Shree Jubilee Naagari Bhandar Bikaner

Sakharam Baendar Tendulkar

Vijay Tendulkar · 2011/03

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सखाराम वाइन्डर
मूल लेखक
विजय तेंडुलकर
अनुवादिका
सरोजिनी वर्मा

GDSUN 12 USD लोकभापती प्रकाशन १५-ए महात्मा गांधी माग इलाहाबाद-

नाटक के हिन्दी रूपान्तर का सर्वाधिकार अनुवादिका
के पास है। लिखित अनुमति और उसकी देय
रायल्टी के बिना नाटक को मंच-प्रस्तुति अथवा
किसी रूप में उसे उद्धृत करना गैरकानूनी होगा।
लोकभारती प्रकाशन
१५-ए, महात्मा गांधी मार्ग
इलाहाबाद-१ वारा प्रकाशित
प्रथम संस्करण: १९७३
मूल्य:६.००
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श्रीमती सरोजिनी वर्मा
लोकभारती प्रेस
१८, महारमा गांधी मार्ग
इलाहायार द्वारा मुद्रित

विजयी भाई साहब और कचन को

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आखिर क्यो । आखिर 'सखाराम बाइडर' पर इतना होहल्ला क्यो' महाराष्ट्र सरकार के सेन्सर ने इस नाटक पर प्रतिबन्ध लगाया, मुकद्दमेवाजी हुई-~-शोर मचा-फिर कोर्ट से प्रतिबघ हटाने का आदेश हुआ, सनात अभिजात्य वर्ग ने पहले नाक-भौ सिकोडी फिर इस नाटक ये दजनी प्रदशनो मे अपने लिए सीटें बुक करायी, अखबारो ने इसके पक्ष विपक्ष दोनो तरफ टिप्पणियां जडी, न्यस्त स्वार्थों ने नाटक- कार पर कीचड़ उछाला और उनके साथ समाज के नैतिक ठीकेदारो' ने शारीरिक हिंसा करने का दु साहस किया । माखिर यह सब क्यो? सम्भवत इसीलिए कि रगमच के माध्यम से नाटककार विजय तेंडुलकर ने 'सखाराम बाइडर' को इस तरह निर्मित किया कि वह गलाजत से भरी दिखावटी सभ्रान्तता को पहली बार इतने सक्षम ढग से चुनौती देता है । रटे रटाए मूल्यो को सखाराम ही नहीं इस नाटक के सारे पात्र अपनी पात्रता की खोज मे ध्वस्त करते चले जाते हैं । जिन नकली मूल्यो को हम अपने ऊपर आडबर की तरह थोप वर चिकने चुपड़े बने रहना चाहते हैं, उसे सही सही इस आइन मे निममता से उघडता हुआ देखते है । सखाराम बाइटर' वही आइना है । प्रचलित जीवन के मूल्यो को चुनौती देना अब तक केवल बडे भाद. मियो का कार्य माना जाता था। सखाराम बाइडर कोई बडा आदमी नही है । वह तो एक अत्यात साधारण प्राणी है किन्तु उसकी सामा- जिकता या उसकी अपनी निजता जिस प्रकार नैतिकता को स्वीकृत मान्यताओ पर प्रश्न चिह्न लगा देती है। वह अभूतपूर्व है उसके जीवन के मूल्य तेंडुलकर के अनुसार-उसो के जीवन-आचरण से नि सृत होते हैं । वह कोई भी बाहरी मूल्य स्वीकार करने को तैयार नहीं है। यह भी सहज सम्भव है कि सखाराम अपने मुक्त यौनाचार को अपने जिन को पर उठाकर चलना चाहता है सम्भवत सक्षम रूप से उस भार को ढोने के लिए उसके कधै उतने मजबूत न दीखें । किन्तु उसके भीतर का एक आत्मविश्वास जिसके द्वारा वह अपने सही-गलत आचरण से सारे प्रतिमानो को लेकर खडा होता है-मैं समझती हूं कि 'करनी' का इतना साहस भी आज के 'वक्बासी क्थनी युग' में अत्यन्त दुर्लभ है । सखाराम का महत्व इसी दृष्टि से है । जिन्दगी जैसी है उसे उसी ही रूप में सहज स्वीकार करके चलना और उस पर अपने ही आचरण की निजी मुहर लगा देना चाहे उससे अन्ततः एक निरर्थकता की ही उपलब्धि हाथ माए-समस्त सखारामों को नियति है। नाटक का ऐसा खुलापन खेलनेवालो के लिए जितनी बड़ी चुनौती है, उससे कम देखने वालो के लिए नही । भाषा के स्तर पर सारे पान बडी खुली और ऐसी बाजारूपन से सयुक्त भापा का प्रयोग करते हैं जिन्हें हमने अकेले-दुकेले कभी सुना जरूर होगा किन्तु उसे अपनी सस्कारिता का अश मानने से सदैव कतराते रहे हैं । पूरे नाटक मे कथावस्तु की विलक्षणता न होते हुए भी पानो का आपसी सयोजन भाषा के जिस स्तर पर नाटककार ने किया है, वह नाटकीयता को उभारने में अद्भुत रूप से सफल हुआ । प्रमाणस्वरूप वम्बई और दिल्ली जैसे नगरो मे इस नाटक के अनेकानेक प्रदर्शन हुए जिन्होंने प्रबुद्ध दर्शकवर्ग को मत्रमुग्ध रखा। मुझे जब यह नाटक बम्बई से श्री सत्यदेव दुबे ने अनुवाद करने के लिए भेजा तो मेरे सामने भारो धर्म-सक्ट उपस्थित हुआ। मराठी वाङ्मय का बहुत-सा अनुवाद कर चुकी हूँ। तेंडुलकर के कई नाटक भी अनूदित कर चुकी थी किन्तु यह नाटक मेरी अपनी उत्तर प्रदेशीय-सस्का- रिता के लिए सचमुच ही एक पर्म-सकट पैदा करता था। जैसा मैंने कहा है भापा के स्तर पर नाटक अभिनेता, निर्देशक और दर्शन के लिए तो चुनौती है हो सबसे अधिष तो अनुवादक के लिए है । मराठी की इतनी बाजारू जनभाषा से परिचित होने के लिए उस वर्ग का सहन सम्पर्क चाहिए था । उसे हिन्दी मे उतारने के लिए भी उसी दुःसाहस को अनिवार्यता थी । नाटक मेरे लिए हर तरह से चुनौती था । पहले हिम्मत छोड दी थी किन्तु नाटक खेलनेवालो के उत्साह को देखकर मुझे अपनी उस 'तथाकथित सस्कारिता' को तिलाजलि देकर-(कहूं कि बेहया होकर ।) इस नाटक के साथ सर्जनात्मक स्तर पर जूझना पडा। भाषा का चयन करते समय मैंने कई बातो का ध्यान रखा है। मूल मराठी में नाटककार को अपनी भाषा के साथ खेलने का जो सहज अधिकार प्राप्त है, वह तो मुझे हिन्दी में प्राप्त नहीं है और, जितना है भी उसका मैं पूरी तरह से उपयोग नहीं कर सकी । मुझे पात्रो की भापा की ऐसी बनावट रखनी पडो जो हिन्दी होते हुए भी केवल हिन्दी प्रदेश के दर्शकों तक ही नही वरन् हिन्दी के माध्यम से दूसरी भाषाओ के रसग्रहण करने वाले पजाब, बगाल, गुजरात और तमिलनाडु में बसने वाले नाट्य-प्रेमियो तक के लिए सहज ग्राह्य हो । कुछ आलोचकों ने इस नाटक की प्रस्तुति की चर्चाओ मे इसकी भाषा पर सस्कारग्रस्त होने का जो आरोप लगाया है । वह किसी अर्थ मे शायद सही भी हो। इस नाटक के आलेख मे में एक विशिष्ट क्षेत्र को ध्यान में रख कर भाषा को सहज ही ऐसा बना सकती थी जो हिन्दी क्षेत्र की लोकभापाओ को समृद्धि से जुड़कर दूसरा रग पैदा कर सकती थी। किन्तु वह 'भोज- पुरी फिल्मो' की तरह एक ऐसी आचलिकता उत्पन करती जो दूसरे प्रदेश के दर्शको के इस बोध पर प्रतिरोध ही लगाती। फिर भी मैंने भाषा में अब दुबारा बहुत से ऐसे परिवर्तन कर दिए हैं जो उनके लोक- रग को उभारने में सहायक होगे । वसे अलग अलग प्रदेशो मे यह नाटक खेलनेवालो से मेरा अनुरोध है कि वे नाटक के पात्रो की बोलियो मे यदि क्षेत्रीय पुट का प्रयोग स्वतः कर लेंगे तो नाटव मे अधिक आन्द आयेगा। इस नाटक को मच पर देराकर ही इसका सपूर्ण रस ग्रहण किया जा सकेगा। पात्र ससाराम पाइन्डर को नाटकवार तेंडुलकर न यहीं से ज्यो का त्यो उठा लिया था। यह उसकी प्रामाणिक्ता की कसोटी न भी हो तो भी आप उससे सीधे-सीधे साक्षात्कार करें और उसके अपन जीवन-दर्शन को समझे । इसके लिए आपको कोई बाहरी लेबुल लगाने की जरूरत न पडे मेरा बस यही आग्रह है। -सरोजिनी वर्मा कातिको पूर्णिमा १० नवम्बर, १६.३J

पात्र-परिचय
.
• सखाराम बाइन्डर
लक्ष्मी
. दाऊद
.चपा
• चपा का पति

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अंक पहला Relanga

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पहला दृश्य
शाम का समय । खपरला घर । जैसा
गांवों में होता है। बाहर का कमरा और
उसके पीछे रसोई दिखाई दे रही है।
घर के याहर बच्चों का शोरगुल...
सखाराम : (बच्चों को संबोधित करते हुए गरजता है) क्या है ? है
क्या यहाँ ? क्या देख रहे हो ? नगा नाच हो रहा है क्या
कोई यहाँ ? भागो यहाँ से--मागो यहाँ से भागो नही तो
साले मार-मार के भूसा भर दूंगा, चलो भागो-
एक स्त्री को साथ लिए हुए दरवाजा
खोलकर अंदर आता है। मध्यम यप
का । रूखे किन्तु तेज व्यक्तित्व का । भूछे
तया दाढ़ी के काले-सफेद खूटे पड़े हुए।
बदन पर गंदा कुर्ता, षोती और जैफेट ।
सिर पर ऊलजलूल तरीके के लगी हुई
टोपी। पैर मे चप्पल । आगन्तुक स्त्री
बहुत भयभीत-सी । पोटली छाती पर
कसकर दबाए हुए । कृश शरीर परपरा
रहा है । दीवार से सटी-सिमटी खड़ी है।

सखाराम बाइन्डर सखाराम : माओ । देखभाल लो ठीक से घर । इसी घर में रहना है अब तुम्हे । घर भी मेरी ही तरह है। बाद में ची चपड मत करना। वह जैसे-तैसे पूरे घर पर एक नजर डालती है। : ठीक से देख दाख लो। समझ मे आए तो डालो पोटली नीचे नही तो ऐसी ही निकल जाओ बाहर । यह राजा का महल नही, सखाराम बाइडर का घर है । सखाराम बाइडर तुम्हारे पहले वाले आदमी की तरह नहीं है । वह क्या है यह अलग से समझना पडेगा तुम्हे । सब घोडे बारह टके वाला हिसाब यहाँ नही चलेगा। दिमाग गरम है अपना । गुस्सा आया तो मार मार के भुरता बना दूंगा । क्या समझी ? मुंहफट हूँ मुंह मे गाली और बीडी हर वक्त मौजूद रहती है । सारा गांव यह कहता है । हालत बहुत अच्छी नहीं पर खाने को दोनो टाइम जरूर मिलेगा । दो धोती शुरू मे । फिर साल मे एक । वह भी बढिया नही, मामूली । बाद मे किटक्टि सुनूंगा नही । घर का सब काम कायदे से और बिना भूल- चूक के करना पडेगा । निकम्मापन दिखाई दिया नही कि घर से बाहर । कोई रियायत नहीं । बाद मे तोहमत न देना। अपने घर मे राजा की तरह रहता हूँ। गांव में मियां बीबी की तरह रहे या नही, घर, घर जैसा चाहिए मुझे । क्या समझो वह जैसे तैसे सिर हिलाती है। : घर के पीछे एक कुआं है । पाखाना दूर है । गर्मी मे कुओं सूख जाता है । पानी नदी से लाना पडता है। नदी सवा मील पर है । बरसात में इस तरफ बिच्छू निकलते हैं । घर से बाहर विना काम आना-जाना मुझे पसन्द नहीं । घर में

सखाराम बाइन्डर
१६
कोई माया तो सिर उठाकर बोलना नहीं। कोई गर आदमी
आए तो मुंह पर आंचल रखकर सिर्फ दो एक जरूरी बात
करना । मैं न रहूं तो घर मे किसी को बुलाना नहीं 1 मैं
भगेडी, गंजेडी, रडीबाज चाहे जो होऊ-बल्कि हूँ भी ।
दारू पीता हूँ। पर अपने घर मे मेरी कदर रहनी चाहिए
इस घर का मालिक मैं हूँ। मेरा अदव मानकर चलना
होगा । क्या समझी ? सब बात कबूल है कि कहना है
कुछ कुछ कहना हो तो बाहर का रास्ता नापो चटपट ।
इस घर मे कहना सिर्फ मेरा ही चलता है, दूसरो को उसके
हिसाब से चलना होगा। क्या समझी ? किसी बात पर
'क्यो नही सुनता मैं । एक बात और-च्याही औरत को
तरह रहना पडेगा । बाकी अपने आप समझो-
वह वयो-बबी नजर घुमाकर सारे घर
को देख रही है।
• करार मजूर है ? अगर मजूर है तो भीतर चाय मे जाकर
लगो । चूल्हे के पास दूध ऊघ होगा, जामो ।
यह हडबडा कर जल्दी से भंवर खिसक
जाती है । पोटली एक तरफ रखकर
चूल्हे के पास जाती है।
जब तक यहां हो किसी से डरने का काम नही । यह ससा-
राम बाइडर सब का काल बनकर बैठा है यहाँ । परमेश्वर
के बाप से भी नहीं डरता।
वह आतकित होकर स्तव्य खड़ी है।
सब करता हूं, बस एक झूठ नहीं बोलता। बताया नो,
रहोबाजी करता हूँ, दारूबाजी करता हूं। जो पृष्ठ दाता
हूँ डके की चोट पर । सब के मुंह पर यह मदता वित
कोठे पर कितनी बार चढा जिसको पूटना हा शाबर पूरे

२०
सखाराम बाइन्डर
कोठा भी दिखा दूंगा कहोगे तो। आजकल नही जाता।
गांव मे साले एक सिरे से सब चोरी-छिपे झक मारते हैं-
सब घाट पानी पीकर बगुला भगत बने फिरते हैं । सब
गुपचुप गुपचुप । अरे कलेजा हो तो खुल्लम खुल्ला करो न
जो करना है । है क्या उसमे ? साला यह शरीर, यह
वासना का भण्डार है भण्डार । इसे बनाया किसने है ? उसी
ने तो। तो क्या उसे पता नही? बाप है वह बाप सबका ।
तुम्हारा भी।
बीडी सुलगाकर स्ट्रल पर बैठ जाता है।
हम कोई संत महात्मा थोडे ही हैं ? आदमी हैं हम । अपनी
खुजली पूजा पाटी से नहीं मिटती कबूल करता हूँ। कोई
चीज चाहिए तो बस चाहिए । उसमे चोरी कैसी? किससे
चोरी? अपने बाप से?
यह चाय बनाने के लिए चूल्हे के पास
बैठती है। पर कोई चीज उसे मिल नहीं
रही है। घबराई हुई आखिर वह उट
कर रसोई के दरवाजे पर माती है।
धीरे से खेखारती है।
सखाराम : (जरा सुखी होते हुए) हां बोलो । बडा मुंहफट हूं मैं ।
सुनकर तरलीफ होती होगी तुम्हें । जनम से ही मैं ऐसा
हूं। पैदा हुआ तो नगा। मां कहा करती थी कि मरे को
ह्या शरम ही नहीं है । बाह्मण के घर, कहती थी कि चमार
पैदा हुआ है । अब चमार पैदा हुआ तो तुम जानो । वह
षया मेरे बरम थे?
यह बहुत सकुधाई सो सड़ी है।
तुम ग्राह्मण के घर की मालूम पडतो हो। तुम्हें उस हिसाब
से तकलीफ होती होगी।
.

सखाराम बाइन्डर
२१
वह इनकार में सिर हिलाती है। कुछ
कहना चाहती है।
: लो, यानी ब्राह्मण के घर की न होकर भी तुम ब्राह्मण और
मैं ब्राह्मण के घर जनम लेकर भी चमार । साला अच्छा
मजा है । ग्यारह बरस का था तभी घर से भाग गया। बाप
हाथ से मार खा-खाकर जी उकता गया था। मेरा सभी
काम काटता था उन्हें । जैसे उनका दुश्मन होकर उनके
पर पैदा हुआ था मैं । जब देखो बस पीटता ही रहता था।
किसी चीज की जरूरत है शायद, क्यो ?
वह स्त्री : (झुकी गर्दन) दियासलाई नही है अन्दर ।
सखाराम : (अपने पास की दियासलाई फेंककर) तो लो न । इस तरह
शरमाने की जरूरत नहीं है । इस घर में जो लगे मांग लो।
मगर न मिले तो हुज्जत न करो। यह राजा का नहीं
सखाराम वाइडर का महल है ।
यह भीतर जाते-जाते ठिठक जाती है।
सखाराम : अब और क्या ? चाय का चूरा होगा वहीं टीन के डिब्बे
मे, कि खतम हो गया? पहली वाली ने बहुत सर्च कर
दिया-बहुत चाय पीती थी-अभी शुक्रवार को ही तो गई
यह स्त्री : (इनफार में सिर हिलाफर) ठाकुर जी कहां हैं ?
सखाराम : अच्छा अच्छा ! ठाकुर ? होगें वही कहीं भीतर । क्वाड
मे । उससे पहली वाली को या चस्का-दो-चार तस्वीर
थी शायद । पता नहीं, है कि उठा ले गई-बाद में यह
आई-वाद वाली । उसे उस सवा कुछ नहीं था-वह
अपने मरद के कुते की पूजा किया करती पो-जान लेने
चला था उसकी-और वही उसका भगवान । जान लेनेवाला
भगवान और जान बचाने वाला इसान । यहाँ दो वरस तक

२२ सखाराम बाइडर उसके कुर्ते को पूजा किया करती थी । तपेदिक हो गया इसलिए मिरज के अस्पताल मे शुक्रवार को पहुंचा दिया था। वही मर गई। कुर्ता तकिए के नीचे तब भी दबा था। ए सुनो । चाय मे शक्कर बहुत लगती है मुझे और पत्ती भी ज्यादा डालना । गाढी बने, लाल रग की । जाओ जल्दी 1 करो। वह अन्दर जाती है। चूल्हे के पास बैठते-बैठते अलगनी पर टंगी हुई घोती पर नजर जाती है। पुरानी फटी सी घोतो। उसे एकटक देखती है फिर धूल्हा जलाकर चाय बढ़ाती है । जरा विचार. मग्न होती है । सखाराम जैकेट उतार- कर खूटी पर टांगता है। खिड़की से पाहर कुछ दिखाई दे जाता है। : अरे ए 5 तेरी मां की साले, गाय सब बाड तोड रही है। आँख फूटी है क्या ? हवा इघर से । पैसे लगे हैं बाड बनवाने मे । अन्दर वह स्त्री यह सम असा होने पर मांखें कसकर बद कर सेती है। सखाराम खूटी से मृदग उतारकर बैठ जाता है। मृदग गोद में रखता है। यजाना शुरू करता है। यहा अच्छे ! वह पाय लेकर जाती है। हरती है और प्यान माकषित परने के लिए संक्षारती हो, सामो दो।

ससाराम बाइन्डर यह देती है । चोय तश्तरी मे डालकर चूंट भरता है फिर गरजता है। - : आ-हा बीज यह भयभीत है। । बहुत अच्छे । यह बहुत भयभीत । चाय पीकर प्याला- ०२ तश्तरी वह एक तरफ रखता है । वह आश65 उसे उठाकर अन्दर जाने लगती है। : तुम भी पी लो चाय । जो खाना पीना हो अपने आप खाआ पिया । यह न सोचो कि कोई कहने जायेगा । यह सब लाड यहाँ नही होने वाला। वह अन्दर जाती है । एक कटोरी मे चाय डालकर फूंकने को होती है कि बाहर पुकार, "सखाराम है क्या ?" (चिल्लाकर) कौन-दाउद मियां ? आओ आओ ! अन्दर आओ। वाव आता वाउव : सलाम वालेकुम सखाराम भाई । सखाराम (चिल्लाकर) और चाय देना बाहर । (दाउद से) वालेकुम सलाम दाउद भाई-आओ बैठो। दाउद : सुना नया पछी लाये हो सखाराम : हाँ । बस चला ही आ रहा हूँ। हुआ होगा-आधा घण्टा । तुम्हारा क्या हाल चाल है ? दाउद : हमारा क्या हाल होगा भाई, चल रही है गाडी किसी तरह (नजर अन्दर) कहाँ से लाये। सखाराम. सोनावण से । खबर मिल गई थी इसीलिए सबेरे ही चला गया था। धरमशाले मे थी। ? ।

२४ सखाराम बाइन्डर । दाउद । दिखाओ तो जरा । (नजर अन्दर की तरफ) सखाराम : देखने लायक कहो तो इस दफे कुछ नही है। किसी समय चेहरा-मोहरा ठीक ठाक रहा होगा पर अब तो मरद की भार वा-खाकर सारा नमक भर-भरा गया है। फप में चाय लिए हुए वह वरवाजे पर खड़ी है। तुम्हे बताऊँ दाउद मियां, ये सब के सब मरद साले पोने आठ, हिंजडे खुद तो बच्चा पैदा कर नहीं पाते गुस्सा उतारते हैं औरत पर । उसो को पीसते कुंचते हैं नामर्द साले । अरे वह तो विचारी ठहरी बेजबान जानवर । मिट्टी का लौंदा समझो- दाउद उसे दरवाजे पर खडी देखकर सखाराम को इशारे से चुप कराता है । सखाराम : (दरवाजे तक जाकर उसके हाथ से चाय लेकर वापस माता है) उन सालों की तरह की नामर्द जमात मैंने नही देखी । उससे तो हम कही अच्छे हैं । दाउद चाय का प्याला पकडता है- चेहरे पर झेप का भाव । हालांकि ऐसा कुछ नही है, मौके मौके हम भी दो हाथ लगा देते हैं। पर अपनी कमजोरी छिपाने के लिए नहीं। यह मृदग जैसे तपने के बाद बढिया बजने लगता है ना वैसे ही हमारा भी है । हाँ। वह रसोई में कुछ खोजने लगी है। : अच्छा हुआ यार । कि हमलोग किसी के ब्याहे मरद नहीं हुए । जो हैं उसी में मस्ती है । मिलता सब कुछ है, बधन कोई नहीं। ऊब लगी, उमे लगी, अपने को लगी। चस साले सुला रास्ता । खतम खेल । सालो बेकार की मगज.

सखाराम बाइन्डर २५ 7 ? पच्ची नहीं-उसको मआसरे का आसरा और अपने को घर का खाना-सस्ते मे सब भूख मिट जाती है। उठ कर किसी के दरवाजे जाना नहीं पडता । और फिर घर मे वह दव कर रहती है । ठीक से काम धाम करती क्योकि उसे मालूम है कि गलती होते ही बाहर का रास्ता नापना पडेगा। वैसे औरत की जात होती चतुर है । पर ब्याह होते ही वह गाफिल हो जाती है दाउद मियां । वह सोचती है कि आदमी अब जायेगा कहाँ । मगर वह भी ठहरा एक पाजी। यह उसे फंसा लेता है पर आप नही फंसता । शादी करके भी छरिदे पछी की तरह उडता फिरता है । और क्या । मैं तो साफ बात करता हूँ। लाग-लपेट करता नही । अपने को उमसे करना ही क्या है अपन किसी के लगते ही क्या हैं मृदंग के पास बैठता है आगे सरफ फर मृदग उठाकर गोद मे रखता है। यह है न मृदग? आज गोद मे है । समय आया तो ऐसे उठाकर छप्पर पर फेंक दूंगा । कुछ नही लगेगा। पलटकर इसे देखूगा भी नही । मृदग पर थाप मारता है। सब चीजें जव एक दिन खतम हो होनी हैं तब फिर उस साली से लिपटे रहने से क्या फायदा क्यों लिपटे रह ? विसी का नुकसान न करके अपनी जिन्दगी मौज से बिता दिया बस । मगर हो । फरेवी और झूठा नही होना चाहिए । पाप परो तो छाती पर चढ़कर कह दो कि पाप रिया हमन । सजा भुगतने के लिए तैयार रहना चाहिए। उसम क्या चोरी, उसने जैसे पैदा किया है वैसे ही तो सामन आमोगे। ऐसा काम करो कि बाकी चाहे जो लगे, उसके लिए परम न . .

