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Sri Sangrabyakarika
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वालवाधिलारीका
13
भावारी
पद नाममा निकाति
श्रीमदासकिय कदम काम
माटनिलामा निजीवित
बरसाती माय
कारका भीरपदी वासयनि
A
निमारवाया
AN
वलसरे घमासे सभामा
भोलाया
दिदाहयलालो गति
པུ། ལྟ་
कदरकारे सह
ܨ ॥श्रीगणेशायनमः॥ श्रीमनेरामानुजायनमः। श्रीमद्रासनमहत्य नथारामानुजगुरुम्नथावाचस्पतिलक पिलादीनमहामुनीन् ॥१॥कुलोकहिता र्थायटीकापाकनभाषयासारख्यस्य का रिकायावैमान्वयांबालबोधिनीम्॥२॥ अजामेकालोहितशुक्लहष्णा बड़ी मज़ा समानानमामः॥ अजायतांजुषमाणांभजतेज हत्येनांभुक्तभोगांनुमलान ॥१॥ अन्वयः वयं गुरुशिष्याः अजानमामः कथंभूना एका लोहिनशुक्रुष्णां वही मजाःसुजमानां ये बहाःअनाजुपमाणां तांभजते येमु
२
साव्य कारिका
का:अजामुक्तभोगाम् एनाजहति तान्
सर्वान्वयनमः इत्यन्वयः॥
टीका
सारख्यकारिकाकै व्याख्याकरनेवालेवाच
सतिमिश्रने वस्तुनिर्देशात्मकमंगला
चरणकरतेहै।अजामित्यादिश्लोकसे।
अजन्मा और एक औरराजस सात्विक
तामसरूप और त्रिगुणात्मक बहन
जाके सष्टिकरनेवाली प्ररुनिको हम
सबनमस्कारकरते हैं और अजन्मा अ
नंतबद्धजीव जोसेवाकरनेवाली प्रकृति
को मजतेहैं और अजन्मा अनंत मुक्तजी
बजो यहप्रकृतिकभोगको भोगकर त्या
गदियेहैं तेहमसबको हमसबगुरुशि
व्य नमस्कार करते हैं ॥१॥
कपिलायमहामुनये शिष्या
यतन्यचांसुरये। पंचशिरता
यतथेवरहष्णायैतेनमः
स्यामः॥२॥
सारव्य कारिका महामुनये कृषिलाय चपुनः तस्यशि ष्याय आसुरये नस्यशिष्याय पंचशि खाय तथा तस्य शिष्याय ईश्वरकृष्णाय एतेवयं गुरुशिष्याः नमस्यामः॥३॥ टीका महामुनिकपिलदेवजीके निमित तिन केशिष्य आसुरिऋषिके अर्थ तिनके शिष्य पंचशिवाचार्य के अर्थ और नि नके शिष्य ईश्वरकृष्णके अर्थ एह हम सबगुरुशिष्यनमस्कारकरने हैं॥२॥ मुलम् दुःखत्रयाभिघाताजिज्ञासा तंदपातके हेतोपरदेसापा चेकातात्यंततोभावात् ॥१॥ अन्वयः दुःखत्रयाभिघातात् तदपघातके हैती प्रकृतिपुरुषविवेके मुमुक्षुभिः जिज्ञासा कर्तव्या दृष्टेमुकरे पायविद्यमाने सा जिज्ञासा अपार्थाचेन एकानात्यंतता भावान एकांतः दुःखनिरत्तेवश्यंभा वः अत्यंतः निवत्तस्य दुःखस्य पुनरनु 3.
