिल्लपुर नयरं मज्झ मज्झेणं निग्गच्छद पचालजणवयस्त मज्झ मज्झेण जेणेव देसप्पते तेणेव उवाग- च्छइ, सुरद्वाजणवयस्स मज्झमझेणंजेणेव वारवइ नयरी तेणेव उवागच्छइ उवागच्छित्ता वारवइ नयरिं मज्झ मज्झेण अणुप- विसइ अणुपविसित्ता जेणेव कण्हस्स वासुदेवस्स बाहिरिया तएण .
जाताधर्मकथा उवट्ठाणसाला तेणे उपागच्छ आगात्तिा चाउघंट आस- रहं ठोइ ठवित्ता रहाओ पच्चो पचौरहित्ता नणुस्सपागु- रापरिक्खित्ते पायविहारचारेणं जेणे कण्हे वासुदेवे तेणेत्र उवागच्छइ उवागन्छित्ता कह पासुदेव समुदविजयपामुक्खे य दस दसारे जाव बलवगसाहस्तीओ करयल तं चैव जाम समोसरह । तएण से कण्ह वासुदेरे तस्त दूयस्स अतिए एयमह सोचा निसम्म हट जाब हियएतंदूय सको इ सम्मा- णेइ सम्माणित्ता पडिविसउनेद ॥ सू० १७ ॥ दोका-'तए से' रत्या । तदनन्तर स दुपदो राजा दूत शब्द यति, शब्दयिता एवमरादीन्-गम खलु । हे देशानुप्रिय ! मारवती-द्वारकां नगरीम् , तन खलु व कृष्ण वासुदेव, समुद्रपिजयप्रमुपान दश दशानि, बलदेव ममुखान पञ्च महावीरान , उग्रसेनममुग्यान् पोडश राजसहस्राणि, मगुम्नप्रमुखाः अर्ध चतुर्थी कुमारकोटी प्रद्युम्नप्रमुग्वान् सार्वत्रिकोटिराजकुमारान् , साम्बप्रमुखार पष्टिदुर्दान्तसाहसी साम्नप्रमुग्वान् पप्टिसहस्रदुर्दान्तान् , पीरसेनममुखान् एक विंशतिवीरपुरुषसाहस्री' वीरसेनप्रमुग्यान एकविंशतिसहस्रवीरपुरुषान , महासेन 'तपणं से दुव' इत्यादि ।। टीकार्थ-(तएणं से दुवए राया दूय सदावेह, सावित्ता एवं वयासी गच्छ तुम देवाणुप्पिया यारवहनयरि-तत्थण तुम कण्ह चाप्लुदेव समु. इविजय पामोक्खे दसदसारे बलदेव पामोक्खे पचमहावीरे जग्गसेन पामो क्खे सोलसरायसहस्से पज्जुणपामोक्खाओ अदुवाओ कुमारकोडीओ सबपामोक्खाओ सहि दुद्दत साहस्सीओवीरसेन पामोक्खाओ इक्कीस तएण से दुवा' इत्यादि- सार्थ-(तएण से दुवए राया दूय सदावेई सहावित्ता एव वयासी-गच्छ तुम देवाणुप्पिया ! वारवइ नरि-तत्थण तुम कण्ह वासुदेवसमुह विजयपामोस्खे दसदसौरे बलदेवपामोक्खे पच महावीरे उग्गसेनपामोक्खे सोलसरायसहस्से पज्जुषण पामुक्खाओ अङ्घद्वानो कुमारकोडीओ सबपामोक्याओ सहि दुइव साहस्तीओ वीर सेन पामोक्खाओ इकवीस वीरपुरिससाहस्सीओ म - . बलव प्रेमगारधर्मामृतवपिणी टी० अ० १६ द्रौपदीचरितवर्णनम् २६१ प्रमुखाः पट्पश्चाशत् बलवत्साहस्री-महासेनप्रमुखान् पट्पञ्चाशत्महसममितबल वतो राज्ञः, अन्याश्च पहून राजेश्वरतलबग्माडरिककौटुम्बिकेभ्यश्रेष्ठिसेनापति सार्थ- वहप्रभृतीन करतलपरिगृहीत दशनख शिर आवर्तमलि मस्तके कृत्वा जयेन विज- येन जयविजयशब्देन 'बद्धावेहि' वर्धय-अभिनन्दय वर्धयित्वा एव ब्रूहि-हे देवानुप्रिया । एक खलु काम्पिल्यपुरे नगरे द्रुपस्य राज्ञो दुहिता-पुत्र्या , चुन्या देव्या आत्मनाया पृष्टद्युम्नकुमारस्य भगिन्या', द्रौपचा राजवरकन्यकाया स्वय वीर पुरिससाहस्सीमो महसेनपामोग्वाओ छप्पन्न बलवगसाहस्सी ओ अन्य यो राई सरतलवरमाडषियकोडंपियइन्भसेडिसेणावह सस्थवारपभिइओ करयलपरिग्गरिय दसनद सिरसावत्त अजलिं मत्या कटूटु जपण विजण वद्धावेहि वद्वावित्ता एव वयाहि) इस द्रुपद राजाने अपने एक दूत को बुलाया और बुलाकर उससे ऐसा कहा-देवानुप्रिय तुम द्वारका नगरीको जाओ वहा तुम कृष्ण वासुदेव को, समुद्र विजय प्रमुख दश दशार्दो को, बलदेव प्रमुख पाच महावीरों को, उग्रसेन प्रमुग्व सोलह हजार राजाओ को प्रद्युम्न प्रमुख ३।।) साढे तीन करोड राजकुमारों को ६० हजार दुर्दान्त साम्ब प्रमुखो को २१ हजार वीरसेन प्रमुख वीरों को ५६ हजार महासेन प्रमुख चलिष्ट राजीओ को, तथा और भी अनेक राजेश्वर तलवर, माडरिक, कौटुम्पिक, इभ्य, श्रेष्ठी, सेनापति, सार्थवाह आदिको को दोनों अपने राधो की दशनखो वाली अजलि बनाकर और उसे मरतक से घुमाकर नमस्कार करना तथा "जय विजय" शब्दोच्चारण करते हुए उन्हें वधाई देना-उनका अभिनन्दन करना। बधाई देकरके फिर उन से ऐसा गसाहस्सोओ भन्ने य बहवे राईसरतलवरमाडनियकोड चियइव्भसेद्विसेणावइसस्थवाह पभिइओ करयल परिग्गहिय दसनह सिरसावत्त अजलिं मत्थए कटु जएण विज एण वद्धावेहि, वद्धावित्ता एव वयाहि ) त्या२५४ी दु५४ रातो पाताना દૂતને બોલાવ્યું અને બોલાવીને તેને કહ્યું કે હે દેવાનુપ્રિય ! તમે દ્વારકા નગરીમા જાઓ ત્યા તમે કૃષ્ણવાસુદેવને, બળદેવ પ્રમુખ પાચ મહાવીરને, ઉગ્રસેન પ્રમુખ સોળ હજાર રાજાઓને, પ્રદ્યુમ્ન પ્રમુખ સાડા ત્રણ કરેડ રાજ કુમારને, ૬૦ હજાર દુર્ઘતસાબ પ્રમુખોને, ૨૧ હજાર વીરસેન પ્રમુખ વીરેને, પદ હજાર મહાસેના પ્રમુખ બલિષ્ઠ રાજાઓને તેમજ બીજા પણ બધા રાજેશ્વર, તલવર, માડબિક, કૌટુંબિક, ઈભ્ય, શ્રેષ્ઠિ, સેનાપતિ, સાથ વાહ વગેરેને પિતાના બને દશ નખેવાળા હાથની અ જલિ બતાવીને તેને મસ્તકે મૂકીને નમસ્કાર કરજો તથા “જય વિજય' શબ્દચ્ચારણ કરતા બધાને તમે અભિન દિત , anrasoi - पातामकथा उवट्ठाणसाला तेणेन उरागच्छद उयागनिमत्ता चाउघट आस- रहं ठयेइ ठवित्ता रहाओ पच्चीरुहड पयोमहित्ता नणुम्सबग्गु- रापरिक्खित्ते पायविहारचारणं जेणे कण्ह वासुदेव तेणेव उवागच्छइ उवागन्छित्ता कण्हे वासुदेवे समुद्दविजयपामुक्खे य दस दसारे जाव वलबगसाहस्सीओ कग्यल त घेव जाम समोसरह । तएण से कण्हे वासुदेने तस्स दूयस्स अतिए एयमह सोचा निसम्म र जाव हियएत दूय सको इ सम्मा- णेइ सम्माणित्ता पडिविसजेड ॥ सू० १७ ॥ टीका-'तए से ' इत्याहि । तनसाटनन्तर सदुपदो राजा दूत शब्द यति, शब्दयित्वा एमगादी-17 ग्लु त दे देशानुमिय । द्वारपतीद्वारका नगरीम् , तत्र सलु त्व कृष्ण वासुदेव, समुद्ररिजयममुग्यान् दश दशानि, बलदेव प्रमुखान् पञ्च महावीरान् , उग्रसेनममुग्यान् पोडश राजसहस्त्राणि, प्रद्युम्नप्रमुखाः अर्धचतुर्थी कुमारकोटी प्रधुम्नप्रमुखान् सार्धत्रिकोटिराजयुमारान् , साम्बप्रमुखाः पप्टिदुन्तिमादत्री.साम्बप्रमुग्वान् पप्टिसहयदुर्दान्तान् , पीरसेनप्रमुग्लान् एक विशतिवीरपुरुषमाहस्री वीरसेनममुग्वान एकविंशतिसहस्रवीरपुरुषान , महासेन तएण से दुवा' इत्यादि ।। टीकार्थ-(तएणं से दुवए राया द्य सद्दावेद, सहावित्ता एव चयासी गच्छ ण तुम देवाणुप्पिया! मारवइ नयरि-तत्यण तुम कण्ह वासुदेव समु दृविजय पामोक्खे दसदसारे बलदेव पामोक्खे पचमहावीरे उग्गसेन पामो क्खे सोलसरायसरस्से पज्जुण्णपामोक्खाओ अनुष्ठाओ कुमारकोडीओ सबपामोक्खाओ सहि दुद्दत साहस्सीओवीरसेन पामोक्खाओइक्कीस तएण से दुवए' इत्यादि-~- सा--(तएण से दुवए राया दूय सहावेइ, सहावित्ता एव वयासी-नाच्छण तुम देवाणुप्पिया ! वारवइ नयरि-तत्यण तुम कण्ह वासुदेवसमुद्द विजयपामोक्खे दसदसारे बलदेवपामोक्खे पच महावीरे उगासेनपामोक्खे सोलसरायसहस्से पज्जुण्ण पामुक्खाओ अधुढाओ कुमारकोडीजो समपामोस्साओ सट्ठि दुद्दत साहस्सीओ वीर सेन पामोक्खाओ इकवीस वोरपुरिससाहस्सीओ महसेनपामोक्खाओ छप्पन बलव - .
। मनगारधर्मामृतापणी टीका प० १६ द्रौपदीचरितवर्णनम् स्नातः यावत्-सर्वालङ्कारविभूपितशरीरश्चतुर्घण्टमश्वरथ · दुरुहइ' दृरोहति-आरो- हति । दुरुह्य बहुभिः पुरुपैः कीदृशैः पुस्पैरित्याह-' सन्नद्ध जाच गहिया' इति अत्र यानन्देनैव बोध्यम्-सन्नरद्धवम्मियारपहि, उम्पीलियसरासनपट्टगेहि, पिणद्धगेविज्जगद्धाविद्धविमलवरचिन्धपीहिं, गहियाऽऽउहपरणेहि इति । सनद्ध- बद्ध वर्मितकवचः उत्पीडितशरासनपट्टकै , पिनगवेयकवद्धपिद्धपिमलबरचिह्न पढ़ेः गृहीतायुधमहरणे , सन्नद्धाः सज्जीकृता, वहा' कशारन्धनेन सबद्धा, बर्मिताः भङ्गे परिहिताः कवचा यै स्ते सनद्धबद्धपर्मितकवचास्तै , तथा-उत्पीडि- तशरासनपट्टके. उत्पीड़ितानि-गुणारोपणेन चक्रीकृतानि शरासनपट्टानि धनुः प्रकाण्डानि यैस्ते उत्पीडितशरासनपट्टका रज्ज्वारोपणवक्रीकृतधनुर्वारिणस्तैः, वह जहा अपना घर था वहीं आया। वहा आकर उसने कौटुम्बिक पुरुपो को बुलाया बुलाकर उनसे ऐसा कहा हे देवानुप्रियों ! तुम लोग शीघ्र ही चार घटों से युक्त अश्वरथ को घोडे जोतकर यहा ले आओ। उन्होंने आज्ञानुसार ऐसा ही किया। वे चार घटा वाले उस रथ में घोडे जोतकर उसे वहा ले आये (तएण से दृए हाए जाव अलकार० मरौरे चाउग्घट आसरह दुमहड, दुरुहित्ता बर्हि पुरिसेहिं मन्नद्ध जाव गहियाऽऽउहपहरणेहिं सद्धिं सपरिवुढे कपिलपुरनयर माझ मजे ण निग्गच्छद) इस के गद दुतने स्नान किया, यावत् अपने शरीर को समम्त अलकारों से विभूपित किया। बाद में वह उस चतुर्घट वाले अचरथ पर सवार हो गया। उस के साथ सजाकर अपने शरीर पर कवच पहिर रखा है ऐसा अनेक पुरुप थे ज्यापर घाण को आरोपित करने से वक्री भूत हुआ धनुप जिनके हाथो में है ऐसे अनेक धनुर्धारी પિતાનું ઘર હતુ ત્યા આવ્યા ત્યાં આવીને તેણે કૌટુંબિક પુરૂષને લાવ્યા અને બેલાવીને તેમને કહ્યું કે હે દેવાનુપ્રિય! તમે સત્વરે ચાર ઘટડીઓવાળો અશ્વરથ જેતરીને અહીં આ કૌટુંબિક પુરૂએ તેમજ કર્યું ચાર ઘટડી ઓવાળે અશ્વર જેતરીને ત્યા લઈ આવ્યા (तपण से दूए हाए जाय अलकार० सरीरे चाउग्घट आसरह दुरुहइ, दुरहित्ता यहूहिं पुरिसेहिं सनद्ध जाव पहियाऽऽउहपहरणे हिं सिद्धिं सपरिबुडे कपिल्लपुरनयर मज्य मज्झेण निगच्छइ ) या२मा इते नान यु यावत् पोताना शरीरने मा adal અલ કારોથી શણગાર્યું ત્યારપછી તે દૂત ચતુર્ઘટવાળા અશ્વરથ ઉપર સવાર થઈ ગયે તે ઇતની બાયે બખતરથી સુસજજ થયેલા ઘણા પુરૂ હતા પ્રન્ય ચા ઉપર બાણ ચઢાવવાથી વક્ર થઈ ગયેલા ધનુ જેમના હાથમાં છે .
AA - २६२ बाला पारेको परो गरिष्यति, तत्-तग्मान् रान्तु गुय देशानुमियाः । पद रानानमनुशान्त 'आल्परिटीण च। 'पालविरमरहिममे याम्पियपुरे नगरे गमगरत, ततः खल स नः करवल गान्-अलि मनके सपा परस्प रात तमय प्रति शृणोति, प्रतिश्रुत्व योग सा गृह संयोपाग उति उपागल गौदुम्मिापुरुषान् शब्दयति शब्दयित्या पपमपादीत्-शिपमा भो देगनुप्रिया चतुर्घटम्टाचतु प्टययुक्तम् अवरथ युक्तमयोपस्थापयत । यारन्-उपम्यापनि । तत गन्द्र म दतः करना-(ध पल देवाणुपिया ! फपिल्लपुरै नपरे दुयधस्म रणगो धूया चुल्लीणीप देशी अत्तया घरजुणकुमारम्म भगिणी टोई रायबर कण्णाए सयवरे भविस्सा, त ण तुम्भे देवाणुप्पिया । दुवय राय अणु गिण्हे माणा अझालपरितीण चेर कपिलपुरे नयरे ममोलरह) हे देवा नुप्रियो ! कापिल्यपुर नगर में द्रुपद राजा की पुत्री, घुरनी टैची की आत्मजा, धृष्टशुम्न कुमार की भगिनी गजवर कन्या द्रौपदी का च्यवर होनेवाला है, इसलिये है देवानुगियों ! आप लोग द्रुपद राजाके ऊपर अनुग्रह करके बहुत ही शीघ्र कौपिल्यपुर नगर में पधारे । (तण्ण से दुए करपल जार कटु दुवयस्स रगो ग्यमट्ट पडिसुणेति पडिसुणित्ता जेणेव सए गिहे तेणेव उवागच्छद, उवागचित्ता कोडपिय पुरिसे सहा- वेइ, सदावित्ता एव पयासी, सिप्पामेच मो देवाणुप्पिया! चाउग्घट आसरर जुत्तामेव उवट्टवेर जाव उवट्ठधेति ) दूतने द्रुपद राजा के इस कथन को दोनों हाथ जोडकर स्वीकार कर लिया। स्वीकार करके फिर કરજે અભિન દિત કર્યા બાદ તમે તેઓને આ પ્રમાણે વિનતી કરજે (વ खलु देवाणुप्पिया ! कपिल्लपुरे नयरे दुवयास रण्णो धूयाए चुलणीए देवीए अत्तयाए धट्टज्जुणकुमारस्य भगिणीए दोवईए रायपरफण्णाए सयवरे भविस्सई, त " तुम्भे देवाणुप्पिया ! दुवय राय अणुगिण्हेमाणा अदालपरिहीण चेव कपिल्ल पुरे नयरे समोसरह ) के वानुप्रियो ! पित्यपुर नगरमा ५४ Puotel पुत्री ચુલની દેવીની આત્મજા, ધૃષ્ટદ્યુમ્નકુમારની બહેન રાજવર કન્યા દ્રૌપદીને ધય વર થવાનું છે એથી હે દેવાનુપ્રિય ! તમે દ્રુપદ રાજા ઉપર છુપા કરીને सत्तरे पिटय नगरमा ५या (तपण से दूए करयल जाव कटु दुवयास रण्णो ण्यमट्ठ पडिसुणे ति, पडिसुणित्ता जेणेव सए गिहे तेणेव उबागच्छइ, उषा गच्छित्ता कोडु वियपुरिसे सहावेह, सहावित्ता एव वयासी विप्पामेन भो देवा प्पिया । चाउग्घट आसरह जुत्तामेव उवटुवेद जाव उवदुवेंति ) ५६ शनी આજ્ઞાને દૂત બને હાથ જોડીને સ્વીકારી લીધી સ્વીકાર કર્યા તે જયા " - २६३ . " मनगारधर्मामृतवपिणी टीका अ० १६ द्रौपदीचरितवर्णनम् नातः यावत्-सर्वालङ्कारविभूपितशरीरश्चतुर्घण्टमश्वरथ · दुरुहइ' दोहति-आरो- इति । दुरुह्य बहुभिः पुरुपै. कीदृशैः पुस्पैरित्याह-' सन्नद्ध जाच गहिया' इति अत्र यानन्देनैव गोध्यम्-सन्नद्धपद्धवम्मियकाएहि, उप्पीलियसरासनपट्टगेहि, पिणद्धगेविज्जगवद्धाविद्धनिमलवरचिन्धपहिं, गहियाऽऽउहपरणेहि इति । सन्नद्ध- बद्धवर्मितकवचैः उत्पीड़ितशरासनपट्टकै , पिनौवेयकवद्धविद्धविमलपरचिह्व- पट्टैः गृहीतायुधमहरणैः, सन्नद्धा. सज्जीकृता, बद्धा कशापन्धनेन सद्धा, वर्मिताः भङ्गे परिहिताः कवचा यै स्ते सन्नद्धबद्धवर्मितकवचास्तै , तथा-उत्पीडि- तशरासनपट्टकै उत्पीडितानि-गुणारोपणेन वक्रीकृतानि शरासनपट्टानि धनुः प्रकाण्डानि यैस्ते उत्पीडितशरासनपट्टका रज्ज्यारोपणनक्रीकृतधनुर्वारिणस्तैः, वह जहा अपना घर था वहां आया। वहां आकर उसने कौडम्बिक पुरुषो को बुलाया बुलाकर उनसे ऐसा कहा हे देवानुप्रियों ! तुम लोग शीघ्र ही चार घटों से युक्त अश्वरथ को घोडे जोतकर यहा ले आओ। उन्होंने आज्ञानुसार ऐसा ही किया। वे चार घटा वाले उस रथ में घोडे जोतकर उसे वहा ले आये (तएण से दृए हाए जाव अलफार० सरीरे चाउग्घट आसरर दुरुड, दुरुहित्ता यहि पुरिसेहिं मन्नद्ध जाव गहियाऽऽउहपहरणेहिं मद्धिं सपरिखुडे कपिल्लपुरनयर मञ्झ मज्ज्ञे ण निग्गइ ) इस के बाद दुतने स्नान किया, यावत् अपने शरीर को समस्त अलकारों से विभूपित किया। बाद में वह उम चतुर्घट वाले अन्धरथ पर सवार हो गया। उस के साथ सजाकर अपने शरीर पर कवच पहिर रग्वा है ऐसा अनेक पुरुष थे ज्यापर घोण को आरोपित करने से वक्री भूत हुआ धनुष जिनके हाथो में हैं ऐसे अनेक धनुर्धारी પિતાનું ઘર હતુ ત્યા આવે ત્યાં આવીને તેણે કૌટુંબિક પુરૂષને બોલાવ્યા અને બોલાવીને તેમને કહ્યું કે હે દેવાનુપ્રિય! તમે સત્વરે ચાર ઘટડીઓવાળા અશ્વરથ જેતરીને અહીં આવે કૌટુંબિક પુરૂએ તેમજ કર્યું ચાર ઘટડી એવાળા અશ્વરથ તરીને ત્યા લઈ આવ્યા (तएण से दूर पहाए जाव अलकार० सरीरे चाउग्घट आसरह दुरुहइ दुरुहित्ता यहूहिं पुरिसेहि सनद्ध जाय गहियाऽऽउहपहरणे हिं सिद्धिं सपरिवुडे कपिल्लपुरनयर मज्झ मज्झेण નિર્) ત્યારબાદ તે સ્નાન કર્યું યાવત્ પિોતાના શરીરને બધી જાતના અલકારોથી શણગાર્યું ત્યારપછી તે દૂત ચતુર્ઘ ટવાળા અશ્વરથ ઉપર સવાર થઈ ગયો તે દૂતની ના બખતરથી સુસજજ થયેલા ઘણા પુરૂ હતા પ્રત્યચા ઉપર બાણ ચઢાવવાથી વક્ર થઈ ગયેલા ધનુષ જેમના હાથમાં છે .
. पातायात परो भविष्यति, तत्-तम्मान रानु गय हे देशानुप्रिया पट राजानमनुगडन्त 'मारपरिटीण र 'कारविमररिनगर काम्पित्यपुरे नगरे समवसरत, वत: खल्ल स दूतः करतल० यार-अलि मनके करया अपदस्य राम तमय प्रवि शृणोति, प्रतिश्रुत्व गौर सय गृह नीयोपाग उति उपागर पौटुम्पिकपुरुषान शब्दयति शब्दयित्य परमपादीत्-भिपस भो देशानुमिगा. चतुर्घट-घटाचतु प्टययुक्तम् अवय युक्तमेोपस्यापयत । यान-उपस्थापनि तन ग्यतु स दूत. करना-(पय गल देवाणुप्पिया! फपिटपुरे नयरे दुग्यस्म रगो घूपात चुल्हीणीप देगी अत्तया धज्जुणकुमारम्म मगि टोरई गयवर कण्णा मयबरे भरिस्सा, न ण नुम्भे देवाणुप्पिया । दुवय राय अणु गिण्हे माणा अकालपरितीण चे कपिझपुरे नयर ममोमरर) हे देवा नुप्रियो ! कापिल्यपुर नगर में द्रुपद राजा की पुत्री, पुरनी टवी की आत्मजा, धृष्टगुम्न कुमार की भगिनी गजवर कन्या द्रौपदी का स्पयवर होनेवाला है, इसलिये है देवानुगियों ! आप लोग दुपद राजाके ऊपर अनुग्रह करके बहुत ही शीघ्र कापिल्यपुर नगर मे पधारे । (तएण से दुए करयल जार कटु दुवयस्स रणो ण्यमट्ट पडिसणेति पउिसुणित्ता जेणेव सण गिहे तेणेव उवागच्छह, उवागच्छिता कोपिय पुरिसे सद्दा. वेड, सद्दावित्ता एव वयासी, खिप्पामेव भो देवाणुप्पिया ! चाउग्घट आसरह जुत्तामेव उवट्ठवेह जाव उचढवेति ) दुतने द्रुपद राजा के इस कथन को दोनों हाथ जोडकर स्वीकार कर लिया। स्वीकार करके फिर કરજે અભિન દિત કર્યા બાદ તમે તેઓને આ પ્રમાણે વિનતી કરજે (વ सलु देवाणुप्पिया ! कपिल्लपुरे नयरे दुवयस्स रणो धूयाए चुल्लणीए देवीए अत्तयाए धट्टज्जुणकुमारस्य भगिणीए दोनईए रायवरकण्णाए सयवरे भविरसई, त ण तुन्भे देशणुप्पिया ! दुबय राय अणुगिण्हेमाणा अकालपरिहीण चेव कपिल्ल पुरे नयरे समोसरह ) नुप्रियो ! पियपुर नगरमा द्रुप Anil yal ચુલની દેવીની આત્મજા, ધૃષ્ટદ્યુમ્નકુમારની બહેન રાજવર કન્યા દ્રૌપદીને સ્વયવર થવાનું છે એથી હે દેવાનુપ્રિયે ! તમે દ્રુપદ રાજા ઉપર કૃપા કરીને सतरे पिय नगरमा ५धारी (तपण से दुए करयल जाव कटु दुवयस्स रणो एयमट्ठ पडिसुणे ति, पडिसुणित्ता जेणेव सए गिहे तेणेव आगच्छइ, उवा गच्छित्ता कोडु वियपुरिसे सद्दावेइ, सद्दावित्ता एव वयासी खिप्पामेव भो देवा गुप्पिया । चाउग्घट आसरह जुत्तामेव उवटुवेह जाव उवदुति ) ६५४ शनी આજ્ઞાને તે બંને હાથ જોડીને સ્વીકારી લીધી સ્વીકાર કર્યા બાદ તે ચા - . . . मनगारधर्मामृतयरिणी टीका १०१६ द्रौपदीचरितवर्णनम् જ बाहिरुपस्थानशाला-आरथानमण्डपः, तौगोपागच्छति, उपागत्य चातुर्घण्टमश्वस्थ स्थापयति, स्थापयित्या ' रहाओ' रथात् ' पचोरुहइ' प्रत्यवरोहति-प्रत्यवत- रति, मत्यवरा 'मनुन्सवग्गुरापरिखित्ते' मनुष्यवागुरापरिक्षित मनुष्यसमूह परिवृतः, स इतः पादविहारचारेण पादाभ्या गमनेन यर कृष्णवासुदेवस्तौवो पागच्छति, उपगत्य कृष्ण नामदेव ममुद्रविजयपमुखाश्च दशदशाहान् यावत् घलपत्साहस्त्री', परतल्परिगृहीतदशनख गिरावर्त मस्त के अनलिं कृवा एमवादीत्-'त चेत्र' तटेव-अत्र पूर्वोक्तमेव वर्णन गोयम् यावत्-समवसरत वासुदेवस्स वाहिनिया उघट्टाण साला तेणेव उवागाइ, उवागत्तिा चाउ घट आसरह ठवेद, ठवित्ता रहाओ पच्चोरुरद, पच्चोरित्ता मणुस्सवरगुरापरिक्खित्ते पायविहारचारेणं जेणेव कण्हे वासुदेवे तेणेव उवागच्च ) चहा आकर द्वारावती नगरी में बीचोंबीच के मार्ग से होता हुआ प्रविष्ट हो कर वह जहां कृष्ण वासुदेव की याहिर में उप स्थानशाला-सभामडप या वहा गया। वर्त पहुंचकर उसने अपने चार घटावाले अश्वरथ को खड़ा कर दिया। रोक दिया-उसके रुकते ही वह उससे नीचे उतरा । उतर कर वह मनुष्योके सम्हसे परिक्षित (युक्त)हो कर पैदल ही जहा कृष्ण वासुदेव थे वहा गया । ( उवागच्छित्ता कण्ह वासुदेवसमुद्दविजयपामुक्खे य दम दसारे बार यलवगसारस्सीओ करयल त चेव जाव नमोसरह) वहां जा करके उसने कृष्ण वासुदेव को समुद्रविजय प्रमुख दश दशा)को यावत् महासेन प्रमुख५६, हजार व. लिष्ट राजाओको दोनो हाथों की अजलिकर और उसे मस्तक पर रग्वकर देवस्स बाहिरिया उपाढाणमाला तेणेव आगन्छइ, उजागच्छित्ता चाउघट आस रह ठवेड, ठवित्ता रहाओ पञ्चोरुहइ पचोरहित्ता मणुस्सवग्गुरापरिस्सित्ते पाय विहारचारेण जेणेव कण्हे वासुदेवे तेणेप उआगच्छ.) त्या मानाने ते द्वारा વતી નગરીના મધ્યમાર્ગ થઈને નગરમાં પ્રવિણ થયે અને ત્યારપછી તે જ્યા કૃષ્ણ-વાસુદેવની બાહ્ય ઉપસ્થાનશાળા-દીવાને આમ-(સભા મડપી હતી ત્યા ગમે ત્યાં પહોંચીને તેણે પિતાના ચાર ઘટડીવાળા રથને ઊભે રાખે અને પિતે નીચે ઉતર્યો ઉતર્યા પછી તે પિતાના નેકરો–સેવકની સાથે જના शु-बाभुव ता त्या भयो (उआगन्ठित्ता कण्ह वासुदेवसमुद्दविजयपामुस्खे य दस दसारे बार बलगमाहस्सोओ करयल त चेत्र जार ममोसरह) त्या જઈને તેણે કૃષ્ણ-વાસુદેવને સમુદ્ર વિજય પ્રમુખ દશાને ચાવતું મહાસેન પ્રમુખ પદ હજાર બલિ રાજાઓને બને હાથની આજલિ બતાવીને તેને ૫૪૪ - मानामा तथा-पिनद्धग्रेयपदारमिलानिप?- पिनहानि - परिश्तानि त्रय फाणि-यण्ठभूपणानि ये से तमा, आरोपिन सपोनितः आविद्ध' मस्त परिश्त. मिलाय. Tr: पिट:-पपयोपारित : येस्ते तया, ततो द्विपदमधारयः, तया-गहीनायुमागण. मायुधानि अत्राणि, प्रहरणानि- शसाणि गृहोनानि यस्ते गृहीतायुधमारणा नै, सार्थ सपरिशतः काम्पिल्यपुर नगर मध्यम येन मध्यमार्गेण निर्गच्छति, पालमपदम्य म"यम पन यीव 'देसपते ' देशमान्त-प्रेयसीमा नौगोपागमति, उपागत्य 'सुरहामण श्याम' सौराष्ट्रमनपदस्य ग यम येन गोत्र वारपती नगरी वोपागमति उपागत्य द्वारसती नगरी मध्यम येन अनुमरिगति, अनुपविश्य योर कप्पाग्य वासुदेवस्य पुरुप थे, जिन्होंने गले में आभूपणों को पहिररसे है और मस्तक के ऊपर स7, स्वपक्षपोधक चिह धारण किया है ऐसे अनेक व्यक्ति थे। तथा आयुध पच प्ररणों को लेकर अनेक सैनिक जन इसके आसपास हो कर चल रहे थे । मो धर दूत इन सय के साध २ उस कोपिल्यपुर नगर के पीचोंबीच से होकर निकला । (पचालजणवयस्स मज्ज्ञ महोण जेणेव देसप्पते तेणेच वागच्छइ-सुरठा जणत्यस्स मजम मजोण जेणेव पारवहनयरी तेणेच वाग) घरते २ वह पाचाल जनपदके बीचोंबीच से शेता एआ जहा पर अपने देशकी सीमा का अन्त था वहा आया । वहा आकर वह सौराष्ट्र देशके बीचसे निक लता हुआ जहा द्वारावती नगरी थी वर्श आया-(उधागघिउत्तो बार बइ नयरी मजा मज्ोण अणुपविसह, अणुपतिसित्ता जेणेव कहस्स એવા ઘણું ધનુધરે તેની સાથે હતા, જેઓએ ગળામા આભૂષણે પહેરેલા અને મસ્તક ઉપર સ્વચ્છ સ્વપક્ષ બેધક ચિહ્ન પટે બાધી રાખેવા એવા પU અનેક પુરૂષે તેની સાથે હતા આયુધ અને પ્રહરને ઉચકીને પણ ઘણસિનિકે તેની બને બાજુએ ચાલી રહ્યા હતા આ રીતે તે દૂત તેઓ બધાની સાથે पिदयपुर नगरनी पश्ये यईन नान्यो (पचाल जणवयस्स मज्झ मझेण नेणेव देसापते तेणेव उवागच्छइ सुग्दा जणवयरस मज्न मज्झेण जेणेव पारवहनयरी तेणेव उवागग्छइ) आभपातानी यात्रा पूरी शन तेइत पायाख જનપદની વચ્ચે વચ્ચે જ્યા પિતાના દેશની હદ પૂરી થતી હતી ત્યાં આવે ત્યાં આવીને તે સૌરાષ્ટ્ર દેશની વચ્ચે થઈને જ દ્વારાવતી નગરી હતી ત્યાં આવ્યા (યા च्छित्ता बारवइ, नयार भञ्झ मझेग, अणुपविसह, h- / ।
, अनगारधर्मामृतपिणी टीका १० १६ द्रौपदीचरितवर्णनम् २६५ चाहिस्पस्थानशाला-आरथानमण्डपः, तगोपागच्छति, उपागत्य चातुर्घण्टमश्वरयं स्थापयति, स्थापयित्या ' रहाओ' रथात् 'पशोरुद्दइ' मत्यरोहति-मन्यवत- रति, प्रत्यवम्य 'मनुन्सनग्गुरापरिखित्ते' मनुष्यवागुरापरिक्षिप्त मनुष्यसमूह परिवृतः, स दूत' पादरिहारचारेण-पादाभ्या गमनेन यौर कृष्णवासुदेवस्तयो- पागच्छति, उपगत्य कृष्ण वासुदेव ममुद्रविजयप्रमुखाश्च दशदशानि यावत् चलमत्साहसी., वरतस्परिगृहीतदशनख गिरावर्त मस्त के अअलि कुवा एनमगदी-'त चेव' सटेव-अत्र पोक्तमेव वर्णन गोन्यम् यावत्-समवसरत वासुदेवस्स बाहिरिया उवाण साला तेणेव उवागच्छद, उवागचित्ता चाउ घट आसरह ठवेड, ठवित्ता रहाओ पच्चोरुरद, पच्चोरिता मणुस्सवरगुरापरिक्ग्वित्ते पायविहारचारेण जेणेच कण्हे वासुदेवे तेणेव उवागइ ) यहा आकर द्वारावती नगरी में बीचोंबीच के मार्ग से होता हुआ प्ररिष्ट हो कर वह जहा कृष्ण वासुदेव की याहिर में उप स्थानशाला-सभामडप या वहां गया । वरी पहुंचकर उसने अपने चार घटाबाले अश्वरथ को खड़ा कर दिया। रोक दिया-उसके म्कते ही वह उससे नीचे उतरा । उतर कर वह मनुष्योके नमूहसे परिक्षित (युक्त) हो कार पैदल ही जनां कृष्ण वासुदेव थे वहा गया । ( उबागच्छित्ता कपह वासुदेवममुद्दविजयपामुक्से य दन दमारे जान पलवगसाहस्सीओ करयल त चेव जाव नमोसरह) वहां जा करके उसने कृष्ण वासुदेव को समुद्रविजय प्रमुख दश दशा) को यावत् महासेन प्रमुख९६, हजार ब. लिष्ट राजाओको दोनों हाथों की अजलिकर और उसे मस्तक पर रग्वकर देवस्स बाहिरिया आढाणमारा तेणेव आगन्छइ, आगच्छित्ता चाउवट आम. रह ठवेड, ठवित्ता रहाओ पयोहाइ पोरहित्ता मणुरसवग्गुरापरिस्सित्ते पाय विहारचारेण जेणेव कण्वे वासुदेवे तेणेर आगन्छइ ) त्या मानाने ते વતી નગરીના મધ્યમા થઈને નગરમાં પ્રવિણ થયું અને ત્યારપછી તે જ્યા કૃષ્ણ-વાસુદેવની બાહ્ય ઉપસ્થાનશાળા-દીવાને આમ-( સભા મડપ) હતી ત્યા ગમે ત્યા પહોચીને તેણે પિતાના ચાર ઘટડીવાળા રથને ઊભે રાખે અને પિતે નીચે ઉતર્યો ઉતર્યા પછી તે પિતાના નેકરો–મેવકની સાથે જવા शु-वासुदेव तो त्या भयो (उपागठित्ता कण्ह वासुदेवसमुद्दविनयपामुक्खे य दम दसारे जाव नलगमाहस्सोओ करयल त चेर जार ममोसरह) त्या જઈને તેણે કૃષ્ણ-વાસુદેવને સમુદ્ર વિજ્ય પ્રમુખ દશાને થાવત્ મહાન મસુખ પ૬ હજાર બલિ રાજાઓને બંને હાથની આજલિ બતાવીને તેને " ---- - मातापायाम इति पर्यन्तम् , अयमर्थ:-काम्पिन्गपुरनगरे दुपा गा. पुन्या द्रौपया स्वयपरो मरिष्यति, तस्माद् गृग अपः राजानमनुशान्त पालग्लिम्बरहितं काम्पिल्यपुरे नगरे समागमतेवि स दन' प्रोक्तमा'ति । ततः खलु म कृष्णो गायुम्नग दतम्याग्निक गतम श्रुत्वा निभम्प हृष्टतुष्टः यायत्-दर्प शेन रिसर्पदयस्त दत गत्याग्यति राया समानपति, सत्कार्य समान्य प्रतिविमर्नयति ॥ ०१७ ॥ मूलम्-तएण से कण्हे वासुदेव कोडवियपुरिसे सदावेइ सद्दावित्ता एव वयासी-गच्छह णं तुम देवाणुप्पिया । सभाए सुहम्माए सामुदाइय भेरि तालेहि, तएण से कोडुबियपुरिसे कर यल जाव कण्हस्स वासुदेवस्स एयमट्ट पडिसुणेड पडिसुणित्ता नमस्कार किया । यरा पर 'पपलु देवाणुप्पिया,' से लेकर ममोसरह "तकका पूर्वोक्त पाठ इसके द्वारा कहा गया रगा लेना चाहिये-जिसका तात्पर्य यह है कि कांपिल्यपुर नगर में द्रुपद राजा की पुत्री द्रौपदी का स्वयवर होने वाला है मो आपलोग दुपद राजा के ऊपर कृपा कर के उसमें शीत पधारे । इस प्रकार (तएण से कण्हे वासुदेवे तम्स दूयस्स अति ण्यम सोच्चा निसम्म हट्ट जाव हिया त दय सरकारेइ सम्मा णे सरकारिता सम्माणित्ता पटिविसज्जेइ) कृष्ण वासुदेव ने उस दूत के मुखसे जप इस समागर को सुना-तो वे सुनकर और उसे हृदयमें धारण कर बत्त ही अधिक हर्पित एव सतुष्ट हुए। दूतका उन्होंने सत्कार किया, सन्मान किया। बादमे उसे वहा से विसर्जित कर दिया।सू०१७|| भरत भूटीन नभ२४.२ ४या मला 'एर सलु देवाणुप्पिया' थी समोसरह' સુધીને પાઠ દૂત વડે કહેવામા આવેલ છે એમ સમજી લેવું જોઈએ તેની મતલબ એ છે કે પિલ્યપુર નગરમાં દુપદ રાજાની પુત્રી દ્રૌપદીને સ્વયવર થવાનો છે તે આપ સૌ દ્રુપદ રાજા ઉપર મહેરબાની કરીને તેમાં સાત્વરે पधारे। मा शत (तएण से कण्हे वासुदेवे तस्स दूयस्स अतिए एयमह सोचा निसम्म हट्ठ जाव हियए त दूय सक्कारेइ सम्माणेइ सक्छारिता सम्माणित्ता पडिविसज्नेइ) -पासुदेवे इतना भुमथी मा लतना सभाया। साया ત્યારે સાભળીને અને તેઓને બરાબર હદયમાં ધારણ કરીને અત્યત હર્ષિત તેમજ સંતુષ્ટ થઈને તેમણે દૂતને સત્કાર તેમજ સન્માન કર્યું ત્યારપછી તેમણે તેને વિદાય કર્યો છે સૂત્ર ૧૦ 4
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पगारधामृतवपिणो टो० भ० १६ द्रौपदीचरिरावर्णनम्
जेणेव सभाए सुहम्माए सामुदाइया
भेरी तेणेव
उवागच्छ
उवागच्छित्ता
सामुदाइय
भेरि
महया महया सदेणं तालेइ
तएणं ताए सामुदाइयाए भेरीए तालियाए समाणीए
समु-
द्दविजयपामोक्खा दस दसारा जाव महसेणपामुक्खाओ
छप्पणं बलवगसाहस्सीओ व्हाया त्रिभृसिया जहा विभव
इड्डिसकारसमुदएणं अप्पेगइया जाव पायविहारचारेण
जेणेव कण्हे वासुदेवे तेणेव उवागच्छति उवागच्छित्ता कर-
यल जाव कण्हे वासुदेवे जएणं विजएणं वद्धावति, तएणं
से कण्हे वासुदेवे कोडुवियपुरिसे सदावेइ सदावित्ता एव वया-
सी-खिप्पामेव भो । देवाणुप्पिया । अभिसेक्क हत्थिरयण
पडिकप्पेह हयगय जाव पञ्चपिणंति, तएणंसे कण्हे वासुदेवे
जेणेव मजणघरे तेणेव उवागच्छइ उवागच्छित्ता समुत्तजा-
लाकुलाभिरामे जाव अंजणगिरिकूडसन्निभ गयवइ नरवई
दुरूढे, तएणं से कण्हे वासुदेवे समुद्दविजयपामुखेहि दसहि
दसारेहि जाव अणंगसेणापामुक्खेहि अणेगाहि गणियासाह-
स्सीहि सद्धि सपरिवुडे सव्विड्डीए जाव रवेण चारवइनयरि
मज्झं मज्झेण निग्गच्छइ निग्गच्छित्ता सुरट्टाजणवयस्स मज्झं
मज्झेण जेणेव देसप्पते तेणेव उवागच्छइ उवागच्छित्ता
पंचालजणवयस्स मज्झ मज्झेण जेणेव कंपिल्लपुरे नयरे
तेणेव पहारेत्थ गमणाए ॥ सू॥ १८ ॥
२५८ माताधा टीका-'तपण सेत्यादिना गाल गोटेया दुम्बिक पुरुप शब्दयति, दयितया यादीन-7ng त्या देवानृपिय समाया सुधर्मागा ' सामुदाइय' सामुदायिक मेरि गाउय, नतः परस यौम्बिक पुरुष करत २० गद्-मस्त केनिया गान् गणस्य गामदेवस्पैतमर्थ मतिमणोति, मतिश्रुत्य योर गमाया गृधर्माया ‘गामुगाया' सामुदायिकी भेरी तोषागति, उपागन्य मा दायिती भरी माना २ देन वाटयति, येन महान्दो भाति, नथा मेरी नायनि मेत्यर्थः, ततस्तदनन्तर खलु तस्या 'ताण से कण्हे घासुदे।' त्यादि। टीमार्थ-(ताण इसके पाद (से करे वासुदेवे) उन कृष्ण वासुदेवने ( कोडुपियपुरिस साये ) अपने कौटुम्पिक पुरुप को बुलाया, धुला कर (व वयासो ) उनसे ऐसा कहा-(गच्छर तुम देवाणुप्पिया। सभा सुरम्माए मामुदाहय भेरि तालेहि ) हे देवानुप्रिय तुम सुधर्मा ममामें जाओ और वहा जाफर सामुदाय की भेरी को यजामओ (तण्ण से कोषिष पुरिसे करयल जाव कण्हस्स पाउदेस्स रायम पडि सुणेइ, पडिणित्ता जेणेव 'सभाप सुरम्माए सामुदाझ्या भेरी तेणेव उवागच्छद, उबागच्छित्ता सामुदाय भेरि मत्या सद्देण तालेह ) इस प्रकार की कृष्ण वासुदेव की आज्ञा को उस पुम्प ने बड़े विनय के साथ अपने दोनों हाथों को मस्तक पर रग्यकर स्वीकार कर लिया और स्वीकार करके फिर वह सुधर्मा सभा मे जहा यह सामुदायिकी भेरी थी बहा आया। यहा आकर उसने उस सामुदायिकी भेरी को इसतरह से तएण से कण्हे वासुदेवे' इत्यादि- 2014-(तपण) त्या२पछी (से कण्हे वासुदेवे) ते ६-१-पाभुढेवे (कोडु बिय पुरिस सहावेइ ) पाताना औमि ५३पान मा भने मासापान ( एव षयासी ) भने मा प्रमाणे अछु -(गच्छत् ण तुम देवाणुप्पिया! सभाए मुहम्माए सामुदाइय भेरि तालेहि ) पानुप्रिय ! तमे सुधर्भा सलाम! on भने त्याने सामुदायि! मेरी पास (तएण से कोड बियपुरिसे कर यल जाव कण्हस्त वासुदेवस्त ण्यममट्ठ पडिसुणेह पडिसुणित्ता जेणेर समाए सुहम्माए सामुदाइया भेरी तेणे आगच्छद उवागरिछत्ता सामुदाइय भेरि मया २ सदेण तालेइ જાતની કૃણ-વાસુદેવની આજ્ઞાને તે પુરૂવે ખૂબજ નામ મૂકીને સ્વીકારી લીધી, સ્વીકાર કર્યા પછી તે ત્યાથી ભેરી હતી ત્યાં જઈને તેણે મેટે અવાજ पास (तएण ताए भेरीप - પણે બને .. orया सु अनगारधामृतवर्षिणी टोका अ०१६ द्रौपदीचरितवर्णनम् २६९ सामुदायिक्या भैया ताडिताया सत्या समुद्रविजयममुखा दश दशार्दा यावत्- महासेन प्रमुखा पट्पश्चाशद्वलयत्साहस्रया पट्पञ्चाशत्-सहस्रममिता बलवन्तो राजानः स्नाता यापद्-सर्वालकारविभूपिता यथाविभवद्धिसत्कारसमुदयेन अप्पेगइया ' अफे-यान केचिद् हयारूढा-अश्वारूढाः केचिद् गजारूढाः, केचिद् रथारूढा. केचिद् पादविहारचारेण यौव कृष्णो पासुदेवस्तीतोपाग छति, उपागत्य करतल. यावत् कृष्ण नासुदेव जयेन विजयेन-जयविजय शब्देन वर्धयन्ति । ततः खलु कृष्णो वासुदेव कौटुम्पिापुरुषान् शब्दयति, शब्द- यित्वा एवमवादीन-भो देवानुपियाः । क्षिप्रमेव — अभिसेक्कं ' आभिषेक्य गज बड़े पल से बजायी कि जिससे उससे बड़ी भारी आवाज निकली (तपण ताए सामुदाइयाए भेरीए तालिया समाणीए समुदविजय पामोक्खा दस दसारा जाव महासेण पामुक्खाओ छप्पण पलवगसाह स्सीओ पहाया जाव विभूसिया जहा विभव इडी सक्कारसमुदएण अत्थेगइया जाब पापविहारचारेण जेणेव कण्हे वासुदेवे तेणेव उवाग च्छति ) इस तरह उस सामुयिकी भेरी के घजने पर समुद्रविजय आदि दश दशाों ने यावत् ५६ हजार महासेन प्रमुख बलिष्ठ राजाओ ने स्नान किया। यावत् समस्त अलकारों से विभूपित होकर एव सबके सब अपने विभव मद्धि और सत्कार के अनुसार जहा कृष्ण वासुदेव थे वहा ओये । इनमे कितनेक घोडों पर कितनेक हाथियों पर कितनक रथों पर बैठकर आये और कितनेक पैदल ही चलकर आये ( उवाग- च्छिता करयल जाव कण्ह वासुदेव जएण विजएण बद्वाति, तएणं से कण्हे वासुदेवे कोडुपिय पुरिसे सद्दावेह सद्दवित्ता एव वयासी, खिप्पामेव तालियाए समाणोए समुदविजयपामोक्ता दस दसारा जाव महासेण पामु एखाओ छप्पण बलगमाहरसीओ व्हाया जाय विभूमिया जहा विभव इड्ढी सकारसमुदएण अप्पेगइया जाव पायविहारचारेण जेणेव कण्हे वासुदेवे वेणेव समागच्छ ति) मा शते ते सामुदिती री गाउामा मापी त्यारे समुद्र विजय વગેરે દશ દશાહએ યાવત પ૬ હજાર મહાસેના પ્રમુખ બલિ રાજાઓએ સ્નાન કર્યું યાવત તેઓ સર્વે સમસ્ત અલ કારોથી સુસજ્જ થઈને પિતાના વિભવ અને સત્કારની સાથે જ્યાં કૃષ્ણ-વાસુદેવ હતા ત્યાં ગયા આમાં કેટલાક ઘોડાઓ ઉપર, કેટલાક હાથીઓ ઉપર, કેટલાક ર ઉપર સવાર થઈને ત્યાં પહેચ્યા હતા તે કેટલાક પગે ચાલીને જ કૃષ્ણ-વાસુદેવની પાસે હાજર થયા उता (उबागच्छिचा करयल जाब कण्ह वासुहेर जएग बिजरग बद्धाव दि तएण से कण्हे वासुदेवे कोडु वियपुरिसे सदावेद सदाविचा पर क्यासी खिप्पा -- પદ . TASHT टीका-'तपण से ' इत्यागि गुदेवः कोदुमिक पुरुष गन्नयति, दयिता मादीन-7 गला देशानुप्रिय ! समाया सुधर्माया ' मागुदाध्य' सामुदायिक भेरि जाउय, गनः गडम पौम्बिक पुरुष फरत 3० यापद्-मस्तकानि कन्या गाए गम्य पामुदयस्पतमर्थ मतिमणोति, पतिश्रुत्य यो समाया गुगर्माया 'गामुदाइया' सामुदायिकी भेरी तौगोपागति, उपागन्य मा दायिकी भरी माना गन्दन ताडयति, येन महागन्दो भाति, नया भरी नायनि मेत्यर्थः, नतस्तदनन्तर सलु तस्या 'तण्ण से कपडे घासुदे' इत्यादि । टीकार्य-(तगण उसके बाद (से करे वासुदेवे) उन कृष्ण वासुदेवने ( कोडयियपुरिस मायेह ) अपने कोम्पिक पुरुप को बुलाया, पुला कर ( ण्व वयासो ) उनसे ऐसा कहा-(गच्छर ण तुम देवाणुप्पिया! सभा सुरम्मा मामुदाहय भेरि तालेरि ) हे देशानुप्रिय तुम सुधर्मा समामें जाओ और वहा जाकर मामुदाय की भेरी को यजाओ (तएण से कोदुनिय पुरिसे करयल जाय कण्हस गासुदेवस्स एयम पडि सुणेड, पडिमुणित्ता जेणेच 'सभाप सुरम्मा सामुदाइया भेरी तेणेव उवागच्छद, उवागच्छित्ता सामुदाइय मेरि मत्या२ सदेण तालेड ) इस प्रकार की कृष्ण वासुदेव की आज्ञा को उस पुरुप ने बड़े विनय के साथ अपने दोनों हाथों को मस्तक पर रखकर स्वीकार कर लिया और स्वीकार करके फिर यह सुधर्मा सभा मे जहा वह सामुदायिकी मेरी धी वहा आया। वहा आकर उसने उस सामुदायिकी भेरी को इसतरह से तपण से कण्हे वासुदेवे' इत्यादि- Astथ--(तएण) त्या२५(से कण्हे वासुदेवे) ते १४-वासुदेव (कोड बिय पुरिस सदावेइ) पोताना मि ५३पान माता॥ मने मालाचीन ( एव षयासी) तेभने मा प्रमाणे धु-(गच्छह ण तुम देवाणुप्पिया। सभाए मुहम्माए सामुदाइय भेरि तालेहि ) पानुप्रिय । तमे सुधर्भा सलामा । भने त्यो ने सामुदायिकी मेश 4i (तएण से कोडु बियपुरिसे कर यल जाव कण्हरस वासुदेवस्स एयममट्ठ पडिसुणेइ पडिसुणित्ता जेणेव समाए सुहम्माए सामुदाइया भेरी तेणेव आगच्छद आगच्छित्ता सामुदाइय भेरिं महया २ सद्देण तालेइ) मा anal -वासुदेवनी भाशाने ते इथे घूमा नम्र પણે બંને હાથને મસ્તકે મૂકીને સ્વીકારી લીધી, સ્વીકાર કર્યા પછી તે ત્યાંથી જ્યા સુધમાં સભામા સામુદાયિકી લેરી હતી ત્યા જઈને તેણે મોટે અવાજ थाय तम त सामुदायिक सेशन गाडी (तएण ताए भेरोए मनगारधर्मामृनपिणो टी० 40 १६ द्रोपदीचरितवर्णनम् वासुदेव समुद्रविजयममुग्वेदशाह वित् अनगसेनाप्रमुखाभिरनेवाभिर्गणिका साहस्रीमि' साधं सपरिहतः सर्या छत्रादिराजचिहरूपया यावत्-शङ्खपण- वपटहभेर्यादिरवेण द्वारबती नगर्या मध्यमध्येन-निर्गच्छति, निगत्य सौराष्टूजन- पदस्य मध्यमध्येन यौव देशमान्त-देशमीमा तत्रैवोपागच्छति, उपागत्य पश्चा- लजनपदस्य म यमध्येन यौव शम्पित्यपुर नगर तत्रैव माधारयद् गमनाय- गतु प्ररत्त' ।। सु०१८॥ कृष्ण वासुदेव जहा स्नान घर थो वहा गये-वहा जाकर उन्होने मुक्ताओं सहित गवाक्षो से गुन्दर उम स्नान घर में स्नान किया-स्नान करके फिर सर्व अलकारो से विभूपित होकर वे नरपति अजन गिरि के शिखर जैसे-विशाल कृष्णवर्ण चाले गजपति पर आरूढ रो गये। (तएणं से कण्हे वासुदेवे समुद्दविजयपामोसेहिं दसहिं दसारेहिं जाव अणग सेणा पामुक्खेहिं अणेगाहिं गणिया साहस्सीहिं सद्धिं सपरिवुडे सन्ध ड्डीए जाब रवेण चारवइनयरिं मझ मज्झेण निग्गच्छइ, निग्गच्छित्ता सुरहा जणवयस्म मज्श मज्झेण जेणेव देसप्पते तेणेव उवागच्छद, उवागचित्ता पचाल जणवयस्स मज्झ मझेण जेणेव कपिल्लपुरे नयरे तेणेव पहारेत्यागमणाप) आरट होकर वे कृष्ण वासुदेव समुद्र विजय आदि दश दशाों यावत् अगसेना प्रमुख हजारों गणिकाओ के साथ २ उत्र आदि राज चिहरूप विभूति से युक्त होकरशस्व, पणथ, पटर, भेरी आदि बाजो की तुमुल ध्वनि पूर्वक द्वारावती नगरी के यीच से ત્યારપછી તે કૃષ્ણ-વાસુદેવ જ્યા સ્નાનઘર હતુ ત્યા ગયા ત્યા જઈને તેમણે મેતી જડેલા ગવાક્ષેથી રમણીય લાગતા સ્નાનઘરમાં સ્નાન કર્યુ અને ત્યાર પછી બધા અલ કારોથી વિભૂષિત થઈને-નરપતિ અ જનગિરિના શિખર જેવા વિશાન ડ્રણ વર્ણવાળા ગજપતિ ઉપર સવાર થઈ ગયા (तण्ण से कण्हे वासुदेवे समुद्दविनयपामोक्सेहि रम पारेहि जाव अण गसेणा पामुग्वे हिं अणेगाहिं गणयामाहस्सीहिं सद्धिं सपरिदुडे सबिट्ठीए जाव रयेण बारकइ नार मज्झ मझेण निगच्छइ निग्गन्धित्ता सुग्दा जणवयम्स म झ मज्झेण जेणेव देसम्पते तेणेच वागन्छ। आगच्छित्ता प चालजगवयस्म म झ मरसेग जेणे क पिल्लपुरे नपरे तेणेप पहारेत्य मणाए ) भा२ २ तेमा मभु वय વગેરે દશ દશાહે યાવત્ અ ગસેના પ્રમુખ હજારે ગણિકાઓની સાથે છા વિગેરે રાજચિહ્ન રૂપ વિભૂતિથી યુક્ત થઈને શખ, પણવ, પટવું, ભેરી વગેરે તુમુવ કવનિ સ્થાને દ્વારવતી નગરીની વચ્ચે વઈને પસાર થયા ત્યાથી પસાર - .
२० जाताrचासो रत्नगम मुराहस्तिन पग्मिन्पयत- गमागमम्मपदापि नारद्वन सज्जीत, एवो ममामा मत्पर्पयत, इनि रापोटपिरगणाः 'नयाऽस्तु' उत्युक्त्वा तदाता पीक-पसी सपास वाहन यलनगन्जोकनमस्माभिरिति यावत् मत्यर्पपन्ति निद्रगन्ति सा । न. पगारो रामगो या मजन गृह सांगोपाग उति, मज्जनगृह समित्यार-'गगुरागारागनिगमे ' समु तमालालागिराम मुक्ताभिः गरितानि नागनि गावरार यूक्तमतएका मिराम सुन्दरम् , उपागत्य म तत्र स्नान करवा गायन-गलकारविभूषितः, अअनगिरिकूटसनिमम्-उगनर श्यामवर्णमित्यर्थ , गनपनिम्तिपु गुग्य हस्तिन नरपति श्री गणासुदेव. 'दुस्टे' दामाद', नत. पर स कष्णो भो देवाणुपिया! अभिसेक विग्यण पटिप्पर, स्यगर जाव पच्चप्पिण ति ) वता आकर उनीने दोनों हाथ जोड़कर कृष्ण वासुदेव को नमस्कार करते हुए जय विजय गन्दी द्वारा बधाई दी-मके याद उन कृष्ण वासुदेव ने कौटुम्पिक पुस्पा को मुलाया-तुलाकर उससे इस प्रकार कहा-भो देवानुपियो । तुमलोग शीघ्र ही मेरे मुग्य हाथी को सजाओ-तथा-त्य, गज, रथ और पदातिरूप चतुरग युक्त सेना को भी सजाकर तैयार करो। पीछे हमको इसको ग्वयर दो। इसके बाद उन कौटुम्पिक पुरुपो ने-"तथास्तु" कहकर उनकी आज्ञा को स्वीकार लिया और स्वीकार करके पल और चाटन समने सजित कर दिये हैं इस प्रकार की खबर उन्हें पीछे कर दी। (तण्ण से कण्हे वास्तुदेवे जेणेव मज्जणघरे तेणेर उवागच्छद, उचागच्छित्ता समुत्तजालाकुलाभिरामे जाव अजणगिरि कृडसनिभ गयवइ भरवई दुरूदे ) इसके पश्चात् मेव भो देवाणुपिया! आभिसेक हस्थिरयण पडिकप्पेह, हयगयजाव पचप्पिणति) ત્યાં જઈને તેઓએ બને હાથ જોડીને વિજય શબ્દોથી કૃષ્ણ-વાસુદેવને નમસ્કાર કરતા અભિન દિત કર્યો ત્યારપછી કૃષ્ણ-વાસુદેવે કૌટુંબિક પુરૂને બોલાવ્યા અને બોલાવીને તેઓને આ પ્રમાણે કહ્યું કે હે દેવાનુપ્રિ સત્વરે તમે મારા મુખ્ય હાથીને તેમજ બીજી પણ ઘડા, હાથી, રથ અને પાયદાની ચતુરગિણી સેનાને સુસજજ કરે અને તેના સુસજજ થઈ જાય ત્યારે અમને ખબર આપિ ત્યારપછી ટુંબિક પુરૂએ તથાસ્તુ' કહીને તેમની આજ્ઞા સ્વીકારી લીધી અને સ્વીકારીને તેઓ પિતાના કામમાં પરોવાઈ ગયા જ્યારે કામ થઈ ગયું ત્યારે તેઓએ “સેના અને વાહન તૈયાર છે ” આ જાતની ખબર આપી (तएण से कण्हे वासुदेवे जेणे मजणघरे वेगेव उवागच्छइ उवागच्छिता उतजालाकुलाभिरामे जाव अजणगिरिकूडसन्लिभ गयवइ नरवई दुरुते ) अनगारधर्मामुनर्पिणी टी० अ० १६ द्रोपदीयरितवनम वासुदेव समुद्रविजयममुखैदशाह यवत् अनइसेनाप्रमुग्वाभिरनेकाभिर्गणिका साहसीभिः साध सपरिहतः सद्धर्या-छवादिराजचिह्नरूपया यावत्-शत्रपण- वपटहभेर्यादिरण द्वारस्ती नगर्या मध्यम येन-निर्गच्छति, निर्गस्य सौराष्ट्रजन पदस्य मध्यमध्येन यो देशमान्त-देशमीमा तनोपागति, उपागस्य पश्चा- लजनपदस्य मायमध्येन योर साम्पिल्यपुर नगर तव पाधारयद् गमनाय: गतु महत्तः॥ मु०१८॥ कृष्ण यासुदेव जहां स्नान घर थो वहा गये-वहा जाकर उन्होंने मुक्ताओं सरित गवाक्षों से सुन्दर उम स्नान घर में स्नान किया-स्नान करके फिर सर्व अलकारो से विभूषित शेकर वे नरपति अजन गिरि के शिखर जैसे-विशाल कृष्णवर्ण वाले गजपति पर आरूढ रो गये। (तरण से कण्हे वासुदेवे ममुद्दविजयपामोरसेहिं दसहिं दमाहि जाब अणंग सेणा पामुक्खेहिं अणेगाहिं गणिया माहस्सीहिं सद्धिं सपरिबुडे सब ड्डीए जान ग्वेण वारवइनररि मझ मज्झेण निग्गच्छ, निग्गच्छित्ता सुरहा जणवयस्त मज्झ मझेण जेणेव देसप्पते तेणेव उवागच्छद, उवागच्छिन्ता पचाल तणवयस्स मजा मझेण जेणेव कपिरलपुरे नयरे तेणेव पहारेत्य गमणाण) आरट होकर वे कृष्ण वासुदेव समुद्र विजय आदि दश दशाों यावत अगमेना प्रमुग्व हजारों गगिकाओं के माय २ उन नादि राज चिह्नरूप विभृति से युक्त होकर भरन, पणय, पटर, भेरी आदि बाजो की तुमुल बनि पूर्वक द्वारावती नगरी के बीच से ત્યારપછી તે કૃષ્ણ-વાસુદેવ ક્યા નાનઘર હતું ત્યાં ગયા ત્યાં જઈને તેમણે મેતી જડેલા ગવાયોથી રમણીય લાગતા સ્નાનઘરમાં સ્નાન કર્યું અને ત્યાર પછી બવા અવકારોથી વિભૂષિત થઈને–નરપતિ આ જનગિન્નિા રિખર જેવા વિશાત તૃણ વર્ણવાળા ગજપતિ ઉપર સવાર થઈ ગયા (तगण से कण्हे वामुळे समुदविजयपामोक्सेटि सहि दसारेडि जाप अण गसेणा पामुकन्ये हिं अणेगाहिं गणियामाइस्सीहिं सद्धिं सपरिबुडे सबिटीस जाब रवेण बारवइ नरि मज्झ मज्झेण निग्गन्छइ निगनिउत्ता सुट्ठा जण्यास मझ मज्झेण जेणेव देसप्पते तेणे आगन्छह आगच्छिता प चालवणक्यस्म मझ मग जेणेश कपिर पुरे नयर तेणेर पहारेत्य गमणार ) भार २७ ने तो ममुद्र विय વગેરે દશ દશાર્દો યાવત્ અ મેના પ્રમુખ હજારો ગણિકાઓની સાથે છત્ર વિગેરે રાજચિહ્ન રૂપ વિભૂતિથી યુક્ત થઈને શખ, પણવ, પટેલ, ભેરી વગેરે તુમુન દેવનિ સ્થાને દ્વારવતી નગરીની વચ્ચે થઈને પસાર થયા ત્યાંથી પસાર भाताचाही मूलम्-तरण से दुवा राया दो द्वयं सदाह सदावित्ता एव वयासी-गच्छ णं तुम देगणप्पिया ! हस्थिणाडर नयरं तस्थ ण तुमं पंडुगयं सपुत्तय जहिठिन्लं भीमरण अज्जुण नउल महदेव दुज्जोहणं भाइसयसमग्ग गगेय विदुर टार्ण जयबह सउणी किवं आमत्थाम करयल जाव कटु तहेव समो. सरह, तएण से दूग एवं क्यासी जहा बासुदेव नवर भेरी नस्थि जाव जेणेव कपिलपुरे नयरे तेणेव पहारस्थ गमणाए । एएणेव कमेणं तच्चं दूय चंपानयरिं तत्थ णं तुमं कण्ह अग- राय सेट नदिराय करयल तहेव जाव समोसरह । चउत्थ दूय सुत्तिमइ नयरिं तत्थ ण तुमं सिसुपाल दमघोसमय पचभाइ- सयसपग्वुिड करयल तहेव जाव समोसरह । पंचमग दूय हत्थसीसनयर तत्थ ण तुमं दमदत राय करयल तहेव जाव समोसरह । छट्ट दूयं महुर नयरिं तत्थ ण तुम धरं राय करयल जाव समोसरह । सत्तम दूयं रायगिहं नयर तत्थ ण तुम सह- देव जरासिधुसुय करयल जाव समोसरह। अट्टम दूय कोडिण्ण नयर तत्थ ण तुम रुप्पि भेसगसुय करयल तहेव जाव समो सरह । नवम दूय विराडनयर तत्थ ण तुम कीयग भाउसय समग्गं करयल जाव समोसरह । दसमं दूय अवसेसेसु य गामागार रोते हुए निकले । निकलकर वे सौराष्ट्र देश के बीचो बीच से चलकर पहा आये जहाँ देश की सीमा थी। उस सीमा पर आकर के फिर वे पाचाल जनपद के मध्य से होते हुए जहा कापिल्य पुर नगर था उस और चल दिये। ચ્ચે થઈને પિતાને દેશની હદ સુધી પહોંચ્યા થઈને જતા કાપિપુર નગર હતું તે RamAH થઈને १ - मगारधामृतषिणी टी० १० १६ द्रौपदीचरितवर्णनम् २७३ नगरेसु अणेगाइ रायसहस्साड जाव समोसरह । तएण से दूए तहेव निग्गच्छइ जेणेव गामागर जाव समोसरह। तएण ताई अणेगाई रायसहस्साइ तस्स दूयरस अतिए एयमट्ट सोचा निसम्म हट्ट० त द्वय सकारोति सकारिता सम्माणति सम्मा- णित्ता पडिविसजिति, तएणं ते वासुदेवपामुक्खा बहवे रायस- हस्सा पत्तेय२ व्हाया सन्नद्धहस्थिखंधवरगया हयगयरह० मया भडचडगररहपकर० सएहितो२ नगरेहितो अभिनिग्गच्छतिर जेणव पंचाले जणवए तेणेव पहारेत्थ गमणाए ॥ सू० १९ ॥ टीका-'तएण से' इत्यादि । तन खलु स द्रुपदो राजा द्वितीय दूत शब्द- यति, शन्दयित्वा एवममादीत्-गम मलु व पाण्डु राज मपुत्रर-पुनै महित 'तण्ण से दुवण राया' इत्यादि। टीकार्य-(तएण) उस के बाद (से दुवा राया ) उस द्रुपद राजाने (दोच्च दय सद्दाबेइ) अपने दुनरे दूनको बुलायो (महावित्ता ग्व वयामी) बुलाकर उससे ऐसा करा-गरण तुम देवाणुप्पिया इत्यिणाउर नयर तत्थ ण तुम पडुराय मपुत्तय जुहिडिल्ल भीमसेण अज्जुण नउल मह- देव दुजोहण भाइमयममाग गगेय विदुर दोण जयहर मउणीकित्र आसत्थाम करयल जाव कटु नहेव समोसन्ह) बुलाकर उससे ऐसा कहा हे देवानुप्रिय । तुम हस्तिनापुर नगर जाओ-वरा जाकर तुम पुत्र तएण से दुपए राया' इत्यानि- A-(तएण) त्यापी (से दुवए राया) ते ५६ २ (दोच्च दूय सदावइ ) ताना मी इतने गावाच्यो (सोवित्ता एस वयासी) मा पान तेन सा प्रभारी उ (गच्छह ण तुम देवाणुप्पिया हत्यिणाउर नयर , तत्य ण तुम पडुराय सपुत्तय जुहिटिल भीमसण अजुर्ण नटल सहदेव दुजो हण भाइसयसमग्ग गगेय विदुर दोण जयदह सउणी किर आसत्थाम करयल लार कट्टु तहेव समोसरह ) ३ आनुप्रिय ! तमे स्तिनापु. नगरमा जा जामाचार मूलम्-तपण से दुरए गया दो द्वयं सहाइ सदाविना एव क्यासी-गच्छ गंतुमं देगणप्पिया! हस्थिणाउर नयरं तस्थ णं तुम पंडराय सपुत्तय जहिटिल्ल भीमलणं अज्जुण नउल महदेव दुजोहणं भाइसयसमग्गं गंगेयं विदुर दोर्ण जयबह सउणी किव आमत्थाम करयल जाव कद तहेव समो सरह, तएण से दूप एव क्यासी जहा वासुदेव नवर भेरी नस्थि जाव जेणेव कपिल्लपुरे नयरे तेणेव पहारेत्थ गमणाए। एएणेव कमेणं तच्चं दूय चंपानयरिं तत्थ णं तुमं कण्ह अंग- राय सेल्ट नदिराय करयल तहेव जाव समोसरह । चउत्थ दूय सुत्तिमइ नयरिं तत्थ णं तुम सिसुपाल दमघोसमय पंचभाइ सयसपग्वुिड करयल तहेव जाव समोसरह । पचमग दूय हत्थसीसनयर तत्थ ण तुम दमदत राय करयल तहेर जाव समोसरह । छट्ट दूयं महुर नयरिं तत्थ ण तुम धर राय करयल जाव समोसरह । सत्तम दूय रायगिहं नयर तत्थ ण तुम सह- देव जरासिधुसुय करयल जाव समोमरह। अट्टम दूय कोडिण्ण नयर तत्थ ण तुम रुप्पि भेसगसुय करयल तहेब जाव समो सरह । नवम दूय विराडनयर तत्थ णं तुम कीयग भाउसय समग्गं करयल जाव समोसरह । दसम दूय अवसेसेसु य गाभागार होते हुए निकले । निकलकर वे सौराष्ट्र देश के बीचो बीच से चलकर पहा आये जहाँ देश की सीमा थी। उस सीमा पर आकर के फिर वे पाचाल जनपद के मध्य से होते हुए जहा कापिल्य पुर नगर था उस और चल दिये। सू०१८ થઈને તેઓ સૌરાષ્ટ્ર દેશની વચ્ચે થઈને પિતાના દેશની હદ સુધી પહોંચ્યા ત્યાથી તેઓ પાચાલ જનપદની વચ્ચે થઈને જતા કાપિતપુર નગર હતુ a त२६ २वाना यया ॥ सूत्र १८ ॥
तगारामतपपिणी टी० अ० १६ द्रौपदीचरितवर्णनम् नयरे तेणेव पहारेत्य गमणाए २ एएणेच कमेण तच्च द्य चपानयरिं तत्थ ण तुम कण्ण अगराय सेल्ल नदिराय करयल तहेव जीव समोसरह चउत्थ दूय सुत्तिमा नयरिं, तत्थ ण तुम सिसुपाल दमघोमसुय पच- भाइसयसपरिवुड करयल तहेव जाव समोसरह ) इस के याद दूत अपने राजा की आज्ञा प्रमाण कर वहा से हस्तिनापुर को चला गया। वहाँ पहुँच कर उसने पांडुराजा आदि से बडे विनय पूर्वक इस प्रकार कहा-कापिल्यपुर में द्रौपदी का स्यवर होगा-सो आप सर कृपाकर शीघ्रातिशीघ्र वहा पपारे। इस तरह के समाचार देकर वह दूत पाडुराजा आदि से सन्मानित होकर वहा से वापिस हो गया। पाडुराज आदि स्नान कर सर्वालकारो से विभूषित होकर गजारूढ हो, चतुरगिणी सेना के साथ अपनी ऋद्धि आदि के अनुसार यावत् जहा कापिल्यपुर नगर था उस ओर चल दिये । इस तरह कृष्ण वासुदेव की तरह यहां पर सय पाठ लगा लेना चाहिये । उस पाठ से इस मे विशेषता केवल इतनी है कि वे सब जय द्वारावती नगरी से कापिल्यपुर नगर को जाने के लिये निकले तो उनके साथ भेरी थी-यहा वह नही है। इसी क्रम से द्रुपद ने तीसरे दूत को बुलाया-चुलाकर उससे भी इसी प्रकार से पुरे नयरे तेणेत्र पहारेत्य गमणाए २ एएणेत्र कमेण तच्च दूय च पानयरिं तत्य ण तुम कण्ण अगराय सेल्ल न दिराय करयर तदेव नाव समोसरह चउत्थ द्य सुत्तिमइ नयरि तस्थण तुम सिसुपाल दमघोसमय पचमाइनयम पvिड करयल तहेव जाब समोसरह ) त्यारपछी त पाताना रानी सा! પ્રમાણે ત્યાથી હસ્તિનાપુર તરફ રવાના થઈ ગયો ત્યાં પહોંચીને તેણે પાડુ રાજા વગેરે રાજાઓને નમ્રપણે આ રીતે વિનતિ કરી કે--કાપિલ્યપુરમા દ્રૌપદીને વય વર થશે તે આપ સૌ કૃપા કરીને સત્વરે ત્યાં પધારો આ રીતે સમાચાર આપીને તે દૂત પાડુરાજ વગેરેથી સન્માન પામીને ત્યાથી પાછો ફર્યો પાડુરાજ વગેરે બધાએ પણ નાન વગેરેથી પરવારીને તેમજ સ લકાથી સુસજ્જ થઈને હાથીઓ ઉપર સવાર થયા અને પિત પિતાની ચતુ- રગિણી સેના તેમજ ઋદ્ધિની સાથે યાવત જે તરફ કાપિલ્યપુર નગર હતું તે તરફ રવાના થયા આ પ્રમાણે કૃષ્ણ-વાસુદેવની જેમજ અહીં પણ વર્ણન સમજી લેવું જોઈએ કૃષ્ણ-વાસુદેવના પાઠમા પાડુરાજ કરતા એટલી વિશેષતા હતી કે તેઓ જ્યારે દ્વારાવતી નગરીની બહાર નીકળ્યા ત્યારે તેમની સાથે લેરી પણ હતી, પાડુરાજની સાથે લેરી ન હતી આ પ્રમાણે પદ રાજાએ ત્રીજા તને બેલા અને તેને પણ આ રીતે કહ્યું કે હે દેવાનુપ્રિય! તમે -- मानाराम युधिष्ठिर भीमसेनम् अर्जुन नागादेव दुर्योधन भागममग तभ्रामिः सरित, गादेप-मीम, विदर द्रोण अगदय यानि कि 'पापागार्य, अघत्यामान परतल० गारन् मथि गमगात यथा पूर्वमुक्त सपात्र ' समयमरत' इतिपर्यन्त गोगा भय मास-जयविनयशन पवित्रा पर हि-याम्पिल्यपुरे नगरे मुपदम्ग रातः पुन्या द्रौपयाः मयारो भविष्यति तस्माद् खलु हे देवानुमियाः ! युग पद राजानमनृगृहन्न. कालगिम्बरहित- भेच पाम्पिल्यपुरे नगरे रामनगरन । तत मदतो मुटम्य वचन मीन्यहस्तिना पुर गा पाप्राजादियमेवमादी गाम्पिन्यपुरे द्रौपचा' बयरो भविष्यति तत्र शीघ्रमागरउत' इति ततोऽसौ दत' पारराजादिना सम्मान्तिो विमतिश्च 'जहा पासुदेवे ' यथा-नारदेव कृष्णस्तदत्रापि विजयम्-'नयर' विशेषस्तु 'मेरी नस्थि ' मेरीनारित, कृष्णयानुदेव हा पाप्राजादिः स्नात माल्यार विभूपितो गजास्दश्चतुरङ्ग सेनया सपरित सवर्ण युक्तो यात कार पाम्पिल्य पुर नगर तगैर प्राधारयट् गमनाय गन्तु प्रत्तः । सहित पाडुराज को, युधिष्ठिर को, भीमसेन को, अर्जुन को नकल को, सरदेव को, सौभाईयों सहित व्यर्योधन को, गागेय भीष्म पितामह को विदुर को, द्रोण को जयद्रथ को, शकुनि को, कृपाचार्य को, और द्रोणा चार्य के पुत्र अश्वत्थामा को पहिले दोनों हाथों की अलि बनाकर और उसे मस्तक पर रखकर नमस्कार करना उन म जय विजय आदि शब्दों से यधा देना । वधाकर फिर इस प्रकार कहना कि कांपिल्य पुर नगर में द्रुपद राजा की पुत्री द्रौपदी का स्वयवर है, इस लिये हे देवानुप्रियों ! आप सब दुपद राजा के ऊपर कृपा करके विना किसी विलय के शीघही कापिल्यपुर नगर में पधारें। (तएण से दृए एव वयासी-जहा वासुदेवे नवर भेरी नथि, जाव जेणेव कपिरलपुरे અને ત્યાં જઈને તમે પુત્ર સહિત પાડુરાજને, યુધિષ્ઠિરને, ભીમસેનને, અ૪ નને નકુલને સહદેવને, સે ભાઈઓ સહિત દુર્યોધનને, ગાય ભીષ્મ પિતા મહને, વિદુરને, દ્રોણને, જયદ્રથને, શકુનિને, કૃપાચાર્યને અને દ્રોણાચાર્યના પુત્ર અશ્વત્થામાને સૌ પહેલા કરબદ્ધ થઈને-અજલિ બનાવીને તેને મસ્તકે મૂકીને નમસ્કાર કરજો અને જય વિજય’ શબ્દોથી તેઓને અભિન દિત કરે ત્યારપછી તમે તેમને આ પ્રમાણે વિનતી કરજે કે કાઠિયપુર નગરમા દુપદ રાજાની પુત્રી દ્રોપદીને સવયવર થવાનો છે એથી હે દેવાનુપ્રિયે ! આપ સૌ દ્રુપદ રાજા ઉપર મહેરબાની કરીને સત્વરે કાપિલ્ય ન ६ तएण से दूर एव वयासी-जहा वासुदेवे नार भेरी नत्यि . - पधारा भातगारामृतयपिणी० अ० १६ द्रौपदीचरितवर्णनम् नयरे तेणेव पहारेथ गमणाए २ एएणेव कमेण तच्च द्य चपानयरिं तत्थ ण तुम कण्ण अगराय सेल्ल नदिराय करयल तहेव जाव समोसरह चत्य यं सुत्तिमा नयरिं, तत्थ ण तुम सिसुपाल दमघोमसुय पच भाइसयसपरिखुड करयल तहेव जाप समोसरह ) इस के बाद दूत अपने राजा की आज्ञा प्रमाण कर वहा से हस्तिनापुर को चला गया । वहाँ पहुँच कर उसने पांडराजा आदि से घडे विनय पूर्वक इस प्रकार कहा-कापिल्यपुर में द्रौपदी का स्पयवर होगा-सो आप सर कृपाकर शीघ्रातिशीघ्र वहा पधारे। इस तरहके समाचार देकर घर दूत पाडुराजा आदि से सन्मानित होकर वहां से वापिस हो गया। पाडुराज आदि स्नान कर सर्वालकारो से विभूपित होकर गजारूढ हो, चतुरगिणी सेना के साथ अपनी ऋद्धि आदि के अनुसार यावत् जहा कापिल्यपुर नगर या उस ओर चल दिये । इस तरह कृष्ण वासुदेव की तरह यहा पर सय पाठ लगा लेना चाहिये । उस पाठ से इस मे विशेषता केवल इतनी है कि वे सब जय द्वारावती नगरी से कापिल्यपुर नगर को जाने के लिये निकले तो उनके साथ भेरी थी-यहा वह नहीं है। इसी क्रम से द्रुपद ने तीसरे दूत को बुलाया-चुलाकर उससे भी इसी प्रकार से पुरे नयरे तेणेव पहारेत्य गमणाए २ एएणेच कमेण तच्च दूय च पानयरिं तत्य ग तुम कण्ण अगराय सेल्ल न दिराय करयल तहेर जान समोसरह उत्थ दूय सुत्तिमइ नयरिं तस्थण तुम सिसुपाल दमघोसय पचभाइप्रयच प. खुिड करयल तहेव जाव समोसरह ) त्या२५०ी इत पाताना Anी भाशा પ્રમાણે ત્યાથી હસ્તિનાપુર તરફ રવાના થઈ ગયા ત્યાં પહોંચીને તેણે પાડુ રાજા વગેરે રાજાઓને નમ્રપણે આ રીતે વિનતિ કરી કે- પિલ્યપુરમાં પદીને સ્વય વર થશે તે આપ સૌ કૃપા કરીને સત્વરે ત્યાં પધારે આ રીતે સમાચાર આપીને તે દૂત પાડુરાજ વગેરેથી સન્માન પામીને ત્યાથી પાછો ફર્યો પાડુરાજ વગેરે બધાએ પણું નાન વગેરેથી પરવારીને તેમજ સર્વા લકારથી સુસજજ થઈને હાથીઓ ઉપર સવાર થયા અને પિત પિતાની ચતુ રગિણ સેના તેમજ ઋદ્ધિની સાથે યાવત જે તરફ કાપિલ્યપુર નગર હતું તે તરફ રવાના થયા આ પ્રમાણે કૃષ્ણ-વાસુદેવની જેમજ અહીં પણ વર્ણન સમજી લેવું જોઈએ કૃષ્ણ-વાસુદેવના પાઠમા પાડુરાજ કરતા એટલી વિશેષતા હતી કે તેઓ જ્યારે દ્વારાવતી નગરીની બહાર નીકળ્યા ત્યારે તેમની સાથે લેરી પણ હતી, પાડુરાજની સાથે લેરી ન હતી આ પ્રમાણે પદ રાજાએ રોજા દૂતને બોલાવ્યો અને તેને પણ આ રીતે કહ્યું કે હે દેવાનુપ્રિય! તમે ९- , -- -- २७६ बताया पतनेर प्रमेण उतीय दा गन्दगान, मिमि मदीन-गन्छ ग्पल हे मानुप्रिय! नम्पानगर्गम , ग ग ग वर्णनागरम-गरानम् प्रदेश स्थाधिपति, तथा मेलजोल्पोपनामा नन्टिगनम्नन्दिाधिप परतल परिगृहीत नशनग्य गायन-मनोलिया मा रिमयेन चयिता एवं हि-तहेर थर-पूर्वपत्र यो गम्-यश-"काम्पिन्यपुरे नगरे द्रुपदस्य राम पुज्या द्रौप या स्वयपरी भरिष्यनि, तस्माद् गट हे देवानुमिया: 1 यूय दुपद राजानमनुएम त शोधमेर फाम्पिन्यपुरं नगरे गमरमरत" इति पर द्रुपदी राजा चतुर्थ दत गलयित्वा परमादीत-गम सत्य शुक्तिमती नगरी, तत्र ग्पलु व शिशुपाल दमपोपमुरा पचभ्रातृमपग्टित परतय. यापनमस्तकेऽजलि कृत्वा हि-' तथैव यावत् समरमरत' यथा पूर्वमुक्त तदा 'गमासरत ' इति कहा-कि हे देवानुप्रिय ' तुम पानगरी जाओ वा अगदेश के अधि पति कर्ण गजा को तथा नन्दिदेवा के अधिपनि शैयराजा को कर तल परिगृहीत दशनमवाली अजलि मस्तक पर रखकर नमस्कार करना पाद में जय विजय शन्दो से उन्हें बधाई देकर पूर्व की तरह ऐसा फरना-कि कापिल्यपुर नगर में द्रुपद राजा की पुत्री द्रौपदी का स्वयवर होने वाला है, सो हे देवानमियों ! आपलोग उपद राजा पर कृपा करके जरदी से जल्दी कापिल्यपुर नगर पधारे । इसी तरह द्रुपद ने चौथे दत को बुलाकर उससे ऐसा ही कहा कि तुम शुक्तिमती नगरी में जाओ वहा जाकर दमघोष के पुत्र तथा पाचसी अपने भाइयों से युक्त शिशुपाल राजा से करतल परिगृहीत दशनम्वचाली अजलि मस्तक पर रखकर कहना, पहिले की तरह ऐसा कहना कि कापिल्यपुर नगरमें ચપા નગરીમાં જાઓ, ત્યાં આગ દેશના અધિપતિ કણે રાજાને તેમજ નાદિ દેશના અધિપતિ તૈયશજને હાથની અ જલિ બનાવીને તેને મસ્તકે મૂકીને નમસ્કાર કરે અને જય-વિજય શબ્દોથી તેમને અભિન દિત કરો ત્યારપછી તેમને વિનતી કરે કે કાપિટ્યપુર નગરમા પદ રાજાની પુત્રી દ્રૌપદીને સ્વિચ વર થવાનું છે તે હે દેવાનુપ્રિયે તમે સૌ કુપદ રાજા ઉપર કૃપા કરીને અવિલબ કાપત્યપુર નગરમાં આવે આ રીતે દ્રુપદ રાજાએ ચોથા દૂતને છેલા અને તેને પણ આ પ્રમાણે કહ્યું કે તમે શક્તિમતી નગરમાં જાઓ અને ત્યાં જઈને દમષના પુત્ર શિશુપાલ રાજાને જ પોતાના પાસે ભાઈઓ સહિતકરબદ્ધ થઈને અ જલિ મસ્તકે મૂકીને વિનતી પ્રમાણેના સમાચાર આપજો કે કાપિસ્યપુર નગરમા પદ ર - , अमगारधर्मामृतवपिणी टी० म०१६ द्रौपदीचरितवर्णनम् पर्यन्त वाच्यमित्यर्थ । एप द्रुपदो राजा पञ्चमक दूत शब्दयित्वा एवमरादीत्- गच्छ खलु व हस्तिशीनगर, तन खलु त्व दमदन्त-दमदन्तनामक रानान कर- तल्परिगृहीतदशनम्व यावन्मस्तकेजलिं कृत्वा हि-' तथैव यावत् समवसरत' इति पूर्ववदेवानापि ' समवसरत' इतिपर्यन्त वान्यम् एव स द्रुपदो राना पष्ठ दूत शब्दयित्वाऽवादीत्-गच्छ खलु व मथुरा नगरी, तर ग्बल त्व धर-भरनामक राजान' करतल. यावत् समवसरत' अवापि पूर्ववदूतगमनादिक बो-यम् , एव सप्तम दूत शब्दयित्वा एवमवदत्-गच्छ खलु व राजगृह नगरम् , तर भलु ल सहदेव जरासिन्युसुन ' करतल० यावत् समवसरत' इति पूर्ववत् द्रौपद्याः स्वय- घरस्य पाती कथयित्वा 'काम्पिल्पपुरे नगरे समवमरत' इति ब्रूहि । तपास द्रुपद राजा की पुत्री द्रौपदी का स्वयंवर होने वाला है-सो आप कृपा करके शीघ्र ही वहा पधारें। (पचमग द्य हत्यिसीसनयर तत्य ण तुम दमदत राय करयल तहेव जार समोसरह छ? य महर नयरिं तत्य ण तुम घर राय करयल जाव समोसरह सत्तम दद्य रायगिह नयर तत्यण तुम सरदेव जरासिंधुसुय करयल जाव समोसरह, अट्टम दूय कोडि- पणं नयर तत्यण तुम रुप्पिं भेगसुय करयल तहेव जाय समोसरह, नवम दूध विराडनपर तत्य णं तुम कीयग भाउसयसमग्ग करयल जाव समोसरह, दसम दूध अवसेसेसु गामागरनगरेसु अणेगाइगयलहरमाइ जाय समोसरह) इसी तरह पाचवे दत को हस्तिशीर्पनगर में दमदन्त नाम के राजा के पास छठे दूत को मयुरा नगरी में धर राजा के पास, सातवे दूत को राजगृह नगर मे जरासिंधु के पुत्र सहदेव के पास દીને સ્વયે વર થવાનું છે એથી તમે કૃપા કરીને અવિલ બ ત્યા પધારે (१चमग दूय हत्थमीसनयर तत्य ण तुम दमदत राय करयल तहेव जाव समोसरह उह दूय महुर नयार तयण तुम धर राय करयल जाव समोसरह खत्तम दूय रायगिह नयर तत्थ ण तुम सहदेर जरासिंधु सुय करयल जाय समोखरह अहम कोहिण्ण नयर तत्यण तुम रूप्पि भेसगसुय करयल सहेव जाय समोसरह नवम दूय विराडनयर तत्य ण तुम कीया भाउसय समग करयल जाय समोसरह, दसम दूय अबसेसेसु गामागर नगरेसु अणेगाह रायसहस्साइ जाव समोसरह ) प्रमाणे पायमा इतनतीशी नामा દમદન્ત નામના રાજાની પાસે, છઠ્ઠા દૂતને મથુરા નગરીમાં ધર ગજાની પાસે, સાતમાં દૂતને રાજગૃહ નગરમા જરાસિંધુના પુત્ર સહદેવની પાસે, આઠમા કતને કૌડિન્ય નગરમા ભીષ્મકના પુત્ર રૂમિ ગજાની પાસે, નવમા દૂતને -- - - २०० तापकथाम पतेने समेण मीग दन गन्दनि, मणि मान-गउ म त्वं देवानुपिय ! सम्मानगरीग, नगर पर्ण नागाम-रानम् प्रदेश स्याधिपति, तथा ' मेलौगोपनामा नन्दिगानन्दिदेगाधिप करतल. परिगृहीत दशनग्य यापन-मम्त के जरिए येन नियेन यिया एष चूहि-तोय तर- पून मोगा- गधा-"पाम्पिल्यपुरे नगरे द्रुपदस्य रामः पुच्या द्रौपायाः स्वयारी भरिष्यति, तस्मात् गट हे देशानुप्रिया. गूप द्रुपद राजानमनुगतः शीपर काम्पियपुर नगरे गमरमरत" इति पद्यपदो राजा चतुर्थ दूत शन्दयित्मा परमादीत-गम गलत शुक्तिमती नगर्ग, तत्र ग्यलु र शिशुपाल दमघोपमुप पचभ्रातामपग्टित रतय० गान्मम्तकेऽवलि कन्या दि- तथैव यावत् समामरत' यया पूर्वमुक्त तपादन 'गमपसरत ' इति कहा-कि हे देवानुप्रिय ' तुम पानगरी जाओ पहा अगदेश के अधि पति कर्ण गजा को तथा नन्दिदेश के अधिपति शेयराजा को कर तल परिगृहीत ददानपवाली अजलि मस्तक पर रखकर नमस्कार करना पाद में जय विजय शन्दों से उन्हें बधाई देकर पूर्व की तरह ऐसा फरना-कि कापिरयपुर नगर में द्रुपद राजा की पुत्री द्रौपदी का स्वयवर होने वाला है, सो हे देवानुमियों ! आपलोग द्रपद राजा पर कृपा करके जल्दी से जल्दी फापिल्यपुर नगर पधारे । इसी तरह द्रुपद ने चौथे दत को बुलाकर उससे ऐसा ही कहा कि तुम शुक्तिमती नगरी में जाओ वहा जाकर दमघोप के पुत्र तधो पाचसी अपने भाइयों से युक्त शिशुपाल राजा से करतल परिगृहीत दशनग्वचाली अजलि मस्तक पर रखकर कहना, पहिले की तरह ऐसा कहना कि कापिल्यपुर नगरमें ચપા નગરીમાં જાઓ, ત્યા અગ દેશના અધિપતિ કણે રાજાને તેમજ નાદિ દેશના અધિપતિ સૈયરાજને હાથની અ જલિ બનાવીને તેને મસ્તકે મૂકીને નમસ્કાર કરે અને જય-વિજય શબ્દથી તેમને અભિન દિત કરે ત્યારપછી તેમને વિનતી કરે કે કાપિલ્યપુર નગરમાં ૫૮ રાજાની પુત્રી દ્રૌપદીને સ્વયવર થવાને છે તે છે દેવાનુપ્રિયે તમે સૌ દ્રુપદ રાજા ઉપર કૃપા કરીને અવિલ બ કાપિયપુર નગરમાં આવે આ રીતે દ્રુપદ રાજાએ ચોથા ક્રતને બોલાવ્યો અને તેને પણ આ પ્રમાણે કહ્યું કે તમે શક્તિમતી નગરમા જાઓ અને ત્યાં જઈને દમઘાષના પુત્ર શિશુપાલ રાજાને જ પિતાના પાચસો ભાઈઓ સહિતકરબદ્ધ થઈને અજલિ મસ્તકે મૂકીને વિનતી કરતા આ પ્રમાણેના સમાચાર આપજે કે કાપિસ્યપુર નગરમાં પદ . सनगारधर्मामृतपिणी दोषा म० १६ द्रौपदीचरितवर्णनम सरति, निर्गत्य यत्रैव ग्रामाफरनगरेषु अनेकानि राजसहस्राणि, तत्रैवोपागच्छति उपागत्य याश्व-समवसरत, ' समवसरत ' इति पर्यन्त दतवाक्य पूर्ववद् बोध्यम् । ततः खलु तानि अनेकानि राजसहस्राणि तस्य दतम्यान्ति के एतमर्थ श्रु वा निशम्य हृष्टतुष्टाः सन्तः दूत सत्कारयन्ति-सत्कृत कुर्वन्ति समानयन्ति,सत्कार्य, समान्य प्रतिविसर्जयन्ति । ततः ग्बलु ते वासुदेवप्रमुखा बहुसहस्रसरयका राजानः, प्रत्येक २ स्नाता: जेणेष गामागर जाव समोसरह) वह दशवा दूत उसी तरह से- पहिले के दूतों के समान कापिल्य नगर से निकला और निकल कर जहां ग्राम आकर और नगर थे-वहा पर अनेक राजसहस्त्रों के पास गया-वहा जाकर शिष्टाचार पूर्वक उसने सब से इस प्रकार कहा कि काम्पिल्यपुर नगर में द्रुपद राजा की पुत्री द्रौपदी का स्वयवर होने वाला है-सो आपमर लोग द्रुपद राजा के ऊपर कृपा करके जल्दी कांपिल्य पुर नगर पधारे (तएण ताइ अणेगाइ रायसहस्साइ तस्स दृयस्स अतिए एयम? सोच्चा निसम्म ह त य सरकारेंति, सक्कारिता सम्माणेति, सम्माणित्ता पडिविसज्जे ति ) इस प्रकार वे अनेक सहस्त्र राजा उस दूत के मुग्च से इस समाचार को सुन कर और उसे अपने अपने २ हृदयों में अवधारित कर हत ही अधिक आनन्द से प्रमुदित बनकर परम सतोप को प्राप्त हुए। उन्होने उस दून का सत्कार किया सत्कार करके सन्मान किया और सन्मान करके फिर उसे पीछे विसर्जित कर दिया-भेजदिया। (तएण ते वासुदेव पामुक्खा परवे रायसहस्सा पत्तेय समोसरह ) ते शमे। इत मधानी रे saleय नाथी नज्यो भने નીકળીને ત્યાં ગ્રામ આકર અને નગર હતા ત્યા અનેક સહમ રાજાઓની પાસે ગયે ત્યાં જઈને નમ્રપણે તેણે સહુને આ પ્રમાણે કહ્યું કે કપિલ્ય નગરમા પદ રાજાની પુત્રી દ્રૌપદીને સ્વયંવર થવાનું છે તે આપ સૌ દ્રુપદ An ५२ कृपा उशने अनि पिट्य नामा पारी (तएण ताइ अगणाइ रायमहरसाइ तस्स दूयस्स अतिए एयम? सोचा निसम्म हट्ठ० त दूर सकारे ति मकारित्ता, मम्माणे ति, सम्माणित्ता, पडिपिस जे ति ) मा शते સહસ્ત્રો રાજાએ તે દૂતના મુખથી આ સમાચાર સાભળીને અને તેને પિતાના હૃદયમાં ધારણ કરીને ખૂબ જ પ્રસન્ન તેમજ પરમ મ તુક થયા તેઓએ દૂતને સત્કાર કર્યો અને સન્માન કર્યું ત્યારપછી દૂતને તેઓએ વિદાયને था (तएण वे वासुदेवसामुक्या यहवे रायसहस्सा पम २ पाया . 4 ATण्यास - प्रपदो राना अहम दा शगिलागीन- गत कानिनगर नत्र खलु यदि ममिणमिनामक भोगमपमुख परतल तथा गारन् समा सरत पूर्वयन् गमामात ' इति पर्य. या । । स पटी राना नाम दुत शब्दयित्वा यादीत-गाल राय विराटनगर, नत्र गनु वकीपर कीचक- को नापक राजान सभातमदित करतल गायन सममा आपि व्याख्या पूचित् । एवम उपदो रागा दगम इन शब्दगिराजआदीन-भागपगु च ग्रामार नगरेपु अनेकानि राजमात्राणि गायन् गमगरत, अनापि व्याया पूर्ववत् । ततस्तदनन्तर सल सदनम्तीपतिदन निन्द्रत काम्पियनगरता नि. में आठवें रत को कौण्डिल्य नगर में मीमक के पुत्र मस्मि राना के पास में नौवें दून को विराट नगर में मौ भाइयो से युक्त फीचक के पाम में, और दशो दनो पो अपशिष्ट ग्रामों में आकरों में नगरों में हजारों राजाओं के पाम जाने के लिये कहा। इन दुतों को राजा द्रुपद ने यह समझादिया कि तुम लोग जन उन राजाओं के पास जाओ तय परिले उन्हे दानों राम जोड़कर नमस्कार करना और कहना कि फापिल्य पुर नगर मे द्रुपदकी पुत्री द्रौपदी को स्वयपर होने वाला है सो आप लोग उस में द्रुपद राजा उपर दया कर के शीघ्र से शीघ्र पधारें। राजाकी आज्ञानुमार तीसरे दूतसे लेकर नौ दुत तक समस्त दूत जिन्हे २ जहाँ २ जाने को कहा था-वे वहार चले गये। वहा जाकर उन्हों ने जैसा द्रुपद राजा ने इन से करने एच करने को कहा था वैसा ही उन्हो ने वहा र किया और कहा । इस तरह पहिले की तरह यहाँ तक मय व्याख्या समझलेनी चाहिये। (तषण से दए तहेव निगच्छन, વિરાટ નગરમા સે ભાઈઓથી યુક્ત કીચકની પાસે અને દશમા દૂતન બાકી રહી ગયેલા બીજા ગ્રામમાં આકરોમાં અને નગરોમા હજારે રાજાઓની પાસે જવા હુકમ કર્યો આ બધા દૂતને રાજા દ્રુપદે જતા પહેલા આ વાત સરસ ફીતે સમજાવી દીધી હતી કે જ્યારે તમે રાજાઓની પાસે જાઓ ત્યારે સૌ પહેલા પિતાના અને હાથ જોડીને તેઓને નમસ્કાર કરશે અને ત્યારપછી તમે તેમને વિનતી કરજો કે કપિલ્ય નગરમાં દુપદની પુત્રી દ્રૌપઢીને વય વર થવાને છે તે આપ સૌ દ્રુપદ રાજા ઉપર કૃપા કરીને અવિલબ ત્યાં પધારે રાજાની આજ્ઞા મુજબ ત્રીજા કૂતથી માડીને નવમાં ડૂત સુધીના બધા ફતે જ જ તેઓને જવાનું હતું ત્યાં ત્યાં પહોચ્યા ત્યાં પહોંચીને તેઓએ દ્રપદ રાજાએ જેમ આજ્ઞા કરી હતી તેમજ તેઓએ કર્યું અને કહ્યું, અહીં नभर समय से भे (तएण से दूध तहेव निगच्छइ, १ . समगारधर्मामृतपाणी शेषा अ० १६ द्रौपदीचरितवर्णनम सरति, निर्गत्य यत्रैव ग्रामाफरनगरेषु अनेकानि राजसहस्राणि, तत्रैवोपागच्छति उपागत्य यावत्-समवसरत, ' समवसरत ' इति पर्यन्त दतवाक्य पूर्ववद् बोध्यम् । ततः खलु तानि अनेकानि राजसहस्राणि तस्य दतम्यान्ति के एतमर्थ श्रु या निशम्य हृष्टतुष्टाः सन्तः दूत सत्कारयन्ति-सत्कृत कुर्वन्ति समानयन्ति,सत्कार्य, समान्य प्रतिविमर्जयन्ति । ततः खलु ते वासुदेवप्रमुखा बहुसहस्रसस्यका राजान', प्रत्येकं २ स्नाताः जेणेत्र गामागर जाव समोसरह) वह दशयां दूत उसी तरह से- पहिले के दूतों के समान कापिल्य नगर से निकला और निकल कर जहां ग्राम आकर और नगर थे-वहां पर अनेक राजसहस्त्रों के पास गया-वहा जाकर शिष्टाचार पूर्वक उसने सब से इस प्रकार कहा कि फाम्पिल्यपुर नगर में द्रुपद राजा की पुत्री द्रौपदी का स्त्रयवर होने वाला है-सो आपमय लोग द्रुपद राजा के ऊपर कृपा करके जल्दी कापिल्य पुर नगर पधारे (तएण ताइ अणेगाइ रायसहस्साइ तस्स दृयस्स अतिए एयम सोच्चा निसम्म ४० त दृय सरकारेंति, सक्कारिता सम्माति, सम्माणित्ता पडिविसज्जे ति ) इस प्रकार वे अनेक सहस्त्र राजा उस दूत के मुख से इस समाचार को सुन कर और उसे अपने अपने २ हृदयों में अवधारित कर रहुत ही अधिक आनन्द से प्रमुदित बनकर परम सतोप को प्राप्त हुए। उन्होंने उस दून का सत्कार किया सत्कार करके सन्मान किया और सन्मान करके फिर उसे पीछे विसर्जित कर दिया-भेजदिया।(तएण ते यासुदेव पामुक्खा परवे रायसहस्सा पत्तेय समोसरह) शमी त मधानी म पास्य नारथी नीयो भने નીકળીને ત્યાં ગ્રામ આકર અને નગર હતા ત્યાં અનેક સહો રાજાઓની પાસે ગયે ત્યાં જઈને નમ્રપણે તેણે સહુને આ પ્રમાણે કહ્યુ કે કપિલ્ય નગરમા દુપદ રાજાની પુત્રી દ્રૌપદીને સ્વય વર થવાનો છે તે આપ સૌ દ્રપદ An ५२ उरी भविस पिट्य ना२मा पारे। (तएण ताइ अगाइ रायसहस्साइ तस्स दूयस्स अतिए ण्यम? सोचा निसम्म हट० त दूर सकारे ति सझारित्ता, सम्माणे ति, सम्माणित्ता, पडिसिजेति) माते સહસ્ત્રો રાજાએ તે દૂતના મુખથી આ સમાચાર સાભળીને અને તેને પિતાના હૃદયમાં ધારણ કરીને ખૂબ જ પ્રસન્ન તેમજ પરમ સંતુષ્ટ થયા તેઓએ દૂતને સત્કાર કર્યો અને સન્માન કર્યું પછી દૂતને તેઓએ विहाय आपा (एण वासुदेवपामुक्या नहवे रायसहस्सा पत्य २ काया , बालापरबासस " समदरदरमितकाना यापद ग्रहीतायुमारणा' निम बरगता हयारण महाभटनटारमकरन्परिसिमा नग्यमहामुगटमम्हपरिणताः, सम्यः सकेभ्योपभिनिर्गन्नि, अगिनिर्गय या पयागे जनपदस्ता पाषाग्यन गमनायगन्तु मचा: ।। १०१९।। मूलम्-तएण से दुवण राया कोडुबियपुरिमे महावेइ सदा वित्ता एव बयासी-गच्छहणं तुमं देवाणुप्पिया। कंपिल्ल. पुरे नयरे वह्यिा गगाए महानदीए अदूरसामते एग मह सयवरमंडव करेह अणेगवंभसयसन्निविटुं लीलट्ठिय साल भजिआग जाव पञ्चप्पिणति, तण्ण से दुवए राया दोच्चंपि वोडुबियपुरिसे सद्दावेइ सहाबित्ता एवं वयासी-खिप्पामेव २पड़ाया मानद लियाधरगया सय गयरह माया भटचढगररहप हकर मस्तिो २ नगरहितो अमिनिगमति २ जेणेव पाचोले जण वा तेणे पहारेत्य गमणा ) यादमें जर इन समाचार देकर वापिस कापिन्य पुर नगर में ओचुके तर वासुदेर प्रमुख वे अनेक शास्त्र राजा प्रत्येक स्नान से निपटे, और मनाकर अपने शरीर पर पच पहिरा, यावत् प्रायुध और प्रहरणों को अपने २ साय लिया, अपने २ प्रधान राधि पर चढे और गधी घोडे रव और महाभदों क समुदाय से चिर हुए होकर ये सब अपने राज मरलोंसे नगरों से-निकले-निलकर जहा पांचाल जनपद या उस ओर चल दिये । सू०१९ सन्नद्धहरियसवरगया हयगयरह० महया भाचडगररहपहकर० सहितो नगरेहिती अभिनिग्गच्छति २ जेणेव पाचाले जणवए तेणेव पहारेत्य गमणाए) ત્યારપછી જ્યારે બધા ફતે સમાચાર આપીને કપિલ્યપુર નગર પાછા આવી ગયા ત્યારે વાસુદેવ પ્રમુખ ઘણા હજારે રાજાઓએ સ્નાન કર્યો અને ત્યારબાદ પિતાના શરીર ઉપર કવચ ધારણ કર્યા યાવતુ આયુધ અને પ્રહરને પિતાની સાથે લીધા ત્યારપછી તેઓ બધા પોતપોતાના પ્રધાન અને હાથી, ઘેડ, રથ અને મહામોના સમુ રાયની સા ૧–નગરથી નીકવા અને નીકળીને હત્યા - हाथीसा પાચાલ ના થયા ! સૂત્ર ૧૬ २८१ अनगारधामृतपपिणी टी० अ० १६ द्रौपदीचरितवर्णनम् भो देवाणुप्पिया । वासुदेवपामुक्खाण वहणं रायसहस्साणं आवासे करेह तेवि करेत्ता पच्चप्पिणति, तएण दूबए वासुदेवपामुक्खाण वहणं रायसहस्साण आगम जाणेत्ता पत्तेयर हथिखध जाव परिवुडे अग्घ च पन्ज च गहाय सवि. डिए कपिल्लपुराओ निग्गच्छइ निग्गच्छित्ता जेणेव ते वासु- देवपामुक्खा वहवं रायसहस्सा तेणेव उवागच्छइ उवाग- च्छित्ता ताई वासुदेवपामुक्खाइ अग्घेण य पज्जेण य सकारेइ सम्माणेइ सक्कारिता सम्माणित्ता तेसि वासुदेवपामुक्खाण पत्तेय२ आसे वियरड, तएणं ते वासुदेवपामोक्खा जेणेव सयार आवासा तेणेव उवागच्छइ उवागच्छित्ता हस्थिख- धाहितो पच्चोरहति पच्चोरुहिता पत्तेय खधावारनिवेस करेंति करित्ता मए२ आवासे अणुपविसति अणुपविसित्ता सएसुर आवासमु य आसणेसु य सयणेसु य सन्निसन्ना य सतुयट्टा य चहूहि गधब्वेहि य नाडएहि य उवगिजमाणा य उवणच्चिजमाणा य विहरति, तएणं से दुवए राया कपिल्ल- पुर नगर अणुपविसड अणुपविलित्ता विउल असण४ उवक्ख- डावेइ उवरखडावित्ता कोडुवियपुरिसे सदावेइ सदावित्ता एव वयासी-गच्छह णं तुम्भे देवाणुप्पिया | विउल असण४ सुर च सज्ज च मम च सीधु च पसपण च सुबहुपुप्फवस्थगंधम- ल्लालकार च वासुदेवपामोक्खाण रायसहस्साण आवासेसु साहरह, तेवि साहरति, तएण त वासुदेवपामुक्खा त विउलं २८० सनदरदपमितपयचा यापद गृहीनापुरमग्णाः निम्फभवरगता यगनरथ महामटरटारमारनपरिक्षणभरणमायगटममा परिना., मवेभ्यः सके यो मभिनिर्गन्ति भमिनिर्गय यस मानो जनपरस्ताव प्राधाग्यन् गमनायगन्तु माताः ॥ ए०१९ ।। मूलम्-तपण से दुत्रए राया कोडुंबियपुरिमे महावेइ सदा वित्ता एच वयामी-गच्छहण तुम देवाणुप्पिया । कपिल्ल पुरे नयरे बहिया गंगाए महानदीए अदूरसामंते एग मह सयररमडव करेह अणेगवंभसयसन्निविट्ठ लीलट्ठिय साल भजिआग जाव पञ्चप्पिणति, तण्णं से दुवए राया दोच्चंपि कोड्डवियपुरिसे सदावेद सहावित्ता एवं वयासी-खिप्पामेव २नाया ननद हल्थियवरगया क्य गयरह० मस्या भइचटगररहप- हकर मतो २ नगरेहितो अमिनिन्गच्छति २ जेणेव पाचोले जण वए तेणे पहारेत्य गमणा ) यादमें जन दून समाचार देकर वापिम कापिल्य पुर नगर में आचुके तर वासुदेव प्रमुख वे अनेक शास्त्र राजा प्रत्येक स्नान से निपटे, और मजार अपने शरीर पर क्यच पहिरा, यात् मायुध और प्रररणों को अपने २ साब लिया, अपने २ प्रधान हाधियों पर चढे और हाथी घोडे रथ और महाभदों क समुदाय से घिरे हुए होकर ये सर अपने राज महलोंसे-नगरों से-निकले-निलकर जरा पांचाल जनपद या उस ओर चल दिये। सू०१९ सनदहरियसबारगया हयगयरह० महया भडचडगररहपहकर० सरहिंतो ? नगरेहितो अभिनिग्गच्छति २ जेणेव पाचाले जणवए तेणेर पहारेत्य गमणाए) ત્યારપછી જ્યારે બધા તે સમાચાર આપીને કપિલ્યપુર નગર પાછા આવી ગયા ત્યારે વાસુદેવ પ્રમુખ ઘણા હજારે રાજાઓએ કર્યા અને ત્યારબાદ પિતાના શરીર ઉપર કવચ ધારણ કર્યા યાવતુ આયુધ અને પ્રહરને પિતાની સાથે લીધા ત્યારપછી તેઓ બધા પોતપોતાના પ્રધાન હાથીઓ ઉપર સવાર થયા અને હાથી, ઘેડા, રથ અને મહામના સમુ દાયની સાથે પિતાના રાજમહેલથી-નગરથી નીકળવા અને નીકળીને જયા પાચાલ જનપદ હતું તે તરફ રવાના થયા છે. સૂત્ર ૧૯ છે . નાન मोमतपिणी टो० अ० १६ द्रौपदीचरितवर्णनम् २८३ काइं आसणाई अत्थुयपच्चत्थुयाइ रएह२ एयमाणत्तिय पच्च- पिणह, ते वि जाव पच्चप्पिणति, तएणं ते वासुदेवपामुक्खा बहवे रायसहस्सा कल्ल पाउ० पहाया जाव विभूलिया हत्थि- संधवरगया सकोरट० लेयवरचामराहि हयगय जाव परिवुडा सविडीए जाव रवेणं जेणेव संयंवरे तेणेव उवागच्छइ उवाग- च्छिन्ता जणुपविसति अणुपविसित्ता पत्तेय२ नामकिएसु आस- णेसु निनीयति दोवड रायवरकण्ण पडिवालेमाणा चिट्ठति, नएण से पहुए राया कल्ल हाए जाब विभूलिए हथिखध- वरगए सकोस्ट० हयगय कपिल्लपुरे मज्झमझेण निग्गच्छति जेणेव सयवरमडवे जेणेन वासुदेवपामुक्खा वहवे रायसहस्सा तेणेव उबागच्छइ उवागच्छित्ता तेसि वासुदेवपामुक्खाण करयला वहावेत्ता कण्हस्स वासुदेवस्त सेयवरचामर गहाय उववीयमाणे चिट्ठति ॥ सू० २०॥ टीमा-'तएग से ' इत्यादि । ततः खलु स द्रुपदो राजा कौटुम्विकपुरु पान शब्दयति, शहायला एवमवादीत-गच्छत खलु यूय ह देवानुपिया. ! काम्पिल्यपुरस्य नगरस्य यहि प्रदेशे गङ्गाया महानया अदरसामन्ते नातिदूर नातिमनापे एक महान्त सम्बरमण्डर कुरुत कोशनित्याह-'अणेग' इत्यादि। 'तएण से द्वए राया कोडुपिय पुरि से ' इत्यादि। टीकार्थ-(तएग) इसके बाद (द्वए राया) द्रुपद राजा ने (कोडुप्रिय पुरिसे सदावेइ) कोटाम्बापुरुषो को बुलाया (सदाविता एव वयाप्ती) बुलाकर उनसे इस प्रकार कहा-(गच्छद ण तुम देवाणुपिया कपिपुरे नयरे पहियागगाए महानईए अदूरसामते एग मह सयवरमडव करेह, तएण से दूरए राया कोडु विय पुरिसे' इत्यादि- Astथ-(तएण ) त्या२५७ (दूपए राया) ६५. लये (कोडु वियपुरिसे सदावेइ) शैणि ५३वाने मासा. ( सदाविता एप क्यालो) मानावीन तमनमा भाग ३ (गाउद ण तुम देवाणुपियो । करिल्लारे नयरे महिया गगाए महानईए अदूरसामवे एग मद पवरमझ करेह, अणेगखमस- - - २८२ धूयाए चुलणीए देवीए माताकपास असण४ जाय पसन्नं च आसाममाणाट विहगति, जिमियाभुत्तु- सरागया बिय समाणा आयता जाय महासणवरगया वहूहि गधब्बेहि जाब विनि, तपणं मे दुवार गया पुवाद- रोहकालसमयसि कोडवियरिस सदावद सदायित्ता एव वयासी गच्छह णं तुम देवाणुप्पिया। कपिल्लपुर सगग जाव पहे वासुदेवपामुवखाण य रायसहसाण आवासेस हस्थिखधवरगया महया२ सद्देण जाव उग्घासमाणा एव बदह-एव खल्ल देवा- णुप्पिया क्ल्ल पाउ० दुवयस्स रपणो अत्तयाए धट्टज्जुण्णस्स भगिणीए दोवईए रायवरकपणाए सयवरे भविस्सइ, त तुम्भे ण देवाणुप्पिया । दुवर रायाणं अणुगिण्हेमाणा पहाया जाव विभूसिया हथिखधवरगया सको- रट० सेयवरचामर० हयगयरह० महया भडडगरेण जाव परिक्खित्ता जेणेव सयवरमटवे तेणेव उवागच्छइ उवागच्छित्ता पत्तेय २ नामकिएसु आसणेसु निसीयह२ दोवइ रायकण्ण पडि- वालेमाणा२ चिटह, घोसण घोसेह२ मम एयमाणत्तियं पच्च- पिणह, तएण ते कोडुबिया तहेव जाव पच्चप्पिणति, तएण से दुवए राया कोडुचियपुरिसे सद्दावेइ सद्दावित्ता एव क्यासी -गच्छह ण तुम्भे देवाणुप्पिया । सयवरमडप आसियसमन्जि- ओवलितं सुगंधवरगंधियं पंचवपणपुप्फपुजावयारकलिय काला- गरुपवरकुदुरुक्कतुरुक जाव गवटिभूय मंचाइमचकलिय करह करित्ता वासुदेवपामुक्खाण बहूण रायसहस्साण
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ताधर्मकपास अनेकस्तम्मानमनिविष्टभो लीटिगमालमनिभाग' लोला स्थितशालसिानीमा गिा नाशिमा पुगलिशामिलाशे, पान- 'तथास्तु' इति ससा ते पाटपिपाना स्वीय र सपाय, प्रत्यर्पयन्ति गण्डपोनिर्मित इति निनाद गपो राजा 'दोचपि' हिनीयारमपि कौटुम्बिापुरपात पतिदमिका परमादीन-हे दवानु मियाः । भिप्रमेव गामदेवमलाणा या रानगागागा आगाम-पामस्थान कुरताचपत, तऽपि यादम्पुिरता परमा' पायादेशादीता निवामा पृथर पृथक् योग्य वासस्थान रियाय मरगतिपाय तो क्ययन्ति । ततः अणेग मभसयसन्नित्रिशलटियसाल मजियागवारपच्चप्पिणति) हे दे वानुमियों ! तुमलोग जाओ-और फापिल्पपुर ननारकगहिर गगामहा नदी के नअतिदुर ओर न अनि समीप-उचित स्थान में एक बड़ाभारी स्वयचरमप यनाओ। जो अनेक नाटो साभोंसे युक्त हो तथा जिसमें विविध प्रकार की क्रीडा करती ई पुत्तलिका सजा कर लगाई गई हो । यावत् "तथास्तु" कह कर उन लोगों ने राजा की इस आजा को मान लिया और उसी आज्ञाके अनुमार स्वयपर मइप बना कर इसको खवर राजाको कर दी । (तएण से दुधा राया दोच्चपिकोटुयिय पुरिसे सद्दावेद सद्दावित्ताण्व चयासी-खिप्पामेव देवाणुपिया! वासुदेव पान क्खाण ऋण रायसहस्साण आवासे रेह ते पि करता पच्चपिणति इसके बाद द्रुपद राजा ने दमरे काटुम्निक पुरुषों का बुलाया-गुलाकर उनसे ऐसा कहो-देवानुप्रियो ! तुम लोग शीघ्रातिशीघ्र वासुदेव यसन्निविट्ठ लोलट्ठियसालभजिआग जाव पच्चतिषण ति) हेवानुप्रियो ! पिय પુરનગરની બહાર મહા નદી ગગાથી વધારે દૂર નહીં તેમજ વધારે નજીક પણ નહિ એવા યોગ્ય સ્થળે એક ભારે વિશાળ સ્વય વર મડપ તૈયાર કરે કે જે ઘણા સેકડે થાભલાઓવાળે હેય, તેમજ જેમાં અનેક જાતની કીડા કરતી પૂત બીએ સજાવીને મૂકવામાં આવી હોય તે લોકોએ પણ રાજાની આજ્ઞા સ્વીકારી લીધી અને ત્યારપછી તેમની આજ્ઞા મુજબ જ સ્વય १२ १३५ तैयार ४शन ने तेनी १२ पापी (तएण से दुवए राया दोच्च पि कोड बियपुरिसे सद्दावेइ, सदापिता एन वयाती-सियामेव देवाणुपिया' वासुदेव पामुक्खाणं बहूण रायसहस्साण आवासे करेह, वे विकरेता पञ्चयिण ति) ત્યારપછી દ્રુપદ રાજાએ બીજી કૌટુંબિક પુરૂષને બેલાગ્યા અને બોલાવીને તેમને કહ્યું કે હે દેવાનુપ્રિયે! તમે લેકે અવિલ બ વાસ તથાસ્તુ ” કહીને ઘણુ अनगारधर्मामृतवर्षिणी टीका अ० १६ द्रौपदीचरितवर्णनम् खलु पदो राजा वासुदेवप्रमुग्वाणा पहना राजसहस्राणाम् आगम-आगमन ज्ञात्वा प्रत्येक २ हस्तिस्कघारगतः, हयगजस्यमहाभटममूहपरिटत , जय पानार्थ जल पाचरणमक्षालनार्यमुदक च गृहीत्वा सद्धर्चा छत्रचामरादिरूपया काम्पिल्यपुरतो निर्गन्छति, निर्गत्य यौन ते वासुदेवप्रमुखा बहुसहस्रमख्यका- रानानस्तत्रैवोपागच्छति, उपागत्य तानि वासुदेवप्रमुखागि बहूनि राजमवाणि तान् बहुसहस्रसख्याकान् वासुदेवप्रमुखान् राज्ञः, अर्येण च पायेन च सत्कार- प्रमुख अनेक सहस्र राजाओं को बैठने के लिये पृथक स्थान बनाओ। उन्होंने राजाकी आज्ञानुसार वैसा ही किया और इसकी खबर राजाको कर दी । (तण्ण दुवा वासुदेव पामुक्खाण रणरायसहस्साण आगम जाणेत्ता पत्तेय २ रत्थिसध जाय पडिबुडे अग्य च पज्ज च गहार सब्धि ड्डीए कपिल्लपुगओ निग्गच्छइ,निगच्छित्ता जेणेव ते वासुदेव पामोक्खा चहवे रायसहस्सा तेणेव उवागच्छद, उपागचित्ता ताइ वासुदेव रामु- क्खाइ अग्घेण य पजेण य सरकारेइ, सम्माणेइ ) इसके बाद द्रुपद रोजा वासुदेव प्रमुख हजारों राजाओं को आगमन जानकर अपने प्रधान हस्ती पर आरूढ हो त्य, गज, रथ तथा महाभटो के समूह के साथ २ प्रत्येक राजा के लिये अर्ध-पीने के लिये पानी, पाय-चरण प्रक्षालन के जल-लेकर छत्रचामर आदि अपनो राजविभूनिसे युक्त होकर कापिल्य पुर नगर से निकले-निकलकर जहा वासुदेव प्रमुख हजारों राजा थे वहा गये। वहा जाकर उन्होंने उन वासुदेव प्रमुख रजारा राजाओ का अर्थ હજાર રાજાઓને બેસવા માટે જુન જુદા સ્વાન તૈયાર કરો તે લે એ પણ રાજાની આજ્ઞા મુજબ જ બધુ કામ પતાવી દીવું અને કામ થઈ ગયાની ખબર रात सुधी पायाधी (तएग दुपए वासुदेवसामुक्खाण वर्ग राय सहस्साण आगम जाणेता पतेय २ हत्यिसब जाव पडिबुडे अग्ध च पज्ज च गहाय सबिड्ढोए क पिल्लपुराभा निगच्छ, निग्गच्छिता जेगा ते वासुदेवसामोसा वहवे रायसहस्सा तेणेव उपागच्छन, आगच्छि वा ताइ वासुदेवपामुक्सा३ अग्वेग य पज्जेण य सकारेइ, सम्मागेइ) त्या२५० पासुन प्रभुम | રાજાઓનું આગમન સાભળીને ૬૫૮ રાજા પિતાના પ્રધાન હાથી ઉપર સવાર થયા અને ઘડા, હાથી, રવ તેમજ મહાલટેના સમૂહની સાથે દરેકે દરેક રાજાને માટે અપીવા માટે પાણું-લઈને છત્ર ચામર વગેરે પિતાની રાજ વિભૂતિથી યુક્ત થઈને કપિલપુરથી બહાર નીકળવા અને નિકળીને જપા વાસુદેવ પ્રમુખ હજારે રાજાએ હતા તે પહેલા ત્યા જાને તેમણે તે नापास पति, ममानमति, सहकार्यमा पाटेकामा प्रत्यार पृथर - नाराम पिरिनि । 11. मने देवमामा यीव पका =निगा गावालानगपागनिन, गनिमयार परवडन्ति प्रत्यया प्रत्येक म-धापरिनिाम iT, T-1 के मक नापामेऽनुपवि मन्ति, अनुमरिय र चागु जामागेगु-भागपुन भनेगु च सनिपणा उपविष्टान तथा 'मनुहा सवर्ण परितिकाची निर्गन्धीच 'नाड एहि ग' नाटी 'अगितमागान ' उपगीरमाना. ' अचिनमागाय' और पाप से मत्कार किया-मन्मान किया। (नकारिता, सम्माणिता, तेसिं वारदेवमुपाण पत्तय २ आनासे विचरत, ताण ते वासुदव पामुरगा जेणे सपा २ भागमा तणे वागसागरिता स्थि सपाहि तो पच्योमहात, पच्चोमरित्ता पत्तेय याचारनियमति) सरकार सन्मान करके उनॉन उन मय वासुदेव प्रमुखों का प्रत्येक के लिये पृयरुर आगम-स्थान-दिया। इसके पश्चात् पे बासुदेवप्रनुसराजा जहा अपना २ स्थान नियत या-वहा गये। वहा जाकर के अपने २ हाथियों पर से नीचे उतरे और उतर करके उन्होंने अपनी २ स्कन्धा चार स्थापित कर दो-अर्थात् सैन्य को ठहरा दिया। (करित्ता सा २ आगले अणु०) ठररा कर फिर वे अपने २ आवासों में प्रविष्ट हुए (अणुपरिसित्ता सएप्लु २ आवासेसु य आसणे य सयणेसु य सन्नि सन्ना य सतुपट्टा य यहिं ग पवेहि य नाडाहि य उवगिज्जमाणा य વાસુદેવ પ્રમુખ હજાર રાજાઓનું અર્થ અને પાદ્યથી સત્કાર તેમજ સમાન यु (सफारिचा सम्माणिता वेनि वासुदेवपामुम्साण पत्ते । २ आरासे बिगाइ, तएण ते वासुदेवपामुम्सा जेणेव सया २ आवासा तेणे जागच्छइ, मा गच्छिता हस्थिरसधाहितो पच्चोरुह ति, पच्चोहहित्ता पतेय समाचार निवेस करेति) २ तेभ सन्मान २ तेभए वासुदेव प्रभुभ ४२३ ४२३ રાજાને જુદુ જુદુ આવાસ સ્થાન આપ્યું ત્યારપછી વાસુદેવ પ્રમુખ રાએ જ્યા પાતપિતાનું આવાસ સ્થાન નકકી કરવામાં આવ્યું હતુ ત્યા ગયા ત્યાં જઈને તેઓ પિતાપિતાના હાથીઓ ઉપરથી નીચે ઉતર્યા અને ઉતરીને તેઓએ પિતાપિતાની સ્કાવાર-છાવણી સ્થાપિત કરી એટલે કે સનાને પડાવ નાખે (करित्ता सए २ आवासे अणु०) १५ नाभान तेमा पातपाताना मावास स्थानमा अविष्ट प्या (अणुपविसिचा सएसु २ आवासेसु य आसणेसु य सयणे सय मनिसला य सतुयट्टा य बहूहिं गधव्वेहि य नाइएहि य भनगारधर्मामृतषिधी टीम द्रोपटीयरितवर्णनम उपनृत्यमानाच गीत श्राध्यामाञ्च, नृत्य दर्यमानाश्च विहरन्ति । ततः दुपदो राजा पारिपल्यपुर नगरमनमविश्ति, अनुप्रविश्य विपुलम्-अश्न खाद्य ग्वाद्यम् उपचारयति. मग्यास्यति, उपकार्य कौटुम्चिनपुरपान शब्दयित्वा एयमाढीत-गच्छत रलु यय हे देवानम्यिाः पुिरम् , अरन ५ खाध स्वाद्य सुरा च मय च मासं च सीधु च प्रसन्ना च सीधुः प्रसन्ना च मदि निजणे, तथा मुबह पुष्पवर धमाल्याल्पार च वासदेवण्मुरसाणा (111 आवासेषु ' साहरह सहरत-उपनयत, तेऽपि कौटुम्विर पुस्पास्तथैव सहरन्ति उघणचिजमाणा य विहरति ताण से दुरा गया कपिलपुर । अणुपविमइ, अणुपविमित्ता विउल असण ४ उवरवडावेह) होकर के वे अपने अपने आवास स्थानों में आसनों पर एव वितर पर जाकर अच्छी तरह बैठ गये लेट गये। वहाँ लेटे हा उनकी जन गर्बोने, अनेक नाटयसरों ने स्तुति की-उन की प्रशसा के गीत गाए, नाटक दिखलाया । दमके बाद द्रुपद राजा कापिल्यपुर नगर के भीतर आये-वहा आकर के उन्होंने विपुलमात्रा में अशन, पान, खान्य ज्व स्वाद्यरूप चतुर्विध आहार तैयार करवाया-पकयोया। (उवक्खडाविता कोनियरिसे सदावेह मदायित्ता एर क्यामी-(गन्छ णं तु मे देवाणु प्पिया! विल असण ४ सुर च मज्ज च स्मीयु र परपण च सुरह पुष्फरन्य गधम गलकर च वाढेनपामोमवाण रायसरम्माण आवासे सु साहरह) तैयार करवा कर फिर उन्होने कौटुम्निक पुम्पों को बुलाया चुलाकर उनसे ऐसा कहा-हे दबानुप्रियो तुमलोग जाओ और इस उरणचिजमाणा य विएर ति, ताण से दुरए राया क पिहपुर यर अणुप पिमइ अणुपविसित्ता विउल असण४ ग्यासट वेइ) प्रवेशान तेगो पातपाताना આસને ઉપર સારી રીતે બેસી ગયા, સુઈ ગયા ત્યા સુઈ ગયેલા તેઓની ઘણુ ગવએ, ઘણા નાટયકારોએ સ્તુતિ કરી, તેમની પ્રશ રમા ગીત ગાયા અને નાટક ભજવ્યા ત્યારપછી પદ ગજા કાપિલ્યપુર નગરમાં આવ્યા આવીને તેઓએ પુકળ પ્રમાણમાં અશન, પાન ખાવ અને સ્વાદ્ય રૂપે ચાર गतनी मातार तयार 3143ब्यो ( डारित्ता सोडविरपुरिसे सद्दाइ सदायित्ता एव ययामी गन्छह ण तुभे दवाणुपिया ! विर असण ४ सुर घ मज च मसं च सीवु च पसण्ण च सुरहुपुष्फरत्यंगमहाल कार देपामोस्वाण रायसहाराण आवासेमु मारइ) तयार ना तने પુરૂનું લાગ્યા અને બોલાવીને તેઓને કહ્યું કે હે દેવાનુપ્રિયા ! તમે . ત્યા - घवासु . T - माताधर्मकथास यति, समानयति, सकार्य सवार का, समान्य नेपामामुदेवामानामा प्रकार पृथर र नापास पिपरईतिरति । नतः गते पारमामा गोमा २=निजा २ आवामातोपागनि, उपाग-4 निस्कन्धान मन्पपरीमन्नि प्रत्यारुद्य प्रत्येकर समापारनिश लिन ला सके मनापामेनुमति शन्ति, अनुपविश्य सकेप स्वपु नानासेपु-आमनेपु च गयनेषु न मनिषण्या उपविष्टाय तथा 'सत्या' सत्वमसि ता. परिवर्तित राधा पहनिर्माण नाड एहि य' नाटीध ' उपगिनमागा' उपगीयमाना T. 'अगचिजमाणा' और पाद्य से मत्कार किया-सन्मान किया। (नस्कारिता, सम्माणित्ता, तेसिं वासुदेवपोमुराण पत्तय २ आसे विचरत, तण ते वासुदेव पामुकमा जेणेर सया २ आरामातेणेच उबागबगचित्रता रथि खधाहि तो पच्चोमहति, पच्चोकहिता पत्तेय पाचारनिम कति) सत्कार सन्मान करके उन्होंने उन नय वासुदेव प्रमुग्नों को प्रत्येक के लिये पृा आवास-स्थान-दिया, । इसके पश्चात् पे बालदेवप्रमुवराजा जहा अपना २ स्थान नियत या-दरा गये । वहा जाकर के अग्ने २ शथियों पर से नीचे उतरे और उतर करके उन्होंने अपनी २ स्कन्धा- वार स्थापित कर दो-अर्थात् सैन्य को ठहरा दिया । (करित्ता सए २ आवासे अणु०) ठहरा कर फिर वे अपने २ आवासों में प्रविष्ट हुए (अणुपविसित्ता सएप्सु २ आघासेतु य आसणेप्नु य सयणेतु य सन्नि- सन्ना य सतुपट्टा य यहिं ग पवेहिं य नाडारि य उवगिज्जमाणा य વાસુદેવ પ્રમુખ હજારે રાજાઓનુ અર્થ અને પાઘથી સરકાર તેમજ સન્માન ज्यु (सफारिचा सम्माणिता तेनि वासुविधामुम्साण पत्ते । २ आरासे वियाइ, तएण ते वासुदेवपामुस्सा जेणे सया २ आवासा तेणेर उवागन्छइ, उमा गच्छिना हथिसधाहितो पन्चोरुह ति, पच्वोरुहिता पतेय सवागारनिवेस करे ति) सर तमान सन्मान २ तेमणे वासुदेव प्रभुभ १३ ६२ રાજાને જુદુ જુદુ આવાસ સ્થાન આવ્યું ત્યારપછી વાસુદેવ પ્રમુખ રાજાઓ જ્યા પિતાપિતાનુ આવાસ સ્થાન નક્કી કરવામાં આવ્યું હતુ ત્યા ગયા ત્યા જઈને તેઓ પિતાપિતાના હાથીએ ઉપરથી નીચે ઉતર્યા અને ઉતરીને તેરોએ ગિતતાની સ્કન્યાવાર-છાવણી સ્થાપિત કરી એટલે કે સેનાને પડાવ નાખ્યા (करिता सए २ आवासे अगु०) mejl नामीन तो पातपाताना मापास स्थानमा प्रविष्ट थया (अणुपविसिचा सएसु २ आवासेसु य आसणेसु य सयणे म्य सप्तिसना य सत्यहा य बहर्हि गधध्वेहि य नाइएहि य सागरामागृतवर्षिणी टीका० १० १६ दौपटीचरितवर्णनम् पविटा बहुभिर्गन्धर्यापद् नाटकै बोपगी साना उपन्त्यमागाश्च विहरन्ति आसते स्म इत्यर्थः। तत रलु स मुण्दो राजा पूर्वापरालसमये कौटुम्मिरपुरुषान् शब्दयति, शन्दयित्वा एचमगादीत-गाउस खलु हे देवानुमिः ! काम्पिरयपुरे नगरे शृङ्गा- एक यावत्-निश्चतुरचत्वर महापयपयेपु पासुदेवप्रमुखागा च रामहस्राणामात्रा सेषु चारासामीपेषु इन्तिरगता माता २ शब्टेन उचः परेण याबद् उद्बोपन्तः २ एव नदत-ए। चलु हे देवानुमियाः । रल्ये-आगामोनि दिनीय गर्यों ने नाना प्रकार के स्तुत्यात्मक गीत गाये और नाटधकारी ने नृत्य दिग्वलाये । (तरण से दुचाप रोया पुज्यावरणरकालसमा पनि कोड विधपुरिले सहावेत,महावित्ता एव क्याली, गहण तुमे देवाणुपिया। करिल्लपुरे पिंघोटग जार पहेतु पातु देवपामुश्ताण य राय महस्माण य आवासेसु विराघरगया माया मोण जाव उग्रोसेमाणा २ एव चटार, रावसामु देवानुप्पिया! रल पार० दुबरम रगो धूयाग चुलणीपदेनी अत्तयाण धण्णस भगिणीए दोवईए रायबरकन्ना सयबर भविरा3 ) इसके बाद द्रुप गाजा ने पूर्वापान काल के समय में कौद्धस्पिक पुस्मों को युलनामा और बुलाकर उन ऐसा कहा-हे देवानु घिरों । तुमरोग हाधी पर कर तापित्यपुर नगर में जाओ और वा शृगादक शयत् विज तुम चत्तर मापय आदि मार्गो में जो बासुदेव प्रमुग गा के आवासस्थान है उनके समीप बडे जोर २ ઉપર શાતિપૂર્વક બેગી ગયા તેમના મને-વિદ માટે ગધએ અનેક જાતના તુન્યા મર ગીતો ગાયા અને નાટયકારે નૃત્ય કરી બતાવ્યા (तएण से दूरए राग पुवारण काल समयमि कौपियपुरिसे मदावेइ, सदापित्ता, एव पगामी, गाउहण तुमे देवाणुप्पिया कपिल्लपुरे सपाटग नाव पहेसु नासुपपागुरुवाण य महवा महेण ताा उन्धोसेमाणा • एव यह, एवं खलु देवाणप्पिया वाल्ल पाउ० पयस्म रगो धूयाए चुलगी देवीए अत्तयाए यहजुगणम्स भागणीए दोनईए रायवरकन्नाए सरवर भविस्सइ) ત્યાર૫ ૬૫ રાજએ પૂર્વોપરાતું કાળના સમયે કૌટુંબિક પુરૂને લાવ્યા અને બેલા પીને તેમને આ પ્રમાણે કહ્યું કે હે દેવાનુપ્રિયે ! તમે લેકે હાથી ઉપર બેસીને વાપિતયપુર નગરમાં જાઓ અને ત્યાના શ્રાટક તુ નિ ચતુષ્ક ત્વર મહાપરા વગેરે મામા-કે માર્ગોની પાસે વાસુદેવ મખ રાઓના આવાસ ઘરા છે તે સી પાને બહુ મોટા સાદે આ જાતની का ३७ - २८८ हातापासूत्र ततः खलु ते वासुदेवममुखास्तद् विपुलम् , असन पान याद्य स्वाघ यावत् मसन्नां च ' आसायमाणा' आस्वादन्तो विदरन्ति, अपि च खलु 'निमिया' जिमिता:-भुक्तवन्तः, 'भुत्तनगगया' मुनोत्तरागताः मुक्तोचर भोजनानन्तरम् आगताः भुक्तेश्यत्र भाचे क्तःभोगनस्थानादासननदेयो मुम्बमक्षालनार्थमागताः सन्न आयता' आचान्ताः-फतचुल्लुस, यावत्-मुखामनपरगता-आगनपरे सुग्यो- अशन, पान, खाद्य स्वायरूप चतुर्विध आहार को सुरा मन्य, मीधु और प्रसन मदिरा को और अनेक विध हन पुप्पों को वस्त्रों को गवमाल्य एच अलकारो को वासुदेव प्रमुख राजसहस्रों के आराम स्थानों पर ले जाओ। (ते वि साहरति ) राजा की आज्ञानुसार ये सन उन अशनादिवस्तुओं को वहा पर ले गये। (तएण ते वासुदेवपामु क्खा त विउल असण ४ जाव पसन्न च आसाण्माणा ४ विहरति) इसके बाद उन चासुदेव प्रमुग्व राजाओं ने उस आनीत विपुल अशनादिरूप प्रसन्ना महिरा तक की आशर की सामग्री को ग्वाया (जिमिरा भुत्तुत्तरागया वि य ण समाणा जार सुडामणवरगया बहि गधव्यहिं जाय विहरति ) खा पी कर जब वे निश्चिन्त हो चुके और मुम्ब प्रक्षालन के लिये भोजन स्थान से उठकर दूसरे निकट स्थान पर आये-तय उन्होंने कुल्ला किया और फिर सुन्दर अपने २ आसनों पर शाति पूर्वक आकर बैठ गये। इनके बैठते ही मनोविनोद के लिये લકા જાઓ અને આ અાન, પાન, ખાધ, સ્વાદ્ય રૂપ ચાર જાતના આહી રને મુરા, મધ, માસ, મધુ અને પ્રસન્ન મદિરાને અને ઘણી જાતના આ પુને, વસ્ત્રોને, ગધમાન્ય અને અલકાને વાસુદેવ પ્રમુખ રાજસહસ્ત્રોના सापास स्थान पाया (ते वि साहर ति) रानी माज्ञा प्रमाणे तय બધાએ તે ખાદ્ય પદાર્થોને રાજાઓના આવાસ સ્થાને પહોંચાડી દીધા હતા से वासुदेवपामुक्सा त विउल असण ४ जाव पसन्न च असाएमाणा ४ विहर ति ત્યારપછી તે વાસુદેવ પ્રમુખ રાજાઓએ ત્યાં પહોચાડવામાં આવેલા પુષ્કળ પ્રમાણમા અશન વગેરથી માંડીને પ્રસન મદિરા સુધીના બધી જાતના આહાર સામગ્રી વગેરે મુ ખ રૂચિપૂર્વક પાન કર્યું (जिमिया भुत्तुत्तरागया वि य ण समाणा आयता जार मुहामणवरगया वहरि गधब्धेहि जाब विहरति) જમી પરવારીને જ્યારે તેઓ નિશ્ચિત થઈ ચૂક્યા ત્યારે તેઓ મુખ પ્રક્ષાલન માટે જન સ્થાનથી ઊભા થઈને બીજા પાસેના તેઓ કેગળા કર્યા અને ત્યારપછી તેઓ ફરી પિત अमगारचमानपिणी टी० म० १६ हौपटीवरिमयर्णनम् मण्डपस्तौगोपागच्छत. उपागत्य प्रत्येक 'नामकिएसु' नामाङ्कितेषु स्व स्त्र नामा,सरयुक्तेषु आमनेपु निपीदव, निपद्य द्रौपदी राजकन्या 'पडिवालेमाणा २' मविपालयन्न. २ प्रतीक्षमाणा २ तिष्ठत इति घोपणा घोपयत, घोपयित्वा ममैतागलतिका प्रत्यर्पयत, ततः बलु ते काटुम्निकारतयैव यारत् प्रत्य पंयन्ति । तत' सलु स द्रुपदो राजा कौटुम्पिापुरुपान् शब्दयति, शब्दयित्वा एवमवादीव-गच्छा सलु यूय हे देशानुप्रियाः ! स्वयवरमण्डपम् " आमियसम- जियोपलिा" आसिक्तसमार्जितोपलिप्तम् आसिक्तम्-जयप्रक्षेपेणार्टीकत, समा नित-कचरायपनयनेन सशोधितम् , उपलिप्त-मृद्गोमयादिभिरनुलिप्त, तया- गावागावर सुगमपरगन्धित-जगुरुगुग्गुरसरलदादादिजनितसुगन्धयुक्त , पञ्चवर्गपु'फनोवयारकलिय' पञ्चवर्णयुप्पपुञ्ज पचारकठिन । ' कालागुरुपवर- कुरु-गाय गवाहिय' कालागुरुपवरकुन्दुरु' कतुरुक-यावद्-गन्यति- भूत, नत्र याकन्देन-डम्झनमवनवागन्युयाभिराम ' इति गोध्यम् । सरसाव हो । मडप में आकर प्रत्येक जन अपने अपने नामवाले आसन पर बैठजावें । बैठकर फिर वा वह राजवर कन्या द्रौपदी की प्रतीक्षा करें। (घोसण पोसेर २ मम प्रयमाणत्तिय पच्चप्पिणर) इस प्रकार की घोषणा करो और जब तुमलोग ऐसी घोषणा कर चुको तय इसकी हमें पीछे खबर दो। ( तएण ते कोटुविधा तहेच जाव पच्च पिण ति ) उन काटुम्विक पुरुषों ने नृपाज्ञानुमार ऐमा ही विचा-याद में हमलोग आपकी आज्ञानुसार घोषणा कर चुके हैं ऐसी सूचना राजा के पास भेज दी । (तएण से दुव राया काडपिय पुरिसे सदोवेइ, सदायित्ता एव चयासी-गच्छह ण तुम्भे देवाणुप्पिया । सयवरमडव आसियानमज्जिोवलित्त सुगंधवरगधिय पचवण्यपुष्फपुजोक्यार- कलिय कालागरुपवरकुदुरुक्कतुरुक जार गधट्टिभूध मयाइमचकलियं મ ડપમાં આવીને દરેકે દરેક પિતા પોતાના નામવાળા આસન ઉપર બેસી જાય त्या माने तो २४५२ न्या द्रौपalat मारामाननी प्रतीक्षा ४३ (घोसण घोसेह २ मम एयमाणत्तिय पच्चप्पिगह) मा शने तमे घोष। ४। सन माम यजय त्यारे भने भमर माया (तएण ते कोडु पिया तहेव जान एचप्पिण ति) ते टुभिः ५३३॥ये रानी माता प्रमाणे ४ ५५ अभ પતાવી દીધું અને “અમે લેકેએ આપની આજ્ઞા અનુસાર શેષ કરી છે” એવા ખબર જાની પાસે પહોંચાડી દીધી (तरग से वर राया फोडु वियपुरिने सहावे, सदायित्ता एवं वयामी- गच्छद ग तुभे देगापिया ! मारमडा आमिनमन्जिभोवलितं सुगपवर- मधिय पचमपुष्काजापयारकलिप कालागुरुपवरकुदरुरतुरुक्क जाव गहि २९० हामायाको दिवसे प्रादुर्भूतमभाताया रज या तेजसा पति सर्येऽस्यगते दुपदम्य राम्रो दुहिता-पु-या, चुलायादेव्या आत्मजाया , धृष्टयुम्नाय गगिन्या द्रौपधारामार- फ्न्याया स्वयबरो मरिष्यति, समात् सतु हे देवानुपिया. ! पग द्रुपद राजाना रहतः सनाता यावत-सर्गरद्वारविभूषिता-स्तिम रगताः सको. रप्टमाल्यदाग्ना छोण ध्रियमाणेन श्वेतपरचामरेरदगमानश्च युक्ताः हयग- जरथमहा टकरेण चतुरङ्गवलेन यात परिक्षिप्ता -परिटता यर स्यवर- से ऐसी घोषणा करते हुए कहो-फि हे देवानुप्रिय ! पल मर्योदय होने पर द्रुपद राजा की पुत्री चुनी देवी की आत्मा और धृष्टदाम्न की यहिन राजवर कन्या-द्रौपदी का स्वयचर होगा (त तुम्भेण देवाणुपिया! दुपय रायाण अणुगिहेमाणा हाया जाच चिभूसिया इथियधवरगया सकारण्ट० सेयवर चामर एय गयरह० मया भटनगरेण जाव परिधिखत्ता जेणेवसयवर मटवे तेणेच ज्यागच्छा, चागत्तिा पत्तेयर नामकिएसु आसणेसु मिसीयह २ दोष रायकपण पउिचालेमाणा २ चिदुर ) इस लिये हे देवानुप्रियो ! आपलोग दुपदराजा के ऊपर कृपा करके स्नान आदि से निबट कर एव समरत अल्पारो से विभूषित होकर जहाँ स्वयवर मडप है वहा पधारे । आते समय साथियों पर बैठकर आवे। कोरण्ट पुष्पों की मालाओ से सुशोभित छन्न उस समय आप सब के ऊपर तने हों और श्वेत सुन्दर चामर पर बोरे जा रहे हों । र, गज, रय एव महाभटो का समृरूप चतुरगदल आप ઘેષણ કરે કે હે દેવાનુપ્રિયે ! આવતી કાલે સવાર થતા દુપદ રાજાની પુત્રી ચુલની દેવીની આત્મા અને ધૃષ્ટદ્યુમ્નની બહેન રાજવર કન્યા દ્રૌપદીને સ્વય વર થશે (त तुम्भेण देवाणुप्पिया । दुवय रायाण अणुमिण्माणा व्हाया जाय विभू सिया हत्थिखधवरगया समोरण्ट० सेयवरचामर० हय गय रह० महया भडचड- गरेण जार परिक्खिता जेणेव सयवरमडवे तेणेन उवागाह, उवागच्छित्ता पत्तेय नामरिएसु आसणेसु निसीयह २ दोबइ रायफण्ण पडिवाले माणा २चिट्ठह) એથી હે દેવાનુપ્રિયે ! તમે લેકે દુપદ રાજા ઉપર મહેરબાની કરીને સ્નાન વગેરેથી પરવારીને તથા સમસ્ત અલકારથી વિભૂષિત થઈને જ્યા સ્વયંવર મૂડ છે, ત્યાં હાથીઓ ઉપર સવાર થઈને પધારે કેરટ પુની માળાઓથી શોભતુ છત્ર તે વખતે તમારા ઉપર તાણેલું હોવું જોઈએ અને સફેદ ચમરે પણ તમારા ઉપર કેળાના હોવા જોઈએ હાથી, રથ અને મહા ભટેના સમૂહ રૂપ ચતુર ગિણી સેના તમારી સાથે હોવી વર ।
अमगारधर्मामतपिणी टी0 40 १६ हौपटोचरित्यर्णनम् मण्डपस्तयोपागत. उपागत्य प्रत्येक नामकिएसु' नामाङ्कितेषु स्व स्व नामाक्षरयुक्तेपु आसनेषु निपीदत, निपद्य द्रोपदी राजान्या 'पडिवालेमाणा २' प्रतिपालयन्त २ मतीक्षमाणा. २ तिष्ठन इति घोपणा घोपयत, घोपयित्वा ममैनामाज्ञप्तिका प्रत्यर्पयत, ततः खलु ते कौटुम्निमारतथैव यानत् प्रत्य पंयन्ति । ता खलु स द्रुपदो राजा कौटुम्मिन्पुरुषान् शब्दयति, शब्दयित्वा एमादीत-गच्छन खलु यूय हे देवानुप्रिय. ! सयवरमण्डपम् “ आमियसम- ज्जियोबलिन" आसिक्तसमार्जितोपलिसम्मासिक्तम्-जल प्रक्षेपेणार्टीकृत, समा जित-काबरायपनयनेन सशोधितम् , उपलिप्त-मृद्गोमयादिभिरनुलिप्त, तथा- चुगमवागावर मुगमागन्धित-मगुरुगु.गुलमरसरलदाहादिजनितसुगन्धयुक्त, 'पञ्चार्गपु'फानोवयारकलिय' पञ्चवर्णपुष्पपुञ्जपचारमस्ति । 'कालागुरुपयर- कुतुबारक-नापग-पादिभूय' काला गुरुपवरकुन्दुरुतुरुक-यावद्-गन्धपति- भूत, ना यानन्देन-पडझामपनगन्युचुयाभिराम ' इति योध्यम् । सर मसाप हो । मडप में आकर प्रत्येक जन अपने अपने नामवाले आसन पर बैठजायें । बैठकर फिर वहा वह राजघर कन्या द्रौपदी की प्रतीज्ञा करें। (घासण घोसेर २ मम ण्यमाणत्तिय पच्चप्पिणह) इस प्रकार की घोषणा करो और जन तुमलोग ऐसी घोषणा कर चुको तव इसकी हमें पीछे खपर दो। ( तण ते कोटुरिया तहेव जाव पच्च प्पिणति ) उन कौटुम्निक पुरुषों ने नृपानानुसार ऐमा ही विवा-बाद मे हमलोग आपको आज्ञानुसार घोषणा कर चुके हैं ऐसी सूचना राजा के पास भेज दी। (तएण से दुवए राया काड थिय पुरिसे सदावेइ, सदाविती एव वयासी-गच्छह ण तुन्भे देवाणुपिया । सफ्वरमडव आसियसमज्जिोवलित्त सुगंधयरगधिय पचवणापुफपुजोक्यार- कलिय कालागरुपवरकुदुरूस्कतुरुक जार गधवट्टिभूप मचाइमचकलियं મડપમાં આવીને દરેકે દરેક પિતતાના નામવાળા આસન ઉપર બેસી જાય त्या मानते २०३२ अन्या द्रौपाना आरमननी प्रतीक्षा रे (घोसण घोसेह २ मम एयमाणत्तिय पच्चप्पिगह ) मा रीते तमे घोषणा । भने माम 25 लय त्यारे भने मार माथे (तएण ते कोडु पिया तहेव जाव पच्चप्पिणति ) त टुभिः ५३३॥ रानी माना प्रभारी ४ मधु म પતાવી દીધું અને અમે લોકોએ આપની આજ્ઞા અનુસાર ઘોષણા કરી છે” એવા ખબ, રાજાની પાસે પહોંચાડી દીધી (सएग से द्वर रापा कोडु पियरिमे सदावे, समाविता एवं वयामी- गछद ण तुम्भे देशागुपिया ! समारनडा आमिपनमन्जिभोवलित्त सुगमवर गधिय पचवणपुजारयारकलिप कालागुरुपयरकुदरुस्तुरुक्क जाव गवरहि २२२ - রাখাই धृपदधमानमघमघायमानगन्चोघृताभिराम, 7 कालागुरु जणागुम., प्रार कुन्दुरुक-चीडानानको गन्नद्रव्यविशेषः, तुरुपक च सिरक, प्रश्न गन्नद्रव्य सयो गन इति द्वन्द', यता-रतमन्न नी यो धुपम्नस्य दयानस्य य सुरभिर्मपमा यमाना-प्रतिशमान , गन्ध उस्तम्तेनाभिरामो रमणीर स तया त तया- गतिपूगि मात-गावाटे शानदान-नसलामोभ्यातिशया तया- मचाइमचकलिय ' मञ्चातिमश्चलित फुरत, त्या वासुदेवममुन्यागा बना फरेह, करित्ता वालदेव पाठाखाग घ गरायसहस्ताण पते। २ नाम काइ आस गाइ असुपरब्ध युयाइरएह २ एयमाणत्तिा पच्चपिणह) इसके पाद मुपदराजा न कोडम्बिक पुरूषा को बुलाया और बुलाकर उनसे ऐसा कहा-हे देवानुनिया ! तुमलोग जामा-और स्पयवर मडप को आसिक्त कर-जलसिवन से जाई कगे, समाजित करा- कचर आदि को उससे वाहिर कर उसे साफ करो एवं उपलिप्त करोमि. तथा गार से उसे लोपी। सुगमगधित करो उसमे- अगुरु, गुग्गुल, कपूर आदि को जलाकर उनकी गर से उसे सुगध युक्त बनाओ पचग के पुजा क पुज उसने जगर २ रखो। कृष्णा- गुरु प्रवर कु- दक, तुरुकोनान इनके चूर्ण को वहां आस में खूब जलाकर उनके सर से उसे बहुत हो अधिक मनोभिराम बनाभा ज्यादा था-उस एसा करदा किजिसस ऐसा ज्ञान हा कि यह एक सुमति द्रव्य को वर्तिका है। वह मचा के ऊपर मयो को भूर भचाइमपाले । करह, जारत्ता वासुदेव सामुस्खाग बहूग रायसहस्साग पत्तेय २ नामकाइ आसपाई जत्युयपच युपाइ रए र एयमागत्तिर पचापेगह ) ત્યારપછી દુપટ રાજાએ કૌટુંબિક પુરૂને બેલાગ્યા અને બોલાવીને કહ્યું કે હે હેવાનુપ્રિયે ! તમે લોકો જાઓ અને સ્વયંવર મડપને આમિક્ત કરા-પાણું છાટે, સ માર્જિત કરે, કચરા વગેરે સાફ કરે, અને ઉપલિપ્ત કરો, એટલે કે માટી તેમજ છાણથી લીપે સુગધર ગધિત કરે એટલે કે તે સ્થાને અનુરૂ, ગુગ્ગલ, કપૂર વગેરેનો ધૂપ કરીને તેની સુગ ધથી તે સ્થાનને સુવાસિત કરે પચવર્ણના પુષ્પપુજના સમૂહ સ્થાને સ્થાને ગોઠવીને તમે મડપની શોભામાં અભિવૃદ્ધિ કરે કૃષ્પગુરૂ, પ્રવર, કુદરૂન્ડ, તુરૂષ્ક, લેબાન આ છાષા પદાર્થોના ચૂર્ણને અગ્નિમાં નાખીને તે રવાનને સુમધથી ખૂબ જ રમ હીિય બનાવી દો તે સ્થાને તમે એવું માસ સુગ ધમય બના તે સુગધિત દ્રવ્યની વર્તિક (અગરબત્તી જેવું લાગે તે , - खेनगारधर्मामृतपिणी ठीका अ० १६ द्रौपदीवरितवर्णनम् २२३ राजमहत्राणा प्रत्येक २ नामाद्विान्यासनानि 'जत्युयपचत्युचाइ ' आस्कृत मत्यवस्तृतानि-आन्छादित मत्याच्छादितानि 'रएह' रचयत, रचयिचा एतामा ज्ञप्तिमा प्रत्यर्पयत, तेऽपि कौटुम्बिापुरुषाः, यारत् प्रत्ययन्ति । 'तएण ते' वासुदेममुग्याः बहुमहसमयकाराजान 'कट' कल्ये प्रादुर्भूतमभाताया रजन्या यावन् तेजमा अति सूर्यग्भ्युगते स्नाता यावत् सील कारविभूपिता हस्ति- सायबरगता सकोरटमाल्यदाम्ना छोग प्रियमाणेन वेतपरचामराङ्मयमानैश्च उक्ता हय गज-यारत-पदानिममोत परिवृता सद्वर्ग यार ' शपणापट हादीनां रवेण यत्रो स्थाने स्वयनर मण्डपस्तगोपागन्ति, उपागत्यानुपविशन्ति, अनुपविश्य प्रत्येक २ 'नामकिए मु' नामाथिनेपु-स्वरसनामाक्षरयुक्तेषु नामनेषु निपीदन्ति-उपनिरान्ति, निपा द्रोपती राजपरकन्या 'पडिमालेमाणा' पति- पालयन्त प्रतीक्षमाणास्तिष्ठन्ति । रखो । उन पर वास्लुदर प्रमुग्व राजाओ के प्रत्येक के नाम के आसनो को आरत-शुभ्रवस्ल से ढककर प्रत्यवस्तृत-और रिती शुन्नवस्त्र से आच्छादित कर रसो। रस कर फिर हमें पीछे इस सब कार्य के समास होने की खबर दो। (ते नि जाव पच्चप्पिणति) इस प्रकार गजा की आजानुमार उन कौटुम्पिक पुस्पों ने सर कार्य उचित रूप में करके पीछे राजा को "नच कार्य आजानुसार यथोचित हो चुका है " ऐसी खबर करदी। ( ताण ते वासुदेवपामुममा पवे रायसहस्सा सल्ल पाउ० पहाया जाय विभ्रमियो हत्यिवधवागवा सकोरट० सेयवर- चामराहिं एय गय जाव परिबुडा सचिड्डीए जाव रवण जेणेव सयवरे तेणेव उवागच्छा, उवागच्छित्ता अणुपविसति, अणुपविसित्ता पत्तेय नामकिएसु आसणेलु निसीयति, दोवइ रायवर कण्ण पडिवालेमागा २ ચેની ગઠવણ કરે ત્યા તમે વાસુદેવ પ્રમુખ દરકે દરેક રાજાના નામથી અતિ થવા આસનને આતૃત–સ્વર વસ્ત્રથી ઢાકીને, પ્રત્યાવસ્તૃત અને બીજા સ્વરછ વસ્ત્રથી ઢાકે આ બધું કામ પતાવીને તમે અમને ખબર આપે (ते वि जाय पच्चप्पिण ति) Alsa Iral मासा मामणीन ते मि કરુએ તે મુજબજ બધુ કામ પતાવી દીધું અને ત્યારપછી તમારી આજ્ઞા મુજબ કામ બધુ પતી ગયુ છે” એવી ખબર રાજાની પાસે પહોંચાડી (तएण ते वासुदेवपामुक्खा वहवे रायसहस्सा कल्ल पाउ० पहाया जा विभूसिया हत्यिखधवरगया समोरट० सेयवरचामराहिं हय गय जार परिखुडा सच्चिड्डीए जाव रवेण जेणेव सयवरे तेणेव आगच्छइ, उवागच्छिता अणुपवि - सति, अणुपतिसिचा पत्तेय नामफिएसु आसणेसु निसीयति, दोवइ रायवरकष्ण , . BRU हाताधर्मकार पवः खलु 'पद्धए' पाण्दु नामको राना 'कल'पल्य-मात. काठे स्नाती यारन् सर्वालङ्कारविभूपितो इस्तिसन्चारगत सकोरण्टमारपदाम्ना छोण प्रिय माणेन श्वेतपरचामरेरुद्धूयमानेन युक्तों हयगगस्थपदातिसमूहेन परिटत. सर्व दर्या यावत्-रपेग काम्पिल्यपुरस्य नगरम्य मध्यम येन म भूवा निर्गछति, निर्गत्य और स्पयरमण्डपो योर वासुदेवप्रमुखा बहुमानसरयका रानानम्त- वोपागच्छति, उपागत्य तेपा वासुदेवमाखाणा करतल्पग्गृिहीतदशनस चिति) दृस के बाद वे वासुदेव प्रमुग्य हजारों राजा दूसरे दिन जय रात्रि समात हो चुकी प्रातः काल हो गया-सूर्य उदित हो चुका तय स्नान यावत् समस्त अलकारों से विभूषित होकर, हाथियों पर चढे हुए प्रियमाण कोरट पुष्पों की माला से पिराजिा छत्र से युक्त होते हुए उधूयमान श्वेत वरचामरो से वीज्यमान होते हुए एव त्य, गज यारत् स्य पदाति समूह से परिवृत्त होते हुए अपनी राज विभूति के अनुमार यारत् शव पणव पटर आदि के साथ २ जरा वह स्वयवर मंडप धा-वही आये । बरा आकर वे सर उसके भीतर प्रविष्ट हुए। प्रविष्ट होकर वे प्रत्येक जन अपने २ नाम से अकिन आसनों पर पृथक २ घेठ गये और राजवर कन्या द्रौपदी की प्रतीक्षा करने लगे। (तएण से पड्डा राया कल्ल पहाण जार विभूसिए सकारट० हयगय कपिल्लपुर मजन मज्झेण निगच्छति-जेणेव मयवरमडवे जेगेर वासुदेव पातु पाया वह रायमस्मा तेणे उवागच्छइ,उवागच्छित्ता तेमि वासुदेव पटियाले माणा २ चिट्ठति) ત્યારપછી વાસુદેવ પ્રમુખ હજારે રાજાએ બીજા દિવસે જ્યારે રાત્રિ પસાર થઈ ગઈ અને સવાર થતા સૂર્ય ઉદય પામ્યું ત્યારે સ્નાન વગેરેથી પરવારીને પિતાના શરીરને બધા આભૂષણેથી શણગારીને, હાથીઓ ઉપર વાર થન, સુગ ધિત કેરટ પુષ્પોની માળાએથી શોભિત અને છ થી યુક્ત થઈ ઉત્તમ વેત ચામરેથી વીજયમાન થતા તેમજ ઘોડા, હાથી યાવતુ રથ પદાતિ સમૂહથી પરિવૃત થતા પિતાના રાજા વૈભવ અનુસાર યાવત્ શખ પાવ હ વગેરે વા. સાથે જ રાય વર મા હતો ત્યાં ગયા પ્રવિણ થયા અને પ્રવિણ થઈને તેઓ પિત પગને ઉપર બેસી ગયા અને રાજવર કન્યા नार विभूसिए विधारगए सको पामुक्खा वह रायमहम्सा तेणे ત્યાં જઈને તેઓ પિતાના ન - કોપરીની - मगार घामृतषिजी टी०१० १६ द्रौपदरितवर्णनम् शिर आरतं मरततेऽञ्जलिं कृत्ला जयेन विजयेन वर्धयित्वा कृष्णस्य वासुदेवस्य श्वेतवरचामर गृहीचा ' उपवीयमाणे ' उपवीजयन् चामराद्धृननेन सेवमान स्तिष्ठति ॥ म०२१॥ पामुग्याण करयल बद्धचित्ता परम चासुदेवरस सेयवरचामर गहाय उववीयमाणे चिट्टति) इस के बाद पार नामक राजा प्रातः काल स्नान से निपट पर और समस्त अलझारो से विभूपित होकर अपने पट्ट गजराज पर चढ कर कापिल्य पुर नगर के बीच से होते हुए उस स्थ- यवर मटप में आये। जब ये गजराज पर चढ़े हुए आरहे थे उस समय इन के ऊपर कोरट पुष्पों की माला से विरजित छत्र, छत्रधारियों ने तान रखा था। चामर ढोग्ने वाले शुभ्र चामर ढोर रहे थे। हम, गज, रथ एक पदादि समृहस्प चतुरगिणी सेना इनके माय चल रही थी। राज्सी ढाट गट से ये सुसज्जित थे। विविध राजे साथ में रजते हए- आरहे थे। मडप में आकर ये जहां वासुदेव प्रमुख हजारों राजा बैठे थे-वागये। यहा जाकर उन्होंने उन वमुदेव प्रमुच हजारो राजाओं को दोनों हाथ जोड कर बडी नम्रता के सार नमकार किया। जय विजय शब्दो द्वारा उन्हें बधाई दी। बधाई देकर फिर ये कृष्ण वासुदेव के ऊपर श्वेतचामर लेकर ढोरते हुए वहा चैठ गये ।। स० २० ॥ उवागन्छन, उपागठित्ता तेमि वासुदेवपामुक्खाण करयल०वद्धावेत्ता रण्डम्स वासुदेवम्म सेयरचामर गहाय उवगीयमाणे चिट्ठति) ત્યારપછી પાડુ નામક રાજા સવારે નાનથી પરવારીને સમસ્ત અલકા- રથી પિતાના નારીરને શણગારીને અને પિતાના મુખ્ય ગજરાજ ઉપર સવાર થઈને કાપિલ્યપુર નગરની વચ્ચેટી પસાર થઈને વય વર જ્યારે તેઓ ગજરાજ ઉપર બેસીને આવતા હતા ત્યારે કોર ટુ પુપોની માળા એથી શોભિત છત્ર છત્રધારીઓએ તાબેવુ હતુ ચામર ઢળનારાઓ ત ચામર ઢાળી રહ્યા હતા, ઘોડા, હાથી, રથ અને પદાતિ સમૂહ રૂપ ચતુરગિણી સેને તેમની સાથે સાથે ચાલી રહી હતી રાજમાં ઠાથી તેઓ અજિત હતા, અનેક જાતના વાજીએ વાગી રહ્યા હતા મડ૫માં આવીને તેઓ જ્યાં વાસુદેવ પ્રમુખ હજાર રાજાઓ બેઠેલા હતા ત્યા ગયા જતા વાસુદેવ પ્રમુખ રાજાઓ બેઠેલા હતા ત્યાં તેમની પાસે જઈને તેઓએ વાસુદેવ પ્રમુખ સર્વ રાજાઓને ખૂબ જ નમ્રપણે બંને હાથ જોડીને નમસ્કાર કર્યો ય વિજય શબ્દથી તેઓને અભિનંતિ કર્યા અભિન દિત કર્યા બાદ તેઓ કૃષ્ણ વાસુ- દેવની ઉપર શ્વેત ચામર ઢળતા ત્યાં બેસી ગયા સૂત્ર ૨૦ / મ ડ૫માં આવ્યા - २२४ हाताधर्मक्यास ततः सल 'पट्टए' पाण्टु नामको राजा ' कल 'स्व-मा.काले स्नाती यावत् सर्वालकाविभूपितो स्तिसन्चारगर सकोरण्टमाल्पदाम्ना गणज्यि माणेन श्वेतपरचामरैरुद्धूयमानेन युक्ती इयगजरथपदातिसमूहन परिटतः सर्व दर्या यात्-रग काम्पिल्यपुरस्य नगरस्य मध्यम येन म भूत्वा निर्गति, निर्गत्य योर स्परमण्डपो यो वासुदेवप्रमुखा बहुमानसरयका राजानम्त- वोपागच्छति, उपागत्य तेपा वासुगममुरसागा करतल्परिगृहीतरशनस चिट्टति ) इस के बाद वे वासुदेव प्रमुख रजारों राजा दूसरे दिन जय रात्रि समात हो चुकी प्रातः काल हो गया-सूर्य उदिन हो चुका तय स्नान यावत् समस्त अलकारो से विभूपित होकर, हाथियों पर चढे हुए प्रियमाण कोरट पुष्पों की माला से विराजिा छत्र से युक्त होते हुए उद्धृयमान श्वेत घरचामरो से चीज्यमान होते हुए एव हय, गज यावत् रथ पदाति समूह से परिवृत्त होते हुए अपनी राज विभूति के अनुमार यावत् शग्व पणव पटर आदि के साथ २ उहा वह स्त्रयवर मंडप था-वही आये। वा आकर वे सर उसके भीतर प्रविष्ट हुए। प्रविष्ट होकर ये प्रत्येक जन अपने २ नाम से अकिन आसनों पर पृथक २ वैठ गये और राजवर कन्या द्रौपदी की प्रतीक्षा करने लगे। (तएण से पडुए राया कल्ल हा जाय विभूसिए सकारट हयगय कपिल्लपुर मज्न मज्झेण निगच्छति-जेणेव मयरमडवे जेगे। वासु पानु क्खा यहवे रायमहस्सा तेणे उबागच्छइ,उवागत्तिा तेमि वासुदेव पडिवालेमाणा २ चिट्ठति) ત્યારપછી વાસુદેવ પ્રમુખ હજારે રાજાએ બીજા દિવસે જ્યારે રાત્રિ પસાર થઈ ગઈ અને સવાર થતા સૂય ઉદય પાપે ત્યારે નાન વગેરેથી પરવારીને પિતાના શરીરને બધા આભૂષણોથી શણગારીને, હાથીઓ ઉપર સવાર થઈને, સુધિત કેરટ પુન માળાએથી શોભિત અને છથી યુક્ત થઈ ઉત્તમ શ્વેત ચામથી વીજયમાન થતા તેમજ ઘેડા, હાથી યાવત્ રથ પદાતિ સમૂહથી પરિવૃત થતા પિતાના રાજન વૈભવ અનુસાર યાવત્ શખ પણુવ પરહ વગેરે વાજાઓની સાથે જમા થવર મડર હતો ત્યા ગયા ત્યાં જઈને તેઓ બધા મડપમાં પ્રવિણ થયા અને પ્રવિત થઈને તેઓ પિત પિતાના નામાંકિત જુદા જુદા ભાગને ઉપર બેસી ગયા અને રાજવર કન્યા પનીની પ્રતીક્ષા કરવા લાગ્યા (नएण से पहुए राया पल्ल हाए नाव विभूसिए हरिखधारगए सको रंट० इय गय० सयवरमडवे जेणेर वासुदेव पामुक्खा बद्दवे ।
દેવની ઉપર Aત ચામર ઢોળતા ત્યાં બેસી ગયા - अगर घमामृतपिजी री०१० २६ ट्रौपदीपरितवर्णनम् शिरसावत मस्तऽजलिं कृत्ला जयेन विजयेन वर्धयित्ग कृष्णस्य वामदेवम्य वक्तवरचामर गृहीचा उचीयमाणे ' उपवीजयन् चामराद्धननेन सेश्मान स्तिष्ठति ॥ म०२१॥ पामुरग्वाण कारयल बद्धावित्ता वरम वामदेवरस सेयवरनार गाय उववीरमाणे चिति) इस के बाद पाहु नामक राजा प्रातः काल स्नान से निघट पर और समरत अलकारो से विभूपित होकर अपने पट्ट गजराज पर चढ़ कर कांपिल्य पुर नगर के पीच से होते हुए उस स्थ- यवर मटप में आये । जर ये गजराज पर चढ़े हुए आरहे थे उस समय इन के ऊपर कोरट पुप्पों की माला से विरजित छत्र, छनधारियों ने तान रखा था। चामर ढोरने वाले शुभ्र चामर ढोर रहे थे। त्य, गज, रथ एक पदादि समूहस्प चतुरगिणी सेना इनके माय चल रही थी। राज्सी हाटगद से ये सुसज्जित थे। विविध राजे माय में रजते हा- आरहे थे। मटप में आकर ये जहा वासुदेव प्रमुग्ब हजारों राजा ठे हुए थे-वहां गये। वहा जाकर उन्होंने उन वनदेव नमुन्य हजारो राजानों को दोनों हाय जोउ र चटी नम्रता के साथ नमस्कार किया। जय विजय शब्दो द्वारा उन्हें वाई दी। वधाई देकर फिर ये कृष्णा वासुदेव के ऊपर येतचामर लेकर दोरते हए वहा बैठ गये ॥ ५० २० ॥ उवागाउद, उपागनिमत्ता तैमि रामुदेवपामुक्खाण करयल पहावेत्ता रण्डम्स वासुदेवस्म सेयरचामर गदाय उयनीयमाणे चिट्ठति) ત્યારપછી પાડુ નામક રોજ સવારે નાનથી પરવારીને સમસ્ત અલ કા- રેવી પિતાના હારીરને શણગારીને અને પિતાના મુખ્ય ગજરાજ ઉપર સવાર થઈને કાપિલ્યપુર નગરની વચ્ચેથી પસાર થઈને વયવર જ્યારે તેઓ ગજરાજ ઉપર બેસીને આવતા હતા ત્યારે કેરટ પુપની માળા એથી ભિત છત્ર દવાઓએ તાણવુ હતુ ચામર ઢળનારાએ તુ ચામરે હેળી પડ્યા હતા, ઘા, હાથી, 4 અને પદાતિ સમૂર રૂપ ચતુરગિણી બેના તેમની સાથે સાથે ચાલી રહી હતી .જમો ઠાઠથી તેઓ મુસજિત હિતા, અનેક જાતના વાજા વાગી હ્યા હતા મડપમાં આવીને તેઓ જ્યા વાસુદેવ પ્રમુખ હારે રાજાઓ બેઠેલા હતા ત્યા ગયા જ્યા વાસુદેવ પ્રમુખ ગજાએ બેઠેલા હતા ત્યાં તેમની પાસે જઈને તેઓએ વાસુદેવ પ્રમુખ સર્વ રાજાઓને ખૂબ જ નમ્રપણે બને છે ડીને નમસ્કાર કર્યો જય વિજય રાથી તેઓને અભિન દિત કર્યા અભિન દિત કર્યા બાદ તેઓ કૃષ્ણ વાસુ . મ ડ૫માં આવ્યા ॥ सूत्र २० ॥
-- beu प्रसपाह ततः सल 'पहर' पाद नामको रामा रह गय-47 साणे स्नाती यावत् रावलियाविभूपितो स्तिसन्यागत. सकारष्टमास्याम्ना नजरिय माणेन श्वेतपरचामरुध्यमानेभ युक्ता इयगगस्थपदातिसमूहन परिटतः दर्या यावत्-रण काम्पिल्यपुरस्य नगरम्य मध्यम येन म भूत्वा निर्गति, निर्गत्य यौन स्स्यारमण्डपो योर वासुदेवमाया बहुमरमसर यका राजानम्त- वोपागच्छति, उपागत्य तेषा पासुम्यममुरसाना सरतपरिगृहीत शनस चिट्ठति) इस के बाद चे वासुदेव प्रमुग्य परमारों राजा दूसरे दिन जब रात्रि समात हो चुकी प्रातः काल से गया-सूर्य उदिन थुका तय स्नान यावत् समस्त अलकारो से विभूपित होकर, हाथियों पर चढे हुग घियमाण योरट पुप्पों की माला से राितिर छत्र से युक्त होते हुए उधूयमान वेन वरचामरो से चीज्यमान रोते हुए एच हय, गज यावत् रथ पदाति समूह से परिवृत्त होते हुए अपनी राज विभूति के अनुसार यावत् शव पणव पटर आदि के साथ २ जरा वह स्यवर मडप था-वतो आये। वरा आकर वे सर उसके भीतर प्रविष्ट हुए। प्रविष्ट होकर वे प्रत्येक जन अपने २ नाम से अफिन आसनो पर पृथक २ चैठ गये और राजधर कन्या द्रौपदी की प्रतीक्षा करने लगे। (तएण से पहुए राया कल्ल हा जाय विभूसिए सकारट० हयगय फपिल्लपुर मज्न मज्झेण निगच्छति-जेणेच मयवरमडवे जेगेर वापुरेश पातु क्वा यहवे रायमहस्सा तेणेव उवागच्छह,उवागउित्ता तेसि वासुदेव पडिवालेमागा २ चिट्टति) ત્યારપછી વાસુદેવ પ્રમુખ હજાર રાજાએ બીજા દિવસે જ્યારે રાત્રિ પસાર થઈ ગઈ અને સવાર થતા સૂર્ય ઉદય પાપે ત્યારે નાન વગેરેથી પરવારીને પોતાના શરીરને બધા આભૂષણથી શણગારીને, હાથીઓ ઉપર સવાર થઈને, સુગધિત કેરટ પુની માળાએથી શેભિત અને છથી યુક્ત થઈ ઉત્તમ શ્વેત ચામરેથી વીજયમાન થતા તેમજ ઘડા, હાથી ચાવત્ રથ પદાતિ સમૂહથી પરિવૃત થતા પિતાના રાજા વૈભવ અનુસાર યાવત્ શખ પણુવ પરહ વગેરે વાજાઓની સાથે જવા ય વર મડર હતા ત્યા નવા ત્યાં જઈને તેઓ બધા મડપમાં પ્રવિણ થયા અને પ્રવિત થઈને તેઓ પિત પિતાના નામાંકિત જુદા જુદા મારા ઉપર બેસી ગયા અને રાજવર કન્યા પરીની પ્રતીક્ષા કરવા લાગ્યા (नएण से पडुए राया क्ल्ल ण्डाए नाव पिसिए हरियखधारगए सको द० इय गय० सयवरमडवे जेणेष वासुदेव पामुक्खा तेणे अनगारधर्मामृतवषिणी टी० मा ६झोपदीपर्चा वसाणि परिघाय ' जिणपटिमाण अवर्ण करेड' जिनप्रतिमाना, कामदेव प्रति- मानामर्चन क्रोति विवाहविधि निर्विन सपनार्य मिति भावः 'करिता' कृत्वा 'जेणेव अतेरे देणेव उवागार' यौवा-तापुर तत्रैवो- पागच्छति ।।सू०२६॥ द्रौपदीचर्चा यत्-" जिणपटिमाण अक्षण परेड ' इति पाठ समाश्रित्य भगवतोऽहंतः पूजन जैनधर्मानुयायिभि' पर्त यमित्याहस्तमि यात्वविलसितम् , अस्य पाठस्य चरितानुवादस्पत्वेन विधायकत्वासम्भवात् । विधियाक्य हि जिनोझाया बोधक स्वेन विधायकं भवति, यथा-भगमता विधेयतयोपदिष्ट पदविधावश्यक चतुर्विध- जिन प्रतिमा का कामदेव की प्रतिमा का निर्विन विवाह कार्य के लिये अचंन करती है अर्चन कर के फिर वह (जेणेव अते उरे लेणेच उवा- गच्छह ) जहाँ अत पुर था वहा चली गई ॥ सू० २१ ॥ द्रौपदी चर्चा जो "जिणपडिमाण अचणं करेह" इस पाठका आश्रय लेकर प्रति- मापूजन की उपयोगिता कहते हुए यह कहते हैं, कि " अहैत भगवान की प्रतिमा की पूजा जैनधर्म के पाल को को करना चाहिये" यह उनका कथन मिथ्यात्व का विलासी है। क्यो कि यह "जिनपरिमाण"" इत्यादि वाक्य चरित का ही अनुवादक है-अतः ऐसे वाक्य क्सिी मुरय अर्थ के विधायक नहीं आ करते हैं। चारितानुवाद से तो मिर्फ जिस व्यक्ति ने जो २ आचरण किया है उसका ही बोध होता है। शास्त्र विहित मार्गके निर्देशक विधिवाक्य हुआ करते है-क्यों कि कि ऐसे वाक्य जिन भगवान की आजाके विधायक होते हैं। जिस प्रकार पद પ્રતિમાનુ કામદેવની પ્રતિમાનું નિવિને વિવાહના સપન્ન થવાના હેતુથી मर्थन ३ छ, भयन ने ( जेणे अतेउरे तेणेव उवागच्छइ ) જ્યા રણવાસ છે તે તરફ જતી રહી | સૂત્ર ર૧ | દ્રિૌપદી ચર્ચા 21 "जिंणहिमाण अयण करेइ" 21 પાઠના આધારે પ્રતિમા પૂજ નની ઉપગિતા સિદ્ધ કરતા આ પ્રમાણે કહે છે કે “અહંત ભગવાનની પ્રતિમાનું પૂજન જૈનધર્મ પાલન કરનારાઓએ કરવું જોઈએ” તેમનુ આ કથન સત્યથી બહુ દૂર છે એટલે કે આ વાત સાવ અસત્યથી પૂર્ણ છે કેમકે मा "निनपहिमाण " वगैरे वा यतिना अनुवाद छे भेटमा भाटे એવા વચનો કેઈ વિશેષ અને સ્પષ્ટ કરનારા હોતા નથી ચરિતાનુવાદથી તે ફક્ત જે માટે જે તે આચરણ કર્યું છે, ફક્ત તેનુ જ જ્ઞાન થાય તેમ છે શાવિહિત માર્ગને બતાવનાર તે વિધિ ના જ થાય છે જેવી રીતે 32- . भाका मूलम्-तएण सा दोबइ रायवरकन्ना जेणेव मज्जणघरे तेणेर उवागच्छद उवागच्छित्ता बहाया कयवालिम्मा कय. कोउयमगलपायच्छित्ता सुद्धप्पाोमाइ मंगल्लाई बन्थाई पवरपरिहिया जिणपडिमाण अच्चण करेइ, करिता जेणेव अंतेउरे तेणेव उवागच्छइ ॥ सू० २१ ।। टीका-'तएण सा' इत्यादि । ततस्तदनन्तर सा द्रोपदी राजरसन्या योव मज्जनगृह तगोपागाउति, उपागत्य स्नाता क्यालिाम्मा' कृतपलि कर्मा अन्नादिपु पायसादिनाणिनां सविमागो पतिकर्म तन् त यया सा तथा कृतवाकमद्गलप्रायविता 'सुद्रप्पामाइ 'शुद्धप्रश्यानि शुदानि स्वचानि प्रवेशानि-सभाया प्रपेष्टु योग्यानि, यत्परिधानेन समाया लोकाः मष्टमन्ती त्यर्थ, मालानि-शुभानि वस्त्राणि 'पपरपरिहिय' प्ररपरिरिता-पसरविधिना प्रवरेण शोभाकारेण पिपिना परिहिता परिधान धृतरती आपत्वात् नरिक्तः, 'तरण सा दोरई रावर ' इत्यादि। टीका-(तपण ) इस के बाद (गा दोवई रावर कन्न) वह गजवर बता दौपदी (जेणे मज्जणारे) जहा स्नान घर या (तेणेच उबागच्उइ) उम ओर गई (उवागघिउत्ता पहाया कयरलिकम्मा कपकोयमगल पायच्छित्ता) बहा जासर २ उसने स्नानघर में स्नान किया, रताकर फिर उमने काफ पक्षि आदि को अन्नादि का भाग देने रूप निर्म किया कौतुक मगल प्रायश्चित्त किये। (सुदप्पावेमाइ मगल्लाइ वत्थाइ पर परिरिया) सभा में प्रवेश के योग्य ५ शुद्ध स्वच्छ मालिक वस्त्र अच्छी तरह विधि के अनुसार पहिरी हुई (जिणपडिगाण अचण करेद) तपण सा दोवईरायवरकना ' इत्यादि- टी-(तएण) य २५छी (सा दोवई रायवरकन्ना) ते २४१२ न्या द्रौपदी (जेणेव मानणरे ) नानघर तु (ठणेव उपागच्छद) त्या : (आगन्छिता पहाया कयरलिकम्मा कय कोउयमगलपायच्छि ता ) त्याने તેણે સ્નાનઘરમાં સ્નાન કર્યું સ્નાન કર્યા બાદ તેણે કાગડા વગેરે પક્ષીઓને અન વગેરેને ભાગ અપીને બલિકર્મ કર્યું કૌતુક મગળ પ્રાયશ્ચિત્ત કર્યા (सुद्धप्पावेमार मगरलाइ वत्थाइ पारपरिहिया मजणधराओ पडिनिखमइ) સભામાં પ્રશેશવા ગ્ય સ્વચ્છ માગલિક વસ્ત્રો તેવું સરસ રીતે પહેર્યા, त्या२५० ते नानघरथी मडार नीजी (जिणाडिमाण अञ्चण . - -).
. भनगारधर्मामृतवपिणी टी० अ० १६ द्रौपदीचर्चा वस्त्राणि परिधाय ' जिणपटिमाण अचणं करेड' जिनप्रतिमाना, कामदेव पति- मानामर्चन करोति विवाहविधि निर्विन सपनार्य मिति भारः 'करिता ' कृत्वा 'जेणेव अतेरे तेणेव उवाग छ?' यौवा-तापुर तत्रैवो- पागच्छति ।।सू०२६॥ द्रौपदीचर्चा यत्तु-" उिणपटिमाण अक्षण करेइ ' इति पाठ समाश्रित्य भगवतोऽहंतः पूजन जैनधर्मानुयायिभि' वर्तन्यमित्याहुम्तन्मियावविलस्तिम् , अस्य पाठस्य चरितानुवादस्पत्वेन निधायकत्वासम्भवात् । विधिवाक्य हि जिनाज्ञाया बोधक स्वेन विधायक भवति, यथा-भगवता विधेयतयोपदिष्ट पइविधावश्यक चतुर्विध- जिन प्रतिमा का कामदेव की प्रतिमा का निर्विन विवाह कार्य के लिये अर्चन करती है अर्चन कर के फिर वह (जेणेव अते उरे तेणेव उवा- गच्छद) जहाँ अत पुर था वहां चली गई ॥ सू० २१ ॥ द्रौपदी चर्चा जो "जिणपडिमाण अञ्चणं करे।" इस पाठका आश्रय लेकर प्रति- मापूजन की उपयोगिता करते हुए यह कहते हैं, कि " अरैत भगवान की प्रतिमा की पूजा जैनधर्म के पाल को को करना चाहिये" यह उनका कथन मिथ्यात्व धा विलास ही है। क्यो कि यह "जिनपडिमाण"" इत्यादि वाक्य चरित का ही अनुवादक है-अतः ऐसे वाक्य किसी मुरय अर्थ के विधायक नहीं हुआ करते हैं । चारितानुवाद से तो सिर्फ जिस व्यक्ति ने जो २ आचरण किया है उसका ही बोध होता है। शास्त्र विहित मार्गके निर्देशक विधिचाक्य हुआ करते हैं-क्यों कि कि ऐसे वाक्य जिन भगवान की आज्ञाके विधायक होते हैं। जिस प्रकार पट પ્રતિમાનુ કામદેવની પ્રતિમાનું નિવિને વિવાહ કાર્ય સંપન્ન થવાના હેતુથી मर्थन ४३ छ, अयन न ( जेणेव अ तेउरे तेणेव उवागच्छइ ) જ્યા રણવાસ છે તે તરફ જતી રહી છે સૂત્ર ૨૧ ! દ્રૌપદી ચર્ચા eals "जिणाडिमाण अचण करे" मा પાઠના આધારે પ્રતિમા પૂજ નની ઉપયોગિતા સિદ્ધ કરતા આ પ્રમાણે કહે છે કે “અહંત ભગવાનની પ્રતિમાનું પૂજન જૈનધર્મ પાલન કરનારાઓએ કરવું જોઈએ” તેમનું આ કથન સત્યથી બહુ દૂર છે એટલે કે આ વાત સાવ અસત્યથી પૂર્ણ છે કેમકે मा “ जिनपडिमाण" वगेरे वाय ચશ્નના જ અનુવાદક છે એટલા માટે એવા વચને કેઈ વિશેષ અને સ્પષ્ટ કરનારા હતા નથી ચરિતાનુવાદથી તે ફક્ત જે માણસે જે તે આચરણ કર્યું છે, ફક્ત તેનું જ જ્ઞાન થાય તેમ છે શાવિહિત માર્ગને બતાવનાર તે વિષિ વા જ થાય છે જેવી રીતે २९६ कार मूलम्-तएणं सा दोरइ रायवरकन्ना जेणेव मजणघरे तेणेव उवागच्छद उवागच्चित्ता बहाया कयवलिकम्मा कय. कोउयमंगलपायच्छित्ता सुहप्पासाइ मंगल्लाई कथाइ पवरपरिहिया जिणपटिमाण अच्चण परेइ, करित्ता जेणेध अतेउरे तेणेव उवागच्छइ ॥ सू० २१ ॥ का-'तएण सा' इत्यादि । ततस्तनन्तर सा द्रोपदी राजसन्या यौप मज्जनगृह तीयोपागन्उति, उपागत्य साना 'क्यालिसम्मा' कृत पलि का अनादिपु पायसादिप्राणिना संविभागो लिफर्म तन् कत यया सा तथा कृतवानुमङ्गलप्रायविता 'सुद्रप्पामाइ ' शुदप्रमेश्यानि शुद्धानि स्वच्छानि मवेशानि-सभाया प्रपेष्टु योग्यानि, यत्परिधानेन समाया लोकाः प्रवेष्टमन्ती त्यर्थ., मालानि-शुभानि वस्राणि 'पररपरिहिय ' प्रमापरिरिता-मपरविधिना प्रवरेण शोभाकारेण पिविना परिहिता परिपान धृतरती आपत्वात् पर्नरिक्त, 'तरण सा दोई रायवर मा' इत्यादि। टीका-(तण्ण) इस के बाद (गा दोवई रायवर कन्न) वह गजवर वया दौपदी (जेणे मज्जणारे) जहा स्नान घर था (तेणेच उबागच्छइ) उम ओर गई (उवागउित्ता ण्डाया क्यपलिकम्मा कयकोचमगल पायच्छित्ता) यहा जासर २ उसने स्नानघरमें स्नान किया, नहाकर फिर उसने काफ पक्षि आदि को अनादि का भाग देने रूप परि वार्म किया कौतुक मगल प्रायश्चित्त किये। (सुप्पावेमाइ मगलाइ यत्थाइ पर परिहिया) सभा मे प्रवेश के योग्य ५ शुद्ध स्वच्छ मागलिक वस्त्र अच्छी तरह विधि के अनुसार पहिरी हुई (जिणपडिगाण जयण करेइ) तपण सा दोवईरायवरकना ' इत्यादि- टी-(तएण) य २५ठी (सा दोवई रायवर कन्ना) ते २।४१२ न्या द्रोपही (जेणेव मानणरे) oril नान५२ तु (ठणेव उनागइ) त्याम (उबागच्छिता पहाया कयरनिकम्मा कय कोउयमगलपायच्छिता ) त्या भने તેણે નાનઘરમાં નાન કર્યું અનાન કર્યા બાદ તેણે કાગડા વગે” પક્ષીઓને અન વગેરેને ભાગ અપને બલિકર્મ કર્યું –કૌતુક આગળ પ્રાયશ્ચિત્ત કર્યા (सुद्धप्यावेमाइ मगल्लाइ बत्थाइ पारपरिहिया मजणधराओ पडिनिय समइ) સભામાં પ્રશેશવા યોગ્ય સ્વચ્છ માગતિક વસ્ત્રો તે સરસ રીતે પહેયી, सा२५० ते नानघरथी मा२ नगी (जिणाडिमाण अच्चण करेइ) ७२ .
भनगारधर्मामृतपिणी टीका अ० १६ द्रौपदीचर्चा चारितानुवादवचनस्य विधायकत्वाङ्गीकारे सूर्याभदेवचरिते शस्त्रादिवस्तू- नामर्चनस्य श्रूयमाणतया तन्मते तदपि विधेय स्यात् । द्रौपद्यऽपि तत्र सलु प्रतिमाया भगतोऽहंत. पूजन न कृतम् , जैनप्रवचने प्रतिमापूजनस्य विधानाभावात् , प्रतिमापूजनस्य पट्कायजीवहिंसासा-यतया जैन धर्मत्वाभावाच । तथाहि-प्रतिमापूजाऽङ्गीकारे तदर्थ पटकाहिंसाऽवश्यभाविनी, एव च जाता है कि वह उन्हीं में चित्त लगाकर और मन को तन्मय करके इसे उभय काल में अवश्य करें। चरित के अनुवादक कथन करने वोले-वास्य को यदि विवेय रूप से स्वीकार किया जाय तो सूर्याभदेवके चरित में सड़्गादि शस्त्र आदि वस्तुओं की भी पूजा सुनी जाती है-अन' उनमें भी पूज्यता आजानी चाहिये और इस प्रकार से पूजन के पक्षपातियों को उनका पूजन भी विधेय कोटि मे मानलेना चाहिये। द्रौपदी ने भी वा प्रतिमा मे जो भगवान अर्हत की पूजन नहीं को उसका कारण यह है कि एक तो जैन प्रवचन मे प्रतिमा पूजन के विधान का अभाव है और दूसरे-यह प्रतिमा पूजन पट् काय के जीवों की विराधना द्वारा साध्य होती है, इसलिये इस प्रतिमा पूजन मे जिने- न्द्र द्वारा प्रतिपादित-धर्म आत्मकल्यणसोधकरूप सम्यग्दर्शनादिक का अभाव है । पट काय के जीवों की विराधना से जो साध्य हुआ करता है वहा सच्चे धर्म के दर्शन तक भी दुर्लभ हैं अतः प्रतिमा पूजन ન હેય તેની એ ફરજ થઈ પડે છે કે તે તેઓમાં જ પિતાનું ચિત્ત પરેવીને મનને તલ્લીન કરીને તેને બને કાળમા અવશ્ય આચરે ચરિતને અનુવાદક રૂપે બતાવનાર વાકયને જે વિધેય રૂપમાં સ્વીકારવામાં આવે તે સૂર્યાભદેવના ચરિતમાં શસ્ત્ર વગેરે વસ્તુઓની પણ પૂજાની વાત સાભળવામાં આવે છે એથી તેમનામાં પણ પૂજ્યતા આવી જવી જોઈએ અને આ રીતે પૂજનના પક્ષપાતીઓએ તેમની પૂજા પણ વિધેયના રૂપમાં માન્ય કરવી જોઈએ દ્રૌપદીએ પણ ત્યા પ્રતિમામા ભગવાન અહંતનુ પૂજન કર્યું નથી તેનું કારણ એ છે કે પ્રથમ તે જૈન પ્રવચનમાં પ્રતિમા-પૂજનનુ વિધાન નથી અને બીજી આ પ્રતિમા પૂજન ષકાયના જીવોની વિરાધનો દ્વારા સંપન્ન હેય છે, તેથી આ પ્રતિમા પૂજનમા જીતેન્દ્ર વડે પ્રતિપાદિત ધર્મ-આત્મકલ્યાણ સાપક રૂપ સભ્યદર્શન વગેરેને અભાવ છે પકાયના જાની વિરાધનાથી ---- MAIN सघस्प कर्तव्य भवति । तथा चोक्तम्-समणेण सापण्ण य अस्सकायव्यय हवद जम्हा। अतो अहोनिसस्स य, तम्हा आरम्मय नाम ॥ १॥ इति (अनुयोगद्वा०) छाया-श्रमणेन श्रापकेण च आश्यकव्यक भाति यस्मात् । अन्तेऽहनिशस्य च तस्माद् आवश्यक नाम ।। १॥ ज इम समणे वा समणी पा सारए पा सारिया गा। तचित्ते तम्मणे जाप उभओकाल छविह आपस्सय करेंति (अनु०) छाया-यदिद श्रमणो या श्रमणी वा बारको गाथापिका पा। तञ्चित्तः तन्मना यानद् उभयकाल पइविधमाश्श्यक नाम ।। २ ।। आवश्यक कार्यों को प्रतिपादन करने वाले वाक्य जिन प्रभु की आज्ञा के निर्देशक होने से साधु साध्वी श्रावक श्राचिकारूप चतुर्विध संघ को उपादेय माने जाते हैं । शास्त्र में भी यही पात कही गई है समणे ण सापण्ण य' इत्यादि शास्त्र विहित पटू आवश्यक कर्तव्य चतुर्विध श्रीसघ को रात्री एव दिनके अतिम भागमें अवश्य करन चोहिये। उनके किये बिना मुनि का मुनिपन नहीं और श्रावकका आवकपन नही । अत पटू आवश्यक कार्य अवश्य करने योग्य होनेसे आवश्यक रूप से प्रतिपादित हुए हैं। ज इम समणे वा समणी वा सोचए वा साविया वा तच्चित्ते तम्मणे वा जाव उभओ काल" इत्यादि। इसलिये जब ये आवश्यक हैं तब चाहे साधु हो या साध्वी हो श्रावक हो यो आविका हो कोई भी क्यो न हो उसका यह कर्तव्य हो છ આવશ્યક કાર્યોના પ્રતિપાદન કરનારા વાક્યો જીન પ્રભુની આજ્ઞાના નિર્દે- શક હેવાને કારણે સાધુ સાદેવી શ્રાવક શ્રાવિકા રૂપ ચતુર્વિધ સંઘના માટે યોગ્ય ગણાય છે. શાસ્ત્રમાં પણ આ પ્રમાણે કહેવામા આવ્યુ છે – " समणेण सावएण य ' त्यादि શાસ્ત્રવિહિત છ પ્રકારના આવશ્યક કર્તવ્ય ચતુર્વિધ સઘને રાત્રિ તેમજ દિવ સના અતિમ ભાગમાં ચક્કસ પણે આચરવા જોઈએ તેના આચરણ વગર મુનિનુ મુનિપણું નથી અને શ્રાવકનું શ્રાવકપણું નથી એટલા માટે છ આવશ્યક કાર્ય ઍક્કસ કરવા ગ્ય હોવાથી આવક રૂપથી પ્રતિપાદિત કરવામાં આવ્યા છે ज इम समणे वा समणी वा सावए वा साविया वा तचित्ते तम्मणे जाव उभओ काल इत्यादि-भा प्रभारी न्यारे ते 'मावश्य', त्यारे नवे સાધુ હોય કે સાધ્વી છે તેમજ શ્રાવક હોય કે શ્રાવિકા હોય ज भ .
. करें। नगारधर्मामृतपिणी टीका २० १६ द्रौपदीचर्चा चारितानुवादवचनस्य विधायस्वागीकारे सूर्याभदेवचरिते शस्त्रांदिवस्तू- नामर्चनस्य श्रूयमाणतया तन्मते तदपि विवय ग्यात् । द्रौपद्यपि तत्र सलु प्रतिमाया भगतोऽईत. पूजन न कृतम् , जैनप्रवचने प्रतिमापूजनस्य विधानाभावात् , प्रतिमापूजनस्य पट्कायजीवहिंसासा-यतया जैन धर्मत्त्वाभावाच । तथाहि-प्रतिमापूजाऽङ्गीकारे तदर्थ षट्कायहिंसाऽवश्यभाविनी, एव च जाता है कि वह उन्हीं में चित्त लगाकर और मन को तन्मय करके इसे उभय काल में अवश्य चरित के अनुवादक कथन करने वोले-वास्य को यदि विधेय रूप से स्वीकार किया जाय तो सूर्याभटवके चरित में सद्गादि शस्त्र आदि वस्तुओ की भी पूजा सुनी जाती है-अतः उनमें भी पूज्यता आजानी चाहिये और इस प्रकार से पूजन के पक्षपातियों को उनका पूजन भी विधेय कोटि मे मानलेना चाहिये । द्रौपदी ने भी वहा प्रतिमा मे जो भगवान अर्हत की पूजन नहीं को उसका कारण यह है कि एक तो जैन प्रवचन में प्रतिमा पूजन के विधान का अभाव है और दूसरे-यह प्रतिमा पूजन षट् काय के जीवों की विराधना द्वारा साध्य होती है, इसलिये इस प्रतिमा पूजन मे जिने- न्द्र द्वारा प्रतिपादित-धर्म आत्मकल्यणसोधकरूप सम्यग्दर्शनादिक का अभाव है । पटू काय के जीवों की विराधना से जो साध्य हुआ करता है वहा सच्चे धर्म के दर्शन तक भी दुर्लभ हैं अतः प्रतिमा पूजन ન હોય તેની એ ફરજ થઈ પડે છે કે તે તેઓમાં જ પિતાનું ચિત્ત પરેવીને મનને તલ્લીન કરીને તેને અને કાળમા અવશ્ય આચરે ચરિતને અનુવાદક રૂપે બતાવનાર વાકયને જે વિધેય રૂપમાં સ્વીકારવામા આવે તે સૂર્યાભદેવના ચરિતમા શસ્ત્ર વગેરે વસ્તુઓની પણ પૂજાની વાત ભાભળવામાં આવે છે એથી તેમનામાં પણ પૂજ્યતા આવી જવી જોઈએ અને આ રીતે પૂજનના પક્ષપાતીઓએ તેમની પૂજા પણ વિધેયના રૂપમાં માન્ય કરવી જોઈએ દ્રૌપદીએ પણ ત્યા પ્રતિમામાં ભગવાન અહંતનુ પૂજન કર્યું નથી તેનું કારણ એ છે કે પ્રથમ તે જૈન પ્રવચનમાં પ્રતિમાપૂજનનુ વિધાન નથી અને બીજુ આ પ્રતિમા પૂજન પકાયના જીની વિરાધનો દ્વારા સંપન્ન હેય છે, તેથી આ પ્રતિમા પૂજનમાં જીનેન્દ્ર વડે પ્રતિપાદિત ધર્મ-આત્મકલ્યાણ પક રૂપ સભ્ય દર્શન વગેરેને અભાવ છે પકાયના જીની વિરાધનાથી " पाताचा सघस्य कर्तव्य भवति । तथा चोक्तम्-समणेण सावएण य भास्सकायव्यय पद जम्हा। अतो अहोनिसरस य, तम्हा आवम्सय नाम ॥ १ ॥ इति (अनुयोगद्वा०) छाया-श्रमणेन श्रावकेण च अवश्यकर्त्तव्यक भाति यस्मात् । अन्तेऽदनिशस्य च तस्माद आवश्यक नाम ।।१॥ ज इम समणे या समणी पा सारए पा सापिया पा। तच्चित्ते तम्मणे जाव उभओकाल छबिह आरम्सय करेंति (अनु०) छाया-यदिद श्रमणो वा श्रमणी वा आरको पा श्राविका पा। तचित्तः तन्मना यापद् उभयकाल पइविधमावश्यक नाम ॥२॥ आवश्यक कार्यों को प्रतिपादन करने वाले वाक्य जिन प्रभु की आज्ञा के निर्देशक होने से साधु साध्वी श्रावक श्राविकारूप चतुर्विध संघ को उपादेय माने जाते हैं । शास्त्र में भी यही बात की गई है समणे ण सापण्ण य' इत्यादि शास्त्र विहित पटू आवश्यक कर्तव्य चतुर्विध श्रीसंघ को रात्री एव दिनके अतिम भागमे अवश्य करना चाहिये। उनके किये विना मुनि 'का मुनिपन नही और श्रावकका आवकपन नहीं । अत पटू आवश्यक कार्य अवश्य करने योग्य होनेसे आवश्यक रूप से प्रतिपादित हुए हैं। ज इम समणे वा समणी या सोवर वा साविया वा तच्चित्ते तम्मणे वा जाव उभओ काल" इत्यादि। इसलिये जब ये आवश्यक हैं तय चाहे साधु हो या साध्वी हो श्रावक हो यो श्राविका हो कोई भी क्यो न हो उसका यह कर्तव्य हो છ આવશ્યક કાર્યોના પ્રતિપાદન કરનારા વા જીન પ્રભુની આજ્ઞાના નિર્દે- શક હેવાને કારણે સાધુ સાધ્વી શ્રાવક શ્રાવિકા રૂપ ચતુર્વિધ સંઘના માટે રોગ્ય ગણાય છે. શાસ્ત્રમાં પણ આ પ્રમાણે કહેવામા આવ્યુ છે – "समणेण सावएण य ' त्यहि શાસ્ત્રવિહિત છ પ્રકારના આવશ્યક કર્તવ્ય ચતુર્વિધ સઘને રાત્રિ તેમજ દિવ સના અતિમ ભાગમાં ચોક્કસ પણે આચરવા જોઈએ તેના આચરણ વગર મુનિનું મુનિ પણ નથી અને શ્રાવકનું શ્રાવપણું નથી એટલા માટે છ આવશ્યક કાર્ય ચેકકસ કરવા લાગ્યા હોવાથી આવશ્યક રૂપથી પ્રતિપાદિત કરવામા આવ્યા છે ज इम समणे वा समणी वा सावए वा साविया वा तचित्ते तम्मणे जाव उमओ काल इत्यादि –આ પ્રમાણે જ્યારે તેઓ “આવશ્યક છે, ત્યારે ભલે સાધુ કેય કે સાવી હોય તેમજ શ્રાવક હોય કે શ્રાવિકા હોય, " " भनगारधर्मामृतपिणी टीका २० १६ द्रौपदीचर्चा चारितानुवादवचनस्य विधायकत्वाद्गीकारे सूर्याभदेवचरिते शस्त्रादिवस्तू- नामर्चनस्य श्रूयमाणतया तन्मते तदपि निवेय स्यात् । द्रौपद्यपि तत्र सलु प्रतिमाया भगतोऽईत. पूजन न कृतम् , जैनप्रवचने प्रतिमापूजनस्य विधानाभावात् , प्रतिमापूजनस्य पट्कायजीवहिंसासा-यतया जैन धमत्त्वाभावाच । तथाहि-प्रतिमापूजाऽङ्गीकारे तदर्थ पट्कायहिंसाऽवश्यभाविनी, एव च जाता है कि वह उन्हीं मे चित्त लगाकर और मन को तन्मय करके इसे उभय काल में अवश्य करें। चरित के अनुवादक कथन करने वोले-वाक्य को यदि विधेय रूप से स्वीकार किया जाय तो सूर्याभदेवके चरित में सड्गादि शस्त्र आदि वस्तुओ की भी पूजा सुनी जाती है-अत' उनमें भी पूज्यता आजानी चाहिये और इस प्रकार से पूजन के पक्षपातियों को उनका पूजन भी विधेय कोटि मे मानलेना चाहिये। द्रौपदी ने भी वहा प्रतिमा मे जो भगवान अर्हत की पूजन नहीं को उसका कारण यह है कि एक तो जैन प्रवचन में प्रतिमा पूजन के विधान का अभाव है और दूसरे-यह प्रतिमा पूजन षट् काय के जीवो की विराधना द्वारा साध्य होती है, इसलिये इस प्रतिमा पूजन मे जिने- न्द्र द्वारा प्रतिपादित-धर्म आत्मकल्यणसोधकरूप सम्यग्दर्शनादिक का अभाव है। पटू काय के जीवों की विराधना से जो साध्य हुआ करता है वहा सच्चे धर्म के दर्शन तक भी दुर्लभ हैं अतः प्रतिमा पूजन ન હેય તેની એ ફરજ થઈ પડે છે કે તે તેમાં જ પિતાનું ચિત્ત પરોવીને મનને તલ્લીન કરીને તેને બને કાળમાં અવશ્ય આચરે ચરિતને અનુવાદક રૂપે બતાવનાર વાકયને જે વિધેય રૂપમાં સ્વીકારવામાં આવે તો સુભદેવના ચરિતમાં શસ્ત્ર વગેરે વસ્તુઓની પણ પૂજાની વાત સાભળવામાં આવે છે એથી તેમનામાં પણ પૂજ્યતા આવી જવી જોઈએ અને આ રીતે પૂજનના પક્ષપાતીઓએ તેમની પૂજા પણ વિધેયના રૂપમાં માન્ય કરવી જોઈએ દ્રૌપદીએ પણ ત્યા પ્રતિમામાં ભગવાન અહંતનુ પૂજન કર્યું નથી તેનું કાર એ છે કે પ્રથમ તે જૈન પ્રવચનમા પ્રતિમા–પૂજનનુ વિધાન નથી અને બીજું આ પ્રતિમા પૂજન કાયના જીની વિરાધના દ્વારા સંપન્ન હેય છે, તેથી આ પ્રતિમા પૂજનમા જીતેન્દ્ર વડે પ્રતિપાદિત ધર્મ-આત્મકલ્યાણ અધક રૂપ સમ્યગુ-દર્શન વગેરેને અભાવ છે પકાયના જાની વિરાધનાથી पातामा पाणातिपातचिरमणप्रतिना मुनीना भविमापूनोपरेशे स्वधर्मस्य मंत्रोच्छेद स्या देव । अत एप-जिनमणीतागमे प्रतिमापूजायारिधिपलभ्यते । मतिमास्थापनार्थ अगीकार करने में उस पूजन के समय में पद काय के जीवों की विरा- धना जय अवश्यभावी है तय भला! हम इसे विधेय मार्ग कैसे मान सकते हैं, और कैसे यह स्वीकार किया जा सकता है कि इस पूजन का का सच्चे धर्म का उपामक है तथा प्रतिमापूजन को धर्म माना जावे तो एक बड़ा भारी दोप यह भी आकर उपस्थित होता है कि सर्व प्रकार के हिंसादिक पापों से सर्वथा विरक्त महाव्रती मुनिजन जय इस प्रतिमापूजनरूप धर्म का उपदेश करेंगे तब वे भी कारितादिरूप कराने आदि रूप से इसके कर्ता होने के कारण अपने मुनिधर्म के मूलतः ही विध्वसक माने जायेगे। मुनिजन हिंसादिक सायन्य व्यापारों के कृत, कारित एव अनुमोदना इन तीन करण एव तीन योग से त्यागी हुआ करते हैं। जब ये प्रतिमापूजन रूप धर्म का गृहस्थो के लिये व्याख्यान देंगे तब उनके व्याख्यान से प्रेरित हो गृहस्थ जन उस ओर अपनी प्रवृत्ति चालू करने वाले होंगे, और उस प्रकार के उनके व्यवहार से इस कार्य में पट्काय के जीवों की विराधना होने से उस विराधना જે સાર્થ થાય છે તેમાં તે સાચા ધર્મના દર્શન સુદ્ધા દુર્લભ છે એટલા માટે પ્રતિમા--પૂજન સ્વીકારવામાં તે પૂજન કરતી વખતે પટકાયના જીવોની વિરાધના જ્યારે ચોક્કસપણે થવાની છે ત્યારે અમે તેને વિધેય માર્ગ કયા આધારે માન્ય કરીએ અને એની સાથે સાથે અમે એ પણ કેવી રીતે સ્વીકાર કરીએ કે આ જાતનું પૂજન કરનાર સાચા ધર્મને ઉપાસક છે? જે પ્રતિમા પૂજનને ધર્મ રૂપે સ્વીકારીએ તે એમાં એક ભારે દેવ એ છે કે સર્વ પ્રકા ૨ના હિંસા વગેરે પાપોથી સવથા વિરક્ત મહાવતી મુનિજને જ્યારે આ પ્રતિમા પૂજન રૂપ ધર્મને ઉપદેશ આપશે ત્યારે તેઓ પણ કારિતાદિ રૂપ કરાવવા વગેરે રૂપથી એના કર્તા રૂપે હવા બદલ પિતાના મુનિ ધર્મના મૂલત વિદવ સક ગણશે મુનિજને હિંસા વગેરે સાવધ વ્યાપાના કૃત, રિત અને અનુદના આ ત્રણ કરણ અને ત્રણ ભેગના ત્યાગી હોય છે જ્યારે તેઓ પ્રતિમા–પૂજન રૂપ ધર્મનુ ગૃહસ્થાને માટે વ્યાખ્યાન આપશે ત્યારે તેમના વ્યાખ્યાનથી પ્રેરાઈને ગૃહસ્થ તે પ્રમાણે આચરશે જ અને આ જાતના તેમના આચરણેથી આ કામમાં થાય છની વિરાધના હેવાથી તે વિરાધનાને કરાવનારા આ ઉપદેશક મુનિએ જ ગણાશે ત્યારે એમના અહિંસા વગેરે મહા બતે વિગ અને ત્રિકરણ વિશુદ્ધ રૂપે કેવી રીતે રહી શકશે ? એથી ધર્મ લાભને ઈચ્છતાં પણ તેઓ આ જાતને વિચારોની ભૂલમાં જ , अंगारधर्मामुपविगी टीका ०१६ द्रौपदीयचो ३०१ देवायतनमतिमाऽऽरामकृपादिकरणे तदुपदेशदाने च पृथिवी कायहिंसाया जब- श्यम्भावः । देवयतनादिकरणे पूजाङ्गतयास्नान प्रतिमास्नपनास्त्रक्षालनाटिक- रणे च तदुपदेशदाने चाप्कायनिरापनमपि, तथा-पूजागधूपदीपारानिकसम्पा- दन चाग्निमायविराधनया गिना न सभवति, वायुकायहिंसन तु धूपदीपारात्रिका के कराने वाले ये उपदेशक मुनिजन माने जायेगे-तब इनके अहिंसादि महावत त्रियोग और त्रिकरण विशुद्ध कैसे रह सकेंगे? अतः लाभ की चाहना में इन विचारों की भृल में ही बडी भारी भूल शेने से ये अपने धर्म के सच्चे आराधक नही माने जा सकेगे। इसलिये यह पात अवश्य माननी चाहिये कि जिन प्रणीत आगम में प्रतिमापूजन की विधि नही पाई जाती है। इसी प्रकार प्रतिमा स्थापन, प्रतिमा प्रतिष्ठा करवाना, मदिर वगैरह पनवाना एव उस प्रतिमा की पूजा निमित्त बगीचा तथा कुआ आदि का करवाना ये बाते पृथिवी कायिक जीवों की हिंसा के कारण हैं अतः त्याज्य है। इनके बनवाने आदि का जो उपदेश करते है वे भी पृथिवी कायिक जीवों की हिंसा से मुक्त नहीं हो सकते हैं। इसी प्रकार पूजन का अग रोने से स्नान, प्रतिमा के अभिपेक तथा पूजन के वस्त्रों के धोने साफ करने मे और उसके उपदेश देने में अप्काय के जीवो की विराधना होती है, यूपखेना, दीपक जलाना, आरती उतारना ये सब बातें अग्निकायिक जीवों की विराधना के विना नहीं हो सकती है अर्थात् इनमें अग्निकायिक जीवो की विराधना अवश्यभाविनी है । બેસશે અને તેઓ પિતાના ધર્મના સાચા આરાધક ગણાશે નહિ એટલા માટે આ વાત ચોક્કસપણે માની જ લેવી જોઈએ કે “જીને પ્રણીત પ્રતિમા–પૂજનની વિધિ મળતી નથી આ પ્રમાણે પ્રતિમા સ્થાપન, પ્રતિમા–પ્રતિષ્ઠા કરાવવી, મદિર વગેરે બનાવવા અને તે પ્રતિમાની પૂજા માટે ઉદ્યાન તેમજ વાવ વગેરે તૈિયાર કરાવવા એ પૃથ્વિ-કાયિક જીવની હિંસાના કારણ છે-એટલા માટે ત્યાજ્ય છે તેને બનાવવા માટે જે લેકે ઉપદેશ આપે છે તેઓ પણ પૃથ્વિ-કાયિક જીવેની હિંસાથી મુક્ત થઈ શક્તા નથી આ રીતે જ પૂજનને માટે સ્નાન, પ્રતિમાનો અભિષેક તેમજ પૂજનના વસ્ત્રોને જોવામાં અને તેના ઉપદેશમાં પણ અપકાયને જેની વિરાધને હેય છે ધૂપ કર, દીપક કરે, આરતી ઉતારવી આ બધી વિધિઓ અગ્નિ-નાયિક જીવની વિરાધના વગર સભવી રાકે તેમ નથી એટલે કે તેમાં અગ્નિકાયિક જીની વિરાધના ચક્કસપણે આાગમમાં . १०० भातायात प्राणातिपातविरमणप्रतिना मुनीना मतिमापूनोपदेशे स्वधर्मस्य मूलोच्छेद स्या देव । अत एप-जिनमणीतागमे मतिमापूजायारिधि पलभ्यते । प्रतिमास्थापनार्थ भगीकार करने में उस पूजन के समय में पद फाय के जीवों की विरा धना जय अवश्यभावी है तप भला। हम इसे विधेय मार्ग कैसे मान सकते हैं, और फैसे यह स्वीकार किया जा सकता है कि इस पूजन का कर्त्ता सच्चे धर्म का उपामक है तथा प्रतिमापूजन को धर्म माना जावे तो एक बड़ा भारी दोप यह भी आकर उपस्थित होता है कि सर्व प्रकार के हिंसादिक पापों से सर्वधा विरक्त महावती मुनिजन जय इस प्रतिमापूजनरूप धर्म का उपदेश करेंगे तर वे भी कारितादिरूप कराने आदि रूप से इसके कर्ता होने के कारण अपने मुनिधर्म के मूलत. ही विध्वसक माने जायेगे। मुनिजन हिंसादिक सावध व्यापारों के कृत, कारित एव अनुमोदना इन तीन करण एव तीन योग से त्यागी हुआ करते हैं। जय ये प्रतिमापूजन रूप धर्म का गृहस्थो के लिये व्याख्यान देंगे तब उनके व्याख्यान से प्रेरित हो गृहस्थ जन उस ओर अपनी प्रवृत्ति चालू करने वाले होंगें, और उस प्रकार के उनके व्यवहार से इस कार्य में पट्काय के जीवों की विराधना होने से उस विराधना જે સાધ્ય થાય છે તેમાં તે સાચા ધર્મના દર્શન સુદ્ધા દુર્લભ છે એટલા માટે પ્રતિમાપૂજન સ્વીકારવામાં તે પૂજન કરતી વખતે પકાયના જીવોની વિરાધના જવારે ચક્કસપણે થવાની છે ત્યારે અમે તેને વિધેય માર્ગ કયા આધારે માન્ય કરીએ અને એની સાથે સાથે અમે એ પણ કેવી રીતે સ્વીકાર કરીએ કે આ જાતનું પૂજન કરનાર સાચા ધર્મને ઉપાસક છે? જે પ્રતિમા પૂજનને ધર્મ રૂપે સ્વીકારીએ તે એમાં એક ભાર દેશ એ છે કે સર્વ પ્રકા ૨ના હિંસા વગેરે પાપથી સર્વથા વિરક્ત મહાવ્રતી મુનિજને જ્યારે આ પ્રતિમા પૂજન રૂપ ધર્મને ઉપદેશ આપશે ત્યારે તેઓ પણ કારિતાદિ રૂપ કરાવવા વગેરે રૂપથી એના કર્તા રૂપે હવા બદલ પિતાના મુનિ ધર્મના મૂલત વિશ્વ સક ગણાશે મુનિજને હિંસા વગેરે સાવધ વ્યાપારના કુત, કારિત અને અનુમોદના આ ત્રણ કરવું અને ત્રણ ભેગના ત્યાગી હોય છે જ્યારે તેઓ પ્રતિમાપૂજન રૂપ ધર્મનું રહસ્થને માટે વ્યાખ્યાન આપશે ત્યારે તેમના વ્યાખ્યાનથી પ્રેરાઈને ગૃહસ્થ તે પ્રમાણે આચરશે જ અને આ જાતના તેમના આચરણથી આ કામમાં મૂકાય જીવોની વિરાધના હેવાથી તે વિરાધનાને કરાવનાર આ ઉપદેશક મુનિએ જ ગણાશે ત્યારે એમના અહિંસા વગેરે મહા તે ત્રિગ અને ત્રિકરણ વિશુદ્ધ રૂપે કેવી રીતે રહી શકશે એથી ધર્મ લાભને ઈચ્છતા પણ તેઓ આ જાતના વિચારોની ભૂલમાં જ :
. , विगी टीका २०१६ द्रौपदीचची ३०१ देवायतनमतिमाऽऽरामकृपादिकरणे तदुपदेशदाने च पृथिवीकायहिंसाया अव- श्यम्भावः । देवयतनादिकरणे पूजाङ्गतयास्नान प्रतिमास्नपनरस्त्रक्षालनाटिक- रणे च तदुपदेशदाने चाप्कायपिरावनमपि, तथा-पूजाग यूपदीपारानिकसम्पा- दन चाग्निकायविराधनया विना न सभवति, वायुकायसिन तु धूपदीपारात्रिका के कराने वाले ये उपदेशक मुनिजन माने जायेगे-तब इनके अहिंसादि महाबत त्रियोग और त्रिकरण विशुद्ध कैसे रह सकेंगे? अतः लाभ की चाहना मे इन विचारों की भूल में ही बडी भारी भूल रोने से ये अपने धर्म के सच्चे आराधक नहीं माने जा सकेगे। इसलिये यह यात अवश्य माननी चाहिये कि जिन प्रणीत आगम में प्रतिमापूजन की विधि नहीं पाई जाती है। इसी प्रकार प्रतिमा स्थापन, प्रतिमा प्रतिष्ठा करवाना, मदिर वगैरह बनवाना एव उस प्रतिमा की पूजा निमित्त वगीचा तथा कुआ आदि का करवाना ये याते पृथिवी कायिक जीवों की हिंसा के कारण हैं अतः त्याज्य है। इनके बनवाने आदि का जो उपदेश करते है वे भी पृथिवीकायिक जीवों की हिंसा से मुक्त नहीं हो सकते है। इसी प्रकार पूजन का अग रोने से स्नान, प्रतिमा के अभिपेक तथा पूजन के वस्त्रों के धोने साफ करने मे और उसके उपदेश देने में अप्काय के जीवो की विरावना होती है, धृपखेना, दीपक जलाना, आरती उतारना ये सब बातें अग्निकायिक जीवों की विराधना के विना नहीं हो सकती है अर्थात् इनमें अग्निकायिक जीवो की विराधना अवश्यभाविनी है। બેસશે અને તેઓ પિતાના ધર્મના સાચા આરાધક ગણાશે નહિ એટલા માટે આ વાત ચોક્કસપણે માની જ લેવી જોઈએ કે જન પ્રણેતા પ્રતિમા–પૂજનની વિધિ મળતી નથી આ પ્રમાણે પ્રતિમા–સ્થાપન, પ્રતિમા–પ્રતિષ્ઠા કરાવવી, મદિર વગેરે બનાવવા અને તે પ્રતિમાની પૂજા માટે ઉદ્યાન તેમજ વાવ વગેરે તૈિયાર કરાવવા એ પૃથ્વિ-કાયિક જીવોની હિંસાના કારણ છે–એટલા માટે ત્યાજય છે તેને બનાવવા માટે જે લોકે ૫દેશ આપે છે તેઓ પણ પૃશ્વિ-કાયિક જીની હિંસાથી મુક્ત થઈ શક્તા નથી આ રીતે જ પૂજનને માટે સ્નાન, પ્રતિમાને અભિષેક તેમજ પૂજનના વસ્ત્રોને જોવામાં અને તેના ઉપદેશમાં પણ અપૂકાયના જીવોની વિરાધના હોય છે ધૂપ કર, દીપક કરવો, આરતી ઉતારવી આ બધી વિધિઓ અગ્નિ-કાયિક જીવેની વિરાધના વગર સ ભવી શકે તેમ નથી એટલે કે તેમાં અગ્નિ-કાયિક જીવોની વિરાધના ચેકસપણે . , આગમમાં पोताधकथा दिभिश्चामरादिवाननैत्यगीतवादित्रैश्च सविशद माति, वनस्पतिशायपिरायन च मतिमापूनानिमित्त केऽनन्तकायकोमलपिविधफल पुपपनसपदे निपत भाति । पृथि- चीकायाद्याश्रिता बहुविधनिरपगधहीनदीनदुलप्रकृतिमीसगोपिशरीरा द्वीन्हि. यादि पञ्चन्द्रियान्तास्त्रमा जीया अपि छेदाभेदनस्वाभगनिनाराजनितानन्ताव स्तीनतरवेदनामुपलभ्येतस्ततः स्खलितपतिता म्रिपन्ते । धूपकेधु आ से, दीप तथा आरती की ज्योति से घमर आदि के ढोरने से, नृत्य करने से, गीत गाते समय मुस से निकले हुए गर्म चायु से, एव वाजों के पजाने से वायुकायिक जीवों की विरावना होती हुई स्पष्ट मालूम देती है। वनस्पति कायिक जीवों की विराधना भी उस समय इस प्रकार से होती है, कि-मूर्ति पूजन के लिये उसके पूजक अनन्त कायिक ऐसे कोमल अनेक प्रकार के फल, पुष्प और पत्रों का सग्रह जो करता है इस प्रकार इस पूजन में पटकायिक जीवों को हिंसा का आरभ स्पष्ट देखा जाता है । तथा उस कायिक जीवों का भी इसके निमित्तहनन होता है और वह इस प्रकार से-कि जर पृथिवीकायि कादि जीवों का आरभ प्रतिमा आदि के निर्माण में या देव आयतन (मन्दिर) आदि के कराने में किया जाता है तो उस समय उसके आश्रित जो पहुत से अनेक जाति के निरपराधी, हीन, दीन, दुर्यल, प्रकृति से भयशील तथा सगोपित शरीरवाले ऐसे द्वीन्द्रियादिकसे लेकर पचेन्द्रिय तक जितने भी उस जीव रहते हैं वे सय के सर छेदन, भेदन, एव स्वाश्रय के विनाश जनित अनत दुःखों से सतप्त होकर થવાની જ છે ધૂપના ધૂમાડાથી દીપક અને આરતીની જ્યોતથી ચમર વગેરેને ઢાળવાથી તેમજ વાજાઓ વગાડવાથી વાયુકાયિક જીવોની વિરાધના થાય છે તેની દરેકને સ્પષ્ટ પ્રતીતિ થતી જ રહે છે વનસ્પતિ-કાયિક જીની વિરા થના પણ તે વખતે આ પ્રમાણે થાય છે કે મૂર્તિ-પૂજન માટે પૂજા કરનારાઓ અનત-કાયિક એવા કેમળ ઘણું જાતના ફળે, પુપ અને પત્રોને એકઠા કરે છેઆમ આ પૂજામાં પડૂ-કાયિક જીવોની હિંસા સ્પષ્ટપણે દેખાય છે બસ-કાયિક જીવેનુ પણ તેને લીધે હનન હોય છે જેમકે જ્યારે પૃથ્વિ-કાયિક વગેરે જેને આરભ પ્રતિમા વગેરેના નિર્માણમા અથવા તે દેવ-આયતન (મદિર) વગેરે બનાવવામાં કરવામાં આવે છે ત્યારે તેના આશ્રિત જે ઘણુ અનેક જાતના નિરપરાષિ, હન, દીન, દુર્બલ, પ્રકૃતિથી બીકણ તેમજ સગે પિત શરીખ્વાળા એવા હીન્દ્રિયાદિકથી માંડીને પચેન્દ્રિય સુધીના જ રહે છે તેઓ સવે છેદન, ભેદન અને સ્વાશ્રયના વસ मनगारधामृतपपिणी टी० अ०१६ सपदीचा धर्मस्य लक्षण हि-जिनाज्ञापयोज्यप्रवृत्तियत्वम् , " आणाए मामग धम्म इति भगवद्वचनाद , किं च-अगारानगारभेदेन धर्मस्य द्वैविध्यमभिधाय-भग- वता-"अणगारधम्मो ताव" इत्यादिना सर्वप्राणातिपातविरमणादि-रात्रिभो मनान्तान् अनगारधर्मानुपदिश्य तदनन्तरमिद कथितम्- 'अयमाउसो ! अणगारसामइए धम्मे पण्णत्ते एयरस धम्मस्स सिक्खाए उव हिए निग्गथे वा निग्गयी चा विहरमाणे आणा ए आराहए भवइ' (औपपातिसूत्रम्) अयमायुप्मन् ! अनगारसामायिका अनगारसिद्धान्तविषयः, धर्म: प्रज्ञप्त । एतस्य धर्मस्य 'शिक्षायामुपस्थितः' आराधकः, निग्रंथो वा निथी वा विवर- और वहा से गिर पड़कर अन्त में मर जाते है। जिनेन्द्र की आज्ञा में प्रवृति करना यही धर्म का लक्षण है। भग- वान का भी आचारागसूत्र अ. ६ उ २ सू- ८ में यही कथन है ओणाए मामग धम्म” इति । प्रभु ने जिस समय धर्म का उपदेश दिया उस समय उन्होने इस धर्मके दो भेद कहे हैं इनमें एक- १ सागारी गृहस्थका धर्म और दूसरा अनगार-मुनिका धर्म । अन- गार यम्मो ताच" इत्यादि सूत्र से समस्त जीवों की विराधना आदि से विरक्त होना यहा से लगाकर रात्रिभोजन का सर्वथा परिहार करना यहा तक जो कुछ कहा है वह सब अनगार धर्म को लेकर कहा गया है उसके बाद उन्होंने औपपातिक सूत्र में यह कहा है कि " अयमाउसो अणगारसामडरा धम्मे पण्णत्त, एयरस धम्मस्स सिक्खाप, उवहिए निग्गये वा निग्गथी वा विहरमाणे आणाग आराहए भव" हे आयु’मन ! यह अनगारसामायिक-मुनियो का सिद्धान्त विषयक ૬ એવો બતપ્ત થઈને અને ત્યાથી પડી જઈને, ભ્રષ્ટ થઈને અને મૃત્યુને ભેટે છે જીનેન્દ્રની આજ્ઞા પ્રમાણે અનુસરવું એ જ ધર્મનું લક્ષણ છે આચારાગ સત્ર અ-૬, ૬-૨, સૂ-૮ મા પણ ભગવાને આ પ્રમાણે કહ્યું છે કે “ मामग धम्म इति" प्रभुमे न्यारे धर्म वि पहेश मा-या त्यारे तेभरे આ ધર્મને બે ભેદ બતાવ્યા છે ? સાગાર ગૃહસ્થને ધર્મ અને ૨ અનગર मुनिना धर्म " अनगारधम्मो तार" वगेरे सूत्रथा ममन्त वानी वि। ધન વગેરેથી વિરક્ત થવું અહીંથી માડી રાત્રિ-જનને સપૂર્ણપણે ત્યાગ કર અહીં સુધી જે કઈ કહ્યું છે તે બધુ અનગાર ધર્મને ઉદ્દેશીને કહેવામાં આવ્યું છે ત્યારપછી ઔપપાતિક સૂત્રમાં તેઓશ્રીએ આ પ્રમાણે કહ્યું છે કે- (अयमाउसो अणगारमामइए धम्मे पण्णत्ते, एयस्स धम्मस्त सिम्पाप, उदिए निगये पा निग्गथी पा विहरमाणे आणाए आराहए भवा) मायुभन्। আগাং ०२ মঙ্গ दिभिवामरादिवीजनैत्यगीतवानिश्च सविशद मरति, नम्पतिसायनिराधन च प्रतिमापूजानिमित्त केऽनन्तकायकोमलविविधफलपुष्पपरसप हे नियत भाति । पृथि वीकायायाश्रिता बहुविधनिरपराधहीनदीनदुपतिमीरुसगोपितारीरा द्वीनि- यादि पञ्चन्द्रियान्तास्त्रमा जीया अपि छेदनभेदनस्वाभयविनागजनितानन्तदु ग्व स्तीनतरवेदनामुपलभ्येतस्ततः स्वलितपतिता म्रिपन्ते । धूपकेधु आ से, दीप तथा आरती की ज्योति से चमर आदि के ढोरने से, नृत्य करने से, गीत गाते समय मुप से निकले हुए गर्म वायु से, एव वाजों के बजाने से वायुमायिक जीवों की निराधना होती हुई स्पष्ट मालूम देती है । वनस्पति कायिक जीवों की विराधना भी इस समय इस प्रकार से होती है, कि-मूर्ति पूजन के लिये उसके पूजक अनन्त कायिक ऐसे कोमल अनेक प्रकार के फल, पुष्प और पत्रों का सग्रह जो करता है इस प्रकार इस पूजन में पट्कायिक जीवों को हिंसा का आरभ स्पष्ट देखा जाता है । तथा घस कायिक जीवों का भी इसके निमित्तहनन होता है और वह इस प्रकार से-कि जर पृथिवीकायि- कादि जीवों का आरभ प्रतिमा आदि के निर्माण में या देव आयतन (मन्दिर) आदि के कराने में किया जाता है तो उस समय उसके आश्रित जो बहुत से अनेक जाति के निरपराधी, हीन, दीन, दुर्बल, प्रकृति से भयशील तथा सगोपित शरीरवाले ऐसे दीन्द्रियादिकसे लेकर पचेन्द्रिय तक जितने भी इस जीव रहते हैं वे सब के सब छेदन, भेदन, एव स्वाश्रय के विनाश जनित अनत दुःखों से सतप्त होकर થવાની જ છે ધૂપના ધૂમાડાથી દીપક અને આરતીની તથી ચમર વગેરેને ઢળવાથી તેમજ વાજાઓ વગડવાથી વાયુકાયિક જીવોની વિરાધના થાય છે તેની દરેકને સ્પષ્ટ પ્રતીતિ થતી જ રહે છે વનસ્પતિ–કાયિક જીવોની વિરા ધના પણ તે વખતે આ પ્રમાણે થાય છે કે મૂર્તિપૂજન માટે પૂજા કરનારાઓ અનત-કાયિક એવા કેમળ ઘણું જાતના ફળે, પુ અને પત્રોને એકઠા કરે છે. આમ આ પૂજામાં ડૂ-કાયિક જીની હિંસા સ્પષ્ટપણે દેખાય છે ત્ર--કાયિક જીવન પણ તેને લીધે હનન હોય છે જેમકે જ્યારે પૃથ્વિ-કાયિક વગેરે જીવેને બારભ પ્રતિમા વગેરેના નિર્માણમાં અથવા તે દેવ-આયતન (મદિર) વગેરે બનાવવામાં કરવામાં આવે છે ત્યારે તેના આશ્રિત જે ઘણા અનેક જાતના નિરપરાધિ, હીન, દીન, દુર્બલ, પ્રકૃતિથી બીકણુ તેમજ સગા પિત શરીરવાળા એવા હીન્દ્રિયાદિકથી માડીને પચેન્દ્રિય સુધીના જેટલા ત્રસ જ રહે છે તે સર્વે છેદન, સેદન અને સ્વાશ્રયના વિનાશથી અનત .
मनगारधामृतषिणी टी० अ० १६ द्रौपदीवा धर्मस्य लक्षण हि-जिनाज्ञामयोज्यप्रवृत्तियत्वम् , " आणाए मामग धम्म इति भगवद्वचनात् , किं च-अगारानगारभेदेन धर्मस्य वैविध्यमभिधाय-भग- यता-" अणगारधम्मो ताव" इत्यादिना सर्वप्राणातिपातविरमणादि-रात्रिभो जनान्तान् अनगारधर्मानुपदिश्य तदनन्तरमिद कथितम्- 'अयमाउसो ! अणगारसामइए धम्मे पण्णत्ते एयरस धम्मस्स सिक्खाए उव हिए निग्गये वा निग्गयी वा विहरमाणे आणा ए आराहए भवइ' (औपपातिसूत्रम्) अयमायुप्मन् । अनगारसामायिकः अनगारसिद्धान्तविषयः, धर्मः प्रज्ञप्त । एतस्य धर्मस्य 'शिक्षायामुपस्थितः 'आराधकः, निग्रंथो वा निग्रंथी वा विहर- ओर वहा से गिर पड़कर अन्त में मर जाते हैं। जिनेन्द्र की आज्ञा में प्रवृति करना यही धर्म का लक्षण है। भग- चान का भी आचाराङ्गमत्र अ.६ उ २ सू- ८ में यही कथन है " ओणाए मामग धम्म" इति । प्रभु ने जिस समय धर्म का उपदेश दिया उस समय उन्होने इस धर्मके दो भेद कहे हैं इनमें एक- १ सागारी गृहस्थका धर्म और दूसरा अनगार-मुनिका धर्म । " अन. गार यम्मो ताव " इत्यादि सूत्र से समस्त जीवों की विराधना आदि से विरक्त होना यहा से लगाकर गत्रिभोजन का सर्वथा परिहार करना यहा तक जो कुछ कहा है वह सब अनगार धर्म को लेकर कहा गया है उसके बाद उन्होंने औपपातिक सूत्र में यह कहा है कि " अयमाउसो अणगारसामउए धम्मे पण्णत्त, एयम्स धम्मस्स सिक्खाप, उचहिए निग्गथे वा निग्गथी वा विहरमाणे आणाए आराहए भवइ" हे आयु'मन ! यह अनगारसामायिक-मुनियो का सिद्धान्त विषयक ૬ ખેથી સતત થઈને અને ત્યાથી પડી જઈને, ભ્રષ્ટ થઈને અતે મૃત્યુને ભેટે છે જીનેન્દ્રની આજ્ઞા પ્રમાણે અનુસરવું એ જ ધર્મનું લક્ષણ છે આચારાગ સુત્ર અ-૬, ૬-૨, સૂ-૮ મા પણ ભગવાને આ પ્રમાણે કહ્યુ છે કે “ मामग धम्म इति પ્રભુએ જ્યારે ધર્મ વિશે ઉપદેશ આપે ત્યારે તેમણે આ ધર્મના બે ભેદ બતાવ્યા છે ૧ સાગાર ગૃહસ્થને ધર્મ અને ૨ અનગાર भुनिना धर्म " अनगारधम्मो ताव" वगेरे सूत्रथा समस्त वानी विरा ધના વગેરેથી વિરક્ત થવું અહીંથી માડી રાત્રિ-જનને સ પૂર્ણપણે ત્યાગ કરે અહીં સુધી જે કઈ કહ્યું છે તે બધુ અનુગાર ધર્મને ઉદ્દેશીને કહેવામાં આવ્યું છે ત્યારપછી પપાતિક સૂત્રમાં તેઓશ્રીએ આ પ્રમાણે કહ્યુ છે કે – (अयमाउसो अणगारमामइए धम्मे पण्णत्ते, एयस्स धम्मस्स सिक्साए, उदिए निगये या निग्गथी या विहरमापो आणाप आराहए भवइ) मा भन् । आणाए तापकयात्रा दिभिधामरादिवीजनैत्यगीतवादिय सरिशद माति, वनस्पतिकायनिराधन च मतिमापूनानिमित्त केऽनन्तकायकोमलपिरिषफरपुपपत्रसमद नियत भाति । पृयि चीकायाधाश्रिता बहुविधनिरपराधहीनदीन मतिमीसगोपिशरीरा द्वीनि- यादि पश्चेन्द्रियान्तावमा जीया अपि छेदाभेदनस्वाभानिनाजनितानन्तव स्तीत्रतरवेदनामुपलभ्येतस्तवः स्वलितपतिता निपन्ते । धूपकेधु आ से, दीप तथा आरती की ज्योति से चमर आदि के दोरने से, नृत्य करने से, गीत गाते समय मुप से निकले हुग गर्म वायु से, एव वाजों के पजाने से वायुमायिक जीवों की विराधना होती हुई स्पष्ट मालूम देती है । वनस्पति कायिक जीवों की विराधना भी इस समय इस प्रकार से होती है, कि-मूर्ति पूजन के लिये उसके पूजक अनन्त कायिक ऐसे कोमल अनेक प्रकार के फल, पुष्प और पत्रों का सग्रह जो करता है इस प्रकार इस पूजन में पटकायिक जीवों को हिंसा का आरभ स्पष्ट देखा जाता है । तथा घस कायिक जीवों का भी इसके निमित्तहनन होता है और वह इस प्रकार से-कि जर पृथिवीकायि कादि जीवों का आरभ प्रतिमा आदि के निर्माण में या देव आयतन (मन्दिर ) आदि के कराने में किया जाता है तो उस समय उसके आश्रिन जो बहुत से अनेक जाति के निरपराधी, हीन, दीन, दुर्यल, प्रकृति से भयशील तथा सगोपित शरीरयाले ऐसे द्वीन्द्रियादिकसे लेकर पचेन्द्रिय तक जितने भी उस जीव रहते हैं वे सब के सब छेदन, भेदन, एव स्वाश्रय के विनाश जनित अनत दुःखों से सतप्त होकर થવાની જ છે ધૂપના ધુમાડાથી દીપક અને આરતીની જ્યોતથી ચમર વગેરેને કેળવાથી તેમજ વાજાઓ વગાડવાથી વાયુકાયિક જીવોની વિરાધના થાય છે તેની દરેકને સ્પષ્ટ પ્રતીતિ થતી જ રહે છે વનસ્પતિ-કાયિક જીવેની વિરા પના પણ તે વખતે આ પ્રમાણે થાય છે કે મૂર્તિપૂજન માટે પૂજા કરનારાઓ અનત-કાયિક એવા કેમળ ઘણું જાતના ફળ, પુપિ અને પોને એકઠા કરે છે. આમ આ પૂજામાં પડૂ-કાયિક જીની હિંસા સ્પષ્ટપણે દેખાય છે બસ-કાયિક જીવેનુ પણ તેને લીધે હનન હોય છે જેમકે જ્યારે પશ્વિ-કાયિક વગેરે છ આરબ પ્રતિમા વગેરેના નિર્માણમા અથવા તે દેવ-આયતન (મદિર) વગેને બનાવૂવામાં કરવામાં આવે છે ત્યારે તેના આશ્રિત જે ઘણા અનેક જાતના નિરપરાધિ, હીન, દીન, દુર્બલ, પ્રકૃતિથી બીકણ તેમજ સગે પિત શરીરવાળા એવા હીન્દ્રિાદિકથી માડીને પચેન્દ્રિય સુધીના જેટલા વસ જ રહે છે તેઓ સવે છેદન, દન અને વાશ્રયના વિનાશથી અનત मनगारघमामृतवरिणी टी० २०१६ दौपदीचचर्चा छाया-अयमायुप्मन् ! अगारसामयिको धर्मः प्रज्ञप्तः, एतस्य धर्मस्य शिक्षायामुपस्थितः'आराधकः श्रमणोपासको वा श्रमणोपासिका वा विहरमाणा आज्ञाया आराधको भवति । इति ।। अत्रापि एतस्य द्वादशविधस्य धर्मस्याराधक एवं श्रमणोपासक आज्ञाया आराधक इति बोधयताऽऽ धर्मस्य मूलमिति चोधितम् । आचारागसत्रेऽपि प्रथमाध्ययने तृतीयोदेशे भगवताऽभिहितम्-“जाए सद्धाए णिक्खते तमेवमणुपालिज्मा-विजहिता विमोत्तिय पुवसंजोग । पणया वीरा महावीदि । लोग च आणाए अभिसमेचा अकुतोभय ।" इति आयुप्यमन् ! यह गृहस्थ का धर्म कहा गया है। इस धर्म की शिक्षा में उपस्थित-श्रमणोपासक-मुनिजनों के भक्त ऐसे श्रावकजन अथवा श्राविकाजन तीर्थंकर प्रभु की आज्ञा के आराधक माने जाते हैं । इस सूत्र में भी यही प्रकट किया गया है कि इस १२ प्रकार के धर्म का ओराधक ही श्रमणोपासर-प्रावक, श्राविका तीर्थकर प्रभु की आज्ञा का आराधक है इस प्रकार समझानेवाले श्री जिनेन्द्र देव ने आज्ञा ही धर्म का मूल है यह समझाया है । आचाराग सूत्र के प्रथम अ ययन के तृतीय उद्देशे में भगवान ने यह कहा है " जो मद्वारा णिवते तमेव मणुपालिजा विज हिता विसोत्तिय पुत्रसजोग । पणया वीरा महावोहि लोग च आणाए अभिसमेचा अकुतोभय' कि जिस श्रद्धा उत्साह से "अहंत प्रभु द्वारा प्रतिपादित सम्यग्दर्शनादिक मोक्षके मार्ग है या नहीं है" इस प्रकार सर्च आणाए आराहए. भवइ" आयुष्मन्त ! 20 लभ्य धर्म मतावामा माव्य। છે આ ધર્મની શિક્ષામાં ઉપસ્થિત શ્રમણોપાસક મુનિએના ભક્તજન-શ્રાવકે અથવા તો શ્રાવિકા તીર્થંકર પ્રભુની આજ્ઞાન આરાધક ગણાય છે આ મૂત્રમાં પણ આ પ્રમાણે જ સ્પષ્ટ કરવામાં આવ્યુ છે કે ૧૨ પ્રકારના ધર્મના આરાધના જ શ્રમણ પામક શ્રાવક શ્રાવિકા તીર્થ કર પ્રભુની આજ્ઞાને આરાધકે છે રીતે સમજાવનાર શ્રી જીતેન્દ્રદેવે આજ્ઞા જ ધર્મનું મૂળ છે આમ સમજાવ્યું છે આચારાગ સૂત્રના પહેલા અધ્યયનના ત્રીજા ઉદ્દેશકમાં ભગવાને આ પ્રમાણે उधु छ-" जाए सद्धाए णिसते तभेवमणुपालिज्जा विजहिता विसोत्तिय पुव्य सजोग । पणया वीरा महावीहिं रोग च आणाए अभिसमेन्चा अकुतोभय " है જે શ્રદ્ધા-ઉત્સાહથી “અહંત પ્રભુ વડે પ્રતિપ્રાદિત સમ્યમ્ દર્શન વગેરે માનામાગે છે કે નહિ એ આ રીતે સર્વ આગમ વિષયક સર્વ સફા તેમજ માં ।
जाताधर्मका माण आज्ञाया आराधको भाति । एतस्य धर्मस्थाराया पयामाया आराधक इत्युक्त्याऽऽनैव धर्मस्य मकाशकतपा मूलमिति चोधितम् । तदनन्तर च भगवा- अगारधम्म दुपालसरिह आइरखः । त जहा-47 अणुचयाइ, निणि- गुणव्ययाइ चचारि सिक्खावयाइ" इत्पादिना द्वादशाविध धर्म निरप्प कधितम् । 'अयमाउमो ! अगारसामइए धम्मे पण ' एयरस धम्मम्स सिरसाए उद द्विए समणोवासए वा समणोपासिया या विहरमाणे आगाए आराहए भवः" इति । धर्म कहा गया है-अर्थात् मुनियों का यह धर्म करा गया है। इस धर्म की शिक्षा में जो उपस्थित होता है अर्थात् जो इस धर्म की- आराधना करते हैं- चाहे वे साधु हो चाहे साधी हो कोड भी हो ये जिनेन्द्र भगवान की आजा के आराधक होते है । इस धर्म की आरा धना करनेवाला जीवही जिनेन्द्र की आज्ञा का आराधक माना गया है इस कवन से " जिस बात में भगवान की आज्ञा हो वही धर्म का मूल है अन्य आज्ञा विरुद्ध प्रवृत्ति है " यह घात समझाई गई है इस के बाद भगवान ने “अगारधम्म दुवालसविह आइरखइ तं जरा-पच अणुव्ययाइ, तिपिणगुणव्ययाइ चत्तारि सिक्खावयाइ" इस सूत्र से यह प्रकट किया है कि गृहस्थ का धर्म १२ प्रकार का है ५ अणुव्रत, ३ गुण घ्रत और ४ शिक्षात्रत । इस प्रकार से कथन कर " अयमाउसो अगार सामइए धम्मे पण्णत्ते एयस्स धमस्स सिक्खाए, उबटिप, समणोबासए वा समणोवासिया वा विहरमाणे आणाए आराहए भवइ " इति-हे આ અનગાર સામાયિક મુનિને સિદ્ધાન્ત વિષયક ધર્મ કહેવામા આવે છે એટલે કે આ મુનિઓને ધર્મ કહેવામા આવ્યું છે આ ધર્મની શિક્ષામાં જે ઉપસ્થિત હોય છે એટલે કે આ ધર્મની આરાધના કરે છે–ભલે તેઓ સાધુ હોય કે સાધ્વીઓ ગમે તે કેમ ન હોય તેઓ જીનેન્દ્ર ભગવાનની આજ્ઞાના આરાધક હોય છે આ ધર્મની આરાધના કરનારે જીવ જ જીનેન્દ્રના આરા ધક ગણાય છે આ કથનથી એ વાત સમજાવવામાં આવે કે જે વાત માં ભગવાનની આજ્ઞા હોય તે જ ધર્મ છે, આજ્ઞા વિરૂદ્ધ બીજુ આચરણ અધર્મ છે ત્યારપછી ભગવાન વડે अगारधम्म दुवालसविह आइक्खइ त जहा पच अणुव्वयाइ,तिण्णि गुणत्रयाइ चत्तारि सिक्खावयाइ" आ सूत्र बारा से स्पष्ट કરવામા આવ્યુ છે કે ગૃહસ્થને ધમ ૧૨ પ્રકાર છે-૫ અણુવ્રત, ૩ ગુણત અને ૪ શિક્ષાવ્રત આ રીતે જ अयमाउसो अगारसामाइए धम्मे पण्णत्ते एयरस धम्मस्स सिक्खाए अद्विग, समणोवासए वा समणोनासिया वा " नारमामृतवदिती टी० २०१६ द्रौपदीची छाया-अयमायुप्मन् ! अगारसामयिको धर्मः प्रज्ञप्तः, एतस्य धर्मस्य शिक्षायामुपस्थित आराधकः श्रमणोपासको वा श्रमणोपासिका वा विहरमाणा आज्ञाया आराधको भवति । इति ।। अत्रापि एतस्य द्वादशघिस्य धर्मस्याराधक एव श्रमणोपासक याज्ञाया आराधक इति योधयताऽऽऔर यमस्य मूलमिति चोधिनम् । आचारागसत्रेऽपि प्रथमान्ययने तृतीयोदेशे भगनताऽभिहितम्-" जाए सद्धाए णिक्ख ते तमेवमणुपालिज्जा-विजहित्ता विमोत्तिय पुचसंजोग । पणया वीरा महाबीहि । लोग च आणाए अभिसमेचा अकुतोभय ।" इति आयुष्यमन् ! यह गृहस्थ का धर्म कहा गया है । इस धर्म की शिक्षा में उपस्थित श्रमणोपासक-मुनिजनों के भक्त ऐसे श्रावकजन अथवा श्राधिकाजन तीर्थकर प्रभु की आज्ञा के आराधक माने जाते हैं। इस सूत्र में भी यही प्रकट किया गया है कि इस १२ प्रकार के धर्म का ओराधक ही श्रमणोपासक-प्रावक, श्राविका तीर्थकर प्रभु की आज्ञा का आराधक है इस प्रकार समझानेवाले श्री जिनेन्द्र देव ने आज्ञा ही धर्म है यह समझाया है। आचाराग सत्र के प्रथम अ ययन के तृतीय उद्देशे में भगवान ने यह कहा है "जोए मद्वाए णिवते तमेव मणुपालिजा विज हित्ता विसोत्तिय पुव्वसजोग । पणया बीरा महावीरि लोग च आणाए अभिसमेच्या अकुतोभय' कि जिस श्रद्धा उत्साह से "अहंत प्रभु द्वारा प्रतिपादित सम्यग्दर्शनादिक मोक्षके मार्ग है या नहीं है" इस प्रकार सर्व आणाए. आराहए भवइ" मायुमन्त ! A Pह-५ धम मतावमा माव्ये! છે આ ધર્મની રિક્ષામાં ઉપસ્થિત શ્રમણોપાસક મુનિઓના ભક્તજન-શ્રાવકે અથવા તે શ્રાવિકાઓ તીર્થંકર પ્રભુની આજ્ઞાના આરાધક ગણાય છે આ મૂત્રમાં પણ આ પ્રમાણે જ સ્પષ્ટ કરવામાં આવ્યું છે કે ૧૨ પ્રકારના ધર્મના આધકે જ શ્રમણ પામક શ્રાવક શ્રાવિકા તીર્થ કર પ્રભુની આજ્ઞાને આગવકે છે રીતે સમજાવનારા શ્રી જીતેન્દ્રદેવે આજ્ઞા જ ધર્મનું મૂળ છે આમ સમજાવ્યુ છે આચારાગ સૂત્રના પહેલા અધ્યયનના ત્રીજા ઉદ્દેશકમાં ભગવાને આ પ્રમાણે घुछ-" जाए सद्धाए णिसते तभेवमणुपालिज्जा विज्ञहित्ता रिसोत्तिय पुव्य सजोग । पणया पोरा महावीहिं लोग च आणाए अभिसमेच्चा अछुतोभय " જે શ્રદ્ધા-ઉત્સાહથી “અહંત પ્રભુ વડે પ્રતિપ્રાદિત સમ્યક્ દર્શન વગેરે મહાના માગે છે કે નહિ આ તે સર્વ આગમ વિષયક સ ક તેમજ का मुल . 211 ३०४ माण आज्ञाया आराधको भाति । एतस्य धर्मस्याराधक पवाझाया आराधक इत्युक्त्वाऽऽध धर्मस्य प्रकाशकतया मृलमिति योधितम् । तदनन्तर च मगरता- " अगारधम्म दुवालसहि आइनरवः । त जहा-पर अणुचयाउ, तिमि गुणव्ययाइ चत्वारि सिखारयाइ" इत्यादिना द्वादशविध धर्म निरूप्य कथितम् । 'अयमाउमो अगारसामइए धम्मे पण्गते' पयस्स धम्मस्स सिक्साए उव द्विए समणोवासए वा समणोपामिया वा विहरमाणे आणाए आराहए भवः" इति । धर्म कहा गया है-अर्थात् मुनियों का यह धर्म करा गया है। इस धर्म की शिक्षा में जो उपस्थित होता है अर्थात् जो इस धर्म की- आराधना करते है- चाहे वे साधु हो चाहे सांची हो कोड भी से ये जिनेन्द्र भगवान की आज्ञा के आराधक होते हैं । इस धर्म की आरा धना करनेवाला जीव ही जिनेन्द्र की ओजा का आराधक माना गया है इस कथन से " जिस बात में भगवान की आज्ञा से वही धर्म का मूल है अन्य आज्ञा विरुद्ध प्रवृत्ति है " यह यात समझाई गई है इस के बाद भगवान ने " अगारधम्म दुवालमविद आइस्खह त जहा-पच अणुच्चयाइ, तिष्णिगुणब्धयाइ चत्तारि सिक्खावयाई" इस सूत्र से यइ प्रकट किया है कि गृहस्थ का धर्म १२ प्रकार का है ५ अणुवत, ३ गुण व्रत और ४ शिक्षाप्रत । इस प्रकार से कथन कर "अयमाउसो अगार सामइए धम्मे पण्णत्ते एयरस घमस्स सिक्खाए, उबहिण, समणोवासए वा समणोवासिया वा विहरमाणे आणाए आरारए भवइ" इति-हे આ અનગાર સામાયિક મુનિને સિદ્ધાન્ત વિષયક ધર્મ કહેવામાં આવ્યો છે એટલે કે આ મુનિઓને ધર્મ કહેવામાં આવ્યું છે આ ધર્મની શિક્ષામા જે ઉપસ્થિત હોય છે એટલે કે આ ધર્મની આરાધના કરે છે–ભલે તેઓ સાધુ હોય કે સાધ્વીઓ ગમે તે કેમ ન હોય તેઓ જીનેન્દ્ર ભગવાનની આજ્ઞાના આરાધકે હોય છે આ ધમની આરાધના કરનારે જીવ જ જીનેન્દ્રના આરા ધક ગણાય છે આ કથનથી એ વાત આવી છે કે જે વાત મા ભગવાનની આજ્ઞા હોય તે જ ધર્મ છે, આજ્ઞા વિરૂદ્ધ બીજુ આચરણ અધર્મ છે ત્યારપછી ભગવાન વડે अगारधम्म दुवालसविह आइक्खइ त जहा पच अणुव्वयाइ,तिण्णि गुणब्जयाइ चत्तारि सिक्खावयाइ > આ સત્ર દ્વારા એ સ્પષ્ટ કરવામાં આવ્યું છે કે ગૃહસ્થને ધર્મ ૧૨ પ્રકારને છે–પ અણુવ્રત, ૩ ગુણત અને ૪ શિક્ષાત્રત આ રીતે જ अयमाउसो अगारसामाइए धम्मे पण्णत्ते एयरस धम्मस्स सिक्खाए उपदिए, समणोवासए वा समणोवामिया वा माणे મજાવવામાં गायनातागो टोक. १६ द्रौपदीचा ३०७ 'पगया' प्रणता प्राप्ताः कठिनतरतप सयमाराधनेन प्राप्तवन्त इत्यर्थः । अय मेर मागी मोसावाप्तिकरोऽशेपसपमिसेविचत्वात् , तीर्थङ्करादिमहापुरुषा अपि मार्गगिममनुशीलितपन्त इति विश्वसनीयतया शिष्याणा श्रद्धापूर्वक प्रत्तिर्यथा स्यादितिमात्र । कश्चिन्मन्दधीः शिष्योऽनेकदृष्टान्तो यमानोऽपि अपकायादिजीवेषु न अदयातीति तमुद्दिश्य कथयति-हे शिष्य । तर मतियद्यपि अपकायजीविपये न वीर दो प्रकार के होते है ? द्रव्यवीर और दूसरे भाववीर । सयम के अनुष्ठान करने में जो शक्तिसपान हैं वे भाववीर ह । ये जीव सम्यग्द- शन आदि लक्षगरूप इस महाविस्तृतमार्ग को कि जो महापुरुपो द्वारा सेवित हुआ है कठिनतर तप और सयम की आराधना से प्राप्त कर लिया करते हैं। कहने का सार यही है कि भाववीर यही अपने चित्तमें विचार किया करते हैं कि मम्यग्ज्ञान, सम्यग्दर्शन, सम्यगूचोरित्र और सम्परतप रूप ही मार्ग है क्योकि इसी से मुक्ति की प्राप्ती होती है- इसीलिये इस मार्गका समस्त सयमीजीवोंने पूर्व में सेवन किया है और तो क्या स्वर तीर्थकर प्रभु ने भी इसी मार्ग की परिशीलना की है। इसलिये इस मार्ग में प्रवृत्ति सर्वहित विधायी है इस प्रकार यह मार्ग विश्वास योग्य होने से शिष्यजन भी श्रद्धापूर्वक इसमे प्रवृत्ति करे । कोई मन्दबुद्विवाला शिष्य अनेक दृष्टान्तो द्वारा समझाये जाने पर भी यदि अपकाय आदि जीवों की श्रद्धा से रहित होता है तो उसे ૧ દ્રવ્ય-વીર, ૨ ભાવ-વીર સયમના અનુદાનમા જે શક્તિશાળી છે તે ભાવ વીર છે આ બધા જ સમાગૂદાન વગેરે લક્ષણ રૂપ આ વિસ્તૃત માને કે જે મહાપુરૂ વડે સેવવામા આવ્યુ છે-કઠણ તપ અને સયમની આરા ધનાથી મેળવી લે છેકહેવાનો મતલબ એ છે કે ભાવ-વીરો પોતાના મનમાં આ પ્રમાણે જ વિચાર કરતા રહે છે કે ખરી રીતે સમ્યગ જ્ઞાન, સમ્યગૂ દર્શન, સમ્યગ ચારિત્ર રૂપ જ માને છે કેમકે મુક્તિની પ્રાપ્તિ એનાથી જ થાય છે એટલા માટે જ પહેલા થઈ ગયેલા બધા જીએ આ માર્ગનુ જ અનુસરણ કર્યું હતું તીર્થંકર પ્રભુએ જાતે પણ આ માર્ગની જ પરિશીલતા કરી છે એથી બા માર્ગમાં પ્રવૃત્ત થવું તે બધી રીતે હિતાવહ છે આ પ્રમાણે આ માર્ગ વિશ્વસનીય હેવા બદલ વિશે પણ શ્રદ્ધા રાખીને તેમાં પ્રવૃત્ત થાય કેઈક મદ બુદ્ધિ ધરાવનાર શિષ્ય ઘણા દુછાત વડે સ્પષ્ટ કરવામાં આવવા છતા પણ જે અષ્કાય વગેરે જેની શ્રદ્ધાથી રહિત હોય છે તે - जानाधर्मकपास यया श्रद्धया-सम्यक्त्येन 'पिगोशिय' विमोतसिगंगा-शहां देश शाड्रा चेत्यर्थः, यथा-'किमाईती मोक्षमागोऽस्ति न माइति सर्वागमनिपयिका शङ्का सर्वशङ्का, तथा-"किमप्कायाम्यो जीगः सन्ति न पा" अनि देशशङ्का । तथा 'पुन्यसनोगं ' पूर्वसंयोग-मातापित्रादिसम्बन्धं धनधान्याननादिसम्बन्ध वा, इदमुपलक्षण-तेन पश्चात्सयोगमपि श्वशुरादिकत, 'विता' विय-परि स्यज्य 'णिवत्ते' निष्क्रान्त: मनजितः । '' श्रद्धाम् ' अणुपानिजा एव' अनुपालयेदेव-निरतिचार रक्षेदित्यर्थः । अथ-' परिशीलितमार्गोऽनुगम्यते' इति शेयरीत्या शिष्यश्रद्धादीकरणाय पूर्वमहापुरुषापरितोऽय मार्ग इति । वीरा:~-भायवीराः संयमानुष्ठाने वीर्यवन्तः । महानीहि ' महावीथिक महावीथि -सम्यग्दर्शनादिलक्षणो महामार्ग• महापुरपसेपितवाद , नामहावीपि आगम विषयक सर्वशका का तथा " अपू कायिकादिक जीव हैं या नही" इस प्रकार की देशशका और माता पिता आदि के साथ के सषधरूप पूर्व सयोग एव धन, धान्य, स्वजन आदि सबंध, उपरक्षण से श्वशुर आदिरूप प्रश्चात् सयोग का परित्याग कर यह जीव ससार आदि पदार्थी को हेय समझ उनसे सर्वथा विरक्त हो जाता है उस श्रद्धा का अतिचार आदि को से रक्षा करनी चाहिये-उस श्रद्धा का अतिचार ररिक होकर मुनि को पालन करना चाहिये । जो मार्ग परि. शीलित होता है उस पर अनेक प्राणी चलते हैं यह लौकिकरीति है। इसीरीति के अनुसार शिष्यो की श्रद्धा को दृढ करने के लिये यह मार्ग पूर्व में महापुरुषों द्वारा सेवित किया गया है " हमें समझाने के पणया वीरा महावीहिं इस अश का कथन करते हैं “અચ્છાયિક વગેરે જીવે છે કે નથી” આ જાતની દેશ શકા અને માત, પિતા વગેરેની સાથેના સબ ધ રૂપ પૂર્વ સાગ અને ધન, ધાન્ય, વજન વગેરે સ બધા ઉપલક્ષણથી “શ્વસુર વગેરે રૂપ પશ્ચાત્ સાગને પરિત્યાગ કરીને આ જીવ સસાર વગેરે પદાર્થોને હેય સમજીને તેમના તરફ પૃપણે વિરક્ત થઈ જાય છે તે શ્રદ્ધાની અતિચાર વગેરેથી રક્ષા કરવી જોઈએ તે શ્રદ્ધાનું પાલન મુનિએ અતિચાર વગર થઈને કરવું જોઈએ જે માર્ગ પરિ શાલિત હોય છે તે તરફ ઘણા પ્રાણીઓ જાય છે, આ લૌકિક પ્રથા છે આ પ્રથા પ્રમાણે શિવેની શ્રદ્ધાને મજબૂત બનાવવા માટે “ આ મામહે પુર વડે સેવવામાં આવ્યું છે સમજાવવા માટે पणया वीरा महावीहि આ વચનને ટાકે છે વીર બે પ્રકાર* लिये सूत्रकार આ વાત સત્રકાર RAI नागो टोकाम. १६ द्रौपदीचर्चा २०७ 'पाया' प्रणता प्राप्ताः फठिनतरतप सयमाराधनेन प्राप्तवन्त इत्यर्थः । अय मेव मागों मोसामाप्तिफरोऽशेपसयमिसेवितत्वात् , तीर्थङ्करादिमहापुरुषा अपि मार्गमिममनुशीलितान्त इति विश्वसनीयतया शिष्याणा श्रद्धापूर्वक प्रत्तिर्यथा स्यादितिमात्र । कश्चिन्मन्दधीः शियोऽनेकदृष्टान्तोन्यमानोऽपि अपकायादिजीवेषु न श्रदधातीति तमुद्दिश्य कथयति-हे शिष्य ! तर मतिर्यद्यपि अप्कायजीनविषये न वीर दो प्रकार के होते हैं ? द्रव्यवीर और दूसरे भाववीर । सयम के अनुष्ठान करने में जो शक्तिसपन्न हैं वे भाववीर ह । चे जीव सम्यग्द शन आदि लक्षगरूप इस महाविस्तृतमार्ग को कि जो महापुरुपो द्वारा सेवित हुआ है कठिनतर तप और सयम की आराधना से प्राप्त कर लिया करते हैं । कहने का सार यही है कि भाववीर यही अपने चित्तमें विचार किया करते हैं कि मम्यग्ज्ञान, सम्यग्दर्शन, सम्यगूचोरित्र और सम्यग्तप रूप ही मार्ग है क्योंकि इसी से मुक्ति की प्राप्ती होती है- इसीलिये इस मार्गका समस्त सयमीजीवोंने पूर्व में सेवन किया है और तो क्या स्वर तीर्थकर प्रभु ने भी इसी मार्ग की परिशीलना की है। इसलिये इस मार्ग में प्रवृत्ति सर्वहित विधायी है इस प्रकार यह मार्ग विश्वास योग्य होने से शिष्यजन भी श्रद्धापूर्वक इसमे प्रवृत्ति करे । कोई मन्दबुद्विवाला शिष्य अनेक दृष्टान्तो द्वारा समझाये जाने पर भी यदि अपकाय आदि जीवो की श्रद्धा से रहित होता है तो उसे ૧ દ્રવ્ય-વીર, ૨ ભાવ-વીર સયમના અનુષ્ઠાનમાં જે શક્તિશાળી છે તે ભાવ વીર છે આ બધા જીવો સમ્યા -દશન વગેરે લક્ષણ રૂપ આ વિસ્તૃતમાને કે જે મહાપુરૂ વડે સેવવામા આવ્યુ છે-કઠણ તપ અને સયમની આરા ધનાથી મેળવી લે છે કહેવાની મતલબ એ છે કે ભાવ–વીરો પોતાના મનમાં આ પ્રમાણે જ વિચાર કરતા રહે છે કે ખરી રીતે સમ્યગ જ્ઞાન, સમ્યગૂ દર્શન, સમ્યગ ચારિત્ર રૂપ જ માગે છે કેમકે મુક્તિની પ્રાપ્તિ એનાથી જ થાય છે એટલા માટે જ પહેલા થઈ ગયેલા બધા જીએ આ માર્ગનુ જ અનુસરણું કર્યું હતું તીર્થ કર પ્રભુએ જાતે પણ આ માર્ગની જ પરિશીલતા કરી છે એથી ના માર્ગમાં પ્રવૃત્ત થવું તે બધી રીતે હિતાવહ છે આ પ્રમાણે આ માર્ગ વિશ્વસનીય હવા બદલ શિષ્યો પણ શ્રદ્ધા રાખીને તેમાં પ્રવૃત્ત થાય કેઈક મદ બુદ્ધિ ધરાવનાર શિષ્ય ઘણું દૃષ્ટા વડે સ્પષ્ટ કરવામાં આવવા છતા પણ જે અષ્કાય વગેરે જીવેની શ્રદ્ધાથી રહિત હોય છે તે ५०४ पाताचा परिस्फुरति, तद्विपये विशेपशानाभावात् , तथापि गगरदारया अदा नितरां विधेयेत्याशयेना- लोग च आणाए अभिसमेघा अमृतोमय " इति । "लोग " लोकम् अत्र लोकगन्देन प्रकरणपशादकाय लोक एर गृयते, वमझायलोक, च शब्देन अन्यायाएफायाश्रितान् जीपान " आणाए" नया तीर्थकर बचनेन " अभिसमेचा" अमिसमेत्य आभिमुग्येन सम्यगाया, अप् फायादयो जीवा सन्तीत्येवमायु येत्यर्थः, " अकुतोभय " नास्ति कुतश्वित् समझाने के लिये सूत्रकार करते है कि हे शिष्य ! तुम्हारी घुद्धि अपका यिक आदि जीवोकी श्रद्धा करने में उन विषयक विशेषज्ञानके अभावसे यदि समर्थ नहीं है, तो भी भगवान् की आज्ञा से तुम्हें उनके विषय में अपनी श्रद्धा को दुपित नही होने देना चाहिये-अर्थात भगवान की आज्ञा प्रमाण मानकर तुम्हें उनके चिपय में अपनी अतिशय श्रद्धा जाग्रत करनी चाहिये । सूत्रकार इसी अभिप्राय से करते है कि" लोग च आणाए अभिसमेच्चा अकुताभय " इति । अप्काय रूप लोक को तथा "च" शब्द से अन्य अपफाय के अधित जीवों को तीयकर प्रभु की आज्ञा से अच्छी तरह जानकर उनकी आज्ञानुसार उनका अस्तित्व मानकर आत्मकल्याण के अभिलापी मुनियों को सयम का पालन करना चाहिये। सूत्रस्थलोक शब्द यहा प्रकरण के वश से अपू काय का बोधक है। शब्द से तदाधित अन्य जीवों का ग्रहण हुआ है। "अकुतोभय" शब्द का अर्थ सयम है कहीं से भी किसी તેને સમજાવવા માટે સૂત્રકાર કહે છે કે હે શિષ્ય ! તમારી બુદ્ધિ અષ્કાયિક વગેરે ની શ્રદ્ધા કરવામાં તેમના વિષે સવિશેષ જ્ઞાનના અભાવના લીધે જે સમર્થ નથી તે પણ ભગવાનની આજ્ઞાથી તે પ્રત્યે તમે પિતાની શ્રદ્ધાને દૂષિત થવા દેશે નહિ એટલે કે ભગવાનની આજ્ઞા પ્રમાણ માનીને મદ બુદ્ધિવાળા શિષ્યએ તેમના પ્રત્યે પોતાની વધારેમાં વધારે શ્રદ્ધા त ४२वी समे सूत्रा२ मा प्रयोगनथा छ , "लोग व आणाए अभिसमेच्चा अकुतोभय " इति । १४ाय ३५ वने तेमन ' ' શબ્દથી બીજા અખાયાશ્રિત છને તીર્થ કર પ્રભુની આજ્ઞાથી સારી પેઠે સમજીને તેમની આજ્ઞા મુજબ તેમનુ આસ્તિત્વ માનીને આત્મકલ્યાણને ઈચ્છનારા મુનિ- એ સયમનું પાલન કરવું જોઈએ સૂત્રમ આવેલ “ક” શબ્દ અહીં પ્રકરણ વશાત્ અષ્કાયને વાચક છે 'च' शथी हाशित भात वानु પ્રહણ થયું अकृतोमय " शनी अर्थ सयम छे ५y એથી કોઈ પણ રીતે અને જેનાથી ભય હોતું નથી તે આ "च" - ४०॥
३०९ भागारधर्मामृतपिणी टी० म०१६ द्रौपदीचा केनापि प्रकारेण प्राणिना भय यस्मात् सोऽकुतोभयः-सयमस्तम् , "अणुपालिज्जा' अनुपालयेत् इति पूर्वोक्तेन सम्बन्धः । सर्पदा जोवाभिरक्षणरूपसयमानुपालने सावधानतया यत्नः कार्यः इत्यर्थः । अत्र "जार सद्वार गिरावने तमेमणुपालिज्जा विजहित्ता विसोत्तिय पुषसजोग" इत्यनेन अद्भाया भाराध्यत्वे जिनाज्ञायाः सद्भागत् श्रद्धाया धमत्व सिद्धम् । श्रद्धाहीकरणमपि च धर्मस्तदर्थ " पणया वीरा महानोहिं " इति भगवदुप देशस्य सद्भावात् । लोग च आणाए अभिसमेच्चा" इत्यनेनाज्ञायाः पदकायजीवतत्वज्ञान- हेतुत्वेन वर्णनात् तत्त्वज्ञानस्य धर्मत्वम् । भी प्रकार से जीवो को जिससे भय नहीं होता है वह अकृतोभय- सयम है भाव इसका यही है कि आत्म कल्याण के इच्छुक मुनियों को जीवों के सरक्षण रूप सयम की आराधना करने में सावधानता पूर्वक प्रयत्नशील रहना चाहिये। यहा "जाए सद्धाए निक्खते तमेवनणुपा- लिजा, विजहिता वितोत्तिय पुश्वसजोग" इस सूत्राश से यह बात समझाई गई है फित्रद्वा की आराधना में जिनेन्द्र की आज्ञा का सद्भाव है अनः वहा धर्म है । अपि च श्रद्धा की दृढता करना यह भी धर्म है। इसी निमित्त "पणया वीरा महावाहि" यह भगवान का उपदेश है। "लोग च अणाए अभिसमेचा" इस सूत्राश से यह प्रकट होता है कि जब जिनेन्द्र की आज्ञा पटू कायिक जीवों के वास्तविक ज्ञान होने में हेतुरूप से वर्णित हुई है तो इस स्थिति मे तत्वज्ञान धर्म है। છે મતલબ એ છે કે આત્મકલ્યાણ ઈચ્છનારા મુનિઓને એની રક્ષા રૂપ સયમની આરાધના કરવામાં સાવધાન થઈને પ્રયત્ન કરતા રહેવું જોઈએ અહીં जाए सद्धाए निक्सते तमेवमणुपालिज्जा, विजहित्ता वित्तिय पुरसजोग " આ સૂત્રાશ વડે આ વાત સ્પષ્ટ કરવામાં આવી છે કે શ્રદ્ધાની આરાધનામાં જીનેન્દ્રની આજ્ઞાને મદભાવ છે એટલા માટે તેજ ધર્મ છે અને શ્રદ્ધાને મજબૂત બનાવવી તે પણુ ધર્મ છે આ નિમિત્તે पणया वीरा महावीदि આ ભગવાનને ઉપદેશ છે लोगच आणाए अभिसमेच्चा " मा सूत्राश १ मा पात २५४ थाय છે કે જ્યારે જીનેન્દ્રની આજ્ઞા પાયિક જી વિષે વાસ્તવિક જ્ઞાન કરાવવા કરવામાં આવી છે ત્યારે આવી પરિસ્થિતિમાં તત્વજ્ઞાન ધર્મ છે, ४ માટે જ ON - १०४ बताया परिस्फुरति, तद्विपये पिशेपशानाभागाद , तथापि भगादाशया श्रद्धा नितरां विधयेत्याशयेनाद-" लोग न आणाए अभिसमेशा अकृतीमय " इति । " लोग " लोकम् अत्र लोकशब्देन प्रकरणपशादफाय लोक एप गृपते, तमपुकायलोक, च शब्देन अन्यायापायाश्रितान् जीपान " आणाए " आगया तीर्थकर वचनेन " अभिसमेचा " अमिसमेत्य आभिमुग्येन सम्यग्ज्ञावा, अ कायादयो जीया सन्तीत्येवमनट येत्यर्थः, अतोमय" नास्ति फुतचित् समझाने के लिये सूत्रकार कहते है कि हे शिण ! तुम्हारी बुद्धि अप्का यिक आदि जीवोकी श्रद्धा करने में उन विषयक विशेषज्ञानके अभावसे यदि समर्थ नहीं है, तो भी भगवान् की आज्ञा से तुम्हें उनके विषय में अपनी श्रद्धा को दूपित नही होने देना चाहिये-अनि भगवान की आज्ञा प्रमाण मानकर तुम्हें उनके विषय में अपनी अतिशय श्रद्धा जाग्रत करनी चाहिये । सूत्रकार इसी अभिप्राय से कहते है कि "लोग च आणाए अभिसमेच्चा अकुताभय " इति । अप्काय रूप लोक को च" शब्द से अन्य अप्काय के अश्रित जीवों को तीर्थकर की आज्ञा से अच्छी तरह जानकर उनकी आज्ञानुसार उनका अस्तित्व मानकर आत्मकल्याण के अभिलापी मुनियों को सयम का पालन करना चाहिये। सूत्रस्थलोक शब्द यहा प्रकरण के वश से अप् काय का बोधक है। "च" शब्द से तदाधित अन्य जीवों का ग्रहण हुआ है। "अकुनोभय" शब्द का अर्थ सयम है कही से भी किसी તેને સમજાવવા માટે સૂત્રકાર કહે છે કે હે શિષ્ય! તમારી બુદ્ધિ અષ્કાયિક વગેરે જીવોની શ્રદ્ધા કરવામાં તેમના વિશે સવિશેષ જ્ઞાનના અભાવના લીધે જે સમર્થ નથી તે પણ ભગવાનની આજ્ઞાથી તે પ્રત્યે તમે પિતાની શ્રદ્ધાને દૂષિત થવા દેશે નહિ એટલે કે ભગવાનની આજ્ઞા પ્રમાણ માનીને મદ બુદ્ધિવાળા શિષ્યોએ તેમના પ્રત્યે પિતાની વધારેમાં વધારે શ્રદ્ધા यत ४२वी ने ये सूत्र२ मा प्रयोजनधी छ "लोग व आणाए अभिसमेच्चा अकुतोभय " इति । १४य ३५ asने तेमा । * શબ્દથી બીજા અકાયાશ્રિત જીવેને તીર્થ કર પ્રભુની આજ્ઞાથી સારી પેઠે સમજીને તેમની આજ્ઞા મુજબ તેમનું અસ્તિત્વ માનીને આત્મકલ્યાણને ઈચ્છનારા મુનિ એએ સયમનું પાલન કરવું જોઈએ સૂત્રમાં આવેલ “લેક” શબ્દ અહીં પ્રકરણ વશાત અષ્કાયને વાચક છે “” શબ્દથી તદાશ્ચિત બીજા જીવન પ્રહણ થયું છે अकुतोभय " शहने। अर्थ सयम छ ५y એથી કઈ પણ રીતે અને જેનાથી ભય હેત નથી તે યમ भनगारधर्मामृतयपिणी टोका अ० १६ द्रौपदीचर्चा सव्वे पाणा, सन्चे भूया, सब्वे जीवा, सव्वे सत्ता न इतन्वा न अज्जा वेयव्या, न किलायन्या, न उद्दवेयचा । एस धम्मे सुद्धे णितिए सासए, समेच्चा लोयं खेयन्नेहिं पवेइए । आईतधर्मए। श्रद्धेय इति वोधयितु श्रीसुधर्मास्वामीमाह-" से बेमि" इत्यादि । तो यर स्वस्थ निष्येभ्यो यत् सम्ययायमुक्त तदह ब्रवीमि । यद्वा- 'से' इत्यस्य 'स' इतिछाया । येन मया भगदतः श्री वर्धमानरवामिनस्तीध- परस्य सफाशे तद्वचनतरतत्वज्ञान रब्ध, सोऽह ब्रवीमि ।- भगदुक्तार्थमेव कथयामि, तस्मान्मम वाक्य श्रद्धेयमितिभावः । पाणा, सव्वे भूया, सव्वे जीवा, सब्वे सत्ता न हतव्या, न अजावेये- व्या, न परिघेत्तव्वा, न परितावेयव्वा न किलामेयन्वा, न उद्दवेयवा। एम धम्मे सुद्धे णितिय समेच्चा लोय खेयन्नेहिं पवेइए" (आ. सू० अ. ४ उ १ सू० १) श्री सुधर्मा स्वामी इम सूत्र द्वारा जम्बूस्वामी को यह समझाते है कि अर्हतप्रभु द्वारा प्रतिपादित धर्म ही श्रद्धा करने योग्य है-वे इसमें कहते है कि तिथंकर देवो ने अपने २ शिष्यों के लिये जिस सम्यक्त्व का कथन किया है वही तत्व उन तीर्थकर प्रभुके वचनो द्वारा श्रवण कर मैं तुम्हें समझाता हूँ अर्थात् मैं अपनी निजी कल्पना से इस विषय में कुछ भी न कह कर जो कुछ तुम्हें समझाउँगा वह तीर्थकर प्रभु की मान्यतानुमार ही समझाऊँगा अत इस में सदेह के लिये थोडी सी भी जगह नहीं है-इसलिये इस मेरे कथन का मूल- स्रोत जय श्री तीर्थकर प्रभु का उपदेशश्रवण है तब यह श्रद्धेय-श्रद्धा करने योग्य आवश्य है भगवान् का यह आदेश है-कि जितने भी पाणा, सव्वे भूया, सब्वे जीवा, सव्वे सत्ता न ह तन्या, न अज्जावेयव्या, न परिवेत्तव्या, न परितावेयव्या, न किलामेयव्वा, न उद्दवेयव्या। एस धम्मे सुद्धे णितिए सभेचा लोय सेयनेहि पवेइए" (आ सू अ ४ उ १ सू १) શ્રી સુધર્મા મામી આ સૂત્ર વડે શ્રી જ બૂ સ્વામીને આ પ્રમાણે સમજાવે છે કે અહત પ્રભુ વડે પ્રતિપાત ધર્મ જ શ્રદ્ધય છે, તેઓ આ સૂત્રમાં કહે છે કે તીર્થ કર દેવોએ પિતાપિતાના શિષ્યો માટે જે સમ્યકત્વનું નિરૂપણ કર્યું છે તે જ તત્ત્વ તીર્થંકર પ્રભુના મુખથી શ્રવણ કર્યા બાદ તમને સમજાવી રહ્યો છું એટલે કે પિતાની મેળે આમાં કઈ પણ ઉમેર્યા વગર તીર્થંકર પ્રભુની માન્યતા મુજબ જ તમને સમજાવીશ એવી અમા કાને માટે સહેજ પણ સ્થાન નથી આ પ્રમાણે જ્યારે મારા કથનને મૂળ સ્રોત શ્રી તીર્થ કર પ્રભુનું ઉપદેશ છે ત્યારે તે ય જ છે ભગવાનની આ પ્રમાણે આજ્ઞા છે કે - - to भाताकपास ' अकृतोगय' इत्यस्य-" अणुपालिग्ना" इत्यनेनावपाद तोमर्य- सयमम् अनुपालयेदित्यपि भगवदार, तथा च सयमस्याऽऽराध्यतया विधानाद सयमस्य धर्मत्व वो यम् । अपर च-उत्तराध्ययनमूने-“धम्माण कासको मुह " इत्युक्तम् " धम्माण धर्माणा श्रुतधर्मागां चारित्रमागा च " फासो" काश्यपः काश्यपगोत्रीयः श्रीमहावीरवर्धमानस्वामी " मुह " मुख वक्ता पर्वते । अहिंसादौ खलु भगतोऽईत आशा वर्तते, पश्यागमे । यथा-आचारागसूत्रे- " से बेमि-जे य अतीता, जे य पदुप्पन्ना, जे य आगमिस्सा अरहता भगवतो, ते सव्वेवि एषमाइग्खति ए भासति एर पण्णति एष पति- 'अकुत्तोभय' इस पद का "अणुपालिजा" इस क्रियापद के साथ अन्वय करने से यह अर्थ होता है कि अकुतोभयरूप सयम का पालन करना भी जय भगवान को आज्ञाही है तो इससे यह बात स्पष्ट हो जाती है कि भगवान को आज्ञा से सयम आराधन करने लायक होने से धर्म रूप है । अपर च-उत्तरा ययन सूत्र में " धम्माण कासवो मुह" यह कहा है इसका भाव यह है कि श्रुत एव चारित्र धर्मों के मुख-वक्ता-काश्यय गोत्रीय श्री महावीर वर्धमान स्वामी हे । देखो उन्हो ने आगमों में अहिंसादिक महावतो के पालने का मुमुक्षुओं मोक्षाभिलापियो के लिये इस प्रकार आज्ञा प्रदान की है "से बेमि-जे य अतीता जे य पडुप्पना जे य आगमिस्सा अरहता भगवतो ते सव्वे वि एवमाइक्वति एव भासति एव पण्णवेति एव परुति" सच्चे चाहिये, यह - अकुतोभय मा पनि 'अणुपालिग्जा' यानी साथै स-पय ४२ વાથી આ પ્રમાણે અર્થ થાય છે કે અકુભય રૂ૫ સયમનું પાલન કરવું જોઈએ આ પણ ભગવાનની જ આજ્ઞા છે તે એનાથી આ વાત સ્પષ્ટ થઈ જાય છે કે ભગવાનની આજ્ઞાથી “ સયા આરધવા ગ્યા હોવાથી ધર્મરૂપ છે અને વળી “ઉત્તરાધ્યયન સૂત્ર'માં धम्माण कासवो मुह બા મા ને ઉલેખ છે એનો અર્થ એમ થાય છે કે શ્રુત અને ચારિત્ર ધના મુખ્ય-વક્તા-કાશ્યપ ગોત્રીય શ્રી મહાવીર વર્ધમાન સ્વામી છે તેઓશ્રીએ અહિંસા વગેરે મહાવ્રતના પાલન કરનારા મોક્ષ ઈચ્છનારા લોકોને માટે આગ- મામ આ જીતની આજ્ઞા કરી છે કે – "से मि-जे य अतीता जे य पवना जे य आगमिस्सा अरह वा भगवती हे सन् वि एवमाइस्खति एव भासति पव पण्णरे वि एव सम्रे - मनगारधर्मामृतषिणी टी० १० १६ छौपदीचर्या तयोरपि ग्रहणम् , तथा च-' एपमारख्यु , एवमाख्यास्यन्ति' इत्यपि योजनी. यम् । एवं सामु क्रियामु योजनीयम् । तथा-एव " भासंति " मापन्ते-सुर- नरपरिपदि सर्वजीवाना स्वस्वभापापरिणामिन्याऽर्धमागध्या भापया ध्रुवन्ति । तथा-एव" पण्णति" प्रज्ञापयति हेतुदृष्टान्तादिना प्रकर्पण गोधयन्ति । तथा- एव ' परुति ' प्ररूपयन्ति-तत्तनेद पदय प्रकण निर्णयन्ति । ननु सर्वेऽप्यहन्तो भगान्तः-किमाख्यान्तीत्यादिजिज्ञासायामाह-सवे- पाणा' इत्यादि । सर्वे-निरपशेपाः, प्राणाप्राणिनः, पृथिव्यादयः स्थावरा कर परिग्रह रूप से सग्रह करने योग्य, अन्न, पान आदि के निरोध एवं गर्मीसर्दी आदिमें रखने से कभी भी पीडा पहुँचाने योग्य और विषम दान एव शस्त्र के आपात से विनाश करने योग्य नहीं है। सूच में "आइक्रवति-आख्यान्ति" यह वर्तमानकालिक-क्रिया पद अतीत और अनागतकालिक क्रियापद का उपलक्षक है। अतः इस से यह अर्थ प्रतीत होता है कि उन तीर्थ कर प्रभुओ ने वर्तमान में जैसा कहा है वैसा ही उन्हों ने या अन्य भूत कालिक तीर्थ करों ने भूत काल में भी कहा है एय आगामी कालमे भी वे वैसा ही कहेंगे। इसी प्रकार “भासति, पण्णवेति" इत्यादि क्रियापदो के साथ भी अतीत और अनागत कालिक क्रियादोंका सबध कर लेना चाहिये। इस कथन से सूत्रकार ने उनके कथन में परस्पर में विरुद्ध अर्थकी प्ररूपणा का अभाच प्रदर्शित किया है जो कुछ उन्हो ने कहा है। वह भूत, भचिप्यत और वर्तमान काल में से किसी भी काल में किसी भी એવુ સમજીને પરિગ્રહ રૂપથી સંગ્રહ કરવા ગ્ય, કે અન્ન, પાન વગેરેને નિરોધ અને ગમ, ઠડી વગેરેમાં રાખીને કઈ પણ વખતે પીડિત કરવા ગ્ય અને વિષ આપીને તેમજ શાસ્ત્રના આઘાતથી વિનાશ કરવા ગ્ય નથી સૂત્રમાં भाइक्सति आरयान्ति" આ વર્તમાનકાલિક ક્રિયાપદ અતીત તેમજ અનાગત કાલિક ક્રિયાપદનું ઉપલક્ષક છે એથી એના વડે આ જાતના અર્થની પ્રતીતિ થાય છે કે તે તીર્થંકર પ્રભુએ વર્તમાનકાળમાં જે પ્રમાણે કહ્યું છે, તે પ્રમાણે જ તેઓએ અથવા તે બીજા ભૂતકાલિંક તીર્થ કરેએ ભૂત- કાળમાં પણ કહ્યું છે અને ભવિષ્યકાળમાં પણ તેઓ તે પ્રમાણે જ કહેશે આ रात " भासति, पण्णवे ति" वगेरे हियापहानी साये ५९ मतीत भने मना- ગત કાલિક ક્રિયાપદને સ બધ જેડ જોઈએ આ કથનથી સૂત્રકારે તેમના કથનમાં પરસ્પરમા વિરૂદ્ધ અર્થની પ્રરૂપણાને અભાવ બતાવે છે તેમણે જે का ४० भातापर्मकपास भगवदुक्तार्थमाह-"जे य अतीता" इत्यादि। ये च अतीताः अतीतका लियाः, ये च 'पटुप्पना ' प्रत्युत्प नाः वर्तमानकारिफाः पश्चभरतेगु पोर बतेषु पश्चमहानिदेहेषु वर्तमानाः, ये च " आगमिस्मा" भागामिना भविष्य कालभाविनः, ते सर्वेऽपि अईन्तो भगवन्त: एक्ष्यमाणमयारेण "आइवखति' आख्यान्ति=परमश्नावसरे पथयन्ति । अत्र वर्तमानग्रहणमुपलक्षणं तेनातीतानाग- भूतकाल में तीर्थ कर छुए है, वर्तमान काल में भी पांच भरत, पाच ऐरचत तथा पांच माविदेर सम्पन्धी जितने भी तीर्थकर है और भविष्यत काल मे जो तीर्थकर रोगे उन मय ने जय उनसे किमी ने प्रश्न किया, तो एक यही उत्तर दिया है देव एव मनुष्यों को समा में अपनी सर्वभाषा में परिणमित हुई अर्धमागधीरूप दिव्यध्वनि द्वारा उन्हो ने समस्त जीवो को यही समझाया है, और हेतु, दृष्टान्नो मारा इसी बात की पुष्टि की है। वक्तव्य विषय के भेद और प्रभेदों को प्रकट करते हुए उन्हों ने अच्छी तरह से यही प्ररूपणा की है कि समस्त प्राणी पृथिवी आदिक एकेन्द्रिय स्थायर जीवों से लेकर द्वीन्द्रि यादिक पचेद्रिय जीव पर्यन्त घस जीव, चतुर्दश भूनग्रामरूप समस्त भूत, नरकगति, तिर्यञ्चगति, मनुष्यगति एव देवगति के समस्त जीव, एव अपने द्वारा किये गये कर्मों के उदय के फल स्वरूप सुख दुख आदि का अनुभव करने वाले समस्न सत्व दण्ड आदि द्वारा कभी भी ताडन करने गेग्य, घात करने योग्य, ये मेरे आधीन हैं ऐमा ख्याल ભૂતકાળમાં જેટલા તીર્થ કર થયા છે, વર્તમાનકાળમાં પણ પાચ ભરત, પાચ ઐશ્વત તથા પાચ મહાવિદેહ સબધી જેટલા તીર્થ કરે છે અને ભવિષ્યકાળમાં જેટલા તીર્થ કરે થશે તે બધામાથી જ્યારે કેઈએ પ્રશ્ન કર્યો ત્યારે એક જ ઉત્તર આપે છે, દેવ અને માણસોની સભામાં પિતાની સર્વ ભાષામાં પરિ કૃમિત થયેલી અર્ધમાગધી રૂપ દિવ્યધ્વનિમા તેઓએ બધા જીવોને એજ વાત સમજાવી છે અને હેતુ તેમજ દૃષ્ટા વડે આ વાતનું જ સમર્થન કર્યું છે વક્તવ્ય વિષયને ભેદ અને પ્રભેદને સ્પષ્ટ કરતા તેઓએ સરસ રીતે એજ પ્રરૂપણ કરી છે કે સમસ્ત પ્રાણીઓ પૃથ્વિ વગેરે એકેન્દ્રિય સ્થાવર જીથી માડીને દીદ્રિય વગેરે પચેન્દ્રિય જીવ સુધીના ત્રસ જીવ, ચતુર્દશ ભૂતગ્રામ રૂપ સમસ્ત ભૂત, નરક ગતિ તિર્થં ચ ગતિ, મનુષ્ય ગતિ અને દેવ ગતિના બધા છે, અને પિતાના વડે કરવામાં આવેલા કર્મોના દયના ફળ વરૂપ સુખ દુખ વગેરેને અનુભવતા બધા સ દડ કરવા એમ કે વાત योग, समा १५ વખત તાડન ममगारधर्मामृतपपिणी टी० १० १६ द्रौपदीषर्चा तयोरपि ग्रहणम् , तथा च-' एउमाचख्यु , एचमाख्यास्यन्ति' इत्यपि योजनी यम् । एवं सर्वासु क्रियामु योजनीयम् । तथा-एव " भासंति" भाषन्ते-सुर- नरपरिपदि सर्वजीवाना स्वस्वभाषापरिणामिन्याऽर्धमागण्या भाषया त्रुवन्ति । तथा-एव" पण्णवेति " मज्ञापयन्ति हेतुदृष्टान्तादिना प्रकण गोधयन्ति । तथा- एव 'पति' प्ररूपयन्ति-तत्तद्भेद प्रदश्य प्राण निर्णयन्ति । ननु सर्वेऽप्यहन्तो भगवन्तः-किमाख्यान्तीत्यादिजिज्ञासायामाह-सव्वे- पाणा' इत्यादि । सर्वे निरवशेपाः, प्राणा: प्राणिनः, पृथिव्यादयः स्थावरा कर परिग्रह रूप से संग्रह करने योग्य, अन्न, पान आदि के निरोध एव गर्मीसर्दी आदिमें रखने से कभी भी पीडा पहुँचाने योग्य और विपप्र- दान एव शस्त्र के आपात से विनाश करने योग्य नहीं है। सूत्र में “आइरखति-आख्यान्ति" यह वर्तमानकालिक-क्रिया पद अतीत और अनागतकालिक क्रियापद का उपलक्षक है। अतः इस से यह अर्थ प्रतीत होता है कि उन तीर्थ कर प्रभुओ ने वर्तमान में जैसा कहा है वैसा ही उन्हों ने या अन्य भूत कालिक तीर्थ करों ने भूत काल में भी कहा है एच आगामी कालमे भी वे वैसा ही कहेंगे। इसी प्रकार "भासति, पणति" इत्यादि क्रियापदों के साथ भी अतीत और अनागत कालिक क्रियादोंका सबध कर लेना चाहिये। इस कथन से सूत्रकार ने उनके कथन में परस्पर में विरुद्ध अर्थकी प्ररूपणा का अभाव प्रदर्शित किया है जो कुछ उन्हो ने कहा है। वह भूत, भविष्यत और वर्तमान काल में से किसी भी काल में किसी भी એવુ સમજીને પરિગ્રહ રૂપથી સંગ્રહ કરવા ગ્ય, કે અન્ન, પાન વગેરેને નિરોધ અને ગમી, ઠડી વગેરેમાં રાખીને કોઈ પણ વખતે પીડિત કરવા ગ્ય અને વિષ આપીને તેમજ શાના આઘાતથી વિનાશ કરવા ગ્ય નથી સૂત્રમાં भाइक्सति आरयान्ति " मा पतभानति व्याप४ मतीत તેમજ અનાગત કાલિક ક્રિયાપદનુ ઉપલક્ષક છે એથી એના વડે આ જાતના અર્થની પ્રતીતિ થાય છે કે તે તીર્થંકર પ્રભુઓએ વર્તમાનકાળમાં જે પ્રમાણે કહ્યું છે, તે પ્રમાણે જ તેઓએ અથવા તે બીજા ભૂતકાલિક તીર્થ કરેએ ભૂત કાળમાં પણ કહ્યું છે અને ભવિષ્યકાળમાં પણ તેઓ તે પ્રમાણે જ કહેશે આ शते " भासति, पण्णवे ति" पोरे यापहीनी साये ५ मतीत भने मना- ગત કાલિક ક્રિયાપદનો સબંધ જેડ જોઈએ આ કથનથી સૂત્રકારે તેમના કથનમાં પરમ્પરમા વિરૂદ્ધ અર્થની પ્રરૂપણને અભાવ બતાવ્યું છે તેમણે જે . का ४० . हाताचा भगवदुक्तार्थमाह-"जे य अतीar" इत्यादि । ये च अतीता अतीतका लिया:, ये च 'पटुपमा ' प्रत्युत्प ना! वर्तमानकारिकाः पश्चभरतेषु और बतेपु पञ्चमहाविदेहेषु वर्तमानाः, ये च " आगमिस्मा" आगामिन:-भविष्यत् कालभाचिनः, ते सर्वेऽपि अईन्तो भगवन्तः।क्ष्यमाणमयारेण "आवखति" आख्यान्ति-परमश्नावसरे पथयन्ति । अत्र वर्तमानग्रहणमुपरक्षण तेनातीतानाम- भूतकाल में तीर्थ कर हुए है, वर्तमान काल में भी पाच भरत, पाच ऐरचत तथा पाच माविदेह सम्बन्धी जितने भी तीर्थकर हैं और भविष्यत फाल मे जो तीर्थकर होगे उन मय ने जय उनसे किसी ने प्रश्न किया, तो एक यही उत्तर दिया है देव एव मनुष्यों को समा में अपनी सर्वभाषा में परिणमित हुई अर्धमागधीरूप दिव्यत्वनि हारा उन्हो ने समस्त जीवों को यही समझाया है, और हेतु, दृष्टान्तो द्वारा इसी रात की पुष्टि की है। वक्तव्य विषय के भेद और प्रभेदों को प्रकट करते हुए उन्हों ने अच्छी तरह से यही प्ररूपणा की है कि समस्त प्राणी पृथिवी आदिक एकेन्द्रिय स्थावर जीवों से लेकर द्वीन्द्रि यादिक पचेन्द्रिय जीव पर्यन्त त्रस जीव, चतुर्दश भूतग्रामरूप समस्त भूत, नरकगति, तियञ्चगति, मनुष्यगति पय देवगति के समस्त जीव, एव अपने द्वारा किये गये कर्मों के उदय के फल स्वरूप सुख दुम्व आदि का अनुभव करने वाले समस्त सत्व दण्ड आदि द्वारा कभी भी ताइन करने गेग्य, घात करने योग्य, ये मेरे आधीन हैं ऐसा ख्याल ભૂતકાળમાં જેટલા તીર્થ કર થયા છે, વર્તમાનકાળમાં પણ પાચ ભરત, પાચ ઐશ્વત તથા પાચ મહાવિદેહ સબધી જેટલા તીર્થ કરે છે અને ભવિષ્યકાળમા જેટલા તીર્થ કરે થશે તે બધામાથી જ્યારે કેઈએ પ્રશ્ન કર્યો ત્યારે એક જ ઉત્તર આપે છે, દેવ અને માણસોની સભામાં પિતાની સર્વ ભાષામાં પરિ કૃમિત થયેલી અર્ધમાગધી રૂપ દિવ્યવનિમાં તેઓએ બધા ને એજ વાત સમજાવી છે અને હેતુ તેમજ દૃષ્ટા વડે આ વાતનુ જ સમર્થન કર્યું છે વક્તવ્ય વિષયને ભેદ અને પ્રભેદને સ્પષ્ટ કરતા તેઓએ સરસ રીતે એજ પ્રરૂપણ કરી છે કે સમસ્ત પ્રાણીઓ પૃથ્વિ વગેરે એકેન્દ્રિય સ્થાવર જીથી માડીને દીદ્રિય વગેરે પંચેન્દ્રિય જીવ સુધીના ત્રમ જીવ, ચતુર્દશ ભૂતગ્રામ રૂપ સમસ્ત ભૂત, નરક ગતિ તિર્થં ચ ગતિ, મનુષ્ય ગતિ અને દેવ ગતિના બધા જી, અને પિતાના વડે કરવામાં આવેલા કર્મોના ઉલ્ય ફળ વરૂપ સુખ દુખ વગેરેને અનુભવતા બધા સ ક વીર ' કેઈ પણ ३२१ा माय uia २५. याम, मा . Sખત તાડન - . . " मनगारधर्मामृतषिणी टी० १० १६ द्रौपदीचर्या तयोरपि ग्रहणम् , तथा च-'एचमारख्यु , एवमारयास्यन्ति' इत्यपि योजनी. यम् । एव सामु क्रियाम योजनीयम् । तथा-एच “ भासंति" भाषन्ते-सुर- नरपरिषदि सर्वजीवाना स्वस्वभाषापरिणामिन्याऽर्धमागध्या भापया ब्रुवन्ति । तथा-एव" पण्णवेति" प्रज्ञापयन्ति-हेतुदृष्टान्तादिना प्रकर्पण गोधयन्ति । तथा- एव ' पस्चेति ' मरूपयन्ति तत्तद्भेद मदर्य प्रकर्पण निर्णयन्ति । ननु सर्वेऽप्यन्तिो भगान्तः-किमाख्यान्तीत्यादिजिज्ञासायामाह-सव्वे- पाणा' इत्यादि । सर्वे निरवशेषाः, प्राणा: प्राणिनः, पृथिव्यादयः स्थावरा कर परिग्रह रूप से सग्रह करने योग्य, अन्न, पान आदि के निरोध एव गर्मीसर्दी आदिमें रखने से कभी भी पीडा पहुँचाने योग्य और विषम दान एव शस्त्र के आपात से विनाश करने योग्य नहीं है। सूत्र में “आइक्खति-आख्यान्ति " यह वर्तमानकालिक-क्रिया पद अतीत और अनागतकालिक क्रियापद का उपलक्षक है। अतः इस से यह अर्थ प्रतीत होता है कि उन तीर्थ कर प्रभुओ ने वर्तमान में जैसा कहा है वैसा ही उन्हों ने या अन्य भूत कालिक तीर्थ करों ने भूत काल में भी कहा है एव आगामी कालमे भी वे वैसा ही कहेंगे। इसी प्रकार "भासति, पण्णवेति" इत्यादि क्रियापदों के साथ भी अतीत और अनागत कालिक क्रियादोंका सबध कर लेना चाहिये । इस कथन से सूत्रकार ने उनके कथन में परस्पर में विरुद्ध अर्थकी प्ररूपणा का अभाव प्रदर्शित किया है जो कुछ उन्हो ने कहा है। वह भूत, भविष्यत और वर्तमान काल में से किसी भी काल में किसी भी એવુ સમજીને પરિગ્રહ રૂપથી સંગ્રહ કરવા યોગ્ય, કે અન્ન, પાન વગેરેને નિરોધ અને ગમી, ઠડી વગેરેમાં રાખીને કોઈ પણ વખતે પીડિત કરવા યોગ્ય અને વિષ આપીને તેમજ શઆના આઘાતથી વિનાશ કરવા યોગ્ય નથી आइक्सति आरयान्ति " मा पतभान या५६ मतीत તેમજ અનગિત કાલિક ક્રિયાપદનુ ઉપલક્ષક છે એથી એના વડે આ જાતના અર્થની પ્રતીતિ થાય છે કે તે તીર્થ કર પ્રભુએ વર્તમાનકાળમાં જે પ્રમાણે કહ્યું છે, તે પ્રમાણે જ તેઓએ અથવા તે બીજા ભૂતકાલિક તીર્થ કરોએ ભૂત કાળમાં પણ કહ્યું છે અને ભવિષ્યકાળમાં પણ તેઓ તે પ્રમાણે જ કહેશે આ शत “भासति, पण्णवे ति" पोरे यापहोनी साय ५ मतीत भने मना ગત કાલિક ક્રિયાપદને સબધ જેડ જોઈએ આ કથનથી સૂત્રકારે તેમના કથનમાં પરસ્પરમાં વિરૂદ્ધ અર્થની પ્રરૂપણનો અભાવ બતાવ્યું છે તેમણે જે સૂત્રમાં - -- हाताधर्मकपाल दीन्द्रियादिपोन्द्रियपर्य जारवसायेत्यर्थः, इद्रियादिमाणाना यथासम्भवधार णात् तेषु माणिस्यमस्तीति भावः । तथा-सर्वे भूया' भूताः भान्ति भविष्य- न्यभूपन्निति भूता:-चतुर्दशभूतग्रामरूपाः, तथा-सर्वे जी जीवन्ति जीवि- प्यत्यजीविपु रिति जीवा:-नारकतिर्यमनुष्यदेवाः, तया-सर्वे "सत्ता" सत्ता प्रमाण वारा घाधित नरी हो सकने से पूर्वापर निरोध ररितीकहा है। प्राण शब्द से सूत्रकार ने घस और स्थावर प्रणियो का मरण किया है। क्यो कि १० द्रव्य प्राणो में से इनको अपने २ योग्य प्राणो का सद्भाव पाया जाता है। अत: इनके सद्भाव से ही ये प्राणी फहे जाते हैं। " भवन्ति, भविष्यन्ति, अभूवन् "यह भूत शब्द की व्युत्पत्ति है । इसका भाव यही है कि जो वर्तमान में सत्ता विशिष्ट है, आगामी काल में सत्ता विशिष्ट रहेंगे एव भृत- फाल में भी जो सत्ता विशिष्ट थे । इस व्युत्पत्ति से सत्रकार ने यह प्रदर्शित किया है कि प्रत्येक जीवादिक पदार्थ किसी भी काल में उत्पाद और व्यय धर्म विशिष्ट होते हुए भी अपनी • सत्ता से ररित नहीं होते हैं। क्यों कि द्रव्य का " उत्पादव्ययधौव्य सत्" उत्पाद, व्यय और ध्रौव्य ये स्वभाव है । इससे यह बात निश्चित कोटि में आता है कि किसी भी नवीन पदार्थ का उत्पाद नहीं होता है और न सत् पदार्थ का विनाश ही होता है । " सतो विनाश. असतश्चोत्पादो न" "जीवन्ति, जीविष्यन्ति, अजीविपु" यह जीव शब्द की व्युत्पत्ति है। કઈ કાલુ છે તે ભૂત ભવિષ્યત અને વર્તમાનકાળમાથી કોઈ પણ કાળમાં ગમે તે પ્રમાણ દ્વારા બાધિત નહિ લેવા બદલ પૂર્વાપર વિરોધ રહિત જ કહ્યું છે, શબ્દ વડે સૂત્રકારે ત્રસ અને સ્થાવર પ્રાણીઓનું ગ્રહણ કર્યું કેમકે ૧૦ દ્રવ્ય પ્રણેમાથી એમનામાં પિતાપિતાને ચગ્ય પ્રાણોને સદૂભાવ भो छ मेथी मेमना समाथी मा rjी उपाय छे " भवन्ति, भयिष्यति, अभूवन् " मा भूत शनी व्युत्पत्ति छ मेरो भय मा प्रभाव છે કે વર્તમાનકાળમાં જેઓ સત્તા વિશિષ્ટ છે, તેઓ ભવિષ્યકાળમાં સત્તા વિશિષ્ટ રહેશે અને ભૂતકાળમાં પણ જેઓ સત્તા વિશિષ્ટ હતા આ વ્યુત્પત્તિ વડે સરકારે એ બતાવ્યું છે કે દરેકે દરેક જીવ વગેરે પદાર્થ કોઈ પણ કાળમાં અને વ્યયધર્મ વિશિષ્ટ હોવા છતાએ પિતાપિતાની સત્તાથી રહિત હતા oयन " उत्पादव्ययधौल्य सत् " Gपा, व्यय अन प्रौव्य એથી એ વાત ચોક્કસ રીતે સ્પષ્ટ થાય છે કે કોઈ પણ નવીન થતું નથી અને સત્ પદાર્થને વિનાશ પણ થતું નથી असतधोत्पादो न"" जोरन्ति, जीविष्यन्ति, अजीविधु " मा " प्राण - अनगारधर्मामृतपिणी ठोका अ० १६ द्रौपदीची ३१५ स्वकृतकर्मजन्यमुखदुःखानुभविनः । अत्र सर्वपाणिपु पुन पुनर्दयाकरणाय पर्यायशब्दप्रयोगः। न हतवा' न हन्तव्याः दण्डादिभिर्न ताडयितव्या इत्यर्थ , "न अज्जा- वेयया" नालापयितव्या-न पातयितव्या इत्यर्थः, " न परिवेत्तव्या" न परि- ग्रहीतव्या इमे ममायत्ता इति कृत्या परिग्रहरूपेण न स्वीकर्तव्या, "न परिता- जो जीते है, जीवेंगे और जिये है, इस कयन से मूत्रकार ने जीव में त्रिकाल में भी जीवनत्व धर्म का अभाव नहीं होता है वह प्रदर्शित किया है चाहे जीव एक इन्द्रिय अवस्थावाला भी हो तो भी वह जीवन अवस्था से रहित नहीं होता है इससे वृक्षादिको में अचेतनता मानने वाले यौद्ध आदिकों का मन्तव्य खडित होता है। सूत्र में प्राणी, भूत, और सत्त्व इन एकार्थक पर्यायवाची शब्दों का जो सूत्रकार ने प्रयोग किया है उनका मुख्य प्रयोजन “समस्त जीवों में पारवार दया करनी चाहिये "है। यह वीतरागप्रभु द्वारा प्रतिपादित प्राणातिपातविरमणरूप धर्मशुद्ध पापानुबन्ध रहित है । इस कथन से सूत्रकार ने इस बात की पुष्टि की है जो अवीतराग-शाक्य आदि द्वारा धर्मरूप से प्रतिपादित हुआ है तथा जिसे उन्होंने धर्मरूप से स्वीकार किया है वह वास्तविक धर्म नहीं है । कारण कि इनमें हिंसादिक दोपो का सद्भाव पाया जाता है इनके જીવ શબ્દની વ્યુત્પત્તિ છે જેઓ જીવે છે, જીવશે અને જીવ્યા છે આ કથન વડે સૂત્રકારે જીવમા ત્રિકાળમાં પણ જીવન ધર્મને અભાવ થતો નથી આ વાત સ્પષ્ટ કરી છે ભલે તે જીવ એક ઈન્દ્રિય અવસ્થાવાળે હેય છતાએ તે જીવન અવસ્થાથી રહિત થતો નથી આ કથનથી વૃક્ષ વગેરેમા અચેનતા માનનારા બૌદ્ધ વગેરેના મતનુ ખલન થઈ જાય છે સૂત્રકારે સૂત્રમાં જે પ્રાણ, ભૂત અને સત્વ આ બધા એકાઈક પર્યાય વાચી શબ્દને જે પ્રયોગ કર્યો છે તેનું ખાસ કારણ છે બધા જામા વારવાર सय २७ "छ વીતરાગ પ્રભુ વડે પ્રતિપાદિત પ્રાણાતિપાત વિરમણ રૂપ આ ધર્મ શુદ્ધ પાપાનુબબ્ધ રહિત છે આ કથનથી સૂત્રકારે એ વાતને પુષ્ટ કરી છે કે જે અવીતરાગ-શાય વગેરે દ્વારા ધર્મ-રૂપથી પ્રતિપાદિત થયા છે તેમજ તેમણે જેને ધર્મ-રૂપથી સ્વીકાર્યો છે તે ખરેખર ધર્મ નથી કેમ કે તેમાં હિંસા વગેરે જેનો સદુભાવ છે અસર્વજ્ઞ તથા રોગયુક્ત લોકો દ્વારા પ્રતિપાદિત હેવાને प्राण" ११७ मालापरवाह द्वीन्द्रियादिपञ्चेन्द्रियपर्यताबसायेत्यर्थः, द्रियाटिमाणानां यथासम्भधार- णात् तेषु माणिस्वमस्तीति भावः । तया-स ' भूया' भूताः मान्ति भविष्य- त्यभूवन्निति भूता:-चतुर्दशभूतग्रामरूपाः, तया-सचे जीवजीवन्ति जीवि प्यत्यजीविपु रिति जीयाः-नारकतिर्यमनुष्यदेवाः, तया-सर्वे "सत्ता" सत्ता प्रमाण द्वारा प्राधित नही हो सकने से पूर्वापर निरोध रहित ही कहा है। शब्द से सूत्रकार ने उस और स्थावर प्रणियो का ग्रहण किया है। क्यो कि १० द्रव्य प्राणो में से इनको अपने २ योग्य प्राणो का सद्भाव पाया जाता है। अत' इनके सद्भाव से ही ये प्राणी कहे जाते हैं। " भवन्ति, भविष्यन्ति, अभूवन "यह भूत शब्द की व्युत्पत्ति है । इसका भाव यही है कि जो वर्तमान में सत्ता विशिष्ट हैं, आगामी काल में सत्ता विशिष्ट रहेंगे एव भूत. काल में भी जो सत्ता विशिष्ट थे । इस व्युत्पत्ति से सूत्रकार ने यह प्रदर्शित किया है कि प्रत्येक जीवादिक पदार्य किसी भी काल में उत्पाद और व्यय धर्म विशिष्ट होते हुए भी अपनी • सत्ता से ररित नहीं होते हैं। क्यों कि द्रव्य का " उत्पादव्ययधौव्य सत्" उत्पाद, व्यय और ध्रौव्य ये स्वभाव है । इससे यह बात निश्चित कोटि में आता है कि किसी भी नवीन पदार्थ का उत्पाद नहीं होता है और न सत् पदार्थ का विनाश ही होता है । " सतो विनाश. असतश्चोत्पादो न" " जीवन्ति, जीविष्यन्ति, अजीविपु" यह जीव शब्द की व्युत्पत्ति है । કઈ કહ્યું છે તે ભૂત ભવિષ્યત અને વર્તમાનકાળમાથી કોઈ પણ કાળમાં ગમે તે પ્રમાણ દ્વારા બાધિત નહિ હોવા બદલ પૂર્વાપર વિધ રહિત જ કહ્યું છે, શબ્દ વડે સૂત્રકારે ત્રસ અને સ્થાવર પ્રાણીઓનું ગ્રહણ કર્યું છે કેમકે ૧૦ દ્રવ્ય પ્રાણેમાથી એમનામા પોતપોતાને ગ્ય પ્રાણોને સદ્દભાવ મળે છે એથી એમના સદુભાવથી જ તેઓ પ્રાણી કહેવાય છે “ भवन्ति, भविष्यन्ति, अभूवन् ” આ ભૂત શબ્દની વ્યુત્પત્તિ છે એને અર્થ આ પ્રમાણે છે કે વર્તમાનકાળમાં જેઓ સત્તા વિશિષ્ટ છે, તેઓ ભવિષ્યકાળમા સત્તા વિશિષ્ટ રહેશે અને ભૂતકાળમાં પણ જેઓ સત્તા વિશિષ્ટ હતા આ વ્યુત્પત્તિ વડે સૂત્રકારે એ બતાવ્યું છે કે દરેકે દરેક જીવ વગેરે પદાથે કઈ પણ કાળમાં ઉત્પાદ અને વ્યયેધમ વિશિષ્ટ હોવા છતાએ પિોતપોતાની સત્તાથી રહિત હોતા नयी भो यो “ उत्पादव्ययध्रौव्य सत्" Gपा, व्यय मने प्रौव्य સ્વભાવ છે એથી એ વાત ચોક્કસ રીતે સ્પષ્ટ થાય છે કે કોઈ પણ નવીન પદાર્થને ઉત્પાદ થતું નથી અને સત્ પદાર્થને વિનાશ પણ "सतो विनाश असवयोत्पादो न जीवन्ति, जीविष्यन्ति, प्राण " તે નથી . - भनगारधर्मामृतपिणी टोका १० १६ द्रौपदीचचर्चा ३५ स्वकृतकमजन्यमुखदुःसानुभविनः । अत्र सर्पमाणिपु पुन पुनर्दयाकरणाय पर्यायशब्दप्रयोगः। 'न हतन्या' न हन्तन्याः दण्डादिभिर्न ताडयितव्या इत्यर्थ , "न अज्जा- वेयया" नातापयितव्या-न पातयितव्या इत्यर्थः, " न परिघेत्तवा" न परि- ग्रहीदव्या इमे ममायत्ता इति कृत्वा परिग्रहरूपेण न सोकर्तव्या, "न परिता- जो जीते हैं, जीवेंगे और जिये है, इस कथन से सूत्रकार ने जीप में त्रिकाल में भी जीवनत्व धर्म का अभाव नही होता है यह प्रदर्शित किया है चाहे जीव एक इन्द्रिय अवस्थावाला भी हो तो भी वह जीवन अवस्था से रहित नहीं होता है इससे वृक्षादिको में अचेतनता मानने वाले पौद आदिकों का मन्तव्य खडित होता है। सूत्र में प्राणी, भूत, और मत्व इन एकार्थक पर्यायवाची शब्दों का जो सूत्रकार ने प्रयोग किया है उनका मुख्य प्रयोजन "समस्त जीवों में चारयार दया करनी चाहिये "है। यह वीतरागप्रभु द्वारा प्रतिपादित प्राणातिपातविरमणरूप धर्मशुद्ध पापानुबन्ध रहित हे। इस कथन से सूत्रकार ने इस बात की पुष्टि की है जो अवीतराग-शाक्य आदि द्वारा धर्मरूप से प्रतिपादित हुआ है तथा जिसे उन्होंने धर्मरूप से स्वीकार किया है वह वास्तविक धर्म नहीं है। कारण कि इनमें हिंसादिक दोषो का सद्भाव पाया जाता है इनके જીવ શબ્દની વ્યુત્પત્તિ છે જેમાં જીવે છે, જીવશે અને જીવ્યા છે આ કથન વડે સૂત્રકારે જીવમાં ત્રિકાળમાં પણ જીવનત્વ ધમને અભાવ થતે નથી આ વાત સ્પષ્ટ કરી છે તે જીવ એક ઈન્દ્રિય અવસ્થાવાળે હેય છતાએ તે જીવન અવસ્થાથી રહિત થતો નથી આ કથનથી વૃક્ષ વગેરેમાં અનતા માનનારા બૌદ્ધ વગેરેના મતનું ખંડન થઈ જાય છે સૂત્રકારે સૂત્રમાં જે પ્રાણી, ભૂત અને સત્વ આ બધા એકાઈક પર્યાય વાચી શબને જે પ્રયોગ કર્યો છે તેનું ખાસ કારણ છે બધા મા વાર વાર સદાય રહેવું જોઈએ ” તે જ છે વીતરાગ પ્રભુ વડે પ્રતિપાદિત પ્રાણાતિપાત વિરમણ રૂપ આ ધર્મ શુદ્ધ પાપાનુબન્ધ રહિત છે આ કથનથી સૂત્રકારે એ વાતને પુષ્ટ કરી છે કે જે અવીતરાગ-શાય વગેરે દ્વારા ધર્મ-રૂપથી પ્રતિતિ થયેલ છે તેમજ તેમણે જેને ધર્મ-રૂપથી સ્વીકાર્યો છે તે ખરેખર ધર્મ નથી કેમકે તેમાં હિંસા વગેરે દેને સદ્દભાવ છે અસર્વજ્ઞ તથા રોગયુક્ત લેક દ્વારા પ્રતિપાદિત હોવાને সকাথায় वेयधान परितापयितच्या अन्नपानाबरोधनेन मीमातपादी स्थापनेन च न पीडनीयाः, " न किसमेयच्या" न सामयितव्यान खेदयितव्या-न विष शस्त्रादिना मारयितव्याः। एप अनन्तरोक्तः सर्टिगात्मरूपितः, धर्म:मनमाणिप्राणातिपातविरमण रूपः, शुद्धा निर्मला-पापानुवन्धरहित-रत्यर्य । आईतवर्मादन्यस्तु धर्मत्वेन या शाक्यादेरभिमतः स खलु असतसरागोपदिष्टत्वन हिंसादिदोपसद्भावेन चम शुद इति भावः । अत एव-एप नित्या अविनाशी, सर्वदा पत्रमु महानिदेहेषु सद्भाव का कारण उसमें असर्वज्ञ और सरागियों द्वारा प्रणीतता ही है पूर्ण ज्ञानीयो द्वारा प्रदर्शित मार्ग ही शुद्ध रोता है इसका कारण उनमें राग देप का सर्वथा अभाव ही होता है। असर्व या रागद्वेषकलपित. चित्तवालों द्वारा प्रदर्शित मार्ग इसलिये शुद्ध नहीं होता है कि वे एक तो उस विषय के पूर्ण ज्ञाता नहीं होते, दूसरी अपनी रागदेपमयी प्रवृ. त्ति को पुष्ट करने के लिये उसकी अन्यया भी प्ररूपणा कर देते हैं । ऐसा धर्म शाश्चतिकनिल नहीं होता है-क्यों कि ऐसा धर्मका विशिष्ट ज्ञानियों केवलज्ञानियो द्वारा जीवों का कल्याण की कामना से निराक- रण कर दिया जाता है । वीतरागप्रतिपादित धर्म ही अविनाशी रहता है, और उसीसे जीवों का सदा कल्याण होता रहता है । इसमे अन्य थाप्ररूपणाके लिये थोडी सी भी जगह नहीं मिलती है। पच महाविदेह क्षेत्रों में अब भी इस शुद्धधर्मका सद्भाव है। इसी अपेक्षा इसे सत्रकारने नित्य-अविनाशी कहा है । शाश्वतगतिरूप मुक्ति का कारण होने से લીધે જ તેમાં હિંસા વગેરે સદેષતા છે પૂર્ણજ્ઞાનીઓ વડે પ્રદર્શિત માર્ગે જ શુદ્ધ હોય છે કેમકે તેમા સ પૂર્ણપણે રાગદ્વેષને અભાવ જ હોય છે અસર્વજ્ઞ કે રાગદ્વેષ કલુષિત ચિત્તવાળા લોકે વડે પ્રતિપાદિત મા શુદ્ધ એટલા માટે હેત નથી કે તેઓ પ્રથમ તે તે વિષયને સપૂર્ણપણે જાણતા નથી અને બીજુ તેઓ પિતાની રાગદ્વેષમયી પ્રવૃત્તિને પુષ્ટ કરવા માટે તેની અન્યથા પ્રરૂપણા પણ કરી બેસે છે એ ધર્મ શાસ્પતિક-નિત્ય હોતો નથી કેમકે એવા ધર્મનું વિશિષ્ટ જ્ઞાનીઓ-કેવળજ્ઞાનીઓ-વડે જીવની કલ્યાણ કામનાથી પ્રેરાઈને નિરાકરણ કરવામાં આવે છે વીતરાગ પ્રતિપાદિત ધર્મ જ અવિનાશી રહે છે, અને તેથી સર્વદા જીવનું કલ્યાણ થતું રહે છે આમા અન્યથા પ્રરૂપણા માટે અવકાશ જ નથી અત્યારે પણ પચવિદેહ ક્ષેત્રમાં આ શુદ્ધ ધર્મને સદભાવ છે આ ધમને આ દૃષ્ટિથી જ સરકારે નિ, કહ્યું છે શાશ્વત ગતિ રૂપ મુક્તિને હિોવાથી આ ધ * - - - अमरावतरंगी टीका २०१६ द्रौपदीय सद्भावात् । तथा-शाश्वतः शाश्वतगतिकारणत्वात् । यद्वा-यतो नित्यस्तस्माच्छा- श्वत इति । अयमेव धर्मः श्रद्धेयो ग्राह्यश्चेत्यत्र हेतु पदर्शयन् विशेषणान्तरमाह- समेत्य इत्यादि । लोक पटू जीवनिकाय दुःखदावानलान्त पतित, समेत्य केव- लज्ञानेन प्रत्यक्षतया विज्ञान, खेदज्ञैः सर्वप्राणिदुःखाभिस्तीर्थकरैः प्रवेदित:- आदिष्ट । 'प्रवेदित' इत्यनेन धर्मोऽय मया न स्वमनीपया कल्पितः' इति च मुधर्मस्वामिना शिप्यमुशिष्य चितम् । अनुयोगद्वारे- यह शाश्वत माना गया है अथवा हेतु हेतुमद्भाव से भी यों कह सकते है कि जिस कारण से यह नित्य है इसी कारण से यह शाश्वत माना गया है । अतः प्रत्येक मुमुक्षु जीवों द्वारा यह धर्म श्रद्धेय श्रद्धा करने योग्य एव ग्राह्य-आराधन करने योग्य है इस विषय मे पूर्वोक्त- रूप से सूत्रकार हेतु का कथन कर उस धर्म की प्ररूपणा करने के कारण का प्रदर्शन करते हुए " समेत्य लोक खेदज्ञैः प्रवेदितः" कहते है कि समस्त पाणीयों के दुखों के वेत्ता केवलज्ञानी प्रभु ने इस पट्जीव निकायरूप लोक को प्रत्यक्षरूप से साक्षात् दुःखरूपी दावानल से जलता हुआ देखकर इस शुद्ध, शाश्वतिक धर्म का कथन किया है । भावार्थ-अनत सासारिक दुखो से सतप्त समस्त ससारी जीवों को साक्षात् हस्तामलकवत् देखकर दुःखो से उनके उद्धार के निमित्त वोतराग केवलज्ञानियोंने ही इस धर्म की प्ररूपणा की है। मैं ने अपनी ओर से इसका कथन नहीं किया है। इस प्रकार श्री सुधर्मास्वामी अपने शिष्य जम्बूस्वामी को समझाते है । વામાં આવ્યા છે અથવા હેતુ-હેતુ મદુભાવથી પણ એમ કહી શકાય છે કે જે કારણને લઈને આ નિત્ય છે તે કારણથી જ આ શાશ્વત માનવામાં આવ્યું છે એથી દરેક મોક્ષને ઈચ્છનારા છ વડે આ ધમ શ્રદ્ધય-શ્રદ્ધા કરવા યેગ્ય અને ગ્રાહ્ય આરાધવા ગ્ય છે આ વિશે સૂત્રકાર પૂર્વોક્ત રૂપે હેતુનું કથન કરીને તે ધર્મની પ્રરૂપણ કરતા समेत्य लोक खेद प्रवेदित છે કે બધા પ્રાણીઓના ૬ ખેને જાણનારા કેવળજ્ઞાની પ્રભુએ આ જીવ નિકાય રૂપ લેકને પ્રત્યક્ષ રૂપમાં સાક્ષાત દુખ રૂપી દાવાનળમાં સળગતા જેઈને શુદ્ધ, શાશ્વતિક ધર્મનું કથન કર્યું છે– भावार्थ - સારના બધા અને અનત સાસારિક દુ ખોથી હસ્તા મલકાવત્ સતત જોઈને તેમના ઉદ્ધાર માટે વીતરાગ કેવળજ્ઞાનીએ એ જ આ ધર્મનું નિરૂપણ કર્યું છે કે પિતાની મેળે આ કથન કર્યું નથી શ્રી સુધર્મા સ્વામી પિતાના શિષ્ય જન્ સ્વામીને આ પ્રમાણે સમજાવે છે “ . খাবার वेयच्या" म परितापयितव्या अन्नपानापरोधनेन मीमातपादी स्थापनेन च न पीडनीयाः, " न फिलामेयन्या" न सामयितव्याम्न रोदयितव्या-न विष शस्त्रादिना मारयितव्याः। एपः अनन्तरोक्तः सनिगमरूपिता, धर्मममाणिप्राणातिपातविरमण रूप., शुद्धा निर्मल:-पापानुवन्धरहित-इत्यर्थ । आईतवर्मादन्यस्तु धर्मस्वेन यः शाक्यादेरभिमतः स खलु असनसरागोपदिष्टत्वेन हिंसादिदोपसद्भावेन च न शुद इति भाषः । अत एक-एप नित्यः अविनाशी, सर्वदा पश्चम महाविदहेषु सद्भाव का कारण उसमें असर्वज्ञ और सरागियों बारा प्रणीतता ही है पूर्ण जानीयो द्वारा प्रदर्शित मार्ग ही शुद्ध होता है इसका कारण उनमें राग देष का सर्वथा अभाव ही होता है। असर्वज्ञ या रागद्वेषकलुषित- चित्तवालों द्वारा प्रदर्शित मार्ग इसलिये शुद्ध नहीं रोता है कि वे एक तो उस विषय के पूर्ण ज्ञाता नहीं होते, दूसरी अपनी रागद्वेपमयी प्रथ. त्ति को पुष्ट करने के लिये उसकी अयया भी प्ररूपणा कर देते हैं। ऐसा धर्म शाश्वतिक नित्य नहीं होता है क्यों कि ऐसा धर्मका विशिष्ट ज्ञानियों केवलज्ञानियो द्वारा जीवों का कल्याण की कामना से निराक- रण कर दिया जाता है । वीतरागप्रतिपादित धर्म ही अविनाशी रहता है, और उनीसे जीवों का मदा कल्याण होता रहता है । इसमे अन्य थाप्ररूपणाके लिये थोडी सी भी जगह नहीं मिलती है । पच महाविदेह क्षेत्रों में अब भी इस शुद्ध धर्मका सद्भाव है । इसी अपेक्षा इसे सूत्रकारने नित्य-अविनाशी कहा है। शाश्वतगतिरूप मुक्ति का कारण होने से લીધે જ તેમાં હિંસા વગેરે સદોષતા છે પૂર્ણજ્ઞાનીઓ વડે પ્રદર્શિત મા જ શુદ્ધ હોય છે કેમકે તેમાં પૂર્ણપણે રાગદ્વેષને અભાવ જ હોય છે અસર્વજ્ઞ કે રાગદ્વેષ કલુષિત ચિત્તવાળા લોકો વડે પ્રતિપાદિત માર્ગ શુદ્ધ એટલા માટે તો નથી કે તેઓ પ્રથમ તે તે વિષયને સ પૂર્ણપણે જાણતા નથી અને બીજુ તેઓ પિતાની રાગમથી પ્રવૃત્તિને પુષ્ટ કરવા માટે તેની અન્યથા પ્રરૂપણ પણ કરી બેસે છે એ ધર્મ શાશ્વતિક-નિત્ય હેતે નથી કેમકે એવા ધર્મનું વિશિષ્ટ જ્ઞાનીઓ...કેવળજ્ઞાનીઓ-વડે જેની કલ્યાણ કામનાથી પ્રેરાઈને નિરાકરણ કરવામા આવે છે વીતરાગ પ્રતિપાદિત ધર્મજ અવિનાશી રહે છે, અને તેથી સર્વદા જીવનું કલ્યાણ થતું રહે છે. આમાં અન્યથા પ્રરૂપણા માટે અવકાશ જ નથી અત્યારે પણ પચવિદેહ ક્ષેત્રમાં આ શુદ્ધ ધર્મને સદભાવ છે આ ધમને આ દૃષ્ટિથી જ સૂત્રકાર નિ કો છે શાશ્વત ગતિ રૂપ મુકિતને કહેવાથી આ ધર્મ 7 , महरिगोटीका0 ० १६ द्रौपीयों सद्भावात् । तथा-शाश्वतः शाश्वतगतिकारणत्वात् । यद्वा-यतो नित्यस्तस्माच्छा- श्वत हति । अयमेव धर्मः श्रद्धेयो ग्राह्यश्चेत्यत्र हेतु प्रदर्शयन् विशेषणान्तरमाह- समेत्य इत्यादि । लोक पट् जीननिकाय दुःखदावानलान्त पतित. समेत्य केव- लज्ञानेन प्रत्यक्षतया विज्ञान, खेदज्ञैः सर्वमाणिदुःसाभिस्तीर्थकरैः प्रवेदिता आदिष्ट । 'प्रवेदितः' इत्यनेन धर्मोऽय मया न स्वमनीपया कल्पितः' इति च मुधर्मस्वामिना शिष्यमुदिष्य सूचितम् । अनुयोगद्वारे- यह शाश्वत माना गया है अथवा हेतु हेतुमझाव से भी यों कह सकते है कि जिस कारण से यह नित्य है इसी कारण से यह शाश्वत माना गया है । अतः प्रत्येक मुमुक्षु जीवों द्वारा यह धर्म श्रद्धेय श्रद्धा करने योग्य एव ग्राह्य-आरापन करने योग्य है इस विषय मे पूर्वोक्त- रूप से सूत्रकार हेतु का कथन कर उस धर्म की प्ररूपणा करने के कारण का प्रदर्शन करते हुए " समेत्य लोक खेदज्ञैः प्रवेदित" कहते है कि समस्त प्राणीयों के दुखों के वेत्ता केवलज्ञानी प्रभु ने इस पट्जीव निकायरूप लोक को प्रत्यक्षरूप से साक्षात् दुःखरूपी दावानल से जलता हुआ देखकर इस शुद्ध, शाश्वतिक धर्म का कथन किया है । भावार्थ-अनत सासारिक दुखो से सतप्त समस्त ससारी जीवों को साक्षात् हस्तामलकवत् देखकर दुःखो से उनके उद्धार के निमित्त योतराग केवलज्ञानियोंने ही इस धर्म की प्ररूपणा की है। मैं ने अपनी ओर से इसका कथन नहीं किया है। इस प्रकार श्री सुधर्मास्वामी अपने शिष्य जम्बूस्वामी को समझाते है । વામાં આવ્યું છે અથવા હેતુ-હેતુ મદૂભાવથી પણ એમ કહી શકાય છે કે જે કારણને લઈને આ નિત્ય છે તે કારણથી જ આ શાશ્વત માનવામા આવ્યો છે એથી દરેક મેક્ષને ઈચ્છનારા છ વડે આ ધમ શ્રદ્ધય-શ્રદ્ધા કરવા ગ્ય અને ગ્રાહ્ય આરાધવા યોગ્ય છે. આ વિષે સૂત્રકાર પૂર્વોક્ત રૂપે હેતુનું ४थन रीने त भनी प्र३५ ४२ता “ समेत्य लोक खेदज्ञ प्रवेदित " છે કે બધા પ્રાણીઓના દુખેને જાણનારા કેવળજ્ઞાની પ્રભુએ આ જીવ પ્રત્યક્ષ રૂપમાં સાક્ષાત દુ ખ રૂપી દાવાનળમાં જોઈને શુદ્ધ, શાશ્વતિક વર્મનું કથન કર્યું છે– ભાવાર્થ- –સ સારના બધા ને અન ત માસારિક મલકાવત્ સતસ જોઈને તેમના ઉદ્ધાર માટે વીતરાગ કેવળજ્ઞાનીએ એ જ આ ધર્મનું નિરૂપણ કર્યું છે કે પિતાની મેળે આ કથન કર્યું નથી શ્રી સુધર્મા સ્વામી પિતાના શિષ્ય અબૂ સ્વામીને આ પ્રમાણે સમજાવે છે નિકાય રૂપ લેકને સળગતા हु ખેથી હસ્તા । -- - माताधर्म कथा "जह मम ण पिय दुरख जाणिय एमे सपनीमाण । न हणइ न इणावेइ य, सममणइ तेण सो समणो । इति" छाया-यथा मग न प्रिय दुःख, शाला एउमेर सनीवानाम् । न हन्ति न घातयन्ति च समम् अणति तेन स समणः ।। च शब्दात् घ्नतथान्यान्न समणुजानीत इत्यनेन प्रकारंग 'सममणति' ति सर्वजीवेपु तुल्य वर्तते यतस्तेनासौ अमण इति गाथार्थ । 'एस धम्मे सुद्धे' इत्यनेन आईत धर्मस्य हिंसादि दोपाभागाङ्गगता शुद्ध स्वमुक्तम् । शुद्धधर्मयोधकत्याच द्वादशाङ्गायाः मानवमागमत्र सर्वोत्कृष्टत्व च सिध्यति । प्राचनस्य स्वरूप माहात्म्य चाऽऽगमेयु भगववाऽभिहितम् । अनुयोगद्वार में- जह मम ण पिय दुःख जाणिय प्रमेय सव्वजीवाण । न हणइ न हणावेइ य सममण तेण सो समणो ॥ इति । जिस प्रकार दुःख मुझे इष्ट नहीं है, उसी तरह वह दुःख किसी भी ससारी जीवो को इष्ट नहीं है ऐसा समझ कर जो जीवों की विराधना स्वय नहीं करता और न दूसरों से करवाता है तथा समस्त जीवों में तुल्यता की भावना रखता है वही श्रमण है। श्रमण होने में ये पूर्वोक्त बाते हेतु-कारण हैं। एस धम्मे सुद्धे " इस सूत्राश से श्री सुधर्मास्वामी ने तीर्थकर कथिन वर्म मे हिंसादिक दोपो के अभाव से शुद्धता का कथन किया है । इत्त शुद्ध धर्म का योधक-बोध करानेवाली होने से ही द्वादशागी में प्रवचनता, आगमता एव सर्वोत्कृष्टता सिद्ध होती है। भगवान ने मनुयोमबारभा-जह मम ण पिय दुस जाणिय एमेव सव्यजीवाण । न हणइ न हणावेइ य सममणइ तेण सो समणे ॥ इति । જેમ મને દુખ ગમતું નથી તેમજ તે દુ ખ સસારના કેઈ પણ જીવને ગમે જ નહિ આમ સમજીને જેઓ જીવોની વિરાધના પિતે કરતા નથી અને બીજાઓથી કરાવતા નથી તેમજ બધા જેમા તુત્યતા (સમાનતા) ની દૃષ્ટિ રાખે છે તેઓ જ “શ્રમણ છે આ ઉપરની વાતે શ્રમણ થવા માટેનું કારણ છે एस धम्मे सुद्धे " मा सूत्राशयी श्री सुधर्मा स्वाभास ती १२ अथित ધર્મમા હિંસા વગેરે દેશના અભાવથી શુદ્ધતાનું કથન કર્યું છે આ શુદ્ધ ધર્મને બેધક બધ કરાવનારી હોવાથી જ દ્વાદશાંગીમા પ્રવચનતા આગ, सवा- જૂરતા સિદ્ધ થાય છે. ભગવાને આગમાં પ્રવચનનું રૂપ “ का " मनगारपातयरिणी टीका १० १६ द्रौपदीचर्चा यथा भगरतीसरे- पवयषण भते । पचयण, पावयणी पचयण ? | "गोयमा! अरहा ताव णियमा पावयणी । पत्रयणं पुण दुवालसंगे गणिपिडगे । त जहा-आयारो० जाव दिष्टि- वाओ । इति, (श० २० उ०८) भते ! हे भदन्त ! पचयण प्रवचन-कि प्रवचन, उत-" पावयणी" प्रवचनी प्रवचनम् ? | " गोयमा !" हे गौतम ! ' अरहा' अर्हन् 'तार' तावत् नियमात्मवचनी । प्रवचन पुन 'दुवालसगे' द्वादशाङ्गी "गणिपिडगे "गणि- पिटकम् । तद् यथा-" आयारो जाव दिहिवाओ" आचाराङ्गादि यावत् दृष्टिवादः । इति, पुनस्तत्रैव-" से नृण भते ! तमेव सच्च नीसक ज जिणेहिं पवेइय १ । प्रवचन का स्वरूप और उसका प्रभाव-माहत्म्य आगमों में कहा है। जैसे भगवती सूत्र में पवयण भते' पचयण, पावयणी पवयण ? गोयमा ! अरहा ताव णियमा पावयणी । पवयण पुण दुवालसगे गणि- पिडगे । त जहो-आयारे जाच दिद्विवाओ । इति (श० २० उ ०८) भावार्थ-गौतमस्वामी पूछते हैं हे भगवन् ! प्रवचन प्रवचन है-या प्रवचनी प्रवचन है ' इस अश का समाधान करते हुए भगवान् करते हैं-हे गौतम ! गणिपिटक जो आचासंग से लेकर दृष्टिवाद तक द्वादशाग आगम है वह समस्त प्रवचन है। इस प्रवचन को अर्थत प्रकट करनेवाले श्री तीर्थकर प्रभु प्रवचनी हैं। उसी भगवती सूत्र में और भी यह कहा है कि-" से नृण भते ! तमेव सच्च निसक ज जिणेहिं पवेश्य । हता गोयमा ! तमेव सरच से नृण भते ! एव मणे भाडाभ्य ४ो छ र भगवती सूत्रमा “पवयण भते ! पवरण पावयणी परयण १ गोयमा ! परहा ताव णियमा पाक्यणी । पवयण पुण दुवालसगे गणि पिडगे | त जहा-आयारो जाव दिद्विवाओ । इति (श २० उ ८) ભાવાર્થ—ગૌતમ વામી પૂછે છે કે હે ભગવન ! પ્રવચન પ્રવચન છે કે પ્રવચની પ્રવચન છે? આ શ કાનું સમાધાન કરતા ભગવાન કહે છે-કે હે ગૌતમ! ગણિપિટક-કે જે આચારાગથી માડીને દૃષ્ટિવાદ સુધી દ્વાદશામાં આગળ છે તે સમસ્ત પ્રવચન છે અર્થત આ પ્રવચનને પ્રકટ કરનારા શ્રી તીર્થ કર પ્રભુ પ્રવચની છે તે ભગવતી સૂત્રમા જ આ પ્રમાણે કહેવામા આવ્યુ છે કે- (से नूण भते तमेव मच नीस क ज जिणेहिं पवेइय ! हता गोयमा । समेत सन्च से नूण भते ! एर मणे धारेमाणे एव परेमाणे आणाए आराहए Mak . जाताधर्म कयासो "जह मम ण पिय दुक्ख जाणिय एमेर मायनीवाण । न हणइ न इणायेइ य, सममणइ तेग सो समणो । इति" छाया-यथा मग न प्रिय दुःख, शात्वा एरमेव सर्पनी रानाम् । न इन्ति न घातयन्ति च समम् अणति तेन स समणः ।। च शब्दात् घ्नतथा यान समणुमानीत इत्यनेन प्रकारेण 'सममणति' त्ति सर्वजीवेपु तुल्य वर्तते यतस्तेनासो श्रमण इति गायार्थ । 'एस धम्गे मुद्धे' इत्यनेन आईत धर्मस्य हिंसादि दोपाभागङ्गगता शुद्ध स्वमुक्तम् । शुद्धधर्म योधकत्याच द्वादशाहयाः प्रपनत्वमागमत्व मऊस्कृष्टत्व च सिध्यति । प्राचनस्य स्वरूप माहात्म्य चाऽऽगमेषु भगवताऽमिहितम् । अनुयोगद्वार में- जह मम ण पिय दुःख जाणिय प्रमेय सध्वजीवाण । न हणह न हणावेइ य सममणइ तेण सो समणो ॥ इति । जिस प्रकार दुःख मुझे इष्ट नहीं है, उसी तरह वह दु.ख किसी भी ससारी जीवो को इष्ट नहीं है ऐसा समझ कर जो जीवों की विराधना स्वय नही करता और न दूसरों से करवाता है तथा समस्त जीवों में तुल्यता की भावना रखता है वही श्रमण है। श्रमण होने में ये पूर्वोक्त पाते हेतु-कारण हैं। एस धम्मे सुद्धे " इस सूत्राश से श्री सुधर्मास्वामी ने तीर्थकर कथिन धर्म में हिंसादिक दोपो के अभाव से शुद्धता का कयन किया है । इत्त शुद्ध धर्म का बोधक-बोध करानेवाली होने से ही द्वादशागी में प्रवचनता, आगमता एव सर्वोत्कृष्टता सिद्ध होती है। भगवान ने अनुयोगाभा-जह मम ण पिय दुख जाणिय एमेव सजीवाण । न हणइ न हणावेइ य सममणइ तेण सो समणे ।। इति । જેમ મને દુ ખ ગમતું નથી તેમજ તે દુ ખ સ સારના કોઈ પણ જીવને ગમે જ નહિ આમ સમજીને જેઓ જીની વિરાધના પિતે કરતા નથી અને બીજાએથી કરાવતા નથી તેમજ બધા જ મા તુલ્યતા (સમાનતા) ની દૃષ્ટિ રાખે છે તેઓ જ “શ્રમણ છે આ ઉપરની વાતે શ્રમણ થવા માટે હેતુ કારણ છે एस धम्मे सुद्धे " मा सूत्राशयी श्री सुधा स्वामी ताय ४२ थित ધમાં હિંસા વગેરે દેના અભાવથી શુદ્ધતાનું કથન કર્યું છે આ શુદ્ધ ધર્મને બોધક-બેધ કરાવનારી હેવાથી જ દ્વાદશાંગીમા પ્રવચનતા આગમતા અને સર્વે- જૂતા સિદ્ધ થાય છે ભગવાને આગમાં પ્રવચનનું સ્વરૂપ અને व मनगारधर्मामृतवर्षिणीटी० २०१६ द्वौपदीचर छाया-इदमेव निर्ग्रन्य प्रवचन सत्यम् अनुत्तर, कैलिक, प्रतिपूर्ण, नैया- यिक, समृद्ध, शल्यकर्तन, सिद्धिमार्गः, मुक्तिमार्गः, निर्याणमार्गः, निर्माणमार्गः, अवितथम् , अमन्दिग्धम् , अब स्थिता जीवाः सिद्धयन्ति, युध्यन्ते, मुच्यन्ते, परिनिर्वान्ति, सर्व दु खानामन्त कुर्वन्ति । अन्यच्च-इमं च ण सन्चजगजीवरक्खणदयट्ठाए पावयण भगवया सुक- हिय" इति (प्रश्न सघर०) छाया- इद च खलु सर्वजगज्जीवरक्षणदयार्याय प्रवचन भगवता मुकथितम्' इति । धर्मध्यानस्याऽऽज्ञाविचयादि भेदेन चातुर्विध्य प्रदर्शयता भगवता-माधान्या- दाज्ञाविचयः प्राथम्येन प्रोक्त । भावार्थ-इस का स्पष्ट है। इसमें सूत्रकार ने मुख्यरूप से यही यात प्रकट की है कि इस निर्गन्य प्रवचन मार्ग में स्थित जीव अष्ट कोको विनाश कर सिद्धदशासपन्न हो जाते है। इस अवस्थाकी प्राप्ति होना ही जीवों के समस्त दुःखों का विनाश है। अन्यच-इमं व ण सन्चजगजीवरक्खणट्टयाए पावयण भगधया सुकहिय" इति-(प्रश्न संवर०) इस प्रवचन की प्ररूपणा करने का श्री तीर्थकर प्रभु का यही एक उद्देश रहा है कि समस्त ससारीजन इस प्रवचन के अभ्यास से सर्व जगत के जीवों की रक्षा करे और उनकी दया पालें। ध्यान का वर्णन करते हुए भगवान ने उस ध्यान के ४ भेद कहे हैं। उनमें धर्मध्यान के आज्ञाविचय आदि जो ४ पाये प्रकट किये આ કથનને ભાવાર્થ સ્પષ્ટ છે આમા ખાસ કરીને સૂત્રકારે એ જ વાત સ્પષ્ટ રીતે બતાવી છે કે આ નિગ્રંથ પ્રવચન માર્ગમાં સ્થિત જીવ અષ્ટ કર્મોને વિનાશ કરીને સિદ્ધિ દશા સપન થઈ જાય છે આ અવસ્થા મેળ વવી એ જ જીના સઘળા દુ અને વિનાશ છે अन्यच्च-इम च ण सव्व जगजीवरक्षणदयट्टयाए पावयण भगवया सुकहीय इति-(प्रश्न- सबर०) શ્રી તીર્થ કર પ્રભુને આ પ્રવચનની પ્રરૂપણ કરવાને એ જ ઉદેશ રહ્યો છે કે બધા સસારી અને આ પ્રવચનના અભ્યાસથી જગતના સર્વે જીની રક્ષા કરે અને તેમની દયા પાળે ધ્યાનનું વર્ણન કરતા ભગવાને તેના ચાર ભેદ વર્ણવ્યા છે તેમા ધમ ના આશા-વિચય વગેરે ચાર ઉપભેદે સ્પષ્ટ કરવામાં આવ્યા છે माताधर्मकथा इता गोयमा ! तमेव सच्चं । से नूण भते ! ए मणे धारेमाणे एन परेमाणे आणाए आराहए भवइ । इता गोयमा । तर" ति। छाया-अथ नून भदन्त । तदेव सत्य निश्शक यज्जिनः मवेदितम् ? | हन्त गौतम । तदेव सत्यम् । अथ नून भदन्त १ एव मनसि धारयन एव प्रकुर्वन् आज्ञाया आराधको भाति १ त गौतम ! तदेव" इति । आवश्य सत्रेऽपि-"इणमेव निग्गय पावयण सच्च अणुत्तर केवलिय पडि- पुन्न नेयाउय समुद्ध स लगत्तण सिदिमग्ग मुत्तिमग्ग निज्जाणमग्ग निवाणमग्ग अवितहमसदिद्ध । इत्थठिया जीवा सिझवि पुण्झति मुच्चति परिणिन्याएति सम्बदु खाणमंत करति। धारेमाणे एव पकरेमाणे आणाए आरोहए भवइ । हता गोयमा ! त चेव इति " इस सूत्र का भावार्थ यह है कि प्रत्येक मुमुक्षु ( मोक्षाभि लापी) जन को अपने हृदय में इस बात का पूर्णदृढ विश्वास रखना चाहिये कि जो जिनेन्द्र देव ने प्रतिपादित किया है वही वास्तविक तत्त्व है-उसमें किसी भी प्रकार की शका के लिये स्थान नहीं है इम प्रकार के दृढ विश्वास से उसे अपने मन में धारण करनेवाला और उसके अनुसार ही अपनी प्रवृत्ति करनेवाला मोक्षाभिलापीजन तीर्थकरप्रभुकी आज्ञाका आराधक होता है आवश्यक सूत्र में भी यही बात कही गई है इणमेव निग्गय पावयण सच्च अणुत्तर केवलिय पडिपुन्न नेया उय ससुद्ध सल्लगत्तण सिद्धिमगं मुत्तिमग्गं णिज्जाणमग्ग निव्वाणमग्ग अवितहमसदिद्ध । इत्थ ठिया जीवा सिज्झति घुझ ति मुच्चति परिणि बाएति सव्वदु खाणमत करति । भवइ । ह ता गोयमा । त चेव इति ) मा सूत्री मावा मा प्रभारी छ । દરેક મેક્ષ ઈચ્છનારી વ્યક્તિને પિતાના હૃદયમા સપૂર્ણપણે આ વાતની ખાતરી થવી જોઈએ કે જે જીતેન્દ્ર દેવે પ્રતિપાદિત કર્યું છે તે જ વાસ્તવિક તત્વ છે તેમાં લગીરે શ તો નથી આ જાતના દઢ વિશ્વાસથી તેને પોતાના મનમાં કરનાર અને તે મુજબ જ આચરણ કરનારી મને ઈચ્છનારી વ્યક્તિ પ્રભુની આજ્ઞાની આરાધક હોય છે આવશ્યક સૂત્રમાં પણ એ જ વાત કહેવામાં આવી छ-(इणमेव निग्गय पावयण सच्च अणुत्तर देवलिय पडिपुन नेयाउय ससुद्ध सलगत्तण सिद्धिमग मुत्तिमा णिज्जाणमग निव्वाणमग अवितहमम दिद्ध । इत्य ठिया जोवा सिन्मति बुज्झति मुच्च ति परिणिवाएति सव्व कर ति। " . मनगारधर्मामृतवर्षिणी ० १६ द्वौपदोधरी छाया-इदमेव निर्ग्रन्थ माचन सत्यम् अनुत्तर, कैलिक, प्रतिपूर्ण, नैया- यिक, समुद्र, शल्यकर्तन, सिद्धिमार्ग', मुक्तिमार्गः, निर्याणमार्गः, निर्वाणमार्गः, अवितथम् , अमन्दिग्धम् , अब स्थिता जीवाः सिद्धयन्ति, बुध्यन्ते, मुच्यन्ते, परिनिर्वान्ति, सर्व दु खानामन्त कुर्वन्ति । अन्यच्च-इम च ण सन्चजगजीवरक्खणदयट्ठाए पावयण भगवया सुक- हिय" इति (प्रश्न सर०) छाया- इद च खलु सर्वजगज्जीवरक्षणदयार्याय प्रवचन भगवता मुकथितम्' इति । धर्मध्यानस्याऽज्ञाविचयादि भेदेन चातुर्विध्य प्रदर्शयता भगवता-प्राधान्या- दाज्ञाविषयः प्राथम्येन प्रोक्त । भावार्थ-इस का स्पष्ट है। इसमें सूत्रकार ने मुख्यरूप से यही बात प्रकट की है कि इस निर्ग्रन्य प्रवचन मार्ग में स्थित जीव अष्ट काँका विनाश कर सिद्धदशासपन्न रो जाते हैं। इस अवस्थाकी प्राप्ति रोना ही जीवों के समस्त दुःखो मा विनाश है। अन्यच्च-इमं च ण सधजगजीवरक्खणट्टयाए पावयण भगवया सुकहियं" इति-(प्रश्न सवर०) इस प्रवचन की प्ररूपणा करने का श्री तीर्थकर प्रभु का यही एक उद्देश रहा है कि समस्त ससारीजन इस प्रवचन के अभ्यास से सर्व जगत के जीवों की रक्षा करे और उनकी दया पालें। ध्यान का वर्णन करते हुए भगवान ने उस ध्यान के ४ भेद कहे हैं। उनमें धर्मध्यान के आलाधिचय आदि जो ४ पाये प्रकट किये આ કથનને ભાવાર્થ ૫ટ છે આમા ખાસ કરીને સૂત્રકારે એ જ વાત સ્પષ્ટ રીતે બતાવી છે કે આ નિર્ચ થ પ્રવચન માર્ગમાં સ્થિત જીવ અષ્ટ કર્મોને વિનાશ કરીને સિદ્ધિ દશા સંપન્ન થઈ જાય છે આ અવસ્થા મેળ વવી એ જ જીવોના સઘળા દુખનો વિનાશ છે अन्यर-इम पण सव्व जगजीवरक्खणदयट्टयाए पावयण भगवया सुकहीय " इति-(प्रश्न- सबर०) શ્રી તીર્થ કર પ્રભુને આ પ્રવચનની પ્રરૂપણું કરવાને એ જ ઉદ્દેશ રહ્યો છે કે બધા સમાજને આ પ્રવચનના અભ્યાસથી જગતના સર્વે જેની રક્ષા કરે અને તેમની દયા પાળે દયાનનું વર્ણન કરતા ભગવાને તેના ચાર ભેદે વર્ણવ્યા છે તેમાં ३२० जाताधर्मकार हता गोयमा । तमेव सच्च । से नूण भते !पमणे धागेमाणे पर पकरेमाणे आणाए आराहए भाइ । हता गोयमा । तचेव"ति। छाया-अथ नून भदन्त । तदेव सत्य निश्शक यज्जिनः प्रवेदितम् । हन्त गौतम ! तदेव सत्यम् । अथ नून भदन्त १ एव मनसि धारयन एव प्रकुर्वन् आक्षाया आराधको भाति १ त गौतम । तदेव" इति । आवश्य सूनेऽपि-"इणमेव निग्गय पाययण सच्च अणुत्तर केलिय पडि- पुन्न नेयाउय समृद्ध सल्लगत्तण सिदिमग मुत्तिमग्ग निज्माणमग्ग निव्वाणमग्ग अपितहमसदिद्ध । इत्थठिया जीरा सिप्झ ति युज्झति मुच्चति परिणिन्चाएति सव्वदु खाणमंत करति । धारेमाणे एव पकरेमाणे आणाए आरोहए भवइ । ता गोयमा ! त चेव इति " इस सूत्र का भावार्थ यह है कि प्रत्येक मुमुक्षु ( मोक्षाभि लापी) जन को अपने हृदय में इस बात का पूर्णदृढ विश्वास रखना चाहिये कि जो जिनेन्द्र देव ने प्रतिपादित किया है वही वास्तविक तत्व है-उसमें किसी भी प्रकार की शका के लिये स्थान नहीं है इस प्रकार के दृढ विश्वास से उसे अपने मन में धारण करनेवाला और उसके अनुसार ही अपनी प्रवृत्ति करनेवाला मोक्षाभिलाषीजन तीर्थकरप्रभुकी आज्ञाका आराधक होता है आवश्यक सूत्र में भी यही बात कही गई है 'इणमेव निग्गय पावयण सच्च अणुत्तर केवलिय पडिपुन्न नेया उय ससुद्ध सल्लगत्तण सिद्धिमगं मुत्तिमनगं णिज्जाणमग्ग निव्वाणमग्ग अधितहमसदिद्ध । इत्थ ठिया जीवा सिज्झति घुज्झति मुच्चति परिणि याएति सव्वदुःखाणमत करति । भवइ । हता गोयमा ! त चेव इति ) मा सूत्रन लावाय मा प्रभारी छ । દરેક મેક્ષ ઈચ્છનારી વ્યક્તિને પિતાના હૃદયમા સપૂર્ણપણે આ વાતની ખાતરી થવી જોઈએ કે જે જીતેન્દ્ર દેવે પ્રતિપાદિત કર્યું છે તે જ વાસ્તવિક તત્વ છે તેમા લગીરે શકી નથી આ જાતના દઢ વિશ્વાસથી તેને પિતાના મનમા કરનાર અને તે મુજબ જ આચરણ કરનારી મોક્ષને ઈરછનારી વ્યક્તિ પ્રભુની આજ્ઞાની આરાધક હોય છે આવશ્યક સૂત્રમાં પણ એ જ વાત કહેવામાં આવી छ-(इणमेव निग्गय पावयण सन्च अणुत्तर केवलिय पडिपुन नेयालय ससुद सलगत्तण सिद्धिमगा मुत्तिमगा णिज्जाणमग्ग निव्वाणमग अवितहमस दिद्ध ! इत्य ठिया जीवा सिन्मति बुज्झति मुच्च ति परिणिवाएति सव्व ८ कर ति।
. - मनगारधर्मामृतवपिणी टी० १० १६ झोपदोपरी छाया-इदमेव निर्ग्रन्थ पाचन सत्यम् अनुत्तर, कैवलिक, प्रतिपूर्ण, नैया- यिक, सद, शल्यकर्तन, सिद्धिमार्गः, मुक्तिमार्गः, निर्याणमार्गः, निर्वाणमार्गः, अवितथम् , अमन्दिग्धम् , अब स्थिता जीवाः सिद्धयन्ति, युध्यन्ते, मुच्यन्ते, परिनिर्वान्ति, सर्व दु खानामन्त कुर्वन्ति । अन्यच्च-इम च ण सव्वजगजीवरक्खणदयट्ठाए पावयण भगवया सुक- डिय" इति (प्रश्न सार०) छाया-' इद च ग्खलु सर्वजगज्जीवरक्षणदयार्याय भवचन भगवता मुकथितम्' इति । धर्मध्यानस्याऽऽज्ञाविचयादि भेदेन चातुर्विध्य प्रदर्शयता भगवता-प्राधान्या- दाज्ञापिचयः प्राथम्येन पोक्त । भावार्थ-इस का स्पष्ट है। इसमें सूत्रकार ने मुरयरूप से यही यात प्रकट की है कि इस निन्य प्रवचन मार्ग में स्थित जीव अष्ट काँकी विनाश कर मिद्धदशासपन्न हो जाते हैं। इस अवस्थाकी प्राप्ति रोना ही जीचों के समस्त दुःखों का विनाश है। अन्यच्च-इम च ण सम्बजगजीवरक्खणट्टयाए पावयण भगवया सुकहिय" इति-(प्रश्न सवर०) इस प्रवचन की प्ररूपणा करने का श्री तीर्थकर प्रभु का यही एक उद्देश रहा है कि समस्त समारीजन इस प्रवचन के अभ्यास से सर्व जगत के जीवों की रक्षा करे और उनकी दया पालें। ध्यान का वर्णन करते हुए भगवान ने उस ध्यान के ४ भेद कहे । उनमें धर्मध्यान के आलाविचय आदि जो ४ पाये प्रकट किये આ કથનને ભાવાર્થ સ્પષ્ટ છે આમાં ખાસ કરીને સૂત્રકારે એ જ વાત સ્પષ્ટ રીતે બતાવી છે કે આ નિગ્રંથ પ્રવચન માર્ગમાં સ્થિત છવ અષ્ટ કને વિનાશ કરીને સિદ્ધિ દગા સ પન્ન થઈ જાય છે આ અવસ્થા મેળ વવી એ જ જીવેના સઘળા દુખને વિનાશ છે अन्यञ्च-इम च ण सव्व जगजीवरक्षणयट्टयाए पावयण भगवया सुकहीय इति-(प्रश्न- स वर०) શ્રી તીર્થ કર પ્રભુને આ પ્રવચનની પ્રરૂપણ કરવાને એ જ ઉદ્દેશ રહ્યો છે કે બધા સમારીને આ પ્રવચનના અભ્યાસથી જગતના સર્વ જીવોની રક્ષા કરે અને તેમની દયા પાળે વ્યાનનું વર્ણન કરતા ભગવાને તેના ચાર ભેદે વર્ણવ્યા છે તેમાં ધર્મધ્યાનના આશા-વિચય વગેરે ચાર ઉપભેદે સ્પષ્ટ કરવામાં આવ્યા છે पातालकथा हता गोयमा ! तमेर सच्च । से नूण भते ! ए मणे धारेमाणे पय परेमाणे आणाए आराइए भाइ । इता गोयमा ! त "त्ति । छाया-अथ नून भदन्त । तदेव सत्य निश्शत यज्जिनः प्रवेदितम् ? । हन्त गौतम ! तदेव सत्यम् । अथ नून भदन्त १ एव मनसि धारयन् एव प्रकुर्वन् आज्ञाया आराधको भाति १ इन्त गौतम ! तदेव" इति । आवश्य सूत्रेऽपि-"इणमेव निग्गय पारयण सच्च अणुत्तर केवलिय पडि- पुन नेयाउय समुद्ध सलगत्तण सिदिमग्ग मुत्तिमम्ग निज्जाणमग निव्वाणमन्ग अवितहमसदिद्ध । इत्थठिया जीया सिझ ति युज्झति मुच्चति परिणिच्चाएति सम्बदु खाणमत करति । धारेमाणे एवं पकरेमाणे आणाए आरोहए भवइ । हता गोयमा त चेव इति " इस सूत्र का भावार्थ यह है कि प्रत्येक मुमुक्षु (मोक्षाभि लापी) जन को अपने हृदय में इस बात का पूर्णदृढ विश्वास रखना चाहिये कि जो जिनेन्द्र देव ने प्रतिपादित किया है वही वास्तविक तत्त्व है-उसमें किसी भी प्रकार की शका के लिये स्थान नहीं है इस प्रकार के दृढ विश्वास से उसे अपने मन में धारण करनेवाला और उसके अनुसार ही अपनी प्रवृत्ति करनेवाला मोक्षाभिलापीजन तीर्थकरप्रभुकी आज्ञाका आराधक होता है आवश्यक सूत्र में भी यही बात कही गई है "इणमेव निग्गय पावयण सच्च अणुत्तर केवलिय पडिपुन्न नेया उय ससुद्ध सल्लगत्तण सिद्धिमग्ग मुत्तिमग्गं णिज्जाणमग्ग निव्वाणमग्ग अवितहमसदिद्ध । इत्थ ठिया जीवा सिज्झति घुझ ति मुच्चति परिणि याएति सव्वदुःखाणमत करति । भवइ । हता गोयमा । त चेव इति ) मा सूत्रता मापा 240 प्रभारी छ । દરેક મેક્ષ ઈચ્છનારી વ્યક્તિને પિતાના હૃદયમા સ પૂર્ણપણે આ વાતની ખાતરી થવી જોઈએ કે જે જીતેન્દ્ર દેવે પ્રતિપાદિત કર્યું છે તે જ વાસ્તવિક તત્વ છે તેમા લગીરે શ કા નથી આ જાતના દઢ વિશ્વાસથી તેને પિતાના મનમાં કરનાર અને તે મુજબ જ આચરણ કરનારી એક્ષને ઈરછનારી વ્યક્તિ પ્રભુની આજ્ઞાની આરાધક હોય છે આવશ્યક સૂત્રમાં પણ એ જ વાત કહેવામાં આવી छ-(इणमेव निग्गय पावयण सच्च अणुत्तर केवलिय पडिपुन नेयाउय ससुद सलगत्तण सिद्धिमा मुत्तिमग णिज्जाणमग्ग निव्वाणमग्ग अवितहमस दिद्ध ! इत्य ठिया जोया सिझ ति युज्हति मुच्च ति परिणिवाएति सव्व ८ कर ति। - मनगारधर्मामृतवषिणी री० म०१६ द्रौपदीय छाया-इदमेव निर्ग्रन्थ प्रवचन सत्यम् अनुत्तर, कैलिक, प्रतिपूर्ण, नैया. यिक, समृद्ध, शल्यकर्तन, सिद्धिमार्गः, मुक्तिमार्गः, निर्याणमार्गः, निर्माणमार्गः, अवितथम् , अमन्दिग्धम् , अत्र स्थिता जीवाः सिद्धयन्ति, युध्यन्ते, मुच्यन्ते, परिनिर्वान्ति, सर्व दु खानामन्त कुर्वन्ति । अन्यच्च--इम च ण सव्वजगजीवरक्खणदयट्टाए पावयण भगवया सुक- हिय" इति (प्रश्न सबर०) छाया- इद च बलु सर्वजगज्जीवरक्षणदयार्याय प्रवचन भगवता मुकथितम्' इति । धर्मध्यानस्याऽऽज्ञाविचयादि भेदेन चातुर्विध्य प्रदर्शयता भगवता-माधान्या- दाज्ञापिचयः माथम्येन प्रोक्त । भावार्थ-इस का स्पष्ट है। इसमें सूत्रकार ने मुरयरूप से यही यात प्रकट की है कि इस निग्रंन्य प्रवचन मार्ग में स्थित जीव अष्ट काँका विनाश कर सिद्धदशासपन्न हो जाते है। इस अवस्थाकी प्राप्ति रोना ही जीवों के समस्त दुःखों का विनाश है। अन्यञ्च-इमं च ण सव्वजगजीवरक्खणट्टयाए पावयण भगवया सुकहिय" इति-(प्रश्न संवर०) इस प्रवचन की प्ररूपणा करने का श्री तीर्थकर प्रभु का यही एक उद्देश रहा है कि समस्त ससारीजन इस प्रवचन के अभ्यास से सर्व जगत के जीवों की रक्षा करे और उनकी दया पालें। ध्यान का वर्णन करते हुए भगवान ने उस ध्यान के ४ भेद कहे हैं। उनमें धर्मध्यान के आज्ञाविचय आदि जो ४ पाये प्रकट किये આ કથનને ભાવાર્થ સપષ્ટ છે આમાં ખાસ કરીને સૂત્રકારે એ જ વાત સ્પષ્ટ રીતે બતાવી છે કે આ નિર્ચ થ પ્રવચન માર્ગમાં સ્થિત જીવ અષ્ટ કર્મોને વિનાશ કરીને સિદ્ધિ દશા સંપન્ન થઈ જાય છે આ અવસ્થા મેળ વવી એ જ જીવેના સઘળા દુખનો વિનાશ છે अन्यच्च-इम च ण सव्व जगजीवरक्षणदयद्वयाए पावयण भगवया मुकहीय " इति-(प्रश्न सबर०) શ્રી તીર્થ કર પ્રભુને આ પ્રવચનની પ્રરૂપણ કરવાને એ જ ઉદ્દેશ રહ્યો છે કે બધા સમારીને આ પ્રવચનના અભ્યાસથી જગતના સર્વ જીવોની રક્ષા કરે અને તેમની દયા પાળે ઠયાનનું વર્ણન કરતા ભગવાને તેના ચાર ભેદ વર્ણવ્યા છે તેમાં ધર્મધ્યાનના આશ-વિચય વગેરે ચાર ઉપભેદ સ્પષ્ટ કરવામાં આવ્યા છે पाताधर्मकपार हता गोपमा ! तमेव सच्च । से नूण मते ! मणे घारेमाणे य पकरेमाणे आणाए आरादए भाइ । हता गोयमात "ति। छाया-अथ नून भदन्त । तदेव सत्य निश्शत यज्जिनः मवेदितम् ? । हन्त गौतम ! तदेव सत्यम् । अथ नून भदन्त १ एव मनसि धारयन् एव मकुर्वन् आझाया आराधको भवति ? हन्त गौतम । तदेव" इति । आवश्य सोऽपि-"इणमेव निग्गय पाययण सच्च अणुत्तर केलिय पडि- पुग्न नेयाउय ससुद्ध सलगत्तण सिदिमाग मुत्तिमग्ग निजाणमग निवाणमग्ग अचितहमसदिद्ध । इत्याठिया जीया स्थिति युज्झति मुच्चति परिणिन्चाएति सव्वदु खाणमत करति। धारेमाणे एव पकरेमाणे आणाए आरोहए भवह । हता गोयमा ! त चेव इति " इम सूत्र का भावार्थ यह है कि प्रत्येक मुमुक्षु (मोक्षाभि लाषी) जन को अपने हृदय में इस बात का पूर्णदृढ विश्वास रखना चारिये कि जो जिनेन्द्र देव ने प्रतिपादित किया है वही वास्तविक तत्व है-उसमें किसी भी प्रकार की शका के लिये स्थान नहीं है इस प्रकार के दृढ विश्वास से उसे अपने मन में धारण करनेवाला और उसके अनुसार ही अपनी प्रवृत्ति करनेवाला मोक्षाभिलाषीजन तीर्थकरप्रभुकी आज्ञाका आराधक होता है आवश्यक सूत्र में भी यही बात कही गई है "इणमेव निग्गय पावयण सच्च अणुत्तर केलिय पडिपुन्न नेया उय ससुद्ध सल्लगत्तण सिद्धिमग्ग मुत्तिमर्ग णिजाणमग्ग निव्वाणमन्ग अवितहमसदिद्ध । इत्थ ठिया जीवा सिज्झति घुन्झ ति मुच्चति परिणि वाएति सव्वदुःखाणमत करति। भवइ । हता गोयमा । त चेव इति ) मा सूत्रन लावा 20 अभाव छ । દરેક મેક્ષ ઈચ્છનારી વ્યક્તિને પિતાના હૃદયમા સ પૂર્ણપણે આ વાતની ખાતરી થવી જોઈએ કે જે જીનેન્દ્ર દેવે પ્રતિપાદિત કર્યું છે તે જ વાસ્તવિક તત્વ છે તેમાં લગીરે શકી નથી આ જાતના દઢ વિશ્વાસથી તેને પોતાના મનમાં કરનાર અને તે મુજબ જ આચરણ કરનારી મોક્ષને ઈચ્છનારી વ્યક્તિ પ્રભુની આજ્ઞાની આરાધક હોય છે આવશ્યક સૂત્રમાં પણ એ જ વાત કહેવામાં આવી छ-(इणमेव निग्गथ पावयण सच्च अणुत्तर केवलिय पडिपुन नेयाच्य ससुद सलगत्तण सिदिमग मुत्तिमग गिजाणमग्ग निषाणमग्ग अवितहमस दिद्ध ! इत्य ठिया जीवा सिन् ति युवति मुन्धति परिणिवाएति सव्व दु, कर ति।
भनगारधर्मामृतर्यापणी वी० १० १६ द्रौपदीचर्चा है, अनवद्य है, हम में प्रत्येक जीवादिक पदार्थ का विवेचन बहुत ही अच्छी तरह से किया गया है अतः यह महतार्थ है इसका प्रभाव भी अद्वितीय है इसकी छत्रछाया में आने से प्रत्येक भव्य जीव आस्मक ल्याण के अपने अन्तिम लक्ष्य की मिद्धि कर लिया करते हैं। इस में प्रतिपादित तत्व सामान्यजन नही जात कर सकते हैं-द्रव्याधिक और पर्यायार्थिक नयल्प दो दृष्टिया जिनके पास हे-वे ही इसमें प्रतिपादित विषय को अच्छी तरह ज्ञात कर सकते हैं। इसमें जो भी कुछ कथन सर्वज्ञ भगवान ने किया है वह इन्ही दो दृष्टियो को सामने रखकर किया गया है यदि एक दृष्टि को ही प्रधान रखकर इसके तत्व को समझने की चेष्टा को जाय तो वह प्रतिपाद्य विपय ठीक २ नही सम झा जा सकता है। तथा इस प्रकार की प्ररूपणा अन्यथा भी ज्ञात होने लगती है इसलिये दूसरी दृष्टि को सामने रखकर ही वह विषय ठीक २ रीति से समझ में आ सकता है, अन इसी अभिप्रायसे इसे निपुण जनवेद्य कहा है तथा इस में प्रत्येक पदार्थ को उत्पादन व्यय और धोव्य आत्मक कहा गया है-वह भी द्रव्य और पर्याय की अपेक्षा से ही कहा गया है द्रव्य की अपेक्षा से प्रत्येक जीवादिक पदार्थ प्रौव्यरूप અતીવકુશળ છે દર દરેક જી ને આ હિતકારી છે અનવદ્ય છે, એમાં દરેકે દરેક જીવ વગેરે પદાર્થનું વિવેચન બહુજ સૂક્ષમતા પૂર્વક કરવામાં આવ્યું છે એથી આ મહાઈ છે અને પ્રભાવ પણ અદ્વિતીય છે, આની છત્ર-છાયામા આવવાથી દરેક ભવ્યજીવ આત્મકલ્યાણ વિષયક પિતાની અતિમ લક્ષમની સિદ્ધિ પ્રાપ્ત કરી લે છે. આમાં પ્રતિપાદિત તત્વ સામાન્ય લેકે જાણી શક્તા નથી દ્રવ્યાર્થિક તેમજ પર્યાયાર્થિક નયરૂપ બે દિઓ જેની પાસે છે તેઓ જ આમાં પ્રતિપાદિત વિષયને સારી પેઠે સમજી શકે છે સર્વજ્ઞ ભગવાને આમા જે કઈ કહ્યું છે તે બધુ આ પૂત બને દષ્ટિએ ને પિતાની સામે રાખીને જ કહ્યું છે જે એક-દૃષ્ટિને જ પ્રધાન સમજીને તેના તત્વને જાણવાની ચેષ્ટા કરવામા આવે તો તે પ્રતિપાદ્ય વિષય યથાવત્ સમજી શકાય જ નહિ તેમજ આ જાતની પ્રરૂપણ અ યથા પણ માલુમ થવા માડે છે એથી બીજી દષ્ટિને પિતાની સામે રાખીને જ વિચાર કરીએ તે વિષય સરસ રીતે સમજી શકાય તેમ છે. આ પ્રોજનથી જ આને “નિપુણજન-વેધ કહેવામાં આવ્યું છે તેમજ આમાં જે દરેક પદાર્થને ઉત્પાદ, વ્યય અને પ્રૌવ્ય આત્મક કહેવામાં આવ્યું છે તે પણ દ્રવ્ય અને પર્યાયની અપેક્ષાથી જ કહેવામાં આવ્યું છે જ્યની mereringer " -- यथा भगवती सप्रे--(२०२५ उ०७) "धम्मे झाणे चउबिहे पणते, त जहा-माणापिचए" वायवियप, विवागविचए, सठाणविचए॥ छाया-धर्मध्यान चतुर्विध प्राप्तम् । तद् यथा-आमाविचया, अपाय विषय , विपाकविचयः, सस्थानपिचयः। अत्र मसङ्गवशाद् आशाविचय एव व्याख्यायते- आज्ञाविचयश्च-आज्ञाया पर्यालोचन, आक्षा-स शमणीत आगम', तामाशा मित्य विचिनुयात्-पर्यालोचयेत् - पूर्वापरविशुद्धमतिनिपुणामोपजीवकार्याहता हैं उन में सर्व प्रथम आज्ञाविचय को जो कहा है उसका कारण यरी है कि शेष तीन पायों (भेदों) में प्रधान है। भगवती सूत्र श. २५ उ. ७ में देखो यह वर्णन इस प्रकार से हुआ है-धम्मे झाणे चविहे पण्ण ते, त जरा-आणाविषण, अवायविचए, विवागविचए, सठाणविचा॥ अर्थ-धर्मध्यान ४ प्रकार का है (१) अज्ञाषिचय (२) अपायविषय (३) विपाकविषय (४) सस्थानविचय । प्रसगवश यहां आाविचय पर विवेचन किया जाता है-तीर्थकर प्रभु की आज्ञा का विषय-पर्यावचन-विचार करना सो आज्ञाविषय है सर्वज्ञ कथित आगम का नाम आज्ञा है । उस आगमरूप आज्ञा का इस प्रकार से विचार करना चाहिये-यह प्रभु प्रतिपादित आगम पूर्वा- पर विरोध रहित होने से विशुद्ध है, प्रत्येक सूक्ष्म अन्तरित और दूरार्थ के प्रतिपादन करने में अतिनिपुण है, प्रत्येक जीवों का यह हितकारी તેએામાં જે સૌ પ્રથમ આજ્ઞા વિચયને જે ઉલ્લેખ કરવામાં આવ્યો છે તેનું કારણ એ જ છે કે બાકી રહેલા ત્રણ ઉપભેદેમા તે મુખ્ય છે ભગવતી સૂત્ર શ ૨૫ ૬ ૭ મા એને માટે જોવું જોઈએ ત્યા આનું વર્ણન કરવામાં આવ્યુ छे-धम्मे झाणे चउविहे पण्णते, त जहा-आणाविचए, अवायविचए, विवाग विचए, स ठाणविचए ॥ અર્થ—ધર્મધ્યાનના ચાર પ્રકાર છે (૧) આજ્ઞા-વિચય, (૨) અપાય. वियय, (3) वि वियय, (४) सथान Gul પ્રસ ગવશ અહીં આજ્ઞાવિચય વિષે વર્ણન કરવામા આવે છે તીર્થંકર પ્રભુની આજ્ઞાને વિચય-પર્કોચન-વિચાર કરવો તે આજ્ઞાવિચય છે સર્વ કથિત આગમનું નામ આજ્ઞા છે તે આગમરૂપ આજ્ઞાને આ રીતે વિચાર કરવું જોઈએ કે આ પ્રભુ પ્રતિપાદિત આગામ પૂર્વાપર વિરોધ ૨ બદલ વિશુદ્ધ છે, દરેક સૂક્ષ્મ અતરિત અને દરાર્થના .