२६ सखाराम बाइन्डर लगे । शरम नहीं लगनी चाहिए । वाउन : हाँ सखाराम भाई, हां (संकोच में) लेकिन जरा वह निकालो सखाराम : क्या? चिलम ? (वाउद उसे चुप रहने का इशारा करता है) अरे मियो ! तो नाम लेने में क्या शरमाते हो ? कोने में जाकर चिलम आदि सामान निकालता है। : गांजा क्या कोई रईस को रखेल है कि सारा मामला गुप- चुप गुपचुप ? अरे यह तो रंडी है रडी। कोई चोरी चमारी का मामला नही। जिसका जितना जी चाहे तबियत भर ले । दो दम मार ले | तुमसे कहता हूं दाउद मियां ! रंडी जितनी जल्दी भगवान के पास पहुंच जायेगी न, उतनी जल्दी कोई नहीं। कोई भी नही पहुँच सकता। उसकी वजह यह है कि उसे जरा भी शरम नहीं होती। खुला खेल । परमात्मा के सामने भी वह सोना तान कर ही जायेगी। कहेगी, पेट के लिए जिन्दा रही मगर किसी भकुए को धोखा नहीं दिया, तकलीफ नहीं दिया। फंसा कर फरेब नहीं किया। जिसे दिया मजा ही दिया है । आदमजात की खुजली मिटाई है। खुजली ! छोटे-बड़े, लूले-लंगड़े, गरीब-अमीर, बीमार-अच्छा, कुछ देखा नहीं । सब को एक बराबर माना । हे परमात्मा ! पाप किया होगा दूसरों ने, हमने नही । हम पापी नहीं। इसो योच अन्दर के कबाड़ से ढूंद-सांड कर उस स्त्री ने तीन-चार तस्वीर निकाल लो हैं । और उन्हें झार-पोछफर करीने से एक जगह लगा दिया है। : एको, आग लेकर आता हूँ।

सखाराम बाइन्डर
अन्दर जाता है-उसे तस्वीर के सामने
बैठी हुई देखता है।
: आग चाहिए।
वह चौंकती है । उठकर चूल्हे के पास
जाती है।
: खाना सात बजे मिलना चाहिए मुझे । जोधरी को पार
रोटी और साथ मे हरा मिरचा । लहसुन की चटनी उधर
किसी डिब्बे मे होगी। मिरचा डलिया में है। और जोधरी
का आटा उस बड़े वाले डिब्बे मे ।
वह एक थाली मे रखकर आग देती है।
: ऐसे नही चिलम की आग दी जाती।
किनारे पडी हुई पुरानी धूपवानी उठाता
: इसमे दिया करो।
वह देती है।
: तुम्हे भात खाने की आदत हो तो बना लेना । चावल होगे
घर में । पहली वाली खाया करती थी। खोज कर देखो।
दाल भी होगी । मैं भात नहीं खाता ।
वह धुपचाप सुन लेती है। सखाराम
ठिठक कर एक नजर उसे देखता है फिर
आग लेकर बाहर आ जाता है। यह
साना बनाने की तैयारी में जुट जाती
है। एक आरतीवानी मिलती है उसे
उठाकर तस्वीरों के सामने रख देती है।
बाहर दूर पर कहीं मविर का घटा
बजता है यह उस दिशा मे नमस्कार
करती है। बाहर के फमरे मे सखाराम

२८
ससाराम बाइन्डर
और बाउर गांजे में मस्त होकर दम
मारते हैं।
.मो...हो हो ..बम भोले..
......दाउद मियां मजा आ गया
यार...
यह दृश्य अन्धकार में डूब जाता है।
ara
दृश्य दूसरा
मृदंग बजने लगता है। रोशनी होती,
है तो वह स्त्री रसोई में फटी कयरी नुमा
कोई चीज बिछातो हुई दिखाई देती है।
सखाराम बाहर के कमरे में मृदंग बजा
रहा है । वह फयरी बिछा कर भगवान
को नमस्कार करती है और सिर के नीचे
हाय लगाकर लेट नाती है। सखाराम
मृदंग एक तरफ रख देता है।

ससाराम बाइन्डर
२६
सखाराम : बम भोले । (अंगसाई लेफर जोर से जंभाई लेता है फिर
उठकर दरवाजा खोलकर बाहर जाता है।)
मृदंग रुक गया और पदचाप बाहर
की तरफ जाती हुई सुनाई दी तो वह
उठकर बैठ जाती है। बाहर कहीं भजन
हो रहा है । यह उठकर धीरे से बाहर
जाती है। देखती है। चिलम आदि
उठाकर एक किनारे रखती है। झाडू
से जगह को साफ करने लगती है कि
सखाराम आ जाता है। वह चौंककर
एक तरफ सिमट कर खडी रहती है।
: फरो करो, सफाई करो।
खूटी के पास जाकर यह कमोज
उतारता है। रसोई मे जाकर मुंह पर
पानी के छोटे मारता है। इसी समय
उसकी फथरी बिछी हुई देखता है ।
बाहर के कमरे मे आता है। वह स्त्री
उसका बिस्तर बिछा रही है।
• उपर नही । इस तरफ ।
यह घबराकर जल्वो से बिस्तर उठाकर
दूसरी जगह लगाती है। सखाराम गजि
के नशे में भरी-भरी नजर से उसे देखता
हुआ खडा है। वह बिस्तर ठीक करने
के लिए बिस्तर पर यंठकर चावर ठीक
करती है। फिर उठती है।
• उठो मत । बैठी रहो।
यह किनारे हटफर सिर झुकाए-सफाए

सखाराम बाइन्डर
जरा सा उठती है।
: कह रहा हूं उठो नही । सुना नहीं?
वह चुप
: आज यही सो जाओ।
यह यको सी लग रही है। किसी तरह
उठकर अन्दर जाने लगती है।
: सुनो। सोने से पहले पैर दबाने की रीत है यहाँ । बहुत
सी आई और चली गई पर इसमे फेर-बदल नहीं हुआ,
याज भी नही होगा।
बिस्तर पर बैठता है
: बम भोले
वह चुपचाप खड़ी है
: समझ में आया कि नही पर।
यह घबराई हुई सो आफर पर के पास
बैठ जाती है।
: हाँ दबाओ पर । (स्वर में सौम्यता)
वह सकुचाई सो उसके पैर दबाने लगती
: ऊपर तक दबाओ!
वह हिचकिचाती हुई ऊपर तक पर
स्वाती है।
। ठीक से...और तुम्हें खा नहीं जायेगा। बहुत थक गया
आज । सबेरे ही सबेरे सोनावण चला गया। लौटते में
उतनी ही कवायद फिर करनी पड़ी। बहुत चक्कर पड
गया।
वह पैर दवाती रहती है । धुपचाप ।
: अब जरा नाम बता दो अपना।

सखाराम याइन्डर
वह : लछमी !
......
सखाराम : लक्ष्मी ? (उसे एकटक देखता हुआ) अच्छा नाम है । आदमी
का नाम क्या था?
वह चुपचाप पर दवा रही है।
: आदमी का नाम क्या था तुम्हारे ?
यह गुमसुम पैर बनाती रहती है।
: अच्छा अच्छा । नाम लिया नहीं जाता है न ? मुझे यह
सब यादत नहीं..
यह मातो हुई क्लाई रोकती है। आंचल
से आँखें पोछती है ।
: क्या हुआ ? नहीं पूछूगा बस ? तुम सब निकाली हुई औरतें
और बातों में चाहे हो या नहीं, पर इस मामले में सब एक
सी। आदमी की बात आई कि वस भांख में आंसू । वहीं
लात मारकर घर से निकालेगा। जान लेने जायेगा । मगर
वही देवता । ऐसे देवता की तो जूते से पूजा होनी चाहिए।
ये साले सब देवता नहीं, लात के देवता हैं । यह देवता है
हरामजादे ।
यह पाय क्या रही है।
: तुम सब की सब एक ही मिट्टी की हो। मरी हुई मां का
दूध पिये हुए । मुर्दा हो मुर्दा तुम भी । जो लात मारे उसी
के पर चाटोगी।
वह गुमसुम पांव दबा रही है।
: खाना खाया?
वह पर बाती रहती है।
: मैं क्या पूछ रहा हूँ? (घावर दूर फेंक देता है।)
लक्ष्मी : (जरा डरी हुई) भाज चतुर्थी है । फिर भूख भी नहीं थी।
सखाराम : (यह उत्तर अनपेक्षित लगता है ) इसीलिए उपवास ?

सखाराम बाइन्हर लक्ष्मी सिर हिलाकर हामी भरती है। सबेरे तो लाया ही न होगा। फल ? लमो इनकार में सिर हिलाती है। : क्या मतलब ? उपवास करके जान देनी है? लक्ष्मी : आदत है मुझे। सखाराम : क्या आदत है ? इस घर मे यह सब नहीं चलेगा यहाँ पर दोनो समय कसकर खाना होगा । जी तोड सेवा करनी होगी । सब उपास कुपास बन्द ! कान खोलकर सुन लो । लकमी कुछ बोलतो नहीं। :जाओ सो जामो अब । लक्ष्मी : (संकुचित सो) एक बात पूर्वी ? सखाराम : पूछो न- लक्ष्मी : (हिचकिचाती हुई) रुई कहाँ रहती है ? भगवान के आगे दिया जला देती। सखाराम : पहले वाली कही रखती थी मुझे पता नहीं । मैंने कभी जानने की तबालत नहीं उठाई. चिलम कहाँ रहती है, मृदग कहाँ रहता है यह पूछो तो बता सकता हूँ उसमे अपना राज है । न हो क्ल ला दूंगा रुई । और क्या । लक्ष्मी : पहले वाली कंसी थी? सखाराम : पहले वाली । यह बात जरूर पूछेगी सब । वाद वाली को पहले वाली के बारे में जरूर पता हो जाय । छः हो चुकी पर इसमें फरक नही पहा। पहले पाली पपा पी। विस्तर पर भी तो नहीं टिकी ज्यादा । सूखती ही चली गई दिन ब दिन । कमजोर होती जा रही थी। मांस तो जैसे था ही नही, हही हो हड्डी । मगर ईमानदार पो बहुत । सिर उठा कर भी देखा नहीं। उलटपर जवाब देना तो बही यात 1 मिरज के अस्तपताल में मर गई । अव तो एक महीना हो रहा है।

TIM al mar अरुण जोगलेकर- सखाराम

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सखाराम बाइन्डर
लक्ष्मी : बच्चे थे?
सखाराम : दो थे। आदमी ने रख लिये । इसीलिए तो और घुली जा
रही थी। आखिरी सांस तक अपने आदमी का और बच्चो
का ही नाम रट रही थी । मुंह मे आखिरी बूंद पानी का
मेरे हाथ से गया पर नाम साले मरद का ही था ।
नक्ष्मी ठण्डी सांस भरती है।
' क्या हुआ? सब कायदे से ही किया। आग मैंने दी । कौआ
पिण्डा पर उतर नही रहा था तो गाली दिया भरपूर ।
कहा उस हरामखोर ने तुम्हे निकाल बाहर किया तो उसकी
तकलीफ मुझे देतो हो ? मैं तेरा क्या लगता हूँ ' तुझे घर
मे आसरा दिया तो क्या गलती किया? मुझे झटपट छुट्टी
दे पहले । मेरे विगडते ही कोमा चट आकर पिण्डा ले गया ।
नहा-धोकर छुट्टी पाई । इस घर की देहरी लांघकर एक
वार अदर आते ही वह आदमी इस घर का हो जाता है ।
दुबारा बाहर आया कि सब खत्म । तकलीफ नहीं चाहिए।
मगर बाहर जाते समय भी कायदे से साडी-जम्पर और
पचास रुपये देकर ही भेजता हूँ। ऊपर से टिकट । जहाँ
जाना हो वहां का, यह कहना भूल ही गया था । अन्छा हुआ
याद आ गई। साथ ही जो कुछ यहां मिला है उसे साथ
ले जाने की छूट, यानी कपडे चप्पल, चूडी-ऊडी । इसमे
कोई कसर नहीं होगी। यह सखाराम किसी को ब्याही
औरत नही जो आदमियत छोड दे । जामो, सो जाओ।
अंघो नही । भूखे पेट ताकत नही रह गई है पर आगे से
ऐसे बलि का बकरा बनने से गुजारा नहीं होगा इस घर
मे । यताए देता हूं। मेरी भूख मामूली नहीं है । बाद मे
किचकिच सुनूंगा नहीं । सुबह सात बजे प्रेस पहुंचना होगा
मुझे। दुपहर बारह बजे घर आता हूँ। दो बजे फिर निकम
३

३४
ससाराम बाइन्डर
पर छ बजे वापस । मओवर टाइम, अगर काम अजेंट देना
हुआ तो। सुबह ठीर साढ़े छः बजे दो बाजरे की रोटी
तयार रहनी चाहिए। आज का दिन सोनावण जाने-जाने
मे यरवाद हो गया। पल ओवर टाइम परना पड़ेगा।
परयट लेकर दूसरी तरफ मुंह परके
सेटता है। यह भीतर पसी जाती है।
दूर पर भगन हो रहा है। अंधकार
होता है । दुपारा रोगनी होती है तो
सर्राटे भर पर सोता मा साराम
दिखाई देता है । यार सन्नाटा । सामी
उसरे पर पारा पुटने पर ही परे
पुपचाप यंठी है । मोप-योप में मात
भपाती है गिर गुमतो है।
अम्पर।
तीसरा
दृश्य
mirmimrarmst

सखाराम बाइन्डर
है । कुछ कम उदास और कुछ पहले से
चैतन्य भी है। बाहर के कमरे में कोई
नहीं है।
लक्ष्मी : (झुकी हुई खूब खिलखिला खिलखिलाकर हंस रही है) पाजी
कही का । मुझे फंसाता है क्यो रे ? बाहर निकाल देती हूँ
तो फिर लौट आता है ? तुझको रोज रोज खाने को
चाहिए, क्यो रे ? चाट पड गई है तुझे । अब कुछ नही
मिलेगा। नहीं मिलेगा कह रही हूँ न ऊपर ही चढा जा
रहा है मरा । मैं तुझसे कह रही हूं मेरे बदन पे न चढ ।
भना कर रही हूं ना?
गुबगुबी लगने की तरह हंसती है।
: अरे नहीं । अच्छा देख ओ, गोद मे चढ़ा तो दूंगी एक, हद
दूर । दूर हट पहले, चिपकू कही वा । आज तुझे कुछ नहीं
मिलेगा । रोज रोज की मुसीबत बन गया है। पहले उतर
मेरे ऊपर से।
खिलखिलाती है।
: उतर न मेरे ऊपर से पहले । उई मां कितना सताता है
मुझे?
सखाराम काम पर से लौटता है और
दरवाजे पर खडा होकर यह सुनता है।
: उतर रे मेरे ऊपर से-
सखाराम का पारा चढ़ने लगा है तेजी
से भीतर आता है । लक्ष्मी अफेली ही
घंठो-मंठी खिलखिला-खिलखिलाकर हंस
रही है । सखाराम को देखकर घुप हो
जाती है । आती हुई हंसी को खार
चुपचाप खरी हो जाती है।

सखाराम बाइन्डर
?
सखाराम : (हर तरफ सशकित होकर देखता हुआ) क्या हो रहा था
लक्ष्मी : (सिर हिलाकर) कुछ नहीं ।
सखाराम : तो फिर इतनी हंसी क्यो आ रही थी अभी भी सदेह मे)
किसके साथ बात कर रही थी?
लक्ष्मी : (हंसी दवा रही है)
सखाराम : (जरा गुर्राफर) क्या दिमाग खराब हो गया है जो अवेले मे
वात कर रही हो? (हर तरफ अभी भी सशंकित होकर
देख रहा है।)
लक्ष्मी (हंसी गायब हो जाती है । गुमसुम खड़ी रहती है।)
सखाराम . किससे बात कर रही थी?
लक्ष्मी : (सिर्फ इनकार मे सिर हिलाती है)
सखाराम : (जफेट उतारते हुए याहर आता है) अवेले बात कर रही
थी। हुँ ।
जाते जाते फिर अविश्वास से देखता
है । सखाराम के जाते ही लक्ष्मी जहाँ
बैठी है यहां जल्दी जल्दी कुछ ढूंढने
लगती है।
सखाराम बाहर के कमरे से चिल्लाता
है।
फिर दुबारा यह सब न हो। कहे देता हूँ | अकेले बैठे बैठे
हंसती है । हुँ
लक्ष्मी चूल्हे पर से पाप उतारती है।
फिर पाल्टी मे पानी और लोटा लेकर
बरामदे की तरफ आती है। सखाराम
यहाँ आकर खड़ा है । लक्ष्मी पानी
डालतो है । वह हाथ, पैर, मुंह साफ
करता है । लक्ष्मी के हाथ से तौलिया

सखाराम बाइन्डर
लेकर मुंह पोंछता है। दोना अन्दर आते
हैं । सखाराम आगे लक्ष्मी पीछे । सखा-
राम आकर तखत पर लेट जाता है।
लक्ष्मी चुपचाप बैठकर उसके पैर दबाने
लगती है। सखाराम बारी-बारी से
उसकी तरफ और भीतर की तरफ कुछ
नएपन से देखता है। दोनों की नजर
मिलती है । लक्ष्मी नजर झुका लेती है।
सखाराम : (उसका हाथ पकडकर) हंस क्यो रही थी ?
लक्ष्मो : (हाय छुडाने की कोशिश मे) छोडो कोई देख लेगा
सखाराम : किसी से चोरी है क्या?
लक्ष्मी : चाय लेकर आती हूं
सखाराम : (लक्ष्मी का हाय पकडे-पकडे कुछ सोचता है फिर हाथ
छोड़ देता है) जल्दी आओ।
लक्ष्मी अन्दर जाकर चाय ले आती है
उसे देती है।
सखाराम : (चाय उसके हाथ से लेकर अपने बगल में बैठने का इशारा
करके) बैठो।
यह खडी है।
: मैं कहता हूँ बैठो यहाँ।
यह घबराई-सी पैठती है। जरा दूर
खिसश्कर।
ऐसी व्याही औरत की तरह नहीं । यहाँ पास मे बैठो।
उसे अपने पास खाँचता है। अपने
प्याले से चाय पिलाता है।
: लो पियो
सम्मो . मेरो चाय है भीतर

ससाराम बाइन्डर । 7 7 7 सखाराम मुंह तोड दूंगा दुबारा वरवर किया तो । अपने मे से दे रहा हूं तो कहती है अन्दर है । हूँ यह एक पूंट चाय लेती है 'यस' कहती है । यह जवरदस्ती और पिलाता है। फिर खुद पीता है । यह चाय का प्याला तश्तरी लेकर जाने लगती है। उसे रोककर। : किसके साथ चल रहा था अभी हंसी-ठट्टा लक्ष्मी : किसी के साथ नही । सखाराम : तो मैंने सुना वह क्या था ऐसे ही लक्ष्मी : नही यह बात नहीं सखाराम : फिर लक्ष्मी : ऐसे ही .. सखाराम : ऐसे माने? लक्ष्मी : (हिचकिचाती हुई) चीटे के साथ । सखाराम : क्या लक्ष्मी : (स्यीकृति सूचक सिर हिलाती है, 'हो, यही बात है जैसे भाव से) सखाराम : चोटे के साथ बात कर रही थी? लक्ष्मी : हाँ । सच्ची. सखाराम : चीटा तो नही बोल रहा था तुमसे लक्ष्मी : हो (फिर) नही। सखाराम अचरज से उसे देखता है। । मतलब कि उसकी तरफ से भी मैं ही बोल रही थी। सखाराम : चीटे से बात कर रही थी। कुछ और तो नहीं चुप खडी है। : दिमाग का इलाज करना चाहिए । क्यो चोटे से बात क्या . १

पर रहो यो । सोई पहचान का चीटा होगालो'
सम्मो : पहसान तो बात करते-करते हो जायेगी। मैं उसे गरकर
देती हूं वह जाता है।
ससाराम : चौटा बसा एक है पर मे' टोकरी भर होगे। कोई भी
बायेगा।
समो : मैं पहचानती हूं उसे ।
सबाराम : बन्छारे कसे?
समो : ऐरो हो । यह पाता है तो पता मग जाता है।
सताराम : पता लग जाता है। किस बात से?
सक्ष्मी : उसको पात से ।
सखाराम : चोटें की चाल ?
लक्ष्मो : सच्ची। यह पीटा जोर से दौडकर नही माता धीरे-गारे
आता है और शकर के दाने पर मुंह लगाने से पहले दाने
के चारो तरफ एक बार परकर करता है।
सखाराम : पौन? पीटा? बोर सो कुछ नहीं करता?
सक्ष्मी : हो । एक बार शक्कर मुंह लगा सेता है तो फिर एक
पर उठाकर अपना मुंह साफ करता है।
सखाराम : मुंह साफ करता है ? वाह ! और मया करता है सुम्हारा
यह चौंटा?
सम्मो : दाना लेकर दीवार के पास जाता है।
सखाराम : और?
लवमी : आजकल दो दिन से ढीठ हो गया है यह । शाशरा
दाना छोडकर मेरे ही पीछे-पीछे भागता रहता है हरग ।
सखाराम : अच्छा ? वाह ! फिर?
लदमी : बदन पे चढ़ जाता है फिर ।
सखाराम : वाह ! बदन पर चढ़ता है ? फिर उसके बाद?
लक्ष्मी : किसी तरह उतरता नहीं। (उठकर) दिशा पपा

४०
सखाराम बाइन्डर
सखाराम : क्या' चीटा नही ! अभी मेरा दिमाग ठीव है । हूंह !
चोंटा बोलता है । यह सब पागलपन यहाँ चलेगा नहीं ।
दिमाग खोलकर यहां रहना होगा। क्या समझी ? ठीक
से याद रक्खो। जाओ अन्दर ।
यह चाय का प्याला तश्तरी लेकर भीतर
जाती है। सखाराम उसे अन्दर जाते हुए
देखता रहता है। बेसुरी आवाज मे
लावणी का पहला चरण गुनगुनाता है ।
सखाराम : यह अजीब ही है। वह पहले वाली साली मरद पा कुर्ता
चिपकाए घूमती थी और यह चोटें से बात करती है । यह
मरद भी हरामजादे क्या बना डालते हैं इन औरतो को।
यह भीतर जाकर कप-तश्तरी धोकर
रखती है। फिर झुको-झको इधर-उधर
कुछ खोजती है। उदास होकर फिर
वहीं बैठ जाती है। सखाराम 'आज
दाउद मियां नहीं आए' कहता हुआ
चिलम वगैरह फोने से उठाता है।
लक्ष्मी : (धीमो मगर सुनाई पड़ सके ऐसी भावाज मे) तेरी वजह
से .तेरी वजह से बात सुननी पडी मुझे और नही तो क्या
...तू शवकर खाए और मैं तेरे पीछे डांट खाऊँ। किसी
को सच नहीं लगता कि चीटे, चीटी, गौरया, कौवा सब
मुझसे बोलते हैं। सब बात करते हैं । क्यो बोलता है तू
मुझसे ? बोल ? क्यो बोलता है रे ? बोल ना । बोल ।
वोल मेले बुद्ध ले बोल...
रसोई के दरवाजे पर आग लेने के लिए
आया हुआ सखाराम यह देखता हुआ
खड़ा है। वह आपे से बाहर हो उठता है ।

मताराम दाइहर ७ - . सताराम : (ोतर) बरे हो कमा रहा है यह पापलसाना वह घराकर ससेहो बात है। : क्या कहा था मैंने सरकार ' इसके बाद यह तमाश हमा तो-यह सम पागलपन बन्द पते पोल। यह भर से परस्पर कारतो है। : घर से बाहर निकाल दूंगा, दुबारा यह सब देखा तो बाग दो मुझे चिलम के लिए। यह पुपचाप अन्यारवानी उठाकर उसमे अंगारा रखकर देने के लिए पाती है। उसके हाथ मे पकड़ाती है। रोना बन्द । क्या है ' मर गया क्या कोई मर जाये तो भो इस घर मे रोना नहीं है। यह जल्दी से श्रास पोछने का प्रयत्न करती है। अग्मारदालो हिल जाती है भंगारा उसके पैर पर गिर जाता है । पर जल जाता है । यह परराह कर बैठ जाती है। पैर पकड़ती है। ससाराम जल्दी से भंगारा पर पर से हटा देता है। ससाराम : जल जाने दो पर अच्छी तरह । बोई तपतीय नही होने की मुझे। यह येवना से व्यापुरा है । पिसी तरह उठती है धूपदानी उठाती है और भाग समेट कर उसमे भरने लगती है। • हरामीपन को सजा मिलनी हो पाहिए । हो तो वही काम होता रहेगा । ठीप रो परड नहीं । नालायक नहीं थी। उठते-बैठते लात-रो से

४२
सखाराम बाइन्डर
पड़ेगा तभी समझ मे आयेगी वात ! दो वह आग इधर
और भीतर जाकर लगाओ कुछ पैर में । नहीं तो मरो
जाकर।
धूपदानो में आग लेकर वह चिलम के
पास आता है। वह अन्दर जाती है।
चूल्हे के पास बैठकर पर सहलाती
रहती है। जलन कम करने का प्रयत्न
करती है । सखाराम चिलम तैयार करते
: यह दाउद भी नही आया आज...न जाने कहां अटक
गया-
यह चूल्हे के पास बैठी-बैठी पर को
बार-बार फूंक रही है। बाहर सखाराम
आग को फूंक कर तेज कर रहा है।
गांजे का वम मारकर...
: बम भोले...
लक्ष्मी : (पर सहलाते हुए जमीन की तरफ देखती हुई उदास स्वर
में) तू क्या पूछता है मुंह उठाकर? कौन-सी कदर है ? यहाँ
आखिर हूँ तो निकाली हुई न ! पाँव जलकर भसम हो
गया तो क्या कोई पूछेगा ? देख क्या रहा है ? शरम नहीं
तुझे ? जा उघर ! काला मुंह न दिखा मुझे। जा! जा
कहती हूं न ! भाग यहां से ! रख हाथ ! जा भैया तू...
...जा । नही तो मारुगो...
यह दृश्य अन्धकार में डूब जाता है ।

दृश्य चौथा
रसोईघर मे किसी छोटी चिमनी के
जितना मंद प्रकाश । बाहर के कमरे
मे पूर्ण अन्धकार सिर्फ आवाजें सुनाई
सदमी: उसी तरह क्या ओफ मुझे बहुत नींद आ रही है दा
ससाराम • सो लेना थोडी देर मे। पहले हस । चीटा तेरे ऊपर चढ़
Rsमो : हसती हूँ अभी ..उई पाँव दुसा दिया न मेरा उई रे .
?
एक पल को चुप्पी।
देती हैं।
सखाराम : ए उठ उठ | जल्दी ..उठती है कि लगाऊँ एक लात ।
उठने के लिए कह रहा हूँ न ..
सक्ष्मी : (नोंद से भरे हुए स्वर मे) क्या है, उठती हूं जरा देर मे ।
सखाराम : जरा देर मे नही-अभी फौरन उठ ।
लक्ष्मो : उई क्या है ? अभी तो रात है ।
सखाराम : इसीलिए जगा रहा हूँ।
समो : क्या ? है क्या
सखाराम : हंस उसी तरह ।
लामो : किस तरह ? क्या इतनी रात को
सखाराम हंस पहले उसी तरह ।
.
रात सोने को नहीं मिला
रहा था तब जैसे हंस रही थी उसी तरह हंस ।
हाय..