४ सारय कारिका सादः तयोरभावात इत्यन्वयः॥१॥ टीका अध्यात्म अधिभूत अधिदेवा एहानीनो दुःखके संबंध नानापीझने नेतीनोदः खकेनितिकेहेतु प्ररुतिपुरुषके विव ककेनिमित्त मुमुक्षुकोज्ञानकी इच्छा करनाचाहिये यदिकहोकि नीनोदकरव कैनितिकनिमित औषधि औरसुंद रीस्त्रीऔरनीतिशास्त्र के अभ्यासी रमणिमंत्रादिक सुगमउपायकेविय मानहोयते सोजिज्ञासाव्यर्थहै सोन ही एहसबउपायने अवश्य दुःख छुट जाय औरटकरपुनःनहाय एहदो नौवानकैअभावते॥१॥ दृष्टवादानुश्राविकःसह्यविशु द्विक्षयातिशययुक्तानाही परीतःश्रेयान्यताब्यतज्ञ विज्ञानान् ॥२॥ आनुश्राविकः वेदोक्त स्वर्गलोकः दृष्टवन्द्र ५ साडरव्यकारिका पनि हि.यस्मान् सखर्गलोक अविशुदिक्ष यानिशययुक्त नस्यात् स्वर्गादेविपरीना हतिपुरुषविवेकः श्रेयान करमानयकाव्य कज्ञविज्ञानात् ॥२॥ दीका आनुश्रविकनामवेदोक्त स्वर्गादिकलोकभी एहीलोककेसरशहै जानेसास्वर्गलोकभी अविशुद्धिः दुःखमिश्रिनसुख औरक्षय औरअपनेनेअधिकदेखकरदुःखिनहो ना एहतीनोअवगुणकरके युक्त है नाने नेवादिकनेभित्र महतिपुरुषकेविवेक श्रेष्ठहै काहेने व्यक्तमहदादिक और व्यक्तमूलप्रति और ज्ञःआत्माएहनीनी के विज्ञानने ॥३॥ मूलमरुतिरविशतिर्महदा द्या महातिविनयासमा घोड़शकरविकारोनमक निविहार्तिःपुरुषः॥३ अन्वयः मूलपकनिःअविहानिर्भवनि महदाद्या ६ साङ्ख्यकारिका महदहङ्कार पंचनयात्रा सनप्रति विरु नयःभवन्ति नुपुनः पोडशक पञ्चज्ञाने द्रियाणि पंचकर्मेद्रियाणि एकंमनः प चमहाभूतानि विकारोभवति पुरुष स्तुन प्रकृतिर्भवति नविरुानिर्भवति ॥३॥ का मूलप्रहति जिसके प्रधान और अव्यक्त अव्याहत असत अविद्या और माया एहसबनामहैं सोकोईकाकार्यनहिहै औरमहदहंकार शब्दस्पर्शरूपरसगंध एहसाततत्व अपनेतेपूर्वपूर्वके कार्य हैं औरउत्तरउत्तरकै कारणहैं और श्रोत्र वकुचक्षुजिहाघ्राण एहपञ्चज्ञानेंद्रि य और बाकपाणि पाद पायु उपस्थए हपञ्चकर्मेन्द्रिय और एकमन और थिवीजल तेज वायुआकाश पञ्चमहाभू न एह षोडशनत्व केवलकार्यहैं और पुरुष नकोईकाकारणहै नकोईका का यहै॥३॥ मूलम् दृष्टमनुमानमाप्तवचनं चसर्व
साव्य कारिका
प्रमाणसिद्धत्वात् ॥ त्रिविधं
प्रमाणमिप्रमेयेसिद्धिन
माणादिः॥४॥
अन्वयः
प्रमाणविविधमिष्भवति ननकिम् ।
एम् अनुमानम् च पुनःआप्तवचनमक
नः एनावदेवप्रमाणमउपमानादीनाम
पि पृथकप्रमाणलात सर्वप्रमाणसिद्ध
लात् यहि प्रकृतिपुरुषविवेकः श्रेयान
तर्हि प्रमाणकिमर्थ मिष्टंभवति हि यस्मा
त प्रमेयसिद्धिःप्रमाणवद्भवति अनः
टीका
प्रमेयकेसिडिके निमित्त प्रमाणकहने हैं
प्रमाणनीनप्रकारकाहमकोइष्टहै सोको
नहैं प्रत्यक्ष अनुमान औरआप्रवचनउ