मनारधर्मामृतपिणी 10 १० १६ द्रौपदीची है, अन वद्य है, हम में प्रत्येक जीवादिक पदार्य का विवेचन बहुत ही अच्छी तरह से किया गया है अतः यह महार्थ है इसका प्रभाव भी अमितीय है इसकी छनडाग में जाने से प्रत्येक भव्य जीव आत्मक ल्याण के अपने अन्तिम लक्ष्य की सिद्धि कर लिया करते हैं। इस में प्रतिपादित तत्व सामान्यजन नही ज्ञात कर सकते हैं-द्रव्यार्थिक और पर्यायाधिक नयरूप दो दृष्टिया जिनके पास है-वे ही इसमें प्रतिपादित चिपय को अच्छी तरह ज्ञात कर सकते हैं। इसमें जो भी कुछ कथन सर्वज भगवान ने किया है पर इन्ही दो दृष्टियो को सामने रखकर किया गया है यदि एक दृष्टि को ही प्रधान रखकर इसके तत्व को समझने की चेष्टा को जाय तो पर प्रतिपाद्य चिपय टीक २ नहीं सम- झा जा सकता है । तथा इस प्रकार की प्ररूपणा अन्यथा भी ज्ञात होने लगती है इमलिये दूसरी दृष्टि को सामने रखकर ही वह विषय ठीक २ रीति से समझ में आ सकता है, अन इसी अभिप्रायसे इसे निपुण जनवेद्य कहा है तथा इस में प्रत्येक पदार्थ को उत्पादन व्यय और धोव्य आत्मक कहा गया है-वह मो द्रव्य और पर्याय की अपेक्षा से ही कहा गया है द्रव्य की अपेक्षा से प्रत्येक जीवादिक पदार्थ धौव्यरूप અતીવકુશળ છે દરેકે દરેક જી ને આ હીતકારી છે અનવદ્ય છે, એમા દરેકે દરેક જીવ વગેરે પદાર્થનું વિવેચન બહુજ સૂક્ષમતા પૂર્વક કરવામાં આવ્યું છે એથી આ મહાર્થ છે અને પ્રભાવ પણ અદ્વિતીય છે, આની છત્રછાયામાં આવવાથી દરેક ભવ્યજીવ આત્મકલ્યાણ વિષયક પિતાની અતિમ લવની સિદ્ધિ પ્રાપ્ત કરી લે છે. આમાં પ્રતિપાદિત તત્વ સામાન્ય લોકે જાણી શકતા નથી દ્રવ્યાર્થિક તેમજ પર્યાયાર્થિ, નયરૂપ બે દષ્ટિએ જેની પાસે છે તેઓ જ આમાં પ્રતિપાદિત વિષયને સારી પેઠે સમજી શકે છે સર્વજ્ઞ ભગવાને આમા જે કઈ કહ્યું છે તે બધુ આ પૂર્વોકત અને દષ્ટિએ ને પિતાની સામે રાખીને જ કહ્યું છે જે એક-દૃષ્ટિને જ પ્રધાન સમજીને તેના તત્વને જાણવાની ચેષ્ટા કરવામાં આવે છે તે પ્રતિપાદ્ય વિષય યથાવત્ સમજી શકાય જ નહિ તેમજ આ જાતની પ્રરૂપણ અન્યથા પણું માલુમ થવા માંડે છે એથી બીજી દષ્ટિને પિતાની સામે રાખીને જ વિચાર કરીએ તે વિષય સરસ રીતે સમજી શકાય તેમ છેઆ પ્રજનથી જ આને “નિપુણજન–વેદ્ય' કહેવામાં આવ્યું છે તેમજ આમાં જે દરેક પદાર્થને ઉત્પાદ, વ્યય અને ત્રૌવ્ય આત્મક કહેવામા આવ્યું છે તે પણ દ્રવ્ય અને પર્યાયની અપેક્ષાથી જ કહેવામાં આવ્યું છે દ્રવ્યની पाताधर्मकथा मनवां महाथी महानुभाग निपुर्णजनविशेया द्रव्यपर्यायमपनवतीमनापनि धमाम् । अस्य प्रवचनस्याऽऽधन्तरहितत्व च भगता नन्दीसूत्रे निगदितम् - " इच्चेदय दुगालसग गणिपिडग न कयाइ णासी ।।" इत्येतद् द्वादशाङ्ग गणिपिटक न कदापि नासीत् ।। इत्यादि । है और पर्याय की अपेक्षा से उत्पादन व्ययरूप है, इसलिये भी जिन प्रतिपादित आगमरूप आज्ञा स्त्रय द्रव्य और पर्याय के विस्तार वाली है। अथवा जीवादिक ममम्त ६ द्रव्यो की निकालयः समस्त पर्याय इसमे प्रतिपादित हुई है, अथवा कोई भी द्रव्य कभी भी पर्याय रहित नहीं हो सकता है-स्वभाव पर्यायें और व्यजन पर्याये, विभाव पर्याय और अर्थपर्याये प्रत्येकक्षण में समस्तद्रव्यों में होती रहती हैं, इत्यादिरूप से द्रव्य और पर्यायो का प्रतिपादन इस आजा में भगवान ने प्रदर्शित किया है इस अपेक्षा भी यह द्रव्य और पर्याय के विस्तार वाली मानी गई है तथा यह अनादि अनन्त है न कभी इस आज्ञा की आदि हुई है और न कभी इसका विनाश होगा। नदीसूत्र में भी प्रवचन की अनादि अनन्तता के विषय मे " इच्चेइय दुवालसम गणिपिडिग न कयाइनासी" यही कहा है-ऐसा कोई सा भी काल नहीं था कि जिस काल में इस दोदशागरूप गणिपिटकका सद्भाव नहीं था। અપેક્ષાથી દરેક જીવ વગેરે પદાર્થ પ્રીવ્યરૂપ છે અને પર્યાયની અપેક્ષાથી ઉત્પાદ પયરૂપ છે એટલા માટે પણ જિન પ્રતિપાદિત આગામરૂપ આજ્ઞા પિતે દ્રવ્ય અને પર્યાયના પ્રપચ (વિસ્તાર) વાળી છે અથવા તે જીવ વગેરે બધા ૬ દ્રવ્યના નિકાલ વર્તા સમસ્ત પર્યાયે આમાં પ્રતિપાદિત થયા છે, અથવા કઈ પણ દ્રવ્ય કેઈ પણ દિવસે પર્યાય રહિત થઈ શકતુ નથી સ્વભાવ પર્યા અને વ્ય જન પર્યા, વિભાવ પર્યાયો અને અર્થ પર્યાયે દરેક ક્ષણમાં બધા દ્રવ્યમા થતી રહે છે ઈત્યાદિ રૂપથી દ્રવ્ય અને પર્યાયોનું પ્રતિપાદન આ આજ્ઞામાં ભગવાને બતાવ્યું છે આ અપેક્ષાથી પણ આ દ્રવ્ય અને પર્યાયના પ્રપ ચ (વિસ્તાર) વાળી માનવામાં આવી છે તેમજ આ છે કેઈ દિવસ આજ્ઞાની આદિ થઈ નથી અને કોઈ પણ દિવસે આને વિનાશ थरी न& नदीसूत्रमा ५ अपयननी मनाहि मन ताने सती (इच्चे इय दुवालसग गणिपिडग न कयाइनासी) मे पात सुवामा भाषा એ કઈ પણ કાળ હતો નહિ કે તે કાળે આ દ્વાદશાગ રૂપ ગણિપિટકને સદુભાવ હતું નહિ આ રીતે આ આગમની મત્તા અથવા તે અનાદિ અન ત भनेगारधामृतपिणी टो० अ० १६ द्रौपदीचों इस्य चागममाहात्म्यपर्यालोचनरूपस्य धर्मध्यानस्याss-ईताऽऽज्ञाविप- यत्वाद् धर्मभ्यानस्य धर्मत्व सिद्धम् । तथा-हिंसादि-दोपलेशेनाप्यसपृक्तस्य शुद्ध धर्मस्प बोधकत्वादहिंसाप्रधानस्य प्रवचनस्य श्रद्धेयत्व च सिद्धम् । अहिंसायामईतो भगवत आज्ञा प्रदर्शिता, एव सयमेपि तदाज्ञा वर्तते । यथा -साताधर्मकथाऽङ्गमूत्रे-( प्रथमा ययने) तएण समणे भगा महावीरे मेह कुमार सयमेव पयावेइ, जार सयमेव आयार जाव धम्ममाइक्खइ एव खलु देवाणुप्पिया ! गतव्य चिट्टियव्य णिसीइयव्य इस प्रकार इस आगम की महत्ता अथवा उसके महात्म्य का विचार करना ही आज्ञाविचय नामक धर्मभ्यान का प्रथम भेद है। इस ध्यान में अर्हतप्रभु की आज्ञा का ही विचार होता है-अतः इस ध्यान मे उन की आज्ञा का विषय करनेवाला होने से धर्मरूपता सिद्ध है तथा हिंसा- दिक दोप के लेश से भी रहित ऐसे शुद्ध धर्म का योधक होने से अहिंसाप्रधान इस प्रवचन में श्रद्धेयता सिद्ध होती है। इस पूर्वोक्त प्रकार से अहिंसा में अहंत भगवान् की आज्ञा का प्रदर्शन कर अब सयममें भी उनकी आज्ञा इसी प्रकार को है यह प्रकट करने के लिये सर्व प्रथम ज्ञातीधर्मकथाङ्ग सूत्र से इस विषय की पुष्टि करते हुए सूत्रकार कहते हैं । तएण समणे भगव महोवीरे मेरकुमार सयमेव पवावेइ, जाव धम्ममाइक्खड, एव पल देवाणुप्पिया 1 गतव्व चिट्ठियब णिसी- તેઓને લગતો વિચાર કરવો એ જ આજ્ઞા-વિચય નામક ધર્મધ્યાનને પ્રથમ ભેદ છે આ ધ્યાનમા અહંત પ્રભુની આજ્ઞા વિશે જ વિચાર હોય છે તેથી આ ધ્યાનમાં તેમની આજ્ઞાને વિષય પ્રતિપાદિત થયે છે માટે આમા ધર્મ રૂપતા સિદ્ધ છે તેમજ હિંસા વગેરે દેથી પણ રહિત શુદ્ધ કર્મને બેધક હેવાને કારણે અહિંસા પ્રધાન આ પ્રવચનમાં પ્રયતા સિદ્ધ થાય છે આ પ્રમાણે પૂર્વોક્ત રીતે અહંત ભગવાનની અહિંસાના વિષે આજ્ઞા બતાવીને હવે આગળ સૂત્રકાર સયમ માટે પણ તેઓશ્રીની આજ્ઞા આ રીતે જ છે આ વાત સ્પષ્ટ કરવાને માટે સૌ પ્રથમ જ્ઞાતા-ધર્મકથા સૂત્રથી આ વિષયની પુષ્ટિ કરતા કહે છે— तए ण समणे भगव महावीरे मेह कुमार सयमेव पवावेइ, जाव मय धम्ममाइक्खन, एव खल देवाणुप्पिया ! ग तव्य चिह्नि- . मेव आधार जाव की प्रवृत्तिशील होने से ही मुनि द्वारा अपने सयम की रक्षा होती है इस विषय में मुनि को कभी भी प्रमाद नहीं करना चाहिये । दशव कालिक सूत्र में भी यही कहा है-"जय चरे जय चिट्ठे जयमाले जय यव णिसीइयव्य तुट्टियन भुजियव्य, भासियव्य, एर उद्धाय उटाय पाणेहि भूयेहि जावेहि सहि सजमेण सजमियन्य अरिंस च ण अठे णो पमाएयव्व શ્રમણ ભગવાન મહાવીરે જાતે પોતાના હાથથી જ મેઘકુમારને જ્યારે ભાગવતી દીક્ષા આપી અને તેને મુનિવિષયક આચાર વગેરેને લગતે ઉપદેશ આપે ત્યારે તેઓશ્રીએ તેને ઉપદેશમાં એ જ વાત સમજાવી કે હે દેવાનું પ્રિય ! ચાલતા ઊભા રહેતા, બેસતા, સૂઈ જતા, આહાર કરતા અને વાતચીત કરતાં પ્રાણુંઓ, ભૂતે, જી અને સામા હંમેશા સથમથી જ પ્રવૃત્તિ કરતા રહેવું જોઈએ મુનિની એ જ ફરજ છે કે તે દરેક શારીરિક અને વાચનિક ક્રિયા મા સ યમિત પ્રવૃત્તિ કરે આ રીતે પ્રવૃત્તિશીલ થઈને રહેવાથી જ મુનિઓ કર જોઈએ નહિ દશવૈકાલિક સૂત્રમાં પણ એજ વાત કહેવામાં माताकपाल तुपटिगण भुजियम मासियम्प, पर उवाय उद्याय पाहिँ भृयेहि जीवहिं सत्तेहि सनमेण मनगियणं, अस्सिन अटे णो पमाएयर " इति । ततः खलु श्रमणो भगार महागीरो मेय कुमार सयमा प्रत्राजयति, यार सत्यमेव आचार यावद धर्ममारयाति-प खल हे देशानुमिय ! गन्तव्य,स्थातव्य' निपत्तन्य, त्यागपतयितव्य भोक्तव्य मापितव्यत्, एपमुत्या य उत्याय प्राणेषु भूतेषु जीयेषु सत्त्वेपु सयमेन सयन्तव्यम् , अस्मिथ खलु अर्थे नो प्रमादयितव्यम् । इति, दसवैकालिक एने ऽपि- जय चरे जय पिटे जयमासे जय सए । जय मुंजतो भासतो पारसम्म न वई ॥" इयव्य तुयट्टियव्य भुजियन्य भासियञ्च ण्य उट्टाय उट्टाय पाणेहिं भूयहि जीवेरि सत्तेरि सजमेण सजमियन्य, अस्सिच ण अढे णो पमाण्यच" श्रमण भगवान महावीर ने स्वयं अपने ही हाथों से मेयमारको जय भागवती दीक्षा प्रदान की उनके लिये मुनि विपयक आचार आदि का जय उन्हो ने उपदेश दिया तब उन्हो ने उसे यही समझाया कि हे देवानुप्रिय! चलते, ठरते, बैठते, लेटते, आहारकरते और यात चित करते समय प्राणियो, भूतो, जीयो, और मत्वो में सदा सयम से ही प्रवृत्ति करनी चाहिये। मुनि का यहो कर्तव्य है कि वह प्रत्येक शारीरिक एव वाचनिक क्रियाओ में, सयमित प्रवृत्ति करें। इस प्रकार આ બાબતમા મુનિએ કોઈ પણ દિવસે પ્રમાદ - " ડે સયમની રક્ષા થાય છે । जय विद्वे जयमासे जय सप, जय सुजतो भास तो an - मनपारधर्मामृतपाणी at R०१६ श्रीपदीया छाया-यतं चरेत् यत निप्ठेन्, यतमासीत यत शयीत । यत मुखानो भापमान पापर्म न वनाति ॥ १ ॥ इति । तत्रैव-' संजम निहुओ चर" इत्यादि । छाया-सयम निभृतश्वर' इति । सयमे तीर्थपरस्याना प्रदर्शिता, इदानीं तपसि तदाशा प्रदर्यते । यथा-दश कालिक सूशे-(द्वितीयाध्ययने) आयाश्याही चय सोगमष्ट इति । आयावयाही आतापयम्आता. पनारूपतपोधर्माराधनेन तनु गोपय, " सोगमल" सौकुमार्य " चय" स्यज परिवर। . सण, जय भुजतो भासतो पावकम्म न बधाई" सकल सयमियो को पूर्ण सावधान तापूर्वक ही चलना चाहिये और पूर्ण सावधानता पूर्वकटी पैठना चाहिये । उठने बैठने में तथा आहारादि क्रिया करने और योलने चालने में सदा उसे अपनी यानाचारमय प्रवृति पर ही लक्ष्य रग्बना चरिये। इस प्रकार की प्रवृत्ति करने से वह साधु पापकर्म का बध नही करतो है । इसलिये हे मेघकुमार ! तुम सयम निभृतश्वर इस सकल सयम की अच्छी तरह से-यत्नाचारमय प्रवृत्ति से रक्षा करो-पालन करो। इस प्रकार से सयम की आराधना में तीर्थकर प्रभु की आज्ञा का प्रदर्शन सत्रकार ने किया है। अब तप के आराधन करने में उनकी क्या आज्ञा है-वे यह स्पष्ट करते है " आयावयारी चय मोगमल्ल" (दशचैकालिक द्वितीय अध्ययन ) 'हे मुने! सुकुमालपने को छोड़ आतापनाले' आतापनारूप तपधर्म की आराधना से मुनि को चाहिये બધા સયમી લોકોએ સંપૂર્ણપણે સાવધાન થઈને જ ચાલવું જોઈએ અને પૂર્ણ સાવધાન થઈને જ બેસવું જોઈએ ઉઠવા બેસવામાં તેમજ આહાર વગેરે કિયા કરવામાં અને બોલવા ચાલવામાં હમેશા તેને પિતાની યનાચારમય પ્રવૃત્તિ ઉપર જ લક્ષ્ય આપવું જોઈએ આ રીતે પ્રવૃત્તિ કરવાથી તે સાધુ પાપ-કમને બધ કરતે નથી એથી હું મેઘકુમાર ! તમે “ सयम निभृनम्वर સયમની સારી રીતે યાચારમયી પ્રવૃત્તિ વડે શ્વા કરા-આનુ પાલન કરો આ રીતે સૂત્રકારે સયમની આરાધના વિષે પ્રભુની આજ્ઞાનું પ્રદર્શન કર્યું છે હરે તપની આરાધના કરવામાં તેઓશ્રીની આજ્ઞા શી છે? તે મૂત્રકાર અહીં २५८ रे छे-“ आयावयाही चय सोगमल्ल " ( दशकालिक द्वितीय अध्ययन) હે મુનિ ! સુકોમળતાને ત્યજીને આતાપના સ્વીકારે આતાપના ૩૫ તમન્ના આરાધનાથી મુનિ પિતાના શરીરને કૃશ (દુબળ) બનાવે અને શારીરિક " मा सदा ! . ३२० भासामेयाङ्ग तुष्टिया भुजियर मासियव्य, पर उहाय उद्याय पाणेहिं भूयहि जीवहिं सतेहि सजमेण सजगियन्व, अस्सि च ण अहे णो पमापयन " इति । ततः खलु श्रमणो भगवान् महावीरो मेघ कुमार सयमेन प्रजाजयति, यावत् स्वयमेव आचार यावद् धर्ममाख्याति- खल हे देशानुप्रिय ! गन्तव्य,स्थातव्यं' निपत्तव्य, त्वगतयितव्य भोक्तव्य मापितव्यत्, एपमुत्या य उत्थाय प्राणेषु भूतेषु जीवेषु सत्त्वेषु सयमेन सयन्तव्यम् , अस्मिन खलु अर्थे नो प्रमादयितव्यम् । इति, दशवैकालिक स्ने ऽपि-- जय चरे जय चिट्ठ जपमासे जय सए । जय भुजतो भासतो पारफम्म न उधई ।। इयव्य तुयट्टियव्व भुजियव्य भासियन व उट्टाय उद्याय पाणेहि भूयेहि जीवेटिं सत्तरि सजमेण सजमियन्च, अस्मिच ण अडे णो पमाण्यव" श्रमण भगवान महावीर ने स्वय अपने ही हाथों से मेघमारको जय भागवती दीक्षा प्रदान की उनके लिये मुनि विषयक आचार ओदि का जप उन्हो ने उपदेश दिया तब उन्होने उसे यही समझाया कि हे देवानुप्रिय! चलते, ठहरते, बैठते, लेटते, आहारकरते और यात चित करते समय प्राणियो, भूतो, जीयो, और नत्वो में सदा सयम से ही प्रवृत्ति करनी चाहिये। मुनि का यहो कर्तव्य है कि वह प्रत्येक शारीरिक एव वाचनिक क्रियाओ में, सयमित प्रवृत्ति करें। इस प्रकार की प्रवृत्तिशील होने से ही मुनि द्वारा अपने सयम की रक्षा होती है इस विषय में मुनि को कभी भी प्रमाद नहीं करना चाहिये । दशवै कालिक सूत्र में भी यही कहा है-" जय चरे जय चिढे जयमासे जय यच णिसीइयव्य तुट्टियन भुजियव्य, भासियव्व, एर उहाय उट्टाय पाणेहि भूयेहि जावेहि सत्तहि सजमेण सजमियन्व अरिंस च ण अठे णो पमाएयव्व શ્રમણ ભગવાન મહાવીરે જાતે પોતાના હાથથી જ મેઘકુમારને જ્યારે ભાગવતી દીક્ષા આપી અને તેને મુનિવિષયક આચાર વગેરેને લગતે ઉપદેશ આપે ત્યારે તેઓશ્રીએ તેને ઉપદેશમા એ જ વાત સમજાવી કે હે દેવાનુ પ્રિય ! ચાલતા ઊભા રહેતા, બેસતા, સૂઈ જતા, આહાર કરતા અને વાતચીત કરતા પ્રાણુઓ, ભૂત, છે અને સમાં હમેશા સયમથી જ પ્રવૃત્તિ કરતા રહેવું જોઈએ મુનિને એ જ ફરજ છે કે તે દરેક શારીરિક અને વાચનિક કિ એમા સયમિત પ્રવૃત્તિ કરે આ રીતે પ્રવૃત્તિશીલ થઈને રહેવાથી જ સુનિએ પડે સ યમની રક્ષા થાય છે. આ બાબતમાં મુનિએ કઈ પણ દિવસે પ્રમાદ કાર જેઇએ નહિ દશવૈકાલિક સૂત્રમાં પણ એજ વાત કહેવામાં આવી છે (जय परे जय पिदै जयमासे जय सए, जय सुजतो भास तो - , " मनगारधर्मामृत पिणी का R० १६ प्रौपदीचा छाया-या चरेत् यत तिप्ठेन्, यतमासीत यत शयीत । गत भुतानो भापमान' पापर्मन वनाति ॥ १ ॥ इति । तत्रैव- संजम निहुओ चर" इत्यादि । छाया-सयम निभृतश्चर' इति । सयमे तीर्थपरस्याज्ञा प्रदर्शिता, दानी तपसि तदाज्ञा प्रदर्यते । यथा-दश- कालिक सूशे-(द्वितीयाध्ययने) " आयावयाही चय सोगमल्ल " इति । " आयावयाही" आतापय आता. पनारूपतपोधर्माराधनेन तनु शोपय, " सोगमल्ल " सौकुमार्य " चय" त्यज- परिहर। सप, जयं भुजतो भासतो पावकम्म न बधई" सकल सयमियो को पूर्ण सावधान तापूर्वक ही चलना चाहिये और पूर्ण सावधानतापूर्वक ही बैठना पाहिये । उठने बैठने में तथा आहारादि क्रिया करने और घोलने चोलने में सदा उसे अपनी यानाचारमय प्रवृति पर ही लक्ष्य रग्वना चरिये । इस प्रकार की प्रवृत्ति करने से वह साधु पापकर्म का वध नहीं करतो है । इसलिये हे मेघकुमार ! तुम "सयम निभृतश्वर" इस सफल सयम की अच्छी तरह से-यत्नाचारमय प्रवृत्ति से रक्षा करो-पालन करो। इस प्रकार से सयम की आराधना में तीर्थकर प्रभु की आज्ञा का प्रदर्शन सूत्रकार ने किया है। अब तप के आराधन करने में उनकी क्या आज्ञा है-वे यह स्पष्ट करते हैं "आयावयारी चय मोगमल्ल" (दशवैकालिक द्वितीय अध्ययन) 'हे मुने! सुकुमार पने को छोड़ आतापना' आतापनारूप तपधर्म की आराधना से मुनि को चाहिये બધા મયમી લેકએ સ પૂર્ણપણે સાવધાન થઇને જ ચાલવું જોઈએ અને પૂર્ણ સાવધાન થઈને જ બેસવું જોઈએ ઉઠવા બેસવામાં તેમજ આહાર વગેરે કિયા કરવામાં અને બોલવા ચાલવામા હમેશા તેને પોતાની યનાચારમય પ્રવૃત્તિ ઉપર જ લક્ષ્ય આપવું જોઈએ આ રીતે પ્રવૃત્તિ કરવાથી તે સાધુ પાપ-કમને બધ કરતું નથી એવી છે મેઘકુમાર ' તમે “ सयम निभृतश्वर સયમની સારી રીતે યત્નાચારમયી પ્રવૃત્તિ વડે ગ્યા કરે-આનુ પાલન કરો આ રીતે સૂત્રકારે સયમની આરાધના વિષે પ્રભુની આજ્ઞાનું પ્રદર્શન કર્યું છે હને તપની આરાધના કરવામાં તેઓશ્રીની આજ્ઞા શી છે? તે મૂત્રકાર અહીં २५०८ ४२ छ-" आयावयाही चय सोगमल " ( दशवकालिक द्वितीय अध्ययन) હે મુનિ' સુકોમળતાને ત્યજીને આતાપના સ્વીકારે આતાપના ૩૫ તપધર્મના | મુનિ પિતાના શરીરને કૃશ (દુબળ) બનાવે અને શારીરિક આ સકલ આરા - " १२८ पातापाय किंच श्रमणस्य क्षान्त्यादिदशविधे धर्म तपसः पाठो वर्तते, तस्मात् तपोधर्म इति विज्ञायते । तथाचोक्तं समवायाम्।-( समवाय १०) दसविहे समणधम्मे पण्णत्ते, व जहा-(१) खंती, (२) मुत्ती (३) अज्जवे (४) महवे (५) लायवे (६) सच्चे (७) संजमे (८) तये (९) चिया (१०) चंभचेरवासे। अहिंसादीना जिनाशाप्रयोज्यमत्तिकत्यरूपस्य धर्मलक्षणस्य सद्भावाद धर्मत्व सिद्ध । उक्त धर्मस्य लक्षण, लक्ष्या अहिंसादयम मोक्ताः, तत्राहिंसासयमतपोरूपो धर्म उत्कृष्ट मङ्गल योध्यम् । तथाचोक्तं दशवकालिकमूत्रे-(म० अ०१) "धम्मो मगलमुक्टि'अहिंसा संजमो तयो । देवावि त नमसति जस्स धम्मे सया मणो ॥ कि वह अपने शरीर को कृश करें एव शारीरिक सुकुमारता का मोह छोड़े। उत्तम क्षमा आदिक जो श्रमणों के दशप्रकार के धर्म कहे गये हैं, उनमें तप का भी कथन आया है, अत' तप में धर्मरूपता सिद्ध ही होती है। समवायाग सूत्र मे श्रमण के दश प्रकार के धर्मों का क्यन करते हुए सूत्रकार ने यही कहा है-" दसविहे समणधम्मे पण्णत्ते, त जहा-खती, मुत्ती, अज्जचे, मद्दवे, लाघवे, सच्चे, सजमे, तवे, चियाए बभचेरवासे। इन अहिंसादिक महावतों में धर्मरूपता इसलिये सिद्ध होती है कि वहा पर जिनेन्द्र प्रभु की आज्ञा प्रयोज्य प्रवृत्तिरूप धर्म के रक्षण का सद्भाव पाया जाता है इस प्रकार धर्म का लक्षण और उनके लक्ष्यभूत अहिंमादिको का कथन है। ये अहिंसा, सयम और तपरूप धर्म ही સુકુમારતાને મોહ ત્યજી દે ઉત્તમ ક્ષમા વગેરે પ્રમાણેના દશ પ્રકારના ધર્મ કહેવામાં આવ્યા છે તેમાં તપનું કથન છે એથી તપમાં ધર્મરૂપતા સિદ્ધ થાય જ છે સૂત્રકારે સમવાયાગ સૂત્રમાં શ્રમણના દશ પ્રકારના ધર્મનું કથન કરતા આ પ્રમાણે જ કહ્યું છે– "दमविहे समणधम्मे पण्णत्ते -त जहा-खत्ती, मुत्ती, अज्जवे, महवे, लाघवे, सन्चे' स जमे, तवे चियाए बभचेरवासे।" આ અહિંસા વગેરે મહાવતેમા ધર્મરૂપતા એટલા માટે સિદ્ધ થાય છે કે તેમાં જીનેન્દ્ર પ્રભુની આજ્ઞા પ્રયજ્ય પ્રવૃત્તિ રૂપ ધર્મના લક્ષણને સદુ- ભાવ છે આ રીતે ધર્મનું લક્ષણ અને તેના લક્ષ્યભૂત અહિંસા અહિંસા, સયમ અને તપ રૂપ ધર્મ –ઉકુટ મગળ 1 मनगारधर्मामृतयपिणी टीका थ०१६ द्रौपदीय छाया-धर्मों मङ्गलमुत्कृष्टम् अहिंसा संयमस्तपः । देवा थपि त नमस्यन्ति, यस्य धर्म सदा मनः।। नन्वहिंसा-संयम-तपो-रूपो धर्मों मङ्गलमुत्कृष्टमित्येतद्वचः क्मिाशासिद्धम् आहोस्विद् युक्तिसिद्धमपि ? अत्रोच्यते-उभयसिद्धमपि, तथाहि-जिनवचनत्ला-दाज्ञासिद्धम् अनुमानम- प्यावर्तते-' अहिमासयमतपोरूपो-धर्मो मगल मुत्कृष्टम् इति प्रतिज्ञा, 'देवादि उत्कृष्ट मगलरूप हैं दशवैकालिकसूत्र में यही कहा है " धम्मो मगल- मुफिट अहिंसा सजमो तवो। देवा वि त नमसति जस्स धम्मे सया- मणो" धर्म ही उत्कृष्ट मगल है। अहिंसा सयम और तप ये ही धर्म हैं । जिसका अन्तः करण इस धर्म से सदा युक्त रहता है उसके लिये देव भी नमस्कार करते है। शका-अहिंसा, संयम और तपरूप धर्म में जो उत्कृष्ट मगलरूपता कही है वह आजासिद्ध है इसलिये कही है कि युक्ति से सिद्ध है इस लिये कही है ? भावार्थ-अहिंसादिकों में उत्कृष्टमगलता किस प्रमाण से सिद्ध है ? आगम से या अनुमान से ? उत्तर-इनमें उत्कृष्ट मगलरूपता आगम और युक्ति दोनों से सिद्ध है। जिनेन्द्र के वचन होने से इनमें आजासिद्धता है तथा अनुमान से प्रसिद्ध होने से युक्ति सिद्धता है । " धम्मो मगलमुकिट्ट" इत्यादि गाथा द्वारा इनमें जिने द्रवचनरूप आगमता पूर्व में ही प्रदर्शित की जा चुकी है अनुमान प्रसिद्धता इस प्रकार है-अनुमान के पांच अग होते सूत्रमा से पात उपामा मापी छ-" धम्मो म गलमुस्किट्ठ-अहि सो सजमो तवो। देवा वि त नमसति जस्स धम्मे सया मणो" धर्म Gट भमण છે અહિંસા સયમ અને તપ એ જ ધર્મ છે જેનું અત્ત કરણ આ ધર્મથી સદા યુક્ત રહે છે તેને દેવે પણ નમન કરે છે શકા–અહિંસા, સયમ અને તપ રૂપ ધર્મને જે ઉત્કૃષ્ટ મ ગળ રૂ૫ કહેવામાં આવ્યું છે તે આજ્ઞાસિદ્ધ છે માટે કહેવામા આવેલ છે કે યુકિતથી સિદ્ધ છે એટલા માટે કહેવામાં આવે છે ? ભાવાર્થ—અહિંસા વગેરેમાં ઉત્કૃષ્ટ મગળતા કયા પ્રમાણથી સિદ્ધ છે? આગમથી કે અનુમાનથી ? ઉત્તર-આમાં ઉત્કૃષ્ટ મગલરૂપતા આગમ અને યુકિત બનેથી સિદ્ધ છે જિનેન્દ્રના વચને હેવાથી આમા આજ્ઞા સિદ્ધતા છે તેમજ અનુમાનથી પ્રસિદ્ધ डापा मस युति सिद्धता छ " धम्मो मगलमुक्किट्ठ » વગેરે ગાથા વડે આમા જિનેન્દ્ર પ્રવચનરૂપ આગમતા પહેલા બતાવવામાં આવી જ છે અને અનુ- R८ माताकपाल किंच श्रमणस्य शान्त्यादिदशविधे धर्मे तपसः पाठो वर्तते, तस्मात् तपोधर्म इति विज्ञायते । तथाचोक्त समाया-(समवाय १०) दसविहे समणधम्मे पण्णते, त जहा-(१) खती, (२) मुत्ती (३) अज्जवे (४) मद्दवे (५) लाघवे (६) सच्चे (७) सनमे (८) तये (९) चिया (१०) बंभचेवासे । अहिंसादीनां जिनाशामयोज्यमत्तिकस्वरूपस्य धर्मलक्षणस्य सद्भावाद धर्मत्व सिद्ध । उक्त धर्मस्य लक्षण, लक्ष्या अहिंसादयम मोक्ताः, तत्राहिंसासयमतपोरूपी धर्म उत्कृष्ट मङ्गल बोध्यम् । तथाचोक्त दशकालिकसूत्रे-(म० अ०१) "धम्मो मगलमुपिट अहिंसा संजमो तवो । देवावि त नमसति जस्स धम्मे सया मणो । कि वह अपने शरीर को कृश करें एव शारीरिक सुकुमारता का मोह छोड़े। उत्तम क्षमा आदिक जो श्रमणों के दशप्रकार के धर्म कहे गये हैं, उनमें तप का भी कथन आया है, अत: तप में धर्मरूपता सिद्ध ही होती है। समवायाग सूत्र में श्रमण के दश प्रकार के धर्मों का क्थन करते हुए सूत्रकार ने यही कहा है-" दसविहे समणधम्मे पण्णत्ते, तं जहा-खती, मुत्ती, अज्जवे, मद्दवे, लाघवे, सच्चे, सजमे, तवे, चियाए थभचेरवासे। इन अहिंसादिकं महावतों में धर्मरूपता इसलिये सिद्ध होती है कि वहा पर जिनेन्द्र प्रभु की आज्ञा प्रयोज्य प्रवृत्तिरूप धर्म के लक्षण का सद्भाव पाया जाता है इस प्रकार धर्म का लक्षण और उसके लक्ष्यभूत अहिमादिको का कथन है। ये अहिंसा, सयम और तपरूप धर्म ही સુકુમારતાનો મોહ ત્યજી દે ઉત્તમ ક્ષમા વગેરે પ્રમાણેના દશ પ્રકારના ધર્મ કહેવામાં આવ્યા છે તેમાં તપનું કથન છે એથી તપમા ધર્મરૂપતા સિદ્ધ થાય જ છે સૂત્રકારે સમવાયાગ સૂત્રમા શમણુના દશ પ્રકારના ધર્મનું કથન કરતા આ પ્રમાણે જ કહ્યું છે– " दमविहे समणधम्मे पण्णत्ते -त जहा-खत्ती, मुत्ती, भज्जवे, महवे, लाघवे, सच्चे स जमे, तवे चियाए बभचेरवासे । આ અહિંસા વગેરે મહાવતેમાં ધર્મરૂપતા એટલા માટે સિદ્ધ થાય કે તેઓમાં જીનેન્દ્ર પ્રભુની આજ્ઞા પ્રજ્ય પ્રવૃત્તિ રૂપ ધર્મના લક્ષણને સદુ ભાવ છે આ રીતે ધર્મનું લક્ષણ અને તેના લક્ષ્યભૂત અહિંસા અહિંસા, સયમ અને તપ રૂપ ધર્મ જ ઉમટે મગળ ૩ -- भनगारधर्मामृतपिणी टीका 40 १६ छोपवीपर्धा " वर्माधर्मव्यवस्थाया, शास्त्रमेन नियामकम् । तदुक्ताऽऽसेवनाद् धर्मस्वधर्मस्तद्विपर्ययात् ॥” इति, आगम से ही ज्ञात कर सकते हैं। घटपटादिको की तरह उसे स्पष्ट रूप से देखनहीं सकते हैं । इसीलिये वह दुज्ञेय है। जो अनुमान और आगम से गम्य होता है वह अग्नि आदि की तरह किसी न किसी के प्रत्यक्ष रोता है यह स्पष्ट सिद्वान्त है। तीयकर प्रभु ने कि जो राग और बेप से सर्वथा रहित हैं, त्रिकालवी समस्त पदार्थों को जो हस्तामलक वत् स्पष्ट जानते हैं, ३५ वाणी के अतिशय से जो युक्त है अपने केव- लज्ञान रूपी आलोक से उसे विशदरूप से जान लिया है। हम छद्मस्थों के लिये इनके वचनों के सिवाय इस विषय का नियामक और कुछ नहीं है। अतः उनके कथनानुसार ही धर्म और अधर्म का स्वरूप हम ससारी जीव जान सकते हैं या जानते हैं। "धर्माधर्मव्यवस्थाया' शास्त्रमेव नियामक, तदुक्ता सेवनात् धर्मस्त्वधर्मस्तद्विपर्ययात्"-धर्म और अधर्म के स्वरूप की व्यवस्था करने वाले केवल सर्वज्ञभगवान् के वचन स्वरूप आगम ही है। अतः उनके द्वारा प्रदर्शित मार्ग का सेवन करना धर्म और उससे विपरीत मोर्ग का सेवन करना अधर्म है भावार्थ-जीवोको धर्मकी प्राप्ति सर्वज्ञ भगवान द्वारा प्रदर्शित मार्ग સમજી શકીયે છીએ ઘટ પટવગેરેની જેમ તેને સ્પષ્ટ પણે જોઈ શકતા નથી એથી જ તે ય છે જે અનુમાન અને આગમથી ગમ્ય હોય છે તે અગ્નિ વગેરેની જેમ કઈને કઈને પ્રત્યક્ષ હોય છે. આ એક સ્પષ્ટ સિદ્ધાંત રાગ અને દ્વેષથી સ પૂર્ણ પણે રહિત એવા તીર્થંકર પ્રભુએ-કે જેઓ ત્રિકાળવતી બધા પદાર્થોને હસ્તામલાવત્ સ્પષ્ટ રીતે જાણે છે, ૩૫ વાણુના અતિશયથી જેઓ યુક્ત છે-પિતાના કેવળજ્ઞાન રૂપી આલોકથી તેને વિશદ રૂપથી જાણું લીધુ છે. અમારા જેવા છદ્મને માટે એમ વચને સિવાય આ વિષય નિયામક બીજે કઈ નથી એથી અમે તેમના કહ્યા મુજબ જ यम भने अनु २१३५ onejी शीये छीमे " धर्माधर्म-व्यस्थाया शास्त्र मेव नियामक , तदुक्तासेवनात् धर्मस्त्वधर्म सद्विपर्ययात् " धर्म भने अपना સ્વરૂપની વ્યવસ્થા કરનાર ફકત સર્વજ્ઞ ભગવાનના વચન સ્વરૂપ આગામે જ છે એથી તેમના વડે દર્શાવવામાં આવેલા માર્ગનું સેવન કરવું એજ ધર્મ અને તેથી વિરુદ્ધ માર્ગનું સેવન કરવું અધર્મ છે ભાવાર્થસર્વજ્ઞ ભગવાન દ્વારા ताधर्मकार मान्यत्वात्, इति हेतुः । अदादियत् इति दृष्टातः ह यो यो देवादिमान्यः स स उत्कृष्ट मङ्गल यथाऽहदादयः, 'तया चाय धर्मः' इत्युपनयः, तस्माद् देवादि मान्यत्वादुत्कृप्ट मझलमिति निगमनम् । वस्तृतस्तु धर्माधर्मस्वरूप रु. मत्वासस्थैर्दुज्ञेय, केवल तीन रागादिदोष रहितेन पश्चशिवचनातिशयसप नेन केलिना तीर्थकोण केवलालोकेन सुज्ञेय भाति । छद्मस्थानां तु भगवचनमे नियामक, तथाचोक्तम्- हैं-१ प्रतिज्ञा, २ हेतु, ३ दृष्टान्त, उपनय ४ और ५ निगमन । अर्हत भगवान की तरह देवादिकों द्वारा मान्य रोने से हिमा, तप और सयमरूप धर्म उत्कृष्ट मगल हैं। इस अनुमान वाक्य में "अहिंसा, सयम और तप रूप धर्म उत्कृ- ष्टमगल है" यह प्रतिज्ञा है "देवादिकों द्वारा मान्य रोने से" यह हेतु है। "अर्हन्त की तरह " यह दृष्टान्त है पक्ष में हेतु के दुहराने से उपनय और प्रतिज्ञा के दुहराने से निगमन सिद्ध हैं जैसे-"जो जो देवादिकों द्वारा मान्य होता है वह २ उत्कृष्ट मगल रोता है जैसे अर्ह- त प्रभु-ये भी देवादिकों द्वारा मान्य हैं। इस प्रकार पक्ष में हेतु के दुहराने रूप उपनय है इसलिये "वे भी उत्कृष्ट मगल स्वरूप हैं " इस प्रकार प्रतिज्ञा के दुहराने रूप निगमनवाक्य है । वास्तव में तो धर्म और अधर्म का स्वरूप सूक्ष्म होने से हम उद्म . स्थो के लिये अत्यत परोक्ष है-इस लिये हम उसे सिर्फ अनुमान या માન પ્રસિદ્ધતા આ પ્રમાણે સમજવી જોઈએ અનુમાનના પાચ અગે હેય छे-प्रतिज्ञा १, हेतु २, eld 3, उपनय ४, मन निशमन ५, અહંત ભગવાનની જેમ દેવ વગેરે દ્વારા માન્ય હોવા બદલ અહિંસા, તપ અને સયમ રૂપ ધર્મ ઉત્કૃષ્ટ-મગલ છે આ અનુમાન વાકયમા “અહિંસા, સયમ અને તપ રૂ૫ ઉત્કૃષ્ટ મ ગળ છે જે આ પ્રતિજ્ઞા છે “ દેવ વગેરે દ્વારા માન્ય હોવાથી આ હેતુ છે અહં તની જેમ ” આ દષ્ટાત છે પક્ષમાં હેતુને બેવડાવવાથી ઉપનય અને પ્રતિજ્ઞાને બેવડાવવાથી નિગમન સિદ્ધ છે જેમકે દેવ વગેરે દ્વારા જે જે માન્ય હોય છે તે તે ઉત્કૃષ્ટ-મગલ હેય છે જેમ અહંત પ્રભુ પણ દેવ વગેરે દ્વારા માન્ય છે આરીતે પક્ષમાં હેતુને બેવડાવવાથી ઉપનય છે, માટે “તેઓ પણ ઉત્કૃષ્ટ મગળ સ્વરૂપ છે ” આરીતે પ્રતિજ્ઞાને બેવડાવવા રૂપ નિગમન થાય છે વસ્તુત ધર્મ તેમજ અધર્મનું સ્વરૂપ સૂકમ હેવાથી અમારા જેવા છઘર માટે તે અતીવ પરોક્ષ છે એથી અમે ફકત તેને અનુમાન કે આગમથી मेनगारधर्मामृतवर्षिगी टीका २०१६ द्रौपदीच! स्वयमेव भगवता-अहिंसासंयमतपसां वर्मत्व,तथा - तेपामुत्कृष्टमङ्गलस्वरूप- त्वेन प्राधान्य च पर्णित, तत्राप्यहिंसाया.-सबर्ममूलत्वेन भरपान्यात् प्रथम स्थान प्रदत्तम् । तस्य सर्वमधानस्याऽहिंसाधर्मस्य पदकायोपमर्दनसाध्ये मूर्तिपूजने मूलतः समुच्छेद केवलालोकेन साक्षात् पश्यन् भगवानहन मूर्तिपूजनार्थमाशा पद धादित्याकाशकुसुममिवात्यन्तमसदेन यो यम् । स्पष्ट रूप से ज्ञान के विपय नहीं हो सकते हैं। अत. ऐसे विषयो में सर्वज्ञ के वचन ही प्रमाण कोटि में अगीकार करना चाहिये । भगवान ने स्वय ही अहिंसा, सयम और तप में धर्मरूपता तथा उत्कृष्ट मगलरूप होने से प्रधानता कही है। अहिंसा में जो प्रधान रूपना कही गई है उसका मुख्य कारण यह है कि वह समस्तधर्मों का मूल है और इसीलिये उसे उन्हो ने सर्वप्रथमस्थान दिया है जब यह बात है तो विचारना चाहिये कि भगवा मूर्तिपूजा की आज्ञा कैसे दे सकते हैं। क्यों कि वह पूजा पटुकाय के जीवो की विराधना से सा य होती है। इस विरापना में अहिंसा धर्म को मूलतः ही अभाव समाया हुआ है। अर्थात् मूर्तिपूजा में उस प्रभुप्रतिपादित अहिंसा धर्म का सर्वथा उच्छेद हो हो जाता है-मूर्तिपूजा करने वाला पूजक अहिंसा धर्म का रक्षक नहीं हो सकता है-प्रत्युत उसे हिंसा का ही दोप लगता है इस प्रकार स्वय भगवान जय अपने केवल ज्ञान से इस बात को તેમ નથી એથી એવી બાબતમાં સર્વસ ના વચને જ પ્રમાણ રૂપમાં સ્વીકા- રવા જોઈએ ભગવાનને પિતે જ અહિંસા, સયમ અને તપમા ધમ રૂપતા તેમજ ઉત્કૃષ્ટ મંગળરૂપ હેવાથી પ્રધાનતા બનાવી છે અહિંસામાં જે પ્રધાન રૂપતા દર્શાવવામાં આવી છે, મુખ્યત્વે તેનું કારણ આ પ્રમાણે છે કે તે બધા ધર્મોનું મૂળ છે અને એથી તેને સૌએ સૌ પ્રથમ સ્થાન આપ્યું છે જ્યારે એવી વાત છે ત્યારે આપણે વિચારવું જોઇએ કે ભગવાન મૂર્તિપૂજાની આજ્ઞા કેવી રીતે આપી શકે તેમ છે ? કેમ કે તે પૂજા જીવોની વિરાધનાથી સાધ્ય હોય છે આ વિરાધનામાં અહિંસા ધર્મતે મુખ્યત્વે અભાવને જ સમાવેશ થયે છે તેમ કહી શકાય છે એટલે કે મૂર્તિપૂજામાં તે પ્રભુ પ્રતિપાદિત અહિંસા ધર્મને સંપૂર્ણ પણે ઉછેદ જ થઈ જાય છે મૂર્તિપૂજા કરનાર પૂજારી અહિંસા ધર્મને રક્ષક થઈ શક્તા નથી અને બીજી રીતે તે તેને હિંસાને દેશ જ એ પડે છેઆ રીતે જ્યારે પોતે ભગવાન પિતાના કેવલજ્ઞાનથી આ તે પકાયના -- साधER पर चलनेसे ही हो सकती है, इससे विपरीत मार्ग पर चलने से नहीं। अत. जो जीव धर्म को साक्षात्कार करना चाहते है उनका कर्तव्य है कि वे सर्वज्ञ भगवन दारा कथित मार्ग का सेवन कर और उस से भिन्न मार्ग का परित्याग करे। इस प्रकार की प्रवृत्ति से वे धर्म और अधर्म के स्वरूप के ज्ञाता बन जाते हैं। इस कथन से शकाकार की इस आशकाका या परिहार किया गया है कि जो उसमें पहिले यह प्रश्न किया कि अहिंसादिकों में जो उत्कृष्ट मगलरूपता है वह किस प्रमाण से है। सूत्रकारने आगम और अनुमान दोनो प्रमाणों से उनमें उत्कृष्ट मगलता सिद्ध की है इस कथन से एक यात और हमें यह ज्ञात होती है कि सर्वज्ञ कथित सिद्धान्त की जाच के लिये जपतक तर्क का जोर चलता रहे बुद्धिमान तबतक अपनी तर्कणा की कसौटी पर उसे कसता रहे-पर जब तर्क की समाप्ति हो जाये-तर्कणा शक्ति कुठित हो जावे- तो उस व्यक्ति का कर्तव्य है वह आगम प्रमाण से ही उस सिद्धान्त का अनुसरण करें। फिर उसे उस विषय में तर्क करने की आवश्य कता नही है क्यों कि सूक्ष्मादिक पदार्थ सर्वज्ञ के सिवाय छद्मस्थों के પ્રદર્શિત માર્ગ ઉપર ચાલવાથી જ છે ને ધર્મની પ્રાપ્તિ થઈ શકે તેમ છે એનાથી વિરુદ્ધ માર્ગના સેવન થી નહિ એથી જે જ ધર્મનું પ્રત્યક્ષ દર્શન ઈચ્છતા હોય તેમની ફરજ છે કે તેઓ સર્વજ્ઞ ભગવાન દ્વારા કથિત માર્ગનું સેવન કરે અને તેના વિરુદ્ધ માગને ત્યાગ કરે આ જાતની પ્રવૃત્તિથી તેઓ ધર્મ અને અધર્મના સ્વરૂપને જાણનારા થઈ જાય છે આ કથનથી શકાકારની એ આશકાને અહી પરિહાર કરવામાં આવ્યો છે કે જે તેમાં પહેલા આ પન્ન કરવામાં આવ્યું છે કે અહિસા વગેરે મા જે ઉત્કૃષ્ટ મગળ રૂપતા છે તે કયા પ્રમાણુના આધારે છે? સૂત્રકારે આગમ તેમજ અનુમાન બને-પ્રમાણે થી તેમા ઉત્કૃષ્ટ મળતા સિદ્ધ કરી છે એ કથન વડે બીજી આ વાતનું પણ થાય છે કે સર્વજ્ઞ-કથિત સિદ્ધાન્તની પરીક્ષા માટે જ્યા સુધી તેની શક્તિ કાયમ રહે બુદ્ધિમાને ત્યા સુધી પિતાની તર્કણાની કસોટી ઉપર કસતા રહે પણ જ્યારે તર્કની શક્તિ મદ થઈ જાય-તર્કણુ શક્તિ કુતિ થઈ જાય ત્યારે તે વ્યકિત ની ફરજ છે કે તે આગળ પ્રમાણથી જ તે સિદ્ધાન્ત નું અને સરણ કરે પછી તે વિષયમાં જ તેને મીનમેખ કરવી જોઈએ નહિ કેમ કે સૂમ વગેરે પદાર્થો સર્વર સિવાય છાના માટે સ્પષ્ટ રૂપથી જાણી શકાય . જ્ઞાન , नगारधर्मामृतवर्षिगी टीका ०१६ द्रौपदीच! स्वयमेव भगवता-अहिंसासंयमतपसां धर्मत्व,तथा - तेपामुत्कृष्टमङ्गलस्वरूप- त्वेन माधान्य च वर्णित, तत्राप्यहिंसाया.-सर्वधर्ममूलत्वेन प्राधान्यात् प्रथम स्थान मदत्तम् । तस्य सर्वप्रधानन्याऽहिंसाधर्मस्य पटूकायोपमर्दनसाध्ये मूर्तिपूजने मूलतः समुच्छेद केवलालोकेन साक्षात् पश्यन् भगवानहन मूर्तिपूजनार्थमाशा पद- धादित्याकाशकुतुपमिवात्यन्तमसदेव गोध्यम् । स्पष्ट रूप से ज्ञान के विषय नहीं हो सकते है । अतः ऐसे विषयों में सर्वज्ञ के वचन ही प्रमाण कोटि में अगीकार करना चाहिये । भगवान ने स्पय ही अहिंसा, सयम और तप में धर्मरूपता तथा उत्कृष्ट मगलरूप होने से प्रधानता कही है। अहिंसा में जो प्रधान रूपता कही गई है उसका मुख्य कारण यह है कि वह समस्तधर्मों का मूल है और इसीलिये उसे उन्हो ने सर्वप्रथमस्थान दिया है जय यह बात है तो विचारना चाहिये कि भगवा मूर्तिपूजा की आज्ञा कैसे दे सकते है। क्यों कि वह पूजा पटू काय के जीवों की विराधना से साय होती है। इस विरापना में अहिंसा धर्म को मूलतः ही अभाव समाया हुआ है । अर्थात् मूर्तिपूजा में उस प्रभुप्रतिपादित अहिंसा धर्म का सर्वथा उच्छेद हो हो जाता है-मूर्तिपूजा करने वाला पूजक अहिंसा धर्म का रक्षक नहीं हो सकता है-प्रत्युत उसे हिंसा का ही दोप लगता है इस प्रकार स्वय भगवान जय अपने केवल ज्ञान से इस बात को તેમ નથી એથી એવી બાબતમાં સર્વ ના વચને જ પ્રમાણ રૂપમાં સ્વીકા- २५ नन् ભગવાનને પિતે જ અહિંસા, સયમ અને તપમ ધર્મરૂપતા તેમજ ઉત્કૃષ્ટ મગળરૂપ હોવાથી પ્રધાનતા બનાવી છે અહિંસામાં જે પ્રધાન રૂપતા દર્શાવવામાં આવી છે. મુખ્યત્વે તેનું કારણ આ પ્રમાણે છે કે તે બધા ધમેનુ મૂળ છે અને એથી તેને સૌએ સૌ પ્રથમ સ્થાન આપ્યું છે ત્યારે એવી વાન છે ત્યારે આપણે વિચારવું જોઈએ કે ભગવાન મૂર્તિપૂજાની આજ્ઞા કેવી રીતે આપી શકે તેમ છે કેમ કે તે પૂર તે પકાયના જીવોની વિરાધનાથી સાધ્ય હોય છે આ વિરાધનામાં અહિંસા ધમતો મુખ્યત્વે અભાવને જ સમાવેશ થયે છે તેમ કહી શકાય છે એટલે કે મૂર્તિપૂજા તે પ્રભુ પ્રતિપાદિત અહિંસા અને સંપૂર્ણ પણે ઉછેદ જ થઈ જાય છે મૂર્તિપૂજા કરનાર પૂજારી અહિંસા ધર્મને રક્ષક થઈ શકતું નથી અને બીજી રીતે તે તેને હિંસાને દેવ જ એક પડે છેઆ રીતે જયારે પોતે ભગવાન પિતાના કેવલજ્ઞાનથી આ हाताधर्मया पर चलनेसे ही हो सकती है, इससे विपरीत मार्ग पर चलने से नहीं। अतः जो जीव धर्म को साक्षात्कार करना चाहते। उनका कर्तव्य है कि वे सर्वज्ञ भगवन द्वारा फयित मार्ग का सेवन कर और उस से भिन्न मार्ग का परित्याग करे। इस प्रकार की प्रवृत्ति से वे धर्म और अधर्म के स्वरूप के ज्ञाता पन जाते हैं। इस कथन से शकाकार की इस आशकाका यहां परिहार किया गया है कि जो उसमें पहिले यह प्रश्न किया कि अहिंसादिकों में जो उत्कृष्ट मगलरूपता है वह किस प्रमाण से है। सूत्रकारने आगम और अनुमान दोनो प्रमाणों से उनमें उत्कृष्ट मगलता सिद्ध की है इस कथन एक यात और हमें यह ज्ञात होती है कि सर्वज्ञ कथित सिद्धान्त की जाच के लिये जबतक तर्फ का जोर चलता रहे बुद्विमान तपतक अपनी तर्फणा की कसौटी पर उसे कसता रहे-पर जय तर्क की समाप्ति हो जावे-तर्कणा शक्ति कुठित हो जावे- तो उस व्यक्ति का कर्तव्य है वह आगम प्रमाण से ही उस सिद्धान्त का अनुसरण करें। फिर उसे उस विषय में तर्क करने की आवश्य- कता नहीं है क्यों कि सूक्ष्मादिक पदार्थ सर्वज के सिवाय छद्मस्थों के પ્રદર્શિત માર્ગ ઉપર ચાલવાથી જ છે ને ધર્મની પ્રાપ્તિ થઈ શકે તેમ છે એનાથી વિરુદ્ધ માર્ગના સેવન થી નહિ એથી જે જે ધર્મનું પ્રત્યક્ષ દર્શન ઈચ્છતા હોય તેમની ફરજ છે કે તેઓ સર્વજ્ઞ ભગવાન દ્વારા કથિત માર્ગનું સેવન કરે અને તેના વિરુદ્ધ માગને ત્યાગ કરે આ જાતની પ્રવૃત્તિથી તેઓ ધર્મ અને અધર્મના સ્વરૂપને જાણનારા થઈ જાય છે આ કથનથી શકાકારની એ આશ કાને અહી પરિહાર કરવામાં આવ્યું છે કે જે તેમાં પહેલા આ પન્ન કરવામાં આવ્યું છે કે અહિસા વગેરે મા જે ઉત્કૃષ્ટ મગળ રૂપતા છે તે કથા પ્રમાણના આધારે છે? સૂત્રકારે આગમ તેમજ અનુમાન બને-પ્રમાણે થી તેઓમાં ઉત્કૃષ્ટ મળતા સિદ્ધ કરી છે એ કથન વડે બીજી આ વાતનું પણ જ્ઞાન થાય છે કે સર્વ-કથિત સિદ્ધાન્તની પરીક્ષા માટે જ્યા સુધી તેની શક્તિ કાયમ રહે બુદ્ધિમાને ત્યા સુધી પિતાની તર્કણની કસોટી ઉપર કસતા રહે પણ જ્યારે તર્કની શક્તિ મા થઈ જાય-તર્ક શક્તિ કુઠિત થઈ જાય ત્યારે તે વ્યક્તિ ની ફરજ છે કે તે આગળ પ્રમાણુથી જ તે સિદ્ધાન્ત નુ અનું સર કરે પછી તે વિષયમાં જ તેને મીનમેખ કરવી જોઈએ નહિ કેમ કે ભૂમિ વગેરે પદાથે સર્વ સિવાય છાના માટે સ્પષ્ટ રૂપથી જાણુ શકાય .
मेनगारधर्मामृतषिगी टीका ०१६ द्रोपदीया स्वयमेव भगवता-अहिंसासंयमतपसां धर्मत्व,तया - तेपामुल्कएमालस्वरूप त्वेन प्राधान्य च वर्णित, तत्राप्यहिंसाया -सर्वधर्ममूलत्वेन प्राधान्यात् प्रथम स्थान मदत्तम् । तस्य सर्वप्रधानन्याऽहिंसाधर्मस्य पदकायोपमर्दनसाध्ये मूर्तिपूजने मूलत. समुच्छेद केवलालोकेन साक्षात् पश्यन् भगवानहन मूर्तिपूजनार्थमाझा प्रद- धादित्याकाशकुसुममिवात्यन्तमसदेव पोयम् । स्पष्ट रूप से ज्ञान के विपय नहीं हो सकते है । अत. ऐसे विषयों में सर्वज्ञ के वचन ही प्रमाण कोटि में अगीकार करना चाहिये । भगवान ने स्पय ही अहिंसा, संयम और तप मे धर्मरूपता तथा उत्कृष्ट मगलरूप होने से प्रधानता कही है। अहिंसा में जो प्रधान रूपता कही गई है उसका मुख्य कारण यह है कि वह समस्नधर्मों का मूल है और इसीलिये उसे उन्हो ने सर्वप्रथमस्थान दिया है जय यह यात है तो विचारना चाहिये कि भगवा मूर्तिपूजा की आज्ञा कैसे दे सकते हैं। क्यों कि वह पूजा पटूकाय के जीयो की विराधना से साय होती है। इस विरापना में अहिंसा धर्म को मूलतः ही अभाव समाया हुभा है । अर्थात् मूर्तिपूजा में उस प्रभुप्रतिपादित अहिंसा धर्म का सर्वथा उल्लेद हो हो जाता है-मूर्तिपूजा करने वाला पूजक अहिंसा धर्म का रक्षक नरी हो सकता है-प्रत्युत उसे हिंसा का ही दोप लगता है इस प्रकार स्वयं भगवान जय अपने केवल ज्ञान से इस बात को તેમ નથી એથી એવી બાબતમાં સર્વજ્ઞ ના વચને જ પ્રમાણુ રૂપમાં સ્વીકા- રવા જોઇએ ભગવાનને પિોતે જ અહિંસા, સ યમ અને તપમાં ધર્મ રૂપતા તેમજ ઉત્કૃષ્ટ મગળરૂપ હોવાથી પ્રધાનતા બનાવી છે અહિંસામાં જે પ્રધાન રૂપતા દર્શાવવામાં આવી છે, મુખ્યત્વે તેનું કારણ આ પ્રમાણે છે કે તે બધા ધમેનુ મૂળ છે અને એથી તેને મૌએ સૌ પ્રથમ સ્થાન આપ્યું છે જ્યારે એવી વાત છે ત્યારે આપણે વિચારવું જોઈએ કે ભગવાન મૂર્તિપૂજાની આજ્ઞા કેવી રીતે આપી શકે તેમ છે ? કેમ કે તે धूत તે પિકાયના જોની વિરાધનાથી સાધ્ય હેય છે આ વિરાધનામાં અહિંસા ધર્મતે મુખ્યત્વે અભાવને જ સમાવેશ થો છે તેમ કહી શકાય છે એટલે કે મૂર્તિપૂજામા તે પ્રભુ પ્રતિપાદિત અહિંસા મને સપૂર્ણ પણે ઉચ્છેદ જ થઈ જાય છે મૂર્તિપૂજા કરનાર પૂજારી અહિંસા ધર્મને રક્ષક થઈ શકતો નથી અને બીજી રીતે તે તેને હિંસાને દેવ જ એહ પડે છેઆ રીતે જ્યારે પિતે ભગવાન પિતાના કેવલજ્ઞાનથી આ " . बताधकपारस एव लक्ष्याः समालोचिताः, इदानीमरक्ष्या उन्यन्ते-हिंसादी जिनाझाविरुद्धा पतिर्भवति लोकाना तम्मादधर्मा हिंसादय एव तस्य धर्मलक्षणस्यालल्या भवन्ति। धर्माधर्मस्वस्पयोधनाय हि भगवाऽऽनश्यक नाम-स्थापनाद्रव्यमावभेदेन चतुर्विधो निक्षेपः प्रदर्शितः । तत्र भागावश्यके एर तीर्थकरामायाः सझावाद साक्षात् जानते हैं तो फिर वे ही मूर्तिपूजा करने की आज्ञा देंगे यह मान्यता आकाशपुष्पकी तरह सर्वधा असत्य ही है यह स्वय समझने जैसी पात है जहाँ हिंसा है वराधर्म नहीं है अहिंसा ही सच्चाधर्म है । इस प्रकार धर्म के लक्ष्यभूत अहिंसा आदि का यहां तक विचार किया। अब उससे विपरीत हिंसादिकों का विचार करते है- हिंसा आदि पाप हैं-इन में प्रवृत्ति कने की आज्ञा जिन भगवान ने नही दी है फिर भी जो प्रवृत्ति करते हैं वे उस आज्ञा से बहिर्भूत हैं। अत. जिनाज्ञा से विरुद्ध प्रवृत्ति होने से जीवों के लिये धर्म प्राप्ति के घदले इनसे अधर्म की ही प्राप्ति होती है। जिन से जीवों को अधर्म की प्राप्ति होती रो, वे स्वय अधर्म हैं। हिंसादिक पापो में अधर्मता होने का कारण उनमें धर्म के लक्षण का अभाव है। इसीलिये ये धर्म के लक्षण के अलक्ष्य हुए है। इस धर्म और अधर्म के स्वरूप को समझाने के लिये भगवान ने आवश्यकसूत्र में नाम, स्थापना, द्रव्य और भाव વાતને સ્પષ્ટપણે પ્રત્યક્ષરૂપમાં જાણે છે તે પછી તેઓ જ મૂર્તિપૂજા કરવાની આજ્ઞા આપે એવી માન્યતા આકાશ પુષ્પની જેમ સંપૂર્ણપણે અસત્ય જ સિદ્ધ થાય છે. આપણે પોતે પણ આ વાત સમજી શકીએ તેમ છીએ કે જ્યાં હિંસા છે ત્યા ધર્મ નથી અહિંસામાં જ સાચો ધર્મ છે આ રીતે ધર્મના લક્ષ્યભૂત અહિંસા વગેરે ને માટે અહીં સુધી વિચાર કરવામાં આવ્યું છે હવે આગળ તેથી વિરુદ્ધ હિંસા વગેરેની બાબતમા વિચાર કરવામાં આવે છે હિંસા વગેરે પાપ છે–આમાં પ્રવૃત્ત થવાની આજ્ઞા જિન ભગવાનને કેઈને પણ આપી નથી છતા જેઓ તેમાં પ્રવૃત્તિ કરે છે તેઓ તે આજ્ઞાથી બહિર્ભત છે એથી જિનાજ્ઞાની પ્રતિકૂળ પ્રવૃત્તિ હેવાથી જીવને ધર્મ પ્રાપ્તિના સ્થાને એમનાથી અધર્મની જ પ્રાપ્તિ થાય છે જેને જેનાથી અધર્મની પ્રાપ્તિ થાય છે તે પિતે અધર્મ છે હિંસા વગેરે પાપમા અધમતા હોવાને લીધે તેઓએ ધર્મના લક્ષણને અભાવ છે એટલા માટે જ તેઓ ધર્મના લક્ષણથી અલક્ષ્ય થયા છે આ ધર્મ અને અધર્મને સ્વરૂપને સમજાવવા ને मनगारधर्मामृतषिणी टी०म० १६ द्रौपदीचचर्चा धर्मम्, अन्यविधेप्यावश्यके पु रागद्वेषहिंसादिदोपसद्भावेन मोक्षमार्गोपदेशे प्रवृत्तस्य तीर्थकरस्य चाऽऽशाया अभावेन न तत्र धर्मलक्षण समनुगच्छति, तेषा मोक्षसाधत्वाभावापजैनधर्मपद लधु-मनईत्यात् । तथाचोक्तमनुयोगद्वारे-- "से कि त नामावरसय नामावस्सयं जरस ण जीवरस वा अजीवरस वा के भेद से ४ चार निक्षेपों का क्यन स्यिा है उनमें नाम स्थपना और द्रव्यरप धर्म निक्षेप के आराधन करने की भगवान ने जीवों को आज्ञा नहीं दी है क्यो कि इनसे जीवों को धर्म की प्राप्ति नहीं होती है। धर्म की प्राप्ति कराने वाला केवल भाव निक्षेपरूप आवश्यक है। इसकी आराधना से ही जीवों को धर्म प्राप्त हुआ करता है-अतः इस में ही धर्मरूपता प्रकट की गई है बाकी के इसके अतिरिक्त निक्षेपों में-आव. इयको में रागद्वेष और हिंसा आदि दोषों का सद्भाव होने से एव मोक्ष मार्ग के उपदेशप्रदान करने में प्रवृत्त तीर्थकरो की इनके आराधन करने में आज्ञा का अभाव होने से धर्म के रक्षण का समन्वय ही नही होता है। मुक्ति का जो माधक होता है वही जैन-धर्म है। इन ३ निक्षेपरूप आवश्यकों में मुक्ति की साधक्ता का अभाव है-इसलिये ये जैनधर्म के पदको स्वप्न में भी प्राप्त नहीं कर कते हैं। अनुयोगद्वार में यही थात कही गई है- से कि त नामावस्सय ? नामावस्सय जस्स ण जीरस्स अजीवरस આવશ્યક સૂત્રમાં નામ, રથાપના દ્રવ્ય અને ભાવના ભેદથી ચાર નિક્ષેપ નું કથન કર્યું છે તેમાં નામ, થાપના, અને વ્યરૂપ ધર્મ નિક્ષેપને આગધવાની ભગવાને જેને આજ્ઞા આપી નથી કેમ કે એમનાથી છને ધર્મની પ્રાપ્તિ થતી નથી ધર્મની પ્રાપ્તિ કરાવનાર કેવળ ભાવનિક્ષેપરૂપ આવશ્યક છે એની આરાધનાથી જ જીવોને ધર્મની પ્રાપ્તિ થાય છે એથી આમા જ ધર્મરૂપતા બતાવવામા આવી છે એના સિવાયના બીજ નિક્ષેપમા–આવશ્યકોમા-રાગદ્વેષ અને હિંસા વગેરે દોષોનો સદુભાવ હોવાથી અને મેં ક્ષ માર્ગના ઉપદેશ આપ વામાં પ્રવૃત્ત તીર્થ કરની એમની આરાધના કરવાની આજ્ઞાને અભાવ હોવાથી ધર્મના લક્ષણનો સમન્વય જ થતો નથી મુકિતને જે સાધક હોય છે તે જ જન-ધર્મ છે આ ૩ નિક્ષેપરૂપ આવશ્યકેમાં મુકિતની સાધકતાને અભાવ છે માટે એઓ જન ધર્મના પદને સ્વમમાયે મેળવી શકે તેમ નથી અનુગદ્વરમાં એ જ વાત કહેવામાં આવી છે- से कि त नामावासय ? नामावस्मय जस्स ल जीवस्स अजीवस्स वा जीवाण वा मातामकथा जीवाण वा अजीवाण या तदुभयरम पा तदुभयाण या आवस्सपत्ति नाम फज्जा से त नामावस्सया अथ किं तत् नामावश्यक ? नामापर्व-यस्य खलु जीपस्य वा अनीवस्य या जीवाना वा अजीयानां था, तदुभयस्य या तदुभयेपा ना आवश्यकमिति नाम क्रियते तदेतनामावश्यकम् । " से कि त ठवणावरसय २ १ जण पटकम्मे या पोत्थाम्मे चित्तकम्मे वा पयम्मे वा गथिमे वा वेदिमे या परिमे वा सघामे या अवखे या वराडए या एगो वा अपोगो वा सम्भावठवणा वा असमावठवणा या आवस्सएत्ति ठपणा ठविज्जह से त उवणावस्सय । छाया-अथ ति तत स्थापनावश्यम् ? स्थापनावश्यक यत् खलु काप्टकर्म वा पुस्तकम वा चित्रम वा लेप्यम वा थिम या वेष्टिम वा परिम या सङ्घातिम वा जीवाण या अजीवाण वा तदुभयस्स चा तदुभयाण वा आवस्सए त्ति नाम कजह से त नामावस्सय । से कि त ठवणावग्सय ? जष्ण कट्टपम्मे वा पोत्थकम्मे वा चित्तकम्मे वा लेप्पकम्मे वा गथिमे वा वेढिमे वा पूरिमे वा सधाइमे वा अक्खे वा वराडए वा एगो वा सब वणा वा अस णा वा आवस्सए त्ति ठवणा ठविजड, से त ठवणावस्सय भावार्थ-जीच, अजीव अथवा तदुभय स्वरूप आदि पदार्थों में यह आवश्यक है " इस प्रकार नाम सस्कार करना वह जीव अजीव आदि नाम आवश्यक है इस नाम आवश्यक में आवश्यक के वास्त विक गुणादि कुछ भी नहीं रोते हैं-सिर्फ लोक व्यवहार के लिये ही इस प्रकार की चहा पर निक्षेपविधि करली जाती है काष्ठ, पुस्तक चित्र अजीवाण वा तदुभयरस वा तदुभयाण वा आवस्सए त्ति नाम कज्जइ से त नामावस्सय । से कि त ठवणावस्सय १ जण्ण कट्टकम्मे वा पोत्यवम्मे वा चित्तकम्मे वा लेप्प कम्मे वा गथिमे वा वेढिमे वा पूरिमे वा सघाइमे वा अवखे वा वराडए वा एगो वा भणेगो घा सम्भावठवणा वा असम्भावठवणा वा भावस्सएत्ति ठवणा ठ विज्जइ, सेत . ठवणावस्सय । આ નામ ભાવાર્થ–જીવ, અજીવ અથવા તદુભય સ્વરૂપ વગેરે પદાર્થોમા આવશ્યક છે” આ રીતે નામ મસ્કાર કરવો ને જીવ અજીવ વગેરે આવશ્યક છે આ નામ આવશ્યકમાં આવશ્યક ના વાસ્તવિકગુણ વગેરે કોઈ જ હોતા નથી ફક્ત લેકવ્યવહાર ને માટે જ આ જાતની ત્યા નિક્ષે . मनगारमामृतावणी टी० ५० १६ दौपदीची पा अक्ष वा पराटक वा एकोपा अनेको मा सद्भावस्थापना वा असद्भावस्थापना पा 'आवश्यक'-मिति स्थापना स्थाप्यते, तदेतत् स्थापनावश्यकम् । भावावश्यकस्वस्परान्ये गोपालदारकादी आवश्यकेति नामकरणे नाम्ना- नाममाणावश्यक नामावश्यक गोपाल्दारकादिर्भवति। स्थापनाऽपि भावावश्यक एवं अक्ष-शतरज की गोटी आदि में एक अथवा अनेक आवश्यक क्रिया करने वाले श्रावक आदि को तदाकार अथवा अतदाकार लिखित चित्र स्थापना आवश्यक (निक्षेप) है यह स्थापना दो प्रकार की है एक सद्भाव स्थापना और २ दूसरी असद्भावस्थापना ! सझार स्थापना में जिसकी स्थापना की जाती है उसकी सर्व आकृति कोतरी रहती है -असद्भूत स्थापना में इस प्रकार की आकृति आदि नही रहती है वर्श पर केवल सकेत ही है जैसे शतरज की गोटिया में यह प्यादा है यह घजीर है, यह हाथी है इत्यादि मिर्फ कल्पना ही कल्पना रहती है-वहां उनका कोई भी आकार कोतरा नहीं रहता है। नाम निक्षेप में जिस प्रकार मात्र आवश्यक शन्यता रहती है उसी प्रकार स्थापना में भी यही यात रहती है किसी गोपाल (ग्वालिये) के लड़के का “ आव श्यक" इस प्रकार का नाम जिस प्रकार भाव आवश्यक रहित नाम निक्षेप में है उसी प्रसर भाव आवश्यक के स्वरूप से शून्य स्थापना निक्षेप में भी " यह आवश्यक है" यह स्थापना निक्षेप है। આવે છે, કાઇ, પુરતક, ચિત્ર અને અક્ષ-રાતર જ ની સોગઠી વગેરેમાં એક કે અનેક આવશ્યક ક્રિયા કરનાર શ્રાવક વગેરેનું તદાકાર કે અતદાકાર લેખિત ચિત્ર-સ્થાપન આવશ્યક (નિક્ષેપ) છે આ સ્થાપના બે પ્રકારની છે એક સદ્દભાવ સ્થાપના અને બીજી અસદ્ભાવ સ્થાપના સદ્દભાવ સ્થાપનામાં જેની સ્થાપના કરવામાં આવે છે તેની આકૃતિ સંપૂર્ણ પણે કોતરેલ હોય છે અસદુ- ભૂત સ્થાપનામાં આ જાતની આકૃતિ વગેરે રહેતી નથી ત્યા ફક્ત સકેત જ છે જેમ શેતર ની સેગડીઓમાં આ પાયદળ છે, આ વજીર છે, આ હાથી છે વગેરે ફક્ત કેરી કલ્પના જ હોય છે તેમાં તેમની કોઈપણ જાતની આકૃતિ કતરેલી હોતી નથી નામ નિક્ષેપમા જેમ ભાવ આવશ્યક શૂન્યતા રહે છે તેમજ રથાપનામાં પ એ જ વાત હોય છે કે ગોવાળિયાના પુત્રનું - ” આ જતન ન મ જેમ ભાવ આવશ્યક રહિત નામ નિક્ષેપમા છે તે પ્રમાણે જ ભવ આવશ્યકતા સ્વરૂપથી શુન્ય સ્થાપના નિક્ષેપમાં પણ આ સ્થાપના નિક્ષેપ છે - ભાવ , "240 આવશ્યક हा ४३ -- -- - . . पर पाताधर्मकथा स्वरूपशून्ये काष्ठकर्मादौ क्रियते । अतो भाशये प्रियमाणत्वारिशेपादनयो नास्ति कश्चिद् भेद इत्याशयेना--- "णामढवणाण को पइविसेसो ?। छाया-नामरयापनयोः प्रतिविशेषः । अत्रोत्तरमुच्यते-- 'णाम आपकहिल, ठपणा इसरिआ पा होज्जा आश्यहिआ पा॥ छाया- नाम-यावत्कथिक, स्थापना-इत्वरिका मा भवेद् यारत्कयिका था। 'णाम आवकहिय' नाम यायत्कथिक-साश्रयद्रव्यस्यास्तित्वकथा याव दनुवर्तते इत्यर्थः, स्थापना तु ' इत्तरिया पा' इत्वरिता वा सल्पकालस्थायिनी वा 'होज्जा' स्यात् , यावत्कथिका चा, अय भाष:-काचित्-स्थापना स्वाश्रय वन्यस्य सद्भावेऽपि, मध्यकाल एच निवर्तते, काचित्तु-तत्सत्ता यावदपतिप्ठते शका-जिस प्रकार भाव आवश्यक के स्वरूप से शन्य गापाल के लड़के आदि में "आवश्यक" इस प्रकार का नामनिक्षेपल्प आवश्यक है उसी प्रकार भाव आवश्यकके स्वरूपसे शुन्य काष्टधर्म आदिकों में भी यही बात है। अतः भाव ओवश्यकके स्वरूप की शन्यताकी अपेक्षा से इन दोनोमें कोई भी अन्तर नही है। तो फिर इन दोनों में क्या भेद है ! उत्तर-"णाम आवकहिय ठवणा इत्तरिया चा होज्जा आयकहिओ- वा" इस प्रकार की शका ठीक नहीं-क्यों कि नाम यावत्कथित शेता है स्थापना इत्वरिक और यावत्कथिक दोनों प्रकार की होती है । अपने आश्रयभूत द्रव्यका जबतक अस्तित्व-सद्भाव रहता है तबतक नामनि क्षेप रहता है ! इत्वरिक शब्द का अर्थ अल्पकालीन है चित्र एव अक्ष आदिकों में यह स्थापना अल्पकालीन होती है। इस प्रकार नाम और શકા–જેમ ભાવ આવશ્યકના સ્વરૂપથી શૂન્ય ગોવાળિયાના પુત્ર વગે આ જાતનું નામ નિક્ષેપ રૂપ આવશ્યક છે તેમજ ભાવ આવશ્યકના સ્વરૂપથી શૂન્ય કાષકર્મ વગેરેમાં પણ એ જ વાત છે એથી ભાવ આવશ્યકના સ્વરૂપની શૂન્યતાની દ્રષ્ટિએ આ બનેમા કેઈ પણ જાતને તફાવત નથી, ત્યારે આ બનેમાં ભેદ શું છે ? उत्तर-(णाम आवकहिय ठवणा इत्तरिया या होज्जा ओवकहिआ वा) શકા યોગ્ય નથી કેમકે નામ યાવત્ કથિત હેય છે સ્થાપના ઈત્વરિક અને યાત્કથિત અને પ્રકારની હોય છે પિતાને આશ્રયભૂત દ્રવ્યનુ જ્યા સુધી સ૬ ભાવ-અસ્તિત્વ રહે છે ત્યાં લગી નામ નિક્ષેપ રહે છે! ઈરિક શબ્દનો અર્થ અલ્પકાલીન છે ચિત્ર અને અક્ષ (રમવાના પાસા) વગેરેમાં એ સ્થાપના અપકાળ માટે હેય છે આ રીતે નામ અને સ્થાપનામાં જેમા આવશ્ય " " , . मनगारधर्मातापिणी टी० म० १६ द्रोपदीचा इति । एव च-नामस्थापनयोपिशून्यत्वेनाधारसाम्येऽपि भेदः स्वस्वावस्थानकाल. कृत एव भगवता प्रदर्शित । यद्यपि गोपालदारकादौ विद्यमानेऽपि कदाचिद- नेकनामपरिवर्तन लोके याचिद् दृश्यते, तथा च कास्कृतोऽपि भेदो नास्ति, तथापि-बहुशः स्थले नाम्नो यावत्कायिकत्वमेव दृश्यते, नाम्नः परावर्तन तु क्वचिद्विरलतयोपलभ्यते । अतोऽल्पस्थलव्यापित्वेन नाम्न इत्वरिफता भगवता न विवक्षिता । नाम्नोऽल्पकालिस्तापल्पने तुत्सूत्रारूपणापत्तिरिति बोध्यम् । स्थापनामें भावनिक्षेपकी शून्यताकी अपेक्षासे समानता आती है तो भी अपने२ फालकी अपेक्षासे इनमें इस प्रकार भेद-अन्तर माना गया है। शफा-नामनिक्षेप में जो यावत्कधिकता प्रदर्शित की गई है, वह ठीक नरी है-कारण कि हम देखते है नामवान द्रव्य-गोपालदारक आदि के विद्यमान रहते हुए भी उस में अनेक नोमो का परिवर्तन होता रहता है। कभी उसका " आवश्यक" यह नाम होता है, तो इन्द्र" यह नाम रख लिया जाता है। फिर "आवश्यक" इस नाम निक्षेप में यावधिकता कैसे आ सकती है ? उत्तर-शका ठीक है इस प्रकार से विचार करने पर कालकृत अन्तर यद्यपि उन दोनों में नहीं मालूम होता है तो भी इस बात की यहां पर विवक्षा नहीं है इसका कारण यही है कि यह नामपरिवर्तन अल्पस्थलवर्ती होनेसे व्याप्य है। यह बात सब जगह नहीं होती। कहीं २ ही होती है यहा सामान्यकथन है-विशेप नही । सामान्यरूप से नाम શૂન્યતાની અપેક્ષાથી સમાનતા આવી જાય છે, છતાયે પિતતાના કાળની અપેક્ષાથી તેમાં આ જાતનો ભેદ અખ્તર માનવામાં આવ્યું છે શકા–નામ નિક્ષેપમા જે યાવસ્કથિકતા બતાવવામાં આવી છે, તે ઉચિત નથી કારણ નામવા ગોપાળદારક વગેરેના વિધમાન રહેતા પણ તેમાં અનેક નામનુ પરિવર્તન થતું રહે છે કઈ વખતે તેનું નામ मावश्य" રાખવામાં આવે છે તે કઈ વખત “ઈન્દ્ર” નામ રાખવામા આવે છે તે પછી આવશ્યક' આ નામ નિક્ષેપમાં થાકથિત કેવી રીતે આવી શકે છે ? ઉત્તર–શકા ઉચિત છે આ રીતે વિચાર કરવાથી જે કે કાળકૃત અતર તેઓ બનેમા જણાતું નથી છતાયે આ વાતની અહીં વિવક્ષા નથી એનું કારણ આ પ્રમાણે છે કે આ નામ પરિવર્તન અ૯પ-સ્થલવતી હોવાથી વ્યાપ્ય છે. આ વાત બધે સ્થાને હોતી નથી કેઈક કોઈક સ્થાને જ હોય છે અહીં . vo माताधर्मकया यत्त-उपलक्षणमात्र चेद पालमदनेवयोमैदकयनम्-अपरस्यापि बहुप्रकार- भेदस्य सम्भवात् , इत्युक्त , तदुत्प्रारूपणम् यथासूत्रमरपगभियानामनिक्षेपे इत्वरिकताया. काचित् समवेऽपि मगाताऽमुक्तत्वादुपलक्षणमिति न स्वीप्त तथैव स्थापनाया कालातिरिक्तस्य भेदहेतोः कल्पनेऽप्युतत्रास्पण प्रसज्येत कालान्यात यावत्कशिक री होता है। इसी अपेक्षा को लक्ष्य में रखकर भगवान ने उसमे इत्वरिकता का कथन न कर केवल यावत्कधिकता काही कथन किया है यदि नाम में जो केवल इत्वरिकता ही मानी जावेगी-तो यह यात सिद्धान्त से पहिभूत होने से मानने वाले के लिये उत्सूत्रप्ररूपणा करने की आपत्ति का दोप आवेगा-क्यों कि शास्त्र में भगवान ने नाम निक्षेप में केवल यावद्रव्य भविता ही प्रदर्शित की है। जो व्यक्ति इस शका का इस प्रकार से समाधान करते हैं कि काल के भेद से जो नाम और स्थापना मे भेट कहा गया है वह केवल उपलक्षण मात्र है-इससे अन्य अनेक प्रकारों से भी इन दोनों में परस्पर भेद है यह वात जानी जोती है " सो उनका यह कयन शाब. मर्यादा के विरुद्ध है जिस प्रकार नाम निक्षेप में कही २ इत्वरिकता होने पर भी भगवान द्वारा स्वीकृत न होने से वह उपलक्षगरूप से स्वीकृत नही की गई है-उसी प्रकार स्थापना में भी कालकृत भेद के સામાન્ય કથન છે વિશેષ નહિ સામાન્ય રૂપથી નામ યાવત્ કથિત જ હોય છે આ વાતને સામે રાખીને જ ભગવાને તેમા ઈરિકતાનું કથન ન કરતા ફક્ત યાવત્રુથિકતાનું કથન કર્યું છે જે નામમાં ફકત ઇરિકતા જ માનવામાં આવશે તે આ વાત સિદ્ધાન્તની બહાર હોવાથી માનનાર માટે ઉત્સુત્ર પ્રરૂ પણ કરવા રૂપ દોષ આવશે કેમકે શાસ્ત્રમાં ભગવાને નામ નિક્ષેપમાં ફક્ત યાવદુ-દ્રવ્ય-ભાવિતા જ બતાવી છે જે માણસે આ શકાનું સમાધાન આ પ્રમાણે કરે છે કે “કાલના ભેદથી જે નામ અને સ્થાપનામાં તફાવત બતાવવામાં આવ્યું છે તે ફક્ત ઉપલક્ષણ માત્ર છે એથી બીજા અનેક પ્રકારેથી પણ આ બનેમાં પરસ્પર તફાવત છે આ વાત સ્પષ્ટ થાય છે “જેથી તેમનું આ કહેવું શાસ્ત્ર-સર્યાદાથી વિપરીત છે જેમ નામ-નિક્ષેપમાં કેક કેઈક ઠેકાણે ત્વરિતા હોવા છતા ભગવાન વડે સ્વીકૃત ન હોવાથી તે ઉપરક્ષણ રૂપથી સ્વીકારવામાં આવી નથી, તેમ સ્થાપનામાં પણ કાલકૃત ભેદ સિવાય બીજા વડે - , अनगारचर्मामृतपिणी टोका म०१६ द्रौपदीचर्चा भेदस्य भगवताऽनुतत्वात् । एतेन-" यत् कैश्चिदुक्त यया प्रतिमाख्पस्थापनाद- शनाद् भावः समुल्लसति नै नामश्रवणमादिति नामन्यापनयोर्भेदः, यया चे न्द्रादे' प्रतिमारूपधापनाया,लोकस्योपयाचितेन्छा पूनापत्ति समीहितलाभादयो. दृश्यन्ते,नैव नागेन्द्रादी, इत्यपि तयोर्भेदः । एवमन्यदपि वाच्यमिति तदुत्सूत्रप्ररू सिवाय अन्य द्वारा अन्तर भेद मानने में उत्सन प्ररूपणा करने का दोप आता है, कारण कि भगवान ने काल कृत भेदके सिवाय स्थापना निक्षेप में अन्य और किसी दूसरी अपेक्षा से भेद का कथन नहीं किया है इस प्रकार के फथन से " यह बात भी जो दूसरों ने कही है कि नाम और स्थापना में इस प्रकार से भी भेद है-कि "जिस प्रकार अर्हत की प्रतिमारूपस्थापना के देवने-दर्शन करने से भावों की जागृति होती है, उस प्रकार नाम निक्षेपरूप अहं त नाम के सुनने से भावों की जागृति नहीं होती है। अथवा-इन्द्रादिक की प्रतिमारूप स्थापना में जिस प्रकार से लौकिकजनों की उस प्रतिमा से कुछ मागने की इच्छा उसके पूजन करने की भावना और उस प्रतिमा द्वारा उनके अभिलपि- तमनोरयों की पूर्ति होती हुई देखी जाती है उस प्रकार नामरूप इन्द्र में उनकी इस प्रकार की प्रवृत्ति और अभिलपित मनोरथो की पूर्ति रोनी हुई नहीं देखी जाती है। इसी तरह और भी ऐसी कई याने हैं जो नाम और स्थापना में अन्तर कराती है। यह सब कालकृत भेद के सिवाय ઉત્સવ પ્રરૂપણ રૂપ દેષ થઈ જાય છે કારણ કે ભગવાને કાલકૃત ભેદ સિવાય સ્થાપના નિક્ષેપમા બીજી કોઈ અન્ય દષ્ટિએ ભેદ-કથન કર્યું નથી આ જાતના ४थनथी । આ વાત પણ જે બીજાઓએ કહી છે કે નામ અને સ્થાપનામાં આ રીતે પણ તફાવત છે કે “જેમ અહં તની પ્રતિમા રૂપ સ્થાપનાને જેવા એટલે કે દર્શન કરવાથી ભાવની જાગૃતિ થાય છે, તેમ નામ નિક્ષેપ રૂપ અહંતના નામને સાડ થી પણ ભાવેની જાગૃતિ હોતી નથી અથવા તે ઈન્દ્ર વગેરેની પ્રતિમા રૂપ સ્થાપનામાં જેમ લૌકિક માણસોની તે પ્રતિમાથી કઈક માગણી કરવાની ઈચ્છા, તેની પૂજા કરવાની ભાવના અને તે પ્રતિમા વડે તેમના અભિલવિત મનોરથોની પૂર્તિ થતી દેખાય છે તેમ નામ રૂપ ઈન્દ્રમાં તેમની આ જાતની પ્રવૃત્તિ અને અભિવષિત મનેરથાની પૂર્તિ થતી જોવામાં આવતી નથી આ પ્રમાણે બીજી પણ ઘણી બાબત છે જે નામ અને થાપ મામાં અતર કરાવે છે, . - हातापण्यास पणा जनितानन्तसमारजनकम् । भागमे यदिदमुरउभ्यते-" हास्वाण अरहताण भगवताण नामगोयमवणयाए महाफलं।" इति, तत्र नास्ति नामनिक्षेपस्य विषयः। अरहताण भगताण इत्युक्त्या तस्मिन्नथें प्रयुक्तस्य नाम्न प श्रवणेन महा फलसभवात् , गोपालदारकादौ मयुक्तस्य नाम्न प्राणेन तु गोपालद्वारकाद्यर्थ स्यैव पोधादात्मपरिणामशुद्धिहेतृत्व तस्य नास्तीति । नामनिक्षेपस्थले भगतोऽ ईतः स्मरणासभव., तस्य भावशून्यत्वात् , अतु नामगोत्राभ्या गगवदर्हतः सम्बन्ध पष्ठचन्तपदपयोगादेव दर्शयता भगाता नामनिक्षेपो न पिवक्षितः । भावजिन नाम और स्थापना में भेद करपना का कथन उत्सूत्र प्रल्पक शेने से अनन्त ससार का जनक है अतः हेय है। "तहास्याण अरहताण भगवताण नामगोयसवणयाए महाफल " आगम में जो यह सूत्र लिग्वा हुआ देखा है उसका अभिप्राय नामनिक्षेप परक नहीं है। अर्थात्-इस सूत्र से नाम निक्षेप की पुष्टि नहीं होती है। यदि सूत्रकार को इस सूत्र से जो नामनिक्षेप की पुष्टि करना इष्ट होता तो " अरहताण भगव तोण इस पद के स्वतन्त्र देने की कोई खास आवश्यकता नहीं थीं। अतः यह यान माननी चाहिये कि अरहत भगवान के ही नामगोत्र के श्रवण से महाफल होता है। किसी गोपाल के लड़के में निक्षिप्त अरहत" इस नाम के सुनने से नहीं। उस में प्रयुक्त भी के श्रवण से तो केवल उस गोपाल दारकरूप अर्थ का ही योष होता है। अरहत यह नाम जिसरूप के सकेत से अरि- આ બધુ કાલકૃત ભેદ સિવાય નામ અને સ્થાપનામા ભેદ કલ્પનાનું કથન ઉસૂત્ર પ્રરૂપક હેવાથી અન ત સ સારનું જનક છે એથી ત્યાજ્ય तहारूवाण अरह वाण भगवताण नाम गोयसवणयाए । महोफले " मागममा જે આ સૂત્ર મળે તેને અભિપ્રાય નામનિક્ષેપપરક નથી એટલે કે આ સૂત્ર વડે નામ નિક્ષેપપુષ્ટિ થતી નથી જે સૂત્રકારને આ સૂત્ર વડે નામ-નિક્ષેપની पुष्टि ४२ e and a तो " अरह ताण भगव ताणं આ પદને સ્વત ત્ર રૂપમાં મૂકવાની કઈ ખાસ આવશ્યકતા હતી નહિ એથી આ વાત માની લેવી જોઈએ કે અહિત ભગવાનના નામ ગોત્ર-શ્રવણથી મહાફળ પ્રાપ્ત હોય છે કેઈ ગેપાળના પુત્રમાં નિક્ષિપ્ત “અરહત” આ નામને સાભળવાથી નહિ તેમ પ્રયુક્ત પણ તે નામના શ્રવણથી તે ફક્ત તે નેપાળના પુત્ર રૂપ અર્થ જ બોધ હોય છે જે अरहत આ નામ જે રૂપના મા કેતથી અહિત પ્રભુમાં સકેતિત થયું છે તે રૂપના સાકેતથી જ ગેપાળના उस नाम मनगारपामृतयरिणी टीका १० १६ द्रौपदीयों हंत प्रभु में मकेतित हुआ है-उसी रूप से सकेत से गोपाल के पुत्र में मकेतित नहीं हुआ है । लौक्कि व्यवहार के लिये ही वैवल "अरहत" ऐसा उसका नाम करलिया गया है। नाम निक्षेप में जिसका निक्षेप किया जाता है उस जाति के द्रव्य, गण और कर्म-क्रिया आदि निमित्त की अनपेक्षा रहती है इस निमित्त के सद्भाव में वह नाम निक्षेप का विपर नही माना जाताहै। भाव निक्षेप का ही वह विषय होता है अतः यह निश्चित होता है कि अरहत भगवान के ही नाम गोत्र के श्रवण के महाफल सम्रकार ने प्रकट कियाहै यदि नामनिक्षेप से यह फल प्राप्त होने लगता तो फिर भावनिक्षेप की आवश्यकता ही क्या थी। उसके श्रवण मात्र से ही जीवों के आत्मिक भावों में शुद्धिरूप महाफल का लाभ होने रगता। तथा जिसका “ अरिहन " यह नाम है वह ग्वय अरिहत प्रभु की तरह महापवित्र, ३४ अतिशयों सहित ८ प्रातिशय आदि विभूति सपन्न हो जाता। परन्तु ऐसा नहीं होता अरा: यह मानना चाहिये कि यह सूत्र भावनिक्षेप की ही पुष्टि विधायक है-नामनिक्षेप का नहीं। नामनिक्षेप से भगवान अरिहत की स्मृति भी नही कराई जाती है-कारण कि वह नामनिक्षेप स्वय उस प्रकार के भावों से शन्य है। अनुभूत पदार्थ की स्मृति हुआ करती થયુ નથી લૌકિક વ્યવહાર માટે ફક્ત અરહ ત આવું નામ પાડવામાં નામનિક્ષેપમા જેને નિક્ષેપ કરવામા આવે છે તે જતિના દ્રવ્ય, ગુણ અને કમ-ક્રિયા વગેરે નિમિત્તની અપેક્ષા રહે છે આ નિમિત્તના સદુભાવમાં તે નામ-નિક્ષેપને વિષય માનવામાં આવતું નથી ભાવ નિક્ષેપને જ તે વિષય હોય એથી એ સિદ્ધ થાય છે કે અહિત ભગવાનના જ નામ ગોત્રના શ્રવણથી જ સૂત્રકારે મહાફળ બતાવ્યું છે જો નામનિક્ષેપથી આ કળ મળી શકયુ હતું તે પછી ભાવનિક્ષેપની આવશ્યકતા જ શી હતી? તેના શ્રવણ માત્રથી જ જીવેની આત્મિક ભામા શુદ્ધિ રૂપ મહાફળનો લાભ થવા માડતે. આ નામ છે તે પોતે અરિહર પ્રભુની જેમ મહા પવિત્ર, ૩૪ અતિશયે સહિત, ૮ પ્રતિહાર્ય વગેરે વિભૂતિઓથી સપન થઈ જિાત, પણ આવું થતું નથી એથી એમ સમજી લેવું જોઈએ કે આ સૂત્રથી ભાવનિક્ષેપની જ પુષ્ટિ થાય છે-નામ નિક્ષેપની નહિ નામ નિક્ષેપથી ભગવાન અરિહતની સમૃતિ પણ કરવામાં આવતી નથી કારણ કે તેનામ-નિક્ષેપ જાતે તે જાનના ભાવથી રાહત છે અનુભૂત પદાર્થનું સ્મરણ થયા કરે છે જેનું તેમજ જેનુ "मरित " শামস है जिसका "अरिरंत" यह नाम रखा गया है उसके देखने से अरिहंत की स्मृति हो भी कैसे सकती है-स्मृति तो अरिहंत की जायरो मकती कि जब उसमें उनकी स्मृति के चिह होते-घर स्वप उस प्रकार के हेतु हो सकती है माना कि श्रवण फर्ता शान आदिको में अरिहरप्रभु के गुणों का वर्णन पढकर चित्त में उकेर कर भले ही "अति" इम नामके श्रवण से उनका स्मरण कर सकता है । परतु गोपालदारकादी में का नाम से उनका स्मरण उसे नहीं हो सकता-उस नाम से तो उसमें ही सकेतित उस शब्द से उस गोपाल दाररूप अर्थ का ही उसे योध शेगा। यदि अरिरत नाम के सुनने से सुनने वाले को अरिहत पदार्थ का भान होता हैतो वह नाम निक्षेप का विषय नहीं माना गया है भावनिक्षेप का ही वर विपय है। थोड़ा बहुत भी किमी अपेक्षा से सादृश्य होने पर एक पदार्थ को देखकर सदृश मरे पदार्थ का स्मरण हो जाता है परन्तु प्रकृत मे गोपालदोकरप अरित्त नामनिक्षेप में ऐसा कौन सा सादृश्य है जो वर अरिहत का स्मरण करा सके । अत' नाम और गोत्र के साथ साक्षात् भगवान अरिहत का सब पष्ठी विभक्ति द्वारा प्रर्शित करने वाले पत्रकार ने इस सूत्र में नामनिक्षेप का कोई આ નામ રાખવામાં આવ્યું છે તેને જોવાથી અરિહંત સ્મૃતિ પણ કેવી રીતે થઈ શકે તેમ છે? મૃતિ તે અરિહતની ત્યારે જ થઈ શકે કે જ્યારે તેમાં તેમની સ્મૃતિને ચિઠ્ઠો હોય, તે પોતે આ જાતના ભાવથી રહિત થયેલ હોય ત્યારે તે કેવી રીતે તેમની સ્મૃતિનું કારણ થઈ શકે છે આ વાત આપણે સ્વી કારી રાકતેમ છીએ કે શ્રવણ-કન્તુ શાસ્ત્ર વગેરેમા અરિહત પ્રભુના ગુણોનું વર્ણન વાચીને ચિત્તમાં ધારણ કરીને ભલે “અરિહત આ નામના શ્રવણથી તેમનું સ્મરણ કરી પાકે છે પણ ગોપાળદારક વગેરેમાં કૃત નામથી તેનું સ્મરણ થઈ શકતું નથી તે નામ વડે તે તેમા જ સ કેતિત તે શખથી તે ગોપાળદારક રૂપ અર્થનો જ તે બંધ થશે જે અરિહત નામ શ્રવણથી સાભળનારને અરિહંત પદાર્થોનું જ્ઞાન થાય છે ત્યારે તે નામનિસેપને વિષય માનવામાં આવ્યું નથી ભાવનિક્ષેપને જે તે વિષય છે કઈ પણ રીતે થોડુ પણ સરખાપણુ હેવાથી એક પદાર્થને જોઈને તેને સરખા બીજા પદાર્થનું સ્મરણ થઈ જાય છે પણ પ્રકૃતમ ગપાળદારક રૂપ અરિહત નામનિક્ષેપમાં એવુ કઈ જાતનું સરખાપણું છે કે જે તે અરિહંતનું સ્મરણ કરાવી શકે? એથી નામ અને ગેત્રની સાથે સાક્ષાત્ ભગવાન અરિહંતને સબષ પછી વિભકિત વડે દર્શાવનારા સૂનકારે આ સુરમા નામનિસેપને કંઈ પણ વિષય પ્રતિપાદિત કર્યો નથી * અરિહંત सनगराधमा मृतनविणी टीका० अ० १६ द्रौपदीचर्चा ३५५ वोधकम्य नाम्न एघ श्रवणेन महाफममयः । एप स्थापनापि भावरूपार्थशून्या, स्थापनया भावस्पार्थग्य नास्ति कोऽपि मम्पन्ध । भावजिनशरीरसतिनी याss- कृतिरामीत , तस्या आश्रयाश्रयिमा परम्मन्यो भागनिनेन सर तदानी विय- मान आसीन । या भावजिन पश्यास्तदानी भागोलासोऽपि कस्यचित् सजातः, भी विपर प्रतिपादित नहीं किया है। भावनिक्षेप का विषय इसमे कहा है इसलिये भावजिन वा सोध कराने वाले जिन 'अरिहत' आदि नामों के सुनने से ही महाफल होता है ऐसा मानना चाहिये। इसी प्रकार स्थापना निक्षेप भी भावरूप अर्थ से शून्य है कारण कि इसका उसके माग कोई सब नही है भावजिन की अवस्था की आकृति पापाण आदि की मृति मे "यह वही है" इस प्रकार की कल्पना करने का नाम स्थापना है तीर्थंकर प्रकृति के उदयसे समवस रणादि विभूति महिन आत्मा का नाम भाव जिन है हम मोव जिन के शरीर की जो आकृति है उसका सबप विचारिये उस पापाण आदि की प्रतिमा में कैसे आमकता है। क्यों कि इस आकृति का सवध आश्रय आश्रयी मावसे वे जिन जिसकाल मे थे उसी काल में उनके साथ था। उनके नही रहने पर पापाण आदि मे इस तरह का आश्रय आश्रयी भाव सबंध मानना उचित कैसे कहा जा सकता है, भावजिन के सहार में जिम प्रकर उनके साक्षात् दर्शन से प्राणियो को एक प्रकार ને જ વિષય તેમા બતાવ્યું છે એથી જીનને બોધ કરાવનાર જીન અરિ હત” વગેરે નામ શ્રવણથી મહાફળ પ્રાપ્ત હોય છે આમ સમજવું જોઈએ આ પ્રમાણે સ્થાપના નિક્ષેપ પણ ભાવ રૂપ અર્થથી રહિત છે કારણ કે આને તેની સાથે કોઈ પણ જાતને સબવ નથી ભાવનની અવસ્થાની આકૃતિ પથ્થર વગેરેની મૃતિમા આ તેઓ જ છે આ જાતની કલ્પના કરવાનું નામ સ્થાપના છે તીથ કરની પ્રકૃતિના ઉદયથી સમવસરણ વગેરે વિભૂતિ સહિત આત્માનું નામ ભાવજીન છે આ ભાવજીનના શરીરની જે આકૃતિ છે તેના વિશે આપણે પણ વિચાર કરીયે ક પથ્થર વગેરેની પ્રતિમામા તેને મધ કેવી રીતે આવી શકે કેમકે તે આકૃતિને સ બ ધ આશ્રય આશ્રયી ભાવથી તે જીન જે વાળમાં હતા તે કાળમા જ તેમની સાથે હતો તેમની ગેરહાજરીમાં પથર વગેરેમાં આ જાતને આશ્રય-આશ્રયી ભાવ સબબ માન્ય રાખ કેવી રીતે ચોગ કહી શકાય તેમ છે? ભાવજીનના સદૂભાવમાં જેમ તેમના સ લાત નથી પ્રાણીઓમાં એક જાતને ભલ્લારા દૂ “ - माताधर्मकथा तथा भत्या तामाकृति स्मरतो जनस्य भाषोल्लासः समवा, तदाऽऽर्भावजिनेन सरन्धात् , परतु स्थापनाया आश्रयाययिभावसम्पन्धो नास्ति भारजिनेन सह । भावजिनात्मनस्तत्रावाहन स्थापनंतु जिनातापाय पाचनविरुद तुमशम्य, कथ तर्हि-भावजिनसम्पन्धाभावे मतिमा भारजिन तद्गुण पा स्मारयितु शक्ता भवेत् । का भावोल्लास रोता है, उमी प्रकार से भक्ति के आवेश से भी उनकी उस आकृति का उस समय स्मरण करने वाले प्रोणी को उस प्रकार के भावोल्लास का सद्भाव हो मकता है। इसका निपेध नरी है। क्यों कि स्मृति के आधारभूत जिन परमात्मा उस काल में स्वय विद्यमान हैं। उन के अभाव में उन्हें नही देखने वाले प्राणियोंको भी उनकी उस प्रतिमा से उसी प्रकार का भीगोल्लास होता है यह मान्यता केवल एक कल्पना मात्र है वास्तविक नहीं। इसके समाधान के निमित्त जो यह कहा जाता है कि उस पापाण प्रतिमा में जिन भगवान की आत्मा का मत्रादिकों द्वारा आह्वान किया जाता है अत. उस प्रतिमा के दर्शन से साक्षात् भाव जिनके ही दर्शन होते है सो यह मान्यता सर्वथा असत्य है-कारण कि मोक्ष में प्राप्त आत्माओं का पाषाण आदि प्रतिमाओं में अपनी मान्यता सिद्ध करने के लिये आह्वान आदि मानना गर्वथा जिनसिद्धान्त से विरुद्ध है मोक्ष प्राप्त आत्माएँ कही पर भी किसी भी काल में आह्वान करने से नहीं आती हैं ऐसी जिन शासन की आजा है इस तरह से उस पाषाण आदि की आत्माओं का છે, તેમ ભકિતને આવેશથી પણ તેમની એ આકૃતિનું તે સમયે સ્મરણ કરનાર પ્રાણને તે જાતના ભાલ્લાસની અનુભૂતિ થઇ શકે છે અને નિષેધ નથી કેમકે સ્મૃતિમા તે આકૃતિના આધારભૂત જીન પરમાત્મા તે કાળમા જાતે વિદ્યમાન છેતેમના અભાવમાં તેમને નહિ જેનારા પ્રાણીઓને પણ તેમની તે પ્રતિમાથી તે પ્રમાણેને જ ભલ્લાસ થાય છે, આ માન્યતા ફક્ત એક કેરી કલ્પના જ છે, વાસ્તવિક નથી એના સમાધાન માટે જે આમ કહેવામાં આવે છે કે તે પથ્થરની પ્રતિમામા અને ભગવાનના આત્માનું મને વગેરેથી આવાહન કરવામા આવે છે, એથી તે પ્રતિમાના દર્શનથી પ્રત્યક્ષ ના જ દર્શન થાય છે, તે આ માન્યતા સાવ અસત્ય છે કારણ કે મેક્ષમાં પ્રાપ્ત આત્માઓનુ પથ્થર વગેરે પ્રતિમાઓમાં પોતાની માન્યતા સિદ્ધ કરવા માટે આહ્વાહન વગેરે માનવું છે તે જન સિછાતથી સાવ વિરૂધ્ધ છે મેક્ષ પ્રાપ્ત આત્માઓ કઈ પણ સ્થાને અને કોઈ પણ કાળે આવાહન કરવાથી નથી, એવી જીન રાસનની આજ્ઞા છે આ રીતે તે પથ્થર ભાવજીન આવતા अनगारधर्मामृतपिणी री० अ० १६ द्रौपदीचर्चा ३४७ सर्वथा कुमारचनिकद्रव्यावश्यकवत् प्रतिमापूजन कुर्वन्तः कारयन्तच मिथ्या- दृष्टित्व प्राप्नुवन्ति न तु सम्परत्वमिति । द्रव्यावश्यक-द्विविध-आगमतो नोआगमतश्च । यस्य जन्तोरावश्यकशास्त्र शिक्षितादिगुणोपेत भवति, स जन्तुस्तनावश्यक्शाखे शिष्याध्यापनरूपया वाचनया गुरु प्रति प्रश्नलक्षणया मच्छनया, पुनः पुनः सूत्रार्थाभ्यासरूपया परावर्तनया, तथा अहान होने से आना मान लिया जाय तो फिर उस प्रतिमा में सजी- यता मानने में क्या दोप है इसलिये यह स्वीकार करना ही चाहीये । कि भावजिन के अभाव में वह प्रतिमा भावजिन एव उनके गुणों का स्मरण करवाने में सर्वधा समर्थही है। जब यह निश्चित मिद्धान्त है तो फिर इसकी पूजनादि करने कराने से जो मनुष्य समकित की प्राप्ति होना मानते हैं वे उस विधवा कि दशा जैसे है जो अपने पति की फोटो या मृति के दर्शन एव सहवास आदि से सन्तान की उत्पत्ति की कामना करती हो । इसलिये कुमावनिक द्रव्य आवश्यक की तरह यह प्रतिमापूजनादि कर्म करने कराने वाले दोनों ही जन मिथ्यात्वरूप दृष्टि के ही पात्र हैं, सम्यक्त्व के नहीं। द्रव्य निक्षेपरूप आवश्यक, आगम और नोआगम के भेद से दो प्रकार का है। उसमे जिस प्राणी के आवश्यक शास्त्र शिक्षितादिगुणों युक्त है वह प्राणी उस आवश्य शास्त्र में, शिप्यों का पढानेरूप તે આત્માઓનું આવાહન હોવાથી આવવુ માની લઈએ તે પછી તે પ્રતિ માને સજીવ માનવામા શે વાધ છે? એટલા માટે આપણે આ વાત નવીકા ૨વી જ જોઇએ કે ભાવજનના અભાવમાં તે પ્રતિમા ભાવજીન અને તેમના ગુણોનું સ્મરણ કરાવવામા - પૂર્ણપણે સમર્થ જ છે જ્યારે આ મિધાન નિશ્ચિત રૂપે માન્ય થયેલો છે ત્યારે તેનું પૂજન વગેરે કરાવવાથી જે લેકે મમતિની પ્રાપ્તિ થવી માને છે તેમની તે વિધવા જેવી દશા છે કે જે પોતાના પતિની છબી કે મૂર્તિના દર્શન અને સહવાસ વગેરેથી સતાન મેળવવાની ઈચ્છા કરતી હેય ! એટલા માટે કુપ્રવચનિક દ્રવ્ય આવશ્યકની જેમ આ પ્રતિમા વગેરે કાર્ય કરનાર તેમજ કરાવનાર અને માણસો મિથ્યાત્વ રૂપ દૃષ્ટિના જ . से પાત્ર છે, સમ્યકત્વના નથી દ્રવ્ય નિક્ષેપ ૩૫ આવશ્યક આગમ તેમજ આગમના ભેદથી બે પ્રકાર છે તેમાં જે પ્રાણ આવશ્યક રાસ શિક્ષિત વગેરે ગુણોથી યુક્ત છે તે માણી તે આવશ્યક સામા શિને ભણાવવા રૂપ વાચનાથી, ગુરૂ-તિ તદ્ . पातामकथा धर्मकथया धनमानोप्यनुपयोगे सति आगमतो द्रव्यावश्यकम् , 'मणुपोगो दन्च' इति वचनात् । अनुपयोगो भानशून्यता । वाचना से, गुरु के प्रति तढिपयक प्रश्न लक्षणरूप पृच्छना से पार बार सूत्र और अर्थ के अभ्यामरूप परावर्तन से तथा धर्मकथा से वर्तमान होता हुआ भी अनुपयुक्त अवस्थासपन्न होने से आगम की अपेक्षा द्रव्य आवश्यक है। अनुपयोग का नाम ही द्रन्य है। भावार्थ-" भूतस्य माविनो वा भावस्य हि कारण तु यल्लोके तह- व्यम्" यह द्रव्यनिक्षेप का लक्षण है। भूतपर्याय या भविष्यत् पर्याय का जो कारण आधार होता है, या द्रव्य है जिस प्रकार किसी राजा के युवराज को राजा कह दिया जाता है यद्यपि वह अभी वर्तमान में राजारूपपर्याय से युक्त नहीं है-आगे उसे राजपर्याय प्राप्त होगी, परन्तु फिर भी उसे व्यवहार में लोग राजा करते है। यह भविष्यत पर्याय की अपेक्षा द्रव्य निक्षेपका विषय है । जोपहिले राजाधा-कारण वा जर वह राजागद्दी का परित्याग कर देता है-तय भी लोग उसे राजा कहते हैं। यहा उस राजा में यद्यपि वर्तमान समय मे राजपर्याय से युक्तता नही है तो भी भूतकाल की अपेक्षा से ही उसे राजा कहा जाता है। यह भूतकाल की अपेक्षा से राजपर्याय का आधार होने के कारण द्रव्य निक्षेप का विषय है प्रकृत मे इस निक्षेप की आयोजना इस प्रकार से વિષયક પ્રશ્ન લક્ષણ રૂપ પૃચ્છનાથીવાર વાર સૂત્ર અને અર્થના અભ્યાસ રૂપ પરાવતનથી તથા ધર્મકથાથી વર્તમાન હવા છતાયે અનુપયુક્ત અવસ્થા સંપન્ન રહેવાથી આગમની અપેક્ષા દ્રવ્ય આવશ્યક છે, અનુપયોગનું નામ જ દ્રવ્ય છે सापाथ- भूतस्य भाविनो वा भावत्य हि कारण तु यल्लाके तद् द्रव्यम्' આ દ્રવ્ય નિક્ષેપનું લક્ષણ છે ભૂત-પર્યાય કે ભવિષ્ય પર્યાયને જે કારણ આધાર હોય છે, તે દ્રવ્ય છે જેમ કે ઈ રાજાના યુવરાજને રાજા કહી દેવામાં આવે છે જે છે તે વર્તમાનમાં રાજા રૂપ પર્યાયથી યુકત નથી આગળ તેને રાજ પર્યાય પ્રાપ્ત થશે, છતાયે તેને વ્યવહારના લોકો રાજા કહે છે આ ભવિષ્ય પર્યાયની અપેક્ષા દ્રવ્ય નિક્ષેપને વિષય છે જે પહેલા રાજા હત–પણ કઈ કારણસર રાજગાદિને તે પરિત્યાગ કરી દે છે, ત્યારે પણ લકે તેને રાજા કહે છે. અહીં તે રાજામાં જે કે વર્તમાન સમયમાં રાજ પર્યાયથી યુકતતા નથી છતાયે ભૂતકાળની અપેક્ષાથી તેને રાજા કહેવામા આવે છે આ ભૂતકાળની અપેક્ષાથી તેને રાજ કહેવામાં આવે છે. આ ભૂતકાળની અપેક્ષાથી રાજપર્યાયને આધાર રહેવા બદલ ધ નિક્ષેપને વિષય છેપ્રકૃતિમાં આ " भनगारधर्मामृतपिणी टी० अ० १६ द्रौपदीचर्चा जब नो नागमतो द्रव्यावश्यकान्यते-आ नो शब्द सर्वथा प्रतिपेधे देशतः मतिपेपेऽपि च पर्तते । तथा च साथा-नागमाभावमाश्रित्य द्रव्यावश्यक, तथा होती है कि जो वर्तमान में आवश्यक शास्त्र का ज्ञाता नरी है आगे भविष्यत् काल में उत्त शास्त्र का ज्ञाता होंगे उसे तथा जो मृतकाल में उस शास्त्र का ज्ञाता था अब वर्तमान काल में उसका जाता नहीं है- उसे आवश्चक इस प्रकार जानना या कहना यहव्यनिक्षेप की अपेक्षा आवश्यक है। इसके मृल मे दो भेद हैं ? आगम द्रव्य निक्षेप और दूसरा नोआगमद्रव्यनिरुप । आवश्यक शान आदि का जो ज्ञाता हो, शिष्यों को जो उसे पहाता हो, उस चिपयक गुरु आदि के निकट जो तात्विक चर्चा आदि भी करता हो इस प्रकार वाचना, प्रच्छना-पर्य- टना अनुप्रेक्षा और धर्मोपदेशरूप पाचो प्रकार के स्वाध्याय से जो उसकी पर्यालोचना कर रहा है परन्तु उसमे उपयोग नहीं है-अनुपयुक्त है वह जागम की अपेक्षा द्रव्य आवश्यक है। इसमें आवश्यक शब्द के अर्थ का ज्ञान ही आगमरूप से विवक्षित है । अतः आवश्यक शास्त्र का ज्ञाता होता हुआ भी उसमे अनुपयुक्त आत्मा आगम की अपेक्षा द्रव्य आवश्यक है यह बात निश्चित हुई। नो आगम की अपेक्षा द्रव्य आवश्यक इस प्रकार है-जा आगम का सर्वथा अभाव या आगम के एक देश का अभाव विवक्षित होता જના એ રીતે હેય છે કે વર્તમાનમાં જે આવશ્યક શાસ્ત્રને જ્ઞાતા નથી, ભવિષ્યકાળમા તે ગાસ્ત્રને જ્ઞાતા થશે તેને તેમજ જે ભૂતકાળમાં તે શાસ્ત્રનો જ્ઞાતા હતે હમણું વર્તમાનકાળમાં તેને જ્ઞાતા નથી તેને, “આવશ્યક તે જાણવું કે કહેવુ આ દ્રનિલેપની અપેક્ષાએ આવશ્યક છે એના મૂળ રૂપે બે ભેદ છે-૧ આગમ દ્રવ્ય નિલેપ અને બીજે ને આગમ દ્રવ્ય નિષ વિષય ગુરૂ વગેરેની પાસે જઈને જે તાત્વિક ચર્ચા વગેરે પણ કરતા હોય, આવસ્યક વગેરેને જે સાતા હોય, જે સિબેને ભણાવતે હેય, તદુ આ રીતે વાચના, પ્રના, પટના, અનુપ્રેક્ષા અને ધર્મોપદેશ રૂપ પાસે જાતના સ્વાધ્યાયથી જે તેની પર્યાલચના કરી રહ્યો છે, પણ તેમા તેને ઉપ યેગ નથી, અનુપયુકત છે, તે આગમની અપેક્ષાદ્રવ્ય આવશ્યક રાદના અર્થનું જ્ઞાન જ આગમ રૂપથી વિવક્ષિત છે એવી આવશ્યક શાસ્ત્રના જ્ઞાતા હેવા છતાયે તેમાં અનુપયુકત આત્મા આગમની અપેક્ષા દ્રવ્ય આવશ્યક છે, આ વાત સિદ્ધ થઈ છે નોઆગમની અપેક્ષા દ્રવ્ય આવશ્યક એ પ્રમાણે છે કે જ્યા આગમને સંપૂર્ણપણે અભાવ કે આગમના એક દેશને અભાવ વિવલિત હોય છે તેનો , . અાવશ્યક છે એમાં - पातापर्मकया धर्मकथया चर्नमानीप्यनुपयोगे सति भागमतो द्रव्यावश्यकम् , 'अणुवनोगो दव्य' इति वचनात् । अनुपयोगो मान्यता। वाचना से, गुरु के प्रति तलिपयक प्रश्न लक्षणरूप पटना से चार बार सूत्र और अर्थ के अभ्यासरुप परावर्तन से तथा धर्मकथा से वर्तमान होता हुआ भी अनुपयुक्त अवस्थासपन्न होने से आगम की अपेक्षा द्रव्य आवश्यक है। अनुपयोग का नाम ही द्रव्य है। भावार्थ-" भूतस्य भाविनो वा भावस्प हि कारण तु यल्लोके तद्र व्यम्" यह द्रव्यनिक्षेप का लक्षण है। मूतपर्याय या भविष्यत् पर्याय का जो कारण आधार होता है, वह द्रव्य है जिस प्रकार किसी राजा के युवराज को राजा कह दिया जाता है यद्यपि वह अभी वर्तमान में राजारूपपर्याय से युक्त नहीं है-आगे उसे राजपर्याय प्राप्त होगी, परन्तु फिर भी उसे व्यवहार में लोग राजा कहते है। यह भविष्यत् पर्याय की अपेक्षा द्रव्य निक्षेपका विषय है। जोपहिले राजा था-कारण वा जर वह राजागद्दी का परित्याग कर देता है-तब भी लोग उसे राजा करते हैं। यहां उस राजा में यद्यपि वर्तमान समय मे राजपर्याय से युक्तता नही है तो भी भूतकाल की अपेक्षा से ही उसे राजा कहा जाता है। यह भूतकाल की अपेक्षा से राजपर्याय का आधार होने के कारण द्रव्य निक्षेप का विषय है प्रकृन में इस निक्षेप की आयोजना इस प्रकार से વિષયક પ્રશ્નના લક્ષણ રૂપ પુરતાથી, વારવાર સૂત્ર અને અર્થના અભ્યાસ રૂપ પરાવર્તનથી તથા ધર્મકથાથી વર્તમાન હોવા છતાયે અનુપયુક્ત અવસ્થા સંપન્ન હોવાથી આગમની અપેક્ષા દ્રવ્ય આવશ્યક છે, અનુપગનું નામ જ દ્રવ્ય છે लापा--" भूतस्य भाविनो वा भावत्य हि कारण तु यल्लाके तद् द्रव्यम् આ દ્રવ્ય નિપનું લક્ષણ છે ભૂત-પર્યાય કે ભવિષ્ય પર્યાય છે કારણ આધાર હોય છે, તે દ્રવ્ય છે જેમ કે ઈ રાજાના યુવરાજને રાજા કહી દેવામાં આવે છે જે કે તે વર્તમાનમાં રાજા રૂપ પર્યાયથી યુક્ત નથી આગળ તેને રાજ પર્યાય પ્રાપ્ત થશે, છતાયે તેને વ્યવહારમાં લોકો શા કહે છે આ ભવિધ્યતા પર્યાયની અપેક્ષા દ્રવ્ય નિક્ષેપને વિષય છે જે પહેલા રાજ હત–પણ કોઈ કારણસર રાજગાદિને તે પરિત્યાગ કરી દે છે, ત્યારે પણ લેકે તેને રાજા કહે છે. અહીં તે રાજામાં કે વર્તમાન સમયમાં રાજ પયયથી યુકતતા નથી છતાયે ભૂતકાળની અપેક્ષાથી તેને રાજા કહેવામાં આવે છે આ ભૂતકાળની અપેક્ષાથી તેને રાજા કહેવામાં આવે છે આ ભૂતકાળની અપેક્ષાથી રાજપને આધાર લેવા બદલ દ્રવ્ય નિક્ષેપનો વિજય છે પ્રકૃતિમાં આ " -- . भनगारधर्मामृतवपिणी टी० ५० १६ द्रौपदीचर्चा जय नोभागमतो द्रव्यावश्यकमुन्यते-ना नो शब्द' सर्वथा प्रतिषेधे देशतः मतिपेयेऽपि च वर्तते । तथा च सर्वथा-नागमाभावमाश्रित्य द्रव्यावश्यक, तथा होती है कि जो वर्तमान में आवश्यक शास्त्र का ज्ञाता नती है आगे भविष्यत् काल में उप्त शाल का ज्ञाता होंगे उसे तथा जो भूतकाल में उस शास्त्र का ज्ञाता या अर वर्तमान काल मे उसका ज्ञाता नहीं है- उसे आवश्यक इस प्रकार जानना या कहना यहद्रव्यनिक्षेप की अपेक्षा आवश्यक है। इसके मूल मे दो भेद हैं ? आगम द्रव्य निक्षेप और दूसरा नोआगमद्रव्यनिक्षेप । आवश्यक शास्त्र आदि का जो जाता हो, शिष्यों को जो उसे पढाता हो, उस विषयक गुरु आदि के निकट जो तात्त्विक चर्चा आदि भी करता हो इस प्रकार वाचना, प्रच्छना-पर्य- टना अनुप्रेक्षा और धर्मोपटेशरूप पाचो प्रकार के स्वाध्याय से जो उसकी पर्यालोचना कर रहा है परन्तु उसमे उपयोग नहीं है-अनुपयुक्त है वह आगम की अपेक्षा द्रव्य आवश्यक है। इसमें आवश्यक शब्द के अर्थ का ज्ञान ही आगमरूप से विवक्षित है। अतः आवश्यक शास्त्र का ज्ञाता होता हुआ भी उसमे अनुपयुक्त आत्मा आगम की अपेक्षा द्रव्य आवश्यक है यह बात निश्चित हुई। नो आगम की अपेक्षा द्रव्य आवश्यक इस प्रकार हे-जहा आगम का सर्वथा अभाव या आगम के एक देश का अभाव विवक्षित होता જના એ રીતે હોય છે કે વર્તમાનમાં જે આવશ્યક શાસ્ત્રને જ્ઞાતા નથી, ભવિષ્યકાળમા તે શાસ્ત્રનો જ્ઞાતા થશે તેને તેમજ જે ભૂતકાળમાં તે શાસ્ત્રને જ્ઞાતા હતે હમણું વર્તમાનકાળમા તેને જ્ઞાતા નથી તેને, “આવશ્યક રીતે જાણવું કે કહેવું આ દ્રનિક્ષેપની અપેક્ષાએ આવશ્યક છે એના મૂળ રૂપે બે ભેદ છે-૧ આગમ દ્રવ્ય નિલેપ અને બીજ ને આગમ દ્રવ્ય નિક્ષેપ આવશ્યક રાસ વગેરેને જે સાતા હોય જે શિષ્યને ભણાવતે હેય, તદ વિષય ગુરૂ વગેરેની પાસે જઈને જે તાવિક ચર્ચા વગેરે પણ કરતા હોય, આ રીતે વાચના, પ્ર૭ના, પર્યટના, અપ્રેલા અને ધર્મોપદેશ રૂપ પાસે જાતને સ્વાધ્યાયથી જે તેની પર્યાલચના કરી રહ્યો છે, પણ તેમાં તેને ઉપ ગ નથી, અનુપયુક્ત છે, તે આગમની અપેક્ષાદ્રવ્ય આવશ્યક ” છે એમ આવશ્યક પાબ્દને અર્થનું જ્ઞાન જ આગમ રૂપથી વિવક્ષિત છે એવી આવશ્યક ગાસ્ત્રના જ્ઞાતા હોવા છતાયે તેમાં અનુપયુક્ત આત્મા આગમની અપેક્ષા દ્રવ્ય આવશ્યક છે, આ વાત સિદ્ધ થઈ છે આગમની અપેલા દ્રવ્ય આવશ્યક એ પ્રમાણે છે કે જ્યા આગમને સંપૂર્ણપણે અભાવ કે આગમના એક દેશને અભાવ વિવક્ષિત હોય सा તે ને.
146 शानाधर्मकपास देशत आगमाभाषमाश्रित्य द्रव्यापक 7-नानागमती द्रव्याश्यकम् । तत्-त्रिवि धम्-शरीरद्रव्यावश्यक, भव्यशरीरमध्यावश्यक तापनिरिक्त द्रव्याश्या चेति । है-वर नो आगम की अपेक्षा से वय आवम्यक माना गया है। "नो आगम "में नो शन्द सर्वथा आगम के अभाव का अपना उसके एक देश के अभाव का योधक है। हमके जठारीरगन्यायक, भव्यशरीर. द्रव्यावश्यक, और तद्व्यतिरिक्त द्रव्याश्यक, इन प्रकार तीन भेद हैं। आवश्यक शान्न का जो पहिले (भूतकाल में ) ज्ञाता -तथा दूसरों के लिये इस शास्त्र का उपदेश आदि भी जिसने पहिले दिया है ऐसे जीव का अचेतन शरीर शरीरदन्यावश्यक हे जो जीव इस समय आवश्यक शास्त्र का ज्ञाता नहीं है भविष्यत् काल में उमझा जाता बनेगा उसका वह मचेतन शरीर भविष्यत् काल में आवश्यक शास्त्र के ज्ञान का आधार होने की अपेक्षा से, भव्यशरीरद्रव्यावश्यक है। तयतिरिक्तद्रव्यावश्यक लौकिक प्रापचनिक और लोकोत्तर के भेद से ३ प्रकार का है। लौकिकजनों द्वारा आचरित आवश्यक कर्म लौकिक द्रव्यआवश्यक है । जैसे राजसभा मे जाने वाले राजा, युवराज, तल वर (कोहपाल) आदि जन प्रातः काल मे उठकर राजसभा मे जाने के लिये प्रथम प्राभातिक विधियो से निपटते है-मुग्व धोते है, दानों को मागभनी अपेक्षाथी द्रव्य मापश्य मानवामा साध्या "नोआगम" भा ને શબ્દ આગમના સંપૂર્ણપણે અભાવને કે તેના એક દેશના અભાવને બેધક છે તેના જ્ઞશરીર દ્રવ્યાવશ્યક, ભગશરીર દ્રવ્યાવશ્યક અને તદતિ રિકત દ્રવ્યાવશ્યક આ પ્રમાણે ત્રણ ભેદે છે આવશ્યક સાસ્ત્રને જે પહેલા (ભૂતકાળમાં) જ્ઞાતા હતા તેમજ બીજાઓ માટે આ શાસ્ત્રનો ઉપદેશ વગેરે પણ જેણે પહેલા આપે છે એવા જીવતુ અચેતન શરીર જ્ઞ શરીર દ્રવ્યાવશ્યક છે જે જીવ અત્યારે આવશ્યક રાસ્ત્રનો જ્ઞાતા નથી, ભવિષ્યકાળમા તેને જ્ઞાતા થશે તેનું તે સચેતન શરીર ભવિષ્યકાળમાં આવશ્યક શાસ્ત્રના જ્ઞાનને આધાર હોવાને કારણે ભવ્ય શરીર દ્રવ્યાવશ્યક છે તદુવ્યતિરિકત વ્યાવશ્યક લૌકિક કુટાવચનિક અને લેકાર એમ ત્રણ પ્રકારને છે લૌકિક માણસે વડે આચરિત આવશ્યક કમ લૌકિક દ્રવ્ય આવશ્યક છે જેમ રાજસભામાં જનારા રાજા, યુવરાજ, તલવર (કેટ્ટપાલ) વગેરે લેકે સવારે ઉઠીને રાજ સભામાં જવા માટે પ્રથમ પ્રભાતિક વિધિથી પરવારે છે, મુખ ધુએ છે, " अनगारधर्मामृतपरिणी टी० अ० १६ द्रौपदीचर्चा ३५१ ज्ञात गनिति-ज, तस्य गरीर जगरीर नदेव न्यायसमिति विग्रहः । जीव परित्यक्तमावश्यकशासनानवतः गरीर नगरीरद्रव्यावश्यकम् । यः कश्चिद् जीवः जन्मकालादारभ्य अनेनैर आत्तेन - गृहीतेन शरीरसमुन्ग, निनोपदिप्टेन भावेन आवश्यकमित्येतत् पद-शाम आगामिनि काले शिभिप्यते न तारटिश्यते, तज्जीवाधिष्ठित शरीर भव्यगरीरद्रव्यापश्यामिति । शरीर-भव्यशरीरव्यति रिक्त द्रव्यापरयक त्रिवियम्-लोरिक, कुमारचनिक, लोकोत्तरिक चेति । लौकिक द्रव्यापश्यम् । ये राजेश्वरतलबरादय प्रभातसमये-मुखधावन- दन्तप्रक्षालन-तेल-कडूतक-मर्पप-दुर्या-दर्पण-धूप-पुष्प-मारय-गन्ध-ताम्बूल वनादिकानिद्रव्यानश्यकानि कुर्वन्ति, कृत्या पश्चाद् राजकुलदेवकुलादौ गच्छन्ति, तत्-तेपा सम्बन्धिमुग्वधारनादि । कुमावनिक द्रव्यावश्यकम् 'ये इमे चरकचीरिकादयः पापण्डस्था , इन्द्र- स्कन्द-रुद्र-शिव-वैश्रवण-देव-नाग-यक्ष-भूत-मुकुन्दाऽऽर्या-दुर्गा- कोक्रिया णाम् उपलेपनसमार्जनाऽऽपणधूपपुप्पगन्धमाल्यादिनानि ट्रयावश्यकानि कुर्वन्ति तेपा तद् इन्द्रस्कन्दादेरुपलेपनादि । कुत्सित मवचन येपा ते कुपवचना स्तेपामिद कुमावचनिकम् । उपलेपन चन्दनपङ्केन, समार्जन-स्नपनानन्तर वस्त्रेण जलपोन्छनम् आवर्षणगन्धोदकेन, 'गुलावजल ' इत्यादि भापापसिद्धेन । नामावश्यम्-आवश्यफ्नामको गोपालदारकादिः, स्थापनावश्यकम्-आव साफ करते ह, स्नान करते है। सुगधित तेल लगाते हे इत्यादि आव- श्यक कार्य करते हैं। पीछे राजसभा मे या देवकुल मे जाते है। उनका यह मुख धावन आदि कार्य लौकिक द्रव्य आवश्यक है। चरक चीरिक आदि पाखडियो द्वारा जो इन्द्र, स्कन्द, रुद्र, वैश्रवण, देव, नाग और यक्षादिकों की मृतियो का चदन से लेपन, अभिषेक कराने के बाद वस्त्र से मूर्तिस्थ जल का पोछना मदिर में या उन मूर्तियो पर गुलाब जल का छिडकाव आदि करना ये सब कुप्रावनिक द्रव्यावश्यक है। દાત સાફ કરે છે, સનાન કરે છે, સુગ ધિત તેલ લગાવે છે, વગેરે આવશ્યક કાર્યો કરે છે ત્યારપછી રાજસભામા અથવા તે દેવકુળમાં જાય છે તેમનું મુખ ધવું વગેરે કામ લૌકિક-દ્રવ્ય આવશ્યક છે ચરક ચીરિક વગેરે પાખ सो १२न्द्र, २४६, ३६, शिव, वैश्रत हेव, ना२ २५ने यक्षी पनी મૃર્તિઓનુ ચદનથી અભિષેક કરાવ્યા બાદ વસ્ત્રથી મૂર્તિના પાણીને સૂવું, મદિરમાં કે તે મૂર્તિઓ ઉપર ગુલાબજળનું સિંચન વગેરે કરવું આ બધુ કુપ્રવચનિક દ્રાવક છે. આ પ્રમાણે નામ સ્થાપના અને દ્રવ્યના ભેથી આ . - ३५२ माताधर्मकपाङ्गमारे यफक्रियारत यस्यचित् का टर्मादिपु प्रतिमतिः, द्रव्यापश्या च आपश्य कोपयोगगन्या देहानमकिया, पारश्यका उपयोगामान चाणगुणरहितत्वेन च कर्मनिराजनकत्सामागदागययन जिनामा नास्ति, तम्मादतन विनियमाव श्यक धर्मपदाच्य न भवतीति निश्रयादरल्यमेव । कोतरिकद्रव्यापक प्रव इस प्रकार नाम, स्थापना और द्रव्य के भेद से यर आश्यक तीन प्रकार का होता है। किसी गोपाल के पुन का "आवश्यक " हम प्रकार का कृतनाम सस्कार नाम आवश्यक है। आवश्यक शियाओ से युक्त किसी व्यक्ति की काष्ठ आदि में तदाकार रूप से या अतदाकाररूप से प्रतिकृतिको कल्पना करना या उसे बनाना यह स्थापना आवश्यक है। आवश्यक में उपयोग से शन्य प्राणी की जो भी आगम और नो आगम की अपेक्षा से क्रियाएँ है वे सर द्रव्य आवश्यक हैं। इन तीनों आव श्यको मे उपयोग-भाररूप-आवश्यक के अभाव से तथा चारित्रगुण तदनुकूल प्रवृत्ति के आचरण से रहित शेने से कर्मों की निर्जग कराने में साधकपना नहीं है। अत' जिनेन्द्रदेव ने इनके आराधन करने की आज्ञा प्रदान नहीं की है। धर्म को ही आराधन करने की उन्होंने आज्ञा दी है क्यों कि वही कर्मों की निर्जरा कराने में साधक है। इन तीनों में कों की निर्जरा कराने का अभाव होने से धर्मम्वरूपता नहीं है। धर्मपद वाच्य भी ये नहीं हैं। इसीलिये ये तीनो धर्म के लक्षण से शुन्य होने से उसके अलक्ष्य है, ऐसा समझना चाहिये । लोकोत्तरिक द्रव्य આવશ્યક ત્રણ પ્રકારનું હોય છે કેઈ ગોપાળના પુત્રને આવશ્યક રીતે કરેલ સસ્કાર નામ આવશ્યક છે આવશ્યક ક્રિયાઓથી યુકત કઈ વ્યકિતની કોષ વગેરેમાં તદાકાર રૂપથી કે અતદાકાર રૂપથી પ્રતિકૃતિની કલપના કરવી કે પ્રતિકૃતિનું નિર્માણ કરવું તે સ્થાપના આવશ્યક છે આવશ્યકમાં ઉપયોગથી પહિત પ્રાણની જે કઇ પણ આગમ અને ન આગમની અપેક્ષાથી કિયાઓ છે તે બધી દબ આવશ્યક છે આ ત્રણે આવશ્યકમા ઉપગ ભાવ રૂપ આવશ્યના અભાવથી તેમજ ચારિત્રગુણ તદનુકુળ પ્રવૃત્તિના આચરણ વગર થઈ જવાથી કર્મોની નિર્જરી કરાવવામાં સાધકપણું નથી તેથી જીતેન્દ્ર દેવે તેમના આરાધનની આજ્ઞા આપી નવી ધર્મની આરાધના કરવાની જ તેઓ શ્રીએ આજ્ઞા આપી છે કે વર્મજ કર્મોની નિર્જરા કરાવવામાં સાધક છે આ ત્રણેમા કર્મોની નિર્જરા કરાવવાને અભાવ હોવાને કારણે ધર્મવરૂપના નથી એ ધર્મપદ વાચ્ચ પણ નથી તેથી આ ત્રણે ધર્મના લક્ષણથી રહિત હોવાને કારણે તેના અલગ્ન છે એમ સમજવું જોઈએ સામાયિક વગેરે લકે . ' આ अनगारधर्मामृतपपिणी टी० १० १६ द्रौपदीचर्चा ३५३ चनोक्त सदपि जिनाज्ञागार सन्न्दनिहारिभिर्मूलोत्तरगुणरहितै पट्कायनिरनु फम्पैरनुपयोगपूर्व क्रियमाण मामायिकादिकम् तच्च धर्मपदवाच्य न भवितुमर्हति, तनापि निराजनकलाभावेन वियतया जिनाज्ञाया आभावात् । एवमेन-नामजिन' स्थापनामिनस्तथा द्रव्यजिनश्च निर्जराजनस्त्वाभावा दाराध्यत्वेन जिनाज्ञाया अभावात् । तदारापन धर्मपदवान्य न भनितुईति । आवश्यक समायिक आदि है इनके करने का विधान यद्यपि प्रवचन शास्त्र में विहित है तो भी उसे जो धर्म का अलक्ष्य बताया गया है उसका कारण यह है कि ये जर जिनदेव की आज्ञा से रहिर्भूत बने हुए, स्वेच्छाचारी, मृलगुण और उत्तर गुणो से रहित एव पटूकाय के जीवों की रक्षा करने में आसावधान मनुष्यो द्वारा अनुपयोगपूर्वक करने में आते हैं तब ये द्रव्य आवश्यकरूप से कहे जाते हैं। और इसीलिये ये धर्मपद के चाच्य नही है अर्थात् धर्मरूप नहीं हैं। जहा धर्मरूपता नही है वहा कर्मों की निर्जरा कारकत्व भी नही है। यह सर्व सम्मत सिद्धान्त है। भगवान ने जो इम अवस्था में इन्हें विधेय नहीं कहा है उसका यही कारण है । अतः जिस प्रकार नाम आव- व्यक, स्थापनो आवश्यक और द्रव्य ओवश्यक ये तीन निक्षेप आरा यरूप से तीर्थकर प्रभु ने अनविधेय कहे है, उसी प्रकार से नामजिन स्थापनाजिन तथा द्रव्यजिन भी आराय नही हैं। इनकी आराधना करने में जो धर्म की प्राप्ति होना कहते है या मानते हैं उन्हें जिन તાર દ્રવ્ય આવશ્યક છે પ્રવચન શાસ્ત્રમાં એમના આચરણનું વિધાન વિહિત છે છતાયે એને જે ધર્મના અલક્ષ્ય રૂપમાં બતાવવામાં આવે છે તેની મત લબ એ છે કે જ્યારે તે જનદેવની આજ્ઞાથી બહિબૂત બનેલા સ્વેચ્છાચારી, મૂળગુણ તેમજ ઉત્તર ગુણોથી રહિત અને પટકાય જીની કરવામાં અસાવધાન માણ વડે અનુપગ પૂર્વક આચરવામાં આવે એથી તે ધર્મપત્ર વાચ્યા નથી એટલે કે ધર્મ રૂપ નથી ક્યા ધર્મરૂપતા નથી ત્યા કર્મોની નિરા કારકતા પણ નથી આ સર્વમા ય સિદ્ધાન્ત છે ભગવાને જે આ અવસ્થામાં એમને વિધેય કહ્યા નથી તેનું કારણ પણ એ જ છે એટલા માટે જેમ નામ આવશ્યક, સ્થાપના આવશ્યક અને દ્રવ્ય આવશ્યક આ ત્રણ્ નિક્ષેપને આરાવ્ય રૂપથી તીર્થકર પ્રભુએ અવિધેય કહ્યા છે, તેમજ નામ જિન, સ્થાપના જિન, તેમજ વ્યજિન પણ આરાધ્ય નથી એમની આરાધના કરવામા જે ધર્મની પ્રાપ્તિ થવી બનાવવામા આવે છે કે માનવામા આવે છે, તેમને જિન ભગવાનની રક્ષા ત્યારે તે દ્રવ્ય અવશ્યક રૂપમાં કહેવાય છે झा ४५ पाताधकथा एर च मतिमापूजनमपि धर्मलक्षणस्य लक्ष्यं न भवति, तत्र धर्मवाभाष निश्चयात् । 'मोक्षकागो जिनप्रतिमा पूजयेत्' इत्येवमहतो भगवन आशायाः प्रवचने- ऽनुपलव्धेः । धर्मविपये संत भगादासोपलभ्यते-दृश्यते हि आवश्ययार्थ भगव भगवान की आज्ञा से परिभ तरी समझना चाहिये । यदि इन निक्षेपों की या स्थापनानिक्षेप की आराधना करने से आरोधक जीवों को धर्म का लाभ होता तो वे उनकी आराधना करने का मन्य जीवों को अब श्य २ उपदेश देते। इस प्रकार की स्वमनः करिपत प्रवृत्ति से उनकी पूजा आदि करने में पटूफाय के जीवों की कितनी विरापना होती है यह एक स्वानुभवगम्य बात है। अतः जहाँ आरभ है वरा धर्म नहीं है। जहा धर्म नहीं है उसकी आराधना से कर्मो की निर्जरा भी नहीं हो सकती है। इस प्रकार से नाम स्थापना और द्रव्यजिन आदि तीन निक्षेप भी धर्म के लक्षण से शून्य रोने से उसके अलक्ष्य माने गये है । जय स्थापना जिन ही उसका अलक्ष्यभूत है, तो फिर जिन की प्रतिमा बनाकर उसकी पूजा आदि कार्य भी धर्मलक्षण से शून्य होने से वह भी उसका अलक्ष्य है ऐसा निश्चित हो जाता है भगवान ने इस प्रकार की आज्ञा शास्त्र में कहीं भी नही दी है " मोक्षकामो जिन प्रतिमा पूजयेत्" कि मुक्ति की अभिलापा वाला प्राणी जिन प्रतिमा की पूजा धर्मकी आराधना करने की ही उन्हों ने आगम में आज्ञा આજ્ઞાથી બહિÉત જ સમજવા જોઈએ આ નિક્ષેપની સ્થાપના નિક્ષેપની આરાધના કરવાથી આરાધક જીને ધર્મને લાભ થતો હોય ત્યારે તે તેઓ તેમની આરાધના કરવા માટે ભવ્ય અને ચોક્કસ ઉપદેશ આપતા પિતાના મનથી જ કલ્પના કરીને તેમની પૂજા વગેરે કરવામા પકાય છની કેટલી બધી વિરાધના હોય છે તે જાતે જ અનુભવવા જેવી વાત છે એટલા માટે જ્યા આર ભ છે ત્યા ધર્મ તો નથી જ અને જ્યા ધર્મ નથી તેની આરા ધનાથી કર્મોની નિર્જરા પણ થઈ શકે તેમ નથી આ રીતે નામ સ્થાપના અને દ્રવ્ય જિન વગેરે ત્રણ નિક્ષેપ પણ ધર્મના લક્ષણથી રહિત લેવા બદલ તેને અલક્ષ્ય માનવામાં આવ્યા છે જ્યારે સ્થાપના જિન જ તેના માટે અલક્ષ્યરૂપ છે, ત્યારે જિનની પ્રતિમા બનાવીને તેની પૂજા વગેરે કાર્યો પણ ધર્મલક્ષણથી રહિત લેવાથી તે પણ તેના માટે અલક્ષ્યરૂપ છે આવી ચોક્કસ ખાત્રી થઈ જાય છેભગવાને આ જાતની આજ્ઞા શાસ્ત્રમાં કોઈ પણ સ્થાને કરી નથી मोक्षकामो जिनप्रतिमा पूजयेत् " भाक्षी छ। रामनार ent પ્રતિમાનું પૂજન ડરે ધર્મની આરાધના કરવાની જ તેઓશ્રીએ करें। આ રીતે माज्ञा भनगारधर्मामृतपिणी टी० १० १६ द्रोपदीचर्चा दाहा, दर्शनार्य ज्ञानार्य च भगवदागा पुनरहिंसासयमतपःसारादिविधिरपि शास्त्रे प्रदर्शितः परतु प्रतिमापूजनार्थमाता क्यापि नोपलभ्यते शास्त्रेषु, प्रत्युत कुप्रावचनिकद्रव्यावश्यकलक्षणाक्रान्तत्वेन प्रतिमापूजन जैनागमविरुद्धमिति सचितम् । इन्द्रादिपूजन हि कुमावनिकस्य नोआगमतो द्रव्यावश्यकस्योदाह- रणतया भगवता प्रदर्शितम् । तेन सर्व मतिमापूजन कुमावनिचक तादृशद्रव्याव इपके भगता निक्षिप्तमिति मुस्पष्ट प्रतीयते । पटकायहिमासान्यायाः पूजाया प्रदान की है जैसे-आवश्यक, दर्शन और ज्ञान की आराधना प्रत्येक मोक्षामिलापी भव्य जन को करना चाहिये-इस प्रकार के आवश्यक आदि की आराधना करने का स्पष्ट उल्लेख आगमो में मिलता है-तथा जिस प्रकार उन्होंने अहिंसा, सयम, तप और सवर आदि की विधि शास्त्रों में प्रदर्शित की है-उस प्रकार न तो उन्होने प्रतिमा पूजन की कहीं न आज्ञा प्रदान की है और न उस की विधि ही कही है कुप्रा- वचनिक द्रव्य आवश्यक के लक्षण से युक्त होने से प्रत्युत प्रतिमापूजन को जैन आगम से विरुद्ध ही सूचित किया है। कुप्रापचनियों द्वारा मान्य इन्द्रादिकों के पूजन को भगवान नो आगम की अपेक्षा से द्रव्य आवश्यक के उदाहरण रूप में प्रकट किया है इससे ही यह यात स्पष्ट हो जाती है कि उन्होंने अन्य समस्त प्रतिमा पूजन को भी इसी कुप्रा- वचनिक द्रव्य आवश्यक की तरह द्रव्य आवश्यक में रखा है । प्रवचन में कुत्सितता-खोटापन कुशास्त्रता हिमादिक माध्य पूजा आदि कार्यो કરી છે જેમ આવશ્યક, દર્શન અને જ્ઞાનની આરાધના દરેકે દરેક મિક્ષ ઈ કનારા ભવ્ય જનને કરવી ઘટે છે જેમ આવશ્યક વગેરેની આરાધના કરવા વિષેને ઉલેખ આગમાં મળે છે, તેમજ જેમ તેમણે અહિંસા, સયમ, તપ અને સવર વગેરેની વિધિ શાસ્ત્રોમાં બતાવી છે તેમ તેમણે કોઈ પણ સ્થાને પ્રતિમા પૂજનની આજ્ઞા કરી નથી અને તેની વિધિ પણ બતાવી નથી પ્રતિમા પૂજાને કુપાવચનિક દ્રવ્ય આવશ્યકના લક્ષણથી યુક્ત હેવા બદલ જૈન બતાવવામાં આવી છે કુકાવથનીઓ વડે માન્ય ઈન્દ્ર વગેરેના પૂજનને ભગવાને આગમની અપેક્ષાએ દ્રવ્ય આવકના ઉદાહરણ રૂપમાં બતાવ્યું છે એથી આ વાત સ્પષ્ટ સમજી શકાય તેમ છે કે તેમણે બીજી પણ બધી પ્રતિમા પૂજાને પણ આ કુવચનિક દ્રવ્ય આવશ્યકની જેમ ક આવશ્યકમાં જ સ્થાન આપ્યું છે પ્રવચનમાં કુત્સિતતા કુશાસ્ત્રતા હિંસા વગેરે સાધ્ય પૂજા વગેરે કાર્યોની પુષ્ટિ કરવાથી જ સંભવે છે બીજા ચરક આગામેથી વિરૂદ્ધ কামাখা विधायकतया पचनस्य कुत्सितत्व, तेने चन्द्रादिपूजनस्य कुमारचनिक्ल भवति । एत्र प्ररूपयतो भगनतोऽहंतः प्रतिमाया पूजनस्य प्रगद पर तदानी नासी-हिंसामयत्वात्पूजनस्य, तेन मायने मगाता मतिमापूजनमतिषेधो विशिष्य नोक्त । प्रतिपेचवाक्य हि तदैव सार्थक, यदाप्रतिपयम्पोऽर्थः कथचित् प्रसक्तो भाति । जिनमतिमापूजन हि न तावहौकिक द्रन्यावश्यक, नापि लोकोतरिक द्रव्यावश्यक. जिनो हि लोकोत्तरी देवस्तत्पूजनमपि स्यान्चेत् लोकोतरिकमेव की पुष्टि करने से ही आती है। अन्य चरक आदि समस्त प्रवचनों में इन्ही हिंसादिक कर्मों के करने का विधान स्पष्टरूप से पाया जाता है। इसीलिये ये कुप्रवचन माने गये हैं। इनके द्वारा प्रदर्शित इन्द्रादिक पूजन भी इसी निमित्त से कुमावनिक कहा गया है। जैन शास्त्रों में प्रतिमापूजन के निषेध का स्पष्ट उल्लेप जो देखने में नहीं आता है, उसका यह कारण है कि जिस समय प्रभु ने इन्द्रादिक के पूजन का कुमावनिक रूप मानकर निषेध किया उस समय उनके समक्ष अर्हत की प्रतिमा के पूजन का प्रसग ही नहीं था, नही तो इसका भी वे स्वतन्त्र रूप से निषेध करते-दूसरे-प्रतिमा पूजन कार्य हिंसामय कार्य है-भगवान ने धर्म के लिये भी हिंसा करने का आदेश नहीं दिया है अत' जब वीतराग शास्त्र में हिंसा का विधान ही नहीं है-तर इसका भी विधान कैसे वे करते प्रतिपेध वाक्य उसी समय सार्थक माना जाता है जब प्रतिपेध्यरूप पदार्थ किसी भी रूप से प्रसक्त होता है। ચીરિક વગેરે બધા પ્રવચનમાં એ જ હિંસા વગેરે કર્મોને કરવાનું વિધાન સ્પષ્ટ રૂપ જોવામાં આવે છે એથી આ બધા કુમારચનિક માનવામાં આવે છે એમના વડે પ્રદર્શિત ઇન્દ્ર વગેરેનું પૂજન પણ આ કારણને લીધે જ કુખાવચ નિક કહેવાય છે જૈન શાસ્ત્રોમાં પ્રતિમા પૂજનના નિષેધને સ્પષ્ટપણે જે ઉલ્લેખ જેવામાં આવતું નથી તેનું કારણ પણ એ છે કે જ્યારે પ્રભુએ ઈન્દ્ર વગેરેના પૂજનને કુબાવચનિક રૂ૫ માનીને નિષેધ કર્યો ત્યારે તેમની સામે અહંતની પ્રતિમાના પૂજનની વાત જ ન હતી, નહિતર તેઓશ્રી એ તેને પણ સ્વત ત્ર રૂપથી નિવેધ કર્યો હત બીજી વાત એ છે કે પ્રતિમા પૂજનનું કાર્ય હિંસા મય છે, ભગવાને ધર્મના માટે પણ હિંસા કરવાની આજ્ઞા કરી નથી એટલા માટે જયારે વીતરાગ શાસ્ત્રમાં હિંસા વિધેનુ વિધાન જ નથી ત્યારે આનુ વિધાન પણ તેઓ કેવી રીતે કરે પ્રતિષેધ વાક્ય ત્યારે જ સાર્થક જ્યારે પ્રતિધ્યરૂપ પદાર્થ કેઈ પશુ રૂપથી પ્રસક્ત હોય છે बनेगारधर्मामृतवपिणी टीका २०१६ द्रौपदीचर्चा ३५७ सात् लोके तु तस्य समावेशानहतया गैकिरवासभपात् । प्रवचने भगरता यत् सामायिकादि पइविधावश्यक प्ररूपित तदेव स्वच्छन्दविहारिभिः पट्कायडिं- सकैर्जिनाज्ञापये क्रियमाण लोकोत्तरिक-द्रव्यावश्यकम् । तत्र पदवियावश्यक निनप्रतिमा पूजनस्य प्रवेशात् तस्य लोकोत्तग्निद्रव्यावश्यके समावेशो न सभाति । यर प्रतिमापूजनरूप कार्य न लौकिक द्रव्य अवश्यक है और न लोको त्तर द्रव्य अवश्यक ही है। शका-प्रतिमा पूजन लौकिक द्रव्य आवश्यक नहीं है यह तो आप का कहना ठीक है, क्यों कि यह लौकिक द्रव्य आवश्यको से सर्वथा भिन्न है । परन्तु इसे रोकोत्तरिक द्रव्य आवश्यक मानने में आपको क्या विवाद है। क्यो कि प्रभु स्वय लोकोत्तर देव माने जाते अतः उनका पूजन भी लोकोत्तरिक ही मानना चाहिये ? उत्तर-प्रवचन में भगवान जो सामायिक आदि छह प्रकार के आवश्य कों का वर्णन किया है-वे जर जिन आज्ञा पाद्य-स्वच्छन्दवि- हारी और पटकाय की विराधना करने में निरत अनुपयुक्त पुरुषों द्वारा करने में आते हैं लोकोत्तरिक द्रव्य आसश्यक रूप से प्रतिपादित किये गये हैं। इन पप्रकार के आवश्यकों में प्रतिमापूजन का कोई अधिकार हीनही है। अत: इसे कैसे लोकोत्तरिक आवश्यक माना जा सकता है। પૂજનરૂપ કાર્ય માટે ન તે લૌકિક દ્રવ્ય આવશ્યક છે અને ન તે લોકોત્તર દ્રવ્ય આવશ્યક છે રાકા –પ્રતિમા પૂજન લૌકિક દ્રવ્ય આવશ્યક નથી તમારી આ વાત તે ઉચિત છે કેમ કે આ લૌકિક દ્રવ્ય આવશ્યકોથી સંપૂર્ણપણે ભિન્ન છે પણ એને લકત્તરિક દ્રવ્ય આવશ્યક માનવામાં તમને શે વાધ છે ? કેમકે પ્રભુ જાતે લેકોત્તર દેવ મનાય છે ત્યારે તેમનું પૂજન પણ લકત્તરિક જ માનવુ જોઈએ ? ઉત્તર–પ્રવચનમાં ભગવાને જે સામાયિક વગેરે છ જાતના આવશ્યકોનું વર્ણન કર્યું છે તેઓ જ્યારે જિન-આજ્ઞા બાહ્ય સ્વચ્છદ વિહારી અને બહુ કાયની વિરાધના કરવામાં નિરત અનુપયુકત પુરુષો વડે આચરવામાં આવે છે લેકોરિક દ્રવ્ય આવશ્યક રૂપથી પ્રતિપાદિત કરવામાં આવે છે આ છ જાતના આવશ્યકોમાં પ્રતિમા પૂજનને કઈ અધિકાર જ નથી એટલા માટે કે- રિક આવશ્યક કેવી રીતે માની શકાય ?
মায়ায় विधायकतया पचनस्य कुत्मितत्व, तेने चन्द्रादिजनस्य सुभावचनिस्त भवति । एव मरूपयतो भगतोऽर्हतः पतिमाया पूजनस्य प्रगन पर तदानी नासोत्-हिंसामयस्यात्पूजनस्य, तेन प्रायने भगाता मतिमापूजनमतिपधो विशिष्य नोक्त । प्रतिपेधमाश्य हि तदैव सार्थक, यदाप्रतिपे यम्पोऽर्थः फयचित् प्रसक्तो माति । जिनमतिमापूजन हि न तावलौकिक द्रव्याश्यक, नापि लोकोत्तरिक द्रव्यावश्यक, जिनो हि लोकोत्तरो देवस्तत्पूजनमपि स्यान्चेत् लोकोत्तरिकमेव की पुष्टि करने से ही आती है। अन्य चरक आदि समस्त प्रवचनों में इन्ही हिंसादिक कर्मों के करने का विधान स्पष्टरूप से पाया जाता है। इसीलिये ये कुप्रवचन माने गये हैं। इनके द्वारा प्रदर्शित इन्द्रादिक पूजन भी इसी निमित्त से कुमावनिक कहा गया है। जैन शास्त्रों में प्रतिमापूजन के निषेध का स्पष्ट उल्लेप जो देखने में नही आता है, उसका यह कारण है कि जिस समय प्रभु ने इन्गदिक के पूजन का कुमावनिक रूप मानकर निषेध किया उस समय उनके समक्ष अर्हत की प्रतिमा के पूजन का प्रसगरी नहीं था, नही तो इसका भी वे स्वतन्त्र रूप से निपेध करते-दूसरे-प्रतिमा पूजन कार्य हिंसामय कार्य है-भगवान ने धर्म के लिये भी हिंसा करने का आदेश नहीं दिया है अतः जय वीतराग शास्त्र मे हिंसा का विधान ही नही है-लय इसका भी विधान कैसे वे करते प्रतिपेध वाक्य उसी ममय सार्थक माना जाता है जब प्रतिपेध्यरूप पदार्थ किसी भी रूप से प्रसक्त होता है । ચીરિક વગેરે બધા પ્રવચનમા એ જ હિંસા વગેરે કર્મોને કરવાનું વિધાન સ્પષ્ટ રૂપ જોવામાં આવે છે એથી આ બધા કુપ્રવચનિક માનવામા આવે છે એમના વડે પ્રદર્શિત ઈન્દ્ર વગેરેનું પૂજન પણ આ કારણને લીધે જ કુપાવર નિક કહેવાય છે જૈન શાસ્ત્રોમાં પ્રતિમા પૂજનના નિષેધને સ્પષ્ટપણે જે ઉલ્લેખ લેવામાં આવતો નથી તેનું કારણ પણ એ છે કે જ્યારે પ્રભુએ ઈન્દ્ર વગેરેના પૂજનને કુકાવચનિક રૂપ માનીને નિષેધ કર્યો ત્યારે તેમની સામે અર્વતની પ્રતિમાના પૂજનની વાત જ ન હતી, નહિતર તેઓશ્રી એ તેને પણ સ્વતંત્ર રૂપથી નિષેધ કર્યો હત બીજી વાત એ છે કે પ્રતિમા પૂજનનું કાર્ય હિંસા મય છે, ભગવાને ધર્મના માટે પણ હિંસા કરવાની આજ્ઞા કરી નથી એટલા માટે જયારે વીતરાગ શાસ્ત્રમાં હિંસા વિધેનુ વિધાન જ નથી ત્યારે આનું વિધાન પણ તેઓ કેવી રીતે કરે પ્રતિષેધ વાકય ત્યારે જ સાર્થક ગણાય છે ત્યારે પ્રતિધ્યરૂપ પદાર્થ કેઈ પણ રૂપથી પ્રસકત હોય છે अनगारधर्मामृतपिणो टोका अ०१६ द्रौपदीचर्चा चित्रादय इति प्रलपितम् । एष च जिनपूनन-कुमावनिक-नोपागमतो द्रव्या- वश्यक प्रतिमाया क्रियमाणत्वात् , इन्द्रादिपूजनयत् ,इन्यनुमानेनापि कुपावचनिक द्रव्याश्श्यस्तया धर्मपदवाच्य न भरतीति । उत्तर-यद्यपि कुपवचन में प्रतिमा पूजा का विधान स्वतन्त्ररूप से नही किया गया है, तो भी कामपाक प्रणियों के मनोरथ को पूर्ण करने वाले-मनुष्य के मृत-निर्जीव देह की पूजा की तरह प्रतिमा में होती हुई पूजा भी कुप्रावचननि की है। इस प्रकार हम अनुमानसे कर सकते हैं । उसमें प्रवचनमें पूजाके आधार का निर्णय करते समय सामान्यरूप से पूजा के आधारभूत जितने भी प्रतिमा चिन आदि पूज्य हैं वे सर गृहीत हुए है। इस प्रकार प्रतिमा की मर्व पूजा का आधार प्रतिमा और चित्र आदि है। इसलिये वह कुप्रावनिक है । इस प्रकार हम करते है। इस कथन से यह व्याप्ति सिद्ध होती है कि इन्द्रादिक पृजन की तरह प्रतिमा में जो जो पूजा की जाती हैं वे सब कुमावनिकी है । अत जिन पूजन भी प्रतिमा में किये जाने पर नोआगम की अपेक्षा से कुपावनिक द्रव्य आवश्यक ही है, और इसीलिये वह धर्मपद का वाच्य नहीं है यह बात स्पष्टरूप से सिद्ध हो जाती है इसमें अनुमान गयोग उस प्रकार से करना चाहिए। ઉત્તર –જે કે કુપ્રવચનમાં પ્રતિમા પૂજનનુ વિધાન સ્વતંત્ર રૂપમા કર વામાં આવ્યું નથી છતાય માનવીના મનોરથને પૂર્ણ કરનારા-માણસના મૃત નિજીવ શરીરની પૂજાની જેમજ પ્રતિમાની કરવામા આવેલી પૂજા પણ કુમા વચનિકી છે આમ અમે અનુમાનથી કહી શકીએ છીએ તે કુપ્રવચનમાં પૂજાના આધારને નિર્ણય કરતી વખતે સામાન્ય રૂપથી પૂજાના આધારભૂત જેટલા પ્રતિમા ચિત્ર વગેરે પૂજ્ય છે તેઓ સર્વેનું ગ્રહણ થયું છે આ રીતે પ્રતિમાની સર્વ પૂજાને આધાર પ્રતિમા અને ચિત્ર વગેરે છે એટલા માટે તે કુબાવચનિક છે આમ અમે કહી શકીએ છીએ આ કથનથી એ વ્યપ્રિસિદ્ધ થાય છે કે ઈદ્ર વગેરેના પૂજનની જેમ પ્રતિમાઓમા જે જે પૂજા કરવામા આવે છે તેઓ સર્વે કુપાવચનિકી છે એટલા માટે જિન પૂજા પણ પ્રતિમામાં આવતી હોવાથી આગમની અપેક્ષાથી કુકાવચનિક દ્રવ્ય આવશ્યક છે અને એથી તે ધર્મપ વાય નથી વાત સ્પષ્ટપણે સિદ્ધ થઈ જાય છે. આમાં અનુમાન પ્રયોગ આ પ્રમાણે કહી શકાય તેમ છે મ્બા Tpartamo प्रीताधर्मकथाजसी समवचनेऽईत पूजाविधान शिशिष्य नाका नापि रागपूरकमृतमनुष्यपूजनवन् तस्य पूजा प्रतिमाया नियमाणा कुपापरनिकीनिया मयते । तम्मिन् कुप वचने हि पूजाधारनिर्णयाचमरे सामान्यत' पूज्यम्य मनस्यापि पूनाधारः प्रतिमा भावार्थ-शकाकार ने प्रतिमापूजन को लोकोतरिक आवश्यक मानकर द्रव्य आवश्यक में जो उसका समावेश करना चाहा है सो उसकी इस आशका का समाधान करते हुए सूत्रकारने यह कहा है कि जिन आजा पाह्य एव सामायिक आदि में अनुपयुक्त पुरुपो द्वारा किये गये सामायिक आदि पट् वित्र आवश्यक कार्य ही लोकोत्तरिक द्रव्य आवश्यक में परिगणित किये गये है। इनमें प्रतिमा पूजा को कोई सबध ही नहीं है-प्रतिमा पूजा पटू विध आवश्यक कार्यों में परि- गणित ही नहीं हुई है। अत उसका चहा पर किमी भी प्रकार का सम्बन्ध नहीं होने से उसे लोकोतरिक द्रव्य आवश्यक में नहीं गिना जा सकता है अत: इसका समावेश केवल कुमारचनिफ द्रव्य आवश्यक में ही हुआ है ऐसा मानना चाहिये। शका-कुप्रवचन में इन्द्रादिकों की पूजा करने के विधान की तरह प्रतिमा पूजा का विधान तो पाया नहीं जाता है फिर आप इसे कुप्रा वचननिक में अन्तर्भूत कैसे कर सकते है। ભાવાર્થ –કાકારે પ્રતિમા પૂજનને લેકેસરિક આવશ્યક માનીને દ્રવ્ય આવશ્યકમાં તેને સમાવેશ કરવાની જે ઈચ્છા બતાવી છે તેની તે શકાનું સમાધાન કરતા સૂત્રકારે આ પ્રમાણે કહ્યુ છે કે જિને આજ્ઞા બાહ્ય અને સામાયિક વગેરેમાં અનુપયુક્ત પુરુ વડે કરવામાં આવેલા સામાયિક વગેરે છ જાતના આવશ્યક કાર્યો જ લકત્તરિક દ્રવ્ય આવશ્યકમ પરિગણિત કરવામા આવ્યા છે એનાથી પ્રતિમા પૂજાનો કેઈ સબ ધ જ નથી પ્રતિમા પૂજા વિવિધ આવશ્યક કાર્યોમાં પગિણિત જ થઈ નથી એટલા માટે ત્યા તેને કઈ પણ રીતે સ બ ધ નહિ હોવાથી લોકોત્તરિક દ્રવ્ય આવશ્યકમા તેની ગણના થઈ શકે તેમ નથી એથી ફક્ત દ્રવ્ય આવશ્યકમાં જ થયે છે આમ માની લેવું જોઈએ શકા -કુપ્રવચનમાં ઈદ્ર વગેરેની પૂજા કરવાના વિધાનની જેમ પ્રતિમા પૂજાનુ વિધાન તે મળતુ નથી ત્યારે તમે એને કુપ્રવાસનિકમાં કેવી રીતે પ્રમાવિષ્ટ કરી શકે ?
अनगारधामृतषिणो टोका म०१६ द्रौपदीवl चित्रादय इति प्रपितम् । एव च जिनपूजन-कुप्रावनिक-नोआगमतो द्रव्या- वश्यक मनिमाया क्रियमाणत्वात् , इन्द्रादिपूजनयत् ,इत्यनुमानेनापि कुमावनिक व्यावश्यकतया धर्मपदवाच्य भरतीति । उत्तर-यद्यपि कुप्रवचन में प्रतिमा पूजा का विधान स्वतन्त्ररूप से नहीं किया गया है, तो भी कामपरक प्रणियों के मनोरथ को पूर्ण करने वाले-मनुष्य के मृत-निर्जीव देर की पूजा की तरह प्रतिमा में होनी हुई पूजा भी कुप्रावचननि की है। इस प्रकार हम अनुमानसे कर सकते हैं। उसमें प्रवचन में पूजाके आधार का निर्णय करते समय सामान्यरूप से पूजा के आधारभूत जितने भी प्रतिमा चित्र आदि पृज्य है चेसर गृहीत हुए है। इस प्रकार प्रतिमा की सर्व पूजा का आधार प्रतिमा और चित्र आदि है। इसलिये वह अप्रायनिक है । इस प्रकार हम कहते है। इस कथन से यह व्याप्ति सिद्ध रोती है कि इन्द्रादिक पूजन की तरह प्रतिमा में जो जो पूजाएं की जाती हैं वे सब कुप्रावनिकी हे । अत जिन पूजन भी प्रतिमा में किये जाने पर नोआगम की अपेक्षा से कुप्रावनिक द्रव्य आवश्यक ही है, और इसीलिये वह धर्मपद का वाच्य नहीं है यह बात स्पष्टरूप से सिद्ध हो जाती है इममें अनुमान गयोग उस प्रकार से करना चाहिए। -જે કે કુપ્રવચનમાં પ્રતિમા પૂજનનું વિધાન સ્વતત્ર રૂપમા કર વામાં આવ્યું નથી છતાય માનવીના મનેરને પૂર્ણ કરનારા-માણસના મૃત નિવ શરીરની પૂજાની જેમજ પ્રતિમાની કરવામાં આવેલી પૂજા પણ કુમા વચનિક છે આમ અમે અનુમાનથી કહી શકીએ છીએ તે કુપ્રવચનમા પૂજાના આધારને નિર્ણય કરતી વખતે સામાન્ય રૂપથી પૂજાના આધારભૂત જેટલા પ્રતિમા ચિત્ર વગેરે પૂજ્ય છે તેઓ સર્વેનું ગ્રહણ થયુ છે આ રીતે પ્રતિમાની સર્વ પૂજાને આધાર પ્રતિમા અને ચિત્ર વગેરે છે એટલા માટે તે કુપાવચનિક છે આમ અમે કહી શકીએ છીએ આ કથનથી એ વ્ય સિદ્ધિ થાય છે કે ઇન્દ્ર વગેરેના પૂજનની જેમ પ્રતિમાઓમા જે જે પૂજા કરવામાં આવે છે તેઓ સર્વે કુપાવચનિકી છે એટલા માટે જિન પૂજા પણ પ્રતિમામાં આવતી હોવાથી આગમની અપેક્ષાથી કુપ્રાયનિક દ્રવ્ય આવશ્યક છે અને એથી તે ધર્મપ વાય નથી આ વાત સ્પષ્ટપણે સિદ્ધ થઈ જાય છેઆમાં અનુમાન આ પ્રમાણે કહી શકાય તેમ છે ઉત્તર Howar -- ३१० বাগমন अथ भारावश्यकमुच्यते-पियभितक्रियानुभयुक्तो योऽर्ध' म मात्र, भाव तद्वतोरभेदोपचाराद् माः । यथा-ऐश्वर्या पायाइन्ननक्रियाया अनुभवात् इन्द्रो भाव उच्यते । भावशासी आवश्यक च, भावमाश्रित्य ा आवश्यक भागवश्यकम् । जिनपूजन नो आगमतो कुमावनिक द्रव्याच्या प्रतिमायां क्रियमाणत्वान् इन्द्रादिपृजनयत् । अतः इम समस्त प्रोक्त कथन से यह यात स्पष्ट हो जाती है कि वह प्रतिमापूजन कार्य लोकोत्तरिक द्रव्य आवश्यक रूप से भी प्रसक्त होता तो भगवान् इसका अन्य प्रति पेध करते। अथ भावाश्यकमुच्यते अत्र भाव आवश्यक क्या है इसका कथन सूत्रकार करते हैं-वर्तमान समय में उस विवक्षितरूप पर्याय से युक्त द्रव्य का नाम भाव है। भाव यथपि वर्तमान क्रिया रूप माना गया है, फिर भी यहां पर उस क्रिया से युक्त द्वन्ध को जो भाव कहा है उसका कारण द्रव्य और पर्याय का अभेद सरध है। भगवान द्रव्य के विना नहीं रह सकता है। भाव द्रव्य की पर्याय है, वह निराश्रय होती नहीं है-अतः जिस द्रव्य के आश्रय वह रहेगी बन दोनो में अभेशेपचार से उस पर्याय से उपलक्षित उस द्रव्य को ही भाव कह दिया है। जिस प्रकार ऐश्वर्यरूप इदन (देदीप्यमान होना) जिनपूजन नो आगमतो कुप्रावनिक द्रव्यावश्यक मतिमाया क्रियमाण त्वात् इन्द्रादिपूजनयत् " એટલા માટે આ પૂર્વોકત કથનથી આ વાત ત્પષ્ટ થાય છે કે તે પ્રતિમા પૂજન કાર્ય કેત્તરિક દ્રવ્ય આવશ્યક પણ નથી જે તે લેકોરિક દ્રવ્ય આવશ્યક રૂપે પણ પ્રસક્ત હતા તે ભગવાન તેને ચોક્કસ પ્રતિષેધ કરત अथ भावावश्यकमुन्यते 'वे मावश्य शु छ मेनु स्पष्टी४२६) સૂત્રકાર કરે છે-વર્તમાન સમયમાં તે વિવક્ષિત રૂપ પર્યાયથી યુક્ત દ્રવ્યનું નામ ભાવ છે જે કે ભાવ વર્તમાન ક્રિયારૂપ માનવામાં આવ્યું છે, છતાય અહીં તે કિયાથી યુક્ત દ્રવ્યને જ ભાવ બતાવ્યું છે તેનું કારણ દ્રવ્ય અને પર્યાયને અભેદ સ બ ધ છે ભાવ ભગવાન દ્રવ્ય વગર રહી શકતો નથી ભાવ દ્રની એક પર્યાય છે, તે નિરાશ્રય હતી જ નથી એથી જે દ્રવ્યના આશ્રયે તે રહેશે તેઓ બંનેમા અભેદેપચારથી તે પર્યાયથી ઉપલક્ષિત તે દ્રવ્યને જ ભાવ કહી દીધું છે જેમ એશ્વર્ય ઈદન (દેદીપ્યમાન થવું) ક્રિયાના અનુભ एक ।
. जनगारधर्मामृतवषिणी टीका अ० १६ द्रौपदीचच तद् दिनिधम्- (१) नागमनागममाश्रित्य, (२) नोनागमता भाग माभावमाश्रित्य। आगमतो भानावश्यक्रमाह- " से कि त आगम यो भाषा, सर ? आगमी भावावस्सय जाणए उवउत्ते, से त आगमभो भागाररसय" । ( अनुयोग०) अथ कि तागमतो मावाश्यकम् ?, उत्तरमाह-"जायक उपयुक्त आग. मतो भारावश्यम् । अपमर्थ'-गावश्यकपदार्यज्ञम्तजनिनसवेगेन विशुध्यमानारिणामस्ता चो पयुक्त सावादिरागमतो मानायकम् , अावश्यका ज्ञानरूपन्यागमस्यान किया के अनुभव से उपलक्षित शचीपनि भाव इन्द्र कहा जाता है। इसी प्रकार जो आवश्यक रूप लिया के अनुभवसे युक्त हे वही आत्मा भावश्यक जलाता है। भावरूप जो आवश्यक वर, अथवा भाव को आश्रय करके जो आवश्यक है यह भावावश्यक है। यह भार आश्यक भी दो प्रकार का है-१ आगम की अपेक्षा भाव ओवश्यक और दुमरा नो आगम की अपेक्षा भाव आवश्यक । इनमें " जायक उपर्युक्त' आगमतो भावावश्यक " ज्ञायक उपयुक्त आत्मा आगम की अपेक्षा से भाव आवश्यक माना गया है। आव- श्यकरूप पदार्थ का जो जाता है उसका नाम ज्ञायक है । आवश्यकरूप पदार्थ के ज्ञान से जनित सवेग द्वारा विशुद्ध हुए परिणामो को नाम उपयोग है। हम उपयोग से विशिष्ट जो साधु आदि जन हैं वे आगम की अपेक्षा से भाव आवश्यक है । क्यों कि इनमें आवश्यकरूप पदार्थ વથી ઉપલક્ષિત શચીપતિ ભાવ ઈન્દ્ર કહેવાય છે તેમજ જે આવશ્યકરૂપ ક્રિયાના અનુભવથી યુક્ત છે તે આત્મા ભવાવશ્યક કહેવાય છે ભાવરૂપ જે આવશ્યક છે તે અથવા ભાવને આશ્રય કરીને જે આવશ્યક છે તે ભાવાવશ્યક છે આ ભાવ આવશ્યક પણ બે પ્રકાર છે-૧, આગમનની અપેક્ષા ભાવ मावश्य: भने २,न। सामाननी अपेक्षा भाप मापश्य: यमनामा "ज्ञायक उपयुक्त मागमतो भावावश्यक જ્ઞાયક ઉપયુક્ત આત્મા આગમની અપેક્ષાથી ભાવ આવશ્યક માનવામાં આવ્યું છે આવશ્યકરૂપ પદાર્થને જે જ્ઞાતા છે તેનું નામ જ્ઞાયક છે આર્ય રૂપ પદાર્થના જ્ઞાનથી જનિત સગવડે વિશુદ્ધિ નામ ઉગ છે આ ઉપગથી વિશિષ્ટ જે સાધુ વગેરે લેકે છે તેઓ આગમની અપેક્ષાથી ભાવ આવશ્યક છે કેમકે તેમ આવા પામેના પરિણામેનુ । हा ४६ . - - - भाताधर्मकथाम सत्त्वात् , भानावश्यकता चात्रापश्यार्थशानमनितोपयोगपरिणामचाभा माश्रित्यापश्यामिति व्युत्पचे । इग्मुक्त भरति आश्पकार्थगस्य आवश्यकोप योगपरिणाम आगमतो भाषावश्यक, मागादिस्तु ताशपरिणामागदागमतो भावावश्यकगुच्यते । इदमानश्यकोपयोगपरिणामम्प मा विश्यक धर्मपदयाच्य, श्रुतधर्मान्तर्गततात् , अन मिनातायाः सचात् । नोभागमतोमागावश्यक विध-लौकिक, कुमानिक, लोगोतरिक चेति लौरिक भागावश्यक पूर्वा भारतस्य वाचन यषण वा, अपराहे रामायणस्य के ज्ञानरूप आगम का मार पाया जाता है। इसलिये माधु आदि जनों में आगम की अपेक्षा से आवश्यकता और इस आवश्यक के अर्थ ज्ञान से जनित उपयोगरूप परिणामों की विशिष्टतो रोने से भाव रूपता आती है । अत. " भार को आश्रित करके जो आवश्यक है वह भाव आवश्यक है " यह कथन लुसगत हो जाता है भावार्थ-''आवश्यक" इस पद के अर्थज्ञान से विशिष्ट तथा तद नुकूल उपयोग परिणति सपन आत्मा ही आगम की अपेक्षा से भावा- वश्यक कहा गया है । ये भावावश्यक साधु आदि हैं । क्यों कि ये ही उस प्रकार की परिणति वाले रोते हैं। अतः श्रुतधर्म के अन्तर्गत होने से यह नावावश्यक ही धर्म पद का वाच्य कहा गया है और ऐसे ही धर्म की आराधना करने की भगवानने आज्ञा प्रदान की है। नो आगम की अपेक्षा से भाव आवश्यक तीन प्रकार का माना गया है । (१) लौकिक (२) कुमावचनिक और लोकोत्तरिक । पूर्वाह्न में શ્યકરૂપ પદાર્થના જ્ઞાનરૂપ આગમને સદભાવ મળે છે એટલા માટે સાધુ વગેરે લેકમાં આગમની અપેક્ષાથી આવશ્યકતા અને આ આવશ્યકતાના અર્થ જ્ઞાનથી જનિત ઉપગરૂપ પરિણામોની વિશિષ્ટતા કહેવાથી ભાવરૂપતા આવે છે એટલા માટે “ભાવને આશ્રિત કરીને જે આવશ્યક છે તે ભાવ આવશ્યક છે ” આ કથ સુસ ગત થઈ પડે છે भावार्थ આ પદના અર્થ જ્ઞાનથી વિશિષ્ટ તેમજ તદ નુકૂળ ઉપગ પરિણતિ સંપન્ન આત્મા જ આગમની અપેક્ષાએ ભાવ આવશ્યક સાધુ વગેરે છે કેમકે એ લોકે જ આ જાતની પરિણતિવાળા હોય છે એથી શ્રતધર્મના અતગત હોવા બદલ આ ભાવાવશ્યક જ ધમ દવા કહેવામાં આવ્યું છે અને આ જાતના ધર્મની આરાધના કરવાની ભગવાને પણ આજ્ઞા કરી છે ને આગમની અપેક્ષાએ ભાવ આવશ્યકના ત્રણ પ્રકાર છે -(૧) લૌકિક (૨) કુપાવચનિક (૩) અને કેન્સરિક પૂર્વાહમાં ભારતનું વા “ આવશ્યક " " શ્રવણ - येनेगारधर्मामृतवपिणी टी० ५० १६ द्रौपदीचर्चा वाचनं अरण या । लोके हि भारतस्य पाचन अषण पूर्गह एप क्रियमाणं दृश्यते, तथा रामायणस्य वाचन श्रषणमपराह्न एन क्रियमाणं दृश्यते, परीत्ये दोपदर्श नात् । ततश्चेत्थ लोकेऽश्यकरणीयतयाऽऽवश्यकत्व तवाचकस्य तश्च तदर्थों- पयोगपरिणामसत्वाद् भावत्व, तहाचक पुस्तकपत्रादिपरावर्तनरूपया हस्ताभि- नयरूपया च क्रियया युक्तो भाति, श्रोतापि च गानसयतत्व-करसंपुटीकरणादि भारत का वाचना अथवा सुनना, अपराह्न में रामायण का वाचना या सुनना ये सप लौकिक भाव आवश्यक हैं। लोक में भारत का वाचना अथवा सुनना पूर्वाह्नमें ही किया जाता है । गमायणका वाचन और श्रवण अपराह में ही होता हुआ देखा जाता है। इससे विरुद्ध प्रवृत्ति करने से अनेक प्रकार के दोपो का भाजन बनना पडता है, इस प्रकार लोक में भारतादिक ग्रन्थों का वाचना आदि कार्य नियमित समय में अवश्य करने योग्य होने की वजह से आवश्यक रूपमें माना गयो है । अतः इसमे इस प्रकार से आवश्यकपना आ जाता है । तथा इनके वाचने वालो मे या सुनने वोलो में उनके अर्थ के प्रति उपयो- गात्मक परिणाम के सद्भाव से भावरूपता आती है । क्यों कि जबतक उनके वाचने वाले में उनके अर्थ के प्रति उपयोगात्मक परिणाम की जागृति नहीं शेगी तब तक वे उन पुस्तको के पत्रों आदि का पराव. र्तन करने रूप क्रिया और श्रोताओं को अनेक अर्थ की संगति बैठाने के लिये रस्त आदि के सचालनरूप अभिनय क्रिया का उपयोग ही અપરાદ્ધમાં રામાયણનું વાચન કે શ્રવણ આ બધુ લૌકિક ભાવ આવશ્ય છે લેકમાં ભારતનું વાચન અથવા તે શ્રવ પૂર્વાહમાં જ કરવામાં આવે છે રામાયણનું વાચન અને શ્રવણ અપરાદ્ધમાં જ થતું જોવામાં આવે છે એથી વિરુદ્ધ આચરણ કરવાથી માણસ ઘણી જાતના દોને પાત્ર થઈ પડે છે આ પ્રમાણે ભારત વગેરે ગ્રંથનું વાચન વગેરે કાર્ય નિયમિત સમયમાં આવશ્યક કરવા યોગ્ય લેવા બદલ આવશ્યક રૂપમાં માનવામા આવે છે એથી આમા આ રીતે આવશ્યકપણુ આવી જાય છે તેમજ એમનું વાચન કરનારાઓમાં તેમના તરફ ઉપગાત્મક પરિણામના સદુભાવથી ભાવરૂપતા આવે છે કેમકે જ્યાસુધી વાચન કરનારાઓમાં તેમના અર્થ પ્રત્યે ઉપગાત્મક પરિણામની જાગૃતિ થશે નહિ, ત્યા સુધી તેઓ તે પુસ્તકના પત્ર વગેરેના પરાવર્તન કરવારૂપ ક્રિયા અને માતાના માટે અનેક જાતના અર્થની સગતિ બેસાડવા માટે હાથ વગેરેના હલનચલનરૂપ અભિનય ક્યિા ઉપર જ કેવી રીતે કરી શકે, તેમનુ A ३४ ৪ারাথবা क्रियावान् भाति, एव तयोः मियारचेन नोशागमन, "गिरियाऽऽगमो नहोइ" इति वचनात् । क्रियारूपे देशे आगमाभागाद नोआगमनमपि, अननो शब्दस्य देशनिषेधयोधकत्वात् । लोके भारतादापागमा च्यातियते, तस्माद्देशत आगमो ऽस्त्यपि । तस्माद पूऽिपराने ययानिर्दिष्टकाले भारतायुपयुक्तो यदवश्य भारतादि वाचयति शृणोति ना, तद् वाचन श्राण च लोकिक मागाश्ययमिति बोध्यम् । कैसे कर सकते हैं । परन्तु उस समय इस प्रकार की समस्त क्रियाएँ उनमें प्रत्यक्ष ही देसने में आती है । इसी प्रकार श्रोताजन भी अटल होकर उनके सुनने मे तन्मय हो जाते है । ममय २ पर हाथ जोड़ने रूप क्रिया भी करते है । इस प्रकार की क्रियाएँ मे युक्त होने से उन सुनने वाचने वालो में नो आगमता भी है क्यो कि" किरिया आगमो न होइ" किया आगम नही मानी जाती है ऐसा सिद्धात का कथन है। "नो आगम" में नो शब्द आगम के एक देश का वाचक है । इसलिये क्रियारूप एक देश में पूर्णरूप से आगम का अभाव शेने से आगम की एक देशता उसमें मानने में आती है। भारतादिक पुस्तकों में आगमता का कथन लोक की अपेक्षा से ही किया गया जानना चाहिये । क्यो कि लोक में अन्य व्यवहारी जन इनमें आगमता का व्यवहार करते हुए देखे जाते है । इस प्रकार पूर्वाह्न या अपराह्न में किसी भी निर्दिष्ट समय मे भारतादिक ग्रन्धो का ज्ञाता उनमें उपर्युक्त होकर जो उनका वाचना आदि कार्य करता है-या जो श्रोताजन उप પણ તે વખતે આ જાતની આ બધી ક્રિયાઓ તેઓમાં પ્રત્યક્ષરૂપે જોવામાં આવે છે. આ રીતે શ્રોતાઓ પણ તcલીન થઈને સાભળવા માટે છે ચોગ્ય સમયે તેઓ હાથ જોડવારૂપ ક્રિયાઓ પણ કરે છે આ જાતની ક્રિયાઓથી યુક્ત હેવા બદલ તે વાચનારા તેમજ સાભળનારાઓમા ને આગમતા छ भ" किरिया आगमो न होइ" या मागम मानवामा माती नयी આ સિદ્ધાન્તનું કથન છે જ ને શદ આગમના એક દેશને વાચક છે એટલા માટે ક્રિયારૂપ એકદેશમાં આગમને સંપૂર્ણપણે અભાવ હોવાથી તેમાં આગમની એકદેશતા માનવામાં આવે છેભારત વગેરે મા આગમતાનું કથન લોકની અપેક્ષાથી જ કરવામા આવ્યુ છે કેમકે લોકમાં બીજી વ્યવહારી લેકે પણ એમાં આગમતારૂપ વ્યવહાર કરતા જોવાય છે આ રીતે પૂર્વાદ્ધ કે અપરહિમા કેઈ પણ નિર્દિષ્ટ સમયમાં ભારત વગેરે છે ને જ્ઞાતા તેઓમાં ઉપયુક્ત થઈને જે તેમનું વાચન વગેરે કાર્ય કરે છે 1 તે પણ को आगम માં . नगारधर्मामृतवपिणी टीका ०१६ द्रौपदीचर्चा कुमारचनिक भागावश्यम्मुन्यते-ये इमे चरकचीरिकादयो यावत् पापण्डस्था उपयुक्तो यथावसर यदवश्यम्-ईज्या-जलि-होम-जपो-न्दुरुक्नमस्कारादिक भाव रूपमावश्यक कुर्वन्ति तंपा तत् कुपावनिक भाषावश्यकम् तर-उज्या-सन्ध्योपासनम् , अञ्जलि'-जलाजलि' सूर्याय दीपते, होम'- नित्यहानम् , जप -गायच्या., उन्दुरुक-अय देशीयः शब्द धूपार्थकः, नम- स्कारः चन्दनम् , एतेपा चरकादिभि पापण्डस्थैरवश्य क्रियमाणत्वादावश्य- कत्यम् । तदर्थोपयोगश्रद्वादिपरिणामसद्भावात् भारत्वम् । चरकादीना तदर्थोप- युक्त होकर उन्हें सुनते हैं वह सत्र वाचना सुनना आदि कार्य नो आगम की अपेक्षा से लोकिक भाव आवश्यक है। जो चरक चीरिकादि जन उपयुक्त होकर अपने आवश्यक कार्य स्वरूप इज्या, जजलि, होम जप, उन्दुरुम, और नमस्कार आदि भाव रूप आवश्यक करते हैं, उनके चे सर कार्य कुमावनिक भाव आव श्यक है स-या की उपासना करना इन्चा है, सूर्य के लिये जलकी अजलि देना असलि है, निल हवन करना होम, गोयत्री का पाठ करना जन, धूप का खेना उन्दुरुक और नमस्कार करना वन्दना फर्म ह । ये सन कार्य चरकादि जनो द्वारा प्रतिदिन अवश्य करने योग्य होते हैं-अतः इनमें उन्ही की मान्यतानुसार आवश्यकपना कहा गया है इनके करने में उनके अन्तः कारण में उनके अर्थ के प्रति उपयोग एव श्रद्धा ओदिरूप परिणति का सद्भाव पाया जाता है । इस જે શ્રોતાઓ ઉપયુકત થઈને તેમનું શ્રવણ કરે છે તે બધું વાચન શ્રવણ વગેરે કાર્ય ને આગમની અપેક્ષાએ લોકિક ભાવ આવશ્યક છે જે ચરક ચારિક વગેરે લકે ઉપયુકત થઈને આવશ્યક કાર્યસ્વરૂપ ઈત્યા, અ જલિ, હોમ, જપ, ઉન્ફરક અને નમસ્કાર વગેરે ભાવરૂપ આવશ્યક કરે છે, તેઓના આ બધા કાર્યો કુમારચનિકભાવ આવશ્યક છે સંધ્યાની ઉપાસના કરવી એ ઈજ્યા છે, સૂર્યને માટે પાણીની અંજલિ આપવી તે આ જલી છે, દરજ હવન કરવું તે હામ, ગાયત્રી પાઠ કરવો તે જપ અને ધૂપ કરે તે ઉદ્રુક અને નમસ્કાર એ વદના આ બવા કાર્યો ચરક વગેરે લોકો વડે હંમેશા અવશ્ય કરવાગ્ય હોય છે એટલા માટે આમાં તેમની માન્યતા મુજબ જ આવશ્યકપણ કહેવામા આવ્યું છે એમના આચરણથી તેમના હૃદયમાં તેના અર્થ પ્રત્યે ઉપગ અને શ્રદ્ધા વગેરે રૂપ પરિણતિ ને સદ્ભાવ મળે છે આ અપેક્ષાએ ત્યા ભાવતા અને आताधर्मग्यास तत्र - । । योगरूपो देश आगम , करतिरः सयोगादिगियारूपो देगन्तु नोआगम , तथा च दैशिकागमामारमाश्रित्य नो आगमत्वमपि, नोशनस्यात्रापि देशानिए धपरत्वात् । लौफिक कुमारचनिक च नोभागमतो भागावश्यक न धर्मपटवान्यम् । जिनामाया अभावादिति पो यम् । अथ फि लोकोत्तरिक नोभागमतो भाषावश्यकम् ? उच्यते अनुयोगद्वारे । जण्ण इमे समणे या समणी या सारी या सारिया ना तचित्ते तम्मणे अपेक्षा से वहीं भावता और एकदश से आगमता भी है। क्यों कि हाथों का जोडना नमस्कार करना आदि रूप जो भी क्रियाग है वे मय नो आगम हैं। इस अपेक्षा इनमें पूर्णरूप से आगमपना न होकर आगम की एक देशता ही है चरक चीरीकादि द्वारा मान्य ग्रन्थों की निर्दिष्ट क्रियाओं का ही बता सद्भाव है और उन्ही के अर्थ मे उनका उपयोगादिरूप परिणाम है। इसलिये ये मर चरक चीरीकादि की क्रियाएँ नो आगम की अपेक्षा से भाव आवश्यक है। यहा पर भी नो शब्द देश निषेध परक है अर्थात् आगम के एक देश का वाचक है ये लौकिक और कुमावनिक जिन्हें नो मागम की अपेक्षा से भावावश्य फरूप में प्रकट किया गया है धर्मपद के वाच्य नहीं है । क्यों कि इन की आराधना से जीरो के कर्मो की निर्जरा नही होती है। अत तीर्थ कर प्रभु ने इनके आरावन करने की आज्ञा प्रदान नहीं की है । नो आगम की अपेक्षो से लोकोत्तरिक भाव आवश्यक इस प्रकार એકદેરાથી આગમતા પણ છે કેમકે હાથ જોડવા, નમસ્કાર કરવા વગેરે રૂપ જે ક્રિયાઓ છે તે સર્વે ને આગમ છે આ દષ્ટિએ એમનામાં આગમતા સપૂણ પણે નથી ફકત આગમ ની એકદેશતા જ છે ચરક ચીરિ, વગેરે વડે માન્ય ગ્રંથોની નિષ્ટિ ક્રિયાઓને જ ત્યા સદૂભાવ છે અને તેમના જ અર્થમા તેમને ઉપગ વગેરરૂપ પરિણામ છે એટલા માટે આ બધા ચરક ચરિકા વગેરેની ક્રિયાઓ નો આગમની અપેક્ષાથી ભાવ આવશ્યક છે અહી પણ તે શબ્દ દેહાનિધ પરક છે એટલે કે આગમના એકદેશને વાચક છે આ લૌકિક અને કુપ્રવચનિકો જેમને ને આગમની દૃષિ એ ભાવાવશ્યક રૂપમાં પ્રગટ કર વામાં આવ્યા છે-ધર્મપદના વાચ્ય નથી કેમકે એમની આરાધનાથી જીવેના તેમની નિર્જરા થતી નથી, એટલા માટે તીર્થકર પ્રભુએ એમને આરાધવાની આજ્ઞા કરી નથી - ને આગમની અપેક્ષાએ લેકેતરિક ભાવ આવશ્યક આ પ્રમાણે છે – जण्ण इमे समणे वा समणी वा सावो वा साविया वा तच्चिने तल्लेसे अनगारधर्मामृतारिणी टीका २० १. द्रौपदीचर्चा तल्लेसे तान्झयमिए तत्तियझरमाणे तदद्रो उत्ते तदप्पियकारणे तब्भावगा भाविध अण्यात्थ कत्थड मण बारेमाणे उभभोपाल आवलय करेड, से त लोग तरिय भागास्मय, से त नोआगमतो भाषास्सय, से त भावायम्सय ॥' आया-यत्नलु अमणो पा श्रमणी वा श्रारको मा बारिका या तचित्तस्तन्म- नमस्तल्लेश्यस्तदा पासितस्तत्तीना यसायस्तदोपयुक्तम्तदर्पितरणस्तद्भावना- भावित अन्धन कुत्रचिन्मनोऽनि उमरकाल यत् आवश्यक सामायिकादि करोति तेपां तलोकोत्तरिक भाषावश्यम् । तेपां तद् नोआगमतो भागवश्यकम् तदे- तद्भावविश्यम् । अनाप्यवश्य करणीरत्वादावश्यक वतोपयोगदादिपरिगामन्य पदा- नाद् मावत्वम् , रजोरणपमानिझाव्यापारयथारानिकान्दनररणानन्तर सविधि है-जण्ण इमे समणे वा ममगी वा सारओ चा साथिया वा तच्चित्ते तम्मणे तल्लेसे तदज्झयमिए ततिवाझवसाणे तदहोस् उत्ते तदप्पिा- करणे तभारणामाथिए अपगत्य कत्वइ मण अफरेमाणे उभोकाल आवम्मय करेति, से त लोगुत्तरिय भावावस्मय, से त नो आगमतो भावावस्मय से त भावावस्सय (अनुयोगदार ) अमण अथवा श्रमणी प्रारक अथवा श्राविका जो सामायिक आदि आवश्यक क्रियाओं को चित कर ( उनमें शी चित्त लगाकर ) तनन होकर उनमे ही अन्त करणको एकाग्रकार त्यादि सूत्रमे कथित विपिके अनुमार दोनों बालों मे करतेहें वह उनको कार्य नो आगम की अपेक्षा से लोकोत्तरिक भाव आवश्यक है। ये म्गमायिक आदि क्रियाण अवश्य करने योग्य होने से आवश्यक है। कर्ता का उनके अर्थ में उपयोग स्प ण्य अदा आदि रूप परिणाम का मदार होने से उनमें तदज्मयसिए तत्तिव्यझरसाणे तदट्ठोपउत्ते तदप्पिारणे तव्भाषणाभाषित गत्य कत्थड मण करेमाणे उभगोकाल आउम्सय करेंति, मे त ठोगुलरिय भावावस्सय, से त नो आगमतो भावावस्सय, मे त भागाम्मर (अनुयोगद्वार)। શ્રમણ અથવા શ્રમણ શ્રાવક અથવા ભાવિ. જે સામાવિ, નર આવ ત્યક ક્રિયાઓને તચિત્ત થઈને (તેમનામાં મન પરોવીને તવીન અને તેમનામાં જ મન લગાવીને વગેરે સૂત્રમાં કથિત વિવિ જ બને છે અને કરે છે તેમનું તે કાર્ય - આગમની અપેક્ષાએ લેનરિક ભાવ છે આ સામાયિક વગેરે ક્રિયાઓ અવશ્ય વા યોગ્ય દેવા જ .. કર્તાને તેમના અર્થમા ઉપગ્નરૂપ પરિનાને - રેરા --- ભાવતા પણ છે રજોહરણી ભૂમિ વગેરેનું પ્રમાન , ૧૬. :-- 224 - . - बताणा योगरूपो देश आगम , करशिरः गयोगार्शियारपो देशरतु नोमागम , तथा च दैशिकागमागारमाश्रित्य नी आगमतमपि, नौशन्दम्यात्रापि देशनिष धपरत्वात् । लौकिक कुमारचनिक च नोआगगतो भागावश्यक न धर्मपदयान्यम् । तत्र मिनाक्षाया अमारादिति यो यम् । अथ किं लोकोत्तरिक नोभागमतो भावाश्यकम् ? उन्यते अनुयोगद्वारे । * जज इमे समणे या समणी पा सानभी पा साविया ना तचिते तम्मणे अपेक्षा से वहीं भावता और एकदश से आगमता भी है। क्यों कि हाथों का जोडना नमस्कार करना आदि रूप जो भी किया है ये मघ नो आगम हैं। इस अपेक्षा इनमें पूर्णरूप से आगमपना न होकर आगम की एक देशता ही है चरक चीरीकादि द्वारा मान्य ग्रन्थों की निर्दिष्ट क्रियाओं का ही वहा सझार है और उनके अर्थ में उनका उपयोगादिरूप परिणाम है। इसलिये ये मर चरक चारीकादि की क्रियाएँ नो आगम की अपेक्षा से भाव आवश्यक है । यहा पर भी नो शब्द देश निषेध परक है अर्थात् आगम के एक देश का वाचक है ये लौकिक और कुमावनिक जिन्हें नो मागम की अपेक्षा से भावावश्य करूप में प्रकट किया गया है धर्मपद के वाच्य नहीं है। क्यों कि इन की आराधना से जीशे के कर्मों की निर्जरा नही रोती है। अत तीर्थ कर प्रभु ने इनके आरावन करने की आज्ञा प्रदान नहीं की है। नो आगम की अपेक्षो से लोकोत्तरिक भाव आवश्यक इस प्रकार એકદેરાથી આગમતા પણ છે કેમકે હાથ જોડવા, નમસ્કાર કરવા વગેરે રૂપ જે ક્રિયાઓ છે તે સર્વે ને આગમ છે આ દષ્ટિએ એમનામાં આગમતા સપૂણ પણે નથી ફકત આગમ ની એકદેશના જ છે ચરક ચીરિક વગેરે વડે માન્ય ગ્રથોની નિષ્ટિ ક્રિયાઓને જ ત્યા સદુભાવ છે અને તેમના જ અથમાં તેમને ઉપ વગેરે રૂપ પરિણામ છે એટલા માટે આ બધા ચરક ચરિકા વગેરેની ક્રિયાઓ નો આગમની અપેક્ષાથી ભાવ આવશ્યક છે અહી પણ શબ્દ દેશનિષેધ પરક છે એટલે કે આગમના એકદેશને વાચક છે આ લૌકિક અને કુપાવચનિકો જેમને ને આગમની વિ એ ભાવાવશ્યક રૂપમાં પ્રગટ કર વામાં આવ્યા છે—ધર્મપના વાચ્ય નથી કેમકે એમની આરાધનાથી છાના ની નિર્જરા થતી નથી, એટલા માટે તીર્થકર પ્રભુએ એમને આરાધવાની આજ્ઞા કરી નથી - ને આગમની અપેક્ષાએ લોકેનરિક ભાવ આવશ્યક આ પ્રમાણે છે अण्ण इमे समणे वा समणी वा सावत्रो वा साचिया वा तच्चिने -पणे तल्लेसे કર્તાને તેમના અર્થમા ઉપગરૂપ પરિણામનો સદ્ભાવ હોવાથી તેમનામાં अनगारधाम्राविणी टीका O "द्रौपदीचचर्चा उल्लेसे ताज्यामि तनियझरमाणे तोउत्ते तदपियकरणे तभानगा माविण अण्णत्व कत्यहमण नारेमाणे उमभोताल आवार करेड, से व लोगु तरिय भागास्सर, से त नोजागमतो भाषाम्सय, से त भाषासम्सय ॥ छाया-यतापलु यमणोपा अमणी पायापको वा आधिका पातचित्तस्तन्म- नस्कस्तल्लेश्यस्तद पामितन्ततीता-यवसायातदोपयुक्तस्तदतिमरणरतद्भावना- भावित अन्न कुनचिन्मन्गेडान उभरकाल यत् आवश्यक सामायिकादि करोति तेपां तल्लोकोत्तरिक भाषाश्ययम् । तेपा तद् नोआगमतो भानावश्यकम् तदे- तद्भावावश्यकम् । आआप्यवश्य करणी पत्यादारश्यात व, तदोपयोगदादिपग्गिामन्य मदा- घाइ भावत्वम् , रजो रणपमानिमाव्यापारयधारानिकचन्दन करणानन्तर समिति है-जण्या इमे ममणे या समगी चा सापओ चा साचिया था तच्चित्ते तम्मणे तस्लेसे तदामि तत्तिवाझवसाणे तदोपउत्ते तदपिभ- करणे तभारणामावि अपत्य यह मण अरेमाणे उभोकाल आवस्मय करति, से त रोगुत्तरिय भावावस्सय, से त नो आगमतो भावावस्मय से तभावावस्मर (अनुयोगटार) अमण अथवा श्रमणी श्रारक अथवा प्राविका जो सामायिक आदि आवश्यक क्रियाओ को तचिन शेफर ( उनमें ही चित्त लगाकर ) तनन होकर उनमे ही अन्त करणको पकाकर त्यादि सून कथिन विधिक अनुमार दोनों कालों में करतेह वह उनको कार्य नो आगम की अपेक्षा से लोकोत्तरिक भाव आवश्यक है। ये सामायिक आदि क्रियाएँ अवश्य करने योग्य होने से आवश्यक है। कर्त्ता का उनके अर्थ मे उपयोग स्प एव श्रद्धा आदि रूप परिणाम का मद्भार होने से उनमे सदमासिए तत्तिव्यज्झरसाणे तदवोपउत्ते तदप्पिकरणे तभावणाभारिए गत्य क्त्या मण जारेमाणे उभओकाल आवम्सय करेंति, से त लोगुत्तरिय भावारस्सय, से त नो आगमतो भावावस्सय, से त भानाम्सय (अनुयोगद्वार) । શ્રમણ અથવા શ્રમણ શ્રાવક અથવા શ્રાવિકા જે સામારિક વગેરે આવ એક ક્રિયાઓને તચિત થઇને તેમના મન પરોવીને તલીન વડને તેમનામાં જ મન લગાવીને વગર સૂત્રમાં કથિત વિધિ - બ બને વખત કરે છે તેમનું તે કાર્ય ને આગમની અપેક્ષાએ લેકોત્તરિક ભાવ છે આ સામાયિક વગેરે કયા આવકવા ગ્ય લેવાથી આવશ્યક છે જાવતા પણ છે જેહરણી ભૂમિ વગેરેનું પ્રમા કરવું, વદના વગેરે કૃતિ मा४ . मातारामकथामा पद्रविधायक करणर पायाः मियाया अनागम गत नोभागमय गेयम् , अत्रापि मो-गदानशा: मनिषेधासान् । इदम् ओसारिक नो भागमतो भागन इया धर्मपदया पण नत्र पिसया भगतोऽदन प्रातः महारान् । भन्येऽपि বদলাম।' " मादरिद्राप-दनुपात यथोपिनम् । मेयादिमागमिधं तदम इति कीर्पते ॥ १ ॥ भारता भी है रजोररण से भूमि आदि का प्रमार्जन करना, बदना आदि कृति फर्म फरना आदि विधि पूर्वक जो पर विर आवश्यक करने रूप मियाम किरिया आगमोनोर" हम नियम के अनुमार आगम नही है। अत इन में आगम के 6 देश अभाव की अपेक्षा से नो आगमता है। यहां पर भी नो सन्द सम्पूर्ण रूप से आगमका प्रतिपेपन र उसके एक देग काही प्रतिपेरक है। अन घे सामापिक आनि पवित्र आवश्यक नोआगम की अपेक्षा से लोकोत्तरीक भार आरकऔर इनके री आराधन करने की जिनेन्द्र देयने मय जीवों को आज्ञा दी है। कारण किये धर्मपट के वाच्य है की आराधना से भन्यजीवों के कर्मो की निर्जरा शेती हैं। दुमरों ने भी इस प्रकार धर्म का लक्षण नहा है- पाचनादविद्रावनुष्टान यथोदितम् । मेगानिमारममित्र तदूर्म इति कीयं ते ॥ કર્મ આચ વા વગેરે વિધિપૂર્વક જે વિવિધ આવશ્યક કરવારૂપ ક્રિયાઓ છે ते सवे "किरिया आगमो न होई" मा नियम ९४५ मा नथी मेटल માટે એમનામાં આગમના એકદેશ અભાવની અપેક્ષાથી ને આગમતા છે અહી પણ ન શબ્દ સપૂર્ણ રૂપથી આગમન પ્રતિ પરક નથી પણ તેના એકદેશને જ પ્રતિક છે એટલા માટે સામાયિક વગેરે આ ષવિધ આવ શ્ય ને આગમની અપેક્ષા એ લેરરિક ભાવ આવશ્યક છે અને જિને દ્ર દેવે એમની આરાધના કરવાની જ ભવ્ય જીને આજ્ઞા કરી છે ડમકે આ વાશ્ય છે એમની આરાધનાથી ભવ્ય જીના કર્મોની નિજરે ચાય છે એ પણ આ રીતે ધર્મનું લક્ષણ બતાવ્યું છે ।५ पिरान यथोदितम् । भारसमि तद्धर्म इति कोय॑वे ।। બધા ધમ ૫ ના अनगारधर्मामृतवपिणी टोका १० १६ द्रौपदीया ३६९ अस्यव्यार या वचनादिति परलोपे पञ्चमी, वचनमनुसृत्त्यर्थः । वचनम्- अमागः । कोहगाद वचनादिन्या'- अनिरुद्धात्-कपन्छेदतापेषु अविघटमानात् , तत्र विधिप्रतिपेपयोलिनोपर्णा पशुद्धि', परे पटे तद्योगक्षेमकारिकियोपद- र्शन छेदगृद्धि., पिपिपतिपेवतद्विपयाणा जीरादिपदार्थाना च स्याद्वादपरीक्षया याधात्म्येन समर्थन नापशुद्धि । तन्चाविरुद्ध वचन जिनमणीतमेश, निमित्तशृद्वेः अविरुद्ध आगम से यादित एव मैत्री आदि भावनाओ से मिश्रित जो अनुष्ठान कर धर्म है। स्पष्टीर्थ-वचन शब्द का अर्थ आगम है। आगम में अविन्दना कप, ताप, और छेद द्वारा परीक्षित होने पर ही आती है। जिस प्रकार सुवर्ण की परीक्षा कप-कमोटी पर करने से ताप-अग्नि में तपाने से और छेद छैनी वगैरह द्वारा काटने से होती है, उसी प्रकार अगन की शुद्धि की परीक्षा भी इन तीन उपायों द्वारा की जाती है। विधि और प्रतिपेव का घलना से जिस शास्त्र में वर्णन है, वह शास्त्रकप से शुद्ध करा जाता है। पट पद पर जिस शास्त्र में उनके योग और क्षेमकरि क्रियाओ का कथन किया गया मिलता है वह शान छेदसे शुद्धमाना जाता है। विधि एव प्रतिषेध तथा इन के विषयभृत जीवादिक पदार्थो का स्यादाद ढग से जहा पर यथार्थ समर्थन किया जातो है सप्तभगी द्वारा जहा पर इनका सुन्दर शैली से विवेचन करने में आता है वह शास्त्र तप उपायद्वारा शुद्ध माना जाता અવિરુદ્ધ આગમથી યોદિત અને મિત્રી વગેરે ભાવનાઓથી મિશ્રિત જે અનુષ્ઠાન છે તે ધર્મ છે પઝાઈ–વચન શબ્દનો અર્થ ગમ છે આગ મમાં અવિરુદ્ધતા, કપ, તાપ અને છેદ વડે પરીક્ષિત થયા પછી જ આવે છે જેમ સોનાની પરીક્ષા કપ-સોટી ઉપર સવાથી તાપ અગ્નિ ઉપર તપાવવાથી અને છેદ-છીણી વગેરેથી કાપવાથી હોય છે, તેમજ આગમની શુદ્ધિની પરીક્ષા પણ આ ત્રણે ઉપાચ વડે કરવામા આવે છે. વિધિ અને પ્રતિષેધનું મોટા પ્રમાણમા જે શાસ્ત્રમાં વર્ણન છે, તે શાસ્ત્ર કષથી શુદ્ધ કહેવાય છે ડગલે ને પગલે જે શાસ્ત્ર એમને ચેગ અને સેકરિ કિયાઓનું કથન કરવામાં આવ્યુ છે તે ગાસ્ત્ર છેદથી શબ્દ માનવામાં આવે છેવિવિ અને પ્રતિષેધ તેમજ એમના વિષયમૃત જીવ વગેરે પદાર્થોને સ્થાવાદના રૂપથી ક્યા યથાર્થ વર્ણન કરવામાં આવે છે, મHભગી વડે જ્યા સુદર શૈલીમા એમનું વિવેચન કરવામાં આવે છે, તે શાસ્ત્ર તપ ઉપાયવડે શુદ્ધ માનવામાં આવે છે. આ ત્રણે छा ४७. म मानार्मकाजमा . पइविधायककरणस्पाया कियाया अनागम रान नोभागमान्य यो-यम् , अापि नो-गन्दम्य देशनः मनिपेधारवान् । उदम् लोकारिक नो भागमतो भावात्र श्यक धर्मपदयाच्यम् तन विगतया भगतोऽर्डत आपा गमागन् । अन्येऽपि धर्मलक्षणमेपमाहु'- "चनादविरुद्राय-दनुमान यथोपिनम् । मैयादिभाषममिश्रं तद्धर्म इति वीर्यते"॥१॥ भावता भी है रजोररण से भूमि आदि का प्रमार्जन करना, वदना आदि कृति कर्म करना आदि विधि पूर्वक जो पद विध आवश्यक करने रूप मिया : वेनर "किरिया आगमो न रोड" इस नियम के अनुमार आगम नही है। अत इन में आगम के एक देश अमात्र की अपेक्षा से नो आगमता है। यहां पर भी नोवाद सम्पूर्ण रूप से आगमका प्रतिषे परकन हर उसके एक देश का ही प्रनिपेश्क है। अन घे मामापिस आदि पनि आवश्यक नोआगम की अपेक्षा से लोकोत्तरीक भाव आवश्यक है, और इनके ही आराधन करने की जिनेन्द्र देवने भन्य जीवों को आज्ञा दी है। कारण कि ये धर्मपद के वाच्य है इनकी आराधना से भन्यजीवों के कर्मो की निर्जरा होती है। दूमरों ने भी इस प्रकार पम का लक्षण कहा है- वाचनादविरुद्धायदनुष्ठान यथोदितम् । मेम्याग्भिारसमि तदर्म इति कीयं ते ।। કર્મ આચ વા વગેરે વિધિપૂર્વક જે વિધ આવશ્યક કરવારૂપ ક્રિયા છે ते । स "किरिया आगमो न होई" मा नियम भु४५ मा नथी असा માટે એમનામાં આગમના એકદેશ અભાવની અપેક્ષાથી ના આગમતા છે અહી પણ ન શબ્દ સ પૂર્ણ રૂપથી આગમને પ્રતિષ પરક નથી પણ તેના એકદેશનો જ પ્રતિક છે એટલા માટે સામાયિક વગેરે આ વવિધ આ કો ને આગમની અપેક્ષા એ લેવોત્તરિક ભાવ આવશ્યક છે અને જિનેન્દ્ર દેવે એમની આરાધના કરવાની જ ભવ્ય જીવોને આજ્ઞા કરી છે કમકે આ બધા ધર્મપ ના વાગ્ય છે એમની આરાધનાથી ભવ્ય જીવોના કર્મોની નિર્જરા થાય છે બીજાઓએ પણ આ રીતે ધર્મનું લક્ષણ બતાવ્યું છે वाचनादविरद्धाद्यदनुष्ठान यथोदितम् । मैयादि म वसमिश्न तद्धर्म इति कोय॑वे ।। - मनगारधर्मामृतषिणी टी० १० १६ हौपदीचर्या कारणस्वरूपानुविधायि कार्य, तन्न दुष्टकारणाऽऽख्य कार्यमदुष्ट भवितुमईति, निम्बपीनादिक्षु यप्टिरिवेति । अन्यथा-कारणव्यवस्थोपरमप्रसङ्गात् । यच्च-यहच्छाप्रणयनमत्तेषु तीर्थान्तरीयेपु रागादिमत्स्वपि घुणाक्षरोकिरण रागदेपमोहरूपान् अन्तरगरिपून् इति जिनः" राग द्वेष आदिक जो अन्तरग शत्रु है इन पर जिसने विजय पायी है वे ही जिन कहलाते है जिस प्रकार तपन (सूर्य) दहन (अग्नि) आदि शब्द यथानाम तथा गुण वाले हुआ करते है, इसी प्रकार "जिन" यह नाम भी यथा नाम तथा गुण वाला है यथा नाम तथा गुण का होना ही नाम की सार्थकता है। जिन्हों ने इन अन्तरग शत्रुओं को परास्त नहीं किया उनके वचनो में परस्पर अविरुद्धार्थता नही आसकती है-क्यो कि बहा पर निमित्त की शुद्धि नहिं हैं। इसीलिये अजिन प्रणीत वचन अवि- रुद्ध नहीं होते हैं। लोक में भी जिस प्रकार नीम के बीज से इक्षु की उत्पत्ति देखने में नहीं आती उसी प्रकार सदोप कारण से उत्पन्न हुआ कार्य भी निर्दोष नहीं होता है । कार्य में निर्दोपता कारण कि निर्दोपता पर आधार रग्बती है। न्याय शास्त्र का भी यही सिद्धान्त है “ कोरण स्वरपानुविधायि कार्य" कि कार्य, कारण के स्वरूप का अनुविधायक होता है। यदि इस प्रकार की व्यवस्था न मानी जावे तो फिर कार्य कारण भाव की व्यवस्था ही नही बन सकती है। हर एक पदार्थ "जयति रागद्वेपमोहरूपान् अतर गरिपून् इति जिन " ५ को रे અતર ગ શત્રુઓ છે તેમના ઉપર જેમણે વિજય મેળવ્યું છે તે જ જિન કહેવાય છે જેમ તપન (સૂર્ય) દહન (અનિ) વગેરે શબ્દ નામ જેવા જ ગુણુવાળા હોય છે, તે પ્રમાણે જ આ નામ પણ નામ પ્રમાણે જ ગુણવાળું છે એવું નામ તેવા ગુણે હાવા એ જ નામની સાર્થકતા છે જેમણે આ અતર ગ શત્રુઓને હરાવ્યા નથી તેમના વચનેમા પરસ્પર અવિરુ દ્વાર્થતા આવી શકતી નથી કેમ કે ત્યા નિમિત્તની શુદ્ધિ નથી એટલા માટે અજિન પ્રણીત વચને અવિરુદ્ધ હોતા નથી લેકમાં પણ જેમ લીમડાના બીજથી શેરડીની ઉત્પત્તિ જોવામાં આવતી નથી તેમજ સદેષ કારણથી ઉત્પન્ન થયેલું કાર્ય પણ નિર્દોષ હેતુ નથી કાર્યમાં નિર્દોષતા તારણની નિર્દોષતા ઉપર આધારિત હોય છે न्यायशासन पy सिद्धात छ, “ कारणावरूपानुविधायिका" आय ४२ યુના સ્વરૂપને અનુવિધાતા હોય છે જે આ જાતની વ્યવસ્થા માનવામાં આવે . "सिन P . - हुआ करता हाताधर्मपाल वचनस्य हि वक्ता निमित्तमन्तरङ्गम् , तस्य न रागोपमोहपारगम्यमशुद्धिः, तेभ्यो वित्तथरचनप्रटत्ते', न चेपाऽशुद्धिर्जिने भगाति, जिनत्यतिरोधात् , जयति रागद्वेष मोहरूपान्तरज्ञान रिपूनिति दार्यानुपपत्ते. तपनदहनाशिवात् , अन्वर्यतया चास्याभ्युपगमात् , निमित्तशृदयभाषाद नाजिनमणीताचनमविगदम् । यत- है। इन तीनों उपायों से परीक्षित आगमरी परिशुद्ध कहा गया है। अविरुद्ध वचन का नाम ही आगम है। इन कपादिकों से जो आगम में शुद्धता आती है उसका कारण निमित्त की शुद्धि है। निमित्त शुद्ध जिन प्रणीत वचन ही हैं। अन्य प्रणीत वचन नहीं। निमित्त में भी शुद्धि का कारण राग, उप और मोह का अभाव है। बचने का अन्तरग कारण वक्ता ही है वक्ता की प्रमाणता से ही वचन-ओगम में प्रमाणता आती है इसी लिये राग द्वेष आदि से कलुपित व्यक्तियों के वचन प्रमाण कोटि में नहीं आते हैं। क्यों कि राग ढेप आदिक सद्भाव में वचनों में परस्पर विरुद्ध अर्थ की प्ररूपकता स्वय ही आ जाती है अत: यह निश्चित सिद्धान्त है कि जहां पर इनका सर्वथा अभाव है वही सच्चा आगम का प्रणेता हो सकता है। और उसी आगम में अविद्वता है। ऐसा अवि. रुद्ध आगम जिन प्रणीत ही हो सकता है क्यो कि उनमें पूर्व क्ति राग देष आदि द्वारा अशुद्धि का सर्वथा अभाव हो चुका है इस के सर्वथा दूर होने से ही वे " जिन" इस प्रकार की सज्ञा वाले हुए हैं। "जयति ઉપાયથી પરીક્ષિત આગમ જ પરિશુદ્ધ કહેવામા આવ્યો છે અવિરુદ્ધ વચનનું નામ જ આગમ છે કષ વગેરેથી આગમમા જે શુદ્ધતા આવે છે તેનું કારણ નિમિત્તની શુદ્ધિ છે જિન પ્રણેત વચને જ નિમિત્તશુદ્ધ છે બીજાઓ વડે પ્રણીત વચને નહિ નિમિત્તમા પણ શુદ્ધિનું કારણ રાગ દ્વેષ અને મહિને અભાવ છે વચનનું અતર ગ કાણુ બોલનાર જ હોય છે બેલનાર (વક્તા) ની પ્રમાણુતાથી જ વચન-આગમમાં પ્રમાણતા આવે છે એટલા માટે જ રાગ છેષ વગેરેથી કલુષિત સોના વચને પ્રમાણ કેટિમાં આવતા નથી કેમકે રાગષ વગેરે મદુભાવ વચનેમા પરસપર વિરુદ્ધ અર્થની પ્રરૂપતા જાતે જ આવી જાય છે એટલા માટે આ નિશ્ચિત સિદ્ધાત છે કે જયાં એમને સ પૂર્ણ અભાવ છે તે જ સાચા આગમને પ્રણેતા થઈ શકે છે અને તે આગમમાજ અવિરુદ્ધતા છે એવું અવિરુદ્ધ આગમ જિનપ્રણીત જ થઈ શકે છે કેમકે ચુક્યો છે અશુદ્ધિ સર્વ રીતે મટી જવાથી તેઓ “જિન स - मनगारधर्मामृतयपिणी ट०० १६ द्रौपदीचची २७३ कोहगमनुष्ठान धर्म ? इत्याह-'यथोदितम् ' यथा येन मझारण काराद्या रापनानुसाररूपेण-उदितम्भतिपादित, नराविरुद्धश्चने इति गम्यम् । अन्यच्च-- जो जहपाय न कुणइ, मिच्छादिही तयो उ को बनो।। वड्डेइ मिन्छत्त, परस्स सक जणेमाणो ।। इति । छाया-यो यथावाद न करोति, मिथ्यादृष्टिस्ततस्तु कोऽन्यः । वयति मिथ्यात्व, परस्य गवाजनयन् ।। इति । पुनरपि कीदृशमित्यार-मेयादिभारसमित्रम्' इति । मंत्र्यादयः मैत्री मुदिता करुणा माव्यरथतमणा ये भाषा अन्तरजपरिणामा , तत्पूर्वकाथ न्याय से कही २ अविरद्ध अर्थ प्रतिपादकता सो वह उनकी निज की घर की वस्तु नही है-उसका मूल सोत अविरुद्ध अर्थ का प्ररूपक जिन प्रणित आगम ही है । यही नात मार्मानुसारी बुद्धिवाले व्यक्ति में भी समझ लेनो चाहये । वह जो कुछ नी सत्यार्य करता है उसका मूल कारण जिनप्रणीत आगन का महाराही है । श्लोक कथित "यथोदित" पद इस बात का समर्थन करता है कि देश काल आदि की आराधना के अनुसार जो आचार-अनुष्ठान प्रतिपादित किया गया है। उससे जो अविरुद्ध जहा गया है-यही धर्म है इससे विपरीत नहीं । “ मैन्यादि भाव समिश्रम्" इस पद द्वारा सूत्रकार यह प्रतिपादित करते है कि पर अनुष्ठान मैत्री, मुदिता, करुणा और माध्यस्थ इन चार लक्षणों से युक्त होता है । ये धर्म के वाह्य चिह्न है । इनके सगाव से आत्मा मे અર્થ પ્રતિપાદકતા પણ છે તે તેમની પિતાની વસ્તુ તે નથી જ કેમકે તેના મૂળિયા તે અવિરુદ્ધ અર્થના પ્રરૂપક જિનપ્રણીત આગમમાં જ છે એ જ વાત માર્ગાનુસારી બુદ્ધિવાળી વ્યક્તિમાં પણ સમજી લેવી જોઈએ તે જે કઈ પણ સત્યાર્થ કહે છે તેનું મૂળ કારણ જિન પ્રણીત આગમ જ છે શ્લોક કથિત “યાદિત પદ આ વાત ને સ્પષ્ટ કરે છે કે દેશકાળ વગેરેની આરાધના મુજબ જે આચાર–ળનુષ્ઠાન-પ્રતિપાદિત કરવામાં આવ્યા છે, તેનાથી જે અ- વિરુદ્ધ કહેવામાં આવ્યું છે તે ધર્મ છે એનાથી વિપરીત નહિ भावसमित्रम् આ પરવડે સૂત્રકાર આ વાત મૈત્રી, મુદિતા, કરુણા અને માધ્યસ્થ આ ચાર લક્ષણેથી યુક્ત હોય છે આ બધા ધર્મના બાહ્ય ચિન્હ છે એમના સદભાવથી આત્મામા ધર્મનું અસ્તિત્વ । मैयादि સ્પષ્ટ કરે છે કે તે અનુષ્ઠાન .
प्रांताधवयाचे व्यवहारेण कचित् किंचिदपिद्धपि पचनमुपलभ्यते, मार्गानुसाग्निद्धी वा पाणिनि यचित् , तदपि जिनमणीतमेश, तन्मूलफत्वात् तम्य । हर एक का कार्य और कारण हो जायगा । अतः आगमप कार्य की शुद्धि के लिये निमित्त रप कारण शुद्धि का होना अवश्य आवश्यकीय माना गया है। प्रश्न-आपने जो कहा कि आगम में अविद्वता उसके कारणभूत प्रणेता के अधीन है-मो यह बात में मान्य है । परन्तु इससे यह यात तो सिद्ध नहीं होती है कि वे अविरुद्ध वचन जिन भगवान के ही है' अन्य के नहीं-कारण कि अन्य सिद्धान्तकारों के वचनों में भी किसी अशसे अविरुद्धार्थता देवी जाती है। अत. उन्हें सदीप मान कर आप जो उनमें अनाप्तता सिद्ध करते है नो यर यात कैसे मान्य हो सकती है? उत्तर-शका तो ठीक है-परन्तु विचार करने से इनका उत्तर भी सहजरूप में मिल जाता है। अन्य सिद्वान्तकारो ने जो कुछ रचनाएँ की हैं-वे सब उन्हों ने अपनी इच्छानुसार ही की है। अपनी निज कल्पना में जो कुछ उन्हें सूझा वही उन्होंने लिखा है। उनकी रच नाओ में पूर्वापर विरोध स्पष्ट प्रतीत होता है इससे उनमें रागादिक दोषों का अस्तित्व सिद्ध होता है। अब रही उनके वचनों में घुणाक्षर નહિ તે કાર્ય કારણ ભાવની વ્યવસ્થા બની શકે તેમ નથી દરેક પદાર્થ દરે કનુ કાર્ય અને કારણ થઈ જશે એટલા માટે આગમરૂપ કાર્યની શુદ્ધિ માટે નિમિત્તરૂપ કારણ શુદ્ધિ થવી ચોક્કસપણે આવશ્યકીય માનવામા આવી છે નક્ષ – તમે કહ્યું કે આગમમા અવિરુદ્ધતા તેના કારણભૂત પ્રણેતા આધીન છે-એ વાત એમને માન્ય છે પણ એનાથી આ વાત તે સિદ્ધ થતી નથી કે તે અવિરુદ્ધ વચને જિન ભગવાનના જ છે, બીજાઓના નહિ કેમકે બીજા સિદ્ધાતકારના વચનોમાં પણ કોઈ પણ અશે અવિરુદ્ધાર્થતા જોવામાં આવે છે એટલા માટે તેમને દોષયુક્ત માનીને તમે જે તેમનામાં અનાખતા સિદ્ધ કરે છો આ વાત કેવી રીતે માન્ય થઈ રાકે તેમ છે ! ઉત્તર – કા તે ઠીક છે, પણ વિચાર કરવાથી આને જવાબ પણ સરળ રીતે મળી શકે તેમ છે બીજા સિદ્ધાન્તાએ જે રચના કરી છે તે બધી તેમણે પિતાની ઈચ્છા મુજબ જ કરી છે પિતાની કલ્પનાથી જે કઈ તેમને ગ્ય લાગ્યું કે તેમણે લખ્યું છે તેમની રચનાઓમાં પૂર્વાપર વિરોધ સ્પષ્ટ રીતે દેખાઈ આવે છે એનાથી તેઓમા રાગ વગેરે દોષો છે એવી વાત સિદ્ધ થાય છે. હવે ઘુણાક્ષર ન્યાયથી કઈક કોઈક સ્વાને તેમના - अमगारधर्मामृतषिणी टी०म० १६ द्रौपदोपर्चा पञ्चमी, तथा च-पचनप्रयोज्यप्रवृत्तिमत्व लक्षणमिति न कुत्राप्यव्याप्तिदोपावकाशः प्रीतिभक्त्यसद्गानुष्ठानानामपि वचनप्रयोज्यत्वाऽनपायादिति । किं च--हिंसाटिपाएपरिहारो धर्मसिद्धेरिङ्गमित्याईता' स्वीकुर्षति । तथा चोक्तम्- औदार्य दाक्षिण्य पापजुगुप्साऽथ निर्मलो गोधः । लिगानि धर्मरिः, प्रायेण जनमियत्व च ॥ इति । पापजुगुप्सा-पापपरिहारः। पदकायवधमाध्य प्रतिमापूजन कुर्वता धर्मसिद्धि कध स्यादिति विचारयन्तु मुधिय । अपर च rher - प्रतीत नहीं होता है क्यों कि बचनानुष्ठान धर्म का अर्थ वचन के अनुसार होने वाला अनुष्ठान धर्म है उसमें कोई जातका दोष नहीं आता है।" किंच--हिंसादिक पांच पापों का परित्याग धर्म सिद्धि का चिह्न इस प्रकार की मान्यता जैनियों की है। शास्त्रान्तर में यही बात प्रकट की गई है- औदार्य दाक्षिण्य पापजुगुप्माऽध निर्मलो योधः । लिङ्गानि धर्ममिद्धे प्रायेण जनप्रियत्व च ॥ (पोउश-ग्रथ ४ प्रकरण) उदारता-हृदय की विपालता, दाक्षिण्य-सर्व जीवो के अनुम्ल प्रवृत्ति, पापजुगुप्सा-पाप का परित्याग, निर्मलयोध-तत्त्वज्ञान, और जन प्रियत्व ये ५ धर्मसिद्धि के लक्षण हैं। अब यहा पर विचारने की यात यह है कि जर पाप का परिहार करना यह धर्मसिद्धि का लक्षण આવશ્યકતા જણાતી નથી કેમકે વચનાનુષ્ઠાન ધર્મને અર્થ વચન મુજબ થનાર અનુષ્ઠાન ધર્મ છે આમાં કોઈ પણ જાતને દોષ નથી ચિ–હિંસા વગેરે પાચ પાપને પરિત્યાગ ધમસિદ્ધિનું ચિહ્ન છે આ જાતની માન્યતા જેનીઓની છે શાસ્ત્રી તરમાં પણ એ જ वाभा आची छे. औदार्थ दाक्षिण्य पापजुगुप्साऽय निम लो बोध । लिङ्गानि धर्मसिद्ध प्रायेण जिनप्रियत्व च ॥ ( पोडशन य ४ प्रकरण) ઉદારતા-હૃદયની વિશાલના, દાક્ષિણ્ય-બધા જીવોને અનુકળ થઈ પડે તેવી પ્રવૃત્તિ, પાપ જુગુપ્સા-પાપનો ત્યાગ, નિર્મળ બેધ - તત્વજ્ઞાન, અને આ પાચે ધમ સિદ્ધિના લક્ષણે છે, હવે આપણી સામે આ વાત વિચાર કરાગ્ય છે કે જ્યારે પાપનો પરિહાર ફરે એ વમસિદ્ધિનું લક્ષણ વાત સ્પષ્ટ જિનપ્રિયત્ન . -- ફટ पातामकथाम वाहयचेष्टाविशेपाः, वैः समिश्र-सयुक्त, मेगादिमायाना नि श्रेपसाभ्युदयधर्मम् लत्वेन शास्त्रान्तरेषु प्रतिपादनात् । तदेवरियमनुष्ठान धर्म इति कीर्त्यते शब्धते सुधीभिरिति । नन्वेन पचनाऽनुष्ठान धर्म इति माप्त, तथा 7 मीविभक्त्यसमानुष्ठानेष्व व्याप्तिरिति चेन्न-रह तु वचनादित्यत्र नात् प्रचिरित्या प्रयोज्यत्वार्थिका धर्म का अस्तित्व जाना जाता है अन्य सिद्धान्तकारों ने भी इने नि. श्रेयस और स्वर्ग के कारणभूत धर्म का मूल का है । अतः जो आगम से अविरुद्ध है, काल आदि की आराधना के अनुसार जो आराधित होता है और जो मैत्री आदि पार भावनाओ से गर्मित है ऐसा अनुष्ठान ही धर्म है। ऐसे ही धर्म की बारापना करने का गण धर आदि का आदेश है। भावार्थ-तीर्थकर कथित आगम के अनुसार होने वाले अनुष्ठान का नाम धर्म है । इसका फलितार्थ यही है कि जिस अनुष्ठान मे तीर्थकर प्रभु द्वारा कथित आगम से विरोध नहीं आना है वही धर्म है । तथा च-प्रीति भक्ति और असग रूप अनुष्ठानों में इस लक्षण की अप्राप्ति नही होती है क्यों कि वहा पर भी इस लक्षण का सद्भाव पाया जाता है " वाचनानुष्ठान धर्मः" इन प्रकार के कथन में की तरह प्रयोज्य अर्थ में पचमी विभक्ति हुई है अत जिस प्रवृत्ति का प्रयोज्य वचन है वह धर्म है। (वचनानुष्ठान धर्म ) यहा से लेकर (प्रीति भक्ति असगानुष्ठान इत्यादि तक) लिखने की आवश्यकता જાણવામાં આવે છે બીજા સિદ્ધાતકાએ પણ આ બધાને નિ શ્રેયસ અને સ્વર્ગના કારણભૂત ધમનુ મૂળ બતાવ્યું છે એથી જે આગમથી અવિરુદ્ધ છે કાળ વગેરેની આરાધના મુજબ જે રાધિત હોય છે અને જે મૈત્રી વગેરે ચાર ભાવનાઓથી યુક્ત છે એવું અનુષ્ઠાન જ ધર્મ છે એવા જ ધર્મની આરાધના કરવા માટે ગણધર વગેરેને આદેશ છે ભાવાર્થ –તીર્થકર કથિત આગમ મુજબ આચરાયેલા અનુષ્ઠાનનું ધર્મ છે એને અર્થ આ પ્રમાણે ફવિત થયેલ છે કે જે અનુષ્ઠાનમા તીર્થંકર પ્રભુ વડે કથિત આગમથી વિરોધ જણાતું નથી તે જ ધર્મ છે તેમજ પ્રીતિ, ભક્તિ અને અસ ગ રૂપ અનુષ્ઠાનોમાં આ લક્ષણની અપ્રાપ્તિ પણ હતી નથી भ त्या ५ मा सक्षन। समाप भणे छ " वाचनानुष्ठान धर्म " मा वेदात् प्रवृत्ति नभ प्रयोज्य अर्थमा ५भी वित થઈ છે એટલા માટે જે પ્રવૃત્તિનું પ્રત્યે વચન છે તે ધર્મ (वचना नुष्ठान धर्म ) महीथी भान प्रीति भक्ति असगानुष्ठान पोरे -ખવાની “ वेदात् प्रवृत्तिः" નામ જાતની કથનમાં ३७५ , मनगारधर्मामृतपणी टी० अ० १६ द्रौपदोचर्चा पञ्चमी, तथा च-पचनप्रयोज्यप्रवृत्तिमत्व लक्षणमिति न कुत्राप्यव्याप्तिदोपावकाशः प्रीतिभक्त्यसद्गानुष्ठानानामपि वचनप्रयोज्यत्वाऽनपायादिति । कि च--हिंसादिपापपरिहारो वर्मसिद्धेलिङ्गमित्याईता' स्वीकुति । तथा चोक्तम्- औदार्य दाक्षिण्य पापजुगुप्साऽथ निर्मलो वोधः । लिङ्गानि धर्मसिद्धे, प्रायेण जनमियत्व च ॥ इति । पापजुगुप्सा-पापपरिहारः। पदकायवधमाध्य प्रतिमापूजन कुर्वता धर्मसिद्धि कप स्यादिति विचारयन्तु मुधिय । अपर च- प्रतीत नहीं होता है क्योंकि वचनानुष्ठान धर्म का अर्थ वचन के अनुसार होने वाला अनुष्ठान धर्म है इसमे कोई जातका दोष नहीं आता है।" किंच-हिंसादिक पांच पापों का परित्याग वर्म सिद्धि का चिह्न है इस प्रकार की मान्यता जैनियो की है। शास्त्रान्तर मे यही बात प्रकट की गई है- औदार्य दाक्षिण्य पापजुगुप्साऽध निर्मलो बोधः । लिङ्गानि धर्मसिद्धे' प्रायेण जनप्रियत्व च ॥ (पोउश-ग्रय ४ प्रकरण) उदारता-हृदय की विपालता, दाक्षिण्य-सर्व जीवो के अनुकूल प्रवृत्ति, पापजुगुप्सा-पाप का परित्याग, निर्मलपोध-तत्त्वज्ञान, और जन प्रियत्व ये ५ धर्मसिद्धि के लक्षण हैं। अब यहा पर विचारने की पात यह है कि जप पाप का परिहार करना यह धर्ममिद्धि का लक्षण આવશ્યકતા જણાતી નથી કેમકે વચનાનુષ્ઠાન ધર્મને અર્થ વચન મુજબ થનાર અનુષ્ઠાન ધર્મ છે. આમાં કોઈ પણ જાતને દોષ નથી કિંચ–હિંસા વગેરે પાચ પાપને પરિત્યાગ ધર્મસિદ્ધિનું ચિહ્ન છે આ જાતની માન્યતા સૈનીઓની છે શાસ્ત્રા તરમાં પણ એ જ કરવામાં આવી છે औदार्य दाक्षिण्य पापजुगुप्साऽथ निमलो बोध । लिङ्गानि धर्मसिद्वे प्रायेण जिनप्रिपत्व च ॥ ( पोडशमथ ४ प्रकरण) ઉદારતા-હૃદયની વિશાળતા, દાક્ષિણ્ય-અધા એને અનુકળ થઈ પડે પાપ જુગુપ્સા–પાપને ત્યાગ, નિર્મળ બોધ – તત્વજ્ઞાન, અને જિનપિયત્વ આ પાચે ધમસિદ્ધિના લક્ષણે છે, હવે આપણી સામે આ વાત વિચાર કરવાગ્ય છે કે જ્યારે પાપને પવ્હિાર કરે એ ધર્મસિદ્ધિનુ લક્ષણ - વાત ૫૭ તેવી પ્રવૃત્તિ, ३७६ माताधर्मकाज एकेद्रियाम्पिदजी निकायसीना रक्षणं धर्म मृलमिति पत्तामता पट्कायविराधनासाध्यायाः प्रतिमापूजाया भीमारे पनामे नश्यति, जन धर्मस्य मूलतस्तत्र समुन्द्रदात् । तथा चोक्तम्-जीवदयसच्चायण, परधणपरिसज्जण मुसील च । सती पस्न्यिनि-ग्गहो य धम्मम्ग मृलाइ ॥ दर्शनशुद्धि-२ तत्व) है तो प्रति मा का पूजन करने वाले के पसमा परिहार कसे हो सकता है। क्यों कि यर पहिले ही प्रकट किया जा चुका है कि यह प्रतिमा पूजन कार्य पट् काय के आरभ के पिना सा होती नही ममता। अतः प्रतिमापूजन वाले को धर्ममिति का लाभ मानना यह एक मनग ढन कल्पना ही है-शानोर कल्पना नहीं। शास्त्र में तो यही जिनेन्द्र देव की आज्ञा है कि एकेन्द्रिय आदि पद निकाय के जीवों की रक्षा करना ही प्रत्येक जैन मात्र का कर्तव्य है, और वही धर्म का मूल है जर इस प्रकार की वीतराग प्रभु की आज्ञा है-तो फिर यह तो सोचो की पनिकाय की विराधना से साध्य इस प्रतिमापूजन की मान्यता जैनत्व का रक्षण ही कसे हो सकता है। प्रत्युत जैनधर्म का इस प्रकार मे सम्लत नाश ही हो जाता है। जी पदयस चबयण परधन परिवजण सुसीलच । खनी पचिंदिय निग्गहोय यम्मस्स मलाइ ॥ (दर्शन शु २ तत्व) છે ત્યારે પ્રતિમાની પૂજા કરનારાઓ માટે અને પરિહાર કેવી રીતે થઈ શકે તેમ છે, કેમકે આ વાત પહેલા જ પ્રગટ કરવામા આવી છે કે આ પ્રતિમા પૂજન કાર્ય પકાયના આર ભ વગર સાધ્ય થઈ શકે તેમ નથી એથી પ્રતિમા પૂજનવાળા માટે ધર્મસિદ્ધિને લાભ સમજી લે આ એક બેટી કલ્પના માત્ર છે. સાસ્ત્રીય કપના નથી રાસ્ત્રમા તે જિનેન્દ્રદેવની એ જ આજ્ઞા છે કે એકેન્દ્રિય વગેરે ષટૂકાયના જીની રક્ષા કરવી જ દરેકે દરેક જૈનનું કર્તવ્ય છે અને એ જ ધર્મનું મૂળ છે જ્યારે આ જાતની વીતરાગ પ્રભુની આજ્ઞા છે ત્યારે આ વાત ઉપર તે વિચાર કરીએ કે શકાય નિકાયની વિરાધનાથી સાધ્ય આ પ્રતિમા પૂજનની માન્યતામા જૈનનનું રક્ષણ જ કેવી રીતે થઈ શકે છે આ જાતની માન્યતાથી તે જૈન ધર્મને મૂળરૂપે વિનાશ જ થઈ જાય છે जीपदयसन्चवयण परधनपरिवज्नण मुमील च । सती पचि दियनिग्गहोय धम्मस्स मुलोइ ॥ ( दर्श तत्व) की मान्यता मनगारधर्मामृतपिणा टीका ०१६ द्रौपदीचर्चा ३७७ जीवाश्चेतनादिलिट्व्यतया एकेन्द्रियादय तेपा दया रक्षणं जीवदयेति । इस्वत्व माकृतमभवम् । धर्ममूल भवनि सर्वन क्रियाऽध्याहारः कार्यः । प्रतिमापूजन विशुद्धपरिणाम त्यादुपादेयमितिकथन निर्मूलम्-- धर्माङ्गेषु दयायाः मावान्यात प्राथभ्य वर्तते । हिंसासाभ्याया मतिमापूजाया दयाया अभावाद् पाहत्व न मि यति । तथा च रिशुद्धात्मपरिणामरूप धर्म प्रति कारणत्व प्रतिमापूजनस्य न सभवति । अन्यच्च इस लोक में यही बात कही गई है। जीवों की दया करना सत्य योलना, पर धन के हरण करने का त्याग करना, कुशील का त्यागना, क्षमाभाव रखना, पाचों इद्रियों को वश में रसना ये सन धर्म के मूल हैं । जिस प्रकार दिना मूल जड़ के वृक्ष की स्थिति आदि नहीं हो सकती है-उमी प्रकार उनके विना भी धर्मरूपी महावृक्ष की जीवात्मा ओ में स्थिरता नही हो सकती है जो व्यक्ति "प्रतिमा के पूजने से विशुद्ध परिणामो की आत्मा में जागृति रोती है" इस बात का सम- धन करते हुए उपयोगिता सिद्ध करते हैं उनका यह कथन बिलकुल ही निर्मूल है क्यो कि धर्म में सर्वप्रथम स्थान दया को ही दिया गया है जीवों की हिंसा से साध्य इस प्रतिमापूजन में उस दया का सरक्षण ही नही होता है-इसलिये उसे धर्म का अग कैसे माना जा सकता है जो धर्म का ही अग नही बनता है उससे कैसे परिणामो में विशुद्धता की जागृति हो सकती है अतः यह प्रतिमापूजन धर्म प्राप्ति में कारण नहीं है ऐसा मानना चाहिये। આ લેકમાં એ જ વાત બતાવવામાં આવી છે કે જીવ ઉપર દયા કરવી, સત્ય બોલવું, પારકાના ધનને લઈ લેવાની વૃત્તિને દૂર કરવી, કુશીલને ત્યાગ કર, ક્ષમાભાવ રાખે, પાચ ઈન્દ્રિયને વશમાં રાખવી આ ધર્મના મૂળ છે જેમ મૂળ-જડ વગરના વૃક્ષની સ્થિતિ વગેરે જ થઈ શકે તેમ નથી તેમજ એમને વગર પણ ધર્મરૂપી મહાવૃક્ષની જીવાત્માઓમાં સ્થિરતા થઈ કે તેમ નથી જે વ્યક્તિ “પ્રતિમાના પૂજનથી વિશુદ્ધ પરિણામોની આત્મામાં જાગૃતિ થાય છે ” આ વાતને ગ્ય માનીને આની ઉપયોગિતા સિદ્ધ કરે છે, તેમનું આ કથન સાવ નિર્મળ વ્યર્થ છે કેમકે ધર્મમાં સૌ પ્રથમ સ્થાન દયાને જ આપવામાં આવે છે જીવોની હિંસાથી સાધ્ય આ પ્રતિમા પૂજનમાં તે દયાની રક્ષા જ થતી નથી એટલા માટે આને ધર્મનું અગ કેવી રીતે માની શકીએ અને જે ધર્મનું જ અગ થઈ શકતું નથી તેનાથી કેવી રીતે પરિણામમાં વિશુદ્ધતાની જાગૃતિ થઈ શકે એટલા માટે આ પ્રતિમાપૂજન ધર્મ પ્રાપ્તિમાં કાર નથી આમ માની લેવું જોઈએ બધા ॥ - गण, जाताधर्माचार धर्मालम्पनानि स्थानाम्ने भगवा मातानि-- धम्म ण चरमाणस्स पर निस्साठाणा पणता। त जहा-उपाया, गणो, राया, गिहराई, सरीर " ॥ इति । भगाता धर्मालम्सनानि पश्चिम कवितानि । तत्र "छपाया" इत्युक्त्या गणराजादीनामपि सग्रहे सत्यपि पुनस्तेपारिशिष्योपन्यासः प्राधान्यर योपनार्थः अन्यच-"धम्म चरमाणस्स पच निस्साटाणा पत्ता-तजहा-छ काया, गणो, राया, गिरवई, मरीर" इति-भगवान ने धर्म के छरकाय, गण, राजा, गाथापति और शरीर इस प्रकार ये छह आलम्यन स्थान स्थानाङ्गसूत्र में कहे है। इनमें जिन प्रतिमा का कथन नहीं किया है-इससे यह भलीभाति विदित हो जाता है कि जिन प्रतिमा और उसका पूजन धर्म का अवलम्पन रूप नहीं है यदि जिन प्रतिमा का पूजन कार्य धर्म का अवलम्बनरूप सिद्धान्तकारों की दृष्टि में मान्य होता तो वे अवश्य इन स्थानों के कथन करते-जिस प्रकार छहकाय, राजा इत्यादि का कथन किया है । यद्यपि "छकाय" इस एक पद से ही गण, राजा आदि का स्वत. कथन सिद्ध हो जाता है, क्यो की इन सब का समावेश उसी एक पद में हो जाता है। फिर भी इनका भिन २ रूप से जो नाम निर्देय किया है उसका कारण ये धर्म के प्रधान आलम्बन रूप हैं इस बात को प्रकट करने के लिये ही किया गया है। इसी प्रकार भने यी ५ धु छ है "धम्म चरमाणस्स पच निस्साठाणा पणत्ता-त जहा उपाया, गणो, राया, गिहवई, सरीर " इति, लगवाने मना छ य, ગણ, રાજા, ગાથા પતિ અને શરીર આ રીતે છ આલ બનસ્થાન સ્થાનાગ સૂત્રમાં કહ્યા છે. આ બધામા જિન પ્રતિમાનું કથન કરવામાં આવ્યું નથી એનાથી આ સ્પષ્ટ રીતે જણાય છે કે જિનપ્રતિમા અને તેનું પૂજન ધર્મનું અવલ બન નથી જે સિદ્ધાન્તકારની દષ્ટિમા જિન પ્રતિમાના પૂજનનું કાર્ય ધર્મના અવ લબના રૂપમાં માન્ય હેત તે તેઓ ચોક્કસ આ સ્થાનના કથનની સાથે સાથે તેમનુ પણ કથન જેમ છ કાય, ગણુ રાજા વગેરેનું કથન કર્યું છે તેમ કહ્યું શકાય આ એક પદથી જ ગણ, રાજા વગેરેનું સ્વત કથન સિદ્ધ થઈ જાય છે, કેમકે આ બધાને સમાવેશ તે એક પદમાં જ થઈ જાય છે, છતાય આ બધાને સ્વતંત્ર રૂપમાં જે નામ નિર્દેશ કરવામાં આવ્યું છે તેનું કારણ આ છે કે તે સર્વે ધર્મના પ્રધાન આલબનરૂપ છે, આ વાતને પ્રગટ કરવા માટે જ કરવામાં આવ્યો છે આ પ્રમાણે જે ' ५५ डातन -- अनारधर्मामृतपिणी टीका अ० १६ द्रौपदीचर्चा दर्शनवन्दनपूजनादिना जिनप्रतिमायाः सम्यक्त्वशुद्धिहेतुत्वाऽष्टकर्मक्षयहेतुत्व स्वीकारे तु अस्या अपि निधास्थानत्वेन निवास्थानेषु विशिष्य तदुपन्यासमकृत्वा "पच निस्साठाणा पणत्ता" इति कथन विरुध्यते । तस्मात् जिनप्रतिमाया निश्रास्थानेष्वनभिधानात् प्रतिमाया धर्मालम्पनत्व न सिध्यति । एव च तत्पूजन कुशलात्मपरिणामविशेपस्य धर्मस्य कारण नास्तीति विश्वसनीयम् । प्रतिमापूजायामारम्भः परिग्रहश्चावश्य भावी । ताभ्या विना पूजाया अस भवात् तथाऽपि-प्रतिमापूजोपदेशकाः एव वदन्ति- यदि जिन प्रतिमा भी दर्शनवन्दना और पूजादिक द्वारा सम्यक्त्वशुद्धि एव अष्टकर्मों के क्षय का कारण होती तो उसका भी धर्म का आल म्पनरूप होने से यहा पर विशेषरूप से शास्त्रकार को कथन करना चहिये था ! परन्तु ऐसा तो सूत्रकार ने किया नहीं है । फिर भी यदि उसे धर्म का अवलम्पनरूप स्वीकार किया जाय तो इस सूत्र में प्रति- पादित 'पाच ही निवास्थान हैं" इस कथन से विरोध आता है कारण कि उन स्थानों से अतिरिक्त एक और जिनप्रतिमापूजन धर्म का आल- म्चन रूप स्थान बढ जाता है अतः 'पच निस्साठाणा पण्णत्ता इस सूत्र प्रदर्शित उपन्यास से यह बात पुष्ट होती है कि जिन प्रतिमा धर्म की आलम्बन स्थान नहीं है। यह तो उस के पक्षपातियो के ही दिमाग की एक उटपटाग सूझ है यह जानते हुए भी कि जिनप्रतिमापूजन में आरभ और परिग्रह अवश्यभावी है, इनके विना वह कथमपि साध्य हो नही सकती है, तो भी जिनपूजाके उपदेशक खेद है कि जनता को દર્શન વન્દના અને પૂજા વગેરે વડે સમ્યકત્વ શુદ્ધિ અને અષ્ટ કર્મોનો ક્ષયનુ કારણે હેત તે ધર્મના આલ બનરૂપ હવા બદલ અહી વિશેષરૂપમાં શાસ્ત્ર વાર વડે તેનું કથન કરવું જોઈએ પણ સૂત્રકારે આવું કઈ કર્યું નથી છતાય જે તેને ધર્મના અવલ બનરૂપે સ્વીકારીયે તે આ સૂત્રમાં પ્રતિપાદિત પાચ જ નિશ્રાસ્થાને છે « આ કથનથી વિરોધ ઊભો થાય છે કેમકે તે રથાનેથી અતિરિક્ત એક બીજા જિનપ્રતિમા પૂજન ધર્મના આલ બનરૂપ સ્થાનની વૃદ્ધિ થઈ જાય છે એથી “ पच निस्साठाणा पण्णत्ता પ્રદર્શિત ઉપન્યાસથી આ વાત પુષ્ટ થાય છે કે જિનપ્રતિમા ધર્મનું આલબેન સ્થાન નથી આ તે ફક્ત તેના તરફદારીઓના મસ્તિષ્કની જ વ્યર્થની કલ્પના છે જિનપ્રતિમા પૂજનમા આરભ અને પરિગ્રહ અવશ્ય ભાવી છે એના વગર તે કઈ પણ સંજોગે સાધ્ય થઈ શકે તેમ નથી આવું જાણવા છતા બહુ EM साये ९५ छन भूना पहेश सभाने “ पूयाए काय . આ સૂત્ર -- . पाताधर्मकपणे धर्मालम्पनानि स्थानानसूत्रे भगाता मातानि-- "धम्म ण चरमाणस्स पर निस्साठाणा पगा। त जहा-उपाया, गणो, राया, गिटपई, सरीर" ॥ इति । भगाता धर्मालम्मनानि पश्चा कवितानि । तत्र उपाया " इत्युक्त्या गणराजादीनामपि सग्रहे सत्यपि पुनस्तेपा पिशिष्योपन्यासः प्राधान्यर योपनार्थः अन्यच-"धम्म चरमाणस्म पच निस्माठाणा पण्णत्ता-तजहा-छ फाया, गणो, राया, गिरवई, सरीर" इति-भगवान ने धर्म के उरकाय, गण, राजा, गाथापति और शरीर इस प्रकार ये छह आलम्पन स्थान स्थानाइसत्र में कहे है। इनमें जिन प्रतिमा का कथन नहीं किया है-इससे यह भलीभाति विदित हो जाता है कि जिन प्रतिमा और उसका पूजन धर्म का अवलम्मन रूप नहीं है यदि जिन प्रतिमा का पूजन कार्य धर्म का अवलम्बनरूप सिद्धान्तकारों की दृष्टि में मान्य होता तो घे अवश्य इन स्थानों के कथन करते-जिस प्रकार छकाय, गण, राजा इत्यादि का कथन किया है । यद्यपि "छकाय" इस एक पद से हीगण, राजा आदि का स्वतः कथन सिद्ध हो जाता है, क्यो की इन सब का समावेश उसी एक पद मे हो जाता है। फिर भी इनका भिन्न २ रूप से जो नाम निर्देय किया है उसका कारण ये धर्म के प्रधान आलम्बन रूप हैं इस बात को प्रकट करने के लिये ही किया गया है। इसी प्रकार भने यी ५ रघुछ है "धम्म चरमाणस पच निस्साठाणा पण्णत्ता-त जहा उफाया, गणो, राया, गिहवई, सरीर " इति, सपा पमना छ ।य, ગણ, રાજા, ગાથાપતિ અને શરીર આ રીતે છ આલ બનસ્થાન સ્થાનાગ સૂત્રમાં કહ્યા છે. આ બધામા જિન પ્રતિમાનું કથન કરવામાં આવ્યું નથી એનાથી આ સ્પષ્ટ રીતે જણાય છે કે જિનપ્રતિમા અને તેનું પૂજન ધર્મનું અવલ બન નથી જે સિદ્ધાન્તકારેની દૃષ્ટિમાં જિન પ્રતિમાના પૂજનનું કાર્ય ધર્મના અવ લ બન રૂપમાં માન્ય હેત તે તેઓ ચોક્કસ આ સ્થાનના કથનની સાથે સાથે તેમનુ પણ કથન જેમ છ કાય, ગણુ રાજા વગેરેનું કથન કર્યું છે તેમ કર્યું હત જે કે કાય આ એક પદથી જ ગણ, રાજા વગેરેનું સ્વત કથન સિદ્ધ થઈ જાય છે, કેમકે આ બધાને સમાવેશ તે એક પદમાં જ થઈ જાય છે, છતાય આ બધાને સ્વતંત્ર રૂપમાં જે નામ નિર્દેશ કરવામા આવે છે તેનું કારણ આ છે કે તે સર્વે ધર્મના પ્રધાન આલબનરૂપ છે, આ વાતને પ્રગટ કરવા માટે જ કરવામા આવ્યો છે. આ પ્રમાણે જે 0 . " न पण - . अनगारधर्मामृतवपिणी टी० अ० १६ द्रौपदीचर्चा दो द्वाणाइ' द्वे स्थानेदू वस्तुनी 'अपरियाणिचा' अपरिनार परितया एतापारम्भपरिग्रहानाय ' इत्यविज्ञाय अल ममाभ्यामिति परिहाराभिमुख्य. द्वारेग प्रत्याख्यानपरिनमा अप्रत्यारयाय च ब्रह्मदत्ता तयो प्रत्तः, 'माया' आत्मा-जीन , नो के गलि प्रज्ञप्त-निनोक्त धर्म लभेत यातया-श्रवणभागेन योतुमिय । जैन धर्मश्रणानह) भवतीति भावः । तद् यथा आरम्भा-प्राणा तिपातादिरूप , पापस्थानम् परिग्रह.-वनधान्यादिसनाः । द्वे स्थाने अपरिज्ञाय - परिवयाऽनर्थकारणमज्ञात्वा प्रत्याल्यानपरिक्षया अप्रत्याख्याय च तन प्रकृतः आया' आत्मा-जीवः केनल पोधि अर्थात् सम्यक्त्व न बुध्येतन प्राप्नुयादित्यर्थ । पाने के भी योग्य बन सकती है" यह सत्र हमे यह शिक्षा देता है कि भलो जिस परिग्रह और आरभयुक्त आत्मामें केवलि प्रज्ञप्स वम सुनने तक की भी योग्यता नहीं है और न जिसमें सम्यक्त्व का अनुभव है, है उम आत्मा में " वह प्रतिमा सम्यक्त्य की शुद्धि का कारण होता इस प्रकार की मान्यता आकाश के फूल के समान एक कल्पना मात्र ही है । अतः यह सिद्धान्त निश्चित होता है कि इस प्रतिमापूजन मे न तो धर्म के कोई मौलिकतत्त्व का समावेश हे और न धर्म का कोई अग ही है। यह न तो धर्म का आलम्पनरूप है और न धर्म के लक्षण से री युक्त है। फिर भी इसे धर्म पद का वाच्य मानना केवल स्पष्ट रूप से उत्तपत्र गरूपणामात्र है इस प्रकार शास्त्रीयमर्यादा के विरुद्ध इस प्रतिमा पूजन का उपदेश देने वाले तथा प्रतिमापूजन कराने वाले उप- . બની શકે તેમ નથી “આ સૂત્ર અમને આ જાતની ભલામણ કરે છે કે જે પરિગ્રહ અને આર ભયુક્ત આત્મામાં કેવલિ પ્રજ્ઞત્વ ધર્મ સાભળવા સુધીની પણ રેગ્યતા નથી અને જેમાં સમ્યગ્રત્વની અનુભૂતિ પણ નથી તે આત્મામાં તે પ્રતિમા સમ્યક્ત્વની શુદ્ધિનું કારણ હોય છે. આ જાતની માન્યતા આકા શના પુની જેમ એક બેટી કલ્પના માત્ર જ નથી તે બીજુ શુ છે ? એટલા માટે એ સિદ્ધાન્ત નિશ્ચિત થાય છે કે આ પ્રતિમાપૂજનમ ધર્મના ન કોઈ મૌલિક તોનો સમાવેશ છે અને ન તો તે વર્મનુ કઈ પણ એક અગ છે આ ધર્મનું આ મનરૂપ નથી અને ધર્મના લક્ષણથી યુક્ત પણ નથી છતા ય તેને ધમ પદાચ માનવું તે સ્પષ્ટ રીતે ઉસૂત્ર પ્રરૂપણું માત્ર છે. આ રીતે શાસ્ત્રની મર્યાદાથી વિપરીત આ પ્રતિમા પૂજનને ઉપદેશ આપનારાઓ તેમજ પ્રતિમા . Maruथा अपि च-" पूयाए फायदो, पडिकुट्ठो सो उ किंतु जिणपूया । सम्मत्सुद्धिदेउ, ति भापणीया उणिवा ॥१॥ छाया-पूजाया कायधः मति सारिन्तु जिनपूना । सम्यक्त्वशुद्धिहेतु-रिति भारनीया त निरपद्या ॥१॥ सर्वमेतदुत्सूत्रमरूपणम्-भूपता प्रवचन ताप--- दो द्वाणाइ अपरियागिता आया णो केलिपनत्त धम्म लमेज सरगयाए । त जहा-आरभे चेत्र परिग्गहे चेा । दोहाणाइ अपरियाणित्ता माया णो केवल वोहिं युझिज्जा। त जहा-आर मे चेव परिग्गहे चेत्र ॥ (म्या २ ठा १३.)इति " पूयाए कायरहो पडिकुट्टो सो उ किंतु जिणपूपा। सम्मत्तसुद्धिहेउ, त्ति भावणीया उणिरयजा ॥१॥ इस प्रकार की उत्सूत्र प्ररूपणा द्वारा भ्रम में ही डालते रहते हैं। हमें तो धुद्धि पर तरस आता है कि वे क्यों नही इस सिद्धान्त को समझने की पेप्टा करते है कि-"दोहाणाइ अप रियाणित्ता आया णो केवलिपण्णत्त धम्म ल भेज सवणयात जहा- आरभे चेव परिगाहे चेव । दोहाणाइ अपरियाणित्ता आया णो केवल बोधि धुज्झिज्जा त जहा-आरभे चेय परिग्गहे चेय (स्था २ टा १ उ.) ये दो धनधान्य आदि रूप परिग्रह और प्राणातिपात आदि रूप आरभ स्थान अनर्थ के कारण है । जप तक आत्माज परिज्ञा से इन्हें जान कर और प्रत्याख्यान परिज्ञा से इनका परित्याग नही कर देती है तब वह ब्रह्मदत्त की तरह केवलि द्वारा कथित धर्म के सुननेका अधिकारी नहीं हो सकती है और न इन दोनों के त्याग किये विना चक्र सम्यक्त्व को वहो पडिकुट्ठो सोउ किं तु जिणपूया । सम्मत्तसुद्धिहेउ, ति भावणीया उणिर वजा ॥ १ ॥ Alandit सूत्र ७३५ पडे भ्रमभा क नामी रामेछ અમને તે તેમની બુદ્ધિ ઉપર દયા આવે છે કે તેઓ આ સિદ્ધાતને સમ नानी अशिश भ न ४२त राय ? मी "दो द्वाणाइ अपरियाणिता आयाणो केवलिपण्णत्त धम्म लभेज्ज सवणयाए । त जहा-आरभे चेर परिग्गहे चेव । दो द्वाणाइ अपरियाणित्ता आया णो केवलिशोधि चुझिज्जा त जहा- आरभे चेव परिग्गहे चेव ( स्था० २ ठा० १ ० ) धन धान्य कोरे રૂપ પરિગ્રહ અને પ્રાણાતિપાત વગેરે રૂપ આરભ સ્થાન અનર્થના કારણ જ્યા સુધી આત્મા સ પરિજ્ઞા વડે એમને જાણીને અને પ્રત્યાખ્યાન પરિઝાવડે એમને પરિત્યાગ કરતી નથી ત્યા સુધી તે બ્રહ્મદરની જેમ ફેવલિવડે કથિત ધર્મને સાભળવા માટે અધિકારી (ગ્ય પાત્ર) ગણાઈ ! ” તે બનેને જ્યા સુધી ત્યાગ કરે નહિ ત્યા સુધી તે સભ્ય નથી અને - अगगारधर्मामृतवपिणी टी० अ० १६ द्रौपदीची ક08 'दो हाणाइ' द्वे स्थाने रस्तुनी 'अपरियाणिचा' अपरिज्ञाय-ज्ञपरिज्ञया एतावारम्भपरिग्रहानाय' इत्य विज्ञाय अल ममान्यामिति परिवाराभिमुख्य द्वारेण प्रत्याख्यानपरिजमा अप्रत्यारयाय च ब्रह्मदत्तात् तयो प्रवृत्तः, 'जाया' आत्मा-जीन , नो के गलि नज्ञप्त=जिनोक्त धर्म लभेत अपातया-श्रवणभावेन श्रोतुमिलयः । जैन धर्मश्रवणानहाँ मातीति भाषः । तद् यथा आरम्भः-प्राणा तिपावादिरूप , पापस्थानम् परित्रा-नवान्यादिसग्रहः । द्वे स्थाने अपरिज्ञाय - परिनयाऽनर्थकारणमज्ञात्वा प्रत्यायानपरिज्ञया अपत्याख्याय च तत्र प्रतः 'आया' आत्मा-जीवः केवल पोषि-अर्थात् सम्यक्त्व न युध्येतन प्राप्नुयादित्यर्थ । पाने के भी योग्य बन सकती है" यह सूत्र हमें यह शिक्षा देता है कि भलो जिस परिग्रह और आरभयुक्त आत्मामें केलि प्रज्ञप्त धर्म सुनने तक की भी योग्यता नहीं है और न जिसमें सम्यक्त्व का अनुभव है, है उस आत्मा में वह प्रतिमा सम्यक्त्व की शुद्धि का कारण होता इस प्रकार की मान्यता आकाश के फल के समान एक कल्पना मात्र ही है । अतः यह सिद्धान्त निश्चित होता है कि इस प्रतिमापूजन में न तो धर्म के कोई मौलिकतत्व का समावेश हे और न धर्म का कोई अग ही है । पर न तो धर्म का आलम्पनरूप है और न धर्म के लक्षण से ी युक्त है। फिर भी इसे धर्म पद का वाच्य मानना केवल स्पष्ट रूप से उत्सूत्र रूपणामात्र है इस प्रकार शास्त्रीयमर्यादा के विरुद्ध इस प्रतिमा पूजन का उपदेश देने वाले तथा प्रतिमापूजन कराने वाले उप- બની શકે તેમ નથી “આ સૂત્ર અમને આ જાતની ભલામણું કરે છે કે જે પરિગ્રહ અને આર ભયુક્ત આત્મામા કેવલિ પ્રજ્ઞવ ધર્મ સાભળવા સુધીની પણ ચગ્યતા નથી અને જેમાં સમ્યવની અનુભૂતિ પણ નથી આત્મામાં તે પ્રતિમા સમ્યકત્વની શુદ્ધિનું કારણ હોય છે.” આ જાતની માન્યતા આકા- શના પુની જેમ એક બેટી કલ્પના માત્ર જ નથી તે બીજુ શુ છે? એટલા માટે એ સિદ્ધાન્ત નિશ્ચિત થાય છે કે આ પ્રતિમાપૂજનમા ધર્મના ન કેઈ મૌલિક તત્ત્વોને સમાવે છે અને તે તે વમનું કઈ પણ એક અગ છે આ ધર્મનું આલ બનરૂપ નથી અને ધર્મના લક્ષણથી યુક્ત પણ નથી છતા ય તેને ધ પદવાચ માનવું તે સ્પષ્ટ રીતે ઉત્સુત્ર પ્રરૂપણા માત્ર છે. આ રીતે શાસ્ત્રની મર્યાદાથી વિપરીત આ પ્રતિમા પૂજનને ઉપદેશ આપનારાઓ તેમજ પ્રતિમા १८० ताधकथा अपि च-"पूयाए फायदो, पडिट्ठो सो उ किंतु जिणपूया । सम्मतमुद्भिदेउ, ति मारणीया उणिरज्मा ॥१॥ छाया-पूजाया कायवधः मतिष्ठः सनु किन्तु जिनपूना। सम्यक्त्वशुद्धिहेतु-रिति भाग्नीया त निरक्या ॥१॥ सर्वमेतदुत्सूत्रमरूपणम्-थूयतां प्रपचन तारन्-- दोहाणाइ अपरियाणिचा आया णो केलिपनत्त धम्म लमेज्न सगयाए । त जहा-आरभे चेत्र परिगहे थे। । दोहाणाइ अपरियाणिता आया णो केवल बोहि बुज्झिज्जा । त जहा-आर भे चेत्र परिग्गहे चेत्र ॥ (स्था. २ ठा १३ )इति पूयाए कायरहो पडिकुट्टो सो उ किंतु जिणपूया। सम्मत्तसुद्धिहेउ, त्ति भावणीया उणिरवजा ॥ १ ॥ इस प्रकार की उत्सूत्र प्ररूपणा द्वारा भ्रम में ही टालते रहते हैं। हमें तो घुद्धि पर तरस जाता है कि वे क्यों नही इस सिद्धान्त को समझने की चेष्टा करते हैं कि-"दोहाणाइ अप रियाणित्ता आया णो केवलिपण्णत्त धम्म लभेज सवणया | त जरा- आरभे चेव परिगाहे चेव । दोहाणा अपरियाणित्ता आया णो केवल योधि घुज्झिज्जा त जहा-आरभे चेव परिग्गहे चेय (स्था २ ठा १ उ.) ये दो धनधान्य आदि रूप परिग्रह और प्राणातिपात आदि रूप आरभ स्थान अनर्थ के कारण है। जप तक आत्मा ज्ञ परिज्ञा से इन्हें जान कर और प्रत्याख्यान परिज्ञा से इनका परित्याग नही कर देती हे तय वह ब्रह्मदत्त की तरह केवलि द्वारा कथित धर्म के सुननेका अधिकारी नही हो सकती है और न इन दोनों के त्याग किये विना चक्र सम्यक्त्व को वहो पडिकुट्टो सोउ किं तु जिणपूया । सम्मत्तसुद्धिहेउ, त्ति भावणीया उणिर वज्जा ॥ १ ॥ मा anail सूत्र प्र३५ पडे भ्रममा १ नामी रामे छ અમને તે તેમની બુદ્ધિ ઉપર દયા આવે છે કે તેઓ આ સિદ્ધાંતને સમ Mqali शिश भ नड ४२ता य? भो " दो हाणाइ अपरियाणिवा आयाणो केवलिपण्णत्त धम्म लमेज सवणयाए । त जहा-आर भे चेत्र परिगहे चेव । दो द्वाणाइ अपरियाणित्ता आया णो केवलिमोधि बुझिज्जा त जहा- आरभे चेव परिगहे चेव (स्था० २ ठा० १ उ० ) भा धन धान्य कोरे રૂપ પરિગ્રહ અને પ્રાણાતિપાત વગેરે રૂપ આરભ સ્થાન અનર્થના કારણે છે જ્યા સુધી આત્મા જ્ઞ પરિક્ષા વડે એમને જાણીને અને પ્રત્યાખ્યાન પરિઝાવડે એમને પરિત્યાગ કરતી નથી ત્યા સુધી તે બ્રા દત્તની જેમ ફેવલિવડે કથિત ધર્મને સાભળવા માટે અધિકારી (યોગ્ય પાત્ર) ગણાઈ રાકે તેમ નથી અને ચોગ્ય તે બનેને જ્યા સુધી ત્યાગ કરે નહિ ત્યા સુધી તે સમ્યફ 1 अनगारधामृतपिणो टीका २० १६ द्रौपदीचर्चा तथा-सम्यक्त्वशुद्वयर्थ कर्मक्षपार्थ च प्रतिमापूजने मत्तस्य जीवस्य पट्कायो पमर्दनसाध्यपूजया ज्ञानापरणीयस्य दर्शनमोहनीयस्य च कर्मणो वृद्धौ सत्या सम्य- क्त्वम्य केवलि मनप्तपमन्याऽपि प्राप्तिःकालत्रयेऽपि न सभाति किंपुन कर्मक्षयाशा सम्यक्त्वमात्मनः क्षायोपशमिको भारः । प्रतिमा तु न क्षयोपशमस्वरूपा, न चापि क्षयोपशमहेत , ज्ञानापरणीयदर्शनमोहनीयर्मनिर्जराजनकत्वाभावात् , देशतः कर्मसयो हि निर्जरा तामति तपस एव कारणत्वात् । उक्त चोत्तराध्ययनमो- प्रकार सम्यक्त्व की शुद्धि अथवा कर्मों का विनाश प्रतिमापूजनसे नहीं होता है, प्रत्युत जिम प्रकार वह विरयुक्त वस्त्ररुधिर से साफ किये जाने पर अधिक मलिन हो जाता है उसी प्रकार पटकाय की विराधना साध्य इस प्रतिमापूजन में लवलीन जीव भी ज्ञानावरणीय और दर्शन मोहनीय कर्म की वृद्धि करता हुआ अधिकाधिक मलिन होता रहता है वह कभी भी इनकी वृद्धि में सम्यक्त्व और केवलि प्रज्ञप्त धर्म का पाने वाला नही बन सकता है। इसलिये कर्मों के क्षय करने की आशा से मतिमापूजन में लवलीन मनुष्य अपने कर्मों का इस कार्यसे क्षय करता यह एक दुराशामात्र है अरे ! जर इस कार्य से जीच सम्यक्त्व और केवलिप्रज्ञप्त धर्म तक के भी लाभ से सदा वचित रहता है तो उससे फिर कर्म क्षय मानना यह कोरी कल्पना मात्र ही है। सम्यक्त्व यह जीव का क्षायोपशमिक भाव है । प्रतिमा न क्षयोपशम स्वरूप है और न उस क्षयोपशम में कारण रूप ही है । कारण कि इस से जानावर- णीय और दर्शनमोहनीय कर्म की निर्जरा नही होती है । कर्मों का ખરડાયેલું વસ્ત્ર લેહીવડે સાફ કરવાથી મલિન થઈ જાય છે તેમજ પકાયની વિરાધના સાથે આ પ્રતિમાપૂજનમાં તલ્લીન થયેલે જીવ પણ જ્ઞાનાવરણીય દર્શન મેહનીય કર્મની વૃદ્ધિ કરતે કરતા વધારે વધારે મલિન થતું જાય છે તે પણ સમયે એમની વૃદ્ધિમાં સમ્યક્ત્વ અને કેવલિપ્રજ્ઞમ ધર્મને મેળવી શકનાર થઈ શકતું નથી એટલા માટે કર્મોનો ક્ષય કરવાની આશાથી પ્રતિમા પૂજનમા તદલીન માણસ પિતાના કર્મોને આ કાર્ય (પ્રતિમાપૂજન) થી ક્ષય કરવા માગે છે તે રડત દુરાશા માત્ર છે જ્યારે આ કાયથી જીવ સભ્યત્વ અને કેવલિપ્રજ્ઞસ ધર્મને લાભથી પણ સદા દૂર રહે છે ત્યારે તેનાથી કર્મ ક્ષયની આશા રાખવી તે બેટી કલ્પના માત્ર જ છે સમ્યત્વ જીવને ક્ષ પશમિક ભાવ છે હવે ન તે પ્રતિમા પશમ સ્વરૂપ છે અને ન તે ક્યો પશમમાં કારણ રૂપે છે કેમકે એનાથી જ્ઞાનાવરણીય અને દર્શનમેહનીય है 1 8 " -- ताधर्मकास्त्र यत्र केलिप्रज्ञप्तधर्मस्य प्राणायापि योग्यता न भवति, सम्यक्त्यम्य च नानु भव., तत्र सम्यक्त्वशद्विदेतृत्व गगनसुमान्मनोविकपमानम् | यस्य प्रतिमा पूजनस्य नास्ति धर्ममूलत न चास्ति धमहिल, नापि धर्मालम्पनत्य, न चापि धर्मलक्षणसमन्वित, तस्य धर्मपदयान्यत्वात्पने - गुस्सष्टमेनोत्स्नमरूपणम् । भगवताईता-भाचने अनुपदिष्टस्य प्रतिमापूजनत्योपदेशकरणेन भ्रान्ति जनयता प्रतिमापूजन कारयताच फा गतिःस्यादिवि समालो पनीय मुधीमि । अपर च- दोहि ठाणेहि आया केलिपन्नत्त धम्म लभेजा सपणयाए त जहा खएण घेव उपसमेण चेच एव जाप मणपज्जानाण उप्पादेज्जा त जवा-खएण चेर उब समेण चेव । (स्था० २ ठा० ४३०) खएण चेय" इति ज्ञानावरणीयस्य दर्शनमोहनीयस्य च कर्मण उदय प्राप्तस्य क्षयेण, अनुदितस्य चोपगमेनक्षयोपशमेनेत्यर्थः । अत्र पदद्वयेन श्योप शमरूपोऽर्थों गृह्यते । यावत् करणा-"केवल गोहिं युज्झेजा।" केलिप्रज्ञप्तधर्मस्य श्रवण तथा सम्यक्त्व च ज्ञानावरणीयस्य दर्शनमोहनीयस्य च कर्मण, क्षयोपशमादेव लभ्यते इति भगाता प्रतियोधितम् । इदमत्रबोध्यम् नहि रुधिरलिप्तवत्रस्य रुधिरेण पक्षालने शुद्धिर्भवति प्रत्युत मलिनतरस्वमेव, देशक तथा प्रेरक की वास्तविक वस्तुस्थिति से जनता को अधकार में रखने के कारण क्या गति होगी यह स्वय बुद्विमानों को विचार ने जैसी बात है। अपर च-दोहिं ठाणेहिं आयाके वलिपन्नत धम्म लभेजा सवण याए-त जहा इत्यादि सूत्र- इसका भावार्थ यह है-जीव केवलियों द्वारा प्रजप्त धर्म का श्रवण तथा सम्यक्त्व का लाभ ज्ञानाधरणीय और दर्शनमोहनीय कर्म के क्षय और क्षयोपशम से ही करता है प्रतिमापूजन से नही। जिस प्रकार रुधिर से मैले वस्त्र की सफाई रुधिर में ही धोने से नहीं होती, उसी પૂજન કરાવનાર ઉપદેશક પ્રેરકરૂપ થઈને યથાર્થ વસ્તુસ્થિતિથી સમાજને અંધારામાં રાખે છે તે બદલ તેમની શી દશા થશે તે વિદ્વાન સમજી શકે છે भने oily -दोहि ठाणेहि ओया केवलिपन्नत्त धम्म लभेजा सवणयाए-त जहा-त्यादि सूत्र- આને ભાવાર્થ આ પ્રમાણે છે કે કેવલિઓ વડે પ્રજ્ઞસ ધર્મનુ શ્રવણ તેમજ સમ્યક્ત્વને લાભ જીવ જ્ઞાનાવરણીય અને દર્શન મેહનીય કાર્યના ક્ષય અને ક્ષયે પશમથી કરે છે પ્રતિમાપૂજનથી નહિ જેમ લોહીથી ખરડાએલા વસ્ત્રની સાફસૂફ લેહી વડે ધેવાથી થતી નથી તેમ જ સામ્યત્વની શુદ્ધિ અથવા તે કર્મોને વિનાશ પ્રતિમાપૂજનથી થતું નથી કે જે તે લેહથી अनगारधर्मामृतपिणी टीफा २० १६ द्रौपदीचर्चा तथा-सम्यक्त्वशुद्वयर्थ कर्मक्षयार्थ च प्रतिमापूजने मटत्तस्य जीवस्य पट्कायो पमर्दनसाध्यपूजया ज्ञानापरणीयस्य दर्शनमोहनीयस्य च कर्मणो वृद्धौ सत्यां सम्य. क्त्वम्य केवलि मनप्तपर्मस्याऽपि प्राप्तिःकालत्रयेऽपि न सभाति किं पुन कर्मक्षयाशा सम्यक्त्वमात्मनः क्षायोपशमियो भानः । प्रतिमा तुन क्षयोपशमस्वरूपा, न चापि क्षयोपशमहेत , ज्ञानापरणीयदर्शनमोहनीयर्मनिर्जराजनकत्वाभावात् , देशतः कर्मक्षयो हि निर्जरा ता प्रति तपस एव कारणत्वात् । उक्त चोत्तराध्ययनमने- प्रकार सम्यक्त्व की शुद्धि अथवा कर्मों का विनाश प्रतिमापूजनसे नहीं होता है, प्रत्युत जिस प्रकार वह रूपिरयुक्त वस्त्ररुधिर से साफ किये जाने पर अधिक मलिन हो जाता है उसी प्रकार पटकाय की विराधना साध्य इस प्रतिमापूजन में लवलीन जीव भी ज्ञानावरणीय और दर्शन मोरनीय कर्म की वृद्धि करता हुआ अधिकाधिक मलिन होता रहता है वह कभी भी इनकी वृद्धिमे सम्यक्त्व और केवलि प्रज्ञप्त धर्म का पाने वाला नहीं बन सकता है। इसलिये कर्मों के क्षय करने की आशा से प्रतिमापूजन में लवलीन मनुष्य अपने कर्मों का इस कार्यसे क्षय करता है यह एक दुराशामात्र है अरे ! जय इस कार्य से जीव सम्यक्त्व और केवलिप्रज्ञस धर्म तक के भी लाभ से सदा वचित रहता है तो उससे फिर कम क्षय मानना यह कोरी कल्पना मात्र ही है। सम्यक्त्व यह जीव का क्षायोपशमिक भाव है। प्रतिमा न क्षयोपशम स्वरूप है और न उस क्षयोपशम में कारण रूप ही है। कारण कि इस से ज्ञानावर- णीय और दर्शनमोहनीय कर्म की निर्जरा नरी होती है । कर्मों का વસ્ત્ર લેહીવડે સાફ કરવાથી મલિન થઈ જાય છે તેમજ પકાયની વિરાધના સાધ્ય આ પ્રતિમાપૂજનમાં તલ્લીન થયેલ જીવ પણ જ્ઞાનાવરણીય દર્શન મોહનીય કર્મની વૃદ્ધિ કરતે કરતે વધારે વધારે મલિન થતું જાય છે તે કોઈ પણ સમયે એમની વૃદ્ધિમા સભ્ય અને કેવલિયમ્સસ ધમને મેળવી શકનાર થઈ શકતું નથી એટલા માટે કર્મોને ક્ષય કરવાની આશાથી પ્રતિમા પૂજનમાં તદલીન માણસ પિતાના કર્મોને આ કાર્ય (પ્રતિમાપૂજન) થી ક્ષય કરવા માગે છે તે ફકત દુરાશા માત્ર છે જ્યારે આ કાર્યથી જીવ સભ્યત્વ અને કેવલિપ્રજ્ઞસ ધર્મના લાભથી પણ સદા દૂર રહે છે ત્યારે તેનાથી કર્મ ક્ષયની આશા રાખવી તે બેટી કલ્પના માત્ર જ છે સમ્પત્ય જીવને ક્ષ પશમિક ભાવ છે હવે ને તે પ્રતિમા ક્ષપશમ સ્વરૂપ છે અને ન તે ક્ષ “મમાં કારણ રૂપે છે કેમકે એનાથી જ્ઞાનાવરણીય અને દર્શનમોહનીય ખરડાયેલુ २८४ हाताधर्मकथा "भाकोडीसंगिय कम्म तासा निजरिजनह" (३०, ना ६) तथार्थ सूत्रेऽपि- तपमा निर्जरा च" (३० ९ ०४। अन चकारः सरगमुद्ययार्थः । ममितिगुतिधर्मानुप्रेक्षापरीपतनयचारित्रः सबरी भाति, तपसा तु निर्जरा सारोऽमिति मायः सम्पकाम सम्यग्दर्शन, तच स्थानानम्- (स्था० २३० १) द्विविध मोक्त । मिर्गसम्यग्दर्शनम् अभिगमसम्यगदर्शन चेति । निसर्गतः सभावतः- परोपदेशतो यदुत्परते, तनिसर्गरम्यग्दर्शनम् । अभिगमात् - मद्गुर पदेशतो गत्परते, तदभिगम सम्यगार्शनम् । एक देश क्षय होना निर्जरा है। इस निर्जरा के प्रति कारणता तो तप में परालाई गई है । देयो उत्तराध्ययन सूत्र में यही पात कही है- 'जयकोडी सचिध कम्म तपमा निजरिजा" करोडों भवों में सचित कर्मों की जीव तप से निर्जरा कर दता हे । तया सूत्र में मो " तपसा निर्जरा च" इस सूत्र द्वारा यही बात कही गई है-तप से निर्जरा और सबर दोनों होते हैं। सूत्रम्थ शब्द से सवर का ग्रहण रओ है। भावार्थ-इसका यही है कि पाच समिति, 5 गुप्ति, १० यतिधर्म १२, अनुप्रेक्षा, २२ परोपहों का जीतना एव ५ प्रकार का चारित्र पालना- इनसे सबर होता है और तप से सबर ण्व निर्जरा दोनों ही होते हैं। स्थानाङ्गस्तूत्र में सम्मग्दर्शन दो प्रकार का કર્મના નિજ ર થઈ પાકે તેમ નથી કર્મોના એકદેશને ક્ષય થવે તે નિર્જરા પ્રત્યે કારણુતા તે તપમાં બતાવવામાં આવી છે, જુએ ઉત્તરાધ્યયન સૂત્રમાં એ જ વાત સ્પષ્ટ કરી છે – " भवकोडी सचिय कम्म तपसा निजरिज्जइ" से लाभा सथित કર્મોની નિર્જરા જીવ તપથી કરી નાખે છે તત્વાર્થ સૂત્રમાં પણ निर्जरा च આ સૂત્રવડે એ જ વાત કહેવામાં આવી છે કે તપથી નિર્જરા તેમજ સ વર અને થાય છે કે * શબ્દથી સવારનું પ્રહણ કરવામાં આવ્યું છે ભાવાર્થ—અને આ પ્રમાણે છે કે પાચ સમિતિ, ૩ शुति, १० યતિધર્મ, ૧૨ અનુપ્રેક્ષા ૨૨ પરીષહેને જીતવા અને ૫ પ્રકારના ચારિક્વનુ પાલ કરવુ આ બધાથી આ વર થાય છે અને તપથી સવર અને નિરા બને થાય છે સ્થાનાગસૂત્રમાં સમ્યગ્દર્શન બે પ્રકારનું બતાવવામાં અાયુ घ कहा गया है-१ निसर्ग तपसा સૂત્રમાં આવેલ છે च मनगारधर्मामृतरपिणी टोका म०१६ द्रौपदीचर्चा ३८५ केचित्तु--त्राभिगमश-दार्थो निमित्तमपि, तच्च प्रतिमादि ति दन्ति, तन्मोहनीफर्मोदयविनम् -- अभिगममम्यगदर्शने हि प्रतिमानि- मित्तका न सभाति अपणादिना योपशमहेनोरेन सद्गुरुपदेशम्यागाभिगमन और दुसरा अभिगम । जो सम्यग्दर्शन जीवों को स्वभाव से ही लेता है। सद्गुरु के उपदेश से जो जीव को प्राप्त होता है पर अभिगम सम्यग्दर्शन है। निसर्ग और अभिगम में अन्नरग कारणदर्शन मोह नीर कर्म का क्षयोपशम आदि समान है परन्तु इससे होने पर भी जो जीव को मदगुरु के उपदेश से प्राप्त होता है वह अभिगम और जो इसके बिना प्राप्त होता है वह निसर्ग सम्यग्दर्शन कोई २ व्यक्ति अभिगम शब्द का अर्थ निमित्त परक भी करते है और वह निमित्त "प्रतिमा आदि है" ऐसा मानते है। परन्तु यह उनका कथन केवल मोह कर्म का ही पिलाम है क्योकि अभिगम सम्यग्दर्शन में प्रतिमा स्प निमित्त कला सभवित नही होती-बरा तो श्रवण आदि से दर्शन मोहनीय कर्म के क्षयोपशम के कारणम्प सद्गुण के उपदेश का ही अभिगम शब्द से ग्रहण हुआ है। यदि सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति में वह कारण रोता तो उसका ग्रहण निमित्तस्प से होता परन्तु ऐमा तो होता नहीं हैपारण कि वह अचेतन है उस से प्रवचन के अर्थ का उपदेश होता नही है। प्रवचन के अर्थ के उपदेश सनेविना प्रोता. ओं को प्रवचन का अर्थ जान कैसे हो सकता है ? अर्थान हुए विना ૧ નિસર્ગ અને ૨ અભિગમ સદગુરુના ઉપદેશથી નહિ પણ એને સ્વભાવથી જ જે સમદર્શન થાય છે તે નિસર્ગ સમ્યગ્દર્શન છે સદ્દગુરુના ઉપદેરાથી જે જીવને સમ્યગ્દર્શન પ્રાપ્ત થાય છે તે અભિગમ સમ્યગ્દર્શન છે નિસર્ગ અને અભિગમમા અતર ગ તારણ દર્શનમોહનીય કર્મને પશમ વગેરે સમાન જ છે પણ એના હોવા છતાય જીવને જે સદ્દગુરુના ઉપદેશથી મળે છે તે અભિગમ અને જે એના વગર મળે તે નિસર્ગ સમ્યગ્દન છે કેટલીક વ્યક્તિઓ અભિગમ શબ્દનો અર્થ નિમિત્ત પર પણ કરે છે અને તે નિમિત પ્રતિમા વગેરે છે” એવુ માને છે પણ આવું કથન તેમના ફક્ત મહ કર્મને જ વિલાસ છે કેમકે અભિગમ સમ્યગ્દર્શનમાં પ્રતિમા રૂપ નિમિ જતા સભવિત થઈ શકે તેમ નથી ત્યા તે શ્રવણ વગેરેથી દર્શન મેહનીય કમના પશમના કારણરૂપ ગુણના ઉપદેશનુ જ અભિગમ ગબ્દથી ગ્રહણ થયુ છે જે અમ્યાનની ઉત્પત્તિના તે કાણું હોત તે તેનું ગ્રહણ નિમિત્ત રૂપવી થાત ! આવુ વતુ નથી કેમકે તે અચેતન છે તેનાથી પ્રવચનના અર્ચને તારા થઈશ નથી પ્રવચનના અર્થને ઉપદેશ સાભળ્યા વિના 다 घा ५२ ॥ , . हातापमंकथाम शब्देन ग्रहणात् सम्या हि तलाश्रमानम्पं, तच्च प्राचार्यज्ञानादेव, पत्र चनार्थशान च निर्जरामूलक, निर्जरा न नियौयायस्वाध्यायस्पतपोविशे पेभ्य , तत्र च मद्गुरूपदेश चारण, न तु प्रतिमा । सो हि गद्गुरुयन प्राचनार्थ मुपदेष्टुमसमर्धा, तम्या जडत्वात् , 1 नापि सा निर्जराहेतु', नियादितपोरूप कर्मा की निर्जरा नहीं ले सकती है। निर्जग के अभाव में दर्शन मोहनीय कर्म के क्षय उपशम आदि रूपमन्याय की उत्पत्ति समवित नहीं है। अत: अभिगम मम्यग्दर्शन में सदगुरु का उपदेश ही निमित्त माना गया है और उसीका ग्ररण वहा पर उम शब्द से हुआ है प्रतिमा का नही-इसी का खुलाशा " सम्यक्त्व हि तत्वार्यश्रद्धानरूप, तच प्रवचनार्थज्ञानादेव, प्रवचनाजान च निर्जरामूलक - निर्जरा च विनय चैयावृत्यस्वाध्यायरूपतपोचिशेपेभ्य , तत्र च सद्गुस्पटेशः कारण न तु प्रतिमा" अर्थ इन पक्तियों में लिखा गया है। तत्वार्थ का प्रदान करना सम्यक्त्व है। वह श्रद्धान प्रवचन के अज्ञान से ही होता है और उस अर्थज्ञानका मूल कारण निर्जरा मानी गई है अपना प्रतिपक्षी कर्मों की निर्जरा हुए विना तत्त्वज्ञान हो ही नहीं सकता है विनय, वैयावृत्य, स्वाध्यायरूपतप विशेष निर्जरा के कारण हैं तप की आरा धना में सद्गुरू का उपदेश कारण है इस प्रकार परम्परा सबध से अभिगम सम्यग्दर्शन में सद्गुरु का उपदेश ही निमित्तरूप से गृहीत हुआ है प्रतिमा नहीं-कारण वह सद्गुरु के उपदेश की तरह प्रवचन શ્રોતાઓને પ્રવચનનુ અર્થજ્ઞાન કેવી રીતે થઈ શકે અજ્ઞાન વગર કર્મોની નિર્જરા પણ થઈ શકતી નથી નિર્જરા વિના દર્શનમોહનીય કામના ક્ષય ઉપશમ વગેરે રૂપ સમ્યકત્વની ઉત્પત્તિ સભવિત નથી એટલા માટે અભિગમ સમ્યગ્દર્શનમાં સદ્દગુરુને ઉપદેશ જ નિમિત્તરૂપે માનવામાં આવ્યું છે અને તે શબ્દથી તેનુ જ ગ્રહણ થયુ છે પ્રતિમાનું નહિ આનુ જ સ્પષ્ટીકરણ सम्यक्त्व हि तत्त्वार्थ श्रद्धानरूप, तच्च प्रवचनार्थ ज्ञानादेव, प्रवचनार्थज्ञान निर्जरामूलक निर्जरा च विनयवैयावृत्त्यस्वाध्यायरूपतपोविशेपेभ्य , सद्गुरूपदेश कारण न तु प्रतिमा " माना अर्थ मा प्रभारी छे, ते તત્વાર્થનું શ્રદ્ધાન કરવું તે સમ્યક્ત્વ છે તે શ્રદ્ધાન પ્રવચના અજ્ઞાનનું મૂળ કારણ નિર્જરા જ માનવામા આવે છે પિતાના પ્રતિપક્ષી કર્મોની નિરા થયા વગર તત્વજ્ઞાન થઈ જ શકતુ નથી વિનય, વિયાવૃત્ય, સ્વાધ્યાય રૂપ તપ વિશેષ નિર્જરાના કારણ છે તપની આરાધનામાં સદગુરુને ઉપદેશ કારણ છે રીતે પરપરા સ બ ધથી અભિગમ સમ્યગાનમાં સદ્ગુરુને ઉપદેશ જ નિમિત્ત રૂપમાં ગૃહીત થયે કે નહિ કે પ્રતિમા કેમકે તે સદગુરુના ઉપદેશની જેમ આ . मनगारधर्मामृतपिणी टी० अ० १६ द्रौपदीचर्चा साभावात् , कथ तहि सम्यक्त्व मतिमायाः सभवति ? क्थमपि नहि । अत एवो पदेशस्य सम्यक्त्व पति कारणल प्रदर्शयन् भगवानवादीत्-उत्तरा ययनसूत्रे- (५० २८ गा० १५) "तहियाण तु भागाण सम्भारे उपएमण । भावेण सद्दहतस्स सम्मत्त त वियाहिय ॥ इति । छाया-त. याना तु भावाना सद्भार उपदेशनम् । भावेन श्रद्दधत सम्यक्त्व तद् व्यारयातम् ।। जीवाजीवादिपदार्थाना सद्भावे यद् उपदेशन-गुरोरुपदेशः, तद् भावेन- अन्तःकरणेन अन्त मोहनीयकर्मण क्षयेण क्षयोपशमेन ना याऽभिरुचिरुत्पद्यते, वत् सम्यक्त्व तीर्थकरैयाख्यातम् । के अर्थ का उपदेश करने में अचेतन होने से सर्वथा असमर्थ हे कर्मों की निर्जरा में भी वह हेतु स्प नहीं होती है-कारण कि कर्मो की निर्जरा के हेतु तो विनयादिक तप ही माने गये हैं, प्रतिमा विनयादि तप स्वरूप नही है । अत प्रतिमा में सम्यक्त्व की उत्पत्ति मे कारणता किसी भी प्रकार सभवित नरी होती है-उत्तरा चयन सूत्र में सद्गुरु के उपदेश को सम्यक्त्व के प्रति कारण प्रकट करते हुए सिद्धान्तकार कहते है कि-तरियाण तु भावा ण सम्भावे उचएसण । भावेण सदहतस्स सम्मत्त त वियाहिय ॥ इति ।। जीव और अजीव आदि पदार्थो का सद्गुरु ने जो यथावस्थित स्वरूप प्रकट किया है, उसका उसीरूप से अन्तः करण से श्रद्धान करने वाले प्राणी के दर्शन मोहनीय कर्म के क्षय अथवा क्षयोपशम પ્રવચનના અર્થને ઉપદેશ કરવામા અચેતન હોવા બદલ સ પૂર્ણપણે અસમર્થ છે કારણ કે કર્મોની નિર્જરાના હેતુ તે વિનય વગેરે તપ જ માનવામાં આવ્યા છે પ્રતિમા વિનય વગેરે તપ સ્વરૂપ નથી, એટલા માટે પ્રતિમામા સમ્યકત્વની ઉત્પત્તિમા કારણતા કઈ પણ રીતે સંભવી શકે તેમ નથી ઉત્તરાધ્યયન સૂત્રમા સદુશુરૂના ઉપદેશને સમ્યકત્વના પ્રતિ કારણ બતાવતા સિદ્ધાન્તકાર કહે છે तहियाण तु भावाण सम्भावे उचएसण । भावेण सहहतरस सम्मत्त त वियाहिय ॥ इति ॥ જીવ અને અજીવ વગેરે પદાર્થોનું જે યથાવસ્થિત સ્વરૂપ સદગુરૂએ પ્રકટ કર્યું છે તેનું તે રૂપથી અત કરણથી શ્રદ્ધા ન કરનારા પ્રાણીના દર્શન મોહ નીય કર્મના લય કે પરામથી જે રૂચિ ઉત્પન્ન થાય છે, તેનું નામ જ - ३८६ माताकया शब्देन ग्रहणात् सम्पत्य हिताश्रमानरूप, सग पाचनविज्ञानादेव, प्रत्र चनार्थशानं च निर्जरामूला, निर्जरा च नियोयात्याध्यापस्पतपोविशे पेभ्य , तत्र च सद्गुरुपदेश चारण, न तु प्रतिमा । सारि गद्गुरपा प्राचनार्थ मुपदेष्टुमसमर्धा, तस्या जडत्वात् , I नापि सा निर्जरातेतु', नियादितपोम्प फर्मा की निर्जरा नहीं हो सकती है। निर्जग के जमाव में दर्शन मोहनीय कर्म के क्षय उपशम आदि रूप सम्यक्त की उत्पत्ति समवित नही है। अतः अभिगम सम्यग्दर्शन में सद्गुरु का उपदेश ही निमित्त माना गया है और उसीका ग्रहण वहा पर उम द से हुआ है प्रतिमा का नहीं-उसी का खुलाशा " मम्यक्त्व हि तत्वार्यश्रद्धानरूप, तच प्रवचनार्थज्ञानादेव, प्रवचनार्वज्ञान च निर्जरामूलक-निर्जरा च विनय वैयावृत्यस्वाध्यायरूपतपोविशेपेभ्यः, तत्र च मद्गुरुपदेशः कारण न तु प्रतिमा " अर्थ इन पक्तियो में लिखा गया है। तत्वार्थ का श्रद्धान करना सम्यक्त्व है। वह श्रद्धान प्रवचन के अर्थज्ञान से ही होता है और उस अर्थज्ञानका मूल कारण निर्जरा मानी गई है अपना प्रतिपक्षी कर्मों की निर्जरा हुए बिना तत्त्वज्ञान हो ही नहीं सकता है विनय, वैयाहत्य, स्वाध्यायरूपतप विशेप निर्जरा के कारण हैं तप की आरा धना मे सद्गुरू का उपदेश कारण है इस प्रकार परम्परा सबध से अभिगम सम्यग्दर्शन में सद्गुरु का उपदेश ही निमित्तरूप से गृहीत हुआ है प्रतिमा नही-कारण वह सद्गुरु के उपदेश की तरह प्रवचन શ્રોતાઓને પ્રવચનનુ અર્થજ્ઞાન કેવી રીતે થઇ શકે ? અજ્ઞાન વગર કર્મોની નિર્જરા પણ થઈ શકતી નથી નિર્જરા વિના દર્શન મેહનીય કર્મના ક્ષય ઉપશમ વગેરે રૂપ સમ્યક્ત્વની ઉત્પત્તિ સભવિત નથી એટલા માટે અભિગમ સમ્યગ્દર્શનમાં સદ્દગુરુનો ઉપદેશ જ નિમિત્તરૂપે માનવામાં આવ્યો છે અને તે શબ્દથી તેનુ જ ગ્રહણ થયુ છે પ્રતિમાનું નહિ આનું જ સ્પષ્ટીકરણ " सम्यक्त्व हि तत्त्वार्थ श्रद्धानरूप , सच्च प्रवचनार्थ ज्ञानादेव, प्रवचनार्य ज्ञान निर्जरामूलक निजरा च विनयवैयावृत्त्यस्वाध्यायरूपतपोविशेपेभ्य , तत्र च सद्गुरूपदेश कारण न तु प्रतिमा "भाना म मा प्रभारी छे, ते તત્વાર્થનું શ્રદ્ધાન કરવું તે સમ્યક્ત્વ છે તે શ્રદ્ધાન પ્રવચના અર્થજ્ઞાનનું મૂળ કારણુ નિર્જરા જ માનવામા આવે છે પિતાના પ્રતિપક્ષી કર્મોની નિરાં થયા વગર તત્ત્વજ્ઞાન થઈ જ શકતુ નથી વિનય, વૈયાવૃત્ય, સ્વાધ્યાય રૂપ તપ વિશેષ નિજેરાના કારણ છે તપની આરાધનામાં સદગુરુને ઉપદેશ કારણે છે રીતે પર પરા સ બ ધથી અભિગમ સમનમા સદ્દગુરુને ઉપદેશ જ નિમિત્ત રૂપમા ગૃહત થશે નહિ કે પ્રતિમા કેમકે તે સદ્ગુરુના ઉપદેશની જેમ मा अनगारधर्मामृतवपिणी टी० अ० १६ द्रौपदी चर्चा वाभावात् . कथ तहि सम्यक्त्व मतिमायाः मभवति ' स्थमपि नहि । अत एवो पदेशस्य सम्यक्त्व प्रति कारणत्व प्रदर्शयन् भगवानवादीद-उत्तरा-ययनसूत्रे- (अ.२८ गा० १५) "तहियाण तु भाषाण सम्भावे उपएमण । भावेण सद्दहतस्स सम्मत्त त वियाहिय ॥ इति । गया-तव्याना तु भानाना सद्भाव उपदेशनम् । भावेन अदधतः सम्यक्त्व तद् व्यारयातम् ।। जीवाजीवादिपढार्थाना सद्भावे यद् उपदेशन-गुरोरुपदेश., तद् भावेन- अन्त फरणेन श्रह पत मोहनीयकर्मणःक्षयेण क्षयोपशमेन ना याऽभिमचिरुत्पद्यते, तत् सम्यमत्व तीर्थकराख्यातम् । के अर्थ का उपदेश करने में अचेतन होने से सर्वथा असमर्थ है कर्मों की निर्जरा में भी वह हेतु रूप नहीं होती है-कारण कि कर्मो की निर्जरा के हेतु तो विनयाटिक तप ही माने गये हैं, प्रतिमा विनयादि तप स्वरूप नहीं है । अत प्रतिमा में सम्यक्त्व की उत्पत्ति मे कारणता किसी भी प्रकार सभवित नहीं होती है-उत्तरा चयन सत्र में सद्गुरु के उपदेश को सम्यक्त्व के प्रति कारण प्रकट करते हुए सिद्वान्तकार कहते हैं कि-तहियाण तु भावा ण सम्भावे उवएसण । भावेण सदहतस्स सम्मत्त त वियारिय ॥ इति ॥ जीव और अजीव आदि पदार्थो का सद्गुरु ने जो यथावस्थित स्वरूप प्रकट किया है, उसका उसीरूप से अन्तः करण से श्रद्धान करने वाले प्राणी के दर्शन मोहनीय कर्म के क्षय अथवा क्षयोपशम પ્રવચનના અર્થને ઉપદેશ કરવામા અચેતન હોવા બદલ સ પૂર્ણપણે અસમર્થ છે કારણ કે તેની નિર્જરાના હતુ તે વિનય વગેરે તપેજ માનવામા આવ્યા છે પ્રતિમા વિનય વગેરે તપ સ્વરૂપ નથી, એટલા માટે પ્રતિમામા સમ્યકત્વની ઉત્પત્તિમાં કારણુતા કોઈ પણ રીતે સંભવી શકે તેમ નથી ઉત્તરાધ્યયન સૂત્રમાં સન્નુરૂના ઉપદેશને સમ્યકત્વના પ્રતિ કારણ બતાવતા સિદ્ધાન્તકાર કહે છે- तहियाण तु भावाण सम्भावे उवएसण | भावेण सदहतरस सम्मत्त त वियाहिय ॥ इति ॥ જીવ અને અજીવ વગેરે પદાર્થોનું જે યથાવસ્થિત સ્વરૂપ ગુરૂએ પ્રકટ કર્યું છે તેનું તે રૂપથી અત કરણથી શ્રદ્ધા ન કરનારા પ્રાણના દર્શન મેહ નય કર્મના ક્ષય કે પશમથી જે રૂચિ ઉત્પન્ન થાય છે, તેનું નામ જ ३८८ . पाताधर्मस्थागस यदि मतिमाऽपि सम्यक्त्वगमे निमित्त स्यातर्हि भगाता स्थानानने मतिमानिमित्तमत्वेन सम्पगननाय तृतीय भेदोऽपि पागा, तस्यानुक्तवाद पतिमायाः सम्यक्त्वलामे निमित्ता नास्तीति पोयम् । किंच- माणातिपातसा याया. प्रतिमापूजायाः सम्यस्त्वशुद्धि हेनुत्व वन्तः स्त्र दुर्गतिं न पश्यन्ति मोहान्धाः, स्थानानम्मे हि मागातिपातम्य दुर्गतिहत्त्व प्रदर्शितम्- पचहि ठाणेहिं जीवा दुग्गइ गच्छति । त तहा-पाणापापण, मुसापाएण, अदिन्नादाणेण, मेहुणेण, परिग्गहेण" इति । (स्था ५ टा १ उ ) से जो रुचि उत्पन्न होती है उसी का नाम नम्यग्दर्शन है ऐमा तीर्थकर प्रभुने कहा है यदि सम्यक्त्व की प्राप्ति में प्रतिमा निमित्त होती तो स्थानाङ्ग सूत्र में जो "दोहिं ठोणेहिं आया केलि पमत्त चम्म लभेजा सवणया " ऐसा कहा है वहा यदि सम्यक्त्व के लाम में प्रतिमा भी निमित्त होती तो उसके निमित्त होने से दो स्थानों की जगह सम्यक्त्व की प्राप्ति में तीन स्थानो का कथन सत्रकार को करना चाहिये था परन्तु वहा दो स्थानो के अतिरिक्त तृतीयस्थान का कथन हुओ नहीं है, अतः इससे यह सिद्धान्त निश्चित होता है कि सम्यक्त्व के लाभ में प्रतिमा निमित्त नही है ।फिर भी प्राणातिपात द्वारा साध्य प्रतिमा पूजन को मोह के आवेश से ऊधे हुए व्यक्ति सम्यक्त्व की शुद्धि का कारण बत लाते मुए अपनी दुर्गति का कुछ भी ख्याल नही करते ह यही एक बडे आश्चर्य की बात है देखो प्राणातिपात को स्थानाङ्ग सूत्र में दुर्गति સમ્યગ્રદર્શન છે, આમ તીર્થ કર પ્રભુએ કહ્યું છે જે સમ્યકત્વની પ્રાપ્તિમાં निमित्त ३ डात तो स्थाना-सूत्रमा २ " दोहि ठाणेहिं आया देवलिपन्नत्त धम्म लभेज्ज्ञा सवणयाए આ પ્રમાણે કહ્યું છે, ત્યાં જે સમ્યકત્વના લાભમા પ્રતિમા પણ નિમિત્ત થઈ શકત તે તેને નિમિત્ત રૂપે થવા બદલ બે સ્થાની જગ્યાએ સમ્યકત્વની પ્રાપ્તિમાં ત્રણ સ્થાનેનું કથન સૂત્રકારે કરવું જોઈતું હતું, પણ ત્યા તે બે સ્થાને સિવાય ત્રીજા સ્થાનનું કથન થયુ જ નથી એથી આ સિદ્ધા તની ખાત્રી થાય છે કે સમ્યકત્વના લાભમાં પ્રતિમા નિમિત્ત નથી છતાયે પ્રાણાતિપાત વડે સાધ્ય પ્રતિમા પૂજનને અજ્ઞાનની નિદ્રામાં પડેલી વ્યક્તિઓ સમ્યકત્વની શુદ્ધિનું કારણ બતાવતી પિતાની દુરવસ્થા તરફ સહેજ પણ જેતી નથી તે એક બહુ નવાઈ જેવી વાત છે જુઓ પ્રાણાતિપાતને સ્થાનાગસૂત્રમાં દુર્ગતિનુ જ २ मतापामा माथु छ-(प चहि ठाणेहि " , नगारधर्मामृतयपिणी टीफा ०१६ द्रौपदीचर्चा किं च-यथा लोके मुग्पाना मुवर्णमात्रसाम्येना शुद्धवर्णेऽपि प्रतिमवलोक्य शुद्धाशुद्धपरीक्षणार पिचक्षणः रुपन्छेदतापा आद्रियाने, तथाऽत्रापि परीक्षणीये श्रुतचारिकरणे व पादय समादरणीया भवन्ति । माणिपादीना पापम्थानाना यस्तु शास्त्रे प्रतिपेप', तथा स्वाध्यायध्यानादीना यश्च तत्र विधि स धर्मरुप । माणिवपमपर्फपति पूजने तु धर्मत्यबुद्धिर्मोहवशादेन भवति, शास्त्रे मागिपरस्य प्रतिषेधात् । अास्तत्र नास्ति पशुद्धिः । का ही कारण कहा है “पचहि ठाणेहिं जीवा दुग्गड गच्छति-त जहा-पाणोडवाएण, मुलावाणं,' अदिन्नादाणेण, मेहुणेण, परिग्गहेण इति । (स्या ५ ठा १३ ) उन पाचो स्थानो से जीव दुर्गति के पात्र धनते है - प्राणातिपान से, मृपावाद से. अदत्तादान से मैयुन से और परिजह से। किच-लोक में जिस में जिस प्रकार भोले भाले व्य- क्तियो की सुवर्णनात्र की समानता से अशुद्ध स्वर्ण में भी यह सच्चा सुवर्ण है इस प्रकारकी प्रवृत्ति को दे ग्वकर सुवर्णपरीक्षक जन उसके सम्यक्त्व और असम्पत्स्य परीक्षाके लिये कप छेद और तप रूप उपायों का अबलम्बन करते है उसी प्रकार परीक्षणीय इस श्रुतचारित्ररूप धर्म की परीक्षा के लिये सूत्रकारों ने कपादिक परीक्षा के साधनो का उपयोग किया हे प्राणियवादिक पापस्थानो का शास्त्र में जो निषेध का विधान हुआ है तथा सा-याय एव अध्ययन आदि का जो वहा पर विधान किया गया है यही धर्म का कप है पूजन में यह धर्म कप नही है क्यों कि यह प्राणि वध के सपर्क से दूपित है-अत. फिर भी जो उसमे धर्म जीवा दुगइ गच्छति-त जहा-पाणाइनाएण, मुसाबाएण, अदिनादाणेण, मेहु गेण परिग्गहेण इति ) (स्था ५, ठा १ उ ) मा पाये स्यानाथी हु તિને ઠરે છે-પ્રાણાતિપાતથી, મૃષાવાદથી, અદત્તાદાનથી, મિથુનથી અને પરિગ્રહથી અને બીજી પણુ કે લેકમાં જેમ ભેળા માણસની સુવર્ણ માત્રની સમાનતાથી અશુદ્ધ સુવર્ણમા પણ આ સોનુ ખરૂ છે,” આ જાતની પ્રવૃત્તિ જોઈને સુવર્ણ પરીક્ષક તેના ખરા-ખોટાની પરીક્ષા માટે કષ, છેદ અને તાય રૂપ ઉપાયને આસરો લે છે તેમજ પરીક્ષણય આ કૃતચરિત્ર રૂપ ધર્મની પરીક્ષા માટે સૂત્રકારોએ કપ વગેરે પરીક્ષાના માધનેને ઉપયોગ કર્યો છે પાgિ વધ વગેરે પાપાનું શાસ્ત્રમાં જે નિષેધ રૂપ વિધાન થયુ છે તેમજ વાધ્યાય અને અધ્યયન વગેરેનું જે ત્યા વિધાન કરવામાં આવ્યું છે તે જ ધમની કસોટી –ષ છે પૂજનમા આ ધર્મ કબૂ નથી કેમકે તે પ્રાણિવધના સપકથી દૂષિત છે છતાયે તેમા ધર્મની બુદ્ધિ રાખવામા આવે છે તે ફક્ત .