सखाराम वाइन्डर
सखाराम : तो हंसती क्यों नही ? हंस उसी तरह ? हंस जल्दी । हंस ।
लक्ष्मी : मुझे नहीं आता।
सखाराम : चीटे के आगे फिदिर-फिदिर हंसती है और मैं कहता हूँ
तो नही हंसते बनता । अभी यह जला वाला पर और
कुचल दूंगा...हंस नही तो...उठ । हंस उसी तरह । सोने
का नखरा न कर ! उठ ..
लक्ष्मी : सचमुच नही आता मुझे। छोड़ दो न ! सोने दो मुझे-
सखाराम : नही बाद में सोना । उठ पहले...हॅस ! हंस जल्दी...
सम्मो पहले सप्रयास हंसती है फिर
सचमुच हंसने लगती है। जैसे शाम को
हंस रही थी। उसके बाद सखाराम को
हँसी भी सुनाई देती है। दोनों को
सम्मिलित हंसी चलती रहती है । उसके
बाद खामोशी।
लक्ष्मी : उई रे । थक गई मैं । अब नहीं हँसा जाता । सोने दो भव
मुझे । पैर भी बहुत दरद कर रहा है ।
सखाराम : कहाँ देखू ? फिर कभी पागलपन देखा तो यह पर तोड़
ही दूंगा । नालायक कही की...
(अंधकार)

दृश्य
पाँचवाँ
प्रकाश होता है । रसोईघर में लक्ष्मी
जल्दी-जल्दी किसी तैयारी में लगी है ।
घर के बाहर से आवाज आ रही है,
"मंगलमूरति मोर्या" यह आवाज
सखाराम को है। यच्चों का झुण्ड भी
मो sss र या ss कहता है । सखाराम
पोर्ट पर गणपति की मूर्ति को लिए हुए
आता है । पीछे पोछे दाउव-मियां झांझ
लिए हुए आते हैं, वोनो उत्साहित ।
सखाराम : (दरवाजे पर जाकर) मगलमूरति...
दाउद : मोर्या ।
लक्ष्मी पूजा की तैयारी में जल्दी से बाहर
आती है, मूर्ति की पूजा होती है । मूर्ति
के लिए सजाई हुई जगह पर सखाराम
मूर्ति को स्थापना करता है।
सखाराम : बैठो मगलमूरति जी, अपने बाप-दादा की बात तो नही
जानता पर मेरे घर तो तुम पहली ही बार आए हो।
चलो आराम करो।
दाउव : मैं तो यार सभी धरम दे खुदा-उदा पूज लेता हूं। पाप
क्यो लूं । क्या पता कब कौन से खुदा खफा हो जायें और
अपना बुरा-मला कर दें।

सखाराम वाइन्डर
क
सखाराम : यह बात नही है दाउद पर अपने में साफ रहो तो
विसी खुदा के पाप की भी हिम्मत नहीं कि एक बाल
भी का कर दे,हो ।
वाउद · मगर सखाराम | मैं तो साफ-याफ नही हूँ। खुदा की
अदालत की चालो याद ही नहीं रहती अपने को । हर
वक्त एक नया गुनाह हो ही जाता है ।
सखाराम वह तो कचहरी का है यार परमात्मा की कचहरी का
गुनाह एव हो है-झूठ बोलना । झूठ की सजा काला
पानी। वह गुनाह सबसे बड़ा है। वाकी जिसने यह साला
शरीर बनाया है वह क्या शरीर की सुजली नहीं जानता
होगा। सब जानता है वह । वह भी जब अवतार लेकर
आता है तो क्या होता है। जरा कृष्ण की याद करो
दाउद मियां बैठकर मौज करो। माल-दाल उडायो।
साथ देने के लिए ये चूहे जो तो हैं ही तुम्हारे पास ।
लक्ष्मी : क्या कहते हो? इस तरह नहीं बोलना चाहिए।
सखाराम क्या बोल रहा हूं? दाउद मियां अब तुम ही बताओ मैंने
इस समय क्या गलत कहा ? न तोद का मजाक उडाया
न दांत की बात की। सूंड तक की बात तो को नही ।
लवमी . अच्छा अच्छा बहुत हुआ । चुप रहो अब ।
सखाराम नही | दाउद तुम्हें बताना पडेगा कि मेरी गलती क्या थी
इस समय
वाउद अरे छोड यार । गल्ती-वल्ती कुछ नहीं थी । जो कहा
सब ठीक ही है । अरे मगलमूरति तो सब कुछ खुद ही
जानते-बूझते हैं। खुदा हैं वह तो ।
सखाराम मगर देखो न आते ही इसने मुझे दोक दिया क्यो टोका?
आखिर खुद ही जाकर मैं आज गणपति को घर ले आया
कि नहीं ? जो काम हमारे सात पुरखों ने नहीं किया था
7

सखाराम बाइन्डर ४७ वह मान मैंने किया। उस पर से यह बकवास- वाउद रहने दो यार । लाओ, दो कुछ परशाद-वरशाद जल्दी मुझे भी काम पर जाना है। लक्ष्मी भारती के बिना कोई न जाए । बस, अभी आरती का सामान ले कर आती हूँ मैं ! (अन्दर जाती है) लक्ष्मी भारती का सामान लेकर आती .. लक्ष्मी : (ससाराम से) हाँ, यह लो । सखाराम आरती की थाली हाथ मे पक डता है यह आरतो जलाती है । वाउद- मिपां मदद करते हैं। तुम अलग रहो दाउद भैया (दाउद अलग हट जाता है । लक्ष्मी सखाराम की तरफ मुडकर) हाँ अब शुरू करा आरती सखाराम दाउद बोलो गाइए गणपति जगवदन शकरसुवन भवानी के नदन दाउद झांझ लेकर साथ देता है दोनों गाने लगते हैं । मोटो-मोटो घेसुरी आवाज मे । लक्ष्मी किनारे हट जाती है । उसे कुछ अच्छा नहीं लग रहा है । लक्ष्मी : (इशारे से दाउद को चुप रहने का इशारा करके) तुम मत गाओ। यह धुप हो जाता है। सखाराम : (गाना रोककर) क्या हुआ दाउद ? गा यार 'गाइए गणपति जगरदन, शकरसुवन भवानी के नदन, सिद्धि- सदन गजवदन विनायक' दाउद धुप।

४८ सखाराम बाइन्डर . अरे यार मुंह खोल । चुप क्यो हो गया दाउद को नजर लवमो पर । : क्या हुआ दाउद आरती क्यो नहीं गा रहा है ? वाउन धुप। : क्यो नहीं गा रहा है बोल' दाउद घोरे से लक्ष्मी को तरफ देखता है। गाने को मना किया है ? वाउद खामोश। : किसने मना किया? अच्छा। लक्ष्मी की तरफ घूमता है। : दाउद को आरती के लिए मना किया? लक्ष्मी : वह मुसलमान है कि नही । सखाराम बहुत तैश मे आरती नीचे फेंक देता है । लक्ष्मी और बाउब भयभीत । सखाराम : दाउद मियां को आरती के लिए तूने मना किया ? यो मना किया ? दाउद : जाने दो सखाराम... सखाराम . तुम चुप रहो जी । (लक्षमी से) क्यो नही कर सकता वह भारती? लक्षमी : वह मुसलमान हैं हमलोग हिन्दू हैं सखाराम उसको कनपटी पर जोर से झापड मारता है । वह वदं से तिल- मिलाकर फान पर हाथ रखती है। सखाराम : फिर कभी कहेगी। लक्ष्मी मैंने झूठ क्या कहा ? गणपति की पूजा मे मुसलमान कैसे आरती कर सकता है ? सखाराम • कैसे नही कर सकता जब मैं कर सकता हूं तो वह क्यो नहीं कर सकता? .

सखाराम बाइन्डर ४६ . लक्ष्मी : मुसलमान के हाथ से.. सखाराम फिर उसे मारता है। उसके बाद फिर मारता है। दाउद : सखाराम छोड दे यार । जाने दे। सखाराम : (खूटी पर से पेटो खींचकर उतारते हुए लकमी से) फिर बोल | बोल फिर से । सवमो : जो सच बात है वही कह रही हूँ। मेरे घर के गणपति को मुसलमान के हाथ की आरती... सखाराम उसे पेटी से मारता है। दाउद: सखाराम लवमो : (वेदना से तिलमिलाती है फिर दीठ होफर) मारना ही है तो भीतर चलकर मारो गणपति के आगे नहीं। माज ही ठाकुर हमारे घर आए हैं । बाउब: सखाराम यार सुन तो. सखाराम (लक्ष्मी की थरथराती हुई देह को उसका अकडमरा पैतरा समझकर और भी क्रोधित होता है और उसे खोंचता हुमा अन्दर ले जाता है ।) चल, अन्दर चल तो बताऊँ तुझे। वह मुडकर अन्दर जाती है । पीछे-पीछे पेटी लिए हुए सखाराम जाता है। बरामद परेशान-सा वहीं खडा रहता है। अन्वर ने पेटी की मार की आवाज आती है। सदमी को अस्पष्ट करा सुनाई देती हैं पर शोरगुल नहीं । बाउर पह सह नहीं पाता, जावी से धाहर निकल जाता है । अन्दर से मारने और कराहने को मायाले भा रही हैं। .

दृश्य
छठवाँ
हल्का आलोक फैलता है । सखाराम
नहीं दिखाई देता । रसोई से लक्ष्मी को
कराह सुनाई दे रही है । वह किसी
तरह उठकर लंगडाती हुई मूर्ति के
सामने आती है । आरती का बिखरा
हुआ सामान एकत्र करती है। दिया
जलाकर मूर्ति के सामने रखती है । फिर
उसी तरह लंगडाती हुई अन्दर जाकर
लेट जाती है । कुछ क्षण वाद ।
सखाराम (बाहर से हो) साली कहती है कि मुसलमान आरती
नहीं कर सकता । दाउद तू सच्चा है । अच्छा, ठीक है
सभी जा मेरे दोस्त । कल आना आरती के समय ।
देखता हूँ साली कैसे नहीं करने देती आरती ।
नशे मे कुछ बडबड करता हुमा तेजी से
अदर आता है । खूटी के पास जाकर
जैकेट तया शर्ट उतारता है। एकाएक
मूर्ति की तरफ ध्यान जाता है।
सखाराम नही-न-न-तेरा कोई कसूर नहीं तेरा कसूर नही
मूति के नजदीक जाता है । आरती का
सामान खोजता है। दियासलाई दूदकर
आरती जलाता है। हाय मे भारती

EVIss)
पर
Reat परी मदार
सखाराम बाइन्डर
पकडे हुए लडखडाता हुआ-सा जैसे-
तैसे खडा रहता है।
पी लिया है आज
माफ कर (वेसुरी आवाज मे आरती
करने लगता है। आरती हाय में। चेहरा और आंख
नशे में धुत)
अन्धकार
C062
बायह
दृश्य
सातवाँ
बाहर के कमरे में आरती के दिए का
उजाला। रसोई में अन्धकार सिर्फ
सवाद।
सखाराम हस । हंसेगी कि नहीं ?
लक्ष्मी (कराहती हुई) नही ।
सखाराम हसगी कि नही ?
लक्ष्मी बदन बहुत ददं कर रहा है-(कराहती है) भाग जल
रही है सारे बदन मे...

सखाराम बाइन्डर
.
..
..
सलाराम : जलने दे । हंस पहले । कुछ कह रहा हूँ में ? इस घर में
रहना है तो मेरी बात माननी पड़ेगी। जो मैं कहूंगा
करना पड़ेगा । हंस, नही तो अभी घर से निकाल बाहर
कर दूंगा। निकालूं चल-उठ...
लक्ष्मी : मोह छोड़ो मुझे...उई दया...हाय
सताराम : जब तक हंसेगी नही, नहीं छोड़ गा
समी : जान निकल रही है मेरी । मर जाऊंगी ऐसे तो...
सखाराम : मर जा साली पर हंस पहले...
लक्ष्मी : (कराहती है)
सखाराम : हंस जल्दी...हंस...हंसती है कि मरोहूं हाय ? मरोहूं ?
ठहर पेटी ले माता हूं सबेरे याली। हरा नहीं तो...हंस !
उसो तरह हंस-हंस जल्दी साली...सुनाई दिया कि
नही...
लक्ष्मी हंसने का प्रयास करती है। योष
में बवं फी फराह मिली-जुली। फिर
उसको हसो यदती है । हंसती हो जाती
है। जैसे कोई जोर से गुदगुदाता जा
रहा हो। वनभरो कराह उसमें मिली.
पुती । उसो में ससाराम बी वाहपाली
भरो हंसो भी मिली हुई है। बाहर
के
कमरे का दिया पुझता है।

दृश्य आठवाँ
?
मृदंग बज रहा है। कुछ क्षण अन्धकार
फिर उजाला । सखाराम तल्लीन होकर
मृदंग बजा रहा है। सम्मो बाहर के
दरवाजे से पानी का घड़ा लेकर आती
है, थकी-यकी-सी रसोई मे जाफर उसे
रखती है और हांफने लगती है हांफते-
हांफते किसी चीज का सहारा लेकर
सुस्ताती है।
सखाराम : (उसे आया जानफर चिल्लाता है) चाय दे एक प्याला-
जल्दी-(रसोई मे लक्ष्मी वैसी ही खड़ी है । सखाराम
फिर चीखता है) मर गई क्या चाय दे जल्दी से।
लक्ष्मी
(चूल्हे के पास जाकर भुनभुनाती हुई) देती हूँ चाय भी।
पानी ढोते-ढोते जान आधी रह गई । बदन है कोई ठेला
गाडी नहीं । मर जाती तो भी छुट्टी मिलती।
सखाराम : (उठकर रसोई मे आते हुए) क्या कहा
?
लदमी : कुछ नही । यह चाय ले जाओ। बन गई । (चाय छान
कर देती है)
सखाराम · बक-बक क्या कर रही थी अभी ?
लक्ष्मी : (एकदम विफर कर) झूठ कुछ थोडे ही कह रही थी।
आखिर कोई कितना सहेगा । आज एक बरस हुआ यहाँ
आए । एक दिन को भी चैन नही । तीज-त्योहार,
बीमारो-अरामी सव बरावर । दिन-रात कभी छोडा है
.

सखाराम बाइन्डर
तुमने ' मर जाऊँगी किसी दिन छुट्टी मिल जायेगी ।
सखाराम : हाँ हाँ मर जा ! फूंक-ताप दूंगा ठीक से । आदमी ने जब
कुतिया की तरह दुत्कार दिया तब था क्या कोई टके को
पूछने वाला ? घर लाकर तुझे खाना दिया, कपडा दिया
रहने को ठिकाना दिया कोई खरात बंट रही थी क्या
यहाँ ?
लक्ष्मी : ठिकाना कहीं भी मिल जाता। नही तो नदी-तलाब मे
कूद के मर-मरा गई होती। तुम्हारे दरवाजे आया हो
कौन था आसरा मांगने ! मर गई होती तो छुटकारा
मिल जाता।
सखाराम : तो जा अब से डूब मर । रोज तो जाती है नदी पर ।
रोका किसने है ?
लक्ष्मी : जान भारू नहीं है मेरी । अम्मा ने पाला-पोसा है तो
इसके लिए नहीं। आदमी ने निकाल दिया तो क्या ।
ऐसी वसी नही हूँ मैं ! बाप मुन्सिफ था मेरा।
सखाराम : मुन्सिफ जाय भाड मे आदमी के घर से निकाली औरत
सब ऐसी ही वैसी होती हैं । कोई टके को नहीं पूछता।
मैंने तो कहो सहाग भी दे दिया।
लक्ष्मी : सहारा तो रोज किसी को देते फिरते हो कोई टिकी भी ?
मेरी जगह कोई और होती तो कब को भाग-भूग गई
होती।
सखाराम : छ रही छ ! तू तो सातवी हैं।
लक्ष्मी : उसमे से एक भी टिकी होती तो षया करने को मुझे ले
याते?
सखाराम : तो क्या मारे गरज के तुझे लाने गया था?
सश्मी : नही तो क्या उपकार पिया मुझ पर ?
मताराम : अन्छा तो जा यहाँ से-चाय बनाने को रहने दे।

सखाराम बाइन्डर लक्ष्मी कप में चाय डालती है । :जा भाग यहाँ से-निकस फोरन- सक्ष्मी : चाय पी लो पहले । चली जाऊंगी। चाय का भ्याला ससाराम को एकडाती सखाराम : सालभर रह कर घमड चढ गया है ? क्यो ? (पलथी मारकर चाय पीने लगता है) निवल जा मेरे घर से । फिर मुंह न दिखाना। लक्ष्मी : नही दिखाऊंगो। अमलनेर मे मेरा भतीजा रहता है। उसके पास चलो जाऊंगी। सखाराम : जाज्जा । मर साली । दफा हो यहाँ मे ? लक्ष्मी : जब मेरा मन करेगा तब जाऊंगी। सखाराम : क्या? लक्ष्मी • मुर्दे को आग से क्या डर? सब तरह से तो सता लिया। अब यचा ही क्या है जिससे डरूं ? सारी दुनिया जानती है कि यहाँ क्या होता है । जरा-जरा से छोकरे भी कहते फिरते हैं। ससाराम : (चाय जल्दी से पीकर) क्या वहते-फिरते हैं । लक्ष्मी : उन्ही से जाके पूछो सुनने की गरज है तो। सखाराम : ऐरो-रो से नहीं पूछता फिरता मैं-तू बोल क्या कहते है लोग? लक्ष्मी : मैं क्या करने को अपनी जबान गदी करूं बेमतलब मार खाने को? सखाराम : बेमतलब नही मारता कोई । अपनी गलती जाना करो। लक्ष्मी • बहुत जाना है । यहाँ आई यही गलती की। सखाराम : जीभ सभाल के बोल लक्ष्मी। लक्ष्मी : क्या करोगे? मार लो जितना मारना है। ऐसे ही क्या

सखाराम बाइन्डर
कसर छोडी है ? सारा बदन तो पहले ही भरता कर
दिया है । इतने दिन मार छोड खाया ही क्या है ?
सखाराम : लक्ष्मी कहे देता हूं गुम्सा न दिला मुझे...
लक्ष्मी : सोधे से दो बोल कभी कसम खाने को भी नही । जब देखो
तब हाय-नोबा, गाली-गलौज जब-तब घर से निकाल देने
की घोस ऊपर से लात-घूसा ( आंचल से आँख पोछती
है ) पेटी मार-मार के खाल उधेड दिया और ऊपर से
कहते रहे 'हस : हंस और हंस ।" दरद से जान निकलती
रहे तो भी हंस । इससे तो नरक भी अच्छा होता होगा
(सिसकती है) मर जाऊँ तो छुटकारा मिले तुम्हारे इस
नरक से।
सखाराम : पहले ही दिन बता दिया था जैसा हूँ। अपने पास ढका-
मुंदा कुछ नहीं है सब खुला खेल । बता दिया था कि
नहीं तुझे? यह भी कह दिया था कि ठीक लगे तो रहो
वरना बाहर का रास्ता नापो । कहा था कि नहीं ? तब
क्या कान मे ठेठी लगी थी तेरे, कि पैर में छाला पड़ा
था? गई क्यों नहीं ? पिछले बरस भर से दारू पीना
भी कम कर दिया । कर दिया कि नहीं ? कभी एकाप
दफे पी लेता हूँ। तूही बोल चौमासे मे पिया है कभी ?
गांजा भी इस महीने बस दो दफे चढाया । पूजा भी करने
लगा तेरे थाने के बाद से | रोज नहा-धोकर पूजा करता
हूँ कि नहीं ? बोल । दे जवाब नही तो मुंह तोड दूंगा
तेरा । बोल कपड़े साफ रहते हैं कि नही, अब मेरे ?
क्यो? अब क्यों मुंह बन्द है । रोने का नसरा न कर।
लक्ष्मी : बडा उपवार रिया मेरे ऊपर ।
सखाराम : छ. छ. आ चुकी विसी की एक बात मान कर नहीं दी।
में वह हूँ जिसने भी बाप को पाप नहीं माना । पर

सखाराम बाइन्डर ५७ तेरी बात मानी कि नही वोल? सक्षमो हाँ, और उसके बदले दिन रात मार-पीट और गाली सखाराम तो क्या यहाँ तुझे पलग पर बैठाकर तेरी आरती उतारूंगा ? तेरे पीछे दुम हिलाऊंगा ? लक्ष्मी जब चली जाऊंगी तब लगेगा पता। सखाराम जा जा सहक को कुतिया की तरह मारी-मारी फिरेगी तब पता लगेगा। लामो नो अभी कौन सा फरव है? सखाराम फरक नही हैं ? फरक नही लगता तुझे तो जा भाग यहाँ से । जा उठ । उसे चूल्हे के पास से घसीटता हुआ दरवाजे के बाहर ठेल कर दरवाजा बन्द कर देता है और हाय झाडता हुआ अन्दर आ जाता है। दुबारा घर मे पैर रक्खा तो गला घोट दूंगा । फांसी चढ़ जाऊंगा फांसी, अगर जरूरत पड़ी तो । तेरी ऐसी नाकारा को मार के तो फांसी चढने को भी तैयार हूँ। नमक हराम साली। दरवाजा बन्द कर लेता है। जा यहाँ से पाप कटे। एक तरफ जाकर कुढ़ा हुआ बैठ जाता है। बाहर कोई माहट नहीं। खबरदार । दुबारा अदर आई तो टांग तोड दूंगा। जा भाग अपने रास्ते । कोई रख ही लेगा। रानी जी को पलग पे बिठाकर आरती पूजा करेगा । जा ब्याह रचा जा के उसके सग । जा भाग । मैं मर गया तेरे कमीनी साली । दिमाग चढ गया है । ऊपर से . * ५८ सखाराम बाइन्डर ? ही हो गया। आसरा दिया इसीलिए? पूरे घर मे चक्कर लगाता है। दरवाजे पर थपथपाहट। • जा जा । मर गई तू मेरे लिए । भीतर आने का काम नहीं । चलो जा यहाँ से । दाऊद : (दरवाजा खटखटाफर) सखाराम ! अमां ओ ससाराम भाई। सखाराम : कौन ? दाऊद? दरवाजे के पास जाता है । खोलने को होता है फिर रुक जाता है। : दाऊद भाई । बाहर अकेले ही हो न तुम वाऊर : (बाहर से ही ) खोलो भी तो। बिल्कुल अकेले ही हूँ यार। सखाराम : वह साली हरामजादी चली गई न ? बाऊद : अा दरवाजा तो खोलो यार । (सखाराम दरवाजा खोलता है वाऊद अंदर आफर) : क्या तमाशा बना रक्खा है लक्ष्मी जल्दी से घुसकर अन्दर रसोई मे जाने लगती है। (चीखकर) फिर घुसी आ रही है भीतर ? दाऊद : जाने दो सखाराम । सखाराम • अब यहाँ क्या करने आई है ? यहां किसी को गरज नहीं है। लक्ष्मो चूल्हे के पास जाकर काम में लग जाती है। • अपने को किसी की गरज नही है । अकेलेदम रह लूंगा। साली समझतो क्या है मुझे मरद बच्चा होऊंगा तो 7 सखाराम सखाराम बाइन्डर ५६ पवास और लाकर रख लूंगा । एक अकेले तू ही सोना मोती जडी नही है । जा निकल यहां से-उठ यहां से। यार पया रोज-रोज बेमतलब किचकिच किया करता है । छोड भी | आदमी औरत में तो यह सब चलता ही दाऊद रहता है। सखराम माज तर किसी को मेरी तरफ आंख उठाकर देखने की हिम्मत नहीं हुई । और यह निकाली हुई सालो टके की औरत मेरे ऊपर रोब जमाती है । हरामजादी को रडी बना के छोडूगा । बैठो तुम, मैं अगारा लेकर भाता हूँ। धूपवानी लेकर अन्दर आता है । लक्ष्मी रसोई मे चूल्हे के पास बैठी है। आग दे निकाल के। लक्ष्मी निकाल लो अपने से गरज है तो । सखाराम मैं कहता हूँ आग दे निकाल कर । लक्ष्मी जब गरज नहीं है तो फिर आए काहे को ? करो न अपने हाथ से। सखाराम (क्रोध से तिलमिलाफर चोखता है) आग चाहिए मुझे। लखमो क्यो मैं तो रडी हूँ, टके की औरत हूँ कुतिया हूँ मार डालो मुझे । मारो न । रुक क्यों गए हो' मारो जित्ता जी करे । मार डालो नही तो जिन्दा ही फूंक ताप दो ले जा के ! मेरा अपना कोई नही है इसी से तो जान तो फालतू है मेरी। सखाराम अपने ऊपर बहुत काबू करता है। किसी तरह अपने आप ही माग निकालकर बाहर दाऊद के पास जाता है । बिना कुछ कहे-सुो चिलम भरने

६०
सखाराम बाइन्डर
लगता है। लक्ष्मी चार-चार आँख
पोछती हुई खाना बनाने लगती है।
अंधकार
दश्य नवॉ
मृदंग पूब जोर-जोर से पजने लगता
है। रसोई और बाहर के कमरे में हल्की
रोशनी। अंदर सदमी जमीन पर फपरी
विद्याए हुए लेटी हुई है। बाहर सखा-
राम मत जसा बंटा बेतहाशा मृदंग
बजाए ना पहा है । उसी में सन्मय है।
दांत होठ भौधे हुए हैं।
एअरे बन्द गरी यह...यह या आधी रात को छोर
हई मायाज):
मचा रखता है?
दूसरोभावान : ए...ए टोला वाई...
थाहर से:
एक सोमो:

सखाराम बाइन्डर
सखाराम-बदहवास-सा बजाता ही जा
रहा है। फिर एकाएक बजाना यन्व
करके उठता है। रसोई की तरफ जाता
सखाराम : जाग रही है।
उत्तर नहीं मिलता।
कुछ पूछ रहा हूँ, जाग रही है कि सो गई ?
उत्तर फिर भी नहीं।
: मादरचो-साली | कोई जबाव ही नही, उठ पहले, उठ ।
सुन जो कहता हूँ।
उसे जबरन उठाकर बैठा देता है।
विस्तर अलग फेंक देता है।
: सुन ! गलती हुई मेरी तरफ से । एक तो ऐसे ही दिमाग
मेरा गरम है, ऊपर से तू उल्टा-सीधा बोलकर और भी
आग लगा देती है। अच्छा बोल झूठ कहता हूँ? साल
भर मे दारू पीना कम कर दिया कि नही पूजा भी
करने लगा। इतना किया यह क्या कुछ भी नहीं है ?
वह मुंह पर आंचल लगाए बैठी है।
• छ आकर चली गई कभी किमी की एक बात भी नहीं
मानी । जैसे रक्खा वैसे रही। एक तू आई है अनोखी ।
ऊपर से लगती है सीधी पर भीतर से पाय है घाघ पूरी ।
क्या झूठ कह रहा हूँ बोल ? उठ । नींद का नखरा न
दिखा मुझे। बहुत हुआ सोना । सुन कान खोल के ।
सुनती है कि नहीं? हुंकारी भर । भर हुँकारी । 'हो'
कह
लक्ष्मी • (नींद से छोझिल स्वर मे) हो ।
सखाराम : साल भर तूने मुझे सताया-मैंने तुझे सताया । मैं तुमसे
१

सखाराम बाइन्हर ऊब गया। तू भी मुझमे उविया गई । क्यो ? ठीक कहता ? हाँ कह लक्ष्मी (नोंद मे हो) हो सखाराम तुझे अब मेरे पास मजा नहीं आता। मुझसे भी तेरा स्वभाव निभता नहीं । दिमाग भडक जाता है । बदन मे आग लग जाती है। लक्ष्मी (उसी स्वर मे) हाँ। सखाराम 'हो क्या १ साली पागल कर देगी मुझे। लक्ष्मी हां सखाराम वन्द कर यह हा-हाँ । बहुत हुआ । सुन | तेरा मरा कोई व्याह नहीं रचा है । कोई वन्धन नही है। एक दूसरे के साथ रहने की कोई जबर्दस्ती नही है । तेरे लिए तेरा रास्ता खुला है। मेरे लिए मेरा । तेरी कोई देनदारी मुझ पर नही। मेरी कोई देनदारी तुझ पर नहीं । चल हम अब एक दूसरे से छुटकारा ले ल । तेरा कोई भतीजा है कह रही थी न अमलनेर मे कल तू उसके पास चली जा । टिकट-विकट ले दूंगा । साथ मे साडी-जम्फर कायदे से दे दूंगा। जो साथ लाई है वह भी ले जा । पहने हुए कपडे भी तेरे । ऊपर से दस पांच खर्चे के लिए दे दूंगा। बाद मे कहन को न रहे कि कुछ किया नही। आराम से जहां जाना हो चली जा । मैं तुझे कोई तोह- मत नहीं देने का । पर ही अपने बीच सब नाता आज से खतम है । समझ में आया ? लक्ष्मी (अस्पष्ट स्वर मे) हाँ। अन्धकार क्या ?