पमानादिककै पृथकप्रमाणहोयेने तीन
हीप्रमाणकैसेहैं सर्वप्रमाणयाहि मेसि
दहीयते यदिप्रकृतिपुरुषकाविवेकक
ल्याणकरनाहै नवप्रमाणकाकहना क्या
प्रयोजनहै जातेप्रमेयरूपतिपुरुषकीसि प्र
दि प्रमाणने होनी है ताते ॥४॥
॥४॥
साइप्रख्यकारिका ॥५॥ मूलम् प्रतिविषयाध्यवसायारष्ट्र त्रिविधमनमानमाख्यानम्॥ नलिंगलिगेपूर्वकमानश्रुति राप्तवचनंतु॥५॥ अन्वयः प्रतिविषयाध्यवसायोदृष्टंभवति यन लिं गलिंगिपूर्वअनुमानं नत् विविधभव नि तुपुनःआफ्नश्रुतिःआप्तवचनं भवति टीका प्रतिविषय जोइन्द्रियनिसकोअर्थमेसंयो गसंत्रिकर्षहोनेने जोसालिकबुडिकाव्या पार अध्यवसायरूपयथार्थज्ञान है सोहष्ट जो है औरव्याप्यव्यापक धूम अधिकाज्ञान ज्ञानसहितजोअनुमानसो नीनम कारका पूर्ववत् शेषवन सामान्य नोह जो एमिति किंतु पूर्ववत् अनुमान है सोहि प्रकारकाहै बीन औरअबीन अन्वय हा रजोवर्तमानसोबीतहै जैसेवाहोयने वसुकालहोय व्यतिरेकुहारावर्तमान निषधकरूपसोअबीनसाई शेषवन है सायकारिका ६ जैसेवर्षानहोय नबसुकालनहोय,औरतो पहिलाबीन है सोहिपकारहै दृष्ट खलक्षण्ड सामान्य विषयको अनुमान सापूर्ववत अर एसलक्षणसामान्यविशेषविषय जोअनुमा नसोसामान्यनारष्टहै आप्नवचन जोश्रुति स्थतिइतिहासपुराणादिकतिससेजोयथा र्थज्ञानसोआप्तश्रुतिकहातीहै ॥५॥ मूलम् सामान्यतरहष्यादतीन्द्रियाणा प्रतीतिरनुमानात्तस्मादपि चासिद्धम्पाक्ष गमासिइम्॥६॥ माघ सामान्यतः पदार्थस्य घटपदादेःरष्टापत्य क्षात्रतीतिर्भवति तुपुनःसामान्यतःहष्टाद नुमानात् अतीट्रियाणाम् प्रधानपुरुषादी नापनीतिर्बुहेरध्यवसायो यथार्थज्ञानंभ वति तस्मादपिच असिइम्प्रेसमाप्ताग मात्सिदभवति॥६॥ टीका जिसप्रमाणतेजोवनसिहहोताहै सोक हनेहें सामान्यवस्तु घटपादिककाज्ञान
१.
साव्य कारिका
प्रत्यक्षइंद्रियनेहोनहै अतींद्रियवस्तु
मरुतिपुरुषादिककाज्ञान सामान्यतोदष्ट
अनुमानतेहोताहै औरनाहने अगम्यूपरे
क्षवस्तुकाज्ञान आप्तागमेश्रुतिस्मृति
आदिकसे होताहै ॥६॥
अतिदुरात्सामिप्यादिन्द्रियघा
नायनानवस्थानात्सीया
यवधानादभिभवात्समानाभि
हाराच॥७॥
अन्वयः
सातपिवस्तुन उपलब्धिरष्टभ्योहेतुभ्यो न
भवति अतिदूरात चपुनः सामीप्यान इ
ट्रियघातान् मनोनवस्थानात् सोक्ष्म्यात
व्यवधानान् अभिभवान समानाभिहागन्
टीका
विद्युमानवस्लुकीमीप्रतीतिअष्टप्रकारते
नहीं होतीहै अत्यनरते जैसआकाशके
पक्षी असनसमापने जैसेनेत्रों
जन अंधवधिरहोयेने औरमनकी
चंचलनाने जैसे कामीपुरुषोंकोसमीपका
॥७॥