. जताया यन पिधि गतिषेधाति दय कदाचिन् सम्पती परीत्यन याति, जात- स्था याय यानादौ नियमतः प्रत्त्या विधिपरिशुद्धिः, तथा हिमादी नियमतो निटत्या प्रतिपेधपरिशुद्धिर्भवति, स धमद उन्यते । प्रतिमापूजाया तु नास्ति डेदशुद्धिः, तम्याः पकायोपमर्दनसाध्यत्वेन प्रतिप परिशुद्धपभाषात् । माचने जीवाजीरादीना तच्चाना यथास्थितपस्पनिरूपा मोसमाधक मित्येव निश्चयस्तापशुद्धिः । यथा यही तापनेन सुवर्णरय यथावस्थितम्मरूपावि र्भाव तथा-प्रवचनोक्ततचानुमन्यानेन धर्मस्य सम्पमानिर्भवति । अत्र प्रतिमा पूजायां प्रवचनोस्तस परनिर्जरातचलक्षणानामान्तत्यानास्ति ताप पुद्धिः । त्वकी वृद्धि होती है वह केवल मोर का ही आवेश है। प्राणिवध शास्त्र से निषिद्ध है । जो पर विधि और प्रतिपेध ये दोनों कभी भी अपने स्वरूप से विपरीतपने को प्रोप्त नहीं होते है बता पर छेद से शुद्धि मानी जाती है जिस प्रकार स्वाध्याय और अध्ययन आदि शुभ कार्यों में नियम से शास्त्र में प्रवृत्ति प्रदर्शित की गई है और हिंसादि कार्यों से उसमे नियम से निवृत्ति कही गई है। प्रतिमा पूजन में यह छेद शुद्धि नही है । क्यो कि इसमें प्रतिपेय से परिशुद्धि का अभाव है इस को कारण यह है कि वन पट्काय के जीवों के घात से साध्यकार्य है । प्रवचन में जीव और अजीव आदि तत्वो के यथावस्थित स्वरूप का वर्णन ही मोक्षका साधक है इस प्रकार का निश्चय ही ताप शुद्धि है। जिस प्रकार अग्नि मे तपाने से स्वर्ण का यथावस्थित स्वरूप प्रकट होता है । उसी प्रकार प्रवचन कथित तत्त्वो के अनुसन्धान से धर्म के स्वरूप का अविर्भाव होता है इस प्रतिमापूजन मे धर्मतत्त्वके अविर्भाव करने અજ્ઞાનને જ ઊંભરે છે પ્રાણિ વધ શાસ્ત્રનિષિદ્ધ છે જ્યા વિધિ અને પ્રતિષેધ આ બન્ને કઈ પણ વખતે પિતાના સ્વરૂપથી વિપરીતાવરથામાં પરિવર્તિત થતા નથી ત્યા છેદથી શુદ્ધિ માનવામાં આવે છે જેમ સ્વાધ્યાય અને અધ્યયન કાર્યોમાં નિયમથી રાસ્ત્રમાં પ્રવૃત્તિ બતાવવામાં આવી છે અને હિંસા વગેરે કાર્યોથી તેમાં નિયમથી નિવૃત્તિ બતાવવામાં આવી છે પ્રતિમા પૂજનમા આ છેદ શુદ્ધિ નથી કેમકે આમાં પ્રતિષેધથી પરિશુદ્ધિને અભાવ છે આનુ કારણ આ પ્રમાણે છે કે તે પકાયના જીવના ઘાતથી સાધ્ય કાર્ય છે પ્રવચનમાં જીવ અને અજીવ વગેરે તરના યથાવસ્થિત સ્વરૂપનું વર્ણન જ મેનુ સાધક છે આ જાતને નિશ્ચય જ તાપ શુદ્ધિ છે જેમ અગ્નિમાં તપા વવાથી સેનાનુ યથાવસ્થિત સ્વરૂપે પ્રગટ થાય છે તેમજ પ્રવચન કથિત તને અનુસધાનથી ધર્મના સ્વરૂપને આવિર્ભાવ થાય છે આ વગેરે શુભ है।
, अनगारधर्मामृतयपिणी टी० अ० १६ द्रौपदीचर्चा ३२१ एमिः कपादिभिः परिशुद्धस्यैा पमत्व सभरति तादृगस्यैर धर्म फल जनस्यात् । या-नामाकर्मादिदोपदापिताहारादिदाने धर्मयुद्धया नियमाणे धर्म- व्याघात', यया या इन्द्रादिपजादौ म व्याघातः, तथैव धर्म बुद्ध या प्रनिगपूजनेऽपि धर्मव्याघातः स्यात् । तस्य जीवोपत्रातहेतुत्वात् । "मतिमापना-धर्मव्याघातपती, नागमोक्तन्यायनिगमतत्वात् , अयोग्य- पवज्यादानरत् , इन्द्रादिपजावद पा" इत्याद्यनुगानेनापि प्रतिमापूजाया धर्म- व्याघाती भवतीति विधमनीयम् । उक्त च- की योग्यता तक भी नही है। कारण कि यह प्रवचन कथित मवर और निर्जरा तत्व के क्षण से युक्त नहीं है-अत उसमें तार शुद्धि भी नहीं है। इन कपादिशो दोरा परिशुद्ध हुई वस्तु ने ही धर्मना आती है और यही यथार्थ मे धर्म के फलका प्रदाता होता है। प्रतिमापू जन में यह बात नही हे-अत. वह धर्मस्प नही है। किंच-वर्मबुद्धि से बनाये गये, परन्तु आ कर्म आदिदोषों से दूपित ऐसे आहार के दान में तथा इन्द्र आदिको का पूजन करने में जिस प्रकार धर्म का व्याघात माना गया है, उसी प्रकार धर्मपुद्धि से की गई प्रतिमा का पूजन में भी जीवो का घात होने से धर्म का व्यापात : है। इमलिये आगम कथित मिद्धान्त के अनुमार यह प्रतिमापूजन उपो- देय कोटि में नहीं आना है। फिर भी जो इसे करते है-कराते हे-वे आगम कथित सिद्वान्त से सर्वथा चाध ह-और धर्म का व्याघात कर- તત્ત્વને આવિર્ભત કરવા સુધીની પણ ક્ષમતા નથી, કેમકે આ પ્રવચન કથિત સ વર અને નિર્જરા તવના લક્ષણથી યુકન નથી એટલા માટે આમાં તાપ શુદ્ધિ પણ નથી આ નવ વગેરે વડે પરિશુદ્ધ થયેલી વસ્તુમા જ ધમતા આવે છે અને તે જ સાચા સ્વરૂપમાં ધર્મના ફળને આપનાર છે પ્રતિમા પૂજનમા આ વાત નથી એથી તે ધર્મ રૂપ નથી ધર્મબુદ્ધિથી તૈયાર કરવામાં આવેલા, પણ આધામ વગેરે દે ૧૩ દ્રષિત એવા આહારના દાનમાં તેમજ ઈન્દ્ર વગેરેની પૂજા કરવામા જેમ ધર્મને વ્યાઘાત માનવામાં આવે છે, તેમ જ ધર્મબુદ્ધિ રાખીને કરવામાં આવેલા પ્રતિમા પૂજનમાં પણ જીવને ઘાત હોવાથી મને વ્યાઘાત હોય છે એટલા માટે આગમ કથિત સિદ્ધાન્ત મુજબ આ પ્રતિમા પૂજન ઉપાદેય કોટિમા આવતુ નથી છતા એ જે આને કરે છે, કરાવે છે તેઓ આગમ કથિત સિદ્ધા તથી સર્વથા બાહ્યા છે અને ધર્મના વ્યાઘાતક છે એવી અચોગ્યને આપેલી होता हाताधर्मकथा "मनाच्यादिविधाो च, गानोतन्यायाधिते । द्रव्यादिभेदतो शेयो, धर्म-गावात पर हि"||हारिभद्राष्टकम् यत्तु-जिनमतिमाया दर्शन पन्दन चावश्या मंत्र गाधूनामिति नन्दनायकत्या भक्तपान न क्सने तेषामित्या स्तनिर्मलम्- अहोरात्रकन्येषु माधुाल्पेषु जिनमतिमार्शनादेरनुतत्वात् । शृणु तारदोरान- कृत्य माधूनाम्- नेवाले है अतः अयोग्य को दीक्षा दान की तरह जयनान्द्रादिक के पूजन की तरह यह प्रतिमापूजन आगमोक्त न्याय से निगत होने से धर्म का व्याघान करनेवाला है ऐमा चियाम करना चाहिये । तच अनुमानप्रयोगोऽय-प्रतिमापूजा धर्मव्यायात पती आगमोक्तन्यारनिराक तत्वात् अयोग्यप्रव्रज्यादोन्वत इन्द्रादिपूजन रहा । इस अनुमान में दिया गया हेतु असिद्ध नहीं है-यो कि "प्रवज्यादिपिपाने च शास्त्रोक्तन्या ययाधिते - दन्यादिभेदतो ज्ञेयो धर्मयाघात एव हि" दृष्टान्त में इस हेतु का इस श्लोक द्वारा कथित प्रकार से सद्भाव पोया ही जाता है। जो यह कहा जाता है कि जिनप्रनिमा के दर्शन चन्दन किये बिना साधुओं को आहार पानी करना कल्पनीय नहीं है-अत. उसका दर्शन वन्दन करना साधुओ के लिये आवश्यक है वह बिलकुल निर्मूल है- कारण कि दिनरात सधी जितने भी साबुओ के कल्प ह उन में इस बात का कही भी कथन किया हुआ नहीं मिलता है-दिनरात मवधी साधुओं के ये कृत्य है- દીક્ષાની જેમ અથવા તે ઈન્દ્ર વગેરેની પૂજાની જેમ આ પ્રતિમાપૂજન આગમ કથિત ન્યાયથી નિરાકૃત લેવા બદલ ધમને નાશ કરનારૂ છે આમ માની જ લેવું જોઈએ છે तथा च अनुमानप्रयोगोऽय प्रतिमापूजा धर्मव्याधातवती आगमो क्तन्यायनिराकृनत्वात् अयोग्य-प्रव्रज्यादाननत् इन्द्रादिपूजनरद्वा 1 240 मनुभानमा यापेस तु मसिद्ध नथी, ४१२६ -प्रव्रज्यादिविधाने च शास्रोक्त यायबाधिते -द्रव्यादिभेदतो ज्ञेयो धर्मव्याघात एव हि । हातमा मातुने। मा als વરે જે કથિત પ્રકાર છે તેને સદ્ભાવ મળે છે જે એમ કહેવામાં આવે છે કે જીન પ્રતિમાના દર્શન કર્યા વગર સાધુ એને આહાર પણ કરવું એમ નથી એથી તેના દર્શન વન્દન કરવા સાધુ એના માટે આવશ્યક છે તે સાવ ખોટી વાત છે કેમકે દિવસ અને રાત્રિને લગતા સાધુઓને માટે જેટલા કપ છે તેમા આ વાતનું કથન કયા નથી દિવસ અને રાત્રિના સાધુઓના આ નીચે લખ્યા મુજબ કૃત્ય - मनगारधर्मामृतवपिणी टी० अ० १६ द्रौपदीचचा पढम पोरिसि सज्झायं, पीए झाण झियायए । तइयाए भिवस्वायरिय, चउत्थीए पुणो नि सज्झाय ॥ पढम पोरिमि सज्झाय, पीए झाण झियायए । तइयाए नि-मोरख च, चउत्थीए पुणो रि समाय ॥ इति, (उत्तराध्ययनमत्र २६ अ ) किं च-सामायिकाद्यावश्यकेपपि प्रतिमादर्शनादेरनुक्तत्वाद् जिनाज्ञाया एब च धर्ममूलत्यात्तस्य धर्मत्व न सि यति । यत्तु-पुप्पादिसमभ्यर्चन क्षणो द्रव्यस्तवः साधुना हेय एस श्रावकेण तु उपादेयोऽपि तथा चाह-भाष्यकार:- अफसिणपरत्तगाण, रियाविरयाण एस खलु जुत्तो। ससारपयणुकरणो दव्यथए रुवादिद्वतो (भाप्यकारः ४२) पढम पोरिसि सज्माय बीए आण जियायए । तच्याए भिवायरिय चउत्थीए पुणो वि सज्झाय ।। पढम पोरिसि मज्झाय पीप झाण झियाय । तइया निद्दमोक्ख च च उत्थीए पुणो वि सज्झाय ।। (उतरा सूत्र २६ अ.) अर्थस्पष्ट है । इसी प्रकार साधुओं के जो सामायिक आदि आव- उयक कृत्य है, उनमें भी प्रतिमा के दर्शन आदि करना नहीं कहा है। धर्म का मूल तो जिनेन्द्र भगवान की आज्ञा की आरोपना करने में है इसलिये दर्शन वगैरह ये धर्म के मूल नहीं हैं। भाष्पकारने जो इस गाया द्वारा “ अकसिण पवत्तगाण विरयोविरयाण एस खलु जुत्तो। ससार पयणुकरणो दव्यथए कृवदिहतो" (भाष्यकार ४२) यह कहा है कि पढमे पारिसि सज्झाय बीए झाण झियायए । तइयाग भिस्वायरिय चथिए पुणो वि सज्ज्ञाय ।। पढमे पोरिसि सज्झाय बीए झाण झिया। तइयाए निमोरख च चउथिए पुणो वि सज्झार ॥ (उत्तराव्सन-२६ अ) અર્થ સરળ જ છે આ રીતે સાધુઓના જે સામાયિક વગેરે આવશ્યક કૃત્ય છે તેમનામાં પણ પ્રતિમાના દર્શન વગેરે કરવાની વાત કહી નથી ધર્મનુ મૂળ તો જીનેન્દ્ર ભગવાનની આજ્ઞાને આરાધવામાં આવે છે માટે દર્શન पणेरे मा मा भृण नथी माव्यारे ने 20 121 43-(अकसिण पवत्तगाण रियाविरयाण एस खलु जुत्तो । ससारपयणुकरणो दव्यत्थए . था ५०- ३९४ माताधर्मकथा अकृत्स्नमपर्वकानां पानसयममटतिमता निापिरताना देगापिरतीना श्रावकाणाम् एप द्रव्यस्तर' रालु युक्त पप । विभूनोऽयमित्याह-ससार प्रतनु फरण-समारक्षयकारः इत्यर्थः । ननु मनमोहेग महर्यवामुन्दरः स क्य श्रापकाणा युक्त ? । इत्यादरम्याह-कृपाप्टान्त इति- यथा लोके केऽपि जलाभारतावरणारा. पिपामापनोरनापर्यप सनन्ति ते कृपसनका मृत्तिकार्यमादिगिध मल्लिा भवन्ति, पथात् तदम्पेन जलेन तेपा तृप्णायास्तथा मृर्दमगलस्य च नागो भाति तदनन्तरमपि ते तदन्ये च श्रवणों के लिये उपादेय भी पुष्प आदिको द्वारा भगवान की पूजा स्व रूप द्रव्यस्तव साधुओं के लिये देय ही है। क्यों कि साधु नर्व आरम और परिग्रह के सर्व या त्यागी है-पाक नही वे देश विरति सपन्न हैं। अतः उनके लिये द्रव्यस्तव मसार का क्षय कारक माना गया है कृप का दृष्टान्त देकर मात्रकार ने हमशका का परिहार किया है कि जिस प्रकार जल के अभाव से पिपासा को दूर करने के लिये कोई २ मनुष्य कूप को खोदते हे और उसे खोदते समय मिट्टी और कीचड से मलिन भी रो जाते हैं परन्तु पश्चात् उस कूप मे निकले हुए जल से वे उस कीचड और लगी हुई मिट्टी को साफ कर देते हैं और समय २ पर अपनी पिपासा की भी शाति करते रहते ह । मरे और भी लोक उससे लोभ उठाते है । इस प्रकार उस जलयुक्त कुएँ से खोदने वाले व्यक्तियों को तथा और भी अन्यजनों को समय पर अनेक प्रकार से लाभ होता रहता है । ठीक इसी तरह इस द्रव्यस्तव मे जो कि सयम कृवदिट्ठवो ।) (भाप्यकार ४२ ) मा प्रभारी उयु 3 श्रावहीन भाटे ७॥ દેય હોવા છતા પુષ્પ વગેરે વડે ભગવાનની પૂજા સ્વરૂપ દ્રવ્યતવ સાધુઓના માટે તે ત્યાજ્ય જ છે, કેમકે સાધુ સર્વ આર ભ અને પરિગ્રહના સ પૂર્ણપણે ત્યાગી હોય છે. શ્રાવક નથી, તેઓ દેશ વિરતિ સંપન્ન છે એટલા માટે તેમને સામે રાખીને વિચાર કરીએ તે દ્રવ્યત્વ સસારને ક્ષય કરનાર માનવામાં આ છે ફૂપનુ દહાત આપીને ભાષ્યકારે આ શાને દૂર કરી છે કે જેમ પાના અભાવને લીધે પીડાઈને તરસ મટાડવા માટે કેટલાક માણસે વાવ દે છે અને તે વખતે તેઓ માટી અને કાદવથી ખરડાઈ જાય છે પણ ત્યાર પછી વાવમાંથી નીકળતા પાણીથી જ તેઓ કીચડ તેમજ શરીરે ચેટેલી માટીને સાફ કરી નાખે છે અને વખતે વખત પિતાની તરસ પણ મટાડે છે બીજા પણ કેટલાક લો કે તેનાથી લાભ મેળવે છેઆ રીતે તે પાણી ભરેલી વાવથી ~ अनगारवर्मामृतवपिणी टीका २० १६ द्रौपदीचर्चा लोका जलेन मुसिनो भवन्ति एक द्रव्यस्तो गद्यप्यसयमो मरति तथापि तत एव सा परिणामशुद्धिर्भनति, या तद् असयमोपार्जितमन्यच्च निरवशेपतपयति इति । " तम्माविरतापिरतः पाकैरेप द्रव्यन्ता कर्तव्य । सुभानुनन्धी प्रभूतनिर्जराफल इति कृला" इत्युक्तम्- तदसत्-अत्र हि कपष्टान्तो न सघटते कृपवननेन जलमुत्पद्यते इति सफल लोकपत्यक्ष, किन्तु पट्कायवर कुर्वत. कारयतश्च धर्म मूलभूताया दयाया एव की रक्षा नहीं होती है, तो भी यह कर्ता को परिणामों मे शुद्धि का हेतु होता है। इससे कर्ता उस व्यस्तव के करने मे उद्भूत असयम द्वारा उपार्जित पापो का सम्पूर्णरूप से विनाम कर देता है। इसलिये विरताविरत (एकदेश सयम की आरावना करनेवाले पचमगुणस्थान- वर्ती श्रावको हारा यह द्रव्यस्तय वर्तव्य कोटि में आने से उपादेय है। कारण कि यह उनके लिये शुभानुनबी और कमों की अधिक निर्जरा रूप फल का प्रदाता होता है" यह सब भाष्यकार का कथन ठीक नही है। कारण कि उन्हो ने जो कूप या दृष्टान्त देकर इस विषय की पुष्टि करनी चाहिये, उससे प्रकृत विषय की वास्तविक पुष्टि नहीं होती है। यह तो प्रत्येक लौकिक जन के प्रत्यक्ष अनुभव मे आने जैसी बात है कि कृप के खोदने से जल निकलता है .म में तो विवाद की कोई जरू- रत ही नहीं है, किन्तु प्रतिमा की पूजा करने और करानेवालो से पट् ખોદનાર લોકોને તેમજ બીજા પણ ઘણા માણને વખતે વખત ઘણી રીતે લાભ થતા રહે છે ઠીક આ પ્રમાણે જ વ્યસ્તવમાં જે કે સયમની રક્ષા થતી નથી, છતાય તે કર્તાના માટે પરિણામમાં બુદ્ધિનુ કાગ, હેય છે તેનાથી કતાં તે દ્રવ્યસ્તવને કવ્વામાં ઉદ્દભૂત અસયમ વડે મેળવેલા પાપને પૂર્ણ પણે વિનાશ કરી નાખે છે એથી વિરતાવિરત (એકદેશ સ યમની આરાધના કરનાર પચમ ગુણસ્થાનવતી ) શ્રાવ વડે આ દ્રવ્યસ્તવ કર્તવ્ય કોટિમા આવવાથી ઉપાદેય છે કારણ કે તે તેમના માટે શુભાનુબંધી અને કર્મોની વધારે નિર્જરા ફળને આપનાર છે ભાષ્યકાનુ આ બધુ કથન યોગ્ય નથી, કારણ કે તેઓએ જે વાવનુ દૂછાત આપીને આ વિષયની પુષ્ટિ કરવા પ્રયત્ન કર્યો છે, તેનાથી પ્રકૃત વિષયની વાસ્તવિક રૂપમાં પુષ્ટિ વતી જોવામાં આવતી નવી દરેકે દરેક માણસ્મા માટે આ તે એક પ્રત્યક્ષ અનુભવ કરી શકાય તેવી હકીકત છે કે વાવ પેદવાથી પાણી નીકળે છે, આમ તે ચર્ચાની કોઈ વાત જાગિભી થતી નથી પણ પ્રતિમાની પૂજા કરનાર અને કરાવનારાઓથી हाताधर्मकपास काय के जीयो की रक्षा नी रो सकती है-उनसे उनकी चिराधना होती है। ऐसी परिस्थिति में धर्म के मूलभून सिद्धान्त का ही जय वहां अभाव है तब उस पूजन कार्य के उनके परिणामों मे शुद्धि मानना यह कथन शास्त्र से विरुद्ध और प्रत्यक्ष आदि समस्त प्रमाणों से बाधित होता हुआ किसी भी समझदार व्यक्ति को मान्य नहीं हो सकता है प्रतिमा पूजनके पक्षपाती जो इस प्रकार अपने पक्ष में तर्क करते है कि- सम्यक् स्नात्वोचिते काले सस्नाप्यच जिनान फ्रमात् । पुप्पाहारस्तुतिभिश्च पूजयेदिति तनिधिः ॥ तथा-जिनप्रभसूरिकृतपूजाविधी-सरससुगहिचढणेण अगेसु पूअ काऊण पचगप्लमेहि गपचासेहिं च पृएड सदणे सुगधिभिः सरसैरभूपतितैर्विकाशिभिरसहितदलै' प्रत्यत्रैश्च प्रकीर्ण नाप्रकारग्रधि तैर्वा पुष्पैः पूजयेत्" इति-तथा-कुसुमक्सयगधपईवधूयनेवेजफलज लेहिं पुणो अट्ठविदकम्मदलनी अठ्ठयारा रवड पूया" इति किञ्च- जिनभवन जिनपिम्न जिनपूजा जिनमत च यः कुर्यात् । तस्य नरामरशिवसुखफलानि करपल्लवस्थानि ॥ કાય જીવોની રક્ષા થઈ શકતી નથી, તે કાર્યથી તો તેમની વિરાધના જ હોય છે. આવી પરિસ્થિતિમા ધર્મના મૂળભૂત સિદ્ધા તેને જ જ્યારે અભાવ છે ત્યારે તે પૂજા રૂપ કાર્યથી તેમના પરિણામમાં શુદ્ધિ માનવી આ વાત શાસ્ત્રથી વિરૂદ્ધ અને પ્રત્યક્ષ વગેરે બીજા બધા પ્રમાણેથી બાધિત થતી કોઈ પણ સમજુ માણસના માટે તે માન્ય થઈ કે તેમ નથી પ્રતિમા પૂજનની તરફદારી કરનારાઓ પિતાની વાતને પુષ્ટ કરવા માટે જે આ જાતની ખેતી દલીલ સામે મૂકે છે કે – सम्यक् स्नात्वोचिते काले सस्नाप्य च जिनान् क्रमातू । पुष्पाहारस्तुतिभिश्च पूनयेदिति तद्विधि ॥ तथा-जिनप्रभृसूरिकृतपूजाविधी-सरस-सुरहिच दणेण अगेसु पूअ काउण पचगकुसुमेहि गधासेहि य पूएइ सद्वणे सुगधिभि सरसैरभूपतितैर्विकाशिभिरसहित दलै प्रत्यप्रैश्च प्रकोणैर्नानाप्रकारथितैर्वा पुष्पै पूजयेत् । इति तथा कुसु- मक्सयगधपईवधूयनेवेनफलजलेहि पूणो अविहकम्मदलनी अटुपयारा हवइ पूया" इति किञ्च- जिनभवन जिनविम्ब जिनपूजा जिनमत च य कुर्यात् । तस्य नरामरशिवसुखफलानि करपल्लवस्थानि ॥ HMM सनगारधर्मामृतवपिणी टी० अ० १६ द्रौपदीचर्चा ३९७ समुन्छेदात् परिणामशुद्धिरत्पद्यत इति प्रवचनविरुद्ध कल्पन सममाणाधित कस्यानुमत भवेत् । अपि तु न स्यापि । (आचाराङ्गमूने भगवताऽभिहितम् ( १ उ १) इमस्म चेव जीवियस्स परिवदणमाणणपूयणाए जाइमरणमोयणाए दुपग्वप- डिघायदेउ ते सयमेव पुढविसत्य समारभइ, अण्णेहि वा पुढविमत्य समारभावेइ, भावार्थ-पृजक उचित समय में अच्छी तरह स्नान करके जिनेन्द्र का अभिषेक कर पुष्प आदिकों से उन की पूजा करे । जिनप्रभसरि द्वारा विरचित पूजाविधि मे भी पूजा के विपय में वही विधि प्रदर्शित की गई हे सरस सुगधिन चदन से भगवान के नव अगो में तिलकरूप पृजन कर पूजक सुगधित, जमीन पर नहीं गिरे हुए, पत्र विनाके ताजे पच जाति ते पुप्पों डाग प्रभु की पूजा करें। पुष्प, अक्षत, गध, प्रदीप, धृप, नैवेद्य फल और जल इन आठ द्रव्यो से आठ कर्मों को नाश कर नेवाली अध्यकारी पूजा होती है । जिनमदिर, जिनप्रतिमा जिनपूजा और जिनमत को जो करता है, उस मनुष्य के हाथ मे मनुष्यगति देव- गति और मोक्ष के लुख आ जाते है-अर्थात वह मनुष्य इन गतियो के सर्वोत्तम सुख भोग कर मोक्षसुख का भोक्ता पन जाता है-सो इस प्रकार का यह पूजन विपयक समस्त कथन प्रवचन सिद्ध ही है क्योंकी आचारांगसूत्र में भगवान ने "इमस्स चेव जीवियस्स परिवद्ग माणण प्रयणाए जाइमरणमोयणोए दुवखपरिघायहेज से सयमेव पुढविस- ભાવાર્થ–પૂજા કરનાર ચોગ્ય સમયે સારી રીતે સ્નાન કરીને જીનેન્દ્રને અભિષેક કરે તેમજ પુષ્પ વગેરેથી તેમની પૂજા કરે જીનપ્રભસૂરિ વડે વિર ચિત પૂજાવિધિમાં પણ પૂજાના વિષયમાં આ વિધિ જ બતાવવામાં આવી છે સરસ સુગષિત ચદનથી ભગવાનના નવ અ ગેમ તિલક રૂપ પૂજન કરી પૂજા ડનાર સુવાસયુકત, જમીન ઉપર પડેલા નહિ, પત્ર વગના તાજા, પાચ જાતિના પુષ્પથી પ્રભુની પૂજા કરે પુપ, અક્ષત, ગધ, પ્રદીપ, ધૂપ, નૈવૈદ્ય, ફળ અને પણ આ આઠ દ્રવ્યથી આઠ ને નષ્ટ કરનારી અષ્ટ પ્રકારનાં પૂજા હોય હે જીન મદિર, જીન પ્રતિમા, જીન પૂજા અને જીન મતને જે કરે છે, તે માણસની પાસે મનુષ્ય ગતિ, દેવગતિ અને મોક્ષના સુખો આવી જાય છે એટલે કે તે માણસ આ ગતિએના સર્વોત્તમ સુખ ભોગવીને મેક્ષ સુખને ભેગવનાર બની જાય છે, માટે આ જાતનુ આ પૂજનને લગતુ બધુ કથન प्रपयन मि छ, भ? माया सूत्रमा मापाने-(इमरस चेव जीवि परिव दण माणणपुयणाए जाइमरणमोषणाए दुस्सपरिघायहेउ से - यरस माधिमंकवानी . अण्णे या पुरनिमन्य समारगते समगुजाण । त से भदियाप त से जोरीए । इति जीः कस्म भयोजनाय पृथिवीरायस्प ममारम्भ फरोतीत्या:-" उमस्स चे " इत्यादि । अस्यैर-क्षणगरस्य, " जीवियस्सा" जीनस्य नीयनस्यार्थे, तथा परिपन्दनमाननपूजनाय-परिव दन प्रशसा, तदर्थ यथाऽऽर्यगृहाटिकरणे, मानन=सत्कारः तदर्थ, यथा जोतिस्वम्भादिकरणे, पूनसान ! प्रतिमापूजन च, तत्र पूजन-पत्ररत्नादिपुरस्कारलाभस्तदर्थ, तया-प्रतिमापूजनाः च प्रति मादिरचने तथा जातिमरणमोचनाय, तथा दुग्यविधातहेतु-दु खपि गाय । त्य समार मह, अण्णेहिं या पुढधिसत्य समारभावेठ, अपणे चा पुढवि सत्य समोरभते समणुजाण । त से अरियाए त से अपोरिण" इति- इस सूत्र में "जीव किस प्रयोजन के लिये पृधिवीकार का ममारभ करता है " इस प्रश्न का उत्तर देते हुए यह कहा है कि यह जीव इस क्षणभगुर जीवन के लिये परिचन्दन-प्रशंसा के लिये-आचर्योत्पादक गृह आदि वनवा न दें मान-सत्कार के लिये कीर्तिस्तभ आदि कराने में, अपनी प्रतिष्ठा के लिये वस्त्र रत्नमाल आदि पुरस्कार में तथा प्रतिमापूजन के लिये प्रतिमादि बनवाने मे तथा जाति-परलोक में सुख के लिये देवमन्दिर आदिके बनवानेमे, मरण-जिनकी नृत्यु हो चुकी है ऐसे अपने पिता आदि की स्मृति के लिये स्तूप आदि की रचना कराने ने मे, मोचन-मुक्ति प्राप्ति के लिये देव प्रतिमा आदि धनवानेमे अथवा अनेक प्रकार के दुःखोंके विनाशके लिये वर्तमानकालमे स्वय भी पृथिवी सममेव पुढविसत्थ समार भइ, अण्णेहिं वा पुढविसत्य समार भावेइ, अण्णेवा पुढविसत्य समार मते समणुजाणइ त से अहियार त से अमोहिए ) इति- જીવ શા માટે પૃથ્વિીકાયને સમારભ કરે છે? એ સવાલનો જવાબ આપતા આ પ્રમાણે કહેવામાં આવ્યુ છે કે આ જીવ આ ક્ષણભંગુર જીવન માટે પરિવદન-પ્રશસા માટે આશ્ચર્યોત્પાદક ઘર વગેરે બનાવવામાં, માન-સત્કાર માટે કીર્તિસ્ત વગેરે તૈયાર કરાવવામાં, પોતાની પ્રતિષા માટે વસ્ત્ર, રન, કામળ વગેરે રૂપ પુરસ્કાર તેમજ પ્રતિમા પૂજન માટે પ્રતિમા વગેરે બના વવામા જાતિ પરલોકમાં સુખ પ્રાપ્તિ થાય તેના માટે દેવ-ન્મદિરો વગેરે તૈયાર કરાવવામા, મરણ જેઓ મરણ પામ્યા છે તેવા પિતાના પિતા વગેરેની યાદમાં તૂપ, સમાધિ વગેરે બનાવવામાં, મોચન-મુકિત મેળવવા માટે દેવ-પ્રતિમા વગેરે બનાવવામાં અથવા તે ઘણી જાતના દુખેના વિનાશ માટે વર્તમાન કાળમાં પિતે પણ પૃથ્વિીકાયના વિના સ્વરૂપ દ્રવ્યભાવ - “ માપાર ३०९ - मनगारधर्मामृतपिणी टी० १० १६ द्रौपदीचर्चा सः जीवनपरिचन्दनमाननपूजनाद्यर्थ जनः स्वयमेव पृथिवीशस्त्र समारभते पृथिव्युपमर्दक द्रव्यभावशस्र व्यापारयति । अन्यैर्वा पृथिवीशस समारम्भयति -उयोजयति । पृथिवीशस समारभमाणान् अन्यान समनुजानाति अनुमोदयति । एवमतीतानागतान्या, तया मनोकायायैश्च पृथिवीशससमारम्भभेदा अवगन्तव्याः। पृथिवीनस समारभमाणः किं फल प्राप्नोतीत्याह-"त से अहियाए" इत्यादि । 'त ' तत्-पृथिवीका यसमारम्भण, " से" तस्य-पृथिवीशस्त्र समारभमाणस्य "जहिया" भहिताय अराणाय भवतीति शेपः। 'त' तत् = तदेव च पृथिवीकायसमारम्भणमेव च "से" तस्य पृथिवीशस्त्र समारभमाणस्य "जयो- हीए " अयोपये सम्यक्त्तालाभाय जिनर्मप्राप्त्यभावाय च भरति । पृथिवीमायरामारम्मण हि-कृतकारितानुमोदितभेदेन निविषम् , तरयातीत- काय के विनाशस्सप द्रव्य भाव गलका व्यापार करता है, इसरों से कराता हे और इस शस्त का प्रोग करने वाले प्राणियोकी अनुमोदना करता है इसी प्रकार भूत और भविग्यत काल में मनवचन और काय से(त्रियोग और त्रिकरणके सरवसे) यह जीव पृथिवी कायका लमारम्भ करने गला हुआ है और रोगा। अतः जिस प्रकार वर्तमान में त्रियोग और त्रिकरण के सर से इस पूधिरी काय समारम के भेद होते उसी प्रकार भूत और भविष्यत काल मे भी उनके सबध इसके भेद जानलेना चाहिये। यह पृथिवी काय का समारमप शस्त्रका प्रयोग प्रयोका जीवको कभी भी कल्याण एब सम्पात्व के लाभ जिन धर्म की प्राप्ति की प्राप्ति कराने वाला नहीं होता है। भावार्थ-पृथिवीकाय का ममारम्भ मृल, कारित और अनुमोदना (ાય ) કરે છે, બીજાઓ પાસે કરાવે છે અને આ નમ્ર પ્રયાગ કરનાર પ્રાણીઓની અનુમોદના કરે છે આ પ્રમાણે ભૂત અને ભવિષ્ય ળમાં મન, વચન અને કાયથી (ત્રિગ અને ત્રિકરણના મન ધથી) આ જીવ પૃષ્યિ કાયને સમાર ભ કરનાર થયે છે અને થશે એટલા માટે જેમ વર્તમાનકાળમા વિગ અને ત્રિકરણના સંબધથી આ પૃથ્વિનય સમાર ભના બે પ્રકાર) હેય છે તેમજ ભૂત અને ભવિષ્યત કાળમાં પણ તેમના સબ ધ તેમજ ભેદ જાણી લેવા જોઈએ આ પૃથ્વિનાયના સમારભ રૂપ અને પ્રયોગ પ્રયતા જીવન માટે કદાપિ વ્યાણ સભ્યને લાભ તેમજ જીન ધર્મની પ્રાપ્તિ કરાવનાર થતા નથી ભાવાર્થ–પૃથ્વિકાને સમાર ભકૃત, જાતિ અને અનુમોદનાના ભેદથી ત્રણ પ્રકાર છે અતીત અને અનાગત કાળના ભેદથી તેના બીજા ત્રણ ત્રણ . , माताधर्मकथा अण्णे या पुरविसन्थ समारगते समणुजाण । त से अधियाण त से अमोठीए । इति जीवः कस्मै भयोजनाय पृथिवीमायस्प समारम्भ फरोतीत्याद-" इमस्स चेव" इत्यादि । अस्यैर भणपुरस्य, "जीरियस्म" जीवनस्य-जीवनम्यार्थे, तथा परिपन्दनमाननपूजनाय परिसदन प्रगसा, तदर्थ यथाऽऽयय हाटिकरणे, मानन सत्कारः तदर्थ, यया कीर्तिस्वम्भादि करणे, पूजनम्सपूजन प्रतिमापूजन च, तत्र स्वपूजन-पत्ररत्नादिपुरस्कारलाभस्तदर्थ, तथा प्रतिमापूजनार्य च प्रति मादिरचने तथा जातिमरणमोचनाय, तथा दु समविघातरेतु-गविश्यमा । स्थ समार मह, अण्णेहिं या पुचिसत्य ममारभावेत, अण्णे चा पुढवि सस्य समारभते समणुजाण । त से अहियाप त से अमोलिए" इति- इस सूत्र में “जीव किस प्रयोजन के लिये पृधिवी काय का ममारभ करता है " इस प्रश्न का उत्तर देते हुए यह कहा है कि यह जीव इस क्षणभगुर जीवन के लिये परिचन्दन-प्रशंसा के लिये-आध्ययोत्पादक गृह आदि पनवा न दें मान-सत्कार के लिये कीर्तिस्तभ आदि कराने में, अपनी प्रतिष्ठा के लिये वन रत्नशाल आदि पुरस्कार में तथा प्रतिमापूजन के लिये प्रतिमादि यनवाने में तथा जाति-परलोक मे सुख के लिये देवमन्दिर आदिके बनवानेमे, मरण-जिनकी मृत्यु हो चुकी है ऐसे अपने पिता आदि की स्मृति के लिये स्तूप आदि की रचना कराने ने मे, मोचन-मुक्ति प्राप्ति के लिये देव प्रतिमा आदि पनवानेमे अथवा अनेक प्रकार के दुःखों के विनाशके लिये वर्तमानकालमे स्वय भी पृथिवी सममेव पुढविसत्य समार भइ, अण्णेहिं वा पुढविसत्य समार भाषेइ, টানা पुढविसत्य समारभते समणुजाणइ त से अहियाप त से अमोहिए ) इति- "0 भाटे पृथ्विीजयनी समा२ल उरे" એ સવાલનો જવાબ આપતા આ પ્રમાણે કહેવામાં આવ્યું છે કે આ જીવ આ ક્ષણભંગુર જીવન માટે પરિવદન-પ્રશસા માટે આશ્ચર્યોત્પાદક ઘર વગેરે બનાવવામાં, માન-સત્કાર માટે કીર્તિત વગેરે તૈયાર કરાવવામાં, ની પ્રતિષ્ઠા માટે વસ્ત્ર, રતન, કામળ વગેરે રૂપ પુરરકાર તેમજ પ્રતિમા પૂજન માટે પ્રતિમા વગેરે બના વવામાં જાતિ પરલેકમાં સુખ પ્રાપ્તિ થાય તેના માટે દેવ-મદિરો વગેરે તૈયાર કરાવવામાં, મરણ-જેઓ મરણ પામ્યા છે તેવા પિતાના પિતા વગેરેની યાદમાં તૂપ, સમાધિ વગેરે બનાવવામા, મોચન-મુકિત મેળવવા માટે દેવ-પ્રતિમા વગેરે બનાવવામાં અથવા તે ઘણી જાતના ૮ ના વિનાશ માટે વર્તમાન કાળમાં પિતે પણ પૃથ્વિીકાયના વિનાશ સ્વરૂપ દ્રવ્યભાવ - fપાર ४०१ मनगारधर्मामृतपरिणी टी० अ० १६ द्रौपदीचा मलभ्य, किं पुनस्तन पटकायसमारम्भणे सर्गापगलाभस्य सभव । परिवन्दन- माननपूजनार्थ जातिमरणमोचनाय दुःखप्रतिघातार्थ च ये जीवाः पृथिवीकायादि- समारम्भ कुर्वन्ति, ते तत्फल विपरीतमेन लभन्ते यतोऽसी समारम्भः अबोधिमहित चोत्पादयतीत्युक्त भगवता । परतु तत्र प्रतिमापूजका शास्त्रविरुद्धमेव कथयति- प्रतिमापूजाया स्वाभ्युदयमोक्षार्थ क्रियमाणः पटनायसमारम्भः खलु अयोधिम- जीर के लिये यह अफेला पृथिवीकाय का समारभ ही अहित का कर्ता और मोक्ष के मार्ग से वचित रग्वनेवाला कहा गया है तो भला किस कार्य में पट्काय के जीवों को समारभ होता है, उस कार्य से अथवा उस प्रकार के समारभ से जीवों को स्वर्ग और अपवर्ग (मोक्ष) का लाभ कैसे हो सकता है ? अर्थात् किमी तरह नहीं हो सकता। जो मनुष्य परिवदन मानन और पूजन के निमित्त तथा जाति और मरण के मोचन के निमित्त एव दुग्यो के विनाश करने के निमित्त पृथिवीकाय आदि को समारभ करते है, वे उसका विपरीत ही फल भोगते हैं यह यात अच्छी तरह से प्रकट की जा चुकी है। क्यों कि प्रतिमापूजा बोध एव रित प्राप्ति के लक्ष्य को लेकर के ही की जाती है -परन्तु इस लक्ष्य की सिद्धि न होकर उससे उल्टा कर्त्ता जीव अबोध एव अहित का प्रापक ही होता है ऐसा श्री महावीर प्रभु का कथन है। फिर भी इसके पक्षपाती जन इस बात पर ध्यान न देकर शास्त्र विरुद्ध ही कथन करते है-वे यह कहते हैं " कि इस प्रतिमापूजन में माना कि માર્ગથી દૂર ફેકી દેનાર બતાવવામા આવ્યો છે ત્યારે કયા કાર્યમાં પકાયના જીવને સમારભ હોય છે, તે કાર્યથી અથવા તે તે જાતના સમારભથી જીવને સ્વર્ગ અને અપવર્ગ (મોક્ષ) ને લાભ કેવી રીતે સંભવી શકે તેમ છે ? એટલે કે કોઈ પણ કાળે જીવને આ કાયથી સ્વર્ગ કે મોક્ષને લાભ થઈ અકતે નથી જે અણુમ પરિવદન, માન અને પૂજનના માટે તેમજ જાતિ અને મરણના મોચન માટે અને દુખોના વિનાશ માટે વૃશ્ચિકાય વગેરેને આમ રણ કરે છે, તેઓ તેનુ ઉવટુ ફળ ભેગવે છે આ વાત સારી રીતે સમ જાવવામાં આવી છે, કેમકે પ્રતિમા પૂજા બોધ તેમજ હિત પ્રાપ્તિના લક્ષ્યને લઈને જ કરવામાં આવે છે પણ આ લક્ષ્યની સિદ્ધિ ન થતા તેનાથી સાવ વિપરીત કર્તા જીવ અધ અને અહિતને મેળવે છે એવું જ શ્રી મહાવીર પ્રભુએ કહ્યું છે છતાય પ્રતિમા પૂજાના કેટલાક તરફદારીઓ આ વાતને લક્ષ્યમાં ન રાખતા શાસ્ત્ર વિરૂદ્ધ જ કથનને વળગી રહે છે તે આ પ્રમાણે કહે છે हाताधर्मका वर्तमानानागतभेदेन प्रत्येक प्रेयिष्ये नवधा भाति । नाविधस्यापि पृथिवीराय समारम्भगस्य मनोयागाययोगभेदेन प्रत्येक पनि गतिभिज्ञा भवति । एव विधपृथिवीकायसमारम्भपरत्तः सल पदकायारम्गसंपातजन्यधोरतदुरितार्जनन दुरन्तससारदारानलमालान्तःपात पाप्यान तनरकनिगोदादिदुग्यमनुभान् न पदाचित् कल्याण शाश्वतमुखमद मोक्षमार्ग मामोतीतिमात्र ॥ भगरता पृथिवीकायसमारम्भणनदपकायादिसमारम्भणमप्यहितायागोषये च भवतीत्यपि तर प्ररपितम् । यमस्य पृथिवीरायस्य समारम्भणे सम्यक्त्व के भेद से तीन प्रकार का है-दमके अतीत और अनागत काल के भेद से तीन ३ प्रकार का और हो जाते है इस प्रकार यह तीनों कालों की अपेक्षा से ९ प्रकार का है। इन नव प्रकारों के साथ-मन वचन और काय इन तीनो का गुणा करने से यह २७ प्रकार का माना गया है इस प्रकार विकरण और त्रियोग के समय से २७ प्रकार के इस पृथिवीकाय के समारभ में प्रवृत्त जीप पटकाय के आरभ के सपात जन्य घोरतर पापों के अर्जन से दुरन्त समार रूपी दावानल की बाला के मध्य में निमग्न बन अत में अनन्त नरक निगोदादिकों के दुःसो का अनुभव करता हुआ कभी भी निज करयाण का भोक्ता एव शाश्वत सुख को प्रदान करने वाले मोक्ष के मार्ग का पथिक नहीं बन सकता है पृथिवी काय के समारम्भ की तरह अप्काय आदि का समारम भी इस जीवात्मा को सदा अहितकारी और अयोध का दाता है यह बात भी वर्श पर (आचाराग सूत्र में) भगवान ने कही है अब विचारिए-जब ભેદ થઈ જાય છે. આ રીતે આ ત્રણે કાળની અપેક્ષાએ નવ પ્રકાર છે આ નવ પ્રકારની સાથે મન, વચન અને કાર્યો અને ત્રણેને ગુણાકાર કરવાથી આ ૨૭ પ્રકારનું માનવામાં આવ્યું છે આ પ્રમાણે ત્રિકરણ અને ત્રિગના સ બ ધથી ૨૭ પ્રકારના આ પૃશ્વિનાયના સમારંભમાં પ્રવૃત્ત જીવ પટકાયના આર ભના સ પાત જન્મ ઘોરતર (ભયકર) પાપને કારણે દુર ત સ સાર રૂપી દાવાનલના અગ્નિમાં પડીને છેવટે અનત નરક નિવેદ વગેરે દુખને અનુ ભવતે કદ પિ પિતાના કલ્યાણને ભકતા થઈને અને શાશ્વત-સુખને આપનાર મેક્ષ માને પથિક (વટેમાર્ગ) બની શકતે નથી પૃશ્ચિકાયના સમા ભની જેમ અમુકાય વગેરેને સમારભ પણ આ જીવાત્મા માટે હમેશા અહિતકારી અને અબોધ (અજ્ઞાન) આપનાર છે ભગવાને કહી છે હવે આટલું તે આપણે પણ સમજી શકીએ છીએ કે જ્યારે જીવન માટે ફક્ત પૃશ્ચિકાયને સમાર ભ જ જયારે અહિત કરનાર અને મોક્ષના આ વાત પણ આચરાગ સૂત્રમાં . मेनगारधर्मामृतरपिणी टोका अ० १६ दोपदीयर्चा समाग्भमाण अन्यान् अनेकरूपान् प्राणान् विहिंसति । एपः पृथिवीशस्त्रसमार- म्भः खलु निश्चयेन ग्रन्थः प्रयतेचध्यते जीवोऽनेनेति ग्रन्थः, अष्टविधर्मनन्धः, पन्यजनकत्वाद् ग्रन्थ इत्युच्यते । तथा-एप मोहः विपर्यास वीपरीतनानरूप इत्यर्थ तया-एप मार निगोदादिगरणरूपः । तथा-एप सलु नरका-नारक जीवाना दशविषयातनास्थानम् । इत्यर्थम्-एतदर्थ कर्मपन्ध-मोह मरण-नरक- रूप पोर दुःसफलं प्राप्य पुन पुनरेतदर्थमेव लोक.मज्ञाननशनी जीनः गृद्धः-लिप्पुरस्ति । यद्यपि विपयभोगासक्तो लोक शरीरादिपरिपोपणार्थ परिवन्दनमाननपूजनार्थ जातिमरणमोचनार्थ दुखप्रतिघातार्य च पृथिवी- शराममारम्भ करोति, तथापि तत्फल मरन्धमोहमरणनरकरूपमेन लभते, अतः पृथिवीकर्मसमारम्भस्त तदेव फल भवतीति भारः । तदेव प्रपचनविरुद्धमरूपण कराने वाला होने से ग्रन्यस्वरूप, विपरीत ज्ञान का जनक होने से मोह- रूप, निगोदादि जीवों का इस मे भरण होता है-इसलिये मार स्वरूप तथा नारकियो की दश प्रकार की यातनो का हेतु होने से यह नरकरूप माना गया है। इस प्रकार यह जीव इम पृथिवीकाय के समारभरूप शस्त्र के फलस्वरूप कर्मचन्ध, मरण और नरकस्प घोरतर दुःखों को भोगता हुआ भी अज्ञान के आधीन होकर उसी शस्त्र के प्रयोग करने का फिर भी अभिलापी हो रहा है। यद्यपि विषय भोगों में आसक्त बना हुआ यह जीव शरीर आदि की पुष्टि परिवदन, मानन, पृजन एव जाति और मरण के मोचन के लिये तथा दुःखो के विनाश के लिये पृथिवीकार के समार मरूप शस्त्र का प्रयोग करता है-परन्तु फिर भी इसका वर कर्मवन्ध, मोह, मरण, नरकरूप फल का ही भोक्ता बनता જ્ઞાનાવરણીય વગેરે કર્મોને બધ કરાવનાર હોવા બદલ ગ્રન્થ સ્વરૂપ, વિરુદ્ધ જ્ઞાનને ઉત્પન્ન કરનારૂ હેવાથી મેહ રૂપ, નિગોદ વગેરે જાનુ આમાં મરણ વાય છે માટે માર સ્વરૂપ તેમજ નારકીઓની દશ પ્રકારની યાતનાનું કારણ રૂપ હોવાથી આ નરક રૂપ માનવામાં આવ્યુ છે આ રીતે આ જીવ આ પૃથ્વિકાયના સમાર ભ રૂપ શસ્ત્રના ફળ સ્વરૂપ કર્મબ ધ, મરણ અને નરક રૂપ ઘેરતર હુ ને ભેગવવા છતા પણ અજ્ઞ નવા થઈને તે જ અને પ્રયોગ કરવા માટે ફરી તૈયાર થઈ રહ્યો છે જે તે વિષય ભોગોમા આસક્ત બનેલે આ જીવ શરીર વગેરેની પુષ્ટિ પરિવદન, માનન, પૂજન અને જાતિ મરણના મેચન માટે તેમજ દુઓને દૂર કરવા માટે પૃથ્વિલાયના સમારભ રૂપ શસ્ત્રને પ્રવેગ કરે છે પણ છતાયે તે કમબન્ય, મેહ, મણ અને નરક રૂપ ફળને જોગવનાર જ બને છે એટલા માટે આપણે સેક્સ કહી શકીએ તેમ છીએ . ४०२ মারামাঞ্চ हित नोत्पादयति, प्रत्युत बोधि नरामरणियसरप दित च सम्यग जनयतीति, तदेतत् साक्षात् माननपिद्धमिति । किं च आचारागाने पृथिवीकायसमारम्भरच फमुस्त्या मगाता पुनरनिहि तम्-'एम सलु गये, एस गलु मोहे एस सी मारे, एम गल गिरये, इन्चन्य गहिए लोए, जमिण विरूपर हि मत्यहि पुहरिरमासमारंभा पुढविसत्य समा रभमाणे अण्णे अणेगाने पाणे पिडिमड ।' (आ० १ अ० २ उ०) छाया- एप खलु ग्रन्यः, एप खलु मोह , पप ग्पलु मारः, एप सल नरक' इत्ययं गृद्धो लोकः, यदिम विरूपस्पैः शतैः पृथिवीर्मममारम्भेण पृथिवी शस्त्र पटकाय का ममारम होता है-परन्तु यह ममारभ स्वाभ्युदय व मुक्ति माप्ति के निमित्त ही किया जाता है-अतः यह की जीवों को न अस्ति का ही उत्पादक होता है और न बोधि के लाभ से वचित रखता है प्रत्युत यह उन्हें योधि एव नर अमर और मोक्ष के सुग्व स्वरूप हित का प्रदान करने वाला ही होता है " सो इस प्रकार का उनका यह कयन साक्षात् शास्त्र से विरुद्ध ही है-यह यान आचाराग सत्र से भली भांति पुष्ट होती है उसमें पूर्वोत्तरीति से पृथिवीकाय के समारभ का फल कर कर फिर यह कहा गया है--"एम खलु गधे, सम्बल मोहे, एस ग्वल मारे, एम खलु नरये, एच्चत्य गट्टिए लोए,जमिण विस्वरूवेहिं सत्थेहि पुढविकम्मसमारभेण पुढविसत्य समारभमाणे अण्णे अणेगग्वे पाणे विहिंसइ" ( आ १ अ-२ उ-) यह पृथिवीकाय का समारभरूप शस्त्र निश्चय से जीवो को अष्टप्रकार के ज्ञानावरणीय आदि कर्मों का बन्ध કે-આપણે થોડા વખત માટે આમ પણ માની લઈએ કે આ પ્રતિમા પૂજ નમાં પકાયને સમારભ થાય છે પણ આ સમાર ભ સ્વાન્યુદય અને મુકિતની પ્રાપ્તિ માટે જ કરવામાં આવે છે એટલા માટે આ કર્તા જેના માટે અહિ તને ઉત્પાદક પણ હેત નથી અને બેષિના લાભથી પણ તેઓને વચિત રાખને નથી આ તે તેમને બેધિ અને નર અમર અને મેક્ષના સુખ સ્વરૂપ હિતને આપનાર જ હોય છે પણ તેમનું આ કથન પ્રત્યક્ષ રૂપમા શાયથી વિરૂદ્ધ જ છે આ વાત આચારાગ સૂવથી સારી પેઠે પુષ્ટ થઈ જાય છે તેમાં પૂર્વોક્ત રીતથી પૃથ્વિકાયના સમારંભનુ ફળ બતાવીને આ પ્રમાણે કહ્યું છે-- एस सलु गये, एस रालु मोहे, एस सलु मारे एस सलु नरये, एचत्थ गढिए लोए जमिण विरूवरूवेहि सत्थेहि पुढविकम्मसमार भेण पुढविसस्थ समार भमाणे अण्णे अणेगरूवे पाणे विहि सइ " ( आ १ अ આ પૃષિકાયનુ સમારભ રૂપ શસ્ત્ર ચક્કસ જીના - . પ્રકારના अनगारधर्मामृतवपिणी टीका म०१६ द्रौपदीचर्चा ४०५ यत्तु-त्रामीलिपिरित्र प्रतिमा पन्धा, 'नमो भीए लिबीए" इतिपद यद व्यारयापनतेरादाउपन्यस्त तर ब्राह्मी लिपिरवरचिन्यास', सा यदि श्रुतज्ञानस्याऽऽ कारस्थापना, तदा तद्वन्द्यने साकारस्थापनाया भगवत्पतिमाया. स्पष्टमेव नन्धत्तम् तुल्यन्यारादित्युक्तं, तन्मोहनोयकर्मोदयविलमितम्- अतज्ञानरूपस्य भारश्रुतस्य स्थापना-श्रुतज्ञानवत, श्रुतपठनादिक्रियावत' सा नादेश्विनादिक भाति, अततद्वतोरभेदोपचारात् सा वादि श्रुतमुन्यते । स्था- पनावश्यकस्य स्थापनाश्रुतस्य च तयैवानुयोगद्वारे भगवता वर्णनात् । यदेव लिपिः श्रुतज्ञानम्य स्थापनारूपन्य न मामोति । तस्मात् प्रतिमाया ब्राह्मीलिपिदृष्टान्त प्रदर्शनमुत्सूत्रप्ररूपणम् । फिश्च-प्रतिमापूजन की पुष्टि के लिये “ नमो वभीए लिवीए" व्याख्याप्रज्ञप्ति की आदि में लिसे हुए उस सूत्र के बल पर जो उसके पक्षपाती जन यह कहते हैं-"कि अक्षर विन्यासरूप ब्राह्मीलिपि जिस प्रकार झुतज्ञान के आकार की स्थानपारूप होकर वन्द्य-चन्दनीय मानी गई है उसी प्रकार साकार स्थापनारूप भगवान की प्रतिमा में भी बन्द- नीयता स्पष्ट ही है" सो यह कथन विचार करने पर ठीक नहीं बैठता है। तथाहि-श्रुतज्ञानरूप भावश्रुत की स्थापना-श्रुतज्ञानसपन्न, और श्रुत के पठन की क्रिया विशिष्ट ऐसे जो साधु आदिजन है उनके चित्र आदि स्वरूप पडती है अर्थात् श्रुतज्ञानी सोधु आदि के चित्रस्वरूप ही श्रुनजानरूप मावश्रुतकी स्थापना होती है। ब्रामीलिपि अक्षर विन्यास है। वह श्रुतज्ञान की स्थापना है । यहाँ श्रुतज्ञानी साबु आदि को जो भने olng -प्रतिभा पुराना पुष्टि भाटे “ नमो बभीए-लिपीए" વ્યાખ્યા પ્રજ્ઞપ્તિની શરૂઆતમાં આવેલા આ સૂત્ર મુજબ જે તેની તરફદારી કરનારા માણસે આમ કહે છે કે “ અલર વિન્યાસ રૂપ બ્રાહિ લિપિ જેમ થતજ્ઞાન આકારની સ્થાપના રૂપ થઈને વધૂ-વનીય માનવામા આવી છે, તેમજ આકાર-થાપના રૂપ ભગવાનની પ્રતિમામા પણ વદનીયતા સ્પષ્ટ દેખીતી વાત જ છે પરંતુ આ કવનને પણ વિચાર્યા બાદ ચગ્ય લાગતું નથી તેમજ શ્રુતજ્ઞાન રૂપ ભાવકૃતની સ્થાપના-કુતજ્ઞાન સ પત્ત અને શ્રુતના પઠનની કિયા વિશિષ્ટ એવા જે સાધુ વગેરે લેકે છે તેમના ચિત્ર વગેરે સ્વરૂપ હોય છે એટલે કે શ્રુતજ્ઞાની સાધુ વગેરેના સ્વરૂપ જ શ્રુતજ્ઞાન રૂ૫ ભાવકૃતની સ્થાપના હેય છે બ્રાહિ-લિપિ અલર વિન્યાસ છે તે સુતજ્ઞાનની સ્થાપના છે અહીં શ્રુતજ્ઞાની માધુ વગેરેને જે ભાવશુત રૂપ કહેવામાં આવ્યું છે તે तसान Vo आताधर्मकया पराः सर्पदोपनिर्मुक्त शुदमद्वितीयमन जनधर्म सापथमोपदेशेन पावचनि फोपमेय कुन्तिः ससारदामानले जनान् पातयन्तः पय च मोहनीयकमंदियाशा दन्धा इस सन्मार्गतो निपतन्तः सामानमहितेन मिल्यात्वेन च पुनः पुनः सयो जयन्ति । यदि मृगठप्णाऽपि पारित पिपासालानां सरजलपारावाहिनी भवेत् , तदा प्रतिमापूजापि तेपा द्रव्यलिसिना परिणामशुद्धि सपादिनी अष्टवि धर्मदलनी नरामरशिवसुखविधायिनी भरेदिति यो यम् । है। अतः प्रतिमापूजन का उपदेश निश्चित है कि प्रवचनमार्ग से विरुद्ध है। इस विरुद्ध प्ररूपणा करने में तत्पर मनुष्य सर्व दोपों से ररित, शुद्ध और अद्वितीय एव अनवद्य इस जैनधर्म को सारा पूजा के उपदेश से कुप्रावनिक की तरह मलफित-सदोप कर ससाररूपी दावानल में भोले भाले प्राणियो को डाल रहे है और स्वय भी मोहनीय कर्म के उदय से अन्ध की तरह बन कर सन्मार्ग से विमुख होते हुए अपनी आत्मा को अरित और मिथ्यात्व के कलक से कलुपित कर रहे हैं। अरे-कहीं मृगतृष्णा से भी प्यासे व्यक्तियों की प्यास बुझती हैं ? यदि नहीं, फिर मृगतृष्णा तुल्य इस प्रतिमा पूजन से कर्त्ता की सम्यक्त्व और हित की प्राप्ति होने रूप प्यास कैसे घुझ सकती है-सोचो। ।। यदि ऐमा होता कि मृगतृष्णा स्वच्छ जल की धारा बहाकर प्यासे प्राणियो की तृपा को शांत करती-तो यह प्रतिमा पूजन भी द्रव्यलिङ्गि यों के परिणामो में शुद्वि करती हुई उनके अष्टकर्मों को दलने वाली और उन्हें नर, अमर ण्व शिवसुख प्रदान करने वाली भी हो सकती। કે પ્રતિમા પૂજનને ઉપદેશ પ્રવચન માર્ગથી વિરૂદ્ધ છે આ જાતની વિરૂદ્ધ પ્રરૂપણ કરવામાં તત્પર માણસ બધા દેથી રહિત, શુદ્ધ અદ્વિતીય અને અનવદ્ય આ જૈન ધર્મને સાવધ પૂજાના ઉપદેશથી કુપ્રવચનિકની જેમ કલકિત દેવયુક્ત બનાવીને સસાર રૂપી દાવાનલમા ભેળા પ્રાણીઓને ન ખી રહ્યો છે અને જાતે પણ મોહનીય કર્મના ઉદયથી આધળાની જેમ થઈને સન્માર્ગથી દર થતા પિતાના આત્માને અહિત અને મિશ્નાત્વના કલ કથી કલુષિત કરી રહ્યો છે મૃગજળથી પ કે દિવસે તરસ્યા માણસોની તરસ મટી શકી છે ? જે આવું નથી તે પછી મૃગજળ જેવી આ પ્રતિમા પૂજનથી કર્તાની સભ્ય કવિ અને હિતની પ્રાપ્તિ થવા રૂપ તરસ કેવી રીતે મટી શકે તેમ છે જે મૃગજળ નિર્મળ પાણી ઝરે થઈને તરસ્ય પ્રાણીઓની તરસ મટાડી શકત તે આ પ્રતિમા પૂજા પણ દ્રવ્યલિંગિઓના પરિણામશુદ્ધિ કરનારી તેમના આ કર્મોને નષ્ટ કરનારી અને નર, અમર અને શિવ-સુખ આપનારી १ ४०७ -- अनगारधर्मामृतवपिणी टीका म० १६ द्रौपदीचर्चा चाराङ्गादिक प्रतिपूर्णपोप क्ण्ठोष्ठनिममुक्त पठितात सायादेस्तदर्थज्ञानाभावे सति द्रव्यश्रुतत्व भाति, तथैवानुयोगद्वारे द्रव्य श्रुतस्य वर्णनात् । वर्णस केतरूपा लिपिस्नु न शब्दात्मिका, यतो वर्णस्येोच्चारणमुपपयते, न तु तत्लकेतस्य लिपिमत पुस्तकादेस्तु श्रुत गिक्षित यावद् वाचनोपगत न भवितुमर्हति अतस्तस्य द्रव्ययुनत्व न सभाति मय पुनस्तद्गतलिपेस्तत्समनः ? कामपि नहि । किं च-द्रव्यश्रुतस्य पन्धत्वमेव नास्ति, अनुपयुक्तत्वाच्चरणगुणशून्यत्वाच्च, तस्माद् भावश्रुतस्यैा वन्यत्वमाप्तौ द्रव्यश्रुतनमस्कारकल्पन भ्रान्तिमूलकमेव । 'नमो भीए लिपीए' अस्थायमर्थ-वर्गात्मकभापास केतरूपा लिपिाह्मी लिपिः प्रकार द्रव्यश्रुत का वर्णन अनुयोगटार में किया गया मिलता है। अकार आदि वर्णरूप से सकेतित लिपि मे शब्दान्मकता आभी नही सकती है-यो कि वर्ण का ही उच्चारण होता है-उसके सकेत का नहीं। लिपियुक्त पुस्तकादि में भी वाचना आदि कुछ नहीं होता है। क्यों कि वह जड है-चेतन में ही ये वाचना पृच्छना आदि होते है । अतः उस में द्रव्यश्रुतता मानना सर्वथा अयुक्त है इसलिये यह निश्चित होता है कि अकार आदि वर्णरूप से सकेतित लिपि में और इस लिपि विशिष्ट पुस्तकादिक में द्रव्यश्रुतता किंचित मात्र भी सभवित नहीं है। किञ्च-अनुपयुक्त होने से और चरणगुण शून्य होने से द्रव्यश्रुत में चधता आ ही नहीं सकती है। भाषश्रुत में ही उपयोग सहित और चरणगुण युक्तता होने से बदत्ता आती है-अत द्रन्यश्रुत मे नमस्कार करने की करपना करना केवल भ्रान्तिमूलक ही है " नमो बभीए આ રીતે દ્રચકૃતનુ વર્ણન અનુયોગ દ્વારા કવ્વામા આવ્યુ છે અકાર વગેરે વર્ણપથી સતિત લિપિમાં શબ્દાત્મકતા આવી શકે તેમ નથી કેમકે ઉચા દવ્યનુ જ થાય છે, તેના સ કેતનુ નહિ લિપિ યુક્ત પુસ્તકો વગેરેમાં પણ વાચના વગેરે કઈ જ હેતુ નથી કેમકે તે જડ છે, ચેતનમા જ વાચના પૂરક વગેરે થાય છે એથી તેમાં કશુતતા માનવી સાવ અલગ છે એથી એ વાત ચોક-સ થાય છે કે અકાર વગેરે વર્ણરૂપથી સ કેતિત લિપિમા અને આ લિપિ વિશિષ્ટ પુસ્તક વગેરેમાં દ્રવ્યશ્રુતતા થોડી પણ સભવિત નથી અને બીજી પણ કે-અનુપયુકત હોવાથી અને ચરણગુણ શૂન્ય હોવાથી કબઘુતમા બ ધતા આવી જ પાકતી નથી ભાવકૃતમાં જ ઉપગ સહિત અને ચરણગુણ યુક્તતા હોવાથી વદતા આવે છે એટલા માટે દ્રવ્યથુનમા નમસ્કાર કરવાની કુપના કરવી બ્રાતિમૂલક જ છે " नमो वभीए ट्विीए" माना अर्थ પણ તે - ५०६ HTTधर्मकथाजस्त्र यत्तु-अभयदेवीयस्ता समाक्षरस्प द्रव्य श्रा नमनाद- णमो मीए लिपीए' इत्युक्त तद् भ्रान्तिमृल्पम् पुस्तकार्तिन्या जमारादिवर्णसकेतस्पाया लिपेद्रव्यश्रुतल न समाति यत श्रुत नाम दगातीपमहत्मपाचन शास्त्र यस्प कस्पचिजीनस्य शिसित स्थित जित यावद् पाचनोपगत माति म जन्तुम्तत्र वाचनामन् उनादिमिर्वर्तमानोऽपि श्रुतोपयोगाभागादागममाश्रित्य न्यश्रुतम् , आ भाव श्रुतरूप कहा गया है-वर अतमान और अनवान में अभेद के उपचार से ही कहा गया समझाना चाहिये । इसी रूप से ही भगवान ने अनुयोग द्वार में रथोपना आपत्यक और स्थापना भूत का कथन किया है। अत. लिपि में भारत की कल्पना से शुतज्ञान की स्थापना मानना कथमपि युक्ति सगत नही है। इसी प्रकार लिपि में दयनुतता भी नही आती है। क्यो कि हादशागीरूप अईत प्रवचन का नाम श्रुत है । श्रुतज्ञान का ज्ञाना जब उसमे अनुपयुक्त अवस्थानवाला है । तर वही आगम की अपेक्षा द्रव्यश्रुत कहा जाता है। सजाअक्षर रूप आकृति को द्रव्यश्रुत नही कहा है। इस कथन से इस बात की पुष्टि होती है कि-अभयदेश विरचित वृत्ति मे"णमो वभी लिपीग" इस पद का अर्थ सज्ञो अक्षररूप द्रव्यश्रुत परक मानकर जो नमस्कार किया गया है -वर भ्रान्तिमूलक है, क्यो कि पुस्तक में रही हुई मकेतित अकार आदि वर्ण की आकृति मे द्रव्यश्रुतता सभवित नहीं होती है । वाचना, पृच्छना आदि से अधिगत श्रुत मे अनुपयुक्तज्ञाता ही द्रव्यश्रुत है इसी અને નવાનમાં અભેદેપચારથી જ કહેવાયેલે સમજ જોઈએ આ રૂપથીજ ભગવાને અનુગદ્વારમાં સ્થાપના આવશ્યક અને સ્થાપના શ્રતનું કથન કર્યું છે એટલા માટે લિપિમાં ભાવથુતની કપનાથી શ્રુતજ્ઞાનની સ્થાપના માનવી કઈ પણ રીતે યોગ્ય નથી આ પ્રમાણે જ લિપિના દ્રવ્યતતા પણ આવતી નથી કેમકે દ્વાદશાગી રૂપ અહંત પ્રવચનનું નામ શ્રત છે આ કૃતજ્ઞ અને જ્ઞાતા જ્યારે તેમાં અનુપયુકત અવસ્થાવાળો હોય છે ત્યારે તે આગમની અપેક્ષાએ દ્રવ્યશ્રુત કહેવાય છે સત્તા અક્ષર રૂપ આકૃતિને કથન કહી નથી मा ४थनयी मा पातनी पुष्टी थाय छ : अलय विरचित वृत्तिमा " णमो ब भीए लिवीए " मा ५.ने। म सा अक्षर ३५ ३०५ श्रुत५२४ मानान આગ્યા છે તે જાતિમય છે, કેમકે પુસ્તકમાં રહેલી સ કેતિત અકાર વગેરે વર્ણની આકૃતિમાં દ્રવ્યથતતા ગભવિત નથી હોતી વાચના, પૂ૭ના વગેરેથી અધિગત કુતમાં અનુનયુકત જ્ઞાતા જ જે નમસ્કાર કરવામાં થત છે ४०९ अनगारधर्मामृतषिणो टी० म० १६ द्रोपदीचा भावलिपि प्रति समुपजातभक्तिः श्रीसुधर्मा मामी लिपिज्ञानरय माहात्म्य प्रकट- यन् भावश्रुत पनि भारलिपे कारणतयाऽभ्यर्हितत्वेन तत पूर्व भापलिपिवन्दन कृतवान् , तत्पश्चाद् भाषश्रुत नमस्कुवादीत् ' नमः मुयस्म ' इति । यत्तु-अभयदेवसरिणा म्बकृतटीमायामुक्तम् ' जिणपडिमाण अच्चण रेद' ति एक्स्या वाचनायामेतावदेव टश्यते । वाचनान्तरे तु-'हाया जाच सवाल कारविभूसिय मज्जणघराओ पडिनिक्समइ पडिनिश्खमित्ता जेणामेव जिणपरे तेणामेव उपाग-3 उपगच्छित्ता जिणवर अणुपविसह २ ता, जिणपडिमाण समहरूप श्रुत को लिपिबद्ध करने की इच्छा से श्री सुधर्मास्वामी कि जिन की भक्ति श्रुतचोक भावलिपि के प्रति जागृत हुई है लिपिज्ञान के महात्म्य को प्रकट करते हुए भाववत को नमस्कार करने के पहिले भावलिपि को ही नमस्कार करते हे क्यों कि भावशुत के प्रति भाव लिपि को ही कारणता है, और इसी निमित्त रो यह उमकी अपेक्षा पूज्य मानी गई है भावलिपि को नमस्कार करने के पश्चात् ही उन्हो ने नम-सुयस्स" भावशून को नमस्कार इस सूत्र द्वारा किया है। "जिणपडिमाण अञ्चण करेइ" इस पाठ को लेकर जो टीकाकार अभयदेव सरि ने जिनप्रतिमा कि पूजन करने की बात कही हे-सो ठीक नही है। क्यों कि मालूम होता है, कि उन्हें मूल पाठ का निश्चय ही नहीं हुआ है-कारण कि एक वाचना मे तो यही पाठ मिलता है-तब कि दूसरी वाचना में "हाया जाव सव्वालकारविभूसिया मजण राओ पडिमिग्वमई, . जेणामेव जिणघरे तेणामेव उवागच्छद, २ પ્રતિપાદન કરનારા શબ્દોના સમૂહરૂપ શ્રતને લિપિબદ્ધ કરવાની ઈચ્છાથી શ્રી સુધર્મા સ્વામી-કે જેમની તબેધડ ભાવલિપિ પ્રત્યે ભક્તિ ઉત્પન્ન થઈ છે-લિપિ રનના માહાભ્યને પ્રગટ કરતા ભાવકૃતને નમસ્કાર કરતા પહેલા ભાવલિપિ ને જ નમસ્કાર કર્યો છે કેમકે ભાવથુન પ્રત્યે ભાવલિપિ જ કાણુતા છે અને આ કારણથી જ આ તેના કરતા પૂજ્ય માનવામા આવી છે ભાવવિપિને નમ સ્કાર કર્યા બાદ જ તેમણે नम सुयस्स સૂવ વડે ભાવBતને નામ २४१२ छ " जिणपडिमाण अपचण करई આ પાઠના આધારે જે ટીકા- વાર અભદેવસૂરિએ જનપ્રતિમાની પૂજાની વાત કહી છે તે ખ્ય નથી કેમકે તેમને મૂળ પાઠને નિશ્ચય જ થયો નથી એમ જણાઈ આવે છે કારણ કે એક વાચનામ તે એ જ પાઠ મળે છે ત્યારે બીજી વાચનામા- (हाया जार सवाल कारविभूसिया मजणघराओ पडिनिसमई २ जेणा मेव जिणघरे तेणामेव आगच्छई, २ जिणधर अणुपविसइ, जिणपडिमाण आलोए . આ " ४०८ हाताधर्मकपा प्राप्तीशम्भस्य भाषार्थ कस्यात् , उाव चामरकोगे-'प्राणी तु भारती भाषा गीर्यान् पाणी सरस्वती' इति । यद्वा-अष्टादशपकारा लिपि श्रीमन्नाभयजिनेन वामीना मिका समुना पदर्शिता तस्मात् सा लिपिनामीत्युन्यते । विपिशानस्य श्रुतज्ञा नोपयोगितया भापश्रुनहेतु लिपिशानरुप भापलिपि बन्दमान श्रीमुधर्मा स्वा मी माह-नमो वभीए लिपीए' इति । अतज्ञान प्रति विविज्ञान पारण, यतो लिपिज्ञानेन वत्स केतितशब्दम्मरण, वस्तदर्यज्ञान जायते । तस्माद् भगदुक्ता थस्य प्रतियोधनाय तन्दोधमादनावरूप चुन लिपिरद्ध तुकाम* श्रुतगोधिका लिवी" इसका अर्थ इस प्रकारसे सगन धैठना है-अमार जादि वर्णा स्मक भापा के सफेतरूप लिपि का नाम नामी लिपि है-नामी शब्द इस अर्थ में प्रयुक्त हुआ है अमर कोप में भी यही पात कही है-"वामी तु भारती भापा गीर्वाग् वाणी सरस्वती"। अधश-श्री आदिनाथ प्रभु ने अपनी ब्राझी नाम की पुत्री को १८ प्रकार की लिपि कही थी इसलिये भी उस लिपि का नाम ब्रामी लिपि इस प्रकार से पड़ गया है । श्रुतज्ञान में उपयोगी होने से हम लिपि के ज्ञान को भावभुन का कारण माना है। इसलिये लिपि ज्ञानरूप भाव लिपि को वदन करते हुए श्री सुधर्मा स्वामी करते हैं " नमो यभीए लिवीए"। श्रुतज्ञान के प्रति लिपि ज्ञान कारण है-क्यों कि लिपि के ज्ञान से अकारादि वर्णा स्मक लिपि रूप से सकेतित उस उस शब्द का स्मरण होती है और उससे उसके अर्थ का ज्ञान होता है । अत. भगवान द्वारा प्रतिपादित अर्थ को समझाने के लिये उस अर्थ का प्रतिपादन करने वाले शब्दों के ભાષા આ આ પ્રમાણે સુસ ગત બેસી શકે છે કે-અકાર વગેરે વર્ણાત્મક ભાષાના સંકેત રૂપ લિપિનું નામ બ્રાહ્મી લિપિ છે બ્રાહ્મી શબ્દ અર્થમાં પ્રયુકત थ। छे अमरशमा ५९१ पात उवामा भावी है " ब्रह्मी तु भारती भाषा गोर्शगवाणी सरस्वती " अथातोश्री माहिनाथ प्रभु पातानी બ્રાહ્મી નામની પુત્રીને અઢાર પ્રકારની લિપિઓ બતાવી હતી એટલા માટે પણ આ લિપિનું નામ બ્રાહ્મી લિપિ પડી ગયુ છે કૃતજ્ઞાનમા ઉપયોગી હોવાથી આ લિપિના જ્ઞાનને ભાવથતનું કારણ માનવામાં આવ્યું છે એથી લિપિશાન ३५ लापलिपिन १६४२॥ श्रीसुधास्वामी ४ "नमो ब भीए लिवीए" શવજ્ઞાનના પ્રતિ લિપિત્તાન કારણ છે કેમકે લિપિના જ્ઞાનથી અકાર વગેરે વર્ણાત્મક લિપિ રૂપથી સ કેતિત તે શકનું સ્મરણ થાય છે અને તેનાથી તેના અર્થનું જ્ઞાન થાય છે એટલા માટે ભગવાન દ્વારા પ્રતિપાદિત અર્થને સમજાવવા d , अंगराधामृनपणी टीका० १० १६ द्रौपदीचर्चा तदनन्तर पुनः प्रतिमापूजकैः स्वीकृते-मूलपाठे-'तिश्युचो मुद्राण वरणि- यलसि नमेड' इति दृश्यते, 'नमेई' इत्या टीकाहारः-'निवेसेइ' इतिलिखित्वा निवेशयतीत्यर्थ उक्त', तेनान-मूल्पाठस्य स्वस्वकपोलकल्पितत्व सि-यति, द्रौप- द्याथरित टीकाकृताऽमयदेवमूरिणा पुनरीदृशः पाठो लब्धः- 'ईसि पच्चुम्नमति २त्ता, करयन जाप कटु एष वयामी-नमोत्यु ण अरि- हत्ताण मगरताण जाव सपत्ताण उदइ नमसह२ जिपपरानो पडिनिखमह' इति इम पाठ टीकाया विलिरय टीकाकार प्राह- 'तत्र वन्दते चयवन्दनपिपिना प्रसिद्धन,नमरयति पश्चात् मणि पानादियोगे- नेनि रद्धाः । न च द्रौपद्या प्रणिपातदण्ड गान चैत्यान्दनममिहित बने इनि सुत्र- में जैसा पाठ रचा है उसने उसी प्रकार मूल पाठ में जिन करपना का पाठ प्रक्षिप्त करके पाठ भेद कर दिया है। अतः स्वकपोलकल्पित होने से असली मूल पाठ का निश्चय ही नहीं होता है, द्रौपदी ने चरित में टोलकार अमयदेवसूरि को इस प्रकार को पाट उपलब्ध हुमा-ईसि पच्चुन्नमति २, करयल० जाय कट्टु एव बयासी-नमोत्युण अरिहताणं भगवताण जाव लपत्ताण चदड, नमसइ २, जिणघराओ पडिनिक्खमह इति" पाठ यो लिखकर उन्हो ने टीका की । वन्दते-नमस्यति पद के अर्थ का खुलाशा करते हुए वे कहते है कि प्रमिद्ध चैत्यवंदन विधि के अनुसार नमन करना बदा और इसके बाट प्रणिधान आदि के योग से नमस्कार करना नमन हे ऐसा सिद्वान्त वृटों का है। सूत्र मे जर द्रौपदी का प्रणिपात दृण्डर मात्र चैत्वादन कही है-अर्थात् दण्ड की तरह प्रणाम करने रप चैत्यवदन जरा गया है-तो इसी से यह કઈ ઉમેરે કરીને પાઠ ભેદ કરી નાખે છે એટલા માટે સ્વકપોલકલ્પિત હોવા બદલ અસલ મૂળપાઠનો નિશ્ચય જ થઇ શકે તેમ નથી દ્રૌપદી ચરિતમા Asst२ मलयसरिना मा andal पा० भन्यो -(इसिं पच्चुनमत्ति २, करयर० जार करटु पत्र वयासी-नमोत्थुण अरिह ताण भाव ताण जाव स पत्ताण उदइ, नमस: २, मिणवराओ पडिनिस्समइ इति ) मा पाइने समान तेभो टरी १ 'व- नमस्यति' पहन! अर्थ स्पष्टीsong ४२ તેઓ કહે છે કે પ્રસિદ્ધ ચિત્ય વદન વિધિ મુજબ નમન કરવું વદના અને ત્યારપછી પ્રાણવાન વગેરેના ચગથી નપકાર કરે નમન છે, વૃદ્ધોને આ જાતનો સિદ્ધાન્ત છે મૂત્રમા જ્યારે પ્રણિપાત દડક માત્ર ચિત્યવદન કહ્યું છે ત્યારે એનાથી જ આ વાત સિદ્ધ થઈ જાય છે કે બીજા ત્રાવને પણ આ . . - ४१० बालारामकथा आलोए पणाम फरेइ २ गा, लोमहत्यय परामुमा सा, जहा मृरियामी जिणपडिमाओ अचेइ तदेव माणिव जाधून सहर' नि । तेन मूल्याटस्य निश्यत्तस्य नाभूदिति विशागते । अत' पर च-नाम जाणु अप्रेड दारिण जाणु धरणियलमि णिवेसेइ २ इति प्रतिमापूजन यीनो मृम्पाटस्ता वर्तते, टीकाकारस्तु- दाहिण जाणु धरणीतलसि निहट' ति पाट टीकाया सिलिण्य निगदति-'निट' निहत्य स्थापयिन्त्यर्थः, 'णिवेसेड ' इत्यत्र-निदु ' इति पाठभेद' पत्तः । तेना प्येतद् विदित गाति-यस्य यादृश मनम्यभिरुचित स तारगामिह मूत्पाठ पर ल्पयति स्म इति । जिणघर अणुपविसह जिणपडिमाण आलो पगाम करेड, २ लोमहत्थय परामुस, २ एव जासूरियामो जिनपडिमाओ अच्चे तहेच माणि यव्य जाव धूव इ"त्ति यह पाठ मिलता है । इसके बाद " वाम जाणु धरणियलनि णिवेसेड"ऐसा पाठ मिलता है-और यही पाठ प्रतिमा पूजको को समत है। परन्तु टीकाकार श्री अभयररि ने “ दारिण जाणु धरणीतलसी निटूट ' रोमा पाठ टीकामें रखकर 'निहट्टु' इस पद की टीका " स्थापना करके " ऐसी की है। इस प्रकार "णिवेनेइ" की जगह 'नि१' ऐसा पाठ भेट किया गया है। इसी प्रकार प्रतिमा पूजको द्वारा स्वीकृत "तिम्खुत्तो मुद्धाण वरणियलसि नमेड" इस मूल पाठ में भी परिवर्तन "नमेड" किया पद में निवेशयति" इस रूप से कर दिया है। इससे यह बात निश्चित रोती है कि जिस के मन पणाम करेइ, २ लोमहत्यय परामुसइ, २ एव जहा सूरियामो जिनपडिमाओ अच्चेइ तहेव भाणियव्य जार धून डहइ) त्ति, આ પાઠ મળે છે ત્યારપછી वाम जाणु धरणियल सि णिवेसेड २ આ જાતને પાઠ મળે છે અને એ જ પાઠ પ્રતિમા પૂજાના તરફદારીઓને માટે समत ३५ छ पा२श्री मलयवसूरिय " दाहिण जाणु धरणीतल सो या तो पा3 Astn 1 " निहटु ": 2m पहनी Ast- સ્થાપના કરીને આ પ્રમાણે કરી છે "णिवेसेइ" निहट्टु ” આ જાતનો પા ભેદ કરવામાં આવ્યો છે આ રીતે જ પ્રતિમા पूजन तारीमा 43 स्वीकृत (तिम्सुत्तो मुहाण धरणीतल सि नमेइ ) मा મૂળપાઠમાં પણ नमेइ "निवेशयति "'t andनु ५० વર્તન કરી નાખ્યું છે. આથી આ વાતની ખાત્રી થ ય છે કે જેના મનમાં જે પાઠ ગયે તેણે તે પ્રમાણે જ ફાવે તેમ પિતાની ક निहट्टु" આ રીતે ના સ્થાને " यापहमा પ૦માં नगारधर्मामृतयपिणी टी०म०१६ द्रौपदीचर्चा नानि विपिनिपेयसाधकानि भवन्ति अन्यया सूर्यादेवादिवक्तव्यताया पहूनां शस्त्रादिवस्तूनामर्चन भूयते इति तदपि विधेय स्यात् ।। अत्रेद यो यम्-'न च द्रौपया प्रणिपातदण्ट कमात्र चैत्यवन्दनमभिहित सो इत्यादि पायसन्दर्भण टीकाकारेणाभयदेवसरिणा द्रौपद्या पन्दनमेव कृत न तु पूजनादिकमिति पोधयता तावाने पाठः स्वीकृत इति । तरमाद् विधिरूपण प्रति मापूजनाय भगनतोऽहंत आज्ञा न लभ्यते इति यादस्तापदास्ताम् , चरितानुवाद- रूपेणापि शास्त्रे भगवताऽहत्प्रतिमापूजन कापि नोक्तमिति सिद्धम् । एव चायमे- है चरितानुवादरूप वाक्य में विधि और निषेध बोधकता सभवित नही होती है इसी ध्येय से " न च चरितानुवादवचनानि विधिनिषेध साधकानि भवन्ति" ऐमा माना जाता है नहीं तो फिर, सूर्याभदेव द्वारा जिस प्रकार बहुत शस्त्र आदि वस्तुओं का पूजन करना सुना जाता है उसी प्रकार प्रतिमा पूजकों के लिये भी इनका पूजन विधेय मान लेना चाहिये। भावार्थ-" न च द्रौपद्याः प्रणिपातदण्डकमात्र चैत्यवदनमभिहित सूत्रे" इत्यादि वास्य के द्वारा टीकाकार अभयसरि ने इतना ही पाठ स्वीकृत किया है कि द्रौपदी ने मिर्फ वदना ही की है, पतिमापूजन नही इसलिये हमसे यह बात सिद्ध हो जाती है जब चरितानुवाद रूप से भी शास्त्र में कही भी भगवान ने अहंत की प्रतिमा का पूजन नही कहा है । तब विधिरूप से प्रतिमा पूजन के लिये भगवान अर्हत की आजा है ऐसी मान्यता कोरी कल्पनामात्र ही है। इस प्रकार स्थानक- કાઈ પણ સ્થાને કરી નથી ચરિતાનુવાદ રૂપ વાકયના વિધિ અને નિષેધ माधाता ससक्ति यती नथी मा व्ययथा (न च चरितानुवादरचनानि विधि निपेधसापकानि भवन्ति ) म भानपामा भाव छे नडित२ ५छी सूर्यालय વડે જેમ ઘણા શસ્ત્રો વગેરે વસ્તુઓની પૂજા કરેલી વાત સભળાય છે તેમજ પ્રતિમા પૂજકોના માટે પણ એમની પૂજા વિધેય રૂ૫મા માની લેવી જોઈએ भावार्थ:-" न च द्रौपद्या प्रणिपातदण्डकमान चेत्या दनमभिहित सूत्रे વગેરે વાક્ય દ્વારા ટીકાકાર અભયદેવસૂરિએ આટલા પાઠને જ બીકાર કર્યો છે કે દ્રૌપદીએ ફક્ત વદના જ કરી છે પ્રતિમા પૂજા નહિ એથી આ વાત સ્પષ્ટ રીતે સિદ્ધ થઈ જાય છે કે જયારે ચરિતાનુવાદ રૂપથી પણ શાસ્ત્રમાં કઈ પણ સ્થાને ભગવાને અહં તની પ્રતિમાના પૂજન વિષે કહ્યું નથી ત્યારે વિધિ રૂપથી પ્રતિમા પૂજન માટે ભગવાન અહંતની આજ્ઞા છે એવી માન્યતા માત્ર જ છે આ પ્રમાણે સ્થાનકવાસી સંપ્રદાયની આ માન્યતા " A - - ४१२ साताधर्मकपाशी मामाण्यादन्यस्यापि थापादेस्तायदन निति मन्तव्य, परिवानुवादरूपत्वादस्य, इति ।न चेत्यस्य मन्तव्यमित्यत्रावयः। द्रौपदी मणिपात-परमात्र-दण्ड यत्मणा ममात्ररूप चैत्यान्दन-प्रतिमायन्दन तपतीत्यर्थ उधाऽन्योपि थापफ एतत्सूत्र प्रमाणमाश्रित्य तापदेव तत् मणिपातदण्डकमात्र पन्दन पुर्यादिति न मन्तव्यम् , तत्र कारणमाद 'चरितानुपादम्पत्पादस्य ' इति । अन्य तत्सूत्रस्य चरितान पादरूपत्वाद ज्ञातप्रदर्शकतया यथाटत्तस्य उत्तन्यरितस्यानुनादरूपसात् , न तु भगवता 'जय चरे जय चिह' इत्यादिवत् कचिदा प्रदत्ता। तम्मादस्य विधिनिषेधयोपरत्व न समपतीत्याह-'नच चरितानुवादवच पात भी सिद्ध हो जाती है कि अन्य श्रावकों को भी इसी प्रकार वन्दन नमन करना चाहिये-सो इस प्रकार का क रन ठीक नहीं है। कारण कि यह चरितानुवाद रूप है। भावार्थ-कोई अन्य नायक जन ऐसासमझकर किसूत्रमे जब द्रौपदी ने दण्टकी तरह होकर चैत्यवदन किया है तो इमी सूत्रकी प्रमाणता लेकर हमें भी इसी तरहसे प्रणाम करना चाहिये सो इस प्रकार की मान्यता उनकी ठीक नहीं है कारण कि यह चरित का ही अनुवादक है। चरितका अनुवादक वाक्य विधेयरूप से मान्य नहीं होता है । यह सत्र चरित का अनुवादक रूप हे इसका यह भाव है कि यह वाक्य ज्ञात अर्थ का प्रदर्शक होने से पहिले जो जो बातें २ जिस २ रूपमें हो चुकी हैं उन सब का अनुवादक रूप है। जय चरे जय चितु" इत्यदि सूत्र की तरह यह विधि वाक्य नही है। इसीलिये भगवान ने प्रतिमा के पूजन और बदना, नमन करने आदि की आज्ञा कही भी सूत्र में नही दी પ્રમાણે જ વદન નમન કરવા જોઈએ તે આ જાતનું કથન એગ્ય નથી, કેમકે આ ચરિતાનુવાદ રૂપ છે ભાવાર્થ—ગમે તે શ્રાવક આમ સમજીને કે સૂત્રમા જ રે દ્રોપદીએ દડાકારે થઈને ચેત્ય વદન કર્યું છે તે આ સૂત્રને જ પ્રમાણે સ્વરૂપ માનીને અમારે પણ આ પ્રમાણે જ પ્રણામ કરવા જોઈએ તે તેમની આ વાત પણે ઠીક કહી શકાય તેમ નથી, કેમકે આ ચરિતનો જ અનુવાદક વાકય વિધેય રૂપમાં માન્ય હોતું નથી આ સૂત્ર ચરિતને અનુ વાદક રૂપ છે આનો ભાવ એ છે કે આ વાય જ્ઞાત અર્થમાં પ્રદર્શક હવાથી જે જે વાતે જે રૂપમા થઈ ચૂકી છે તે બધાનુ અનુવાદક રૂપ છે- 'जय चरे जय चिट्रे" त्यादि सबनी सभा विधिकार અનુવાદક છે ચરિતનું नगारधर्मामृतयपिणी टी० १० १६ द्रौपदीचर्चा ४१३ - नानि विपिनिपेवसाधकानि भवन्ति जन्यथा सूर्यादेवादिवक्तव्यताया बहूना शस्त्रादि वस्तूनामर्चन भूपते इति तदपि पिवय स्यात् ' । अद यो यम्-' न च द्रौपचा प्रणिपातदण्टकमान चेत्यचन्दनमभिहित सूत्रे इत्यादि पाग्यसन्दर्भेण टीकाकारणाभयदेवसरिणा द्रौपद्या पन्दनमेव कृत न तु पूजनादिकमिति पोधयता तावाने पाटः स्वीकृत इति । तस्माद् विधिरूपण प्रति मापूजनाय भगनतोऽर्हत आज्ञा न लभ्यते इति नादम्तापदास्ताम् , चरितानुवाद- रूपेणापि शास्त्रे भगवताऽईत्पतिमापूजन कापि नोक्तमिति सिद्वम् । एव चायमे- है चरितानुवादरूप वाक्य में विधि और निषेध बोधकता सभक्ति नहीं होती है इसी व्येय से " न च चरितानुवादवचनानि विधिनिषेध- माधकानि भवन्ति " ऐमा माना जाता है नहीं तो फिर, सूर्याभदेव द्वारा जिस प्रकार बहुत शस्त्र आदि वस्तुओं का पूजन करना सुना जाता है उसी प्रकार प्रतिमा पूजकों के लिये भी इनका पूजन विधेय मान लेना चाहिये। भावार्थ न च द्रौपद्या. प्रणिपातदण्डकमात्र चैत्यवदनमभिहितं सूत्रे" इत्यादि वाक्य के मारा टीकाकार अभयसूरि ने इतना ही पाठ स्वीकृत किया है कि द्रौपदी ने सिर्फ वदना ही की है, पतिमापूजन नहीं इसलिये इससे यह बात सिद्ध हो जाती है जब चरितानुबाद रूप से भी गास्त्र में कही भी भगवान ने अहंन की प्रतिमा का पूजन नहीं कहा है । तब विधिरूप से प्रतिमा पूजन के लिये भगवान अर्हत की आजा है ऐनी मान्यता कोरी कल्पनामात्र ही है। इस प्रकार स्थानक- કાર્ડ પણ સ્થાને કરી નથી ચઢિાનુવાદ રૂપ વાકયના વિધિ અને નિષેધ माध ता ससक्ति यती नथी भी व्येयथा (न च चरितानुवादवचनानि विधि- निषेधसाघकानि भवन्ति ) सेम भानपामा मावे छे नडितर ५४ी सूर्यालय વડે જેમ ઘણુ શસ્ત્રો વગેરે વસ્તુઓની પૂજા કરેલી વાત સંભળાય છે તેમજ પ્રતિમા પૂજકોના માટે પણ એમની પૂજા વિધેય રૂપમાં માની લેવી જોઈએ न च द्रोपद्या प्रणिपातदण्टकमान चैत्या दनमभिहित सूत्रे વગેરે વાક્ય દ્વારા ટીકાકાર અભયદેવસૂરિએ આટલા પાઠને જ સ્વીકાર કર્યો છે કે દ્રૌપદીએ ફક્ત વદ જ કરી છે પ્રતિમા પૂજા નહિ એથી આ વાત પષ્ટ રીતે સિદ્ધ થઈ જાય છે કે જ્યારે ચરિતાનુવાદ રૂપથી પણ શાસ્ત્રમા પણ સ્થાને ભગવાને અર્વતની પ્રતિમાના પૂજન વિષે કહ્યું નથી ત્યારે વિધિ રૂપથી પ્રતિમા પૂજન માટે ભગવાન અહંતની આજ્ઞા છે એવી માન્યતા ફક્ત કેપના માત્ર જ છે આ પ્રમાણે સ્થાનકવાસી સંપ્રદાયની આ માન્યતા सावाथ- “ . ४४ पाताधर्मकथा तभूप' स्थानकमासिना सिद्धान्तः शायानुकूल. सत्य इति निनीयताम् । जहद्वन्द नमपि द्रौपचा न हमित्यग्ने सममाण निग्पगिप्याम | किं च-प्रतिमापूजयाना प्रमाणभृते महानिशीथगनेऽपि 'प्रतिमापूजायाः सावतया तदर्थ जिनालयरिधान मात्र मननीति मत्वा दयलिसिभिः पृप्टेन कुवलयप्रमनाम्नाऽनगरेण निगटिरा गमिद नाद नामानेगापि " इति । तदेवमनेन भणतासता ती फग्नामगोत सिनितम् । परभारोपीचनश्च भगोदधिः । ततस्तैः सारेकमत कृत्वा तस्य नावाचार्य इति नाम दत्त प्रसि द्धिनीत च । इति प्रतिनोधितम् । चासी सप्रदाय की यह मान्यता निर्दोष व शाखानुकल और सत्य है कि अर्हत की प्रतिमा बनाकर पूजना शान्न रितमार्ग से विपरीत मार्ग है । अहंत की प्रतिमा की वन्दना भी द्रोपदी ने नहीं की है इस यात को भी हम आगे प्रमाण देकर पुष्ट करेंगे। किञ्च-प्रतिमापूजको द्वारा प्रमाणरूप से स्वीकृत महानिशीथ सूत्र में भी यरी समझाया गया है कि प्रतिमापूजन स्वयं एक सावद्यकर्म है, उसके निमित्त जनालय आदि बनवाना भी सावधर्म ह । ऐसा सम झकर-कुवलयप्रभनामक आचार्य ने द्रव्य लिंगियों द्वारा पूछे जाने पर यही उत्तर दिया है कि ये सब सावद्यकर्म है, में अपने बचनी से भी इस विषय का जरा भी मडन नहीं कर सकता" इस प्रकार करने वाले उन कुवलयप्रमनामक आचार्यने तीर्थकर नाम गोत्र कर्म उपार्जन करके एकभयावतारी बने। सावधकर्म निषेध करने वाले होने से નિર્દોષ તેમજ શાસ્ત્રાનુલ અને સત્ય છે કે અહીં તેની પ્રતિમા બનાવીને પૂજવી શાસ્ત્રવિહિત માર્ગથી ઉલટ માર્ગ છે અઈતની પ્રતિમાની વદના પણ પ દીએ કરી નથી, આ વાતને પણ અમે આગળ સપ્રમાણસિદ્ધ કરવા પ્રયત્ન કરીશુ અને બીજુ પણ કેપ્રતિમા પૂજક વડે પ્રમાણ રૂપે સ્વીકૃત મહાનિશીથ સૂત્રમાં પણ એ જ વાત સમજાવવામાં આવી છે કે પ્રતિમા પૂજન જાતે એક સાવધ કર્મ છે તેના નિમિત્તે જીનાલય વગેરે બનાવવા તે પણ સાવદ્ય કર્મ છે એમ જાણીને જ કુવલયપ્રભ નામના આચાર્યે કલિંગિઓ વડે પૂછાએલા પ્રશ્નના ઉત્તરમાં આ પ્રમાણે જ કહ્યું છે કે આ બધુ સાવચકર્મ છે હું મારા વચનથી પy આ વિષયનું જરાય પણ મડન કરી શકું તેમ નથી આ રીતે કહેનાર તે કુવલયપ્રભ નામક આચાચે તીથ કર નામ ગોત્રકમ ઉપાઉન કરીને એક ભવાવતારી બન્યા સાવદ્યકર્મ નિષેધ કરનાર હોવાથી તે ન - अनगारधामृतवपिणी टी० अ० १६ द्रौपदीचर्चा ४१५ भगवान् श्री पर्वमानस्सामी गौतम प्रति स्थयति-'जस्या ऋपमादिचतुर्वि- शतिमायाः प्राक अतीतकालेन याऽतीता चतुर्विशतिका, तरया मत्सरश सप्तहस्त- तनुर्धर्मगीनामा चरमतीर्थदरो भून तस्मिंश्च तीर्थङ्करे सप्ताश्चर्याणि अभूवन् । असयतपूजाया प्रत्तायामने के आदेभ्यो गृहीतद्रव्येण स्वस्वकारितचैत्यनिवासि नोऽभवन , तत्रैको मरकत-उपिः कुपलयमभनामाऽनगारो महात परबी उग्रचिधारी शिष्यगणपरिवृत्त समागात , तैन्दित्वोक्तम् , तदेव तस्वमारण प्रदर्श्यते, तथा हि--महानिमीयम पञ्चमान्ययने- जहा ण भया जड तुममिहार एगवानारत्तिय चाउम्पासिय पउजियताण- मिन्छा अणेगे चेइयालया गति नूग तज्झाणणत्तीए ता पीरउ अणुग्गहमम्हाण उन चैत्यवासियो ने मिसार उनका नाम 'सावयाचा' रस दिवा, और प्रसिद्ध भी कर दियो । जैसे-भगवान् श्री वर्बमानस्वामी गौतम प्रति करते हैं-इस पभादि चौवीसी के पहले भूतकालमें जो चोवीसी होगई हे उस चौपोनीमे मेरे जैसा सात हायप्रमाण शरीर वाला धर्म श्री नामका अतिम तीर्थकर हो गया है, उस तीर्थकर के सत्रयमे सात आश्चर्य असयतपूजा" नामका एक आश्च यथा । उस असयतपूजाकी प्रवृत्ति होनेपर बहुतले साधु श्रावको के पैसो रो अपने अपने चनबारे हुवे चैत्योमें निवास करते थे अर्थात् चैत्यवासी हो गये थे, बता पर एक याम कांतिवाले कुवलयप्रभ नाम के मुनि महातपस्वी उग्रविहारी शिग्यपरिवार सहिन पधारे थे, उनको उन चैत्यदानियो ने वदना कर के जो कहा सो इस प्रकार है । जिस पाठ का यह कथानक है वह पाठ इस प्रकार है- તેમનું સાવધાચાર્ય એ પ્રમાણે રાખ્યું અને પ્રસિદ્ધ પણ કર્યું જેમકે ભગવાન શ્રી વર્ધમાનસ્વામી ગૌતમને કહે છે કે-આ રુષભાદિ ચીને સીના પહેલા ભૂતકાળમાં જે વીમી થઈ ગઈ છે તે વીસીમાં મારા જેવા સન હાથ પ્રમાણ શરીરવાળા ધર્મશ્રી મના છેલ્લા તીર્થ ડર થઈ ગયા છે તે તીર્થકરના સમયમાં સાત આશ્ચર્યો થયા હતા, તેમાં અમ થતપૂજા નામનુ એક આશ્ચર્ય હતુ તે અમયત પૂજાની પ્રવૃત્તિ થઈ ત્યારે અનેક સાધુ- શ્રાવકોના પૈસાથી પિતપિતાના માટે બનાવરાવેલા ચમા વાસ કરતા હતા અર્થાત્ ત્યવાણી થઇ ગયા હતા ત્યા એક ગ્યામ વર્ણવાળા કુવલયપ્રભ નામના મુનિ મહારાજ કે જેઓ મહા તપસ્વી, ઉગ્ર વિહારી હતા, તેઓ પિતાના શિષ્ય પરિવાર સહિત ત્યા પધાર્યા હતા તેમને તે ચૈત્યવાગીગાએ વદન કરીને જે કહ્યું તે આ પ્રમાણે છે- हुए थे, उनमे ॥ નામ भानाधर्मपाल इहेर चाउम्मासिय । ताहे भगिय तेण माणुगागेण - गोयमा जहा भो भो पियाए ! जानि निणाप तहा शिसारजमिण माह पायामितण पि आयरिज्जा । प न समपसारपर तर जट्रिय विपरीत णीमरु गणमाणेण तेसि पिन्छदिष्टिलिंगीण साहूयेसधारीण मज्झे गोगमा ! आरापलिय नित्ययर नामसम्म गोय तेणं कुश्लयप्पभेग, एगमगार मेगीरको गोयही ।। इति । छाया-यथा खलु भगवन् ! यदि त्वमिहापि एकरात्रिक चातुर्मासिक प्रयो रवणामिछपा अने के चत्पाल्या भवन्ति नून । तयानातवा तस्मान् करोतु अनुग्रहमस्माम् व चातुर्मामियम् । तदा गणित तेन महानुभागेन - गौतम । यथा भा भो पियवदाः । यद्यपि जिनालय , तापि सावधमिद नाह पाहमाने णापि आचरामि । एप च समयमारनर तत्व यथास्थितम् अविपरीत नि शङ्क भणता नेपा मि पादृष्टिलिजिना साधुपधारिगा मध्ये गौतम । आसकलित तीर्थ करनामगगोत्र तेन कुवन्याभण एकभारोपी कृती भनोदधिः ॥ इति " जरा ण भयव ' जह तुममिशाह एकरासारत्तिय चाउम्मा सिय पउजियताणमिच्छाए अणेगे चेडयालया भवति तृण तज्माण पत्ती, ता कीरउ अणुग्गहमम्हाण इहेव चाउमामिय । ताहे भणिय तेण महाणुभागेण गोचमा! जहा मो भो पियवए जदवि जिणालए ता वि सावजमिण णा यापामित्तण पि आयरिजा समयमारपर तत्त जट्ठिय अविपरीत णीसक भणमाणेण तेसिमिच्छद्दि द्विलिंगीण साट्वेसधारीण मज्डो गोयमा! आसकलिय तित्थयरनाम गोत्त तेण कुवलयप्पभेण एगभवावसेसीकओ भयोयी। इति (महा निशीय पञ्चम अध्ययन ) इस सूत्रका भावार्थ इस प्रकार है- हे भगवन् । आप यहा एक वरानिक चारमहिने ठररे - जहा ण भयर | जइ तुमभिहाइ एकरासारत्तिय चाउम्मासिय पठ जिय ताण मिच्छाए, अणेगे चेइयालया भव ति नूण तज्झाणत्तिए ता कोरउ अणुग्गहम्माण इहेब चाउम्मासिय । ताहे भणिय तेण महाणुभागेण गोयमा । जहा भो मो पिय वए जइपि जिणालए तहावि सावजमिण णाह वायामित्तेण पि आयरिखना । समयसारपर तत्त जट्ठिय अविपरीत जीसक भाणमाणेग तेसि मिच्छदिद्विलि गीण साहुवेसधारीण मज्झे गोयना ? आसकलिय तित्थयरनामगोत्त तेण कुपलयरमेण एगभवावमेसीको भतोयही । इति (महानिशीथ पञ्चम अध्ययन) मा सूत्रनालापाथ मा प्रभाव छ एव मनगारधर्मामृतपिणी टी० अ० १६ द्रौपदीचर्चा ४२७ हेभगवन् ! -ह यदि या सलु स्वम् एकपाराविक चातुर्मामिक तिष्ठसि प्रयोक्तृणाम् प्रवर्तकानाम् दया-आज्ञया अनेके चैत्यालपा नून भवन्ति भपि- प्यन्ति, तत् नम्माद् निवासार्थमाशामुपादाय इहेर चातुर्मासिक दुरु तावदस्माक मनुग्रह कुरु भवदीयाज्ञया वहपश्चैत्याल्या भविष्यन्ति । ततश्चास्माकमुपकारः क्रिय- तामिति भावः । तदा तेपा सानधनाया प्रवृत्ताना द्रव्यलिगिना वचन श्रुत्वा तेन महानुभावन कुपलयमभनाम्नाऽनगारेण भणितम्-उक्तम् , यथा-भो भो मिय बदा । भो देवानुमिया' ! यद्यपि जिनालय , तथापि सावद्यमिद जिनभवने कृते -अर्थात यही पर चौमामा व्यतीत करे । प्रवर्तकों की आज्ञा से यहां पर अनेक चैत्यालय न जायेगे । उस लिये आप यही पर चौमासा व्यतीत करने का अनुग्रह करें। हमारे ऊपर आपका वडा ही अनुग्रह होगा । आपके उपदेश से निश्चय समझिये अनेक चैत्यालयों का निर्माण हो जायगा। इस प्रकार से उन व्यलिंगियो से प्रार्थित होने पर भानुभाव अवलयप्रभ आचार्य ने कहा कि हे देवा नुप्रिय ! ययपि तुम जिनालय के विषय मे करते हो-परन्तु-मै इस कार्य को रचाने में श्रेय नहीं देखता-कारण कि यह सावद्यकार्य है जिन भवन बनवाना और उसके बनवाने की प्रेरणा करना इन दोनों प्रकार की प्रवृत्तियों में पृथिवीकाय आदि छह प्रकारके जीवों की विराधना होती है इसी प्रकार से पूजन करने में भी पट्काय के जीव निकायों का आरभ अक्यभावी है। इसलिये अनेक प्रकार के पटू- काय के जीयो के विधात का हेतु होने से पूजन के निमित्त भी जिन भवन का बनवाना मावद्यतर कार्य है ऐसे मावद्यतर कार्य का मैं किसी भी प्रकारसे उपदेश नही दगा । मैं कभी भीऐसा उपदेश नहीं दगा कि તમે અહીં એવરાત્રિ-ચાર માસ-કા-એટલે કે અહીં તમે માસુ પુરૂ કરે પ્રવર્તઓની આજ્ઞાથી અહીં ઘણા ત્યાલ બની જશે એથી તમે અહીં જ ચોમાસુ પુરૂ કરવાની કૃપા કરો, અમારા ઉપર તમારે ભારે અનુગ્રહ થશે તમારા ઉપદેશથી અમને ચોક્કસ ખાત્રી છે કે ઘણા રીયાલયનું નિર્માણ થઈ જશે આ રીતે દ્રવ્ય લિંગિઓની પ્રાર્થના સાભળીને મહાનુભાવ કુવલયપ્રભ આચાર્યે કહ્યું કે હે દેવાનુપ્રિય! જો કે તમે જીનાલયના વિષે કહે છે, પણ મને આ કામ કરાવવામાં ન લાગતુ નથી, કેમકે આ સાવઘકમ છે જીન ભવન બનાવવું અને તેને બનાવવાની રેણુ આપવી આ બને જાતની પ્રવૃ ત્તિઓમાં પૃશ્ચિકાય વગેરે છ જાતના છની વિરાધના થાય છે આ રાતે પૂજા કરવામાં પણ બેયના જવનિકાને આર ભ અવશ્ય ભાવી છે એટલા માટે ઘણી જાતના પડાયના જીવોના વિઘાતના માટે હેતુરૂપ હેવા બદલ પૂજાના માટે પણ જીનવન બનાવવું સાવઘતર કાર્ય છે એવા સાવઘાર કાર્ય हाताधर्मकथा कारिते च पृथिवीकायापिली निकायगिधना, नत्र जिन्पूनायामपि तस्मात् पूनार्यस्त्याजिनभवनरिधान सावधतर, वरपटायगोपघानहेतुत्वात् नाह वाड्मात्रेणाऽपि उपदेशदान पेण माग्योगमात्रणापि आवम निनाय गर्नु मुपदेशन करिप्यामीत्या च च अनेन पकारणा, ममयमारपर मायसिद्धात साराऽशेषोठ तवनिकरणनियोग प्राणातिपातोवनी प्रत्यारिस्प य गस्थित यथायस्थित्तस्वरूप प्रमाणभूत, नविपरीत-विपर्ययज्ञानाविपग, यिनित वचन भणता यता, नेपा गिगारिलिजिना मि टा. गुतीथिकान्तद्वज्जी योपयातकाग्णिासाधुपचारिणामध्ये हे गोनम ! जाममलितम्-सन्या सर हीतम् उपार्जितमित्यर्थ । पिमुपानिमित्याह-ती करनामगो नेन कुवल्या भेण, एकमवायोपी तो भयोदधिः । सुगममेवत् । जिस में जिनालय बनवाने का विधान हो। इस प्रकार प्रबचन सिद्धा न्त की सारभूत वस्तुस्थिति को यधार्य रूप से वित्ता किसी सकोच के प्रकट करने वाले उन मुनिराज ने उन साधुप धारी द्रव्यलिंगियों के बीच कि जो मिथ्याष्टियो की तरह जीवों की हिंसा करने मे प्रवृत्त थे उनके सामने इस प्रकार शुद्ध प्ररूपणा करनेसे है गौतम ! तीर्थकर नाम गोत्र कर्म का वध किया-और ससार भी उनका एक भव मात्र चाकी रह गया इस उद्धरण से यही समझना चाहिये-फिजप प्रतिमा पूजन के लिये भी मदिर बनवाना सावध कर्म है और का उपदेश देना भी साधु के लिये वर्जनीय है-इसी अभिप्राय से कुवलयप्रभ सरि ने इस कार्य को निपेध किया-इस निषेध से उन्हें तीर्थकर नाम-गोत्र कर्म को बध हुआ और ससार भी उनका एकभव मात्र बाकी बचा-तो फिर सर्व प्रकार से सावध कर्मों का परित्याग માટે ड કઈ પણ રીતે ઉપદેશ આપવા તૈયાર નથી, હું આ જાતને ઉપદેશ કોઈપણ વખતે આપવા તૈયાર નથી કે જેમા જીના ય બતાવવાનું વિધાન સરખુય હેય આ રીતે પ્રવચન સિદ્ધાતની સારભૂત વસ્તુસ્થિતિને સાચા રૂપમાં વગર કઈ પણ જાતના સ કેચે–પ્રગટ કરનારા તે મુનિરાજે તે સાધુ વેષધારી દવ્ય લિંગિઓની સામે કે જેઓ મિથ્યાષ્ટિવાળાઓની જેમ જીવોની હિંસા કરવામાં પ્રવૃત્ત હતા–શુદ્ધ પ્રરૂપણ કરી આ રીતે ધ પ્રરૂપણ કરવાથી ગૌતમ ! તીર્થંકર નામ–ોર્મને બધ કર્યો અને તે સાર પણ એક ભવ એટલે જ શેષ રહ્યો આ ઉદાહરણથી આપણે એજ વાત સમજવી જોઈએ કે જ્યારે પ્રતિમા પૂજન માટે પણ મદિર બનાવવું માવ કર્મ છે અને આ સાવધકાર્યને ઉપદેશ કરે પણું સાધુના માટે વાય છે આ હેતુથી જ કુવલયપ્રભસૂરીએ આ કાર્યને નિષેધ કર્યો છે આ નિધનથી તે सावकार्य . ४२ नगारधर्मामृनयपिणी टीफा अ० १६ द्रौपदीचर्चा जोद गोध्यम्-या मतिमापूजा निपमाणस्य जिनालयस पाचोपदेशरण सारगिति जानता तत्परिवर्जने कृते तीर्थकर नामगोत्र कर्म ममुपार्जित, तत्र सर्वथा माद्यमार्ग परिवर्जरता सर्वप्राणिरक्षणार्थमहिसाम सर्वतः प्रचारयता प्रवचन-सिद्धान्तसार विजानतां सयममार्गे प्रवृत्तिमता सम्यक्त्वशुद्धिमता प्रति- मापूजामकुर्वता तन्निपेक्यता नि नामात्मनः रल्याणकर कार्यमनशिष्टम् , इति । अब विवाहसमये द्रौपदी सम्यक्त्वाती नासोदिति वर्ण्यते-जैनागमाना विद्वास सम्यगिढ वदन्ति-सनिढानम्य जीवस्य निदानफलप्राप्तिर्यावन भवति, तारदसौं सम्मत्वाश्चितो जैनधर्माद् दर एवावतिष्ठते । करने वाले, समस्त प्राणियो की रक्षा के निमित्त अहिंसाधर्म का प्रचार करने वाले, प्रवचन सिद्धान्त के सार को जानने वाले, सयममार्ग मे प्रवृत्ति वाले, सम्यस्त्र की शुद्धि से विशिष्ट और प्रतिमा की पूजा नहीं करने वाले एव उसका निपेश करने वाले ऐसे सयमियों का अव और कौनसा ऐसा कार्य बाकी रहा है जो उनकी आत्मा के लिये कल्याण का साधन न हो। अब पा इस बात का वर्णन किया जाता है कि विवाह के समय द्रौपदी सभ्यत्यवाली नही थी। जैन आगमों का भलीभाँति परिशीलन करने वाले विद्वान् टस यातको अच्छी तरह जाते ह कि जिम जीर ने जो निदान किया है- जबतक उसके फल की प्रानि उल जीव को नहीं हो जाती-तबतक वह जीव मरयत्व से चचित राफर जिनधर्म से दूर ही रहता है। નામ-શેત્ર ન બ લ વ અને તે સાર પણ તેમને માટે એકભવ જેટ લે જ શેષ રહ્યો હતો તે પછી સર્વ રીતે સાવદ્યકર્મોને પરિત્યાગ કરનારા બધા પ્રાણીઓની રક્ષાના નિમિત્તે અહિંસા ધર્મને પ્રચાર કરનારા પ્રવચન સિદ્ધાતના નરને જાણનાગ, સયમ માગ મા પ્રવૃત્તિ કરનારા, સમ્યકત્વની શુદ્ધિથી વિશિષ્ટ અને પ્રતિમા પૂળ નહિ કરનારા અને તેને નિષેધ કરનારા એવા સયમીઓનુ એવુ કયુ કામ શેષ રહ્યુ છે કે જે તેમના આત્માના કલ્યાણનું સાધનરૂપ ન હોય ? હવે અહીં આ વાતનું વર્ણન કરવામાં આવે છે કે લગ્નના વખતે દ્રૌપદી સમ્યુકવવાળી ન હતી જૈન આગમનુ સારી રીતે પરિશીલન કરનારા વિદ્વાને આ વાતને સારી પિઠે જાણે છે કે જે જીવે જે નિદાન કર્યું છે-જ્યા સુધી તેના ફળની પ્રાપ્તિ તે જીવને થઈ જતી નથી ત્યા સુધી તે જીવ સમ્યકત્વથી વિચિત રહીને જીન ધર્મથી દૂર રહે છે - ४२० - - " माताधर्मया पुचफयनियायेण चोदजमाणी२ जेणेच पच पच्या तेणेव उवागन्छइ, उपागन्छित्ता ते पच पडये तेण दसवण्णेण कुसुमहामेण आढियपरिवढिय करेइ, करित्ता, एर ग्यासी-एप गमए पच परवा परिया। रति मृत्रपाठ मामाण्याद् विवाहसमये पूर्वतिनिदानाधीनतया सम्यारादित्य द्रौपद्या आसीद अतस्तस्यास्तदानी पिलावन सिध्यति युगपत् पक्षाना पतीना उरणेन तस्यो पूर्वसस्कारोदयशाद् विपुल मुखभोगलारसाऽपि सामापिकी, जत' सा कौमारे वयसि थापिका नासीदिति युक्तिसिद्धस्यास्यापलापः केन शायते कर्तुम् । द्रौपदी वस्य पूजन कृतातीति निशामाया निर्णीयते--- पुचयनिब्याणेण चोइज्जमाणी • जेणेव पच पडया तेणेव उवागच्छह, उवागच्चित्ता ते पच पड तेण दसवण्णेण कुसुमदामेण आवेढिय परिवेढिय करे । करित्ता पच वयासी-एण मग पंच पंडवा वरिया" इस प्रकार के इस प्रमाणिक सत्र पाठ से यह स्पष्टरीति से विदित हो जाता है कि विवाह के समय पूर्वकृत निदान के अधीन रोने से द्रौपदी सम्यक्त्व रहित थी इसी लिये उस समय उस में श्राविकापना भी सिद्ध नहीं होता है। तथा एक ही साथ पाव पांडवों को पतिरूप से चरण करने से उसके पूर्व सरकार के उदय से विपुल सुख भोगने की लालसा भी समाविकी शोत होती है इसलिये वह कुमार अवस्था में श्राविका नहीं थी इस युक्ति सिद्ध अर्थ का अपलाप कौन कर सकता है । द्रौपदी ने किस की पूजा की इस प्रकार की जिज्ञासा होने पर " पुचकनियाणेण चोइज्जमाणी २ जेणेन च प डबा तेणेव आगच्छ, उवागच्छिता, ते पच पडवे तेण दसद्धपणेण कुसुमदामेण आवेढियपरिवेढिय करेइ । करित्ता पर क्यासी-एएण मए पच पडवा वरिया" આ જાતના આ પ્રામાણિક સૂત્રપાઠથી આ સ્પષ્ટ રૂપમાં માલુમ થઈ જાય છે કે લગ્નના વખતે પૂર્વકૃત નિદાનને સ્વાધીન હોવાને કારણે દ્રોપદી સમ્યકત્વ રહિત હતી એટલા માટે તે સમયે તેમાં શ્રાવિકાપણુ સિદ્ધ થઈ શકે તેમ નથી તેમજ એકી સાથે પા પાડીને પતિરૂપમા વરણ કરવાથી તેના પૂર્વ સ સકારોના ઉદયથી વિપુલ સુખ ભોગવવાની ઈચ્છા પણ વાલા વિકી માલુમ થાય છે એથી તે કુમાર અવસ્થામાં શ્રાવિકા હતી નહિ આ યુક્તિ અને પરિહાર કેણ કરી શકે તેમ છે દ્રૌપદીએ કેની પૂજા કરી ? આ જાતની જીજ્ઞાસાને સામે टी.
अनगारधर्मामृतवपिणी टी0 0 १६ द्रौपटीचर्चा ५२१ अखण्डसौभाग्यप्रचुरभोगकामनया कामदेवस्यैव पूजन तदानीमुपपद्यते । कामपूजन विवाहोत्सवे निस्तरतो भनतीति लोके प्रसिद्वमस्तीति प्रतिमापूजकोऽपि श्री वर्धमानमूरि प्रोक्तमान् । स्पष्ट चैतत् तद्विरचिते आचारदिनारे द्वितीय- विभागे--" परममये गणपतिकन्दर्प स्थापनम् । गणपतिकन्दर्पस्थापन सुगम लोकमसिद्धम् । " इति । टीकाकार निर्णय करते है- अखड सौभाग्य एव प्रचुर भोग की इच्छा से कामदेव का ही पूजन उस समय द्रौपदी ने किया है-यही पोत सगत यैठती है। लोक में भी यही व्यवहार देखा जाता है कि विवाह के समय अच्छी तरह गाजे बाजे के सारा काम देवका पूजन लोग किया करते हैं। इस बात को वर्धमान मरि भी जो प्रतिमापूजन के पक्षपाती है स्वीकार करते हैं और ऐसा ही करते है। इमी बात का स्पष्टीकरण उन्हों ने स्वनि- मित आचारदिनकर के द्वितीय विभाग मे किया है-वे लिखते हैं कि- - परसमये गणपतिकदर्पस्थापनम् । गणपतिकदर्पस्थापन सुगम लोकप्रसिद्धम्" इति । लौकिक शास्त्र में गणपति एव दर्प (कामदेव ) की स्थापना होती है अत' गणपति और कन्दर्पका स्थापन करना सुगम और लोकप्रसिद्ध है। કાર નિર્ણય કરતા કહે છે – અખંડ સૌભાગ્ય તેમજ પ્રચુર ભેગની ઈચ્છાથી જ તે સમયે દ્રૌપદીએ કામદેવનુ જ પૂજન કર્યું છે, આ વાત જ ચગ્ય લાગે છે મા પણ આ જાતને જ વહેવાર જોવામાં આવે છે કે લગ્ન વખતે વાત એની સાથે સારી રીતે કામદેવનું પૂજન લેકે કરતા રહે છે આ વાતને વર્ધમાનસૂરિ પણ કે જેઓ પ્રતિમા પૂજનના તરફદાર છે-સ્વીકાર કરે છે અને પ્રમાણે જ કહે છે આ વાતનું સ્પષ્ટીકરણ તેમણે વનિર્મિત આચાર દિનકરના બીજા વિભા નમાં કર્યું છે તેઓ લખે છે કે- परसमये गणपतिकदर्पस्थापनम् । गणपतिकदर्पस्थापन सुगम लोक प्रसिद्धम् " इति । લૌકિક શાસ્ત્રમાં ગણપતિ અને કદર્પ (કામદેવ) ની સ્થાપના થાય છે તેથી ગણપતિ દર્પની ન્યાપના કરવી તેજ સુગમ અને પ્રસિદ્ધ છે ४२२ माताकया "निणपडिगाण अन्य परर" अन निनादरामदे परः । जिनशदस्य पहमोऽर्था. कोशादी मसिद्धाः सन्ति । यथा- अहमपि जिनीक, मिन पामान्यदली। कन्दपोऽपि मिनयन, मिनो नारायणी हरि ॥ इगि (हमी नाममाग) विजयगच्छीयः श्रीगुणसागरपरिरपिटारमागरनाम पाव्य पष्टपण्डे द्रौपधा पूज्यन निर्णीतवान् । उक्त च तेन- करि पूजा कामदेवनी भारो मुपदी नार। देव दया करी मुझने मठो देगो गरतार ।। १ ।। अर्हन् सकलकर्म कपायमोहपरीपान जपतीति मिल उन्चरो । सामान्य "जिनपडिमाण अच्चण करेह । इस सत्र में जिन शब्द जिनेन्द्र भगवान का बाचक नहीं है, किन्तु कामदेव का वाचक है क्यों कि जिन शब्द के अनेक अर्थ कोपादिक ग्रन्थों में प्रसिद्ध र-यथा- अनापि जिन जिन सामान्य केली। कदापोऽपि जिनश्चय जिनो नारायणो हरिः॥ दति (मीय नोममाला विजय गच्छीय श्री गुणसागर सूरि ने भी " ढालसागर" नाम के काव्य मे उठवें सड मे द्रौपदी के आराध्य देव का निर्णय किया है। उन्होंने लिखा है- करि पूजा कामदेव नी माखे नुपडी मार । देव दया फरी मुझने भलो देजो भरतार ॥१॥ इस सूत्रले अन्त भगवान को 'जि' इसलिये कहा गया " जिनपदिमाण अच्चण करेइ" આ સત્રમાં જન શબ્દ જીતેદ્ર ભગવાનને વાચક નથી પણ કામદેવને વાચક છે કેમકે જીન શબ્દના ઘણા અ કોષ વગેરે માં પ્રસિદ્ધ છે જેમકે- अहन्नपि जिनश्चैव जिन सामान्यदेवली । क दोऽपि जिनश्चैव जिनो नारायणो हरी ॥ इति (हेमीय नाममाला) વિજયગીય શ્રી ગુણસાગરસૂરિએ પણ છઠ્ઠી ખડમાં દ્રૌપદીના આરાધ્યદેવનો નિર્ણય કરતા તેમણે કહ્યું છે કે- करि पूजा कामदेवनी भाखे द्रुपदिन र । देव ! दया करी मुझने भलो देशो भरतार ॥ १ ॥ આ સૂત્રમાં અહંત ભગવાનને “જીન એટલા માટે કે તેમણે है . ઢાલસાગર નામના કાજ્યના ४२३ - " अनगारधर्मामृतवपिणी टोका १० १६ द्रौपदीचर्चा केली पनघातकर्म तुष्टय जयतीति जिन उच्यते । विष्णुः सभुजपलेन खण्ड- जय ज्यतीति जिन उज्यते । जिनगदस्य कामगोऽर्थश्चापि मगतः, यत' ससा रिणा कामदेवमाति-वेन लोकजगमारिवाज्जिनत्व कामस्योपपद्यते । रूपरहित म्यापि सिद्धम्य मतिमा पूजानेन शावानुक्तामपि पतिमापूजकाः प्रकल्पयन्ति, तद्वदनस्यापि रामस्न लोकशावामिद्ध तद्वधानमनुसृत्व पतिमा प्राप्यत इति कि उन्हों ने मनम्न कपाय, कर्म, मोर और परीपहों को जीता है । सामान्य केवली 'जिन' इसलिये कहे गये हैं कि उन्होंने चार घनघो निया कसो को अपनी आत्मा से समूल नष्ट कर दिया है। विष्णु 'जिन' उसलिये करलाये ति उन्ना ने अपने सुनत से भरतरखड के छह खडों में से तीन खलों को अपने वश किया है इसी लिये ये अर्द्धचकी भी कहलाते हैं। मामदेन को 'जिन' उस लिये करा गया है कि इसके वश समस्त त्रिलोक है त्रिलोक में कोई भी प्राणी गेमा नहीं घचा फिजिसे इस ने अपने वश मे न किरा हो। शका-द्रौपदी ने कानटेन की मूर्ति की पूजो की-आप की यह पात उस समय मानी जा सकनी-जन कि हामदेव की मूर्ति बन सकती होती ? परन्तु कामदेव की मृति तो धन नही सकती क्यों कि वह तो अनतिक-अशरीर-आई है। अगवाले की ी सूर्ति बनती है-अनग की नहीं। બવા કષાય કર્મ, મેહ અને પરિવારને જીત્યા છેસામાન્ય કેવલી “જીન” એટલા માટે કહેવામાં આવ્યા છે કે તેમણે ચાર ધનપતિઓના કર્મોને પિતાના આત્માથી અમૃળ નષ્ટ કરી નાખ્યા છે વિષ્ણુ “જીન” એટલા માટે કહેવાય છે કે તેમણે પિતાના ભુજ બળથી ભગ્નખડના છ ખડામાંથી ત્રણ ખડેને પિતાને વશ કર્યા છે જેથી તેઓ અદ્ધચકી પણ કહેવાય છે કામદેવને “જી” એટલા માટે કહેવામાં આવ્યું છે તેના વશમાં ત્રતે લેકે છે ત્રણે લોકમાં એવુ કે પ્રાણી રહ્યું નથી કે જેને કામદેવે પોતાના વરામ કર્યું ન હોય -- દ્રૌપદીએ કામદેવની મૂર્તિની પૂજા કરી તે તમારી આ વાત ત્યારે જ ગ્ય કહી શકાય કે જ્યારે કામદેવની મૂર્તિ બની રાતી હેય? પણ કામદેવની મૂર્તિ તે તૈયાર થઈ શકે તેમ નથી કેમકે તે તે અમૂર્તિ-અશરીર અનગ અગવાળાની જ મૂર્તિ બને છે, અન ગની નહિ श- ४२४ ষষম খায় नारत्यन सशय । लक्ष्मीगौर्यादिदेच्या विसामोपनिमासिामनया पूजन लोके मसिद्धमस्ति । लीफिरमन्त्रशाले मन्त्रात्नमजपाचा यामदेवारापनस्यामी प्टपतिगभदेतुन निगदितम्- कन्यामिप्टामवाप्नोति, सापीष्ट पतिमाप्नुयात् ।। " इति । अधुनाऽपि परिणयनगमये कुल्देवपूजन लोके क्रियमाण दृश्यते । कामदेयोऽपि उत्तर-घर करना ठीक नहीं है क्यो कि मूर्ति पूजक जन अना -सिद्धों की भी तो मृर्ति पनाकर उसकी पूजा किया करते है । ग्यपि सिद्धों की मृति बनाने की आज्ञा शास्त्रों में नही की गई है-तो भी नतिजा जन अपनी करपना से उनको भी मूर्ति बनाकर पूजा करते ही हैं- उसी प्रकार लौकिकशास्त्र प्रसिद्ध अनङ्ग कामदेव की भी लोग अपनी कल्पनाप्र मूर्ति बनाकर पूजते है। इस में आपत्ति की कौनसी गत है। लक्ष्मी, गौरी आदि देपियों को भी पूजा लोक में अपने को अभि लपित पनि प्राप्ति की कामना से स्त्रियो द्वारा की ही जाती है। लौकिक मन्त्र शस्त्र में मत्ररत्नमजूपा में कामदेव का आराधन-"कन्यामिष्टा मवानोति सापीष्ट पतिमाप्नुयात् ' इस श्लोकार्धदारा इच्छित पति प्राप्ति का कारण कहा गया है। वर्तमान समय में भी देखो! विवाह के समय में लोक में कुल देवता का पूजन किया ही जाता है यह कुल देवता का पूजन ही एक उत्तर –આ વાત એગ્ય નથી, કેમકે મૂર્તિ પૂજા કરનારા લોકો અનn સિદ્ધોની મૂર્તિ બનાવીને તેની પૂજા કરતા રહે છે જે કે શાસ્ત્રોમાં સિદોની મૂર્તિ બનાવવાની આજ્ઞા કરવામાં આવી નથી છતાય મૂર્તિ પૂજક લેકે પિતાની ૫નાથી તેમની પણ મૂર્તિ બનાવીને પૂજા કરે જ છે તેમજ લૌકિક શાસ્ત્ર પ્રસિદ્ધ અનગ કામદેવની પણ લેકે પિતાની કલ્પના મુજબ મૂર્તિ બનાવીને તેને પૂજે છે, આમા વાધા જેવી કઈ વાત નથી લક્ષ્મી, ગૌરી વગેરે દેવીઓની પૂજા લેમ પિતાની ઈચ્છા મુજબ પતિ મેળવવાની કામનાથી સ્ત્રીઓ વડે કરવામાં આવે જ છે લૌકિક માત્ર શાસ્ત્રમાં भवन भभूषामा अभद्देषनु साराधन “कन्यामिष्टामवाप्नोति साभीष्ट पति माप्नुयात्" मा भरियो पत प्रतिभासिनु २५ मतापवाभा माव्यु વર્તમાન સમયમાં પણ આપણે જોઈએ તે લગ્નના સમયે લોકમાં કુળ દેવતાનું પૂજન કરવામા આવે જ છે આ કુળદેવતાનું પૂજન मनगारधर्मामृतषिणो टो० अ० १६ द्रौपदीचर्चा रागवता गृहस्थाना कुलदेवत्वेन व्याहिमाण आसीत् । द्रौपद्यापि स्वकुर देवः पूजित इति युक्तमुत्पश्यामः । आ-" नमोऽस्यु ण अरिहताण " इति पाठस्तु प्रवचनविन्द एव वर्तते, लौकिर कुलदेवप्रतिमानप्रकरणे लोकोत्तरस्य भगवतोऽर्हत. प्रमङ्गाभावात् । पूर्वभवकृतनिदानवत्या रामभोगानुरवत्या द्रौपद्या नामदेवार्चनसमये कामभोग चिरतस्य वीतरागमार्गोपदेशकम्य गीतरागम्य भगवतोऽहतो वदन नैव शास्त्रानु- लम् । अत्र परिणयारसरे कुलदेवपूजनासदे भगवतोऽईत प्रसङ्गएव नास्ति, तरह से कामदेव का पूजन अनुसरण है। एक समय था कि जब काम- देवी, रागशाली गृहस्थ जनो के लिये कुल देवता के रूप से वैवाहिक व्यवहार में मान्य होता था। द्रौपदीने भी उस समय जो कुल देवता का पूजन किया-वह कामदेव का ही पूजन किया यदी युक्ति मगत पैठती है। इस पूजन के प्रकरण में जो " नमोत्युण अरिहनाण" यह पाठ आता है वह प्रवचन बिन्दही हे क्यों कि लौकिक कुलदेवता की प्रतिमा के अर्चन-प्रकरण में लोकोत्तर अहंत भगवान के प्रकरण का सबध ही क्या है । उस समय जय कि वर पूर्व भव में किये गये निदान से युक्त थी-और कामभोग में अनुरक्त हृदयवाली थी उस के लिये कामदेवका अर्चन (पूजन) करनेका समय ही स्पष्टरूपसे ज्ञात होता है कामभोगों से विरत वीतराग मार्ग के उपदेशक वीतरागप्रभु अहं त भगवान की पूजन चना का नहीं। यही सिद्वान्त शास्त्रनुकूल है-अन्य नहीं। अरे कहीं કામદેવની પૂજનનું અનુસરણ છે એક વખત એ હતું કે જ્યારે કામદેવજ, રાગરાળી ગૃહસ્થ લેકોને માટે કુળ દેવતાના રૂપમાં લગ્ન-સ બ ધી વ્યવહારમાં માન્ય ગણાતું હતું. દ્રૌપદીએ પણ તે સમયે જે કુળ દેવતાનું પૂજન કર્યું તે કામદેવનુ જ પૂજન કર્યું હતું એ જ વાત ખરેખર લાગે છે આ પૂજનના પ્રકરણમાં જે नमोत्थुण अरिह ताण આવે છે તે પ્રવચન વિરૂદ્ધ જ છે કેમકે લૌકિકે કુળદેવતાની પ્રતિમાના અર્ચન-પ્રકરણમાં લોકોત્તર અહંત ભગવાનના પ્રકારનો સબ ઘ જ શી રીતે ચોગ્ય કહી શકાય તે વખતે કે જયારે તે પૂર્વ ભવમા કરેલા નિદાનથી યુક્ત હતી અને કામગમાં અનુ રત હદયવાળી હતી એવી સ્થિતિમાં તે તેના માટે કામદેવની અર્ચના કર વાને વખત જ સ્પષ્ટ રૂપે જણાઈ આવે છે કામગથી વિરત વીતરાગ માર્ગને ઉપદેશક વીતરાગ પ્રભુ અઠત ભગવાનની પૂજા થઇના માટે તે વખત શ્ય કહી શકાય નહિ આ સિદ્ધાંત જ શાસ્સાનુકૂળ છે બીજે નહિ યુધિમાં “ આ પાઠ ४२४ जाताधर्मवधानसरे - नारत्या संशय । लक्ष्मीगीर्यादिदेव्या मपि सामीपतिमाहिरामन्या पूजन लोके मसिद्धगस्ति । लाफिरमन्त्रमा मात्नमाजपारा कामदेवागधनस्यामी प्टपतिरामदेवत्व निगदितम्- " कन्यामिप्टामवाप्नोति, सापी'ट पतिमाप्नुयात् ॥ " इति । अनाऽपि परिणयनममये कुलदेवपूजन लोके किरमाप दृश्यते । कामदेवोऽपि उत्तर-पर करना ठीक नहीं है क्यो कि मूर्ति पूजक जन अनल -सिद्धों की भी तो मनि बनाकर की पूजा किया करते है । यपि सिद्धों की मूर्ति बनाने की आजा ना में नीरी गई है-तो भी नतिजा जन अपनी करपना से उनको भी मूर्ति बनाकर पूजा करते ही है- उसी प्रकार रौकिकशास्त्र प्रसिद्ध अन कामदेव की भी लोग अपनी रसानासुर मूर्ति बनाकर पूजते है। इस में आपत्ति की कौनसी बात है। लक्ष्मी, गौरी आदि देवियों को भी पूजा लोक में अपने को अभि लपित पनि प्राप्ति की कामना से स्त्रियों द्वारा की दी जाती है। लौकिक मन्त्र शस्त्र में मत्ररत्नमजूपा में कामदेव का आराधन-"कन्यामिष्टा मवानोति सापीष्ट पतिमाप्नुयात् ' इस श्लोकार्धदारा इच्छित पति प्राप्ति का कारण कहा गया है। वर्तमान समय में भी देखो! विवाह के समय में लोक में कुल देवना का पूजन किया ही जाता है यह कुल देवता का पूजन ही एक ઉત્તર–આ વાત યોગ્ય નથી, કેમકે મૂર્તિ પૂજા કરનારા લેકે અનગ સિદ્ધોની મૂર્તિ બનાવીને તેની પૂજા કરતા રહે છે. જો કે શામ મિની મૂર્તિ બનાવવાની આજ્ઞા કરવામાં આવી નથી છતાય મૂર્તિ પૂજક લેકે પિતાની કપનાથી તેમની પણ મૂર્તિ બનાવીને પૂજા કરે જ છે તેમજ લૌકિક શાસ્ત્ર પ્રસિદ્ધ અનગ કામદેવની પણ લેકે પિતાની કલ્પના મુજબ મૂર્તિ બનાવીને તેને પૂજે છે, આમાં વાધા જેવી કઈ વાત નથી લક્ષ્મી, ગૌરી વગેરે દેવીઓની પૂજા કમા પિતાની ઈચ્છા મુજબ પતિ મેળવવાની કામનાથી સ્ત્રીઓ વડે કરવામા આવે જ છે લૌકિક માત્ર શાસ્ત્રમાં भत्र २ मधूपामा भवनु भाराधन "कन्यामिष्टामवाप्नोति साभीष्ट पति माप्नुयात्" मा मोड पछि प्रतिप्राप्सिनु ४२८ गतामा मा०Y વર્તમાન સમયમાં પણ આપણે જોઈએ તે લગ્નના સમયે લેકમાં કુળ દેવતાનું પૂજન કરવામાં આવે જ છે આ કુળદેવતાનું પૂજન, રીતે .
मनगारधर्मामृतवपिणो टो० अ० १६ द्रौपदीचर्चा रागवता गृहस्थाना कुलदेवत्वेन च्याहिमाण आसीत् । द्रौपद्यापि स्वकुलदेवः पूजित इति युक्तमुत्पश्यामः । अत्र-" नमोऽस्यु णं अरिहताण " इति पाठस्तु प्रवचनविन्द एव वर्तते, लौकिरकुलदेवप्रतिमार्चनमारणे लोकोत्तरस्य भगवतोऽर्हत. प्रमङ्गाभावात् । पूर्वभवकृतनिदानवत्या नामभोगानुरवत्या द्रौपद्या नामदेवार्चनसमये कामभोग- चिरतस्य चीवरागमार्गोपदेशकम्य वीतरागस्य भगवतोऽहतो बदन नैव शास्त्रानु- कूलम् । अत्र परिणयावसरे कुल्देवपूजनमसदे भगवतोऽईत प्रसङ्गएव नास्ति, तरह से कामदेव का पूजन अनुसरण है। एक समय था कि जब काम- देवी, रागशाली गृहस्थ जनो के लिये कुल देवता के रूप से वैवाहिक व्यवहार में मान्य होता था। द्रौपदीने भी उस समय जो कुल देवता का पूजन किया-वह कामदेव कानी पृजन किया यही युक्ति मगन बैठती है। इस पूजन के प्रकरण में जो "नमो. (युण अरिहताण" यह पाठ आता है वह प्रवचन विरह ही है क्योकि लौकिक कुल देवता की प्रतिमा के अर्चन-प्रकरण में लोकोत्तर अहंत भगवान के प्रकरण का सबध ही क्या है । उस समय जब कि नर पूर्व भव में किये गये निदान से युक्त थी-और कामभोग में अनुरक्त हृदयवाली थी उस के लिये कामदेवका अचन (पूजन) करनेका समय ही स्पष्टरूपले ज्ञात होता है कामभोगों से विरत वीतराग मार्ग के उपदेशक वीतरागप्रभु अई त भगवान की पूजन वदना का नहीं। यही सिद्धान्त शास्त्रनुकूल है-अन्य नहीं। अरे कहीं કામદેવની પૂજનનું અનુસરણ છે એક વખત એ હતું કે જ્યારે કામદેવજ, રાગાળી ગૃહસ્થ લોકોને માટે કુળ દેવતાના રૂપમાં લગ્ન–સ બ ધી વ્યવહારમાં માન્ય ગણાતે હતે દ્રૌપદીએ પણ તે સમયે જે કુળ દેવતાનું પૂજન કર્યું તે કામદેવનુ જ પૂજન કર્યું હતુ એ જ વાત બરોબર લાગે છે આ પૂજનના પ્રકરણમાં જે " नमोत्थुण अरिह ताण " 41 48 मा छे त अपयन વિરૂદ્ધ જ છે કેમકે લૌકિક કુળદેવતાની પ્રતિમાના અર્ચન-પ્રકરણમાં કોત્તર અહંત ભગવાનના પ્રકારણને સ બ ધ જ શી રીતે યોગ્ય કહી શકાય તે વખતે કે જ્યારે તે પૂર્વ ભવમા કરેલા નિદાનથી યુક્ત હતી અને કામગ અનુ રક્ત હૃદયવાળી હતી એવી સ્થિતિમાં તે તેના માટે કામદેવની અર્ચના કર વને વખત જ સ્પષ્ટ રૂપે જણાઈ આવે છે કામગોથી વિરત વીતરાગ માર્ગને ઉપદેશક વિતરાગ પ્રભુ અહ ત ભગવાનની પૂજા વદના માટે તે વખત એય કહી શકાય નહિ આ સિદ્ધાંત જ શાસ્ત્રાનુકૂળ છે બીજે નહિ યુદ્ધમાં तामयालय -- द्रौपद्याः पूर्वमातनिदानफलमाप्यमान सम्पावरहितध्यात् । यस्य पूजने तस्यैव वन्दन सु न्यायोपपन भाति, अत्र पूजन लदेवतायाः, बन्दन तु वीतरा गस्याहत इति लोकन्यायनिरुदम् । तस्माद्रीपघातीवरागस्याईदो वन्दनमपि तदानों न कृतमिति सर्पप्रमाणसिद्धम् । अभाभयदेवरिणा सातत्तौ यद्वक्तम् पय म्यां वाचनायामेतावदेव दृश्यते "जिणपडिमाण अच्चण करेड" इति । वीररसके मियाय युद्ध में जानेवाले वीरके लिये महारराग मी आनददायी हो सकता है। कभी नहीं परिणय-चियार के अवसर में कुलदेवता की ही पूजा करने का प्रसग होता है-न कि भगवान अत की । अतः इस प्रकार का प्रसग माननो एक मनगढत कापना मात्र ही है ! क्यों कि इस समय द्रौपदी पूर्व भव में किये हुए निदान की फल प्राप्ति के अभाव से सम्यक्त्व रहित थी, फिर उसे उस समय कामदेव की री इच्छित फल प्राप्ति के लिये पूजा की सूझेगी, या उसके अभाव को करने वाले जिन भगवान की पूजा की। यह स्वय विचारने जैसी बात है जिस का पूजन किया जाता है उसी की यदना की जाती है-पूजन तो हो कुलदेवतारूप कामदेव का और बदनो की जाय वीतराग प्रभु श्री अरिहत देव की। इस प्रकार की मान्यता तो लौकिकरीति से भी विरुद्ध पड़ती है। इसलिये सर्च प्रमागों से यह सिद्ध रोता है कि द्रौपदी ने जिनप्रतिमा का पूजन नही किया। જનાર લડવૈયા માટે વીર રસ સિવાયને મલ્હાર રાગ પણ શુ આનદ પમા ડનાર થઈ શકે છે નહી જ લગ્નના સમયે તે ભગવાન અને પૂજા કરતા તે કુળદેવતાની પૂજા કરવાનો પ્રસગજ એગ્ય લેખાય છે એટલા માટે આ જાતના પ્રસગની વાત માનવી એ મનમાની કલ્પના માવજ છે કેમકે આ સમયે દ્રૌપદી પૂર્વભવમાં કરેલા નિદાનની ફળ પ્રાપ્તિના અભાવને લીધે સમ્યકરવાથી રહિત હતી અને એવી સ્થિતિમાં ઈચ્છિત ફળ પ્રાપ્તિ માટે તેને કામદેવની પૂજા કરવાની ઈચ્છા થાય કે તેનાથી વિરૂધ્ધ ફળ આપનાર પૂજાની ? આ જાતે વિચાર કરવા ગ્ય વાત છે જેની પૂજા કરવામા આવે છે તેને જ વદન કરવામાં આવે છે પૂજા તે કુળ દેવતારૂપ કામદેવની થાય અને વદના વીતરાગ પ્રભુ શ્રી અરિહંત દેવની કરવામાં આવે આ જાતની માન્યતા તે લૌકિક રીતિથી પણ વિરૂધ્ધ આ પ્રમાણે બધી રીતે વિચારતા આ સિધ્ધ થાય છે કે દ્રૌપદીએ જન પ્રતિમાનું પૂજન કર્યું નથી. જીને ભગવાનની m मनगरमागी टोला अ० १६ द्रौपदी चरितनिरूपणम् वाचनान्तरे तु प्हाया' इत्यादि, तया-द्रोपद्याः प्रणिपातदण्डकमाग चंत्यवन्दनमभिहित मो इति, तदप्यत्र पाठे सिद्धान्तविरुद्धपाठप्रक्षेपसभावनां प्रद्योतयति । अत्र यद्वाच्य तत्लागेव निगदितम् । मूलम्-तएण तं दोवइरायवरकन्नं अतेउरियाओ सव्वा- लंकारविभूसिय करेंति कि ते १ वरपायपत्तणेउरा जाव चेडिया- चकवालमयहरगविदपरिक्खित्ता अतेउराओ पंडिणिक्खमइ- पडिनिक्खमित्ता जेणेव वाहिरिया उवट्टाणसाला जेणेव चाउ- ग्घटे आसरहे तेणेव उवागच्छइ उवागच्छित्ता किड्डावियाए लेहियाए सद्धि चाउग्घंटं आसरह दुरूहइ, तएण से धट्टज्जुणे कुमारे दोवईए कण्णाए सारत्यं करेइ, तएण सा दोवई राय- वरकण्णा कंपिल्लपुरं नयर मझ मझेण जेणेव सयवरमडवे तेणेव उवागच्छइ उवागच्छित्ता रह ठवेइ रहाओ पञ्चोरुहड पचोरु- अभयदेव सूरि ने स्वरचित वृत्ति में जो यह कहा है कि एक वाचना में "जिनपडिमाणं अञ्चण करेइ " दूसरी अन्य वाचना में "पहाया इत्यादि-तथा द्रौपद्याः प्रणिपात दण्डकमात्र चैयबदनमभिहित सूत्रे इति" सो यह उनका कपन इस बात की सभावना को प्रकट करता है कि इस पाठ में सिद्धान्त से विरुद्ध पाठ का प्रक्षेप हुभा है। इस विषय में जो कुछ हमें समाधान करना या वह हमने पहिले हो कर दिया है। ॥ द्रौपदी पूजाचर्चा समाप्त ॥ અભયદેવસૂરિએ સ્વરચિત વૃત્તિમાં જે એ કહ્યુ છે કે એક વાચનામા जिनपडिमाण अच्वग करेइ भी पायनामा पाया इत्यादि -तया द्रोपद्या प्रणिपातदण्ड मात्र चै यवदनमभिहित सूत्रे इति ।" तो तभनु मा ४ मा વાતને પ્રકટ કરે છે કે આ પાઠમા સિ વાતથી વિરૂધ એવા પાઠને પ્રક્ષેપ એ છે આ વિશે જે કઈગ્ય સ્પષ્ટીકરણ કરવાનું હતું કે અમે પહેલા દ્રૌપદી પૂજા ચર્ચા સમાપ્ત २८ हिता किड्डावियाए लोहियाए य सद्धिं सयंवरमंडपं अणुप- विसड अणुपविसित्ता करयल तेसि वासुदेवपामुम्वाण बहूर्ण रायवरसहस्साणं पणाम करेद, तएण सा दोबई रायवर० एग मह सिरिदामगंड किं ते १ पाडलमलियचपय जाव सत्तच्छया- इहि गंधद्धाणि मुवत परमसुहफास दरिसणिज गिण्हइ, तएण सा किड्डाविया जाव सुरूवा जाव वामहत्थेणं चिलग दप्पण गहेऊण सललिय दप्पणसकतविवसदसिए य से दाहिणेण हत्थेण दरिसए पवररायसीहे फुडविसयविसुद्धरिभियगभीर महु- रभणिया सा तेसि सव्वेसि पत्थिवाण अम्मापिऊण वससत्तसा मत्थगोत्तविक्कतिकति बहुविह आगममाहप्परूवजोवणगुण लावण्णकुलसीलजाणिया कित्तण करेड, पढम ताव वण्हिपुगवाणं दसदसारवीरपुरिसाण तेलोक्कवलवगाण सत्तुसयसहस्समाणा- वमद्दगाण भवसिद्धिपवरपुडरीयाण चिल्लगाण बलवीरियरूव- जोवणगुणलावन्नकित्तिया कित्तण करेइ, ततो पुणो उग्गसेण- माईणं जायवाण, भणइ य-सोहग्गरूवालिए वरेहि वरपुरिस- गधहत्थीणं । जो हु ते होइ हिययदइओ, तएणं सा दोवई रायवरकन्नगा यहूण रायवरसहस्साणं मज्झ मज्झेण समतिच्छ- माणी२ पुवकयणियाणेण चोइज्जमाणी २ जेणेव पच पडवा तेणेव उवागच्छइ उवागच्छित्ता ते पचपडवे तेण दसवण्णेण कुसुमदामण आवेढियपरिवढिय करेइ करित्ता एव वयासी- एएण मए पच पडवा वरिया, तएणं तेसि ..
अनगारधर्मामृतविणो टीका अ० १६ द्रौपदीचरितनिरूपणम् પર वहूणि रायसहस्साणि मह्यारसदेणं उग्रोसेमाणा२ एव वयति सुवग्यि खलु भो । दोवइए रायवग्क्न्नाए२ निस्ठ सयवरमड- वाओ पडिनिक्खमति पडिनिवमित्ता जेणेव सया आवासा तेणेव उवागच्छइ उवागच्छित्ता, तएण धज्जुण्णे कुमारे पच पडवे दोवइं रायथरकण्ण चाउग्घट आसरह दुरूहइ दुरूहित्ता कपिल्लपुर मज्झ मज्झेण जाव सय भवा अणुपविसइ, तरणं दुवए राया पच पडव देवइ रायवरकन्न पथ दुरूहेइ दुरूहित्ता सेया पएिहि कलसेहि मज्जावेइ मज्जावित्ता अग्गिहोम कारवेइ पचण्ह पडवाण दोवईए य पाणिग्गण करावेइ तएण से दुवए राया दोवईए रायबरकण्णयाए इम एयारूवं पोईदाण दलयइ, त जहा - अट्ट हिरपणकोडीओ जाव अटु पेसणकारीओ दासचेडीओ, अण्ण च विउल धणकणग जाव दलयइ तएण से दुवए राया ताइ वासुदेवपामोक्खाणं विउ- लेणं असण४ वत्थगव जार पडिविसज्जेइ ॥ सू० २१ ॥ टीका-'तएण त' इत्यादि । ततस्तदनन्तर खलु ता द्रौपदी राजवरकन्या 'अत्तेउरियागो' आन्तः पुरिक्य = अन्तःपुरसतिन्य स्त्रियः सल्किारविभू- पितां कुर्वन्ति, 'किं ते ' तन्-तत्सौन्दर्य किं वर्णयामि तद् पाचाऽभिलपितु न तरा ण त दोघः रायवरकन्न इत्यादि । दीकार्य-(तए ण) इसके बाद (त दोवह रायवरकन्न) उस गजवर कन्या प्रौपदी को ( अतेउरियाओ मव्वालकारविभूसिय करे ति ) अतः पुर की स्त्रियो ने समस्त अलकारो से विभूषित किया। (किंते) उस समय तण्ण त दोवद रायवरान इत्यादि- ext-ताण) त्यापी (त दोषद रायवरकन्न) ते १५० ४.या न (अते उरियाओ-बाल कारविभूसिय कर ति ) २०१५-1 से મક અતકારથી શણગારી ( તે) તે સમયના તેના મૌદર્યનું વર્ણન .
- जान तामयाबी शक्यत इत्यर्थः ।' रसायपणेउरा' रपाटमासनपुरा चरणस्थापित प्रशस्त नूपुरा यारत्- चेडियाचा वाळमयहरगविन्दपरिक्खिता चेटिकाचमलालमहतरक ग्रन्देन-अनेकदासीमहत्तरसमूहेन परिसिप्ता-परिटता, अन्तःपुरात् मतिनिष्कामति -नि: सरति, मतिनिष्क्रम्य योर महिः प्रदेशस्था 'उपहाणसाला' उप स्थानशाला आस्थानमण्डप -सभामण्डइत्पर्यः, यत्रेय चापटोऽश्वरथस्तोत्रोपाग च्छति, उपागत्य 'किटारियाए ' मीड़िकया-क्रीड़नधान्या कीदृश्या कीडिया इत्याह 'लेदियाए ' इति लेखिकया रामकुलपशनामादिपरिचारित्या सार्व के उसके सौन्दर्य का हम क्या वर्णन करें। पर वाणी द्वारा कहने के योग्य नहीं है अर्थात् वाणी से उसका वर्णन नहीं ले सकता है । (वर पायपत्तणेउरा चेडियाचा वालमयहरगविंदपरिश्खिता अते उराओ पडिणिस्तमह ) चरणों में स्थापित किये गये है-पहिराये गये हैं-प्रशस्तन पुर जिसको ऐसी वह द्रौपदी यावत अनेक समझदार दासियों के महामहिम समूह से परिक्षिप्त होकर-अत.पुर से बाहिर निकली । (पटिनिखिमित्ता जेणेच पाहिरिया उवट्ठाणसाला जेणेव चाउग्घटे आसरहे तेणेव उवागच्छइ, उवागच्छिता किड्डावियाए लेरि याए सद्धिं चाउग्घट आसरह दुरूह) याहिर निकलकर वह जहाँ पाहिर में सभामडप और उसमें भी जहा चारघटो चाला अश्वरथ था पहा आई । वहा आकर वह अपनी क्रीडमधात्री के कि जो लेखिका राजकुल, घश नाम आदि की परिचायिका यी साथ उस चारघटोंवाले આપણે કેવી રીતે કરી શકીયે વાણી વડે તેનું વર્ણન અશકય છે એટલે કે વર્ણમા એટલી હક્તિ નથી કે તેના સૌદર્યનું સચોટ વર્ણન કરી શકે (बरपायपत्तणेउरा जाब चैडियाचकालमयहरगविंदपरिक्खिता अतेउराओ पडिणिस्खमा) પગેમ જેણે સુદર નૂપુર પહેર્યા છે એવી કપડી ઘણી ચતુર દાસી ઓથી વીંટળાઈને રણવાસથી બહાર નીકળી (पडिनिस्खमित्ता जेणेन बाहिरिया उवटाणमाला जेणेव चाउग्पटे आसरहे तेणेव उआगच्छद, उवागच्छिता किडावियाए लेहियाए सद्वि चाउग्घट आसरह दुरुहइ) બહાર નીકળીને તે જ્યા બહારના સભામંડપમા ચાર ઘટવાળે અશ્વ સ્થ હતા ત્યા આવી ત્યાં આવીને તે પિતાથી કીડન ધાત્રી-કે જે લેખિકા રાજકુલ, વશ નામ વગેરેની પરિચારિકા હતી તેની સાથે તે અશ્વરથ ઉપર સવાર થઈ ગઈ ચાર ઘટવાળા भनगारधर्मामृतवपिणी टी० म० १६ द्रौपदीचरितनिरूपणम् ४३१ चातुर्घण्टमश्वरयं दुरुहड' दूरोहति आरोहति । ततस्तदनन्तरं धृष्टद्युम्नः कुमारो द्रौपधाः कन्यायाः 'सारत्य' सारथ्य-सारथिम क्रोति, ततः खलु सा द्रौपदी रानवरकन्या काम्पित्यपुरस्य नगरस्य मध्यमध्येन यौव स्वयम्बरमण्डपस्तत्रैवो- पागच्छति, उपागत्य रथं स्थापयति रथात् प्रत्यारोहति प्रत्यवरह्य क्रीडिकया लेसिकया च साध स्वयवरमण्डपम् अनुप्रविशति, अनुप्रविश्य करतलपरिगृहीत दशनख शिरआवर्त मस्तकेऽञ्जलिं कृत्वा तेषां वासुदेवप्रमुखाणा रहण राजवरसह- अश्वरथ में सवार हो गई । (तएण से धट्टझुण्णे कुमारे दोवईए कमाए सारस्थ करेड, तण्ण सा दोवइ रायवरकण्णा कपिल्लपुर नयर मज्झ- मज्झेण जेणेव सयवरमंडवे तेणेव उवागच्छद) उस के सवार होते ही धृष्टद्युम्न कुमार ने उस द्रौपदी कन्या का मारथ्य किया-उमके रथ पर सारथि का काम कियो-द्रौपदी के रथ को हाका। इस तरह धृष्ट द्युम्न के द्वारा हाके गये रथ पर बैठी हुई वह राजवर कन्यो द्रौपदी कांपिल्य पुर नगर के बीच से होकर जहा स्वयवर-मडप या उस ओर चल दी। ( उयागच्छित्ता रह ठवेइ रहोओ पच्चोन्हह, पच्चोरुहित्ता किड्डावियाए लेहिया सद्धि सयवरमडव अणुपचिसड, अणुपविसित्ता करयल तेसिं चासुदेवपामुक्खोण यण रायवरसहस्साण पणाम करेड) वहां पहुचकर उसने रथ को खड़ा करवा दिया-रथके खडे होते ही वह उससे नीचे उतरी, नीचे उतर कर वह उस लेखिका क्रीडन धात्री के साथ स्वयवर मडप में प्रविष्ट हई। प्रविष्ट होकर के उसने अपने दोनों होयों को जोड कर उन वासुदेव प्रमुख हजारों राजाओ को प्रमाण (तएण से धट्ठज्जुण्णे कुमारे दोनईए बनाए सारत्य करेड, तएण सा दोपद गयवरकण्याकपिल्लपुर नगर मझ मज्झेणे जेणेव सयवरमडवे तेणेव आगच्छड) જ્યારે તે સવાર થઈ ગઈ ત્યારે કુમાર ઘુખે તે દ્રૌપદી રાજવર કન્યાના રથ ઉપર બેસીને સારથીનું કામ સંભાળ્યું આ પ્રમાણે ધૃષ્ટ ન વડે હાકવામાં આવેલા તે રથ ઉપર સવાર થઈને તે રાજવર કન્યા દ્રૌપદી કપિલધપુર નગરની વચ્ચે થઈને જ્યા વય વર મ ડપ હતો ત્યા ૨વાના થઈ (उवागच्छित्ता रह ठवेड रहाओ पचोरुहइ, पच्चोरुहिता मिहावियाए लेहियाए सद्धि सयपरमडव अणुपविसद, अणुवविसित्ता करयल तेसि वासुदेव पामुक्साण वहण रायवरसहस्साण पणाम करेइ) ત્યા પહેચીને તેણે રથને ભાવડાવે, જયારે રથ છે ત્યારે તે રથ ઉપરથી નીચે ઉતરી, નીચે ઉતરીને તે લેખિકા કીડન ધાત્રીની સાથે સ્વય વર મડપમાં પ્રવિણ થઈ પ્રવિષ્ટ થઈને તેણે વાસુદેવ પ્રમુખ હજાર રાજાઓને પિતાના બંને હાથ જોડીને નમસ્કાર કર્યા .
VR पातमा साणा प्रणामं करोति, ततः ग्वन माद्रीपदी राजकन्या पक महन् श्रीदाम कामं 'कि ते 'किं तत्-तत्सौन्दर्यगोग गर्णन किं करोमि ? म अपूर्वमितिमावः । 'पाडलमलियचपय गाउ मन याहि पाटलमटियानम्मा-पारद सारक दादिभिः ' गधद्धागि गन्धधागि गन्धनप्ति 'मुयनं' मनाइदत् प्राशयदित्यर्थः पग्ममुग्वस्पर्श दर्शीग गृहानि । तन' पल मा नीटिक धीटनामी यार- सुरूपा जार'नामरत्येण नित्ग दप्पण' यास वामस्तन विष्टग दर्पणम् अत्र यावच्छब्देनेद को यम्-सामारियषप्त चोहटनणम्म उस्मुपकर विचित्तमणिरयण पदच्उह' इति । याभाविप साभारियो नेमगिको घर्षो धर्पण यत्र स तथा त दर्पणमित्यन्नयः । म्यमानादेव पिणमित्यय', नया-चतुर्दगजनस्यारसम्यार- तरुणरोपरय प्रेक्षणाभिटापजना तया-विनितमणिरत्नाक-विचित्रमणि रत्नद्धः छरुको-मुष्टि ग्राणम्यान, यम्य स नया त, क्या-चिल्लग' देदीप्य मान. दर्पण-पामहस्ते " हे उण " गृहीत्या 'सललिय' मललित 'दप्पण किया (तपमा दोबई रायवरकता एग मह मिरिदामगड विते ? पाउलमलियचाच जाय सत्तच्च्याईहि गधन्द्वाणि मुयत परमसुहपाम दग्मिणिज्ज गेण्इ) इसके बाद उस राजवर कन्या द्रौपदी ने एक यडा विस्तृत श्री दामकाड-जिस की सुन्दरता और सुगधि का हम क्या वर्णन करें-जो अपूर्व था-पाटक-गुलाब के पुप्पों से, मल्लिका-मोघरा के पुष्पो से यावत् सप्तच्छद वृक्ष के पुष्पो के गया गया था और जिस में से नासिका को तृप्ति करने वाली गा निकल रही थी। जिसका स्पर्श परम सुख नाक था-तथा जो दर्शनीय था अपने हाथ में लिया (तपण मा किड्डारिया जाव सुख्या जाव वामहत्थेण चिल्लग दप्पण गहेऊग मललिय दप्पणसकताविसदसिए य से दाहिणे] (तए ण सा दोबई रायवरकन्ना एग मह सिरिदामगड किं ते ! पाडलम ल्लिय चपय जाव सत्तच्छयाईहिं गधद्धाणि मुयत परमसुहफास दरिसणिज्ज गेण्डइ) ત્યારપછી તે રાજવર કન્યા દ્રોપરીએ એક બહુ મોટે ભારે શ્રીદામાને કે જેની સુંદરતાનું વર્ણન થઈ શકે તેમ નથી અને જે અપૂવ હતે-પાટલ ગુલાબના પુષ્પોથી, મક્ષિકા-મોગરના પોથી, ચશ્માના પુષ્પોથી યાત્ સદ્ધચ્છદ વૃક્ષના પુપેથી તે તૈયાર કરવામા આવે તે અને જેમાથી નાસિકાને તૃપ્તિ થાય તેવી સુવાસ પ્રસરી રહી હતી જેને સ્પણ અત્યંત સુખકારી તેમજ જે દર્શનીય હતો-હાથમાં લીધે (तएण सा विजा दिया जाय सुरूवा जाय वामहत्थेण चिल्लग दप्पण गहे जण सललिय दप्पणसकतदिवसदसिए य से दाहिणेण इत्षेण दरिसए पर अनगारधर्मामृतषिणी टोका अ० १६ दौपदीचरितनिरूपणम् सकतविधसदसिए य' दर्पणमान्तरिम्सदर्शितान-दर्पणे संक्रान्तानि यानि राना विम्यानि-प्रतिविम्मानि, तैः सदर्शिताः प्रतिबोधितास्ताश्च प्रवरराजसिंहान सिंहसदृशशूरान् श्रेष्टनृपान दक्षिणेन हस्तेन ' से ' तस्या' द्रौपद्या 'दरिसए' दर्शयति इह यर्मणः सम्बन्धमानविवक्षाया पप्ठी। तथा-'फुडविसयविमुद्ध- रिभियगभीरमहुरभणिया ' स्फुटविशदविश्वरिभितगम्भीरमधुरमणिता= अर्थतः हत्येण दरिस पवररायसीहे फुडविसयविसुद्धरिभियगभीरमरर- भणिया सा तेसिं सन्वेसिं पत्विवाणं अम्मापिऊण वससत्तसामत्य- गोत्तविश्कतिकतिरहुविआगममहप्पस्वजोव्वणगुणलावण्ण जाणिया कित्तण करेड) इसके बाद उस फ्रीडन धाय ने अपने हाथ में एक चमकता हुआ दर्पण लिया। यहा दर्पण के इन और विशेपणो का यावत् शब्द से ग्रहण हुआ है वे विशेपण ये हैं 'सामावियघसं चोद्दरजणस्म उस्सुयकर विचित्तमणिरयणवद्धरुह " इनका अर्थ इस प्रकार है-यह दर्पण स्वभावत. चिकना था । तथा तरुणजनों के चित्त में अपने को देखने की अभिलाषा का जनक था । मुष्टि से पकड़ने का जो इसका स्थान था वह विचित्र मणि-रत्नों से निर्मित था। उस दर्पण में जिन २ सिंह जैसे शूरवीर राजाओं के उस समय प्रतिबिम्ब पड़े हुए थे उन प्रतिविम्मों को लेकर उस धायने उन श्रेष्ठ राजाओं को उस द्रौपदी के लिये अपने दक्षिण हाथ से यतलाया। बतलाते समय उन्हें दिखाते नमय-वह गत्री विलकुल अर्थ की अपेक्षा स्फुट एव वर्ण रायसीहे फुडक्सियविसुरिभियगभीरमहुरभणिया सा तेसि सव्वेसि पत्थि वाण पम्मापिऊण ससत्तसापत्थगोत्तविक्कतिकतिबहुविहआगममहाप्परूवजोवण गुणलावण्ण कुल जाणिया फित्तण करेइ) ત્યારપછી તે કીડનધાત્રીએ પોતાના હાથમાં એક ચમકતે અરીસે લીધે અહીં “અરીસા માટે વ શબ્દથી નીચે લખ્યા મુજબ વિશેષનુ પણ ચહેણ સમજવું જોઈએ (मामोवियचस चोदहजणस्स उस्सुयकर विचित्त मणिरयणवदछह ) मा विषयानु २५८४२८] 20 प्रभाए छ-भरी। સ્વાભાવિક રીતે લી હતી, તેમજ તરુણ સ્ત્રીઓના ચિત્તમાં તેને જોવાની સહજ ભાવે ઈચ્છા જાગ્રત થાય તે હેતે તે અરીસાને હાથે વિચિત્ર મણીરત્નથી જડેલે હતો તે અરીસામાં સિંહ જેવા શુરવીર જે જે રાજાઓ દેખાયા તે ધાત્રીએ તે રાજાઓને પિતાના જમણા હાથથી સકેત કરીને બતાવ્યા બતાવતી વખતે અને સમજાવતી વખતે તે ધાય અર્થની અપેક્ષાથી - પણ माताधर्मकथा स्फुट, वर्णतो गित फिरमिर-गदादीपरहिन, रिमित-म्परयुक्त गम्भीर- मेघधनियत् , मधुर-मिग अरणगुगढ, भणित भापित यम्या जीटिकाया सा तथा, सा क्रीटिका तेगा गपा पार्थिवानां । अम्मापिण' मातापित्री: वससत्तसामत्यगोत्तविशतिकनिवाविद्यागममाहप्पगोयणगुणलावण्णकुन्सी लगाणिया ' यशसञ्चसाम यगोत्रविक्रान्तिरान्तियविधागममाहात्म्यम्पयौवनगु णलावण्यकुलशीलझायिका-यश-रिमादिक, सत्यम्-आपत्सु चर्यम् सामर्थ्य चल गोत्र गौतमगोनादि, विक्रान्नि-विक्रम, शान्ति-प्रमा, बहुविधागम अनेक शास्त्रविशारद, माहात्म्य-महानुभावता, तथा-रूपयौपनगुणलावण्यानि च तथा- कुल-वशस्यान्तरभेद, शील च-समान च जानाति या मा 'फित्तण' कीर्तन- वशादिवर्णन करोति स्म । प्रथम तापत्-' पण्डिपुगवाण' प्णिपुगवाना ' दस दसारवीरपुरिसाण ' दगाना दगार्हाणा समुद्रविजयादौना वीरपुरुषाणा, 'तेलोग चलवगाण' त्रैलोक्यालयता 'समयसहस्समाणावमगाण' शनुशतसहस्रमानाव मर्दकाना, तथा-' भरसिद्रियारपुडरीयाण' भरसिद्धिस्परपुण्डरीकाणा-भवति की अपेक्षा विशद ऐसी विशुद्ध-शब्दार्थ दोप रहित-स्वर युक्त मेघ ध्वनि समान गभीर मपुर वाणी से भाषण करती जाती थी । उस मापण मे वह उन सब राजाओं के माता, पिता, यश, सत्व, सामर्थ्य, गोत्र, विक्रम, काति, अनेक शास्त्रों का ज्ञातृत्व, माहात्म्य, तथा रूप, यौवन गुण, लावण्य, कुल एव शील की ज्ञाता होने के कारण इन सब का वर्णन करती जाती थी। वश से हरिवश आदि का और कुल से वशके अवान्तर भेद का कथन होता है। (पढम ताव वहिषु गवाण दसदसारवीरपुरिसाण तेल्लोकयलवगाण सत्तुसयसहस्समाणाव मद्दगाण भवसिद्धिपवरपुडरीयाण चिरलगाण चलवीरियरूवजोवण એકદમ ફુટ અને વર્ણની અપેક્ષાથી વિશદ એવી વિશુદ્ધ એટલે કે શબ્દાર્થ દેવરહિત-શ્વરયુક્ત, મેઘવનિ જેવી ગભીર મધુરવાણનું ઉચ્ચારણ કરી રહી હતી પિતાના ભાષણ વડે તે ધાય બધા રાજાઓના માતા પિતા વશ, સત્વ, सामथ्य, मात्र, विभ, ति, शाज्ञान, महान तमा ३५, यौवन, गुप, લાવણ્ય, કુળ અને શીલ વગેની બાબતમા જાણકાર હતી એટલે બધુ વર્ણન કરતી જતી હતી વશિથી હરિવશ વગેરે અને કુળથી વને અવાન્તર ભેદનું કથન થયુ છે (पदम तार पण्हिपुगगण दसदसारवीरपुरिसाण तेलोकवल्वगाण सनु सयसहस्समाणावमदगाण भासिद्धिपवरपुडरीयाण चिल्लगाणं वलवीरियरूब " .
- . . . अनगारधर्मामृतवपिणी टो० य० १६ द्रौपदीचरितनिरूपणम् ४३५ भाविनी सिद्धिर्येपा, ते भवसिद्विकास्तेपा मध्ये परपुण्डरीकाणीत्र ये श्रेष्ठास्ते तथा तेपा, तथा चिल्लगाणं' तेजसा देदीप्यमानाना ' चिल्लग' इति देशी शब्दः। तथा- 'पलपीरियरूपजोधणगुणलावन्नफित्तिया' चलपीयरूपयौवन- गुगलापण्य कीर्तिका-चल-कायिक, वीर्यम्-उत्साहा, रूप-सौन्दर्य, यौवन-तारुण्य, गुणान्-ओदार्यगाम्भीर्यादीन् , लारण्य-यौवनपयोजन्य कान्तिविशेप, कीर्तयति या सा तथा, सा क्रोडिका यात्री कीर्तन करोति स्मेत्यर्थ । अन पूर्वोक्तमपि विशे- पण किंचिद् विशेपयोधनार्थ पुनः कथितम् । ततस्तदनन्तर पुनः सा कीडनधानी 'उग्गसेणमाईण जायबाण ' उग्रसेना दीना यादवाना बलवीर्यादि कीर्तन करोति कृत्वा भणति च-सा पात्री द्रौपदी गुणलावण्ण कित्तियाकित्तणं करेड ) सबसे पहिले उस कोडन धात्री ने वृष्णिवश के पुगव समुद्रविजय आदिश दशाहों के कि जो त्रैलोक्य में भी विशिष्ट बलशाली माने जाते थे, लाग्यो शत्रुओ के मान को मर्दन करने वाले थे, भवसिद्धिक पुरुषों में जो श्रेष्ठ कमल के जैसे माने गये हैं, और जो अपने स्वाभाविक तेज से सदा दमकते रहते थे बल का, वीर्य का, रूप का, यौवन का, गुणो का, लावण्य का, कीर्तिका होने के कारण कीर्तन-वर्णन किया। शारीरिक शक्तिका नाम चल, उत्साह का नाम वीर्य, सौन्दर्य का नाम रूप तारुण्य का नाम यौवन है । औदार्य गाभीर्य आदि गुण है । यौवन वय से जय जो कांति शरीर में आती है वह लावण्य है (तओ पुणो उग्गसेणमाईण जायवाण भणह य सोग्गख्वकलिए वरेरि बर पुरिसगधहत्यीण जो हु ते होह हियय डओ, तण्ण सा दोबई रायवरकन्नगा यहणं रायवरसहस्साण मज्न जोव्यणगुणलारणफित्तिया फित्तण करेइ) તે કીડન ધાત્રીએ સૌ પહેલા વૃષ્ણિ વશમા પુગવ (૪) સમુદ્ર વિજય વગેરે દશ દશાનુ–કે જેઓ ત્રણે લેકેમાં પણ વિશિષ્ટ શક્તિશાળી ગણાતા હતા, લાખે શત્રુઓના માનનુ મન કરનારા હતા, ભવસિદ્ધિક પુરૂષમા જેઓ કમળ ની જેમ શ્રેષ્ઠ ગણાતા હતા અને જેઓ પોતાના સ્વાભાવિક તેજથી मे॥ प्राशता २डे , मा, वीर्य, ३५, यौवन, गुणी, १९५, प्रीति વગેરેથી સંપન્ન હતા-વર્ણન કયુ ગારીરિક શક્તિનું નામ બળ, ઉત્સાહનું નામ વીર્ય, સૌન્દર્યનું નામ રૂપ અને તારૂણ્યનું નામ યૌવન છે ઔદાર્ય, ગભીર્ય ગુણે છેયુવાવસ્થામાં જે શરીર કાતિવાળું થાય છે તેને લાવણ્ય કહેવામાં આવે છે (तओ पुणो उग्गसेणमाईण जायगाण भणइ य सोहागरूवालिए रेहि वरपुरिसगधहत्थीण जो हु ते होइ यियदइओ तएण ते दोबई रायवरकन्नगा h মাথায় पुनराह- 'सोडगरूपकलिए ' इत्यादि, परमप्रान्धयमुखेनव्याया-' वरपुरि सगधहत्योण' पीरपुम्पगन्धहस्तिना-दस्तिपु गन्धहस्तिन ए ये विशिष्टगुणसद्भा पात् पुरुपेषु सर्वतः श्रेष्ठास्ते परपुरुागन्यहस्तिनम्तेपा म ये 'मोदग्गस्वकलिए' सोभाग्यरूपरलित:-अतिशयेन सौभाग्यमौन्दर्यसमन्धित , यः स्पलु न तहग्य दयित =हृदयप्रियः 'हो' भवति, त 'वरेहि परय-पतिमान स्वीकुरु इत्यर्थे । ततस्तदनन्तर खलु द्रौपदी रानारकन्या पहना रानपरसहस्राणा मध्यमध्यन 'समइच्छमाणी २ ' समतिकामन्ती-उन्ती 'पुयायणियाणेण' पूर्तान दानेन=सुकुमारिकामये भर्तपनकामिलापस्प निशान कत तेन, 'चोदज्नमाणी २' प्रेर्यमाणा २ योर पञ्च पाण्यास्तगोपागाउति, उपागत्य तान् दशार्धवर्गेन- पञ्चवर्णेन कुसुमदाम्ना ' आवेढियपरिवेटिए' आरोटितपरिषेप्टिवान् करोति, मज्झेण समतिच्छमाणी २ पुयायणियाणेण चोइज्जमाणी - जेणेव पचपडया तेणेव उवागड ) इसके याद उम कीडन धाय ने यादव वशयाले उग्रसेन आदि यादवो के पलवीर्य आदि का वर्णन किया- उसने द्रौपदी से कहा ये जैसे हाधियों में गधास्नी श्रेष्ठ होता है उसी तरह ये पुरुषों में विशिष्ट गुणोंके सद्भाव के कारण सर्व प्रकार से श्रेष्ठ हैं-उनके बीच में जो तुझे सौभाग्यरूप सकलित प्रतीत हो और तेरे को पारा लगे-उसे तृ पनिरूप से वरले । इसके बाद वह राजवर कन्या द्रौपदी उन हजारों राजाओ के बीच से होती हुई सुकुमारिका के भव में कृन निदान के प्रभाव से यार २ प्रेरित होकर जरा पाच पाडव थे-घश पहूँची-(उधागच्छित्ता ते पच पाड तेण दसरणेण कुसुम दामेण आवेढियपरिवेढिय करेड, करित्ता व ययासी, एएण भए पच बहूण रायवरसहस्साण मज्झ मज्ज्ञेण समतिच्छमाणी २ पुयायणियाणेण चोइ- जमाणी २ जेणेव पच पडवा तेणेव उवागच्छद) ત્યારપછી કિડન ધારીએ ઉગ્રસેન વગેરેનું વર્ણન કર્યું અને કહ્યું કે- હાથીઓમાં જેમ ગઇ હસ્તી ઉત્તમ ગણાય છે તેમજ પુરૂષમા સવિશેષ ગુણવાન એવા એઓ બધી રીતે સારા છે. આ બધામાં તને જે સૌભાગ્ય શાળી લાગતા હોય અને તને જેઓ ગમતા હોય તેઓને तु સ્વીકારી લે ત્યારપછી તે રાજવર કન્યા કદી તે હજારે રાજાઓની વચ્ચેથી પસાર થઈને પોતાના સુકુમારિકાના ભવમા કરેલા અભિલાષથી પ્રેરાઈને જ્યા પાચ પાડ હતા ત્યાં પહોચી (उवागच्छित्ता ते पच पाडवे तेण दसद्धपण्णेणं कुसुमदामेण आवेढिय परिवेढिय करेइ, करिता एव क्यासी, एए ण मए पचपडया - , પતિ રૂપમાં मनगारधामृतषिणी ये० अ० १६ द्रौपदीबरितनिरूपणम् कला एवमवादी-एते सलु पञ्च पाण्डवा मया रता इति । ततः खलु 'ताइ वासुदेवपामोरग्वार बहूणि रायसहस्साणि ' तानि वासुदेनममुग्वाणि बहूनि राज- सहस्रसरयका पामुदेप्रमुखा राजान इत्यर्थ. । महता २ गब्टेनोद्धोपयन्त एर बदन्ति-सुन खलु भोः ! द्रौपद्या राजवरकन्यया इति कृत्वा-इत्युक्त्या स्वयवर- मण्डपात् मतिनिष्कामन्ति, निर्गच्छन्ति, प्रतिनिष्क्रम्य योर स्वासका आवा- साम्तगेवोपागच्छन्ति । तत' सलु धृष्टद्युम्न' कुमारः पञ्च पाण्डवान् द्रौपदी राजवरकन्या चातुर्वण्टमथरथ 'दुरूहइ' रोहयति-आरोहयति दरोद्य काम्पि- पडवा परियो, तगण तेसि वासुदेवपामोस्वाण यहणि राप्तहस्साणि, महया २ मद्देण उग्घोसेमाणा २ एव वयति, सुवरिय खलु भो! दोव हुए रायवरकन्नाए ति कट्टु सयवरमडवाओ पडिनिस्खमति, पडि निस्वमित्ता जेणेव सया २ आवासा तेणेव उपागच्छड) वहा पट्टच कर उसने उन पाचो पाडवों को उस पचवर्णवाली माला से अवेष्टिन परिवेष्टित कर दिया। करके फिर वह इस प्रकार कहने लगी-ये पांच पाडय मैंने पतिरूप से वर लिये हैं। इसके बाद उन वासुदेव प्रमुग्व हजारो राजाओं ने बडे २ जोर के शब्दो से ऐसा कहा इस राजवर कन्या द्रौपदीने बहुत अच्छे वर वरे ऐसा कहकर वे उस स्वयार मडप से गहिर हो गये। बाहिर आकर फिर वे जहा अपने • आवास स्थान थे वहा चले आये। (उवागरिता तएण धज्जुणे कुमारे पच पडवे दोवइ रायवर कण्ण चाउग्घट आसरह दुरूहद, दुसहित्ता कपिल्लपुर तेर्सि वासुदेवपामोक्खाण बहूणि रायसहस्साणि, महया २ सद्देण उग्मोसेमाणा २ एव वयति, सुवरिय खलु भो ! दोपइए रायवर कन्नाए २ त्ति सयवरमड वाभो पडिनिक्खमति, पडि निक्ख मित्ता जेणेर सयार आवासा तेणेव उवागाउद्द) ત્યા પહેચીને તેણે તે પાચ પાડને પાચ વર્ણવાળી માળાથી અવે દિત, પરિણિત કરી દીધા ત્યારપછી તેઓને કહેવા લાગી કે હે પાચ પાડ ! મે તમને પતિ રૂપમાં વરી લીધા છે ત્યારબાદ તે વાસુદેવ પ્રમુખ હજાર રાજાઓએ બહુ મેટા સાદથી આ પ્રમાણે કહ્યું કે આ રાજવર કન્યા દ્રૌપદીએ બહુ જ સારા વરે પસંદ કર્યા છે આમ કહીને તેઓ સર્વે સ્વયવર મંડપમાથી બહાર નીકળી ગયા બહાર નીકળીને તેઓ જ્યા પિતાના આવાસ સ્થાને હતા ત્યા જતા રહ્યા (उवागच्छित्ता तएण घटज्जुण्णे कुमारे पचपडव दोवड रायवरकण्णं चाउ ग्घट आसरह दुरूहइ, दुलहिता कपिल्लपुर मज्झ मज्झे ण नाव सय भवण अशु- -- . - - . भाताधकथा त्यपुरस्य मध्यमभ्येन यार सकं भानमनुमशिति, तनः बल द्रुपदो राजा पश्च पाण्डवान् द्रौपदी रामपरपन्यां 'पट्टय' पर-पक्षकोपरि 'दुरूहेड' दूरो हपति-भारोहयति, दीप श्वेतपतिः पशः 'मज्जा' मजयतिम्रनपयति अग्निटीम विवाहविधिनानी होम यारयति, पनाना पाण्डवाना द्रौपद्यात्र पाणि गहण कारपति, अन पञ्चाना पाण्डवानामिति सम्बन्धसामान्ये पाठी । ततः खलु स पदो राजा द्रौपया गजपरकन्याया. इममेननृप भीतिदान योतुरदान ददाति, मज्म मझेण जाच सयभवण अणुपविसह, तगणं दुराया पच पडवे दोवड रापवरकन्न पय दुल्हेह, दुरहित्ता सेपापी कलसेहि मज्जावेइ, मजारित्ता अगिहोम कारवेद, पचण्ड पडवाण दोवाए प पाणिगारणं करायेइ, ) इसके पाद धृष्टद्युम्नकुमार ने उन पाच पाडवो को पर राजवर कन्या द्रौपदी को चारघटो से युक्त उस अश्वरथ पर बैठाया-बैठाकर कापिल्पपुर नगर के पीच से होता हुआ वह जहा अपना भवन था वहां आया यहां आकर वह उसमें उन सत्र के सोध प्रविष्ट हुआ। इसके बाद द्रुपद राजा ने उन पांचो पांडवों को और राजवर कन्या उस द्रौपदी को एक पट्टक पर बैठा दिया-धैठाकर फिर उसने उनका श्वेत पीत कलशों से चादी सोने के घड़ो से अभिषेक करवाया अभिषेक करचा फर फिर उसने अग्नि होम करवाया-और उसकी मोक्षी पूर्वक पाचो-पाडयो के साथ अपनी कन्यो द्रौपदी का पाणि ग्रहण मस्कार करवा दिया । (तण्ण से दुवए राया दोवइए राय पवितइ, तएण दुवए राया पच पड़वे दोबड रायपरकन्न पट्टय दुम्हेह, दुरूहित्ता सेयापीएहिं कलसेहिं मज्जावेइ मज्जापिता अग्गिहोम कारवेइ, पचण्ह पडवाण दोवइए य पाणिग्गहण करावेह) ત્યારપછી ધૃષ્ટદ્યુમ્ન કુમારે તે પાચ પાડો અને રાજવર કન્યા પ દીને ચાર ઘટવાળા તે અશ્વથ ઉપર બેસાડયા અને બેસાડીને કપિ નગરની વચ્ચે થઈને જ્યા પિતાનુ ભવન હતુ તવી ગયા સર્વે તેમાં પ્રવિણ થયા ત્યારપછી પ રાજાએ તે પા પાડો અને રાજ વર કન્યા તે દ્રૌપદીને એક પટ્ટક ઉપર બેસાડી દીધા અને બેસાડીને તેણે તેમનો સફેદ, અને પીળા કળશથી-એટલે કે ચાદી અને સેનાના કળશેથી અભિષેક કરાવડાવે અભિષેક કરાવીને તેણે અનિહામ કરાવરાવ્યો અને તેની સાક્ષીમા પિતાની કન્યા 17 स्तमा तेशानी साथै ४२वी हीथे। (तएण से। યપુર ત્યાં જઈને તેઓ - - मनगारधर्मामृतपणी टो० अ० १६ हौपदीचरितनिरूपणम् ४३५ तद् यथा-अप्ट हिरण्यकोटीः, यारत् अप्ट रजतोटी, अष्ट सुवर्णकोटी , अप्ट 'पेमणकारीओ 'प्रेपणकारिणीः, आज्ञाकारिणी दासचेटी:-दासपुत्री, अन्न च पिपुल धनानक-यावत् धन-गणिमादिक, कनकम् अटितवर्ण, यापच्छब्देन- रत्ननि-तनादीनि, मणयश्चन्द्रकान्ताधा' मौक्तिकानि च शखश्व प्रतीत एव शिलामनालानि च विद्रुमाणि रक्तरत्नानि-पद्मरागादीनि तान्येव सद् विद्यमान यत् सार-प्रधान सापतेयं द्रव्यं तद ददाति स्म । तत' खलु स पदो राजा तान् वासुदेवप्रमुखान् बहुसहस्रमरयकान् रानः विपुलेन पशनपानग्वाद्यस्वायेन मोजयति, भोजयित्वा वम्वगन्धादिभिर्यावत् सत्का- स्यति समानयति, सत्कार्य समान्य प्रतिविसर्जयति ।। मू०२२ ॥ वरफण्णयाए दम ण्यारुव पीईदाण दल यह, त जहा-अहिरण्ण कोडीओ जाव अट्टपेसणकारिओ दासचेडीओ, अण्ण च विउल वणकणग जाव दलयह, तण्ण से दुवए राया ताइ वासुदेव पामोक्खाणं विउलेण असण४ वत्यगध जाउ पडिविसज्जेड) इसके बाद द्रुपद राजाने राजवर कन्या उस द्रौपदी के लिये इतना इस प्रकार प्रीति दान दिया आठ हिरण्य कोटि-चादी के बने हुए आठ करोड आभूषण, सुवर्ण के बने हुए आठ करोड आभूपण यावत् आज्ञा कारिणी ८ आठ दासियों और भी यरत सा गणिमादिक स्प धन, अघटित सुवर्ग, तनादि रत्न, चन्द्रकान्त आदि मणि, मौक्तिक, शंख, विद्रुम, पद्मरागादि रक्त रत्न । यह मय मारभूत द्रव्य उसके लिये प्रदान किया। इसके बाद दुपदराजा ने उन बासुदेव प्रमुग्व हजारों राजाओं को अशन, पान, खाद्य एव स्वाद्यरूप चतुर्विध आहार एव वस्त्र गध आदि से सत्कृत सन्मानित कर अपने यहा से चिदा कर दिया । मू० २२ ।। दव्यह, त जहा अट्ठ हिरण्णकोडीओ जाव अट्ट पेसगकारीओ दासचेडीभो, अण्ण च विरल धणकणग जाव दलया, तएण से दुवए राया ताइ वासुदेव पामोक्खाण विउलेण अमण ४ वयं गध जाव पडि विसज्जे३) ત્યારપછી દુપદ રાજાએ રાજવર કન્યા દ્રૌપદીને આ પ્રમાણે પ્રતિદાન આપ્યું કે આ હિરણ્ય-કેટિ–ચાદીના આઠ કરોડ આભૂષણે યાવતું આજ્ઞા માં રહેનારી આ દાસીઓ અને બીજું પણ ઘણું ગણિમ વગેરે રૂપ ધન, અવ- ટિત સુવર્ણ, કવેતન વગેરે રન, ચન્દ્રકાત વગેરે મણિ, મૌક્તિક, શેખ, વિ ૫, પધગગ વગેરે રત રત્ન આપ્યા આ બધુ સારભૂત ધન દ્રૌપદને આપ્યું ત્યારપછી કુપદ રાજાએ તે વાસુદેવ પ્રમુખ હજારે રાજાઓને અશન, પાન, ખાદ્ય અને વાવ રૂપ ચાર જાતના આહાર અને વસ્ત્ર, ગ ધ વગેરેથી સ કૂત સન્માનિત કરીને પિતાના નગરથી વિદાય કર્યો. એ સૂત્ર ૨૨ - - . माताकपास ल्पपुरस्य मध्यमभ्येन यापन पर भानमनुपविशति, तनः पलु दुपटी राजा पञ्च पाण्डपान् द्रौपदी राजारपन्या पट्टय' पटक-पटकोपरि ' दुम् ' दो इयति मारोहयति, दरोष वेतपतिः यशः । मज्जा मज्जयतिम्नपति अग्निोम पिनाविधिनाऽग्नी होम पारयति, पत्राना पाण्डवाना दौरान पाणि ग्रहण कारयति, अन पश्चाना पाण्यानामिति सम्पन्धसामान्ये पप्ठी । तत' खलु स गुपदो राजा द्रापया गारन्याया. इमर्मतम्प प्रीतिदान यौतुदान दनाति, मज्झ मज्झेण जान सयभवण अणुपपिमह, ताण दुवा राया पच पडवे दोवइ रायवरकन्न पदृय दुल्हेड, दुरहित्ता सेयापी कलसेहि मज्जावेइ, मजावित्ता अग्गिहोम कारवेह, पचण्ड पडवाण दोवडा य पाणिराहणं करायेइ, ) इनके पाद धृष्टद्युम्नकुमार ने उन पाच पाडवो को एव राजपर कन्या द्रौपदी को चार घटो से युक्त उस अन्वरथ पर पैठाया-बैटाकर कापित्यपुर नगर के बीच से होता हुआ वर जा अपना भवन को वहां आया यहां आकर वह उसमें उन सर के साथ प्रविष्ट हुआ। इसके बाद द्रुपद राजा ने उन पाचो पांडवों को और राजवर कन्या उस द्रौपदी को एक पट्टक पर बैठा दिया-यैठाकर फिर उसने उनका श्वेत पीत कलगों से चादी सोने के घड़ो से-अभिषेक करवाया अभिषेक करवा कर फिर उसने अग्नि होम करवाया-और उसकी साक्षी पूर्वक पाचो-पाटयो के साथ अपनी कन्यो द्रौपदी का पाणि ग्रह्ण सस्कार करवा दिया। (तण्ण से दुवए राया दोवइए राय पविसद, तरण दुवए राया पच पडवे दोवड रायवरकन्न पट्टय दुम्हेइ, दुरूहित्ता सेयापीएहिं कलसेहि मज्जावेड़ मजापिता अग्निहोम कारवेइ, पचण्ड पडवाण दोवइए य पाणिग्गहण करावे.) ત્યારપછી ધૃષ્ટદ્યુમ્ન કુમારે તે પાચ પાને અને રાજવર કન્યા દ્વિપ દીને ચાર ઘટવાળા તે અશ્વથ ઉપર બેસાડ્યા અને બેસાડીને કપિ યપુર નગરની વચ્ચે થઈને જવા પિતાનુ ભવન હતુ તેવા ગયા સર્વે તેમાં પ્રવિણ થયા ત્યારપછી પદ રાજાએ તે પાચે પાડને અને રાજ વર કન્યા તે દ્રૌપદીને એક પટ્ટક ઉપર બેસાડી દીધા અને બેસાડીને તેણે તેમને સફેદ, અને પીળા કળશેથી એટલે કે ચાદી અને સોનાના કળશેથી અભિષેક કરાવડાવ્યે અભિષેક કરાવીને તેણે અગિહામ કરાવવા અને તેની સાક્ષીમાં પોતાની કન્યા દ્રૌપદીને હસ્તમેળાપ તેની સાથે કરાવી દીધે (तएण से दुवए राया दोवइए रायवरकग्णयाए इम - ત્યાં જઈને તેઓ ४४१ मनगारधर्मामृतपरिणी टो० अ० १६ द्रौपदीचरितनिरूपणम् सयाइं२ आवासाइ तेणेव उवा० तहेव जाव विहरति,तएणं से पंदुराया हत्थिणाउरणयरं अणुपविसह अणुपविसित्ता कोडुविय० सदावेइ सहावित्ता एव वयासी-तुभेण देवाणु. प्पिया । विउल असण४ तहेब जाव उवणेति, तएण ने वासुदेवपामोक्खा वहवे राया पहाया कयवलिकम्मा तं विउल असणं४ तहेब जाव विहरति, तएणं से पंडुराया पच पडवे दोबडं च देवि पट्टयं दुरूहेइ दुरूहित्ता सेयपी- एहिं कलतेहि पहावेंति पहावित्ता कल्लाणकारि करेइ करित्ता ते वासुदेवपामोस्खे बढे रायसहस्से विउलेण असण? पुप्फवस्थेणराहारेइ सम्माणेइ जावपडिविसज्जेइ, तएण ताइ वासुदेवपामोरखाइ बहूहि जाव पडिगयाइ ॥ सू॥ २३ ॥ टीका-'तएण से ' इत्यादि। ततस्तदनन्तर खलु पाण्ड राजा तेपा वासुदेव ममुखागा बहूना राजमहस्राणा रतलपरिग्रहीत दशनख शिर आवर्त मस्तकेञ्जलि कृस्या एवमवादी-एव खलु हे देवानुभिया ! हस्तिनापुरे नगरे पञ्चाना पाण्ड- वाना द्रौपद्याश्च देव्या. कल्याणकरो भविष्यति तत्-तस्मात् यूय खलु हे देवानु मिया:-मामनुगृहत , काल्पगिहीन कालविलम्बरहित-शीघ्र समरसरत-आग- तएण से पथराया इत्यादि । टीकार्य-(तएण) इसके याट (से पहराया) उस पांडुराजा ने (तेसि घासुदेव पामोक्खा ण) उन वासुदेव प्रमुख (पहण राय० करयल एव चयासी-एव खलु देवाणुप्पियो । शत्थिणाउरे नयरे पचण्ड पडवाण दोवइए देवीए कल्लाणकरे भविस्सइ त तुम्भे ण देवाणुप्पिया ! मम तएण से पडुराया इत्या~ि- साथ-(तएण ) त्यापी ( से पडूराया) ते पाहु सन्त (वे सि वासुदेवधामोक्साण ) ते वासुहे प्रभु (वहूण राय० ग्यल ए क्यासी-एव खलु देवाणुप्पिया! इत्यिणाउरे नयरे पचण्ह पडवाणं दोनाए, देवीए क्ल्लाणकरे भविस्सइ त तुम्भेण देवाणु- प्पिया ! मम अनुगिण्हमाणा अकालपरिहीणं समोसरह) . हा ५४० जाताममेकपा गूल्म्-तपण से पडू राया तेसिं वासुदेवपामोरखाण वहणं राय० करयल एवं वयासो- एवं खलु देवाणुप्पिया । हत्यि. णाउरे नयरे पंचण्ह पंडवाणं दोवइए य देवीए कल्याणकरे भविस्सइ तं तुम्भे णं देवाणुप्पिया । मम अणुगिण्हमाणा अकालपरिहीण समोसरह, तएण वासुदेवपामोरसा पत्तेयर जाव पहारेत्थ गमणाए । तएणं से पंडुराया कोडवियपुरिसे सदा० २ एव वयासी-गच्छहणं तुम्भे देवाणुपिया। हरिथ- णाउरे पचण्ह पडवाणं पच पासायवडिसए कारेह अब्भु- ग्गयमूसिय बण्णओजावपडिस्वे,तएण ते कोडुवियपुरिसा पडिसुणेति जाव करावेंति, तएण से पंडुए पचहि पडवहि दोवईए देवीए सद्धिं हयगयसपरिवुडे कपित्लपुराओ पडि- निक्खमइ२ जेणेव हथिणाउरे तेणेव उवागए, तएणं से पडुराया तेसि वासुदेवपामोक्खाणं आगमण जाणित्ता कोथुवि० सद्दावेड सहावित्ता एव वयासी-गच्छह ण तुझे देवाणुप्पिया । हत्थिणाउरस्स नयरस्स वहिया वासुदेवपा- मुक्खाणं बहूण रायसहस्साण आवासे कारेह अणेगखभसय तहेब जाव पच्चप्पिणति, तएणं ते वासुदेवपामोक्खा बहवे रायसहस्सा जेणेव हथिणाउरे तेणेव उवागच्छइ, तएणं से पडुराया तेसि वासुदेवपामोक्खाण आगमण जाणित्ता हट्टतुट्टे पहाए कयवलिए जहा दुवए जाव जहारिह आवासे दलयइ, तएण ते वासुदेव पा. बहवे 1-जेणेव - , . भनगारधर्मामृतोपणो टी० अ० १६ द्रौपदीचरितनिरूपणम् मेधकुमार-मासादवद् वर्णन विज्ञेयम् यावद् अनेकस्तम्भशतसनिविष्टान् प्रति रूपान्-शोभासौन्दर्यसम्पन्नान् । ततः खलु ते कौटुम्बिकपुरुपा:-'तथाऽस्तु इत्युक्त्वा प्रतिशृण्वन्ति आज्ञा स्वीकुर्वन्ति, प्रतिश्रुत्य हस्तिनापुर गत्वा पञ्च प्रासादारतसकान् यावत् कारयन्ति । ततस्तदनन्तर पाण्डराजा पञ्चभिः पाण्डवै द्रौपया देव्या च साधैं हयगजरथपदातिसपरितः काम्पिल्पपुरात् मतिनिष्कामति- प्रतिनिष्क्रम्य यौर हस्तिनापुर नगर तौवोपागत । तत खलु स पाण्डुराजा तेपा वासुदेवप्रमुखाणामागमन ज्ञात्वा कौटुम्बिक- पुरुषान् शब्दयति, शब्दयित्वा एवमनादी-गच्छत खल यूय हे देवानुमियाः । पहुत ऊचे हो । इन प्रासादों का वर्णन प्रथम अध्ययन में उक्त मेघ कुमार के प्रासादों जैसा जानना चाहिये । यावत् ये प्रासाद' अनेक स्त- भशत से युक्त हो-शोभा सौन्दर्य से सपन्न हों। (तएण ते कोडम्बिय पुरिसा पडिसुणेति, जा करावेति ) राजा की इस प्रकार की आज्ञा को उन कौटुम्विक पुरुपों ने मान लिया और हस्तिनापुर जाकर उन्होंने पाच प्रासाद कथित रूपसे बनवा दिये । (तएण से पडुए पचहिं पडवेहि दोवइरा देवीए सद्धि य गय सपरिवुडे कपिल्लपुराओ पडिनिक्खमइ २ जेणेव हथिणाउरे तेणेव उवागण) इसके बाद वे पाडुराजा पाडवों और द्रौपदी देवी को साथ लेकर हय, गज, आदि चतुरगिणी सेना के साथ २ कापिल्यपुर नगर से चल दिये-चलकर जहा हस्तिनापुर नगर था-वहा आये (नण्ण से पडुराया तेसिं वासुदेवपामोक्खाण आगमणं પાચે પાડવા માટે પાચ ઉત્તમ મહેલ બનાવડા મહેલ ઊચા હોવા જોઈએ આ મહેલનુ વર્ણન પહેલા અવ્યયનમા વર્ણવવામાં આવેલા મેઘ કુમારના મહેલ જેવું જાણું લેવું જોઈએ યાવત્ આ બધા મહેલ ઘણા સેકડે થાભલા माथी युत तेमा शाला तथा सौर्य सपन्न पामे (तएण ते कोडु बियपुरिसा पडिसुणे ति जाव करावे ति) naनी रानी माजाने કૌટુંબિક પુરૂએ સ્વીકારી લીધી અને હસ્તિનાપુર જઈને તેઓએ કહેવા મુજબ જ પાચ મહેલ તૈયાર કરાવી દીધા (तएण से पडुर पचहिं पडवेहि दोनइए देवीए मद्धिं हयगयसपरिवुढे कपिल्लपुराओ पडिनिक्खमइ २ जेणेव हत्थिणाउरे तेणेव उनागए) ત્યારપછી તે પાડુ રાજા પાચે પાડ અને દ્રૌપદી દેવીને લઈને સાથે ઘેડા, હાથી વગેરેની ચતુરગિણી સેનાની સાથે કાપિડવપુર નગરની બહાર નીકળ્યા અને નીકળીને યા હસ્તિનાપુર નગર હતું ત્યાં પહોચ્યા (तएण से पडुराया तेसिं वासुदेवपामोक्खाण आगमण जाणित्ता कोडविय० वाताधर्मका - - मन पुरत । ततः गलु बासुदेवममुखा प्रत्येक ' यावत् माघारयद् गमनाय- हस्तिनापुर नगर गतु मला इत्यर्थः। ततः खलु स पारनामको राजा पीटुम्मिय पुग्णान् दयवि, गन्दयित्वा एवमवादी-गाउत खलु यय दे देवानुमियाः । हस्तिनापुरे पश्चानां पाण्डवाना पञ्च 'पासायाडिसए ' प्रासादापतंसकान् पारयत । किं भूतानित्याइ- अम्भु- ग्गयमृसिय' अभ्युद्गतोपिछतान-अत्युच्चानित्यर्थः । वर्णक-प्रथमाध्ययनोक्त- अणुगिण्यमाणा अकालपरिरीण समोसरह ) हजारों राजाओं से अपने दोनों हाथों की अजलि करके और उसे शिर पर रखकर के पड़ी नम्रता के साथ नमस्कोर करके-इस प्रकार कहा हे देवानुप्रियो ! हस्तिनापुर नगर में पाच पाडवों और द्रौपदी देवी का कल्याणकारी उत्सव होगा इसलिये हे देवानुनियों। आप सब मेरे ऊपर अनुग्रह करके शीघ्र से शीघ्र पधारें । (तण्ण वासुदेवपामोसा पत्तेय • जाव पारेत्थ गम णाए) इम के बाद वे वासुदेव प्रमुख प्रत्येक जन वहाँ हास्तिना पुर जाने के लिये प्रस्थित हो गये। (तपण से पडराया कोडम्बियपुरिस सद्दावेइ • एव वयासी-गच्छह ण तुम्भे देवाणुप्पिया हत्थिणाउरे पचह पडवाण पच पासायवडिसए कारेह, अभुग्गयमुसिय वण्णओ जावपडि रूवे) इतने में पाडुराजा ने कौटुम्यिकपुरुपों को बुलाया ओर बुलाकर उनसे ऐसा कहा-हे देवानुप्रियो! तुम लोग हस्तिना पुर जाओ वहा जाकर पाचों पाडवों के लिये पांच श्रेष्ठ प्रासाद बनवाओ । ये प्रासाद હજાર રાજાઓને પિતાના બંને હાથની અજલિ બનાવીને અને તેને મસ્તકે મૂકીને ખૂબ જ નમ્રપણે નમસ્કાર કર્યો અને આ પ્રમાણે વિનતી કરી કે હે દેવાનુપ્રિયે ! હસ્તિનાપુર નગરમા પા પાડો તેમજ દ્રૌપદી દેવીને કલ્યાણકારી ઉત્સવ થશે એથી હે દેવાનુપ્રિયે ! તમે સૌ મારા ઉપર 2 ४शन सत्वरे त्या पधारी (तएण वासुदेवपामोक्सो पत्तेय २ जाय पहारस्थ गमणाए) त्यारपछी વાસુદેવ પ્રમુખ દરેક રાજા ત્યાથી હસ્તિનાપુર ઉપડી ગયા तएण से पडुराया कोड वियपुरिस सदावेइ २ एव वयासी-गच्छह ण तुन्भे देवाणुप्पिया हथिणाउरे पचण्ड पडवाण पच पासायवडिसए कारेह, अभुग्गयमुसिय वण्णओ जाव पडिरूवे) તે વખતે પાડુ રાજાએ કૌટુંબિક પુરૂષને બોલાવ્યા અને બેલાને તેઓને કહ્યું કે હે દેવાનુપ્રિયે ! તમે હસ્તિનાપુર જાઓ ४२ જવા भेनगारधर्मामृतषिणी टीका म० १६ द्रौपदीवरितनिरूपणम् ४४५ उपागत्य तथैर यानद विहरन्ति । ततः ग्वलु स पाण्ह राजा हस्तिनापुर नगर- मनुपविशति, अनुमविश्य कौटुम्बिापुरुपान् शद्रयति, शदायित्वा एमवादीत- यूय पलु हे दवानुप्रियाः । पिपुलम् अगनपानपानखाधस्वार, उपचारयत, उपकार्य गौर वामुढेवप्रमुखाम्तगोपनयत । तथैव यावद् उपनयन्ति, ततस्ते कौटुम्पिकपुरुषास्तथैव विपुलमशनादि चतुर्विधाऽऽहारमुपस्कारयन्ति उपसार्य यानद वासुदेवादीनामन्ति के-उपनयन्ति-उपस्थापयन्ति । नगर था यहा आगये। (तपणं से पडुराराया तेसिं वासुदेवपामोकावा ण आगमण जाणित्ता तुढे पहाए कयरलिकम्मे जहा दुवा जाव जहा रिह आवासे दलयति, तएण ते वासुदेव पा० नवे रायमस्मा जेणेष सयाह २ आगामाइ तेणेव उवाग० तहेव जाब विहरति) चासुदेव प्रमुग्व उन हजारों राजाओं का आगमन जानकर पाडराजाने हर्पित एव सतुष्ट होकर स्नान किया वायसादि पक्षियों के लिये अन्नादि का देने रूप लि कर्म किया-जिस प्रकार द्रुपद राजाने यथा योग्य आवास- स्थान इन्हों के लिये दिये थे उसी तरह पाडुराजा ने भी उन्हे जो जिस के योग्य स्थान था चर आवासस्थान दियो। पश्चात् वे वासुदेव प्रमुख हजारों राजा जहा अपने २ ठहरने के लिये आवासस्थान थे वहा गये वहा जाकर वे उसी तरह से ठहर गये। (तएण से पराया हथिणा उर नयर अणुपविसह, अणुपविसित्ता, कोडुपिय० सदावेड, सहावित्ता ण्य क्यासी-तुम्भेण देवाणुप्पियो । विउल असण ४ तहेव जाव उच (तएण से पडुराया तेसि पासुदेवपामोखाण आगमण जाणित्ता दृढतृढे हाए कयालिकम्मे जहा दुवए जाव उहारिह आवासे दलयति, तरण ते वामुद्देन पा० बहवे रायसहम्सा जेणेव सयाइ २ आनासाइ तेणेव उवाग० तहेव जार विहरति) વાસુદેવ પ્રમુખ તે હજારે રાજાઓનું આગમન સાભળીને હર્ષિન તેમજ સ તુષ્ટ થઈને પાડુ રાજાએ સ્નાન કર્યુ કાગડા વગેરે પક્ષીઓના માટે અને વગેરેને ભાગ અને બલિકર્મ કર્યું દુપદ ગાએ જેમ તે રાજાઓને યથા યોગ્ય આવાસ સ્થાને રહેવા માટે આપ્યા હતા તેમજ પાડુ રાજાએ પણ તેઓ બધાને ઉચિત આવાસ આપ્યા ત્યારપછી તેઓ વાસુદેવ પ્રમુખ હજારે રાજા જ્યા પોતપોતાના કાવાના આવા હતા ત્યા ગયા, ત્યાં પહોંચીને તેઓ ત્યા શેકાઈ ગયા (तएण से पाइराया इस्थिणाउर' नयर अणुपविसइ, अणुपविसित्ता, फोडविय० सदाचेइ, सहावित्ता एव वयासी-ब्भेण देवाणुप्पिया! विउल असण গল্প - 1 , हस्तिनापुरस्य नगरम्य रतिः प्रदेश चामुढेमागाणा घाना रानमा स्राणामाग सान कास्यन, कीरशानामासान् यार-भणेगबम' न्यादि । अनेकम्तम्म शतमनिविष्ठान , तथैव-ययाऽऽघासान पारगिनु पाण्टना कथित, तथैव कारयित्वा सौम्बिरपुमा यारत् प्रत्यर्पयन्ति- नियिनि म | नापर वासुदेव प्रमुग्वा र सहरमरपका राजानो योर स्वकामका आरमातीपागन्ति, जाणित्ता कोविय० महावेह सदारिता र ययासी-गर ण तुम्भे देवाणुपिया ! रविणाउरस्म नयरत परिया पासुटेवपामोक्वाण यण रायमहस्माण आवासे करर) आकर उन पांडगना ने उन वासुदेव प्रमुग्म हजारों राजाओं का आगमन जानकर कौडम्यिक पुरुषों को बुलाया और बुलाकर उनसे हम प्रकार का हे देवानुप्रियो ' तुम लोग जाओ और हस्तिनापुर नगर के पारि वासुदेव प्रमुग्व हजारों राजाओं को ठहरने के लिये आरामों को पनवाओ (अणेगग्वभसय तहेव जाय पच्चप्पिणति, तएण ते चासुदेवपामोरसा हवे रायसहस्सा जेणेव हथिणारे तेणेव उवागच्छति) ये आवास अनेक सेकडोंस्तभों से युक्त हो। इस प्रकार जैसे आयामों को बनवाने के लिये पांडु राजा ने उन कौटुम्विक पुस्पों से कहा या-वैसे ही आपस उन कोटुन्त्रिक पुरुषों ने यनवादिये और अनवार पीछे उसकी गर भी राजा को फरदी। इसके याद वे वासुदेव प्रमुग्ध हजारों राजा जहा हस्तिनापुर सदावेइ, सदायित्ता एव वयामी-गह ण तुभे दवाणुप्पिया ! हविगाउरस्स नयरस पहिया वासुदेवपामोक्खाण बहूण रायसहस्साण आवासे फरेह ) ત્યા આવીને તે પાડુ રાજાએ તે વાસુદેવ પ્રમુખ હજા રાજાઓને આવી ગયેલા જણને પિતાને કૌટુંબિક પુરૂષને બોલાવ્યા અને બોલાવીને તેમને આ પ્રમાણે કહ્યું કે હે દેવાનુપ્રિ ! તમે લેકે જાઓ અને હસ્તિનાપુર નગરની બહાર વાસુદેવ પ્રમુખ હરે રાજા એને રહેવા માટે આવાસ બનાવે (अणेगखभसय तहेव जान पचप्पिणति, तए ण ते वासुदेवपामोक्खा यहवे रायसहस्मा जेणेव हस्थिणाउरे तेणेप उपागच्छति) આ બધા આવાસે સેકડે નથી યુક્ત રહેવા જોઈએ આ રીતે પાડુ રાજાએ જે જાતના આવા બનાવવવાને હુકમ કર્યો હતો તે કૌટુંબિક પુરૂએ તે જ જાતના આવા બનાવડાવી દીધા અને બનાવડાવીને કામ પુર થઈ જવાની રાજાને ખબર આપી ત્યારપછી તે વાસુદેવ પ્રમુખ હજારે રાજાએ જ્યા હસ્તિનાપુર નગર હતુ ત્યા આવી ગયા , भनगारघमामृतवपिणी टीका म० १६ द्रौपदीचरितनिरूपणम् स्नपयित्वा 'वलाणकारि ' कल्याणकारि-शुभकारकं कर्म कारयति, कारयित्वा तान् वासुदेवप्रमुखान् बहुसहस्रसख्यकान् राज्ञो विपुलेन अशनपानखाद्यस्वाधेन भोजयति, भोजयित्वा पुप्परस्त्रादिभिः सत्कारयति, समानयति, सत्कार्य समान्य यावत् प्रतिविसर्जयति । ततः खलु ते वासुदेवप्रमुखा बहुसहस्रसख्यका राजानो यावत् मतिगताः ।। मू०२३ ॥ मूलम्-तएण ते पच पडवा दोवईए देवीए सद्धि कल्ला- कल्लि वारवारेण ओरालाइ भोगभोगाइं जाव विहरति, तएर्ण से पडू राया अन्नया कयाइं पचहि पडवेहि कोंतीए देवीए को और द्रौपदी देवी को एक पटक पर बैठाया-बैठाकर उन का श्वेत पीत कलशों से चादी और सोने के घडो से स्नान करवाया स्नान कर- वाकर फिर उसने उनका शुभकारक कर्म करवाया । (करित्ता ते वासु- देव पामोक्खे बहवे रायसहस्से विउलेण असण ४ पुप्फवत्येण सकारेड सम्मोणेड जाव पडिविमन्जेह, तरण ताइ वासुदेवपामोक्वाड यहि जाव पटिगयाइ) शुभकारक कर्म करवाकर बाद में उन वासुदेव प्रमुख हजारों राजाओं का उस पाटुगज ने विपुल अशन पान आदिरूप चतुर्विध आहोर से एव पुष्प वस्त्रादि से खूब सत्कार किया सन्मान किया । यावत् फिर उन्हें अपने यहासे अच्छी तरह से पिदा कर दिया। इसके बाद वे वासुदेव प्रमुख हजारों राजा जहा २ से जो २ आये थे वहा • चले गये ।। सू० २३ ॥ પાચે પાડ અને દ્રોપદી દેવીને એક પટ્ટક ઉપર બેસાડયા અને બેસાડીને સફેદ તેમજ પીળા કળશોથી એટલે કે ચાદી અને સેનાના કળશથી તેમને સ્નાન કરાવ્યા બાદ તેમણે તેમની પાસેથી શુભ કર્મો કરાવડાવ્યા (करिता ते वासुदेवपामोक्खे वहवे रायसहस्से विउलेण असण पुष्फरत्येणं सक्कारेइ, सम्माणेड जाव पड्रिविसज्जेइ तएण ताइ वासुदेवपामोक्खाइ रहहिं जाव पडिगयाइ) શુભ કર્મો કરાવ્યા બાદ તે વાસુદેવ પ્રમુખ હજાર રાજાઓને તે પાડ રાજાએ વિપુલ અશન-પાન વગેરે રૂપ ચતુર્વિધ આહાથ્થી તેમજ પુષ્પ વસ્ત્ર વગેરેથી ખૂબ જ સત્કાર કર્યો અને સન્માન કર્યું યાવત ત્યારપછી તેઓને ત્યાથી સારી રીતે વિદાય કર્યા વાસુદેવ પ્રમુખ હજારો રાજાએ પણ જ્યાથી આવ્યા હતા ત્યાં જતા રહ્યા છે સૂત્ર ૨૩ | સ્નાન કરાવ્યું . - जीनामग्यास तत खलु ते वासुदेवममुग्ला प्रहयो राजानः स्नाताः कृतवालिफर्माण: कामादिजीवेभ्यः कतानादिसपिभागाः, तद् पिपुलम् अशन पान गार वाप तथैव-भास्वादयन्तो विसादयन्त परिभुनाना याद हिरन्ति आसतेस्म । ततस्तदनन्तर म पाण्हरामा तान् पन पाण्डवान् द्रौपदी च देवी 'पट्टय' पट्टा पट्टकोपरि 'दुल्हेइ ' दोहपत्ति-मारोहयति । आरोग तपीतैः क्लीः स्नपयति, ऐति, तण्ण ते वासुदेवपामोरखा पहवे राया पहाया कययलिम्मा त विउल असण ४ तहेर जाय वितरति-तण्ण से पराया पचपडवे दोवह च दोविं पट्टय दुरूहेड, दुरिता सेयपीहि पहावेंति, विसो कल्लाण कारि फरेड ) इस के पाद पाडराजा ने हस्तिनापुर नगर में प्रवेश किया प्रवेश कर कौटुम्पिक पुरुषों को बुलाया पुलाकर उनसे ऐसा करा हे देवानुप्रियो ' तुम लोग विपुल मात्रामें अशनादि रूप चतुर्विध आहार बनवाओ बनवाकर फिर उसे जहा वासुदेव प्रमुग्व राजा ठहरे हुए हैं वहा लेजाओ। इस प्रकार की अपने राजाकी आज्ञानुमार उन्होने वैसा ही किया-चतुर्विध आहार घनवाया और फिर उसे वासुदेव आदि राजाओ के पास पहुंचा दिया। आहार के पहुंचने पर उन वासुदेव प्रमुग्व राजाओं ने स्नान किया पलिकर्म किया-काम आदि जीवों के लिये कृत अन्नमें से विभाग देनेरूप कियाफी-यादमें उन्हों ने उस चतु विध आहार को किया। इसके पश्चात् पाडुराजा ने उन पाचों पाडवों ४ तहेव जाव उवणेति, तएण ते वासुदेवपामोक्खा बहवे राया व्हाया कयबलि फम्मा त निउल असण४ तहेव जाब विहरति-तएण से पडुराया पच पडवे दोवई च देविं पट्टय दुरुहेइ, दुरुहिता सेयपीएहि कलसेहिं व्हावेति हावित्ता फरलाणकारि करेइ) ત્યારપછી પાડુરાજા હન્તિનાપુર નગરમાં પ્રવિણ થયા પ્રવિષ્ટ થ્યને તેઓએ કૌટુંબિક પુરૂને લાવ્યા અને બોલાવીને તેઓને આ પ્રમાણે કહ્યું કે હે દેવાનુપ્રિયે તમે વિપુલ માત્રામાં અશન વગેરે રૂપ ચાર જાતને આહાર બનાવડાવે બનાવડાવીને તમે તે આહારને ક્યા વાસુદેવ પ્રમુખ રાજાએ રોકાયા છે ત્યા લઈ જાઓ, આ રીતે પોતાના રાજાની આજ્ઞા સાભ ળીને તે લોકેએ તે પ્રમાણે જ કર્યુ તેઓએ ચાર જાતના આહારે બના વડાવ્યા અને ત્યારપછી તે આહારને વાસુદેવ પ્રમુખ રાજાઓની પાસે પહો થાડી દીધા આહાર પહોંચાડી દીધા બાદ તે વાસુદેવ પ્રમુખ રાજાઓએ સ્નાન કર્યું અને કાગડા વગેરે પક્ષીઓને અન્ન ભાગ અપને બલિકર્મ કર્યું ત્યાર પછી તેઓએ તે ચાર જાતના આહારને જમ્યા ત્યારબાદ (રાજાએ તે अनगारधर्मामृतपिणी टोका अ०१६ द्रौपदीचरितनिरूपणम् त्तो आयाहिणपयाहिणं करेइ करित्ता वदइ णमसड महरिहेण आसणेणं उवणिमतेइ,तएण से कच्छुल्लनारए उदगपरिफासियाए दभोवरिपच्चत्थुयाए भिसियाए णिसीयइ, णिसीयित्ता पडुरायं रज्जे जाव अतेउरेय कुसलोदतं पुच्छइ,तएणसे पंडराया कोनी- देवी पच य पडवा कच्छुल्लणारय आढति जाव पज्जुवासंति, तएणं सा दोवई कच्छुलनारय असजय अविरय अपडिहयप- चक्खायपावकम्मे त्तिक नो आढाइ नो परियाणइ नो अब्भु- हेइ नो पज्जुवासइ ।। सू० २४ ।। टीका-'तपण ते' इत्यादि । ततस्तम्वदनन्तर खलु ते पञ्चपाण्डवा द्रौपद्या देव्या साकाकति' कल्याफल्ये प्रतिदिवस वारसारेण उदारान भोगभोगान् यावद् भुमाना विहरन्ति । तत खलु स पण्ड राजाऽन्यदा कदाचित पञ्चभिः पाण्डवैः कुन्त्या देव्या द्रौपद्या देव्या च सार्ध ' अतो अतेउरपरियाल' तएण ते पच पडवा' इत्यादि । टीकार्य-(तएण) इसके बाद (ते पच पडवा) वे पांचों पाउब (दोवईए देवीए) द्रौपदी देवी के साथ-(कल्लाकल्लिं वारवारेण ओरालाइ भोग भोगाइ जाव विहरति-ताण से पट्टराया अन्नया कयाई पर्ति पडहिं कोतीए देवीए दोबई। देवी य सद्धिं अतेउरपरियालसद्धिं मपरिखुडे सीहासणघरगए यावि विरह) प्रतिदिन पारी नारी से उदारकाम भोगों को भोगने लगे एक दिन की यात है-कि पाटु राजा किसी एक समय पाचों पांडवों एव अपनी पत्नी कुन्ती देवी और पुत्रवत द्रौपदी A1 तएण ते पच पहरा इत्यादि- थ-(तएण ) त्यापी (ते पच पडवा) ते पाय पाउ (ोवई देवीए ) श्रीपही वीना साथ (ल्लाकलिल वारवारेण औरालाइ भोगभोगाड जाब विहरनि-तएण से पडराया अन्नया कयाई पर्चाई पडवेहि कोतीए देवीए दोवइए देवीए य सद्धिं अतेउरपरियालसद्धि सपरिवुढे सीहामणवरगए यावि विहरइ) દરરોજ વનફરતી ઉદાર કાબેગ ભેગવવા લાગ્યા. એક દિવસની વાત " ना my ४४८ पातापर्मसारखे दोवइए देवीए य सडिं अंतो अंतेउरपरियालसद्धि सपरिवुडे सीहासणवरगए यावि विहरइ, इम च ण कच्छल्लणारए दस णेण अइभदए विणीए अतोर य क्लसहिया मज्झन्थोवस्थिए य अल्लीणसोमपियदसणे सुम्वे अमइलसगलपरिहिए काल मियचम्मउत्तरासगरदयवच्छे दण्डकमण्डलुहत्थे जडामउडदि- त्तसिरए जन्नोवइयगणेत्तियमुंजमेहलवागलघरे हत्यकयकच्छभीए पियगवव्वे धरणिगोयरप्पहाणे सवरणावरणिओवयणिउप्पयणि लेसणीमु य सकामणिअभिओगपण्णत्ति गमणीथभणीसु य बहुसु विजाहीसु विज्ञासु विस्सुयजसे इ8 रामस्स य केस वरस य पज्जुन्नपईवसवअनिरुदणिसढ-उम्मुयसारणगयसुमुह दुम्मुयहातीण जायवाणं अधुट्ठाण कुमारकोडीण हिययदइए सथवए कलहजुद्धकोलाहलप्पिए भडणाभिलासी बहुसु य सम रसयसपराएसु दसणरए समतओ कलहसदक्खण अणुगवेस माणे असमाहिकरे दसारवरवीरपुरिसतिलोक्कबलवगाणआम तेऊण त भगवई पक्कमणि गगणगमणदच्छ उप्पइओगगणमभि लघयतो गामागरनगरनिगमखेडकब्बडमडबदोणमुहपट्टणासम सवाहमहस्समडिय थिमियमेइणीतल वसुहओलोइतो रम्म हस्थि- णाउर उवागए पडुरायभवपि अइवेगेण समोवइए, तएणं से पडुराया कच्छुल्लनारय एजमाण पासइ पासित्ता पत्रहि पड- वेहि कुतीए य देवीए सद्धि आसणाओ अब्भुटेइ अब्भुट्टित्ता कच्छुल्लनारय सत्तटुपयाईपच्चुग्गराइ पवीत यज्ञमूत्र . . अनगारधर्मामृतपिणी टी० अ० १६ द्रौपदीचरितनिरूपणम् પ रइयवच्छे कालमृगचर्मोत्तरासगरचितवक्षा:-कृष्णमृगचर्मोत्तरासङ्गेन रचित शोभित वक्षो यस्य स तथा, कृष्णमृगचर्मोत्तरीपवस्त्रधारकः । तथा-'दडकमडलुइत्ये' दण्डकमण्डलुहस्त:-'जडामउडदितसिरए' जटामुकुटदीप्तशिरम्कः, जप्णोपट्यगणे- त्तियमुजमेइलावागलधरे । यज्ञोपवीतगणेविकामुञ्जमेखलावल्कलधरः-तत्र यशो. गणेत्रिका-रुद्राक्षकत कलाचिकाभरण, मुञ्जमेखला-मुञ्जमय कटि पन्धनमूत्र वल्कल क्षत्वक, तेपो धारकः स्कन्धोपरियज्ञसूत्रधारी, करमूले धृत रुद्राक्षमालः, मुनमयफटिमूत्रधारी, शरीरे परिधृतरस्कल इत्यर्थः । 'हत्यकयकच्छ भीए' इस्तकृतकच्छपिकः-हस्ते कृता कच्छपिका-वीणा येन स तया, 'पियग- घवे ' भियगन्धर्वः-गानप्रियः, 'धरणिगोयरप्पहाणे' धरणिगोचरप्रधान - धरणिगोचराणा-भूमिचारिणा जनाना मध्ये प्रधानस्तस्या काशेऽपि पिहरणशीलत्वात् चम्मउत्तरासगरहयवच्छे दण्डकमण्डलुहत्थे, जडामउडदित्तसिरए, जन्नो वहयगणेत्तिय मुजमेहलवागलधरे, हत्यकयकच्छभीए, पियगंधब्बे, धर- णिगोयरप्पहाणे, सवरणावरणिओवयणिउप्पयणी लेसणीसुयसकामणि अभिओगपण्णत्ति गमणीचमणीसु य बहुसु विजाहरीसु विज्जासु विस्तृयजसे ) इनका वक्षस्थल काले मृग के चर्म रूप उत्तरासग से सुशोभित था। दण्ड और कमण्डलु इनके हाथोमे या । जटारूपी मुकुट से इनका मस्तक दीप्त हो रहा था। यज्ञसूत्र-जनेऊ, गणेत्रिका कलाई का आभरण रूप रद्राक्ष की माला, मुञ्जमेखला-मुज का बना हुआ कटि बन्धन सूत्र, और वृक्ष की छाल इन्हो ने धारण कररक्खी थी। हाथमें कच्छपिका-चीणा ले रखी थी। गान इन्हे बहुत प्रिय या। भूमि गोचरियों के बीच में ये प्रधान थे-क्यो कि ये आकाश मे भी विहार (कालमियचम्मउत्तरासगरइयवच्छे दण्डकमण्डलुइत्ये जडामउड दित्तसिरए, जन्नोवइय गणेत्तियमुजमेहलवोगलधरे, इत्यकयकच्छभीए पियगधन्वे, वरणि- गोयरप्पहाणे, सवरणावरणिओवयणिउप्पयणिलेसणोमु य सकामणि अभि- भोगपण्यत्ति गमणीयमणीमुय बहुसु विज्जाहरीसु विज्ञासु विस्सुयजसे ) તેમનું વક્ષસ્થળ કાળા હરણના ચર્મરૂપ ઉત્તરાસગથી શોભતુ હતુ દડ અને કમ ડળ તેમના હાથમાં હતા જટા રૂપી મુકુટથી તેમનું મસ્તક પ્રકાશિત થઈ રહ્યું હતું યજ્ઞ સૂવ-જેનાઈ, ગણેત્રિકા-કાડામાં પહેરવાનો આભ રણ રૂ૫ રૂદ્રાક્ષની માળા, મુ જ-મેખલા-મુજકુ બનેલુ કેડમાં પહેરવાનું બ ધન સૂત્ર અને વૃક્ષની છાલ તેઓએ ધારણ કરેલી હતો હાથમાં તેઓએ કચ્છ પિકા-વીણ ધારણ કરેલી હતી સગીત તેમને ખૂબ જ ગમતું હતુ ભૂમિ રશે તેઓ પ્રધાન હતા કેમકે તેઓ આકાશમાં વિચરણ કરતા ગેચરીએ ५५० - . पातामेवालय अन्तः अतःपुरस्प मासादमध्ये अतापुरपरिवारेण 'परियाल ' इति लुप्तवती यान्त साधं सपरिरतः सिंहासनारगतथापि रिहरति । 'म च ' अस्मिन् समये खलु 'फन्दुरलणारए' फलनाम्नामसिदो नारदः दर्शनेन 'अइमदए अतिभद्रका भद्रदर्शनः 'रिणी' निीतानम्रो यत 'अतो य ' अन्तत्र- कलुपदयः, 'मझत्योपत्थिर य' मा पम्योपस्थित मानतो मध्यस्थमाव प्राप्तः अल्लीणसोमपियदसणे' आलीनमाम्यमियदर्शनः आलीनानामाश्रिताना सौम्यम् =आपादक, मिय = प्रीतिकारक दर्शन यस्य म तया, मुरूपः- सुन्दराकृतिक, तथा-'अमइलसगलपरिहिए ' अमलिनसमपरिरित.अमलिन सम्लम्-अख ण्डम् परिहित-पलकल पखरूप परिधान यस्य स तथा, 'कालमियचम्मउत्तरासग के साथ अतःपुर के प्रामाद के भीतर अन्त पुरपरिवार के साथ सिंहासन पर बैठे थे-कि (इमच ण) इसी समय (कच्छुल्लणारए पडरायभवणसि अइवेगेण ममोवइए दसणे ण अइभहण, विणीए, अतोय फलुसरिया मज्झत्योवत्यिए य, अल्लीणसोमपियदसणे सुस्वे अमइलसगलपरिहिण) पाडराजा के भवन में कच्छुल्लनाम से प्रसिद्ध नारद गगन-आकाश-मार्ग से बड़े वेगसे उतर कर आये। नारद देखने में अति भद्र थे। ऊपर से पडे विनीत थे। परन्तु भीतर में इनका हृदय बहुत अधिक कलुपित था। केवल ऊपर से ये माध्यस्थ भाव सपन्न थे। अपने आश्रित व्यक्तियों को इनका दर्शन आहादक एव प्रीति कारक होता था। आकृति उनकी बड़ी सुन्दर थी। इनका यल्कल रूप परिधान अमलिन-साफ स्वच्छ और खण्ड रहित था। (कालमिय છે કે તે પાડુ રાજા કે એક વખતે પાચે પાડવો, પિતાની પત્ની કુતી દેવી અને પુત્ર વધુ દ્રૌપદીની સાથે રણવાસના મહેલની અંદર પિતાના પરિવારની साथे सिंहासन ५२ ता (इम च ण) ते ते (कच्छुल्लणारए पडुरायभवणसि अइवेगेण, समोवइए दसणे ण अइभदए विणीए अतोय कलुसहियए मज्झत्योवथिए य, अल्लीणसोमपियदसणे सुरूवे अमइलसगलपरिहिए) પાડુ રાજાના ભવનમાં કચ્છતલ નામથી પકાયેલા નારદ ગગન-આકાશ માર્ગથી બહુ જ વેગથી ઉતરીને આવ્યા નારદ રેખાવમા અત્યત ભદ્ર હતા ઉપર ઉપરથી તેઓ એકદમ વિનમ્ર હતા પણ અતર તેમનું મન ખૂબ જ કલુષિત હતુ ફક્ત ઉપર ઉપરથી જ તેઓ માધ્યસ્થ આશ્રિત વ્યક્તિઓને તેમનું દર્શને આહલાદક અને પ્રતિકારક હતું તેમની આકૃતિ ખુબ જ સુંદર હતી તેમનુ વલ્કલ રૂપ પરિધાન, એકદમ સ્વ-નિર્મળ હતું અને ખડરહિત હતુ ભાવ સપન હતા है , मनगारधर्मामृतषिणी टी० अ० १६ द्रौपदीचरितनिरूपणम् ४५१ रइयवच्छे कालमृगचर्मोत्तरामगरचितवक्षाः-कृष्णमृगचर्मोत्तरास न रचित शोभित वक्षो यस्य स तथा, कृष्णमृगचर्मोत्तरीयवस्त्रपारकः । तपा-दडकमडलुइत्ये' दण्डकमण्डलुहस्त:-'जडामउडदित्तसिरए' जटामुकुटदीप्तशिरम्का, जप्णोवदयगणे- त्तियमुजमेहलावागलधरे ' यज्ञोपवीतगणेत्रिकामुञ्जमेखलावल्कलधरः-तत्र यज्ञो. पवीत यज्ञमूत्र गणेत्रिका-रुद्राक्षकत कलाचिकाभरण, मुजमेखला-मुञ्जमय कटि पन्धनमूत्र वल्कल क्षत्वक, तेपा धारक. स्कन्धोपरियज्ञसूत्रधारी, करमूले धृत रुद्राक्षमालः, मुझमयफटिमूत्रधारी, शरीरे परिधृतरकल इत्यर्थः । ' इत्यकयकच्छ भीए' इस्तकृतकच्छपिक:-दस्ते कृता कच्छपिका-वीणा येन स तथा, 'पियग पन्चे' भियगन्धर्वः-गानमिय., 'धरणिगोयरप्पहाणे' धरणिगोचरप्रधान - घरणिगोचराणा-भूमिचारिणा जनाना मध्ये प्रधानस्तस्पा काशेऽपि विहरणशीलत्वात् चम्मउत्तरासगरइयवच्छे दण्डकमण्डलुहत्थे, जडामउडवित्तसिरए, जन्नो वक्ष्यगणेत्तिय मुजमेहलवागलधरे, हत्यायकच्छभीए, पियगंधब्बे, धर- णिगोयरप्पहाणे, सवरणावरणिओवयणिउप्पयणी लेसणीसुयसकामणिं अभिओगपण्णत्ति गमणीयभणीसु य यहुसु विजारीसु विज्जासु विस्तृयजसे ) इनका वक्षस्थल काले मृग के चर्म रूप उत्तरासग से सुशोभित था । दण्ड और कमण्डलु इनके हाथोमें था। जटारूपी मुकुट से इनका मस्तक दीप्त हो रहा था। यज्ञसूत्र-जनेऊ, गणेत्रिका कलाई का आभरण रूप रुद्राक्ष की माला, मुञ्जमेखला-मुज का बना हुआ कटि बन्धन सूत्र, और वृक्ष की छाल इन्हो ने धारण कररक्खी थी। हाथमें कच्छपिका-वीणा ले रखी थी। गान इन्हें बहुत प्रिय था। भूमि गोचरियों के बीच में ये प्रधान थे-क्यो कि ये आकाश मे भी विहार (कालमियचम्मउत्तरासंगरइयवच्छे दण्डकमण्डलुइत्ये जडामउडदित्तसिरए, जभोवइय गणेत्तियमुजमेहलवागलधरे, हत्थकयकच्छभीए पियगपव्वे, धरणि- गोयरप्पहाणे, सवरणारणिभोवयणिउप्पयणिलेसमोसु य सकामणि अभि- ओगपण्णत्ति गमणीयमणीमुय बहुसु विज्जाहरीसु विज्ञासु विस्सुयजसे ) તેમનું વક્ષસ્થળ કાળા હરણના ચર્મરૂપ ઉત્તરાસગથી શોભતુ હતુ દડ અને કમ ડળ તેમના હાથમાં હતા જટા રૂપી મુકુટથી તેમનું મસ્તક પ્રકાશિત થઈ રહ્યું હતું ય સૂત્ર-જનોઈ ગણેત્રિકા-કાડામા પહેરવાનૌ આભ રણ રૂપ રૂદ્રાક્ષની માળા, મુ જ-મેખલા-સુજતુ બનેલુ કેડમાં પહેરવાનુ બ ધન સુત્ર અને વૃક્ષકની છાલ તેઓએ ધારણ કરેલી હતો હાથમાં તેઓએ કર પિકા-રણ ધારણ કરેલી હતી સગીત તેમને ખૂબ જ ગમતું હતું ભૂમિ ગોચરીઓને વચ્ચે તેઓ પ્રધાન હતા કેમકે તેઓ આકાશમાં વિચરણ કરતા पीतामेचा . "सारणारणित्रयणिउप्पणिसणीमु य मंपरण्यापरण्यपतन्युत्पतनी श्लेपगीपु च ' सारणी-सम्पान्तधानकारिणी धिा, आपरणी-परम्यान्तर्शन कारिणी विद्या, अप्रपतनीअधोऽतरणी विद्या, उत्पतनी-गमनकारिणी विद्या, लेपणी-जलेपादियन् मन्धानकारिणी विधा, वासु, तथा-'सकामगि अभि ओगपण्णति गमणीयमणीमु य ' मझमण्यभियोगमशप्तिगमनीस्तम्भनीपु च- सकामणी-विधा-विशेपः यया-परशरीराटी प्रवेष्टु क्नोति, सा विद्या, अभि योग स्वर्णादिनिर्माणविधा वशीकरणविद्याच, प्राप्ति:-अविदिताबोधिनी गमनी करते थे। मवरणी, आचरणी अउपतनी, उत्पतनी, लेपणी इन विद्या ओ में तथा मक्रमणी, अभियोग, प्रजप्सि, गमनो स्तम्भिनी इन नाना प्रकार की विद्या पर सपन्धी विद्याओं में इनकी कीर्ति विरयात थी। जिस पिया के प्रभाव से अपने आपको अन्तर्धान कर दिया जाता जाता है उसका नाम मवरणी विद्या है। दूसरा जिस विधा से अन्त र्धान करदिया जाता है उस विद्या का नाम आवरणी विद्या है । जिस विद्या के प्रभाव से ऊपर से नीचे उतरा जाता है उसका नाम अव पतनी और जिसके प्रभाव से उर्व में गमन किया जाता है उसका नाम उत्पतनी विया है। वज्रलेप आदि की तरह जो चिपका देती है वह श्लेपणी विद्या है । जिस विद्या के बल से दूसरे के शरीरमें प्रविष्ट होना होता है-ऐमी परशरीरप्रवेशकारिणी विद्याका नाम सक्रमणी विद्या है। स्वर्ण आदि के बनाने की जो निपुणता है-7व परको હતા સવરણી, આવરણી, અવપતની, ઉત્પતની, લેવણી આ બધી વિદ્યા એમાં તેમજ સક્રમણ અભિગ, પ્રકૃતિ, ગમન, મતભની આ અનેક જાતની વિદ્યાધર સબધી વિવાઓમાં તેમની કીતિ મેર પ્રસરેલી હતી જે વિદ્યાના પ્રભાવથી પિતાની જાતને અદશ્ય કરી શકાય છે તે સવરણી વિધા છે જે વિવાથી બીજાને અદશ્ય કરી શકાય છે તે આવરણી કહેવાય છે જે વિદ્યાના પ્રભાવથી ઉપરથી નીચે ઉતરી શકાય છે તે અવપતની અને જેના પ્રભાવથી ઉર્વ ( આકાશ) મા ગમન કરી શકાય છે તે વિદ્યાનું તની છે વગેરેની જેમ જે ચટાડી દે છે તે શ્લેષણી વિદ્યા છે જે विद्या । ના શરીરમાં પ્રવેશી શકાય એવી પરકાય પ્રવેશ કરિણી G । सानु पोरे मनापामा २. જે.નિપુણતા નામ ઉ૫ छ , - नगरिधर्मामृतपपिणी टी० अ० १६ द्रौपदीवरितनिरूपणम् ४५३ -गमनपसाधिका-आकाशगामिनी च विद्याविगेपः-स्तम्भनी-स्तम्भनकारिणी विद्या, तासु 'हुमु विज्जाहरीमु पिउनासु' पहुपु-नानाविधासु विद्याधरीपु-विद्या- घर सम्बन्धित विद्यास 'विस्मयजसे' निश्रुतयशा-विद्यासु नैपुण्या-पियातकीर्ति, इष्ट मिया, रामस्य पलदेवस्य केशवस्प-कृष्णवासुदेवस्य च पुन केपा प्रियइ- त्याह-' पज्जुनपईवसभनिरुद्धनिमढ़उस्सुयमारणगयमुमुहदुम्मुहाईण जायवाण प्रद्युम्न प्रतीपशाम्बानिरनियोत्सुकसारणगजमुमुखदुर्मुग्वादीना यादवानाम् , प्रद्युम्नादीना सग्च्यामाह-प्रद्यम्न , प्रतीप, शाम्बः, अनिरुद्ध, निपः, उन्मुकः, वश मे करने कि जो शक्ति है उस विद्या का नाम अभियोग विद्या है। अविदित अर्थ जिस के प्रभाव से विदित हो जावे वह प्रज्ञप्ति विद्या गमन प्रकर्ष की साधक तथा आकाश में गमन कराने वाली विद्या गमनो विन्या स्तम्भन कराने वाली विद्यास्तम्भिनी चिया है। (इटे रामस्स य केसस्स य पज्जुनपईयसर अनिरुद्धणिसढ उम्मय सारण गयसुमुह दुम्मुहातीण जायवाण अनुष्ठाण कुमारकोडीण दिययदइए स या कलहजुद्धकोलाहलप्पिण, भडणामिलामी, यहुसु य समर सयसपराएसु दसणरए, समतओ कलहसदस्खण अणुगवेसमाणे, असमाहिकरे दमारवरवीरपुरिसतिलोक्कपलवगाण, आमतेऊण त भगवई पक्कमणि गगणगमणदच्छ उप्पहओ गगणमभिलघयतो गामागरनगरनिगमखेडकरउमउबदोणमुहपट्टणासममवाहसहस्समडिय थिमियमेहणीतल वसु आलोडतोरम्म हरियणाउर उवागण) यलदेव एव कृष्ण वासुदेव को ये इष्ट थे तथा साढे तीन करोड, प्रद्युम्न, प्रतीप, साम्ब, अनिरुद्ध निपध उत्सुक, सारण, गज सुकुमाल सुमुग्व दुर्मुख વિયા છે અવિદિત અર્થ જેના પ્રભાથ્થી જાણી શકાય તે પ્રકૃતિ વિદ્યા, ગમન પ્રકર્ષની માષિકા તેમજ આકાશમાં ગમન કરનારી વિયા ગામની વિદ્યા કહે १६५ छे स्तमान सपनारी विद्या स्तमनी विधा छ (इटे रामरस य केस. घास य पञ्जुन्नपईक्सपअनिरुद्ध णिसढउस्सुयसारणगयसमुहदुम्मुहतीण जायवाण अर्बुदाणकुमारकोडीग हिययदइए सबवए कल इजुद्धकोलाहलप्पिए, भडणाभिलासी, बहुसयसमरसयसराएसु दसणरए समतओ कलईसक्नण अणुगसमाणे अस माहिकरे सारवरवीरपुरिसतिलोक्कालवगाण, आमतेऊण त भगवई, पक्कमणि गगणगमणदच्छ उप्पइओ गगणममिल गय तो गामागारनगरनिगमखेडकबडमडब दोण मुहपट्टणासमसबाइसहरसम डिय थिमिण मेइणीतल वसुह आलोइ तो रम्म हथिणाटर उवाग) मजदेवतमा ४वासुदेवने तेसोट ता भने मात्र ४२।३ प्रधुम्न, પ્રતીપ, માખ, અનિરૂધ, નિષધ, ઉત્સુક, નારણુ, ગજ સુકમાલ, સુમુખ દુર્મુખવગેરે વદાય કુમારે માટે તેઓ હૃદયદયિત હતા એટલે કે ખૂબ જ પ્રિય હતા એટલા .
- तामेव्या "सरणारणिोरयणिउप्पपणिसणीमु ग मारण्यावरण्यवपतन्युत्पवनी प्रलेपगीपु च सरणी-सम्पान्तर्धानकारिणी ful, आरणी-परस्यान्वर्धान कारिणी विद्या, अवपतनीअधोऽयतरणी विद्या, उत्पतनी-गमनकारिणी विधा, प्रलेपणी-पतलेपादियन् मन्धानकारिणी निघा, ताम, तथा-' मकामणि अभि ओगपाणति गमणीयमणीमु य ' मक्रमपभियोगमाप्तिगमनीस्तम्भनीषु च- सकामणी-विद्या-विशेषः यया परारीरादी प्रवेटु शक्नोति, सा विद्या, अभि योगः स्वर्णादिनिर्माणपिया गीकरणविद्याच, प्राप्ति गरिदिगार्थबोधिनी गमनी करते थे। मवरणी, आचरणी अरपतनी, उत्पतनी, लेपणी इन विद्या ओं में तथा मक्रमणी, अभियोग, मजप्ति, गमनो स्तम्भिनी इन नाना प्रकार की पिया घर सयन्धी चियाओ में इनकी कीर्ति विख्यात थी। जिम चिया के प्रभाव से अपने आपको अन्तर्धान कर दिया जाता जाता है उसका नाम मवरणी विधा है। दूसरा जिम विधा से अन्त र्धान करदिया जाता है उस विद्या का नाम आवरणी विद्या है। जिस विन्या के प्रभाव से ऊपर से नीचे उतरा जाता है उसका नाम अब पतनी और जिसके प्रभाव से उर्ध्व में गमन किया जाता है उसका नाम उत्पतनी विधा है। वज्रलेप आदि की तरह जो चिपका देती है वह लेपणी विद्या है। जिम विद्या के बल से दूसरे के शरीरमें प्रविष्ट होना होता है-ऐमी परशरीरप्रवेशकारिणी विद्याका नाम सक्रमणी विद्या है। स्वर्ण आदि के बनाने की जो निपुणता है-राव परको હતા. સાવરણી, આવરણી, અવપતની, ઉત્પતની, શ્લેષણ આ બધી વિદ્યા એમ તેમજ સક્રમણ, અભિગ, પ્રાપ્તિ, ગમની, તભની આ અનેક જાતની વિધાધર સંબધી વિવાઓમાં તેમની કીતિ મેર પ્રસરેલી હતી જે વિદ્યાના પ્રભાવથી પિતાની જાતને અદશ્ય કરી શકાય છે તે સાવરણ વિદ્યા છે જે વિવાથી બીજાને અદશ્ય કરી શકાય છે તે આવરણી કહેવાય છે જે વિધાના પ્રભાવથી ઉપરથી નીચે ઉતરી શકાય છે તે અવતની અને જેના પ્રભાવથી ઉન્હ (આકાશ) માં ગમન કરી શકાય છે તે વિદ્યાનું નામ ઉ૫ તની છે વળ લેપ વગેરેની જેમ જે ચોટાડી દે છે તે વણી વિદ્યા છે જે વિદ્યાના બળથી બીજાના શરીરમાં પ્રવેશી શકાય એવી પ્રરકાય પ્રપેર કરિણ વિદ્યાનું નામ સકમ વિદ્યા છે તેનું વગેરે બનાવવામાં જે નિપુણતા છે અને બીજાને વશવતી કરવાની જે શક્તિ છે તે . , , भमगारधर्मामृतवपिणी टीका अ० १६ द्रौपदीचरितनिरूपणम् वीराः पुरुपास्त्रैलोक्ये वलन्त नेमिनाथापेक्षया तेपाम् , 'आमतेऊण त भगवई' आमन्य-प्रयुज्य ता भगवती-विद्या, कीदृशीं विद्यामित्याह-'पकमणि' प्रक मणी-प्रकृष्टगमनशक्ति शालिनी 'गगणगमणदच्छ' गगनगमनदक्षाम् आकाशे गमने समर्थाम् 'उप्पडओ' उत्पतितः, गगनमभिलड्डयन् उड्डीय गमनेनाकाशतलमुलड्डयन् 'गामागरनगरनिगमखेडस्पडमडवदोणमुहपट्टणासमसवाहसहस्समडिय' ग्रामावर नगरनिगमखेटनंटमडपद्रोणमुखपत्तनाश्रमसवाहसहस्रमण्डित, तत्र अष्टादशकरग्राह्यो ग्रामः, आकरः स्वर्गाद्युत्पत्तिभूमिः, अविद्यमानकर नगर, निगम धणिग्ग्राम खेट- धूलीमकार,कट-कुत्सितनगर, यत्र योजनान्तराले ग्रामादिनास्ति तन्मडम्ब यत्र जल स्थलमार्गाभ्या, भाण्डान्यागच्छति तत् द्रोणमुख, पत्तन द्वधा-जलपत्तन स्थलपत्तन, यत्र पर्वतादिदुर्गे लोका धान्यानि संवहति स सवाह एतैः सहसमण्डितं, स्तिमित- मेदिनीतल, 'वसुह' वसुधा भूमि ' ओलोइतो' अवलोकयन् पश्यन् रम्य हस्ति नापुर नगरमुपागत• पाण्डुराजभवनेऽतिवेगेन समुपेतः गगनादवतीर्ण इत्यर्थः । तत सलु स पाण्डुराजा कच्छुल्लनारय' च्छुल्लनारदम् आगच्छन्त पश्यति-दृष्ट्वा पञ्चमि पाण्डवैः कुन्त्याच देव्यासार्धमासनादम्युत्तिष्ठति, अभ्युत्थाय दशाह थे उनके ये सदा चित्त के विक्षेप कारक बने रहते थे। गमन में विशिष्ट शक्ति प्रदान करने वाली एव आकाश में उठाकर ले चलने वाली उस भगवती प्रक्रमणी विद्या को प्रयुक्त करके ये आकाश में उड़ा करते थे। ये नारद, गमन से आकशतल को उल्लघन करते हुए ग्राम, आकर, नगर, निगम खेट, कर्यट, मडव, द्रोणमुख, पत्तन, सयाह इनके सहस्रों से मडित हुई ऐसी स्तिमितमेदनीतलवाली वसुधा-भूमि को देखते हुए रम्य हस्तिनापुर नगर में आये और वहा से गगनमार्ग से होकर फिर ये पाडुराज के भवन में पहुंचे। ऐसा सध यहां लगाना (तएणं से पडूराया कच्छुल्लनारय एज्जमाणं पासइ) इम के बोद पाडुराजा ने कच्छुल्ल इन नारद को आते हुए जब देखा ( पामित्ता) तो ગમનમાં વિશિષ્ટ શક્તિ આપનારી અને આકાશમાં ઉડાડીને લઈ જનાર તે પગવતી પ્રક્રમ વિદ્યાના બળથી તેઓ આકાશમાં ઉડતા રહેતા હતા આ રીતે આ નારદ ગમનથી આકાશને ઓળગીને સહએ ગ્રામ, આકર નગર, નિગમ ખેટ કર્બટ, મડબ, દ્રણમુખ, પત્તન,સ બાહોથી, મડિત અને સ્વિમિત પૃથ્વીને જોતા મણીય હસ્તિનાપુર નગરમાં આવ્યા અને ત્યાથી આકાશ भागमा यधने पास अपनभा ५४ाच्या (तएण से पाडुराया कच्छुल्ल नारय एज्जमाण पासइ) त्यारा पाये छुनाहने न्यारे मापता नया (पासिता ) त्यारे ने (पचहिं पहवेहिं कुतीए देवीए सद्धि आसणाओ - - - ताकया सारण', गजमुकुमाल', मुगुवः, दर्मय , इत्यादयो यादरामारास्तेषा 'अट्ठाण कुमारकोडीण' अर्धचतुर्थीना कुमारगोटीनां च सार्धतिकोटिममिताना यादव कुमाराणामित्यर्थः 'हिययदर' इदयदयितः हृदयमियः, ' सथापए ' सस्ता मा-यादवाना प्रशसफः, तथा-कलयुद्धकोलाहलमियाबरहो-विवाद , युद्ध- शस्त्रादिभिः प्रहरण, कोलाहलो जनाना माधनिः, पते मिया: प्रमोदजनका यस्य स तथा, 'भटणामिलासी' मण्टनामिलापी-भण्डन राटि-फलद 'राह इति भापाया तम्याभिलापी तया-बहुपु च समरसतमपरायेपु-समरशतसग्रामेषु दर्शनरत दर्शनाऽऽसक्त., 'समतमो समन्ततः सर्वप्रकारेग-परस्पर च कलई सदरखण' सदाक्षण-सस्मिन क्षणे ' अणुगवेसमाणे ' अनुगवेपयन् अन्वेष यन् , ' असमाहिकरे' असमाधिकरः-चितविक्षेपकारकः चित्तस्यास्थैर्यकर केषा चित्तस्य विक्षपकइत्याह-'दसारवरवीरपुरिसतिलोष पलपगाण' दशाईवरवीर पुरुपौलोक्यालयता-दशाहा.-समुद्रविजयादयो दशसख्यका त एव वरा श्रेष्ठाः इत्यादि यादवकुमारों के लिये ये हृदय दयित थे-अत्यत प्रिय थे। इसी कारण यादवों के प्रशसक थे । कलरविवाद युद्ध एव मनुष्यो का कोलाहल ये सब इन्हें बहुत अधिक अच्छे लगते थे। आनन्द जनक होते थे। रोड़ (लडाई) के ये अभिलापी घने ररते थे। अर्थात् हर एक जगह किसी न किसी रूप में परस्पर में लोगों में तकरार, कजिया कैसे उत्पन्न हो इस घात का इन्हें विशेष ध्यान रहता था। समर शतसग्राम के देखने में इन्हें विशेष होल्लास होता था। सब प्रकार से परस्पर में सब समय में ये कलह की गवेपणा करने में ही लगे रहते थे । नेमिनाथ की अपेक्षा त्रैलोक्य में विशिष्ट बलवाली जो श्रेष्ठ वीर पुरुष समुद्र विजयादि दश માટે જ તેઓ યાદવેના વખાણ કરનારા હતા કલહ-કકાસ, વિવાદ, યુધ્ધ અને માણસને શોરબકોર આ બધુ તેમને બહુ જ ગમતુ હતુ આ બધાથી તેમને ખૂબ જ મજા પડતી હતી, કજીએ તેમને ખૂબજ ગમતું હતું એટલે કે દરેક સ્થાને ગમે તે કારણને લીધે વચ્ચે પરસ્પર કલહ-ક કામ કરે કેવી રીતે શરૂ થાય આ વાતની તેઓ તક જતા રહેતા હતા સેકડે યુદ્ધોના બીભત્સ દશ્ય જોવામાં તેમને ખૂબ જ આનદને અનુભવ થતા હતા તે બધી રીતે રાત અને દિવસ એકબીજાને લડાવવાની શોધમાં જ ચાટી રહેતા હતા નેમિનાથની અપેક્ષા વાક્યમાં સવિશેષ બળવાન શ્રેષ્ઠ વીર પુરૂષ સમુદ્ર વિજય વગેરે દશ દશાર્દો હતા તેમના ચિત્તને તેઓ કઈ ? dl.
" ममगारधर्मामृतपिणी टीका म०१६ द्रौपदीचरितनिरूपणम् वीराः पुरुपाबैलोक्ये वलयन्त नेमिनायापेक्षया तेपाम् , 'आमतेऊण त भगवई आमन्य-प्रयुज्य ता भगवती-विद्या, कीदृशीं विद्यामित्याह-'पकमणि' प्रक मणीं-मकृष्टगमनशक्ति शालिनी 'गगणगमणदन्छ' गगनगमनदक्षाम् आकाशे गमने समर्थाम् 'उप्पडओ' उत्पतितः, गगनमभिलङ्घयन् उड्डीय गमनेनाकाशतलमुलड्डयन 'गामागरनगरनिगमखेडकपडमडवदोणमुडपट्टणासमसवाइसहस्समडिय' ग्रामार नगरनिगमखेटाटमडबद्रोणमुग्वपत्तनाश्रमसवाइसहस्रमण्डित, तर अष्टादशकरग्राह्यो ग्रामः, आकरः स्वर्गाद्युत्पत्तिभूमिः, अविद्यमानकरं नगर, निगम-चणिग्ग्राम खेट- धूलीप्रकार कट-कुत्सितनगर, यत्र योजनान्तराले ग्रामादिनास्ति तन्मडम्म यत्रजल. स्थलमार्गाभ्या, भाण्डान्यागच्छति तद द्रोणमुख, पत्तनं बंधा-जल्पत्तन स्थलपत्तन, यत्र पर्वतादिदुर्गे लोका धान्यानि संवइति स संवाह एतैः सहस्रमण्डित, स्तिमित- मेदिनीतल, 'वमुह' वसुधा भूमि ‘ओलोइतो' अबलोकयन पश्यन् रम्य हस्ति नापुर नगरमुपागतः पाण्डुरानभवनेऽतिवेगेन समुपेता गगनादवतीर्ण इत्यर्थः । तत सलु स पाण्डुराजा कच्छुल्लनारय' पच्छुल्लनारदम् आगच्छन्त पश्यति-दृष्ट्वा पञ्चभिः पाण्डवैः कुन्त्याच देव्यासार्धमासनादम्युत्तिष्ठति, अभ्युत्थाय दशाह थे उनके ये सदा चित्त के विक्षेप कारक बने रहते थे। गमन में विशिष्ट शक्ति प्रदान करने वाली एव आकाश में उठाकर ले चलने वाली उस भगवती प्रक्रमणी विद्या को प्रयुक्त करके ये आकाश में उड़ा करते थे। ये नारद, गमन से आकशनल को उल्लघन करते हुए ग्राम, आकर, नगर, निगम खेट, कट, मडंच, द्रोणमुख, पत्तन, सयाह इनके सहस्रों से महित हुई ऐसी स्तिमितमेदनीतलवाली वसुधा-भूमि को देखते हुए रम्य हस्तिनापुर नगर में आये और वरा से गगनमार्ग से होकर फिर ये पाडराज के भवन में पहुंचे। ऐसा सध यहां लगाना (तएणं से पंडराया कच्छुल्लनाग्य एज्जमाणं पासइ) इम के योद पाडुराजा ने कच्छुल्ल इन नारद को आते हुए जब देखा (पामित्ता) तो ગમનમાં વિશિષ્ટ શક્તિ આપનારી અને આકાશમાં ઉડાડીને લઈ જનાર તે પગવતી પ્રક્રમ વિદ્યાના બળથી તેઓ આકાશમાં ઉડતા રહેતા હતા આ રીતે આ નાદ ગમનથી આકાશને ઓળગીને સહસ્ત્રો ગ્રામ, આકર નગર, નિગમ ખેટ કર્બટ, મડબ, દ્રોણમુખ, પત્તન,સ બાહોથી, મડિત અને સ્વિમિત પૃથ્વીને જોતા મણીય હસ્તિનાપુર નગરમા આવ્યા અને ત્યાથી આકાશ भाभा य. पाना अपनभा पाया (तएण से पादुराया कच्छुल्ल नारय एजमाण पासई) त्या२मा पाशा पद्धनाने न्यारे मापता नया (पासिता) यारे ने (पचहि पडवेदि कुतीए देवीए सद्धि आसणाओ - - - ।। साधर्मकर मारणः, गजमुकुमालः, मुसा, दर्मुप , स्यादयो यादमारास्तेषा ' अवार्य कुमारकोडीण' अर्धचतुर्थीना कुमाररोटीनां च सार्धनिकोटिममिताना याद कुमाराणामित्यर्थः ' दियपदइण' इदयदयिता-दृदयमियः, 'सथावए ' सस्ता- का-यादवाना प्रशसफा, तथा-महायुद्धकोलाहल प्रिया करहो-विवाद , युद्ध शस्त्रादिभि पहरण, पोलाहलो जनाना मायनिः, एते मियाः प्रमोदजनका यस्य स तथा, 'भटणामिलासी' भण्डनामिलापी-मण्डन राटि-कटह. 'राह इति भापाया तम्याभिलापी तथा-पहुषु च समरसतमपरायपु-समरशतसग्रामेनु दर्शनरत =दर्शनाऽऽसक्त., 'समतो' समन्ततः समकारेग-परस्सर च कलह सदरखण' सदाक्षण-सस्मिन क्षणे 'अणुगवेममाणे ' अनुगवेपयन् अन्वेष यन् , ' असमाहिकरे' असमाधिकर:-चित्तविक्षेपकारकः चित्तस्यास्थैर्यकर. केपा चित्तस्य विक्षपकइत्याह-'दसारवरवीरपुरिसतिलोकपलपगाण' दशाईवरवीर पुरुपौलोक्यालयता-दशाहा.-समुद्रपिनयादयो दशसख्यका त एप वरा श्रेष्ठाः इत्यादि यादवकुमारों के लिये ये हृदय दयित ये-अत्यत प्रिय थे। इसी कारण यादवों के प्रशसक थे । कलहविवाद युद्ध एव मनुप्यो का कोलाहल ये सघ इन्हें बहुत अधिक अच्छे लगते थे। आनन्द जनक होते थे। रोड़ (लडाई) के ये अभिलापी बने रहते थे। अर्धात हर एक जगह किसी न किसी रूप में परस्पर में लोगों में तकरार, कजिया कैसे उत्पन्न हो इस घात का इन्हें विशेष ध्यान रहता था। समर शतसग्राम के देखने में इन्हें विशेष हर्षोल्लास होता था। सब प्रकार से परस्पर में सब समय में ये कलह को गवेषणा करने में ही लगे रहते थे। नेमिनाथ की अपेक्षा त्रैरोक्य में विशिष्ट बलवाली जो श्रेष्ठ वीर पुरुप समुद विजयादि दश માટે જ તેઓ યાદના વખાણ કરનારા હતા કલહ-કકાસ, વિવાદ, યુધ્ધ અને માણસને શોરબકોર આ બધુ તેમને બહુ જ ગમતુ હતુ આ બધાથી તેમને ખૂબ જ મજા પડતી હતી, કજીયે તેમને ખૂબજ ગમત હત એવે કે દરેક સ્થાને ગમે તે કારણને લીધે વચ્ચે પરસ્પર કલહ-ક કામ કજીયે કેવી રીતે શરૂ થાય આ વાતની તેઓ તક જતા રહેતા હતા કડે યુદ્ધના બીભત્સ દશ્ય જોવામાં તેમને ખૂબ જ આનદને અનુભવ થતે હતા તેઓ બધી રીતે રાત અને દિવસ એકબીજાને લડાવવાની શોધમાં જ ચાટી રહેતા હતા નેમિનાથની અપેક્ષા ક્યમાં સવિશેષ બળવાન શ્રેષ્ઠ વીર પુરૂષ સમુદ્ર વિજય વગેરે દશ દશાર્દો હતા તેમના પિત્તને તેઓ કષ્ટ ता.
" अनगारधर्मामृतयपिणी टीका अ० १६ द्रौपदीचरितनिरूपणम् सयत्तस्तथा विधो न भरति यः सोऽसयतः सयमरहित इत्यर्थः, अविरत -अतीत फालिम्पापा-जुगुप्सापूर्वक, भविष्यति च सरपूर्वकमुपरतो निवृत्तो विरतस्तथा विधो न भाति यः सोऽविरतः, पिरतिरहितः, अमतिहतप्रत्याख्यातपापकर्मा प्रतिहत वर्तमानगाले स्थित्यनुभागहासेन नाशित तथा प्रत्याख्यात-पूर्वकृताति- उनके लिये तीन पार आदक्षिण प्रदक्षिण किया-करके उनको बंदनाकी नमस्कार किया। वंदना नमस्कार करके फिर उन्होंने उनसे महान् पुरुषों के बैठने योग्य आमन पर चैटने के लिये प्रार्थना की-इस के पाद वे कच्छुल्ल नारद जल के छीटो से सिक्त हुए आसन पर कि जो दर्भ के ऊपर आस्तीर्ण या घट गये। बैठकर उन्होंने पाडु राजा से राज्य की यावत् अतः पुर की कुशल वर्ता पूली। उनके पूछने पर पांड राजाने कुन्ती देवी ने एव पांचों पाडवों ने उन कन्छल नारद को खूप आदर किया यावत अच्छी तरह से उनकी पर्युपासना की । द्रौपदी ने उन्हें असयत, अविरत एव अप्रतिहत प्रत्याख्यतपापकर्मा जानकर उनका आदर नहीं किया, उनके आगमन की अनुमोदना नहीं की और न वह उनके आने पर उठी। वर्तमान कालिक सर्व सावध अनुष्टान से जो निवृत्त होता है वह सयत है-ऐसा सयत जो नही होता है वह असयत कहलाता है। अतीत काल में प्सा पूर्वक और भविष्यकाल में उनसे सवर पूर्वक जो उपरत होता સામે જઈને તેમણે ત્રણવાર તેમની ચોમેર આદક્ષિણ પ્રદક્ષિણા કરી ત્યારપછી તેમણે વદન તેમજ નમન કર્યા અને પછી તેમને પિતાના કરતા મોટા માણને બેસવા ગ્ય આસન ઉપર બેસવાની વિનતી કરી ત્યારબાદ તે કચ્છતલ નારદ પાણીના છાટાએથી ભીના પાથરેલા દર્ભના આસન ઉપર બેસી ગયે બેસીને તેઓએ પાડુરાજાને રાજ્યની ચાવત રણવાસની કુશળવાર્તા પૂછી પાડુરાજા, કુતીદેવી અને પાચે પાડેએ કચ્છદલ નારદને ખૂબજ આદર કર્યો યાવત્ સારી રીતે તેમની પથુપાસના કરી તેમને અસયત, અવિરત અને અપ્રતિહાપ્રત્યાખ્યાતપાપકર્મા જાણીને દ્રૌપદીએ તેમને આદર કર્યો નહિ તેમના આગમનની અનુમોદના કરી નહિ અને જ્યારે તેઓ આવ્યા ત્યારે પણ તે ઊભી થઈ નહિ વર્તમાનકાલિક સર્વ સાવદ્ય અનુષ્ઠાનથી જે નિવૃત્ત હોય છે તે સયત છે, આ વ્યાખ્યા મુજબ જે સયત નથી તે અસ થત કહેવાય છે ભૂતકાળમાં થઈ ગયેલા પાપકર્મોપી જુગુપ્સાપૂર્વક અને ભવિષ્ય કાવમાં તેમનાથી સવરપૂર્વક જે ઉપરત હોય છે તે વિરત છે, એ જે નવી તે અવિત છે, એટલે કે વિગતિથી રહિત છે વત માનકાળમા જેમાં पापों से जुगु- साताकपास फच्छुर नारद सप्ताप्टपटानि प्रत्युतति, नारदाभिमुपमायाति,प्रत्युहत्य तिरसतो' नि. कृत्वः - निबार, 'आयारिणपयाहिण' आदक्षिणप्रदक्षिण करोति, कन्या वन्दते, नमरयति पदिया, नया, महाग-महता योग्येन आसनेन उपनिमन्त्र यति । उपवेशनार्य प्रार्थयति । ततः सलु म यमुस्लमाग्द. 'उदगपरिफासिया उदकपरिस्पृष्टायां जल रटेन मिक्तायां 'दन्भोगरिपचा पुयाए ' दोपरिम यवस्त तायां कुश पर्याप्तीर्णाया 'मिसियाए 'पृप्या आमननिशेपे निपीदति-उपविशति, निपध पाण्ट रानान राज्ये यापदन्तः पुरे न कुशलोदन्त-मुगलमार्ता पृच्छति, ततः खल स पाण्डराजा कुन्ती देवी पन च पाण्डमा, कन्गुल्नारद 'आढति' आद्रियन्ते यावत् पर्युपासते सेवन्ते स्म । वत खलु सा द्रौपदी करछुल्लनारदम् 'असजयभविश्यअपडिहयपचाखायपाकम्मे ति । असयतापिरतापतिहता पत्याख्यातपापक्मेंति कन्या, तत्र-अमयतः-वर्तमानकालिमारधानुष्ठाननिवृत्तः देवकर (पहिं पवेहि कुनी देवीए मद्धिं आसणाओ अन्भुढेह) ये पाचो पाडवो एच कुन्ती के सार अपने आमन से उठे।(अन्भुद्वित्ता कच्छुल्लनारय मत्तग्याइ पच्चुग्गच्छह ) और उठकर सात आठ पैर फच्छुलनारद के सामने स्वागत निमित्त गये ( पच्चुग्गच्छित्तो निक्खु त्तो आयाहिणपयारिण करेइ, करित्ता चदा नमसइ, महरिहेण आस णेण उवणिमतेइ तण्ण से कच्छुल्लनारण उदगपरिफासियाए दभोवरि पच्चत्युयाए भिसीया णिसीयह, णिसीयित्ता पडराय रज्जे जाव अते उरे य कुसलोदत पुच्छा, तएण से पडुराया कोंतीदेवी पचय पडवा कच्छल्लनारय आढति जाव प-जुवासति, तएण सा दोबई कच्छुल्ल नाग्य असजयअविरयअपडिहयपच्चखायपावकम्मे त्ति कट्टु. आढाइ नो परियाणइ नो अब्भुटेड, नो पज्जासह) जाकर के इन्हों ने अन्भुटेइ) तो पाये पाउ! मन ताना साथै पाताना आसन परथी ( अन्मुद्वित्ता कछुल्लनारय सत्तटुपयाइ पच्चुग्गच्छइ ) मने अना થઈને કચ્છcલ નારદના સ્વાગત માટે સાત આઠ ડગલા સામે ગયા (पच्चुग्गन्उित्ता तिक्युत्तो आयादिणपयाहिण करेइ, करित्ता बदइ नमसइ। महरिहेण आसणेण उवगिमतेइ, तएण से कच्छुल्लनारए उदगपरिफासियाए दमोपरिपच्चायुयाए भिसियाएं णिसीयह, णिसीयित्ता पडराय रज्जे जाव अते उरेय कुसलोदत पुच्छइ तएण से पडुराया मोतीदेवी पचय पडवा कच्छुल्लनारय आढति जार, पज्जासति, तएण सा दोई कच्छुल्लनारय असजयअविरयअयडि- हयपचक्खायपावकम्मे ति कट्टु नो आढाइ नो परियाणइ नो अमुद्देइ, नो पज्जुवासह) . नो - ઊભા થયા " मनगारधर्मामृतषिणी टोका अ० १६ द्रौपदीचरितनिरूपणम् सयतस्तथा विधो न भरति यः सोऽसयतः संयमरहित इत्यर्थः, अविरत =अतीत कालिपापा-जुगुप्सापूर्वक, भविष्यति च सबरपूर्वमुपरतो निवृत्तो विरतस्वथा विधो न भाति यः सोऽविरतः, पिरतिरहितः, अमतिहतमत्याख्यातपापकर्मा मतिहतम्-वर्तमानवाले स्थित्यनुभागहासेन नाशित तथा प्रत्याख्यात पूर्वकृताति- उनके लिये तीन चार आदक्षिण प्रदक्षिण किया-करके उनको वंदनाकी नमस्कार किया। बदना नमस्कार करके फिर उन्होंने उनसे महान् पुरुषों के बैठने योग्य आसन पर बैठने के लिये प्रार्थना की-इस के बाद वे कच्छुल्ल नारद जल के छीटो से सिक्त हुए आसन पर कि जो दम के ऊपर आस्तीर्ण या बैठ गये। बैठकर उन्होंने पांडु राजा से राज्य की यावत् अतः पुर की कुशल वर्ता पूछी। उनके पूछने पर पांड राजाने कुन्ती देवी ने एव पांचों पांडवों ने उन कन्छुल नारद को खूप आदर किया यावत् अच्छी तरह से उनकी पर्युपासना की । द्रौपदी ने उन्हें असयत, अविरत एव अप्रतिहत प्रत्याख्यतपापकर्मा जानकर उनका आदर नहीं किया, उनके आगमन की अनुमोदना नहीं की और न वह उनके आने पर उठी। वर्तमान कालिक सर्व सावद्य अनुष्टान से जो निवृत्त होता है वह सयत है-ऐसा सयत जो नहीं होता है वह असयत कहलाता है। अतीत काल में हुए प्सा पूर्वक और भविष्यकाल में उनसे सवर पूर्वक जो उपरत होता સામે જઈને તેમણે ત્રણવાર તેમની ચોમેર આદક્ષિણ પ્રદક્ષિણા કરી ત્યારપછી તેમણે વદન તેમજ નમન કર્યા અને પછી તેમને પિતાના કરતા મોટા માણોને બેસવા યોગ્ય આસન ઉપર બેસવાની વિનંતી કરી ત્યારબાદ તે છુલ નારદ પાણીના છાટાઓથી ભીના પાથરેલા દર્ભના આસન ઉપર બેસી ગયા બેસીને તેઓએ પાડુરાજાને રાજ્યની ચાવતું રણવાસની કુશળવાર્તા પછી પાડુરાજા, કુતીદેવી અને પાચે પાડેએ કહ્યુલ નારદને ખૂબજ આદર કર્યો યાવત્ સારી રીતે તેમની પર્યું પાસના કરી તેમને અસયત, અવિરત અને અપ્રતિહાપ્રત્યાખ્યાતપાપકર્મા જાણીને દ્રૌપદીએ તેમને આદર કર્યો નહિ તેમના આગમનની અનુમોદના કરી નહિ અને જ્યારે તેઓ આવ્યા ત્યારે પણ તે ઊભી થઈ નહિ વર્તમાનકાલિક સર્વ સાવધ અનુદાનથી જે વૃિત્ત હોય છે તે સ યત. આ વ્યાખ્યા મુજબ જે સયત નથી તે અસ થત કહેવાય છે ભૂતકાળમાં થઈ ગયેલા પાપકર્મોથી જુગુપ્સાપૂર્વક અને ભવિષ્ય કાલમાં તેમનાથી સવરપૂર્વક જે ઉપગ્ન હોય છે તે વિરત છે, એ જે નવી તે અવિરત છે, એટલે કે વિતિથી રહિત છે વર્તમાનકાળમા જેમા पापों से जुगु- छे, - - बासापा फन्छुल्पनारद सताएपदानि प्रत्युति, नाराभिमुममायाति,प्रत्युहत्य विस्तृत नि. कृत्वः - निगारं, 'आयारिणपयारिण' आदक्षिणप्रदक्षिण करोति, कुस्सा वन्दते, नमस्पति पदिया, नया, मदाग-महना योग्येन आसनेन उपनिमन्त्र यति । उपवेशनार्थ प्रार्थयति । ततः स स यगुल्लनारदः 'उटगपरिफासियाए' उदकपरिम्पृष्टाया जलछटेन मिक्ताया 'टभोपरिपत्थुयाए ' दोपरिपन्यास्त ताया कुशे पर्याप्तीर्णाया 'मिसियाए 'प्या आसनविशेपे निपीदति अविशति, निपथ पाण्ड राजान राज्ये यापदन्तः पुरे न कुशलोदन्त-राठवार्ता पृच्छति, ततः खल स पाण्इराजा कुन्ती देवी पञ्च च पाण्डवा, कल्पनारद ' आइति' आद्रियन्ते यावत् पर्युपासते सेवन्ते स्म । तत खलु सा द्रौपदी करछुल्लनारदम् असजयविरयअपडिहयपचाखायपारसम्मे चित्र ' असयतापिरतापतिद्वता प्रत्याख्यातपापकर्मेति कृपा तत्र-आगयत -पर्तमानकालिपसमापद्यानुष्ठाननिवृतः देवकर (पहिं पडवेहि फुनी देवी० मद्धिं आसणाओ अन्भुटे) ये पाचो पाडवो एच कुन्ती के साथ अपने आसन से उठे।(अन्भुद्वित्ता कन्छुल्लनारय माग्याइ पच्चुग्गच्छद ) और उठकर सात आठ पैर कच्छुलनारद के सामने स्वागत निमित्त गये ( पच्चुग्गच्छित्तो लिक्खु त्तो आयारिणपयारिण करेइ, करित्ता यह नमसइ, महरिहेण आस णेण उवणिमतेइ ताण से कच्छुल्लनारण उदगपरिफासियाए दभोवरि पच्चत्युयाए भिसीया णिसीयह, णिसीयित्ता पडुराय रज्जे जाव अते उरे य कुसलोदत पुच्छइ, तएण से पहराया कोतीदेवी पचय पडवा कच्छुल्लनारय आढति जाव पन्जुवासति, तएण सा दोबई कच्छुल्ल नाग्य असजयअविरयअपडिहयपच्चक्खायपावकम्मे ति कटु नो आढाइ नो परियाणइ नो अन्मुढेह, नो पज्जुवासह) जाकर के इन्हों ने આ મુદ) તેઓ પાચે પાડો અને કુતીની સાથે પિતાના આસન ઉપરથી (अन्मुद्वित्ता कच्छुल्लनारय सत्तटुपयाइ पच्चुग्गच्छइ) भने अना થઈને કછુcલ નારદના સ્વાગત માટે સાત આઠ ડગલા સામે ગયાં (पच्चुग्गच्छित्ता तिक्खुत्तो आयाहिणपयाहिण करेइ, करित्ता बदइ नमसइ। महरिहेण आसणेण उवगिमतेइ, तएण से कच्छुल्लनारए उदगपरिफासियाए दभोपरिपच्चत्थुयाए भिसियाए णिसीयइ, णिसीयित्ता पडराय रज्जे जाव अते उरेय कुसलोदत पुच्छइ तएण से पडुराया कौतीदेवी पचय पडवा कच्छुल्लनारय आढति जाव, पज्जुवासति, तएण सादोई इच्छुल्लनास्य असजयअविरयमयडि- हयपञ्चक्खायपावकम्मे ति कट्टु नो आढाइ नो परियाणइ नो अन्भुइ, नो पशुवासइ) . ઉભા થયા
मनगारपापिगो टी० १० १६ द्रौपदी परितनिरूपणम्
जाव सरीरा त इच्छामिण देवाणुप्पिया । दोवई देवी इहमा-
णिय, तएणं पुत्रसंगइए देवीए पउमनाभं एव वयासी - नो
खलु देवाणुप्पिया ! एयं भूयं वा भव्व वा भविस्स वा जण्ण
दोबई देवी पचपंडवे मोत्तूण अन्नेण पुरिसेणं सद्धि ओरालाई
जाव विहरिस्तइ, तहा वि य णं अह तव पियट्टतयाए दोवई
देवि इहं हबमाणेमि त्तिक? पउमणाभं आपुच्छइ आपुच्छित्ता
ताए ऊकिटाए जाव लवण तमुद्दे मज्झमझेण जेणेव हत्थिणा-
उरे णयरे तेणेव पहारेत्थ गमणाए। तेण कालेणं तेणं समएण
हत्थिणाउरे जुहिडिल्ले राया दोवईएसद्धि उप्पि आगासतलंसि
सुहपसुत्ते यावि होत्था, तएण से पुवसगइए देवे जेणेव जुहि-
ट्ठिले राया जेणेव देोवई देवी तेणेव उवागच्छइ उवागच्छित्ता
दोवईए देवीए ओसोवणियं दल यइ दलित्ता दोवई देवीं
गिण्हइ गिणिहत्ता ताए उकिटाए जाव जेणेव अमरकका जेणेव
पउमगाभस्त भवणे तेणेव उवागच्छद उवागच्छित्ता पउमणा-
भस्स भवर्णसि असोगवणियाए दोवइ देवी ठावेइ ठाविचा
ओसोवणि अवहरइ अवहारत्ता जेणेव पउमणाभे तेणेव उवा-
गच्छद उवागच्छित्ता एव वयासी-एसणं देवाणुप्पिया मए
हस्थिणाउराओ दोवई इह हव्यमाणीया तव असोगवाणयाए
चिटुइ, अतो पर तुमं जाणसित्तिकटु जामेव दिसि पाउन्भूए
तामेव दिसि पडिगए ॥ सू० २५ ॥
४६० प्रांताधर्मपानी एउजमाणं पासइ पासित्ता आसणाओ अन्भुट्टेड अन्मुद्वित्ता अग्घेणं जाव आसणेणं उपणिमतेइ, तएण से कच्छुलनारए उद्गपरिफासियाए दभोवरिपच्चत्धुयाए भिसियाए निसीयइ जाव कुसलोदंत आपुच्छइ, तएणं से पउमनाभे राया णियग ओरोहे जायविम्हए कच्छुल्लणारयं एवं वयासी-तुम्भं देवाणु प्पिया । वहूणि गामाणि जाव गेहाइ अणुपविससि, त अत्यि आई ते कहिंचि देवाणुप्पिया ! एरिसए ओरोहे दिट्टपुटने जा रिसए ण मम ओरोहे ?, तएणं से कच्छुल्लणारए पउमनाभेण रन्ना एव वुत्ते समाणे ईसिं विहसियं करेइ करित्ता एव वयासी -सरिसे णं तुम पउमणाभा । तस्स अगडदुरस्स, के ण देवाणुप्पिया से अगडदुरे ?, एव जहा मल्लिगाए एव खलु देवाणुप्पिया। जबूदीवे दीवे भारहेवासे हथिगाउरे दुवयस्स रपणो धूया चूलगीए देवीए अत्तया पंडुस्स सुहा पचण्हं पंड- वाणं भारिया दोवई देवी रूवेण य जाव उकिडसरीरा दोवईए णं देवीए छिन्नस्स वि पायंगुट्टयस्स अय तव ओरोहो सतिमंपि कल ण अग्घतित्तिकटु, पउमणाभं आपुच्छइ आपुच्छित्ता जाव पडिगए, तएणं से पउमणाभे राया कच्छुल्लगारयस्स अंतिए एयमट्ट सोच्चा णिसम्म दोवईए देवीए रूवे य३ मुच्छिए ४ दोवइए अज्झोववन्ने जेणेव पोसहसाला तेणेव उवागच्छई उवागच्छित्ता पोसहसाल जाव पुत्रसगइय देव एवं क्यासी- एवं खल्लु देवाणुप्पिया ! जंबूद्दीवे दीवे भारहेवासे
मनगरपामुनपिगी टी० म० १६ द्रौपदी धरितनिरूपणम्
जाब सगरा त इच्छामिणं देवाणुप्पिया । दोवई देवी इहमा-
णिय, तएणं पुवसगइए देवीए पउमनाभं एवं वयासी - नो
खल्लु देवाणुप्पिया । एयं भूयं वा भव्वं वा भविस्स वा जपणं
दोवई देवी पचपंडवे मोत्तूण अन्नेणं पुरिसेणं सद्धि ओरालाइ
जाव विहरिस्सइ, तहा वि य ण अह तव पियतयाए दोवई
देवि इहं हवमाणेमित्तिकहु पउमणाभं आपुच्छइ आपुच्छित्ता
ताए ऊकिटाए जाव लवण तमुद्दे मज्झमझेण जेणेव हत्थिणा-
उरे णयरे तेणेव पहारेत्थ गमणाए। तेण कालेणं तेणं समएणं
हत्थिणाउरे जुहिडिल्ले राया दोबईएसद्धिं उप्पि आगासतलंसि
सुहपसुत्ते यावि होत्था, तएणं से पुत्वसंगइए देवे जेणेव जुहि-
ट्ठिले राया जेणेव दोवई देवी तेणेव उवागच्छइ उवागच्छित्ता
दोवईए देवीए ओसोवणियं दल यइ दलित्ता दोवइ देवीं
गिण्हइ गिहित्ता ताए उकिट्ठाए जाव जेणेव अमरकका जेणेव
पउमणाभस्त भवणे तेणेव उवागच्छइ उवागच्छित्ता पउमणा-
भस्स भवर्णसि असोगवणियाए दोवइ देवी ठावेइ ठावित्ता
ओसोवणि अवहरइ अवहारत्ता जेणेत्र पउमणाभे तेणेव उवा-
गच्छद उवागच्छित्ता एव वयासी-एसणं देवाणुप्पिया मए
हस्थिणाउराओ दोवई इह हब्बमाणीया तव असोगवाणियाए
चिटइ, अतो पर तुम जाणसित्तिकटु जामेव दिसि पाउन्भूए
तामेव दिसि पडिगए ॥ सू० २५ ॥
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F तामेकयानी टीका-'तण्ण तस्मयादिना तम्ग पाएकनारा अयमत पःआध्यात्मिकगिन्तित. माणितः करितो मनागा. गाय मगुरपयन, अहो! खलु द्रौपदी देवी रूपेग या नान र पनि पाजीरनुपद्धामनी मा नो आद्रिय ते यापद नो पर्युपास्ते, रावस्मारनेर पलु मम द्रौपया दव्या 'वि प्पिय फरित्तए' पिमिप फर्नग, पापग-मागमानाशिपिहिता जाता -तण्ण तस्स कान्लनारपस्म प्रत्यादि । टीकार्थ-(तपण) उसके पाद (नम्न कच्चरलनाग्यम्स) उन कल नारदको (इमेया) यर दस स(अशस्थिण, चिनिण, पत्धि, मणी गए, सकप्पे समुपन्जिया) आ यात्मिक, चिन्तित, प्रार्थिन, मनोगत सकल्प उत्पन्न हुआ। (महोण दोनईश्वी स्वैग जाव लावण्गय पहि पडवेहिं अणुपद्धा समाणी मम णो आडाड, जार नो पज्जुवासह त सेय खलु मम दोवईए देवी विषिष करित्ता त्ति कटु एव सपेहेह, सपेहित्ता पटुराय आपुच्छह आपुचित्ता उप्पयणि विज्ज आवाहेइ आवाहित्ता ताए उक्किट्ठा जाय विजाहरगई० लरणसमुह मझ मज्झेण पुरत्याभिमुहे वीइवहउ पयत्ते यानि होत्या) देखो-यह कितने आश्चर्य की यात है कि द्रौपदी देवी ने रूपा यावत् लावण्य से पाचों पाडवों के साथ भोगासक्त घनकर मेरा कोड आदर नहीं किया है यावत् किसी भी प्रकार की पर्युपासना नहीं की है। इसलिये अब मुझे यही उचित-श्रेयस्कर है कि मैं इस द्रौपदी देवी का विनिय करू-अनिष्टकर वएण तस्स कच्छुल्नारयरस इत्यादि । Astथ-(तएण ) त्या२५छी ( तास कच्छुल्लनारयस्स) ते ४२शुस નારદને ( इमेयारूने) PAL तन (अज्झथिए, चितिए, पथिए, मणोगए, सकप्पे समुपज्जित्था ) माध्यामि, वितित, पार्थित, मनात ४६५ मल्यो : (अहोण दोबई देवी स्वेण जाव लावण्णेण य पचहिं पडवेहिं अणुबद्धा समाणी मम णो आढाइ, जाव नो पज्जुवासइ त सेय खलु मम दोवईए देवीए विप्पिय करित्तए ति कडु एव सपेद्देइ, सपेहिता पडराय आपुच्छइ आपुच्छिता उप्पणि विज्ज आवाहेइ जावारिता ताए उकिष्टाए जाव विनाहरगई लयम समुद्द मझ मज्झेग पुरत्याभिमुहे वीइबाउ पयत्ते याविहोत्या) જુએ, આ કેવી નવાઈની વાત છે કે દ્રૌપદી દેવીએ રૂપ યાવત્ લાવ યથી પાચે પાડવાની સાથે ભેગાસક્ત થઈને મારી કોઈ પણ રીતે આદર કર્યો નથી થાવ કઈ પણ જાતની પથુપાસના કરી નથી એથી હવે મને એ જ યોગ્ય જણાય છે કે ગમે તે રીતે દ્રૌપદીનું વિ . . . , मनगारधर्मामृतवपिणी टी० अ० १६ द्रौपदीचरितनिरूपणम् खस्मान्मदापरणेन अस्याः प्रतिकलाचरणं श्रेय' इति भारः। इति कृत्वान्दति मनसि निधार एक सोसते-पर्यालोचयति, समेत्य पाण्डु राजानमापृच्छय ' उप्प यणि रिज' उन्मतनीम्-विद्याम् ' आहे. पावाहयति स्मरति आवाह्य, मत्ला क्या उत्कृष्टया यापद् विद्याधर गत्या लपणसमुद्रम्य मध्यमध्येन पौरस्त्याभिमुख पूर्वदिगभिमुख', 'चीटपदउ पयत्ते' व्यतित्रजितु प्रवृत्ता=गमनतत्परथाप्यभवत् । तस्मिन् काले तन्मिन् समरे 'धायईमडे' धातकीपण्डे धातमीपण्डनामके, द्वीपे 'पुरस्थिमदादिण्डभरहवासे' पौरस्त्यार्धदक्षिणार्ध-भारतवर्षे पूर्वदिग्ध तिनि दक्षिणार्धभरतको अमरकका नाम राजधानी आसीत् । तत खलु अमर- फकाया राजधान्या पद्मनाभो नाम राजाऽभवत् । स कीदृश इत्याह-माया हिम पतमहतमलयमदग्महिंदसारे ' महा-दिमयन्मामठयमन्दरमहेन्द्रसारस महाग्मि- बानिय तथा-महामलयमन्दरमहेन्द्रवत् सार प्रधान । अन्यनृपापेक्षयाऽधिकम हत्यादिगुणविभपैश्वर्यसम्पन्न इत्यर्थः, पिस्तरतस्तु व्याख्यान प्रथमाध्ययने कृतम् , यह इस समय पाउवों द्वारा कृत सत्कार सम्मान से गर्विष्ट बनी हुई है-सो विवेक ररित बन गई है-इसलिये इसके मद को उतारनाचारिये अत इसके प्रतिकल आचरण करना यही मुझे श्रेयस्कर है। इस प्रकार मन में रखकर उन्हों ने विचार कियो-विचार करके फिर उन्हों ने पांड- राज से पूछा हे राजन् एम जाते हैं-पूछकर उन्हों ने उत्पतनी नाम की विद्या का आह्वान किया स्मरण किया-स्मरण कर के उस उत्कृष्ट यावत् विद्याधर सन्धी गति से परा से पूर्व दिशा की तरफ मुख कर के वे उडने में प्रवृत्त भी हो गये-(तेण कालेण तेण समण धायईसडे टीवे पुरत्यिमद्वदारिणड्डभरहे वासे अमरकका णाम रायवाणी होत्या-तरणं अमरककाए रायहाणीरा पउमणाभे णाम राजा होत्या, मत्या हिमवतः તે આ પાડો વડે મસ્તૃત તેમજ સન્માનીત થઈને અવિકા બની ગઈ છે તેથી તે અવિવેકી થઈ પડી છે, એથી હવે એના મદને ઉતારો જોઈએ, એના વિરૂદ્ધ આચરવુ જે એ, આ પ્રમાણે તેઓએ મનમાં વિચાર કર્યો વિચાર કરીને તેમણે પાડુરાયને પૂયુ કે હે રાજન ! અમે જ એ, એ પ્રમાણે પૂછીને તેઓએ ઉત્પતની નામની વિવાનુ આહાન કર્યું, આવું કર્યું મરણ કરીને તે ઉત્કૃષ્ટ યાવત વિવ વર સબ ધી ગતિથી ત્યાથી પૂર્વ દિશા ભણી મુખ કરીને ઉડવા લાગ્યા (तेण झालेण तेण समएणधायईडे दीवे पुरयिमद्वदाहिणभरहे वामे अम या तरण अमरकमाए रायहाणीए पउमणाभे णाम राया 3--- - जाताधर्मकचार पर्णक वर्णनं पूर्वोक्ताद् गोध्यम् । तस्य पलु पमनामस्य राज्ञः सनदेवीमयाइ' सप्तदेवीशतानि-देवीना राशीनां गवानि-सप्तशतानिमार्याः 'ओरोहे ' अवरोधे- अन्तः पुरे आसन् तस्य खलु पचनामस्य रामः सुनामो नाम पुत्रो युपरानाप्य भरत् । ततः खलु स पमनामो राना मतः प्रदेश 'अतेउरसि' अन्त पुरे 'आरोहसंपरिचुढे' आरोधसपरिटवः - स्त्रीपरिवारमपरिटत', सिंहासनवरगतो विहरति-आस्तेस्म । घण्णओ तस्सण पउमनाभस्म रणो सत्तदेवीसया ओरोहे होत्था सस्स ण पउमनाभस्स रपणो सुनाभे नाम पुत्ते जुराया यावि होत्या तएण से पउमणाभे राया अतो अतेउरमि ओरोहमपरिघुढे सिंहोसण घरगण विहरड) उस काल और उस समय में धातकी पड नाम के दीप मे पूर्व दिग्ची दक्षिणा भरत क्षेत्र में अमरकका नाम की राजधानी थी। उस अमरकका नाम की राजधानी में पद्मनाम नाम का रोजा रहता था। यह राजा महा हिमवान् पर्वत की तरह तथा महा मलय, मन्दर एवं माहेन्द्र की तरह अन्य राजाओं की अपेक्षा अधिक महत्त्वादिगुणों से विभव से पं ऐश्वर्य से सपन्न था। इन पदों का विस्तार पूर्वक वर्णन प्रथम मेघकुमार अध्ययन में किया जा चुका है। इस राजा का वर्णन पहिले की तरह जानना चाहिये । उस पद्मनाभ राजा के अतःपुर में ७०० सात सौ रानिया थीं। सुनाम नाम का पुत्र था जो युवराज था, पद्मनाभ राजा के यहा एक दिन की बात है होत्था, महया हिमतपणओ,तस्सण पउमनाभस्सरणो सत्तदेवी सयाइ ओरोहे होत्था तस्स ण पउमनाभस्स रण्णो सुनाभे नाम पुत्ते जुबराया यावि होत्था तएण से पउमणाभे राया अतो अते उरसि ओरोहसपरिवुढे सिंहासणपरगए विदरइ ) તે કાળે અને તે સમયે ઘાતકી ષડ નામે દ્વીપમાં પૂર્વ દિશા તરફના દક્ષિણધે ભરત ક્ષેત્રમાં અમરકકા નામે રાજધાની હતી તે અમરક કા નામે રાજધાનીમા પદ્મનાભ નામે રાજા રહેતા હતા તે રાજા મહા હિમાચલ પર્વ તની જેમ તેમજ મહામાય, મદર અને મહેન્દ્રની જેમ બીજા ગજાઓ કરતા વધારે મહત્વ વગેરે ગુણેથી, વૈભવથી અને ઐશ્વર્યથી સંપન્ન હતે આ પદન સવિસ્તાર વર્ણન પ્રથમ મેઘકુમાર અધ્યયનમાં કરવામાં આવ્યુ છે આ રાજાનું વર્ણન પણ પહેલાની જેમ જ સમજવું જોઈએ તે પદ્મનાભ રાજાના રણવાસમાં ૭૦ ૦ રાણીઓ હતી, સુનાભ નામે તેને પુત્ર હતા, જે યુવરાજ હતે એડ દિવસની વાત છે કે તે પદ્યનાભ રાજા રણવાસમાં સ્ત્રી પરિવારની સાથે સિંહા સન ઉપર બેઠા હતા . - अनगारधर्मामृतदपणी री० अ० १६ द्रौपदीचरितनिरूपणम तत खलु स च्छुल्लनारदो यौवामरककाराजधानी यत्रैव पद्मनाभस्य भवन तत्रैवोपागच्छति, उपागत्य पद्मनाभस्य राज्ञो भाने 'झत्ति' झटिति वेगेन समोवइए' समुपेत आकाशादवतीर्णः । ततः खलु स पद्मनाभो राजा कन्छुल्ल नारद एजमानम्-आगच्छन्त पश्यति, दृष्ट्वा आसनादभ्युत्तिष्ठति, अभ्युत्थायायेण यापदासनेन उपनिमन्त्रयति-जलमासन च ग्रहीतु प्रार्थयति । ततः खलु स कन्फुल्ल कि अत पुर के भीतर स्त्री परिवार के साथ सिंहासन पर बैठे हुए थे। (तपण से कच्छुल्लनारए जेणेव अमरकका रायहाणी जेणेष पउम नामस्स भवणे तेणेव उवागच्छद, उवागत्तिा पउमणामस्स रणो भवर्णमि झत्तिवेगेणं समोवइए, तएण से पउमनाभे राया कच्छुल्ल नारय एज्जमाण पासइ, पामित्ता आसणाओ अम्भुट्टेड, अन् हित्ता अग्घेणं जाव आमणेण उवणिमतेइ, तएण से कच्छुल्लनारण उद्ग परिफासियाए दम्भोवरिपच्चत्युमा भिसियाए निसीयइ जाव कुस. लोदत आपुच्छह ) वे कच्छुल्ल नारद जहा अमर कसा राजधानी थी, जहा पद्मनाम का भवन था वहां आये । आकर के बे पद्मनाभ राजा के भवन में बहुत शीघ्र वेग से उतरे। पद्मनाभ राजा ने जैसे री कच्छुल्ल नारद को आते हुए देग्वा तो देखकर के अपने आसन से उठे और उठकर के उन्हो ने उन्हे अर्घ्य यावत् आसन से आमत्रित किया। (तएण से कच्छुल्लनारए जेणेव अमरकरा रायहाणी जेणेव पउमनामस्स भवणे तेगेर उवागच्छइ, उवागच्छित्ता पउमणाभस्स रणो भवणसि झत्तिवेगेण समोबदए, तएण से पउमनाभे राया कच्छुल्ल नारय एज्जमाण पासइ, पासित्ता आपणाओ अन्मुढेइ, अन्मुहिता अग्ण जाव आसणेण उवणिमतेड, तपण से कल्लनारए उदगपरिकासियाए दभोपरिपञ्चत्युयाए भिसियारा निसीय जार कुसलोदत आपुन्छई) તે કચ્છલ નારદ જ્યાં અમર કા રાજધાની હતી, જ્યા પદ્મનાભનુ ભવન હતુ ત્યાં આવ્યા, આવીને તે પદ્મનાભ રાજના ભવનમા શીત વેગથી તથા પનામ રાજાએ જ્યારે કચ્છલ નાદને આવતા જોયા ત્યારે તેઓ પિતાના આસન ઉપરથી ઊભા થયા અને ઊભા થઈને તેમણે તેઓને અર્થ યાવત भा-५९ -- भातापर्मचारी पर्णक वर्णनं पूर्वोक्ताद बोध्यम् , तस्य स पनामस्य राम: ' सनदेवीमया' सप्तदेवीशतानि-देवीना राशीनां शवानि-सप्तगतानिमार्या ' औरोई ' अवरोधे- अन्तः पुरे आसन् तस्य खलु पचनाभम्प रा सुनामो नाम पुत्रो युपराजश्राप्य भवत् । ततः खलु स पननामो राना अतः प्रदेशे तेउरसि' अत पुरे आरोहसंपरिचुढे 'आरोधसपरिटतः - स्त्रीपरिवारमपरिटत , सिंहासनवरगतो विहरति-आस्तेस्म । वपणो तस्सण पउमनाभस्म रणो मतदेवीसया ओरोहे होत्या सस्स ण पउमनामस्स रपणो सुना नाम पुत्ते जुनगया यावि होत्था तएण से पउमणाभे राया अतो अतेउरमि ओरोहसपरियुडे मिहोसण घरगर विदरह) उस काल और उस समय में धातकी पड नाम के दीप मे पूर्व दिग्यर्ती दक्षिणा भरत क्षेत्र में अमरकका नाम की राजधानी थी। उस अमरकमा नान की राजधानी में पद्मनाम नाम का रोजा ररता था। यह राजा महा हिमवान् पर्वत की तरह तथा महा मलय, मन्दर एवं माहेन्द्र की तरह अन्य राजाओं की अपेक्षा अधिक महत्त्वादिगुणों से विभव से एवं ऐश्वर्य से संपन्न था। इन पदों का विस्तार पूर्वक वर्णन प्रथम मेधकुमार अध्ययन में किया जा चुका है। इस राजा का वर्णन पहिले की तरह जानना चाहिये। उस पद्मनाभ राजा के अतःपुर में ७०० सात सौ रानियां थीं। सुनाम नाम का पुत्र था जो युवराज था, पद्मनाभ राजा के यहा एक दिन की बात है होत्या, महया हिमतपण्णभो,तस्सण पउमनाभस्सरणो सत्तदेवी सयाइ ओरोहे होत्या तस्स ण पउमनाभस्सरणो सुनाभे नाम पुत्ते जुबराया यावि होत्या तएण से पउमणाभे राया अतो अते उरसि ओरोहसपरिखुड़े सिंहासणवरगए विहरइ ) તે કાળે અને તે સમયે ઘાતકી ૫ડ નામે દ્વીપમા પૂર્વ દિશા તરફના દક્ષિણ ભારત ક્ષેત્રમાં અમરક કા નામે રાજધાની હતી તે અમરક કા નામે રાજધાનીમાં પવાના નામે રાજા રહેતો હતો તે રાજા મહા હિમાચલ પર્વ તની જેમ તેમજ મહામલિય, મદર અને મહેન્દ્રની જેમ બીજ ગાઓ કરતા વધારે મહત્વ વગેરે ગુણેથી, વૈભવથી અને ઐશ્વર્યથી સંપન્ન હતો આ પદે સવિસ્તાર વર્ણન પ્રથમ મેઘકુમાર અધ્યયનમાં કરવામાં આવ્યું છે આ રાજાનું વર્ણન પણ પહેલાની જેમ જ સમજવું જોઈએ તે પદ્યનાભ રાજાના રણવાસમાં ૭૦૦ રાણીઓ હતી, સુનાભ નામે તેને પુત્ર હતા, જે યુવરાજ હતે એક દિવસની વાત છે કે તે પાનાભ રાજા રણવાસમાં સ્ત્રી પરિવારની સાથે સિંહા સન ઉપર બેઠા હતા . मनारमा मृनयपिणी टी० १० १६ द्रौपदीपरितनिरूपणम् देवानुप्रिय ! ईदृशोऽवरोधो दृष्टपूर्वी यादृशः खलु ममावरोधः ? ममान्तः पुरे यादृश्यः स्त्रियो वर्तन्ते, तादृश्य स्त्रियः कुत्रापि भवता दृष्टा इति पृच्छतीत्यर्थः । ततः खलु स कन्छुल्लनारदः पद्मनाभेन राना एवमुक्त सन् 'ईपद् विहसित' मन्दहास करोति, कृत्वा एवमवादीत्-हे पद्मनाभ ! सदृशस्त्वं खलु तस्य 'अग- डदुरस्स' गडद१रस्य-कूपमण्ड कस्य यथा कूपमण्डूकः कूपाद् वहिः प्रदेशे विद्यमान नकिमपि जानाति, तद्वत् त्वमपि स्वभवनाद् पहिरन्यत्रारस्थित किमपि वस्तु न वेत्सीति भावः । कन्छुल्लनारदस्य वचन श्रुत्वा पद्मनाभः कच्छुल्लनारद पृच्छति- के ण देवाणुप्पिया! से अगडदद्दुरे' इति। हे देवानुप्रिय ! कः खलु सोगडदर्दुरः १ एव पद्मनाभेन राजा पृष्टः सन् कच्छुल्लनारदः माह-एन यथा मल्लिगाए' यथा मलिज्ञाने वर्णितमेवमत्र पोध्यम् समुद्रदर्दुरकूपद१रयोः परस्परवार्तालापो यथा सजातस्तथा कच्छुल्लनारदेन कथित इत्यर्थः । पुनः कच्छुल्ल- कहा-हे देवानुप्रिय ! तुम अनेक ग्राम यावत् से घरों में आते जाते रहते हो तो क्या हे देवानुप्रिय ! तुमने कहीं पर क्या ऐसा अतः पुर पहिले कभी देखा है-जैसा मेरा अन्तः पुर है ? पद्मनाभ राजा के द्वारा इस प्रकार पूछे गये वे कच्छुल्ल नारद कुछ हँसने लगे- हँसकर तर उन्हों ने उनसे इस प्रकार कहा-हे पद्मनाभ ' तुम उस कूपम इक के समान हो-जो अपने निवासस्थान भूत कुए से बाहिरी प्रदेश में विद्यमान कुलभी नहीं जानते हो । कच्छुल्ल नारद के वचन सुनकर के पमनाभ ने उन कच्छुल्ल नारद से पूछा-देवानुप्रिय! वह अगड?र का आख्यान कैसा है ? तय नारद ने उनसे कहा-मल्लि नाम के अध्ययन में कूपमडूक और समुद्र मडूक के परस्पर में वार्ता- लाप के रूप में यह आख्यान वर्णित किया हुआ है-सो नारद ने यह आख्यान जैसे का तैमो उन्हें सुना दिया- पुन' कच्छल्ल नारद उनसे કેઈ પણ સ્થાને અને કોઈ પણ દિવસે આ મારા જે રણવાસ જે છે? પદ્મનાભ રાજા વડે આ રીતે પ્રશ્ન પૂછાએલા તે કચ્છલ નારદ હસવા લાગ્યા, હમીને તેઓએ તેમને આ પ્રમાણે કહ્યું કે હે પદ્મનાભ! તમે તે ફૂપ મહૂક જેવા છે કે જે પિતાના નિવાસસ્થાન કૂપથી બહારના પ્રદેશ વિષે થોડુ પણ જ્ઞાન ધરાવતે નથી કડ્ડલ નારદના વચન સાંભળીને પદ્મનાભે તે કરછુલ નારદને પૂછયું કે હે દેવાનુપ્રિય ! તે અગડ દરકનું આખ્યાન કેવી રીતે છે? ત્યારે નારદે તેમને મલ્લિ નામે અધ્યયનમા વર્ણવવામાં આવેલા ફૂપ મહૂક અને સમુદ્ર મહૂકના વાર્તાલાપ રૂપે તે સંપૂર્ણ આખ્યાન તેમને કહી સંભળાવ્યુ नारदः उदफपरिस्पृष्टायां-जलामिपिक्तायां दर्मोपरि प्रत्यास्तृतायां गुप्याम् आस नशेपे निपीदति, यार गलोदन्त-शलार्वाम् आकृति-सोपविष्टं त फच्छुल्लनारद पानामः कुशलपाती पडतीत्यर्थ । तव सल स पमनाभो रामा निजकारो श्रीपरिवारे जातपिस्मयः समुत्पनगः, कन्गुल्लनारदम् एव- पक्ष्यमाणक्रमेण, आदीन-हे देशानुपिय ! र यहुन् ग्रामान् यापत् गृहाणि अनु पविशति, तत् तस्माद् अस्ति 'आइ ' इति पाण्याद्वारे ते त्या कुत्रचिन् । इसके पाद वे फरलनारद जल के गीटो से सिंचित आसन पर जो दर्भ के ऊपर यिठा हुआ था पैठ गये-पैटकर उन्हों ने पद्मनाभ राजा से कुशलवार्ता पूछा। पद्मनाभ राजा ने भी सुग पूर्वक यैठे हुए उन फच्छुल्ल नारद से उन के कुशल समाचार पूछे । (ताण से पउमनाने राया णियगओरो हे जायविम्तए कच्छुल्लणारयं एवं वयासी-तुम्भ देवाणुप्पिया! यणि गामाणि जीव गेहाइ अणुपविससि त अस्थि आइ तेकहिं चि देवाणुप्पिया! रिसए ओरोहे दिद्वपुव्वे, जारिसए णं मम आरोहे 'तण्ण से कच्छुल्लणारए पउमनाभेण रन्ना एव युत्ते समाणे ईसिं विहसिय करेइ, करित्ता एव चयासी-सरिसेण तुम परमणामा तस्स अगड ददुरस्स, केणं देवाणुप्पिया ! से अगडदुरे ! एव जहा मल्लि णाए एव खलु देवाणुप्पिया!) इसके याद पद्मनाभ राजा ने अपने अतःपुर में विस्मित पनकर कच्छुल्लनारद से આસન ઉપર બેસવા માટે વિનતી કરી ત્યારપછી તે કચ્છલ નારદ પાણીના છોટાઓથી સિચિત દર્ભના ઉપર પાથરેલા આસન ઉપર બેસીને પદ્મનાભ રાજાને તેઓના પરિવારની કુશળતાના સમાચારો પૂછયા પદ્મનાભ રાજાએ પણ આસન ઉપર સુખેથી બેઠેલા તે ક@cલનારદને કુશળ સમાચારે પૂછયા (तएण से पउमनाभे राया णियगओरोहे जायविम्हए कच्छुल्लणारय ण्व चयासी-तुब्भ देवाणुप्पिया । बहणि गामाणि जाव गेहाइ अणुविससि, त अत्थि आइ ते कहिं चि देवाणुपिया ! एरिसए ओरोहे दिट्टपूच्चे जारिसए ण मम ओरोहे ? तएण से कच्छुल्लणारए पउमनाभेण स्ना एव वुत्ते समाणे ईसिं विह सिय करेइ, करित्ता एव वयासी-सरिसेण तुम पउमणाभा तस्स अगडददुररस केण देवाणुप्पिया ! से अगडददुरे? एव जहा मल्लिगाए एव खलु देवाणुप्पिाया) ત્યારપછી પદ્મનાભ રાજાએ પિતાના રણવાસના વૈભવને જોઈને આશ્ચર્ય થઈને કચ્છતલ નારદને આ પ્રમાણે કહ્યું કે હે દેવાનુપ્રિય! તમે ઘણા ગ્રામ યાવતુ ઘરમાં આવજા કરતા રહે છે તે છે દેવાનુપ્રિય ! "131 इस प्रकार .
. मनारामृतपिगी टी० १० १६ द्रौपदीचरितनिरूपणम् -४६७ देवानुमिय ! ईदृशोऽवरोधो दृष्टपूर्वी यादृशः खलु ममावरोधः ? ममान्तः पुरे यादृश्यः त्रियो वर्तन्ते, तादृश्य स्त्रियः कुत्रापि भवता दृष्टा इति पृच्छतीत्यर्थः । ततः खलु स कन्छुल्लनारदः पद्मनाभेन राजा एवमुक्त सन् 'ईपद् विहसित' मन्दहास करोति, कृत्वा एवमवादीत्-हे पद्मनाभ ! सदृशस्त्वं खलु तस्य 'अग- डदुरस्स' आडद१रस्य-कूपमण्ड कस्य यथा कूपमण्डकः कूपाद् वहिः प्रदेशे नियमान नकिमपि जानाति, तद्वत् त्वमपि स्वभवनाद् पहिरन्यत्रारस्थित किमपि वस्तु न वेत्सीति भारः । कन्छुल्लनारदस्य वचन श्रुत्वा पद्मनाभः कच्छुल्लनारदं पृच्छति-'के ण देवाणुप्पिया से अगडदद्दुरे' इति। हे देवानुप्रिय ! कः खलु सोऽगडदईरः १ एव पद्मनाभेन राजा पृष्टः सन् कच्छुल्लनारदः माह-' एव यथा मल्लिगाए' यथा मलिज्ञाने वर्णितमेवमत्र पोध्यम् समुद्रदर्दुरकूपद१रयोः परस्परवार्तालापो यथा सजातस्तथा कच्छुल्लनारदेन कथित इत्यर्थः । पुनः कच्छुल्ल. कहा-हे देवानुप्रिय ! तुम अनेक ग्राम यावत् से घरों में आते जाते रहते हो तो क्या हे देवानुप्रिय ! तुमने कहीं पर क्या ऐसा अतः पुर पहिले कभी देखा है-जैसा मेरा अन्तः पुर है ? पद्मनाभ राजा के द्वारा इस प्रकार पूछे गये वे कच्छुल्ल नारद कुछ हँसने लगे- हसकर तर उन्हों ने उनसे इस प्रकार कहा-हे पद्मनाभ ' तुम उस कृपम दृक के समान हो-जो अपने निवासस्थान भूत कुए से घाहिरी प्रदेश में विद्यमान कुलभी नहीं जानते हो। कच्छुल्ल नारद के वचन सुनकर के पद्मनाभ ने उन कच्छुल्ल नारद से पूछा-देवानुप्रिय! वह अगडदर्दुर का आख्यान कैसा है ? तर नारद ने उनसे कहा-मल्लि नाम के अध्ययन में कूपमडूक और समुद्र मडूक के परस्पर में वार्ता- लाप के रूप में यह आख्यान वर्णित किया हुआ है-सो नारद ने यह आख्यान जैसे का तैमा उन्हें सुना दिया- पुनः कच्छुल्ल नारद उनसे કઈ પણ સ્થાને અને કઈ પણ દિવસે આ મારા જે રણવાસ જે છે? પનાભ રાજા વડે આ રીતે પ્રશ્ન પૂછાએલા તે કચ્છલ નારદ હસવા લાગ્યા, હસીને તેઓએ તેમને આ પ્રમાણે કહ્યું કે હે પદ્મનાભ ! તમે તે ફૂપ મહૂક જેવા છે કે જે પિતાના નિવાસસ્થાન કૂપથી બહારના પ્રદેશ વિષે થોડું પણ જ્ઞાન ધરાવતે નથી કચ્છલ નારદના વચન સાંભળીને પદ્મનાભે તે કરહુલ નારદને પૂછયું કે હે દેવાનુપ્રિય! તે અગડ દર નુ આખ્યાન કેવી રીતે છે? ત્યારે નારદે તેમને મ૦િ નામે અધ્યયનમાં વર્ણવવામાં આવેલા કૂપ મહૂક અને સમુદ્ર-મકના વાર્તાલાપ રૂપે તે સંપૂર્ણ આખ્યાન તેમને કહી સંભળાવ્યું बाताबवापर नारदोवदति-एव पक्ष्यमाणमकारेग सल दे देशानुमिय । जम्बूद्वीपे टीप भारते वर्षे हस्तिनापुरे नगरे ग्रुपदस्य रामो दुदिता लन्या देव्या आत्मना पाण्डो स्नुपा पञ्चाना पाण्डमाना भार्या द्रौपदी देवी रूपेण च या उरुष्ट शरीरा वर्तते द्रौपयाः खलु देव्यानिनस्यापि पादाप्यास्पाय तारोध. तया त पुरवर्तिनी काचिदपि देवी 'सयतमपि कर शततमामपि फलां नाईति, इति कृत्वा-एव ज्ञात्या कथयामि-दौपदीसरशी नास्ति काचिदपीति । ततः फन्न्लनारदीगन्तुकाम. करते हैं कि हे देवानुप्रिया सुनो-पात इस प्रकार है-(जनू दीवे दीवे भारहे वासे हस्थिणाउरे दुवयस्स रणो धूपा, चूलणीप देवीए अत्तया पट्टस्त सुण्डा, पचण्ड पत्याण भारिया दोवई देवी रूपेण य जाव उक्कि सरीरा, दोवईए ण देवी निस्स वि पायगुयस्स अय तपअवरोहरोसय नमपिकल ण अग्यई तिकटु पउमणाभआपुच्छह आपुच्छित्ता जावपडि गए, तण्ण से पउमणाभे रोयो कच्छुल्लणारयस्म अतिएण्यम सोच्चा णिसम्म दोवइए, देवीए स्वे य च्छिए४ दोवई अजोववन्ने जेणेव पोस हसाला तेणेव उवागच्छद) जबूदीप नाम के प्रथम द्वीप (मध्य जवुढीप में) में भारतवर्ष में, हस्तिनापुर नाम के नगर में द्रुपद रोजा की पुत्री चुलनी देवी की आत्मजा, पांढ राजा की स्नुपा-पुत्रवधू-पाच पाडवों की भार्या द्रौपदी देवी है । यह रूप से यावत् उत्कृष्ट शरीर है । तुम्हारा यर अतःपुर उसके कटे हुए पैर के अगूठे के सौवें अश के बराबर અને ત્યારપછી કચ્છલ તેમને કહેવા લાગ્યા કે હે દેવાનુપ્રિય! સાભળે, વાત એવી છે કે – (जबू द्दीचे दीवे मारहेवासे हथियाउरे दुवयस्स रणो धूया, चूलणीए देवीए अत्तया पहुस्स सुण्हा, पचण्ह पडवाण भारिया दोवई देवी स्वेण य जाब उक्किसरीरा, दोवईए ण देवीए छिन वि पायांयस अप तव अबरोहो सयन्नमपि कल ण अधई ति कट्टु पउमगाम आपुच्छह, आपुच्छित्ता जाव पडि गए, तएण से पउमणाभे राया कच्छल्लगारयस अतिए एम सोच्चा णिसम्म दोवईए, देवीए रूवेय मुच्छिए ४ दोचईए अज्झोक्वन्ने जेणेव पोसहसाला तेणेव उवागच्छइ) જબ દ્વિપ નામના પ્રથમ દ્વિપમાં ભારત વર્ષમાં હસ્તિનાપુર નામે નગ રમા દુપદ રાજાની પુત્રી સૂવની દેવીની આત્મજા, પાડુ રાજાની ખુષા-પુત્રવધુ પાચ પાડવેની પત્ની દ્રૌપદીદેવી છે તે રૂપથી યવ ઉત્કૃષ્ટ શરીરવાળી છે તમારે આ રણવાસ તેના કપાયેલા અન્હાના સમા ભાગની બરોબર પણ નથી, આ બધુ હુ વિચારપૂર્વક કહી રહ્યો છે દ્રોપદી જેવી .
मनगारधामृतपिणी टी० अ० १६ द्रौपदीचरितनिरूपणन् पद्मनाभमापृच्छति, पृष्ट्वा यावत् पानाभेन राज्ञा सत्कार प्राप्य प्रतिगतः उत्पतनी विद्यया गगनमुड्ययन् प्रतिगत इत्यर्थः । तत खलु स पद्मनाभो राजा कछुल्लनारदस्यान्तिके एतमय अवा- आकर्ण्य निशम्य हवार्य द्रोपद्या देव्या रूपे च यौवने च लापण्ये च मूच्छितः आसक्तः, गृद्धः = लोलुपः, ग्रथिवा-निवचित्तः, अ युपपन्न. = एकाग्रचित्त सन् यत्रैव पौपधशाला तीवोपागन्छति, उपागत्य पौषधशाला प्रमार्य यावदप्टम मक्त कृत्वा ' पूर्वमगतिक ' पूर्वमित्र देवम् एव अक्ष्यमाणप्रकारेण आदीत् एवं खलु हे देगनुप्रिय ! जम्बूद्वीपे द्वीपे भारत वर्षे हस्तिनापुरे पाण्डवभार्या द्रोपदी देवी यावत्-उत्कृष्टशरीरा वर्तते, तत्-तस्माद् इच्छामि सलु हे देवानुप्रिय ! भी नहीं है। ऐसा में जानकर ही कह रहा हूँ। द्रौपदी के जैसी कोई भी नारी नहीं है। उस प्रकार कहकर वे कच्छुल्ल नारद वहा से चलने के लिये अभिलापी बन गये-तय उन्होंने पद्मनाभ राजा से जाने के लिये पूछा पूछकर यावत् वे वहा से पद्मनाभ राजा से सत्कृत होकर उत्पतनी विद्या के प्रभाव से गगन तल को उल्लंघन करते वापिस चले गये। इसके बाद वे पद्मनाभ राजा कच्छुल्ल नारद के मुख से इस समाचार रूप अर्थ को सुनकर और उसे हृदय में धारण कर द्रौपदी देवी के रूप, यौवन एव लावण्य मे मृच्छित ४ यन गये, यावत् उनका चित्त उन में बिलकुल एकाग्र हो गया। इस तरह होकर, वे जहा पौपधशाला थी वहा गये । ( उवगच्उित्ता पोमहसालं जाव पुव्वसगहय देव एच चयासी एव खलु देवाणुप्पिया! जद्दीवे दीचे भारहे वासे हत्यिणाउरे जाव सरीरा त इच्छामि ण देवाणुप्पिया ! નથી આ પ્રમાણે કહીને તે કચ્છલ્લ ત્યાથી ચાલવા માટે તૈયા થઈ ગયા તેમણે પદ્મનાભ રાજાને જવા માટે પૂછ્યું, પૂછીને થાતુ ત્યાથી તેઓ પદ્મનાભ રાજાની પાસેથી સત્કૃત થઈને ઉત્પતની વિદ્યાના પ્રભાવથી આકા શને ઓળગતા જતા રહ્યા ત્યારપછી તે પદ્મનાભ રાજા કચ્છડલ નારદના મુખથી આ સમાચારને સાભળીને અને તેને હૃદયમાં ધારણ કરીને દ્રૌપદી, દેવીના રૂપ, યૌવન અને લાવણ્યથી મૂર્થિત ૪ થઈ ગયા, યાવતું તેમનું મન તેમા એકદમ ચાટી ગયુ આ સ્થિતિમાં તેઓ જ્યા પૈષધશાળા હતી ત્યા ગયા (उवागच्छित्ता पोसहसाल जाव पुन्वसगइय देव एव चयासी एव खल देशणुप्पिया ! जयू दीवे दीवे भारहे वासे इत्थिणाउरे जाव सरीरा त इच्छामि प देवाणिया! दोबई देवी इहमाणिय तएण पुरसगइए देवे पमनाम एवं નારદ सामेच्या नारदोपदति-एव वक्ष्यमाणमकारेण सलु हे देशानुमिय । जम्बूद्वीपे टीपे भारते वर्षे हस्तिनापुरे नगरे ग्रुपदस्य रामो दुदिता पूल या देण्या आत्मना पायोः स्नुपा पश्चाना पाण्डमाना भार्या द्रौपदी देवी रूपेण च यापद उस्कृष्ट शरीरा वर्तते द्रौपचाः खलु देव्याउिनस्यापि पादानुष्ठास्पाय तगारोध तपान्तःपुरवर्तिनी काचिदपि देवी 'सयतमपि फर' शतवमामपि पला नाईति, इति कृता-एक ज्ञात्वा कथयोमि-द्रोपदीसरशी नास्ति काचिदपीति । ततः कन्जुल्लनारदोगन्तुकामः कहते हैं कि हे देवानुप्रिय । सुनो-पात इस प्रकार है-(जबू दीवे दीवे भारहे वासे हरियणाउरे दुवयस्स रण्णो धूया, चुलणी देवीए अत्तया पद्यस्त सुण्डा, पचण्ह पहाण भारिया दोवई देवी स्वेण य जार उकि सरीरा, दोवईए ण देवीण छिन्नस्स वि पायगुट्टयस अय तर अवरोरोसय नमपिकल ण अग्यई त्तिकट्टु पउमणामआपुच्छह आपुच्छित्ता जाव पडि गए, तण्ण से पउमणाभे रायो कच्छुल्लणारयस्स अतिएण्यम सोच्चा णिसम्म दोवइए, देवीए स्वे यच्छिए४ दोवई अजोववन्ने जेणेव पोम हसाला तेणेव उवागच्छद) जबूदीप नाम के प्रथम द्वीप (मध्य जवुद्धीप में ) में भारतवर्ष मे, हस्तिनापुर नाम के नगर में द्रुपद रोजा की पुत्री घुलनी देवी की आत्मजा, पांडु राजा की स्नुपा-पुत्रवधू-पाच पाडवों की भार्या द्रौपदी देवी है। यह रूप से यावत् उत्कृष्ट शरीर है । तुम्हारा यह अतःपुर उसके कटे हुए पैर के अगूठे के सौवें अश के घरायर અને ત્યારપછી કરશુલ તેમને કહેવા લાગ્યા કે હે દેવાનુપ્રિય! સાભળે, વાત એવી છે કે – (जबू दीवे दीवे भारदेवासे हथिगाउरे वयस्स रणो धूया, चूलणीए देवीए अत्तया पडुस्सू सुण्डा, पचण्ह पडवाण भारिया दोवई देवी स्त्रेण य जाव उक्टिसरीरा, दोवईए प देवीए निवि पायगुटयरस अप तब अवरोहो सयन्नमपि कल ण अवई चिकह पउमणाम आपुछा, आपुच्छिता जाव पडि गए, तएण से पउमगाभे राया कच्छुल्लगारयस अतिए एम सोचा णिसम्म दोवईए, देवीए रूवेय मुच्छिए । दोचईए अन्झोववन्ने जेणेव पोसहसाला तेणेव उवागच्छइ) જબ દ્વિપ નામના પ્રથમ દ્વિીપમાં ભારત વર્ષમા હસ્તિનાપુર નામે નગ રમા દુપદ રાજાની પુત્રી સૂવની દેવીની આત્મજા, પાડુ રાજાની ખુષા-પુત્ર પાચ પાડવની પત્ની દ્રોપદીદેવી છે તે રૂપથી યવ ઉત્કૃષ્ટ શરીરવાળી છે તમારે આ રણવાસ તેના કપાયેલા અગડાના સમા ભાગની બરાબર પણ નથી, આ બધુ હુ વિચારપૂર્વક કહી રહ્યો છે પરી જેવી નારી કેઈ પણ मनगारधामृतवपिणी टी० म० १६ द्रौपदीचरितनिरूपणन् पद्मनाभमापृच्छति, पृष्ट्वा यावत् पद्मनाभेन राज्ञा सत्कार प्राप्य प्रतिगतः उत्पतनी विद्यया गगनमुड्ययन् प्रतिगत इत्यर्थः । तत खलु स पद्मनाभो राजा कन्टुल्लनारदस्यान्तिके एतमयं श्रुत्या आकर्ण्य निशम्य हघवधार्य द्रौपद्या देव्या रूपे च यौवने च लावण्ये च मूछितः- आसक्तः, गृद्धः = लोलुपः, ग्रथिता निवद्धचित्तः, ज युपपन्नः = एकाग्रचित्त सन् यौन पोपधशाला तौयोपागति, उपागत्य पोपधशाला प्रमाय यावदाटम मक्त कृत्या पूर्वसगतिक' पूर्वमित्र देवम् एवम्त्यमाणप्रकारेण आदीत् एव खलु हे देवानुप्रिय । जम्बूद्वीपे _ पे भारते व हस्तिनापुरे पाण्डवभार्या द्रोपदी देवी यावत्-उत्कृष्टशरीरा वर्तते, तत्-तस्माद इच्छामि सलु हे देवानुप्रिय ! भी नहीं है। ऐसा में जानकर ही कह रहा हूँ। द्रौपदी के जैसी कोई भी नारी नहीं है। उस प्रकार कहकर वे कच्छुल्ल नारद वहा से चलने के लिये अभिलापी बन गये-तर उन्होंने पद्मनाभ राजा से जाने के लिये पृछा पूलकर यावत् वे वहा से पद्मनाभ राजा से सत्कृत होकर उत्पतनी विद्या के प्रभाव से गगन तल को उल्लंघन करते हुए वापिस चले गये। इसके बाद वे पद्मनाभ राजा कच्छुल्ल नारद के मुख से इस समाचार रूप अर्थ को सुनकर और उसे हृदय में धारण कर द्रौपदी देवी के रूप, यौवन एव लावण्य मे मूच्छित ४ घन गये, यावत् उनका चित्त उन में बिलकुल एकाग्र हो गया। इस तरह होकर, वे जहा पौपयशाला थी वहा गये । ( उवगच्छित्ता पोमहसाल जाव पुन्वसगड्य देव एव चयासी एव खलु देवाणुप्पिया! जद्दीवे दीवे भारहे वासे हत्यिणाउरे जाव सरीरा त इच्छामि ण देवाणुप्पिया ! નથી આ પ્રમાણે કહીને તે કક્ષુલ્લ ત્યાથી કરવા માટે તૈયા થઈ ગયા તેમણે પદ્મનાભ રાજાને જવા માટે પૂછ્યું થાવત ત્યાથી તેઓ પદ્મનાભ રાજાની પાસેથી સત્કૃત થઈને ઉ૫તની શિને ઓળગતા જતા રહ્યા ત્યારપછી તે પદ્મનાભ મુખથી આ સમાચારને સાભળીને અને તેને હૃદયમ દેવીના રૂપ, યૌવન અને લાવથી મૂક્તિ ૪ થઈ તેમા એકદમ ચેટી ગયુ આ સ્થિતિમાં તેઓ જ્યા પણ (उवागच्छित्ता पोसहसाल जाव पुध्वसगइय देव देवाणुप्पिया ! जयू बीवे दीवे भारहे वासे हथिणाउरे ण देवाशुणिया! दोबई देवी इरमाणिय तएवं નારદ વથી આકા ४५० HTTA दोपदी देशीम् इह माणिय' हानेतुम् । ततः रामगतिको देशः पमनाम नपम् एपमपादीत्-ई देशानुप्रिय ! नो गर तद्भूत या भवद् गा भविष्य वा, यत् खलु दोपदी देवी पश्च पाहमान मुसान्येन पुरुषण सामुदागन् भोगान यानद् पिहरवि, तयापि च मलु भावामीत्याद्रीपदीदेशीमिह व्यपानयामीति दोवई देशों हरमाणिप ताण पुषसग देवेपउमनाम प वयोसी-नो खलु देवाणुपिया। एप भूय या मर या मस्मि वा जग दोबई देवी पच पडरे मोत्तुग अन्नेण पुरिसेण सद्धिं ओरालाइ जार विहरि सह ) वहां जाकर उन्हों ने उम पोपद्य शाला को रजोहरण से साफ किया यावत् अष्टम भक्त फर के पूर्व सगति दव का आगाहन किया देवों के आनेपर पूर्व सगतिक देव से इस प्रकार का हे देवानु प्रिय ! जयूटीप नाम के दीप में भारत वर्ष में हस्तिनापुर नगर में पाडवो की भार्या द्रौपदी देवी है। यह यावत् उत्कृष्ट शरीर है । इसलिये हे देवानुप्रिय ! मैं उस द्रौपदी देवी को तुमसे यहा ले आने के लिये चाहता हूँ। पद्मनाभ की इस घोत को सुनकर पूर्वभव के मित्र उस देव ने उस से तय ऐसा कहा-हे देवानुप्रिय । ऐसी यात द्रौपदी के साथ न पहिले हुई है, न आगे होगी और न अय वर्तमान में हो सकती है, जो द्रौपदी देवी पाच पांडवो को छोड़कर अन्य किसी दुमरे पुरुष साथ उदार यावत् मनुष्य भव समन्धी काम सुग्बो को भोगे (तहावि वयासी नो खलु देवाणुप्पिया! एय भूय वा भव्य वा भविस्स वा जन्म दोबई देवो पच पडवे मोत्तग अ नेण पुरिसेग सद्धि ओरालाइ जाव, विहरिस्सइ) ત્યાં જઈને તેમણે તે પવધશાળાને રજોહરણથી સાફ કરી યાવત્ અષ્ટમ ભક્ત કરીને પૂર્વ ગતિ દેવનું આવાહન કર્યું દેવ જયારે આવી ગમે ત્યારે તેમણે પૂર્વસંગતિક દેવને આ પ્રમાણે કહ્યું કે હે દેવાનુપ્રિયા જ નામના દ્વીપમાં ભરત વર્ષમા હસ્તિનાપુર નગરમાં પાડવની પત્ની દ્રૌપદીદેવી છે, તે યાવતું ઉત્કૃષ્ટ શરીરવાળી છે એથી હે દેવાનુપ્રિય છે તે દ્રૌપી દેવીને તમે અહીં લઈ આવે એવી મારી ઇચ્છા છે પાનાની આ વાતને સાભળીને તેમને આ પ્રમાણે કહ્યું કે હે દેવાનુપ્રિય દ્રૌપદી ચરણ ન પહેલા થયું છે ને ભવિષ્યમા થશે અને આ છે દ્રૌપદી દેની પા પા સિવાય બીજા નવ સ બ ધી કામસુખ ભોગવે આ के બુદ્વીપ પૂર્વભવના મિત્ર, દેવીની સાથે ન વર્ત " मनगरापामृतषिणी टीका० १० १६ द्रौपदीचरितनिरूपणम कृत्वा उक्त्वा पद्मनाभम् आपृच्छति आपृच्छय तया उत्कृष्टया देवसम्पन्धिया गया यावत् लपणसमुद्रस्य मध्यम येन-उपरिभागेन गगनमार्गेण, यत्रैव हस्तिनापुर नगर तत्रैव प्राधारयद् गमनाय । तस्मिन् काले तस्मिन् समये हस्तिनापुरे नगरे युधिष्ठिरो राजा द्रोपद्या सार्धमुपरि आकागतले प्रासादाहालिकोपरि सुसम सुप्तश्चाप्यासीत् , तत' खलु स पूर्वसगतिको देवो यत्र युधिष्ठिरो राजा यौव द्रौपदीदेवी तीवोपागच्छति, उपागत्य द्रौपद्यै यण अहतव पियतया दोबइ देवी हह ह्यमाणेमि त्तिकट्टु पउमणाभ आपुन्छड, आपुच्चित्ता ताए उस्किट्ठाए जाव लघणसमुद्द मझ मञ्झेणं जेणेव रविणाउरे जयरे तेणेव पहारस्थ गमणाए) फिर भी मै तुम्हारी मीति के निमित्त द्रौपदी देवी को यहां शीघ्र लेकर आता है। ऐसा कह- कर उसने जाने के लिये उन पद्मनाभ से पूछा, पूछकर फिर वह उस , उत्कृष्ट देवभवसबन्धी गति से यावत् लवर्ण समुद्र के बीच से होकर जहा हस्तिनापुर नगर था उस और चल दिया ! (तेण कालेण तेण सम- एण हथिणाउरे जुहिडिले राया,दोवईए सद्धिं उपि आगासतलसि सुह पसुत्ते यावि होत्या, तएणं से पुव्वसगइए देवे जेणेव जुहिडिल्ले राया जेणेव दोबई देवी तेणेव उवागच्छद) उस काल और उस समय में हस्तिनापुर नगरमें युधिष्ठिर राजाके साथ द्रौपदी आकाशतलमें-प्रासाद की अट्टालिका के ऊपर सोये हुए थे। वह पूर्व सगतिक देव जहा वे युधिष्ठिर राजा और जहां वह द्रौपदी देवी थी वहां आया-(उयोगच्छित्ता (तहानि य ण अह तब पियट्टतयाए दोवइ देवीं इह हव्वमाणेमि ति बहु पउमणाम आपुच्छइ, आपुच्छित्ता ताए उम्टिाए जाव लवणसमुद्द मज्झ मज्झेण जेणेव हथिणाउरे णयरे तेणेव पहारेत्थ गमणाए) છતાએ તમને ખુશ કરવા માટે હુ દ્રૌપદી દેવીને શીઘ અહીં લઈ આવું છુ આમ કહીને તેણે જવા માટે પદ્મનાભ રાજાને પૂછયું પૂત્રને તે પોતાની ઉત્કૃષ્ટ દેવભવ સ બ ધી ગતિથી ચાવત લવણુ સમુદ્રની વચ્ચે થઈને જ્યા હસ્તિનાપુર નગર હતું તે તરફ રવાના થયે ( तेण हालेण तेण समएण हत्विणाउरे जुहिहिले राया, देवईए सद्धि उप्पि जागासतलसि सुहपसुत्ते यावि होत्था तएण से पुव्यसगइण देवे जेणेव जुहि- हिल्ले राया जेणेर दोबई देवी तेणेव उवागच्छद) તે કાળે અને તે સમયે હસ્તિનાપુર નગરમા યુધિષ્ઠિર રાજા અને દ્રૌપદી દેવી મહેલની અગાશી ઉપર સૂતા હતા તે પૂર્વ સાગતિક દેવ જ્યા તે યુધિ કિર રાજા અને જ્યા તે ટૌપદી હી હતી ત્યા આવ્યા HAIN दोपदी देवीम् इह माणिय' हानेतुम् । तनः रातु पूमिगतिको देवः पचनाम नुपम् एमादीत्-दे देवानुप्रिय ! नो गलु तद् भूत मा पा मवि यद् वा, यत् खलु दोपदी देनी पश्च पाण्डवान मुरयाऽन्येन पुरुणेग सामुदागन भोगान याद पिहरवि, तथापि च ग्बलु भातमीप हीदी देवीमि व्यपानयामीवि दोवई देवों इरमाणिय ताण यमगहा देवे पउमनाम पत्र वासी-नो खलु देवाणुपिया ! एय भूय चा मन वा मस्मि या जण दोवई देवी पच पडो मोत्तुग अन्नेण पुरिसेण सद्धि ओरालाइ जाप विहरि स्सह ) वा जाकर उन्हों ने उस पौषध शाला को रजोहरण से साफ किया यावत् अष्टम भक्त फर के पूर्व सगति देव का आवाहन किया देवों के आनेपर पूर्व सगतिक देव से इस प्रकार कहा हे देवानु प्रिय ! जंबूद्वीप नाम के दीप में भारत वर्ष में हस्तिनापुर नगर में पाडवो की भार्या द्रौपदी देवी है । यह यावत् उत्कृष्ट शरीर है । इसलिये हे देवानुमिय ! मैं उस द्रौपदी देवी को तुमसे यहा ले आन के लिये चाहता है। पद्मनाभ की इस बात को सुनकर पूर्वभव के मित्र उस देव ने उस से तय ऐसा कहा-हे देवानुप्रिय ! ऐसी यात द्रौपदी के साथ न पहिले हुई है, न आगे होगी-और न अप वर्तमान में हो सकती है, जो द्रौपदी देवी पाच पांडवो को छोड़कर अन्य किसी दूसरे पुरुष के साय उदार यावत् मनुष्य भव समन्धी काम सुग्वों को भोगे (तावि चयासी नो खलु देवाणुप्पिया! एय भूय वा भव्य वा भविस्स वा जण दोवई देवो पच पडवे मोत्तग अ नेण पुरिसेग सद्धिं ओरालाइ जाव, बिहरिस्सइ) ત્યાં જઈને તેમણે તે પૈષધશાળાને રજોહરણથી સાફ કરી યાવતુ અષ્ટમ ભકત કરીને પૂર્વ સગતિ દેવનું આવાહન કર્યું દેવ જયારે આવી ગમે ત્યારે તેમણે પૂર્વસ ગતિક દેવને આ પ્રમાણે કહ્યું કે હે દેવાનુપ્રિય! જ બૂઢીપ નામના દ્વીપમાં ભરત વર્ષમાં હસ્તિનાપુર નગરમાં પાકની પત્ની દ્રૌપદવી छ, ते થાવત્ ઉત્કૃષ્ટ શરીરવાળી છે એથી હે દેવાનુપ્રિય! તે દ્રૌપદી દેવીને તમે અહીં લઈ આવે એવી મારી ઈચ્છા છે પદ્મનાભની આ વાતને સાભળીને પૂર્વભવના મિત્ર તે દેવે તેમને આ પ્રમાણે કહ્યું કે હે દેવાનુપ્રિય ! દ્રૌપદી દેવીની સાથે આ જાતનું આચરણ ન પહેલા થયુ છે ન ભવિષ્યમાં થશે અને ને વર્તમાનમાં થવાની શકતા છે દ્રૌપદી દેવી પા પા સિવાય બીજા કઈ પુરૂષની સાથે ઉદાર યાવત્ મનુષ્યભવ સબ ધી કામસુખ ભોગવે આ વાત તદ્દન અસભવિત છે, अनगारधामृतषिणो टीका म० १६ द्रौपदीचरितनिरूपणम् ४७३ यव पद्मनाभस्तौवोपागच्छति, उपागत्य एवमवादी-एपा खलु हे देनानुपिय ! मया हस्तिनापुराद् द्रौपदी इह हव्यमानीता ताशोकवनिकाया तिष्ठति, अतः पर त्व जानासि ' इति कृत्वा उक्खा, यस्या एवं दिशः प्रादुर्भूतम्तामेव दिशं पतिगतः ॥ सू०२५ ॥ मूलम्-तएणं सा दोवई देवी तओ मुहुत्ततरस्स पडिवुद्धा समाणी त भवणं असोगवणियं च अपच्चभिजाणमाणी एव वयासी-नो खल्लु अम्हं एसे सए भवणे णो खल्लु एसा अम्हं सगा असोगवणिया, तं ण णज्जइ णं अहं केणइ देवेण वा दाणवेण वा किं पुरिसेण वा महोरगेण वा गंधव्वेण वा अन्नस्स रपणो असोगवणिय साहरियत्तिकटु ओहयमणसकप्पा जाव झियायइ, तएणं से पउमणाभे राया पहाए जाव सव्वालंकार विभूसिए अतेउरपरियालं संपरिवुडे जेणेव असोगवणियाजेणेव दोवई देवी तेणेव उवागच्छइ उवागच्छित्ता दोवईं देवीं ओहय० जाव झियायमाणी पासइ पासित्ता एव वयासी- किष्णं तुम देवाणुप्पिया । ओहय जाव झियाहि, एवं दिया-गाढ निद्रा से ररित कर फिर वह वहाँ से जरा पद्मनाभ राजा थे वहा गया-वहा जाकर उसने उनसे ऐसा कहा-हे देवानुप्रिय ! मैं हस्ति- नापुर नगर से द्रौपदी को यहा ले आया हूँ। वह तुम्हारी अशोक वाटिका में ठहरी है, अत अब तुम जानो। ऐसा कहकर वह देव जिस दिशा से प्रकट हुआ था-उसी दिशा की और वापिसचला गयो। स-२५ પદ્મનાભ રાજા હતા ત્યા ગો ત્યાં જઈને તેણે તેમને આ પ્રમાણે કહ્યું કે હે દેવાનુપ્રિય ! હસ્તિનાપુર નગરથી દ્રૌપદી દેવીને હું અહીં લઈ આવ્યો છુ તે તમારી અશોકવાટિકામાં છે, એથી હવે તમે જાણે આ પ્રમાણે કહીને તે દેવ જે દિશા તરફથી પ્રકટ થયે હતો તે જ દિશા તરફ પાછો જતે રહ્યો છે સૂત્ર ૨૫ કરીને તે જ્યા आ गिण्हइ, गिणिदत्ता ताए उविट्ठाए जाव जेणे अमरकका जेणेर पउमणामस्स उपागच्छइ, उवागच्छित्ता एक बयासी-एसण देवाणुप्पिया मए हथिणाउराओ ४७२ देव्यै 'आसोपणिप ' गाम्मापनी निद्रां 'दलया। दाति मुसममुप्ता द्रौपदी गादनिद्रयाऽऽकान्ता कामानित्यर्थः । दला-गादनिहानी कन्या द्रौपदी देवी गृहीत्या त्या उत्कृष्टया देवमम्पन्धिन्यागत्या यापन योपामरकका राजधानी यौर पमनाभस्य भान गोपागरउति, उपागत्य पमनामस्य भाने ' असोगर णियाए ' अशोकानिकायाम् गोपाटिमाया द्रौपदी देवी स्थापयति, स्थापयित्या ' आगोगि आहरइ । अपनापनी निद्रामपारति, अपहस्य दोईप देवीए ओसोवणिय दल्यड, दलित्तादोई देििगता,गिण्हसा तीए उक्किटाए जार जेणे अमरफका जेणे पउमणाभरस भवणे तेणेव उवागच्छा, उवागजित्ता पत्रमणामस्न भवसि असोगवणि याए दोवह देवीं ठवेह ठारित्ता ओमोवणिं अपहरड, अवह रित्ता जेणेव पउमणाभे तेणेच उचागाइ,उवागरिकत्ता एव चयासी-एस ण देवाणु प्पिया! मरा हरियणाउराओ दोवई हर रव्यमाणीया, तब असोगवणियाए चिट्ठइ, अतोपुर तुम जाणिसि तिकटुनामेव दिमि पाउन्भूए तामेव दिसि पटिगए) वा आकर उसने द्रौपदी देवी को गाढ निद्रा में सुला दिया, सुलाकर फिर उसने उस द्रौपदी को वहा से उठाया-और उठा कर फिर वह उस उत्कृष्ट देवभवसन्धी गति से चलकर यावत् जहा अमरकका नगरी और जहा पद्मनाभ राजा का भवन था वहा आया वश आकर के उसने पक्षमा भवन में अशोकवाटिका में द्रौपदी देवी को रखदिया। रग्बकर के फिर उसने उसे गाढ निद्रा से रहित कर (उवागच्छित्ता दोवईए दीपीए ओसोपणिय दलयइ, दलित्ता दोवई देवि भवणे-नेणेव आगच्छह उवान्छिता पउमणाभस्स भवणसि असोगवणियाए दोवइ देवीं ठवेइ ठावित्ता ओसोपणि बहरहअपहरिता जेणेप पउमणामे तेणेव दोबई इह हव्यमाणीया, तब असोगवणियाए चिटइ, अतोपुर तुम जाणिसित्ति कटु जामेव दिसि पाउम्भूए तामेव दिसि पडिगए) ત્યાં આવીને તે દ્રૌપદીને ગાઢ નિદ્રામાં સૂવાડી દીધી, સુવાડીને તેણે તે દ્રૌપદીને ત્યાથી ઉવી અને ઉડાવીને તે ઉત્કૃષ્ટ વિભવ સ ધી ગતિથી ચાલને યાવત્ જ્યાં અમર કા નગરી અને મા પધનાભ રાજાનું કામવન હતું ત્યાં આવ્યું ત્યાં આવીને તેણે પાનાભના ભવનમાં અશોક-વાટિકામાં દ્રૌપદી રેવીને અકી દીધી. અકીને તે ગાઢ નિદ્રા દર કરી દી भनेगारधर्मामृतषिणो टोका म० १६ द्रौपदीयरितनिरूपणम् मेतद् भवन नो खलु एपाऽस्माक ' सगा' स्वका-स्वकीया, अशोकवनिका, तद् न ज्ञायते खलु-अह केनापि देवेन वा दानवेन ना किं पुरुषेण वा किंनरेण वा महोरगेण वा गन्ग वा अन्यस्य राज्ञोऽशोकवनिकाया 'साहरिया' संहता- आनीताऽस्मि ' इति कृत्वा इति पिचार्य, अपहतमनःसकल्पा अनिष्टयोगेन भग्न- मनोरथा पिपादमुपगतेत्यर्थ. यावद् ध्यायति आर्त यान करोति । वतः खलु पद्मनाभो राजा स्नातो यावत् सलिकारविभूपितोऽन्तःपुरपरि- वारसपरिवृतो यौवाशोकनिका यौन द्रोपदी देवी, तत्रैयोपागन्छति, उपागत्य एसो अम्द सगा असोगवणिया, त ण णजइ, ण अह केणई देवेणवा दाणवेण वा किं पुरिसेण वा किन्नरेण वा महोरगेण वा गवव्वेण वा अन्नस्त रगो असोगणिय साहरियत्ति कटु ओह्यमणसकप्पा जाव झियायड) यह मेरा निज का भवन नहीं है, यह मेरी निज की अशोक वाटिका नहीं है । तो पता नही पडता क्या मैं किसी दूसरे राजा की अशोकवाटिका में किसी देव, दानव, किंपुरुप, किन्नर महो रग अथवा, गधर्व के द्वारा हरण कर लाई गई हूँ। इस प्रकार के विचार से उस का मनः सकल्प अपहत हो गया-अनिष्ट के योग से उस का मनोरथ भग्न हो गया और वह खेदखिन्न हो गई यावत् आत-यान करने लगी। (तरण से पउमणाभे राया पहाए जाव सव्वालकारविभू- सिए अतेउरपरियाल सपिवुडे, जेणेव असोगवणिया जेणेच दोवई देवी, तेणेव उवागच्छद, उवागच्छित्ता दोवई देवी ओत्य० जाव मिया- (नो खलु अम्ह एसे सएभवणे णो खलु एसा अम्ह सगा असोगरगिया, तण णज्जड ण अह केणई देवेग वा दागवेग वा किंपुरिसेग वा किन्नरेण चा महो. रगेग वा गपब्वेण वा अनस्त रणो असोगपणिय साहरियत्ति कटु ओहयमण सफप्पा जाव झियायड) આ મારૂ ભવન નથી, આ મારી અશોક વાટિકા નથી પડતી નથી, શુ હુ બીજા કેઈ રાજાની અશોક વાટિકામા કેઈ દેવ, દાનવ, કિપુરુષ કિંજર, મહારગ અથવા તે ગધર્વ વડે અપહૃત થઈને લઈ જવામાં આવી છુ આ જાતના વિચારોથી તેનું મન ઉદાસ થઈ ગયુ, અનિષ્ટના વેગથી તેને મરથ ભગ્ન થઈ ગયે અને તે ખેદ-ખિન્ન થઈ ગઈ યાવત્ આર્તધ્યાન કરવા લાગી (तएग से पउमणामे राया हाए जाव सबाल कारगिभूसिए अते उरपरियाल संपरिखुडे, जेणे अमोगणिया जेणैव दोबई देवी, वेणा उपागच्छइ, उचाग- . કઈ ખબર
वाताव
खल्ल तुम देवाणुप्पिया! मम पुव्यसंगइएणं देवेणं जंबूही-
वाओ २ भारहाओ वासाओ हस्थिणापुराओ नयराओ जुहिदि
लस्स रणो भवणाओ साहरिया त मा णं तुम देवाणुप्पिया।
ओहय० जाव झियाहि, तुम मए सद्धिं विपुलाई भोगभोगाई
जाव विहराहि, तएणं सा दोवई देवी पउमणाभं एव वयासी
-एव खलु देवाणुप्पिया । जंवूदीचे दीवे भारहे वासे बारवइए
णयरीए कण्हे णाम वासुदेवे ममप्पियभाउए परिवसइ, तणे
से छण्हं मासाण मम कूर
नो हव्वमागच्छा तएणं अह देवा
णुप्पिया। जं तुम वदसि तस्स आणाओवायवयणणिदेसे चिहि
स्सामि, तएणं से पउमे दोवईए एयमटुं पडिसुणित्तार दोवई
देवि कणतेउरे ठवेइ, तएणं सा दोवई देवी छटु छट्टेणं अनि
विखत्तेणं आयंविलपरिग्गहिएणंतवोकम्मेणं अप्पाणं भावेमाणे
विहरइ ॥ सू० २६ ॥
टीका-'तएण सा' इत्यादि । तव स्खलु सा द्रौपदी देवी ततो मुहूर्तान्तरे
प्रतिबुद्धा जागरिता सती तद् भवनम् अशोम्वनिका च ' अपञ्चभिजाणमाणी
अप्रत्यभिजानन्ती भवनादिकमपरिचित जानन्ती एवमवादी-नो खलु अरमा
-तएण सा दोवई देवी इत्यादि ।
टीकार्थ-(तएण) इसके बाद (सा दोवईदेवी) वह द्रौपदीदेवी (ताओ
मुहत्ततरस्स पडिघुद्धा समाणी) १ मुहर्त के बाद जगी सो जग कर
उसने ( त भवण असोगवणिय च अपञ्चभिजाणमाणी एव वयासी)
उस भवन को एव उस अशोकवाटिका को अपरिचित जानकर अपने
मन में ऐसा विचार किया-(नो खल अम्ह एसे सएभवणे, णो खल्लु
तण्ण सा दावई देवी इत्यादि ।।
टोय-(तएण) त्या२५छ। (सा दोवई देवी) द्रौपट्टी वी (ताओ मुहुत्तरस
पडिबुद्धा समाणी) मे भुत पछी मन त (व भवण
असोगवाणिय च अपञ्चभिजाणमाणी एव वयासी) ते लपन भने त भAt
વાટિકાને અપરિચિત જાને પિતાના મનમાં આ જાતને
४७७ भनगारधर्मामृतपिणी टी० अ० १६ द्रौपदीपरितनिरूपणम् खलु त्व हे देनानुप्रिये ! अपहतमनःसाल्पा यावद् ध्याय, आत.यान मा कुरु त्व मया साधं विपुलान् मोगभोगान् यावद् भुजाना पिहर-मदीयमासादे तिष्ठ' इति । वत खलु सा द्रौपदी देवी पद्मनाभमेवमादी-एर सल्लु हे देवानुप्रिय ! जम्बूद्वीपे द्वीपे भारते वर्षे द्वारवत्या नगर्या कृष्णो नाम वासुदेवो मम प्रियभातृक'= ममभियस्य भर्तुर्धाता परिवमति, तद् यदि खलु म पण्णा मामाना मध्ये 'मम' मा कूर' देशीशब्दोऽयम् , अन्वेायितु ग्रहीतु वा नो शीघ्रमागच्छति-तत खलु गई तो। इमलिये हे देवानुप्रिये ! तुम आपहतमनासकरप बनकर यावत् आर्तध्यान मत करो। टुन तो अब मेरे साथ विपुल कान मोगों को भोगती हुई मेरे प्रासाद में रहो। (तएण सा दोवई देवी पउमणाम एव चयासी-एच खलु देवाणुप्पिया' जंबूद्दीवे दीवे भारहे वासे बारवइए णयरीए कण्हे णामं वासुदेवे ममप्पियभाउरा परिचमइ, त जहण से छण्ड मासाण मम कूच णो हर नागच्छड ताणं अह देवाणुप्पिया ! ज तुम चदसि तस्त आणाओवायत्रयणणिद्देसे चिहिस्सामि तएण से पउमे दोवईए एयम पडिसुणेइ २ दोवड देवी कण्णतेउरे ठवेइ, तएण सा दोवई देवी छह छटेण अणिरिखत्तेण आयविलपरिग्गहिएण तबोकम्मेण अप्पाण भावेमाणे विदरड) इसके बाद उस द्रौपदी देवी ने पद्मनाभ से इस प्रकार कहा-हे देवानुप्रिय ! सुनो-जबूद्वीप नाम के द्वीप में भारतवर्ष में द्वारावती नगरी में कृष्ण वासुदेव मेरे प्रिय पतिके भ्राता रहते है । वे यदि छह मासके भीतर मुझे अन्वेषण करने के लिये या આવી છે એવી હે દેવાનુપ્રિયે ! તમે અપહતમન સ૫ા થઈને યાવત્ આધ્યાન ન કરે તમે મનુષ્યભવ સબ ધી કામ લે ગો ભોગતા મારા મહેલમાં રહે (तएण सा दोवई देवी पउमणाभ एन वयासी एव खलु देवाणुप्पिया जब होवे दीवे, भारहे वासे पारखइए णयरीए कण्णे णाम वासुदेवे मम पियभाउए परिवसइ, त जइण से छह मामाण मम कूब णो हम मागच्छइ, तएण अह देवाणुप्पिया ! ज तुम वदसि तस्स आणाओवायवयणणिदेसे चिहिस्सामि तएण से पउमे दोपईए एयमह पडिसुणित्ता २ दोवई देवीं कण्णतेउरे ठवेद, तएण सा दोई देवी छ? छटेण अणिक्खित्तेणं आयविलपरिग्गहिएण तबोक- म्मेण अप्पाण भावे माणे विहरह) ત્યારપછી દ્રૌપદી દેવીએ પદ્મનાભને આ પ્રમાણે કહ્યું કે દેવાનુપ્રિય ! સાભળે, જબુદ્દીપ નામના દ્વીપમાં ભારત વર્ષમા દ્વારાવતી નગરીમાં કૃષ્ણ વાસુદેવ મારા પ્રિય પતિના ભાઈ રહે છે તેઓ છ મહીનાની અંદર મારી તપાસ मेरे पूर्व भव के मित्र देव के द्वारा जबूढीप नाम के द्वीप से भारतवर्ष तापमान द्रौपदी देवीमपद्दतमन सकरपा यानन्यायन्ती आर्त याने ती पश्यति ष्ट्वा एवम्वक्ष्यमाणमकारेण, यादीत-हे दयानुमिये ! कि खल त 'ओडय० नाव झियाहि ' अपहतमनः सकल्पा यापद ध्यायसिम्पादसि एव खलु व हे देवानु मिये ! मम पूर्वसंगतिकेन देवेन जम्तीपाइलीपाद भारताद् दि इम्तिना पुरा नगगद् युधिष्ठिरस्य राशो भानात् संहता-अपहताऽसि, ततस्तस्माद मा घमाणी पासइ, पासित्ता पर क्यासी, किण्ण तुम देवाणुप्पिया ! मन पुन्चसगइण्ण देवेर्ण जद्दीवाओ २ मारहामो वासाओ हथिणापु राओ नयरामो जुहिहिन्लस रपणो भरणाओ साहरिना, त माण तुम देवाणुप्पिया ! ओत्य० जार झियाहि तुम मा सद्धिं विपुलाइ भोग भोगाइ जाव विरराहि ) इसके पाद वर पमनाम राजा नहा घोकर यावत् सर्वारकारो से विभूषित हो अपने अतःपुर परिवार से सपरि घृत होकर जहा वर अशोक वाटिका बो-और उसमें भी जहाँ वह द्रौपदी देवी बैठी धी-वहा आया-वहा आर के उसने द्रौपदी देवी से अपहत मनः सकल्पवाली यावत् आतध्यान करती हुई देखकर इस प्रकार कहा-हे देवानुप्रिये ! तुम क्यों अपहत मनः सकल्प होकर यावत् आत यान कर रही रो-खेद सिन्न हो रही हो तुम यहा हे देवानुप्रिय के हस्तिनापुर नगर से युधिष्ठिर राजा के भवन से हरण कर ले आई छित्ता दोबई देवो ओहय० जाव झियायमाणी पासइ, पासित्ता एव वयासी फिण्ण तुम देवाणुप्पिया ! ममपुव्यसगइएण देवेण जनूदिवाओ • भारहाओ वासाओ हथिणापुराओ नयराओ जुहिटिलरस रणो भाणाओ साइरिया, त माण तुम देवाणुप्पिया । ओहय० जार ज्ञियाहि तुम मए सद्धि विपुलाइ भोग भोगाइ जाब विहराहि) ત્યારપછી તે પદ્મનાભરના સ્નાન કરીને યાવત્ સર્વોલ કારેથી વિભૂષિત થઈને પિતાના રણવાસ-પરિવારને સાથે લઈને જ્યાં અશોકવાટિકા હતી અને તેમાં પણ જ્યા તે દ્રૌપદી દેવી બેઠી હતી ત્યાં આવ્યો ત્યાં આવીને તેણે દ્રૌપદી દેવીને અપહતમન સકલ્પવાળી ચાવત આધ્યાન કરતી જોઈને આ પ્રમાણે કહ્યું કે હે દેવાનુપ્રિયે ! તમે શા માટે અપહતમન સલ્પા થઈને થાવત્ આર્તધ્યાન કરી રહી છે કે ખેદ-ખિન્ન થઈ રહ્યા છે ? હે દેવાનુપ્રિયે ! મારા પૂર્વભવના મિત્ર દેવ વડે તમે જ બૂઢીપ નામના દ્વીપના, ભારત વર્ષના હસ્તિનાપુર નગરના યુધિષ્ઠિર રાજાના ભવનથી અપાહત થઈને भनगारधर्मामृतवपिणी टो० अ० १६ द्रौपदीचरितनिरूपणम् दोवइ देवी ण णजइ केणइ देवेण वा दाणवेण वा किन्नरेण वा किं पुरिसेण वा महोरगेण वा गंधव्वेण वा हिया वा णीया वा अवक्खित्ता वा ?, इच्छामि णं ताओ दोवईए देवीए सव्वओ समता मग्गणगवेसणं कयं, तएण से पंडुराया कोडुवियपुरिसे सद्दावेइ सदावित्ता एवं क्यासी-गच्छह गं तुम्भे देवाणुप्पिया। हत्थिणाउरे नयरे सिघाडगतियचउक्कचञ्चरमहापहपहेसु महयार सदेण उग्घोसेमाणा २ एवं वयासी-एवं खलु देवाणुप्पिया । जुहिहिल्लस्स रणो आगासतलगसि सुहपसुत्तस्स पासाओदोवई देवी ण णजइ केणइ देवेण वा दाणवेण वा किन्नरेण वा कि- पुरिसेण वा महोरगेण वा गंधव्वेण वा हिया वा नीया वा अवक्खित्ता वा तं जो णं देवाणुप्पिया । दोवइए देवीए सुई वा जाव पवित्ति वा परिकहेइ तस्स णं पंडुराया विउल अत्थ- सपयाण दाणं दलयइ तिकटु घोसणं घोसावेहर एयमाणत्तिय पञ्चप्पिणह, तएणं ते कोडुवियपुरिसा जाव पच्चप्पिणति, तएणं से पडूराया दोवईए देवीए कत्थइ सुइ वा जाव अलभ- माणे कोती देवी सदावेइ सदावित्ता एवं वयासी-गच्छह णं तुम देवाणुप्पिया। वारवइ णयरिं कण्हस्स वासुदेवस्स एयम? णिवेदेहि कण्ह णं पर वासुदेवे दोवइए मग्गणगवेसणं करेजा अन्नहा न नजइ दोवइए देवीए सुती वा खुती वा पवत्ती वा उवलभेज्जा, तएणसा कोंती देवी पडुरण्णा एव वुत्ता समाणी जाव पडिसुणेइ पडिसुणित्ता पहाया कयवलिकम्मा हत्थिखध- । . - ७t जातिधमेश्या अब हे देशानुप्रिय । यत् व सिम्पशितितम र 'आणाोगपश्य णणिदे से ' आतापातपचननिर्देश स्थास्यागि, तपानमारिणी पर्विनी भत्रि प्यामीत्यर्थ , आशा-अपश्य विधेयतया आदेश', उपायान सेनापन, निर्देश - कायाणि प्रति प्रश्नेहते यग्निपतातरम् , VI समाहारः तत्र, ततः खड़ स पद्मनाभो राजा द्रौपचा पतमय प्रतिथुत्पापीहत्य द्रौपदी देशी ' यण्णतेउरे' कन्यान्तः पुरे म्यापयति, ततः पल सा द्रोपदीदेशी 'छट्ठ गट्टेण षष्ठपष्ठेन पष्ठभक्तानन्तर पुन: पष्ठमक्तेन, 'अनिश्चित्तेण' अनिक्षिप्तेन=पिरामरहितन अन्तररहितेनेत्यर्थः, 'आयस्लिपरिगटिपण' आयरिलपरिगृहीनेन तपः कर्मणा आत्मान भापयन्ती विहरति । सू०२६ ।। मूलम्-तएणं से जुहूढिल्ले रायगतओ मुहुर्ततरस्त पडिबुद्धे समाणे दोबइ देविपासे अपासमाणो सयणिजाओ उद्देइ उहित्ता दोवईए देवीए सवओ समता मग्गणगवेसण करेइ करिता दोवईए देवीए कत्थइ सुइ वा खुइ वा पत्ति वा अलभमाणे जेणेव पडुराया तेणेव उवागच्छइ उवागच्छित्ता पडुरायं एवंवयासी एवं-खलु ताओ । मम आगासतलगसि सुहपसुत्तस्स पासाओ लेने के लिये यहा जल्दी से नहीं आयेगे तो उसके बाद हे देवानुप्रिय! जैसा तुम कहोगे वैसा मैं करूंगी-तुम्हारी आज्ञा कारिणी वशवर्तिनी पन जाऊँगी। ऐसा अर्थ "आणाओवायवयणणिद्देसे" इन पदो का निकलता है। इसके बाद पद्मनाभ राजा ने द्रौपदी के इस कथन को स्वीकार करके उसे कन्या के अन्तः पुर में रखदिया। वहा वह द्रौपदी देवी आयविल परिगृहीत उटु छट की अन्तर रहित तपस्या से अपने आप को भावित करती हुई रहने लगी। सू० २६ કરતા કરતા અહીં નહિ આવી શકે તે ત્યારપછી હે દેવાનુપ્રિય ! તમે જેમ કહેશે તેમ કરીશ, હું તમારી આજ્ઞાકારિણી વશવર્તિની બની જઈશ ओवायवयणाणिदेसे" જાતને અર્થ નીકળે છે ત્યારપછી પદ્મનાભ રાજાએ દ્રૌપદીના તે કથનને સ્વીકારી લીધું અને તેને કયાના અન્ત પુરમાં મૂકી દીધી ત્યા તે દ્રૌપદી દેવી આય બિલ પરિગૃહીત છઠ્ઠ છઠ્ઠની અત્તર રહિત તપસ્યાથી પિતાની જાતને ભાવિત કરતી રહેવા લ अणा આ પદેથી આ मनगारधर्मामृतवषिणी र० स० १६ द्रौपदीचरितनिरूपणम् दोबइ देवी ण णज्जइ केणइ देवेण वा दाणवेण वा किन्नरेण वा किं पुरिसेण वा महोरगेण वा गंधव्वेण वा हिया वा णीया वा अवरिखत्ता वा १, इच्छामि णं ताओ दोवईए देवीए सव्वओ समता मग्गणगवेसणं कय, तएण से पडुराया कोडंवियपुरिसे सद्दावेइ सदावित्ता एवं क्यासी-गच्छह गं तुम्भे देवाणुप्पिया। हत्थिणाउरे नयरे सिघाडगतियचउपचच्चरमहापहपहेसु महयार सदेण उग्रोसेमाणा २ एवं वयासी-एवं खलु देवाणुप्पिया । जुहिटिल्लस्स रण्णो आगासतलगसि सुहपसुत्तस्स पासाओ दोवई देवी ण णज्ज केणइ देवेण वा दाणवेण वा किन्नरेण वा कि- पुरिसेण वा महोरगेण वा गंधव्वेण वा हिया वा नीया वा अवक्खित्ता वा तं जो णं देवाणुप्पिया। दोवइए देवीए सुई वा जाव पवित्ति वा परिकहेइ तस्स णं पडुराया विउल अत्थ- सपयाणं दाणं दलयइ तिक्डु घोसणं घोसावेहर एयमाणत्तिय पञ्चप्पिणह, तएणं ते कोडुवियपुरिसा जाव पच्चप्पिणंति, तएणं से पडूराया दोवईए देवीए कत्थइ सुइ वा जाव अलभ- माणे कोंती देवीं सद्दावेइ सदावित्ता एवं वयासी-गच्छह णं तुम देवाणुप्पिया। वारवइ णयरिं कण्हस्स वासुदेवस्स एयम? णिवेदहि कण्ह णं पर वासुदेवे दोवइए मग्गणगवेसणं करेज्जा अन्नहा न नज्जड दोवइए देवीए सुती वा खुती वा पबत्ती वा उवलभेज्जा, तएण सा कोंती देवी पडुरण्णा एव वुत्ता समाणी जाव पडिसुणेइ पडिसुणित्ता पहाया कयवलिकम्मा हत्थिखध- ४०० तामचा वरगया हधिणाउरं माझमझेणं णिग्गच्छद णिग्गच्छित्ता कुरु- जणवये मझमज्झेण जेणेव सुग्द्वजणवा जेणेव वारबई णयरी जेणेव अग्गुजाणे तेणेव उवागच्छइ उवागच्छित्ता हस्थिखधाओ पच्चोरुहइ पच्चोरुहित्ता कोडुधियपुरिसे सदावेइ सदावित्ता एवं वयासी-गच्छह णं तुम्भे टेवाणुप्पिया । जेणेच बारवई णयरी तेणेव अणुपविसह, अणुपविसित्ता कण्हं वासुदेव करयल० एव वयह-एवं खल्लु सामो। तुम्भं पिउच्छा कोती देवी हस्थिणा उराओ.नयराओ इह हबमागण तुभ दसणं कंखइ, तएणं ते कोडुवियपुरिसा जाव कहेंति, तएणं कण्हे वासुदेवे कोडुवि यपुरिसाणं अतिए सोच्चा णिसम्म हस्थिसंधवरगए हयगय वारवईए य सज्झमज्झेणं जेणेव कोंती देवी तेणेव उवागच्इ उवागच्छित्ता हत्थिखधाओ पञ्चोरुह पच्चोरुहिता कोंतीए देवीए पायग्गहण करेइ करित्ता कोतीए देवीए सद्धि हत्थिखंध दुरूहइ दुरुहित्ता बारावइए णयरीए मज्झमझेणं जेणेव सए गिहे तेणेव उवागच्छइ उवागच्छित्ता सय गिह अणुपविसइ । तएणं से कण्हे वासुदेवे कोती देवि पहाय कयवलिकम्म जिमियभुत्तुत्त- रागय जाव सुहासणवरगय एव वयासी सदिसउ णं पिउच्छा । किमागमणपओयणं १, एसा कोंती देवी कण्ह वासुदेव एव वयासी-एव खलु पुत्ता । हत्थिणाउर णयरे जुहिदिल्लस्स आगासतले सुहपसुत्तस्स पासाओ दोवई देवी ण णजड़ केणइ अबहिया जाव अवक्खित्ता वा, त इच्छामि ण ममगारधामृतषिणी टी० ० १६ प्रौपदीचरितनिरूपणम् કટર देवीए मग्गणगवेसणं करित्तए, तएणं से कण्हे वासुदेवे कोंती पिउच्छि एव वयासी-जं णवरं पिउच्छा । दोवइए देवीए कत्थइ सुई वा जाव लभामि तो णं अहं पायालाओ वा भवणाओ अद्धभरहाओ वासमंतओ दोवई साहत्थि उवणेमित्तिकट्ठ कोंती पिउत्थि सकारेइ समाणेइ जाव पडिविसज्जेइ, तएणं सा कोंती देवी कण्हेणं वासुदेवेणं पडिविसज्जिया समाणी जामेव दिसि पाउ० तामेव दिसिं पडिगया ॥ सू० २५ ॥ टीका-'तएण से' इत्यादि । ततः खलु स युधिष्ठिरो राजा ततो मुहूर्ता- न्तरे प्रतिबुद्धः सन् द्रौपदी देवी पार्वे 'अपासमाणो ' अपश्यन् अनवलोकयन् शयनीयादुत्तिष्ठति, उत्याय द्रौपद्या देव्या सर्वतः समन्ताद् मार्गणगवेपण करोति, कृत्वा द्रोपद्या देव्या ' कत्थइ' कुत्रापि 'सुइ ' श्रुति सामान्यवृत्तान्त वा, 'सुइ । क्षुति छिक्कादि शब्द वा 'पवत्ति' प्रवृत्ति वा विशेपत्तान्त अलभमानो तरण से जुहिडिल्ले राया इत्यादि । टीकार्य-(तण्ण) इसके बाद (से जुहिडिल्ले राया) वे युधिष्ठिर राजा (तओ मुहत्ततरस्स) एफ मुहर्त के याद (पडिबुद्धे समाणे ) जगे-और जगकर उन्होंने (दोवई देवीं) द्रौपदी देवी को (पासे अपासमाणो सयणि नाओ उट्टेइ, उहित्ता दोवईए सव्वओ समतो मग्गणगवेसण करेइ ) अपने पास जर नही देखा तो वे अपनी शय्या से उठे और उठकर द्रौपदी देवीकी सयओरसे उन्होंने मार्गणा गवेपणाकी (करित्ता दोबई देवीए कत्या सुइ वा खुइ वा पति वा अलभमाणे जेणेव पडराया 'तएण से जुहिछिल्ले राया ' इत्यादि । हाथ-(तएण ) त्या२पछी ( से जुहिटिल्ले राया ) ते युधिष्ठिर रात ( तओ मुहत्त तरस्स) में भुडूत माह (पडियुद्धे समाणे) ग्या અને જાગીને तेभरे (दोवई देवी ) द्रौपदी हैवान, (पासे अपासमाणो सयणिज्जाओ उठेर, उद्वित्ता दोबईए सबओ समता मगणगवेसण करेइ) જ્યારે પિતાની પાસે જોઈ નહિ ત્યારે પિતાની શય્યા ઉપરથી ઊભા થયા અને ઊભા થઈને દ્રૌપદી દેવીની ચેમેર માર્ગ કરી (करित्ता दोवईए देवीए पत्थइ सुइ वा सुइ वा पति वा अग्भमाणे .
तएणं वरगया हस्थिणाउरं मझमझेणं णिग्गच्छद णिग्गच्छित्ता कुरु- जणवये मज्झमज्झेण जेणेव मुरट्टजणपए जेणेव वारवई णयरी जेणेव अग्गुज्जाणे तेणेव उवागच्छइ उवागच्छित्ता हस्थिबंधाओ पच्चोरुहइ पच्चोरुहित्ता कोडुबियपुरिसे सदावेइ सद्दावित्ता एवं वयासी-गच्छह णं तुम्भे देवाणुप्पिया ! जेणेच वारवई णयरी तेणेव अणुपविसह, अणुपविसित्ता कण्हं वासुदेवं करयल० एव वयह एवं खल्लु सामी । तुम्भ पिउच्छा कोती देवी हथिणा- उराओ नयराओ इह हव्वमागया तुम्भं दसणं कंखइ, ते कोडुवियपुरिसा जाव कहेंति, तएणं कण्हे वासुदेवे कोडुबि यपुरिसाणं अतिए सोच्चा णिसम्म हधिसंधवरगए हयगय बारवईए य मज्झमज्झेणं जेणेव कोंती देवी तेणेव उवागच्छइ उवागच्छित्ता हस्थिखधाओ पच्चोरुह पच्चोरुहित्ता कोंतीए देवाए पायग्गहण करेइ करित्ता कोंतीए देवीए सद्धि हस्थिखध दुरूहइ दुरुहित्ता बारावइए णयरीए मज्झमझेण जेणेव सए गिहे तेणेव उवागच्छइ उवागच्छित्ता सयं गिह अणुपविसइ । तएणं से कण्हे वासुदेवे कोती देविं पहाय कयवलिकम्म जिमियभुत्तुत्त रागय जाव सुहासणवरगय एव बयासी सदिसउ णं पिउच्छा ! किमागमणपओयणं १, तएणं सा कोंती देवी कण्ह वासुदेव एव वयासी-एव खलु पुत्ता । हत्थिणाउरे णयरे जुहिडिल्लस्स आगासतले सुहपसुत्तस्स पासाओ टोवई देवी ण णज्जइ केणइ अवयिा जाव अवविखत्ता वा, त इच्छामि णं अनेगारधर्मामृतवाणी टोका अ० १६ द्रौपदीचरितनिरूपणम् ततः खलु स पाण्डुराजा कौटुम्भिकपुरुषान् शब्दयति शब्दयित्वा एवमवा- दीत-गच्छत खलु यूय हे देवानुप्रियाः ! हस्तिनापुरे नगरे शृङ्गाटकत्रिकचतुष्क- चत्वरमहापथपथेषु महता महता शब्देनोद्धोपयन्त एव वदत-एव खल हे देवानु प्रिया ! युधिष्ठिरम्य राज्ञ आकाशतलके मुखममुप्तस्य पार्थाद् द्रौपदी देवी न ज्ञायते केनापि देवेन वा दानवेन वा किं पुरुपेण वा फिनरेण वा महोरगेण चा और सब प्रकार से मार्गणा और गवेपणा करना चाहता हूँ। (तए ण से पटुराया कोडुरियपुरिसे सहावेह, सदावित्ता एव वयासी गच्छहाण तुबमे देवाणुपिया! हत्यिगाउरे नयरे, सिंघाडगतीय चउक्कचच्चर महा पहपहेसु मया २ सद्देण उग्घोसेमीणा २ एव वयासी-एव खलु देवा- णुपिया ! जुहिडिल्लम्स रणो आगासतलगसि सुहपसुत्तस्स पासाओ दोबई देवी ण णजह, केणइ, देवेण वा दानवेण वा किन्नरेण वा किंपुरि- सेण वा महोरगेण वा गंधव्वेण वा हिया वा नीया वा अवरिखत्ता वा) इस बात को सुनकर के उन पाटुराजा ने कौटुम्पिक पुरुषों को बुलाया और बुलाकर उनसे ऐसा कहा-हे देवानुप्रियो ! तुम लोग हस्तिनापुर नगर में जाओ और वहा के शृगाटक, त्रिक चतुष्क, चत्वर, महापथ इन समस्त मागों में बडे जोर २ से ऐसी घोपणा चार २ करो कि हे देवाणुप्रियो ! सुनो प्रासादकी अट्टालिका पर सुखपूर्वक सोये हुए युधिष्ठिर राजा के पास से न मालूम किसी देवने, या दानवने, किसी, किन्नरने, गवेषण कय ) । माटतात ! हु भै२ मधी ने द्रोपही पीना માગણા અને ગષણ કરવા ઈચ્છું છું (तए ण से पडराया कोडवियपुरिसे सद्दावेइ, सद्दाविना एवं बयासी गच्छह ण तुम्मे देवाणुपिया ! हत्यिणाउरे नयरे, सिंघाडगतोयचउक्कचचरमहापद- पहेमु महया २ सण उग्योसेमागा २ एक घयासी-एर खलु देवाणुप्पिया ! जुहिडिल्लास रणो आगासतलगसि मुहपमुत्तस्स पासाओ दोनई देवी ण णज्जइ, केगइ देवेग वा दानवेर वा किंनरेण वा किंपुरिसेण वा महोरगेग वा गधन्धेग वा हिया ना नीया वा अवविखत्ता वा) આ વાતને સાભળીને પાડુ રાજાએ કૌટુંબિક પુરૂને બોલાવ્યા અને બેલાવીને તેમને આ પ્રમાણે કહ્યું કે હે દેવાનુપ્રિયો ! તમે લોકે હસ્તિનાપુર નગરમાં જાઓ અને ત્યાના મૃગાટક, ત્રિક, ચતુષ્ક, ચત્વર, મહાપથ આ બધા માર્ગોમાં મોટા સાદે આ જાતની ઘોષણા કરે કે હે દેવાનુપ્રિયે ! સાભળે, મહેલની અગાશી ઉપર સુખેથી સૂતા યુધિષ્ઠિર રાજાની પાસેથી ન જાણે કે દેવે કે દાનવે અથવા તે કઈ કિન્નર કે કિપરુપે અથવા કઈ મારગે કે - . को नाका यीय पारामा तपागच्छति, उपागत्य पाद रानानमेवमवादी-हे ताव! एव खलु ममाकाशतले पासादाबाल्मिोपरि सापसुपरस' सुरवप्रसप्तम्य पार्थाद् द्रौपदी देशी ' ण णग्ना' न शायते फेनापि देवेन या दानपेन या किमरेण वा किंपुरुषेण पा गन्धर्येण या तापा नीता भयर प्रापिठा वा अवक्षिप्ता बान कूपगर्तादौ फुचित् पातिता का इत्ययः, तत्-तस्माद् छामि खलु हे वातः । द्रौपद्या देव्याः सर्वत समन्ताद मार्गणगोपण गर्नुम् । तेणेच उयागच्छद, उवागरिकता पद्धराय च चपामी एव खलु ताओ मम आगासतल्गसि सुरपसुत्तस्म पासाओ दोवई देवी ण णना) फेणइ देवेण वा दाणवेण चा फिनरेण चा किंपुरिसेण वा मरोरगेण वा गधव्वेण वा रिया वा णीया चा अपरिपत्ता वा) मार्गणा गवेषणा करके जय उसने द्रौपदी देवी की करी भी शोध, सामान्य खबर उस के चिहस्वरूप जिया आदि के शब्द को, अथवा प्रवृत्ति-विशेष वृत्तान्त को नहीं पाया तय वे जहां पांडराजा ये घरां गये-वरा जाकर के उन्होंने पाडुराजा से इस प्रकार करा-हतात ! जय में प्रासाद की अट्टालिकाके ऊपर सुखसे सो रहा था-तय मेरे पाससे न मालूम द्रौपदी देवी को किसी देवने, दानवने, किन्नरने, किंपुरुपने, महोरगने, गधर्वने हरण कर कहां रख दिया है।-या उसे किसी कुए में या खड्डे में डाल दिया है (इच्छामिणं ताओ दोवईए देवीए सवओ समता मग्गण गवेसण कय ) इस लिए हे तात ! में द्रौपदी देवी की सय तरफ से जेणेव पडराया तेणेव उवागच्छइ, उवागच्छित्ता पडुराय एव वयासी एव खल ताओ मम आगासतलगसि सुपसत्तस पासाओ दोवई देवी ण णज्जइ, पेणइ देवेण वा दाणवेण वा किन्नरेण वा विपुरिसेण वा महोरगेण वा गधन्वेण वा हिया वा णीया वा अवक्खित्ता वा) માર્ગણ વેષણ કર્યા બાદ પણ જ્યારે તેમણે દ્રૌપદી દેવીની કેઈપણ રીતે, સામાન્ય ખબર અને ચિહ સ્વરૂપ છીંક વગેરે શબ્દને અથવા તે પ્રવૃત્તિ વિશેષ વૃત્તાત–ની પણ જાણ થઈ નહિ ત્યારે તેઓ યા પાર હતા ત્યા ગયા, ત્યાં જઈને તેમણે પાડુરાજાને આ પ્રમાણે કહ્યું કે હે તાત જ્યારે હુ મહેલની અગાશીમા સુઈ રહ્યો હતો ત્યારે મારી પાસે ન જાણે કેણે દ્રૌપદી દેવીનું કઈ દેવ, દાનવે કે કિન્નર કે કિપુરુષ કે મહોરગે કે ગધ હરણ કર્યું છે અથવા તે દ્રૌપદી દેવીને કેઈએ કૂવામા नाभी धी छे (इच्छामि ण ताओ दोवईए देवीए सव्वओ - કે ખાડામાં मगगण- मनगारधर्मामृतवर्षिणी टीका ० १६ द्रौपदीचरितनिरूपर्ण ततः खलु स पाण्डू राजा द्रौपद्या देव्याः कुत्रापि अति वा यावत् प्रत्तिम् अलभमानः कुन्ती देवीं शब्दयति शब्दयित्वा एवमवादी-गच्छ खलु वं हे देवानुपिये ! द्वारवती नगरी कृष्णस्य वासुदेवस्य एतम निवेदय=सुसपमुप्ता द्रौपदी केनापि हता नीता कूपादौ प्रक्षिप्ता वेति न ज्ञायते इत्येतद्रूप वृत्तान्त क्थय, कृष्णः खलु पर वासुदेवो द्रौपद्या मार्गणगवेपण कुर्यात् अन्यथा न ज्ञायते द्रोपद्या देव्याः अति वा प्रवृत्तिं वा क्षुत्तिं वा उपलभेत । पास भेजदी। इसके बाद जब पाटुराजा ने द्रौपदी देवी की कही पर भी श्रुती यावत् प्रवृत्ति नहीं पाई तय उन्हो ने कुति देवी को बुलाया- (सद्दावि०ए०वयासी) और बुलाकर उन से ऐसा कहा-(गच्छहण तुम देवाणुप्पिया ! वारवइ नयरिं कण्हस्स वास्तुदेवस्स एयम णिवेदेहि, कण्हेण पर चासुदेवे दोबदए मग्गणगवेसण करेजा-अन्नहान नजई, दोवईए देवीए सुती वा सुती वा पवत्ती वा उवलभेन्ना) हे देवानुप्रि यो! तुम द्वारावती नगरी में कृष्ण वायुदेव के पास जाओ-और उनसे इस अर्थका निवेदन करो कि सुख प्रसुप्त द्रौपदी को किसी ने हरलिया है। हरण कर उसे कहीं पहुंचा दिया है या किसी कुएँ में या खड्डे में डाल दिया है। पता नहीं पड़ता है । वे कृष्ण वोसुदेव अवश्य २ ही द्रौपदी को मार्गणा गवेपणा करेंगे। नही तो द्रौपदी देवी को श्रुति, क्षुति अथवा प्रवृत्ति हमें प्राप्त हो जावेगी-यह नहीं कहा जा सकता है। श्रुति यावत् प्रवृत्ति भजपी नड त्यारे तभो ती वान मानावी (सदा वि० ए० वयासी) मन मोसावीन तेभने । प्रमाणे धु- (गच्छह ण तुम देवाणुप्पिया ! वारवद नयरिं काहस्स वासुदेवस्स एयमट्ट णिवेदेहि, कण्हेण पर वासुदेवे दोवईए मग्गणगवेसण करेज्जा अन्नहा न नज्जई, दोवईए देवीए मुती वा खुती वा पपत्ती वा उक्लभेज्जा) હે દેવાનુપ્રિયે ! તમે દ્વારાવતી નગરીમાં કૃષ્ણવાસુદેવની પાસે જાઓ અને તેમને આ પ્રમાણે વિનતી કરે કે સુખથી સુતેલી દ્રૌપદીનું કેઈએ હરણ કરી લીધુ છે હરણ કરીને તેને કયાક મૂકી દીધી છે અથવા તે કોઈ કૂવામાં કે ખાડામાં નાખી દીધી છે ન જાણે શું થઈ ગયુ છે? કૃષ્ણવાસુદેવ મને ખાત્રી છે કે ચોક્કસ દ્રૌપદી દેવીની માર્ગણ ગવેષણ કરશે નહિંતરદ્રૌપદી દેવીની ઐતિ, સુતિ અથવા પ્રવૃત્તિની જાણ અમને થશે એવી શકયતા જણાતી નથી, ७ Ve गन्धर्षेण पाहता या नीता पा माशिप्ता या, तत् नरमायः खलु हे देवानु मिया ! द्रौपधा देव्याः अति माविमा प्रारी या परिकथयति, तस खलु पाण्ड राजा पिपुलमर्थसमदान दानं ददाति हत्या-त्युक्ला घोषणां घोष- यत, घोपयित्वा एतामाप्तिका परर्पयत 1 ततः खलु ते कौटुमिकामपास्त थेर घोषणा कत्या यादा मत्यर्पयन्ति हे सामिन् । मादामया घोषणा कृतास्माभिरिवि निवेदयन्ति । या किसी किंपुरुप ने या किसी महोरग ने या किसी गधर्व ने द्रौपदी देवी को एरण कर लिया है-या हरणफर उसे कहीं रस दिया है अथवा किसी कुएँ में या सड्डे में डाल दिया है (त जो ण देवाणुप्पिया । दोव ईए देवोग सुर चा जाव पत्ति या परिकहेइ, तस्स ण पराया विउल अत्यसपयाण दाण दलयह, त्ति फहद्ध पोमण घोसावेर २ ण्यमाणत्तिय पच्चपिण, तएण ते कोनिय पुरिसा जार पच्चप्पिणति-तण से पडराया दोवईए देवीए कत्थइ सुहया जाव अलभमाणे कोती देवी सहावेह) तो हे देवानुप्रियो ! जो कोई भी मनुष्य द्रौपदी देवी की शोध करेगा पावत् उसके विशेषत्तान्न को लाकर देगा-हम से आकर कहेगा, उसको पाडुराजा यहुत अधिक मात्रा में अर्थ मप्रदान-दोन- देगा। इस प्रकार की तुम घोसपणा करो, और घोषणा कर के फिर हमें इसकी पीछे खबर दो। इस प्रकार राजा की आज्ञा पाकर उन कौटुम्पिक पुरुषों ने इसी प्रकारकी घोषणा करके इस की खबर राजाके ગધ દ્રૌપદી દેવીનું અપહરણ કર્યું છે કે હરણ કરીને તેને કયાક મૂકી દીધી છે કે કઈ કૃવામાં અથવા તે ખાડામાં નાખી દીધી છે (त जो ण देवाणुप्पिया ! दोवईए देवीए सुइ वा जान पति वा परिकहेइ, तस्सण पडुराया विउल अत्यसपयाण दाण दलयइ, ति कटु घोसण घोसावेह २ हयमाणत्तिय पचप्पिणह, तएण ते कौडवियपुरिसा नाव पञ्चपिणति-तएण से पडुराया दोवईए देवीए कत्थइ सुइ वा जाप अलभमाणे कोती देवी सदावेइ) તે હે દેવાનુપ્રિચો! જે કોઈ પણ માણસ દ્રૌપદી દેવીની શોધ કરશે વાત તેના વિષે સવિશેષ સમાચાર જાણીને અમને ખબર આપશે, અમને કહેશે તેને પાડુ રાજા ખૂબ જ દ્રવ્ય-ધન આપશે આ રીતે તમે ઘેષણા કરે અને ઘોષણા થઈ જવાની અમને ખબર પણ આપે આ રીતે રાજાની આજ્ઞા સાભળીને તે કૌટુંબિક પુરૂએ આ પ્રમાણે જ ઘોષણા કરીને તેની ખબર રાજાને આપી ત્યારપછી જ્યારે પાડુ રાજાએ દ્રૌપદી દેવીની કોઇ સ્થાને , भनगारधामृतषिणी टीका २०१६ द्रौपदीचरितनिरूपणम् ४५ ततः खलु स पाण्डू राजा द्रौपद्या देव्याः कुनापि अति या यावत् प्रत्तिम् अलभमानः कुन्ती देवीं शब्दयति शब्दयित्वा एवमवादीत्-गच्छ खलु त्वं हे देवानुप्रिये ! द्वारवती नगरी कृष्णस्य पासुदेवस्य एतमर्थ निवेदय-सुखममुप्ता द्रौपदी केनापि हृता नीता कूपादौ प्रक्षिप्ता वेति न ज्ञायते इत्येतद्रूप वृत्तान्त कथय, कृष्णः खलु पर वासुदेवो द्रौपद्या मार्गणगरेपण कुर्यात् अन्यथा न ज्ञायते द्रोपद्या देव्याः अति वा प्रवृत्ति वा क्षुत्तिं वा उपलभेत । पास भेजदी ! इसके बाद जब पाडराजा ने द्रौपदी देवी की कही पर भी श्रुती यावत् प्रवृत्ति नहीं पाई तय उन्हों ने कुति देवी को बुलाया- (सहावि०एचयासी) और बुलाकर उन से ऐसा कहो-(गच्छहण तुम देवाणुप्पिया ! वारवइ नयरिं कण्हस्स वासुदेवस्स एयम णिवेदेहि, कण्हेण पर वासुदेवे दोबइए मग्गणगवेसण करेजा -अन्ना न नजई, दोवई देवीए सुती वा सुती वा पवत्ती वा उपलभेजा ) हे देवानुप्रि यो! तुम द्वारावती नगरी में कृष्ण वायुदेव के पास जाओ-और उनसे इस अर्थका निवेदन करो कि सुख प्रसुप्त द्रौपदी को किसी ने हरलिया है। हरण कर उसे कही पहुंचा दिया है या किसी कुएँ में या खड्डे मे डाल दिया है। पता नहीं पड़ता है। वे कृष्ण पोसुदेव अवश्य २ ही द्रौपदी को मार्गणा गवेपणा करेंगे। नहीं तो द्रौपदी देवी को श्रुति, क्षुति अथवा प्रवृत्ति हमें प्राप्त हो जावेगी-यह नहीं कहा जा सकता है। श्रुति यावत् प्रवृत्ति मेपी नड त्यारे तभो ती हेवीन मादायी (सदा वि० ए० बयासी) सने मारावीन तमने सा प्रमाणे ४ - (गच्छह ण तुम देवाणुप्पिया ! वारवद नयरिं कण्हस्स वासुदेवस्स एयम णिवेदेहि, कण्हेण पर वासुदेवे दोवईए मग्गणगवेसण करेज्जा अन्नहा न नज्जई, दोईए देवीए मुती वा खुती चा पत्ती वा उवल भेज्जा) હે દેવાનુપ્રિયે ! તમે દ્વારાવતી નગરીમાં કૃષ્ણવાસુદેવની પાસે જાઓ અને તેમને આ પ્રમાણે વિનતી કરે કે સુખથી સુતેલી દ્રૌપદીનુ કોઈએ હરણ કરી લીધુ છે હરણ કરીને તેને કયાક મૂકી દીધી છે અથવા તે કઈ કૂવામા કે ખાડામાં નાખી દીધી છે ન જાણે શું થઈ ગયું છે? કૃષ્ણ વાસુદેવ મને ખાત્રી છે કે ચોક્કસ દ્રૌપદી દેવીની માગણ ગણું કરશે નહિતર દ્રૌપદી દેવીની કૃતિ, અતિ અથવા પ્રવૃત્તિની જાણ અમને થશે એવી શકયતા જગૃતી નથી, विउल . गन्धर्षेण या हवा या नीता या माक्षिप्ता या, सन्माद यः खलु हे देवानु मिया ! द्रौपचा देव्याः श्रुति या शुटि मा प्रसि या परिकथयति, तस्य खलु पाण्ड राजा विपुलमर्यसमदान दान ददाति-धति कत्या-त्युत्ता घोषणां घोष यत, घोपयित्वा पतामाप्तिका मर्पयत । तवः गल ते कौटुमिकास्त थेर घोषणा कत्ता यादाणां मत्यर्पयन्ति हे स्वामिन् । मादानया घोषणा कृताऽस्माभिरिति निवेदयन्ति । या किसी किंपुरुप ने या किसी महोरग ने या किसी गधर्व ने द्रौपदी देवी को एरण कर लिया है-या हरणफर उसे कहीं रस दिया है अथवा किसी कुएँ में या सड्ढे में डाल दिया है (त जो ण देवाणुप्पिया । दोव ईए देवोए सुह वा जाय पत्ति पा परिकहेह, तरस ण पराया अत्यसपयाणं दाण दलयह, त्ति कटु घोसण घोसावेह २ एयमाणत्तिय पच्चप्पिणह, तएण ते कोद्वतिय पुरिसा जाव पच्चप्पिणति-तरण से पडुराया दोवईए देवीए कत्था सुया जाव अलभमाणे कोंती देवीं सद्दावेइ) तो हे देवानुप्रियो ! जो कोई भी मनुष्य द्रौपदी देवी की शोध करेगा यावत् उसके विशेषवृत्तान को लाकर देगा-हम से आकर कहेगा, उसको पाडुराजा घटुत अधिक मात्रा में अर्थ सप्रदान-दान- देगा। इस प्रकार की तुम घोसपणा करो, और घोषणा कर के फिर हमें इसकी पीछे खबर दो। इस प्रकार राजा की आज्ञा पाकर उन कौटुम्पिक पुरुषों ने इसी प्रकारकी घोषणा करके इस की खबर राजाके ગધ દ્રૌપદી દેવીનું અપહરણ કર્યું છે કે હરણ કરીને તેને કયાક મૂકી દીધી છે કે કેઈ કવામા અથવા તે ખાડામાં નાખી દીધી છે (त जो ण देवाणुप्पिया । दोवईए देवीए सुइ वा जार पति वा परिकहेइ, तस्सण पडराया विउल अत्यसपयाण दाण दलयइ, त्ति कडु घोसण घोसावेह २ हयमाणत्तिय पचप्पिणह, तएण ते कौडवियपुरिसा भाव पंचप्पिणति-तएण से पडुराया दोवईए देवीए कत्थइ सुइ वा जाव अलभमाणे कोंती देवीं सद्दावेइ) તે હે દેવાનુપ્રિયે! જે કોઈ પણ માણસ દ્રૌપદી દેવીની શોધ કરશે યાવત તેના વિષે સવિશેષ સમાચાર જાણીને અમને ખબર આપશે, અમને કહેશે તેને પાડુ રાજા ખૂબ જ દ્રવ્ય-ધન આપશે આ રીતે તમે પણ કરે અને શેષણુ થઈ જવાની અમને ખબર પણ આપે આ રીતે રાજાની આજ્ઞા સાભળીને તે કૌટુ બિક પુરૂએ આ પ્રમાણે જ ઘોષણા કરીને તેની ખબર રાજાને આપી ત્યારપછી જ્યારે પાડુ રાજાએ દ્રૌપદી દેવીની કોઈપણ સ્થાને .