दृश्य दसवाँ
.
बरवाजे के पास गठरी बंधी रक्खी है।
एक दंक भी है। लक्ष्मी रसोईघर में
सामान सहेज रही है। सखाराम दरवाजे
के पास खडा है।
सखाराम खतम हुआ काम कि नही ? गाडी का बखत हो गया ।
लक्ष्मी बस ठाकुर जी को हाथ जाड के आई।
भगवान की तस्वीर के आगे दिया जलाती
है । झुककर नमस्कार करती है। फिर
वापस आती है। एकाएक कुछ याद आ
जाता है। फिर लौटकर कुछ सामान
ठीक-ठाक करती है।
सखाराम (सामान उठाफर) चल जल्दी ।
लक्ष्मी जरा रुको ] सामन जरा उन लोगो से कह आऊँ । एसे
जाना अच्छा नहीं लगता।
माहर जाती है। सखाराम ट्रक गठरी
रखकर खडा रहता है । लक्ष्मी जाती है ।
सखाराम हो गया सब काम?
लक्ष्मी कोई बाहर जाये तो फौरन झाडू नहीं लगाना चाहिए ।
गरीबी आती है। जाने से पहले अपने हाथ से लगाए
देती हूँ।
सखाराम पर गाडी चल देगी

६४ सखाराम बाइन्डर लक्ष्मी जल्दी-जल्दी झार, लगाती है। : अब चल निकल जल्दी... लक्ष्मी : लो । (एकाएक रुककर) एक काम छूटा ही जा रहा था। अन्दर जाती है । सखाराम खीझता है । लक्ष्मी वापस बातो है। सखाराम : क्या सूट गया था? लक्ष्मी : चीटें को शक्कर देना भूल गई थी। अच्छा हुआ याद आ गई (खिड़की के पास जाती है बाहर कोओं को कांव- काय) जाती हूँ रे काऊ | रोज आता था विचारा । मैं खिलाती थी तभी खाता था । अब कौन देगा खाना उसे ? सखाराम : मैं खिला दूंगा । निकल किसी तरह यहाँ से... लक्ष्मो : पांव उठता नहीं है। सखाराम : वह तो दिखाई ही दे रहा है। लक्ष्मी : (घर की तरफ देखकर) साल भर रही । सारा घर ऐसा चमक गया था। अब फिर...(मधिल से माख पोछती है) माया बडी बुरी है .. सखाराम इस उतावली मे है कि यह कर किसी तरह जाये घर से। सखाराम : तो फिर छोड म माया-वाया चल जल्दी- लक्ष्मी उसके पैर छूती है वह पर पोछे हटा लेता है। : यह क्या...यह किस लिए . लक्ष्मी : फिर मेंट नहीं होगी। मां-बाप ने जिसके गले बाधा वह नसीव में नहीं रहा । उसको मेरी जरूरत नहीं रही । यहाँ बाई तुम्हारे पास ! तुमको पपरा माना । अपना मान के सब कुछ दिया। कुछ रएसा नहीं। ..अपनी देखभाल करना । यहुत पीना नहीं । ठीक समय से खाना - सखाराम वाइन्डर ६५ खा लेना । पूजा करते रहना भूलना नहीं। उससे पुन्न होगा । देवी की भभूत भीतर सिकहर पर पुड़िया में रखी है, प्रेस जाते वखत लगा लिया करना। सखाराम : सब कर लूंगा । तू जा यहाँ से किसी तरह । सिसफती हुई लक्ष्मी को बाहर ठेलकर खुद भी बाहर निकल जाता है। दर- वाजा बन्द करके ताला लगाता है वोनों चले जाते हैं । कुछ क्षण स्तब्धता । SITHOURUITMANURA OFO Flon दृश्य ग्यारहवाँ आहिस्ते से प्रकाश फैलता है। बाउव और सखाराम गांजा चढ़ाए हुए। ससाराम : दाऊद भाई । इतनी आई गई पर इसके जाने से पता नहीं क्यों कुछ खाली-खाली लगता है । दाउद : (नशे में कुछ युक्खुदाहट भरे स्वर में) हां लगता होगा." सखाराम : मगर उसे अब चलाए रखने से कोई फायदा नहीं था। वेमतलब रोज-रोज की किचकिच साली। फिर उसे बहुत ५ ६६ सखाराम बाइन्डर तकलीफ भी होती थी। कमजोर तो पहले ही मरद को मार खा-खाकर हो गई थी। कुछ उमर की वजह से भी थक गई थी। फिर अपना हाल तो तुम जानते हो हो यार । कुछ भी कहो यह शरीर है तो आखिर वासना का भण्डार अपने काबू मे रहता नही-इसीलिए सोचा अब बिचारी को तकलीफ देना ठीक नहीं । रहेगी अपने भतीजे के पास । बची खुची जिदगी पूजा पाटी मे गुजार लेगी (उसो पोनक में) अच्छा किया । तुम भी इस बात को ठीक मानते हो न हाँ हाँ, एकदम पक्की बात है। मैं भी आजकल यही सोचता था। दाउद सखाराम श दाउद सखाराम क्या ? वाउद सखाराम दाउद यही दि अब तुम्हारा यह सरदद खत्म होने का समय आ गया। न उसको सर ददन बहो यार । ठीक है नही कहूंगा। दोनों गांजे का दम मारते हैं। उसी में तल्लीन से बैठे रहते हैं। एक क्षण को चुप्पो फिर दाउद योलता है। सखाराम भाई । अगली का क्या सोचा है । अगली का? यानी क्या ? यानी नया कुछ। नया। मतलब Tया पछी कब लान वाले हो ? (विचार-निमग्न सा) अच्छा अच्छा वह । हो। अभी दो दिन पहले एक खबर वान मे पड़ी है। चिमखहे के कोई डिसमिन पुलिस फौजदार के बारे में । उमपी औरत दरा सखाराम दाउद सखाराम साउद सखाराम

सखाराम बाइन्डर
६७
पन्द्रह दिन मे शायद उसे छोड़ने वाली है। औरत की
मां सौतेली है । और दूसरा कोई है नहीं। हो सकता है
कि कल ही परसो मे कुछ न कुछ बात बन जाये।
दाउद • अच्छा है तब तो।
सखाराम : अब कल से उसी के चक्कर मे रहूंगा।
वाउद : हाँ जरूर । लो, चिलम लो।
दोनों उसी तरह बैठे रहते हैं धीरे-धोरे
अधिकार । परवा गिरता है।

अंक दूसरा

दृश्य एक
..
-
सखाराम बाहर से चिल्ला रहा है, 'ए
...क्या है ? इतनी बार कहा समझ मे
नहीं आता था ? हरामजादे साले .
चलो भागो यहाँ से । सिनेमा हो रहा
है क्या यहाँ कि नौटंकी ? सालो । खाल
खींच लूंगा एफ एक को . भागो .
बाहर का दरवाजा खुलता है । सखाराम
घर के अंदर जाता है। हाथ मे चमडे
की एक अटेची। पोछे-पीछे कुछ ठहर
कर एक स्त्री जाती है। यह लक्ष्मी की
तुलना में कुछ कुछ युवा, कुछ स्थूल और
देखने में आकर्षक है। यह चंपा है।
सखाराम पहले अंक के आरंभ मे जो कुछ
लक्ष्मी से कहता है, फ्रम से चंपा को भी
सुनाता है। फर्क इतना ही है कि उसकी
नजर बार-बार चंपा के शरीर पर
फिरती रहती है। और चपा रह-रहकर
प्रकारण खिल-खिल करती हुई हँसतो
रहती है । जिसकी यजह से सारी अपनी
शत और बातें उसे सुनाते-सुनाते
सखाराम शिथिल होता जाता है। किसी
तरह अपने घर में मेरी कदर रहनी
चाहिए। इस वाक्य तक पहुंचता है।

अंक दूसरा सखाराम बाइन्डर १ सखाराम : अब जैसा है यही है। चपा : छि: पुराना कित्ता है । एकदम बाबा मादम के जमाने का है। सखाराम : (अपने को काबू में करता हुमा) पसद नहीं है तो जाओ। बाहर का रास्ता नापो । चलो उठो । चंपा : बाहर का रास्ता? या बाहर कोनो और घर है सखाराम : नही, बस यही है। और यह भी कोई राजा का महल नही । सखाराम बाइडर का घर है । चंपा : सखाराम यंडर कौन ? सखाराम : (जरा अचकचा जाता है) मैं ही। चंपा : हाय देय्या । हम तो समझी कि कोनो और | सच्ची । १ राम कसम । . सखाराम : (चंपा के शरीर के प्राकर्षण से अपने आपको जबरन उबारता हुआ) शर्त मन्जूर हो तो चूल्हे के पास जाकर चाय बनाओ। दूध ऊथ वही चूल्हे के पास होगा । अरे हां। एक बात बनी रह ही गई। ब्याही औरत की तरह रहना पड़ेगा इस घर मे चंपा : हमे बडी भूख लगी है । खाने के लिए दे कुछ जल्दी। सखाराम : अन्दर देखो जाकर कुछ होगा रसोई मे । चंपा : (पसर कर बैठती हुई) तो देव न तू । सखाराम : (सकपकाता है। फिर कहने लगता है) इस घर में आई औरत को अदब के साथ रहना चाहिए । मेरी कदर और इज्जत रहनी चाहिए इस घर मे । चंपा : ए | देख न भीतर खाने को है का कुछ ? कल से पेट में कुछ गया नहीं । चलने बखत एक अमरूद हाथ लगा था। वही खाया है । पेट कुडमुडा रहा है । सखाराम : (उसके शरीर पर से जबरन अपनी पोल हटाता हुआ) सखाराम पाइन्डर दोनों की आंखें मिलती हैं और सखाराम एकदम स्तव्य हो जाता है। इसी बीच किसी समय दरवाजे पर दाउद आकर सड़ा है। पाउद : (अनजाने में) याहूऽ ! ससाराम और चंपा चकित होकर उसे देखते हैं । दाउद झेप जाता है। : माफ करना यार, मगर... सखाराम : नही नहीं कोई बात नहीं। वाजव : वात यह है कि कभी ऐसा देखा नही था न इसलिए- सखाराम : ऐसा यानी क्या ? दाउद : पया यार बातें बनाते हो-लेकिन सखाराम भाई- (प्रांष मारकर, चुटकी से 'क्या बात है' जैसा भाव वर्शाकर, धीरे से सखाराम के कान में) बडा किस्मत- वाला है यार तू तो! क्या था और क्या आ गया तेरे हाथ ! मैं चला। फिर आऊँगा। जाते-जाते चंपा पर फिर एक नजर दालता हमा चला जाता है । सखाराम और चंपा एक दूसरे को देखकर अकारण हो हंसते हैं । सखाराम उसके शरीर के माफर्षण मैं घायल हुआ-सा है। सखाराम : (स्वर के तेवर में नौ) घर पसद आया । चंपा : उहंक ! पहिले वाला हमारा घर बहुत बढ़िया रहा। बड़ा भी रहा।

सखाराम बाइन्डर
सखाराम : अब जैसा है यही है ।
चपा : छिः पुराना कित्ता है । एकदम बाबा आदम के जमान
का है।
सखाराम • (अपने को काबू में करता हुआ) पसद नही है तो जाओ।
बाहर का रास्ता नापो । चलो उठो।
चपा : बाहर का रास्ता? का बाहर कौंनो और पर है ?
सखाराम : नही, बस यही है। और यह भी कोई राजा का महल
नहीं । सखाराम बाइडर का घर है।
चपा : सखाराम बैडर कौन ?
सखाराम : (जरा अचकचा जाता है) मैं ही।
चपा : हाय देय्या ' हम तो समझो कि कोनो और । सच्ची।
राम कसम।
सखाराम : (चपा के शरीर के मरकर्षण से अपने आपको जबरन
उवारता हुआ) शतं मजूर हो तो चूल्हे के पास जाकर
चाय बनाओ । दुघ ऊघ वही चूल्हे के पास होगा । अरे
एक बात कहनी रह ही गई। ब्याही औरत की
तरह रहना पडेगा इस घर में
चपा : हमे बडी भूख लगी है । खाने के लिए दे कुछ जल्दी।
सखाराम : अन्दर देखो जाकर कुछ होगा रसोई मे ।
चपा : (पसर कर बैठती हुई) तो देव ग तू ।
सखाराम : (सकपकाता है। फिर कहने लगता है) इस घर मे आई
औरत को अदब के साथ रहना चाहिए । मरी पदर और
इज्जत रहनी चाहिए इस घर में।
पपा : ए ! देसन भीतर खाने को है का कुछ कल से पेट में
कुछ गया नहीं। चलने वसत एक अमरूद हाथ लगा था।
वही खाया है । पेट कुडमुड़ा रहा है ।
सखाराम : (उसके शरीर पर से जबरन अपनी प्रति हटाता हमा)
.
7

सखाराम बाइन्डर ७२ ? यहां रहते किसी से डरने की जरूरत नही। यह सखाराम बाइडर सबका काल बन के बैठा है यहां। चंपा : डर ? हम केसे डर है । ऊ हरामी भतार से (थूकती है) बडचो-कर का लेगा हमारा चार छ दिन और रह गई होती हरामी के घर तो मजा चखाय देती। वह तो हमी ऊब गई रही बडचो के साथ रहि रहिके । जब देखो तब दारू पी पी के हमे धौंस दिखाता रहा, 'जान दै दूंगा। जान दे दूंगा' हुंह । हरामी जान देगा मुंह- जना । कुछ दे न खाने को जल्दी से । सखाराम : (जरा ठिठकता है फिर रसोई की तरफ जाता है) हा-हाँ, ला रहा हूँ। चंपा : ए ढोलकी बजाता है का तू? सखाराम : ढोलकी नही है । मृदग है । चपा : दोनों एक जैसा । बडचो हमरे भतार के मूं को तरा । कहने को फोजदार रहा मगर चोरो न मूर्त हरामी के मूं पे। सरकार ने डिसमिस कर दिया। पिस्तौल चोरी चली गई रही। चोरी की खबर हरामी को दूसरे दिन लगी ऐसा धुत्त पड़ा रहता रहा पी पी के । अन्दर से थाली मे कुछ खाने का सामान लेकर पा रहे सखाराम को यह सुनकर प्राश्चर्य से पका लगता है। सखाराम : (बाहर के कमरे मे माकर क्रोप को पयाता हुमा) इस घर मे रहकर औरत को तमोउ से बातचीत करनी चाहिए । उल्टी-सीधी यक्वक यहां नहीं चलेगी। बदन में पाग सुलग सपा : हो (खाने लगती है) सोच-सोच जाती है ; हरामी हमसे पधा करावं चला रहा । यहचो की अम्मा फिर से विधायगी तब पंदा होगा हमसे पधा

सखाराम बाइन्डर
?
करावे वाला । (खाना खाकर उंगली चाटती है) और
नही तो का हम का कोई रडी-मुडी हैं ? ए-जरा
चाय बना के दे न बढिया-सी।
सखाराम : इस घर मे यह सब काम औरत करती है।
चंपा : तो कह न औरत से ।
सखाराम : यहाँ नौकरानी नहीं रहती । इस घर मे जो औरत आती
है वही करती है।
चंपा : हाय देय्या । हाँ कह रहा है तू? हमैं नहीं चाय-फाय
बनानी आती?
सखाराम : बनानी नहीं आती?
चपा : न न । हमैं मही आती । ऊ घर मे सास बनाती रही,
भतार के घर । ओ मैके में बाप करता रहा । खाना भी
वही पकाता रहा । अम्मा की पान-तम्बाकू की दुकान रही।
बढिया बिजनेस रहा अम्मा का । दारू भी बिकती रही ।
वहीं तो आया रहा यह मुरदार । मरद हमारा । रेड
करने आया रहा औ जबरदस्ती रेड करके चला गया ।
फिर तो जब देखो तब हाजिर । 'ब्याह पर ब्याह कर'
रट लगाए था। हमने कर लिया । हमें का पता रहा कि
हिजडा है हरामजादा । नहीं कोई गदी बात नहीं करेंगी
हम । याद है हमैं तेरी बात । चाय का कर न कुछ जल्दी
से । खाना खाया कि ऊपर से चाय लगती है पोरन ।
सखाराम सकपकाया-सा सडा है। प्रखें
प्रमो भी चपा के शरीर से सेल रही
हैं । सहसा दरवाजे पर धाउन प्राखडा
होता है।
ससाराम : (पहले दाउद को देखकर चौकता है फिर उसे युप्ताता है)
आओ यार । (उसे एक तरफ ले जाकर) पार दाउद ।

७४ सखाराम बाइन्डर १ जरा चाय बना दोगे क्या दाउद : हा-हाँ क्यो नही ? अमां यार ऐसे माशूक के लिए तो माफ करना। दाउद रसोई की तरफ जल्दी से लपकता है। वर्तन वगैरह खोज-खान कर चाय चढ़ाता है । ध्यान बाहर वाले कमरे में सखाराम : (कुछ याद करके चंपा से) तुमसे पहले वाली जो थी यहाँ पर । सातवौं । गई क्ल ही तो चंपा च्च च्च च च क्या बीमार रही ? सखाराम : क्या मतलव ? मर थोडे हो गई । यहां से चली गई। मैंने हो भेज दिया । जो गरजू होती है उसी को यहाँ रखता हूँ। यहाँ सब कुछ उस स्याही औरत का तरह करना पडता है । दोनो को या किसी एक को ऊव सगी कि यस पता क्ट । जहाँ उसे जाना हो फौरन भेज देता हूं। टिक्ट-विक्ट ले देता हूं। ऊपर से साडी जम्पर । अलावा यहाँ मिली हुई सब चीजे ले जाने की खुली छूट । धपा : हमे नहीं जाना इत्ती जल्दी । सखाराम : (तायले मन से) मैं ही वहां अभी भेज रहा हूँ दोनों एक दूसरे को देखकर येमतलय पागस की तरह हंसते हैं । परले घा फिर ससाराम । फिर सताराम अपने पर जबरन कायू परताहमा। : मगर यहाँ पर यहाँ या तौरतरोरा मान पर रहना पडेगा। घंपा : (जोर से पुराएर) दास भागा दौडाहमा माता है . r सखाराम बाइन्डर ७५ : जरा एक बीडा पान और तम्बाकू ला दे मेरे लिए दाउद : (एकदम पिघलकर) आं? हा-हा-क्यो नही...लाता हूँ ....लाता हूँ... भागता हुआ बाहर जाता है। सखाराम : ए- वाउव अनिच्छा से रुक जाता है। : एकदम गधे की तरह भागने क्या लगे । पैसा ले जाओ। दो पान ले आना । और हां, वह चाय का क्या किया? वाउद : बस अभी बनी जाती है...मैं अभी आया... भागता हुमा जाता है । मुड़-मुड़कर चंपा को देखता जाता है। चंपा : अच्छा है। सखाराम को जरा ई- होती है। दाउद से कुछ कहने के बहाने दरवाजे के पास जाता है और दाउद के जाते हो धीरे से दरवाजा बन्द कर लेता है। दोनों फिर एक दूसरे को देखकर अफा. रण हंसते हैं । सखाराज अब चंपा के खिचाव में बेहाल-सा हो चला है। सहाराम : (चंपा के करीब आता हुआ) और क्या ! अच्छा तो है ही बहुत अच्छा है। अब दोनों एक दूसरे के बहुत करीब हैं। सखाराम येसन होकर उसके कंधे पर हाय रखता है । वरयाजे पर खटपटाहट वाउद की पुकार, सखाराम भाई। दरवाजा खोलो।' सखाराम होश में आकर दरवाजे के पास प्राता है । दर-

ससाराम बाइन्डर
पाजा खोलता है।
वाउद : (अन्दर जाता हुआ) यार इतनी जल्दी दरवाजा भी बन्द
कर लिया...(चम्पा को पान देता है । यह उसको तरफ
देखकर जानलेवा हसो हंसतो है । दाउद भागता हुआ
रसोई में जाकर चाय पनाने सगता है।
घंपा : (दाउद जिस मोर जाता है उपर देसती हुई) बहुत
अच्छा है।
सखाराम : हो, मगर इस घर में बाहरी आदमी के साथ ज्यादा
यातचीत करना मुझे पसन्द नही । मैंने शुरू मे ही जो-
जो बातें बता दी हैं वह सब याद रखना।
चंपा : ए ! अब हम जरा कपड़े बदलने जा रही हैं (अटेची
खोलने लगती है।)
सखारम : रुको ! दाउद वाहर आ जाये तो रसोई मे जाकर बदलो
कपडे।
चंपा : मगर जब यही घर में रहना है तो शरम काहे की ?
जरा किनारे जाकर निःसंकोच साड़ी
बदलने लगती है । दाउद वो कप चाय
लेकर आता है । यह दृश्य देखकर जोभ
काटता है। अनदेखा करने का भाव
जाहिर करता है । चंपा को कोई संकोच
नहीं।
सखाराम : दाउद ! अब आगे से मैं ही तुम्हारी दुकान पर आ जाया
करूंगा। वहीं मिल लिया करूंगा। क्यो ? मेरे ख्याल से
वही ठीक रहेगा।
वाउद : (सखाराम के हर वाक्य के बाद) हां, वाकई यही ठीक
होगा-अच्छा । (मगर ध्यान कपडे बदलती हुई चम्पा
पर । अन्ततः रहा नहीं जाता । बोल पड़ता है ।) अहा

सखाराम बाइन्डर ७७ 7 - वाह सखाराम : क्या हुआ चाउद : गजव .(उसी भाव में डूबा सा) अच्छा भाई । चलता हूं। (फिर रुककर) फिर आऊंगा । सखाराम : नही नही । मैं ही आ जाऊंगा। दाउद : हो । आ जाना। (धपा को सम्बोधित करता हुआ) भा (भी मुंह से निकल नहीं रहा है) मैं चलता हूँ। चाय रक्खी है भीतर (जल्दी से बाहर निकल जाता है।) चपा : (जिपर यह जाता है उधर देखते हुए) बडा सुन्दर है । सखाराम : समझ गया । क्तिनी दफे कहोगी लो चाय लो- दोनो चाय पीने लगते हैं। चपा : (चाय का चूंट भरकर) वहुत बढिया चाय है । सखाराम : (क्रोध मे विफर कर) बस बहुत हुआ, अच्छा है, सुन्दर है, बढ़िया है । बद करो यह वकवास । चपा क्यो चाय बढ़िया नही है सखाराम : (सहसा गलती का एहसास होने पर) ओ चाय के लिए कह रही थी। मैं समझा चपा : (पा गाल मे दबाकर सखाराम से) ले तू भी खा । सखाराम : अपने हाथ से खिला दो। चपा : (उपेक्षा से) ला दे खिला दें । (पान लेकर उसके मुंह मे डाल देती है) ले खा । हमे तो बडी नोंद आ रही है । चार दिन चार रात सोने नहीं दिया बडचो क्लमुंहे ने । दिन रात जान दे दूंगा, जान दे दूंगा की धौंस (जभाई लेकर) सोने जा रही है जरा देर हम । सखाराम : दिन मे? चपा : और नहीं तो का रात मे ? खाना बन जाय तो उठा देना । कहाँ, खटिया वटिया बिछौना-उछौना कहाँ घरा है ? 7 ७८ सम्बाराम बाइन्डर ? सखाराम : यह सब यहां नहीं है । चंपा : नहीं है ? का माने पर है फि सड़क ससाराम : और साना भी खुद बनाना पड़ेगा । औरत वाला काम औरत को ही करना होगा । यहाँ का नियम है यह । घंपा : नियम चलाने को यह कौनो स्कूल है क्या ? कि पचायत ? सखाराम : नियम यहाँ मानकर रहना होगा। जिसको मंजूर न हो यह बाहर का रास्ता नापे । घंपा : (यड़ी सी जंभाई आयाज के साप सेतो हुई) बडी नीद आ रही है । (पास में पड़ी हुई एक कपरी उठाकर जमीन पर बिछाने लगती है।) सखाराम : यहाँ पर नही, अन्दर । कोई आ जायेगा तो क्या कहेगा? चंपा : (फयरी उठाकर अन्दर जाती हुई) वा, बहेगा का ? यही कहेगा कि सो गई है और का ? नीद भी क्या किसी के याप की गुलाम है? रसोई में जाकर जमीन परकपरी बिछाती है और सिर के नीचे हाथ लगाकर लेट जाती है। जरा देर में ही सो जाती है। सखाराम रसोई के परवाजे पर खड़ा यह देखता है । कमरे में चक्कर काटता है। सोती हुई चंपा को बार-बार देखता है। उसके मन की वासना अब पूरी तरह जाग्रत हो गई है। इसी समय याहर कौआ चोखने लगता है। सखाराम : (कौए को धीरे से हे काता gमा)है है हक् (कौवा चिल्लाता रहता है । सखाराम बेचन है। बाहर का दरवाजा बन्द- कर लेता है। चंपा जहाँ सो रही है यहाँ आता है । जरसी उतार कर फेंक देता है उसके पास जमीन पर ससाराम बाइन्डर ७६ ? घेठ जाता है । गरम स्वर मे) सो रही हो क्या...उठो ..उठो...सो गई क्या .. याहर कौआ और जोर से चिल्लाता रहता है । वह उस व्यवधान को बर्दाश्त नहीं कर पाता । बैठाठा आवाज हो आवाज लगाकर उसे हडकाता है। : ए भाग साले मादरचो नजर फिर चंपा पर । उसके ऊपर एका- एक हाथ रखता है। चंपा जोर से चिल्लाकर फथरी पर उठ घंठती है। सखाराम घबराकर अलग हट जाता है । चंपा : का है ? है का ? आय ? ओ तू है । मैं समझी वह कल- मुहाँ हरामजादा । मरद हमारा । का हुआ खाना बन गया? वाहे को उठाया हमे ? सखाराम सकपकाया-सा खडा है । उतर नहीं दे पाता। : हाय देय्या यह बात है ? आया समझ मे । अच्छा सूझा तुझे । बडी बात हुई कि जाग गई हम । ए सुन । मरद का घर छोडा जरूर है पर हम कोई कोठे वाली रडी नहीं । इज्जत बचाने को ही छोडा है उसका घर । क्या करने चला था मुरदार । आपे मे रह जरा । तू भी क्या सडक का कुत्ता है ? नीद तो ले ही डूबा हमारी अब जरा खाने-वाने का जल्दी से कर कुछ जा बडी-सी जंभाई लेती है। सखाराम जल्दी से जरसी ढूंढकर पहनता है। बाहर निकल जाता है । वह अकेले हो बैठी हुई है । चेहरे पर नींद और सुस्ती । 1 सखाराम बाइडर ग है । बगल की कथरी के नीचे से एक छोटी सी डिबिया निकलती है और उसमे तबाफू निकालकर मलती है फिर होंठ में बचा लेती है। वह तम्बाकू चुयलाती रहती है कि अंधकार । दृश्य दूसरा उजाला । दिन का समय । धूप जैसी रोशनी । सखाराम बाहर के कमरे में बिछावन पर पेट के बल, अस्त-व्यस्त पडा सो रहा है । मुर्दे की तरह । वर- वाजा खुला है। कमरे में और कोई नहीं है । खाकी वर्दी में व्यक्ति दरवाजे से झांकता है। सिर पर थाने- दारों वाली टोपी तिरछी लगी हुई है। दाढ़ी के खूटे बड़े हए । चेहरा पिय- ककडों की तरह । मगर इस वक्त होश में है । बगल मे दवा हुमा एक सामान से कसा हुमा गदा फैनवस का मेला ।

सखाराम बाइन्डर
वह एक बार अन्दर नजर डालता है फिर
ढोठ होकर भीतर घुस आता है । जूता
उतारता है। थैला धोरे से उतार कर
एक तरफ रखता है। पेट के बल पड़े
हुए सखाराम के चारों तरफ चपकर
लगाकर उसे देखता है। एक भद्दी सो
डकार लेता है । फिर एक कोने में जाकर
चुपचाप बैठ जाता है। कुछ देर इसी
तरह बैठा रहता है फिर उठकर रसोई
के पास जाकर अंदर झांकता है । अन्दर
जाकर हाय-मुंह धोता है । ढके हुए
बर्तन खोल-खोलकर देखता है, फिर
वापस आकर थले से बोतल निकालकर
एक बूंट गले के नीचे उतार देता है।
बोतल थैले में डालकर चुपचाप यंठा
रहता है । अब सखाराम कुछ भुनभुनाता
है। फिर करवट लेता है । जागने को
सखाराम : ए...
घर में कोई नहीं है । दुवारा ।
: ए...जरा देख यह धूप कहाँ से आ रही है...
कौन देखे।
: मादरचो-फिर..
बिछावन से मुंह पर पड़ती हुई धूप को
राकना चाहता है पर सफल नहीं हो
पाता। कोने में खडा-खडा वह व्यक्ति
यह सब बडी उत्सुकता से देख रहा है।
६