१८७ . ममगारधर्मामृतषिणी टी० १० १६ द्रौपदीचरितनिरूपणम् देवानुमियाः ! यव द्वारवती नगरी तवानुप्रविशत, अनुप्रविश्य कृष्णं वासुदेव करतलपरिगृहीतदशनम्व शिर आवते मरत केऽञ्जलिं कृत्सा एस वदत एन सलु हे स्वामिन् ! युप्माक पिचप्पसा हुन्ती देवी हस्तिनापुराद् नगराद् इह हव्यमागता युष्माक दर्शन काडूक्षति । ततः खलु ते कौटुम्बिकापुरुषा यावत् कथयन्ति=कृष्ण- वासुदेवस्य समीपे कुन्तीकयित वचन निवेदयन्तीत्यर्थः । ततः खलु कृष्णो नामु- घह हाथी से नीचे उतरी और उतर कर के उम्ने कौटुबिक पुरुषो को घुलाया- बुलाकर उनसे इस प्रकर कहा-(गच्छह ण तुम्भे देवाणु प्पिया! जेणेव वारवईणयरी, तेणेव अणुपविसह, अणुपविसित्ता कण्ड वासुदेव करयल० एच वयह, एवं खलु सामी ! तुम्भ पिउच्छा कोती देवी धिणाउराओ नयराओ इह रव्यमागया,-तुभ दंसण कखड, तएण ते कोडुयिय पुरिसाण अतिए सोच्चा णिसन्म रत्यिसववरगए हयगययार वईए यमज्झ मज्झेण जेणेव कोती देवी-तेणेव उवागच्छद) हे देवानुप्रियो ! तुम द्वारापती नगरी में जाओ-वहा जाकर कृष्ण वासुदेव को दोनो हायोंकी अजलि बनाकर और उसे मस्तक पर रख- कर शिर झुकाते हुए नमस्कार करना यादमे उनसे ऐसा करना-कि हे स्वामिन् ! आपकी पितृष्वसा-भुआ-कुती देवी हस्तिनापुर नगर से यहा अभी -आई है-वे आपके दर्शन करना चाहती है। उन कोड- म्पिक पुरुषोने कुस्ती देवी को इस आज्ञा को शिरोधार्य कर श्री कृष्ण 18 ત્યાં જઈને તે હાથી ઉપરથી નીચે ઉતરી અને ઉતરીને તેણે કૌટુ બિક પુરૂષને લાવ્યા અને બોલાવીને તેમને આ પ્રમાણે કહ્યું કે— (गच्छह ण तुभे देवाणुप्पिया ! जेणेन यारवई णयरी, तेणेर अणुपविसह, अणुपविसित्ता कण्ह वासुदेव परयल० एव वयह एव सलु सामी। तुम्भ पिउच्छा कोंती देवी हा पाउराओ नयराओ इइ हव्वमागया, तुन्भ दसण कसइ, तए ण ते कोडु नियपुरिसा जाव कहे ति, तएण कण्हे वासुदेवे कोइ मिय पुरि अतिए सोच्चा णिसम्म हथिसधवरगए हयगय चारवईए य मज्झेण जेणेव कोंती देवी-तेणेव उपागच्छद) દેવાનુપ્રિ ! તમે દ્વારાવતી નગરીમા જાઓ, ત્યાં જઈને કૃષ્ણવાસુ દેવને બને હાથની અ જલિ બનાવીને અને તેને મસ્તકે મૂકીને માથુ નીચે નમાવીને નમસ્કાર કરે ત્યારપછી તેમને આ પ્રમાણે વિનતી કરો કે હે સ્વામિન્ ! તમારી પિતૃશ્વસા-ફોઈ કુતી દેવી હસ્તિનાપુર નગરવો અત્યારે અહીં આવ્યા છે તેઓ તમને જોવા માગે છે તે કૌટુબિક પુરૂએ કુતી દેવીની આ આજ્ઞાને સ્વીકારીને શ્રીકૃષ્ણ વાસુદેવને આ સમાચારની ખબર આપી साण मज्ज्ञ ६ तन खलु ग गन्ती देवी पाया गया गुतागणी या प्रतियोति- पापस्चात योरोति, मतिभुत-सी गागा तासिमा दस्तिस्वन्त्र परगा दस्तिनापुर मपमा या निर्गनि, निर्गत्य हमननपदम्यम्झनाम कम्य देशस्य ग पयन योर सौराटाप, या मारनी नगरी, यौवाग्रो धानन्यत्रात्यम्पानादागतानां स्थियमागमो वियन ताहि गायुपव नम् , तोयोपागति, गत्य इस्तिम्मन्याव मत्यारोति-पत्ययतरति, प्रत्य चरुव कौटम्मिरपुरपान सन्ध्यति, गायित्वा पामराटीद-गात खल यूय हे (तण्ण मा कोतो की परगा युत्ता ममाणी जार पडिसुणेड, पडिसुणिता, या कपालिकामा थियधरगया रविणाउर मजा मोण मिग णिगच्छित्ता फुरुनणवय मज्न मरमेण जेणेव सुरह जणवा जेणे पारबई एयरी जेणे अग्गुनाणे तेणे वागाई उवा गच्चित्ता हरियसपाओ पच्चोल्हाड, पच्चोमरिता कोयियपुरिसे सदा वेह, सहाविता व वासी) के बाद पालुराजा द्वारा इस प्रकार कही गई कुती देवी ने पाडराजा की आज्ञा को स्वीकार कर लिया और स्वीकार कर के उसने स्नान किया-फाफ आदि पक्षियों के लिये अन्नदेने रूप बलि कर्म किया। बाद में वह राधी के ऊपर बैठकर हस्तिनापुर नगर के बीच से होकर निकली निकलकर वह कुरुदेश के बीच से होती हुई जहां सौराष्ट जनपद था और उसमें भी जहा द्वारावती नगरी थी-वहा पर भी जहां वह अग्रउद्यान था कि जिसमें बाहरसे आये हुए पथिक विश्राम के लिये ठहर जाते थे-वहां गई। वहा जाकर (तए ण सा कोंती देवी पडुरण्णा एर चुत्ता समाणी जाव पडिसुणेइ, पडिसुणित्ता, हाया कयालिफम्मा हथिसधवरगया हस्थिणाउर मज्झ मझेण णिगई, निगच्छिता कुरुजाणवय मझ मझेण जेणेव सुरद्वजणवए जेणेक धारवई णयरी जेणेव अग्गुज्जाणे तेणेव उवाग, आगच्छित्ता हथिखधाओ पच्चोरुहइ, पच्योरुहित्ता कोदु थियपुरिसे सहावेइ, सदाविता एव वयासी) ત્યારપછી પાડુરાજા વડે આ પ્રમાણે આજ્ઞાપિત થયેલી કુતી દેવીએ પાડુરાજાની આજ્ઞાને સ્વીકારી લીધી અને સ્વીકારીને તેણે સ્નાન કર્યું કાગડા વગેરે પક્ષીઓને અન્નભાગ અપને બલિર્મ કર્યું ત્યાર પછી તે હાથી ઉપર સવાર થઈને હસ્તિનાપુર નગરની વચ્ચે થઈને નીકળી નીકળીને તે કુરૂદેશની વચ્ચે થઈને જ્યા સૌરાષ્ટ્ર જનપદ હતું અને તેમાં પણ જ્યા અગ્ર ઉધાન હતુ કે જેમાં બહારથી આવનારા પથિકે વિશ્રામ માટે -- - मनगारधर्मामृतमपिणी टी० अ० १६ द्रौपदीवरितनिरूपणम् ततः खलु स कृष्णो वासुदेवः कुती देनी स्नाता कृतवनिर्माण काकादिभ्यः कृतान्नसविभागा जिमित्तभुक्तोत्तरागवा जिमिता-भोजन कृतवती भुक्तोत्तरागता. भुक्तोत्तरकाल-भोजनोत्तरकालम्-आगता, ता तथा, यावन् सुखामनवरगताम्सुख पूर्वक विशिष्टासनोपविष्टाम् एमवादीत्-हे पितृप्पसः । सदिशन्तु किमागमनप्रयो- जनम् , ततः खलु सा कुन्ती देवी कृष्ण वासुदेवमेनमवादीत्-एव खलु हे पुत्र ! हस्तिनापुरे नगरे युधिष्ठिरस्याकाशतले सुग्यप्रमुप्तस्य पार्वाद द्रौपदी देवी न ज्ञायते केनापि अपहता यानद् अवक्षिप्ता वा, तत् तस्माद् गच्छामि खलु हे पुत्र ! चले गये । कुनी ने वहा जाकर स्नान किया बलिकर्म किया। बाद में चतुर्विध आधार को जीमकर जन ने सुखपूर्वक बैठ गई त्र कृष्ण वासुदेव ने उनसे कहा ( मदिसउ ण पिउच्छा ! किमागमणपओषण ? तएण सा कोंती देवी कण्ह वासुदेव ण्व वयासी एव खलु पुत्ता! रत्यि णाउरे जुरिहिल्लस्स अगासतले हपप्लुत्तस्त पासाओ दोवई देवी ण णजइ, केणह अपहिया जाव अवक्खित्ता वा त इच्छामिण पुत्ता! दोवई ए देवीए मग्गणगवेसण करित्तए) हे भुआजी ! कहिये-किस कारण से आप यहा पधारी हैं ? इस प्रकार कृष्ण वासुदेव के पूछने पर उस कुतीने उन कृष्ण वासुदेव से इस प्रकार कहो-पुत्र ! सुनो-आने का कारण इस प्रकार है-हस्तिनापुर नगरमें प्रासाद की अट्टालिका के ऊपर सुखके साथ मोये हुए युधिष्ठिर के पास से द्रौपदी देवी न मालूम किसीने हरण करली है-यावत् किसी कुए मे या खड्डे में डाल दी है। અદર ગયા કુતીએ ત્યા પહોચીને સ્નાન કર્યું અને બલિકર્મ કર્યું ત્યાર પછી ચાર જાતના આહાર જમીને જ્યારે તે સુખેથી સ્વસ્થ થઈને બેસી ગયા ત્યારે કૃષ્ણ વાસુદેવે તેમને કહ્યું કે – (सदिसउ णं पिउच्छा किमागमणपओयण ? तण्ण सा को ती देवी कण्ह वासुदेव एव वयासी एर सलु पुचा ! हथियाउरे णयरे जुहिद्विहस्स आगोसतले सुइपमुत्तस्स पासाओ दोवई देवीण णनइ, केणइ अवहिया जाव अवक्सित्ता वा त इच्छामिण पुत्ता ! दोवईए मग्गणगवेसण करित्तए) હે, શા કારણથી તમે અહી આવ્યા છેઆ રીતે કૃષ્ણ વાસુદેવના પ્રશ્નને સાભળીને કુતી દેવીએ કૃષ્ણ વાસુદેવને આ પ્રમાણે કહ્યું કે હે પુત્ર! સાભળે, હુ એટલા માટે અહીં આવી છુ કે હસ્તિનાપુર નગરમાં મહેલની અગાશી ઉપરથી સુખેથી સૂતેલા યુધિષ્ઠિરની પાસેથી ન જાણે કોણે દ્રૌપદી દેવીનું હરણ કરી લીધુ છે યાવત કેઈ કૂવામા એ કે ખાડામાં નાખી દીધી છે એથી पत्र | R... -ौटी देवानी शोधाण थवा नको देवः कौटुम्पिकपुपाणागतिफे श्रुषा निशम्य निस्कन्धारगठो हयगजरथ पदातिसपरिसतो द्वारयत्मा नगर्या मागमध्येन यौन उन्ती देवी तीतोपागच्छति, उपागत्य इग्निस्सन्धान मत्यरोपति, प्रपामा गन्त्या देयाः पादग्रहण करोति, कवा त्या देव्या सार्ध हस्तिस्कन्ध ' दुमा दोहति आरोहीत्यर्थः । दुरुप द्वाररत्या नगर्या मध्म येन परम्पक गृह तोपागवि, उपागन्य वक गृहमनुप्रविशति । वासुदेव के लिये इम समाचार की गयर फरदी कृष्ण वासुदेव कौद्ध यिक पुरुषों के पास से इस समाचार को सुनकर और उसे हृदय में धारण कर हाथी पर पेठ, ध्यगज, रथ एव पदातियो के साथ २ बारा वती नगरी के पांच से रोते हुए जहाँ फुतीदेवी यी चा आये। (उवा गच्छित्ता रत्विावधाओ पच्चोगहह, पच्चोरिता कोतीए देवीए पाय गहण करेड, करित्ता कोती देवी सद्धि पत्थिखध दुरुरड, दुरूहित्ता चारवईए पथरीरा मज्न मज्झेणं जेणेव सएगिहे तेणेव उवागच्चा, उधागघिउत्ता सय गिह अणुपरिसइ, तण से पण्हे वासुदेव कोंतीदवीं हाय कयरलिकम्म जिमियभुत्तुत्तरागय जाय सुहासणवरगय राव वयासी ) वहा आकर वे हाथी पर से नीचे उतरे और उनरकर कुती देवी के चरणों में नमन किया-चरण स्पर्श करके कुतीदेवी के साथ २ हाथी पर बैठ गये-बैठ कर के द्वारावती नगरी के ठीक भीतर से होकर जहाँ अपना गृह-प्रासाद-या वहाँ आये-पहा आकर प्रासाद के भीतर દીધી કૃgવાસુદેવે કૌટુંબિક પુરની પાસેથી આ સમાચાર સાભળીને તેને હદયમાં ધારણ કરીને, હાથી ઉપર સવાર થઈને, ઘોડા, હાથી, રથ અને પાય દળેની સાથે દ્વારાવતી નગરીની વચ્ચે થઈને યા કુતી દેવી હતા ત્યા આખા ( उवागच्छित्ता हथिसधाओ पच्चोरुहाइ पच्चोरुहि । कोवीए देवीए पायगहण करेइ, करित्ता कोंतोए देवीए सशि हस्थिसध दुहद, दुहिता धारवईए णयरीए मझ मज्झेण जेणेव सए गिहे वेणेव आगच्छइ, आगनिउत्ता, सय गिह अणु पविसइ, तरण से कण्दे वासुदेवे कोंडी देवी हाय कपलिकम्म जिमियभुत्तुत रागय जाव सिहासणवरगय एव वयासी) ત્યા પહોચીને તેએ હાથી ઉપથ્થી નીચે ઉતર્યા અને ઉતરીને કુતી દેવીને પગે લાગ્યા અને પગે લાગીને કુતી દેવીની સાથે હાથી ઉપર સવાર થવા સવાર થઈને જ્યા પિતાનું ભવન હન ના આવ્યા, ત્યા मनगारचर्मामृतपिणी टी० य० १६ द्रौपदीवरितनिरूपणम् ततः खलु स कृष्णो वासुदेनः कुती देवी स्नाता कृतरनिर्माण काकादिभ्यः कृतान्नसविभागा जिमित्तमुक्तोत्तरागता जिमिता-भोजन कृतवती भुक्तोत्तरागता- भुक्तोत्तरकाल-भोजनोत्तरकालम्-आगता, ता तया, यावत् सुखामनवरगताम्मुख- पूर्वक निगिटासनोपविष्टाम् एवमपादीत्-हे पितृप्पसः ! सदिशन्तु किमागमनप्रयो- जनम् ?, ततः खलु सा कुन्ती देवी कृष्ण पासुदेवमेनमवादीत्-एव खलु हे पुत्र ! हस्तिनापुरे नगरे युधिष्ठिरस्याफाशतले सुग्वप्रमुप्तस्य पार्थाद् द्रौपदी देवी न ज्ञायते केनापि अपहता यापद् अवक्षिप्ता वा, तत् तस्माद् गच्छामि खलु हे पुत्र ! चले गये। कुती ने यहा जाकर स्नान किया घलिकर्म किया। बाद में चतुर्विध आहार को जीमकर जर वे सुखपूर्वक बैठ गई तव कृष्ण वासुदेव ने उनसे कहा ( सदिसउ ण पिउच्छा ! किमागमणपओयण? तएणं सा कोंती देवी कण्ह वासुदेव एवं वयासी एव खलु पुत्ता! हत्यि णाउरे जुहिहिल्लस्स अगासतले सुहपसुत्तस्त पासाओ दोवई देवी ण णज्जइ, केणइ अपहिया जाव अवश्वित्ता वा त इच्छामिण पुत्ता' दोवई ए देवीए मग्गणगवेसण फरित्तए) हे भुआजी ! कहिये-किस कारण से आप यहा पधारी हैं ? इस प्रकार कृष्ण वासुदेव के पूछने पर उस कुतीने उन कृष्ण वासुदेव से इस प्रकार कहो-पुत्र । सुनो-आने का कारण इस प्रकार है-हस्तिनापुर नगरमें प्रासाद की अधालिका के ऊपर सुखके साप सोये हुए युधिष्ठिर के पास से द्रौपदी देवी न मालूम किसीने हरण करली है-यावत् किसी कुए मे या खड्डे में डाल दी है। અદર ગયા કુતીએ ત્યાં પહોંચીને સ્નાન કર્યું અને બલિકર્મ કર્યું ત્યાર પછી ચાર જાતના આહારે જમીને જ્યારે તે સુખેથી સ્વસ્થ થઈને બેસી ગયા ત્યારે કૃષ્ણ વાસુદેવે તેમને કહ્યુ કે - ( सदिसउ ण पिउन्छा । किमागमणपओयण ? तण्ण सा को ती देवी फण्ड वासुदेव एस वयासी एव सलु पुचा ! हस्थिणोउरे णयरे जुहिद्विलस्म आगोसतले सुइपमुत्तस्स पासाओ दोवई देवीण णनइ, केणइ अवहिया जाय अवक्सिचा वा त इच्छामिण पुत्ता । दोवईए मग्गणगवेसण करिचए) કહે, શા કારણથી તમે અહીં આવ્યા છેઆ રીતે કૃષ્ણ વાસુદેવના પ્રશ્નને સાભળીને કુતી દેવીએ કૃષ્ણ વાસુદેવને આ પ્રમાણે કહ્યું કે હે પુત્ર! સાભળ, હુ એટલા માટે અહીં આવી છુ કે હસ્તિનાપુર નગરમા મહેરની અગાશી ઉપરથી સુખેથી સૂતેલા યુધિષ્ઠિરની પાસેથી ન જાણે કોણે દ્રોપદી દેવીનું હરણ કરી લીધુ છે યાવત કઈ વામા એ કે ખાડામાં નાખી દીધી છે એથી હે પુત્ર ! હું ઈચ્છું છું કેન્દ્રૌપદી દેવીની શોધખોળ થવી જોઈએ - ! T ५९० - કેઈ ! હું વધારે શું કહુ, દ્રૌપદી દેવીની જે હું કોઈ પણ સ્થાને શ્રુતિ, શ્રુતિ तापमंकणा द्रौपया देन्या मार्गणगरेपणं परिणाम ति । नत' गट रा कष्णों वासु देवः कुन्ती 'पिउति' पिपमाग्यमान-पा ना पिठष्यम' । यदि द्रौपया देव्या कुमापि श्रुति वा ममिति का यान में, 'तो' ताई खलु, अह पावाला मानाद पाओगरा TITTERमध्यान् समतान् सर्वतः स्थानाद् , द्रौपदी देशी 'सादस्यि' मानेन ' उणेमि' उपनयामि, इति कृसा-इत्युक्त्या पुन्ती 'पिउस्थि' पिनापमार गताति समानयति, सत्कार्य इस लिये हे पुत्र ! में चाहती कि द्रौपदी की मार्गणा एव गवेषणा होनी चाहिये । (तपण से कण्हे वासुदेव कोनी पिउनिउ वयासो- जणघर पिउच्छी दोवडा देवीरा फरया सुद या जार मामि तोण अह पायालाओ चा भरणाओ अद्ध भरहाओ चा, ममतओ दोवड साहत्यि उवणेमि त्ति कहल कोंती पिटि मझारेड मम्माणेड, जार पडिविस ज्जेइ, तणं सा कोंती दबी कण्टेण वासुदेवेणं परिधिसज्जिया, समा णी जामेव दिसि पाउ० तामेदिसि पटिगया) तर कृष्ण वासुदेव ने अपनी भुआ कुती देवी से इस प्रकार करा-हे भुआ! में और अधिक तो क्या कहें-द्रौपदी देवी की यदि मैं कही पर भी श्रुतिक्षुति, और प्रवृत्ति पा लेता है तो मै चाहे वर पाताल में हो, या किसीके भवन में से, या अर्ध भरत क्षेत्र में से कहीं पर भी क्यों न हो-उस द्रौपदी देवी को सब जगह से अपने हाथों से ला कर दूंगा। इस प्रकार कहकर उन कृष्ण चासुदेव ने अपनी पितृवसा कुती देवी का सत्कार किया। (तएण से कण्हे वासुदेवे को त पिउच्छि एव क्यासी ज णवर पिउछा दोवइए देवीए कत्थइ सुइ वा जाव लभामि तो ण अह पायालाओ वा भवणाओ अद्ध भरहाओ वा, समतओ दोवइ साहत्थि उवणेमित्ति कटु को ती पिउच्छि सकारेइ सम्माणेइ, जाव पडिविसज्जेइ, एण सा को ती देवो कण्हेण वासुदेवेण पडिविसज्जिया समाणी जामेव दिसि पास० तामेव दिसि पडिगया) ત્યારે કૃષ્ણ વાસુદેવે પિતાના ફેઈ કતી દેવીને આ પ્રમાણે કહ્યું કે અને પ્રવૃત્તિ મેળવી લઈશ તે ભલે તે પાતાળમાં હોય, કોઈના ભવનમા હાય કે અધ ભરત ક્ષેત્રમાં ગમે ત્યાં કેમ ન હોય તે દ્રૌપી દેવીને ગમે ત્યાથી હું લાવી આપને આપીશ તેમ છુ આ પ્રમાણે કહીને તે વાસુદેવે પોતાના ફેઈ પિશ્વસા-કુતીદેવીને સત્કાર કર્યો અને સન્માન કર્યું સરકાર न मनगारयमांमृनपिणो टीका य० १६ द्रौपदीचरितनिरूपणम् समान्य यावत्-प्रतिविसर्जयति । तत. खलु सा कुन्ती देवी कृष्णेन वामदेवेन प्रतिविसर्जिता सती यस्या एर दिश' प्रादुर्भूता तामेव दिश मतिगिता । सू०२७ ।। मूलम्-तएणं से कण्हे वासुदेवे कोडवियपुरिले सहावेइ सद्दावित्ता एवं वयासी-गच्छह ण तुम्भे देवाणुप्पिया। वार- वइ एवं जहा-पडू तहा घोसणंघोसावेति जाव पञ्चप्पिणति, पंडस्स जहा तएण से कण्हे वासुदेवे अन्नया अतो अंतेउ- रगए ओरोहे जाव विहरइ, इमं च णं कच्छुल्लए जाव समो- वडए जाब णिसीइत्ता कण्ह वासुदेवं कुसलोदत पुच्छइ, तएणं से कण्हे वासुदेवे कच्छुल्ल एवं वयासी-तुम ण देवा- णुप्पिया । वहूणि गामा जाव अणुपविससि, त अस्थि याई ते कहिं वि दोवडए देवीए सुती वाजाव उवलद्धा ?, तएणं से कच्छुल्ले कण्हं वासुदेव एवं वयासी-एव खलु देवाणु- प्पिया । अन्नया कयाइं धायईसंडे दीवे पुरथिमद्धं दाहिण- डभरहवास अवरककारायहाणिं गए, तत्थ णं मए पउमना- भस्स रन्नो भवणसि दोवई देवी जारिसिया दिट्टपुवा यावि होत्या तएण कण्हे वासुदेवे कच्छुल्ल एव वयासी-तुब्भ घेव ण देवाणुप्पिया । एव पुत्वकम्म, तएणं से कच्छुल्ल- नारए कण्हेण वासुदेवेणं एव वुत्ते समाणे उप्पयणि विज सन्मान किया, सत्कार सन्मान कर यावत् उन्हें प्रति विसर्जित कर दिया। इसके बाद वे कुती देवी वहा से प्रतिविसर्जित होकर जिस दिशा से प्रकट हुई थी-उसी दिशा की और चली गई । म०२७॥ કરીને તેમને વિદાય કર્યો, ત્યારપછી તે કુતીદેવી ત્યાથી વિદાય મેળવીને જે દિશા તરફથી આવ્યા હતા તે જ તરફ પાછા રવાના થયા છે. સુત્ર ૨૭ तएण से कण्हे वासुदेवे इत्यादि ॥ सूत्र २८ ॥ .
५६२ माताभवाचा आवाहेइ आवाहिता जामे दिसि पाउन्भूप तामेव दिसिं पडिगए, तएणं से कण्हे वासुदेवे दूयं सदावेइ सदाविता एव वयासी-गच्छहणं तुम देवाणुप्पिया । हत्थिणाउरपंडुस्स रन्नो एयमट्ट निवेदेहि एवं सल्ल देवाणुप्पिया । धायइसंडे दीवे पुरच्छिमडे अवरकंकाए रायहाणीएपउमणामभवणंसि दोवइए देवीए पउत्ती उवलद्धा, त गच्छंतु पंच पडवा चाउरगिणीए सेणाए सर्टि सपरिवुडा पुरस्थिमवेयालपि मम पडियालेमाणा चिट्ठतु, तएण से दूए जाव भणइ, पडिवालेमाणा चिहह ते वि जाव चिट्टति, तएणं से कण्हे वासुदेवे कोडवियपुरिसे सदावेइ सदावित्ता एवं वयासो- गच्छह णं तुम्भे देवाणुप्पिया | सन्नाहियं भेरिताडेह, ते वि -तालेति, तएणं तेसि सण्णाहियाए भेरीए सद्द सोञ्चा समुदविजयपामोक्खा दसदसारा जाव छप्पण्णं वलवयसा- हस्सीओ सन्नद्धवद्ध जाव गहियाउहपहरणा अप्पेगइया हयगया गयगया जाव वग्गुरापरिक्खित्ता जेणेव सभा सु. हम्मा जेणेव कण्हे वासुदेवे तेणेव उवागच्छइ उवागच्छित्ता करयल जाव वद्धाति, तएण कण्हे वासुदेवे हत्थिखधवर- गए सकोरटमल्लदामेण छत्तेण० सेयवर० हयगय० महया भडचडगरपहकरेण वारवईए णयरीए मज्झ मझेण णिग्ग- च्छइ, जेणेव पुरस्थिमवेयाली तेणेव उवागच्छइ उवागछित्ता पचहि पडवेहि सद्धि एगयओमिलित्तापय 1* करे .
भनगारधर्मामृतवपिणी टोका अ० १६ द्रौपदीचरितनिरूपणम् करित्ता पोसहसाल अणुपविसइ अणुपविसित्ता सुट्ठिय देवं मणसि करेमाणे२ चिटइ, तएण कण्हस्स वासुदेवस्स अट्ठ- मभत्तंसि परिणममाणसि सुटिओ आगओ, भण देवाणु- पिया । ज मए कायव्व, तएण से कण्हे वासुदेवे सुष्ट्रिय एवं वयासी-एव खल्लु देवाणुप्पिया । दोवई देवी जाव पउ- मनाभस्त भवणसि साहरिया तण्णं तुमं देवाणुप्पिया । मम पंचहि पंडवेहि सद्धिं अप्पछट्टस्स छण्ह रहाणं लवणसमुद्दे मग्गं वियरेहि, जण्ण अह अमरकंकारायहाणा दोवईए कूवं गच्छामि, तएण से सुटिए देवे कण्ह वासुदेव एव वयासी- किण्ह देवाणुप्पिया। जहा चेव पउमणाभस्स रन्नो पुव्वसं- गइएणं देवेण दोवई जाव संहरिया तहा चेव दोवईं देविं धायइसंडाओ दीवाओ भारहाओ जाव हस्थिणापुर साह- रामि, उदाहु पउमणाम राय सपुरवलवाहण लवणतमुद्दे पक्खिवामि', तएण कण्हे वासुदेवे सुट्ठिय देव एव वयासी -मा ण तुम देवाणुप्पिया | जाव साहराहि तुम णं देवा- णुप्पिया । लवणसमुद्दे अप्पछठुस्स छण्ह रहाण मग्गं विय- राहि, सयमेव ण अह दोवईए कूव गच्छामि, तएण से सुट्टिए देवे कण्ह वासुदेव एव वयासी-एव होउ, पचहिं पडवेहिं अप्पछट्टस्स छण्ह रहाण लवणसमुद्दे मग्गं वियरइ, तएण से कण्हे वासुदेवेचाउरगिणसिण पडिविमज्जेइ-पडिवि- सज्जित्ता पचहि पंडवेहि सद्धिअप्पछडे छहि रहेहि लवणसमुद्द ५६२ मातामेवात आवाहेइ आवाहिता जामे दिसि पाउभूए तामेव दिसिं पडिगए, तएण से कण्हे वासुदेवे दूयं सदावेद सदावित्ता एव वयासी-गच्छह ण तुम देवाणुप्पिया ! हस्थिणाउरपंदुस्स रन्नो एयमढे निवेदेहि एवं खलु देवाणुप्पिया | धायइसंडे दीवे पुरच्छिमद्धे अवरककाए रायहाणीए पउमणाभभवणंसि दोवइए देवीए पउत्ती उवलद्धा, त गच्छंतु पंच पंडवा चाउरगिणीए सेणाए सहिं सपरिवुडा पुरस्थिमयालाए मम पडियालेमाणा चिट्ठतु, तएण से दूर जाव भणइ, पडिवालेमाणा चिहह ते वि जाव चिट्टति, तएणं से कण्हे वासुदेवे कोडवियपुरिसे सदावेइ सद्दाविना एवं क्यासी- गच्छह णं तुम्भे देवाणुप्पिया । सन्नाहियं भेरिताडेह, ते वि -तालेति, तएण तेमि सण्णाहियाए भेरीए सदं सोचा समुद्दविजयपामोक्खा दसदसारा जाव छप्पणं वलवयसा हस्सीओ सन्नद्धवद्ध जाव गहियाउहपहरणा अप्पेगइया हयगया गयगया जाव वग्गुरापरिक्खित्ता जेणेव सभा सु. हम्मा जेणेब कण्हे वासुदेवे तेणेव उवागच्छड उवागच्छित्ता करयल जाव बद्धाति, तएण कण्हे वासुदेवे हत्थिखंधवर- गए सकोरटमल्लदामेण छत्तेण० सेयवर० हयगय० मया भडचडगरपहकरेण बारवईए णयरीए मज्झं मझेण णिग्ग- च्छइ, जेणेव पुरथिमवेयाली तेणेव उवागच्छइ उवागछित्ता पचहि पडवेहि सद्धि एगयओमिलित्ता. करे , ४९५ मनगारधामृतवपिणी टी० अ० १६ द्रौपदीचरिततिरूपणम् वासुदेवस्स दोवई, एसणं अहं सयमेव जुज्झसज्जो णिग्गच्छामि त्तिक१ दारुयं सारहि एव वयासी- केवलं भो । रायसत्थेसु दूये अवज्झे तिकटु असक्कारिय असम्माणिय अवदारेणं णिच्छुभा- वह, तएणं से दारुए सारही पउमणाभेणं असकारिय जाव णिच्छुढे समाणे जेणेव कण्हे वासुदेवे तेणेव उवागच्छइ उवा- गच्छित्ता करयला कण्हं जाव एव वयासी-एवं खलु अह सामी ! तुभ वयणेण जाव णिच्छुभावेइ ॥ सू० २८ ॥ टीका-'तएण से' इत्यादि । ततः खलु स कृष्णो वासुदेवः कौटुम्विकपु- रुपान् शब्दयति, शब्दयित्वा एवमगादीत् गच्छत खलु यूय हे देवानुप्रिय' द्वार- वती नगरीम् , 'ए। यथा पाण्डम्तथा घोपणां पोपयत'-यथा पाण्डू राजा हस्ति नापुरे घोषणा कारितवान् तदित्यर्थः । तेऽपि कौटुम्पिकपुरुषास्तथैव घोषणा -तएण से कण्हे वासुदेवे इत्यादि। टीकार्य-(तएण) इसके बाद (से कण्हे वासुदवे) उन कृष्ण वासुदेव ने (कोडयियपुरिसे सहावेह) कौटुम्बिक पुरुपों को बुलाया (महावित्ता) बुलाकर (ण्व वयासी) उन से ऐसा कहा (गच्छह ण तुम्भे देवाणुप्पिया पारवइ ) हे देवानुप्रियों । तुम द्वारावती नगर में जाओ (एव जहा पडु तहा घोसण घोसावति जाव पच्चप्पिणति पडुस्स जहा) वहा पांड राजाकी तरह घोषणा करो-अर्थात् पाडु राजाने जिस प्रकार द्रौपदी की खयर लानेवाले के लिये अर्थ प्रदान का घोपणा अपने कौटुम्पिक पुरुषों बारा हस्तिनापुर नगर में करवाई थी-इसी प्रकार की घोपणा करने के तएण से कण्हे वासुदेवे' त्यादि Rst-(तएण) त्या२पछी (से कण्हे वासुदेवे) ५ वासुदेव (कोड बिय पुरिसे सहावेइ) मिड पुरुषाने मासाव्या (सदाविचा ) मोवीन ( एव वयासी) भने मा प्रमाणे उधु 3-(गन्छह ण तुन्भे देवाणुपिया वारपई) के आनुप्रियो ! तम दारवती नगरीमा ती (एव जहा पडु तहा घोसण घोसावे ति जाव पन्चपिणति पहुस्स जहा) त्या पानी भर घोषणा કરે એટલે કે પાડુ રાજાએ જેમ દ્રૌપદીની શોધ કવા માટેની દ્રવ્ય આપ વાની ઘણા હસ્તિનાપુર નગરમાં કરાવી હતી તે પ્રમાણે જ પણ કરવા .
२५
।
जीतापण्या
मज्झमझेणं बीइवयइ वीडवत्ता जेणेव अमरकंका राय
हाणी जेणेव अमरकंकाण अग्गुनाणे तेणेव उवागच्छद उवा
गच्छित्ता रह ठवेइ ठवित्ता दारुयं सारहिं सदाइ सहावित्ता
एवं वयासी-गच्छह णं तुम देवाणुप्पिया! अमरकंकारायहाणी
अणुपविसाहि२ पउमणाभस्त रणो वामेण पाएणं पायपीढ
अकमित्ता कुतग्गेणं लेहं पणामेहि तिवलिय भिउडि णिडाले
साहहु आसुरुत्ते रुटे कुद्धे कुविए चडिकिए एव वयासी-हं भो
पउमणाहा | अपस्थियपस्थिया दुरतपंतलक्खणा हीणपुन्नचा
उद्दसा सिरीहिरिधी परिवज्जिया अज्ज ण भवसि किन्न तुम ण
याणासि कण्हस्स वासुदेवस्स अहव णं जुद्धसज्जे णिग्गच्छाहि
एस ण कण्हे वासुदेवे पंचहि पडवेहि अप्पछट्टे दोवई देवीए
कूवं हव्वमागए, तएणं से दारुए सारही कण्हेणं वासुदेवेण
एवं वुत्ते लमाणे हटुतुट्टे जाव पडिसुणेइ पडिसुणित्ता अमरकका
रायहाणि अणुपविसइ अणुपविसित्ता
जेणेव पउमनाहे
तेणेव उवागच्छइ उवागच्छित्ता करयल जाव वडावेत्ता एव
वयासी-एस ण सामी | मम विणयपडिवित्ती इमा अन्ना मम
सामिस्स समुहाणत्तित्तिकटु आसुरुत्ते वामपाएणं पायपीढ
अणुकमइ अणुक्कमित्ता कोतग्गेणं लेह पणामइ पणामित्ता
जाव कूव हव्वमागए, तएणं से पउमणाभे दारुणेणं सारहिणा
एव वुत्ते समाणे आसुरुत्ते तिवलि भिउडि निडाले साह?
एव वयासी -णो अप्पिणामि णं अह देवाणुप्पिया ।
४९५ . भनगारघामृतवपिणी टी० ०१६ द्रौपदीचरितनिरूपणम् वासुदेवस्स दोवई, एसणं अहं सयमेव जुज्झसज्जो णिग्गच्छामि त्तिक? दारुय सारहि एव वयासी केवलं भो । रायसत्थेसु दूये अवज्झे तिकटु असक्कारिय असम्माणिय अवदारेणं णिच्छुभा- वइ, तएणं से दारुए सारही पउमणाभेणं असकारिय जाव णिच्छूढे समाणे जेणेब कण्हे वासुदेवे तेणेव उवागच्छइ उवा- गच्छित्ता करयला कण्हं जाव एव वयासी--एवं खलु अहं सामी | तुम्भ वयणेण जाव णिच्छुभावेइ ॥ सू० २८ ॥ टीका-'तएण से' इत्यादि । ततः खलु स कृष्णो वासुदेवः कौटुम्किपु- रुपान् शब्दयति, शब्दयित्वा एवमपादीत् गच्छत खलु यूय हे देवानुपिय । द्वार- यती नगरीम् , 'एव यथा पाण्डम्तथा पोपणां पोपयत'-यथा पाण्डू राजा हस्ति नापुरे घोपणा कारितमान् तद्वदित्यर्थः । तेऽपि कौटुम्पिकपुरुपास्तथैव घोपणा -तएण से कण्हे वासुदेवे इत्यादि। टीकार्य-(तएण) इसके बाद (से कण्हे वासुदवे) उन कृष्ण वासुदेव ने (कोइयियपुरिसे सदावेद ) कौटुम्पिक पुम्पों को बुलाया (महावित्ता) बुलाकर (ण्व वयासी) उन से ऐसा कहा (गच्छह ण तुम्भे देवाणुप्पिया वारवइ ) हे देवानुप्रियो ! तुम द्वारावती नगर में जाओ (एव जरा पड तहा घोसण घोसावेति जाव पच्चप्पिणति पहुस्स जहा) वहा पांड राजाकी तरह घोषणा करो-अर्थात् पाड राजाने जिस प्रकार द्रौपदी की खबर लानेवाले के लिये अर्थ प्रदान का घोपणा अपने कौटुम्विक पुरुषों बारा हस्तिनापुर नगर में करवाई थी-इसी प्रकार की घोपणा करने के 'तएण से कण्हे वासुदेवे' त्यादि Aथ-(तएण) त्या२५०ी (से कण्हे वासुदेवे) ते पृय पावे (कोडु बिय पुरिसे सहावेइ) अमि: पुरुषाने मासाव्या (सदावित्ता ) मोवीन ( एव वयासी) तमने भी प्रमाणे उधु 3-(गन्छह ण तुम्भे देवाणुपिया धारपई) वानुप्रिया! तमे द्वारपती नगरीमा तया (एव जहा पडु तहा घोसण घोसावे ति जाव पञ्चपिणति पहुस्स जहा ) त्या पाडसतनाम घोषणा કરે એટલે કે પાડુ રાજાએ જેમ દ્રૌપદીની શોધ કવા માટેની દ્રવ્ય આપ વાની ઘેષણ હસ્તિનાપુર નગરમાં કરાવી હતી તે પ્રમાણે જ પોષણા કરવા कत्या 'जार पच्चप्पिणंति' यात प्रत्यर्पयन्ति-गोपणांसपा-मष्णस्य वामदेव स्पान्तिके ते कौद्धम्भिापुरमा निवेदगनिन-द्वारपत्यां नगर्या सर्वत्र घोषणाकता ऽस्माभिरिति । 'पम्स जहा' पाडाया गया पाडो पम्प वर्ण कम्तथाऽत्रापि यो यः। यथा पाण्टराना द्रौपयाः सी यापन् मतिं न लब्धवान, तथा कृष्णा सुदेवोऽपि द्रौपद्याः श्रुत्यादिक न प्राप्त मानिनि भारः । ततः पल को वामदेवः अन्यदाभन्यस्मिन् कमिथित् समये अतोना-प्यमामाद अन्तःप्रगतो ऽबरोधे यावद विहरति । 'इम चण' अस्मिन् समये च गल 'कन्तुल्लए' कर लको नारदो यार समरसता गगनतलास्तान प्णममनि ममागत यावत् निपय-उपविश्य गगनालादपनरल कामपनि ममागतः, याात् निपध-उपविश्य लिये कृष्ण वासुदेव ने अपने कौटुम्पिक पुरुषों को आदेश दिया कि वे भी द्वारावती में इसी तरह की घोषणा करें। अपने राजा की आजानु सार उन्हों ने यारावती में घोषणा करदी और इस की ग्वयर पीछे कृष्ण वासुदेव को कर दो। यहा अपशिष्ट वर्णन पांड राजा के जसा वर्णन है वैसा ही जानना चाहिये । अर्थात् घोपणा कराने पर भी द्रौपदी की किसी भी प्रकार की खबर वगैरह का कोई भी समाचार पाङ राजा को नहीं मिला पैसा कृष्ण वासुदेव को भी नहीं मिला (तएण) तब (से कण्हे वासुदेवे अन्नया अतो अतेउरग ओरोहे जाव विहरइ इम च ण कच्छुल्लए जार समोसरए ) वे कृष्ण वासुदेव एक दिन की बात कि अपने अन्त पुर के प्रासाद के भीतर अन्त पुर की स्त्रियों के साथ थे कि इसी समय चे कच्छुल्ल नाम के नारद आकाश मार्ग से માટે કૃષ્ણ વાસુદેવે પિતાના કૌટુંબિક પુરુષને આજ્ઞા કરી કે તેઓ પણ દ્વારાવતી નગરીમાં આ પ્રમાણે જ છેષણ કરે પિતાના રાજાની આજ્ઞા પ્રમાણે તે લેકેએ તારવતી નગરીમાં શેષણા કરી અને ઘોષણાનું કામ થઈ ગયું તેની ખબર પણ કૃષ્ણ વાસુદેવની પાસે પહોંચાડી દીધી અહી અવશિષ્ટ વર્ણન પાડુ રાજાનું જેવું છે તે પ્રમાણે જ સમજી લેવું જોઈએ એટલે કે ઘોષણા કર્યા પછી પણ પાડુ રાજાને દ્રૌપદી દેવીની કઈ પણ જાતની ખબર કે સમાચાર મળ્યા નહિ તે પ્રમાણે કૃષ્ણ વાસુદેવને પણ કોઈ પણ સમાચારે ઘોષણુ माह भन्या नल (एण ) त्यारे (से कण्हे वासुदेवे अन्नया अतो अते उरगए ओरोहे जाव विहरइ, इमण कन्छुल्लए जाव समोसरए ) मेसिन વાત છે કે તે કૃષ્ણ વાસુદેવ પિતાના મહેલની અંદર રણવાસની સ્ત્રીઓની સાથે બેઠા હતા તે વખતે કચ્છલ નામે નારદ આકાશ માં है . ત્યા मनगारधर्मामृतषिणी टी० अ० १६ द्रोपदीचरितनिरूपणम् ४९७ कृष्ण वासुदेवं कुशलोदन्त-अशल्वार्ता पृच्छति, तत. खलु सकृष्णो वासुदेवः कच्छुल्ल नारदमेरमवादीत्-हे देवानुप्रिय ! त्व खल बहूनि ग्रामाकरादीनि परिभ्राम्यसि, तत्र वहूनि गृहाणि यावदनुमविशसि तत् तस्मादस्ति 'आइ' इति वाक्यालकारे ते त्वया यदि कुत्रचिद् द्रौपद्यादेव्या श्रुतिर्वा यावद् उपलब्धा-नाता' खर्हि कथय' इति भावः । ततः सलु स कच्छुल्लनारद कृष्ण वासुदेवमेवमयादीत्-एर खलु हे देवानुपियाः जहमन्यदाकदाचिदू धातकीपण्डे द्वीपे पौरस्त्याः पूर्वदिग्भागव वर्तिनि, दक्षिणार्धभरतवर्षे-अमरककानाम्नी राजधानी गत । तत्र ग्बलु मया उतरकर वहा आये-(जाव णिसी इत्ता कण्ह वासुदेव कुसलोदत पुच्छह, तएणं से कण्हे वासुदेवे कच्छुल्ल एव वयामी-तुम ण देवाणुप्पिया! पहणि गामागर जाव अणुपविससि त अस्थि आइ ते कहिं वि दोबईए देवीए सुतीचा जाय उवलद्धा ताण से कच्छुल्ले कण्ह वासुदेव एव वयासी) यावत् बैठकर उन्हो ने कृष्ण वासुदेव से कुशल वृत्तान्त पूछा -कृष्णवासुदेव ने तब कच्छुल्ल नारद से ऐसा करो-हे देवानुप्रिय ! तुम अनेक ग्राम आफर आदिस्थानों में परिभ्रमण करते रहते हो-अनेक गृहादिको में आते जाते रहते हो तो करो-कही पर क्या तुम्हें द्रौपदी देवी की श्रुति उपलब्ध हुई है-उसकी तुम्हें किसी प्रकार की कोई खबर मिली है-उसका किसी भी प्रकार का कोई चिन्द उपलब्ध हुआ है ? इस प्रकार कृष्ण वासुदेव के पूछने पर कच्छुल्ल नारद ने उन कृष्ण वासुदेव से इस प्रकार कहा-(एव खलु देवाणुप्पिया । अन्नया कयाइ भाच्या (जाव णिसीइत्ता कण्ह वासुदेव कुसलोद त पुच्छइ, तपण से कण्हे वासुदेवे कच्छुल्ल एव वयासी, तुम ण देवाणुप्पिया! बहूणि गामागर जाव अणु पविमसि त अत्यि भाइ ते कहि वि दोवईए देवीए सुती वा जाव उवलद्वा- तपण से कच्छुल्ले कण्ह वासुदेव एव वयासी) त्या मापीन मे सने ममीन તેમણે કૃષ્ણ વાસુદેવને કુશળ વાર્તા પૂળ વાસુદેવે ત્યારે કચ્છ નારદને આ પ્રમાણે કહ્યું કે હે દેવાનુપ્રિય ! તમે ઘણા ગ્રામ, આકર વગેરે સ્થાને મ પરિ બ્રમણ કરતા રહે છે, ઘણા ઘરે વગેરેમા આવજા કરતા રહે છે તે કહે, કેઈ પણ સ્થાને તમને દ્રૌપદી દેવીની કૃતિ મળી છે તેને તમને કોઈ પણ જાતના સમાચાર મળ્યા છે, તેનું કઈ પણ જાતનું ચિહ્ન તમને મળ્યું છે? આ રીતે કૃષ્ણ વાસુદેવના પ્રશ્નને સાભળીને કચ્છતલ નારદે તે કૃષ્ણ વાસુદેવને આ પ્રમાણે કહ્યું કે ( एव खलु देवाणुप्पिया | अन्नया कयाइ धायईसडे दीवे पुरथिमद्ध वा ६३ ૧ પરિચિત થઈ શક નારદની આ વાત સાંભળીને - ময়, पानाभस्य गशो भाने द्रौपदीदेवी यारणी पूर्ण चाप्यमान् , अय भावः- काचिद्रौपदीमशी दयी पानामा रामोगात या नि सा मयान सम्यग शाता नापि सम्पपरिनिता, इति | Tत रुप्यो मायदेव. पन्नारदमेव मादीत्-हे देवानुभिवाः मुमारमेव गलु परम् ' इश 'पुयाम्म' पूर्वकर्म -पूर्वकृत कर्ग, युप्मागिरवैशायर्म पूर्वकामित्यर्थ । 1. गलु म कटनारदः कृष्णेन नामदेन मुक्त मन अपनी विधामाराध्यनि। नागाद्य यस्याः एवदिशः मादुर्भूतस्तामेव दिश प्रतिगतः । ततः पर साप्पो गामदेवो दत शब्दयति- धायईस दीवे पुरथिमद्ध दारिणदभरायाम अमरकका गयाणि गए तत्थ ण मरा पउमनाभस्स रण्णो भवणसि दोई देवी जानिमिया दिछ पुव्वा याचि होत्या, तण्ण फण्हे वासुदेवे फल व वयामी-तुम्भ घेव ण देवाणुप्पिया! पर पुचम्म-तण्णं से कतुलनारग कण्हेणं वासुदेवेण एव वुत्ते समाणे उप्पयणि विज्ज आवारेड, आवारिता जामेव दिसिं पाउन्भु तामेव दिसि पडिगए) सुनो में तुम्हें बताता है -हे देवाणुप्रिय ! मैं किसी एक समय द्वितीय धातकी खरीप में पूर्व दिग्भागवर्ती दक्षिणार्ध भरतक्षेत्र में अमरकका नाम की राजधानी में गया हुआ था वहा मैने पद्मनाभ राजा के भवन में द्रौपदी देवी जैसी एक नारी देखी थी-परन्तु मैं उसे अच्छी तरह नहीं जान सका और न उससे परिचित ही हो सका- नारद की ऐसी बात सुनकर कृष्ण वासुदेव ने उनसे कहा हे देवानुप्रिय । आपने ही ऐसा कार्य सय से पहिले किया है-इसके याद उन कन्जुल्ल नारदने कृष्ण घासुदेवके द्वारा दाहिणभरहवास अमरकका रायहाणि गए, तत्यण मए पउमनाभस्स रण्णो भवण सि दोषई देवी, जारिसिया दिट्ठपुवा यावि होत्या, तएण फण्हे वासुदेवे फच्छुल्ल एवं वयासी-तु-भ चेवण देवाणुप्पिया ! एव पुत्र कम्म-तरण से कच्छुल्ल नारए कण्हेण वासुदेवेण एव वुत्ते समाणे उत्पयणि विज्ज आवाहेइ, आगाहित्ता जामेव दिसि पाउभुए तामेव दिसि पडिगए) સાભળે, તમને હુ બધી વિગત બતાવું છું હે દેવાનુપ્રિય ' કેઈ એક વખતે હુ ઘાતકી ષડપમા, પૂર્વ દિશા તરફના દક્ષિણા ભરત ક્ષેત્રમાં અમરક કા નામે રાજધાનીમાં ગયે હતે ત્યા મે પાનાભ રાજાના ભવનમાં દ્રૌપદી દેવી નારી જોઈ હતી પણ હું તેને સારી પેઠે ઓળખી शयो न/ કુણુવા નયિ! સૌ પહેલા તમે જ આ કામ કર્યું છે ત્યાર પની આ વાત સાંભળીને .
४२१ . - अनगराधामृतपिणी टीका० अ० १६ द्रौपदीचरितनिरूपणम् आहयति, शब्दयित्ला-एवमवादीव-गच्छ खलु त्व हे देवानुप्रियाः ! हस्तिनापुर पाण्डोराज्ञ एतमर्थ निवेदय-एव खलु हे देवानुप्रिय ! धातकीपण्डे द्वीपे 'पुर- स्थिमढे ' पौरस्त्यार्थे पूर्व दिग्भागवर्तिनि अमरककाया राजधान्या पद्मनाभभवने द्रौपद्या देव्याः मवृत्तिरुपलव्या, तत्-तस्मात् गच्छन्तु पञ्च पाण्डवाश्चतुरङ्गिण्या सेनया सा सपरिटता 'पुरत्थिमवेयालीए ' 'पौरस्त्यवेलायां-पूर्व दिग्वर्तिनि लवणसमुद्रे मा 'पडिवालेमाणा' प्रतिपालयन्तः-प्रतीक्षमाणा स्तिष्ठन्तु, ततस्त दनन्तर स दूतो यावत् पाण्डोरग्रे गत्वा कृष्णनासुदेवोस्त वचन भणति-कथयति 'पब्बिालेमाणा चिट्ठद' अय भावः- पातकीपण्डे द्वीपे पूर्व दिग्भागर्तिनि अम- रकमाया राजपान्या पवनामभरने द्रौपया' प्रवृत्तिरुपलब्धा, तस्मात् पञ्च पाण्ड- इस प्रकार कहे जाने पर अपनी उत्पतनीविद्याका स्मरण किया। स्मरण करके फिर वे जिस दिशा से प्रकट हुए थे उसी दिशा की और चले गये। (तएण से कहे वासुदेवे दूय सहावेइ सहावित्ता एवं बयासी गच्छण तुम देवाणुप्पिया ' हत्यिणाउर पडत्त रण्णो ण्यम निवेदेहि) इसके बाद उन कृष्ण वासुदेव ने दूत को बुलाया-बुलाकर उससे ऐसा कहा-हे देवानुप्रिय ! तुम हस्तिनापुर नगर जाओ-वहां पाड राजा से ऐसा करना-(एव वल देवाणुप्पिया! घाइमडे दीवे पुरित्थिमद्धे अमरककाए रायहाणीए पउमणाभभवणसि दोबईए देवीए पउती ज्वलद्धा-त गच्छतु पच पडवा चाउरगिणीए सेणाए सहि सपरिवुडा पुरस्थिमवेयालीए मन पडिबालेमाणा चितु) हे देवानुप्रिय ! वह वक्तव्य विषय यह धातकी पंड नाम के द्वीप में पूर्व दिग्भागवर्ती दक्षिणार्ध भरत क्षेत्र में वर्तमान अमरकका नाम की राजधानी मे पद्मनाभ राजा સ્મરણ કરીને પછી તેઓ જે દિશા તરફથી આવ્યા ता तशा त२६ पाछ। २वाना थs गया (तएण से कण्हे वासुदेवे दूय सदावेइ, सहावित्ता एव क्यासी-गच्छ ण तुम देवाणुप्पिया । हरियणाउर पडुस्स रणो एयमट्ट निवेदेहि ) त्यारपछी ते वासुदेवे इतने मासाव्या भने બોલાવીને તેને આ પ્રમાણે કહ્યું કે હે દેવાનુપ્રિય ! તમે હસ્તિનાપુર નગરમાં જાઓ-અને ત્યા પાડુ રાજાને આ પ્રમાણે કહો કે – (एव सलु देवाणुप्पिया! धायइसडे दीवे पुरथिमद्धे अमरफकाए राय हाणीए पउमणाभा भवणसि दोषईए देवीए पउत्ती उबलद्धा-त गच्छतु पच पडवा चाउर गिणोए सेणाए सद्धि सपरिवुडा पुरस्थिमयालीए मम पडिवाले माणा चितु) पानुप्रिय ! पाती ५3 नाम द्वीपमा पूर्व दिशा त२३ना दक्षिणा ભરત ક્ષેત્રના વિદ્યમાન અમરક કા નામની રાજધાનીમાં પદ્મનાભ રાજાના ભાવ વિદ્યાનું સ્મરણ કર્યું - - पातापमंचा पानाभस्य गयो भाने द्रौपदीनी याशी पू चाप्यमान् , अय भाव:- काचिद्रौपदीमदगी दपी पमनाम राशोमो प्रष्ट लिगा मयान सम्परा शाता नापि सम्पपरिचिता, इति । ना ग कप्णी यायशः पालनारदमेव मवादीत्-डे देशानुभिधाः युग्मामेव ग म ग 'पुयाम्म' पूर्वकर्म -पूर्वकत कर्ग, युग्मामिरवेश कर्म कामित्पर्य | 17. सलु स उल्लनारदः कृष्णेन वासुदेवेनेमुक्त गा उतनी पियामागाध्यनि । भावाय यम्पाः एवदिशः मादुर्भूतस्तामे दिश प्रतिगतः । ततः पराप्यो गमृदेवो दन शदपति- धायईसटे दीचे पुरथिमद सारिणद्वभर पाम अमर कला गाणि गए तत्थ ण मर पउमनामस्म रपणो भरणनि दोई देवी जानिमिया दिछ पुव्वा यावि होत्या, ताण कण्हे वासुदेवे फन्चल ग वामी-तुम्भ चेव ण देवाणुप्पिया! एप पुरसम्म-ताण से फलनारण कण्हेणं वासुदेवेण एव बुत्ते समाणे उप्पयणि विज्ज आवाहेड, आवारिता जामेव दिसि पाउन्भु तामेव दिसि पडिगए) सुनो मैं तुम्हें बताता हूँ -हे देवाणुप्रिय ! मैं किसी एक समय द्वितीय धातकी वह ठीप में पूर्व दिग्भागवर्ती दक्षिणार्ध भरतक्षेत्र में अमरकका नाम की राजधानी में गया हुआ था वहा मैने पद्मनाभ राजा के भवन में द्रौपदी देवी जैसी एक नारी देखी थी-परन्तु मैं उसे अच्छी तरह नहीं जान मका-और न उससे परिचित ही रो सका- नारद की ऐसी बात सुनकर कृष्ण वासुदेव ने उनसे कहा हे देवानुप्रिय । आपने ही ऐसा कार्य सय से पहिले किया है-इसके याद उन कन्छुल्ल नारदने कृष्ण वासुदेवके द्वारा दाहिणभरहवास अमरकका रायहाणि गए, तत्यण मए पउमनाभरस रण्णो भवण सि दोषई देवी, जारिसिया दिवपुव्वा यावि होत्या, तरण कण्हे वासुदेवे फच्छुल्ल एव वयासी-तुभ चेवण देवाणुप्पिया! एव पुत्र कम्म-तएण से कच्छुल्ल नारए कण्हेण वासुदेवेण एव वुत्ते समाणे उपयणि विज्ज आवाहेइ, आवाहित्ता जामेव दिसि पाउभुए तामेव दिसि पडिगए) સાભળે, તમને બધી વિગત બતાવું છું હે દેવાનુપ્રિય! કેઈ એક વખતે હ ધાતકી ષડપમા, પૂર્વ દિશા તરફના દક્ષિણા ભરત ક્ષેત્રમાં અમરક કા નામે રાજધાનીમાં ગયા હતા ત્યા મે પદ્મનાભ રાજાના ભવનમાં દ્રૌપદી દેવી જેવી એક નારી જેઈ હતી પણ હું તેને સારી પેઠે ઓળખી શકે નહિ અને ન તેનાથી પરિચિત થઈ શક્યો નારદની આ વાત સાંભળીને કુચ્છવાસુદેવે તેમને કહ્યું કે હે દેવાનુપ્રિય સે પહેલા તમે જ આ કામ કર્યું છે ત્યારપછી તે કરછુ-લનારદે કૃષ્ણ વાસુદેવની આ વાત સાંભળીને જે . अमगारधर्मामृतपिणो टीका अ० १६ द्रौपदीचरितनिरूपणम् ५०१ शन्दयित्वा एवमवादीद-गच्छत खलु यूय हे देवानुमिया सानाहिकी सैनिकानां सज्जीभवनार्थ नादो यस्यास्ता भेरी ताडयत तेऽपि ताडयन्ति, ततः खलु तस्या सानाहिक्या भेर्याः शब्द श्रुत्त्वा समुद्र विजयप्रमुखा दश दशार्हा यावत् 'उप्पण्ण बलवयसाहस्सीओ' पट् पञ्चाशद् बलवत्साहस्रयाः पट्पश्चाशत्सहस्रपमिता वल- वन्त इत्यर्थः 'सनद्धवद्ध-जाव गाहियाउहपहरणा' अत्र यावन्छन्देनैव द्रष्टव्यम्- सन्नद्धबद्धर्मितकवचा उत्पीडितशरासनपट्टकाः पिनद्वग्रैवेयकबद्धाविद्धविमल वरचिह्नपटाः गृहीतायुपमहरणा इति । व्याख्याऽस्मिन्नेवा ययने पूर्वमुक्ता अप्ये- किकाः केचिद् हयगताः केचिद् गजगता यानद् वागुरापरिक्षिप्ताः मनुष्यवृन्दैः परिसता', यौव कृष्णो वासुदेवस्तत्रैवोपागच्छन्ति उपागत्य करतल० यारद् जयेन विजयेन वर्धयन्ति । ततः खलु कृष्णो वासुदेवो इस्तिस्कन्धवरगतः सको उनसे ऐसा कहा-हे देवानुप्रियो ! तुम सुधर्मा सभी में जाओ वहीं जाकर तुम सानाटिकी भेरी बजाओ-कौटुम्बिक पुरुषोने ऐसा ही किया सुधर्मा सभामें जाकर उस सानाहिकी भेरीको धजाया- इस सानाहिकी भेरीकी गर्जनाको सुनकर समुद्रविजय आदि दश दशाह यावत् ५६,हजार प्रमित यलवीर पुरुप सन्नद्ध बद्धर्मितकवच होकर, यावत् आयुव प्रह- रणों को लेकर तैयार सुसज्जित हो गये । यहाँ यावत् शब्द से उत्पी डितशरासन पट्टकाः, " पिनद्धात्रैवेयकयद्धपिद्धविमलवरचिह्नपट्टाः " इस पाठ का सग्रह हुआ है। इन शब्दो की व्याख्या इसी अ ययन मे पहिले की जा चुकी है। इनमें कितनेक घोडों पर, कितनेक हाथियो पर, चैठकर अन्य मनुष्यो के समूह से परिवृत्त हो जहा वह सुधर्मा सभा और जहा वे कृष्णवासुदेव थे वहाँ आये । (उवागच्छित्ता करयल जाव કે હે દેવાનુપ્રિયે ! તમે સુધર્મા સભામાં જાઓ, ત્યાં જઈને તમે સાનાહિકી ભેરી વગાડે, તે કૌટુ બિક પુરુએ પણ તે પ્રમાણે જ આજ્ઞાનું પાલન કર્યું સુધમ સભામાં જઈને તેઓએ સાનાદ્દિકી ભેરી વગાડી સામાણિકી ભરીને અવાજ સાંભળીને સમુદ્રવિજય વગેરે દશ દશાહે યાવતુ ૫૬ હજાર પ્રમિત બળવીર પુરૂષે ડવ વગેરેથી સુસજજ થઈને યા આયુધ પ્રહરણને લઈને तयार थ या अडी यावर शस्था " उत्पीडितशरासनपट्टका , पिनद्ध वेयक पद्धानिद्धविमलपरचितपट्टा " मा पाइने! सई यथे। छ सा शहोनी व्याभ्या આ અધ્યયનમાં જ પહેલા કરવામાં આવી છે આમા કેટલાક ઘેડાઓ ઉપર, કેટલાક હાથીઓ ઉપર બેસીને તેમજ કેટલાક માણસના સમૃહેથી પરિવૃત થઈને જ તે સુવર્મા, સભા અને જમા કૃષ્ણ-વાસુદેવ હતા ત્યા આવ્યા साधर्मध्या पाश्चतुरहिण्या सेनया सार्थ सपरिवा' पौरम्ययेागा मा प्रतिपालपान्तस्ति प्रन्तु ' इति । एव युतमुखात उष्णराममोक्त पन श्रुत्वा तेऽपिम्पा पापा यावत् तिष्ठन्ति । ततः खलु स कृष्णो नाम फौदम्पिापुरुषान् शम्दयति, के भवन में द्रौपदी देवी की पर मिली है-इमलिये पाचो पाप चतुरगिणी सेना के माध युक्त होकर लवण समुद्र की पूर्व दिग्भाग पर्तिनी वेला पर जाफर यहाँ मेरी प्रतीक्षा करें। (ताण से दूर जाव भणह, पडिवालेमाणा चिट्ठर, ते वि जाप चिट्ठति, ताण से कण्हे वास देवे फोदयियपुरिसे सहावे महापिता एव पयासी-गच्छह ण तुम्मे देवाणुप्पिया! स-नारिय भेरि ताटेर ते वि ताति, तण्णं तीसे सण्णा हियाए भेरिए सद्द मोच्चा विजयपामोश्या, दस दमारा जाव छप्पण्ण पलवयसारस्सीओ सन्नपद जार गरियाउपररणा अप्पेगल्या एयगया, गयगया, जार घग्गुरा परिस्पित्ता जेणेव सभा सुहम्मा जेणेव कपणे वासुदेवे तेणेव उवागच्छड) इस प्रकार अपने राजा कृष्णवासु देव की आज्ञा लेकर वह दूत रस्तिनापुर गया वहां जाकर उसने इस समाचार को पाङराजा से कह दिया। वे पाचों पाटव इस समाचार को दूत के मुस से सुनकर चतुरगिणी सेना के साथ लवण समुद्र के पूर्व दिग्भागवर्ती तट पर जाकर कृष्ण वासुदेव की प्रतीक्षा में ठहर गये। इसके बाद कृष्ण वासुदेव ने कौटुम्निक पुस्पों को बुलाया-बुलाकर નમાં દ્રૌપદી દેવીના વાવડ મળ્યા છે તે હવે પા પા ચતુરગિણ સેનાની સાથે લવણું સમુદ્રના પૂર્વ કિનારા ઉપર પહોંચીને મારી પ્રતીક્ષા કરે (तएण से दूए जाय भणइ, पडिबाले माणा चिट्ठह ते वि जाव चिट्ट ति, तएण से कण्हे वासुदेवे कोडुपिय पुरिसे सद्दावेइ सहावित्ता एव क्यासी गच्छद ण तुभे देवाणुपिया ! सन्नाहिय भेरिं ताडेह वे वि ताडे ति, तएण से सण्णा हियाए भेरीए सद्द सोचा समुद्दविजयपामोसा, दस दसारा जाव छपष्ण बल वय साहस्सीओ सन्नद्वपद्धजाव गहियाउहपहरणा अपेगइया हयगया, गयगया, जाव वग्गुरापरिक्खित्ता जेणेव सभा सुहम्मा जेगेव कण्णे वासुदेवे तेणेव उवागच्छइ) આ રીતે પિતાના રાજા કૃષ્ણ વાસુદેવની આજ્ઞા મેળવીને તે દ્વત હરિત નાપુર તરફ રવાના થયે ત્યાં પહોચીને તેણે પાડુ રાજાને બધા સમાચાર કહી સંભળાવ્યા પાચે પાડે દૂતના મુખથી આ સમાચાર સાભળીને પિતાની ચતુરગિણી સેના સાથે ત્યાથી પ્રયાણ કરીને લવણ સમુદ્રના પૂર્વ કિનારા ઉપર પહેચીને ત્યા કૃષ્ણ વાસુદેવની પ્રતીક્ષા કરતા રોકાઈ ગયા ત્યારપછી 39 વાસુદેવે કૌટુંબિક પુરુષને બોલાવ્યા અને બોલાવીને તેમ? પ્રયાણ કરીને . भनगारामृतषिणी टी० अ० १६ द्रौपदीचरितनिरूपणम् ५०३ एकतः एकस्मिन् स्थाने मिलति, मिलिला स्कन्धावारनिवेश सैनिकानामावास करोति कृत्वा पौपधशालामनुपविशति, अनुमविश्य " सुद्विय देन" स्थित- सुस्थितनामान देव लपणममुद्राधिष्ठित मनसि कुर्वन् स्मरन् तिष्ठति, तत' खलु कृष्णस्य वासुदेवस्याएमभक्ते परिणममाणे मुस्थितो देव पागतः, जागत्य वदति- हे देवानुप्रियाः ! भणन्तु कथयन्तु चन्मया कर्तव्यमिति ततः खलु स कृष्णो वासुदेव मुस्थितदेवमेवमयादी-एव खलु हे देवानुपिय ! द्रौपदी देवी यावत् पद्मनाभस्य भवने सहता, तत्तस्मात् खलु व हे देवानुमिय ! मम पञ्चभि: पाण्डवैः सार्ध आप्पास' आत्मपप्ठस्य-आत्मा-गह पप्ठो या तस्य समुदा- यस्य-नस्माकं पण्णामित्यर्थः, पण्णा स्याना लपणसमुद्रे माग वितर-देहि, येनाह ममरक वा राजपानी द्रौपद्या देव्याः 'स्व' मत्यानयनमर्तु गन्छामि । वहा पहुँचकर वे पांच पांडवों के साथ एक स्थान पर समिलित हुए। समिलित होकर उन्होंने अपनी सेना को ठहर ने का स्थान नियत किया-स्थान नियतकर के फिर वे पौपधशाला मे प्रविष्ट हो गये वहां प्रविष्ट होकर उन्हो ने लवण समुद्र के अधिपति सुस्मित देय का स्मरण किया। इसके बाद जय कृष्णवासुदेव का अष्टमभक्त समाप्त हो रहा था-तय यह सुस्थित देव उनके पास आयो-और कहने लगा हे देवा- नुप्रिय ! कहिये-मेरे लायक क्या काम है ? (तण्ण से कण्हे वासुदेवे सुट्टिय एव वयासी एव खलु देवाणुप्पिया। दोबई देवी, जार पउमना- भस्स भवणसि साहरिया, तएण तुम देवाणुपिया मम पवहि पडवेहि सद्धिं अपहस्स छह रहाण लवणसमुद्दे मग्गं वियरेहि, जण्ण अह अमरककारायहाणी दोवईए कवं गच्छामि, तएण से सुट्टिए देवे कण्हं હતા ત્યાં પહોંચ્યા ત્યાં પહોંચીને તેઓ પા પાડની સાથે એક સ્થાને એકત્ર થયા એકત્ર થઈને તેમણે પિતાના સૈન્યને પડાવનું સ્થાન નક્કી કર્યું સ્થાન નક્કી કરીને તેઓ પૌષધશાળામાં પ્રવિણ થયા ત્યાં જઈને તેઓએ લવણ સમુદ્રના અધિપતિ સુસ્થિત દેવનું સ્મરણ કર્યું ત્યારબાદ જયારે કૃgવાસુદેવને અષ્ટમ ભક્ત પૂરો થઈ રહ્યો હતો, ત્યારે તે સુસ્થિત દેવ તેમની પાસે આવ્યો અને કહેવા લાગ્યું કે હે દેવાનુપ્રિય ! બેલે, મારા લાયક શું કામ છે ? ( तण्ण से कण्हे वासुदेवे सुट्टिय एक बयासी एव स्खलु देवाणुप्पिया । दोईदेनी, जाच पदमनाभम्स भरणसि साहरिया, तरण तुम देवाणुप्पिया मम पचहि पडवेहिं सद्धि अप्पस्स छह रहाण लवणसमुद्दे मग्ग पियरेदि, जण्ण अह अमरकका रायहाणी दोवईए कूव गच्छामि, वएण से मुट्टिए देवे कण्ड - - , ५०५ ताधर्मग्या रण्टमात्यदाम्ना छत्रेण धार्यमाणेन श्येवरचामरेरययमानः, ध्यगनरथपदाति सपरिस्तो महागटाटयरप्रकरण द्वारसत्या नगर्या म यमन निगन्छति, याय पौरस्त्याला तातोपाग ति उपागत्य पथमि. पायासह 'एगयो' घद्धाति, तण्ण फण्टे पाउदे हथियधधरगण मकोरटमल्लदामेण छत्तेण सेयवर यगय मल्या मनगरपहरण पारवईए णपरीण मज्ज्ञ मझेण णिगच्छा, जेणेच पुरधिमयाली तेणेव उचागच्छा, उवागच्छित्ता पहिं परि मदिपायओ मिरठ, मिलित्ता ग्वधावा रणिवेस करेड, करित्ता पोमामाल अणुपचिमह, अणुपरिसित्ता सुट्टिय देव मणसिं फरेमाणे २ चिदृढ, तण्ण कणम्स वासुदेवस्स अहम मत्तसि परिणममाणसि मुहिमो आगो माग देवाणुप्पिया जमए कायन्व) वा आफर उन मपने कृष्ण वासुदेव को दोनो हाथ जोरकर बड़े विनय के साथ नमस्कार करते ट्रय जय विजय शब्दों द्वारा बधाई दी। इसके याद वे कृष्णवासुदेव हावी पर सवार मा सवार होते ही छत्र धारियों ने उन पर कोरट पुष्पों की माला से पिराजित पत्र ताना, चोमर ढोरने वालों ने उनपर वेत चामर ढोरना प्रारभ करदिया। इस प्रकार श्य गज, रथ, एव पैदलसेना से घिरे हुए चे कृष्णवासुदेव महाभटों के समूह के साथ २ दारावती नगरी के बीच से रोकर निकले, निकलकर जहा वह लवगसमुद्र की पूर्व दिन्भागवर्तिनी वेला यी वहा पहुंचे। ( उवागुच्छिचा करयल जार पद्धाति, तरण कण्हे वासुदेवे इत्थि खध वरगए सकारेंटमल्लदामेग छतेग सेयपर. हयगय मल्या भउचडगरपहरण वारबईए णयरीए मज्झ मज्ज्ञेण जिगच्छद जेणेन पुरत्विमवेयाली तेणेव उपा गच्छइ, उागच्छित्ता पचहिं पडवेंहि सदि एगयओ मिलइ, मिलित्ता खधावार णिवेस करेइ, करिता पोमहसाल अणुपविसइ, अणुपविसित्ता, सुट्ठिय देव मणसि करेमाणे २ चिट्ठइ, तएण कण्हम्स वासुदेवस्स अट्टमभत्तसि परिणममाणसि मुडिओ आगओ भणदेवाणुप्पिया ! ज मए कायव्य) ત્યાં પહોંચીને તે બધાએ બંને હાથ જોડીને બહુ જ વિનમ્રતાથી નમ સ્કાર કરતા જયવિજય રાખેથી તેમને વધામણી આપી ત્યારપછી તે કૃષ્ણ વાસુદેવ હાથી ઉપર સવાર થયા સવાર થતા જ છત્રધારીઓએ તેમની ઉપર કેરટ પુષ્પની માળાથી શોભતું છત્ર તાણ્ય તેમજ ચામર ઢળનારાઓએ ચામર ઢળવાની શરૂઆત કરી આ પ્રમાણે ઘોડા, હાથી, રથ અને પાયદળથી પરિવૃત્ત થયેલા તે કૃષ્ણ-વાસુદેવ મહાભને સમૂહની સાથે સાથે દ્વારાવતી નગરીની વચ્ચે થઈને પસાર થયા અને જ્યા તે લવણ . मनगारधर्मामृतवपिणी टी० अ० १६ द्रौपदीचरितनिरूपणम् मवादीद-मा खल्ल त्व हे देवानुमिय । यावत् सहर, स खलु हे देवानुमिय । लवणसमुद्रे आत्मपाठस्य पण्णा रथानो माग 'पियराहि ' वितर-देहि, स्वयमेव खल्वह द्रौपद्या देव्या 'कर' प्रत्यानयनकर्तुं गच्छामि, ततः खलु स सुस्थितो अथवा-आपकी आजा हो तो नगर, सैनिक, और वाहन सहित पन्न नाभ राजो को लवण समुद्र में डुपा दे सकता हूँ (तण्ण कण्हे वासुदेवे सुट्टिय देव एव वयासी) जन कृष्णवासुदेव ने उस स्वस्तिक देव से इस प्रकार का-(माण तुम देवाणुप्पिया! जाव साहराहि तुम ण देवाणु पिया। लवणसमुझे अप्पट्ठस्स छण्ड ताण लवणसमुद्दे मग्ग विय- राहि सरमेव ण अर दोवईए कृव गच्छामि, तण्ण से सुटिए देवे कण्ह वासुदेव एव वयासी, एव होउ, पहिं पडहिं सदि अप्पट्ठस्स उपह रहाण लवणममुद्दे मांग वियरड तण्ण से कण्हे वासुदेवे चाउरगिणी सेणं पडिविसज्जेइ, पडिमिज्जित्ता पचहिं पडवेहिं मद्धिं अप्पटे छहिं रहेहिं लवणसमुद्द मज्झ मज्झेण वीइवयइ, चीडवत्ता जेणेव अमर कको रायहाणी, जेणेव अमरकका अगुज्जाणे तेणेव उवागच्छड ) हे देवानुप्रिय ! तुम ऐसा मत करो-अर्थात् पद्मनाभ के भवन से द्रौपदी देवी को हरण मत करो, और न पद्मनाभ राजा को नगर, सैनिक एव वाहन महित लवणसमुद्र में प्रक्षिप्त करो, तुम तो केवल हे देवानुप्रिय ! मारे छहों रधों को लवणसमुद्र में मार्ग दे दो। में તમારી આજ્ઞા હેય તો નગર, મિનિટ અને વાહન સહિત પનાભ રાજાને લવણસમુદ્રમાં ડુબાડી રાકુ તેમ છુ (तएण कण्हे वासुदेवे सुद्विय देव एव वयासी) त्यारे ए-वासुदेव तस्ति हेक्ने प्रभारी ४ - ( माण तुम देवाणुप्पिया । जाव साहराहि तुम " देवाणुपिया ! लवण- समुझे अप्पस्म उण्ह रहाण लवणसमुदे मग्ग चियराठि सयमेव ण अह दोवईए कूच गच्छामि, तएण से सुटिए देवे कण्ह वासुदेव एव वयासी, पव होउ, पचईि पडवेहि सद्धि अप्पउटस उण्ड रहाण लवणममुद्दे मग्ग पियरइ, तण्ण से कण्हे वासुदेवे चाउरगिणी सेण पडिविसज्जेड, पडिपिसज्जित्ता पचहि पडवेहि सद्धिं अप्पछठे छहि रहेहिं लपणसमुद मज्ज्ञ मझेण वीइवयइ, वीइवइत्ता जेणेव अमरकंका रायहाणी, जेणेच अमरककाए अग्गुज्जाणे तेणेव उवागच्छद) હે દેવાનુપ્રિય! તમે આ પ્રમાણે કરવાની તસ્દી લે નહિ એટલે કે પદ્મનાભના ભવનમાથી દ્રોપદી દેવીનું હરણ કરે નહિ તેમજ પદ્મનાભ ગજાને નગર, સેનિક અને વાહન સહિત લવણ સમુદ્રમા ફેક પણ નહિ તમે તે હે દેવાનુપ્રિયા ફક્ત અમારા છએ ર માટે લવણ સમુદ્રમાં માર્ગ આપે भ६४ ५०४ तापर्मचा तत खलु स मुस्वितो देश कण पारदेशमेरमादीद-हे देवानप्रिय 1 किला यथैव पानाभस्य रामः पूर्वसंगतिकन गरेन द्रौपदी यापन् गहना, तथैव द्रौपदी देवी धातकीपण्डा सीपाद भारतार याद् इग्निमापुर सहरामि । ' उदाए' उतादो ! अया. रथय, पदनाम गनान गपुरपल पहननगरसनिकवान सहित लपणसाने मविपामि ? ततः राहगो पामुदेव सुस्थित देवम् एवं घासुदेव पर चामी हि देवाणुपिया जा चेन पउमणामस्स रसो पुन्धसगहएण देण दोवई जान सारिया, तहाचे दोवईदेवि धापईस डाओ दीयाओ भाराओ जारिणापुर माहरामि, उदाए पउमणाम रायमपुरयल पारण लपणसमु पशिपयामि') ता कृष्णवासुदेव ने उस सुस्थित देव से इस प्रकार कहा-रे देवानुप्रिय! सुनो-द्रौपदी देवी योवत् पानाम के भवन में रण कर रखी गई है इमलिये हे देवानु प्रिय ! तुम आत्मपष्ठ मेरे पाच पादयो के माध उही रधों को लवण समुद्र में मार्ग प्रदान करो। अर्थात पाच पाडवों के और छठे मेरे इस प्रकार हमारे उर रथों को जाने के लिये रास्ता दो-फि जिससे मैं अम रकका राजधानी में द्रौपदीदेवी को वापिस ले आने के लिये जा सकू । तप सुस्थित देव ने उन कृष्ण वासुदेव से इस प्रकार कहा-हे देवानु प्रिय ' जिस प्रकार पद्मनाभ राजा के पूर्व सगतिक देवने द्रौपदीदेवी का यावत् हरण किया है, उसी तरह मैं भी द्रौपदी देवी को धातकी खा द्वीप के भरत क्षेत्र से यारत् हस्तिनापुर में हरणकर ला सकता हूँ- वासुदेव एव वयासी किण्ह देवाणुप्पिया! जहा चेव पउमणाभस्स रनो पुख्य सगइएण देवेण दोबई जार सहरिया, तहा चेव दोई देवि धायईसडाओ दीवाओ भारहाओ जार इत्थिणापुर साहरामि, उदाहु पउमणाभ राय सपुरवर वाहण लवणममुद्दे पक्खिवामि ?) ત્યારે કૃષ્ણ વાસુદેવે તે સુસ્થિત દેવને આ પ્રમાણે કહ્યું કે હે દેવાનું પ્રિય! સાભળે, દ્રૌપદી દેવી યાવત પદ્મનાભના ભવનમાં હરણ કરાઈને રાખ વામા આવી છે એટલા માટે હે દેવાનુપ્રિય! તમે “આત્મષણ' મારા તેમજ પાચે પાડવેના છ રને લવણ સમુદ્રમાં થઈને પસાર થવા માટે માર્ગ આપે એટલે કે પાચે પાડવેના અને છઠ્ઠા મારા આમ છએ રને પસાર થવા માટે રસ્તે આપે જેથી હુ દ્રૌપદી દેવીને પાછા લાવવા માટે અમર રાજધાનીમા જઈ શકુ ત્યારે સુસ્થિત દેવે તે કૃષ્ણ-વાસુદેવને આ પ્રમાણેક કે હે દેવાનુપ્રિયા પદ્મનાભ રાજાના પૂર્વ સાંતિક દેવે જેમ ટ્રીપદી દેવીનું ચાવત્ હરણ કર્યું છે, તેમજ હુ પણ દ્રૌપદી દેવીને ધાતકી ખડદીપના ભરત ક્ષેત્રમાથી યાવત હસ્તિનાપુરમાં હરણ કરીને લાવી શકે અને જે - . अनगारधर्मामृतषिणी टी० अ० १६ द्रौपदीचरितनिरूपणम् ५०५ मवादीत-मा खलु त्व हे टेवानुमिय । यावत् सहर, व खलु हे देवानुमिय । लवणसमुद्रे आत्मपाठस्य पण्णा रयानां मार्ग 'पियराहि ' वितर=देहि, स्वयमेन खल्लह द्रौपद्या देव्या 'का' प्रत्यानयनकतुं गच्छामि, ततः खलु स मुस्थितो अथवा-आपकी आजा हो तो नगर, सैनिक, और वाहन सहित पद्म नाभ राजो को लवण समुद्र में डया दे सकता हूँ (तण्ण कण्हे वासुदेवे सुद्विय देव एव चयाती) जन कृष्णवासुदेव ने उस स्वस्तिक देव से इस प्रकार करा-(माण तुम देवाणुप्पिया ! जाव साहराहि तुम ण देवाणु पिया! लवणसमुद्दे अप्परहस्स छह रहाण लवणसमुद्दे मग्ग विय राहि सयमेव ण अह दोवईए कृव गच्छामि, तपण से सुटिए देवे कण्ड वासुदेव एव वयाली, एव होड, पचहिं पडवेहिं सद्धिं अप्पस्स उपह रहाण लवणममुद्दे मग्ग वियरड ताण से कण्हे वासुदेचे चाउरगिणी सेण पडिपिसज्जेइ, पडिविसज्जिता पचहिं पडवेहि मद्धिं अप्पटे छहिं रहेहिं लवणसमुह मज्झ मझेण वीइबयइ, चीइवइत्ता जेणेच अमर कको रायहाणी, जेणेब अमरककाए अगुजजाणे तेणेव उवागच्छद) हे देवानुप्रिय ! तुम ऐसा मत करो-अर्थात् पद्मनाभ के भवन से द्रौपदी देवी को ररण मत करो, और न पद्मनाभ राजा को नगर, सैनिक एव वाहन सहित लवणसमुद्र में प्रक्षिप्त करो, तुम तो केवल हे देवानुप्रिय ! हमारे छहों रथों को लवणसमुद्र में मार्ग दे दो। मैं તમારી આના હોય તે નગર, મિનિટ અને વાહન સહિત પદ્મનાભ રાજાને લવણસમુદ્રમાં ડુબાડી શકું તેમ છુ (तएण कण्हे वासुदेवे सुद्विय देव एव वयासी) त्यारे ४-पासुहवे ते २५ति वने । प्रभारी छु 3- ( माण तुम दवाणुप्पिया ! जाव साहराहि तुम णं देवाणुप्पिया ! लवण- समुझे अप्पच्छस्म उपह रहाण लवणसमुद्दे मग्ग वियराठि सयमेव ण अह दोबईए कूव गच्छामि, तएण से सुटिए देवे कण्ह वासुदेव एव वयामी, पव होउ, पचहि पडवेहि सद्धि अप्पउटस्स छण्ह रहाण लवणममुद्दे मग्ग पियरइ, तण्ण से कण्हे वासुदेचे चाउरगिणी सेण पडिविसज्जेट, पडिविसज्जित्ता पचहिं पायेहि सदि अप्पछठे छहि रहेहिं लपणसमुद मज्ज्ञ मझेण वीइवयइ, वीडवइत्ता जेणेच अमररका रायहाणी, जेणे अमरककाए अग्गुज्जाणे तेणेव उवागन्द) હે દેવાનુપ્રિય! તમે આ પ્રમાણે કરવાની તસ્દી લે નહિ એટલે કે પદ્મનાભના ભવનમાથી દ્રૌપદી દેવીનું હરણ કરો નહિ તેમજ પાનાભ ગજાને નગર, સેનિક અને વાહન સહિત લવણ સમુદ્રમાં ફેકે પણ નહિ તમે તે ---“શ છએ રથ માટે લવણ સમુદ્રમા માર્ગ આપે . हवा.
५०४ जाताधर्मपाल - तत खलु स एस्पिनो देश का नामदेवमादीन- देवानुपिय । किला यथैव पदनामस्य रामशः पूर्वमाकन न तोपदी या मंहगा, तथैव द्रौपड़ीं देवी धातकीपण्डा द्वीपाद भारताः पारद गिनापुर संहरामि । 'उदाहु उताहो ! अया. ययग, पमनाम रामान गपुरपलाइन नगरंगनिकवान सहित लपणसाढ़े मविपामि ? तन' रामगो पामुदेशा स्थित देवम् एव घासुदेव एव चयमी किण वाणुप्पिया। ता घे पउमणामस्स रझो पुन्चमगहरण देण दोवई जार मारिया, तारा चेनदोईदेवि धायईस डाओ दीयाओ भारताओ जाविणापुर मारामि, उदार पउमणाम रायसपुर पल वारण लपणममुटे पशिवामि?) तप कृष्णवासुदेव ने उस सुस्थित देव से इस प्रकार फा-रे देवानुप्रिय ! सुनो-द्रौपदी देवी योवत् पानाम के भवन में हरण कर रपी गई है इमलिये हे देवानु प्रिय ! तुम आत्मपष्ट मेरे पाच पात्रों के साथ नहीं रधों को लवण समुद्र में मार्ग प्रदान करो। अर्थात् पांच पाडयों के और छठे मेरे इस प्रकार हमारे यह रथों को जाने के लिये रास्ता दो-कि जिससे मैं अम रकका राजधानी में द्रौपदीदेवी को वापिस ले आने के लिये जा सकू । तप सुस्थित देव ने उन कृष्ण वासुदेन से इस प्रकार कहा-हे देवान प्रिय ! जिस प्रकार पद्मनाभ राजा के पूर्व सगतिक देवने द्रौपदीदेवी का यावत् हरण किया है, उसी तरह में भी द्रौपदी देवी को धातकी खा द्वीप के भरत क्षेत्र से यावत् हस्तिनापुर में हरणकर ला सकता है- वासुदेव एव वयासी किण्ह देवाणुप्पिया! जहा चेव पउमणाभस्स रनो पुब्ध सगइएण देवेण दोबई जान सहरिया, तहा चेव दोबई देवि धायईसडाओ दीवाओ भारहाओ जाव इत्थिणापुर साहरामि, उदाहु पउमणाम राय सपुरवा वाहण लवणममुद्दे पक्खिवामि ?) ત્યારે કૃષ્ણ-વાસુદેવે તે સુસ્થિત દેવને આ પ્રમાણે કહ્યું કે હે દેવાનું પ્રિય ! સાભળે, દ્રૌપદી દેવી ચાવત પવનાભના ભવનમાં હરણ કરાઈને રાખ વામાં આવી છે એટલા માટે હે દેવાનુપ્રિય! તમે “આત્માણ મા તેમજ પાસે પાડવેના છ રથને લવણ સમુદ્રમાં થઈને પસાર થવા માટે માર્ગ આપે એટલે કે પાચે પાડવેના અને છઠ્ઠા મારા આમ છએ રથને પસાર થવા માટે રસ્તો આપે જેથી હુ દ્રૌપદી દેવીને પાછા લાવવા માટે અસરક રાજધાનીમાં જઈ શકુ ત્યારે સ્થિત દેવે તે કૃષ્ણ-વાસુદેવને આ પ્રમાણે છે કે હે દેવાનુપ્રિયા પદ્મનાભ રાજાના પૂર્વગતિક દેવે જેમ દ્રૌપદી દેવી ચાવતું હરણ કર્યું છે, તેમજ હુ પણ દ્રૌપદી દેવીને ધાતકી અડદ્વપના ભરત ક્ષેત્રમાંથી યાવત હસ્તિનાપુરમાં હરણ કરીને લાવી શકુ કે - , अनगारधर्मामृतव पणो टी० अ० १६ द्रौपदीचरितनिरूपणम ५०७ प्रविश्य पद्मनाभस्य राज्ञो वामेन पादेन ' पायपीढ ' पादपीठम् सिंहासनसलग्न- सोपानम् भाक्रम्य कुन्ताग्रेण लेख पत्रिका ' पगामेहि ' अर्पय देहि अर्पयित्वा 'तिवलिय ' त्रिवलिका रेखात्रययुक्ता 'मिउडि ' भ्रूकुटिं-' णिडाले ' ललाटे साइटु ' संहृत्य-उन्नीय 'आमुरुत्ते' आशुरुप्तः शीघ्र क्रोधाविष्टः ' रुट्ठ रुप्टः ' कुद्वे' क्रुद्धः 'कुपिए ' कुपितः चडि किए' चाण्डिक्यित:-रोपयुक्तः, एवमवादीत्-ह भो ! पद्मनाभ ! 'आत्थियपत्थिया' अप्रार्थितमाथित !-मर- णवाञ्छक ! 'दुस्तपतलक्खण ।' दुरन्तप्रान्तलक्षण पूर्व व्याख्यातमेतत् , पोयपीढ अक्कमित्ता कुत्तग्गेण लेह पणामेदि, तिवलियं भिउडिं णिडाले साहट्टु आसुरते रहे कुद्धे कुविए चडिक्किए एव वयासी भोपउमणाहा अपत्थियपत्थिया ! दुरतपतलक्खणा! हीणपुण्णचाउद्दसा ! सिरिहिरि धो परिवजिया। अज्ज ण भवसि किन्न तुम ण याणासि, कण्हस्स वासुदेवस्स अहवण जुद्वसज्जे णिगच्छाहि) रथ को रोककर वहां स्थापित कर-दारुक सारथि को बुलाया चुलाकर के उससे ऐसा कहा- हे देवानुप्रिय तुम जाओ-अमरकका राजधानी में जाओ वहां जाकर पद्मनाभ राजाके पादपीठको वाम पादसे आक्रमित कर कुन्त (भाला)के अग्रभाग से उसे पत्रिका दो देकर के अपनी भृकुटी को भालपर चढा. कर, इकदम गुस्से में आकर, रुष्ट, कुपित एव क्रुद्ध होकर क्रोध के आवेश से तम तमाते हुए तुम उससे ऐसा कहों-अरे ओ पद्मनाभ ! अप्राधित प्रार्थित। मरणवान्क- दुरतप्रान्त लक्षण ! मोलुम होता है पाएण पायपीढ अरुमित्ता कुत्तग्गेण लेह पणामेहि, तिवलिय भिउर्दि गिडाले साहहु आसुरुत्ते रुठे कुद्वे कुपिण चडिक्किए एवं व्यासी ह भो पउमणाहा! अपत्थियपत्थिया ! दुरतातलरखणा ! हीणपुण्णचाउदसा । सिरि हिरिधी परिवज्जिया । अज्ज ण भासि किन्न तुम ण याणासि, कण्हस्स वासुदेवस्स अहवण जुद्धसज्जे णिगन्छादि) રથને ઊભે રાખીને, ત્યાં જ રથને મૂકીને દારૂક સારથિને બોલાવ્યો અને બોલાવીને તેને આ પ્રમાણે કહ્યું કે હે દેવાનુપ્રિય! તમે અમરકકા રાજધાનીમાં જાઓ અને ત્યાં જઈને પાનાભ રાજાના પાદપીઠને ડામ પગથી આકમિત કરીને કુતના અગ્ર ભાગથી તેને પત્રિકા આપ પત્રિકા આપીને તમે પિતાની ભમ્મરે ચઢાવીને, એકદમ લાલચેળ થઈને રર, કુપિત અને વૃદ્ધ થઈને ક્રોધના આવેશમાં આવીને તેને આ પ્રમાણે કહો કે અરે એ પદ્મનાભ ! અપ્રાર્થિત પ્રાર્થિત! મરશુ વાછક ! હુરત પ્રાત લક્ષ' (નીચ - हातापाया देर ण वासुदेवमेरमवादी-पा माशी, नोडमा पत्रमिः पाण्टाः सार्धम् आत्मपष्टस्य पाणा स्थानां यममार्ग परनिरात गगणो वाम देवचतुरगिणी सेना मतिमिर्गगति, प्रनिनिसय पचगि पाया मामात्म पप्ठ पदमीरयषणममुट मध्मध्यनकाय, निवनी-गलनि. व्यति प्रज्य यौयामरसासनमानी, गौशामरामाया अनोगान गोपागलति, उपागत्य रच स्थापयति, स्थापयिता वारक सारविन्दयवि, गायिका एव मवादी-गच्छ खलु च । देशानुमिय ! अमरारामपानीमनुमविश, अनु स्वयही द्रौपदी देवी को वहा से वापिस ले आऊंगा । अथवा मैं स्वय ही द्रौपदी देवी को लेने के लिये जाग तय उस सुस्थित देव ने कृष्ण चासुदेव से इस प्रकार कहा-अयं ऐमा हीरो-इस प्रकार कह फर उसने आत्म पष्ट के छरों रयो को स्वणसमुद्र में मार्ग वितरित कर दिया। तय कृष्णयासुदेव ने अपनी चतुरगिणी सेना को वरा से वापिस करदिया वापिस कर फिर चे पाच पांडवों के साथ उशीरयों को- एक अपने रथको और पांच पाहयोंके रोंको-लेकर लवणसमुद्रके भीतरसे रोकर चरने लगे। चलते २ चे जरा अमरकका राजधानी धौं- और उसमें भीजहां वह अग्रोद्यान था वहां पहुंचे। (उवाग्गच्छित्ता रह ठवेइ) वरा पहुँच कर उन्होने अपने रथ को रोक दिया-(ठवित्ता दारुय सारहिं सदावेह, सदायित्ता एव वयासी गच्छह ण तुम देवाणुप्पिया! अमरककारायहाणी अणुपतिमाहिर, पउमणाभस्त रणो वामेण पाएण ત્યાં જઈને હુ જાતે જ દ્રૌપદી દેવીને ત્યાંથી પાછી લઈ આવીશ એટલે કે હુ જાતે જ દ્રૌપદી દેવીને લેવા માટે જઈશ ત્યારે તે સુસ્થિત દેવે કૃષ્ણ વાસુદેવને કહ્યું કે સારૂ, આમ જ કરે આ પ્રમાણે કહીને તેણે આત્મષણના જીએ રથને લવણ સમુદ્રમાં રતે આપે ત્યારપછી કૃષ્ણ-વાસુદેવે પિતાની ચતુરાગિણે સેનાને ત્યાંથી પાછી વળાવી દીધી અને પાછી વળાવીને તેઓ પાસે પાડની સાથે છએ રથને-એક પિતાના રથને અને પાચ પાડના રથને- લઈને લવણ સમુદ્રની વચ્ચે થઈને પસાર થવા લાગ્યા આમ પસાર થતા તેઓ જયા અમરકકા રાજધાની અને તેમાં પણ જ્યા તે અદ્યાન હતું ત્યાં પહોંચ્યા (उवागच्छित्ता रह ठवेइ) त्या पहायान तभो चौताना थने l Av. (उविता दारुय सारहिं सदावेइ, सदावित्ता एवं क्यासी, गच्छह ण तुम देवाशुपिया ! अमरकका रायहाणी अणुपविसाहि २ . वामेणं ५०७ - , अनगारधामृतव पणो टी० अ० १६ द्रौपदीचरितनिरूपणम प्रविश्य पद्मनाभस्य राज्ञो चामेन पादेन 'पायपीढ' पादपीठम् सिंहासनसलग्न- सोपानम् आक्रम्य पुन्ताग्रेण लेख प्रविका 'पणामेहि ' अर्पय देहि अर्पयित्वा 'तिवलिय ' त्रिवलिका रेखात्रययुक्ता ‘भिउडि ' भूकुटि-णिडाले ' ललाटे सा? ' सहत्य-उन्नीय 'आसुरुत्ते' आशुरुप्ता शीघ्र क्रोधाविष्टः ' रुट रुप्टः ‘कुद्वे 'क्रुद्धः 'कुपिए ' कुपितः चडिकिए' चाण्डिक्यितः-रोषयुक्ता, एवमवादीत-ह भो! पद्मनाभ ! 'आत्थियपत्थिया' अप्रार्थितमाथित !--मर- णवाञ्छक ! 'दुरतपतलक्षण ।' दुरन्तप्रान्तलक्षण ! पूर्व व्याख्यातमेतत् , पायपीढ अकमित्ता कुत्तग्गेण लेह पणामेहि, तिवलिय भिडिं णिडाले साहट आसुस्रो रहे कुद्धे कुविण चडिस्किए एव वयासी हमोपउमणाहा अपत्थियपत्थिया ! दुरतपतलवणा! हीणपुण्णचाउद्दसा ! सिरिहिरि धो परिवजिया! अज ण भवसि किन्न तुम ण याणासि, कण्हस्स वासुदेवस्स अवण जुद्धसज्जे णिगच्छाहि) रथ को रोककर वहां स्थापित कर-दारुक सारथि को बुलाया चुलाकर के उससे ऐसा कहा- हे देवानुप्रिय तुम जाओ-अमरकका राजधानी में जाओ वहां जाकर पद्मनाभ राजाके पादपीठको वाम पादसे आक्रमित कर कुन्त (भाला)के अग्रभाग से उसे पत्रिका दो देकर के अपनी भृकुटी को भालपर चढा कर, इकदम गुस्से में आकर, रुष्ट, कुपित एव क्रुद्ध होकर क्रोध के आवेश से तम तमाते हुए तुम उससे ऐसा कहों-अरे ओ पद्मनाम ! अमाधित प्रार्थित मरणवाक-! दुरतप्रान्त लक्षण ! मोलुम होता है पाएण पायपीढ अझमित्ता कुत्तग्गेण लेह पणामेहि, तिवलिय भिडहिं गिडाले साहहु आसुरुचे रुठे कुटे कुनिए चडिक्किए एवं बयासी ह भो पउमणादा! अपत्थियपत्थिया ! दुस्तातलयखणा ! हीणपुण्णचाउदसा । सिरि हिरिधी परिवज्जिया । अज्जण भरसि किन तुम ण थाणासि, कण्डस्स चामुदेवस्स अहवण जुद्रसज्जे णिगच्छादि) રથને ઊભા રાખીને, ત્યા જ રથને મૂકીને દારૂ સારથિને બેલાવ્યો અને બેલાવીને તેને આ પ્રમાણે કહ્યું કે હે દેવાનુપ્રિય! તમે અમરકકા ગજધાનીમાં જાઓ અને ત્યાં જઈને પદ્મનાભ રાજાના પાદપીઠને ડાબા પગથી આકમિત કરીને કુતના અગ્ર ભાગથી તેને પત્રિકા આ પત્રિકા આપીને તમે પિતાની ભમ્મર ચઢાવીને, એકદમ લાલચોળ થઈને રૂ, કુપિત અને કૃદ્ધ થઈને ક્રોધના આવેશમાં આવીને તેને આ પ્રમાણે કહો કે અરે એ પદ્મનાભ ! અપ્રાતિ પ્રાર્થિત ! મરણ વાછક હુરત પ્રાત લક્ષણ' (નીચ - AMकया देव कृष्ण गासुदेवगेमगीर-ए माशी, गोमा पक्षमि पाण्डी: मार्षम् आत्मपष्ठस्य पप्णा रथाना गम मार्ग गिरान पसरणो वाम देवयतरङ्गिणी सेना पनिरिमनयनि, पनि विसर्य पाणिः पाण्डेय, सार्वमात्म पप्ठ परभीरये गणममुद्र गमध्येनजर गतिमी-गनि. व्यति बज्य यौवामररका राजधानी, यमरामाया अग्रगान गारोपाग छति, उपागत्य रय स्थापयति, स्थापकिया दारुरु सारथि गन्दयवि, गडयित्वा एव मवादी-गच्छ खल व हे देगनुपिय ! अमा,राजमानीमनुपविग, अनु स्वयही द्रौपदी देवी को वहा से चापिस ले आऊँगा । अयत्रा में स्वय ही द्रौपदी देवी को लेने के लिये जाॐ तप उस मुस्बिन देव ने कृष्ण वासुदेव से इस प्रकार क-अच्छो रोमानी रो-इस प्रकार कह कर उसने आत्म पष्ट के छरों रथो को स्पणसमुद्र में मार्ग वितरित कर दिया । तर कृष्णयासुदेव ने अपनी चतुरगिणी सेना को वरा से वापिस करदिया वापिस कर फिर वे पाच पांडवों के माध छही रयों को- एक अपने रथको और पांच पाइयों के रथोंको लेकर लवणसमुद्रके भीतरसे रोकर चलने लगे। चलते २ वे जराअमरकका राजधानी थीं- और उसमें भी जा यह अनोद्यान धा वा पहुंचे। (उवाग्गच्छित्ता रद्द ठवेइ) वरा पहुँच कर उन्रोने अपने रथ को रोक दिया-(ठवित्ता दारुय सारहिं सदावेइ, सदायित्ता एव क्यासी गच्छद ण तुम देवाणुप्पिया! अमरककारायहाणी अणुपविसारि२, पउमणाभस्स रणो धामेण पारण ત્યાં જઈને જાતે જ દ્રૌપદી દેવીને ત્યાંથી પાછી લઈ આવીશ એટલે કે હું જાતે જ દ્રૌપદી દેવીને લેવા માટે જઈશ ત્યારે તે સુસ્થિત દેવે કૃષ્ણ- વાસુદેવને કહ્યું કે સારૂ, આમ જ કરે આ પ્રમાણે કહીને તેણે આત્મપછાત છએ રથને લવણ સમુદ્રમાં રસ્તો આપે ત્યારપછી કુષ્ણ-વાસુદેવે પોતાની ચતુરગિણી સેનાને ત્યાંથી પાછી વળાવી દીધી અને પાછી વળાવીને તેઓ પાસે પાડની સાથે છએ રથને-એક પિતાના રથને અને પાચ પાના રથને- લઈને લવણ સમુદ્રની વચ્ચે થઈને પસાર થવા લાગ્યા આમ પસાર થતા તેઓ જ્યા અમરકકા રાજધાની અને તેમાં પણ જ્યા તે અગ્રસ્થાન હતું ત્યાં પહોચ્યા ( वागच्छित्ता रह ठवेइ ) त्या पडायाने तभ] पोतान! २थने aal सभ्य (ठवित्ता दारुय सारहिं सद्दावेइ, सदायित्ता एव क्यासी, गच्छह ण तुम देवाणप्पिया ! अमरकका रायहाणी अणुपविसाहि २ वामेण - .
भनिगारधर्मामृतषिणी नेफा अ० १६ द्रौपदीचरितनिरूपणम् ५०१ ततः खलु स दारुक सारथिः कृष्णेन वासुदेवेनैवमुक्तः सन् हृष्टतुप्टो यात् प्रतिशृणोति ' तयाऽस्तु' इति कृत्वाऽऽज्ञा सीकरोति प्रतिश्रुत्य-अमर- कङ्काराजधानीमनुमविशति, अनुप्रविश्य यत्रैव पद्मनाभस्तनैवोपागन्छति, उपागत्य फरतलपरिगृहीतदशनम्व शिरआरतं मस्त केऽञ्जलिं कृत्वा यापद् वर्धति-जयेन विजन चाभिनन्दयति । वर्धयित्वा-अमिनद्य एमवादी-एपा खलु हे स्वामिन् ! मम विनयप्रतिपत्तिः इयमन्या मम स्वामिनो विनयपतिपत्तिः, " समु. समाणे तुढे जाव पडिसुणेइ, पडिलुणित्ता, अमरकका रायाणि अणु पविसइ, अणुपविसित्ता जेणेव पउमनाहे तेणेव उवागच्छइ, उवाग- छित्ता, करयल जाव चद्वावेत्ता एव वयासी-एसण सामी मम विण यपडिवित्ती, इमो अन्नी मम सामिस्स समुहाणत्ति त्ति कट्टु असुरुत्ते नाम पाएण पायपीढ अणुक्मड ) पाच पाडवों के साध आत्म पष्ठ होकर द्रौपदी देवी को लेने के लिये अभी अभी आये हुए है। इस प्रकार कृष्णवासुदेव के चारा कहे गये उस दोरुक सारथि ने सृष्ट तुष्ट होकर कृष्णवासुदेव की आज्ञा स्वीकार करली। स्वीकार कर के फिर वह अमरकका राजधानी में प्रवेश किया वहा प्रवेश कर वह वहा पहुंचा जहा पद्मनाभ राजा थे। उनके समीप जाकर उस ने पहिले उन्हें दोनों हाथों की अजलि बना कर और उसे मस्तक पर रखकर नमस्कार किया-जय विजय शन्दों से उन्हें पधाया-पाद में उसने इस प्रकार कहना प्रारभ किया-हे स्वामिन् ! यह तो मेरी विनय प्रतिपत्ति है-दूत सारही कण्हेण वासुदेवेण एव वुत्ते समाणे हनुढे जाव पडिसुणेइ पडिमुणित्ता, अमरकका रायहाणि अणुपविसइ, अणुपविसित्ता जेणेव पउमनाहे तेणेव उवाग- छठ, उवागच्छित्ता,करयल जान बद्धावेत्ता एव बयासी-एसण सामी मम विणय- पडिवित्ती, इमा अन्ना मम सामिस्स समुदाणत्ति त्ति कटु आसुरुत्ते वामपाएण पायपीढ अणुक्कमड) પચે પાડવાની સાથે આત્મણ થઈને દ્રૌપદી દેવીને લેવા માટે અત્યારે આવી ગયા છે આ પ્રમાણે કૃષ્ણ-વાસુદેવ વડે કહેવામાં આવેલા વચને સાભળીને હe-તુષ્ટ થઈને તે દારુક સારથીએ તેમની આજ્ઞા સ્વીકારી લીધા સ્વીકારીને તે અમરક કી રાજધાનીમાં પ્રવિણ થયે પ્રવિષ્ટ થઈને તે જ્યા પવ નાભ રાજા હતા તેમની પાસે જઈને સૌ પહેલા તેણે બંને હાથની અતિ બનાવીને અને તેને મસ્તકે મૂકીને નમસ્કાર કર્યો અને જય વિજય શબ્દોથી રાજાને વધામણે આપી ત્યારપછી તેણે આ પ્રમાણે કહેવાની શરૂઆત કરી કે સવામી આ તે મારી વિનય પ્રતિપત્તિ છે તની ફરજ બજાવતા એ + -- . - . . . ५० पालामा हीणपुनचाउदसा !' दीनपुप गर्दगिकः - मध्यपुग्यचातुर्दभिकजन्मा, चतुर्दशीनातो हि भाग्यमान माति । तथा-'मिरी गिरिधी परिवग्निया!' श्री सीधी परिणनित! लक्ष्मी ना पुदि सहित !, मान मामि, किम्बल त्व न जानासि, कणस्य पादेयम्य भगिनी द्रौपदी सीमिद न आणमाणे' रव्यमानयत् , 'त' तन्-तस्मान् ‘एममपि ' पनामपि मानीनामपि आ पूर्व काद् इण्गा ' इत्यस्मात् क्त मत्ययः, 'भार' अयमा ग्यलु 'जुद्र सन्जे' युद्ध सना-युद्धाय सजना सनतः सन् 'गिग्गजाहि' निर्गल-बहिनि.मर एष खलु कृष्णो गामुदेवः पञ्चभिः पाण्डव. मह अपहे' आत्मपष्ठ आत्मा षष्ठो यत्र स समूहे, द्रौपदी देव्या. 'कर' मत्यानयन का हव्यमागत । तू अलब्ध पुण्य चातुर्दशिक जन्म वाला है-तृ-चतुर्दशी में उत्पन्न हुआ नरी हैं-क्यों कि चतुर्दशी के दिन उत्पन्न हुआ व्यक्ति भाग्यशाली होता है किन्तु तू ऐसा नहीं है अर्थात् अभागा है त श्री दी, धुद्धि से रहित है। याद रस-या तो आज त नही है या मैं नही है तुझे यह ख्याल नहीं है कि यह द्रौपदी देवी कृष्ण वासुदेव की वहिन है जिसे तूने यहा हरण करवा कर मगाई है। अतः यदि अपनी कुशल चाहता है, तो तू इस हरण करवा कर अपने यहा मंगवाई गई द्रौपदी देवी को कृष्ण वासुदेव के पास जाकर पीछे वापिस पहुँचा दे। नहीं तो युद्ध के लिये सज्जित होकर र पाल आ। (सण कण्हे वासुदेवे) ये कृष्ण वासुदेव (पचहि पडवेरि अप्परटे दोबई देवीए कूव रव्यमागण, तएण से दारुए सारी कण्हे ण वासुदेवे ण एव धुत्ते વિચારે તેમજ નીચ લક્ષણે યુક્ત) અમને એમ લાગે છે કે તે અલ પુય ચાતુનિક જન્મવાળે છે, એટલે કે તુ ચૌદશને દિવસે જન્મ્યો નથી કેમકે ચૌદશને દિવસે ઉત્પન્ન થનારી વ્યક્તિ ભાગ્યશાળી હોય છે તુ શ્રી, હી અને બુદ્ધિ વગરને છે બરોબર સાભળી લે કે આજે કે તે તું નહિ કે હું નહિ તને એટલી પણ ખબર નથી કે આ દ્રૌપદી દેવી કૃષ્ણ-વાસુદેવની બહેન છે કે જેને તે હરણ કરાવીને અહીં મગાવી છે. હવે જો તુ પિતાનું ભલુ ઈચ્છતે હેય તે , આ હરણ કરાવીને પોતાને ત્યાં રોકી રાખેલી પડી દેવીને કૃષ્ણ-વાસુદેવની પાસે જઈને પાછી સોપી દે નહિતર માટે तैयार थन मार मेहानमा भावी (एस ण कण्हे वासुदेवे) मा वासुदेव ( पचहि पडवेहि अप्पटे दोवई देवीए कूब इव्व . યુદ્ધના दारुए . . अनगारधर्मामृतषिणी टी० अ० १६ द्रौपदचरितनिरूपणम् दारुक सारयिमेवमादी- केवल भोः !' रायसत्येसु ' राजशास्त्रेषु-राजनीतिपु दृतः ' अब झे' अअध्या= न हन्तव्यः, इत्युक्तमस्ति तस्मात् त्वा मुश्चामि इति कृत्वा इत्युक्त्वा त दतम् असत्कार्य, असम्मान्य अपद्वारेण णिच्छुभावेइ' निक्षोभयति-निकासयति, तत खलु म दारुकः सारथिः पद्मनाभेनासत्कार्य यावत्-' णिच्छ्ढे ' निक्षोभित:- निःसारितः समाणे ' सन् , यौन कृष्णो वासुदेवस्तगोपागच्छति, उपागत्य करतलपरिगृहीतदशनख शिरआरतं मस्तकेऽञ्जलि कृत्वा कृष्ण यावद् एमवादीत- जुद्धसज्जो णिगच्छामि,त्ति कटूटु दारय सारय एव वयासी-केवल भो रापसत्येसु ये अवज्झे त्ति कटु असफारिय असम्माणि अवघारेण णिच्छुभावेइ) तप वह पद्मनाभ जब दारुक सारथि ने इस प्रकार कहा तो इकदम क्रोधित होकर त्रिवलि युक्त भूकृटि को माथे पर चढा कर इस प्रकार करने लगा हे देवानुप्रिय ! में द्रौपदी से कृष्णवासुदेव के लिये अर्पित नहीं करता ह-पीछी नहीं देता है- इसके रिये में अभी स्वय ही युद्ध करने को तैयार है। इस प्रकार कहकर फिर उसने उस दारुक सारथि से ऐसा कहा अरे ! राजनीति के शास्त्रों में दूत अवश्य कहा गया है-इस लिये तुझे छोड़ देता है। इस तरह कहकर उसने दूत असत्कृत और असमानित कर पीछे के दरवाजे से याहिर निकलवा दिया ! (तएण दारुए सारही पउमणाभे ण असकारिय जाव णिच्छुढे समाणे जेणेव कण्हे वासुदेवे तेणेव उवा कण्डस्स वासुदेवस्स दोवई, एसण अह सयमेव जुद्धसज्जो णिगच्छामि त्ति दारुय सारहिं एव वयासी-केवल भो ! रायसत्थेमु दूये अवज्झे त्ति कटु अस कारिय असम्माणिय अवद्दारेण णिच्छुभावेइ) દારુક સારથિના આ પ્રમાણે વચનો સાંભળીને મનાભ એકદમ ક્રોધમાં લાલચોળ થઈ ગયે અને ભમ્મરે ચઢાવીને આ પ્રમાણે કહેવા લાગ્યું કે દેવાનુપ્રિય ! હુ કૃષ્ણ-વાસુદેવને દ્રૌપદી કૈઈપણ સ્થિતિમાં સોપવા તૈયાર નથી એના માટે હું અત્યારે પણ યુદ્ધ કરવા તૈયાર છુ આ પ્રમાણે કહીને તેણે દારુક સારથીને કહ્યું કે અરે ! રાજનીતિના શાસ્ત્રોમાં દૂત અવધ્ય કહેવામાં આવ્યું છે એથી તને જ કરૂ છુ આ પ્રમાણે કહીને તેણે દૂતને અદ્ભુત અને અસમાનિત કરીને પાછલા બારણેથી બહાર કઢાવી મૂક્ય (तएण दारुए सारही पउमणाभेण असक्कारिय जाब णिच्छुढे समाणे जेणेव कण्णे वासुदेवे तेणेप उपागच्छइ, उगागच्छित्ता परयल कण्ह जाप एव को आणगि "मुगामि.-सरोन कविता भातक्षिा-आमा'नि कुत्ता आम रुचे' आशुरुषतः शीध्र पोधाविष्ट, यामपादन पादपीठ ' अणुक्मा' मनुका मति, अनुक्रम्य गुन्तामंग लेब-पशि 'पणाम अर्पयति । अपपिस्ता यावत् फर' प्रत्यानयन का रव्यमागतः । नन गलुग पमनामो दारुण सार थिना एवमुक्त' सन् भशुरुणी: सोधानान, पिपलिया रेखात्रययुक्ता भृकुटि-' निडाले 'लाटे-मालमदेशे 'साट्ट' महत्प-उन्नीय, एत्रमवादीव- नो अर्पयामि पल अब दे देशानुपिय कास्य पाटेषम्य द्रौपदीम् , एष खलु आ सपोर युद्धपानो निर्गमित्र युद्धाय पहिनि मरामि इतिकला के कर्तव्य अनुमार मेने यर आपको नमस्कार किया है जय विजय आदि शब्दों दारावपाई दी है-परन्तु मेरे स्वामीकी उनके मुख से आपके लिये जो आज्ञा दी गई है वह इमरी है-और घर इस प्रकार है-इस प्रकार अपने मुख से करकर घर शीघ्र कोर से भर गा, और वामपाद से उसके पादपीठ पर चढ़ गया। (अपपमित्ता) चढ़कर फिर (कोतग्गेण लेर पणामह) फिर उसने उसके लिये फुन्त के अग्रभाग से पत्रिका अर्पित की। (पणामित्ता जाव कृव हवमागए) पत्रिका अर्पित करके यावत् कृष्णवासुदेव पाचो पाटों के साथ यरा द्रौपदी देवी को वापिस लेने के लिये एच-अभी अभी-आये है यह मा समाचार उसे सुना दिया। (तपण से पउमणाभे दानएण साररिणा ण्वयुत्ते समाणे आसु रुत्ते त्तियलिं भिउडि निडाले सारटु ण्व वयासी णो अप्पिणामि, ण अह देवाणुप्पिया ! कण्डस्म वासुदेवस्स दोवई, एस ण अह सयमेव વિનોપચાર માટે નમસ્કાર કર્યો છે તેમજ જય વિજય વિજ્ય શબ્દ દ્વારા તમને વધામણ આપી છે પરંતુ મારા સ્વામીએ તેમના મુખથી તમારે માટે જે કઈ આજ્ઞા આપી છે તે કઈક બીજી જ છે અને તે આ પ્રમાણે છે કે- દૂત આમ કહીને એકદમ ક્રોધમા લાલચોળ થઈ ગયો અને ડાબા પગથી तेना पाहासन ५२ यही गयो (अवक्कमित्ता) यदी (कोतग्गेण लेह पणा मइ) तेथे ने त (HIEL) न ममाथी पनि आधी (पणामित्ता जाव कूर हव्वमागए ) पनि सापाने यावत -पासुदेव पाये पावानी સાથે અહીં દ્રૌપદી દેવીને લેવા માટે અત્યારે આવ્યા છે સમાચારે તેને કહી સંભળાવ્યા (तएण से पउमणाभे दारुयेण सारहिणा एव वुत्ते समाणे आमुरुते त्ति पलि भिउडि निडाले साइट्ठ एव वयासी-णो अप्पिणामि આ જાતના બધા ।
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मनगारधर्मामृतयपिणी टीका अ० १६ द्रौपदीचरितनिरूपणम्
एव वयासी- ह सो दारगा। किन्न तुम्भे पउमनाभेण सद्धिं
जुज्झिहिह उयाहु पेच्छिहिह , तएण ते पंच पंडवा कण्ह
वासुदेव एवं वयासी--अम्हे णं सामी | जुज्झामो तुझे पेच्छह
तएणं पंच पंडवे सपणद्ध जाब पहरणा रहे दुरुहति दुरुहित्ता
जेणेव पउसनाने राया नेणेव उवागच्छ उवागच्छित्ता एव
वयासी--अम्हे वा पउमणाभे वा रायसिक पउमनाभेणं सद्धि
सपलग्गा यावि होत्था, तएण से पउमनाभे राया तं पंच पडवे
खिप्पामेव हयनहिय पवर निवडिय चिन्धद्धूयपडागा जाव
दिसोदिसि पडिसेहेइत्ति, तएणं ते पंच पंडवा पउमनाभण रन्ना
हयमहियपवरनिवडिय जाव पडिसेहिया समाणा अत्थामा
जाव आधारणिज्जत्तिकटु जेणेव कण्हे वासुदेवे तेणेव उवा०,
तएण से कण्हे वासुदेवे ते पच पडवे एवं वयासी--कहाणं
तुम्भे देवाणुप्पिया । पउमणाभेण रन्ना सद्धिं संपलग्गा ?,
तएण ते पच पडवा कण्हं वासुदेव एव वयासी- एवं खल्लु
देवाणुप्पिया । अम्हे तुम्भेहि अव्भणुन्नाया समाणा सन्नद्ध०
रहे दुरुहामोर जेणेव पउमनामे जाव पडिसेहेइ, तएणं से
कण्हे वासुदेवे तं पच पडवे एवं वयासो- जड णं तुम्भे देवाणु
प्पिया । एव क्यता अम्हे णो पउमणाभे रायत्तिकटु पउमना-
भेण सद्धि सपलग्ग ताओ णं तुम्भे णो पउमणाहे हयमहिय
पवर जाव पडिसेहते, त पेच्छह ण तुम्भे देवाणुप्पिया । अहं
नो पउमणाभे रायत्तिकटु पउनाभेण रन्ना सहिं जुज्झामि रहे
५१२ हाताचमेकवार एन पलु भ६ हे पामिन् । युमा पनि यायन् 'पिच्चमा 'निनोमयति- पद्मनाभः शोधारिष्टः सा द्रौपदी न दास्यामीत्युक्त्या दूतो न हन्तव्य इति कृता माममकार्य, ममान्यापद्वारेग निम्मारयति सा इत्यर्थः ॥ २८ ॥ मूरम्-तपण से पउमणाभे चलयाउय सदाइ सदावित्ता एवं वयासी--खिप्पामेव भो देवाणुप्पिया। आभिसेक हस्थिर- यणं पडिकप्पेह, तयाणंतर च ण से बलवाउए छेयायरियउव देसमाविकप्पणा विगापेहिं निउणेहिं जान उवणेइ, तएणं से पउमनाहे सन्नद्ध० अभिसेयं दूरुहइ दुरुहित्ता हयगय जेणेव क्ण्हे वासुदेवे तेणेव पहारेत्थ गमणाए, तएण मे कण्हे वासु देवे पउमणामं रायाण एजमाण पासइ पासित्ता त पंच पडवे गच्छद उपगच्छित्ता करयल. कर जार एव पयासी-एव ग्वल अह सामी ' तुम क्यणेण जाप णिच्छुभावेइ) इस प्रकार जब वह दारुक सारथि पमनाभ के यारा असत्कृत यारत् होकर बाहिर निलया दिया, तय वर वरा से चलकर जी कृपगवासुदेव थे घरा आया । वरा आकर उसने दोनो हरा की अजलि बनाकर और उसे मस्तक पर रखकर कृष्णवासुदेव से इस प्रकार कहा-हे स्वामिन् ? मेंने पद्मनाभ राजा से आपके वचन जैसे ही कहे वैसे ही उसने "क्रोध में आकर " मैं नहीं दूगा दूतमारने योग्य नहीं होता है-इत्यादि कहकर मुझे असत्कृत एवं असमानित कर अपने यहां से पीछे के दरवाजे से याहिर निकलवा दिया है। सूत्र २८॥ वयासी-एव खलु अह सामी । तुम वयणेण जाव णिच्छुमावेइ) આ પ્રમાણે જ્યારે તે દારુક સારથિ પદ્મનાભ રાજા વડે અસત્કૃત યાવત અસ માનિત થઈને બહાર કઢાવી મૂકી ત્યારે તે ત્યાથી બહાર આવીને જયા કૃષ્ણ વાસુદેવ હતા ત્યા આવ્યા ત્યા આવીને તેણે બંને હાથથી અ જલિ બનાવીને અને તેને મસ્તકે મૂકીને કણ-વાસુદેવને આ પ્રમાણે કહ્યું કે હે સ્વામી ! " નાભ રાજાને મે જ્યારે તમારો સ દેશ કહી સંભળાવ્યો ત્યારે સાભળતાની સાથે જ તે ક્રોધમા ભરાઈને બહુ દ્રૌપદી દેવી પછી આપીશ નહિ, થાવત ત અવધ્ય ય છે ” વગેરે વચનેથી અસત્કૃત તેમજ અસામાનિત કરીને મને તેણે પિતાના ભવનના પાછલા બારણેથી બહાર કઢાવી મૂકો मनगारधर्मामृतवपिणी टीका अ० १६ द्रौपदीचरितनिरूपणम् एवं वचासी-ह सो दारगा। किन्न तुम्भे पउमनामेण सद्धि जुज्झिहिह उयाहु पेच्छिहिह , तएण ते पंच पंडवा कण्ह वासुदेवं एवं बयासी--अम्हे णं सामी | जुज्झामो तुभ पेच्छह तएणं पंच पंडवे सपणद्ध जाव पहरणा रहे दुरूहति दुरुहित्ता जेणेव पउमनाभे राया नेणेव उवागच्छद उवागच्छित्ता एव वयासी--अम्हे वा पउमणाभे वा रायत्तिकटु पउमनाभेणं सद्धि संपलग्गा यावि होत्था, तएण ले पउमनाभे राया त पंच पडवे खिप्पामेव हयमहिय पवर निवडिय चिन्धधूयपडागा जाव दिसोदिसि पडिसेहेइत्ति, तएणं ते पंच पंडवा पउमनाभण रन्ना हयमहियपवरनिवडिय जाव पडिसेहिया समाणा अत्थामा जाव आधारणिज्जत्तिकदृ जेणेव कण्हे वासुदेवे तेणेव उवा०, तएण से कण्हे वासुदेवे ते पंच पंडवे एवं वयासी--कहणणं तुम्भे देवाणुप्पिया । पउमणाभण रन्ना सद्धि संपलग्गा , तएण ते पच पडवा कण्ह वासुदेव एव वयासी- एवं खल देवाणुप्पिया । अम्हे तुम्भेहि अन्भणुन्नाया समाणा सन्नद्ध० रहे दुरुहामोर जेणेव पउमनाभे जाव पडिसेहेइ, तएणं से कण्हे वासुदेवे तं पच पडवे एव वयासो--जइ णं तुम्भे देवाणु प्पिया । एव श्यता अम्हे णो पउमणाभे रायत्तिकटु पउमना- भेण सद्धि सपलग्गं ताओ णं तुम्भे णो पउमणाहे हयमहिय. पवर जाव पडिसेहते, त पेच्छह णं तुम्भे देवाणुप्पिया । अहं नो पउमणाभे रायत्तिकट्ठ पउनाभेण रन्ना सद्धिं जुज्झामि रह .
- पाताघमारे दुरुहइ दुरुहिता जेणेव पउमना गया तेणेव उवागच्छइ उवागच्छित्ता सेय गोसीरहारधवल तणसोटियसिंदुवारकुदेंदुम निगासं निययनलस्त हरिसजणणं रिउमण्णविणासकर पत्र जपणं सख परामुसइ परामुसित्ता मुहवायपुरिय करेइ, तएण तस्स पउमणाहस्स तेणं सससदेणं वलइभाप हयजाव पडिसेहिए, तएणं सेकण्हे वासुदेवे धणु परामुसइवेढो धणु पूरेड पूरित्ता धणुसदं करेइ, तएण तस्स पउमनाभस्त दोचे वलइभाए तेण धणुसद्देण हयमहिय जाव पडिसेहिए, तएण से पउमणाभेराया तिभाग वलावसेसे अत्थामे अवले अवीरिए अपुरिसरकारपरक्कमे अधारणिज्जत्तिकह सिग्धं तुरिय जेणेव अमरकका तेणेव उवा- गच्छइ उवागच्छित्ता अमरकक रायहाणि अणुपविलइ अणुप विसित्ता दाराइ पिहेइ पिहित्ता रोहसज्जे चिट्टइ, तएण से कण्हे वासुदेवे जेणेव अमरकका तेणेव उवागच्छइ उवागच्छित्ता रह ठवेइ ठवित्ता रहाओ पच्चोरुहइ पच्चोरुहित्ता बेउब्वियसमु ग्घाएणसमोहणइ,एगं मह णरसीहरूव विउव्वइ विउवित्ता महया महया सद्देणं पादददरयं करेइ, तएण से कण्हेण वासुदेवेण महया महया सद्देणं पाददद्दरएण कएण समाणेणं अमरकका रायहाणी सभग्गपागारगोपुराट्टालयचरियतोरणपल्हथियपव- रभवणसिरिघरा सरस्सरस्स धरणियले सन्निवइया, तएण से पउमणाभे राया अमरकक रायहाणि सभग्ग जाव पासित्ता भीए दोवईए देवीए सरणं उवेइ -सा अनगारधर्मामृतपिणी टी० अ० १६ द्रौपदीचरितनिरूपणम्द दोवईदेवी पउमनाभ रायं एव वयासी- किण्णं तुम देवा- णुप्पिया ! न जाणसि कण्हस्त वासुदेवस्स उत्तमपुरिसस्त विप्पियं करेमाणे मम इहं हव्वमाणेसि, तं एवमवि गए गच्छह ण तुम देवाणुप्पिया । पहाए उल्लपडसाडए अवचूलग- क्थणियत्ये अतेउरपरियालसपरिवुडे अग्गाइ वराई रयणाई गहाय मम पुरओ काउं कण्ह वासुदेवं करयलपायपडिए सरणं उहि, पणिवइयवच्छला ण देवाणुप्पिया । उत्तमपुरिसा, तएणं से पउसनाभे, दोवइए देवीए एयमह पडिसुणेइ पडिसुणित्ता पहाए जाव सरणं उवेइ उवित्ता करयल० एवं व्यासी-दिहाण देवाणुप्पियाण इड्डी जाव परक्कमे तं खामेमि णं देवाणुप्पिया। जाव खमंतु णं जाव णाह भुज्जोर एवं करणयाएत्तिकह पंज- लिवुडे पायवडिए कण्हस्स वासुदेवस्स दोवइ देवि साहस्थि उवणेइ, तएण से कण्हे वासुदेवे पउमणाभ एव वयासी ह भो पउमणाभा । अप्पत्थियपत्थिया४ किपण तुम ण जाणसि मम भगिणि दोवइदेवी इह हबमाणमाणे त एवमवि गएणस्थि ते ममाहि तो इयाणि भयमस्थि तिकटुपउमणाभं पडिविसज्जेइ पडिविसज्जित्ता दोबइ देवि गिव्हइ गिण्हित्तारह दुरूहेइ दुरूहित्ता जेणेत पच पडवे तेणेव उवागच्छइ उवागच्छित्ता पचण्हं पडवाणं दोवइ देवि लाहत्थि उवणेइ,तएणसे कण्हे पचहि पंडवेहि सद्धिं अप्पछट्टे छहि रहेहि लवणसमुद्द मज्म मझेण जेणेव जबूहीवे दीवे जेणेव भारहे वासे तेणेव पहारेत्थ गमणाए ।। स० २९॥ --- HEME the -- आतापमण्याल टीका-'तएण से ' इत्यादि । तवा पलु रा पानाम: 'पलगाउप' बन्या पृत-सैन्यनायफ शब्दयति, शन्दयित्या एयमराटीन्-शिममेर-भोप्रमेव मो देवानुप्रिय ! 'आमिसेमा आमिग्य प्रगान गिरता परिकप्पड' प्रतिक ल्पय सुसज्जित फुर, बदनन्तर प स यग्यात गलु "गायरियउत्रदेममा विकप्पणागिप्पेहि " छेकाचार्योपशमतिविपनाविकल्पः-तत्र छका-निपुणः, आचार्य'-कलाशिक्षक , तम्योपरगाद् या मति 'विस्तस्या किल्पना-विचारणा, तज्जनितो सिल्प.-विशिष्ट रचनाशक्तिर्यपांव, 'जार उपणेई' यावद् उपत. -तण्ण से पउमणामे इत्यादि । टीपार्थ-(तण्ण) इसके बाद (से पउमणाने) उन पद्मनाभ राजा ने (पलवाउय सद्दावेह ) अपने सन्य नायक को तुलाया (सदायित्ता) और घुलाकर फिर उनसे (ण्य चयासी) इस प्रकार कहा-'विप्पामेव भो देवाणुप्पिया! आभिसेवक हत्विरयण पटिकप्पेर) हे देवानुप्रिय ! तुम शीघ्र ही प्रधान रस्तिरत्न को समजित करो। (तयाणतर च ण से पलवाउरा छेयायरिय उबदेसमा विकप्पणा विगप्पेहि निउणेहिं जाव उवणेइ) इसके याद उस सैन्य नायक ने निपुणफला शिक्षक के उपदेश से प्राप्त बुद्धि की कल्पना से उत्पन्न हुई है विशिष्ट रचना की शक्ति जिन्हों को ऐसे मनुष्य से कि जो गोमा करने में अत्यन्त निपुण थे उस हस्तिरत्न को सुसज्जित करवाया। जर उन्हो ने उस रस्तिरत्न को चम कीले निर्मल वेप से शीघ्र परिवस्त्रित-करदिया। वनाच्छादन द्वारा तएण से पउमणाभे इत्यादि- साथ-(तएण) त्या२पछी (से पउमणा) ते पनाम लिये (बलवाव्य सहावेइ ) पोताना सैन्य नायने मोलायो (सहावित्ता ) भने महावीन तन ( एव वयासी) मा प्रभाले यु है (जिप्पामेव भो देवाणुप्पिया ! आभिसेक हत्थिरयण पडिकप्पेह) हे कानुप्रिय ! तमे सपरे प्रधान अस्तित्तने सुस । (तयाण तर च ण से बलवाउए छेयायरियउबदेसमइविकप्पणा विगप्पेहि निउणेहि जाव आणेइ) त्या२पछी सैन्य नायडे निपु४ाशिक्ष કના ઉપદેશથી જેમણે વિશિષ્ટ રચના માટે બુદ્ધિ તેમજ કપને શક્તિ મેળવી છે, તેમજ શ્રુગાર કલામાં જેઓ અતી ચતુર છે તેવા માણસે વડે હસ્તિનને સુસજિજત કરાવ્યું. જ્યારે સત્વરે તેમણે તે હસ્તિત્વને ચમકતા નિર્મળ થી પરિવશ્ચિત કરી દીધે-વારછાદન વડે આચ્છાદિત પીને સુ , " भनगारधर्मामृतवर्षिणी टीका म० १६ द्रौपदीचरितनिरूपणम् यति-अत्र यावच्छन्देनैन बोध्यम्-सुनिउणेहि नरेहिं हत्थिरयण परिकप्पेट, उज्ज- लनेवत्थ इन्वपरिवस्थिय सुसज्ज इत्यादि परिकप्पित्ता' इति सुनिपुणैः शोभा करणचतुरैः, नरैर्हस्तिरत्न परिकल्पयति-शोभयति किं भूतं हस्तिरत्न-उज्ज्वल- नेपथ्यहव्यपरिवरित उज्ज्वलनेपथ्येन-द्युतिमन्निर्मल वेपेण शीत परियस्त्रितः वस्त्राच्छादनमुशोभिवः, तथा-सुसज्ज-घण्टाभरणादिभि. समल्ड्कृत, एव परि कल्प्य सरलव्यापूतः पद्मनाभनृपस्यान्ति के त हस्तिरत्नमुपनयति, आनयति । तत खलु स पद्मनाभः सन्नद्धबद्धर्मितकरच - आभिपेश्य हस्तिरत्न दृरोहति- आरोहति दुरुह्य हयगजस्यपदातिपरित यत्रैव कृष्णो वासुदेवस्तव मापारयद् गमनाया तत खलु स कृष्णो वासुदेवः पद्मनाभ राजानम् एजमानम् आगच्छन्त पश्यति । दृष्ट्वा च तान् पञ्च पाण्डवान् एवमवदत-ह भो ! दारकाः भो वत्सा ! आच्छादित कर सुशोभित करदिवा-अर्थात्-झूल वगैरह डालकर उसे पछुत अच्छी तरह सजा दिया, तथा घटा आभरण आदि से उसे अल कृत करदिया, तब वह सैन्य नायक उस हस्ति रत्न को लेकर पद्मनाभ रोजा के पास पहुँचा (तएण से पउमणाभे सन्नद्ध० अभिसे य० दूरुहइ, दूरहित्तो हयगर जेणेव कण्हे वासुदेवे तेणेव पहारेत्य गमणाए, तएणं से कण्हे वासुदेवे पउमणाभरायाण राजमाण पोसइ पासित्ता ते पच पडवे एव चयासी) इसके बाद वह पद्मनाभ राजा सन्नद्ध, पद्ध, यर्मित कवच चाला होकर उस प्रधान हस्तिरत्न पर आरूढ हो गया और आरूढ होकर स्य, गज, रय, एव पैदल सैन्य को साथ लेकर जरा कृष्णवासुदेव थे उस और चल दिया। जब कृष्णवासुदेव ने पमनाभ राजा को आता हुआ देखा तो देखकर उन्हो ने पाच पाडवो से ऐसा कहा-(ह भो ભિત કરી છે એટલે કે સ્કૂલ વગેરે નાખીને બહુ જ સરસ રીતે સુસજ્જિત કરી દીધે તેમજ ઘટ, આભરણે વગેરેથી તેને અલકૃિન કરી દીધો ત્યારે તે અન્ય નાયક તે હસ્તિત્વને લઈને પદ્મનાભ રાજાની પાસે ગયે (तएण से पउमणाभे सनद्ध० अभिसेय० दृम्हइ दूरूलित्ता हयगय जेणेव फण्हे वासुदेवे तेणे पहारेत्य गमणाए, तएण से कण्हे वासुदेवे पउमणाभरायाण एज्जमाण पासइ, पासित्ता ते पच पडरे एव वासी) ત્યારપછી તે પદ્મનાભ રાજા કવચ તેમજ બીજા રાસ્ત્રોથી સજ્જ થઈને તે પ્રધાન હસ્તિન ઉપર સવાર થઈ ગયે અને સવાર થઈને ઘેડા, હાથી, રથ અને પાયદળ સેનાને સાથે લઈને કૃષ્ણ-વાસુદેવ હતા તે તરફ રવાના થયે કૃષ્ણ-વાસુદેવે જ્યારે પદ્મનાભ રાજાને આવતે જે ત્યારે તેને જોઈને પાંચે - MAT - . ५१६ भाताचा टीका-'तपण से' इत्यादि । रात. गलस पानाः 'परमाउय' वरूपा पृत-सैन्यनायक शब्दपति, गन्दपित्या पयमराठी-शिममेर-शीघ्रमेव भो देशानुप्रिय ! ' आमिसेम आभिपेश्य प्रान हस्तिरस्न पटिरप्पेह' प्रतिक ल्पय मुसजित पुरू, तदनन्तर न स परल्याप्त बलु "गायरियउबदेममह विकप्पणाविगप्पेहि " छेकाचार्योपदेशमतिविपनाविपत्पा-तत्र :-निपुणः, आचार्य:-क्लाशिक्षक , तस्योपदेशाद् या मवि 'दिस्तस्या किल्पना-विचारणा, तज्जनितो रियल्प -विशिष्ट सनाशक्तिपात, 'नार उपणेड' यावद् उपत -तपण से पउमणामे इत्यादि । टीपार्थ--(तपण) इसके बाद ( से पउमणाने) उन पद्मनाभ राजा ने (पलधाउय सद्दावे ) अपने सेन्य नायक को बुलारा (महावित्ता) और घुलाकर फिर उनसे ( चयासी) इस प्रकार का-(विप्पामेव भो देवाणुप्पिया! आभिसेक रत्थिरयण पडिकपेट) हे देवानुप्रिय । तुम शीघ्र हरी प्रधान हस्तिरत्न को सुसज्जित करो। (तयाणतर च ण से पलवाउरा छेयायरिय उवदेसमइ विरुप्पणा विगप्पेति निउणेहिं जाव उवणेइ) इसके बाद उस सेन्च नायक ने निपुणाला शिक्षक के उपदेश से प्राप्त बुद्धि की कल्पना से उत्पन्न हुई है विशिष्ट रचना की शक्ति जिन्हों को ऐसे मनुष्य से कि जो गोमा करने में अत्यन्त निपुण थे उस हस्तिरत्न को सुसज्जित करवाया। जब उन्हो ने उस हस्तिरत्न को चम कीले निर्मल वेप से शीघ्र परिवस्त्रित-करदिया। वनाच्छादन द्वारा तएण से पउमणाभे इत्यादि- 2014-(तएण) त्या२५७ (से पउमणाभे) त पानाम शलमे (बलवाव्य सद्दावेइ ) पोताना सैन्य नायने मालाव्यः (सहावित्ता ) मने मोबापान ने (एव वयासी) मा प्रभाएं ४यु (निप्पामेव भो देवाणुप्पिया! आभिसेक हत्थिरयण पडिकप्पेह ) वानप्रिय ! तमे सावरे प्रधान अस्तित्तने सुस । ( तयाण तर च ण से बलवाइए छेयायरियउबदेसमइविकप्पणा विगप्पेहि निउणेहि जाव उणे) या अन्य नाय Ayy शिक्ष કના ઉપદેશથી જેમણે વિશિષ્ટ રચના માટે બુદ્ધિ તેમજ કપના શક્તિ મેળવી છે, તેમજ શ્રુગાર કલામાં જેઓ અતી ચતુર છે તેવા માણસે વડે હરિત્નને સુસજિજત કરાવ્યું. જ્યારે સત્વરે તેમણે તે હસ્તિનને ચમકતા નિર્મળ વેવથી પરિવઅિત કરી દીધા-આચ્છાદન વડે આચ્છાદિત ' સશે m , . मैनगारधर्मामृतवपिणी टीका म० १६ द्रौपदीयरितनिरूपणम् ५९७ यति-अत्र यापच्छब्देनैव पोध्यम्-मुनिउणेहि नहिं हत्थिरयण परिकप्पेट, उज्ज- लनेवत्थ इन्बपरिवत्थिय सुसज्ज इत्यादि परिकप्पित्ता' इति सुनिपुणे. शोभा करणचतुरैः, नरैईस्तिरत्न परिकल्पयति-शोभयति किं भूत हस्तिरत्न-उज्ज्वल- नेपथ्यहव्यपरिवखित उज्ज्वलनेपथ्येन-द्युतिमन्निर्मल वेपेण शीत्र परिवस्त्रितः वस्त्राच्छादनमुशोभितः, तथा-सुसज्ज-घण्टाभरणादिभि. समल्ड्कत, एर परि कल्प्य सरलच्यापूतः पद्मनाभनृपस्यान्ति के त हस्तिरत्नमुपनयति, आनयति । तत खलु स पद्मनाभः सन्नद्धबद्धर्मितकरच - भाभिपेक्य हस्तिरत्न दूरोहति- आरोहति दुसह्य हयगजरवपदातिपरिवृत यत्रैव कृष्णो वासुदेवस्तत्रैव मापारयद् गमनाय। तत खलु स कृष्णो वासुदेवः पद्मनाभं राजानम् एजमानम् आगच्छन्त पश्यति । दृष्ट्वा च तान् पञ्च पाण्डवान् एवमवदत-हं भो ! दारकाः भो वत्सा ! आच्छादित कर सुशोभित करदिया-अर्थात्-झूल वगैरह डालकर उसे घात अच्छी तरह सजा दिया, तथा घटा आभरण आदि से उसे अल कृत कर दिया, तब वह सैन्य नायक उस हस्ति रत्न को लेकर पद्मनाभ रोजा के पास पहुँचा (तएण से पउमणाभे सन्नद्ध० अभिसेय० दूरहइ, दूरहित्तो हयगत जेणेव कण्हे वासुदेवे तेणेव पहारेत्थ गमणाए, तएण से कण्हे वासुदेवे पउमणाभरायाण एज्जमाण पोसइ पासित्ता ते पच पडवे एव ययासी) इसके याद पर पद्मनाभ राजा सन्नाद्ध, यद्ध, वर्मित चाला होकर उस प्रधान हस्तिरत्न पर आरूढ हो गया और आरूढ रोकर त्य, गज, रथ, एव पैदल सैन्य को साथ लेकर जरा कृष्णवासुदेव थे और चल दिया। जब कृष्णवासुदेव ने पद्मनाभ राजा को आता हुआ देखा तो देखकर उन्हो ने पाच पाडवो से ऐसा कहा-(ह भो બિત કરી દીધા એટલે કે ઝવ વગેરે નાખીને બહુ જ સરસ રીતે સુસજ્જિત કરી દીધે તેમજ ઘટ, આભરણે વગેરેથી તેને અલકૃન કરી દીધો ત્યારે તે સૈન્ય નાયક તે હસ્તિનને લઈને પદ્મનાભ રાજાની પાસે ગયે (तएण से पउमणाभे सन्नद्ध० अभिसेय० दृम्हइ दूरुहिता हयगय जेणेच कण्हे वासुदेवे तेणेच पहारेत्य गमगाए, तएण से कण्हे वासुदेवे पउमणाभरायाण एज्नमाण पासइ, पासित्ता ते पच पडरे एव वासी) ત્યારપછી તે પદ્મનાભ રાજા કવચ તેમજ બીજા રાઓથી સજજ થઈને તે પ્રધાન હસ્તિન ઉપર સવાર થઈ ગયે અને સવાર થઈને ઘેડા, હાથી, રથ અને પાયદળ સેનાને સાથે લઈને કૃષ્ણ-વાસુદેવ હતા તે તરફ રવાના થયે કૃષ્ણ-વાસુદેવે જ્યારે પદ્મનાભ રાજાને આવતો જે ત્યારે તેને જોઈને પાંચ . कवच सिं खलु यूय पमनामेन साथ 'मुगिहिह 'गुपथ ! 'यार' उताणे-अपमा 'पेल्लिदिन मे, ततः गत पा पाडाग वामदेवमेवमया दीत-पय गल्लु दे सामिन ! गुपामा, यूप मेश पम् । ततः स पत्र पाठवाः सनद पद्धमितापचा यार गृहीतायुधप्रहाणाः रसाना स रथोपरि दूरो हन्ति आरोहति दरोग यर पमनामी गना रागोपागन्ति, उपागत्य एवं मपटन्-'अम्हे या पउमगाभेपा गया' या नाम पमनामी वा राजा, इति दारगा! किन्न तुम्भे पउमनामेण मनि जन्मिरिर उह पेच्छिहिए? तपण ते पटना कपणं वासुदेव पर यामी) हे वत्सो! क्या तुमलोग पद्मनाभ के माध युद्ध करोगे-या युद्ध को देगोगे ? तय उन पाइयो ने कृष्ण वासुदेव से इस प्रकार कहा-(अम्रेण सामी ! जुमामो, तुम्मे पेच्छर, तण्ण पच पडवे सनद्ध जाय पररणा रहे दुरूहति, दुरुहिता जेणेव पउमणाभे राया तेणेव ज्यागच्छति उवागविता एव वयासी, अम्हे चा पउमणाभे या रायत्ति कट पउमणाभेण सद्धि सपरग्गा यावि होत्या) हे स्वामिन् ! हम तो युद्ध करेंगे-आप उस का निरीक्षण करें। इसके बाद वे पाचो पाडव सनद्वद्धवर्मित कवचबाले होकर यावत् आयुध प्रहरणों को ले २ कर अपने २ रथों पर सवार हो गये। सधार शेकर फिर वे जहा पद्मनाभ रोजा थे-उस और गये-वहां जाकर उन्हों ने पद्मनाभ राजा से इस प्रकार कहा-या तो आज हम नहीं या पन १४ाने मी प्रमाणे धु-(ह भो दारगा। किन्न तुमे पउमनाभेण सद्धि जुज्झिहिह उया पेन्छिहिह ? वएण ते पच पहवा कण्ह वासुदेव एव वयासी) હે વત્સ! શું તમે પદ્મનાભ રાજાની સાથે મેદાને ઉતરશે કે ફક્ત યુદ્ધને જશે ત્યારે તે પાડએ કૃષ્ણ-વાસુદેવને આ પ્રમાણે કહ્યું કે- (अम्हेण सामी ! जुज्झामो, तुम्भे पेच्छह, तएण पच पडवे सन्नद्ध जाव पहरणा रहे दुरूहति, दुरूहित्ता जेणेव पउमणाभे राया तेणेव उवागन्छति, उवा गन्छित्ता एप वयासी, अम्हे या पउमणाभे या रायत्ति बटु पउमणाभेण सदि मपलगा यावि होत्था) હે સ્વામી! અમે તે યુદ્ધ છેડીશુ, તમે અમારા યુદ્ધને જુઓ ત્યાર પછી તે પાચે પાડ કવચથી સુસજજ થઈને આયુધ પ્રહરને લઈને પિતા પિતાના રથ ઉપર સવાર થઈ ગયા સવાર થઈને તેઓ પદ્મનાભ રાજા તરફ પદ્મનાભ રાજાની પાસે પહોંચીને તેણે આ પ્રમાણે કહ્યું કે- આજે કા તો અમે નહિ અને કા પદ્મનાભ નહિં ” પદાનાભ રાજાની સાથે યુદ્ધ કરવા લાગ્યા ૨વીના થયા આમ કહીને તેઓ . अनगारधर्मामृतबिंगो टी० २० १६ द्रौपदी चरितनिरूपणम् कृत्वा-इत्युक्त्वा-पद्मनाभेन साध योद्धु संप्रलग्नाश्चाप्यभवन् , तत खलु स पध नाभो राजा तान् पञ्च पाण्डवान् शिममेर 'इयमहियपवरनियडियचिन्धद्धयपड़ागा' हयमथितमवरनिपतितचिहध्वजपताकान्-तत्र हया'-अश्या मथिता-पीडिताः, भवरा:-प्रशस्ताः, चिह्न बजपताका निपातिता येपा तान् , शस्त्रास्त्रप्रहारजनित माप्तान् इत्यर्थः, यानद् दिगो दिश-सर्वतः ‘पडिसेहेइ' प्रतिपेश्यनि-प्रतिनिवर्त- यति स्मेत्यर्थः । ततः खलु ते पञ्च पाण्डवाः पद्मनाभेन राजा हयमथितमवरनिप तित यावत् प्रतिपेधिताः सन्तः अत्यामा' अस्थामान:-बलरहिता, 'जाव अधारगिज्जा' अन यापच्छन्देन-'अबला अपीयर्या' इत्यनयोः सग्रहः । अमला:- नाम राजा ही नही" ऐसा कहकर वे पद्मनाभ राजा के साथ युद्ध करने में सलग्न हो गये। (तएणं से पउमनाभे राया ते पच पडवे खिप्पामेव यमहियपवर निवडिय जाव पडिसेहिया, समाणा, अत्थामा जाव अधारणिज्ज त्ति कटु जेणे कण्हे वासुदेवे तेणेव उवा०, तएण से वासुदेवे ते पच पडवे एवं चयामी कहाणं तुम्भे देवाणुप्पिया ! पउमना- भेण रन्ना सद्धिं सपलग्गा? तएण ते पच पडवा कण्ह वासुदेव एव वयासी-एव खलु देवाणुप्पिया! अम्हे तुम्भेहिं अभणुन्नाया समाणा सन्नद्ध० रहे दुल्हामो २ जेणेच पउमणाभे जाव पडिसे हेइ ) तय पद्म नाम राजा ने उन पांचो पाडवो को चट्टत जत्दी पीडित घोडों वाला एच निपातित प्रशस्त चिह्नध्वज पताका चाला कर दिया। यावत् एक दिशो से दूसरी दिशा में जाने से भी उन्हें रोक दिया अथवा-एक दिशा से दूसरी दिशा में ग्वदेड दिया। इस तरह वे पाचो पाडव पद्म नाभ राजा के द्वारा पीडित घोडोवोले, एव निपातित प्रशस्त चिह्न ध्वज पताका वाले जर बन गये और एक दिशा से दूसरी दिशा में जाने से रोक दिये गये-अथवा खदेड़ दिये गये तथ घलरहित बनकर यावत् (तएण से पउमनाभे राया ते पच पडवे खिप्पामेव हयमहियपार निर- डिय जाब पडिसेहिया समाणा, अत्थामा जाब अधारणिज्ज ,ति क्टु जेणेव कण्हे वासदेवे तेणेप उवा०, तएण से कण्हे वामदेवे ते पच पडवे ऐव वयामी कहाण तुम्भे देवाणुप्पिया ! पउमनाभेण रत्ना सद्धिं सपलग्गा ' तएण ते पच- पडवा कण्ह वासुदेव एव नयासी-एव खलु देवाणुप्पिया । अम्हे तुम्भेहि अन्मणु- भाया समाणा सनद्व० रहे दुरूहामो २ जेणेव पउमणाभे जाव पडिसेहेड) ત્યારપછી પદ્મનાભ રાજાએ તે પાચે ૫ડને છેડા વખતમાં જ પીડિત ઘોડાઓવાળા તેમજ નિપતિત પ્રશસ્ત ચિહવજ પતાકાવાળા બનાવી દીધા થાવત એક દિશામાથી બીજી દિશા તરફ જઈ શકે નહિ તેમ તેઓએ રસ્તા રોકી લીધે અથવા તે એક દિશામાથી બીજી દિશા તરફ ભગાડી મૂક્યા આવી - . ५९० हातापक्षया सम्पहीना. अत्रीपा-पान्तरिफक्तिरहिता, उसादीनाप तया-अधा रणीयामात्मान रणभूमो भागिनुपगताः, इति कथा-ति रिवार्य: यौन कागो मासुदेवस्कीयोपागनि । नः पातु ग यो रेषस्तान् पश्च पाण्डान् एम पक्ष्यमाणप्रकारेण, आरी-माण कथ पल यूप हे देवानु मियाः ! पद्मनाभन राना साध गोषु ममगना. १, TTः ग्यलु से पच पाण्डवाः कृष्ण वागुरे गमे उमगीन्- यो देशानुमिया' ! य युप्माभिरभ्यनुज्ञाताः सतः सनद पद्धर्मितयाग रयान् ' दुगहामो ' दूरोदामः-आरोहामः आम्दी, आस्थ याच पानामस्तीप गया युद्धाय सपनाः ततः परामय प्राप्ता यावन् प्रतिपेधिता' इति । तत' सहस कृप्यो रासुदेवन्तान् प7 पाण्डवान् एमवा रणभूमि में अपने आपको दीका ने में भी असमर्थ जानकर जहा कृष्ण वासुदेव थे वहाभाये । वहा पहुँच तेही कृष्णवासुदेवने उनसे-उन पांचो पाडयों से-उम प्रकार फरा-जय आपलोग पराजित हो गये तो पत्र नाम राजा के साथ युदरत एप-लड़े-तर उन पायो पाडवो ने कृष्ण वास्तुदेव से इस प्रकार कहा, हे देशानुप्रिय! हमलोगो ने आप से अभ्य नुज्ञात होकर ही करच आदि से सुसजित हो रधों पर आरोहण किया, और आगेहग कर जहा पानाभ राजा था वहां हमलोग पहुंचे। वहा पहुँचकर हमलोग उनके माय युद्धरत हो गये। याद में पराजित हो गये। और पराजित होकर फिर ऐसे बन गये जो उसने हमें एक दिशा से दूसरी दिशा में खदेड दिया या जाने से रोक दिया। (तएण से कण्हे वासुदेवे ते प प ) तव कृष्णवासुदेव ने उन पाचो पांडवो से પરિસ્થિતિમાં લાચાર થઈને યાવત્ યુદ્ધભૂમિમા પિતાની જાતને ટકાવી શકે વામાં પણ અસમર્થ જાણીને પા પા જ્યા કૃષ્ણવાસુદેવ હતા આવ્યા ત્યા પહેચતા જ કણ-વાસુદેવ પાસે પડને આ પ્રમાણે કહ્યું કે તમે લેકે પડનાભ રાજાની સાથે યુદ્ધરત થઇને પરાજીત થઈ ગયા છે ત્યારે તે પાચે પાડએ g-વાસુદેવને આ પ્રમાણે કહ્યું કે હે દેવાનુપ્રિયા અને બધા આયની આજ્ઞા મેળવીને કવચ વગેરેથી સુસજિજત થઈને રથ ઉપર સવાર થયા સિવાર થઈને અને ત્યા પદ્મનાભ રાજા હતું ત્યાં ગમે ત્યાં પહેરીને અમે બધા તેની સાથે યુદ્ધ કરવા લાગ્યા અને તેને પરિણામે અમે હારી ગયા છીએ હાર પામીને અમે એવી ભય કર પરિસ્થિતિમા સપડાઈ ગયા હતા કે જેથી એક દિશા તરફથી બીજી દિશા તરફ જવા પણ અર્થ થઈ ગયા અથવા તે તેણે અમને એક દિશામાથી બીજી દિશા તરફ ભગાડી भूया छे (तएण से कण्हे वासुदेवे ते प प ) त्यारे -वासुदेव ते पाय પાડાને આ પ્રમાણે કહ્યું કે- - . मनगारधर्मामृतषिणी टी०म० १९ नौपदीचरितनिरूपणम् दी-यदि खलु यूय हे देवानुप्रियाः ! पूर्वमेव वक्तारो भात, 'अम्हे,' णो पउनाभे राया' इति 'चय भवामः, नो पद्मनाभो राजा' इति " वयगेवजेप्यामो न तु पद्मनाभो राजा' इत्यवः तया-यदि पूनम्-इति कृत्वा इत्येव निश्चय मनसि निवाय, पानाभेन सा 'सपलग्गता' युद्धाय समलग्ना भनत, ' तो ण तर्हि खलु ' तुम्भे, णो पउमणाहे ' यूय नो पझनाम =यूयमेव जेतारो भवेत, न तु पद्मनाभः, तथा यूय त हयथितश्वरनिपतित चिह जपताक यावत्-पद्मनाभ 'पडिसेहते ' पतिपेपत-प्रतिनिवर्तयेत । तत्-तम्मात् 'पेच्छद ' प्रेक्षध्व, ग्वलु इस प्रकार का-(जहण तुम्भे देवाणुप्पिया! एव वयता अम्हे णो पउ- मणाभे राय त्ति कट्टु पउमनाभेण सदि सपलग्गताओ णं तु णो पउमणाहे, त्य-महिय-पवर-जाव पडिसेहते, त पेच्छह ण तुम्भे देवा णुप्पिया! अहणो पउमणाभे राय त्ति कटु पउमनामेण रन्ना सद्धिं जुज्जामि, रद दुरहह, दुरुहिता जेणेच पउमणाभे राया तेणेव उवाग- च्छइ उवागच्छित्ता सेय गोपीरहारधवलतणसोल्लियसिंदुबारकुदे दु सन्निगास निययालरम हरिसजणण रिउसेण्णविणासकर पचजण्ण सस परामुमह ) हे देवोनुप्रिय ! तुम तो पहिले ऐसा करते थे कि हम जीतेंगे, पद्मनाभ राजा नही जीतेगा और ऐसा ही मन मे विचार कर-निश्चय कर-तुमलोगों ने पद्मनाभ राजा के साथ युद्ध करना भारभ किया-तो तुमलोगो को ही जीतना चाहिये था। पद्मनाभ राजा को नही-और तुम्हीं लोग उसे पीडित घोडो वाला व निपातितप्रश- (जइण तुम्भे देवाणुपिया ' एव वयता अम्हे जो पउमणाभे राय त्ति कटु पउमनाभेण सद्धिं सपलग्ग ताओण तुम्भे णो पउमणाहे, हयमहियपवर जाव पडिसेहते, त पेच्छह ण तुम्भे देवाणुप्पिया । अह णो पउमणाभे रायत्ति कह पउमनाभेण रन्ना सद्धिं जुझामि, रह दुरूहइ, दुरुहिता जेणेच पउमणाभे राया तेणेव उवागच्छइ, उपगच्छित्ता सेय गोपीरहारधवलवणसोड़ियसिंदुपार कुदेंदु सन्निगास निययवलस्स हरिमजणण रिउसेण्णविणासकर पचनण्ण सख परामुसइ) હે દેવાનુપ્રિય! તમે તે પહેલેથી જ આ પ્રમાણે કહેતા હતા કે અમેજ જીતીશુ, પદ્મનાભ રાજા છતશે નહિ અને આ પ્રમાણે વિચાર કરીને જ તો લેએ પાનાભ રાજાની સાથે યુદ્ધની શરૂઆત કરી હતી, આવી પરિસ્થિમા તે તમારે જીત મેળવવી જોઈએ પદ્મનાભ રાજાની જીત નહિ થવી જોઈએ તમે કે તેને પીડિત શેઠાઓવાળો બનાવત, તમને તે નહિ પણ આ બધી તમારી મનની ઈચ્છા સફળ થઈ શકી નહિ એથી હે દેવાનુપ્રિયે ! હવે જુઓ, ६६६ - ५२२ जाताधर्मक्या यूय हे देशानुमियाः ।। अद नो पउमणागगगा मह नो पमनामो रामा अहमेव जेता ममामि, न तु पानामो गना, पमनामेन रामा सा पुयामि, इत्युपत्ता पदुमदद रोदति-भारी- गण पामुढे एम नाभेन सह योधु रथमाम्मान इत्यर्थः। माय पानाभो राजा तौलो पागच्छति, उपागत्य 'भेग -गोपीग्दास्थल गोदुग्नान-दाराब धवल शुक्ल । तगमोल्लिपमिदारहदमनिगास । तमोलिया। मल्लिका अप देशीयः शादः मिन्दुरारो-निर्गुण्टी, कुन्द-न्दनाम्ना गमिदः येनपुष्पविशेषः, इन्दुभन्दस्तद्वन् सनिकाश-प्रभा यम्य म तं, निययालम' निकाम्य पकी यसेनाय 'हरिगजणा' हननन-पोत्पादफ, रिउमेण विणासकर' रिपुमेन्य पिनाशकर शत्रुसन्यवलदारक पाशानन्य र पाश्चायनामक र परामुमा परा मृशति हस्ते गृहाति, पगपृश्य 'मुशायरिय करें।' मुघरातपूरित मुसानेन -मात फरोति-पादयतीत्यर्थः। तत' खलु वस्य पमनाभस्व तेन शशब्देन 'बन स्त चिहध्वज पताका चाला पनाते-यह तुम्हें ऐसा नही बनाता परन्तु ऐसा तुम लोगों का मन में धारा विगर सफली भूत नहीं हुआ अतः देवानुप्रियो । अब देयो-में उसके साथ युद्धरत होता है इसमें मैं हरी जीतू गा पद्मनाभ राजा नहीं । ऐसा करकर वे कृष्णवासुदेव रथपर सवार हो गये। और सवार होकर वे वहा पहुँचे जहा पद्मनाभ राजा था। वहाँ पहुँच कर उन्हों ने अपने पाचजन्य श्वेतशख को जो अपनी सेनाको हर्ष का जनक ण्व शत्रु सेना का सहारक था ण्व गोक्षीर तथा रार के जैसा धवल वर्णवाला था उठाया । इसकी प्रभा मल्लिका निर्गुठी कुदपुष्प एव चन्द्रमाके जैसी उज्ज्वल थी।(परामुसित्तामुत्यायपूरिय करे।) उसे उठाकर उन्हों ने मुंह से बजाया-तण तस्स उमणास्त तेण सखसद्देण बलइभाए हय जाव पहिसेहित) तर उम पदमनाभ की सेना તેની સાથે હું હવે મેદાને પડુ છુ આમા વિજય મને જ પ્રાપ્ત થશે, પર્સ નાભ રાજાને નહિ આમ કહીને કૃષ્ણ-વાસુદેવ રથ ઉપર સવાર થઈ ગયા અને સવાર થઈને જ્યા પદ્મનાભ રાજા હતે ત્યાં પહોંચ્યા તેમણે પિતાના પાચજન્ય સફેદ અને-કે જે તેમની સેવા માટે હત્યાક તેમજ શત્રુઓને તેના માટે સહાર રૂપ હ તથા ગાયના દૂધ અને હારના જે સફેદ હત-હાથમા લીધે તેમની કાતિ અતિકા નિ & ક૬૩૫ भने यन्द्र की ती (परामुसिता मुहवायपरिष करेइ) ने भए મુખથી વગાડે ( तस्स पउमणाहास तेण सससदेण जाव पडिसेबिन રાજાની સેનાને ત્યાં પહોંચીને ते..
. अनगारधर्मामृतार्षिणी टी० अ० १६ द्रौपदीचरितनिरूपणम् तिभाए हते ' यलनिभागो हत.-सैन्यस्य तृतीयाशो इतमथित यावत दिशोदिश प्रतिपेपित-पतिनिवृत्तः पलायित इत्यर्थः । ततस्तदनन्तर खल स कृष्णो वासु- देयो धनु परामृशति गृह्णाति, परामृश्य ' वेढो ' वेष्ट वर्णकः धनुचि पयक वर्णन जन्दीपप्रज्ञप्तितो रिशयमित्यर्थः, 'धणु पूरेइ' धनुः पूरयति धनुपि गुणमारो. पयति पूरयित्वा धनुः शन्द करोति तत खलु तस्य पद्मनाभस्य द्वितीयवार 'बल तिभाए ' वलनिभाग लस्य रौन्यस्य सतीयोभागस्तेन धनुः शब्देन ' इयमहिय परनिवडिय चिन्यद्धयपडागे' हयमथितमपरनिपतितचित-बजपताको यावद् का विभाग उस शख के शब्द से रत हो गया मथित हो गया यावत् एक दिशो से दूसरी दिशा की तरफ भाग गया। तएण से कण्हे वासु- देवे धणु परामुसइ, वेढोवणु पूरेट, पूरित्ता धणुसद्द करेह) इसके बाद कृष्ण वासुदेवने धनुप को उठाया। इस धनुप को वर्णन ज बूद्वीप प्रज्ञ- प्ति में किया गया है । मो वहा से जानना चाहिये उठाकर उन्होंने उस पर ज्या का आरोपण किया फिर उसे चढाना-सो उससे शब्द हुआ (तपण तस्स पउमनाभस्स दोच्चे लइभाए तेण धणुसपण हयमरिय जाव पडिसेहिए, तएण से पउमणाभे राया तिभागनलावसेसे अत्था मे अयले, अवीरिए अपुरिनकारपरक्कमे अधारणिज्जत्ति कटु सिग्घ तुरिय जेणेव अमरकंका तेणेव उवागच्छड) तब उस पद्मनाभ राजा की सैन्य का तृतीयभाग उस धनुष के शब्द से हत हो गया, मथित हो गया, उस की प्रवर चिन्ह स्वरूप ध्वजापताकाएँ सर गिर गई यावत् શબ્દથી જ હત થઈ ગયે, મથિત થઈ ગયે યાવતુ એક દિશા તરફથી બીજી શા त२५ नासी गयो (तएण से कण्हे वासुदेवे धणु परोमुसइ, वेढो धणु पूरेइ, पूरित्ता धणुसद करेइ ) त्या२५४ी ४.शु-पामुद्देव धनुष यु मा ધનુષનું વર્ણન જ બૂઢીપ પ્રજ્ઞપ્તિમાં કરવામાં આવ્યું છે જિજ્ઞાસુઓએ ત્યાથી જાણી લેવું જોઈએ ઉઠાવીને તેઓએ તેની ઉપર પ્રત્યે ચા ચઢાવી ત્યારપછી ધનુષને ચઢાવ્યું અને તેનાથી શબ્દ થયે– (तएण तस्स पउमनाभस्स दोच्चे वलइभाए तेण धणुसदेण हयमहिय जाव पडि सेहिए, तएण से पउमणाभे राया तिभागवलावसेसे अत्यामे अमले, अवीरिए अपुरिसक्कारपरक्कमे अवारणिज्जत्ति क्१ सिग्ध तुस्यि जेणेव अमर- फका तेणेर उवागच्छद) તે પાનાભ રાજની સેનાને ત્રીજો ભાગ તે ધનુષના શબથી જ હત થઈ ગ, મથિત થઈ ગયે, તેની પ્રવર ચિહ્નસ્વરૂપ પ્રવજા પતાકાઓ બધી પડી " , . नहीं हुआ अतः ૨૨ माताधर्मया यूय हे देशानुमियाः । 'गद नो पउमणा रागानो पानामी राना'- अहमे जेता मामि, न तु पानाभी गना, नि, पमनामेन राना मात्र युयामि, इत्युक्त्या व 'दुरदर' दोदति-भारोनि-ग कप्य पामुदेशः पत्र नामेन सह योद्धु रघमासान इत्पर्यः। मामय पदनामी राजा तीवो पागच्छति, उपागत्य ' सेग' श्वेत-गोगीग्दापालगोदग्नान-दारवञ्च धवल शुक्ल ' तगमोल्लिगिंदगारदगनिगास । 'तणमोलिया मलिका अय देशीयः गन्दा सिन्दुपारो-निर्गुडी, जन्ट-न्दनाम्ना प्रमिदः श्वेतपुग्पविशेष', इन्दुनन्द्रस्तद्वन् सनिका-ममा यम्य स त, निययालम्म' निनकरस्य सकी यसेनाय ' इरिमजण' हर्पननन-हर्पोत्पादक, 'रिउमेण पिणासार' रिपुमैन्य विनाशकर-शसन्यालदारक पाशनन्या पाश्चनन्यनामक शाप 'परामुमइ परा मृशति इस्ते गृहाति, परागृश्य 'मुशायरिय करे।' मुग्यरातपूरित मुपानेन मात फरोति-वादयतीत्यर्थः । ततः खलु तम्प पद्मनाभस्य तेन शशब्देन 'वर स्त चिह्नध्वज पताका घाला पनाते-यह तुम्हें ऐमा नती बनाता-परन्तु ऐसा तुम लोगों का मन में धारा जिगर सफली भूत देवानुप्रियो । अय देसो-में उसके साथ युद्धरत होता है इसमें मैं ही जीतू गा पद्मनाभ राजा नहीं । ऐसा करकर वे कृष्णवासुदेव रथपर सवार हो गये। और सवार होकर वे वहा पहुंचे जहा पद्मनाभ राजा था। वहां पहुंच कर उन्हों ने अपने पाचजन्य श्वेतशख को जो अपनी सेनाको स्र्प का जनक एव शत्रु सेना का सहारक था एव गोक्षीर तथा हार के जैसा धवल वर्णवाला था उठाया । इसकी प्रभा मल्लिका निर्गुठी कुदपुष्प एव चन्द्रमाके जैसी उज्ज्वल थी।(परामुसित्ता मुवायपूरिय करेइ) उसे उठाकर उन्हों ने मुँह से बजाया-(तएण तस्स पउमणाहस्त सखसद्देण बलहभाए ठय जाव पडिसहिए ) तय उम पदमनाभ की सेना તેની સાથે હું હવે મેદાને પડુ છુ આમા વિજય મને જ પ્રાપ્ત થશે, પ નાભ રાજાને નહિઆમ કહીને કુષ્ણ-વાસુદેવ રથ ઉપર સવાર થઈ ગયા અને સવાર થઈને જ્યા પાનાભ રાજા હતા ત્યાં પહોંચ્યા તેમણે પોતાના પાચજન્ય સફેદ શખને-કે જે તેમની સેના માટે હોંપાદક તેમજ શત્રુઓની સેના માટે સહાર રૂપ હ તથા ગાયના દૂધ અને ઉના જે સફેદ હો-હાથમાં લીધે તે શેખની કાતિ મલ્લિકા નિણું ઠીક૬ પુષ્પ भने यन्द्र वा पती (परामुमिचा मुहवायपरिष करेइ) ने भरे भुमयी वायो (तएण तस्स पउमणाहस्स तेण जाव पडिसेलिए) a मते ते पनाम रानी सेनाना । तेण ત્યા પહોચીને सखसहेण बrn Pय - , . , नंगारधामृतवपिणी टोफा अ० १६ द्रौपदीचरितनिरूपणम् ५२५ वासुदेवो यौवामकता तोवोपागच्छति, उपागत्य रथ स्थापयति, रथात् प्रत्यय रोहति मत्यवरुह्य, 'वेउब्वियसमुग्घाएण' क्रियसमुद्घातेन क्रियशरीर निर्मातु मात्मप्रदेशाना बहिनि सारणेन खलु ' समोहणड ' समुद्घात करोति समुद्नन्ति एक महत् ' णरसीहरूव' नरसिंहरूप 'पिउवह ' चिकुर्वते दिव्यसामर्थन करोति विकुऱ्या महता २ शब्देन 'पादददरय' पाददरक-भूमौ चरणाघात करोति, ततः खलु स कृष्णेन वासुदेवेन महता २ शब्देन पाददर्दरकेण-भूमी चरणाघातेन कृतेन सता अमरकडाराज पानी 'समग्गपागारगोपुराट्टाल्यचरिय- तोरणपल्हत्थिय पवरभवणसिरिधरा ' सम्भग्नप्राकारगोपुराहालकचरिकातोरणपर्य- स्तितपवरभानश्रीगृहा-तत्र सभग्नानि-पाफारच गोपुराणि च अट्टालकाच चरिका जहावह अमरकका थी वहा गये( उवा० ) वहा जाकर के ( रह ठवेह, ठवित्ता रहाा पचोरुहइ, पच्चारित्ता वेउव्वियसमुग्याएण समोह- णइ ) उन्होंने अपने रथको खडा किया-खडा करके फिर वे उससे नीचे उतरे । नीचे उतर कर वैक्रिय समुद्घोत किया। वैक्रियशरीरको निर्माण करने के लिये जो आत्मप्रदेशों का बाहिर निकालना होता है-उनको नम वैक्रिय समुद्घात है । ( एग मह णरसिहरूव विउव्वद विउन्वित्ता महया २ सद्देण पादददरएण कएण समाणेण अमरकंका रायहाणी सभग्ग पागारगोपुराहालचरियतोरण पल्हथियपवरभवणसिरिघरा सरस्स रस्स धरणियले सन्निवइया) इस समुद्घातके डरा उन्होंने एक विशाल काय नरसिंहरूप की विकुर्वणा की नरसिंहरूप की विकुर्वणा करके अपनी भयकर गर्जना से भूमि पर चरणों द्वारा आघात किया। इस तरह गर्जना पूर्वक किये गये चरणाघात से अमरकका राजधानी की गया (उवा०) त्या xsa (रह ठवेइ, ठवित्चा रहाओ पञ्चोकहइ, पचोरुहित्ता वेउब्वियसमुग्धारण समोहणइ) तभये पाताना २थने बानी राज्या, बनो રાખીને તેઓ તેમાથી નીચે ઉતર્યા નીચે ઉતરીને તેમણે વિકિય સમુદ્દઘાત કર્યો વૈક્રિય શરીરને બનાવવા માટે જે આત્મપ્રદેશોને બહાર કાઢવામાં આવે છે તે વૈક્રિય સમુદુઘાત કહેવાય છે ( एग मह णरसिहरून विउव्वइ, विउवित्ता महया २ सद्देण पादददरएण फएण समाणेण अमरकका रायहाणी सभग्गपागारगोपुराट्टालयचरियतोरण पल्हत्थियपवरभवणसिरिधरा सरस्सरस्स धरणियले सन्निवइया) આ સમુઘાત વૃકે તેમણે એક વિશાળ કાય નરસિંહ રૂપની વિકૃણા કરી નરસિંહ રૂપની વિકુણા કરીને પિતાની ભયકર ગર્જનાથી ભૂમિ ઉપર ચરણેને આઘાત કર્યો આ રીતે ગર્જનાપૂર્વક કરાયેલા ચરણઘાતથી અમર - rom- - " - दुर्ग (किल्ला) की रक्षा करता हुआ वह ठहा। इसके बादकृष्णवासुदेव पिहेइ, पिहिता रोहसज्जे चिट्ठइ, तरण मे कण्हे वासुदेवे, जेणेव अमरकका ५२४ ताब्याय दिशो दिश प्रतिपेधितः, ग म पमनामी राना । तिमागवलासेसे' त्रिभागाशेपः तनीयावाशिष्टरी गवान् मा मस्यामा, आमा, अवीर्यः, अस्थामेत्यादि माग्पारयातम् अपुमाकारपरा कम -पौरुपपराक्रमरहितः, अधार णीयः-माणान् धारायितुमात', उति कन्या इति विर्य शीघ चरित यौवा मरकमा तत्रोपागपति, उपागत्य अमरका गनपानीमनुप्रविशति, अनुभविश्य द्वाराणि ' पिहेइ ' पिधने, रोधममार्ग निमय तिष्ठति, ततः पलु स कृष्णो वह एकदिशा से दूसरी दिशा में भाग गया अधम भागने में असमर्थ पन गया । इस के पाद तनीयाशावशिष्ट सेना वाला शेकर वर पद्म नाभराजा पल रहित हो गया, पर्याप्त मन्य रहित हो गया एव अन्तरिक शक्ति-उत्साहीन हो गया। अतः पर पौम्प परामम से रहित होने के कारण रणभूमि में उतरने के योग्य नरी । अथवा प्राणों को धारण करने में भी असमर्थ पर गया। इसलिये वह वहा से शीघ्र पड़ी उतावली से जरा अमरकको नगरी थी वहा आ गया। ( उवाग छित्ता अमरका रायराणि अणुपविसह, अणुपविसित्ता दारोइ पिहेर पिरित्ता रोरसज्जे चिट्ठद, तएण से फटे वासुदेवे, जेणेव अमरकका तेणेव उवागच्छद ) वहा आकर वर अमरकको राजधानी में गया। जाकर उसने दरवाजोंको घद करवा दिया। बद करवाकर फिर वह अपने ગઈ યાવતુ તે સેનાને ભાગ એક દિશા તરફથી બીજીદિશા તરફ નાશી ગયે અથવા તે તે નાશી જવામાં પણ અસમર્થ થઈ ગમે ત્યારપછી બીજા ભાગ જેટલી સેના જ જેની પાસે રહી છે એ તે પનાભ રાજા સાવ નિબળ થઈ ગયે, પર્યાપ્ત સૈન્ય રહિત થઈ ગયે અને આતરિક શક્તિ-ઉત્સાહ રહિત થઈ ગયે તે પૌરૂષ પરાક્રમ વગર થઈ તે રણભૂમિમા ટકી શકે તેમ રહ્યો નહિ અથવા તે તે પ્રાણેને ધારણ કરવામાં પણ અસમર્થ થઈ ગયા એથી તે સત્વરે જ્યાં અમરક કા નગરી હતી ત્યાં આવી ગયે उवागच्छित्ता अमरका रायहाणि अणुपविसइ, अणुपविसित्ता-दाराइ - तेणेव उवागच्छइ) ત્યાં આવીને તે અમરક કા રાજધાનીમાં ગયા, ત્યાં જઈને તેણે દરવા જાઓને બંધ કરાવી દીધા બધ કરાવીને તે પોતાના દર્શની રક્ષા કરતા ત્યાજ રોકાશે ત્યારપછી કૃષ્ણ-વાસુદેવ જ્યા તે અમરક કા નામે તે ' भर्नेगारघमामृतवपिणी टीका अ० १६ द्रौपदीचरितनिरूपणम् वासुदेवो यौवामकङ्का तोवोपागच्छति, उपागत्य रथ स्थापयति, रथात् मत्यव रोहति मत्यवरुह्य, 'वेउब्वियसमग्घाएण' वैक्रियसमुद्घातेन क्रियशरीर निर्मातु मात्मप्रदेशाना बहिनि सारणेन खलु ' समोहणड' समुद्घात करोति समुद्रन्ति एक महत् ' णरसीहरूव ' नरसिंहरूप 'पिउच्चइ ' चिकुर्वते दिव्यसामर्यन करोति विकुऱ्या महता २ शब्देन 'पाददद्दरय' पादर्दरक-भूमौ चरणाघात करोति, ततः खलु स कृष्णेन पासुदेवेन महता २ शब्देन पाददर्दरकेण भूमा चरणाघातेन कृतेन सता अमरकङ्काराजधानी 'संभग्गरागारगोपुराहालयचरिय तोरणपल्हत्थिय पवरभवणमिरिधरा' सम्भग्नपाकारगोपुराहालकचरिकातोरणपर्य- स्तितपवरभानश्रीगृहात सभग्नानि-माकारश्च गोपुराणि च अट्टालकाश्च चरिका जावह अमरकका थी वहा गये( उवा० ) वहा जाकर के ( रह ठवेह, ठवित्ता रहाओ पचोरुहइ, पच्चारित्ता वेउब्वियसमुग्याएण समोर- गइ) उन्होंने अपने रथको खडा किया-खडा करके फिर वे उससे नीचे उतरे । नीचे उतर कर वैक्रिय समुद्घोत किया! वैक्रियशरीरको निर्माण करने के लिये जो आत्मप्रदेशों का बाहिर निकालना होता है-जमको नम थैक्रिय समुद्घात है । ( एग मह णरसिहरूवं विउव्वड विउन्वित्ता महया २ सद्देण पादददरएण कएण समाणेण अमरकका रायहाणी सभग्ग पागारगोपुराहालचरियतोरण परहस्थियपवरभवणसिरिघरा सरस्स रस्स परणियले सन्निवइया) इस समुद्घातके बरा उन्होंने एक विशाल काय नरसिंहरूप की विक्रुर्वणा की नरसिंहरूप की विकुर्वणा करके अपनी भयकर गर्जना से भूमि पर चरणों द्वारा आघात किया । इस तरह गर्जनो पूर्वक किये गये चरणाघात से अमरकका राजधानी की गया (उवा०) त्या धन (रह ठवेइ, ठवित्ता रहाओ पञ्चोमहइ, पचोरुहित्ता वेब्जियसमुग्याएण समोहणइ) तभणे पाताना २थने से राज्य), सो રાખીને તેઓ તેમાથી નીચે ઉતર્યા નીચે ઉતરીને તેમણે વૈકિય સમુદ્દઘાત કર્યો ક્રિય શરીરને બનાવવા માટે જે આત્મપ્રદેશને બહાર કાઢવામાં આવે છે તે વૈકિય સમુદુઘાત કહેવાય છે ( एग मह णरसिहरूप विउव्वइ, विउवित्ता महया २ सदेण पादददरएण फएण समाणेण अमरकका रायहाणी सभग्गपागारगोपुराट्टालयचरियतोरण पल्हत्यियपवरभवणसिरिधरा सरस्सरस्स धरणियले सन्निवाया) આ સમુદ્રઘાન વડે તેમણે એક વિશાળ કાય નરસિંહ રૂપની વિફર્વણા કરી નરસિંહ રૂપની વિદુર્વણા કરીને પોતાની ભયકર ગર્જનાથી ભૂમિ ઉપર ચરણેને આઘાત કર્યો આ રીતે ગર્જનાપૂર્વક કરાયેલા ચરણઘાતથી અમર . মম च तोरणानि च यस्यां सा तया, नत्र गोपुराणि-मनोरयः अहालका प्राकारो परिस्थान विशेषाः, चरिका-नगरमागरserniमार्ग तया-पम्नितानि- सर्वतः क्षिप्तानि मारमानानि श्रीराणि-माडागाराणि कोशागाराणि च यम्यांसा वधा, तो द्विपदः कर्मधारय । कृष्णमायुदेवन भूमौ चरणाघातमन्दन अमर फकारामधान्याः मारगोपुरादिक रिमितमिस्र्य, तया- सरस्सरस्स' अनुकरणशब्दोऽयम् निपतन क्रियाविशेषण परमिनले सनिपतिता-अमरकंको राजधानी मरम्सरस्सेनि शन्द काणा भूगो पतितत्यर्थः । नतः सलु स पननामो राना अमरकां राजधानी समग्नमाकारादिगा यात्-धरणितले सनिपतिता दृष्ट्वा मीतः प्रस्त , उद्विग्न', सनातभय , द्रौपद्या देव्या शरण पैति प्राप्नोति, ततः खल सा द्रौपदी देवी पमनाम रानानमेवमादी-कि खलु स्व हे देवानु प्रिय ! न जानासि कृष्णस्य समुदेवस्योनमपुरुपस्य प्रिमिय कुर्वन् मामिह अत्र गलियों को अदारियों को, चरिकाओं को, श्री गृहों को कोशागारा को श्री कृष्ण ने ध्वस परदिया। तथा वह अमरकमा राजधानी भी मरसर शब्द करती हुई उस गर्जना पूर्वक किये गये चरणाघात से जमीन पर गिर पड़ी। (तण्ण से पउमणाम राया, अमरकका रायहाणि सभाग जाव पासित्ता, भीष दोवईए देवीए सरण उवेइ) तय पद्मनाभ राजा अमरकका राजधानी को प्राकार गोपुर आदि की ध्वस्त अवस्थावाली देखकर अत्यन्त भीत हुआ अस्त हुआ, द्विग्न हुआ। और सजात भय सपन्न होकर द्रौपदी देवी की शरण में पहुंचा। (तरण सा दोवई देवी, पउमनाम राय एव पयासी) तय उस द्रौपदी देवी ने पद्मनाभ राजा से इस प्रकार कहा-(किण्ण तुम देवाणुपिया! न जाणासि कण्ह કકા રાજધાનીની શેરીઓને, અટારીઓને ચરિકાઓને, શ્રીગૃહોને, કેશા ગારેને શ્રીકૃષ્ણ નષ્ટ કરી નાખ્યા તેમજ તે અમરફ કા રાજધાની પણ સસર શબ્દ કરતી ગર્જનાપૂર્વક કરવામાં આવેલા ચરણાઘાતથી જમીનદોસ્ત થઈ ગઈ (तएण से पउमणाभे राया, अमरकका रायहाणि सभग जाव पासित्ता, मीए दोबईए देवीए सरण उवेइ) પદ્મનાભ રાજા અમરક કા રાજધાનીના પ્રાકાર, ગેપુર વગેરેને વિનાશ જોઈને ખૂબ જ ભયભીત થઈ ગયો, ત્રસ્ત થઈ છે તેમજ ઉદ્વિગ્ન થઈ ગયે भने समतलय सपन्न थाने हीपी हवानी शरणे पडाय। (तरण मा दावई देवी पउमनाभ राय एव वयासी) त्यारे द्रौपदी वीमे पानी રાજાને આ પ્રમાણે કહ્યું કે – - अनगारधामृतवपिणी टोका अ०१६ द्रौपदीचरितनिरूपणम् इव्य-शीत्रम् आनयमि-आनीतवानसि तत्-तम्मात्-' एवमपि गए' एवमपि गते-इत्थंममापहरणे कृतेऽपि, गच्छ खलु त्व हे देवानुप्रिय । स्नातः 'उल्ल पड- साडए' आर्द्रपसाटकः स्नानेनाऽऽर्कीकृतोत्तरीयपरिधानवस्त्रपारी 'अरचूलग- वस्थणियन्ये' अवचूलकवस्त्रणियथा अपचूलपम्-अयोमुग्न नीचैलम्यगन चूल- वस्त्राञ्चल-पत्रमाप्त यथा भवति तथा 'णियत्य' परिहित वस्त्र येन स तथा-वीगा परिवानमिव चरणपर्यन्तलम्मितवस्त्रान्त यथास्त्रात्तथा परिहितवस्त्र इत्यर्थः । अते उग्परियालसपरिमुढे अन्त पुरपरिवारमपरिटता स्त्री परिसरेण सहितः, अग्गाइ' अग्र्याणि वराणि रत्नानि गृहीत्वा मा पुरतः 'काउ' कृत्वा कृष्ण स्स वा सुदेवस्स उत्तमपुरिसस्म विपि र करे माणे मम इह हव्वमाणेसि) हे देवानुप्रिय ! क्या तुम उत्तम पुस्प कृष्णवासुदेव को नहीं जानते हो जो उनको अनिष्ट कर तुम मुझे यहां ले आये हो । (त एव- मविगए गच्छरण तुम देवाघुप्पिया! पहाए उल्लपडसाडरा अव चलगवत्यणियत्ये अतेउरपरियालसरिघुडे, अग्गड घराइ गहाय, मम पुरओ, काउ कण्ह वासुदेव करयलपायपडिए सरण उवेहि) खैर अय इस पात को जाने दो-हे देवानुप्रिय ! तुम स्नान कगे, और गीले वस्त्र पहिने हुए ही श्री कृष्णवासुदेव की शरण मे जाओ। जाते समय तुम स्त्रीयों के परिधान के समान चरण पर्यन्त लटकते हुए वस्त्र पहिनकर जाना । अकेले मत जाना किन्तु अपने अत पुर की समस्त स्त्रियों को साथ में ले जाना। रीते हाथ भी मत जानो किन्तु भेट निमित्त वेश कीमती रत्नो को लेकर और मुझे आगे करके चलना । (पिण्ण तुम देवाणुप्पिया ! न जाणासि क्ण्हस्स वासुदेवस्स उत्तमपुरिसस्स विप्पिय करेमाणे मम इह इन्चमाणेसि) હે દેવાનુપ્રિય ! શુ તમે ઉત્તમ પુરૂષ કૃષ્ણ–વાસુદેવને ઓળખતા નથી મને અહીં લાવીને તમે તેમનું જ અનિષ્ટ કર્યું છે ( त एवमविगए गच्छह ण तुम देवाणुप्पिया ! पहाए उल्लपडसाडए अर चूनगवत्यणियत्ये अतेउरपरियालसपरिबुडे अग्गाइ वराड रयणाइ गहाय, मम पुरतो, काउ कण्ह वासुदेव करयल्पायपडिए सरण उवेहि ) ખેર, છેડે એ વાતને હે દેવાનુપ્રિય! તમે હવે સ્નાન કરે અને ભીના વસ્ત્રથી જ શ્રીકૃષ્ણ વાસુદેવની શરણમા જાએ જતી વખતે તમે સ્ત્રીઓના પરિધાન (ચણિયા)ની જેમજ પગ સુધી લટકતા વસ્ત્રો પહેરજે તમે એકલા જતા નહિ પરતુ રણવાસની બધી સ્ત્રીઓને સાથે લઈને જો તમે ખાલી હાથે તેમની પાસે જતા નહિ પણ કઈક ભેટ સ્વરૂપ કિંમતી વસ્ત્રોને લઈને ५२८ जो हुआ वासुदेव' परयलपायपदिए रतलपादपति-संगोनित करतद्वया, पादयोः पतितः गन् शरण उपेदि-प्रायम्पमामितिया उपगो भवेत्यर्थः । हे देवानु मिय! 'पणियाला' मणिपतितावा-गागापरिनिपतितानां वत्मला: स्नेहान्त खलु उत्तमरुपा गान्ति प्रणामगाण महापुरगाः प्रमोदन्तीत्यर्थः । ततस्तदनन्तर म पचनामी रामा द्रौपया द-या एनम उक्तस्थनस्पर्य प्रति श्रृगोति-स्पीकरोति, प्रतिशुन्य ग्नातो यान् शरणमुपति द्रौपदीवानमनुमृत्य पद्मनाभो राजा प्रण गदरम्प शरणमुपगत इत्यर्थः। उपेत्य करतलपरिगृहीत दशनाव पिर आरत मम्न अलि कापसमागप्रकारेण, आदी दृष्टा घहा पहुँच कर तुम दोनो राध जोड़ कर उनके चरणों में गिर जाना (पणि वडयवच्छलो ण देवाणुप्पियो उत्तमपुरिमो तगण से पउमनाभे दोबई देवोपम पहिणेड, पहिसुणित्ता मा जार सरण उवेह, उरित्ता, करयल क्यासी दिहाण देवानुप्पियाण इट्टी, जाव परक्कमे त सामेमि ण देवाणुप्पिया।) हे देवाणुप्रिय ! उत्तम पुरुष करते हैं वे प्रणिपतितवत्सल टुआकरते है-प्रणाममात्रसे महापुरुष प्रमन्न हो जाया करते है-अर्थात् नमन करनेवालेको वे नहीं मारते तय पद्मनाभ राजाने द्रौपदी देवी के इस शिक्षाप्रद कथनरूप अर्थको स्वीकार कर लिया। स्वीकार कर बाद में उसने स्नान किया, यावत् वह द्रौपदीके कहे अनुसार कृष्णवासुदेव की शरणमें पहुंच गया। शरण में पहुंच कर उसने अपने दोनों हाथो को जोडकर अजलि बनाई और आदक्षिण प्रदक्षिण करके उसे शिरपर रग्वा । फिर इस प्रकार बोला-आप देवानुप्रियकी मैंने ऋद्धि તેમજ મને આગળ રાખીને ચાલને ત્યાં પહોચીને તમે બંને હાથ જોડીને તેમના પગે પડશે ( पणिपइय वच्छलाण देवाणुप्यिो उत्तमपुरिसा, तएण से पउमनाभे दोवइए देवीए एयमह पडिसुणेइ, पडिसुणिता हाए जाब सरण उबेइ, उवित्ता करयळ० एस बयासी,दिट्ठा ण देवाणुप्पियाण इट्टी जाय परक्कमे त खामेमि ण देवाणुप्पिया) હે દેવાનુપ્રિય' ઉત્તમ પુરૂષે તેમની સામે વિનમ્ર થયેલા માણસો પ્રત્યે એકદમ વત્સલ થઈ જાય છે ફક્ત નમસ્કાર કરવાથીજ તેઓ પ્રસન્ન થઈ જાય છે આ બધુ સાભળીને પાનાભ રાજાએ દ્રોપદીના આ શિક્ષાપ્રદ કથન ?' અર્થને સ્વીકારી લીધું સ્વીકાર કરીને તેણે સ્નાન કર્યું યાવતુ તે દ્રૌપદીના કહ્યા મુજબ જ કૃષ્ણ-વાસુદેવની શરણમા ગયો શરણમાં જઈને તેણે પિતાના બને હાથ જોડીને અજલિ બનાવી અને આદક્ષિણ પ્રદક્ષિણા ઉપર મૂકી અને ત્યારબાદ તે આ પ્રમાણે કહેવા લાગ્યું -- ५२९ - - भनगारधर्मामृतपिणा टीका १० १६ द्रौपदीचरितनिरूपणम् खलु देवानुप्रियाणाम् ऋद्धिर्यावत् पराक्रमः-तत्-तस्मात् क्षमयामि ग्वलु हे देवा- लुमियाः । यावत् क्षमन्तु खलु यावन् नाह भूयो भूयः एव करणतया पुनरेव न परिप्यामि, इति कृत्वा-इत्युक्त्या-' पनलिघुडे' प्राञ्जलिपुट -सयोजित- करतलद्वयः पादपतितः कृष्णस्य वासुदेवस्य द्रौपदी ' साहत्थि ' सहस्तेन, उप- नयति । ततः रालु स कृष्णो वासुदेव पद्मनाभमेवमनादीत्-ह भोः ! पद्मनाभ ! अप्रार्थितमाथित ! हे मरणवाञ्छा ! ४ किं खलु व न जानासि मम भगिनीं द्रौपदी देवी मिहद्दव्यमानयन् , ' ' तत्-तस्मात् ' एवमपि गए ' एवमपिगते अनेन मारेण शरण पाप्ते सति, नास्ति ते तव मद्भयमिदानीमिति कृत्वा प्रति विसर्जयति । प्रतिपिसृज्य द्रौपदी देवीं गृह्णाति, गृहीत्वा रथ दूरोहति आरोहयति देखली, गवा पराक्रम देग्य लिया। हे देवानुप्रिय । मैं अपने अपराध की क्षमा मांगता हूँ। (जाव खमतु) यावत् आप मुझे क्षमा दें। (ण जाव णा ह भुज्जो एव करणाए) अब मै पुनः ऐमा नहीं करूगा। (त्ति कटु पजलिवुडे पायवडिए कण्हस्स वासुदेवस्स दोवइ देवि सा हत्यि उवणेह) इस प्रकार कहकर वह दोनों हाथ जोड उन कृष्णवा- सुदेव के पैरों पर गिर पडा और अपने हाथ से ही उसने फिर उनके लिये द्रौपदी सौपदी। (तएण से कण्हे वासुदेवे पउमणाभ एव वयासी - भो' पउमणामा। अपत्थियपत्थिया ४ किण्ण तुम ण जाणासि मम भगिणि दोबड देवि इह हव्व माणमाणे त एवमविगए, णत्थि ते ममाहितो इयाणि भयमथि त्ति कटु पउमणाम पडिविसज्जेह, पडि विसज्जित्ता दोव- देवि गिण्ड, गिटित्ता रह दुरूहेइ, दुरुदित्ता जेणेव સદ્ધિ જોઈ લીધી છે, યાવતુ તમારૂ પરાક્રમ પણ મે જોઈ લીધુ છે કે દેવાનુપ્રિય ' હુ મા અપરાધ બદલ ક્ષમા માગુ છું (जाव समव) यावत् सभे भने क्षमा । (ण जाप णाह मुज्जो • एर करणाए ) ७३ री हु भानु पि न ३ (ति टु प जलिवुडे पायवडिए कण्हरम वासुदेवरस दोवइ देवि साहत्थि उवणेइ) मा प्रभारी सीन ते पने साथ लेन કૃષ્ણ-વાસુદેવના પગમાં આળેટી ગયા અને ત્યારપછી તેણે પિતાના હાથથીજ - દ્રૌપદી તેમને સોપી દીધી (तएण से काहे वासुदेवे पउमणाभ एव वयासी-ह भो । पउभणाभा ! अपत्थियपत्थिया ४ मिण मण जाणासि मम भगिणिं दोवड देवि इह, हव्य माणमाणे त एवमपि गए, णस्थि ते ममाहितो इयाणि भयमत्थि तिकटु पउम- णाम पटिपिसज्जेइ पडिसिज्जित्ता दोवइ देवि गिण्डर, गिदित्ता रह दुरुहेइ, - भाताचा वासुदेव फरयलपायपटिप ' करत उपादपनिव-योनित करतद्वयः, पादयोः पतितः मन् पारण उपैहि-त्रायस्थमामितियान पग भयेत्यर्थः । हे देवानु मिय। 'पणियाउला' मणिपनिताता-जाणापरिनिपतिगना रत्सलाः स्नेहान्त खलु उतमपुरा मति प्रणाममाण महापुरपाः प्रसीमन्तीत्यर्थः । ततस्तदनन्तर म प्रानामो राजा द्रौपया देच्या एनमस्तस्थनरपमर्थ पति- गोति-स्पीकरोति, मतिश्रुत्य ग्नातो यान् शरणमुपैति द्रौपदीपनमनुमृत्य पद्मनाभो राजा कणगमुदेवस्य शरणमुपगत इत्यर्थः । उपेत्य करतरपरिगृहीत दशनाव गिर आतं मम्न केजलि का यमागप्रकारेण, नादी दृष्ट्या वहा पहुँच कर तुम दोनों हाथ जोड़ कर उनके चरणों में गिर जाना (पणिरइयरच्छलो ण देगणुप्पियो उत्तमपुरिमा तण्ण से पउमनाभे दोई। देवोरा एयम पडिणेड, पडिसुणित्ता हा जाप मरण उवेड, उरित्ता, करयल व ययासी दिहाण देवानुप्पियाण इट्टी, जाव परक्कमे त खामेमि ण देवाणुप्पिया।) हे देवाणुप्रिय ! उत्तम पुरुप जो हुआ करते हैं वे प्रणि तितवत्सल हुआ करते हैं-प्रणाममात्रसे महापुरुप प्रसन्न हो जाया करते हैं-अर्थात् नमन करनेवालेको वे नहीं मारते तय पद्मनाम राजाने द्रौपदी देवीके इस शिक्षाप्रद कथनरूप अर्थको स्वीकार कर लिया। स्वीकार कर यादमें उसने स्नान किया, यावत् वह द्रौपदीके कहे अनुसार कृष्णवासुदेव की शरणमें पहुंच गया। शरण में पहुंच कर उसने अपने दोनों हाथो को जोडकर अजलि पनाई और आदक्षिण पदक्षिण करके उसे शिरपर रग्वा । फिर इस प्रकार योला-आप देवानुप्रियकी मेंने ऋद्धि તેમજ મને આગળ રાખીને ચાલજે ત્યાં પહોંચીને તમે બંને હાથ જોડીને તેમના પગે પડજે. ( पणिवइय वाटलाण देवाणुप्यिा उत्तमपुरिसा, तएण से पउमनाभे दोवइए देवीए एयमट्ट पडिसुणेइ, पडिसुणित्ता पहाए जाव सरण उवेइ, उवित्ता करयल० एर बयासी,दिट्ठा ण देवाणुप्पियाण इड्डी जाप परक्कमे त खामेमि ण देवाणुप्पिया) હે દેવાનુપ્રિય ઉત્તમ પુરૂ તેમની સામે વિનમ્ર થયેલા માણસે પ્રત્યે એકદમ વત્સલ થઈ જાય છે ફક્ત નમસ્કાર કરવાથીજ તેઓ પ્રસન્ન થઈ જાય છે આ બધુ સાભળીને પદ્યનાભ રાજાએ દ્રોપદીને આ શિક્ષાપ્રદ કથન રૂપ અર્થને સ્વીકારી લીધું સ્વીકાર કરીને તેણે સ્નાન કર્યું યાવત્ તે દ્રૌપદીના કહ્યા મુજબ જ કૃચ્છ-વાસુદેવની શરણમાં ગ શરણમાં જઈને તેણે પિતાના બને હાથ જોડીને અજલિ બનાવી અને આદક્ષિણ પ્રદક્ષિ કરી- ઉપર મૂકી અને ત્યારબાદ તે આ પ્રમાણે કહેવા લાગ્યું - - अपत्यियपत्थिया ४ विष्ण तुम ण जाणासि मम भगिर्णि दोबड देहि, हच्च ममगारधर्मामृतयपिंको टीका अ० १६ द्रौपदीचरितनिरूपणम् खल्लु देवानुप्रियाणाम् ऋद्धिर्यावत् पराक्रमः-तत्-तस्मात् समयामि ग्वलु हे देवा चुमियाः । यावत् क्षमन्तु खलु यावत् नाह भूयो भूय एव करणतया-पुनरेव न करिप्यामि, इति कृत्वा-इत्युक्त्वा-पनलिवुढे' प्राञ्जलिपुट -सयोजित- करतलद्वयः पादपतितः कृष्णस्य वासुदेवस्य द्रौपदी ' साहन्थि ' सहस्तेन, उप- नयति । ततः खलु स कृप्णो मासुदेव पद्मनाभमेवमादीन-ह भोः । पद्मनाभ ! अप्रार्थितमाथित ! हे मरणवान्छ । ४ किं खलु व न जानासि मम भगिनीं द्रौपदी देवीमिहद्दव्यमानयन् , 'त' तत्-तस्मात् ' एवमनि गए । एमपिगते अनेन प्रकारेण शरण प्राप्ते सति, नास्ति ते तब मद्यमिदानीमिति कृत्वा प्रति रिसर्न यति । प्रतिपिसृज्य द्रौपदों देवीं गृह्णाति, गृहीत्वा रथ दूरोदति-आरोहयति देखली, गवा पराक्रम देर लिया। हे देवानुप्रिय । मैं अपने अपराध की क्षमा मांगता है। (जाव खमतु) यावत् आप मुझे क्षमा दें। (ण जावणा र भुज्जो २ एव करणाए) अब मै पुनः ऐसा नहीं करूगा। (ति कट्टु पजरिबुडे पायवडिए कण्हस्स वासुदेवस्त दोवइ देचि सा हत्धि उवणेह) इस प्रकार कहकर वह दोनों हाथ जोड उन कृष्णवा सुदेव के पैरों पर गिर पडा और अपने हाथ से ही उसने फिर उनके लिये द्रौपदी सौपदी । (तएण से कण्हे वासुदेवे पउमणाम एव वासी हे भो पउमणामा। अपत्थियात्थिया ४ किण्ण तुम ण जाणासि मम भगिणि दोबइ देवि इह हव्व माणमाणे त एवमविगए, णस्थि ते ममाहितो इयाणि भयमस्थिति कट्टु पउमणाभ पडिविसज्जेइ, पडि विसज्जित्ता दोव, देवि गिड, गिरिशा रह दुरूहेड, दुरुहिता जेणेव એ કદ્ધિ જોઈ લીધી છે, યાવતુ તમારૂ પરાક્રમ પણ મેં જોઈ લીધું છે કે દેવાનુપ્રિ' હુ મારા અપરાધ બદલ ક્ષમા માગુ છે (जाव समत) यापत भ भने क्षमा । ( नाव ह भुजो ए करणाए ) वेश मायु पि न ३ (ति टु पजलिवुडे पायवडिए कण्हम वासुदेवरस दोवइ दवि साहस्थि उवणेइ ) भ होने से मने यीन વાસુદેવના પગમાં આળેટી ગયા અને ત્યારપછી તેણે પિતાના હાથથી જ (तएण से कण्हे वासुदेवे पउमणाम एस बयासी-ह भो । पउभणामा ! माणमाणे त एवमपि गए, गाय ते ममाहिती इयाणिं भयमथि चिटु पउम- शाभ पटिनिसज्जेड पडिसिज्जित्ता दोबइ देवि गिण्डद, गिण्डित्ता रह दुलहेइ, દ્રૌપદી તેમને આપી દીધી द६७ ५२८ आताधर्मपाल वासुदेव 'फरयलपायपढिप' परत उपादपति-पयोनिवरत रदयः, पादयोः पतितः मन् शरण उपैहि-त्रायस्पमामितिपदन उपगनो भयेपर्यः । हे देवानु मिय। 'पणियाउला' पणिपनितम्या-जगोपरिसपतिताना वत्सलाः स्नेहात खन्नु उत्तमपृरुपा मति प्रणाममाण महापुरता प्रसीदन्तीत्यर्थः । ततस्तदनन्तर म प्रानामो रामा द्रौपया देव्या एम-उत्त कयनन्पमर्थ पति- श्रृगोति-पीकरोति, मतिश्रुत्य स्नातो यारत् शरणमुपैति द्रौपदीपनमनुमृत्य पद्मनाभो राजा कणगसुदरग शरणमुपगत इत्यर्थः। उपत्य करतपरिगृहीत दशमग्य शिर आरत मानके िक पा एमापमागप्रकारेण, आदी दृष्ट्वा वहा पहुँच कर तुम दोनों हाथ जोड़ कर उनके चरणों में गिर जाना (पणि वडयरच्छलो ण देवाणुप्पियो उत्तमपुरिमा तरण से पउमनामे दोई देवोए म पडिपुणेड, पडिसुणित्ता हाजार सरण उवेड, उवित्ता, करयलययासी दिट्टाण देवानुप्पियाण इट्टी, जाव परक्कमे त खामेमि ण देवाणुप्पिया।) हे देवाणुप्रिय! उत्तम पुरुप जो हुआ करते हैं वे प्रणि तितवत्सल हुआ करते है-प्रणाममात्रसे महापुरुष प्रमन्न हो जाया करते हैं-अर्थात् नमन करनेवालेको वे नहीं मारते तय पद्मनाम राजाने द्रौपदी देवी के इस शिक्षाप्रद फधनरूप अर्थको स्वीकार कर लिया। स्वीकार कर बाद में उसने स्नान किया, यावत् वह द्रौपदीके कहे अनुसार कृष्णवासुदेव की शरणमें पहुंच गया। शरण में पहुंच कर उसने अपने दोनों हाथो को जोडकर अजलि यनाई और आदक्षिण प्रदक्षिण करके उसे शिरपर रग्वा । फिर इस प्रकार बोला-आप देवानुप्रियकी मैंने ऋद्धि તેમજ મને આગળ રાખીને ચાલજો ત્યાં પહોંચીને તમે બંને હાથ જોડીને તેમના પગે પડ (पणियइय वच्छलाण देवाणुप्यिो उत्तमपुरिसा, तएण से पउमनाभे दोवइए देवीए एयम पडिसुणेइ, पडिसुणिचा हाए जाव सरण उवेइ, उवित्ता करयल. एर पयासी,दिट्ठा ण देवाणुप्पियाण इड्डी जान परक्कमे त खामेमि ण देवाणुप्पिया) હે દેવાનુપ્રિય ! ઉત્તમ પુરૂ તેમની સામે વિનમ્ર થયેલા માણસો પ્રત્યે એકદમ વત્સલ થઈ જાય છે ફક્ત નમસ્કાર કરવાથી જ તેઓ પ્રસન્ન થઈ જાય છે આ બધુ સાભળીને પદ્મનાભ રાજાએ દ્રોપદીના આ શિક્ષાપ્રદ કથન રૂપ અર્થને સ્વીકારી લીધે સ્વીકાર કરીને તેણે સ્નાન કર્યું ચાવત તે દ્રૌપદીના કહી મુજબ જ કૃષ્ણ-વાસુદેવની શરણમાં ગયો શરણમાં જઈને તેણે પિતાના બને હાથ જોડીને અ જલિ બનાવી અને આદક્ષિણ પ્રદક્ષિણા કરી… ૧ ઉપર મૂકી અને ત્યારબાદ તે આ પ્રમાણે કહેવા લાગે છે કે भाया તેમાં પણ જ્યા ભારતવર્ષ નામે ક્ષેત્ર હેતુ તે તરફ રવાના થયા. माणे नगारधामृतपिणो टी० १० १६ द्रौपदीचरितनिरूपणम् ५३१ मूलम्-तेणं कालेण तेणं समएणं धायइसडे दीवे पुरस्थि- मिद्धे भारहे वासे चंपाणामं णयरी होत्था, पुण्णभद्दे चेइए, तत्थ णं चंपाए नयरीए कविले णामं वासुदेवे राया होत्था, महिया हिमवंत० वण्णओ, तेण कालेणं तेणं समएणं मुणिसुव्वए अरहा चपाए पुण्णभदे समोसढे, कपिले वासुदेवे धम्म सुणेइ तएण से कविले वासुदेवे मुणिसुव्वयस्स अरहओ धम्म सुणे- कण्हस्स वासुदेवस्स सखसई सुणेइ, तएण तस्स कवि- लस्स वासुदेवस्स इमेयारूवे अज्झथिए समुप्पज्जित्था – किं मण्णे धायइसंडे दीवे भारहे वासे दोच्चे वासुदेवे समुप्पण्णे' जस्स ण अय संखसदे ममपिव मुहवायपूरिए वीय भवइ,तएण मुणिसुव्वए अरहा कविल वासुदेवं एवं वयासी से णूण ते कविला वासुदेवा । मम अतिए धम्म णिसामेमाणस्स सखसद आकपिणत्ता इमेयात्वे अज्झथिए कि मन्ने जाव वीय भवइ, णूण कविला वासुदेवा । अयमढे समढे ' हता । अत्थि, नो कविला | एव भूय वा३ जन्न एगे खेत्ते एगे जुगे समए दुवे अरहता वा चक्वही वा बलदेवा वा वासुदेवा वा उप्पन्जिसु उप्पज्जिति उप्पज्जिस्सति वा, एव खलु वासुदेवा । जबूद्दीवाओ भारहाओ वासाओ हत्थिणाउरणयराओ पंडुस्स रण्णो पुव्व- यीच हो जहा जवृद्धीप नाम का द्वीप, जहा भरतक्षेत्र नाम का क्षेत्र था उस ओर चल दिये। सू०२९ ॥ રને લઈને લવણ સમુદ્રની વચ્ચે થઈને જ્યા જ બૂઢીપ નામે કપ, અને से ।। सूत्र २८॥
- - ५० सायास आरोग या पत्र पाडास्तौगोपाग जति, उपागम पाना पाडवानां द्रौपदी देवी माहन्धि ' महम्नेन. उपनयनि-पदानि । ततः स ग मणः पत्रमि' पाण्डवे गार्धमात्मपाठ पहभीरपैतागगमुद्रम्प म यम येन यौ। जम्बूद्वीपो द्वीपः, योर भारत वर्ष और पापाग्यद् गमाग गतु मटतः ॥ मु०२९।। पच पडघे तेणे Tri, वागरिता पन पडाण दोषद देविं माधि उपणे ) तप प्रणयोसुदेव ने पद्मनाभ से इस प्रकार कहा अरे ओ पदमनाभ ! तुम हम तर से अकाल में ही मरण के अभिलाषी क्यों यने ५क्यातुक्षे यह पना नरीधा किद्रौपदी मेरी परिन है। क्यों त इम को यहां ले आया ! पर-जय तृ इमरूप में मेरी शरण मे आचुका हे-तो अय तुझे किसी भी प्रकार का मेरी तरफ से भय नही रहा-ऐसा फरकर कृष्णासुदेव ने उसे विसर्जित कर दिया-अपने स्थान पर उसे जाने की आज्ञा देदी-1 याद में द्रौपदी को माथ में लिया और लेकर वे रथ पर आम्द हुए। आरूढ होकर फिर वे, पर्श आये-जहा पाचों पांडव थे वहा आकर उन्हों ने द्रौपदी को अपने शयों से पांचो पाडवों के सुपुर्द कर दिया। (तण्ण कण्हे पचेहिं पटवेहिं सद्धिं अप्पच्छे हिं रहेहिं लवणसमुद मज्झ मझेण जेणेय जवूद्दीवे दीवे जेणेव भारहे चासे तेणेव पहारेत्य गमणाए) इसके बाद ये कृष्णवासुदेव पांचों के साथ आत्मपष्ट रोकर उहो रधों को ले लवण समुद्र से बीचों पडवे तेणेव उवागच्छइ आगन्छित्ता पचण्ह पडवाण दोवइ ។ મદેવે પદ્મનાભને આ પ્રમાણે કહ્યું કે અરે એ ! પદ્મનાભ! મયમાં જ મરણ અભિલાષી કેમ બની ગયા છે, કે દ્રોપદી મારી બહેન છે તુ એને અહીં શા માટે લઈ રે આ સ્થિતિમાં મારી પાસે આવ્યો છે તે હવે તારે જાતને ભય રાખવો જોઈએ નહિ આમ કહીને કૃષ્ણ - ત્યારપછી દ્રૌપદીને સાથે લઈને તેઓ રથ ઉપર તેઓ જ્યા પાચે પડ હતા ત્યા આવ્યા ત્યા ની દ્રૌપદીને પાચે પાડવેને સોપી દીધી सद्धि अप्प छ? छहि रहेहि लवणसपुर जेणेव भारदेवासे तेणेव पहारेत्य गमणाए) પાડવોની સાથે આ धन मनारधर्मामृतविणो टी० २० १६ द्रौपदीचरितनिरूपणम् मूलम् तेणं कालेण तेणं समएण धायइसंडे दीवे पुरस्थि- मिद्धे भारहे वासे चंपाणामं णयरी होत्था, पुण्णभद्दे चेइए, तत्थ णं चपाए नयरीए कविले णामं वासुदेवे राया होत्था, महिया हिमवंत० वण्णओ, तेण कालेण तेण समएण मुणिसुव्वए अरहा चपाए पुण्णभद्दे समोसढे, कपिले वासुदेवे धम्म सुणेइ तएणं से कविले वासुदेवे मुणिसुब्वयस्स अरहओ धम्म सुणे- माणे कण्हस्त वासुदेवस्स सखसहं सुणेइ, तएण तस्स कवि- लस्स वासुदेवस्ल इमेयारूवे अज्झस्थिए समुप्पज्जित्था – किं मण्णे धायइसंडे दीवे भारहे वासे दोच्चे वासुदेवे समुप्पण्णे ? जस्स णं अय संखसद्दे ममंपिव मुहवायरिए वीयं भवइ,तएणं मुणिसुव्वए अरहा कविल वासुदेवं एव वयासी-से गुण ते कविला वासुदेवा । मम अतिए धम्म णिसामेमाणस्स सखसद आकपिणत्ता इमेयारूवे अज्झथिए किं मन्ने जाव वीयं भवइ, से णूणं कविला वासुदेवा । अयमढे सम? ? हता । अस्थि, नो कविला | एव भूय वा३ जन्न एगे खेत्ते एगे जुगे समए दुवे अरहता वा चकवट्टी वा बलदेवा वा वासुदेवा वा उप्पजिसु उप्पज्जिति उप्पज्जिस्सति वा,एवं खलु वासुदेवा | जबूद्दीवाओ भारहाओ वासाओ हरियणाउरणयराओ पडुस्स रपणो पुव- पीच हो जहा जबूढीप नाम का द्वीप, जहा भरतक्षेत्र नाम का क्षेत्र था उस ओर चल दिये। सू०२९ ।। રથને લઈને લવણ સમુદ્રની વચ્ચે થઈને જ્યા જ બૂઢીપ નામે ઠપ, અને તેમાં પણ જ્યા ભારતવર્ષ નામે ક્ષેત્ર હતુ તે તરફ રવાના થયા 1 ॥ सूत्र २८॥
५.० शाहायचा आरोग यौर पश्च पाण्डवास्तीयोपाग रति, उपागय पत्राना पायानां द्रौपदी देवीं ' साहत्यि' साम्तेन, उपनयति ददाति । ततः यस कृष्ण पश्रमि पाण्डौ गार्धमात्मपष्ठ पत्भीरथैलवणसमुद्रम्य मध्यम येन यौर जम्बुद्रीपो द्वीपः, यौव मारत वर्ष तौर प्राधारयन् गमनाय ग तु मटतः ।। म०२९।। पंच पडवे तेणेव उजागरड, उवागघिउत्ता पचण पडवाण दोवइ देवि सारधि उवणे) तप कृष्णवासुदेव ने पद्मनाभ से इस प्रकार कहा अरे ओ पद्मनाभ ! तुम इस तरह से अकाल में ही मरण के अभिलाषी क्यो बने ४क्यातुझे यह पता नरी था कि द्रौपदी मेरी यहिन है। क्यों तु इस को यहाँ ले आया! सैर-जय तृ इम रूप में मेरी शरण में आचुका है-तो अय तुझे किसी भी प्रकार का मेरी तरफ से मय नी रहा-ऐसा कहकर कृष्णवासुदेव ने उसे विसर्जित कर दिया-अपने स्थान पर उसे जाने की आज्ञा देदी-। याद में द्रौपदी को सार में लिया और लेकर वे रथ पर आरूढ हुए। आरूढ होकर फिर वे, वहां आये-जहां पांचों पाडव थे वरा आफर उन्हों ने द्रौपदी को अपने हाथों से पांचो पांडवों के सुपुर्द कर दिया। (तपण कण्हे पचेहिं पडवेहिं सद्धिं अप्पछट्टे छहिं रहेहिं लवणसमुद्द मज्झ मज्झेण जेणेव जद्दीव दीवे जेणेव भारहे वासे तेणेव पहारेत्थ गमणाए) इसके बाद वे कृष्णवासुदेव पांचों पांडवों के साथ आत्मपष्ठ रोकर छहो रथों को ले लवण समुद्र से यीचों दुरूहित्ता जेणेव पच पडवे तेणेव उवागच्छर उवागच्छित्ता पचण्ह पडवाण दोवइ देवि साइथि उवणेइ) ત્યારે કૃષ્ણ-વાસુદેવે પદ્મનાભને આ પ્રમાણે કહ્યું કે અરે ઓ પાનાભ' તમે આ પ્રમાણે અસમયમાં જ મરણ અભિલાષી કેમ બની ગયા છો, શુ તમને ખબર ન હતી કે દ્રોપદી મારી બહેન છે તુ એને અહીં શા માટે લઈ આ? ખેર, તું જ્યારે આ સ્થિતિમાં મારી પાસે આવ્યો છે તો હવે તારે મારા તરફથી કોઈ પણ જાતને ભય રાખ જોઈએ નહિ આમ કહીને કૃષ્ણ વાસુદેવે તેને વિદાય કર્યો ત્યારપછી દ્રૌપદીને સાથે લઈને તેઓ રથ ઉપર સવાર થયા સવાર થઈને તેઓ જ્યા પાસે પાડ હતા ત્યા આવ્યા ત્યા આવીને તેમણે પિતાના હાથથી દ્રૌપદીને પાર પાડવેને પી દીધી (तएण से कण्हे प चेहि पडवेहि सद्धि अप्प छठे छईि रहेहिं लवणसमुद मज्झ मज्जेण जेणेव जवृद्दीवे दीवे जेणेव भारहेवासे तेणेव पहारेत्य गमणाए) ત્યારબાદ તે કૃણ-વાસુદેવ પાસે પાડની સાથે આત્મષણ થઈને એ , अनगारधर्मामृतपपिणी टीका अ० १६ द्रौपदीचरितनिरूपणम् मायारि करेइ, तएण से कविले वासुदेवे जेणेव अमरकका तेणेव उवागच्छइ उवागच्छित्ता अमरककं रायहाणि सभग्गतोरणं जाव पासइ पासित्ता पउमणाभं एवं क्यासी-किन्नं देवाणुप्पिया। एसा अमरकका सभग्ग जाव सन्निवइया , तएण से पउभ- गाहे कविलं वासुदेवं एवं वयासी-एव खल्लु सामी। जबदी- वाओ दीवाओ भारहाओ वासाओ इह हव्वमागम्म कण्हेणं वासुवेणं तुम्भे परिभृए अमरकका जाव सन्निवाडिया, तएण से कविले वासुदेवे पउमणाहस्स अंतिए एयम? सोचा पउम- णाह एव वयासी हं भो। पउमणाभा। अपत्थियपत्थिया किन्न तुम नजाणसि मम सरिसपुरिसस्स कण्हस्म वासुदेवस्स विप्पियं करेमाणे १, आसुरुत्ते जाव पउमणाहं णिव्विसयं आणवेइ, पउ- मणाहस्स पुत्ते अमरकंका रायहाणीए महया महया रायाभि- सेएण अभिसिचइ जाव पडिगए ॥ सू० ३० ॥ टोका- तेणं कालेण' इत्यादि । तस्मिन् काले तस्मिन् समये धातकी- पण्डे द्वीपे पौरस्त्याधै भारते वर्षे चम्पा नाम नगरी आसीत् । तस्या बहिर्भागे पूर्णभद्र नाम चैत्यम्-उद्यानम् , आसीत् । तत्र-तस्या खलु चम्पानगयाँ 'तेण कालेण तेण समएण' इत्यादि ।। दीकार्थ-(तेण कालेण तेण समएण) उस काल में और उस समयमें (धायइसडे दीवे, पुरथिमद्धे भारहेवासे चपा णाम णयरी होत्था, पुण्ण भद्दे चेइण) धातकी पड द्वीप मे पूर्व दिग्भागवर्ती भरत क्षेत्र में चपा 'वेर्ण कालेण तेण समएण' इत्यादि- A-(तेण कालेण तेण समएण) ते ॥णे भने ते सभये (पायइ स डे दीवे, पुरस्थिमद्धे भारहेवासे चपा णाम णयरी होत्था, पुण्णमद्दे चेइए) पाती વડદ્વીપમાં પૂર્વ દિભાગવત ભરતક્ષેત્રમાં ચ પ નગરી હતી, તેમાં પૂર્ણભદ્ર નામે ઉદ્યાન હતું
মালামাল
संगइएणं देवेण अमरकंकाणरि साहरिया, तएणं से कण्हे
वासुदेवे पंचहि पंडवहिं सद्धि अप्पछठे छहिं रहेहि अमरकंकं
रायहाणि दोवईए देवीए कूवं हव्वमागए, तएण तस्स कण्हस्स
वासुदेवस्स पउमणाभेण रण्णा सद्धिं सगामे सगामेमाणस्स
अय संखसद्दे तव मुहवाया० इव वीइ भवद, तएण से कविले
वासुदेवे मुणिसुव्वयं वदइ२ एवं वयासी-गच्छामि णं अह
भंते । कण्हे वासुदेवे उत्तमपुरिस सरिसपुरिस पासामि, तएण
मुणिसुब्बए अरहा कविले वासुदं वे एव पयासी - नो सल्ल
देवाणुप्पिया । एव भूय वा३ जण्ण अरहतो वा अरहतं पासइ
चकवट्टी वा चकवट्टि पासइ बलदेवा वा बलदेव पासइ वासु
देवो वा वासुदेव पासइ, तहविय ण तुम कण्हस्त वासुदेवस्स
लवणसमुद्द मज्झमझेण वीइवयमाणस्स सेयापीयाइ धयग्गाइ
पासिहिसि, तएण से कविले वासुदेवे मुणिसुव्वय वदइ नमसइ
वंदित्तानमंसित्ताहत्थिखध दुरूहइ दुरूहित्ता सिग्घ२ जेणेव वेला
उले तेणेव उवागच्छइ उवागच्छित्ता कण्हस्त वासुदेवस्स लवण
समुद्द मज्झमझेण वीइवयमाणस्त सेयापीयाइ धयग्गाइ पासइ
पासित्ता एवं वयइ एसण मम सरिसपुरिसे उत्तमपुरिसे कण्हे वासु
देवे लवणसमुद्द मज्झ मज्झेण वीइवयइत्तिकटु पचजन्न सख
परामुसइ परामुसित्ता मुहवायपूरिय करेइ, तएण से कण्हे
वासुदेवे कविलस्स वासुदेवस्स सखसद्द आयन्नेइ आयन्नित्ता
पचजन्न जाव पूरियं करेइ, तएण दोवि ..
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अनगारधर्मामृतपपिणो टीका १० १६ द्रौपदीचरितनिरूपणम् मायारि करेइ, तएण से कविले वासुदेवे जेणेव अमरकका तेणेव उवागच्छइ उवागच्छित्ता अमरकंकं रायहाणि संभग्गतोरणं जाव पासइ पासित्ता पउमणाभं एव वयासी-किन्न देवाणुप्पिया। एसा अमरकंका सभग्ग जाव सन्निवइया , तएणं से पउन- णाहे कविलं वासुदेवं एव वयासी-एव खलु सामी । जंबूदी- वाओ दीवाओ भारहाओ वासाओ इहं हव्वमागम्म कण्हेणं वासुदेवेण तुम्भे परिभूए अमरकंका जाव सन्निवाडिया, तएणं से कविले वासुदेवे पउमणाहस्स अंतिए एयमट्ठ सोच्चा पउम- णाह एवं वयासी ह भो। पउमणाभा। अपत्थियपत्थिया किन्न तुम न जाणसि मम सरिसपुरिसस्त कण्हस्म वासुदेवस्स विप्पियं करेमाणे १, आमुरुत्ते जाव पउमणाहं णिव्विसय आणवेइ, पउ- मणाहस्स पुत्ते अमरकंका रायहाणीए महया महया रायाभि- सेएण अभिसिंचइ जाव पडिगए ॥ सू० ३० ॥ टीका- तेण कालेण' इत्यादि । तस्मिन् काले तस्मिन् समये धातकी. पण्डे द्वीपे पौरस्त्यायें भारत वर्षे चम्पा नाम नगरी आसीत् । तस्या वहिर्भागे पूर्णभद्र नाम चैत्यम् उद्यानम् , आसीत् । तरतस्यां खलु चम्पानगयां 'तेण कालेण तेण समएण' इत्यादि । दीकार्य-तेणं कालेण तेण समएण) उस कालमें और उस समय में (वायइसडे दीये, पुरथिमद्धे भारहेवासे चपा णाम णयरी होत्या, पुण्ण भद्दे चेइण) धातकी पड द्वीप मे पूर्व दिग्भागवर्ती भरत क्षेत्र में चपा वेण कालेण वेण समएण' इत्यादि- साथ-(तेण कालेण तेण समएण) ते णे भने त सभये (पायइ स डे दौवे, पुरथिमद्धे भारहेवासे चपा णाम जयरी होत्था, पुण्णभद्दे चेइ) udsी ષડદ્વીપમા પૂર્વ દિગભગવર્તી ભરતક્ષેત્રમાં ચ પા નગરી હતી, તેમાં પૂર્ણભદ્ર . નામે ઉદ્યાન હતુ
शासाधका
संगइएणं देवेण अमरकंकाणयरिं साहरिया, तएणं से कण्हे
वासुदेवे पंचहि पडवेहि सद्धिं अप्पछठे छहिं रहेहि अमरकक
रायहाणि दोवईए देवीए कूवं हव्वमागए, तएण तस्त कण्हस्स
वासुदेवस्स पउमणाभेणं रण्णा सद्धि संगामे सगामेमाणस्स
अय सखसद्दे तव मुहवाया० इव वीइ भवद, तएणं से कविले
वासुदेवे मुणिसुव्वय वंदइ२ एवं वयासी-गच्छामि णं अहं
भते । कण्हे वासुदेवे उत्तमपुरिस सरिसपुरिस पासामि, तएण
मुणिसुव्वए अरहा कविले वासुदेव एव चयासी - नो खल्ल
देवाणुप्पिया | एव भूय वा३ जपण अरहंतो वा अरहत पासइ
चकवट्टी वा चकवट्टि पासइ वलदेवा वा बलदेव पासइ वासु
देवो वा वासुदेव पासइ, तहविय ण तुम कण्हस्त वासुदेवस्स
लवणसमुद्द मज्झमज्झेण वीइवयमाणस्स सेयापीयाइ धयग्गाइ
पासिहिसि, तएण से कविले वासुदेवे मुणिसुव्वय वंदइ नमसइ
वदित्तानमसित्ताहत्थिखध दुरूहइ दुरूहित्ता सिग्ध२ जेणेव वेला
उले तेणेव उवागच्छइ उवागच्छित्ता कण्हस्स वासुदेवस्स लवण
समुद्द मज्झमझेण वीइवयमाणस्त सेयापीयाइ धयग्गाइ पासइ
पासित्ता एवं वयइ एसण मम सरिसपुरिसे उत्तमपुरिसे कण्हे वासु
देवे लवणसमुद्द मज्झ मज्झेण वीइवयइत्तिकटु पचजन्न सख
परामुसइ परामुसित्ता मुहवायपूरिय करेइ, तएण से कण्हे
वासुदेवे कविलस्स वासुदेवस्स सखसद्द आयन्नेइ आयन्नित्ता
पचजन्नं जाव पूरियं करेइ, तएण दोवि 1 -
,
- मनगारधर्मामृतपर्पिणी टी० अ० १६ द्रौपदीचरितनिरूपणम् समुत्पन्न ? यस्य वासुदेवस्य सलु अयं शशब्दो ममेव मुखपातपूरित -मद्वादित- शस बनिरिवेत्यर्थः, 'नीय भाइ ' द्वितीयो भवति । तत खलु मुनिसुव्रतोऽईन् कपिल वासुदेवम् एवम्वक्ष्यमागप्रकारेण, अवादी-' से घृण इत्यादि-से' नून ते तर हे कपिल वासुदेव ! ममान्तिके धर्म ‘णिमामेमाणस्स' निशामयतः= भृण्वतः, शहशब्दम् ' आकणित्ता' आकर्ण्य=श्रुत्या 'इमेयारुवे ' अयमेतद्रूपः आयात्मिकः सरल्पो पिचारः समुदपद्यत-किमन्यो वामुदेवः समुत्पन्नः, यस्याय शब्दशब्दो यावद द्वितीयो भवति ' से ' अथ नून हे कपिलवासुदेव ! अयमर्थ. समर्थः किं सत्य ?, कपिल वासुदेवः माह-हता! अत्थि इति हन्त ! हे प्रभो । अयमयः सत्योऽस्ति । मुनिसते भगवानाह-हे कपिल वासुदेव ! नो स्लु एवम्- ईदृश, 'भूय वा ' भूत वा अतीत वा, भवद् वा-वर्तमान वा भविष्यद वा अना- गत वा कालत्रयेऽप्येव न भवतीत्यर्थः, 'जन्न यत् सल एकस्मिन् क्षेत्रो, एक भवह) उनके पास वे कपिल वासुदेव धर्मका उपदेश सुन रहे थे। सोउस कपिल वासुदेवने मुनिसुव्रतप्रभुके पास धर्मका उपदेश सुनते हुए कृष्ण वासुदेवकी शखध्वनि सुनि । तब उस कपिल वासुदेवको इस प्रकार आध्यात्मिक यावत् मनोगत विचार उत्पन्न हुआ-क्या वातकीपड नामके द्वीपमें वर्तमान भरतक्षेत्र में कोई और दूसरी वासुदेव उत्पन्न हुआ है ? कि जिसके शखका यह शब्द मेरे द्वारा यजाये गये शंखके शब्द जैसा हुआ है ? (तएणं मुणि सुव्वए अरहा कविल वासुदेव एव वयासी-से गृणं ते कविला वासुदेवा ! मम अतिए धम्म णिसामेमाणस्स सखसद आक- ण्णित्ता इमेयारूवे अज्झथिए कि मपणे जाव चीय भवइ से गृण कविला वासुदेव !अयमटे समझे? हता अत्यि, नो खलु कविला एयभूय वा३ जन्नं તેમની પાસે તે કપિલ વાસુદેવ ધર્મોપદેશ સાભળી રહ્યા હતા તે કપિલ વાસુદેવે મુનિસુવ્રત પ્રભુની પાસે ધર્મોપદેશ સ ભળતા જ કૃષ્ણવાસુદેવના શપને ધ્વનિ સ ભળે ત્યારે તે કપિલ વાસુદેવને આ જાતને આધ્યાત્મિક યાવતું મને ગત સકલ્પ ઉત્પન્ન થયો કે શું ઘાતકી પડ નામના દ્વીપમાં વિદ્યમાન ભરતક્ષેત્રમાં કઈ બીજે વાસુદેવ ઉત્પન થયે છે? કેમકે તેના શબને આ દવનિ મારા વડે વગાડવામાં આવેલા શખના વનિ જેવો જ છે (तएण मुणि सुन्चए अरहा कविल वासुदेव एव वयासी-से गृण ते कवि लावासुदेवा ! मम अतिए धम्म णिसामेमाणस्स सखसद्द आफण्णिता इमेयासवे अझथिए कि मण्णे जाव वीय भवइ, से शूण कपिला वासुदेवा ! अयमद्वे समहे ' हता, अत्थि, नो खलु कविला एय भूयं वा ३ जन्न एगखेचे एगे जुगे - +3D - तापकथानी कविले णाम' कपिलो नाम वासुदेवो राजाऽऽसीत् ' महया हिमयत०' वणो' महाहिमवानित्यादि वर्णका वर्णन पूर्वोक्ताद् हो यम् । तस्मिन् काले तस्मिन् समये गुनिमुत्रवोर्ड चम्पापा नगयों पूर्णमढ़े नाम्नि चैत्पै समरसृतः । तस्य ममीपे कपिलो नाम पामुदेशो धर्म ऋगोति । ततः खलु स कपिलो बामदेवः मुनिमुनतस्याईतोऽन्ति के धर्म शृण्वन् कृष्णस्य वासुदेवस्य शतशब्द शृगोति ततः स्वछ तस्य कपिलस्य वामदेवस्य अयगेतद्रूषा वक्ष्यमाणस्वरूप., 'अज्झथिए ' आध्यात्मिका आरमगतः साल्पो-विचार, यावद् समुदपयत-किम्-भन्यो धातकीपण्डे द्वोपे भारते व द्वितीयो वामदेव नामकी नगरी थी। उसमें पूर्णभद्र नाम का उद्यान था। (तत्यण चपाए नयरीए कपिले नाम वासुदेवे राया होत्या, मरया हिमवत वण्णओ तेण कालेण तेण समएण मुणिसुपए अरहो, चपाए पुण्णभद्दे समोसढे) उस चपानगरीमें कपिल नाम के वासुदेव राज्य करते थे। ये मराहिम वान् पर्वत जैसे गुणोंसे पूर्ण थे। पहिले जैसा वर्णन राजाओंका भिन्न २ जगह किया गया है वैसा ही वर्णन इसका भी जानना चाहिये । उस काल और उस समय में मुनि सुव्रत तीर्थ कर चपा नगरी में इस पूर्ण भद्र उद्यान में आये हुए थे (कविले वासुदेवे धम्म सुणेइ, तएण से कविले वासुदेवे मुगिसुव्वयस्स अरहाओ धम्म सुणेमाणे कण्हस्स वासुदेवस्स सखसद्द सुणेइ, तएण तस्स कविलस्स वासुदेवस्स इमेयारूवे अज्झथिए समुप्पज्जिया-किं मण्णे धायइसडे दीवे भारहे वासे दोच्चे वासुदेवे समुप्पपणे ? जस्सण अय सखसद्दे ममपिध मुहवायपूरिए बीय ( तत्थ ण चपाए नयरीए कपिले नाम वासुदेवे राया होस्था, महया हिमवत यण्णभो, वेण कालेण तेण समएण मुणिसुध्धए अरहा, चंपार पुण्णभद्दे समोसटे) તે ચ પ નગરીમા કપિલ નામે વાસુદેવ રાજ કરતા હતા તેઓ મહા હિમાવાન વગેરે જેવા બળવાન હતા પહેલા જુદા જુદા રાજાઓનુ જે પ્રમાણે વર્ણન કરવામા આવ્યુ છે તે પ્રમાણે આ રાજાનું પણ વર્ણન જાણી લેવું જોઇએ તે કાળે અને તે સમયે મુનિસુવત તીર્થ કર ચપા નગરીમાં તે પૂર્ણ ભદ્ર ઉદ્યાનમાં પધાર્યા હતા (कपिले वासुदेव धम्म मुणेइ, तपण से कविले रासुदेवे मुणि सुध्धयस्त अरहाओ धम्म सुणेमाणे, कण्हस्स वासुदेवस्स सखसद मुणइ, तए ण तस्स कधि- लस्स वासुदेवस्स इमेयारूबे अज्झविए समुप्पन्जित्था-कि मण्णे धायइसडे दीवे भारहेवासे दोच्चे वासुदेवे समुप्पण्णे ? जस्स ण अय सखसरे मम पिव मुहवाय पूरिए वीय भवइ ) मनगारधामृतवर्षिणीटी० १० १६ प्रौपदीचरितनिरूपणम् . समुत्पन्न ? यस्य वासुदेवस्य खलु अय शतशब्दो ममेव मुखातपूरित -मद्वादित- शस पनिरिवेत्यर्थः, 'वीय भाइ' द्वितीयो भवति । तत खलु मुनिमुव्रतोऽहन कपिल वासुदेवम् एवम्वक्ष्यमागप्रकारेण, अपादीत्-' से णूण इत्यादि-से' नून ते तव हे कपिल वासुदेव । ममान्तिके धर्म ‘णिसामेमाणस्स' निशामयतः- शृण्वत', शङ्खशब्दम् ' आकणित्ता' आकर्ण्य=श्रुत्या 'इमेयारुचे ' अयमेतद्रूपः आ यात्मिकः सरल्पो पिचारः समुदपद्यत-किमन्यो वासुदेवः समुत्पन्नः, यस्याय शङ्खशब्दो यावद द्वितीयो भवति 'से' अथ नृन हे कपिलवासुदेव ! अयमर्थ. समर्थः किं सत्य ?, कपिल वासुदेवः माह-इता! अत्थि इति इन्त । हे प्रभो ! अयमर्थः सत्योऽस्ति । मुनिसुनते भगवानाह-हे कपिल वामदेव ! नो स्लु एवम् = ईदृश, ' भूय वा ' भूत वा=अतीत वा, भवद् वाम्वर्तमान वा भविष्यद् वा अना- गत वा काल्त्रयेऽप्येव न भवतीत्यर्थः, 'जन्न ' यत् सलु एकस्मिन् क्षेत्र, एक भवट) उनके पास वे कपिल वासुदेव धर्मका उपदेशसुन रहे थे । सो उस कपिल वासुदेवने मुनिसुव्रतप्रभुके पास धर्मका उपदेश सुनते हुए कृष्ण वासुदेवकी शख वनि सुनि । तब उस कपिल बासुदेवको इस प्रकार आध्यात्मिक यावत् मनोगत विचार उत्पन्न हुआ-क्या धातकीपड नामके द्वीपमें वर्तमान भरतक्षेत्र में कोई और दूसरी वासुदेव उत्पन्न हुआ है ? कि जिसके शखका यह शब्द मेरे द्वारा वजाये गये शंखके शब्द जैसा हुआ है ? (तएण मुणि सुब्बए अरहाकविल वासुदेव एव वयासी-से गुण ते कविला वासुदेवा ! मम अतिए धम्म णिसामेमाणस्स सखसद आक- पिणत्ता इमेयारूवे अज्झत्यिक किं मण्णे जाव चीय भवइ से गूण कविला वासुदेव ! अयमढे समझे ? हता अत्यि, नो खलु रविला एयभूय वा३ जन्न તેમની પાસે તે કપિલ વાસુદેવ ધર્મોપદેશ સાંભળી રહ્યા હતા તે કપિલ વાસુદેવે સુનિસુવ્રત પ્રભુની પાસે ધર્મોપદેશ સ ભળતા જ તૃષ્ણવાસુદેવના શ ખને ધ્વનિ સંભળે ત્યારે તે કપિલ વાસુદેવને આ જાતને આધ્યાત્મિક યાવતું મગત સકલ્પ ઉત્પન્ન થયો કે શું ઘાતકી વડ નામના દ્વીપમાં વિદ્યમાન ભરતક્ષેત્રમાં કઈ બીજે વાસુદેવ ઉત્પન્ન થાય છે? કેમકે તેના શોખને આ ધ્વનિ મારા વડે વગાડવામાં આવેલા શખના ધ્વનિ જેવો જ છે (तएण मुणि सुन्धए अरहा कविल वासुदेव एव बयासी-से गुण ते कवि लावासुदेवा ! मम अतिए सम्म णिसामेमाणस्स सखसद्द आफण्णित्ता इमेयासवे अझत्यिए कि मण्णे जाव वीय भवइ, से णूण कपिला वासुदेवा ! अयमद्वे समटे ? हता, अत्थि, नो खलु कविला एय भूय वा ३ जन्न एगखेत्ते एगे जुगे - . . - . तापपास स्मिन् युगे, पस्मिन् समये द्वापहन्ती या चक्रातिनी या बलदेवौ वा यामुदेवी वा 'उप्पग्जिमु ' उदप चेताम् , ' उपज्निति ' उत्पते उपजिजरसति' उत्पत्स्येते चा, एव खलु हे वासुदेव ! जम्वृद्रीपाद् मारताद् दि हस्तिनापुरनगरात् पाण्डो राजः ‘गुण्डा ' स्नुरा-पुनमधुः, पञ्चाना पाण्डवानां भार्या द्रौपदी देवी ता पम एगे खेत एगे जुगे एगेसमा दुवे अरहता पा,चपाचट्टी चा, यलदेवा वा, चासुदेवा वो उप्पजिसु, उपजिति, उप्पनिस्सति था,) तर मुनिसुव्रत तीर्थ कर प्रभुने उन कपिल वासुदेव से इस प्रकार करा हे कपिल वास्तु देव ! मेरे पास धर्म को सुनते समय तुम्ह शस शन्द श्रवण कर इस प्रकार का यह आध्यात्मिक सकरप-विचार उत्पन्न हुआ है, कि क्या कोई दूमरा वालदेर उत्पन्न हो गया है-जिसके शप का शद मुझे सुनाई दिया है। कहो कपिल वासुदेव ! यही यात है न ? तय कपिल चासुदेवने कहा-हा प्रभो! यही यात है-ऐसा ही विचार उत्पन्न हुआ है-तर मुनिसुव्रत भगवान्ने कपिल वासुदेवसे कहा-हे कपिल वासुदेव ऐसी बात न भूतकाल में हुई है और न भविष्यकाल में होगी-न वर्त मान् मे होती है कि जो एक ही क्षेत्रमें एक ही युगमें एक ही समय में दो अहंत प्रभु, दो चक्रवर्ती, दो चलदेव, दो वासुदेव, उत्पन्न हो रहे हों, उत्पन्न हुए हो और आगे उत्पन्न रो! (एव खलु वासुदेवा! जबूद्दीवा ओ भाराओ चामाओ हथिणाउरणयरोओ, पडुस्सरणो सुहा एगे समए दुवे अरहता वा चकाट्टो वा, वासुदेवा वा उप्पब्जिसु, उप्पजिति, उपज्जिरसति वा) ત્યારે મુનિસુવ્રત તીર્થ કર પ્રભુએ તે કપિલ વાસુદેવને આ પ્રમાણે કહ્યું કે હે કપિલવાસુદેવ મારી પાસે ધર્મને સાભળતા શખ-શબ્દ સાંભળીને તમને આ જાતને આધ્યાત્મિક સક૫-વિચાર ઉત્પન્ન થયે છે કે, શું કઈ બીજે વાસુદેવ ઉત્પન્ન થયે છે-જેના શબને ઇવનિ મને સંભળાઈ રહ્યો છે બેલે, કપિલ વાસુદેવે કહ્યું કે હે પ્રભુ! એ જ વાત છે મારા મનમાં એ જ જાતને વિચાર ઉદભવ્યો છે ત્યારે મુનિસુવ્રત ભગવાને કપિલ વાસુદેવને કહ્યું કે હે કપિલ વાસુદેવ! આવી વાત ભૂતકાળમા થઈ નથી અને ભવિષ્યકાળમાં થશે નહિ અને વર્તમાનકાળમા સ ભવી શકે તેમ પણ નથી કે જે એક જ ક્ષેત્રમાં, એક જ યુગમાં, એક જ સમયમાં બે અહંત પ્રભુ, બે ચક્રવતી, બે બળદેવ, બે વાસુ દેવ ઉત્પન્ન થયા હય, ઉત્પન્ન થઈ રહ્યા હોય અને આગળ ઉત્પન્ન થવાના હોય ( एव खलु वासुदेवा जयू दीवाभो भारहाओ वासाओ हथिणाउरणया राओ, पइस्सरग्णो, मुण्हा पचण्ह पडवाण भारिया दोवई देवी 14 , , - . मनगारधामृतषिणी टी० अ० १६ द्रौपदीचरितनिरूपणम् नाभस्य राज्ञः पूर्वसगतिकेन देवेनामरकट्टानगरी ' साइरिया' सहता आनीता, ततः खलु सः कृप्णो वासुदेवः पञ्चभिः पाण्डः सधं आत्मपप्ठः पइभीरथैरमर- क्या राजधानी द्रौपद्या देव्याः 'व' देशी शब्दोय प्रत्यानयनार्थकः प्रत्या- नयन कतु हव्यमागत., ततः खलु तस्य कृष्णस्य वासुदेवस्य पद्मनाभेन राज्ञा सार्ध ' सगाम' संग्राम युद्ध 'सगामेमाणस्स' युभ्यत, अय शङ्खशब्दस्तवमु खवावपूरित इव द्वितीयो भवति । ततः खलु स कपिलो वासुदेवो मुनिसुव्रत चन्दते, नमस्यति बन्दित्वा नमस्यित्वा एवमवादी-गच्छामि खलु अह हे पचण्ह पडवाण भारिया दोवईदेवी तव पउमनाभस्स रपणो पुव्वसगई. एण देवेण अमरक्का नयरिं साहरिया, तएण से कण्हे वासुदेवे पहिं पडवेहिं सद्धिं अप्पउछे छहिं रहेहिं अमरकक रायहाणि दोवईए देवीए कृव हव्हमागण, तण्ण तस्स कण्णस्स वासुदेवस्स पउमणाभेण रण्णा सद्धिं सगाम, सगामेमाणस्म अय सखसद्दे तव मुहवाया० इव- पीय भवइ) सुनो यात हम प्रकार है जबूद्वीप के भरत क्षेत्र में वर्तमान हस्तिनापुर नगर से पांडराजा की पुत्रवधू पाच पाडवो की पत्नी द्रौपदी देवी को तुम्हारे पद्मनाभ राजा को पूर्व भवीय मित्र कोई देव हरण कर अमरकका नगरी में ले आया । तर भरत क्षेत्र के वासुदेव कृष्ण पाच पांडवों के साथ आत्मपाठ होकर छह रथों से उस अमरकका नगरी में द्रौपदी देवी को वापिस ले जाने के लिये यहृत जल्दी आये। तय उन कृष्ण वासुदेव के, पद्मनाभ राजा के साथ युद्ध करते समय शंख का यह शब्द तुम्हारे शंख के शब्द जैसा हुआ है। (तएण से कविले वासुदेवे मुणिसुच्चय वदति, २ एव वयासी गच्छामि ण रण्णो पुव्वसगहएण देवेण अमरकका नयरिं साहरिया तएण से कण्हे वासुदेवे पचहिं पडवेहि सद्धि अपछट्टे छहि रहेहिं अमरस्क रायहाणि दोवईए देवीए कूच हन्धमागए, तएण तस्स कण्णस्स वासुदेवस्स पउमणाभेण रण्णा सद्धिं सगाम, सगामे माणस्स अय सम्वसदे तन मुहवाया० इव वीय भवइ ) સ ભળે, વિગત એવી છે કે જે બૂઢીપના ભરતક્ષેત્રમાં વિદ્યમાન હસ્તિ નાપુર નગરથી પાડુરાજાની પુત્રવધૂ પાચે પાડવોની પત્ની દ્રૌપદી દેવીને તમારા પદ્મનાભ રાજાના પૂર્વભવને મિત્ર કોઈ દેવ હરીને અમરકકા નગરીમાં લઈ આજે હતો ત્યારપછી ભરતક્ષેત્રના વાસુદેવ કૃષ્ણ પાસે પાડની સાથે આત્મ પણ થઈને છ ર ઉપર સવાર થયા અને સત્વરે દ્રૌપદી દેવીને પાછા મેળ વવા માટે ત્યાં પહોંચી ગયા પદ્મનાભ રાજાની સાથે યુદ્ધ કરતા કૃણવાસુદેવે જે શનિ કયો છે તે તમારા શખના વનિ જે છે (तएण से कविले वासुदेवे मुणि सुव्यय वदति, २ एव वयासी, गच्छामि ram- " - - . गायकवास स्मिन् युगे, एकस्मिन् समये द्वाईन्ती या चक्रवर्तिनी मा बलदेवौ वा यासुदेवी या 'उप्पजिसु ' उदपवेताम् , ' उपनिति ' उत्पयेते ' उपज्जिरसति' उत्पत्स्येते चा, एक खलु हे वासुदेव ! जम्वृद्धीपाद् मारताद् पदि हस्तिनापुरनगरात् पाण्डो राज्ञ. 'मुण्डा' स्नुमा-पुत्रवधूः, पञ्चाना पाण्डवाना भार्या द्रौपदी देवी तर पम एगे खेत्ते पगे जुगे पगे समए दुवे अरस्ता या,चफाचट्टी वा, यलदेवा वा, वासुदेवा यो उप्पग्निसु, उपनिति, उपजिस्मति चा, ) तय मुनिसुव्रत तीर्थ कर प्रभुने उन कपिल वासुदेव से इस प्रकार कहा हे कपिल वासु देव ! मेरे पास धर्म को सुनते समय तुम्ह शाम शद अरण कर इस प्रकार का यह आध्यात्मिक सक-प-विचार उत्पन्न शुआ है, कि क्या कोई दूसरा चाप्लुदेर उत्पन्न हो गया है-जिसके शप का शद मुझे सुनाई दिया है। कहो कपिल वासुदेव । यही यात है न ? तय कपिल चासुदेवने कहा-हा प्रभो । यही बात है-ऐसा ही विचार उत्पन्न हुआ है तय मुनिसुव्रत भगवान्ने कपिल वासुदेवसे कहा-हे कपिल वासुदेव ऐसी यात न भूतकाल में हुई है और न भविष्यकाल में होगी-न वर्त मान् मे होती है कि जो एक ही क्षेत्रमें एक ही युगमें एक ही समय में दो अहंत प्रभु, दो चक्रवर्ती, दो बलदेव, दो वासुदेव, उत्पन्न हो रहे हों, उत्पन्न हुए हो और आगे उत्पन्न रो! (एव खलु वासुदेवा! जबदीवा ओ भारहाओ वामाओ हथिणाउरणयरोओ, पडस्मरणो सुहा एगे समए दुचे अरहता वा चकवट्टो वा, वासुदेवा वा उप्पज्जिसु, उप्पजिति, उप्पज्जिस्सति वा) ત્યારે મુનિસુવ્રત તીર્થ કર પ્રભુએ તે કપિલ વાસુદેવને આ પ્રમાણે કહ્યું કે હે કપિલવાસુદેવ મારી પાસે ધમને સાભળતા શખ-શબ્દ સાંભળીને તમને આ જાતને આધ્યાત્મિક સ ક૫-વિચાર ઉત્પન્ન થયે છે કે, શું કઈ બીજે વાસુદેવ ઉત્પન્ન થયે છે-જેના શખ ધનિ મને સંભળાઈ રહ્યો છે બેલે, -વિલ વાસુદેવે કહ્યું કે હે પ્રભુ! એ જ વાત છે મારા મનમાં એ જ જાતને વિચાર ઉદુભળે છે ત્યારે મુનિસુવ્રત ભગવા કપિલ વાસુદેવને કહ્યું કે હે કપિલ વાસુદેવ! આવી વાત ભૂતકાળમા થઈ નથી અને ભવિષ્યકાળમા થશે નહિ અને વર્તમાનકાળમાં સભવી શકે તેમ પણ નથી કે જે એક જ ક્ષેત્રમાં, એક જ યુગમ, એક જ સમયમા બે અહંત પ્રભુ, બે ચક્રવર્તી, બે બળદેવ, બે વાસુ દેવ ઉત્પન્ન થયા હોય, ઉત્પન્ન થઈ હ્યા હોય અને આગળ ઉત્પન્ન થવાના હોય (एव खलु वासुदेवा । जय दीवाओ भारहाओ वासाओ हत्थिणाउरणया राओ, पहुस्स रष्णो, मुण्हा पचण्ह पडमाण भारिया दोवई देवी तब - मनगारधर्मामृतषिणी टी० अ० १६ द्रौपदीचरितनिरूपणम् नाभस्य राज्ञः पूर्वसंगतिकैन देवेनामरककानगरी ' साहरिया' सहता आनीता, ततः खलु सः कृप्णो वासुदेवः पञ्चभिः पाण्डः स आत्मपप्ठः पइभीरथैरमर- कमा राजधानी द्रौपद्या देव्याः 'कर' देशी शब्दोयं प्रत्यानयनार्थकः प्रत्या- नयन कतु हव्यमागत., ततः खलु तस्य कृष्णस्य वासुदेवस्य पद्मनाभेन राज्ञा साध सगाम' संग्राम=युद्ध 'सगामेमाणस्स' यु यत, अय शमशब्दस्तवमु खवातपूरित इव द्वितीयो भवति । ततः खलु स कपिलो वासुदेवो मुनिसुत्रत चन्दते, नमस्यति चन्दित्वा नमस्यित्वा एवमवादीत्-गच्छामि खल अह हे पचण्ह पडवाण भारिया दोबईदेवी तव पउमनाभस्स रपणो पुव्वसगई. एण देवेण अमरकका नयरिं साहरिया, तएण से कण्हे वासुदेवे पहिं पडवेहिं सद्धिं अप्पच्छे छहिं रहेहिं अमरकक रायहाणि दोवईए देवीए कृव हव्हमागण, तण्ण तस्स कण्णस्स वासुदेवस्स पउमणाभण रपणा सद्धिं सगाम, सगामेमाणस्म अय सखसहे तव मुहवाया० इव- पीय भवइ) सुनो बात इस प्रकार है जबूद्वीप के भरत क्षेत्र में वर्तमान हस्तिनापुर नगर से पांडुराजा की पुत्रवधू पाच पाडवो की पत्नी द्रौपदी देवी को तुम्हारे पद्मनाभ राजा को पूर्व भवीय मित्र कोई देव हरण कर अमरकका नगरी में ले आया। तय भरत क्षेत्र के वासुदेव कृष्ण पाच पांडवों के साथ आत्मपष्ठ होकर छह रथों से उस अमरकका नगरी में द्रौपदी देवी को वापिस ले जाने के लिये बहुत जल्दी आये। तब उन कृष्ण वासुदेव के, पद्मनाभ राजा के साथ युद्ध करते समय शख का यह शब्द तुम्हारे शंख के शब्द जैसा हुआ है। (तएण से कविले वासुदेवे मुणिसुव्वय वदति, २ एव वयासी गच्छामि गं रण्यो पुव्यसगइएण देवेण अमरकका नयरिं साहरिया तएण से कण्हे वासुदेवे पचहि पडवेहि सद्धिं अप्पटे उहि रहेहिं अमरकक रायहाणि दोवईए देवीए कूव हुन्धमागए, तरण तस्स कण्णस्स वासुदेवस्त पउमणाभेण रण्णा सद्धिं सगाम, सगामे माणस्स अय सम्बसद्दे तन मुहवाया. इव वीय भवइ ) સ ભળે, વિગત એવી છે કે જે બૂદ્વીપના ભરતક્ષેત્રમાં વિદ્યમાન હસ્તિ કપુર નગરથી પાડુરાજાની પુત્રવધૂ પાચે પાડવોની પત્ની દ્રૌપદી દેવીને તમારા પદ્મનાભ રાજાના પૂર્વભવનો મિત્ર કે ઈ દેવ હરીને અમરક કા નગરીમાં લઈ આવ્યો હતો ત્યારપછી ભરતક્ષેત્રના વાસુદેવ કૃષ્ણ પા પાડવાની સાથે આત્મ પણ થઈને છ ર ઉપર સવાર થયા અને સત્વરે દ્રૌપદી દેવીને પાછા મેળ વવા માટે ત્યાં પહોચી ગયા પદ્મનાભ રાજાની સાથે યુદ્ધ કરતા કૃષ્ણ વાસુદેવે જે શખધ્વનિ કર્યો છે તે તમારા શખના ધ્વનિ જેવો છે (तएण से कविले वासुदेवे मुणि मुव्यय वदति, २ एव वयासी, गच्छामि - . natur स्मिन् युगे, एकस्मिन् समये द्वारहन्ती या चायतिनी या बलदेवी या वासुदेवी या 'उप्पग्निसु' उदपवेताम् , ' उपस्निति ' उत्पयेते 'उपजिजस्सति उत्पत्स्येते वा, एक खलु हे वासुदेव ! जम्बूद्वीपाद् मारताद् वर्षात हस्तिनापुरनगरात् पाण्डो राज्ञः 'सुण्डा ' स्नुरा-पुनमधुः, पञ्चाना पाण्डवानां भार्या द्रौपदी देवी तर पम एगे खेत्ते एगे जुगे एगेसमा दुवे अरहताना,चावट्टी वा, पलदेवा वा, वासुदेवा यो उपजिसु, उपजिति, उप्पनिस्सति चा, तर मुनिसुव्रत तीर्थ कर प्रभुने उन कपिल वासुदेव से इस प्रकार करा हे कपिल थाट देव! मेरे पास धर्म को सुनते समय तुम्ह शंग शदश्रण कर इस प्रकार का यह आध्यात्मिक सकल्प-विचार उत्पन्न हुआ है, कि क्या कोई दूसरा वासुदेव उत्पन्न हो गया है-जिसके शव का शद मुझे सुनाई दिया है। कहो कपिल वासुदेव ! यही बात है न? तय कपिल वासुदेवने कहा-हा प्रभो । यही बात है-ऐसा ही विचार उत्पन्न हुआ है-तत्र मुनिसुव्रत भगवान्ने कपिल वासुदेवसे कहा-हे कपिल वासुदेव ऐसी पात न भूतकाल में हुई है और न भविष्यकाल में होगी-न वर्त मान् मे होती है कि जो एक ही क्षेत्रमें एक ही युगमें एक ही समय में दो अहंत प्रभु दो चक्रवर्ती, दो बलदेव, दो वासुदेव, उत्पन्न हो रहे हों, उत्पन्न हुए हो और आगे उत्पन्न हों। (एच खलु वासुदेग! जबूद्दीवा ओ भारहाओ वासाओ हथिणाउरणयरोओ, पडस्मरणो सुहा एगे ममए दुवे अरहता गा चकाट्टो वा, वासुदेवा वा उपजिसु, उप्पजिति, उपज्जिरसति वा) ત્યારે મુનિસુવ્રત તીર્થ કર પ્રભુએ તે કપિલ વાસુદેવને આ પ્રમાણે કહ્યું કે હે કપિલવાસુદેવ મારી પાસે ધર્મને સાભળતા શખ-શબ્દ સાંભળીને તમને આ જાતને આધ્યાત્મિક સંકલ્પ-વિચાર ઉત્પન્ન થયે છે કે, શું કઈ બીજો વાસુદેવ ઉત્પન્ન થયા છે જેના શબને વનિ મને સંભળાઈ રહ્યો છે બોલે, કવિલ વાસુદેવે કહ્યું કે હા, પ્રભુ! એ જ વાત છે મારા મનમાં એ જ જાતને વિચાર ઉદભવ્યું છે ત્યારે મુનિસુવ્રત ભગવાને કપિલ વાસુદેવને કહ્યું કે હે કપિલ વાસુદેવ! આવી વાત ભૂતકાળમાં થઈ નથી અને ભવિષ્યકાળમા થશે નહિ અને વર્તમાનકાળમાં સભવી શકે તેમ પણ નથી કે જે એક જ ક્ષેત્રમાં, એક જ યુગમાં, એક જ સમયમાં બે અહંત પ્રભુ, બે ચક્રવર્તી, બે બળદેવ, બે વાસુ દેવ ઉત્પન્ન થયા હોય, ઉત્પન્ન થઈ રહ્યા હોય અને આગળ ઉત્પન્ન થવાના હોય (एव खलु वासुदेवा ' जयू दीवानी मारहाओ वासाओ इत्थिणाउरणया राओ, पहुस्स रणो, मुण्हा पचण्ड पडवाण भारिया दोवई देवी तर - %3D मनगारधर्मामृतवाणी टी. म. १६ द्रौपदीचरितनिरूपण कृष्णस्य वासुदेवस्य लवणसमुद्रस्य मध्यमध्येन व्यतिव्रजत श्वेतपीतानि-ध्वजा- प्राणि 'पासिहिसि' द्रक्ष्यसि । ततः खलु स कपिलो वासुदेवो मुनि सुत्रत वन्दते, नमस्यति वन्दित्वा नमस्यित्वा इस्तिस्कन्ध दृरोहति आरोहति आरा शीघ्र २ यौव 'वेलाउछे । वेलाकूलं समुद्र वेला तट वर्तते, तनवोपागन्छति, उपागत्य कृष्णस्य वसुदेवस्य लवणसमुद्रस्य मध्यमध्येन ' वीइवयमाणस्स' व्यतित्रजत : गन्छत , श्वेतपीतानि धजाग्राणि पश्यति, दृष्ट्वा एव वदति एसण मम सदृशपुरुषः उत्तमपुरुषः कृष्णो वासुदेवो लवणसमुद्रस्य मध्यमध्येन ' वीइचयइ' व्यतित्रजति गच्छति, इति कृत्वा पाञ्चजन्यं शट्स परामृशति-गृह्णाति, गृहीत्वा मुखपातपूरित करोति-कपिलमामुदेवः स्वशङ्क वादयति । ततः खलु स कृप्णो वासुदेवः कपि चक्रवर्ती का दूसरे और चक्रवर्ती से बलदेव का दूसरे और किसी वल- देव से, वासुदेव का दूसरे और वासुदेव से कभी भी मिलाप नहीं होता है । (तह वियण तुम कण्हस्स वासुदेवस्स लवणसमुद्द मज्झ मझेण वोइवयमाणस्स सेया पीयाइ घयग्गाइ पासिरिसि) हा, इतना हो सकता हैं कि जब वे कृष्णवासुदेव लवणसमुद्रके बीचसे होकर जा रहे होवें तय तु मउनकी श्वेत पीत ध्वजाओंके अग्र भाग को देख सकते हा । (तएण से कवि वासुदेवेमुणिसुव्वय बदइ, नमसइ, वंदित्ता,नमसित्ता, हस्थि- खध दुरूहह, दुरुहित्ता सिग्ध २ जेणेव वेलाउले,तेणेव उवागच्छद, उवा गच्छित्ता कण्हस्स वासुदेवस्स लवणसमुद्द मज्झ मज्झेण वीइवयमाणस्स सेयापीयाहिंधयग्गाइ पासइ,पासित्ताण्व वयह-एसण मम सरिसपुरिसे उत्तमपुरिसे कण्हे वासुदेवे लवणसमुद्द मज्झ मज्झेण वीइवयइत्ति कटु તીર્થ કરની સાથે બીજા તીર્થ કરનો મેળાપ કોઈ પણ સંજોગોમાં થતું નથી એક ચકવર્તીને બીજા ચક્રવર્તીની સાથે, એક બળદેવને બીજા બળદેવની સાથે તેમજ એક વાસુદેવને બીજા કોઈ પણ વાસુદેવની સાથે કદાપિ મેળાપ થત नयी (वह वि य ण तुम कणइस्स वासुदेवरस लवण समुद्द मज्झ मज्झेण वीइ वयमाणस्स सेयापीयाइ धयग्गाइ पासि हिसि ) , म य श छे क्यारे તે કૃષ્ણવાસુદેવ લવણ સમુદ્રની વચ્ચે થઈને પસાર થતા હોય ત્યારે તમે તેમની स, पाणी qमाना अभाग ने शो। छ। (तएण से) कविले वासुदेवे मुणिमुव्यय बदइ, नमसइ, वदित्ता नमसित्ता हत्थिखव दुरूहइ, दुरुहिता सिंग्ध२ जेणेव वेलाउले, उवागच्छित्ता कण्हस्स वासुदेवस्स लषणसमुद मज्झ मझेण वीइवयमाणस्स सेयापीयाहि धयग्गाइ पास, पासिता एन वया, एसण मम सरिसपुरिसे उत्तमपुरिसे कण्हे वासुदेवे तेणेव उवागच्छइ, तापमंपचार भदन्त ! कृष्ण वासुदेवमुनमपुरुष पश्यामि तत खल मुनिसुव्रतोऽहन कपिलं वासुदेवम् एमवादी-नो सल हे देवानुमिय ! एच भूत वा, भवति का भविष्यति वा यत् खलु भईन् अईन्त पश्यति, चक्रवर्ती वा चक्रवर्तिन पश्यति बलदेवो वा बलदेव पश्यति वासदेवो पापामुदेर पश्यति, तथा ऽपि च खलु त्व अह भते । कण्ह वासुदेव उत्तमपुरिस मरिसपुरिस पासामि) इस प्रकार सुनकर उस फपिल वासुदेव ने मुनि सुव्रत प्रभु को वदना की-नमस्कार किया वदना नमस्कार करके फिर उनसे इस प्रकार कहा -हे भदत ! मैं जाता हूँ और उत्तम पुरुष उन कृष्णवासुदेव से कि जो मेरे जैसे पुरुप हैं-वासुदेव पद के धारक है-जाकर मिलता। (तण्ण मुणि सुव्यए अरहा कविल वासुदेव एव चयासी) तय मुनि सुव्रत प्रभु ने उस कपिल वासुदेव से इस प्रकार कहा-(नो खलु देवाणुप्पिया! एव भूय वा ६ जण्ण अरहतो, वा अरहंत पासइ, चक्कवट्टी वा चक्क वहिं पामइ, बलदेवो वा, यलदेव पासइ, वासुदेवो वा वासुदेव पासह) हे देवानुप्रिय ! ऐसी यात न हुई है, वर्तमान में न होती है और न भवि ष्यत्काल में होनेवाली है कि जो एक तीर्थकर दूसरे तीर्थंकर से मिलें, एक चक्रवर्ती दूसरे चक्रवर्ती से मिले, एक पलदेव दूसरे यलदेव से मिलें, एक वासुदेव दूसरे वासुदेव से मिलें । ऐसा सिद्धान्त का नियम है कि एक तीर्थकर का दूसरे तीर्थकर से कभी भी मिलाप नहीं होता है। णं अहमते । कण्ह वासुदेव उत्तमपुरिस सरिसपुरिस पासामि) આ પ્રમાણે સાભળીને તે કપિલવાસુદેવે મુનિસુવ્રત પ્રભુને વદન તેમજ નમન કર્યા વદન અને નમન કરીને તેમની સામે આ પ્રમાણે વિનતી કરતા કહ્યું કે હે ભદત ! જાઉ છુ અને જઇને મારા જેવા તે ઉત્તમ પુરૂષ કૃષ્ણ વાસુદેવ કે જેઓ વાસુદેવ પદને શોભાવે છે તેમને મળું છુ सुव्वए भरहा कबिल वासुदेव एव क्यामी) त्यारे मुनिसुव्रत प्रभु पिल વાસુદેવને આ પ્રમાણે કહ્યું કે- (नो खलु देवाणुप्पिया ! एव भूय वा ३ जण्ण अरहतो वा अरहत पासइ, चक्कवट्टी वा चक्कट्टि पासइ, देवो वा, चकदेव पासइ, वासुदेवो वा वासुदेव पासइ) હે દેવાનુપ્રિય! એવી વાત કોઈ પણ દિવસે સભવી નથી, વર્તમાનમાં પણ સંભવી શકે તેમ નથી અને ભવિષ્યકાળમાં પણ સ ભવી શકશે નહિ કે એક તીર્થંકર બીજા તીર્થ કરને મળે, એક ચકરતી બીજા ચક્રવર્તીને મળે, એક બળદેવ બીજા બળદેવને મળે આ જાતને સિદ્ધાન્તને - (तएण मुणि - - मनगारधर्मामृतवाणी टी० म० १६ द्रौपदीचरितनिरूपणम् ५.९ कृष्णस्य वासुदेवस्य लवणसमुद्रस्य मध्यमध्येन व्यतिव्रजत श्वेतपीतानि-ध्वजा- ग्राणि 'पासिहिसि' द्रक्ष्यसि । ततः खलु स कपिलो वासुदेवो मुनि सुत्रत वन्दते, नमस्यति वन्दित्वा नमस्यित्वा हस्तिस्कन्ध दृरोहति आरोहति आरह्य शीघ्र २ यौच 'वेलाउले ' वेलाकूलं समुद्रवेला तट वर्तते, तोवोपागच्छति, उपागत्य कृष्णस्य वसुदेवस्य लवणसमुद्रस्य मभ्यमध्येन ' वीइवयमाणस्स' व्यतिरजत = गन्छत , श्वेतपीतानि घजाग्राणि पश्यति, दृष्ट्वा एव वदति एसण मम सदृशपुरुपः उत्तमपुरुषः कृष्णो वासुदेवो लणसमुद्रस्य मध्यमध्येन 'वीइवयइ' व्यतित्रजति गच्छति, इति कृत्वा पाञ्चजन्य श परामृशति-गृह्णाति, गृहीत्वा मुग्वातपूरित करोति कपिलमासुदेवः स्वशङ्क वादयति । ततः खलु स कृप्णो वासुदेवः कपि चक्रवर्ती का दूसरे और चक्रवर्ती से यलदेव का दूसरे और किसी पल- देव से, वासुदेव का दूसरे और वासुदेव से कभी भी मिलाप नही होता है। (तह वियण तुमं कण्ठस्स वासुदेवस्स लवणसमुद्द मज्झ मझेण वोइवयमाणस्स सेया पीयाइ धयग्गाइ पासिरिसि)हा, इतना हो सकता हैं कि जब वे कृष्णवासुदेव लवणसमुद्रके वीचसे होकर जा रहे होवें तय तु मउनकी श्वेत पीत ध्वजाओके अग्र भाग को देख सकते हा। (तएण से कविले वासुदेवेमुणिसुव्वय वदइ, नमसइ, वदित्ता,नमसित्ता, हस्थि- खध दुरूहह, दुरुहित्ता सिग्ध २ जेणेव वेलाउले,तेणेव उवागच्छइ, उवा गच्छित्ता कण्हस्स वासुदेवस्स लवणसमुद्द मन्झ मज्झेण वीइवयमाणस्स सेयापीयाधियग्गाइ पासइ,पासित्ता एव वयह-एसण मम सरिसपुरिसे उत्तमपुरिसे कण्हे वासुदेवे लवणसमुद्दमज्झ मज्झेण वीइवयहत्ति कटु તીર્થ કરની સાથે બીજા તીર્થ કરને મેળાપ કઈ પણ સંજોગોમાં થતું નથી એક ચક્રવર્તીને બીજા ચક્રવર્તીની સાથે, એક બળદેવને બીજા બળદેવની સાથે તેમજ એક વાસુદેવને બીજા કોઈ પણ વાસુદેવની સાથે કદાપિ મેળાપ થતા नयी (तह वि य ण तुम कणहस्स वासुदेवस्स लपण समुद्द मज्म मज्झेण वीइ वयमाणस्स सेयापीयाइ धयागाइ पासिहिसि ) , सम थई राछ में क्यारे તે ડ્રણવાસુદેવ લવણ સમુદ્રની વચ્ચે થઈને પસાર થતા હોય ત્યારે તમે તેમની स, पानी साना सभागने न श। छ। (तएण से) कविले वासुदेवे मुणिमुव्यय वदइ, नमसइ, वदित्ता नमसित्ता हथिखध दुरूहइ, दुरुहिता सिंग्ध२ जेणेव वेलाउले, तेणेव उवागच्छइ, उवागच्छित्ता कण्हस्स वासुदेवस्स लवणसमुद्द मज्झ मज्झेण वीइवयमाणस्स सेयापीयाहि धयग्गाइ पास पासिता एस वपर, एसण मम सरिसपुरिसे उत्तमपुरिसे कण्हे वासुदेषे - पाताचा भदन्त ! कृष्ण वासुदेवमुत्तमपुरुष पश्यामि तत खलु मुनिमयतोऽर्हन कपिलं वामदेवम् एमादीद-नो सल हे देशानुमिय ! एव भूत या, भवति वा मविष्यति वा यत् खलु अईन् अईन्त पश्यति, चक्रवर्ती वा चक्रवर्तिन पश्यति पलदेवो वा बलदेव पश्यति वासुदेवो पा वासुदेव पश्यति, तथा ऽपि च खलु त्व अह भते ! कण्हं वासुदेव उत्तमपुरिसं मरिसपुरिस पासामि) इस प्रकार सुनकर उस कपिल वासुदेव ने मुनि सुव्रत प्रभु को बदना की-नमस्कार किया वदना नमस्कार करके फिर उनसे इस प्रकार कहा -हे भदत ! मैं जाता हूँ और उत्तम पुरुप उन कृष्णवासुदेव से कि जो मेरे जैसे पुरुष हैं-वासुदेव पद के धारक है-जाकर मिलता। (तण्ण मुणि सुब्चए अरहा कविल वासुदेव एवं चयासी) तथ मुनि सुव्रत प्रभु ने उस कपिल वासुदेव से इस प्रकार कहा-(नो खलु देवाणुप्पिया! एव भूय वा ६ जपण अरहतो, वा अररत पासइ, चक्कवट्टी वा चक्क वटि पामइ, बलदेवो वा, पलदेव पासइ, वासुदेवो वा वासुदेव पासइ) हे देवानुप्रिय ! ऐसी यांत न हुई है, वर्तमानमें न होती है और न भवि प्यत्काल में होनेवाली है कि जो एक तीर्थकर दूसरे तीर्थकर से मिलें, एक चक्रवर्ती दूसरे चक्रवर्ती से मिले, एक पलदेव दूसरे यलदेव से मिले, एक वासुदेव दूसरे वासुदेव से मिलें। ऐसा सिद्धान्त का नियम है कि एक तीर्थकर का दूसरे तीर्थकर से कभी भी मिलाप नहीं होता है। ण अहमते ! कण्ह वासुदेव उत्तमपुरिस सरिसपुरिस पासामि ) આ પ્રમાણે સાભળીને તે કપિલવાસુદેવે મુનિસુવ્રત પ્રભુને વદન તેમજ નમન કર્યા વદન અને નમન કરીને તેમની સામે આ પ્રમાણે વિનતી કરતા કહ્યું કે હે ભદત! હું જાઉ છુ અને જઈને મારા જેવા તે ઉત્તમ પુરૂષ કૃષ્ણ पामुद्देव । वासुदेव पहने समावे-तभने भगु छ (तएण मुणि सुव्वए भरहा कबिल वासुदेव एव वयागी) त्यारे भुनिभुनत प्रभुत पिर વાસુદેવને આ પ્રમાણે કહ્યું કે- (नो खलु देवाणुप्पिया ! एव भूय वा ३ जण्ण अरहतो वा अरहत पासइ, चक्कवट्टी वा चक्कट्टि पासइ, नरदेवो वा, बलदेव पासइ, वासुदेवो वा चासुदेव पासइ) હે દેવાનુપ્રિય! એવી વાત કોઈ પણ દિવસે સભવી નથી, વર્તમાન પણ સંભવી શકે તેમ નથી અને ભવિષ્યકાળમાં પણ સ ભવી શકશે નહિ કે એક તીર્થંકર બીજા તીર્થ કરને મળે, એક ચક્રવતી બીજા ચક્રવર્તીને મળે, એક બળદેવ બીજા બળદેવને મળે આ જાતને સિદ્ધાન્તને નિયમ છે કે એક अनगारधर्मामृतवर्षिणी टोको म०१६ द्रोपदीचरितनिरूपणम् ततस्तदनन्तर स कपिलो वासुदेवो यत्रैयामरकनाराजधानी तोवोपागच्छति, उपागत्यामरसवां राजधानी सभग्नतोरणां यावत् पश्यति, दृष्ट्वा पद्मनाभमेवमया दीत्-कि-फरमात् खलु हे देवानप्रिय ! एपा अमरकका सभग्नतोरणा यावत्- सनिपतिता ? ततः खलु स पद्मनाम: कपिल वासुदेवमेवमवादी-एव खलु हे स्वामिन् । जम्बूद्वीपाद् द्वीपाद् भारताद् चर्पाद् इह हव्यमागत्य कृष्णेन वासुदेवेन 'तुम्भे परिभूए ' युग्मान् परिभूय-अनादृत्य कपिलवामुदेवेन मम काऽपि हानि शक्यते तुमिति मनमि निधायेत्यर्थः, अमरकङ्का यावत् सनिपतिता । से कविले वासुदेवे जेणेव अमरकका तेणेव उवागच्छइ, उवागच्उित्ता अमरककं रायहाणि सभग्गतोरण जाव पामइ, पासित्ता पउमणाभ एव वयासी) तर कृष्ण वासुदेव ने कपिल वासुदेव के शख शब्द को सुना सुनकर उन्हो ने भी पांचजन्य शख को अपने मुख की वायु से पूरित किया-यजाया-इस तरह वे दोनों वासुदेव साक्षात् रूप में मिलकर शव के शब्द से परस्पर में मिले । अब वे कपिल वासुदेव जहा वह अमरकंका नगरी थी वहाँ आये । वहां आकर उन्होंने अमर- कका राजधानी को सभग्न तोरण आदि वाला देवा । देखकर तर पद्म- नाभ राजा से इस प्रकार कहा-(किण्ण देवाणुप्पिया' एमा अमरकका सभग्ग जाव सन्निवझ्या? तएण से पउमणाहे कविलं वासुदेव एव वयासी-एव खलु सामी ? जबूद्दीवाओ दीवाओ भारहाओ वासाओ इह हव्वमागम्म कण्हेण वासुदेवेण तुम्भे परिभूए अमरकका जाव सनिवाडिया) हे देवानुप्रिय ! यह अमरकका नगरी क्या कारण है-जो अमरककारायहाणि सभग्गतोरण जाव पासइ, पासित्ता पउमणाभ एव वयासी) જ્યારે કૃષ્ણવાસુદેવે કપિલ વાસુદેવના શખને ધ્વનિ સાભળે ત્યારે તેમણે પણ પિતાના પાચજન્ય શ ખને મુખના પવનથી પૂરિત કર્યો અને આ રીતે તેઓ બને વાસુદેવ પ્રત્યક્ષ રીતે નહિ પણ શ નના વનિથી પરસ્પર મળ્યા ત્યારપછી તે કપિલ વાસુદેવ જ્યા તે અમરક કા નગરી ત્યાં આવીને તેમણે અમરક કા રાજધાનીને ધજાઓ વગે રેથી નષ્ટ થયેલી જોઈ, જોઈને તેમણે પદ્મનાભ રાજાને આ પ્રમાણે કહ્યું કે (किण्ण देवाणुप्पिया ऐमा अमरकका संभग्ग जाव सनिवइया ? तएण से पउमणाहे कपिल वासुदेव एव वयासी-एव खलु सामी ! जबूदीवाओ दीवाओ भारहाभो वासाओ इह हव्यमागम्म कण्डेण वासुदेवेण तुम्भे परिभूए अमरकका जाव सनिवाडिया) વગાડ હતી ત્યાં આવ્યા RAT . - ५५० वाताधर्मकथा लस्य वामदेवस्य शडशन्दम् 'आपन्ना' आवर्णयति-गृणोति, आर्य पाश्च जन्य यावत् मुखपातपूरित करोति-कृष्णो वासुदर सकीय शर वादयति, तत. खलु द्वारपि वासुदेवो । संखसहसामायारि ' शहगन्दमामाचारि शशब्देन परस्परमिलन कुरुतः। पचयन सख परामुसह, परामुसित्ता मुहवायपूरिय करेइ ) इस प्रकार प्रभु का आदेश सुनकर उन कपिल वासुदेव ने उन प्रभु मुनिसुव्रत भगवत को वदना की, नमस्कार किया । बदना नमस्कार करके फिर वे अपने प्रधान हस्ती पर आरूढ हुए। और आरूढ होकर शीघ्र जहाँ लवणसमुद्र का वेलातट था -वहां पहुँचे । वरा पहुँचकर उन्होंने लवण समुद्र के पीच से होकर जाते हुए कृष्णवासुदेव की श्वेत पीत ध्यजाओं के अग्रभाग को देखा देखकर तय मनमें विचार-किया ये ही मेरे जैसे उत्तम पुरुष कृष्णवासुदेव लवणसमुद्र के बीच से होकर जारहे हैं- ऐसा विचार कर उन्हों ने अपने पाचज य शख को उठाया और उठा कर उसे अपने मुख की वोयु से पूरित किया (तएण से कण्हे चासुदेवे कविलस्स वासुदेवस्स सखसद्द आयन्नेइ, आयन्नित्ता, पचजन्ने, जाव पूरिय करेइ, तएण दो वि वासुदेवा सखसद्दसामायारिं करेइ, ताण लवणसमुद्द मज्झ मज्झेण वीइवयइत्ति कटु पचजन्न सख परामुसइ परामुसित्ता मुहवायपूरिय करेइ) આ રીતે પ્રભુની આજ્ઞા સાભળીને તે કપિલ વાસુદેવે તે પ્રભુ મુનિસુવ્રત ભગવતને વદન અને નમસ્કાર કર્યા વદન અને નમસ્કાર કરીને તેઓ પિતાના પ્રધાન હાથી ઉપર સવાર થયા અને સવાર થઈને જદી જ્યા લવણું સમુ દ્રને કિનારે હતું ત્યાં પહોચ્યા ત્યાં પહોચીને તેમણે લવણસમુદ્રની વચ્ચે થઈને પસાર થતા કૃષ્ણ વાસુદેવની સફેદ-પીળી દવાઓના અગ્રભાગને જે અને જોઈને મનમાં વિચાર કર્યો કે મારા જેવા ઉત્તમ પુરુષ કૃષ્ણવાસુદેવ છે કે જેઓ લવણ-સમુદ્રની વચ્ચે થઈને પસાર થઈ રહ્યા છેઆમ વિચાર કરીને તેમણે પાચ જન્ય શખને ઉઠા અને ઉઠાવીને પિતાના મુખના પવનથી તેને પરિત કર્યો (तएण से कण्हे वासुदेवे कविलस्स वासुदेवस्स सम्वसद्द आयन्नेइ, आय भित्ता, पचजन्न जाव पूरिय करेइ तएण दो वि वासुदेवा सखसद्द सामायारि करेइ, तएण से कक्लेि वासुदेवे जेणेर अमरकका तेणेव .
की अनगारधर्मामृतवपिणी टोको अ०१६ द्रोपदीचरितनिरूपणम् ततस्तदनन्तर स कपिलो वासुदेवो यत्रैयामरसताराजधानी तीवोपागच्छति, उपागत्यामरकका राजधानी सभग्नतोरणां यावत् पश्यति, दृष्ट्वा पद्मनाभमेवमवा दीत्-कि-कस्मात् खलु हे देवानप्रिय ! एपा अमरकका सभग्नतोरणा यावत्- सनिपतिता ? ततः खलु स पद्मनाम: कपिल वासुदेवमेवमवादी-एव खलु हे स्वामिन् । जम्बूद्वीपाद् द्वीपाद् भारताद् वर्पाद् इह हव्यमागत्य कृष्णेन वासुदेवेन तुम्भे परिभूए' युग्मान् परिभूय-अनाहत्य कपिलवासुदेवेन मम काऽपि हानिर्न शक्यते कर्तुमिति मनसि निधायेत्यर्थः, अमरकङ्का यावत् सनिपतिता । से कविले वासुदेवे जेणेव अमरकका तेणेव उवागच्छह, उवागच्छित्ता अमरककं रायहाणि सभग्गतोरण जाव पामइ, पासित्ता पउमणाभ एच वयासी) तर कृष्ण वासुदेव ने कपिल वासुदेव के शख शब्द को सुना सुनकर उन्हों ने भी पांचजन्य शख को अपने मुख वायु से पूरित किया-यजाया-इस तरह वे दोनों वासुदेव साक्षात् रूप में न मिलकर शव के शब्द से परस्पर में मिले। अब वे कपिल वासुदेव जहा वह अमरकका नगरी थी वहां आये । वहा आकर उन्होंने अमर- कका राजधानी को सभग्न तोरण आदि वाला देखा । देखकर तय पद्म- नाभ राजा से इस प्रकार कहा-(किण्ण देवाणुप्पिया! एमा अमरकंका सभग्ग जाव सन्निवहया? तएण से पउमणाहे कविल वासुदेव एव वयासी-एव खलु सामी ? जवूद्दीवाओ दीवाओ भारहाओ वासाओ इह हन्धमागम्म कण्हेण वासुदेवेण तुम्भे परिभूए अमरकका जाव सनिवाडिया) हे देवानुप्रिय ! यह अमरकका नगरी क्या कारण है-जो अमरककारायहाणि सभग्गतोरण जाच पासइ, पासित्ता पउमणाभ एव क्यासी) જ્યારે કૃષ્ણવાસુદેવે કપિલ વાસુદેવના શખને ધ્વનિ સાભળે ત્યારે તેમણે પણ પિતાના પાચજન્ય શ ખને મુખના પવનથી પૂરિત કર્યો અને વગાડ આ રીતે તેઓ બને વાસુદેવ પ્રત્યક્ષ રીતે નહિ પણ શ ખના વનિથી પરસ્પર મળ્યા ત્યારપછી તે કપિલ વાસુદેવ જ્યા તે અમરફ કા નગરી હતી ત્યાં આવ્યા ત્યા આવીને તેમણે અમરક કા રાજધાનીને ધજાઓ વગે રથી નષ્ટ થયેલી જોઈ, જોઈને તેમણે પદ્મનાભ રાજાને આ પ્રમાણે કહ્યું કે– (किण्ण देवाणुप्पिया ऐसा अमरकका सभग्ग जाव सनिगडया ? तएण से पउमणाहे कपिल वासुदेव एव वयासी-एव खलु सामी ! जबूदीवाओ दीवाओ भारहाभो वासाओ इह हव्यमागम्म कण्हेण वासुदेवेण तुम्भे परिभूए अमरकका जाव सचिवारिता " पताधर्मया ततः खलु स कपिलो यासदेवः पद्मनामस्पान्ति के पतमय श्रुत्वा पचनामम् एव-वक्ष्यमाणपकारेण, आदीद-ह भो ! पमनाम ! अप्रार्थित प्रार्थित ! -मरण वाञ्छक !, किं खल व न जानासि मम सदृशपुरपस्य पामुदेवम्य विप्रिय-विरुद्ध कुर्वत् ।, इत्युक्त्वा आशुरुता शीघ्र फ्रोधाऽऽकान्त , यापन पद्मनाम 'णिविसर्य' निर्षिपय-विपयोव स्वराज्याद् निर्गत-निष्पामित पर्तुम् 'आणवेइ ' आशापयति पानामस्य पुत्रममरकङ्काराजधान्या महता महता राज्याभिषेकेण अमिपिश्चति, सभग्न तोरण आदि वाली होकर भूमिसात् रो गई है। तय पद्मनाभ राजा ने उस कपिल वासुदेव से इस प्रकार कहा-हे स्वामिन् ! इसका कारण इस प्रकार है-जबूदीप नाम के प्रथम दीप से भरतक्षेत्र मे यहाँ बहुत ही शीघ्र ओकर कृष्ण वासुदेव ने आपकी कुछ भी परवाह न करके-कपिल वासुदेव हमारी कुछ भी हानि नहीं कर सकते हैं-ऐसा अपने मन में समझ करके-अमरकका में आकर-उसे पहिले सभा तोरण वोली किया और बाद में विध्वस्तकर दिया । (तएण से कविले वासुदेवे पउमणास्त अतिए एयम सोच्चा पउमणाह एव वयासी) तब पद्मनाभ राजा के मुख से इस समाचार के चासुदेव ने उस पद्मनाभ राजा से इस प्रकार कहा-(ह भो! पउम. णाभा ! अपस्थियपत्थिया ! किन्न तुम न जाणासि मम सरिसपुरिस स्स कण्हस्स वासुदेवस्स विप्पिय करेमाणे ? असुरूत्ते जाव पउमणाह णिन्विसय आणवेइ, पउमणाहस्स पुत्त अमरकका रायहाणीए महया હે દેવાનુપ્રિય! શા કારણથી આ અમરફ કા નગરીની ધજાઓ વગેરે પણ તૂટી ગઈ છે અને સંપૂર્ણ નગરી વિનષ્ટ થઈ ગઈ છે. ત્યારે પદ્મનાભ રાજાએ તે કપિલ વાસુદેવને આ પ્રમાણે કહ્યું કે હે સ્વામી! વાત એવી છે કે જ બૂદીપ નામના પ્રથમ દ્વિપના ભરતક્ષેત્રથી અહીં બહુ જ જલદી આવીને કુણુવાસુદેવે તમારી જરાએ દરકાર કર્યા વગર “કપિલ વાસુદેવ અમારૂ કોઈ જ કરી શકશે નહિ” આ જાતને પિતાના મનમાં વિચાર કરીને પહેલા તે અમરકાકાના તેરો નષ્ટ કર્યો અને ત્યારપછી આ નગરીને પણ જમીન સ્ત शनामी छ (तएण से कविले वासुदेवे पउमणाहस्त अतिए एयम? सोच्चा पउनणाह एव वयासो) त्यारे पनाम राना भुभयो मधी विगत साल બીને તે કપિલવાસુદેવે તે પવનાભ રાજાને આ પ્રમાણે કહ્યું કે- (ह भो! पउमणाभा ! अपत्यियपत्थिया किन्न तुम नजाणासि मम सरिस पुरिसस्स कण्दस्त वासुदेवस्स विप्पिय करेमाणे ? आमरुत्ते जाव को सुनकर उस कपिल उत्तरित्तए उदाहु ममगारधामृतवपिणी का अ० १६ द्रौपदीचरितनिरूपणम् यावत् प्रतिगत =पद्मनाभस्य पुत्र राज्येऽभिपिच्य कपिलवासुदेवो यस्यादिशः मादुर्भुतस्ता दिश प्रतिगत इति भाव ॥ सू०३० ॥ मूलम्-तए णं से कण्हे वासुदेवे लवणसमुद्द मज्झं मझेणं वीइवयइ, त पच पडवे एवं व्यासी-गच्छह ण तुम्भे देवानु- प्पिया । गंगामहानई उत्तरह जाव ताव अह सुटियं लवणा- हिवइं पासामि, तए णं त पंच पंडवा कण्हेणं वासुदेवेणं एवं वुत्ता समाणा जेणेव गंगामहानई तेणेव उवागच्छति उवाग- च्छित्ता एगट्टियाए णावाए मग्गणगवेसणं करेति करित्ता एग- ट्टियाए नावाए गंगामहानइ उत्तरति उत्तरित्ता अण्णमण्णं एवं वयंति-पहू ण देवाणुप्पिया । कण्हे वासुदेवे गंगामहाणइं वाहाहि उदाहु णो पभू उत्तरित्तएत्ति कटु एगठियाओनावाओ महया रायाभिसेएण अभिसिंचइ जाव पडिगए) अरेओ मरणवाञ्छक पद्मनाभ । मेरे जैसे पुस्प कृष्ण वासुदेव का विप्रिय-अनिष्ट-करते हुए तुमने मेरा कुछभी ख्याल नहीं किया ? इस प्रकार कह कर वे उस पर पहुत अधिक कुपित हो गये। यावत् उस पद्मनाभ राजा को उन्हों ने अपने देश से बाहिर भी निकालदिया । तथा-उसका जो पुत्र सुनाम था। उस को यडे भारी उत्सबके साथ राज्य में अभिषिक्त किया। इस प्रकार पद्मनाभ के पुत्र को राज्य में अभिषिक्त करके वे कपिल वास्तु- देव जिस दिशोसे आये थे उस दिशाकी ओर वापिस चले गये ॥१३०॥ सय आणवेइ, पउमणाहस्स पुत्त अमरकका रायहाणीए महया महया रायाभिसे- एण अभिसिंचइ, जाव पडिगए) અરે, એ મૃત્યુને ઇચ્છનાર પદ્મનાભ! મારા જેવા પુરુષ કૃષ્ણવાસુદેવનું બુર કરતા તે મારી પણ દરકાર કરી નહિ? આ પ્રમાણે કહીને તેઓ ખૂબજ ક્રોધિત થઈ ગયા યાવત્ તે પદ્મનાભ રાજાને પિતાના દેશથી બહાર પણ નસાડી મૂળે ત્યારપછી તેના પુત્ર સુનાભને ભારે ઉત્સવની સાથે રાજ્યાભિષેક કર્યો આ રીતે પદ્મનાભના પુત્રને રાજ્યસને અભિષિક્ત કરીને કપિલ વાસુદેવ જે દિશા તરફથી આવ્યા હતા તે દિશા તરફ પાછા જતા રહ્યા સૂત્ર ૩૦ | ५४४ वाताधर्मकथा णूमेंति मित्ता कण्हं वासुदेवं पडिवालेमाणार चिटुंति, तएणं से कण्हे वासुदेवे सुट्टियं लवणाहिवइं पासइ पासित्ता जेणेव गंगामहाणई तेणेव उवागच्छइ उवागच्छित्ता एगट्टियाए सव्वओ समता मग्गणगवेसणं करेइ करित्ता एगट्टियं अपासमाणे एगाए चाहाए रहं सतुरगं ससारहिं गेण्हइ एगाए वाहाए गंगं महाणई बासहिं जोयणाइ अद्धजोयणं च विच्छिन्न उत्तरिउ पयत्ते यावि होत्था, तएण से कण्हे वासुदेवे गंगामहाणईए वहुमझदेस- भागं सपत्ते समाणे सते तते परितते बद्धसेएजाए यावि होत्था तएण कण्हस्स वासुदेवस्स इमे एयारूवे अझथिए जाव समुप्पज्जित्था अहो ण पंच पंडवा महावलवगा जेहि गंगा- महाणई वासढि जोयणाई अद्धजोयणं च विच्छिण्णा वाहाहिं उत्तिपणा, इत्थभूएहि णं पचहि पंडवेहि पउमणाभे राया जाव णो पडिसेहिए, तएण गगादेवी कण्हस्स वासुदेवस्स इम एया- रूव अज्झत्थिय जाव जाणित्ता थाह वितरइ, तएण से कण्हे वासुदेवे मुहुत्ततर समासासइ समासासित्ता गंगामहाणई वावर्टि जाव उत्तरइ उत्तरित्ता जेणेव पच पडवा तेणेव उवागच्छइ उवा- गच्छित्ता पच पडवे एव वयामी-अहो णं तुब्भे देवाणुप्पिया। महाबलवगा जेण तुब्भेहिं गंगामहाणई वासहिं जाव उत्तिण्णा, इत्थ भूएहि तुम्भेहि पउम जाव णो पडिसेहिए, तएण ते पच पडवा कण्हेण वासुदेवेणं एव वुत्ता समाणा कण्हं वासुदेव एव वयासी एव खलु देवाणुप्पिया अम्हेतुब्भेहि विसजिया समाणा मनगारधर्मामृतपिणी टी० स० १६ द्रौपदीचरितनिरूपणम् जेणेव महाणई तेणेव उवागच्छइ उवागच्छित्ता एगट्टियाए मग्गणगवेसण त चेव जाव णूममोतुम्भे पडिवालेमाणा चिट्ठामो तएण से कण्हे वासुदेवे तेसि पंचण्हं पांडवाणं एयमट्ट सोच्चा णिसम्म आसुरुत्ते जाव तिवालयं एव वयासी-अहो णं जया मए लवणसमुदं दुवे जोयणसयसहस्सा विच्छिण्ण वोइवइत्ता पउमणाभ हयमहिय जाव पडिसेहित्ताअमरकका संभग्गा दोवई साहत्थिं उवणीया तया ण तुम्भेहि मम महप्पं ण विण्णायं इयाणि जाणिस्सहत्तिकद्दु लोहदंडं परामुसइ, पंचण्हं पंडवाणं रहे चूरेइ चूरित्ता णिव्विसए आणवेइ आणवित्ता तत्थ ण रह महणे णाम कोड्डे णिविटे, तएण से कण्हे वासुदेवे जेणेव सए खधावारे तेणेव उवागच्छइ उवागच्छित्ता सएणं खधावारेणं सद्धि अभिसमन्नागए यावि होत्था, तएण से कण्हे वासुदेवेजेणेव चार- णयरी तेणेव उवागच्छइ उवागच्छित्ता अणुपविसइ॥सू०३१॥ टीका-'तएण से इत्यादि । ततस्तदनन्तर खलु स कृष्णो वासदेवो लपण समुद्रस्य मध्यमध्येन व्यतिनजति गच्छति व्यतित्रज्य तान् पश्च पाण्डवान एवं मवादीत-गच्छत खलु यूय हे देवानुमिया गङ्गामहानदीमुत्तरत्त-उतीर्णा भवत, तएण से कण्हे वासुदेवे इत्यादि । टीकार्थ-(तएण) इसके याद (से कण्हे वासुदेवे) उन कृष्णवासुदेवने (लवणसमुद्द) जय लवण समुद्र में (मज्न मझेण वीइवयइ ) चीच से होकर वे चले जा रहे थे। (ते पच पडवे एव वयासी ) तय पाच पाडवों से ऐसा कहा-(गच्छह ण तुम्भे देवाणुप्पिया ! गंगामहानइ उत्तरह जाव तपण से कण्णे वासुदेवे इत्यादि-- As10-(एण) त्या२५७ (से कण्हे वासुरे) ते ४पासुदेव (लवणसमुद। है न्यारे तसा पy समुद्रनी ( मज्झ मज्झेण वीइचयइ) पश्ये ७२ पसार यता ता त्यारे (ते पच पडवे एव वयासी) पाये पावाने या प्रभार अधु (गच्हण तुन्भे देवाणुपिया ! गगा महानदि उत्तरह जाव ताव अह सुट्ठिय - . ५४६ पाताधर्मक्यास यावत् तापदह सुस्थित देव लपणाधिपतिं पश्यामि, मुस्थितेन देवेन सह मिलिस्ता तमापृच्छयागच्छामि, ततः खल ते पश्चपाण्डवा माणेन पासुदेवेन एवमुक्काः सन्तो यौव गद्गामहानदी तगोपागाति, उपागत्य ' एगट्टियाए ' एकाथि फाया:-महानौकासमानकार्यकारिण्या । णाराए 'नानीकाया मार्गणगवेषण कुर्वन्ति । कृत्या मार्गणगवेपण कृत्ला नौकायामाय ते पञ्च पाण्डवा एकाधि- फया नागा गङ्गामहानदी मुत्तरन्ति, उत्तीर्य अन्योन्यम् परस्परमेव वदन्ति-पहू' प्रभुः समर्थ , खलु हे देवानुमियाः। कृष्णो वासुदेवो गदामहानदी वादाहि' बाहुभ्या-भुजाभ्याम् ' उत्तरित्तए' उत्तरीतुम् 'उदाहु' उताहो-अथवा नो ताव अह सुहिय लवणाहिवह पासामि) हे देवानुप्रिया! तुमलोग जाओ-और गगानदी को पार करो तयतक में लवणसमुद्राधिपति सुस्थित देव से मिलकर और उनकी आज्ञा लेकर आता है। (तएण ते पच पडवा कण्हेण वसुदेवेण एव वुत्ता समाणा जेणेव गगा महानई तेणेव उवागच्छति उवागच्छित्ता एगट्टियाए णावाए मग्गणगवेसण करेंति, करित्ता एगट्टियाए गगामहानइ उत्तरति) इस तरह कृष्ण वासु देव द्वारा कहे गये वे पाचों पांडव जहां गगा महानदी थी-वहा आये । वहा आकर के उन्होंने एकाधिक-मरानौकासे जैसी कार्य साधक-नौका मार्गणा एव गवेषणा की, मार्गणा गवेषणा कर के वे पाचा पाडव नौका पर चढ गगा महानदीसे पार हो गये। (उत्तरित्ता अण्णमण्ण एव वयति पटूण देवाणुप्पिया कण्हे वासुदेवे गगा महानई वाहारिं उत्तरि- लवणाहिवइ पासामि) पानुप्रिया! तमे वो तय भने નદીને ઓળગે ત્યાસુધી હુ લવણ સમુદ્રના અધિપતિ સુથિત દેવને મળીને અને તેમની આજ્ઞા પ્રાપ્ત કરીને આવું છું (तएण ते पच पडवा कण्हेण वासुदेवेण एव बुचा समाणा, जेणेव गगा महानई तेणेव उवागच्छति उवागच्छित्ता एगट्टियाए णाचाए मग्गणगवेसण करेति, करित्ता एगट्टियाए नावाए गगा महानइ उत्तरंति) આ રીતે કૃષ્ણ વાસુદેવ વડે આજ્ઞાપિત થયેલા તે પાચે પાડે ત્યા ગગા મહા નદી હતી ત્યા આવ્યા ત્યાં આવીને તેમણે એકાર્થિક મહાનૌકા જેવી કામમાં આવી શકે તેવી નૌકાની માર્ગણ તેમજ ગવેષણ કરી માગણા તેમજ ગવેષણ કરીને તે પાચે પાડવો નૌકા ઉપર સવાર થઈને ગગા મહા નદીને પાર ઉતરી ગયા (उत्तरित्ता अण्णमण्ण एव वयति पहूण देवाणुप्पिया ! कण्हे वासुदेवे गगा- , मनंगारधर्मामृतवपिणो टी० ब १६ द्रौपदीचरितनिरूपणम् ५४७ मभुः समर्थ उत्तरीतुम् , इति कृत्वा गगामहानया वाहुभ्यामुत्तरणे कृष्णवासु- वदेस्य सामर्थ्यमस्ति, नास्ति वा तद् विनानामीति विचार्य एकाथिका नाव= नौका 'मेति' गोपयन्ति । गोपयित्वा कृष्ण वासुदेव 'पडिबालेमाणा' प्रति- पालयन्त =प्रतीक्षमाणाः तिष्ठन्ति । ततः खलु स कृष्णो वासुदेवः सुस्थित देव लपणाधिपतिं पश्यति सुस्थितेन साफ मिलति दृष्ट्वा तमापृच्छथ यौव गङ्गामहा- नदी तवोपागच्छति, उपागत्य एकाधिकाया नावा नौकाया मार्गणगवेपणं करोति, कृत्वा, एकार्थिकां नावमपश्यन् एकेन बाहुना रथ सतुरग-सहाश्व, त्तए उदाटुणो पभू उत्तरित्तए तिकट्टु एगट्ठियाओ णावाओ मेंति, ऋमित्ता कण्हं वासुदेव पडिवाले माणा २ चिट्ठति, तएण से कण्हे वास्तु देवे सुद्विय लवणाहिवइ, पासइ, पासित्ता जेणेव गगा महाणई तेणेव उवागच्छद) जय पार होकर वे तट पर पहुंच चुके-तब परस्पर में उन्हों ने ऐसा विचार किया-हे देवानुप्रियों । देखो कृष्ण वासुदेव गगा महानदी को हाथों से तैरकर पार करने में समर्थ हो सकते हैं या नहीं हो सकते हैं ? इस प्रकार विचार करके उन्हों ने उस एकाधि नौका को कृष्ण वासुदेव के आने के लिये वापिस उस पार भेजा नहीं वहीं पर छिपा दिया। और छिपाकर कृष्ण वासुदेव की प्रतीक्षा करते वे वही ठहरे रहे। उधर-कृष्ण वासुदेव लवणसमुद्राधिपति सुस्थित देव से जाकर मिले और उसकी आज्ञा लेकर जहां गगा नदी थी वहा । (उवागच्छित्ता एगट्टियाए सव्वओ समता मग्गणगवेसण करेई, करित्ता एगद्विय अपासमाणे एगाए पाहाए रह सतुरगं ससारहिं गेण्डा महानई वाहाहि उत्तरित्तए, उदाहु णो पभू उत्तरित्तए तिकटु एगठियाओ णावाओ णूमेति, मित्ता कण्ह वासुदेव पडिवालेमाणार चिट्ठति, तर ण से कण्हे वासुदेवे मुट्ठिय लवणाहिबइ, पासइ, पासित्ता जेणेव गगा महाणई तेणेव उवागच्छइ ) પાર ઉતરીને જ્યારે તેઓ કિનારે પહોચી ગયા ત્યારે તેમણે પરસ્પર વિચાર કર્યો કે હે દેવાનુપ્રિયે ! કૃષ્ણવાસુદેવ ગગા મહાનદીને હાથ વડે તરીને પાર કરી શકે કે નહિ? આમ વિચાર કરીને તેમણે તે “એકાર્થિ નૌકાને કૃષ્ણ વાસુદેવને લાવવા માટે પાછી મોકલી નહિ પણ ત્યાજ છુપાવી દીધી અને છુપાવીને તેઓ ત્યાજ કૃષ્ણવાસુદેવની પ્રતીક્ષા કરતા રોકાઈ ગયા કચ્છવાસુદેવ લવણ સમુદ્રાધિપતિ સુસ્થિતદેવને મળ્યા અને તેની આજ્ઞા પ્રાપ્ત કરીને જયાં ગગા નદી હતી ત્યાં આવ્યા (उआगच्छित्ता एगढियाए सन्धमो समता मग्गणगवेसण करेइ, करिता एगट्ठिय अपाममाणे एगाए वाहाए रह सतुरग ससारहिं गेण्डइ, एगाए वाहाए आये . , ५ माताधर्मयानले ससारथि गृहाति एकेन पाहुना गाता महानदी माहि' द्वापष्टिं योजनानि अर्धयोजन च 'वित्थिन्न' पिम्तीर्णाम् , उत्तरितु प्रत्याप्यमात् । ततः खल स कृष्णो वासुदेवो गद्गामहानद्या बहुमभ्यदेशभाग सप्राप्तः सन् 'सते ' श्रान्त श्रमप्राप्तः, 'तते' वान्ता खिन्न । परितते परितान्त पर्वथा खिनः 'बद- सेए ' समाप्तस्वेदः, जातथाप्यभवत् । ततः खलु कृष्णस्य वासुदेवस्पायमेतद्रूप आ यात्मिको यावत् मनोगत सकल्पः समुदपद्यत-अहो खलु पश्च पाण्डया महागलपन्त', येडामहानदी द्वापष्ठि योजनानि अर्धयोजन च वित्थिना-पिस्तीर्णा पाहु-पामुत्तीर्णा, ' इत्यभूपहि इत्यभूतैः-ईदृशपराक्रमशालिभिः खलु पञ्चमिः पाण्डवैः पमनाभो राजा यावत् नो एगाए पाहाए गग महाणइ वासहि जोयणाइ अद्धजोयणच विच्छिन्न उत्त रिपयत्ते यावि होत्था) वहा आकर के उन्हों ने एकाधिक नौका की सब तरफ सब प्रकारसे मार्गणागवेपणा की'मार्गणागवेपग करके जय उनके देखने में एकाधिक नौका नहीं आई, तय सारथि और घोडों से युक्त रथ को उन्हों ने एक हाथ से पकडा और एक हाथ से ६२॥, माढे वासठ, योजन विस्तीर्ण उस गगा महानदी को तैरकर पार करना प्रारभ किया। (तण्ण से कण्हे वासुदेवे गगा माणईए बहुमज्झदेस भाग सपत्ते समाणे सते, तते, परितते, पद्धसेए जाए यावि होत्या, तएण कण्हस्स वासुदेवस्स इमे एयारूवे अज्झथिए जाव समुप्पजित्था -अहोण पच पडवा महोबलवगा, जेहिं गगामहाणई वासहि जोयणाइ अद्धजोयण च विच्छिण्णा पाहाहिं उत्तिण्णा इत्यभूएहिं ण पचरिं पड गग महाणइ वासढि जोयणाइ अद्धजोयण च विच्छिन्न उत्तरिपयत्ते यावि होत्था) ત્યાં આવીને તેમણે “એકર્થિક નૌકાની ચોમેર બધી રીતે માર્ગણા વેષણ કરી માર્ગણ તેમજ ગષણ કરીને જ્યારે એકાર્ષિક’ નૌકા તેમના જોવામાં આવી નહિ ત્યારે સારથિ અને ઘડાથી યુક્ત રથને તેમણે એક હાથમાં ઉપાડ અને એક હાથ વડે દુર એજન વિસ્તીર્ણ તે ગગા મહા નદીને તરીને પાર કરવા લાગ્યા (तएण से कण्हे वासुदेवे गगा महाणईए बहुमज्झदेस भाग सपत्ते समाणे सते, तते, परितते, बद्ध सेए जाए यावि होत्या, तएण कण्हस्स वासुदे वस्त इमे एयारूवे अझथिए जान समुप्पज्जित्था-अहोण पच पडवा महावलवगा जेहि गगा महाणई वासद्धि जोयणाइ अद्धजोयण च विच्छिष्णा बाहानि , - होते हुए मनगारधर्मामृतवपिणो टी० ० १६ द्रौपदी चरितनिरूपणम् ५४१ प्रतिषेधितानो पराजितः, इदमाश्चर्यम् , ततः खलु गङ्गादेवी कृष्णस्य वासुदेवस्य इममेतद्रूपमाध्यात्मिक यावत् मनोगत सकल्प ज्ञात्वा 'थाह ' स्ताघ-गाधवित- रति, ददाति । ततः खलु स कृष्णो वासुदेवो मुहूर्वान्तरे ' समासासह' समाश्व सिति-विश्राम माप्नोति समाश्वस्य गङ्गामहानदी द्वापष्ठि यावद् उत्तरति, उत्तीर्य वेहिं परमणाभे राया जाव णो पडिसेहिए-तएण गंगादेवी कण्ठस्स वासुदेवस्स इम एयारुव अज्झथिए जाव जाणित्ता थाह वितरह ) तैरते २ जब वे कृष्णवासुदेव गंगा महानदी के ठीक मज्झ-मभ्य भाग में आये-तब वहा तक आते २ वे श्रम प्राप्त हो गये, खेदखिन्न बन गये, और सर्वथा थक गये। यहा तक कि उनके शरीर भर में धकावट की पजह से पसीना २ हो गया। तप उन कृष्णवासुदेव को इस प्रकार का यह आध्यात्मिक यावत् मनोगत सकल्प उत्पन्न हुआ। देखो-ये पाचो पाडव पड़े यलिष्ट है-जिन्हों ने ६२॥, योजन विस्तीर्ण इस गंगा महा- नदी को हाथों से तैरकर पार कर दिया परन्तु यह बड़े आश्चर्य की यात हैं-कि ऐसे पराक्रम से युक्त भी इन पाडवों से वह पद्मनाभ राजा प्रतिपेधित नहीं हो सका-जीता नहीं जा सका। इस प्रकार के उन कृष्णवासुदेव के इस रूप इस आध्यात्मिक यावत् मनोगत सकल्प को गंगादवी ने जानकर उन्हें थाह दे दी ( अधार दिया)। (तएण से कण्हे वासुदेवे मुटुत्तत्तर समासासइ) थाह प्राप्त कर कृष्णवासुदेव ने पहा भूएहि ण पचहि पडवेहि पउमणाभे राया जाव णो पडिसेहिए-तएण गगादेवी वहस्स वासुदेवस्स इम एयारूव अज्झथिए जान जाणित्ता थाह वितरइ) તરતા તરતા જ્યારે કૃષ્ણ વાસુદેવ ગગા મહાનદીના એકદમ મધ્યમાં આવ્યા ત્યા સુધી આવતા આવતા તે તેઓ થાકી ગયા, ખેદખિન્ન થઈ ગયા, અને એકદમ થાકી ગયા થાકને લીધે તેમનું સ પૂર્ણ શરીર પરસેવાથી તરબોળ થઈ ગયું ત્યારે તે કૃષ્ણવાસુદેવને આ જાતને આધ્યાત્મિક યાવત્ મનોગત સકલ્પ ઉદ્દભવે કે જુઓ આ પાચે પાડવો કેટલા બધા બલિષ્ટ છે કે જેમણે ૬૨જન વિસ્તણું આ ગગા મહાનદીને હાથ વડે તરીને પાર કરી છે 'પણ એની સાથે આ પણ એક નવાઈ જેવી વાત છે કે એવા પરાક્રમી હોવા છતાએ આ પાડવોથી તે પદ્મનાભ રાજા યાવત્ પરાજીત કરી શકાય નહિ કૃષ્ણવાસુદેવના ગગા મહાનદીએ આ જાતના આધ્યાત્મિક યાવત મને ગત ६५ तमना भाटे या माथी (तएण से कण्हे वासुदेवे मुहुत्तत्तर समामासइ) थाई भवीन गुपामुद्धव थापार त्या विश्राम ४ (समासा०) વિશ્રામ કર્યા બાદ તેમણે - . ५५० तिर्मक यौव पञ्च पाण्डवास्तगोपागन्छति, उपागत्य पत्र पाण्डयान एवमवादी- अहो खलु यूय हे देवानुमियाः । मदापात येन युप्मामिर्गहा महानदी द्वापष्टि योजनानि अर्धयोजन च पिस्तीर्णा याद उत्तीर्णा, इत्यभूतैर्युष्माभिः पर- नामो यावत् नो प्रतिपेधित पराजय न प्रापिता, ततः सल ते पत्र पाण्डवाः थोड़ी देर तकविश्राम किया (समासा०)विश्राम करके फिर उन्होंने (गगा महाणइ पावहिजाब उत्तरइ,उत्तरित्ताजेणेव पचपडवातेणेव उवागच्छा, उवागछित्तो पच पडवे एव वयामी-अहोण तुम्मे देवाणुपिया! महा पलवगा जेण तुम्भेरिं गगा माणई वासहि जाव उत्तिण्णा, इस्थभूएहिं तुम्भेहिं पउम जोव णो पडिसेहिण, तएण ते पचपडवा कण्हे ण वासु देवेण एव घुत्ता समाणा कण्ह वासुदेव एवं वयासी-एव खलु देवाणु- पिया । अम्हे तुम्भेहिं विसज्जिया समाणा जेणेच गगा महाणई तेणेव उयागच्छद, उवागघिउत्तो एगट्टियाए मग्गणगवेसणं त चेव जाव णूमेमो तुम्भे पडिवाले माणा चिट्टामो) साढे पासठ योजन विस्तीर्ण उस गगा महानदी को तैरकर पार कर दिया। पार करके फिर वे वहां आये-जहाँ ये पाचो पाडव थे । वहा आकर उन्हों ने उन पांचो पाडवों से इस प्रकार कहा-हे देवानुप्रियों ! तुमलोग बहुत ही अधिक बलशाली हो जो तुमलोगों ने ६२॥ योजन विस्तीर्ण इस गगा महानदी को बाहुओं से तैरकर पार कर दिया। परन्तु यह आश्चर्य की बात हैं कि इतने बल शाली होकर भी जो तुम से पद्मनाभ राजा पराजित नहीं हो सका। (गगा महाणइ बावहि जाव उत्तरइ, उत्तरित्ता जेणेव पच पडवा तेणेव उबागच्छइ, उागच्छित्ता पच पडवे एवं क्यासी-अहोण तुम्भे देवाणुप्पिया ! महाबलवगा जेण तुम्भेहिं गगा महाणई वासहि जाव उत्तिण्णा इत्थ भूएहि तुम्भेहि पउम जाव णो पडिसेहिए, तरण ते पच पडवा कण्हे ण वासुदेवेण एव वुत्ता समाणा कण्ह वासुदेव एव चयासी-एव खलु देवाणुप्पिया ! अम्हे तुम्भेहिं विस ज्जिया समाणा जेणेव गगा महाणई तेणेव उवागच्छइ, उवागच्छित्ता एगट्टियाए मग्गण गवेसण त चेव जाब मेमो तुम्मे पडिवाले माणा चिट्ठामो) દુર" જન વિસ્તીર્ણ તે ગગા મહાનદીને તરીને પાર પહોચી ગયા પાર પહેચીને તેઓ જરા પોચે પાડવો હતા ત્યા આવ્યા ત્યાં આવીને તેમણે પાચે પાડવોને આ પ્રમાણે કહ્યું કે હે દેવાનુપ્રિયે ! તમે બહુ જ બળવાન છે કેમકે તમે લેકએ ૬૨જન વિસ્તી આ ગગા મહાનદીને હાથ વડે તરીને પાર કરી છે પણ એની સાથે આ એક નવાઈ જેવી વાત તમે આટલા બધા બળવાન હોવા છતા પણ પદ્મનાભ રાજાને २॥
भनगारधर्मामृतवपिणी टी० अ० १६ द्रौपदीचरितनिरूपणम् कृष्णेन वासुदेवेनैवमुक्ताः सन्तः कृष्ण वासुदेवमेवमवादी-एव खलु हे देवानु. मियाः । वय युप्माभिर्विसर्जिताः सन्तो यौव गङ्गा महानदी तौवोपागच्छामा, उपागत्य 'एगट्टियाए ' एकाथि काया नावो मार्गणगवेपण कृत्वा तं चेव जाव ण्मेमो' तदेव यदुक्त पूर्व तदेवान योध्यमित्यर्थः-ता नावमधिरुह्य वय गगामहानदीमुत्तीर्णाः, ततः खलु हे देवानुप्रियाः ! गङ्गा महानदी बाहुभ्या- मुत्तरितु भवन्तः शक्नुवन्ति नमा, इति ज्ञातु वयमेकाथिका नौका यावद् 'मेमो' गीपयामः, युग्मान 'पडियालेमाणा' प्रतिपालयन्तः-प्रतीक्षमाणा वय तिष्ठामः । ततः सलु स कृष्णो वामदेवस्तेपा पञ्चाना पाण्डवानाम् एतमर्थ श्रुत्वा आकर्ण्य निशम्य हयवधार्य आशुरुताः-शीघ्र सजातकोप , यावत् त्रिनलिकां रेखा इस प्रकार जन कृष्णवासुदेवने उन पांचो पांडवों से कहा तब उन्हो ने कृष्णवासुदेव से ऐसा कहा हे देवानुप्रिय ! सुनिये-यात इस प्रकार है जर हमलोगों को आपने वहां से विसर्जित कर दिया-तय हमलोग जहा गगा महानदी थी-वहाँ आये-वहा ओकर हमलोगों ने एकार्थिक नौका की मार्गणा गवेपणा की-नाव के मिलते ही हमलोग उसपर चढ- कर यरां गंगा नदी को पार कर आये हैं। हमलोगों ने यहा आकर फिर हे देवानुप्रिय ! ऐसा विचार किया - कि - कृष्णवासुदेव गगा महानदी को रायों से पार कर सकते है या नहीं-इसी यात को जानने के लिये हमलोगो ने उस एकाधिक नौका को यही छिपा कर रख दिया है। और आपकी प्रतीक्षा में यहा ठहरे हुए हैं। (तएण से कण्हे वासु- देवे तेसि पचण्ठं पाडवाण एयम सोच्चा णिसम्म आसुरुत्ते जाय तिव- આ રીતે જ્યારે કૃષ્ણવાસુદેવે તે પાચે પાડવોને કહ્યું ત્યારે તેમણે કૃષ્ણવાસુ દેવને આ પ્રમાણે કહ્યું કે હે દેવાનુપ્રિય સાભળે, વાત એવી છે કે અમને બધાને તમે જવારે વિદાય કર્યા ત્યારે અમે લેકે જ્યા ગગા મહાનદી હતી ત્યા આવ્યા ત્યા આવીને બધાએ એકાયક નૌકાની માગણ ગવેષણ કરી નૌકા પ્રાપ્ત થતા જ અમે બધા તેમા બેસીને ગગા મહાનદીને પાર કરીને આ તરફ આવી ગયા આ તરફ આવીને હે દેવાનુપ્રિય ! અમે લેકેએ આ પ્રમાણે વિચાર કર્યો કે-કુષ્ણવાસુદેવ ગગા મહાનદીને હાથ વડે તરીને પાર કરી શકશે કે કેમ? આ વાત જાણવા માટે જ અમે લેકએ તે એકર્થિક નૌકાને છુપાવીને તમારી પ્રતીક્ષા કરતા અમે અહીં જ બેસી રહ્યા હતા (तए ण से कण्हे वासुदेवे तेर्सि पचण्ह पाडवाण एयमह सोचा णिसम्म आसुरूत्ते जाब विवलिय एव वयासी-अहोण जया मए लवणसमुद्द दुवे जोयण + मन तिमेwed यौर पञ्च पाण्डवास्तवोपागन्छति, उपागत्य पत्र पाण्डपान् एवमवादी- अहो खलु यूय हे देवानुभियाः । महायलपत येन युष्मामिला महानदी दापष्टि योजनानि अर्धयोजन च पिस्तीर्णा याद् उत्तीर्णा, इत्यंभूतैर्युग्माभिः पत्र- नाभो यावत् नो मतिपेधित पराजय न पापितः, ततः सलु ते पञ्च पाण्डवाः थोड़ी देर तकविश्राम किया (समासा०)विश्राम करके फिर उन्होंने (गगा महाणइ घावटिजाव उत्सरइ,उत्तरित्ताजेणे पचपडवातेणेव उवागच्छा, उवागच्छित्तो पच पडवे एक बयासी-अहोण तुम्भे देवाणुपिया ! महा- घलयगा जेण तुम्भेहिं गगा महाणई चासहि जाव उत्तिण्णा, इस्थभूएहिं तुम्भेहिं पउम जोच णो पडिसेहिए, तएण ते पचपडवा कण्हे ण वासु देवेण एव पुत्ता समाणा कण्ह वासुदेव एव वयासी-एव खलु देवाणु पिया। अम्हे तुम्भेहिं विसज्जिया समाणा जेणेव गगा महाणई तेणेव उवागच्छह, उवागघिउत्तो एगट्टियाए मग्गणगवेसण त चेव जाव णूमेमो तुम्भे पडिवाले माणा चिट्टामो) साढे पासठ योजन विस्तीर्ण उस गगा महानदी को तैरकर पार कर दिया। पार करके फिर वे वहां आये-जहाँ ये पाचो पाडव थे ! चहा आकर उन्हों ने उन पांचो पाडवों से इस प्रकार कहा-हे देवोनुप्रियो ! तुमलोग यहुत ही अधिक बलशाली हो जो तुमलोगों ने ६२॥ योजन विस्तीर्ण इस गगा महानदी को बाहुओं से तैरकर पार कर दिया। परन्तु यर आश्चर्य की बात है कि इतने बल शाली होकर भी जो तुम से पद्मनाभ राजा पराजित नहीं हो सका। (गगा महाणइ वावडिं जार उत्तरइ, उत्तरित्ता जेणेव पच पडवा तेंणेव उवागच्छइ, उवागच्छित्वा पच पडवे एव चयासी-अहोण तुम्भे देवाणुप्पिया ! महाबलवगा जेण तुब्भेहिं गगा महाणई वासष्टिं जाव उत्तिष्णा इत्य भूहि तुम्भेहि पउम जाव णो पडिसेहिए, तरण ते पच पडया कण्हे ण पासुदेवेण एव वुत्ता समाणा कण्ह वासुदेव एव क्यासी-एव खलु देवाणुप्पिया! अम्हे तुम्भेहिं विस. ज्जिया समाणा जेणेव गगा महाणई तेणेव उवागच्छइ, उवागरिछत्ता एगट्टियाए मग्गण गवेसण त चेव जाव मेमो तुम्मे पडिवाले माणा चिट्ठामो) દર” જન વિસ્તીર્ણ તે ગગા મહાનદીને તરીને પાર પહોચી ગયા પાર પહેચીને તેઓ જ પોચે પાડવો હતા ત્યા આવ્યા ત્યાં આવીને તેમણે પાચે પાડવોને આ પ્રમાણે કહ્યું કે હે દેવાનુપ્રિયે! તમે બહુ જ બળવાન છે કેમકે તમે લોકોએ ૬૨ જન વિસ્તીમાં આ ગગા મહાનગીને હાથ વડે તરીને પાર કરી છે પણ એની સાથે આ એક નવાઈ જેવી વાત છે કે તમે આટલા બધા બળવાન હોવા છતા પણ પદ્મનાભ રાજાને १ .
" - ममगारधर्मामृतषिणी टी० अ० १६ द्रौपदीचरितनिरूपणम् मतिषे-य-हतमथितमारपीरघातितनिपतितचिव व जपताक यावत् प्रतिपेय = संग्रामात् मविनिमय-पानाम विजिन्येत्यर्थः, अमरकका राजपानी समग्नतोरणा यावद विनिपातिता-विधसिता,तथा-द्रौपदी सहस्तेनोपनीतामवयः प्रदत्ताः, ' तदा तस्मिन् समये खलु युप्माभिर्मम 'माहप्प ' माहात्म्य महत्त्व चलं, 'ण विणाय ' न विज्ञातम् ' इयागि ' इदानीम्-अस्मिन् समये 'जाणि- ससह ' ज्ञास्यथ, इति कृत्वा इत्युक्त्या, लोहदण्ड 'परामुसइ' परामशति-गृह्णाति पञ्चाना पाण्डमाना स्थान् चूर्णयति, चूर्णयित्वा ' णिनिसए आणवेइ' निर्विप यान् आज्ञापयति-पियात देशतो निर्गता वहिर्याता इति निर्विपयास्तान , यूय मम देशात् निगिच्छत, इत्याज्ञापयति स्म ' इत्यर्थ । आशाप्य तत्र खलु रहमदणे णाम कोहे णिविटे' ग्यमर्दननामा फोप्ठो निविष्ट'-रयमर्दनपुर नाम नगर स्थापितम् । ततस्तदनन्तर स कृष्गो पासुदेवो यत्रैव स्वक-निज , 'खधावारे' स्कन्धा- चार:-सेनानिवेशस्तोपागच्छति, उपागत्य स्वकेन सन्धावारेण-सोपकरण- सैनिकेन सार्नम् अभिममन्वागत: मिलितश्चाप्यभवत् । ततः खलु स कृष्णो मासु- देवो यौन द्वारवती नारी, तत्रैवोपाग उति, उपागत्य, अनुपविशति ।मु०३१॥ प्रशस्त ध्वजा पताकाओं को जमीन में मिरादिया-उस की राजधानी अमरकका नगरी को ध्वस्त कर दिया, तया उससे द्रौपदी को अपने हाथ से लाकर तुमलोगों को दिया उस समय तुमलोगो ने मेरे बल को नहीं जाना ? जो अब जानोगे-ऐसा कहकर उन वासुदेव कृष्ण ने लोर दडे को उठाया और उससे पाचो पाडवों के रथों को चूर २ कर दिया। चर २ कर के फिर उन्हें देश से बारिर हो जाने की आज्ञा देदी । आज्ञा देकर उन कृष्ण वासुदेव ने वहीं पर एक रथमर्दन नाम का नगर वसा दिया । इस के बाद वे कृष्ण वासुदेव जहां अपना स्कधावार था वहां જમીનત કરી નાખી તેની રાજધાની અમરક કા નગરીને નષ્ટ કરી નાખી અને તેની પાસેથી દ્રૌપદીને લાવીને તમને સોપી દીધી તે વખતે તમે લોકો મારા બળને જાણી શકયા નહિ તે હવે મારા બળને તમે જુઓ-આમ કહીને તે કૃષ્ણ વાસુદેવે લોહદડને હાથમાં લીધું અને તેનાથી તેમણે પાચે પાડવોના રના ભૂકેલૂક ઉડાવી દીધા રને નષ્ટ કરીને તેમણે પા પાડવોને દેશથી બહાર જતા રહેવાની આજ્ઞા આપી આજ્ઞા આપીને તે કૃષ્ણ વાસુદેવે તે સ્થળેજ એક રથમર્દન નામે નગર વસાધુ ત્યારપછી તે કૃણવાસુદેવ જ્યા પિતાના સિન્યની છાવણી હતી ત્યા આવ્યા ત્યા આવીને તેઓ પિતાના સિનિકોને ५५२ . पाताया प्रयुक्ता भुकुटि ललाटे उन्नीय प्रदर्य, परमादीव-हो-मार्य खलु 'नया' यदा-पस्मिन् समये, मया लवणसमुद्र 'दुवे जोपणसयमहरमा विस्थिष्णं' दियो जनशतसहसविस्तीर्ण द्विलनयोजनपरिमित विस्तीर्ण पीवात्ता' व्यतित्रज्य- समुल्लध्य, पद्मनाभ राजान ' हयमहिय-नार पडिसेहिता' इतमथित-यावत् लिय एव वयासी-अहोण जया मग लरणसमुददुवे जोयणसयसहस्सा विच्छिन्न वीइवहत्ता पउमणाम हयमहिय जात्र पडिसेहिता अमरकका सभग्ग० दोबई सारथि उवणीया तया ण तुम्भेहिं मम मारप्प ण वि. ण्णाय इयाणि जाणिस्सर, त्ति कटूड लोहड परामुसह, पचह पर घाणं रहे चूरेइ, चरित्ता णिन्धिसए आणवेड आणवित्ता तत्य ण रह मद्दणे णाम कोहडे णिवेट्टे,तण्ण से कण्हे वासुदेवे जेणेव साए ग्वधावारे, तेणेव उवागच्छद, उवागच्छित्ता सएण खधाबारेण सद्धि अभिसमझो गए यावि होत्या, से कण्हे वासुदेवे जेणेव यारवई णयरी तेणेव उवा गच्छइ, उगच्छित्तो अणुपरिसइ) उन पाचो पाडवों के मुख से इस कथन रूप अर्थ को सुनकर और उसे अपने हृदय में अवधारित कर उन कृष्णवासुदेव को इकदम फ्रोध आ गया। त्रिवलियुक्त उनकी दोनों भृकुटिया लाटतट पर चढ गई । उसी समय उन्हों ने उन पाडवों से कहा यह पढ़े आश्चर्य की यात है-जिस समय मैंने २ दो लाख योजन विस्तारवाले लवणसमुद्र को उल्लधन कर पद्मनाभ राजा को सग्राम मे जीता-उस की सेना को हत मथित किया-राजचिन्दस्वरूप उसकी सयसहस्सा विछिन्न वीइवइत्ता पउमणाम हय महिय जार पडिसेहिता अमर फका सभग्ग० दोबई साहत्यि उवणीया तयाण तुम्भेहिं मम माइप्प ण विणाय इयाणि जाणिस्सह, तिकट्टु लोहदद परामुसह, पचण्ह पटवाण रहे चूरेइ, चूरिक्षा णिधिसए आणवेइ आणवित्ता तत्यण रहमपणे णाम कोझे णिवेटे, तरण से कण्हे वासुदेवे जेणेव सए खधावारे, तेणेव उवागच्छइ, उवागच्छित्ता सपण खधा वारेण सद्धिं अभिसमन्नागए यावि होत्या तरण से कहे वासुदेवे जेणेव वारवर तेणेच उचागच्छद, उवागच्छित्ता अणुपविसइ) તે પાચે પાડવોના મુખથી આ કથનરૂપ અર્થને સાભળીને અને તેને પિતાના હૃદયમાં અધારિત કરીને તે કૃષ્ણ વાસુદેવ એકદમ ક્રોધાવિષ્ટ થઈ ગયા ત્રિવલિયુક્ત તેમના બને ભમ્મરે વક્ર થઈ ગયાતેમણે તે જ સમયે પાડવોને આ પ્રમાણે કહ્યું કે આ ખરેખર નવાઈ જેવી વાત છે કે જ્યારે મે ૨ લાખ જન વિસ્તીર્ણ લવ સમુદ્રને ઓળગીને પદ્મનાભ રાજાને યુદ્ધમા છત્યા, તેની સેનાને મથી નાખી, રાજચિત સ્વરૂપ તેની પ્રશસ્ત જ પતાકાઓને સિન્યની છાવણી હતી ત્યાં આવ્યા - - ममगारधर्मामृतषिणी टी० अ०१६ द्रौपदीचरितनिरूपणम् प्रतिषे य-हतमयितप्राचीरघातितनिपतितचितवजपताफ यापन् प्रतिषेध्य सग्रामात् प्रतिनिवर्त्य-पद्मनाम विमिन्येत्यर्थः, अमरकका राजधानी सभग्नतोरणा यावद् चिनिपातिता-विधसिता,तथा-द्रौपदी स्वहस्तेनोपनीता भवद्भयः पदत्ता., तयाण' तदा तस्मिन् समये खलु युप्माभिर्मम 'माहप्प' माहात्म्यमहत्त्वं चल, ‘ण विण्णाय 'न विज्ञातम् ' इयागि' इदानीम्-अस्मिन् समये 'जाणि ससह ' ज्ञास्यय, इति कृत्वा=इत्युक्त्वा, लोहदण्ड 'परामुसइ' परामशति-गृहाति पश्चाना पाण्डवाना स्थान् चूर्णयति, चूर्णयित्वा ' णिन्चिसए आणवेइ' निर्विप यान् आज्ञापयति-विपयात सदेशतो निर्गताः बहिर्याता इति निम्पियास्तान , यूय मम देशात् निर्विगच्छत, इत्याज्ञापयति स्म ' इत्यर्थ । आमाप्य तत्र खलु रहमदणे णाम कोटे णिविटे' रथमर्दननामा कोष्ठो निविष्ट.-रथमर्दनपुर नाम नगर स्थापितम् । ततस्तदनन्तर स कृष्गो वासुदेवो यत्रैव स्वक-निज , ' खपावारे ' स्कन्धा- वार:-सेनानिवेशस्तत्रोपागच्छति, उपागत्य स्वकेन सन्धावारेण-सोपकरण- सैनिकेन सार्थम् अभिममन्वागता-मिलितश्चाप्यभवत् । ततः खलु स कृष्णो वासु- देवो यप द्वारवती नगरी, तत्रैवोपागच्छति, उपागत्य, अनुपविशति ॥०३१॥ प्रशस्त ध्वजा पताकाओं को जमीन में मिलादिया-उस की राजधानी अमरकका नगरी को ध्वस्त कर दिया, तथा उससे द्रौपदी को अपने हाय से लाकर तुमलोगों को दिया उस समय तुमलोगों ने मेरे बल को नहीं जाना ? जो अब जानोगे-ऐसा कहकर उन वासुदेव कृष्ण ने लोह दडे को उठाया और उससे पाचो पाडवों के रथों को चूर २ कर दिया। चर २ कर के फिर उन्हें देश से बाहिर हो जाने की आज्ञा देदी ! आज्ञा देकर उन कृष्ण वासुदेव ने वहीं पर एक रथमर्दन नाम का नगर वसा याद वे कृष्ण वासुदेव जहां अपना स्कधावार या वहाँ જમીનદેસ્ત કરી નાખી તેની રાજધાની અમરક કા નગરીને નષ્ટ કરી નાખી અને તેની પાસેથી ટ્રીપદીને લાવીને તમને સોપી દીધી તે વખતે તમે લોકો મારા બળને જાણી શક્યા નહિ તે હવે મારા બળને તમે જુઓ-આમ કહીને ते કૃષ્ણ વાસુદેવે લેહદ ડને હાથમાં લીધું અને તેનાથી તેમણે પાર પાડવાના રોના ભૂકેમ ઉડાવી દીધા રથને નષ્ટ કરીને તેમણે પા પાડવોને દેશથી બહાર જતા રહેવાની આજ્ઞા આપી આજ્ઞા આપીને તે કૃષ્ણવાસુદેવે તે સ્થળેજ ત્યારપછી તે કૃષ્ણ વાસુદેવ યા પિતાના ત્યાં આવીને તેઓ પોતાના સિનિકોને दिया । इस के એક રથમઈન નામે નગર વસાવ્યું श , पानाधर्मकपणे मूलम-तएणं ते पंच पडया जेणेप हरियणाउरे तेणेव उवा- गच्छति उवागच्छित्ता जेणेत्र पट्ट तेणेव उवागच्छति उवाग- च्छित्ता करयल एवं बयासी-एव खल्ल ताओ ! अम्हे कण्हेणं णिविसया आणत्ता, तएणं पडुराया तपंच पडवे एव वयासी- कहाण पुत्ता । तुम्भे कण्हेण वासुदेवेण णिव्विसया आणत्ता, तएण ते पच पंडवा पडुराय एव वयानी-एव खल्ल ताओ। अम्हे अमरककाओ पडिणियत्ता लवणसमुद्द दोनि जोयणसय सहस्साइ वीइवत्ता तएण से कण्ह अम्हे एवण्यासी-गच्छह णं तुझे देवाणुप्पिया । गंगामहाणड उत्तरह जाव चिट्टह ताव अहं एवं तहेव जाव चिट्ठामो, तएण से कण्हे वासुदेवे सुट्टियं लवणाहिबई दवण त चेव सव्वं नवर कण्हस्स चिंता ण जुजइ जाव अम्हे णिदिवसए आणवेइ,तएणं से पंडुराया ते पच पडवे एव वयासा-दुक्षणं पुत्ता कय कण्हस्स वासुदेवस्स विप्पिय करेमा- हिं, तएण से पडुराया कोंति देवि सदावेइ सदावि त्ता एव वयासी गच्छहणे तुम देवाणुप्पिया । बारवइ कण्हस्स वासुदे- वस्त णिवेदेहि- एव खलु देवाणुप्पिया तुम्हे पच पडना णिब्धि- सया आणत्ता तुम च णं देवाणुप्पिया ! दाहिणभरहस्स सामी त सदिसतुण देवाणुप्पिया पच पडवा कयर दिसि वा विदिस आये । यहाँ आकर वे अपने सैनिको के साथ मिले। याद में जहा द्वारावती नगरी थी उस ओर चल दिये वर्श पहुँच कर वे द्वारावती नगरी में प्रविष्ट हुए ॥४० ३१ !! મળ્યા, ત્યારબાદ તેઓ જે તમ્ફ દ્વારાવતી નગરી હતી તે તરફ રવાના થયા ત્યાં પહોંચીને તેઓ દ્વારાવતી નગરીમાં પ્રવિષ્ટ થયા १ नगारधर्मामृतपिणी टीका अ० १६ द्रौपदीचरितनिरूपणम् वा गच्छंतु , तएण सा कोती पंडुणा एवं वुत्ता समाणी हत्थि- खंध दुल्हइ दुरूहित्ता जहा हेट्टा जाव सदिसतु णं पिउत्था। किमागमणपओयणं १, तएण सा कोती कण्ह वासुदेव एवं वयासी- एव खलु पुत्ता | तुम पच पंटवा णिविसया आणत्ता तुम च णं दाहिणभरह जाब विदिस वा० गच्छतु , तएण से कण्हे वासुदेवे कोति देवि एव वयासी -अपूईवयणाण पिउ- स्था | उत्तमपुरिसा वासुदेवा बलदेवा चकवट्टी त गच्छतु ण देवाणुप्पिया । पंच पडवा दाहिणिल वेलाऊल तत्थ पडुमहुर णिसंतु मम अदिवसेवगा भवतु तिकट कोति देवि सकारेइ सम्माणेइ जाव पडिविनज्जेइ, नएण सा कोंती देवी जान पडुस्त एयम णिवेदेइ, तएणं पडू पच पडवे सदावेइ सदावित्ता एव क्यासी गच्छह ण तुम्भे पुत्ता ! दाहिणिल्ल वेलाऊल तत्थ ण तुम्भे पडुमहुरं णिवेसेह, तएण एच पडवा पडुस्स रण्णो जाव तहत्ति पडिसुणेति सवलवाहणा हयगय हथिणाउराओ पडि णिखमतिपडिणिक्खमित्ताजेणेदक्षिणिले बेयाली तेणेव उवा- गच्छइ उवागच्छित्ता पडुमतुर नगरि निवेसेति निवेसित्ता तत्थ णं ते विपुलमोगसमिति समपणागया यावि होत्था ॥ सू० ३२ ॥ टीका--'तएण ते इत्यादि । नतरतदनन्तर खलु ते पञ्च पाण्डरा यव हस्तिनापुर नगर कौवोपागच्छन्ति, उपागत्य यौव पाण्ड राजा तीवोपागच्छन्ति, - तरुण ते पच पडवा इत्यादि । टीकार्य-(तएण) इसके बाद (ते पच पटवा) वे पाचो पाडर (जेणे हत्थिणा उरे) जहा इस्निापुर नगर ग (तेणेव उवागच्छति) वहां वएण ते पच पडवा इत्यादि- + साथ-(तएण) त्या२५७ (वे पच पहा) ते पाये ५४ो (जणेय हरियणा उरे) या सुस्तिनापुर न१२ तु (वेणेव आगन्छ ति ) या 11-11 (पक्षा - नीताल उपागत्य करतलपरिगृहीतदानख शिरारते मस्तकेऽसति कृत्वा, एवम् पक्ष्य माणमकारण, आदिपुर-एर खड देतात ! य न निम्पियापियार मम देशाद् पहिनिर्गताः आसप्ता: कृष्णोऽस्मान् देशाद् यहि निगन्तुमानप्तानि त्यर्थः । ततः खलु पाण्ड राजा तान् पश पाण्डमार समपादीत-कहम्म' कथ केन कारणेन खल हे पुत्र ! यूय काणन निम्पिया आमा ? ततः खलु ते पश्च पाण्डवाः पाण्डु राजानम् एमबहार-एर खलु हे नात! उगममरकट्टातः प्रति नित्ता लपणसमुद्र ' दोनिनोयणसय सहस्साइ' द्वियोजनशतसहस्राणि द्विलक्ष योजनपरिमित पीवत्ता' व्यतित्रजिता:-उल्लहिताः । ततः खलु स कप्णो आगए (उधोगचित्ता) चहा आफर के (जेणेव पट्ट) वे जहा पांडु राजा थे (तेणेव उवागच्छति) वहां गये ( उचागघिउत्ता) वा जाकर (करयल०एव चयासी) उन्हों ने अपने २ दोनों रायों को जोड़कर उनसे इस प्रकार कहा-(ण्व खलु ताभो!) हे पिनाजी ! सुनो-(अम्हे कण्हे ण णिग्विसया आणत्ता) हमलोगों को कृष्ण वासुदेव ने देश से निकल जने को कहा है (तएण पडराया पच पडवे व वयासी) तव पाडु राजा ने उन पाचों पाडवो से इस प्रकार फहा-(कहाण पुत्ता तुम्भे कण्हेण वासुदेवेण णिविसया आणत्ता) हे पुत्रो किम कारण को लेकर कृष्ण वासुदेव ने तुमलोगों को देश से याहिर निकल जाने को कहा है (नएण ते पच पडया पडुराया एव चयासी) तर उन पांचो पाडवों ने पाड रोजी से इस प्रकार कहा-(एव खलु ताओ । अम्हे अमरककाओ पडि णियत्ता लवणसमुद्द दोन्नि जोयणसयसहस्साइ वीइवत्ता) हे तात! गच्छित्ता ) त्या भावान (जेणेर पडू ) तेथे ०५॥ पा3 Non ( तेणेव उवागच्छति ) त्या गया ( उवागच्छिता) या ४२ (करयल० एव वयासो) તેમણે પિતાના બને હાથ જોડીને તેમને આ પ્રમાણે વિનતી કરી કે (एव खलु ताओ) से पिता | सामी, (अम्हे कण्हेण णिविसया आणत्ता) वा वे अभने शिथी माता २खेपानी याज्ञा माथी छ (तएण ११ राया पच पडवे एव वयासी) त्यारे पा रातो पाये पायोने मा प्रभारी छु 3-(कहण्ण पुत्ता तु-भे कण्हेण वासुदेवेण णिविसया आणत्ता ) पुत्र। કૃણવાસુદેવે શા કારણથી તમને દેશમાથી બહાર જતા રહેવાની આજ્ઞા આપી छ ? (तएण ते पच पडवा पडुराया एव वयासी ) त्यात पाय पापोमे पाहु ने प्रमाणे घु-( एव सलु ताओ । अम्हे अमरककाओ पडि णियत्ता लवण-समुद्द दोन्नि जोयणसयसहस्साइ वीइबइचा) 31 साला, - - भनगारधर्मामृतयपिणो टीका म० १६ द्रौपदीचरितनिरूपणम् ऽस्मान् एवमवादीत्-गच्छत खलु यूय हे देवानुप्रियाः ! गङ्गामहानदीमुत्तरत, यावत् तिष्ठत । ताव अह एव तहेर 'जार चिट्ठामो' एवं यथा कृष्णवासुदेवस्य वाक्य पूर्वमुक्त तथैवात्र चोध्यम्-तावदह सुस्थित लवणाधिपतिं पश्यामीति । 'जाव चिट्ठामो' यावतिष्ठामः-अत्र यावच्छब्देनैवं योजनीयम्-ततः खलु वय कृष्णवासुदेवेनैवमुक्ताः सन्तो नौकया गद्गामहानदीमुत्तीर्य, कृष्णो बाहुभ्यां गङ्गा महानदीमुत्तरितु समर्थों न वेति विज्ञातु ता नोका सगोपितपन्त , ततः कृष्ण प्रतीक्षमाणास्तिप्ठाम इति । ततः खलु स कृष्णो वासुदेवः मुस्थित लवणाधिपति दृष्ट्वा, 'त चेप सब ' तदेव सर्व-गङ्गामहानयास्वटे समागत्य, एकाथिका नाव- सुनो-बात इस प्रकार है-जन हमलोग अमरकका नगरी से पीछे आकर २, दो लाग्य योजन विस्तार वाले लवणसमुद्र को पार कर चुके (तएण) तर (से कण्हे अम्दं एव वयासी) उन कृष्ण वासुदेव ने हमलोगों से इस प्रकार कहा-(गच्छद ण तुम्भे देवाणुपिया! गगा महाणइ उत्तरह जाव चिट्ठर-तार-अह एव तहेव जाव चिट्ठामो ) हे देवानुप्रियो ! तुम लोग चलो और गगा महानदी को पारकरो-तय तक में सुस्थित देव से मिलकर और आज्ञा प्राप्तकर आता है। कृष्ण वासुदेव द्वारा इस प्रकार आजप्त हुए हमलोगों ने नौका से गगा महानदी को पार करके वही पर उस नौका को छुपा दिया-इस अभिप्रायसे कि देखें कृष्ण वासुदेव अपने हाथों से तैर कर इस गगा महानदी को पार कर ने में सम- र्थ हो सकते हैं या नहीं । नौका को छिपाकर हमलोग वही पर उनकी प्रतीक्षा करते हुए ठहरे। (तण्ण से कण्हे वासुदेवे सुटिय लवणादिवइ વાત આ પ્રમાણે છે કે જ્યારે અમે અમરકકા નગરીથી પાછા વળતા ૨ લાખ જન જેટલા વિસ્તારવાળા લવણ સમુદ્રને પાર કરી ચૂકયા ( તાળ) ત્યારે (से कण्हे अम्ह एव वयासी) geवामुवे मभने भा प्रभार ४धु है- (गच्छपण तुटभे देवाणुप्पिया । गगा महाणइ उत्तर ह जाव चिट्ठह-तान अह एव तहेर जाव चिट्ठामो) वानुप्रियो ! तमे न मने 10 महानतीन पार કરો તેટલામા હુ સુસ્થિત દેવને મળીને અને તેમની પાસેથી આજ્ઞા મેળવીને આવુ છુ આ પ્રમાણે કૃણવાસુદેવ વડે આજ્ઞાપિત થયેલા અમે નૌકા વડે ગગા મહાનદીને પાર કરીને ત્યાં જ તે નોકાને છુપાવી દીધી નૌકાને છુપા- વવા પાછળ અમારે એ જાતને આશય હતું કે કૃષ્ણ વાસુદેવ પિતાના હાથેથી તરીને ગગા મહાનદીને પાર કરી શકે છે કે નહિ? કાને છુપાવીને અમે ત્યાં જ તેમની પ્રતીક્ષા કરતા રોકાઈ ગયા (तपण से कण्हे वासुदेव सुद्वियं ? . तामकथा उपागत्य करतलपरिपृहीतदशनख शिरापरी मस्तकेऽतलि फवा, परवक्ष्य माणमकारेण, आदिपुः-एर खलु तात ! यहाणन निस्पिा:-पियार मम देशाद् वदिनिर्गताः आसप्ताः कृष्णोऽस्मार देशाद् यहि निगन्तुमानप्तानि त्यर्थः । ततः खलु पाण्ड राजा तान् पश्च पाण्डमार मवादीत-कहाण' कथ केन फारणेन खल हे पुत्र ! यूय कृष्णेन निम्पिया आज्ञप्ताः १ ततः खलु ते पश्च पाण्डवाः पाण्डु राजानम् एमपदा-एव खलु देवात यममरकडातः प्रति निटत्ता लवणसमुद्र 'दोनिनोयणसय सहम्साइ' द्वियोजनशतसहस्राणि द्विलक्ष योजनपरिमित पीइवइत्ता' व्यतित्रनिता:-उल्लहिताः । ततः खलु स कष्णो आगए (उधोगच्छित्ता) वहा आकर के (जेणेच पडू) वे जहा पांडु राजा थे (तेणेव उवागच्छति ) वश गये ( उवागच्छित्ता) वहा जाकर (करयल एव वयासी) उन्हों ने अपने २ दोनों हाथों को जोड़कर उनसे इस प्रकार फहा-(एव सल ताओ!) हे पिताजी ! सुनो-(अम्हे कण्हे ण णिन्धिसया आणत्ता) हमलोगों को कृष्ण वासुदेव ने देश से निकल जने को कहा है (तण्ण पडुराया पच पडचे एच वयासी) तव पाडु राजा ने उन पाचों पांडवो से इस प्रकार कहा-(कापण पुत्ता तुम्भे कण्हेण वासुदेवेण णिव्विसया आणत्ती) हे पुत्रो किस कारण को लेकर कृष्ण वासुदेव ने तुमलोगों को देश से याहिर निकल जाने को कहा है (नएण ते पच पडया पडुराया एव चयासी) तर उन पाचो पाडवों ने पाडु राजा से इस प्रकार कहा-(एव खलु ताओ! अम्हे अमरककाओ पडि णियत्ता लवणसमुद्द दोन्नि जोयणसयसहस्साइ बीइवइत्ता) हे तात ! गच्छित्ता ) त्या भावान (जेणेर पडू) तो या पाई let &ता ( तेणेव उवागच्छति ) त्या मया ( उवागच्छित्ता) या न ( करयल० एव वयासी) તેમણે પિતાના અને હાથ જોડીને તેમને આ પ્રમાણે વિનંતી કરી કે (एव खलु ताओ) से पिता | सामगो, (अम्हे कण्हेण णिबिसया आणत्ता) वामुवे अभने शिथी महाता रहेपानी माशा आची छे (तएण पडु राया पच पडवे एव चयासी) त्यारे पाई रातो पाये पापोने या प्रमाणे ४थु 3-(कहण्ण पुत्वा तुम्भे कण्हेण वासुदेवेण णिन्धिसया आणत्ता ) पुत्र ! કૃષ્ણવાસુદેવે શા કારણથી તમને દેશમાથી બહાર જતા રહેવાની આજ્ઞા આપી छ ? (तएण ते पच पडवा पडुराया एव चयासी ) त्यारे पाये पापोने पाड २ मा प्रभारी धु है-(एव खलु ताओ । अम्हे अमरककाओ पडि णियचा लवण-समुद्द दोन्नि जोयणसयसहस्साइ वौइवइचा) 3 पिता! सामना, ।
५५९ ७ भनगारधर्मामृतवपिणी टीका १० १६ द्रौपदीचरितनिरूपणम् नगरी, कृष्णम्य वासुदेवम्य निवेदय, एव खलु हे देवानुप्रियाः ! युग्माभिः पञ्च पाण्डवा निर्विषयाः देशनिष्कासिता' आज्ञप्ताः, यूय च खलु हे देवानुप्रियाः ! दक्षिणार्थभरतस्य सामिन । 'त' तन्तस्मात् सदिशन्तु कथयन्तु हे देशानु मिया 1 ते पञ्च पाण्डवाः कतरा दिश विदिश या गन्छन्तु ? मननामेव सर्वे देशा, तर्हि मे कुरा गमियन्तीति क्ययन्तु भरत । तत. ग्बलु रा कुन्ती पाण्डुना गझैवमुक्ता सती हस्तिसन्ध दुरोहति-आरोठयति-दूना 'जहादेठा' देवाणुप्पिा चारवइ कण्हस्त वाटदेवस्स निवेदेहि व खलु देवाणु- प्पिया ! तुम्हे पंच पडवा णिन्विमया आणत्ता, तुम च ण देनाणुप्पिा! दाहिणड्डभरहस्स मामी, त सदिसतुण देवाणुप्पिया । ते पच पडवा कयर दिसि वा विटिस वा गच्छतु') तब पांडु राजा ने उन पाचों पांडवों से इस प्रकार करा तुम लोगो ने यह सुन्दर काम नहीं किया जो इस प्रकार से कृष्ण वासुदेव का अनिष्ट किया-उन्हें नहीं रुचने वाला काम किया इस प्रकार कहकर पांदु राजा ने उसी समय कुती देवी को बुलाया-बुलाकर उससे ऐसा कहा-हे देवानुप्रिये ! तुम द्वारा- वती नगरी में कृष्ण वासुदेव के पास जाओ और उनसे निवेदन करो -कि आपने पाच पाडवो को देश से वाहिर निकल जाने के लिये आज्ञा दी है-मो रेदेवानुप्रिय । आप दक्षिणार्य भरत क्षेत्र के अधिपति हैं- अत. करें कि वे कौनसी दिशा अथवा विदिशा की ओर जाने । ज्य आपके ही सर्व देश -तो ये कहाँ जावें आप कहें । (तण्ण सा कोदी वित्ता एस क्यासी-गच्छहइ ण तुम देवाणुप्पिया। वारच कण्हस्स वासुदेवस्स निवेदेहि एवं सलु देवाणुप्पिया । तुम्हे पच पडना णिविसया आणता, तुम च ण देवाणुप्पिया ! दाहिणभरहस्स सामी, त सदिसतु ण देवाणुप्पिया ' ते पच पडवा कयर दिसि वा विदिस वा गच्छतु ?) ત્યારે પાડુ રાજાએ તે પાચે પાડેને આ પ્રમાણે કહ્યું કે તમે લેકેએ દૃષ્ણ વાસુદેવનુ બુરૂ કરીને સારૂ કર્યું નથી તેમને અણગમતું કામ તમે કર્યું છે આ પ્રમાણે કહીને પાડુ રાજાએ તે જ વખતે કુતી દેવીને બેલાવી બેલાવીને તેમને આ પ્રમાણે કહ્યું કે હે દેવાનુપ્રિયે ! તમે દ્વારાવતી નગરીમા કૃષ્ણ વાસુદેવની પાસે જાઓ અને તેમને વિનતી કરો કે તમે પચે પાડવોને દેશથી બહાર નીકળી જવાની આજ્ઞા આપી છે હે દેવાનુપ્રિય! તમે દરિણાઈ ભરતક્ષેત્રના અધિપતિ છે તે બતાવે કે તેઓ કઈ દિશે કે વિદિશા તરફ જાય જ્યારે બધા દેશો તમારા જ છે ત્યારે બનાવે કે આ લેકે કયા જાય?
- . - - . ६५८ matधर्मकथाम मदृष्टा एकेन पाहुना स मारग मसारथि गृहीत्या, एकन गाना गङ्गागहानदी मुत्तीर्य, समागतः । 'नार या विा न युझर' नार करणाय चिन्ता न बुभ्यते नपर-विशेगस्तु हे तात ! नौमाया सगोपिताया सस्या रणः केनोपायेन गङ्गामहानदी तरिग्यति इति चिताऽस्माभिर्न युध्यते-न क्रियतेस्म, अनेनापरा धेन 'जाव अम्हे णिधिसए आणइ ' यानन्-रयाणीत्यागार निर्विपयान आशापयति । ततस्तदनन्तर स पा राना तान पनपाण्याने समयादी- 'दुखण' दुष्टु-प्रशोमन गलु हे पुत्राः । एत युग्माभिः कृष्णस्ग वामदेवस्य विप्पिय ' पिप्रियम्-मनिष्टर कुतिः, वव सलु स पाण्ट्र राजा कुन्ती देवी शब्दयति, शन्दयित्वा, एमवादी-गन्छ मल व हे देवानुप्रिये ! द्वारवती दछुण तचेच सच्च-नयर कण्हस्म चिंता न जुन्नतिजार अम्हे णिवि सये आणवेइ ) गाद में कृष्ण वासुदेव लवणननुद्राधिपति सुस्थित देव से मिलकर ज्यो ही गगा मरानदी के तट पर आये-तो उन्हें वह नौका नहीं मिली-इस कारण ये १ एक हाथ से तुरग एर सारथि युक्त रथ को ये दूसरे हाथ से गगा महानदी को तैर कर जा हमलोग थे-वा आ गये । “कृष्णजी किस तरह गगा महानदी को पार करेंगे" यह विचार रमवोगो ने नौका को छिपाते समय नहीं किया। इसी अपराध से उन्हों ने हमारे रयों को चकना चूर कर देश से बाहिर निकल जाने के लिये आज्ञा दी है । (तगण से पडराया ते पच पडवा एक वयासी- दुटूण पुसा ! कय कण्रस्त चासुदेवस्स विपियं करेमाणेनि-तएण से पडुराया कोंनि देवि सहावे सदाविता एव बयासी-गच्छद ण तुम लवणाहिनइ ठुण त चेत्र सब-नवर कण्डस चित्ता न जुज्नति जाव अम्हे णिव्यिसये आणवेइ ) त्या२५छी पासुदेव aey समुद्रमा मधिपति सुस्थित દેવને મળીને જ્યારે ગગા મહાનદીના કિનારા ઉપર આવ્યા ત્યારે તેમને નૌકા જડી નહિ ત્યારે તેઓ એક હાથમા ઘડા અને સારથિ સહિત રથને ઉચ કોને બીજા હાથથી ગગા મહાનદીને તરીને જવા અમે હતા ત્યા આવી ગયા “કૃષ્ણવાસુદેવ કેવી રીતે ગગા મહાનદીને પાર કરશે” નૌકાને છુપાવતા અમે આ વિષે વિચાર જ કર્યો નહોતે આ અપરાધથી તેમણે અમારા રથોને નષ્ટ કરી નાખ્યા અને અમને દેશની બહાર જતા રહેવાની આજ્ઞા કરી છે (तएण से पडुराया ते पच पडवे एच बयासी-दुgण पुत्ता । कय कण्हहस्स वासुदेवस्स विप्पिय करेमाणेहि-तएण से पडराया कोतिं देवि विइ, सदा १ मनगारधर्मामृतपषिणी टीका १० १६ द्रौपदीचरितनिरूपणम् नगरी, कृष्णम्य वासुदेवम्य निवेदय, एर खलु हे देवानुप्रियाः । युप्माभिः पञ्च पाण्डवा निम्पियाः देशनिष्कासिताः आसप्ताः, यूय च खलु हे देवानुप्रियाः ! दक्षिणावभरतम्य स्वामिन । 'त' तत्-तस्मात् सदिशन्तु-कथयन्तु हे देवानु- पिया ! ते पञ्च पाण्डवाः कतरा दिश विदिश पा गन्छन्तु ? भननामे सर्ने देशाः, तर्हि उमे कुरा गमियन्तीति क्ययन्तु भवन्त । तत. बलु सा अन्ती पाण्डना गवमुक्ता सती हस्तिस्कन्ध दूरोहति-आरोहपति-दुग्द्य 'जहादेठा देवाणुप्पिया । पारवह कण्हस्त वाटेवस्स निवेदेहि एव वल देवाणु- प्पिया ! तुम्हे पच पडवा णिन्विमया आणत्ता, तुम च ण देवाणुप्पिया! दाहिणड्डभरहस्स नामी, त सदिसतु ण देवाणुप्पिया' ते पच पडवा फयर दिसि वा विटिस वा गच्छतु ?) तय पांडु राजा ने उन पाचों पाडवों से इस प्रकार करा तुम लोगो ने यह सुन्दर काम नहीं किया जो इस प्रकार से कृष्ण वासुदेव का अनिष्ट किया-उहे नहीं रुचने चाला काम किया इन प्रकार कहकर पादु राजा ने उसी समय कुती देवी को बुलाया-पुलाकर उससे ऐसा कहा-हे देवानुप्रिये ! तुम द्वारा- वती नगरी में कृष्ण वासुदेव के पान जाओ और उनसे निवेदन करो -कि आपने पाच पाउवो को देश से बाहिर निकल जानेके लिये आज्ञा दी है-मो हेदेवानुप्रिय । आप दक्षिणा भरत क्षेत्र के अधिपति हैं- अतः करें कि वे कौनसी दिशा अथवा विदिशा की ओर जावें । जन आपके ही सर्व देश हे-तो ये कहाँ जावें आप कहें । (तरण सा कोती वित्ता एप पयासी-गच्छहड ण तुम देवाणुप्पिया' पारख कण्ठस्स वासुदेवस्स निवेदेहिं एव सलु देवाणुप्पिया । तुम्हे पच पडवा गिव्विसया आणता, तुम च ण देवाणुप्पिया ! दाहिणभरहस्स सामी, त सदिसतु ण देवाणुप्पिया । ते पच पडवा कयर दिसि वा विदिस वा गच्छतु ') ત્યારે પાડુ રાજાએ તે પાચે પાડાને આ પ્રમાણે કહ્યું કે તમે લોકોએ ડ્રણવાસુદેવનું બુરૂ કરીને સારૂ કર્યું નથી તેમને અણગમતુ કામ તમે કર્યું છે આ પ્રમાણે કહીને પાડુ રાજાએ તે જ વખતે કુતી દેવીને બોલાવી બેલાવીને તેમને આ પ્રમાણે કહ્યું કે હે દેવાનુપ્રિયે ! તમે કાવતી નગરીમા કૃષ્ણ વાસુદેવની પાસે જાઓ અને તેમને વિનતી કરો કે તમે પા પાડવોને દેશથી બહાર નીકળી જવાની આજ્ઞા આપી કે હે દેવાનુપ્રિય ! તમે દક્ષિણ ભરતક્ષેત્રના અધિપતિ છે તે બતાવે કે તેઓ કઈ દિશા કે વિદિશા તરફ જાય ત્યારે બધા દેશો તમારા જ છે ત્યારે બનાવો કે આ લકે કયા જય?
. " ५६० ताजपाले यथा अधः, ययापूर्व द्वारपतीमागता तथाऽत्रापि वो यम् यापन सदिशन्तु-अत्र यावदित्यनेनैव योध्यम्-मारवतों नगरीमागत्य कृष्णेन गत्यता स्नाता कनभोजना सुग्यासनमरगताऽम पद इनि, ततस्तां कृष्ण पृच्छति सदिशन्तु स्ययन्तु खलु हे पडणा ण्व चुत्ता समाणी, हस्पिषध दुरूप, दुहिता जहा रेटा जाव सदिसतु ण पिउत्था । फिमागमणपोयण ? तपण सा कोंती कर घासुदेव एव वयामी-एव बलु पुत्ता! तुमे पच पहया णियितया आणत्ता, तुम च ण दारिणभरह जान विदिम पो गच्छतु ? तण्ण से कण्हे वासुदेवे कोतीदेवि एव चयामी अपूईययणा ण पिउत्या ! उत्तम पुरिसा वासुदेवा, पलदेवा, चकटी त गच्छतु ण देवाणुपिया! पच पडवा दाहिणिल्ल वेलराउल तत्य पद्यमहर णिवेसतु मम अदिहसेवगा भवतु त्ति कटु कोंतीदेवि सफारेड, सम्माणेइ, जार पडिपिसज्जेइ) पाडु के बारा इस प्रकार कही गई वह देवी राथी पर चढी और चढ कर जिस प्रकार पहिले यह दारवती आई थी उसी तरह अब भी यह वरा पहुंची। यहा यावत् शब्द से इस प्रकार पाठका सपन्ध लगा लेना चाहिये-जब कुनी द्वारावती नगरी में आई-तप कृष्ण वासुदेवने उनका खूब मनमाना सत्कार कियो। बडे ठाट घाट से उनका प्रवेशोत्सव मनाया- कुतीने स्नान आदि दैनिक कार्यों से नियट कर आनद के सार चतुर्विध आहार किया याद में विश्राम के निमित्त स्तुग्वासन पर (तएण सा कोंती पडुणा एव वुत्ता समाणि, इत्थिखध दुरुह, दुरूहित्ता जहा हेट्ठा जार सदिसतु ण पिउत्था । किमोगमणपोयण' तरण सा कोती कण्ह वासुदेव एव पयासी-एव खलु पुत्ता ! तुमे पच पडवा णिविसया आणत्ता, तुम च ण दाहिणट्ट भरद जाब विदिस वा गच्छतु ? तरण से कण्हे वासुदेवे कौती देवि एच वयासी-अपूई वयणा ण पिउत्था उत्तमपुरिसा देवा, वळदेवा, चकवट्ठी त गच्छतु ण देवाणुप्पिया! पच पडवा दाहिणिल वेलाउल्लतत्थ पडुमहुर णिवेसतु मम अदिट्ठसेनगा भवतु त्ति कटु कोती देवि सकारे, सम्माणेइ, जार पडिविसज्जेइ) આ પ્રમાણે પાડુ વડે આજ્ઞાપિત થયેલી કુતી દેવી હાથી ઉપર સવાર થઈ અને સવાર થઈને પહેલા જેમ તે દ્વારાવતી નગરી ગઈ હતી તેમજ અત્યારે પણ પહોંચી અહીં યાવત્ શબ્દથી આ જાતને પાઠ સમજવો જોઈએ કે જયારે કુતી દ્વારાવતી નગરીમાં આવી ત્યારે કૃષ્ણવાસુદેવે તેમને ખૂબ જ સત્કાર કર્યો બહુ જ ઠાઠથી તેમને પ્રવેશે સવ ઉજવ્ય કુતીએ પણ સ્નાન વગેરે નિત્યકર્મથી પરવારીને સુખેથી ચતુર્વિધ આહાર કર્યો ત્ય 4 - मनगारधर्मामृनवषिणी टीका १० १६ द्रौपदीचरितनिरूपणम् पिप्पसः । किमागमनप्रयोजनम् , ततः खलु सा कुन्ती कृष्णं पासुदेवमेवमवा- दीद-एव खलु हे पुन । त्वया पश्च पाण्डमा निर्विपया आजप्ता ल च खलु दक्षिणार्धभरतस्य यावत् स्वामी, तत् कथय ते पञ्च पाण्डवाः कतरा दिश विदिश वा गच्छन्तु ।। ततः सलु स कृष्णो वासुदेवः कुन्ती देवीमेवमयादीव-' अपूइ- वयणाण' अत्तिवचनाद्वचनाः खलु हे पिष्षसः | उत्तमपुरुषाः वासु देवा बलदेवाश्चक्रवर्तिनः, 'त' वत्-तस्मात् गाउन्तु खलु है देवानुप्रिये । पञ्च पाण्डगः 'दाहिणिल्ल' बेलाऊल ' दाक्षिणात्य वेलाकूल-दक्षिणसमुद्रतटम् , तत्र पडुमहुर' पाण्डुमथुरा नगरी ' णिवेसतु' निवेशयन्तु, ममादृष्टसेका भवन्तु, उन्होंने आराम किया। इतने में कृष्ण वासुदेव ने जघ चे चि प्राम कर चुकीं उन से पूछा-कहिये भुआ जी ! किस प्रयोजन को लेकर यहां आपका आगमन हुआ है तर कुनी ने कृष्ण वासुदेव से इस प्रकार कहा हे पुत्र । आने का प्रयोजन इस प्रकार है-तुमने जो पाचों पाडवों को अपने देश से बाहिर निकल जाने की आजादी है-सो इम विषय में यह पूछना है कि तुम तो दक्षिणार्ध भरत के अधिपति हो अत हमें समझाइये कौनसी दिशा व विदिशा में जायें ? इस प्रकार कुतीदेवीके मुखसे सुनकर कृष्ण वासुदेव ने उससे ऐसा कहा-हे भुआ जी-उत्तम पुरुप, वासुदेव, बलदेव, एव चक्रवर्ती ये सब अपूतिवचन वाले होते हैं-जो कुछ करते हैं वह एक ही यार कहते हैं-उसमें परिवर्तन नहीं होता है इसलिये हे देवानुपिय! पाचों पांडव दक्षिणसमुद्र पर जावे और वहा पाँटु मयुरा नगरी को घसायें-स्थापित करें और मेरे अदृष्ट सेवक માટે તેમણે સુખાકાન ઉપર આરામ કર્યો ત્યારે તેને સારી રીતે વિશ્રામ ચૂકયા ત્યારે તેમને કૃgવાસુદેવે પૂછ્યું કે-બેલે, ફઈબા, શા કારણથી તમે અહીં પધાર્યા છે ત્યારે કુતોએ કૃષ્ણવ સુદેવને આ પ્રમાણે કહ્યું કે હે છે ! હું એટલા માટે આવી છુ કે તમે પાચે પાડવોને પિતાના દેશમાંથી બહાર નીકળી જવાની આજ્ઞા કરી છે તે આ વિશે મારે આ વાતનું પછી જ કરવું છે કે તમે તે દક્ષિણાઈ ભરતના અધિપતિ છે, તે આવી પરિ સ્થિતિમાં તમે જ અમને બતા કે તેઓ કઈ દિશા કે વિદિશા તરફ જાય? આ પ્રમાણે કુતી દેવીના મુખથી બધી વાત સાંભળીને કૃષ્ણવાસુદેવે તેમને આ પ્રમાણે કહ્યું કે હે ઈબા! વાસુદેવ, બળદેવ અને ચક્રવતી આ બધા ઉત્તમ પુરૂ પતિ વચન વાળા હોય છે તેઓ જે કઈ પણ કહે છે તે એકજ કર કહે છે તેમાં કઈ પણ જાતનો ફેરફાર થઈ શકતો નથી એટલા માટે કે દેવાધિયે પચે પાડે દક્ષિણ સમુદ્ર તરફ જાય અને ત્યા પાડુ મથુરા ? કરી 710.
५६० माताजपा यथा अधः, यथापूर्व द्वारपतीमागता तयाऽत्रापि वो यम् यापन सदिशन्तु-अत्र यावदित्यनेनैव योभ्यम्-द्वारसती नगरीमागत्य कणेन गत्यता स्नाता कृतमोजना मुग्यासनवरगताऽभवत् इति, ततस्ता कृष्ण पृति सदिशन्तु अययन्तु खलु हे पडणा व युत्ता ममाणी, हस्थिय दुरूप, दुरहित्ता जा रहा जाय सदिसतु ण पिउत्था। फिमागमणपोयण ? तण्ण सा कोती कण्ह घासुदेव एच वयासी-एव पल पुत्ता ! तुमे पच पहया णिविसया आणत्ता, तुम च ण दारिणशभरह जार विदिम वो गच्छतु ' ताण से कण्हे वासुदेवे कोंतीदे िण्व चयामी अपूर्व वयणा ण पिउत्या ! उत्तम पुरिसा वासुदेवा, पलदेवा, चकटी त गच्छतु ण देवाणुपिया। पच पडवा दाहिणिल्ल वेराउल तत्व पटुमर णिवेसतु मम अदिवसेवगा भवतु त्ति कटु कोंतीदर्षि सरिड, सम्माणेइ, जार पडिपिसज्जेइ ) पाडु के द्वारा इस प्रकार कही गई वह देवी हाथी पर चढी और चढ़ कर जिस प्रकार पहिले यह दारवती आई थी उसी तरह अथ भी यह वरा पहुंची। यहा यावत् शब्द से इस प्रकार पाठका सबन्ध लगा लेना चाहिये-जब कुनी द्वारावती नगरी में आई-तप कृष्ण वासुदेवने उनका खूब मनमाना सत्कार कियो। घडे ठाट घाट से उनका प्रवेशोत्सव मनाया- कुतीने स्नान आदि दैनिक कार्यों से निवट कर मानद के साप चतुर्विध आहार किया बाद में विश्राम के निमित्त सुग्वासन पर (तएण सा कोंती पडुणा एव वुत्ता समाणि, इस्थिखध दुरुहड़, दुरूपित्ता जहा हेहा जाव सदिसतु ण पिउत्था। स्मिोगमणपोयण ? तरण सा कौती कण्ह वासुदेव एव क्यासी-एव खल्लु पुत्ता ! तुमे पच पडवा णिधिसया आणत्ता, तुम च ण दाहिणड भरह जाव विदिस वा गच्छतु ? तएण से कण्हे वासुदेवे कोंती देवि एव चयासी-अपूई वयणा ण पिउत्था उत्तमपुरिसा देवा, बलदेवा, चक्कवट्ठी त गच्छतु ण देवाणुप्पिया! पच पडवा दाहिणिल वेलाउल तत्थ पडुमहुर णिवेसतु मम अदिद्रुसेनगा भवतु त्ति कटु कौती देवि सकारे, सम्माणेइ, जार पडिविसज्जेइ) આ પ્રમાણે પાડું વડે આજ્ઞાપિત થયેલી કુતી દેવી હાથી ઉપર સવાર થઈ અને સવાર થઈને પહેલા જેમ તે દ્વારાવતી નગરી ગઈ હતી તેમજ અત્યારે પણ પહેચી અહી યાવત્ શબ્દથી આ જાતને પાઠ સમજ જોઈએ કે જ્યારે કુતી દ્વારાવતી નગરીમાં આવી ત્યારે કૃષ્ણ વાસુદેવે તેમને ખૂબ જ સત્કાર કર્યો બહુ જ ઠાઠથી તેમને પ્રવેશ સવ ઉજજે કુતીએ પણ સ્નાન વગેરે નિત્યકમોથી પરવારીને સુખેથી ચતુવિધ આહાર કર્યો વિશ્રામ
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- पाताधर्मकपानसरे इति कृत्वा पुन्ती देवी सत्तारयति समानयति, सत्कार्य, समान्य यावद् विसर्ज यति । ततः खलु सा कुन्ती देवी हस्तिन ममारन हस्तिनापुरमागता यावत् पाण्डो राश एतमर्थ निषेदयति । ततः सलु पागा प पाण्डवान् शब्दयवि शब्द- यित्वा एपमयादीत-गच्छन खलु यूय हे पुत्रा'! 'दाहिणिल्ट चेलाऊल' दाक्षि णात्यवेलाकूल-दक्षिणसमुद्रतट, ना सल यूय पातमधुरा नगरी निवेशयत । होकर रहें । इस प्रकार पाकर उनों ने कुतीदेवी का सत्कार किया सन्मान किया। सत्कार सन्मान करके फिर उमें अपने यहा से विदा दिया । (ताण मा कोंती देवी जाच पटुस्स एयमह निवेदेड, तगण पट्ट पच पडवे सद्दावेद, सदायित्ता पंचयामी-गाह ण तुम्भे पुत्ता' दाहि. णिल्ल वेलावल तत्यण तुरभे पदुमहरणिवेसेर ताण पच पडा पहुस्स रपणो जाय तरत्ति पडिसुणेति, सबल धारणाय गज स्थिणाउराओ पडिणिक्खमति,पडिणिवमित्ताजेणेचदपिणिल्ले वेयाली तेणेव उवा- गच्छइ, उवागरिउत्ता पटुमसर नगरि णिवेसेंति, निवेसित्ता तत्थ ण ते विउलभोगसमितिसमपणागया याविरोत्था) वहा से हाथी के ऊपर बैठ कर कुतीदेवी हस्तिनापुर में आगई, यापत पाडुराजासे कृष्णवासुदेव के कथितआदेश को उन्हो ने सुना दिया। इसके पाद पाडु राजा ने पांचों पाडवों को बुलाया और बुलाकर उनसे इस प्रकार कहो-हे पुत्रों-तुम या से दक्षिण दिग्वी समद्र तट पर जाओ और वहा पाडु मथुरा નગરીને વસાવે અને મારા અદષ્ટ સેવ થઈને ત્યાં નિવાસ કરે આ પ્રમાણે કહીને તેમણે કુતી દેવીને સત્કાર કર્યો અને સન્માન કર્યું સરકાર તેમજ સન્માન કરીને તેમણે કુ તીદેવીને ત્યાથી વિદાય કર્યા (तएण सा कौती देवी जाप पद्धस्स एयम निवेदेड, तएण पडू पच पडवे सद्दावेइ, सहाविता एर धयासी-गच्छह ण तुम्भे पुत्ता ! दाहिणिल्ल बेलाऊल तत्यण तुम्भे पडुमहुर णिवे सेह तएण पर पडया पद्धस्स रणो जार तहत्ति पडि सुर्णेति, सबलवाणा हय गय० हथिणाउराभो पडिणिक्खमति, पडिणिक्खमित्ता जेणेव दविश्वणिल्ले वेयाली तेणे उगच्छइ, उपगचित्ता पडुमहुर. णिवेसे ति निसित्ता, तत्यण ते विउलभोगसमितिसमण्णागया यार होत्या) ત્યાથી હાથી ઉપર સવાર થઈને કુતીદેવી હસ્તિનાપુર આવી ગયા યાવત કૃષ્ણ વાસુદેવની જે કઈ આજ્ઞા હતી તે પાડુ રાજાને કહી સંભળાવી ત્યારપછી પાડુ રાજાએ પાચે પાડાને બોલાવ્યા અને બોલાવીને તેમને આ પ્રમાણે કહ્યું કે હે ! તમે અહીંથી દક્ષિણ દિશા તરફના સમુદ્રના કિનારા ઉપર જાઓ અને ત્યાં પાડુ-મથુરા નગરીને વસાએ પિતા પાડુ ૨ नगरि -આ પ્રમાણે - मनिगारधर्मामृतषिणी टोका अ० १६ द्रौपदीचरितनिरूपणम् तत खलु पञ्च पाण्डवाः पाण्डो रातो वचन यावत्-' तहचि तथाऽस्तु' इति कृत्या मतियन्ति = स्वीकुर्वन्ति, पतिथुत्य सबलवाहनाः-सैन्ययानसहिताः, हयगजरवपदातिसपरिहताः, हस्तिनापुरात् प्रतिनिप्फ्रामन्ति, प्रनिनिष्क्रम्य यत्रैव ' दाहिगिल्लं वेलाऊल ' दाक्षिणात्य वेलाकल तत्रैवोपागच्छन्ति, उपागत्य पाण्डुमधुरा नगरी निवेशयन्ति निवेश्य तत्र खलु ते पिपुलभोगममिति ममत्वा- गवावाप्यभरन् ।। सू०३२ ।। मूलम्-तएणं सा दोवई देवी अन्नया कयाइ आवण्णतत्ता जाया यावि होत्था, तएण सा दोवई देवो णवण्हं मासाणं जाव सुरूव दारगं पयाया सूमालणिवत्तवारसाहस्त इमं एयारूव गुणनिप्फन्न नामधिज्ज करेति जम्हाण अम्हं एस दारए पचण्ह पडवाणं पुत्ते दोवईए अत्तए त होउ अम्हं इमस्स दारगस्त णमधेज्ज पडुसेणे, तएणं तस्स दारगस्स अम्मापियरो णामधेज करेंति पडुसेणत्ति, वावत्तरि कलाओ जाव भोगसमत्थे जाए जुवराया जाव विहरइ, थेरा समो- सढा परिसा निग्गया पडवा निग्गया धम्म सोच्चा एव ज णवर देवाणुप्पिया । दोवइ देवि आपुच्छामो पडुसेण च नगरी को बसाओ। पिता पाडु राजा की इस आज्ञा को उन पाचों पाडवो ने "तत्ति" कहकर स्वीकार कर लिया। स्वीकार करके फिर वे हय, गज, रथ, एव पदातिरूप चतुरगिणी सेना से परिवृत होकर हस्तिनापुर नगर से निकले और निकलकर जहा दाक्षिणात्य वेलोकूल था वहां आये-वहाँ आकर उन्हो ने पाडु मयुरा नगरी को वसाया। साकर वहा के विपुल भोगों को भोगते हुए रहने लगे। सू०३२ ॥ આજ્ઞાને તે પાચે પાએ “તહતિ ” કહીને સ્વીકારી લીધી સ્વીકાર કરીને તેઓ ઘોડા, હાથી, રથ અને પાયદળવાળી ચતુરસિ સેનાની સાથે હનિના પુર નગરથી બહાર નીકળ્યા-અને નીકળીને જ્યાં દક્ષિણ દિશાને સમુદ્રને કિનારો હતા ત્યાં પહોંચ્યા, ત્યાં પહોંચીને તેમણે પાડુ-મથુરા નગરી વસાવી વસાવીને તેઓ ત્યાં પુષ્કળ કામગ ભોગવતા રહેવા લાગ્યા છેસૂત્ર ૩૨ ताधर्मकार इति कृत्या पुन्ती देवी सत्तारगति संमानयति, सवार्य, संमान्य यावद् विमर्ज यति । ततः खलु सा कुन्ती देवी हस्तिन गमारा हस्तिनापुरमागता यावत् पाण्डो राश एतमर्थ निवेदयति । ततः सलु पारगमा पञ्च पाण्डवान् शन्द्रयति शब्द- यित्वा एवमवाटीत-गच्छा पल यूय हे पुनः! 'दाहिणिल्ल वेलाऊल' दाक्षि णात्यवेलाकूल-दक्षिणसमुद्रतट, ना खलु यूर पाण्ठमधुरा नगरी निवेशयत । होकर रहें । इस प्रकार पाकर उगों ने फुनीदेवी का सत्कार किया सन्मान किया । सत्कार सन्मान करके फिर ने अपने यहा से विदा दिया। (तपण सा कोंती देवी जान पस्स एयम निवेदेड, ताण पडू पच पडवे सद्दावेइ, महावित्ता वंचयामी-गाणं तुम्भे पुत्ता! दाहि- जिल्ल वेलाउल तत्थण तुन्भे पटुमसर णिवेसेट ताणं पच पडवा पड्डुस्स रणो जाव तहत्ति परिसुणेति, सपर वारणास्य गजल इविणाराओ पडिणिक्रवमति,पडिणिग्नमित्ताजेणेव दक्मिणिल्ले वेयाली तेणेव उवा गच्छइ, उधागचित्ता पटुमधुर नगरि णिवेसेंति, निवेसित्ता तस्य ण ते विउलभोगसमितिसमण्णागया याचि होत्या) वहा से हाथी के ऊपर बैठ कर कुतीदेवी हस्तिनापुर में आगई, यावत पाराजासे कृष्णवासुदेव के कथितआदेश को उन्हों ने सुना दिया। इसके पाद पाई राजा ने पांचों पाडवों को बुलाया और बुलाकर उनसे इस प्रकार कहाँ-हे पुत्रों-तुम यहा से दक्षिण दिग्वी सात तट पर जाओ और वहा पाडु मधुरो નગરીને વસાવે અને મારા અદા સેવકે થઇને ત્યાં નિવાસ કરે આ પ્રમાણે કહીને તેમણે કુતી દેવીને સત્કાર કર્યો અને સન્માન કર્યું સત્કાર તેમજ સન્માન કરીને તેમણે કુતીદેવીને ત્યાંથી વિદાય કર્યો (तएण सा कोती देवी जाव पदुस्स एयम निवेदेड, तएण पडू पच पडवे सदावेइ, सदावित्ता एर वयासी-गच्छह ण तुम्भे पुत्ता ! दाहिणिल्ल वेलाऊल तत्यण तुम्भे पडुमहुर णिवेसेह तएण पच पडया पहुस्स रणो जार तहत्ति पडि सुगंति, सबलवाइणा हय गय० हथिणाराो पडिणिस्खमति, पडिणिक्खमित्ता जेणेव दश्विणिले वेयाली तेणेव आगच्छा, आगच्छित्ता पडुमहुर नगरि णिवेसे ति निवेसित्ता, तत्यण ते विलभोगसमितिसमण्णागया याचि होत्या) ત્યાથી હાથી ઉપર સવાર થઈને કુતીદેવી હસ્તિનાપુર આવી ગયા યાવત કૃષ્ણ વાસુદેવની જે કઈ આજ્ઞા હતી તે પાડુ રાજાને કહી સંભળાવી ત્યારપછી પાડું રાજાએ પાચે પાડવેને લાવ્યા અને બોલાવીને તેમને આ પ્રમાણે કહ્યું કે હે પુત્રે 1 તમે અહીંથી દક્ષિણ દિશા તરફના સમુદ્રના કિનારા ઉપર જાઓ અને તેના પાડુ-મથુરા નગરીને વસાઓ પિતા પાડુ ૨ क . . -मा प्रभाव . ममगारधर्मामृतषिणी टी० ० १६ द्रौपदीचरितनिरूपणम् ५६५ टोका-'तएण सा' इत्यादि । ततः सलु सा द्रौपदीदेवी अन्यदा कदा चित् 'आवण्णसत्ता' आपन्नसचा गर्भरती जाता चाप्यभवत् । ततः खलु सा द्वौपदीदेवी नवसु मासेषु संपूर्णपु सार्धाष्टमदिवसेषु व्यतिक्रान्तेषु सत्सु यावत् सुरूप मन्दर दारकचालक 'पयाया' प्रजाताम्मनितवतो, कि भृत दारक- सूमाल-सुकुमारपाणिपाद, 'णिव्यत्तवारसाहस्स ' निर्वृत्तद्वादशाहस्स-समाप्त द्वादशदिवसस्य दारकस्य इदमेतद्रूप गुगनिष्पन्न नामधेय कुर्वन्ति यस्मात् खलु अस्माकमेप दारकः पञ्चानां पाण्डवाना पुत्रो द्रौपद्या आत्मनः, 'तु' तत्-तस्माद् तण्ण सा दोबई देवी इत्यादि। टीकार्थ-(तएण) इसके योद (सादोवई देवी) वह द्रौपदीदेवी (अन्नया कयाइ ) किसी एक समय (आवण्णसत्ता जाया यावि होत्या) गर्भा- वस्थासे सपन्न हुई। (तएण सा दोवई देवी णवण्ह मासाण जाव सुरुव दारगं पयाया) जप गर्भ ९ नौमास ७|| दिन का हो गया तर उस द्रौपदी देवी ने पुत्र को जन्म दिया। यह बालक बहुत ही अधिक सुन्दर था । ( सूमालणिवत्तयारसाहस्सइम एयारूव गुणनिष्फन्न नामधिज्ज करेति जम्हाण अम्हं एस दारए पचण्ड पडवाण पुत्ते दोवईए अत्तए त होउ अम्दं इमस्स दारगस्स णामवेज्ज पडुसेणे) इसके करच. रण आदि अवयव सब हो अधिक सुकुमार थे। जब यारहवां दिन लगा -तय माता पिताओ ने इस पुत्र का गुणनिष्पन्न होने से यह नाम रक्खा यस्मात्-यह पुत्र हम पाचो पाडवो का है तथा द्रौपदी की कुक्षि से तएण सा दोबई देवी इत्यादि- A-(तरण) त्या२५छ। (सा दोवई देवी) द्रोपही हेवी (अन्नया कयाइ) 5 मते (भावण्णसत्ता जाया यायि होत्या) समक्षा / (तएण सा दोवई देवी णवण्ह मासाण जाय सुरूव दारग पयाया ) न्यारे मन માસ દિવસને થઈ ગયે ત્યારે તે દ્રૌપદી દેવીએ પુત્રને જન્મ આપે, તે બાળક ખૂબ જ સુન્દર હતુ (सूमालणिव्यत्तवारसाहस्स इम एयारूव गुणनिप्फन्न नामधिज्ज करेंति, जम्हाण अम्ह एसदारए पचण्ह पडवाणं पुत्ते दोनईए अत्तए त होउ अम्ह इमस्स दारगस्स णामधेज्जे पडसेणे) તેના હાથ પગ વગેરે બધા અવયવે ખૂબ જ સુકોમળ હતા જ્યારે બારમે દિવસ આવ્યો ત્યારે માતા-પિતાએ તે પુત્રનું નામ તેના ગુણે વિષે વિચાર કરતા આ પ્રમાણે રાખ્યું કે આ પુત્ર અમર પાસે પાડવેનો છે, प्रांताधर्मकथाङ्ग कुमार रज्जे ठावेमो तओ पच्छा देवाणुप्पिया! अतिए मुडे भवित्ता जाव पव्वयामो, अहासुहं देवाणुप्पिया।, तएणं ते पंच पंडवा जेणेव सए गिहे तेणेव उवागच्छइ उवाग- च्छित्ता दोवइ देवि सदाति सदावित्ता एवं वयासी-एवं खल्लु देवाणुप्पिया । अम्हेहिं थेराणं आंतिए धम्मे णिसंते जाव पव्वयामो तुमं देवाणुप्पिए ! कि करेसि ?, तएण सा दोवई देवी ते पंच पडवे एव वयासी-जइणं तुम्भे देवाणु- पिया । ससारभउबिग्गा पव्वयह मम के अपणे आलवे वा जाव भविस्सइ १, अहपि य णं संसारभउब्बिग्गा देवा- णुप्पिएहि सद्धिं पव्वइस्सामि, तएण ते पच पडवा पडुसे- णस्स अभिसेओ राया जाए जाव रज्जे पसाहेमाणे विहरइ, तएण ते पच पडवा दोवई य देवी अन्नया कयाइ पडुसेणं रायाण आपुच्छति, तएण से पडुसेण रायाकोडुवियपुरिसे सदावेइ सदावित्ता एव वयासी-खिप्पामेव भो । देवाणु- प्पिया । निक्खमणाभिलेय जाव उवटवेह पुरिससहस्सवाहि- णीओ सिवियाओजाव पच्चोरुहति पच्चोरुहिता जेणेव थेरा तेणेव० आलित्तेणं जाव समणा जाया चौदस्त पुवाइ अहि- ज्जंति अहिज्जित्ता वहूणि वासाणि छठुटुमदसमदुवालसेहिं मासद्धमासखमणेहि अप्पाण भावेमाणा . २॥
- ममगारधर्मामृतयषिणी टी० १० १६ द्रौपदीचरितनिरूपणम् टीका-'तएणं सा' इत्यादि । ततः खलु सा द्रौपदीदेवी अन्यदा कदा चित् ' आवण्यसत्ता' आपन्नसचा गर्भरती जाता चाप्यभवत् । ततः खलु सा द्वौपदीदेवी नवम् मासेपु सपूर्णेपु सार्धाष्टमदिवसेपु व्यतिक्रान्तेषु सत्सु यावत् सुरूप सुन्दर दारकचालकं 'पयाया' प्रजाताममनितवनी, कि भूत दारक- समाल-सुकुमारपाणिपाद, । णिवत्तवारसाहस्स , नित्तद्वादशाहस्स-समाप्त द्वादशदिवसस्य दारकस्य इदमेतद्प गुगनिप्पन्न नामधेयं कुर्वन्ति यस्मात् खलु अस्माकमेष दारकः पञ्चाना पाण्डवाना पुत्रो द्रौपद्या आत्मन', 'त' तत्-तस्माद् -तएण सा दोवई देवी इत्यादि । टीकार्थ-(तएण) इसके बाद (सादोवई देवी) वह द्रौपदीदेवी (अन्नया कयाइ ) किसी एक समय (आवण्णसत्ता जाया याविहोत्या) गर्भा- वस्थासे सपन्न हुई । (तएणं सा दोबई देवी णवह मासाण जाव सुरूव दारग पयाया) जय गर्भ ९ नौमास ७॥ दिन का हो गया तर उस द्रौपदी देवी ने पुत्र को जन्म दिया । यह बालक यहुन ही अधिक सुन्दर था । ( सूमालणिवत्तारसाहस्सइम एयास्व गुणनिप्फन्नं नामधिज्ज करेति जम्हाण अम्हं एस दारए पचण्डं पडवाण पुत्ते दोवईए अत्तए त होउ अम्हं उमस्स दारगस्स णामवेज्ज पडुसेणे) इमके करच. रण आदि अवयव सघ ही अधिक सुकुमार थे। जब पारस्वां दिन लगा -तय माता पिताओ ने इस पुत्र का गुणनिष्पन्न होने से यह नाम रक्खा यस्मात्-यह पुत्र हम पाचो पाडवो का है तथा द्रौपदी की कुक्षि से तएण सा दोबई देवी इत्यादि- साथ-(तएण) त्या२५छ। (सा दोवई देवी) द्रोपटी वी (अन्नया कयाइ) ३६ मे १मते (भाषण्णसत्ता जाया यायि होत्या) समा थ/ (तएण सा दोवई देवी णवण्ह मासाण जाव सुरूव दारग पयाया ) न्यारे नप માસ દિવસને થઈ ગયે ત્યારે તે દ્રૌપદી દેવીએ પુત્રને જન્મ આપે, તે બાળક ખૂબ જ સુર હતુ (सूमालणिन्यत्तरारसाहस्स इम एयारुव गुणनिष्फन्न नामधिज्ज करेंति, जम्हाण अम्ह एसदारए पचण्ह पडवाण पुत्ते दोनईए अत्तए त होड अम्ह इमस्स दारगस्स णामधेज्जे पडुसेणे) તેના હાથ પગ વગેરે બધા અવયે ખૂબ જ સુકોમળ હતા જ્યારે બારમે દિવસ આવે ત્યારે માતા-પિતાએ તે પુત્રનું નામ તેના ગુણે વિષે વિચાર કરતા આ પ્રમાણે રાખ્યું કે આ પુત્ર અમારા પા પાડે છે, ५६४ जातामकथा कुमार रज्जे ठावेमो तओ पच्छा देवाणुप्पिया! अतिए मुंडे भवित्ता जाव पव्वयामो, अहासुह देवाणुप्पिया, तएणं ते पंच पडवा जेणेव सए गिहे तेणेव उवागच्छद उवाग- च्छित्ता दोवई देविं सदावेति सदावित्ता एवं वयासी-एवं खल्ल देवाणुप्पिया । अम्हेहि थेराणं अतिए धम्मे णिसंते जाव पव्वयामो तुम देवाणुप्पिए । कि करेसि ?, तएण सा दोवई देवो ते पंच पडवे एवं वयासी-जइणं तुम्भे देवाणु- पिया | ससारभउब्बिग्गा पव्वयह मम के अपणे आलवे वा जाव भविस्सइ १, अहपि य णं संसारभउब्बिग्गा देवा- णुप्पिएहिं सद्धि पव्वइस्सामि, तएण ते पच पडवा पडसे- णस्स अभिसेओ राया जाए जाव रज्जे पसाहेमाणे विहरइ, तएण ते पच पडवा दोबई य देवी अन्नया कयाइ पडुसेणं. रायाण आपुच्छंति, तएण से पंडुसेण रायाकोडुवियपुरिसे सदावेइ सदावित्ता एव वयासी-खिप्पामेव भो । देवाणु- प्पिया । निक्खमणाभिलेय जाव उवटवेह पुरिससहस्सवाहि- णीओ सिवियाओ जाव पच्चोरुहति पच्चोरुहिता जेणेव थेरा तेणेव० आलित्ते णं जाव समणा जाया चोदस्स पुवाइ अहि- ज्जति अहिज्जित्ता वहूणि वासाणि छट्टटुमदसमदुवालसेहि मासद्धमासखमणेहिं अप्पाण भावमाणा 0 ५६७ मनगारधर्मामृतयदिणी टी० १० १६ द्रौपदीचरितनिरूपणम अथ कदाचित् दर-थेरा समोसड़ा' स्वनिगः समरसताः, परिसगिता, पाण्डमा अपि स्वपिराणा चन्दनार्थ निर्गताः, धर्म श्रुबा ते पाण्डको प्रतिमुद्रा. सन्त एउमदन्-यत् नार हे देशानुप्रिया. द्रौपदी देवीमान्छामः, पाण्डुमेन च कुमार राज्ये स्थापयाम , ततः पश्चात् देवानुप्रियाणामन्ति के मुण्डाभुत्ला यावत् पाजामः प्रज्या गृहीम., तदा स्थविरा ऊचुः-' अढासुह देशानुप्पिया । 'हे देवानुमिया यथामुख सुख यया भवति तया कुरत, अल विलम्चेन इति भाव । तत खलु ते पञ्च पाण्डा यौव स्पक गृह तवापागच्छन्ति, उपागत्य द्रौपदी देवी शब्दयन्ति, शब्दयित्वा, एमपदन्-एव खलु हे दवानुप्रिये ! वय स्थविरा- व्यतीत करने लगा। एक समय की बात है कि पाहु मयुरा नगरी में स्थविरो का आगमन मुआ। विरों का आगमन सुनक नगरी का समस्त जन उनकी वदना एव धर्मोपदेश सुनने के निमित्त अपने २ घर से निकले पाचों पाडव भी निकले- परिपट को आयी हुई देवकर स्थविरों ने उसे धर्म का उपदेश दिया। उपदेश श्रवण कर परिपद पीछे चली गई। पांडव लोग उस धर्म के उपदेश का पानकर प्रतियोध से प्राप्त हो गये-उसी समय उन्हों ने उन स्थविरों से कहा-हे देवानुप्रियो । हमलोग द्रौपदी देवी को पूछकर और पाडुसेन कुमार को राज्य में स्था पित कर आप देवानुप्रियो के समीपमुडित होकर यावत् प्रव्रज्या अगी कार करना चाहते हैं। पांडवो की इस प्रकार हार्दिक भारना देखकर उन स्थविरों ने पाडयो से इम प्रकार कहा-(अहासुर देवाणुप्पिया। तएण ते पच पडवा जेणेव मागिहे, तेणेघ उघागच्छह, उवागघिउत्ता दोवइ देवि सद्दावेति, सदायित्ता एव चयासी एवं ग्वलु देव गुप्पिया! વિરે પધાર્યા વિના આગમનની જાણ થતા નગરીના બધા લેકે તેમની વદના તેમજ તેમની પાસેથી ધર્મોપદેશ સાંભળવા માટે પોતપોતાના ઘરથી નિકળ્યા, પા પાડે પણ ત્યા પહેઓ પરિષદને આવેલી જેઈને સ્થવિરાએ ધર્મનો ઉપદેશ આપે ઉપદેશ સાંભળીને પરિષદ જતી રહી પાડો ધર્મને ઉપદેશ સાંભળીને પ્રતિબંધિત થઈ ગયા તેમણે તે જ સમયે સ્થવિ રોને વિનતી કરતા કહ્યું કે હે દેવાનુપ્રિયે ! અમે દ્રૌપદી દેવીને પૂછી તેમજ પાડુબેન કુમારને રાજ્યાસને અભિષિક્ત કરીને તમારી પાસે મુડિત થઈને યાત પ્રત્રજના ગ્રહણ કરવાની અભિવાષા રાખીએ છીએ પાડવાની આ જાતની હાર્દિક ઈરછા જાણીને તે સ્થવિરાએ તે પાચે પાડાને આ પ્રમાણે કહ્યું કે- (अहासुह देवाणुप्पिया ! तएण ते पच पडवा जेणे सए गिहे, तेणे उनागद, उवागच्छित्ता दोबइ देवि सदाति, सदानिता एवं बयासी, एवं - . भाताया पतु अस्माकमस्य दारफम्य नामय 'पाण्डमेन' इति । ततः खलु तम्प दार स्याम्पारितरी नामधेय कुन्नि-पाण्डुसेन ' इति । 'यारत्तरि कलायो' दाम पति कला शिक्षिताः, यारद मोगममों नातः, राजकन्या परिणीय युवराजो यारत् मानुष्य फान् भोगान् गुनानो विहरति-ओन्ते । उत्पन्न हुआ है-अतः हमारे इम पुत्र का नाम पाटुसेन होना चाहिये (तरण तस्स दारगस्स अम्मापियरो नामधेज फरेंनि पडसेणत्ति) इस ख्याल से उनों ने उस नवजात पुन का नाम पडिसेन रग्ब दिया। (पावत्तरि वलाओ जाय भोगममत्ये जाग जुवराया जाव विहरइ थेरा समोसढा, परिसो निग्गया, पहचा निग्गया, धम्म मोच्चा एव वयासी ज णवर देवानुप्पिया ! दोष देवि आपुच्छामो पटुसेणं च कुमार रज्जे ठावेमो तओ पच्छा देवानुप्पिया! अतिए मुढे भवित्ता जाव पव्वधामो) पाडुसेन कुमार को ७२ कलाओं में निपुण पनाने के लिये माता पिताने उसे कलाचार्य के पास भेज दिया। धीरे २ बर ७२, कलाओं में निष्णात यन गया । यावत् भोग भोगने के लायक अवस्था सपन्न भी शे गया। राजकन्याओं के साथ इसका वैवाहिक समन्ध कर के पिताओं ने इसे युवराज पद प्रदान भी कर दिया-यावत् यह मनुष्यभव सबन्धी काम सुरखो से अनुभव करता हुआ अपने समय को आनन्द के साथ તેમજ દ્રૌપદી દેવીને ગભ થી તેને જન્મ થ છે, એટલા માટે અમારા આ પુત્રનું નામ પાંડુસેન લેવું જોઈએ (तएण तस्म दारगस्स अम्मापियरो नामधेज करेंति पडुसेणत्ति) આ વિચારથી તેમણે તે નવજાન પુત્રનું નામ પાડુસેન રાખ્યું ( वापत्तरि कलाओ जाव भोगसमत्थे नाए जुराया जाय विहरइ, थेरा समोमढा, परिसा निग्गया, पडवा निग्गया धम्म सोचा एव चयासी ज णवर देनानुपिया ! दोयइ देवि आपुन्छामो पडुसेण च कुमार रज्जे ठावेमो तओपच्छा देवाणुप्पिया। अतिए मुडे भवित्ता जार पचयामो) પાડુનેન કુમારને ૭૨ કળાઓમાં નિપુણ બનાવવા માટે માતાપિતાઓએ કલાચાર્યની પાસે એક આમ ધીમે ધીમે તે ૭૨ કળાએ મા નિષ્ણાત બની તે સ સારના ભેગો ભોગવવા યોગ્ય અવસ્થાવાળા પણ થઈ ગયો છે રાજકન્યાઓની સાથે લ કરાવીને પિતાએ તેને યુવરાજ પ પણ છે, દીધુ યાવત્ તે મનુષ્ય-ભવ સબધી કામસુખને અનુભવને પિતાના વખતને સુખેથી પસાર કરવા લાગે એક વખતની વાત છે કે પાડુ-મગરા નગરીમા ગયે વાવતું ५६७ . मनगारधर्मामृतपिणीटी० १० १६ द्रौपदीचरिततिष्पणम अथ कदाचित् दन-'येरा समोसड़ा' स्थविराः समवस्ताः, परिपनिर्गता, पाण्डया अपि स्थपिराणा चन्दनार्थ निर्गताः, धर्म श्रुबा ते पाण्डमा प्रतिमुद्राः सन्त एवमदन्-यत् नबर है देवानुप्रियाः द्रौपदी देवीमापृच्छामः, पाण्टुमेन च कुमार राज्ये स्थापयाम , ततः पश्चात् देवानुमियाणामन्ति के मुण्डाभूत्वा यावत् भवनामः प्रमज्या गृहीमः, तना स्थविरा ऊचुः-'अहासुह देशानुप्पिया 'हे देवानुप्रिया यथासुख-एस यया भवनि तया कुरुत, अल विलम्चेन इति भाव । तत खलु ते पश्च पाण्डा यौन स्त्रक गृह तत्रैवापागच्छन्ति, उपागत्य द्रौपदी देवीं शब्दयन्ति, शब्दचित्वा, एमपदन्-एव खलु हे देवानुपिरे ! वयं स्थपिरा- व्यतीत करने लगा। एक समय की बात है कि पाडु मयुरा नगरी में स्थावरो का आगमन मुआ। विरों का आगमन सुनक नगरी का समस्त जन उनकी चदना एव धर्मोपदेश सुनने के निमित्त अपने २ घर से निकले पाचों पाडव भी निकले- परिपट को आयी हई देवकर स्थविरो ने उसे वर्म का उपदेश दिया। उपदेश श्रवण कर परिपन पीछे चली गई। पाडव लोग उस धर्म के उपदेश का पानर प्रतियोचो प्राप्त हो गये-उसी समय उन्हों ने उन स्थदिरों से कहा-हे देवानुप्रियो ! हमलोग द्रौपदी देवी को पूछकर और पाड्डुसेन कुमार को राज्य में स्था पित कर आप देवानुप्रियों के समीपमुडित होकर यारत् प्रव्रज्या अगी- कार करना चाहते हैं। पांडवो की इस प्रकार हार्दिक भावना देखकर उन स्थविरों ने पाडवो से इस प्रकार करा-(अहासुर देवाणुपिया। तएण ते पच पडवा जेणे मागिहे, तेणेच उवागच्छइ, उवागच्छित्ता दोवड देविं सहाति, सहावित्ता एव वासी एवं खलु देव णुप्पिया! વિરે પધાર્યા સ્વવિરોના આગમનની જાણ થતા નગરીના બધા લોકો તેમની વદના તેમજ તેમની પાસેથી ધર્મોપદેશ સાંભળવા માટે પોતપોતાના ઘરથી નિકળ્યા, પા પાડવે પણ ત્યાં પહોચ્યા પરિષદને આવી જઈને વિરોએ ધર્મનો ઉપદેશ આપે ઉપદેશ સાભળીને પરિષદ જતી રહી પાડો ને ધમને ઉપદેશ સાંભળીને પ્રતિબોધિત થઈ ગયા તેમણે તે જ સમયે સ્થવિ રેને વિનતી કરતા કહ્યું કે હે દેવાનુપ્રિયે ! અમે દ્રૌપદી દેવીને પૂછી તેમજ પાડુનેન કુમારને રાજ્યસને અભિષિક્ત કરીને તમારી પાસે મુ ડિત થઈને થાવત્ પ્રવ્રજ ગ્રહણ કરવાની અભિવાયા રાખીએ છીએ પાડની આ જાતની હાર્દિક ઈચ્છા જાણીને તે સ્થવિરાએ તે પાચે પાડેને આ પ્રમાણે કહ્યું કે- ( अहासुह देवाणुप्पिया ! तएण ते पच पडवा जेणेर सए गिहे, तेणे आगन्छ, उवागच्छित्ता दोवइ देवि सद्दावि, सहापिचा एव वयासी, एव पाताधर्मकथा णामन्तिके धर्म श्रुतयन्तो यावत् प्रनमामः, व हे देवानुप्रिये । किं करोषि किं करिष्यमि ? | ततः खलु सा द्रौपदी तान् पत्र पाण्डगन् एमवादीन-यदि ग्वल यूय हे देवानुमियाः । समारभयोनिग्नाः जन्ममरणादिक साद् मीताः सन्तो यावत् मानथ, मम मोऽन्य आलम्पो या याद् भरि यति ?, अहमपि च खल ससारभयोद्विग्ना देशानुपिय साध प्राजियामि, तत सल ते पच पाण्डवाः पाण्इसेनस्य अभिपेरा यागिक क्या स्वराज्य स्थापित पन्तः, यापद राजा जात', यावद् राज्य प्रमाधगन् गाउपन् विहरतिभास्तेस्म । अम्हेहि थेराण अतित धम्मे णिमते जाव पच्चयोमो-तुम देवाणुप्पिण! किं करेसि) हे देवानुप्रियों ' जिम प्रकार तुम्हें सुप मिले वैमा तुम को अच्छे काम में विलम्य मत फगे। इसके बाद-वे पांचों पाडव जहा अपना घर था वहा आये-वा आकर के उन्हों ने द्रौपदी देवी को बुलाया-गुलाकर उससे ऐसा करा-हे देवानुप्रिये ! सुनो घान इस प्रकार है-हमरोगो ने स्थविरोंके पाम धर्ममा श्रवण किया है। अन हमलोगों की भावना मुटिन होकर उनके पास प्रजित रोने की है। अब-तुम्हारी भावना क्या है-हे देवानुपिये को तुम हमारे बाद क्या करोगी-(तणं सा दोवई देवो ते पच पडवे एव वयासी-जह ण तुम्भे देगणुप्पिया! ससारभउब्धिागा पचयह मम के अण्णे आलये यो जाव भविस्सह' अह पि र ण ससारभउचिगा देवाणुप्पिएहिं सद्धिं पञ्चहस्सामि, तएण ते पच पड्या पडलेणस्म अभिसेओ जाव राया जाए, जाव रज्ज पसाहे खलु देवाणुप्पिया ! अम्हेहि थेराण अतिए धम्मे णिसते जाव पचयामो तुम देवाणुप्पिए ! किं रेसि) હે દેવાનુપ્રિયે! જેમ તમને સુખ મળે તેમ કરો સારા કામમા મોડુ કરે નહિ ત્યારપછી તેઓ પાચે પાડવે જ્યા પિતાનું ઘર હતું ત્યા આયા ત્યાં આવીને તેમણે દ્રૌપદી દેવીને બોલાવી લાવીને તેને આ પ્રમાણે કહ્યું કે હે દેવાનુપ્રિયે! સાભળે, વાત એવી છે કે અમોએ સ્થવિરેની પાસેથી ધર્મનુ શ્રવણ કર્યું છે, એટલા માટે અમારી ઈચ્છા મુડિત થઈને તેમની પાસેથી પ્રવજ્યા ગ્રહણ કરવાની છે હવે તમારી શી ઈચ્છા છે? હે દેવાનું પ્રિયે ! અમને કહે અમે પ્રવજ્યા ગ્રહણ કરી લઈશું ત્યારબાદ તમે શું કરશે? (तएण सा दोवई देवी ते पत्र पडवे एव वयासी-जइण तुम्भे देवाणुप्पिया ! ससारभउबिग्गा पञ्चयह, मम के अण्णे आलो वा जाव भविस्स ? अह पि यण ससारभउबिग्गा, देवाणुप्पिएहि सद्धि पन्चास्मामि, तएण ते पच पडवा पडसेणस्स अभिसेओ जाव राया जाए, जाव रज्ज पसाहेमाणे विहरह) .
- लिये मनगारधर्मामृतवपिणी 10 अ० १६ द्रौपदीचरितनिरूपणम् ततः खलु ते पञ्च पाण्डवा द्रौपदी च देवी अन्यदा कदाचित् पाण्डुसेन राजा. नमान्छन्ति, तत खलु स पाण्डुसेनो राजा कौटुमिपुरुषान् शब्दयति, शब्द- विला, एवमवादीत्-सिप्रमेन भो ! देवानुमियाः निष्कमणामिपेक-दीक्षोपयोग वस्तूनि यापद उपस्थापयत, पुरुपसहसवादिनी शिविका उपस्थापयत, ' यावद प्रत्यवरोइन्ति अत्र यावच्छब्देनेद चोध्यम् , तत पाण्डुसेनस्य राशीवचनमाकर्ण्य ते माणे विहरह) इस प्रकार पाडवो का फहना सुनकर द्रौपदी देवी ने उन पाचो पांडवों से इस प्रकार कहा-हे देवानुप्रियों । तुमलोग यदि ससार भय मे उद्विग्न होकर प्रबजित होना चारते हो, तो फिर मेरे आप के सिवाय और कौन दूसरा आलयन अथवा आधार होगा। अतः मैंभी आप देवानुपियों के साथ ससार भय से उद्विग्न होकर दीक्षित होगी। इस प्रकार द्रौपदी देवी का कथन सुनकर उन पांचो पांडवों ने पाइसेन कुमार का राज्याभिषेक करके उसे राज्यपद में स्था- पिन किया। इस तार पांडकुमार राजा हो गया। यावत् राज्य का वर अच्छी तरह पालन करने लगा। (तएण ते पच पडवा दोवईय देवी अन्नया कयाइ पडुसेणरायाण आपुच्छति, तएण से पडसेणे राया कोड़ें- पिय पुरिसे सदावेइ, सदायित्ता, एव वयासी खिप्पामेव भो देवाणु- प्पिया । निक्खमणाभिसेयं जाव उवद्ववेद, पुरिससहस्मवाहणीओ सिवियाओ उचहवेह, जाव पच्चोल्हति, पच्चोरुहिता जेणेव थेरा उचा- આ પ્રમાણે પાડાનું કથન સાભળીને દ્રૌપદી દેવીએ તે પાચે પાડાને આ પ્રમાણે કહ્યું કે હે દેવાનુપ્રિ ! તમે જ્યારે સસારભયથી ઉદ્વિગ્ન થઈને અષા ગ્રહણ કરવા ઈચ્છે છે ત્યારે તમારા વગર મારા માટે આ સંસારમાં ખીજી કયુ આલબન અથવા તો બીજે ક આધાર થશે ? એટલા માટે હુ પણ તારી સાથે સારશી ઉદ્વિગ્ન થઈને દિક્ષા ગ્રહણ કરવા ઈચ્છું છું આ પ્રમાણે દ્રોપદી દેવાનું કથન સાભળીને તે પાચે પાડવોએ પામેન કુમારને રાજ્યાભિષેક કરીને તેને રાજ્યાને બેસાડી તે આ પ્રમાણે પાસેન કુમાર રાજા થઈ ગયે યાવત તે રાજ્યનું સારી રીતે રક્ષણ કરવા લાગ્યો (खएण ते पच पडवा दोवईय देवी अभया कयाइ पडुसेणरायाण जापुच्छति, वएण से पडसेणे राया कोड वियपुरिसे सदावेद, सदाविचा एवं क्यासी, खिप्पामेव मो देवाणुप्पिया ! निमाणाभिसेय नाव उवद्ववेद, पुरिससहस्सपाहणीओ सिवियाओ उपद्ववेह, नापति, पचोरुहिता जेणेव थेरा तेणेव उवाग० आलित्तेण नाव समणा जाया, चोदासपुवाइ अहिज्जति, अदिग्जिना पहणि - - ५७० जातामचा कौटुम्धिफपुम्पास्तथास्तु' इत्युक्त्या तर यापदुपस्थापयन्ति, तदा ते पत्र पाण्डवा पुरुपसहस्रवाहिनीः शिविका आम्हा, पाण्डमथुराया नगर्या मध्यम येन निर्गच्छति, निर्गत्य शिरिकाम्या प्रत्यारोपति-मत्यरतरति । मस्यवरुण, 'जेणे यौन स्थपिरास्तगोपागच्छन्ति, उपागत्य एमरादिपु:-'आलिते ण जाव समणा गच्छइ आलित्तेण जाव समणा जाया, घोसपुल्याइ अरिजति, अरिजित्ता, पहणि थासाइ घट्टहमदसमदुवालसेहिं मामद्धमासग्बम णेहिं अप्पाण भावेमाणा विररति ) इसके पाद पाचो पाडवों ने और द्रौपदी देवी ने किसी एक समय पांडसेन राजा से दीक्षित शेने के लिये पूछा। तर पाहुसेन राजा ने कौटुम्यिक पुरुषों को बुलाया वुलोकर उनसे ऐसा कहा-भो देवानुप्रियो ! तुमलोग शीघ्र ही दीक्षा में उपयोग आनेवाली वस्तुओं को लाकर उपस्थित करो-तथा पुरुष सरस्रवाहिनी शिपिकाओं को भी उपस्थित करो-इस प्रकार पाडुसेन राजा के वचन सुनकर उन कौटुम्यिक पुरुषों ने "तथास्तु" करकर उनकी आज्ञा को स्वीकार कर लिया-और दीक्षा में उपयोगी समस्त सामग्री को एवं पुरुष सहस्रवाहिनी शियिकाओं को लाकर उपस्थित कर दिया। तब वे पांचो पार्डव उन पुरुप सहस्रवाहिनी शियिकाओं पर आरूढ रोकर पांड मथुरा नगरी के बीच से रोकर निकले। वरा से निकलकर वे जरा स्थ- विर ठहरे हुए थे-वहां-आये-वहा आकर सबके सब शिविकाओं से वाप्ताइ छमदसमदुवालसेहिं मासदमासखमणेहिं अप्पाण भावेमाणा विहरति) ત્યારપછી પાસે પાડવોએ અને દ્રૌપદી દેવીએ કેઈએક વખતે પાડુસેન રાજાને દીક્ષા ગ્રહણ કરવા માટે પૂછ્યું ત્યારે પાસેના રાજાએ કૌટુંબિક પર ને બોલાવ્યા બોલાવીને તેમને આ પ્રમાણે કહ્યું કે હે દેવાનુપ્રિયે ! તમે લેકે દીક્ષા વખતે ઉપયોગમાં આવનારી બધી વસ્તુઓ જદી લઈ આવો તેમજ પુરુષ સહસવાહિની પાલખી પણ લઈ આવે આ પ્રમાણે પાડુસેન રજાના વચન સાંભળીને તે કૌટુંબિક પુરુષોએ “તથાસ્તુ' કહીને તેમની આજ્ઞા સ્વીકારી લીધી અને દીક્ષા માટે ઉપયોગી એવી બધી વસ્તુઓ તેમજ પુરુષ–સહસવાહિની પાલખી લઈ આવ્યા ત્યારપછી તે પાચે પાડવો તે પુરુષ સહસ્ત્રવાહિની પાલખીઓ ઉપર સવાર થઈને પાંડુ-મથુરા નગરીની વચ્ચે થઈને નીકળ્યા ત્યાંથી નીકળીને તેઓ જ્યાં સ્થવિર હતા ત્યાં પહોંચ્યા, ત્યા પહા ચીને તેઓ બધા પાલખીઓમાથી નીચે ઉતર્યો, નીચે ઉતરે સ્થવિરાની - भनगराधर्मामृतषिणी टीका० अ० १६ द्रौपदीचरितनिरूपणम् ५७१ जाया ' आदीप्तोऽयं लोक खलु इत्यादि । यावद् श्रमणा जाताः, चतुर्दशपूर्वाणि अधीयते स्म,अधीत्य बहूनि वर्षाणि पष्ठाष्टमदशम द्वादशैर्मासार्धमासक्षपणैस्तपोभि- रात्मान भावयन्तो विहरन्ति ॥ ९ ३३ ।। मूलम्-तएणं सा दोबई देवी सोयाओ पञ्चोरुहइ जाव पव्वइया सुव्वयाए अज्जाए सिस्सिणीयत्ताए दलयइ, इक्का- रस अंगाइ अहिज्जइ बहूणि वासाणि छट्ठट्ठमदसमदुवाल- सेहि जाव विहरइ ॥ सू० ३४ ॥ टीका-'तएणं सा' इत्यादि । ततस्तदनन्तर खलु सा द्रोपदी देवी शिवि- कातः प्रत्यवराहति मत्यरतरति, प्रत्यवतीर्य यानत् प्रव्रजिता-दीक्षा गृहीतरती। सुब्बयाए ' सुनतायै सुव्रतानामधेयाय ' अजाए 'आर्यायै 'सिस्सिगीयत्ताए' नीचे उतरे। नीचे उतरकर स्थविरों के पास पहुंचे। वहां पहुंचकर उन्हों ने स्थविरों से इस प्रकार कहा-हे भदत । यह समस्त लोक आदीप्त-हो रहा है इत्यादिरूप से अपनी भावना प्रदर्शित कर यावत् वे श्रमण हो गये। चौदह पूर्वो का उन्हों ने अध्ययन किया। अध्ययन करके अनेक वर्षों तक पष्ठ, अष्टम, दशम, द्वादश, मास अर्धमास की तपस्याओं को वे करते हुए विचरने लगे ॥ सू० ३३ ।। तएण सा दोवई ' इत्यादि। टीकार्थ-(तण्ण)इसके बाद (दोवई देवी) द्रौपदीदेवी (सीयाओपच्चो- रुहह ) अपनी शिविका से नीचे उतरी-(जो पव्वइया, सुव्ययाए अजाए सिस्सिणीयत्ताए दलयह, इक्कारसअगाइ अहिज्जइ, वणि घासाइ પાસે પહયા ત્યા પહોચીને તેમણે સ્થવિરોને વિનતી કરતા આ પ્રમાણે કહ્યું કે હે ભદન્ત ! આ સંપૂર્ણ જગત સળગી રહ્યું છે વગેરે રૂપથી પિતાની ભાવના પ્રકટ કરીને યાવત તેઓ શ્રમણ થઈ ગયા ચૌદ પૂર્વેનું તેમણે અધ્ય થન કર્યું, અધ્યયન કરીને ઘણા વર્ષો સુધી તેઓ પ૪, અષ્ટમ દશમ, દ્વાદશ, માસ અમાસની તપસ્યા કરતા રહ્યા तएण सा दोबई इत्यादि- Astथ-(तएण) त्या२५४ी (दोवई देवी) द्रोही हेवी (सीयाओ पचोरुहइ) પિતાની પાલખીમાં નીચે ઉતરી (जा-"च्या, मुन्धयाए अजाए सिस्सिणीयत्ताए दलयइ, इककारसअगाइ । , | સૂત્ર ૩૩ || ५७० जाताममेकपा फौदुम्पिकपुरपास्तथास्तु' इत्युक्त्या तयत्र यापदुपस्थापयन्ति, तदा ते पत्र पाण्डया पुरुषसहस्रवाहिनीः शिविका आम्हा, पाप्तुमधुराया नगर्या मध्यम येन निर्गच्छति, निर्गस्य शितिकाम्या प्रत्यवरोदति-पत्यावरति । प्रत्यवरा, 'जेणेव' यौन स्थविरास्तौगोपागच्छन्ति, उपागत्य एवमादिगु:-'आलिते णं नाव समणा गच्छइ आलित्तेण जाव समणा जाया, चोइसपुयाइ अरिज्जति, अहि जित्ता, पट्टणि पामाइ घट्टमदसमवालसेरि मासदमासम्बम णेहि अप्पाण भावेमाणा चिररति ) इसके बाद पाचो पाडवों ने और द्रौपदी देवी ने किसी एक समय पांडुसेन राजा से दीक्षित शेने के लिये पूछा। तर पाटुसेन राजा ने कौटुम्यिक पुरुपों को बुलाया बुलाकर उनसे ऐसा कहा-भो देवानुप्रियो ! तुमलोग शीघ्र ही दीक्षा में उपयोग आनेवाली वस्तुओं को लाकर उपस्थित करो-तथा पुरुप सहस्रवाहिनी शिपिकाओं को भी उपस्थित करो-इस प्रकार पांडुसेन राजा के पचन सुनकर उन कौटुम्विक पुरुषों ने "तथास्तु" कहकर उनकी आजा को स्वीकार कर लिया-और दीक्षा में उपयोगी समस्त सामग्री को एव पुरुष संरस्रवाहिनी शियिकाओं को लाकर उपस्थित कर दिया। तब वे पाचो पाउंच उन पुरुप सहस्रवाहिनी शियिकाओं पर आरूढ होकर पाडु मथुरा नगरी के बीच से रोकर निकले। वरा से निकलकर वे जहा स्थ विर ठहरे हुए थे-वहां-आये-वहा आकर सयके सय शियिकाओं से वासाइ छहमदसमदुवालसेहिं मासद्धमासखमणेहि अप्पाण भावमाणा विहरति) ત્યારપછી પાચે પાડવોએ અને દ્રૌપદી દેવીએ કેઈ એક વખતે પાડુસેન રાજાને દીક્ષા ગ્રહણ કરવા માટે પૂછયું ત્યારે પાછુસેન રાજાએ કૌટુંબિક પુરુ ને બોલાવ્યા બોલાવીને તેમને આ પ્રમાણે કહ્યું કે હે દેવાનુપ્રિયે ! તમે લેકે દક્ષિા વખતે ઉપગમા આવનારી બધી વસ્તુઓ જલ્દી લઈ આવે તેમજ પુરુષ સહસવાહિની પાલખી પણ લઈ આવે આ પ્રમાણે પાડુસેન રાજના વચન સાંભળીને તે કૌટુંબિક પુરુષોએ “તથાસ્તુ' કહીને તેમની આજ્ઞા સ્વીકારી લીધી અને દીક્ષા માટે ઉપયોગી એવી બધી વસ્તુઓ તેમજ પુરુષસહસવાહિની પાલખી લઈ આવ્યા ત્યારપછી તે પાચે પાડવો તે પુરુષ સહસ્ત્રવાહિની પાલખીઓ ઉપર સવાર થઈને પાંડુમથુરા નગરીની વચ્ચે થઈને નીકળ્યા ત્યાંથી નીકળીને તેઓ જ્યા વિર હતા ત્યાં પહોંચ્યા, ત્યાં પહો ચીને તેઓ બધા પાલખીઓમાથી નીચે ઉતર્યો, નીચે ઉતરીને સ્થવિરાની .
५७३ मनगारधर्मामृतपिणी टी० सं० १६ द्रौपदीयरितनिरूपणम् अन्नमन्नस्स एयमटुं पडिसुणेति पडिसुणित्ता जेणेव थेरा भगवंतो तेणेव उवागच्छइ उवागच्छित्ता थेरं भगवंतं वंदति णमंसंति वंदित्ता णमंसित्ता एवं वयासी-इच्छामो णं तुम्भेहिं अब्भणुनाया संमाणा अरहं अरिहनेमि जाव गमित्तए, अहासुहं देवाणुप्पिया | तएणं ते जुहिहिल्लपामोक्खा पंच अणगारो थेरेहिं भगवंतेहिं अन्भणुन्नाया समाणा। थेरे भगवते वंदइ णमंसइ वंदित्ता णमंसित्ता थेराणं अतियाओ पडिणिक्खमति मासंमासेणं अणिक्खित्तेणं तवोकम्मेणं गा. माणुगाम दुईज्जमाणा जाव जेणेव हत्थिकप्पे नयरे तेणेव उवा० हत्थिकप्पस्स घहिया सहसववणे उजाणे जाव विह- रति, तएणं ते जुहिहिलवज्जा चत्तारि अणगारा मासख- मणपारणए पढमाए पोरिसीए सज्झायं करेंति वीयाए एव जहा गोयमसामी णवरं जुहिटिलं आपुच्छति जाव अड- माणा वहुजणसई णिसाति, एव खलु देवाणुप्पिया । अरहा अरिट्ठनेमी उज्जितसेलसिहरे मासिएणं भत्तेणं अपाणएणं पंचहि छत्तीसेहि अणगारसएहि सद्धिं कालगए जाव पहीणे, तएणं ते जुहिडिलवज्जा चत्तारि अणगारा बहुजणस्स अतिए एयमढे सोच्चा हस्थिकप्पाओ पडिणि- क्खमति पडिणिक्खमित्ताजेणेव सहसववणे उज्जाणे जेणेव जुहिट्ठिल्ले अणगारे तेणेव उवागच्छइ उवागच्छित्ता भत्तपाणं पच्चक्खंति पच्चक्खित्ता गमणागमणस्स पडिक्कमति पडि- M
,
५७२
पातायडपाणी
शिष्यातया ददाति पाण्डसेनो राना द्रौपदी मुराये शिपयारूपेग दत्तवानिति
भाव । एकादशागानि अधीते, हनि वर्षाणि पटाऽष्टमदशमद्वादशेस्तपोभिर्यात्र
दास्मान भावयन्ती विहरति ॥सू०३४॥
मूलम्-तएण थेरा भगवंतो अन्नया कयाई पडुमहुराओ
णयरीओ सहसंचवणाओ उज्जाणाओ पडिणिस्खमंति पडि-
णिक्खमित्ता पहिया जणवयविहारं विहरति, तेण कालेण
तेणं समएण अरिहा अरिटनेमी जेणे सुरद्वाजणवए तेणेव
उवागच्छइ उवागच्छित्ता सुरद्वाजणवयंसि संजमेणं तवसा
अप्पाण भावेमाणे विहरइ, तएणं वहुजणो अन्नमन्नस्स
एवमाइक्खइ०-एवं खल्लु देवाणुप्पिया। अरिहा अरिट्ठनेमी
सुरहाजणवए जाव वि०, तएणं ते जुहिडिल्लपामोक्खा पच
अणगारा बहुजणस्स अतिए एयमहं सोचा अन्नमन्न
सदाति सहावित्ता एव वयासी-एव खल्लु देवाणुप्पिया ।
अरहा अरिटनेमी पुव्वाणु० जाव विहरइ, त सेयं खलु
अम्ह थेरा आपुच्छित्ता अरह अरिट्टनेमि वदणाए गमित्तए
छट्टहमदसमदुवालसेहिं जाव विहरइ ) नीचे उतरकर यावत् वह भी
प्रबजित हो गई। पांडुसेन राजा ने उसे द्रौपदी को सुव्रता नाम की
साध्वी के शिष्यारूप से प्रदान किया। द्रौपदी आर्या ने ग्यारह अगों
का अध्ययन किया। बाद में अनेक वर्षों तक छट्ठ अष्टम, दशम, द्वादश
तपस्याओं से अपने आपको उसने भावित किया। सू०३४ ॥
अहिज्जइ, वहूणि बासाइ छ8ढमदसमदुवालसेहिं जाब रिहरइ)
પ્રજિત થઈ ગઈ પાહુસેન રાજાએ
દ્રૌપદીને સુત્રતા નામની સાન્થીને શિષ્યાના રૂપમા અર્પિત કરી દ્રૌપદી આર્યાએ
અગિયાર અગેનું અધ્યયન કર્યું ત્યારપછી ઘણા વર્ષો સુધી છઠ્ઠ, અષ્ટક
દામ, દ્વાદશ તપસ્યાઓથી પિતાના આત્માને તેણે ભાવિત
નીચે ઉતરીને
યથાવત્
તે
પણ
॥३४॥
५७५ भनगारधर्मामृतवर्षिणो टीका अ० १६ द्रौपदीचरितनिरूपणम् तस्मिन् काले तस्मिन् समयेऽर्हन अरिष्टनेमियत्रैव सौराष्ट्रजनपदस्तत्रैवोपा- गच्छति, उपागत्य सौराष्ट्रजनपदे संयमेन तपसाऽऽत्मान भावयन् विहरति । ततः खल्ल बहुजनोऽन्योन्यमेवमाख्यातिक्ति, एप मापते, एव प्ररूपयति एवं प्रज्ञाप- यति-एव सलु हे देवानुमिय ! अर्हन् अरिष्टनेमि सौराष्ट्रजनपदे यावद् विहरति । ततः खलु ते युधिष्टिरप्रमुवा पश्चानगारा बहुजनस्यान्तिके एतमर्थ श्रुत्लाज्योन्य भन्दयन्ति, शब्दयित्वा एवम पदन ,एव खलु हे देवानुप्रिय! अहन अरिष्टनेमिः पूर्वा णाओ) उद्यान से (पडिणिक्खमति) विहार किया (पडिणिक्खमित्ता) विरार करके (पहिया जणवयविहार विहरति) घाहिर के जनपदों में विचरने लगे (तेण कालेण तेणं समएण अरिहा अरिहनेमी जेणेव सुरट्ठा जणवए तेणेव उवागच्छइ, उवागच्छित्ता सुरट्ठा जणवयंसि सजमेण तवसा अपाण भावेमाणे विहरह, तएण घट्टजणो अन्नमन्नस्स एवमाइक्खह ) उस काल में और उस समय में अहंत अरिष्टनेमि प्रभु विहार करते हुए जहाँ सौराष्ट्र जनपद था-वहां आये वहा आकर के वे उस सौराष्ट्र जनपद में सयम और तप से अपने आत्मा को भावित करते हुए विचरने लगे। जय वहा के अनेक लोगो को इसकी खयर हुई तब वे परस्पर में इस प्रकार कहने लगे (एव खलु देवाणु- प्पिया ! अरिहा । अरिहनेमी सुरहा जणवए जोव वि० तएण ते जुहि- हिल्लपामोक्खा पच अणगारा बहुजणस्स अतिए एयम१ सोचो अन्न- णिक्सम वि ) विहार ज्या (पडिणिक्समित्ता) बिहार धरीने तेमा ( बहियो जणवयविहार विहर वि) महाना नपोमा विडार ४२११ लाया ( तेण कालेण तेण समएण अरिहा अरिहनेमी जेणेव सुरट्ठा जणवए तेणेव आगच्छइ, उवागच्छित्ता मुरट्ठा जणवयसि सजमेण तवसा अप्पाण भावे- माणे एवमाइक्खइ) તે કાળે અને તે સમયે અહત અરિષ્ટનેમિ પ્રભુ વિહાર કરતા કરતા ક્યા સૌરાષ્ટ્ર જનપદ હો ત્યા આવ્યા ત્યાં આવીને તેઓ તે સૌરાષ્ટ્ર જનપદમા સયમ અને તપથી પિતાના આત્માને ભાવિત કરતા વિચરણ કરવા લાગ્યા જ્યારે ત્યાના ઘણા લોકોને આ વાતની જાણ થઈ ત્યારે તેઓ પરસ્પર આ પ્રમાણે કહેવા લાગ્યો કે- (पच खलु देवाणुप्पिया अरिहा अदिट्टनेमी सुरद्वाजणवए जार वितरण ते जुडिटिल्लपामोक्खा पच अणगारा बहुजणस्स अतिए एयमट्ट सोच्चा अन्नमय सहावेंति, सद्दाविना एव वयासी एव खलु देवाणुप्पिया ! अरिता अरिहनेमी जाताधर्मपाल कमित्ता एसणमणेसणं आलोएंति आलोइत्ता भत्तपाणं पडिदसेंति पडिदंसित्ता एवं वयासी एवं खलु देवाणुपिया। जाव कालगए तं सेयं सल्लु अम्ह देवाणुप्पिया ! इमं पुवगहियं भत्तपाणं परिद्ववेत्तासेत्तुं पव्वयं सणियं सणियं दुरूहित्तए 'संलेहणा झूसणा झुसियाण' कालं अणवकख- माणाणं विहरित्तएत्तिक अण्णमण्णस्स एयमह पडिसुणेति पडिसुणित्ता त पुव्वगाहियं भत्तपाणं एगंते परिवेति परि- हवित्ता जेणेव सेत्तुजे पव्वए तेणेव उवागच्छति उवागच्छित्ता सेत्तुजं पव्वय दुरूहति दुरूहित्ता जाव कालं अणवकखमाणा विहरति । तएण ते जुहिडिल्लपामोक्खा पच अणगारा सामाइयमाइयाइ चोदसपुव्वाइ०बहुणि वासाणि दोमा- सियाए संलेहणाए अत्ताण झोसित्ता जस्तहाए कीरइणग्ग- भावे जाव तमहमाराहेति तमहमाराहिता अणते जाव केवलवरणाणदसणे समुप्पन्ने जाव सिद्धा ॥ सू० ३३ ॥ टीका-'तएण येरा' इत्यादि । ततस्तदनन्तर खल स्थविरा भगवन्तोऽ न्यदाकदाचित् पाण्डुमथुरातो नगरीतो सहसाम्रवणादुद्यानात् प्रतिनिष्क्रामन्ति- निर्गच्छन्ति, प्रतिनिष्क्रम्य निर्गत्य, बहिर्जनपदविहार विहरन्ति । -तएण थेरो भगवता इत्यादि। टीकार्थ-(तएण) इसके बाद (थेरा भगवतो) उन स्थविर भगवतोने (अन्नया कयाइ) किसी एक समय (पडुमहुराभो) पाडु मथुरा (णय रीओ) नगरी से (सहसबवणाओ) सहस्राम्रवन नाम के (उज्जा तएण थेरा भगव ता इत्यादि- सार्थ-(तएण) त्या२मा (थेरा भाव तो) ते स्थविर लगतामे (अभया कयाइ) 5 मे मते (पडु महुराओ) पाहु मथुरा (णयरीओ) नारी (सहस बवणाओ) ससावन नामना (उज्जाणाओ) Gl ५७५ मनगारधर्मामृतवपिणी टीका अ० १६ द्रौपदीचरितनिरूपणम् तस्मिन् काले तस्मिन् समयेऽर्हन अरिष्टनेमियत्रैव सौराष्ट्रजनपदस्तत्रैवोपा- गच्छति, उपागत्य सौराष्ट्रमनपदे संयमेन तपसाऽऽत्मान भावयन् विहरति । ततः खलु बहुजनोऽन्योन्यमेवमाख्यावि-क्ति, एस भापते, एव मरूपयति एव प्रज्ञाप- यति-एव खलु हे देवानुप्रिय ! अर्हन् अरिष्टनेमि सौराष्ट्रजनपदे यावद् विहरति । तवः खलु ते युधिष्टिरप्रमुवा पश्चानगारा बहुजनस्यान्तिके एतमर्थ श्रुत्वान्योन्य शन्दयन्ति, शब्दयित्वा एवमपदन ,एव खलु हे देशानुप्रिय! अईन अरिष्टनेमिः पूर्वा णाओ) उद्यान से (पडिणिस्खमति ) विहार किया (पडिणिक्खमित्ता) विहार करके (यरिया जणवयविहार विहरति) याहिर के जनपदों में विचरने लगे (तेण कालेण तेणं समएण अरिहा अरिहनेमी जेणेव सुरट्ठा जणवए तेणेव उवागच्छइ, उवागच्छित्ता सुरक्षा जणवयसि सजमेण तवसाअप्पाण भावेमाणे विहरइ, तएण बहुजणो अन्नमन्नस्स एवमाइक्खह) उस काल में और उस समय में अईत अरिष्टनेमि प्रभु विहार करते हुए जहां सौराष्ट्र जनपद था-वहा आये वहां आकर के वे उस सौराष्ट्र जनपद मे सयम और तप से अपने आत्मा को भावित करते हुए विचरने लगे। जय वहां के अनेक लोगो को इसकी खयर हुई तब वे परस्पर में इस प्रकार कहने लगे (एव खलु देवाणु- प्पिया! अरिरा। अरिहनेमी सुरहा जणवए जोव वि० तएण ते जुहि- द्विल्लपामोक्खा पच अणगारा बहुजणस्स अतिए एयमई सोचो अन्न- णिक्सम ति) विहा२ ध्यो (पडिणिक्समित्ता) विडार ४शन तया (पहिया जणवयविहार विहर ति ) महान तपमा विडार ४२१. सान्या (तेण काळेण तेणं समएण अरिहा अरिहनेमी जेणेव सुरहा जणवए उनागन्छइ, उवागच्छित्ता सुरहा जणवयसि सजमेण तवसा अप्पाण भावे- तेणेव माणे एवमाइक्खइ) સૌરાષ્ટ્ર તે કાળે અને તે સમયે અહંત અરિષ્ટનેમિ પ્રભુ વિહાર કરતા કરતા ક્યા જનપદ હતા ત્યા આવ્યા ત્યા આવીને તેઓ તે સૌરાષ્ટ્ર જનપદમા સયમ અને તપથી પિતાના આત્માને ભાવિત કરતા વિચરણ કરવા લાગ્યા જ્યારે ત્યાના ઘણા લોકોને આ વાતની જાણ થઈ ત્યારે તેઓ પરસ્પર આ પ્રમાણે કહેવા લાગ્યું કે- (एव खलु देवाणुप्पिया! अरिहा अदिट्टनेमी सुरद्वाजणवए जार वितरण ते जुडिडिल्लपामोक्खा पव अणगारा बहुजणस्स अतिए एयमह सोच्चा अन्नमनं सदावेति, सद्दावित्ता एव पयासी एव खलु देवाणुप्पिया ! अरिया अरिहनेमी बासाधर्मपचासे नुपूा-तीर्थकराणां मर्यादया यावद् विहरति, 'त' तत्-तस्मात् 'सेय' श्रेपः खण्ड अस्मारु यत् स्थपिरान् आपल्याईन्तमरिष्टनेमि वन्दनाय गन्तम् । अन्योन्यस्प -परस्परस्पैतमर्थ सर्वे पश्चानगाराः प्रतिशृमन्ति, स्वीर्षन्ति प्रतिश्रुत्य या स्थ विरा भगवन्तस्तत्रयोपागच्छन्ति, उपागत्य तान् स्थपिरान् मगरती बन्दन्ते नम- स्यन्ति च चन्दिया नमस्यित्वा एपमादिपु -रछामः खलु युप्मामिरभ्यनुशाता: सन्तोऽईन्तमरिष्टनेमि यापद् गन्तुम् । स्थविरा ऊचुः यथामुख हे देवानुप्रिया! मन्न सघाति, सदायित्ता एवं क्यासी-एव खलु देवाणुप्पिया अरिहा अरिहनेमी पुन्वाणु जाव विहरह, त सेय पल अम्ह थेरा आपुच्छित्सा अरह अरट्टिनेमि वदणाण गमित्तए) हे देवानुमियों । सुनो-अरंत अरि टनेमि प्रभु तीर्थकर परम्परानुसार विहार करते हुए यावत् सौराष्ट्र जन पद में आये हुए हैं। लोगों के मुख से इस यात को उन पांच युधिष्ठिर आदि अनगारो ने सुना-तप आपस में एक दूसरे को-धुलाया और धुलाकर इस प्रकार कहा-देवोनुप्रियो ! सौराष्ट्र जनपद में तीर्थकर पर- मरा के अनुसार भगवान् अरिष्टनेमि विहार कर रहे हैं-अतः हमलोगों को स्थविरो की आज्ञा लेकर अहंत अरिष्टनेमि को वदना करने के लिये चलना पहुत अच्छा है-उचित है-(अन्नमन्नस्स एयमह पडिसुणेति, पडिसुणित्ता जेणेच थेरा भगवतो, तेणेव उवागच्छद, उवागच्छित्ता थेरे भगवते वदति णमसति, चदित्सा णमसित्ता एव वयासी-इच्छामो ण पुल्वाणु० जाच विहरइ, त सेय खल अम्ह थेरा आपुच्छित्ता अरह अस्टिनेमि बद- णाए गमित्तए) હે દેવાનુપ્રિયે! સાભળે, અહંત અરિષ્ટનેમિ પ્રભુ તિર્થ કર પર પરા મુજબ વિહાર કરતા યાવતું સૌરાષ્ટ્ર જનપદમાં પધારેલા છે તેના મુખથી આ વાતને તે પાચે યુધિષ્ઠિર વગેરે અનગારાએ સાભળી ત્યારે તેઓએ પરસ્પર એક બીજાઓને બોલાવ્યા અને બેલાવીને આ પ્રમાણે કહ્યું કે તે દેવાનુપ્રિયે! સૌરાષ્ટ્ર જનપદમાં તીર્થંકર પરંપરા મુજબ ભગવાન અરિષ્ટનેમિ વિહાર કરી રહ્યા છે એથી સ્થવિરાની આજ્ઞા મેળવીને અરિષ્ટનેમિને વંદન કરવા માટે અમારે જવું જોઈએ (असमन्नस्स एयमट्ट पडिमुणेति, पडिसुणित्ता जेणेव थेरा भगवतो, तेणेव उवागाइ, उवागच्छित्ता थेरे भगवते वदति गमसति, बदित्ता णमसित्ता एव चयासी-इच्जमो ण तुम्भेहि अन्भणुमाया समाणा अरह अरिछनेमि जान गमित्तए - . मनगारधामृतवपिणी टी० अ० १६ द्रौपदीचरितनिरूपणम् ५८७ ततः खलु ते युधिष्ठिरप्रमुखा' पश्चानगाराः स्थविरैर्भगवहिरभ्यनुज्ञाताः सन्त स्थपिरान् भगरतो बन्दन्ते नमस्यन्ति, पन्दित्ला, नमस्यित्वा स्थविराणामन्तिकात प्रतिनिप्कामन्ति, माम-मासेन 'अणिविपत्तेण' अनिक्षिप्तेन अन्तररहितेन तपः तुम्भेहिं अभुणुन्नाया ममाणा अरह अरिट्टनेमि जाव गमित्तए अहासुह देवाणुप्पिया! तरण ते जुहिडिल्लपामोरग्वा पच अणगारा धेरेहिं भग वतेहिं अन्भणुन्नाया समोणा येरे भगवते बदह णममइ चदित्ता णम- सित्ता घेराण अतियाओ पडिणिक्खमति, मास मासेण अणिक्खित्ते ण त कम्मेण गामाणुगाम दुईज्जमाणा जाब जेणेव हत्यिकप्पे नयरे तेणेव उवा. हथिकप्परम पहिया सहसवणे उज्जाणे जाव विहरति-तएण ते जुहिहिल्लपज्जा चत्तारि अणगारा मासखमगपार- गए पढमाए पोरमीए सज्झाय करे ति, वीयाए जहा गोयमसामी, णवर जुरिद्विल आपुच्छति जाव अडमाणा यह जणसद्द णिमाति) इस प्रकार का परस्पर का यह विचार उन्होंने स्वीकार कर लिया-स्वीकार करके फिर वे जहा स्थविर भगवत थे-वहा गये-वहा जाकर उन्हो ने उन स्थविर भगरतो को वंदना की नमस्कार किया । वदना नमस्कार कर फिर उनसे इस प्रकार कहा हमलोग आप भगवतो से आज्ञा प्राप्त कर अर्हत नेमिनाथ प्रभु को वदना करने के लिये सौराष्ट्र जनपद जाना चाहते हैं। तब उन स्थविर भगवतो ने उनसे कहा हे देवानुप्रियों! यथासुखम्-तुम्हें जैसे सुग्व हो-वैसा करो इस प्रकार उनस्थविर भग अहासह देवाणुप्पिया ! तएण ते जुहिहिलपामोक्खा पच अगगारा, थेरेहिं भग वतेहि अभणुनाया समाणा थेरे भगवते वदह णमसइ, बदित्ता णममित्ता येराण अतियाओ पडिमिक्खमति, मासमासेण अणिखेत्तेण तवोकम्मेण गामाणुगाम दूइज्जमाणा जा जेणे हथिकप्पे नयरे तेणेव उ० हथिकप्पस्स पहिया सह सबरणे उजाणे जाव विहरति तएण ते जुहिडिल्लवजमा चत्तारि अणगारा मास खमणपारणप पढमाए पोरसीए सज्झाय करेंति, पीयाए एव जहा गोयमसामी, गवर जुहिद्विल आपुच्छति जान अडमाणा बहुजणसद णिसामेति ) આ રીતે તેઓએ એકબીજાના વિચારોને સ્વીકારી લીધા, સ્વીકારીને તેઓ જ્યા વિર ભગવત હતા ત્યા ગયા ત્યા જઈને તેમણે તે સ્થવિર ભગવતેને વદન અને નમસ્કાર કર્યા વદન અને નમસ્કાર કરીને તેમને આ પ્રમાણે વિનંતી કરી કે અમે આપ ભગવતની આજ્ઞા મેળવીને અહં ત નેમિ નાથ પ્રભુના વદન માટે સૌ ષ્ટ્ર જનપદમાં જવા ઈચ્છીએ છીએ ત્યારે તે વિર ભગ તોએ તેમને આ પ્રમાણે આના કરી કે હે દેવાનુપ્રિયે ! सुखम् ' ताने आभमा भान पास थाय न २ मा प्रमाणे ते स्थविर यथा हा ७३ जाताधर्मप्रचार नुपूर्या-तीर्थकराणां मर्यादया यापद् विहरति, 'त' बद-तस्माद् 'सेय' श्रेप' खलु अस्माकं यत् स्थपिरान् आपन्छयाईन्तमरिष्टनेमि चन्दनाय गन्तुम् । अन्योन्यस्य =परस्परस्यैतमय स पञ्चानगाराः पतिरपन्ति, स्वीकृन्ति प्रतिश्रुत्य यव स्य गिरा भगवन्तस्तत्रैवोपागच्छन्ति, उपागस्प तान् स्परिरान् भगवतो वन्दन्ते नम. स्यन्ति च पन्दित्वा नमस्थित्वा एरमादिपु-रामः खलु युप्मामिरभ्यनुमाता: सन्तोऽहंन्तमरिष्टनेमि याद् गन्तुम् । स्थविरा अचु' यथामुख हे देवानुप्रिया। मन्न सदाति, सदाचित्ता एव वयासी-एव पल देवाणुप्पिया! अरिहा अरिहनेमी पुव्वाणु जाय विररह, त सेय खलु अम्ह थेरा आपुच्छित्सा अरह अरहिनेमि वदणाण गमित्तए) हे देवानुप्रियो । सुनो-अरंत अरि- टनेमि प्रभु तीर्थकर परम्परानुसार विहार करते हुए यावत् सौराष्ट्र जन- पद में आये हुए हैं। लोगों के मुख से इस यात को उन पांच युधिष्ठिर आदि अनगारो ने सुना-तप आपस में एक दूसरे को-घुलाया और बुलाकर इस प्रकार कहा-देवानुमियो ! सौराष्ट्र जनपद में तीर्थंकर पर- मरा के अनुसार भगवान् अरिष्टनेमि विहार कर रहे हैं-अतः हमलोगों को स्थविरो की आज्ञा लेकर अहंत अरिष्टनेमि को वदना करने के लिये चलना पहुत अच्छा है-उचित है-(अन्नमन्नस्स एयमट्ठ पडिसुणेति, पडिसुणित्ता जेणेव थेरा भगवतो, तेणेष उवागच्उह, पवागच्छित्ता थेरे भगवते वदति णमसति, वदिसा पामसिसा एव वयासी-इच्छामो ण पुवाणु० जाब विहरइ, त सेय खलु अम्ह थेरा आपूच्छित्ता अरह अस्टिनेमि वद णाए गमित्तए) હે દેવાનુપ્રિયે! સાભળો, અહંત અરિષ્ટનેમિ પ્રભુ તિર્થ કર પર પરા મુજબ વિહાર કરતા યાવત સૌરાષ્ટ્ર જનપદમાં પધારેલા છે લોકોના મુખથી આ વાતને તે પાચે યુધિષ્ઠિર વગેરે અનગારેએ સાભળી ત્યારે તેઓએ પરસ્પર એક બીજાઓને બોલાવ્યા અને બોલાવીને આ પ્રમાણે કહ્યું કે તે દેવાનુપ્રિયે ! સૌરાષ્ટ્ર જનપદમાં તીર્થંકર પરંપરા મુજબ ભગવાન અરિષ્ટનેમિ વિહાર કરી રહ્યા છે એથી સ્થવિરાની આજ્ઞા મેળવીને અરિષ્ટનેમિને વંદન કરવા માટે અમારે જવું જોઈએ (अनमन्नस्स एयमह पडिसणेति, पडिसुणित्ता जेणेव थेरा भगवतो, तेणेव उवागाइ, उवागच्छित्ता थेरे भगवते वदति णमसति, बदित्ता गमसित्ता एव बयासी-इच्छामो ण तुम्भेहि अन्भणुमाया समाणा अरह अरिष्टनेमि जाव गमित्तए - . मैनगारधर्मामृतवर्षिणी टी० अ० १६ द्रौपदीयरितनिरूपणम् ५७१ हस्तिकल्पे नगरे उच्चनीचम यमकुलानि ' अडमाणा' अटन्त बहुजनशब्द निशा मयन्ति-शृपन्ति कि शृण्वन्तीत्याह-' एव खलु हे देशानुमियाः ! अईन परिष्ट नेमिः 'उज्जितसेलसिहरे ' उज्जयन्तशैलशिवरे-गिरनारपर्वतोपरिभागे मासि केन भक्तेन भक्तमत्यार यानेन पानकेन-पानीयरहितेन चतुर्विधाहारपरित्यागेने- त्यर्थः ‘पञ्चहिं छत्तीसेहि जणगारसएहि । पञ्चभि पद्विशताऽनगारशतैः शट्त्रिं शदधिकपञ्चशतसख्यकैरनगारः सार्य कालगतो यावत्-सिद्धोबुद्धः परिनित सर्वदुःखमहीणो जात ।। तएण' ति' तत खलु ते युधिष्ठिरवर्भाश्चत्वरोऽनगारा बहुजनस्यातिके एतमर्थ श्रुत्वा हस्तिकल्पाद् नगरात् प्रतिनिष्कामति, प्रतिनिष्क्रम्य या सहस्रा- करप नगर में उच्च, नीच एच मधम कुलों में गोचरी के लिये आये। उस समय इन्हो ने अनेक मनुष्यों के मुख से इस प्रकार समाचार सुने (एव देवाणुप्पिया । अरहा अरिहनेमी उजितसेलमिहरे मासिएण मत्तेण अपाणण पचहिं लत्तासेरि अणगारसह सद्धि कालगए जाव पहीणे, तण ते जुरिद्विल्लवजा चत्तारि अणगारा यहुजणस्स अतिए एयमठ्ठ मोच्चा हत्थिाप्पाओ पडिणिक्खमति) देवानुप्रियो ! अर्हत अरिष्टनेमि ऊर्जयतशैल शिखर पर-गिरनार पर्वत के ऊपर एक मास के चतुरविध आहार के परित्यागरूप भक्तप्रत्याख्यान से ५३६ अनगा- रो के साथ कालगत यावत् सिद्ध, बुद्ध, परिनिवृत हो कर सर्व दुखों से रहित हो गये है। इस प्रकार अनेक मनुष्यो के मुख से इस समाचार को सुनकर वे युधिष्ठिर पर्ज चारों अनगार उस हस्तिफरपन गर से निकले (पडिनिक्खमित्ता जेणे सहसवणे उज्जाणे जेणेच અને મધ્યમ કુલેમા ગોચરી માટે આવ્યા તે સમયે તેમણે ઘણા માણના મુખથી એ જાતના સમાચાર સાભળ્યા કે – (एव देवाणुप्पिया । अरहा अरिहनेमी उजितसेलसिहरे मासिएण भत्तेण अपाणएण पचहिं उत्तीसेहिं अणगारसएहि सद्धिं कालगए जाच पहीणे, तएण ते जुडिदिल्लवज्जा चत्तारि अणगारा बहुजणस्स अंतिए एयम सोचा रत्थिकप्पाओ હે દેવાનુપ્રિયે ! અહંત અરિષ્ટનેમિmજ ય ત શિલશિખર ઉપર–ગિરનાર પર્વત ઉપર-એક માસના ચારે જાતના આહારના પરિત્યાગ રૂપ ભક્ત પ્રત્યા ખ્યાનથી પ૩૬ અનગારોની સાથે કાળાત યાવત્ સિદ્ધ, બુદ્ધ, પરિનિવૃત થઈને સર્વ ૮ થી મુક્ત થઈ ગયા છે આ પ્રમાણે ઘણા માણસના મુખથી આ જાતના સમાચાર સાભળીને તે યુધિષિર વગરના ચારે અનગારે તે હસ્તિ૫ નગરથી નીકળ્યા पडिणिक्खमति) ५७८ - माताधर्ममयाजणे फर्मणा ग्रामानुग्राम ' दाजमाणा' ट्रान्ताउलः, यापद योव इथिकप्पे नयरे' इस्तिफ्ल्प नगर योपागच्छन्ति, उपागत्य स्तिकल्पस्य पहिः सहमा म्रपणे उद्याने यापद विहरन्ति । ततः 3 ते युपिष्टिपथवारोऽनगारा मास क्षपणपारण के प्रथमाया पीसग्या साध्याय जन्ति, 'बीयाए ' द्वितीयाया पौरु प्या यान न्यायन्ति उतीयाया पौरुप्यामसग्निपचपलममभ्रान्तमढोसमुख पत्रिका प्रतिलेखयन्ति, भाजनानाणि मतिले वयन्ति, भाननानि च-पात्राणि प्रमार्जयन्ति, भाजनान्यगृहन्ति, गृहीत्या पायथा गौतमयामी श्रमण महावीर मापृच्छति नपर-अयमत्र विशेषः अत्र पसारोऽनगाराः युधिष्ठिमान्छन्ति यावत् वतों से आज्ञा प्राप्त कर वे युधिष्ठिर प्रमुग पाच अनगार उन स्थविर भगवत को चंदना नमस्कार करके उनके पास से चले आये और निर न्तर मास मास समण करते हुए एक ग्राम से दूसरे ग्राम में विहार करने लगे। इस तरह ग्रामानुग्राम विहार करतेगा वे पांचो अनगार जहा इस्तिकरपनाम का नगर था चहा आये । वहा आकर वे हस्तिकरप नगर के पाहिर सहस्रामवन उद्यान में जाकर ठहर गये । इसके बाद वे युधिष्टिर के सिवाय चारो अनगार मासक्षपण के दिन प्रथम पौरुषी में स्वाध्याय करते, द्वितीय पौरुपी में ध्यान करते, और तृतीय पौरुषी में अत्वरित, अचपल एच असभ्रान्त रोकर सदोरक मुखवत्रिकाकी प्रतिले खना करते, भाजन और वस्त्रोंकी प्रतिलेखना करते-फिर उन्हें उठाते- और लेकर जिस प्रकार गौतम स्वामी श्रमण महावीर स्वामी से पूछकर गोचरी के लिये निकलते उसी प्रकार ये भी युधिष्ठिर से पूछ कर हस्ति ભગવતેની આજ્ઞા મેળવીને તે યુધિષ્ઠિર પ્રમુખ પાચે અનગારે તે સ્થવિર ભગવતે વદન તેમજ નમસ્કાર કરીને તેમની પાસેથી આવતા રહ્યા અને સતત માસ ખમણ કરતા એક ગામથી બીજે ગામ વિહાર કરવા લાગ્યા અ રીતે ગ્રામનુગ્રામ વિહાર કરતા તે પાસે અનગારે જ્યા હસ્તિક ૫ નામે નગર હતું ત્યા આવ્યા ત્યા આવીને તેઓ હસ્તિક૫ નગરની બહાર સહસામ્રવન ઉદ્યાનમાં જઈને મુકામ કર્યો ત્યારબાદ તે યુધિષ્ઠિર સિવાયના ચારે અનગર માસક્ષપણ પારણાના દિવસે પ્રથમ પૌરૂષીમા સ્વાધ્યાય કરતા, દ્વિતીય પૌરૂષીમા ધ્યાન કરતા અને તૃતીય પૌરૂષીમા ગોચરી માટે નીકળતી વખતે પણ અચપળ અસ છાત થઈને સદર મુખવસ્ત્રિકાની પ્રતિલેખન કરતા, ભાજન અને વસ્ત્રોની પ્રતિલેખના કરતા, ત્યારબાદ તેમને ઉપાડતા અને ઉપાડીને જેમ ગૌતમ સ્વામી શ્રમણ ભગવાન મહાવીર સ્વામીની આજ્ઞા મેળવીને ગોચરી માટે નીકળતા તેમજ તેઓ પણ યુધિષ્ઠિરની આજ્ઞા મેળવીને હસ્તિકા નગરમાં ઉચ્ચ, નીચ, M ५७९ ननगारधर्मामृतवपिणी टी० अ० १६ द्रौपदीयरितनिरूपणम् हस्तिकल्पे नगरे उच्चनीचम यमकुलानि ' अडमाणा' टन्त बहुजनगब्द निशा- मयन्ति-पृषन्ति-कि भृण्वन्तीत्याह-' एव खलु हे देवानुप्रियाः ! अर्हन अरिष्ट- नेमिः ‘उजितसेलसिहरे' उज्जयन्त लशिखरे-गिरनारपर्वतोपरिभागे मासि- केन भरतेन भक्तवत्यार यानेन पानकेन-पानीयरहितेन चतुर्वियाहारपरित्यागेने- त्यर्थः 'पञ्चहिं छत्तीसेहिं जणगारसरहिं । पञ्चभि पनिशताऽनगारशतैः शत्रिं शदधिकपश्चगतसल्यकैरनगारः सार्ध कालगतो यावत्-सिद्वोवुद्धः परिनित सर्वदुःखमहीणो जात । तएण' ति ' तत सलु ते युधिष्ठिरवश्चित्तरोऽनगारा बहुजनस्यान्ति के एतमर्य श्रुत्ना हस्तिकल्पाद् नगरात् प्रतिनिष्कामन्ति, प्रतिनिष्क्रम्य यत्रै सहस्रा- कल्प नगर में उच्च, नीच एव मध्यम कुलों में गोचरी के लिये आये। उस समय इन्हों ने अनेक मनुष्यों के मुख से इस प्रकार समाचार सुने (एव देवाणुप्पिया ! अरहा अरिहनेमी उजितसेलसिहरे भासिएण भत्तेण अपाणपण पचहिं छत्तातेहि अणगारस सद्धि कालगण जाव पहीणे, तण ते जुहिद्विल्लवजा चत्तारि अणगारा टुजणस्स अतिए एयम सोच्चा हत्यिकप्पाओ पडिणिक्खमति) देवानुप्रियो ! अर्हत अरिष्टनेमि ऊर्जयतशैल शिखर पर-गिरनार पर्वत के ऊपर एक मास के चतुरविध आहार के परित्यागरूप भक्तप्रत्याख्यान से ५३६ अनगा- रों के साथ कालगत यावत् सिद्ध, बुद्ध, परिनिवृत हो कर सर्व दुखों से रहित हो गये है। इस प्रकार अनेक मनुष्यो के मुख से इस समाचार को सुनकर वे युधिष्ठिर चर्ज चारों अनगार उल हस्तिफल्पन गर से निकले (पडिनिक्खमित्ता जेणे सहसवणे उज्जाणे जेणेव અને મધ્યમ કુલોમા ગેચરી માટે આવ્યા તે સમયે તેમણે ઘણા માણસોને મુખથી એ જાતના સમાચાર સાભળ્યા કે- (एव देवाणुप्पिया ! अरहा अरिहनेमी उज्जितसेलसिहरे मासिएण भत्तेण अपाणएण पचहिं उत्तीसेहिं अणगारसएहिं सद्धिं कालगए जाब पहीणे, तएण ते जुहिदिल्लवज्जा चत्तारि अणगारा बहुजणस्स अतिए एयमट्ट सोच्चा इत्थिाप्पाओ पडिणिस्खमति) હે દેવાનુપ્રિયે ! અહંત અરિષ્ટનેમિઊર્જયાત શિલશિખર ઉપર-ગિરનાર પર્વત ઉપર-એક માસના ચારે જાતના આહારના પરિત્યાગ રૂપ ભક્ત પ્રત્યા. ખ્યાનથી પ૩૬ અનારોની સાથે કાળગત યાવત્ સિદ્ધ, બુદ્ધ, પરિનિવૃત થઈને સર્વ દુખેથી મુક્ત થઈ ગયા છે આ પ્રમાણે ઘણા માણસના મુખથી આ જાતના સમાચાર સાભળીને તે યુધિષ્ઠિર વગરના ચારે અનગારે તે હસ્તિકલ્પનગરથી નીકળ્યા " . . माताधर्मकथा म्रपणमुपान यत्रेय युधिष्ठिरोऽनगारस्तौगोपाग उन्ति, उपागत्य भक्तपान 'पन्च क्षति ' प्रत्यारयान्ति प्रत्यारयाय गमनागमनस ' गमनागमन प्रतिकामन्ति ईर्यापथिकी कुर्वन्ति प्रतिक्रम्य 'एमणमणेसण ' एपणामनेपणाम् आलोचयन्ति, आलोच्य भक्तपान-प्रतिदर्शयन्ति-युधिष्ठिरस्य पुरोऽवस्थाप्य प्रतिदर्शयन्ति, प्रति दर्य एग्मवादिषुः-एव खलु हे देशानुप्रिय । यावत् कालगताईन् अरिष्टनेमि र्मोक्षमाप्तः, 'त' तस्मात् श्रेयः खलु अस्माक हे देशानुमियाः ! इम पूर्वगृहीत जुरिहिरले अणगारे तेणेव उवागमति, उचाच्छिता मत्रापाण पच्च क्खति, पच्चक्रिवत्ता गमणागमणस्स पडिकामति पडिकमित्ता एसणम नेसण आलोणति, आलोहत्ता भत्तपाण पदिदसैंति पडिदसित्ता एव वयासी-एव खलु देवाणुप्पिया! जान कालगए त सेय गल अम्ह देवा णुप्पिया! इम पुव्यगहिय भत्तपाण परिहवेत्ता सेज पव्वय सणिय सणिय दुरुहित्त) निकलकर वे जा सहस्त्राम्रवन नाम का उद्यान था और उस में भी जहा युधिष्ठिर अनगार विराजमान थे, वहा आये । वहां आकर उन्हों ने उनकी साक्षी से भक्त प्रत्याख्यान करदिया और भक्त प्रत्याख्यान करके फिर उन्हो ने ईर्यापय शुद्धि की । शुद्धि करके एषणा अनेपणा की आलोचना करके फिर उन्होंने लाये हुए उस आहार को युधिष्ठिर अनगार के समक्ष रख कर दिखलाया। दिखलाकर फिर वे इस प्रकार करने लगे। हे देवानुप्रिय अर्हन अरिष्टनेमि मुक्ति को प्राप्त हो चुके है-इसलिये हे देवानुप्रिय! हमको अब यही उचित (पडिनिक्खमित्ता जेणे सहसपत्रणे उज्जाणे जेणेव जुहिडिल्ले अणगारे तेणेव उवागच्छति उवागच्छित्ता भत्तपाण पच्चक्खति पञ्चक्खिता गमणागमणस्स पडिक्कमति, पडिक्वमित्ता एसणमनेसण आलोएति, आलोइत्ता भत्तपाण पडिदसैंति पडिदसित्ता एव वयासी-एव सलु देवाणुप्पिया ! जाव कालगए त सेय खलु अम्हें देवाणुप्पिया ! इम पुजगहियभत्तपाण परिद्ववेत्ता सेत्तुज पब्यय सणिय सणिय दुरूहित्तए) નીકળીને તેઓ જ્યા સહસામ્રવન નામે ઉઘાન હતુ અને તેમાં પણ જ્યા યુધિષ્ઠિર અનાર હતા ત્યાં આવ્યા ત્યાં આવીને તેમણે તેમની સામે ભક્ત પાનનું પ્રત્યાખ્યાન કરી દીધુ પ્રત્યાખ્યાન કરીને તેમણે પથની શુદ્ધિ કરી શુદ્ધિ કરી અને અષણા કરી, આલોચના કરી આલોચના કરીને તેમણે છે કે તે આહાર યુધિરિ નગરની સામે મૂકીને ખતાળે “પ્રમાણે કહેવા લાગ્યા કે હે અહંત છે એટલા માટે -- - भेनेगरिधर्मामृतवपिणी टीका २०१६ द्रौपदीचरितनिरूपणम् ५८ भक्तपान परिष्ठाप्य ' सेत्तुज ' शत्रुजय-शत्रुजयनामक पर्वत शनैः शनैरोहितुम् आरोहितम् , तथा-'सलेहणाझसणासियाण ' संलेखना जोपणाजुष्टाना-सले- खनाया कपायशरीरकृपीकरणे या जोषणा-प्रीतिः सेवा वा तया जुप्टा-सेवि- तास्तेपासलेखनातपःकारिणामित्यर्थः-कालम्-अनवकाक्षमाणानाम् - अनि- च्छताम् विहर्तुम् , इति कृत्वाऽन्योन्यस्यैतमर्थ प्रतिशृण्वन्ति-स्त्रीकुर्वन्ति, पति श्रुत्य तद् पूर्वगृहीत भक्तपानम् एकान्ते-मासु के स्थाने परिष्ठापयन्ति, परिप्ठाप्य यौव शत्रुजयः पर्वतस्तौगोपागच्छन्ति, उपागत्य शत्रुजय पर्वत शनैः शनैरोहन्ति आरोहन्ति, दूरूद्य यावत्-कालमनकाक्षमाणा विहरन्ति । है कि हम इस पूर्व गृहीत भक्त पान का परिष्ठापन कर शत्रुजय नामके पर्वत पर धीरे धीरे चढे (सलेणा झूसणा झुसियाण काल अणवकख माणाण विहरित्तए त्तिकटूटु अण्णमण्णस्स एयम पडिसुणेति, पडिसु. णित्ता तं पुब्बगहिय भत्तपाण एगते परिदृति, परिद्ववित्ता जेणेव सेत्तुज पव्वए तेणेव उवागच्छति) और वहाँ काय और कपाय को कृश करनेवाली सलेखना मरणाशसा से रहित होकर प्रीति पूर्वक धारण करे इस प्रकार विचार करके उन्हों ने परस्पर के इस विचार रूप अर्थ को स्वीकार कर लिया। स्वीकार करके फिर उस पूर्व गृहीत भक्त पान को उन्होंने एकान्त स्थान में परिछापित कर दिया और परिष्ठापित करके वे सब जहा शत्रुजय पर्वत था वहाँ चले गये (उवागच्छित्ता) वहा जाकर के (सेतुज पव्वय दुरुदति, दुरुहित्ता जाव काल अणव- હવે અમને એ જ વાત એગ્ય લાગે છે કે અમે આ પૂર્વગ્રહિત ભકત પાનનુ પરિઝાપન કરીને શત્રુ જય નામના પર્વત ઉપર ધીમે ધીમે ચઢીએ (सलेहणा झूसणा झुसियाण काल अणवफखमाणाण विहरित्तए तिकटु अण्णमण्णस्स एयमह पडिमुणेति, पडिसुणित्ता त पुच्चगहिय भत्तपाण एगते परि- ति, परिद्वविता जेणेव सेत्तुज पब्बए तेणेप उवागच्छति ) અને ત્યાં કાય અને કષાયને કુશ કરનારી સલેખનાને મરણશ સાથી રહિત થઈને પ્રેમપૂર્વક ધારણ કરીને આ પ્રમાણે વિચાર કરીને તેમણે એક બીજાના આ વિચાર રૂપ અર્થને સ્વીકારી લીધે વીકાર કરીને તેમણે તે પૂર્વગ્રહીત ભક્તપાનને એકાંત સ્થાને પરિણાપિત કરી દીધું અને પરિપિત ४शन तेथे! सबै ज्या शत्रुत्य पर्वत तो त्या यादया गया (वागच्छित्ता) ત્યાં જઈને– जाव काल अणवरुखमाणा विहरवि, Pa- 2- , সামবার म्राणमुद्यान यत्र युधिष्ठिरोऽनगारस्तमोपागन्ति, उपागस्य भक्तपान 'पच्च खति' मत्याख्यान्ति-प्रत्यारयाय गमनागमनस्स ' गमनागमन प्रतिकामन्ति ईर्यापथिकी कुर्वन्ति मतिक्रम्य 'एमणमणेमण ' एपणामनेपणाम् आलोचयन्ति, आलोच्य भक्तपान-प्रतिदर्शयन्ति-युधिष्ठिरस्य पुरोऽस्थाप्य प्रतिदर्शयन्ति, प्रति दर्य एवमादिपुः-एव खलु हे देशानुपिय ! यापन कालगतान अरिष्टनेमि मोक्षमाप्त., 'त' तस्मात् श्रेयः खलु अस्माक हे देवानुपिया. ! इम पूर्वगृहीत जुरिहिल्ले अणगारे तेणेव उवागच्छति, उवागचित्ता मत्सपाण पच्च खति, पच्चरित्ता गमणागमणस्त पडिकामति पडिकमित्ता एसणम नेसण आलोऍति, आलोहत्ता भत्तपाण पडिदसेति पडिदसित्ता एव वयासी-एव खलु देवाणुप्पिया! जाच कालगए त सेय ग्बलु अम्ह देवा णुप्पिया । इम पुग्वगहिय भत्तपाण परिहवेत्ता सेत्तुज पन्वय सणिय सणिय दुरहित्तए) निकलकर वे जहां सहस्त्राम्रपन नाम का उद्यान था और उस में भी जहा युधिष्ठिर अनगार विराजमान थे, वहा आये। वहां आकर उन्हो ने उनकी साक्षी से भक्त प्रलाख्यान करदिया और भक्त प्रत्याख्यान करके फिर उन्हो ने ईर्यापय शुद्धि की । शुद्धि करके एषणा अनेपणा की आलोचना करके फिर उन्होंने लाये हुए उस आहार को युधिष्ठिर अनगार के समक्ष रख कर दिखलाया। दिखलाकर फिर वे इस प्रकार कहने लगे। हे देवानुप्रिय ! अर्हन अरिष्टनेमि मुक्ति को प्राप्त हो चुके है-इसलिये हे देवानुप्रिय ! हमको अब यही उचित (पडिनिस्खमित्ता जेणे सहसवणे उज्जाणे जेणेव जुहिडिल्ले अणगारे तेणेव उवागच्छति उवागच्छित्ता भत्तपाण पच्चक्खति पञ्चक्खित्ता गमणागमणस्स पडिकमति, पडिकमित्ता एसणमनेसण आलोएति, आलोइचा भत्तपाण पडिदसैंति पडिदसित्ता एव क्यासी-एव खलु देवाणुप्पिया । जाव कालगए । सेय खलु अम्हें देवाणुप्पिया ! इम पुजगहियभत्तपाणं परिद्ववेत्ता सेत्तुज पमय सणिय सणिय दुरूपित्तए) નીકળીને તેઓ જ્યા સહસામ્રવન નામે ઉદ્યાન હતુ અને તેમાં પણ જ્યા યુધિષ્ઠિર અનાર હતા ત્યા આવ્યા ત્યાં આવીને તેમણે તેમની સામે ભક્ત પાનનું પ્રત્યાખ્યાન કરી દીધુ પ્રત્યાખ્યાન કરીને તેમણે ઈપથની શુદ્ધિ કરી શુદ્ધિ કરીને એષણ અને અનેષણ કરી, આલોચના કરી આલોચના કરીને તેમણે લઈ આવેલા તે આહારને યુધિષ્ઠિર અનગારની સામે મૂકીને બતા બતાવ્યા બાદ તેઓ આ પ્રમાણે કહેવા લાગ્યા કે હે અહંત અરિષ્ટનેમિ પ્રભુએ મુક્તિ મેળવી છે એટલા માટે - भनेगारधर्मामृतवपिणी टीका अ० १६ द्रौपदीवरितनिरूपणम् भक्तपान परिप्ठाप्य ' सेत्तुज ' शत्रुजय-शत्रुजयनामक पर्वत शनैः शनैरोहितुम् =आरोहितुम् , तथा-' सलेहणाइसणासियाण ' संलेखना जोपणाजुप्टाना=सले- खनाया कपायशरीरकृपीकरणे या जोषणा-पीतिः सेवा ना तया जुप्टा-सेवि- तास्तेपासलेसनातपाकारिणामित्यर्थः- -कालम्-अनवकाङ्क्षमाणानाम् - अनि- च्छताम् विदर्तुम् , इति कृत्वाऽन्योन्यस्यैतमर्थ प्रतिशृण्वन्ति स्वीकुर्वन्ति, पति- श्रुत्य तद् पूर्वगृहीत भक्तपानम् एकान्ते मासु के स्थाने परिठापयन्ति, परिप्ठाप्य यत्रैव शत्रुनयः पर्वतस्तत्रैवोपागच्छन्ति, उपागत्य शत्रुजय पर्वत शनैः शनैरोहन्ति आरोहन्ति, द्द्य यावत्-कालमनपकाइसमाणा विदरन्ति । है कि हम इस पूर्व गृहीत भक्त पान का परिष्ठापन कर शत्रुजय नामके पर्वत पर धीरे धीरे चढे (सलेणा झूसणा झुसियाण काल अणवकख- माणाण विररित्तए तिकटूटु अण्णमण्णस्स एयम पडिसुणेति, पडिसु- णित्ता तं पुवगहिय भत्तपाणं गते परिदृति, परिद्ववित्ता जेणेव सेत्तुज पन्यए तेणेव उवागच्छति) और वहाँ काय और कपाय को कृश करनेवाली सलेखना मरणाशसा से रहित होकर प्रीति पूर्वक धारण करे इस प्रकार विचार करके उन्हों ने परस्पर के इस विचार रूप अर्थ को स्वीकार कर लिया। स्वीकार करके फिर उस पूर्व गृहीत भक्त पान को उन्होंने एकान्त स्थान मे परिष्ठापित कर दिया और परिष्ठापित करके वे सब जहां शत्रुजय पर्वत या वहाँ चले गये (उवागछित्ता) वहा जाकर के (सेतुज पन्रय दुरुहति, दुरुहित्ता जाच काल अणव- હવે અમને એ જ વાત એગ્ય લાગે છે કે અમે આ પૂર્વગ્રહિત ભતપાનનું પરિણાપન કરીને શત્રુ ય નામના પર્વત ઉપર ધીમે ધીમે ચઢીએ (सलेहणा असणा झसियाण काल अणवकरसमाणाण विहरित्तए तिकट्टु अण्णमण्णस्स एयमह पडिमुणेति, पडिसृणित्ता त पुषगहिय भत्तपाण एगते परि- ति, परिढविता जेणेव सेत्तुज पचए तेणेव उवागच्छति ) અને ત્યાં લાય અને કપાયને કુશ કરનારી સલેખનને મરણશ સાથી રહિત થઈને પ્રેમપૂર્વક ધારણ કરીને આ પ્રમાણે વિચાર કરીને તેમણે એક બીજાના આ વિચાર રૂપ અને સ્વીકારી લીધે પીકાર કરીને તેમણે તે પૂર્વગ્રહીત ભાષાનને એકાંત સ્થાને પરિપિત કરી દીધું અને પરિણાપિત शन तेमत्या शल्य त ता न्याय 14t (आगच्छित्ता) (सेतुन पव्यय दुरूहति, दुहिता जाव काल अणवकखमाणा विहरति, स्या न.- ५८२ पाताधर्मकथा ततः खलु ते युधिष्ठिरमासाः पशानगाराः 'सामाइयमाझ्याइ 'सामायि कादीनि चतुर्दशपूर्वाणि भीत्य वहनि वर्षाणि प्रामथ्यपर्याय पालयिया पठाप्ठ मादितपः कृत्रा द्विमासिकया सलेम्पनयाऽऽत्मान 'झोसित्ता' जुष्ट्वा सेवित्वा यस्यार्थाय क्रियते नग्नमानो-निर्ग्रन्यभार यान् तमर्यगारापयति, आराध्य अनन्तम् अनन्तार्थविषयक योवत् । केरलवरणाणदगणे' केरलवरज्ञानदर्शन समु त्पन्न यावत् सिद्धा'-गिदिगति माता इयर्थः । सू०३५ ॥ कखमाणा विदरति, तरण ते जुरि हिल्ट पामोरया पच अणगारा सामा इयमाझ्याउ चोद्दसपुन्याइ रहणि वामामि० दो मासियाए सलेहणाए अत्ताण झोसित्ता जस्सहाए कीरह, जग्गभावे जाव तमट्टमारोहति, तमट्ठमारारित्ता अणते जार केवलपरणादसणे समुप्पन्ने जाव सिद्धा) वे शत्रुजय पर्वत पर चढे चढकर के उन्होंने मरणाशसा से रहित होकर सलेसना धारण करली । इस तरह उन युधिष्ठिर प्रमुख पच अनगारोंने सामायिक आदिचतुर्दश पूर्वी का अध्यन करके अनेक वर्षों तक श्राम ण्य पर्याय का पालन करके तथा पष्ठ, अष्टम, आदि तपस्याओ को करके अन्त में दो मास की सलेसना से अपने आप की प्रीति पूर्वक सेवित किया और जिस निमित्त नग्न भाव-निग्रंथ अवस्था धारण की थी उस अर्थ को उन्हों ने सिद्ध कर लिया। सिद्ध करके आरोधित कर के अनत अर्थ को विपय करने वाले केवलवरज्ञानदर्शन को उत्पन्नकर यावत् वे सिद्धि गति को प्राप्त हो गये। सूत्र ३५॥ खएण ते जुहिडिल्लपामोक्खा पच अणगारा सामाइयमाइयाइ चोदसपुवाइ वहूणि वासाणि० दोमासियाए सलेहणाए अचाणे झोसित्ता जस्सहाए कीरइ, णग्गभावे जार तमट्ठमारोहति, तमट्ठमाराहिता अणते जाव केवलवरणाण दसणे समुप्पन्ने जाव सिद्धा) તેઓ શત્રુ જય પર્વત ઉપર ચઢયા અને ચઢીને તેમણે મરણશ સાથી રહિત થઈને સલેખના ધારણ કરી લીધી આ પ્રમાણે તે યુધિષ્ઠિર પ્રમુખ પાશે અનગારાએ સામાયિક વગેરે ચતુર્દશ પૂર્વેનું અધ્યયન કરીને ઘણા વર્ષો સુધી શ્રમણ્ય-પર્યાયનું પાલન કરીને તેમજ ૫૪ અષ્ટમ વગેરે તપસ્યાઓને કરીને છેવટે બે માસની સલેખનાથી પ્રેમપૂર્વક પિતાની જાતને સેવિત કરી અને જે નિમિત્તને લઇને નગ્નભાવ-નિર્ચ થ અવસ્થા ધારણ કરી હતી તે અર્થને તેમણે સિદ્ધ કરી લીધે સિદ્ધ કરીને આરાધિત કરીને અનત અને વિષયરૂપ બનાવનાર કેવળજ્ઞાન દર્શનને ઉત્પન્ન કરીને યાવત તેઓએ સિદ્ધગતિ મેળવી લીધી છે. સૂત્ર ૩૫ .
આર્યાની પાસે સામાયિક વગેરે ૧૧ અગેનું અધ્યયન કર્યું मनगारधर्मामृतपिणी टीफा ० १६ द्रौपदीचरितनिरूपणम् मूलम्-तएणं सा दोवई अजा सुव्वयाण अज्जियाण अंतिए सामाइयमाइयाइं एक्कारसअंगाइ अहिजइ अहि जित्ता बहणि वासाणि० मासियाए सलेणाए० आलोइयपडिकता कालमासे कालं किच्चा वंभलोए उववन्ना, तत्थ णं अत्थेगइयाणं देवाणं दस सागरोवमाई ठिई पण्णत्ता तत्थ णं दुवयस्स देवस्स दस सागरोचमाइं ठिई पन्नत्ता, से णं भते । दुवए देवे ताओ जाव महाविदेहे वासे सिज्झइ जाव काहिइ । एवं खलु जंवू । लम गणं जान सपत्तेणं सोलमस्त णायज्झयणस्स अयम? पण्णत्ते त्तिवेमि ॥ सू० ३४ ॥ सोलसमं नायज्झयणं समत्त ॥ १६ ॥ टीका-'तरण मा' इत्यादि । ततस्तदन तर खलु मा द्रोपदी आर्या साधी मुव्रतानामायिकाणामन्ति के सामायिकादिकानि एकादशागानि अधीते, अधीत्य बहूनि वर्षाणि श्रामण्यपर्याय पालयित्वा मासिक्या सलेग्वनया आलोचित प्रतिक्रान्ता कालमासे काल कृत्वा 'यमलोए पचमे ब्रह्मलोके देवत्वेन ' उववन्ना' तण्णं सा दोवई ' इत्यादि । टीकार्थ-(तण्ण) इसके बाद (सा दोबई अज्जा) उस द्रौपदी आर्याने (सुव्वयाण अज्जियाण अतिम सामाइयमाझ्याइ एकारसअगाइ अहि जह) सुव्रता आर्या के पास सामायिक आदि ११ अगो का अ ययन किया (अदिज्जित्ता बदणि वासाणिमामियाए सलेरणाए. आलोइय पटिकना कालमासेमाल किच्चा वभलोए उववन्ना) अध्ययन करके अनेक वर्ष तक श्रामण्य पर्याय का पालन कर एक मास की सलेग्वना तपण सा दोवई इत्यादि- सहाय-(वएण) त्या२पछी (सा दोवई अज्जा) द्रौपदी आर्याय (सञ्च याण अज्जियाण अतिए सामाइयमाइयाइ एकारसअगाइ अहिज्नह) सुरता (अहिन्जित्ता बहुणि वासाणि० मासियाए सलेहणाए० आलोईय पडिस्कता फालमासे कालकिचा वभलोए उवयना) અધ્યયન કરીને ઘણા વર્ષો સુધી ગ્રામ પર્યાયનું પાલન કર્યું ત્યાર ताधर्मकपाल उत्सना, तत्र तस्मिा देवलोके-मल अन्त्ये केपा केपादियानाम् दवसागरोप मानि स्थिति प्राप्ता, तन खलु द्रौपदेयम्यम्य दशसागरोपमानि स्थितिः प्रनता तत्र खलु गौतमः पृति-हे भदन्त । स रालु द्रौपदी देव आयुभरस्थितिक्षयेण 'ताओ' तस्माद् देवकान्युत्वा राजगमिष्यति पुत्रोत्पत्स्यते ? भगवान माह-'जात्र इति यापनमहाविदेहे वर्षे सेत्स्यति, याच साद यानामन्त करिष्यति । से आलोचित प्रतिमान्त न चे फाल अपसर काल कर के पाचवें ब्रह्म लोक में देव को पर्याय से उत्पन्न हुई। (तत्य ण अत्थे गहयाण देवाण दस सगरोवमाइ ठिई पण्णता, तत्य ण दुवयस्स दवस्म दस सागरो वमाइ ठिई पण्णत्ता, सेण भते ! दुपा देवे ताओ जाप माविदेहे वासे सिज्झइ, जाव काहिह । एवं सल जसमणेण जाव सपत्तेण सोलसम स्स णायजप्रयणस्स अयम? पण्णत्ते तिमि ) उस देवलोक में कितनेक देवों की दश सागर की स्थिति प्रज्ञप्त हुई है। सो वा द्रौपदी देव की दश सागर को स्थिति हुई। अय गौतम पूरते है हे भदत ! वह द्रौपदी देव आयु ण्य भवस्थिति के क्षय होने पर वहा से चव कर कहां जावे गा-कहा उत्पन्न होगा ? उत्तर में भगवान करते हैं-हे गौतम ! वह द्रौपदी देव वर्ग से चव कर महाविदेह क्षेत्र में उत्पन्न होगा और वहीं से सिद्ध बनेगा यावत् समस्त दुःखों का अत करेगा। પછી એક માસની સ લેખનાથી આચિત પ્રતિકાત બનીને તેઓ કાળ અવ સરે કાળ કરીને પાચમા બ્રહાલેકમાં દેવના પર્યાયથી જન્મ પામી (तत्थ ण अत्थेगइयाण देवाण दस सागरोवमाइ ठिई पण्णता, तत्थ ण दुवयस्स देवस्स दस सागरोवमाइ टिई पण्णत्ता, सेण भते ! दुवए देवे ताओ जाव महाविदेहे वासे सिज्झद, जाव काहिइ । एव खलु जबू । 'समणेण जाव सपत्तेण सोलमस्स णायज्झयणस्स अयम? पणत्ते तिमि) તે દેવલેમાં કેટલાક દેવે ની દશ સાગરની સ્થિતિ પ્રાપ્ત થઈ છે આ પ્રમાણે દ્રૌપદી દેવીની ત્યા દશ સાગરની સ્થિતિ પ્રજ્ઞસ થઈ હવે ગૌતમ સ્વામી પ્રશ્ન કરે છે કે હે ભદન્ત ! તે દ્રૌપદી દેવીની આયુ અને ભવરિથતિ પૂરી થયા બાદ ચવીને કયા જશે ? કયા ઉત્પન્ન થશે ? તેના ઉત્તરમાં ભગવાન કહેવા લાગ્યા કે હે ગૌતમ ! તે દ્રૌપદી દેવ ત્યાથી ચવીને મહાવિદેહ ક્ષેત્રમાં ઉત્પન્ન થશે અને ત્યાંથી જ સિદ્ધ બનશે થાવત્ તેઓ પિતાના સમસ્ત દુ ખેને અત કરશે - , भनगारघमामृतवपिणी टी० अ० १६ द्रौपदीचरितनिरूपणम् सुधर्मास्वामी कथयति-' एव खलु' इत्यादि । एव खलु हे जम्बू ! श्रमणेन भगवता महावीरेण या सिद्विगतिनाम पेय स्थान समाप्तेन पोडशस्य ज्ञाता ध्ययनस्यायं पूर्वकथितः अर्थः द्रौपदीटप्टान्तरूपो भाषः प्रज्ञप्तः, प्ररूपितः, इति प्रवीमि व्याख्यापूर्वपत् ।। ३४ ॥ इति श्री-विश्वविख्यात-जगद्वभ-प्रसिद्धवाचकपञ्चदशभापाकलितललितक- लापालापक-प्रविशुद्धगद्यपद्यनैकान्थनिर्मापक-पादिमानमर्दक-श्रीगाहन्छ पतिकोल्हापुरराजप्रदत्त-'जेनशास्त्राचार्य ' पदभूपित-कोल्हापुरराज- गुरु-पालनह्मचारि-जैनाचार्य-जैन धर्मदिवाकरपूज्यश्री घासीलाल- प्रतिविरचिताया ज्ञाताधर्मकथासूत्रस्या, नगारधर्मामृतपर्पि- ण्यारयाया व्यारयाया पोडशमध्ययन समाप्त ॥ १६॥ सुधर्मा स्वामी कहते है हे जबू' श्रमण भगवान महावीर ने जो सिद्धि गतिनामक स्थान को प्राप्त हो चुके है इस पोडश ज्ञानाध्ययन का यह पूर्वोक्त द्रौपदी दृष्टान्त रूप भाव अर्थ प्ररूपित किया है। ऐसा मैं उन्ही भ्रमण भगवान महावीर के द्वारा कहे श्रुत उपदेश के अनुसार कहता हूँ॥ सूत्र ३६॥ श्री जैनाचार्य जैनधर्म दिवाकर पूज्य श्री घासीलालजी महाराज कृत ज्ञाताधर्मकथाङ्गमूत्र" की अनगारधर्मामृतवर्पिणी व्याख्याका सोलहवा अभ्ययन समाप्त ॥ १६ ॥ સુધર્મા સ્વામી કહે છે કે હે જ બૂ! શ્રમણ ભગવાન મહાવીરે કે જેઓ સિદ્ધગતિ નામક સ્થાનને મિળવી ચૂકયા છે આ સોળમા જ્ઞાતાધ્યથનને આ પૂર્વે વર્ણવેલ દ્રૌપદી દૂછાત રૂ૫ ભાવ અર્થ પ્રરૂપિત કર્યો છે તે શ્રમણ ભગવાન મહાવીર વડે કહેવાએલા કૃત ઉપદેશ મુજબ જ તમને જ કહી વ્ર છુ સદા શ્રી જૈનાચાર્ય ઘાસીલાલજી મહારાજ કૃત જ્ઞાતાસૂત્રની અનગારધર્મામૃતવર્ષિણી व्याभ्यानु भोजभु मध्ययन समास ॥ १६ ॥ सा७
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बताधर्मकथा
नाए जाव उवायमाणा२ चिट्टति, तपण से णिज्जामए तओ
मुहुत्ततरस्स लद्धमइए३ अमूढदिसाभाए जाए यावि होत्था,
तएणं से णिज्जामए ते वहवे कुच्छिधारा य एवं वयासो-
एव खल्ल अह देवाणुप्पिया । लद्धमइए जाव अमूढदिसाभाए
जाए, अम्हे ण देवाणुप्पिया । कालियदीवे तेणं सबूढा एसण
कालियदीवे आलोकइ, तएणं ते कुच्छिधारा यष्ट तस्स णिज्जा-
मगस्स अतिए
एयमट्ट
सोच्चा
हट्टतुट्टा पयरिखणाणुकूलेण वा.
एणं जेणेव कालियदीवे तेणेव उवागच्छति उवागच्छित्ता पोय
वहणं लवेंति लवित्ता एगट्टियाहिं कालियदीव उत्तरति, तस्थ
ण ते बहवे हिरण्णागरे य मुवण्णागरे य रयणागरे य वइरा
गरे य वहवे तत्थ आसे पासति, कि ते १, हरिरणुसोणिसुत्तगा
आइण्णवेढा, तएण ते आसा ते वाणियए पासति पासित्ता
तेसि गंध अग्घायंति अग्धायित्ता भीया तत्था उविग्गमणा
तओ अणेगाइ उन्भमति, तेण तत्थ पउरतणपाणिया निब्भया
निरुब्विग्गा सुह सुहेण विहरति ॥ सू०१ ॥
टीका-जम्मूस्वामी पृच्छति-यदि खलु भदन्त ! श्रमणेन भगवता महावी-
रेण यावत् सिद्धिगतिनाम पेय स्थान सम्माप्तेन पोडशस्य ज्ञाताध्ययनस्यायमर्थ.
-जण भते ! इत्यादि।
टीकार्थ-(भते । हे भदत ! (जहण समणेण भगवया महावीरेण जाव
संपत्तेण) यदि अमण भगवान महावीरने कि जो सिद्धिगति नामकस्थान
को प्राप्तकर चुके हैं (सोलसमस्स णायज्ञयणस्स अयमढे पण्णत्ते सत्तर
जइण भते ! इत्यादि-
A-(भते !) महन्त ! ( जइण समणेण भगवया महावीरेण जाव
सपत्तेण ) ने श्रम ભગવાન મહાવીરે કે-જેઓ સિદ્ધગતિ નામના સ્થાનને
મેળવી ચૂકયા છે
- अमगारधर्मामृतपिणी टी० म०१७ मौकापणिग्यर्णनम् ५८२ पूर्वोक्तो भावः प्रज्ञप्तः ? सुधर्मास्वामीप्राह-एव खलु हे जम्नः । तस्मिन् काले तस्मिन् समये इस्तिशीपं नाम नगरमासीन् । 'अण्णो' वर्णका= ऋद्धे'त्यादि- नगरवर्णनम् पूर्वपद् विज्ञेयम् । तत्र खलु कनककेतुर्नाम राजाऽऽसीत् ‘वण्ण नो ' वर्णक:- महयाहिमवते ' त्यादि राजवर्णन पूर्ववद् बोध्यम् । तत्र खलु हस्तिशीर्षे मस्स ण भते! जायज्ञयणस्स समणेण भगवया महावीरेण जाव सप. तेण के अहे पणत्ते) सोलहवें जाताध्ययन का यह पूर्वोतस्प से अर्थ प्ररूपित किया है तो सिद्धिगति नामक स्थान को प्राप्त हुए उन्हीं श्रम- ण भगवान् महावीर ने सत्रहवें ज्ञाताध्ययन का क्या अर्थ प्ररूपित किया है (एव खलु जबू!) इस प्रकार जब स्वामी के पूछने पर सुध- मा स्वामी अथ उन्हें समझाते हैं-वे कहते है हे जबू! तुम्हारे प्रश्न का उत्तर इस प्रकार है:- (तेण कालेण तेण समएण हत्यिसीसे नयरे होत्या, वण्णओ, तत्य, ण कणगकेऊणाम राया होत्या, वण्णओ, तत्य, ण हत्यिसीसे णयरे बहवे सजत्ता णावा वाणिगया परिवसति, अड्डा जाव घटुजणस्स अपरिभूया यावि होत्था) उस काल और उस समय मे हस्तिशीर्ष नाम का नगर था। "ऋद्ध" इत्यादि रूपसे पूर्व अध्ययनों में वर्णित पाठ की तरह इस नगर का वर्णन जानना चाहिये । उस नगर मे कनक केतु नामका राजा रहता था। इसका भी वर्णन " मया हिमवत " इत्यादिरूप से पहिले के अध्ययनोंमे वर्णित राजाओंके वर्णन जैसा ही जानना चाहिये। उस (सोलसमस्स णायज्झयणस्स अयमढे पणत्ते सत्तरमस्स ण भते ! णायज्झ यणस्स समणेण भगनया महावीरेण जान सपत्तेण के अटे पण्णत्ते ) સોળમા જ્ઞાતાધ્યયનને પૂર્વોકત રૂપે અર્થ પ્રરૂપિત કર્યો છે ત્યારે સિદ્ધ ગતિ સ્થાનને મેળવી ચૂકેલા તે જ શ્રમણ ભગવાન મહાવીરે સત્તરમા જ્ઞાતા ધ્યાનને શું અર્થ પ્રરૂપિત કર્યો છે (एव सलु जयू) मा शतमूना प्रश्नाने सामान भने समानता સુધર્મા સ્વામી કહેવા લાગ્યા કે હે જબ! તમારા પ્રશ્નને જવાબ આ પ્રમાણે છે કે (तेण कालेण तेण समएण हथिसीसे नयरे होत्या, वणो, तत्थण कण- गऊणाम राया होत्या, पण्गओ, तत्यण दस्थिसीसे पयरे हवे सजत्ता णावा वाणियगा परिवसति, अड्डा जाव बहुजणस्म अपरिभूया यावि होत्था) તે કાળે અને તે સમયે હતિશીર્ષ નામે નગર હતું રૂપમા પહેલાના અધ્યયનમાં વર્ણન કરવામાં આવેલા પાઠની જેમ આ નગરનું વર્ણન પણ જાણી લેવું જોઈએ તે નગરમાં કનકતુ નામે રાજા રહેતે હતે ऋद " वगैरे -- ५८८ जाए, एयमट्ट सोचा जाताधर्मकथा नाए जाव उवायमाणा२ चिटुंति, तपण मे णिज्जामए तओ मुहुत्ततरस्स लद्धमइए३ अमूढदिसाभाए जाए यावि होत्था, तएण से णिज्जामए ते वहवे कुच्छिधारा य ४ पवं वयासी- एव खल्लु अह देवाणुप्पिया । लद्धमइए जाब अमूढदिसाभाए अम्हे णं देवाणुप्पिया | कालियटीवे तेण सबूढा एसण कालियदी आलोकइ, तएण ते कुच्छिधारा यह तस्स णिजा- मगस्स अतिए हट्टतुट्टा पयक्खिणाणुकूलेण वा. एणं जेणेव कालियदीवे तेणेव उवागच्छति उवागच्छित्ता पोय वहण लवेति लवित्ता एगट्टियाहिं कालियदीव उत्तरति, तत्थ ण ते वहवे हिरण्णागरे य सुवण्णागरे य रयणागरे य वइरा गरे य वहवे तत्थ आसे पासति, कि ते १, हरिरणुसोणिसुत्तगा आइण्णवेढा, तएणं ते आसा ते वाणियए पासति पासित्ता तेसि गंध अग्घायति अग्घायित्ता भीया तत्था उबिग्गमणा तओ अणेगाइ उम्भमति, तेणं तत्थ पउरतणपाणिया निब्भया निरुव्विग्गा सुह सुहेण विहरति ॥ सू०१॥ टीका-जम्मूस्वामी पृच्छति-यदि खलु भदन्त ! श्रमणेन भगवता महावी- रेण यावत् सिद्धिगतिनाम पेय रथान सम्माप्तेन पोडशस्य ज्ञाताध्ययनस्यायमर्थ:- -जण भते ! इत्यादि। टीकार्य-(भते । हे भदत (जइण समणेण भगवया महावीरेण जाव संपत्तेण) यदि श्रमण भगवान महावीरने किजो सिद्धिगति नामकस्थान को प्राप्तकर चुके हैं (सोलसमरस णायज्ञयणस्स अयमढे पण्णत्ते सत्तर- जइण भते । इत्यादि- --(भते ! ) : महन्त ! (जइण समणेण भगवया महावीरेण जाव सपत्तेण )ने भए भगवान महापार -नया सिद्धशतिनामना स्थानन મેળવી ચૂક્યા છે - भनगारधर्मामृतविणी टी० अ० १७ निर्यामकस्यदिमूढ-यम् माना 'सखोहिज्जमाणी २ ' सक्षोभ्यमाणा २ पुनः पुनः क्षोभ प्राप्यमाणा सती तत्रैव एरस्थान एवेतस्ततः परिभ्राम्यनि किन्तु ततः पर गन्तु न मभवतीति भावः। ततः खलु स निर्यामका नाविक 'ट्ठमइए' नष्टमतिक -मतिज्ञानरहितः ' गट्ठसुइए' नष्टश्रुतिक-विस्मृतनिर्यामकशास्त्रः दिग्निर्णय कर्तुमशक्तत्वात् णहसणे ' नष्टसज्ञः=मार्गज्ञानन्तिः ‘मूढदिसाभाए ' मूढदिग्भागः पूर्णदि दिग्विभागज्ञानरहितः जातश्चप्यासीत् , पुनश्च स न जानाति यत् कारक देश २ तत्येव परिभमड, तएण से णिजामण णहमइए ण? सुइए ण सपणे मृढदिसभाए जाए यावि होत्य) एक दिनकी बात है कि जब ये साया त्रिक पोत वणिक एक जगह मिलकर धैठे हुए थे तब अष्टम अध्ययन में वर्णित अरहनक सेठ की तरह इनका लवण समुद्र से होकर परदेश में व्यापर निमित्त जाने का विचार हुआ। विचार स्थिर होते ही ये जय नौका द्वारा लवण समुद्र मे सैकडो योजन तक निकल चुके तर इनके लिये जिन रक्षित और जिनपालितकी तरह आकस्मिक अनेक उत्पातशत (सैकडों)हए। उस समय प्रलय कालकी तरह प्रचण्ड वायु उटी। उससे उनकी नौका थार २ डगमगा ने लगी इधर से उधर फिर ने लगी। बार २ चञ्चल होकर बार २ क्षुभित होकर एक ही स्थान पर नीची ऊंची होने लगी-उससे आगे वह नहीं पढी। इससे निर्यामिक-नाविक- मतिजान से रहित हो गया। दिशाओं का निर्णय करने का ज्ञान उसका जाता रहा। वह मार्ग ज्ञान रहित होकर दिग्मृढ बन गया। (ण जाणा २ सखोहिज्जमाणी १ तत्ये परिभमइ, तएण से णिज्जामए णहमदए णहसुइए महसण्णे मूढ दिसाभाए जाए यावि होत्या) એક દિવસની વાત છે કે જ્યારે તેઓ સર્વે સાયાત્રિક પિતવધિ એક સ્થાને એકત્ર થઈને બેઠા હતા ત્યારે આઠમાં અધ્યયનમાં વર્ણિત અરડનક શેઠની જેમ તેમને પણ લવણ સમુદ્રમા થઈને પરદેશમાં વેપાર માટે જવાનો વિચાર થયે વિચાર સ્થિર થતા જ તેઓ જ્યારે નૌકા વડે લવણ સમુદ્રમા સેકડે જન સુધી પહોચી ગયા ત્યારે જીનપાલિત અને જનરહિતની જેમજ તેમના માટે પણ સેકડો એચિંતા ઉપદ્રવ ઉત્પન્ન થયા કાળના જે પ્રચડ વાયુ કુકાવા લાગે તેથી તેમની નૌકા વાર વાર ડગ મગવા લાગી, આમથી તેમ ફરવા લાગી વારેઘડીએ ચચળ થઈને, વાર વાર મુભિત થઈને એક જ સ્થાન ઉપર નીચે ઉપર થવા લાગી, તેનાથી આગળ વધી નહિ તેથી નિર્ધામિક-નાવિક મહિનાનથી રહિત થઈ ગયે દિશા ઓને જાણવાનું તેનું જ્ઞાન જતું રહ્યું માર્ગજ્ઞાનથી રહિત થઈને દિમૂઢ બની તે વખતે પ્રલય . . ५९० ताधर्मकपास नगरे पहा सजवाणापामाणियगा १ सयानानारावाणिजमा स-साता यात्रा देशान्तरगमन सयाना, तस्मघाना नौकामाणिजमा-पोतयणिज.-सयात्रा नौका बाणिनकाः परिपसति कीरगाः ? इत्याह-ग्राहया यापत् 'बहुजणस्म बहुजनस्य सम्पन्धमामान्पे पछीजनगमुदायेनेत्यर्थः 'मारिभूया' अपरिभूताः- पराभवरहिता चाप्यासन् । तत खलु तेपा सयारानीका नाणिज कानाम् अन्यदा- अन्यस्मिन् कस्मिभित्समय 'एगयो'एक एकत्रमिलिया जहा अरहण्णओ' यथा अईन्नक-अरेगाष्टमा ययनोक्ताईनान् यावत् लपणसमुद्रमनेकानि योजन शतानि 'ओगाहा' अवगाहा: उत्तीर्णायप्यागन् । तत तत्र सलु तेपा यार वहूनि ' उप्पाइयसयाइ ' औत्पातिकशतानि आकस्मिोत्पातशतानि यथा माक न्दिकदारकयो:-निनरक्षितजिनपालितयोः सनातानि तथैवास्यापि यावत् कालि यवाए ' कालिकनातः मलयकालिकात्मचण्डयातच तन समुत्यितः । ततः तदन न्तर खलु सा नौका तेन कालिकयातेन 'आपोलिजमाणी . ' आघूर्ण्यमाना २ पुन: पुनम्यिन्ती 'सचालिज्जमागी २' सचाल्यमाना २ पुन' पुनथाल्य हस्तिशीर्ष नगर में अनेक पोत चणिक (नाबसे व्यापार करने वाले) ररते थे। ये एक साथ मिलकर ही परदेश मे जाकर व्यापार किया करते थे। इनकी उस नगर में अच्छी प्रतिष्ठा थी-कारण ये सब के सब लक्ष्मीदेवी के विशेष रूप से कृपापात्र थे। (तण्ण तेसिं सजत्ता णोवा वाणियगाणं अन्नया गयाओजहा अरहण्णाभो जान लवणसमुद्द अणेगाड जोयण सयाइ ओगाढा यावि होत्या, तण्ण तेसिं जाव यदृणि उप्पाइयसयाइ जहा मागदियदारगाण जाव कालियवाए य तत्थ समुत्थिए, तएण सा तेण कलियवारण आयोलिजमाणी २ सचालिजमाणी २ सखोहिजमाणी આ રાજાનું વર્ણન પણ महया हिमव त" वगैरे ३५. पाना मध्य યમાં વર્ણિત રાજાઓનું વર્ણન જેવું જ જાણી લેવું જોઈએ તે હસ્તિ શીર્ષ નગરમાં ઘણું પિતવણિકે (વહાણ વડે વેપાર કરનારા) રહેતા હતા તેઓ સવ એકી સાથે મળીને પરદેશમાં જતા અને ત્યા વેપાર કરતા હતા તે નગરમા તેમની સારી એવી પ્રતિષ્ઠા હતી કેમકે ખાસ કરીને તેઓ સર્વે લક્ષમીના કૃપાપાત્ર હતા (तएण तेसिं सजता णारा वाणियगाण अन्नया एगयाओ नहा अरहण्णओ जार लपणसमुद्द अणेगाड जोयणसयाइ ओगाहा यावि होत्था, तएण तेसिं नाव वहणि उप्पाइयसयाइ जहा मागदियदारगाण जार कालियवाए य तत्य समु थिए तएण सा णावा तेण कलियवारण आपोलिज्जमाणी २ - - मनगारधर्मामृतवपिणी टी० अ० १७ कालिकद्वीपगत आकीर्णाश्वधक्त यता ६०१ प्रविशन्ति, अनुपविश्य यौव कनस्केत राजा तदोपागच्छन्ति, उपागत्य यावत् वत्माभृतम् ' उपणेति ' उपनयन्ति भूपसमीपे स्थापयन्ति ॥ मू०२ ।। मूलम्-तएणं से कणगफेऊ राया तेसि सजत्ताणावावाणि- यगाण त महत्थ जाव पडिच्छइ पडिच्छित्ता त सजत्ताणावा- वाणियगा एवं वयासी तुमेणं देवाणुप्पिया । गामागार जाव अहिंडह लवणसमुद च अभिक्खण२ पोयवहणेणं ओगाहह तं अस्थि आई केइ भे कहिनि अच्छेरए दिटुपुव्वे ?, तएणं ते सजत्ताणावावणियगा कणगऊ एव वयासी-एव खलु अम्हे देवाणुप्पिया । इहेब हस्थिसीले नयरे परिवसामो त चेव जाव कालियदीव तेणं सबूढा, तत्य ण वहवे हिरण्णागरा य जाव कणगकेज राया तेणेव उवागच्छ, उघागच्छित्ता जाय उवति) वहाँ आकर के वे लोग उस हस्तिशी नगर के बाहर के प्रधान उद्यान में ठार गये वहा ठरर उन्हो ने वही पर शकटी-गाडी शाकटो-गाडों की ढील-टएरा दिया। ढीलकर के गद में महार्थ-महाप्रयोजन सावक भूत -यावत् प्राभृत भेट को उन्हों ने अपने २ हाथो मे लिया-और लेकर के वे हस्तिशीर्ष नगर में प्रविष्ट हुए नगर में प्रविष्ट होकर वे जहा कनक केतु राजा ये वहा पहुँचे। वहा पहुंचक उन्हो ने उस महाप्रयोजन साधक भूत प्रामृत को राजा के पास रख दिया। सू०२॥ हत्थिसीस नगर अणुपविसति, अणुपरिसित्ता, जेणेन कणगकेक राया तेणेव उवा गच्छइ, उदोगच्छित्ता जाव उवति) ત્યા આવીને તેઓ બધા તે હસ્તિથી4 નગગ્ની બહારના મુખ્ય ઉદ્યા નમાં રેકાઈ ગયા, ત્યાં કાઈને તેમણે ત્યાં જ शटी-गाडी भने शाट ગાડાઓને છોડી મૂકયા ત્યારબાદ તેમણે મહાથ–મહાજન સાધક ભૂત થાવત ભેટને પિતપોતાના હાથમાં લીધી અને લઈને તેઓ હસ્તિશીર્ષ નગ માં પ્રવિણ થયા નગરમાં પ્રવિણ થઈને તેઓ જ્યા કનકકેતુ રાજા હતા ત્યા પહોંચ્યા ત્યા પહેચીને તેમણે તે મહાપ્રયજન સાધક રૂપ ભેટને રાજાની સામે મૂકી દીધી છે સૂત્ર ૨ ज्ञा ७६ ARDA गाधर्मचारी वा दिशा विदिशा मति मे पोतदनम् नौकायान 'मारिए' अपहतम् महा पानेन नीतम् : इनि । इति करयाइतिमनगि निधाय अपहतमनः समन्पो यावर +यायति मार्ग यान करोति । तत ग्पन्नु ते पहा सिधारा-गार्थ तो नौका चालकाः पर्णधाराम-नागि' । 'गम्भिलगाय' गार्भयका नीमध्ये यथाव सर कम करा, सयात्रानीका गणिनफा-माण्डपतयथ यम निर्यामसान्नौका धिपतिस्तत्रयोपागन्छन्ति, उपागत्य परम गादिपु:-किंबलु यूय हे देशानुभियाः। अपहतमन सकल्पाः निरत्साहमनमा यारत् 'मियायद ध्यायथ आतध्यान कुरुथ, भारार्थे पहुवचनम् । तत खल म निर्याम मस्तान बहन कुक्षिधाराश्च ४ फयर देम या दिम वा चिदिस वा पोयवरणे अवरित्ति कटूड) अतः जप उसे इस बात का भी ज्ञान नहीं रहा कि यह महावीत मेरी नौका को किस दिशा अपरा विदिशा की ओर ले गया है-तय इस प्रकार मन में विचार कर के यह (ओत्यमगसकप्पे जार प्रियायह) अपहत मन. सकल्पवाला पनकर यारत् आर्तध्यान करने लगा। (तपण ते परवे कुपिउधारा य कण्णधारा प गम्भिल्लगा य सजत्ता णावो वाणि यगा य जेणेव से णिज्जामए तेणेच उचागच्छद) इतने में अनेक कुक्षि धर-पार्थ में बैठकर नौका चलाने वाले कर्णधार-नाविक, गायक-नौका के भीतर ययावसर काम करने वाले और सांयात्रिक पोत वणिक जरा यह निर्यात्रिक या-वहा आये। (उागघिउत्ता एव वयासी-किन्न तुम देवाणुप्पिया ओत्यमणस कप्पो जाव शियायह-तरण से णिज्जामए गयो (ण जाणाइ कयर देस वा दिस वा विदिस वा पोयवहणे अवहिएति कटु) એથી જ્યારે તેને આ વાતની પણ ખગર રહી નહિ કે આ મહાવાત અમારી નૌકાને કઈ દિશા અથવા તે વિદિશા તરફ લઈ ગયો છે ત્યારે મનમાં આ सतना पियार ४शन ते (ओइयमणस कप्पे जाव झियायइ) अपडतमन સકલપવાળે થઈને યાવત્ આર્તધ્યાન કરવા લાગ્યો (तएण ते वह कुन्छिधारा य कण्णधारा य गम्भिल्लगा य सजत्ता णावा वाणियगा य जेणेव से णिज्जामए तेणेग उवागच्छद) એટલા મા ઘણું કુક્ષિધર–પામાં બેસીને નૌકા ચલાવનારા, કર્ણધાર નાવિક, ગાર્મેયક-નોકામાં યથા સમય કામ કરનારા અને સાયાત્રિકે–પિત વણિકે જ્યા તે નિર્ધામક હતું ત્યાં ગયા (उवागच्छिता एव चयासी-किन्न तुम देवाणुपिया ओहयमणसकप्पा जाव झियायह-तएण से गिज्जामए ते वहवे कुच्छिमारा य ४ एव_वयासी- मनगारवर्मा नविगी टी० य. १७ कालिकहीपगतआकोश्चिवक्तव्यता ६०॥ य पावरणाण य नवतयाण य मलयाण य मसूराण य सिला- वाण य जाव हंसगम्भाण य अन्नेसि च फासिदिय पाउग्गाणं दव्याणं सगडीसागड भरेति भरित्ता सगडीसागडं जोएति जोइत्ता जेणेव गंभीरए पोयट्ठाणे तेणेव उवागच्छति उवाग- च्छित्ता सगडीसागडं मोएति मोइत्ता पोयवहणं सजेति सजित्ता तेसि उकिटाणं सद्दफरिसरसरूवगंधाणं कठुस्स य तणस्स य पाणियस्त य तदुलाण य समियस्स यगोरसस्स य जाव अन्नति च वहण पोयवहणपाउग्गाण पोयवहणं भरेंति भरित्ता दक्खि णाणुकूलेणं वाएणं जेणेब कालियदीवे तेणे उवागच्छइ उवा- गच्छित्ता पोयवहणं लबेति लंवित्ता ताइ उकिट्ठाइ सदफरिसरस रूवगधाई एगद्वियाहि कालियदीवे उत्तारेति । जहि २ च णं ते आसा आसायति वा सयति वा चिट्ठति वा तुयति वा तहि २ च णं ते कोथुवियपुरिसा ताओ वीणाओ य जाव वित्त वीणाओ य अन्नाणि य चहूणि सोइदियपाउग्गाणि य दवाणि समुदीरेमाणा चिटुंति तेसि परिपरंतेण पासए ठवेति ठवित्ता णिच्चला णिप्फदातुसिणीया चिटुंति,जत्थर ते आसा आसयंति वा जाव तुयद्दति वा तत्थ तत्थ णं ते कोडवियपुरिसा बहूणि किण्हाणि य ५ कहकम्माणि य जाव सघाइमाणि य अन्नाणि य वहूणि चक्खिदियपाउग्गाणि य दव्वाणि ठवेति तेसि परि- पेरतेण पासए ठवेंति ठवित्ता णिच्चला णिप्फदा तुसिणीया चिट्टति जत्थ २ ते आसा आसयति ४ तत्थ २ ण तेसिं वहूर्ण हातापाय चहवे तत्थ आसा किं ते ?, हरिरेणु जाव अणेगाई जोयणाइ उन्भमंति, तएणं सामी अम्हेहि कालियदीवे ते आसा अच्छे- रए दिट्टपुव्वे, तएण से कणगकेज राया तेसिं सजत्तगाणं अंतिए एयमट्ट सोच्चा ते सजत्तए एवं वयासी-गच्छहणं तुन्भे देवाणुप्पिया मम कोडुंबियपुरिसेहि सद्धि कालियदीवाओ ते आसे आणेह, तएण ते संजत्ताणावावाणियगा कणगकेऊ रायं एवं वयासी-एवं सामि तिकटु आणाए पडिसुणेति, तएणं कणगकेऊ राया कोडुवियपुरिमे सद्दावेड सहावित्ता एवं वयासी-गच्छह णं तुम्भे देवाणुप्पिया ! संजत्तिएहि सद्धिं कालियदीवाओ मम आसे आणेह, ते वि पडिसुणेति, तएणं ते कोडुविय० सगडीसागडं सजेति सजित्ता तत्थ ण वहूर्ण वीणाण य वल्लकीण य भामरीण य कच्छभीण य भंभाण य छब्भामरीण य वित्तवीणाण य अन्नेसि च बहूण सोतिदिय- पाउग्गाण दवाण सगडीसागड भरेंति भरित्ता बहूणं किण्हाण य जाव सुकिलाण य कटकम्माण य ४ गंथिमाण य ४ जाव सघाइमाण य अन्नेसिं च बहूणं चक्खिदियपाउग्गाणं दव्वाणं सगडीसागड भरेति वहूर्ण कोहपुडाण य केयईपुडाण य जाव अन्नेसि च बहूणं घाणिदियपाउग्गाणं दवाण सगडीसागड भरेंति बहुस्स खडस्स य गुलस्स य सकराए य मच्छंडियाए य पुप्फुत्तर पउमुत्तराण य अन्नेसि च जिभिदियपाउग्गाणं दवाणं सगडीसागड भरेति । बहूण कोयवियाण य कबलाण ।
-- . भनगारधर्मामृतपिणी टो० अ० १७ कालिकद्वीपगत आकीर्णाश्वरक्तव्यता ६०५ टीका-'तएण से' इत्यादि । ततः खलु स कनर केनू राजा तेपा सयान नौकावाणिजकाना तन्महार्य यावन् माभृत 'पडिच्छइ' प्रतीच्छति-स्वीकरोति पतीप्य तान् सयाननौकाराणिजमान् एवमराठीत्-यूय सल हे देवानुप्रियाः ! गामागर जात्र अहिंडह ' ग्रामाकर यावत् - ग्रामाफरनगरादिपु आहिण्डथ= गछत, लमणसमुद्र च अभीक्ष्म २ पोतदनेन अवगाहचे 'त' तत्-तर्हि अस्ति 'आउ' इतिमाक्यालद्वारे किमपि 'भे ' युष्माभिः 'कहिचि' कुचिद् अच्छे(ए ' आश्चर्यकर्म आश्चर्यजनामस्तु 'दिट्टपुत्रे ' दृष्टपूर्वम् ? यदि दृष्टमस्ति तर्हि क्थयतेतिभावः । ततः सलु ते सयात्रनौकावाणिजका कनककेतुमेवमय -तएण से कणगके राया इत्यादि । टीकार्य-(तण्ण) इसके बाद से कणगऊराया) उस कनककेतु गजा ने (तेसिं सजता गारा वाणियगाण त महत्व जाव पडिइ, पडि- च्छित्ता-ते सजत्ता णाया वाणियगा एव बयासी-तुम्भे ण देवाणुप्पिया। गामगर जाब आहिंडर लवणसमुह च अभिरवण २ पोयवणेण ओगाहह त अविआइ केइ भे कहिंचि अच्छेरए दिट्ठपुव्वे ?) उन सायात्रिक पोतयणिक जनों की उस महार्यसाधक भेट को स्वीकार कर लिया और स्वीकार करके फिर उन सायात्रिक पोतवणिक जनों से इस प्रकार कहा हे देवानुमियों तुमलोग अनेक ग्राम आकर नगर आदि स्थानों में जाते रहते हो और बार २ पोनवन द्वारा लवणसमुद्र में अवगाहन करते रहते हो तो करो कही पर तुम ने यदि कोई आश्चर्य कोरी वस्तु देवी हो तो को-(ताणं ते सजत्ता णावा वाणियगा कण तएण से कणगके राया इत्यादि- A- (तएण ) त्या२५छी (से कणगरे ऊ राया) ते नतु २००१ मे ( तेसिं सजत्ता णापा वाणियगाण त महत्य जार पडिच्छइ, पदिच्छित्ता- ते सजाता जाना चाणियगा एव क्यासी-तुम्भेण देवाणुप्पिया ! गामागर जान आडिह लवणममुः च अभिक्खण २ पोयवहणेणं ओगाहह त अत्थि आइ केइ मे कहिचि अन्रए दिद्वपुब्वे ?) તે સાયાવિક પિતવણિક જનની તે મહાઈ સાધક ભેટને સ્વીકારી લીધી અને સ્વીકારીને તે માયાવિક તિવણિકજનને આ પ્રમાણે કહ્યું કે હે દેવાનુ પ્રિયે ! તમે લેકે ઘણું ગામ, આકર, નગર વગેરે સ્થાને મા આવજા કરતા રહે છે અને વહાણ વડે લવણ સમુદ્રની વાર વાર યાત્રા કરતા રહે છે તે અમને કહે કે તમે કઈ નવાઈ પમાડે તેવી અદ્ભુત વસ્તુ જોઈ છે? - २०४ माताधर्मव्यास कोटपुडाणा य जाय अन्नेसिं च बहूणं घाणिदियपाउग्गाणं दव्वाणं पुंजे य णियरे य करेंति करिता तेसिं परिपेरतेणंजाव चिट्ठति जत्थ २ णं ते आसा आसयति ? तत्थ २ णं गुलस्स जाव अन्नोसि च वहूर्ण जिभिदियपाउग्गाय दवाणं पुंजे य निकरे य करेंति करित्ता विचरए खणति खणित्ता गुलपाणगस्स खंडपाणगस्स जान अन्नेसि च बहण पाणगाण वियरे भरेति भरित्ता तेसि परिपेरतेण पासए ठति जान चिटुंति, जहिं २ च णं ते आसा आस० तहिं २ च णं ते वहवे कोयविया य जाव हसगम्भा य अण्णाणि य चहणि फासिंदिय पाउग्गाई अत्यपञ्चत्थुयाइ ठवेति ठवित्ता तेसिं परिपेरतेणंजाव चिट्ठति, तएणं ते आसा जेणेव एते उकिडा सद्दफारिसरसरूवगंधा तेणेव उवागच्छति उवागच्छित्ता तत्थण अत्थेगइया आसा अपुव्वा णं इमे सदफरिसरसरूवगंधा इतिकटु तेसु उकिडेसु सदफरिस- रसरूवगंधेसु अमुच्छिया ४ तेसिं उकिहाण सह जाव गंधाणं दूरदूरेणं अवक्कमति, तेणं तत्थ पउरगोयरा पउरतणपाणिया णिब्भया णिरुव्विग्गा सुह सुहेण विहरति, एवामेव समणाउसो। जो अम्ह णिग्गथो वा णिग्गथी वा जाव सदफरिसरसरूवगंधेसु णो सज्जइ णो रज्जइ णो गिज्झइ, णो मुज्झइ णो अज्झोववज्जेइ से णं इहलोए चेव वहण समणाण ४ अच्चणिजे जाव वीइ- वइस्सइ ॥ सू०३ ॥ 1 भनगारधामृतवपिणी री० १० १७ कालिकद्वीपगत आफीश्चिवक्तव्यता ६.७ कनककेतू राजा तेपा 'सजनिगाण' सायात्रिकाणामन्तिके एतमर्थ श्रुत्वा तान् सायानिकान् एमवदत्-गन्छत खलु यूय हे देवानुप्रियाः ! मम कौटुम्बिक- पुरुषैः सार्द्ध कालिकद्वीपात्तानश्वानानयत । ततः खलु ते सयानानौमाणिजका कनककेतु राजानगेगमपादिपुः हे स्वामिन् ! एनमस्तु 'त्ति कटु' इति कृपा- इत्युक्त्वा 'आणाए' आज्ञायाः आज्ञामित्यर्थ,-'पडिमुणेति' प्रतिशृणन्ति- कर वहासे कइ योजन दूरतक जगल में भाग गये । अतः हे देवानुपिय "कालिकद्वीप में हमलोगों ने उन घोडों रूपी आश्चर्य को देवा है। (तएण से कणगकेऊ राधा तेसिं सजत्तगाण अतिए एयमट्ट सोच्चा ते सजत्त एवं वयासी-गच्छह णं तुम्भे देवाणुप्पिया मम कोडुपिय पुरि- सेहिं सद्धि कालियदीवाओ ते आसे आणेह तएण ते सजत्ता णाया वाणिगया कणगऊ राय एव वयासी एव सामित्ति कटु आणाए पडिसुणेति, तण्ण कणगकेज राया कोडुयियपुरिसे सद्दावेड, मक्षावित्ता एव चयासी-गच्उरण तुम्भे देवाणुप्पिया ! सजत्तिहिं सद्धिं कारिय दीवाओ मम आसे आणेह, ते वि पडिसुणेति ) इमके बाद कनक केतु राजा ने उन सायात्रिक पोतवणिजनो के मुग्व से इस अर्थ को सुन- कर सन सायात्रिकों से इस प्रकार कहा हे देवानुप्रियो ! तुमलोग जाओ और मेरे कौटुम्बिक पुरुषो के साथ कालिकद्वीप से उन अश्वो को लाओ। इस प्रकार सुनकर पोतवणिरु जनो ने कनक केतु राजा से ऐसा कहा વનમાં નાસી ગયા હે દેવાનુપ્રિય! અમે એ કાલિક દ્વીપમાં તે અશ્વ રૂપી અદ્ભુત વસ્તુને જોઈ છે (तएण से कणग के ऊ राया तेसि सजत्तिगाण अंतिए एयमह सोचा ते सजत्तए एर वयासी-गच्छहण तुब्भे देवाणुप्पिया ! मम कोडुपियपुरिसेहिं सद्धि कालियदीवाओ ते आसे आणेह, तएण ते सजत्ता णावा वाणियगा कणग केज राय एव बयासी एव सामी त्ति कटु आणाए पटिमुणेति, तएण कणगरे राया कोड बियपुरिसे मद्दावेद, सद्दावित्ता एव वयासी-गच्छण तुम्भे देशणु- पिया ! सजत्तिएहि सद्धि कालियदीवाओ मम आसे आणेह, ते विपडिसूणेंदि) ત્યારબાદ કનકકેતુ રાજાએ તે સાયાત્રિક પિતવણિકજનેના સુખથી આ વાતને સાભળીને તે સાયાત્રિકોને આ પ્રમાણે કહ્યું કે હે દેવાનુપ્રિયે ! તમે લોકે મારા કૌટુંબિક પુરુષની સાથે કાલિક દ્વીપમાં જાઓ અને ત્યાથી તે અને લા આ પ્રમાણે કનકકેતુની આજ્ઞા સાભળીને તે પિતવણિકજનોએ તેમને આ પ્રમાણે કહ્યું કે હે સ્વામી! તમારી આજ્ઞા અમારા માટે પ્રમાણ સ્વરૂપ છે આમ કહીને તેમણે કનકકેતુ રાજાની આજ્ઞા સ્વીકારી લીધી ત્યારે - - . भाताचा दन्-एव खलु पय हे देशानुप्रियाः । हेर हस्तिशीर्ष नगरे परिवसामः, 'तर' तदेव पूक्तिवर्णन सर्वमत्र रायम् ' जार' यारन् फारिकद्वीपान्ते कालिक द्वीपममीपे सलु ' सदा' सम्पदा:-माता, तब पलु गहलो दिरण्याराश्च यावद् वहवस्तत्रायाः सन्ति, स्तिरिम्भूतास्ते ? इत्याह-'हरिरेणु जाव' हरिदेणु शोणि सूत्रकाः पापद्-तेऽस्मद्गन्धमात्राय भीताः सन्तःअनेकानि योजनानिदरम् 'उम्म मति' उद्ममन्ति पलायन्ते स्म, ता. खलु हे सामिन् । अस्माभि "कालिक- द्वीपे तेऽश्याः सन्ति " तर 'अन्रए ' आर्यक दृपूपिति । ततः ग्वल स गकेज एव चयामी एवम अम्हे देशणुपिया! इव स्थिसीसे नपरे वसामो त चेत्र जार कालियदीय तेण सहा तत्थ ण याये शिरणागरा य जाव यावे तत्व आता पिते हरिणेणु जार अणेगाइ जोयणाइ उम्भ मति-तपण मामी अम्हें रि कोलियदीवे ते आसा अरेरण दिट्ठपुग्वे) इस प्रकार राजा की यात सुनकर उन सायानिक पोतवणिगजनों ने उन कनककेतु राजा से कहा हे देवांनुप्रिय! हमलोग इसी हस्तिशीर्ष नगर में रहते हैं। हमलोग यहा से लवणसमुद्र में रोकर व्यापार के निमित्त बाहर परदेश गये हुए थे- मार्ग में हमलोगो को अनेक प्रकार के सैकडो उपद्रव हुए-उनसे जिस किसी तरह सुरक्षित हो हमलोग कालिकद्वीप के समीप पहुँच गये। व हमने अनेक हिरण्य आदि की ग्वानो को एव अनेक अश्वों को कि जिनका कटिभाग हरिद्वर्णवाली धूलि से रचित कटिसूत्रसे चिन्तित या देखा, वे हमलोगों की गध को सूध (तएण ते सजता णामा वाणियगा कणगके एव चयासी-एव खलु अम्हे देवाणुप्पिया ! इहेव हथिसीसे नयरे वसामो त चेत्र जार, कालिश्र दीव तेण सबूढा, तत्थ ण वहवे हिरण्णागरा य जाव वहवे तत्य आसा कि ते ? हरि- रेणु जाव अणेगाइ जोयणाइ उब्भमति-तएण सामी अम्हेंहि कालियदीवे ते आसा अच्छेरए दिहपुच्चे) આ પ્રમાણે રાજાની વાત સાંભળીને તે સયાત્રિક પિતવણિક અને તે કનકકેતુ રાજાને કહ્યું કે હે દેવાનુપ્રિય! અમે બધા આ હસ્તિશીર્થ નગર મા જ રહીએ છીએ અમે બધા વ્યાપાર ખેડવા માટે અહીંથી લવણ સમુદ્રમાં થઈને બહાર પરદેશમાં ગયા હતા રસ્તામાં ઘણી જાતના સેકડો ઉપદ્રવ થયા છે. ગમે તેમ કરીને સુરક્ષિત રૂપમાં અમે બધા કાધિકદ્વીપની પાસે ગયા ત્યા અમોએ ઘણી હિરણ વગેરે ખાણને અને ઘણા અશ્વોને-કે જેમના કટિભાગે લીલા રંગની માટીથી બનાવેલા કટિસૂત્રથી ચિહિત હતા જોયા અમારી ગંધને સૂળીને તે અશ્વો ત્યાથી કેટલાક કે - ર સુધી . - अनगारघामृतवपिणी टी० अ०१७ कालिकद्वीपगत आकीर्णाश्ववक्तव्यता ६० 'वित्तमीणाणय' वृत्तवीणानाम्गोलाकार वीणाना च-अन्येपा च बहनां नानाविधानां 'सोइदियपाउम्गाण 'श्रोगेन्द्रिय प्रायोग्याणा कर्णेन्द्रियमुखजनकाना द्रव्याणां- तन्यादिरूपाणा शकटीशाकट भरन्ति तैवीणादिभिरित्यर्थ , भृत्वा बहूना 'किण्हा. णय जाय मुकाणय ' कृष्णाना यावत्-नीलाना पीताना रक्ताना शुलानां च कृष्णादिपञ्चवर्णयुक्ताना 'क्ट्टकम्माण य' काष्ठकर्मणाकाष्ठनिर्मितपुत्तलिकादी- नाम् , ' पोत्थकम्माणय' पुस्तपु फर्मगा-पुम्तेपु-यत्रताडपत्रकर्गलादिपु कर्माणि- टेखनकर्माणि, तेपाम् , 'चित्तकम्माण य' चित्रकर्मणा पट्टकादिषु चित्ररूपा- णाम् , ' लेप्पकम्माणय' लेप्पकर्मणान्मृत्तिकासे टिकादिना वल्ल्याद्याकाररचना विशेषरूपाणाम् , तथा-'गथिमाण य' ग्रन्थिमाना-कौशलातिशयेन ग्रन्थिसमु- दायनिष्पादितानाम्-यात्-'वेढिमाण य' वेप्टिमाना लतादि चेष्टनतो निष्या- दितानाम् , ' पूरिमाण य' पूरिमाणा-कनकादिषु पुत्तलिकावत् छिद्रादिपूरणेन के आकार जैसी वीणाओं को, भभाओं भेरियो-को, पडू भ्रामरियों को -गोलाकार वीणाओं को, तया और भी अनेक विधोत्रेन्द्रिय सुखज- नक तत्री आदिरूप द्रव्यों को, भरा-भर करके फिर नीले, पीले, रक्त, शुक्ल और कृष्ण रग से रगे हुए काठ के बने हुए खिलौनों को, पुस्त- कर्मों को-वस्त्र, ताडपत्र एवं कागज आदि पर लिखे विविध प्रकार के लेम्वों को, निबन्धों को उपदेश पूर्ण-दोहे चौपाइ आदि में लिखी हुई कविता आदि को को-चित्रकों को-पटिया आदि पर उकेरे गये विविध चित्रों को-लेप्यकर्मो को-मृत्तिका सेटिका आदि से यल्ली आदि रूप में बनाये गये चित्रों को, ग्रथिमों को विशेप चतुराई के साथ गांठों से धनाये गये खिलौनों को, लनाओं आदि द्वारा वेष्टित करके २ रची गई चीजों को, योपियों को, हाथों की पैरों की अगुलियों में पहिरने योग्य જેવી વાણુઓ, ભાભાઓ-ભેરીઓ (નગારાઓ) –ભ્રામરીઓ, ગોળ આકાર વાળી વણિઓ તેમજ બીજા પણ ઘણા કણેન્દ્રિયને સુખ આપે તેવા તત્રી વગેરે સાધનાને ભર્યા ભરીને લીલા, પીળા, રાતા, સફેદ અને કાળા રંગથી ૨ગાએલા લાકડાના બનેલા રમકડાને, પુસ્તકર્મોને-વસ્ત્ર તાડપત્ર અને કાગળ વગેરે ઉપર લખાએલા જાતજાતના લેખેને, નિબ ને, હા, ચોપાઈ વગેરેમાં લખાએલી ઉપદેશક કવિતાઓ વગેરેને, ચિત્ર કર્મોને-ફલક વગેરે ઉપર ચિત્રિત કરેલા ઘણા ચિત્રને લેપ્ય કર્મોને, માટી સેટિક વગેરેથી લતા વગેરે રૂપમાં બનાવવામાં આવેલા ચિત્રોને, ગ્રથિમેને વિશે ચાતુર્યથી ગાઠોથી બનાવવામાં આવેલા રમકડાને, લતાઓ વગેરે વડે વેષ્ટિત કરીને બનાવવામાં આવેલી વસ્તુ बा ७७ ६०८ पातापा स्वीकृन्ति । ततः खलु पनरुफेत रामा कोदुम्पिकपुरधान दयनि, मन्दापिता एमादीत-गाउन खलु यप हे देशानुमिगाः । गोयात्रिक' मा पालिसीपात् मयम् अधानानयत । तेऽपि गौतुम्बिापुमा परिणनि' प्रतिमान 'तथास्तु' इत्युक्त्या रानाशा स्पोन्ति । ततः खलु ते चोदुन्धिकपुम्पाः शक्टीशाकटं 'सज्जेंति' सज्जयन्ति-शालिग्द्वीपे गमनाथ मज्नीन्ति, सजयित्वा तत्र खलु माफटीशाफ्टे बना च बहसीनां च, ग्रामरी गांव मीण य' बन्छमीना च- 'कभी' इति पच्छाकारलीणाविशेषः, मभाना भेगमा च, पइभ्रामरीणां च, हे-स्वामिन् । रमें आपकी आज्ञा प्रमाण है-ऐसा कहकर उन्हों ने कनक केतु राजा की आज्ञा को स्वीकार कर लिया। इसके पाद कनक केतु राय ने अपने कोम्यिक पुरुषों को बुलाया और घुलाकर उनसे ऐसा कहा-हे देवानुप्रियो ! तुम मायात्रिक पोतरणिक जनों के साथ जाओ -और फालिरदीप से मेरे लिये घोड़ों को ले आओ। राजा की इस आज्ञा को उन लोगों ने भी स्वीकार कर लिया। (तपण ते कोडुषियपु रिसामगडीसागड सज्जेंति, मज्जिता तत्थण यहण चीणाण य बल्ल कीण य भामरीण य कभीण यममाण य उन्मामरीण वित्तवीणाण य अन्नसिं च पण सोइदिय पाउमाण दव्याण सगडी सागट भरेंति, भरित्ता सण किण्हाण य जाव सपाइमाण य अन्नेसिं च बहण चस्सिदियपाउगाण दयार्ण सगडीमागड भरेति ) इसके बाद उन कौटुम्पिक पुरुषों ने गाड़ी और गाड़ों को मज्जित किया-सज्जित करके उनमें उन्हों ने अनेक वीणाओ को, वल्लकियों को, भ्रामरियों को, कच्छप બાદ કનકકેતુ ગજાએ પિતાના કૌટુંબિક પુરુને લાવ્યા અને બેલાવીને તેમને આ પ્રમાણે કહ્યું કે હે દેવાધિ ! તમે સાયાત્રિક પિતવણિકજનેની સાથે જાઓ અને કાલિક દ્વીપમાથી મારા માટે ઘોડાઓને લા રાજાની આ આજ્ઞાને તે લેકે એ પણ સ્વીકારી લીધી (तपण ते कोरियपुरिसा सगडीसागड सन्जेति, सज्जित्ता तत्थण बहूण वीगाण य बल्लकीण य भामरीणय कच्छभीणय भभाण य छब्भामरीण य वित्तवीणाण य अन्नेसिं च वहण सोइ दियपउग्गाण दव्याण सगडीसागड भरेंति, भरित्ता चढूण किण्हाण य नाव सवाइमाण य अन्नेमि च बहूण चक्खि दियपाउग्गाण दव्याण सगडीसागड भरेंति) ત્યારપછી તે કૌટુંબિક પુરુષએ ગાડી અને ગાડાઓને જેતય નેત રીને તેમાં તેમણે ઘણી વણાઓ, વાલીએ બ્રામરીએ, કાચબાના આકાર - - - . अनगारधामृतवपिणी टी० स०१७ कालिकद्वीपगत आकीर्णाश्ववक्तव्यता ६०५ 'वित्तपोणाणय' वृत्तवीणाना=गोलाकार वीणाना च-अन्येषा च बहूनां नानाविधानां 'सोइदियपाउग्गाण' श्रोगेन्द्रिय पायोग्याणा कर्णेन्द्रियसुखजनकाना द्रव्याणां तन्व्यादिरूपाणा शकटीशाकट भरन्ति तैर्वीणादिभिरित्यर्थ , भृत्वा बहूना 'किण्हा- णय जाव सुकाणय' कृष्णाना यावत्-नीलाना पीताना रक्ताना शुक्लानां च कृष्णादिपञ्चवर्णयुक्ताना 'क्लुकम्माण य ' काष्ठकर्मणाकाष्ठनिर्मितपुत्तलिकादी- नाम् , ' पोत्थकम्माणय' पुस्तषु कर्मगा-पुस्तेपु-यत्रताडपत्रकलादिपु कर्माणि= लेखनकर्माणि, तेपाम् , 'चित्तकम्माण य' चित्रर्मणा-पट्टकादिपु चित्ररूपा- णाम् , ' लेप्पफम्माणय' लेप्यकर्मणान्मृत्तिकासे टिकादिना वल्ल्याद्याकाररचना विशेषरूपाणाम् , तथा-'गथिमाण य' ग्रन्थिमाना-कौशलातिशयेन ग्रन्थिसमु- दायनिष्पादितानाम्-यानत्-'वेढिमाण य' वेप्टिमाना लवादि वेष्टनतो निष्पा- दितानाम् , 'पूरिमाण य' पूरिमाणानकादिषु पुत्तलिकावत् छिद्रादिपूरणेन के आकार जैसी वीणाओं को, भभाओं भेरियो-को, पडू भ्रामरियों को -गोलाकार वीणाओं को, तया और भी अनेक विधोत्रेन्द्रिय सुखज- नक तत्री आदिरूप द्रव्यों को, भरा-भर करके फिर नीले, पीले, रक्त, शुक्ल और कृष्ण रग से रगे हुए काठ के बने हुए खिलौनों को, पुस्त- कर्मो को-वस्त्र, ताडपत्र एव कागेज आदि पर लिखे विविध प्रकार के लेखों को, निवन्धों को उपदेश पूर्ण-दोहे चौपाइ आदि में लिखी हुई कविता आदि को को-चित्रकों को-पटिया आदि पर उकेरे गये विविध चित्रों को-लेप्यकर्मो को-भृत्तिका सेटिका आदि से बल्ली आदि रूप में बनाये गये चित्रों को, ग्रथिमों को विशेष चतुराई के साथ गाठों से धनाये गये खिलौनों को, लताओं आदि द्वारा वेष्टित करके २ रची गई चीजों को,-योपियों को, हाथों की पैरों की अगुलियों में पहिरने योग्य की पीसी, म मामा-रीमा ( ना२।।) ५३-ब्रामरीमा, गो मार વાળી વણઓ તેમજ બીજા પણ ઘણું કન્દ્રિયને સુખ આપે તેવા તત્રી વગેરે સાધનને ભર્યા ભરીને લીલા, પીળા, રાતા, સફેદ અને કાળા રંગોથી ગાએલા લાકડાના બનેલા રમકડાને, પુસ્તકર્મોન-વસ્ત્ર તાડપત્ર અને કાગળ વગેરે ઉપર લખાએલા જાતજાતના લેખેને, નિબ છેને, દુહા, એપાઈ વગેરેમાં લખાએલી ઉપદેશક કવિતાઓ વગેરેને, ચિત્ર કર્મોને-ફલક વગેરે ઉપર ચિત્રિત કરેલા ઘણા ચિત્રને લેખ કને, માટી સેટિકા વગેરેથી લતા વગેરે રૂપમાં બનાવવામાં આવેલા ચિત્રોને, ગ્રથિમેને વિશે ચાતુર્યથી ગાઠેથી બનાવવામા આવેલા રમકડાને, લતાઓ વગેરે વડે વેષ્ટિત કરીને બનાવવામાં આવેલી વસ્તુ , - । - - नानाधर्मकथा निप्पादितानाम् , 'सघारमाण य' सहातिमानां लोकाष्ठादिमी ग्यादिवत् पातु- समू निष्पादितानाम् , तथा-अन्येषा न रहना नगिटियपाउग्गाण ' चक्षुरि न्द्रियमायोग्याणान्नयनान ननकाना दम्याणा शक्टीशायट मरन्ति । तथा बहना कोट्टपुडाण य' कोष्टपुटाना = सुगन्धिद्रगतिशेपाणां च केतकीपुरानां च यावत्-एलापुटानां न, तुमपुटाना , उगीरपुटाना= सम' इतिमाषा प्रसिद्धमुगन्धिद्रव्याणा च, ल्यापुटाना चेत्यादि । अन्येषां च पहूना घ्राणेन्द्रिय प्रायोग्याणा द्रव्याणा शस्टीशास्ट भरन्ति । तया होः सण्डस्य च गुडस्य च शर्करायाध 'मिसरी' इति भाषा मसिदाया. 'मडियाय' मत्स्यण्डिकाया 'कालपीमिसरी' इति भाषा प्रसिद्धायाः, पुप्पोचर-पौत्तरागा=गुलकन्द ' इति प्रसिद्धाना च, अन्येपा च जिहद्रियमायोग्याणा द्रयाणा शस्टीशाक्ट भरन्ति । तथा पहना 'कोयपियाण य' कोयविकाना = रूतपूरितमाररणविशेषाणां 'रजाई । इति मसिद्धानाम् , कपलाना रत्नकम्मलानाम् , मावरणाना=गाटिकानां -चद्दर' इति प्रसिद्धानाम् , ' नवतयाण य' ननकानाम् ऊर्णामयपर्याणानां आभूपर्ण आदि कों को-पुत्तलिका की तरह जो सुवर्ण आदि के पतरों पर कृत छिद्रादिकों के पूरने से चित्र बनाये जाते हैं वे पूरिम है इन परिमों को और संघातिमों को लोहकाष्ट आदि की तरह अनेक वस्तुओं के समुदाय से निष्पादित चित्रो को तथा और भी नेत्र इन्द्रिय को सुहावने लगने वाले द्रव्यों को भरा । (पण योहपुडाण य, केयई पुडा- ण य जाव अन्नेमि च यहण पाणिदियपाउग्गाण दवाणं सगडीसागड भरे ति, बहुस्स खडस्स य गुल्स्ससकराए व मच्छडियाए य पुप्फुत्तर पउमुत्तराणय अन्नेसिं च जिभिदिय पाउरगाण दवाण सगडीमागड भरे ति बहण कोयवियाण य केलाणय पावरणोण य नवतयाण य એને-પીને, હાથ, પગે અને આગળીએમાં પહેરવાના આભૂષણ વગે રેને પૂતળીની જેમ જે સુવર્ણ વગેરેના પતરા ઉપર કાણા પાડીને તેમને પૂરીને બનાવવામાં આવેલા ચિત્ર એટલે કે પૂરિને અને સ ધ તિને લેખડ, કાષ્ઠ વગેરેથી બનાવવામાં આવેલા રથ વગેરેની જેમ ઘણી વસ્તુઓને એકત્રિત કરીને તેમના વડે બનાવવામાં આવેલા ચિત્રોને તેમજ બીજા પણું ઘણું નેત્ર ઈન્દ્રિયને ગમે તેવા દ્રવ્યોને ભર્યા '(वहूण कोहपुडाण य, केयई पुडाण य जान अन्नेसि च वहण पाणिदिय पाउगाण दवाण सगडीसागड भरेंति, बहुस्म खडस्स य गुलस्स सक्कराए य मच्छडियाए य पुप्फुत्तरपउमुत्तराण य अन्नेसिं च जिभिदियपाउग्गाण दवाण सगंडीसागड भरेति वहूण कोयवियाण य केवलाण य पावरणाण - अनगारधर्मामृतवपिणी टी० अ०१७ कालिकद्वीपगत आकोणाश्ववक्तव्यता ६५ 'जीन' इति प्रसिद्धानाम् , मलयाना च=मलयदेशोत्पन्नवस्त्रविशेषाणाम् , ' मसू- राण य' मम्रकाणावस्त्रादिनिर्मित वृत्ताकारासनविशेषाणाम् , 'सिलावट्टाण य' शिलापट्टानां पट्टाकारचिक्णशिलाना यावत् हसगर्भाणा-हसा चतुरिन्द्रियकृमि- विशेषः, गर्भ: तनिवर्तित कोसिकारोख्तरूपः, तन्मयस्त्राण्यपि हंसगर्भाणीत्यु- मलयाण य मसूराण य सिलावहाण य जीव सगम्भाण य अन्नेसिं च फासिंदियपाउग्गाग दव्याण सगडीसागड भरेति) इसी तरह अनेक कोप्टपुटो को-सुगंधित द्रव्य विशेषों को केतकीपुटो को-सुगधित पुष्पों यावत् एलापुटो को-इलायचियों को, उखीरपुटों को, खश के समुदाय को-कुकुमपुटों को तथा और भी अनेक, घ्राणेन्द्रिय को तृप्ति कारक द्रव्यों को उन लोगो ने गाडी और गाडो में भरा । बहुत सी खाड, घहुत से गुड यहुत सी शर्फरा- मिसरी-बहुत सी मत्स्यण्डी-कालपी मिसरी बहुत से गुलकद, बहुतसे पद्मपाक को तथा और भी जिह्वाइ- न्द्रिय को तृप्ति करने वाले द्रव्यों को उन लोगों ने गाड़ी और गाडों में भरा। इसी तरह स्पर्शन इन्द्रिय को आनद्देने वाले कोयविको को-रूई कपास-से भरे हुए प्रावरण विशेषों को रजाइयो को-कम्पलों को-रत्न कम्पलों को-प्रावरणा को-चद्दरो को-नबलको को-ऊन के बने हुए पलेंचों को-जीनो को-मलयदेश के बने हुए वस्त्रों को, मसरकों को-वस्त्रों से बनाये हुए गोलाकार आसनों को-शिलापट्टो को-पाकार चिकनी य मलयागय ममूराण य सिमानहाण य जाव हसगन्माण य अन्नेसि च फासिं- दिय पाउग्गाग दवाण सगडी सागड भरेंति) આ પ્રમાણે ઘ, કેષ્ટ પુટને-મુગ ધિત દ્રવ્ય-વિશેષોને, કેતકી પુટને કેવડાના પુપોને યાવત એલાપુને, એલચીઓને, ઉપર પેટેને–ખશના સમુનિ, કુકમ પુટને તેમજ બીજા પણ ઘણા પ્રાણેન્દ્રિય (નાડ )ને તૃપ્તિ પમાડનારા દ્રવ્યને તેઓએ ગાડી અને ગાડાઓમા ભર્યા - બહુ જ પુષ્કળ પ્રમાણમાં ખાડ, ગેળ, સાકર મિશ્રી, મયડી કાલપી મિશ્રી, (ઉચી જાતની સાકર) ગુલાદ, પપા તેમજ બીજા પણ ઘણા હાઈ ઈન્દ્રિય (જીભ)ને તૃપ્તિ આપ નાર દ્રવ્યને તે લોકોએ ગાડી અને ગાડાઓમાં ભર્યા આ પ્રમાણે સ્પર્શેન્દ્રિયને સુખ આપનારી કેયવિકેને રૂથી ભરેલા પ્રવરણ વિશેને–રાઈઓને, કામ છેને, રતન વામને, પ્રાવરને, ચાદરને, નવલકને, ઊનથી બનાવવામાં આવેલા પચાઓને-જીનેને-મલય દેરાના વસ્ત્રોને, મસૂરકોને-વસ્ત્રો વડે બનાવવામાં આવેલા ગેળ આકાર આસનને, શિલાપટ્ટને-પદના આકારની - - - - निष्पादितानाम् , 'संघारमाण ग' सहानिभानालोकाप्ादिगी म्यादि पद वस्तु समनिपादितानाम् , तथा-अपेपा न पहना 'यपिटियपाउरगाण' चरि न्द्रियमायोग्याणा-नयनानन्दजनकाना द्रव्याणा शीशायट भान्ति । तथा बहुना 'कोद्रपुडाण य' योरपुटाना - गुगन्निविशेषाणां च केवीपुटानां च यानत्-एलापुटाना च, फुकुमपुटाना २, उगीरपटानां सम' इतिमापा मसिद्धमुगन्धिद्रव्याणां च, लगनपुटाना चेत्यादि । अन्येषां च यहूना प्राणेन्द्रिय प्रायोग्याणा द्रव्याणा शस्टीशास्ट भरन्ति । नया नहोः खण्डस्य च गुडस्य च शर्करायाथ 'मिसरी' इति मापा मसिझाया 'म उडिया य' मस्यण्डिकाया: 'काल्पीमिसरी' इति भाषा प्रसिद्धाया , पुष्पोत्तर-पोतरागा-गुलकन्ट ' इति प्रसिद्धाना च, अन्येपा च निश्वेन्द्रियप्रायोग्याणा द्रव्याणां शरटीशाक्ट भरन्ति । तथा बहूना 'कोयरियाण य' फोगविकाना स्तपूरितमाररणविशेपाणा 'रजाई ' इति प्रसिद्धानाम् , कम्पलाना-रत्नकम्बलानाम् , मापरणाना-शाटिकाना '-चद्दर' इति प्रसिद्धानाम् , ' नवतयाण य' नानानाम् जामयपर्याणानां आभूपण आदि कों को-पुत्तलिका की तरह जो सुवर्ण आदि के पतरों पर कृत छिद्रादिकों के पूरने से चित्र पनाये जाते हैं वे पूरिम हैं इन पूरिमों को और सघातिमों को-लोहकाप्ट आदि की तरह अनेक वस्तुओं के समुदाय से निष्पादित चिनो को तथा और भी नेत्र इन्द्रिय को सुहावने लगने वाले द्रव्यों को भरा । (मण बोहपुडाण य, केयई पुडा ण य जाब अन्नेमि च यहण याणिदियपाउग्गाण दवाणं सगडीसागड भरे ति, बहुम्स खडस्म य गुल्स्स सकराए य मच्छटियाए य पुप्फुत्तर पउत्तराणय अन्नेसिं च जिभिदिय पाउगाण दव्वाण सगडीसागड भरेति यहण कोरियाण य केलाय पावरणोण य नवतयाण य એને-પાને હાથ, પગ અને આગળીઓમા પહેરવાના આભૂષણ વગે રને પૂતળીની જેમ જે સુવર્ણ વગેરેના પતરા ઉપર કાણું પાડીને તેમને પૂરીને બનાવવામાં આવેલા ચિ એટલે કે પૂરિને અને સઘ તિ લેખડ, કાણ વગેરેથી બનાવવામાં આવેલા રથ વગેરેની જેમ ઘણી વસ્તુઓને એકનિત કરીને તેમના વડે બનાવવામાં આવેલા ચિત્રોને તેમજ બીજા પણ ઘણું નેત્ર ઈન્દ્રિયને ગમે તેવા દ્રવ્યોને ભર્યા (बहूण कोट्टपुडाण य, केयई पुडाण य जार अन्नेसिं च वहण याणिदिप पाउग्गाण दव्याण सगडीसागड भरेंति, बहुस्म खडस्स य गुलस्स सक्कराए य मच्छडियाए य पुप्फुत्तम्पउमुत्राण य अन्नेसि च जिभिदियपाउग्गाण दवाण सगडीसागड भरेति वहूण कोरियाण य केवलाण य पावरणाण य नातयाण *Suna - - भनगारधर्मामृतवर्षिणी टी० अ० १७ कालिकद्वीपगत आकोणाश्वतव्यता ६९६ गोधूमादीनामट्टकस्य 'आटा' इति प्रमिद्धस्य, 'गोरसस्म य' गोरसस्पधृता- दिकस्य च यावत् अन्येपा च बहूना पोतवहनमायोग्याणा द्रव्यागां पोतनहन भरन्ति, भृत्वा 'दक्षिणाणुकूलेण' दक्षिणानुकलेन-सानुकूलेन बातेन यौव कालिकद्वीपस्तत्रोपागच्छन्ति, उपागत्य तर पोतवहन 'ति' लम्पयन्ति तीरस्थापितङ्कुपु वनन्ति, उद्धा तान्नौकास्थितान् उत्कृष्टान्-उत्तमोत्तमान् शब्दस्पर्शरसरूपग धान् एगट्टियाहिं' एकाधिकाभिः लघुनौकाभिः 'कारिय- दी' कालिकद्वीपे ' उत्तारेति ' उत्तारयन्ति नाकातो निस्सार्य भूमौ स्थापयन्ति । यावत् और अनेक पोतवहन प्रायोग्य द्रव्यो को उम नौका में भरदिया। (भरित्ता दक्खिणाणुकलेण वाएण जेणेव कालियदीवे तेणेव उवागच्छड उवागच्छित्ता पोयवहण लति, लपित्ता ताइ उकिट्ठाइ मद्दफरिसरस रूप गधाई एगहियाहि कालियदीवे उत्तारेंनि । जहिं २ च ण ते आसा आसायति वा सयति वा चिट्ठति वा तुयद्दति वा तहिं२ च ण ते कोड चियपुरिसा ताओ वीणाओ य जाब वित्तवीणाओ य अन्नाणि य पणि साइदिय पाउग्गाणि समुदीरेमाणा चिट्ठति) भर करके फिर ये लोग जर पीछे से आनेवाला अनुकूल वायु चरा तय वहा से चलकर जहा कालिक द्वीप था वहा आये-वहा आकर के इन लोगों ने लगर डाल दिया-लगर डालकर पोत में से शब्द के साधन भूत वीणा आदिको को, अच्छे स्पर्श के साधनभूत रूई से भरे हुए रजाई आदि वस्त्रों को रसनाइन्द्रिय को सुहावने लगनेवाले वाड आदि पदार्थों को ઘઉના લોટને, ગેરસ ઘી વગેરેને યાવત્ બીજા પણ ઘણું વહાણ યાત્રામાં કામ લાગે તેવા દ્રવ્યને તે નકામા ભર્યા ( भरित्ता दकिवणाणुकृले ण वारण जेणे कालि यदीवे तेणेव उवागन्छन, उवागच्छित्ता पोयरहण लवेति, लवित्ता ताड उक्ट्ठिाइ सदफरिमरमरूपगधाइ एगट्ठियाहिं कालियदीवे उत्तारेति । जहिं २ च ण ते आसा आसायति वा सयति पा चिट्ठति वा तुयति वा तर्हि २ च ण ते कोड वियपुरिसा ताभो वीगाओ य जाय पित्तविणाओ य अन्नाणि य वहूणि सोइदिय पाउग्गाणि य दवाणि समुदीरेमाणा चिट्ठति) ભરીને તેઓ બધા જ્યારે પાછળથી વહેતે અનુકળ પવન વહેવા લાગ્યા ત્યારે ત્યાથી રવાના થઈને જ્યા કાલિક દ્વીપ હ ત્યા આવ્યા ત્યાં આવીને તે લેકેએ લગર નાખ્યું લગર નાખીને વહાણમાથી શના સાધન રૂપ વીણા વગેરેને, કોમળ સ્પર્શના સાધનભૂત રૂથી ભરેલા રજાઈ વગેરે વસ્ત્રોને, રસના (જીભ) ઈન્દ્રિયને ગમતા ખાડ વગેરે પદાર્થોને, નેત્ર ઈન્દ્રિયને આનંદ - ६१२ माताधर्मपाल च्यन्ते, तेषां कौशेयपखाणां 'रेशमी वस्त्र' इति मापा प्रसिद्धानां च, तथा- अन्येपा चस्पर्शेन्द्रियमायोग्याणा द्रव्याणां शकटीशास्ट भरन्ति, मृत्वाभाटीशाकर्ट योनयन्ति, योजयित्वा यौर गम्मीरप गम्भीरनामा पोतस्थान तश्योपागच्छन्ति, उपागत्य शकटीशाकट मोचपन्ति, मोचयित्या 'पोयमहणं' पोतवहनम्नीको सज्नयन्ति, सज्जयित्वा तेपाम् ' उगिहाण' उत्तष्टाना= श्रेष्ठानां शवस्पर्शरसरूप गन्धाना फाप्ठस्य च पानीयस्य च तन्दुलानां च 'सामियम्म य' समीतस्य- शिलाओं को, हस गों को-रेशमी पत्रों को, तथा और भी स्पर्शन इन्द्रिय को आनन्द देने वाली घस्तुओं को उन लोगो ने गाडी और गाडों में भरा। (भरित्ता सगहीसागढ जोएति, जोहत्ता जेणेव गभी- रए पोयट्ठाणे तेणेय उवागच्छति, उवागरिता मगढीसागट मोएति, मोइत्ता पोयचरणे सज्जेंति, सजिता तेसि किटाण सद्दफरिसरम- रूवगधाण कहस्स य तणस य पाणियस्स य तदुलाणय समियरस य गोरसस्स य जाव अन्नेसिं च पण पोयवग्णपाउग्गा ण पोयवरण भरेंति) भरकर के फिर उन लोगों ने गाडी और गाडी को जोत दिया। जोतकर के फिर वे चर्चा आये-जहां गभीर नाम का पोतस्थान धा-यद- रगाह था । वहा आकर के उन लोगों ने गाड़ी और गाडों को ढील-रोक दिया। और फिर नौकाओंको सजाया-तैयार किया। और तेयार करके पादमें उन्होंने उन श्रेष्ठ शब्द, स्पर्श, रस, रूप, एव गधों को काष्ठको तृण को पानीय द्रव्य को तदलों को, गेहुँ के आटे को, गोरस घृतादिक-को લીસી શિલાઓને, હસ ગર્ભોને-રેશમી વસ્ત્રોને તેમજ બીજી પણ ઘણે સ્પશે ન્દ્રિયને સુખ પમાડે તેવી ઘણી વસ્તુઓને તે લેકેએ ગાડી અને ગાડાઓમાં ભરી (भरिता सगडीसागड जोएति, जोइत्ता जेणेव गभीरए पोयट्ठाणे तेणेव उवागच्छति, उवागच्छित्ता सगडीसागड मोएति मोइत्ता पोयवहण सज्जेति, सज्जित्ता तेसि उक्किट्ठाण सहफरिसरसरूपगधाण कट्टस य तणस्स य पाणि यस्म य तदुलाण य समियस्स य गोरसस्स य जाव अन्नेसि च वहूण पोयवहण पाउग्गाण पोयवहण भरेंति) ભરીને તે લેકેએ ગાડી અને ગાડાઓને છેતર્યા જેતરીને તેઓ ત્યાથી જ્યા ગભીર નામે પિતસ્થાન (બ દર) હતું ત્યાં આવ્યા તે લેકેએ ગાડી અને ગાડાઓને છેડી મૂક્યા અને ત્યારપછી નૌકાઓને સુસજિજત કરી સુસજિજત કર્યા બાદ તેમણે તે ઉત્તમ શબ્દ, સ્પર્શ, રસ, ३५ भने पाने, ४ने, धावने, पाedit द्रव्याने, agar (1), ત્યાં આવીને . . मनगारधर्मामृतवर्षिणी टी० अ० १७ कालिकद्वीपगत आकोणाबतव्यतो ६७ गोधूमादीनामट्टकस्य ' आटा' इति प्रमिद्धस्य, ' गोरसस्स य' गोरसस्प-घृता- दिकस्य च यावत् अन्येपा च बहूना पोतवहनमायोग्याणा द्रव्याणां पोतनहन भरन्ति, भृत्या 'दक्खिणाणुकूलेण' दक्षिणानुकलेनमानुकलेन बातेन यौव कालिकद्वीपस्तौवोपागन्छन्ति, उपागत्य तत्र पोतवहन 'ति' लम्पयन्ति= तीरस्थापितङपु वनन्ति, पद्ध्या तान्नीकास्थितान् उत्कृष्टान् उत्तमोचनान् शन्दस्पर्शरसरूपग धान् ' एगडियाहि ' एकाधिकाभिः लघुनौमामि ‘कारिय- दी' कालिकद्वीपे ' उत्तारेति' उत्तारयन्ति=नाकातो निस्सार्य भूमौ स्थापयति । यावत् और अनेक पोतवन प्रायोग्य द्रव्यो को उस नौका में भरदिया। (भरित्ता दरिवणाणुकलेण वाएण जेणेव कालियदीवे तेणेव उवागच्छड उवागत्तिा पोयवहण ल-ति, लबित्ता ताइ उकिट्ठाइ सद्दफरिसरस रूप गधाइ एगढियाहिं कालियदीवे उत्तारेंनि । जहिं २ च ण ते आसा आसायति वा सयति वा चिट्ठति वा तुयदृति वा तहिं२ च ण ते कोड थियपुरिसा ताओ वीणाओ य जाव वित्तवीणाओ य अन्नाणि य बद्दणि साइदिय पाउग्गाणि समुदीरेमाणा चिट्ठति) भर करके फिर ये लोग जन पीछे से आनेवाला अनुकूल वायु चरा तर वहा से चलकर जहा कालिक द्वीप था वहा आये-वहा आकर के इन लोगों ने लगर डाल दिया-लगर डालकर पोत में से शब्द के साधन भूत वीणा आदिको को, अच्छे स्पर्श के साधनभूत रूई से भरे हुए रजाई आदि वस्त्रों को रसनाहन्द्रिय को सुहावने लगनेवाले खाड आदि पदार्थों को ઘઉના લોટને, ગરમ ઘી વગેરેને યાવત્ બીજા પણ ઘણા વહાણ યાત્રામાં કામ લાગે તેવા દ્રવ્યોને તે નૌકામાં ભર્યા ( भरित्ता दकिवणाणुकले ण वाएण जेणेर कालियदीवे तेणेव उवागन्छ, उवागच्छित्ता पोयरहण लवेति, लवित्ता ताइ उक्क्ट्ठिाइ सदफरिसरसरूपगधाइ एगडियाहि कालियदीवे उत्तारेति । जहिं २ च ण ते आसा जासायति वा संपति वा चिट्ठति वा तुयति वा तर्हि २ च ण ते कोटु पियपुरिसा तामो वीजाओ य जाब वित्तविणाओ य अन्नाणि य वहूणि सोइदिय पाउग्गाणि य दन्वाणि समुदीरेमाणा चिट्ठति) ભરીને તેઓ બધા જ્યારે પાછળથી વહેતે અનુકૂળ પવન વહેવા લાગ્યો ત્યારે ત્યાથી રવાના થઈને ત્યા કાલિક દ્વીપ હતા ત્યા આવ્યા ત્યાં આવીને તે લેકોએ લગ નાખ્યું લગર નાખીને વહાણમાથી શના સાધન રૂપ વીણા વગેરેને, કેમળ સ્પર્શના સાધનભૂત રૂથી ભરેલા રજાઈ વગેરે વસ્ત્રોને, રસના (જીભ) ઈન્દ્રિયને ગમતા ખાડ વગેરે પદાર્થોને, નેત્ર ઈન્દ્રિયને આનંદ - माताधर्मकथामा ध्यन्ते, तेषां कौशेयरखाणां रेशमीपन' इति मापा पमिद्वानां च तया- अन्येया चस्पर्शेन्द्रियमापोग्पाणां द्रव्याणां शकटीगाट मरन्ति, मृत्वा शटीशाकटं योनयन्ति, योजयित्वा योर गम्मीरम-गम्भीरनामक पोतस्थान तत्रोपागाउन्ति, उपागत्य शकटीशाफट मोचयन्ति, मोचयिया 'पोयपहण' पोतवहनम्नौका सज्नयन्ति, सज्जयित्वा तेपाम् ' उगिहाण' उत्कृष्टाना श्रेष्टाना शब्दम्पर्शरसरूप गन्धाना काष्ठस्य च पानीयस्य च तन्दुलाना च 'सामियम्स य' समीतस्य शिलाओं को, एस गी को-रेशमी घरों को, तथा और भी स्पर्शन इन्द्रिय को आनन्द देने वाली घस्तुओं को उन लोगो ने गाडी और गाडों में भरा। (भरिता सगडीसागढ जोपति, जोहत्ता जेणेव गभी- रए पोयहाणे तेणेव उवागच्छति, उवागरिता मगढीसागट मोएति, मोइत्ता पोयवरणे सज्जेति, सजिता तेसि उकिट्ठाण सदफरिसरम रूवगधाण कहास य तणस्स य पाणियरस य तदुलाणय समियरस य गोरसस्स य जाच अन्नेसिं च पहण पोयवाणपाउग्गा ण पोयवर्ण भरेंति ) भरकर के फिर उन लोगों ने गाडी और गाडों को जोत दिया। जोतकर के फिर वे वहाँ आये-जहां गभीर नाम का पोतस्थान था-बद- रगाह था। वहा आकर के उन लोगों ने गाड़ी और गाडों को ढील-रोक दिया। और फिर नौकाओको सजाया-तैयार किया। और तेयार करके पादमें उन्होंने उन श्रेष्ठ शब्द, स्पर्श, रस, रूप, एवं गधोंको काष्ठको तृण को पानीय द्रव्य को तलों को, गेहुँ के आटे को, गोरस घृतादिक-को લીસી શિલાઓને, હસ ગ-રેશમી વસ્ત્રને તેમજ બીજી પણ ઘણી સ્પર્શ ન્દ્રિયને સુખ પમાડે તેવી ઘણી વસ્તુઓને તે લેકેએ ગાડી અને ગાડાઓમાં ભરી (भरित्ता सगडीसागड जोएति, जोइता जेणेव गभीरए पोयट्ठाणे तेणेव उवागच्छति, उवागच्छित्चा सगडीसागड मोएति मोइत्ता पोयवहण सज्जेंति, सज्जिता तेसि उक्किट्ठाण सहफरिसरसरूपगधाण वहस्स य तणस्स य पाणि यस्म य तदुलाण य समियस्स य गोरमस्स य जाब अन्नेसि च बहूण पोयवहण पाउम्गाण पोयवहण भरेति) ભરીને તે લેકોએ ગાડી અને ગાડાઓને છેતર્યા તરીકે તેઓ ત્યાથી જ્યા ગભીર નામે પિતસ્થાન (બદર) હતુ ત્યા આવ્યા તે લોકેએ ગાડી અને ગાડાઓને છોડી મૂક્યા અને ત્યારપછી નૌકાઓને સુસજિજત કરી સુસજ્જિત કર્યા બાદ તેમણે તે ઉત્તમ શબ્દ, સ્પર્શ, રસ, ३५ अने गधोने, आ४ने, धासने, elaint द्रव्याने, agar (711), , ત્યા આવીને अंगारधर्मामृतषिणी टी० अ० १७ कालिकद्वीपगत आकोणाश्चवक्तव्यता ६४३ गोधूमादीनामट्टकस्य ' आटा' इति प्रमिद्धस्य, ' गोरसस्म य ' गोरसस्प-घृता- दिकस्य च यावत् अन्येपा च बहूना पोतवहनमायोग्याणा द्रव्याणा पोतवहन भरन्ति, भृत्या ' दक्षिणाणुकूलेण' दक्षिणानुक्लेन-सानुकलेन वातेन यत्रैव कालिकहीपस्तौवोपागच्छन्ति, उपागत्य तत्र पोतवहन 'लति' लम्बयन्ति-- तीरस्थापितगडपु वनन्ति, उद्ध्वा तान्नौकास्थितान् उत्कृष्टान उत्तमोत्तमान् शब्दस्पर्शरसरूपग धान् ' एगट्टियाहि ' एकाधिकाभिः लघुनौमाभि 'कारिय- दी' कालिकद्वीपे ' उत्तारेति' उत्तारयन्ति=नोकातो निस्सार्य भूमौ स्थापयति । यावत् और अनेक पोतवहन प्रायोग्य द्रव्यो को उम नौका में भरदिया। (भरित्ता दक्खिणाणुक्लेण वारण जेणेव कालियदीवे तेणेव उवागच्छह उवागच्छित्ता पोयवा लति, लयित्ता ताई उकिटाइ सद्दफरिसरस रूप गधाइ एगडियाहिं कालियदीवे उत्तारेंनि । जहिं २ च ण ते आसा आसायति वा सयति वा चिट्ठति वा तुयति वा तहिं च ण ते कोडु चियपुरिसा ताओ वीणाओ य जाव वित्तवीणाओ य अन्नाणि य वणि साइदिय पाउग्गाणि समुदीरेमाणा चिट्ठति) भर करके फिर ये लोग जन पीछे से आनेवाला अनुकूल वायु वहा तब वहा से चलकर जहा कालिक द्वीप था वहा आये-वहा आकर के इन लोगो ने लगर डाल दिया-लगर डालकर पोत में से शब्द के साधन भूत वीणा आदिको को, अच्छे स्पर्श के साधनभूत रूई से भरे हुए रजाई आदि वस्त्रों को रसनाइन्द्रिय को सुहावने लगनेवाले खाड आदि पदायों को ઘઉના લોટને, ગોરસ ઘી વગેરેને યાવત્ બીજા પણ ઘણું વહાણ યાત્રામાં કામ લાગે તેવા દ્રવ્યોને તે નૌકામાં ભર્યા (भरित्ता दकिवणाणुकूले ण वारण जेणे कालियदीवे तेणेव उवागन्छइ, उवागच्चित्ता पोयरहण लवेति, लवित्ता ताइ उविक्ट्ठाइ सद्दफरिसरमरूपगधाइ एगट्टियाहि कालियदीचे उत्तारे ति । जहिं २ च ण ते आसा आसायति या सयति वा चिट्ठति वा तुयट्ट ति वा तर्हि २ च ण ते कोडुपियपुरिसा ताभो वीनाओ य जार वित्तविणाभो य अन्नाणि य वहूणि सोइदिय पाउग्गाणि य दध्याणि समुदीरमाणा चिट्ठति) ભરીને તેઓ બધા જ્યારે પાછળથી વહેતો અનુકુળ પવન વહેવા લાગ્યા ત્યારે ત્યાથી રવાના થઈને જ્યા કાલિક દ્વીપ હ ત્યા આવ્યા ત્યાં આવીને તે લોકોએ લગર નાખ્યું લગર નાખીને વહાણમાથી શબના સાધન રૂ૫ વીણા વગેરેને, કેમળ સ્પર્શના સાધનભૂત રૂથી ભરેલા રજાઈ વગેરે વસ્ત્રોને, રસના (જીભ) ઈન્દ્રિયને ગમતા ખાડ વગેરે પદાર્થોને, નેત્ર ઈન્દ્રિયને આન 6 -- पताधर्मभयानमा च्यन्ते, तेषां कौशेयाखाणां 'रेशमीपत्र' इति भागा मसिद्धानां च तथा- अन्येपा पस्पशेन्द्रियमायोग्याणां द्रव्याणी शकटीशास्ट भरन्ति,भृत्वा श्रटीशाकलं योजयन्ति, योजयित्वा यो गम्मीरस गम्भीरनामा पोवस्थानं तत्रोपागच्छन्ति, उपागत्य शकटीशाकट मोचयन्ति, मोचविधा 'पोयण' पोतवानम्नीको सज्जयन्ति, सज्जयित्वा तेपाम् 'उपिट्ठाण' उत्तप्टाना श्रेष्ठानां शम्पीरमरूप गन्धाना काष्ठस्य च पानीयस्य च तन्दुलानां च 'सामियम्स य' समीतस्य- शिलाओं को, एस गर्भो को-रेशमी चत्रों को, तथा और भी स्पर्शन इन्द्रिय को आनन्द देने वाली वस्तुओं को उन लोगो ने गाडी और गाडों में भरा। (भरिता सगडीसागढं जोएति, जोहत्ता जेणेव गभी- रए पोयट्ठाणे तेणेच ज्यागच्छति, वागरिता मगढीसागड मोति, मोइत्ता पोयवरणे सज्जेंति, सनित्ता तेसि किट्ठाण सहफरिसरम रूवगधाण फहस्स य तणस्स य पाणियस्स य तदुलाणय समियरस य गोरसस्स य जाय अग्नेसिं च पण पोयवाणपाउग्गा ण पोयवरण भरेंति) भरकर के फिर उन लोगों ने गाडी और गाडी को जोत दिया। जोतकर के फिर वे वर्श आये-जहां गभीर नाम का पोतस्थान था-धद- रगाह था। वहा आकर के उन लोगों ने गाड़ी और गाडों को ढील-रोक दिया। और फिर नौकाओको सजाया-तैयार किया। और तैयार करके थामें उन्होंने उन श्रेष्ठ शब्द, स्पर्श, रस, रूप, एव गंधों को काष्टको तृण को पानीय द्रव्य को तदलों को, गेहुँ के आटे को, गोरस घृतादिक-को લીસી શિલાઓને, હસ ગ-રેશમી વસ્ત્રોને તેમજ બીજી પણ ઘણી સ્પશે ન્દ્રિયને સુખ પમાડે તેવી ઘણી વસ્તુઓને તે લોકોએ ગાડી અને ગાડાઓમાં ભરી (भरिचा सगडीपागड जोएति, जोइत्ता जेणेव गभीरए पोयट्ठाणे तेणेव उवागच्छति, उवागच्छित्ता सगडीसागड मोएति मोइत्ता पोयवहण सज्जेति, सज्जित्ता तेसि उक्किट्ठाण सहफरिसरसरूपगधाण कहस्स य तणस्स य पाणि यस्म य तदुलाण य समियस्स य गोरसस्स य जाव अन्नेसिं च वहण पोयत्रण पाउग्गाण पोयवहण मरति) ભરીને તે લોકેએ ગાડી અને ગાડાઓને જોત જોતરીને તેઓ ત્યાથી જ્યા ગભીર નામે તિસ્થાન (બદર) હતું ત્યા આવ્યા ત્યા આવીને તે લેકએ ગાડી અને ગાડાઓને છોડી મૂકયા અને ત્યારપછી નૌકાઓને સુસજિજત કરી સુસજિજત કર્યા બાદ તેમણે તે ઉત્તમ શબ્દ, સ્પર્શ, રસ, ३५ भने धान, ४४ने, धामने, plant द्रव्याने, तga (*), मनगारधर्मामृतषिणी टोका अ०१७ कालिकद्वीपगत आकीर्णाश्यवक्तव्यता १५ कर्माणि यावत् स पातिमानि च अन्यानि च पनि चक्षुरिन्द्रियमायोग्याणि च द्रव्याणि स्थापयति एकत्री कुर्वन्ति, तेपामश्वाना परिपर्यन्तेन-सर्वत' समन्तात् पाचे स्थापयन्ति च, स्थापयित्वा ते निश्चलाः, निस्पन्दाः, तूष्णीकास्ति'ठन्नि । तथा-यत्र या तेऽवा आसते स्वपन्ति तिष्ठति त्वग्वतयन्ति च तत्र तत्र खलु तेपा बहूना कोष्ठपुटाना च यावद् अन्येपा च बहूना घाणेन्द्रियप्रायोग्याणा जाव सघाडमाणि य अन्नाणि य पट्टणि चविखदिय पाउगाणि यदव्याणि ठति, ठवित्ता तेसिं परिपेरतेणं पाप्त ठवेंति, ठवित्ता णिचरला णिप्फदा तुसिणीया चिट्ठति ) उस के चारों तरफ चारो दिशाओं में- वीणा आदिको को स्थापित करते रहे । स्थापित करके फिर वे वही पर निश्चल-चलन क्रिया से रहित होकर हस्तादि अवयव को कपित किये विना ही चुपचाप बैठ गये। इस तरह-जिस२ धनमें वे अश्व चैटते थे, सोते थे, ठहरते थे, लेटते थे, वहा २ उन कौटुम्विक पुरुषों ने उस आनीत बहुतसी कृष्ण, नील, पीत, रक्त, शुक्ल वर्णवाली काष्ठकर्म आदि सघातिम पर्यत की सामग्री को जो चक्षुइन्द्रिय को आनन्दप्रद थी. तथा और भी चक्षुइन्द्रि को सुरा वनी लगनेवाली जो वस्तुएँ थी उन को एकत्रित किया और उन्हे उन अश्वो की चारो दिशाओ मे रख दिया। रखकर के फिर वे निश्चल, निस्पन्द होकर चुपचार बैठ गये। (जन्य २ ते आमा आसयति ४ तत्थ विय पुरिसा वहूणि किण्हाणि य ५ कट्ठकम्माणिय जाव सपाइमाणि य अन्नाणि य प्रहणि चक्खिदिय पाउग्गाणि य दयाणि ठवेंति, ठवित्ता तेसि परिपेरतेण पासप ठवेंति ठविता णिच्चला, णिप्फदा तुसिणीया चिट्ठति) તેમની ચેમેર, ચારે ચાર દિશાઓમાં વણાઓ વગેરે મૂકી મૂકીને તેઓ ના જ નિશ્ચલ-હવન ચલનની ક્રિયાથી રહિત થઈને આગને હલાવ્યા વગર ચુપચાપ ત્યાં બેસી ગયા આ પ્રમાણે જે જે વનમાં અશ્વો (ઘડા) બેસતા હતા, સૂતા હતા, રહેતા હતા, આરામ કરતા હતા તે તે વનમાં તે કૌટુંબિક પુરુષોએ સાથે લાવેલી ઘણી કાળી, નીલી, પીળી રાતી, સફેદ રંગની કાકર્મ વગેરે સઘાતિમ સુધીની બધી વસ્તુઓને કે જેઓ ચક્ષુ (આખ) ઈન્દ્રિયને સુખ આપનારી હતી તેમજ બીજી પણ ચબુ ઈન્દ્રિયને સુખ આપ નારી જેટલી સારી વસ્તુઓ હતી તેમને ભેગી કરી અને અશ્વોની ચોમેર તેમને ગોઠવી દીધી ગઠવીને તેઓ ત્યાં જ નિશ્ચલ, નિસ્પદ થઈને ચુપચાપ ત્યાં જ બેસી ગયા ( जत्थ २ ते आसा आमयति ४ वत्थ २ ण तेसि बहूण फोट्टपुटाण य जात अन्नेसि च बहूण घागिदियपाउग्गाण दवाण पुजेय णियरे य यरेति, - . - नहिं २ च ण' यत्र यत्र च ने ग्बल ते 'मामा' अघामात्या अपाः 'आसपति या' आसते-उपविशन्ति 'सयंति पाशरतेसपनि वा' चिट्ठति वा' तिष्ठन्ति पा, ' तुपहतिया'लगायन्ति-शरीर प्रसार्य स्वपन्ति वातहि २ तत्र तत्र च खलु ते कौटुम्बिापुरुषाः 'नामो' तास्तिगी नगरादानीता गीगाव यात्-उत्तवीणाश, तथा अन्यानि च पनि श्रोगेन्द्रियप्रायोग्याणि च द्रव्याणि 'समुदीरमाणा' ममुदीरयन्ता मधुरध्वनिना पादयतः तिष्ठन्ति, तेषा मवाना 'परिपेरतण ' परिपर्यन्तेन सर्वतः सम तात् चर्षिभु इत्यर्थ 'पासए' पार्थे समीपे वीणादीनि स्थापयन्ति, स्थापयिचा ते पुमपाः 'निचला' निश्चला चलनक्रियारहिताः ‘णिप्फदा' निःस्पन्दा दस्तावश्यवमचाररहिताः 'तुसिणीया' पचन च्यापाररहिताः 'चिट्टति ' तिष्ठन्ति । तथा यत्र यत्र तेऽश्याः आसते वा यात् त्वमपन्ति लुठन्ति तत्र तत्र खलु ते कौटुम्भिकपुरुपा रहनि कृष्णानि च कृष्णनीलपीतरक्तशुरुवर्णानि काष्ठ- नेत्र इन्द्रिय को आनद देनेवाछे नीले पीले आदि रगवाले चित्रो को एव घाणइन्द्रियों को सुखकारक काष्ठपुट आदि सुगधित द्रव्यों को छोटी २ नौकाओं द्वारा पोत में से उतार कर कालिक द्वीप में रख दिया। बाद में जहा २ वे जाति अश्व बैठते थे मोते थे, ठहरते थे, लेटते थे, वहा २ वे कौटुम्निक पुरुप उन रस्तिशीर्ष नगर से लाये हुए वीणा से लेकर वृत्तवीणा पर्यन्त के साधनो को तथा और भी श्रोत्र इन्द्रिय को सुहा वनी लगनेवाली साधन सामग्री को मधुर धनि से पजाते हुए ठहर गये। और (तेसिं परिपेरतेण पासए ठवेंति, ठवित्ता णिच्चला, गिफदा, तुसिणीया चिट्ठति, जत्य २ ते आसा आसयति वा जाव तुयद्वति वा तत्य र ण ते कोडुपिय पुरिसा बदृणि किण्हाणि य ५ कट्टकम्माणि य પમાડનાર નીલા, પીળા વગેરે રગના ચિત્રો અને પ્રાણ (નાક) ઇન્દ્રિયને સુખ આપે તેવા કાછપુટ વગેરે સુગ ધિત દ્રવ્યોને વહાણમાથી નાની નાની હેડીએમાં મૂકીને કાલિક દ્વીપ ઉપર મૂકી દીધી ત્યારપછી જ્યા તે જાતિ અશ્વો બેસતા હતા, સુતા હતા, રહેતા હતા, આરામ કરતા હતા ત્યા ते કૌટુંબિક પુરુષે તે હસ્તિશી નગરથી લઈ આવેલો વણાથી માંડીને વૃત્ત વણિ સુધીના સાધને તેમજ બીજા પણ શ્રોત્ર (કાન) ઈન્દ્રિયને ગમે તેવી સાધન સામગ્રીને મધુર ધ્વનિથી વગાડતા ત્યાં રોકાઈ ગયા અને (तेसिं परिपेरतेण पासए ठति, ठविता णिच्चला, गिफदा, तुसिगीया चिट्ठति, जत्य २ ते आसा आसयति वा जाव तुयति वा तत्या २ ..कोड. , - मनगारधामृतपपिणी टीका २०१७ कालिकद्वीपगत आकी श्ववकव्यता १५ कर्माणि यावद् स पातिमानि च अन्यानि च वहनि चक्षुरिन्द्रियमायोग्याणि च द्रव्याणि स्थापयति एकनी कुर्वन्ति, तेपामश्वाना परिपर्यन्तेन-सर्वतः समन्तात् पार्च स्थापयन्ति च, स्थापयित्वा ते निश्चला, निस्पन्दाः, तूष्णीकास्ति ठन्ति । तथा-यत्र या तेऽधा आसते स्वपन्ति तिष्ठति त्वरवर्तयन्ति च तत्र तत्र खलु तेपा रहूना कोष्ठपुटाना च यावद् अन्येपा च वहन प्राणेन्द्रियमायोग्याणा जाव संघाउमाणि य अन्नाणि य रहणि चरिखदिय पाउग्गाणि यदव्याणि ति, ठवित्ता तेसिं परिपेरतेणं पालए ठवेंति, ठवित्ता णिचरला णिप्फदा तुसिणीया चिट्टति) उस के चारों तरफ चारो दिशाओं में- वीणा आदिको को स्थापित करते रहे । स्थापित करके फिर वे वही पर निश्चल-चलन क्रिया से रहित होकर हस्तादि अवयव को कपित किये विना ही चुपचाप बैठ गये। इस तरह-जिस२ चनमें वे अश्व चैटते थे, सोते थे, ठहरते थे, लेटते थे, चहा २ उन कौटुम्विक पुरुपों ने उस आनीत बहुतसी कृष्ण, नील, पीत, रक्त, शुक्ल वर्णधोली काष्ठकर्म आदि सघातिम पर्यत की सामग्री को जो चाइन्द्रिय को आनन्दप्रद थी. तथा और भी चक्षुइन्द्रि को सुरा वनी लगनेवाली जो वस्तुएँ थी उन को एकत्रित किया और उन्हे उन अभ्यो की चारो दिशाओ मे रख दिया। रखकर के फिर वे निश्चल, निस्पन्द होकर चुपचाप बैठ गये। (जस्य २ ते आमा आसयति ४ तत्य विय पुरिसा बहूणि किण्हाणि य ५ कट्टकम्माणिय जाव सपाइमाणि य अन्नाणि य पहूणि चविखदिय पाउग्गाणि य दव्याणि ठवेंति, ठवित्ता तेसि परिपेरतेण पासए ठवेंति ठवित्ता णिच्चला, णिप्फदा तुसिणीया चिट्ठति ) તેમની ચેમેર, ચાર ચાર દિશાઓમાં વણાઓ વગેરે મૂળ મુકીને તેઓ વા જ નિશ્ચલ-હવન ચલનની ક્રિયાથી રહિત થઈને વગર ચુપચાપ ત્યાં બેસી ગયા આ પ્રમાણે જે જે વનમાં અશ્વો (ઘડા) બેસતા હતા, સૂતા હતા, રહેતા હતા, આરામ કરતા હતા તે તે વનમાં તે કૌટુંબિક પુરુષોએ સાથે લાવેલી ઘણી કાળી, નલી, પીળી રાતી, સફેદ રંગની કાણકર્મ વગેરે સઘાતિમ સુધીની બધી વસ્તુઓને કે જેઓ ચબુ ( આખ) ઈન્દ્રિયને સુખ આપનારી હતી તેમજ બીજી પણ ચક્ષુ ઈન્દ્રિયને સુખ આપ નારી જેટલી સારી વસ્તુઓ હતી તેમને ભેગી કરી અને અશ્વોની ચોમેર તેમને ગોઠવી દીધી ગોઠવીને તેઓ ત્યાં જ નિશ્ચલ, નિસ્પદ થઈને ચુપચાપ ત્યાં જ બેસી ગયા (जत्थ २ ते आसा आमयति ४ तत्य २ ण तेस पण फोटपुडाण य जान अन्नेसि च बहूण धागिदियपाउग्गाण दवाण पुजेय णियरे य रेति, . ઓ ગેને હલાવ્યા - - . Iमाधमेशा नहिं २ चण' यत्र यत्र चपने बलुते 'भागा' अपामारपा अधा: 'आसयति पा' आस-उपविशन्ति 'सयंति शेरतेस्पति वा चिट्ठति वा' तिष्ठन्ति ना, 'तुयति वा त्वयनयन्ति-शरीर मसार्य पन्ति वातहि २ तत्र तत्र च खल ते कौटुम्पिकपुरषाः 'तामो' तारितशीपनगरादानीता गीगाश्च यायन-वृत्तपरीणाम, तथा अन्यानि च पानि श्रोगेन्द्रियमायोग्याणि च द्रव्याणि — समुदोरैमाणा' यमुदीरयन्त मधुरध्धनिना पादय वः तिष्ठन्ति, तेषा मवाना 'परिपेरतण' परिपर्यन्तेनसत. समतात् चर्दिभु इत्यर्थ 'पासए' पार्थे समीपे वीणादीनि स्थापयन्ति, स्थापयित्वा ते पुस्पाः 'निचला' निश्चला चलनक्रियारहिताः ‘णिप्फदा' निःस्पन्दा दस्तायायवमचाररहिताः 'तुसिणीया' पचन व्यापाररहिताः 'निति ' तिष्ठन्ति । तथा-यत्र यत्र तेऽश्वाः आसते वा यारत् त्सयतयन्ति लुठन्ति तत्र तत्र स्खलु ते कौटुम्पुिरुषा' वहनि कृष्णानि च कृष्णनीलपीतरक्तशुनपर्णानि काष्ठ- नेत्र इन्द्रिय को आनद देनेवाले नीले पीले आदि रगपाले चित्रो को एव घाणइन्द्रियों को सुखकारक काष्ठपुट आदि सुगधित द्रव्यों को छोटी २ नौकाओं द्वारा पोत में से उतार कर कालिक द्वीप में रग्व दिया। बाद में जहा २ वे जाति अश्व पैठते थे मोते थे, टहरते थे, लेटते थे, वहा २ वे कौटुम्पिक पुरुप उन रस्तिशीर्ष नगर से लाये हुए वीणा से लेकर वृत्तवीणा पर्यन्त के साधनो को तया और भी श्रोत्र इन्द्रिय को सुहा वनी लगनेवाली साधन सामग्री को मधुर धनि से बजाते हुए ठहर गये । और (तेसिं परिपेरतेण पासण्ठति, वित्ता णिच्चला, णिप्फदा, तुसिणीया चिठ्ठति, जत्य २ ते आसा आसयंति वा जाव तुयति वा तत्य र ण ते कोडुबिय पुरिसा बद्दणि किण्हाणि य ५ कट्ठकम्माणि य પમાડનાર નીલા, પીળા વગેરે રગના ચિત્રોને અને ઘાણ (નાક) ઈન્દ્રિયને સુખ આપે તેવા કાકપુર વગેરે સુગ ધિત દ્રવ્યોને વહાણમાથી નાની નાની હેડીએમાં મૂકીને કાલિક દ્વીપ ઉપર મૂકી દીધી ત્યારપછી જ્યા તે જાતિ અો બેસતા હતા, સૂતા હતા, રહેતા હતા, આરામ કરતા હતા ત્યા તે કૌટુંબિક પુરુષે તે હસ્તિશીષ નગરથી લઈ આવેલી વણથી માડીને વૃત્ત વિણ સુધીના સાધનોને તેમજ બીજા પણ શ્રોત્ર (કાન) ઇન્દ્રિયને ગમે તેવી સાધન સામગ્રીને મધુર વનિથી વગાડતા ત્યા રોકાઈ ગયા અને (तेसि परिपेरतेण पासए ठवेति, ठविता णिच्चला, गिफदा, तुसिगीपा चिट्ठति, जत्य २ ते आसा आसयति वा जार तुयद्वति वा तत्य २ कोई. - .
मनगारधर्मामृनषिणी टीका अ०१७ कालिकद्वीपगत आकीश्चिवक्तव्यता १५ कर्माणि यावत् स पातिमानि च अन्यानि च रहनि चक्षुरिन्द्रियपायोग्याणि च द्रव्याणि स्थापयति एकत्री कुर्वन्ति, तेषामश्वाना परिपर्यन्तेन-सर्वतः समन्तात् पार्था स्थापयन्ति च, स्थापयित्वा ते निश्चलाः, निस्पन्दाः, तूष्णीकास्ति ठनि२ । तथा-यर या तेऽवा आसते स्वपन्ति तिष्ठति त्वग्वतयन्ति च तत्र तर खलु तेपा पहना कोष्ठपुटाना च यापद् अन्येपा च रहना घाणेन्द्रियमायोग्याणा जाव सघाउमाणि य अन्नाणि य दृणि चरिखदिय पाउग्गाणि यदव्याणि ठति, टवित्ता तेसिं परिपेरतेणं पाप्तए ठवेंति, ठवित्ता णिचरला णि'फदा तुसिणीया चिट्ठति ) उस के चारों तरफ चारो दिशाओं में- वीणा आदिको को स्थापित करते रहे । स्थापित करके फिर वे वही पर निश्चल-चलन क्रिया से रहित होकर हस्तादि अवयव को कपित किये विना ही चुपचाप बैठ गये। इस तरह-जिस२ वनमें वे अश्व बैठते थे, सोते थे, ठहरते थे, लेटते थे, बहा २ जन कौटुम्विक पुरुपों ने उस आनीत बहुतसी कृष्ण, नील, पीत, रक्त, शुक्ल वर्णवोली काष्ठकर्म आदि सघातिम पर्यंत की सामग्री को जो चक्षुइन्द्रिय को आनन्दप्रद थी, तथा और भी चक्षुइन्द्रि को सुहा वनी लगने वाली जो वस्तुएँ थी उन को एकत्रित किया और उन्हें उन अश्वो की चारो दिशाओ मे रख दिया। रखकर के फिर वे निश्चल, निस्पन्द होकर चुपचार बैठ गये । (जस्य २ ते आसा आसयति ४ तत्व विय पुरिसा यहूणि किण्हाणि य ५ कट्ठकम्माणिय जाच सपाइमाणि य जन्नाणि य रहूणि चविखदिय पाउग्गाणि य दयाणि ठवेंति, ठवित्ता तेसि परिपेरतेण पासए ठवेंति ठवित्ता णिच्चला, णिप्फदा तुसिणीया चिट्ठति ) તેમની ચેમેર, ચારે ચાર દિશાઓમાં વણાઓ વગેરે મુકી મુકીને તેઓ વા જ નિશ્ચલ-હવન ચલનની ક્રિયાથી રહિત થઈને આગને હલાવ્યા વગર ચુપચાપ ત્યાં બેસી ગયા આ પ્રમાણે જે જે વનમાં અશ્વો ઘોડાઓ) બેસતા હતા, સૂતા હતા, રહેતા હતા, આરામ કરતા હતા તે તે વનમાં તે કૌટુંબિક પુરુએ સાથે લાવેલી ઘણી કાળી, નીલી, પીળી રાતી, સફેદ રંગની કાઈકમ વગેરે સ ઘાતિમ સુધીની બધી વસ્તુઓને કે જેઓ ચક્ષુ (આખ) ઈન્દ્રિયને સુખ આપનારી હતી તેમજ બીજી પણ ચક્ષુ ઈન્દ્રિયને સુખ આપ નારી જેટલી સારી વસ્તુઓ હતી તેમને ભેગી કરી અને અશ્વોની મેર તેમને ગઠવી દીધી ગઠવીને તેઓ ત્યા જ નિશ્ચલ, નિસ્પદ થઈને ચુપચાપ ત્યાં જ બેસી ગયા ( जत्थ २ ते आसा आमयति ४ तत्य २ ण तेसिं बहूण फोट्टपुडाण य जान अन्नेसि च बहूण घागिदियपाउग्गाण दवाण पुजेय णियरे य परति, . नाहिचणं' यत्र यत्र चपने खलु ये 'भामा' अमावारपा अथा: 'आसयंति या' आस-उपविशन्ति 'सयंति शेरतेसपनि वा चिट्ठति वा' तिष्ठति या, 'यति या 'सर्तयति-शरीर मसार्य म्यपनि वातहिं २ तत्र तन च खलु ते कौटुम्बिापुरुषाः 'तामो' तहस्तिशीर्ष नगराधानीता पीगाश्च यापत्-वृत्तीणाश, तथा अन्यानि पनि श्रीगेन्द्रियमायोग्याणि च द्रव्याणि ' समुदोरेमाणा' ममुदीरयन्ता मधुरध्वनिना चादयन्तः तिष्ठन्ति, तेषा मवाना 'परिपेरतेण' परिपर्यन्तेनसतः समन्तात् चर्दिशु इत्यर्थ 'पासए' पार्थे समीप पीणादीनि स्थापयन्ति, स्थापयित्वा ते पुमपाः 'निचरा' निश्चलाः चरनकियारहिताः ‘णिफंदा' निःस्पन्दा दस्तावश्यवमचाररहिताः 'तुसिणीया' पचन च्यापाररहिता. 'चिट्ठति ' तिष्ठन्ति । तया-यत्र यत्र तेऽश्वाः आसते वा यार सपनयन्तिलुठन्ति तत्र तत्र खलु ते कौटुमिफपुरुषा' पहनि कृष्णानि च प्णनीलपीतरक्तशुरुवर्णानि काष्ठ नेत्र इन्द्रिय को आनद देनेवाले नीले पीले आदि रगवाले चित्रों को एवं घाणइद्रियों को सुखकारक काष्ठपुट आदि सुगंधित द्रव्यों को छोटी २ नौकाओं द्वारा पोत में से उतार कर कालिक दोप में रग्व दिया। बाद में जहा २ वे जाति अश्व पैठते थे मोते थे, ठहरते थे, लेटते थे, वहा २ वे कौटुम्निक पुरुप उन रस्तिशीर्ष नगर से लाये हुए वीणा से लेकर वृत्तवीणा पर्यन्त के साधनो को तया और भी श्रोत्र इन्द्रिय को सुहा धनी लगनेवाली साधन सामग्री को मधुर ध्वनि से बजाते हुए ठहर गये। और (तेसिं परिपेरतेण पासपठति, ठवित्ता णिच्चला, णिप्फदा, तुसिणीया चिट्ठति, जत्य २ ते आसा आसयति वा जाव तुयति वा तत्य र ण ते कोडविय पुरिसा बहूणि किण्हाणि य ५ कट्टकम्माणि य પમાડનાર નીલા, પીળા વગેરે રગના ચિત્રોને અને પ્રાણ (નાક) ઈન્દ્રિયને સુખ આપે તેવા કાપુર વગેરે સુગધિત દ્રવ્યોને વહાણમાથી નાની નાની હાડીઓમાં મૂકીને કાલિક દ્વીપ ઉપર મૂકી દીધી ત્યારપછી જ્યા તે જાતિ અશ્વો બેસતા હતા, સૂતા હતા, રહેતા હતા, આરામ કરતા હતા ત્યા त કૌટુંબિક પુરુષે તે હસ્તિી નગરથી લઈ આવેલી વીણાથી માંડીને વૃત્ત વીણા સુધીના સાધનોને તેમજ બીજા પણ શ્રોત્ર (કાન) ઈન્દ્રિયને ગમે તેવી સાધન સામગ્રીને મધુર ધ્વનિથી વગાડતા ત્યાં રોકાઈ ગયા અને—- (तेसिं परिपेरतेण पासए ठति, ठवित्ता णिचला, गिफदा, तुसिगीया विट्ठति, जत्य २ ते आसा आसयति वा जाव तुयवति वा तत्थ २ कोई. .
आमपारधर्मामृतवपिणी टी० अ०१७ कालिकद्वोपगत माकीणाश्वतन्यता ६१७ रए ' विवराणि-गानि सनन्ति, खनित्वा गुडपानझस्य खण्डपानकस्य यावद् अन्येपा च बहूना पानकाना विवराणि भरन्ति, भृत्वा तेपा परिपर्यन्तेन पार्थे स्थापयन्ति यागत् तूप्णीकास्तिष्ठन्ति ४ । यत्र यत्र च खलु तेऽवा आसते ४ तत्र तत्र च खलु ते कौटुम्मिरपुरुषाः वहून कोयविकान्-रूतपूरिनपावरणविशेपान यावत् हसगर्भान् कौशेयवस्त्रनिशेपान् अन्यानि च बहुनि स्पर्गेन्द्रियपायोग्याणि वस्त्रादीनि 'अत्युय पञ्चायुयाह आस्तृतप्रत्यवस्तृतानि-लक्ष्णप्रावरणमातानि कृत्वा स्थापयन्ति, स्थापयित्वा तेपा परिपर्यन्तेन यानत् तूष्णीकास्तिष्ठन्ति ५ । ततः खलु तेऽश्वा यत्रेय एते उत्कृष्टाः शब्दस्पर्शरसरूपगन्धास्तत्रैवोपागच्छन्ति, द्रव्यों के पुज एव निकर लगाकर खडे कर दिये । एक ही वस्तुओंकी जो राशि होती है उसका नाम पुज तथा भिन्न वस्तुओं की राशि का नाम निकर है । याद मे वही पर उन्हों ने अनेक गत खड्डे किये । गर्त करके उनमें गुडपानक खडपानक यावत् और भी अनेक पानक भर दिये। पाद में वहा पर उनकी चारो दिशाओं में निश्चल-निस्पन्द होकर चुप- चाप बैठ गये। इसी तरह जिन २ वनो में वे घोडे बैठते थे, सोते थे, टहरते थे, एव लेटते थे, वहा २ उन कौटुम्पिक पुम्पो ने अनेक रूई के भरे हुए प्रावरणों को यावत् हसगी को-रेशमी वस्त्रों को तथा-और भी अनेक स्पर्शनइन्द्रिय को सुखदायक बस्त्रो को चिकने प्रावरणों से ढककर रख दिया। बाद में वे उनके चारों ओर यावत् चुपचाप चैठ गये (नएण ते आसाजेणेव एए उस्किट्टा सद्दफरिसरसरूवगंधा तेणेव उघा- બિક પુરુએ ગેળના થાવત્ બીજ ઘણા રસનેન્દ્રિય (જીભ) ને સુખ પમાડે તેવા દ્રવ્યોના પુજે અને નિકો લગાવીને ખડકી દીધા એક જ વસ્તુના ઢગ- લાને પુજ તેમજ જુદી જુદી વસ્તુઓના ઢગલાઓને નિકર કહે છે ત્યારપછી તે લે એ ત્યા જ ઘણા ખાડાઓ તૈયાર કર્યા તે ખાડાઓમા તેઓએ ગોળ પાનક, ખાડપાનક, યાવત્ બીજા પણ ઘણી જાતના પાનકા ભરી દીધા બાદ તેઓ ત્યાં જ તેમની ચારે તરક નિશ્ચલ-નિરૂદ થઈને ચુપચાપ બેસી ગયા આ પ્રમાણે જે જે વનેમા તે ઘોડાઓ બેસતા હતા, સૂતા હતા, રહેતા હતા અને આરામ કરતા હતા ત્યા ત્યા તે કોટુંબિક પુરુએ ઘણા રૂના પ્રાવ ને યાવત હસને, રેશમી વસ્ત્રોને તેમજ બીજા પણ ઘણા સ્પશે ન્દ્રિયને સુખ આપે તેવા વસ્ત્રોને લીસા પ્રાવથી આચ્છાદિત કરી દીધા ત્યારપછી તેઓ બધા ચુપચાપ તેની ચારે તરફ બેસી ગયા (तपण ते आसा जेणेव एए उक्ट्ठिा सद्दफरिसरसरूवगवा तेणेर नाग- ત્યાર PJa/ " माताधर्मका द्रयाणां पुआथ एकवस्तुमहरूपान निफ नानाधिराशिम्यान कुर्नन्ति, फरत्या तेपामश्चानां परिपर्यन्तेनाग्नुि या नूष्णीकाम्निष्ठन्ति । यत्र यत्र च वसु तेऽश्या आमते ४ तत्र तत्र गल एडस्य यारद अन्येषां च पहना निष्ठियमायोग्यागा द्रव्यमा पुवांध निराश्र पूर्वन्ति. कला 'विय २ ण तेमि पण फोहपुटाणं पजार अन्नेमिच पण घाणिदिय पाउ गाण दवाण पुजेय गियरे य कति करिता तेमि परिपरतेण जाव चिनि, जत्य जपण ते आमा आमयति ४ तत्पर गुलस्म जाव अन्नेसि च यथर्ण निम्भिदिय पाउग्गाण दव्याण पुंजे य णियरे य करेंति, करिता पियर खति, सणित्ता गुलपाणगस्स गहाणगस्त जाव अन्नेमि च चहा पाणगाण पियरे भरेंति-भरिता तेमि परिपेरतेण पामए ठति जार चिति २ च ण ते आमा आम० तहिं २ण ते घहवे कोयविया य जार गम्भाय अण्णाणि य सहणि फामिदियपाउ ग्गाइ अत्युष पच्चत्धुयाइ ठनि, रित्ता तेमि परिपेरतेण जाव चिट्ठति ) जहा जहा ये घोडे पैठते थे, सोते थे, ठहरते थे, लेटते थे, वहीं २ उन कौटुम्निक पुरुपों ने उन अनेक कोष्ट पुटों के यावत् अन्य और घाणेन्द्रिय प्रायोग्य द्रव्यो, के पुजों यो निकरो को एकात्रित कर दिया और करके फिर वे उन अब्दों की चारों दिशाओं में यावत् चुपचाप बैठ गये। जहा २ वे घोडे धैठते थे, सोते थे, ठहरते थे, लेटते थे, वहार उन फौटुम्पिक पुरुषो ने गुड़ के यार दूसरे और रसनेन्द्रिय आरसादक करिता तेसिं परिपेरतेण जार चिट्ठति, जत्थ जत्य गते आसा आसयति ४ तत्थ २ ण गुलस्स जान अन्नेमिं च वर्ण जिभिदिय पाउग्गाण दव्याण पुजे य गियरे य मोति, करित्ता वियरए खणति, खणित्ता गुलपाणगस्स खडपाणगस्स जाव अ नेमि च बहण पाणगाण पियरे भरेंति-भरित्ता तेसिं परिपेरतेणे पासए ठति जाव चिट्ठति जहि २ च ण ते आसा आस० तहिं २ च ण ते वहवे कोय विया य जान गम्भाय अण्णाणि य बहूणि फासिदिय पउग्गाइ अधुयपच्चत्यु याइ ठति, उवित्ता तेर्मि परिपेरतेण जाव चिट्ठति) જયા જ્યા તે ઘડાઓ બેસતા હતા સૂતા હતા રહેતા હતા, આરામ કરતા હતા ત્યા ત્યા તે કૌટુંબિક પુરુષોએ તે ઘણા કે ફટકોને ચાવતુ બીજી પણ ઘણું ધ્રાણેન્દ્રિય (નાક) ને સુખ પમાડે તેવી વસ્તુઓને પુષ્કળ પ્રમા માં ચા ગોઠવી દીધી, એકઠી કરી દીધી અને એકઠી કરીને તેઓ તે ઘડા એને ચારે તરફ ચાવતું ચુપચાપ થઈને બેસી ગયા તે ઘોડાએ જ્યાં જ્યાં બેસતા હતા, સૂતા હતા, રહેતા હતા, આરામ કરતા હતા ત્યાં ત્યાં તે કૌટું - आमगारधर्मामृतषिणी टी० अ० १७ काल्विद्वोपगत पाकीर्णाश्व व्यता ६१७ रए' विवराणिगानि सनन्ति, खनित्ला गुडपानकस्य खण्डपानकस्य यावद् अन्येपा च बहूना पानकाना विवराणि भरन्ति, भृत्वा तेपा परिपर्यन्तेन पार्क स्थापयन्ति यापत् तूष्णीमस्तिष्ठन्ति ४ । यन यन च खलु तेऽश्वा आसते ४ तन तत्र च खलु ते कौटुम्निमपुरुषाः वहून कोयरिकान्-स्तपरितमावरणविशेपान् यावत् हसगर्भान् कौशेयवस्त्ररिशेपान अन्यानि च पनि स्पर्शेन्द्रियपायोग्याणि वस्त्रादीनि 'अत्युय पञ्चत्युयाइ आस्तृतप्रत्यवस्तृतानिश्लक्ष्णप्रावरणमावृतानि कृत्ला स्थापयन्ति, स्थापयित्वा तेपा परिपर्यन्तेन यावत् तूष्णीकास्तिष्ठन्ति ५ । ततः खलु तेऽन्वा यत्रैव एते उत्कृष्टाः शब्दस्पर्शरसरूपगधास्तत्रैवोपागच्छन्ति, द्रव्योंके पुज एव निकर लगाकर खडे कर दिये । एक ही वस्तुओकी जो राशि होती है उसका नाम पुज तथा भिन्न वस्तुओं की राशि का नाम निकर है । पाद मे वी पर उन्हों ने अनेक गर्त खड्डे किये । गर्त करके उनमें गुडपानक खडपानक यावत् और भी अनेक पानक भर दिये। थाद में वहा पर उनकी चारो दिशाओं में निश्चल-निस्पन्द होकर चुप- चाप पैठ गये। इसी तरह जिन २ वनो में वे घोडे बैठते थे, सोते थे, ठरते थे, एच लेटते थे, वहा २ उन कौटुम्बिक पुस्पो ने अनेक रूई के भरे हुए प्रावरणो को यावत् हसगी को-रेशमी वस्त्रों को तथा-और भी अनेक स्पर्शनइन्द्रिय को सुखदायक वस्त्रो को चिकने प्रावरणों से ढककर रख दिया। याद मे वे उनके चारो ओर यावत् चुपचाप बैठ गये (तएण ते आसा जेणेव एए उस्किट्ठा सफरिसरसरूवगंधा तेणेव उवा- બિક પુરુએ ગોળના યાવત્ બીજા ઘણા રસનેન્દ્રિય (જીભ) ને સુખ પમાડે તેવા દ્રવ્યોના પુજે અને નિઝરે લગાવીને ખડકી દીધા એક જ વસ્તુના ઢગ- લાને પેજ તેમજ જુદી જુદી વસ્તુઓના ઢગલાઓને નિકર કહે છે ત્યારપછી તે લોકોએ ત્યા જ ઘણુ ખાડાઓ તૈયાર કર્યા તે ખાડાઓમાં તેઓએ ગળ પાનક, ખાડપાનક, યાવત્ બીજા પણ ઘણ જતના પાનને ભરી દીધા ત્યાર બાદ તેઓ ત્યાં જ તેમની ચારે તરફ નિશ્ચલ-નિરૂદ થઈને ચુપચાપ બેસી ગયા આ પ્રમાણે જે જે વનમાં તે ઘડાઓ બેસતા હતા, સૂતા હતા, રહેતા હતા અને આરામ કરતા હતા ત્યા ત્યા તે કોટુંબિક પુરુષોએ ઘણું રૂના પ્રાવણને યાવત હસગને, રેશમી વસ્ત્રોને તેમજ બીજા પણ ઘણા સ્પર્શ નિયને સુખ આપે તેવા વસ્ત્રોને લીસા પ્રાવરથી આચ્છાદિત કરી દીધા ત્યાર પછી તેઓ બધા ચુપચાપ તેની ચારે તરફ બેસી ગયા (तएण ते आसा जेणेव एए उक्ट्ठिा सदफरिसरसरूवगधा तेणेव उनाग- माताकपा उपागत्य तत्र खट-अत्यगाया' अग्न्येके केचिद् अधा-'अपूर्वा: अष्टपूतोः खल्लु इमे शब्दस्पर्शरमस्पगन्धाः सन्ति' इति पनि पिचित्य तेषु उत्कटे- आयर्प के पु शन्दस्पर्शरमस्पगन्धेयु 'मानिया' अदिता =मूरिदिता, माप्तहेयोपादेयरिकाः अढा-अमक्तिदिताः, अपथिताटोमतन्नुभिरबद्धाः, अनध्युपपन्ना'तदेशाग्रतारहिताः शिथिन्मामपि तेप्यासक्तिमर्याणाः सन्तः तेपामुन्टाना 'सहजार गंधाण' दस्पर्शग्मल्पगन्याना टरेण अतिदरत एव 'असमति ' अपकामन्ति पलायते स्म । ते च स तत्र परगोचरा- प्रचुरचरणभूमयः प्रचुरतृणपानोया, निर्भयाः, निरुद्विग्नाः 'मुह मुहण' मुख सुखेनन्सुसपूर्वक विहरन्ति । गच्छति, उद्यागच्छित्ता तत्य ण अधेि गया आसा अपुन्या ण हमे सह- फरिसरसरूधगधाइ त्ति कटु तेसु उरिक्सु सफरिसरसरुवगधेसु अमुच्छिया४ तेसि उसिट्ठाण सद्द जान गधाण दूरं दूरेण अरस्कमति) पादमे घे अश्व जरा ये पूर्वोक्त उत्कृष्ट शब्द, स्पर्श, रस, रूप गध और स्पर्शचाले पदार्थ ये वहा पर आये यहा आकर के इनमें कितनेक अश्व "ये शब्द, स्पर्श, रस, रूप, गध अदृष्टपूर्व है" ऐसा विचार कर उन आकर्पक शब्द रूप, रस, स्पर्श व गधों में-उन पदार्थों मे-मृद्धित नहीं यने । हेय उपादेय के विवेक से युक्त यने हुए ये कितनेक अश्व उन में आसक्ति से ररित ही रहे रोभस्पतन्तु से बन्धे नहीं। तथा किञ्चि न्मात्र भी उनमे आमक्ति नहीं करते हुए वे उन शब्द, स्पर्श रूप, और गधों को पहुत ही दूर से छोड़कर चल दिये । (तेण तत्थ पउरगोपरा छति, उपागच्उित्ता तत्थण अत्यगया आसा अपुरमा ण इमे सदफरिसरसरूव त्ति को तेसु उक्किठेसु सहफरिसरसरूपगवेसु अमुच्छिया ४ तेसि उक्विट्ठाण सर नाव गधाण दूर दूरेणं अश्क्कमति) ત્યારપછી તે ઘડાઓ આ બધા પૂર્વે મૂકેલા ઉત્કૃષ્ટ શબ્દ, સ્પર્શ, રસ ૨૫ અને ગ ધવાળા પદાર્થો હતા ત્યા આવ્યા ત્યાં આવીને તેમાથી કેટ લાક ઘડાઓ ૮ આ શબ્દ સ્પર્શ, રસ, રૂપ અને ગધ અપૂર્વ છે ” આમ વિચાર કરીને તે આકર્ષક શe, રૂપ, રસ, પશે અને ગધેવાળા તે પદા માં મૂછિત (મહાધલુપ) ધ નેહિ હોય અને ઉપાદેયના વિવેકથી સાવધ બનેલા કેટલાક ઘડાઓ તે પદાર્થોમાં નિકાસક્ત જ રહ્યા તેઓ લેભ રૂપી રનરીથી બધાયા નહિ થોડો પણ આસક્તિ બતાવ્યા વગર તેઓ તે શબ્દ, સ્પર્શ, રસ, રૂપ અને ગધવાળા પદાર્થોને ખૂબ દરથી જ છોડીને જતા (तेण तत्थ परगोयरा पउरत्तण गणिया णिन्भया गिन्विग्गा सुद २छा अनगराधामृतर्वापणी टी० अ० १७ कालिकद्रीपगत आकोणाश्याक्त यता ६१९ अथोपनय प्रदर्शयति,–'एवामेर' एपमेप-शब्दाधर्मिताकीर्णाश्ववत् ‘सम माउसो' हे आयुप्मन्त श्रमणा ! योऽस्माक निर्ग्रन्थी या यावत्-आचार्योंपा. ध्यायानामन्ति के प्रजितः सन् शब्दस्पर्शरसरूपगन्धेपु 'नो सज्जइ 'नो सज्जते= आसक्तिमान् न भवति 'नो रज्नड'नो रज्यते जनुरक्तो न भाति, नो गृ यति, न वाञ्छति, नो मुधति-न मूर्छति, नो अ युपपद्यते-न तल्लीनो भवति, स खलु इह लोक एन बहूना श्रमणादीना चतुर्पिधसङ्घस्य जर्चनीयासंमाननीय. यावत् चातुरन्तप्तसारकान्तार 'वीउवहस्मइ ' व्यतिप्रजिष्यति उल्लड्पयिष्यति-पारं गमिप्यतीत्यर्थ । सू०३ ।। पउरत्तणपाणिया णिन्भया णिरुधिग्गा सुह सुहेण विहरति) और जगल में ही जो प्रचुरचरने की जमीन थी-जिममें अधिक से अधिक मात्रा मे तृण और पानी भरा हुआ रहता था उममे ही निर्भय, निरु द्विग्न होकर सुखपूर्वक रहे। अब इस दृष्टान्त का उपनय प्रदर्शित करने के लिये सूत्रकार कहते है-1(एवामेवममणाउसो! जो अम्ह णिगंथो वा णिग्गथी चा जाय सद्द फरिसरसरूवगवेसु णो सजा णो णो रज्जद, जो गिज्झइ, णो मुज्झइ, णो अज्झोपवज्जेइ, से ण इह लोए चेव चरण समणाण ४ अच्चणिज्जे जाव वीदवइस्सइ) हे आयु प्मत भ्रमणो! इसी तरह जो हमारा निम्र य साबुजन एव निर्ग्रन्थी साध्वी जन अचार्य उपा-यय के पास प्रव्रजित होकर शब्द स्पर्श, रस, रूप, और गध इन पांचो इन्द्रियो के विपयो में आपक्ति युक्त नहीं होता है, अनुरक्त नहीं बनता है, उन्हें चाहता नहीं है, उनमें मूठित नहीं होता है, उनमें तल्लीन नहीं होता है, वह इस लोक मे ही अनेक सुहेण विहरति ) म वनमा २४ प्रयु२ यरवानी भीन ती, या पधारेमा વધારે ઘાસ અને પા હતા ત્યાં જ નિર્ભય, નિરૂદ્વિગ્ન થઈને સુખથી રહેવા લાગ્યા હવે આ દુષ્ટાતને ઉપનય સ્પષ્ટ કરવા માટે સૂત્રકાર કહે છે કે ( एवामेव समणाउसो जो अम्ह णिग्गथो वा णिग्गयी वा जार सदफरिस- रसख्वगधेसु णो सज्जइ णो रज्जइ, जो गिझइ, णो मुज्झइ, णो अग्झोनवज्जेइ, से ण इहलोए चेव बहूण समणाण ४ अच्चणिज्जे जार वीइनइस्सइ) હે આયુષ્મત શમણે! આ પ્રમાણે જ જે અમારા નિગ્રંથ સાધુઓ કે નિર્ચ થ સાવીઓ આચર્યું કે ઉપાધ્યાયની પાસે પ્રજિત થઈને શબ્દ, સ્પર્શ, રસ, રૂપ અને ગ ધ આ પાસે ઈન્દ્રિયેના વિષમાં આસક્ત થતા અનુરક્ત થતા નથી, તેમને ઈચ્છતા નથી, તેઓમા મૂર્થિત થતા . . . - . माधयानम् शदस्पर्शरसस्पगन्धार ' आसेगाणा' आसेपमानाः रामानुभय कुर्माणाः तैई हुभि टूटेभ न्यनशिपः, पागा ज्यादिस्पागलपपु-गलेपु-अष्टेषु पाटेषु च 'यज्झति ' यस्यन्ते-ते पौम्मिापुरुषास्तान धान बन्नन्ति म्मत्यर्थः । तत घोड़ों में से फिननेक घोड़े ऐसे भी थे जो जाये उत्कृष्ट शब्द स्पर्श रस, रूप गध ये पांचो इन्द्रियों के आकर्षक रिपय थे आकर उन उत्कृष्ट शन्द स्पर्श आदि विषयो में मृति यावत् तालीन यनगये। और उन्हें सेवन करने में प्रवृत्त भी हो गये। (तपण ते आमा ते उपिढे मद्द५ आसेचमाणा तेसि पहहिं कूटेहि य पासेरि य गलासु य पाणसु य यज्झति, तण ते पोयियपुरिमा ते आसे गिरति गिहिसा एगढियारि य पोयवहणे सचारेंति, सचारित्ता तणस्म कस्स जाव भरेंति. तएण ते सजत्ता णावा चाणियगा दरिखणाणुकृलेण वारण जेणेव गभीरपोयपट्टणे तेणे उवागच्छइ,उवागउित्तापोयवहण लयेति- लपित्ता ते आसे उत्तरति) इसके बाद ये घोड़े उन उत्कृष्ट शब्द स्पर्श रस, रूप, एवं गध इन पाचौं इन्द्रियों के विपयों को सेवन करते हुए रज्यादिरूपन्धन विशेषों द्वारा कठों और पैरों में लिये गये । अर्थात् खन कौटुम्बिक पुरुषों ने इन घोड़ों को उस समय रस्सियो द्वारा यांध लिया। पाध करके फिर उन कौटुम्बिक पुरुषोंने उन्हें पकड लिया पकड તે ઉત્કૃષ્ટ શબ્દ, સ્પર્શ, રસ, રૂપ અને ગધ આ પાચે ઈન્દ્રિયોના આકર્ષક વિ હતા ત્યાં આવીને તે ઉત્કૃષ્ટ શબ્દ સ્પર્શ વગેરે વિષયમાં મૃછિત (આસકત) યાવત્ તલીન થઈ ગયા અને તેમના સેવનમાં પ્રવૃત્ત પણ થઈ ગયા (तएण ते आसा ते उक्किडे सह ५ आसेवमाणा तेसि वहिं कूडे हिं य पासेहिय गलएसु य पाएमु य वज्ञति, तएण ते कोड वियपुरिसा ते आसे गिण्हति गिण्डित्ता एगद्वियाहिं य पोयवहणे सचारेति, सचारित्ता तणस्स कट्ठस्स जान भरेति, तरण ते सनत्ता णावा वाणियगा दक्खिणाणुकूलेण वारण जेणेव गभीरपोयपणे तेणेव उवागच्छद, उवागछित्ता पीयवहण लति-लविता ते आसे उत्तारैति) ત્યારપછી તે ઘડાઓ ઉત્કૃષ્ટ શબ્દ, સ્પર્શ, રસ, રૂપ અને ગ ઘ આ પાચે ઈન્દ્રિયના વિષયનુ સેવન કરતા રડાઓ વગેરે રૂપ બઘન વિશેષથી કે અને પગમા બધાઈ ગયા એટલે કે તે કૌટુંબિક પુરુષોએ તે ઘડા એને દેરડાઓથી બાધી લીધા બાધીને તે કૌટુંબિક પુર જયા - " अनगारधामृतषिणो टीका अ० १७ आकोणावदादातिययोजना खलु ते कोटुम्बिापुरुपास्तानश्वान् टहन्ति, गृहीत्वा एगद्वियाहि एकाथियामि'- लघुनौकाभि पोतबहने वृहन्नौकाया सचारेंति' सञ्चारयन्ति आरोहयन्ति सश्चार्य तृणस्य साप्ठस्त्र च यावत् पोतवहन भरति तृणकाष्ठादिभिरितिभाः । ततः खलु ते सयानोकावाणिजकाः दक्षिणानुकूलेन-स्वानुरलेन पातेन यत्रोत्र गम्भीरपोतपचन-पोतलम्बनस्थान तगोपागच्छन्ति, उपागत्य पोतवहन 'लति' लम्बयन्ति-शकुपु बद्धा स्थापयन्ति, लम्पयित्वा तान् अश्वान् 'उत्तारेंति' उत्तारयन्ति, उत्तार्य यौन इस्तिशीर्ष नगर यत्रैव कनककेतू राजा तशैवोपाग- च्छन्ति, उपागत्य 'करयल जाव' करतलपरिगृहीत शिरारतं दगनख मस्त के कर फिर उन्हें छोटी २ नौकाओ द्वारा लाकर बडी नौका में चढाया- चढा करके फिर उसमे तृण और काष्ट आदि को भरा। इसके बाद वे सायानिक पोतषणिक दक्षिणानुकूल वायु के चलने पर जहा गभीर नामका पोतपट्टण (रन्दरगाह) था वहा आये। वहां आकर के उन्होंने अपने पोत को लगर डालकर ठहरा दिया। ठहरा कर उन अन्चों को उस पोत से फिर उन्हों ने नीचे उतार लिया। (उत्तारितो जेणेच हत्थिसीसे जयरे जेणेव कणगकेज राया तेणेव उवागच्छति उवाग- च्छित्ता करयल जाव पडावेंति, बद्धावित्ता ते आसे उवणेति, तएण से कणकेक तेसिं सजत्ता णायावाणियगाण उस्तुक्क बियर, विय रित्ता सकारेइ समाणे सकारिता समाणित्ता पडिविसज्जेइ) उतार कर फिर वे वहां उन्हें ले गये जहा हस्तिशीर्ष नगर और उसमें भी પકડી લીધા પકડીને તેમણે નાની નાની હેડીઓ વડે મોટા વહાણમાં ચઢાવ્યા ચઢાવ્યા બાદ તેઓએ તેમા ઘાસ એને કાઇ ભર્યા ત્યારપછી તે સાયાત્રિક પિતવણિકે દક્ષિણને અનુકૂળ પવન વહેવા લાગે ત્યારે ત્યાથી રવાના થઈને જ્યા ગભર નામે પિતપટ્ટણ (બદર) હતુ ત્યા આવ્યા ત્યા આવીને તેમણે પિતાના વહાણને લગર નાખીને કર્યું ત્યારબાદ તેમણે ઘોડાઓને વહાણ માથી નીચે ઉતાર્યા (उत्तारित्ता जेणेव हथिसीसे णयरे जेणेव कणगकेऊ राया तेणेव उना. गच्छति, उवागन्छिता करयल जार बद्धाति, वद्धापिता ते आसे उवणेति. तएण से कणगकेऊ तेमि सजत्ता णावा वाणियगाण उम्भुका वियरह, पियारत्ता सरकारेड, समाणेइ, सक्करित्ता, समाणित्ता पडिसिज्जेइ) નીચે ઉતારીને તેઓ તે ઘડાઓને હસ્તિ શીર્ષ નગરમાં જ્યા કનકકેતુ રાજા હતા ત્યા લઈ ગયા ત્યાં જઈને પહેલા તેમણે બને હાથ જોડીને રાજા ६२४ . हातापाय शालि कत्या 'पद्धाति' पर्दयति नपरिजयशदेनाभिनन्दन्ति, गर्दयित्वा तान् अवान् रामः समीपे ' उति' उपनयन्नि नतः ग्बलु स कनसकेन राजा तेपा सयानोकामाणिज रानाम् ' उस्मृणा उगम् पश्य केनापि परो न ग्राख । प्रत्येम्पमाशाप तिरविन्ददाति. विीर्य सत्करोति-मधुर पचनादिभि., समानयति-नादिमिः, सत्कार्य सम्मान्य प्रतिसिर्जयति । ततः खलु स कनककेन् राना 'आसमाए' अधमर्दकान् अश्वशिक्षकान् शब्दयति, शब्दयित्वा एमादीत-ग्य सलु हे देवानुमियाः ! ममाधान ‘विण एह ' दिनयत शिक्षयत-गत्यादिकगाशलान् फुरतेत्पर्य । ततः खलु तेऽत्र मर्दकाः ' तइति । तथेति 'वयाऽस्तु' इत्युक्त्वा मतिऋण्वन्नि-नृपाशा स्वीकुर्वन्ति, जहा कनककेतु राजा थे। यहा जाकर उन्होंने पहिले दोनों राय जोड कर राजा कन ककेतु को नमस्कार किया-जय विजय शन्दों धारा उन्हें बधाई दी-यगई देकर पाद में उन घोहों को उनके समक्ष उपस्थित करदिया इसके पाद पनककेतु राजा ने उन सांयाधिक पोतवणिजनों के लिये निःशुल्क (फररहित ) अवस्था वितरित की इन्हों से कोई भी राज्यकर्मचारी टेक्स न छे इस प्रकार का आज्ञापत्र उन्हे लिखकर दे दिया। आजापत्र लिखकर देने के बाद जाने उनका मधुर वचनों द्वारा सत्कार किया। वस्त्रादि प्रदान पूर्वक उनका सम्मान किया। फिर सत्कार म मान करके उन्हें विसर्जित कर दिया। (तएण से कणककेऊ कोडुपियपुरिसे सहावेइ, सदायित्ता सकारेति पडिविसज्जेइ, तएण से कणगकेऊरावा आसमहरा सदावेह सदावित्ता एव वयासी तुम्भेण देवानुप्पिया! मम आसे विणएह) इस के बाद कनककेतु राजाने कौटु કનક તુને નમસ્કાર કર્યા અને જય-વિજય શબ્દો વડે તેમને વધામણ આપે વધામણી આપીને તેમણે તે બધા ઘોડાઓને તેમની સામે ઉપસ્થિત કર્યા ત્યારપછી કનકકેતુ રાજાએ તે સાયાત્રિક પિતરણિ કોને માટે કર માફી કરી આપી તેમની પાસેથી કોઈ પણ રાજ્ય કર્મચારી કર (ટેકસ) કે નહિ તેવું આજ્ઞાપત્ર તેમને લખી આપ્યું આજ્ઞાપત્ર આપીને રાજાએ તેમને મધુર વચને વડે સત્કાર કર્યો અને વસ્ત્રો વગેરે આપીને તેમનું સન્માન કર્યું ત્યારપછી તેમને વિદાય કર્યા (तरण से कणगकेऊ कोडुपियपुरिसे सदावेइ, सद्दावित्ता सक्कारे ति० पडिविसज्जेइ, तरण से कणगके राया आसमदए सनगवेइ सदावित्ता एवं वयासी तुमभण देवाणुप्पिया ! मम आसे विणएह ।
. . * भनगारघामृतवर्षिणी टोका अ०१७ आकोणश्विदान्तिक्योजना प्रतिश्रुत्य तान् अश्वान् बहुभिर्मुखपन्धैश्च कर्णव वैश्च नासार पैश्च वालगन्धैश्व केशवन्धैरित्यर्थः खुरसन्यैश्च 'खलिणनधेहि य' खलीननन्धैः ' लगाम इति प्रमियन्यनैः, 'अहिलाणेहि य ' अभिलानः 'जीन' इति प्रसिद्धः, पडिया- णेहि पर्याणकै.' तग' इति प्रसिद्धैश्चर्ममयैरश्वोपकरणविशेपैः, 'अकणाहि य' अङ्कनाभितप्तलोहगलाकादिभिरङ्कनकरणैश्च — वित्तप्पहारेदि य ' वेत्रमहारैश्च म्भिक पुरुपो को बुलाया, बुलाकर उनका आदर सत्कार किया। फिर उन्हें विसर्जित कर दिया। इसके पश्चात् कनककेतु राजा ने अश्वशिक्ष कों को बुलाया और बुलाकर उनसे ऐसा कहा-हे देवानुप्रियों ! तुम इन हमारे इन घोड़ों को शिक्षित वनाओ-गन्यादिकला में निपुण करो। (तपण ते आसमांगा तहत्ति पडिसुणेति, पडिसुणित्ता ते आसे नहि मुह वधेहि य अण्णय धेहि णासा वधेहि य बालबपेहि य खुरवधेहि य खलिणवधेहि य अहिलाणेहि य पडियाणेहि य अफणादिय वित्तप्पहारेहि यसप्पहारेहि य विप्पहारेहि य विणयति) राजा कनककेतु की इस आज्ञा को उन अश्वमर्दकों ने "तरत्ति" कहकर स्वीकार कर लिया। स्वीकार करके फिर उन्हों ने अनेक विध मुख वधनों से, कर्णधनों से नासावधनों से लगामरूप बधनो से अभिलानों से-पलेचाओ से-पर्या णकों से तगो के कसो से-अफनों से-तप्त हुई लोहकी शलाकाओं द्वारा डाम लगाने से वेत्र के प्रारों से, लताओंके प्रारोंसे, चाधुकों के ત્યારપછી કનકકેતુ રાજાએ કૌટુંબિક પુરુષને બોલાવ્યા, બોલાવીને તેમને સત્કાર કર્યો અને પછી તેમને વિદાય કર્યા ત્યારબાદ કનકેતુ રાજાએ અશ્વશિક્ષકને બોલાવ્યા અને બોલાવીને તેમને આ પ્રમાણે કહ્યું કે હે દેવા નુપ્રિયે ! તમે અમારા આ ઘડાઓને શિક્ષિત બનાવે, દેડવા વગેરેની કળા- એમાં નિપુણ બનાવે (तएण ते आसमद्दगा तहत्ति पडिसूणेति, पडिसृणित्ता ते आसे वहहिं मुह वधेहि य कण्ण वधेहिं णासा वधेहि य वालवधेहि य सुर वधेहि य खलिण वधेहि य अहि लाणेहि य पडियाणेहि य अक्षणाहि य पित्तप्पहारेहिय लयप्पहारे- हिय करप्पहारेहि य डिपप्पहारेहि य विणयति) રાજા કનકકેતુની આજ્ઞાને તે અશ્વમ કે એ “તહત્તિ” કહીને સ્વીકારી લીધી સ્વીકાર કરીને તેમણે ઘણી જાતના મુખ બધથી, બધનોથી, નાસા બધાનેથી, વાળ બધાનેથી, ખુર બધથી, લગામ રૂપ બનેથી, અભિલાનેથી, પહેચાએથી, પર્યાણુકથી, તને કસવાથી, અનેથી, તપા વવામાં આવેલી ભેખડની સળીઓ વડે ડામવાથી, વેતોના આઘાતથી લતા . . ७९ - - . - पाताभापा लयप्पहारेहि य 'लनामहरिश, गप्पहार' बामहरिच 'यश'- चापुरु' इति भाषागम् , 'चियपहारेविय'मिरेममयचिषणाया महारच विणयंति ' नियति शिक्षान्ति, चिनीय शिक्षायिका पनकतो राज उपनगन्ति । तत' रालु सः नारेन राना तान नश्चमकान मत्सरोनि मम्मा नयति, सत्कृत्य सम्मान्य प्रनिसियति । ततः रालु तेऽधाः बहुभिर्मुपान्यैश्व यावत्-डियामहारैश्च बहूनि शारीरमानरगनि दुपानि प्राप्नुवन्ति । एपामे' एमेर-दादादिविषयमूटिशाश्वत् 'ममणाउसो' हे आयुप्मन्तः श्रमणा. योऽस्मात निग्रन्योता निधी रानाचार्यापायायानाम- न्तिके मनजितः सन् इप्टेषु शन्दरपरिसस्पा पेषु 'मज्जइ' सज्जते आसक्तो प्रहारी से, लिपा-चर्म पी पनी हुई चिकनी पागाओं के प्रहारों रो उन घोडों को शिक्षित बना दिया। (वियित्ता कणगऊम्म रणो उवणेति तएण से कणगराया ते आसमा सफारेड सरकारिता पटिविस ज्जेइ, तरण ते आसा घाहि मुत्यति जाब छिबप्पारेहि य यदृणि सारीरमानसाणी दुरयाइ पाति ) शिक्षित पनाकर फिर वे उन पाहो को कनकोतु गजा के पास ले गये । पारमे राजा कनककेतु ने उन अश्वमर्दको का तकार सन्मान किया। मत्कार सन्मान करके फिर उन्हें विसर्जित कर दिया। ये घोडे लेकर अनेक विध उन मुप यधनों से यावत् चर्ममय चिक्कणकशाओ के प्रहारों से नाना प्रकार के शा रीरिक एव मानसिक दुग्यो को पाने लगे। (यामेर समणाउसे। जो अम्ह निग्गयो वा निग्गयी वा पन्नड समाणे इडेसु मद्दफरिसरस એના પ્રહારથી ચાબુકના પ્રહારી, પિ ચામડાના બનેલા લીસા ચાબુ કોના પ્રહારોથી તે ઘેડાઓને કેળા (पिणयित्ता वणगऊ राया ते आसमदए मस्कारेइ, सक्कारित्ता पडिविप्त ज्जेइ तरण ते आसा बहहिं मुह वधेहि नार चिपहारेहिं य बहुणि सारीर- मानसाणि दुखाइ पार्वति ) કેળવીને-શિક્ષિત બનાવીને તે ઘડાઓને તેઓ કનકતુ રાજા પાસે લઈ ગયા ત્યારપછી કનકકેતુએ તે અશ્વમ કે સરકાર તેમજ સન્માન કર્યું સત્કાર અને સન્માન કરીને તેમને વિસર્જિત કર્યા તે ઘોડાએ ઘણું સુખ બધાથી યાવત્ ચામડાના લીસા ચાબુકના પ્રહારથી અનેક જાતના શારી રિક અને માનસિક દુખે ગવા લાગ્યા (एवामेव समणाउसो ! जो अम्ह निग्गयो वा निग्गयी या पत्याए समाणे इटेस सहफरिसरसरूवगधेसु य सज्जइ, रज्जइ, गिज्यइ, मुज्झ, - . . नगारचर्मामृतपिंगी टीका अ०१७ आकोणान्यदायोन्तिकयोजना ६२७ भवति, रनइ' रज्यते अनुरक्तो माति, ' गिझइ' गृध्यति-तहान्छासक्तो भवति, 'मुज्नइ ' मुथति-मूठितो भाति, 'अज्झोवपना' अ-युपपद्यते-सर्वथा तल्लीनो भनति, स खलु इह लोक एक बहना श्रमणाना च यावत्-श्रमणीनां श्रावकाणा श्राविकाणा च 'हीलणिज्जे ' हीलनीय यावत् चातुरन्तससारकान्ता- रम् ' अणुपरियटिस्सइ ' अनुपर्यटिग्यति-भ्रमिप्यतीति भावः ।।०४॥ मूलम्-कलरिभियमहुर ततीतलतालवंसकउहाभिरामेसु । सद्देसु रज्जाणा रमति सोइंदियवसहा ॥ १ ॥ सोइदियदुद्दन्तत्तणस अह एत्तिओ हवइ दोसो। दीविगरुयमसहसो वहबध तित्तिरो पत्तो ॥ २ ॥ टीका-अथेन्द्रियासपरणदोषान् गाथामिः प्रदर्शयति-'कलरिभिय०' इत्यादि कलरिभितमपुरतन्नी तल तालवसककुदाभिरामेषु । रूवगधेसु य सज्जड, रज्जइ, गिज्झद, मुज्झइ, अज्जोरवज्जइ, सेणं इलाहे चेर रहण समणाण 7 जाव साविगण य हीलणिज्जे जाव अणुपरियट्टिस्सह ) इसी प्रकार हे आयुष्मंन श्रमणो ! जो हमारा निर्ग्रन्थ सायुजन अथवा सा-पीजन आचार्य उपायाय के पास अवजित होता हुआ इष्ट शब्द, स्पर्श, रस, रूप, गंध इन पाचों इन्द्रियों के विषयों में आसक्त होता है, अनुरक्त होता है, उनकी चाह से बचता है, उनमें मूछित बनता है, सर्व प्रकार से उनमें तल्लीन होता है वह इस लोक में ही अनेक श्रमणजनों द्वारा श्रमणी, श्रावक और श्राविकाओं द्वारा हीलनीय-निन्दा का पात्र होता है यावत् वह चतुर्गतिरूप इस ससार कान्तार में भटकना है ।। सू०४ ॥ सेण इहलोए चेन वहूण समाणाण य जाव साधियाण य हीलणिज्जे जाव अणु परियहिस्सइ) આ પ્રમાણે તે આયુમત શ્રમણ જે અમારા નિર્ચ થ સાધુજને કે સાધ્વીજનો આચાર્ય અથવા ઉપાયની પાસે પ્રત્રજિત થઈને ઈષ્ટ, શબ્દ, સ્પર્શ, રસ, રૂપ અને ગ છે આ પાચે ઇન્દ્રિયોના વિષયમાં આસક્ત હોય છે, અનુરક્ત હોય છે, તેમની ઈચ્છા કરીને તેમાં બાઈ જાય છે, તેમાં મૂર્ટિન બની જાય છે, બધી રીતે તેમાં તલીન બની જાય છે તે આ લાકમાં જ ઘ@ા શ્રમણે વડે તેમજ ઘણી શ્રમણી, શ્રાવક અને શ્રાવિકાઓ વડે હલનીય-નિન્દનીય-હાય છે યાવત તે ચતુર્ગતિ રૂપ આ સંસાર–કાતારમાં જ રહે છે કે સત્ર ૪ છે - - ताधमैया शब्देषु रज्यमाना, रमन्ते भोगोन्द्रियाशार्चा ॥1॥ श्रोगेन्द्रियदुर्दान्तत्वस्य अय एतापान माति दोषः। द्वीपिकारतमसहमानो,-यघन्ध तिचिर प्राप्तः ॥२॥ श्रोत्रेन्द्रियाशार्चा-कणेन्द्रियशपिन. याः श्रागगुम्बदाः रिभिताः स्वर घोलनाविशेपयुक्ता मधुरा:-प्रिपा कलरिमितमपुरधनि ननावात् तपा ये तन्त्री तलतालपशा-पोणा-करताल ण यस्तै समुस्वित्लान्-याद'-प्रधानाः, अमि रामा:-मनोहरास्तेपु-शब्देपु रपमाना: अनुग्क्ताः सन्तः रमन्ते-मोदन्ते ॥ १॥ 'सोइदिये ' त्यादि । 'सोइदियदुदतत्तणस्म श्रीनेन्द्रियदुर्दान्तत्वस्य औष्ट्रिय दुर्दान्त यस्य स श्रोत्रेन्द्रियदुन्ति =ोपोन्द्रियस्य जेतुमयस्यतया तशयीत्यर्थः, तस्य भारस्तच, तस्प, श्रीन्द्रियाधीनतायाः, 'एलिओ' एतावान वक्ष्यमाण प्रकारका दोपो भवति । त सदृष्टान्त प्रदर्शयति-दीपिगरुयमसहतो' द्वीपिकार तमसहमान'-दीपिका-व्याध पञ्जरस्थतिचिर', तस्याः रुत शब्दम् असहमान = 'कलरिभिय' इत्यादि। अप सूत्रकार, इन्द्रियों के असरण से जो दोष उत्पन्न होते हैं उन्हें इन गाथाओं द्वारा प्रदर्शित करते है-फणेन्द्रिय के वशवर्ती यने हुए माणी फल-श्रवण सुग्वद, रिभित-स्वरों के घोलना विशेप से युक्त ऐसे मधुरप्रिय, तत्री-वीणा, तलताल-करताल, वशवासुरी इन से उत्पन्न होने की वजह से ककुद-अत्यन्न, अभिराम-मनोहर ऐसे शब्दो में अनुरक्त होते हुए यद्यपि मुदितमन होते हैं परन्तु श्रोत्रेन्द्रिय उनकी दुर्दमन होने के कारण-श्रोत्रेन्द्रिय उनकी जितनेमे अशक्य होनेके कारण तदशवर्ती बने हुए वे प्राणी जिस तरह व्याध के पजर में रही हुई तित्तिरी के शब्द को सुनकर तीतरपक्षी-कामराग के वश से आकृष्ट कलरिभिय' इत्यादि- સૂત્રકાર હવે ઇન્દ્રિયના અસ વરણથી જે દેવ ઉત્પન્ન થાય છે તેમને આ ગાથાઓ વડે પ્રદર્શિત કરે છે કણેન્દ્રિયને વશમા થયેલા પ્રાણીઓ કવ- શ્રવણ સુખદ, વિભિત સ્વરોને વિશેષ રૂપમા મેળવવાથી ઉત્પન્ન થયેલે ઇવનિ, भ 1-प्रिय, तत्री-पीया, तadla-४२तास, १२-वासी मनायी उत्पन्न હાવા બદલ કુદ-અત્યત, અભિરામ-મને હર એવા શબ્દોમાં અનુરકત થતા જો કે તેઓ મુદિતમન-પ્રસન્ન થાય છે પરંતુ તેમની કોન્દ્રિય (કાન) મનીય હેવા બદલ એટલે કે મોટેન્દ્રિય ઉપર કાબુ મેળવવાનું કામ તેમના માટે અશકય લેવા બદલ તેને વશ થેયેલા પ્રાણીઓ જેમ વ્યાપ-શિકારીના પીંજરામાં સપડાઈ ગયેલી તિતિરીના શબ્દને સાભળીને તીતર પક્ષી - अनंगारधर्मामृतवपिणी टीका म० १७ आकीर्णाश्यवाष्टान्तिकयोजना तित्तिर वध-मरण वन्ध पञ्जरादि पन्धन मामा-प्राप्नोतीत्यर्थः 'अथ' वाक्यालङ्कारे ॥२॥ मूलम्--थणजहणवयणकरचरणणयणगव्वियविलासियगईसु । रूवेसु रज्जमाणा रमंति चविखदियवसहा ॥ ३ ॥ चक्खिदियदुद्दतत्तणस्स अह एत्तिओ भवइ दोसो । जं जलणंमि जलते पडइ पयंगो अबुद्धोओ ॥ ४ ॥ टीका-स्तनजघनवदनकरचरणनयगर्वित विलासितगतिः । रूपेषु रज्यमाना,-रमन्ते चक्षुरिन्द्रिययशार्ताः ॥ ३ ॥ चक्षुरिन्द्रियदुर्दान्तत्तस्य अथ एतावान् भवति दोषः । यद्ज्वल ने ज्वलति, पतति पतङ्गः अशुद्धिकः ॥ ४ ॥ 'थणे ' त्यादि । चक्षुरिन्द्रियवशार्ताः स्त्रीणा स्तनजवनादि रूपेषु रज्यमानाः अनुरक्ता रमन्ते ॥ ३ ॥ ज्यलने अग्नी । कोप सुगमम् ॥ ४॥ होकर वध और घधन को पाता है उसी तरह नाना प्रकार के वध वधनो को पाया करते है । गा० १-२॥ 'धणजरण, चक्खिदिय 'इत्यादि । यद्यपि चक्षुन्द्रिय के विषय की प्राप्ति करने में व्याकुल हुए प्राणी उस विषय की प्राप्ति होने पर आनन्दमग्न बन जाया करते है-वे स्त्रियों के स्तन, जघन, बदन, कर, चरण, नयन, गर्वित विलासयुक्त गमना दिरूप चक्षुहन्द्रिय के विषय को योर यार देखकर आसक्त होते हैं- परन्तु यह इद्रिय जब दुर्दान्त बन जाया करती है-तब ऐसे प्राणी जिस આવેશમાં આવીને મૃત્યુ તેમજ બ ધનને પ્રાપ્ત કરે છે, તેમ જ અનેક જાતના વધબ ધને મેળવે છે गा १-२॥ थण जहण चक्सिदिय इत्यादि- જે કે ચક્ષુન્દ્રિયોના વિષયેને મેળવવા માટે અત્યંત ઉત્સુક બનેલા પ્રાણીઓ તે વિયેની પ્રાપ્તિ થઈ જા બાદ આન દમગ્ન થઈ જાય છે તેઓ સ્ત્રીઓના ખન, જઘન, મુખ, હાથ, ચણ, નયન ગર્વિત વિલાસ-યુક્ત ગમન વગેરે રૂપ ચબુદ્ધિના વિષયને વાર વાર જોઈને આસક્ત થઈ જાય છે, પરંતુ આ ઈન્દ્રિય જ્યારે દુર્દાત બની જાય છે ત્યારે એવા પ્રાણીઓ અજ્ઞાની પત ગની हातापाने मूलम्-अगुरुवरपवरधूवण उउय मल्हाणुलेषणविहीसु । गंधेसु रजमाणा रमति घाणिदियवसट्टा ॥५॥ घाणिदियदुद्दतत्तणस्स अहं एत्तिओ हरह दोसो । ज ओसहिगधणं विलाओ निहायड उरगो ॥ ६ ॥ टीका-भगुरुपरमारधूपन ऋतुनमाल्यानुलेपनविधिपु । गधेपु रज्यमाना, रमन्ते प्राणेन्द्रिगशाः ॥6॥ नाणेन्द्रिपदुर्दान्तत्वस्य अप एवार माति दोपः । यद् श्रीपधिगन्धेन पिलाद निर्धाति उरग ॥ ६ ॥ घाणेन्द्रियवशार्चा अगुरुपरम्=कृष्णागुमः, प्रारधूपन-दशागादिरूपो धूप, उउयमल्ल ' मनमाल्यानित्तानात पाणि, अनुलेपनानि-चन्दनकुञ्ज मादिरूपाणि, तेपा विधयाफारा येपु गन्येषु तत्र रज्यमाना' अनुरक्ता. सन्तो रमन्ते ।। ५ ॥ ' ओसहिगण । ओपधिगम्येन केतक्यादिनस्पतिसुगन्धानुरागवशेन प्रकार अज्ञानी पतग अपने प्राणों को अग्नि में डाल देता है उसी प्रकार उसी विषय में अपने प्राणों का नाश करते हैं। गा० ॥ ३-४ ॥ अगुरुवर, घाणिय इत्यादि। घोणइन्द्रिय के वशवी बने हुए प्रागी अगुरुपर-कृष्णागुरु, प्रवर, धूपन,-दशाङ्गादिरूप घूप, ऋतुजमा य-तत्तऋतु के पुष्प, अनुलेपन- चन्दन ककुम आदि के विविध लेप रूप गंध में अनुरक्त होते हुए हर्षित मन होते हैं, परन्तु वे इस इन्द्रिय की दुर्दमनता का कुछ भी विचार नहीं करते हैं। जब यह इन्द्रिय दुर्दमन बन जाती है-तब ऐसे प्राणी જેમ પિતાના પ્રાણને અગ્નિમાં હેમી દે છે, તેમજ તે પણ તે વિષયમાં જ પોતાના પ્રણેને નષ્ટ કરી નાખે છે अगुरुवर, पाणिं दिय इत्यादि । ઘણુઈન્દ્રિયના વશમાં પડેલા પ્રાણીઓ અગુરૂવર-કૃષ્ણગુરૂ, પ્રવર, ધૂપન દશાગાદિ રૂપ ધૂપ ઋતુ જ માવ્ય-તત ઋતુના પુષિ, અનુપન ચદન-કુકમ વગેરેના જાતજાતના લેપના ગધમાં અનુરક્ત થઈને હર્ષિત થઈ જાય છે, પરતું હકીકતમાં તે તેઓ તે ઇન્દ્રિયની દુમતા વિષે કઈ પણ જાતને વિચાર કરતા જ નથી જ્યારે તે ઈન્દ્રિય દુમ બની જાય છે . " 3-४॥
- , - मगारधामनयर्षिणा टीका म० १७ आकोणाभ्यदाष्ट्रोन्तिकयोजना उरग सर्पः पिलात् 'निधाबई - निर्धावति-निरसरति, ततो वर न्यन च प्राप्नो- तीति भावः 1 शेप स्पष्टम् ॥ ६॥ मूल्म्-तित्तकडुय कसायंवमहुखज्जपेजलेज्झेसु । आसाएसु य गिद्धा रमति जिभिदियवसहा ॥७॥ जिभिदिय दुदतत्तणस्त अह एत्तिओ हवइ दोसो। ज गललग्गुक्खित्तो फुरइ थरविरल्लिओ मच्छो ॥ ८॥ छाया--तिक्तकटुककपायाम्लमधुन्ध खाद्यपेयले होपु । आस्वादेषु च गृद्धा, रमते जिहेन्द्रियवशात ॥ ७ ॥ जिहेन्द्रियदुर्दान्तत्वस्य, अथ एतारान् भवति दोप' । यद् गललग्नोक्षिप्त', स्फुरति स्थल रल्लितो मत्स्यः ॥ ८॥ टीका-निवेन्द्रियगाती -तिक्त-मरीचादिक, कटुक-बारवेल्लादिक, पाय- आम कादिकम् , अम्लकारमादिक, मधुरम्मोदकादिक, पह-अनेरुपिय'खज' खाद्य-कदलीफलादिक, ' पेज्ज' पेय-दुग्मादिक, ' लेज्म ' लेह्य-दशिर्कगदि. केतकी आदि की गध से आकृष्ट बनकर जिस प्रकार बिल से निकला सर्प वधन धन आदि कप्टा को पाता है वैसे कष्ट पाते है । गा० ५-६ ॥ 'तित्तमाय जिभिप' इत्यादि । जो प्राणी जिह्वाइन्द्रिय के वशवर्ती बना रहता है वह मरीच आदि के जैसे तिक्त स्वाद में करेला के जैसे बटुक स्वाद में, आमल आदि के जैसे कपायरस में करनादिके जैसे अम्ल-खद रस में, मोदकादि के मधुर स्वाद में तथा विविध प्रकार के कदली फलादिक ग्वान्य पदार्थों में, दुग्धादि पेयपदार्थों मे, एय दधि और शक्कर आदि से निष्पन्न हुए કેતકી વગેરેની ગધથી આકૃષ્ટ થઈને જેમ દરમાથી નીકળે સાપ વધબ ધન વગેરે કન્ટેને પ્રાપ્ત કરે છે તેમજ ત્રણ પ્રાપ્ત કરે છે तित्तबद्धय जिभिदिय इत्यादि । જે પ્રાણી છવા ઇન્દ્રિય (જીભ) ને વરા થયેલું હોય છે, તે મન્સ વગેરેના જેવા તીખા વાદમા, કારેલા જેવા કડવા સ્વાદમા, આમલી વગેરેના કર બાદિના જેવા અ–ખાટા રસમા, લાડવા વગેરેના જેવા મધુર સ્વાદના તેમજ જાતજાતના કેળા વગેરેના ખાદ્ય પદાર્થોમાં, દૂધ વગેરે જેવા પિય પદાર્થોમા, અને દહીં તેમજ ખાંડ વગેરેવી તૈયાર થયેલા . जैसे ।। गा ५-६ ॥ જેવા કષાય રસમાં દ૨ बामाचार निप्पन श्रीखण्डादियम् , पनेपा नन्', तेषु आहार-आस्वायन्ते इति आस्वादाः रसास्तेपु गृदा आसक्ताः सन्त. रमन्ते ॥ ७ ॥ 'निम्भिदिये ' स्यादि । गिरते-मरस्यायने मान , मरम्यवेधनेन मुखे गिद्ध इत्ययः, पशाद् उक्षिप्त जगतः इति धर्मधारयः, एवभूतो मत्स्य स्थलविरल्लित:स्थले निपातित' सन स्फुरति व्याठो भूमा भूमौ लुठति । शेप स्पष्टम् ॥ ८॥ मूलम् उउभयमाणा सुहेसु य पविभवहिययमणनिव्वुइकरेसु । फाससु रज्जमाणा रमंति फासिंदियवसट्ठा ॥ ९ ॥ फासिदिय दुद्दतत्तणस्स अह एत्तिओ हवई दोसो। ज खणइ मत्थय कुंजरस्स लोहकुसो तिक्खो ॥ १० ॥ छाया-नुभज्यमानमुसेपु च, सपिमहदयमनोनितिस्रेषु । स्पर्शेषु रज्यमाना, रमन्ते स्पर्शेन्द्रियरशा ः ॥९॥ स्पर्शेन्द्रिग दुर्दान्तत्वस्य, अब एतान् भवति दोपः । यत् ग्वनति मस्तक कुञ्जरस्य लोहादुशस्तीक्ष्णः ॥ १० ॥ टीका-'उउभये त्यादि । स्पर्शेन्द्रियवशार्ता -'उउभयमाणसुहेसु य' मनुभज्य मानमुखेपु ऋतुपु-हेमन्तादिपु भन्यमानानि सेव्यमानानि मुखानि, येषु ते, श्री खड ओदि लेय पदार्थों में आसक्तमति होकर पड़ा हर्ष मनाया करते हैं । परन्तु जप इनकी यह इन्द्रिय दुर्दान्त बन जाती है तब ऐसे प्राणी जैसे मत्स्यवेधन से-मछली पकड़ने के काटे-घशी-से मुख में विद्ध हुआ मत्स्य जल में से खीचका पार भूमिपर डाल दिया जाता है और वह भूमिपर तड़प् २ कर मर जाता है उस इन्द्रिय के विषय में फंसकर तडपू २ कर मर जाया करते हैं। गा० ७-८।। શ્રીખડ વગેરે લેહા (ચાટીને ખાઈ શકાય તેવા) પદાર્થોમા થઈને ખૂબ જ હર્ષિત થતા રહે છે પરંતુ જ્યારે તેમની આ ઇન્દ્રિય દુર્દા ત બની જાય છે, ત્યારે એવા પ્રાણી જેમ મસ્યવેધનથી-માછલી પકડવાના કાટાથી મુખમા વિદ્ધ થયેલુ માછલું પાણીમાંથી બહાર ખેચીને બહાર જમીન ઉપર નાખવામા આવે છે અને તે જમીન ઉપર તડપી તડપીને મૃત્યુ વશ થાય છે, તેમજ તે ઈન્દ્રિયના વિષયમાં ફસાઈને તડપી તડપીને મત્યુ થાય છે કે ગા ૭-૮ છે - આસક્ત ६३३. अमगारधर्मामृतपिणी टी० स०१७ आकीर्णाश्वदाष्टान्तिकयोजना तेषु तथोक्तेपु तथा सपिभाना-सपत्तिशालिना हृदयस्य मनसश्च नित्तिकरेषु सुम्बकरेपु । एव भूतेपु स्पर्शेषु रज्यमानाअनुरक्ताः रमन्ते ॥ ९ ॥ फासिदिये त्यादि । कुअरस्यकरिणीस्पर्शलुब्धस्य हस्तिनो मस्तक तीक्ष्यो- लोहाकुशः खनति-विदारयति । शेप मुगमम् ।। १० ।। ५ ।। मू० ॥ मूल्म्-कलरिभिय महुरतंतीतलतालवसकउहाभिरामेसु । सद्देसु जं न गिद्धा वसट्टमरणं न ते मरए ॥ ११ ॥ थणजहणवयणकरचरणनयणगव्वियविलासियगईसु । रूवेसु न रत्ता वसहमरण न ते मरए ॥ १२ ॥ अगुरुवरपवरधूवण उउयमल्लाणुलेवणविहीसु । गधेसु जे न गिद्धा वसहमरणं न ते मरए ॥ १३ ॥ तित्तकडुयकसायवमहुरवहुखज्जपेज्जलेज्झेसु । आसाएसु न गिद्धा वसट्टमरण न ते मरए ॥ १४ ॥ (उउभयमाण, फार्सिदियदुद्दत इत्यादि, टीकार्य-जोमाणीस्पर्शन इन्द्रियके वशवर्ती होते हैं वे अपनी स्पर्श- नेन्द्रियकी लोलुपतासे हेमन्त आदि प्रत्येक ऋतु सबन्धी सुख भोगते हैं। तथा सपत्तिशालियों के हृदय में और मन सुखकर स्पों में अनुरक्त बने रहते हैं। इस तरह करते २ जब इनकी यह स्पर्शन इन्द्रिय दुर्दान्त बन जाती है तब वे प्राणी जिस प्रकार तीक्ष्ण रोह को अकुश करिणी (हस्तिनी) के स्पर्श करने में लुन्धक बने हुए मत्त गजराज के मस्तक को विदार देता है उसी तरह इस सर्शन इन्द्रिय के द्वारा विनष्ट कर दिये जाते है । गा०९-१०॥ उ उ भयमाण, फ सिदियदुद्दत इत्यादि । જે પ્રાણ સ્પશેન્દ્રિયને વશ થાય છે, તે પિતાની સ્પશેન્દ્રિયની લોલુપતાથી હેમત વગેરે દરેકે દરેક ઋતુઓના સુખ ભોગવે છે તેમજ પત્તિવાળાઓના હદય અને મનસુખદ સ્પશેમાં આસક્ત બનીને રહે છે આમ કરતા કરતા જ્યારે તેમની આ સ્પર્શેન્દ્રિય દુદત બની જાય છે ત્યારે તે પ્રાણુંઓ (હાથિણી) ને સ્પર્શવામાં ડુબ્ધ બનેલા મત્ત ગજગજના મસ્તકને વિદી કરી નાખે છે તેમજ આ સ્પર્શેન્દ્રિય વડે વિનષ્ટ કરી નાખવામાં આવે છે કે ગા ८-१० ॥ स८० पाताधर्मका उउभयमाणसुहेसु य सविभवाहिययमणनिव्वुइकरेसु । फासेसु जे न गिद्धा वसहमरणं न ते भरए ॥ १५ ॥ टीका-शब्दादिरिपयेपनामताना मार्चमा न भातीति पाभिर्गा याभिः प्राह-करिभिय' इत्यादि। फलरिमितमधुरतन्त्रीतलताशादाभिरामेषु । शब्देषु ये न गृद्धा, शामरण न ते म्रियन्ते ॥ ११ ॥ स्तनजघनपदनगरचरणनयन गतिविगसितगतिपु। रूपेषु ये न रक्ता,-शामरण न ते म्रियन्ते ॥ १२ ॥ अगरुपरमारधूपन,-जनमात्यानुलेपनविधिपु । गन्धेषु ये न रद्धा-शामरण न ते म्रियन्ते ॥ १३ ॥ विक्तस्टुकरूपायाम्ल, मधुरवसायपेय लोपु । आस्वादेपु न गृद्धा,-वशामरण न ते नियन्ते ॥१४॥ ऋतुभज्यमानसुसेषु च, सविभर हृदयमनोनितिकरेषु । स्पर्शपु ये न गृद्धा-पशातैमरण न ते नियन्ते ॥ १५ ॥ आसाम व्याख्या सुगमा ।। १५ । सू०६॥ (कलरिभिय, धणजहण, अगुरुवरपबर, नित्तकडय, उउभयमाण, इत्यादि। इन गाथाओं द्वारा सूत्रकार यह प्रदर्शित करते है कि जो शब्दादि पांच इन्द्रियों के विपयो में आमत नही बनते हैं उनका वशार्तमरण नहीं होता है। इन गाथाओं की व्याख्या सुगम है। जो प्राणी कर्णहन्द्रिय के विषयभूत शब्द मे, चक्षुइन्द्रिय के विष यभूत रूप में नामिका इन्द्रिय के विश्यभूत गध में जिह्वाइन्द्रिय के विष- यभूत रस में, तथा स्पर्शन इन्द्रिय के विषयभूत स्पर्श में आसक्त- गृद्ध नहीं होते है। गा० ११-१५॥ कलरिभिय, थणजहण, गुरुवरपत्रर, तित काय उ उ भयमाण, इत्यादि । આ ગાથાઓ વડે સૂકાર આ વાત સ્પષ્ટ કરવા માગે છે કે જે શબ્દ વગેરે પાચે ઇન્દ્રિયોના વિષયમાં આસક્ત થતા નથી, તેમનું વશાત મરણ થતું નથી, આ ગાથાઓની વ્યાખ્યા સરળ છે જે પ્રાણી કર્ણઇન્દ્રિયન વિષયભૂત રૂપમા, નાસિકા ઈન્દ્રિયના, વિષયક ગ ધમાં, જીવા ઈન્દ્રિયના વિષયભૂત રસમો તેમજ રપન ઇન્દ્રિયના વિષય ભૂત સ્પર્શમાં અત્યત આસક્ત-ગૃઢ થતા નથી, તેઓ વશર્તમરણને પ્રાપ્ત કરતા નથી ! ગા ૧૧-૧૫ છે , मारनामी टी. अ० १७ आकीर्णाश्वदान्तिकयोजना मूलम्-सद्देसु य भयपावएसु सोयविसयं उवागएसु । तुट्टेण व रुहेण व समणेण सया ण होयव्वं ॥ १६ ।। रूवेसुय भदपावरसु चक्खुविसय उवगएसु । तुट्टेण व रुटेण व समणेण सया ण होयत्व ॥ १७ ॥ गंधेसु य भद्दपावएसु घाणविसयं उवागएसु । तुटेण व रुटेण व समणेण सया ण होयव्यं ॥ १८ ॥ रसेसु य भयपावएसु जिभविसय उवगएसु । तुडेण व रुटेण व समणेण सया ण होयव्य ॥ १९ ॥ फासेसु य भइयपावएसु कायविसय उवगएसु । तुटेण व रुद्रेण न समणेण सया ण होयव ॥ २० ॥ एव खल्ल जंबू । समणेण भगवया महावीरेणं जाव संपत्तेणं सत्तरसमस्त नायज्झयणस्स अयमढे पन्नत्ते तिबेमि। ॥ सत्तरसम नायज्झयणं समत्त ॥ १७॥ टीका-अनुकूल प्रतिकूल शब्दादिपु रागद्वेपवर्जन पञ्चभिर्गाथाभिः प्रतिबोध यति- सद्देस य' इत्यादि। शब्देपु च भद्रकपापकेयु श्रीनविषयगुपगतेपु । तुष्टेन वा रुष्टेन वा, शमणेन सदा न भवितव्यम् ॥ १६ ॥ सद्देसुय, फासेतुय इत्यादि। एव खलु जबू! समणेण भगवया महावीरेण जाव सपत्तेण सत्त रसमस्स णायज्झयणस्स अयम? पण्णत्त तिमि ॥ अब सत्रकार इन पाच गाथाओं द्वारा अनुकूल प्रतिकूल शब्दादि विषयों में श्रमणजन को कभी भी रागद्वेप नहीं करना चाहिये-इस सद्देसुय, फासेसुय इत्यादि एव खलु जबू ! समणेग भगच्या महावीरेण जार सपत्तेण सत्तरसमस्स णायज्झयणस्स अयमहे पण्ण तिमि ।। સૂત્રકાર હવે આ પાચ ગાથાઓ વડે એ વાત કે અનુકૂળ-પ્રતિકૂળ શબ્દાદિ વિષયમાં શમણુજનેને કદાપિ રાગ-દેવ નહિ પષ્ટ કરવા ઈચ્છે છે PAL १४ पातकथाम उउभयमाणसुहेसु य सपिभनहिययमणनिव्वुइकरेसु । फासेसु जे न गिद्धा वसहमरणं न ते मरए ॥ १५ ॥ टीका-शब्दादिपिपये पनामताना शामगा न भातीति पञ्चभिर्गा याभिः प्राह-कारिभिय' इत्यादि । फलरिमितमधुरतन्त्रीत नायकदाभिरामेषु । शन्देषु ये न वृद्धा,-शामरण न ते नियन्ते ॥ ११ ॥ स्वनजघनगरनारचरणनपनगस्तिमिगसितगतिपु । रूपेषु ये न रक्ता,-शामरण न ते नियन्ते ॥ १२ ।। अगुरुवरप्रयरधूपन, -जमाल्यानुलेपनविधिपु । गन्धेपु ये न गृद्धा, शार्तमरण न ते म्रियन्ते ॥ १३ ॥ तिक्ताटुकापायाम्ल, मधुरसहुसाघपेय लेयेषु । आस्वादेषु न गृद्धा,-वशार्तमरण न ते नियन्ते ॥ १४ ॥ ऋतुभज्यमानसुसेपु च, सविभा हृदयमनोनितिकरेषु । स्पर्शपु ये न गृद्धा-वशार्तमरणं न ते म्रियन्ते ॥ १५॥ आसाम् व्याख्या सुगमा ॥ १५ ॥ सू०६॥ (कलरिभिय, धणजरण, अगुरुचरपवर, नित्तकडय, उउभयमाण, इत्यादि। इन गाधाओं द्वारा सूत्रकार यह प्रदर्शित करते है कि जो शब्दादि पांच इन्द्रियों के विषयों में आमत नही धनते है उनका वशार्तमरण नहीं होता है। इन गाथाओं की व्याव्या सुगम है। जो प्राणी कर्णहन्द्रिय के विषय मृत शब्द में, चक्षुइन्द्रिय के विष यभूत रूप में नासिका इन्द्रिय के विषयभूत गध में जिह्वाइन्द्रिय के विष यभूत रस में, तथा स्पर्शन इन्द्रिय के विषयभूत स्पर्श में आसक्त- गृद्ध-नही होते हैं ।। गा० ११-१५ ।। कलरिभिय, थणजहण, अगुरुवरपवर, तित कडय ४ उ भयमाण, इत्यादि । આ ગાથાઓ વડે સૂકાર આ વાત સ્પષ્ટ કરવા માગે છે કે જે શબ્દ વગેરે પાચે ઈન્દ્રિયના વિષયમા આસક્ત થતા નથી, તેમનું વશામરણ થતું નથી, આ ગાથાઓની વ્યાખ્યા સરળ છે જે પ્રાણી કઇન્દ્રિયના વિયભૂત રૂપમા, નાસિકા ઈન્દ્રિયના, વિષયભૂત ગધમાં, જહુવા ઈન્દ્રિયના વિષયભૂત રસમ તેમજ પર્શન ઈન્દ્રિયના વિષય ભૂત સ્પર્શમાં અત્યત આસક્ત-ગૃઢ થતા નથી, તેઓ વશામરણને પ્રાપ્ત કરતા નથી તે ગા ૧૧-૧૫ : ,
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माताधका उउभयमाणसुहेसु य सविभवाहिययमणनिव्वुडकरेसु । फासेसु जे न गिद्धा वसहमरणं न ते मरण ॥ १५ ॥ टीका-शब्दादिपिपयेवनायकाना शामग्ण न भावीति पामिर्गा थाभिः प्राइ-कररिभिय' इत्यादि । फलरिमितमधुरतन्त्रीतलतान्यादाभिरामेपु । शब्देपु ये न शृद्धा,-गार्गमरण न ते म्रियन्ते ॥ ११ ॥ स्तननधानरचरणनयन गतिविगसितगनिपु । रूपेषु ये न रक्ता,-शार्तगरण न ते म्रियन्ते ॥ १२ ॥ अगुरुपरमारधूपन,-नानुनमाल्यानुलेपनविधिषु । गन्धेषु ये न गृद्धा,-शामरण न ते नियन्ते ॥ १३ ॥ तिक्तस्टुकरुपायाम्ल, मधुरमसाधपेय लेयेषु । आस्वादेषु न गृद्धा,-शामरण न ते म्रियते ॥ १४ ॥ ऋतुभज्यमानमुसेषु च, सविमा हृदयमनोनितिकरेपु । स्पर्शेषु ये न गृद्धा-वशार्तमरणं न ते म्रियन्ते ॥ १५ ॥ आसाम् व्याख्या सुगमा ॥ १५ ॥ सू० ६ ॥ (फलरिभिय, धणजहण, अगुस्वरपर, तित्सकडय, उउभयमाण, इत्यादि। इन गाथाओं द्वारा सूचकार यह प्रदर्शित करते हैं कि जो शब्दादि पांच इन्द्रियों के विषयो में आमत नहीं बनते है उनका वशातमरण नहीं होता है। इन गाथाओं की व्याख्या सुगम है। जो प्राणी कर्णहन्द्रिय के सियनूत शब्द मे, चक्षुइन्द्रिय के विष- यभूत रूप में नासिका इन्द्रिय के विषयभूत गध में जिह्वाइन्द्रिय के विष यभूत रस में, तथा स्पर्शन इन्द्रिय के विषयभूत स्पर्श में आसक्त- गृद्ध-नही होते है ।। गा० ११-१५ ।। कलरिभिय, थणजहण, अगुरुवरपवर, वित्त बडुय उ उ भयमाण, इत्यादि । આ ગાથાઓ વડે સૂનકાર આ વાત સ્પષ્ટ કરવા માગે છે કે જે શબ્દ વગેરે પચે ઈન્દ્રિયના વિષયમા આસક્ત થતા નથી, તેમનું વશામરણ થતું નથી, આ ગાથાઓની વ્યાખ્યા સરળ છે જે પ્રાણી ઈન્દ્રિયના વિષયભૂત રૂપમા, નાસિકા ઈન્દ્રિયના વિષય ગ ધમા, જીવા ઇન્દ્રિયના વિષયભૂત રસમો તેમજ સ્પર્શન ઇન્દ્રિયના વિષય ભૂત સ્પર્શમા અત્યત આસક્ત-દ્ધ થતા નથી, તેઓ વશામરણને પ્રાપ્ત કરતા નથી છે ગા ૧૧-૧૫ .
मासासी टो। अ० १७ आकोणावदाप्टान्तिकयोजना ६३५ मूलम्-सदेसु य भदयपावएसु सोयविसयं उवागएसु । तुट्टेण व रुटेण व समणेण सया ण होयव्वं ॥ १६ ॥ रूवेसुय भदपावएसु चक्खुविसय उवगएसु । तुट्टेण व रुटेण व समणेण सया ण होयव्य ॥ १७ ॥ गधेसु य भद्दपायएसु घाणविसयं उवागएसु । तुटेण व रुटेण व समणेण सया ण होयव्य ॥ १८ ॥ रसेसु य भद्दयपावएसु जिव्भविसय उवगएसु । तुडेण व रुटेण व समणेण सया ण होयम्य ॥ १९ ॥ फासेसु य भद्दयपावएसु कायविसय उवगएसु । तुटेण व रुद्रेण न समणेण सया ण होयव्वं ॥ २० ॥ एव खल्लू जंबू । समगेण भगवया महावीरेणं जाव सपत्तेणं सत्तरसमस्त नायज्झयणस्स अयमढे पन्नत्ते त्तिवेमि। ॥ सत्तरसमं नायज्झयण समत्त ॥ १७ ॥ टीका-अनुक्ल प्रतिकूलशब्दादिपु रागद्वेपवर्जन पञ्चभिर्गाथाभिः प्रतिवोध यति- सद्देमु य' इत्यादि। शब्देपु च भद्रकपापकेषु श्रोत्रविपयगुपगतेपु । तुप्टेन वा रुष्टेन वा, शमणे। सदा न भवितव्यम् ॥ १० ॥ सद्देसुय, फासेतुय इत्यादि। एव खलु जबू! समणेण भगवया महावीरेण जाव सपत्तेणं सत्त रसमस्स जायज्झयणस्स अयमढे पणत्त तिमि ।। अर सूत्रकार इन पाच गाथाओ द्वारा अनुकूल प्रतिकृल शब्दादि विषयों में श्रमणजन को कमी भी रागद्वेप नहीं करना चाहिये-इस सदसुय, फासेसुय इत्यादि एच खलु जन् ! समपोगं भगवया महानीरेण जार सपत्तेण सत्तरसमस्स णायज्झपणस्स अयम पगत्ते तिमि ॥ સૂત્રકાર હવે આ પાચ ગાથાઓ વડે એ વાત મ્પષ્ટ કરવા ઈચ્છે છે કે અનુકૂળ-પ્રતિકૂળ શબ્દાદિ વિષયમાં શમણુજનેને કદાપિ રાગ-દ્વેષ નહિ ४ बताया उउभयमाणसुहेसु य सविभवाहिययमणनिव्वुइकरसु । फासेसु जे न गिद्वा वसहमरणं न ते मरए ॥ १५ ॥ टीका-शब्दादिपिपये वनामक्तानां शार्गमग न भातीति पञ्चभिर्गा थाभिः प्राइ-कारिभिय' इत्यादि। फलरिभिामधुरतन्त्रीतलताग्यशकदाभिरामेपु । शन्देपु ये न रद्धा, सामरण न ते म्रियन्ते ॥ ११ ॥ स्तनजघनश्यनारचरणनयनगर्षितविगसिनगनिपु । रूपेषु ये न रक्ता,-वशा-मरण न ते म्रियन्ते ॥ १२ ॥ अगुरुपरमपरधूपन, नजमाल्यानुलेपनविधिपु । गन्धेषु ये न गृद्धा,-शामरण न ते नियन्ते ॥ १३॥ तिक्ताटुकापायाम्ल, मधुरवासायपेय लेह्येषु । आस्वादेषु न गृद्धा,-वशामरण न ते नियन्ते ॥ १४ ॥ अतुभज्यमानमुसेषु च, सविभा हृदयमनोनितिकरेषु । स्पर्शपु ये न गृद्धा-शामरण न ते म्रियन्ते ।। १५ ॥ आसाम् व्याख्या सुगमा ।। १५ ।। सू०६॥ (कलरिभिय, धणजरण, अगुरुचरपर, नित्तकडय, उउभयमाण, इत्यादि । इन गाथाओं द्वारा सत्रकार यह प्रदर्शित करते है कि जो शब्दादि पांच इन्द्रियों के विषयों में आमत नहीं धनते है उनका वशार्तमरण नहीं होता है। इन गाथाओं की पाव्या सुगम है। जो प्राणी कर्णइन्द्रिय के शिय नूत शब्द मे, चक्षुइन्द्रिय के विष- यभूत रूप में नासिका इन्द्रिय के निश्यभूत गध में जिह्वाइन्द्रिय के विष यभूत रस में, तथा स्पर्शन इन्द्रिय के विषयभूत स्पर्श में आसक्त- गृद्ध-नही होते हैं। गा० ११-१५॥ कलरिभिय, थणजहण, अगुरुवरपवर, तित्त कडुय उ उ भयमाण, इत्यादि । આ ગાથાઓ વડે સૂત્રકાર આ વાત સ્પષ્ટ કરવા માગે છે કે જે શબ્દ વગેરે પાચે ઈન્દ્રિયોના વિષયમા આસક્ત થતા નથી, તેમનું વશામરણ થતું નથી, આ ગાથાઓની વ્યાખ્યા સરળ છે જે પ્રાણું છું ઈન્દ્રિયના વિષયભૂત રૂપમા, નાસિકા ઈન્દ્રિયના, વિષથત ગધમાં, જહુવા ઈન્દ્રિયના વિષયભૂત સિમ તેમજ સ્પર્શન ઇન્દ્રિયના વિષય ભૂત સ્પર્શમાં અત્યંત આસક્ત-વૃદ્ધ થતા નથી, તેઓ વશામરણને પ્રાપ્ત કરતા નથી ! ગ ૧૧-૧૫ છે सीटो. अ० १७ आकोनां यदार्टान्तिकयोजना ६३५ मूलम्-सद्देसु य भइयपावएसु सोयविसयं उवागएसु । तुटेण व रुहेण व समणेण सया ण होयव्वं ॥ १६ ॥ रूवेसुय भदपावएसु चक्खुबिसय उवगएसु । तुटेण व रुटेण व समणेण सया ण होय ॥ १७ ॥ गधेसु य भद्दपावएसु घाणविसयं उवागएसु । तुटेण व रुटेण व समणेण सया ण होयव्व ॥ १८ ॥ रसेसु य भयपावएसु जिब्भविसय उवगएसु । तुटेण व रुटेण व समणेण सया ण होयन ॥ १९ ॥ फासेसु य भदयपावएसु कायविसय उवगएसु । तुटेण व रुद्रेण न समणेण सया ण होयध्वं ॥ २० ॥ एव खल्लु जबू । समणेण भगक्या महावीरेणं जाव संपत्तेणं सत्तरसमस्त नायज्झयणस्स अयमढे पन्नत्ते तिबेमि। ॥ सत्तरसम नायज्झयणं समत्त ॥ १७॥ टीका-अनुकूल प्रतिकुलशब्दादिपु रागद्वेपवर्जन पञ्चभियाभिः पतिबोध यति- सद्देनु य' इत्यादि। शब्देषु च भद्रकपापकेपु श्रोतविषयमुपगतेपु । तुष्टेन वा रुग्टेन वा, मणेन सदा न भवितव्यम् ॥ १६ ॥ सद्देसुय, फासेसुय इत्यादि। एच खलु जवू ! समणेण नगवघा महावीरेण जाव सपत्तणं सत्त रसमस्स जायज्झयणस्स अयमढे पण्णत्ते तिमि ॥ अर सूत्रकार इन पाच गाथाओ द्वारा अनुकूल प्रतिकूल शब्दादि विषयों में श्रमणजन को कभी भी रागद्वेप नहीं करना चाहिये-इस सदेसुय, फासेमुय इत्यादि एव खलु जन् ! समणेगं भगवया महागीरेण जाव सपत्तेण सत्तरसमस्स णायज्ञपणस्स अयमहे पण्गले तिमि ।। સૂત્રકાર હવે આ પાચ ગાથાઓ વડે એ વાત સ્પષ્ટ કરવા ઈચ્છે છે કે અનુકૂળ-પ્રતિકૂળ શબ્દાદિ વિષયમાં શમણુજને કદાપિ રાગ-દેવ નહિ E जाताधर्मकचासो उउभयमाणसुहेसु य सविभवाहिययमणनिव्वुइकरेसु । फालेसु जे न गिद्धा वसहमरणं न ते मरए ॥ १५ ॥ टीका-शब्दादिपिपयेवनामताना शामरण न भातीति पञ्चभिर्गा याभिः माह-कररिभिय' इत्यादि । फलरिमितमधुरतन्त्रीतटताग्यशकदाभिरामेषु । शब्देपु ये न गृद्धा-सामरण न ते म्रियन्ते ॥ ११ ॥ स्तननघनपनारचरणनपनगतिविगसितगतिपु। रूपेषु ये न रक्ता,-शातगरण न ते म्रियन्ते ॥ १२ ॥ अगुरुपरप्रारधूपन,-ऋतुजमात्यानुलेपनविधिषु । गन्धेषु ये न गृद्धा, शार्तमरण न ते नियन्ते ॥ १३ ॥ तिक्तदुरुपायाम्ल, मधुरम साधपेय लेह्येषु । आस्वादेषु न गृद्धा, वशान्मरण न ते म्रियन्ते ॥ १४ ॥ ऋतुभज्यमानसुसेषु च, सपिभर हृदयमनोनितिकरेषु । स्पर्शपु ये न गृद्धा-शामरण न ते म्रियन्ते ॥ १५ ॥ आसाम् व्याख्या सुगमा ।। १५ ।। ८० ६॥ (कलरिभिय, धणजरण, अगुरुचरपवर, वित्तकडय, उउभयमाण, इत्यादि। इन गाथाओं द्वारा सूत्रकार यह प्रदर्शित करते है कि जो शब्दादि पांच इन्द्रियों के विपयो में आमत नहीं बनते है उनका वशार्तमरण नहीं होता है। इन गाथाओं की व्याख्या सुगम है। जो प्राणी कर्णइन्द्रिय के पियनूत शब्द मे, चक्षुइन्द्रिय के विष- यभूत रूप में नासिका इन्द्रिय के विषयभूत गध में जिह्वाइन्द्रिय के विष- यभूत रस में, तथा स्पर्शन इन्द्रिय के विषयभूत स्पर्श में आसक्त- गृह-नही होते है ।। गा० ११-१५॥ कलरिमिय, थणजहण, अगुरुवरपवर, तित बडय उ उ भयमाण, इत्यादि । આ ગાથાઓ વડે સૂરકાર આ વાત સ્પષ્ટ કરવા માગે છે કે જે શબ્દ વગેરે પારે ઇન્દ્રિયના વિમા આસક્ત થતા નથી, તેમનું વશાસ્તરણ થતું નથી, આ ગાથાઓની વ્યાખ્યા સરળ છે જે પ્રાણી કઇન્દ્રિયના વિધ્યભૂત રૂપમા, નાસિકા ઈન્દ્રિયના, વિષયભત ગ ધમ, જવા ઇન્દ્રિયના વિષયભૂત રસ તેમજ સપર્શ ઈદ્રિયના વિષય ભૂત સ્પર્શમા અત્યત આસક્ત-વૃદ્ધ થતા નથી, તેઓ વશામરણને પ્રાપ્ત કરતા નથી ! ગ ૧૧-૧૫ अनगारधर्मामृतवषिणो टी० अ० १७ प्राकीणविदाप्टान्तिकयोजना 'सद्देस य ' इत्यादि, गाथा पञ्चक सुगमम् ।। सुधर्मास्वामी पाह-' एव खलु हे खम्मूः । अमणेन भगवता महावीरेण यावत्समाप्तेन मप्तदशस्य ज्ञाताध्ययनस्य असमर्थपूर्वोक्तो भावः मनात प्रापितः। इति प्रवीमि-पाख्या पूर्ववत् ।। मू०७ ॥ इति श्री विश्वविख्यात - जगद्वल्लभ-प्रसिद्धवाचकपञ्चदशभापाकलित- ललितकलापालापक - प्रविशुद्धगयपयनैक्ग्रन्थनिर्मापक-वादिमानमर्दक श्रीशाहू छत्रपतिकोल्हापुरराजप्रदत्त 'जैनशास्त्राचार्य, पदभूपित- कोल्हापुरराजगुरु-वालब्रह्मचारि जैनाचार्य जैनधर्मदिनाकरपूज्यश्री घासीलालबतिविरचिताया श्री ज्ञाताधर्मकथागसूत्रस्यानगारधर्मामृ- तवर्षियारयाया व्याख्याया सप्तदशमध्ययन समाप्त ॥ १७ ॥ ८ आठ प्रकार का स्पर्श चाहे वह अनुकूल हो चाहे प्रतिकूल हो- जय २ स्पर्शन इन्द्रिय का विषय हो उसमें साधु को किसी भी तरह से कभी भी तुष्ट एव रुष्ट नहीं होनी चाहिये ॥ २० ॥ इस प्रकार हे जंवू ! श्रमण भगवान् महावीर ने कि जो सिद्धिगति नामक स्थान को प्राप्त कर चुके है इस सत्रहवें ज्ञाताभ्ययन का यह पूर्वोक्त रूप से अर्थ प्ररूपित किया है। ऐसा में उन्ही के कहे अनुसार कह रहा है। श्री जैनाचार्य जैनधर्म दिवाकर श्री घासीलालजी महाराज कृत "जाता धर्मकथाङ्गमन " की अनगार धर्मामृतवर्पिणी व्याख्या का सत्रहवा अध्ययन समाप्त ॥१७॥ ૮ જાતનો સ્પર્શ—ભવે તે અનુકૂળ કે પ્રતિકૂળ ગમે તેવો કેમ ન હોય જ્યારે જ્યારે તે સ્પર્શન ઈન્દ્રિયને વિષય હેય તેમાં સાધુને કોઈ પણ રીતે કદાપિ તુષ્ટ અને રૂષ્ટ થવું જોઈએ નહિ ગા આ પ્રમાણે જબૂ! શ્રમણ ભગવાન મહાવીરે કે જેમણે સિદ્ધગતિ નામક સ્થાન મેળવ્યું છે-આ સત્તરમા જ્ઞાતાધ્યયનને આ પૂર્વોક્ત રૂપમાં અર્થ પ્રરૂપિત કર્યો છે આવુ છુ તેમના કહ્યા મુજબ જ તમને કહી રહ્યો છુ શ્રી જૈનાચાર્ય ઘામીવાલજી મહારાજ કૃત જ્ઞાતાસૂત્રની અનગારધર્મામૃતવર્ષિણ વ્યાખ્યાનું સત્તરમું અધ્યયન સમાસ | ૧૭ ! २० ॥
. " সাধমকথা रूपेषु च भद्रापापपु, गम्पियामुपगतेषु । तृप्टेन या रुष्टेन गा, श्रमणेन सदा न गरिनव्यम् ।। १७ ॥ १-भद्रकपारकेपु-अनुकूल-पतिहऐपु। ग धेषु च भद्रकपापकेषु, धागरिपयमुपगतेपु। तुप्टेन या रुप्टेन बा, श्रमणेन सदा न भविष्यम् ॥ १८ ॥ रसेपु च भद्रपापकेपु, निहाविपयापगतेषु । तुप्टेन गा रुप्टेन पा, श्रमणेन सदा न भरितव्यम् । १९ ।। स्पर्शपु च भद्रपापकेपु, फायपियमुपगतेषु । तुष्टेन पा रुटेन पा, अमणेन सदा न भवितव्यम् ॥२०॥ विषय को समझाते हैं यहां भद्रक शब्द का अर्थ अनुकूल और पापक शब्द का अर्थ प्रतिकूल है। जय शद परिपय श्रोत्रेन्द्रिय का हो तो उस समय चाहे वह मनोज रो या अमनोज कैसा ही क्यों न रो उसमें अमण-साधु-को कभी भी तुष्ट अधया सप्ट नहीं होना चाहिये । गा० ॥१६॥ चक्षुइन्द्रिय का विषयभूतरूप जब उस इन्द्रिय द्वारा ग्रहण करने में आवे-तब यह चाहे मनोज्ञ हो या अमनोज्ञ हो उसमें श्रमण जन को कभी भी हर्प विपाद-तुष्ट रुष्ट नहीं होना चाहिये । गा० १७॥ मनोज एव अमनोज्ञ गध जर घ्राणइन्द्रिय का विषय को उस विषय में कभी भी तुष्ट रुष्ट नहीं होना चाहिये । गा० १८॥ मनोज्ञ अथवा अमनोज्ञ रस जिह्वाइन्द्रिय का विषय हो-तब उसमें श्रमण जन को कभी भी तुष्ट और मष्ट नहीं होना चाहिये । गा० १९ ॥ કરવું જોઇએ અહીં ભદ્રક શબ્દનો અર્થ અનુકૂળ અને પાપક શબ્દનો અર્થ પ્રતિકુળ છે જ્યારે શબ્દરૂપ વિષય શ્રોત્ર ઈન્ડિોને હોય તે ભલે તે મનેસ હોય કે અમનેસ હય, ગમે તે કેમ ન હોય, તેમા શ્રમણ-સાધુ-ને કદાપિ તુષ્ટ કે રૂષ્ટ થવું જોઈએ નહિ મ ગ ૧૬ ૫ ચક્ષુ ઈન્દ્રિયના વિષયભૂત રૂપ જ્યારે તે ઇન્દ્રિય વડે ગ્રહણ કરવામાં આવે ત્યારે તે મનોજ્ઞ હેય કે અમને હાય, શ્રમણને કદાપિ તેમા હર્ષ વિષાદ-તુષ્ટ-રૂષ્ટ નહિ થવું જોઈએ છે ગા ૧૭ છે મજૂ અને અમનેઝ ગાધ જ્યારે પ્રાણ ઈન્દ્રિયને વિષય હોય ત્યારે સાધુને તે વિષયમાં કદાપિ તુષ્ટ કે રૂઝ નહિ થવું જોઈએ કે ૧૮ મને જ્ઞ અથવા તે અમને રસ જ્યારે હુવા ઈન્દ્રિયને વિષય હેય ત્યારે તેમા શ્રમણ-જનને કદાપિ તુષ્ટ અને રૂટ થવું જોઈએ નહિ अनगारधर्मामृतवपिणो टी० अ० १७ माकीणश्विदाप्टान्तिकयोजना 'सदेस य' इत्यादि, गाथा पञ्चक सुगमम् ।। सुधर्मास्वामी पाह-' एव सलु हे खम्मूः । श्रमणेन भगवता महावीरेण यावत्समाप्तेन सप्तदशस्य ज्ञानाध्ययनस्य अपम:=पूर्वोक्तो भावः प्रज्ञप्ता प्रापितः। इति नवीमि-उपाख्या पूर्ववत् ।। मू०७ ।। इति श्री विश्वविख्यात - जगद्वल्लभ-प्रसिद्धवाचकपञ्चदशमापालित- ललितकलापालापक - परिशुद्धगापयनैकग्रन्थनिर्मापक-वादिमानमर्दक श्रीशाहू छत्रपतिकोल्हापुरराजमदत्त 'जैनशास्त्राचार्य ' पदभूपित- कोल्हापुरराजगुरु-बालब्रह्मचारि जैनाचार्य जैनधर्मदिवाकरपूज्यश्री घासीलालप्रतिविरचिताया श्री ज्ञाताधर्मकथाद्गमूनस्यानगारधर्मामृ- तवपिण्याख्याया व्याख्याया सप्तदशमध्ययन समाप्त ॥ १७ ॥ ८ आठ प्रकार का स्पर्श चाहे वह अनुकूल हो चाहे प्रतिकल हो- जय २ स्पर्शन इन्द्रिय का विषय हो उसमें साधु को किसी भी तरह से कभी भी तुष्ट एव रुष्ट नहीं होनी चाहिये ।। २० ॥ इस प्रकार हे जवू ! भ्रमण भगवान महावीर ने कि जो सिद्धिगति नामक स्थान को प्राप्त कर चुके है इस सत्र ज्ञाताभ्ययन का यह पूर्वोक्त रूप से अर्थ प्ररूपित किया है। ऐसा में उन्ही के कहे अनुसार कह रहा हूँ। श्री जैनाचार्य जैनधर्म दिवाकर श्री घासीलालजी महाराज कृत "जाता धर्मकथागसूत्र" की अनगार धर्मामृतवर्षिणी व्याख्या का सत्रहवा अध्ययन समाप्त ॥ १७॥ ૮ જાતને સ્પર્શ—ભવે તે અનુકૂળ કે પ્રતિકુળ ગમે તે કેમ ન હોય જ્યારે જ્યારે તે સ્પર્શન ઈન્દ્રિયને વિષય હોય તેમાં સાધુને કોઈ પણ રીતે કદાપિ તુષ્ટ અને રૂષ્ટ થવું જોઈએ નહિ કે ગા આ પ્રમાણે હે જ બૂ! શ્રમણ ભગવાન મહાવીરે કે જેમણે સિદ્ધગતિ નામક સ્થાન મેળવ્યું છે-આ સત્તરમા જ્ઞાતાધ્યયનને આ પૂર્વોક્ત રૂપમાં અર્થ પ્રરૂપિત કર્યો છે આવુ છુ તેમના કહ્યા મુજબ જ તમને કહી રહ્યો છુ શ્રી જૈનાચાર્ય ઘામલાલજી મહારાજ કૃત જ્ઞાતાસૂત્રની અનગારધર્મામૃતવર્ષિણ વ્યાખ્યાનું સત્તરમ્ અધ્યયન સમાપ્ત / ૧૭ છે २० ॥
॥ अथाप्टादशमध्ययनम् । अधाष्टादशमारभ्यते, अस्य च पूर्वग महायमभिमम्पन्ध -पूस्मिन् अध्य यने इन्द्रियशर्तिनाम् वशीकतेन्द्रियाणां च अनर्थार्थी मोक्ती, इह तु लोभावि प्टानां लोभरहितना च तायपोन्यते, इत्येत्र पूर्वेण सह संबद्धमिदमभ्ययनम् , तस्वेदमादिम मूत्रम्-'जाण भते' इत्यादि- मूलम्-जइ णं भंते । समणेणजाव सपत्तेणं सत्तरसमस णाय- ज्झयणस्स अयम? पण्णत्ते, अट्टारमस्त ण भंते । णायज्झय. णस्त समणेण जाव संपत्तेण के अट्टे पण्णत्ते ? एवं खलु जंबू । तेणं कालेणं तेणं समएणं रायगिहं णामं णयरे होत्था । वण्णओ० । तत्थ णं धण्णे णाम सत्यवाहे । भद्दाभारिया तस्स ण धण्णस्स सत्यवाहस्स पुत्ता भदाए अत्तया पंचसत्थवाह- अठारर्वा अध्ययन प्रारभ सुसमादारिका का वर्णन सत्रयां अध्ययन समाप्त हो चुका है। अब १८ वा अ-ययन प्रारभ होता है । इस अध्ययन का पूर्व अध्ययन के साथ इस प्रकार से सयध है-कि पूर्व अध्ययन में इन्द्रियवशवर्ती तथा वशकृत इन्द्रियवाले जीवों को अर्थ की प्राप्ति होना करा गया है। अब इस अध्ययन में सूत्रकार यह कहेंगे कि जो लोभ कपापसे युक्त तथा लोभ कषाय से रहित जीव होते हैं वे अनर्थ और अर्थ प्राप्ति से योग्य होते हैं। इस अ ययन का सर्व प्रथम सूत्र यह है- जइण भते ' इत्यादि। અઢારમા અધ્યયનને પ્રારંભ સુ સમાદારિકાનું વર્ણન બારમું અધ્યયન પુરૂ થયુ છે હવે અઢારમા અયનની શરૂઆત થાય છે આ અપ્પયનને પહેલા અધ્યયનની સાથે આ જાતને સ બ ધ છે કે પહેલા અધ્યયનમાં ઈન્દ્રિય વશવતી તેમજ વશીત ઈન્દ્રિયવાળા અને અર્થની પ્રાપ્તિ થાય છે, તે વિષે કહેવામા આવ્યુ છેસૂત્રકાર હવે આ અધ્યયનમાં આ વાતનું સ્પષ્ટીકરણ કરશે કે જે જ ભકષાયથી તેમજ ભકષાયથી રહિત હોય છે તેઓ અનર્થ અને અર્થ પ્રાપ્તિને લાયક ઠરે છે આ અધ્ય यमनु पडेलु सूत्र मा -जइण भते समणेण महावीरेण न्यादि- .
६३९ मनगार घर्मामृतवपिणी टी० अ० १८ सुसमादारिकावर्णनम् दारगाहोत्था,तं जहा-धण्णे धणपाले, धणदेवे, धणगोवे, धणर- विखए । तस्स णं धण्णस्त सत्थवाहस्सधूया भद्दाए अत्तया पंचण्हं पुत्ताण अणुमग्गजातीया सुंसुमाणामं दारिया होत्था, सूमालपाणिपाया, तस्स णं धपणस्त सस्थवाहस्स चिलाए नाम दासचेडे होत्था, अहीणपचिदियसरीरे मसोवचिए वालकीलाव- णकुसले यावि होत्था। तएणसे चिलाए दासचेडे सुसुमाए दारियाए वालग्गाहे जाए यावि होत्था । सुसुम दारिय क्डीए गिण्हइ, गिणिहत्ता, वहहिं दारएहि यदारियाहि य वालेहि वालियाहि य डिभएहि य डिभियाहि य कुमारएहि य कुमारियाहि य सद्धि आभिरममाणे २ विहरइ । तएणं से चिलाए दासचेडे तेसि वहूर्ण दारियाण य जाव अप्पेगइयाणं खुल्लए अवहरइ, एव वइ आगेलियाओ, तेदुसए, पोतुल्लए, साडोल्लए, अप्पेगइयाणं आभरणमल्लालकारंअवहरइ अप्पेगइए आउस्सइ, एव अवहसइ निच्छोडेइ, निभच्छेइ तज्जेइ, अप्पेगइए तालेइ । तएणं ते वहवे दारगा य ६ जाव रोयमाणा य कदमाणा य साण २ अम्मापिऊण णिवेदेति । तएणं तेसि बहूणं दारगाणय ६ जाव अम्मापियरो जेणेव धन्ने सस्थवाहे तेणेव उवागच्छति, उवागच्छित्ता धन्ने सस्थवाहे वहूहिं खिजणाहि य स्टणाहि य उवलभणाहि य खिज्जमाणाहिय रुटमाणाहि य उवल्भमाणा य धण्णस एयम? णिवेदेति ॥ सू० १ ॥
॥ अथाप्टादशमध्ययनम् ॥ अधाप्टादशमारभ्यते, अस्य च पूग महायमभिगम्पन्च -म्मिन् अन्य यने इन्द्रियशतिनाम् वशीकतेन्द्रियाणां च अनाथों मोक्ती, उह तु लगेमावि प्टाना लोगरहिराना च तासोन्यते, इत्येव पूर्वण सह संबद्धमिदम ययनम् , तस्येदमादिम सूत्रम्-'जाण भते' इत्यादि- मूलम्-जइ णं भते । समणेणंजाव संपत्तेणं सत्तरसमस्त णाय- ज्झयणस्स अयमट्टे पपणत्ते, अट्ठारमस्त ण भंते । णायज्झय- णस्स समणेणं जाव संपत्तेण के अद्वे पण्णत्ते ? एवं खलु जंवू । तेणं कालेणं तेण समएणं रायगिहं णाम णयरे होत्था । वष्णओ० । तत्थ णं धपणे णाम सत्यवाहे । भद्दाभारिया तस्स ण धण्णस्स सत्यवाहस्स पुत्ता भदाए अत्तया पचमत्थवाह- अठारहर्वा अध्ययन प्रारभ सुसमादारिका का वर्णन सत्रयाँ अध्ययन समाप्त हो चुका हैं। अप १८ वा अध्ययन प्रारभ होता है। इस अ ययन का पूर्व अध्ययन के साथ इस प्रकार से सघध है-कि पूर्व अध्ययन में इन्द्रियवशवर्ती तथा धशकृत इन्द्रियवाले जीवों को अर्थ की प्राप्ति होना कहा गया है। अप इस अध्ययन में सूत्रकार यह कहेंगे कि जो लोम कपायसे युक्त तथा लोभ कषाय से रहित जीव होते हैं वे अनर्थ और अर्थ प्राप्ति से योग्य होते है। इस अययन का सर्व प्रथम सूत्र यह है-'जहण भते' इत्यादि। અઢારમા અધ્યયનને પ્રારંભ સુસમાદારિકાનું વર્ણન સત્તરમું અધ્યયન પુરૂ થયું છે. હવે અઢારમા અધ્યયનની શરૂઆત થાય છે આ અધ્યયનને પહેલા અધ્યયનની સાથે આ જાતને સ બ ધ છે કે પહેલા અધ્યયનમાં ઈન્દ્રિય વશવતી તેમજ વગીકૃત ઈન્દ્રિયવાળા છોને અથની પ્રાપ્તિ થાય છે, તે વિષે કહેવામાં આવ્યું છેસૂત્રકાર હવે આ અધ્યયનમાં આ વાતનુ સ્પષ્ટીકરણ કરશે કે જે છ લાભકષાયણી તેમજ ભકષાયથી રહિત હોય છે તેઓ અનર્થ અને અર્થ પ્રાપ્તિને લાયક કરે છે આ અા यननु ५ सूत्र मा छ-जइण भते समणेण महावीरेण इत्यादि-~ अनगारधर्मामृतपिणी टी० अ० १८ सुसमादारिकावर्णनम् धनः १ धनपाल २ धनदेवः ३ धनगोपः ४ धनरक्षितः ५ इति । तस्या खल धन्यस्य सार्थ वाहस्य दुहिता भद्रायाः सार्थबाधा आत्मजा धनादीना पञ्चाना पुत्राणाम् ' अणुमग्गनाइया' अनुमार्गनातिका-जाता एव जातिका, अनुमार्ग जातिका अनुमार्गजातिका पश्चाजाता सुमुमा नाम दारिका जासीत् । कीदृशी सा ?- समालपाणिपाया' सुकुमार पाणिपादा-कोमलरचरणा । तस्य खलु धन्यस्य सार्थवाहस्य चिलातो नाम दासचेट. दासपुत्र आसीत् । योहि 'अहिण- धणे २- धणपाले-२ धणदेवे ३, वणगोवे-४ घणरक्पिए-५) उस काल और उस समयमें राजगृह नाम का नगर था। इसका वर्णन पहले जैसा हो जानना चाहिये। उस नगर में वन्य नामका सार्थवाह रहता या। इसकी पत्नी का नाम भद्रा था। इस भद्रा भार्या से उत्पन्न हुए धन्य सार्थवार के ये पांच पुत्र थे-धन-१ वनपाल-२ वनदेव-३ धन- गोप-४ और धनरक्षित-५। (तस्सण धण्णस्स सत्यवाहस्स धूया महाए अत्तया पचण्ड पुत्ताणं अणुमग्गजातीया सुसुमा णाम दारिया, होत्था, सूमालपाणिपाया, तस्स ण धण्णस्स सत्यवाहस्स चिलाएणाम दासचेडे होत्या, अह ण पचेदिय सरीरे मसोवचिए, पालकीलावणकुसले याचि होत्या) इस धन्य सार्थ वाह के भद्रा भार्या की कुक्षि से उत्पन्न एक सुसुमा नामकी पुत्री थी- जो धनादिक पाच पुत्रों के पीछे उत्पन्न हुई थी । इसके कर, चरण बड़े कोमल थे। इस धन्य मार्थवाद का एक दामचेट-दास पुन-धा-जिस अत्तया पच सत्यवाददारगा होत्या, त जहा-पण्णे १, वणपाले २, धणदेवे ३, धणगोवे-४, धणरक्खिए-५) તે કાળે અને તે સમયે રાજગૃહ નામે નગર હતું તેનું વર્ણન પહેલાની જેમ સમજી લેવું જોઈએ તે નગરમાધન્ય નામે સાર્થવાહ રહેતું હતું તેની પત્નીનું નામ ભદ્રા હતું તે ભદ્રા ભાર્યાના ગર્ભથી જન્મ પામેલા પાચ પુત્ર હતા, તેમના नाम मा प्रभारी छे-धन-1,धनपा-२,धन-3,धन-४,मने धनरक्षित-५ (तस्स ण धण्णस्स सत्यवाहस्स च्या भदाए उत्तया पचण्ह पुत्ताण अणु मंग्गजातीया सुसुमा णाम दारिया, होत्या, मूमालपाणिपाया, तस्स ण ण्णस्स सस्थवाहस्स चिलाए णाम दासचेडे होत्या, जहण पदिय सरीरे मसोवचिए, बालफीलावणकुसले यावि होत्था) તે ધન્ય સાર્થવાહની ભદ્રા-ભાર્યાના ગર્ભથી જન્મ પામેલી સુસુમા નામે એક પુત્રી હતી તે ધન વગેરે પિતાના ભાઈઓ બાદ ત્પન્ન થઈ હતી તેના હાથ-પગ બહુ જ કોમળ હતા તે ધન્યમાર્થવાહને એક દાસીપુત્ર હતો તેનું - पातायात टीका- जइण मन्ते ! ' इत्यादि । जम्पूधामीपति-यदि खलु मदन्त ! श्रमणेन यापन्मोस ममाप्लेन सप्तदशस्य गाताध्ययना अपाय: नितेन्द्रियाऽजिते न्द्रियाणामनिर्यमाप्तिस्पो भारः प्रभातपसपितः, अष्टादशम्य तु शाताध्ययनस्प श्रमणेन यारमोक्ष सम्माप्तेन योऽयः मत ? गुधर्मास्वामी पाह-एव ग्वलु है जम्पू: तस्मिन काले तस्मिन् समये राजगृह नाम नगरमासीन् । 'अण्णओ वर्णका-नगरवर्णन पूर्वपद् विशेयम् । तत्र सलु धन्पो नाम मार्थवादः परिपसति । तस्य भद्रा नाम भार्याऽसीन् । तस्य पटु पत्यम्य सार्थ वाहम्य पुत्राः, भद्राया आत्मनाः पञ्च सार्थ पाहदारका आसर । तेपा नामान्याह-'त जहा' तया- टीकार्थ-ज- स्वामी श्री सुधर्मास्वामीसे पूछते है कि-(जइण भते! समणेण जाप संपत्तेण सत्तरसमस णायअयणस्स अयमढे पण्णत्ते अट्टारसमस्म ण भते णायज्ञयणास समणेण जारसपत्तण के अहे पण्ण- ते ? ) हे भदन्त ! अमण भगवान महावीर ने जो कि सिद्विगति नाम क स्थान को प्राप्त कर चुके है मत्राचे ज्ञानाप्ययन का यह पूर्वोक्त रूप से अर्थ प्राप्त किया है तो उन्हों मिद्विगति नामक स्थान को प्राप्त हुए श्रमण भगवान महावीर ने १८ चे ज्ञाताध्ययन का क्या अर्थ प्ररूपित किया है ? (ण्व खलु जा!) इस प्रकार जबे स्वामी के पूछने पर सुध स्त्रिामी उनसे कहते है कि जंबू! सुनों-तुम्हारे प्रश्न का उत्तर इस प्रकार है-( तेण कालेण तेण समाण रामगिहे णाम जयरे होत्था । वाणओ० १० तत्वण घण्णे णामं मत्यवाहे-भदाभारिया-तम्सण धण्णस्स मन्यवाहम्म पुना महाग अत्तया पच सत्यवाहदारगा होत्या, त जहा કાર્થ-જબૂ સ્વામી શ્રી સુધર્મા સ્વામીને પૂછે છે – ( जण मते ! ममणेण जाव सपत्तेण सत्तरसमस णायज्झयणस्स अयमद्धे पपत्ते अद्वारममम्स ण भने णायज्झयणस समण नाव सपत्तण के अटे पण्णते ?) હે ભદન્ત | શ્રમણ ભગવાન મહાવીરે -જેઓ સિદ્ધગતિ નામક સ્થાનને મેળવી ચુક્યા છે. તમાતાનની આ પૂર્વોક્ત રૂપે અર્થ નિરૂપિત કર્યો છે તે તે જ સિદ્ધગતિ નામના સ્થાન મેળવી ચુકેલા શ્રમણ ભગવાન મહા વીર ૧૮ મા જ્ઞાતાધ્યયનને શું અર્થ પ્રવિત કર્યો છે? ( एव खलु ज) प्रमाणे स्वाभा प्रश्न पूच्या त्या२माई શ્રી સુધર્મા સ્વામી તેમને કહે છે કે હું જ બૂ! સાભળો, તમારા પ્રશ્નનો જવાબ આ પ્રમાણે છે – ( तेण शालेण तेण समएण रायगिहे णाम णयरे होत्था ! वपओ० तत्थण धण्णे णाम सत्यवाह-मा भारिया-तमण गरस सत्यवान पुत्ता भद्दार मनगारधर्मामृतवपिणी टी० १० १८ सुसमादारिकावर्णनम् ६५१ धनः १ धनपाल २ धनदेवः ३ धनगोपः ४ धनरक्षितः ५ इति । तस्या खल्ल धन्यस्य सार्थवाहस्य दुहिता भद्रायाः सार्थवाद्या आत्मजा धनादीना पञ्चाना पुत्राणाम् ' अणुमग्गजाइया ' अनुमार्गनातिका-जाता एप जातिका, अनुमार्ग जातिका अनुमार्गजातिका पश्चानाता सुममा नाम दारिका आसीत् । कीदृशी सा ?-'सूमालपाणिपाया' सुकुमार पाणिपादा-कोमलपरचरणा । तस्य खलु धन्यस्य सार्थवाहस्य चिलातो नाम दासचेटा-दासपुत्र आसीत् । योहि 'अहिण- धणे २-धणपाले-२ धणदेवे ३, धणगोवे-४ धणरक्खिए-५) उस काल और उस समयमें राजगृह नाम का नगर था। इसका वर्णन पहले जैसा हो जानना चाहिये। उस नगर में धन्य नामका सार्थवाह रहता था। इसकी पत्नी का नाम भद्रा था। इस भद्रा भार्या से उत्पन्न हुए धन्य सार्थवाह के ये पांच पुत्र थे-धन-१ वनपाल-२ धनदेव-३ धन गोप-४ और धनरक्षित-५। (तस्सण धण्णस्स सत्यवाहस्स धूया महाए अत्तया पचण्ड पुत्ताणं अणुमग्गजातीया सुसुमा णाम दारिया, होत्था, समालपाणिपाया, तस्स गंधण्णस्स सत्यवाहस्स चिलाएणाम दासचेडे होत्या, अह ण पर्चेदिय सरीरे मसोवचिए, पालकीलावणकुसले यावि होत्या) इस धन्य सार्थ वाह के भद्रा भार्या की कुक्षि से उत्पन्न एक सुस्तुमा नामकी पुत्री थी- जो धनादिक पाच पुत्रो के पीछे उत्पन्न हुई थी। इसके कर, चरण बड़े कोमल थे। इस धन्य मार्थवाद का एक दासचेट-दास पुत्र-धा-जिस अत्तया पच सत्यवाहदारगा होत्था, त जहा-धण्णे १, धणपाले २, धणदेवे ३, धणगोवे-४, धणरक्खिए-५) તે કાળે અને તે સમયે રાજગૃહ નામનગર હતુ તેનું વર્ણન પહેલાની જેમ સમજી લેવું જોઈએ તે નગરમાધન્ય નામે સાર્થવાહ રહેતું હતું તેની પત્નીનું નામ ભદ્રા હતુ તે ભદ્રા ભાર્યાને ગર્ભથી જન્મ પામેલા પાચ પુત્ર હતા, તેમના नाम मा प्रभारी छ-धन-1,धनपाल-२,धनद्वेष-3,धनगण-४,मने धन.क्षित-५ (तस्स ण धण्णस्स सस्थवाहस्स धूया भदाए अत्तया पचण्ह पुत्ताण अणु- मेग्गजातीया सुसुमा णाम दारिया, होत्या, सूमालपाणिपाया, तस्स ण धण्णस्स सत्यवाहस्स चिलाए णाम दासचेडे होत्या, अह ण पचेदिय सरीरे मसोवचिए, बालकीलावणकुसले यावि होत्या) તે ધન્ય સાર્થવાહની ભદ્રા-ભાર્યાના ગંભથી જન્મ પામેથી સુસુમા નામે એક પુત્રી હતી તે ધન વગેરે પિતાના ભાઈઓ બાદ ઉત્પન્ન થઈ હતી તેના હાથ-પગ બહુ જ કોમળ હતા તે ધન્યસાર્થવાહને એક દાસીપુર હતું તેનું - सपास पचिदियसरीरे ' अद्दीनपश्चेन्द्रियशरीरम्मतिपूर्णसन्द्रिगरीरः, 'मसोपषिए ' मांसोपचितः मासंरुपचित', पुष्टशरीर इत्ययः, पुनः पालकीलारणकुसले पालक्रीडनकुशलथापि आसीत् । तत खलु स दासचेट' गुसुमाया दारिकायाः 'पालग्गाहे' यालग्राहः यो हि पालफीढयितु नियुक्तो भृत्यः स 'बालग्रार' इत्युच्यते जातायाप्पभवत् । सहि चिलातः सुसमा दारिया क्टयां गृहाति, गृहीत्वा, बहुभिरिरथ दारिकामिय पाच पालिकामिन, डिम्मकच डिम्भि- काभिश्च कुमारश्च कुमारियाभिश्च सार्द्धम्दारकटिंभ पालक कुमाराणां अल्प, पहु, बहुतर कालात मेदो विजेयः, अभिरममाणः २ = पुनः पुनः क्रीडन् विहरति । ततः खलु स चिलातो दामचेट' तेपी पहना ' दाराण जार ' दार- काणा यार-दारकाणा दारिकाणा डिम्मरामा डिम्भिकाना कुमाराणा कुमारिकाणां का नोम चिलात था। जो प्रमाणोपेत पाचों इन्द्रियों से परिपूर्ण शरीर वाला था। मासोपचित था पुष्ट देवाला था। यह पालकों को खिलाने में विशेप कुशल था। (तएण से चिलाए दासचेडे सुसुमाए दारियाए पालग्गाहे जाए यावि होत्था सुसुमदारियं कडीए गिण्हई, गिण्हित्ता यहि, दारएहिं य दारियाहि य विरह-तेसिं यहण दारियाण य जार अप्पेगइयाण खुल्लए अवहरड, एच वद्दए आडोलियाओ ते दुइए पोतुल्लए साडोल्लए, अप्पेगइयाण आभरणमल्लाहकार अवहरइ, अप्पेगइयाए आउस्सइ, एव अवहरइ, निच्छोडेइ, निभइ तज्जेइ अप्पेगइए तालेह ) इमलिये वह दासचेट सुसमा दारिकाके खिलाने के लिये नियुक्त हो गया। अतः वह चिलान दास चेटक सुसमादारिका को गोदी में लेकर अनेक दारक दारिकाओं के साथ बालक बालि काओं के साथ डिभक डिभिकों के साथ और कुमार कुमारिकों નામ ચિલાત હતુ તે સપ્રમાણ પાચે ઈન્દ્રિયોથી પરિપૂર્ણ શરીરવાળે હતા તે માસલ તેમજ પુષ્ટ શરીરવાળે હવે તે બાળકને રમાડવામાં સવિશેષચતુર હતા (तण्ण से चिलाए दासचेडे सुसुमाए दारियाए बालग्गाहे जाए यावि होत्या सुसुम दारिय फडीए गिदइ, गिहित्ता बहूहि, दारएहि य दारियाहि य विहरइ तेसि बहूण दारियाण य जाव अप्पेगइयाण खुल्लए अवहरइ, एर वद्दए आडोलि याओ तेंदुरुए पोत्तुल्लए, साडोल्लए, अप्पेगइयाण आभरण मल्लाहकार अबहरइ, अप्पेगइए, आउस्सइ, एव अवहसइ, निच्छेडेद, निभच्छेइ, तज्जेइ, अप्पेगइए तालेइ) તેથી તે દાસર સુસમા દારિકાને રમાડવા માટે નિયુક્ત કરવામાં આજે આ પ્રમાણે તે ચિલાત દાસ ચેરક સુસમા દારિકાને મેળામાં બેસા ઢિીને ઘણું દારક દારિકાઓની સાથે બાળક તેમજ બાળાઓની . .