८२ सखाराम बाइन्डर : अरे ए कान फूटे हैं क्या तेरे कोई रिस्पॉन्स नहीं । आँखें बन्द किए. किए हो बहुत क्रोधित होफर । घर मे आदमी रहते हैं या पत्थर ? इतना चिल्ला रहा हूं फिर भी खिडकी बन्द नही करती उठकर बैठ जाता है आंख अभी भी खुल नहीं पा रही है। ' कहाँ गई ? सबेरे-सबेरे चली वहां गई ? किसी तरह आंख खोलता है । सामने उत्सुक और निस्पृह से बैठे हुए खाकी व वाले उस व्यक्ति को आंख मिच- मिचाकर देखता है। कौन ? कौन है इधर वह व्यक्ति सिर्फ नस-सा मुस्कुराने को कोशिश करता है पर साहस नहीं जुटा पाता। : कौन है तू ? सीधे घर के भीतर ? यह चली कहाँ गई? दरवाजा एकदम खुला हडबडा कर उठता है। : धूप भी कितनी चढ आई है। अरे ए मगर पहले तू बोल । तू कौन है । सीधे घर के भीतर ही घुम आया (रिस्पॉन्स नहीं) क्या काम है ? यह घर है कि धर्म- . ? 7 7 शाला 7 अब नोंद पूरी तरह उचट गई है। : खडा हो जा झटपट । क्सिसे काम है ? बोल । यौन यह विवश होकर उठता है । सिर हिला-

मसाराम बाइन्डर
कर संकेत करता है कि उसे किसी से
काम नहीं है--चेहरे पर स्नेहयुक्त
: तब फिर चोर की तरह क्यो घुस आया घर में ?
वह व्यक्ति इनकार में सिर हिलाता है ।
: पुलिस के हवाले कर दूंगा तुझे (उसे ठीक से देखकर)
पर पुलिस थानेदार को तरह तो तू ही लग रहा है ।
सचमुच । मगर थानेदार का यहां क्या काम है ? इस
सखाराम वाइडर को समझा क्या है तूने ? सडक का
उचक्का भाग यहां से निकल जा पौरन । बाहर से कह
जो कहना-सुनना हो, चल । जा बाहर
वह जाने को जरा भी उत्सुक नहीं
दिखता । दुवारा बैठने के चक्कर मे है।
: बैठ नही । खडा रह।
वह खडा रहता है। उसे अच्छी तरह
देखकर ।
..
?
व्यक्ति : (नवस-सा मुस्कुराकर अधूरा नमस्कार करता हुआ)
आदमी चपू का-फौजदार शिंदे कहते हैं सब मुझे।
डिसमिस हूँ।
सखाराम : (सिर तप जाता है) वही है तू तू यहाँ कसे आ गया
किसने आने दिया तुझ पर मे चपू कहाँ है ? तूने तो
नहीं कुछ उसका भला-बुरा
वह इनकार में सिर हिलाता रहता है।
: तो फिर वह कहीं गई ? कहाँ गई चपू'
व्यक्ति : (कंधे उचकाकर) भगवान जाने-मुझे क्या पता ? थी ही
नही जब यहाँ आया मैं । मगर आप सो रहे थे यहाँ ।

८४ सखाराम बाइन्डर , . इसीलिए बैठ गया, बस । अच्छा हुआ जान-पहचान हो गई। फिर अधूरे ढंग से नमस्कार करता है । सखाराम : क्या काम है तुझे यहां पर ? उसे वापस ले जाने के लिए आया है ? वह नही जायेगी, जा व्यक्ति : मैं भी कहीं लिवाने आया हूँ। यही अच्छी तरह है। आराम से रहे बस करना क्या है सखाराम . नो फिर क्या करने आया है यहाँ ? व्यक्ति : सोचा देख जाऊँ कैसी है । जी नहीं माना। सखाराम : बडा प्यार है उसके ऊपर व्यक्ति : औरत है वह मेरी । घर से चली आई तो क्या । सखाराम : गई कहाँ थाखिर ? समझ में नहीं आ रहा है । पता नही चाय भी बनाकर रख गई है या नहीं। ध्यक्ति : नहीं। सखाराम : क्या नहीं व्यक्ति : चाय तयार नहीं है । सखाराम : तुझे क्या पता व्यक्ति : चाय नहीं है। सखाराम • (चिढ़कर) तू क्या जाने ? व्यक्ति : (जरा भयभीत होकर) ऐसे हो । मेरा पीने को मन था इसलिए ढूंढा था-अन्दर । सखाराम : पर भर ढूंढ पाया तू व्यक्ति : नही बस बर्तन देखा था चाय या । और नहीं... सखाराम : भाग यहाँ से । जा भाग नहीं तो जान ले लूँगा तेरी। व्यक्ति : चिल्लाइए नहीं । बेकार यदनामी होगी। सखाराम : तुझे क्या करना है व्यक्ति : पपी का आदमी हूं। उसपी यदनाभी मेरी बदनामी 7 7 , सखाराम बाइन्डर ८५ ? 7 भी तो- सखाराम : तेरा उससे अब क्या सबध व्यक्ति : सबध जनम भर का होता है । वही तय होता है । ऊपर वाले के यहाँ। ऊपर नमस्कार करता है। सखाराम : अब वह यहाँ मेरे पास रहती है। व्यक्ति : पता है । तभी तो आपा हूँ ढूंढते-ढूंढते । सखाराम : वह अब वापस नही जायेगी। व्यक्ति : न जाय । सुखी है तो ठीक है। सखाराम : वह तुझे पूछेगो भी नहीं व्यक्ति : तकदीर की बात है। सखाराम : तो तुझे फिर चाहिए क्या ? क्यो आया यहां व्यक्ति : ( नर्वस निरीह मुस्कान चेहरे पर ) ऐसे ही। चपा के बिना नुझे चैन नही पडता .. सखाराम : चुप रह । उसने तुझे छोड दिया है । व्यक्ति : मगर चपा बहुत सुन्दर है । ऐसा-ऐसा पुट्ठा इतनी इतनी छाती .ऐसे ऐसे सखाराम : चार लात दूंगा दिमाग सही हो जायेगा । जा, भाग यहाँ से ! साला, अपनी औरत के लिए ऐसे बोलता है हरामी वही का .. उसकी गर्दन पकडकर उसे दरवाजे तक ले जाकर छोडता है। :जा दफा हो यहां से । व्यक्ति : झोला रह गया। (दरवाजे से वापस जाकर फिर बैठ जाता है) मैं रुकता हूं जरा । चपी से मुलावात हो जायेगी बहुत याद आती है उसकी सखाराम : (उसके बेहयाई से बहुत असहाम होकर) साली मादरची- सखाराम बाइन्हर मुंह भी नहीं घुला रही है। ठहर मैं मुंह धोलू फिर बताता । हूँ तुझे। रसोई में जाता है। खिड़की से बाहर कुल्ला करता है । मुंह पर पानी के छोटे देता है। यह सब करते हुए चम्पा के नाम पर बड़बड़ाता जाता है। फिर चंपा के पति के पास जाता है। वह निश्चित-सा बैठा-बंठा बोतल निकाल- फर एक चूंट पोता है। सखाराम को देखकर नवंस-सा मुस्कुराता है । अनाथ लड़के की तरह लगता है। : उठ यहाँ से ! जा दफा हो यहाँ से ! वह उसी तरह बैठा है । अब ठीक से टेक लगाकर बैठ गया है। पैर फैला लिया है । सखाराम परेशान है कि क्या फरे। दाउद : (थाहर से पुकारता हुमा) सखाराम माई-यो सखाराम भाई । (अन्दर जाकर) पछी कहाँ है ?.. फौजदार शिदे को देखकर चुप हो जाता है। यह कौन है' यह इशारे से सखाराम से पूछता है । सखाराम : मरद है चपूका। दाउद : (देखकर) देखते ही मैंने यह सोचा था यार । तो यह है पछी का पिंजड़ा (उस व्यक्ति से) खुदा हाफिज । यह नवंस-सा मुस्कुराता है। दाउद : पछी आया तो पिंजडा तो पीछे-पोछे बायेगा ही। वह पछी के विना बवेला कसे जियेगा ससाराम माई ?

सखाराम बाइन्डर ५७ . सखाराम : सूरत शकल से सीधा लगता है पर महा पाजो है यह । साला अपनी बीवी का इतना गदा बखान अपने मुंह से कर रहा था कि क्या कहूँ बाउद : अच्छा, क्या कह रहा था ? सखाराम : छोड़ो यार । एक तो कब से भगा रहा हूं जाने का नाम ही नहीं ले रहा है ..बैठा है माठू की तरह... दाउद : जहां उसका पछी वहां वह (उससे) क्यो जनाव सच कह रहा हूँ या झूठ चम्पू का पति फिर नर्वस-सा मुस्कुराता 7 सखाराम : दिखाता ऐसे है जैसे बड़ा चाहता हो औरत को । चल उठ । दफा हो मेरे सामने स । केचुआ साला दाउद : सखाराम भाई । इस बार लगता है पछी के साथ माथ उसका पिजडा भी तुम्हे रखना पडेगा (धौरे से) मारो गोली यार पछी बढ़िया हो तो फिर पिंजड़े से क्या पव- चंपू का पति यह सुनता हुआ बोतल निकालकर नया धूंट भरता है और मयंस मुस्कान के साथ बैठा रहता है। सखाराम : (क्रोध से होठ चबाकर) जी करता है उठाकर फेंक दूं साले मादरचोको। दाउद : समझने की कोशिश करो यार । मगर पछी है कहाँ ? अन्धकार

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सखाराम बाइन्डर . ? सखाराम : सूरत शकल से सीधा लगता है पर महा पाजो है यह । साला अपनी बीवी का इतना गदा बखान अपने मुंह से कर रहा था कि क्या कहूँ दाउद : अच्छा, क्या कह रहा था सखाराम : छोड़ो पार । एक तो पाब से भगा रहा हूँ जाने का नाम ही नहीं ले रहा है ..बैठा है माठू की तरह... दाउद : जहाँ उसका पछो वहाँ वह (उससे) क्यों जनाब सच कह रहा हूं या झूठ? चम्पू का पति फिर नर्वस-सा मुस्कुराता सखाराम : दिखाता ऐसे है जैसे बडा चाहता हो औरत को । चल उठ । दफा हो मेरे सामने स । केचुआ साला .. दाउर : सखाराम भाई । इस बार लगता है पछी के साथ साथ उसका पिजडा भी तुम्हे रखना पडेगा (धीरे से) मारो गोली यार पछी बढिया हो तो फिर पिंजड़े से क्या धब- राना। चंपू का पति यह सुनता हुआ पोतल निकालकर नया घूट भरता है और नर्वस मुस्कान के साथ बैठा रहता है । सखाराम : (क्रोध से होठ चबाकर) जी करता है उठाकर फेंक दूं साले मादरचो-को। दाउद : समझने की कोशिश करो यार । मगर पछी है कहाँ ? अन्धकार

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है सुपमा सेठ-चम्पा, किमती सामदै चम्पा का पति

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Sath सुषमा सेठ-पम्पा, किमती मामदेचम्पा का पति

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सखाराम बाइन्डर
८६
में उठा तो यह यहाँ बैठा था। फिर किसी तरह गया
ही नहीं।
चंपा : वाह वा। गया नहीं ? देखती हूँ कैसे नहीं जाता
हरामी।
आगे बढ़कर पति का कॉलर पकड़कर
झटके से खड़ा करती है।
: क्यो बेमुरदे।
उसके मुंह पर एफ थप्पड़ लगाफर ।
: कोन सी रोकड घरी है तेरी यहाँ पे ? बोल ।
उसे लात-घूसो से बेतहाशा मारने लगती
: किसने दिया था न्योता तुझे यहां आने का ? क्यो ?
सखाराम और दाउव अवाक् होकर यह
देख रहे हैं। उस आदमी का हाथ छोड़
कर वह दरवाजे के पास जाती है । वहीं
रखो हुई चप्पल उठाकर तेजी से
लौटती है। फिर उसका हाथ पकड़कर
झटके से खडा करती है । और चप्पल
से तडातड़ मारने लगती है । बदहवास
सी हैं । वहाँ पर खड़े हुए सखाराम
और वाउद यह देखकर भयभीत हैं ।
चपा अब उस व्यक्ति को बोरे की तरह
घसीटती हुई दरवाज के पास डाल
देती है।
जा यहाँ से । दुवारा मुंह दिखाया तो मुंह नोच लूंगी
तेरा । हमारे रास्ते मे न पड बताए देती हूँ। तेरा मेरा
अब कोई नाता नहीं।

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सखाराम बाइन्डर
चंपा : (आगे बढ़कर उसे फिर लात मारती है) ले .और ले ।
और ले फलमुंहे मुरदे और ले हरामी।
सखाराम : (चंपा से) औरत है कि आफत की पुडिया दू कितना
भारती जा रही है उसे...कलेजा है कि नही तेरे...?
चंपा : नही; कलेजा नही है हमारे । इसी हरामजादे ने चवाय
डाला है कलेजा, बहुत पहले । जरा-सी बच्ची थी तभी ।
पंसा देके अम्मा से खरीद लाया था हमे, फिर ब्याह कर
लिया । तब कुछ समझ मे भी नहीं आता था हमारे ।
सारी-सारी रात यह नोंचता-खसोटता था हमे मुरदार ।
सुई चुभोता रहता था । आग लेके सारी देह जलाता
रहता था। हमें गदी-गदी बात करने को कहता था
हामी । जब सहा नहीं गया तो भाग गई हम घर से।
यह फिर पकड़ लाया । हमे बांध के बदन मे मिर्चा भर
दिया हरामजादे ने ! कलेजा कहाँ से रहता ..यह ..यही
हरामजादा ..यही नोच-नोच के खा गया उसे .मेरा
खून पी गया यह हरामी...उठ बे चमरचिह तेरे भी
मिर्चा न भरा तो कहना...
आगे बढ़ने लगती है । सखाराम उसे
पकड़ता है वह अपने को छुडाना चाहती
है । सखाराम पूरी ताकत से उसे पकड़े
रहता है वह टूटने का जोर लगा रही
सखाराम : दाउद ! साले को जल्दी से बाहर ले जा यार... जन्दी
कर...
दाउद आगे बढ़कर चंपा के पति को
पकडकर खींच-खींचकर किसी तरह
ले जाता है । चंपा देख रही है । उसकी

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दृश्य चौथा रसोई घर हल्का उजाला। चंपा फयरी पर सो रही है । एक परछाई बाहर के कमरे से रसोई घर में आती है । परछाई सखाराम को है । सखाराम सोती हुई चंपा फो देखता हुआ खड़ा रहता है। फिर बाहर के कमरे में आता है । टहलता रहता है फिर अन्दर जाता है । येचन है। सोई हुई घंपा पर झुकता है फिर पड़ा हो जाता है। पुछ अलग हटता है फिर रहा नहीं जाता । उसके पास बैठ जाता है। कुछ निश्चय नहीं कर पाता । चंपा करवट बदलकर सो जाती है उसकी सांस को तेज आवाज सुनाई दे रही है। सखाराम बेसन होकर उसके ऊपर हाय रखता है । स्पर्श से पोंककर यह भटके से उठ- कर मंठ जाती है। घंपा : (माल फाड़ फारकर देखती हुई) क्या है ? कौन है ? तू? पिर दिमाग विगड गया तेरा क्या कहा है हमने ?

६४
सखाराम बाइन्डर
समझ में नही आया क्या? वताए देती हैं तुझे । हम
बहुत बुरी हैं । समझ ले यड़ा खराव गुस्सा है हमारा ।
अस्त-व्यस्त आंचल ठीक करती है।
: हमे गुस्सा न दिला कहे देती हैं। हमें वह सब अच्छा
नहीं लगता समझा? वह औरत मरद के बीच का ।
सखाराम दूर हट कर खड़ा है।
:जा । बाहर जाके सो जा उस तरफ ।
सखाराम : करार है। जो औरत यहाँ रक्खी जायेगी उसे मेरी
औरत होकर रहना पड़ेगा। उसी तरह सब करना पड़ेगा
मैंइसो शतं पर रखता हूँ यहाँ । सात आई-गई किसी
ने चूं तक नहीं किया।
चंपा : वह होंगी वैसी । हम नही । हमें सोने दे ।
सखाराम : मुझे तकलीफ होती है । घर मे रहकर भी न मिले इसके
क्या माने ? सामने छप्पन पकवान फिर भी पेट भूखा ।
बहुत तकलीफ होती है।
चंपा : हमसे नहीं होगा वह सब । जा बाहर जा के सो। नहीं
तो खडा रह । हम भी ऐसे ही बैठी रहेगी।
सखाराम जरा देर वैसे ही खड़ा रहता
सखाराम: मर साली।
बाहर के कमरे में आता है । रसोई घर
में चंपा कयरी पर बैठी हुई है । सखा-
राम कोने से दारू को बोतल निकालता
है । मुंह से लगाता है।
: मर मादरचो..
...मर...
फिर पोता है । बैठी हुई । आयाज में
चौखकर 'मर हरामजादी मर कमोनी।"

सखाराम बाइन्डर
दरवाजा खोलकर बाहर अंधेरे में चला
जाता है । रसोई में चंपा पहले तटस्थ
सी बैठी रहती हैं । फिर कुछ निश्चय
करके उठती है। बाहर के कमरे मे
जाती है । फिर बाहर जाती हैं । बाहर
से सखाराम का हाय पकडकर अंदर ले
जाती है।
चंपा : अच्छा चुप कर । हम देती हैं तुझे सब कुछ हमें दारू दे
तू पहले।
वह स्तब्ध-सा खडा उसे देखता है।
: मुरदे । दारू दे हमें । कहाँ है ? कुछ कह रही हैं हम
कहाँ है बोतल?
वह ताख पर से बोतल उठाता है। चपा
बोतल छीन लेती है।
: बैठ वहाँ ।
उसे जबरन बिठाती है । बोतल खोलकर
गट-पट पोने लगती है। वह निश्चल
सा उसे देखता रहता है । यह सब हल्की
रोशनी मे।
अन्धकार।
तुरन्त ही फिर हल्का उजाला ।
चंपा : (छके हुए स्वर मे ?) योडी देर मे ले ले हमे मुरदे ।
कर जो घरना है तुझे।
सखाराम हफरकाया-सा उसे देख रहा
अन्धकार।

दृश्य
पाँचवाँ
उजाला। दिन पढ़ आया है। कोई
बाहर खरा दरयाजा खटखटा रहा है।
रसोई घर मे चंपा के बगल मे सोया
हुआ सखाराम हायड़ाकर उठता है ।
अलसाया-सा बाहर के कमरे मे आता
है दरवाजा खोलता है।
बाहर से कोई }
दरवाजे के
सखा चल रहे हो क्या । प्रेस पर पहुंचने में देर हो
जायेगी कितनी देर दरवाजा भडभडा रहा हूँ । बाबा
रे । सोते हो घोडा बेंच कर ।
सखाराम : (अभी भी नींव गई नहीं) वस आया अभी ।
दरवाजा उढ़का कर रसोई में जाता है।
गहरी नोंद मे सोई हुई घंपा को देखता
है। झुक कर, अस्तव्यस्त ओढ़ना ठीक
करने के बहाने उसे धीरे से स्पर्श करता
है। नाली की तरफ जाकर मुंह पर पानी
के छोटे देता है। कुल्ला करता है। बाहर
के कमरे मे प्राते-आते फिर पंपा की

सखाराम बाइन्डर
तरफ देखता है। फिर गुनगुनाता हुआ
बाहर पाता है। शर्ट, जरसी, टोपी
पहनता है। पांघों मे चप्पल सालकर
बाहर निकल जाता है। जाते-जाते
दरवाजा खींचकर ठीक से बन्द कर
लेता है । थोडी देर तक रसोई मे शान्त
सोई हुई चंपा दिखती है।
अन्धकार।
दृश्य छठा
उजाला । दुपहरी । चपा रसोई मे पूल्हे
के पास बैठी हुई खाना खा रही है।
सखाराम बाहर से आता है । चप्पल
उतारता है। सूंटी पर जरसी टोपी
आदिटोगता है।
ससाराम: में आ गया
७

संसाराम बाइन्डर
चंपा : ( भीतर से ) इतनी जल्दी ? प्रेस में छुट्टी उट्टी हो
गई का?
सखाराम : (भीतर जाता हुआ) नहीं। ऐसे ही आ गया । बोल !
यो आया?
चंपा : हमें का पता
सखाराम : मन नहीं लगा।
चंपा: ये बात अच्छी नही ।
सखाराम : पर सच्ची तो है (उसके करीब जाकर) ए...
चंपा : दूर हट । खाना खाने दे हमे। अभी नहाया भी नहीं ।
सबेरे कितनी देर से आँख खुली।
सखाराम : रात बहुत मजा आया "
चंपा : (चुपचाप काम करती हुई) हमे कुछ नहीं याद ।
सखाराम : अरे जा झूठी
चंपा : झूठ नही कहती।
सखाराम : खूब मजा आया, दिन भर वही वही याद आती रही।
मन नहीं लगा ! मन किया कि बस घर चलूं...
चंपा : बाहर बैठ चलकर । हमे खाने दे..'
सखाराम : नहीं।
चंपा: फिर क्या ?
सखाराम : पहले यह ।
पीछे पकडी हुई दारू की बोतल निकाल
कर उसे दिखाता है।
चंपा : (उसकी तरफ देखकर) खाना खाने दे हमे ।
सखाराम : उहुंक !
उसका हाथ पकड़ लेता है यह अनपेक्षित
दृढ़ता से भिटक देती।
: हस्साली यह गुमान !

सखाराम बाइन्डर ६६ - चपा. खाते बखत हमे ऐसे तग न कर कहे देती हैं । सखाराम : इस घर में मेरी बात चलती है । मैं जो कहूंगा करना पडेगा। चपा खाना खाती रहती है। 'हुकुम मेरा मानना पडेगा नही तो मुझसे बुरा कोई नहीं । मार मार कर भुरकुस निकाल दूंगा । आगा पीछा नहीं देखूगा फिर । चपा : आय हाय । यह हमसे कह रहा है । क्यो? सखाराम : तू क्या कोई दूध की धोई है । मुझे जो चाहिए वह लेकर रहता वपा : जा उघर बाहर । काम है हमे । सखाराम . (हाथ पकडकर) चपा। चपा : (हाय झिटकती नहीं। समझाती हुई कहती है) समझ वात्त । नग न कर हमे। सखाराम हाथ छोटकर बाहर के कमरे में चला जाता है। और बेचन सा चक्कर काटता रहता है। सखाराम • (एकाएक रुफकर चिल्लाता है) बाहर निकाल दूंगा साली घर से । तब पता लगेगा। सहक की कुतिया की तरह रहना पड़ेगा ऐरा-गरा सब के साथ बाजार लगा के बैठना पडेगा बाजार चपा अभी भी खाना खा रही है। पर अब यह भी देन हो उठी है। कुष समय ऐसे ही गुजरता है । चपा खाना रोककर चुप बैठी है। फिर एकाएक भयकर आवेश के साथ सामने को पासी दूर फेंक देती है। जोर की १०० ससाराम बाइडर - आवाज 4 साय थाली दूर जा गिरती है । बाहर सखाराम इस मावाज से स्तब्ध हो उठता है । आवाज जरा देर मे शान्त हो जाती है चम्पा उठ कर नाली के पास जाती है। पानी डाल कर हाय धोती है फिर आंचल मे पोछती है। गिरी हुई थाली उठाकर उसमें जूठन बटोरकर रखती है और नाली के पास रख देती है। फिर बाहर के कमरे में आती है। घपा : (सखाराम के पास जाकर) चल । दे दारू इधर- सखाराम चुपचाप हतप्रभ होकर उसके उग्र रुप को देखता रह जाता है । • क्या कह रही हैं हम दारू दे हमे। सखाराम चुपचाप उसे बोतल पफमा देता है। चम्पा क्रोध में दांत पीसती हुई बोतल का ढक्कन खोलती है। जल्दी-जल्दी पोने लगती है। ले । तू भी पी। पो हरामी । जयरन उसके मुंह में बोतल लूंसती है । खुद भी पोती है। खिलखिला खिल- खिलाकर हंसती रहती है-एक तुक मजा देतो हूँ ! अभी मजा देती हूँ तुझे ! पोती रहती है। सखाराम के मुंह मे भी जबरन डालती रहती है । बराबर खिल- खिलाकर हंसती ही रहती है । • आ जिते मजा लेना हो । आ । सब को मजा देंगी हम -- --- सखाराम बाइन्डर १०१ 7 . साले कुत्ते को भी। मुरदे को भी। आ मुरदे । तुझे भी लेना है मजा? बाहर के दरवाजे से दाउद मन्दर माता है और घबराया-सा दरवाजे के पास ही खडा रह जाता है। कोन दाऊत आ । चल तुझे भी लेना है न मजा ? आ तू भी ले । ले मुरदार । आ । अरे आ न मुरदे । ले हमे भुरदे... दाउव हक्का-पवका-सा खडा है । सखाराम अयसन्न । चम्पा सखाराम के गले से लिपटी हुई है। वारू मे छको-सो बदहवास हंसे जा रही है । अस्त- व्यस्त। । अन्धकार।

दृश्य सातवाँ
क्षोण मालोक । जो घर को बाहरी
खिडकी के रास्ते मा रहा है । शेष घर
में धना मन्धकार । कुछ देर चंपा को
अस्पष्ट कराह । अर्थ चेतनायस्था में कही
जानेवाली मुक्खुवाहट।
चपा : कौन है ? चल रे हरामजादे ? आ। मजा ले मजा । ए
मुरदे दूर हट
11
वारू के नशे में डूबी हंसी। फिर फराह ।
दारू दे । दारू दे हमे । दे दारू हरामी | "दारू'
हंसी, कराह ।
अन्धकार ।
..
aza

दृश्य आठवाँ
तेज़ उजाला दिन का। चंपा घर में नहीं
है। बाउ और सखाराम । सखाराम
के चेहरे पर नई जिन्दगी के चिन्ह ।
वह पहले से भिन्न लग रहा है।
वाउव : लेकिन सखाराम ! यार तू काम पर नहीं जायेगा तो कैसे
तेरा निभेगा। काम तो करना ही पड़ता है । घर-गृहस्थी
है। पिछले पूरे हफ्ते काम पर गया ही नही तू
सखाराम : देखा जायेगा । मन हुआ तो फिर चला जाऊँगा ।
दाउद : और नौकरी से निकाल दिया गया तो ?
सखाराम : वह नही उसका बाप निकाल दे नौकरी से तो क्या ।
अपने राम को फिकर नही। यह न सही दूसरी
मिलेगी। कुलोगीरी कर लूंगा साले को । नहीं तो वही
मजदूरी । काम तो करना ही है दाउद मियाँ । यह सखा-
राम बाइडर कार से कभी नही डरा। अपने डील की
मशक्कत पर इनी उमर पार पिया है दाउद । बाप को
वाप नहीं समझा। मां जब-तब मुझे चमार को बोलाद
कहा करती थी। मियां यह सखाराम बोटे वाले बवूल
की तरह अकेला मैदान मे खडा हुआ इतनी जिन्दगी बाट
दे आया है । उसको किस साले वा डर है । उसे