. . अनगारधामृतवषिणी टी० अ० १८ सुसमादारिकावर्णनम् च मध्ये 'अप्येगइयाण' अप्ये केपाम् 'सुल्लए' क्षुल्लकान कार्दनिशेपान 'कोडी' इति भापामसिद्धान अपहरति चोरयति। एव 'वट्टए' वर्तकान्-जत्वादिमयगोलकान् 'आडोलियाओ' आडोलिका इति नाम्नामसिद्धान् वाल क्रीडनवस्तुविशेषान् तेसए' देशीशब्दोऽयम्-गेन्दुकान् 'पोत्तुल्लए ' वस्त्रमयपुत्तलिकाः, 'साडोल्लए ' उत्त रीयवस्त्राणि चोरयति । तथा अप्येकेपाम् आभरणमाल्यालङ्कारान् अपहरति । अन- न्तरम् ' अप्पेगहए ' अप्येककान् ‘आउस्सइ ' आक्रुश्यति-निष्ठुरवचनेन ' एव अवहमई अपहसति अपशब्दमुच्चार्य हास्यं करोति, 'निच्छोडेइ 'निछोटयति यदि व किमपि वदिष्यसि तदा त्वा बहिनिष्काशयिष्यामीत्यादि शब्दस्तान् भीपयति, तथा 'णिन्भच्छेइ , निर्भर्त्सयतितेपा निर्भर्त्सना करोति, एव 'तज्जेइ ' तर्जयति 'मया कृत किमपिकार्य यदि स्व मातापितभ्यो यूय वदिष्यथ के साथ वार २ खेलने में लगा रहता। खेलते २ वर चिलात दास चेटक उन अनेक दारक दारिक, डिम्भका, डिम्भिका, कुमार कुमा- रिकाओं में से कितने बच्चो के खेलने के साधन भूत कपर्दक विशेपों को कौडियों को चुरा लेता कितनेक के जतुके बने चपेटा को, कितनेक के अडोलिक नाम से प्रसिद्ध खिलाने को, कितनेक घच्चों की गेंदों को कितनेक बच्चा की वस्त्र के बनी हुई गुडियो को, तथा कितनेक बच्चो के उत्तरीयवस्त्रों-को फरियो को बुरालेता था। कितनेक बच्चों के आभरणा को मालाओं को और अलकारो को भी चुरालिया करता था कितनेक बच्चा को गाली देता कितनेक बच्चो की वह नि- ष्टुर बचना को उच्चारण कर हँसी मजाक करने लग जाता था। यदि तू कुछ कहेगातो मैं तुझे यहाँ से बाहिर निकाल द्गा इत्यादि शब्दों से कितनेक बच्चों को वह डरा दिया करता था। कितनेक बच्चों को અને ડિભિકઓ સાથે અને કુમાર કુમારિકાઓની સાથે વાર વાર રમવામાં જ ચાટી રહેતે હવે તે ચિલાત દાસચેર રમતા રમતા ઘણુ દારક-દારિક, ડિભડ-હિંભિક, કુમાર-કુમારિકાઓમાંથી કેટલાક બાળકેના રમવાના સાધન કપર્દક વિશેને-કેડીઓને ઘેરી લેતે, કેટલાકના લાખના બનેલા ચપેટા- એને, કેટલાકના અડેલિક નામથી પ્રસિદ્ધ એવા રમકડાઓને, કેટલાક બાળ કેની દડીઓને, કેટલાક બાળકોની વસ્ત્રથી બનેલી ઢીંગલીઓને તેમજ કેટલાક બાળકોના ઉત્તરીય વસ્ત્રોને ચોરી જતું હતું તે કેટલાક બાળકના આભરણેને, માળાઓને અને ઘરેણાઓને પણ ચોરી જતા હતા તે કેટલાક બાળકોને ગાળે તે અને કેટલાક બાળકની નિષ્ફર વચને બેલીને ઠઠ-મશ્કરી કરવા લાગતે હતા જે તું કઈ પણ બેલશે તો તને અહીંથી બહાર કાઢી - . W૨ BIHAR पचिंदियसरीरे' अहीनपश्शेन्द्रियशरीरम्पतिपूर्णसन्द्रिशरीरस, 'मसोपपिए ' मांसोपचित मासैरुपचितः, पुष्टशरीर इत्यर्थः, पुनः पालकीमावणकुसले' मालकीडनकुशलथापि आसीत् । यत खलु स दासचेट' गुगुमाया दारिमायाः 'बालग्गाहे ' वालग्राहः यो हि यालझीढयितु नियुक्तो भृत्यः स 'बामयादा' इत्युच्यते जातानाप्पभरत् । सहि चितः गुसुमा दारिता कटयां गृहाति, गृहीत्वा, बहुभिरच दारिका मिथ वालपेश्च रिकाभिय, डिम्भकश्च डिम्भि- फाभिश्च कुमारश्च पुमारियामिश्च सार्दम्दारफडिंभक्चारयकुमाराणां अल्प, बहु, रहुतर कालकृत मेदो विज्ञेय', अमिरममाणः २ = पुनः पुनः क्रीडन् विहरति । ततः खलु स चिलातो दामचेट' तेपी पहना ' दाराण जाव ' दार काणा यावत् दारकाणा दारिकाणा डिम्भाना डिम्मिकाना कुमाराणा कुमारिकाणां का नोम चिलात था। जो प्रमाणोपेत पाचों इन्द्रियों से परिपूर्ण शरीर वाला था। मासोपचित था पुष्ट देहवाला था। यह पालकों को खिलाने में विशेप कुशल था । (तएण से चिलाए दासचेडे सुसुमाए दारियाए पालग्गाहे जाए याचि होत्था सुसुमदारियं कडीए गिण्हई, गिमिहत्ता पद्दहि, दारएहिं य दारियाहि य विरह-तेसिं यहण दारियाण य जार अप्पेगइयाण खुल्लर अवररड, एव चहए आडोलियाओ ते दुरुए पोतुल्लए साडोल्लए, अप्पेगइयाण आभरणमल्लाहकार अवहरह, अप्पेगहयाए आउस्सइ, एव अवहरइ, निच्छोडेइ, निन्भच्छेइ तज्जेइ अप्पेगइए ताले ) इमलिये वह दासचेट सुसमा दारिकाके खिलाने के लिये नियुक्त हो गया। अतः वह चिलान दास चेटक सुसमादारिका को गोदो में लेकर अनेक दारक दारिकाओं के साथ बालक बालि काओं के साथ डिंभक डिभिकों के साथ और कुमार कुमारिकों નામ ચિલાત હતુ તે સપ્રમાણ પાચ ઈન્દ્રિયથી પરિપૂર્ણ શરીરવાળે હતિ તે માસલ તેમજ પુષ્ટ શરીરવાળો હે તે બાળકોને રમાડવામાં સવિશેષચતુર હો (तएण से विलाए दासचेडे सुसुमाए दारियाए मालग्गाहे जाए यावि होत्था सुसुम दारिय कदीए गिण्हइ, गिण्डिता बहहि, दारएदि य दारियाहि य विहरइ तेसि बहूण दारियाण य जाव अप्पेगइयाण खुल्लए अवहरइ, एत्र बद्दए आडोलि याओ तेदुरुए पोत्तुल्लए, साडोल्लए, अप्पेगइयाण आभरण मल्लालकार अवहरइ, अप्पेगइए, आउस्सइ, एव अवहसइ, निच्छेडेइ, निभन्छेइ, तज्जेइ, अप्पेगइए तालेइ) તેથી તે દાસર સુસમા દારિકાને રમાડવા માટે નિયુક્ત કરવામાં આ આ પ્રમાણે તે ચિલાત દાસ ચરક સુસમાં દારિકાને ખોળામાં બેસ ઢિીને ઘણા દારક દારિકાઓની સાથે બાળક તેમજ બાળાઓની ભિક . - । . " अनगारधर्मामृतार्पणी टी० अ० १८ सुसमादारिकापर्णनम् कादीना अम्यापितर योव धन्य सार्थवाहस्तत्रैव उपागच्छन्ति, उपोगत्य धन्य सार्थगह बहुभिः ' खिज्जणाहि य ' खेदनाभिश्व खेदजनकवाग्भिः 'रुटणाहि य' रोदनाभिः मारुदितनाग्भिः, 'उपलभणाहि ' उपालम्भनाभि-किमेतचितम् ? भवा शाम् ? इत्यादि वाग्भिव खेज्जमाणा' खेदयन्तः स्वखेद प्रकाशयन्तः रुटमाणा य' रूदन्त उपलभमाणा उपालम्भयन्तश्च धन्याय सार्थवाहाय एतमर्थ-चिलातकृताऽपरावरूपमर्थ निवेदयन्ति ।। मू०१ ।। मूलम्-तएणं से धपणे सत्थवाहे चिलाय दासचेड एय- मट्ठ भुजो भुज्जो णिवारेई, णो चेव णं चिलाए : दासचेडे उवरमइ। तएण से चिलाए दासचेडे तेसिं वहूणं दारगाण य ६ अप्पेगइयाणं खुल्लए अवहरइ जाव तालेइ। तएणं ते वहवे दारगा य जाव रोयमाणा य जाव अम्मापिऊणं जाव णिवेदेति । तएणं ते आसुरुत्ता जेणेव धणे सत्थवाहे तेणेव की शिकायत करने लगें। अपने २ चालकों के मुख से इस प्रकार की दामचेटक यी हरकत सुनकर उन दारक आदि को के माता पिता जहा धन्य सार्थवाह होता था वहा आते और आकर के वन्य सार्यवाह को अनेक खेदजनक वचनों द्वारा रोते २ उपालभ उलहना दिया करते- क्या आप जैसे व्यक्तियो को यह उचित-है-इस तरह से उससे कहा करते । इस तरह वे खेदजनक तथा अश्रु भरकर कही गई वाणियों द्वारा अपना खेदप्रकाशित करते हुए रोते हुए एव उलहना देते हुए धन्यसार्थ वाह के लिये चिलातकृत अपराध रूप अर्थ की निवेदना करते ॥०१॥ મુખેથી આ પ્રમાણે દામ ચેટકની ખરાબ વર્તણુક વિષેની વિગત સાભળીને તે દારક વગેરેના માતાપિતા જ્ય, ધન્યસાર્થવાહ હતો ત્યા આવતા અને આવીને ધન્યસાર્થવાહને ઘણું કઠેર વચનથી રડતાં રડતા ઠપકો આપતા રહેતા હતા શું તમારી જેવી વ્યક્તિને આ વાત શેભે છે? આ પ્રમાણે તે કહ્યા કરતા હતા આ પ્રમાણે તેઓ ખેદજનક તેમજ અશ્રુભીની હાલતમાં રહેલી વાણુઓ વડે પિતાનું દુખ પ્રકટ કરતા, રડતા તેમજ ઠપકો આપતા ધન્ય સાર્થવાહને ચિલાતે જે કઈ ખરાબ વર્તણૂક કરી હોય તે બદલ ફરિયાદ કરતાં રહેતા હતા કે સૂત્ર ૧ !! + - तदायुष्माक माणान् आहरिष्यामीत्येवरुपयरलिनिर्दशक तेषु मीतिमत्ता दयति । तथा अप्पेसकान चालान 'ताले साइयति चपेटादिमि । तत बल ते वयो दोरकर यात्-कुमारिकाध सापाला 'रोयमागा य' रुदन्तथ 'कंद माणा य ' क्रन्दन्त उन्धः सरेण चीत्कार कुन्ति 'माण २' स्वेषाम् २ 'अम्मापिऊण ' अम्पापितृभ्पादमर्थ निवेदयन्ति । ततः सलु तेपा वहनाचार- यह निर्भसित कर देता " मेरा किया हुआ कुछ भी काम यदि तुम लोग अपने माता पिता से कहोगे-तो याद रखना मैं तुम्हारे प्राणों को ले लूगा-तुम्हे जान से मार डालूगा" इस तरह कितनेक मालको को वर अगुलि दिग्या २ कर भयभीत कर दिया करता। कितनेक पालको को वह पप्पर आदि भी मार देता। (तपण ते यहवे दारगा- य जाव रोयमाणा य कदमाणा य ४ साय २ अम्मापिऊण णिवेदेति, तएण तेसिं यहण दारगाण य ६ जाय अम्मापिउरो जेणेव धणे सत्य- चाहे तेणेच उचागच्छति, उवागच्छितो वण सत्यवाह पट्टा खिन्न णाहिं य रुटणाहि य उवलभणाहिय खिज्जमाणाय स्टमाणाय उवल भेमाणा य धण्णस्स एयम णिवेदेति) इस तरह वे अनेक दारक यावत् कुमारिकार सब ही रो रो कर के आदन करके उच्चस्वर से चीत् कार करके-अपने • माता पिलाओं से उस दामचेटक की इस बर्ताव મૂકીશ વગેરે વચનેથી કેટલાક બાળકોને તે બીવડાવી દેતે હતે કેટલાક બાળકની તે ભર્સના પણ કરતે હત–મારી કઈ પણ વાત તમે તમારા માતાપિતાને કહેશો તે યાદ રાખજે હું તમને જીવતા નહિ છે તમને નથી મારી નાખીશ ” આ પ્રમાણે કેટલાક બાળકની સામે તે આગળીએ ચી ધી ચ ધીને બીવડાવી દેતા હતા કેટલાક બાળકને તે તમારી વગેરે પણ લગાવી દેતા હતા (तपण ते बहवे दोरगा य ६ जार शेयमाणा य कदमाणा य ४ साय २ अम्माणि णिवेदे ति, तएण तेमि हूण दोरगाण य ६ जाव अम्मापिठरो जेणेय धण्णे सत्यवाहे तेणेव आगन्छ ति, उवागछित्तो धण्ण सत्यवाह रहि खिज्ज णाहि य रुठणाहि य उपलभणाहि य बिजमाणा य रूटमाणा य उवल भमाणी य धण्णरस एयमट्ठ णिवेदेति) આ પ્રમાણે તે ઘણું દરક યાવતે કુમારિકાએ રડતા રડતા, આઇ ન કરતા કરતા, મા સાદે ચીત્કાર કરીને પોતપિતાના માતાપિતાને તે દાસ ચેટની ખરાબ વર્તણુક વિષે ફરિયાદ કરવા લાગ્યા પિતાના . , मनगारधर्मामृतषिणी टी० अ०१८ सुसमादारिकावर्णनम् ६५७ कादीना म ये अप्येकपा 'खुल्लए ' क्षुल्लकान् पर्दकविशेषान् अपहरति 'जाव तालेइ' यावत्ताइयति-पूर्वोक्तक्रमेण एव कपर्दकाद्यपहरण यावत ने ताडनं च करोति । ततः खलु वहयो दारकाच दारकादयो रुदन्तश्च यावत् स्वेपा २ अम्बापिवभ्यो निवेदयन्ति । तत खलु ते आशुरुताः-स्स पुत्रवचन झुन्या झटिति क्रोधाविष्टमानसा यौव धन्य सार्थवाहः तत्रैव उपागच्छन्ति उपागत्य बहुभिः खेज्जणाहि जाव एयमट्ट ' खेदनाभिर्यावत् एतमर्थम् खेदसमूचनाभिर्यावत् उपालम्भनयुक्ताभिर्वाग्भिः चिलातदासचेटक कृताऽपराधलक्षणम् अर्थम् निवेदयन्ति । ततः खलु धन्यः सार्थवाहो बहूना ' दारगाण' दारकाणा ६=दारकादीनाम् अम्बापितॄणामन्तिके एतमथै श्रुत्वा निशम्य आशुरुतः चिलात दासचेटम् 'उच्चा- वचाभिः अनेकविधाभिः 'आउमणाहिं ' आक्रोशनाभिः कोपननर्वचनैः आउसई ' आक्रुश्यति-आक्षिपति । उद्धसइ । उद्धर्ष यति-नामगोत्रादिनाधः पातयति-निन्दतीत्यर्थः । नेत्रमुखादि वक्रीकमणेन ‘णिन्भच्छेइ ' निर्भर्त्सयति= अप्पेगइयाण खुल्लए अवहरइ जाव तालेइ, तएण ते वहवे दारगा य जाव रोयमाणा य जाव अम्मापिऊण जाव णिवेदेति ) इस तरह सम- झाने पर भी वह चिलात दासचेट उन अनेक दारको आदि में से कितनेक दारक आदिको के कपर्दक (कौड़ी) विशेषों को चुराता रहा यावत् उन्हें ताडित करतो रहा-मारता पीटता रहा । और वे यालक आदि भी रोते हुए अपने २ माता पिताओं से उस के अपराध को जा २ कर कह देते रहे । (तएण ते आसुस्त्ता जेणेव धण्णे सत्यवाहे तेणेव उवागच्छद, उवागच्छित्ता, यहहिं खेज्जाणाहिं जाब एयमट्ठ णिवेदेति, तएण से धणे सत्यवाहे घट्टण दारगाण अम्मापिऊण अतिए एयमट्ट सोच्चा आसुरूत्त चिलायदासचेड उच्चावयाहिं आउमणादिं आउसह उद्धसह णिभच्छेद,) इस प्रकार अपने २ बालकों के मुख से पार २ खुए अवहरइ नाव तालेइ, तपण ते यहवे दारगा य जोव रोयमाणा य जाव अम्मापिऊण नाव णिवेदेति) આ પ્રમાણે સમજાવવા છતાએ તે ચિલાત દાસચેટક ઘણા દા વગે રેમા કેટલાક દારિક વગેરેની કેડીએને ચેર જ રહ્યો યાવત તે બાળકને તાડિત કરતે રહ્ય, તેમજ મારતે પીટતે રહ્યો અને તે બાળકો વગેરે પણ રડતા રડતા પિતપોતાના માતાપિતાને આની ફરિયાદ કરતા જ રહ્યા (तएण ते आसुरुत्ता जेणेव धण्णे सत्यवाहे वेणेव उवागच्छन, आगच्छित्ता बहहिं खेज्जणाहि जाप एयम? णिवेदे ति, तरण से धण्णे सत्यवाहे बहूण दार गाण अम्मापिऊण अतिए एयम? सोचा आसुरूत्ते चिलाय दासचेढ उचावयाहि भातमणाहि आउसइ उद्धसइ, णिभच्छेद)
६४६
ताधर्म
उवागच्छइ, उवागच्छित्ता वहहिं सेजणाहिं जाव एयमहूँ
णिवेदेति । तएणं से धण्णे सत्यवाहे वहूर्ण दारगाणं ६
अम्मापिऊण अंतिएएयमट्ट सोचा आसुरुत्ते चिलाय दासखेडं
उच्चावयाहि आउसणाहि आउसइ, उद्धसइ, णिब्भच्छेह
निच्छोडेइ, तज्जेइ उच्चावयाहि तालणाहिं तालेइ, साओ
गिहाओ णिच्छभइ । तएणं से चिलाए दासचेडे साओ
गिहाओ निच्छुढे समाणे रायगिहे णयरे सिंघाडग जाव
पहेसु देवकुलेसु य सभासु य पवासु य जूयखलएसु य
वेसाघरेसु य पाणघरेसु य सुहं सुहेर्णपरिवड्डइ ॥सू० २॥
टीका-तएणं से ' इत्यादि । ततः खलु धन्य सार्थवाह. चिलात दास
चेटम् ' एयम? ' एतमर्थम् एतस्मादर्थात् दारकादीनां कपर्द कापहरणादिरूपाद
र्थात भूयोभूयो निवारयति । नो चैव खलु दासचेट एतस्माद्दुष्कृत्यादुपरमते ।
ततः खलु स चिलातो दासचेटः तेषां वहूना 'दाग्गाण य ' दारकाणां चदार
तएण से धण्णे सत्यवाहे इत्यादि।
टीकार्थ-(तएण से धपणे सत्यवाहे) इसके बाद उस धन्यसार्थवाहने
(चिलाय दासचेड) चिलात दास पुत्र को (एयमह भुज्जो २ णिवारेह)
पालको के कपर्दक आदि चुराने रूप अर्थ से घार २ मना किया, परन्तु
(णो चैव ण चिलाए दासचेडे उवरमइ ) वह चिलात दारक उस काम
से विरक्त नहीं हुआ। (तएण से दासचेडे तेसि बहूण दारगाण य ६
तएणं से घण्णे सत्यवाहे इत्यादि-
टी-(एण से घण्णे सत्यवाहे) त्या२माह से धन्य साया (चिलाय दास
वेड ) dि सपुत्रने (प्यम' भुजो २ णिवारेइ) मागनी 3150
पोरेने यारी ! मत पा२ वा२ भनाई री ५२d (णो घेव ण चिलाए
दासचेडे उबरमई) a fald th२४ पातानी भ२d । सुधा नाह
(वएण से चिलाए दासचेडे तेखि बहूग दारगाण य
६४२ . बनणारधर्मामृतवपिणी टी० १० १८ सुसमादारिकाचरितनिरूपणम् प्रपामु-पानीयशालासु च 'जय खलएसु' द्यूतखलकेपु-द्यूतक्रीडनस्थानेषु च वेसाघरेसु ' वेश्यागृहेषु च पाणवरेसु' पानगृहेपु-मधपानगृहेषु च सुख सुखेन परिवड्डइ' परिवर्द्धते-वृद्धि प्राप्नोति ॥ सू०२॥ मूलम्-तएणं से चिलाए दासचेडे अणोहहिए अणिवा- रिए सच्छदमई सइरप्पयारी मज्जप्पसगी चोजप्पसंगी मत- पसगी जुयप्पसंगी वेसापसंगी परदारप्पसगी जाए यावि य पवासु य जूयखलएसु य वेसाघरेसु य पाणघरेसु य सुहसुहेण परि- बड्डइ) और यहां तक हुआ कि कभी २ वह उसे छोड भी देता रहा और कभी २ त मेरे घर मे से निकल जा नही तो मै तुझे मारूँगा इस तरह के वचनों से उस को तिरस्कार भी कर देते थे। परन्तु जब इस की शिक्षाओं का या भय प्रदर्शक चाश्यों का उस चिलात दासचेटक पर कुछ भी प्रभाव नहीं पड़ा तय अन्त में धन्य सार्थवाह ने हताश होकर उसे अनेक विध यष्टि मुष्टि आदिकी ताडनाओं से ताडित कर अपने घर से बाहिर निकाल दिया। इस तरह जय धन्य सार्थवाह ने इसे अपने घर से बाहिर निकाल दिया-तय यह राजगृह नगरमें शृगा- टक आदि मार्गो में अवारा (स्वच्छन्दगामी) फिरने लगा और देवकुलों में सभास्थानों में, पानीय शालाओं में-प्याऊ घरो में, जुआ खेलने के स्थानों में वेश्याओं के घरोंमें, और शराब पीने की जगहो में घूम फिर कर जिस किसी भी तरह से अपना पालन पोषण करने लगा ॥२॥ અને છેવટે આ વાત ત્યા સુધી પહોચી કે કઈ કઈ વખતે તે તેને બહાર પણ કાઢી મૂકતે હતો અને કઈ કઈ વખતે તેને આ જાતના વચ- નથી ઠપકે પણ આપતે રહેતો હતો કે તું મારા ઘરમાથી નીકળી જા નહિ તર તને હુ મારી નાખીશ પર તુ જ્યારે આ જાતની શિક્ષાઓની કે ભય પ્રદર્શનની તે દાસ ચેટક ઉપર કશી અસર થઈ નહિ ત્યારે છેવટે ધન્યસાથે વાહે હતાશ થઈને તેને લાકડી, મુક્કી ઓ વગેરેથી તાડિત કરીને પિતાના ઘરથી બહાર કાઢી મૂક્યો આ પ્રમાણે જ્યારે ધન્ય સાર્થવાહે તેને પિતાના ઘરથી બહાર કાઢી મૂકે ત્યારે તે રાજગૃહ નગરના શૃંગાટક વગેરે રસ્તાઓમાં રખડેલની જેમ ભટકવા લાગ્યા અને દેવકુળોમા, સભાસ્થાનેમા, પરબમા, જુગારના અડ્ડાઓમા, વેશ્યાઓના ઘરોમાં અને શરાબખાનાઓમાં ભટકીને જેમ તેમ કરીને પિતાનુ પાલન-પોષણ કરવા લાગ્યું સૂત્ર ૨ માં - - પદ चार तिरस्करोति, 'निन्छोटेइ' निलोटपतित्यनति, 'जेड' नयनि- 'निस्सर मम गृहान् नोवेचा वारयिष्यामि' इत्यादि कानेन भर्मयनि 'उची वयाहि तालणाहिं' उच्चारचाभिर्यष्टिप्रयायोगविधामिम्ताउनाभिः 'ताल' ताडयति सानो गिहाभो 'स्वस्मार गृहात् ‘णिन्युमा' निसिपति-नि सार यति । ततः खल स चिगती दामचेटः तेन सार्थवादन स्वस्माद् गृहात "णिन्दे ' निक्षिप्त नि. सारितः गन् रामगृहे नगरे सिंघाडग जार गहेसु श्रृगाटक यारन्महापरपयेषु चतुप्पयादिपु सर्वत्र स्पलेपु, देवालेषु च सभासु च चिलात दासचेटक की पूर्वोक्त अपराधों को जय २ वे सुना करते तब वे गुस्से में भर २ कर जहां धन्यसार्थवाह शेता वहा चले जाते रहे । और वहा जाय र यढे खेद के साथ, रोते हुए अपने २ दुःखों को प्रकट करते रहे इस तरह पार २ उन दारक आदि के माता पिताओं के मुख से इस दासचेटक के दुष्कृत्य को सुनकर वह धन्य सार्थवाह क्रोध में आकर उस दामचेटक चिलात को..अनेक विधकोप जनक ऊँचे नीचे शब्दो से धिक्कार ने लगते थे उसका नाम गोत्र आदि की निंदा करने. लग जाते थे। नेत्र, मुग्व, आदि को टेडा करके उसका तिरस्कार भी करते थे। (णिच्छोडेड, तज्जेह, उच्चावयाहिं तालणादिं तालेइ, सानो गिहाओ णिच्छुभह, ताण से चिलाप दासचेडे साओ गिहाओ निच्छूढे समाणे रायगिहे णयरे सिंघाडग जाव पहेसु देवकुले जाव सभास આ પ્રમાણે પોતપોતાના બાળકને મુખેથી વારંવાર ચિલાત દાસટકની ફરિયાદે જ્યારે જ્યારે તેઓ સાભળતા ત્યારે ત્યારે તેઓ ગુસ્સે થઈને જય ધન્યસાર્થવાહ હતા ત્યાં જતા હતા અને ત્યાં જઈને તેઓ બહુ જ. દુખની સાથે રડતા રડતા પિતાપિતાને હું એને પ્રકટ કરતા રહેતા હતા આ પ્રમાણે વારંવાર તે દારક વગેરેના માતાપિતાને મુખથી તેં દાસચેટની ખરાબ વર્તણુક વિષેની વિગત સાભળીને તે ધન્યસાર્થવાહ ક્રોધમા ભરાઈને તે દાસ ચેટક ચિલાતને ઘણા ક્રોધ ઉત્પન્ન કરે તેવા ખરાબ વચનેથી ધિક્કારવા લાગતું હતું તેમજ તેના નામ શેત્ર વગેરેની નિંદા કરવા લાગતો હતો, આખે મુખ વગેરે બગાડીને તેને તિરસકાર ગુણ કસ્તા રહેતા હતા (णिन्छोडेइ, तज्जेइ, उच्चावयाहि तालणाहि ,तालेइ, साओ गिहाओ णिच्छुमइ, तएण से चिलाए दासचेडे साओ गिहाओ निच्छुढे समाणे रायगिहे णयरे सि घाडग जव पहेसु देवकुळेसु जाव सभासु य पवासु य जून सलपमु य बेसा धरैसु य पाणधरेस य सुइ सुहेण परिवटइ) . . ५ ६४२ अनगारधर्मामृतवपिणी टी० अ० १८ सुसमादारिकाचरितनिरूपणम् अपामु-पानीयशालासु च 'जूय सलएसु' द्यूतखलकेपु-द्यूतक्रीडनस्थानेषु च वेसाघरेसु ' वेश्यागृहेषु च पाणघरेसु ' पानगृहेपु-मद्यपानगृहेषु च सुख सुखेन परिवड्डइ' परिबर्द्धते-वृद्धि प्राप्नोति ॥ सू०२॥ मूलम्-तएणं से चिलाए दासचेडे अणोहहिए अणिवा- रिए सच्छदमई सइरप्पयारी मज्जप्पसगी चोजप्पसंगी मस. पसगी जुयप्पसंगी वेसापसगी परदारप्पसंगी जाए यावि य पवासु य जूयग्वलएसु य वेसाघरेसु य पाणपरेसु य सुहसुहेण परि- बड्डइ ) और यहां तक हुआ कि कभी २ वह उसे छोड भी देता रहा और कभी २ त मेरे घर में से निकल जा नही तो मै तुझे मारूंगा इस तरह के वचनों से उस को निरस्कार भी कर देते थे। परन्तु जब इस की शिक्षाओं का या भय प्रदर्शक वाक्यों का उस चिलात दासचेटक पर कुछ भी प्रभाव नहीं पडा तय अन्त में धन्य सार्थवाह ने हताश होकर उसे अनेक विध यष्टि मुष्टि आदिकी ताडनाओं से ताडित कर अपने घर से बाहिर निकाल दिया। इस तरह जब धन्य सार्थवाह ने इसे अपने घर से बाहिर निकाल दिया-तप यह राजगृह नगरमें शृगा. टक आदि मार्गों में अवारा (स्वच्छन्दगामी) फिरने लगा और देवकुलों में सभास्थानों में, पानीय शालाओ में-प्याऊ घरो में, जुआ खेलने के स्थानों में वेश्याओं के घरों में, और शराब पीने की जगहों में घूम फिर कर जिस किसी भी तरह से अपना पालन पोषण करने लगा ॥२॥ અને છેવટે આ વાત ત્યા સુધી પહોંચી કે કઈ કઈ વખતે તે તેને બહાર પણ કાઢી મૂકતો હતો અને કેઈ કેઈ વખતે તેને આ જાતના વચ- નેથી ઠપકે પણ આપતે રહેતું હતું કે તું મારા ઘરમાથી નીકળી જા નહિ તર તને હુ મારી નાખીશ પર તુ જ્યારે આ જાતની શિક્ષાઓની કે ભય પ્રદર્શનની તે દાસ ચેટક ઉપર કશી અસર થઈ નહિ ત્યારે છેવટે ધન્યસાથે વાહે હતાશ થઈને તેને લાકડી, મુક્કીઓ વગેરેથી તાડિત કરીને પોતાના ઘરથી બહાર કાઢી મૂળે આ પ્રમાણે જ્યારે ધન્ય સાર્થવાહે તેને પિતાના ઘેરથી બહાર કાઢી મૂક્યું ત્યારે તે રાજગૃહ નગરના શૃંગાટક વગેરે રસ્તામાં રખડેલની જેમ ભટકવા લાગ્યા અને દેવકુળમાં, સભાસ્થાનેમા, પરમા, જુગારના અડ્ડાઓમા, વેશ્યાઓના ઘરોમાં અને શરાબખાનાઓમાં ભટકીને જેમ તેમ કરીને પિતાનુ પાલન-પોષણ કરવા લાગે છે. સૂત્ર ૨ ll गताधर्मक्षया होत्था । तएणं रायगिहस्स नयरस्स अदरसामंते दाहिण. पुरस्थिमे दिसीभाए सीहगुहा नाम चौरपाटी होत्या, विसम- गिरिकडगकोडवसंनिविद्या, वसी कलंकपागारपरिक्खित्ता छिपसेलविसमप्पवायफलिहोवगूढा एगदुवारा अणेग- खंडी विदियजणणिग्गमपसा अभितरपाणिया सुदुल्ल भजलपेरंता सुबहुस्स वि कुवियवलस्स आयगस्स दुप्पहंसा यावि होत्था । तत्थ सीहगुहाए चौरपाटीए विजए णामं चोरसेणावई परिवसइ अहम्मिए जाव अधम्मकेऊ समुटिए वहुणगरणिग्गयजसे सूरे दृढप्पहारी साहसिए सद्दवेही । से णं तत्थ सीहगुहाए चोरपल्लीए पंचण्ह चोरसयाणं आहेव- च्च जाव विहरइ । तएणं से विजए तक्करे चोरसेणाचई वहणं चोराण य पारदारियाण य गठिभेयगाण य सधि- च्छेयगाण यखत्तखणगाण य रायाचगारीण य अणधारगाण य बालघायगाण य विसभघायगाण य जयकाराण य खडरक्खाण य अन्नेसि च बहूणं छिन्नभिन्नवहिराययाण कुडगे यावि होत्था । तएणं से विजए तकरे चोर- सेणावई रायगिहस्स दाहिणपुरस्थिमे जणवय बहूहि गामघाएहि य नगरघाएहि य गोग्गहणेहि य बदिग्गहणेहि 'य खत्तखणणेहि य पथकुणहि य उवालेमाणे २ विद्धंसे माणे २ णित्थाणं णिद्धणं करमाणे विहरइ । तएणं से 'पिलाए दाप्सचेडे रायगिहे बहुहि अस्थाभि सकीहि चोजामि मनमायोजयिनी टी अ० १८ सुसमादारिकाचरितनिरूपणम् संकीहिय दाराभिसकीहि य धणिएहि य जूइकरेहि य पर- भवमाणे रायगिहाओ नगराओ णिग्गच्छइ, णिगच्छित्ता, जेणेव सीहगुहा चोरपल्ली तेणेव उवागच्छइ उवागच्छित्ता विजय चोरसेणावइ उवसंपजित्ताणं विहरइ ॥ सू०३ ॥ टीका-'तएण से इत्यादि । ततः खलु स चिलातो दासचेटः 'अणोह- ट्टिए' अनपघटितः, यो हि दुप्कृती प्रवर्तमान कमपि हस्तौ धृत्वा निवारयति, सोऽपघटका, निवार्यमाणस्तु अपघहितः, अय हि निनारयितुरभावात् अनपघट्टितः= निरङ्कुश ' अणिवारिए ' अनिपारित', हितोपदेशकस्याभावात् अनिवारितः, तएण से चिलाए दासचेडे' इत्यादि । टीकार्य-(तएण) इसके बाद (से चिलाए दासचेडे) वह चिलात दासचे टक (अणोहट्टिए अणिवारिए सच्छदमई सहरप्पयारीमज्जप्पसंगी चोज्ज- प्पसगी मसप्पसगी, जूयप्पसगी, वेसापसगी, परदारप्पसंगी जाए यावि होत्या ) अनपघहित-निरङ्कुश बन गया-जो दुष्कर्म में प्रचर्तमान किसी को भी हाथ पकडकर उससे निवारित कर देता है उसका नाम अपटक और जो दूर किया जाता है वह अपघहित कहलातो है । निवारण कर नेवाले का अभाव होने से यह चिलात दासचेटक अनपघट्टित इसी कारण से बन गया। हितोपदेशक कोई उसका रहा नहीं अत यह कुत्सित काम करने से पीछे नहीं हटता-इसलिये यह अनिवारित होकर जो मन में आता उसे कर डालता-अत: उद्दण्ड बन गया। स्वच्छन्द तपण से चिलाए दासचेडे इत्यादि- सार्थ-तएण) या२५छी (से चिलाए दासचेडे ) ते PिAad म थेट (अणोहट्टिए अणिमारिए सन्छ दमई, सइरप्पयारी मनपसगी, चोजरसगी मस पसगी, जूयप्पसगी, वेसासगी, परदारप्पसगी, जाए यावि होत्या) અનપદ્ધિત-વરદ બની ગયે, દુષ્કર્મમા પડેલા ગમે તેને જે હાથ પકડીને તેમાથી તેને દૂર કરે છે તેનું નામ અપઘટ્ટક અને જે કરવામાં આવે છે તે અપઘહિત કહેવાય છે ચિલાત દાસટકને બે કામેથી દૂર લઈ જનાર–તેને નિવારણ કરનાર કોઈ હતું નહિ એથી તે અનપતિ થઈ ગયે હતું તેને કઈ ફિતેપદેશક હને નહિ તેથી તે કુત્સિત કામ કર વામાં પણ પીછેહઠ કરતું ન હતું, ખરાબ કામેથી તેને રોકનાર નહિ હોવાને કારણે તે મનમા ફાવે તેમ કરતે હતે એથી તે ઉડ બની ગયે હતા તે . . . - - - . ५२ माता सच्छदमई 'सन्दमतिः सामिाय-उद्दण्डात्यर्थः, अतपत्र 'सारप- पारी' सैरमचारी = सान्दविहारी 'मनप्पसंगी मममी मपपायी, 'चोजप्पसगी' चौर्यमतजी नर्गिकर्मणि परायण , 'ममप्पसंगी ' मांसमसङ्गी- मासभक्षणशीला, 'ज्यप्पसगी' पूतमसही घूतक्रीयासक्तः, 'वेसापसगी' वेश्यालम्पटः, एच 'परदारपसंगी' परदारप्रसङ्गो परदाररतो जातश्चापि आसीत् । ततः खलु राजगृहस्य नगरस्य असामन्ते दक्षिणपौरम्त्ये दिग्भागे अग्निकोणे सिंहगुहानाम चोरपरली आसीन् , या हि पल्ली 'विसमगिरिकडगकोडवसनि- विट्ठा' पिमगिरिकट ककोडम्बसगिविप्टा-शिपमो निम्नोभतो यो गिरिस्टका पर्वत मध्यमागः, तम्य यः फोडम्यःमान्तमाग, तत्र सनिविष्टा-स्थिता आसीत् । पुनः 'यसीकल कपागारपरियिखचा' वशीक्लकमाकारपरिक्षिप्ता वशीकलङ्का वंशजालमयी तिः, सैव प्राकार, तेन परिसिप्तापरिवेष्टिता-शनिर्मितजार मयमाकारैः समन्तात् -परिवेष्टिता, 'ठिणसेलविसमप्पवायफलिहोवगूढा'- छिन्नशैलविपममपातपरिखोपगूढा छिन्नोऽयमातरापेक्षया विभक्तो य. शैला- पर्वतः, तत्सम्बन्धिनो ये पिपमाः प्रपाता गर्ताः, त एव परिखा. तया उपगूढा- आश्लिष्टा परिवेप्टिता विभक्तशैलाश्यानिर्गतविपमप्रपातरूपपरिसापरिवेष्टितेत्यर्थः एगदुवारा ' एसद्वारा एक द्वार परेशनिर्गमरूप यस्या सा-एकप्रवेशनिर्गमा, 'अणेगखडी' अनेकग्वण्डा अनेकानि खण्डानि-विभागा रक्षातोर्यस्यां सा अनेकखण्डा, यत्र=स्वरक्षार्थ अनेकानि स्थानानि सन्ति, 'विदियजणणिग्गमपवेसा' विहारी हो गया-मद्यप्रसगी हो गया-मदिरा पीने लग गया। मास खाने लग गया, चोरी करने लगा, जूआ खेलने लगा, वेश्यासेवन करने लगा, और परदार सेवन करने मे भी लपट हो गया। (तएणे राय- गिरस्म नयरस्स अदूरसामते दाहिणपुरस्थिमे दिसीभाए सीहगुहा नाम चोरपल्ली होत्या-विसमगिरिकडगकोडवसन्निविटा वसीकलक पागारपरिक्खित्ता छिण्णसेलविसमप्पायफालिहोवगूढा रग्गदुवारा, अणेगखडी, विदिचजणणिग्गमपवेसा अम्भितरपाणिया सुदुल्लभजल છ દ વિહારી થઈ ગયે હતે, દારૂ પિનાર થઈ ગયું હતું તે માસ *ખાવાલાગે, ચોરી કરવા લાગે, જુગાર રમવા લાગે, વેશ્યા–સેવન કરવા લાગે અને પરસ્ત્રી સેવનમાં પણ લપટ થઈ ગયે હતે (तएण रायगिम्य नयररस अदूरसामते दाहिणपुरस्थिमे दिसीमाए सीहगुहा नाम घोरपल्ली होत रिकडगकोडवसन्निविदा वसीकलकपगारपरिक्सित्ता, छिण्णा एगदुवारा, अणेगसंडी, विदियजणणिग्गमपवेमा - अनारधर्मामृतापिणी टो० अ० १८ सुसुमागारिकाचरितनिरूपणम् विदितनननिर्गप्रवेशा-विदितजनानामेव-विश्वासवतामेव निर्गमप्रवेशौ यस्या सा- विश्वस्तजननिर्गमप्रवेशवती ' अभितरपाणिया' अभ्यन्तरपानीया मध्यस्थित- - पेरता, सुबहस्स विकूवियबलस्स आगयस्स दुप्पहसा, यावि होत्था तत्थ सीहगुहाए चोरपरलीए विजए णाम चोरसेणावई परिवसई, अहम्मिय जाव अहम्मके कसमुट्टिए बहुगगरणिग्गयजसे, सूरे दढप्पहारी सारसिप सदवेही-सेण तत्य सीगुहाए चोरपल्ली पचण्ड चोर सयाण आहेवच्च जाव विहरइ) उसी राजगृह नगर के न अधिक दूर पर और न अधिक पास में दक्षिण पौरम्त्य दिग्विभाग में-अग्निकोण में-सिंहगुहा नाम की एक चोर पल्ली धी-यह चोरपरली विषम गिरि- कटक के प्रान्त भाग में-निम्नोन्नतपर्वत के मध्यभाग के अन्त भाग में स्थित थी। इसके चारों ओर वासों की पाड़ थी-यह चाड ही इसका प्राकार (किला) था-उससे यह घिरी हुई थी। अवयवान्तरों की अपेक्षा से विभक्त जो पर्वत तत्मयन्धी जो विषम प्रपात खड्डा उन विषम ग्वड्डरूप परिखा से यह परिवेष्टित थी । निकलने का और आने का इस में एक ही द्वार था। इसमें रक्षा के निमित्त चोरोने अनेक स्थान बना रखे थे। परिचित-विश्वासवाले व्यक्ति ही इसमें आ जा सकते थे। अभितरपाणिया, सुटुलभनलपेर ता, सुबहुस्स वि कूषियवस्स आगयस्स दुप्पहमा, यापि होत्था तत्य संहगुहाए चोरपल्लीए विजए णाम चोरसेणावई परिवसई, अह म्मिय जाब अहम्मके उ समुट्ठिए बहुणगरणिग्गयजसे, सूरे दढप्पहारी, साहसिए सद्दवेही सेण तत्थ सीहगुहाए चोरपहीए पचण्ड चोरसयाण अहिवञ्च जीव विहरह) તે રાજગૃહ નગરથી ઘણે દૂર પણ નહિ અને ઘણી નજીક પણ ન એવી, દક્ષિણ પર દિગવિભાગમાં અગ્નિકેશુમા-સિંહગુહા નામે એક ચિરાપલ્લી હતી તે ચારપટલી ઊચી નીચી ગિરિમાળાઓના પ્રાત ભાગમા નિમ્નન્નત પર્વતના મધ્યભાગના અતભાગમાં આવેલી હતી તેની મેર વાનોની વાડ હતી તે વાડ જ તેને કેટ (કિલે) હતો તેનાથી તે ઘેરા એલી હતી અથવાતરોની અપેક્ષાએ વિભક્ત જે પર્વત અને તમ્સ બધી જે વિષમ પ્રપાત-આડે-તે વિષમ ખાડારૂપી પરિખાથી તે પરિષ્ટિત હતી આવવા અને જવા માટે તેમાં એક જ દરવાજ હતો ચરોએ પિતાની રક્ષા માટે ઘણા સ્થાને બનાવેલા હતા પરિચિત વિશ્વાસુ માણસો જ તેમાં આવા કરી શકતા હતા પાણી માટે તેની વચ્ચે એક જળાશય હતું, તેની બહાર - . - माताधर्मकार जलाशया 'सुल्लगमलपेरंगा' मुभनम्पर्यन्ता=गुदुर्लभ जलं पर्यन्ते मान्न मागे-पहिर्मागे पस्या सा=जलरहित महिर्मागा गबहुम्स वि' मुगदोरपि कूरियलस्स ' पिकालाप चोरगयेपफसेन्यस्य आगयरस' आगतस्य 'दुप्प इंसा' दुप्पञ्चमा दुर्धर्पणीया चापि आसीत् । तत्र खलु मिहगुहाया चोरपल्या विजयो नाम चोरसनापति-चोरनायकः परिचमति यो हि'अहम्मिए जाव अधार्मिको यावत् अधर्मेण चरति भयार्मिकः अधर्माचरणशील:-भत्र यावत्पदेन- इतभारभ्य 'घायाए रहाए अच्छायणा' इत्यन्तः पाठो ग्रायः, तथाहि-' अध- मिटे' अधर्मिट' मथा धर्मरहितः, 'अधम्मरखाई ' अधर्माख्यायी-अधर्मक थक , ' अधम्माणुगे 'अधर्मानुग अधर्मानुगामी ' अपम्मपकोई ' अधर्ममलोकी अधर्मदर्शी ' अधम्मपलन्जणे' अधर्ममरत्रना अपर्मानुरक्त', 'अम्मसीलसमु दायारे' अर्मशीलपमुदाचार =अधर्म एव शील म्बमात्र समुदाचार यस्य स', पानी के लिये इसमें वीच में एक जलाशय धा-इसके बाहिरी भाग में जल नही था। अनेक भी चोर गवेषक सेनाजन यहा आजावे तो भी वे इस पल्ली का नाश नहीं कर सकते थे। इस सिंहगुहा नामकी चोर पल्ली में विजय नाम का एक चोर सेनापति रहता था। यह अधार्मि क यावत् अधर्म केतुग्रह जैसा उदित हुआ था। यहां यावत् शब्द से घायाए वहाए अच्छायणाए " यहां तक का पाठ ग्रहण किया गया है-दस का खुलाशा भाव इस प्रकार है-अधार्मिक शब्द का अर्थ होता है अधर्माचरणशील-यह विजय नामका चोर अधर्माचरणशील था। अध मिष्ठ था-सर्वथा धर्मसे रहित था, अधर्माख्याधी या-अधर्मका कथन कर नेवाला था, अधर्मानुग था-अधर्म का अनुगामी था, अधर्मप्रलोकी था- अधर्म का ही देखने वाला था-अधर्मप्ररञ्जन था अधर्म में अनुरक्त था પાયું હતું નહિ ઘણું ચોરોની શોધ કરતા મિનિકે ત્યા આવે છાએ તે પલ્લીને નાશ કરી શકતા ન હતા તે સિંહગુડા નામની ચેરપલીમા વિજય નામે એક ચોર સેનાપતિ રહે અને તે અધાર્મિક યાત્ અધમ કેતુગ્રહની જેમ ઉદય પામ્યો હતે અહીં યાવત્ શબ્દથી “ અહીં સુધી પાઠ ગ્રહણ કરવામાં આવ્યું છે તેનું સ્પષ્ટીકરણ આ પ્રમાણે છે -અધાર્મિક શબ્દને અધર્માચરણશીલ હોય છે તે વિજય નામે ચોર અધર્માચરણશીવ હતા, અધર્મિક હો, સાવ ધર્મરહિત હો, અધર્માખ્યાયી હતે, અધર્મની વાત કહેનાર હતું, અધર્માનુરાગી હતે, અધર્મનો અનુગામી એટલે કે અધર્મને અનુસરનાર હતું, અધર્મપ્રકી હો, અધમને જ જેનાર હત, અષમધર જન હતું, અધર્મમાં આસક્ત હતું, અધર્મશીલ " घायाए वहाए अच्छायणाए 1 * - मनगारधर्मामृतवषिणी टी० अ० १८ सुसमादारिकाचरितनिरूपणम् अधर्म शीलोऽधर्माचरणश्चेत्यर्थः, 'अधम्मेण चे वित्तिं यापे माणे विहरइ ' अधर्म- णैव वृत्ति कल्पयन् विहरति अधर्मेणैव सावधानुष्ठानेनैव, वृत्ति कल्पयन् जीविका- मुपायन् ‘विहरइ ' विहरति आस्ते । पुनः ' हणदिभिंदवियत्तए 'जहिछिन्धि भिन्धि विकत का=' हण' जहि-मारय यष्टयादिना 'डिंद ' छिन्धि छेद्य- खड्गादिना, 'भिंद ' भिन्धि-भेदय भल्लादिना, इतिशब्दै सानुयायिन प्रेरयन् माणिनो विकृन्तति यः सः, जहि छिन्धिभिन्धि विर्तक., इति, ' लोहियपाणी' लोहितपाणिः लोहितौ पाणी यस्य सः, रक्तरञ्जितकरयुगलः 'चढे' चण्ड उत्कटरोप: 'रुद्दे ' गैद्रा भयानकः 'छुल्ले ' क्षुद्र क्षुद्र कर्मचारी ' उकाचगवचणमायानिय- डिकवडकूडसाइसपयोगबहुले' उत्कञ्चनवञ्चनमायानिकृतिकपटकूटमाइसपयोग- अधर्मशील समुदाचारवाला या अर्थात् इसका स्वभाव और आचरण दोनों अधर्ममय ये-अधर्म ही इस का स्वभाव था और अधर्म ही इस का आचरण या । अतः अपनी जीविका का निर्वाह सावद्य अनुष्ठानों (अधर्म ) द्वारा ही किया करता थ । यष्टयादि द्वारा इसे मारो, खगादि द्वारा इसे छेदो भल्लादि दारा इसे भेदो इस प्रकार के शब्दो से यह अपने अनुयायियों को सदा प्रेरित करता हुआ स्वय जीवों का छेदन भेद न किया करता था। इसके दोनों हाथ रक्त से रजित रहते थे। इस का क्रोध घटुन प्रचड था देग्वने में यह बडा भयानक दिग्वता था। कर्मकारी था। " उक्कचणवंचणमायानियडिककूबडडसाइसपओग यष्टुले" उत्वचन, वचन, माया, निकृति, कपट, कूट, साइ, इनका व्यव- હતેએટલે કે તેને સ્વભાવ અને આચરણ બને અધર્મમય હતા અધમ જ તેને સ્વભાવ હને અને અધમ જ તેનું આચરણ હતુ એથી તે પોતાનું જીવન સાવ અનુષ્ઠાનો વડે એટલે કે અધર્મનું આચરણ કરીને પુરૂ કરતો હતો લાકડી વગેરેથી એને મારે, તરવાર વગેરેથી એને કાપી નાખે, ભાલાઓ વગેરેથી એને ભેદી નાખે આ જાતના શબ્દોથી તે પોતાના અનુય યીઓને હંમેશા હુકમ કરતે રહેતે હવે તે પોતે પણ જીવનું છેદન-ભેદન કરતા રહે હતિ તેના બંને હાથે લેહીથી ખરડાએલા રહેતા હતા તેને ક્રોધ અત્યત પ્રચંડ હતે દેખાવમાં તે ખૂબ જ ભયાનક લાગતું હતું, તે મુદ્ર કર્મ કરનાર હતો ( कचणवचणमायानियडिकवडकूडसाइसपओगबहुले) Gयन, ५यन, भाया, निति, ४५८, ८, साई मा બધાને વહેવાર તેના જીવનમાં " . - जाताधर्माचा जलाशया 'सुल्लमजलपरता' गुदुमनलपर्यन्ता=गुदुर्लभं जल पर्यन्ते मान्न भागे बहिर्मागे यस्या सा-जलरहित्यहिभांगा बहुम्म वि' मुरोपि कूवियलस्स' कूपिकवलस्प-चौरगयेपकरी यस्य 'आगयरस' आगतस्य 'दुष्प- इंसा' दापचमा दुर्धर्पणीया चापि आसीत् । तत्र खलु सिंहगुहाया चोरपल्या विजपो नाम चोरसनापति चोरनायका परिवसति यो हिअम्मिए जाव' अधार्मिको यारत् अधर्मेण चरति अधार्मिकः अधर्माचरणशीला-अत्र यावत्पदेन- इतभारभ्य 'घायाए रहार अच्छायणाए 'इत्पन्तः पाठो ग्रायः, तथाहि-'अघ म्मिटे' अधर्मिष्ठ'मर्पया धर्मरहितः, ' अधम्मालाई । अधर्माम्यायो-अधर्मक यक, अधम्माणुगे 'अधर्मानुग =अधर्मानुगामी अपम्मपनोई ' अधर्मप्रलोकी- अधर्मदर्शी ' अधम्मपलग्जणे' अधर्ममरजना अधर्मानुरक्तः, 'अम्मसीलसमु दायारे' अधर्मशीलपमुदाचार अधर्म एर शील समाव समुदावारश्च यस्य स', पानी के लिये इसमें बीच में एक जलाशय धा-इसके बाहिरी भाग में जल नहीं था। अनेक भी चोर गवेपक सेनाजन यहां आजावे तो भी वे इस पल्ली का नाश नहीं कर सकते थे। इस सिंरगुहा नामकी चोर पल्ली में विजय नाम का एक चोर सेनापति रहता था। यह अधार्मि क यावत् अधर्म केतुग्रह जैसा उदित हुआ था। यहा यावत् शब्द से घायाए वहाए अच्छायणाए " यहां तक का पाठ ग्रहण किया गया है-इस का खुलाशा भाव इस प्रकार है-अधार्मिक शब्द का अर्थ होता है अधर्माचरणशील-यह विजय नामका चोर अधर्माचरणशील था। अध मिष्ठ धा-सर्वथा धर्म से रहित था, अधख्यिायी था-अधर्मका कथन कर नेवाला था, अधर्मानुग था-अधर्म का अनुगामी था, अधर्मप्रलोकी था- अधर्म का ही देखने वाला था-अधर्मप्ररजन था अधर्म में अनुरक्त था પાણી હતું નહિ ઘણું ચેરોની શોધ કરતા સૈનિકે ત્યા આવે છલાએ તે પલ્લીને નાશ કરી શકતા ન હતા તે સિંહગુઠા નામની ચોરપક્વીમા વિજય નામે એક ચોર સેનાપતિ રહેતા હતા તે અધાર્મિક યાવત્ અધમ કેતુગ્રહની भ 4 मी यावत् २४थी " धायाए वहाए अछायणाए અહીં સુધી પાઠ ગ્રહણ કરવામા આવે છે તેનું સ્પષ્ટીકરણ આ પ્રમાણે છે -ધાર્મિક શબ્દને અધર્માચરણુશીલ હોય છે તે વિજય નામે ચાર અધર્માચરણશીન હતું, અધર્મિક હો, સાવ ધર્મરહિત હતું, અધમખ્યાયી હત, અધર્મની વાત કહેનાર હતું, અધર્માનુરાગી હતા, અને અનુગામી એટલે કે અધર્મને અનુસરનાર હતો, અધર્મપ્રલે કી હો, અઘમને જ જેનાર હત, અધર્મપ્રર જન હતું, અધર્મમાં આસકત હતું, અધર્મશીલ સમુદાચારી , " " - . भनगारधर्मामृतवपिणी टी० अ० १८ सुसमादारिकाचरितवर्णनम् विशेषप्रकारेण नाशाय, उत्सादनाय-द्विपदादिमकलजीनानां सर्वथा नागाय च, 'जधम्मकेऊ समुट्ठिए ' अधर्मकेतु' समुत्थितः-अधर्म पापप्रधानो यः केतुः- केतुग्रहः, अधर्म केतुः उत्पातरूपधूमकेतुमहाग्रहः तद्वत् समुत्थितः। बहुणगर- णिग्गयजसे ' बहुनगरनिर्गतयशाः, रहुनगरेषु निर्गत जनमुखानिःसृत यशः ख्याति यस्य सः, प्रसिद्ध इत्यर्थः, यूर: 'दढप्पहारी' दृढपहारी दृढपहरण शीलः 'साहसिए ' साहसिक अविमृश्यकारी 'सदवेही' शब्दवेधीशब्दश्रव- णेन लक्ष्यवेधी च आसीत् । ' से ' सः = विजयश्चौर खलु तत्र सिंहगुहार्या चोरपल्ल्या पञ्चानाम् चोरशतानाम् ' आहेनच्च जाव' आधिपत्य यावत्- स्वामित्व कुर्वन विहरति । ततः खलु स विजयस्तस्करः चोरसेनापति बहूना चोराणा च पारदारियाणय' पारदारिकाणा-परस्त्रीगामिना च 'गठिभेय गाणय' ग्रन्थिभेदकानां 'सधिच्छेयगाणय' सन्धिच्छेदसाना-भित्तिसधि छिच्चा ये धनमपहरन्ति ते संधिच्छेदका उन्यन्ते, तेताम् , ' खत्तखणगाण य' क्षात्र- खनकाना-सधिरहितभित्ति खनकानाम् , 'रायाचगारीणय ' राजाऽपकारिणां- पशु, पक्षी, सरीसृप आदि प्राणियोंके घातके लिये,वधके लिये,तथा उनके सर्वथा विनाशके लिये, यह अधर्मकेतुग्रह जैसा उदित हुआ था। अनेक नगरों में यह कुख्यात होचुका था। पडा शुरवीर था। इसका प्रहार बहुत गहरा होता था। विना विचारे काम करना ही इसका स्वभाव था शब्द श्रवण कर यह अपने लक्ष्य के वेधने मे बडा निपुण या। वह विजय चौर सिंहगुफा नाम की उस चोरपल्ली मे पाचसौ चोरों का आधिपत्य यावत् स्वामित्व करता हुआ रहता था। (तएण से विजय तस्करे चोरसेणावई बहण चोरोण य पारदारियाण य गंठिभेयगाण य सधिच्छेयगाण य खत्तखणगाण य, रायावगारीण य अणधारगाण य घा द्विपक्ष, यतु०५४, भृग, पशु, पक्षी, सरीमृ५ (सा५) पोरे प्राणीमाना ઘાત માટે, વધ માટે તેમજ તેમના સર્વનાશ માટે તે અધર્મ કેતુ હની જેમજ ઉદય પામ્યું હત ઘણા નગરમાં તે કુખ્યાત થઈ ચુક્યો હતો તે ભારે શૂરવીર હતા, તેને પ્રહાર ખૂબ જ ભારે થતું હતે વગર વિચાર્યા કામ કરવામાં જ તેને સ્વભાવ હતો શખ શ્રવણ કરીને તે પિતાના લક્ષ્યને વધી નાખવામાં ખૂબ જ નિપુણ હતું તે વિજ્ય ચાર સિંહ ગુફા નામની તે ચાર પલીમા પાસે ચોરોને સ્વામી-ચાવત્ સ્વામિત્વ ભગવતે રહેતે હતા (तएण से विजयतझरे चोरसेणावई बढण चोराण व पारदारियाण य गठिभेयगाण य सधिच्छेयगोण य सत्तसणगाणय, रायाचगारीण य ऊण ܀ ܝܚ - . - . माताधर्मकथा पहल, तर-उत्तचनम् मुग्धननाशनमस्य समीपागनिक्षणमयात् तन्तये यश्चनाकरणम् पधनभतारणम् , गाया-परमानमुदिः, निति: मायापच्छाद- नार्थ मायान्तरकरणम् , पपटम्येपादिविपर्ययकरणम् , रुटम् नगतोलनका दीनामन्ययाकरणम् , ' साइ' देशी शन्नोऽयम् , विश्वासामार, एषां समयोगो व्यवहारः स एप बहुल: प्रचुरो यस्य सः, 'निस्सीले' निःशी पीलरहित', नियए' निर्गत: अणु-तारित , ' निरगुणे' निर्गुण =गुगततरहितः, 'निप चक्खाणपोसदीयवासे' निप्पत्याग्यान पीपधोपामः- मत्याग्यानपोषधोप वासरहितः 'याण दुपयचउपयमियपसुपरिखमरीसिमाण पायाए पहाए उच्छाय णाए' पहना द्विपदचतुप्पटमृगपशुपसिसरीमपाणा घानाय, वाय-सामान्य हार इसके पास प्रचुर था। भोलेजनों के वचन करने में प्रवृस हुआ वचक जन जय पास में आये हुए जनको भय से नहीं उगता है इस का नाम उत्कचन है। प्रतारण (ठगना) करना इसका नाम वचन है। दूसरों को वगन करने की घुद्धि का नाम माया है। अपनी मायाचारी को छिपाने के लिये जो दूसरी मायाचाररूप क्रिया करनी होती है इस का नाम निकृती है। येप आदि के परिवर्तन करने का नाम कपट है। तराजू एव तोलने आदि के यारों को कमती चढती रखना इसका नाम कृट है। "साइ" यह देशीय शन्द है। इसका अर्ध विश्वास का अभाव होता है। यह निःशील था-शीलरहित था-नित था-व्रत रहित था, निर्गुण था-गुण रहित था, "प्रत्याख्यान और पौषधोपवास पण दुपयचउप्पयमियपसुपक्खिसरीसिवाण घायाए वहा उच्छायणा अधम्मकेऊ समुहिए" अनेक द्विपद, चतुष्पद, मृग, પુષ્કળ પ્રમાણમાં હો ભેળા માણસોના વચનમાં પ્રવૃત્ત થયે વાચક જ્યારે પાસે આવેલા માણસને બીકથી ઠગ નથી તેનું નામ ઉત્કચન છે પ્રતા ! નામ વચન છે બીજા માણસને ઠગવાની બુદ્ધિનું નામ માયા છે પિતાની માયાચારીને છુપાવવા માટે જે બીજી માયાચાર રૂપ ક્રિયા કરવામાં આવે છે તેનું નામ નિકૃતિ છે વેશ વગેરે બદલવુ તે કપટ કહેવાય છે ત્રાજવા તેમજ જોખવાના વજનેને હલકા અને ભારે કરવા તેનુ નામ ફૂટ છે એ દેશીય શબ્દ છે તેને અથે વિશ્વાસનો અભાવ હોય છે તે નિશીલ હતેશીલ રહિત હો, નિવ્રત વ્રત રહિત હતા નિર્ગુણ હત-ગુણ રહિત હતે પ્રત્યાખ્યાન અને પૌષધોપવાસથી વજિત હતો જ बहूण मियपसुपस्विमरीसिवाण पायांए वहाए - उन्ायणाएं से वजित था "स" दुपयच उत्पय " - , -- - . अनगारधर्मामृतपिणी टी० अ०१८ सुसमादारिकाचरितवर्णनम् विशेपप्रकारेण नाशाय, उत्सादनाय-द्विपदादिमकलजीवाना सर्वथा नाशाय च, 'अधम्मकेऊ समुट्ठिए ' अधर्मकेतुः समुत्थितः-अधर्म पापप्रधानो यः केतुः= केतुग्रहः, अधर्मकेतुः-उत्पातरूप घूमकेतुमहाग्रहः तद्वत् समुत्थितः। बहुणगर- णिग्गयजसे ' बहुनगरनिर्गतयशाः, बहुनगरेपु निर्गत जनमुखानिःसृत यशः ख्याति यस्य सः, मसिद्ध इत्यर्थः, शूरः 'दढप्पहारी दृढमहारी-दृढपहरण शीलः 'साहसिए' साहसिक अविमृश्यकारी सदवेही' शब्दवेधी-शब्दश्रव- णेन लक्ष्यवेधी च आसीत् । ' से ' सः = विजयश्चौर खलु तत्र सिंहगुहायाँ चोरपल्ल्या पश्चानाम् चौरशतानाम् ‘आहेबच्च जाव' आधिपत्य यावत् स्वामित्व कुर्वन् विहरति । ततः खलु स विजयस्तस्कर. चोरसेनापति बहूना चोराणा च पारदारियाणय' पारदारिकाणा-परस्त्रीगामिना च 'गठिभेय गाणय' ग्रन्थिभेदकानां 'सधिच्छेयगाणय' सन्धिच्छेदना-भित्तिसधि छिच्चा ये धनमपहरन्ति ते सधिच्छेदका उन्यन्ते, तेगम् , ‘खत्तखणगाण य' क्षात्र- खनकाना-सधिरहितभित्ति खनकानाम् , 'रायावगारीणय' राजाऽपकारिणां- पशु, पक्षी, सरीसृप आदि प्राणियोंके घातके लिये वध के लिये,तथा उनके सर्वथा विनाशके लिये, यह अधर्मकेतुग्रह जैसा उदित हुआ था। अनेक नगरों में यह कुख्यात होचुका था । बडा शुरवीर था । इसका प्रहार बहुत गहरा होता था। विना विचारे काम करना ही इसका स्वभाव था शब्द श्रवण कर यह अपने लक्ष्य के वेधने में बडा निपुण था। वह विजय चौर सिंहगुफा नाम की उस चोरपल्ली में पाचसौ चोरों का आधिपत्त यावत् स्वामित्व करता हुआ रहता था। (तएण से विजय तस्करे चोरसेणावई यहण चोरोण य पारदारियाण य गठिभेयगाण य सधिच्छेयमाण य खत्तखणगाण य, रायाचगारीण य अणधारगाण य घा विपद, यतुष्पद, भृग, पशु, पक्षी, सरी५५ (सा५) वगैरे प्राणीमाना ઘાત માટે, વધ માટે તેમજ તેમના સર્વનાશ માટે તે અધમ કેતુ ગ્રહની જેમજ ઉદય પામ્યા હતા ઘણા નગરમા તે કુખ્યાત થઈ ચુક્યા હતા તે ભારે શૂરવીર હતા, તેને પ્રહાર ખૂબ જ ભારે થતે હેતે વગર વિચાયો કામ કરવામાં જ તેને સ્વભાવ હતે શબ્દ શ્રવણ કરીને તે પિતાના લક્ષ્યને વીંધી નાખવામાં ખૂબ જ નિપુણ હતું તે વિજય ચાર સિંહ ગુફા નામની તે ચાર પલીમા પાચ ચેરોને સ્વામીજાવત્ સ્વામિત્વ ભગવતે રહેતે હતો (तएण से विजयतकरे चोरसेणावई बदण चोराण य पारदारियाण य गठिभेयगाण य सधिच्छेयगोण य प्रत्तसणगाणय, रायावगारीण य कण पा८३ - - - पातापर्मचारी पहलः, तन-उत्रनम् मुग्धमनासनस्य समीपागनिमणमयात् सन्तये धश्चनाकरणम् ययन-मतारणम् , गाया-परपशन दिः, निति मायाप्रसाद नार्थ मायान्तरकरणम् , पपटम्पादिविपर्ययारणम् , स्टम्गतोलनका दीनामन्ययाकरणम् , ' साइ' देशी गोऽयम् , विधासामार., पा समयोगो व्यवहारः स पर नामचुरो यस्प स', 'निस्सीले' नि'शीन: शीलरहित', 'नियए' निर्माणुस्तारित , 'निरगुणे' निर्गुण -गुगततरहितः, 'निए च्चवखाणपोसदीयवासे' निष्प्रत्याख्यान पापधोपरास. - प्रत्यारयानपोषधोप घोसरहितः पण दुपयचउपयमियपरिखमरीसिपाण धायाए वहाए उच्छाय पाए' पहना द्विपदचतुप्परगपशुपतिसरीमपाणा घाताय, वाय-सामान्य हार इसके पास प्रचुर था। भोलेजनों के चयन करने में प्रवृस हुआ वचक जन जय पास में आये हुए जन को भय से नहीं उगता है इस का नाम उत्कचन है। प्रतारण (ठगना) करना इसका नाम बंधन है। दूसरों को यपन करने की पुद्धि का नाम माया है। अपनी मायाचारी को छिपाने के लिये जो दूसरी मायाचाररूप क्रिया करनी होती है इस का नाम निकृती है। वेप आदि के परिवर्तन करने का नाम कपट है। तराजू एव तोलने आदि के यादों को कमती चढती रखना इसका नाम कृट है। "साइ" यह देशीय शन्द है। इसका अर्थ विश्वास का अभाव होता है। यह निःशील था-शीलरहित था-नित था-व्रत रहित था, निर्गुण था-गुण रहित था, "प्रत्याख्यान और पौषधोपवास से वर्जित था यहण दुपयचउप्पयमियपसुपक्खिसरीसिवाण घायाए वहाए उच्छायणा अधम्मऊ समुट्ठिए" अनेक द्विपद, चतुष्पद, मृग, પુષ્કળ પ્રમાણમાં હેતે ભેળા માણસના વચનમાં પ્રવૃત્ત થયે વાચક જ્યારે પાસે આવેલા માણસને બીકથી કગતે નથી તેનું નામ ઉત્કચન છે પ્રતારણ ! નામ વચન છે બીજા માણસને ઠગવાની બુદ્ધિનું નામ માયા છે પિતાની માયાચારીને છુપાવવા માટે જે બીજી માયાચાર રૂપ ક્રિયા કરવામાં આવે છે તેનું નામ નિવૃતિ છે- વેશ વગેરે બદલવુ તે કપટ કહેવાય છે ત્રાજવા તેમજ જોખવાના વજનને હલકા અને ભારે કરવા તેનું નામ ફૂટ છે આ દેશીય શબ્દ છે તેને અર્થે વિશ્વાસને અભાવ હોય છે તે નિશીલ હતે-શીલ રહિત હો, નિવૃત વ્રત રહિત હતે નિર્ગુણ હતે-ગુણ રહિત હતે પ્રત્યાખ્યાન અને પૌષધોપવાસથી વર્જિત હતું बहूण मियपसुपविम्ब मरीसिवाण घायाए वहाए - उच्चायणाए " "सा" " दुपयच उपय " . - . - - भनगारधर्मामृतपिणी टी० अ०१८ सुसमादारिकाचरितवर्णनम् विशेपमकारेण नाशाय, उत्सादनाय-द्विपदादिमकलजीवाना सर्वथा नाशाय च, 'जधम्मकेऊ समुट्ठिए ' अधर्मकेतुः समुत्थितः-अधर्म पापप्रधानो यः केतुः- केतुग्रहः, अधर्म केतुः-उत्पातरूपधूमकेतुमहाग्रहः तद्वत् समुत्थितः । बहुणगर- णिग्गयजसे ' बहुनगरनिर्गतयशा', बहुनगरेषु निर्गत जनमुखानिःसृत यशः ख्याति यस्य सः, प्रसिद्ध इत्यर्थः, शुरः ‘ढढप्पहारी' दृढमहारी-दृढमहरण शीलः 'साहसिए ' साहसिक-अविमृश्यकारी ' सहवेही' शब्दवेधी-शब्दशव- णेन लक्ष्यवेधी च आसीत् । ' से ' सः = विजयश्चोर खलु तत्र सिंहगुहायाँ चोरपल्ल्या पञ्चानाम् चौरशतानाम् ‘आहेगच्च जाव' आधिपत्य यावत्- स्वामित्व कुन विहरति । ततः खलु स विजयस्तस्कर. चोरसेनापति बहूना चोराणा च पारदारियाणय' पारदारिकाणापरस्त्रीगामिना च 'गठिभेय गाणप' ग्रन्थिभेदकानां सधिच्छेयगाणय' सन्धिच्छेदसना-मित्तिसधि छिचा ये धनमपहरन्ति ते सधिच्छेदका उन्यन्ते, तेपाम् , 'खत्तखणगाण य ' क्षात्र- खनकाना-सधिरहितभित्ति खनकानाम् , रायाचगारीणय' राजाऽपफारिणां- पशु, पक्षी, सरीसृप आदि प्राणियोंके घातके लिये,वध के लिये,तथा उनके सर्वया विनाशके लिये, यह अधर्मकेतुग्रह जैसा उदित हुआ था। अनेक गरों में यह कुख्यात होचुका था । पडा शुरवीर था। इसका प्रहार बहुत गहरा होता था। विना विचारे काम करना ही इसका स्वभाव था शब्द श्रवण कर यह अपने लक्ष्य के वेधने में बडा निपुण था। वह विजय चौर सिंहगुफा नाम की उस चोरपल्ली में पाचसौ चोरों का आधिपत्य यावत् स्वामित्व करता हुआ रहता था। (तएण से विजय तस्करे चोरसेणावई यथण चोराण य पारदारियाण य गठिभेयगाण य सपिच्छेयगाण य खत्तखणगाण य, रायाधगारीण य अणधारगाण य घ! द्विप, यतुष्पह, भृग, पशु, पक्षी, सरी२१५ (भा५) को प्रमाना ઘાત માટે, વધ માટે તેમજ તેમના સર્વનાશ માટે તે અધર્મ કેતુહની જેમજ ઉદય પામ્યું હતે ઘણા નગરમા તે કુખ્યાત થઈ ચુક્યું હતું તે ભારે શૂરવીર હતા, તેને પ્રહાર ખૂબ જ ભારે થતું હતે વગર વિચાર્યા કામ કરવામાં જ તેને સ્વભાવ હતે શબ્દ શ્રવણ કરીને તે પિતાના લક્ષ્યને વધી નાખવામાં ખૂબ જ નિપુણ હતો તે વિજય ચાર સિંહ થફ નામની તે ચાર પઢીમા પાચ એને સ્વામી-યાવત્ સ્વામિત્વ ભગવતે રહેતે હતે (वएण से विजयतबारे चोरसेणावई घण घोराण य पारदारियाण य गठिभेयगाण य सपिच्छेयगोण य सत्तसणगाणय, रायावगारीण य कण शा८३ - - . - घहुलः, तर-उत्पश्चनम् मुग्धमनमनमानस्य समीपागनिक्षणभयान सन्तये वचनाकरणम् यश्चन-मतारणम् , गाया पानादित, निति. माथापच्छाद नार्थ मायान्तरकरणम् , पटम्पंपादिविपर्ययकरणम् , एटम् शुगतोलनका दीनामन्यधाकरणम् , ' साइ' देशी गन्दोऽयम् , विश्वासामार., एपा सप्रयोगो व्यवहारः स पर यहुः प्रचुगे यस्य स', 'निस्सीले' निशी गोलरहित', 'नियए' नितिअणुस्तरहित , 'निरगुणे' निर्गुण =गुगततरहितः, 'निप चक्रपाणपोसदोकासे । निष्प्रत्याख्यान पापधोपयाम = प्रत्यारपानपोषधोप वासरहितः बहण दुपयचउप्पयमियपमुसरिखमरीसिपाण धायाए उहाए उन्धाय णार' पहना द्विपदचतुष्पदमृगपशुपसिमरीसपाणा घाताय, बाप-सामान्य हार इसके पास प्रचुर था। भोलेजनों के वचन करने में प्रवृत्त हुआ वचक जन जय पास में आये हुए जनको भय से नहीं उगता है इस का नाम उत्कचन है। प्रतारण (ठगना) करना इसका नाम वधन है। दूसरों को घनान करने की पुद्धि का नाम माया है। अपनी मायाचारी को छिपाने के लिये जो दसरी मायाचारम्प क्रिया करनी होती है इस का नाम निकी है । येप आदि के परिवर्तन करने का नाम कपट है। तराजू एव तोलने आदि के चाटों को कमती घढती रखना इसका नाम कृट है। "सार" यह देशीय शन्द है। इसका अर्थ विश्वास का अभाव होता है। यह निःशील थां-शीलरहित या-निव्रत धा-प्रत ररित था, निर्गुण था-गुण रहित था, "प्रत्याख्यान और पौषधोपवास से वर्जित था " यहण दुपयचउप्पयमियपसुपरिखसरीसिवाण पायाए वहाए उच्छायणाग अधम्मकेऊ समुट्टिए" अनेक द्विपद, चतुष्पद, मृग, પુષ્કળ પ્રમાણમાં હતે ભેળા માણસોના વચનમાં પ્રવૃત્ત થયે વાચક જ્યારે પાસે આવેલા માણસને બીકથી ઠગતે નથી તેનું નામ ઉત્કચન છે પ્રતાર ! નામ વચન છે બીજા માણસને ઠગવાની બુદ્ધિનું નામ માયા છે પિતાની માયાચારીને છુપાવવા માટે જે બીજી માયાચાર રૂપ ક્રિયા કરવામા આવે છે તેનું નામ નિતિ છે વેશ વગેરે બદલવુ તે કપટ કહેવાય છે ત્રાજવા તેમજ લેખવાના વજનને હલકા અને ભારે કરવા તેનું નામ ફૂટ છે આ દેશીય શબ્દ છે તેને અથ વિશ્વાસને અભાવ હોય છે તે નિશીલ હતા,-શીલ રહિત હતું, નિવ્રત વ્રત રહિત હતો નિર્ગુણ હિતે-ગુણ રહિત હતે પ્રત્યાખ્યાન અને પૌષપવાસથી વર્જિત હતે “ मियपसुपस्बिमरीसिवाण घायाए वहाप - उन्हायणाए "सा" बहूण दुपयच उपय " - . " अनगारधर्मामृतवपिणी टी० अ०१८ सुसमादारिकाचरितवर्णनम् विशेपप्रकारेण नाशाय, उत्सादनाय-द्विपदादिमफलजीवाना सर्वथा नाशाय च, 'जधम्मकेऊ समुट्ठिए ' अधर्मकेतुः समुत्थितः-अधर्म पापप्रधानो यः केतुः- केतुग्रहः, अधर्मकेतुः उत्पातरूप घूमकेतुमहाग्रहः तद्वत् समुत्थितः । वहुणगर- णिग्गयजसे ' बहुनगरनिर्गतयशाः, पहुनगरेपु निर्गत जनमुखानिःसृत यशः ख्याति यस्य सः, प्रसिद्ध इत्यर्थः, शूरः 'दढप्पहारी' दृढपहारी-दृढपहरण शीलः 'साहसिप' साहसिक-अविमृश्यकारी 'सदवेही' शब्दवेधी-शम्शव- णेन लक्ष्यवेधी च आसीत् । ' से ' सः = विजयश्चोर खलु तत्र सिंहगुहायाँ चोरपल्ल्या पञ्चानाम् चौरशतानाम् 'चाहेनच्च जाव' आधिपत्य यावत्= सामित्व कुन विहरति । ततः ग्वलु स विजयस्तस्करः चोरसेनापति बहूना चोराणा च 'पारदारियाणय' पारदारिकाणा-परस्त्रीगामिना च 'गठिभेय गाणय' ग्रन्थिभेदकानां 'सधिन्छेयगाणय' सन्धिच्छेदमना-भित्तिसधि छित्त्वा ये धनमपहरन्ति ते संधिच्छेदका उन्यन्ते, तेराम् , 'खत्तखणगाण य ' क्षात्र- खनकाना सधिरहितभित्ति खनकानाम् , 'रायाचगारीणय' राजाऽपकारिणां- पशु, पक्षी, सरीसृप आदि प्राणियों के घातके लिये वध के लिये,तथा उनके सर्वथा विनाशके लिये, यह अधर्मकेतुग्रह जैसा उदित हुआ था। अनेक नगरों में यह कुख्यात होचुका था। वडा शुरवीर था। इसका प्रहार बहुत गहरा होता था। विना विचारे काम करना ही इसका स्वभाव था शब्द श्रवण कर यह अपने लक्ष्य के वेधने मे बडा निपुण था। वह विजय चौर सिंहगुफा नाम की उस चोरपल्ली मे पाचसौ चोरों का आधिपत्य यावत् स्वामित्व करता हुआ रहता था। (तएण से विजय तक्करे चोरसेणावई बढण चोराण य पारदारियाण य गठिभेयगाण य सधिच्यगाण य खत्तखणगाण य, रायाचगारीण य अणधारगाण य ઘણા દ્વિપદ, ચતુષ્પદ, મૃગ, પશુ, પક્ષી, સરીપ (સાપ) વગેરે પ્રાણીઓના ઘાત માટે, વધ માટે તેમજ તેમના સર્વનાશ માટે તે અધમ કેતુ ગ્રહની જેમજ ઉદય પામ્યો હતો ઘણા નગરમાં તે કુખ્યાત થઈ ચુક્યા હતા તે ભારે શૂરવીર હતા, તેને પ્રહાર ખૂબ જ ભારે થતો હતે વગર વિચાર્યા કામ કરવામાં જ તેને સ્વભાવ હતે શબ્દ શ્રવણ કરીને તે પિતાના લક્ષ્યને વીંધી નાખવામાં ખૂબ જ નિપુણ હતું તે વિજય ચાર સિંહ ગુફા નામની તે ચાર પક્ષીમા પાસે ગેરેને સ્વામી-યાવત્ સ્વામિત્વ ભગવતે રહેતે હતે (वएण से विजयतकरे चोरसेणावई बहण चोराण व पारदारियाण य गठिभेयगाण च सधिच्छेयगोण य सत्तखणगाणय, रायावगारीण य कण शा८३ -- - राजद्रोहिणां ' अणधारगाणय ' मणधारयाणाम् वाग्याताना 'बीसमवायमान य' थिम्मघातकाना=विश्वापानिना पूनमारकाणां' यावाण य ' खण्डर क्षाणां राजपिरोधेन भूमिसण्डधारिणाम् गम् अन्गेषां च रहना 'सिभित्रकारि राहयाण' छिन्नभिन्नाहियातानाम्-रिवारिलतादिया', मिश्रा-भिन्नक नासिकादिकाः, हिराहता रानापराधन देशनिकाशिताः, एतेगा द्वन्दः, तेषां च 'कुटुगे' फुटका टङ्क इस कुटङ्क - शयन रक्षार्धमाश्रयणीयत्वसाम्यात् पालधायगाण य धीमभयायगाण य जयकाराण य पहरपखाण य अ नेसि यहण छिन्नभिन्न पहिरायगाण कुडगे याविरोत्या) वह विजय तस्कर चोर सेनापति अनेक चोरों का अनेक परस्त्री लपटों का प्रन्धि भेद को का, सपिच्छेदको का-मकान की भीत फोड़कर धनका अपह रण करनेवालो का, क्षात्रसनकों का सधि रहित भीत को फोडकर चोरी करनेवालों का, राजा का अपकार करने वालों का-राजद्रोहियों का, ऋण करने वालों का पाल रत्या करने वालों का विश्वासघात करने चालों का जुआ खेलनेवालों का, राजा की आज्ञा लिये बिना ही कुछ जमीन को अपने अधिकार में करनेवालो का, तथा और भी अनेक छिन्न, भिन्न पहिराहत व्यक्तियों का यह कुटक जैसा था। जिन के हाथ आदि काटदिये गये है ऐसे प्राणी, छिन्न शब्द से जिनकी नाक आदि काट दी गई है ऐसे प्राणी भिन्न शब्द से एवं राजापराप के कारण जो देश से धारिर निकाल दिये गये हैं ऐसे मनुष्य यहां घहि आहत शब्द बारधायगाण य वीसभघायगाण य जूयकाराण य सडरक्खाण ये अन्नेसिं बहण छिन्नभिन्नयहिराययाणं कुडगे यावि होत्या) તે વિજય તકર ચોર સેનાપતિ ઘણા ચહા, ઘણા પી લપટા, ગ્રથિભેદક, સધિદક-માકેરૂ પાડીને ધનનું અપહરણ કરનારાઓ, ક્ષાત્ર ખનકે--સધિભાગ વગરની ભીતમાં બાકોરૂ પાડીને ચેરી કરનારાઓ, રાજાના ५५४।२४-२४ोडीमा, * ४२नारासी (वाडा) माणत्या ४२नारामा, બાળહત્યા કરનારાઓ, વિશ્વાસઘાત કરનારાઓ, જુગાર રમનારાઓ, રાજાની 'આજ્ઞા લીધા વગર જ ડી જમીનને પિતાના અધિકારમા લેનારાએ તેમજ બીજા પણ ઘણુ છિન્ન, ભિન્ન બહિરાહત લોકોના માટે તે કુક જે હતો જેમના હાથ પગ વગેરે કાપી નાખવામા આવ્યા છે એવા પ્રાણીઓ, શબ્દ વડે જેમના નાક વગેરે કાપવામાં આવ્યા છે એવા પ્રાણીઓ, ભિન્ન શબ્દ વડે અને રાજ્યપરાધ બદલ જે દેશમાંથી બહાર કાઢી મૂકવામાં આવ્યા છે એવા માણસે અહીં-“બહિ આહત ” શબ્દ વડે સ બે धारगाण य છિન્ન 100 . . अनगारधर्मामृतवपिणी टो० अ० १८ सुसमादारिकाचरितवर्णनम् ६५९ चापि अभूत् । ततः खलु स विजयस्तस्करः चौरसेनापतिः राजगृहस्य ! दाहिण पुरथिम ' दक्षिणपौरस्त्य अग्निकोणस्थित जनपद बहुभिः — गामघाएहि ' ग्राम घाते -यामविनाशैश्च, नगरपातैश्च, 'गोग्गहणेहिय ' गो ग्रहण गवां लुण्ठनैः, वदिग्गहणेहिय' वन्दिग्रहण'-लुण्ठने ये जना गृहीवास्ते चन्दिनउच्यन्ते, तेपा ग्रहणैः स्वकाराया स्थापनैः, ' खत्तखणणेहिय ' क्षात्रखननैश्च एवं विधैष्दुकृत्यै से प्रतियोधित किये गये हैं। रक्षणार्य आश्रयणीय होने की समानता से इसे कुटक-वशवन-जैसा कहा गया है। (तएण से विजए तफरे चोरसेणावई रायगिहस्स दाहिणपुरस्थिमं जणवय यहिं गामधाएहिं य नगरधाएहिं य गोग्गहणेहि य पदिगहणेहि य खत्तखणणेहिय, पथकु पणेहि य उवीले माणे • विद्धसणे माणे • णित्याण, णिवण करेमाणे विदरइ, तएण से चिलाए दासचेडे रायगिहे यहि अत्याभिसकीहि य चोज्जाभिसकीहि य दाराभिसकीहि य धणिएहि य जूयकरेहि य पर- भवमाणे २ रायगिहाओ नगराओ णिग्गच्छद, णिग्गच्छित्तो जेणेव सीहगुहा चोरपल्ली तेणेव उवागच्छड, उवाच्छित्ता विजय चोरसेणावह अवसपजित्ताण विहरइ ) चोरों का सेनापति वह विजय तस्कर राज- गृह नगर के अत्रिकोण में स्थित जनपदा को, अनेक ग्रामो के विनाश से नगरों के घात से, गायों के लूटने से, लूटते समय पकडे गये मनुष्य को अपने कारागार में यद करने से, क्षत्रवनन से-मकानो में खोतदेने છે રક્ષણ માટે આશ્રયણીય હવાના સામ્યથી તેને કુટક-વાસનાવન”ની જેમ બતાવવામાં આવે છે (तएण से विजए तकरे चोरसेणावई रायगिहास दाहिणपुरत्यिम जणषय घहहिं गामधार ह य नगरधाएहि य गोग्गहणेहि य व दिग्गहणे हि य सत्तसणणेहि य पथकुदणे हि य बोलेमणेर विद्धसणे माणे२ णि थाण, णिद्धण करेमाणे विहरह, तएण से चिलाए दास चेडे रायगिहे बहूहिं अत्यामिसकीहि य चोजाभिसकी हि य पणियेहि य जूयकरेहि य परभवमाणे २ रायगिहाओ नगराओ णिग्गच्छइ, णिग्गच्छिता जेणेव सीहगुहा चोरपल्ली तेणेव उवागच्छद, उपोगच्छित्ता विजय चोरसेणावइ उबसपजित्ताण विहरइ) ચોરેને સેનાપતિ તે વિજય તસ્કર રાજગૃહ નગરના અગ્નિકેના જનપદેને, ઘણા ગ્રામેનો વિનાશ કરીને નગરને ઘાત કરીને ગાયોને લૂટીને લતી વખતે પકડી પાડેલા માણસને પિતાના કારાગારમાં પૂરી દઈને, ક્ષેત્ર ખનન કરીને, મકાનમાં ખાતર પાડીને અને મુસાફરોને મારીને નિરતર . - - २६० narai पथकुटणेडिय' पान्यटनः पथिकलनमाग्गोत्र पीलेमाणे २. उत्पीडयन -सन्ततमुत्पीडन कुन्,ि 'द्धिसमाणे १ विधमयन् २-सर्वदा विध्वस हुन् , 'णिस्याण 'निः स्यान=गृहरहित, 'गिद्धण निर्धनम् धनरहित करीन वहरति । तत खलु स चिरातो दासचेटः रामगृहे बहुभिः अयामिस कीडिय' अर्याभिशक्षिमि-भय पिलातो मदीयम होतान , ग्रहीत्यति वा इत्यभिशान शीले 'चोनाभिस कोहिय चौर्याभिशनिमिः अय मम गृह चीयं कृतवान् करिष्यति वेत्यभिशङ्कन शीलेश्च दारामिम कीहि ' दारामितिभिः अय मम दारान् पितवान् दूयिष्यति चेत्यभिगनशीले तथा धनिश्च द्यूतक्रैश्व परा भूयमाणः २= पुनः पुन पराभव माप्यमाणो रानगृहात् नगराद् वहि निर्गन्छत्ति, निर्गत्य, यव सिंहगुहा चोरपल्ली तर आगछति, उपागत्य विजय चोरसेना पतिम् उपस पधमाप्य विहरति ।। सू०३ ।। से, एव पथिकजनो के मारने से, निरन्तर पीडित करता विध्वस करता करता और गृह विरिन करता रहता था। इस के पश्चात् वह दासचेटक चिलात राजगृह नगर में अनेक अर्थाभिशक-इस चिलात ने हमलोगों को हरण किया है तथा इसी तरह से यह आगे भी करेगा- प्रकार की शझा करने वाले, चौर्याभिशंकी इसने हमलोगों के घर में घुसकर पहिले चोरी की है-ता इसी तरह यह आगे भी करेगा-इस प्रकार की आशका करने वाले, दाराभिशकी-इसने पहिले हमारी स्त्रियों के साथ बलात्कार किया है-इसी तरह से यह आगे भी करेगा इस तरह की अपनी स्त्रियों के साथ बलात्कार करने की आशकावाले पुरुषों के द्वारा तथा धनिक व्यक्तियों के द्वारा, जुआ खेलने वाले ज्वारियो के द्वारा पुनः पुनः पराभूत होता हुआ राजगृह नगर से बाहर निकला પીડિત કર, વિવસ કરતે અને ગૃહવિહીન બનાવી મૂકતે હતા ત્યારપછી તે દાસચેટક ચિલાતે રાજગૃહ નગરમાં ઘણા અથભિશ ક-આ ચિલાતે અમારા દ્રવ્યનું હરણું કર્યું છે તેમજ આ પ્રમાણે ભવિષ્યમાં પણ હરણ કરશે, આ જાતની શકા કરનારાઓ વડે, ચૌર્યાભિશ કી-એણે અમારા ઘરમાં પસીને પહેલા ચોરી કરી હતી તેમજ ભવિષ્યમાં પણ તે ચેરી કરશે જ-આ જાતની ચોરીની આશકા કરનારાઓ વડે, દારાભિશકીએણે પહેલા અમારી સ્ત્રીઓ ઉપર બલાત્કાર કર્યો છે, આ પ્રમાણે ભવિષ્યમાં પણ તે ચોક્કસ આવુ કરે શે જ, આ રીતે પિતાની સ્ત્રીઓ ઉપર બલાત્કારની આશ કાવાળા પુરૂ વડે તેમજ ધનવાને વડે, જુગાર રમનારા જુગારીઓ વડે, વાર વાર के द्रव्य .
६६१ मगारधर्मामृतषिणो टी० अ० १८ सुसमादारिकाचरितवर्णनम् मूलम्-तएणं से चिलाए दासचेडे विजयस्स चोरसेणा- वइस्स अग्गे असिलदग्गाहे जाए यावि होत्था, जाहे वियणं से विजए चोरसेणावई गामघायं वा जाव पंथकोहि वा काउं वञ्चइ ताहे वि य ण से चिलाए दासचेडे सुवहुपि हु कुवियवल हयविमहिय जाव पडिसेहेइ । पुणरवि लढे कयकज्जे अणह समग्गे सहिगुह चौरपल्लि हव्वमागच्छइ । तएण से विजए चोरसेणावई चिलायं तकर वहुईओ चोरविजाओ य चोरमते य चोरमायाओ चोरनिगडीओ य सिक्खावेइ । तएणं से विजए चोरसेणावई अन्नया कयाइ कालधम्मुणा सजुत्ते यावि होत्था । तएणं ताई पंचचोरसयाइ विजयस्स चोरसेणावइस्स महया२ इड्डीसक्कारसमुदएणं णीहरणं क्रेंति, करित्ता बहुइ लोइयाइं मयकिच्चाइ करेति, करित्ता जाव विगयसोया जाया यावि होत्था । तएण ताइ पच चोरसयाई अन्नमन्नं सदावेति, सदावित्ता एव वयासी-एव खल्लु अम्ह देवाणुप्पिया। विजए चोरसेणावई कालधम्मुणा संजुत्ते, अय च ण चिलाए तकरे विजएण चोरसेणावइणावहुईओ चोरविजाओ य जाव सिक्खा विए, त सेय खल्लु अम्ह देवाणुप्पिया | चिलाय तकर सीह- गुहाए चौरपल्लीए चोरसेणावइत्ताए अभिसिचित्तए तिकडु अन्नमन्नस्स एयम पडिसुणेति, पडिसुणित्ता चिलाय तीए सोहगुहाए चोरसेणावइत्ताए अभिसिचति । तएणं से चिलाए और निकल कर जहा वह सिंहगुहा नाम की चोरपरली थी वहां आया घहा आकर वह चार सेनपति के याद रहने लगा। सूत्र-३॥ રાજગૃહ નગરથી બહાર નીકળે અને નીકળીને જ્યાં તે સિહગુહા નામે ચેરપરલી હતી ત્યાં આવ્યું, ત્યાં આવીને ચાર સેનાપતિની સાથે રહેવા લાગે સૂ૦૩ - - -- - - - - - , ६० पाताल पवटणेडिय' पान्यटनः पथिकजनमाग्गेच 'उवीलेमाणे २ ' उत्पीडयन २-सन्ततमुत्पीडन कुन , 'पिसेमाणे २१ भ्यिमयन् २-सर्वदा विध्वस कुर्वन् , 'णिस्थाणं 'निः स्थान=गृहरहित, 'गिधणं निर्धनम् धनरहित कर्मन् विहरति । ततः खलु स चिलातो दासचेटः राजगृहे पाभिः अन्याभिम कीडिय' अभिशङ्किमि-अप पिलातो मदीयमधं गृहीतवान् । ग्रहीपति वा त्यभिशङ्कन शीले 'चोज्जामिस कोहिय' चौर्याभिशद्धिमिः अप मम गृह चौयं कृतवान करिष्यति वेत्यभिशङ्कन शीलेश ' दारामिग कोहि दारामिलिमिा अप मम दारान् पितवान् दूपयिष्यति चेत्यभिशहनशीले तथा धनिश्च द्यूतक्रैश्व परा भूयमाणः २= पुनः पुन पराभव माध्यमाणो राजगृहात् नगराद् वहि निर्गन्छति, निर्गस्य, या सिंहगुहा चोरपल्ली तगा पागछति, आगत्य विजय चौरसेना पतिम् उपस पद्य-माप्य विहरति ।। सू०३ ।। से, एव पथिकजनों के मारने से, निरन्तर पीडित करता विध्वस करता करता और गृह विरिन करता रहता था। इस के पश्चात् वह दासचेटक चिलात राजगृह नगर में अनेक अर्थाभिशफ-इस चिलात ने हमलोगों के द्रव्य को हरण किया है तथा इसी तरह से यह आगे भी करेगा- प्रकार की शका करने वाले, चौर्याभिशकी इसने हमलोगों के घर में घुसकर पहिले चोरी की है-तया इसी तरह यह आगे भी करेगा-इस प्रकार की आशका करने वाले, दाराभिशकी-इसने पहिले हमारी स्त्रियों के साथ बलात्कार किया है-इसी तरह से यह आगे भी करेगा इस तरह की अपनी स्त्रियों के साथ बलात्कार करने की आशकावाले पुरुषों के द्वारा तथा धनिक व्यक्तियों के द्वारा, जुआ खेलने वाले ज्वारियो के द्वारा पुनः पुनः पराभूत होता हुआ राजगृह नगर से बाहर निकला પીડિત કરને, વિશ્વ સ કર અને ગુડવિહીન બનાવી મુક્ત હતો ત્યારપછી તે દાસચેટક ચિયાતે રાજગૃહ નગરમાં ઘણા અભિશક-આ ચિલોતે અમારા દ્રષ્યનું હરણ કર્યું છે તેમજ આ પ્રમાણે ભવિષ્યમાં પણ હરણ કરશે, આ જાતની શકા કરનારાઓ વડે, ચૌર્યાભિશકી-એણે અમારા ઘરમાં પેસીને પહેલા ચોરી કરી હતી તેમજ ભવિષ્યમાં પણ તે ચોરી કરશે જ- આ જાતની ચેરીની આશકા કરનારાઓ વડે, દારાભિશક-એણે પહેલા અમારી સ્ત્રીઓ ઉપર બલાત્કાર કર્યો છે, આ પ્રમાણે ભવિષ્યમાં પણ તે ચોક્કસ આવુ કરે શે જ, આ રીતે પિતાની સ્ત્રીઓ ઉપર બળાત્કારની આશકાવાળા પુરૂ વડે તેમજ ધનવાન વડે, જુગાર રમનારા જુગારીઓ વડે, વાર વાર मनगारधामृतषिणो टी० अ० १८ सुसमादारिकाचरितवर्णनम् मूलम्-तएणं से चिलाए दासचेडे विजयस्स चोरसेणा- वइस्स अग्गे असिलटुग्गाहे जाए यावि होत्था, जाहे वियणं से विजए चोरसेणावई गामघायं वा जाव पथकोटि वा काउं वच्चइ ताहे वि य ण से चिलाए दासचेडे सुवहुपि हु कुवियवल हयविमहिय जाव पडिसेहेइ । पुणरवि लट्टे कयकज्जे अणह समग्गे सहिगुह चोरपल्लि हव्वमागच्छइ । तएण से विजए चोरसेणावई चिलायं तक्कर वहुईओ चोरविजाओ य चोरमते य चोरमायाओ चोरनिगडीओ य सिक्खावेइ । तएणं से विजए चोरसेणावई अन्नया कयाइ कालधम्मुणा संजुत्ते यावि होत्या । तएण ताई पंचचोरसयाइ विजयस्स चोरसेणावइस्स महया२ इड्डीसक्कारसमुदएणं णीहरणं करेंति, करित्ता बहुइ लोइयाइ मयकिच्चाइ करेति, करित्ता जाव विगयसोया जाया यावि होत्था । तएण ताइ पंच चोरसयाई अन्नमन्नं सदावेंति, सदावित्ता एव क्यासी-एव खल्लु अम्हं देवाणुप्पिया। विजए चोरसेणावई कालधम्मुणा संजुत्ते, अयं च णं चिलाए तकरे विजएणं चोरसेणावइणावहूईओ चोरविजाओ य जाव सिक्खा विए, त सेयं खलु अम्ह देवाणुप्पिया | चिलाय तकरं सीह- गुहाए चोरपल्लीए चोरसेणावइत्ताए अभिसिचित्तए तिकट्टु अन्नमन्नस्स एयम पडिसुणेति, पडिसुणित्ता चिलाय तीए सोहगुहाए चोरसेणावइत्ताए अभिसिचति । तएण से चिलाए और निकल कर जहा वह सिंहगुहा नाम की चोरपल्ली थी वहां आया पहा आकर वह चार सेनपति के बाद रहने लगा ।। सूत्र-३ ॥ રાજગૃહ નગરથી બહાર નીકળે અને નીકળીને જ્યા તે સિંહગુહા નામે ચેરપરલી હતી ત્યાં આવ્યું, ત્યાં આવીને ચેર સેનાપતિની સાથે રહેવા લાગ્યું સૂ૩u - -- - ६९० साधण्यास पथदणेहिय। पान्यटनपथिकानमाग्यो सीमाणे २ ' उत्पीडयन २सन्ततमुत्पीडन कुर्वन् , 'द्धिसेमाणे २. विध्यमयन् २-सर्वहा विषम कुर्वन् , ' णित्याण 'निः स्थान-गृहरहित, गिधणं निर्धनम् धनरहित कुर्वन विहरति । ततः खलु स चिलातो दासचेट. राजगृहे यहुभिः अयाभिम कीरिप' अर्धाभिशविभि-अप रिलातो मदीयमधं गृहीतवान् , ग्रहीत्यति वा इत्यभिशङ्कन शीले 'चौज्जाभिस कोहिय गोर्याभिशद्विमि-अप मम गृहे चौयं कृतवान् फरिष्यति वेश्यभिगवन शीलेश्च दारामिम कोहि ' दारामिलिमिा अय मम दारान पितवान् पयिष्यति येत्यभिशनशीले तथा धनिश्च पृतरेव परा भूयमाणः २- पुनः पुन पराभव प्राप्यमाणो रामगृहाव नगरादु बहि निर्गन्छति, निर्गत्य, यत्रैव सिंहगुहा चोरपल्ली तर उपागछति आगत्य निजय चोरसेना पतिम् उपस पद्य-पाप्य विहरति ॥ ०३ ।। से, एव पधिरुजनो के मारने से, निरन्तर पीडित करता विध्वस करता करता और गृह विहिन करता रहता था। इस के पश्चात् वह दासचेटक चिलात राजगृह नगर में अनेक अर्थाभिशक-इस चिलात ने हमलोगों के द्रव्य को हरण किया है तथा इसी तरह से यह आगे भी करेगा- प्रकार की शमा करने वाले, चौर्याभिशकी इसने हमलोगों के घर में घुसकर पहिले चोरी की है तथा उसी तरह यह आगे भी करेगा-इस प्रकार की आशका करने वाले, दाराभिशकी-इसने पहिले हमारी स्त्रियों के साथ बलात्कार किया है-इसी तरह से यइ आगे भी करेगा इस तरह की अपनी स्त्रियों के साथ बलात्कार करने की आशकावाले पुरुषों के द्वारा तथा धनिक व्यक्तियों के द्वारा, जुआ खेलने वाले ज्वारियो के द्वारा पुनः पुनः पराभूत होता हुआ राजगृह नगर से बाहर निकला પીડિત કરતા, વિશ્વ સ કરતા અને ગૃહવિહીન બનાવી મૂકો અને ત્યારપછી તે દાસટક ચિલાતે રાજગૃહ નગરમાં ઘણા અભિશ ક-આ ચિલતે અમારા દ્રવ્યનું હરણ કર્યું છે તેમજ આ પ્રમાણે ભવિષ્યમાં પણ હરણ કરશે, જાતની શા કરનારાઓ વડે, ચૌર્યાભિશ ક–એણે અમારા ઘરમાં પિસીને પહેલા શારી કરી હતી તેમજ ભવિષ્યમાં પણ તે ચેરી કરશે જ-આ જાતની ચોરીની આશકા કરનારાઓ વડે, દારાભિશક-એણે પહેલા અમારી સ્ત્રીઓ ઉપર બળાત્કાર કર્યો છે, આ પ્રમાણે ભવિષ્યમાં પણ તે ચોક્કસ આવુ કર શે જ, આ રીતે પિતાની સ્ત્રીઓ ઉપર બલાત્કારની આશકાવાળા પુરૂષે વડે તેમજ ધનવાને વછે, જુગાર રમનારા જુગારીઓ વડે, વારવાર I , *Pamme ६६१ अनेगारधर्मामृतषिणो टी० अ० १८ सुसमादारिकाचरितवर्णनम् मूलम्-तएणं से चिलाए दासचेडे विजयस्स चोरसेणा- वइस्स अग्गे असिलटुग्गाहे जाए यावि होत्था, जाहे वियण से विजए चोरसेणावई गामघायं वा जाव पंथकोटि वा काउं बच्चइ ताहे वि य ण से चिलाए दासचेडे सुबहुपि हु कुवियवल हयविमहिय जाव पडिसेहेइ । पुणरवि लढे कयकज्जे अणह समग्गे सहिगुह चोरपल्लि हव्वमागच्छइ । तएण से विजए चोरसेणावई चिलायं तकर वहुईओ चोरविजाओ य चोरमते य चोरमायाओ चोरनिगडीओ य सिक्खावेइ । तएणं से विजए चोरसेणावई अन्नया कयाइ कालधम्मुणा सजुत्ते यावि होत्था । तएण ताई पचचोरसयाई विजयस्स चोरसेणावइस्स महया२ इड्डीसक्कारसमुदएणं णीहरणं करेंति, करित्ता वहुई लोइयाइं मयकिच्चाई करेति, करित्ता जाव विगयसोया जाया यावि होत्था । तएणं ताइ पंच चोरसयाइ अन्नमन्न सहाति, सदावित्ता एव वयासी-एव खल्लु अम्हं देवाणुप्पिया। विजए चोरसेणावई कालधम्मुणा संजुत्ते, अयं च णं चिलाए तकरे विजएणं चोरसेणावइणा वहुईओ चोरविज्जाओ य जाव सिक्खा विए, तं सेयं खलु अम्ह देवाणुपिया | चिलायं तकर सीह- गुहाए चौरपल्लीए चोरसेणावइत्ताए अभिसिचित्तए तिकट्टु अन्नमन्नस्स एयमह पडिसुणेति, पडिसुणित्ता चिलाय तीए सोहगुहाए चोरसेणावइत्ताए अभिसिचति । तएण से चिलाए और निकल कर जहा वह सिंहगुहा नाम की चोरपल्ली थी चर्चा आया वहां आकर वह चार सेनपति के याद रहने लगी। सूत्र-३॥ રાજગૃહ નગરથી બહાર નીકળે અને નીકળીને જ્યા તે સિંહગુહા નામે ચેરપરલી હતી ત્યાં આવ્યું, ત્યાં આવીને ચોર સેનાપતિની સાથે રહેવા લાગે સૂઇ . सामेशचार चोरसेणावई जाए अहम्मिए जाब विहरइ । तएणं से चिलाए चोरसेणावई चोराणय जाव कुठंगे यावि होत्या । से ण तस्य सोहगुहाए चोरपल्लीए पचण्हं चोरसयाण य एवं जहा जिओ तहेव सव्वं जाव रायगिहस्स दाहिणपुरथिमिल्ल जणवयं जाव नित्थाणं निद्रण करमाणे विहरड़ ।। सू०४॥ टीका-'त' इत्यादि । ततः खलु स पिलातो दासवेटो विजयस्य चोरसेनापतेरम्यापमान । असिन्टग्गा अभियष्टिया असि' करवाल, यष्टि अशदण्डः, तो गृहातीति, असियटिग्राह. असियवादिप्रचालनचतुरो जातथापि अभून् । 'नाहे पि यण' यदाऽपि च खलु स विजयीर सेनापतिः ताण से चिलाप दासचेडे इत्यादि। टीकार्थ-(तएण) इसके बाद से चिलाप दासचेडे) वह दासचेटक चिलात (विजयस्स चोरसेणाइरस) चोर सेनापति उस विजय तस्कर यावि हो०) सय से प्रधान असि, यष्टि, ग्रह-तलवार और लाठी के चलाने मे चतुर-यन गया। (जाहे वि यण से विजए चोरसेणावईगामघाय वा जाव पथकोहि वो काउ बच्चइ, ताहे वि यणं से चिलाप दासचेडे सुटु पि कृविययल हयविमहिय जाव पडिसेहेह, पुणरवि लद्धढे कयकज्जे अणहसमग्गे सीगुह चोरपल्लि हब्वमाग छह ) जय वर चोर सेनापति विजय, ग्रामो का घात करने के लिये, (तएण स चिलाए दासचेडे इत्यादि- साथ-(तएण ) त्या२५छी (से चिलाए दासचेडे) तास २८४ aिrd (विजयस्स चोरसेणावइस्स) यार सेनापति Arudev (अगो यावि हो०) सौथी प्रधान भासि, (AIA) प्रार्ड, तरपार भने साही ચલાવવામા ચતુર બની ગયે ( जाहे वि य ण से यिजए चोरसेणावई गामधाय वा जाव पथकोटि का काउ बच्चइ, ताहे वि यण से चिलाए दासचेडे सुबहु पि हू कूवियबल हयविम हिय जाब पडिसेहेइ, पुणरवि ल? कथाजे अणहसमगे सीहगृह चोरपति हवमागच्छद) જ્યારે તે થોર સેનાપતિ વિજય મામાના ઘાત માટે વાવત્ ધિકને લુટવા માટે નીકળો હતો ત્યારે તે દાસ ચેટક ચિલાત ચાર” का (अग्गे - - .. मनगारधर्मामृतवपिणी टोका अ०१८ सुसमादारिकाचरितवर्णनम् ६६३ ग्रामपात वा यावत् 'पयकोट्टि' पान्यकुटिम् पथिकननलुण्टन पा'काउ' कर्तुं बच्चइ जति गति 'ताहेवि य तदाऽपि च खलु स चिठातो दासचेटः मुबहु अपि 'हु' इति वाक्यालङ्कारे वियरल' कूपिकाल-चोरगवेपकमैन्य 'हयविमहिय जाव' हतपिमथित यावत्-सर्वथा विध्वस्त कृत्वा 'पडिसे हेइ' मतिपेधयति=निवारयति । पुनरपि ' लबट्टे' लब्धार्थ ल्यः प्राप्तः, अर्थ = सामिलपित येन समाप्तस्वाभिलपितः, अत एव 'कयकज्जे ' कृतकार्यः कृत कार्य येन स , कृतनिजकृत्यः 'अणहममग्गे' जनसमग्रः अनवम् अक्षतम्- अन्तराले केनाप्यनपढ्त समग्र-समस्त चौर्याद्यपहृतवस्तुजात यस्य सः अलुटित सर्वतः सिंहगुहा चोरपल्लि ' हव्य' शीघ्रमाग उठि । ततः खलु स विजयश्चोर- सेनापति. चिलात तस्कर वहीः चोरविद्याश्च चोरमन्त्राश्च चोरमायाश्चोरनिकृतीश्व मायायाः प्रच्छादनाय या माया सा 'निकृतिः' उच्यते ता. 'सिक्खाह' यावत् पथिक जनो को लूटने के लिये चलता या-तर वह दास चेटक चिलात भी चोर गवेयक सैन्य को हत, विमथिन यावत सर्वथा वि-वस्त करके पीछे भगा देता था और स्वाभिलपित अर्थ को प्रोतकर अपने कार्य में सफलता प्राप्त कर लिया करता था। इस तरह वह चोरी में मिले हुए द्रव्य को सुरक्षित रखता हुआ-बीच में किसी के भी द्वारा द्रव्य की छीना अपटी से रहित होता हुआ उम सिंहगुहा नाम के चोरपल्ली में पहुत जल्दी लौट आता या' (तएण से विजा चोर सेनावई चिलरोय तक्कर घट्टईओ चोरविजाओ चोरमते य चोर मायाओ चोर निगडीओ य सिस्वावेड) उस चोर सेनापति विजय तस्कर ने चिलात चोर के अनेक चोर विद्याओ को, अनेक चोरमत्रो को अनेक विध चोर सम्बन्धी मायाचारी को और मायो को छिपाने के આવેલા સિન્યને હત, વિમવિત યાવત્ સ પૂર્ણ રીતે વિવસ્ત કરીને ભગાડી મુકત હતા અને પિતાના ઈચ્છિત અર્થને પ્રાપ્ત કરીને પોતાના કાર્યમાં સફ ળતા મેળવતે હતો આ પ્રમાણે તે ચોરીમાં મેળવેલા દ્રવ્યને સુરક્ષિત રાખ વચ્ચે કોઈ પણ બીજા વડે દ્રવ્યની લટ-પાટ ન થાય-તેમ પોતાની જાતને સુરક્ષિત રાખત તે શીધ્ર સિંહગુહા નામે ચેરપલીમાં પાછો આવતે રહેતે હવે (तपण से विजए चारसेनावई चिलाय तकर पहूईओ चोरविजाय चोरमते य चोग्मायाओ चोरनिगडीओ य सिक्सावे) તે ચોર સેનાપતિ વિજય તસ્કરે ચિલાત ચારને ઘણી ચાર વિદ્યાઓને, ઘણું રમત્રોને, ઘણી ચેર સ બ ધી માયાચારીઓને અને માયાને છુપાવવા માટે બીજી માયાચારીઓ શીખવાડી बाताधर्मकथा चौरसेणावई जाए अहम्मिए जार विहरइ । तएणं से चिलाए चौरसेणावई चौराणय जाव कुलंगे यावि होत्या । से गं तस्य सोहगुहाए चोरपल्टीए पचण्ह चोरसयाण य एवं जहा विजओ तहेव सव्वं जाव रायगिहस्स दाहिणपुरस्थिमिल्ल जणवयं जाव नित्थाणं निद्धणं करेमाणे विहरइ ।। सू०४॥ टीम-तण' इत्यादि । ततः खलु स पिलातो दामचेटो विजयस्य चोरसेनापतेरम्याप्रधान असिलम्गाई । अगियाष्टिनार =असिकरवाला, यष्टि यशदण्डः, तो गृहातीति, अमिष्टिग्राह: असियष्यादिमचालनचतुरो जातश्रापि अभूत् । 'नाई दियण' यदाऽपि च खलु स विजयश्रोर सेनापतिः ताण से चिलाए दामचेढे इत्यादि। टीकार्थ-(तएण) इसके पाद (से चिलाप दासचेडे) वर दासचेटक चिलात (विजयस्स चोरसेणाइरस) चोर सेनापति उस विजय तस्कर यावि हो०) सप से प्रधान असि, यष्टि, ग्रह-तलवार और लाठी के चलाने मे चतुर-यन गया। (जाहे वि य णं से विजए चोरसेणावईगामघाय वा जाव पयकोहि वो काउ वच्चद, ताहे वि यण से चिलाए दासचेडे सुबहु पिटु कृवियपल हयविमहिय जाव पडिसेहेइ, पुणरवि लढे कयकज्जे अणसमग्गे सीगुह चोरपल्लि हव्वमाग छह ) जय वह चोर सेनापति विजय, ग्रामो का घात करने के लिये, (तरण से चिलाए दासचेडे इत्यादि- 12-( तएण ) त्या२पछी (से चिलाए दाघचेडे ) हास 223 शिand (विजयस्स चोरसेणावइस्स ) यार सेनापति Arय २४२।। ( अग्गे यावि हो०) सौयी प्रधान मासि, यEि (ara) आहे, त२वार भने दाही ચલાવવામા ચતુર બની ગયે (जाहे वि य ण से यिजए चोरसेणावई गामधाय वा जाव पथकोटि वा काउ वयइ, ताहे वि यण से चिलाए दासचेडे सुबहु पि हू कूवियबल हयविम हिय जात्र पडिसेदेइ, पुणरवि लद्धटे कयाजे अणहसमगे सीहगुह चौरपछि हव्यमागच्छद) જ્યારે તે ચેર સેનાપતિ વિજય ગ્રામના ઘાત માટે વાવત્ પથિકને લુટવા માટે નીકળતું હતું ત્યારે તે દાસ ચટક ચિલાત ચાર- का (अग्गे . - अनगारधामृतपिणी टी० १० १८ सुसुमादारिकाचरितवर्णनम् खलु अस्माक हे देशानुमिपाः ! विजयश्नोर सेनापति कालपर्मेण संयुक्ता मृत इत्यर्थः । अय च खल विलातः तस्करो विजयेन चोरसेनापतिना 'बहईभी चोर- विज्जाओ जाव बहन्यः चोरविद्या भारत-चोरविद्यादि चोरनिकृतिपर्यन्तासु सकळचोरशिक्षासु 'मिरिग्वए ' शिक्षितः पारङ्गमितः, ' त' तरमात् कारणात् 'सेय' श्रेयः खलु जस्माक हे देनानुप्रियाः ! चित्रात तस्कर मिहगुहायाश्चीर- पल्ल्याचौरसेनापतितयाऽभिपिश्चितम् , अर्थात् अय चिलोत तस्करोऽम्माभिः चोर सेनापतिपदे नियोज्य , ' तिकडु इति कृत्या=इति मनसि विधाय ' अन्नमन्नस्स' अन्योऽन्यस्य ' एपमट्ठ ' एतमर्थम्-चिलातस्य चोरसेनापतिपदे नियोजनरूपमर्थम् किया-(एव खलु अम्ह देवाणुप्पिया! विजा चोरसेणावई कालधम्मु णा सजुत्ते, अय च ण चिलाप तक्करे विजण्ण चोरसेणावइणा बहाई- ओ चोरचिजाओ य जाव सिक्खाविण, त सेय विलु अम्र देवाणुप्पिया! चिलाय तस्कर सीरगुहाए चोरपडीए चोरसेणावहत्साए अभिमिचित्तए त्ति करटु अन्नमन्नस्स एयमट्ट पढिसुणेति, पडिसुणित्ता चिलाय तीसे सीहगुहाए चोरसेणावइत्साए अभिसिंचति ) देवानुप्रियो । देखो-हमारे नायक चोर सेनापति विजय तो अब मर चुके हैं। उन्होंने इस चिलात चोर को अनेक चोर विद्या आदि सब कुछ सिखलारी दिया है। अत हमलोगों को अब ग्रही उचित है कि हमलोग चिलात चोर को सिंह गुहा नामकी इस चोर पल्ली का चोर सेनापति के रूप में नियुक्त करले अर्थात् चोरलेनापति के पद पर इस चिलात चोर को नियुक्त करलें इस प्रकार विचार करके उन्होंने एक दूसरे के विचार रूप अर्थ को ( एव सलु अम्ह देवाणुपिगा ! विजए चोरसेणावई कालवम्मुणा सजुत्ते, अय च पिलाए तकरे विजएण चोरसेणायइणा बहूईओ चोविजाओ य जाय सिक्साविए, त सेय सलु अम्ह देवाणुप्पिया! चिलाय तफा सीह गुहार चोरपल्ली। चोरसेणावइत्ताए अभिसिंचित्तए तिकटु अन्नमन्नस्स ण्यम? पहिसुणे नि, पडिसुणित्ता, चिलाय तीसे मीहगुहाए चोरसेणाबदत्ताए अभिसि च ति) હે દેવાનુપ્રિયે ! જુઓ, અમારા નાયક ચોર સેનાપતિ વિજય તે હવે મરણ પામ્યા છે તેમણે આ ચિલા ચોરને ઘણી ચોર વિદ્યાઓ વગેરે બધું શીખવ્યુ જ છે એટવા માટે હવે અમને એ જ એગ્ય લાગે છે અમે લેકે ચિલાત ચોરને આ સિંહગુહા નામની ચોપલીને ચોર સેનાપતિ બનાવી લઈએ કેટલે કે ચોર સેનાપતિના સ્થાને આ ચિવાત ચોરની નીમ કરી લઈએ આ પ્રમાણે વિચાર કરીને તેમણે એક બીજાના વિચાર .
. हाताचणार शिक्षयति । तनः पातु म विनयो गोरमेनापतिः अन्यदा कदागिन् 'कालधम्मणा' फालधर्मेग-म.युना रायुक्तमापि अभान मृतात्यर्थः । ततः स तानि पाचोर उतानि-नाश्तपर यकायौरा , विजयस्य चौरसेनापतेः माता । इडिसकार समुदएण' ऋद्धिमत्तारसमुदयेन 'णीहरण' निर्हग्ण-मशान भूमिनयन 'कति' कुति, कुन्या पनि लौकियानि मृतात्यानिति, रुपा यारत् विगत शोका जानाथापि अमरन् । ततः खलु तानि पश्चगोरगतानि अन्योऽन्य शब्द यति शब्दयित्या एमयादिपु:-स मिनिसा परस्परमेव विचारितान्तइत्यर्थ एव लिये दूसरी और माया चारी को मिला दिया। (तण्ण से विजए चोरसेणाचई अनया फयाड फारधम्मुणा सजुत्ते यायि होत्या, तएण ताइ पचचोरसयाइ विजयस्स चोरसेणारहस्स मरया २ हट्टी सक्कार समुदण्ण णीहरण रेंति फरित्ता यदृढ लोहयाइ मयकिच्चाइ करेंति, फरित्ता जार विगयसोया जाया यावि शेत्या। तण्ण ताइ पच चोर सयाइ अन्नमन सदाति, सदायित्ता एव वयासी) इस से पाद वह चोर सेनापति रिजय किसी एक दिन कालधर्मगत ो गया। तब उन पांच सौ चोरो ने चोर सेनापति विजय तस्कर को बड़े ठाट बाट के साय अर्थी-श्मशान यात्रा निकाली बादमें उन्हों ने भृत्यसयन्धी जितने भी लौकिक कृत्व होते है वे सब किये। लौकिक कृत्य करके सबके सब धीरे २ शोक रहित जर बन चुके-तप उन पांच सौ चोरो ने परस्पर में एक दूसरे को बुलाया और बुलाकर उन से इस प्रकार कहा-विचार कारधम्मुणा सजुत्ते (तरण से विजए चोरसेणाई अनया कयाइ यापि होत्या, तएण ताइ पच धोरसयाई विजयस्स चोरसेणावइरस महया २ इइढी सक्कारसमुदएण जोहरण करे ति करिना यहइ लोइयाइ मकिंचाइ करे ति, फरित्ता जाब विगयसोया जाया यानि होत्था । ताण ताइ पच चोर सयाइ अन्नमन्न सदावे ति, सहावित्ता एव धयासी) ત્યારપછી તે ચેર સેનાપતિ વિજ કોઈ એક દિવસે મૃત્યુ પામે ત્યારે તે પાચસે ચેરીએ શેર સેનાપતિ વિજય તસ્કરની ભારે ઠાઠથી સમશાનયાત્રા કાઢી ત્યારપછી તેમણે તેના મૃત્યુ સાધી લૌકિક કૃત્ય કર્યો લૌકિક કૃત્ય પૂરા કર્યા બાદ ધીમે ધીમે જયારે બધા શાક રહિત થયા ત્યારે તે પાચસો ચોરોએ પરસ્પર એકબીજાને બોલાવ્યા અને એક સ્થાને એકત્ર થઈને તેમણે આ પ્રમાણે વિચાર કર્યો કે - - अनगारघमामृतषिणी टी० अ० १८ सुसुमादारिकाचरितवर्णनम् खलु अस्माक हे देशानुपियाः ! विजयभोरसेनापसि काल्पर्मेण संयुक्त मृत इत्यर्थः । अय च खल विठातः तस्करो विजयेन चोरसेनापतिना' पहईओ चोर- विज्जाओ जाव ' यहव्यः चोरविद्या या रत्-चोरविद्यादि चोरनिकृतिपर्यन्तासु सकळचोरशिक्षामु 'मिश्विए ' गिक्षित:-पारगामितः, 'त' तरमात् कारणात् सेय' श्रेय' खलु जस्माक हे देनानुप्रिया ! चिठात तस्कर मिहगुदायाचीर- पल्ल्याचोरसेनापतितयाऽभिपिश्चितम् , अर्थात् अय चिलोत तस्करोऽम्माभिः चोर सेनापतिपदे नियोज्य , ' तिकडु' इति कृत्वा इति मनसि विधाय ' अन्नमन्नस्स' अन्योऽन्यस्य 'एयमह ' एतमर्थम्-चिलातस्य चोरसेनापतिपदे नियोजनरूपमर्थम् किया-(एच खलु अम्ह देवाणुप्पिया' विजए चोरसेणाचई काल यम्मु णा सजुत्ते, अय च ण चिलाए तक्करे विजण चोरसेणावइणा बन्नई ओ चोरविनाओ य जाव सिक्खाविए, त सेय खलु अम्ह देवाणुप्पिया! चिलाय तस्कर सीरगुहाए चोरपडीए चोरसेणायहसाए अभिमिचित्तए त्ति कट्टु अन्नमन्नस्स एयमह पडिसुणेति, पडिसुणित्ता चिलाय तीसे सीहगुए चोरसेणावइताए अभिसिंचंति) देवानुप्रियो ! देखो-हमारे नायक चोर सेनापति विजय तो अब मर चुके हैं। उन्होंने इस चिलात चोर को अनेक चोर चिन्याए आदि सब कुछ सिखलाही दिण है। अत हमलोगों को अब यही उचित है कि हमलोग चिलात चोर को सिंह गुहा नामकी इस चोर पल्ली का चोर सेनापति के रूप में नियुक्त करले अर्थात् चोरसेनापति के पद पर इस चिलात चोर को नियुक्त करलें इस प्रकार विचार करके उन्होने एक दूसरे के विचार रूप अर्थ को (एन सलु अम्ह देवाणुप्पिगा ! विजए चोरसेणावई काल्वम्मुणा सजुत्ते, अय च ण चिलाए तफरे विजएण चोरसेणावइणा वहूईओ चोरविजाओ य जाव सिक्साविए, त सेय सलु अम्ह देवाणुप्पिया ! चिलाय तका सीह गुहाए चोरपल्ली चोरसेणारइत्ताए अभिसिंचित्तए तिकटु अन्नमन्नस्स ज्यमट्ट पहिसुणे ति, पटिसुणित्ता, चिलाय तीसे सीहगुहाग चोरसेणावइत्ताए अभिसि च ति) હે દેવાનુપ્રિયે ! જુઓ, અમારા નાયક ચોર સેનાપતિ વિજય તે હવે મરણ પામ્યા છે તેમણે આ ચિલાત ચોરને ઘણી ચોર વિદ્યાઓ વગેરે બધું શીખવ્યુ જ છે એટલા માટે હવે અમને એ જ એગ્ય લાગે છે કે અમે લેકે ચિલાત ચોરને આ સિંહગુડે નામની ચોરપલ્લીને ચોર સેનાપતિ બનાવી લઈએ એટલે કે ચોર સેનાપતિના સ્થાને આ ચિલાત ચોરની નીમ શુક કરી લઈએ આ પ્રમાણે વિચાર કરીને તેમણે એક બીજાના વિચાર રૂપ ET४ - जातामर्मचारी पदिसुगति' पतियन्ति-सीर्यन्ति, पतिथुय, चिलात तस्कर बोरसेना पतितया अर्थात् चोरसेनापतिपदे भगिरिशानि । तत' पर म चिलातः चोरसेना पतिर्जातः, फीदृशः ? इत्याह-'अदम्मिए गार' अधार्मिको यात्-विजयचोर सेनापतिवदधार्मिको यापदधर्म के सर्भया सिरगि । AT: ग्वलु स चिलाता चोर सेनापति 'चोराण य जार' चोराणा न या धोरपारदारिकादीनां च 'कुडगे' फुडगः आत्रयस्थान चाऽपि आसीत । स खलु तर सिंहगुहायौ चोर पल्ल्या पञ्चाना चोरशताना च पर यथा विजयस्तयर सा यार-विजयवत् पश्च- शनाना चोराणामुपरि आधिपत्य कर , राजगृहस्य दक्षिणपौरम्त्यम् अग्निकोणस्थ स्वीकार कर लिया। और स्वीकार करके उस चिलात चोर को अन्त में उस सिंहगुहा नामकी चोर पल्ली का उन्हों ने चोर सेनापति के रूप में अभिषेक कर दिया। (तएण से चिलात चोरसेणाचई जाए अहम्मिण जाव विएर ताण से चोर से० घोराण य जाव कुटगे यावि होस्था, से ण तत्थ सीरगुहाए चोरपल्लीए पचण्ट चोरसयाण य एवं जरा विजओ तद्देव सव्व जाव रायगिएस्स दाहिणपुरथिमिरल जणवय जाव जित्थाण निद्धण फरेमाणे विहरह) इस तरह यह चिलात चोर सेनापति यन गया। चोरसेनापति बनकर वह विजय चोर सेनापति की तरह अधार्मिक यायत् अधर्मकेतु जैसा हो गया यावत् अधर्मकेतु जैसा हो गया। अतः वह चिलात चोर सेनापति चोरों का यावत् पारदारिक आदिकों का कुडग की तरह वासों के वन के समान-आश्रयस्थान यन गया और उस सिंहगुहा नामकी पल्ली में पाचसौ चोरों का आधिपत्य करता हुआ विजय तस्कर અર્થને સ્વીકારી લીધું અને સ્વીકારીને છેવટે તે ચિલાત ચોરને તે સિંહગુહા નામની ચોર૫લીને તેમણે ચોર સેનાપતિના રૂપમા અભિષેક કરી દીધે (तएण से चिलाए चोरसेणावई जाए अहम्मिए जीव विहाइ तएण से चोर से० चोराण य जाव कुड गे मावि होत्था, सेण तत्थ सीहगुहाए चोरपल्लीए पचण्ह चोरसयाण य एव जहा विजओ तहेव सव्व जाव रायगिहस्स दाहिण पुरथिमिल्ल जणवय जाव णित्थाण निद्धण करेमाणे विहरह) આ પ્રમાણે તે ચિલાત ચાર ચોર સેનાપતિ થઈ ગયે ચોર સેનાપતિ બનીને તે વિજય ચેર સેનાપતિની જેમ અધાર્મિક યાવત્ અધર્મકેતુ જે થઈ ગયે તેથી તે ચિલાત ચેર સેનાપતિ શેરોને યાવત પારદારિક વગેરેને કુડગની જેમ-વાસના વતની જેમ-આશ્રયસ્થાન બની ગયે .
भेनगारधामृतपदिणी टी० म० १८ सुसुमादारिकाचरितवर्णनम् ६६७
जनपद 'नित्याण निधण' निस्थान निर्धन गृहरहित धनरहित च कुर्वन्
विहरति ।। सू०४ ॥
मूलम्-तएणं से चिलाए चोरसेणावई अन्नया कयाइ विउल
असणपाणखाइमसाइम उवक्खडावेत्ता पचचोरसए आमतेइ।
तओ पच्छा पहाए कयवलिकम्मे भोयणभंडवंसि तेहि पचहि
चोरसएहि सद्धि विउल असणं पाणं खाइमं साइम सुर च
जाव पसण्ण च आताएमाणे४ विहरइ, जिमिय भुत्तुत्तरागए
ते पच चोरसए विउलेण धूवपुप्फगंधमल्लालकारेणं सक्कारेइ,
सम्माणेइ, सकारिता सम्माणित्ता एव वयासी-एवं खलु देवा-
गुप्पिया । रायगिहे णयरे धणे णाम सत्थवाहे अड्डे०, तस्स
णं धूया, भद्दाए अत्तया पचण्ह पुत्ताणंअणुमग्गजाइया सुसुमा
णाम दारिया यावि होत्था, अहीण जाव सुरूवा, त गच्छामो
णं देवाणुप्पिया। धण्णस्स सत्थवाहस्स गिह क्लिंयामो, तुम्भं
विउले धणकणगजाव सिलप्पवाले मम सुसुमा दारिया। तएणं ते
पंच चोरसया चिलायस्स चोरसेणावइस्स एयम पडिसुणेति।
तएणं से चिलाए चोरसेणावई तेहि पचहि चोरसएहि सद्धि
अल्लचम्म दुरूहइ, दुरूहित्ता पुव्वावरण्हकालसमयसि पंचहि
चोरसएहि सद्धि सण्णद्ध जाव गहियाउहपहरणे माइयगोमु-
हिएहि फलएहि णिकट्टाहि असिलठ्ठीहि असगएहि तोणेहि
की तरह राजगृह नगर के बाहिर के अग्निकोणस्थ जनपदो को गृह
रहित और धन रहित करने लग गया। सूत्र ४॥
નામની એરપલીમા પાસે ચોરેને અધિપતિ થઈને વિજય તસ્કરની જેમ
રાજગૃહ નગરની બહારના અગ્નિકેણુ તરફના જનપદોને ગૃહરહિત અને ધન
રહિત એટલે કે બરબાદ કરવા લાગ્યા છે. સૂત્ર ૪
पाताधर्माचार - पटिगेति' प्रतिशृयन्ति-शीर्यन्ति, प्रतिधुन्य, चिलात तार चौरसेना पतितया अर्थात् चोरसेनापतिपदे भगितिशति । ततः गल म निजात चोरसेना पति वः, फीदृशः ? इत्याह- अहम्मिए जाप ' अधार्मिको यान-विजयचोर सेनापतियधार्मिको यायदधर्म केयर्मा पिरनि । ततः ग्वस चित्रातः चोर- सेनापति 'चोराण य जार' चौराणा च या धोरपारदारिकादीनां च 'कुडगे ' कुउद्गः मात्रयस्थान नाऽपि मामीत् । स मलु तर मिहगुहायां चोर पल्ल्या पञ्चाना चोरशताना च पर यथा विजयस्तथा मरे यार-विजयवत् पञ्च शताना चोराणासुरारि आधिपत्य कुर्वन् , राजगृहस्य दक्षिणपोरस्त्वम् अग्निकोणस्य स्वीकार कर लिया। और स्वीकार कर के उस चिलात चोर को अन्त में उस सिंहगुहा नामकी चोर पल्ली का उन्हों ने चोर सेनापति के रूप में अभिषेक कर दिया। (तएण से चिलाए चोरसेणायई जाए अहम्मिए जाव विहर ताण से चोर से० चोराण य जाव कुडगे यावि होत्या, से ण तत्थ सीरगुहाए चोरपही पचर चोरसयाण य एव जरा विजओ तहेव सव्व जाव रायगिहस्स दाहिणपुरथिमिरल जणवय जाव णित्याण निद्वण फरेमाणे विहरइ) इस तरह यह चिलात चोर सेनापति यन गया। चोरसेनापति बनकर वह विजय चोर सेनापति की तरह अधार्मिक यायत् अधर्मकेतु जैसा हो गया । अतः वह चिलात चोर सेनापति बोरों का यावत् पारदारिक आदिकों का कुडग की तरह वासों के वन के समान-आश्रयस्थान यन गया और उस सिंहपुरा नामकी पल्ली में पाचसौ चौरों का आधिपत्य करता हुआ विजय तस्कर અર્થને સ્વીકારી લીધું અને સ્વીકારીને છેવટે તે રિલા ચોરને તે સિંહગુઠ નામની ચોરપીને તેમણે ચોર સેનાપતિના રૂપમા અભિષેક કરી દીધે (तएण से चिलाए चोरसेणावई जाए अहम्मिए जोव विहाइ तएण से घोर से० चोराण य जाव कुड गे यावि होथा, सेण तत्थ सीहगुहाए चोरपल्लीए पचण्ह चोरसयाण य एवं जहा विजओ तहेव सव्व जाव रायगिहस्स दाहिण पुरथिमिल्ल जणवय जाव जित्थाण निण करेमाणे विहरह) આ પ્રમાણે તે ચિલાત ચાર ચોર સેનાપતિ થઈ ગયો ચર સેનાપતિ બનીને તે વિજય ર સેનાપતિની જેમ આધાર્મિક યાવત્ અધમ કેતુ જે થઈ ગયે તેથી તે ચિલાત ચાર સેનાપતિ ચોરોને યાવત પારદારિક વગેરેને કુડગની જેમ-વાસના વનની જેમ-આશ્રયસ્થાન બની ગયે . मनगारधामृतवपिणी टीका अ० १८ सुसुमादारिकाचरितवर्णनम् भुत्तुत्तरागए' जिमितभुक्तोत्तरागत =जिमितः कृतभोजनः भुक्तोत्तरकालमागत यावत् परमशुचिभून. सुम्वासनपरगतः सन् तानि पञ्च चोरशतानि विपुलेन अत्य र्थेन 'धूवपुप्फगधमल्लालकारेण 'धूप पुष्पगन्धमाल्यालकारेणधृपः सुगन्धित द्रव्येण उत्पन्नो धूमः, पुष्प-कुसुमम् , गन्धः चन्दनादि माल्यम्-माला, अलङ्का- राणि भाभरणानि, एतेपा च समाहारद्वन्द्वः, तेन सत्करोति, सम्मानयति, सत्कृत्य सम्मान्य एवम्-अवदत्-एव खलु हे देवानुभिया ! राजगृहे नगरे धन्यो , ल्लालकारेण सरकारेइ, सम्माणेड, सकारिता सम्माणित्ता एव क्यासी) विपुल मात्रो मे, अशन पान, सादिम एव स्यादिमरूप चारो प्रकार का आहार बनवा कर उन पांचसौ चोरो को आमत्रित किया। जब वे सच आचुके-तय उस चिलात चोर ने स्नान से निवट कर और वायसादि को अन्नादिका भाग देनेरूपपलिकर्म आदि कर भोजन मडपमे बैठकर उन पाच सौ चोरी के साथ उस विपुलमात्रा में निष्पन हुए अशन, पान, सादिम, एवं स्वादिमरूप चारो प्रकार के आहार को तथा सुरा, यावत् प्रसन्न मदिरा को खूद मनमाने रूप में पिया खाया जब वे सर के सन अच्छी तरह भोजन कर उत्तर काल में परमशुचिभूत होकर आनद के साथ एक स्थान पर आकर वेठचुके तव उस चिलात चोर सेनापति ने उनका वृप से-सुगधित द्रव्य से निष्पन्न हुए धूप से, पुप्पो से, चंदन आदि से, मालाओ से, और आभरणो से सत्कार किया सन्मान किया। सत्कार सन्मान करके फिर उनसे उसने इस प्रकार પુષ્કળ પ્રમાણમાં અશન, પાન, ખાદિમ અને સ્વાદિમ ચારે જાતને આહાર બનાવડાવીને તે પાચસો ચેરેને આમત્રિત કર્યા જ્યારે તેઓ બધા આવી ગયા ત્યારે તે ચિલાત ચેરે નાન કર્યું અને ત્યાર પછી તેણે કાગડા વગેરે પક્ષીઓને અન્ન વગેરેને ભાગ અપને બલિકર્મ વગેરે કર્યું તેણે ભજન મડપમાં બેસીને તે પાચ એની સાથે તે પુષ્કળ પ્રમાણમાં બનાવડાવેલા, અશન, પાન, ખાદિમ અને સ્વાદિમ રૂપ ચારે પ્રકારના આહા ને તેમજ સુરા યાવત્ પ્રસન્ન મદિરાને ખૂબ ધરાઈ ધરાઈને ખાધા-પીધા જ્યારે તેઓ બધા સારી રીતે જમીને પરમશુચીભૂત થઈને આનંદપૂર્વક એક સ્થાન ઉપર આવીને એકઠા થયા-બેસી ગયા, ત્યારે તે ચિલાત શેર સેના પતિએ તેમને ધૂપથી, પુથી, ચાંદન વગેરેથી, માળાઓથી અને આભર થી સત્કાર કર્યો અને સન્માન કર્યું સત્કાર તેમજ સન્માન કરીને તેણે તેમને આ પ્રમાણે કહ્યું કે ત્યારબાદ Prem 1. . ६५८ माया सजीवेहि धगृहि समुचिरात्तेहि सरेहि समुल्लालियाहि दीहाहि ओसारियाहिं उरुघंटयाहि छिप्पतरहि वजमाणेहि मध्या महया उकिसीहणायचोरकलफलरव समुदरवभूय करेमाणे सीहगु- हाओ चोरपल्लीओ पडिणिसमइ पडिनिक्समित्ता जेणेव राय- गिहे नयरे तेणेव उवागच्छइ, उवागच्छित्ता रायगिहस्स नयरस्स अदूरसामते एग महं गहण अणुपविसइ, अणुपरिसित्ता, दिवस खवेमाणे चिट्टइ ॥ सू० ५॥ टीका-'तएण से ' इत्यादि । ततः सलु म विगतयोरसेनापतिः अन्यदा कदाचित् पिपुलम् अशनपानखादिमम्बादिमम् 'अखत्ता' उपसार्य-निष्पाय पञ्च चोग्शतानि आमन्त्रयति । तत. पश्चात् स्नात 'फयवलि कम्मे ' कृतवलि फर्मा-कृत पलिकर्म येन सः, काकादीना कृतेदत्त भोजनोपहारो मोननमण्डपे तैः पचमि चोरशतैः सार्घ 'विउल ' पिपुलम् अत्यर्थम् , अशन पान खायस्वाच मुर्रा च यावत् प्रसन्ना च 'आसाएमाणे' आस्वादयन् विदरति । पुनश्च 'जिमिय 'तण्ण से चिलाए चोरसेणावई' इत्यादि । टीकार्थ-(तएण) इसके बाद (चोर सेणावई चिलाए) चोर सेना पति चिलात चोर ने (अनया कयाइ) किसी एक समय (विउल असण पाणखाइमसाइम उवक्खडावेत्ता पचचोरसए आमतेइ - तओ पच्छा हाए ग्ययलिकम्मे,भोयणमडवसि तेहिं पचहिं चोरसएहि सद्धिं विउल असण पाण ग्वाइम साइम सुर च जाव पसण्ण च आसाए माणे ४ विहरह, जिमियभुत्तुत्तराग ते पच चोरसए विउलेण दूधपुप्फगधम तपण से चिलाए चोरसेणाबई इत्यादि-- EAu0-(तएण ) त्या२पछी ( चोरसेणावई चिलाए) ये २ सेनापति थिक्षात योरे (अन्नया कयाइ) असे मते (विउल असणपाणसाइमसाइम उपसरावेचा पच चोरसए भामतेइ-तओ पच्चा हाए क्यवलिकम्मे, भोयण मडवसि वेहिं पचहि चोरसहि सति विउल असण पाण खाइम साइम सुर घाव पसण्ण च आसाए माणे४ विहरइ, शिमिय भुनुत्तरागए ते पच चोरसए विठ लेण धूवपुल्फगधमल्लालकारेण सकारेद, सम्माणेइ, सकारिता सम्माणित्ता' वयासी) . T ८ - यसि । . . मनगारधर्मामृतषिणी टी० १० १८ सुसुमादारिकाचरितवर्णनम् ६७१ यावत् शिलप्रवाल., मम सुसुमा दारिका-ण्ठितेपु वस्तुपु मध्ये धनकनकमणि- मौक्तिकशिलापवालादि वस्तु नातानि युष्माक भवन्तु, मम तु एका ससुमा दारिका भविष्यति । तत सलु तानि पञ्च चोरशतानि चिलातस्य चोरसेनापतेः एतमर्थ पतिशृण्वन्ति स्वीपूर्वन्ति । ततः खलु स चिलातश्चोरसेनापतिः तै पञ्चभिः चोरशतैः साई । अल्लचम्म ' आर्द्रचर्म दूरोदति, लुण्ठकाहि लुण्ठनप्रस्थानात् पूर्वं माल्यार्थमाचमण्यारोहन्तीति तेपाप्यवहार , दूरह्य, 'पुन्यावरण्डकालसम पूर्वापराहकालसमये 'दिनस्य चतुर्थप्रहरे पञ्चमिथोरशतैः माई सण्णद्ध जार गहियाउहपहरणे' सन्नद्ध यावत् गृीतायुधप्रहरणा-मनबद्ध चर्मितकवचा सनद्ध' सज्जीकृतः, बद्धः कशाबन्धनेन सपद्धः, वर्मित: बङ्गे परि हितः कवचो येन स तथोक्तः, 'गृहीतायुपमहरण• ' गृहीतानि आयुधमहरणानि लूट-जो वस्तु हम तुम लूटेंगे उनमें से तुम्हारी तो धन, कनक, मणि, मौक्तिक शिलाप्रवाल आदि चीजें होगी और मेरी केवल एच वर सुम मादारिका होगी। इस तरह उन पांचसौ चोरों ने अपने सेनापति चिलात चोर की इस बात को मान लिया। इसके बाद यह चोर सेना- पति चिलात, उन पाचसौ चोरों के साथ गीले चमडे पर बैठ गया। लुटेरे लूटने के लिये जर प्रस्थान करते है तर वे पहिले गीले चमडे पर शुभ शकुन मानने के निमित्त बैठते है ऐसा उनमें व्यवहार है पेठकर फिर वह दिन के चतुर्थप्रहर में पाचसौ चोरों के साथ (सीरगुहाओ चोरपरलीओ पडिनिक्खमइ) उस मिगुहा नाम की चोरपल्ली से निकला । (सण्णद्ध जाच गहियाउहपहरणे माइयगोमुहिएहि फलएहिं એટલા માટે ચાલે તૈયાર થાઓ, હે દેવાનુપ્રિયે! આપણે બધા ત્યા જઈએ અને ધન્ય સાર્થવાહના ઘરને લુટી લઈએ, જે વસ્તુઓ આપણે બધા લુટીશું તેમાથી ધન, કણક, મણિ, મૌક્તિક, શિલાપ્રવાલ વગેરે વસ્તુઓ તમારી થશે અને ફક્ત તે સુસમાં દારિકા મારી થશે આ પ્રમાણે તે પાચસે ચારાએ પિતાના સેનાપતિ ચિલાત શેરની આ વાત સ્વીકારી લીધી ત્યારપછી તે ચાર સેનાપતિ ચિલાત, તે પાચસે ચેરોની સાથે સાથે ભીના ચામડા ઉપર બેસી ગ લુટારાઓ લુવા માટે જ્યારે ઘેરથી નીકળે છે ત્યારે તેઓ પહેલા શુભ શકુન માટે ભીના ચામડા ઉપર બેસે છે, આ જાતને તેઓમાં રિવાજ છે ભીને ચામડા ઉપર બેસીને તે દિવસના ચેથા પહેરમાં પાચ ચારની साथे (सीहगुहाओ घोरपल्लीओ पडिनिक्खमइ ) ते सिंहYखा नामना ચેરપલીમાથી નીકળે १७० नाम सार्वाह भादयोऽस्ति । तस्य ग्वल दुहिता मद्राया आत्मजा पथाना पुत्रा णामनुमार्गनातिका पश्चाना पुप्राणा जननान्तर समुत्पन्ना मुममा नाम दारिका चापि अम्ति, पीशी मा ? ' जहाण ना सुरुषा' अहीन यापन् मुम्पा अहीन पञ्चेन्द्रियशरीरा याप सुरूपाती, 'त' तत् तस्माद् गन्छामः खलु हे देवानु मियाः । धन्पस्य मार्यमादम्य गृह पिटम्पाम'-तुण्ठामा, युग्माक धनानक फरा-(ण्य सलु देवाणुप्पिया रायगिहे णयर घण्णे णाम सत्यवाहे अड्डे तस्स ण धूया भहाण अत्तया पचण्ड पुत्ताण अणुमग्गजाइपा लुसमाणान दारिया याचि होत्या, अटोण जाच सुख्यात गच्छामीण देवाणुप्पिया ! धणस्स सत्ववाहस्स गिर विलुयामो तुभ विउले धणणग जाय सिलप्पयाले, मम सुसुमा दारिया! ताण ते पत्र चोरसया चिलायस्स चोरसेणईस्म एयमह पडिसुणेति । तएण से- चिलाए चोरसेणावई तेहिं पचर्ति चोरसहि सद्धि अल्लचम्म दुरूहड, दुरुरित्ता पुव्यावरणहकालसमयसि पैचहिं चोरसएहिं सद्धि) हे देवानु प्रियो । सुनो-एक बात कहना है-वर इस प्रकार है-रोजगृह नगर में धन्य नाम का एक धनिक एव सर्वजन मान्य सार्थवाह रहता है। इस की एक लड़की है। जिसका नाम सुममा है। यह उसकी पत्नी भद्रा भार्या से पांच पुत्रों के बाद उत्पन्न हुई है। यह अहीन पाचों इन्द्रियों से युक्त शरीरवाली है तथा पहुत अधिक सुकुमार एवं सुन्दर है। इसलिये -चलो हे देवानुप्रियो ! हम सर चलें और धन्य सार्थवाह के घर (एव सलु देवाणुप्पिया! रायगिहे णयरे धणे णाम सत्यवाहे अढे० तस्सण धूया भद्दाए अत्तया पचण्ह पुत्ताण अणुमग्गजाइया सु समा णाम दारिया यावि होत्था अहीण जाव सुरुवा त गन्छामो ण देवाणुपिया वाहस्स गिह विलयामो, तुभ विउले धणकणग नाव सिलपवाले, मम सुसमा दारिया! तएण ते पच चोरसया चिलायस्स चोरसेणावइस्स एयमट्ट सुणे ति । तएण से चिलाए चोरसेण वई तेहिं प चहि चोरसएहि सद्धि अल्ल चम्म दुरूहइ, दुरुहिता पुव्यावरहकालसमयसि पचहि चोरसएहि सद्धि ) હે દેવાનુપ્રિયે! સાભળે, તમને મારે એક વાત કહેવી છે તે આ પ્રમાણે છે કે રાજગૃહ નગરમા ધન્ય નામે એક ધનિક અને સર્વજનમાન્ય સાર્થવાહ રહે છે તેને એક પુત્રી છે, તેનું નામ સુમમાં છે ધન્યની પત્ની ભદ્રાભાર્થીના ગર્ભથી તે પુત્રી પાસે ભાઈઓ બાદ જન્મ પામી છે તે અહીન પાસે ઈન્દ્રિયોથી યુક્ત શરીરવાળી છે તેમજ ખૂબ જ સુક को धणस्स सत्थ पडि .
यसि । . भनगारधर्मामृतषिणी टी० १० १८ सुसुमादारिकाचरितवर्णनम् ६७१ यावत् शिलप्रवालः, मम स सुमा दारिका-लुण्ठितेपु वस्तुपु मध्ये धनकनकमणि- मौक्तिकशिलाप्रवालादि वस्तुजातानि युष्माक भवन्तु, मम तु एका ससुमा दारिका भविष्यति । तत खलु तानि पञ्च चोरशतानि चिलातस्य चोरसेनापतेः एतमर्थ पतिशृण्वन्ति-सीकुर्वन्ति । ततः खलु स चिलातश्चोरसेनापतिः तै पञ्चभिः चोरशतैः साई · अल्लचम्म' आईचम दूरोहति, लुण्ठकाहि लुण्ठनप्रस्थानात् पूर्व माजल्यार्थमाद्रचर्मण्यारोहन्तीति तेपा व्यवहार , दूरा, 'पुवावरण्डकारसम पूर्वापराहकालसमये 'दिनस्य चतुर्थप्रहरे पञ्चमिचोरशतैः सार्द्ध सण्णद्ध जान गहियाउहपहरणे' सन्नद्ध यावत् गृहीतायुधप्रहरण, सन्नवद्ध वर्मितकवचाम्सनाह' सन्नीकृतः, बद्धा कशावन्धनेन सपद्धः, वर्मित: अङ्गे परि- हितः कवचो येन स तथोक्तः, 'गृहीतायुपमहरणः' गृहीतानि आयुधमहरणानि लूट-जो वस्तु हम तुम लूटेंगे उनमें से तुम्हारी तो धन, कनक, मणि, मौक्तिक शिलाप्रवाल आदि चीजें होगी-और मेरी केवल एच वह सुस- मादारिका होगी। इस तरह उन पांचसौ चोरों ने अपने सेनापति चिलात चोर की इस बात को मान लिया। इसके बाद यह चोर सेना- पति चिलात, उन पावसौ चोरों के साथ गीले चमडे पर बैठ गया। लुटेरे लूटने के लिये जर प्रस्थान करते है तर वे पहिले गीले चमडे पर शुभ शकुन मानने के निमित्त बैठते है ऐसा उनमें व्यवहार है पेठकर फिर वह दिन के चतुर्थप्ररर में पाचसौ चोरों के साथ (सीगुहाओ चोरपल्लीओ पडिनिक्खमइ) उस सिहगुहा नाम की चोरपरली से निकला। (सण्णद्ध जाव गहियाउहपहरणे माइयगोमुरिहिं फलएहिं એટલા માટે ચાલો તૈયાર થાઓ, હે દેવાનુપ્રિયે ! આપણે બધા ત્યા જઈએ અને ધન્ય સાર્થવાહના ઘરને લુટી લઈએ, જે વસ્તુઓ આપણે બધા લુટી તેમાથી ધન, કણક, મણિ, મૌક્તિક, શિલાપ્રવાલ વગેરે વસ્તુઓ તમારી થશે અને ફક્ત તે સુસમા દરિયા મારી થશે આ પ્રમાણે તે પાચસે ચોરોએ પિતાના સેનાપતિ ચિલાત ચારની આ વાત સ્વીકારી લીધી ત્યારપછી તે ચોર સેનાપતિ શિવાત, તે પાચસે ચરાની સાથે સાથે ભીના ચામડા ઉપર બેસી ગ લુટારાઓ લુટવા માટે જ્યારે ઘેરથી નીકળે છે ત્યારે તે પહેલા શુભ શકુન માટે ભીના ચામડા ઉપર બેસે છે, આ જાતને તેઓમાં રિવાજ છે. ઉપર બેસીને તે દિવસના ચોથા પહોરમાં પાચસે ચોરોની સાથે (सीहगुहाओ चोरपल्लीओ पडिनिक्समइ ) ते सिंY नामनी ચેરપલીમાથી નીકળે ભીના ચામડા - . - पाया येन स', गृहीनाऽयशनः, 'माध्यगोमुहियेहि मागोमुग्विने - माकानिक पक्ष्ममानि, गोमुगितानि-गोगग्याशाराणि-मापानि 7 तानि गोमुखितानि तै-उदररक्षा भतारोमानगोमुग्याकरिः 'पलाँ' फरी' पहिकति पमिद्ध' 'गिपट्टार्टि असिष्ट्रीदि ' निफटामि• असि पप्टिमि, कोगरविकतः बक, ' असगरहिं तोणेहिं ' अशगतेस्तूगेमपस्थितेसणारे', ' सनीवहिं धर्डि' सजीर्धनुभिः कोटयारोपितमत्पर्धनुमि', 'ममुस्वितेति गरेहि ' समुत्क्षिप्तैः शरैः-तूणीरसकाशान्निाकाशितणः, 'समुछारियाहि दीहारि ' समुलगालि तामि दीहामि समुच्छास्ति शतपिशेपे ओमारियाहिं' आम्वरिताभि- नादितासि । उम्पटियाहि । उम्पण्टिाभि सिलवटाभिः 'डिप्पतूरेगी गिमहाहिं असिलहीहि असगहि तोणेहि मजीवेहि घणूहिं, समुक्ति त्तेहिं सरेहिं समुल्लालियाहिं दीहारि, ओसारियाहिं उमपट्याहि उिप्प तृरेहिं बजमाणेहि मत्यार उमिट्टी सीरणाये चोरकलकल रव समुदरव भूय करेमाणे) चोरपल्ली से वह किम तरह की स्थिति में निकला-यही यात सम्रकार इन पक्तियो में कर रहे है-वे करते है कि जय वह अपनी चोरपल्ली में से निकला तो उस समय उसने अपने शरीर पर कवच को सन्जित करके कगारधन से अच्छी तरह बाध रखा था " गृही तायुधपहरण " आयुध और प्रहरण उसके दोनों हाथों में थे। रीछ के रोम से युक्त गोमुसाकार पहिका से, म्यान से चाहिर खेंची हुई तलवारों से, कधो पर लटकते हुए भायोतृणीरों-से ज्यापर चढे हुए धनुषों से, तूणीर से निकाले गये बाणों से ऊपर उछालेगये शास्त्र विशेषों से, (सपणद्ध जाय गहियावहपहरणे माइयगोमुहिएहि फसएहि णिकट्ठाहि भसिलट्ठीहि भसगपदि तोणेहि सजीवेहि धणूहि समुक्सित्तेहि सरेहि समुल्ला लियाहि दिहाहि ओसारियादि उरूघरियाहि छिप्पतूरेहि वजमाणेदि महया २ उकिट्ठसीहणाये चोरकलकलरव समुद्दरव भूय करेमाणे) ચેરપલ્લીમાથી તેઓ કેવી રીતે બહાર નીકળ્યા એ જ વાત સૂત્રકાર આ પક્તિઓમાં સ્પષ્ટ કરી રહ્યા છે તેઓ કહે છે કે જ્યારે તે પિતાની ચેરપનીમાથી નીકળે ત્યારે તેણે પિતાના શરીર ઉપર કવચ ધારણ કરીને તેને કશાન ધનથી સારી રીતે બાંધી રાખ્યું હતું " गृहितायुधप्रहरण " આયુધ અને પ્રહરણ તેના બંને હાથમાં હતા રીંછના રેમી યુક્ત ગેમુ ખાકાર પટ્ટિકાથી, મ્યાનમાથી બહાર કાઢેલી તવારોથી ખભાઓ ઉપર લટ કતા તીરથી, જ્યા ઉપર ચઢેલા ધનથી, તણીરમાથી કા માં આવેલા બાણથી, ઉપર ફેકવામાં આવેલા શસ્ત્ર વિશેથી, .
. अनगारधामृतवषिणी टी० म०१८ सुसुमादारिकाचरितवर्णनम् ६७३ वज्जमाणेहिं ' क्षिमतयः वाघमान-द्रुत गायमानैः तृयः उपलक्षितः सन् ' महया- महया उकिसीहणाये चोरफल कलरव ' महामहोत्कृष्टसि हनादचोरकलकलरव- अत्यन्तोत्कृष्ट सिंहनादचोरक्लरलशब्दं समुद्ररवभूत-समुद्रओलावृद्धिसमये ध्वनि मिचकुर्वन् , यद्वा मन्ता महता उत्कृप्टसि हनादेन-' लुप्ततृतीयान्त पदम् स्वकृतोत्कृष्टसि दनादेनेत्ययः, शेप पूर्ववत् । सि हगुहातश्चोरपल्लीतः प्रतिनिष्का । म्यति, मतिनिष्क्रम्य यत्रैव राजगृह नगर तत्रैव उपागच्छति, उपागत्य राजगृहस्य नगरस्य अदूरसामन्ते एक महद् गहण ' गहनम् धनम् अनुमविशति, अनुमविश्य, दिवसम्-शेप दिवसभाग क्षपयन् व्यतियन् तिष्ठति ।। मू०५ ॥ शन्दायमान-पडे २ घटों से जल्दी २ बजते हुए बाजोंसे वह उपलक्षित -युक्त या। तथा उसके निकलने पर जो चोरों का कलकल रवटुआ-वह सिंह की गर्जना के जैसा महान उच्चस्वर था-1 तथा जिस समय समुद्र पढता है उस समय जैसा उसका शब्द होता है-वैसा ही वह कल २ रव गंभीर या। (पडिनिक्खमित्ता जेणेव रायगिहे नयरे तेणेव उवाग च्छड, उवागचित्ता रायगिहस्स नयरस्स अदर सामते एगं मह गरण अणुपविसह, अणुपविसित्ता दिवस खवेमाणे चिट्ठ) चोरपल्ली से निकलकर वह जहा राजगृह नगर या वहां आया-वहां आकर के वह राजगृह नगर के अदरसामत-न अति दूर न अति समीप रहे हुए एक महान जगल मे छिप रहे यहा छिपकर उसने अपना यह दिवस वही पर ठहर कर समाप्त कर दिया ॥ सू०५ ॥ જલ્દી જલદી વાગતા વાજાઓથી તે યુક્ત હતા તેમજ જ્યારે તે નીકળે ત્યારે એને જે ઘંઘાટ થયો તે સિંહની ગર્જના જે મહા ધ્વનિ તે તેમજ જ્યારે સમુદ્રમાં ભરતી આવે છે અને ત્યારે જે તેનો ધ્વનિ હોય छ, त भारमान पनि ५ तेवो गला ( पडिनिक्समिचा जेणेव रायगिहे नयरे तेणेव उवागच्छ्इ, उजागच्छित्ता रायगिहस्स नयरस्म अदूरसामते एग मह गहण अणुपविसइ, अणुपविसित्ता दिवस सवेमाणे चिदुइ) योपनीमाथी નીકળીને ત્યાં રાજગૃહ નગર હતું ત્યાં તે આવે ત્યાં આવીને તે રાજગૃહ નગરથી ઘણે દૂર પણ નહિ અને ઘણા નજીક પણ નહિ એવા એક મોટા વનમા છુપાઈને રહ્યા ત્યાં છુપાઈને તેણે પિતાને તે દિવસ ત્યાં જ પસાર કરી દીધેસૂપ . जाताधर्मचारी मूलग-तएणसे चिलाए चोरसेणावई अद्वरत्तकालसमयसि निसत पडिनिसतसि पचहि चोरसपाहि साद माइयगोमुहिएहि फलएहि जाव मृद आहि उरुघंटियाहि जेणेव रायगिहस्स नयरस्स पुरथिमिल्ले दुबारे तेणेव उवागच्छड, उवागच्छित्ता उदगवत्थिं परामुसइ, आयते चोक्खे सुइभूए तालुग्घाडणिविजं आवाहेइ, आवाहित्ता, रायगिहस्स दुवारकवाडे उद- एण अच्छोडेइ, कवाड विहाडइ विहाडित्ता रायगिह अणुप- विसइ, अणुपविसित्ता, महया२ सदेणं उग्घोसेमाणे२ एवं वयासी -एव खलु अह देवाणुप्पिया। चिलाए णाम चोरसेणावई पचहि चोरसएहि सद्धि सीहगुहाओचोरपल्लीओ इह हव्वमागए धण्णस्स सत्थवाहस्स गिह घाउकामे, त जोणं णवियाएमाउ याए दुद्ध पाउकामे से णं णिगच्छउत्तिकटु जेणेव धण्णस्स सत्थ वाहस्स गिह तेणेव उवागच्छइ, उवागच्छित्ताधणस्स गिह विहा डे। तएणसे धपणे चिलाएणं चोरसेणावइणा पचहि चोरसएहि सद्धि गिह घाइज्जमाण पासइ, पासित्ता भीए तत्थे४ पचहि पुत्तेहि सद्धि एगंत अवकमइ । तएणं से चिलाए चोरसेणावई धण्णस्स सत्थवाहस्स गिह घाएइ घाइत्ता, सुबहु धणकणग जाव सावएज्ज सुसुम च दारिय गेण्हइ, गेण्हित्ता,रायगिहाओ पडिणिक्खमइ, पडिनिक्खमित्ता, जेणेव सोहगुहा तेणेव पहारेत्थ गमणाए ॥ सू० ६ ॥ , - - - मैनगारधर्मामृतवपिणी टीका अ०१८ सुसुमावारिकाचरितवर्णनम् टीका-'तएण से' इत्यादि । ततः खलु स चिलातश्चोरसेनापतिः 'अद रत्तकालसमयमि' अबरानकालसमयेम यराने, कीदृशे 'निसतपडिनिसते'निशान्त- प्रतिनिशान्ते निशान्त-जन वनिरहित प्रतिनिशान्त प्रत्येकगृह यस्मिन् तस्मिन् , जने प्रसुप्ते सतीत्यर्थः, पञ्चभिश्वोरशतै सार्द्धम् ‘माइयगोमुहिएहिं ' माइकगोमु- खितैः, उदररक्षार्थ भल्लूकरोमाश्तैर्गोमुखाकारैः ‘फल एहि फलकै =पट्टकैः उदरव- द्धकाष्ठफलकैरित्यर्थः, यानत् 'मूडआर्हि उम्घटियाहि' मूकिताभिरुरुपंण्टिकाभिः निः शन्दी कृताभि विशालघण्टाभियुक्तः यव राजगृहस्य नगरस्य पौरस्य द्वार तत्रैर उपागच्छति, उपागत्य, 'उदगपत्थि' उदकास्ति चर्ममयजलपात्रम् , 'ममक' इति प्रसिद्धम् ' परामुसइ ' परामृशतिगृह्णाति, अनन्तरम् 'आयते' आचान्त = कृतमुखादि मक्षालनः 'चोक्खे' चोक्ष: स्वच्छः अतएव तालुग्याडणि विज्ज' 'तएण से चिलाय गेरसेणावई ' इत्यादि । टीकार्थ-(तएण) इसके बाद (चोरसेणावई से चिलाए) चोरसेनापति वह चिलात चोर (निसतपडिनिसते अद्धरत्तकालसमयसि) जव जन ध्वनिरहित प्रत्येक घर हो गया ऐसे मध्यरात्रिके समयमें (पचहिं चोर सएहिं सद्धि) उन पांचसौ चोरों के साथ (माइय गोमुहिएहिं फलएहिं जाव मूहआहिं उरुघटियाहिं जेणेव रायगिहस्स नयरस्स पुरथिमिल्ले दुवारे तेणेव उवागच्छइ ) अपने उदर की रक्षा के निमित्त बद्धभल्लूक के रोमों से आवृत ए गोमुखाकार काष्ठफलको से यावत् निःशब्दीभूत विशाल घटिकाओ से युक्त होकर जहा राजगृह नगर का पूर्व दिशा का दार था वहा आया। (उवागच्छित्ता उदगवत्यि परामुसइ, आयते, चोक्खे, सुइभूए, तालुग्घाडणिविज्ज आवाहेड, आवाहिता रायगिहस्स तएण से चिलाए चोरसेणावई' इत्यादि-- 11-(तएण ) त्या२मा चोरसेणापई से चिलाए) यार सेनापतित क्षिात यार (निसतपडिनिसते अद्धरत्तकालसमयसि) न्यारे हरे हरे: ઘરમાં માણુનો અવાજ એકદમ બધ થઈ ગયે, એવા તે મધ્યરાત્રિના समये ( प चहि चोरमएहि सद्धि ) ते पायो योशनी साये (माइय गोमुहिएहि फलएहि पाव मूइआहि उरुघ टियाहि जेणेव राय गिहस्स नयरस्स पुरथिमिल्ले दुवारे तेणेव वागच्छद) પિતાના પિટની રક્ષા માટે રીછના રેમથી આવૃત્ત થયેલા ગોમુખાકાર કા ફલકથી થાવત્ રાત થઈ ગયેલી મોટી ઘટિકાઓથી યુક્ત થઈને જ્યા २।०४७ नगनु पूर्व दिशानु द्वार तु त्या माव्या (उवागन्तिा उद्गवत्थि परामुसइ आय ते चोखे सुइभूए, तालुग्धाडणि विऊन आवाहेइ, आवाहिता .
६७४ बासाधर्मया मूलग्-तण्णं से चिलाए घोरसणावई अद्वरत्तकालसमयांस निसत पडिनिसतंसि पचहिं चौरसएहि साहिं माइयगोमुहिएहि फल एहि जाव मृदआहि उमाटियाहि जेणेव रायगिहस्स नयरस्स पुरस्थिमिरले दुवारे तेणेव उवागच्छा, उवागच्छिता उदगवत्थि परामुसइ, आयंते चोक्से सुइभूए तालुग्घाडणिविजं आवाहेइ, आवाहित्ता, रायगिहस्स दुवारकवाडे उद- एण अच्छोडेइ, कवाड विहाडेइ विहाडित्ता रायगिह अणुप- विसइ, अणुपविसित्ता, महया२ सद्देणं उग्रोसेमाणे२ एव वयासी -एव खलु अहं देवाणुप्पिया। चिलाए णामं चोरसेणावई पचहि चोरसएहि सद्धि सीहगुहाओचोरपल्लीओ इह हव्वमागए धण्णस्स सत्थवाहस्स गिह घाउकामे, त जोण णवियाएमाउ याए दुद्धं पाउकामे से णं णिगच्छ उत्तिक? जेणेव धण्णस्स सस्थ वाहस्स गिह तेणेव उवागच्छइ, उबागच्छित्ताधण्णस्त गिह विहा- डे। तएणं से धपणे चिलाएणं चोरसेणावइणा पचहि चोरसएहि सद्धि गिह घाइज्जमाण पासइ, पासित्ता भीए तत्थे४ पचहि पुत्तेहि सद्धि एगंत अवक्कमइ । तएणं से चिलाए चोरसेणावई धण्णस्स सत्थवाहस्स गिह घाएइ घाइत्ता, सुबहु धणकणग जाव सावएज्ज सुसुम च दारिय गेण्हइ, गेण्हिता,रायगिहाओ पडिणिक्खमइ, पडिनिक्खमित्ता, जेणेव सोहगुहा तेणेव पहारेत्थ गमणाए ॥ सू० ६ ॥
६५७ , - भनेगारधर्मामृतपिणी डी० १० १८ मुसुमादारिकाचरितवर्णनम शीघ्रम् आगतः धन्यस्य सार्थवाहम्य गृह 'घाउकामे पातयितुझाम: लुण्ठयितकामः हे देवानुमियाः ! यूयं शृणुत, पञ्चशतचौरैः सहाह चिलातश्चौरमेनापतिरपन्यस्य सार्थवाहस्य गृह लुण्ठयितुमागतोऽस्मीति भावः, 'त' तत्-तस्मात् कारणात् 'जोग' यः खलु ' णवियाए माउआए ' नव्याया मारकाया 'दुद्ध पाउकामे' दुग्ध पातुकाम =यः खलु मदीयहस्तान्मृत्यु प्राप्य पुनभाविभवभाविन्या नूतनाया मातुर्दुग्धाभिलापीभवेत् ' सेण ' स खलु ‘णिग्गन्छ ' निर्गन्तु मम समुख मागन्छनु 'त्ति कटु' दतिकृत्वा इत्यमुक्त्वा यौव वन्यस्य सार्यवाहरय गृह तव पाचसौ चोरों के साथ यहा सिंहगुहा नाम की चोरपरली से आया हुआ है। मेरी इच्छा बन्यसार्थवाह के घर को लूटने की है-(त) इसलिये -(जो ण णवियाए, माउयाण, दुद्ध पाउकामे सेण णिग्गच्छउ, त्तिकस्ट जेणेव धण्णस्स सत्यवाहस्स गिहे तेणेच उपागच्छद, उवागच्चित्ता गिह विहाडेइ। ताण से धण्णे चिलाएण चोरसेणावइणा पहिं चोर- सहिं सद्धि गिह घाइजमाण पासह, पासित्ता मीए तत्थे ४ पचहि पुत्तेहिं सद्धि एगत अवक्षमह, । तएणं से चिलारा चोरसेणावई बण्णस्स सत्यवाहस्स गिह घाण्इ, घाइत्ता सुबहुधणकणग जाव सावएज सुसमं चदारिय गेण्हह, गेण्टित्ता रायगिहाओ पडिणिक्खमद,पडिणिक्खमित्ता जेणेव मीराहा तेणेव पहारेत्य गमीण ) जो नवीन माता का दूध पीना चाहता हो-मेरे हाथ से मृत्यु को प्राप्त कर पुनः भाविभव में होनेवाली जननी का दुग्ध पान करने का जो अभिलापी बन रहा हो ચિલાત નામે ચેર છુ હમણા જ હુ પાંચસે ચોરોની સાથે અહીં સિંહગુહા નામની ચારપદલીથી આવ્યો છુ ધન્ય સાર્થવાહના ઘરને લૂટવાની મારી ४२० छ (त) माटे (जोण णवियाए, माउयाए, दुद पाउकामे सेण जिग्गाउ, ति यह जेणेच धणस्स सत्यवाहस्स गिहे तेणेत्र आगच्छइ, उवागन्छित्ता वण्णस्स गिह विहाडेइ, तएण से धण्णे चिलाएण चोरसेणानइणा पचर्हि चोरसएहिं सद्धिं गिढ घाइजर्माण पासइ, पासिता भीए तत्ये४ पचहि पुत्तेहिं सद्धिं एगत आरकमइ । तएण से चिलाए चोरसेणाई वण्णस्स सत्यवाहस्म गिह घाएइ, घाइत्ता मुबहु धणणग जाव सावएज्ज सुसम च दारिय गेण्डइ, गेदिचा रायगिहाओ पडि णिक्खमड, पडिक्खमित्ता जेणेव सीह गुहा तेणेर पहारेत्य गमणाए) જે નવી માતાનું દૂધ પીવા ઈચ્છે છે એટલે કે મારા હાથથી મૃત્યુ પામીને ફરી બીજા ભવમાં વનારી માતાનું દૂધ પીવા જે ઈચ્છતા હોય તે - - - - १७६ भाताधर्मव्यापार तालोदाटिनी विधाम् जापा' आगगति-परनि 'आरित्ता' आगम- स्मृत्वा रामगृहम्य द्वारकपाटानि उदकेन ' न्यौदा आन्द्रौटयति अमिपि चति, 'आजोडिना' आच्छोटय-अगिपिन्य, पपाट 'विवाह' विघाटयति- उद्घाटयति, विचाटय समचौर सहितः रानामनुमपिगति, अनुपविश्य महता महता-अतिमहता शब्देन ' उग्योसमाणे २ ' उदोषयन २=मुहर्मुहूर्योपणा कुर्वन् परमवदत् , घोपणामकारमाह-एव पलु अह हे देवानुमिया ! चिलातो नाम चोरसेनापतिः पञ्चमिः चोरशतैः साईम् सिहगुहातधोरपल्लीत उह 'हव्य ' इन्य= दुवारे कवाडे उदण्ण अच्छोटेड फवाह विशाह, विशरित्ता रायगिह अणुपचिसह अणुपचिसित्ता माया महेण उग्योसेमाणे २ एव वयासी -एच ग्वल अर देवाणुप्पिया चिलाए नाम चोरसेणावेई पचहि चोरस एहिं सद्धि सिंहगुराओ घोरपरलीओ र रन्धमाग धण्णस्स सत्यवा हस्स गिह घाउकामे) यहां आकर के उसने चर्ममय जलपात्र को-मसक को-अपने हाथ में लिया और उसके जल से आचमन किया-आचमन करके जय वह शुद्ध परमशुचीभूत हो चुका-तत्र उसने तालोद्घाटिनी विद्या का आवाहन किया-स्मरण कियो-और स्मरण करके राजगृह के द्वार कपाटों को उदक के छीटों से सिश्चित किया। सिञ्चित करके फिर उसने उन किवाडों को खोला और खोल करके फिर वह समस्त चोरों के साथ राजदर नगर के भीतर प्रविष्ट हो गया। प्रविष्ट होकर के उसने वहां बड़े आवाजले चारपार घोषणा करते हुए इस प्रकार कहा- -हे देवानुप्रियो । सुनो-मै चोरसेनापति चिलात नाम का चोर है-अभी २ रायगिहस्स दुवारकवाडे उदपण अच्छोडेइ कत्राड विहाडेइ, विहाडित्ता रायगिह अणुपविसइ, अणुपविसित्ता महया २ सदेणं उग्धोसेमाणे २ एव वयासी-एव खलु अह देवाणुप्पिया चिलाए नाम चोरसेणावई प चहि चोरसएहि सद्धि सि हगुहाओ चोरपल्लीओ इह हव्वमागए. धण्णस्स सत्यवाहस्स गिह घाउ कामे ) ત્યાં આવીને તેણે ચામડાની થેલી–મશક-ને પિતાના હાથમાં લીધી અને તેના પાણીથી આચમન કર્યુ આચમન કરીને જ્યારે તે શુદ્ધ પરમ શુચીભૂત થઈ ચૂક્યું ત્યારે તેણે તાલેદુઘાટિની વિદ્યાનું આવાહન કર્યું—મરણ કર્યું, અને સ્મરણ કરીને રાજગૃહના દરવાજાના કમાડને પાણીથી સિંચિત કરીને તેણે તે કમાડેને ઉઘાડયા ઉઘાડીને તે બધા ચેરોની સાથે રાજગૃહ નગરની અ દર પ્રવિષ્ટ થઈ ગયે પ્રવિષ્ટ થઈને તેણે ત્યાં મોટા સાદે વાર વાર ઘોષણા કરતા આ પ્રમાણે કહ્યું કે હે દેવાનુપ્રિયે! સાભળે ચોર સેનાપતિ ६५७ . - बनगारधर्मामृतवाणी चौ० ० १८ सुसुमादारिकाचरितवर्णनम शीघ्रम् आगतः धन्यस्य सार्थवाहम्य गृह 'घाउकामे पातयितुझामः लुण्ठयितुकामः हे देवानुमियाः । यूय शृणुत, पञ्चशतचौरैः सहाह चिलातश्चोरसेनापतिरनधन्यस्य सार्थवाहस्य गृह लुण्ठयितुमागतोऽस्मीति भावः, 'त' तत्-तस्मान् कारणात् जो ण' यः खलु ' णवियाए माउआए' नव्याया मावकाया 'दुद्ध पाउकामे' दुग्ध पातुकाम =यः खलु मदीयहस्तान्मृत्यु प्राप्य पुन विभवभाविन्या नूतनाया मातुर्दुग्धाभिलापीभवेत् ‘सेण ' स खलु ‘णिग्गन्छउ ' निर्गन्छतु मम समुख मागच्छनु 'ति कटु' इतिकृत्वा-इत्यमुक्त्वा योव धन्यस्य सार्थनाहस्य गृह तत्रैव पाचसी चोरों के साथ यहां सिंहगुहा नाम की चोरपरली से आया हुआ है। मेरी इच्छा धन्यसार्थवाह के घर को लूटने की है-(त) इसलिये -(जो ण णवियाए, माउयाए, दुद्ध पाउकामे सेण णिग्गच्छउ, त्तिकट्टु जेणेव धण्णस्स सत्यवाहस्स गिहे तेणेव उवागच्छद, उवागच्चित्ता गिह विहाडेइ । लण्ण से धण्णे चिलाएण चोरसेणावणा पचर्हि चोर- सहिं सद्धि गिह घाइजमाण पासह, पासित्ता भीए तत्थे ४ पचहि पुत्तेहिं सद्धिं गतं अवक्षमद, । तएणं से चिलाए चोरसेणावई वण्णस्स सत्यवाहस्स गिहं घाएइ, घाइत्ता सुबहुधणकणग जाव सावएज्ज सुसम च दारिय गेण्डह, गेण्डित्ता रायगिहाओ पडिणिक्खमइ,पडिणिक्खमित्ता जेणेव सीहगुहा तेणेव पहारेत्थ गमणोए) जो नवीन माता का द्ध पीना चाहता हो-मेरे हाथ से मृत्यु को प्राप्त कर पुनः भाविभव में होनेवाली जननी का दुग्ध पान करने का जो अभिलापी बन रहा हो ચિલાત નામે ચેર છુ હમણા જ હુ પાંચસે એરોની સાથે અહીં સિંહગુહા નામની ચેરપલીથી આવ્યો છુ ધન સાર્થવાહને ઘરને લૂટવાની મારી ४२छ। छे (त ) भाट (जोण णपियाए, माउयाए, दुद्ध पाउकामे सेण जिग्गच्छउ, ति यह जेणे धणस्स सत्यवाहस्स गिहे तेणेव आगच्छइ, उवागच्छित्ता धण्णस्स गिह चिहाडेद, तएण से धण्णे चिलाएण चोरसेणानइणा पचहिं चोरसएहि सद्धिं गिह घाइज्जमाण पासइ, पासित्ता भीए तत्ये४ पचहि पुत्तेहिं सद्धि एगत अवक्कमइ । तएण से चिलाए चोरसेणापई धण्णस्स सत्यवाहस्स गिह घाएइ, घाइत्ता मुबहु धणणग जाव सावएज्ज सुसम च दारिय गेण्डइ, गेहित्ता रायगिहाओ पडि णिक्खमइ, पडिक्खमित्ता जेणेव सीह गुहा तेणेच पहारेत्य गमणाए ) જે નવી માતાનું દૂધ પીવા ઈચ્છે છે એટલે કે મારા હાથથી મૃત્યુ પામીને ફરી બીજા ભવમાં થનારી માતાનું દૂધ પીવા જે ઈચ્છતા હોય તે . .
- st आतापर्मचारी उपागन्छति, उपाग प धन्यस्य गृहरिदार विधाट्यति उदारयति । तत खल स धन्यः सार्थवादः चिगनेन गोरसेनापतिना पञ्चभिः चौरसतः साई गई 'घाइज्जमाण ' घात्यमान-उण्ठपमान पश्यति इष्टता, गीतामय प्राप्तः, प्रस्ता- प्रासगतः, सिता-विशेषततास मातः 'उधिगे उनिग्न अयमम्माक सर्वस्त्र मपहरवि अहमस्य किमपि यतुं न शनामीति देतोः परमपितामापना, पञ्चभिः पुनः सार्धम् ‘एगत' एकान्तम्-भयरहिन स्थानम् 'अपमह' अपक्राम्यति अपगन्छति । ततः खलु म चिलात. चौरसेनापतिः धन्यम्य मार्यवाहस्थ गृह घातयति-लुण्ठयति घातयित्ता लुण्ठयित्वा मुहणणग नाव सारएन' धनकनक यायत् स्थापतेयम्-धन कनक मणिमौक्तिकादिक द्रव्य मुममा च दारिका गृहाति, गृहीत्वा राजगृहात् मतिनिष्काम्पति, प्रनिनिष्क्रम्प यत्रैव सिंहगुहा तत्रैव माधारयद् गमनाया-तमुद्यतोऽभूत् ।। ०६ ।। -चरी मेरे सम्मुस आवे-इस प्रकार काकर यह जहा धन्यसार्थवाह का घर था वहा गया-वहा जाकर उसने धन्यसार्थवाह के घर को खोला जय चन्यसार्थवाद ने पाचसौ चोर के माय चोरों सेनापति चिलात के द्वारा अपने घर को लुटता हुआ देसा-तो देखकर वह भय को प्राप्त हो गया और त्रस्त एव सित-विरोप त्रास को प्राप्त होकर अन्त में वह उद्विग्न यन गया यह हमारा सर्वस्व हरण कर रहा है और में इसका कुछ भी नही कर सकता-इस यान से वर चिन्ताकुल हो गया और चिन्ताकुल होकर अपने पाचो पुत्रों के साथ वहा से निर्भय स्थान में चला गया। चोर सेनापति चिलात ने धन्य सार्थवाह को खूब मनमाना लूटा और लूट करके उसमेंसे यहुत सा धन कनक, मणि, मौक्तिक आदि द्रव्यो को एव सुसमादारिका को ले लिया-1 लेकर वह राजगृह नगर से મારી સામે આવે આ પ્રમાણે કહીને તે જ્યા ધન્ય સાર્થવાહનું ઘર હતું તથા ગમે ત્યાં જઈને તેણે ધન્ય સાવાહિના ઘરને ઉઘાડયું જ્યારે અન્ય સાથેવાતું પાસે એરોની સાથે ચોર સેનાપતિ ચિલાત ઉડે પોતાના ઘરને લુટાતુ જે ત્યારે જોઈને તે ભયભીત થઈ ગયા અને ત્રસ્ત તેમજ ત્રાસિત (વિશેષ વ્યાસ) પ્રાપ્ત કરીને છેવટે ઉદ્વિગ્ન થઈ ગયો આ અમારૂ સર્વસ્વ હરણ કરી રહ્યો છે અને એનુ કઈ જ બગાડી શકતું નથી, આ જાતને વિચાર કરીને તે ચિંતાતુળ થઈ ગયું અને ચિંતાકુળ થઈને તે પિતાના પાચે પુત્રોની સાથે ત્યાથી નિર્ભય સ્થાનમાં જતું રહ્યો ચોર સેનાપતિ ચિલાતે ધન્ય સાર્થવાહના ઘરને ખૂબ ઈચ્છા મુજબ તૂટયું અને લૂંટીને તેમાથી ઘણુ ધન, કનક, મણિ, મિતી વગેરે ક તેમજ સુસમા દારિકાને લઈ લીધી ગુહ ६७९ , अनगारधर्मामृतवपिणी टी० अ० १८ सुसुमादारिकाचरितनिरूपणम् मूलम्-तएण से धन्ने सत्थवाहे जेणेव सए गिहे तेणेव उवागच्छइ, उवागच्छित्ता सुवहुं धणकणगं सुसुमं च दारियं अवहरियं जाणित्ता, महत्थ महग्यं महरिह पाहुड गहाय जेणेव णगरगुत्तिया तेणेव उवागच्छइ, उवागच्छित्ता, त महत्थं महग्ध महरिह पाहुड जाव उवणेति, उवणित्ता, एवं वयासी-एव खलु देवाणुप्पिया । चिलाए चोरसेणावई सीहगुहाओ चोरपल्लीओ इह हव्वमागम्म पचहि गेरसएहि सद्धि ममगिह घाएत्ता धणकणगं सुसुमं च दारिय गहाय जाव पडिगए । त इच्छामो ण देवाणुप्पिया । सुसुमा दारियाए कूव गमित्तए, तुभ णं देवाणुप्पिया से विउले धणकणगे, ममं सुसुमा दारिया। तएणं ते णगरगुत्तिया धपणस्स एयमटुं पडिसुणेति, पाडसुणित्ता संनद्ध जाव गहियाउहपहरणा महया२ उकिट्ठ० जाव समुदरवभूयं पिव करेमाणा रायगिहाओणिग्गच्छति, णिग्गच्छित्ता,जेणेव चिलाए चोरे तेणेव उवागच्छंति, उवागच्छित्ता, चिलाएणं चोरसेणाव- इणा सद्धि संपलग्गा यावि होत्था । तएणं ते जगरगुत्तिया चिलायं चोरसेणावइ हयमहिय जाव पडिसेहेति । तएण चोरसया गयरगोत्तिएहि हयमाहिय जाव पडिसेहिया समाणा त विउल धणकणगं विच्छड्डेमाणाय विप्पकिरेमाणा य सवओ तेपच चापिम निकला-और निकल करके जहा सिंहगुहा नाम की चोरपल्ली थी-उस ओर चलने के लिये उद्यत हो गया। सू०६॥ નગરમાથી પાછે બહાર આવ્યા અને આવીને જ્યા સિંહગુડા નામે ચોરપલી હતી તે તરફ રવાના થવા તૈયાર થઈ ગયો છે સૂત્ર ૬ ६८० पाताधर्मस्या समंता विप्पलाइस्था । तएणं ते णगरगुत्तिया ते विउलं धण कणगं गेण्हति, गेण्हित्ता जेणेव रायगिहे तेणेव उवागच्छति । तएण से चिलाए त चोरसेणं तेहि णयरगुत्तिएहि हयमहिय जाव भीए तत्थे सुसुम दारियं गहाय एगं महं अग्गामियं दीह- मद्ध अडवि अगुप्पषि? । तएणं धण्णे सत्यवाहे मुंसुमं दारिय चिलाएर्ण अडवीमुह अवहीरमाणि पासित्ताणं पचहि पुत्तेहि सद्धि अप्पउटे सन्नवद्ध० चिलायस्स पदमग्गीहि अणुगच्छ- माणे अभिगज्जते हक्कारेमाणे पुस्कारेमाणे अभितज्जेमाणे अभितासेमाणे पिट्टओ अणुगच्छइ । तएण से चिलाए तं धणं सत्थवाहं पंचहि पुत्तेहि सद्धिं अप्पछडं सन्नद्ववद्ध० समणुगच्छ माण पासइ, पासित्ता अत्थामे अवले अवीरिए अपुरिसक्कार- परक्कमे जाहे जो सचाएइ सुसुम दारिय णिवाहित्तए, ताहे सते तते परितते नीलप्पल० असि परामुसइ, परामुसित्ता सुसुमाए दारियाए उत्तमगं छिदइ, छिदित्ता, त गहाय त अग्गामियं अडवि अणुप्पविठ्ठ। तएण से चिलाए तीसे अगा- मियाए अडवीए तण्हाए अभिभूए समाणे सीहगुह चोरपल्लि असपत्ते अतरा चेव कालगए। एवामेव समणाउसो । जाव पव्वइए समाणे इमस्स ओ- रालियसरीरस्स बतासवस्स जाब विद्धसणधम्मस्स वण्णहेउ जाव आहार आहारेइ, से णं इहलोए चेव बहूर्ण समणाणंट हिलणिज्जे ३ जाव अणुपरियहिस्सइ, जहा व से चिलाए तक्करे ॥ सू०७॥ , । पम्हुट्ट दिसाभाए, - . . अनगारधर्मामृतवर्षिणी टी० अ० १८ सुसुमादारिकाचरितनिरूपणम् टीका-'तएण से' इत्यादि । तन' खलु स धन्य' सार्थहो यत्रैव स्वक गृह तौर उपागच्छति, उपागत्य सुरहु बनकनक सुसुमा च दारिकाम् अपहता ज्ञात्वा ' महत्थ महग्य मदरिह ' महाथ महा महाईम्=महानर्थः प्रयोजन यस्मिन् तत्-महाधमहाप्रयोजनम् , बहुमूल्य पुनः महता योग्यम् ' पाहुड' प्राभृत= उपायन गृहीत्या यौर 'णगरगुत्तिया' नगरगोप्तृकानगररक्षका कोपाला- दयः तौव उपागन्छति, उपागत्य तत् महार्थ यावत् महा महाहं माभृतम् ' उनणेड' उपनयति समर्पयति, उपनीय-समर्प्य एवमदत्-एव खलु हे देवानु- 'तएण से धन्ने सत्यवाहे' इत्यादि । टीकार्थ-(तएणं) इसके बाद (से बन्ने सत्यवाहे) वह धन्य सार्थवाह (जेणेव सएगिहे तेणेव उवागच्छड) जहा अपना घर था वहाँ आया (उवागच्छित्ता सुबह यणकणग सुसम च दारिय अवहरियं जोणित्ता महत्थं माग्ध महरिय पाहुड गहाय जेणेव नगर गुत्तिया तेणेव उवागच्छइ ) यहा आकरके उसने अपने घरमें से बहुत सा धन कनक एव सुममा दारिका को हरण किया हुआ जब जाना तब वह महार्थ पहमूल्य एव महापुरुपो के योग्य भेंट लेकर जहां नगर रक्षक -कोपाल-आदि थे वहा गया-(उवागचित्तात महत्थ महग्ध महरिह पाहुड जाव उवणेति, उपणित्ता एच क्यासी) वहा जाकर उसने उस महापयोजन साधक भूत यहुमूरय तथा महापुरुषों के योग्य भेंट को उनके समक्ष सदिया-और रखकर उनसे उसने इस प्रकार का-(एव तएण से धन्ने सत्यवाहे' इत्यादि- रा--(तएण) त्या२पछी ( से धन्ने सत्थवाहे ) ते पन्य सायास (जेणेव सरगिहे तेणेव आगच्छइ ) ज्या पोतानु घर तु त्या मान्य। (उवागच्छित्ता सुबहु धणरणग मुसम च दारिय अवहरिय जाणित्ता महत्थ महग्ध महरिय पाहुड गहाय जेणेव नगर गुत्तिया तेणेव उवागच्छइ ) ત્યાં આવીને તેણે પિતાના ઘરમાથી પુષ્કળ પ્રમાણમાં ધન, કનક અને સુસમા દારિકાનું હરણ કરવામાં આવેલુ જાણીને તે મહાઈ, બહુ કિંમતી અને મહાપુરુષને યોગ્ય ભેટ લઈને જવા નગર–રક્ષક-ટ્ટિપળ-વગેરે હતા ત્યા गयो ( उबागच्छित्ता त महत्थ महान महरिह पाहुड जार उवणे ति, अणित्ता एन क्यासी) त्या ४४ने ते ते महायो भूत पहु भिती तमन મહા પુરુને ય ભેટને તેમની સામે મૂધ દીધી અને મૂકીને તેમને તેણે આ પ્રમાણે વિનતી કરતા કહ્યું કે– - - ૨૮૨ माताधर्मस्या मियाः ! चिलातयोग्सेनापतिः सिंrगुमायालोरपाया गमागग्य पत्रमिवोर शवैः साई ग् मम गृह 'घाएना 'पापिता-उण्ठगिया रागा धनानक मुंसुमा च दारिका गृहीत्वा 'जार पडिगा' याान् पतिगता पत्रमित्रोरनतः सा सिंहगुहा चोरपल प्रतिनिष्टा इत्यर्थ , 'त' तन्तस्मान् कारणात् यामः खलु हे देशानुमिया. ! 'मुगुमा दारिया गुगुमा दारिशया 'ब' प्रत्यान यने 'गमित्तए ' गन्तुम् । ' तुम्मेण देवाणुप्पिया। ' युप्माक पलु हे देवानु मिया ! तत्-अपहत विपुल धनकनझम्हे देशानुमियाः । चौराऽपहत धनकना दिक सबै युप्माक भवन, मम मुमुमा दारिका भातु । ततः सतु ते नगरगोप्तका खलु देवाणुप्पिया ! चिलाए चोरसेणाई सीतगुहामो घोरपल्लीओ इह सन्चमागम्म पर्हि चोरसहिं माद्धिं मम गिह घात्ता, सुथरु धण कणग सुसम च दाग्यि गहाय जार पडिगए-त इच्छामो ण देवाणु प्पिया ! सुसमा दारिया व गमित्तए-तुम्भ ण देवाणुप्पिया! से विउले धणकणगे मम सुसमा दारिया) हे देवानुप्रियों सुनो चोर सेनापति चिलात चोर ने सिंहगुहा नाम की चोरपल्ली से यहां शीघ्र आकर पांचसौ चोरों के साथ मेरे घर पर डाका डाला है। उसमें उसने बहुत साधन, कनक एव सुममा दारिका को लूटा है और-लूटकर वह वहां वापिस अपने स्थान पर चला गया है। अतः हे देवानुपियो ! मै चाहता हूँ कि आप लोग उस सुसमा दारिका को लेने के लिये जावें, मिलने पर वह हुन धनकनक आदि मय आपका रहे-और सुसमा दारिका मेरी ( एव खलु देवाणुप्पिया ' चिलाए चोरसेणाई सीहगुहाओ चोरपल्लीओ इह हव्यमागम्म पचहिं चोरसएहि सद्धिं मम गिह घाएत्ता, सुबहु धणकणग सुसम च दारिय गहाय जाव पडिगए त इच्छामो ण देवाणुप्पिया ! सुसमा दारियाए कूव गमित्तए-तुम्भ ण देवाणुप्पिया ! से विउले धणकणगे मम सुसमा दारिया) દેવાનુપ્રિયે ! સાભળે, ચોર સેનાપતિ ચિલાત ચારે સિંહગુહા નામની ચેરપલીથી એકદમ અહીં આવીને પાચસે ચોરની સાથે મારા ઘરમાં ધાડ પાડી છે તેમાં તેણે ઘણું ધન, કનક અને મુસમા દારિકાની લૂંટ કરી છે લૂટ કરીને તે પાછે પિતાના સ્થાને જતો રહ્યો છે એથી હે દેવાનુપ્રિયે ! મારી ઈચ્છા છે કે તમે સુસમાં દારિકાને પાછી લેવા માટે જાઓ અને તેને મેળવી લીધા બાદ તે અપહુત કરાયેલુ ધન કનક વગેરે બધુ તમે રાખજે અને સુસમાં દારિકાને મને સોપી દેજે अनगारधर्मामृतापणी टी० अ० १८ सुसुमादारिकाचरितनिरूपणम् पुरुपा धन्यस्य एतमर्थ प्रति गृण्वन्ति-स्वीकृन्ति, प्रतिश्रुत्य-स्वीकृत्य ' सन्नद्र जार गहियाउहपहरणा' सन्नद्ध यावत् गृहीतायुधमहणाः सन्नद्धपद्धर्मितकवचा यावद् गृहीतायुवपहरणा इत्यस्य व्याख्या पूर्वपद् गो-या, ' महया २ उकिट्ट जान समुदरवभूयपिव ' महा महोत्कृष्ट यावत् समुद्ररवभूतमित्र, वेलारद्धिसमये समुद्रध्यनिमिव महाव्यनि ‘करेमाणा' कुर्वन्तो राजगृहात निर्गच्छन्ति, निर्गत्य रहे। (तएण ते जगरगुत्तिया घण्णस्स सत्यवाहस्स एयम पडिसुणेति, पडिसुणित्ता सनद्ध जाव गहियाउहपहरणा मह्या २ उक्किह० जाव समुद्दरवभूयं पिवकरमाणा रायगिहाओ णिग्गच्छति णिगच्छित्ता जेणेव चिलाए चोरे-तेणेव उवागच्छति, उवागच्छित्ता चिलाएण चोरसेणाव- इणा सद्धिं सपलग्गा यावि होत्या तएण तेणगरगुत्तिया चिलाय चोरसे णावइ यमयि जाव पडिसेहेति, तण्णं ते पच चोरसया जयरगोत्ति एहिं रयमहिय जाच पडिसेरिया समाणात विउल धणकणग विच्छ- उमाणा य विप्पकिरेमाणा य सचओ समता विप्पलाहस्था) धन्य सार्थवाह की इस बात को सुनकर उन नगर रक्षकों ने स्वीकार कर लिया। और स्वीकार करके उसी समय उन्हो ने अपने २ शरीरपर कवच को सजित करके कशानधन से वाध लिया यावत् आयुध और प्रहरणो को ले लिया-1 वेलावृद्धिके समय में जिस प्रकार समुद्र की ध्वनि होती है-उसी प्रकार की महाध्वनि करते हुए फिर वे राजगृह नगर (तएण ते जगरगुत्तिया धण्णस्स सस्थवाहस्स एयम पडिसुणेति, पडि मुणित्ता सन्नद्ध जाव गहियाउहपरणा महया २ उक्कि० जान समुद्दरवभूय पिनकरेमाणा रायगिहाओ णिग्गन्छति, किंगच्छित्वा जेणेव चिलाए चोर-तेणेव उचागच्छति, उवागच्छित्ता चिलाएण चोरसेणावणा सद्धिं सपलग्गा यावि होत्या-तएण ते णगरगुत्तिया चिलाय चोरसेणावड हयमहिय जाव पडिसेहेंति, तपण ते पच चोरसया जयरगोत्तिएहिं हयमहिय जाव पडिसेहिया समाणात विउल वणकणग विच्छडे माणा य विपकिरेमाणा य सन्यो समता विप्पलाइत्था) ધન્ય માથવાહની તે વાતને સાંભળીને નગર રક્ષકેએ તેને સ્વીકારી લીધી અને સ્વીકારીને તેમણે તરત જ પિતપોતાના શરીર ઉપર કરચો પહે રીને કશા બ ધનેથી બાધ્યા યાવત્ આયુધ અને પ્રહરણને સાથે લઈ લીધા ભરતીના સમયે જે સમુદ્રને વનિ હોય છે તે જ મહાધ્વનિ કરતા તેઓ રાજગૃહ નગરમાથી બહાર નીકળ્યા અને નીકળીને ક્યા ચાર સેનાપતિ તે ६८२ - - मियाः ! चिलातधोरसेनापतिः गिर गुमायामोग्प याः यमागरम पत्रमिवोर शवः : मार्द्ध म् मम गृह 'घाएता' पातयिता-तुण्ठयिन्या सुगा धनानक सुसुमा च दारिका गृहीत्वा 'जार पडिगा' यान् प्रतिगपत्रभिश्रीरतः सार्ध सिंहगुहा चौरपल्ली प्रतिनिटन इत्यर्थ , ' त' तम्तम्मात् कारणान् इलाम खलु हे देवानुमियाः ! 'मुगुमा दाग्यिाप मुगुमा दारिताया 'व ' प्रत्यान यने 'गमित्तए ' गन्तम् । नुम्मण देवाणुप्पिया ।' युप्माफ सलु हे देशानु मिया ! तत्-अपहत विपुल धनग्नकम् हे देशानुमिया: ! चोराऽपहत धनकना दिक सबै युष्माक भात, मम मुमुमा दारिका भातु । नत. सतुते नगरगोप्तृका सल देवाणुपिया ! चिलाए चोरसेणार्ड सीगुराओ घोरपल्लीओ इह हच्चमागम्म पहिं चोरमहं मद्धिं मम गिह घागता, सुबहु धण कणग सुसम च दारिय गहाय जार पहिगए-त इच्छामो ण देवाणु प्पिया ! सुसमा दारिया व गमित्तए-तुभ ण देवाणुप्पिया। से विउले धणकणगे मम सुसमा दारिया) हे देवानुप्रियो सुनो चोर सेनापति चिलात चोर ने सिंहगुहा नाम की चोरपल्ली से यहां शीघ्र आकर पाचसौ चोरों के साथ मेरे घर पर डाका डाला है। उसमें उसने बहुत सा धन, कनक एच सुसमा दारिका को लूटा है और-लूटकर वह वहा वापिस अपने स्थान पर चला गया है। अतः हे देवानुप्रियों ! मैं चाहता हूँ कि आप लोग उस सुसमा दारिका को लेने के लिये जावें, मिलने पर वह हून धनकनक आदि सब आपका रहे-और सुसमा दारिका मेरी ( एव खलु देवाणुप्पिया' चिलाए चोरसेणाबई सीहगुहायो चोरपल्लीओ इह हन्धमागम्म पचहि चोरसएहिं सद्धिं मम गिह घाएत्ता, सुबहु धणकणग सुसम च दारिय गदाय जाव पडिगए त इच्छामो ण देवाणुप्पिया । सुसमा दारियाए कूव गमित्तए-तुम्भ ण देवाणुप्पिया ! से विउले धणकणगे मम सुसमा दारिया) છે દેવાનુપ્રિયે ! સાભળે, ચોર સેનાપતિ ચિલાત ચારે સિંહગુહા નામની ચેરપલીથી એકદમ અહીં આવીને પાચસો ચોરોની સાથે મારા ઘરમાં ધાડ પાડી છે તેમાં તેણે ઘણું ધન, કનક અને સુસમા દારિકાની લૂંટ કરી છે લૂટ કરીને તે પાછે પિતાના સ્થાને જતો રહ્યો છે એથી હે દેવાનુપ્રિયે ! મારી ઈચ્છા છે કે તમે સુસમાં દારિકાને પાછી લેવા માટે જાઓ અને તેને મેળવી લીધા બાદ તે અપાત કરાયેલું ધન કનક વગેરે બધુ તમે રાખજે અને સુસમાં દારિકાને મને સોપી દેજે - - - अनगारधर्मामृतवर्षिणी टी० अ० १८ सुसुमादारिकाचरितवर्णनम् ६८५ नगरगोप्तका=नगररक्षका-त विपुल धनकनक० मनकादिक गृह्णन्ति, गृहीत्वा, यत्रंथ राजगृह नगर तत्रैव उपागन्छन्ति । ततः खलु स चित्रातः ता चोरसेना ' इयमहिय जाव' हतमथित यावत्-हनमथितमवरसीरघातितनिपतित चितवजपताकाम् यावद् दृष्ट्वा भीतस्त्रस्तः मुंसुमा दारिका गृहीत्वा एका मातीम् 'अग्गामिय' अग्रामिकाम् ग्रामरहिताम् ' दीहमद ' दीर्घा दीर्घमार्गाम् 'अडवि' अटवीग्-अनुपविष्टः । ततः खलु वन्य' सार्थवाह. सुसुमा दारिका चिलातेन 'अडगीमुह ' अटवीमुखम् अरण्यमम्मुखम् ' अबहीरमाणि ' अपहिय माणाम्-नीयमाना 'पासित्ता' दृष्ट्वा पञ्चभि पुत्रै सार्द्धम् ' अप्पछठे ' आत्ग- पाठ. ' सनद्धवद्ध०' सन्नवद्ववर्मितकाचः चिलातस्य ‘पदमग्गीहिं । पद गेहति, गेमिहत्ता, जेणेव रायगिहे तेणेव उवागच्छति । तण्ण से चि- लाए त चोरसेणं तेहिं णयरगुत्तिएहिं त्यमयि जाब भीए तत्थे सुमम दारिय गहाय एग मर अग्गामिय दीहमद्ध अडनिअणुप्पविछे) उन नगर रक्षको ने उस विपुल धन कनक आदिको ले लिया और लेकर राजगृह नगर में वापिस आ गये। इस के बाद वह चिलात चोर अपनी उस सेना को नगर रक्षकों द्वारा हत मथित प्रवल वीरवाली एव घातित तथा निपतित चिन्ह बज पताका वाली देखकर त्रस्त हो गया और सुसमादारिका को लेकर एक बडी भारी ग्रामरहित अटवी में घुस गया (तण्ण धण्णे सत्यवाहे सुसम दारियं चिलाएण अडचीमुह अवहिरमा- णि पासित्ता ण पचहि पुत्तेहिं सद्धि अप्पछट्टे सन्नद्धबद्ध चिलायस्स पद- मग्गवीहिं अणुगच्छमाणे अभिगज्जते हाक्कारेमाणे अभितज्जेमाणे (तएण ते णयर गुत्तिया त विउल धणकणग गेण्हति, गेण्हित्वा, जेणेव रायगिहे तेणेव उवागच्छति । तएण से चिलाए त चोरसेण तेहि णयरगुचिएहि हयमहिय जाव भीए वत्ये सुसम दारिय गहाय एग मह अगामिय दीहमद पडवि अणुप्पविटे) તે નગર રક્ષકોએ તે પુષ્કળ પ્રમાણમાં પડેલા ધન, કનક વગેરેને લઈ લીવું અને લઈને રાજગૃહ નગરમાં પાછા આવી ગયા ત્યારપછી તે ચિલાત રે પિતાની તે ચેર સેનાને નગર રક્ષકે વડે હત, મથિત તેમજ ઘાતિત અને નિપતિત ચિધ્વજ પતાકાઓવાળી જઈને ત્રસ્ત થઈ ગયો અને સુમમા દારિકાને લઈને એક ભારે મોટી ગ્રામરહિત અટવીમા પિસી ગયે (तएग वण्णे सत्यवाहे सुसम दारिय चिलाएण जडवीगुह अाहीरमाणि पासित्ता ण पाहि पुत्तेहिं सदि अप्पटे सन्नद्धनद्धचिलायम पदमग्गवीहि अणुगच्छमाणे अभिगज्जते हाक्कारेमाणे पुक्कारेमाणे अभितज्जेमाणे अभिहासे- - - . - , - . ते माया यौन चिलातमोर, नगर उपागगति, उपागग रिलानेन चौरसेनापतिना साध ' सपरगा' सप्रना=युदर फतुं मायापि अमान् । तत खलु नगर गोप्तकाः चिलात चोरसेनापति रामयिक जान' इतमपित यावातम पित पवरपीरयातितनिपतितनिपतारतागारिता', मथिता निश्शेषता मासिताः, प्रारगराधेपीरा यम्पामो तिमधितमासीर., घातिताम्यातः शस्त्रादिप्रहारेण क्षतिः, म सनातोऽम्प पानिनः सा इत्यर्थः, निपतिता भूमौ पतिता चिध्वज पताका' यस्पासा, निपतितनिपताका, एतेषा कर्म धारयः, तम् , पारन् मतिषेधयन्ति नियाग्यन्ति । ततः गट ते 'पचचौरसया' पश्चशतचौरा 'णगरगोतिएडि' नगग्गोप्कै नगरसः पुरुष. ' हयमहिय नार पडिसेहिया 'हतमपिवयात्मतिपेधिता विपरिता' सन्तः तत् विपुल धनानक धनम्नकमणिमौक्तिकादिक 'पिन्टूढेमागा' न्र्दियन्त प्रक्षिपन्तः 'पिप्पकिरेमाणा य 'निमफिरन्तश्चइतस्ततो पिरिण कुर्वन्तः 'सन्चो समता' सर्वतः समन्तात-चतुर्दिसु 'पिप्पलाइत्या' विप्लायन्त -पगयिताः ततः खलु से बाहर निकले और निकलकर जहा चोर सेनापति वह चिलात चोर था वहा गये-चहा पचते ही उनका चोर सेनापति उस चिलात चोर के साथ युद्ध होना प्रारभ हो गया-उस युद्ध में उन्हों ने उस के सैन्य को पहिले खून मारा-पीटा-बाद में उन्हें बिलकुल नष्ट भ्रष्ट कर दिया। कितनेक चोरो को उन्हों ने क्षत किया। उसकी चिह्न ध्वजपता काओं को जमीन पर डाल दिया । इस प्रकार से हरतरह परास्त कर दिया। जप वे पाचसौ चोर नगररक्षक पुरुपो मारा हर प्रकार से हतमथित यावत् प्रतिपेधित हो चुके तय वे उस विपुल धनकनक मणिमौक्तिक आदिको छोडकर तथाइधर उधर डालकर सर्व प्रकारसे चारो दिशाओंमें इधर उधर भाग गये। (तएण ते णयरगुत्तिया त विउल धणकणग ચિલાત ચેર હતું ત્યાં ગયા ત્યા જતાની સાથે જ ચોર સેનાપતિ ચિલાતની સાથે તેમનું યુદ્ધ શરૂ થઈ ગયું યુદ્ધમાં તેમણે પહેલા તે ચિલાતની સેના સાથે ખૂબ માર--પીટ કરી અને ત્યારપછી તેને નષ્ટ-ભ્રષ્ટ કરી નાખી કેટલાક ચારેને તે તેમણે ક્ષત (ઘવાયેલા) કર્યા તેમની ચિઠ્ઠભૂત ધ્વજા પતાકાઓને જમીનદોસ્ત કરી નાખી આ પ્રમાણે તેને બધી રીતે હરાવી દીધે જયારે તે પાંચસો ચેરો નગર રક્ષક પુરુ વડે સર્વ રીતે હત, મથિત યાવત્ પ્રતિષધિત થઈ ગયા ત્યારે તેઓ તે પુષ્કળ ધન, કનક, મણી, મોતી વગેરેને ત્યાં જ મૂકીને આમતેમ નાખીને ચારે દિશાઓમાં આમતેમ પલાયન चिलात ६८७ . . मनगारधर्मामृतपिणी टी० अ० १८ सुसुमादारिकाचरितनिरूपणम् पुरुपकारः पौरुपम् , पराक्रमा-मामथ्र्य, तद्रहितः सन् 'जाहे' यदा नो शनकोति सुसुमा दारिको 'णिमाहित्तए' निर्वाहयितु-बोढुम् , ' ताहे' तदा 'सते' श्रान्तः परिश्रम गतः, 'तते' तान्ताग्लानि प्राप्तः, 'परितते ' परितान्तः= सर्वतोभावेन खिन्नतामुपगतः, 'नीलुप्पल० ' नीलोत्पल नीलोत्पगवलगुलि कादि विशेषणविशिष्टमतितीक्ष्णम् 'असि' करवालं 'परामुसद' परामृशति- कोशान्निासारयति, परामृश्य, सुसुमाया दारिकायाः ' उत्तमग ' उत्तमान-शिरः अवीरिए अपुरिसकारपरकमे जाहे णो सचाण्ड सुसम दारिय णिव्वा हित्तए, ताहे सते तते परितते निलुप्पल असिं परामुसह, परामुसित्ता सुसमाए दारियाए उतमग छिदइ, छिदित्ता, त गराय त अग्गामिय अटर्षि अणुपचिहे, तएण से, चिलाए तीसे ओग्गासियाए अडबीए तण्हाए अभिभूए समाणे पम्हढदिसाभाए सीह गुहं चोरपल्लिं अस पत्ते अतराचेव कालगए ) जय चिलात चोर ने उस वन्यसार्थवाह को पाचो पुत्रों के साथ आत्मषष्ठ होकर एव कवच आदि से सुसज्जित होकर अपने पीछे २ आता हुआ देखा-तब वह देख कर आत्मबल रहित हो गया। इस तरह सैन्य रहित, उत्साह रहित तथा पौरुप और पराक्रम रहित बना हुआ वह जब सुममा दारिका को अपने पास रखने के लिये शक्तिशाली नही हो सका तब उसने श्रान्त, तान्त-ग्लानि युक्त और परितात सर्वतोभावेन खिन्नता को प्राप्त होकर नीलोत्पल, गवलगुलिका, आदि विशेषणो वाली अपनी तलवार को उठाया-म्यान परक्कमे जाहे णो सचाएइ सुसम दारिय णिवाहित्तए, ताहे सते तते परितते नीलुप्पल० असि परामुसइ, परामुसित्ता सुसमाए दारियाए उत्तमग छिदइ, छिदित्ता, त गहाय त अग्गामियं अडवि अणुपविटे, तएण से, चिलाए तीसे आग्गामियाए अडवीए तहाए अभिभूए समाणे पम्हुट्टदिसाभाए सीहगुह चोरपल्लि असपत्ते अतरा चेव कालगए) જ્યારે ચિલાત ચારે તે ધન્ય સાર્થવાહને પાચે પુત્રોની સાથે આત્મષણ થઈને તેમજ કવચ વગેરેથી સુસજિત થઈને પિતાની પાછળ પાછળ આવતે જે ત્યારે તે જોઈને આત્મબળ વગરને થઈ ગયે આ પ્રમાણે સેના રહિત ઉત્સાહ રહિત તેમજ પરુષ અને પરાક્રમ રહિત થઈ ગયેલ તે જ્યારે સુસમાં દારિકાને પિતાની પાસે રાખવામા પણ અસમર્થ થઈ ગયે ત્યારે તેણે શ્રાત, તાત, ગ્લાનિ યુક્ત અને પતિત તેમજ બધી રીતે ખિન્નતા પ્રાપ્ત કરીને નીલે+વ, ગવલ ગુલિકા વગેરે વિશેષણોવાળી પિતાની તરવારને ઉપાડી અને મ્યાનમાથી બહાર કાઢી અને બહાર કાઢીને સુસમાં દારિકાનું માથું કાપી . - - . . हाताधर्मया मार्गविधि-पदमार्गप्रचारमारणानाम् अणुगमाणे अनुगमन-पृष्ठतो धावन् 'अणुगज्जेमाणे' अनुगर्नन्गेघरलगर्जना हमारेमाणे मो' दुष्ट ! विठ-तिष्ठ' इत्यादि, पायः पारया मागगरयन पारमाणे ' पूरकारयन 'तिष्ठ २, नोचेचा हनिष्यामीत्यानिवारी तमाय ' अमितज्जेमाणे' अमि तनन्-'रे निर्लज्ज ' इत्यादि पाश्यम्तजना नि , ' अमितासेमाणे ' अमि नासयन्-भत्रशस्त्रादिदर्गनेन प्रासमुत्पादयन् 'पिट्ठभो' पृष्ठता चिळातचौरस्य पृष्ठदेशत' जनुगच्छति वादावति । तत. ग्यतु स चिलाता त धन्य सार्थवाद पञ्चभि पुरैः सार्धम् 'अप' भात्माष्ठ 'मानववर्मितकाच यावत् समनुगच्छत प्रवादावन्त पश्यति, पता ' अत्यामे ४' अस्थामा आत्मबल रहितः, अपल: सैन्परहित., भीर्यः = उत्माहरहितः, अपुरुषकारपराक्रम सन् अभितासेमाणे पिट्टाओ अणुगइ ) धन्ममावार ने जय सुसमा दारिका को चिलात चोर द्वारा अटवी के मध्य में हरणकर ले जाई गई जय जाना-तय वर अपने पाचों पुत्रों के साथ आत्मपष्ट होकर कवच याध उस चिलात के पीछे २ पद चिह्नों का अनुसरण करता हुआ, मेष के जैसी गर्जना करता हुआ, अरे ओ दुष्ट ! ठहर ठहर इस प्रकार से कहता हुआ, पुकार करता हुआ ठहर जा ठहर जा-नीं तो में तुझे मार डालूगा इस प्रकार के वाक्यों से उसे घुलाता हुआ रे निर्लज्ज इस प्रकार से उसे तजित करता हुआ, तयो अल शस्त्र आदि के दिखाने से उसे त्रास उत्पन्न करता हुआ चला। (तण्ण से चिलाए त धण्ण सत्यवाह पहिं पुत्तेहिं सद्धि अप्पट अन्नदबद्ध० समणुगच्छमाण पासइ, पासित्ता अत्थामे अबले माणे पिटाओ अणुगच्छद) જ્યારે ધન્ય સાર્થવાહે સુમમા દારિકાને ચિલાત ચાર વડે અટવીમા હરણ કરીને લઈ જવાયેલી જાણી, ત્યારે તે પિતાના પાચે પુત્રની સાથે આત્મ પણ થઈને કવચ બાધાને તે ચિલાત ચારની પાછળ તેના પર ચિહ્નોનું અને સરણ કરતે મેઘના જેવી ઇવનિ કર “ અરે એ દુષ્ટ ! ઊરે, લેરે, આ પ્રમાણે કહે છે રે, ઊભો રે, નહિતર મરી ગયેલ જાજે ” આ પ્રમાણે હાકલ કરતે, તેને બોલાવતે “અરે નિર્લજ” આમ તર્જિત કરતે તેમજ શસ્ત્ર અઅ વગેરેને બતાવીને તેને ત્રસિત કરતે ચાલ્યો (तएण से चिलाए त धण्ण सत्यवाह पचहि पुत्तेहिं सद्धिं अपच्छ? सनद रिसार बद्ध० समणुगच्छमाण पासइ, पासित्ता अत्यामे अबले ! " ६८७ - . - . . . . मनगारधर्मामृतपिणी टी० अ० १८ सुसुमादारिकाचरितनिरूपणम् पुरुपकारः पौरुपम् , पराक्रमामामध्य, तद्रहितः सन् ' जाहे' यदा नो शनोति सुसुमा दारिको ‘णिवाहित्तए' निर्वाहयितु-धोढुम् , ' ताहे ' तदा 'सते' श्रान्तः परिश्रम गतः, 'तते' 'तते' तान्त:लानिं प्राप्तः, 'परितते' परितान्त:- सर्वतोभावेन खिन्नतामुपगतः, 'नीलुप्पल. ' नीलोत्पल =नीलोत्पगवलगुलि कादि विशेपणविशिष्टमतितीक्ष्णम् ' असिं' करवाल 'परामुसइ' परामृशति- कोशान्निसारयति, परामृश्य, सुसुमाया दारिकायाः 'उत्तमग ' उत्तमान-शिरः अवीरिए अपुरिसकारपरकमे जाहे णो सचाण्ड सुसम दारिय णिव्वा हित्तप, ताहे सते तते पग्तिते निलुप्पल० अमिं परामुसह, पराउसित्ता सुसमाए दारियाए उत्तमग दिइ, छिदित्ता, त गहाय त अग्गामिय अडविं अणुपविटे, तएण से, चिलाए तीसे ओग्गासियाए अडबीए तण्हाण अभिभूए समाणे पम्हढदिसाभाए सीह गुहं चोरपल्लिं अस पत्ते अतराचेव कालगए ) जर चिलात चोर ने उस वन्यसार्थवाह को पाचो पुत्रों के साथ आत्मषष्ठ होकर एव कवच आदि से सुसज्जित होकर अपने पीछे २ आता हुआ देखा-तब वह देख कर आत्मबल रहित हो गया। इस तरह सैन्य रहित, उत्साह रहित तथा पौरुप और पराक्रम रहित बना हुआ वह जय सुममा दारिका को अपने पास रखने के लिये शक्तिशाली नहीं रो मका तय उमने श्रान्त, तान्त-ग्लानि युक्त और परितात सर्वतोभावेन खिन्नता को प्राप्त होकर नीलोत्पल, गवलगुलिका, आदि विशेषणो वाली अपनी तलवार को उठाया-म्यान परक्कमे जाहे णो सचाएइ सुसम दारिय णिवाहित्तए, ताहे सते तते परितते नीलुप्पल० असिं पगमुसइ, परामुसित्ता सुसमाए दारियाए उत्तमग छिदइ, छिदित्ता, त गहाय त जग्गामियं अडवि अणुपविटे, तएण से, चिलाए तीसे आग्गामियाए अडवीए तहाए अभिभूए समाणे पम्हट्टदिसाभाए सीहगुह चोरपल्लि अमपत्ते अतरा चेत्र काळगए ) જ્યારે ચિલાત ચોરે તે ધન્ય સાથ વાહને પાચે પુત્રની સાથે આત્મક થઈને તેમજ કવચ વગેરેથી સુસજિત થઈને પિતાની પાછળ પાછળ આવત જો ત્યારે તે જોઈને આત્મબળ વગરને થઈ ગયો આ પ્રમાણે સેના રહિત ઉત્સાહ રહિત તેમજ પિરુષ અને પરાક્રમ રહિત થઈ ગયેલ તે જ્યારે મુસમા દારિકાને પિતાની પાસે રાખવામા પણ અસમર્થ થઈ ગયે ત્યારે તેણે શ્રાત, તાત, લાનિ યુકન અને પરિતાત તેમજ બધી રીતે ખિન્નતા પ્રાપ્ત કરીને નીલેમ્પલ, ગવલ ગુલિકા વગેરે વિરોણવાળી પિતાની તરવારને ઉપાડી અને મ્યાનમાથી બહાર કાઢી અને બહાર કાઢીને સુસમા દારિકાનું માથું કાપી - CAN - - - - " ६८ मातापमकथा मार्गविधि-पदमार्गप्रचारग्रणनितम् 'अणुगारगाणे' अन्ग न्-पृष्ठतो पावन 'अणुगज्जेमाणे' अनुगर्नन यादगर्जना कन, 'पारमाणे मो' दुष्ट ! विष्ठ-तिष्ठ ' इत्यादि, याक्यः पारया आगरयन 'पुगरेमाणे ' पूस्कारयन् 'तिष्ठ २, नोचेचा निष्यामीत्यान्विायर तमाया' अमितज्जेमाणे' अमि तर्जन रे निर्लजन' इत्यादि पास्यतर्जना नि , ' अमितासेमाणे ' अमि जासयन-अखशस्त्रादिदर्शनेन घासमुत्पादयन् 'पिभो' पृष्टता-चिलात वारस्य पृष्ठदेशतः जनुगच्छति प्रथाद्धावति । तन मलु म चिलातः त धन्य सार्थवाद पञ्चभि पुरै सार्धम् 'अप्परट' आत्माष्ट 'मन्नबद्धवर्मितकाच यावत् समनुगच्छन्त-प्रयाद्धावन्त पश्यति, प्रष्ट्या 'अत्यामे' अस्थामा-आत्मबल रहितः, अपल: सैन्परहितः, अभीर्यः = उत्माहरहितः, पुरुपयरपराक्रम सन् अभितासेमाणे पिट्टाओ अणुगच्छद) धन्यसार्थवार ने जय सुसमा दारिका को चिलात चोर दारा अटवी के मध्य में हरणकर ले जाई गई जप जाना तय यह अपने पांचों पुत्रो के साथ आत्मपष्ट होकर कवच पाध उस चिलात के पीछे २ पद चिट्ठों का अनुसरण करता हुआ, मेघ के जैसी गर्जना करता हुआ, अरे ओ दुष्ट ! ठहर ठहर इस प्रकार से कहता हुआ, पुकार करता हुआ ठहर जा ठहर जा-नहीं तो में तुझे मार डालूगा इस प्रकार के वाक्यों से उसे घुलाता हुआ रे निर्लज्ज! इस प्रकार से उसे तर्जित करता हुआ, तथा अस्त्र शस्त्र आदि के दिखाने से उसे त्रास उत्पन्न करता हुआ चला । (तग्ण से चिलाए त धण्ण सत्यवाह पहिं पुत्तेहिं सदि अप्पट अन्नद्धनद्व० समणुगच्छमाण पासइ, पासित्ता अस्थामे अबले माणे पिट्ठाओ अणुगच्छद) જ્યારે ધન્ય સાર્થવાહે સુમમા દારિકાને ચિલાત ચાર વડે અટવીમાં હરણ કરીને લઈ જવાયેલી જાણું, ત્યારે તે પિતાના પાચ પુત્રોની સાથે આત્મ પષ્ટ થઈને કવચ બાધીને તે ચિલાત ચારની પાછળ તેના પ, ચિહ્નોનુ અને સરણ કરતે મેઘના જેવી વનિ કર “અરે એ દુખ ! ઊરે, કરે, આ પ્રમાણે કહેતે “ઊરે, ઊરે, નહિતર મરી ગયે જાગૃજે પ્રમાણે હાકલ કરતે, તેને બેલાવતે અરે નિર્લજજ !આમ તર્જિત કરતો તેમજ શસ્ત્ર અસ્ત્ર વગેરેને બતાવીને તેને ત્રસિત કરતે ચાલ્યો (तएण से चिलाए त धण्ण सत्यवाह पचर्हि पुत्तेहिं सद्धि अपच्छ? सन्नद्र बद्ध० समणुगच्छमाण पासइ, पासित्ता अस्थामे अबले । " " मा - मनगारधर्मामृतवर्षिणी टी० अ० १८ सुसुमादारिकाचरितवर्णनम् वलहेतु-शरीरबलव बनाम् , 'पीरियहेउ' वीर्यहेतृम् आन्तरिक्शक्तिसम्पादना- थम् , आहारम् आहारयति, स गलु इह लोके एव बहूना श्रमणाना श्रमणीना श्रावकाणा श्राविकाणा च ' हीलणिज्जे जाव' हीलनीयो यावत् , यावत्पदेन, निन्दनीय , विसनीय गर्हणीयो भवेत् , परलोकेऽपि दुःख पाप्नोति, यावत्- चातुरन्तससारकान्तारम् 'अणुपरियटिस्सइ' अनुपर्यटिष्यति भ्रमिष्यति, यथा स चिलातस्तस्करः-चिलाततस्करवदिति भार ॥५०७ ॥ मूलम्-तएण से धपणे सत्थवाहे पचहिं पुत्तेहि सद्धि अप्प- छट्टे चिलाय परिधाडेमाणे२ तण्हाए छुहाए य सते तते परितंते णाण ४ हीलणिज्जे ३ जाव अणुपरियटिरसह जहाव से चिलाए तकरे) अब प्रभु इस चिलात के दृष्टान्त से निर्गन्य आदिको को सबोधित कर प्रतियोधित करते हैं-हे आयुष्मत श्रमणों । इसी तरह जो हमारा निर्ग- न्य श्रमण अथवा श्रमणीजन आचार्य उपाध्याय के पास प्रत्रजित होकर वातावचाले पावत् विश्वसन धर्मवाले इस औदारिक शरीर में कान्ति विशेष प्राप्ति के लिये सौन्दर्य आदिरूप विशेष के लिये, बलव धन के लिये तथा आन्तरिक शक्ति वृद्धिके लिये आहार को लेना है- करता है - वह इस लोक में अनेक श्रमण श्रमणी, श्रावक तथा श्राविका जनों द्वारा हीलनीय यावत् निदनीय, खिसनीय गर्हणीय तो होता ही है-परन्तु पर भवमें भी वह दुःखो कोही पाता है। यावत् ऐसा जीव इस चतुर्गतिरूप ससार कान्तार में चिलात चोर की तरह परिभ्रमण ही करता रहता है। सूत्र ७॥ चेव वहण समणाण४ हीलणिज्जे २ जाव अणुपरियट्टिम्सइ, जहाव से चिलाए नकारे) હવે પ્રભુ તે ચિલાતના ઇન્તને સામે રાખીને નિ થ વગેરેને સબ- ધિત કરીને આજ્ઞા કરે છે કે હે આયુષ્મત શ્રમણે! આ પ્રમાણે જે અમારા નિ થ શ્રમણ અથવા શમણીજન આચાર્ય કે ઉપાધ્યાયની પાસે પ્રજિત થઈને વાન્તાસ્ત્રવવાળા યાવત વિશ્વ સન ધર્મવાળા આ દારિક શરીરમાં કાતિ વિશેષની પ્રાપ્તિ માટે, સૌદર્ય વગેરે રૂપ વિશેના માટે, બળવર્ધન માટે તેમજ આતરિક શક્તિને વધારવા માટે આહાર ગ્રહણ કરે છે તે આ લોકમાં ઘણું શ્રમણ, શ્રમણી, શ્રાવક તેમજ શ્રાવિકાઓ વડે હીલની યાવત નિંદનીય, ખિસનીય અને ગહેણીય તે હોય જ છે પણ સાથે સાથે તે પરભવમાં પણ દુ ખ જ મેળવે છે ચાવત એ જીવ આ ચતુર્ગતિ રૂપ સ સાર કાતારમાં ચિલાત ચેરની જેમ ભટકતું જ રહે છે કે સૂત્ર ૭ છે , भ८७ - , ૧૮૮ ret छिनति, दिया, ''-उनमा गृहीमा वाम् अग्रामिराम-जनावामरहि वाम् अटीमनुमपिष्टपपेश कान | तन पर गिरा तस्यामग्रामिकाया मा०या ' तहाए ' तृष्णयानपिपासमा अमिशा गा 'मिन्दादिमामा ' विस्म- तदिग्भागःपूरिदिशापिपिएल. सर सिंहगुहा बोरपाटीम् ' अगपत ' अस स्मा 'आराचेर' अन्तरामपालगा' कागत'अमौ चोरो मृत्यु प्राप्तवान् । अन्य शाचरित गन्मातरायसेयम् , शाखेतु-उपयोगि चरित तारन्मान भगवतोपदिष्टम् । अध चिलातटष्टान्तन मगान निन्यादीन सोध्य प्रतियोधयति मेव एवमेर अनेन प्रकारेण समजाउमो' आयुन्तः यमणाः ! 'जाव पन्न इए सपाणे ' याग्न मानितः सन्स्योऽस्माक निर्मन्यो वा निधी वा आचार्यों पाध्यायानां समीपे भवनितः मन् 'इमस' अस्य 'योरालियसरीरस्स' औदारिदारीरस्य वान्तात्रयस्य यापद विवसनधर्मरय ' गणहेउ' वर्णहेतु कान्तिविशेषमाप्त्यर्थम् , यानन्-' रूपहेउ 'पहेतु सौन्दर्यापर्यम् , 'वरहेड से बाहर किया और उठाकर सुममा दारिका के मस्तक को काट डाला। उस कटे हुए मस्तक को लेकर फिर निर्जन अटवी में प्रवेश कर गया। उस अरवी में पिपासा से व्याकुल होकर यह पूर्णदि दिशाओ के विवेक से रहित हो गया-इस तरह वह पुनः चहा से पीछे वापिस अपनी सिंहगुरा नामकी चोर पट्टी में नहीं आ सका और वीच ही में साल कलित बन गया। इसका अवशिष्ट चरित्र अधान्तर से जान छेना चाहिये। यहाँ तो भगवान ने जितना चरित्र इसका उपयोगी जाना उतनाही उपदिष्ट किया है ।-(एषामेव समणाउसो ! जाव पन्च इण समाणे इमस्त ओरालियसरीरस बतासवत जाव विद्धसण धम्मस्स घण्णहेड जाच आहार आहारेई से ण इहलोए चेव बट्टण सम નાખ્યું તે કપાએલા માથાને લઈને તે નિજન-ભય કર અટવીમાં પેસી ગયો અટવીમાં તે તરસથી વ્યાકુળ થઈને પૂર્વ વગેરે દિશાઓના વિવેકથી રહિત થઈ ગયે અને આ પ્રમાણે તે ફરી ત્યાથી તે પોતાની સિહડા નામની ચાર પલીમાં કઈ પણ દિવસે પાછા આવી શકે નહિ અને વચ્ચે જ મૃત્યુ પામ્ય તેનું બાકીનું ચરિત્ર બીજ પ્રથમથી જાણી લેવું જોઈએ, અહીં તે ભગવાને જેટલું ચરિત્ર તેનું ઉપયુક્ત જાણ્યું તેટલુ કહ્યુ છે ( एषामेव समणाउसो ! जार पन्छाए समाणे इमस्स ओरालियसरीरस्स वतासवस्स जान विद्धसणधम्मस्स वणहेज जाव आहार ।
अनगारधर्मामृतपिणी टी० अ० १८ सुसुमारिकाचरितवर्णनम् ६९१ तुम्हे ममं देवाणुप्पिया । जीवियाओ ववरोवेह, मंसंच सोणिय च आहारेइ, आहारित्ता, तेण आहारेणं अविद्धत्था समाणा तओ पच्छा इम अग्गामिय अडवि णित्थरिहिह, रायगिह च संपावेहिह, मित्तणाइ० य अभिसमागच्छिहिह, अत्थस्स य धम्मस्स य पुण्णस्स य आभागी भविस्सह । तएण से जेटुपुत्ते धण्णेणं सत्थबाहेण एवं वुत्ते समाणे धण्ण सत्थवाहं वयासी- तुम्भे ण ताओ । अम्हे पिया गुरुजण य देवभूया ठावगा पइ- हावगा सरक्खगा सगोवगा तं कहण्णं अम्हे ताओ। तुम्भे जीवि- याओं ववरोवेमो, तुम्भे णं सस च सोणिय च आहारेमो ? त तुम्भे ण तातो। मम जीवियाओ ववरोवेह, मसंच सोणिय च आहारेह, अग्गामिय अडवि णित्थरह, त चेव सव्व भणइ जाव अत्थरस जाव पुण्णस्स आभागी भविस्सह । तएण धण्ण सत्थ- वाह दोचे पुत्ते एव वयासी-मा णं ताओ। अम्हे जेह भायर गुरुदेवयं जीवियाओ ववरोवेमो, तुम्भे ण ताओ । मम जीवि- याओ ववरोवेह जाव आभागी भविस्सह । एव पचमे पुत्ते तएण से धपणे सत्थवाहे पचण्ह पुत्ताण हियइच्छिय जाणित्ता, त पच पुत्ते एव वयासी-मा ण अम्हे पुत्ता ! एगमविजीवियाओ वव- रोवेमो, एसण सुसुमाए दारियाए णिप्पाणे णिच्चेठे जाव विप्प- जढे, त सेयं खलु पुत्ता । अम्हे सुसुमाए दारियाए मस च सोणिय च आहारेत्तए । तएण अम्हे तेण आहारेण अविद्ध, स्थासमाणा रायगिह सपाउणिस्तामो। तरण त पंच पुत्ता । , ६९० " जाताधर्मया नो संचाएइ चिलाय चोरसेणावई साहत्यि गिहित्तए । सेणे तओ पडिनियत्तइ, पडिनियत्तित्ता जेणेव सा सुसुमा दारिया चिलाएण जीधियाओ ववरोविया तेणेत्र उवागच्छइ, उवाग- च्छित्ता, सुसुमं दारिय चिलाएणं जीवियाओ ववरोवियं पासइ, पासित्ता परसुनियत्तेव चपगवरपायवे धसत्तिधरणियलसि निव- डइ । तएण से धपणे सत्यवाहे पचहि पुत्तेहि सद्धिं अप्पछठे आसत्थे कूयमाणे कदमाणे विलयमाणे महया२ सदेणं कुहूर सुपरुन्ने सुचिर काल वाहमोक्ख करेइ। तएणं से धपणे सत्थवाहे पंचहि पुत्तेहिं सद्धिं अप्पछट्टे चिलायंतीसे अग्गामियाए अडवीए सब्बओ समंता परिघाडेमाणे तण्हाए छुहाए य परिभूए समाणे तीसे अग्गामियाए अडवीए सव्वओ समता उदगस्स मग्गण- गवेसण करेइ, करित्ता सते तते परितते, णिविन्ने, तोसे अग्गा- मियाए अडवीए उदगस्स मम्गणगवेसण करेमाणे नो चेवणं उदग आसादेइ । तएण से धण्णे सत्थवाहे अप्पछ? उदग अणासाएमाणे जेणेव सुसुमा जीवियाओ ववरोविया तेणेव उवागच्छइ, उवागच्छित्ता जेह पुत्त धणदत्त सद्दावेइ, सद्दावित्ता एव वयासी-एव खलु पुत्ता | अम्हे सुसुमाए दारियाए अट्ठाए चिलाय तकर सव्वओ समता परिधाडेमाणा तण्हाए छुहाए य आभिभूया समाणा इमीसे अग्गामियाए अडवीए उदग्गस्स मगणगवेसण करेमाणा णो चेव ण उदगं आसादमो, तएणं उदग, अणासाएमाणा णो सचाएमो रायगिह सपा तण्ण .
भनगारधर्मामृतवर्षिणी टी० अ० १८ सुसुमादारिकाचरितवर्णनम् ६९१ तुम्हे ममं देवाणुप्पिया! जीवियाओ ववरोवेह, मसं च सोणियं च आहारेइ, आहारित्ता, तेणं आहारेणं अबिद्धत्था समाणा तओ पच्छा इमं अग्गामियं अडवि णित्थरिहिह, रायागह च संपावेहिह, मित्तणाइ० य अभिसमागच्छिहिह, अन्थस्स य धम्मस्स य पुण्णस्स य आभागी भविस्सह । तएण से जेट्टपुत्ते धण्णेणं सत्थवाहेण एवं वुत्ते समाणे धण्ण सत्थवाहं वयासी- तुम्भे ण ताओ । अम्हे पिया गुरुजण य देवभूया ठावगा पइ- ट्ठावगा सरक्खगा सगोवगा तं कहणणं अम्हे ताओ तुम्भे जीवि- याओ ववरोवेमो, तुम्भे ण ससं च सोणियं च आहारेमो ? त तुम्भे णं तातो । मम जीवियाओ ववरोवेह, मंसं च सोणियं च आहारेह, अग्गामिय अडवि णित्थरह, त चेव सव्व भणइ जाव अत्थस्स जाव पुण्णस्स आभागी भविस्सह । तएण धण्ण सत्थ- वाह दोचे पुत्ते एव वयासी-मा णं ताओ। अम्हे जेट्ठ भायर गुरुदेवय जीवियाओ ववरोवेमो, तुम्भे गं ताओ। मम जीवि. याओ ववरोवेह जाव आभागी भविस्सह । एव पचमे पुत्ते तएण से धणे सत्थवाहे पचण्ह पुत्ताण हियइच्छिय जाणित्ता, त पच पुत्ते एव वयासी-मा ण अम्हे पुत्ता । एगमाविजीवियाओ वव- रोवेमो, एसण सुसुमाए दारियाए णिप्पाणे णिच्चेठे जाव विप्प- जढे, त सेय स्खलु पुत्ता । अम्हे सुसुमाए दारियाए मस च सोणियं च आहारेत्तए । तएण अम्हे तेण आहारेण अविद्ध, स्थासमाणा रायगिह सपाउणिस्सामो । तरण त पंच पुत्ता , १२ आताधर्मपचारले धपणेणं सत्थवाहेणं एवं वुत्ता समाणा एयमट्ट पडिसुणेति । तएणं धपणे सत्थवाहे पंचर्हिपुत्तेहिं सद्धिं अरणिं करेइ, करित्ता, सरगं च करेइ, करित्ता, सरएणं अरणि महेड, महित्ता अग्गि- पाडेइ, पाडित्ता, अगि संधुरखेड, सधुनिसत्ता दारुयाइ परि- क्खेवेइ, परिवखवित्ता, अग्गिपञ्जालेड, पजालिचा, सुंमुमाए दारियाए मंस च सोणियं च आहारोति। ते ण आहारेण अवि द्वत्था समाणा रायगिह नयर संपत्ता मित्तणाइ० अभिसमणा- गया तस्स य विउलस्स धणकणगरयण जाव आभागो जाया यावि होत्था । तएण से धण्णे सत्थवाहे सुसुमाए दारियाए वहूइ लोइयाइ जाव विगयसोए जाए यावि होत्था ॥ सू०८ ॥ टीका-'तरण से' इत्यादि । ततः खल्ल स धन्य' सार्थवादः पञ्चभिः पुत्र सह आत्मपठः चिलात 'परिधाडेमाणे २' परिधावन् २=पिलात ग्रहीतुकामस्त स्पृष्ठतोऽनुधावन् 'तण्हाए छुहाए य' तृप्णया क्षुधया च ' सते ' श्रान्त , मनसा खिनः, 'तते ' तान्त =शरीरेण हात', 'परितते' परितान्त: मनमा शरीरेण च -तएण से धणे सत्यवाहे । इत्यादि। टीकार्थ-(तएण) इसके बाद (पहिं पुत्तेहिं सद्धि अप्पछट्टे से धण्णे सत्यवाहे ) पांचो पुत्रों के साथ उठा बना हुआ वह धन्यसार्थवाह (चिलाय परिधाडेमोणे २) चिलातचोर को पकड ने की इच्छा से उस के पीछे २ चार बार दौडता हुआ, (तण्हाए छुहाए य सते तते परितते नो सचाइए चिलाय चोरसेणावई साहत्थि गिण्डित्तए) पिपासा और 'तएण से धण्णे सत्यवाहे' इत्यादि- साथ-(तएण) त्या२५४ी ( प चहि पुत्तेहिं सद्धि अप्पछट्टे से धण्णे सत्यवाहे ) पाये पुत्रानी साथै हो त धन्य सार्थ वाड (चिलाय परिधाउमाणे २) ચિલાત ચારની પાછળ પાછળ તેને પકડી પાડવા માટે વાર વાર દેડતા દોડતાં (वहाए छुहाए य सते तवे परित ते नो सचाएह चिलाय चोरसेणावइ साहत्थिं गिण्हित्तए ) त भने भूमथा श्रात 45 भयो, भिन्न मनी गये।
६९३ - . . . अमगारधर्मामृतवपिणी टी० अ० १८ सुसुमादारिकारितवर्णनम् खिन्न:, 'नो सचाएइ 'नो शक्नोति चिलात चोरसेनापति 'साहत्थि' वह स्तेन ग्रहीतुम् । तदा स खलु 'तो' तत =चिलातग्रहणव्यापारात् , ' पडि- नियत्त ' प्रति निवर्तते, प्रनिनित्य, यत्रैव सा सुसुमा दारिका चिलातेन जीवि- ताद् ‘वरोनिया' व्यपरोपिता-पृथक्कृता-मारिता सती पतिता आसीत् तत्रैव उपागच्छति, उपागत्य सुसुमा दारिका चिलातेन जीवितादू व्यपरोपिता पश्यति, दृष्ट्वा 'परमुनियत्तेन ' परशुनिकृत्त इव-परशुच्छिन्नो यथा चम्पकवरपादपस्तद्वत् क्षुधा से प्रान्त हो गयो-खिन्न बन गया, तान्त हो गया-शरीर से मुरझा गया-परितान्त हो गया-इक्दम उत्साह रहित बन गया-सो वह उसे अपने हाथ से पकडने के लिये शक्तिशाली नहीं हो सका-(सेण तओ पडिनियत्तइ, पडिनियत्तित्ता जेणेव लो सुसमा दारिया चिलाएण जीवियाओ ववरोविया-तेणेव उवागच्छद) अतः-वह वहा से लौट आयो-और लौटकर वहाँ गया जहा वह अपनी पुत्री सुसमा चिलातचोर के द्वारा-जीवन से रहित की गई पडी थी। (उवागच्छित्ता सुसमा दारिय चिलाएण जीवियाओ ववरोविय पासइ, पासित्तो परसुनियत्तेव चपगवरपायवे धसत्ति धरणियलसि निवडइ-तएण से धपणे सत्यवाहे पहिं पुत्तेहिं सद्धिं अप्पटे आसत्थे कूयमाणे कदमाणे विलबमाणे महया २ सद्देण कुह २ सुपरुन्ने सुचिर कालवाहमोक्ख करेइ) वहा जाकर उसने सुममा दारिका को चिलातचोर के द्वारा जीवन से रहित की गई देखा। देखते ही वह पुत्रों सहित परशु से काटे गये उत्तम ગયે-શરીર તેનુ ચિડાઈ ગયુ પરિતાત થઈ ગયે-સાવ નિરૂત્સાહી બની ગયે એવી હાલતમાં તે પિતાના હાથથી તેને પકડી પાડવામાં સમર્થ થઇ सध्या नड (से ण तओ पडिनियत्तइ, पडिनियत्तित्ता जेणेष सा सुसमा दारिया चिलाएण जिवियाओ ववरोविया तेणेव उवागच्छइ) तेथीत त्याथी पाछी ફરી ગયો અને પાછો ફરીને તે જ્યા ચિલાત ચાર વડે હણાયેલી પિતાની પુત્રી સુસમાં દારિકા પડી હતી ત્યા ગયે (उवागच्छित्ता सुसुमा दारिय चिलाण्ण जीचियाओ ववरोविय पास पासित्ता परसुनियत्तेव चपगवरपायवे धसत्ति वरणियलसि निवडइ,-तएण से धण्णे सत्यवाहे पवहिं पुत्तेहि सद्धिं अप्पछट्टे आसत्थे कूयमाणे कदमाणे विलय माणे महया २ सदेण कुहू २ सुपरुन्ने सुचिर काल वाहमोक्ख करे ) ત્યા જઈને તેણે સુસમા દારિકાને ચિલાત ચેર વડે હણાયેલી જોઈ જોતાની સાથે જ તે પુત્રની સાથે પરશુ વડે કપાએલા ઉત્તમ ચપક વૃક્ષની herhoftrial आताधर्मस्या धपणेणं सत्थवाहेण एन वुत्ता समाणा एयमर्से परिसुणेति । तएणं धपणे सत्थवाहे पचहिपुत्तेहिं सद्धिं अरणिं करद, करित्ता, सरगं च करेइ, करित्ता, सरपण अराणि महेड, महित्ता अग्गि- पाडेइ, पाडिता, अग्गि संधुसेड, संधुक्सित्ता दारुयाइ परि- क्खेवेइ, परिक्सवित्ता, अगिपनालंड, पज्जालित्ता, सुंसुमाए दारियाए मंस च सोणियं च आहारोंति। ते णं आहारेण अवि- द्वत्था समाणा रायगिह नयरं सपत्ता मित्तणाइ० अभिसमणा. गया तस्स य विउलस्स धणकणगरयण जाव आभागी जाया यावि होत्था । तएण से धण्णे सस्थवाहे सुसुमाए दारियाए वहूइ लोइयाइ जाव विगयसोए जाए यावि होत्था ॥ सू०८ ॥ । टीका-'तएण से' इत्यादि । ततः सल स धन्यः सार्थवाह पञ्चभिः पुत्रै सह आत्मपठः चिलात 'परिधाडेमाणे २' परिधारन् २-चिलात ग्रहीतुकामस्त स्पृष्ठतोऽनुधावन् ‘तहाए छुहाए य' वृष्णया क्षुधया च ' सते' श्रान्त , मनसा खिन्नः, 'तते ' तान्त =शरीरेण हात:, 'परितते' परितान्त: मनमा शरीरेण च . , -तएण से धपणे सत्यवाहे । इत्यादि। टीकार्थ-(तएण) इसके बाद (पहिं पुत्तेहिं सद्धि अप्पछट्टे से धण्णे सत्थवाहे ) पांचो पुत्रों के साथ छठा बना हुआ वह धन्यसार्थवाह (चिलाय परिधाडेमोणे २) चिलातचोर को पकड ने की इच्छा से उस के पीछे २ चार बार दौडता हुआ, (तण्डाए छुहाए य सते तते परितते नो सचाइए चिलाय चोरसेणावई साहत्यि गिमिहत्तए) पिपासा और 'तएण से धण्णे सत्थवाहे' इत्यादि- साथ-(तएण) त्या२पछी ( प चहि पुत्तेहिं सद्धि अप्पछट्टे से धण्णे सत्यवाहे) पाये पुत्रानी साथै ७४ो ते धन्य सार्थ वाई (चिलाय परिधाडेमाणे २) ચિલાત ચિરની પાછળ પાછળ તેને પકડી પાડવા માટે વાર વાર દેડતા દેડતાં (तोहाए छुहाए य सते तवे परित ते नो सचाएह चिलाय चोरसेणावइ साहत्यि गिहित्तए ) त भने भूमथा श्रात थ भयो, भिन्न मनी अनगारधर्मामृतवर्षिणी टी० १० १८ सुसुमादारिकाचरितवर्णनम् माणे ' परिधावन् तृष्णया क्षुधया च ' परिभूए । परिभूतः सन् तस्यामग्रामि कायामटव्या सर्वतः समन्तात्-चतुर्दिक्षु ' उदगस्स ' उदकस्य जलस्य ' मग्गण- गवेसण ' मार्गणगवेपणम् अन्वेपण करोति, कृत्वा श्रान्तः, तान्त , परितान्त णिचिन्ने' निर्षिण -औदासीन्य प्राप्तः । तस्यामग्रामिकायामटव्यामुदकस्य मार्गणगवेपण कुन् नो चैव खलु उदकम् ‘आसादेइ ' आसादयति माप्नोति । ततः खलु स धन्यः सार्यवाह आत्मपप्ठ उदकमनासादयन् पानीयममाप्नुवन् यौन सुसुमा जीविताद् व्यपरोपिता मारिता सती पतिताऽऽसीत् तत्रैव उपाग च्छति, उपागत्य ज्येष्ठ पुत्र धनदत्त शब्दयति, श-दयिता, एवमवदत्-एव खलु में चारो दिशाओ में जल की मार्गणा और गवेपणा करने लगा (करित्ता सतेतते परितते णिचिन्ने तीसे अग्गामिया अडवीए उदगस्स मग्गण गवेसण करेमाणे जो चेच ण उयग आसाण्ड) मार्गणा गवेषणा करके वह श्रान्त, मन से खिन्न, तान्तशरीर से खिन्न और परितान्त-बन गया शरीर एव मन इन दोनो से खिन्न हो गया इस तरह उस अग्रा- मवाली अटवी में उदकपानी की मार्गणा और गवेषणा करते हुए भी उसे जल नहीं मिला (तएण से धण्णे सत्यवाहे अप्पछठे उदग अणा- सापमाणे जेणेव सुसुमा दारिया जीवियाओ ववरोविया-तेणेव उवाग- च्छइ ) तय आत्मपष्ट बना हुआ वह धन्यसार्थवाह उदक प्राप्त नहीं करता हुआ जहां सुसुमादारिका का शव पडा हुआ-या वहा आया -(उवागच्छित्ता जेट्ठ पुत्त धणदत्त सदावेद, सद्दावित्ता एव वयासी) અને સુધા (તરસ અને ભૂખ) થી પીડાઈને તે ગામ વગરની અટવીમા ચોમેર પાણીની માગણ અને વેષણ કરવા લાગે (करित्ता सते तते परितते णिचिन्ने तीसे अग्गामियाए अडवीए उदगम मगणगवेसण करेमाणे णो चेव ण उदग आसाएइ) માર્ગણ તેમજ ગષણ કરીને તે થાત, મનથી ખિન્ન, તાત શરીરથી ખિન્ન અને પરિતાત બની ગયે શરીર તેમજ મન આ બનેથી તે ખિન્ન થઈ ગયે આ પ્રમાણે તે ગમ વગરની અટવીમા ઉદક-પાણી-ની માર્ગણ ગવે પણ કરતા તેને પાણી મળ્યું નહિ (तएण से धण्णे सत्यवाहे अप्पच्छे उदग अणासाएमाणे जेणेव मुमुमा दारिया जीचियाओ ववरोपिया तेणेन उवागच्छइ) ત્યારે આત્મષણ બનેલે તે ધન્ય સાર્થવાહ પાણી ન મેળવતા જ્યા सुसमा हारिनु भ७९ ५यु तु त्या माव्य। ( उपागन्छित्ता जेट्ठ पुत्त धण दत्त सरावेई पहावित्ता एव वयासी) या भावीन तो पोताना भाटा पुत्र ધનદત્તને બેલા અને બોલાવીને તેણે આ પ્રમાણે કહ્યું કે– .
- - હાય કરીને શ્વાસે લેને ઘણીવાર સુધી રડને રહ્યો તેમજ આસૂ પાડતા ६९५ सपुत्रो धन्यः सार्यवाहः । धाति' धम' इति भन्दपूर्वक धरणीतछे निपतति । तत. खल स धन्यः मार्थिवादः आमपष्ट ' भागत्ये आश्चत-उच्छवास सुचन सचेप्टः सन 'बमाणे ' हनन् = अयक्ताद पूर्व 'कंमाणे ' कन्दन उच्चस्तरेण, पुनः 'रिलामाणे ' विपन-रिलाप हुन ' महया महया सदेण महतामहता शदेन-प्रत्युचे. शन्देन र २ गुपरने' यह २ सुपरुदन्-श कुद्द इति शब्दगुच्चार्यात्यर्थ रुदितः सा गुपिर पालापाठपर्यन्त वाहमोक्ख' वाप्पमोक्षम्भश्रुमोचन फरोति । ततः ख म धन्यः सार्थवादः पञ्चभिः पुत्रैः सह आत्मपप्ठ. चिलात तस्यामग्रामियाम् अटव्या सर्वत समन्ताद 'परिधारे चपक वृक्ष के समान "धस" इम शन्द पूर्वक भूमिपर गिर पड़ा। बाद मे पांच अपने पुत्रो के माय आत्मपष्ट पना हुआ वह धन्यसार्थवाह आश्वस्त, उच्छ्वास छोड़ता हुआ मचेष्ट-हो गया सो अव्यक्त शब्द करता हुआ खूप जोर २ से रोने लगा, चिलाप करने लगा। एव बहुत ऊँचे २ शब्दों से कुह कह करता हुआ-हाय सासे लेता हुआ-बहुत देरतक रोता रहा-अश्रुमोचन पूर्वक आदन करता ररा-(ताण से धण्णे सत्यवाहे पचहिं पुत्तेहिं सद्धि अप्पछ? चिलाय तीसे अग्गामियाए अडवीए सव्वओ समता परिधाडे माणे तण्डा छुहाए य परिभूए समाणे तीसे अग्गामियाए अटवीप सन्चओ समता उदगस्त मग्गणगवेसण करेइ) इसके बाद पाचो पुत्रों के साथ आत्मपाठ बना हुआ वह धन्यसा र्थवाह उस अग्रामवाली अटवी में चिलातचोर के पीछे पीछे बार २ दौड़ता हुआ तृषा और क्षुधा से पीडित होकर उस अग्रामवाली अटवी ” શબ્દની સાથે જમીન ઉપર પડી ગયો ત્યારપછી પાચે પગે તેમજ છો તે ધન્યસાર્થવાહ આશ્વસ્ત–ઉ વાસ છોડત-નિસાસા નાખતા સચેટ થઈ ગયે અને અવ્યક્ત શબ્દ કરતે ધ્રુસકે ધ્રુસકે ખૂબ જોરથી ૨૧ दायो, विहा५ ३२५॥ सायो भने गई भाटा सा ' २. डाय આકદ કરતો રહ્યો (तएण से धण्णे सत्यवाहे पचहि पुत्तेहि सद्धि अपछठे चिलाय तीसे अग्गा मियाए अडवीए सध्यओ समता परियाडमाणे तहाए छुहाए य परिभूए समाणे तीसे अग्गामियाए अडवीए सचओ समता उगस्स मग्गणगवेसण करेइ) ત્યારબાદ પા પુત્રની સાથે છો તે ધન્યમાર્થવાહ તે ગામ વગરની નિજેન અટવીમા ચિલાત શેરની પાછળ પાછળ વારવાર रेभ. ધમ > तृषा . - अमगारधर्मामृतवपिणो टी० अ० १८ सुसुपादारिकाधरितवर्णनम् मटवीं 'णित्थरिहिह' निस्तरिष्यथ पारङ्गमिष्यथ, राजगृह च 'सपाविहिह' समाप्स्यथ । मित्तणाई० य' मित्रज्ञातिञ्च मित्रज्ञातिस्वजनसम्बन्धिपरिजनाने 'अभिसमागच्छिहिह' अभिममागमिष्यथ-मित्रज्ञातिप्रभृतिभिः सह सगता भवि. ध्यथ, तथा च ' अत्थस्म' अर्थस्य-धनस्य च धर्मस्य च पुण्यस्य च 'आभागी। अभागिनो = भोक्तारो भविष्यथ । ततः खलु स ज्येष्ठपुत्रो धन्येन सार्थवाहेन एव मुक्तः = अनेन प्रकारेण कथितः सन् धन्यं सार्थवाहमेव मवदत्-हे तात ! यूय खलु अस्माक पिता 'गुरुजणदेवयभूया' गुरुजन- दैवतभूताः देवगुरुजनसदृशाः ठावका ' स्थापकाः नीतिधर्मादी 'पइट्ठा- वका' मतिष्ठापका राजादिसमक्ष स्वपदस्थापनेन प्रतिष्ठाकारकाः तथा संरक्खगा' रिहिय रायगिह च सपावेहिह) इसलिये हे देवानुप्रियो ! तुम मुझे मारडालो और मेरे मांस और रक्त से तुम अपने प्राणोंकी रक्षाकर शरीर के विनाश होने से बचाकर इस अग्रामिक अटवी से पार हो जाओगे-एव राजगृह नगर पहुंच जाओगे। (मित्ताणाइ० य अभि- समागच्छिहिह अत्धस्स य धम्मस्स य पुण्णस्स य आभागी भवि. स्सह, तएण से जेट्टे पुत्रो) वहा पहुँचकर तुम अपने मित्र, ज्ञाति, स्वजन, सबन्धी परिजनो के साथ मिलोगे तथा धन, धर्म और पुण्य के भोक्ता भी बनोगे-इसके बाद उस ज्येष्ठ पुत्र धनदत्त ने (धण्णेणं सत्यवाहेण एव बुत्ते समाणे धण्ण सत्यवाह एव वयासी) धन्यसार्थ- वाह के द्वारा इस प्रकार कहे जाने पर उन अपने पिता धन्यसार्थवाह से इस प्रकार कहा (तुम्भे ण ताओ ! अम्ह पिया गुरुजणयदेवभूया ठावगा अडवि णित्थरिहिह रायगिह च सपावेहिह ) એથી હે દેવાનુપ્રિય ! તમે મને મારી નાખે અને મારા માસ અને રક્તને ખા, પી ખાધા પીધા પછી તમે શરીરના વિનાશથી ઊગરી જશે અને તૃપ્તિ મેળવીને આ ગામવગરની અટવીને પાર કરી જશે અને છેવટે રાજગૃહ નગરમાં પહોચી જશો (मित्ताणाइ य अभिसमागच्छिहिह अत्थस्स य धम्मरस य पुण्णस्स य आभागी भनिस्सह, तएणं से जेट्टे पुत्ते ) ત્યા પહેચીને તમે પિ ના મિત્ર,જ્ઞાતિ, વજન, સ બ ધી પરિજનની સાથે મળશે તેમજ ધન, ધર્મ અને પુને ઉપલેગ કરશે ત્યારપછી મોટા પુત્ર ધનદત્ત (धण्णेण सत्यवाहेण एवे चुत्ते समाणे धण्ण सत्यवाह एव वयासी ધન્ય સાર્થવાહ વડે આ પ્રમાણે કહેવાયા બાદ પોતાના પિતા ધન્ય સાર્થવાહને આ પ્રમાણે કહ્યું કે- , - - हाताच्या हे पुत्राः । य गुंगुमाया दारिकायाः 'मटाप ' अगि निमित पिकात तस्कर पति · सम्पभो ममता' सागः ममन्नान् मटयां चतुर्दिछु ' परिधाडेमामा' परिधानतः 'ता' तणया-पिपामा 'पशुधया च अभिभूतो सन्तः अस्यामग्रामिफायामटल्यामुटयम्य मार्गणगषण कुन्तिी नो चेव खलु उदफमासादयाम', तस पलु उदपम् अनौमादयन्ता मालभमानाः नो शक्नुमो राजगृह समाप्तम् , ' तण ' तत्पर-उस्मान् कारणान् बलु यूय मा हे देवानु प्रियाः ! जीरिताद व्यपरोपयत, मास च शोणित च 'आहारेह' आरयत, आहार्य भुक्त्या. ' तेण आहारेण ' तेन आहारण ' अद्धित्या' अविश्वस्तार शरीरनाराममाता' मन्तः तृप्ता सतः 'तभोपन्छा' तत पत्रात् इमामग्रामिका वहा आकर के उसने अपने जेष्ट पुन धनदत्त को बुलाया और बुलाकर उससे इस प्रकार फरा-(एघ पलु पुत्ता ! अम्हे मुसमा दारियाए अट्ठाए चिलाय तस्कर मपओ समता परिधाडेमाणात छुहाए प अभिभूया समाणा हमी से अग्गामियाए अटपीए उदगस्म मग्गण गवेसण फरेमाणा णो चेव ण उदग आसाएमो-तरण उदग अणासा एमाणा णो सचाएमो रायगिह सपाविता) हे पुत्र सुनो अपने लोग सुसमा दारिका के निमित्त चिलातचोर के पीछे २ सब तरफ सब प्रकार से दौड़ते २ प्यास और भूख से दुखी हो गये हैं रमने इस अग्राम वाली अटवी में पानी की मार्गणा और गवेषणा भी की-परन्तु वह मिला नहीं अतः पानी की प्राप्ति के अभाव में अब राजगृह नगर में पहुँचने के लिये हम असमर्थ बन चुके है । (तएण तुम्हे मम देवाणुप्पिया! जीवियाओ ववरोवेह मस च सोणिय च आहारेइ, आहारिता तेण आहारेण अविद्वत्या समाणा तओ पच्छा इम अगामिय अडवि णित्य ( एव खलु पुत्ता ! जम्हे सुसमाए दारियाए अट्ठाए चिलाय तक्कर सवओ समता परिधाडेमाणा तण्डाए छुहाए य अभिभूया समाणा इमीसे अग्गामियाए अडवीए उदगम मगणगवेसण करमाणाणां चैव ण उदग आसाए मो-तएण उदग अणासाएमाणा णो सचाएमो रायगिह सपावित्तए) હે પુત્ર ! સાભળ, અમે સુસમા દારિકાને મેળવવા માટે ચિલાત ચારની પાછળ પાછળ આમતેમ ચારે તરફ ભટકતા ભટકના તરસ અને ભૂખથી દુખ થઈ ગયા છીએ અમેએ આ ગમ વગરની અટવીમાં પાણીની માગંણ અને ગવેષણ પર કરી છે, પણ અમે હજી મેળવી શકયા નથી એથી હવે પાણીના અભાવમાં અમે રાજગૃહ નગરમાં પહોચી શકીશુ તેમ લાગતું નથી (तएण तुम्हे मम देवाणुप्पिया । जीवियाओं ववरोवेड, मस च सोणिय च आहारेइ, आहारित्ता तेण आहारेण अविद्धत्या समाणा तओ अग्गामिय अमगारधर्मामृतवपिणी टी० अ० १८ सुसुपादारिकाचरितवर्णनम् मटवीं ' णित्थरिहिह' निस्तरिष्यथ-पारगामिप्यथ, राजगृह च 'सपाविहिह' समाप्स्यथ · मित्तणाई० य' मित्रज्ञातिश्च-मित्रज्ञातिस्वजनसम्बन्धिपरिजनान अभिसमागच्छिहिह ' अभिषमागमिष्यथ-मित्रज्ञातिप्रभृतिमि सह सगता भवि. व्यथ, तथा च ' अत्यस्म' अर्थस्य-धनस्य च धर्मस्य च पुण्यस्य च 'आभागी। अभागिनो भोक्तारो भविष्यय । ततः खलु स ज्येष्ठपुनो धन्येन सार्थवाहेन एव मुक्तः = अनेन प्रकारेण कथितः सन् धन्य सार्थवाहमेव मवदत्-हे तात ! यूय खलु अस्माक पिता 'गुरुजणदेवयभूया' गुरुजन- दैवतभूताः देवगुरुजनसदृशाः । ठावका ' स्थापफाः नीतिधर्मादौ पइट्ठा- वका' प्रतिष्ठापका राजादिसमक्ष स्वपदस्थापनेन मतिष्ठाकारकाः तथा 'सरक्खगा' रिहिय रायगिह च सपावेहिह) इसलिये हे देवानुप्रियो ! तुम मुझे मारडालो और मेरे मांस और रक्त से तुम अपने प्राणोंकी रक्षाकर शरीर के विनाश होने से बचाकर इस अग्रामिक अटवी से पार हो जाओगे-एव राजगृह नगर पहुँच जाओगे। (मित्ताणाइ० य अभि. समागच्छिहिह अत्थस्स य धम्मस्स य पुण्णस्स य आभागी भवि- स्सह, तएण से जेटे पुत्ते) वहा पहुँचकर तुम अपने मित्र, ज्ञाति, स्वजन, सयन्धी परिजनो के साथ मिलोगे तथा धन, धर्म और पुण्य के भोक्ता भी बनोगे-इसके बाद उस ज्येष्ठ पुत्र धनदत्त ने (धण्णेणं सत्यवाहेण एव वुत्ते समाणे धष्ण सत्यवाह एव चयासी) धन्यसार्थ- वाह के द्वारा इस प्रकार कहे जाने पर उन अपने पिता धन्यसार्थवाह से इस प्रकार कहा (तुम्भे ण ताओ ! अम्ह पिया गुरुजणयदेवभूया ठावगा अडवि पित्थरिहिह रायगिह च समावेहिह) એથી હે દેવાનુપ્રિય ! તમે મને મારી નાખે અને મારા માસ અને રક્તને ખા, પી ખાધા-પીધા પછી તમે શરીરના વિનાશથી ઊગરી જશે અને તૃપ્તિ મેળવીને આ ગામવગરની અટવીને પાર કરી જશે અને છેવટે રાજગૃહ નગરમાં પહોચી જશે (मित्ताणाइ य अभिसमागच्छिहिह अत्थस्स य धग्मस्स य पुण्णस्स य आभागी भविस्सह, तएण से जेटे पुत्ते ) ત્યા પહોચીને તમે પિ ના મિત્ર,જ્ઞાતિ, સ્વજન,સબ ધી પરિજનેની સાથે મળશે તેમજ ધન, ધર્મ અને પુણ્યને ઉપલેગ કરશે ત્યારપછી મોટા પુત્ર ધનદત્ત (धण्गेण सत्यवाहेण एवे वुत्ते समाणे घण्ण सत्यवाह एव वयासी ધન્ય સાર્થવાહ વડે આ પ્રમાણે કહેવાયા બાદ પોતાના પિતા ધન્ય સાર્થવાહને આ પ્રમાણે કહ્યું કે- - . - उससे इस प्रकार फरा-(एच बल पुत्ता। अम्हे सुसमा दारियाए (एव खलु पुत्ता ! अम्हे सुसमाए दारियाए अट्ठाए चिलाय तक्कर सन्चओ समता परिधाडेमाणा तण्हाए छुहोए य अभिभूया समाणा इमीसे अगामियाए । अडवीए उदगस्स मरगणगवेसण करेमाणा णो चेव ण उदग आसाए मो-तएण Amedwane हे पृप्राः ! यय मुगुमाया दारितापा: 'भद्वार' अर्याय=निमित्त मिलान तम्कर पति · समभो ममता ः गमन्ना भट या पर्दिभु ' परिधाडेमाणा' परिधान राणा कृष्णपा-पिपागंगा, 'हा' या म अभिभूतो सन्तः अस्पामग्रामिफायामटव्यामुदयम्य मार्गणगोषण कुन्तिी नो क्षेत्र खलु उदफमासादयाम', तत पलु उदयम् अनौसादयन्त' मम्ममानाः नो अक्नुमो राजगृह समाप्तम् , 'वण' तम्पल-स्मान् पोरणात् गल यूय मा हे देवानु प्रियाः !जीरिताद व्यपरोपयत, माम च शोणित 'आहारेह' आहारयत, आहार्य=भुक्त्या तेण आहारण ' तेन आहारण ' अद्वित्या ' अविवस्ता:- शरीरनाशममाता' सन्तः तृप्ता सातः 'तभोपन्हा' तत पत्रात् इमामग्रामिका वहा आकर के उसने अपने जेष्ट पुन धनदत्त को बुलाया और बुलाकर अट्ठा चिलाय तस्कर मचओ समता परिधाडेमाणा त छुहाए य अभिभूया समाणा हमी से अग्गामियाए अडवी, उदगस्स मागण गवेसण करेमाणा णो चेव ण उदग आसाएमो-तपण उद्ग अणासा एमाणा णो सचाएमो रायगिर पावित्त) हे पुत्र सुनो अपने लोग सुसमा दारिका के निमित्त चिलातचोर के पीले २ सब तरफ सप प्रकार से दौड़ते २ प्यास और भूग्व से दुखी हो गये हैं रमने इस अग्राम वाली अटची में पानी की मार्गणा और गवेषणा भी की-परन्तु वर मिला नहीं अतः पानी की प्राप्ति के अभाव में अब राजगृह नगर में पहुँचने के लिये हम असमर्थ बन चुके है । (तण्ण तुम्हे मम देवाणुप्पिया! जीवियाओ वरोह मस च सोणिय च आहारेह, आहारित्ता तेण आहारेण अविद्धत्या समाणा तओ पच्छाइम अगामिय अडवि णित्य उदग अणासाएमाणा णो सचाएमो रायगिह सपावित्तए) હે પુત્ર ! સાભળ, અમે સુસદારિકાને મળવા માટે ચિલાત ચારની પાછળ પાછળ આમતેમ ચારે તરફ ભટકતા ભટકના તરસ અને ભૂખથી દુખ થઈ ગયા છીએ અમેએ આ ગામ વગરની અવમાં પાણીની માગંણા અને ગષણ પર કરી છે, પણ અમે હજી મેળવી શક્યા નથી એથી હવે પાણીના અભાવમાં અમે રાજગૃહ નગરમાં પહોચી શકીશુ તેમ લાગતું નથી (तएण तुम्हे मम देवाणुप्पिया । जीवियाओ ववरोवेड, मस च सोणिय च आहारेइ, आहारित्ता तेण आहारेण अविद्धत्या समाणा तओ पच्छा अग्गामिय A - मनगारधर्मामृतवयिणो टी० १० १८ सु सुमादारिकाचरितवर्णनम् रह' निस्तरत-पारगच्छत, 'तचे सच भणइ' तदेवसर्व भणति-यथा धन्य सार्थवाहो ज्येष्ठ पुत्रमवदत् । तथैवायमपि तदेव सर्व स्थयति, यावत् अर्थस्य धर्म- स्य पुण्यस्य च आभागिनो भविष्यथ । ततः खलु धन्य सार्थवाह 'दोच्चे' द्वि तीय पुनधनपालनामा एवमवदत्-मा खलु हे तात । अस्माक ज्येष्ठ भ्रातर 'गुरु देवय ' गुरुदैवत देव-गुरुसदृशम् , जीविताद् न्यपरोपयामः=मारयामः, यूय खलु हे तात ! 'मम' मा धनपालनामान जीविताद् व्यपरोपयत यावत् अर्था- दिफलभाजो भविष्यय । 'एव =अनेन प्रकारेण 'जार पचमेपुत्ते' यावत् पहुच कर वहा अपने मित्रादि परिजनों के साथ मिल सके। तथा धन धर्म एव पुण्य के भोक्ता बन सके। "त चेव सव भण" इसका तात्पर्य यही है कि जिस प्रकार धन्यसार्यवाह ने अपने ज्येष्ठ पुत्र, धन- दत्त से कहा-उसी प्रकार धनदत्त ने भी अपने पिता से वैसाही कहा- (तएण धण्ण सत्यवाद दोच्चे पुत्ते एव वयासी-माण ताओ ' अम्हे जेट्टे भायर गुरुदेवय जीवियाओ ववरोवेमो-तुम्भेण ताओ ! मम जीचि याओ ववरोवेह, मस च मोणिय च आहारेह, अग्गामिय अडवि णिस्थ- रह त चेव सव्र भणइ जाव अत्यस्स जाय पुण्णस्म आभागी भवि स्सह ) इसके बाद धन्यमार्यवाह से उसके द्वितीय पुत्र ने इस प्रकार कहा-हे तात | आप हमारे गुरु देवतातुल्य ज्येष्ठ भाई को जीवन से रहित मत कीजिये किन्तु आप तो हे तात! मुझे ही जीवितसे रहितकर दीजिये और मेरे ही रक्त एव मास को आप खाईये पीईये-ताकि इस अग्रामिक अटवी से पार हो सके इत्यादि पहिले जैसा ही इसने પિતાના મિત્ર વગેરે પરિજનોની સાથે મળી શકે તેમજ ધન ધર્મ અને પુણ્યના ભેતા બની શકે છે चे सव्य भणइ છે અને અર્થ આમ થાય છે કે જેમ ધન્ય સાથ વાહે પિતાના મેટા પુત્ર ધનદત્તને કહ્યું તેમજ ધનદત્ત પણ પિતાના પિતાને કહ્યું (तएण धण्णा सत्थवाहे दोघे पुत्ते एवं वयासी-माणं ताओ ! आम्हे जेद्रे भायर गुरूदेवय जीवियाओ वरोवेमो, तुम्भेण ताओ ! मम जीवियाओ ववरोवेह, मस च सोणिय च आहारेह, जम्गामि य अडवि णित्वरह त चेव सत्र भणइ जाब अत्धस्स जाव पुण्णस्त आभागी भविस्मह ) ત્યારપછી ધન્ય સાર્થવાહને તેના બીજા પુત્રે આ પ્રમાણે કહ્યું કે હે તાત! તમે અમારા ગુદેવતા જેવા મોટા ભાઈને જીવન રહિત ન કરે પણ છે તાત! તમે મને જ મારી નાખે અને મારા જ લોહી અને માસને તમે ખાઓ પીઓ જેથી તમે આ ગામ વગરની અટવીને પાર કરી શકે, આમ .
- . सरक्षकाः यहामारणेः 'सगोगा ' सगोपा परितमः, 'त' तम्तम्मान कारणात् ' फडण ' फथ ग्यलुम्न प्रकारेण पलु तात ! वयं यमान् जीवि वाद व्यपरोपयामा-मारपामः, युग्माकं पलु मांग प शोणित च करम् आहार- याम ? 'त' व तम्माद् गृप ग्पल हे तात! मां धनदत्तनामान जीविता व्य परोपयत-मारयत मम मांस व गागितच आहारयत, अनामिकामटली णित्य पट्टागा संरपगा सगोयगा तं कण्ण अम्हे ताओ! तुम्भे जीवियाओ पवरोवेमो तुम्भ ण मम घमोणिय घ आहारमो अग्गमिय अडविं णित्थरह त चेत्र सन्धमणह जाय अत्यम्म जार पुण्णस्त भाभागी भवि स्सर) हे मात ! आप हमारे पिता है इमलिये आप मेरे लिये देव, गुरु जन के स्थान भून हैं। नीति धर्म आदि में मुझे स्थापित करते रहते हैं। राज आदि समक्ष आप अपने पद पर मुझे पठाते है इसलिये आप मेरे लिये स्थापक एव प्रतिष्ठापक है यथेच्या प्रवृत्ति से आप हमारी सदा रक्षा करते रहते है इसलिपे आप मेरे मरक्षक हैं, दुश्चरित-प्रवृत्ति से आप हमे गेकते रहते हैं इसलिये आप मेरे संगोपक है, तो कैसे मैं हे तात ! आप को जीवन से रहित कर सकता है। और कैसे आप के शोणित और मास को खा सकता है। इसलिये हे तात ! आप ही मुझे जीवन से रहित कर दीजीये और मेरे खून और मास को आप खाइये ताकि आप इस अग्रामिक अश्वी को पार कर सके और राजगृह नगर (तुम्भेण ताओ ! अम्ह पिया गुरुजणयदेवभूया ठावगा पदहावगा सरक्खगा सगोवगा त कहण्ण अम्हे ताओ ! तुम्मे जीवियाओ ववरोरेमो तुम्भ ण मस च सोणिय च आहारेमो अगामिय अडवि णित्थरह त चेव सन्म भणइ जाव अत्थस्स जाव पुण्णस्स आभागी भविस्सह) હે તાત' તમે અમારા પિતા છે, એથી તમે અમારા દેવ અને ગુરૂના સ્થાને છે તમે મને નીતિ ધર્મ વગેરેમાં પ્રવૃત્ત પણ કરતા રહે છે. રાજ વગેરેની સામે તમે પિતાના સ્થાને મને બેસાડે છે એથી તમે મારા સ્થાપક અને પ્રતિષ્ઠાપક છે યથેચ્છા પ્રવૃત્તિથી તમે મારી રક્ષા કરતા રહે છે એથી તમે મારા સ રક્ષક છે, દુશ્ચરિત પ્રવૃત્તિથી તમે મને રોક્તા રહે છે, એથી તમે મારા સગાપક છે તે આવી પરિસ્થિતિમાં છે તાત તમને કેવી રીતે જીવન રહિત બનાવી શકુ અને કેવી રીતે તમારા શાણિત અને માસનું ભક્ષણ કરી શકુ ? એથી હે તાત તમે સુજ ધનદત્તને જ જીવન રહિત બનાવી દે અને મારા ખૂન અને માસનું તમે ભક્ષણ કરો જેથી તમે આ ગામ વગરની અટવીને પાર કરી શકે અને રાજગૃહ નગરમાં . " मैनगारधर्मामृतषिणो टी० म० १८ सुसुमादारिकाचरितवर्णनम् रह' निस्तरत-पारगन्छन्, 'तचेर सन्न भणइ' तदेवसर्व भणति यथा धन्य सार्थवाहो ज्येष्ठ पुत्रमवदत् , तथैवायमपि तदेव सर्व कथयति, यावत् अर्थस्य वर्म- स्य पुण्यस्य च आभागिनो भविष्यथ । ततः खलु धन्य सार्थवाह 'दोच्चे' द्वि तीय' पुनधनपालनामा एवमवदत्-मा खलु हे तात ! अस्मा: ज्येष्ठ भ्रातर 'गुरु देवय ' गुरुदैवत-देव-गुरुसदृशम् , जीविताद् व्यपरोपयामा=मारयाम', यूय खलु हे तात ! 'मम' मा धनपालनामान जीनिताद् व्यपरोपयत यावत् अर्था- दिफलभाजो भविष्यथ । 'एव =अनेन प्रकारेण 'जार पचमेपुत्ते' यावत् पहुच कर वहा अपने मित्रादि परिजनों के साथ मिल सके । तथा धन धर्म एव पुण्य के भोक्ता बन सके। "त चेव सब्च भणड इसका तात्पर्य यही है कि जिस प्रकार धन्यसार्थवाह ने अपने ज्येष्ठ पुत्र, धन- दत्त से कहा-उसी प्रकार धनदत्त ने भी अपने पिता से वैसाही कहा- (तएण धपण सत्यवाह दोच्चे पुत्ते एव वयासी-माण ताओ ! अम्हे जेट्टे भायर गुरुदेवय जीवियाओ ववरोवेमो-तुम्भेण ताओ ! ममं जीवि- याओ ववरोवेह, मस च सोणिय च आहारेह, अग्गामिय अडवि णित्य- रह त चेव सन्ध भणइ जाव अत्यस्स जाव पुण्णस्स आभागी भवि स्सह ) इसके बाद धन्यमार्यवाह से उसके द्वितीय पुत्र ने इस प्रकार कहा-हे तात ! आप हमारे गुरु देवतातुल्य ज्येष्ठ भाई को जीवन से रहित मत कीजिये फिन्तु आप तो हे तात ! मुझे ही जीवितसे रहितकर दीजिये-और मेरे ही रक्त एव मास को आप ग्वाईये पीईये-ताकि इस अग्रामिक अटवी से पार हो सके इत्यादि पहिले जैसा ही इसने પિતાના મિત્ર વગેરે પરિજનની સાથે મળી શકે તેમજ ધન ધર્મ અને પુણ્યના ભોકતા બની શકે છે त चेर सब्र भणइ છે આ અર્થ આમ થાય છે કે જેમ ધન્ય સાથ વાહે પિતાના મોટા પુત્ર ધનદત્તને કહ્યું તેમજ ધનદત્ત પણ પિતાના પિતાને કહ્યું (तएण धण्ण सस्थवाहं दोच्चे पुत्ते एवं बयासी-माण ताओ ! अम्हे जेद्वे भायर गुरूदेवय जीवियाओ ववरोवेमो, तुम्भेग ताभो ! मम जीवियाओ ववरोवेह, मस च सोणिय च आहारेह, अम्गामि य अडर्षि णित्यरह त चेव सन्न भणइ जाव अत्थस्स जाव पुण्णस्त आभागी भविस्मह ) ત્યારપછી ધન્ય સાર્થવાહને તેના બીજા પુત્રે આ પ્રમાણે કહ્યું કે હે તાત! તમે અમારા ગુરુદેવતા જેવા મોટા ભાઈને જીવન રહિત ન કરે પણ હે તાત? તમે મને જે મારી નાખે અને મારા જ લેહી અને માસને તમે ખાઓ પીઓ જેથી તમે આ ગામ વગરની અટવીને પાર કરી શકે, આમ - - 160 आतापर्मणा पञ्चमः पुत्रान्तीयो धनदेवगतों धनगोप', पभमो धनगविताऽप्यपदद । ततः इत्य तेषां पचनश्राणानन्तरं, खलु स धम्पः सार्थयार पत्रपुत्राणां 'हियाछिय' हृदयेष्टम्-हदयेप्सित माया तान पुपार एपम पाटीद-मा गलु वय हे पुत्रा.! एकमपि अस्माक मध्येएपमपि जीरिताद् व्यपरोपयाम तत् खलु मुसुमाया दारिकायाः शरीर ‘णिप्पाण' निष्प्राण माणरहितम् , ' णिन्चेट्ट' निश्चेष्ट- चेष्टारहितम् ‘नीवरिप्पनटे ' जीविप्रत्यक्तम्-जीपदीनम् , सर्यया मृतमस्ती त्यर्थ, तय =उचित खलु हे पुप्राः ' अम्द अस्मारम् मुमुमाया दारिकाया मास च शोणित च आहर्तुम् , ततः तदनन्तर च खलु य तेन आरेण सय करा (एच पचमे पुत्ते) इसी तरह उससे तृतीय धनदेवने चतुर्थ धनगोपने ण्य पाचवे धनरक्षित ने भी कहा-(तपण से धण्णे सत्यवाहे पचर पुत्ताण हियइच्छिय जाणित्ता त पचपुत्ते एव वयासी) इस के पाद उस धन्यसार्थवार ने पाचों पुत्रों के अभिप्राय को जानकर उन अपने पाचों ही पुत्रों से इस प्रकार का-(माण अम्हे पुत्ता ! एगमधि जीवियाओ ववरोवेमो पसण सुसमा दारियाए सरीरए णिप्पा णि. च्चे? जीवविप्पजढे-त सेय खलु पुत्ता! अम्ह सुसमा दारियाए मस घ सोणिय च अहारेत्तए) हे मेरे पुत्रों ! में एक को भी जीवन से रहित नहीं करना चाहता है किन्तु यह सुसमादारिका का शरीर जो कि निष्प्राण, निश्चेष्ट, और जीवन से रहित बन गया है इसलिये हमे उचित है कि हे पुत्रों ! हम इस सुसमदारिका का मास एव शोणित તેણે પહેલાની જેમ જ બધુ કહ્યું एव पचमे पुत्ते) मा प्रभारी ४ ते ત્રીજા ધનવે, ચોથા ધનગોપે અને પાચમા ધનરક્ષિતે પણ કહ્યું (तएण से धण्णे सत्यवाहे पचण्ह पुत्ताण हियइच्छिय जाणिता त पच पुत्ते एव क्यासी) ત્યારપછી તે ધન્ય સાર્થવાહ પાચે પુત્રની હત્યની અભિલાષા જાણીને પિતાના તે પાચે પુત્રને આ પ્રમાણે કહ્યું કે- (माणं अम्हे पुत्ता ! एगमवि जीवियाओ ववरोवेमो एसण सुसमाए दारि याए सरीरए णिप्पाणे णिच्चे? जीविष्पजढे-त सेय खलु पुत्ता ! अम्ह सुम माए दारियाए मस च सोणिय च आहारेत्तए) હે મારા પુત્ર તમારામાંથી એકને પણ હું મારવા માગતા નથી પરંતુ આ સુમમા દારિકાનું શરીર કે જે નિમ્બાણ, નિશ્ચ અને નિર્જીવ બની ગયું છે–એટલા માટે અમારા માટે હે પુત્ર! એ જ એ છે કે આપણે આ સુસમા દારિતાના માસ અને શોણિતને ખાઈએ !
. - मनगारधर्मामृतापणी टी० अ० १८ सुसुमादारिकावरितवर्णनम् ७०९ विद्धत्था समाणा' अवि-मस्ताः-शरीरनाशमप्राप्ताः सन्त रानगृह 'सपाउणि स्सामो ' समाप्स्याम । ततः खलु ते पञ्चपुत्रा ध येन सार्थवाहेन एवमुक्ताः सन्तः 'एयमह' एतमर्थम् पूर्वोक्तरूपम् 'पडिमुणेति' प्रतिशृण्वन्ति-स्वीकु वन्ति । तत खलु स धन्यः सार्थवाहः पञ्चभिः पुत्रै सार्द्धम् 'अरणि' अरणि यस्मिन् मध्यमानेऽग्निरुत्पद्यते तत्काष्ठम् 'करेड' करोतिसगृहाति, कृला 'सरग' सरसम्-निर्मन्थनकाष्ठ करोति-आनयति कृत्वा, सरकेण अरणि मनाति-धर्षयति गथित्वा, 'अग्गि पाडे' पातयति मन्यनवशादग्निमुत्पादयति 'पाडित्ता' पात खावें । (तएण अम्हे तेण आगरेण अविद्धत्था समाणा रायगिह सपाउ- णिस्सामो-तएण ते पच पुत्ता धणेणं सत्यवाहेण एक्वुत्ता समाणा एयमट्ठ पडिसुणे ति) इस से हमलोग उस आहार से शरीर नाश को अप्राप्त होकर राजगृह नगर में पहुँच जावेंगे। इस प्रकार धन्यसार्थवाह के द्वारा कहे गये उन पाचों पुत्रो ने धन्यसार्थवाह के इस कथन को स्वी कार कर लिया । (तएण धपणे सत्यवाहे पचहिं पुत्तेहिं सद्धि अरणिक- रेइ, करित्ता सरगच करेइ, करित्ता सरगण अरणिं महेइ, महित्ता अ गि पाडेइ, पाडित्ता अग्गि सधुक्सेड, सधुरिखत्ता दारुयाइ परिक्खवेइ परिक्खवित्ता अग्गि पजालेइ पज्जालित्ता सुसमाए मस च सोणिय च आहारे ति) इस के बाद धन्यसार्थवाह ने पांचो पुत्रों के साथ मिल- कर अरणिकाष्ठ को एकत्रित किया। एकत्रित कर के फिर वह सरक काष्ठ को निर्मथनकाष्ठ को ले आया-उसे लेकर के उसने उससे अरणि का घर्पण किया। इस तरह घपण से अग्नि उत्पन्न हो गई । अग्नि के (तएण अम्हे तेण आहारेण अविद्धत्था समागा रायगिह सपाउणिस्सामो तएण ते पच पुत्ता धण्णेण सत्थवाहेण एव वुत्तासमाणा एयमट्ठ पणिमुणेति) એથી આપણે બધા આ આહારથી શરીર નાશથી ઊગરી જઈને રાજ- ગ્રહ નગરમાં પહોચી જઈશું આ પ્રમાણે ધન્ય સાર્થવાહ વડે કહેવાયેલા પાચે પુએ ધન્ય સાર્થવાહની તે વાતને સ્વીકારી લીધી (तएण धण्णे सत्यवाहे पचहि पुत्तेहिं सद्धिं अरणि करेइ, करित्ता, सरग च करेइ, करित्ता सरएण अाणि महेइ, महित्ता अग्गि पाडेइ, पाडिता अम्गि सधु क्खेइ, सधुकिवचा दारूपाइ परिक्खवेइ, परिक्खवित्ता अग्गि पजनालेइ, पज्जा लित्ता सुसमाए दारियाए मस च सोणिय च आहारेंति ) ત્યારપછી ધન્ય સાર્થવાહે પાચે પુત્રની સાથે મળીને અરણિ કાઇને એકઠું કર્યું એકઠું કરીને તેઓ સરક કાઇનેનિમ થી કાઈને લઈ આવ્યા તેને લઈને તેણે તેથી અરણિકા કાનુ ઘર્ષણ કર્યું આ પ્રમાણે ઘર્ષણથી અગ્નિ .
- - 166 बाताया पञ्चमः पुत्रावतीयो धनदेवशर्यो धनगीपः, पामो धनसिताऽऽयमदद । ततः इत्थं तेप िपनपणानन्तर, खलु स धन्यः सायाः पत्रपुत्राणां 'दिपारिय' हृदयेष्टम् हृदयेप्सित शात्या तान पुमा एमादीद-मा बलु वय हे पुषा । एकमपि अस्माक मध्येपकमपि नीरिवाद्यपरोपयाम पद ख मुमुमाया दारिकायाः शरीर ‘णिप्पाण' निष्प्राण-प्राणरहितम् , 'णिच्चेट' निश्चेष्ट- चेष्टारहितम् 'जीपपिप्पजदे ' जीवविप्रत्यक्तम् जीवहीनम् , सर्वथा मृतमस्ती त्य', वय -उचित खलु हे पुत्राः ' अद' अस्मारम् मुमुमाया दारिकाया मास च शोणित च आहर्जुम् , ततः तदनन्तर च खलु वय तेन आरेण ' सप कहा (एव पचमे पुत्ते) इसी तरह उससे तृतीय धनदेवने चतुर्थ धनगोपने एव पांचवे धनरक्षित ने भी कहा-(तण्ण से धण्णे सत्यवाहे पचण्डं पुत्ताण रिपइच्च्यि जाणित्ता त पचपुत्ते एव वयासी) इस के पाद उस धन्यसार्थवार ने पायों पुत्रों के अभिप्राय को जानकर उन अपने पाचों ही पुत्रों से इस प्रकार का-(माण अम्हे पुत्ता ! एगमवि जीवियाओ वधरोवेमो एसण सुसमा दारियाए सरीरए णिपाए णि च्चे? जीवविप्पजढे-त सेय खलु पुत्ता! अम्ह सुसमाए दारियाए मस घ सोणिय च अहारेत्तए) हे मेरे पुत्रों ! में एक को भी जीवन से रहित नहीं करना चाहता है किन्तु यर सुसमादारिका का शरीर जो कि निष्प्राण, निश्चेष्ट, और जीवन से रहित बन गया है-इसलिये हमे उचित है कि हे पुत्रों ! हम इस सुसमदारिका का मास एव शोणित तेरे पानी मेम मधु ४ (एप पचमे पुत्ते) मा प्रभारी aa ત્રીજા ધનદેવે, ચેથા ધનગોપે અને પાચમા ધનરક્ષિતે પણ કહ્યું (तएण से धण्यो सत्यवाहे पचण्ड पुत्ताण हियइच्छिय जाणित्ता त पच पुत्ते एव क्यासी) ત્યારપછી તે ધન્ય સાર્થવાહે પાયે પુત્રની હત્યની અભિલાષા જાણીને પિતાના તે પાચે પુત્રને આ પ્રમાણે કહ્યું કે (माण अम्हे पुत्ता ! एगमवि जीवियाओ ववरोवेमो एसण सुसमाए दारि याए सरीरए णिप्पाणे णिच्चेट्टे जीवविप्पजढे-त सेय खलु पुत्ता! अम्ह सुस- माए दारियाए मस च सोणिय च आहारेचए) હે મારા પુત્રે તમારામાંથી એકને પણ હું મારવા માગતા નથી પરંતુ આ સુષમા દારિકાનું શરીર કે જે નિઝાણ, નિશ્ચષ્ટ અને નિર્જીવ બની ગયુ છે એટલા માટે અમારા માટે હે પુ! એ જ યોગ્ય છે કે આપણે આ સુસમાં દારિકાના માસ અને શોણિતને ખાઈએ ७०३ मनगारधर्मामृतवषिणी टीका १० १८ सुसुमादारिकाचरितवर्णनम् मृतकृत्यानि कृत्वा कालान्तरे 'विगयसोगे' विगतशोक =सुसुमामरणजनितशोक- रहितो जातश्चास्यभूत् ।। सू०८॥ मूलम्-तेण कालेणं तेणं समएणं समणे भगव महावीरे गुणसिलए चेइए समोसढे।से णं धपणे सत्थवाहे सपुत्ते धम्म सोचा पवइए, एकारसंगवी । मासियाए संलेहणाए सोहम्मे उववण्णो, महाविदेहे वासे सिज्झिहिइ। जहा वि य णं जम्बू। धण्णेण सत्थवाहेणं णो वण्णहेउ वा नो रूवहेउ वा नो वलहेउ वा नो विसयहेउ वा सुसुमाए मससोणिए आहारिए, नन्नत्थ एगाए रायगिहं सपावणटुयाए। एवामेव समणाउसो । जो अम्हं निग्गंथो वा निग्गंथी वा इमस्स ओरालियसरीरस्स वता- सवस्स पित्तासवस्स सुकासवस्स सोणियासवस्स जाव अवस्सं विप्पजहियवस्स वा नो वण्णहेउ वा नो रूवहेउ वा नो बल- हेउ वा नो विसयहेउ वा आहारे आहारेइ, नन्नत्थ एगाए से णं इहभवे चेव वहूणं समणाणं बहूणं समणीणं वहणं सावयाणं वहणं सावियाण अच्चणिजे जाव वीइवइस्सइ। एव खल्लु जम्बू । समणेणं भगवया महावीरेणं जाव संपत्तेणं अट्टारसमस्त णायज्झयणस्स अयम? पण्णत्ते त्तिवेमि ॥सू०९॥ ॥ अट्ठारसम अज्झयण समत्तं ॥ सिद्धिगमणसपावणट्टयाए, टीका-तण कालेण' इत्यादि । तस्मिन् काले तस्मिन् समये श्रमणो भगनान् महावीरो गुणशिलके चैत्ये 'समोसढे' समरसृतः तीर्थकरपरम्परया सुसमा दारिका के मरणोत्तर काल में जो भी लौकिक कृत्य कियेजाते -वे सब भी उन्होने किये और धीरे • विगत शोक भी हो गए।०८। લૌકિક કૃત્ય કરવા જોઈએ તે સર્વે તેમણે પતાવ્યા અને ધીમે ધીમે તેઓ શંકરહિત પણ બની ગયા છેસૂત્ર ૮ !
- ७२ ताजा विद्या-उत्पाद अम्मि 'साई' गमयति-उडीपयति, सपउरीप्य पदार याई 'दारुमाणिन्धनानि तम परिसिह परिलिपति, परिक्षिप्य, गम्मि मनालयति, मजाल्प, मुगुमाया दारिताया भनित मांस च भोणित च 'माहा रेइ' आहारयति । मन तर तेन पारेण ' अदित्या ' अधिवस्तारीरना शममाप्ताः सन्ती राजगृह नगर ममामा: 'मितणाई अभियमणागया' मित्र ज्ञाति-मिरमातिम्मननसम्पन्धिपरिजन मह 'अमिममगागा' अमिसमन्वागता' समिलिताः सन्नः तस्य च विपुलस्य 'धगयणगरयण जार' पनकनक रत्न याक्ट धनकनकरत्नादिकस्य 'आभागी जाया यावि होत्या' आमागिनो जाताया प्यभरन् । तत. खल स धन्प' सार्थबाट मुमृमाया दारिकाया पनि लौकिकानि उत्पन्न होने पर उसने फिर से धौका-उद्दीपित किया जब वह जी पित हो चुकी-तय उसने उसमें लकड़ियों को लगाया- इस तरह की क्रिया से जप अग्नि अच्छी तरह प्रज्यलित हो चुकी-तब उसमें सुसमा दारिका के माम को और खून को भजा-भूजकर उसे सबने बापो पीया (तेण आशरेण अविद्वत्या समाणा रायगिह नयर सपत्ता मित्त णाइ० अभिसमणागया तस्स य विउलस्स चणकणगरयण जाव आभागी-जाया यायि होत्या ताण से धणे सत्यवाहे सुममा दारिया ए पहइ लोइयाइ जाब विगयोए याविरोत्या) इस प्रकार उस आहार की सहायता से अविश्वस्त शरीर रोकर वे वहा से चल कर राजगृह नगर में आ गये। वहाँ अकोर वे अपने मित्रजाति आदि परिजनों से खूब हिले मिले । एव धनकनक आदि द्रव्य के भोक्ता भी बन गये। ઉત્પન્ન થઈ ગયે અમિ ઉત્પન્ન થયા બાદ તેણે તેને ઉપિત કર્યો જ્યારે તે ઉદ્દીપિત થઈ ગયે ત્યારે તેણે તેમાં લાકડીઓ મૂકે આ રીતે જ્યારે સારી રીતે અગ્નિ પ્રજવલિત થઈ ગયે ત્યારે તેમાં મુસમા દરિકાના માસને અને લેહીને કયા, શેકયા બાદ તેને બધાએ ખાધા-પીધા ( तेण आहारेण अविद्धत्या समाणा रायगिह नयर सपत्ता, मित्तणा३० अभिसमणा गया, तस्स य विउलस कणगरयण जाव आभागीजाया यावि होत्या तएण से धण्णे सत्यवाहे सुसमाए दारियाए बहूइ लोइयाइ जाव विगय सीए यानि होस्था) આ પ્રમાણે તે આહારની સહાયતાથી અનિષ્ટ શરીરવાળા થઈને તેઓ ત્યાથી રવાના થઈને રાજગૃહ નગરમાં આવી ગયા ત્યા આવીને તેઓ પિતાના મિત્ર જ્ઞાતિ વગેરે પરિજનની સાથે ખૂબ આનંદ-પૂર્વક મજ્યા, અને ધન કનક વગેરે દ્રવ્યોને ભેગવવા લાગ્યા અસમા દારિકાના મ ।
७०३ भनगारधर्मामृतवषिणी टीका अ० १८ सुलुमादारिकाचरितवर्णनम् मृतकृत्यानि कृत्वा कालान्तरे ' विगयसोगे' विगतशोक =सुसुमामरणजनितशोक- रहितो जातथास्यभूत् ॥ सू० ८॥ मूलम्-तेण कालेणं तेणं समएणं समणे भगव महावीरे गुणसिलए चेइए समोसढे।से गं धपणे सत्थवाहे सपुत्ते धम्म सोचा पव्वइए, एकारसंगवी। मासियाए संलेहणाए सोहम्मे उववण्णो, महाविदेहे वासे सिज्झिहिइ। जहा वि य णं जम्बू। धण्णेण सत्थवाहेणं णो वण्णहेउ वा नो रूबहेडं वा नो वलहेउ वा नो विसयहेउ वा सुसुमाए मससोणिए आहारिए, नन्नत्थ एगाए रायगिहं सपावणट्टयाए । एवामेव समणाउसो । जो अम्हं निग्गंथो वा निग्गंथी वा इमस्स ओरालियसरीरस्स वंता. सवस्स पित्तासवस्स सुक्कासवस्स सोणियासवस्स जाव अवस्सं विप्पजहियव्वस्स वा नो वण्णहेउ वा नो रूवहेउ वा नो वल. हेउ वा नो विसयहेउ वा आहारे आहारेइ, नन्नत्थ एगाए सिद्धिगमणसपावणट्टयाए, से णं इहभवे चेव वहणं समणाणं बहणं समगीणं बहूणं सावयाणं वहणं सावियाण अञ्चणिजे जाव वीडवइस्सइ । एव खलु जम्बू । समणेणं भगवया महावीरेणं जाव सपत्तेणं अट्ठारसमस्त णायज्झयणस्स अयमट्टे पण्णत्ते त्तिवेमि ॥सू०९॥ ॥ अट्ठारसम अज्झयण समत्तं ॥ टोका-तण कालेण' इत्यादि । तस्मिन् काले तस्मिन् समये श्रमणो भगगन् महावीरी गुणशिलके चत्ये 'समोसढे' समरसूत' तीर्थंकरपरम्परया सुसमा दारिका के मरणोत्तर काल में जो भी लौकिक कृत्य कियेजाते -वे सय भी उन्होने किये और धीरे २ विगत शोक भी हो गए सू०८। લૌકિક કૃત્ય કરવા જોઈએ તે સર્વે તેમણે પતાવ્યા અને ધીમે ધીમે તેઓ શંકરહિત પણ બની ગયા છે. સૂત્ર ૮ !
७०४ , . समागतः । अनन्तर स धन्यः साधार सपुत्रो धर्म श्रुत्वा प्रबजित', प्रान्यान न्तरम् ' एगारमगी' फादशाहापिन् एकादशामिनो जातः ' मासिगाए' मासिण्या सलेखनया काल या 'सोहम्मे सौधर्म यल्प 'उपपन्नः' । पुनः तत प्रत्युतः महाविदेह वर्षे सिनिसाहिर' सेत्स्यति-मुक्ति पारस्पति। सम्प्रति धन्यसार्थ पाइष्टान्तेन नम्भूमामिन सम्मोप्य श्रीधर्मासामीप्राद'जहा विइत्यादिना- तेण फालण तेण समाण इत्यादि। टीकार्थ-(तेण फाटेण तेण समाण) उम काल और उस समय में (समणे भगपं महावीरे) अमण भगवान महावीर (गुणसिला चेहए समोसढे, से ण धण्णे सत्थराहे मपुरी धम्म सोचा पवाए-का रसगवी-मामिया सलेहणाए सोहम्मे उववणे, महाविदेहे वासे सि ज्झिहिइ) गुणशिलक उद्यान में आये। उनसे धर्म का उपदेश सुनकर वह धन्यसाचोर अपने पाचों पुत्रों सहित उनके पास प्रवजित हो गया। मनजित होकर धीरे • वह एकादशागों का ज्ञाता भी रो गया। अन्न समय में उसने एक मास की सलेखना धारणकर काल अवसर काल किया तो उसके प्रभाव से वर सौधर्म कल्प में उत्पन्न हो गया। वहा से चब कर अब वर महाविदेर क्षेत्र में मुक्ति को प्राप्त करेगा। इस धन्यतार्थवाद के दृष्टान्त से जवू स्वामीको सवोधितकर के श्री तेण कालेण तेण समरण' इत्यादि-- Aste---(तेण कालेण तेण समपण) aगे मने त समये (समणे भगव महावीरे) म सपान भडापार (गुणसिलए चेइए समोसढे । सेण धण्णे सत्यवाहे सुपुत्ते धम्म सोचा पाइए-एक्कारस गवरी-मासियाए स लेहणाए सोहम्मे उवषण्णे, महाविदेहे वासे सिज्झिहि ) ગુણશિલક ઉદ્યાનમાં આવ્યા તેમની પાસેથી ધર્મોપદેશ સાંભળીને તે ધન્ય સાર્થવાહ પિતાના પાચે પુત્રની સાથે તેમની પાસે પ્રજિત થઈ ગયો પ્રવજિત થઈને તે ધીમે ધીમે એકાદશી (અગિયાર) અને જ્ઞાતા પણ થઈ ગયે છેવટે મૃત્યુ સમયે એક માસની સલેખન ધારણ કરીને કાળ અવ સરે તેણે વાળ કર્યો તે તેના પ્રભાવથી સૌધર્મ ૦૫માં ઉત્પન્ન થઈ ગયો ત્યાથી ચીને હવે તે મહાવિદેહ ક્ષેત્રમાં મુક્તિ પ્રાપ્ત કરશે આ ધન્ય સાથે વાહના દાન્તને સામે રાખીને શ્રી સુધર્મા સ્વામીએ જ બૂ સ્વામીને સ બોધિત जनगारधर्मामृतवपिंगी टीका २०१८ सुसुमादारिकाचरितवर्णनम ८०५ महावि य ण' यथाऽपि च खलु येन प्रकारेण खलु हे जम्यूः! धन्येन सार्थवाहेननो वर्णहेतोः = नो रूपहेतो. चलहेतोःनो विपयहेतो. सुसुमाया दारिकाया मास. शोणितमाहारितम् , एगाए रायगिहसंपावणट्टयाए' एकस्य राजगृह सप्रापणार्यताया अन्यत्र न, किन्तु-अह राजगृह समाप्नुयाम् इति हेतोरेव तेन पुरैः सह तद आहारितमिति भाव । भगवानाह-एवामे' एवमेव भनेन प्रकारेणैव 'समणाउसो' हे आयुष्मन्तः श्रमणाः योऽस्माक निग्रन्यो वा निर्ग्रन्थी वा अस्य वान्तास्रवस्य पित्ता. सुधर्मा स्वामी ने उनसे कहा-(जही वि य ण जत्रु ! धण्णेण सत्थचाहेण णो वण्ण हेउ चानो रूपहेड वा नो बलहेउ वा नो विसयदेउ वा सुसुमाए मंससोणिए आहारिए नन्नत्थ एगाए रायगिहं संपावणट्टयाए-एवामेव सम गाउसो। जो अम्ह निग्गयो वा निग्गंधीचा इमरस ओरालियसरीर स्स वतासवस्स पित्तासवस्स सुरकासवस्स सोणियासवस्स जाव अव. स्स विप्पजहियवस्स नो वण्णहेउ वा नो ख्वहेउ वा नो घलहेड वो नो विसयहेउ आदर अहारेड, नन्नत्थएगाण सिद्विगमणसपावणट्टयाए) हे जबू! जिस तरह धन्यसार्यवाह ने अपने शरीर में कान्ति विशेष चढाने के लिये, बल बढाने के लिये, अथवा विषय सेवन की शक्ति ढाने के लिये सुसुमा दोरिका का मास एव शोणित नहीं खाया। कितु मैं पुत्रों के सहित राजगृह नगर में पहुँच जाऊँ इसी एक अभि प्राय से सुसुमा दारिका का अपने पुत्रों मरित मास शोणित सेवन किया-इसी तरह हे आयुग्मत श्रमणो ! जो हमरा निर्ग्रन्थ श्रमण जन अथवा श्रमणी जन है-यह इस वान्ताम्रवधाले, पित्तानववाले, शुक्रान. કરીને આ પ્રમાણે કહ્યું કે – (जहा वि य ण जवू! धण्णेण सत्यवाहेणं णो वण्णदेउ वा नो रूवहेउ वा नो वलहेउ वा नो विसयदेउ वा सुमुमाए ममसोगिए आहारिए नन्नत्थ एगाए राय- गिह, संपावणट्ठयाए एवामेव समणाउसो ! जो अम्ह निग्गयो वा निग्गयी वा इमस्स ओरालियसरीरस्स बतासवस्स पित्तासवस्स मुक्कासवस्स सोणियासवस्स जाव अपस्से विप्पजहियवस्स नो वण्णहेउ वा नो रूबहेउ या नो वल हेउ वा नो विसयदेउ वा आहार आहारेइ, नन्नत्य एगाए सिद्धिगमणसपावणट्ठयाए) હે જ બૂ! જેમ ધન્ય સાર્થવાહે પિતાના શરીરમાં કાતિ વિશેષની વૃદ્ધિ કરવા માટે બળની વૃદ્ધિ માટે અથવા વિષય સેવનની શક્તિના વર્ધન માટે સુસુમા દારિકાના માસ અને શેણિત નહિ ખાધા, પણ પુત્રે સહિત હુ રાજ ગુડ નગરમાં પહોચી જાઉં આ એક જ મતલબથી પિતાના પુત્રની સાથે સુસુમા દારિકાના માસ-શેણિત સેવન કર્યો આ પ્રમાણે આયુષ્મત શ્રમ જે અમારા નિગ્રંથ શ્રમણુજન અથવા શ્રમણીજને છે તેઓ આ વાતા - मम ७०४ f माधीच्या समागतः । अनन्तर स धन्यः सार्थमा सपुत्रो धर्म श्रुत्वा प्रबजितः, प्राज्यान- न्तरम् ' एपारसगी' कादगानापिन् एकादशामिनो मातः 'मासिगए' मासिस्या सलेखनया यालं त्या 'सोहम्में सौधर्म कल्पे 'उपपन्न.'। पुनः तत प्रत्युतः महानिदेहे वर्षे सिन्सिाहिर' सेत्स्पति-मुक्ति मास्यति । सम्प्रति धन्यसार्थ बाहरप्टान्तेन जम्भूस्वामिन सम्मोप्य श्रीसुधर्मासामीप्रार'जहा वि इत्यादिना- तेण कालेण तेण समाण इत्यादि। टीकार्थ-(तेण फाटेणं तेण समाणं) उस काल और उस समय में (समणे भगव महावीरे) श्रमण भगवान् महावीर (गुणसिलए चेहए समोसढे, से णं घण्णे सत्यवाहे मपुत्ते धम्म सोचा पठ्याए-का रसगवी-मासिया सलेरणा सोहम्मे उववणे, महाविदेहे वासे सि ज्झिहिह) गुणशिलक उद्यान में आये। उनसे धर्म का उपदेश सुनकर वर धन्यसाचार अपने पाचों पुत्रों सहित उनके पास प्रबजित हो गया। प्राजित होकर धीरे २ वह एकादशागों का ज्ञाता भी हो गया। अन्न समय में उसने एक मास की सलेविना धारणकर काल अवसर काल किया-तो उसके प्रभाव से वर सौधर्म कल्प में उत्पन्न शे गया-1 वहा से चव कर अब वह महाविदेह क्षेत्र में मुक्ति को प्राप्त करेगा। इस धन्यसार्थवाह के दृष्टान्त से जब स्वामीको सबोधितकर के श्री तेण कालेण तेण समएण' इत्यादि- At-(तेण कालेण तेण समएण) ते जे मन त समये ( समणे भगव महावीरे) श्रम लगवान महावीर (गुणसिलए चेदए समोसढे । सेण धणे सत्यवाहे सुपुत्ते धम्म सोचा पधइए-एक्कारस गवी-मासियाए स लेडणाए सोहम्मे उबवणे, महाविदेहे वासे सिज्झिहिइ) ગુણશિલક ઉદ્યાનમાં આવ્યા તેમની પાસેથી ધર્મોપદેશ સાંભળીને તે ધન્ય સાર્થવાહ પિતાના પાચે પુત્રની સાથે તેમની પાસે પ્રવૃજિત થઈ ગયા પ્રજિત થઈને તે ધીમે ધીમે એકાદશી (અગિયાર) અગોને જ્ઞાતા પણ થઈ ગયા છેવટે મૃત્યુ સમયે એક માસની સ લેખના ધારણ કરીને કાળ અવ સરે તેણે કાળ કે તે તેના પ્રભાવથી ધર્મ કપમાં ઉત્પન્ન થઈ ગયે ત્યાથી ચવીને હવે તે મહાવિદેહ ક્ષેત્રમાં મુક્તિ પ્રાપ્ત કરશે આ ધન્ય સાથે વાહના દાન્તને સામે રાખીને શ્રી સુધમ સ્વામીએ જ બૂ સ્વામીને સંબોધિત , अनंगारधर्मामृतवपिणी टी० अ० १८ सु सुपादारिकाचरितवर्णनम् ७०४ सुधर्मास्वामीप्राह- एच' अनेन पूर्वोक्तमकारेण खलु हे जम्मू ! श्रमणेन भगवता महागीरेण 'जात्र सपत्तेण ' यावत् समापनेन-मोक्षगतेन अप्टादशस्य ज्ञाता- ध्ययनस्य ' अयमढे ' अयमर्थ भूोक्तरूपोऽर्थः प्रज्ञप्तामरूपितः, 'त्ति मि' इति ब्रवीमि-अस्य व्याख्या पूर्ववत् ॥ सू०९॥ इति श्री-विश्वपिरयात-जगबल्लभ-प्रसिद्धवाचकपश्चदशभाषाफलितललिता लापालापक-प्रविशुद्धगद्यपद्यनैकग्रन्थनिर्मापक-बादिमानमर्दक-श्रीशाहून्छ त्रपतिकोल्हापुरराजमदत्त-'जैनशास्त्राचार्य ' पदभूपित-कोल्हापुरराज- गुरु-वालनमचारि-जैनाचार्य-जैन मंदिवाकरपूज्यश्री-घासीलाल- प्रतिविरचिताया-ज्ञाताधर्मकथागपूत्रस्यानगारधर्मामृतवपि ण्याख्याया व्यारयायामप्टादशम ययन समाप्त ॥ १८॥ जबू! समणेण भगवया महावीरेण जाव सपत्तेण अद्वारसमस्स णाय- ज्झयणस्स अयम? पण्णतेत्तिबेमि ) इस प्रकार से हे जबू! श्रमण भग- वान् महावीरने जो सिद्धि गति नमक स्थान को प्राप्त हो चुके है इस अठारवें ज्ञाताध्ययन का यह पूर्वोक्तरूप से अर्थ प्ररूपित किया है। ऐसा जो मैंने कहा है यह उन्हीं के श्री मुख निर्गतवाणी को सुनकर ही कहा है-अपनी और से इसमें कुछ भी मिलाकर नही कहा है । सू०.९॥ श्री जैनाचार्य जैनधर्म दिवाकर पूज्य श्री घासीलालजी महाराज कृत "ज्ञाताधर्मकवानसूत्र" की अनगारधर्मामृतवर्पिणी व्याख्याका अठारहवां अध्ययन समाप्त ॥ १८॥ एव खलु जन् ! समणेण भगवया महागीरेणं जाव सावेग अट्ठारसमस णायज्झयणस्स अयमद्धे पण्णणेत्तिमि) આ પ્રમાણે તે જ બૂ! શ્રમણ ભગવાન મહાવીરે-કે જેઓ સિદ્ધગતિ નામક સ્થાનને મેળવી ચુક્યા છે આ અઢામાં જ્ઞાતાધ્યયનને આ પૂર્વોક્ત રૂપથી અર્થ પ્રરૂપિત કર્યો છે આવું જે મે કહ્યું છે, તે તેમના જ શ્રીમુખથી નીકળેલી વાણીને સાભળીને જ કહ્યું છે પિતાના તરફથી ઉમેરીને મે કહ્યું નથી કે સૂત્ર ૯ છે શ્રી જૈનાચાર્ય જનનધર્મ દિવાકર પૂજ્ય શ્રી ઘામીલાલજી મહરાજ કુત જ્ઞાતાધર્મકથાસૂત્ર ” ના અનુગારધર્મામૃતવર્ષિણી વ્યાખ્યાન અઢારમું અધ્યયન સમાસ ૧૮ છે " - - , ८०५ माया संरस्य मुकासाप 'जाा आस विपनदियारस' या प्रश्यं विपत्पा ज्यस्प बौदारिफशरीरस्य नो पर्णदेतो र्या, नो रूपहेतोर्वा नो थलहेतो, नो विषयहेतो , आहारमाहरतिभाहार करोति, 'एगाए मिद्विगमणस्पारणट्ठयाए' एकस्याः सिद्धिगमनसपापणार्यतायाः नन्नत्य' अन्यत्र न, मोक्षमाप्तिरूप प्रयो मन विहाय वर्णादिभयोजनेन आहार नाहरतीति भायः । सनिग्रन्थो वा निम्र थी या खलु इहमये चेर' हमरे एम्मिन जन्मन्येर यहना अमणानां वहनां श्रमणीना यहना श्रापकाणा यहना थापिकाणाम् 'अच्चणिज्जे' अर्चनीय = आदरणीय 'जार चीनस्सा यानद् व्यतिनियति चातुरन्तससारकान्तार मुल्लद्धयिष्यति-ससारपार गमिप्यतीत्यर्थः । वाले, यावत् अवश्य परित्याग रोने की योग्यतावाले इस औदारिक शरीर में कान्ति विशेप पढाने के लिये बल बढाने के लिये, अथवा विषय की प्रवृत्ति चालू रग्वने के लिये आरार नहीं लेता है किन्तु-एक- केवल सिद्धि गति नामक स्थान को प्राप्त करने के लिये ही आहार लेता हैं। मोक्ष प्राप्तिरूप प्रयोजन को छोड़कर और किसी कान्ति आदि बढाने के अभिप्राफरूप प्रयोजन से निच अमण श्रमणी जन अशर नहीं लिया करते हैं-(सेण) ऐसे निर्ग्रन्थ श्रमण श्रमणी जन (इहभवे चेव पहण समणाण बट्टण समणीण यण सावयाण यण सावियाण अञ्च णिज्जे जाच वीइवइस्सइ) इस भव में ही अनेक श्रमण, अगणी, जनों द्वारा तथा श्रावक श्राविकाओ द्वारा अर्चनीय-आदरणीय यावत् इस चतुर्गतिरूप ससार कान्तार को पारकरने वाले होते हैं। (एव खल સવવાળા, પિત્તાસવવાળા, શુકાસવવાળા ચાવતું ચોકકસ નષ્ટ થનારા આ દારિક શરીરમાં કાતિ વિશેષની વૃદ્ધિ માટે, બળની વૃદ્ધિ માટે અથવા તે વિષયની પ્રવૃત્તિ ચાલુ રાખવા માટે આહાર લેતું નથી પણ ફક્ત એક જ સિદ્ધગતિ નામક સ્થાન મેળવવા માટે જ આહાર ગ્રહણ કરે છે મોક્ષપ્રાપ્તિ રૂપ પ્રજન વગર બીજી કઈ કાનિ વગેરેની વૃદ્ધિની અભિલાષા રાખીને નિર્ચ થ-શ્રમણીજન આહાર' ગ્રહણ કરતા નથી (૧) એવા નિર્ચથ શ્રમણ શ્રમણીજને– (इहभवे चेव बहूण समणाण समीणं वगं सावयाण वह ग सावियाण अच्चणिज्जे जाव चीइवइस्सइ) આ ભવમાં જ ઘણા શ્રમણ શ્રમણીજને ઉડે તેમજ શ્રાવક-શ્રાવિકાઓ વડે અર્ચનીય, આદરણીય યાવત્ આ ચતુતિ રૂપ સ સાર કાતારને પાર કરી જનારા હોય છે - - ७०९ - मनगारधर्मामृतवर्षिणी टीका म० १९ पुंडरीक-कंडरीकचरित्रम् मूलम्-जइणं भते । समणेणं भगवया महावीरेणं जाव संपत्तेणं अट्ठारसमस्त णायज्झयणस्स अयम? पण्णत्ते, एगूण वीसइमस्स णायज्झयणस्स के अटे पण्णत्ते ? एवं खल्लु जंबू । तेणं कालेणं तेण समएण इहेव जवूदीवे दीवे पुनविदेहेवासे सीयाए महाणईए उत्तरिल्ले कूले नीलवंतस्स दाहिणेण उत्तरि- 'लस्स सीयामुहवणसंडस्स पञ्चस्थिमेणं एगसेलगस्स वक्खारपन्व- यस्स पुरस्थिमेणं एत्थ णं पुक्खलावई णाम विजए पन्नत्ते। तत्थ ण पुडरिगिणी णाम रायहाणी पन्नत्ता णवजोयणवित्थि पणा दुवालसजोयणायामा जाव पञ्चक्ख देवलोगभूया पासाईया दरसणिज्जा अभिरूवा पडिरूवा । तीसेण पुडरिगिणीए णयरीए उत्तरपुरस्थिमे दिसिभाए णलिणिवणे णाम उजाणे । तत्थ णं पुंडरिगिणीए रायहाणीए महापउमे णाम राया होत्था, तस्स ण पउमावई णाम देवी होत्था । तस्स णं महापउमस्त रन्नो पुत्ता पउमावईए देवीए अत्तया दुवे कुमारा होत्था, त जहा- पुडरीए य कडरीए य, सुकुमालपाणिपाया० । पुडरीए जुव- राया । तेणं कालेणं तेणं समएण थेरागमणं, महापउमे राया णिग्गए धम्म सोच्चा, पोंडरीयं रज्जे ठवेत्ता पव्वइए पोडरीए राया जाए, कडरीए जुवराया, महापउमेअणगारे चोदसपुवाई अहिजइ , तएण थेरा वहिया जणवयविहार विहरति , तएण से महापउमे वहृणि वासाइं जाव सिद्धे ॥ सू० १ ॥
अथ एकोनविंशतितममध्ययनम्- गतमष्टादशमध्ययनम् , साम्पसमेकोनशितितम व्यायायते, अस्य च पूर्वेण सह अपममिसम्पन्चा-पूरिणागपने भारतालास्य तदितरस्य च मन- “यों उक्ती, इहत चिर सत्तासयोऽपि यः पशाद पशा स्यानस्य अल्पकाल सर तात्रयस्य च अनर्यायों मोन्येते, इत्येर सम्बन्धनायातस्यास्पदमादिमूत्रम्-'जइण भते ' इत्यादि। ॥ पुण्डदीक-फण्डरीफ नाम का उनीसवा अध्ययन प्रारभ । अठारहवां अध्ययन समाप्त हो चुका-अप १९ वां अ ययन प्रारम होता है-इस अध्ययन का पूर्व अ ययन के साथ इस प्रकार का सम न्ध है पूर्व अध्ययन में असतास्रव अथवा सवृतास्रव वाले प्राणी को अर्थ एव अनर्थ की प्राप्ति रोना समर्थित किया गया है-अर्थात् अस घर वालेको अनर्थ की प्रोप्ति रोती है और सवरवाले को इष्ट अर्थ की प्राप्ति होती है । अय इस अध्ययन में सूत्रकार यह प्रदर्शित कर रहे हैं कि जिस प्राणी ने चिरकाल से आनको सवृत कर दिया है- 'परन्तु यदि वह पीछे से असताम्रव वाला यन जाता है तो उसके अनर्थ की प्राप्ति तथा अल्प काल भी जिसने आनन को सतकर दिया है उसके अर्थ की प्राप्ति होती है। इस संबंध को लेकर प्रारभ किये गये इस अध्ययन का यह सर्व प्रथम सूत्र है।। પુણ્ડરીક-કારીક નામે ઓગણીસમું અધ્યયન કાર ભ અઢારમુ અધ્યયન પુરું થઈ ગયુ છે હવે ઓગણીસમું અધ્યયન શરૂ થાય છે આ અધ્યયનને એના પૂર્વના અધ્યયનની સાથે આ જાતને સ બધ છે કે પૂર્વ અધ્યયનમાં અસ વૃતાસ અથવા સવૃતસવવાળા પ્રાણીને અર્થ અને અનર્થની પ્રાપ્તિ થાય છે, તે વાતનું સમર્થન કરવામા આવ્યું છે એટલે કે અસ વરવાળાઓને અનર્થની પ્રાપ્તિ હોય છે અને સવરવાળાઓને ઈઈ–અર્થની પ્રાપ્તિ હેય છે હવે આ અધ્યયનમાં સૂત્રકાર આ વાતનું સ્પષ્ટીકરણ કરી રહ્યા છે કે જે પ્રાણીઓ ચિરકાળથી એટલે કે બહુ લાબા વખતથી આઅવને સવૃત કરી દીધું છે, પરંતુ જે તે પાછળથી એટલે કે ભવિષ્યમાં અસવૃત્તાસ્ત્રવવાળા બની જાય છે તે તેને અનર્થની પ્રાપ્તિ તેમજ ડા વખત સુધી પણ જેણે આમ્રવને સવૃત કરી દીધું છે તેને અર્થની પ્રાપ્તિ થાય છે આ વાતને લઈને આર ભાએલા આ અધ્યયનનું આ પહેલું સૂત્ર છે भनगारघमामृतधविणीका १०१पुंडरीक पंडरीचा प्रम ७११ पाश्चात्ये पश्चिमेभागे एगसेलगस्स' एक्शैलकस्य मध्यजम्बूद्वीपमेरुपर्वतसमीप स्थस्य एक शैलरनामस्य ‘ववखारपन्चरस्म' वक्षस्कारपर्वतस्य 'पुरथिमेण' पौरस्त्ये पूर्वस्या दिशि 'एत्यण ' अत्र स्लु पुप्फलावती नाम विजयः प्रज्ञप्तः । तत्र खलु पुण्डरीरिणी नाम राजधानी प्रज्ञप्ता, सा 'णवजोयणवित्थिण्णा' नवयोजन विस्तीर्णा = नवयोजन विस्तारवती 'दुपालसजोयणायामा ' द्वादश योजनायामा द्वादशयोजनानि आयामो दैत्रं यस्याः सा द्वादशयोजनदोघेत्यर्थ , पुन 'जाव पन्चक्ख देवलोयभूया यावत् प्रत्यक्षदेवलोकभृता-साक्षात् स्वर्गसहशा पुनः मासादीया, दर्शनीया, अभिरूपा, प्रनिरूपा । तस्या खलु पुण्डरीकिण्या: पुरस्थिीमेण एत्यण पुक्खलाइणाम विजय पण्णत ) इस प्रकार जब्स्वामी के पूछने पर सुधर्मा स्वामी उनसे कहते हैं-सुनो-तुम्हारे प्रश्न का उत्तर इस प्रकार है उस काल और उस समय में इस जवूद्रीप नाम के द्वीप में पूर्व विदेश क्षेत्रमें, शीत महानदी के उत्तरदिग्वर्ती तीर पर स्थित नील पर्वत के दक्षिण दिग्भाग में, तथा उत्तर दिग्वर्ती शीतामुखवनपड के पश्चिम भाग में, तथा एक शैलक नाम वाले वक्षस्कार पर्वत की पूर्व दिशा में पुष्कलावती इस नाम का विजय है । शीतामुखवनषड का तात्पर्य यह है-कि जहां से शीतानदी नीकली है उस उद्गमस्थान पर एक वनपड है। मध्य जद्वीप और मेरुपर्वत के समीप में रहा हुआ एक शैल्क नाम का वक्षस्कार पर्वत है।-(तण्ण पुडरिगिणीणाम रायहाणी पन्नत्ता, णवजोयणविस्थिण्णा दुवालसजोरणायामा, जाव पञ्च क्ख देवलोयभूया पासाईया, दरसणिज्जा अभिरुवा पडिस्चा) उस सीयामुहवणसडस्स पचत्थिमेण एगसेलगस्स खारपब्धयस्स पुरस्थिमेण एत्यण सुक्खलावद णाम रिजए पप्णत्ते) આ પ્રમાણે જ બૂ સ્વામીના પ્રશ્નને સાભળીને શ્રી સુધર્મા તેમને કહેવા લાગ્યા કે હે જ બૂ! સાભળે, તમારા સવાલનો જવાબ આ પ્રમાણે છે કે તે કાળે અને તે સમયે આ જ બૂદ્વીપ નામક દ્વીપમાં પૂર્વ વિદેહ ક્ષેત્રમા, શીતા મહા નદીના ઉત્તર દિશા તરફના કિનારા ઉપર આવેલા નીલ પર્વતના દક્ષિણ દિગ્રભાગમાં તેમજ ઉત્તર દિશામાં આવેલા સતા મુખવષડના પશ્ચિમ ભાગમા, તેમજ એક શેલક નામવાળા વક્ષસ્કાર પર્વતની પૂર્વ દિશામાં પુષ્ક લાવતી નામે એક વિજય છે સીતા મુખવન–ડને અર્થ આમ સમજો જોઈએ કે જ્યાથી શીતા નદી નીકળી છે, તે ઉદ્દગમ સ્થાન ઉપર એક વનપડ છે મધ્ય જ બૂઢીપ અને મેરૂપર્વતની પાસે આવેલ એકશૈલક નામે વક્ષરકાર પર્વત છે (तस्वण पुडरिगिणीणाम रायहाणी पन्नत्ता, णव जोयणवित्थिण्णा दुरालमजो यणायामा, जार पच्चरख देवलोयभूया पासाईया, दरसणिज्जा अभिरुवा पडिस्वा) - . - , . -- (जइण भते ! समणेण भगव्या महावीरेण जाव सपत्तेण, अट्ठारसमस ७१० टीका-'जण भते ' इत्यादि। यदि बलु हे भदन्त ! श्रवन भगवता महावीरेण यारसमान अष्टादशस्य माता पयनस्य अयमर्षः प्रता, पुनखल हे भदन्त ! एकोनविंशतितमस्य गावाऽध्ययनस्य को प्रबन्त । इति जम्म्वामी प्रश्नान तर मुधर्माम्यामी कथयति-२ खलु हे जम्म् । तस्मिन् काले तस्मिन् समये इहै। 'नदीचे दीवे ' जम्बूद्वीपे दीपे-मध्यनम्बूद्वीपे 'पुत्रविदेहेवासे पूर्व विदेहे वर्षे शीताया महानद्याः उतरीपे-उत्तरतिक स्थिते कूले तीरे नील वतस्स दाहिणेग' नीलरतोदक्षिणे-नीला पविस्य दक्षिणेमागे ' उत्तरिल्लस्स' उत्तरीयस्य उत्तरदिर स्थितस्य 'सीयागुहसणसण्डस' सीतामुखानपण्डस्य- शीताया नद्या यन्मुखमुद्गमस्थान, तत्र यद् वनपण्डम् तस्य, 'पचत्थिमेण' 'जहण भते ! समग भगवया महावीरेण ' इत्यादि । टीकार्थ-जब स्वामी श्री सुधर्मा स्वामी से पूछते है कि (जाम भते समणेणं भगयया महावीरेण जीव सपत्तेण अट्ठारसमस णायजा यणस्स अयमढे पण्णत्ते एगणवीसदमस्स णायज्झयणस्स के अटे पण्ण ते?) हे भदन्त ! यदि श्रमण भगवान महावीरने कि जो सिद्धि गति नामक मुक्तिस्थान को प्राप्त कर चुके है अठारहवें ज्ञाताध्ययन का यह पूर्वोक्तरूप से अर्थ निरूपित किया है तो उन्हों अमण भगवान् महावी रने १९ वे ज्ञाताध्ययन का क्या भाव-अर्थ निरूपित किया है ? ( एव खलु जबू! तेण कालेणं तेण समएण इहेच जवृदीवे 'दीवे पुविदेह घासे सीयाए महाणईए उत्तरिल्ले कूले नालवतस्स दारिणेग उत्सरिल्लस्स सीयामुहवणसडस्स पच्चस्थिमेग एगसेलगस्स वग्वारपव्वयस्त जइण मते ! समणेण भगया महावीरेण - य -જબૂ સ્વામી શ્રી સુધર્મા સ્વામીને પૂછે છે કે ? णायज्झयणस्स अयमढे पणते एगूणवीसइमस्स णायज्झयगस के अटे पणते ?) હે ભદન્ત! જે શ્રમણ ભગવાન મહાવીરે-કે જેમણે સિદ્ધિગતિ નામક મુકિતસ્થાનને મેળવી લીધું છે-અઢારમા જ્ઞાતાધ્યયનને આ પક્ત રૂપમાં અર્થ નિરૂપિત કર્યો છે ત્યારે તે જ શ્રમણ ભગવાન મહાવીરે ઓગણીસમાં જ્ઞાતાધ્યયનને શે ભાવ-અર્થ નિરૂપિત કર્યો છે? ( एव खलु जवू । तेण कालेग तेण समएण इहेव जब दीवे दीवे पुन्य विदेवासे सीयाए महागईए उत्तरिल्ले कूले नीलवतस्स * उचरिल्लस - - . भनगारधामृतपदिणी का ७० १२ पुरीफ परीक्षा प्रम ७११ पाश्चात्ये पश्चिमेभागे 'एगसेल्गस्स' एक्शैलकस्य मध्यजम्बूद्वीपमेरुपर्वतसमीप स्थस्य एक शैलपनामस्य ववखारपत्रयस्म' वक्षस्कारपर्वतस्य 'पुरत्थिमेण पौरस्त्ये-पूर्वस्या दिशि 'पत्थण' अत्र स्लु पुपलावती नाम विजयः प्रज्ञप्तः । तत्र खलु पुण्डरीरिणी नाम राजधानी प्रज्ञप्ता, सा 'णवजोयणवित्थिण्णा' नवयोजनविरतीर्णा = नवयोजनविस्तारवती 'दुवालसजोयणायामा ' द्वादश योजनायामा द्वादशयोजनानि आयामो दैर्घ यस्याः सा द्वादशयोजनदीत्यर्थ, पुन 'जार पन्चक्ख देवलोयभूया यावत् प्रत्यक्षदेवलोकभृता-साक्षात् स्वर्गसहशा- पुनः प्रासादीया, दर्शनीया, अभिरूपा, प्रतिरूपा । तस्या खलु पुण्डरीफिण्याः पुरस्थिीमेण एत्यण पक्खलाहणाम विजरा पण्णत्त) हम प्रकार जब्स्वामी के पूछने पर सुधर्मा स्वामी उनसे कहते हैं-सुनो-तुम्हारे प्रश्न का उत्तर इस प्रकार है उस काल और उस समय मे इस जबूद्वीप नाम के द्वीप में पूर्व विदेह क्षेत्रमें, शीत महानदी के उत्तरदिग्वर्ती तीर पर स्थित नील पर्वत के दक्षिण दिग्भाग में, तथा उत्तर दिग्वर्ती शीतामुखवनपड के पश्चिम भाग में, तथा एक शैलक नाम वाले वक्षस्कार पर्वत की पूर्व दिशा में पुष्कलावती इस नाम का विजय है । शीतामुग्ववनपड का तात्पर्य यह है-कि जहा से शीतानदी नीकली है उस उद्गमस्थान पर एक वनपड है। मध्य जबूढीप और मेरूपर्वत के समीप में रहा हुआ एक शैरक नाम का चक्षरकार पर्वत है।-(तण्ण पुडरिगिणीणाम रायहाणी पन्नत्ता, णवजोयणवित्थिपणा दुवालसजोयणायामा, जाव पच्च क्ख देयलोयभूया पासाईया, दरसणिज्जा अभिरुवा पडिस्चा) उस सीयामुढवणसहस्स पन्चत्थिमेण एगसेलगस्स चक्रवारपव्ययस्स पुरस्थिमेण एत्थण पुक्खलावद णाम विजए पण्णते) આ પ્રમાણે જ બૂ સ્વામીના પ્રશ્નને સાભળીને શ્રી સુધર્મા તેમને કહેવા લાગ્યા કે હે જ બૂ! સાભળે, તમારા સવાલને જવાબ આ પ્રમાણે છે કે તે કાળે અને તે સમયે આ જ બૂદ્વીપ નામક દ્વીપમાં પૂર્વ વિદેહ ક્ષેત્રમા, શીતા મહા નદીના ઉત્તર દિશા તરફના કિનારા ઉપર આવેલા નીલ પર્વતના દક્ષિણ દિગ્રભાગમાં તેમજ ઉત્તર દિશામાં આવેલા સીતા મુખવનપડના પશ્ચિમ ભાગમા, તેમજ એક શૈલક નામવાળા વક્ષરકાર પર્વતની પૂર્વ દિશામાં પુષ્ક લાવતી નામે એક વિજય છે સીતા મુખવન–ડને અર્થ આમ સમજ જોઈએ કે ત્યાથી શીતા નદી નીકળી છે, તે ઉદ્દગમ સ્થાન ઉપર એક વનવડ છે મધ્ય જ બૂપ અને મેરૂપવતની પાસે આવેલો એકડોલક નામે વક્ષસ્કાર પર્વત છે (तस्थण पुडरिगिणीणाम रायहाणी पन्नता, णव जोयणविस्थिण्णा दुपालमजो यणायामा, जाव पच्चक्ख देवलोयभूया पासाईया, दरसणिज्जा अभिरूवा पटिस्या) यहा पद्मावती की कुक्षि से उत्पन्न हुए दो कुमार थे (तं जहा पुडरीण ७१२ Tara नगर्याः उत्तरपौरस्त्ये दिमागे नलिनी ने नाम उघानम् । तत्र बलु पुपरीकिम्यो रानधान्या महापमो नाम रानाऽऽसीत् । तस्य खलु पयावती नाम देवी मासीत् । तस्य खलु महापग्रस्प राा पुत्री पारस्पा देव्या आत्मजौ दौमारी मास्ताम् । 'त जहा' तयथा वयोनामरूपे, तदाह-'पुडरीए य कररीए य मुलमाल- पाणिपाया' पुण्डरीकय फण्डरीश्र गहमारपाणिपादौ कोमलकरचरणौ । त्यो मध्ये पुण्डरीको युपराजाऽऽसी । तम्मिन् काले तम्मिन समये 'थेरागमण' पुष्कलावती विजय में पुडरी किनी नाम राजधानी थी। यह नव योजन विस्तारवाली तथा १२ योजन की लंबी है यह साक्षात म्वर्ग जैसी प्रतीत होती है। प्रासादीयचित्त एव अन्तःकरण को यह प्रमन्न करने वाली है, दर्शनीय-नेत्रों को तृप्ति करने वाली है, अभिरूप-असाधारण रचना से युक्त हैं एव प्रतिरूप है-इसके जैसी और दूसरी कोई नगरी नहीं हैं ऐसी। (तीसेण पुडरिगीणी णयरील उत्तरपुरस्थिमे दिसिभाए लिणिवणे णाम उज्जोणे-तत्थ ण पुडरिगिणीण राघराणीए महापउमे णाम राया होत्या-तस्सण परमावईणाम देवी होत्या, तस्स ण महापर मस्स रपणो पुत्ता पउमावईए देवीए अत्तया दुवे कुमारा होत्या) उस पुडरीकिणी नगरी के उत्तर पौरस्त्य दिग्भाग में नलिनीवन नाम का एक उद्यान था। उस पुडरीकिणी राजधानी में महापद्मनाम का एक राजा रहता था। उसकी देवी का नाम पद्मावती थी। उस महापद्म राजा के य, कडरीए य-सुकुमालपाणि पाया । पुडरीए जुवराया तेण कालेण જેટલા વિસ્તારવાળી તેમજ બાર અને જેટલી લાગે છે તે પ્રત્યક્ષ સ્વર્ગ તે પુષ્કલાવતી વિજયમા પુડરીકિની નામે રાજધાની હતી તે નવ જન જેવી જ લાગે છે તે પ્રસાદી ચિત્ત અને અન્તકરણને તે પ્રસન્ન કરનારી છે, દર્શનીય-આને તે તૃત કરનારી છે, અભિરૂપ તે અસાધારણ (અપૂર્વ) રચનાવાળી છે, અને પ્રતિરૂપ-એના જેવી બીજી કોઈ નગરી નથી એવાં છે ( तीसेण पुडरिगिणीए णयरीए उत्तरपुरस्थिमे दिसिभाए णलिणिवणे शाम उज्नाणे-तत्थण पुडरिगिणीए रायहाणीए महापउमे णाम राया होत्या-तस्सण पउमावईणाम देवी होत्या, तस्सण महापउमस रणो पुत्ता पउमावईए देवीए अत्तया दुवे कुमारा होत्था) તે પુંડરીકિણી નગરીના ઉત્તર પરત્વે દિવિભાગમાં નલિનીવન નામે એક ઉદ્યાન હતું તે પુંડરીકિ રાજધાનીમા મહાવ નામે એક રાજા રહે હતે તેની રાણીનું નામ પદ્માવતી હતું તે મહાપ રાજાને ત્યાં પવ વતી દેવીના ગર્ભથી ઉત્પન્ન થયેલા છે રાજકુમાર હતા - अनगारधर्मामृतवपिणी टी०अ० १९ पुडरीक-फडरीकचरित्रम् ७१३ स्थविरागमन तस्या रानपान्या नलिनीनने उद्याने स्थविराणामागमनमभूत् । महा- पद्मो राजा धर्म श्रोतु निर्गतः, धर्म श्रुत्वा सनातवैराग्यः पुण्डरीक राज्ये स्थाप- यित्वा प्रवजितः । अनन्तर पुण्डरीको राजा जात', कण्डरीको युवराजः । महा- पद्मऽनगार चतुर्दशपूर्वाणि अपीते । ततः खलु स्थविरा बहिर्जपदविहार विहरन्ति । ततः खलु स महापद्मो नहनि वर्षाणि श्रामण्यपर्याय पालयित्वा यावद् सिद्धः।मु०१॥ - . तेण समण्ण थेरागमण, महापउमे राया णिग्गए, धम्म सोचा पोंडरीय रज्जे ठवेत्ता पब्बडए । पोंडरीए राया जाए, कडरीए जुबराया। महाप उमे अणगारे चोहसपुन्याइ अरिजइ, तएण थेरा पहिया जणवयविहार विहरति, तएण से महापउसे यहणि वासाइ जाव सिद्धे) उनके नाम इस प्रकार है-१ पुडरीक और दूसरा कडरीक-ये दोनो पुत्र सुकुमार करचणवाले थे। पुडरीक को पिता ने युवराज पदप्रदान किया था। उस काल में और उस समय मे वहा स्थविरों का आगमन हुआ। महाप- भराजा धर्म का व्याख्यान सुनने के लिये अपने महल से निकलकर नलिनीवन उद्यान में आये । वहा धर्म का उपदेश सुनकर उन्हे वैराग्य भाव उत्पन्न हो गया-सोवे पुडरीक को राज्य में स्थापितकर दीक्षित हो गये। पुडरीक राजा यन गया-और कडरीक युवराज हो गया। महापद्मराजर्पि ने चौदह पूर्वो का अ ययन कर लिया। इसके बाद वहा से स्थविरो ने ( त जहा-पु डरीए य, कडरीए य-सुकुमालपाणिपाया० । पुडरीए जुन राया तेण कालेण तेण समएण थेरागमण, महापउमे राया णिग्गए, धम्म सोन्या पोंडरीय रज्जे ठवेत्ता पव्वइए । पोडरीए राया जाए, कडरीए जुबराया । महा. पउमे अणगारे चोद्दसपुब्बाइ अहिज्जइ, तरण थेग घडिया, उणवयविहार विह- रति, तएण से महापउमे पहणि वामाइ जात्र सिद्धे ) તેમના ન મે આ પ્રમાણે છે-૧ પુંડરીક, અને ૨ કડીક આ બને પુત્રે સુકેમળ હાથ-પગવાળા હતા રાજાએ પુડરકને યુવરાજપદ પ્રદાન કર્યું હતું તે કાળે અને તે સમયે ત્યા સ્થવિરેનું આગમન થયુ મહાપ રાજા ધર્મનું વ્યાખ્યાન સાંભળવા માટે પિતાના મહેલથી નીકળીને નલિનીવન ઉદ્યા નમાં આવ્યું ત્યા ધર્મોપદેશ સાંભળીને તેને વૈરાગ્યભાવ ઉત્પન્ન થઈ ગયે છેવટે પુડરકને રાજ્યસને સ્થાપિત કરીને તેઓ દીક્ષિત થઈ ગયા પુરીક રાજા થઈ ગયે અને કરીના યુવરાજ થઈ ગયે મહાપદ્મ રાજર્ષિએ ચી. પર્વોનું અધ્યયન કરી લીધું ત્યારપછી સ્થવિરે ત્યાથી બહાર જનપદોમા વિહાર झा ९० यहा पद्मावती की कुक्षि से उत्पन्न हुए दो कुमार थे (त जहा पुडरीण उज्जाणे-तत्थण पुडरिगिणीए रायहाणीए महापउमे णाम राया होत्था-तस्सण ७१२ नगर्याः उपरपोरस्स्ये दिमागे नलिनीरन नाम टपानम् । तत्र मलु पुण्डरीविष्या रामधान्यां महापयो नाम रानाऽऽसीद । तस्य खलु पद्मावती नाम देवी आसीत् । तस्य खलु महापास्य राम पुत्रोपमावस्या देव्या आत्मनो द्वौ कुमारी आस्ताम् । 'त जहा' तयधा तयो मरूपे, सदा-'पुडरीए य कडरीए य मुकमाल पाणिपाया ' पुण्डरीका पण्डरीरथ गुरूमारपाणिपादौ कोमलकरचरणी । तयो मध्ये पुण्डरी युरानाऽऽसीत् । तस्मिन् काले तस्मिन समये 'थेरागमण' पुष्कलावती विजय में पुडरी किनी नाम राजधानी धी। यह नव योजन विस्तारवाली तथा १२ योजन की लयी है यह साक्षात स्वर्ग जैसी प्रतीत होती है। प्रासादीयचित्त एव अन्तःकरण को यह प्रसन्न करने वाली है, दर्शनीय-नेत्रों को तृप्ति करने वारी है, अभिरूप-असाधारण रचना से युक्त है एव प्रतिरूप है-इसके जैसी और दूसरी कोई नगरी नहीं है ऐसी। (तीसेण पुडरिंगीणी णयरी उत्तरपुरस्थिमे दिसिभाए णलिणिवणे णाम उज्जोणे-तत्व ण पुडरिगिणी रापहाणीए मरापउमे णामं राया होत्या-तस्सण पउमावईणाम देवी होत्या, तस्स ण महापर मस्स रपणो पुत्ता पउमावईए देवीए अत्तया दुवे कुमारा होत्या) उस पुडरीकिणी नगरी के उत्तर पौरस्त्य दिग्भाग में नलिनीवन नाम का एक उद्यान था। उस पुडरीकिणी राजधानी में महापद्मनाम का एक राजा रहता था। उसकी देवी का नाम पद्मावती थी। उस मरापद्म राजा के य, कडरीए य-सुकुमालपाणि पाया । पुडरीए जुवराया तेण कालेण તે પુષ્કલાવતી વિજયમા પુડીકિની નામે રાજધાની હતી તે નવ જ જેટલા વિસ્તારવાળી તેમજ બાર જેને જેટલી લાંબી છે તે પ્રત્યક્ષ સ્વર્ગ જેવી જ લાગે છે તે પ્રસાદી રચિત અને અન્ત કિરણને તે પ્રસન્ન કરનારી છે દર્શનીય-આને તે તૃમ કરનારી છે, અભિરૂપ તે અસાધારણ (અપૂર્વ) રચનાવાળી છે, અને પ્રતિરૂપ-એના જેવી બીજી કઈ નગરી નથી એવી છે (तीसेण पुडरिगिणीए णयरीए उत्तरपुरथिमे दिसिभाए णलिणिवणे णाम पउमावईणाम देवी होत्या, तस्सण महापउमस्स रणो पुत्ता पउमावईए देवीए अत्तया दुवे कुमारा होत्था) તે પુરકિણી નગરીના ઉત્તર પરિત્ય દિવિભાગમા નલિનીવન ના એક ઉદ્યાન હતું તે પુડરીકિ રાજધાનીમા મહાપ નામે એક રાજા રહે હતે તેની રાણીનું નામ પદ્માવતી હતું તે મહા રાજાને ત્યાં પદ્મવતી દેવીના ગર્ભથી ઉત્પન્ન થયેલા બે રાજકુમાર હતા - अनगारधर्मामृतवपिणी टी०अ० १९ पुडरीक-फडरीकचरित्रम् ७१३ स्थविरागमननस्या रानपान्या नलिनीनने उयाने स्थविराणामागमनमभूत । महा- पद्मो राजा धर्म श्रोतु निर्गतः, धर्म श्रुत्वा सनातवैराग्यः पुण्डरीक राज्ये स्थाप- यित्वा मनितः । अनन्तर पुण्डरीको राजा जातः, कण्डरीको युवराजः । महा- पाऽनगार चतुर्दशपूर्वाणि अपीते । ततः खलु स्थविरा बहिर्नपदविहार विहरन्ति । ततः खलु स महापद्मोनहूनि वर्षाणि श्रामण्यपर्याय पालयित्वा यावद् सिद्धासू०१॥ तेणं समएण थेरागमण, महापउमे राया णिग्गए, धम्म सोचा पोंडरीय रज्जे ठवेत्ता पव्वडए । पोंडरीए राया जाए, कडरीए जुवराया। महाप उमे अणगारे चोद्दसपुव्वाइ अहिलइ, तएण थेरा पहिया जणवयविहार विहरति, तएणं से महापउमे यणि वासाइ जाब सिद्धे) उनके नाम इस प्रकार है-१ पुडरीक और दूसरा कडरीक-ये दोनो पुत्र सुकुमार करचणवाले थे। पुडरीक को पिता ने युवराज पदप्रदान किया था। उस काल में और उस समय मे वहा स्थविरों का आगमन हुआ। महाप- मराजा धर्म का व्याख्यान सुनने के लिये अपने महल से निकलकर नलिनीवन उद्यान में आये। वहा धर्म का उपदेश सुनकर उन्हे वैराग्य मात्र उत्पन्न हो गया-सो वे पुडरीक को राज्य मे स्थापितकर दीक्षित हो गये। पुडरीक राजा बन गया-और कडरीक युवराज हो गया। महापद्मराजर्षि ने चौदह पूर्वो का अ ययन कर लिया। इसके बाद वहां से स्थविरो ने . , ( त जहा-पुडरीए य, कडरीए य-सुकुमालपाणिपाया० । पुडरीए जुर- राया तेण कालेण तेण समरण थेरागमग, महापउमे राया णिग्गए, धम्म सोच्या पोंडरीय रज्जे ठवेत्ता पत्याए । पोडरीए राया जाए, कडरीए जुत्रराया । महा पउमे अणगारे चोद्दसपुयाइ अहिज्जइ, तएण थेरा बडिया, जणवयविहार विह- रति, तएण से महापउमे पहाणि वासाड जात्र सिद्धे ) તેમના નામે આ પ્રમાણે છે-૧ પુંડરીક, અને ૨ કડીક આ બને પુત્રે સુકેમળ હાથ-પગવાળા હતા રાજાએ પુડરકને યુવરાજપદ પ્રદાન કર્યું હતું તે કાળે અને તે સમયે ત્યા વિરેનું આગમન થયુ મહાપ રાજા ધર્મનું વ્યાખ્યાન સાંભળવા માટે પિતાના મહેલથી નીકળીને નલિનીવન ઉદ્યા નમાં આવ્યું ત્યા ધર્મોપદેશ સાંભળીને તેને વૈરાગ્યભાવ ઉત્પન થઈ ગયે છેવટે પુંડરીકને રાજ્યાસને સ્થાપિત કરીને તેઓ દીક્ષિત થઈ ગયા પુરીક રાજા થઈ ગયે અને કડક યુયરાજ થઈ ગયે મહાપા રાજર્ષિએ ચૌ. પર્વોનું અધ્યયન કરી લીધું ત્યારપછી સ્થવિરે ત્યાથી બહાર જનપદેમા વિહાર जाताधर्मकथा मूलम्-तएणं थेरा अन्नया कयाई पुगरवि पुंडरिगिणीए रायहाणीए गलिणिवणे उजाणे समोसटा, पोंडरीए राया णिग्गए । कंडरीए महाजणसद्द सोचा जहा महावलो जाव पज्जुवासइ । थेरा धम्म परिकहेंति पुडरीए समणीवासए जाए जाव पडिगए । तरण से कडरीप उट्टाए उद्देइ, उट्टाए उट्टित्ता जाव से जहेयं तुम्भे वदह जं णवर पुण्डरीय रायं आपुच्छामि, जाव पव्वयामि । अहासुह देवाणुप्पिया । तएण से कडरीए जाव थेरे वदइ णमसइ वैदित्ता णमसित्ता थेराण अंतियाओ पडिनिक्खमइ, पडिनिक्खमित्ता तमेव चाउग्घट आप्तरह दुरु हइ जाव पच्चोरुहइ, जेणेव पुण्डरीए राया तेणेव उवागच्छइ करयल जाव पुडरीयं एव क्यासी-एवं तल देवाणुप्पिया मए थेराण अतिए जाव धम्मे निसते से धम्मे जाव अभिरुइए तपणं देवाणुप्पिया। जाव पव्वइत्तए । तएण से पुडरीए कड- रीए एवं वयासी-माणं तुम देवाणुप्पिया । इयाणि मुडे जाव पव्वयाहि, अह णं तुम महयार रायाभिसेएणं अभिसंचामि। तएण से कडरीए पुडरीयस्स रपणो एयमह णो आढाइ णो परिजाणइ तुसिणीए सचिटुइ । तएण पुण्डरीए राया कडरीय दोच्चपि तच्चपि एव वयासी-जाव तुसिणीए सचिट्ठइ। तएणं पुण्डरीए कडरीय कुमार जाहे नो सचाएइ, बहूहिं आघवणाहि पारिर जनपदों में विहार कर दिया। महापद्मअनगार ने अनेक वर्षों तक श्रामग्य पर्याय का पालनकर योवत् मिद्धपद को प्राप्त कर लिया । सू० १॥ માટે નીકળી પડયા મહાપા અનગારે ઘણા વર્ષો સુધી શ્રામગ્ય પર્યાયનું પાલન કરીને યાવત્ સિદ્ધપદને પ્રાપ્ત કરી લીધુ . ॥ सूत्र एयमट्ठ अणुमन्नित्था - । नगारधर्मामृतवपिणी टी० अ० १९ पुडरीक-कहरीकचरित्रम् ७१५ य पण्णवणाहि य४ ताहे अकामए चेव जाब णिस्खमणाभिसेएण अभिसिचइ जाव थेराण सीसभिक्खं दलयड । पव्वइए अणगारे जाए एगारसगविऊ । तएण थेरा भगवंतो अन्नया कयाइं पुडरिगणीओनयरीओ णलिणीवणाओ उजाणाओ पडिणिस्खमति पडिणिक्खमित्ता वह्यिा जणवय- विहारं विहरति ॥ सू० २॥ टीका-'तएण ते ' इत्यादि । ततः खलु ते स्थपिरा अन्यदा कदाचित् पुण्डरीकिण्या राजधान्या नलिनीवने उद्याने समनमृता समगताः । तेपासमा गमन श्रुत्वा पुण्डरीको राजा तान् वन्दितु निर्गतः । अनन्तरम्-कण्डरीको ' महा- जणसद्द ' महाजनशन्द स्थविरान् वन्दितु कामाना गच्छता बहूना जनाना कोलाहल श्रुत्वा 'जहा महावलो जाव पपज्जुनामइ ' यथामहावलो यावत्पर्यु- पास्ते । महावल इव स्थविराणा समीपे गत्वा तान् वन्दित्वा नमस्थित्वा सेवते । स्थविरा धर्म परिकहेंति' परिकथयन्ति=उपदिशन्तीत्यर्थः । तेरुपदिष्ट धर्म श्रुन्या पुण्डरीकः श्रमणोपासको जातः 'जाव पडिगए' यावत्मतिगतः स्थविरान् वन्दित्त्वा तएण ते येरा अन्नया कयाइ' इत्यादि। टीकार्य:-(तएण) इसके बाद (ते थेरा) वे स्थविर (अन्नया कयाइ किसी एक समय (पुणरवि) फिर से (पुडरिगीणीए रायहाणीए लिणिवणे उलाणे समोसढा, पोंडरीए राया जिग्गए) पुडरीकिणी राज- धानी में आये। वहा वे नलिनीवन उद्यान में ठहरे। पुडीक राजा उनका आगमन सुनकर धर्म सुनने की इच्छा से वहा जाने के लिये अपने महल से निकले। (कडरीए महाजणसद्द सोचा जहा महम्बलो जाव पज्जुवासइ, थेरा धम्म परिकहेंति, पुडरीए समणोवासए जाए जाव तएण ते येरा अन्नया कयाइ ' इत्यादि-- साथ-(तएण ) त्या२५डी (ते थेरा) ते स्थविरी ( अन्नया कयाइ) मे मते (पुणरवि) (पुडरिंगीणोए रायहाणीए णलिणिवणे उज्जाणे समोसढा, पोंडरीए रायाणिग्गए) पुरीणी सधानीमा माव्या ત્યા તેઓ નલિનીવન ઉદ્યાનમા રેડાયા પુંડરીક રાજા તેમનુ આગમન સાભળીને ધર્મનું વ્યાખ્યાન સાભળવાની ઈચ્છાથી ત્યા જવા માટે પિતાના મહેલથી નીકળ્યા (कडरीए महाजणसद्द सोचा जहा महावलो जान पज्जुवासइ, येरा चम्म परि - . , तापमान मूलम्-तण्णं थेरा अन्नया कयाइ पुणरवि पुडरिगिणीए रायहाणीए णलिणिवणे उन्नाणे समोसढा, पॉडराए राया णिग्गए । कंडरीए महाजणसह सोचा जहा महावलो जाव पज्जुवासइ । थेरा धम्म परिकहति पुडरीए समणोवासए जाए जाव पडिगए । तएण से कंडरीण उद्याए उटेइ, उट्टाए उट्टित्ता जाव से जहेयं तुम्भे वदह ज णवर पुण्डरीय राय आपुच्छामि, जाव पव्वयामि । अहासुहं देवाणुप्पिया । तएणं से कडरीए जाव थेरे वंदइ णमसइ वंदित्ता णमसित्ता थेराण अंतियाओ पडिनिक्खमइ, पडिनिक्खमित्ता तमेव चाउग्घट आसरह दुरु हइ जाव पच्चोरुहइ, जेणेव पुण्डरीए राया तेणेव उवागच्छइ करयल जाव पुंडरीय एवं क्यासी-एवं खल्लु देवाणुप्पिया । मए थेराण अतिए जाव धम्मे निसंते से धम्मे जाव अभिरुइए तण्णं देवाणुप्पिया । जाव पव्यइत्तए । तएण से पुडरीए कड- रीए एव वयासी-माणं तुम देवाणुप्पिया । इयाणि मुंडे जाव पवयाहि, अह णं तुमं महया२ रायाभिसेएणं अभिीसंचामि। तएण से कडरीए पुडरीयस्स रण्णो एयम णो आढाइ णो- परिजाणइ तुसिणीए सचिट्टइ । तएण पुण्डरीए राया कडरीय दोच्चपि तच्चपि एव पयासी-जाव तुसिणीए सचिट्ठइ । तएणं पुण्डरीए कडरीय कुमार जाहे नो सचाएइ, बहुहि आघवणाहि बाहिर जनपदों में विशार कर दियो।महापद्म अनगार ने अनेक वर्षो तक श्रामण्य पर्याय का पालनकर योवत् सिद्धपद को प्राप्त कर लिया ।। सू० १॥ માટે નીકળી પડયા મહાપા અનગારે ઘણું વર્ષો સુધી ગ્રામ પયયનું પાલન કરીને ચાવત્ સિદ્ધપદને પ્રાપ્ત કરી લીધું છે. સૂત્ર ૧ / टीका-'तएण अनगारधर्मामृतवषिणी टी० अ० १९ पुंडरीक-कहरीकचरितम् ७५ य पण्णवणाहि य४ ताहे अकामए चेव एयम? अणुमन्नित्था जाव णिक्खमणाभिसेएणं अभिसिचइ जाव थेराणं सीसभिक्ख दलयइ । पव्वइए अणगारे जाए एगारसंगविऊ । तएण थेरा भगवतो अन्नया कयाइं पुंडरिगणीओनयरीओ णलिणीवणाओ उजाणाओ पडिणिक्खमति पडिणिक्खमित्ता वहिया जणवय- विहारं विहरंति ॥ सू० २॥ ते ' इत्यादि । ततः खलु ते स्थविरा अन्यदा कदाचित् पुण्डरीकिण्या राजधान्या नलिनीवने उद्याने समनमृता -समगताः । तेपा समा गमन श्रुत्वा पुण्डरीको राजा तान् चन्दितु निर्गतः । अनन्तरम्-कण्डरीको ' महा- जणसद्द' महाजनशब्द-स्थपिरान् वन्दितु कामाना गच्छता बहूना जनाना कोलाहल श्रुत्वा 'जहा महापलो जात्र पपज्जुवामइ ' यथामहावलो यावत्पर्यु- पास्ते । महाबल इस स्थविराणा समीपे गत्वा तान् वन्दित्वा नमस्थित्वा सेवते । स्थविरा धर्म परिकहति' परिकथयन्ति-उपदिशन्तीत्यर्थः । तैरुपदिष्ट धर्म श्रुत्वा पुण्डरीकः श्रमणोपासको जातः 'जाव पडिगए' यावत्मतिगतः स्थविरान् वन्दित्त्वा 'तएण ते थेरा अन्नया कयाइ' इत्यादि । टीकार्य:-(तएण) इसके बाद (ते थेरा) वे स्थविर (अन्नया फयाइ किसी एक समय (पुणरवि) फिर से (पुडरिगीणीए रायहाणी लिणिवणे उजाणे समोसढा, पोडरीए रायाणिग्गए) पुडरीकिणी राज- धानी में आये। वहा वे नलिनीवन उद्यान में ठहरे। पुडीक राजा उनका आगमन सुनकर धर्म सुनने की इच्छा से वहा जाने के लिये अपने महल से निकले। (कडरीए महाजणसद्द सोचा जहा महबलो जाव पज्जुवासह, थेरा धम्म परिकहेति, पुडरीए समणोवासए जाए जाव . तएण ते येरा अन्नयो कयाइ ' इत्यादि- साथ-(तएण ) त्या२पछी (ते थेरा) ते स्थविरे ( अन्नया कयाइ) मे मे मते (पुणरवि) (पुडरिंगीणोए रायहाणीए णलिणिपणे उज्जाणे समोसढा, पोंडरीए रायाणिग्गए ) पुराणी राधानीमा भाव्या ત્યા તેઓ નલિનીવન ઉદ્યાનમાં રોકાયા પુંડરીક રાજા તેમનું આગમન સાભળીને ધર્મનું વ્યાખ્યાન સાભળવાની ઈચ્છાથી ત્યાં જવા માટે પિતાના મહેલથી નીકળ્યા (कहरीए महाजणसद्द सोचा जहा महा रलो जाव पग्नुवासइ, थेरा वम्म परि नमस्थित्या प्रतिनिटतः । ततः पलु काउरीक उद्या' उत्थया-उत्थानशक्त्या उत्तिष्ठति, उत्यया उत्थाय ' जार' यान् स्थविरान पन्दिया नमम्पिका एक मवदत्-' से जहेय तुम्भे यह तयवेद उप रदय हे देशानुप्रियाः यूय यथा यद् बदय, तत्तथैव, 'जणार ' यसरन्यो विशेष सत्रम्-यदा पूर्व पुण्ड रीक राजानम् आपृच्छामि । तत सर 'जार पयामि' पाचन प्रजामि । पडिगए) इसके बाद फररीक युवराज स्थविरों को वढना करने के लिये जानेवाले अनेक मनुष्यो का फोलाहल सुनकर मरायल राजा की तरह स्थचिरो के पास गया-घहा जाकर उसने उनकी वदना की-नमस्कार किया। वदना नमस्कार कर फिर उसने उनकी पर्युपासना की। स्थविरों ने धर्म का उपदेश दिया। उस उपदेश को सुनकर पुडरीक श्रमणोपा सक यन गया। पाद में वह स्थविरों को वदना और नमस्कार कर अपने स्थान पर वापिस वहा से लौट आया। (तपण से कडरी ठाए उडेइ, उठाए उद्वित्ता जाव से जहेय तुम्भे बदर, ज णवर पुडरीय राय आयु शामि, तएण जाय पन्चयामि-अहासुर देवाणुप्पिया ताण से कडरोए जाव थेरे पदइ, नमसइ, वदित्ता नमसित्ता राण अतियाओ पडि- निक्खमह) इसके बाद कडरीक उत्थानशक्ति से उठा-उत्थानशक्ति --उठने की शक्ति से उठकर उसने स्थविरों को वदना की-नमस्कार किया। वदना नमस्कार करके फिर उसने उनसे इस प्रकार कहा-हे कहेंति, पुरीए समणोवासए जाए जाव पडिगए) त्या२५छी ४ 315 युपरा વિરેની વદના કરવા માટે ઉપડેલા અનેક માણસોને ઘોઘાટ સાભળીને મહાબવ રાજાની જેમ વિરાની પાસે ગયો ત્યાં જઈને તેણે તેમને વજન અને નમસ્કાર કર્યા વદના અને નમસ્કાર કરીને તેણે તેમની પર્ય પાસના કરી વિરએ ધર્મોપદેશ આપ્યું, તે ઉપદેશને સાભળીને પુડરીક શ્રમણે પાસક બની ગયે ત્યારપછી તે વિરાને વદન તેમજ નમન કરીને પિતાના નિવાસસ્થાને પાછા આવતો રહ્યો ( तएण से कडरीए उढाए उट्टेइ, उढाए उद्वित्ता जाव से जहे य तुम्भे वदह ज णवर पुडरीय राय आपुच्छामि, तएण जाव पव्वयामि-अहासुह देवाणु प्पिया ! तएण से कडरीए जाप थेरे व दइ, नमसइ, बदित्ता, नमसित्ता थेराण अतियाओ पडिनिस्खमइ) ત્યારપછી કડરીક ઉત્થાન શકિત વડે ઊભે થયે, ઉસ્થાન શકિત-ઊભા થવાની શકિત વડે ઊભે થઈને તેણે સ્થવિરોને વદન તેમજ નમસ્કાર કર્યો વદના અને નમસ્કાર કરીને તેણે તેમને આ પ્રમાણે વિનતી - बनगारधर्मामृतवपिणो टी० अ० १९ पुडरीक-कंडरीकचरित्रम् ७१७ इति तद् वचन श्रुत्वा ते स्थविरा' मोचु. ' अहासह देवाणुप्पिया' यथासुख है देवानुप्रिया । हे देवानुप्रिय ! यथा तव मुखकर भवेत् तथा कुरु । ततः खलु स कण्डरीको यावत् स्थविरान् वन्दते नमस्यति, वन्दित्वा नमस्यित्वा स्थविराणा- मन्तिकात्-ममीपात् प्रतिनिष्क्राम्यति, प्रतिनिष्क्रम्य, तमेव 'चाउग्घट' चतु- घेण्ट चतस्रो घण्टा यस्मिन् स तम्घण्टा चतुष्टयोपेतम् अश्वस्थ दूरोहति, यारद प्रत्यारोहति-रथादवतरति । अवतरणानन्तर यौव पुण्डरीको राजा तत्रैव उपाग च्छति, 'करयल जाव' करतल यावत् करतलपरिगृहीत शिर आवत्तं दशनख मस्तकेजलिं कृत्वा पुण्डरीकमेवमवादी-एव खलु हे देवानुपिय ! मया स्थवि राणामन्तिके यावद्दों निशान्त =Qत', स धर्मः स्थविरप्रोक्तो धर्मः यावत् अभिरुचित' । तत् खलु हे देवानुप्रिय । 'जाव पव्यात्तए ' यानत् प्राजितुम्हे देवानुपियाः भवद्भिरभ्यनुज्ञातो स्थविराणामन्ति के मनजितुमिच्छामीतिभावः । देवानुप्रियो आप जैसा कहते है-वह पैसा ही है-मेरी भावना उसे सुनकर सयम लेने की हो गई है-अतः सयम धारण करने के पहिले मैं पुडरीक राजा से इस विषय में पूछ आता है उसके बाद सयम धारणे करना चाहता है। इस प्रकार उसके वचन सुनकर उन स्थविरों ने उससे कहा-हे देवानुप्रिय ! तुम्हे जैसे सुख हो-तुम वैसा करो-इसके याद कडरीक ने स्थविरों को बदना की-नमस्कार किया और वदना नम- स्कारकर वह उनके पास से चला आया (पडिनिक्खमित्ता) आकर के (तमेवचाउग्घट आसरह दुरूहह, जाव पच्चोरुहइ, जेणेव पुडरीए राया तेणेव उवागच्छद, करयल जाव पुडरीय एव वयासी एव खलु देवाणु- प्पिया! मए थेराण अतिए जाव धम्मे निसते से धम्मे जाव अभिरूइय હે દેવાનુપ્રિયે ! તમે જેમ કહે છે તે ખરેખર તેમ છે આ બધું સાંભળીને સયમ ગ્રહણ કરવાની મારી ઈચ્છા થઈ ગઈ છે એટલા માટે સયમ ધારણ કરતા પહેલા હુ પુડરીક રાજાને આ વિષે પૂછી આવું છું ત્યારપછી હુ સંયમ ધારણ કરવા ચાહુ છુ આ પ્રમાણે તેના વચન સાંભળીને તે સ્થવિરોએ તેને કહ્યું કે હે દેવાનુપ્રિય ! તમને જેમાં સુખ મળે તેમ કરે ત્યારપછી તરીકે વિરાને વદન તેમજ નમસ્કાર કરીને તે તેમની પાસેથી આવતે રહ્યો (पडिनिस्पमित्ता) भावीने, (तमेव चाउग्घट आसरह दुरुहड, जाव पच्चोरूहइ, जेणेव पुडरीए राया तेणेव उवागच्छद, करयल पुडरीय एर बयासी एव ग्वलु देवाणुप्पिया ! मए राण अतिए जाव धम्मे निसते से धम्मे जाव अभिरूइए-तण्ण देवाणुप्पिया !