१०४ सखाराम वाइन्डर अब सिर्फ चपा चाहिए ] चपा बस और कुछ नही । दाउद : लेकिन गांव वाले क्या बक्बक करते हैं... सखाराम : (पलेयर अप होफर) गांव वाले ? गांव वालो बाप का कौन कर्जा खाया है सखाराम वाइडर ने ? भूखा मर रहा था तब तो कभी दो कौर खाने को नहीं पूछा साले गांव- वालो ने ? मिरज के मिशन अस्पताल मे जब बुखार से जल रहा था तब कोई हरामजादा गांववाला पूछने नहीं आया कि मरा कि जिया ? नही दाउद मियां । गांव- वालो की बात मुझसे मत कहो । ये साले मादरचो- खुद तो सत्तर कोठे झक मारते घूमते है और दूसरो की नाक नापते घूमते हैं । गांव मे अपने से साफ कोई नहीं । सब साले एक सिरे से नाली के कीड़े। बस ऊपर से सफेद चकमक कपडा देख लो, भोतर जिसको उघडोगे गोबर ही पाओगे । उनकी बात क्या करते हो ? अपने से साफ तो बस एक ही है दाउद भाई । रडी । वह क्या कभी कहेगी कुछ ? कभी नही । वह कभी मुझे शराबी नही कहेगी । कभी नहीं कहेगी कि सखाराम औरत के पीछे आवारा हो गया या चपा के पीछे विगड गया। क्योकि वह जानती है सब । रडी और आदमी मे कुछ फरक नहीं होता मियाँ दाउद J:"फरक बस एक ही है कि आदमी भूठा होता है और रडी झूठी नहीं होती। बस । वाउद : लेकिन सखाराम । अपनी हालत तो आप ही देखनी चाहिए न तुम्हारा यह घर कैसा था और कसा हो गया । सखाराम भाई । याद है तुम्हें "उससे अभी बहुत दिन भी नहीं हुआ''जब यहाँ बह वाला पछी था." वही 'लक्ष्मी भाभी। कमा लगता था तव" ससाराम : अरे लक्ष्मी गई जहन्नुम मे मर गई वह मेरे लिए । अब 7

सखाराम बाइन्डर
१०५
उससे क्या मतलव । उन दिनो की बात छोडो दाउद
मियाँ । यहाँ कोई किसी की याद मे नही बैठा रहता ।
अब तो बस चपा है । चपा के नाखून के मल को भी
बराबरी नही कर सकती कोई । अरे तुम क्या जानो कि
चपा क्या चीज़ है
वाउद : जो दिखाई देता है और जो सुनाई देता है यार वह
अच्छा नहीं लगता मुझे। बस यह कहना है मुझे तुम
मानो या न मानो । अच्छा तो मैं चलूं-धधे का टाइम
हो गया
सखाराम: जा जा
दाउद जाता है। अकेला सखाराम ।
कुछ देर उसी तरह बैठा रहता है फिर
उठकर ताख के पास जाता है।
अन्धकार।

दृश्य नवाँ
उजाला दिन का।
बाहर दूर पर जोर-जोर से शहनाई
नगारा बज रहा है। रसोई मे चंपा
दारू के नशे मे अपने को संभालने का
प्रयत्न करतो हुई काम कर रही है ।
बाहर सखाराम आता है।
सखाराम : (चप्पल उतारकर खूटी की तरफ जाता हुआ) चपा"
चपा"
चंपा किसी तरह लटपटाती-सी सामने
माती है।
: तूने पिया ? सबेरे-सबेरे ? आज दशहरा, त्योहार का
दिन और"
वह
नशे में हंसती है।
: त्योहार के दिन सबेरे-सबेरे यह क्या तमाशा कर रखा
है ? यह अच्छा नहीं है चपा । क्यो पिया तूने ? क्या
कहा था मुझसे प्रेस जाते समय ? अभी नहाई तक नहीं
और पी के बैठी है । त्योहार के दिन घर की औरत को
कैसे रहना चाहिए कोई आयेगा तो क्या कहेगा ? जा
भीतर जा पहले। जा जल्दी जा भीतर..
?

र सनसे रसोईयो ।
- का
है
र का रासह
बन्द ३० ॥ उरमो SAT
रचर स्टो २९ मा
दलाई। इस पर मरतो
पप कर उसे करता है पर
उसे एक पुरक कर रखता
शन के पत्तोर सोसाकर
কথা । বম ও ধন যাণ্ড কক
अदा के रात रहना है। या काय
और सामान लास से सत्ता है।
रुषप्ता है। फिर सो कर
शहर से कुष्कर उसमें से आता है।
समें नासी के पास जाकर हाथ पैर
देता है। नो नो से न भरता
समाप्ती ५ काम कर रही है।
एकाएक शशिरने सस्तो है । सबारम
इमे सरप्पर है। इन उसके पते से
निस्ट जना है। सलाम उसे अप
करते कारन करना
भवा नहीं होतोको मे भभकी रहनो
है- हसलो रहमो है।
: म सानो । हा उभर दर हर र रहा है ना।
मुझे पुमा करती है। र हती है कि नहीं रहा।

सखाराम बाइन्डर
वह वैसे ही झूमती हुई-सो हंसे जा
,
: साली मादरचो-शरम ही नहीं। निकल जा मेरे घर
से ।
यह कहते हुए उसके उन्मत्त शरीर से
एक तरफ अधिक मदहोश भी होता जा
चपा
: दूर हटती है कि लगाऊँ एक लात कमर मे'
वह नशे मे और हंसे जा रही है ।
• दूर हट । हट अलग । कुतिया साली । (उसे ढकेल देता
है । वह जोर से गिरती है । दर्द से लोटने लगती है)
(दर्द से) हाय हाय उई
सखाराम उसके पास जाता है। यह
देखने के लिए उस पर झुकता है कि
कहीं उसे चोट तो नहीं लगी।
सखाराम : देखू कहाँ लगी ? अरे लगी कहाँ है तुझे बोलती ही नहीं
हरामजादी । बोल कहां लगी? नहीं तो जा
अन्धकार।
मर

दृश्य दसवाँ
उजाला।
रसोई में मंद उजाला । चंपा, सखाराम
रसोई में बिछावन पर । बाहर दरवाजा
खटखटाया जा रहा है।
फोई व्यक्ति : कोई है घर में ? सखाराम"'ए सखाराम"
कुछ देर रुककर फिर कोई बरवाजा
खटखटाने लगता है।
कोई और]
: सखाराम " अरे ओ सखाराम पंत'"लगता है घर में नहीं
व्यक्ति
फोई तीसरा
व्यक्ति
: कोई है तो शायद घर में...
दूसरा व्यक्ति : औरत होगी।
तीसरा व्यक्ति : दोनों होंगे।
पहला : (पुकार कर) ए सखाराम' अरे हो कि नही ?
दरवाजा बराबर खटखटाया ही जा रहा
है । रसोई में लेटे-लेटे हो सखाराम
जरा-सा फुनमुनाता है। पर उठता
नहीं । जबाव भी नहीं देता। थोड़ी-थोड़ी

सखाराम बाइन्डर
देर मे दरवाजे पर इसी तरह खटखटा-
हट, पुकार और आपस में बातचीत ।
फिर सब शान्त ।
रसोई में भी सब शान्त । बीच बीच मे
दारू के नशे मे बेहोश सखाराम को
कुछ बुदबुदाहट । बाहर दूर पर नगारा
शहनाई बजने को आवाज । घर पर
कौवा आकर चिल्लाने लगता है ।
फिर दरवाजे पर थपथपाहट, पुकार ।
इसके बाद माया हुआ वह व्यक्ति लोट
जाता है। सब शान्त ।
अन्धकार।

a.wal यारी मण्यार दृश्य ग्यारहवाँ (" 4) दा उजाला रात का समापन रसोई में चिमनी को मंद रोशनी। याहर दूर पर कहीं कुत्तो के भूकने की आवाज, झींगुर को आवाज । बरवाजे पर थप- यपाहट । रुक-रुककर बार-बार होती रहती है। उठ' सखाराम : (नशे के स्वर में) ए फिर थपथपाहट । लगता है दरवाजा खटखटा रहा है कोई । उठ ए' उठ कह रहा हूँ न "उठ जल्दी। कैसी पसरी है। उठ देख कोई दरवाजा खटखटा रहा है। फिर थपथपाहट । कुछ ठहर कर फिर । यौन आया है आधी रात को साली उठती भी नहीं बेहोश पड़ी है (किसी तरह उठकर बैठता है। सिर को जोर से पकड़ सेता है ) आह सिर उनप रहा है एक- दम । फिर थपथपाहट सखाराम अलसाई आवाज में। : अरे हाँ, सुन लिया कोन है इतनी रात को?

११२
सखाराम बाइन्डर
?
किसी तरह अपने को संतुलित करता
हुआ उठता है। झूमता, लडखडाता
बाहर के कमरे मे आता है। पूजा के लिए
रखे हुए मृदंग से टकरा जाता है । पूजा
का सारा सामान बिखर जाता है।
यहाँ से यह दरवाजे के पास जाता है।
: पौन है इतनी रात को ?
दरवाजा खोलता है। दरवाजे पर कौन
है यह दिखाई नहीं देता।
: कौन है ? (आखें मलफर गौर से देखफर) कौन तू
(भौचरका सा) सपना है क्या, यि सच । (फिर पति
मलकर देखता है) तू कैसे यहाँ, तू क्यो?
जरा देर वह वैसे ही घफरापा-सा खडा
रहता है । इसी समय पोटली पको हुए
एप आकृति सिमटी सिकुड़ी सी उसकी
बगल से होकर अन्दर आ जाती है।
यहुत दयनीय अवस्पा । पहुत कुछ
सिकुती-सो। मानो भय से कांप रही हो।
मुंह पर आंचल क्याए हुए है । पर
पोटली नीचे परती है। यह सम्मी है ।
सामी : (सपाट पर मे) भतीजे ने पर से निकाल दिया । उमरी
औरत न चोरी सपाई मुझे। मैं चोरी रहेंगी भला?
पुलिस में दे रहा था मुझे। यही जाती ? सीधे यही मा
गई। पही तो एप टिशना था मेरे पाग ।
रासाराम अपरयापा-सा उसे देश रहा

सखाराम बाइन्डर
• अब यही रहूंगी जब तक जियूंगी। कही नही जाऊंगी।
यही जियूंगी यही मरूंगी।
दरवाजे के पास सखाराम हयका यक्का
सा खडा है। जरा अन्दर की तरफ लक्ष्मो
कांपती हुई उसके सामने खडी है।
रसोई मे बिछावन पर चपा नशे मे कुछ
बुदबुदाती हुई करवट बदलती है।
दूर पर कहीं कुत्ते भूक रहे हैं।
परवा।

अंक तीसरा ㅁ

दृश्य पहला
दूसरे प्रक का प्रतिम दृश्य यथावत ।
लक्ष्मी : (समतल स्वर मे) भतीजे ने घर से निकाल दिया । उसकी
औरत ने चोरी लगाई मुझे। मैं चोरी करूंगी भला
पुलिस मे दे रहा था मुझे । कहाँ जाती ? सोधे यही आ
गई। यही तो एक ठिकाना था मेरे पास । अब यही
रहूंगी जब तक जियूंगी। कही नहीं जाऊंगी। यहीं
जियूंगी यही मलंगी।
सखाराम भौधषका सा पडा है । लक्ष्मी
कुछ और अन्दर आ गई है। सखाराम
के पास खडी हुई है। भय से थरथरा
रही है। रसोई मे धपा बिछावन पर
पडी हुई नशे मे कुछ बापटा कर कर.
घट बदलती है। सखाराम को एकाएक
परिस्थिति का एहसास होता है। यह
खोजकर लक्ष्मी के पास बढ़ता है और
उसका हाथ पकडकर उसे खींचता हुआ
दरवाजे के बाहर करके दरवाजावर
कर लेता है। एरवाजे पर दुबारा कोई
आहट नहीं है यह देख कर निश्चिन्तता
को सांस लेता है।
चपा (विछावन पर पड़े हो पड़े इस घटना से कुछ सचेतन
होपर) कौन है ? औ? कौन था? कोन पाया था ?

सखाराम बाइन्डर फिर सन्नाटा। अभी अभी जो कुछ घटित हो गया उस पर सखाराम विश्वास नहीं कर पा रहा है । लक्ष्मी आई थी यह सच है या झूठ? और उसे बाहर निकाल दिया यह भी सच है या झूठ ? इसे वह समझ पाने में असमर्थ है। यह इस मन स्थिति में हो नहीं है कि इस पर विचार कर सके। इतना सच है कि दरवाजे पर दुबारा थप- थपाहट नहीं हो रही है। कोई आहट नहीं है। यह कुछ क्षण सर पकडे हुए हतबुद्धि सा खडा रहता है। फिर तेजी से रसोई फो तरफ बढ़ जाता है और बिछावन पर निढाल-सा पड जाता है। फिर सो जाता है । चपा पड़े-पडे ही नशे मे यड़यड़ा रही है, टूटे फटे यिसरे शम्द । दूर पर कुत्ते भूकते हैं। एक रक पर । धारबार। अन्धकार।

दृश्य दूसरा
दुबारा रात को हल्को रोशनी । याहर
अनवरत मूसलाधार बारिश को आवाज ।
अन्धकार ।
दृश्य तीसरा
उजाला । सुबह का समय । घर के भीतर
धूप आ रही है। चंपा हाथ में झार, लिए
हुए बाहर के कमरे में आती है। बाहर
का दरवाजा खोलती है । दरवाजे से भी
धूप अन्दर आने लगती है । चम्पा मार
लगाने लगती है-अपने में तल्लीन-सी
कोई पंक्ति पुनगुनाती है। इसी समय
दरवाजे पर एक आकृति । यह सक्ष्मी
है। चम्पा का उस पर ध्यान नहीं
जाता।
चंपा : (एकाएक उस पर नजर पड़ती है) रोज-रोज नहीं मिलने.
वाली भीख तुझे बाई । जा अगला दरवाजा देख ।

११८ सखाराम बाइन्डर . 7 सदमी दरवाजे पर अचल खडी है । : हम क्या कह रही हैं तुझसे । बहरी है क्या? तुझे यहाँ भीख नही मिलने की । जा मागे बढ । नई लगती है। लक्ष्मी उसी तरह खती है। : अच्छी भली हट्टी-चट्टी है तू । फिर भीख क्यो मांगती फिरती है ? लक्षमी फिर भी अचल खरी है। जाती है कि आऊँ ? करने को भिखमगिया और ढिठाई ऐसी-जा भाग यहाँ से चम्पा आगे बढ़ती है । लक्ष्मी घरवाजे पर वैसी ही खडी है। लक्ष्मी : (समतल स्वर में) में भिखमगिन नही हूं। घपा : नही तो क्या रजवाडे की महरानी है लक्ष्मी : इसी घर में रहती थी मैं । चपा : (जैसे नई यात सुन रहो हो) क्या ? लक्ष्मी : हाँ इसी माड से यहां साफ सूफ करती थी। जैसे तुम । तुमसे पहले यहां मैं रहती थी। चपा : अच्छा तो तू लक्ष्मी : लछमी । एक बरस और एक्कीस दिन यहाँ रही मैं । पिछले बरस सावन मे मुझे लाए थे यहाँ । छ दिन की भूखी थी । खूब अच्छी तरह याद है। चपा : तो अब क्या करने आई है ? लक्ष्मी सगमनेर भतीजे के पास गई थी। राजा रानी की गिरि स्ती । बीच म मुझे कौन रखता । और कोई ठिकाना नहीं । यहीं आ गई और कोई नहीं है मेरे । आदमी लक्ष्मी (ठण्डी सांस भरती है) .. . चपा सखाराम बाइन्डर ११६ चपा 7 2 चपा : (झाडू लगाने लगती है) वह घर मे नही है प्रेस गया है जिसके पास आई है तू । वही सखाराम । लक्ष्मी : पता है मुझे। देखा था जाते बखत । देखा था ? तो पुकारा नही लक्ष्मी नही । उनको देर हो गई थी। फिर मेरी वजह से और देर होती। चपा : तव तू थी कहां अब तक । दो घण्टे तो हो गए होगे उसे गए। लक्ष्मी : रात भर बाहर ओलती के नीचे थो । पानी बरस रहा था । सवेरे सबेरे जरा आंख लगी। मगर वह प्रेस जाने लगे तो पता नही कैसे फिर आंख खुल गई थी अपने आप ही। घपा : तू रात को ही आई है लक्षमी : हो। चपा : फिर? लक्ष्मी : बाहर ही थी। पानी न वरसता तो आंगन मे मो रहती। चपा : तो दरवाजा तो खटखटाती ? लम्मी • (जरा रककर) नही खटखटाया । सोचा क्या करने को रात मे बहुत रात भी हो गयी थी । ऐसे हो कौन बहुत नीद आती है । बेकार तुम लोगो को नीद खराब होती। चपा : हम तो दारू के नशे मे मुरदे की तरा सोई रहती हैं। लक्ष्मी . (चकित सो) तुम दारू पीती हो धपा : हाँ । क्यो? सक्ष्मी : रात को भी दारू पिये हुए थीं तुम हो। रोज पीती हैं हम ! वह भी पीता है। लक्ष्मी : (कुछ दुखी होकर) बल दशहरा था। त्योहार का दिन 7 था कल।

१२० सखाराम बाइन्डर 7 7 चपा. १ चपा : तो क्या? लक्ष्मी : त्योहार के दिन, पूजा के दिन यह अच्छा नहीं । चपा : तू पूजा-ऊजा करती है ? लक्ष्मी : हो पहले से हो । बहुत छुटपन से यह सब मुझे अच्छा लगता है । बुरे समय मे भगवान को इसी पूजा की बदी लत बची रही। नहीं तो कब की मर-खप गई होती। पर जीती रही । (जरा रुककर उत्सुकता से) तुम अब से आई हो यहाँ चपा • हो गए होगे एक दो महीने । दो हुए होगे। लक्ष्मी : मेरे जाने के फौरन बाद तू भब गई, मुझे क्या मालूम लक्ष्मी • भादो की अष्टमी को गई थी मैं । दिन याद है मुझे। यहाँ का हर दिन याद है । एक एक बात बता सकती हूं। मैं बताती हूँ। दो महीने, यानी मेरे जाने के फोरन बाद आई तुम । चपा : अब आगे क्या इरादा है तेरा ? लक्ष्मी : क्या होगा हाँ सचमुच । तेरा तो दूसरा कोई ठिकाना ही नहीं । तो बोल ना कि यही रहेगी। सक्ष्मी : हो यही सोचा है। चपा : (जरा रुककर) अन्दर चल चाप बनाती हैं । सक्षमो . नही रहने दो। चम्पा रसोई मे जाती है । लक्ष्मी अवेली ही बाहर सही है। चंपा : (भीतर जाते-जाते) हम भी तो पीनी है। रात भर बहुत चूसता है यह सखाराम। ? चपा .

सखाराम बाइन्डर
बाहर सपमो पर इस पात को प्रति.
किया।
: सवेरे फिर खुद ही उठके चाय बनाना बहुत भारू लगता
है। जो नहीं करता कुछ करने को। सारा बदन और
माथा ठनकता रहता है।
लक्ष्मी से रहा नहीं जाता यह अन्दर
रसोई में पहुंच जाती है।
लक्ष्मी : लाओ ! बनाना है तो मैं हो बनाए देती हूँ चाय ।
चंपा : (तुरन्त) नहीं नहीं । दो दिन को आई है तू, तुझे क्यों
सताएं ?
तक्ष्मी : (असमंजस में) उसमें तकलीफ कैसी...
अनजाने में ही वह काम में जुट जाती
है। चम्पा देखती रहती है।
: यह वर्तन अभी भी यही रहता है ना ?
चंपा : हाँ।
?
लक्ष्मी : (सब तरफ देखती है। बगर बोले रह नहीं पाती)
ठाकुर जी कहाँ है
चंपा : ठाकुर जी ? क्या पता?
सक्ष्मी : तुम्हें मिले नहीं ? मैं जाते वखत यहाँ दो छोटी-छोटी
तस्वीरें धर गई थी।
चंपा : होंगो (चिता भरे स्वर में) क्या पता कहां चली
लक्ष्मी : (फिर बोले बिना रहा नहीं जाता) ये अभी भी पूजा
करते हैं ना?
चंपा : फोन ? सखाराम ? उसको तो बस एक ही पूजा आती
लक्ष्मी : मैं थी तो रोज बिना भूले वह नहा-धोके भगवान के आगे

१२२ सखाराम बाइन्डर 7 धूपदीप-फूल चढाया करते थे। तुम करती हो कि नहीं पूजा चपा : हमने कोई उधार नही खाया है तुम्हारे ठाकुर-फाकुर का । लक्ष्मी : ऐसा क्यो कहती हो । सव कुछ तो उसी का दिया है । चपा : उसका दिया क्या है ? हमारा कुछ उसका दिया फिया नहीं है समझी ले चाय पी ले। (चाय का प्याला उसके आगे परती है) क्या देख रही है इसमे ? लामी : (चाय के प्याले मे एकटक देखती हुई ) किसने कहा था तुझे यहाँ आके मरने को बोल । किसने कहा था अब मुंह नाक म चाय भर गई तो लगी छटपटाने । बुद्ध 2 कही की। 7 खिलखिला कर हंसती है फिर बहुत धीरे से चाय मे उंगली झलकर पीटी को निकालती है। : जरा सा तो पेट है चाय पीने चली प्याला भर । पिर होगा क्या डूब तो जायेगी ही। एक तुझे सुखा दूं । ठहर आंचल से चींटी को धीरे से सुखाती है। : हूँ। अब तो नही जायेगो न चाय पीने ' नही जायेगीन भाग जा यहाँ से। लक्ष्मी चींटी को छोड़ देती है। धपा भिखारिन सी लक्ष्मी का यह रूप देख- फर स्तभित है। चाम पीना छोड़कर उसी की तरफ देखती रहती है। जय पहले मैं यहां रहती थी तो ऐसे ही एव चीटा आया करता था। वह पाजी ऐसा नखरीला था, ऐसा घमण्डी कि बस पूछो मा । उसको राजा कहने बुलाया करती थी जा सखाराम बाइन्डर १२३ मैं । एकदम राजा जैसा था भी। बहुत हिल गया था मुझसे । और एक कौवा भी था। बाहर कौवे को कांव कांव । : वह देखो वही आया होगा । जल्दी से खिडको के पास जाकर देखने लगती है। एकाएक उसे चक्कर आ जाता है वह आंख बंद करके दीवार का सहारा लेती है। चपा : (ोडकर उसे संभालती है और वापस ले आती है) चाय पी ले पहले । कौवा कही भागेगा नही । पेट मे जाने कब से कुछ गया नहीं तेरे-चल पी पहले। लक्ष्मी को जबरन बंठाती है। दोना चाय पीने लगती हैं। ले यह बटर बिस्कुट खा (देती है) खा चाय के साथ । कित्ते दिन रहेगी यहाँ पे? सवमी : और अब जाऊँगी ही कहाँ ? भतीजे का घर तो बन्द ही हो गया । आदमी का पहले ही बन्द हो गया था। चपा: क्यो निकाल दिया मरद ने? लक्ष्मी निपूती जो रही । लडका नहीं हुआ इसी से निकाल दिया। तो फिर दूसरी से हो गया क्या लक्ष्मी : क्या जानूं ? मुझे क्या पता | उपर वो कुछ खबर ही कहाँ मिली ! तुम तुम्हारा क्या हुआ था ? चपा : अरे होयगा का | मरद हरामी साला केंचुआ | खुद तो रहा हिजडा ऊपर से हमें सताया करे। हमी छोड-छाडके भाग आई उधर से । दिखावे के लिए भतार रख के का चाटना है ? लमी : अब कहाँ रहता है वह चपा ? 7 १२४ ससाराम बाइन्डर चपा . चपा : का पता जिन्दा है कि मर-मरा गया हरामी । सदमी : (म्याकुल होकर) ऐसे न बोलो । चपा : और नही तो कस बोले? लक्ष्मी : चाहे जैसा हो है तो तुम्हारा आदमी। भगवान के आगे पडित-पुरोहित के आगे उसी के साथ गांठ जोडी है। अय हय | फिर जब वह मारता कूटता रहा तब साले पडित पुरोहित वहाँ गए रहे ? सक्षमो : वह तो अपन करम का भोगमान है। चपा : वाह रे वा भोगमान । तेरे हिसाब से तो हमें मुंह बांध सब जोर-जुलुम सह लेना चाहिए। पर सहन की कोई हद्द भी तो हो । बहुत सहा है जव बहुत हद्द कर दी तब मुरदे को लात मार दिया और घर छोड दिया। वहीं से यह यहाँ पे ले आया । यह तेरा सखाराम । सवमी : (ठण्डी सांस भरफर) मेरे कहाँ ? अब तो तुम्हारे हैं । चपा : ए सुन । हमारे लिए हमी बहुत हैं । हमें किसी नास पोटे की जरूरत नहीं समझी? सव साले मतलब के यार हैं। लकमी . (बिना पूछे रहा नहीं जाता) तुम्हारा यहाँ पर वैसा चल ? रहा है? चपा : चल का रहा है | दारू मे धुत्त रह के तो किसी का भी चल सकता है । जिता खाने को देता है उसका दूना दाम झपट लेता है तेरा सखाराम । हम तो इसी से टिकी हैं । चारा भी का है। बाहर दस तरा के जानवर और खसो. टेंगे मरे । उससे तो यह एक अकेला कुत्ता भला । लक्ष्मी : (ठण्डी सांस भरकर साहस जुटाकर कहती है) तो मैं यहाँ रह जा? अगर रह जाऊं, हमेशा के लिए तो-तो तुम-तुम्हे कोई तकलीफ तो नही-

सखाराम बाइन्डर
१२५
चपा (जरा सोचकर) रह न । पर हमारे बीच टांग न अडाना
फिर ठीय है। पर हमें बाहर निकाले की बात की तो
फिर हमसे बुरी कोई नहीं यह अभी से बताए देती हैं
1
लक्ष्मी ऐसा कैसे करूंगी ? मुझे कुछ चाहिए नही | अब पहले
पी तरह अपने से निभता भी नहीं। अब तो बस सर पे
जरा-सा छप्पर और दो रोटी । और कुछ नही । जैसे
पहोगी वैसे रहूंगी। सब काम करूंगी-
चपा • (जरा सोच विचारफर) अच्छी बात है रह जा तू घर
का काम पधा देख । हम हरामी की भूख पूरी करेगी।
दोनो अपने बस का नही । तू भी गुजारा कर हमैं भी
गुजारा करने दे । चल।
लक्ष्मी (अत्यत कृतज्ञ होकर) हो हो । अच्छा । ठीक है । मैं--
मैं
कह दूंगी उनसे । सचमुच में जरा भी नहीं सताऊंगी
तुम्हें । उल्टे तुम्हे सहारा ही दूंगी। काम-धाम सब
करूंगी । तुम्हे कुछ करना नहीं पडेगा। देखने मे दुबली
पतली जरूर हूँ पर काम जितना कहोगी सब करूँगी।
फिर खाना भी कम खाती हूँ। दिन मे एक दफै थोडा
सा बासी भात एक कटोरी छाछ । बस इतने से ही चल
जायेगा मेरा-कोई मभट नहीं और मेरे साथ । फिर
उपवास भी बहुत करती हूँ। धोती भी एक पहनने को,
एक धोने को बस दो चाहिए । वह भी जरूरी नहीं कि
नई हो-तुम्हारी पुरानो धुरानी भी चलेगी---
क्रमश अधकार।

दृश्य चौथा
उजाला। शाम का समय । रसोई में
काम करती हुई लक्ष्मी । वह अब सुबह
से अपेक्षाकृत साफ सुथरी और सहज
लग रही है । बगल मे चपा बाल संवार
रही है। सखाराम आता है। चप्पल
उतारता है। पहले से ही किसी वजह
से नाराज है।
सखाराम : (भीतर चपा को सबोधित करके) में आ गया हूं।
अन्दर चपा लक्ष्मी को इशारा करती
है। सखाराम खूटी के पास जाकर
जरसो टोपी उतारता है। साथ ही भुन.
भुनाता जा रहा है।
: मजदूरी उतनी ही देंगे और काम बोझा भर मांगेंगे
साले कौन करेगा? मेरे ताऊ लगते हो साले तुम
या खरीद लिया है मुझे ? मैं भी नाको चरे न चबवा दूं
-
तो कहना-
पर घोने का पानी लिए हुए लक्ष्मी
बाहर के दरवाजे पर खड़ी है । सखाराम
बिना देसे हुए अपनी ही धुन मे भुन

सखाराम बाइन्डर १२७ । . भुनाता हमा आवतन पर धोने के लिए जाता है। सभी को देखकर एकदम उत्तेजित हो उठता है। लक्ष्मी को देह मे क्षण भर में सीमातीत भय सिमट प्राता है। वह सिर भकाए फोपती रहती है सखाराम (कठोर स्वर मे) तू क्यो आई लौटकर ? फिसने यहाँ घुसन दिया तुझे? लक्ष्मी (साहस करके) भतीजे न पर से निकाल दिया। यहाँ आ गई । कैदखाने भेज रहा था चोरी लगा के- सखाराम तो फिर यहाँ क्या करने आई है तू? लक्ष्मी तो और कहो जाती सखाराम जहन्नुम में। बता दिया था पहले ही मुझसे अब तेरा कोई नाता नहीं। लक्ष्मी मुझे रोज याद आती थी। एक दिन भी ऐसा नहीं गया जब यहां की याद नही आई । मगर मुझे नही आई कभी याद फाद । यहाँ से जो एक दफा चली गई वह मर गई मेरे लिए । यही कायदा है इस घर का ! आज चौदह वरस से यह ऐस ही चल रहा है । तू जानती नही क्या? तुझे लेकर आया तभी सब कुछ समझा दिया था। लक्ष्मी हां। मगर वह घर चन्द जो हो गया। कहाँ जाती ? दूसरा कोई ठिकाना भी तो नही था। तभी तो यहाँ आ गई। सखाराम . ठिकाना नही था तो कही मर खप जाती। मुझसे तेरा क्या नाता है ? मैंने क्या जिदगी भर का ठेवा ले रखा है तेरा? मैं हूँ कौन तेरा? सखाराम.