७८ . ततः पुण्डरीका पण्डरीर मेमगीत-मा ग्यछ तव हे देशानुमिय ! भ्रातः इदानीं सुण्डो यार मनन अह सलु तामझता २ 'रायामिसेण्ण' राजाभिपकेय अभिसिंचामिममिपेचयामि । तना पल पण्डरीको युगिजः पुण्डरीवस्य राश एतमर्थ नो नादियतमस्य राज्यामिपारूपमर्थ नो मनुते, 'नो परिमाणइ 'नो मतिनानाति-नसीरीति तुमिणीप सचिइ ' तृष्णीक -तपण देवाणुप्पिया! पचहत्ततपण से पुरी कडरी एव वयासी -मोण तुम देवाणुप्पियो ! इयाणि मुटे जाव पव्वयाहि-अहण तुम महया २ राधाभिसेणं अभिसिंचामि) वर वहा आया-जहा चतुघटो पेत अपना अश्वरथ रमाआ । वरा आकर वह उमपर चढ़ गया -चढकर वह जहा पुरीफ राजा थे वहां आया-यहां आते ही वह रथ से नीचे उतरा । नीचे उतरकर पुडरीक गजा के पास गया- यहा जाफर उसने पुडरीक राजा को दोनों हाथ जोडकर नम स्कार किया-बाद में इस प्रकार करने लगा-हे देवानुप्रिय मैंने स्थ विरो के पास धर्म का उपदेश सुना है-वह मुझे बहुन रूचा है इसलिये हे देवानुमिय! में आपसे आज्ञापित होकर उन स्थविरो के पास सयम लेना चाहता है-इस प्रकार कटरीक की बात सुनकर पुडरीकने उससे इस प्रकार कहा-हे देवानुप्रिय! तुम इस समय मुडित होकर स्थविरों के पास सयम धारण मतकरा में बड़े जोर शोर के उत्सव के साथ तुम्हारा राज्याभिषेक करना चाहता है। (तएण से कडरीए पुडरीयस्स जार पचहत्तए । तएण से पुडीए कडरीए एव वयासी-माण तुम देवाणुप्पिया। इयाणिमुडे जाव पव्ययाहि अह ण तुम महयार राथाभिसेएण अभितिचामि ) તે ત્યાં આવ્યું જ્યા ચતુર્ઘટવાળે પિતાને અધૂરય હતા ત્યા આવીને તે તેમાં બેસી ગયે, અને બેસીને તે જ્યા પુંડરીક રાજ હતું ગમે ત્યાં પહેચતા જ તે રથ ઉપરથી નીચે ઉતર્યો, નીચે ઉતરીને પુંડરીક રાજાની પાસે ને ત્યાં જઈને તેણે બંને હાથ જોડીને મુડીક રાજાને નમસ્કાર કયાં અને ત્યારપછી તેણે તેમને વિનતી કરતા આ પ્રમાણે કહ્યું કે હે દેવાનુપ્રિય ' મે વિરેની પાસેથી ધર્મોપદેશ સાભળ્યો છે તે મને ખૂબ જ ગમી ગયે છે એથી હે દેવાનુપ્રિય ! તમારી આજ્ઞા મેળવીને વિરેની પાસેથી સ યમ ગ્રહણ કરવા ઈચ્છું છું આ પ્રમાણે ડરીકની વાત સાંભળીને પુંડરીકે તેને આ પ્રમાણે કહ્યું કે હે દેવાનુપ્રિય ! તમે હમણ મુક્તિ થઈને સ્થવિરેની પાસેથી સયમ મેટા ઉત્સવ સાથે તમારે રાજયાભિષેક કરવા ધારણ કરો નહિ . मनगारधर्मामृतपपिणी टी० अ० १९ पुडरीक-कडरीफचरित्रम् सतिष्ठते-तमर्थ न स्वीकृतवान् केवल मौनमवलम्ब्य स्थितः । ततः सलु पुण्ड- रीको राजा कण्डरीक भ्रातर द्वितीयमपि तृतीयमपि पारम् ' एवं 'पूर्वोक्तरूपेण अवादी- जाव तुसिणीए सचिट्ठ' यावत्-तुष्णीकः सतिष्ठते । ततः खलु पुण्डरीकः कण्डरीक यदा 'नो सचाएइ ' नो नोति = न समर्थों भवति बहुमि आघवणाहि य 'आख्यापनाभिश्च-आख्यापनाभि -पव्रज्याविगेविमि राख्यानः 'पण्णवणाहि य ' प्रतापनामिश्च ' अह तब ज्येष्ठभ्राताऽस्मि, तव हित येन भाति, तदेव कथयामि, इत्यादि रूपैः प्रज्ञापनवात्यैः एव 'विण्णवणाहिय' विज्ञापनाभिः चिनितमृदुवचनावलिरूपक्षिप्रबन्धैः, तया 'सण्णनणाहि य सज्ञापनाभिः 'मनज्याया महान् कप्टो भवति' इत्यादि साभीप्सितसज्ञापकैर्वात्यैश्च रण्णो ण्यम णो आढाइ, णी पजिाणइ, तुसिणीए सचिट्ठड, तएण पुड- रीए राया कडरीयं दोच्चपि तच्चपि एव ययासी जाव तुमिणीए सचि- हइ, तण्ण पुडरीए कडरीय कुमार जाहे नो सचाई, नहिं आघवणाहि य पण्णवणाहि य ४ ताहे अकामा चेव एवमट्ठ अणुमनित्था जाय णिस्खमणाभिसेएण अभिसिंचइ जाच थेराण सीसभिरख दलयह) कडरीक कुमारने पुडरीक राजा की इस बात को आदर की दृष्टि से नहीं देखा-नही माना-और न उसे स्वीकार ही किया-केवल चुपचाप ही रहा । पुडरीक राजा ने जर कडरीक कुमार को चुपचाप देखा-तर उसने दुयारा और तियारा भी उससे ऐसा ही कहा-परन्तु उमने इस चात पर बिलकुल ही ध्यान नहीं दिया केवल चुपचाप ही रहा-। अतः जय पुडरीक राजा कडरीक कुमार को उसके घेय से विचलित करने (तएण से कडरीए पुडरीयस्स रण्गो एयम णो आहाइ, णो परिजाणइ, तुसिणीए सचिट्टइ, तएण पुडरीए राया कडरीय दोच्चपि तच्चपि एव पयासी जाव तुसिणीए सचिट्ठइ, तएण पुडरीए कडरीय कुमार जाहे नो सचाएई, बहूहि आधणाहि य पण्णवणाहि य ४ ताहे जकामए चेन एयमट्ट अणुमनित्था जाव णिक्खमणाभिसे एण अभिसिंचइ जाव येराण सीसभिरख दलयइ) કડક કુમારે પુડરીક રાજાની આ વાતનું સન્માન કર્યું નહિ—માની નહિ અને તેને આકાર પણ કર્યો નહિ, ફક્ત તે મૂગો થઈને બેસી જ રહ્યો પુડરીક રાજાએ જ્યારે કડરીક કુમારને મૂગો મૂગો બેસી રહેલ છે ત્યારે તેમણે બીજી વાર અને ત્રીજી વાર પણ તેને આ પ્રમાણે જ કહ્યું પરંતુ તેણે આ વાતની સહજ પણ દરકાર કરી નહી, ફક્ત મૂરો થઈને બેસી જ રહ્યો છેવટે જ્યારે પુડરીરાજા કંડરીક કુમારને તેના દયેયથી મક્કમ વિચારથી - . . - ७२० माया 'आयविनर' भाग्यापयितु ४थापनिरोधयितु न शानोतीति पूर्वेग सम्बन्ध', 'ताहे ' तदा अगमपचेर अामा अनि 'एपमह' एतम- र्थम्-अण्डरीकामिलपित प्रवश्यास्पम् , अणुमन्नित्या' अमन्यतस्वीकृत चान् , 'जार णिस्चमणामिसैपण ' यात नि क्रागामिपेकेण ' सीकरणानन्तर निक्रमणोपयोगि रस्तुजानगृपनीय सरिधि दीक्षामि केण अभिपिश्चति, 'जाव राण सीमभिनय दलयइ ' यारत्-स्थरिभ्य शिप्यभिक्षाम् अभिषेकानन्तर स पुण्डरीको राजा पण्डरीक शिशिया समुपश्य महता समारोहेण सह नलिनी पने उद्याने समायाति, तत्र स्पितेभ्प' स्थगिम्यः म्यषुभ्रातर शिष्पभिक्षा ददाति । अनन्तर सण्डरीरः मयभित सन अनगारो जातः । तथा 'एका रस गविक ' एकादशागरिव एकादशहरानपान नावः । तत' खलु स्थविरा मग के लिये आरयापनाओं द्वारा, प्रज्ञापनाओं द्वारा विज्ञापनाओं द्वारा सज्ञापनाओं द्वारा, समर्थ नहीं हो मके-तब उन्होंने विना इच्छा के ही कडरीक कुमार को दीक्षा ग्रहण करने रूप अर्थ की स्वीकृति देने के पाद निष्कमणोपयोगी समस्त वस्तुओं को उन्होंने मंगवाया-जय वे आ चुकी-तय उन्होंने उसका सविधि दीक्षाभिषेक से अभिसिंचन किया। अभिषेक के बाद पुडरीक राजा कडरीक को शिथिका में बैठाकर बड़े समारोह के साथ नलिनीवन में आये। वहा आकर उन्होंने स्थविरों के लिये अपने लघुभाई को शिष्य की भिक्षा रूप से प्रदान किया। इसके पाद कडरीक (पन्धइए अणगारेजाए) प्रवजित होकर अनगोरावस्था सान हो गये। ( एगारसगविऊ, तएण थेरा भगवतो अन्नया कयाइ पुडरिगिणीओ नयरीओ जलिणीवणाओ उजाणाओ पडिमिक्खमति, વિચલિત કરવા માટે આખ્યાપનાઓ, પ્રજ્ઞાપનાઓ, વિજ્ઞાપનાઓ, સાપ નાએ વડે પણ સમર્થ થઈ શકયા નહિ ત્યારે તેમણે ઈચ્છા ન હોવા છતાએ કડરીક કુમારને દિક્ષા ગ્રહણ કરવાની સ્વીકૃતિ આપી દીધી સ્વીકૃતિ આખ્યા બાદ તેમણે નિષ્ક્રમણને લગતી બધી વસ્તુઓ મગાવી જ્યારે વસ્તુ છે આવી ગઈ તારે તેમણે તેનું વિધિસર દીક્ષાભિષેક વડે અભિસિંચન કર્યું અભિષેક કર્યા બાદ પુંડરીક રાજા કડરીકને પાલખીમા બેસાડીને ભારે સમારોહની સાથે નલિની વનમાં આવ્યા ત્યાં આવીને તેમણે સ્થવિરોને પોતાના નાના ભાઈને शिष्यना ३५मा आधा दीपो त्यारी 05 ( पाइए अणगारे जाए) પ્રજિત થઈને અનગારાવસ્થા સંપન્ન થઈ ગયે ( एगारसगचिऊ-तएण थेरा भगवतो अन्नया कयाइ ५ नय ७२१ मनगारधर्मामृतवपिणी टीका २० १९ पुडरीक-कडरीकचरित्रम् वतो ऽन्यदा कदाचित् पुण्डरीकिण्या नगर्या नलिनीपना उद्यानात् पतिनिष्का म्यन्ति, प्रतिनिकम्य हिर्जनपदविहार विहरन्ति ॥ मू० २ ॥ मूलम्-तएणं तस्स कंडरीयस्त अणगारस्स तेहि अतेहि य पंतेहि य जहा सेलागस्स जाव दाहवक्कतिए यावि विहरइ । तएणं थेग अन्नया कयाड जेणेव पोंडरिगिणी तेणेव उवाग- च्छइ, उवागच्छित्ता, णलिणिवणे समोसढा, पोंडरीए णिग्गए धम्मं सुणेइ । तएणं पोंडरीए राया धम्म सोच्चा जेणेव कडरीए अणगारे तेणेव उवागच्छद, उवागच्छित्ता कडरीय अणगार वंदइ णमसइ वदित्ता णमंसित्ता कडरीयस्स अणगारस्स सरीरगं सव्वावाहं सरोय पासइ, पासित्ता, जेणेव थेरा भगवतो तेणेव उवागच्छइ, उवागच्छित्ता, थेरे भगवते वंदइ, णमंसइ, वंदित्ता णमसित्ता एव वयासी-अहण्णं भते । कडरीयस्स अणगारस्स अहा पवत्तेहि ओसहभेसज्जेहि जाव तेडच्छं आउटामि, त तुम्भे ण भते । मम जाणसालासु समोसरह। तएण थेरा भग- वतो पुंडरीयस्स पडिसुणेति, पडिसुणित्ता, जाव उवसपजित्ताणं " पडिणिस्खमित्ता यहिया जणवयविहार विरति) धीरे २ वे ग्यारह अगोंके पाठी भी नगये इसके बाद उन स्थविर भगवतों ने किसी एक दिन पुडरीशिणी नगरी के उम नलिनीवन नामकेउद्यान से विहार किया सो विहार कर वे वाहिर के जनपदों में विचरने लगे। १० २॥ रीमो णलिणीवणाओ उजाणाश्रो पडिणिक्खमति, पडिणिक्खमित्ता पहिया जणवयविहार विहरति) ધીમે ધીમે તેમણે અગિયાર અગોનુ અદાયન કરી લીધુ ત્યારબાદ તે સ્થવિર ભગવતેએ કઈ એક દિવસે પુડરીકિ નગરીના તે નલિનીન નામને ઉપાનથી વિહાર કર્યો, વિહાર કરીને તેઓ બહારના જનપદમા વિચરણ સૂત્ર ૨ || કરવા લાગ્યા ७२० . आपतिर आग्यापयितु ४यापतिरोधयितु न शमोतीति पूर्वेण मगन्धा, 'ताहे' तदा ' अकामा घेर। भामक एप-अनिन्छन 'पयमह' एतम- म्-कण्डरीकामिलपित माज्यास्पम् , ' अणुमन्निया' अमन्यत स्वीकृत वान् , ' जार णिस्वमणामिमेण्ण' या निफ्रागामिपकेण' स्त्रीकरणानन्तर निष्क्रमणोपयोगि रस्तृजातमुपनीय सविधि दीनामिपण अमिपिअति, 'जाव थेराण सीमभिक्ख दलयर' यान-स्थविरेभ्य शिष्यमिक्षाम् अभिषेकानन्तर स पुण्डरीको राजा फण्डरीक शिपिकाया समुपदेश्य महना समारोहेण सह नलिनी पने उद्याने समायाति, तत्र स्थितेभ्यः स्थपिरेभ्यः स्वरधुभ्रातर शिष्यमिक्षा ददाति । अनन्तर स पण्डरीमः प्रबजित सन मनगारो जातः । तथा ' एका रसगविऊ ' एकादशागरिद=एकादगारमानवान जातः । तत' सल स्थविरा भग के लिये आरयापनाओं द्वारा, प्रज्ञापनाओं द्वारा विज्ञापनाओं द्वारा सज्ञापनाओं द्वारा, समर्थ नहीं हो सके-तय उन्होंने विना इच्छा के ही कटरीक कुमार को दीक्षा ग्रहण करने स्प अर्थ की स्वीकृति देने के बाद निष्कमणोपयोगी समस्त वस्तुओं को उन्होंने मंगवाया-जब वे आ चुकी-तब उन्होंने उसका सविधि दीक्षाभिषेक से अभिसिंचन किया। अभिषेक के बाद पुडरीक राजा कडरीक को शिक्षिका में बैठाकर बडे समारोह के साथ नलिनीवन में आये। वहा आकर उन्होंने स्थविरों के लिये अपने लघुभाई को शिष्य की भिक्षा स्प से प्रदान किया। इसके घाद कडरीक (पन्यइए अणगारेजाए) प्रव्रजित होकर अनगोरावस्था सान हो गये। (एगारसगविऊ, तएण थेरा भगवंतो अन्नया कयाइ पुडरिगिणीओ नयरीओलिणीवणाओ उजाणाओ पडिणिक्खमति, વિચલિત કરવા માટે આખ્યાપનાઓ, પ્રજ્ઞાપનાઓ, વિજ્ઞાપનાઓ, સરા, નાઓ વડે પણ સમર્થ થઈ શકયા નહિ ત્યારે તેમણે ઈચ્છા ન હોવા છતાએ કડરીક કુમારને દિક્ષા ગ્રહણ કરવાની સ્વીકૃતિ આપી દીધી સ્વીકૃતિ આપ્યા બાદ તેમણે નિષ્ક્રમણને લગતી બધી વસ્તુઓ મગાવી જ્યારે વસ્તુ એ આવી ગઈ ત્યારે તેમણે તેનું વિધિસર દીક્ષાભિષેક વડે અભિસિંચન કર્યું અભિષેક કર્યા બાદ પુડરીક રાજા કડરીકને પાલખીમા બેસાડીને ભારે સમારેહની સાથે નલિની વનમાં આવ્યા ત્યા આવીને તેમણે સ્થવિરેને પિતાના નાના ભાઈને शिष्यता ३५॥ भाषा सीधी त्या२पछी 50 ( पवइए अणगारे जाए) પ્રજિત થઈને અનગારાવસ્થા સ પન્ન થઈ ગયે ( एगारसगविऊ-तपणं थेरा भगवतो अन्नया कयाइ पु. नय.
. - अनगारधर्मामृतवपिणी टो० अ० १९ पुडरीक-फडरीकचरित्रम् ७३ टीका-'तरण तस्स ' इत्यादि । तत खलु तम्य कण्डरीकस्य अनगारस्य तैः । अतेहि य ' अन्तैश्व-बल्लचणकादिभि , ' पतेहि य' मान्तैश्च पर्युपिते., नीरसेः सादर्जितैर्वा अशनादिभिः यथा शैलकस्य राजत्तथा ऽस्याऽपितथा- विवमाहार कुर्वतो यावत्प्रकृतिमकुमारकस्य सुयोपचितस्य शरीरे वेदना प्रादुर्भूता, कीदृशीत्याह - उग्वला यावद् दुरधिसया - सोढुमशक्या पुन सुखलेशरहिता कण्डरीकः दाहात्तिए ' दाहव्युत्कान्तिक -दाहस्य गरीरसन्तापरूपरोगस्य व्युत्क्रान्ति =उत्पत्तिर्यस्यासी दाहव्युत्क्रान्तिक =करचरणादिज्वलनवान् चापि विह- रति । तत खलु स्थपिरा पन्यदा कदाचित् यत्र पुण्डरीकिणी नगरी तीव उपागन्छन्ति, उपागत्य, नलिनीवने समवस्ताः । पुण्डरीस्तदर्शनार्य स्वभवना- 'तएण तम्स कउरीयस्स' इत्यादि। टीकार्थ--(तएण) इसके पाद (तस्स कडरीयस्स अणगास्स तेहिं अतेहिं पतेहिं य जहासेलगस्स जाव दारवक्कतिए यावि विहरह) उस कडरीक अनगारके पल्लचणक आदि रूप अन्ताहार करनेसे तयापर्युपित अथवानी रस आहाररूप प्रान्तोहार करनेसे शैलक राजर्पिकी तरह प्रकृतिसे सुकुमार सुखोपचित होने के कारण शरीर में वेदना उत्पन्न हो गई । जो उज्ज्वला एव सोढुमशक्या थी । इस तरह शरीर सन्तापरूप रोग की उत्पति से वे कडरीक अनगार कर चरण आदि में जलन होने के कारण सुख के लेश से भी वर्जित हो गये। (हरण थेग अन्नया कयाह जेणेव पोड- रिगिणी तेणेव उवागच्छर, उवागघिउत्ता लिणिवणे समोसढा पोडरीए तपण तस्त्र कडरीयास इत्यादि- डाय-(तएण) त्यारपछी, (तस्स कडरीयस्स आगगारस्स तेहिं अतेहिं पतेहि य जहा सेलगस्स नाव दाहवक्कतिए यानि विहरड) તે કડક અનગારના શરીરમાં લલચણક વગેરે રૂપ અ તાહાર કરવાથી તેમજ પર્યત અથવા નીરસ આહાર રૂપ પ્રાન્તાહાર કરવાથી વિન રાજર્વિની જેમ પ્રકૃતિથી સુકુમાર અને સુખોપચિત લેવા બદલ વેદના તત્પન્ન થઈ ગઈ તે વેદના અત્યંત ઉગ્ર અને અસહ્ય હતી આ પ્રમાણે શરીર સતાપ રૂપ રેગની ઉપત્તિથી તે કરી અનગર હાથે પગમાં બળતરાને લીધે થોડી સુખશાતિ પણ મેળવી શક્યા નહિ (तएण थेरा अन्नया कयाइ जेणेव पोडरिगिणी तेणेव उवागन्इ, उवाग च्छित्ता णलिणिवणे ममोसहा पोंडरीए निग्गए धम्म मुणेड, तएण पोंडरीए राया विहरति। तएणं पुंडरीग गया जहा मडुप सेलागस्स जाव वलियसरीरे जाए । ताणं थेरा भगवनो पोंडरीय राय पुच्छति, पुच्छित्ता पहिया जणवयविहारं विहरति । तएण से कंडरीए ताओ रोयायंकाओ विप्पमुक्के समाणे तसि मणुपणास अस- पाणखाइमसाहमसि मुच्छिण् गिद्धे गढिए अजोचवणे णो संचाएइ पोंडरीय राय आपुच्छित्ता पहिया अन्भुज्जएण जण क्यविहार विहरित्तए । तत्थेव ओसणे जाए । तएण से पोंड रीए इमीसे कहाए लट्ठ समाणे पहाए अतेउरपरियालसंप रिवुडे राया जेणेव कडरीए अणगारे तेणेव उवागच्छइ, उवा गच्छित्ता, कडरीयं अणगार तिक्खुत्तो आयाहिणं पयाहिण करेइ करित्ता वदइ णमसइ वदित्ता णमंसित्ता, एवं व्याप्ती- धन्नेसि णं तुम देवाणुप्पिया | तब माणुस्सए जम्मजीवियफले जेणं तुम रज्ज व जाव अतेउर वावि छड्डयित्ता जाव विगो वइत्ता जाव पव्वइए । अहपणं अहपणे अकय पुन्नं रज्जे जाव अन्तेउरे य माणुस्सएसु य कामभोगेसु मुन्छिए जाव अज्झो ववन्ने नो सचाएमि जाव पवइत्तए । त धन्नेसि णं तुम देवा शुप्पिया । जाव जीवियफले । तएणं से कंडरीए अणगार पुड रीयस्स एयमह णो आढाइ जाव सचिटुइ । तएणं कटरीए पोंड- एिणं दोच्चपि तच्चपि एव वुत्ते समाणे अकामए अवस्सवसे लज्जोए गारवेणय पोंडरीय राय आपुच्छइ, आपुच्छिन्ता थेरेहि सद्धिं बहिया जणवयविहार विहरइ ।। सू०३ ॥
- . - अनेगारधर्मामृतवर्षिणी टी० अ० १९ पुण्डरीफ कडरीकचरित्रम् ७२५ अनगारस्य 'अहापवत्तेहिं ' यथा प्रवृत्त प्राररित्यर्थः 'ओसहभेसज्जेहि' औप- भैपज्यैः 'जावतेइच्छ' यावत् चिकित्साम् 'आउटामि' आवर्तयामि-कारयामि, 'त' तत्-तस्मात् कारणात् यूय ग्वल हे भात ! मम पानशालासु समवसरत- आगच्छत । तत. वलु स्थविरा भगवन्त पुण्डरीकस्य एतम प्रतिशृण्वन्ति= एत- वचन स्वीकुर्वन्ति, प्रतिश्रुत्य-स्वीकृत्य यावत्-उपसपद्य-यानशाला समाश्रित्य विहरति । ततः खलु पुण्डरीको राजा जहा मइए सेलगस्स जाब बलियसगरे जाए' यथा मण्डकः शौलफस्स यापद् पलिशरीरो जातः %D कडरीयस्स अणगारस्स अहापयत्तेहिं ओसहभेसज्जेहिं जाव तेइच्छ आउट्ठामि-त तुम्भे णं भते । मम जाणसालास्तु समोसरह-तएण थेरा भगवतो पुडरीयस्स पडिसुणेति, पडिसुणित्ता जाव उपसपजित्ताण विहरति ) देखकर जहा स्थविर भगवत विराजमान थे-वहा पर वे आये वहा आकर उन्हों ने स्थविर भगवतों को वदना एव नमस्कार किया- चदना नमस्कार करके फिर उन्हों ने उनसे इस प्रकार का हे भदत! में कडरीक अनगार की यया प्रवृत्त-प्रासुक-औपध, भैषज्यों द्वारा यावत् चिकित्सा करवाऊंगा-अतः हे भदत! आपलोग मेरी यानशाला में यहा से विहार कर पधारें-वही ठहरें- इस प्रकार पुडरीक राजा की प्रार्थना को उन स्थविर भगवतो ने स्वीकार कर लिया और वहा से विहार कर वे पुडरीक राजा की चानशाला में आकर ठहर गये। (तरण पुडरीए राया जहामडए सेलगस्स जाव बलियसरीरे जाए तएण थेरा गारस्त अहापवत्तेहिं ओसहभेसज्जेहिं जाव तेइच्छ आउट्ठामि त तुम्भेण भते मम जाणसालामु समोसरह-तएण थेरा भगवतो पुडरीयस्म पडिसुणेति, पडि सुणित्ता जा उपसज्जित्ताण विहरति) જોઈને તેઓ જ્યા સ્થવિર ભગવત વિરાજમાન હતા ત્યા આવ્યા ત્યા આવીને તેમણે કરિ ભગવતેને વદન અને નમસ્કાર કર્યા વદન અને નમસ્કાર કરીને તેમણે તેમને આ પ્રમાણે વિનતી કરી કે હે ભદન્ત ! હું કરી અનગારની યથાપ્રવૃત્ત-પ્રાસુક-ઔષધ-શૈષ (દવાઓ) વડે યાવત ચિકિત્સા (લાજ) કરવા માગુ છું એટલા માટે હે ભદન્ત ! તમે સૌ અહીથા વિહાર કરીને મારી યાનશાળામાં આવે અને ત્યાજ એકાએ આ પ્રમાણે પુડરીક રાજાની વિનતીને તે સ્થવિર ભગવતોએ સ્વીકાર કરી લીધો અને ત્યાથી વિહાર કરીને તેઓ પુડરીક રાજાની યાનશાળામાં આવીને રોકાઈ ગયા (तएण पुडरीए राया जहा मडुए सेलगरस जान लियसरीरे जाए तएण घेरा - D ६२५ जाताधर्मया निर्गत तत्र गत्वा धर्म भणोति । तत बलु पुण्डरीको गजा धर्म श्रुवा योन कण्डरीकोऽनगारम्तार उपागनि, उपागत्य, सगैक पन्दते नमस्यति, पन्दिया नमस्यिसा पण्डरीरस्य अनगारम्य दशरीर 'सायद' सब्यावाध पीडासहित 'सरोय' सरोग-रोगन्ति 'पामा' यति, या यौव स्थविरा भगव तस्तो उपागन्द्रति, उपागत्य सि मगरतो चन्दन नमस्यति, वन्दित्वा नमस्थित्वा पमनादीव-'अग्ण मते !' अह य है भदन्त । कण्डरीकस्य निग्गए धम्म सुणेड, तरण पोहरीप गया धम्म मोचा जेणेव कडरी अणगारे तेणे उपागच्छद उपागन्धित्ता कटरीय अणगार बदह नम सह, वदित्ता नमसित्ता करीयरस अणगारस्न सरीरंग सव्वावाह सरोय पासह ) किसी एक समय वे स्थविर पुडरी किणी नगरी में विहार करते हुए आये। यहा आकर वे नलिनीवन नाम के उन्धान में ठहर गये। आगमन सुनकर पुटरीक राजा उन को वदना एव उनसे धर्मश्र वण करने की भावना से अपने राजमहल से निकलकर उस नलिनीवन उद्यान में आये-स्थचिरों ने उन्हें धर्म का उपदेश दिया। धर्म का उप देश श्रवण कर फिर वे जहा कडरीक अनगार थे उनके पास आये। वहा आकर उन्हों ने उनको वदना की नमस्कार किया-1 वदना नमस्कार करके उन्होंने कडरीक अनगारके शरीर को पीडासहित एव रोगसरित देखा-(पासित्ता जेणेच थेरा भगवतो तेणेय उवागच्छद, उचागच्छित्ता थेरे भगवते वदइ णमसइ, बदित्ता णमसित्ता एव चयासी-अहण्ण धम्म सोचा जेणेव कडरीए अणगारे तेणेव उवागछइ, उवागच्छित्ता कडरीय अणगार बदइ नमसइ, वदित्ता नमसित्ता कडरीयस्स अणगारस्स सरीरग सव्वा बाह सरोय पासइ) કેઈ એક વખતે તે સ્થવિર પુંડરીકિણી નગરીમ વિહાર કરતા કરતા આવ્યા ત્યા આવીને તેઓ નલિનીન નામના ઉદ્યાનમાં રોકાયા તેમનું આગમન સાભળીને પડરીક જ તેમને વદન કરવા માટે તમે તેમની પાસેથી મેં પદેશ સાંભળવા માટે પોતાના રાજમહેલથી નીકળીને તે નલિનીવન ઉદ્યાનમાં આજે વિરાએ તેમને પણ આવે, ધર્મોપદેશ સાંભળીને તેઓ જ્યા કડરીક અનગાર હતા તેમની પાસે ગયા ત્યાં જઈને તેમણે તેમને વદન અને નમસ્કાર કર્યા વદન અને નમસ્કાર કરીને તેમણે કડરીક અનગારના શરીરને પીડા સહિત અને રેગયુક્ત જેવું ( पासित्ता जेणेव येरा भगवतो तेणेव उवागच्छद, उपगच्छित्ता थेरे भग वते वदइ, णमसइ, वदित्ता णमसित्ता एव क्यासी-अण्ण भते ' भते! 1 14 अण . - - अनगारधर्मामृतषिणी टी० अ०१९ पुण्डरीक-कडरीकचरित्रम् હરે अनगारस्य ' अहापवत्तेहिं ' यथा प्रवृत्त-मासुरित्यर्थः 'ओसहभेसज्जेहि' औप- भैषज्यैः 'जावतेइच्छ' यावद चिकित्माम् ‘आउटामि' आवर्तयामि कारयामि, 'त' तत्-तस्मान् कारणात् यूय खलु हे भदख ! मम यानशालासु समवसरत= आगच्छत । तत' खलु स्थपिरा भगवन्त पुण्डरीकस्य एतमर्थ पविण्पन्तिएत हचन स्वीकुर्वन्ति, प्रतिश्रुत्य-स्वीकृत्य यावत्-उपसपद्य-यानशाला समाश्रित्य विहरति । ततः खलु पुण्डरीको राजा जहा मडुए सेल्गस्स जाव वलियसगैरे जाण' यथा मण्डमः शौलकस्स यारद् रलिफशरीरो जातः = कडरीयस्स अणगारस्स अापत्तहिं ओसहभेसज्जेहिं जाच तेहच्छ आउटामि-त तुम्भे ण भते । मम जाणसालासु समोसरह-तण्ण थेरा भगवतो पुडरीयस्म पडिसुणेति, पडिसुणित्ता जाव उपसपजित्ताण विहरति) देखकर जहा स्थविर भगवत विराजमान थे-वहा पर वे आये वहा आकर उन्हों ने स्थविर भगवतों को बदना एव नमस्कार किया। वदना नमस्कार करके फिर उन्हों ने उनसे इस प्रकार कहा है भदत ! मैं कडरीक अनगार की यया प्रवृत्त-मासुक-औपध, भैपज्यों द्वारा यावत् चिकित्सा करवाऊँगा-अतः हे भदत ! आपलोग मेरी यानशाला में यहा से विहार कर पधारें-वहीं ठहरें- इस प्रकार पुडरीक राजा की प्रार्थना को उन स्थविर भगवतो ने स्वीकार कर लिया और वहा से विहार कर वे पुडरीक राजा की पानशाला में आकर ठहर गये । (तण्ण पुडरीए राया जहामडए सेलगस्स जाव बलियसरीरे जाए तएण थेरा વદન અને गारस्स महापवत्तेहिं ओसहभेसज्जेहिं जाव तेदच्छ आउट्ठामि त तुम्भेण भते मम जाणसालामु समोसरह-तएण थेरा भगतो पुडरीयस्म पडिमुणेति, पडि सुणित्ता जान उचत रज्जित्ताण विहरति) ઈને તેઓ જ્યા સ્થવિર ભગવત વિરાજમાન હતા ત્યા આવ્યા ત્યા આવીને તેમણે અવિર ભગવતોને વદન અને નમસ્કાર કર્યા નમસ્કાર કરીને તેમણે તેમને આ પ્રમાણે વિનતી કરી કે હે ભદન્ત ! હું કડરીક અનગરની યથાપ્રવૃત્ત-માસુક-ઔષધ-ભૈષ ( દવાઓ) વડે યાવત ચિકિત્સા (ઈલાજ) કરવા માગુ છું એટલા માટે હે ભદન્ત ! તમે સૌ અહીથી વિહાર કરીને મારી યાનશાળામાં આવે અને ત્યાજ એકાએ આ પ્રમાણે પુડરીક રાજાની વિન તને તે સ્થવિર ભગવતેએ સ્વીકાર કરી લીધા અને ત્યાથી વિહાર કરીને તેઓ પુડરીક રાજાની યાનશાળામાં આવીને રોકાઈ ગયા (तएण पुडरीए राया जहा मडुए सेलगस्स जार वलियसरीरे जाए तएण घेरा ६२४ rথম निर्गत तत्र गत्वा धर्म भगोति । तर बलु पुरीको राजा धर्म श्रुमा यत्रत्र कण्डरीकोऽनगारम्तर उपागमति, उपागत्य, रण्टगक पदते नमस्यति, पन्दिया नमस्थिता पण्डरीकम्य अनगारस्य गरीर ' राह' मध्यावाध- पीडासहित ' सरोय' सरोग रोगगन्ति 'पामा' पश्यति, दृष्ट्वा यौव स्थविरा भगर तस्तोर उपागम्धति, उपागत्य स्थविरा मगातो पन्दने नमस्पति, वन्दित्वा नमस्थित्मा परमादीत्-'अग्ण मते !' अह यलु है भदन्त ! कण्डरीकस्य निग्गा धम्म सुणेड, तपण पोहरीपराया धम्म सोचा जणेव कहरील अणगारे तेणे उगागच्च उघागन्छिता करीय अणगार वदा नम सह, वदित्ता नमसित्ता कटरीयस्स अणगारस्म सरीरंग सव्वाबाह सरोय पासह) किसी एक समय वे स्थविर पुडरी किणी नगरी में विहार करते हुए आये। वहा आकर चे नलिनीवन नाम के उद्यान में ठहर गये। आगमन सुनकर पुररीक राजा उन को बदना एव उनसे धर्मन वण करने की भावना से अपने राजमरल से निकलकर उस नलिनीवन उद्यान में आये-स्थपिरों ने उन्हें धर्म का उपदेश दिया। धर्म का उप देश श्रवण कर फिर वे जहा कडरीक अनगार थे उनके पास आये। घहा आकर उन्हों ने उनको वदना की नमस्कार किया-1 वदना नमस्कार करके उन्होंने कडरीक अनगारके शरीर को पीडासहित एव रोगसरित देखा-(पासित्ता जेणेव येरा भगवतो तेणेव उवागच्छद, उवागच्छित्ता थेरे भगवते वदइ णमसइ, यदित्ता णमसित्ता एव चयासी-अण्ण भते । धम्म सोचा जेणेच कडरीए अणगारे तेणेव उवागच्छइ, उबागच्छित्ता कडरीय अणगार बदइ नमसइ, बदित्ता नमसित्ता कडरीयस्स अणगारस्स सरीरंग सन्चा बाह सरोय पासइ) કોઈ એક વખતે તે સ્થવિર પુંડરીકિણી નગરીમ વિહાર કરતા કરતા આવ્યા ત્યાં આવીને તેઓ નલિનીન નામના ઉદ્યાનમાં રોકાયા તેમનું આગમન સાભળીને અંડરીક રાજા તેમને વરદ કરવા માટે તે તેમની પાસેથી ધર્મો પદેશ સાભળવા માટે પિતાના રાજમહેલથી નીકળીને તે નલિનીવન ઉદ્યાનમાં આવ્યે વિરાએ તેમને ઉપદેશ આપ્યો, ધર્મોપદેશ સાંભળીને તેઓ જ્યા ડરીક અનગાર હતા તેમની પાસે ગયા ત્યાં જઈને તેમણે તેમને વદન અને નમસ્કાર કર્યો વદન અને નમસ્કાર કરીને તેમણે કડરીક અનગારી શરીરને પીડા સહિત અને રોગયુક્ત જેયુ (पासित्ता जेणेन येरा भगरतो तेणेव उवागन्छइ, उवागच्छित्ता थेरे भग वते वदइ, णमसइ, वदित्ता णमसित्ता एव वयासी-अहण्ण भते । . . अग . अभंगारघामृतवपिणी टी० अ० १९ पुण्डरीक कडरीकचरित्रम् કરે अनगारस्य ' अहापबत्तेहिं ' यथा प्रवृत्ते. मासुकै रित्यर्थः 'ओसहभेसज्जेहि' औप- भैपज्यैः 'जावतेहन्छ' यावत् चिकित्माम् 'आउटामि' आवर्तयामिकारयामि, 'त' तत्-तस्मात् कारणात् यूय ग्वलु हे भदन्त ! मम रानशालासु समवसरत= आगच्छत । तरा. खलु स्थविरा भगवन्त पुण्डरीफस्य एतमर्थ प्रति-मन्ति= एत इचन स्वीकुर्वन्ति, प्रतिश्रुत्य-स्वीकृत्य यावत्-उपसपद्य-यानशाला समाश्रित्य विहरति । ततः खल पुण्डरीको राजा 'जहा मदुए सेलगस्स जाव वलियसरीरे जाए' यथा मण्टकः शौलकस्य याद पलिकशरीरो जातः = कडरीयस्स अणगारस्स अशापयत्तेहिं ओसहभेसज्जेहिं जाच तेदच्छ आउटामि-त तुम्भे ण भते । मम जाणसालास्तु समोसरह-तएण थेरा भगवतो पुडरीयस्स पडिसुणेति, पडिसुणित्ता जाव उपसपजित्ताण विहरति ) देखकर जहा स्थविर भगवत विराजमान थे-वहा पर वे आये वहा आकर उन्हों ने स्थविर भगवतों को वदना एव नमस्कार किया। वदना नमस्कार करके फिर उन्हों ने उनसे इस प्रकार कहा हे भदत ! मैं कडरीक अनगार की यया प्रवृत्त-प्रासुक-औपध, भैषज्यों द्वारा यावत् चिकित्सा करवाऊँगा-अतः हे भदत ! आपलोग मेरी यानशाला में यहा से विहार कर पधारें-वही ठहरें- इस प्रकार पुडरीक राजा की प्रार्थना को उन स्थविर भगवतो ने स्वीकार कर लिया और वहा से विहार कर वे पुडरीक राजा की पानशाला में आकर ठहर गये। (तण्ण पुडरीए राया जामडए सेलगस्स जाच बलियसरीरे जाए तएण थेरा गारस्स अहापयत्तेहिं ओसहभेसज्जेहिं जाव तेइच्छ आउट्ठामि त तुम्भेण भते मम जाणसालासु समोसरह-तएण थेरा भगवतो पुडरीयस्म पडिसुणेति, पडि सुणित्ता जाव उपसज्जिताण विहरति) જોઈને તેઓ જ્યા સ્થવિર ભગવત વિરાજમાન હતા ત્યા આવ્યા ત્યા આવીને તેમણે વિર ભગવતોને વદન અને નમસ્કાર કર્યા વદન અને નમસ્કાર કરીને તેમણે તેમને આ પ્રમાણે વિનતી કરી કે હે ભદન્ત હું કડરીક અનગારની યથાપ્રવૃત્ત-પ્રાસુક-ઔષધ-ૌષ (દવાઓ) વડે યાવત ચિકિત્સા (લાજ) કરવા માગુ છું એટલા માટે હે ભદન્ત ! તમે સૌ અહીથા વિહાર કરીને મારી યાનશાળામાં આવે અને ત્યાજ એકાઓ આ પ્રમાણે પુંડરીક રાજાની વિનતીને તે સ્થવિર ભગવતોએ સ્વીકાર કરી લીધા અને ત્યાથી વિહાર કરીને તેઓ પુડરીક રાજાની યાનશાળામાં આવીને રેકાઈ ગયા (तएण पुडरीए राया जहा मडुए सेकगस्स जान लियसरीरे जाए तएण थेरा यथा मण्डको रागा शोलकाय रान मारायभापरिकिरमामकारवत् , वधेय पुण्डरीकोऽपि पण्डरीरस्थानगारस्य यया योग्यगैपरमेषज्यविकिसा कारयतिस्म यापन कानिपीर्टिन पण्डरीको रमितशरीर निरामयो भातः। ततः खलु स्थविरा भगान्त. पुण्डरीक राना7 भारान्ति, आपन्य परिर्जनपदवि हार विहरन्ति । तत खलु सकारीकः तम्मान 'गैगायकाओ' रोगाबाद विषमुक्तः सन् तस्मिन् 'मनुग्गमि' मनोजेमगीये अशनपानवायसाये चतु प्रिये आहारे 'मुच्छिए' भूमितामू प्राप्तः आमकायर्थः, 'गिद्धे 'गदा- आकाक्षाान् , 'गदिए ' ग्रन्धितासासाद निवदमानस., 'अझोनवणे' भगवतो पोंडरीय राय पुति, पुत्तिा यरिया जणवयविहार विह रति, तण्ण से कडरीप ताओ रोयायकाओ विप्पमुक समाणे तसि मणुपणसि असणपाणग्यामसाइममि मुच्छिा गिद्ध गढि अझोववपणे जो सचाइए पोटरीय राय आपुत्तिा परियो अन्भुजाण जणवय विहार विररित्तण) इसके बाद महक ने जिस प्रकार शैलकराजर्षि की प्रासुक औषध, भैपज्यों द्वारा चिकित्मा करवाई थी उसी प्रकार पुडरीक राजा ने भो कडरीक अनगार की यथायोग्य औषध भैषज्यों द्वारा चिकित्सा करवाई-इस से वे पलितशरीर निरोग हो गये। इसके अन न्तर उन स्थविर भगवतो ने वश से विहार करने के लिये पुडरीक राजा से पूमा बाद मे ये वरा से वाहिर जनपदों में विहार कर गये। कड रीक अनगार कि जो रोगातकसे निर्मुक्त हो चुके थे मनोज्ञ अशन, पान, खाद्य, एव स्वाद्यरूप चतुर्विध आहार में इतने अधिक आसक्त शे गये भगवती पौडरीय राय पुन्छति, पुच्छित्ता पहिया जणत्रयविहार विहरति, तएण से कडरीए ताओ रोयायकाओ पिप्पमुक्के समाणे तसि मणुष्णसि-असणपाण खाइमसाइमसि मुच्छिए गिद्धे गहिए अझोवण्णे णो सचाएइ पोंडरीय राय आपुच्छित्ता बहिया अन्भुज्जएण जणक्यविहार विहरित्तए) ત્યારપછી મહૂકે જેમ શૈલક રાજનિી પ્રાક, ઔષધ અને શ્રેષપે વડે ચિકિત્સા કરાવડાવી હતી તેમજ પુરીક રાજાએ પણ કડરીક અનગારની ઉચિત ઔષધ-ભષ (દવા) વડે ચિકિત્સા કરાવડાવી તેથી તેઓ નિશગ-સબળ બની ગયા ત્યારપછી તે સ્થવિર ભગવતીએ ત્યાથી વિહાર કરવા માટે પુડરીક રાજાને પૂછયું ત્યારબાદ તેઓ બહારના જનપદમાં વિહાર ગાતોથી નિર્મુક્ત થઈ ગયેલા કડરીક અનગાર તે મને, અશન, પાન, ખાદ્ય અને સ્વાદરૂપ ચાર જાતના આસક્ત થઈ ગયા-ગુદ્ધ બની ગયા, ગ્રથિત-રસના આસ્વાદનમા નિબદ્ધ માન - કરી કાયા આહારમાં એટલા બધા ७२७ बहि । , - अनगारधर्मामृतवपिणी टी अ० १९ पुण्डरीक-फडरीकरित्रम् अयुपपन्ना सर्वथा आसक्तः सन् नो शक्नोति पुण्डरीक राजानमापृन्छ। 'पहिया' अभुज्जएण' अभ्युद्यतेन-उपविहारेण खलु विहर्तुम् , कि तु 'तन्थेव' तव यानशालायामेव 'ओसणे' अपसन्ना, शियिसाधुसमाचारवान् जातः। तत खलु स पुण्डरीको राजा 'इमीसे कहाए' अस्या, कथायाः कण्डरीकोऽनगारो- ऽवसन्नो जातः' इति वृत्तान्तस्य लब्धार्थः सन् स्नातः 'अतेउरपरियालसपरि- बुडे ' अन्तःपुरपरिवारसपरिटतः, यौव कण्डरीकोऽनगारस्तव उपागच्छति, उपआगत्य, कण्डरीक निः कृत्व आदक्षिण प्रदक्षिण करोति, कृत्वा, वन्दते नमस्यति, वन्दित्वा मस्थित्वा एवमवाढीत्-धन्योऽसि खलु व हे देवानुप्रिय ! यतस्तम् 'कय? ' कृतार्थः विहितजीवनकृत्य 'कयपुन्ने कृतपुण्या विहितमनजितपः । पुनः सुलद्धे 'सुलय-मुष्ठुतया माप्त खलु हे देवानुप्रिय ! 'त'च्या 'माणु- स्सए ' मानुष्यक-मनुष्यसम्बन्धि, 'जम्मजीवियफले ' जन्मजीवितफलम्-जन्म- गृद्ध बन गये प्रथित-रसास्वाद मे निनद्धमानसवाले हो गये, और अध्युपपन्न बन गये-अर्थात् सर्वथा आसक्त बन गये कि वही से बाहिर उग्र विहार करने के लिये उनका मन ही नहीं हुआ-अतः उन्हो ने पुडरीक नरेश से विहार करने की कोई बात ही नहीं पूछी किन्तु (तत्थेव-ओसन्ने जाण) वही पर वे रहते २ शिथिल साधुसमाचारीवाले बन गये। (तण्ण से पोडरीए इमीसे कहाए लट्ठ समाणे हाए अंते उरपरियालसपरितुडे राया जेणेव कडरीए अणगारे तेणेव उवागच्छा, उवागच्छित्ता कडरीय अणगार तिम्खुत्तो आयाहिण पयाहिण करेइ, करित्ता वदइ, णमसह, वदित्ता णमसित्ता एव वयासी-धन्नेसिण तुम देवाणुपिया । कयत्थे कयपुन्ने कयलक्खणे सुलद्धण देवाणुप्पिया तव माणुस्सजन्मजीवियफले जेण तुम रज च जाब अतेउर थावि छड्डइत्ता સવાળા થઈ ગયા અને અષ્ણુપયન બની ગયા એટલે કે તેઓ એક્રમ આસક્ત થઈ ગયા છે ત્યાથી બહાર ઉગ્ર વિહાર કરવા માટે પણ તેઓ તૈયાર થયા નહિ એથી તેમણે પુડરી. રાજાને વિહાર કરવાની બાબતમાં કઈજ પૂછ્યું ना प( तत्थेव ओसन्ने जाए ) या हेता रडता तसा शिथिल साधु સમાચારી થઇ ગયા એટલે કે સાધુઓના આચારમાં તેઓ શિથિત થઈ ગયા (तएण से पोंडरीए इमीसे कहाए लढे समाणे हाए अतेउरपरियाल- सपरिखुडे राया जेणेप कडरीए अणगारे तेणेप उवागच्छड, उवागच्छित्ता कडरीय अणगार त्तिक्खुत्तो आयाहिण पयाहिण करेइ, करिता पदइ पमसइ, बदित्ता णमसिना एव वयासी-चन्नेसि ण तुम देवगुप्पिया ! कयत्ये कयपुन्ने कयलक्खणे . यथा मण्डको राणा शीलकम्य राजर्षे भागभापमिकिम्मामकारयत्, तधेर पुण्डरीकोऽपि पण्डरी स्यानगारस्य यया योग्य पधमेवग्यधिरिमा कारयतिस्म यापन कतिपयैर्टिन फण्डरीको यतिगार =निरामयो प्रातः । ततः खलु स्थविरा भगान्त. पुण्डरीक राजा भागन्ति, आपृच्छय बहिर्जनपदनि हार विहरन्ति । तत ग्यलु स कण्डरीका तम्मा 'रोगायफाओ' रोगाबाद विषमुक्तः सन् तस्मिन् 'मनुग्गमि' मनोमणीये जशनपानावाघस्साये चतु पिप आहारे 'शुच्छिए' मूतिः-मूत्र माप्त. आसक्त इयर्थः, 'गिदै 'गदा- आकाक्षावान् , 'गदिए 'ग्रन्धितासासादे निवदमानस:, 'अन्यौवष्णे' भगवतो पोटरीय राय पुति, पुत्तिा पहिया जणवयविहार विह रति, तण्ण से कडरी ताओ गेयायकाओ विप्पमुक्के समाणे तसि मणुष्णसि असणपाणपाहमसाइमसि मुच्छिा गिद्ध गदिश असावधपणे जो सचाइए पोटरीय राय आपुत्तिा परियो अन्भुजाण जणवय विहार विदरित्तण) इसके पाद महक ने जिस प्रकार शैलकराजर्षि की प्राप्सुक औपध, भैपज्यों द्वारा चिकित्सा करवाई थी उसी प्रकार पुडरीक राजा ने भो कडरीक अनगार की यथायोग्य औषध भैषज्यों द्वारा चिकित्सा करवाई-इस से वे पलितशरीर निरोग हो गये। इसके अन न्तर उन स्थविर भगवतो ने वहा से विहार करने के लिये पुडरीक राजा से पूछा- याद मे ये वश से वाहिर जनपदो में विहार कर गये । कड रीक अनगार कि जो रोगातकसे निर्मुक्त हो चुके थे मनोज्ञ अशन, पान, खाद्य, एव स्वाधरूप चतुर्विध आहार में इतने अधिक आसक्त हो गये भगवतो पोडरीय राय पुच्छति, पुच्छित्ता पहिया जणवयपिहार विहरति, तएण से कडरीए ताओ रोयायकाओ पिप्पमुक्के समाणे तसि मणुग्णसि-असणपाण खाइमसाइमसि मुच्छिए गिद्धे गढिए अझोचवण्णे णो सचाएइ पौडरीय राय आपुच्छित्ता बहिया अब्भुज्जएण जणवयविहार विहरित्तए ) ત્યાપછી મા કે જેમા શૈલક રાજનિી પ્રાસ, ઔષધ અને શ્રેષજો વડે ચિકિત્સા કરાવડાવી હતી તેમજ ડરીક રાજાએ પણ કડરીક અનગારની ઉચિત ઔષધ-ભિષ (દવા) વડે ચિકિત્સા કરાવડાવી તેથી તેઓ નિરેગા-સબળ બની ગમે ત્યારપછી તે રવિર ભગવતીએ ત્યાથી વિહાર કરવા માટે પુડરીક રાજાને પૂછયું ત્યારબાદ તેઓ બહારના જનપદમા વિહાર કરી ગયા ગાતથી નિમુક્ત થઈ ગયેલા કડરીક અનગર તે મને, અશન, પાન, ખાદ્ય અને સ્વાદ્યરૂપ ચાર જાતના આસક્ત થઈ ગયા-દ્ધ બની ગયા, ગ્રથિત-રસના આસ્વાદનમા નિબદ્ધ માન - આહારમાં એટલા બધા ७२९ - अनगारधर्मामृतवपिणी टीका अ०१९ पुण्डरोक-कडरीकचरित्रम् कारणात् खलु पीमि यन् धन्योऽमि ख हे देवानुप्रिय ! ' जाप सुलब्ध जन्म जीवितफलम् , ताः खलु स कण्डरीकोऽनगार' पुण्डरीकस्य एतमर्थ-विहाराभि मायक्रमर्थ, नो आठियते यावत् तृष्णीकः सतिप्ठते मौनमवलम्ब्य तिष्ठति । ततः खलु कण्डरीकः पुण्डरीकेण द्वितीयमपि तृतीयमपि-द्वितियारम् , एवम् पूर्वोक्त- प्रकारेण, उक्तः सन् ' अफामर' अफामक'कामनारहितः 'जयसबसे ' अप- देवाणुप्पिया जाव जीवियफले तण्ण से कडरीए अणगारे पुडरीयस्स ण्यम णो आढाइ जाब सचिट्ठइ, ताण कडरीए पोडरीएण दोच्चपि तच्चपि एवं वुत्ते समाणे अकामए अवम्नवसे लजाए गारवेण य पोंड रीय आपुच्छा, आपुच्छित्ता थेरेहिं सद्वि यरिया जणवयविशेर विहर) मैं अधन्य है अकृतपुण्य है। जो राज्य मे यावत् अन्तःपुर में तथा मनुष्य सरधी कामभोगों में मठित यावत् अध्युपपन्न बना हुआ है। इमीलिये प्रव्रज्या ग्रहण करने में असमर्थ हो रहा है। इसी कारण से मैं यह कर रहा है कि तुम धन्य हो, हे देवानुप्रिय तुमने ही जन्म और जीवन का फल जो प्रव्रज्या का ग्रहण करना है-वह अच्छी तरह पा लिया है। पुडरीक राजा की विहार करने के अभिप्रायवाली इस बात को सुनकर कडरीक अनगार ने उस पर कुल यान नहीं दिया-उसे आदर की दृष्टि से नहीं देखा-किन्तु वे उसे सुनकर भी चुपचाप बैठ रहे। कडरीक अनगार की इस स्थिति को देखकर पुडरीक ने दूसरी पार और तीसरी तुम देवाणुप्पिया । जाव जीवियफले तएण से कडरीए अगगारे पुडरीयम्स एयमह णो आहार, जार सचिटइ, तएण कडरीए पोडरीएण दोच्चपि तच्चपि एश्चुत्ते समाणे अकामए अस्सवसे लज्माए गारवेण य पोडरीय राय आपुन्छइ, आपुच्छित्ता थेरेहिं सद्धिं वहिया जणश्यपिहार विहरत ) તે અધન્ય અને અકૃતપણ, છુ કેમકે તો રાજયમાં યાવત રણવાસમા તેમજ મનુષ્યભવના કામોમાં મૂછિત થાવત અષ્ણુપપન્ન બની રહ્યો છું, એટલા માટે જ પ્રવજના ગ્રહણ કરવામાં અસમર્થ થઈ રહ્યો છુ એથી જ હુ આ કડી રહ્યો યુ - તમે ખરેખર ધન્ય છે કે દેવાનુપ્રિય ! તમે જ જન્મ અને જીવનનું ફળ કે જે પ્રવજ્યા ગ્રહણ કરવા રૂપ છે-તે સારી રીતે મેળવી લીધું છે તેઓ ત્યાથી વિહાર કરી જાય તે આશયથી કહેવા તે કરી ના વચને સાભળીને કડક અનગારે તેની કશી જ દરકાર કરી નહિ તે વાતને તેમણે સન્માનની દષ્ટિએ સ્વીકારી નહિ આ બધુ સાભળીને પણ તેઓ ત્યાજ મૂગા થઈને બેસી જ રહ્યા કડરીક અનગારની આ સ્થિતિ જોઈને तस्मात् की मानपयोगी उत्सनिः, विशम् नीयना माणधारणम् , तया' फलम् जन्मनीति तफरम् भवन्याग्रह गमे मनुष्यजन्मसारः, तदा स्पष्टगति-यः ग्वलु स्वं राज्य च यापदन्नः पुर च छइडइनायित्वाम्म्परता विगोवत्ता गिोप्य तिर- स्कृत्य यावत् मानिनः अह गलु अधन्यः अतपुण्यो राज्ये यावत् अन्तः पुरे च मानुप्यकेषु च याममोगेपु मूच्छितो यारत् अध्युपप नो नो अक्रोमि यावत् भवनितम् = राज्येऽन्त = पुरे मानुप्पयेषु च कामभोगेषु निमग्न मानसोऽह न गरकोमि प्रवज्या ग्रहीतुम् उति भाषः। 'त' तत् । विगोहत्ता जाव पद्य) जप पुटरीक राजा को "कारीक अनगार अवसन्न हो गये है " यर समाचार ज्ञात हुआ-तो वे स्नान कर अपने अन्त पुर परिवार को साथ लेकर जरा कटरीक अनगार थे वहाँ आये वहा आफर उन्हों ने कटरीफ अनगार को तीन चार आदक्षिण प्रदक्षिण करके पदना नमस्कार किया। बदना नमस्कार करके फिर उनसे वे इस प्रकार करने लगे-हे देवानुप्रिय! तुम धन्य हो, तुम कृतार्थ हो, तुम कृतलक्षण रो। हे देशानुप्रिय! तुमने मनुष्यभव सबंधी जन्म और जीवन का फल अच्छी तरह पालिया है। जो तुम राज्य यावत् अन्तःपुर का परित्याग एव तिरस्कार कर प्रवजित हो गये हो। (अहण्ण अहणे अकयपुन्ने रज्जे जाव अतेउरे य माणुरसगट य कामभोगेसु मुछिए जाव अज्झोचवन्ने नो सचामि जाव पचहत्तए । त धन्नेमि ण तुम सुलद्धेण देगणुप्पिया । तब माणुस्मए जम्म जीनियफले जेण तुम रन व जाव अतेउर चापि छड्डदत्ता विगोपत्ता जाव पब्बइए) જયારે પુડરીક રાજાને કડરીક અનગારના અવમન થઈ જવાના સમા ચાર મળ્યા ત્યારે તેઓ નાન કરીને પિતાના રવાસના પરિવારને સાથે લઈને જ્યાં કડરીક અનગાર હતા ત્યાં આવ્યા ત્યાં આવીને તેમણે કડરીક અનગારને ત્રણ વખત આક્ષિણ પ્રદક્ષિણા કરીને વદન તેમજ નમક કર્યા વદન અને નમસ્કાર કરીને તેઓ તેમને આ પ્રમાણે કહેવા લાગ્યા हे देवानुप्रिय ! तमे धन्य छो, ताय' , त-Geeg छ। देवानुप्रिय મનુષ્ય ભવના જન્મ અને જીવનના ફળને સારી પેઠે મેળવી લીધુ છે કેમકે તમે ખરેખર રાજ્ય યાવત્ રણવાસને ત્યજીને તેને તિરસ્કૃત કરીને પ્રજિત થઈ ગયા છે ( अहण्ण अण्णे अझयपुन्ने रज्जे जाव अतेउरे य माणुस्सएसु य काम भोगेस मुच्छिए जात्र अन्झोववन्ने नो सचाएमि जाव पन्नइत्तए त धन्नेसिण - अनगारधर्मामृतपिणी टोका अ०१९ पुण्डरोक कडरीकचरित्रम् ७२९ कारणाद् खलु पीमि पन् धन्योऽमि स हे देशानुप्रिय ! 'जाव सुलब्धं जन्म- जीवितफलम् , ताः खलु स कण्डरीकोऽनगार' पुण्डरीकस्य एतमर्थ विहाराभि प्रायफमर्थ, नो आद्रियते यावत् तूष्णीकः सतिष्ठते मौनमवलम्ब्य तिष्ठति । ततः खलु कण्डरीक पुण्डरीकेण द्वितीयमपि तृतीयमपि-द्विनिवारम् , एक्-पूर्वोक्त- प्रकारेण, उक्तः सन् 'अामए ' अझामक'कामनारहितः 'अबस्सबसे ' अप- देवाणुप्पिया | जाव जीवियफले तण्ण से कटरीए अणगारे पुडरीयस्स ण्यम णो आढाइ जाव सचिट्ठइ, तरण कडरीय पोडरीण्ण दोच्चपि तच्चपि एवं वुत्ते समाणे अकामए अवम्तवसे लजाए गारवेण य पोंड- रीय आपुच्छइ, आपुच्छित्ता थेरेहिं सद्वि रहिया जणवयविहार विहरड) मैं अघन्य हैं अकृनपुण्य हूँ। जो राज्य में यावत् अन्त'पुर में तया मनुष्य सरधी कामभोगों में मठित यावत् अध्युपपन्न बना हुआ हूँ। इमीलिये प्रव्रज्या ग्रहण करने में असमर्थ हो रहा है। इसी कारण से मै यह कर रहा हूँ कि तुम धन्य हो, हे देवानुप्रिय तुमने ही जन्म और जीवन का फल जो प्रव्रज्या का ग्रहण करना है-वह अच्छी तरह पा लिया है। पुडरीक राजा की बिहार करने के अभिप्रायवाली इस बात को सुनकर कडरीक अनगार ने उस पर कुछ यान नहीं दिया-उसे आदर की दृष्टि से नही देखा-किन्तु वे उसे सुनकर भी नुपचाप बैठ रहे। कडरीक अनगार की इस स्थिति को देखकर पुडरीक ने दूसरी पार और तीसरी तुम देवाणुपिया । जाव जीवियफले तएण से कडरीए जगगारे पुडरीयस्स एयम णो आढाइ, जार सचिटइ, तरण कडरीए पौडरीपण दोच्चपि तच्चपि एवुत्ते समाणे अकामए अस्पवसे लज्जाए गारवेण र पोंडरीय राय आपुन्छइ, आपुच्छित्ता थेरेहिं सद्धिं वहिया जणश्यपिहार विहरड) તે અધન્ય અને અકૃતપુ છું કેમકે તો રાજમા થાવત્ રણવાસમાં તેમજ મનુષ્યભવના કામમાં મૂર્શિત થાવતુ એ ચુપપન બની રહ્યો છું, એટલા માટે જ પ્રજા ગ્રહણ કરવામાં અસમર્થ થઈ રહ્યો છું એથી જ હુ આ કહી રહ્યો છું –કે તમે ખરેખર ધન્ય છે કે દેવાનુપ્રિય ! તમે જ જન્મ અને જીવનનું ફળ કે જે પ્રજ્યા ગ્રહણ કરવા રૂપ છે-તે સારી રીતે મેળવી લીધું કે તેઓ ત્યાથી વિહાર કરી જાય તે આશયથી કહેવા તે પરીકને વચને સાભળીને કડક અનગારે તેની કશી જ દરકાર કરી નહિ તે વાતને તેમણે સન્માનની દષ્ટિએ સ્વીકારી નહિ આ બધુ સાભળીને પણ તેઓ ત્યાજ મૂગા થઈને બેસી જ રહ્યા કરીક અનગારની આ સ્થિતિ જોઈને .
७२० . म्यशा-अपगतम्मान ग. सन 'लगा रजिया, 'गारवण' गौरवण- साधुत्वगौरवेण च पुण्डरीक गनानमापनि, आपला स्थविरः माई बहिर्जन पदविहार विहरति ॥ १०३ ॥ मूलम् तपणं से कंडरीए थेरेहि सद्धिं किंचिकाल उग्गं उग्गेणं विहरइ । तओ पच्छा समणतणपरितंते समणतण णिविणे समणत्तणणिभच्छिए समणगुणमुक्कजोगी, थेराणंअतियाओ सणियर पच्चोसण्ड, पच्चीसक्कित्ता, जेणेव पुंडरिगिणी णयरीजेणेव पुडरीयस्तभवणे नेणेव उवागच्छइ, उवागच्छित्ता, असोगवणियाए असोगवरपायवस्स अहे पुढविसिलापट्ट्यास णिसीयइ णिसीइत्ता, ओहयमणसंकप्पे जाव झियायमाणे संचिट्ट । तएण तस्स पोंडरीयस्स अम्म- धाई जेणेव असोगवणिया तेणेव उवागच्छइ, उवाच्छिता कंडरीय अणगार असोगवरपायवस्स अहे पुढविसिलावट- यसि ओहयमणसकप्प जाव झियायमाणं पासइ, पासित्ता जेणेव पोंडरीए राया तेणेव उवागच्छइ, उवागच्छिन्ता पोडरीय राय एव-वयासी-एव खलु देवाणुप्पिया। तव पिउभाउए कडरीए अणगारे असोगवणियाए असोगवर वार जब उनसे पूर्वोक्त प्रकारसे कहा-तर.उन्हो ने नहीं इच्छा होने पर भी स्ववशताका अभाव होने के कारण लज्जावश होकर सायुवके गौरवके ख्याल से-पुडरीक राजा से विहार करने की बात पूछी-पूछकर फिर वे वहा से स्थविरोके साथ बाहिरके जनपदों में विहार कर गये ॥१०३॥ પુડરીકે બીજી અને ત્રીજી વાર પણ જ્યારે પહેવા મુજબ જ વાત કહી ત્યારે તેમણે પિતાની ઈચ્છા નહિ હોવા છતાએ લાચાર થઈને, લજિજત થઈને, સાધુત્વના ગૌરવને લક્ષ્યમાં રાખીને પુંડરીક રાજાને વિહાર કરવાની વાત પૂછી પૂછીને તેઓ ત્યાથી સ્થવિરેની સાથે બહારના જાપમાં વિહાર કરી ગયા છે . अनगारधर्मामृतवर्षिणी टी० अ० १९ पुण्डरीक-कण्डरीकरित्रम् पायवस्स अहे पुढविसिलावट्टे ओहयमणसंकप्पे जाव झिया- यइ । तएणं पोंडरीए अम्मधाईए एयमट्ट सोच्चा णिसम्म तहेव संभते समाणे उट्टाए उट्टेइ, उद्वित्ता, अंतेउरपग्यिाल- सपरिवुडे जेणेव असोगवणिया जाव कडरीगं तिक्खुत्तो आयाहिणं पयाहिणं करेइ करित्ता, एव वयासो-धण्णेसि णं तुम देवाणुप्पिया | जाव पव्वइए । अहण्णं अधण्णे३ जाव नो पव्वइत्तए । त धन्नेसि णं तुमं देवाणुप्पिया | जाव जीवियफले । तएणं कडरीए पुडरीएणं एवं वुत्ते समाणे तुसिणीए संचिटइ, दोच्चपि तच्चपि जाव संचिट्टइ। तएणं पोडरीए कडरीय एव वयासी अहो भते । भोगेहि ' हंता अट्ठो तएण से पोण्डरीए राया कोडुवियपुरिसे सद्दावेइ, सद्दावित्ता, एव वयासी -खिप्पामेव भो देवानुप्पिया | कंड- रीयस्स महत्थ जाव रायाभिसेअ उवटवेह जाव रायाभिसे- एणं अभिसिचइ ॥ सू० ४॥ टीका-'तएण से' इत्यादि । तत ग्वलु स कण्डरीक स्थनिरैः सार्ध किंचित् कालम् — उग्ग उग्गेण ' उग्रोग्रेण-अत्युग्रेण विहारेण विहरति । तत' पश्चात् ' समणतणपरितते ' श्रमणत्यपरितान्तः श्रमणधर्मपरिपालने खिन्नः पुनः 'तएण से कडरीए थेरेहि सद्धिं' इत्यादि। टीकार्य-(तएण) इसके बाद (से कडरीप) वे कडरीक (थेरेहि सद्धि ) स्थविरो के साथ (किचिकाल) कुछ काल पर्यन्त ( उग्ग उग्गेर्ण) अत्युग्रविहार करने मे (विटइ) लग गये (तओपच्छा समणत्तण , 'तएणे से कडरीए येरेहिं सद्धि' इत्यादि । साथ-(तएण) त्या२५छी (से कडरीए) ते ४3री (थेरेहि सद्धि ) स्थविशनी सार्थ (कि चिकाल) 21 मत सुधी तो (उग्गउग्गेण) अतीय Gविडार ४२वामा (विहरइ) प्रवृत्त च्या (तओ पच्छा समणतण परित) ફર - - " - 'समणतणनिविष्णे' भमणनिविण मामा औदासीन्य प्राप्तः 'समण तणणिभनिए' अमणत्मनिर्भसित प्रमणत्व निर्मसित येन म साघुमावा नादरपरायणः, अतएर 'समणगुणगानोगी' श्रमणगुणमुक्तयोगी श्रमणगुणे यो मुक्ता रहिनो योगः योगा-मनोगतायप, सोऽस्यास्तीतित्यक्तश्रमणगुणइत्यर्थः, स्थविराणामन्तिकात् शनैः शने प्रत्ययवस्कने पत्रादाग उति, प्रत्यववस्क्य कौव पुण्डरीकिणी नगरी यौर पुण्डरीरस्य भान तर उपाग उति, उपागत्य अशोका निकाया: अशोकवाटिकाया कारपादपम्य ना. पृचोशिलापट्ट के निपीदति-उपविशति, निपद्य, 'ओहयमणसाप्प 'बाहनमनः साल्पा अबहती मन सकल्प =मनोव्यापारो यस्य सः अपगतमानसिकव्यापार , ' जाव झियाय परितते) याद में वे श्रमणधर्म के परिपारन करने में बिन्न चित्त यन गये (समणतणणिन्त्रिणे ममणतणणिभच्चिासमणगुणमुक्कजोगी थेराण अतियाओ मणिर पच्चोसरकर, पच्चोसत्रिकत्ता जेणेव पुड रिगिणी णेयरी जेणेच पुडरीयस्स भरणे तेणेव उवागच्छद) साधुभाव के निर्वाह करने में उदासीनता को प्राप्त हो गये-साधुभाव के प्रति उनमें अनादर भाव आ गया अत एव वे श्रमण गुणों से मुक्त योगवाले धन गये-श्रमण के गुणों का उन्हों ने परित्याग कर दिया। इस तरह वे धीरे २ स्थविरों के पास से सिसककर एक दिन जहाँ पुडरीकिणी नगरी थी और उसमें भी जहा पुटरीक राजा को भवन था वहा पर आ गये- (उबागच्छित्ता असोगवणिया असोगवरयायवस्त अहे पुढविसिला पट्टयसि णिसीयइ, णिसीइत्ता ओयमणसकप्पे जाव शिपायमाणे ત્યારપછી તેઓ શ્રમણ ધર્મના પાલનમા ખિન્નચિત્ત-ઉદાસ બની ગયા (समणत्तणणिविण्णे समणत्तणणिभच्छिए समणगुणमुकजोगी थेराण अतियाओ सणिय २ पञ्चोसकर, पच्चीसकित्ता जेणेव पुडरागिणी णयरी जेणेव पुडरीयस्स भरणे वेणेव उवागन्छइ) તેઓ સાધુભાવને નભાવવામાં ઉદાસ બની ગયા સાધુભાવ પ્રત્યે તેમ 4 નામા અનાદર ભાવ ઉત્પન્ન થઈ ગયે, એથી તેઓ શ્રમણ-ગુણેથી મુક્ત ગવાળા બની ગયા એટલે કે શ્રમણના ગુણેને તેમણે ત્યજી દીધા આ પ્રમાણે તેઓ ધીમેધીમે સ્થવિરોની પાસેથી ચુપચાપ નીકળીને એક દિવસ જ્યા પુડરિકિર્ણ નગરી હતી અને તેમાં પણ જ્યા પુડરીક રાજાનુ ભવન હતું, ત્યા આવી ગયા (उवागच्छित्वा असोगवणियाए असोगवरपायवरस अहे पुढविसिलापा यसि, णित्रीयह, णिसीइत्ता ओहयमणसकम्पे जाव झिपायमाणे चिटड, वएणं 4 .
भनगारधर्मामृतषिणी टी० अ० १९ पुण्डरीक-कण्डरीकरित्रम् माणे ' यावद्ध्यायन आर्त यानं कुर्वन् सतिष्ठते । तत एलु तस्य पुण्डरीरस्य राज्ञोऽम्वधात्री यत्रैच अगोकवनिका तर उपागच्छति, उपागत्य कण्डरीकमन गारम् अशोकवरपादपस्य अधः पृथिवीशिलापट्ट केऽपहतमन सकल्प यापद् ध्यायन्त पश्यति, दृष्ट्वा, यचैव पुण्डरीको राजा तौर उपागच्छति, उपआगत्य पुण्डरीक राजानमेवमवादीत्-एव खलु देवानुप्रिय । तब पिउभाउए' प्रियभ्राता कण्ड रीकोऽनगारोऽशोकवनिकाया अशोकवरपादपस्य अधः पृ. पीशिलापट्टके अपहतमन. सकल्पो याबद्-यायति । तत खलु पुण्डरीकः अगधाच्या एतमर्थ=कण्डरीकस्य सचिट्टइ, तरण तस्स पोंडरीयस्स अम्मधाई जेणेच असोगवणिया तेणेव उवागच्छद, उवागघिउत्ता कडरीय अणगार असोगवरपायरस अहे पुढ- विसिलावयसि ओयमणसकप्प जार मियायमाण पासइ, पासित्ता जेणेव पोडरी राया तेणेव उवागच्छइ, उवाच्छित्ता पोंडरीय राय एव क्यासी) वहा आकर वे अगोक वाटिका मे अशोक वृक्ष के नीचे पृथिवी शिला पटक पर बैठ गये। बैठकर अपहत मानसिक व्यापारवाले होकर वे वहा आर्तध्यान करने लगे। इतने मे पुडरीक राजा की अम्ब- धात्री-धायमाता उस अशोक वाटिका मे आई-वश आकर उसने कडरीक अनगार को अशोक पादप के नीचे पृथिवीशिलो पटक पर चिन्तामग्न देखा-देखकर वह जहा पुडरीक राजा थे वहा आई-वहा आकर उसने पुडरीक राजा से इस प्रकार कहा-(ण्य ग्वलु देवाणुप्पिया! तव पिउ भाउरा कडरीए अणगोरे असोगवणियाए असोगवरपाययस्स अहे पुढविसिलावट्टे ओत्यमणसकप्पे जाव झियायह ) हे देवानुप्रिय ! तस्स पोंडरीयस्स अम्मधाई जेणे असोगवणिया तेणे उबागच्छइ, उवोच्चित्ता फहरीय अणगार असोगवरपायवस्स अहे पुढविसिलावट्टयसि छोहयमणसम प्प जाय झियाययाण पासइ, पासित्ता जेणेव पोंडरीए राया तेणेव उपागच्छद, यागच्छित्ता पोरीय राय एष वयासी) ત્યાં આવીને તેઓ અશોક વાટિકામા અશોક વૃક્ષની નીચે પૃથ્વિશિલા પટ્ટક ઉપર બેસી ગયા ત્યાં બેસીને તેઓ અપહત માનસિક વ્યાપારવાળા ( ઉદાસ) થઈને આર્તધ્યાન કરવા લાગ્યા એટલામાં પુડરીક રાજાની આ બે ધાત્રી ધાયમાતા-અશોક વાટિકામાં આવી ત્યાં આવીને તેણે કડરીક અનગારને અશોક વૃક્ષની નીચે પૃથ્વિશિલા ઉપર આત ધ્યાન કરતાં જોયા જોઈને તે જ્યા પુડરીક રાજા હતા ત્યા આવીને તેણે પુડરક રાજાને આ પ્રમાણે કહ્યું કે (एष खलु देवाणुप्पिया ! तव पिउमाउए कडरीए अणगारे असोगवणि याए असोगारपाययस्स अहे पुढविसिलावट्टे ओहयमणसप्पे जाव झियाय) ४ - - अशोकानिकाम यगतागोरक्षाः स्थितम्मात पानम्पमर्थ भुवा नियम बधार्य तय ' संधा-यवास्थितम्तये 'समते समाणे ' मम्भ्रान्ता - कब पुनरसी समागत' इति गदितः मन् उत्यार उचिप्ठति अटिति उचिठी- त्यर्थः, उत्याय अतः पुग्पतिरसपग्टिन या नौकनिका कीव कण्डरीको- ऽनगारस्तनौर उपागन्छति, उपागत्य 'निपयुनो' त्रि कृत्वा बारवयम् भाद क्षिणमदक्षिण फरोति, कत्याएमादीव-धाणेसि ण तुम देवाणुपिया 1 जाब पञ्चइए' धन्योऽसि खलु व हे देगानुपिय ! या प्रत्रनित । अह खलु 'अधणे ' ३ अधन्यः ३ याद नो शक्रोमि माजितुम् । 'त' तस्मात्कारमा 'धन्नेसि । धन्योऽमि यलु व हे देशानुपिय ! 'जार जीवियफले' याद जीवितफलम् त्वया जन्मजीरितफ्ल सुधम् इति भावः। ततः खलु कण्डरीकेण ए-शसापरवचनरुक्तः सन् तूष्णीक सतिष्ठते, 'दोचपि तगति' द्वितीय मपि तृतीयमपि पार पूर्वप्रकारेण उक्तः सन् ‘जार सचिट्ठ' यावत् सतिष्ठते- मौनमवलम्ब्य स्थित इतिभाव 1 तत. खलु पुण्डरीका कण्डरीकमेवमयादीन-अट्टो सुनिये-तुम्हारे प्रिय भाई कटरीक अनगार अशोक वाटिका में अशोक वृक्षके नीचे पृथिवीशिलापटक पर अपहतमनःसकल्प होकर यावत् चिन्ता मग्न धैठे हुए हैं (तण्ण पोंडरी अम्मघाईए एयम सोच्चा णिसम्म तहेव समते समाणे उठाए उद्देह, पट्टित्ता अतेउरपरियालसपरिपुरे जेणेव असोगणियाजाव कडरीय तिखुत्तो आयाहिणपयाहिण करेइ, करिता एव वयासी धण्णेसि ण तुम देवाणुप्पिया! जाव पधइए अरण्ण अधपणे ३ जाय नो पचहत्तपत धन्नेसि ण तुम देवाणुप्पिया' जाव जीवियफले-तपण कडरी पुडीएण एव वुत्ते समाणे तुसिणीए सचिट्ठद, दोच्चपि तच्चपि जाप सचिटइ, तएण पोटरीए कडरीय एव वयासी अट्ठो भते ! भोगेहिं । हता अहो! तएण से पोंडरीए राया कोड હે દેવાનુપ્રિયા સાભળે, તમારા પ્રિય ભાઈ કડરીક અનવાર અશોક વાટિકામા અશોક વૃક્ષની નીચે પૃશ્ચિશિલા પટ્ટક ઉપર અપહરમન સક૬૫ થઈને યાવત્ ચિંતામગ્ન થઈને બેસી રહ્યા છે (तएण पोंडरीए अम्मधाईए एयमह सोचा णिसम्म तहेन सभते समाणे उद्वित्ता अतेउरपरिपालसपरिवुडे जेणेव असोगवणिया जाव कड रीय तिक्खुत्तो आयाहिणपयाहिण करेइ, करित्ता एव वयासी धणेसि ण तुम देवाणुप्पिया ! जाव पव्वइए अण्ण अधणे २ जाव नो पाइत्तर त ध नेसि तुम देवाणुप्पिया ! जाव जीवियफले तएण कडरीए पुडरीएण एव वुत्ते समाणे तुसिणीए सचिदुइ, दोशवि तच्च वि जार सचिटुइ, तएण पोंडरीप कडरीय एव बयासी, अट्टो ता अट्ठो! तएण से । उट्ठाए उट्टेइ, या कोडुपिय अनगारधर्मामृतवपिणी टी० स. १९ पुण्डरीक-कण्डरीकचरित्रम् ७३५ वियपुरिसे मद्दावेह, सहावित्ता व वयासी-खिप्पामेव भो देवाणुप्पिया! कडरीयस्स महत्व जाव रायाभिसेअ उवट्टवेर, जाव रायाभिसेएण अभिसिंचह) इस प्रकार अम्बाधाय के मुख से इस बात को सुनकर और उसे चित्त मै जमाकर जैसे बैठे हुए थे उसी तरह सभ्रान्त होते हुए-ये क्यों आये है-इस प्रकार शक्ति चित्त होते हुए-उत्थानशक्ति से उठे घहुन जल्दी सुनते ही प्रमाण-उठे और उठकर अन्तापुर के परि- वार को साथ लेकर जहा अशोक वनिका थी-वहा पर आये-वहां आकर कडरीक अनगार के पास पहुँचे-वहां पहुँच कर उन्हो ने उन्हें तीन बार आदक्षिण प्रदक्षिण किया बाद में वे कहने लगे-हे देवानुप्रिय! तुम्हें धयवाद है-जो तुम राज्य एव अन्नापुर का परित्याग कर प्रत्रजित हो गये हो इत्यादि जिम प्रकार पहिले उनसे कहा था इमी प्रकार अय भी कहा मैं अधन्य है-३-जो योवत् दीक्षित होने के लिये शक्तिशाली नहीं हो रहा है। इसलिये हे देवानुप्रिय आपके लिये धन्यवाद है-आपने जन्म और जीवन का फल अच्छी तरह प्राप्त कर लिया है। इस तरह प्रशंसा परक वचनों से पुडरीक राजा द्वारा कहे गये वे कडरीक अन- गार कुछ भी नहीं बोले-किन्तु चुपचाप ही बैठे रहे- जय पुडरीक राजा ने उनकी इस प्रकार की स्थिति देखी-तब दुवारा तिवारा भी उन्हो ने पुरिसे सहावेइ, सदावित्तो एर क्यामी सिप्पामेव भो देवाणुप्पिया | क डरीयस्स महत्थ जाव रायाभिसेअ उबटुवेह, जाव रायाभिसेएण अभिसिंचइ) આ પ્રમાણે અબાધાયના મુખથી આ વાત સાંભળીને અને તેને મનમાં ધારણ કરીને જેવી સ્થિતિમાં તેઓ બેઠા હતા તેવી જ સ્થિતિમાં સ્તબ્ધ થઈને "तेमभमाच्या छे" આ પ્રમાણે શકાયુક્ત થતા-ઉથાન શક્તિ વડે તેઓ ઊભા થયા અને ઊભા થઈને જતી રણવાસના પરિવારને સાથે લઈને જ્યા અશોક વાટિકા હતી ત્યા આ વ્યા ત્યાં આવીને કડરીક અનગારની પાસે પહેચ્યા ત્યાં પહોંચીને તેમણે તેમને ત્રણવાર આદક્ષિણ પ્રદક્ષિણા કર્યા બાદ કહેવા લાગ્યા કે હે દેવાનુપ્રિય! તમને ખરેખર ધન્યવાદ ઘટે છે કે જે તમે રાજ્ય અને રણવાસને ત્યાગ કરીને પ્રવજીત થઈ ગયા છે, વગેરે જેમ પહેલા કહ્યું હતું તેમજ તે વખતે પણ કહ્યુ હુ તે અન્ય ૯-૩-જે યાવત્ દીક્ષા ગ્રહણ કરવાનું પણ સામર્થ્ય ધરાવતા નથી એથી હે દેવાનુપ્રિય! તમને ધન્ય છે તમે ખરેખર પિતાના જન્મ અને જીવનનુ ફળ સારી રીતે પ્રાપ્ત કરી લીધુ છે આ પ્રમાણે પ્રશ સાજનક વચનેથી પુડરીક રાજા વડે સંબોધિત કરાવા તે કડરીક અનગાટ કઈ પણ બોલ્યા નહિ, તેઓ મૂગા થઈને બેસી જ ម៉េរ , " अशोकानिकामा गतागोरक्षाय स्थितस्यात यानरूपम श्रुत्वा नियमय- बधार्य तहेव' तधाम्यवास्थित तर 'समते समाणे' मम्भ्रान्तः सन्- एव पुनरसी समागत' इति शक्तिः सन उत्यार उत्तिष्ठति अटिति उत्तिष्टी त्यर्थः, उत्याय अतः पुरपरिमारसपरिटन या गोपनिका यत्रीव कण्डरीको- ऽनगारस्तोर उपागाउति, उपागल्प 'निम्युनो' विकृत्वा वारप्रयम् आद क्षिणपदक्षिण करोति, सत्ता यमदीन-धणेसि ण तुम देवाणुपिया ! जान पन्यइए' धन्योऽसि खलु हे देशानुभिय ! यान् भवनित अह खलु 'अधण्णे ३ अधन्य. ३ पारद नो गक्रोमि मनजितुम् । 'त' तम्मात्कारमा 'धन्नेसि ' धन्योऽमि ग्यलु व हे देशानुमिय ! ' जार जीवियफले ' यावद जीवितफरम् व्या जन्मजीरितफल मुल्यम् इति भा'। ततः खलु कण्डरीकेण एअशसापरवचनरुक्तः सन् तूप्णी सतिष्ठते, दोन्चपि तगति द्वितीय मपि तृतीयमपि पार पूर्वमकारेण उक्तः सन् ‘जार सचिट्ठइ ' यावन् सतिष्ठते- मौनमवलम्ब्य स्थित इतिभाव । तत. खल पुण्डरीका कण्डरीकमेपमवादीन-अट्ठो सुनिये-तुम्हारे प्रिय भाई कटरीक अनगार अशोक वाटिका में अशोक वृक्षके नीचे पृथिवीशिलापटक पर अपहतमनासकरप होकर यावत् चिन्ता मग्न बैठे हुए हैं (तपणं पोंडरी अम्मधाईए एयमट्ट सोच्चा णिसम्म तहेव समते समाणे उट्ठाए उठेह, उहित्ता भतेउरपरियालसपरिघुडे जेणेव असोगवणियाजाय कडरीय तिखुत्तो आयाहिणपयाहिण करेइ, करिता एव पयासी धण्णेसि ण तुम देवाणुप्पिया! जाव पञ्चहए अरण्ण अधण्णे ३ जाव नो पचहत्ता त धन्नेसि ण तुम देवाणुप्पिया जाव जीविधफले-तएण कडरी पुडरी एण एव वुत्ते समाणे तुसिणीए सचिट्टद, दोच्चपि तच्चपि जान सचिट्ठइ, तएण पौंडरीए कडरीय एवं वयासी अठ्ठो मते ! भोगेहिं ! हता अहोतएण से पोंडरी राया कोड હે દેવાનુપ્રિય! સાભળે, તમારા પ્રિય ભાઈ કડરીક અનગાર અશોક વાટિકામા અશોક વૃક્ષની નીચ વૃશ્ચિશિલા પટ્ટક ઉપર અપહરમન સક* થઈને યાવત્ ચિંતામગ્ન થઈને બેસી રહ્યા છે (तएण पोंडरीए अम्मधाईए एयमह सोचा णिसम्म तहेर सभते समाणे उढाए उठेइ, उहित्ता अतेउरपरिपालसपरिवुडे जेणेव असोगवणिया जाव कर रीय तिक्खुचो भायाहिणपयाहिण करेइ, करित्ता एवं वयासी धण्णेसि ण तुम देवाणुप्पिया ! जाव पव्वइए अहण्ण अधण्णे २ जाव नो पाइतर त धन्नेमिण तुम देवाणुप्पिया ! जाव जीवियफले तएण कडरीए पुडरीएण एव वुत्ते समाणे तुसिणीए सचिट्ठइ, दोचवि, तच्च वि जाव सचिटुई, तएण पोंडरीर कडरीय एष षयासी, अट्ठो भते ! भोगैहि ? हता अट्ठो! तएण से पोंडरीप गया कोई विय - अनगारधर्मामृतयपिणी टी० अ० १९ पुण्डरीक-फण्डरीकचरित्रम् ७३५ बियपुरिसे मद्दावेह, सहाचित्ता ण्व वयासी-विप्पामेव भो देवाणुप्पिया। कडरीयस्स महत्व जाव रायाभिसेअ उचट्ठवेर, जाव रायाभिसेएणं अभिसिंचइ ) इस प्रकार अम्बाधाय के मुख से इस चौत को सुनकर और उसे चित्त मै जमाकर जैसे बैठे हुए थे उसी तरह सभ्रान्त होते हुए-ये क्यों आये है-इस प्रकार शकित चित्त होते हुए-उत्थानशक्ति से उठे बहुत जल्दी सुनते ही प्रमाण-उठे और उठकर अन्तःपुर के परि- वार को साथ लेकर जहा अशोक वनिका थी-वहा पर आये-वहा आकर कडरीक अनगार के पास पहूँचे-वहा पहूँच कर उन्हो ने उन्हें तीन वार आदक्षिण प्रदक्षिण किया बाद में वे कहने लगे-हे देवानुप्रिय] तुम्हें धन्यवाद है-जो तुम राज्य एब अन्तःपुर का परित्याग कर प्रबजित हो गये हो इत्यादि जिस प्रकार पहिले उनसे कहा था इमी प्रकार अय भी कहा में अधन्य है-३-जो योवत् दीक्षित होने के लिये शक्तिशाली नहीं हो रहा है। इसलिये हे देवानुप्रिय' आपके लिये धन्यवाद है-आपने जन्म और जीवन का फल अच्छी तरह प्राप्त कर लिया है। इस तरह प्रशंसा परक वचनो से पुडरीक राजा द्वारा कहे गये वे कडरीक अन- गार कुछ भी नही बोले-किन्तु चुपचाप ही यैठे रहे- जर पुडरीक राजा ने उनकी इस प्रकार की स्थिति देखी-तव दुवारा तिवारा भी उन्हो ने पुरिसे सद्दावेइ, सहवित्ता एव वयासी सिप्पामेर भो देवाणुप्पिया । क डरीयस्स महत्थ जाप रायाभिसेअ उक्टुवेह, जाव रायामिसेएण अभिसिंचइ) આ પ્રમાણે અબાધાયના મુખથી આ વાત સાંભળીને અને તેને મનમા ધારણ કરીને જેવી સ્થિતિમા તેઓ બેઠા હતા તેવી જ રિથતિમાં સ્તબ્ધ થઈને "तसभ माव्या छे" આ પ્રમાણે શકાયુક્ત થતા-ઉથાન શતિ વડે તેઓ ઊભા થયા અને ઊભા થઈને જલ્દી રણવાસના પરિવારને સાથે લઈને જ્યા અશોક વાટિકા હતી ત્યા આવ્યા ત્યાં આવીને કડરીક અનગારની પાસે પહોંચ્યા ત્યાં પહોચીને તેમણે તેમને ત્રણવાર આદક્ષિણ પ્રદક્ષિણા કર્યા બાદ કહેવા લાગ્યા કે હે દેવાનુપ્રિય ! તમને ખરેખર ધન્યવાદ ઘટે છે કે જે તમે રાજ્ય અને રણવાસને ત્યાગ કરીને પ્રજીત થઈ ગયા છે, વગેરે જેમ પહેલા કહ્યું હતું તેમજ તે વખતે પણ કહ્યુ હુ તે અધન્ય ૭-૩-જે યાવત્ દીક્ષા ગ્રહણ કરવાનું પણ સામર્થ્ય ધરાવતે નથી એથી હે દેવાનુપ્રિય! તમને ધન્ય છે તમે ખરેખર પિતાના જન્મ અને જીવનનું ફળ સારી રીતે પ્રાપ્ત કરી લીધુ છે આ પ્રમાણે પ્રશસાજનક વચનેથી પુડરીક રાજા વડે સ બોધિત કરાએવા તે કડરીક અનગાર કઈપણ બોલ્યા નહિ, તેઓ મૂગા થઈને બેસી જ - - ७६ जानाधर्मपचार मंते ' भोगेहि 'ओं हे गदन्त ! भोगे• ?=ff भौगैः प्रयोजनमस्ति ? इति, पण्डरीक माह-'हना ! भट्ठो 'हन्त ! अर्थ: मोगपमोस्तुमानमोऽम्मीति भाः । ततः खलु-कण्डरीशामिपापानानन्तरमित्यर्थ', स पुण्डरीको राजा पौटुम्पिकपुरूपान् गादयति मापयति, शयिता, पयमत्रदत् - सिममेव भो देवानुभियाः ! पण्डरीकस्य महार्थम् भययम् ‘जार रायाभिसेय ' यावन् राजा भिपेकम् ' उपहोइ' उपस्थापयत परिसन्पयत, जापरायाभिसे एण अभिसि चह' यावत् राज्याभिषेकेण अभिपिश्यति स पुण्डरीको राना कण्डरीक राजपदे स्थापयति ॥ ० ४ ॥ मुम-तण्णं पुडरीए सयमेव पंचमुट्टियं लोय करेइ, उनसे ऐसा ही कहा परन्तु फिर भी उनों ने कुछ नहीं ध्यान दिया केवल मौन धारण कर ही पैठे रहे-तप पुनः पुडरीकने उन कडरीक अनगार से इस प्रकार कहा-हे भदन्न क्या आप को भोगों से तात्पर्य है ' तय कडरीक ने कहा हा-मेरा मन भोगों को उपभोग करने के लिये हो रहा है। इस तरह कडरीक का अभिप्राय जानने के बाद पुड रीक राजो ने कौटुम्पिक पुरुषों को बुलाया और बुलाकर उनसे ऐसा कहा-भो देवानुमियो तुम लोग कडरीक के लिये राज्याभिषेक योग्य सामग्री एकत्रित कर लेआओ पुडरीक राजा की इस आज्ञा के अनु सार, उनलोगों ने वैसा ही किया-जब राज्याभिषेक सामग्री उपस्थित हो चुकी-तब पुडरीकने कडरीक का राज्याभिषेककर दिया-कडरीक को राजपद में स्थापित कर दिया ॥ सूत्र ४॥ રહ્યા પુડરીક રાજાએ તેમની આવી સ્થિતિ જોઈને બીજી અને ત્રીજી વખત પણ આ પ્રમાણે જ કહ્યું પણ તેમણે તેની કઈ દરકાર કરી નહિ તેઓ ફક્ત મૂગા થઈને બેસી જ રહ્યા ત્યારે ફરી ૫ડરીકે તે કડરીક અનગારને આ પ્રમાણે કહ્યું કે હે ભગવન્ ! તમને હજી બેગ ઉપભોગની ઈરછા છે? ત્યારે કડરેકે કહ્યું કે હા, ખરેખર મારૂ મન ભોગ ઉપગમા કરછે છે આ પ્રમાણે કરીકની ઈચ્છા જાને ડરીક રાજાએ કૌટુંબિક પુરુષને બોલાવ્યા અને બેલાવીને તેમને આ પ્રમાણે કહ્યું કે હે દેવાનુપ્રિય ' તમે લેકે કડીક માટે રાજ્યાભિષેક ગ્ય સામગ્રી ભેગી કરે પુરીક રાજાની આ પ્રમાણે આજ્ઞા સાભળીને તે લોકોએ તેમજ કર્યું જયારે રાજય નિપેકની બધી વસ્તુઓ એકત્રિત થઈ ગઈ ત્યારે પુડરીકે કરીને રાજ્યાભિષેક કરી દીધે એટલે કે કરીને રાજ્યાસને બેસાડી દીધું | સૂત્ર ૬ ! पत्त था - अमगारधामृतयपिणी टीका अ० १९ पुण्डरीक-कण्डरोफचरित्रम् करित्ता, सयमेव चाउजाम धम्म पडिवज्जइ, पडिवजित्ता कडरीयस्स सतिय आयारभडय गेण्हड, गेण्हित्ता, इम एयारूवं आभिग्गह आभिगिण्हइ-कप्पइ मे थेरे वंदित्ता णमंसित्ता थेराणं अतिए चाउज्जाम धम्म उवसपजित्ताणं तओ पच्छा आहार आहरित्तए तिक्डु, इम च एचारूव अभिग्गह अभिगिपहेत्ता णं पोडरिगिणीए पडिणिक्खमइ, पडिणिक्खमित्ता, पुव्वाणुपुविचरमाणे गामाणुगाम दुइज्ज- माणे जेणेव थेरा भगवतो तेणेव पहारेत्थ गमणाए।सू०५॥ टीका-'तएण पुडगए' इत्यादि । ततः खलु पुण्डरीका स्वयमेर पश्च मुष्टिक लोच करोति, तथा स्वयमेव 'चाउज्जाम चातुर्याम-चतुर्महानतलक्षण धर्म प्रतिपद्यते, प्रतिपद्य, 'कढरीचम्म सतिय ' वण्डरीकस्य सत्कम् कण्डरीक सम्बन्धि इत्यर्थः, 'आयारभटय ' आचारभाण्डक आचाराय-माधोः पञ्चविधा चारपरिपालनाय यद्भाण्डक-त्रिपात्रमदोकमुखवस्विकारजोहरणादिरूपम् तद् तएण पुडीए सयमेव पचमुट्टिय' इत्यादि । टीकार्थ-(तएण) इसके पाद (पुडरीए) पुडरीक ने (सयमेव) अपने आप (पचमुट्ठिय लोय करेड) अपना पचमुष्टिक लोच किया- (करित्ता सयमेव चाउज्जाम धम्म पडिवजड पडिज्जित्ता कडरीयस्स सतिय आयारभडय गेण्हइ) और लोच करके स्वय ही उन्होंने-चातु र्याम-चतुर्महाव्रत रूप धर्म को धारण कर लिया। एवं कडरीक के अनगार अवस्था मरन्धी आचार भाण्डक को-वस्त्र, पात्र सदोरक मुख वस्त्रिका, रजोहरण आदिरूप साधु चिह्नों को-ले लिया। (गेण्हित्तो इम एयाख्व अभिग्गह अभिगिण्ट, कप्पा मे थेरे वंदित्ता णमसित्ता 'तएण पुडरी सयमेव पचमुट्टिय' इत्यादि । २-(तएण) सा२५छ (पुंडरीए) धुरी (सयौर) तानी (पचमुष्ट्रिय लोय करेद) पातानु ५ यमुष्टि: दुयन (करित्ता सयभेन चाउज्नाम धम्म पडिज्जिइ, पडिबग्नित्ता कटरीयरस सतिय भायारभ दय गेण्डा) અને લુચન કરીને જાતે જ તેમણે ચાતુર્યામ-ચતુર્મહાવત રૂપધમને ધારણ કરી લીધું અને કડીકની અનગાર અવસ્થા સ બ ધી આચાર ભાડકે–વસ્ત્ર, પાત્ર, સદીરક મુખવસ્તિકા, રજોહરણ વગેરે સાધુ ચિઠ્ઠોને લઈ લીધા . જાતે જ हा ९३ - - ७३६ माधान मंते । भोगेटिभरी मदन भोगे: ?f भौगैः प्रयोजनमस्ति । इति, पण्डरीर माह-हना ! अहो 'हन्त ! भीमोगपभोक्तुमानमोऽस्मीति भार' । ततः खलु-कण्डरीशमिपायानानन्तरमित्यर्थः, स पुण्उरीको राजा पौटुम्पिकपुमपान गन्दयति माध्यति, पदायित्ता, परमवदत् - शिपमेव भो देशानुपिया 1 कण्डरीकम्य महार्यम् अत्ययम् जा रागाभिसेय ' यावत् राना भिपेकम् ' उहवेड' उपस्थापयत परिस्पयत, 'जाव रायाभिसे एण अमिर्सि चह' यावत् राज्याभिषेकेण अमिपिचति स पुण्डरीको राना कण्डरीकं राजपदे स्थापयति ॥ मू० १॥ मृल्म-तण्ण पुडरीए सयमेव पचमुष्ट्रिय लोय करेइ, उनसे ऐसा ही कहा परन्तु फिर भी उन्हों ने कुछ नहीं ध्यान दिया केवल मौन धारण कर ही पैठे रहे-तप पुनः पुडरीकने उन कडरीक अनगार से इस प्रकार कहा है भदन्न ! क्या आप को भोगों से तात्पर्य है ' तय कडरीक ने कहा हा-मेरा मन भोगों को उपभोग करने के लिये हो रहा है। इस तरह कडरीक का अभिप्राय जानने के बाद पुड रीक राजो ने कौदाम्बिक पुरुषों को बुलाया और बुलाकर उनसे ऐसा कहा-भो देवानुमियो तुम लोग करी के लिये राज्याभिषेक योग्य सामग्री एकत्रित कर लेआओ पुडरीक राजा की इस आज्ञा के अनु सार, उनलोगों ने वैसा ही किया-जय राज्याभिषेक सामग्री उपस्थित हो चुकी-तव पुडरीकने कडरीक का राज्याभिषेककर दिया-कडरीक को राजपद में स्थापित कर दिया ॥ सूत्र ४॥ રહ્યા પુડરીક રાજાએ તેમની આવી સ્થિતિ જોઈને બીજી અને ત્રીજી વખત પણ આ પ્રમાણે જ કહ્યું પણ તેમણે તેની કોઈ દરકાર કરી નહિ તેઓ ફકત મૂગા થઈને બેસી જ રહ્યા ત્યારે ફરી ફડરીકે તે ક ડરીક અનગારને આ પ્રમાણે કહ્યું કે હે ભગવન ! તમને શું હજી બેગ ઉપભેગેની ઈચ્છા છે? ત્યારે કડરીકે કહ્યું કે હા, ખરેખર મારૂ મન ભોગ ઉપભોગમા પ્રાપ્ત થવા કછે છે આ પ્રમાણે કરીકની ઈચ્છા જાણીને પુડરીક રાજાએ કૌટુંબિક પુરુષને બોલાવ્યા અને બોલાવીને તેમને આ પ્રમાણે કહ્યું કે હે દેવાનુપ્રિય ' તમે લેકે કાડરીક માટે રાજ્યાભિષેક ચોગ્ય સામગ્રી ભેગી કરી પુરીક રાજાની આ પ્રમાણે આજ્ઞા સાભળીને તે લોકોએ તેમજ કર્યું જયારે રાજા ભિષેકની બધી વસ્તુઓ એકત્રિત થઈ ગઈવારે ૫ ડરીકે કરીને રાજ્યાભિષેક કરી દીધે એટલે કે કડરીકને રાજ્યાને બેસાડી દીધા છેસૂત્ર ૪ / M १ अमगारधर्मामृतपिणी टीका अ० १९ पुण्डरीक-ठण्डरीकचरित्रम् ও करित्ता, सयमेव चाउजाम धम्म पडिवज्जइ, पडिवजित्ता कंडरीयस्स सतिय आयारभडय गेण्हइ, गेण्हित्ता, इम एयारुव आभग्गहं आभिगिण्हइ-कप्पड़ मे थेरे वंदित्ता णमंसित्ता थेराणं अतिए चाउजाम धम्म उवसपज्जित्ताणं तओ पच्छा आहार आहरित्तए तिकडु, इम च एयारूव अभिग्गह अभिगिण्हेत्ता णं पोडरिगिणीए पडिणिक्खमइ, पडिणिक्खमित्ता, पुव्वाणुपुविचरमाणे गामाणुगाम दूइज्ज- माणे जेणेव थेरा भगवतो तेणेव पहारेत्थ गमणाए।।सू०५॥ टीका-'तएण पुडीए' इत्यादि । ततः खलु पुण्डरीका स्वयमेन पश्च मुष्टिक लोच करोति, तथा स्वयमेव ' चाउज्जाम चातुर्याम-चतुर्महानतलक्षण धर्म प्रतिपद्यते, प्रतिपद्य, 'क्टरीयम्म सतिय ' कण्टरीफस्य सत्कम्=कण्डरीक सम्बन्धि इत्यर्थः, 'आयारभडय' आचारभाण्डक आचाराय-माधोः पञ्चविधा चारपरिपालनाय पाण्डकं-स्त्रपात्रसदोकमुखवस्त्रिकारजोहरणादिरूपम् तद् 'तएण पुडरी सयमेव पचमुहिप' इत्यादि । टीकार्थ-(तएण) इसके बाद (पुडरीए) पुडरीक ने (संयमेव) अपने आप (पचमुट्ठिय लोय करेड) अपना पचमुष्टिक लोंच किया- (करित्ता मयमेव चाउज्जाम धम्म पडिवजह पडिवज्जित्ता कडरीयस्स सतिय आधारभडय गेण्इ) और लोच करके स्वय ही उन्होंने-चातु मि-चतुर्महाव्रत रूप धर्म को धारण कर लिया। एव कडरीक के अनगार अवस्था मन्धी आचार भाण्डक को-वस्त्र, पात्र, सदोरक मुख वस्त्रिका, रजोहरण आदिरूप माथु चिह्नों को-ले लिया। (गेण्डित्तो इम एयाख्व अभिग्गह अभिगिण्ट, कप्पह मे धेरे बंदित्ता णमसित्ता 'तपण पुडरीए सयमेव पचमुट्टिय' इत्यादि । साथ-(तपण) (२५छी (पुडरीए) धुरी (मयमेर) यतानी ( पचमुट्ठिय लोय करेद) पातानु ५ यमुष्टि दुयन (करित्ता सयभेर चाउज्जाम धम्म पडिजनइ, पडिबज्जिती कहरीयरस सतिय भायारभर गेण्डा) અને લુચન કરીને જાતે જ તેમણે ચાતુર્યામ-ચતુમહાવ્રત રૂપધમને ધારણ કરી લીધું અને કડરીકની અનગાર અવસ્થા સ બ ધી આચાર ભાડ-વસ્ત્ર, પાત્ર, સદર મુખવડિા, રજોહરણ વગેરે સાધુ ચિને લઈ લીધા જાતે જ था ९३ - . - ताधर्मपाल गृहाति, गृहोद्या, इममेतपक्ष्यमाणममिग्रामप्रतिक्षाविशेषम् अमिताति- श्रोति अभिग्रहस्परुपमा-कल्पते में स्थगिन सन्दिया नमस्थित्वा स्थविराणा मन्तिके चातग धर्मम् ' उसपग्निताण ' उपसपा-स्वीकत्य, सत्ता पश्चात- आहारमाहर्तुम् इनि कत्या निमित्य, उम य एतदूपम् अभिग्रहम् , अभिगा खलु पृण्डरीकिण्या प्रतिनिष्काम्यति निम्मरति, मतिनिकम्य 'पुवाणुपुनि' पूर्वानु पूर्ध्या चरन् , गामानुग्राम द्रयन् यत्र स्थगि भगवन्तस्तव प्राधारयाम नाय गन्तु मम्बित' ।। सु०५ ॥ थेराण अतिश चाउज्जाम धम्म सपत्तिाण, तो पच्छा आहार आहरितण) पाद में उनोंने इस प्रकार अभियर धारण किया कि जपतक में स्थविर भगवनो को बदना नमस्कार कर उनके पाससे चातुर्याम धर्मको धारण नहीं कर लूगा, तपतक मैं आहार पानी ग्रहण नहीं करूँगा उनके पास चातुर्याम धर्म धारण करके ही आहार ग्रहण करूँगा (त्ति कटु इमच प्याल्व अभिग्गा अभिगिहित्ता ण पोडरिगिणीए पडिनिक्खमइ, पडिनिक्पमित्ता पुव्वाणुपुब्धि परमाणे गामाणुगाम दुइ ज्जमाणे जेणेच थेरा भगवतो तेणेव पहारेत्य गमणाए) इस प्रकार का यह अभिग्रहण कर वे उस पुडरीकिणी नगरी से निकले और निकल कर तीर्थकर परम्परानुमार विहार करते हुए एव एक ग्राम से दूसरे ग्राम में विचरण करते हुए वे उस ओर स्थित हुए कि जहा स्थविर भगवत विराजमान थे। सूत्र ५॥ (गेहिता इम एयारून अभिग्गह अभिगिण्हर, कापड, मे थेरे व दित्ता णमसित्ता गण अति चाउजाम धम्म त्यसपजित्ताण तओपन्छा आहार आरित्तप) ત્યારબાદ તેમણે આ જાનને અભિગ્રહ ધારણ કર્યો કે જ્યાં સુધી હું સ્થવિર ભગવાને વદના તેમજ નમરકાર કરીને તેમની પાસેથી ચાતુર્યામ ધર્મને ધારણ નહિ કરે ત્યા સુધી હું આહાર પાણી ગ્રહણ કરીશ નહિ તેમની પાસેથી ચાતુર્યામ મને ધારણ કરીને જ હુ આહાર ગ્રહણ કરીશ (त्ति कटु इम + एयारूप अभिग्गह अभिगिहित्ताण पोंडरिगिणीए पहिनिक्खमइ, पहिनिक्खमित्ता पुवाणुपुब्धि परमाणे गामाणुगाम दूइज्जमाणे जेणेव थेरा भगव तो देणेव पहारेत्थ गमणाए ) આ પ્રમાણે તે અભિગ્રહને મનમાં ધારણ કરીને તેઓ તે પુડરકિર્ણ નારીની બહાર નીકળ્યા અને નીકળીને તીર્થ કર પર પરા મુજબ વિહાર કરતા કરતા અને આ પ્રમાણે એક ગામથી બીજે ગામ વિચરણ કરતા કરતા તેઓએ જ્યા સ્થવિર ભગવતો વિરાજમાન હતા તે તરફ પ્રસ્થાન કર્યુ ॥सू०५ मनगारधर्मामृतपिणी टी० अ० १९ पुण्डरोक-फडरीकचरित्रम् मूलम्--तएणं तस्स कडरीयस्स रण्णो त पणीय पाण- भोयणं आहारियस्स समाणस्त अतिजागरिएण य अइ भोयणप्पसगेण य से आहारे णो सम्मं परिणमइ । तएणं तस्स कंडरीयस्त रणो तसि आहारसि अपरिणममाणसि पुनरत्तावरत्तकालसमयसि सरीरसि वेयणा पाउन्भूया उज्जला विउला पगाढा जाव दुरहियासा पित्तज्जरपरिगय- सरीरे दाहकतीए यावि विहरइ । तएणं से कडरीए राया रज्जे य रटे य अतेउरे य जाव अज्झोववन्ने अट्टदुहवसट्टे अकामए अवस्सवसे कालमासे काल किच्चा अहे सत्तमाए पुढवीए उनोसकाल दिइयसि नरयसि नेरइयत्ताए उववण्णे । एवासेव समणाउसो | जाव पब्वइए समाणे पुणरवि माणुस्सए कामभोगे आसाए जाव अणुपरियट्टि- स्तइ, जहा व से कडरीए राया ॥ सू० ६॥ टीका-'तएणं तस्स ' इत्यादि । तत खलु तस्य कण्डरीकस्य राशस्त पणीय' प्रणीतम् = सरस गरिष्ठ च पानभोजनम् । आहारियस्म ममाणस्स आहारितस्य सत' आहार कुर्वतः सत• 'अजागरियेग य ' अतिजागरितेन च टीकार्थ-(तपण) इसके बाद (तस्स कडरीयस्स रणो) उस कड रीक राजा के (त पीय पोण भोयण आहारीयस्त समाणस्स अतिजा गरिएणय अइभोयणप्पसगेणय से आतारे णो सम्म परिणमह ) इस प्रणीत-सरम-गरिष्ठ पान भोजन के खाने से तथा विपनों की अधिक आसक्ति के कारण अतिजागरण करने से ण्व प्रमाणाधिक भोजन के , 'तएणं तरस फटरीयस्स रणो' इत्यादि । A1-(तएण) त्या२पछी (तस्स कडरीयस्स रण्णो) ते 31४ २०नने (त पणीय पाणभोयण ओहारियस्स समाणस अतिजागरिएण य अईमो यणप्पसगेण य से आहारे णो सम्म परिणम ) તે પ્રણત-સરસ-ગરિક પાન ભજનના આહારથી તેમજ વિષયોમા વધારે પડતી આસક્તિના લીધે, વધારે જાગરણ કરવાથી, અને પ્રમાણ કરતા - હું ખી થયા આ વેદનામાં માત્ર દુખ જ થતું હતું, તે વેદના તેમના સંપૂર્ણ ( tતી પ્રમાણમાં તે બહુ જ વધારે હતી યાવતું वाल विषयामरतेरनिजागरणया' मामायणप्पागा' अति भोजनमानमावाधिक भोजनेन स आहारो नो सम्पक परिणमतिम्यादाहारम्प परिपाको न भवति । ततः सलु तस्य कण्डरीरस्य राशः 'सि' आदारसि तस्मिन् आहारे 'अप रिणममाणंसि' भपरिणमति-परिवारमगति सति पुत्ररत्तावरत्तकालसम यसि' पूर्वराजापररात्रकारसमजामध्यमागे मरसि' भरीर वेदना पार भूता, कोदशीवेदना ? उज्ज्वला-मुखलेशरहिना, विपुलामविशाला-सर्वशरीरव्याप्ता पगादा' मगादा 'जार दुरहियासा' यापद् दुरघिसघा-सोहमशक्या, पुनः स कण्डरीको राजा पित्तज्जरपरिगयसरी ' पित्तसर परिगतभरीर =पिचवरेण परिगत-व्यात शरीर यस्प मा-पित्तयारपग्व्यिाप्तशरीर. 'दाहकतीए' दाह व्युत्क्रान्तिकान्दाहचरमागसमाकान्त चापि विहरति आस्ते । ततः खलु स कण्डरीको राना राज्ये च राष्ट्रे च अन्न'पुरे च 'जार अओवबन्ने ' यावत् प्रसग से कृत आहार का परिपाक ठीक २ नहीं होता रहा-(सएण तस्स पटरीयस्स रणो तसि आहारसि अपरिणममाणसि पुन्वरत्तावर त्तकालसमयसि सरीरसि वेयणा पाउन्भुया उज्जला विउला पगाढा जाव दुरहियाता पित्तज्जरपरिगयसरीरे दारवक्कतीए यावि विहरह) इसलिये एक दिन की बात है कि उन कडरीक राजा के जब वह कृत सरस गरिष्ट आहार अच्छी तरह नही पचा तय उनके शरीर में रात्रि के मध्यभागमे वेदना प्रादुर्भूत हुई। जिस वजह से वह वेदना सुख के लेश से वर्जित थी उनके समस्त शरीर भर में व्याप्त हो रही थी बहुत अधिक थी-यावत् वह उन्हें दुरधिसद्ध हो रही थी। पिसज्वर से व्याप्त है शरीर जिन का ऐसे वे कडरीक राजा दाहज्वर की ज्वाला પણ વધારે ભેજન પ્રસગોમા કરેલા આહારનું પાચન (तएण तम्स क डरीयरा रणो तसि आहार सि अपरिणममासि पुन रत्तावरत्तकालसमय सि सरीर सि वेयणा पाउभुया उज्जला विउला पगाढा जाव दुरहियासा पित्तमरपरिगयसरीरे दादवकतीए यावि विहर) એથી એક દિવસની વાત છે કે તે ક ડરીક રાજાને જ્યારે ભજન રૂમ લીધેલા તે સરમ અને ગરિક આહારનુ સારી રીતે પાચા થયુ નહિ ત્યારે રાત્રિના મધ્ય ભાગમાં તેમના શરીરમાં વેદના થવા માડી, તેથી તેઓ ખૂબ જ શરીરમાં વ્યાપ્ત થા; તેમના માટે દુર સહ્ય) થી પડી હતી પિત્તવરથી પ્રાપ્ત થયેલા શરીરવાળા તે ॥ वाणासाथी सणशी या બરાબર થતું નહોતુ - - - मनगारधर्मामृतवर्षिणी टो० अ० १९ पुण्डरीक कंठरोकचरितम् अध्युपपन्ना-मूच्छितो गृद्धः प्रथित अयुपपन्नः राज्यादिषु सर्वथासक्त इत्यर्थः, ' अदुइट्टवस: आर्तदुःखार्तवशातः तय-आर्त मनसा दु ग्वितः, दुःखातः= देहदु स्वयुक्तः, यशातः राज्यराष्ट्रान्त. पुराधासक्तेन्द्रियाशेन विषयमम्ववियोग- सम्भावनया पीडित -आर्तध्यानोपगत इत्यर्थ । अझामए ' अफामा अनि- उक-मरणवाटारहित , 'अवस्सरसे' अपस्ववश =अपगतस्वातन्त्र्य. परा धीनः सन् कालमासे काल कृत्वा 'अहे सत्तमाए' अधः सप्तम्या पृथिव्याम् तमस्तमः प्रभाख्ये सप्तमे नरके 'उकोसकालहिइयसि' उत्कृष्ट कालस्थिति के नरके से भी युक्त हो गये । (तएण से कडरीए राजा रज्जे य रहे प अतेउरे य जाव अज्झोववन्ने अदुवसहे अकाम अवम्सवसे कालमासे काल किच्चा अहे सत्तमाए पुढवीए उकोसकालाहिश्यसि नरयसी नेरइयत्ता उववण्णे ) इस तरह दुःखित बने हुए वे कडरीक राजा राज्य राष्ट्र, एव अन्तपुर में अव्युपपन्न हो गये इस प्रकार राज्यादिको में सर्वथा आस क्तिभाव से यधे हुए वे राजा मन से दुखित होकर, देह के दुःख से एकक्षण अर्तध्यान में पड़ गये । अन्त में वे, ये नहीं चाहते थे कि मेरी मृत्यु हो जावे-तो भी मासारिक स्थिति से वन्धे हुए होने के कारण या वेदनाओं से पीडित होने के कारण वे स्ववश नहीं थे परतत्र थे, इसलिये काल अवसरकाल करके मर कर नीचे तमस्तम प्रभा नाम के सातवे नरक मे कि जो उत्कृष्ट काल स्थिति प्रमाण है-अर्थात् ३३ सा (तएण से कडरीए राया रज्जे य रटे य अतेउरे य जाव अझोववन्ने अट्ट दुहवसट्टे अकामए अवस्सवसे कालमासे काल किच्चा अहे सत्तमाए पुढवीए, अकोसकालदिइयमि नरय सि नेरइयत्ताए उववण्णे) આ પ્રમાણે દુ ખિત થયેલા તે ક ડરીક રાજા રાજ્ય, રાષ્ટ્ર અને રણ વાસમાં અયુપપન્ન થઈ ગયા એટલે કે વધારે પડતા આસક્ત થઈ ગયા આ પ્રમાણે ગત્ત વગેરેમા સ પૂર્ણપણે આસક્ત ભાવથી બ ધાયેલા તે રાજા મનથી દુખિન થઈને, શારીરિક કષ્ટથી એક ક્ષણ માટે પણ મુક્તિ નહિ થવાને કારણે વિષય સુખના વિયેગની સંભાવના બ લ તેમજ રાજ્ય, રાષ્ટ્ર, રણવાસ વગેરેમાં આસક્ત ઈન્દ્રિયેના વશમાં હોવાને કારણે આર્તધ્યાનમાં મગ્ન થઈ ગયા છે કે તેઓ મૃત્યુને ઈચ્છતા નહતા છતાએ સમારિક વાતાવરણમાં બધાયેલા હોવાને કારણે અથવા વેદનાઓથી પીડિત હેવાને કારણે તેઓ સ્વવશ હતા નહિ, પરવશ–પરતત્ર હતા, એથી કાળ અવસરે કાળ કરીને - મધુ પામીને-નીચે તમસ્તમપ્રભા નામના સાતમા નરકમાં કે જે ઉત્કૃષ્ટ કાલ .
- - . - love तापमान विषयामस्तेरनिजागरणया' आमायणप्पण' अतिमोजनमान-प्रमायाधिक मोजनेन स माहारी नो सम्पच परिणमति चयापदादरम्य परिपाको न भवति । ततः रसलु तस्य कण्डरीरस्य रामः 'सि' आहारसि' तस्मिन् आहारे ' अप रिणममाणमि' अपरिणमति परिपारमगति सति 'पुनरत्तापरत्तकालसम यसि' पूर्वराजापरराका समबोर्मध्यमागे 'मरमि' शरीरे वेदना माद भूता, कोदशीवेदना ? उज्जवला गुग्यलेशरहिना, विपुला विसाला-शरीरव्याप्ता पगाहा' पगाढा 'जार दुरहियासा' यापद दुरबिसद्या-सोढुमशक्या, पुनः स कण्डरीको राजा ' पित्तज्जरपरिगयसरी' पित्तनर परिगतशरीरपिचवरेण परिगतच्याप्त शरीर यस्य सः पित्तचरपरिष्याप्तशरीरः 'दाहकतीए' दाह व्युत्क्रान्तिक' दाहज्यपालासमाकान्त चापि विहरति आस्ते । ततः खलु स कण्डरीको राजा राज्ये च राष्ट्रे च अन्तःपुरे च 'जार अझोपबन्ने ' यावत् प्रसग से कृत आहार का परिपाक ठीक नहीं होता रहा-(सएण तस्स क्टरीयस्स रण्गो तसि आहारसि अपरिणममाणसि पुन्धरत्तावर सकालसमयसि सरीरसि वेयणा पाउन्भुया उज्जला विउला पगाढा जाव दुररियासा पित्तज्जरपरिंगयसरीरे दारवाकतीए यावि विहरह) इसलिये एक दिन की बात है कि उन कडरीक राजा के जब वह कृत सरस गरिष्ठ आहार अच्छी तरह नहीं पचा तर उनके शरीर मे रात्रि के मध्यभागमे वेदना प्रादुर्भूत हुई। जिस वजह से वह वेदना सुख के लेश से वर्जित थी उनके समस्त शरीर भर में व्याप्त हो रही थी घहुत अधिक थी-यावत् वह उन्हें दुरधिसह्य हो रही थी। पित्तज्वर से व्याप्त है शरीर जिन का ऐसे वे कडरीक राजा दाहज्वर की ज्वाला પણ વધારે ભેજન પ્રસગમાં કરેલા આહિરનું પાચન (तएण तम्स क डरीयस्रा रणो तसि आकार सि अपरिणममासि पुव्व रत्तावरत्तकालसमय सि सरीर सि वेयणा पाउन्भुया उज्जला विउला पगाढा जाव दुरहियामा पित्तज्जरपरिगयसरीरे दाहकतीए यावि विहरइ) એથી એક દિવસની વાત છે કે તે ક ડરીક રાજાને જયારે ભજન રૂપમાં લીધેલા તે સરસ અને ગરિક આહારનુ સારી રીતે પાચન થયું નહિ ત્યારે રાત્રિના મધ્ય ભાગમાં તેમના શરીરમાં વેદના થવા માડી, તેથી તેઓ ખૂબ જ દુખી થયા આ વેદનામા માત્ર હોખ જ થતું હતું, તે વેદના તેમના સંપૂર્ણ શરીરમાં વ્યાપ્ત થઈ રહી હતી પ્રમાણમાં તે બહુ જ વધારે હતી યાત તેમના માટે સુરધિસહ્ય (અસહ્ય થઈ પડી હતી પિત્તવરથી પાસ થયેલા શરીરવાળા તે કડરીક રાજા દાહજારની જવાળાઓથી સળગી ઉઠયા બરાબર થતુ નહોતુ . - " मनगारधर्मामृतवषिणी टी० अ० १९ पुण्डरीक कंठरोकयरितम् अध्युपपन्ना-मूच्छितो गृद्धः प्रथित अायुपपन्नः राज्यादिषु सर्वथासक्त इत्यर्थः, ' अदुइट्टवस' आर्तदुःखार्तवशातः-तयआर्तः-मनसा दु सितः, दुःखातः- देहदु खयुक्तः, शार्तः राज्यराष्ट्रान्तः पुराधासक्तेन्द्रियाशेन विषयसवियोग- सम्भावनया पीडित =आर्तध्यानोपगत इत्यर्थ । ' असामए' अकामका अनि- छक -मरणवाञ्छारहितः, 'अबस्सपसे अपस्ववश-अपगतस्वातन्त्र्यः परा धीनः सन् कालमासे काल कृत्वा 'अहे सत्तमाए' असा सप्तम्या पृथिव्याम् तमस्तमः प्रभाख्ये सप्तमे नरके 'उकोसकालढिइयसि' उत्कृष्टकालस्थिति के नरके से भी युक्त हो गये । (तण्ण से कडरीप राया रज्जे य रहे य अतेउरे य जाव अज्झोववन्ने अदुहवसढे अकामा अवस्सबसे कालमासे काल किच्चा अहे सत्तमाए पुढवीए उकोसकालहिश्यसि नरयसी नेरइयत्ताए उपवण्णे ) इस तरह दुःखित बने हुए वे कडरीक राजा राज्य राष्ट्र, एव अन्तपुर में अध्युपपन्न हो गये इस प्रकार राज्यादिको में सर्वथा आस क्तिभाव से बधे हुए वे राजा मन से दुखित होकर, देह के दुःख से एकक्षण अर्तध्यान में पड़ गये । अन्त में वे, ये नहीं चाहते थे कि मेरी मृत्यु हो जावे-तौ भी नासारिक स्थिति से बन्धे हुए होने के कारण या वेदनाओं से पीडित होने के कारण वे स्ववश नहीं थे परतत्र थे, इसलिये काल अवसरकाल करके मर कर नीचे तमस्तम प्रभा नाम के सातवे नरक मे कि जो उत्कृष्ट काल स्थिति प्रमाण है-अर्थात् ३३ सा (तएण से कडरीए राया रजे य रटे य अतेउरे य जाव अझोववन्ने अदृदुइवसट्टे अकामए अवस्सवसे कालपासे काल किन्चा अहे सत्तमाए पुढवीर, अक्कोसकालदिइयमि नरय मि नेरइयत्ताए उपवण्णे ) આ પ્રમાણે દુ ખિત થયેલા તે ક ડરીક રાજા રાજ્ય, રાષ્ટ્ર અને રણ વાસમા અયુપન્ન થઈ ગયા એટલે કે વધારે પડતા આસક્ત થઈ ગયા આ પ્રમાણે રાજન વગેરેમા સ પૂર્ણપણે આસક્ત ભાવથી બધાયેલા તે રાજા મનથી દુખિન થઈને, શારીરિક કષ્ટથી એક ક્ષણ માટે પણ મુકિત નહિ થવાને કારણે વિષય સુખના વિયેગની સભાવના બદલ તેમજ રાજ્ય, રાષ્ટ્ર, રણવાસ વગેરેમાં આસક્ત ઈન્દ્રિયેના વશમાં હોવાને કારણે આર્તધ્યાનમા મગ્ન થઈ ગયા છેવટે તેઓ મૃત્યુને ઈચ્છતા નહોતા છતાએ સાંસારિક વાતાવરણમાં બધાયેલા હોવાને કારણે અથવા વેદનાઓથી પીડિત હોવાને કારણે તેઓ સ્વવશ હતા નહિ, પરવશ–પરતત્ર હતા, એથી કાળ અવસરે કાળ કરીને – મૃત્યુ પામીને-નીચે તમસ્તમપ્રભા નામના સાતમા નરકમાં કે જે ઉત્કૃષ્ટ કાલ- - गाहेइ, ४२ ताधर्मवचार नैरयिकतया उपपना एन एष्टान्तन गगवान महावीर' गानुपदिशति-एवमेव =गने नैवमकारेण हे आयुष्मावः ! श्रमणाः यः पथिदस्मार श्रमणो वा श्रमणी वा आचार्योपाध्यायामतिके यारमयभितः सन प्रारपि मानुष्यान कामभोगान् 'आसाइ' आस्वादयति । स 'जार अणुपरिपट्टिस्मा ' याचदनुपर्यटिप्यति- यावत्-पातुरन्तससारकान्तार परिभामिप्यति । ' नहर से कडरीप राया' यथैव स एण्डरीको राना ॥ मू०६ ।। मूरम्-तएणं से पोंडरीए अणगारे जेणेप थेरा भगवंतो तेणेव उवागच्छड, उवागाच्छित्ता येरे भगवते वदइ नमसइ, वदित्ता नमंसित्ता थेराण अंतिए दोच्चपि चाउज्जाम धम्म पडिवज्जइ, छक्खमणपारणगंसि पढमाए पोरिसीए सज्झाय करेइ, करित्ता जाव अडमाणे सीयलरखं पाणभोयणं पडि- पडिगाहित्ता, अहापज्जत्तमिति कटु पडिणियत्तर गर की जहा उत्कृष्ट स्थिति है-नारकी की पर्याय से उत्पन्न हो इसी यात को दृष्टान्त से श्री भगवान महावीर प्रभु साधुओं को भाते है-(एवामेव समणाउसो! जाय पचहए समाणे पुणरवि स्सए कामभोगे आमाए जाव अणुपरियटिस्मइ, जहा व से कई राया) इसी तरह हे आयुग्मत श्रमणो ! जो कोई हमारा श्रमण अर्थ श्रमणीजन आचार्य उपा याय के पास मे दीक्षित होकर के पुन मनुष्य भव सबन्धी कामभोगों को भोगता है वह कडरीक राजा की तरह यावत् इस चतुर्गति रूप ससार कान्नार में परिभ्रमण कयेगा ॥सूत्रः। સ્થિતિ પ્રમાણ છે એટલે કે ૩૩ સાગરની જયા તત્કૃષ્ટ સ્થિતિ છે-નારકની પર્યાયથી જન્મ પામ્યા એ જ વાતને શ્રી ભગવાન મહાવીર પ્રભુ દૃષ્ટાંત રૂપમાં સાધુઓને સમજાવે છે કે- एवामेय समणाउसो ! जाव पव्वईए समाणे पुणरवि माणुस्सए कामभोगे आसाए जाव अणुपरियट्टिस्सइ, जहा व से क डरीए राया) આ પ્રમાણે તે આયુષ્મત શ્રમણ ! જે કોઈ અમારા શ્રમણ અથવા શ્રમજન આચાર્ય કે ઉપાધ્યાયની પાસે દીક્ષિત થઈને ફરી જે તે મનુષ્ય ભવના કામોને ભેગવે છે, તે કડરીક રાજાની જેમ યાવત્ આ ચતુર્ગતિ રૂપાસ સાર કાતારમાં પરિભ્રમણ કરશે સત્ર ૬ છે ७४३ मनगारधामृतषिणी टी० अ० १९ पुण्डरीक-कडरीश्चरित्रम् जेणेव थेरा भगवंतो तेणेव उवागच्छइ, उवागच्छित्ता, भत्त- पाणं पडिदसेइ पडिदसित्ता, येरेहि भगवतेहि अब्भणुनाए समाणे अमुच्छिए अगिद्धे अगढिए अणझुववण्णे विल मिव पण्णगभूएणं अप्पाणेण तं फासुएसणिज्ज असणपा- णखाइमसाइम सरीरकोटुगंसि पविखवइ । तएणं तस्स पुडरीयस्स अणगारस्स त कालाइछतं अरस विसर सीय- लुक्ख पाणभोयण आहारियस्स समाणस्स पुवरत्तावरत्तकाल- समयसि धम्मजागरिय जागरमाणस्त से आहारे णो सम्भ परिणमइ । तएणं तस्स पुडरीस्त अणगारस्स सरीरगसि वेयणा पाउन्भूया उज्जला जाव दुरहियासा, पित्तज्जरप- रिगयसरीरे दाहवक्कंतिए विहरइ । तएणं से पुडरीए अण- गारे अत्थामे अवलं अवीरिए अपुरिसक्कारपरक्कमे करयल जाव एव बयासी-णमोऽत्थुणं अरिहताणं जाव सपत्ताणं णमोत्थुणं थेराण भगवताण मम धम्मायरियाणं धम्मोत्र- एसयाण पुचि पि य ण मए थेराण अतिए सव्वे पाणाइ- वाए पञ्चक्खाए जाव मिच्छादसणसल्ले णं पच्चक्खाए जाव आलोइयपडिकते कालमासे काल किच्चा सव्वदृसिद्धे उव- वन्ने । तओ अणतर उत्वट्टित्ता महाविदेहे वासे सिज्झिहिइ जाव सव्वदुक्खाणमत काहिह । एवामेव समणाउसो ! जाव पवइए समाणे माणुस्सएहि कामभोगेहि णोसज्जइ णो रजड, जाव विप्पडिघायमावजइ,सेण इहमवे चेव वहूण सावगाणं० ! - - - . ७२ ताधर्मक्या नेरपिस्तया उपपनः। एन घटान्तन गगवान महावीर मानुपदिशति एवमेव =अने नैवप्रकारेण हे आयुणतः ! श्रमणाः यः पश्रिदस्माक श्रमणो वा श्रमणी वा आचार्योपाध्यागानामतिके यात्मयनितः सन पुनरपि मानुष्यकान काममोगान् 'आसाइ' आस्वादयति । स 'जार जणुपग्यिहिस्मः' यापदनुपर्पटिष्यति- यावत्-चातुरन्तरासारकान्तार परिभ्रमिष्यति । 'जहा से कडरीए राया' यथैव स कण्डरीरो राजा ।। मू०६ ।। मूलम्-तएणं से पोंडएि अणगारे जेणेव थेरा भगवंतो तेणेव उवागच्छइ, उवागच्छित्ताधेरे भगवते वदइ नमसइ, वदित्ता नमंसित्ता थेराणं अंतिए दोच्चपि चाउज्जाम धम्म पडिवज्जइ, छक्खमणपारणगंसि पढमाए पारिसीए सज्झाय करेइ, करित्ता जाव अडमाणे सीयल्लपख पाणभोयणं पडि गाहेइ, पडिगाहित्ता, अहापज्जत्तमिति कट्ठ पडिाणियत्तइ, गर की जहा उत्कृष्ट स्थिति है-नारकी की पर्याय से उत्पन्न हो गये। इसी बात को दृष्टान्त से श्री भगवान महावीर प्रभु साधुओं को सम झाते है-(एवामेव समणाउसो! जाव पचहए समाणे पुणरवि माणु स्सए कामभोगे आमाए जाव अणुपरियटिस्मइ, जहा व से कडरी राया) इसी तरह हे आयुष्मत श्रमणो ! जो कोई हमारा श्रमण अथवा श्रमणीजन आचार्य उपायाय के पाम मे दीक्षित होकर के पुनः मनुष्य भव सवन्धी कामभोगो को भोगता है वह कडरीक राजा की तरह यावत् इस चतुर्गति रूप ससार कान्नार में परिभ्रमण कयेगा ॥सूत्र६।। સ્થિતિ પ્રમાણ છે એટલે કે ૩૩ સાગરની જ્યા ઉત્કૃષ્ટ સ્થિતિ છે-નારકીની પર્યાયથી જન્મ પામ્યા એ જ વાતને શ્રી ભગવાન મહાવીર પ્રભુ દેખાતા રૂપમાં સાધુઓને સમજાવે છે કે- एवामेय समणाउसो! जाव पव्वईए समाणे पुणरवि माणुस्सए कामभोगे भासाए जाव अणुपरियट्टिरसइ, जहा व से क हरीए राया) આ પ્રમાણે તે આયુષ્મત શ્રમણ ! જે કે અમારા શ્રમણ અથવા છમહુજન આચાર્ય કે ઉપાધ્યાયની પાસે દીક્ષિત થઈને ફરી જે તે મનુષ્ય ભવના કામને ભગવે છે, તે કડરીક રાજાની જેમ યાવતુ આ ચતુર્ગતિ રૂપ સંસાર કાતારમાં પરિભ્રમણ કરશે ! સૂત્ર ૬ છે .
४५ , - अनगारधर्मामृतवपिणो टी० अ० १९ पुण्डरीक-फडरीकचरित्रम् पौरुष्या-प्रयमे पहरे म्वाध्याय करोति, कृत्ला 'अडमाणे' यावत् अटन उच्चनीच- मध्यमकुलेषु भिक्षायं परिभ्राम्यन् 'सीयलुक्ख ' शीनरूक्ष-शीत-पर्युपित, रूक्ष घृतादिरहित पान भोजन प्रतिगृह्णाति, प्रतिगृद्य 'अहापज्जत्तमितिकटु' यथापर्या- प्तमिति कृत्वा उदरभरणपर्याप्तमिदमन्नमितिमनसि कृत्य 'पडिणियत्तइ ' प्रति- पठिवजह, छट्टक्खमणपारणगसि पढमाग पोरिसीए मज्झाय करेइ करित्ता जाव अडमाणे सीयलुक्ख पागभोयण पडिगाहेड, पडिगारिता अहापज्जत्तमि त्ति कट्टु पडिनियत्तइ-जेणेव थेरा भगवतो तेणेव उवा गच्छड, उवागच्छित्ता भत्तपाणं पडिदसेइ, पडिदसित्ता येरेहिं भगवतेहि अभणुन्नाए समाणे अनुच्छिा अगिद्धे अगढिए अणमुक्वण्णे चिल मिव पण्गगभूएण अपाणेण त फासुएसणिज्ज असणपाणखाइम साइम सरीरकोहगसि परिखबह) वहाँ आकर के उन्हो ने स्थविर भग- चतों को बदना नमस्कार किया। वदना नमस्कार करके बाद में उन्हो ने उनसे दुवाराचातुर्याम-चतुर्महाव्रतरूप धर्म को धारण किया। जब पष्टक्षपण की पारणा का समय आया उस समय वे प्रथम पौरुपी में स्वाध्याय करते-और स्वाध्याय करके फिर वे उच्च नीच मध्यम कुलों में भिक्षा के लिये परिभ्रमण करते उस समय जो उन्हें शीत-पर्युषित, रूक्ष-घृतादिरहित पान भोजन मिलता-वह वे ले लेते-और यह अन्न- सामग्री उदरभरण के लिये पर्याप्त है ऐसा मन में विचार कर वहा से पारिसीए सज्जाय करेइ करिता जाव अडमाणे सीयलुस पाणमोयण पडिगाहेइ पडिगाहिता अहापजनतमि त्ति कटु पडिनियत्तई-जेणेव थेरा भगव तो तेणेव उवागन्छइ, उवागठित्ता भत्तपाण पडिदसेइ, पडिसित्ता थेरेहिं भगव तेहि, अभणुनाए समाणे अमुन्जिर अगिद्धे अगढिर अणझुववण्णे विलमित्र पण्णगभूएण अप्पाणेण त पासुएसणिज्ज असणपाणसाइमसाइम सरीरकोटग सि पक्सिवइ) ત્યાં આવીને તેમણે અવિર ભગવતેને વદના અને નમસ્કાર કર્યા વદના અને નમસ્કાર કરીને તેમણે તેમની પાસેથી બીજીવાર ચાતુર્યામ-ચતુ મહાવ્રત રૂપ ધર્મને ધારણ કર્યો જયારે પષ્ટ ક્ષપણની પારણને વખત આવ્યું ત્યારે તેઓ પ્રથમ પૌરૂષીમા સવાધ્યાય કરતા અને સ્વાધ્યાય કરીને તેઓ ચ્ચ, નીચ અને મધ્યમ કુળમાં ભિક્ષા માટે પરિભ્રમણ કરતા તે સમયે તેમને શીત-પર્યુષિત, રઘી વગરને, પાન આહાર મળને તે તેને તેઓ સ્વીકારી લેતા અને “આટલે આહાર ઉદર–પષણ માટે પૂરતું છે આવે મનમાં વિચાર કરીને ત્યાંથી પાછા ફરી જતા પાછા આવીને ભિક્ષામાં अच्चणिजे वदणिज्जे पूणिज्जसरकारणिजे सम्माणणिके कालाण मगल देवय चेइय पज्जुवासणिज्जेत्तिका परलोए वि य ण णो आगच्छइ पहणि दडणाणि य मुंडणाणि य तज्जणाणि य ताडणाणि य जाव चाउरत ससारकतार जाव वीइवइस्सइ जहावसे पोंडरीए अणगारे । एवं खलु जंवू । समणेणं भगवया महावीरेणं आइगरणं तित्थगरणं जार सिद्धिगइणामधेन ठाण मपत्तेण एगणवीसइमस्स नायज्झयणस्स अयम? पन्नत्ते । एव खलु जबू ! समजेणं भगवया महावीरेणं जाव सिद्विगइणामधेज ठाण संपत्तेणं छट्ठस्स अंगरस पढमस्स सुयक्खधस्स अयम? पण्णेत्ते त्तिवेमि ॥ सू०७॥ टीका--'तएण से ' इत्यादि । ततः खलु स पुण्डरीकोऽनगारो यत्रैव स्थविराभगवन्तस्तत्रैव उपगच्छति, उपागत्य स्थविरान भगवतो वन्दते नमस्थति, वन्दित्वा नमस्थित्वा स्थविराणामन्तिके दोच्चपि ' द्वितीयमपिवारम् चातुर्याम- चतुर्महात्रतरूप धर्म प्रतिपयते । तथा पष्ठापगपारणाया समाप्ताया प्रथमाया 'ताण से पोंडरीए अणगारे' इत्यादि । टीकार्थः-(तण्ण) इसके बाद से पोंडरीए अणगारे) वे पुडरीक अनगार (जेणेव थेरा भगवनो तेणेव उवागच्छद) जहा स्थविर भग चन विराजमान थे वहा आ गये। ( उवाच्छित्ता थेरे भगवते धदर, नमसह, दित्ता, नमसित्ता थेराणं अतिए दोच्चापि चाउजनाम धम्म (तएणसे पोहरीए अणगारे) इत्यादि । साथ-(तएण) त्यारमा ( से पहिरोए अणगारे) ते सन गार (जेणेव थेरा भगव तो तेणेव उवागच्छर) જન સ્થવિર ભગવત બિરા જભાન હતા ત્યા ગયા ( उवागच्छित्ता थेरे भगवते बदा, नम सइ, व दित्ता, नम सित्ता येण भतिए दोच्चापि पाजाम, धम्म परिवाना , - ७४५ , - अनगारधर्मामृतवपिणी टी० अ० १९ पुण्डरीक-फडरीफचरित्रम् पौरुष्या-अयमे प्रहरे पाध्याय करोति, कृत्वा 'अडमाणे' यावत् अटन उच्चनीच- म यमकुलेषु भिक्षार्थ परिभ्राम्यन् 'सीयलुनख' शीतरून-शीत-पर्युपित, रूक्ष घृतादिरहित पान भोजन प्रतिगृहाति, पतिगृद्य 'अहापजनमितिक' यथापर्या- प्तमिति कृत्वा उदरभरणपर्याप्तमिदमानमितिमनसि कृत्य ' पडिणियत्तइ ' प्रति- पडिवजह, छटुक्खमणपारणगसि पढमाग पोरिसीए मज्झाय करेइ करित्ता जाव अडमाणे सीयलुक्ख पागभोयण पडिगाहेड, पडिगारिता अहापज्जत्तमि त्ति कटु पडिनियत्तह-जेणेव थेरा भगवतो तेणेव उवा- गच्छह, उवागच्छित्ता भत्तपाणं पडिदसेइ, पडिसित्ता थेरेहिं भगवतेहिं अन्भणुन्नाए समाणे अमुच्छिा अगिद्धे अगढि अणझुवणे विल मिव पगगभूएण अप्पाणेण त फाण्सणिज्ज असणपाणग्वाहम साइम सरीरकोगसि पक्खिवह ) वहाँ आकर के उन्हो ने स्थविर भग- वतों को वदना नमस्कार किया। वदना नमस्कार करके बाद में उन्हो ने उनसे दुवाराचातुर्याम-चतुर्महाव्रतरूप धर्म को धारण किया। जब षष्टक्षपण की पारणा का समय आया उस समय वे प्रथम पौरुपी में स्वाध्याय करते-और स्वाध्याय करके फिर वे उच्च नीच मध्यम कुलों में भिक्षा के लिये परिभ्रमण करते उस समय जो उन्हें शीत-पर्युषित, रुक्ष-घृतादिरहित पान भोजन मिलता-वह वे ले लेते-और यह अन्न- सामग्री उदरभरण के लिये पर्याप्त है ऐसा मन में विचार कर वहा से पारिसीए सज्जाय करेइ करित्ता जाव अटमाणे सीयलुपस पाणभोयण पडिगाहेइ पडिगाहित्ता अहापत्तमि त्ति कटु पडिनियत्तई-जेणेव थेरा भगवतो तेणेव उवागच्छइ, उवागत्तिा भत्तपाण पडिदसेइ, पडिदसित्ता थेरेहिं भगर तेहिं, अमणुन्ना समाणे अमुन्जिर अगिद्धे अगढिर अणझुववण्णे निलमित्र पण्णगभूएण अप्पाणेण त पासुएसणिज्ज असणपाणसाइमसाइम सरीरकोढग सि पक्सिवइ) ત્યા આવીને તેમણે વિર ભગવતેને વેદના અને નમસ્કાર કર્યો વદના અને નમસ્કાર કરીને તેમણે તેમની પાસેથી બીજીવાર ચાતુર્યામ-ચતુ મહાગત રૂપ ધર્મને ધારણ કર્યો જ્યારે પ૪ લપણની પારણાને વખત આવ્યું ત્યારે તેઓ પ્રથમ પૌરૂષીમા સ્વાધ્યાય કરતા અને સ્વાધ્યાય કરીને તેઓ ચ્ચ, નીચ અને મધ્યમ કુળમા ભિક્ષા માટે પરિભ્રમણ કરતા તે સમયે તેમને શીન-પર્યેષિત, રૂક્ષઘી વગરને, પાન આહાર મળને તે તેને તેઓ સ્વીકારી લેતા અને “આટલો આહાર ઉદર-પષણ માટે પૂરતે છે” આવે મનમાં વિચાર કરીને ત્યાંથી પાછા ફરી જતા પાછા આવીને ભિક્ષામાં ताचा अच्चणि जे वदणिज्जे पूणिज्जे सबकारणिज्जे सम्माणणिले कल्लाण मगल देवय चेइय पज्जुवासणिज्जेत्तिका परलोए वि य णं णो आगच्छइ पणि दडणाणि य मुंडणाणि य तज्जणाणि य ताडणाणि य जाव चाउरत ससारकतारं जाव वीइवइस्सइ जहावस पॉडरीए अणगारे । एव खल्लु जवू । समणेणं भगवया महावीरेणं आइगरणं तिस्थगरण जाप सिद्धिगइणामधज्ज ठाण मपत्तेण एगृणवीसइमस्स नायज्झयणस्स अयम? पन्नत्ते । एव खलु जंबू ! समणेणं भगवया महावीरेणं जाव सिद्धिगइणामधेज ठाणं सपत्तेणं छठुस्स अंगरस पढमस्स सुयक्खधस्स अयमहे पण्णेत्ते त्तिबेमि ॥ सू०७॥ टीका-'तएण से ' इत्यादि । ततः खलु स पुण्डरीकोऽनगारो यत्रैव स्थविराभगवन्तस्तत्रैव आगच्छति, उपागत्य स्थविरान भगवतो वन्दते नमस्पति, पन्दित्वा नमस्यिता स्थविराणामन्तिके 'दोच्चपि' द्वितीयमपिवारम् चातुर्याम- चतुर्महावतरूप धर्म प्रतिपयते । तथा पष्ठक्षपणपारणाया समाप्ताया प्रथमाया 'तण्ण से पोंडरीए अणगारे' इत्यादि। टीका:-(तगण) इसके बाद (से पोंडरीए अणगारे) वे पुडरीक अनगार (जेणेव थेरा भगवतो तेणेव उवागच्छद) जहा स्थविर भग चन विराजमान थे वहा आ गये। ( उवागच्छित्ता थेरे भगवते बदइ, नमसह, वदित्ता, नमसित्ता थेराण अतिए दोच्चपि चाउजनाम धम्म (तण्णं से पो डरीए अणगारे) इत्यादि । साथ-(तएण) त्यामा६ ( से पोहरीए अणगारे) ते पुरी मन २ (जेणेव थेरा भगवतो तेणेव उवागच्छद) « थपिर मत मिस જમાન હતા ત્યા ગયા (उवागच्छित्ता थेरे भगवते वदा, नम मइ, व दित्ता, नम सित्ता थेराण अतिए दोच्चापि घाबजाम, धम्म परिषद, छक्लमणपारणगंसि पदमाए وی , . , , अनगारधर्मामृत्यर्पिणी टी० १० १९ पुंगडरीक कंडरीकचरित्रम् समयमुल्लड्-य प्राप्तम् , अरस विरस शीतरूक्ष पान भोजनम् ' आहारियस्स आहारितस्य सत पूर्वरात्रापररात्रकालसमये ' धम्मजागरियं जागरमाणस्स ' धर्म जागारिका जाग्रत =धर्मचिन्तनाथ जागरणा कुतः स आहारो नो सम्यक् परि- णमतिनो परिपाक गच्छति । ततः खलु तस्य पुण्डरीकस्य अनगारस्य गरीरे वेदना प्रादुर्भूता ' उज्जला जार दुरहियासा ' उज्ज्वला यावत् दुरविसह्या, एपा व्याख्यापूर्ववत् , तथा स पुण्डरीकोऽनगारः पितज्वरपरिगतशरीरो दाहव्युत्का- न्तिका दाहज्वरसमाकुलथापि विहरति । तत. खलु स पुण्डरीकोऽनगार अस्थामे' अस्थामा गक्तिरहितः, अबल =शारीरिकालरहितः, 'अवीरिए' अवीर्यः-उत्साहरहितः, अपुरुपकारपराक्रमः पुरुषार्थपराक्रमरहितः 'करयल जान करतल यावत्-करतलपरिगृहीतं दशनख मस्तके अञ्जलिं कृत्वा एवमवादी-नमो- ऽस्तु खलु अर्हद्भ्यो यावत्समाप्तेभ्याम् मोक्ष गतेभ्यः, नमोस्तु खलु स्थविरेभ्यो भगवद्भ्यो मम धर्माचार्येभ्यो धर्मोपदेशकेभ्यः, पूर्वमपि च खलु मया स्थविराणा भोयण आहारियरस समाणस्स पुव्वरत्तावरत्तकालसमयसि धम्मजा गरिय जागरमाणस्स से आहारे णो सम्मं परिणमइ ) इस तरह उन पुडरीक अनगार का कालातिकम से खाया हुआ वह अरस, विरस, शीत, रुक्ष, पानभोजन रात्रि के मध्यभाग में धर्मचिन्तन निमित्त जाग रण करने के कारण अच्छी तरह से नहीं पचता था (तएण तस्स पुडे- रीयस्स अणगारस्स सरीरगसि वेपणा पाउन्भूया उज्जला जाव दुरहि- यासा, पित्तम्जरपरिगयसरीरे दाहवरकति विहरड, तएण से पुडरीए अणगारे अस्थामे, अग्ले, अवीरिए अपुरिसक्कारपरिक्कमे करयल जाव, एव वयासी-णमोत्युण अरिहताण जाव सपत्ताण णमोत्युण थेराण भगवताण मम धम्मायरियाण धम्मोवएसयाण पुचि पि य ण मए लुक्स पाणभोयण आहारियरस समाणस्स पुव्यरत्तोवरत्तकालासमय सि धम्मजाग रिय जागरमाणस्स से आहारे णो सम्म परिणमा) આ પ્રમાણે તે ડરીક અનગારને કાળાતિક્રમથી કરેલે તે અરસ, વિરસ, ગીત, રૂક્ષે પાન આહારનુ રાત્રિના મધ્ય ભાગમાં ધર્મચિંતન માટે કરેલા જાગરણને લીધે સારી રીતે પાચન થતુ ન હતું (तएण तस्स पुडरीयस्त अणगोरस सरीरगसि वेयणा पाउ भूया उजला भाव दुरहियासा, पित्तज्जरपरिगयसरीरे वाहवक्कतिर विहरइ, तएण से पुडीए अणगारे अत्यामे, अपले, अवीरिए अपुरिसझारपरिधमे करयल जाव, एव षयासी-णमोत्थुग अरिह ताण जाव साताण थेराण भगर ताण मम चम्मायरियाण .
. . वाताधर्मशा निवर्तते अत्यागाति, प्रनिनिारय गौरम्पपिगभगवानस्तऔर उपागच्छति, उपागत्य, भत्तपान मतिदर्शयति, प्रतिदर्य, स्थविरभंगारद्विरभ्यनुज्ञातः सन् अपूर्षित अगृद्ध अग्रथित' अनध्युपपन्ना आमक्तिपम्मिनिन इतिभात', 'बिल मित्र पगभूपण अप्पाणेण' लिमिा पन्नगभूनेन आत्मना सन्यथा पन्नग भूतेन पन्नगमयमागतेन आत्मनानीन पिल प्रविण्यते, तथा त 'फामएस णिज्ज ' प्रामुकेपणीयदाचत्वारिंगटोपानितम् अगन पान याच पात्र 'सरीर फोह्रगसि' शरीरकोप्टके-उढरे मभिपति, यथा सुनहो पिग्म्य पार्थ भागद्वयमसम्प शन् म यभागत एपात्मान रिले प्रवेशपति तथा स मुग्यम्य पाद्वयस्पनरहित माहार कण्ठनालाभिमुख मवेश्य आहारयतीति भार' । तत खलु तस्य पुण्डरी फस्य अनगारस्य 'कालापत' यालातिकान्तकारमतिक्रम्य प्राप्तम्-बुभुक्षा वापिस आ जाते-वापिस आकर फिर प्राप्त भिक्षान्न को दिखाने के लिये वे जहा स्थविर भगवत विराजमान होते व आते-यहां आकर प्राप्त भिक्षान्न को उन स्थविर भगवतो को दिग्पलाते-दिखालकर जब वे उस आहार को खाने की आज्ञा देते-तब वे अमृच्छित भाव से अगृद्धचि त्तवृत्ति से, एव आसक्ति रहित परिणति से उस प्राशुक एपणीय-४२ दोषों से रहित अशन, पान, खाद्य, एव स्वाद्यरूप-आहार को जिस तरह सर्प-गिल में प्रविष्ट होता है उसी तरह से शरीर कोष्ठक में- उदर में डाल देते थे। कारण इसका इस प्रकार है-जैसे भुजग बिल के पार्श्वदय नही छूता हुआ सीधे मध्यभाग से अपने को मिल में प्रविष्ट कराता है उसी तरह वे मुनिराज मुख के पार्षद्वय के स्पर्श से ररित आहार को सीधे कण्ठनाल में धर कर आहार करते थे (तएण तस्स पुडरीयस्स अणगारस्स त कालाइस्कत अरसविरस सियलक्ख पाण પ્રાપ્ત આહારને બતાવવા માટે જ્યા તે સ્થવિર ભગવત વિરાજમાન હતા ત્યા આવતા ત્યાં આવીને મેળવેલા આહારને તે સ્થવિર ભગવાને બતાવતા અને બતાવીને જ્યારે તેઓ તે આહારને ગ્રહણ કરવાની આજ્ઞા કરતા ત્યારે તેઓ અમૂછિત–ભાવથી, અJ -ચિત્તવૃત્તિથી અને આસક્તિ રહિત પરિણતિથી તે પ્રાસુક એવાણીય-૪ર દોથી રહિત અશન, પાન, ખાદ્ય અને સ્વાદરૂપ અહી રને જેમ સાપ દરમાં પ્રવેશે છે તેમજ શરીર કોષ્ટકમા–પેટમાં નાખી દેતા હતા જેમ સાપ દરને બને પાને સ્પર્શ ન કરતા સી વચ્ચે થઈને પિતાની જાતને દરમાં પ્રવિષ્ટ કરાવી લે છે તેમજ તે મુનિરાજ પણ મુખના બને પાર્શ્વના સ્પર્શથી રહિત આહારને સીધે કઠનાળમા મૂકીને ઉદરસ્થ કરતા હતા (सएण तस्स पुनीयस्स अणगाररस त कालाइक्कत भरस बिरस मिय - अनगारधर्मामृतवपिणी टी० स० १९ पुण्डरीक कडरीकचरित्रम् G8 समयमुल्लड्य प्राप्तम् , अरस विरस शीतरूक्ष पान भोजनम् 'आहारियस्स आहारितस्य सत पूर्वरात्रापररानकालसमये 'धम्मजागरियं जागरमाणस्स' धर्म जागारिका जाग्रत =धर्मचिन्तनाथ जागरणा कुर्वतः स आहारो नो सम्यक् परि- णमति नो परिपाक गच्छति । ततः खलु तस्य पुण्डरीकस्य अनगारस्य शरीरे वेदना प्रादुर्भूता ' उज्जला जान दुरहियासा' उज्ज्वला यावत् दुरविसह्या, एपा व्याख्यापूर्ववत् , तथा स पुण्डरीकोऽनगार. पितज्वरपरिगतशरीरो दाहव्युत्क्रा- न्तिकादाहचरसमाकुलथापि विहरति । तत. खलु स पुण्डरीकोऽनगार 'अस्थामे' अस्थामा गक्तिरहित., अबल =शारीरिकरलरहितः, 'अवीरिए' अवीर्या उत्साहरहितः, अपुरुपकारपराक्रमः-पुरुषार्थपराक्रमरहितः 'करयल जान करतल यावत् करतलपरिगृहीतं दशनख मस्तके अञ्जलि कृत्वा एवमवादी-नमो- ऽस्तु खलु अर्थ यो यावत्सपाप्तेभ्या-मोक्ष गतेभ्यः, नमोस्तु खलु स्थविरेभ्यो भगवद्भ्यो मम धर्माचार्येभ्यो धर्मोपदेशकेभ्यः, पूर्वमपि च खलु मया स्थविराणा- भोयण आहारियस्स समाणस्स पुव्वरत्तावरत्तकालसमयसि धम्मजा- गरिय जागरमाणस्स से आहारे णो सम्म परिणमड) उस तरह उन पुडरीक अनगार का कालातिकम से खाया हुआ वह अरस, विरस, शीत, रुक्ष, पानभोजन रात्रि के मध्यभाग में धर्मचिन्तन निमित्त जाग- रण करने के कारण अच्छी तरह से नहीं पचता था (तएण तस्स पुडे- रीयस्स अणगारस्स सरीरगसि वेषणा पाउन्भूया उज्जला जाव दुरहि- यासा, पित्तज्जरपरिगयसरीरे दाहवक्कतिए विहरड, तएण से पुडरीए अणगारे अत्यामे, अग्ले, अवीरिए अपुरिसक्कारपरिस्कमे करयल जाब, एव वयासी-णमोत्थुण अरिहताण जाव सपत्ताण णमोत्युण येराण भगवताण मम धम्मायरियाण धम्मोवएसयाण पुचि पि य ण मए लुक्स पाणभोयण आहारियस समाणस पुव्वरत्तोवरत्तकालासमय सि धम्मजाग रिय जागरमाणस्स से आहारे णो सम्म परिणम ) આ પ્રમાણે તે પુડરીક અનગારને કાળાતિક્રમથી કરેલે તે અરસ, વિરસ, શીત, રૂક્ષ પાન આહારનુ રાત્રિના મધ્ય ભાગમાં ધર્મચિંતન માટે કરેલા જાગરણને લીધે સારી રીતે પાચન થતુ ન હતું (तएण तस्स पुडरीयस्स अणगोरस्स सरीरगसि वेयणा पाउ भूया उज्जला आव दुरहियासा, पित्तज्जरपरिगयसरीरे दाहवकातिर विहरइ, तएण से पुडरीए भणगारे अत्यामे, अवले, अवीरिए अपुरिसकारपरिकमे करयल जाब, एव -पोत्थग अरिह ताण जाव सत्ताण येराण भगर ताण मम यम्मायरियाण - .
७४८ जाताधर्मपाल मन्तिके मरी'माणातिपातः प्रत्याग्यात यापन मियादर्शनशल्यं खलु प्रत्याख्या- तम्-अप्टादशपापम्यानानि प्रत्याख्यातानि इति भार, इदानीमपि तेषामेव धेरार्ण अति मध्ये पाणापा पराजाय मिनादमणसल्ले गं पच्चम्याण जाय आलोइयपश्यिकते कालमासे काल किच्चा सम्बह- सिद्धे उघवन्ने) इस कारण पुटरीक अनगोर के शरीर में वेदना प्रकट रो गइ। जिसके कारण उन्हें क्षणभर भी शाता नही मिलती। धीरे २ यह समस्त शरीर में भी व्याप्त हो गई। यावत् यह उनके लिये सहन हो सके ऐसी नहीं रही-वे उसे पड़ी कठिनता से महते । दाहज्वर ने भी इनके शरीर पर अपना प्रभार जमा लिया। हम तरह ये दाहज्वर की ज्वाला से भी आकुल व्याकुल रने लगे। धीरे २ इनका शरीर शक्ति रहित हो गया। शारीरिक पल भी इनका जाता रहा। उत्साह रहित एव पुरुषार्थ पराक्रम से विहीन जप ये हो गये तय करतल परि- गृहीत दशनखोवाली अजलि को इन्हों ने अपने मस्तक पर रखकर इस प्रकार का पाठ योलना प्रारभ किया यावत् मुक्ति प्राप्त अरंत भगवतों के लिये मेरा नमस्कार हो, मेरे धर्माचार्य, धर्मोपदेशक स्थविर भगवतों के लिये मेरा नमस्कार हो । मैंने पहिले भी स्थविर भगवतों के निकट सम स्त प्राणातिपात प्रत्याख्यान कर दिया है-यावत् मिथ्यादर्शन शल्य धम्मोवएसयाण पुदि पि य मए थेराण अतिए सव्वे पाणाइवाए पच्चरवाए जाव मिच्छाद सणसल्लेण पच्चस्साए जाव आलोहयपडिक्क ते कालमासे काल किच्चा सन्य सिद्धे उपवन्ने ) એથી તે પુડરીક અનગારના શરીરમાં વેદના પ્રકટ થઈ ગઈ તેથી તેમને એક ક્ષણ માટે પણ શાતા મળતી નહતી ધીમે ધીમે આ વેદના સંપૂર્ણ શરીરમાં પ્રસરી ગઈ થાત્ તે તેમના માટે અસહ્ય થઈ ગઈ, ભારે મુશ્કેલીથી તેઓ તેને ખમતા હતા દાઉજવરે પણ તેમના શરીર ઉપર પોતાનો પ્રભાવ જમાવી લીધું હતું, એથી તેઓ દાહવરની જ્વાળાઓથી પણ આકુળ-વ્યાકુળ રહેવા લાગ્યા ધીમે ધીમે તેમનું શરીર અશક્ત થઈ ગયુ શારીરિક બળ પણ તેમનુ નષ્ટ થઈ ગયુ હતુ આ પ્રમાણે જ્યારે તેઓ ઉત્સાહ રહિત અને પુરૂષાર્થ પરાક્રમ વિહીન થઈ ગયા ત્યારે કરતલ-પરિગ્રહીત દેશ નખેવાળી અ જલિને તેમણે પિતાના મસ્તકે મૂકીને આ પ્રમાણેને પાઠ બોલવા લાગ્યા કે યાવત મુક્તિ પ્રાપ્ત અહંત ભગવતે મારા નમરકાર છે, મારા ધર્માચાર્ય, ધર્મોપદેશક સ્થવિર ભગવતોને મારા નમસ્કાર છે કે પહેલા પણ ભગવતીની પાસે સમસ્ત પ્રાણાતિપાત કરી દીધુ છે યાવત મિદર્શન ७५ . . - अनगारधर्मामृतवर्षिणी टी० अ० १९ पुण्डरीक-कडरीकचरित्रम् अन्ति के प्राणातिपात यावत् मियादशनशल्य प्रत्याख्यामि, एव 'जाव आलो- इय पडिकते' यावदालोचितप्रतिक्रान्त' कालमासे काल कृत्वा सर्वार्थसिद्धे उपपन्नः । ततोऽनन्तरम् तत्पश्चात् सर्वार्थसिद्धात् 'उध्वट्टित्ता' उद्धृत्य-सर्वार्थ- सिद्धेर्निर्गत्य महाविदेहे वर्षे सेत्स्यति यावत् सर्वदुःखानामन्त करिष्यति । पुण्डरी- कानगारचरित दृष्टान्तेनोपदय श्रमणानुपदिशति भगवान महावीर:-' एवामेव' अनेनैवप्रकारेण हे आयुष्मन्तः श्रमणाः 'जाव पाइए ' यावत्पत्रनिता योऽस्माक श्रमणो वा श्रमणी वा आचार्योपाध्यायानामन्ति के प्रत्रजितः सन् मानुष्य केपु कामभोगेषु नो सज्जते नो असक्तिमाश्रयते 'नो रज्जते ' नो रज्यते=नो अनु रागवान् भवति, 'जाव नो विप्पडियायमावनइ ' यावत् नो विप्रतिघातमाप- घते-सयमनाश न प्राप्नोति, स खलु इह भवे एव वहूना श्रमणाना वहूना श्रम- णीना बहूना श्रावकाणा बहूना श्राविकाणाम् अर्चनीयो वन्दनीयः पूजनीयः सत्कारणीयः सम्माननीयो भाति, तथा च-स सर्वेपा ‘कल्लाण' कल्याण= कल्याणरूपम् ' मगल' मङ्गलम् मगलरूपम् , 'देवय' देवत-धर्मदेवरूपः, 'चेइय' चैत्यम् ज्ञानरूप पर्युपासनीयश्च भवति 'तिकडु' इति कृत्वा इति का अष्टादश पापस्थानो का, मैंने प्रत्याख्योन कर दिया है। और अब भी उन्ही के साक्षी से प्राणातिपात यावत् मिव्यादर्शन शल्य का प्रत्या- ख्यान करता है। इस तरह आलोचित प्रतिकान्त होकर वे कालअवसर कालकर सर्वार्थ सिद्ध नामके अनुत्तर विमान में उत्पन्न हो गये। (तओ अणतर उव्वहित्ता महाविदेहे वासे सिज्झिहिए, जाव सम्वदुक्खा णमत काहिह, एवामेव समणाउसो! जाव पन्चहए समाणे माणुस्स एहिं कामभोगेहिं णो सजइ, णो रज्जइ, जाव नो विप्पडियायमावज्जइ सेण इह भवे चेव यण सावियाण अच्चणिज्जे, वदणिज्जे, पूणिज्जे, सरकारणिजे सम्माणणिज्जे, कल्लाण मगल देवय चेहय पज्जुवास- પાપાનું મેં પ્રત્યાખ્યાન કરી દીધુ છે અને હવે તેમની જ સાક્ષીમા પ્રાણતિપાત યાવત મિથ્યાદર્શન શવનું પ્રત્યાખ્યાન કરૂ છુ આ પ્રમાણે આચિત પ્રતિકાત થઈને તેઓ કાળ અવસરે કાળ કરીને સર્વાર્થસિદ્ધ નામના અનુત્તર વિમાનમાં ઉત્પન્ન થઈ ગયા અને ત્યા તેમની ૩૩ સાગરોપમની સ્થિતિ છે (तओ अणतर उच्वद्वित्ता महाविदेहे वासे सिज्झिहिइ, जाव सव्वदुक्साण- मत काहिइ, एवामेव समणाउसो' जाव पन्चइए समाणे माणुस्सएहिं काम भोगेहि णो सज्जइ, णो रज्जइ, जाव नो विपडिघायमावज्जइ से ण इह भवे चेव यहूण सावियाण अच्चणिज्जे, वदणिज्जे, पूयणिज्जे, सकारणिग्ने, सम्माणणि ज्जे, कालाण मगल देवय चेइय पज्जुवासणिज्जे त्ति कटु परलोए वि य णं णो . , ७५८ हाताधर्मपाल मन्तिके मर्गः माणानिपातः प्रत्यारयातः या मिपादनन्य खलु प्रत्याख्या- तम् अष्टादशपापस्थानानि मत्पाग्यातानि प्रति माघ, इटानीमपि तेषामेव धेराणं अति मन्ये पाणाहघाग पच्चया जाय मिच्छादमणसल्ले गं पच्चम्पाप जाय आलोहयपरिककते कालमासे काल किच्चा सम्वट्ठ सिद्धे उववन्ने ) इस कारण पुटरीक अनगार के शरीर में वेदना प्रकट रो गइ। जिसके कारण उनें क्षणभर भी शाता नरी मिलती। धीरे २ यह समस्त शरीर में भी व्याप्त हो गई। यावत् यह उनके लिये सहन हो सके ऐसी नहीं रही-वे उसे पड़ी कठिनता से महते । दाहज्वर ने भी इनके शरीर पर अपना प्रभार जमा लिया। इस तरह ये दाहज्वर की ज्वाला से भी आकुल व्याकुल राने लगे। धीरे २ इनका शरीर शक्ति रहित हो गया। शारीरिक पल भी इनका जाता ररा। उत्साह रहित एव पुरुषार्थ परफम से विहीन जब ये हो गये तय करतल परि गृहीत दशनखोवाली अजलि को इन्हों ने अपने मस्तक पर रखकर इस प्रकार का पाठ बोलना प्रारभ किया याचत् मुक्ति प्राप्त अरंत भगवतों के लिये मेरा नमस्कार हो, मेरे धर्माचार्य, धर्मोपदेशक स्थविर भगवतों के लिये मेरा नमस्कार हो। मैने पहिले भी स्थविर भगवतों के निकट सम स्त प्राणातिपात प्रत्योख्यान कर दिया है-यावत् मिथ्यादर्शन शल्य धम्मोवएसयाण पुब्धि पि य ण मए थेराण अतिए सव्वे पाणाइवाए पच्चक्खाए जाव मिच्छाद सणसल्लेण पच्चक्साए जाव आलोइयपडिस्क वे कालमासे काल किच्चा सव्वद सिद्धे उववन्ने) એથી તે પુડરીક અનગારના શરીરમાં વેદના પ્રકટ થઈ ગઈ તેથી તેમને એક ક્ષણ માટે પણ શાતા મળતી નહોતી ધીમે ધીમે આ વેદના સ પૂર્ણ શરીરમાં પ્રસરી ગઈ ચાવત તે તેમના માટે અસહ્ય થઈ ગઈ, ભારે મુશ્કેલીથી તેઓ તેને ખમતા હતા દાઉજવરે પણ તેમના શરીર ઉપર પિતાને પ્રભાવ જમાવી લીધું હતું, એથી તેઓ દાહરની જ્વાળાઓથી પણ આકુળ-વ્યાકુળ રહેવા લાગ્યા ધીમે ધીમે તેમનું શરીર અશક્ત થઈ ગયું શારીરિક બળ પણ તેમનુ નષ્ટ થઈ ગયુ હતુ આ પ્રમાણે જ્યારે તેઓ ઉત્સાહ રહિત અને પુરૂષાર્થ પરાક્રમ વિહીન થઈ ગયા ત્યારે કરતલ-પરિગ્રહીત દેશ નખેવાળી અજલિને તેમણે પિતાના મસ્તકે મૂકીને આ પ્રમાણેને પાઠ બોલવા લાગ્યા કે યાવત્ મુક્તિ પ્રાપ્ત અહંત ભગવતેને મારા નમસકાર છે, મારા ધર્માચાર્ય, ધર્મોપદેશક સ્થવિર ભગવતેને મારા નમસ્કાર છે કે પહેલા પણ ભગવતેની પાસે સમસ્ત પ્રાણાતિપાત કરી દીધુ છે યાવત મિચ્છાદન + ७५ . नगारधर्मामृतवपिणी टी० अ० १९ पुण्डरीक कडरीकचरित्रम् अन्तिके प्राणातिपात यावत् मिल्यादर्शनशल्य प्रत्याख्यामि, एव 'जार आलो- इय पडिक्कते' याचदालोचितप्रतिक्रान्तः कालमासे काल कृत्वा सर्वार्थसिद्धे उपपन्नः । ततोऽनन्तरम्=तत्पश्चात् सार्यसिद्धात् 'उन्नट्टित्ता' उद्धृत्य-सर्वार्थ- सिद्धेर्निर्गत्य महाविदेहे वर्षे सेत्स्यति यावत् सर्वदुःखानामन्त करिष्यति । पुण्डरी- कानगारचरित दृष्टान्तेनोपदश्य श्रमणानुपदिशति भगवान् महागीर:-' एवामेव ' अनेनैवप्रकारेण हे आयुष्मन्तः श्रमणाः 'जाव पाइए' यावत्मवजितः योऽस्माक श्रमणो वा अमणी वा आचार्योपाध्यायानामन्तिके प्राजित' सन् मानुष्य केषु कामभोगेपु नो सज्जते नो असक्तिमाश्रयते 'नो रज्जते ' नो रज्यते नो अनु रागवान् भवति, 'जाव नो विप्पडियायमावज्जइ ' यावत् नो विप्रतिघातमाप- द्यते-सयमनाश न प्राप्नोति, स खलु इह भवे एव वहना श्रमणाना बहूना श्रम- णीना बहना श्रावकाणा बहूना श्राविकाणाम् अर्चनीयो चन्दनीयः पूजनीयः सत्कारणीयः सम्माननीयो भाति, तथा च-स सर्वेषा । कल्लाण' कल्याण%3D कल्याणरूपम् ' मगल मङ्गलम् -मगलरूपम् , 'देवय' दैवत-धर्मदेवरूपः, 'चेश्य ' चैत्यम्-ज्ञानरूप पर्युपासनीयश्च भवति 'त्तिकद्दु' इति कृत्वा इति का अष्टादश पापस्थानो का, मैने प्रत्याख्योन कर दिया है। और अब भी उन्हीं के साक्षी से प्राणातिपात यावत् मिथ्यादर्शन शल्य का प्रत्या ख्यान करता है। इस तरह आलोचित प्रतिक्रान्त होकर वे कालअवसर कालकर सर्वार्थ सिद्ध नामके अनुत्तर विमान में उत्पन्न हो गये। (तओ अणतर उध्वहिता महाविदेहे वासे सिज्झिहिइ, जाव सव्वदुक्खा णमत काहिह, एवामेव समणाउसो! जाव पव्वहण समाणे माणुस्स एहि काममोगेहिं णो सज्जइ, णो रज्जइ, जाव नो विप्पडियायमावज्जह सेण भवे चेव यण सावियाण अच्चणिज्जे, वणिज्जे, पूणिज्जे, सरकारणिज्जे राम्माणणिज्जे, कल्लाण मगल देवय चेहय पज्जुवास- પાપા નુ મે પ્રત્યાખ્યાન કરી દીધુ છે અને હવે તેમની જ સાક્ષીમા પ્રાણતિપાત યાવત્ મિથ્યાદર્શન શવનું પ્રત્યાખ્યાન કરૂ છું આ પ્રમાણે આચિત પ્રતિક્રાત થઈને તેઓ કાળ અવસરે કાળ કરીને સર્વાર્થસિદ્ધ નામના અનુત્તર વિમાનમાં ઉત્પન્ન થઈ ગયા અને ત્યાં તેમની ૩૩ સાગરોપમની સ્થિતિ છે (तओ अणतर उन्धद्वित्ता महाविदेहे वासे सिज्झिहिइ, जाव सव्वदुक्याण- मत काहिइ, एवामेव समणाउसो । जाव पव्वइए समाणे माणुस्सएहि काम भोगेहि णो सज्जइ, णो रज्जइ, जाव नो विपडियायमावन्जइ से ण इह भवे चेय बहूण सावियाण अच्चणिज्ने, वदणिज्जे, पूयणिज्जे, सकारणिज्ने, सम्माणणि ज्जे, कलाण मगल देवय चेइय पज्जुवासणिज्जे ति कटु परलोए वियण गो - * કે તેની ઉપાસના કરે છે, તે પરલેકમાં ७५० वाधर्मा हेतोः पालोफेऽपि च पल सा नो आगगति न प्राप्नोति यहनिम्बहुविधानि दण्डनानि च मुण्डनानि न वनानि च ताउनानि च यावत् चतुरन्त संसार फान्तर 'पोइ परम्पर' व्यनि बनियति उदयिष्यति, यथास पुण्डरीकोऽनगार णिज्जे ति फटूट परलो यि य ण णो आगच्छर, बहगि दडणाणि घ मुडणाणि य तज्जणाणि य ताटगाणि य जाव चाउरतससारकतार जाव पीडवाइस्सइ) इसके याद वे उस सर्विमिद विमान से चव कर महाविदेहक्षेत्र में जन्म धारण कर यहीं से सिद्धपद के भोक्ता बनेंगे- यावत् समस्त दुग्यों का अन्त करेंगे। हम तर पुडरीक अनगार के चरित्र को दृष्टान्त रूप से करकर भगवान महावीर प्रभु श्रमणजनों को उपदेश करते है कि इसी प्रकार से हे आयुष्मत श्रमणो ! जो हमारा श्रमण या श्रमणीजन आचार्य उपाध्याय के पास प्रव्रजित होकर मनु प्यभव सयधी कामभोगों में आसक्त नही बनता है, रज्जित-अनुराग भाव सपन्न-नही होता है, यावत् अपने सयम को नष्ट नहीं करता है, वह इस भव में ही अनेक श्रमण श्रमणी, श्रावक व श्राविकाओं द्वारी अर्चनीय बदनीय पूजनीय सत्करणीय एव सन्माननीय होता है। तथा जगत के लिये कल्याणरूप, मगलरूप, धर्म देवरूप, और ज्ञानरूप घन जाता है। लोग उसकी उपासना करते हैं। वह परलोक में भी अनेक प्रकार के दडनरूप, दुखो को, मुडनों को तर्जनों को, ताडनाओं आगच्छइ, बहूणि दडगाणि य मुडणाणिय तज्जणाणि य ताडगाणि य जाव चाउर तस सारकतार जाव वीइवइस्सइ) ત્યારપછી તેઓ તે સર્વાર્થસિદ્ધ વિમાનમાથી ચવીને મહાવિદેહ ક્ષેત્રમાં જન્મ ધારણ કરીને ત્યાથી જ સિદ્ધપદ મેળવશે યાવતુ સમસ્ત દુખોને અને કરશે આ રીતે પુડરીક અનગારના ચરિત્રને છાત રૂપે કહીને મહાવીર પ્રભુ શમણુજને ઉપદેશ કરતા કહે છે કે આ પ્રમાણે જ છે આયુષ્મત શ્રમ જે અમારા શ્રમણ કે શ્રમણીજને આચાર્ય ઉપાધ્યાયની પાસે પ્રજિત થઈને મનુષ્ય ભવના કામોમાં આસક્ત થતા નથી રજિજતઅનુરક્ત થતા નથી, થાવતુ પિતાના સયમને નષ્ટ કરતા નથી તે આ ભવમાં જ ઘણા શ્રમ શ્રમણી અને શ્રાવક મિ વડે અર્ચનીય, વદનીય, પૂજનીય, સકરણીય અને સન્માનનીય જતના માટે કલ્યાણરૂપ, મગળરૂપ, ધમ દેવરૂપે અને નેને । પણ ઘણું dyn. ।
मनगारधर्मामृतवपिणी टीका अ० १९ पुंडरीक-कहरीकचरित्रम् सुधर्मासामी कथयति-एर खलु हे जम्बूः । श्रमणेन भगरता महावीरेण आदिकरेण तीर्थकरेण यावत् सिद्धिगतिनामधेय स्थान समाप्तेन एकोनविंगतित मस्य ज्ञाताध्ययनस्य अयमर्थः प्रज्ञप्तः । ज्ञातश्रुतस्कन्ध समापयन् सुधर्मा पुनः कथययि-एव खल हे जम्यू: ! श्रमणेन भगवता महावीरेण यावन् सिद्धिगतिनाम- धेय स्थान समाप्तेन पष्ठस्य अङ्गस्य पष्ठाइसम्पन्धिन प्रथमस्य श्रुतस्कन्धस्य अयम: पूर्वोक्तरूपो भावः प्रज्ञप्त: भगता कथितः । 'त्ति चेमि' इति ब्रवीमि, व्याख्या पूर्ववत् ॥ मू०७॥ को नहीं पाता है और चतुर्गतिवाले इस समार कान्तार को पुडरीक अनगार की तरह पार करनेवाला हो जाता है । (एव खलु जवू ! सम- णेण भगवया महावीरे ण आइगरेण तित्वगरेण जाव सिद्ध गई नाम- बेज्ज ठाणं सपत्तण एगूणवीसहमस्स नायज्झयणस्स अयमढे पण्णत्ते, एव बलु जवू ! समणेण भगवया महावीरे ण जाव सिद्धिगइणामधेज्ज ठाणं सपत्ते णं छहस्स अगस्स पढमस्स सुयक्खधस्स अयभट्टे पण्णत्ते त्तिवेमि) अव श्री सुधर्मा स्वामी कहते हैं कि हे जवू । आदिकर तीर्थ- कर. यावत् सिद्धि गति नामक स्थान को प्राप्त हुए श्रमण भगवान महावीर ने १९ वे ज्ञाताभ्ययन का यह पूर्वोक्त रूप से अर्थ प्ररूपित किया है। इस तरह हे जवू ! श्रमण भगवान महावीर ने कि जो सिद्धिगति नामक स्थान को अच्छी तरह प्राप्त कर चुके हैं, उठे अग के प्रथम श्रुत- स्कर का यह पूर्वोक्त रूप से भाव प्रतिपादित किया है। ऐमा मैंने प्रभु के कहे अनुसार ही यह हे जत्रू ! तुमसे निवेदित किया है। પ્રાપ્ત કર નથી અને થતુગતિવાળા આ સ સાર કાતારને પુડરીક અનગારની જેમ પાર કરનાર થઈ જાય છે ( एव सलु न । समणेण भगवया महावीरेण आइगरेण नित्यगरेण जाव सिद्धगई नामधेज्ज ठाण सपत्तेण एगूणवीस इमस्स नायज्झयणरस अयमढे पणत्ते, एव सलु जनू ! समगेण भगवया महार्य रेण जाव सिद्धिगइणामघेज्ज ठणं सपत्तेण उट्ठस्स अगस्स पढमस्स सुयक्सधस्स अयम पण्णत्ते तिमि ) હવે શ્રી સુધર્મા સ્વામી કહે છે કે હે જબ! આદિકર તીર્થ કર યાવત સિદ્ધગતિ નામક સ્થાન મેળવી ચુકેલા શ્રમણ ભગવાન મહાવીરે ઓગણીસમાં ગાતાધ્યયનને આ પૂર્વોક્ત રીતે અર્થ પ્રરૂપિત કર્યો છે આ પ્રમાણે તે જ બૂ ! શ્રમણ ભગવાન મહાવીર કે જેમણે સિદ્ધગતિ નામક સ્થાનને સારી રીતે પ્રાપ્ત કરી લીધુ છે-છ અગના પ્રથમ શ્રુતક ધને આ પૂર્વોક્ત રૂપમા ભાવ પ્રતિ પાદિત કર્યો છે હે જ બૂ! આવુ પ્રભુના કહ્યા મુજબ જ તમને કહ્યું છે .
७५० - हेतोः पग्लोकेऽपि च खछ सा नो आगन्छतिन प्राप्नोति बनि-बहुविषानि दण्डनानि च मुण्डनानि न तनानि न ताडनानि च यावत् चतुरन्त संसार फान्तर 'पीइपडम्मर' प्यनि अनियति-उत्पयिष्यति, यथा म पुण्डरीकोऽनगार णिज्जे ति कट्टु परलो यि य ण णो आगच्छा, बहगि दडणाणि य मुडणाणि य तज्जणाणि य ताहगाणि य जाव चाउरतससारकतार जाव घीउघहस्सइ) इसके याद ये उस सर्वाध मिद विमान से थव कर महाविदेहक्षेत्र में जन्म धारण कर वहीं से सिद्धपद के भोक्ता बनेंगे- यावत् समस्त दुःपों का अन्त करेंगे। हम तर पुडरीक अनगार के चरित्र को दृष्टान्त रूप से कर कर भगवान महावीर प्रभु श्रमणजनों को उपदेश करते है कि इसी प्रकार से हे आयुष्मत श्रमणो ! जो हमारा श्रमण या श्रमणीजन आचार्य उपाध्याय के पास प्रवजित होकर मनु प्यभव सयधी कामभोगों में आसक्त नही यनता है, रज्जित-अनुराग भाव सपन्न नहीं होता है, यावत् अपने सयम को नष्ट नहीं करता है, वह इस भव में ही अनेक श्रमण श्रमणी, श्रावक एव श्राविकाओं द्वारी अर्चनीय वदनीय पूजनीय सत्करणीय एव सन्माननीय होता है। तथा जगत के लिये कल्याणरूप, मगलरूप, धर्म देवरूप, और ज्ञानरूप घन जाता है । लोग उसकी उपासना करते हैं। वह परलोक में भी अनेक प्रकार के दडनरूप, दुःखों को, मुडनों को तर्जनों को, ताटनाओं आगच्छइ, बहूणि दडणाणि य मुहणाणिय तज्जणाणि य ताडगाणि य जाव चाउर तस सारकतार जाव वीइवइस्सइ) ત્યારપછી તેઓ તે સર્વાર્થસિદ્ધ વિમાનમાથી ચવીને મહાવિદેહ ક્ષેત્રમાં જન્મ ધારણ કરીને ત્યાથી જ સિદ્ધપદ મેળવશે યાવતુ સમસ્ત દુઓનો મત કરશે આ રીતે પુડરીક અનગારના ચરિત્રને છાત રૂપે કહીને મહાવીર પ્રભુ શમણુજનને ઉપદેશ કરતા કહે છે કે આ પ્રમાણે જ છે આયુષ્મત શ્રમણે જે અમારા શ્રમણ કે શ્રમણીજને આચાર્ય ઉપાધ્યાયની પાસે પ્રજિત થઈને મનુષ્ય ભવના કામગોમા આસક્ત થતા નથી રજિજત-અનુરક્ત થતા નથી, યાવત પિતાના સ યમને નષ્ટ કરતા નથી તે આ ભવમાં જ ઘણા શ્રમણ- શ્રમણી અને શ્રાવક-શ્રાવિકાઓ વડે અર્ચનીય, વદનીય, પૂજનીય, સતકરણીય અને સન્માનનીય હોય છે તેમજ જેના માટે કલ્યાણરૂપ, મગળરૂપ, ધર્મ દેવરૂપ અને જ્ઞાનરૂપ બની જાય છે કે તેની ઉપાસના કરે છે, તે પરલોકમાં પણ ઘણું જાતના ६उन ३५, माने, मुनान, त ' मनगारधर्मामृतवपिणी टीका म० १९ पुंडरीक-फहरीकचरित्रम् ७५१ सुधर्मासामी कथयति-एर खलु हे जम्बुः ! श्रमणेन भगनता महावीरेण आदिकरेण तीर्थकरेण यावत् सिद्धिगतिनामवेय स्थान समाप्तेन एकोनविंगतित मस्य ज्ञाताध्ययनस्य अयमर्थ मज्ञप्तः । ज्ञातश्रुतस्कन्ध समापयन् सुधर्मा पुनः कथययि-एव ग्वलु हे जम्बू ! श्रमणेन भगवता महावीरेण यावन् सिद्धिगतिनाम- धेय स्थान सप्राप्तेन पष्ठस्य अङ्गस्य पष्ठागसम्बन्धिन प्रथमस्य श्रुतस्कन्धस्य अयमा पूर्वोक्तरूपो भावः प्रज्ञप्तः भगता कथितः । ' ति बेमि' इति ब्रवीमि, व्याख्या पूर्ववत् ॥ सू०७॥ को नहीं पाता है और चतुर्गतिवाले इस समार कान्तार को पुडरीक अनगार की तरह पार करनेवाला हो जाता है । ( एवं खलु जवू | सम णेण भगवया महावीरे ण आइगरेण तित्वगरेण जाव सिद्ध गई नाम- धेज्ज ठाण संपत्तेण एगूणवीसइमस्स नायज्झयणस्स अयमट्टे पण्णत्ते, एव ग्वलु जवू ! समणेण भगवया महावीरे ण जाव सिद्धिगइणामधेज ठाण सपत्ते णं छहस्स अगस्स पढमस्स सुयक्खधस्स अयमढे पण्णत्ते त्तिवेमि) अव श्री सुधर्मा स्वामी कहते है कि हे जवू । आदिकर तीर्थ- कर यावत् सिद्धि गति नामक स्थान को प्राप्त हुए श्रमण भगवान महावीर ने १९ वे ज्ञाता ययन का यह पूर्वोक्त रूप से अर्थ प्ररूपित किया है। इस तरह हे जवू ! श्रमण भगवान महावीर ने कि जो सिद्धिगति नामक स्थान को अच्छी तरह प्राप्त कर चुके हैं, उठे अग के प्रथम श्रुत- स्कूध का यह पूर्वोक्त रूप से भाव प्रतिपादित किया है। ऐसा मैंने प्रभु के कहे अनुसार ही यह हे जनू ! तुमसे निवेदित किया है। પ્રાપ્ત કરતા નથી અને થતુગતિવાળા આ સ સાર કાતારને પુડરીક અનગારની જેમ પાર કરનાર થઈ જાય છે (एव सलु जवू । समणेण भगवया महावीरेण आइगरेण तित्यगरेण जाव सिद्धगई नामधेन ठाण सपत्तेण पगूणवीस इमस्स नायज्झयणस्स अयमद्वे खलु जबू । समणेण भगवया महार्व रेण जाव सिद्धिगइणामधेन ठणं सपत्तेण यदुस्स अगस्स पढमस्स सुयक्सधस्स अयम पण्णत्ते तिबेमि ) હવે શ્રી સુધર્મા સ્વામી કહે છે કે હે જબૂ! આદિકર તીર્થ કર યાવત સિદ્ધગતિ નામક સ્થાન મેળવી ચુકેલા શ્રમણ ભગવાન મહાવીરે ઓગણીસમા જ્ઞાતાધ્યયનને આ પૂર્વોક્ત રીતે અર્થ પ્રરૂપિત કર્યો છે આ પ્રમાણે છે જ બૂ શ્રમણ ભગવાન મહાવીરે કે જેમણે સિદ્ધગતિ નામક સ્થાનને સારી રીતે પ્રાપ્ત કરી લીધું છે-છઠ્ઠા અગના પ્રથમ શ્રુતકને આ પૂર્વોક્ત રૂપમા ભાવ પ્રતિ પાદિત કર્યો છે તે જ ખૂ! આવુ કે પ્રભુના કહ્યા મુજબ જ તમને કહ્યું છે पणत्ते, एव ७१२ बानाधर्मकथा 'तस्से 'त्यादि, नस्य का प्रयमस्य शुनसायम्य एकोनविंशतिर गयनानि 'एगगरगाणि' एREAPानिमानोगारणानि-भताले उद्देशान्तिानि एकोन विशति दिवसेषु समाप्यने ।। मृ०७ ॥ मगल भगवान पोरमगर गौतम । सुधर्मा मगल, जयूमनधर्मश्र मालम् ॥ १ ॥ इति श्री विश्वनि पात-जगदमछम-प्रसिद्धगावपश्चदशभापाकलिकलितक लापालापक-प्रविशुद्धगयपद्यनेकग्रन्धनिर्मापक-बादिमानमर्दक-श्रीशाहच्छ त्रपतिकोल्हापुरराजमदत्त-'जैनशानाचार्य' पदभूषित-कोल्हापुररान गुरु-पालनमचारि-जैनाचार्य-जैनधर्मदिवाकर पूज्यश्री-बासीलार- प्रतिरिचिताया 'शाताधर्मकथान' मूत्रस्थानगारधर्मामृतव- दिव्यायाया व्यार पाया परमश्रुतस्कर समाप्त ॥ इस कथन में मैंने अपनी तरफ से कोई भी कल्पना मिश्रित नहीं की है किन्तु प्रभु के मुग्व से जैमा मने इसे सुना है वैसा ही यह तुम से मैंने कहा है। "तस्से " त्यादि इस प्रथम श्रुतस्कंध के अन्तराल में उद्देश रहित १९ अध्ययन हैं। ये अध्ययन १९ दिनों में समाप्त होते हैं। टीकार्थ:-सासरिक समस्त जीवों के लिये यदि मगलकारी पदार्थ है-तो ये हैं भगरान् महावीर प्रभु गौतमगणघर, सुधर्मास्वामी, जवू स्वामी और जैनधर्म। इस तरह ज्ञाताधर्मकथा सत्रके प्रथम श्रुतस्कए सपूर्ण । આ કથનમા મે મારા તરફથી કેઈપણ જાતની કપના મિશ્રિત કરી નથી, यस्य प्रभुना मुमयी रे में सामन्यु छ त में ४ा छ " तस्से " 46 આ પ્રથમ શ્રુત-સ્ક ધના અતરાલમા ઉદેશ રહિત ઓગણીસ અ યને છે આ અધ્યયને ઓગણીસ દિવસોમા સમાપ્ત હોય છે ટીકા –બધા સાસારિક જીવોના માટે જે મગળકારી પદાર્થો છે તે તે એજ છે-ભગવાન મહાવીર પ્રભુ, ગૌતમ ગણધર, સુધમાં સ્વામી, જબ હવામી અને જૈન ધર્મ આ પ્રમાણે જ્ઞાનાધમ કથાગને જ્ઞાતા નામે પ્રથમ શ્રુત ઘ સમાપ્ત થયે . ॥ अथ ज्ञातासूत्रे द्वितीयश्रुतस्कन्धविवरणम् ॥ मङ्गलाचरणम्- ( सन्ततिलकात्तम् ) आये श्रुते भगवता रुचिरैरनेकै,- तिरदायि सकलातिहरः सुबोध । सन्धे द्वितीयइह धर्मस्था च मामाद् , विज्ञापिता तमनिश वरद स्मरामि ॥१॥ ( मालिनीछन्द) गणघरगुणपार प्राप्तमसारपारम् , भपिजनहितकार, दत्तसम्यक्त्वसारम् , । हृतसकलविशार भव्यचित्तैकहार , शिवमुखपदधार, नौमि चारिनसारम् , ॥ २ ॥ -द्वितीपश्रुतस्कधप्रारभ:- आद्येश्रुते इत्यादि'-प्रथम श्रुतम्कधमे भगवान् सूत्रकार ने अनेक सुन्दर दृष्टान्तों द्वारा सकल आति (दुःख) हारक सुबोध प्रदान किया है अय वे श्रुतस्कध में साक्षात् धर्मकथा प्रकट करेंगे-अतः ऐसे भगवान को मैं कि जो भन्यजीवों को कल्याण करनेवाले होते हैं उनको निरन्तर नमस्कार करता? ॥ १ ॥ गणधरदत्यादि--जो गणधरो के गुणों को धारण करनेवाले हैं ससार को पार करनेवाले है, जो भव्यजनों को हितकारक है, सम्यक्त्वरूपी गुणके योधक है-सकल विकारों से रहित है, इसलिये जो भव्यजीवों દ્વિતીય શ્રુતસ્કંધ પ્રારભ आये श्रुतेत्यादि- प्रथम श्रुत-धमा जापान सूत्र रे या भु२ दृष्टात વડે સમસ્ત આતિ (દુ) હાક સુવ પ્રદાન કર્યો છેહવે તેઓ આ બીજા નરક ધમાં સાક્ષાત્ ધર્મકથાઓ પ્રકટ કરશે એટલા માટે એવા ભગ વાનને-કે જેઓ ભવ્ય છપનું કવાણ કરનારા છે-હુ નિરતર નમસ્કાર કરું છું ગણધર ઈત્યાદિ–જેઓ ગણધરના ગુણોને ધારણ કરનારા છે, સમા રને પાર કરનાર છે જેઓ ભવ્યજનોના હિતકારક છે, સમ્યકત્વ રૂપી ગુણના બેધક છે, આ બધા વિકારોથી રહિત છે, એટલા માટે જ જેઓ ભવ્ય જીનેના इस द्वितीय 1 जानाचा 'तस्से ' स्यात, तस्य पर प्रथमस्य शुनसाधम्य एकोनविभतिर ययनानि एगमरगाणि' परम्पकानिगमानोपारणानितराले घररितानि एकोन विशति दिरसेपु समाप्यते ॥ मू०७१ मगलं भगगन मगले गौतम सुधर्मा मगल, जमनधर्मश्र मालम् ॥१॥ इति श्री-विश्वविर पात-जगदरहम-मसिद्धावकपदामाषाकलितमलितक लापालापर-मविशुद्धगयपद्यनेकग्रन्थनिर्मापक-वादिमानमा-श्रीशाहन्छ पतिकोलापुररानमदन-'जैनशास्त्राचार्य' पदभूषित-कोलापुरराज गुरु-पालनामचारि-जैनाचार्य-जैनधर्मदिवाकर पृज्यश्री-वासीलार- तिरिचिताया ' ज्ञाताधर्मकयार' त्रस्यानगारधर्मामृतव- दिण्याख्याया व्यायाया प्रथमश्रुतम्घ समायः ॥ इस कथन में मैंने अपनी तरफ से कोई भी कल्पना मिश्रित नहीं की है किन्तु प्रभु के मुप से जैसा मने इसे सुना है वैसा ही यह तुम से मैंने कहा है। "तसे " त्यादि इस प्रथम श्रुतरकध के अन्तराल में उद्देश रहित १९ अध्ययन हैं। ये अध्ययन १९ दिनों में समांस होते हैं। टीकार्थ ~ सासरिक समस्त जीवों के लिये यदि मगलकारी पदार्थ है-तो ये हैं भगवान महावीर प्रभु गौतमगणघर, सुधर्मास्वामी, जबू स्वामी और जैनधर्म। इस तरह ज्ञातार्मिकवाद सूत्रके प्रथम श्रुतस्कर सपूर्ण । આ કથનમાં મે મારા તરફથી કોઈપણ જાતની કુપના મિશ્રિત કરી નથી, પણ પ્રભુના મુખથી જેવું એ સામાન્યું છે તેવું જ મે કહ્યુ છે “a” ત્યાં આ પ્રથમ યુન-ક ઇના અતરાલમા ઉદેશ રહિત ઓગણીસ અયને છે આ અધ્યયને ઓગણીસ દિવસોમા સમાસ હોય છે ટીકાથું –બધા સાસારિક જીવોના માટે જે મગળકારી પદાર્થો છે તે એજ છે ભગવાન મહાવીર પ્રભુ, ગૌતમ ગણધર, સુધર્મા સ્વામી, જબ વાભી અને જૈન ધર્મ “આ પ્રમાણે જ્ઞાતાધર્મ કથાગને જ્ઞાતા-નામે પ્રથમ શ્રુતસ્ક ધ સમાપ્ત થયે ” gram । . मनगारधर्मामृतषिणी टी० श्रु २ व १अ १ द्वितीयथुतस्कंधस्योपक्रम ७७ नगारशतैः साई सपरिसृताः ‘पुयाणुपुन्धि' पूर्वानुपूर्व्या-तीर्थङ्करपरम्परया चरमाणा' चरन्त =विदरन्तः ग्रामानुग्राम एकनामाव्यवधानेनान्य ग्रामम् ' दुइ ज्जमाणा'द्रवन्तःस्पृशन्त सुह सहेण' सुख सुखेन=सुग्यपूर्वक यथावसर- मित्यर्थः विहरन्तो यौव राजगृह नगर यत्रैव गुणशिलक चैत्य यावत्-सयमेन तपसा आत्मान भावयन्तो विहरन्ति । अत्र आदरार्थ बहुपचनम् । परिपन्निर्गता । धर्मः कथितः । परिपद् यस्या एवं दिशः प्रादुर्भूता तामेव दिशं प्रतिगता । तस्मिन् काले तस्मिन् समये आर्यमुधर्मणोऽनगारस्थान्तेवासी आर्य जम्बूर्नामान उजमाणा सुहसुहेण विहरमाणा जेणेव रायगिहे णयरे जेणेव गुणसिलए चेहए जाव सजमेण तवसा अप्पाण भावेमाणा विहरति ) उस काल और उम समय में श्रमण भगवान महावीर के अतेवामी आर्य सुधर्मा नाम के स्थविर भगवत कि जो विशुद्ध मातृवशवाले थे विशुद्ध पितृ. वशवाले थे, याग्त् बल, रूप, विनय, ज्ञान, दर्शन, चारित्र एव लाघव सपन्न थे, चौदहपूर्व के पाठी थे-मतिज्ञान, श्रुतज्ञान, अवधिज्ञान एव मन पर्यव ज्ञान इन चारों ज्ञानों के धारक थे-पाचसी अनगारों के साथ तीर्थकर परपरा के अनुसार विहार करते २ एक ग्राम से दूसरे ग्राम में विना किसी व्यवधानके विचरण करते हुए सुख पूर्वक ममय पर-जहा राजगृह नगर और उस में भी जहां वह गुणशिलक चत्य था आये। बहा वे सयम एव तप से आत्मा को भावित करते हुए उतरे (परिसा निग्गया धम्मो कहिओ परिसा जामेव दिस पाउन्भूया तामेव दिसि पडिगया, तेण कालेण तेण समएण अज्जसुम्मस्स अणगारस्स अते. जजमाणा सुह सुहेण विहरमाणा जेणेव रायगिहे णयरे जेणेव गुणसिलए चेइए जाव सजमेण तवसा अप्पाण भावेमाणा विहरति । તે કાળે ને તે સમયે શ્રમણ ભગવાન મહાવીરના અંતેવાસી આર્ય સુધર્મા નામના સ્થવિર ભગવત કે જેઓ વિશુદ્ધ માતૃવ શવાળા હતા–વિશુદ્ધ મિવશવાળા હતા, યાવત્ બળ, રૂપ, વિનય, જ્ઞાન, દર્શન, ચારિત્ર અને લાઇવ-સંપન્ન હતા ચૌદ પૂર્વના પાઠી હતા, મતિજ્ઞાન, શ્રુતજ્ઞાન, અવધિજ્ઞાન અને મન પર્યવજ્ઞાન એ ચારે જ્ઞાનના ધારક હતા પાચસો અનગારોની સાથે તીર્થંકર પર પરા મુજબ વિહાર કરતા કરતા એક ગામથી બીજે ગામ કેઇપણ જાતના વિધાન વગર સુખેથી યથા સમય ક્યા રાજગૃહ નગર અને તેમાં પણ જયા તે ગુણસિલક શૈત્ય હતુ ત્યા આવ્યા ત્યા તેઓ સયમ અને તપ દ્વારા પિતાના આત્માને ભાવિત કરતા રોકાયા (परिसा निग्गया धम्मो कहिओ परिसा जामेर दिस पाउन्भूया तामेव दिसि पडिगया, तेण कालेण तेण समएण अन्नसुहम्मस्स अगगारस्स अतेवासी ७५६ Inाधमा टीका-तस्मिन् काले तस्मिन समय सनया नाम नगरमासीत् , 'वो' वर्णकः-नगरपणन सर्वमन रिशेयम् । तम्प यलु गनरम्य नगरस्य बहिरुत्तरपौरस्त्ये दिग्भागे तन ग्यल गुणशिलक नाम चैत्यमासीत् , 'गो' वर्णचैत्यवर्णन मकारः सर्गेऽत्रवान्यः । तस्मिन याले तस्मिन समये अमणस्य भगवतो महावीर स्यान्तेवासिन आर्यधर्माणो नाम स्थविरा भगवन्तः । जाहसपमा ' जातिस म्पमा मुविसुद्धमाशा, कुलम पन्ना=पिशुद्धपिठयशाः, 'मार' याव-पल- रूप-विनय-ज्ञान-दर्शन-चारित्र-लाघर-सम्पन्ना, इत्यादि यात्-चतुर्दपूर्विणः 'चउणाणोरगया ' चतुर्शानोपगता मतिश्रुतापधिमन. पर्यवज्ञानयुक्ताः पञ्चभिर टीकार्य-(तेण कालेण तेण समपर्ण) उस काल और उस समय में (रायगिहे नाम नयरे होत्या) राजगृर नाम का नगर था। (वण्णओ) नगर का वर्णन औपपातिक सूत्र में वर्णित चपा नगरी के समान जानना चारिये । (तस्स ण रायगिहम्म णयरस्स यहिया उत्तरपुरस्थिमे दिसिभाए तत्वर्ण गुणसिला णाम चेहए होत्या, वागओ) उस राज गृह नगर के वाहिर उत्तर पौरस्त्यदिग्भाग की ओर (ईशानकोण में) एक गुणशिलक नाम का चैत्य-उद्यान-धा। यहा पर भी सब चैत्यवर्णन औपपातिक सूत्र की तरह जानना चाहिये-(तेण कारेण तेण समएण ममणस्स भगवओ महावीरस्स अतेवासी अज्ज सुरम्माणाम थेरा भग वतो जाइ सपन्ना कुल सपन्ना जाव चउद्दसपुची चउणाणावगया पहि अणगारस सद्धिं सपरिवुडा पुच्वाणुपुचि चरमाणा गामाणुगाम दूह साथ-( तेणं कालेण तेण समएण) तणे भने त समये ( रायगिहे नाम नयरे होत्या) AAP नामे न तु (वण्णओ) मा ननु पर्थन પપાતિક સૂત્રમાં વર્ણવવામાં આવેલા ચપા નગરીના વર્ણનની જેમ જ જાણી લેવું જોઈએ (तस्स ण रायगिहस्स गयरस्स वहिया उत्तरपुरत्थिमे दिसिभाए तत्थण गुणसिलए णाम चेहए होत्था, चण्णओ) તે રાજગૃહ નગરની બહાર ઉત્તર પરત્ર્ય દિગ-ભાગની તરફ એટલે કે ઈશાન કોણમાં એક ગુણશિક્ષક નામે ત્ય-ઉદ્યાન-હેતે અહી ચૈત્ય વિષેનું બધુ વર્ણન ઔપપાતિક સૂત્રની જેમ જાણવું જોઈએ ( तेण कालेण तेण समएण समणस्स भगवओ महावीरस्स अतेवासी अज्ज मुहम्माणाम थेरा भगवतो जाइसपना कुलसपन्ना जार चउद्दस पुन्वी चउणाणो वगया पंचहि अणगारसएहिं सद्धि सपरिखुटापुयाणुपुब्बिं चरमाणा गामाणुगाम दुर - अमगारधर्मामृतवपिणी टी० भु २ च १ अ १ द्वितीयश्रुतस्कंधस्योपःम ७७७ नगारशतैः सार्द्ध सपरिवृताः ‘पुयाणुपुन्धि' पूर्वानुपूर्व्या-तीर्थङ्करपरम्परया 'चरमाणा' परन्त =विहरन्तः ग्रामानुग्राम एकग्रामादव्यवधानेनान्य ग्रामम् 'दुइ- ज्जमाणा'द्रवन्तःस्पृशन्त सुह सुहेण' सुख सुखेन-मुग्यपूर्वक यथावसर- मित्यर्थः विहरन्तो यौव राजगृह नगर यत्रैव गुणशिलक चैत्य यावत्-सयमेन तपसा आत्मान भावयन्तो विहरन्ति । अत्र आदरार्थ बहुवचनम् । परिपन्निर्गता। धर्मः कथितः । परिपद् यस्या एवं दिशः प्रादुर्भूता तामेव दिश प्रतिगना । तस्मिन् काले तस्मिन् समये आर्यसुधर्मणोऽनगारस्यान्तेयासी आर्य जम्बूर्नामान ज्जमाणा सुहसुहेण विहरमाणा जेणेव रायगिहे णयरे जेणेव गुणसिलए चेहए जाव सजमेण तवसा अप्पाण भावेमाणा विहरति) उस काल और उम समय में श्रमण भगवान महावीर के अतेवामी आर्य सुधर्मा नाम के स्थविर भगवत कि जो विशुद्ध मातृवशवाले थे विशुद्ध पितृ. वशवाले थे, यान्त् यल, रूप, विनय, ज्ञान, दर्शन, चारित्र एव लाघव सपन्न थे, चौदहपूर्व के पाठी थे-मतिज्ञान, श्रुतज्ञान, अवधिज्ञान एव मन पर्यव ज्ञान इन चारों ज्ञानों के धारक थे-पाचसौ अनगारों के साथ तीर्थकर परपरा के अनुसार विहार करते २ एक ग्राम से दुमरे ग्राम मे विना किसी व्यवधानके विचरण करते हुए सुख पूर्वक समय पर-जहां राजगृह नगर और उस में भी जहाँ वह गुणशिलक चैत्य था आये। वहा वे सयम एव तप से आत्मा को भावित करते हुए उतरे (परिमा निग्गया धम्मो कहिओ परिसा जामेव दिस पाउन्भृया तामेव दिसिं पडिगया, तेण कालेण तेण समएण अज्जसुहम्मस्स अणगारस्स अते. ज्जमाणा सुह सुहेण विहरमाणा जेणेव रायगिहे णयरे जेणेर गुणसिलए चेइए जाव सजमेण तवसा अप्पाण भावमाणा विहरति તે કાળે ને તે સમયે શ્રમણ ભગવાન મહાવીરના અંતેવાસી આર્ય સુધર્મા નામના સ્થવિર ભગવત કે જેઓ વિશુદ્ધ માતૃવશવાળા હતા-વિશુદ્ધ પિતૃવશવાળા હતા, યાવત્ બળ, રૂપ, વિનય, જ્ઞાન, દર્શન, ચારિત્ર અને લાઘવસ પન્ન હતા ચૌદ પૂર્વના પાઠી હતા, મતિજ્ઞાન, કૃતજ્ઞાન, અવધિજ્ઞાન અને મન પર્યાવજ્ઞાન એ ચારે જ્ઞાનના ધારક હતા પાસે અનગારોની સાથે તીર્થ કર પર પરા મુજબ વિહાર કરતા કરતા એક ગામથી બીજે ગામ કેઈપણ જાતના અવધાન વગર સુખેથી યથા સમય ક્યા રાજગૃહ નગર અને તેમાં પણ જ્યાં તે ગુણલિક મૈત્ય હતુ ત્યા આવ્યા ત્યા તેઓ સયમ અને તપ દ્વારા પોતાના આત્માને ભાવિત કરતા રોકાયા (परिसा निग्गया धम्मो कहिओ परिसा जामेन दिस पाउम्भूपा तामेत्र दिसि पडिगया, तेण कालेण तेण समएण अज्जसुहम्मस्स अगगारस्स अतेवासी . मुहम्माणाम थेरा भगवतो जाइसपन्ना कुलसपन्ना जान चउस पुषी उणाणो साधर्मबचाव टीका-तस्मिन् काले तस्मिन समय गजगृह नाम नगरमासीन , पणयो' वर्णफ:-नगरवर्णन सर्वमा विशेयम् । तम्प यलुगमगृास्य नगरस्य बहिरुतरपौरस्त्ये दिग्भागे तन खल गुणशिलक नाम चैन्यमासीत् , 'गो' वर्णचैत्पर्धन प्रकार सर्वोत्र वा यः। तस्मिन् काले तम्मिन समोश्रमणम्य भगवतो महावीर स्यान्तेवासिन आर्यधर्माणो नाम स्थविरा भगान्त' ' जाइपमा' जातिस म्पन्ना धुपिशुद्धमावरमा', फुलम पन्ना-रिशुद्धपिलाशा, '' यावत्-बल- रूप-विनय-ज्ञान-दर्शन-चारित्र-लाघा-सम्पन्नाः, इत्यादि यात्-चतुर्दशपूर्षिणः चउणाणोरगया ' चतुर्शनोपगता =मनिश्रुतावधिमनः पर्यवशानयुक्ताः पञ्चभिर टीकार्थ-(तेण कालेण तेण समार्ण) उस काल और उस समय में (रायगिहे नाम नयरे होत्या) राजगृह नाम का नगर था। (वण्णो) नगर का वर्णन औपपातिक सूत्र में वर्णित चपा नगरी के समान जानना चारिये । (तस्म ण रायगिरस्म णयरस्स बहिया उत्सरपुरस्थिमे दिसिभाए तत्थर्ण गुणसिला णाम चेहए रोत्या, वण्णओ) उस राज- गृह नगर के चाहिर उत्तर पौरस्त्यदिग्भाग की ओर (ईशानकोण में) एक गुणशिलक नाम का चैत्य-उद्यान-या। यहा पर भी सब चैत्यवर्णन औपपातिक सूत्र की तरह जानना चाहिये-(तेण कासेण तेण समएण ममणस्स भगवओ महावीरस्स अतेवासी अज्ज सुरम्माणाम थेरा भग वतो जाइ सपन्ना कुल सपन्ना जाय चउद्दसपुची चउणाणावगया पचहि अणगारसएहिं सद्धिं सपरिवुडा पुच्वाणुपुब्धि चरमाणा गामाणुगाम दूई Aste---(वेणं कालेण तेण समएण) मन त समये ( रायगिहे नाम नयरे होत्या) ArAs नामे नगर तु (वण्णओ) मा ननु पर्थन પાતિક સૂત્રમાં વર્ણવવામાં આવેલા ચ પ નગરીના વણનની જેમ જ જાણું લેવું જોઈએ (तस्स ण रायगिहस्स णयरस्स वहिया उत्तरपुरथिमे दिसिभाए तत्यण गुणसिलए णाम चेहए होत्था, वष्णओ) તે રાજગૃહ નગરની બહાર ઉત્તર પિરસ્ય દિગ-ભાગની તરફ કે ઈશાન કેશુમાં એક ગુણશિલ નામે ત્ય-ઉદ્યાન-હત અહીં ચૈત્ય વિશેનું બધુ વર્ણન ઔપપાતિક સૂત્રની જેમ જાણવું જોઈએ ( तेण कालेण तेण समएण समणस्स भगाओ महावीरस्स अतेवासी अज्ञ वगया पंचहि अणगारसएहिं सदि सपरिखुटापुब्वाणुपुन्धि चरमाणा गामाणुगाम दुई , એટલે .. .. अनगारधर्मामृतवपिंपी टी० व २१ ११हितीयनस्कधस्योपक्रम ७५९ श्रमणेन यावत्सम्माप्तेन धर्मकथाना दावर्गाः प्रज्ञप्ताः, तयथा तानेर दर्शपति- चमरस्म चमरस्य चमरेन्द्रस्य दाक्षिणात्यासुरकुमारेन्द्रस्य प्रमहिमीणा प्रस्मो- वर्ग १'बलिम्स' पलिनाम्नः 'वरोयर्णिदस्स ' पैरोचनेन्द्ररय-वि-विविध मकारैः रोचन्ते दीप्यन्ते दाक्षिणात्यासुरकुमारेभ्यो विशिष्टदीप्तिमत्त्वात् इति विरो चना , त एष वैरोचना: औदीन्यासुरकुमारास्तेपामिन्द्रः वैरोचनेन्द्रस्तस्य 'वहरो- यणरन्नो ' वैरोचनराजस्य-वैरोचनाधिपतेः जगमहिपीणा द्वितीयो वर्गः२ । अमु- रेन्द्रवनिताना 'दाहिणिल्लाण' दाक्षिणात्याना दक्षिण दिसम्बन्धिना भवन- वासिनामिद्राणामग्रमहिपीणा तृतीयो वर्गः ३ । 'उनरिल्लाण' उत्तरीयाणामसु रेन्द्रवनिताना मानवासिनामिद्राणामग्रमहिपीणा चतों वर्ग. ४ । दाक्षिणात्याना वानव्यन्तराणामिन्द्राणामग्रमहिपीणा पञ्चमो वर्गः ५ । उत्तरीयाणां वानव्यन्तरा- गामिन्द्राणामयमहिपीणा पठो वर्ग:६ । चन्द्रस्यायमहिपीणा सप्तमो वर्ग: ७ । स्वामी ने उनसे कहा-हे जळू ! सुनो-यावत् मुक्तिस्थान को प्राप्त हुए श्रमण भगवान महावीर ने धर्मस्याओं के दश वर्ग प्रजत किये हैं-त जहा) वे इस प्रकार हैं-(चमरस्स अग्गमहिसीणं पढमेवग्गे' यलिस्स यहरोयणिंदस्स घडरोयणरन्नो अग्गमरिसीण धीओ बग्गो २ असुरिंद- वजियाण दाहिणिल्लाण भवणवासीण इदाण अग्गमहिसीण तडओ वग्गो ३ उत्तरिल्लाण अमरिंदवज्जियाण भवणवासीण इदाण अग्गम- हिसीण चउत्थो वग्गो ४ दाहिणिलाण बाणमतराण-इदाण अग्गमति सीण पचमो वग्गो, उत्तरित्लाण वाणमत्राण इदाग अग्गदिमीण उट्ठो बग्गो ६, चदस्स अगमहिमीण सत्तमो बग्गो, सरस्म अग्गमहिसीण अट्ठमो वग्गो सास जग्गमाहितीण णयमो वग्गो, ईमाणस्स अग्गम हिसीण दसमो वग्गो) चमरेन्द्र की-दाक्षिणात्य असुरकुमारेन्द्र की- તેમને કહ્યું કે હું જ બૂ! સાભળે ચાવત્ મુક્તિસ્થાનને પ્રાપ્ત કરી ચુકેલા श्रम सामान महावी यथा-माना ६श को 41 उर्या छ (तजहा ) તેઓ આ પ્રમાણે છે- (चमरस अग्गमडिसीण पढमेनग्गे नलिस्स वढगेयर्णितस्स बटरोयणरन्नो अग्गमहिसीण वीमो नग्गो २ सुरिंदवज्जियाण दाहिणिल्यण भणवामीण इदाण अग्गमहिमीण तडओ वग्गो ३, उत्तरिल्लाण जमुरिंदन जियाण भवण- पासीण इदाण यामहिमीण चउत्यो वग्गो ४ दाहिणिल्लाण वाणमाराण- इदाण अगमहिसीण पचमो वग्गो, उत्तरिल्लाण वागमतराण वाण जगमनि- सीण उट्ठो वग्गो ६,चदस्स अगाहियोग सत्तमो वागो, परस्म अगमहिसीण भट्ठमो वग्गो, सरफरस अग्गम हिमीण णपमो वग्गो, ईसाणस्स अग्गमहिसीण दसमो वग्गो) - - - - 42 पाताचाret गार. यात्-'पशुगममाणे' पर्युपासीना संयमान. परमादत-यदि खलु 'भते ' भदन्त-हे भगान ! श्रमणेन भगाता महातीरेण यावत्-मोष सम्मान पप्ठस्याहस्य परमम्य अतम्मरम्प 'मायाण' गातानाम-पारगानाम् अयमर्थ माप्तः द्वितीयस्य सल्लू के गदन्न ! सुनमन्य धर्मस्थाना श्रमणेन पावत्मम्मा प्तेन-मोक्ष गतेन भगताको प्रशसुधर्मासामीमाह- खलु हे जम्ब् ! वासी अज्ज जणाम अणगारे जाच पन्जनाममाणे राय बयासी-जहणं भते समणेण जान सपत्तण उस्म अगस्म पढमस्म सुयश्वधस्स णायाण अयमढे पन्नत्ते दोच्चाम ण मते ! सुयस्वधस्न धम्मकहाण समणेणं जार सपत्तण के अहे पण्णत ? पय गल जवू ! समणेण जाव मपत्तर्ण धम्मकहाण टमग्गा पपणत्ता) गजगर नगर से परिषद् वदन करने के लिये आई। सुधर्मास्वामी धर्म का उपदेश दिया। उपदेश सुनकर परिपद् अपने २ स्थान पर पीने घरा से चली गई। उस काल में और उस समय में आर्य सुधर्मास्वामी के अतेवासी आर्य जब नामके अनगार ने यावत् उनकी पर्युपासना करते हुए उनसे इस प्रकार पूछा हे भदत ! यावत् मुक्तिको प्राप्त हुमण भगवान महावीरने उठे अगके ज्ञातासूत्र प्रथम श्रुतरूध के उदाहरणोका यह पूर्वोक्तरूप से अर्थ निरू पित किया है-तो हे भदत ! द्वितीय श्रुतस्कन्धकी धर्मकथाओं का उन्हीं श्रमण भगवान महावीर ने कि जो मुक्तिस्थान को प्राप्त हो चुके हैं क्या अर्थ निरूपित किया है इस प्रकार जा के प्रश्न को सुनकर श्री सुधर्मा अज्नजबू णाम अगगारे जाव पज्जुपासमाणे एव यामी-जण भते समणेण जाव सपत्तेण छहस्स अगस्स पढमस्म सुयख धस्स गायाण अयमढे पन्नते दोचस्स ण भते ! सुयख धस्स धम्मकहाण समण नाव सपत्तेग के अढे पण्णते ? एव खलु जवू ! समणेण जान सपत्तेण धम्मकहाण दसवमा पण्णता) રાજગૃહ નગથ્થી પરિષદ વદન કરવા માટે ત્યા આવી સુધમાં સ્વામીએ ધર્મને ઉપદેશ આપ્યો ઉપદેશ સાંભળીને પરિષદ પોતાના સ્થાને પાછી જતી રહી તે કાળે અને તે સમયે અર્ધ સુધર્મા સ્વામીના અંતેવાસી શિષ્ય) આર્ય જ “ નામના અનગારે યાવતું મને પપાસના કરતા તેમને આ પ્રમાણે પૂછ્યું કે હે ભદન્ત ! યાવત્ મુક્તિ પ્રાપ્ત કરેલા શ્રમણ ભગવાન મહી વીરે છઠ્ઠા અગન પ્રથમ શ્રુતસ્ક ધના ઉદાહરણેને આ પૂર્વોક્ત રૂપે અર્થ નિરૂપિત કર્યો છે તે હું ભદન્ત તેજ શ્રમણ ભગવાન મહાવીરે-કે જેમણે મુક્તિરથાનને મેળવી લીધુ છે-દ્વિતીય શ્રતસ્કની ધર્મકથાઓને શે અર્થ નિરૂપિત કર્યો છે આ પ્રમાણે જ બૂના પ્રશ્નને સાંભળીને भार ७६१ अनगारधर्मामृतपिणी टी० श्रु २ च १ अ १ कालीदेवीवर्णनम् राईरयणी विज्जू मेहा, जडणं भते। समणेणं जाव सपत्तण पढमस्स वग्गस्स पच अज्झयणा पण्णता पढमस्त णं भते । अग्झयणस्स समणेण जाव सपत्तेण के अटे पण्णत्ते , एव खलु जवू । तेणं कालेण तेण समएणं रायगिहे गयरे गुणसिलए चेइए सेणिए राया चेल्लणा देवी सामी समोसरिए परिसा णिग्गया जाव परिसा पज्जुवासइ, तेणं कालेणं तेणं समएणं काली नाम देवी चमरचचाए रायहाणीए कालवडिसगभवणे कालसि सीहासणसि चउहि सामाणियसाहस्तीहि चउहि मह- त्तरियाहि सपरिवाराहि तिहि परिसाहि सत्तहि अणिएहि सत्तहिं अणियाहिवईहि सोलसहि आयरक्खदेवसाहसीहि अण्णेहि वहुएहि य कालवडिसयभवणवासीहि असुरकुमारेहि देवीहि य सद्धिं सपरिवुडा महया हय जाव विहरइ, इमं च णं केवल- कप्प जबुद्दीव दीवं विउलेणं ओहिणा आभोएमाणी२ पासइ, तस्थ समण भगव महावीर जवुद्दीवे दोवे भारहे वासे रायगिहे नगरे गुणसिलए चेइए अहापडिरूवं उग्गहं उग्गिणिहत्ता संज- मेण तवसा अप्पाणं भावेमाणं पासइ पासित्ता हट्टतुट्ठचित्तमा- णंदिया पीइमणा जाव हियया सीहासणाओ अब्भुटेइ अब्भु- द्वित्ता पायपीढाओ पञ्चोरुहइ पच्चोरुहित्ता पाउयाओ ओमुयइ ओमुइत्ता तित्थगराभिमुहा मत्तट्टपयाइ अणुगच्छइ अणुग- च्छित्ता वाम जाणु अचइ अचित्ता दाहिणं जाणु धरणियलसि नि१ तिक्खुत्तो मुद्धाणं धरणियलसि निवेसेड निवेसित्ता ईसिं ७६० माकपा सूरस्ससूर्यस्यानमारपीणाममो वः ८ । गरयाग्रमपीमा नमो वर्ग: ९ । ईशानस्यायमडिपीणा दशमो वर्ग: १० ॥ ४०॥ मूलम्-जइ णं भंते ! समणेणं जाव संपत्तेण धम्मकहाणं दसवग्गा पणत्ता पढमस्स ण भंते | वग्गस्स समणेणं जाव सपत्तेण के अट्टे पन्नत्तं ?, एवं खलु जबू। समणेणं जाव सप तेण पढमरस वग्गस्स पच अज्झयणा पण्णता त जहा-काली अग्नमहिपियों का-पट्टदेवियों का-प्रथम वर्ग, पलि नामक वैरोचनेन्द्र की अनमहिपियोंका छितीय वर्ग, असुरेन्द्रको छोडकर दक्षिण दिशा सवधी भवनवामियों के इन्द्रों की अग्रहिपियों का तृतीय वर्ग, उत्तर दिशा सरधी मवनवासियो के इन्द्रों की कि जिन में असुरेन्द्र छोड दिये गये हैं अग्रमरिपों का ४ चतुर्थ वर्ग, दक्षिण दिशा सयधी वानव्यन्तरों के इन्द्रों की अग्रमहिपियों का पचम वर्ग, उत्तर दिशा सबंधी व्वानब्धतरोंके इन्द्रो की अग्रमरिपियों का नहा वर्ग, चन्द्र की अग्रमरिषियों का ७ वा वर्ग, सूर्यको अग्रमरिपियोका आठवा वर्ग, शक की अग्रमहिषियों का नयमा वर्ग, और ईशानकी अग्रमहिपियो का दशमा वर्ग। धैरोचन उत्तर दिशाके असुरकुमार है। ये दक्षिण दिशासबधी असुरकुमारोंकी अपेक्षा विशिष्ट दीप्तिसपन होते हैं इसलिये इन्हें वरोचन कहा गया है।सू०१॥ ચમરેન્દ્રની-દક્ષિણના અસુરકુમારેદ્રની-અઢમહિણીઓન-પટ્ટદેવીઓનો પહેલો વર્ગ, બલિ નામે વૈરોચનેન્દ્રની અગમહિણીઓને બીજો વર્ગ, અસુરેન્દ્રને બાદ કરતા દક્ષિણ દિશાના વનવાસીઓના ઈન્દ્રોની અમહિષીઓને ત્રીજો વર્ગ, ઉત્તર દિશા સબધી ભવનવાસીઓના ધોની કે જેઓમાથી અમરેન્દ્રોને બાદ કરી દીધા છે અગ્રમષિીઓનો છે વશ, દક્ષિણ દિશા સાધી વાન વતરના ઈન્દ્રોની અગમહિણીઓનો પાચ વર્ગ, ઉત્તર દિશા સબ ધી વાન ૦ તરેના ઇન્દ્રોની બમહિષાઓને સાત વર્ગ, સૂર્યની અમહિષીઓને આઠમે વર્ગ, શકની અહીવીઓનો નવમ વર્ગ અને ઈશાનની અગમહિ વીઓને દશમે વગ વૈરોચન ઉત્તર દિશાના અસુરકુમાર છે એ દક્ષિ દિશા સ બધી અસુરકુમારે કરતા વિશિષ્ટ દીક્ષિ–સ પન્ન હોય છે એથી જ એ વિરોચન કહેવામાં આવ્યા છે | સૂત્ર ૧ / .
७६१ अनगारधर्मामृतषिणी टी० श्रु २ व ११ कालीदेवीवर्णनम् राईरयणी विज्जू मेहा, जइणं भते। समणेणं जाव सपत्तण पढमस्स वग्गस्स पच अज्झयणा पण्णता पढमस्स णं भते । अन्झयणस्स समणेण जाव सपत्तेण के अहे पण्णत्ते ?, एव खलु जवू । तेणं कालेण तेण समएणं रायगिहे पयरे गुणसिलए चेइए सेणिए राया चेल्लणा देवी सामी समोसरिए परिसा णिग्गया जाव परिसा पज्जुवासइ, तेणं कालेण तेणं समएणं काली नाम देवी चमरचचाए रायहाणीए कालबडिसगभवणे कालसि सीहासणसि चउहि सामाणियसाहस्सीहि चउहि मह- त्तरियाहि सपरिवाराहि तिहि परिसाहि सत्तहि अणिएहि सत्तहिं अणियाहिवईहि सोलसहि आयरक्खदेवसाहस्सीहि अण्णेहि वहुएहि य कालवाडिसयभवणवासीहि असुरकुमारेहि देवीहि य सद्धिं सपरिवुडा महया हय जाव विहरइ, इमं च णं केवल- कप्प जवुदीव दीव विउलेणं ओहिणा आभोएमाणी२ पासइ, तत्थ समण भगव महावीर जंबुद्दीवे दीवे भारहे वासे रायगिहे नगरे गुणसिलए चेइए अहापडिरूवं उग्गह उग्गिण्हित्ता संज- मेण तवसा अप्पाणं भावमाणं पासइ पासित्ता हट्टतुट्ठचित्तमा- गंदिया पीडमणा जाप हियया सीहासणाओ अब्भुट्टेइ अब्भु- द्वित्ता पायपीढाओ पच्चोरुहइ पच्चोसहित्ता पाउयाओ ओमुयइ ओमुइत्ता तित्थगराभिमुहा मत्तटुपयाइ अणुगच्छइ अणुग- च्छित्ता वाम जाणु अचइ अचित्ता दाहिणं जाणुं धरणियलंसि निङ तिक्खुत्तो मुदाणं धरणियलसि निवेसेइ निवेसित्ताईसिं बालापाचा सरस्स-पूर्यस्यामहिषीणामएमो ८ रामहिपीणां नमो वर्ग: ९/ ईशानस्याप्रमहिपीपा दशमो वर्गः १० ॥ १० १॥ मूलम्--जइ णं भंते ! समणेणं जाव संपत्तेण धम्मकहाणं दसवगा पण्णता पढमस्स ण भते! बास्स समणेणं जाव सपत्तेण के अट्टे पन्नत्त , एवं खल्लु अचू । समणेणं जाव संप तेण पढमरस वग्गरस पच अज्झयणा पणता त जहा-काली अग्रमरिपियों का-पटदेपियों का प्रथम वर्ग, पलि नामक वैरोचने की अग्रमहिपियोंका द्वितीय वर्ग, असुरेन्द्रको छोडकर दक्षिण दिशा सबंधी भवनवामियों के इन्द्रों की अग्रमहिपियों का तृतीय वर्ग, उत्तर दिशा सधी मरनवासियों के उन्द्रों की कि जिन में असुरेन्द्र जोड दिये गये है अग्रपतियों का ४ चतुर्थ वर्ग, दक्षिण दिशा सम्धी वानव्यन्तरों के इन्द्रों की अग्रमरिपियों का पचम वर्ग, उत्तर दिशा सबधी ब्यानव्यतरों के इन्द्रों की अग्रमरिपियों का 7वा वर्ग, चन्द्र की अग्रमहिषियों का ७ वा वर्ग, सूर्यको अग्रमरिपियोका आठवा वर्ग, शक की अग्रमहिषियों का नवर्मा दर्ग, और ईशानकी अग्रमहिपियों का दशमा वर्गीरोचन उत्सर दिशाके असुरकुमार हैं। ये दक्षिण दिशासबधी असुरकुमारोंकी अपेक्षा विशिष्ट दीप्तिसपन्न होते हैं इसलिये इन्, वैरोचन करा गया है।सू०१॥ અમરેદ્રની-દક્ષિણુના અસુરકુમારેન્દ્રની-અમહિલાઓ પૂરીઓને પહેલે વર્ગ, બલિ નામે વૈચન્દ્રની અમહિષીઓને બીજે વર્ગ, અસુરેન્દ્રને બાદ કરતા દક્ષિણ દિશાના ભવનવાસીઓના ઇન્દ્રોની અગ્રહિણીઓને ત્રીજો વગ, ઉત્તર દિશા સ બ ધી ભવનવાસીઓના ઈકોની કે જેમાથી અફરેન્દ્રોને બાદ કરી દીધા છે અગમષિીઓને ચેવ, દક્ષિણ દિશા સબધી વાન જતરાના ઇદ્રોની અગમહિલાઓને પાચ વઉત્તર દિશા સબધી વાન વ્યતન ઈન્દ્રોની બગ્રમહિયાઓને સાત વર્ગ, સૂની અમહિષીઓને આઠમે વગર શકની અચાનો નન્ન વર્ગ અને ઈશાનની અઝમહિ પીઓને દશમો વ વૈોચન ઉત્તર દિશાના અસુરકુમાર છે એ દક્ષિણ દિશા સબ ધી અસુરકુમારી કરતા વિણ દીપિન્ન હોય છે એથી જ એ वैशयन अपामा माव्या छ । सूत्र - - अनगारधर्मामृतपणो टोका ध २ व १ प १ कालीदेवी वर्णनम् ७६३ प्रथमस्य खलु हे भदन्त ! वर्गस्य श्रमणेन यावत्सम्पाप्तेन कोऽय: प्रज्ञप्तः सुधर्मास्लामीमाह-एप खलु हे नम्न श्रमणेन यावत्मम्माप्तेन प्रथमस्य वर्गस्य पञ्च अध्ययनानि प्रज्ञप्तानि, तद्यथा-काली १, रात्रि २, रजनी ३, विद्युत् ४, मेधा ५ । जम्यूस्वामी पृच्छति-यदि खलु हे भदन्त ! अमणेन यात्समाप्तेन प्रथमस्य वर्गस्य पञ्च अध्ययनानि मज्ञप्तानि, तत्र प्रथमस्य खल्लु भदन्त ! अ यय- नस्य अमणेन यावत् सम्प्राप्तेन कोऽर्थः प्राप्तः १ । सुधर्मा सामी कपयति- एव खलु हे जम्नू । तस्मिन् काले तस्मिन् समये राजगृह नगर गुणशिलक चैत्यम् , श्रेणिको रागा, चेलना देवी आसीत् । सामी स्वामी श्रीमहावीरस्वामी सुधर्मास्वामी से पूछते हैं कि (भते ) हे भदत ! (जइण) यदि (सम- णेण जाव सपत्तेण धम्मकहाण दसवग्गा पण्णत्ता) श्रमण भगवान् महावीर ने जो कि मुक्तिस्थान को प्राप्त हो चुके हैं धर्मकथा के दश वर्ग प्ररूपित किये है तो (ण मते ) हे मदत ' (समणेण जाव सपत्तेण पढमस्स वगस्त के अढे पन्नत्ते) उन्ही श्रमण भगवान महावीर ने कि जो मोक्ष में विराजमान हो चुके है प्रथम वर्ग का क्या अर्थ प्रजप्त किया है ? (एव खलु जनू समणेण जाव सपत्तण पढमस्स बागस्स पच अज्झयणा पण्णत्ता, त जहा-काली राई रयणी विज्जू मेहा जइण भते ' समणेणं जाव संपत्तण पढमस्स वग्गस्स पच अज्झयणापण्णत्ता पढमस्स ण भते अज्ज्ञयणस्स समणेण जाव सपत्तण के अढे पण्णत्त एवं खलु जव । तेणं कालेण तेणे समएण रायगिहे णयरे गुणसिलए चेइए सेणिए राया चेल्ल. णादेवी) इस प्रकार जब स्वामी के प्रश्न को सुनकर सुधर्मास्वामी ने भू भी श्री सुधर्मा स्वाभान पूछे छे . ( भते) महन्त ! (जइण) = ( समगेर्ण जाव संपतेण धम्मकहाण दसगा पण्णत्ता ) श्रम ભગવાન મહાવીરે કે જેમણે મુક્તિસ્થાન મેળવી લીધુ છે ધર્મકથાઓના દશ वर्गा प्रचित छ त (ण भते ) 3 महन्त ! (समणेण जाव सपण पदमरस वगगस क अहे पन्नते) ते श्रम समपान महावीरे है या મોક્ષમા વિરાજમાન થઈ ચૂકયા છે-પહેલા વર્ગને શો અર્થ પ્રજ્ઞપ્ત કર્યો છે ? ( एव खलु जब समणेण जाव सपत्तेग पढमस्स वग्गस पच अन्झयणा पण्णता, त जहा-काली राई रयणी विज्जू मेहा जण भते ! समणेण जाव सपत्तेणं पढमस्स वग्गरम पचअज्झयणा पगत्ता। पटणस्सा भने, अल्झयण-म समणेणं नाव सपण के अद्वे पण्णते ! एव खलु जनू ! तेग लेग तेण समएम रायगिहे णयरे गुणसिलए चेइए सेणिए राया चेल्लगा देवी) टीका\-(जइण भते ! समणेण जाव सपत्तेणं धम्मकहाण दसवमा (जइण भते । समपोण नाव मरण पम्मकहाण दसवग्गा पण्णता पहमस्स णे भते ! गगस्म समणेणं जाव सपत्तेण के अहे पण्णत्ते १ एन खलु जयू ! सम साचार पच्चुण्णमइ पच्चुण्णमित्ता कउयतुडियर्थभियाओ भुयायो साहरइ साहरित्ता करयल जाय कटु पत्र वयासी-णमोऽस्थुर्ण अरहताणं जाय सपत्ताणं नमोऽस्युर्ण समणस्स भगवओ महा वीरस्स जाव सपाविउकामस्स बंदामि ण भगवंतं तस्थगयं इह गया पासउ म भगव तत्थ गए इह गयत्तिटु वंदा नमंसइ वदित्ता नमंसित्ता सीहासणवरसि पुरस्थाभिमुहा निस- पणा, तएणं तीसे कालीए देवीए इमेयारूवे जाव समुपजिस्था -सेयं खल्ल मे समणं भगवं महावीरं वदित्ता जाव पज्जुवा- सित्तएत्तिक्टु एव सपेहइ सपेहित्ता आभिओगिए देवे सदावेइ सदावित्ता एवं बयासी-एव खलु देवाणुपिया। समणे भगव महावीरे एव जहा सूरियाभो तहेव आणत्तियं देइ जाव दिव्य सुरवराभिगमणजोग्गं जाणविमाणं करेह करित्ता जाव पच्च प्पिणह, तेवि तहेव करेत्ता जाव पच्चप्पिणति, णवर जोयण सहस्सवित्थिणं जाणविमाण सेस तहेव, तहेब णामगोय साहेइ तहेव नदृविहि उवदंसेइ जाव पडिगया ॥ सू० २॥ टीको-'जटण भते' इत्यादि । जम्बूस्वामीपृच्छति-यदि खलु ' भते' भदन्त ! हे भगवन् ! श्रमणेन यावत्समाप्तेन धर्मस्थाना दशवर्गा प्राप्ता, -जइण भते । इत्यादि। पण्णत्ता पढमस्सण भते । वग्गस समणेण जीव सपत्तण के अहे पण्णते ? एव खलु जब ! समण जाव सपत्तण पढमस) जबूस्वामी श्री जइण भवे । इत्यादि- गेण जाव सपत्तेण पढमस्स० ) - - मनगारधर्मामृतवर्षिणी टोका ध २ व ११ कालीदेवीवर्णनम् ७६३ प्रथमस्य खलु हे भदन्त । वर्गस्य श्रमणेन यावत्सम्प्राप्तेन कोऽर्थः प्रज्ञप्तः १ सुधर्मास्लामीमाह-एप खलु हे नम्मूः ! श्रमणेन यावत्मम्प्राप्तेन प्रथमस्य वर्गस्य पञ्च अध्ययनानि प्रनतानि, तद्यथा-काली १, रात्रि २, रजनी ३, विद्युत् ४, मेवा ५ । जम्बूस्सामी पृच्छति-यदि ग्बल हे भदन्त ! श्रमणेन यात्समाप्तेन प्रथमस्य वर्गस्य पश्च अध्ययनानि प्राप्तानि, तर प्रथमस्य खलु भद त ! अ-यय- नस्य श्रमणेन यारत् सम्प्राप्तेन कोऽर्थः प्रज्ञप्तः १ । सुधर्मा सामी कथयति- एव खलु हे जम्बू । तस्मिन् काले तस्मिन् समये राजगृह नगर गुणशिलक चैत्यम् , श्रेणिको राजा, चेलना देवी आसीन् । सामी त्वामी श्रीमहावीरस्वामी सुधर्मास्वामी से पूछते है कि (भते ) हे भदत ! (जइण) यदि (सम- णेण जाव सपत्तेण धम्मकहाण दसवग्गा पण्णत्ता) श्रमण भगवान् महावीर ने जो कि मुक्तिस्थान को प्राप्त हो चुके हैं धर्मकथा के दश वर्ग प्ररूपित किये है तो (ण मते ) हे भक्त । (समणेण जाव सपत्तेण पढमस्स वग्गस्स के अद्वे पन्नत्ते) उन्ही श्रमण भगवान महावीर ने कि जो मोक्ष में विराजमान हो चुके है प्रथम वर्ग का क्या अर्थ प्रज्ञप्त किया है ? (एव खलु जयू समणेण जाव सपत्तणं पढमस्स बगस्स पच अज्झयणा पण्णत्ता, त जरा-काली राई रयणी विज्जू मेरा जइण भते समणेणं जाव संपत्तेण पढमस्स वग्गस्स पच अज्झयणापण्णत्ता पढमस्स णं भते अज्ज्ञयणस्स समणेण जाव सपत्तण के अट्टे पप्णत्त एव खल जव! तेणे कालेण तेण समएण रायगिहे णयरे गुणसिलए चेडए सेणिए राया चेल्ल. णादेवी) इस प्रकार जवू स्वामी के प्रश्न को सुनकर सुधर्मास्वामी ने भाभी श्री सुधा सामान पूछे (भते ) 3 महन्त ! (जइण) ने (समगेणं जार संरतेण धम्मकहाण दसरगगा पण्णत्ता ) श्रम ભગવાન મહાવીરે કે જેમણે મુક્તિસ્થાન મેળવી લીધુ છે ધર્મકથાઓના દશ का प्र३पित छ तो (ण भते ) 3 महन्त ! (समणेण जाव सपत्तेण पढमरस वगरस क अढे पन्नते) ते श्रम समपान महावीरे रेया મોક્ષમા વિરાજમાન થઈ ચૂક્યા છે–પહેલા વર્ગને શું અર્થ પ્રાપ્ત કર્યો છે? (एव खलु जब समणेण जात्र सपत्तेग पहमस्स वग्गरस पच अज्मयणा पण्णत्ता, त जहा-काली राई रयणी विज्जू मेहा जइण मते ! समण जात्र सपत्तेणं पहमस्स वग्गम पचअज्झयणा पण्णत्ता। पढणस्स प भने, अल्झयण स समणेणे नाव सपण के अद्वे पणते ! एव खलु जयू ! तेण कालेग तेण समएग रायगिहे गयरे गुणसिलए चेइए सेणिए राया चेल्लणा देरी) 명명 टीका:~(जहण भले ' समणेण जाव सपत्तेणं धम्मकहाण दसपना पच्चुण्णमइ पच्चुण्णमित्ता कडयतुडियर्थभियामा भुयामो साहरइ साहरित्ता करयल जाप कटु एवं वयासी-जमोऽधुर्ण अरहंताणं जाव सपत्ताणं नमोऽस्थुणं समणस्त भगवओ महा वीरस्स जाव सपाविउकामस्स वदामि गं भगवंत तत्थगयं इह गया पासउ म भगव तत्थ गए इह गयत्तिा बंदर नमसइ वदित्ता नमंसित्ता सीहासणारंसि पुरस्थाभिमुहा निस- पणा, तएणं तीसे कालीए देवीए इमेयारवे जाव समुप्पजिस्था सेयं खल्लु मे समर्ण भगवं महावीर वदित्ता जाव पज्जुवा- सित्तएत्तिकटु एवं सपेहइ सपेहिता आभिओगिए देवे सहावेइ सद्दावित्ता एव वयासी-एव खल्लु देवाणुपिया। समणे भगव महावीरे एवं जहा सूरियाभो तहेव आणत्तिय देइ जाव दिव्वं सुरवराभिगमणजोग्गं जाणविमाणं करेह करित्ता जाव पच्च पिणह, तेवि तहेब करेत्ता जाव पच्चप्पिणंति, णवर जोयण सहस्सवित्थितणं जाणविमाण सेस तहेब, तहेव णामगोय साहेइ तहेव नट्टविहि उवदसेइ जाव पडिगया ॥ सू० २॥ टीको-'जर्ण भते' इत्यादि । जम्वृस्वामीपृच्छति-यदि खलु भते भदन्त । हे भगान् । श्रमणेन यावत्सपातन धर्मयाना दशवर्गाः प्रज्ञमाग -जइण भते । इत्यादि। पण्णता पढमस्स ण भते वग्गस समणेण जोव सपत्तेण के अहे पण्णते ? एव खलु जब ! ममणे जाव सपण पदमाम) जबूवामी श्री जइण भते । इत्यादि- (जइण भने ' समण नाव सपत्तेग मम्मकहाण दसवग्गा पणता पढमस में मते ! जग्गरम समणेणं जीव सपत्तेण के अटे पणते ' एव खलु नवु ! सम ण जाव सपत्तेण पदमस्स०) - अनगारधर्मामृतापिणो टोका थु २ च १ ब १ कालीदेवीवर्णनम् ७६३ प्रथमस्य खलु हे भदन्त ! वर्गस्य अमणेन यावत्सम्प्राप्तेन कोऽर्थः प्रज्ञप्तः सुधर्मापामीमाह-एप खलु हे नम्पू' श्रमणेन यावत्मम्माप्तेन प्रथमस्य वर्गस्य पञ्च अध्ययनानि प्रजातानि, तद्यपा-काली १, रात्रि २, रजनी ३, विद्युत् ४, मेधा ५ । जम्बूस्वामी पृच्छति-यदि खलु हे भदन्त ! अमणेन यात्समाप्तेन प्रथमस्य वर्गस्य पञ्च अध्ययानि प्रज्ञतानि, तर प्रथमस्य खलु भदन्त ! अ यय- नस्य श्रमणेन यारत् सम्प्राप्तेन कोऽर्थः प्रज्ञप्तः १ । सुधर्मा सामी कायति- एव खलु हे जम्नू । तस्मिन् काले तस्मिन् समये राजगृह नगर गुणशिलक चैत्यम् , श्रेणिको राजा, चेहना देवी आसीत् । सामी=स्वामी श्रीमहावीरस्वामी सुधर्मास्वामी से पूछते हैं कि (भते ) हे भदत ! (जहण) यदि (सम- ण जाव सपत्तेण चम्मकहाण दसवग्गा पण्णत्ता) श्रमण भगवान् महावीर ने जो कि मुक्तिस्थान को प्राप्त हो चुके हैं धर्मकथा के दश वर्ग प्ररूपित किये है तो (ण भते ) हे मदत । (समणेण जाय सपत्तेण पढमस्स वग्गस्स के अटे पन्नत्ते) उन्ही श्रमण भगवान महावीर ने कि जो मोक्ष मे विराजमान हो चुके हैं प्रथम वर्ग का क्या अर्थ प्रज्ञप्त किया है ? (एव खलु जनू समणेण जाव सपत्तेग पढमस्स बगस्स पच अज्झयणा पण्णता, त जहा-काली राई रयणी विज्जू मेहा जइण भते । समणेणं जाव सपत्तण पढमस्स वग्गस्स पच अज्झयणापण्णत्ता पढमस्स ण भते अज्ज्ञयणस्स समणेण जाव सपत्तण के अटे पण्णत्ते' एव खलु जवू ! तेणं कालेण तेण समएण रायगिहे णयरे गुणसिलए चेइए सेणि राया चेल्ल- णादेवी) इस प्रकार जवू स्वामी के प्रश्न को सुनकर सुधर्मास्वामी ने पूवामी श्री सुधर्मा स्वाभीत पूछे ( भते ) महन्त ! (जइण) ( समगेणं जार संरतेण धम्मकहाण दसरग्गा पण्णता) श्रभार ભગવાન મહાવીરે કે જેમણે મુક્તિસ્થાન મેળવી લીધુ છે ધર્મકથાઓના દશ को ५३पित ४ा छ त(ण भते ) word! (समणेण जाव सपण पढमरस वगास्स क अहे पन्नते) ते श्रभर सान महापारे रेया મોક્ષમા વિરાજમાન થઈ ચૂકયા છે–પહેવા વર્ગને શું અર્થ પ્રજ્ઞપ્ત કર્યો છે ? ( एव खलु जब समणेण जाव सपत्तेग पढमस्स वग्गरस पच अन्झयणा पण्णता, त जहा-काली राई रयणी विज्जू मेहा जइण भते ! समणेण जाव सपत्ते पहमस्स वग्गस्स पचभज्झयणा पण्णत्ता । पढणस्स पा भने, अल्झयण म समणेणं नाव सपत्तेण के अटे पण्णत्ते ! एक खलु जब । तेण कालेग तेण समएग रायगिहे गयरे गुणसिलए चेहए सेणिए राया चेल्लणा देरी) टीकाथै -(जहण भते ' समणेण जाव सपत्तर्ण धम्मकहाण दसवमा (जइण भते समोण जाब सरत्तण रम्मकहाण दसवगा पण्णता पढमस्स पच्चुण्णमड पच्चुण्णमित्ता कडयतुडियथभियामी मुयानो साहरइ साहरित्ता करयल जाय कहु एवं वयासी-जमोऽत्युर्ण अरहताणं जाव सपत्ताणं नमोऽत्युणं समणस्स भगवओ महा- वीरस्स जाव सपाविउकामस्स चंदामि णं भगवत तस्थगयं इह गया पासउ म भगव तत्थ गए इह गयत्तिा वंदा नमंसइ वदित्ता नमंसित्ता सीहासणवरसि पुरत्याभिमुहा निस- पणा, तएणं तीसे कालीप देवीए इमेयारूचे जाव समुपजिस्था सेयं मे समणं भगवं महावीरं वदित्ता जाव पज्जुवा- सित्तएत्तिकहु एवं सपेहइ सपेहित्ता आभिओगिए देवे सदावेइ सहावित्ता एवं वयासी-एव खलु देवाणुपिया। समणे भगव महावीरे एव जहा सूरियाभो तहेव आणत्तियं देइ जाब दिव्यं सुरवराभिगमणजोगं जाणविमाणं करेह करित्ता जाव पच्च पिणह, तेवि तहेव करेत्ता जाब पच्चपिणंति, णवर जोयण सहस्सविस्थितणं जाणविमाण सेस तहेव, तहेव णामगोय साहेइ तहेव नट्टविहि उबदसेइ जात्र पडिगया ॥ सू०२॥ टीका-'जटण भते' इत्यादि । जम्बूस्वामीपति-यदि खलु ' भते' भदन्त ! हे भगवन् ! श्रमणेन यावत्समाप्तेन धर्मकथाना दशवर्गाः प्रज्ञप्ता, -जहण भते! इत्यादि। पण्णत्ता पढमस्सण भते व मणेण जीव सक्त्तण के अहे पणते ? एव ग्खलु जब ! समजाव पत्ते पढमस) जबूवामी श्री जइण भते । इत्यादि- णं मते ! वग्गस्म समणेणं जाव सपत्तेण के अट्टे पणते ? एप खलु ज ' सम गेण नाव सपत्तेण पढमस्स०) १ . - अंगारधर्मामृतापिणो टोका थु २ च १ व १ कालीदेवीवर्णनम् ७६३ प्रथमस्य खलु हे भदन्त । वर्गस्य श्रमणेन यावत्सम्पाप्तेन कोऽर्थः प्रज्ञप्तः ' सुधर्मासामीमाह-एर ग्वलु हे नम्न श्रमणेन यावत्मम्माप्तेन प्रथमस्य वर्गस्य पञ्च अध्ययनानि प्राप्तानि, तद्यपा-काली १, रानि २, रजनी ३, विद्युत् ४, मेधा ५ । जम्बूस्सामी पृच्छति-यदि खलु हे भदन्त ! अमणेन यात्समाप्तेन प्रथमस्य वर्गस्य पञ्च अध्ययनानि प्रज्ञप्तानि, तर प्रथमस्य खल्लु भदन्त ! अ यय- नस्य अमणेन यार सम्प्राप्तेन कोऽर्थः मज्ञप्तः १। सुधर्मा सामी कपयति- एव खलु हे जम्नू । तस्मिन् काले तस्मिन् समये राजगृह नगर गुणशिलक चैत्यम् , अणिको रागा, चेलना देरी आसीन् । सामी त्वामी श्रीमहावीरस्वामी सुधर्मास्वामी से पूछते है कि (भते ) हे भदत ! (जइण) यदि (सम- णेण जाव सपत्तेण धम्मकहाण दसवग्गा पण्णत्ता) श्रमण भगवान् महावीर ने जो कि मुक्तिस्थान को प्राप्त हो चुके हैं धर्मकथा के दश वर्ग प्ररूपित किये है तो (ण भते ) हे मदत । (समणेण जाव मपत्तेग पढमस्स वग्गस्त के अटे पन्नत्ते) उन्ही श्रमण भगवान महावीर ने कि जो मोक्ष में विराजमान हो चुके हैं प्रथम वर्ग का क्या अर्थ प्रज्ञप्त किया है ? (एव खलु जनू समणेण जाव सपत्तेण पढमस्स बागस्स पच अज्झयणा पपणत्ता, त जहा-काली राई रयणी विज्जू मेहा जइण भते समणेणं जाव संपत्तेण पढमस्स वग्गस्स पच अज्झयणा पण्णत्ता पढमस्त णं भते अज्जयणस्स समणेण जाव सपत्तण के अढे पण्णत्ते? एव खलु जबू! तेणं कालेण तेण सनएण रायगिहे णयरे गुणसिलए चेडए सेणिए राया चेल्ल- णादेवी) इस प्रकार जवू स्वामी के प्रश्न को सुनकर सुधर्मास्वामी ने श्री सुधर्मा सामान पूछे छे है (भते ) महन्त ! (जइण) ने ( समगेगं जार संपतेण धम्मकहाण दुसरगगा पण्णत्ता ) श्रम ભગવાન મહાવીરે કે જેમણે મુક્તિસ્થાન મેળવી લીધુ છે ધર્મકથાઓના દશ पर्णा प्र३पित छ तो (ण भते ) हे लहन्त ! (समणेण जाव सपशेण पदमरस वगारस क अहे पन्न) ते श्रम समपान मडावी या ક્ષમા વિરાજમાન થઈ ચૂક્યા છે–પહેવા વર્ગને શું અર્થ પ્રજ્ઞસ કર્યો છે ? (एव खलु जब समणेण जाव सपत्तेग पडमस्स बग्गरस पच अन्झयणा पण्णचा, त जहा-काली राई रयणी विज्जू मेहा जण भते ! समणेण जाव सपत्तेणे पहमस्स वग्गस्म पचमझयणा पगत्ता । पटणस्स पा भने, अझयण म समणेणं भाव सपण के अटे पण्णत्ते ! एक खलु जयु ! तेग मालेग तेग समएग रायगिहे गयो पिलए चेइए सेणिए राया चेल्लणा देरी) જ બૂ સ્વામી टीकार्य-~-(जहण भते ! समणेण जाव सपत्तेण धम्मकहाण दसयामा पच्चुण्णमइ पच्चुपणमित्ता कडयतुडियर्थभियाओ भुयामो साहरइ साहरित्ता करयल जाव कटु पत्र वयासी-जमोऽस्थुर्ण अरहताणं जाव सपत्ताण नमोऽत्युणं समणरस भगवी महा वीरस्स जाव सपाविउकामम्स बंदामि गं भगवत तस्थगयं इह गया पासउ म भगव तरथ गए इह गयत्तिा वंदर नमसइ वदित्ता नमंसित्ता सीहासणारसि पुरत्याभिमुहा निस- पणा, तएणं तीसे कालीए देवीए इमेयारूबे जाव समुपजिस्था -सेयं खल्लु मे समणं भगवं महावीरं वदित्ता जाव पज्जुवा सित्तएत्तिकटु एवं सपेहेइ सपेहिता आभिओगिए देवे सद्दावेइ सदावित्ता एवं वयासी-एव खलु देवाणुप्पिया! समणे भगव महावीरे एव जहा सूरियाभो तहेब आणत्तियं देइ जाव दिव्वं सुरवराभिगमणजोग्गं जाणविमाणं करेह करिता जाव पच्च प्पिणह, तेवि तहेव करेत्ता जाव पच्चपिणंति, णवर जोयण सहस्सवित्थिपणे जाणविमाण सेस तहेव, तहेव णामगोय साहेइ तहेव नविहि उवदंसेइ जात्र पडिगया ॥ सू० २ ॥ टीको~जदण भते' इत्यादि । जम्वृस्वामीपृच्छति-यदि खलु भते भदन्त ! हे भगवन् ! श्रमणेन यावत्सपाप्तेन धर्मकथाना दशवर्गाः प्रज्ञप्ता' -जण भते । इत्यादि। पण्णत्ता पढमस्सण भते वगत समणेण जीव सपत्तण के अई पणते ? एव खलु जब ! ममण जाव सपत्तण पढमस्स) जबूग्वामी श्री जइण भते । इत्यादि- (जइण भते । समणेण जाव सत्तेण धम्मकहाण दसवग्गा पण्णता पदमस गं मते ! नग्गरम समणेणं जाव सपत्तेण के अटे पणते ? एप खलु जब ' सम ण नाव सपत्तेण पढमस्स० ) 1 -- Trwa १ , अनंगारधर्मामृतपपिणो टोका थु २ व १ अ १ कालीदेवीवर्णनम् ७६३ प्रथमस्य खलु हे भदन्त । वर्गस्य अमणेन यावत्सम्प्राप्तेन कोऽय: प्रज्ञप्तः सुधर्मासामीमाह-एप खलु हे नमः! अमणेन यावत्मम्माप्तेन प्रथमस्य वर्गस्य पञ्च अध्ययनानि मातानि, तद्यपा-काली १, रात्रि २, रजनी ३, विद्युत् ४, मेघा ५ । जम्बूस्वामी पृच्छति-यदि खलु हे भदन्त ! अमणेन यात्समाप्तेन प्रथमस्य वर्गस्य पञ्च अध्ययनानि प्रज्ञप्तानि, तर प्रथमस्य खल भदन्त ! अ यय. नस्य श्रमणेन यात् सम्प्राप्तेन कोऽयः प्रज्ञप्तः । सुधर्मा सामी करयति- एव खलु हे जम्नू । तस्मिन् काले तस्मिन् समये राजगृह नगर गुणशिलक चैत्यम् , श्रेणि को रागा, चेलना देवी आसीन् । सामी त्वामी श्रीमहावीरस्वामी सुधर्मास्वामी से पृछते है कि (भते ) हे भदत ! (जइण) यदि (सम- णेण जाव सपत्तेण यम्मकहाण दसवग्गा पण्णत्ता) श्रमण भगवान् महावीर ने जो कि मुक्तिस्थान को प्राप्त हो चुके हैं धर्मकथा के दश वर्ग प्ररूपित किये है तो (ण भते ) हे भदत । (समणेण जाव सपत्तेग पढमस्स वग्गस्स के अद्वे पन्नत्ते ) उन्ही श्रमण भगवान महावीर ने कि जो मोक्ष में विराजमान हो चुके हैं प्रथम वर्ग का क्या अर्थ प्रज्ञप्त किया है ? (एव खलु जनू समणेण जाव सपत्तेग पढमस्स बागस्स पच अज्झयणा पण्णत्ता, त जहा-काली राई रयणी विज्जू मेहा जइण भते समणेणं जाव सपत्तेण पढमस्स वग्गस्स पच अज्झयणापण्णत्ता पढमस्स ण भते अज्ज्ञयणस्स समणेण जाव सपत्ता के अटे पण्णत्त' एव खलु जत् ! तेर्ण काळेण तेण समए रायगिहे णयरे गुणसिलए चेडए सेणिए राया चेल्ल- णादेवी ) इस प्रकार जवू स्वामी के प्रश्न को सुनकर सुधास्वामी ने ४ भू स्वामी श्री सुधर्मा साभार पूछे है ( भते ) महन्त ! (जइण) (समगेर्ण जाव संरतेण धम्मकहाण दसरग्गा पण्णता) श्रमाय ભગવાન મહાવીરે કે જેમણે મુક્તિસ્થાન મેળવી લીધુ છે ધર્મકથાઓના દશ को प्र३पित अर्यात (ण भते ) हे महन्त ! (समणेग जाय सपत्तेण पदमरस वास्स के अहे पन्नते) ते भए। सपान महापामा ક્ષમા વિરાજમાન થઈ ચૂક્યા છે–પહેવા વર્ગને શું અર્થ પ્રાપ્ત કર્યો છે? ( एव खलु जब समणेण जाव सपत्तेग पहमस्स बग्गरस पर अज्झयणा पण्णता, त जहा-काली राई रयणी विज्जू मेहा जइण भते । समणेण जान सपत्तेण पहमस्स वग्गस्म पचभज्झयणा पणत्ता। पढणस्स [ भने, अन्झयण-म समणेणं नाव सपण के अटे पण्णते ! एक खलु जयू ! तेग मालेग तेण समएग रायगिहे गयो मिलए चेइए सेणिए राया चेल्लणा देवी) (जइण भते । समणेण नाव सात्तण धम्मकहाण दसवग्गा पण्णता पढमस्त ७६२ जइण भते । इत्यादि- पच्चुण्णमइ पच्चुण्णमित्ता कडयतुडियर्थभियाओ मुयानो साहरइ साहरित्ता करयल जाप कटु एवं वयासी-जमोऽत्थुर्ण अरहताणं जाव सपत्ताणं नमोऽत्युण समणस्स भगवो महा- वीरस्स जाव सपाविउकामस्स चंदामि णं भगवत तत्थगयं इह गया पासउ म भगवं तत्थ गए इह गयत्तिरष्टु वंदर नमसइ वदित्ता नमंसित्ता सीहासणवरसि पुरत्याभिमुहा निस- पणा, तएणं तीसे कालीए देवीए इमेयारूवे जाव समुप्पजिस्था -सेयं खल मे समणं भगवं महावीर वदित्ता जाव पज्जुवा- सित्तएत्तिक्हु एव संपेहेइ सपेहिता आभिओगिए देवे सहावेइ सद्दावित्ता एव वयासी-एव खलु देवाणुपिया। समणे भगव महावीरे एवं जहा सूरियाभो तहेव आणत्तियं देइ जाव दिव्वं सुरवराभिगमणजोगं जाणविमाणं करेह करिता जाव पच्च प्पिणह, तेवि तहेव करेत्ता जाव पच्चप्पिणति, णवर जोयण सहस्सवित्थिणं जाणविमाण सेस तहेव, तहेव णामगोय साहेइ तहेव नट्टविहि उवदसेइ जाव पडिगया ॥ सू० २ ॥ टीका-'जयण भते' इत्यादि । जन्नुस्वामीपति-यदि खलु ' भते' भदन्त ! हे भगवन् ! श्रमणेन यावत्समाप्तेन धर्मयाना दशवर्गाः प्रज्ञप्ता, -जइण भते! इत्यादि। टीकार्थ:--(जहण भते । समणेण जाव संपत्तेणं धम्मकहाण दसवमा पण्णत्ता पढमस्स ण भते । वगस्त समणेण जीव सपत्तण के अढे पणते ? एव खलु जब ! समणेण जाव पत्तण पढमस्स) जबूग्वामी ओ र्ण मते ! वग्गरम समणेणं जाव सपत्तेण के अहे पण्णत्ते ? एर खलु जब ' सम गेण जाव सपत्तेण पढमस्स० ) अनगारधर्मामृनर्पिणो टीका २ व १ व १ कालीदेवीवर्णनम् ७६३ प्रथमस्य खलु हे भदन्त ! वर्गस्य अमणेन यावत्सम्प्राप्तेन कोऽर्थः प्रज्ञप्तः ? सुधर्मासामीमाह-एस खलु हे नमः श्रमणेन यावत्मम्माप्तेन प्रथमस्य वर्गस्य पञ्च अध्ययनानि प्रनतानि, तद्यथा-काली १, रात्रि २, रजनी ३, विद्युत् ४, मेरा ५ । जम्बूस्सामी पृच्छति-यदि खलु हे भदन्त ! श्रमणेन यात्समाप्तेन प्रथमस्य वर्गस्य पश्च अध्ययतानि मनप्तानि, तत्र प्रथमस्य खलु भद त ! अ-यय- नस्य श्रमणेन यावत् सम्प्राप्तेन कोऽर्थः प्रज्ञप्तः १ । सुधर्मा मामी कायति- एव खलु हे जम्नू । तस्मिन् काले तस्मिन् समये राजगृह नगर गुणशिलक चैत्यम् , श्रेणिको रागा, चेलना देवी आसीत् । सामी त्वामी श्रीमहावीरस्वामी सुधर्मास्वामी से पूछते ह कि (भते ) हे भदत ! (जहण) यदि (सम- पेण जाव सपत्तण धम्मकहाण दसवग्गा पण्णत्ता) अमण भगवान् महावीर ने जो कि मुक्तिस्थान को प्राप्त हो चुके हैं धर्मकथा के दश वर्ग प्ररूपित किये है तो (ण मते ) हे भक्त ! (समणेण जाय सपत्तेण पढमस्स वग्गस्त के अढे पन्नत्ते) उन्ही श्रमण भगवान महावीर ने कि जो मोक्ष में विराजमान हो चुके हैं प्रथम वर्ग का क्या अर्थ प्रजप्त किया है ? (एव खलु जनू समणेण जाव सपत्तेग पढमस्स बगस्स पच अज्झयणा पण्णत्ता, त जहा-काली राई रयणी विज्जू मेहा जइण भते ! समणेणं जाव सपत्तेण पढमस्स वग्गस्स पच अज्झयणापण्णत्ता पढमस्स ण भते अज्ज्ञयणस्स समणेण जाव सपत्ता के अटे पण्णत्ते ? एव खलु जबू! तेर्ण कालेण तेण समएण रायगिहे णयरे गुणसिलए चेइए सेणिए राया चेल्ल- णादेवी) इस प्रकार जब स्वामी के प्रश्न को सुनकर सुधर्मास्वामी ने ४) सामी श्री सुधर्मा आभीर पूछे छे है ( भते ) हे महन्त ! (जइण) ने (समगेर्ण जान संरतेण धम्मकहाण दसनमा पण्णत्ता) श्रम ભગવાન મહાવીરે કે જેમણે મુક્તિસ્થાન મેળવી લીધુ છે ધર્મકથાઓના દશ पो प्र३पित या तो (ण भते ) 3 महन्त ! (समणेण जाव सपण पदमरस वास्स के अहे पन्नते) ते श्रम समपान मडावी या મેક્ષમાં વિરાજમાન થઈ ચૂકયા છે-પહેલા વર્ગને શું અર્થ પ્રજ્ઞસ કર્યો છે ? ( एव खलु जब समणेण जार सपत्तेग पढमस्स बग्गस्स पच अज्झयणा पण्णता, त जहा-काली राई रयणी विज्जू मेहा जण भते ! समणेण जाव सपत्तेणे पढमस्स वग्गरम पचमझपणा पत्ता। पदणस्स पो भने, अल्झयण म समणेणं नाव सपण के अटे पगते ! एक खलु जबू! तेग मालेग तेण समएग रायगिहे गयरे गुणसिलए चेइए सेणिए गया चेल्लणा देवी) (जइण भते । समणेण जाव सरत्तेण धम्मकहाण दसवगा पणत्ता पहमस्त टीकायें--(जहण भते ! समणेण जाव सपत्तर्ण धम्मकहाण दसवरगा पच्चुण्णमड़ पच्चुण्णमित्ता कडयतुडियथभियाओ भुयानो साहरइ साहरित्ता करयल जाप कटु एव वयासी-णमोऽत्थुर्ण अरहताण जाव सपत्ताणं नमोऽत्थुणं समणस्स भगवओ महा- वीरस्स जाव सपाविउकामस्स वदामि णं भगवंत तत्थगयं इह गया पासउ म भगव तत्थ गए इह गयत्तिरतु वंदर नमसइ वदित्ता नमंसित्ता सीहासणवरंसि पुरत्याभिमुहा निस- पणा, तएणं तीसे कालीए देवीए इमेयारूवे जाव समुपजित्था -सेयं खल्ल मे समणं भगवं महावीर वदित्ता जाव पज्जुवा- सित्तएत्तिकटु एव संपेहेइ सपेहिता आभिओगिए देवे सहावेइ सहावित्ता एवं वयासी-एव खलु देवाणुपिया। समणे भगव महावीरे एव जहा सूरियाभो तहेव आणत्तियं देइ जाव दिन सुरवराभिगमणजोग्ग जाणविमाणं करेह करिता जाव पच्च प्पिणह, तेवि तहेव करेत्ता जाव पच्चप्पिणति, णवर जोयण सहस्सविस्थिपणा जाणविमाण सेस तहेव, तहेव णामगोय साहेइ तहेव नविहि उवदंसेइ जाव पडिगया ॥ सू० २ ॥ टोको-'जग्ण भते' इत्यादि । जम्बुस्वामी-ति-यदि खलु ' भते' भदन्त ! हे भगान् । श्रमणेन यावत्सपाप्तेन धर्म कथाना दशवर्गाः प्रज्ञप्ता, -जण भते ! इत्यादि। पण्णत्ता पढमस्सण भते । वस समणेण जीव सपत्तण के अहे पणते ? एव खलु जब ! समणेण जाव सपत्तण पढमस) जबूग्वामी श्रो जइण भते । इत्यादि- णं मते ! वग्गरम समणेणं जाव सपत्तेण के अटे पणते ? एर खलु जयू' सम गेण जाव सपत्तेण पढमस्स० ) अनगारधर्मामृतविणो टोका शु २ च १ अ १ कालीदेवीवर्णनम् प्रथमस्य खलु हे भदन्त । वर्गस्य श्रमणेन यावत्सम्पाप्तेन कोऽयः प्रज्ञप्तः ? सुधर्मासामीमाह-एप खलु हे नमः ! अमणेन यावत्मम्माप्तेन प्रथमस्य वर्गस्य पञ्च अध्ययनानि प्रातानि, तद्यथा-काली १, रात्रि २, रजनी ३, विद्युत् ४, मेगा ५ । जम्बूस्सामी पृन्डति-यदि खलु हे भदन्त ! अमणेन यात्सप्राप्तेन प्रथमस्य वर्गस्य पञ्च अध्ययानि प्रजातानि, तर प्रथमस्य खलु भद त ! अ-यय- नस्य श्रमणेन यावत् सम्प्राप्तेन कोऽर्थः प्रज्ञप्तः ? | सुधर्मा सामी कपयति- एव खलु हे जम्नू । तस्मिन् काले तस्मिन् समये राजगृह नगर गुणशिलक चैत्यम् , श्रेणिको रामा, चेलना देवी आसीत् । सामी त्वामी श्रीमहावीरस्वामी सुधर्मास्वामी से पूछते है कि (भते) हे भदत । (जहण) यदि (सम- गेण जाव सपत्तेण धम्मकहाण दसवग्गा पण्णत्ता) अमण भगवान् महावीर ने जो कि मुक्तिस्थान को प्राप्त हो चुके हैं धर्मकथा के दश वर्ग प्ररूपित किये है तो (ण मते ) हे भदत (समणेण जाव सपत्तेण पढमस्स वग्गस्त के अट्ठ पन्नत्ते) उन्ही भ्रमण भगवान महावीर ने कि जो मोक्ष में विराजमान हो चुके हैं प्रथम वर्ग का क्या अर्थ प्रजप्त किया है ? (एव खलु जनू समणेण जाव सपत्ते पहमस्स बागस्स पच अज्झयणा पण्णत्ता, त जहा-काली राई रयणी विज्जू मेहा जहण भते समणेणं जाव संपत्तण पढमस्स वग्गस्स पच अज्झयणापण्णत्ता पढमस्सगं भते अज्ज्ञयणस्स समणेण जाव सपत्तण के अटे पण्णत्ते एव खलु जन् ! तेर्ण कालेण तेणं समए रायगिहे णयरे गुणसिलए चेडए सेणिए राया चेल्ल. णादेवी) इस प्रकार जवू स्वामी के प्रश्न को सुनकर सुधर्मास्वामी ने ४ भू वामी श्री सुधर्मा भीर पूछे छे ई (भते ) हे महन्त ! (जइण) ने (समगेगं जाव सरतेण धम्मकहाण दुसरगा पण्णत्ता ) श्रम ભગવાન મહાવીરે કે જેમણે મુક્તિસ્થાન મેળવી લીધું છે ધર્મકથાઓના દશ पर्णा प्र३पित र्यात (ण भते ) महन्त ! (समणेण जार सपत्रेण पदमरस वास्स के अहे पन्नते) ते श्रम लगवान महावीरेया મેક્ષમાં વિરાજમાન થઈ ચૂકયા છે–પહેલા વર્ગને શું અર્થ પ્રજ્ઞપ્ત કર્યો છે? ( एव खलु अबू समणेण जाव सपत्तेग पढमस्स बग्गस्स पच अझयणा पण्णत्ता, त जहा-काली राई रयणी विज्जू मेहा जइण भते ! समणेण जाच सपत्तेन पहमस्स वग्गस्म परमज्झयणा पण्णत्ता । पढणस्स प भने, अल्झयण-म समणेणं नाव सपत्तेण के अटे पण्यते ! एक खलु जयू ! तेग कालेग तेण समएग रायगिहे गयरे गुणसिलए चेइए सेणिए राया चेल्लणा देवी) टीकार्य-~(जइण भते ! समणेण जाव सपत्तेणं धम्मकहाण दसपग्गा भते समणेण नाव सरत्तेण धम्मकहाण दसवग्गा पण्णता पढमस्म पच्चुण्णमा पच्चुपणमित्ता कडयतुडियर्थभियाओ भुयानो साहरइ साहरित्ता करयल जाप कटु एवं वयासी-णमोऽरथुणे अरहताणं जाव सपत्ताणं नमोऽत्थुणं समणस्स भगवओ महा- वीरस्स जाव सपाविउकामस्स दामि णं भगवत तत्थगयं इह गया पासउ म भगव तत्थ गए इह गयन्तिटु वंदर नमंसइ बदित्ता नमंसित्ता सीहासणारसि पुरस्थाभिमुहा निस- पणा, तएणं तीसे कालीए देवीए इमेयारूबे जाव समुप्पाजस्था -सेयं खल्ल से समणं भगवं महावीर वदित्ता जाव पज्जुवा सित्तएत्तिकहु एव संपेहइ सपेहित्ता आभिओगिए देवे सहावेइ सद्दावित्ता एवं वयासी-एव खल्ल देवाणुपिया ! समणे भगव महावीरे एवं जहा सूरियाभो तहेव आणत्तियं देइ जाव दिवं सुरवराभिगमणजोग्गं जाणविमाणं करेह करिता जाव पच्च पिणह, नेवि तहेब करेता जाव पच्चप्पिणति, णवर जोयण सहस्सविस्थितणं जाणविमाण सेस तहेव, तहेव णामगोय साहेइ तहेव नविहि उवदंसेइ जात्र पडिगया ॥ सू० २ ॥ टीका-'जदण भते' इत्यादि । मनुस्वामीपृन्उति-यदि खलु ' भते' भदन्त ! हे भगवन् ! श्रमणेन यावत्सपाप्तेन धर्म कथामा दशवर्गा. प्रज्ञप्ता, -जइण भते 1 इत्यादि। पण्णत्ता पढमस्स ण भते वग्गस समण जीव सपत्तेण के अहे पण्णते ? एव खलु जन ! समजाव पढमस्स) जबूग्वामी श्री जइण भते । इत्यादि-- जइण गै मते ! वग्गरम समणेणे जाव सपत्तण के अहे पणते ' एव खलु जब 'सम गेण जाव सपत्तेण पढमस्स०) -
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- - ७६५ ताया समोसरिए ' समाएतः समागतान । 'परिमा'-परिपत्माजगृहनगर वास्तव्यो जनसमूह 'णिग्गया' निर्गता भगन्दनाय व स्वस्थानान्निस्मता, भगरता धर्मकया फयिता यायद् परिपद् भगात 'पज्नुपासा' पर्युपास्ते सेवते, तस्मिन् काले तस्मिन सगये काली नाम देवी चमरनमाया राजधान्या उन्हें उत्तर देने के अभिप्राय से करा कि (जबू!) हे जबू! तुम्हारे प्रश्न का उत्तर इस प्रकार है सुनो यारत समाप्त श्रमण भग घान् महार ने प्रथम वर्ग के पाच अध्ययन प्राप्त किये हैं वे ये हैं- काली १, रात्रि २, रजनी ३, रिपुत् ४, और मेघा ५। अब पुनः जनू स्वामी प्रश्न करते है कि है भात! यारत् मुक्तिधान को प्राप्त हुए श्रमण भगवान महावीर ने प्रथम वर्ग के पाच अध्ययन निरूपित किये हैं तो में आपसे पूछना ह कि भदत यावत् मोक्ष को सप्राप्त उन्हीं श्रमण भगवान महायीरने प्रथम अध्ययनका क्या अयं निरूपित किया है ? इसका उत्तर उन्हें सुधर्मास्वामी इस प्रकार देते है-हे जवू ! उस काल और उस समय में राजगृह नामकी नगरी थी-उम में गुणशिलक नाम का उद्यान धा-नगरी के राजा का नाम श्रेणिक या। उसकी रानी का नाम चेल्लना था। (सामी समोसरि परिसा जिग्गया जाव परिसा पज्जु वासह-तेण काटेणं तेणं समणकाली नाम देवी, चमर वचाए रायहोणीए આ પ્રમાણે જ બૂ સ્વામી પ્રશ્નને સાભળીને તેમને ઉત્તર આપવાના G६शथी श्री सुधर्मा स्वाभीमे है (एर सलु जनू 1 ) 3 14 1 तमा પ્રશ્નનો ઉત્તર આ પ્રમાણે છે સાભળે, યાવત્ સ પ્રાપ્ત શ્રમણ ભગવાન મહા વીરે પહેલા વર્ગના પાચં અધ્યયને પ્રજ્ઞા કર્યા છે તે આ પ્રમાણે છે – ૧ કાલી, ૨ રાત્રિ, ૩ રજની, ૪ વિદ્યુત, અને ૫ મેવા હવે ફરી કબૂ સ્વામી પ્રશ્ન કરે છે કે હે ભદન્તા યાવત્ મુક્તિસ્થાનને પ્રાપ્ત કરી ચુકેલા શ્રમણ ભગવાન મહાવીર પહેલા વર્ગના પાંચ અધ્યયને નિરૂપિત કર્યા છે તે હું તમને ફરી પૂછવા માગુ કે હે ભદન્ત / ચાવત મોક્ષને પ્રાપ્ત કરી ચુકેલા તે જ શ્રમણ ભગવાન મહાવીર પહેલા અધ્યયન શો અર્થ નિરૂપિત કર્યો છે? શ્રી સુધમાં સ્વામી તેને ઉત્તર આપતા કહેવા લાગ્યા કે જ બૂ! તે કાળે અને તે વખતે રાજગૃહ નામે એક નગરી હતી તેમાં ગલુશિલક નામે ઉઘાન હતું નગરના રાજાનું નામ શ્રેણિક હેતુ તેની રાણનું નામ ચેનના હતું (सामी समोसरिए परिसा णिग्गया जार परिसा पञ्जुवासइ-तेण कालेण तेण समएण काली नाम देवी, चमर चचाए रायहाणीए ७६५ . " - . , अनगारधर्मामृतवपिणी टी० थु २ च १ अ १ कालीदेवीवर्णनम् 'कालपडिसगमवणे' कालावतसकमवने काले कालाख्ये सिंहासने चतमभिः सामानिकसाहस्रीमिः, चतसृभिर्मह तरिकाभिः, सपरिवाराभिस्तिसमिबाह्याभ्य न्तरमध्यरूपाभिः परिसाहि' परिपद्धिः पारिवारिकदेवीरूपाभिः, सप्तभिः 'अणिएहि ' अनी हयगजरवपदातिपभगन्धर्वनाटयस्पैः, अनार विवेम:- कालबडिसगभवणे कालसि, मीहासणसि चाहिं सामाणियमाहस्सीहिं चरिं महरियाहिं, सपरिवाराहिं तिहिं परिसाहिं सत्तहिं अणिहिं सत्तहिं अणियाहिवईहिं सोलमहि आयरक्खदेवसाहस्सीहिं अण्णेहिं यहि कालवडिमगभवणवासिहं अउरकुमारहिं देवहिं देवीहिं य सद्धि संपरिघुडा मयाय जाव विहरइ) वा पर श्री महावीर सामी का आगमन हुआ। लोगों को जब इनके आगमन की खबर लगी-तर समस्त राजगृह निवासी जन इन का बना करने के अभिप्राय से गुणशिलक उद्यान में आये । भगवान् ने वर्मकथा कही-यावत् परिपदने भगवान की पर्युपासना की । उम काल में और उस समय मे काली नाम की देवी चमरचपा नाम की राजधानी में रहती थी। उसके भग्न का नाम कालावतसक था। जिस सिंहोसन पर यह बैठती थी उसका नाम काल था। यह उस भवन में चार हजार सामानिको की परिपदी के साथ, चार हजार महतरिकाओं के साथ, अपने २ परिवारवाली तीन हजार पारिवारिक देवियों के साप, मान अनीकोंके-य, गज, रथ, पदाति, वृपभ, गधर्व एव नाटयरूप सैय के- कालसि, सीहासगसि चउहिं सामाणियसाहस्सीहिं चउहिं महरियाहिं, सपरि- चाराहि तिहिं परिसाहिं सत्तहिं अगिएहि सत्तहिं अणियाहि ईहिं सोलसहिं आय रक्खदेवसाहस्सीहिं अण्णेहिं बह एहिं का अडिसयभवणवामीहि असुमकुमारेहि देवेहि देवी हि य सद्धि सपरिवुडा महयाहय जाब विहरह) ત્યા શ્રી મહાવીર સ્વામીનું આગમન થયું જયારે લોકોને તેમના આગ- મનની જાણ થઈ ત્યારે રાજગૃહના બધા લકે તેમને વદન કરવાના અભિ પ્રાયથી ગુણશિલક ઉધાનમા આવ્યા ભગવાને ધર્મકથા કહી સંભળાવી યાવત પરિષદે ભગવાનની પર્થપાસના કરી તે કાળે અને તે સમયે કાળી નામની દેવી ચમચ ચા નામની રાજધાનીમાં રહેતી હતી તેના ભવનનું નામ કાલા ઘત સક હતુ જે સિંહાસન ઉ ર તે બેસતી હતી તેનું નામ કાળ હતું તે ભવનમા તે ચાર હજાર સામાનિકની પરિષદાની સાથે, ચાર હજાર મહત્ત કાઓની સાથે, પિતપોતાના પરિવારવાળી ત્રણ હજાર પારિવારિક દેવીઓની સાથે સમ અનીકે-ઘેડા, હાથી, રથ, પાયદળ, વૃષભ, ગંધર્વ અને નાટય - ६ amme आपकानि सध्यामाय, गनाटये पुनरुप मोगायेति, सममिनोकापिक- विभिः, पोदशभिः भात्मतादरगाहोमिः, अन्यैयामिश्र पाणावतसकमवनवाति भिरसुरकुमार शामिल साई सपरिहता 'मदयाहय नार विहा' महनाऽहस याप विहरति-'महयाऽऽयनहगीयमायतनीतरतालतुरिययगडगपट्टप्पाइस घेणं महताऽऽहतनाटरगीतवादित तन्नीतलताल गृहित धनागदपवादितावेग, वर- महता' रयेगेनिसम्पन्न, भादतानि-भपाहतानि यानि नाटयगोतानि, तथा-वादितानि-तन्त्रीयीणा, तला हस्तताला, तालकास्पताला, डि. तानि-शेपाणि तूर्यादियानि तथा धन र मदानध्वनिमाया घना स चासौं पटु प्रमादितथेति घनमुद्रपटुनरादितः, ततत्रिपदो इन्दा, तेषा यो रसस्तेन-उपलक्षितान् दिव्यान् भोगमोगान शुन्दादीन भुसाना विहरति । 'इम च ण' अस्मिन्नरसरे खलु केवलकल्प-सपूर्णम् जम्दीप नाम द्वीप-म-पजम्बूद्वीप विपुलेन 'ओहिगा' आधिना प्राधिज्ञानेन 'अमोण्माणी २' अभोगयमाना २ पश्यन्ति पुनः पुनरुपयोग ददती सती पश्यति। किं पश्यति उत्पाह-तत्य' त्र- अवधिज्ञानोपयोगे श्रमण भगान्त महावीर जम्मूद्वाप द्वीपे मारते वर्षे राजगृहे साथ अनीकाधिपतियों के साथ, सोलह हजार आत्मरक्षक देवों के साथ, तथा और भी बहुत से कालावतसक भवन में निवास करनेवाले असु. रकुमार देवों के एव देवियों के साथ परिवृत होकर रहा करती थी। अव्यारत (सतत) नाटयगीतों के ण्व वादिन तन्त्री, रस्त, ताल, कास्य ताक, श्रुडित आदि तृर्यादिचाद्यो के एव मेध की ध्वनि जैसे अच्छी तरह पजाये गये मृदंगों के सुन्दर र शब्दों से उपलक्षित दिव्य मोगा को भोगती हुई अपने समय को आनन्द के साथ व्यतीत किया करती थी। (इम च ण केवलप्प जद्दीव दीव विजलेण ओरिणा आभोएमाणी २ पामइ, तस्य समण भगव महावीर जब होवे दीवे भारहे वास रायमिहे રૂપ મેન્યની સાથે અનીકાધિપતિઓની સાથે, સોળ હાર આત્મરક્ષક દેવેની સાથે તેમજ બીજા પણ ઘણા કાલાવતાસક ભવમા નિવાસ કરનારા અફેર કુમારદે અને દેવીઓની સાથે પરિત થઈને રહેતી હતી તે અચાહત (સત) નાટયગીને વાદિત તત્રી, હસ્તતાલ, કાર્યાલ, ડિત વતુર્થ વગેરે વાઘ, મેઘના ત્રિની જેમ સારી પેઠે વગાડવામાં આવેલા મુદ ગાન સુર શબ્દથી ઉપલક્ષિત દિવ્ય ભેગોને ઉપભોગ કરતી પિતાના સમયને સુખેથી પસાર કરતી રહેતી હતી (इम च ण कैलकप जनुदी दीवै विउलेग भोहिगा आभोएमामी र पासइ, तस्य समणभगर महावीरं जबुदीरे दीवे मारहे अपरे - - - . ममगारधर्मामृतवर्षिणी टी० धु.२३.१० कालीदे औरणनम नगरे गुणशिल के चैत्ये यथामतिरूपन्यथा फल्पम् ' उगह ' अपग्रह असतेराज्ञाम् उग्गिण्डित्ता' अवगृध सयमेन तपसा आत्मान भावयन्त पश्यति, दृष्टा हृष्ट तुष्टचित्तानन्दिता 'पीरमणा' पीतिमनाः प्रसन्नमनस्काः 'जापडियया' यावन्- हर्पशविसर्पदहदया हर्पयशादुल्लसितहदया रिहासनाद् अभ्युत्तिष्ठति, अभ्युत्थाय णयरे गुणसिलए चेहए अहापडिरूवं उग्गह उग्गिदित्ता सजमेण तवसा अप्पाण भावेमाण पासइ, पासित्ता हतुट्टचित्तमाणदिया पीहमणा जाव हियथा सीहालणाओ अम्भुट्टेद, अन्मुद्वित्ता पायपीढाओ पच्चोरुहइ, पच्चोरुहित्ता पाउपाओ ओमुयइ, ओमुइत्ता तित्वगराभि- मुही सत्तहपयाइ अणुगच्छइ, अणुगच्छित्ता वाम जाणु अचेह, अचित्ता दाहिण जाणुधरणियलसि निटूटु त्तिक्खुत्तो मुद्धाण धरणियलसि निवे- सेह, निवेसित्ता कटु एव बयासी) इस अवसर में उसने केवल कल्प-सम्पूर्ण-जबूद्वीप नापके द्वीपको-मध्यजबूद्वीप को-विपुल अवधिज्ञान के द्वारा वार २ उपयोग देकर देखा- उस समय उसने श्रमण भगवान् महावीर को जंबूद्वीपान्तर्गत भरत क्षेत्र में राजगृह नगर मे गुणशिलक चैत्य में यथाकल्प वसति की आज्ञा लेकर संयम एच तप से आत्मा को भावित करते हुए स्थित देखा। देग्यकर वह बहुत अधिक हृष्ट एव तुष्ट हुई । उसका मन प्रीति से भर आया। हर्ष के चरा से हृदय उरलसित हो उठा । वह उसी समय अपने सिंहासन गुणसिलए चेइए अहापडिरूव उग्गह उग्गिण्डित्ता सनमेण तनसा अप्पाण भावे माण पाप्तइ, पासित्ता हट्ट-तृट्ठ चित्तमाणदिया पीइमगा जान हियया सीहा सणाओ अन्भुटेइ, अभुट्टित्ता पायपीढाओ पच्चोरुड, पच्चोरुहित्ता पाउयाओ ओमुयइ, ओमुइत्ता तित्थगराभिमुही सत्तट्ठपयाड अणुगच्छइ, अणुगन्छित्ता, वाम- जाणु अचेइ, अचिचा दाहिन जाणु धरणियलसि निड चिक्खुत्तोमुदाण धरणिय- लमि निवे सेइ निवेसित्ता कटु एव वयासी) તે સમયે તેણે કેવકલ્પ–સ પૂર્ણ-જબૂલીપ નામના તપને મય જ બૂ દીપને વિપુલ અવધિજ્ઞાનના ઉપયોગથી વારવાર જે તે સમયે તેણે શ્રમ, ભગવાન મહાવીરને જ બૂઢીપમાં આવેલા ભારતના રાજગૃહ નગરના ગુણ શિલક ત્યમ યથાકલ્પ વસતીની આજ્ઞા લઈને સયમ અને તપ દ્વારા પિતાના આત્માને ભાવિત કરતા રહેતા યા જોઈને તે ખૂબ જ હુણ અને તુષ્ટ થઈ ગઈ તેનું મન પ્રેમથી તરબોળ થઈ ગયુ હર્ષાતિરેકથી હૃદય લ્લાસિત થઈ ગયું છે તે જ વખતે પિતાના સિંહાસન ઉપરથી ઉડી અને ઉઠીને તે પાપીઠ - - ७६६ गताप आधपशयानि सम्यामाय, गनाटये पुनरूपमोगायेति, सप्तमिरनीकापिए- तिमिः, पोरशभिः आत्मसारदेवगाहवामिः, अन्यथमिभ कालापनसकमानशकि भिरगुरकुमारदे शामिण साई सपरिरता 'महयाहग जार विस' मनाहा यापद विहरति-' महयाऽऽहयनहगीयराइयततीतरताततरिमयगागपहुप्पामा বা ' মনোনায়নাধৰ বনীন্তনা বৃদি ঘনঘদিনাৰ, तत्र-' महता' रणेतिसम्पन्न , आदवानिम्भपाहतानि यानि नाटयगोतानि, तया-आदितानि-तन्त्री मीणा, तला हस्तताला, तालाकास्यताला, भूति- तानि-शेषाणि तूर्यादिशयानि, तया यस मदत घननिमास्याद् धनमा स चासी पटु प्रादितथेति घनमृदङ्गपदुमनादिता, ततत्रिपदो इन्हा, तेषा यो रसस्तेन-उपलक्षितान् दिव्यान भोगमोगान भन्दादीन भुझाना विहरति । इम चप' अस्मिन्नासरे सलु केरलाल्प-सपूर्णम् जम्मदीप नाम द्वीप-मध्यजन्बूद्वीप विपुलेन 'ओहिगा' माधिनाम्माधिज्ञानेन 'अभोण्माणी २' अमोगयमाना २ पश्यन्ति पुनः पुनरुपयोग ददतीमती पश्यति। किं पश्यति पाह-'तत्य' तत्र अवधिज्ञानोपयोगे श्रमण भगान्त महावीर जम्म्द्वीपे द्वीपे भारते वर्षे राज साथ अनीकाधिपतियों के साथ, सोलह हजार आत्मरक्षक देवों के साथ, तथा और भी बहुत से कालावतसक भवन में निवास करनेवाले असुन रकुमार देयों के एव देवियों के साथ परिवृत होकर रहा करती थी। अधारत (सतत) नाटयगीतों के एव चादित तन्त्री, हस्त, ताल, कास्य ताल, त्रुडित आदि तृर्यादिवाद्यो के एव भेध की ध्वनि जैसे अच्छी तरह पजाये गये मृदंगा के सुन्दर र शब्दों से उपलक्षित दिव्य भोगो को भोगती हुई अपने समय को आनन्द के साथ व्यतीत किया करती थी। (इम च ण केवलकम्प जयुद्दीव दीव विउलेण ओरिणा आभोएमाणी पासइ, तत्व समण भगव महावीर जब होवे दीधे भारहे वासे राधमिई ૩૫ સૈન્યની સાથે અનીકાધિપતિએની સાથે, ળ હાર આત્મરક્ષક દેવની સાથે તેમજ બીજા પણ ઘણા કાલાવત સક ભવનોમાં નિવાસ કરનારા અ9 કુમાર અને દેવીઓની સાથે પરિત થઈને રહેતી હતી તે અગ્રાવ (સા) નાટય ગીત,વાદિત તત્રી, હસ્તતાલ, કાસ્યતાવ, યુડિ વગેરે તુર્થ વગર વા, મેઘના વતિની જેમ સારી પિ વગાડવામાં આવેલા સદશાના સુર શબ્દથી ઉપક્ષિત દિવ્ય ભાગ ઉપગ કરતી પિતાના સમયને સુખેથી પસાર કરતી રહેતી હતી (इम च ण केलकप जद्दो दी विउलेगा मोहिणा आभोएमामी २ पास, तस्थ समणभगर महावीर जबुद्दीवे दीवे पपर * - , - मनगारधर्मामृतषिणी टी० ६० २.१० कालीदेवीपर्णनम नगरे गुणशिल के चैत्ये यथामतिरूप-यथााल्पम् ' उगह ' अग्रह-यसतेराज्ञाम् 'उग्गिण्डित्ता' आगृद्य सयमेन तपसा आत्मान भावयन्त पश्यति, दृष्ट्वा हृष्ट तृष्टचित्तानन्दिता ' पीरमणा' प्रीतिमना प्रसन्नमनस्काः 'जापडियया' यावत्- हर्षवनिसर्पदहदया हर्पयशादुल्लसितह दया रिहासनाद् अभ्युत्तिष्ठति, अभ्युत्थाय पयरे गुणसिलए चेहए अहापडिरूचं उग्गह उग्गिमिहत्ता सजमेण तवसा अप्पाण भावमाण पासइ, पासित्ता चित्तमाणदिया पीइमणा जाव हियया सीहासणाओ अम्भुट्टेट, अभुट्टित्ता पायपीढाओ पच्चोख्रह, पच्चोसहिता पाउयाओ ओमुयइ, ओमुइत्ता तित्वगराभि- मुही सत्तट्ठपयाइ अणुगच्छइ, अणुगच्छित्ता वाम जाणु अचेह, अचित्ता दाहिण जाणुधरणियलसि निटूटु त्तिक्खुत्तो मुद्वाण धरणियलसि निवे सेइ, निवेसित्ता कट्टु एव पयासी) इस अवसर में उसने केवल कल्प-सम्पूर्ण-जबूद्वीप नामके द्वीपको-मध्यजबूद्वीप को-विपुल अवधिज्ञान के द्वारा वार २ उपयोग देकर देखा। उस समय उसने श्रमण भगवान् महावीर को जवूदीपान्तर्गत भरत क्षेत्र में राजगृह नगर मे गुणशिलक चैत्य में यथाकल्प वसति की आज्ञा लेकर सयम एच तप से आत्मा को भावित करते हुए स्थित देखा। देवकर वह बहुत अधिक हृष्ट एव तुष्ट हुई । उसका मन प्रीति से भर आया। हर्ष के वश से हृदय उल्लसित हो उठा । वह उसी समय अपने सिंहासन गुणसिलए चेइए अहापडिरूव उग्गह उगिगण्डित्ता सनमेण तपसा अप्पाण भावे माण पामड, पासिचा हट्ट-तृढ़ चित्तमाणदिया पीइमगा जार ढियया सोहा सणाओ अन्भुटेइ, अभुट्टित्ता पायपीढाओ पच्चोरुहइ, पन्चोरुहित्ता पाउयाओ ओमुयद, ओमुइत्ता तित्थगराभिमुही सत्तट्ठपया अणुगच्छइ, अणुगन्छित्ता, वाम जाणु अचेइ, अचित्ता दाहिज जाणु धरणियलसि निहट्ट त्तिक्खुत्तोमुद्राण धरणिय लमि निवे सेइ निवेसित्ता कठ एव वयासी) તે સમયે તેણે કેવકલ્પ–સ પૂર્ણ-જબૂદ્વીપ નામના દ્વીપને મથે જ બૂ દ્વીપને વિપુલ અવધિજ્ઞાનના ઉપયોગથી વાર વાર જે તે સમયે તેણે શ્રમણ ભગવાન મહાવીરને જ ભૂદ્વીપમાં આવેલા ભરતક્ષેત્રના રાજગૃહ નગરના ગુણ શિલાન્યમા યથાકલ્પ વસતીની આજ્ઞા લઈને સયમ અને તપ દ્વારા પિતાના આત્માને ભાવિત કરતા રહેતા જોયા જોઈને તે ખૂબ જ હું અને તુષ્ટ થઈ ગઈ તેનું મન પ્રેમથી તરબોળ થઈ ગયુ હર્ષાતિરેકથી હૃદય ઉદવાસિત થઈ ગયુ છે તે જ વખતે પિતાના સિંહાસન ઉપરથી ઉડી અને ઉઠીને તે પાપીઠ - ७६६ लावणार आघपशानि सध्यामाय, गनाटो पुन:पमोगापेति, सप्तमिरनोकाभिष- विभिः, पोटमभिः भात्मरकार देगाहवीमिः, अन्यत्रगुमिश्र कालापनमकमवनवामि भिरसुरकुमारः वैदेशीभिध सादं सपरिरता ' मध्याहय जार विह' महलाऽइस यारद् विहरति-' महयाऽऽहमनहगीययाइयतनीनरतालतुरियधगमुगपप्पायर पेण' महताऽऽहतनाटपगीतवादित त-नीततोल हित घनमापदपत्रादितावेम, तत्र- महता' पेणेतिसम्बन्ध , आदानि भव्पादनानि यानि नाटयगीतानि, तथा-वादितानि-तन्त्री मीणा, तला=इम्तवाला, ताला-कास्यताला, शुद्धि तानि-शेपाणि तूर्यादिवायानि, त्या घन र मृदगम्बनध्वनिमारस्याद् वनमा स चासी पटु प्रादितथेति घनमूद्रपदुमयादितः, ततत्रिपदो इन्दः, तेषा यो सस्तेन-उपलक्षितान् दिव्यान् भोगमोगान् शन्दादीन भुनाना विहरति । इम चण' अस्मिन्ननसरे खलु केपलाल्प-सपूर्णम् जम्बूद्वीप नाम द्वीप-मध्यजन्बूद्वीप विपुलेन 'ओहिगा' अधिना=अवधिज्ञानेन 'अमोण्माणी २' अभोगयमाना २ पश्यन्ति पुनः पुनरुपयोग ददती सती पश्यति। किं पश्यति ? इत्याह-'तत्य तत्र अवधिज्ञानोपयोगे श्रमण भगवन्त महावीर जम्मूद्वीपे द्वीपे भारते वर्षे राजगृहे साथ अनीकाधिपतियों के साथ, सोलर हजार आत्मरक्षक देवों के साथ, तथा और भी बहुत से कालावतसक भवन में निवास करनेवाले असु. रकुमार देवों के एर देवियों के साथ परिवृत रोकर रहा करती थी। अव्याहत (सतत) नाट्यगीतों के एव वादित तन्त्री, रस्त, ताल, कास्पताल, त्रुडित आदि तर्यादिवाद्यों के एव मेघ की ध्वनि जैसे अच्छी तरह घजाये गये मृद्गों के सुन्दर र शब्दों से उपलक्षित दिव्य भोगों को भोगती हुई अपने समय को आनन्द के साथ व्यतीत किया करती थी। (इम च ण केवलकप्प जमुद्दीव दीव विउलेण ओहिणा आभोएमाणी २ पासइ, तत्थ समण भगव महावीर जब होवे दीवे भारहे वासे रायगिहे રૂપમેન્યની સાથે અનીકાધિપતિએની સાથે, સોળ હજાર આત્મરક્ષક દેવની સાથે તેમજ બીજા પણ ઘણા કાલાવત સક ભવનમાં નિવાસ કરનારા અર કુમારદેવ અને દેવીઓની સાથે પરિવત થઈને રહેતી હતી તે અગ્રાહત (સાત) નાટય ગીત, વાદિત તત્રી, હસ્તલાલ કાસ્પતાલ, સુડિ વગેર ત વગે વાઘ, મેઘના ઇવનિની જેમ સારી પેઠે વગાડવામાં આવેલા મુદ ગેના સુર શબ્દોથી ઉપલક્ષિત દિવ્ય ભેગોને ઉપભોગ કરતી પિતાના સમયને સુખેથી પસાર કરતી રહેતી હતી (इम चाण केलकप्प जद्दीने दीवै विउलेग भो हेणा आभोएमाणी ? पासइ, तत्थ समणमगर महावीर जबुद्दीवे दीवे , गपरे मनगारधर्मामृतषिणी टी० भु २ च ११ कालीदेवीवर्णनम् ७६९ खलु श्रमणाय भगवते महावीराय यावत् सिद्धिगतिनामधेय स्थान समाप्तुकामाय, बन्दे खलु भगवन्त 'तत्यगय ' तनात-जम्बूद्वीपे राजगृहनगरस्य गुणशिलको घाने समरसतम् इहगा' इहगता-चमरवश्चाराजधानी स्थिताऽहम् , पश्यतु मा भगवान् तरगत दहगतम् , 'ति कट्टु' इति कृत्वो इत्युक्त्वा बन्दते नमस्यति, पन्दित्त्वा नमस्यित्वा सिंहामनवरे 'पुरत्याभिमुही ' पौरस्त्याभिमुग्वी पूर्वदिशाभि मुखी 'निमण्णा' निपगा-उपविष्टा । ततः खलु तस्या काल्या देव्या अयमेत- जाव संपाचिउकामस्स वदामि ण भगवत तत्थ गय इह गया पासउ म भगव तत्थ गए इह गय त्तिकटु वदइ नममह, वदित्ता नमसित्ता सीहामणवरसि पुरत्याभिमुही निसण्णा तएण तीसे कालीए देवीए इमेयाख्वे जाव समुपन्जित्था) यावत् सिद्धिगति नामक स्थान को प्राप्त हुए अहंत भगवतो के लिये मेरा नमस्कार हो। सिद्धिगति नामक स्थान को प्राप्त करने की कामनावाले श्रमण भगवान महावीर को मैं नमस्कार करती हूँ। जबूढीप में राजगृह नगर के गुणशिलक उद्यान में इस समय विराजमान उन भगवान को मैं इस चमर चपा नाम की राजधानी में रही हुई नमस्कार कर रही हूँ। वहा पर रहे हुए वे प्रभु मुझे यहा पर रही हुई देखे। इस प्रकार कहकर उसने उनको वदना की -नमस्कार कियो-वदना नमस्कार करके फिर वह अपने उत्तम सिंहा- सन पर आकर पूर्व दिशाकी ओर मुंह करके बैठ गई। इसके बाद उस काली देवी के यर इस प्रकार का यावत् मनः सकल्प उत्पन्न हुआ- (सेय खलु मे समण भगव महावीर वदित्ता जाव पज्जुवासित्तए त्ति तत्थ गए इह गय ति का बदइ नममइ, दिना, नमसित्ता सीहामणवरमि पुरत्याभिमुही निसण्णा-तएण तीसे कालीए देवीए इमेयारूवे नावि समुप्पज्जित्था) યાવત્ સિદ્ધગતિ નામક સ્થાનને પ્રાપ્ત થયેલા અહંત ભગવ તેને મારા નમસ્કાર છે સિદ્ધગતિ નામક સ્થાનને મેળવવાની કામનાવાળા શ્રમણ ભગવાન મહાવીરને હું નમભ્યાર કરૂ છુ જ બૂ દ્વીપના રાજગૃહ નગરના ગુણશિલક ઉધાનમાં અત્યારે વિરાજમાન તે ભગવાનને હુ આ ચમરચ ચા નામની રાજ ધાનીમાં રહેતી નમસ્કાર કરી રહી છુ ત્યા વિરાજમાન તે પ્રભુ અહીં રહેતી મને જુએ આ પ્રમાણે કહીને તેણે તેમને વદન કર્યા અને નમસ્કાર કર્યો વદન અને નમસ્કાર કરીને તે પિતાના ઉત્તમ સિંહાસન ઉપર આવીને પૂર્વ દિશા તરફ મુખ કરીને બેસી ગઈ ત્યારપછી તે કાળી દેવીને આ જાતને થાવત્ મન સક૫ ઉત્પન્ન થયે કે- बा.९५ ७१८ . 1 . पादपीठान् पचोर हा प्रत्यारोहनिभातरति, स्पानोर्य पाउपातो' पादुके 'भोयर ' अप्रमुथति पग्यिाति, मुस्ता तीर्थकरामिपुवी सतीमप्या एपदानि अणुग इ' अनुगन्धति-गम्य ग उति. अनुगम्य बाम जाई अवेइ' अन्नति-उभी रोनि, अनिवा-उपकृत्य दक्षिण जानु धरणितले 'निष्टु' नित्य-स्थापयित्या 'निसुनो' नि: कल त्रिवारम् 'मुदाण' मूर्धान गस्ता धाणितले निवेशयनि-गनि, निवेश्य ईसि प चुण्णमा' ईप स्वत्यानमति-रतोष शिरोनामयति, मत्यानम्प 'यडयढियथमिगाओ' कटकटित स्तम्भिते क्टके-करभूपणे तत्रितेचा भूरणे ते स्तम्मिने-अप्रष्टये भूयाओ' भुजे 'गाहरइ ' सदरनि-एकत्रीकरोति, सह-य करयल जाव बहु' करतलपरि गृहीत शिर आर्त मस्तकेऽअलि पा एमादीत्-'नमोत्थुण' इत्यादि- नमोऽस्तु खलु आभ्यः यारद् सिदिगतिनामय स्थान सम्माप्तेभ्यः, नमोऽस्तु से उठी-और उठकर वह पादपीट से शेकर नीचे आई-नीचे आकर उसने दोनों पादुकाओं को पैरों में से उतार दिया। उत्तार कर फिर यह तीर्थकरराधिष्ठित दिशा की ओर मात आठ पद आगे गई। वहा आकर उसने अपने याम जानु को ऊंचा किया-ऊंचा कर के फिर दक्षिण जानु को नीचे धरणीतल मे रसा-रखकर फिर तीन बार अपने मस्तक को नीचे भूमिपर लगाया-लगाकर फिर वह कुछ झुकी-शिर को नीचे- नवाया। याद मे कटक और पुटित से भूपित भुजाओ को एकत्रित किया-एकत्रित करके फिर उसने उन दोनों हाथोंकी अजलि बनाई-और उरो मस्तक पर आदक्षिण प्रदक्षिण कर इस प्रकार कहो (नमोत्थुण अरहताण जाव सपताण नमोत्थुण समणस भगवओ महावीरस्स ઉપર થઈને નીચે આવા નીચે આવીને તેણે બને પાદુકાઓને પગમાથી તારી દીધી ઉતારીને તે તીર્થંકર જે દિશા તરફ વિરાજમાન હતા તે દિશા તરફ સાત-આઠ ડગલા આગળ ગઈ ત્યાં જઈને તેણે પિતાના ડાબા ઢીંચને ઊંય કે ઊંચો કરીને પછી તેણે જમણા રણને નીચે પૃથ્વી ઉપર ટેક ટેકવીને તેણે જણ વખત પિતાના સ ત નીચે પૃથ્વી ઉપર ટેકવ્યું, તે શેડી નમી-મસ્તકને નીચે નમાવ્યું ત્યારપછી તેણે કટક અને બુદિતથી વિભૂષિત ભુજાઓને ભેગી કરી, કરીને તેણે તેઓ બનેની આ જલિ બનાવી અને તેને મસ્તક ઉપર આદક્ષિણ પક્ષિણ-પૂવ કરીને આ પ્રમાણે કે (नमोत्थुण अरहताण जाव सपत्ताण नमोत्थुण समणस्स भगरी महा- वीरस्म जान सपाविउकामस्स पदामिण भगवत तत्थगय ह गया ટેકવીને म भगव - , मनगारधर्मामृतवर्षिणी टी० श्रु २ घ ११ कालीदेवीवर्णनम् ७६९ खलु श्रमणाय भगवते महावीराय यावत् सिद्धिगतिनामवेय स्थान समाप्तुकामाय, वन्दे खलु भगवन्त 'तत्यगय ' तरगत जम्बूद्वीपे राजगृहनगरस्य गुणशिलको धाने समरसृतम् इहगा' इहगता-चमरचञ्चाराजधानी स्थिताऽहम् , पश्यतु मा भगवान् तगत इहगतम् , 'त्ति कटु' इति कृत्वा इत्युक्त्वा वन्दते नमस्यति, पन्दित्वा नमस्यित्वा सिंहासनारे 'पुरत्याभिमुही 'पोरस्त्याभिमुग्वी पूर्वदिशाभि मुखी 'निमण्णा' निपणा-उपविधा । तत. खलु तस्या काल्या देव्या अयमेत- जाव मपाविउकामस्स वदामिण भगवत तत्थ गय इह गया पासउ म भगव तत्थ गए इद गय तिकटु वदह नममइ, वदित्ता नमसित्ता सीहामणवरसि पुरत्याभिमुही निसपणा तएण तीसे कालीए देवीए इमेयारूवे जाव समुपजिजधा) यावत् सिद्धिगति नामक स्थान को प्राप्त हुए अंत भगवतो के लिये मेरा नमस्कार हो । सिद्धिगति नामक स्थान को प्राप्त करने की कामनावाले श्रमण भगवान महावीर को मै नमस्कार करती है। जद्वीप में राजगृह नगर के गुणशिलक उद्यान में इस समय विराजमान उन भगवान को मै इस चमर चपा नाम की राजधानी में रही हुई नमस्कार कर रही हैं। वहा पर रहे हुए वे प्रभु मुझे यहा पर रही हुई देखे। इस प्रकार कहकर उसने उनको वदना की -नमस्कार कियो-वदना नमस्कार करके फिर वह अपने उत्तम सिंहा- सन पर आकर पूर्व दिशाकी ओर मुंह करके बैठ गई। इसके बाद उस काली देवी के यह इस प्रकार का यावत् मनः सकल्प उत्पन्न हुआ- (सेय खलु मे समण भगव महावीर वदित्ता जाव पज्जुवासित्तए त्ति तत्य गए इह गय ति कटु दइ नममइ, दित्ता, नमसिता सीहामणवरसि पुरत्याभिमुही निसण्या-तएण तीसे कालीए देवीए इमेयारूवे जावि समुप्पज्जित्था) યાવત્ સિદ્ધગનિ નામક સ્થાનને પ્રાપ્ત થયેલા અહંત ભગવ તેને મારા નમસ્કાર છે સિદ્ધગતિ નામક સ્થાનને મેળવવાની કામનાવાળા શ્રમણ ભગવાન મહાવીરને હું નમાર કરૂ છુ જ બૂ હીપના રાજગૃહ નગરના ગુણશિલક ઉવાનમાં અત્યારે વિરાજમાન તે ભગવાનને હુ આ ચમરચ ચા નામની રાજ ધાનીમાં રહેતી નમસ્કાર કરી રહી છુ ત્યા વિરાજમાન તે પ્રભુ અહીં રહેતી મને જુએ આ પ્રમાણે કહીને તેણે તેમને વદન કર્યા અને નમસ્કાર કર્યા વદન અને નમસ્કાર કરીને તે પિતાના ઉત્તમ સિંહાસન ઉપર આવીને પૂર્વ દિશા તરફ મુખ કરીને બેસી ગઈ ત્યારપછી તે કાળી દેવીને આ જાતને થાવત્ મન સ કપ ઉત્પન્ન થયે કે- - . - अवेइ - . . ७१८ ताच्या पादपीठात् 'पोरहा' प्रयोदनि-पातरति, स्यारुपातोर्य पाउयातो' पादुके 'ओयह ' अरमुश्चतिरित्याति, मुस्त्या वीयरामिपुपरी सतीमप्ना एपदानि 'अणुगर' अनुगच्छतिसम्मुसंगछति, अनुगम्य वाम जानु ' अश्यति उभी रगेनि, अनिता-उपत्य दक्षिण जानु घरणितले 'निष्टु' नित्य-न्यापयित्वा तिगुनो 'नि: त्यानिधारम् ' मुद्राण' मृान-मस्ता घरणितले निवेशयनि-लगति, निवेश्य ईमि प णमइ 'ईप लत्यानमति-स्तीफ शिरोनामयति, मत्यानभ्य 'पडपटियथभियानो' टिकटित स्तम्भिते कटके-करभूपणे तुत्रिते पाहुभूपणे तैः स्तम्मिोन्माष्टो' भुयाओ भुजे 'साहरइ ' सहरति एकत्रीकरोति, सह-य करयल जाप कटु' करतलपारि गृहीत गिर आप मस्तकेऽञ्जलि का जमनादीत्-'नमोत्थुग' इत्यादि- नमोऽस्तु खलु अदम्प यारद् सिदिगतिनामधेय स्थान सम्माप्त यः, नमोऽस्तु से उठी-और उठकर वह पादपीट से शेकर नीचे आई-नीचे आकर उसने दोनों पादुकाओं को पैरों में से उतार दिया। उतार कर फिर वह तीर्थकरराधिष्ठित दिशा की ओर मात आठ पद आगे गई। वा आकर उसने अपने याम जानु को ऊंचा किया-ऊंचा कर के फिर दक्षिण जानु को नीचे धरणीतल में रग्बा-रखकर फिर तीन बार अपने मस्तक को नीचे भूमिपर लगाया-रगाकर फिर वह कुछ झुकी-शिर को नीचे- नघाया। बाद में कदक और त्रुटित से भूपित भुजाओं को एकत्रित किया-एकत्रित करके फिर उसने उन दोनों हाथोंगी अजलि बनाई-और उसे मस्तक पर आदक्षिण प्रदक्षिण कर इस प्रकार कहो (नमोत्थुण अरहताणं जाय सपताण नमोत्थुण समणस भगवओ महावीरस्स ઉપર થઈને નીચે આવા નીચે આવીને તે બને પાદુકાઓને પગમાથી ઉતારી દીધી ઉતારીને તે તીથ કર દિશા તરફ વિરાજમાન હતા તે દિશા તરફ સાત-આઠ ડગલા આગળ ગઈ ત્યા જઈને તેણે પોતાના ડાબા ઢીંચને ઉો કર્યો ઊંચો કરીને પછી તેણે જમણા ઢીચણને નીચે પૃથ્વી ઉપર ટેકવ્યે ટેકવીને તેણે ત્રણ વખત પિતાના મ તકને નીચે પૃથ્વી ઉપર ટેક૭, તે થેડી નમી-મસ્તકને નીચે નમાવ્યું ત્યારપછી તેણે કટક અને ગુતિથી વિભૂષિત ભુજાઓને ભેગી કરી, ભેગી કરીને તેણે તેઓ બનેની અ જલિ બનાવી અને તેને મસ્તક ઉપર આદક્ષિણ પ્રદક્ષિણ-પૂર્વ ફેરવીને આ પ્રમાણે છે (नमोत्थुण अरहताण नाव सपत्ताण नमोत्युण समणस्स भगाओ महा वीरस्म जान सपाविउकाम वदामि ण भगवत तत्यगय ह गया .. म भगव 24ौन भमगारधर्मामृतवषिणो टी० शु. २ ० १ १०१ कालीदेवीवर्णनम् ७७१ प्रत्यर्पयन्ति-तढाज्ञानुमारेण कार्य कृत्वा निवेदयन्ति । 'र' नारं-विशेष स्त्वयम्-यत्-सूर्याभस्य यानविमान योजनशतसहस्रविस्तीर्णमस्ति, अस्यास्तु- योजनसहस्र विस्तीर्ण यानविमानमरित, शेप तथैव विनेयम् । तथैर-सूर्याभदेववदेव काली देवी स्त्रस्य नामगोन साधयतिमययति । तथैव-मूर्याभदेवदेव च नाटय- विधिम् उपदर्शयति, उपदय यावत् प्रतिगतान आगता तत्रैव प्रतिनिवृत्ता।।०२।। मूलम-भतेत्ति भगव गोयमे समण भगव महावीर वदइ णमसइ वदित्ता णमसित्ता एव वयासी कालिए णं भंते । देवीए सा दिव्या देविड्डी३ कहि गया० कूडागारसालादिट्टतो, कि जब वर विमान बनकर तैयार हो जावे-तय उसकी पीछे हमें ख़बर कर देना। सो उन आभियोगिक देवो ने वैसा ही किया-और पीछे इसकी बार उसे कर दी। इसमे (जोयणमहम्मवित्यिण्ण जाणविमाण सेस तहेव) विशेषता इतनी रही कि सूर्याभदेव का यान विमान एक लास योजन का विस्तारवाला था। तर कि इमका यह यान विमान १ हजार योजन का विस्तारवाला था। याकी सर रचना इसकी उसी सूर्याभ विमान की तरह जाननना चाहिये । (तहेव गामगोय साहेइ, तहेव नोटयविहिं उबदसेठ जाव पडिगया) सूर्याभ देव की तरह काली देवी ने अपने नाम गोत्र का कथन किया और मर्याभ देव की तरह ही नाटयविधि को दिखलाया दिखालाकर फिर वह जहा से आई थी वहीं पर पीछे गई सूत्र २॥ વિમાન તૈયાર થઈ જાય ત્યારે તેની મને જાણ કરવામાં આવે ત્યારપછી તે આભિગિક દેવેએ તેમજ કર્યું અને વિમાન તૈયાર થઈ જવાની ખબર દેવીની પાસે મોકલાવી દીધી मा विमानमा (जोयणसहस्सवित्यिण जाण विमाण सेस व्हेन) विशेषता भासी । ती न्यारे सूर्याभवनु यान- વિમાન એક લાખ જન જેટલુ વિસ્તારવાળું હતું ત્યારે તેનું આ યાન-વિમાન એક હજાર એજન જેવુ વિસ્તારવાળુ હનુ બાકી રચના સ બધી તેની બધી विगत सूर्याल-विभाननी भर तो (तहेव णामगोय साहेइ, सहेव नाटयविहिं उबदसेइ जाव पहिगया ) सूर्याजी भजी वा પિતાના નામ-શેત્રનું કથન કર્યું અને સૂર્યાભદેવની જેમ જ નાટયવિધિ બતાવી અને બતાવીને તે જવાથી આવી હતી ત્યાં જ પાછી જતી રહી સૂત્ર ૨ છે ७० जाताधर्मव्या भूपः यारत् मनः-सहल मादाया-गागलु मम श्रमगं मगन मापी पन्दित्ता यारत् । पशुपामितप ' पर्युपामितुम् रोपितम् , अनि कतातिमनसि- निधाय एवम् उक्तरीत्या 'महे' सम्प्रेम-विवारयनि मध्य-विचार्य 'आभिभोगिणदेवे' आभियोगिकान देवान-पदेगा। पदयति आरपति, शदयित्वा-माहूय एमपदन्-०३ सट हे देशानुपियाः ! श्रमणो भगवान महा धीरः एच गया मूर्यामस्तथैव आगानिमा ददानि यापन दिव्य सुम्पराभिगमन योग्य 'जाणपिमाण' यानपिमान यानाय गमनाथरिमान कुरुत, कसा यावद- ममाशा 'पचप्पिणहमत्यर्पयामदा नियत । तेऽपिदेवाः तथा कत्वा यावत् फट्टु ण्व मपेहेह सरिता आमिभोगिरा देवे महावेह, महावित्ता एवं घयासी एव पलु देवाणुप्पिया समणे भगर महावीर एव जहा सूरि याभो तहेव आणत्तिय देव जार दिप सुरवभिगमणजोग्गं जाण विमाण करेह, फरित्ता जार पचनप्पिणा ) मुझे भर यही उचित-श्रय स्कर है-कि मैं श्रमण भगवान महावीर को बदना करके यावत् उनकी पर्युपासना करूँ इस प्रकार उसने पूर्णतरूप से विचार किया। विचार करके उसने उसी समय आभियोगिक देवों को बुलाया और घुलाकर उससे इस प्रकार कहा-हे देवानुमित्रों! श्रमण भगवान महावीर राज गृह नगर के गुणशिलक उद्यान में पधारे हुए हैं-मैं उनको वदना करने के लिये जाना चाहती -अत. तुमलोग मेरे लिये दिव्य सुरवराभिग मन योग्य एकयान-विमान तैयार करो इस प्रकार की उसने उन्हें सूर्याभ देव की तरह आज्ञा दी। और स्थान में उनसे यह भी कह दिया (सेय खलु मे समण भगर महावीर वदित्वा जाव पज्जुवासित्तए तिकडु एव स पेहेइ, सपेहिचा आभिभोगिए देवे सदावेद, सदारिता एव पयासी एवं खलु देवाणुप्पिया ! समणे भगव महावीरे एव जहा सरियाभो तहेव आणत्तिय दे जावं दिव्य सुरवराभिगमणजोग्ग जाणविमाण करेह, करिता जाब पच्चप्पिणह) મારા માટે હવે એક વાત ચોગ્ય છે કે હુ શ્રમણ ભગવાનમાં વીરને વદન કરીને વાવત તેમની પાસના કરે, આ પ્રમાણે તેણે વિચાર કર્યો વિચાર કરીને તેણે તરત જ અભિગિક દેરોને બોલાવ્યા અને બેલા વીને તેમને આ પ્રમાણે કહ્યું કે હે દેવાનુપ્રિયે ! રાજગૃહ નગરના ગુણશિલાક ઉધાનમાં પધારેલા છે તેમને વદન કરવા માટે ત્યાં જવા ઈચ્છું છું એથી તમે બધા મારા માટે દિલ સુરવરભિગમન યેગ્ય એક યાન-વિમાન તૈયાર કરે આ પ્રમાણે તે લોકોને તેણે સૂર્યદેવનું જેમ આજ્ઞા કી, અને સાથે સાથે તેને તે આ પ્રમાણે કહ્યું કે જ્યારે - શ્રમણ ભગવાન મહાવીર मेनगारधर्मामृताधणो टी0 श्रु० २ ० १ ० १ कालीदेवीवर्णनम् तएणं सा कालिया दारिया अम्मापिईहि अब्भणुन्नाया समाणी हट्ट जाव हियया पहाया कयवलिकम्मा कायकोउय मगलपायच्छित्ता सुद्धप्पवेसाइ मगल्लाइं वत्थाइ पवर परिहिया अप्पमहाग्याभरणालंकियसरीराचेडियाचकवालपरिकण्णासाओ गिहाओ पडिनिक्खमइ पडिनिक्खमित्ता जेणेव वाहिरिया उव- ठाणसाला जेणेव धम्मिए जाणप्पवरे तेणेव उवागच्छइ उवा- गच्छित्ता धम्मिय जाणपवरं दूरूढा, तएण सा काली दारिया धम्मिय जाणपवरं एवं जहा दोवइ जाव पज्जुवासइ, तएणं पासे अरहा पुरिसादाणीए कालीए दारियाए तीसे य महइ- महालयाए परिसाए धम्म कहेइ, तएणं सा काली दारिया पासस्स अरहओ पुरिसादाणीयस्म अतिए धम्म सोच्चा णिस- म्म हट्ट जाव हियया पास अरहं पुरिसादाणीयं तिक्खुत्तो वदइ नमसइ वदित्ता नमंसित्ता एव वयासी-सदहामिण भते ! णिग्गंथ पावयण जाव से जहेय तुभं क्यह, जं णवरं देवाणु- पिया | अम्मापियरो आयुच्छामि, तएण अह देवाणुप्पियाण अतिए जाव पव्वयामि, अहासुह देवाणुप्पिए ।, तएण सा काली दारिया पासेणअरहयापुरिसादाणीएण एव वुत्ता समाणी हट्ट जाव हियया पास अरह वदइ नमंसह वंदित्ता नमंसित्ता तमेव धम्मियं जाणपवर दूरुहइ दूरुहित्ता पासस्स अरहओ पुरि. सादाणीयस्स अतियाओ अवसालवणाओ चेइयाओ पडिनि- क्खमइ पडिनिक्खमित्ता जेणेव आमलकप्पा नयरी तेणेव ए७२ সামন্তবাদ अहो णं भंते ! काली देवी महिदिया३ कालिए ण भंते ! देवीए सा दिव्या देविड्डी३ किण्णा लद्धा किण्णा पत्ता किण्णा अभि समपणागया ?, एवं जहा सूरियाभस्त जाव एव सलु गोयमा! तेण कालेणं तेणं समएण इहेव जद्दीचे दोरे भारहे वासे आम लकप्पा णाम जयरी होत्था वण्णओ अंबसालवणे चेइए जिय सत्तू राया तत्थ ण आमलकप्पाए. नयरीए काले नाम गाहा वइ होत्था अड्डे जाव अपरिभूए, तस्स णं कालस्स गाहावइस्स कालसिरी णाम भारिया होत्था, सुकुमाल जाव सुरूवा, तस्त ण कालस्त गाहावइस्स धूया कालसिरीए भारियाएअत्तया काली णाम दारिया होत्था, वुड्डा वुट्टकुमारी जुण्णाजुण्णकुमारी पडि यपुयत्थणी णिविन्नवरा वरपरिवजियायावि होत्था, तेणं कालेणं तेण समएणं पासे अरहा पुरिसादाणीए आइगरे जहा बद्धमा- णसामी णवरं णवहत्थुस्सेहे सोलसहिं समणताहस्तीहि अट्टत्ती- साए अज्जियासाहस्सीहि सद्धि सपरिवुडे जाव अंबसालवणे समोसढे परिसा णिग्गया जाव पज्जुवासइ, तएणं सा काली दारिया इमीसे कहाए लट्ठा समाणी हटु जाव हियया जेणेव अम्मापियरो तेणेव उवागच्छइ उवागच्छिन्ता करयल जाव एवं वयासी एव खलु अम्मयाओ। पासे अरहा पुरिसादाणीप आइगरे जाव विहरइ, तं इच्छामि ण अम्मयाओ | तुब्भेहि अब्भणुन्नाया समाणी पासस्स अरहओ पुरिसादाणीयस्सपाय- वदिया गमित्तए ? अहासुह देवाणप्पिया! मा पडिबध करेहि, ० ઉડર नगारधर्मामृतपिणी टी० श्रु० २ ० १ ० १ कालीदेवीवर्णनम् तएणं सा कालिया दारिया अम्मापिईहि अन्मणुन्नाया समाणी हट्ट जाव हियया व्हाया कयवलिकम्मा कायकोउय मंगलपायच्छित्ता सुद्धप्पवेसाइ मगल्लाइं वत्थाइ पवर परिहिया अप्पमहाग्घाभरणालकियसरीराचेडियाचकवालपरिकिण्णा साओ गिहाओ पडिनिक्खमइ पडिनिक्खमित्ता जेणेव वाहिरिया उव- ठाणसाला जेणेव धम्मिए जाणप्पवरे तेणेव उवागच्छद उवा- गच्छित्ता धम्मिय जाणपवर दूरूढा, तएण सा काली दारिया धम्मिय जाणपवर एव जहा दोवइ जाव पज्जुवासड, तएणं पासे अरहा पुरिसादाणीए कालीए दारियाए तीसे य महइ- महालयाए परिसाए धम्म कहेइ, तएण सा काली दारिया पासस्स अरहओ पुरिसादाणीयस्म अतिए धम्म सोच्चा णिस- म्म हट्ट जाव हियया पास अरहं पुरिसादाणीयं तिक्खुत्तो वदइ नमसइ वदित्ता नमंसित्ता एव वयासी-सदहामिण भते । णिगंथ पावयण जाव से जय तुब्भ क्यह, ज णवरं देवाणु- प्पिया । अम्मापियरो आपुच्छामि, तएणं अह देवाणुप्पियाण अतिए जाब पव्वयामि, अहासुह देवाणुप्पिए ।, तएण सा काली दारिया पासेणअरहयापुरिसादाणीएण एव वुत्ता समाणी हट्ट जाव हियया पास अरह वदइ नमंसह वदित्ता नमसित्ता तमेव धम्मिय जाणपवर दूरुहइ दूरुहित्ता पासस्स अरहओ पुरि- सादाणीयस्स अतियाओ अवसालवणाओ चेइयाओ पडिनि- पखमइ पडिनिक्खमित्ता जेणेव आमलकप्पा नयरी तेणेव ८७२ -- सापडया अहो णं भते ! काली देवी महिट्टिया३ कालिए ण भते । देवीए सा दिव्या देविट्टी३ किण्णा लखा किण्णा पत्ता किपणा अभि समण्णागया ?, एव जहा सूरियाभस्म जाव एवं खलु गोयमा! तेण कालेणं तेणं समएण इहेव जद्दीचे दोरे भारहे वासे आम लकप्पा णाम णयरी होत्था वपणओ अंबसालवणे चेइए जिय सत्तू राया तत्थ णं आमलकप्पाए नयरीए काले नाम गाहा वइ होत्था अड्डे जाव अपरिभूए, तस्स णं कालस्स गाहावइस्स कालसिरी णाम भारिया होत्था, सुकुमाल जाव सुरूवा, तस्स ण कालस्स गाहावइस्स धूया कालसिरीए भारियाएअत्तया काली णाम दारिया होत्था, वुड्डा बुट्टकुमारी जुण्णाजुण्णकुमारी पडि. यपुयत्थणी णिविन्नवरा वरपरिवज्जियायावि होत्या, तेणं कालेणं तेण समएणं पासे अरहा पुरिसादाणीए आइगरे जहा बद्धमा- णसामी णवर णवहत्थुस्सेहे सोलसहि समणलाहस्तीहि अटुत्ती- साए अज्जियासाहसीहि सद्धि सपरिवुडे जाव अबसालवणे समोसढे परिसा णिग्गया जाव पज्जुवासइ, तएणं सा काली दारिया इमीसे कहाए लट्ठा समाणी हट्टु जाव हियया जेणेव अम्मापियरी तेणेव उवागच्छइ उवागच्छित्ता करयल जाव एवं वयासी एव खलु अम्मयाओ। पासे अरहा पुरिलादाणीए आइगरे जाव विहरइ, तं इच्छामि ण अम्मयाओ । तुब्भेहि अब्भणुन्नाया समाणी पासस्स अरहओ पुरिसादाणीयस्सपाय- वादिया गमित्तए ? अहासुह देवाणुप्पिया। मा पडिबध करेहि, ७७३ अनगारधर्मामृतवपिणी टी० शु० २ ० १ ० १ कालीदेवीवर्णनम् तएण सा कालिया दारिया अम्मापिईहि अभणुन्नाया समाणी हट्ट जाव दियया पहाया कयवलिकम्मा कायकोउय मंगलपायच्छित्ता सुद्धप्पवेसाइ मगल्लाई वत्थाइ पवर परिहिया अप्पमहाग्घाभरणालकियसरीराचेडियाचकवालपरिकिण्णासाओ गिहाओ पडिनिक्खमइ पडिनिक्खमित्ता जेणेव वाहिरिया उव- ठाणसाला जेणेव धम्मिए जाणप्पवरे तेणेव उवागच्छइ उवा- गच्छित्ता धम्मिय जाणपवरं दूरूढा, तएण सा काली दारिया धम्मिय जाणपवर एवं जहा दोवइ जाव पज्जुवासड, तएणं पासे अरहा पुरिसादाणीए कालीए दारियाए तीसे य महइ- महालयाए परिसाए धम्म कहेइ, तएणं सा काली दारिया पासस्स अरहओ पुरिसादाणीयस्म अतिए धम्म सोच्चा णिस- म्म हट्ट जाव हियया पास अरहं पुरिसादाणीयं तिक्खुत्तो वदइ नमसइ वदित्ता नमसित्ता एव वयासी-सदहामि णं भते । णिग्गंथ पावयण जाव से जा तुम्भ वयह, ज णवरं देवाणु- प्पिया । अम्मापियरो आपुच्छामि, तएण अह देवाणुप्पियाणं अतिए जाव पव्वयामि, अहासुह देवाणुप्पिए ।, तएण सा काली दारिया पासेग अरहयापुरिसादाणीएण एव वुत्ता समाणी हट्ट जाब हियया पास अरह बदइ नमसह वदित्ता नमंसित्ता तमेव धम्मिय जाणपवर दूरुहइ दूसहित्ता पासस्स अरहओ पुरि- सादाणीयस्स अंतियाओ अवसालवणाओ चेइयाओ पडिनि- क्समइ पडिनिक्खमित्ता जेणेव आमलकप्पा नयरी तेणेव
ای
हाताधर्मया
उपागच्छद उवागच्छित्ता आमलकप्पणयरिं मनमज्ञणंजेणेव
चाहिरिया उपहाणसाला तेणेव उपागच्छद उवागच्छित्ता ध
म्मियं जाणपवर ठवेइ ठवित्ता धम्मियाओ जाणप्पवराओ
पच्चोरहइ पच्चोरुहिता जेणेव अम्मापियरा तेणेव उवागच्छइ
उवागच्छित्ता करयल० एव वयासी-एव खल्लु अम्मयाओं।
मए पासरस अरहओ अंतिए धम्म णिसते सेऽत्रि य मे धम्मे
इच्छिए पडिच्छिए अभिरुइए, तएणं अह अम्मयाओ । संसार
भउविग्गा भीया जम्मणमरणाणं इच्छामि गं तुभेहि अब्भ
गुन्नाया समाणी पासस्स अरहओ अंतिए मुडा भवित्ता अगा
राओ अणगारिय पपइत्तए, अहासुहं देवाणुप्पिया । मा पडि.
वध करेह, तएण से काले गाहावई विपुलं असणं४ उवक्ख
डावेइ उवक्खडावित्ता मित्तणाइ णियगसयणसवधिपरियण
आमतेइ आमत्तित्ता तओ पच्छा पहाए जाव विपुलेणं पुप्फब
स्थगंधमल्लालंकारेण सकारत्ता सम्माणेत्ता तस्सेव मित्तणाइणि
यगसयणसबंधिपरियणस्स पुरओ कालिय दारिय सेयापीएहि
कलसेहि ण्हावेइ हावित्ता सव्वालकारविभूसिय करेइ करिता
पुरिससहस्सवाहिणिय सीय दुरोहेइ दुरोहिता मित्तणाइणियग
सयणसंबधिपरियणेणं सद्धिं सपरिवुडे सठिवड्डीए जाव स्वर्ण
आमलकप्प नयरि मज्झ मझेणं जिग्गच्छइ, णिग्गच्छिता
जेणेव अवसालवणे चेइए तेणेव उवागच्छद उवागच्छित्ता
छत्ताइए तित्थगराइसए पासई पासित्ता सीय
ठाविचा
७७५ . अनगारधर्मामृतधषिणी टीका श्रु०२ ३०१ अ० १ कालीदेवीवर्णनम् कालियंदारिय सीयाओ पचोरुहइ तएणं त कालिय दारिय अम्मा- पियरो पुरओ काउ जेणेव पासे अरहा पुरिसा० तेणेव उवागच्छइ उवागच्छित्ता वदइ नमसइ वदित्ता नमसित्ता एवं वयासी- एव खल्लु देवाणुप्पिया | काली दारिया अम्ह धूया इहा कता जाव विमग पुण पासणयाए १, एसणं देवाणुप्पिया। ससार भउबिगा इच्छइ देवाणुप्पियाणं अतिए मुडा भवित्ता जाव पव्वइत्तए, त एय णं देवाणुप्पियाणं सिस्सिणिभिवख, दल- यामो पडिच्छतु णं देवाणुप्पिया। सिस्सिणिभिक्ख, अहासुह देवाणुप्पिया । मा पडिबधं करेह तएणं काली कुमारी पास अरह बदइ नमसइ वदित्ता नमंसित्ता उत्तरपुरस्थिम दिसिभार्ग अबकमइ अवकमित्ता सयमेव आभरणमटालकार ओमुयइ ओमुइत्ता सयमेव लोय करेइ करित्ता जेणेव पासे अरहा पुरि- सादाणीए तेणेव उवागच्छइ उवागच्छित्ता पास अरह तिक्खुत्तो वंदइ नमसइ वदित्ता नमसित्ता एवं क्यासी-आलित्ते ण भते । लोए एव जाव सयमेव पवाविया, तएण पासे अरहा पुरिसादाणीए कालिं सयमेव पुप्फचूलाए अज्जाए सिस्सिणियत्ताए दलयइ, तएण सा पुप्फचूला अज्जा कालि दारिय सयमेव पवावेइ, जाव उवसपज्जित्ताण विहरइ, तएणं सा काली अज्जा जाया ईरियासमिया जाव गुत्तवभयारिणी, तएण सा काली अज्जा पुप्फचूलाए अज्जाए अतिए सामाइय- माइयाइ एकारस अगाइ अहिज्जइ बहूहि चउत्य जाब विहरइ॥सू०३॥
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७७५ अनगारधर्मामृतवषिषी टीका भु० २ ०१ ० १ कालीदेवीवर्णनम् कालियंदारिय सीयाओ पञ्चोरुहइ ताणं त कालिय दारिय अम्मा- पियरो पुरओ काउ जेणेव पासे अरहा पुरिसा० तेणेव उवागच्छइ उवागच्छित्ता वदइ नमसइ वदित्ता नमसित्ता एवं वयासी- एव खलु देवाणुप्पिया । काली दारिया अम्ह धूया इहा कता जाब विमग पुण पासणयाए ', एसणं देवाणुप्पिया। संसार भउठिवगा इच्छइ देवाणुप्पियाणं अंतिए मुडा भवित्ता जाव पव्वइत्तए, त एय णं देवाणुप्पियाणं सिस्सिणिभिक्ख, दल- यामो पडिच्छतु णं देवाणुप्पिया। सिस्सिणिभिक्ख, अहासुह देवाणुप्पिया । मा पडिबधं करेह तएणं काली कुमारी पास अरह वदइ नमसइ वदित्ता नमंसित्ता उत्तरपुरस्थिमं दिसिमागं अवकमइ अवक्कमित्ता सयमेव आभरणमल्लालकार ओमुयइ ओमुइत्ता सयमेव लोय करेइ करित्ता जेणेव पासे अरहा पुरि- सादाणीए तेणेव उवागच्छइ उवागच्छित्ता पास अरह तिकखुत्तो वदइ नमसइ वदित्ता नमसित्ता एव वयासी-आलित्ते ण भते । लोए एवं जाव सयमेव पवाविया, तरण पासे अरहा पुरिसादाणीए कालि सयमेव पुप्फचूलाए अज्जाए सिस्सिपियत्ताए दलयइ, तएण सा पुप्फचूला अज्जा कालि दारिय सयमेव पवावेइ, जाव उवसपज्जित्ताण विहरइ, तएणं सा काली अज्जा जाया ईरियासमिया जाव गुत्तवभयारिणी, तएणं सा काली अज्जा पुप्फचूलाए अजाए अतिए सामाइय- माइयाइ एक्कारसअगाई अहिज्जइ बहूहि चउत्थ जाव विहरइ॥सू०३।।
७४४ নাম उबागच्छइ उवागच्चित्ता आमलकप्प णयरि मझमझेणं जेणेव वाहिरिया उबटाणसाला तेणेव उवागच्छद उवागच्चित्ता म्मियं जाणपवर ठवेइ ठवित्ता धम्मियाओ जाणपत्रराओं पच्चोरुहइ पच्चोरुहिता जेणेव अम्मापियरा तेणेव उवागच्छइ उवागच्छित्ता करयल० एवं क्यासी-एवं सलु अम्मयाओ! मए पासस्स अरहओ अतिए धम्म णिसंते सेऽवि य मे धम्मे इच्छिए पडिच्छिए अभिरुइए, तएणं अह अम्मयाओ । संसार भउविग्गा भीया जम्मणमरणाणं इच्छामि णं तुम्भेहि अभ- गुन्नाया समाणी पासस्स अरहओ अंतिए मुडा भवित्ता अगा राओ अणगारियं पव्यइत्तए, अहासुह देवाणुप्पिया। मा पडि वध करेह, तएण से काले गाहावई विपुलं असणं४ उवक्ख डावेइ उवक्खडावित्ता मित्तणाइ णियगसयणसवधिपरियणं आमंतेइ आमत्तित्ता तओ पच्छा पहाए जाव विपुलेणं पुष्फत्र स्थगंधमल्लालकारेण सकारेत्ता सम्माणेत्ता तस्सेव मित्तणाइणि यगसयणसबंधिपरियणस्स पुरओ कालिय दारिय सेयापीएहि कलसेहि पहावेइ पहावित्ता सव्वालकारविभूसियं करेइ करित्ता पुरिससहस्सवाहिणिय सीय दुरोहेइ दुरोहिता मित्तणाइणियग- सयणसंबधिपरियणेणं सद्धिं संपरिबुडे सठिवड्डीए जाव रखेणं आमलकप्प नयरि मज्झ मझेणं गिरगच्छइ, णिग्गच्छित्ता जेणेव अवसालवणे चेइए तेणेव उवागच्छद उवागच्छित्ता छत्ताइए सित्वगराइसए पासइ पासित्ता सीय ठावित्ता अनगारधर्मामृतवपिणी टीका ध्रु०२५०१ अ० १ कालीदेवीवर्णनम् ७७५ - कालिय दारिय सीयाओ पच्चोरुहइ तएणं त कालिय दारिय अम्मा- पियरो पुरओ काउ जेणेव पासे अरहा पुरिसा० तेणेव उवागच्छइ उवागच्छित्ता वंदइ नमसइ वदित्ता नमसित्ता एवं व्याप्ती- एव खल्लु देवाणुप्पिया । काली दारिया अम्ह धूया इट्टा कता जाब विमग पुण पासणयाए , एसणं देवाणुप्पिया। ससार भउठिवगा इच्छइ देवाणुप्पियाणं अतिए मुडा भवित्ता जाव पव्वइत्तए, त एयं णं देवाणुप्पियाणं सिस्सिणिभिक्ख, दल- यामो पडिच्छतु णं देवाणुप्पिया। सिस्सिणिभिक्ख, अहासुहं देवाणुप्पिया । मा पडिवधं करेह तएणं काली कुमारी पास अरह वदइ नमसइ वदित्ता नमंसित्ता उत्तरपुरस्थिस दिसिमार्ग अवकमइ अवक्कमित्ता सयमेव आभरणमल्लालकार ओमुयइ ओमुइत्ता सयमेव लोय करेइ करित्ता जेणेव पासे अरहा पुरि- सादाणीए तेणेव उवागच्छइ उवागच्छित्ता पास अरह तिक्खुत्तो बदइ नमसइ वदित्ता नमसित्ता एवं वयासी-आलित्ते ण भते । लोए एवं जाव सयमेव पवाविया, तएण पासे अरहा पुरिसादाणीए कालि सयमेव पुप्फचूलाए अजाए सिस्सिणियत्ताए दलयइ, तएण सा पुप्फचूला अज्जा कालि दारिय सयमेव पवावेइ, जाव उवसपज्जित्ताण विहरइ, तएणं सा काली अजा जाया ईरियासमिया जाव गुत्तवभयारिणी, तएणं सा काली अज्जा पुप्फचूलाए अजाए अतिए सामाइय- माझ्याइ एक्कारस अगाइ अहिज्जइ बहूहि चउत्थ जाव विहरइ॥सू०३।।
. ७६ ताप टीकाकालीदेवीगमनानन्तर गौतमः पृच्छति-भंतति' इत्यादि। 'भतेति' भदन्न । इति सम्बो प भगवान् गौनमः अमण भगवन्त महावीर चन्दते नमस्यति पन्दित्या नमस्पित्या परमवादी-कार या गलु है भदन्त ! देव्या सान्या साम्मत दर्शिता मादिदेविड़ी' देवदि विमानपरिवारादिरूपा 'देवजुई 'देवघुतिशरीरामरणादीनां दीनिस्पा देवणुभावे ' देशानुभाव शक्तिभावादिम्प', पुगता? कुन मरिश ? भगवानाह-शरीर गता, शरीरमनु भते ति भगय गोयमे' इत्यादि। टीका:-कालीदेवी के चले जाने के याद (भगव गोयमे) भग वान गौतम ने (भते त्ति) हे भदना इस प्रकार सपोधित कर (समर्ण भगर महावीर बदह णममह) श्रमण भगवान् को बदना की-नमस्कार किया (वदिता गममित्ता पच वयासी) वदना नमस्कार करके फिर उन्हों ने उनसे इस प्रकार पूरा-(कालिराण भते ! देवीए सा दिव्या देयिट्टी : करिं गया डागारमालादिनो, अरोण मते ! कालीदेवी महड्डिया ३, कालिराण भते ! देवी सा दिव्या देघिडि ३ किण्णा लद्धा, किपणा पत्ता, किण्णा अभिसमण्णा गया ? एव जरा सूरियाभस्स जाब) हे भदत कालीदेवी ने जो इस समय दिव्य विमान-परिवार आदिरूप ऋद्धि दिखलाई, शरीर, आमरण आदि की दीप्तिरूप जो देवति एवं शक्ति प्रभाव आदिरूप जो देवानुभाष दिग्बलाया-वह सब कहा चला 'भतेति भाव गोयमे' इत्यादि- 2014-stuी पीना rat Ranun ( भगव गोयमे ) 11- गौतमे ( भते'त ) 3 word! A प्रमाये साधन शन (समण भगव महावीर घदइ णमसइ) श्रम भवान महावीरने हुन भने नमः४१२ यर्या (वदित्ता मसित्ता एष वयासो) 4 अने नभर शन तभी तोश्रान ५७यु (कालिएण भते ! देवोए सा दिव्या देविड्डी ३ कहिं गया० कूडागार सालादिहतो, अहोण भते ! काली देवी महड्रिया ३, फालिएण भते । देवीए सा दिव्या देविड्डि ३ पिण्णा लदा, किण्णा पत्ता, विष्णा अभिसमण्णा गया ? एवं जहा परियाभस्स जाव) હે ભદન્ત ' કાળી દેવીએ અત્યારે જે દિવિમાન, પરિવાર વગેરેની સદ્ધિ બતાવી, પારીર, આભરણ વગેરેની દીપ્તિને જે દેવધતિ તેમજ શક્તિ, પ્રભાવ વગેરેને જે દવાનુભાવ બતાવ્યો તે બધો ક્યા અદય થઈ ગયે ? કયા પ્રવિષ્ટ થઈ ગયે ? - ७७७ मनगारधर्मामृतषिणी टी० ध्रु० २ घ०१ ० १ कालीदेवीवर्णनम् प्रविष्टा, ‘कूडागारसगलादिद्वतो' अत्र कूटागरशाला दृष्टान्तो बोद्धव्यः । 'अहो' आर्ये सलु हे भदन्त ! कालीदेवी महर्टिका महाधुतिका महानुभावा वर्त्तते काल्या खलु हे भदन्त ! देव्या सा दिव्या देवद्धिः ३ 'किण्णा' कय केन प्रकारेण 'लता' व्या अर्जिता, 'पिण्णा' कय केन प्रकारेण पत्ता' प्राप्ता स्वाधीनीकता 'किण्णा' कय केन प्रकारेण 'अभिसमन्नागया' अमि समन्वागता-उपभोगविषयतया समागता' एवं 'जहारियाभस्स जाव' यथा- सूर्याभस्य यावत्यथा सूर्याभदेवरिपये गौतमस्वामिना प्रश्न कृतस्तथैवाचापि विज्ञेयः । अथ भगवान् कालीदेवीपूर्वभववृत्तान्त वर्णयति-'एर खलु' इत्यादि । एव खलु हे गौतम ! तस्मिन् काले तस्मिन् समये इहेन अस्मिन्नेव जम्मूद्वीपे द्वीपे भारते व आमलकल्या नाम नगरी आसीत् । 'वण्णओ' वर्णक नगरी वर्णनग्रन्थोपपातिमूत्रादबसेय' । तत्र आम्रशालपन चैत्यं, जितशत्रू राजा गया-१ का प्रविष्ट हो गया ? इस प्रकार गौतम का प्रश्न सुनकर भगवान् ने उनसे कहा-शरीर में चला गया-शरीर में प्रविष्ट हो गया। इस विषय में कृटाकारशाला का दृष्टान्त जानना चाहिये । हे भदन्तकाली- देवी मर्दिक, महाद्युतिक एव महानुभाववाली है । इस कालीदेवी ने वह देवद्धि ३ किस प्रकार प्राप्त की अर्जित की किस प्रकार उसे अपने आधीन किया? और किस प्रकार से उसने उसे अपने भोग की विप- यभृत बनाई ? इस तरह गौतमस्वामी ने सूर्याभदेव के विषय में जिस तरह से प्रश्न किया उसी तरह से यहां पर भी जानना चाहिये- अय भगवान् कालीदेवी के पूर्वभव के वृत्तान्त का वर्णन करते हैं-(एवं खलु गोयमा । तेण कालेण तेणं समएण-इहेव जवुद्दीवे दीवे भारहे वासे आमलकप्पा णाम णयरी होत्या-वग्णओ-अवसालवणे चेहए जियसत्तू આ પ્રમાણે ગૌતમને પ્રશ્ન સાભળીને ભગવાને તેમને કહ્યું કે શરીરમાં પ્રવિણ થઈ ગયે-શરીરમા જતો રહ્યો આ વિશે કૂટાકાર શાળાનું દૃષ્ટાન્ત જાણવું જોઈએ હે ભદન્ત ! તાની દેવી મહર્તિક મહાકૃતિક અને મહાનુભાવવાળી છે આ કાળી દેવીએ તે દેવદ્ધિ ૩ કેવી રીતે પ્રાપ્ત કરી છે, અર્જિત કરી છે, કેવી રીતે સ્વાધીન બનાવી છે, અને તેણે તેને કેવી રીતે પિતાના ઉપભેગની વિષયભૂતા બનાવી છે? આ પ્રમાણે ગૌતમ સ્વામીએ સૂર્યાભદેવના વિશે જેમ પ્રશ્ન કર્યો હતો તેમજ અહીં પણ જાણવું જોઈએ ભગવાન હવે કાળી દેવીના પૂર્વભવના વૃત્તાન્તનું વર્ણન કરે છે– (एव खल्लु गोयमा । तेण कालेण तेण समएण इहेब जदीये दीवे भारहे वासे अमलरप्पा णाम णयरी होत्या-वाणी-अंसालपणे चेहए जियमत्तू राया ताधर्मपा टीका-कालीदेवीगमनानन्तर गौतमः पति-'भंतेति' इत्यादि । 'भतेति' हे भदन्त । इति मम्मो य भगवान् गौनमः श्रमग भगवन्त महावीर चन्दते नमस्पति पन्दित्वा नमस्पित्ता एमाहीत-काल्या यलु हे भदन्त ! देव्या सा-या साम्मत दर्शिता सा दिया ' टेविड़ी। देवदि रिमानपरिवारादिरूपा, देवजुई 'देवघुतिः शरीरागरणादीना टोनिस्पा 'देवणुभावे ' देवानुभाव' शक्तिमभागादिस्प', कुनगता ? पुत्र प्रापिष्टा ? भगानाह-शरीर गता, शरीरमनु भते ति भगव गोयमे' इत्यादि। टीका:-कालीदेवी के चले जाने के याद (भगव गोयमे) भग वान गौतम ने (भते त्ति) हे भदन ! इस प्रकार सपोधित कर (समर्ण भगव महावीर बदष्ट गमम) श्रमण भगवान को वंदना की-नमस्कार किया (चदित्ता णममित्ता एव वयामी) वदना नमस्कार करके फिर उन्हो ने उनसे इस प्रकार पूरा-(कालिएण भते ! देवीए सा दिव्या देविड्डी : करि गया. हागारसालादिहतो, अशोण मते ! कालीदेवी महड्डिया ३, कालिषण भते ! देवीए सा दिव्या देविति ३ किण्णा लद्धा किण्णा पत्ता, किण्णा अभिसमण्णा गया? एव जहा सूरियाभस्स जाब) हे भदत । कालीदेवी ने जो इस ममय दिव्य विमान-परिवार आदिरूप ऋद्वि दिसलाई, शरीर, आमरण आदि की दीप्तिरूप जो देवाति एव शक्ति प्रभाय आदिरूप जो देचानुभाष दिग्वलाया-यह सर कहा चला 'भतेति भगव गोयमे' इत्यादि- Au-stil all arat Al मा ( भगव गोयमे ) मन गौतमे ( भतेच ) 3 पन्त ! मी प्रमाये समाधन प्रशन (समण भगव महावीर बदइ मसइ) श्रम समपान महावीरने पहन सने नमः॥२ या (वदित्ता णमसित्ता एव पयासी) पहना भने नभर शन तभी तश्रीन धूछथु ( कालिएण भते ! देवोए सा दिव्या देविड्डी ३ कहिं गया० कूडागार- सालादिहतो, अहोण भते । काली देवी मह ट्रया ३, पालिएण भते ! देवीए सा दिव्या देविढि ३ विण्णा लद्वा, किण्णा पत्ता, किण्णा अभिरामण्णा गया ' एवं जहा सूरियाभस्स जाव) હે ભદન્ત 1 કાળી દેવીએ અત્યારે જે દિયવિમાન, પરિવાર વગેરેની સદ્ધિ બતાવી, શરીર, આભરણ વગેરેની દીતિની જે દેવઘતિ તેમજ શકિત, પ્રભાવ વગેરેને જે દેવાનુભાવ બતાવ્યો તે બધો કયા અદય થઈ ગયો ? કયા પ્રવિષ્ટ થઈ ગયે ? . .