१२८
सखाराम बाइन्डर
लक्ष्मी : (किसी तरह) देव."
सखाराम : (कर्कश स्वर मे) क्या ? खवरदार | दुवारा फिर कहा
तो । हरामजादी गला घोट दूंगा! अपना साथ बस गरज
भर के लिए था समझी ? गरज खतम कि नाता भी
खतम ! फिर यहां रहने का काम नहीं । किसने रख
लिया तुझे। निकल बाहर इस घर से । चल निकल
यहां से...
लक्ष्मी भयभीत हो सर्वाग कांप उठती
है । अन्दर से चंपा बालों को लपेटती
हुई पाकर रसोई के दरवाजे पर खड़ी
खड़ी यह देख रही है। उस पर इस सम
को कोई प्रतिक्रिया नहीं।
लक्ष्मी : (लोटा और बाल्टी नीचे रखकर सखाराम का पर पकड़
लेती है ।) मुझे बाहर न निकालो ! कोई और ठिकाना
नही है । और कोई नहीं है मुझे पूछने वाला । मैं एक
कोने मे पडी रहूंगी। सारा काम करूंगी बदले में कुछ
नही चाहिए। बस सर पर जरा-सा उप्पर और मरते
बखत तुम्हारे पांव की धूल"
सखाराम : (उसे सफलफर) चल हट | भाग यहाँ से ! नहीं तो सर
तोह दूंगा । जा भाग | भाग हट
सक्ष्मी उसका पर पूरी ताकत से पकाई
रहती है । सखाराम कोशिश करने भी
पाव छुड़ा नहीं पा रहा है। क्रोध में
गालो दिए जा रहा है । घंपा पपचाप
खड़ी-बड़ी यह देख रही है । सखाराम
सिसियाकर सश्मी को घसों से मारने
सगता है। फिर भी सदमी उस पर

सखाराम बाइन्डर
१२६
से चिपटी हुई है । सखाराम ओर जोर.
जोर से घूसों से मारे जा रहा है । गाली
दिए जा रहा है । चंपा अलग खड़ी हुई
यह सब देख रही है।
चंपा : कितना मारोगे । मर जायेगी ऐसे तो!
सखाराम : मर जाय मेरी बला से ! पर इसे यहां नहीं रहने दूंगा।
और मारता है।
चंपा : और खून हो गया तो फिर मेरा क्या ठिकाना करोगे?
सखाराम : है तो तेरा मरद तेरे लिए...
चंपा : मरद वाली होती तो तेरे घर काहे को मरने आती ?
सखाराम : (क्रोध के नए आवेश से लक्ष्मी को फिर मारने लगता
है।) ले बेहया, ले कुतिया साली, जोंक साली...
घंपा : (आगे बढ़कर लक्ष्मी को परे हटा देती है और सखाराम
के सामने खुद खड़ी हो जाती है ।) ले मुझे मार मारना
है तो?
सखाराम हाथ रोक कर क्रोध से तड़पता
हुआ खड़ा रहता है। चंपा लक्ष्मी को
खड़ा फरके उसके चेहरे पर से उसफा
हाय हटा कर देखती है।
: देखू.."रामराम आँख जरा सी बच गई.. पेट में तो नहीं
लगा ना? पेट के नीचे ? चल भीतर चल ।
सखाराम : भीतर नही."बाहर
चम्पा लक्ष्मी को अन्दर से जाने लगती
.
सखाराम : क्या कह रहा हूं मैं ? सुना नहीं ? उसे बाहर कर पहले।
चंपा : लक्ष्मी । चल भीतर, उसकी फिकर न कर।
चम्पा लटमी को लेकर अन्दर चली

१३० सखाराम बाइन्डर जाती है। सखाराम कोय में कसमसाता हुआ खड़ा है। क्या करे कुछ समझ नहीं पा रहा है। सखाराम : चपा । उसे बाहर कर | कह रहा हूं। चम्पा लक्ष्मी को अन्दर ले जाकर । विठाती है। चंपा : (लक्ष्मी से) बहुत दुख रही है श्या चोट क्यो ? जलन होय रही है ? तू बैठ यही । उठने का काम नहीं । बाहर पाती है। लक्ष्मी द्वारा रक्खी हुई बाल्टी और लोटा उठाकर सखाराम . . 2 । चल पानी डाल दें तेरे पर पे सखाराम क्रोधित खड़ा है। सखाराम : पहले उसे घर से बाहर कर । चम्पाखामोश। : चपा | उसे निकाल पहले इस घर से | हजार दफे कह दिया चंपा : पर हम उसे निकालने वाली कौन हैं । घर तेरा है तू जाके निकाल तुझे गरज है नो। हम थोड़े ही ले आई थी उसे पहली बार ? सखाराम : तो फिर तू बीच मे क्यो पडी हमारे चंपा : क्यो पडी ? इसीलिए कि तू तो खून करके जेल की चक्की पीसेगा और हमे यह डेढ़ विते का गड्ढा मरने के लिए हर दफे एक नया गिराहक ढूंढना पड़ेगा। रोज दस जानवरो की नोंच खसोट सहने से अच्छा है कि एक ही जो करता है करे। समझ आया? चल, अब पर धो ले । चाय तैयार है। ? :

सखाराम बाइन्डर
चपा
सखाराम उससे कह जाके पहले कि चलो जाये यहाँ से मेरा उससे
कोई नाता नही।
चपा पर वह तेरा क्या बिगाड़ रही है ? हमे घर के काम के
लिए एक आदमी हो जायगा । अपने बूते तेरा मिजाज
और घर का प्रघा दोनो नहीं निभने का। घर का वह
देख लेगी । उसे कुछ देना लेना नहीं । दो जून दो कोर
खायेगी और हमारा उतारन पहनेगी । तुझे क्या खल रहा
है उसमें?
सखाराम : दो दो औरत पालना अपने बूते नही ।
तो हम चली गाती हैं।
सखाराम नही । उसे जाने को कह । उसी को जाना पडगा यहाँ
से । नालायक साली-कहती है मरते बखत पांव की धूल
चाहिए।
: (गरजकर) लक्ष्मी । निक्ल जा यहाँ से कह रहा हूं-
फोरन निकल यहां से यहां कोई जरूरत नहीं तेरी।
अदर लक्ष्मी सिहर उठती है ।
तू पांव धोने चलता कि यह सब यहाँ छोड के हम
जायें भीतर?
सखाराम बेमन से पैर धोने के लिए
चपा के पीछे पीछे बाहर जाता है।
लक्ष्मी अन्वर वीवार का सहारा लिए
हुए खडी खडी कांप रही है। बाहर
कौवा बोलने लगता है। जल्दी से लक्ष्मी
रसोई की खिड़की के पास जाकर उत्सुक
हो बाहर देखने लगती है। हाथ मुंह
घोकर पोंछता हुआ सखाराम तथा उसके
पोछे पीछे चपा बाहर के कमरे मे जाते
चपा

१३२
सखाराम बाइन्डर
हैं। चंपा लोटा-पाल्टी लिए हुए रसोई
मे चली जाती है। खिडको से बाहर
देख रही लक्ष्मी को एक नजर देखकर
लोटा-बाल्टी रखने के लिए नाली के
पास जाती है।
लक्ष्मी : (बाहर देखती हुई) फिर नही चिल्लाया ।
चंपा : कौन? सखाराम? कि पोका २
लक्ष्मी : (जैसे यह सुनती ही नहीं) रोज शाम को वह ऐसे ही
चिल्लाता है । वही होगा।
चंपा प्याले मे चाय डालफर बाहर से
जाती है । सखाराम बंठा है।
सखाराम · (चपा के हाथ से चाय लेकर) वह गई कि नहीं?
चंपा : (जरा रुककर) नही ।
ससाराम : (प्याला-तश्तरी नीचे रखकर) नहीं ? क्यो ?
चंपा: चाय पी सीधे से।
ससाराम : लगता है तेरे सर पर भी गरूर चढ़ गया है।
चपा : तो क्या करेगा ? मारेगा हमें?
सखाराम : समय पहा तो मारूंगा हो । क्या छोड दूंगा?
चपा : समय पडेगा तो देसी जायेगी। अभी चाय पी। ठण्डी
हो रही है।
सखाराम : मैं उसको इस घर में रहने नहीं दूंगा चाहे जो हो ।
चपा घाय का प्याला उठाकर उससे
मुंह से लगाती है। यह प्यासा अपने हाय
से पपरकर पीने लगता है। माराजगी
२ साप हो।
उमे
सप्ताराम : एर चार छुटकारा हुआ पि छुटकारा ! फिर दुबारा
यहाँ माओ की जरूरत ही क्या पो? मैं क्या मरर हूं

ससाराम बाइन्डर
-
उसका?
अम्वर लक्ष्मी धीरे-धीरे काम मे जुट गई
है। जरा संगड़ा रही है।
चंपा : दो दिन रहने दो। फिर उससे कह देंगी हम जाने को ।
वही विचारी के पास ठौर-ठिकाना भी तो नहीं है जहां
जाये वह
सखाराम : तो क्या जिन्दगी भर का ठेवा ले रक्खा है उसका ? उसे
कल हो यहाँ से जाने को कह दे चपा ! मुझे दुवारा
उसका मुंह न दिखाई दे । बेशरम साली । कहती है मरते
बखत पाँव की धूल चाहिए।
कुढ़ता रहता । चाय खत्म होने पर
उसके हाथ से प्याला तश्तरी लेकर चंपा
रसोई जाती है। काम करती हुई
लक्ष्मी उसके आते ही काम छोड़कर हट
जाती है।
लक्ष्मी : (भयभीत-सो) क्या हुआ
चंपा : काम कर तू । नही तो करेगी क्या और कोई है पया
देखने वाला तुझे ? पर एक बात याद रख । यहाँ रहना
है तो चुप मार के रह | बोलने का काम नही ।
बाहर सखाराम फमरे भर मे अभी भी
येचनी से चक्कर काट रहा है। उसी
बेचैनी मे ताख के पास जाकर बोतल
निकालता है, पीता है । फिर न जाने
क्या सोचकर मृदंग निकालता है । धूल
झाडता है। नीचे रखकर कवर उतारता
है। और जोर से उसपर थाप मारता
है । भीतर लक्ष्मी मृदंग की आवाज से
7

गारराम यात्रा राग सिंहा उटती है। राम मारे से पाहर होरर मृरंग पगाो समता है। रसोई चपा मोर मामी कार रही हैं। साराम पाहपास-सा भोर जोर से मृग मना रहा है। बार महै। पारामा उस पर ध्यान नहीं जाता। साराम (एसएर दाउद को माया रेतकर)ोन ? दाद? बडे दिनो पार था। परी परत मिली । यो ? गया हो गया था? राज्य : कुछ नहीं ऐगे हो । मगर सगाराम भाई ! माज मृग गुार सग रहा है जो पुराने दिल फिर मोट पाए । रो पुराने दिन? दाउद : जर यह पछी पा-यह मक्ष्मी । सराराम इस यात 2 साप ही मृग पर से अपना हाय सोच सेता है । सामो दाउद को मायाज सुनकर रसोई के घर- वाजे पर आकर सरी हो जाती है। सम्मो : (बिना योले अपने को रोक नहीं पातो) दाउद भाई। शाज्य : (मामलित होकर) अरे । सचमुच । (ससाराम से) क्यो सखाराम भाई । एक से दो पछी हो गए क्या ? कि चपा गई? सखाराम : (तीखे स्वर में) चुप रहो । नही तो भाग जाओ यहाँ से । वर व मुझे पसद नही मृदंग फिर पीटने लगता है, बहुत उत्ते जित होकर । दाउद विमूढ़-सा बैठा है। दरवाजे पर सक्ष्मी खड़ी है। रसोई मे ।

सखाराम वाइन्डर
१३५
?
चुपचाप काम मे व्यस्त चपा ।
चपा (लक्ष्मी से) ए | अव काम भी करेगी-या वही खडी
खडी तमाशा देखेगी तू
लक्ष्मी रसोई मे जाती है और काम
मे लग जाती है। मृदग बजाता हुआ
सखाराम और बगल मे विमूढ़-सा बैठा
हुआ दाउद ।
अन्धकार।
दृश्य पाँचवाँ
रसोई में हल्का उजाला । रात का प्रतिम
प्रहर । दूर कहीं मुर्गे को बांग। रसोई
में रखी चिमनी के उजाले में लक्ष्मी को
बडी सी कालो परछाई जो रसोई भर
में फैली पसरी हुई है । लक्ष्मी हल्के

सखाराम बाइन्डर
हाय से ताली बजाती हुई धोरे-धीरे बोल
"सीताराम सीताराम सीताराम जै
सीताराम"
धीरे-धीरे स्वर और लय तेज होने लगता
.
: (बाहरवाले कमरे के अन्यकार में से सखाराम को आवाज
सुनाई देती है) अरे क्या हो रहा है यह ? बन्द कर यह
बक बक। बन्द कर फौरन ।
लक्ष्मी फिर हल्के हाथ से ताली पजाती
सीताराम जे सीताराम युवयुदाती
रहती है।
सखाराम
बन्द वर नहीं तो गला घोट दूंगा तेरा । ऐंठ जायेगी
इसी दम । साली अच्छी मुसीबत है-
लक्ष्मी अय भी बुदबुवाती जा रही है
'सीताराम, सीताराम' ताली इतनी
हल्को फि सुनाई नहीं दे रही है।
: चिमनी बन्द कर सो जा चुपचाप । नहीं ता समझ से
अच्छा नहीं होगा। चुप साली ! चुप । नहीं तो वह
हाय दूंगा कि सून उगलन लगेगी अभी ।
लक्ष्मी को हल्को सालियां और युवयुवा
हट इसके साथ ही हम जाती है। वह
रोरी सी उटती है। धिमनी र
कर युझाती है। कमरे में पूरी तरह
प्रत्यकार। सिपोरे याहर दरसे
आता या हल्ला मात्यक्ष मासोर
पामामास मर रह जाता है।

सखाराम बाइन्डर
: फिर बोल रही है बोलती ही जा रही है
इसके बाद एकदम सन्नाटा । सिर्फ
झीगुरों को आवाज और सखाराम की
भुनभुनाहट, 'चमरचिट्ट साली मादरचो'
थाहर के कमरे से उठती हुई चपा की
नशे मे डूयो यडगडाहट, तया गहरी
निश्वास इस सन्नाटे को तोडती रहती
है । अन्धेरी रसोई में लक्ष्मी पहले यदत
सिकोडकर सोने के लिए लेटती है फिर
विस्तर पर हो उठकर बैठ जाती है ।
लपमो (एकदम उत्तेजित होकर फेटिकली) सीताराम सीताराम
फिर एकदम आवाज दवा लेती है।
अन्धेरे मे खिडको के बाहर के अप्रत्यक्ष
आलोक के धुधलके में लक्ष्मी को सिर्फ
हिलती हुई आकृति दिखती रहती है ।
पूर्ण अन्धकार ।
RELAT
am
P

दृश्य छठा उजाला। दिन का समय-दुपहर । घर में कोई नहीं है । कुछ क्षण बोतते हैं फिर बाहर से दरवाजे को सांकल कोई हडबडी मे खोलता है । दरवाजा खोल- कर लक्ष्मी अन्दर जाती है । यह जोए. जोर से हांफ रही है। चेहरे पर कुछ बहुत भयंकर घटित हो जाने का-सा भाव । पहले वह भागकर रसोई मे जाती है फिर लौटकर जल्दी से बाहर दरवाजे के पास आती है । झपटकर कुणी बन्द करती है । फिर रसोई में भगवान को तस्वीर के पास जाती है। पंठती है। बहुत जोर से हांफ रही है जैसे जान निकली जा रही हो। सम्मो : (हांफती हुई भगवान को तस्योर से) तुम्हें मालूम है ? मालूम है तुम्हें ? कुछ पाना? मोफ...भयानक.. बहुत ही भयवर ! मुझे तो "सग रहा था जियरा पाार सारे गिर ही पड़ेगी."याप रे."उई मम्मा रे. या पा यह"क्या था यह योसो! हाय अब क्या रूम .

सखाराम वाइन्डर
.
मेरे तो कुछ समझ नहीं आ रही है देखो न भगवान !
कितना भयानक सीताराम सीताराम हाय दैया रे
वह चंपा""उस मुसलमान के पास'''उई रे अम्मा !
फिर हांफती रहती है।
: उसके पीछे-पीछे न जाती तो अच्छा होता ! मगर जी
नहीं माना । (अपने मुंह पर तडातड़ मारती हुई) क्यों
नहीं माना जी?
: क्यों गई मैं ? मगर क्यों गई बताऊं? मुझे शक पड़ रहा
था पिछले हफ्ते भर से कि यह जाती कहाँ है ? इसलिए
आज उसके पीछे-पीछे चली गई मैं । जो करम में था
वह आदमी फला नहीं। इसको पति मानके पूजा । यहाँ
से चली गई तो भी मन ही मन इनकी पूजा किया
करती थी।
: यह देखो । (ब्लाउज में से डोरे में पिरोया मंगलसूत्र
निकालकर) यह मंगलसूत्र उनके नाम पर । मैं उनको
हूँ ! लात-घूसा खाऊँगी पर उनको नही छोड़ गी । उनके
पांव पर सिर रखकर मर जाऊँगी। (क्षुब्ध स्वर में) उनके
साथ इसका यह व्यवहार? उनके पीछे उस मुसलमान के
पास'..
थूक निगलती है।
: सहा नहीं जाता भगवान ! इससे तो अच्छा मैं मर
जाती। कितना बड़ा पाप । यह मर के कोन से नरक में
जायेगी ? अपने साथ इनको भी ले डूवी (सिहरती है)
दय्या रे । घर में दोनों कितनी ढेर दारू पीते हैं "न
दिन का पता न रात का मैं थी तो यह सब कुछ नहीं
था। मैं यह सब कभी न होने देती"और अब तो...
अब मैं कैसे क्या करूँ.."उनको तो इसके यह सब चरित्तर

१४०
ससाराम बाइन्डर
मालूम भी नहीं है"वह बिचारे जानते भी न होंगे कि
यह उस मुसलमान के पास ..
सर्वाङ्ग सिहरती है।
: छि:छि याद करके ही जी मचला रहा है-
मुंह पर हाय रखकर दवाती है। बाहर
के दरयाजे पर खटखटाहट ।
: (भयभीत होकर) हाय राम आ गई लगता है । अब क्या
करूं?
जल्दी-जल्दी तस्वीर के आगे माया
रगड़ती है। बाहर के कमरे में आकर
दरवाजा खोलती । खोलकर अन्दर
को जाने लगती है। चपा का आवमी
झुका हुमा दरवाजे से अन्दर माता है।
अब और अधिक विद्रूप हो उठा है।
पैर मे कुछ नहीं है। चेहरे पर चोट का
निशान ।
व्यक्ति : चपाए चपा"
अन्दर जा रही लक्ष्मी यह सुनकर
चौकती है और यहीं रुक जाती है ।
: चपे मैं आ गया
मार न मुझे मुझे मार तेरे हाथ
मरने को आया हूँ चपे । यहाँ से अब मर के ही जाऊंगा।
सुना चपा।
लक्ष्मी मुड़कर देखती है।
: हाय तू चपा नही है ? तू तो कोई और है चपा कहां गई
फिर ? कहाँ गई ? हाय चपा कहाँ गई? चपा
आंखें बन्द कर के हताश-सा नीचे बैठ
जाता है।

पसाराम बाहर
? पपाये
सक्ष्मी : (यह सर देतर परत भयभीत है) योन हो तुम' पोन
हो योमो (जस्वी से अन्दर से पोटा पानी साकर उसे
देती है) मो, यह पानी पी सा पहले । सो पियो ।
(यह एक श में सारा पानी पो पाता है) योन हो
तुम
पपापा यादमी।
लक्ष्मी सिहर उठती है।
बहा सो गई प्रपा ? मुझे मरी पा ला दे । आज
उसपे हाथों मरंगा! मरने आया हूँ मैं । चपा
सम्मो : घर में नहीं है । यहाँ से आए हो तुम
यह सिर्स हाप ये इशारे से जताता है
'क्या पता।
: यहाँ रहते हो?
वह पक्ति : सहय पर, नाले मे, मरघट में (रोता है) यही भी
सक्षमो : (उसके पास जाए बिना अपने फो रोक नहीं पाती) ऐसे
रोमो मत । यादमियो यह अच्छा नहीं लगता। इत्ते बढे
होपर रोते है पोई ? क्या हुआ है तुम्हें ? युसार है
?
क्या?
उसका बदन टूती है और तुरन्त ही
हाय हटा लेती है।
नही तो। फिर क्या बात है भूरा लगी है क्या ?
रुको ! देखती हूं कुछ है क्या खाने को ।
रसोई में जाती है। एक कटोरी में
जल्दी से कुछ गलकर ले आती है । इस
पीच वह जेय मे से बोतल निकालकर
जल्दी से पूंट भर लेता है और बोतल
जल्दी से जेब में रख लेता है।

१४२ सखाराम बाइन्डर । । . हाय दैय्या लो खा लो ये। कटोरी उसके सामने रखती है वह पैसे ही बैठा रहता है। रुको अच्छा । मुंह खराब हो गया होगा तुम्हारा अन्दर जाकर पानी और एक अगोछा लेफर आती है। घो लो इससे । यह लो । कुल्ला कर लो। वह उसी तरह बैठा हुआ है। पेट मे कुछ भी नही है तुम्हारे ? साहस फरके अपने हाथ से उसका चेहरा पोंछती है। : कैसे आदमी हो । लो अब खाओ। अच्छी तरह से बैठ जाओ पहले। यह हिलता भी नहीं। अपने हाथ से खाने की ताक्न नहीं है ? स्वय खिलाने लगती है। : हां, येलो, खा लो। दो कोर जायेगा पेट में तो जरा अच्छा लगेगा समझे। दारू पीना भी अच्छा नहीं है। क्या घरा है उसमे वही गदी सही गली सब चीजें, यह व्यक्ति : पानी लक्ष्मी : पानी ? रुको, अभी ले आती हूँ। अन्वर जाती है। वह व्यक्ति फिर जेब से बोतल निकलकर जल्दी-जल्दी से. तोन चूंट गले के नीचे उतारता है और बोतल फिर जेब मे रख लेता है। लक्ष्मी पानी लेसर माती है।

सखाराम बाइन्डर १४३ : लो पानी पी लो। अपने हाथ से पिलाती है। : अभी भी हिम्मत नहीं है ? कैसी गत बना रक्खी है । चपा तो बुरी है पर उसके पीछे तुम क्यो ? उसका चेहरा देखती हुई। : यहाँ यह चोट कैसे लग गई ? वह व्यक्ति : उसने उसने मारा है। लक्ष्मी: पिसने ? चपा ने ? यह सिर हिलाकर हामी भरता है। सुनकर लक्ष्मी स्तभित हो उठती है । यहाँ पहले आ चुके हो तुम ? वह सिर हिला कर ही करता है। मार के उसने तुमको बाहर निकाल दिया ? वाप रे औरत है कि डाइन । और तुम भी कैसे हो । तुमने उससे मार कैसे खा ली ? अच्छे भले पांच हाथ के आदमी हो के मार खा ली औरत से? नही मुझे और मार चाहिए उसके हाथ से मर जाऊंगा ‘मुझे अब जीना नहीं है। क्या करूं जी के ? नौकरी चली गई, औरत चली गई वह व्यक्ति घर चला गया' क्या बचा अव 7 रोता है। : क्या बचा है। लक्ष्मी : अच्छा अब चुप भी हो जाओ। कही कोई सुन लेगा। अनजाने में उसके मुंह पर हाथ रखती • वह अब आती ही होगी । कहाँ गई है मालूम है तुम्हे ? बताए या न बताए इस असमंजस मे १४४ सखाराम बाइन्डर कुछ क्षरण चुप रहकर । : अच्छा जान दो। तुम्हे और दुख लगेगा। तुम यहाँ से अब चले जाओ। वह वैसे ही बैठा है। वही वह आ गई तो बवाल मचायेगी। उठो अब । वह वैसे ही बैठा रहता है। उठो । जाओ। उसे सहारा देकर उठाने लगती है । वह जान बूझकर लक्ष्मो पर अपना भार डाल देता है। फिर किसी तरह खा हो जाता है। : जामो जी करे तो याद में फिर चले आना । पर वह न रहे तब आना | मैं तुमको खाना दूंगी। उसके रहते न माना । अच्छा जाओ अब उसे लगभग ढकेल कर पाहर करती है पोछे-पीछे स्वय भी जाती है वापस माती है। क्रोध से दांत पीस फर। । पापिन । चडालिन । कभी भला नही होगा तेरा । अपने आदमी को छोड के दूसरे को फंसाया और अब तीसरे से 'विभिचार' करती घूमती है । छि छि छि । ऊपर से आदमी पे हाथ उठाती है राम राम सीताराम ? अन्दर कमरे रवषी भगवान की तस्वीर के पास सेजी से भाग कर जाती । • देखा तुमन १ (माखें बन्द करके) सीताराम सीता- राम अन्धकार।