अनगारधर्मामृतपपिगी टोका श्रु० २ ० १ ० १ कालीदेवीवर्णनम् ७७१ पतितपूतस्तनी-जानतनितम्बस्तनी, णिविन्नवरा' ' निर्विष्णवराम्बरमरणे विरक्ता, अतएव 'बरपरिवज्जिया' वरपरिवर्जितापतिरहिता चाप्यासीत् । तस्मिन् काले तस्मिन् समये पाचोऽर्हन् पुरुपादानीय =पुरुपश्रेष्ठ, आदिकरः यथा वर्धमानस्वामी तथैव पाचप्रभुरपि ' णवर ' नवरम्-अय विशेषः-श्रीवर्द्ध- मानस्लामी सप्तहस्तोन्ड्रयः, पार्श्वभुः 'णवत्युस्सेहे ' नवहस्तोत्सेधा-नवहम्त- परिमितगरीरावगाहन , स पोडशभिः अमणसाहस्रीमि', अष्टत्रिंशता आर्यिका- जिया यावि होत्था) इस काल गाथापति की कालश्री नाम भार्या थी। इसके हाथ पैर आदि समस्त अग उपाग विशेप सुकुमार थे। देखने में यह बडी सुन्दर थी काल गाथापति के इस काल श्री की कुक्षि से उत्पन्न हुई एक काली नाम की दारिका भी थी। जो बहुत वयस्का हो चुकी थी-उसका विवाह भी नहीं हुआ था। इसलिये कुमारी अवस्था में ही यह वृद्धा जैसी बहु उमर वाली हो गई थी । शरीर भी यहु अव स्था सपन्न होने के कारण इसका जीर्ण हो चुका था । अतः अपरिणीतावस्था में ही यह जीर्ण कुमारी बन गई थी। इसके नितम्ब और स्तन दोनों ही बिलकुल ढोले हो गये थे नीचे झुक आये थे। वरके वरण करने रूप कार्य से यह विरक्त बन चुकी थी अतः यह वर- परिवर्जित थी-पति से सर्वथा रहित थी। (तेण कालेणं तेण समएणं पासे अरहा पुरिसादाणीए आइगरे जहा बद्धमाणसामी णवर णवह- त्थुस्से हे सोलसहि समणसाहस्सीहिं अट्ठत्तीसाए अज्जिया साहस्सीहि णिविन्नपरा, चरपरिवजिया यावि होत्था) તે કાલ ગાથાપતિની કાલશ્રી નામે ભાર્યા હતી તેના હાથ-પગ વગેરે અને બધા અંગે તેમજ ઉપગે સવિશેષ સુકેમાળ હતા દેખાવમાં તે બહુ જ સુદર હતી કાલ ગાથા પતિની આ કાલશ્રીના ગર્ભથી જન્મ પામેલી એક કાલી નામે દારિકા (પુત્રી) પણ હતી તે મોટી ઉમરની થઈ ચૂકી હતી તેનું લગ્ન પણ થયુ નહેતુ એથી કુમારિકાની અવસ્થામાં જ તે ડેબી જેવી બહુ ઉમરે પહોચેલી થઈ ગઈ હતી બહુ ઉમરે પહોચેલી લેવા બદલ તેનું શરીર પણ જીર્ણ થઈ ચૂક્યુ હતુ એથી કુમારિકાની અવસ્થામાં જ તે જ કુમારિકા બની ગઈ હતી તેના નિત છે અને સ્તને બને સાવ ઢીલા થઈ ગયા હતા, નીચે લટકવા લાગ્યા હતા વરને વરણ કરવા રૂપ કાર્યથી તે વિરક્ત બની ગઈ હતી એથી તે વર પરિવર્જિત હતી તે એકદમ પતિ વગરની હતી ( तेणं फालेण तेण समरण पासे अरहा पुरिसादाणीए आइगरे जहा पद्ध माणसामी णव णवहत्युस्सेहे सोलसहि समणसाहस्सीहिं भहत्तीसाए अज्जिया ७८ . - . पासीत् । तत्र ग्यलु आमला यालो नाम गायापतिगमीन कोरमा प्रत्याह- अट्टै ' आपा-धनधान्यादि समृद्धि-ममृदः, ' नार' या ' अपरिए भपरिभूता बहुजनेरपि परामपिगुमशक्य । तस्य ग्यालु पालम्य गायापतेः कात्र श्री म भार्याऽऽमीद, कोरशीत्याह-सुकुमारपाणिपादा गारद मुरूपा। तस्य खलु कालस्य गायापतेदेहिता पालयिय भार्या या आत्मजा काली नाम दारिका-पुत्री आसीत् । सा कोहयो ? त्याह-'युट्टा' दाबहुरयस्करवाद । वृद्धकुमारी अपरिणीतत्वाव , 'नुष्णा'जीर्णा जीर्णशरीरत्वात् , 'जुष्णकुमारी' जीर्णकुमारी-अपरिणीतापस्थायामेव सनातनीर्णशरीरवान्, 'पडियपूयत्यणी' राया तत्य णं आमलकप्पाए नयरीग काले नाम गारावई होत्या, अड्डे जाच अपरिभूए) घे करते है-गौतम सुनो-तुम्हारे प्रश्नों का उत्सर इस प्रकार है-उस काल और उस समय में हमी जदीप नामके द्वीप में भारतवर्पमें आमलकल्पा नामकी नगरी धी। नगरीका वर्णन करनेवाला पाठ यहां पर औपपातिक सत्र से योजित परटेना चाहिये। उस नगरी में उद्यान था जिसका नाम आम्रशालावन था। इस नगरी के राजा का नाम जितशत्रु था। इस आमलकल्पा नगरी में काल नाम का गायापति रहता था। यह धन धान्यादिसे विशेष समृद्ध था और लोगों में भी इस की अच्छी प्रतिष्ठा थी। (तस्स ण कालस्स गाहावहस्स कालसिरी णाम भारिया होत्या, सुकुमाल जाप सुरुवा, तस्स ण कालस्त गावइस्त धूया कालसिरीए भारियाए अत्तया काली णाम दारिया होत्था बुड्डा बुड्डकुमारी, जुण्णो जुण्णकुमारी, पडियपूयत्यणी णिविन्नवरा वरपरिव तत्यण आमलकप्पाए नयरीए काले नाम गाहावई होत्था अड्ढे जाव अपरिभूए) તેઓ કહે છે કે હે ગૌતમ! સાભળે, તમારા પ્રશ્નોને ઉત્તર આ પ્રમાણે છે-કે તે કાળે અને તે સમયે આ જ બુદ્વીપ નામના કપમાં ભાર વર્ષમાં આમલકા નામની નગરી હતી નગરીને વર્ણન વિષેને પાઠ અહીં ઔપપાતિક સૂત્ર વડે જાણી લેવા જોઈએ તે નગરીમા એક ઉદ્યાન હતું તેનુ નામ આમ્રપાલ વન હતું તે નગરીના રાજાનું નામ જીતશડ્યું હતું તે આમલત્પા નગરીમા કાલા નામે ગાથાપતિ રહેતા હતા તે ધનધાન્ય વગેરેથી સવિશે સમૃદ્ધ હતા અને સમાજમાં તે સારી એવી પ્રતિષ્ઠા હતી (तस्स ण कालस्स गाहावइस्स कालसिरीणाम 'भारिया होत्था, सुकुमाल नाव सुरू वा, तस्स ण कालस्स गाहापइस्स चूया कालसिरीए भारियाए अत्तया काली णाम दारिया होत्था बुड्डा बुडकुमारी, जुष्णा जुष्ण कुमारी, पडि .
अनेगारधर्मामृतवयिणी टी० श्र .०१ अ० १ कालीदेवीवर्णनम् ७.१ हतः पुरुपादानीयस्य पादवन्दिका यादवन्दनाशया गन्तुम् । जम्मापितरौ कथ यतः-हे देशानुप्रिये ! पुत्रि यया सुख तथा कुरु किन्तु अस्मिन् शुभकार्ये प्रति- वन्धपमाद मा कुरु । ततः खलु सा कालिका दारिका अम्पापितृभ्यामभ्यनु- बाठा सती हुष्टयापहृदया स्नाता कृतालिकर्मा कृतकौतुकमङ्गलमायश्चित्ता शुद्र- अन्भणुन्नाया समाणी पासस्स अरओ पुरिसादाणीयस्स पायव दिया गमित्ता) लोगो को ज्योती पाच प्रभु के आम्रशालवन में आने की खबर लगी-त्योंही सब जनता प्रभु को वदना के लिये अपने २ स्थान से निकलकर उस आम्रशालवन में आने लगी। वहा आकर प्रभु का धार्मिक उपदेश सुन वह प्रभु की पर्युपासना करने लगी। इसके अन- न्तर जब यह समाचार काली दारिका को मिला तो वह बहुत अधिक हर्पित एव सतुष्ट चित्त हुई। बाद में वह जहा अपने माता पिता थे वहा पहुँची वहा जाकर उसने माता पिता को दोनो हाथ जोडकर चरण वदना की-और इस प्रकार कहा-हे माततात ! पुरुपश्रेष्ठ, आदिकर, ऐसे पार्श्वनाथ अहंत प्रभु आम्रशालवन में पधारे हुए हैं-इसलिये मै आपसे आज्ञापित होकर उन पुन्पश्रेष्ठ अहत प्रभु पार्श्वनाथ को बदना करने के लिये जाना चाहती हूँ। (अहासुर देवाणुप्पिया' मा पडिव करेहि, तण्ण सा कालिया दारिया अम्मापिईहिं अन्भणुन्नाया समाणी तुट्ट जाव यिया पहाया कयालिझम्मा कयकोउयमगलपायच्चित्ता गुनाया समाणी पासस्स अरहो पुरिसादाणीयस्स पायवदिया गपित्तए १) પાર્શ્વ પ્રભુના આમ્રશાલવનમાં પધારવાની જાણ થતા જ બધા લેકે પ્રભુને વદન કરવા માટે પિતાપિતાના સ્થાનેથી નીકળીને તે આમ્રપાલ વનમાં આવવા લાગ્યા ત્યાં આવીને પ્રભુને ધાર્મિક ઉપદેશ સાળીને તેઓ પ્રભુની પર્યું પાસના કરવા લાગ્યા ત્યારબાદ કાલી દારિકાને આ સમાચાર મળ્યા ત્યારે તે ખૂબ જ હર્ષિત તેમજ સંતુષ્ટ ચિત્તવાળી થઈ ગઈ ત્યારપછી તે જવા તેના માતા-પિતા હતા ત્યાં પહોચી ત્યાં જઈને તેણે માતા-પિતાને બને હાથે જોડીને ચરણ વદના કરી અને ત્યારપછી આ પ્રમાણે વિનતી કરી કે હે માતા પિતા ! પુરુષ શ્રેષ્ઠ, આદિકર એવા પાર્શ્વનાથ અર્હત પ્રભુ આઝશાવ વનમાં પધાર્યા છે એટલા માટે હું તમારી આજ્ઞા મેળવીને તે પુરુ શ્રેષ્ઠ અડત પ્રભુ પાર્શ્વનાથને વદન કરવા માટે જવા ઈચ્છું છુ (अहा सुह, देवाणुप्पिया ! मा पडियध करेहि, तएण सा कालिया दारिया अम्मापिईहिं अन्भणुम्नाया समाणी इट्ट जार हियया व्हाया कयालिकम्मा कय ७८० जाताधर्मकचासो साहसीमि सार्द सपरिटतः यावत् आम्रपालाने समामतः । परिपन्निर्गता पार पर्युपास्ते । ततः खलु सा कालो दारिता अस्याः भगायापसमागमन रूपायाः फयापा-धार्गायाः 'सदहा' सार्या भगवानसमबमतः, इत्येव स्पार्थमाता 'हट जार हियया' हए यावद्दया-तुष्टवित्तानन्दिता प्रीतमनस्का हर्पशविसर्पद्हदया सती यौर अम्पापितरौ तौयोपागाउति, उपागस्य 'करयल जार' करतलपरिग्रहीत शिर आरत दशनल मम्त केऽकिस्सा एवमवादी- एव खलु है अब बातो ! पार्थोऽहन पुरुपादानीयः आदिकरो यावत्-आप्रशाल चने चैत्ये यथा-पविरुपमरग्रहमागृय रायमेन तपमाऽऽन्मान भावयन् विहरतिक आस्ते, तद्गन्छामि पल हे अम्रतानी ! युग्माभिरमनुहाता सती पार्थस्सा सद्धि सपरिघुढे जाय अपलसालवणे समोस) उस काल में और उस ममय में पुरुपादानीय पुरुपश्रेष्ठ-आदिकर पानाथ अरंत प्रभु जो श्री वर्द्धमान स्वामी जैसे थे-सोलह एजार भ्रमण के तथा ३८, हजार आपिकाओं के साथ तीर्थकर परपरानुसार विहार करते हुए उस आम्रशालवन में आये। भगवान महावीर और पार्श्वनाथ प्रभु की शरी रावगाहना में विशेपता केवल इतनी ही थी कि उनका शरीर सात हाथ ऊँया था और पार्श्व प्रभु का शरीर ९ हाथ ऊँचाया। (परिसा णिग्गया, जाव पज्जुवासह, तापणं सा दारिया हमीसे कहा लट्ठा समाणी हट्ठ जाव दियया जेणे अम्मापियरो तेणेव उवागच्छद, उवागवित्ता करयल जाव एव वयासी-एव वल अम्मयामो पासे अरहा पुरिसा दाणीए आइगरे जाय विहरह, त इच्छामि ण अम्मयाओ ! तुम्भेहि साहस्सीहि सद्धि सपरिखुडे जाव अवसालपणे समोसढे) તે કાળે અને તે સમયે પુરુષાદાનીય-પુરુષ એક-આદિકર પાર્શ્વનાથ- અહંત પ્રભુ-જેઓ શ્રી વદ્ધમાન સ્વામી જેવા હતા-સોળ હજાર શમણે તેમજ ૩૮ હજાર આર્થિકાઓની સાથે તીર્થંકર પર પરા મુજબ વિહાર કરતા તે આમ્રશાલ વનમાં આવ્યા ભગવાન મહાવીર અને પાર્શ્વનાથ પ્રભુની શરી વગાહનામાં વિશેષતા ફક્ત આટલી જ છે કે તેમનું શરીર સાત હાથ જેટલુ ઊંચુ હતુ અને પાર્થ પ્રભુનુ શરીર નવ હાથ ઊંચુ હતુ (परिसा णिग्गया, जाव पज्जुराम, तएण सा काली दारिया इमीसे कहाए लद्धट्ठा समाणी हह जाव हियया जेणेच अम्मापियरो तेणेच उवागच्छा, उवागच्छित्ता करयल जार एव बयासी-एव खल अम्मयाओ ! पासे अरहा पुरिसादाणीए आइगरे जाव विहरइ, त इच्छामि ण अम्मयाओ ! -- अनगारधर्मामृतवर्षिणी टी० (०२५०१ अ० १ वालीदेवीवर्णनम् जहा दोबई जाप ' यथा द्रौपदी यावत्-द्रौपदीनतू छत्रादीन् तीर्थङ्करातिशयान् दृष्ट्वा धार्मिका यानप्रबरोदवतरति, पञ्चाभिगमपूर्वक भगवन्समीपे गत्या वन्दित्वा नमस्यित्वा च भगवन्त 'पज्जुनासा' पर्युपास्ते । तत खलु पार्थोऽहन पुस्पा- दानीयः काल्यै दारिकायै तस्या च महातिमहालयाया पर्प दि धर्म कथयति ततः खलु सा काली दारिका पार्श्वस्याहत पुरुषादानीयस्यान्तिके धर्म श्रुत्वा निशम्य हष्ट यावद् हृदया पार्थ महन्त पुरुपादानीय विकृत्वो वन्दते नमस्यति, वन्दित्वा बह उस पर आरूढ हो गई। आरूढ होकर वह वहां से चली। ज्योही उसने द्रौपदी की तरह तीर्थकरातिशयरूप छत्रादि विभूति को देखा तो वह देखकर उस धार्मिक यानप्रवर से नीचे उतरी। और पञ्च अभिगमन पूर्वक भगवान के पास जाकर उसने उनको वटना की, उन्हें नमस्कार किया-चदना नमस्कार करके फिर उसने उनकी पर्युपासना की। (तएण पासे अरहा पुरिसादाणीए कालीए दारिया तीसे य महमहालया परिसाए धम्मो कहिओ) पुरपादानीय अहंत प्रभु पार्श्वनाथने उस काली दारिकाको उस विशाल परिषदाके बीचमें धर्मकथा सुनाई। (तएण सा काली दारिया पासस्स अरओ पुरिसादाणीयस्स अतिए धम्म सोच्चा णिसम्म घट्ट जाव हियया पास अरह पुरिसादाणीय तिरखुत्तो वदह नमसइ) पुरुषादानीय उन अहंत पार्श्वनाथ प्रभु से धर्म को सुनकर हृदय मे अवधारण कर वह काली दारिका यहुत अधिक हर्पित ત્યાથી રવાના થઈ દ્રૌપદીની જેમ તેણે જ્યારે તીર્થે રાતિશય રૂપ છત્ર વગેરે વિભૂતિને જોઈ કે જેતાની સાથે જ તે ધાર્મિક યાન-પ્રવરમાથી નીચે ઉતરી પડી અને પાંચ અભિગમનપૂર્વક ભગવાનની પાસે જઈને તેમને વદના કરી, તેમને નમસ્કાર કર્યા વદના અને નમસ્કાર કરીને તેણે તેમની પર્યું પાસના કરી ત્યારપછી (तएण पासे अरहा पुरिसादाणीए कालीए दारियाए तीसे य महइमहा लयाए परिसाए धम्मो कहिओ) પુરુષાદાનીય અહંત પ્રભુ પાર્શ્વનાથે તે કાલી દારિકાને તે વિશાલ પરિ પદાની સામે ધમકથા સ ભળાવી (तएण सा काली दारिया पासस्स अरहो पुरिसादाणीयस्स अतिए धम्म सोच्चा णिसम्म इट्ट जाव हियया पास अरह पुरिसादाणीय तिक्सुत्तो बदह नमसड) પુસ્વાદાનીય તે અહંત પાર્શ્વનાથ પ્રભુની પાસેથી ધર્મને સાભળીને અને તેને હૃદયમાં અવધારિત કરીને તે કાલી દારિક બહુ જ વધારે હર્ષિત और २ MAIN मदयानि माइन्यानि वाणिभपरपरिदिना भन्यमहाभरमा शरीरा पेटिन पकरालपरियीणा सार यहाद् प्रविमिकामति, प्रनिनिष्क्रम्य यौव कर उपस्थानशाला पर पार्मिक यानपारस्तमोपागन्छति, उपागत्य धार्मिकं साल भवर दूढान्भास्ता । ततः खलु सापाली दारिका धार्मिक यानपारम् , एवं सुद्धप्पवसाद मगरह पत्याह पवरपरिहिया अप्पमहायाभरणालकिय सरीरा पेडिया वालपरिकिया साओ गिहाओ पडिनियमह, पटिनिस्पमित्ता जेणेय पारिरिया उवटाणसाला जेणेव धम्मिए जाण परे तेणेव उयाग, वारिसा घम्मिय जाणप्पयर दुल्या, तरण सा काली दारिया धम्मिय जाण पवर जहादीबई जाव पज्जुधासह) सप माता पिता ने उससे ऐसा कहा-हे देवानुप्रिये तुझे जिस मकार सुख मिले उस प्रकार तृ कर-इस शुभकार्य में प्रतिवर-प्रमाद मत फर । इस प्रकार माता पितासे अभ्यनुज्ञात हुई उस दारिका ने इष्ट तुष्ट चित्त होकर स्नान किया वायसादि के लिये अन्नका भागरूप-बलिकर्म किया कौतुक, मगल एव प्रायश्चित्त करके शुद्ध प्रवेश योग्य, मगलकारी चन्नों को अच्छी तरह पहिरा, और अल्पभार यहुमूल्य आभरणा से अलकृत शरीर होकर वर चेटिका चक्रवाल से युक्त हो अपने घर से निकली। निकलकर वह वहां गई-जहरा पाय उपस्थान शाला थी-उसमें जाकर वह जहा धार्मिक यानप्रवर रक्खा था-वहां पहुंची-वहा जाकर कोडयमगलपायच्छिता सुद्धप्पवेसाड मगल्लाइ वत्याइ पवरपरिहिया अप्पमहन्धा भरणालफियसरीरा चेडियाचस्वालपरिफिण्णा साओ गिहाओ पडिनिक्खमइ, पडिनिक्खमित्ता जेणेव राहिरिया पहाणसाला जेणे धम्मिए जाणप्पवरे तेणेव उवागच्छइ, उपागच्छित्ता, धम्मिय जाणप्पवर दुरूढा तएण सा काली दारिया धम्मिय जाणप्पवर एव जहा दोबई जाव पज्जुवासइ) ત્યારે માતાપિતાએ તેને આ પ્રમાણે કહ્યું કે હે દેવાનુપ્રિયે! તને જેમ સુખ મળે તેમ તે કર આ શુભ કાર્યમાં પ્રતિબધ-પ્રમાદ ૨ નહિ આ પ્રમાણે માતાપિતા વડે આજ્ઞાપિત થયેલી તે દારિકાએ હષ્ટ-તુષ્ટ ચિત્ત થઈને સ્નાન કર્યુંકાગડા વગેરેને અન્નભાગ આપીને બલિક કર્યું કૌતુક, ભગ અને પ્રાયશ્ચિત્ત કરોને શુદ્ધ પ્રવેશ મગળકારી વને સારી રીતે પહેર્યા અને વજનમાં હલ્કા પણ કિંમતમાં બહુ ભારે એવા આભરણેથી શરીરને અલ કૃત કરીને દાસીઓના સમૂહથી પરિષ્ટિત થઈને પિતાના ઘેરથી નીકળી નીકળીને તે ત્યાં પહોચી જ્યા બાહ્ય ઉપસ્થાન શાળા હતી તેમાં જઈને તે જ્યાં ધાર્મિક વાનપ્રવર ઊભું હતું તેમાં આરૂઢ થઈ ગઈ . - अनगारधर्मामृतवषिणी टी० श्रु० २ ० १ ० १ कालीदेवीवर्णनम् जहा दोबई जाप ' यथा द्रौपदी यावत्-द्रौपदीवत् छवादीन् तीर्थङ्करातिशयान् दृष्ट्वा धार्मिकादू यानप्रवरांदवतरति, पञ्चाभिगमपूर्वक भगवत्समीपे गत्वा वन्दित्वा नमस्थित्वा च भगवन्त 'पज्जुनासा' पर्युपास्ते । तत खलु पाश्वोऽहन पुस्पा- दानीयः काल्यै दारिकायै तस्या च महातिमहालयाया पर्प दि धर्म कथयति ततः खलु सा काली दारिका पार्श्वस्याहत पुरुपादानीयस्यान्तिके धर्म श्रुत्वा निशम्य हुष्ट यावद् हृदया पार्थ महन्त पुरुपादानीय विकृत्वो वन्दते नमस्यति, वन्दित्वा वह उस पर आरूढ हो गई। आरूढ होकर वह वहाँ से चली। ज्योती उसने द्रौपदी की तरह तीर्थकरातिशयरूप छत्रादि विभृति को देखा तो वह देखकर उस धार्मिक यानप्रवर से नीचे उतरी। और पञ्च अभिगमन पूर्वक भगवान के पास जाकर उसने उनको वदना की, उन्हें नमस्कार किया-वदना नमस्कार करके फिर उसने उनकी पर्युपासना की। (तपण पासे अरहा पुरिसादाणीए कालीए दारियाए तीसे य महामहालयाए परिसाए धम्मो कहिनी) पुरपादानीय अर्हत प्रभु पार्श्वनाथने उस काली दारिकाको उस विशाल परिषदाके बीच में धर्मकथा सुनाई। (तएण सा काली दारिया पासस्स अरहओ पुरिसादाणीयस्म अतिए धम्म सोच्चा णिसम्म घट्ट जाव यिया पास अरह पुरिसादाणीय तिरखुत्तो वदह नमसह ) पुरुपादानीय उन अर्हत पार्श्वनाथ प्रभु से धर्म को सुनकर हृदय में अवधारण कर वह काली दारिका बहुत अधिक हर्पित ત્યાથી રવાના થઈ દ્રૌપદીની જેમ તેણે જ્યારે તીર્થ કરાતિરાય રૂપ છત્ર વગેરે વિભૂતિને જોઈ કે જોતાની સાથે જ તે ધાર્મિક યાન-પ્રવરમાથી નીચે ઉતરી પડી અને પચ અભિગમનપૂર્વક ભગવાનની પાસે જઈને તેમને વદના કરી, તેમને નમસ્કાર કર્યા વદના અને નમસ્કાર કરીને તેણે તેમની પર્થપાસના કરી ત્યારપછી (तएण पासे अरहा पुरिसादाणीए कालीए दारियाए तीसे य महदमहा लयाए परिसाए धम्मो कहिओ) પુરુષાદાનીય અહંત પ્રભુ પાર્શ્વનાથે તે કાલી દારિકાને તે વિશાલ પરિ પદાની સામે ધમ કથા સ ભળાવી (तएण सा काली दारिया पासस्स अरहो पुरिसादाणीयस्स अतिए धम्म सोच्चा णिसम्म इट्ट जाच दियया पास अरह पुरिसादाणीय तिवसुत्तो बदह नममा) પુસ્વાદાનીય તે અહંત પાર્શ્વનાથ પ્રભુની પાસેથી ધર્મને સાભળીને અને તેને હૃદયમાં અવધારિત કરીને તે કાલી દારિકા બહુ જ વધારે હર્ષિત और ७८३ Aau Aam-e- Hmm.wwhile - हातापर्मचा नमस्यित्वा एमवादीन-याधामि गल हे महन्त । नम्रय प्रवमनं यावत् तद् যখন ঘুষ 7থ ল= বিসমূ-শব-শম সংখাবিবী আমি, হয় = मातापितरौ पृष्टा सञ्ज मह देवानमियाणामन्ति के यारत प्रबजामि । मगवाना- यथासुख है देशानुप्रिये । । ततः स मा काली दारिमा पार्थेन अहंता पुरुषा हत्य एई। उसने उन पुरषादानीय पार्श्वनाथ अरंत प्रभु को तीन बार घदना नमस्कार किया। याद में (यदित्ता नमंसिसा एव प्रयासी सा शामिण भते ! णिग्गय पारपण जाव से जहेय तुम्भे वयह, ज णवर देवाणुपिया! अम्म्गपियरी आपुन्छामि, ताण आ देवाणुपियाण अतिए जार पश्यामि, अहासुह देवाणुप्पिा ताण सा काली दारिया पासेण अरहमा पुरिसादाणोण्णं एव वुत्ता समाणी हर जाव हियथा पास अरह बदह, नमसह, घटित्ता नमसित्ता तमेय धम्मिय जाणपवर दुरु हह, दूररित्ता पासस्स अरहओ पुरिसादाणीयास अतियाओ अवसा लवणाओ चेडयाओपडिनियमह, पटिनिवमित्ताजेणेआमलकप्पा नयरी, तेणेव उचाग) चंदना नमस्कार करके उसने उन प्रभु से ऐसा कहा-हे मदन ! में आपके द्वारा प्रतिपादित निर्ग्रन्थ प्रवचन को विशेप श्रद्धा की दृष्टि से देग्वनी है आपने जैसा यह प्रतिपादित किया है वह वस्तुतः वैसा ही है। यह मुझे परत रुचा है। अत में माता पिता से पूछती है। उनसे पूछकर फिर आप देवानप्रिय के पास आकर હૃદય થઇ તેણે તે પુરુ નાદાનીય પાર્શ્વનાથ અર્હત પ્રભુને ત્રણ વાર વદના અને નમસ્કાર કર્યા ત્યારબાદ (पदित्ता नमसित्ता एच चयासी सहामिण भते ! जिग्गय पाश्यण जाव से जहेय तुम्भे चयह, ज णवर देवाणुप्पिया! अम्मापियरो आपुच्छामि, तएण अह देनाणुप्पियाण अतिए जाव पब्धयामि, अहा मुह देवाणुप्पिए ! तएण सा काली दारिया पासे ण अरहया पुरिसादाणीएण एव वुत्ता समाणी हट्ट नाव हियया पास अरह वदा, नमसइ, वदिचा नमसित्ता नमेन चम्मिय जाणपवर दुरुहाई दुरुहित्ता पासस्स अरहओ पुरिसादाणीयम्स अतियाओ असालवणाओ वेइयाओ पडिनिस्खमई, पडिनिक्खमिचा जेणेर आमलकप्पा नयरी तेणेव उवागच्छइ) વદના નમસ્કાર કરીને તેણે તે પ્રભુને આ પ્રમાણે કહ્યું કે હે ભદન્ત ! તમારા વડે પ્રતિપાદિત નિગ્રંથ પ્રવચનને હુ વિશેષ શ્રદ્ધાની દૃષ્ટિએ જોઈ છુ તમે જેવું આ પ્રતિપાનિ કર્યું છે ખરેખર તે તેવુ જ છે અને આ ખૂબ જ ગમી ગયું છે એથી હુ માતાપિતાને પૂછી લઉ છુ તેમને પૂછીને.
मनगारधर्मामृतषिणी दी० श्रु०२५० १ ० १ कालीदेवोवर्णनम् दानीयेन एनमुक्ता सती हृष्ट यावद् हृदया पार्श्व मर्हन्त वन्दते नमस्यति. वन्दित्वा नमस्थित्या तदेव धार्मिक यानप्रपर दोहति, दह्य पार्श्वस्याहत पुरुषादानीय स्यान्तिकाद् आम्रशालानात् चैत्यात प्रतिनिष्क्रामति, मतिनिक्रम्य यत्रैव आमल- कल्पा नगरी तत्रैवोपागच्छति, उपागत्य आमलक्ल्पाया नगर्या मध्य-मध्येन यगैर वाह्या उपस्थानशाला तीवोपागच्छति, उपागत्य धार्मिक यानमवर स्थाप- यति, स्थापयित्वा यामिराद् यानपारात् प्रत्यवरोहति, प्रत्यवाह्य यौव अम्मा पितरौ तौवोपागच्छति, उपागत्य ' करतल. ' करतलपरिगृहीत मस्तकेजलि दीक्षित होना चाहती है। काली दारिका के इस अभिप्राय को सुनकरें प्रभुने उससे कहा देवानुप्रिये । यथासुखम् । इस प्रकार वह काली दारिका पुम्पादानीय उन अहत प्रभु पार्श्वनाथ से अनुमोदित होकर चित्त मे पशुत अधिक प्रसन्न हुई। उसने अर्हन्त पार्श्वनाथ प्रभु को वंदना नमस्कार किया और चदना नमस्कार करके वहा से आकर वह उसी अपने धार्मिक यान पर चढ गई चढकर वह फिर पुरुपादानीय, अहंत प्रभु पार्श्वनाथ के पास से और उस आम्रशालबन नामके उद्यान से बाहिर चली आई। याहिर आकर वह जहा आमलकल्पा नगरी थी -वहा पर आ गई। (उवागच्चित्ता आमलकप्पं णयरि मज्झ मज्झेणं जेणेव बाहिरिया उवठ्ठाणसाला-तेणेव उवागच्छइ, उवागच्छित्ता धम्मिय जाणपवर ठवेड, ठवित्ता धम्मियाओ जाणपवरीओ पच्चोरुहेह, पच्चोरित्ता जेणेच अम्मापियरी तेणेव उवागच्छंइ, उवागच्छित्ता करें- આપ દેવાનુપ્રિયની પાસે આવીને દીક્ષિત થવા ચાહુ છુ કાલી દારિકાના આ અભિપ્રાયને સાભળીને પ્રભુએ તેને કહ્યું કે હે દેવાનુપ્રિયે “યથાસુખમ” આ પ્રમાણે તે કાલી દારિકા પુરુષાદાનીય તે અહંત પ્રભુ પાર્શ્વનાથ વડે અમે દિત થઈને ચિત્તમાં ખૂબ જ પ્રસન્ન થઈ તેણે અહત પાર્શ્વનાથ પ્રભુને ૧દના નમસ્કાર કર્યો અને વેદના નમસ્કાર કરીને ત્યાંથી આવીને તે તેજ પિતાના ધાર્મિક યાનમાં બેસી ગઈ અને બેસીને તે પુરુષાદાનીય અહંત પ્રભુ પાર્થ નાથની પાસેથી અને તે આમ્રશાલ વન નામના ઉદ્યાનથી બહાર આવી ગઈ બહાર આવીને તે જ્યા આમતકા નગરી હતી ત્યાં આવી ગઈ (उवागच्छिता आमलाप्प णयरि मज्झ मज्झेण जेणेव वाहिरिया उपहाण- साला-तेणेन यागाइ, उपगच्छिता धम्मिय जागपवर ठवेइ, ठरिता धम्मि याओ जाणप्पवराभो पचोरुहइ, पच्चोरुहिता, जेणेव अम्मापियरी तेणेव उवाग. छइ, उवागच्छित्ता करयल० एव वयासी-एवं खलु अम्मयाओ ! मए पासस्स ७८३ जाता नमस्यिया एमादीन-अहधामि यल हे महन्त ! नाय प्रवचन यावन वद् तथेतद् गृय उदय नार-विशेषोऽयम्-यन्-माम् अम्बापितरौ आगमि, वत-- मातापितरौ पृष्ठा खत अह देवानुप्रियाणामन्ति के यारद प्रजामि । भगवानाइ- यथासुख है देगानुमिये ।। ततः सलु मा काली दारिता पान आता पुरुषा हदय हुई। उसने उन पुरुपादानीय पार्श्वनाथ अति प्रभु को तीन बार वदना नमार किया। बाद में (बदित्ता नमसित्ता एव बयासी सह शमि ण भते ! णिग्गथं पारयण जाव से जहेय तुम्भे वयह, ज णवर देगणुपिया! अम्गपियरो आपुन्जामि, तण भर देवाणुपियाण अतिए जार पचयामि, अहासुह देवाणुप्पि! ताण सा काली दारिया पासेण अरत्या पुरिसादाणोपणं पर चुना समाणी जाय हियथा पास अरह पदइ, नमसह, दित्ता नमसित्ता तमेय धम्मिय जाणपवर दुरु एड, दूरहित्ता पासस्स अरहओ पुरिमादाणीपास अतियाभो अंबसा लवणाभो चेडयाओपडिनिस्वमद, पटिनिस्पमित्ताजेणेव आमलकप्पा नयरी, तेणेव उवागच्छद) चंदना नमस्कार करके उसने उन प्रभु से ऐसा कहा-हे मदत ! मैं आपके द्वारा प्रतिपादित निर्ग्रन्थ प्रवचन को विशेप श्रद्धा की दृष्टि से देग्वती, आपने जैसा यह प्रतिपादित किया है वह वस्तुतः वैसा ही है । यह मुझे बहुत रुचा है। अत: मैं माता पिता से पूछती हैं। उनसे पूछकर फिर आप देवानुप्रिय के पास आकर હૃદય થઈ તેણે તે પુરુપાદાનીય પાર્શ્વનાથ અર્હત પ્રભુને ત્રણ વાર વેદના અને નમસ્કાર કર્યા ત્યારબાદ (वदिता नमसित्ता एच वयामी सहामिण भते । गिग्गय पावयण जाव से जहेय तुम्भे घयह, ज णवर देवाणुप्पिया! अम्मापियरो आपुच्छामि, तएण अह देवाणुप्पियाण अतिए जाव पच्चयामि, अहा मुह देवाणुप्पिए ! तएण सा काली दारिया पासे ण अरया पुरिसादाणीएण एव युत्ता समाणी हट्ट जाब हियया पास अरह बदह, नमसइ, दित्ता नमसित्ता तमेव धम्मिय जाणपवर दुरुहड़ दुरुहिता पासस्स अरहओ पुरिसादाणीयस्स अतियाओ अवसालवणाओ चेइयाओ पडिनिक्खमई, पडिनिक्खमित्ता जेणे आमलकप्पा नयरी तेणेव उवागठइ) વદના નમસ્કાર કરીને તેણે તે પ્રભુને આ પ્રમાણે કહ્યું કે હે ભદન્ત ! તમારા વડે પ્રતિપાદિત નિગ્રંથ પ્રવચનને હું વિશેષ શ્રદ્ધાની દૃષ્ટિએ જોઈ છુ તમે જેવુ આ પ્રતિપાદિત કર્યું છે ખબર છે તેવું જ છે અને આ ખૂબ જ ગમી ગયુ છે એથી હુ માતાપિતાને પૂછી લઉ છુ તેમને પૂછીને وی " धनगारधर्मामृतपिणी टीश ० २ २०१३० १ फालीदेवीवर्णनम् भ्यनुज्ञाता सती पार्थम्याईतोऽतिके मुण्डाशूत्वा आगाराद् अनगारिता मनजितुम्= स्वीकर्त्तम् । मातापितरो कथयत.-ययामरस हे देशानुप्रिये !=यथा रोचते तथा- कुरु किन्तु अस्मिन कार्ये प्रतिवन्य-प्रमाद मा कुरु । ततः स्वपुत्र्या दीक्षानिश्चया- न तर म्वलु स कालो गायापनिर्विपुलम् अशनम् ४ अशनादि चतुर्विधमाहारम् उपस्कारयति, उपस्कार्य मित्रज्ञातिनिजामजनमम्मन्त्रिपरिजनम् आमन्त्रयति, आमन्त्र्य ततः पश्चात् स्नातः याइन् विपुलेन पुग्परतगन्धमाल्यालङ्कारेण सत्कृत्य सम्मान्य तस्यैर मिशातिनिज स्वजनसम्पन्धिपरिजनम्य पुरता अग्रे कालिका दारिका श्वेतपीतै. रजतमु वर्णमयै कलौ. स्नपयति, स्नपयित्या सर्वालङ्कारविभू- पिता करोति, कृत्वा पुरुपमहपाहिनिका शिपिका दूरोहयति आरोहयति, दूरोद्य मित्रज्ञातिनिजकस्वजनसम्पन्धिपरिजनेन सार्द्ध सपरिसृतः सर्वद्वर्या यानत्-चाध के भय से उद्विग्न होकर जन्ममरण से भयभीत हो चुकी हूँ-अतः मैं चाहती हूँ कि मै आप से आजा प्राप्त कर उन अर्हत पानाय प्रभु के समीप मुडित होकर अगारावस्था से अनगारावस्था स्वीकार कर लू । इस प्रकार अपनी काली दारिका की बात सुनकर माता पिता ने उससे कहा-(अराह देवाणुप्पिया ! मा पडियध करेह, तरण से काले गाहा वई विपुल असण ४ उचक्खडावेइ, उवरखडावित्ता मित्तणाइ णियग सयणसवधिपरियण आमतेइ आमनित्ता तओ पच्छा पहाण जाव विउलेण पुप्फवस्थगधमरलालकारेण सरकारेत्ता मम्प्राणेत्ता तस्सेव मित्तणाइणियगसयणसर धिपरिजणस्स पुरओ कालिय दारिय सेया पीएहि कलसेहिं पहावेइ पहावित्ता सवालकारविभूसिय करेइ, करित्ता पुरिससहस्सचारिणीय सीय दुरोहेड, दुरोहिता मित्तणाइणियगसयण શ્રવણથી હુ આ સ સારના ભયથી ઉદ્વિગ્ન થઈને જન્મ-મણુથી ભયભીત થઈ ગઈ છુ એવી મારી ઈચ્છા છે કે હું તમારી આજ્ઞા મેળવીને તે અહંત પાર્શ્વનાથ પ્રભુની પાસે મુડિત થઈને અગારાવસ્થા ત્યજીને અનગારાવસ્થા સ્વીકારી લઉ આ પ્રમાણે પિતાની કાલી દારિકાની વાત સાંભળીને भातापिता ते धु - ( अहासह देशाणुप्पिया ! मा पडिस करेह, तएग से काले गाहाई विपुल असणं ४ उपखडावेट, उबावडाविचा मित्तणाइणियगमयणसधिपरि यण आमतेइ आमतित्तातो पछाण्डाए जार पिपुलेण पुप्फरत्यग पमल्लालकारेण सक्मरेत्ता सम्माणेत्ता तस्सेय मित्तणादणियगमयणसाधिपरिजणरस पुरजो कालिय दारिय सेयापीरहिं कलसेहि पहावेइ हाचित्ता सवालमारविभूसिय करेइ, करिचा - . - वातावमेचा कृत्वा एपमवादोन-पर ग्यलु हे अम्बनाती । मया पार्धम्याई तोऽन्तिके धर्मः 'णिसंते' निशान्तः श्रुन', सोऽपि न धर्म में' मम इन्छिए ' इष्टा= इच्छाविषयीभूत , 'पडिन्तिप'मनीटा-पुन पुनरमिलपित 'अभिकाए' अभिरुचिता भासायवस्तु पत्सवामियः, ततःचम्मान कारणात् व अहो अम्मताती! समारमयोद्विग्ना भीता जन्ममरणेभ्योऽन लामि खलु युष्माभ्याम पल० एवं पयासी-एर पलु अम्मयाओमप पामम्स अगहभो अतिए धम्मे णिसते से घिय में घम्मे हच्छिा परिच्छिा अभिमा-तण्ण अरं अम्मयाओ! ससारमधिग्गा भीया जम्मणमरणाण-च्छामि णं तुम्भेरि अम्भणुन्नायासमाणी पामरस अरओ अतिए मुंडा भविसा भगारामओ अणगारिय पचहत्त) घरी आकर के वह आमलकल्प नगरी के बीचों बीच से होकर जा पर पाद्या उपस्मन शाला धी-वहाँ आई-वहा आकर वह उस धार्मिक यानयर से नीचे उतरी-नीचे उतर कर फिर बाद में चर जहा अपने माता पिता धे-बरा गई-वहा जाकर उसने अपने दोनों हाथों की अजलि बनाकर और उसे मस्तक पर रखकर उनसे इस प्रकार कहा-हे मात तात ! सुनो मैंने अहंत प्रभु पार्श्वनाथ के मुग्व से धर्म सुना है-यह धर्म मुझे बहुत अच्छा लगा है, पार बार उस धर्म को सुनने की अभिलापा हो रही है । जिस प्रकार आस्वाद्य वस्तु प्रिय लगती है उसी प्रकार वह धर्म मेरे लिये सब प्रकार से प्रिय लगा है। उसके सुनने से मैं हे मात तात ! इम ससार अरहओ अतिए धम्मे णिसते सेीिय मे धम्मे इच्छिए पडिन्छिए अभिरुइए-तएण अह अम्मयाओ ! ससारभउचिग्गा भीया जम्मणमरणाणी-इच्छामि ण तुम्भेहिं अन्भणुन्नाया समाणी पासस्म अरहओ अतिए मुडा भविता जगाराओ अगगा- रिय पव्वइसए) ત્યાં આવીને તે આમલકલ્પા નગરીની વચ્ચે થઈને જ્યાં તે બાહ્ય ઉપ- સ્થાન શાળા હતી ત્યાં આવી ત્યાં આવીને તે તે ધાર્મિક પાન પ્રવરમાથી નીચે ઉતરી, નીચે ઉતરીને તે જ્યા તેના માતાપિતા હતાં ત્યાં ગઈ તવા જઈને પિતાના બંને હાથની અ જલિ બનાવીને અને તેને મસ્તકે મૂકીને તેમને આ પ્રમાણે કહ્યું કે હું માતાપિતા સાભળે, અ ત પ્રભુ પાર્શ્વનાથના મુખથી મે ધર્મનું શ્રવણ કર્યું છે, તે મને બહુ જ ગમી ગયુ છે તે ધર્મને વાર વાર સાભળવાની ઈચ્છા થઈ રહી છે જેમ આ વાદ્ય વસ્તુ પ્રિય લાગે છે તેમજ તે ધર્મ મારા માટે "ધી રીતે પ્રિય થઈ પડયો છે તે માતાપિતા ! તેના धनगारधामृतयषिणी टीश ० २ १० १ ० १ कालीदेवीवर्णनम् ७८७ भ्यनुज्ञाता सती पार्श्वम्याहतोऽतिके मुण्डामृत्या आगाराद् अनगारिता पवजितुम्= स्वीकर्तुम् । मातापित कथयत.-यामुख हे देशानुप्रिये !-यथा रोचते तथा- कुरु किन्तु अस्मिन कायें प्रतिवन्य-प्रमाद मा कुरु । ततः स्वपुच्या दीक्षानिश्चया न तर खलु स कालो गायापनिर्विपुलम् अशनम् ४ अशनादि चतुर्विधमाहारम् उपस्कारयति, उपस्कार्य मित्रज्ञातिनिरस्वजनसम्बन्धिपरिजनम् आमन्त्रयति, आमन्य ततः पश्चात् स्नातः यापन् विपुलेन पुपरवगन्धमाल्यालङ्कारेण सत्कृत्य सम्मान्य तस्यैर मिरवातिनिजकतनसम्बन्धिपरिजनम्य पुरता अग्रे कालिका दारिका श्वेतपीतः रजतमु पर्णमयै कलशै' स्नपयति, स्नपयित्वा सालङ्कारविभू पिता करोति, कृत्वा पुरुषमहसपाहिनिका शिक्षिका दूरोहयवि-आरोहयति, द्रोद्य मित्रज्ञातिनिजकस्वजनमम्पन्धिपरिजनेन सार्द्ध सपरिवृतः सर्वद्धर्या यावत्-याद्य के भय से उद्विग्न होकर जन्ममरण से भयभीत हो चुकी हूँ-अतः मै चाहती है कि मैं आप से आजा प्राप्त कर उन अर्हत पार्वनाथ प्रभु के समीप मुडित होकर अमारावस्था से अनगारावस्था स्वीकार कर लू । इस प्रकार अपनी काली दारिका की यात सुनकर माता पिता ने उससे कहा-(अहासुर देवाणुप्पियामा पडिवध करेह, तएण से काले गाहा वई विपुल असण / उवक्खडावेइ, उवरवडा वित्ता मित्तणाइ णियग सयणसयधिपरियण आमतेइ आमनित्ता तओ पच्छा पहाए जाच विउलेण पुष्फबत्यगधमरलालकारेण सरकारेता मम्माणेत्ता तस्सेव मित्तणाइणियगसयणसर धिरिजणस्स पुरओ कालिय दारिय सेया पीएहि कलसेहिं पहावेइ पहावित्ता सवालकारविभृसिय करेइ, करित्ता पुरिससरस्सवारिणीय सीय दुरोहेड, दुरोरित्ता मित्तणाइणियगसपण શ્રવણથી હુ આ સંસારના ભયથી ઉદ્વિગ્ન થઈને જન્મ-મરણથી ભયભીત થઈ ગઈ છું એથી મારી ઈચ્છા છે કે હું તમારી આજ્ઞા મેળવીને તે અહંત પાર્શ્વનાથ પ્રભુની પાસે મુડિત થઈને અગારાવસ્થા ત્યજીને અનગારાવસ્થા સ્વીકારી લઉ આ પ્રમાણે પિતાની કાલી દારિકાની વાત સાંભળીને માતાપિતાએ તેને કહ્યુ - ( अहासह देवाणुप्पिया ! मा पडियर करेह, तएण से काले गाहाचई विपुल जसण ४ उपखडावेर, उपक्खडावित्ता मित्तणाइणियगसयणसपिपरि- यण आमतेइ आमनित्ता तओ पन्छाण्डाए नार पिपुलैण पुप्फरवगपमल्लालकारेणं सक्कारेत्ता सम्माणेत्ता तस्सेव मित्तणाइणियगमयणसविपरिजणरस पुरजो कालिय दारिय सेयापीरहि कलसेहिं हावेई हारित्ता सवालकारविभूसिय करेइ, करिता . - ७८८ पानाव्या मानानेकरिषादिवरण मद मामलामाया नगर्या मध्यमध्येन निर्गति, निर्गत्य यौयानमालपन पत्य गोपागाति, उपागम्य आदिशान तीर्थकरानि सय धिपरियणेण सद्धिं मपरियुढे मट्टिी जाय ग्वेण आमलकप्प नार मजा मज्ोणं णिग) हे देगनुप्रिये तुझे जिस तरह अच्छा हगे पैसा त कर-इम कार्य में प्रमाद न कर । इस तरह उस काल गाधापति ने अपनी पुत्री को दीक्षा नदण करने मे हद निश्चयवाली जानकर विपुल मात्रा में अशनादि रूप चतुर्विध आशर निष्पन्न कर घाया-पाद में मिन, जाति, निजक, रजन, मपन्धी परिजनों को आमत्रित किया आमचित करके बाद में उसने स्नातकर विपुल पुष्प, वस्त्र, गध माल्य, एच अलकारों से सत्कार सम्मान करके उन मित्र, ज्ञाति, निजक, स्वजन, सपन्धी, परिजनों के साथ काली दारिका का श्वेत पीत कलशों द्वारा अभिषेक किया-बाद में उसे समस्त अलकारों से विभूपित किया-फिर पुरुप सहस्रचाहिनी शियिका पर उसे धढ़वाया। चढवाकर फिर उन मित्र, जाति निजक, स्वजन सबन्धी परिजनों से घिरा हुआ रोकर वर अपनी समस्त ऋद्धि के अनुसार, वाद्यमान अनेक विध याजो की स्वनि के साथ २ आमलकल्श नगरी के ठीक बीचों धीच से होकर निकला। (गिग्गच्उित्ता जेणेव अवमालवणे चेहए पुरिससहस्सवाहिणीय सीय दुरोहेइ, दरोहिता मित्तणाइ, णियगसयगसाधि परियणेण सद्धिं सपरिखुडे सबिदीए जाव रखेण आमलकप्प नयरि मज्ज्ञ मज्ज्ञेण णिगच्छइ ) હે દેવાનુપ્રિયે ! તને જેમ સારૂ લાગે તેમ કર કરીશ નહિ આ પ્રમાણે તે કાલગાથાપતિએ પોતાની પુત્રીને દીક્ષા ગ્રહણ કરવાને મક્કમ વિચાર જાણીને પુષ્કળ પ્રમાણમા અશન વગેરે ચાર જાતના આહાર તૈયાર કરાવડાવ્યા ત્યારબાદ મિત્ર, જ્ઞાતિ, નિજક, સ્વજન, સબ પી પરિજને આમત્રિત કર્યા આમત્રિત કરીને તેણે સ્નાન કરીને પુષ્કળ પુષ, વસ્ત્ર, ગધ, માલ્ય અને અલકાર વડે સરકાર તેમજ સન્માન કરીને તે મિત્ર, જ્ઞાતિ, નિજક, સ્વજન, સબ ધી, પરિજનની સાથે કાલી દારિકાને સફેદ, અને પીળા કળશ વડે અભિષેક કર્યો ત્યારબાદ તેને સમસ્ત અલ કાર વડે વિભૂ ષિત કરી અને ત્યારપછી પુરુષ સહસવાહિની પાલખી ઉપર તેને ચઢાવી ચઢાવીને તેણે મિત્ર જ્ઞાતિ, નિજક, સ્વજન સબ ધી, પરિજનની સાથે પરિ * વેષ્ટિત થઈને પિતાની સમસ્ત કદ્ધિની સાથે, ઘણુ વાજા ના વિનિની સાથે સાથે આમલકલ્પ નગરીની બરાબર વચ્ચે થઈને નીકળે , આ કામમાં પ્રમાદ ५० १ , . भनगारधर्मामृतषिणी टी०१० अ० १ कालीदेवीवर्णनम् शयान् पश्यति, दृष्ट्वा शिविका स्थापयति, स्थापयित्वा कालिका दारिका शिवि- कातः प्रत्यवरोहयति । ततः खलु ता कालिका दारिकाम् अम्पापितरो पुरत कृत्ता यत्रैव पार्थोऽईन् पुरुषादानीयस्तयोपागच्छति, उपागत्य वन्देते नमस्यतः, वन्दित्वा नमस्यित्वा एवमपादिप्टाम्-एन खलु हे देवानुप्रियाः । काली दारिता आवयोर्दुहिता इप्टा कान्ता यावत् उदम्परपुप्पमित्र श्रवणायापि दुर्लभा किमङ्ग ! पुनः तेणेव उवागच्छह, उवागच्छित्ता उत्ताइए तित्यगराइसा पासइ) निक- लकर वह चहा गया कि जहा वह आम्रशालयन नाम का उद्यान या। वहां जाकर उसने तीर्थकर प्रकृति के उदय से होनेवाले छत्रादिक अति शयों को देखा। (पासित्ता सीय ठावेड, ठावित्ता कालियदारिय सीधाओ पच्चोरुहह, तण्ण त कालीय दारिय अम्मापियरो पुरओ काउ जेणेव पाले अरहा पुरिसा० तेणेव उवागच्छद, उधागच्छित्ता वदह, नमसह, वदित्ता नमसित्ता एवं वयासी) देखकर उसने उस पुस्प सहनवाहिनी शिपिका को खटी कर दिया। खड़ी करके उसमे से काली दारिका को नीचे उतारा बाद में वे माता पिता उस कालिक दारिका को आगे करके जहा पुम्पादानीय अहंत प्रभु पार्श्वनाथ विराजमान थे वहा गये। वहा जाकर उन्हों ने उनको वदना की-नमस्कार किया। वदना नमस्कार करके याद में उन्हों ने इस प्रकार प्रभु से कहा-(एव खलु देवाणुप्पिया! काली दारिया अम्ह धूया ३वा कना, जाव किमगपुणपासणया! एस (णिग्गच्छित्ता जेणेव असालपणे चेहए तेणेव उवागच्छद, उपगच्उित्ता छत्ताइए तित्थगराइसए पासइ) નીકળીને તે ત્યા ગયે કે જેમા તે આમ્રશાલ વન નામે ઉઘાન હતુ ત્યા જઈને તેણે તીર્થ કર પ્રકૃતિના ઉદયથી અસ્તિત્વમાં આવતા છ વગેરે અતિશને જોયા (पामित्ता सीय ठावेद, ठारित्ता कालियदारिय सीयाओ पच्चोरुहइ, तरणं त कालिय दारिय अम्मापियरो पुरओ काउ जेणेच पासे अरहा पुरिसा० तेणेव उवागच्छइ उपागच्छित्ता वदइ, नममद, व दित्ता नमसित्ता एव वयासी) જોઈને તેણે તે પુરુષ સહસ્રવાહિની પાલખીને રેકી રેકીને તેમાથી કાલી દારિકાને નીચે ઉતારી ત્યારપછી તે માતાપિતા તે કાલીક દારિકાને આગળ કરીને જ્યા પુરુષદાનીય અહંત પ્રભુ પાર્શ્વનાથ વિરાજમાન હતા ત્યા ગયા ત્યાં જઈને તેમણે તેમને વદના કરી, નમસ્કાર કર્યા વદના તેમજ નમસ્કાર કરીને તેમણે પ્રભુને વિનતી કરતા આ પ્રમાણે કહ્યું કે- ( 3 देवाणुप्पिया! कालीदारिया अम्ह धूया इटा क्ता, जाप किमग - se ধর্মকথা मानानेकविधवादित्ररवेण सह आमलफल्माया नगर्या मध्यमध्येन निर्गन्छति, निर्गत्य यात्रशालपन चैत्य तत्रोपागधति, उपागस्य उचादिकान तीर्थकराति सय धिपरियणेण सद्धिं सपरियुढे सब्धिड्डीप जार रवेण आमलकप्प नयरि मजा मज्झेण णिगरह) हे देवानुपिये! तुमे जिस तरह अच्छा लगे वैसा त कर-इस कार्य में प्रमाद न कर। इस तरह उस काल गाधापति ने अपनी पुत्री को दीक्षा ग्ररण करने मे दृढ निश्चयवाली जानकर विपुल मात्रा में अशनादि रूप चतुर्विध आहार नित्पन्न कर वाया-बाद में मित्र, ज्ञाति, निजक, स्वजन, मप्रन्धी परिजनों को आमनित किया आमत्रित करके याद में उसने स्नात शेकर विपुल पुष्प, वस्त्र, गध माल्य, एच अलकारों से सत्कार सन्मान करके उन मित्र, ज्ञाति, निजक, स्वजन, सबन्धी, परिजनों के साथ काली दारिका का श्वेत पीत कलशों दारा अभिषेक किया-याद में उसे समस्त अलकारों से विभूपित किया-फिर पुरुषसहस्रचाहिनी शिक्षिका पर उसे चढवाया। घढवाकर फिर उन मित्र, ज्ञाति निजक, स्वजन सयन्धी परिजनों से 'घिरा हुआ होकर वह अपनी समस्त ऋद्धि के अनुसार, वाद्यमान अनेक विध बाजो की ध्वनि के साथ २ आमलकल्पा नगरी के ठीक बीचों पीच से होकर निकला। (गिग्गच्चित्ता जैगेव अवपालवणे चेइए पुरिससहस्सवाहिणीय सीय दुरोहेइ, दुरोहिता मित्तणाइ, णियगसयणसरधि परियणेण सद्धिं सपरिखुडे सचिट्ठीए जाव रवेण आमलकप्प नयरि मज्ज्ञ मज्ज्ञेण णिगच्छइ ) હે દેવાનુપ્રિયે! તને જેમ સારૂ લાગે તેમ કર કરીશ નહિ આ પ્રમાણે તે કાલગાથાપતિએ પિતાની પુત્રીને દીક્ષા ગ્રહણ કરવા મક્કમ વિચાર જાણીને પુષ્કળ પ્રમાણમાં અશન વગેરે ચાર જાતના આહારે તૈયાર કરાવડાવ્યા ત્યારબાદ મિત્ર, જ્ઞાતિ, નિજક, વજન, સબ પી પરિજનેને આમત્રિત કર્યો આમત્રિત કરીને તેણે સ્નાન કરીને પુષ્કળ પુષ્પ વસ્ત્ર, ગીધ, માત્ય અને અલકારો વડે સહકાર તેમજ સન્માન કરીને તે મિત્ર, જ્ઞાતિ, નિજક, સ્વજન, સબ ધી, પરિજનોની સાથે કાલી દારિકાને સફેદ, અને પીળા કળશે વડે અભિષેક કર્યો ત્યારબાદ તેને સમસ્ત અલકારે વડે વિભૂ ષિત કરી અને ત્યારપછી પુરુષ સહસવાહિની પાલખી ઉપર તેને ચઢાવી ચઢાવીને તેણે મિત્ર જ્ઞાતિ, નિજક, વજન સબ ધી, પરિજનની સાથે પરિ વેષ્ટિત થઈને પિતાની સમસ્ત ઋદ્ધિની સાથે, ઘણા વાજા અને વનિની સાથે સાથે આમલક૯પા નગરીની બરાબર વચ્ચે થઈને નીકળે . આ કામમાં પ્રમોદ २ च० १ तेणेव उवागच्छड, . अनगारधर्मामृतषिणी टी० १० अ० १ कालीदेघोवर्णनम् शयान् पश्यति, दृष्ट्वा शिविका स्थापयति, स्थापयित्या कालिका दारिकां शिवि कातः प्रत्यारोहयति । तत. खलु ता कालिका दारिकाम् अम्पापितरो पुरत कृत्वा यत्रैव पार्थोऽईन् पुरुषादानीयस्तयोपागच्छति, उपागत्य वन्देते नमस्यतः, वन्दित्वा नमस्यित्वा एवमादिप्टाम्-एर खलु हे देवानुप्रियाः ! काली दारिका आवयोर्दुहिता इप्टा कान्ता यावत् उदम्परपुप्पमिव श्रवणायापि दुर्लभा किमङ्ग ! पुनः उवागच्उित्ता उत्ताइए तित्यगराइसए पासह) निक- लकर वह यहा गया कि जहा वह आम्रशाल वन नाम का उद्यान या। वहाँ जाकर उसने तीर्थकर प्रकृति के उदय से होनेवाले छत्रादिक अति- शयों को देखा। (पासित्ता सीय ठावेद, ठावित्ता कालियदारियं सीयाओ पच्चोरुह, तरण त कालीय दारिय अम्मापियरो पुरओ काउ जेणेव पाले अरहरा पुरिसा० तेणेव उवागच्छइ, उचागच्छित्ता वदह, नममइ, वदित्ता नमसित्ता एवं वयासी) देखकर उसने उस पुस्प सहनवाहिनी शिचिका को खटी कर दिया। खड़ी करके उसमे से काली दारिका को नीचे उतारा बाद में वे माता पिता उस कालिक दारिका को आगे करके जहा पुरुपादानीय अर्रत प्रभु पार्श्वनाथ विराजमान थे वहां गये। वहा जाकर उन्हों ने उनको बदनाकी-नमस्कार किया। वदना नमस्कार करके पाद में उन्हों ने इस प्रकार प्रभु से कहा-(एव खलु देवाणुप्पिया! काली दारिया अम्ह धूया इहा कता, जाय किमगपुणपासगया ! एस (णिग्गच्छित्ता जेणेव असालपणे चेडए तेणेव उवागन्छइ, आगच्छित्ता छत्ताइए तित्यगराइसए पासइ) નીકળીને તે ત્યા ગયે કે જો તે આમ્રશાલ વન નામે ઉઘાન હતુ ત્યાં જઈને તેણે તીર્થ કર પ્રકૃતિના ઉદયથી અસ્તિત્વમાં આવતા છત્ર વગેરે અતિરાને જોયા (पासित्ता सीय ठावेइ, ठानित्ता कालियदारिय सीयाओ पच्चोरुहइ, तएण त कालिय दारिय अम्मापियरो पुरओ काउ जेणेप पासे अरहा पुरिसा० तेणेव उवागच्छद उवागच्छित्ता बदइ, नमसद, व दित्ता नमसित्ता एव वयासी) જઈને તેણે તે પુરુષ સહસ્ત્રવાહિની પાલખીને રોકી રાકને તેમાથી કાવી દારિકાને નીચે ઉતારી ત્યારપછી તે માતાપિતા તે કાવીક દારિકાને આગળ કરીને જ્યા પુરુષદાનીય અહંત પ્રભુ પાર્શ્વનાથ વિરાજમાન હતા ત્યા ગયા ત્યાં જઈને તેમણે તેમને વદના કરી, નમસ્કાર કર્યા વિના તેમજ નમસ્કાર કરીને તેમણે પ્રભુને વિનતી કરતા આ પ્રમાણે કહ્યું – (एव खलु देवाणुप्पिया! कालीदारिया जम्ह धूया इटा यता, जाव किमग - - সানাগাজম . पासणयाए' दर्शनाय ?, एगा खलु हे देवगनुमियाः । समारगयोंद्विग्ना इच्छति देवानुमियाणामन्ति के मुण्डाभूत्वा यारत्मवनितु, तद् एता सलु देवानुप्रियाणा शिष्याभिक्षा दाः, 'पडितु' प्रती-स्वीडन्तु पलु हे देशानुप्रियाः । शिप्याभिक्षाम् । भगनानाह-ययामुग्य हे देवानमियो !मा प्रतिवन्ध पुस्तम् । ततः खलु काली कुमारी पार्श्व महन्त रदते नमस्यति, पन्दित्वा नमस्यित्वा उत्तरपौरस्य ण देवाणुप्पिया! ससारभउन्विग्गा, इच्छ, देवाणुपियाण! अतिए मुटा भवित्ता जाच पचहत्त, त ण्य ण देवाणुप्पियाण निस्सिणिमिक्ख दलयामो पडिस्तु ण देवाणुप्पिया! सिस्मिणिभिवस) हे देवानुपिय! यह हमारी काली दारिका नामकी पुत्री है। यह हमें बहुत अधिक इष्टा, कान्ता यावत् उदम्बर पुष्प के समान सुनने के लिये भी दुर्लभा है-तो फिर हे अग। इसके दर्शन की तो बात ही क्या कहना है । हे देवानु प्रिय ! यह समारभय से उद्विग्न हो रही है अतः आप देवानुप्रिय के पास मुडित होकर यावत् सयम लेना चाहती है। इस लिये हम दोनों आपके लिये शिष्या की भिक्षा दे रहे है-आप देवानुप्रिय ! हमारी इस शिष्यारूप भिक्षा को स्वीकार करें (अहासुह देवाणुप्पिया! मा पडिषध करेह ) इस प्रकार उन दोनों का कथन सुनकर प्रभु ने उनसे कहा हे देवानुप्रियो ! आप को जैमा सुख हो-वैसा आप करो-इसमें विलम्ब करने से लाभ नहीं हैं। (तएण) इसके पाद (काली कुमारी पास पुण पासणयाए ? एमण देवाणुप्पिया । समारभउन्धिग्गा, इन्छइ, देवाणुप्पि याण ! अतिए मुडा भवित्ता जाव पन्नात्तए, त एय ण देवाणुपियाण सिस्सिणि भिक्ख दलयामो पडिच्छतु ण देवाणुप्पिया! मिस्सिणिभिक्ख) હે દેવાનુપ્રિય! આ અમારી કાલી દારિકા નામે પુત્રી છે અમારા માટે આ બહુ જ વધારે ઈષ્ટા, કાતા યાવત્ ઉદુમ્બર પુષ્પની જેમ નામ શ્રવણુમાં પણ દુર્લભ છે તે પછી એના દર્શનની તે વાત જ શી કરવી ? હે દેવા નુપ્રિય! આ સમાર ભયથી ઉદ્ધિ થઈ રહી છે એથી આપ દેવાનુપ્રિય પાસેથી મુડિત થઈને યાવત્ સયમ ગ્રહણ કરવા ઈચ્છે છે એથી અમે બને આપના માટે આશિધ્યાની ભીક્ષા અર્પણ કરીએ છીએ આપ દેવાનુપ્રિય અમારી मा शिव्या३लिहान स्वी४१२ । ( अहासुह देवाणुप्पिया ! मा पडिबध करेह ) मा प्रमाणे तो मनेनु थन सामान प्रभुमे तेभने ४3 દેવાનુપ્રિય! તમને જેમ સુખ પ્રાપ્ત થાય તેમ કરે આમાં વિલંબ કરવાથી साल नथी (तएण) या२पछी " . . . अरिह ममगारधर्मामृतषिणी टी० अ० २ ३०१ ० १ कालीदेवीवर्णनम् ७२१ दिग्भागम् अनक्रामति, अक्राम्य स्वयमेव स्वहस्तेनैव आभरणमाल्यालङ्कारम् अमुश्चति आतारयति, असमुन्य पयमेवम् सहस्तेनैव लोच केगलुश्चन करोति, कृत्वा यत्रै पार्थोऽहन पुरुषादानीयस्तोवोपागच्छति, उपागत्य पार्वमहन्त त्रिः कृत्वो चन्दते नमस्यति, पन्दित्ता नमस्यित्वा एवमवादीव-आदीप्तः खलु हे भद न्त ! लोक' एवम् अनेन प्रकारेण यावत्-एपाऽपि स्वयमेव पार्श्वप्रभुणा पत्राजिता । अरह बदइ, ननसड, चदित्ता नमसित्ता, उत्तरपुरस्थिम दिसिभागं अवक्कमट, अवमित्ता मयमेव आभरणमल्लाल कार ओमुयइ, ओमुइत्ता, सयमेव लोय करेड, करित्ता जेणेव पासे अरिहा पुरिसादा- णीए तेणेच उवागच्छह, उवागच्छित्ता पास अरह तिक्खुत्तो व दह, नमसट, व दित्ता नमप्सित्ता एव चयासी) काली कुमारी ने पार्श्वनाथ त प्रभु को वदना एव नमस्कार किया-1 वदना नमस्कार करके फिर वह उत्तर पौरस्त्य दिग्भाग ईशान कोण की ओर गई। वहा जाकर उसने अपने आप आभरण माल्य एव अलकारों को उतार दिया। उतार कर अपने हाथो से उसने यालो का लुचन किया-लुचन करके फिर वह जहां पुरुपादानीय पार्श्वनाथ प्रभु विराजमान थे वहाँ आई- वहाँ आकर उसने पानाथ अर्हत को तीनथार बदन एव नमस्कार किया और वदना नमस्कार कर फिर वह उनसे इस प्रकार कहने लगी -(आलित्तण भते लोए एवं जहा देवाणदा जाव सयमेव पन्चाविया- (काली कुमारी पास अरह बद६, नमसइ, बदित्ता नमसित्ता, उत्तरपुरथिम दिसिमाग अबक्कमड, अक्कमित्ता, सयमेन आभरणमल्लालकार ओमुयइ, ओमुइत्ता सयमेव लोय करे, करिता जेणेच पासे अरिहा पुरिसादाणीए तेणेव उवागच्छइ, उवागच्छित्ता पास अरह तिवयुत्तो बदइ, नमसद, वदित्ता नमसित्ता एर वयासी) કાલી કુમારીએ પાર્શ્વનાથ અરિહત પ્રભુને વદના અને નમસ્કાર કર્યા વદના અને નમસ્કાર કરીને તે ઉત્તર પીરસ્ય દિક્ષાગ ઈશાન કે ણની તરફ ગઈ ત્યાં જઈને તેણે પોતાની મેળે જ આભરણ, માલ્ય અને અવતારોને ઉતાર્યા તારીને પિતાના હાથે વડે જ તેણે વાળાનુ લુચન કર્યું લુચન કરીને તે જ્યા પુરુષાદાનીય પાર્શ્વનાથ પ્રભુ વિરાજમાન હતા ત્યા આવી ત્યાં આવીને તેણે પાર્શ્વનાથ અહં તને ત્રણ વાર વદન અને નમસ્કાર કર્યા વદના અને નમસ્કાર કરીને તે તેમને આ પ્રમાણે વિનતી કરવા લાગી કે– (आरितेण भते ! लोए एव जहा देवाणदा जाव सयमेव पव्याविया-तएण - ७१२ जाताधर्मव्या ततः खलु पार्थोऽर्हन् पुरुषादानीयः काली सयमेन पुष्पलाये आयर्याय शिष्यात्वेन ददाति । ततः खलु सा पुप्पा आर्या याली दारिको स्वयमेव प्रवाजपति यावत्-सा काली तदागम् उपसम्पद्य सलु विहरति । ततः सा काली-आयो जाता, फीदशी ? त्याह-ईयोममिता याव-गुप्तब्रह्मचारिणी । तत खल सा काली अर्या पुष्पचूाया आर्याया अन्ति के सामायिकरीनि एकादशाहानि अपीते, तण पासे अरहा पुरिसादाणीए कालिं सयमेव पुष्फलाए अजाए सिस्सिणियत्ता दर यह, ताण मा पुष्फला अजा कालिं दारिय सयमेव पवावेह-जाव उवसपजित्ताण विरह) हे भदत ! यह लोक आदीप्त हो रहा है-इस प्रकार से पार्दनाय प्रभु के द्वारा स्वय ही दीक्षित की गई। इसके बाद उन पुरुपादानीय पार्श्व प्रभु ने काली को दीक्षित करके पुप्पचूला आर्या को शिष्याणीस्प से प्रदान कर दिया। पुष्पचूला आर्या ने उसे काली को इस प्रकार दीक्षित करवा कर अपनी शिष्याणीरूप में उसे स्वीकार कर लिया-यावत् वह काली उस आर्या की आज्ञानुसार अपनी प्रवृत्ति करने लग गई। (तएण सा काली अजा जाव) इस तरह वह काली अब आर्या हो गई। (ईरिया समिया जाव गुत्तयभयारिणी तरण सा काली अजा पुप्फचूलाए अजाए अतिए पासे अरहा पुरिसादाणीए कालि सयमेन पुप्फचलाए अज्जाए सिस्सिणियताए दलयइ, तएण सा पुष्फचूला अज्जा कालिं दारिय सयमेव पवावेइ-जात्र उत्सप- ज्जित्ताण विहरइ) હે ભદન્ત ! આ લેન આદીત થઈ રહ્યો છે આ પ્રમાણે આ પણ પાર્શ્વનાથ પ્રભુ વડે જાતે જ દીક્ષિત કરવામાં આવી ત્યારપછી તે પુરુષાદાનીય પાર્શ્વ પ્રભુએ કાલીને દીક્ષિત કરીને પુષ્પચૂલા આર્યાને શિષ્યાના રૂપમાં આપી દીધી પુષ્પશૂવા આર્યાએ તે વાલીને આ પ્રમાણે દીક્ષિત કરાવીને પિતાની શિષ્યાના રૂપમાં તેને સ્વીક જ કરી લાધો થાવ તે કાલી તે આર્યાની माना भुराम तानी प्रवृत्ति ४२११ साली (तण्ण मा काली अजा जाव) આ રીતે તે કાલી હવે આ થઈ ગઈ (ईरिया समिया जाव गुत्तभयारिणी, तएण सा काली अजा पुष्फलाए अज्जाए अतिए समाइयमाझ्याद एस्कारसअगाइ अहिज्जइ, वहूहि १७ विहरड) ७१३ अनगारधर्मामृतपषिणी टी० ४० २५० १ ० १ कालीदेवी घर्णनम् बहुभिः चतुर्थ यावत्-पष्ठाप्टमदशमद्वादशभिस्तपःकर्मभिरात्मान भावयन्ती विहरति । सू०३ ॥ मूलम्-तएणं सा काली अजा अन्नया कयाई सरीरवाउ. सिया जाया याचि होत्था, अभिक्खणं२ हत्थे धोबइ पाए धोवइ सीसं धोवइ मुहं धोवइ थणतराई धोवइ कक्खं तराणि धोवइ गुज्झंतराइं धोवइ जत्थर वि य णं ठाणं वा सेज वा णिसी- हियं वा चेइए त पुवामेव अभुक्खेत्ता तो पच्छा आसयइ वा सयइ वा, णिसीहइ वा, तएणं सा पुप्फचूला अज्ज कालि अजं एव वयासी-नो खल्लु कप्पइ देवाणुप्पिया । समीणं णिग्गं थीणं सरीरवाउसियाण होत्तए तुमं च णं देवाणुप्पिया | सरी- रवाउसिया जाया अभिक्खण२ हत्थे धोवसि जाव आसयाहि वा सयाहि वा णिसीहियाहि वा त तुमं देवाणुप्पिए । एयस्स ठाणस्स आलोएहि जाव पायच्छित्त पडिवजाहि, तएणं सा काली सामायमाझ्याइ एक्कारसअगाइ अहिजइ, घट्टहिं चउत्थ जाव विह- रह) उसका रहन शयन आदि सब व्यवहार नियमित एव सीमित हो गया। चलती तो वह ईर्या समिति से मार्ग का संशोधन कर चलती। यावत् वह गुप्त ब्रह्मचरिणी बन गई। ९ नौ कोटी से ब्राह्मचर्यव्रत की सरक्षिका हो गई। इसके बाद उस काली आर्या ने पुष्पचूला आर्या के पास सामायिक आदि ग्यारह अगो का अध्ययन किया-और अनेक चतुर्थ, पष्ठ, अष्टम दशम, द्वादश, तपस्याओं की आराधना से अपने आपको भावित किया ।। सूत्र ३॥ તેનુ રહેવું, સુવું વગેરે બધુ કામ નિયમિત અને સીમિત થઈ ગયું -ચાલતી ત્યારે તે ઈર્યા–સમિતિથી માર્ગનું સંશોધન કરીને ચાલતી યાત્ તે શસ્ત બ્રહ્મચારિણી બની ગઈ ૯ કટિથી બ્રહ્મચર્ય વ્રતની તે સરક્ષિકા થઈ ગઈ ત્યારપછી તે કાલી આર્યાએ પુષ્પચૂલા આયી પાસે સામાયિક વગેરે અગિયાર અગેનું અધ્યયન કર્યું અને ઘણા ચતુર્થ, પણ, અષ્ટમ, દશમ, દ્વાદશ તપસ્યાની આરાધનાથી પિતાની જાતને ભાવિત કરી સૂત્ર ૩ .
७२५ अज्जा पुप्फचूलाए अज्जाए एयमट्ट नो आढाइ जाव तुसिणीया संचिट्टइ, तएणं ताओ पुप्फचूलाओ अज्जाओ कालि मज्जमभि- पखणं२ हीलेंति जिंदंति खिसंति गरिहंति अवमण्णंति अभि- क्खण२ एयम निवारेति, तएणं तीसे कालीए अजाए सम णीहिं णिग्गंथीहिं अभिरखणं२ हीलिज्जमाणीए जाव वारिज्ज माणिए इमेयारूवे अज्झस्थिए जाय समुप्पन्नित्था जया णं अह अगारवासमझे वसित्था तया णं अह सयवसा जप्पि भिई च णं अह मुंडा भवित्ता अगाराओ अणगारिय पवइया तप्पभिई च णं अहं परवसा जाया, त सेयं खल मम कालं पाउप्पभायाए रयणीए जाव जलते पाडिका उवस्तय उवसप ज्जित्ताणं विहरित्तएत्तिकटु एव सपेहेइ सपेहित्ता मल्ल जाव जळते पाडिएकं उवस्तयं गिण्हइ, तत्थणं साअणिवारिया अणोहटिया सच्छदमई अभिक्खणर हत्थे धोवइ जाव आसयइ वा सयइ वा, णीसेहेइ वा, तएण सा काली अज्जा पासत्या पासस्थविहारी ओसण्णा ओसण्णविहारी कुसीला कुसीलविहारीअहाछदा अहा- छंदविहारी संसत्ता ससत्तविहारी बहूणि वासाणि सामनपरियागं पाउणइ पाउणित्ता अद्धमसियाए सलेहणाए अत्ताण झूसेइ यूसित्ता तीसंभत्ताइ अणसणाए छेएइ छेइत्ता तस्स ठाणस्स अगालोइय अपडिक्कता कालमासे काल किच्चा चमरचपाए रायहाणीए कालव- डिंसए भवणेउववायसभाए देवसणिज्जसि देवदूसतरिए अगुल- स्सअसखेज्जइ भागमेत्ताए ओगाहणाए काली" वपणा, नगारपर्मामृतपिणी टोका ३०२ ३०१ अ०१ कारीदेवोधर्णनम् ७६५ तएणंसा कालीदेवी आहुणोबवण्णा समाणी पंचविहाए पज्जत्तीए जहा सूरियाभो जाव भासामण पज्जत्तीए। तएणं सा काली. देवी चउण्हंसामाणियसाहस्सीण जाव अण्णेसि च वहूर्ण काल- वडेंसगभवणवासीण असुरकुमाराण देवाण य देवीण य आहेवञ्च जाव विहरइ, एवं खलु गोयमा । कालीए देवीए सा दिव्वा देविड्डी३ लद्धा पत्ता अभिसमण्णागया, कालीए णं भते । देवीए केवइय काल ठिई पन्नत्ता १, गोयमा । अड्डाइज्जाइ पलिओवमाई ठिई पन्नता, काली णं भते । देवी ताओ देवलोगाओ अणंतर उबट्टित्ता कहि गच्छिहिइ कहि उववज्जिहिइ १, गोयमा । महा- विदेहे वासे सिज्झिहिइ, एव खलु जवू । समणेणं जाव संपत्तेणं पढमस्स वग्गस्स पढमज्झयणस्स अयम? पण्णत्ते तिबेमि । धम्मकहाणं पढमज्झयणं समत्त ॥ सू० ४ ॥ टीका तएण सा' इत्यादि-ततः खलु सा काली आर्या अन्यदा कदा- चित् ' सरीरवाउसिया' शरीरा वाकृशिका-शरीरसस्करणशीला जाता चाप्या- सीत् । अथ साकिं करोती त्याह-अभीक्ष्ण२ वारसार हस्तौ धावति, पादौ धावति, . 'तरण सा काली अज्जा अन्नया कयाइ,' इत्यादि । टीकार्य-(तएण) इसके बाद (सा काली अज्जा) वह काली आर्या (अन्नया कयाइ) किसी एक समय (सरीरवाउसिया) शरीर को सस्कारित करने के स्वभाववाली धन गई इसलिये वह (अभिक्खण २ 'तरण सा काली अजा अन्नया कयाइ ' इत्यादि- सार्थ-(तएण) त्या२५छ। (सा काली अज्जा) ही माय (अन्नया कयाइ ) a मे मते (सरवाउसिया) २२ने सारित કરવાના સ્વભાવવાળી બની ગઈ, એટલા માટે તે (अभिस्खगर इत्ये घोषह, पाए धोवेइ सोप्त धोरइ, मुह धोनइ, थणतराइ धोवइ, ७९५ साधण्यास अज्जा पुप्फचूलाए अज्जाए एयमढें नो आढाइ जाव तुसिणीया संचिट्टइ, तएण ताओ पुप्फचूलाओ अज्जाओ कालिं अज अभि- क्खणं हीलेंति णिदंति खिसंति गरिहंति अवमण्णति अभि- क्खण२ एयमट्ट निवारेति, तएणं तीसे कालीए अजाए सम णीहि णिग्गंथीहिं अभिक्खणं२ हीलिज्जमाणीए जाव वारिज्ज माणिए इमेयारूवे अज्झथिए जाव समुप्पज्नित्था जया णं अहं अगारवासमझे वसिस्था तया णं अहं सयवसा जप्पि- भिई च णं अह मुंडा भवित्ता अगाराओ अणगारिय पवइया तप्पभिई च णं अह परवसा जाया, त सेय खलु मम काल पाउप्पभायाए रयणीए जाव जलते पाडिका उवस्तय उवसंप- ज्जित्ताणं विहरित्तएत्तिकटु एवं सपेहेइ सपेहिता कल्ल जाव जळते पाडिएक उवस्सयं गिण्हइ, तत्थणं सा अणिवारिया अणोहटिया सच्छदमई अभिक्खणंर हत्थे धोवइ जाव आसयइ वा सयइ वा, णीसेहेइ वा, तएण सा काली अज्जा पासत्था पासत्वविहारी ओसण्णा ओसण्णविहारी कुसीला कुसीलविहारीअहाछदा अहा- छंदविहारी संसत्ता ससत्तविहारी बहूणि वासाणि सामन्नपरियागं पाउणइ पाउणित्ता अद्धमसियाए सलेहणाए अत्ताण झुसेइ झूसित्ता तीसं भत्ताइ अणसणाए छेएइ छेइत्सा तस्स ठाणस्स अगालोइय अपडिक्कता कालमासे कालं किच्चा चमरचपाए रायहाणीए कालव- डिसए भवणे उववायसभाए देवसणिज्जसि देवदूसतरिए अगुल- स्सअसखेज्जइ भागमेत्ताए ओगाहणाए कालीदे त उवण्णा, क - . मनगारधर्मामृतषिणी टी० शु . च अ० १ कालीदेवीवर्णनम् ७१७ निर्ग्रन्थीना शरीरवाइशिका जाताऽसि, यतस्त्वम्-अभीक्ष्ण २ हस्तौ धावसि यावत् 'आसयाहि वा' भास्से-उपविशमि, 'सयाहि वा ' शेषे मयनं करोपि मीमीहियादि वा' निपेपपसि-स्वाध्याय करोपि, ''त-स्मात् पार- गा व हे देवानुप्रिये ! एतत् स्थानम्-' आलोएहि ' आलोचय यारत् माय- श्चित्त प्रतिपद्यस्त्र । मूले-सम्बन्धमामान्ये पप्ठी । ततः खलु सा काली आर्या देवाणुप्पिया! समणी ण णिग्गयीण सरीरवाउसियागं होत्तए-तुम च ण देवाणुप्पिया! मरीरयाउसिया जाया-अभिरखणं २ हत्धे धोवसि, जाव आसयाहि वा सयारि वा णिसीहियाहि वा त तुमं देवाणुप्पियाए ! एयरस ठाणस्स आलोएहि जाव पायच्छित्तं पडिवज्जादि) हे देवानुपिये! निन्य श्रमणियों को शरीरवकुश होना कल्पित नहीं है। परन्तु तुम तो हे देवानुप्रिये शरीरवकुश पन रही हो। बार २ हाथो को धोती हो यावत् जहां तुम्हें उठना यैठना होता है, शयन करना होता है, स्वाध्याय करना होता है उस स्थान को पहिले से ही सिंचित कर लेती हो तर जाकर वहाँ उठती पैठती हो, शयन करती हो, स्वाध्याय करती हो। इसलिये हे देवानुप्रिये ! तुम इस स्थान की आलोचना करो यावत् प्रायश्चित्त ग्रहण करो। (तरुण सा काली अज्जा पुष्फलाए अज्जाए एयम नो आढाइ, जाव तुसिणीया सचिट्ठइ, तरण ताओ पुष्फचूलाओ (नो खलु कप्पड़, देवाणुप्पिया ! समणीण णिग्गीण सरीरखाउसियाण होत्तए-तुम च ण देवाणुप्पिया ! सरीर वाउसिया जाया अभिक्सण २ हाथे धोवसि, लाव आसयाहि वा सयाहि वा, णिसोहियाहि वा त तुम देवाणुपिए ! एयस्स ठाणस्स आलोए हि जाव पायच्छित्त पडिपज्जाहि) હે દેવાનુપ્રિયે ! નિર્ચ થ શ્રમણીઓને શરીરવકુશ થવુ કલ્પિત નથી, પરંતુ તમે તે હે દેવાનુપ્રિયે! શરીરવકુશ થઈ રહી છે વાર વાર હાથને ધૂઓ છે યાવતુ જ્યા તમારે ઉઠવા બેસવાનું હોય છે, સૂવાનુ હોય છે, સવાધ્યાય કરે હેય છે તે સ્થાનને પહેલા તમે પાણીથી સિંચિત કરી લે છે, અને ત્યારપછી તમે ત્યા ઉઠે-બેસે છે, સૂ છે અને સ્વાધ્યાય કરે છે એથી હે દેવાનુપ્રિયે તમે આ સ્થાનની આચના કરે યાવત્ પ્રાયશ્ચિત્ત ગ્રહણ કરે (तएण मा काली अन्जा पुष्फलाए अज्जाए एयम? नो आढाइ जान सिणीया संचिदुई, तएण ताओ पुष्फचूलाओ मज्जाओ कालिं अन अभिः , " . - , साधर्मपाल शीपं धापति, मुख धापति स्तनान्तराणि धापति, पक्षान्तराणि धावति, गुणा न्तराणि धारति, यत्र यत्रापि च खलु 'टाण या' म्यानम् उपवेशनस्थलम् ' सेज्न पा' शग्या शयनभूमिम् , 'णिसीहियं या पधिको सान्यायम्मिम् 'चेएइ ' चेतयते-करोति 'त' तत् स्यानादिक 'पुगामेव ' पूर्वमेव-उपवेश नादि क्रियाया पूर्व आसयइ वा' आस्ते उपविशति, समद या' शेते- शयनं करोति, 'णिसीहडपा' निषेधयति-स्वाध्याय करोति वा । ततः खलु सा पुष्पचूलाऽऽर्या कालीमार्यामेवमयादीत-मो खलु कल्पते हे देवाणुपिये 1 श्रमणीनां हत्ये धोवइ पाए धोवह, सीम धोवड मुर बोगद थणतराइ धोका, करसतराणि धेोवा, गुज्झतराइ धेोवइ, जत्थर वि य ण ठाणं वा सेज्ज घा णिसीहिय वा चेहरा-त पुवामेव अभुक्सेत्ता तओपच्छा आसयइ, वा सयइ वा णिसीहइवा) पार २ रारों को धोने लग गई, पैरों को धोने लग गई, शिर को धोने लग गई, मुंह को धोने लग गई, स्तनान्तरों को-स्तनों के मध्यभाग को-धोने लग गई, कक्षान्तरों को-काखो के मध्यभाग को-धोने लग गई, गुह्यभागों को-गुप्तागों को धोने लग गई। जहा २ वह बैठने का स्थान, शयन, स्थान, स्वा याय करने का स्थान नियत करती उसे पहिले से ही वह पानी से सिंचित कर देती-बाद में वह वहा बैठती शयन करती, स्वाध्याय करती, (तरण सा पुप्फचूला अज्जा कालिं अज्ज एव वयासी) उस काली आर्या की इस स्थिति को देखकर पुप्फचूला आर्या ने उसे इस प्रकार कहा-(नो खलु कप्पड़, फक्सतराणी धोवइ, गुज्झतराइ धोबइ, जत्य२ वि य ण ठाण वा सेज वा णिसी हिय वा चेएई त पुवामेर अनुस्खेचा तओपच्छा आसयइ, वा सयइ वा णिसोहइ वा) વાર વાર હાથને છેવા લાગી, પગેને જોવા લાગી, માથાને ધોવા લાગી, મુખને ધવા લાગી, તનાક્તરનેસ્તનના વચ્ચેના સ્થાનને જોવા લાગી, કક્ષા તને-બગલના મધ્ય ભાગને દેવા લાગી, ગુહ્ય ભાગને-ગુલ્લાને જોવા લાગી જ્યાં જ્યાં તેને બેસવાનું સ્થાન, શયનસ્થાન, સ્વાધ્યાય કરવાનું સ્થાન નક્કી કરતી તે તેને પહેલેથી જ તે પાણીથી સિંચિત કરી દેતી, ત્યારપછી તે स्या मेसती, शयन ४२ती, पाध्याय रती (तएण सा पुरफचूला अजा कार्कि अन्ज एव वयासी) से ही आयन्ति भाषी स्थिति बन गुपयूदा मायर्याय તેને આ પ્રમાણે કહ્યું કે – - - अनगारधर्मामृतपिणी टी० श्रु घ ० १ फालीदेवीवर्णनम् ७९७ निग्रन्थीना शरीरवाकुशिका जाताऽसि, यतस्त्वम्-अभीक्ष्णं २ हस्तौ धावसि यावत् ' आसयाहि वा' आस्से-उपविशसि, 'सयाहि वा' शेपे-अयन करोपि 'पीसीहियाहि वा' निषेधयसि स्वाध्याय करोपि, 'त' तत्-तस्मात् कार- गाद ल हे देवानुप्रिये ! एतत् स्थानम्-' आलोएहि' आलोचय यारत् माय- चित्त प्रतिपयस्व । मूले-सम्बन्धमामान्चे पप्ठी । ततः खलु सा काली आर्या देवाणुप्पिया ! समणी ण णिग्गयीण सरीरवारसियाग होत्तए-तुम च ण देवाणुप्पिया! मरीरबाउसिया जाया-अभिक्खणं २ हत्ये धोवसि, जाव आसयाहि वा सयारिवाणिसीहियाहि वा त तुम देवाणुप्पियाए । एयरस ठाणस्स आरोएहि जाव पायच्छित पडिवज्जाहि) हे देवानुप्रिये ! निर्गन्ध श्रमणियों को शरीरवकुश होना कल्पित नहीं हैं। परन्तु तुम तो हे देवानुप्रिये । शरीरवकुश बन रही हो । वार २ हाथो को धोती हो यावत् जहा तुम्हें उठना बैठना होता है, शयन करना होता है, स्वाध्याय करना होता है उस स्थान को पहिले से ही सिंचित कर लेती हो तर जाकर पर्दा उठती यैठती हो, शयन करती हो, स्वाध्याय करती हो। इसलिये हे देवानुप्रिये! तुम इस स्थान की आलोचना करो यावत् प्रायश्चित्त ग्रहण करो। (तएण सा काली अज्जा पुप्फचूलाए अज्जाए एयमट्ठ नो आढाइ, जाव तुसिणीया सचिट्ठइ, तएणं ताओ पुप्फचूलाओ (नो खलु कप्पड़ देवाणुप्पिया ! समणीण णिग्गथीण सरीरवाउसियाण होत्तए-तुम च ण देवाणुप्पिया! सरीर वाउसिया जाया अभिक्सण २ हत्थे धोवसि, जाव आसयाहि वा सयाहि वा, णिसोहियाहि वा त तुम देवाणुप्पिए ! एयरस ठाणस्स आलोए हि जाव पायच्छित्त पडिपज्जाहि) હે દેવાનુપ્રિયે ! નિર્ચ થ શ્રમણીઓને શરીરવકુશ થવું કવિપત નથી, પરંતુ તમે તે હે દેવાનુપ્રિયે ! શરીરવશ થઈ રહી છે વાર વાર હાને ધુઓ છે યાવત્ જ્યા તમારે ઉઠવા બેસવાનું હોય છે, સૂવાનુ હોય છે, સવાધ્યાય કરવો હોય છે તે સ્થાનને પહેલા તમે પાણીથી સિંચિત કરી લે છે, અને ત્યારપછી તમે ત્યા ઉકે-બેસે છે, સૂવે છે અને સ્વાધ્યાય કરે છે એથી દેવાનુપ્રિયે!તમે આ સ્થાનની આલોચના કર યાવત્ પ્રાયશ્ચિત્ત ગ્રહણ કરે (तएण सा क लो अज्जा पुष्फचूलाए अजाए एयम? नो आढाइ जावं तसिणीया संचिदुई, तएण वाओ पुप्फचूलाओ मज्जाओ कालिं अन्न अभि - - जातामकारक सुप्पाया आर्याया एमय नो भाटाइ' नो आदियतेन मन्यते यावद 'सिगीया' हणीका-समौनी सतिष्ठते । रातः खल्ल ताः पुपर्ला भायोः कालीमार्याप 'अभिसणर' थमीक्षण२ बार बार 'हीलेंति' निम्ति जामको- द्घाटनपूर्वक निर्भर्सनन्ति मिंदति निन्दन्ति कृरिसतशमपूर्वक दोषोद्धाटनेन अना द्वियन्ते, 'खिसनि खिसन्ति-हस्तमुवादिविकारपूर्वकमरमन्याते, अपमान कुन्तिी त्यर्थः 'गरिहति' गहन्तेर्वादिममक्ष दोपारिकरणकतिरस्कुर्वन्ति, 'भरमण ति' अपमन्यन्तेलसाचनादिमिरपमान कुर्वन्ति, तया-अभीक्ष्णममीक्ष्णम् धारवार एतमय शरीरसस्करणरूप निवारयति। ततः बल तस्याः काल्या भार्यायाः भम अज्जाभो कालिं अज्ज अभिक्सण २ हीति, जिंदति, खिसति, गरि- हति अवमण्णति, अभिरवण २ एयम निधारेंति, सण तासे कालीए अाए समणीहिं णिग्गथीहि अभिसण २ रीलिजमाणीए जाव वारिज्जमाणीए इमेयारूवे अज्झथिए जाव समुप्पडिजत्या) उस काली । आर्याने पुष्फचूला आर्या के इस कथन रूप अर्थको नहीं माना। केवल बह यावत् चुपचापीरती। उत्तरमें जप उसने उनसे कुछ नहीं कहा-तब उस पुष्पचला आर्या 'हीलति' काली आर्याकी वार२ जन्मकर्म उद्घाटन पूर्वक भर्त्सना (तिरस्कार) करना प्रारभ करदिया। निति' कुत्सित शब्दोचारण पूर्वक दोषोद्घाटन करते हुए वे उसकी धार २ निंदा करने लगीं। 'खिसति' हस्त, मुख, आदि के विकार प्रदर्शन पूर्वक वे उसका अपमान करने लग गई । 'गरिहति ' गुरु आदिजनों के समक्ष दोषों को प्रकट करके वे उसका तिरस्कार करने लगी। तथा "अवमण्णति" रूक्षवचन आदि बोल २ कर उसका अपमान भी करने लग गई। क्षणं २ हीले ति णि दति, खि सति, गरिह ति अधमण्णति, अभिक्खण २ एय भट्ट लियारे ति, तएण तीसे कालीए अनाए समणीहि मिग थीहि अभिक्षण २ होलिन्जमाणीए जाब वारिज्जमाणीए इमयाहवे अन्झथिए जव समुप्पजित्था) તે કાલી આર્યાએ પુષ્પચૂલા આર્યોના આ કથન રૂપ અને સ્વીકાર કર્યો નહિ ફક્ત તે મૂગી થઈને જ બેસી રહી જવાબમાં જયારે તેણે તેમને કઈ જ કહ્યું નહિ ત્યારે પુષ્પચૂલા આર્યાએ કાલી આર્યાની વાર વાર જન્મ, કર્મ, ઉદ્ધાટનપૂર્વક ભર્સના કરવા માડી કુત્સિત શબ્દચ્ચારણથી દુઘાટન કરતી તે તેની વાર વાર નિંદા કરવા લાગી હાથ, ચુખ વગેરેને વિકૃત કરીને તે તેમનું અપમાન કરવા લાગી ગુરૂ વગેરેની સામે દેને પ્રકટ કરીને તે તેમને તિરસ્કાર કરવા લાગી તેમજ રૂક્ષ વચને વગેરે બોલીને તેનું અપ- માન પણ કરવા લાગી અને સાથે સાથે તે આથી તેને વારવાર શરીર-સરકાર કરવાની મનાઈ પણ કરતી રહી આ પ્રમાણે નિગ્રંથ શ્રમણોએ વડે વારવાર .
७२२ - मनगारधर्मामृतयपिणी टी० २५ ११०१ फालीदेवीपर्णनम् गीमिः मिर्ग्रन्थीभिः भागमभीक्ष्ण दिल्यमानायाः यावत्-चार्यमाणाया अप- मेतद्रूप 'अज्झथिए ' आध्यात्मिका-आत्मगतविचारः यावत्-मनोगतः सङ्कल्पः समुदपयत यदा खलु अहम् भगारवासमभ्ये 'वसित्या' उपिना=न्पयस तदा साल अह 'सयपसा' स्वयंपशा स्वतन्त्रा आसम् , वत्प्रभृति च खलु अह मुण्डाभृत्वा भगारात् अनगारितां प्रत्रजिताऽभर तत्प्रभृति च खछु अह परवशा जाताऽस्मि त' उत्-तस्मात् श्रेयः खलु मम कल्ये मादुष्प्रभातायां रजन्या यावत् सूर्ये ज्व- लति-भूर्योदये सति 'पाडिक' प्रत्येकम्-एकमात्र मिनमित्यर्थः, उपाश्रयनुपर्म- पद्य खलु विहन्तुम् , ' तिक्व' इति कृत्वाम् इति मनसि निसाय एव सम्प्रेक्षते, साथ २ में वे आर्या उसे घार २ शरीर सस्कार करने से मना भी करती रही। इस प्रकार उस काली आर्या के निर्ग्रन्ध श्रमणियों द्वारा पार २ भसित आदि होने पर तथा शरीर सस्कार करने से निषिद्ध होने पर, उसे यह इस प्रकार का आ यात्मिक यावत् मनोगत सकल्प उत्पन्न हुआ। (जया णं अर भगारवासमझे वमित्या तया ण अह सयवसा, जप्पिभिइ च ण अह मुडा भवित्ता अगाराओ, अणगारिय पव्वइया तप्पभिड च ण अह परवसा जाया, त सेयं खलु मम फल्ल पाउप्पभायाए रयणीए जाव जलते पाडिक्काण्वस्सय उवसपज्जित्ता ण विहरित्तए तिफल एच सपहेइ सपेहिता करलं जाव जलते पाडिएक्क अवस्सय गिण्इ) जब मैं अपने घर के बीच में रहती थी-उस समय में स्वतन्त्र परन्तु जिस दिन से मुडित होकर अगार अवस्था से इस अमगार भवस्था में आई उस दिन से मैं परवश-पराधीन बन चुकी हैं। अतः मुझे वही श्रेयस्कर है कि में दूसरे दिन प्रात काल होते ही जय सूर्यो ભસિત વગેરે થવાથી તેમજ શરીર સ સ્કારની મનાઈ હેવા બદલ તે કાલી આર્યાને આ જાતને આધ્યાત્મિક ચાવતું મનોગત સક૫ ઉદ્ભવે કે– (जयाणे भह भगारवासमाझे वसित्या तयाण अह सयवसा जप्पभिइ पण अह मुडा भवित्ता अगाराभो अणगारिय पचया तपभिइ च ण अह परनसा साया त सेय खलु मम कल्ल पउप्पभाषाए रयणीए माघ जलते पाटिका परसय उयसपजिवाण विहरितर तिकट्ठ एव सपेहेह, सपेहिता कम्छ जाव सबसे पारिया उपस्सय गिण्ड) જ્યારે હુ ઘરમાં રહેતી હતી ત્યારે હું સ્વતંત્ર હતી પરંતુ જ્યારથી મે મુઠિત થઈને અગાર અવસ્થાને ત્યજીને અનેગાર અવસ્થા સ્વીકારી છે ત્યારથી હું પરવશ-પરાધીન થઈ ગઈ છુ એથી મારા માટે હવે એ જ પ્રેયસ્કર બીજે દિવસે સવાર થતા જ જ્યારે સૂર્ય ઉદય પામશે ત્યારે थी।
८co - . साधर्म सम्भेक्ष्य कल्ये यानत् सूर्ये चलति पाडिय' प्रत्येकम्-उपाश्रय गृहाति । तर खलु सा ' अणियारिया' अनिगरिता-निगरकाभारात् , ' अणोहडिया ' मन- वहिका यहछा प्रतिमतिरोधकामावाद , अतएर सम्छंदमई' सच्छन्द मतिः अभीक्ष्णमभीक्ष्ण हस्तौ धापति यावत्-आस्ते वा शेते या निषेधयति वा । ततः खलु सा काली आर्या 'पासत्या' पावस्था-गादकारणं विना नित्यपिण्ड भोक्त्री, अवएव पार्थ स्थविहारिणि, ओसणा' आगन्ना समाचारीपालनेऽवसी दय हो जावेगा-दूसरे उपाश्रय में चली जाऊँ । इस प्रकार का उसने अपने मन में विचार किया। विचार करके फिर वह दूसरे दिन प्रात: फाल होते ही सूर्योदय होने पर दूसरे उपाश्रय में चली गई। (तत्थर्ण सा अणिवारिया अणोहटिया सच्छदमई अभिक्खण २ हत्थे धोवेइ, जाव आसयइ वा सयइ वाणीसेहेइ वा-तएण सा काली अज्जा पासस्था पासत्यविहारी ओसण्णा ओसण्णविहारी, कुसीला कुसीलविहारी, अहाउदा अहाउदविहारी, ससत्ता ससत्तविहारी पणि वासाणि सा माणपरियागं पाउणइ) वहां वह विना रोक टोक, यहच्छा प्रवृत्ति करने लग गई। इच्छानुसार घार २ हाथ पैर आदि धोने लग गई। उठने बैठने एवं सोने के स्थान को तथा स्वाध्याय भूमि को पहिले से ही पानी से सिञ्चित फर वहा उठने बैठने एव स्वाध्याय करने लगी। इस तरह की स्वच्छन्द प्रवृत्ति से वह काली आर्या पासस्था-गाढकारण के विना नित्य पिण्ड भोस्त्री-घन गई, पार्श्वस्थ विहारिणी हो गई। समाचारी બીજા ઉપાશ્રયમાં જતી રહુ આ પ્રમાણે તેણે મનમાં વિચાર કર્યો વિચાર કરીને તે બીજે દિવસે સવાર થતા જ સૂર્યોદય થયા બાદ બીજા ઉપાશ્રયમાં જતી રહી (तत्थण सा अणिवारिया अणोहट्टिया सच्छदमई अभिक्खण २ हत्ये भोवेइ, जाव आसयह वा सयइ वा णीसेहेइ वा तएण सा काली अज्जा पासस्था पासत्यविहारी ओसण्णो ओसण्णविहारी फुसीला कुसीलविहारी अहा दा अहाछद विहारी सससा ससत्तविहारी बहूणि वासाणि सामण्णपरियाग पाउणइ) ત્યા તે રેક-ટોક વિના સ્વચ્છદ થઈને પ્રવૃત્તિ કરવા લાગી ઈચ્છા મુજળ વાર વાર હાથ-પગ ધોવા લાગી, ઉઠવા-બેસવા અને સૂવાના સ્થાનને તેમજ સ્વાધ્યાય ભૂમિને પહેલેથી જ પાણી વડે સિંચિત કરીને ત્યા ઉઠવા બેસવા તેમજ સ્વાધ્યાય કરવા લાગી આ જાતની સ્વચ્છખ્ય પ્રવૃત્તિથી તે કાલી આર્યા પાસસ્થા–ગાઢ કારણ વગર નિત્ય પિંડ ભત્રી . अमगारधर्मामृतषिणी टी० भु २ घ १०१ कालीदेवी घर्णनम् दन्ती, अतएव अबसन्नविहारिणी, 'कुसीला ' कुशीला-उत्तरगुणसेवया संज्वलन- फपायोदये प्रवृत्ता, अतएव कुशी-विहारिणी, 'अहाच्छदा' यथान्छन्दा-- स्वाभिप्रायपूर्वकस्समति कल्पितमार्ग प्रत्ता, अतएव यथा छन्दविहारिणी, 'ससत्ता' ससक्ता गृहस्थादिमेमबन्धनेन शिथिलमामाचारीमटत्ता सती बहूनि वर्षाणि श्रामण्य पर्याय पालपति, पालयित्वा अर्द्धमामिश्या संलेखन याऽऽत्मान 'सेइ' जोप- यति-सेवते, झूसित्ता-जोपरिचा त्रिंशद् भक्तानि 'अणसणाए 'अनशनया 'छेएइ' छिनत्ति, जिचा तस्य स्थानस्य अनालोचिता प्रतिक्रान्ता कालमासे काल कृत्वा चमरचञ्चाया राजधान्या कालावत सके भवने उपपातसभाया देवशयनीये देवदृप्यान्तरिते = देवदूष्यवस्वाच्छादिते अङ्गुलस्याऽसख्येयभाग- मात्रायामवगाहनाया कालीदेवीतया उपपन्ना । ततः खलु सा कालीदेवी अधुनो- पालन करने में शिथिलता दिखलाने लगी-अवसन्न विहारिणी हो गई। कुशीला यन गई-मज्वलन कपाय के उदय होने से उत्तरगुणो की विराधना करने लगी-कुशील विहारिणी हो गई और अपनी इच्छानु- सार मार्ग की कल्पना कर उसमें प्रवृत्त रहने लग गई-इसलिये वह यथाच्छन्द विहारिणी भी बन गई। गृहस्थ आदि जनों के अधिक परि- चयजन्य प्रेमबंधन से अपने आचार पालन मे शिथिल बनी हुई उसने इस तरह होकर अनेक वो तक श्रामण्य पर्याय का पालन किया और (पाउणित्ता) पालन कर (अद्धमास्यिाए सलेहणाए अत्ताण झूसेह, झूसित्ता तीस भत्ताइ अणसणाए छेपइ, छेइत्ता, तस्स ठाणस्स अणा रोड्य अपडिक्कत्ता कालमासे काल किच्चा चमरचचाए रायहाणीए कालवाहिएस नवणे उपायसभाए देवसयणिज्जसि देवदूसतरिए अगुल- વિહારિણી થઈ ગઈ સમ ચારી પાલન કરવામાં શિથિલતાવાળી બતાવવા લાગી- અવસન વિહારિણી થઈ ગઈ કુશલા થઈ ગઈ, સા જવલન કષાયને ઉદય હેવાથી ઉત્તર ગુણોની વિરાધના કરવા લાગી, કુશિલ વિહારિણી થઈ ગઈ અને પિતાની ઇચ્છા મુજબ માર્ગની કલ્પના કરીને તેમાં પ્રવૃત્ત થવા લાગી એથી તે યથાચ્છન્દ વિહાર પણ બની ગઈ ગૃહસ્થ વગેરે લોકેના વધારે પડતા પરિચયજન્ય પ્રેમળ ધનથી પિતાના આચાર પાલનમા શિથિલ થઈ ગઈ તેણે આ પ્રમાણે ઘણા વર્ષો સુધી શામણ્ય-પર્યાયનું પાલન કર્યું અને (पणित्ता) पासन गने ( अद्धमासियाए सलेहणार अत्ताण झूसेइ, झूसिवा तीस भत्ताइ अणसणाए "ए ठाणास अणालोइयअपडिव कत्ता कारमासे काल किचा चमर- - ... ८८० जाताधर्मपाल सम्प्रेक्ष्य करपे यामद सूर्य ज्वलति 'पाडिएका प्रत्येकम्-आश्रय गृहाति । तत्र खलु सा 'अणिमारिया' अनिपारिता-निगारकामागरात् , ' अगोडड्डिया' अन- वहिका यहन्छा प्रतिमतिरोधाभावात् , अतएर 'सन्छंदमई' स्वच्छन्द मतिः अभीक्ष्णमभीक्ष्ण हस्तौ धारति यावत्-आस्ते वा शेत वा निषेधयति वा। ततः खलु सा काली आर्या ' पासत्या' पार्श्वस्था-गाइकारणविना नित्यपिण्ड भोक्त्री, अवएव पार्थ स्थविहारिणि, 'ओसणा' अममा समावारीपालनेऽत्रसी दय हो जावेगा-दूसरे उपाश्रय में चली जाऊँ । इस प्रकार का उसने अपने मन में विचार किया। विचार करके फिर वह दसरे दिन प्रातः फाल होते ही सूर्योदय होने पर दूसरे उपाश्रय में चली गई । (तस्थ सा अणिवारिया अणोहिया सच्छदमई अभिक्खण २ रस्थे धोवेह, जाव आसयह या सयइ वाणीसेहेइ वा-तएणसा काली अज्जा पासस्था पासत्थविहारी ओसण्णा ओसण्णविहारी, कुसीला कुसीलविहारी, अहाछदा अहाउदविहारी, ससत्ता ससत्तविरारी पट्टणि वासाणि सा माणपरियागं पाउगइ ) वहाँ वह विना रोक टोक, यहच्छा प्रवृत्ति करने लग गई। इच्छानुसार चार २ हाय पैर आदि धोने लग गई। उठने बैठने एव सोने के स्थान को तथा स्वाध्याय भूमि को पहिले से ही पानी से सिञ्चित कर वहा उठने बैठने एव स्वाध्याय करने लगी। इस तरह की स्वच्छन्द प्रवृत्ति से वह काली आर्या पासस्था-गाढकारण के विना नित्य पिण्ड भोस्त्री-यन गई, पार्श्वस्थ विहारिणी हो गई। समाचारी બીજા ઉપાશ્રયમાં જતી આ પ્રમાણે તેણે મનમાં વિચાર કર્યો વિચાર કરીને તે બીજે દિવસે સવાર થતા જ સૂર્યોદય થયા બાદ બીજા ઉપાશ્રયમાં જતી રહી ( तत्थण सा अणिवारिया अणोहट्टिया सच्छदमई अभिक्खण २ हत्ये भोवेइ, जाव आसयइ वा सयइ वा णीसेहेइ वा तएण सा काली अजा पासस्था पासत्यविहारी ओसण्णा ओसण्णविहारी कुसीला कुसीलविहारी अहा दा अहछिद विहारी ससत्ता ससत्तविहारी बहूणि वासाणि सामण्णपरियाग पाउणइ) ત્યા તે રેક-ટેક વિના સ્વચ્છદ થઈને પ્રવૃત્તિ કરવા લાગી ઈચ્છા મુજબ વાર વાર હાથ-પગ જેવા લાગી, ઉઠવા-બેસવા અને સૂવાના સ્થાનને તેમજ સ્વાધ્યાય ભૂમિને પહેલેથી જ પાણી વડે સિંચિત કરીને ત્યા ઉઠવા બેસવા તેમજ સ્વાધ્યાય કરવા લાગી આ જાતની સ્વછન્ન પ્રવૃત્તિથી તે કાલી આર્યા પાસસ્થા-ગાઢ કારણ વગર નિત્ય પિંડ ભેટ- । .
- अमगारधर्मामृतपिणी टी०धु २ च १०१ कालीदेवी वर्णनम् दन्ती, अतएव अप्रसन्नविहारिणी, 'कुसीला ' कुशीला-उत्तरगुणसेवया संज्वलन- फपायोदये प्रत्ता, अतएव कुशी-विहारिणी, 'अहाच्छदा' यथाच्छन्दा-- स्वाभिप्रायपूर्वकस्वमति कल्पितमार्ग प्रवृत्ता, अतएव यथा छन्दविहारिणी. 'ससत्ता' ससक्ता गृहस्थादिप्रेमपन्यनेन शिथिलमामाचारीपटत्ता सती बहूनि वर्षाणि श्रामण्य पर्याय पालयति, पालयित्वा अर्द्वमासिक्या सलेखनयाऽऽत्मान 'यूसेइ' जोप- यति-सेवते, झूसित्ता-जोपरिना त्रिंशद् भक्तानि 'अणसणाए 'अनशनया 'छेएइ छिनत्ति, जिचा तरय स्थानस्य अनालोचिताऽ प्रतिक्रान्ता कालमासे काल कृत्वा चमरचञ्चाया रानधान्या कालावत सके भवने उपपातसभाया देवशयनीये देवप्यान्तरिते = देवदूष्यवस्वाच्छादिते अगुलस्याऽसंख्येयभाग- मात्रायामवगाहनाया कालीदेवीतया उपपन्ना | ततः खलु सा कालीदेवी अधुनो- पालन करने में शिथिलता दिखलाने लगी-अवसन्न विहारिणी हो गई। कुशीला बन गई-संज्वलन कपाय के उदय होने से उत्तरगुणो की चिराधना करने लगी-कुशील विहारिणी हो गई और अपनी इच्छानु- सार मार्ग की कल्पना कर उसमें प्रवृत्त रहने लग गई-उमलिये वह यथाच्छन्द विहारिणी भी न गई। गृहस्थ आदि जनों के अधिक परि- चयजन्य प्रेमपधन से अपने आचार पालन में शिथिल उनी हुई उसने इस तरह होकर अनेक वर्षों तक श्रामण्य पर्याय का पालन किया और (पाउणित्ता) पालन कर (अद्धमास्यिाए सलेहणाए अत्ताण झुसेइ, झूसित्ता तीस भत्ताइ अणसणाए छेण्इ, छेइत्ता, तस्स ठाणस्स अणा लोहय अपडिक्कत्ता कालमासे काल किच्चा चमरचचाए रायहाणीए कालवडिएस भवणे उपवायमभा देवसणिज्जसि देवदूसतरिण अगुल- વિહારિણી વઈ ગઈ સમ ચારી પાલન કરવામા શિથિલતાવાળી બતાવવા લાગી… અવસન વિહારિણી થઈ ગઈ કુશીલા થJ ગઈ, સ જવલન કષાયને ઉદય હેવાથી ઉત્તર ગુણેની વિરાધના કરવા લાગી, કુશિલ વિહારિણી થઈ ગઈ અને પિતાની ઈચ્છા મુજબ માર્ગની કલ્પના કરીને તેમાં પ્રવૃત્ત થવા લાગી એથી તે યથાસ્કન્દ વિહાીિ પણ બની ગઈ ગૃહસ્થ વગેરે લેકેના વધારે પડતા પરિચયજન્ય પ્રેમળ ધનથી પિતાના આચાર પાલનમા શિથિલ થઈ ગઈ તેણે આ પ્રમાણે ઘણા વર્ષો સુધી શામધ્ય-પર્યાયનું પાલન કર્યું અને (पणिता) पासन ने ( अद्धमासियाए सलेहणार अत्ताण झूसेइ, झूसिचा तीस भत्ताइ अणसणाए छेपद रेइत्ता, तस्स ठागास अणालोइयअपटिव कत्ता काल्मासे काल किच्चा चमर- १०१ .
- . 200 तापा सम्मेक्ष्य कल्ये यावत् सूर्य जति पाडिएफ' प्रत्येकम्-आश्रय गृहाति । तत्र खलु सा 'अणियारिया' अनिगारिता-निगरकाभागात , ' अगोइडिया 'जन- चटिका यदृच्छा प्रतिमतिरोधाभावाद , अतएर 'सच्छंदमई ' स्वच्छन्द मतिः अभीक्ष्णमभीक्ष्ण हस्तौ धारति यावत्-आस्ते वा शेते वा निषेधयति था। ततः खलु सा कात्री आर्या 'पासत्या' पार्थस्था गाहकारणं विना नित्यपिण्ड भोस्त्री, अतएव पार्थस्थविहारिणि, ' ओसणा' अपना समाचारीपालनेऽवसी दय हो जावेगा-दूसरे उपाश्रय में चली जाऊँ। इस प्रकार का उसमे अपने मन में विचार किया। विचार करके फिर वह दूसरे दिन प्रातः काल होते ही सूर्योदय होने पर दूसरे उपाश्रय में चली गई। (तत्यर्ण सा अणिवारिया अणोहटिया सच्छदमई अभिक्खण २ हत्थे धोवेइ, जाय आसयइ वा सयइ वाणीसे हेइ वा-तएण सा काली अज्जा पासस्था पासत्थविहारी ओसण्णा ओसण्णविहारी, कुसीला कुसीलविहारी, अहाउदा अहाउदविहारी, ससत्ता ससत्तविहारी घडणि वासाणि सा भाषणपरियागं पाउ गइ) वहाँ वह विना रोक टोक, यहच्छा प्रवृत्ति करने लग गई। इच्छानुसार चार २ हाथ पैर आदि धोने लग गई। उठने बैठने एव सोने के स्थान को तथा स्वाध्याय भूमि को पहिले से ही पानी से सिश्चित कर वहा उठने बैठने एव स्वाध्याय करने लगी। इस तरह की स्वच्छन्द प्रवृत्ति से वह काली आर्या पासस्था-गाढकारण के विना नित्य पिण्ड भोक्त्री-पन गई, पार्श्वस्थ विहारिणी रो गई। समाचारी બીજા ઉપાશ્રયમાં જતી રહુ આ પ્રમાણે તેણે મનમાં વિચાર કર્યો વિચાર કરીને તે બીજે દિવસે સવાર થતા જ સૂર્યોદય થયા બાદ બીજા ઉપાશ્રયમા જતી રહી (तत्थण सा अणिवारिया अणोहटिया मच्छदमई अभिक्खण २ हत्थे धोवेइ, जाव आसयइ वा सयइ वा णीसेहेइ वा तएण सा काली अज्जा पासत्था पासत्यविहारी ओसण्णा ओसण्णविहारी कुसीला कुसीलविहारी अहा दा अहाछद विहारी ससत्ता ससत्तविहारी बहूणि वासाणि सामण्णपरियाग पाउणइ) ત્યા તે રોક-ટેક વિના સ્વરછદ થઈને પ્રવૃત્તિ કરવા લાગી ઈચ્છા મુજબ વારવાર હાથ-પગ ધવા લાગી, ઉઠવા-બેસવા અને સૂવાના સ્થાનને તેમજ સ્વાધ્યાય ભૂમિને પહેલેથી જ પાણી વડે સિંચિત કરીને ત્યા ઉઠવા બેસવા તેમજ સ્વાધ્યાય કરવા લાગી આ જાતની સ્વચ્છન્દ પ્રવૃત્તિથી તે કાલી આર્યા પાસસ્થા-ગાઢ કારણ વગર નિત્ય પિંડ શેકત્ર अनगारधर्मामृतषिणी टी० भु २ प १ ० १ फालीदेव वर्णनम् ८० दन्ती, अतएर अबसन्नविहारिणी, 'कुसीला' कुशीला उत्तरगुणसेवया संज्वलन- कपायोदये प्रवृत्ता, अतएव कुशी-विहारिणी, 'अहाच्छदा' यथाच्छन्दा:- स्वाभिप्रायपूर्वकस्वमति कल्पितमार्गे प्रवृत्ता, अतएव यया छन्दनिहारिणी. 'ससत्ता' ससक्ता गृहस्थादिप्रेमपन्धनेन शिथिलमामाचारीमटत्ता सती पहूनि वर्षाणि श्रामण्य पर्याय पालयति, पालयित्वा अर्द्धमामिक्या संठेखनयाऽऽत्मान 'सेइ' जोप यति-सेवते, झूसित्ता-जोपरिना त्रिंशद मक्तानि 'अणसणाए 'अनशनया 'छेएइ' छिनत्ति, जिचा तरय स्थानम्य अनालोचिताs पतिक्रान्ता कालमासे काल कृत्ला चमरचञ्चाया रानधान्या कालावत सके भवने उपपातसभाया देवशयनीये देवयान्तरिते = देवप्यवस्वाच्छादिते अङ्गुलस्याऽपख्येयभाग- मानायामवगाहनाया कालीदेवीतया उपपन्ना । ततः खलु सा कालीदेवी अधुनो- पालन करने में शिथिलता दिखलाने लगी-अयसन्न विहारिणी हो गई। कुशीला यन गई-मज्वलन कपाय के उदय होने से उत्तरगुणो की विराधना करने लगी-कुशील विहारिणी हो गई और अपनी इच्छानु- सार मार्ग की कल्पना कर उसमें प्रवृत्त रहने लग गई-इसलिये वह यधाच्छन्द विहारिणी भी बन गई । गृहस्थ आदि जनों के अधिक परि- चयजन्य प्रेमबंधन से अपने आचार पालन में शिथिल बनी हुई उसने इस तरह होकर अनेक यो तक श्रामण्य पर्याय का पालन किया और (पाउणित्ता) पालन कर (अद्धमासियाए सप्टेणाए अत्ताण झूसेइ, झुसित्ता तीस भत्ताइ अणसणाए गह, छेइत्ता, तस्स ठाणस्स अणा लोइय अपडिक्कत्ता कालमासे काल किच्चा चमरचचाए रायहाणीए कालवडिएस भवणे उचवायममा देवसयणिज्जसि देवदूमतरिए अगुल- વિહારિણી વઈ ગઈ સમ ચારી પાલન કરવામા શિથિલાવાળી બતાવવા લાગી- અવસન વિહારિણી થઈ ગઈ કુશીલા થJ ગઈ, સ જવલન તુષાયને ઉદય હેવાથી ઉત્તર ગુણની વિરાધના કરવા લાગી, કુશિલ વિહારિણી થઈ ગઈ અને પિતાની ઇચ્છા મુજબ માર્ગની કલ્પના કરીને તેમાં પ્રવૃત્ત થવા લાગી એથી તે યથારછન્દ વિહારિપ પણ બની ગઈ ગૃહસ્થ વગેરે લેકના વધારે પડતા પરિચયજન્ય પ્રેમળ ધનથી પિતાના આચાર પાલનમા શિથિલ થઈ ગઈ તેણે આ પ્રમાણે ઘણા વર્ષો સુધી ગ્રામય-પર્યાયનું પાલન કર્યું અને (परणिता ) पालन गने ( अद्धमासियाए सलेहणार अत्ताण झूसेइ, झूसिवा तीस भत्ताइ अणसणाए छेएइ, छेइत्ता, तस्स ठाणास अणालोइयअपहिवकत्ता काल्मासे काल किया चमर- 901 -- ८०२ पपन्ना-तत्काल समुत्पन्नासती पञ्चविषयापर्याप्त्या यथार्यामा सूर्यामदेववत् , 'जार भासामणपज्जनी' भाषामन पर्याप्या-याचद-आहारपर्याप्या १, शरीरपर्याप्त्या २, इन्द्रियपर्याप्या ३, आनमाणपर्याप्त्या ४, भाषामन पर्याप्त्या ५, पर्याप्तिभाव गच्छति । पर्याप्तिपन्धाशले देवानामाहारशरीरादिपर्यानिसमाप्ति कालान्तरापेक्षया भाषामन पर्याप्त्योः स्तोककालानरतया तयोरेकस्वेन विवक्ष णात् पर्याप्तीनां पञ्चविधत्तम् । ततः खल सा काली देवी चतमणा सामानिक- साहस्त्रीणां यावत् अन्येपा च रहना कालावतसकमानवासिनामसुरकुमारणा स्स असखेजइ, भागमेत्ताण ओगाहणाग कालीदेवीस उवषण्णा) अर्द्धमास की सलेखना से उसने अपनी आत्मा को युक्त किया। इस प्रकार उसने अनशनों द्वारा ३०भक्तोंका छेदन करने पर भी उस स्थानकी आलोचना नहीं की और न वर उन अतिचारों से पीछे ही टी-अत: अनालोचित अप्रतिक्रान्त बनकर वर जय उस काल अवसर-काल कर चमरचपा नाम की राजधानी में, कालावतसक भवन में, उपातातसभामें देवदूष्यवस्त्रसे आच्छादितदेवशयनीय शग्या ऊपर अगुलके असख्यातवे मात्र की अवगाहना से काली देवी के रूप में उत्पन्न हो गई (तण्ण सा कालीदेवी अटुणोववण्णा समाणी पचविटाए पज्जत्तीए जहा मूरियाभो जाव भासामणपज्जत्तीए .तएण सा कालीदेवी चउण्टं समाणि य साहस्सी ण अण्णेसिं च पहणं कालवडेंसकभवणवासीण असुरकुमाराण पचाए रायहाणीए कालवडि सए भवणे वायसभाए. देवसयणिजमी देवदूस तरिए अगुलस्म अस खेज्जइ, भागमेक्षाए ओगाहणाए कालीदेवीत्तए उबवण्णा) તેણે અદ્ધમાસની સલેખનાથી પિતાના આત્માને યુક્ત કર્યો આ પ્રમાણે તેણે અનશને વડે ૩૦ ભક્તોનું છેદન કરીને પણ તે સ્થાનની આચના કરી નહિ અને તે અતિચારના આચરણથી પણ અટકી નહિ એથી અનાચિત અપ્રતિકાત થઈને તે જ્યારે કાળ અવસરે કાળ કરીને અમરચ ચા નામની રાજધાનીમા કાલાવત સક ભવનમા, ઉ૫પાત સભામા દેવદૂષ્ય વથી આચ્છાદિત દેવશનીય ઉપર આગળીઓના અને ખાતમાં માત્રની અવગાહનાથી કાલી દેવીના રૂપમાં ઉત્પન્ન થઈ ગઈ (तरण सा काली देवी अहुणोववण्णा समाणी पचविहाए पन्जतीए जहा सूरियामो जाव भासमणपजत्तीए । तएण सा काली देवी चटण्ह मामा णिवसाहस्सीण जाव अण्णेसिं च बहण कालवडे सकभवणवासी | असुरकुमा राण देवाण य देवीणय आहेवच जाव विहरइ) .
" - - मैनगारधर्मामृतविणो टी० श्रु २ व १ ० १ कालीदेवावर्णनम् 201 देवाना च देवीना च आहेबच ' आधिपत्य स्वामित्व कुर्वन्तीपालयन्ती यावद् विहरति । एवम्-उक्तमकारेण खलु हे गौतम ! काल्या देव्या सा दिव्या देवद्धिः ३, रुया, माप्ता, अभिसमन्वागता। गौतमः पृच्छति-काल्या खलु हे भदन्त । देव्यास्तत्र केवइय' कियन्त देवाण य देवीण य आहेवच्च जाव विररह) इस प्रकार वह काली देवी अभी अभी उत्पन्न होकर पाच प्रकार की पर्याप्तियों से पर्याप्त बनी है। पर्याप्तिया ६ होती है परन्तु यहा पर जो वे पाच की सख्या में निर्दिष्ट हुई हैं-उसका कारण यह है कि पर्याप्ति के यधकाल में देवों के आहार, शरीर आदि पर्याप्तियों के समासिकाल की अपेक्षा भापा और मनः पर्याय का साथ साथ यध होता है, इसलिये इन दोनो को एक रूप से यहा विवक्षित किया गया है। वे पर्याप्तियां इस प्रकार है-1 (१) आहारपर्याप्ति (२) ,शरीर पर्याप्ति (३) इन्द्रियपर्याप्ति (४) श्वासोच्छ्वा. सपर्याप्ति (५) भापा एवं मनः पर्याप्ति। वह काली देवी चार हजार सामानिक देवोका यावत् और दूसरे अनेक कालावतसक भवनवासी असुरकुमार देवो का देवियो का आधिपत्य कर रही है। (एव खलु गोयमा ! कालीए देवीए सा दिव्वा देवड्डी ३ लद्धापत्ता अभिसमण्णा गया, આ પ્રમાણે તે કાલી દેવી હમણા જ ઉત્પન થઈને પાચ પ્રકારની પર્યારિઓથી પર્યાપ્ત બની છે પક્ષિઓ છ હોય છે પણ અહીં જે પાચની સંખ્યામાં જ બતાવવામાં આવી છે તેનું કારણ આ પ્રમાણે છે કે પર્યામિના બ ધકાલમા દેવના આહાર, શરીર વગેરે પર્યાપ્તિઓના સમાપ્તિકાળની અપેક્ષા ભાષા અને મન પર્યાપ્તિનું એકી સાથે બધ હોય છે એથી આ બંનેને અહીં બતાવવામાં આવી છે તે પર્યાપ્તિએ આ પ્રમાણે છે- (१) मा १२ पति, (२) शरी२ पति, (3) न्द्रिय पर्यासि, (४) वासी વાસ પર્યાપ્તિ, (૫) ભાષા અને મન પર્યાપ્તિ તે કાલી દેવી ચાર હજાર સામાનિક દેવે ઉપર યથાવત્ બીજા પણ ઘણા કાલાવત સક ભવનવાસી અસુર કુમાર દે, દેવીઓ ઉપર શાસન કરી રહી છે (एष स गोयमा ! कालीए देवीए सा दिव्या देविइढी ३ लद्धा पत्ता अभिसमण्णागया, कालीए ण भते ! देवीए केवइय काल ठिई पण्णचा १ गोयमा इनाइ पलिओवमाई ठिई पण्णत्ता) એક રૂપમાં જ ताधर्मपाल पपन्ना-तत्काल समुत्पन्नासती पञ्चविधयापर्याप्त्या यथामूर्यामा र्यामदेवात् , 'जार भासामणपज्जत्ती' भाषामन पर्यापा-यात्-आहारपर्याप्त्या १, शरीरपर्याप्या २, इन्द्रियपर्याप्त्या ३. आनमाणपर्याप्त्या ४, भाषामन पर्यापया ५, पर्याप्तिभाव गच्छति । पर्याप्तिपन्धाले देशानामाहारशरीरादिपर्याप्तिसमाप्ति कालान्तरापेक्षया भाषामन पर्याप्योः स्तोकमान्तरतया तपोरेकत्वेन विवक्ष णात् पर्याप्तीना पश्चविधत्तम् । ततः खल सा काली देवी चतसणा सामानिक- साहस्रीणां यावत्-अन्येपा च पहना कालावतसकमनवासिनामसुरकुमारणा . स्स असखेजइ, भागमेत्ता ओगारणाग कालीदेवीसए उववण्णा) अर्द्धमास की सलेखना से उसने अपनी आत्मा को युक्त किया। इस प्रकार उसने अनशनों द्वारा३०भक्तोंका छेदन करने पर भी उस स्थानकी आलोचना नही की और न वह उन अतिचारों से पीछे ही टी-अतः अनालोचित अप्रतिक्रान्त पनकर वह जय उस काल अवसर-काल कर चमरचपा नाम की राजधानी में, कालावतसकभवनमें, उपातातसभामें देवदृष्यवस्त्रसे आच्छादितदेवशयनीय'शग्या' ऊपर अगुलके असण्यातवे मात्र की अवगाहना से काली देवी के रूप में उत्पन्न हो गई (तरण सा कालीदेवी अहुणोचवण्णा समाणी पचविहाण पज्जत्तीए जहा सूरियाभो जाव भासामणपज्जत्तीए तएण सा कालीदेवी चउर समाणि य साहस्सी ण अण्णेसिं च यहणं कालवडेंसकभवणवासीण असुरकुमाराण पचाए रायहाणीए कालवाडि सए भवणे खवायसभाए देवसयणिजमी देवदूस तरिए गुलाम अस खेज्जइ, भागमेलाए ओगाहणाए कालीदेवीत्तए उववण्णा) તેણે અદ્ધમાસની સલેખનાથી પોતાના આત્માને યુક્ત કર્યો આ પ્રમાણે તેણે અનશને વડે ૩૦ ભક્તોનું છેદન કરીને પણ તે સ્થાનની આચના કરી નહિ અને તે અતિચારોના આચરણથી પણ અટકી નહિ એથી અનલોચિત અપ્રતિકાત થઈને તે જ્યારે કાળ અવસરે કાળ કરીને અમરચ ચા નામની રાજધાનીમા કાલાવત સક ભવનમા, ઉપપાત સભામા દેવદૂષ્ય વકથી આચ્છાદિત દેવશનીય ઉપર આગળીઓના અસ ખ્યાતમા માત્રની અવગાહનાણી કાલી દેવીના રૂપમાં ઉત્પન્ન થઈ ગઈ (तएण सा काली देवी अहुणोववण्णा समाणी पचविहाए पजतीए जहा सूरियामो जाव भासमणपजत्तीए । तएण सा काली देवी चउण्ह मामा णिवसाहस्सीण जाव अण्णेसिं च बहण कालवडे सकभवणवासी अवरकुमा राण देवाण य देवीणय आहेवच जाव विहरह) [ HAL - मनगारधर्मामृतषिणी टीका श्रु २ घे १ ० १ कालीदेवीवर्णनम् ८०५ श्रीसुधर्मास्वामी पाह-एर सलु हे जम्मूः ! श्रमणेन यावत्-मोक्ष सम्माप्तेन प्रथमस्य वर्गस्य मथमाभ्ययनस्य अयमर्थ =पूर्वोक्तो भावः प्रतः । तिमि ' इति प्रीमि, व्यारया पूर्ववत् ।। मू०४ ।। ॥ धर्मकथाना प्रथमवर्गस्य प्रथमाध्ययनं समाप्तम् ।। विदेह क्षेत्र में उत्पन्न होगी और वहीं से सिद्ध होगी। अर सुपर्मा स्वामी श्री जबू! स्वामी से कहते हैं कि हे जबू! मुक्ति को प्राप्त हुए श्रमण भगवान महावीर ने प्रथम वर्ग के प्रथम अध्ययन का यह पूर्वोक्त अर्थ प्रज्ञप्त किया है। ऐसा मैंने उन्हीं के मुख से सुनकर यह तुमसे कहा है ॥ सूत्र ४ ॥ -:प्रथम वर्ग का प्रथम अध्ययन समाप्त - મહાવિદેહ ક્ષેત્રમાં ઉત્પન થશે અને ત્યાથી જ સિદ્ધ થશે હવે સુધર્મા સ્વામી શ્રી જબૂ! સ્વામીને કહે છે કે હે જ બૂ! મુક્તિ પ્રાપ્ત શ્રમણ ભગવાન મહા વીરે પ્રથમ વર્ગના પ્રથમ અધ્યયનને આ પૂર્વોક્ત રૂપે અર્થ પ્રજ્ઞાપ્ત કર્યો છે આવું હું તેમના શ્રી મુખથી સાભળીને તમને કહી ગયો છુ ॥ सूत्र ४॥ પ્રથમ વર્ગનું પ્રથમ અધ્યયન સમાપ્ત …
t हाताधर्मकथा काल स्थिति मशप्ता ? भगवान्पाठ-हे गौतम ! ' अट्टाइजाउ ' अतृतीयेसाई द्वे पस्योपमे स्थितिः प्राप्ता । गौतमः पृच्छति-काली हे भदन्त । देरी तस्मादेवलोकाद् अनन्तरम् आयु भास्थितिक्षयानन्तर 'उत्पट्टिता' उरत्य=निस्टत्य कृत गमिा यति कुत्र- उत्पत्स्यते। भगवानाह-हे गौतम ! सा काली देवी देवलोकान्युत्वा महाविदेहे वर्षे उत्पध सेत्स्यति । कालीए ण भते ! देवीए केवइय फाल ठिई पत्ता ? गोयमा अढाइ जजाइ पलिभोवमाई ठिईपण्णत्ता) इस तरह से हे गौतम ! काली देवी ने वह दिव्य देवर्द्धि ३, अर्जित की है स्वाधीन की है और उसे अपने उपभोग के योग्य बनाया है। अब गौतम पुन प्रभु से पूछते हैं कि हे भदत ! कालीदेवी की कितनी स्थिति है ? उत्तर में प्रभु ने उनसे कहा-हे गौतम ! कालीदेवी की स्थिति अढाई पत्य की (प्रज्ञप्त हुई ) है ( काली ण भते ! देवी ताओ देवलोगाओ अणतर उघहित्ता कहिं गच्छहिइ, कहि उववज्जिरिइ, ? गोयमा! महाविदेहेवासे सिज्झिहिइ एव खलु जबू समणेणं जाव सपत्तण पढमस वगस पढमायणस अयमट्टे पण्णरे त्तिबेमि, धम्मकहाण पढमज्झयण समत्त) हे भदत ! कालीदेवी उस देवलोक से आयु एवं भवस्थिति के क्षय के अनन्तर निकलकर कर जावेगी, कहा उत्पन होगी? इस गौतम के प्रश्न का उत्तर प्रभु ने उ इस प्रकार दिया-गौतम ! वह काली देवी देवलोक से चव कर म આ પ્રમાણે હે ગૌતમ! કાલી દેવીએ તે દિ દેવદ્ધિ ૩ પ્રાપ્ત ક છે સ્વાધીન બનાવી છે અને તેને પિતાને માટે ઉપગ બનાવી હવે ગૌતમ ફરી પ્રભુને પૂછે છે કે હે ભદન્તા કાલી દેવીની સ્થિતિ કે જવાબમાં પ્રભુએ તેમને કહ્યું કે હે ગૌતમ! ફલી દેવીની સ્થિતિ અઢી પડયા (प्रशस य) छे ( कालीण भते ! देवी ताओ देवलोगाओ अणंतर उपद्वित्ता कहि गच्छि हिइ, कहि उववजिहिइ ? गोयमा ! महाविदेहे वासे सिज्ज्ञिहिइ, एत्र बल जबू! समणेर्ण जाव सपत्तेण पढमरस त्ति मि, धम्मकहाण पढमज्झयण समत्त) હે ભદન્ત! કાલી દેવી તે દેવકથી આસુ અને ભવસ્થિતિને પૂરી કરીને કયા જશે? કયા ઉત્પન્ન થશે ? આ પ્રમાણે ગૌતમના પ્રશ્નને સાભળીને પ્રભુએ ઉત્તરમાં તેને કહ્યું કે હે ગૌતમી તે કાલી દેવી છે " वग्गस्स पढमज्झयणस्स अयम? पण्णत्ते ! नमगारधर्मामृतवपिणी टी० ध्रु. २ ० १ ० २ रात्रीदेवीवर्धनम् ८०७ श्रमणेन भगवता महावीरेण यावत् सिद्धिगतिनाममधेयं स्थान सम्पातन धर्मकथाना प्रथमस्य वर्गस्य प्रथमाध्ययनस्यायमर्थः पूर्वोक्तो भावः प्रज्ञप्तः, द्वितीयस्य खलु भदन्त ! अध्ययनस्य श्रमगेन भगवता महावीरेण यावत् मोक्ष सम्याप्तेन फोऽय:- को भावः प्रज्ञप्तः? सुधर्मास्वामीमाह-एव खलु हे जम्मूः । तस्मिन् काले तरिमन् समये राज- गृह नगरम् । गुणशिला पैत्यम् । स्वामी भगवान महावीरः समवरसः । परिप पढमस्स वग्गस्स पढमज्झयणस्स अयमद्धे पण्णत्ते विडयस्स ण भते ! अज्झयणस्स समणेण भगवया महावीरेणं जाव सपत्तेण के अटे पण्णत्ते ? एवं खलु जबू। तेण कालेण तेण समएण रायगिहे णयरे गुण सिलए चेहए सामी समोसढे) यदि श्रमण भगवान महावीर ने जो कि मुक्ति स्थान को प्राप्त हो चुके है वर्मकथाके प्रथम वर्ग के प्रथम अध्य. पन का यह पूर्वोक्त रूप से अर्थ प्ररूपित किया है-तो हे भदत ! द्वितीय अध्ययन का उन्ही श्रमण भगवान महावीर ने जो कि मुक्ति को प्राप्त कर चुके हैं क्या भाव अर्थ प्रतिपादित किया है ? इस प्रकार जबू स्वामी के पूछने पर सुधर्मा स्वामी उनसे कहते हैं कि हे जन् ! सुनो -तुम्हारे प्रश्न का उत्तर इस प्रकार है-उस काल और उस समय में राजगृह नाम का नगर था। उसमें गुगशिलक नाम का उद्यान था। उसमें महावीर स्वामी समवसरे।-(परिसा निग्गया-जाव पज्जुवासइ, बग्गस्स पढमज्झयणस्स अयमढे पण्णत्ते विदयस्स ण मते ! अज्झयणस्स समणेण भगवया महावीरेण जार सपत्तेण के० अढे पण्णत्ते ' एव खलु जबू' तेण कालेण तेण समएण रायगिहे णयरे गुणसिलए चेइए सामी समोसढे) જો શ્રમણ ભગવાન મહાવીર–કે જેમણે મુક્તિસ્થાન મેળવી લીધું છે ધર્મકથાના પ્રથમ વર્ગના પ્રથમ અધ્યયનને આ પૂર્વોક્ત રૂપમાં અર્થ પ્રરૂપિત કર્યો છે તે છે ભદન્ત ! જ શ્રમણ ભગવાન મહાવીરે-કે જેમણે મુક્તિ સ્થાન મેળવી લીધુ છે બીજ અધ્યયનને શે ભાવ-અર્થ પ્રતિપાદિત કર્યો છે આ પ્રમાણે જ ન્યૂ સવામીના પ્રશ્નને સાભળીને શ્રી સુધર્મા સ્વામી તેમને કહે છે કે હું જ બૂ! સાભળે, તમારા પ્રશ્નનો ઉત્તર આ પ્રમાણે છે કે તે કાળે અને તે સમયે રાજગૃહ નામે નગર હતુ તેમાં ગુરુશિલક નામે ઉઘાન હતુ તેમા મહાવીર સ્વામી પધાર્યા ( परिसा निग्गया-जाब पज्जवासइ, तेण कालेण तेण समएण राई देवी अय द्वितीयमध्ययन मारभ्यते- मूलम्-जइ णं भंते ! समणेणं भगवया महावीरेण जाव संपत्तेणं धम्मकहाणं पढमस्स वग्गस्स पढमज्झयणस्त अय- मढे पण्णत्ते विइयस्स ण भंते । अग्झयणस्स समणेणं भग- वया महावीरेणं जाव संपत्तेणं के० अहे पण्णत्ते ?, एव खल्लु जंवू । तेणं कालेण तेणं समएणं रायगिहे नयरे गुणसिलए चेइए सामी समोसढे परिसा निग्गया जाव पज्जुवासइ, तेण कालेण तेण समएणं राई देवीचमरचचाए रायहाणीए एव जहा काली तहेव आगया णविहि उवदसेत्ता पडिगया भंतेत्ति भगवं गोयमा। पुष्वभवपुच्छा, एवं खल्ल गोयमा। तेण कालेण तेणं समएण आमलकप्पा णयरी अबसालवणे चेइए जियसत्तू राया राई गाहावई राईसिरी भारिया राई दारिया पासस्स समोसरण राई दारिया जहेव काली तहेव निक्खंता तहेव सरीरवाउसिया तं चेव सव्वं जाव अत काहिति । एवं खलु जंबू । विइयज्झयणस्स निक्खेवओ ॥ ॥ पढमवग्गस्स वीयज्झयण समत्त ॥ सू० ५॥ टीका-'जइण भते ' इत्यादि । जम्बूस्वामीपृच्छति-यदि खल हे भद त । -द्वितीय अध्ययन प्रारभ:- -जहणं भते ! समणेण इत्यादि। टोकार्थ:-जयू स्वामी श्री सुधर्मास्वामी से पूछते हैं कि (भंते ) हे भदंत ! (जइण समणेण भगवया महावीरेण जाव सपत्तेण धम्मकहाण બીજુ અધ્યયન પ્રારંભ जइण भैते ! समणेण इत्यादि- ટીકાથે–જબૂ સ્વામી શ્રી સુધર્મા સ્વામીને પૂછે છે કે (મતે) હે ભદન્ત ! (जइण समणेण भगाया महावीरेण जाव सपत्तेण - ८०७ ममगारधर्मामृतवपिणी टी० श्रु.२.१ अ० २ रात्रीदेवीचनम् श्रमणेन भगवता महावीरेण यावत् सिद्धिगतिनाममधेय स्थान सम्प्राप्तन धर्मकथाना प्रथमस्य वर्गस्य प्रथमाध्ययनस्यायम:=पूर्वोक्तो भावः प्रज्ञप्तः, द्वितीयस्य सलु भदन्त ! अ ययनस्य श्रमणेन भगवता महावीरेण यावत् मोक्ष सम्प्राप्तेन कोऽर्थ:- को भावः प्रज्ञप्तः ? सुधर्मास्वामीमाह-एव खलु हे जम्मू: । तस्मिन् काले तस्मिन् समये राज- गृह नगरम् । गुणशिलक पैत्यम् । स्वामी भगवान महावीरः समवयसः । परिप पढमस्स वग्गस्स पढमायणस्स अयमढे पण्णत्ते विडयस्स ण भते । अज्झयणस्स समणेण भगवया महावीरेण जाव सपत्तेणं के अटे पण्णत्ते ? एवं खलु जवू ! तेण कालेण तेण समएण रायगिहे णयरे गुण सिलए चेहए सामी समोसढे) यदि श्रमण भगवान महावीर ने जो कि मुक्ति स्थान को प्राप्त हो चुके हे धर्मकथाके प्रथम वर्ग के प्रथम अध्य- पन का यह पूर्वोक्त रूप से अर्थ प्ररूपित किया है-तो हे भदत! दिसीय अध्ययन का उन्हीं श्रमण भगवान महावीर ने जो कि मुक्ति को प्राप्त कर चुके हैं क्या भाव अर्थ प्रतिपादित किया है ? इस प्रकार जब स्वामी के पूछने पर सुधर्मा स्वामी उनसे कहते हैं कि हे जवू ! सुनो -तुम्हारे प्रश्न का उत्सर इस प्रकार है-उस काल और उस समय में राजगृह नाम का नगर था। उसमें गुगशिलक नाम का उद्यान था। उसमें महावीर स्वामी समवसरे।-(परिसा निग्गया-जाव पज्जुवासइ, बग्गस्स पढमज्झयणस्स अयमढे पण्णत्ते पिइयस्स ण भते ! अज्झयणस्स समणेण भगवया महावीरेण जान सपत्तेण के० अढे पण्णत्ते ? एव खलु जबू' तेण कालेण तेणं समएण रायगिहे णयरे गुणसिलए चेइए सामी समोसढे ) જે શ્રમણ ભગવાન મહાવીરે-કે જેમણે મુક્તિસ્થાન મેળવી લીધુ છે ધર્મકથાના પ્રથમ વર્ગના પ્રધમ અધ્યયનને આ પૂર્વોક્ત રૂપમાં અર્થ પ્રરૂપિત કર્યો છે તે છે ભદન્ત ! તે જ શ્રમણ ભગવાન મહાવીરે-કે જેમણે મુક્તિ સ્થાન મેળવી લીધુ છે બીજા અધ્યયનને શો ભાવ–અર્થ પ્રતિપાદિત કર્યો છે આ પ્રમાણે જ ન્યૂ સ્વામીના પ્રશ્નને સાભળીને શ્રી સુધર્મા સ્વામી તેમને કહે છે કે હે જ બૂ! સાભળે, તમારા પ્રશ્નને ઉત્તર આ પ્રમાણે છે કે તે કાળે અને તે સમયે રાજગહ નામે નગર હતું તેમાં ગુણલિક નામે ઉદ્યાન હતુ તેમા મહાવીર સ્વામી પધાર્યા mom गया-जाव पज्जुवासइ, तेण कालेणं तेण समएण राई देवी अप द्वितीयमध्ययन प्रारभ्यते- मूलम्-जइ णं भते ! समणेणं भगवया महावीरेणं जाव सपत्तेणं धम्मकहाणं पढमस्स वग्गस्स पढमज्झयणस्त अय- मढे पण्णत्ते विइयस्स गं भंते ! अज्झयणस्स समणेणं भग- वया महावीरेणं जाव संपत्तेणं के० अहे पण्णत्ते , एव खल जंबू । तेणं कालेणं तेणं समएणं रायगिहे नयरे गुणसिलए चेइए सामी समोसढे परिसा निग्गया जाव पज्जुवासइ,तेण कालेणं तेणं समएणं राई देवीचमरचचाए रायहाणीए एव जहा काली तहेव आगया णहविहि उवदसेत्ता पडिगया भंतेत्ति भगवं गोयमा। पुष्वभवपुच्छा, एव खलु गोयमा । तेण कालेण तेणं समएण आमलकप्पा णयरी अबसालवणे चेइए जियसत्तू राया राई गाहावई राईसिरी भारिया राई दारिया पासस्त समोसरण राई दारिया जहेव काली तहेव निक्खंता तहेव सरीरवाउसिया तं चेव सव्वं जाव अत काहिति । एवं खलु जंबू । बिइयज्झयणस्स निक्खेवओ ॥ ॥ पढमवग्गस्स वीयज्झयण समत्त ॥ सू०५॥ टीका-' जइण भते ' इत्यादि । जम्बूस्वामीपृच्छति-यदि खल हे भदत । -:द्वितीय अध्ययन प्रारभ:- -जण भते! समणेण इत्यादि । टोकार्थ.-जबू स्वामी श्री सुधर्मास्वामी से पूछते हैं कि (भैते) हे भदंत ! (जहण समणेण भगवया महावीरेण जाव सपत्तेण धम्मकहाण બીજું અધ્યયન પ્રારભ – जइण भैते ! समणेण इत्यादि- ટીકાથે--જબૂ સ્વામી શ્રી સુધર્મા સ્વામીને પૂછે છે કે (મતે) હે ભદન્તા (जइण समणेणं भगग्या महावीरेण जाव सपत्तेण पडमास मनगारधर्मामृतवषिणी टी0 श्रु.२ ष. १ ० २ रात्रीदेवीवर्धनम् ८०७ श्रमणेन भगवता महावीरेण यावत् सिद्धिगतिनाममधेय स्थान सम्माप्तन धर्मकथाना प्रथमस्य वर्गस्य प्रथमाध्ययनस्यायमर्थः-पूर्वोक्तो भावः प्रज्ञप्तः, द्वितीयस्य खलु भदन्त ! अ ययनस्य श्रमणेन भगवता महातीरेण यावत् मोक्ष सम्प्राप्तेन कोऽय:- को भावः प्रज्ञप्तः मुधर्मास्वामीमाह-एव खलु हे जम्बूः ! तस्मिन् काले तरिमन् समये राज- गृह नगरम् । गुणशिक्षक चैत्यम् । स्वामी भगवान महावीरः समवस्तः । परिप पढमस्स वास्स पढमज्झयणस्स अयम? पण्णत्त विडयस्स ण भते। अज्झयणस्स समणेण भगवया महावीरेण जाव सपत्तेण के अहे पण्णत्त ? पर खलु जबू! तेण कालेण तेण समएण रायगिहे णयरे गुण सिलए चेइए सामी समोसढे) यदि अमण भगवान महावीर ने जो कि मुक्ति स्थान को प्राप्त हो चुके है धर्मकथाके प्रथम वर्ग के प्रथम अध्य- पन का यह पूर्वोक्त रूप से अर्थ प्ररूपित किया है-तो हे भदत। दिसीय अध्ययन का उन्ही श्रमण भगवान महावीर ने जो कि मुक्ति को प्राप्त कर चुके हैं क्या भाव अर्थ प्रतिपादित किया है ? इस प्रकार जबू स्वामी के पूरने पर सुधर्मा स्वामी उनसे कहते हैं कि हे जंबू । सुनो -तुम्हारे प्रश्न का उत्तर इस प्रकार है-उस काल और उस समय में राजगृह नाम का नगर था। उसमें गुगशिलक नाम का उद्यान था। उसमें महावीर स्वामी समयसरे ।-(परिसा निग्गया-जाव पज्जुवासइ, बग्गस्स पढमज्झयणस्स अयमढे पण्णत्ते विदयस्स ण भते ! अज्झयणस्स समणेण भगवया महावीरेण जान सपत्तेण के० अढे पण्णत्ते ' एव खलु जबू' तेण कालेण तेणं समएण रायगिहे णयरे गुणसिलए चेइए सामी समोसढे) જે શ્રમણ ભગવાન મહાવીર–કે જેમણે મુક્તિસ્થાન મેળવી લીધુ છે ધર્મકથાના પ્રથમ વર્ગના પ્રથમ અધ્યયનને આ પૂર્વોક્ત રૂપમાં અર્થ પ્રરૂપિત કર્યો છે તે છે ભદન્ત તે જ શ્રમણ ભગવાન મહાવીરે-કે જેમણે મુક્તિ સ્થાન મેળવી લીધું છેબીજા અધ્યયનને શે ભાવ-અર્થ પ્રતિપાદિત કર્યો છે આ પ્રમાણે જ બૂ સ્વામીના પ્રશ્નને સાભળીને શ્રી સુધર્મા સ્વામી તેમને કહે છે કે હું જ બૂ! સાભળે, તમારા પ્રશ્નનો ઉત્તર આ પ્રમાણે છે કે તે કાળે અને તે સમયે રાજગૃહ નામે નગર હેતુ તેમા ગુશિલક નામે ઉઘાન હતુ તેમા મહાવીર સ્વામી પધાર્યા ( परिसा निग्गया-जाव पज्जासइ, तेण कारेण तेण समएण राई देवी अय द्वितीयमध्ययन प्रारभ्यते- मूलम्-जइ णं भते । समणेणं भगवया महावीरेणं जाव सपत्तेणं धम्मकहाणं पढमस्स वग्गस्स पढमज्झयणस्त अय- म? पण्णते विइयस्स गं भते ! अग्झयणस्स समणेणं भग- वया महावीरेणं जाव संपत्तेणं के० अहे पण्णत्ते ?, एवं खल्लु जवू । तेणं कालेणं तेणं समएणं रायगिहे नयरे गुणसिलए चेइए सामी समोसढे परिसा निग्गया जाव पज्जुवासइ, तेण कालेण तेण समएण राई देवीचमरचचाए रायहाणीए एव जहा काली तहेव आगया णविहि उवदसेत्ता पडिगया भंतेत्ति भगवं गोयमा पुष्वभवपुच्छा, एव खल्ल गोयमा ! तेण कालेण तेण समएण आमलकप्पा णयरी अंबसालवणे चेइए जियसत्तू राया राई गाहावई राईसिरी भारिया राई दारिया पासस्स समोसरण राई दारिया जहेव काली तहेव निक्खंता तहेव सरीरवाउसिया तं वेव सव्वं जाव अत काहिति । एव खलु जबू । विइयज्झयणस्स निक्खेवओ ॥ ॥ पढमवग्गस्स वीयज्झयण समत्तं ॥ सू०५॥ टीका-'जइण भते ' इत्यादि । जम्बूस्वामीपृच्छति-यदि खल हे भदत। -द्वितीय अध्ययन प्रारभा- -जणं भते समणेण इत्यादि। टीकार्थ जय स्वामी श्री सुधर्मास्वामी से पूछते हैं कि (भैते) हे भदंत ! (जइण समणेण भगवया महावीरेण जाव सपत्तेण धम्मकहाण બીજુ અધ્યયન પ્રારભ – जइण भते ! समणेण इत्यादि- रीक्षार्थी - भूभाभी भी सुधा स्वामीन पूछे छ । (भते) मत ! (जइण समणेण भगरया महावीरेण जाव सपण - भनगारधर्मामृतपिणी दी०४०२ २०१०२ राधादेवीवर्णन रात्रिरिकामीन । पार्श्वन = पार्थप्रभो ममस्मरणम् । रात्रिहारिका पयर काली त्यैव निष्ान्ता-वथैव शरीरवाचनिका. तदेव सर्व यावत्-सर्वदुःखाना- मन्त ररिप्पति। दारिया पामस्म मयोमरणं राई दारिया जहेव काली-तहंव निक्खंता, तहेवमरीर यानिया त चेच सव्व जाव अत काहिह एव खलु जबू। विडर अयणस्स निवसेवओ) उसके चले जाने के बाद श्रमण भगवान् महागीर से गौतम ने रात्रिदेवी का पूर्वभव पूठा-प्रभु ने उनसे इस प्रकार कहा-हे गौतम । उसकाल और उस समयमें आमलकल्पा नामकी नगरी थी। उसमें आनशालयन नामका उद्यान था। नगरीके राजा का नाम जितशत्रु था। वहां रत्रि नामका एक गाधापति रहता था। उस की भार्या का नाम रावित्री धा। इन दोनों के रात्रि नाम की एक पुत्री थी जिस प्रकार काली प्रभु का उपदेश सुनकर प्रतियोष को प्राप्त हो गई थी। उसी प्रकार पार्श्वनाथ के वरा उद्यान में आने पर भी उनसे धर्मोपदेश सुनकर प्रतिबोध को प्राप्त हो गई। अतः वह माता पिता से आज्ञा लेकर काली की तरह बडे टाठ बाट के साथ शिविका में बैठाकर प्रभु के समीप माता पिता ले गये। वहा वह दीक्षित हो गइ। धीरे २ वह शरीर चाकुशिका बनगई । जिस प्रकार नहेच काली-तहेव निक्सता, तहेव सरीरसाउमिया त चेव सव्व जाव अत काहिड एव खलु जन ! पिइयज्झयणस्स निक्खेवओ) તેના ગયા બાદ શ્રમણ ભગવાન મહાવીરને ગૌતમે રાત્રિ દેવીના પૂર્વ ભવની વિગત પૂછી પ્રભુએ તેમને આ પ્રમાણે કહ્યું કે હે ગૌતમ! તે કાળે અને તે સમયે આમલકWા નામે નગરી હતી તેમાં આમ્રશાવવન નામે ઉવાન હતુ નગરીને રાજાનું નામ જિતશત્રુ હતું ત્યા રાત્રિ નામે એક ગાથાપતિ રહેતે હતો તેની પત્નીનું નામ રાત્રિશ્રી હતું તેઓ બંનેને રાત્રિ નામે એક પુત્રી હતી જેમ કાલી પ્રભુને ઉપદેશ શ્રવણ કરીને પ્રતિબંધને પ્રાપ્ત થઈ તેમજ ત્યા ઉધાનમાં પધારેલા પાર્શ્વનાથની પાસેથી ધર્મોપદેશ -સાંભળીને તે પણ પ્રતિબંધિત થઈ ગઈ એથી કાલીની જેમજ તેને પણ પિતાના માતાપિતાની પાસેથી આજ્ઞા મેળવી અને ત્યારપછી તેના માતાપિતાએ તેને પાલખીમા બેસાડીને પ્રભુની પાસે લઈ ગયા, ત્યા તે દિક્ષિત થઈ ગઈ ધીમે ધીમે તે પણ શરીર બાકુલિકા બની ગઈ જેમ કાલી દારિકા પણ આર્યા થઈને શરીર વાકુશિકા બની ગઈ હતી ત્યારપછી જેવી સ્થિતિ કાલી આર્યાની निर्गता यारत् भगान्त पर्युपास्ते । तस्मिन् काले तस्मिन् समये 'राई' गणि रात्रिनाम्नी देरी चमरचवायां रानधान्याम् , एप यया काली तथैव-आगता, नाटयविधिमुपदर्य प्रतिगता।' मते ति' हे भदन्त । इति सम्रोध्य भगवान् गौतमः 'पुचभवपुच्छा' पूर्वभरपन्छा रात्रि देव्या पूर्वभा पृच्छति । भगवान् माह-एव खलु हे गौतम । तस्मिन् काले तस्मिन् ममये आमलकल्पा नगरी, आम्रशालपन चैत्यम् , जितशत राजा, रानिधापतिः, रात्रिश्रीर्भार्या, तयोः तेण काछेण तेण समएणं राई देवी चमरचचा रापहाणी एव जहा काली-तहेव आ गया नहचिहि उवदसेत्ता पहिगया) प्रभु का आगमन सुनकर नगर निवासिनी समस्त जनता उन प्रभु के दर्शन करने और उनसे धर्मोपदेश सुनने के लिये उस गुणशिलक उद्यान में आई। प्रभु ने सब को धर्म का उपदेश दिया। सबने प्रभु की पर्युपासना की। उस काल में और उस समय में रात्रिनाम की देवी चमर- चचाराजधानी में रहती थी-जैसे वहां काली देवी रहती थी। सो वह भी प्रभु का आगमन सुनकर वरा आई । वहां आकर उसने नाटय विधि दिखलाई-और दिखलाकर फिर वह वहा से वापिस अपने स्थान पर चली गई । ( भते त्ति भगव गोयमा ! पुब्बभवपुच्छा-एव खल गोयमा! तेण कालेण तेण समण आमलकप्पा णयरी अपसाल वणे चेहए-जियसत्तू राया-राई गाहावई, रायसिरी भारिया, राई चमरचचाए रायहाणीए एव जहा काली-तहेव आगया नट्टविहि उबदसेत्ता पडिगया) પ્રભુનું આગમન સાંભળીને નગરના બધા નાગરિકને તે પ્રભુના દર્શન કરવા માટે તેમજ તેમની પાસેથી ધર્મોપદેરા સાભળવા માટે તે ગુણશિલક વિદ્યાનમાં આવ્યા પ્રભુએ બધાને ધર્મને ઉપદેશ આપો બધાએ પ્રભુની પપાસના કરી તે કાળે અને તે સમયે રાત્રિ નામે દેવી ચમચ ચા રાજ ધાનીમા કાલી દેવીની જેમ રહેતી હતી તે પ્રભુનું આગમન સાભળીને ત્યાં આવી ત્યાં આવીને તેણે નાટયવિધિ બતાવી અને બતાવીને તે ત્યાંથી પાછી જતી રહી ( भते चि भगव गोयमा ! पुत्वभवपृच्छा-एव खलु गोयमा ! तेणं कालेण तेण समरण आमलकप्पा णयरी अवसालपणे चेइए-जियसत्तू राया-राई गाहावई, रायसिरी भारिया, राई दारिया, पासस्स दारिया ममगारधर्मामृतपिणी टी० भु०२ ० १ ० २ रात्रीदेवीषर्णनम् रात्रिर्दारिकाऽऽसीत् । पार्यस्य पार्श्वप्रभोः समनमरणम् । रानिरिका यथैव काली तथैव निष्कान्ता तयैव शरीरवाकुशिका, तदेव सर्व यावत्-सर्वदु खाना- मन्त करिष्यति । दारिया पासस्स समोमरण राई दारिया जहेव काली-तव निक्सता, तहेवसरीर घाउसिया त चेव सच जाव अत काहिह एव खलु जबू। विइयमयणस्स निक्खेवओ) उसके चले जाने के बाद श्रमण भगवान् महावीर से गौतम ने रात्रिदेवी का पूर्वभव पूछा-प्रभु ने उनसे इस प्रकार कहा-हे गौतम उसकाल और उस समयमें आमलकल्पा नामकी नगरी थी। उसमें आम्रशालयन नामका उद्यान या। नगरीके राजा का नाम जितशत्रु था। वहां रत्रि नामका एक गाथापति रहता था। उस की भार्या का नाम रात्रिश्री था। इन दोनों के रात्रि नाम की एक पुत्री थी जिस प्रकार काली प्रभु का उपदेश सुनकर प्रतियोव को प्राप्त हो गई थी। उसी प्रकार पार्श्वनाथ के वा उद्यान में आने पर भी उनसे धर्मोपदेश सुनकर प्रतियोध को प्राप्त हो गई। अतः वह माता पिता से आजा लेकर काली की तरह बड़े टाठ बाट के साथ शिविका में वेठाकर प्रभु के समीप माता पिता ले गये। वहा वह दीक्षित हो गइ। धीरे २ वह शरीर याकुशिका बनगई । जिस प्रकार जहेव काली-तहेव निक्खता, तहेच सरीरसाउसिया त चेव सब जाव अत काहिइ एव खलु जयू ! पिडयज्झयणरस निक्खेओ) તેના ગયા બાદ શ્રમણ ભગવાન મહાવીરને ગૌતમે રાત્રિ દેવીના પૂર્વ ભવની વિગત પૂછી પ્રભુએ તેમને આ પ્રમાણે કહ્યું કે હે ગૌતમ! તે કાળે અને તે સમયે આમલકલ્પ નામે નગરી હતી તેમાં આમ્રશાવવન નામે ઉદ્યાન હતુ નગરીના રાજાનું નામ જિતશડ્યું હતું ત્યા રાત્રિ નામે એક ગાથાપતિ રહેતું હતું તેની પત્નીનું નામ રાત્રિ શ્રી હતું તે બનેને રાત્રિ નામે એક પુત્રી હતી જેમ કાલી પ્રભુને ઉપદેશ શ્રવણ કરીને પ્રતિબંધને પ્રાપ્ત થઈ તેમજ ત્યા ઉગાનમાં પધારેલા પાર્શ્વનાથની પાસેથી ધર્મોપદેશ સાંભળીને તે પણ પ્રતિબંધિત થઈ ગઈ એથી કાલીની જેમજ તેને પણ પિતાના માતાપિતાની પાસેથી આજ્ઞા મેળવી અને ત્યારપછી તેના માતાપિતાએ તેને પાલખીમાં બેસાડીને પ્રભુની પાસે લઈ ગયા, ત્યાં તે દિલિત થઈ ગઈ ધીમે ધીમે તે પણ શરીર ખાશિકા બની ગઈ જેમ કાલી દારિકા પણ આર્યા થઈને શરીર વાકુશિકા બની ગઈ હતી ત્યારપછી જેવી સ્થિતિ કાલી આર્યાની - प्रताप निर्गता यापद भगवन्तं पर्युपास्ते । तस्मिन् काले तस्मिन् समये 'राई' रात्रि:- रात्रिनाम्नी देशी चमरचश्चाया राजधान्याम् , एवं यथा काली तथैव-आगता, नाटयविधिमुपदर्य प्रतिगता।' मते ति' हे भदन्त । इति सम्रोय भगवान् गौतमः 'पुन्चभवपुच्छा' पूर्वभवपन्छा रात्रि देव्या पूर्वभव पृच्छति । भगवान् माह-एर खलु हे गौतम । तस्मिन् काले तस्मिन् ममये आमलकल्पा नगरी, आम्रशालपन चैत्यम् , जितशटू राजा, रात्रिर्गाथापतिः, रात्रिश्री र्या, तयोः तेण काठेण तेण समएण राई देवी चमरचचाए रायहाणीप एव जहा काली-तहेव आ गया नविहिं उबदसेत्ता पडिगया) प्रभु का आगमन सुनकर नगर निवासिनी समस्त जनता उन प्रभु के दर्शन करने और उनसे धर्मोपदेश सुनने के लिये उस गुणशिलक उद्यान में आई। प्रभु ने सब को धर्म का उपदेश दिया। सथने प्रभु की पर्युपासना की। उस काल में और उस समय में रात्रिनाम की देवी चमर- चचाराजधानी में रहती थी-जैसे वहां काली देवी रहती थी। सो वह भी प्रभु का आगमन सुनकर वा आई । वहा आकर उसने नाटय विधि दिखलाई-और दिखलाकर फिर वह वहा से वापिस अपने स्थान पर चली गई। ( भते त्ति भगव गोयमा! पुब्वभवपुच्छा-राव खल गोयमा! तेण काळेण तेण समाण आमलकप्पा णयरी अपसाल वणे चेहए-जियसत्तू राया-राई गाहावई, रायसिरी भारिया, राई चमरचचाए रायहाणीए एव जहा काली-तहेब आगया नट्टविहि उवदसेत्ता पडिगया) પ્રભુનું આગમન સાભળીને નગરના બધા નાગરિકને તે પ્રભુના દર્શન કરવા માટે તેમજ તેમની પાસેથી ધર્મોપદેશ સાંભળવા માટે તે ગુણશિલક પ્રભુએ બધાને ધર્મને ઉપદેશ આપે બધાએ પ્રભુની પ પાસના કરી તે કાળે અને તે સમયે રાત્રિ નામે દેવી ચમરચચા રાજ- ધાનીમા કાલી દેવીની જેમ રહેતી હતી તે પ્રભુનું આગમન સાભળીને ત્યાં આવી ત્યાં આવીને તેણે નાટયવિધિ બતાવી અને બતાવીને તે ત્યાથી પાછી જતી રહી ( भते त्ति भगव गोयमा ! पुव्वभवपृच्छा-एव खलु गोयमा ! तेण कालेण तेण समरण आमलकप्पा णयरी अबसालपणे चेइए-जियसत्तू राया-राई गाहाबई, रायसिरी भारिया, राई दारिया, पासस्स ઉદ્યાનમાં આવ્યા दारिया भनगारधर्मामृतवपिणी टी० ०२ ० १ ० २ रात्रीदेवीपर्णनम् रात्रिर्दारिकाऽऽसीत् । पार्श्वस्य = पाचप्रभोः समनमरणम् । रात्रिर्दारिका यथैव काली तयर निष्क्रान्ता तथैव शरीरपाकुशिका, तदेव सई यावत्-मर्वदु खाना- मन्त करिष्यति। दारिया पासस्स सयोमरण राई दारिया जहेव काली- तहंव निक्खंता, तदेवसरीर पाउसिया त चेव सव्व जाव अत कारिइ एच खलु जबू। विइयायणस्स निक्खेवओ) उसके चले जाने के बाद श्रमण भगवान् महावीर से गौतम ने रात्रिदेवी का पूर्वभव पृठा-प्रभु ने उनसे इस प्रकार कहा-हे गौतम | उसकाल और उस समयमें आमलकल्पा नामकी नगरी थी। उसमें आम्रशालवन नामका उद्यान या। नगरीके राजा का नाम जितशत्रु था। वहां रत्रि नामका एक गाथापति रहता था। उस की भार्या का नाम रात्रिश्री था। इन दोनों के रात्रि नाम की एक पुत्री थी जिस प्रकार काली प्रभु का उपदेश सुनकर प्रतियोव को प्राप्त हो गई थी। उसी प्रकार पार्श्वनाथ के चरा उद्यान में आने पर भी उनसे धर्मोपदेश सुनकर प्रतियोध को प्राप्त हो गई। अतः वह माता पिता से आज्ञा लेकर काली की तरह बड़े टाठ वाट के साथ शिविका में वेठाकर प्रभु के समीप माता पिता ले गये। वहा वह दीक्षित हो गइ। धीरे २ वह शरीर चाकुशिका यनगई । जिस प्रकार जहेच काली-तहेब निक्खता, तहेव सरीरसाउसिया त चेव सव्व जाव अत काहिइ एव खलु जयू ! पिइयज्झयणस्स निक्खेवओ) તેના ગયા બાદ શ્રમણ ભગવાન મહાવીરને ગૌતમે રાત્રિ દેવીના પૂર્વ ભાવની વિગત પૂછી પ્રભુએ તેમને આ પ્રમાણે કહ્યું કે હે ગૌતમ! તે કાળે અને તે સમયે આમલકલ્પ નામે નગરી હતી તેમાં આમ્રશાવવન નામે ઉદ્યાન હતુ નગરીના રાજાનું નામ જિતશત્રુ હતું ત્યા રાત્રિ નામે એક ગાથાપતિ રહેતે હતો તેની પત્નીનું નામ રાત્રિ શ્રી હતું તે બનેને રાત્રિ નામે એક પુત્રી હતી જેમ કાલી પ્રભુને ઉપદેશ શ્રવણ કરીને પ્રતિબંધને પ્રાપ્ત થઈ તેમજ ત્યા વાનમા પધારેલા પાર્શ્વનાથની પાસેથી ધર્મોપદેશ સાભળીને તે પણ પ્રતિબોધિત થઈ ગઈ એથી કાલીની જેમજ તેને પણ પિતાના માતાપિતાની પાસેથી આજ્ઞા મેળવી અને ત્યારપછી તેના માતાપિતાએ તેને પાલખીમાં બેસાડીને પ્રભુની પાસે લઈ ગયા, ત્યા તે દીક્ષિત થઈ ગઈ ધીમે ધીમે તે પણ શરીર બાકુશિત બની ગઈ જેમ કાલી દારિકા પણ આર્યા થઈને શરીર વાકુગિકા બની ગઈ હતી ત્યારપછી જેવી સ્થિતિ કાલી આર્યાની गतान 'एवं खलु जम्यू!' इत्यादि द्वितीया ययनस्य निक्षेप उपसंहार समाप्तिपास्यमयोऽत्र योय ॥ सू०५॥ इति मथमार्गस्य द्वितीयाध्ययन समाप्तम् ||-१-२ ॥ काली दारिका आर्या होकर शरीर वाशिका बनगई थी। इसके बाद जैसी स्थिति फाली आर्या की हुई-वहो सय स्थिति इस रात्रि दारिका की भी हुई-इस प्रकार सय सयन्ध यहां पर इसके विषय में लगाना चाहिये और वर सपन्ध "मराविदेह में उत्पन्न होकर यह समस्त दुःखों का अन्त करेगी" यरा तक जानना चाहिये । इस प्रकार हे जनू । यह प्रथमवर्ग के वित्तीय अध्ययन का उपसहार है।०५॥ प्रथमवर्ग का दितीय अध्ययन समाप्त । થઈ તેવી જ સ્થિતિ તે રાત્રિદારિકાની પણ થઈ અહીં આ પ્રમાણે કાલિદારિકાનો બધે સ બધ આના વિષે સમજી લેવું જોઈએ અને તે સબ ધ મહાવિદેહમાં ઉત્પન્ન થઈને તે બધા દુખેને અત કરશે ” અહીં સુધી સમજ જઈએ. આ પ્રમાણે તે જ બૂ! પ્રથમ વર્ગના બીજા અધ્યયનનો આ હૈપસ હાર છે સૂ ૫ પ્રથમ વર્ગનું બીજુ અધ્યયન સમાપ્ત “ अथ तृतीयमध्ययनम् मूलम्-जइ णं भंते तइयज्झयपास्स उक्खेवओ, एवं खल्ल जंधू | रायगिहे णयरे गुणसिलए चेइए एवं जहेब राई तहेव रयणी वि, णवरं आमलकप्पा नयरी रयणी गाहावई रयणी- सिरी भारिया रयणी दारिया सेस तहेव जाव अंत काहिइ ३ । एवं विज्जू वि आमलकप्पा नयरी विज्जुगाहावई विज्जु. सिरीभारिया विजुदारिया सेस तहेव । ४ एव मेहा वि आम- लकप्पाए नयरीए मेहे गाहावई मेहसिरी भारिया मेहा दारिया सेसं तहेव ५ । एवं खलु जंबू | समणेणं जाव सपत्तेणं धम्म- कहाणं पढमस्त वग्गस्त अयमढे पण्णत्ते ॥ सू० ६ ॥ टीका-'जइण भते ' इत्यादि । यदि खलु भदन्त! इत्यादि तृतीया- ययनस्य उत्क्षेपका जम्बूप्रश्नादिरूपः मारम्भवास्यप्रपन्योऽयाच्यः । सुधर्मास्वामी कथ ॥ तृतीय अध्ययन प्रारभ ।। (जइण भते! तहयज्नपणस्स उक्खेवओ) इत्यादि ॥ टीकार्थः-(जहण भते! तइयज्झयणस्स उरखेवओ) अब जंबू स्वामी पुन: पूछते हैं कि हे भदन्त ! यदि श्रमण भगवान महावीर ने द्वितीय अध्ययन का यह पूर्वोक्तरूप से अर्थ निरूपित किया है-तो तृतीय अध्ययन का उन्होंने क्या अर्थ प्रतिपादित किया है ? इस तरह से इस तृतीय अध्ययन का जवू स्वामी का यह प्रश्न आदिरूप वाक्य मयन्ध उत्क्षेपक है-प्रारभक है-इस प्रश्न का उत्तर श्री सुधर्मा स्वामी ત્રીજી અધ્યયન પ્રારંભ जइण मते ! सइयज्झयणस्स उखेवओ' इत्यादि- थि-(जदण भते ! तइयज्ज्ञयणरस उखेवओ) ९२ भूपाभी ફરી પૂછે છે કે હે ભદન્ત! જે શ્રમણ ભગવાન મહાવીરે બીજા અધ્યયનનો આ પૂર્વોક્ત રૂપે અર્થે નિરૂપિત કર્યો છે તે ત્રીજા અધ્યયનને તેમણે શે અર્થ પ્રતિપાદિત કર્યો છે? આ પ્રમાણે આ ત્રીજા અધ્યયનને જ બૂ સ્વામીને આ પ્રશ્ન વગેરે રૂપ વાકય પ્રબ ધ ઉક્ષેપક છે-પ્રારભ છે આ પ્રશ્નને ઉત્તર શ્રી ખમવામી આ પ્રમાણે આપે છે કે – ' । एवं खलु जम्यू!' इत्यादि द्वितीया ययनस्य निक्षेप संपर- समाप्तियारयमरन्योऽत्र योय ।। सू०५॥ इति प्रथमवर्गस्य द्वितीयाध्ययन समाप्तम् ॥-१-२॥ काली दारिका आर्या होकर शरीर थाशिका बनगई थी। इसके बाद जैसी स्थिति कालो आर्या की हुई-वो सब स्थिति इस रात्रि दारिका की भी हुई-इस प्रकार सय सयन्य यहां पर इसके विषय में लगाना चाहिये और वह सपन्ध "महाविदेह में उत्पन्न होकर यह समस्त दुःखों का अन्त करेगी " यहा तक जानना चाहिये । इस प्रकार हे जनू । यह प्रथमवर्ग के द्वितीय अध्ययन का उपसरार है।सू०५॥ प्रथमवर्ग का दितीय अध्ययन समाप्त ॥ થઈ તેવી જ સ્થિતિ તે રાત્રિદારિકાની પણ થઈ અહીં આ પ્રમાણે કાલિદારિકાને બધો સ બ ધ આના વિષે સમજી લે જોઈએ અને તે સ બ ધ “મહાવિદેહમાં ઉત્પન્ન થઈને તે બધા દુખોને અત કરો” અહીં સુધી સમજ નઈએ આ પ્રમાણે તે જ બૂ! પ્રથમ વર્ગના બીજા અધ્યયનને આ ઉપહાર છે જ છે પ્રથમ વર્ગનું બીજુ અધ્યયન સમાપ્ત " अथ तृतीयमध्ययनम् मूलम्-जइ णं भंते । तइयज्झयणस्स उक्खेवओ, एव खल्लु जंधू । रायगिहे णयरे गुणसिलए चेइए एवं जहेव राई तहेव रयणी वि, णवरं आमलकप्पा नयरी रयणी गाहावई रयणी- सिरी भारिया रयणी दारिया सेस तहेव जाव अंत काहिइ ३ । एव विज्जू वि आमलकप्पा नयरी विज्जुगाहावई विज्जु. सिरीभारिया विज्जुदारिया सेस तहेव । ४ एव मेहा वि आम- लकप्पाए नयरीए मेहे गाहावई मेहसिरी भारिया मेहा दारिया सेसं तहेव ५ । एव खल्लु जवू । समणेणं जाव सपत्तेणं धम्म- कहाणं पढमस्त वग्गस्त अयम? पण्णत्ते ॥ सू० ६ ॥ टीका-'जइण भते' इत्यादि । यदि खलु भदन्त ! इत्यादि तृतीया ययनस्य उत्क्षेपका जम्बूमश्नादिरूपः मारम्भवास्यप्रबन्योऽयाच्यः । सुधर्मास्वामी कथ ॥ तृतीय अध्ययन प्रारभ ॥ (जइण भते! तइयज्झयणस्स उक्खेवओ) इत्यादि । टीकार्थ:-(जइण भते! तइयज्झयणस्स उक्खेवओ) अब जंबू स्वामी पुनः पूछते हैं कि हे भदन्त ! यदि श्रमण भगवान महावीर ने द्वितीय अध्ययन का यह पूर्वोक्तरूप से अर्थ निरूपित किया है तो तृतीय अध्ययन का उन्होंने क्या अर्थ प्रतिपादित किया है ? इस तरह से इस तृतीय अध्ययन का जवू स्वामी का यह प्रश्न आदिरूप वाक्य प्रबन्ध उत्क्षेपक है-प्रारभक है-इस प्रश्न का उत्तर श्री सुधर्मा स्वामी ત્રીજી અધ્યયન પ્રારભ – जइण मते ! तइयज्झयणरस उक्खेवओ' इत्यादि- साथ-(जण भते ! तइयज्ज्ञयणस्स उखेवओ) व भूपाभी ફરી પૂછે છે કે હે ભદન્ત ! જે શ્રમણ ભગવાન મહાવીરે બીજા અધ્યયનને આ પૂર્વોક્ત રૂપે અર્થ નિરૂપિત કર્યો છે તે ત્રીજા અધ્યયનને તેમણે શે અર્થ પ્રતિપાદિત કર્યો છે? આ પ્રમાણે આ ત્રીજા અધ્યયનને જ બૂ સ્વામીને આ પ્રશ્ન વગેરે રૂપ વાકય પ્રબ ધ ઉક્ષેપક છે-પ્રારભ છે આ પ્રશ્નને ઉત્તર શ્રી સ્વામી આ પ્રમાણે આપે છે કે - ! । ६२ সামবার यति-एव खलु हे जम्यः ! राजगई नगर, गुणशिटक चैत्यम् । एव यथैव रात्रि स्तथैवरजनी अपि, नवरम् आमल कल्पा नगरी, रजनीगाथापति , रजनीश्रीर्माया, रजनी दारिका । शेप वा । यावत्-सर्वदुष्पानामन्त करिष्यति ॥ ।। इति मधमार्गस्य तृतीयाध्ययनम् ।। १-३ ॥ इस प्रकार से देते हैं-(एर सलु ज! रायगिहे पयरे गुणसिलए चेहरा एवं जहेव राई तहेव रयणी वि, णवर आमलकप्पा नयरी, रयणी गाहावई रयणीसिरी भारिया रयणी दारिया सेस तहेव जाव अत काहिह ३) जबू! सुनो-उस काल में और उन ममय में राजगृह नाम का नगर था । उसमें गुणशिलक नामका उन्धान था। जिस प्रकार रात्रि प्रभु का आगमन सुनकर गुणशिलक उद्यान में गई थी उसी तरह रजनी भी यहाँ गई उसने प्रभु के मुग्व से धर्म का उपदेश सुना। सुन कर ससार शरीर और भोगो से वह विरक्त हो गई। दीक्षा लेने का अपना भाव उसने प्रभु से निवेदित किया। प्रभुने यथासुख देवानुप्रि ये करकर उसके भाव की सराहना करतेहुए 'शुभस्य शीघ्र' करने की अपनी अनुमति प्रकट की-तर यर घर आई और मातासे अपना दीक्षा लेने का विचार प्रकट किया-इत्यादि सत्र सन्ध काली दारिका के कथानक अनुमार रजनी के साथ लगालेना चाहिये । जथ रजनी देवी प्रभु को वदना करनेके लिये गुगशिलक उद्यान में आई और (एव खलु नयू ! रायगिहे णयरे गुणसिठए चेइए एव जहेव राई तहेव रयणी वि णवर आमलकप्पा नयरी, रयणी-गाहााई रयणीसिरी भारिया रयणी दारिया सेस तहेव जाव अत काहिइ ३), હે જ બૂ! સાભળે, તે કાળે અને તે સમયે રાજગૃહ નામે નગર હતું તેમ ગુણલિક નામે ઉઘાન હતુ જેમ રાત્રિ પ્રભુનું આગમન સાભળીને ગુણશિલક ઉદ્યાનમાં ગઈ હતી તેમજ રજની પણ ત્યાં ગઈ તેણે પ્રભુના સુખથી ધમને ઉપદેશ સાભળે સાભળીને તે સ સાર, શરીર અને સંગેથી વિરકત થઈ ગઈ તે પિતાનો દીક્ષા અડણ કરવાને ભાવ પ્રભુની સામે પ્રકટ કર્યો પ્રભુએ “યથા સુખ દેવાનુપ્રિયે ! કહીને તેના ભાવની સરાહના કરી અને શુભ કાર્યમાં વિલંબ કરો નહિ એવી પિતાની અનુમતી દર્શાવી ત્યારે તે પિતાને ઘેર આવી અને માતાપિતાની સામે દીક્ષા ગ્રહણ કરવાને વિચાર પ્રકટ કર્યો-વગેરે બધી વિગત કાલી દરિકાની જેમજ રજનિની સાથે પણ સમજી લેવી જોઈએ જ્યારે રજનીદેવી પ્રભુને વદના. કરવા માટે ગુણ શિક્ષક ઉદ્યાનમાં આવી અને ત્યાં તેણે નાટચવિધિનું પ્રદર્શન वहा ત્યારબાદ . अनगारधर्मामृतपदिणी टीका थु २ च १ रजनीदारिकादिधरित्रनिरूपणम् ८१३ एव विजूवि ' इत्यादि । एवं विद्युदपि । आमल फल्पा नगरी, विद्युत् गायापति , पियुत् श्री र्या, विद्युदारिका । शेप तथैव । इति प्रथमवर्गस्य चतुर्या ययनम् ॥ १-४॥ उसने नाट्यविधिका प्रदर्शन किया बाद में वह जब वहा से प्रभु की पर्युपासना कर वापिस अपने स्थान पर चली गई-तत्र प्रभु से गौतम गणधर ने उसके पूर्व भव पृछे तर प्रभु ने उनसे इस प्रकार कहा-उस काल और उस समय में आमलक कल्पा नामकी नगरी थी-उसमें रजनी नामका गायापति रहता था। रजनी श्री उसकी भोर्या का नाम था।इन दोनों के एक पुत्री जिसका नाम रजनी था। उसके विषय का अवशिष्ट कथानक " समस्त दुःखो का यह अन्त करेगी" यहां तक का काली दारिका के जैसा ही जानना चाहिये ॥ १० ६ ॥ ॥ प्रथम वर्ग का तीसरा अध्ययन समाप्त ॥ एव विज्जूवि आमलकप्पा नयरी विज्जू गाहावई ॥ विजुसिरीभार्या विज्जुदारिया, सेस तहेव ॥४॥ एय मेहाचि आमलकप्पाए नयरीए मेहे गाहावई ॥ मेहासिरी भारिया मेहा दारिया सेस तहेव ॥५॥ (एव खलु जन् ! समणेण जाव सपत्तेण धम्मकहाण पढमस्स वग्ग પ્રભુની પર્યપાસના કરીને પાછી પિતાના સ્થાને જતી રહી ત્યારે ગૌતમ ગણ ધરે પ્રભુને તેના પૂર્વ પૂછો ત્યારે પ્રભુએ તેને આ પ્રમાણે કહ્યું કે તે કાળે અને તે સમયે આમલકલ્પ નામે નગરી હતી, તેમા રજની નામે ગાથાપતિ રહેતું હતું, રજની શ્રી તેની પત્નીનું નામ હતું તેઓ બનેને એક પુત્રી હતી-જેનું નામ રજની હતુ એના વિષેની બાકીની બધી વિગત સમસ્ત દુ ખેને તે અન્ત કરશે ” અહીં સુધીની કાલી દારિકાની જેમજ સમજી લેવી જોઈએ છે સૂત્ર ૬ ! પ્રથમ વર્ગનું ત્રીજુ અધ્યયન સમાપ્ત છે (एव विज्जूपि आमलकापा नयरी विज्जु गाहावई । विज्जुसिरीभार्या विज्जुदारिया, सेस तहेव ॥ ४ ॥ एव मेहा वि आमलकप्पाए नयरीए मेहे गाहाई। मेहासिरी भारिया मेहा दारिया सेस तदेव ॥५॥ (एर खलु जवू ! समणेण जाव संपत्तेण धम्मकहाण पढमस्स वग्गस्स अय. महे पापचे ६)
।
tu
ताधर्मवचार
एव मेदारि' इत्यादि । मेघाऽपि । आमन्यल्पायां नगयाँ मेपो गाण
पतिः, मेघश्री र्या, मेघा दारिका। शेप तथैव ।
श्रीसुधर्मासामीमा-एर खल हे जम्मूः ! श्रमणेन यावद् मोक्ष समाप्तेन
धर्मकथाना प्रथमस्य वर्गस्यायमर्थ प्राप्तः ।। मू०६ ॥
॥ इति मथमवर्गस्य पत्रमाभ्ययनम् ॥ १-५ ॥
अथ द्वितीयो वर्ग:मारभ्यते-जाण मते ' इत्यादि।
मूलम् -जइणं भंते । समणेण जाव संपत्तेणं दोच्चस्स वग्ग-
स्म उक्खेवओ, एव खलु जंवू ! समणेणं जाव संपत्तेणं दोबस्त
स्स अयमठे पण्णत्ते ६) इसी तरह का कथानक विद्युतके विषय में भी
जानना चारिये। आमलकल्पा नगरी विद्युत गाथापति विद्युत् श्री भार्या
इन दोनों के यहां विद्युत् दारिका। इस तरह नाम आदि मे ही परिव
तन हुआ है। अभिधेय विषय में कुछ अन्तर नहीं है । मेघ के विषय
में भी यही पात जाननी चाहिये। आमलकल्प नगरी, मेघ गाथापति,
मेघ श्री भार्या, मेघा दारिका-इस प्रकार इस कथानक में इन नामों में
परिवर्तन हुआ है-अभिधेय वक्तव्य-विषय में नहीं । इस प्रकार यहा
तक प्रथम वर्ग के ५, अध्ययन समाप्त हो जाते हैं। विद्युधारिका का
अध्ययन ४ चौधा, एव मेघा दारिका का अध्ययन ५ पचम है । इस
तरह हे जवू ! श्रमण भगवान् महावीर ने कि जो मुक्ति स्थान के अधि
पति बन चुके हैं धर्मकथा के प्रथमवर्ग का यह अर्थ प्ररूपित किया है ।
આ પ્રમાણેનું જ કથાનક વિદ્યુતના વિષે પણ સમજી લેવું જોઈએ
આમલકા નગરી, વિદ્યુત ગાથા પતિ અને વિદ્યુત શ્રી ભાર્યા આ બંનેને ત્યાં
વિદ્યુત દારિકા આ પ્રમાણે ફકત નામ વગેરેમાં પરિવર્તન થયું છેઅભિધેય
વિષયમાં કોઈ પણ જાતને તફાવત નથી મેઘના વિષે પણ એ જ વાત સમજી
લેવી જોઈએ આમલક૫ નગરી, મેઘ ગાથાપતિ, મેઘ શ્રી ભાર્યા, મેઘ દારિકા
આ પ્રમાણે આ કથાનકમાં પણ નામમાં જ પરિવર્તન થયું છે-અભિધેય
વક્તવ્ય વિષયમાં નહિ આ પ્રમાણે અહીં સુધી પ્રથમ વર્ગના પાચ અને
પૂરા થઈ જાય છે વિઘારિકાનું અધ્યયન થુ, અને મેઘ દારિકાનુ અધ્યયન
પાયખુ છે આ પ્રમાણે તે જ બૂ! શ્રમણ ભગવાન મહાવીરે-કે જેઓ મુક્તિ
સ્થાનના અધિપતિ થઈ ચૂકી છે- ધર્મકથાના પ્રથમ વર્ગને આ અર્થ
३पित यी छे ॥६॥
८१५ मनगारधर्मामृतर्विणी ठी0 ध्रु० २ ० १ शुमानिशुंभादिदेवीवर्णनम वग्गस्स पंच अज्झयणा पण्णत्ता, तं जहा-सुभा निसुंभा रंभा निरभा मयणा, जइ ण भते । समणेणं जाव सपत्तेणं धम्मक- हाणं दोच्चस्त वग्गस्स पंच अज्झयणा पण्णता, दोच्चस्स णं भंते | वग्गस्स पढमज्झयणस्स के अटे पण्णत्ते', एव खल्लु जवू । तेण कालेण तेण समएण रायगिहेणयरे गुणसिलए चेइए सामी समोसढे परिसा णिग्गया जाव पज्जुवासइ, तेणं कालेण तेणं समएणं सुभादेवी वलिचंचाए रायहाणीए सुभवडेसए भवणे सुभसि सीहासणसि कालीगमएणं जाव णट्टविहि उव- दसेत्ता जाव पडिगया, पुठवभवपुच्छा, सावत्थी णयरी कोट्टए चेइए जियसत्तू राया सुभेगाहावई सुंभसिरी भारिया सुभा दारिया सेसं जहा कालीए णवर अछुट्टाइ पलिओवमाई ठिई एवं खलु जवू । निक्खेवओ अज्झयणस्स एव सेसावि चत्तारि अज्झयणा सावत्थीए नवरं माया पिया सरिसनामया, एवं खल्लु जवू । निक्खेवओ विईयवग्गस्स२ ॥ सू० ७ ॥ ॥ वीओ वग्गो समत्तो ॥ टीका-जम्बूस्वामीपृच्छति-यदि खलु हे भदन्त ! श्रमणेन यावत्सम्प्राप्तेन द्वितीयस्य वर्गस्य उत्क्षेपक । मुधर्मास्वामीमाह-एव खलु हे जम्मूः श्रमणेन यावत् -दिसीयवर्गप्रारभा- जण भते! समणेण' इत्यादि। टीकार्थ.-जबू स्वामी श्री सुधर्मा स्वामी से पूछते हैं कि (भते । जहण समणेण जाव सपत्तण दोचस्स वग्गस्स उक्खेवओ-एव खलु બીજે વર્ગ પ્રારભં-- जइण भते । समणेण ' इत्यादि- ટીકાથ –જ બૂ સ્વામી શ્રી સુધર્મા હવામીને પૂછે છે કે- ( मते ! जइण समणेण जाप सपत्तेण दोच्चस्स वग्गस्स उक्खेयो-एव खलु - २५ आताधर्मवचार 'एव मेदानिइत्यादि । सय मेघाऽपि । आमलपल्पायां नगाँ मेषो गावा- पतिः, मेघश्रीर्भार्या, मेघा दारिका । क्षेप तथैव । श्रीसुधर्मास्वामीमाह-एघ खलु हे जम्मः । श्रमणेन यावत् मोक्ष सम्पाप्तेन धर्मस्थानां प्रथमस्य वर्गस्यायमर्थ प्राप्तः ॥ ०६॥ ॥ इति मथमवर्गस्य पश्चमाध्ययनम् ।। १-५ ॥ अथ द्वितीयो वर्गः मारभ्यते-जडण मते ' इत्यादि । मूलम् -जइण भंते । समणेणं जाव सपत्तेण दोबस्स वग्म- स्म उक्खेवओ, एव खल्लुजंबू | समणेणं जाव सपत्तेण दोबस्त स्स अयमढे पण्णत्ते ६) इसी तरह का कथानक विद्युत के विषय में भी जानना चाहिये। आमलकल्पा नगरी विद्युत गाधापति विद्युत् श्री भार्या इन दोनों के यहां विद्युत् दारिका । इस तरह नाम आदि मेहरी परिव र्तन हुआ है। अभिधेय विपय में कुछ अन्तर नही है। मेघ के विषय में भी यही पात जाननी चाहिये। आमलकल्प नगरी, मेघ गाथापति, मेघ श्री भार्या, मेघा दारिका-इस प्रकार इस कथानक में इन नामों में परिवर्तन हुआ है-अभिधेय वक्तव्य-विषय में नहीं। इस प्रकार यहा तक प्रथम वर्ग के ५, अध्ययन समाप्त हो जाते हैं। विद्युहारिका का अध्ययन ४ चौधा, एव मेघा दारिका का अध्ययन ५ पचम है । इस तरह हे जबू! श्रमण भगवान् महावीर ने कि जो मुक्ति स्थान के अधि पति बन चुके हैं धर्मकथा के प्रथमवर्ग का यह अर्थ प्ररूपित किया है। આ પ્રમાણે જ કથાનક વિદ્યુતના વિષે પણ સમજી લેવું જોઈએ આમલકલ્પા નગરી, વિદ્યુત ગાથાપતિ અને વિદ્યુત શ્રી ભાર્યા આ બંનેને ત્યા વિદ્યુત દારિકા આ પ્રમાણે ફક્ત નામ વગેરેમાં પરિવર્તન થયું છે અભિધેય વિષયમાં કઈ પણ જાતને તફાવત નથી મેઘના વિષે પણ એ જ વાત સમજી લેવી જોઈએ આમલકા નગરી, મેઘ ગાથાપતિ, મેઘ શ્રી ભાર્યા, મેઘ દારિકા આ પ્રમાણે આ કથાનકમાં પણ નામમા જ પરિવર્તન થયું છે-અભિધેય વક્તવ્ય વિષયમાં નહિ આ પ્રમાણે અહીં સુધી પ્રથમ વર્ગના પાચ અધ્યયને પૂરા થઈ જાય છે વિદ્યુલરિકાનું અધ્યયન થુ, અને મેઘ દારિકાનું અધ્યયન પાયખું છે આ પ્રમાણે તે જ બૂ! શ્રમણ ભગવાન મહાવીરે-કે જેઓ મુકિત સ્થાનના અધિપતિ થઈ ચૂકી છે- ધર્મકથાના પ્રથમ વર્ગને આ અર્થ રરૂપિત કર્યો છે. ૯ છે । , मनगारधर्मामृतयषिणी टी० ध्रु० २५०१ शुमानिशुमादिदेवीवर्णनम वग्गस्स पंच अज्झयणा पण्णत्ता, तं जहा-सुभा निसुंभा रंभा निरंभा मयणा, जइ ण भंते । समणेणं जाव सपत्तेण धम्मक- हाण दोबस्त वग्गस्स पंच अन्झयणा पण्णता, दोच्चस्त णं भंते । वग्गस्स पढमज्झयणस्स के अठे पण्णत्ते १, एवं खल जवू । तेण कालेण तेण समएण रायगिहेणयरे गुणसिलए चेइए सामी समोसढे परिसा णिग्गया जाव पज्जुवासइ, तेणं कालेण तेणं समएणं सुभादेवी चलिचंचाए रायहाणीए सुंभवडेसए 'भवणे सुभसि सीहासणंसि कालीगमएणं जाव णट्टविहि उव- दसेत्ता जाव पडिगया, पुत्वभवपुच्छा, सावत्थी णयरी कोट्टए चेइए जियसत्तू राया सुभेगाहावई सुंभसिरी भारिया सुंभा दारिया सेसं जहा कालीए णवर अधुटाइ पलिओवमाई ठिई एवं खलु जवू । निक्खेवओ अज्झयणस्स एव सेसावि चत्तारि अज्झयणा सावत्थीए नवर माया पिया सरिसनामया, एवं खलु जबू । निक्खेवओ विईयवग्गस्स२ ॥ सू० ७ ॥ ॥ वीओ वग्गो समतो॥ टीका-जम्बूस्वामीपृच्छति-यदि खलु हे भदन्त ! श्रमणेन यावत्सम्प्राप्तेन द्वितीयस्य वर्गस्य उत्क्षेपकः । सुधर्मास्वामीमाह-एव खलु हे जम्मू श्रमणेन यावत् -ठितीयवर्गप्रारभ:- जण भते ! समणेण' इत्यादि। टीकार्थ:-जवू स्वामी श्री सुधर्मा स्वामी से पूछते हैं कि (भते । जइण समणेण जाव सपत्तण दोचस्स चग्गस्स उक्खेवओ-एव खलु બીજે વર્ગ પ્રારંભ जइण मते ! समणेण । इत्यादि- –જ બૂ સ્વામી શ્રી સુધમ વાગીને પૂછે છે કે – (भते ! जण समणेण जार संपत्तेण दोचस्स वग्गस्स उक्खेयो-एव खलु . साथ - etu गताधर्मकाया एव मेदारि' इत्यादि । मेघाऽपि । आमलकापायो नगयों मेपो गाथा पतिः, मेघश्री र्या, मेश दारिका । शेप तथैव । श्रीसुधर्मास्वामीमाह-एर खलु हे जम्मूः ! श्रमणेन यावद मोस सम्प्राप्तेन धर्मकयानां प्रथमस्य वर्गस्यायमर्थ प्रशप्तः ॥ ०६ ॥ ॥ इति भयमवर्गस्य पश्चमाभ्ययनम् ।। १-५ ॥ अथ द्वितीयो वर्गः भारभ्यते-'जरण मते ' इत्यादि। मूलम् -जइणं भंते । समणेण जाव संपत्तेण दोबस्स वग्ग- स्स उक्खेवओ, एवं खल्लुजवू ! समणेणं जाव संपत्तेणं दोबस्स स्स अयमढे पण्णत्ते ६) इसी तरह का कथानक विद्युतके विषय में भी जानना चाहिये। आमलकल्पा नगरी विगत गाधापति विद्युत् श्री भार्या इन दोनों के यहां विद्युत् दारिका। इस तरह नाम आदि मे ही परिध तन हुआ है। अभिधेय विषय में कुछ अन्तर नहीं है। मेघ के विषय में भी यही बात जाननी चाहिये। आमलकल्प- नगरी, मेघ गाथापति, मेघ श्री भार्या, मेधा दारिका-इस प्रकार इस कथानक में इन नामों में परिवर्तन हुआ है-अभिधेय वक्तव्य-विषय में नहीं। इस प्रकार यहा तक प्रथम वर्ग के ५, अध्ययन समाप्त हो जाते हैं। विद्युहारिका का अध्ययन ४ चौधा, एव मेघा दारिका का अध्ययन ५ पचम है । इस तरह हे जवू! श्रमण भगवान महावीर ने कि जो मुक्ति स्थान के अधि पति बन चुके हैं धर्मकथा के प्रथमवर्ग का यह अर्थ प्ररूपित किया है। આ પ્રમાણેનું જ કથાનક વિદ્યુતના વિષે પણ સમજી લેવું જોઈએ આમલક-૫ નગરી, વિદ્યુત ગાથા પતિ અને વિદ્યુત શ્રી ભાર્યા. આ બંનેને ત્યા વિદ્યુત દારિકા આ પ્રમાણે ફક્ત નામ વગેરેમાં પરિવર્તન થયું છે અભિધેય વિષયમાં કઈ પણ જાતને તફાવત નથી મેઘના વિષે પણ એ જ વાત સમજી લેવી જોઈએ આમલકલ્પ નગરી, મેઘ ગાથાપતિ, મેઘ શ્રી ભાર્યા, મેઘ દારિકા આ પ્રમાણે આ કથાનકમાં પણ નામમાં જ પરિવર્તન થયું છે-અભિધેય વક્તવ્ય વિષયમાં નહિ આ પ્રમાણે અહીં સુધી પ્રથમ વર્ગના પાચ અયને પૂરા થઈ જાય છે વિધુરારિકાનું અધ્યયન ચેણુ, અને મેઘ દારિકાનું અધ્યયન પાયમ છે આ પ્રમાણે છે જબૂ! શ્રમણ ભગવાન મહાવીરે-કે જેઓ મુકિત સ્થાનના અધિપતિ થઈ ચૂકી છે-ધમકથાના પ્રથમ વર્ગને આ અર્થ પ્રરૂપિત કર્યો છે કે હું છે .
ममगारधर्मामृतवर्षिणी टी० शु २ च २°मानिशुभ दिदेवीवर्णनम् खलु हे जम्मूः ! तस्मिन् काले तस्मिन् समये राजगृह नगरम् । गुणशिलकं चैत्यम् । स्वामी बर्द्धमानस्वामी समरसूत । परिपन्निर्गता यात्पर्युपास्ते । तस्मिन् काले तस्मिन् समये शुम्भा देवी लिचञ्चाया राजधान्या शुम्भावतमके भरने शुम्भे सिंहासने 'कालीगमण्ण' कालीगमेन-काली देवी सदृशपाठेन यावत्- नाट्यविधिमुपदर्य यारत्-प्रतिगता ! 'पुत्वभवपुच्छा' पूर्वभवपृच्छा गौतम- स्वामी शुम्भा देव्या पूर्व पर पृन्छति। भगवान् कथयति-श्रावस्ती नगरी । कोष्ठक चैत्यम् । जितशयू राजा । शुम्भो गाथापतिः । शुम्भश्रीर्भार्या । शुम्भा ढारिका । शेष यथा काल्या -काली दारिकाया वर्णन तयात्रापि विज्ञेयम् , नर-विशेस्त्व- के पांच अध्ययन प्ररूपित किये हैं-तो हे भदत ! द्वितीयवर्ग के प्रथम अध्ययन का उन्होंने क्या अर्थ प्रतिपादित किया हैं ? इस प्रश्न का उत्तर देने के लिये सुधर्मा स्वामी उनसे इस प्रकार करते हैं कि-हे जबू-उस काल और उस समय में राजगृह नाम का नगर या-उसमें गुणशिलफ नाम का उद्यान था-। उममें वर्द्धमान स्वामी आये। प्रभु का आगमन सुनकर वहां की समस्त जनता उन्हें बदन के लिये अपने २ स्थान से चल कर उम गुणशिलक उद्यान में आई । प्रभु ने सयको धर्म का उपदेश दिया परिषद् उपदेश सुनकर प्रभु की यावत् पर्युपासना की। (तेण कालेण तेण समण्ण) उसी काल और उसी समय मे (सुभादेवी पलिचचाए रायहागीए सुभवडेसए भवणे सुभसि सीहा- सणसि कालीगमएण जाउ नट्टविहिं उबदसेत्ता जाव पडिगया पुष्यभव पुच्छा, सारथी णयरी, कोहए चेहए जियसनू राया,सुभे गाहावई सुभ સ્થાનને પ્રાપ્ત કરેલા શ્રવણુ ભગવાન મહાવીરે બીજા વર્ગના પાચ અધ્યયને પ્રરૂપિત કર્યા છે, તે હે ભદન્ત બીજા વર્ગના પ્રથમ અધ્યયનને તેમણે શું અર્થ પ્રતિપાદિત કર્યો છે? આ પ્રશ્નના ઉત્તરમાં શ્રી સુધર્મા સ્વામી તેમને આ પ્રમાણે કહે છે કે જબૂ! તે કાળે અને તે સમયે રાજગૃહનામે નગર હતું તેમાં શિક્ષક નામે ઉઘાન હતું તેમાં વિમાન સ્વામી પધાર્યા પ્રભુનું આગમન સાંભળીને ત્યાના બધા નાગરિકો તેમને વધના કરવા માટે પિતપતાને સ્થાનેથી નીકળીને તે ગુણશિલક ઉથાનમાં આવ્યા પ્રભુએ બધાને ધર્મને ઉપદેશ આપ્યો परिपहे पाप साली प्रभुनी यावत् युपासना । (रुण फालेण तेण समएण) मन त समये (सुभा देवी पलिचबाए रायदाणीए मुभव.सए भरणे मुभ सि सीदासणसि काली गमण जानना विहिं उबदसेता जाव पडिगया, पुज्यभरपुन्ना सावत्थी णयरी, कोट्ठए चेइए जियमचू राया, मुभे गाहावई, सुभसिरी भारिया, सुभा- - , श्रा १०३ ताधर्मपाल मोक्ष सम्माप्तेन द्वितीयस्य वर्गस्य पञ्चास्ययनानि मातानि, तण्या-भुम्मा, निशुम्भा २, रम्भा ३, निरम्भा ४, मदना ५, । यदि यलु हे भदन्त । श्रमणेन योवत्सम्माप्तेन द्वितीयस्य वर्गस्य पञ्च-भ-ययनानि मज्ञप्तानि, द्वितीयस्प खलु हे भदन्त । वर्गस्य मयमा ययनस्य फोऽर्थः प्राप्तः । शुधर्मासामी पाह-एवं जनू । समणेण जार सपत्तण दोचस्स बग्गस्म पच अयणा पण्णता) हे भदत ! मुक्ति स्थान को प्राप्त हुए श्रमण भगवान महावीर ने द्वितीय चर्ग का उत्क्षेपक भारभ किस रूप से प्ररूपित किया है-तर सुधर्मा स्वामी ने उनसे कहा-हे जवू ! सुनो यावत् मुक्तिस्थान को प्राप्त हुए उन श्रमण भगवान महावीर ने इस दितीय वर्ग के पांच अध्ययन प्ररूपित किये हैं-(त जहा) वे इस प्रकार हैं-(सुभा, निसुभा, रभा, निरमा मयणा, जहण भते ! समणेण जाय सपत्तेण धम्मकहाण दोचस्स वग्ग स्त पच अज्जयणा पण्णत्ता, दोबस्सण भते वगम्म पढमज्झयणस्स के अढे एण्णते ? एच खलु जब! तेण कालेण तेण समण्ण रायगिहे णयरे, गुणसीला चेइए-सामी समोसढे परिसा णिग्गया जाव पज्जुवा सइ) (१) शुम्भा, (२) निशुमा (३) रम्भा, (४) निरभा (५) मदना । अब जब स्वामी पुनः सुधर्मा स्वामी से पूछते हैं कि हे भदत ! यदि यावत् मुक्ति स्थान को प्राप्त हुए श्रमण भगवान महावीरने द्वितीयवर्ग जबू! ममणेण जान मपचेण दोच्चस्स वग्गस्स पचअज्झपणा पण्णत्ता) હે ભદન્ત ! મુક્તિસ્થાનને પ્રાપ્ત કરેલા શ્રમણ ભગવાન મહાવીરે બીજા વર્ગને ઉલ્લેપક-પ્રાર ભય રૂપથી પ્રરૂપિત કર્યો છે ત્યારે સુધર્મા સવામીએ, તેમને કહ્યું કે હે જ બૂ! સાભળે, યાવત્ મુક્તિસ્થાનને વરેલા તે શ્રમણ ભગવાન મહાવીરે આ બીજા વર્ગના પાચ અધ્યયને પ્રરૂપિત કર્યા છે ( त जहा) ते मा प्रभारी छ- (सुमा, निसुभा, रभा, निरमा, मयणा, जदण भते ! समणेण जाव सप तेण धम्मकहाणं दोचस्प वग्गस्स पच अज्झयणा पण्णत्ता, दोचस्स ण भते वग्गस्स पहमज्झयणस्स के अढे पण्णत्ते ! एव खल्लु जयू ! तेण कालेण तेण समएण रायगिहे णयरे, गुणसीलए चेइए-सामी समोसटे परिमाणिग्गया जाव पज्जुवासइ) (1) शुभा, (२) निशुमा, (३) २ा, (४) नि२ मा, (५) भहना ७३ જ બૂ સ્વામી ફરી સુધમાં સ્વામીને પૂછે છે કે હે ભદન્ત ! જે યાવત મુક્તિ ममगारधर्मामृतापिणी टी० थ २ २ शुमानिशुभ दिवेयीवर्णनम् खलु हे जम्वृ ! तम्मिन् काले तस्मिन् समये राजगृह नगरम् । गुणशिलक चैत्यम् । स्वामीचर्द्धमानस्वामी समनमृत । परिपन्निर्गता यावत्पर्युपास्ते । तस्मिन् फाले तस्मिन् समये शुम्मा देवी लिचञ्चाया राजधान्या शुम्भावतसके भरने शुम्भे सिंहासने 'कालीगमएण' कालीगमेन काली देवी सदृशपाठेन यावत्- नाट्यविधिमुपदर्य यारत्-प्रतिगता । 'पुव्यभवपुच्छा' पूर्वभवपृच्छा गौतम- स्वामी शुम्भा देव्याः पूर्वम पृच्छति। भगवान् कथयति-श्रावस्ती नगरी। कोष्ठक चैत्यम् । जितशयू राजा । शुम्भो गाथापतिः । शुम्भश्रीर्भार्या । शुम्भा दारिका । शेप यथा काल्या काली दारिकाया वर्णन तयात्रापि विज्ञेयम् , नर-विशेस्त्व- के पांच अध्ययन प्ररूपित किये हैं-तो हे भदत ! द्वितीयवर्ग के प्रथम अध्ययन का उन्होंने क्या अर्थ प्रतिपादित किया हैं ? इस प्रश्न का उत्तर देने के लिये सुधर्मा स्वामी उनसे इस प्रकार करते हैं कि-हे जबू!-उस काल और उस समय में राजगृह नाम का नगर या-उसमें गुणशिलक नाम का उद्यान था-| उसमें वर्द्धमान स्वामी आये। प्रभु का आगमन सुनकर वहां की समस्त जनता उन्हें वदन के लिये अपने २ स्थान से चल कर उस गुणशिलक उद्यान में आई। प्रभु ने सयको धर्म का उपदेश दिया परिपद् उपदेश सुनकर प्रभु की यावत् पर्युपासना की। (तेणं कालेणं तेण समाण) उसी काल और उसी समय में (सुभादेवी पलिचचाए रापहाणी सुभवडेसए भवणे सुभसि सीहा सणसि कालीगमण जार नविहिं उबदसेत्ता जाच पडिगया पुव्वभव पुच्छा, सारथी णयरी, कोहए चेहए जियसत्तू राया,सुभे गाहाबई सुभ સ્થાનને પ્રાપ્ત કરેલા શ્રવણુ ભગવાન મહાવીરે બીજા વર્ગના પાચ અધ્યયને પ્રરૂપિત કર્યા છે તે હે ભદન્ત ! બીજા વર્ગના પ્રથમ અધ્યયનને તેમણે શું અર્થ પ્રતિપાદિત કર્યો છે? આ પ્રશ્નના ઉત્તરમાં શ્રી સુધર્મા સ્વામી તેમને આ પ્રમાણે કહે છે કે હે જ બૂ! તે કાળે અને તે સમયે રાજગૃહ નામે નગર હતું તેમાં ગુણશિલા નામે ઉઘાન હતું તેમાં વમાન સ્વામી પધાર્યા પ્રભુનું આગમન સાંભળીને ત્યાના બધા નાગરિકે તેમને વદના કરવા માટે પોતપોતાને સ્થાનેથી નીકળીને તે ગુણશિલક ઉડાનમાં આવ્યા પ્રભુએ બધાને ધર્મને ઉપદેશ આ પરિષદે ધર્મોપદેશ સાંભળીને પ્રભુની યાવત્ પય્ પાસના કરી (सेण फालेण तेण समएण) तेणे भने ते सभये (सुभा देवी पलिच पाए रायटाणीए सुभबडेंसए भरणे सुभ सि सीदासणसि काली गमएण जान नट्ट विहिं उबदसेत्ता जाव पडिगया, पुनभरपुन्ज सावत्थी णयी कोट्ठए चेइए नियमत्तू राया, मुभे गादावई, सुभसिरी भारिया, सुभा- ११०३ + । ताधर्मपाल मोक्ष सम्माप्तेन द्वितीयस्य वर्गस्य पक्षाध्ययनानि प्राप्तानि, तपथा-चुम्मा १, निशुम्भा २, रम्भा ३, निरम्भा ४, माना ५, । यदि सलु हे भदन्त ! श्रमणेन योवत्सम्माप्तेन द्वितीयस्य वर्गस्य पश्च-अध्ययनानि मज्ञप्तानि, द्वितीयस्प खल्ल हे भदन्त । वर्गस्य मथमा-ययनस्य कोऽर्थः मशप्तः ? । सुधर्मासामी माह-एव जवू | समणेण जार सपत्तण दोघस्स चग्गस्स पच अजायणा पण्णता) हे भदत ! मुक्ति स्थान को प्राप्त हुए श्रमण भगवान महावीर ने द्वितीय वर्ग का उत्क्षेपक प्रारभ किस रूप से प्ररूपित किया है-तर सुधर्मा स्वामी ने उनसे कहा-हे जनू। सुनो यावत् मुक्तिस्थान को प्राप्त हुए उन श्रमण भगवान महावीर ने इस द्वितीय वर्ग के पांच अध्ययन प्ररूपित किये है-(तं जहा) वे इस प्रकार है-(सुभा, निसुभा, रभा, निरमा मयणा, जहण भंते ! समणेण जाव मपत्तण धम्मकाण दोवस्त वग्ग- स्स पच अज्जयणा पण्णत्ता, दोचस्सण भते चरगस्स पढमन्झयणस्स के अटे एण्णते ? एक खलु जब । तेण कालेण तेण समएण रार्यागहे णयरे, गुणसीलए चेहए-सामी समोसढे परिसा णिग्गया जाव पज्जुवा सइ) (१) शुम्भा, (२) निशुमा (३) रम्भा, (४) निरभा (५) मदना, । अब जबू स्वामी पुनः सुधर्मा स्वामी से पूछते हैं कि हे मदत ! यदि यावत् मुक्ति स्थान को प्राप्त हुए श्रमण भगवान महावीरने द्वितीयवर्ग जबू । समणेण जान सपत्तेण दोच्चस्स वग्गस्स पचअज्झयणा पण्णत्ता) હે ભદન્ત' મુક્તિસ્થાનને પ્રાપ્ત કરેલા શ્રમણ ભગવાન મહાવીરે બીજા વર્ગને ઉપક-પ્રારભર્યા રૂપથી પ્રરૂપિત કર્યો છે? ત્યારે સુધર્મા સ્વામીએ તેમને કહ્યું કે હે જ બૂ! સાભળે, યાવત મુક્તિસ્થાનને વરેલા તે શમણે ભગવાન મહાવીરે આ બીજા વર્ગના પાચ અધ્યયનો પ્રરૂપિત કર્યા છે ( त जहा) ते । प्रभारी छ- ( सुभा, निमुभा, रभा, निरमा, मयणा, जदण भते समणेण नाव सप तेण धम्मकहाण दोचस्प वग्गस्स पच अज्झयणा पण्णता, दोचस्स ण भते वग्गरस पहमज्झयणस्स के अटे पण्णत्ते । एव खलु जयू ! तेण कालेण तेण समएण रायगिहे णयरे, गुणसीलए चेइए-सामी समोसढे परिसा जिग्गया जाव पज्जुनासइ) (1) शुभा, (२) निशुमा, (3) २१, (४) निरा, (५) महना से જ ભૂ સ્વામી ફરી સુધમાં સ્વામીને પૂછે છે કે હે ભદન્ત ! જે યાવત મુક્તિ K । - " मनगारधामृतवपिणी री० श्रु २ घ २ गुभानिगुमादिदेवीवर्णनम् एव सेसावि ' इत्यादि-एव शेपाण्यपि-निशुम्भा १-रम्भा २-निरम्भा ३-मदना ४ नामकानि चत्वारि अध्ययनानि श्रावस्त्या नगर्या विज्ञेयानि, नत्र रम्-एतावान् निशेप:-मातर पितरः सदृशनामान:दारिकासशनामाना, तथाहि- निशुम्भाया माता निशुम्भश्री , पिता निशुम्भः । रम्भाया माता रम्भश्रीः, पिता रम्भः । निरम्भाया माता निरम्भश्रीः, पिता निरम्भः । मदनाया माता मदनश्रीः पिता मदनः । एते सर्व गाथापतयः आसन् । एव खलु हे जम्बू ' निक्षेपको द्वितीयवर्गस्य ॥ ७ ॥ ।। इति धर्मस्थाना द्वितीयो वर्गः समाप्तः ।। २ ।। कालीदेवी का है वैसा ही जानना चाहिये। उसमें और इसमे केवल अन्तर इतना ही है कि कालीदेवी की स्थिति २॥ पल्य की थी और इस शुभादेवी की ३||, पत्य की थी। इस प्रकार हे जवू ! इस द्वितीय वर्ग के प्रथम अ ययन का यह निक्षेपक है। इसी तरह निशु भा, रभा निरम्भा और मदना नाम के चार अध्ययन भी जानना चाहिये । इन में विशेषता केवल इतनी ही है कि यहां जो माता पिता है वे दारिका सदश नामवाले है-जैसे निशु भा के पिता का नाम निशुभ, माता का नाम निशुभ श्री, रभाके पिता का नाम रम्भ, माताफा नाम रम्भश्री, निरभा के पिता नाम निरभ माता का नाम निरभश्री, मदना के पिता का नाम मदन, और माताका नाम मदनश्री । ये सब ही गाथा- पति है । इस तरह यह द्वितीयवर्ग का निक्षेपक-उपसहार-ह । ॥ द्वितीयवर्ग ममाप्त ।। લે જ છે કે કાલી દેવીની સ્થિતિ રા પલ્યની હતી અને આ શુભા દેવીની સ્થિતિ ૩ પળની હતી આ પ્રમાણે તે જ બૂ! આ બીજા વર્ગના પ્રથમ અધ્યયનને આ નિપક છે આ પ્રમાણે જ નિશુભા, રભા, નિરભા અને મદના નામના ચાર અદાયને પણ જાણું લેવા જોઈએ એમનામાં વિશેષતા ફકત એટલી જ છે કે અહીં જે માતાપિતા છે તે પુત્રીના જેવા જ નામવાળા છે જેમકે નિશુભાના પિતાનું નામ નિશુભ, માતાનું નામ નિશુ ભશ્રી, રભા ના પિતાનું નામ રભ, માતાનું નામ શ્રી નિરભાના પિતાનું નામ નિરભ, માતાનું નામ નિર શ્રી, મદનાના પિતાનું નામ મદન અને માતાનું નામ મદનશ્રી, આ બધા ગાથા પતિએ છે આ પ્રમાણે બીજા વર્ગને નિક્ષેપક ઉપસ હાર છે બીજે વર્ગ સમાપ્ત છે माताकपा यम्-अस्याः शुम्भादेव्याः 'अछुट्टाइ' अर्थ पनि-सादत्रयागि पल्योपमानि स्थितिरन्ति । सुधर्मास्वामीमाद-इ जम्यूनिक्षेपका-उपहारोऽध्ययनस्य याच्यः ।। ॥ इति द्वितीयवर्गस्य प्रथमा ययनम् ।। सिरी भारिया सुंभादारिया, सेस जा का णयर अगुहार पलिओव माई ठिई, एव पल बू ! निस्सेवभो अज्झयणस्म एव सेसा विचसा रिअज्झयणा सावत्थीर नयर माया पिशा मरिस नामया एव खलु जबू। निरखेवो पिईयवग्गस्स पीओ बग्गो समतो) शुभादेवी जो यलियचा नामकी राजधानी में शुभावतसक नामके भवन में रहती थी और शुभनाम के सिंहासन पर पैठती धी-वह काली देवी के प्रकरण में वर्णित पाठ के अनुसार प्रभु के समीप उनको वदना करने के लिये आई । वहाँ उसने नाट्यविधिका प्रदर्शन किया यादमें फिर वह वहां से पीछे अपने स्थान पर चली गई । उसके चले जाने के याद गौतमस्वामी ने प्रभु से उस शुभादेवी के पूर्वभव की पृच्छा की-तब भगवान ने उन से इस प्रकार कहा-श्रावस्ती नामकी नगरी थी। उसमें कोछक नामका उद्यान था, । नगरी के राजा का नाम जितशत्रु था उसमें गाया पति रहता था। जिसका नाम शुभ था। इसकी शुभ श्री नाम की भार्या थी। दारिका का नाम शुभा था। इसके बाद का इसका वर्णन दारिया, सेस जहा कालीए णार अट्ठाइ, पलिओवमाइ ठिई । एव खलु जेन् । निक्खेवगो अज्झयणस्स एव सेसा वि चत्तारि अज्झयणस्स सावत्थीए नरमाया- पिया सरिसनामया, एत्र खलु जत्रू ! निक्खेरओ-पिईयरगिस्स पच अज्म यणा समत्ता वीओ वग्गो समत्तो) શુ ભા દેવી-કે જે બલિચ ચા નામે રાજધાનીમા શુભાવત સક નામના ભવનમાં રહેતી હતી અને શુભ નામે સિંહાસન ઉપર બેસતી હતી--કાલી દેવીના પ્રકરણમાં વર્ણવેલા પાઠ મુજબ પ્રભુની પાસે તેમને વદના કરવા માટે આવી ત્યાં તેણે નાટયવિધિનું પ્રદર્શન કર્યું ત્યાબા તે ત્યાંથી પાછી પોતાના સ્થાને જતી રહી તેમના જતા રહ્યા બાદ ગૌતમ સ્વામીએ પ્રભુની શુભા દેવીના પૂર્વ ભવની પૃચ્છા કરી ત્યારે ભગવાને તેમને આ પ્રમાણે કહ્યું કે- બાવસ્તી નામ નગરી હતી, તેમાં કોઇક નામે ઉઘાન હતુ નગરીના રાજાનું નામ જિતવુ હતું તેમાં શુભ નામે ગાથાપતિ રહતે હેત શુભશ્રી નામે તેની પત્ની હતી, તેની પુત્રીનું નામ શુભા હતુ ત્યારપછી તેનું શેષ વર્ણન કાલી દેવીની જેમજ સમજી લેવું જોઈએ તેમા અને આમાં તફાવત એટ अनगारधर्मामृतवपिणी टी० श्रु २ व २ गुभानिगुभादिदेवीवर्णनम् 'एव सेसावि ' इत्यादि-एव शेपाण्यपि-निशुम्भा १-रम्भा २-निरम्भा ३-मदना ४ नामकानि चत्वारि अध्ययनानि श्रावस्त्या नगर्या विज्ञेयानि, नव- रम्-एतावान् विशेषः-मातर पितरः सदृशनामानःदारिकासदृशनामानः, तथाहि- निशुम्भाया माता निशुम्भश्री , पिता निशुम्भः । रम्माया माता रम्भश्रीः, पिता रम्भः । निरम्भाया माता निरम्भश्रीः, पिता निरम्भः । मदनाया माता मदनश्रीः पिता मदनः । एते सर्वे गायापतयः आमन् । एव खलु हे जम्बू । निक्षेपको द्वितीयवर्गस्य ॥ ७ ॥ ॥ इति धर्मस्थाना द्वितीयो वर्गः समाप्तः ॥ २ ॥ कालीदेवी का है वैसा ही जानना चाहिये। उसमें और इसमे केवल अन्तर इतना ही है कि कालीदेवी की स्थिति २॥ पत्य की थी और इस शुभादेवी की ॥, पत्य की थी। इस प्रकार हे जवू ! इस द्वितीय बर्ग के प्रथम अध्ययन का यह निक्षेपक है। इसी तरह निशु भा, रभा निरम्भा और मदना नाम के चार अध्ययन भी जानना चाहिये । इन में विशेषता केवल इतनी ही है कि यहाँ जो माता पिता है वे दारिका सदृश नामवाले हैं-जैसे निशु भा के पिता का नाम निशुभ, माता का नाम निशुभ श्री, रभाके पिता का नाम रम्भ, माताका नाम रम्भश्री, निरभा के पिता नाम निरभ माता का नाम निरभनी, मदना के पिता का नाम मदन, और माताका नाम मदनश्री। ये सर ही गाथा- पति हैं। इस तरह यह द्वितीयवर्ग का निक्षेपक-उपसहार-है। ॥ द्वितीयवर्ग समाप्त ॥ લે જ છે કે કાલી દેવીની સ્થિતિ રા પલ્યની હતી અને આ શુભા દેવીની સ્થિતિ સા પાની હતી આ પ્રમાણે તે જ બૂ! આ બીજા વર્ગના પ્રથમ અધ્યયનને આ નિક્ષેપક છે આ પ્રમાણે જ નિશુભા, રભા, નિરભા અને મદના નામના ચાર અદાયને પણ જાણી લેવા જોઈએ એમનામાં વિશેષતા ફકત એટલી જ છે કે અહીં જે માતાપિતા છે તે પુત્રીના જેવા જ નામવાળા છે જેમકે નિશુ ભાના પિતાનું નામ નિશુ ભ, માતાનું નામ નિષ્ણુ ભશ્રી, રમે ના પિતાનું નામ રભ, માતાનું નામ શ્રી નિરભાના પિતાનું નામ નિરભ, માતાનું નામ નિરભશ્રી, મદનાના પિતાનું નામ મદન અને માતાનું નામ મદનશ્રી, આ બધા ગાથાપતિએ છે આ પ્રમાણે બીજા વર્ગને નિક્ષેપક ઉપસ હાર છે બીજો વર્ગ સમાપ્ત છે पाताधर्मपाल यम्-अस्याः शुम्भादेव्याः 'अधुवाइ ' अई चतुर्थानि-सादत्रयागि पल्योपमानि स्थितिरस्ति । सुधर्मासामीमाह-हे जम्यू: निक्षेपका-उपहारोऽध्ययनस्य वाच्यः ।। ॥ इति द्वितीयवर्गस्य प्रथमा ययनम् ।। सिरी भारिया सुभादारिया, सेस जहा कालीए णयर अगुवाइ पलिओव माई ठिई, एच चल निक्रोवओ अल्झयणस्स एवं सेसा विश्वशा रिअज्झयणा सावत्थीग नयर मायापिया मरिस नामया एय बलजबू। निखेयो पिईयवग्गस्स पीओ चग्गो समत्तो) शुभादेवी जो पलिचचा नामकी राजधानी में शुभावतसा नामके भवन में रहती थी और शुभनाम के सिंहासन पर बैठती धी-यह काली देवी के प्रकरण में वर्णित पाठ के अनुसार प्रभु के समीप उनको वदना करने के लिये आई। वहाँ उसने नाट्यविधिका प्रदर्शन किया यादमें फिर घर वहा से पीछे अपने स्थान पर चली गई। उसके चले जाने के याद गौतमस्वामी ने प्रभु से उस शुभादेवी के पूर्वभव की पृच्छा की-तब भगवान ने उन से इस प्रकार कहा-श्रावस्ती नामकी नगरी थी। उसमें कोष्ठक नामका उद्यान था, । नगरी के राजा का नाम जितशत्रु था उसमें गाथा पति रहता था। जिसका नाम शुभ था। इसकी शुभ श्री नाम की भार्या थी। दारिका का नाम शुभा था। इसके बाद का इसका वर्णन दारिया, सेस जहा कालीए णवर अट्ठाइ, पलिओवमाइ ठिई । एव खलु जनू। निक्खेवो अज्झयणस्स एव सेसा वि चत्तारि अञ्झयणस्स सावत्थीए नगर माया पिया सरिसनामया, एवं खलु जब । निक्खेवओ-बिईयवग्गस्स पच अज्य यणा समत्ता बीओ वग्गो समत्तो) શુભા દેવી-કે જે બલિચ ચા નામે રાજધાનીમાં શુભાવત સક નામના ભવનમાં રહેતી હતી અને શુભ નામે સિંહાસન ઉપર બેસતી હતી-કાલી દેવીના પ્રકરણમાં વર્ણવેલા પાઠ મુજબ પ્રભુની પાસે તેમને વદના કરવા માટે આવે ત્યાં તેણે નાટયવિધિનું પ્રદર્શન કર્યું ત્યારબા. તે ત્યાંથી પાછી પિતાના સ્થાને જતી રહી તેમના જતા રહ્યા બાદ ગૌતમ સ્વામીએ પ્રભુની શુભા દેવીના પૂર્વ ભવની પૃચ્છા કરી ત્યારે ભગવાને તેમને આ પ્રમાણે કહ્યું કે- શ્રાવસ્તી નામે નગરી હતી, તેમાં કેઇડ નામે ઉદ્યાન હતું નગરીના રાજાનું નામ જિતશત્રુ હતુ તેમાં શુભ નામે ગાથા પર રહેતા હતા શુભશ્રી નામે તેની પત્ની હતી, તેની પુત્રીનું નામ શુભા હતું ત્યારપછીનું તેનું શેષ વર્ણન કાલી દેવીની જેમજ સમજી લેવું જોઈએ તેમાં અને આમાં તફાવત એટ । अनगारधामृतवषिणी ० श्रु २ घ २ गुभानिगुमादिदेवीवर्णनम् एस सेसावि' इत्यादि-ए। शेषाण्यपि-निशुम्भा १-रम्भा २-निरम्भा 3-मदना ४ नामकानि चत्वारि अध्ययनानि श्रावस्त्या नगर्या विज्ञेयानि, नव- रम्-एतावान् विशेष:-मावर पितरः सदृशनामान:दारिकासदशनामानः, तथाहि- निशुम्भाया माता निशुम्भश्री , पिता निशुम्भः । रम्माया माता रम्भश्रीः, पिता रम्भः । निरम्भाया माता निरम्भश्री, पिता निरम्भः । मदनाया माता मदनश्रीः पिता मदनः । एते सर्वे गावापतयः आसन् । एव खलु हे जम्बू निक्षेपको द्वितीयवर्गस्य ॥ ७॥ ॥ इति धर्मस्थाना द्वितीयो वर्गः समाप्तः ॥ २ ॥ कालीदेवी का है वैसा ही जानना चाहिये। उसमें और इसमे केवल अन्तर इतना ही है कि कालीदेवी की स्थिति २॥ पत्य की थी और इस शुभादेवी की ३॥, परय की थी। इस प्रकार हे जवू ! इस द्वितीय वर्ग के प्रथम अध्ययन का यह निक्षेपक है । इसी तरह निशु भा, रंभा निरम्भा और मदना नाम के चार अध्ययन भी जानना चाहिये । इन में विशेषता केवल इतनी ही है कि यहां जो माता पिता हे वे दारिका सदृश नामवाले हैं-जैसे निशु भा के पिता का नाम निशुभ, माता का नाम निशुभ श्री, रभाके पिता का नाम रम्भ, माताका नाम रम्भश्री, निरभा के पिता नाम निरभ माता का नाम निरभश्री, मदना के पिता का नाम मदन, और माताका नाम मदनश्री। ये सब ही गाथा- पति हैं । इस तरह यह द्वितीयवर्ग का निक्षेपक-उपसहार-हे। ॥ द्वितीयवर्ग समाप्त ।। લે જ છે કે કાલી દેવીની સ્થિતિ આ પલ્યની હતી અને આ શુભા દેવીની સ્થિતિ ૩ પલ્યની હતી આ પ્રમાણે તે જ બૂ! આ બીજા વર્ગના પ્રથમ અધ્યયનને આ નિક્ષેપક છે આ પ્રમાણે જ નિશુ ભા, રભા, નિરભા અને મદના નામના ચાર અધાયને પણ જાણું લેવા જોઈએ એમનામાં વિશેષતા ફક્ત એટલી જ છે કે અહીં જે માતાપિતા છે તે પુત્રીના જેવા જ નામવાળા છે જેમકે નિશુ ભાના પિતાનું નામ નિશુભ, માતાનું નામ નિષ્ણુ ભશ્રી, રભા ના પિતાનું નામ રભ, માતાનું નામ ર શ્રી નિરભાના પિતાનું નામ નિરભ, માતાનુ નામ નિરભથી, મદનાને પિતાનું નામ મદન અને માતાનું નામ મદનશ્રી, આ બધા ગાથાપતિઓ છે આ પ્રમાણે બીજા વર્ગને નિક્ષેપક GUR બીજે વર્ગ સમાપ્ત છે ८१८ पाताचा यम्-अस्याः शुम्भादेव्याः । अधुद्वाद 'अई चतुर्यानि-सादत्रयागि पल्योपमानि स्थितिरस्ति । सुधर्मास्वामीमाह-हे नम: निक्षेपका-उपहारोऽभ्ययनस्य गाभ्यः ।। ॥ इति द्वितीयवर्गस्य प्रथमा ययनम् ॥ सिरी भारिया सुंभादारिया, सेस जहा कालीए णवर अगुहार पलिओव माई ठिई, एव सलु जंनिक्रोवओ अज्झयणस्म एव सेमा विधत्सा रिअज्झयणा सावत्थीपनवर माया पिया मरिस नामया एव खलु जबू। निरखेयओविईयवग्गस्स पीओ वग्गो ममत्तो) शुभादेवी जो यलिचचा नामकी राजधानी में शुभावतसक नामके भवन में रहती थी और शुभनाम के सिंहासन पर बैठती धी-वह काली देवी के प्रकरण में वर्णित पाठ के अनुसार प्रभु के समीप उनको वदना करने के लिये आई । वहाँ उसने नादयविधिका प्रदर्शन किया यादमें फिर घर वहा से पीछे अपने स्थान पर चली गई । उसके चले जाने के याद गौतमस्वामी ने प्रभु से उस शुभादेवी के पूर्वभव की पृच्छा की-तब भगवान ने उन से इस प्रकार कहा-श्रावस्ती नामकी नगरी थी। उसमें कोष्ठक नामका उद्यान था, । नगरी के राजा का नाम जितशनु था उसमें गाथा पति रहता था। जिसका नाम शुभ था। इसकी शुभ श्री नाम की भार्या थी। दारिका का नाम शुमा था। इसके बाद का इसका वर्णन दारिया, सेस जहा कालीए णवर अट्ठाइ, पलिओवमाइ ठिई । एव खलु जबू! निक्खेवभो अज्झयणस्स एव सेसा वि चतारि अज्झयणस्स सावत्थीए नवर माया पिया सरिसनामया, एव खलु जयू ! निक्खेवओ-पिईयवग्गस्स पच अजय यणा समत्ता बीओ वग्गो समत्तो) શુભા દેવી-કે જે બલિચ ચા નામે રાજધાનીમાં શુભાવત સક નામના ભવનમાં રહેતી હતી અને શુભ નામે સિંહાસન ઉપર બેસતી હતી-કાલી દેવીના પ્રકરણમાં વર્ણવેલા પાઠ મુજબ પ્રભુની પાસે તેમને વદના કરવા માટે આવી ત્યાં તેણે નાટયવિધિનું પ્રદર્શન કર્યું ત્યારબા. તે ત્યાંથી પાછી પોતાના સ્થાને જતી રહી તેમના જતા રહ્યા બાદ ગૌતમ સ્વામીએ પ્રભુની શુભા દેવીના પૂર્વ ભવની પૃચ્છા કરી ત્યારે ભગવાને તેમને આ પ્રમાણે કહ્યું કે શ્રાવસ્તી નામે નગરી હતી, તેમા કોષ્ટક નામે ઉદ્યાન હતું નગરીના રાજાનું નામ જિતશત્રુ હતું તેમાં શુભ નામે ગાથાપર રહતે હતો શુભશ્રી નામે તેની પત્ની હતી, તેની પુત્રીનું નામ શુભા હતુ ત્યારપછી તેનું શેષ વર્ણન કાલી દેવીની જેમજ સમજી લેવું જોઈએ તેમાં અને આમાં તે વત એટ अनगारधर्मामृतपिणी टी0 शु० २ ० २ अलादीदेवीनां चरित्रवर्णनम् अद्धपलिओवम ठिई सेस तहेच, एव खलु गिरखेचओ पढमज्झयणस्स) उस काल और उस समय में राजगृह नाम का नगर था। वहां गुण- शिलक नाम का उन्धान था। उसमें तीर्थकर परपरानुसार विहार करते हुए श्रमण भगवान महावीर आकर ठहरे हुए थे। नगर की परिपदा प्रभु को चना के लिये अपने २ घर से निकल कर उस उद्यान मे आई प्रभु ने सरको धर्म का उपदेश दिया। सुनकर रोगो ने यावत् प्रभु की पर्युपासना की । उसी समय वहा पर धरणेन्द्र की अग्रमहिपी अलादेवी जो धरणा राजधानी में अलावतसक इस नाम के भवन मे रहती थी- और जिसके पैटने के सिंहासन का नाम अला या प्रभु को चदना आदि करने के निमित्त आई। वहां आकर उस ने नाटयविधि दिखलाई। दिखलाकर वह फिर वहा से पीछे अपने स्थान पर गई। उसके आते ही गौतम स्वामी ने श्रमण भगवान महावीर से उसका पूर्वभव पूछा तय भगवान् ने उनसे इस प्रकार कहा वाणारसी नामकी नगरी यी-उसमें काम महावन नाम का उद्यान था। उसमे अलनाम का गायापति रहता था। उसकी भार्या "अल श्री"इस नामकी थी। इस की एक पुत्री थी जिसका नाम अला था। इसका-अला का शेष कथानक, कालीदेवी का वाओ, साइरेग अद्धपलिओवम ठिई सेस तहेव, एव खलु णिक्खेवो पढमज्झयणस्स) તે કાળે અને તે સમયે રાજગૃહ નામે નગર હતુ તેમા ગુગ્રગિલક નામે ઉઘાન હતુ તેમા તીર્થંકર પર પરા મુજબ હિાર કરતાં પધારીને શ્રમણ ભગવાન મહાવીરે મુકામ કર્યો હતે નગરની પરિષદ પ્રભુને વંદન કરવા માટે પોતપોતાને ઘેરથી નીકળીને તે ઉદ્યાનમાં આવી પ્રભુએ સૌને ધર્મને ઉપદેશ આ ઉપદેશ સાભળીને લેકોએ યાવત્ પ્રભુની પર્યપામના કરી, તે વખતે ત્યા ધરણેન્દ્રની અગ્નમહિષી (પાણી) અલાદેવી કે જે ધરણા રાજધાનીમાં અલાવાસક આ નામના ભવનમાં રહેતી હતી, અને જેને બેસવાના સિંહાસનનું નામ અલી હતું- પ્રભુને વદના કરવા માટે આવી ત્યા આવીને તેણે નાટયવિધિનું પ્રદર્શન કર્યું, પ્રદર્શન કરીને તે ત્યાંથી પાછી પિતાના સ્થાને જતી રહી તેના ગયા પછી તરત જ ગૌતમ સ્વામીએ શ્રમણ ભગવાન મહાવીરને તેને પૂર્વભવ પૂછે ત્યારે ભગવાને તેમને આ પ્રમાણે કહ્યું કે વાણારસી નામે નગરી હતી, તેમા કામમહાવન નામે ઉઘાન હતુ, તેમાં અલ નામે ગાથાપતિ રહેતું હતું તેની ભાર્યાનું નામ અલશ્રી હતુ ---ી હતી તેનું નામ અલી હતુ અલા વિષેનું શેષ કથાનક પહેલા - ८२२ 1 - पताधर्मया भदन्त ! श्रमणेन यानत् मोक्ष सम्माप्नेन धर्म धाना हनीयस्य वर्गम्य चतुप्पश्चा शद् अ ययनानि प्राप्तानि, तेपु मथमस्य खलु हे मदन ! अ ययनम्य श्रमणेन यापत् मोक्ष सम्माप्तेन कोऽर्थः प्राप्तः ? गुधर्मस्वामी कथयति- एव खलु हे जम्बूः । तस्मिन् फाले तस्मिन् समरे राजगृह नगरम् , गुण शिला चैत्यम् , सामी समयमा, परिपन्निर्गता यापत्-भगवन्त पर्युपास्ते । तस्मिन् काले तस्मिन् समये अलादगीपरणेन्द्रस्याग्रमहिपी धरणाया राजपान्याम् आलायतसके भाणे अले सिंहासणे, एर 'कालीगमएण' कालीगमेन-काली सदृशपाठेन यान नाटय विधमुपदर्य मतिगता।' पुषमापुन्छा' पूर्वमत्रपृच्छा- गोतमस्वामी अलादेव्याः पूर्वभव पृच्छति, भगवान् कथयति-नागारसी नगरी । काममहापन चैत्यम् । ' अले' अलनामा गायापतिः । अठश्रीर्भार्या । अला दारिका । शेष 'जहाकालीए' यथा काल्याकालीदेव्या वर्णन तयैर अला देव्या वर्णन विज्ञेयम् , नवरम्-चरणस्याग्रमहिपीतयाऽस्या उपपातः, सातिरेक- यावत् मुक्ति को प्राप्त हुए श्रमण भगवान महावीर ने धर्मकथा के तृतीयवर्ग के ५४ अध्ययन प्रज्ञप्त किये हैं तो उनमे से हे भदत। उन्हीं यावत् मुक्ति प्राप्त श्रमण भगवान महावीर ने प्रथम अध्ययन का क्या अर्थ प्ररूपित किया है ? इस प्रश्न के समाधान निमित्त सुधर्मा स्वामी उनसे कहते है कि-(एव खलु जबू! ) हे जव! तुम्हारे प्रश्नका उत्तर इस प्रकार है( तेण कालेण तेण समएण अलादेवी धरणाए राय हाणीए अलावडसए भवणे अलसि सीहासणसि एव कालीगमएण जाव णविहिं उबदसेत्ता पडिगया, पुव्वभवपुच्छा, वाणारसी णयरी, काममहावणे चेइए अल गाहावई, अलासिरी भारिया, अलादारियासेस जरा काली णवर धरणस्म अग्गहिसित्ताए उववाओ, साइरेग છે કે હે ભદન્ત ! યાવત્ મુક્તિ પ્રાપ્ત કરેલા શ્રમણ ભગવાન મહાવીરે ધમક થાના ત્રીજા વર્ગના ૫૪ ચોપનઅધ્યયને પ્રાપ્ત કર્યા છે, તે તેઓમાથી હે ભદત / તે જ પાવત્ મુક્તિ પ્રાપ્ત શ્રમણ ભગવાન મહાવીરે પહેલા અધ્યયનનો શે અર્થ પ્રરૂપિત કર્યો છે? આ પ્રશ્નના સમાધાનમા શ્રી સુધમાં સ્વામી તેમને 3 छ 3 ( एव खलु जनू!) ४५ ! तमा। प्रश्न उत्तर भा प्रमाणे छ । (तेण कालेण तेण समएण अलादेवी धरणाए रायहाणीए अलावडसए भवणे अलसि सीहासणसि एव काली गमएग जाव गट्टविहिं उबदसेता पडिगया, पुत्वभवपुच्छा, वाणारसी णयरी, काममहापणे चेइए, अल गाहावई, अलासिरी भारिया, अलादारिया सेस जहा कालीए णवर धरणस्स . , अनगारधर्मामृतवपिणी टी० ध्रु०२ ३०३ रुपादिदेवीना चरित्रवर्णनम् एन यावत् घोपस्यापि योपेन्द्रस्यापि, एतान्येर पड् अ ययनानि सन्ति । एवमे तानि दाक्षिणात्यानामिन्द्राणा चतुप्पञ्चाशद् अध्ययनानि भान्ति । सर्वा अपि पूर्वो कादेव्य पूर्वभरे वाणारस्या जाताः काममहारने चैत्ये भगवतः पार्श्वस्याईतः समीपे मत्रजिताः, उतीयवर्गस्य निक्षेपका-समाप्तिवाक्यमन्धो निज्ञेयः॥ सू०८ । ॥ इति धर्मकथाना तृतीयो वर्गः समाप्तः ॥ ३ ॥ अध चतुर्थों वर्ग प्रारभ्यते-' चउत्यस्म' इत्यादि । मूलम्वउत्थस्त उक्खेवओ, एवं खल्लु जंवू समणेणं जाव संपत्तेणं धम्मकहाणं चउत्थवग्गस्त चउप्पण्णं अज्झयणा पण्णत्ता, त जहा-पढमे अज्झयणे जाव चउपण्णइमे अज्झयणे पढमस्स अज्झयणस्स उक्खेवओ एव खलु जवू । तेणं कालेणं तेण समएण रायगिहे समोसरणं जाव परिसा पज्जुवासइ, तेणं कालेण तेण समएणं रूया देवी रूयाणदा रायहाणी रूयगव. वडिसए भवणे रूयगंसि सीहासणसि जहा कालीए तहा नवरं पुत्वभवे चंपाए पुण्णभद्दे चेइए रूयगे गाहावई रूयगसिरी भारिया ज्या दारिया सेस तहेव, णवर भूयाणदअग्गमहिसि- वर्णन भी धरणेन्द्र के वर्णन जैसा ही है । घोपेन्द्र के भी ये ही ६ अध्य यन इसी तरह के हैं। इस तरह दक्षिण दिशा सरन्धी इन्द्रों के० ५४ अध्ययन हो जाते हैं। ये सब देवियां पूर्वभवमें वाणारसी में उत्पन्न हुई और काममहावन उद्यानमे भगवान् प्रार्थनाय अर्हत प्रभुके समीप दीक्षित हुई। इस तरहसे वर्मकथामा यह " तृतीय वर्ग समाप्त हुआ है।" વર્ણન જેવું જ છે પેન્દ્રના પણ આ જાતના જ ૬ અધ્યયને છે આ પ્રમાણે દક્ષિણ દિશા સબધી ઇન્દ્રોના ૫૪ અધ્યયને થઈ જાય છે આ બધી દેવીએ પૂર્વભવમા વાણીમાં ઉત્પન્ન થઈ હતી અને કામમહાવન ઉદ્યાનમાં ભગવાન પાર્શ્વનાથ અર્હત પ્રભુની પાસે દીક્ષિત થી આ પ્રમાણે ધર્મકથાને આ બીજો વર્ગ પૂરો થયો છે १०४ गताधर्मपाल साधिकम् अर्द्ध पल्योपम स्थिति । शेप तथैव । एप सलु निक्षेपकः प्रथमाध्ययनस्य। एव क्रमात् शा २, सतेरा ३, सौदामनी ४, इन्द्रा ५, घनविद्युदपि । सर्वां एता धरणस्य-धरणेन्द्रस्य अनमहिण्य एर । एतानि पर अध्ययनानि येणुदेव- स्यापि । 'अपिसेसिया' अपिशेपितानि-निर्षिशेषानि सरशानि भणितव्यानि । जैसा कथानक पीछे वर्णित किया जा चुका है धेमा ही जानना चाहिये। उसके वर्णन में और इसके वर्णन में केवल अन्तर इतना ही है कि यह धरणेन्द्र की अग्रमहिपी के रूप में उत्पन्न हुई और इसकी स्थिति १॥ पल्प से कुछ अधिक है। बाकी का इसका वृत्तान्त कालीदेवी के जैसा ही है। इस तरह यह वितीयवर्ग के प्रथम अध्ययन का निक्षेपक-3ए- सहार-है।-(ण्य कमा सरका, सतेरा, सोयामगी, इदा, घणविज्जया वि, सव्यओ ण्याओ धरणस्त अग्गमहिमीओ, एम, एते ६ अज्झयणा वेणुदेवस्स वि अविसेसिया भाणियच्या, एव जाव घोसस्स वि एव चेव ६ अज्मयणा, एवमेते दाहिणिलाण इदाण-चउप्पण्ण अज्मयणा भवति, सब्घओ वि चाणारसीए फाममहावणे चेहरा तयवग्गस्स णिक्खेवओ ८॥ (तइओ वग्गो समत्तो) इसी क्रम से शका २, सतेरा ३, सौदा मनी ४, इन्द्रा ५, घनविद्युत् ६, ये सर देविया धरणेन्द्र की हरी अग्र महिषिया थीं। इस तरह के ६ अध्धयन वेणुदेव के भी हैं। और इनका વર્ણવેલા કાલી દેવીના કથાનકની જેમજ સમજી લેવું જોઈએ તેના અને આના વર્ણનમાં તફાવત ફક્ત એટલો જ છે કે આ ધરણેન્દ્રની અગમહિષીને રૂપમાં ઉત્પન્ન થઈ અને આની સ્થિતિ ૧ પય કરતા કઈક વધારે છે આનુ બાકીનું વર્ણન કાલી દેવી જેવું જ છે આ પ્રમાણે આ બીજા વર્ગના પહેલા અધ્યયનને નિક્ષેપક ઉપસ હાર છે (एव कमा सक्का सतेरा, सोयामणी, इदा, घणविज्जुया वि, सबओ एयाओ धरणस्स, अग्गमहिसीओ एच एते ६ अज्झयणा वेणुदेवस्स वि अविसे सिया भाणियच्या, एव जाव घोसस्स वि एए चेव६ अज्झयणा, एरमेते दाहिणि ल्लाण इदाण-चउप्पण्ण अज्झयणा भवति, सयाओ वि वाणारसीए काम महा चणे चेइए तइयवग्गस्स णिक्खेओ ॥ ८॥ तइभी वग्गो समत्तो) આ અનુક્રમ પ્રમાણે જ શકી ૨, સતેરા ૩, સૌઢામની ૪, ઈદ્રા ૫, ઘનવિદ્યુત ૬, આ બધી દેવીઓ ધરણેન્દ્રની જ અગ્રમહિપીઓ હતી આ પ્રમાણે જ ૬ એમ્પયને વેણુ દેવીના પણ છે અને એમનું વર્ણન ધન્દ્રના ८२७ " बनगारधर्मामृतषिणी टीका ०२ १०४ र पदिदेवीनां चरित्रपर्णनम् वसरण भगतः श्री महावीरस्वामिन. समागमन सनात, यारन् परिपद् भगवन्त पर्युास्ते । तस्मिन् काले तस्मिन् ममये रूपादेवी भूतानन्देन्द्रस्याग्रमहिपी रूप कावतसके माने रूपके सिंहासने यथा काल्या कालीदेव्या वर्णनं तथा तद्वत् समग्ण रायगिहे समोसरण जाय परिमा पन्जुवामह, तेण कालेण तेण समएणं ख्या देवी, स्याणदा रायहाणी ख्यगडिस भवणे ख्यगमि सीहासणंसि जहा कालीए तहरा नवर पुज्यभवे चपाए पुग्ण भद्दे चेहए ख्यगे गाहावई रूयगमिरी भारिया, रूपा दारिया, सेस तहेव, णवर भूयाणद् अगमहिसित्तारा उववाओ देसूर्ण पलिओवम ठिई निरखेयओ, एर सुरूपया वि, ख्यसावि, रूयगाहावई वि रूपकना वि ख्यप्पभावि, ण्याओ चेव उत्तरिल्लाण इदाण भाणियव्याओ, जाव महाघोसस्स णिस्खेवओ चउत्यवग्गस्स चउत्यो वागो ममतो) प्रथम अध्ययन का हे जबू! उत्क्षेपक इस प्रकार है-उसकाल में और उस समय में राजगृह नगर में मरावीर स्वामी का आगमन हुआ। परिपद प्रभु को वदना करने के लिये अपने २ स्थान से निकलकर जहा प्रभु विराजमान थे वहां आई । प्रभु ने धर्म का उपदेश दिया। यावत् सपने प्रभु की पर्युपासना की। उस काल और उस समय में भृतानद् इन्द्र की अग्रदेवी जिसका नाम रूपादेवी या वह प्रभु को वदना के लिये (पढमस्स अज्झयणस्स उखेवी-एव खलु जवू ! तेग कालेग तेण समएण रायगिहे समोसरण जाव परिसा पज्जुवासइ, तेण कालेण तेण समएण रूयादेवी, रूयाणदा, रायहाणी रूयगवर्डिसए भवणे रूयगसि सीहासणसि जहा कालीए तहा नगर पुव्यभवे चपाए पुण्णभदे चेइए स्पगे गाहाबई स्पगसिरी भारिया, ख्या दारिया, सेस तहेव, णवर भूयाणद अग्गमहिसित्ताए उपवाभो देमूण पलि ओवम ठिई निवखेवओ, एव सुरूवया वि, रूयसावि, रूयगाहावई, वि रूयकता वि रूयप्पभागि, एयाओ चेव उत्तरिल्लाण इदाण भाणियन्याभो, जाव महाघोसस्स णिक्खेभो चउत्थवग्गरस ॥९॥ चउत्थो वग्गो समत्तो) હે જ બૂ! પહેલા અધ્યયનને ઉક્ષેપક આ પ્રમાણે છે-તે કાળે અને તે સમયે રાજગૃહ નગરમાં મહાવીર સ્વામીનું આગમન થયું પ્રભુને વદના કરવા માટે પરિષદ તિપિતાને સ્થાનેથી નીકળીને જ્યાં પ્રભુ વિરાજમાન હતા ત્યા આવી, પ્રભુએ ધને ઉપદેશ આપે યાવત્ સૌએ પ્રભુની પથું પાસના કરી. તે કાળે અને તે સમયે ભૂતાન દ ઈન્દ્રની અગ્રદેવી (પટરાણી) જેનુ નામ રૂપ દેવી હતું-પ્રભુને વદના કરવા માટે આવી તેના રહેવાના ભવનનું ८२६ Marcारी ताए उववाओ देसूर्ण पालिओबम ठिई णिवखेवओ एव सुरु- यावि रूयसावि रूयगावईवि रूयकतानि रूयप्पभावि, एयाओ घेव उत्तरिल्लाणं इंदाणं भाणियच्याओ जार महाघोसस्स, गिक्खेवओ चउत्थवग्गस्स ॥ सू० ९ ॥ ॥ चउत्थो वग्गो समत्तो ॥४॥ टीका--'चउत्यस्स-चतुर्थवर्गस्य उपखेवभो । उत्क्षेपक मारम्भवाक्य पाठोऽनवाच्य । सुधर्मस्वामी माह-एव खलु जम्मूः ! श्रमणेन यावत्सम्मा प्तेन धर्मपथाना चतुर्थवर्गस्य चतुष्पश्चाशत् अ ययनानि प्रज्ञप्तानि तद्यथा प्रथम मध्ययन यात्-चतुप्पञ्चाशत्तमम ययनम् । तेषु प्रथमस्या ययनस्य उत्क्षेपकः । सुधर्मस्वामीपाह-एन खलु हे जम्बू ! तस्मिन् काले तस्मिन समये राजगृहे सम -चतुर्थ वर्ग मारभः- चउत्थस्स अवासेवओ' इत्यादि । टीकार्थ.-(चउत्यस अवस्खेवभो ) चतुर्थ वर्ग का प्रारभ किस तरह से हुआ है-इस प्रकार-जबृस्वामी के पूछने पर श्री सुधर्मास्वामी उनसे कहते हैं कि (एव सलु जबू) हे जत् ! सुनो-(समणेण जाव सपत्तण धम्मकाण चउत्थवरगस्स चउप्पण्ण अज्झयणा पण्णत्ता त जहा पढसे अज्झयणे जाव चउपण्णाइ मे अज्मयणे) यावत् मुक्तिस्थान को प्राप्त हुए श्रमण भगवान महावीर ने धर्मकथा के चतुर्थ वर्ग के ५४ अध्ययन प्रज्ञप्त किये है-वे प्रथम अध्ययन से लेकर ५४ ३ अध्ययन तक हैं-(पढमस्स अज्झयणस्स उक्खेवओ एव खलु जब ! तेण कालेण तेण ચોથે વર્ગ પ્રારંભ घउत्थम्स उवक्खेवओ' इत्यादि-- Ast.--(घउत्थरस उवम्खेवओ) यया बनी २३मात કેવી રીતે થઈ છે. આ જાતને જ બૂ સ્વામીએ પ્રશ્ન કર્યા બાદ શ્રા સુધર્મા સ્વામી तेभने ४३ छ है ( एव खलु जनू) | साली, (समणेण जाव सपत्तेण धम्मकहाण चउत्थवग्गस चउप्पण्ण अज्झयणा पण्णत्ता त जना पहमे अझयणे जाव चउपण्गइमे अज्झयणे) થાવત્ મુક્તિદાનને પામેવા શ્રમણ ભગવાન મહાવીરે ધમકથાના ચોથા વર્ગના ૫૪ અધ્યયને પ્રજ્ઞપ્ત કર્યા છે તેઓ પહેલા અદયયનથી માડીને પ૪ માં અધ્યયન સુધી છે ८२७ जगारधर्मामृतवपिणी टीका ०२ १० ४ सपदिदेवीनां चरित्रवर्णनम् वसरण-भगातः श्री महावीरस्वामिनः समागमन सनात, यापन परिपद् भगवन्त पर्युगास्ते । तस्मिन् काले तस्मिन् समये रूपादेवी भूतानन्देन्द्रस्याग्रमहिपी रूप कावतसके भरने रूपके सिंहासने यथा काल्याः कालीदेव्या वर्णन तथा तद्वत् समण्णं रायगिहे समोसरण जाय परिसा पज्जुवामह, तेण कालेण तेण समएण ख्या देवी, रूपाणंदा रायहाणी ख्यगडिस भवणे ख्यगमि सीरासणसि जहा कालीए तहा नवर पुचमचे चपाए पुग्णभद्दे चेहए रुयगे गाहावई स्यामिरी भारिया, रूपा दारिया, सेस तहेव, णवर भूयाणद् अग्गमहिसित्ताए उववाओ देमणं पलिओवम ठिई निम्खेवओ, एव सुरूषया वि, रूयसावि, रूयगाहावई वि रूपकना वि स्यप्पभावि, ण्याओ चेव उत्तरिल्लाण इमाण भाणियन्याओ, जाव महायोसस्म णिस्खेवओ चउत्यवग्गस चउत्यो वागो समतो) प्रथम अध्ययन का हे जबू! उत्क्षेपक इस प्रकार है-उसकाल में और उस समय में राजगृह नगर में महावीर स्वामी का आगमन हुआ। परिपद प्रभु को चदना करने के लिये अपने २ स्थान से निकलकर जहा प्रभु विराजमान थे वहां आई । प्रभु ने धर्म का उपदेश दिया। यावत् सपने प्रभु की पर्युपासना की। उस काल और उस समय में भृतानद इन्द्र की अग्रदेवी जिसका नाम रूपादेवी या वह प्रभु प्रभु को चदना के लिये (पढमस्स अज्झयणस्स उक्खेरओ-एव खलु जवू ! तेण कालेग तेण समएण रायगिहे समोसरण जाव परिसा पज्जुवासइ, तेण कालेण तेण समएण रूयादेवी, रूयाणदा, रायहाणी रूयगवर्डिसए भवणे रूयगसि सीहासणसि जहा कालीए तहा नगर पुत्वभवे चपाए पुण्णभदे चेइए रूपगे गाहावई रूवगसिरी भारिया, रूया दारिया, सेम तहेव, णवर भूयाणद अग्गमहिसित्ताए उपवाओ देमण पलि ओपम ठिई निखेवओ, एव सुरूवया वि, रूयमावि, रूयगाहावई, वि रूयकता वि रूयप्पभानि, एयाओ चेव उत्तरिल्लाण इदाण माणियवाओ, जाव महाघोसस्स णिक्खेओ चउत्थवरगस्स ॥१॥ चउत्थो वग्गो समत्तो) હે જ બૂ! પહેલા અધ્યયનને ઉક્ષેપક આ પ્રમાણે છે-તે કાળે અને તે સમયે રાજગૃહ નગરમાં મહાવીર સ્વામીનું આગમન થયું પ્રભુને વદના કરવા માટે પરિષદ પિતાપિતાને સ્થાનેથી નીકળીને જતા પ્રભુ વિરાજમાન હતા ત્યા આવી, પ્રભુએ ધર્મને ઉપદેશ આ યાવતુ સૌએ પ્રભુની પર્યું પાસના કરી તે કાળે અને તે સમયે ભૂતાન દ ઈન્દ્રની અગ્રદેવી (પટરાણું) જેનુ રૂપા દેવી હતું–પ્રભુને વદના કરવા માટે આવી તેના રહેવાના ભવનનું .
२८ মামলায় रूपादेव्या अपि विज्ञेयम् , नार-विशेषोऽत्रायम्-मिरे चम्पाया नगर्या पूर्ण भद्र चेत्पम् , स्पफो गाथापतिः, स्पश्री र्या, रूपाटारिका, शेप तथैव नवर भूतानन्दायमहिपीतया तस्या उपपातः जन्म | देशोन पल्पोपम स्थितिः। निक्षे पका-समाप्तिवाक्यरूपः प्रपन्धोऽत्र मिय' । एवं मुरुपाऽपि २, स्पागाऽपि ३, रूपकावत्यपि ४, रूपकान्तापि ५, स्पममापि ६ । एतायर उत्तरीयाणामिन्द्राणां आई। इसके रहने के भवन का नाम रूपकातसकया। और जिस सिंहासन पर यह पैठती थी उसका नाम रूपक था। पीछे जिस प्रकार का वर्णन कालीदेवी का किया गया है-उसी प्रकार का इनका भी वर्णन जानना चाहिये । उस के पूर्वभव का वर्णन इस प्रकार है-यह पूर्वभव में धपा नामकी नगरी में कि जिसमें पूर्णभट्ट नाम का उद्यान या और रूपक गायापति जिस में रहता था उस गाथापति की यह रूपश्री भार्या से " रूपा दारिका " इस नाम से पुत्री उत्पन्न हुई थी। बाद में प्रभु का उपदेश सुनकर यह प्रतिरोध को प्राप्त हो गई और कालीदेवी की तरह यह आर्या बन गई इसके आगे जिस तरह का काली देवी का वृत्तान्त पना इसी तरह से इसका भी जानना चाहिये । जब यह काल अवसर काल कर गई तय यह भूतानद् इन्द्र की अग्रमहिपीरूप से उत्पन्न हुई। यहां इसकी कुछकम १, पल्प की स्थिति है। इस प्रकार रूपा देवी के कथानक का यह निक्षेपक है। इसी तरह से (२) सुरूपा (३) रूपाशा (४) रूपकावती (4) रूपकान्ता और ६ रूपप्रभा का भी वर्णन जानना નામ રૂપકાવત સક હતું અને જે સિંહાસન ઉપર તે બેસતી હતી તેનું નામ રૂપક હતું જેમાં પહેલા કાલી દેવીનું વર્ણન કરવામાં આવ્યુ છે તેમજ આનું વર્ણન પણ સમજી લેવું જોઈએ તેના પૂર્વભવનું વર્ણન આ પ્રમાણે છે- આ પૂર્વભવમાં ચ પ નામની નગરીમા-કે જેમાં પૂર્ગભદ્રા નામે ઉદ્યાન હતું અને રૂપક ગાથાપતિ જેમા રહેતે હતો તે ગાથાપતિની આ રૂપશ્રી ભાર્યાથી રૂપાદારિકા” આ નામથી પુત્રી રૂપે ઉત્પન્ન થઈ હતી ત્યારપછી પ્રભુને ઉપદેશ સાભળીને એ બેધને પ્રાપ્ત થઈ અને કાલી દેરીની જેમ આર્યા થઈ ગઈ એના પછીની વિગત કાલી દેવીની હતી તેવી જ એની પણ સમજી લેવી જોઈએ જ્યારે તેણે કાળ અવસરે કાળ કર્યો ત્યારે આ ભૂતાનદ ઈન્દ્રની અમહિષી (પટરાણું) ના રૂપમાં ઉત્પન થઈ ત્યા તેની થોડી ઓછી એક પલ્યની સ્થિતિ છે આ પ્રમાણે રૂપાદેવીના કથાનકને આ નિપક છે मन I प्रभा १ (२) ३५, (३) ३५॥AI, (४) ३५४ापती, (५) ३..
मेनगारधर्मामृतपपिणी टीका १०२ ३० ५ कमलादिदेवीना चरित्रवर्णनम् ८२९ भणितव्या =अग्रमहिप्यो वक्तव्या यावत् महाघोपस्य । महायोपेन्द्रस्य । निक्षेप कश्चतुर्थवर्गस्य ।। सू०९॥ ॥ इति धर्मकवाना चतुरों वर्ग समाप्तः॥४॥ अथ पञ्चमो वर्ग: मारभ्यते-पचमनग्गरम ' इत्यादि । मूलम्-पंचमवग्गरस उक्खेवओ, एव खलु जवू | जाव वत्तीसं अज्झयणा पण्णत्ता, त जहा-कमला? कमलप्पभार चेव, उप्पला३ य सुदसणा४। रूववई५ बहुरूवा६, सुरूवा७ सुभगाविय८ ॥ १ ॥ पुण्णा९ वहुपुत्तिया१० चेव, उत्तमा११ तारयाविय१२ । पउमा१३ वसुमती१४ चेव, कणगा१५ कण- गप्पभा१६ ॥२॥ वडेसा१७ केउमई १८ चेव, वइरसेणा१९ रह प्पिया२० । रोहिणी२१ नवमिया२२ चेव, हिरी२३ पुप्फ- वईइय २४ ॥३॥ भुयगा२५ भुयगवई २६ चेव, महाकच्छौं- ऽपराइया२८ । सुघोसा२९ विमला३० चेब, सुस्सरा३१ यसर- सबई३२ ॥४॥ उक्खेवओ पढमज्झयणस्त, एव खलु जवू ! तेणं कालेणं तेणं समएणं रायगिहेसमोसरण जाव परिसा पज्जुवासइ, तेण कालेण तेण समएण कमलादेवी कमलाए रायहाणीए कमलवडेंसए भवणे कमलसि सीहासणसि सेसं जहा कालीए तहेव णवरं पुत्वभवे नागपुरे नयरे सहसव चाहिये । ये देविया भूतानद इन्द्र की तरह उत्तरीय इन्द्रो की भी अग्र- महिपिया है। और ये ही महाघोपेन्द्र की भी हैं। इस प्रकार यह चतुर्थ वर्ग का निक्षेपक ( स्वरूप ) है। ॥ चतुर्थवर्ग समाप्त ॥ (૬) રૂપપ્રભાનું વર્ણન પણ સમજી લેવું જોઈએ આ બધી દેવીએ ભૂતાન દ ઈન્દ્રની જેમ ઉત્તરીય ઈન્દ્રોની પણ અગ્નમહિષીઓ (પટરાણીઓ) છે અને મહાન્દ્રની પણ તેએજ પટરાણીઓ છે આ પ્રમાણે આ ચોથા વર્ગને નિક્ષેપક છે , -- ચોથે વર્ગ સમાપ્ત १ तायात उरक्षेपका प्रथमाध्ययनम्य । जम्बूस्वामिना पृष्टे सुधर्मास्वामीमाह-एव खलु हे जम्वृः ! तस्मिन् काले तस्मिन् समये राजगृहे 'समोमरण' समवमरण-भग ३१, सरस्वती ३२,। (उरखेयओ पढमायणस्स एव बलु जबू! तेण कालेण तेण समण्ण रायगिहे समोसरर्ण जार परिसा पञ्जुवामह, तेणे फालेण तेणं समएण फैमला देवी, कमलाप रायहाणी कमलयडेंसए भवणे कमलसि सीहासणमि सेस जहा कालीए तहेव गवर पुन्वभवे नागपुरे नयरे सहसपवणे उज्नाणे कमलस्त गाहावहस्म कमलसिरीए भारियाए कमला दारियापासस्स अति निक्सता कालरस पिसायकु- मारिदस्स असामहिसी अद्धपलिओवम ठिई, एव सेसा वि अज्मयणा दाहिणिल्लाण वाणमतरिंदाण भाणियव्वाभा, सन्यो णागपुरे सहस- घवणे उजाणे माया पिया धृया सरिसनामया, ठिई अद्वपलिभोवम) इसके बाद जबूम्वामी ने श्री सुधर्मास्वामी से पूछा कि इनमें से कमला नामका जो प्रथम अध्ययन है उसका उत्क्षेपक किस तरह से है-इस प्रकार जबूस्वामी के पूछने पर उनसे सुधर्मास्वामी ने कहा-कि हे जबू! सुनो-तुम्हारे प्रश्न का उत्तर इस प्रकार है-उस काल में और उस समय में राजगृह नाममा नगर या। उसमें भगवान महावीर का आग- मन हुआ। यावत् वहा की परिषद प्रभु को वदना करने के लिये आई। ( उक्खेवी पहमज्झयणस्स, एत्र खलु जनू । तेण कालेण तेण समएण रायगिहे समोसरण जाव परिसापज्जुवासइ, तेण कालेण तेण समरण कमला देवी कमलाए रायहाणीए कमल पडेंसए भवणे कमलसि सीहासणसि सेस जहा कालीए तहेच णवर पुब्बभवे नागपुरे नयरे सहसबवणे उज्जाणे कमलस्स गाहा घइस्स कमलमिरीए भरियाए कमला दारिया पासस्स० अतिए निक्खता कालस्स पिसाय कुमारिंदस्स अग्गम हिसी अद्वपलिओनमठिई, एवं सेसा नि अझयणा दाहिणिल्लाण वाणमतरिंदाण भाणियवाओ, सयाओ नागपुरे सहसबवणे उज्जाणे मायापिया धूया सरिसनामया, ठिई श्रद्धपलिओचम) ત્યારપછી જ બૂ સ્વામીએ શ્રી સુધમાં સ્વામીને પૂછ્યું કે આ બધામાં કમલા નામે જે પહેલું અધ્યયન છે તેને ઉભેપક કેવી રીતે છે ? આ પ્રમાણે જ બૂ સ્વામીએ પ્રમ કર્યા બાદ તેમને શ્રી સુધર્મા સ્વામીએ કહ્યું કે હે જ બૂ! સાભળો, તમારા પ્રશ્નનો ઉત્તર આ પ્રમાણે છે કે તે કાળે અને તે સમયે રાજગૃહ નામે નગર હતુ તેમાં ભગવાન મહાવીરનુ આગમન થયુ યાવત નગરની પરિષદ તેમને વદના કરવા માટે આવી પ્રભુએ સૌને मनगारधर्मामृतवपिणी टी० १०२ ० ५ कमलादिदेगोना चरित्रवर्णनम् ८३३ , . यन् महावीरस्वामी समागमन सजात, यावत् परिपद् भगवन्त पर्युपास्ते । तस्मिन् काले तस्मिन् समये कमला देवी कमलाया राजधान्यां, कमलावतमके भवने कमले सिंहासने, शेप यथा-माल्या. कालीदेव्या वर्णन तथैवाऽस्या अपि, नवर विशेषोऽयम्-पूर्वभवे नागपुर नगर, सहस्राम्रवनमुद्यानम् , कमलस्य गाथापतेः कमलश्रियो भार्यायाः कमला दारिका पार्श्व स्याहतः पुरुषादानीयस्य अन्तिके 'निवखता' निष्क्रान्तामजिता, कालस्य पिशाचकुमारेन्द्रस्य अग्रमहिपी। अर्द्धपल्योपम स्थितिः । एष शेपाण्यपि कमलपभादिनाममान्यपि एकत्रिंशद् अध्य- प्रभु ने सबको धर्म का उपदेश दिया। परिपद ने प्रभु की पर्युपासना की। उस काल में और उस समय मे कमला नाम की देवी, कमला राज पानी मे कमलावतसक भवन में रहती थी। उस के सिंहासन का नाम कमला था। इसके आंगे का समस्त वर्णन कालीदेवी के वर्णन जैसा ही जानना चाहिये । परन्तु इममे जो विठोपता है वह इस प्रकार है-जव गौतमस्वामी ने उसके-अर्थात् देवी के चले जाने के बाद उसके पूर्वभव का वृत्तान्त पूछा-तत्र प्रभु ने उनसे इस प्रकार कहा-पूर्वभव के इसके नगर का नाम नागपुर या-उसमे सहस्राम्रवन नाम का उद्यान था। उस नगर में कमल नामका गायापनि रहता था। उसकी भार्या का नाम कमला श्री था। इनके एक पुत्री थी जिस का नाम कमला या। वह काललब्धि के आनेपर पुरुषदानीय-पुरुष श्रेष्ठ-पार्श्वनाथ अर्हत प्रभु के ममीप प्रवजित हो गई। बाद में मरने पर वह काल नाम के पिशाच कुमारेन्द्र की अग्रमहिपी पनी । वहा इसकी स्थिति अर्धपल्य की है। ધર્મને ઉપદેશ આપે પરિષદે પ્રભુની પથું પાસના કરી તે કાળે અને તે સમયે કમલા નામની દેવી, કમલા રાજધાનીમાં કમલાવત સક ભવનમાં રહેતી હતી તેના સિંહાસનનું નામ કમાવા હતુ એના પછીનુ બધુ વર્ણન કર્યાં દેવીના વર્ણનની જેમ જ સમજી લેવું જોઈએ પર તુ આમા જે કઈ વિશેષતા છે તે એ પ્રમાણે છે કે જ્યારે ગૌતમ સ્વામીએ દેવીના ગયા પછી તેના પૂર્વ ભવ વિષેની વિગત પૂરી ત્યારે પ્રભુએ તેમને આ પ્રમાણે કહ્યુ–કે આના પૂર્વ ભવના નગરનું નામ નાગપુર હતું તેમા સહસ્ત્રાપ્રવન નામે ઉદ્યાન હતું તે નગરમાં કમલ નામે ગાયાપતિ રહે હવે તેની પત્નીનું નામ કમલાથી હતું એમને એક દિકરી હતી તેનું નામ કમલા હતુ, તે એગ્ય કાળલબ્ધિના અવ સરે પુરુષાદાનીય-પુરુષ શ્રેષ-પાર્શ્વનાથ અર્હત પ્રભુની પાને પ્રજિત થઈ ગઈ ત્યારપછી મૃત્યુ થયા બાદ તે કાલ નામના પિશાચ કુમારેન્દ્રની અગ્ર - . माता यनानि दाक्षिणात्यानां चानव्यन्तरेन्द्राणामग्रमडिपीणा भणितच्यानि । सविताः पूर्वभवे नागपुरे नगरे समाताः, सहसाम्राने उद्याने भगवत्पाश्रप्रमोः समीपे प्रा. जिताः। मातापिता दुहिता सदशनामकः । सा स्थितिरदपज्योपमम् ।।मु०१०॥ ॥ इति धर्मस्थानां पञ्चमो वर्गः समाप्तः ॥ ५ ॥ मूलम्-छहोवि वग्गो पंचमवग्गसरिसो, णवरं महाकाला- दोणं उत्तरिल्लाणं इदाणं अग्गमहिसीओ पुवभवे सागेय- नयरे उत्तरकुरु उजाणे माया पिया धूया सरिसणामया सेसं तं चेव ॥ सू० ११ ॥ ॥ छटो वग्गो समत्तो ॥ ६ ॥ पाको जो ३१, कमलप्रभा नामके अध्ययन हैं वे दक्षिण दिशा सबन्धी वानव्यतरेन्द्रों की अग्रमहिपियों के हैं ऐसा जानना चाहिये। ये सब ही पूर्वभव में नागपुर नगर में उत्पन्न हुई-और सहस्राम्रवन नामके उद्यान में भगवान् पार्श्वनाथ के समीप प्रबजित हुई । इन अध्ययनों में माता पिता तथा पुत्री ये सब एक सरीखे नामवाली है । जैसे कमलप्रभा नामक अध्ययन में माता का नाम कमलप्रभा श्री, पिता का नाम कम- लप्रभ एव पुत्री का नाम कमलप्रभा है-इमी तरह से और अध्ययनों में भी जानना चाहिये। इन मब देवियों की स्थिति अर्धपल्य की है।सू१०॥ -पचमवर्ग समाप्त:- महिषी ( ५४२) wी ત્યા તેની સ્થિતિ અપલ્યની છે શેષ જે ૩૧ કમલપ્રભા નામના અધ્યયને છે તે દક્ષિણ દિશા સબ ધી વાતરેન્દ્રોની અગ્રમહીષીએ (પટરાણીઓ) ના સમજવા જોઈએ આ બધી પૂર્વભવમાં નાગપુર નગરમાં ઉત્પન્ન થઈ અને સહસામ્રવન નામના ઉધાનમા ભગવાન પાર્શ્વનાથની પાસે પ્રજિત થઈ ગઈ આ બધા અધ્યયનેમા માતાપિતા તેમજ પુત્રી આ સર્વે એક સરખા નામવાળા છે જેમકે કમલપ્રભા નામના અધ્યય નમાં માતાનું નામ કમલપ્રભાશ્રી, પિતાનું નામ કમલપ્રભ અને પુત્રીનું નામ કમલપ્રભા છે એ પ્રમાણે બીજા અધ્યયને વિષે પણ જાણી લેવું જોઈએ બધી દેવીઓની સ્થિતિ અર્ધપત્યની છે કે સૂ૦ ૧૦ || પાચમો વર્ગ સમાપ્ત આ .
भमगारधर्मामृतविणो टी० श्रु.२ व ६ कमलादिदेवोना चरित्रवर्णनम् ८३२ टीका-छटोवि' इत्यादि पष्टोऽपि वर्ग. पञ्चमवर्गसदृशः । नवरम्-एता वान् विशेष -अत्र महाकालादीनाम् उत्तरीयाणामिन्द्राणामयमहिप्यः । एताः सर्वाः पूर्वभवे साकेतनगरे उत्तरकुख्याने पार्थप्रभुसमीपे मनजिताः मातरः पितरो दुहितरः सदृशनामकाः। शेप तदेन सर्व वाच्यम् ।। सू० ११ ॥ इति धर्फकथाना पप्ठो वर्गः समाप्तः ॥ ६॥ -:षष्ठवर्ग प्रारभा- 'छट्टो वि वग्गो पचमवग्गसरिसो' इत्यादि । टीकार्य -(छटो वि वग्गो पचमवग्गसरिसो, णवर महाकालादीण उत्तरिल्लाण इदाण अग्गमहिसीओ पुन्वभवे सागेयनयरे उत्तरकुरुउ जाणे माया पिया धूया सरिसणामया सेस त चेव ११) छठा वर्ग भी पचमवर्ग के जैसे ही है । परन्तु इसमें जो उसकी अपेक्षा विशेषता है -वह इस प्रकार है-इस अध्ययन में उत्तर दिशा के इन्द्र महाकाल आदिकों की अग्रमहिपियों का वर्णन है। ये सब अग्रमहिपिया पूर्वभव में साकेत नगर (अयोध्या) में उत्तर कुरु नामके उद्यान मे पार्श्वप्रभु के समीप प्रबजित हुई है। माता पिता एव पुत्रिया ये सय एक जैसा नामवाले हैं। पाकी का इनके विषय का समस्त कथन कालीदेवी के वर्णन जैसा जानना चाहिये। -:पष्ठवर्ग समाप्त:- છઠ્ઠો વર્ગ પ્રારંભ छटो वि वग्गो पचम वासरिसा' इत्यादि- (छटो विवग्गो पचमवग्गसरिसो, णवर महाकालादीण उत्तरिल्लाण इदाणं अग्गमहिसीनो पुव्वभवे सागेय नयरे उचरकुरु उज्जाणे मायापिया व्या सरिस णामया सेस त चेव ११) છઠ્ઠો વર્ગ પણ પાચમા વર્ગના જેવું જ છે પરંતુ આમા જે તેના કરતા વિશેષતા છે, તે એ પ્રમાણે છે કે આ અધ્યયનમા ઉત્તર દિશાના ઈન્દ્ર મહાકાલ વગેરેની અગમહિષીઓ (પટરાણીઓ) નું વર્ણન છે આ બધી અગ્નમહિષીઓ પૂર્વભવમા સાકેત નગરમાં ઉત્તકરૂ નામના ઉધાનમાં પાર્શ્વ પ્રભુની પાસે પ્રજિત થઈ છે માતાપિતા અને પુત્રીઓ બધા એક સરખા નામવાળા છે એમના વિષેનું બાકીનું બધુ કથન કાલી દેવીનું વર્ણન જેવું જાણવું જોઈએ છઠ્ઠો વર્ગ સમાસ " जाताधर्मपचार यनानि दाक्षिणात्यानां वानव्यन्तरेन्द्राणामग्रमहिपीणां मणितव्यानि । सविता पूभवे नागपुरे नगरे संगाता:, सहस्राम्राने उद्याने भगवत्पार्थ प्रमोः समीपे प्रव. जिताः । मातापिता दुहिता सदशनामकः । आसा स्थितिर पल्पोपमम् ।।५०१०॥ ॥ इति धर्मकथानां पञ्चमो वर्गः समाप्तः ॥ ५ ॥ मूलम्-छहावि वग्गो पचमवग्गसरिसो, णवरं महाकाला- दोणं उत्तरिल्लाणं इदाणं अग्गमहिसीओ पुवभवे सागेय- नयरे उत्तरकुरु उजाणे माया पिया धूया सरिसणामया सेसं तं चेव ॥ सू० ११ ॥ ॥ छट्टो वग्गो समत्तो ॥ ६ ॥ घाको जो ३१, कमलप्रभा नामके अध्ययन हैं वे दक्षिण दिशा सबन्धी वानन्यतरेन्द्रों की अग्रमहिपियों के हैं ऐसा जानना चाहिये। ये सब ही पूर्वभव में नागपुर नगर में उत्पन्न हुई-और सहस्राम्रवन नामके उद्यान में भगवान पार्श्वनाथ के समीप प्रवजित हुई । इन अध्ययनों में माता पिता तथा पुत्री ये सघ एक सरीखे नामवाली है। जैसे कमलप्रभा नामक अध्ययन में माता का नाम कमलप्रभा श्री, पिता का नाम कम- लाभ एव पुत्री का नाम कमलप्रभा है-इसी तरह से और अध्ययनों में भी जानना चाहिये। इन सब देवियों की स्थिति अर्धपल्य की है ।।सू१० -पचमवर्ग समाप्त:- મહિષી (પટરાણું) બની ત્યા તેની સ્થિતિ અર્ધ પત્યની છે શેષ જે ૩૧ કમલપ્રભા નામના અધ્યયને છે તે દક્ષિણ દિશા સ બ ધી વાન તરેન્દ્રોની અગ્ર મહીષીઓ (પટરાણીએ) ના સમજવા જોઈએ આ બધી પૂર્વભવમાં નાગપુર નગરમાં ઉત્પન્ન થઈ અને સહસામ્રવન નામના ઉદ્યાનમાં ભગવાન પાર્શ્વનાથની પાસે પ્રવજિત થઈ ગઈ આ બધા અધ્યયનેમા માતાપિતા તેમજ પુત્રી આ સર્વે એક સરખા નામવાળા છે જેમકે કમલપ્રભા નામના અપ્પય નમાં માતાનું નામ કમલપ્રભાશ્રી, પિતાનું નામ કમલપ્રભ અને પુત્રીનું નામ કમલપ્રભા છે એ પ્રમાણે બીજા અધ્યયને વિષે પણ જાણી લેવું જોઈએ બધી દેવીઓની સ્થિતિ અર્ધપત્યની છે A સૂ૦ ૧૦ | પાચમે વર્ગ સમાપ્ત 24 . . अंगारधर्मामृतवपिणी टी० भु २ व ७ सूरप्रमादिदेवीना चरित्रवर्णनम् ८३७ ययामरममा १, आतपा २, अचिर्मालि' ३, प्रभङ्ककरा ४ । प्रथमाध्ययनस्योत्क्षे पकः । सुधर्मस्वामीमाह-एन खलु हे जम्मू । तस्मिन् काले तस्मिन् समये रान गृहे समवसरणम् भगवद्वर्धमानमामिसमागमनम् यावत् परिपत् पर्युपास्ते । तस्मिन् गले तस्मिन् समये सूरप्रभादेवी, मूरविमाने, मूरप्रभे सिंहासने, शेप भगवान महावीर ने इस सातवें वर्ग के चार अध्ययन प्ररूपित किये हैं -(त जहा-सूरप्पभा, आयवा, अचिमाली, पभकरा, पढमज्झयणस्त, उस्खेवओ एव खलु जबू! तेण कालेण तेण समण्ण रायगिहे समोस- रण जाव परिमा पज्जुवासइ, तेण कालेण तेण समएण सरप्पभा देवी, सूरसि विमाणसि सरप्पभसि सीहासणसि सेस जहा कालीए तहा) वे चार अध्ययन इस प्रकार है सूरप्रभा १, आतपा २, अर्चिमाली ३, प्रभङ्करा ४, इनमें प्रथम अध्ययन का उत्क्षेपक हे जब् ! इस प्रकार है- उस काल और उस समय में राजगृह नाम के नगर में भगवान वर्ध मानस्वामी का आगमन हुआ था-प्रभु का आगमन सुनकर वरा की परिपद उनको वदना करने के लिये उनके समीप गई-प्रभु ने सबको धर्म का उपदेश दिया। उपदेश सुनकर सबने प्रभु की पर्युपासना को। उस काल और उस समय में सरप्रभा नाम की एक देवी जो सरविमान में रहती थी-और सूरमन सिंहासन पर बैठती थी प्रभु को वदना करने के लिये आई। इसके बाद का इसका वृत्तान्त जैसा पहिले कालीदेवी ( त जहा-मूरप्पमा, आयवा, अन्चिमाली, पभरा, पढमज्झयणस्स, उक्खेवओ एव खलु जवू । तेण कालेण तेण समएण रायगिहे समोसरण जाव परिसा पज्जुबासइ, तेण कालेण तेण समएण सूरप्पभादेवी, सूरसि विमाणसि मुरप्पमसि सीहासणसि सेस जहा कालीए तहा) તે ચાર અધ્યયને આ પ્રમાણે છે –સૂરપ્રભા ૧, આતષા ૨, અર્ચિમાલી ૩, પ્રભડકારા ૪, હે જ બૂ! આ બધામાં પહેલા અધ્યયનને ઉલ્લેષક આ પ્રમાણે છે કે તે કાળે અને તે સમયે રાજગૃહ નામના નગરમાં ભગવાન વર્ધમાન સ્વામીનું આગમન થયું પ્રભુનું આગમન સાભળીને ત્યાની પરિષદ તેમને વદના કરવા માટે તેમની પાસે ગઈ પ્રભુએ સૌને ધર્મને ઉપદેશ આ ઉપદેશ સાંભળીને સૌએ પ્રભુની પર્ય પાસના કરી તે કાળે અને તે સમયે સૂરપ્રભા નામની એક દેવી-જે સૂર વિમાનમાં રહેતી હતી અને સૂરપ્રભ સિહાસન ઉપર બેસતી હતી-પ્રભુની વેદના કરવા માટે આવી એના પછીનું .
१ . बाताधर्मकथा अथ सप्तमी वर्ग:मारभ्यते-'सतमस्से 'त्यादि। मूलम्-सत्तमस्स बग्गरस उपवेओ, एवं खलु जंबू । जाव चत्तारि अज्झयणा पण्णत्ता, त जहा-सूरप्पमा आयवा अचिमाली पभकरा, पढमज्झयणस्स उरसेवओ, एव खलु जव । तेणं कालेणं तेण समएणं रायगिहे समोसरणं जाव परिसा पज्जुवासइ, तेणं कालेणं तेण समएणं सूरप्पभा देवी सूरसि विमाणंसि सूरप्पभसि सीहासणंसि सेस जहा कालीए तहाणवर पुवभवे अरक्खुरीए नयरीए यूरप्पभस्स गाहाव इस्स सूरसिरीए भारियाए सुरप्पभा दारिया सूरस्त अग्ग- महिसी ठिई अद्धपलिओवम पचहि वाससएहिं अमहिय सेसं जहा कालीए, एव सेसाओवि सव्वाओ अरक्खुरीए णयरीए ॥ सू० १२ ॥ ॥ सत्तमो वग्गो समत्तो ॥ ७ ॥ टीका-'सत्तमस्से 'ति-सप्तमस्य वर्गस्य उत्क्षेपः । सुधर्मस्वामीकथ यति-एव खलु हे जम्मूः । यावत् चत्वारि अध्ययनानि प्रज्ञप्तानि, तधमा तानि -सप्तमवर्ग प्रारभा- सत्तमस्सवगरस उक्खेवओ' इत्यादि । टीका:-(सत्तमस्स वगस्स उक्खेवओ एव खलु जवू ! जाव चित्तारि अज्झयणा पण्णत्ता) हे भदत । सातवें वर्ग का उत्क्षेपक किस प्रकार है ? इस जबूस्वामी के प्रश्न करने पर गौतमस्वामी उनसे करते हैं-कि हे जबू। सुनो, तुम्हारे प्रश्न का उत्तर इस प्रकार है-श्रमण સાતમો વર્ગ પ્રારંભ सत्तमास वग्गरस उक्खेवओ' इत्यादि--- सर्थ:-(सत्तमरस वग्गास उसेवओ एवासलु जपू! जावाचत्तारि अज्झ थणा पण्णता) महन्त ! सातमा वगना रवीशले छ? જ બૂ સ્વામીના આ પ્રશ્નને સાભળીને ગૌતમ સ્વામી તેમને કહે છે કે હે જબ્બ ! સાભળે, તમારા પ્રશ્નને ઉત્તર આ પ્રમાણે છે કે શ્રમણ ભગવાન મહાવીરે આ સાતમા વર્ગના ચાર અધ્યયને પ્રરૂપિત કર્યા છે . प ! अनगारवांमृतवपिणी टो• भु २ व ७ सूरप्रमादिदेवोना चरित्रपर्णनम् ८३७ यथासूरममा १, आतपा २, अचिर्मालिः ३, प्रभाकरा ४ । प्रथमा ययनस्योत्क्षे पकः । सुधर्मस्वामीमाह-एव खलु हे जम्मू ! तस्मिन काले तस्मिन् समये राम गृहे समवसरणम् भगवर्धमानमामिसमागमनम् यावत् परिपत् पर्युपास्ते । तस्मिन् काले तस्मिन् समये मुरमभादेवी, मूरविमाने, मूरप्रभे सिंहासने, शेष भगवान महावीर ने इस सातवें वर्ग के चार अध्ययन प्ररूपित किये हैं -(त जहा-सूरप्पभा, आयचा, अचिमाली, पभकरा, पदमप्रयणस्त, उस्खेवओ एव खलु जय! तेण कालेण तेण समण्ण रायगिहे समोस- रण जाव परिमा पन्जुयासइ, तेण कालेण तेण समएण सूरप्पमा देवी, सूरसि विमाणसि सरप्पभमि सीहासणसि सेम जहा कालीए तहा) वे चार अध्ययन इस प्रकार है सरप्रभा १, आतपा २, अर्चिमाली ३, प्रभङ्करा ४, इनमें प्रथम अध्ययन का उत्क्षेपक हे जन् ! इस प्रकार है- उस काल और उस समय में राजगृह नाम के नगर में भगवान् वर्ध मानस्वामी का आगमन हुआ या-प्रभु का आगमन सुनकर वहा की परिपद उनको वदना करने के लिये उनके समीप गई-प्रभु ने सबको धर्म का उपदेश दिया। उपदेश सुनकर सबने प्रभु की पर्युपासना को। उस काल और उस समय में सरप्रभा नाम की एक देवी जो सूरविमान में रहती थी-और सूरप्रम सिंहासन पर बैठती थी प्रभु को वदना करने के लिये आई। इसके बाद का इसका वृत्तान्त जैसा पहिले कालीदेवी (तं जहा-सरप्पभा, आयवा, अन्चिमाली, पमकरा, पढमज्झयणस्स, उखेरओ एव खलु जन् । तेण कालेण तेण समएण रायगिहे ममोसरण जाव परिसा पज्जुसइ, तेण कालेण तेण समएण सूरप्पभादेवी, सूरसि विमाणसि भूरप्पमसि सीहासणसि सेस जहा कालीए तहा) તે ચાર અધ્યયને આ પ્રમાણે છે -સૂરપ્રભા ૧, આતા ૨, અર્ચિમાલી ૩, પ્રભડકા ૪, હે જ બૂ! આ બધામાં પહેલા અધ્યયનનો ઉલ્લેયક આ પ્રમાણે છે કે તે કાળે અને તે સમયે રાજગૃહ નામના નગરમાં ભગવાન વધમાન હવામીનું આગમન થયુ પ્રભુનું આગમન સાભળીને ત્યાની પરિષદ તેમને વદના કરવા માટે તેમની પાસે ગઈ પ્રભુએ સૌને ધર્મને ઉપદેશ આ ઉપદેશ સાંભળીને સૌએ પ્રભુની પથુપાસના કરી તે કાળે અને તે સમયે સૂરપ્રભા નામની એક દેવી-જે સૂર વિમાનમાં રહેતી હતી અને સુરકમ સિંહાસન ઉપર બેસતી હતી-પ્રભુની વદને કરવા માટે આવી એના પછીનું - 1 २३६ पातायात अथ सप्तमो गः मारभ्यते-'सत्तमस्से 'त्यादि । मूलम्-सत्तमस्स वग्गरस उखेरओ, एव सलु जब । जाव चत्तारि अज्झयणा पण्णता, त जहा-सरप्पभा आयवा अच्चिमाली पभकरा, पढमज्झयणस्स उखेवओ, एव खलु जब । तेणं कालेणं तेणं समएणं रायगिहे समोसरणं जाव परिसा पज्जुवासइ, तेणं कालेण तेण समएणं सूरप्पभा देवी सूरसि विमाणंसि सूरप्पभंसि सीहासणंसि सेस जहा कालीए तहाणवर पुव्वभवे अरक्खुरीए नयरीए यूरप्पभस्स गाहाव इस्स सूरसिरीए भारियाए सुरप्पभा दारिया सूरस्स अग्ग- महिसी ठिई अद्धपलिओवम पचहि वाससएहि अभहिय सेसं जहा कालीए, एव सेसाओवि सव्वाओ अरक्खुरीए णयरीए । सू० १२ ॥ ॥ सत्तमो वग्गो समत्तो ॥ ७ ॥ टीका-'सत्तमस्से ' ति-सप्तमस्य वर्गस्य उत्क्षेपकः । मुधर्मस्वामीकथ यति-एव खलु हे जम्मूः ! यानत् चत्वारि अध्ययनानि प्रज्ञप्तानि, तद्यथा-तानि -:सप्तमवर्ग प्रारभा- 'सत्तमस्सवग्गस्स उस्खेवओ? इत्यादि । टीकार्थ:-(सत्तमस्स वग्गस्स उखेवओ एव खलु जब जाव चित्तारि अज्झयणा पण्णत्ता) हे भदत सातवें वर्ग का उत्क्षेपक किस प्रकार है इस जबूस्वामी के प्रश्न करने पर गौतमस्वामी उनसे कहते हैं-कि हे जबू। सुनो, तुम्हारे प्रश्न का उत्तर इस प्रकार है-श्रमण સાતમે વર્ગ પ્રારભ- 'सत्तमास वग्गस्स उक्खेवओ' इत्यादि- डाय-(सत्तमरस वगगास उक्खेओ एवासलु ज.जाय चत्तारि अज्झ यणा पणत्ता ) 3 महन्त ! सातमा सना BAप वी शत छ ? જ બૂ હવામીના આ પ્રશ્નને સાભળીને ગૌતમ સ્વામી તેમને કહે છે કે હે જ બૂ! સાભળે, તમારા પ્રશ્નને ઉત્તર આ પ્રમાણે છે કે શ્રમણ ભગવાન મહાવીરે આ સાતમા વર્ગના ચાર અધ્યયને પ્રરૂપિત કર્યા ! - . -- .
- भनगारधर्मामृतपिणी टी० ध्रु०२ ५०८ चद्गप्रमादिदेवीनां परिवर्णनम् ८३९ अयाटमो वर्ग: मारभ्यते- अट्ठमस्से 'त्यादि । मूलम-अट्ठमस्स उक्खेवओ, एवं खल्लु जम्बू ! जाव चत्तारि अज्झयणा पण्णत्ता, त जहा-चंदप्पभा दोसिणाभा अच्चि- माली पभंकरा, पढमस्स अज्झयणस्स उक्खेवओ, एवं खल्लु जवू । तेणं कालेणं तेण समएणं रायगिहे समोसरणं जाव परिसा पज्जुवासइ, तेणं कालेणं तेणं समएणं चंद- प्पभा देवी चदप्पभंसि विमाणसि चदप्पभंसि सीहासणंसि सेस जहा कालीए, णवर पुव्वभवे महुराए णयरीए भंडीर- वडेंसए उजाणे चदप्पभे गाहावई चंदसिरी भारिया चंद- प्पभा दारिया चंदस्स अग्गमहिसी ठिई अद्धपलिओवमं पण्णासाए वाससहस्सेहिं अव्भहिय सेस जहा कालीए, एवं सेसाओवि महुराए णयरीए मायापियरोवि धूयासरि- सणामा ॥ सू० १३ ॥ अहमो वग्गो समत्तो ॥ ८॥ टोका-'अट्टमस्से ति-अष्टमस्य उत्क्षेपः । सुधर्मास्वामी प्राह-एव खलु हे जम्मू ! यावत् चत्वारिअ ययनानि प्रज्ञप्तानि, तद्यथा तानि यथा-चन्द्रप्रभा १, ज्योत्स्नामा २, अचिर्मालिः ३, प्रभङ्करा ४ । प्रथमस्या-ययनस्योक्षेपक । एव -:अष्टमवर्ग प्रारभ- अट्ठमस्स उक्खेवओ' इत्यादि । टीकार्य- (अट्ठमस्स उक्खेवभो-एव खलु जबू! जाव चत्तारि अज्झयणा पण्णत्तात-जहा-चप्पभा,दोसिणाभा, अचिमाली, पमकरा, આઠ વર્ગ પ્રારંભ अट्ठमस्स उपखेवओ, इत्यादि- ( अट्ठमस्स उक्खेवओ-एव खलु जवू जाव चत्तारि अज्झयणा पण्णता-त महा-चदप्पभा, दोसिणाभा, अच्चिमाली, पगारा, पढमस्स अज्झयणस्स उपखे- - .
तापमान यथा पाल्पा-काली देव्या वर्णन तथा विनंयम् , नपरम् भय विशेषः-पूर्वभवे अरशुर्या नगया सूरमभस्य गायापतेः, सूरश्रियो मार्यायाः भरममा दारिका, सूरस्य अग्रमहिषी स्थिविर पल्योपम पञ्चमिशितैरभ्यधिकम् । शेष यथा काल्या । एव शेपा अपि-मातपादिकाः देव्यो गान्या । सर्वा पूर्वभवे अरभुयों नगर्यामासन् | सु०१२ ।। ॥ इति धर्मकथाना सप्तमो वर्गः समाप्तः ॥७॥ का वृत्तान्त लिखा जा चुका है-वैसा ही है। उसमें कुछ अन्तर नहीं है (णचर) परन्तु जिन बातों में अन्तर है-वर इस प्रकार है-(पुन्वभवे) यह पूर्वभव में (अरक्खुरीए नयरीण सूरप्पभस्स गाहावास्स सूरसिरीण भारियाए सूरप्पभा दारिया सूरस्स अग्गमरिसी ठिई अद्धपलिओवम पहिं वाससएहिं अन्भरिय सेसजरा काली एव सेसाओ वि सव्वाओ अरक्खुरीए णयरी १२) अरक्षुर नामकी नगरी में निवास करनेवाले सूरप्रभा गाथापति की सूर श्री भार्या की कुक्षि से अवतरी थी। इसका नाम सरप्रभा था । यह सूर की अनमहिपी हुई। इसकी वहा पांचसो घर्ष से अधिक अर्धपल्य की स्थिति है। और इसका इस अवस्था का समस्त वर्णन काली समान ही है। इसी तरह का आतपाआदिक ३ देवियों का भी जीवन वृत्तान्त है। ये ३ तीनों ही देवियां अपने २पूर्व भव में अरक्षुर नगरी में जन्मी थी। सू०१२ ॥ - सप्तमवर्ग समाप्त:- આનું વર્ણન કાલી દેવીના વર્ણન જેવું જ સમજી લેવું જોઈએ, તેમાં કઈ तो तशवत नयी (णवर') ५२तुरे पातमा त छे, તે प्रभा छ (पुवमवे) मा पूर्व सभा (अरक्खुरीए नयरीए सूरप्पभस्म गाहावइस्स सूरसिरीए भारियाए सूरप्पभा दारिया सूरस्स अग्गमदिसी ठिई अद्धपलिभोवम पचहि वाससएहि अभडिय सेस जहा कालीए, एव सेसाओ वि सयाओ अरक्खुरीए णयरीए १२) અરશુરી નામની નગરીમાં રહેનારી સૂરપ્રભા ગાથાપતિની સૂરશ્રી ભાર્યાના ગર્ભથી જન્મ પામી હતી, તેનું નામ સૂરજપ્રભા હતુ તે સૂરની અમહિણી (પટરાણું) થઈ તેની ત્યા પાચ વર્ષ કરતા વધારે અપત્યની સ્થિતિ છે તેનું આ અવસ્થા વિષેનું બધુ વર્ણન કાલીના જેવું જ છે એ પ્રમાણે જ આતા વગેરે ૩ દેવીઓનુ પણ જીવનવૃત્તાત છે આ ત્રણે દેવીઓ પિત પિતાના પૂર્વભવમાં અક્ષર નગરમાં જન્મ પામી હતી પરા સાતમા વ સમાસ મ 4 . - सनगारधर्मामृतविणी टीका भु०२३०८ चन्द्रप्रभादिदेवीना चरिनवर्णनम् ८४१ विज्ञेयम् , नपर-विशेपस्त्वयम्-पूर्वभवे मयुराया नगा भण्डीरावतसकमुबानम् , चन्द्रपभो गाथापतिः, चन्द्रश्रो र्या, चन्द्रप्रभा दारिका, चन्द्रस्याग्रमहिपी, स्थितिर पल्योपम पञ्चाशद्भिर्वर्षपहरभ्यधिकम् । शेप यया काल्याः । एव चद्रप्रभ विमान में रहती थी और चद्रप्रभ सिंहासन पर बैठती थी- श्रमण भगवान महावीर को बद ना करने एव उनसे धर्म का उपदेश सुनने के लिये उनके निकट आई-। इसके बाद का इसका वृत्तान्त कालीदेवी के वृत्तान्त जैसा ही है। उसमें कोई अन्तर नही है। जहां अन्तर है-उसका खुलाशा इस प्रकार है-पूर्वभव मे यह मथुरा नगरी में जन्मी थी। वहा भडीरावतसक उद्यान था। उस नगरी में चद्रप्रभ नाम का गायापति रहता था। उसकी भार्या थी जिसका नाम चदश्री था। उनके यहा यह चद्रप्रभा नामकी पुत्री थी। यह चन्द्र की अग्रम- दिपी उनी। (ठिई अद्धपलिओचम, पण्णासाए वाससरस्सेहिं अभरिय सेस जहा कालीए एव से साओवि चदस्स अग्गमहिसी) पचास हजार वर्ष से अधिक इसकी स्थिति आधेपल्य की है। इसके बाद का इसका जीवन वृत्तान्त काली दारिका के जीवन वृत्तान्त जैसा ही जानना चाहिये। इसी तरह ज्योत्स्नाभा आदिशेष ३ देवियो के सन्ध को लेकर जो अध्ययन कहे गये है-वे जानना चाहिये ये सब ज्योत्स्नाभा વિમાનમાં રહેતી હતી અને ચદ્રપ્રભ વિમાનમાં બેસતી હતી-શ્રમણ ભગવાન મહાવીરની વદના કરવા માટે અને તેમની પાસેથી ધર્મને ઉપદેશ સાભળવા માટે તેમની પાસે આવી તેના પછીનું તેનું વૃત્તાત કાલી દેવીના વૃત્તાત જેવું જ છે તેમાં કઈ પણ જાતને તફાવત નથી જ્યા તફાવત છે–તેનુ સ્પષ્ટીકરણ આ પ્રમાણે છે કે પૂર્વ ભવમા તે મથુરા નગરીમાં જન્મી હતી, ત્યા ભડીરાત સક ઉદ્યાન હતુ તે નગરીમા ચંદ્રપ્રભનામે ગાથાપતિ રહેતા હિતે ચશ્રી તેની ભાર્યા નામ હતું તેને ચન્દ્રપ્રભા નામે પુત્રી હતી આ ચન્દ્રની અગમહિલી (પટરાણી) થઈ (ठिई अद्धपलिओम, पण्णासाए वाससहस्सेहिं अभदिय सेस जहा कालीए एव सेसाओपि चदम्स अग्गमहिसी) પચાસ હજાર વર્ષ કરતા આની સ્થિતિ અડધા પત્યની છે એના પછીનું આનુ જીવન વિષેનું વર્ણન કાલી દારિકાના જીવન જેવું જ સમજી લેવુ જોઈએ આ પ્રમાણે નાભી વગેરે બાકી ત્રણ દેવીઓના સ બ ધને લ જે અધ્યયને કહેવામાં આવ્યા છે તેમને પણ સમજી લેવા જોઈએ ८४० - विलु हे जम्मूः तस्मिन् काले तस्मिन् समये राम श्रीमातीरम्वामिनः समय सरण, यानत्-परिपत् पर्युपास्ते । तम्मिन् काठे तस्मिन समये चन्द्रप्रभा देवी चन्द्रप्रभे गिमाने चन्द्रम सिंहासने शेष यथा पाल्पाका देव्या वर्णनं तद्वद् पढमस्स अज्झयणस्स उस्सेरो-एव पलु जत्रण काणं तेण समएण रायगिहे समोसरण-जार परिसा पन्जुरामह, तेण कालेण तेण समाण चप्पभादेवी चदपममि विमाणसि सीहामणमि सेम जा फाली, णचर पुन्वभवे महुराण परीस भटीरयडेमरा उमाणे चद- प्पभे गाहावई चदसिरी मारिया चप्पभा दारिया) हे भदत ! आठवें धर्म का उत्क्षेपक कैसा है ? इस प्रकार जम्वामी के पूछने पर सुधर्मा- स्वामी ने उनसे कहा-हे जव! सुनो तुम्हाने प्रश्न का उत्तर इस प्रकार है-श्रमग भगवान महावीर ने इम वर्ग के चार अध्ययन प्रज्ञप्त किये है -वे इस प्रकार से हैं-चद्रप्रभा १, ज्योत्स्नाभा २, अचिर्माली ३, प्रभ- करा ४, । इनमे हे जवू ! प्रथम चन्द्रप्रभा अध्ययन का उत्क्षेपक इस प्रकार से है-उस काल मे और उस समय में राजगृह नामके नगर में श्री महावीर स्वामी का आगमन हुआ था-| उनसे धर्म का उपदेश प्राप्त करने के लिये वहा की समस्त धार्मिक जनता उनके पास आई थी प्रभु ने सर के लिये धर्म का उपदेश सुनाया-सुनाकर सबो ने उनकी यावत् पर्युपासना की। उस काल और उस समय में चन्द्रप्रभा देवी जो कि बो-एव खलु जनू ! तेण कालेणं तेण समएण रायगिहे समोसरण-जाव परिसा पज्जुवासइ, तेण कालेण तेण समएण चदप्पभादेवी चदप्पभसि विमाणसि चप्पमसि सीहासणसि सेस जहा कालीए, णवर पुजभवे महुराए णयरीए भडीरवडेंसए उज्जाणे चदपप गाहावई चदसिरी भारिया चदप्पभा दारिया) હે ભદન્ત ! આઠમા વર્ગને ઉન્નેપક કે છે ? આ પ્રમાણે જ બૂ સ્વામીના પ્રશ્ન કર્યા બાદ સુધમાં સ્વામીએ તેમને કહ્યું કે હે જ બૂ! સાભળો તમારા પ્રશ્નનો ઉત્તર આ પ્રમાણે છે કે શ્રમણ ભગવાન મહાવીરે આ વર્ગના ચાર અધ્યયને પ્રજ્ઞપ્ત કર્યો છે, તે આ પ્રમાણે छे-य द्रप्रभा १ न्योत्स्नामा २, આચિમાલી પ્રભ કરા ૪ હે જ બૂ! આ ચારેમાં પહેલા ચન્દ્રપ્રભા નામે અધ્યયનને ઉક્ષેપક આ પ્રમાણે છે કે તે કાળે અને સમયે રાજગૃહ નામના નગરમાં શ્રી મહાવીર સ્વામીનું આગમન થયુ તેમની પાસેથી ધર્મકથા સાંભળવા માટે ત્યાની બધી ધાર્મિક જનતા ત્યા આવી પ્રભુએ ધમને ઉપદેશ સ ભળાવ્યો સાભળીને બધાએ તેમની યાવત્ *પયુ પાસના કરી તે કાળે અને તે સમયે ચ દ્રપ્રભા દેવી-કે, . 3, " દિપ્રભ सनगारधर्मामृतषिणी टीका ४०२००८ चन्द्रप्रभादिदेवीना चरिनवर्णनम् ८४१ विज्ञेयम् , नवर=विशेषस्लयम्-पूर्वभने मथुराया नगा भण्डीरावतसकमुयानम् चन्द्रमभो गायापतिः, चन्द्रग्रोभर्या, चन्द्रप्रभा दारिका, चन्द्रस्याग्रमहिपी, स्थितिर पल्योपम पञ्चागद्भिपमहरभ्यधिकम् । शेष यथा काल्याः । एव चद्रप्रभ विमान मे रहती थी और चद्रप्रभ सिंहासन पर बैठती थी- श्रमण भगवान महावीर को वदना करने एव उनसे धर्म का उपदेश सुनने के लिये उनके निकर आई- इसके बाद का इसका वृत्तान्त कालीदेवी के वृत्तान्त जैसा ही है। उसमें कोई अन्तर नही है। जहा अन्तर है-उसका खुलाशा इस प्रकार है-पर्चभव मे यह मथुरा नगरी में जन्मी थी। वहा भडीरावतसक उद्यान था। उस नगरी में चद्रप्रभ नाम का गाथापति रहता था। उसकी भार्या थी जिसका नाम चदश्री था। उनके यहा यह चद्रप्रभा नामकी पुत्री थी। यह चन्द्र की अग्रम- हिपी चनी । (ठिई अद्धपलिओवम, पण्णासाए वाससहस्सेटिं अभरिय सेस जहा कालीए एव सेसाओवि चदस्स अग्गमहिसी) पचास हजार वर्ष से अधिक इसकी स्थिति आधेपल्य की है। इसके बाद का इसका जीवन वृत्तान्त काली दारिका के जीवन वृत्तान्त जैसा ही जानना चाहिये । इसी तरह ज्योत्स्नाभा आदिशेप ३ देवियो के सबन्ध को लेकर जो अध्ययन कहे गये है-वे जानना चाहिये ये सब ज्योत्स्नाभा વિમાનમાં રહેતી હતી અને ચદ્રપ્રભ વિમાનમા બેસતી હતી-શ્રમણ ભગવાન મહાવીરની વદના કરવા માટે અને તેમની પાસેથી ધર્મને ઉપદેશ સાભળવા માટે તેમની પાસે આવી તેના પછીનું તેનું વૃત્તાત લી દેવીના વૃત્તાત જેવું જ છે તેમાં કઈ પણ જાતને તફાવત નથી જ્યા તફાવત છે–તેનું સ્પષ્ટીકરણ આ પ્રમાણે છે કે પૂર્વભવમાં તે મથુરા નગરીમાં જન્મી હતી, ત્યા ભાડરાવત મક ઉદ્યાન હતુ તે નગરીમાં ચદ્રપ્રભનામે ગાથાપતિ રહેતો હતે ચદ્રથી તેની ભાર્યાનું નામ હતું તેને ચન્દ્રપ્રભા નામે પુત્રી હતી આ ચન્દ્રની અમહિલી (પટરાણી) થઈ (ठिर्ड अद्धपलिओचम, पण्णासाए पासपहस्सेहि अमहिय सेस जहा कालीए एप सेसाओपि चदस्स अगमहिसी) પચાસ હજાર વર્ષ કરતા આની સ્થિતિ અડધા પત્યની છે એના પછીનું આનુ જીવન વિશેનું વર્ણન કાલી દારિકાના જીવન જેવું જ સમજી લેવું જોઈએ આ પ્રમાણે સ્નામા વગેરે બાકી ત્રણ દેવીઓના સ બ ધને લઈને જે અવ્યયન કહેવામા આવ્યા છે તેમને પણ સમજી લેવા જોઈએ ८४० जाताधर्मकचार सलु हे जम्यूः । तस्मिन् काले तस्मिन् समये राजगृहे श्रीमाावीरस्वामिनः समत्र सरण, यारत्-परिपत् पर्युपास्ते । तस्मिन् काले तस्मिन समये चन्द्रप्रभा देवी चन्द्रप्रभे पिमाने चन्द्रमभे सिंहासने शेप यथा पाल्या कालीदेव्या वर्णन तद्वदू पढमस्स अज्झयणस्स उत्पेरो-एव पलु ज! तेण कालेण तेण समरण रायगिरे समोमरण-जार परिसापज्जुयामः, तेण कालेण तेण समाण चप्पभादेवी चदपममि चिमाणसि सीहासणसि सेम जहा काली, णवर पुन्वभवे महुराए परीप भटीरबंडमग उजाणे चद- प्पभे गाहावई चदसिरी मारिया चप्पभा दारिया) हे भदत ! आठवें वर्ग का उत्क्षेपक कैसा है ? इस प्रकार जस्वामी के पूछने पर सुधर्मा- स्वामी ने उनसे कहा-हे जत्रु ! सुनो तुम्हाने प्रश्न का उत्तर इस प्रकार है-श्रमग भगवान महावीर ने इस वर्ग के चार अध्ययन प्रजप्त किये है -वे इस प्रकार से हैं-चद्रप्रभा १, ज्योत्स्नाभा २, अचिर्माली ३, प्रभ- करा ४,। इनमे हे जवू! प्रथमचन्द्रप्रभा अध्ययन का उत्क्षेपक इस प्रकार से है-उस काल मे और उस समय में राजगृह नामके नगर में श्री महावीर स्वामी का आगमन हुआ था। उनसे धर्म का उपदेश प्राप्त करने के लिये वहा की ममस्त धार्मिक जनता उनके पास आई थी प्रभु ने सब के लिये धर्म का उपदेश सुनाया-सुनाकर सबो ने उनकी यावत् पर्युपासना की । उस काल और उस समय में चन्द्रप्रभा दवी जो कि वी-एव खलु जन् । तेण कालैण तेण समएण रायगिहे समोसरण-जाव परिसा पज्जुवासइ, तेण कालेण तेण समएण चदप्पभादेवी चदप्पभसि रिमाणसि चदप्पभसि सीहासणसि सेस जहा कालीए, णवर पुरभवे महुराए णयरीए भडीरवडेंसए उज्जाणे चदप्पभे गाहाचई चदसिरी भारिया चप्पमा दारिया) આઠમા વર્ગને ઉન્નેપક કેવો છે ? આ પ્રમાણે જ બૂ સ્વામીના પ્રશ્ન કર્યા બાદ સુધર્મા સ્વામીએ તેમને કહ્યું કે હે જબૂ! સાભળે, તમારા પ્રશ્નને ઉત્તર આ પ્રમાણે છે કે શ્રમણ ભગવાન મહાવીરે આ વર્ષના ચાર અધ્યયને પ્રજ્ઞપ્ત કર્યો છે, તે આ પ્રમાણે છે-ચ દ્રપ્રભા ૧ ज्योत्स्नामा २, साथिभासी 3, પ્રભ કરા ૪ હે જ બા આ ચારેમા પહેલા ચન્દ્રપ્રભા નામે અધ્યયનને ઉક્ષેપક આ પ્રમાણે છે કે કાળે અને સમયે રાજગૃહ નામના નગરમાં શ્રી મહાવીર સ્વામીનું આગમન થયુ તેમની પાસેથી ધર્મકથા સાંભળવા માટે ત્યાની બધી ધાર્મિક જનતા ત્યા આવી પ્રભુએ ધમને ઉપદેશ સ ભળાવ્ય માંભળીને બધાએ તેમની યાવત્ ‘પયુ પાસના કરી તે કાળે અને તે સમયે ચદ્રપ્રભા દેવી-કે જે હે ભદન્ત । ka . -- દિપ્રભ - सनगारधर्मामृतषिणी टीका भु०२३०८ चन्द्रप्रभादिदेवीना चरिनवर्णनम् ८४१ विनयम् , नपर-विशेषस्तयम्-पूर्वभवे मथुराया नगा भण्डीरावतसकमुयानम् , चन्द्रमभो गावापतिः, चन्द्रवीर्भायर्या, चन्द्रप्रभा दारिका, चन्द्रस्याग्रमहिपी, स्थितिर पल्योपम पञ्चाशद्भिपरभ्यधिकम् । शेष यथा काल्याः । एव चद्रप्रभ विमान में रहती थी और चद्रप्रभ सिंहासन पर बैठती थी- श्रमण भगवान् महावीर को वदना करने एवं उनसे धर्म का उपदेश सुनने के लिये उनके निकर आई- इसके बाद का इसका वृत्तान्त कालीदेवी के वृत्तान्त जैसा ही है। उसमें कोई अन्तर नहीं है। जहा अन्तर है-उसका खुलाशा इस प्रकार :-पूर्वभव मे यह मथुरा नगरी में जन्मी थी। वहां भडीरावतसक उद्यान या। उस नगरी में चद्रप्रभ नाम का गायापति रहता था। उसकी भार्या थी जिसका नाम चद्रधी था। उनके यहा यह चद्रप्रभा नामकी पुत्री थी। यह चन्द्र की अग्रम- हिपी पनी । (ठिई अद्धपलिओचम, पण्णासाए वाससरस्सेटिं अभत्यि सेस जहा कालीए एव सेसाओवि चदस्स अग्गमहिसी) पचास हजार वर्ष से अधिक इसकी स्थिति आधेपल्य की है। इसके याद का इसका जीवन वृत्तान्त काली दारिका के जीवन वृत्तान्त जैसा ही जानना चाहिये । इसी तरह ज्योत्स्नाभा आदिशेप ३ देवियो के सपन्ध को लेकर जो अध्ययन कहे गये है-वे जानना चाहिये ये सब ज्योत्स्नाभा વિમાનમાં રહેતી હતી અને ચદ્રપ્રભ વિમાનમાં બેસતી હતી-શ્રમણ ભગવાન મહાવીરની વદના કરવા માટે અને તેમની પાસેથી ધર્મને ઉપદેશ સાભળવા માટે તેમની પાસે આવી તેના પછીનું તેનું વૃત્તાત કાલી દેવીના વૃત્તાત જેવું જ છે તેમાં કોઈ પણ જાતને તફાવત નથી જ્યાં તફાવત છે તેનું પષ્ટીકરણ આ પ્રમાણે છે કે પૂર્વ ભવમા તે મથુરા નગરીમાં જન્મી હતી, ત્યા ભડીરાવતક ઉદ્યાન હતુ તે નગરીમા ચદ્રપ્રભનામે ગાથાપતિ રહે હતે ચદ્રથી તેની ભાર્યાનું નામ હતું તેને ચન્દ્રપ્રભા નામે પુત્રી હની આ ચન્દ્રની અગ્રમહિલી (પટરાણી) થઈ (ठिई अद्धपलिओरम, पण्णासाए पासपहस्सेहिं अमहिय सेस जहा कालीए एव सेसाओपि चदम्स अग्गमहिसी) પચાસ હજાર વર્ષ કરતા આની સ્થિતિ અડધા પત્યની છે એના પછીનું આખુ જીવન વિષેનું વર્ણન કલી દારિકાના જીવન જેવું જ સમજી લેવું જોઈએ આ પ્રમાણે નામા વગેરે બાકી ત્રણ દેવીઓના સ બ ધને 11 ८४२ - . ताधर्मग्यायो शेपा:-ज्योत्स्नामादि देव्योऽपि गिया । सर्गः पूर्वभवे मथुरायां नगी जाता,पार्थमभुसमीपे च प्राजिता । मातापितरोऽपि दुहितसदृशनामानः ॥०१३।। इति धर्मकथानामाप्टमो वः समाप्तः ॥ ८॥ अथ नवमो वर्ग:भारभ्यते-'णामम्म' इत्यादि। मूलम्-णवमस्त उक्सेवओ, एवं खल्ल जंबू ! जात्र अटून अज्झयणा पणत्ता, त जहा-पउमा सिवा सई अंजू रोहिणी णवमिया, अचला अच्छरा, पढमज्झयणस्स उक्खेवओ, एवं खलु जंचू । तेणं कालेण तेणं समएण रायगिहे समोसरणं जाव परिसा पज्जुवासइ, तेणं कालेण तेणं समएणं पउमावई देवी सोहम्मे कप्पे पउमव.सए विमाणे सभाए सुहम्माए पउमंसि सीहासणंसि जहा कालोए एव अट्टवि अज्झयणा कालीगमएण नायव्वा, णवर सावत्थीए दो जणीओ हत्थिणा- उरे दोजणीओ कपिल्लपुरे दोजणीओ सागेयनयरे दोजणीओ पउमे पियरो विजया माचराओ सव्वाओऽवि पासस्स अंतिए पव्वइयाओ सकस्त अग्गमहिसीओ ठिई सत्त पलिओवमाई महाविदेहे वासे सिज्झिहिति जाव अत काहिति ॥ सू०१४ ॥ ॥णवमो वग्गो समत्तो ॥९॥ आदि देविया पूर्वभव में (महुराए णयरीए) मथुरा नगरी में उत्पन्न हुई और पार्श्वनाथ प्रभु के समीप दीक्षित हुई। (माया पियरो वि० धृया सरिसणामा) इन पुत्रियों का नाम वैसा ही नाम इनके माता पिता का है। - अष्टमवर्ग समाप्त:- माधी योनामा वगैरे देवीमा लपा (महुराए णयरीए) मथुरा नारीमा उत्पन्न 25 मने पानाथ प्रसुनी पामेथी दीक्षित थ (मायापियरो वि० धूया सरिसणामा ) 0 पुत्रीमानी नामा २१ तमना मातापिता-माना નામે પણ છે આઠમ વર્ગ સમાપ્ત है - मेनगारधर्मामृतविणो टी० श्रु. २ व० ९ पनादिदेवोत चरिचरणनम् ८४३ टीका-'वमस्से 'ति-नामम्य वर्गस्योत्क्षेपकः । एष खलु जम्पू यावत्-अष्ट-अध्ययनानि प्रज्ञप्तानि, तद्यथा-पद्मा १, शिवा २, शची ३ अजूः ४, रोहिणी ५, नवमिका ६, अचला ७, अप्सरा ८ । एप प्रथमाध्ययनस्योत्क्षे. -नयमवर्ग प्रारभ णवमस्स उस्खेवओ इत्यादि। टीकार्य:-(णयमस्स उत्तेवओ-एव खलु जबू' जाव अट्ट अज्झ- यणा पण्णत्ता-त जहा-पउमा, सिवा, सई, अजू, रोहणी, णवमिया, अचला, अच्छरा,-पढमझयणस्स उक्खेवओ-एव खलु जबू! तेण कालेणं तेणं समएण रायगिहे समोसरण जाव परिसा पज्जुबासह, तेण कालेणं तेण समएण पउमावई, देवी सोहम्मे कप्पे पउमव.सए विमाणे सभाए सुहम्माएपउमसि-तीहासणसि जहा कालीए एव अवि अज्झ- यणा कालीगमण्ण नायव्चा) हे भदत ! नौवे वर्ग का उत्क्षेपक किस प्रकार से है ? इस प्रकार जवू स्वामी के प्रश्न करने पर सुधर्मा स्वामी उनसे कहते हैं कि हे जवू ! स्लुनो-तुम्हारे प्रश्न का उत्तर इस तरह से है-श्रमण भगवान महावीर ने इस वर्ग के यावन् आठ अध्ययन प्ररू- पित किये-वे इस प्रकार से है-पद्मा १, शिवा, २, शची ३, अजू ४, रोहिणी ५, नवमिका ६, अचला ७, और अप्सरा । इनमें है जब ! प्रथम નવ વર્ગ પ્રાર ભ (णमस्स उक्खेरओ-एर खलु जवू ! जान अट्ट अज्झयगा पण्णत्ता-त जहा पउमा, सिवा, सई, अजू, रोहिणी, णामिया, अचला, अच्छरा, पढमज्झयणस्त उम्खेवओ-एव खलु जवू ! तेण कालेण तेण समएण रायगिहे समोमरण जाव परिसा पज्जु मासइ, तेण कालेण तेण समएण पउमावई देवी सोहम्मे कप्पे पउम वडेंसए निमाणे समाए सुहम्माए पउमसि-सीहासणसि जहा कालिए एव अट्ठ वि अज्झयणा काली गमएण नायचा) હે ભદન! નવમા વગને ઉક્ષેપક કેવી રીતે છે? આ પ્રમાણે જ બૂ સ્વામીના પ્રશ્ન કર્યા બાદ સુધમાં સ્વામી તેમને કહે છે કે હું જબૂ! સાભળે, તમારા પ્રશ્નનો ઉત્તર આ પ્રમાણે છે-શ્રમણ ભગવાન મહાવીરે આ વર્ગના યાવતુ આઠ અાયને પ્રરૂપિત કર્યા છે, તે मा प्रभा छे-पमा १, शिवा २, शयी 3, मनू ४, शखिशी ५, न મિકા , અચલા ૭ અને અપ્સરા ૮ . mins . গন্ধ पः । एव खलु हे जम्मूः ! तस्मिन् काले तस्मिन् समये राजगृहे समरसरणम् भगतो महावीरस्य समागमनमभृत् , यान् परिगन् पर्युपास्ते । तस्मिन् काले तस्मिन् समये पमारती देवी, सौधर्म कल्पे पभारतसके रिमाने समाया सुधर्माया पो सिंहासने, यथा काल्याः । एनम् अष्टापि अध्ययनानि गालीगमकेन-काली- देवीसदृशपाठेन ज्ञातव्यानि, नपर-विशेषत्वयम्-भरे पापस्त्वा नगयी 'टोज- अध्ययन का उत्क्षेप इस प्रकार से है-उस काल में और उस समय में राजगृह नगर में भगवान महावीर का अगमन छुना था। लोगों को जय इनके शुभागमन की पर पड़ी तो वे मर के सर उनको वदना करने के लिये और उनसे धर्मोपदेश को काम लेने के लिये उनके 'समीप पहुँचे । प्रभु ने आये हुए परिपद को सुनचारित्ररूप धर्म का उपदेश दिया । उपदेश सुनने के बाद उसने प्रभु की यावत् पर्युपामना की। उस काल मे और उस समय में पद्मावती देवी जो कि सौधर्मकल्प में पद्मावतसक विमान मे, सुधर्मा सभामें रहती थी और जिसके सिंहासन का नाम पद्म या श्रमण भगवान महावीर को वदना करने और उनसे धर्म का उपदेश सुनने के लिये वहा आई। इसके बाद का सम्बन्ध कालीदेवी का जैसा वर्णन पहिले किया गया है वैसा ही जानना चाहिये । इसी तरह से अवशिष्ट सात अध्ययन भी जानना 'चाहिये । इन आठों ही अध्ययनों को पाठ जैसा कालीदेवी का पाठ है वैसा ही है । कोई अन्तर नहीं हें (णवर) परन्तु जहा अन्तर है वह- હે જ બૂ' આમાં પહેલા અધ્યયનને ઉભેપક આ પ્રમાણે છે–તે કાળે અને તે સમયે રાજગૃહ નગરમાં ભગવાન મહાવીરનું આગમન થયું તેને તેમના શુભાગમનની જ્યારે જાણ થઈ ત્યારે તેઓ સર્વે તેમને વદન કરવા માટે અને તેમની પાસેથી ધર્મનો ઉપદેશ સાંભળવા માટે તેમની પાસે ગયા. પ્રભુએ આવેલા સર્વ લેકોને શ્રુતચારિત્ર રૂપ ધમને ઉપદેશ સભળાવ્યો ઉપદેશ સાભળીને લેકેએ પ્રભુની યાવત્ પય્ પાસના કરી તે કાળે અને તે સમયે પદ્માવતી દેવી-કે જે સૌધર્મ ક૫મા, પદ્માવત સક વિમાનમાં સુધર્મા સભામાં રહેતી હતી અને જેના સિંહાસનનું નામ પા હતુ-શ્રમણ ભગવાન મહાવીરને વદન કરવા અને તેમની પાસેથી મને ઉપદેશ સાભળવા ત્યા આવી એના પછીનું વર્ણન પહેલા કરવામાં આવેલા કાલી દેવીના વર્ણનની જેમ સમજી લેવું જોઈએ આ પ્રમાણે જ બાકીના સાત અધ્યયને વિષે પણ જાણી લેવું જોઈએ એ આ મુક અભ્યયનને પાડ કાવી દેવીના જે જ अनगारधर्मामृतवपिणी टी० श्रु २ ३० ९ पद्मादिदेवोना चरित्रवर्णनम् ८४५ णीभो' द्वे जन्यौ पद्मा-शिवाभिये द्वे दारिके सजाते । एव हस्तिनापुरे द्वे जन्यौ श्रुतिः-अजः चेति, काम्पिल्यपुरे द्वे जन्यौ रोहिणीनवमिकानाम्यौ, साकेतनगरे द्वे जन्यौ अबला-अप्सरा इति समाते । सबैपाम् ' पउमे' पद्मः पझेति नामानः पितरः, निजया विजयानाम्नो मातर आसन् । सर्वा अपि पार्श्वस्य पार्श्वभोर- न्तिके मनजिताः, शक्रस्याग्रमहिप्यो जाता । तासा स्थितिः सप्तपल्योपमानि । एताः सर्वा महाविदेहे वर्षे सेत्स्यन्ति यावत्सर्वदुःखानामन्त करिष्यन्ति ।मु०१४॥ ॥ इति मिकथाना नवमी वर्गः समाप्तः ॥ ९॥ इस प्रकार से है-(सावत्यीए दोजणीओ) पद्मा और शिवा ये दो कन्याएँ पूर्व भवमे श्रावस्ती नगरी में उत्पन्न हुई (हत्यिणाउरे दोजणी ओ, कम्पिल्लपुरे दो जणीओ सागेयनयरे दो जणीओ पउमे पियरो विजयाभायराओ सचओवि पासस्स अतिए पव्वइयाओ सकस्स अग्ग- महिसीओ टिई सत्तपलिओवमाइ महाविदेहे चासे सिजिहिति जाव अत काहिति १४' ) श्रुति और अजू ये दो हस्तिनापुरमें, रोहिणी, नवमिका ये दो काम्पिल्यपुरमें, अचला एव अप्सरा ये दो साकेत नगर में, उत्पन्न हुई । इन सर कन्याओके पिता का नाम पद्म और माता का नाम विजया था। ये सब कन्याएँ पार्श्वनाथ प्रभु के पास प्रबजित हुई है । शक्र की अग्रमरिपिया बनी है। इन की स्थिति सातपल्य थी। ये छ तभ सम समे तेमा पतन तशवत नथी (णार ) ५२तु त्या तशत छे-२॥ प्रभारी के ( सावत्योए दोजणीओ) पावती અને શિવા આ બને કન્યાઓ પૂર્વભવમાં શ્રાવસ્તી નગરીમાં ઉત્પન્ન થઈ ( हथिणाउरे दो जणीओ, कपिल्लपुरे दो जणीभो सागेय नयरे दो जणीओ पउमे पियरो विजया भायराओ सवाओवि पामस्स अतिए पधल्याभो सक्कस्स अगमहिसीओ ठिई, सत्त पलिभोनमाइ महाविदेहे वासे सिज्झिहिति जाव अत कार्हिति ॥१४"।) કૃતિ અને અન્ન આ બને હસ્તિનાપુરમા, રવિણી અને નામિકા આ બને કપિલ્યપુરમા, અચલા અને અપ્સરા આ બને સાકેત નગરમાં ઉત્પન્ન થઈ આ બધી કન્યાઓના પિતાનું નામ પા અને માતાનું નામ વિજયા હતુ આ બધી કન્યાએ પાશ્વનાથ પ્રભુની પાસે પ્રજિત થઈ છે અને શકની અગ્નમહિણીઓ (પટરાણીઓ) બની છે એમની સ્થિતિ સાત પત્ય જેટલી ४६ प्रातामयामी अथ दशमो वर्ग मारभ्यते-दसमग ' इत्यादि। मूलम्-दसमस्त उखेवओ, एव सलु जबू। जाव अट्ट अज्झयणा पण्णत्ता, त जहा- कण्हा य कण्हराई रामा तहराम- रक्खिया वसू य । वसुगुत्ता वसुमित्ता वसुधरा चेव ईसाणे ॥१॥ पढमज्झयणस्स उक्खेवओ, एवं खलु जबू। तेणं कालेणं तेणं समएणं कण्हादेवी ईसाणे कप्पे कण्हव.सए विमाणे सभाए सुहम्माए कण्हसि सीहासणंसि सेस जहा कालीए एवं अवि अज्झयणा कालीगमएणं णेयव्वा, णवर पुव्वभवे वाणारसीए नयरीए दो जणीओ रायगिहे नयरे दो जणीओ सावत्थीए नयरीए दो जणीओ कोसबीए नयरीए दो जणीओ, रामे पिया धम्मा माया सव्वओऽवि पासस्त अरहओ अंतिए पव्व- इयाओ पुप्फचूलाए अजाए सिस्तिणीयत्ताए ईसाणस्त अग्ग- महिसीओ ठिई णव पलिओवमाई महाविदेहे वासे सिज्झि- हिति बुज्जिहिति मुच्चिहिति सव्वदुक्खाणं अत काहिति। एवं खलु जवू । णिक्खेवओ दसमवग्गस्त ॥ सू० १५ ॥ ॥ दलमो वग्गो समत्तो ॥ १० ॥ टीका-दसमस्से' ति दशमस्य उत्क्षेपकः । एव खल हे जम्मू । यावत् अप्ट-अभ्ययनानि प्रज्ञप्तानि तद्यथा-तानि गायया प्रदर्यन्ते 'कण्हे त्यादि । सब महाविदेर क्षेत्र से सिद्ध अवस्था प्राप्त करेंगी-थावत् सर्व दुःखों का अन्त करेगी। सू०१४ ॥ ॥ नवमवर्ग समाप्त ॥ છે આ બધી મહાવિદેહ ક્ષેત્રમાથી સિદ્ધ અવસ્થા પ્રાપ્ત કરશે યાવતું સર્વ હું એને અત કરશે કે સૃ૧૪ . નવ વર્ગ સમાપ્ત , अनगारधर्मामृतवपिणी टी० ०२ ३०१० कृष्णादिदेवीना चरित्रवर्णनम् ८४७ कृष्णा १ च कृष्णरानिः २, रामा ३ तथा रामरक्षिका ४ वमूश्च ५ वमुगुप्ता ६, वमुमिना ७, वसुन्धरा ८ चैव ईशाने ॥१॥" तत्तनामभिरध्ययनानि प्रसिद्धानि । तर प्रथमा ययनस्योत्क्षेपकः । एव खलु हे जम्मू ! तस्मिन् काले तस्मिन् समये राजगृहे नगरे भगवत श्रीमहावीर- ॥ दशमवर्ग प्रारम॥ दसमस्स उम्खेवओ' इत्यादि. "१५" टीकार्य-(दसमस्स उस्खेवओ-एवं खलु जवू ! जाव अट्ठअज्झ- यणा पण्णत्ता-त जहा कण्हाय कण्हराई, रामा, तह रामरक्खिया वस्य। वसुगुत्ता वसुमित्ता वसुधरा चेव ईसाणे "१"-पढमज्झयणस्स उक्खे- वओ-एक खलु जनू ।) हे भदन्त श्रमण भगवान महावीर ने दशवें वर्गका उत्क्षेपक किस प्रकार से कहा है ? इस तरह का जबू! स्वामी के प्रश्न का समाधान करने के निमित्त सुवर्मा स्वामी उनसे कहते हैं कि हे जबू। सुनो तुम्हारे प्रश्न का उत्तर इस प्रकार है-श्रमण भग- वान् महावीरने इस दशवें वर्ग के आठ अध्ययन प्रज्ञप्त किये हैं-वे ये हैं-कृष्णा १, कृष्णराजि २, रामा ३, रामरक्षिका ४, वसू ५, वसुगुप्ता ६, वसुमित्रा ७, और वसुधरा। इन २ नामो द्वारा इन २ नाम वाले अध्ययन प्रसिद्ध हुए है। इनमें प्रथम अध्ययन का हे जवू ! उत्क्षेपक દશમે વર્ગ પ્રારભ- दस्समरस उक्खेवओ' इत्यादि- (दसमस्म उक्खेवओ-एव खलु जबू ! जार अट्ठ अज्झयणा पण्णत्ता-व जहा-कण्हा य कण्हराई , रामा तह रामरक्खिया वम् य । वसुगुत्ता वसुमित्ता वसुधरा चेव ईसाणे ॥ १ ॥ पढमज्झयणस्स उक्खेवओ-एव खलु ज1) હે ભદન્ત શ્રમણ ભગવાન મહાવીરે દશમા વર્ગને ઉક્ષેપક કેવી રીતે કહ્યો છે? આ પ્રમાણેના કબૂ સ્વામીના પ્રશ્નને સાભળીને તેના સમાધાન માટે શ્રી સુધર્મા સ્વામી તેમને કહે છે કે જ બૂ! સાભળે, તમારા પ્રશ્નને ઉત્તર આ પ્રમાણે છે શ્રમણ ભગવાન મહાવીરે આ દશમા વર્ગના આઠ અધ્યયને પ્રજ્ઞસ કર્યા છે, તે આ પ્રમાણે છે-કૃષ્ણ ૧, કૃષ્ણારરિ, રામા ૩, રામક્ષિકા ૪, વસૂ ૫, વસુગુપ્તા ૬, વસુમિત્રા ૭ અને સુવરા ૮ આ ઉક્ત જુદા જુદા નામે વો એ જ નામના જુદા જુ અધ્યયને પ્રસિદ્ધ થયા છે તે જ ભૂ! આ બધામાથી પહેલા અ વયનો ઉલ્લેપક - ।
८४८ भाताधर्मकथाम स्यामिनः समयमरणं यावत् परिपत् पर्युपास्ते, तम्मिन् काले तस्मिन समये कृष्णा देवीईशाने कल्पे कृष्णावतसके रिमाने सभायां धर्माया, मण सिंहामने, शेष इस तरह से है-(तेण कालेण तेण समण रायगिहे समोसरण जाव परिसा पज्जुवासइ) उस फाल एव उस समय में राजगृह नगरमें भगवान् महावीर का शुभागमन हुआ था। परिपद उन को बदना आदि करने के लिये उनके समीप पहुँची। प्रभुने सबके लिये धर्म का उपदेश सुनाया। लोगोंने उपदेश सुनकर प्रभु की पर्युपासना की (तेण कालेण तेण समएण कपडा देवी ईसाणे कप्पे कपडेसए विमाणे समाए सुहम्माए करसि सीरासणसि सेस जहा कालिए एव अविट्टाअन्न यणा कालीगमएण णेयचा, घर पुचभवे वाणारसीए नयरीत दो जणीओ रायगिहे नयरे दोजणीओ, सावत्धी नयरी दो जणीओ, को सीए नयरीए दो जणीओ रामे पिया धम्मा माया सवओऽवि पानस्स अरहओ अतिए पन्चइयाओ पुप्पाचुलाए अन्ना सिस्सिणीयत्ताए ईसा. णस्स अग्गमहिसीओ ठिई, णवपालिओवमाइ, महाविदेहे वासे सिज्झि हिंति, वुज्झिहिति, मुच्चिहिति, सव्वदुक्खाण, अतकारिति, एव खलु जबू! णिक्खेवओ दसमवग्गस्स) उसी काल और उसी समय वहा कृष्णादेवी जो ईशान कल्प में कृष्णापतसक विमान में रहती थी और । प्रभार छ (तेण कालेण तेण समएण रायगिहे समोसरण, जार परिसा पज्जुवासइ) ते आणे भने ते सभये रागृह नगरमा ભગવાન મહાવીરનું શુભાગમન થયુ તેમને વદન કરવા માટે પરિપદ તેમની પાસે પહોચી સૌને પ્રભુએ ધર્મોપદેશ સંભળાવ્યો ધર્મોપદેશ સાભળીને પરિષદે પ્રભુની પર્યું પાસના કરી ( तेण कालेण तेण समएणं कण्हा देवी ईसाणे कप्पे कण्हेवडेंसए विमाणे सभाए सुहम्माए कण्हसि सीहासणसि सेस जहा कालीए एव अविद्या अज्झयणा कालीगमएण णेयव्या, णवर पु-वभवे चाणारसीए नयरीए दो जणीओ रायगिहे नयरे दो जणीओ, सावत्थीए नयरीए दो जणीभी, कोसपीए नयरीए दो जणीभो रामे पिया धम्मा माया सबओऽवि पासस्स आहओ अतिए पव्वयाओ चलाए अन्नाए सिस्मिणीयत्ताए ईसाणस्स आगमहिसीओ ठिई, णवपलि ओव- माइ, महाविदेहे वासे सिज्झिर्हिति चुज्झिहिति, मुन्चिहिति, सध्यदुक्खाण, जत काहिति एव खलु ज! णिक्सेवमो दसमवग्गस्स) તે કાળે અને તે સમયે ત્યા કૃષ્ણા દેવી-કે જે ઈશાન-કપમાં કૃષ્ણ વત સક વિમાનમા રહેતી હતી અને જેની સભાનું નામ સિંહાસનનું નામ કૃષ્ણા હત–આવી એના પછી - 1 તેમજ १ - ममगारधर्मामृतयषिणी री० ० २ १० १० कृष्णादिदेवीनां चरित्रवर्णनम् १९' यथा कारयाः । एवमष्टा कृष्णराजिप्रभृतीनि अध्ययनानि कालीगमकेन-काली- देवीसदृशपाठेन ज्ञातव्यानि नवर-विशेष यत्-पूर्वभवे वाणारस्या नगर्यो । कृष्ण-कृष्णराजिनाम्न्यौ जन्यौदारिके सजाते । एव राजगृहे नगरे वेबस- वमुगुप्ता नाम्न्यौ जन्यौ, कौशाम्ब्या नगर्या देवसुमित्रा-वसुन्धरा नाम्न्यौ अन्यौ-दारिके समुत्पन्ने । सर्वासा रामारामाभिधः पिता, धर्माधर्माऽभिधा माता । सर्वा अपि पावस्याहतोऽन्तिके प्रव्रजिताः, पुष्पचूलाया आर्यायाः शिष्या रवेन पार्श्वप्रभुणा स्वय मदत्ता । ईशानस्य ईशानेन्द्रस्य अग्रमहिप्यो जाताः । तत्र तासा स्थितिनव पल्योपमानि वर्तते । ततश्च्युत्वा महाविदेहे वर्षे समुत्पध सेत्स्यन्ति, जिसकी सभा का नाम सुधर्म तथा सिंहासन का नाम कृष्ण था आई। इस के आगे का पाठ कालीदेवी के वर्णन में जैसा पाठ कहा गया है वैसा ही है। इसी तरह से कृष्णराजि प्रभृति अध्ययन भी-कालीदेवी वर्णन में पठित पाठ के सदृश ही जानना चाहिये । कालीदेवी के पाठ में और इन आठ अध्ययनोक्त पाठों में जो अन्तर है वह इस प्रकार से है-पूर्वभव में वाणारसी नगरीमें कृष्णा और कृष्णराजि ये दो जनी' -उत्पन्न हुई, राजगृहनगर में रामा और रामरक्षिका श्रावस्ती नगरी में' घन, वसुगुप्ता और कौशायी नगरी में वसुमित्रा एवं, वसुधरा उत्पन्न हुई । इन सब के पिता का नाम राम और माताओं का नाम धर्मा था। ये सयको सय पार्श्वनाथ प्रभु के पास प्रचजित हुई । प्रभुने इन सब को दीक्षित करके पुष्पचूला आर्या की शिष्यारूप से दिया। ये सय इस ईशानेन्द्रकी अग्रमहिषी हुई, । वहां इनकी स्थिति नौ पल्योपम. की है। वहां से चवकर ये मशविदेह क्षेत्र में उत्पन्न होंगी और वहीं से વર્ણનમા જે પ્રમાણે પાઠ કહેવાય છે તે પ્રમાણે જ સમજી લેવું જોઈએ આ પ્રમાણે જ કૃષ્ણરાજિ વગેરે અધ્યયને પણ કાલી દેવીના પાઠમા અને આ ઉક્ત આઠ અધ્યયનના પાઠમા જે કઈ તફાવત છે તે આ પ્રમાણે છે-પૂર્વભવમાં વાણારસી નગરીમાં કૃષ્ણ અને કૃષ્ણારાજ આ બને ઉત્પન્ન થઈ રાજગૃહ નગરમાં રામ અને રામક્ષિકા શ્રાવતી નગરીમા વસૂ, વસુગુપ્તા અને કૌશાની નગરીમા વસુમિત્રા અને વસુધરા ઉત્પન્ન થઈ એમના પિતાનું નામ રામ અને માતાનું નામ ધમ હતું એ બધીએ પાર્શ્વનાથ પ્રભુની પાસે પ્રવજ્યા ગ્રહણ કરી હતી પ્રભુએ સને શિક્ષિત કરીને પુષ્પચૂલા આર્યોને શિષ્યાઓના રૂપમાં સેપી હતી એ બધી ઈશાનેન્દ્રની અગમહિલીએ થઈ ત્યાં તેમની સ્થિતિ નવ પામની છે ત્યાથી ચવીને એ બધી મહાવિદેહ ક્ષેત્રમાં ઉત્પન્ન થશે અને ત્યાંથી જ સિદ્ધ- ܕܙ । -- - भोत्स्यन्ति, मोक्ष्यन्ति सर्व दुयानामन्त करिष्यन्ति । एन मलु हे जमू निजे. पको दशमवर्गस्य ।। सू०१५॥ ॥ इति धर्मकथानां दशमो वर्गः समाप्त ॥१०॥ मूलम्--एवं खलु जंवू समणेणं भगवया महावीरेणं आदि- गरेणं सयंसबुद्धेणं पुरिसोत्तमेण जाव सपत्तेण धम्मकहाणं अयम? पण्णत्ते ॥ ॥ धम्मकहासुयक्खधो समत्तो दसहि वग्गेहिं । ॥णायाधम्मकहाओ समत्ताओ॥ '- टीका-सुधर्मास्वामी कथयति-' एव खलु ' इत्यादि । एक खलु हे जम्बूः! श्रमणेन भगवता महागीरेण आदिकरेण तीर्थकरेण स्वय सम्बुद्धेन पुरुषोत्तमेन सिद्ध पद की भोक्ता पर्नेगी केवलज्ञानरूप आलोक से ममस्त चराचर पदार्थों की ज्ञाता बने गी। द्रव्य एव भावरूप समस्त कर्मों से छूटजावेंगी इस तरह ये वही से समस्त दुःखों का अन्त करने वाली होंगी। इस प्रकार हे जवू ! यह दशवेवर्ग का निक्षेपक है। ॥ दसमवर्ग समाप्त ॥ E'राचे खलु जबू!' इत्यादि । टीकार्थ-(एव खल जब! समणेण भगवया महावीरेणं आदि: गरेण,तित्थगरेण सेयसवुद्धणं पुरिसोत्तमेणं जाव सपत्तेण धम्मकहाणं अयमढे पण्णत्ते) अप ज बूस्वामी से श्री सुधमास्वामी करते हैं कि हे પદ મેળવશે એ બધી કેવળજ્ઞાન રૂપ, આકથી સમસ્ત ચર અને અચર પદાર્થોનું જ્ઞાન મેળવશે દ્રવ્ય અને ભાવરૂપ બધા કર્મોથી મુક્ત થઈ જશે આ પ્રમાણે એ બધી ત્યાથી જ બધા ને અત કરનારે થશે આ પ્રમાણે હે જી ! એ દશમાં ધાને નિક્ષેપક છે દશમો વર્ગ સમાપ્ત एव खलु जबू! इत्यादि- (एव खलु जबू! समणेण भगवया महागीरेणे आदिगरेण तिस्थगरेण सय सवुदेण पुरिसोत्तमेण जीव सपत्तेण धम्म कहाण अयमद्धे पणत्ते ) । r ।
- 7 ममगारधर्मामृतवषिणी टी० शु.२५० १० कृष्णादिदेवीनां चरित्रवर्णनम् ८५१ यावत् सिद्धिगतिनामधेय स्थान संप्राप्तेन धर्मकथानामयमर्थ प्रज्ञप्तः ॥ ॥ धर्मकथानामको द्वितीयः श्रुतस्कन्धः समाप्त ॥ इति श्री-विश्वविख्यात-जगद्वल्भ-प्रसिद्धवाचकपञ्चदशभापाकलितललितक- लापालापक-प्रविशुद्धगद्यपद्यनैकग्रन्धनिर्मापक-वादिमानमर्दक-श्रीशाहूच्छ- ।। त्रपतिकोल्हापुरराजप्रदत्त-'जैनशास्त्राचार्य ' पदभूपित-कोल्हापुरराज- गुरु-बालब्रह्मचारि-जैनाचार्य-जैनधर्मदिवाकरपूज्यश्री घासीलाल- 181 चितिविरचिताया-ज्ञाताधर्मकथासूनस्यानगारधर्मामृतवर्पि- ण्याख्या व्याख्या समाप्ता॥ जबू! आदिकर, 'तीर्थङ्कर, स्वय 'सधुद्ध पुरुषोत्तम, यावत् सिद्धिगति नामक स्थान को प्राप्त हुए ऐसे श्रमण भगवान महावीर ने धर्मकथा नामक द्वितीय श्रुतस्कंध का पूर्वोक्तरूप से अर्थ प्रज्ञस किया है । (धम्म- कहाँसुयक्ख धो सिमत्तो दसहिं वग्गेहिं ) धर्मकथा नामका यह द्वितीय श्रुतस्कघ दशवर्गों में समाप्त हुआ है । इस तरह ( णायाधम्मकहाओ समत्ताओ) यह ज्ञाताधर्मकथासूत्र समाप्त हुआ। श्री जैनाचार्य जैनधर्म दिवाकर पूज्य श्री घासीलालजी महाराज कृत " ज्ञाताधर्मकथासूत्र "की अनगारधर्मामृतवर्षिणी व्याख्या समाप्त ।। હવે જખુ સ્વામીને શ્રી સુધમાં સ્વામી કહે છે કે છે જન્! આદિકર ત કર, સ્વય સંબુદ્ધ પુરૂત્તમ ચાવતું સિદ્ધગતિ નામના સ્થાનને પ્રાપ્ત કરી ચૂકેલા એવા શ્રમણ ભગવાન મહાવીરે ધમકથા નામના બીજા કુતરક वाहत ३३ अयप्रपित ज्या छ (धम्मकहा सुयवधो समतो दसहि घग्गेहि ) या नाम मा uीने श्रुत२४ ५ ६२ कभी पूरी यया 2 21 प्रभाव (णायाधम्मकहाओ समत्ताओ) ज्ञाता या सूत्र ५ई ययु શ્રી જૈનાચાર્ય જૈનધર્મ દિવાકર, પૂજ્ય શ્રી ઘાસીલાલજી મહ રાજ કુત “જ્ઞાતાધર્મકથાસૂત્ર” ની અનગારધર્મામૃતવર્ષિણી વ્યાખ્યા સમાપ્ત ધને 1 11 - . " M 1- -छात्रमशस्ति:- फाठियावाडदेशेऽस्ति, राजकोटपुरे शुभे कोठारीहरगोविन्द काकानाम मसिदिमान् । तस्यास्तिभार्यापरमा मुशीला, धर्मानुरक्तागवादिता । शान्तिप्रिया दीनदयाद्रमावा, नाम्ना प्रसिदा बिमारिणीसा ॥२॥ दिनेशचन्द्रस्तनयोऽस्ति यस्य, कुलस्य दीपः सरलसमा कन्या सुशीला सरला नितुष-सदा-प्रमोदाप गास्थिति॥३॥ व्याख्यानभवने तस्य, ज्ञाताधर्मकयारके। घासीलाछेन मुनिना कता टीका सता मुदे॥४॥ द्विसहस्रचत् सख्ये, विक्रमान्दै रवा दिने । माघे शुक्छे च पञ्चम्या, सम्पूर्णा धर्मवर्षिणी ॥ ५ ॥ काठियावाडदेश में राजकोट नामका अच्छा नगर है। अब में- कोठारी हरगोविन्दकाका रहते हैं। इनका सुशीलभार्याका नाम रुक्मिणी हैं। यह गृहकार्य में बहुत चतुर है। धर्मात्मा है, शान्ति प्रिया है एवं दीन दुःखियों के ऊपर सदा दया भाव रखती है । काका का कुल दीपक, एक दिनेशचन्द्र नाम का पुत्र और जितु नाम की कन्या है। ये दोनों माता पिता के प्रमोद के स्थान भूत हैं। मुझ, घासीलाल मुनिराज ने उन्ही के व्याख्यान भवन में ददर कर विक्रम संवत् २००४ दिन, रविवार माघशुक्ला पचमी के दिन जाता धर्मकवाड, सूत्र की यह टीका रचकर समाप्त की है। કાઠિયાવાડ પ્રાતમાં રાજકેટનામે એક સરસ રમ્ય નગર છે, તે કેકારી હોવિંદ કાકા રહે છે તેમની સુશીલ પત્નીનું નામ રુકિમણી ક તેઓ ગૃહકાર્યમાં બહુ જ ચતુર છે, ધર્મામા તેમજ શાતિ પ્રિય છે તેઓ ગરીબ દુખીઓના ઉપર હમેશા દયાભાવ રાખે છે 'કાકાને કુળદપક એક દિનેશચદ્ર નામે પુત્ર અને જિતુ નામે એક કન્યા છે. આ બને માતા પિતાના પ્રમોદના આશ્રયસ્થાને છે. મે ઘાસલાલ મુનિરાજે તેમના જ વ્યાખ્યાન ભવનમાં રહીને વિરામ સવત ૨૦૦૪ રવિવાર માઘ શુકલા પચમીના દિવસે જ્ઞાતાધર્મકથા સૂત્રની આ ટીકા રચીને પૂરી કરી છે *- ।
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