दृश्य सातवाँ
उजाला। शाम का सम्य । रसोई मे
चंपा । लक्ष्मी सर और कमर पर पानी
से भरे हुए घडे लेकर अन्दर आती है।
किसी तरह कमर वाले घडे को उतार
फर नीचे रखती है फिर सिर वाले को
भी उतार कर राहत से "हुश्श" करती
है । जैसे यह काम उसके बूते से बाहर
थे। वह पहले से भी ज्यादा कमजोर
लग रही है । चंपा एक बार नजर उठा
कर उसे देखती है फिर अपने काम मे
लग जाती है। लक्ष्मी एक-एक करके
दोनों घडे रसोई की नाली के पास
रखती है। फिर दूसरे कामों में जुट
जाती है।
.
कौन ?
चंपा । एई । आजकल दुपहरी में कौन आता है घर पै?
लक्ष्मी
चंपा : हमें फा पता को घर पे तो तू रहती है
लक्ष्मी • (नयाव टालने के लिए) कोन आयेगा'
चंपा : हमारा मरद क्तिी दफा आ चुरा पर पे?
१०

१४६
सखाराम वाइन्डर
लक्ष्मी : (घबरा जाती है) मरद ..
चंपा : एई देख । झूठ तुमसे बनेगा नही । सच्ची बात जो है
वह झट से बता दे हमे ।
लक्ष्मी: तीन दफे।
चंपा : काहे को घुसने दिया हरामी को घर मे ?
लक्ष्मी : (धयराई हुई) वह उसकी तबियत अच्छी नहीं थी।
फिर मुझे क्या मालूम कि वह कौन है । और जब वह अपने
से आना था तो बाहर कैसे ढकेल देती ?
चंपा : हमारे आने के पहले से चला जाता रहा घर से ?
लक्ष्मी यह वह अपने से ही चला जाता था' हा सच
कहती हूं।
चंपा : तूने हमे बताया क्यो नही कि यह आता है
लक्ष्मी मैं (बहुत घबराई हुई है) मैंने • मैंने सोचा बताऊं
किन बताऊँ.
चंपा : (उसके सामने जाकर कमर पर हाथ रखकर खड़ी हो
जाती है) एई । हमसे चार सौ बीसी न कर, बताए देती
?
.
लक्ष्मी इस पर कुछ जवाब देने को है
पर हिम्मत नहीं पड़ती।
: सीधे से रहना है तो रह यहाँ । हमी ने रक्खा है तो रह
पाई है यहाँ । याद है कि नहीं? उस हरामजादे को
फिर से घर के भीतर घुसने न देना कहे देती हैं हम
नहीं तो तेरी भी हड्डी-पसली एक कर देंगी हम समझी
-
लामो खड़ी-खडो कॉप जाती है । उसे
कोई बात बहुत जोर से चिल्लाकर पंपा
से कहनी है पर वह साहस नहीं कर पा

सखाराम बाइन्डर
१४७
रही है । चम्पा उसके सामने से हटकर
फिर से चूल्हे के पास मंठकर काम में
लग जाती है।
जा पीछे वाले दरवाजे पे झाडू लगा आ जाके ।
लक्ष्मी झार लेकर चली जाती है चम्पा
चूल्हे के पास काम में व्यस्त है।
अन्धकार।
दृश्य आठवाँ
उजाला। दोपहर का समय । सदमी
भगवान की तस्वीर के पास । घर में
और कोई नहीं है।
(तस्वीर से) सीताराम ! सीताराम । देखा भगवान
देखा कुलच्छनी को अपने आदमी का आना भी बन्द
कर दिया। उसे सहारा मिल रहा था ना इसीलिए । मैं
लक्ष्मी
१

१४८
सखाराम वाइडर
उसकी नबियत अच्छी कर देती। मगर इसको फिर वह
भारी पडता। सीधा है विचारा । यही छोडके आ गई
उसको । मिला मिलाया अपन से छोड दिया । वह इसको
अपने घर ले जाने को कहता है पर यही नहीं जाना
चाहती। उसके रहते गुरछरे फेसे उडायेगी। यह तो
चाहती होगी कि वह मर जाये । यह एसी-वंसी नहीं है ।
बडी पक्की है । पापी है पापी मुझे धमका रही थी । क्या
कर लेगी मेरा? मैं पापी नही हूँ। मेरा चरित्र खरा
है इसकी तरह नही । मैं हमेशा धरम करम से रहती हूँ
मेरा क्या कर लेगी
वह वह तो अभी भी वही होगी
उसी मुसलमटे के पास
थूक निगलती है।
उसको भी छमा नही करना भगवान कहे देती है।
बहुत बुरी है वह।
यह कहते कहते क्रमश अपकार ।
?
dia
ANTOLIU

दृश्य नवाँ उजाला। रात का समय । रसोई मे लक्ष्मी और चंपा । लक्ष्मी भगवान की तस्वीर के आगे स्तोत्र की फटी हुई पुस्तिका पढ़ रही है। चपा चूल्हे के पास बैठी हुई तरकारी फाट रही है । पाहर के कमरे मे सखाराम चिलम सुल- गाए हुए दम मार रहा है। पास मे रखा हुआ मृदंग और कुछ हटकर बिछावन । सखाराम : चपा। चपा. (नाराजगी से) आई। चपा अपना काम उसी तरह करती रहती है। लक्ष्मी उसकी तरफ एक निगाह देखकर फिर स्तोत्र पढ़ने लगती सखाराम चपा क्या कर रही है चंपा : (ठण्डे स्वर में) तरकारी काट के घर रही हैं सवेरे के लिए। सखाराम : वह सबेरे पट जायगी । सोने चल अव ।

१५०
सखाराम बाइनहर
घपा सन्जी काटती ही रहती है । लक्ष्मी
सारी बातें सुन-समझ रही है पर अब
वह उस तरफ देखना टालती है।
सखाराम : (मायाव में कठोरता) चपा'
चपा सब्जी काटना रोककर, सामान
सारा पटककर रखती है। उठकर हाय
पोती है और पांचल मे पोंछतो हुई
बाहर के कमरे मे पाती है।
यह दरवाजा वन्द कर बीच वाला और बत्ती बुझा दे।
चपा जानबूझकर देर लगाफर दोनो
काम करती है । पिस्तर के करीब जाती
है। रसोई मे लक्ष्मो का ध्यान स्तोत्र से
अब उचट गया है । ध्यान बाहर के कमरे
मे। सखाराम बिस्तर के पास जाता
है। चपा बैठी हुई है।
: चल । सो चलकर ।
वह बैठी ही हुई है। सखाराम जयरन
उसे विस्तर मे लिटा देता है । लक्ष्मी
रसोई मे टहलती रहती है। सखाराम
उससे कर्कश स्वर मे।
ए भीतर वाली बत्ती बन्दकर फौरन ।
सम्मो जल्यो से चिमनी फूक देती है।
एकदम अन्धकार।
कुछ देर सब उसी तरह । फिर सहसा
कुछ धर पकड कुछ स्कफल होने को
भावाजें
बाहर के कमरे से उठने लगती
.

संसाराम बाइडर जा चपा (कठोर स्वर मे) नही नही आज नहीं नहीं सखाराम चपा सीधे से चपा नहीं । दूर हट पहले हट उधर हट जा उधर नही तो सखाराम • (वेवना से एक चीत्कार) ओह साली मादरचो ठहर बताता हूँ तुझे चपा • बदन को हाथ न लगा हमारे कह देती है। दूर हटता है कि नहीं दूर दूर यह तू तू मैं मैं बढ़ती है फिर चपा की पाशविक चीत्कार । अन्धकार में वह झटके से उठकर विस्तर से बाहर पाई हुई दिखाई देती है। रसोई में लक्ष्मी की छाया स्तब्ध बैठी हुई दिखती है । सखाराम को छायाकृति विस्तर से उठती है। सखाराम (चपा को प्रोर खूखार जानवर की तरह पढ़ता हुआ) चल किसे चोचले दिखा रही है तू सडक पर पडी थी मैंने खाने का ठिकाना पिया तेरा चल पहले चल चपा हम चिल्लाके गांव इकट्ठा कर लेंगी, बताए देती हैं । हमे तकलीफ होती है। सखाराम हुआ करे साली ! इस घर में मेरी इच्छा चलेगी-तेरी नही हमसे सहा नहीं जाता अव । सखाराम तेरी ऐसी की तैसी। तेरे नखरे उठान के लिए नही लाया हूं तुझे यहां चल पहले चल चल इधर चपा (उसे झिडक कर) नहीं हट यहां से । तू जब तक मरद चपा १५२ सखाराम बाइन्डर था तब राक सह लिया तुझे अपने पे 'अब छूने भी न देगी। ? .. सखाराम : चपे.. घपा : हां हां चिल्ला जित्ता चिल्लाना हो । हमसे अव नहीं सहा जाता । जी नहीं मानता तो जाके अलग पड रहा कर । पिछले कित्ते दफे तो हुआ | तुझसे कुछ बनता-बनाता नही। उधर भीतर जरा-सी खटखट सुई कि ढीला पड जाता है तू, क्यो, झूठ कह रही हैं हम सखाराम । चपे चपा : अरे चंप-चपे क्या चिल्ला रहा है रे मुरदे | तू अब मरद नही रहा । तू हिजडा है हिजडा । पौने आठ साला' हरामी । जा, काशी जा के गगा किनारे बैठ । हमारे रास्ते मे न आ कहे देती है। सखाराम : मुंह संभाल कर बोल चपे''बहुत बुरा आदमी हूँ मैं" चंपा : अरे जा जा घोंस किसे दिखा रहा है ? उसी लछमी को दिखा अपनी धौंस"हम वैसी नहीं' सखाराम : हस्साली मादरचो चंपा पर झपटती हुई सखाराम को घुघली-सी परछाई । अन्धकार में हाथा. पायो । रसोई में लक्ष्मी स्तम्घ खड़ी हुई है। बाहर के कमरे में घपा चीखने को है कि वह सखाराम उसका मुंह दबाकर चोख रोक देता है । सखाराम को गुर्रा- हट । उठापटक । घंपा को चिधार भरो कराह । बिलखना। सखाराम रे ? . : पी साली ' पी पी और पी-खोल मुंह" यूब रही सखाराम बाइन्डर है""स्साली मादरचो"पो. पियेगी कि पी उठापटक अब बन्द हो गई है। स्त- ब्धता । सिर्फ चंपा को एक गहरी निःश्वास । सखाराम की अस्पष्ट बर्रा- हट । शेष सन्नाटा । रसोई के दरवाजे के बन्द दरवाजे के पास बेचैन खड़ी हुई लक्ष्मी को प्राकृति। फिर पूर्ण अन्ध- कार। दश्य दसवाँ अन्धकार कम होता है। विछावन पर से चंपा को अस्पष्ट घडयाहट सुनाई दे रही है । सखाराम उठता है फिर बोच के दरवाजे के पास जाता है। कुण्डो खोलता है। आट होते हो लक्ष्मी भटके से उठकर खड़ी हो जाती है। हरहा फर जल्दी से दिया जलाती है। दरवाजे पर सखाराम सा है। क्रोध से उसे देख-देखकर। सखाराम . बाहर निकल यहाँ से । जा."अभी जा यहाँ से १५४ सखाराम बाइन्डर लक्ष्मी बुरी तरह भयभीत होकर कांपती : तेरे कारण उसने नामरद कहा मुझे । हरामजादी । दुनिया मे तुझे कोई पूछने वाला नही तो मेरी छाती पर क्यो आकर बैठ गई ? मर क्यो नही गई ? मैं क्या लगता था तेरा? अपना धरम-करम लेकर भले ही कही मर- खप जाती । मुझे दरद न होता । भगवान के वाप का भी करजदार नही हूँ मैं । अपने लिए मैं खुद काफी हूं। ब्राह्मण के घर जनम लेकर भी चमार की औलाद हैं। साली क्यो आई तू यहाँ पर क्यो बैठ गई यहाँ आकर? जा अभी निकल यहाँ से । उठा अपना झोला-झडा, उठा! जा यहाँ से जा I में पहुंचा दूंगा तेरी गठरी-मुठरी । तू निकल यहाँ से, पहले । जा कह रहा हूं-चली जा यही से । मादरचो• सुन रही है कि नहीं ? लक्ष्मी : (जैसे-तैसे) सवेरे तक कम से कम.. सखाराम : नही, अभी, इसी वखत । मैं अपन ही तरीके से रहूंगा। तू या तेरी पूजा पाटी को हमारे घर जरूरत नहीं । उठा तस्वीर वह...उठाती है कि मारूं एव लात • यह हायड़ाकर जल्दी से उठाकर छाती से चिपका लेती है। समी: भगवान को षयो. सखाराम : फिर इस घर में ले वयो आई रो। साला, तेरे बहाने मेरे घर घुस आया हरामखोर ! लक्ष्मी : एसे न बोली- सखाराम : जा जा में नही सरता उससे । मजे से जी रहा हूं. अपने तरीके से । अपनी मर्जी में जी रहा हूँ। म म रागा की तरह जिन्दगो रिता रहा हूँ। रिसो यो पोसा नहीं दिया सखाराम बाइन्डर १ . आज तक । किसी से झूठ-फरेव नहीं किया । मैं क्यो डरूं किसी से ये तेरा ठाकुर-फाकुर क्या कर लेगा मेरा । जातू. निकल यहाँ से पहले जा जा निकल घर से लक्ष्मो : (और कोई रास्ता नहीं है यह जानकर कांपते हायों अपना सामान एकत्र करने लगती है) सबेरे चली जाती सखाराम का आक्रामक पैतरा देखकर बहुत भयभीत होकर। : नही नही जाती हूं-अभी ही जा रही हूँ सारी चीजें समेट कर उठाती है सखा. राम के पास आती है एकाएक उसके पैर पर भुकती है। सखाराम. : (उसे लात मारफर) बाहर चल लक्ष्मी बुरी तरह भयभीत होकर कांपती है। यहुत धोन-हीन हो उठती है । सिमटी सकुची बाहर के कमरे मे आती है पर- वाजे के पास तक जाती है । पीछे पीछे सखाराम है । यह उसके पैर पर फिर झुकती है । सखाराम पोछे हटकर हट मेरा कोई नाता नहीं मुझसे ..जा भाग नहीं वह लात लगाऊँगा पेट मे कि खून उगल देगी। लक्षमी कांपते हाथों से दरवाजा खोलने लगती है । फिर ठिठकती है। लक्मो : मैं जाती हूँ पर एक बात कहना है.. सखाराम : कुछ कहने की जरूरत नहीं है ... लक्ष्मो : अपनी नही । तुम्हारे फायदे को सखाराम : कुछ सुनना नहीं है मुझे। लक्ष्मी : मैं .मैं ठहरूंगी नही कहकर झटपट चली जाऊंगी--- .

१५६
सखाराम बाइन्डर
वात तुम्हारे फायदे को...
सखाराम : (जरा रुककर) क्या है...
लक्षमी : (बेहोश चंपा की तरफ उँगली से इशारा करके) वह...
वह अच्छी नहीं है...
सखाराम : यह मैं देख लूंगा...
लक्ष्मी : तुम्हें धोखा देती है वह ...
सखाराम : तुझसे मुझे यह सब नहीं सुनना है...निकल तू...
लक्ष्मी : वह ..उस मुसलमान के पास जाती है...रोज...
सखाराम : क्या ? मुसलमान के पास ?
लक्ष्मी : हाँ दाउद...दाउद के पास...
सखाराम : (आगे बढ़कर उसके मुंह पर थप्पड लगाता है) मुंह तोड
दूंगा।
लक्ष्मी : मैंने देखा है...अपनी और से...भगवान की कसम खाती
..
सखाराम लक्ष्मी पर आपे से बाहर होकर
टूट पड़ता है-उसे बेतहाशा मारने
लगता है-यह लोद जैसी गिर पडतो
है। चंपा बेहोशी में बड़बडा रही है।
चंपा : (अस्पष्ट) दूर हट मुरदे...दूर हट तू...हट साले हिंजड़े
हट...नामरद...हट केंचुए...हमे न सता...
सखाराम : (लक्ष्मी को एक और लात जमाकर) हूँ ! (फिर किसी
सनक मे उसे उठाफर बैठाता हुआ) बोल फिर से...फिर
से कह के देख...
लक्ष्मी : (उसी तरह पडी हुई) सच है...सच है...
..कराम खाती हूँ मैं
...यह जीभ झूठ कभी भी नही बोली...तुम्हे घोखा दे
रही है चपा...हां...दाउद...दाउद के साथ वह...दुपहर
में...जव तुम प्रेस मे रहते हो...मैंने देखा है अपनी आंख

सखाराम बाइन्डर
से...अपनी आंख से देखा है ।
सखाराम उसे अत्यन्त क्रोध में भरकर
जोर से ढकेलता है और तीर की तेजी
से बाहर चला जाता है । लक्ष्मी को
फराह । चंपा को वेहोशो में बड़बड़ाहट ।
दूर फहीं फुत्ते के भूकने को आवाज ।
अन्धकार1
दृश्य ग्यारहवाँ
अन्धकार हल्का होता है । लक्ष्मी दीवार
से टेक लगाए निश्चल बैठी हुई है।
तस्वीर सामने रखी है । बीच-बीच में
कराहती जा रही है । सखाराम दरवाजे
से भीतर जाता है । दरवाजा बन्द कर
लेता है । लक्ष्मी को देखता है। फिर
उसको एक लात मारता है । वह दर्द से
छटपटाफर बिलखती है। सखाराम चिड़-
कर फिर सीधे चंपा के बिछावन के पास
जाता है। एक क्षण षड़ा-खड़ा उसे

१५८
सखाराम बाइन्डर
देखता है फिर झटके से नीचे बैठता है
और क्रोध से बेहाल, गरजता हुआ चंपा
की गर्दन दोनों हायों से पकड़ कर पूरी
ताकत से दबाता है । चंपा की वमघटी.
सो अस्पष्ट आवाज कुछ देर तक
आती है फिर बन्द हो जाती है । मगर
सखाराम बार-बार उसकी गर्दन मरो.
इता ही रहता है । फिर निश्चेष्ट पडी
चंपा की तरफ क्षण भर देखता है।
एकाएक भप से सिहर उठता है ।
सखाराम : (घपराया हुआ अस्पष्ट) खून ! (स्पष्ट) खून (अस्पष्ट)
खून..
लक्ष्मी भी भय से अवसन्त ।
सखाराम : खून...खून ..
लक्ष्मी घिसटती हुई तेजी से चंपा और
सखाराम को मोर बढ़ती है । एक बार
चंपा को निश्चेष्ट पड़ी हुई वेह को
और एक बार सखाराम को घबराकर
देखती है।
सखाराम : (वहशत से) खून. खून वर दिया मैंने...खून ..खून...
कर दिया।
लक्ष्मी : (एकाएक साहस करके) शश्श...चिल्लाओ नहीं । विल.
कुल नही।
निश्चेष्ट पडी पंपा को देखती हुई।
: चलो कोई बात नहीं। पापी तो थी ही मर के नरक में
हो जायेगी । मैं तो पुण्यवान हूं। मेरे पास बहुत पुण्य हैं।
मैं तुम्हारे साथ रहूंगी । तुम्हारी देखभाल टोर मे करूंगी

सखाराम बाइन्डर
१५६
।
। तुम्हारो गोद मे मरूंगी । तुम डरो नही । हाँ सच ।
चलो, हम लोग इमको नल्दी से गाड दें चल के कहाँ
पर? बाहर नहीं बाहर नहीं यही पर घर के भीतर
हो। कह देना कि भाग गई पर से कोई कुछ पूछना
नही पर कोई पूछेगा तो मैं कह दूंगी उसे IT वह भाग
गई अपन से चरी गई मैं भगवान की कसम खाएर
कह दूंगी। उसे सब पता है । वह तुम्हे पाप नही लगने
देगा । मैं उससे वह दूंगी कि वह मेरा पुण्य तुम्हे दे दे।
तुम्हारे लिए सब करंगी में हो
जल्दी से तम्वीर पर माथा टेककर
नमस्कार करती है । सखाराम के माथे
से भी तस्वोर लगाती है। यह निश्चल
है । लक्ष्मी तस्वीर को नीचे रखकर
बारबार उसपर अपना माथा घिसती
है । आँखें बन्द कर प्रार्थना करती है ।
(आँख खोलकर) चलो उठो अब । काम मे लगो।
वगिया से कुदाल ले आओ जाके । मैं रसोई मे जगह
खाली करती हूँ। देर न करो। सवेरा हो जायेगा तो
बात फैल जायगी। रात भगवान की होती है । उसी का
राज रहता है। आदमी दुष्ट होते है। पापी हाते हैं,
नीच होते हैं जैसे यह थी। चलो, दिन होन से पहले
ही सब काम खत्म कर दें हमलोग । चलो भगवान का
हाथ मेरे ऊपर है।
भगवान को तस्वोर की तरफ इशारा
करती है।
चलो उठो न । देरी न करो डरो नहीं मैं पुण्यवान
हूं वह तो पापी थी। मैंने कभी किसी से बुरा बर्ताव

सखाराम बाइन्डर
नहीं किया । चीटी चीटे के साथ भी नहीं ।
मंगलसूत्र निकाल कर विखाती है।
यह देखो देखो तुम्हारे नाम पर बांधा है आज तक।
पहले जिसने पहनाया था, उसने खुद तोड दिया था, मैंने
नही तोडा था। इसने अपने मरद को छोड़ दिया, तुमको
पोखा दिया। उसका कभी भी भला नही होता तुम
अच्छे हो। भगवान तुम्ह क्षमा करेंगे। मैं कह दूंगी
उनसे । मेरी सुनेंगे । रुको, मैं ही ले आती हूँ कुदाल ।
तुम बैठे रहो अभी आती हूँ मैं
घिसटतो संगातो बाहर के अंधेरे में
जाती है। विचित्र धेयं से कुदाल लिए
हुए पाती है। सखाराम के हाप में
देती है।
• लो चलो रसोई में चलो
सखाराम आंखें फाडे हुए निश्चेष्ट धपा
को देखे जा रहा है । लक्ष्मी उठती है।
पास सही घाबर उठाती है धपा
सा शरीर घेहरे तक ढक देती है।
: लो, हो गया ना' अय बुलन्छनी से छुट्टी मिल गई।
अब तो इसको मारमा नरव में पहुंच भी गई होगी।
भगवान को न्याय करने में पर देर सगती है
(घम्सा को देह से मोर देसकर सुन्छना से) पापिन ।
फिर सखाराम का हाय
उठो । अन्दर पलो जल्दी । सबेरा होने से पहले सर
पहले पंसा पर दो सिमी को पता नहीं चलेगा शिर
में यह दंगी राय को विभाग गई पर मै
सताराम अप येजार-सा उता है।

सखाराम बाइन्डर सदमी उसे रसोई में ले जाती है। कुवाल पमाती है। : हो । लो यह । खोदो गड्ढा । (सखाराम निश्चल और अवाक् खड़ा है) खोदोन ? सखाराम उसी तरह खडा है। कमजोर और चोटिल लक्ष्मी स्वयं कुदाल लेकर पूरी ताकत से गडढा खोदने लगती है। एक के बाद एक आघात परती पर होता रहता है। हर प्राघात के साथ लामी को हुंकार । अचानक दरवाजे पर यपथपाहट होने लगती है । सखाराम बहुत भयभीत और दयनीय । लक्ष्मी तनकर खडी हो जाती है । खट- खटाहट सुनतो है ध्यान से। धपा का पति • (वाहर से दरवाजा खटखटाता हुआ नशे मे डूयो आवाज मे) पा! चपा। चपा तू कहाँ है ? मुझे मार डाल चपा! पपा | दरवाजा खोल चपा! मैं आ गया, मुझे मार डाल चपा । मार न ! चपाचपूरे लक्ष्मी : (घबराए सखाराम से) वही उसका मरद | थोडी देर खटखटायेगा फिर अपने रास्ते चला जायेगा। तुम वेफिकर रहो। फिर पूरी शक्ति से गड्ढा खोदने लगती है। वह एक विशेष वेग से फुवाल चला रही है । उसको कुवाल का एक के एक पडता हुमा आघात । साम-साथ उसको दबी हुई हुंकार। बाहर के दरवाजे पर थपथपाहट । चम्पा के

१६२
सखाराम बाइडर
पति की क्षीण होती हुई पुकार ।
चपाका पति चपा
चपा चपूरे । तू कहाँ है चपा ? चपा में आया
हूँ दरवाजा खोल चपा चपूरे
लक्ष्मी को बगल मे खडा) वेजान-सा
सखाराम । जैसे उसका सारा रस निचुड
चुका है। बाहर के कमरे मे सिर तक
चादर से ढकी हुई चपा को निश्चेष्ट
देह । थाहर चम्पा के पति का उसके
पर एकसुरा अभद्र रुवन अब
शुरू हो गया है । भयावह और क्षीण
यह चलता ही रहता है। रात का
अन्धकार।
नाम
परवा ।

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विजय तेंडुलकर
• मराठी के युवा नाटककार, जि होने रगमच को
परम्परा से मुक्त कर के भी सशस्त और लोक.
प्रिय बनाने मे अभूतपूर्व सफलता पायो है ।
अलमस्त फाड स्वभाव के तेंडुलकर जनमानस
मे
घुसकर नये नये चरित्र पकडने और उहे
रगमच पर प्रस्तुत करने में माहिर हैं । वस्तुत
यही उनका असली पेशा है। वैसे कहने को तो
वे एक प्रतिष्ठित पवार हैं और मराठी के एक
प्रमुख दैनिक अखबार के सह-सम्पादक
.
सरोजिनी वर्मा
हि दो प्रदेश मे जमी और मराठी क्षेत्र मे
आरनिय शिक्षा दीक्षा प्राप्त करने वाली समर्थ
भाषा शिल्पी-जिनके अनुवादो ने नाटको मे
नयो विदगी भर दी है । मराठी साहित्य के
आधुनिक्तम स्वरूप को हिन्दी पाठक के सामने
विविध रगों मे प्रस्तुत करने का श्रेय श्रीमती
सरोजिनी वर्मा को ही है।

Sakharam Baendar Tendulkar

Author
Vijay Tendulkar
Title
Sakharam Baendar Tendulkar
File name
Sakharam Baendar Tendulkar
Text
OCR done
Citation
1973
Published
2011/03
Publisher
Lokbharati Prakashan Mahatama Gandhi Marg Allahabad
Language
Sanskrit
Pages
174
Library
Shree Jubilee Naagari Bhandar Bikaner
Classification
Literature
DLI number
550910
Barcode
4990010031703.00
Scanning centre
C-DAK, Kolkata
Digital publisher
Digital Library Of India
VMLT id
P24s9UX8H6A
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