साझल्यकारिका वस्तुनहींदेखपडताहै सूक्ष्मतानेजैसे परमाणु आदिक औरयवधानने जैसेघरके भीतरके वस्तु औरअभिभवते जैसे दिन में सूर्य केलेजस ग्रहनक्षत्रादिक और समा नाभिहारते जैसेमेषकाजलनदीकेजलमें मिलते चकारते अनुभववस्तुकीभीप्रती तिनहींहोतीहै जैसेदुग्धावस्थामदधि। मूलम् सौम्यातदनुपलब्धि भावा कार्यतस्तदुपलब्धः।महदा दितच्चकार्यम्प्रहतिसरूसंवि रूपच॥८॥ नदनुपलब्धिःप्रधानानुपलब्धिः सोक्षम्या द्भवति नअभावात् कुतः कार्यस्तदुपल त थेः किंतत्कार्यम् महदादिचतकार्यभ वति कथंभूतं प्रकृतिसरूपम् चपुनः वि रूपम्॥६॥ रोका प्रधानकेअनुपलब्धिके हेतुकहते हैं प्र धानके अनुपलब्धिअप्रतीतिसूक्ष्मता ने होतीहै गगनकेकुसुम और कर्मकेरो A ब्रह्मसेसप्रपंचासत १२ साव्य कारिका म औरशशके रंगकेसदृशअभावतेअनुप लब्धिनहीं होतीहै काहेने कार्यझणप्रकृति के उपलबिहानते कोन प्रकृतिकाकार्यहै मह दादिकतिसकेकार्य, कैसे, कारण अव स्थामप्रतिकेसमानरूप हैं जैसेमृत्तिका मेघट सुवर्णकुंडल औरकायर्यावस्थावि विधप्रकार, प्ररुतिकाजगतके कारणक हेते असत्तेसतहोताहै यह बौडकामन औ रएकसत निप्रपंच विवर्तवस्तुहोताहै यह 'शंकराचार्यकामत औरसनपरमाण्वादिक असत्कार्यहोताहै यहकणादगौतमकाम नतेसवको निरासकरके सततेसनहोताहै कारणऔरकार्यदूनोसतहैं यहसाइ-ख्यशा स्त्रके आचार्यकामतढकिया॥८॥ मूलम् असदकरणापादानग्रहणात्म संभवाभावात्॥शक्तस्वशक्य करणाकारणभावाचमतकार्य म्॥॥ अन्वयः कारणव्यापाहत्यागपि कार्यसद्भवति करमा असदकरणात चपुनःउपादानग्रहणात साव्यकारिका सर्वसम्मवाभावात् शतस्य शकरकरणात् कार णभावात् ॥९॥ टीका प्रथमकार्यकोसत्जनावतेहैं उत्पतितेप हिलेभी कार्य सतह काहेते असतवतुकेन हींकरते जैसेनीलवर्णकोकोईपीतवर्णन ही करसकताहै और तेलको तिलमेसतजा नकरके तैलके निमित तिलके ग्रहणकरेते और सर्ववस्तुते सर्ववस्तुको नहिं उत्सबहाने ने और तेल उत्पत्तिकरणरूपशक्तियुक्त श- ततिलको शक्यरूपतैलहीवे उत्पन्न करते और कार्यको कारणरूपहोनेते कारण कार्यका अभेदते जैसे मृत सुवर्णादिकते घट कुंडलादिक अभेदह मतसुवर्णादिक रूप ॥ ॥ मूलम् हेतुमदनित्य मध्यापिसक्रिय मनेकमाश्रितंलिइम्॥सावय परतन्त्रव्यक्त लहिपरीतम व्यक्तम्॥९॥ i १४ सारख्यकारिका व्यक्तंभवति कथंभूतम हेतुमत् अनित्यम अध्यापि सत्रियम् अनेकम आश्रितम् लिङ्गम् सावयवम् परतन्त्रम् अव्यक्त तहिंपरीतम् भवति ॥९॥ दीका कारणके सत्ताकेनिमित्त कार्यकोसत कह कर अबकार्य कारणकाभेद जनावतेहैं व्य तनाम महदादिकतत्व हैं कैसेहैं कारणजि नकोविद्यमानहै और विनाशी तिरोभावी है औरसर्वतत्वके प्रति अव्यापकहैं और कि याकरके युक्त हैं एकदेहको छोडकर दूसरे देहमेजातेहैं और पुरुष पुरुषप्रति बुध्या दिककोपथक पथक होनेते अनेकहैं और प्रहातिके आश्रित जैसे वनके आश्रित वृक्षहैं और प्रधानकै जनावनेको लिंग, और अवयव अवयवीनामसंयोग संयोगी अप्राप्तिपूर्वक जोमाप्तिमोसंयोग ताकरके सहित सावयवकहाता है जैसेमहदादि ककार्य परस्पर संयोगहै औरपरतंत्र हैं जै से गंगाकेयूरको नहरको अपेक्षाहै तैसे बुध्या दिकको अपने कार्य में प्रकृतिके पूर साव्यकारिका काअपेक्षाहै और अव्यक्त जोमूलप्रति सोमहदादिकतत्वते विपरीनहै नामअहे तुमत औरनित्य औरव्यापि औरअभि य औरएक औरआश्रय औरलिंगि और निरवयव औरखतंग्रहै॥ मूलम् त्रिगुणमविवेकिविषयःसामा न्यमचेतनप्रसवधर्मि।व्यक्त तथाप्रधानंतहिपरीतस्तथा चपुमान्॥११॥ अन्वयः यथाव्यतं भवति तथाप्रधानभवतिक थंभूतमुभयं त्रिगुणम् अविकेकि विषयः सामान्यम् अचेतनम् प्रसवधर्मि पुमान तथाचभवति तदिपरीतोपिभवति॥१॥ टीका व्यक्त अव्यक्त के साधर्मताऔरपुरुषकेवि धर्मुनाकहते हैं जैसाव्यक्त है तैसाअव्य लहै दौना कैसे हैं त्रिगुणात्मक अ वि वेकी, नामजैसे प्रतिवतः नबिलगही यसकती है नैसबुध्यादिक प्रतिसे १६ साव्यकारिका नहिबिलगहोयसकते हैं औरविषयहैं जा नने देखने सुनने के योग्यहैं औरसामान्य हैं सर्व पुरुष कोसाधारणग्रहणहोते हैं और जडहैं और प्रसवधर्मिनामसरूपविरू प्रसदाहोतेरहते हैं औरपुरुष नथानाम प्रधानमहदादिकके सदृशभीहै औरतेह सबसेविपरीतभीहै अहेतु मत और नित्यत्वादिगुणकरके प्रधानकेसहशहै और अनेकत्वादिकगुणकरके महदादि केसहशहै औरतीनोगुणतेरहितहोनेसे व्यत अध्यत्त दोनोनेविपरीनहै॥1॥ मीसप्रीतिविषादात्मनकाश प्रतिनियमार्था अन्योन्याभि भवाश्रयजननमिथुनरत्तय ध्वगुणाः॥१२ सखजस्लमोरूपाः त्रयोगुणाभवन्ति कथंभूताः प्रीत्यप्रीतिविषादात्मका:प्रका १ शप्रतिनियमार्थाः च पुनःअन्योन्याभिभ वाश्रयजनन मिथुनवृत्तयः॥१२॥ मूलम् का साजव्यकारिका टीका गुणकालक्षणकहतेहैं सवरज तमरूप नीनगुण है कैसेक्रमकरके सुखदुःखमो हरूसह औरप्रकाशपरनिनियमकरके में अर्थहै औरपरस्पर अभिभवकरनाजैसे एकहि पुरुषकोगुणोंके उद्भवअभिभव होनेतेकाईसमयमेंज्ञान और कोईकालमें विषयभोगचंचलताऔरकोई कालमें मोहहोता है औरजैसे एकस्त्रीरूपगुण शीलवती अपने पतिकोसुख और सप नीकोईO औरकामीकोमोह उत्पन्नकर तीहै और आश्रयकरना औरजनननाम परिणामकरनाऔरमिथुनरतिनाम अ विनाभावतिरूपपरस्परमिलकरहना यहसवतीनोगुणके स्वभाव हैं ॥१२॥ सलेलघुप्रकाशकमिष्टमुपएं भकंचलचरजःगुरवरणक मेवतमःप्रदीपवञ्चार्थतोरतिः ॥१३॥ अन्वयः सत्वमेवलघुप्रकाशकंचसाङ्ल्याचारि प्रदीपवत् १८ साव्यकारिका टमरजएवउपष्टंभकंचसंचइष्टम् तम एवगु स्वर्णकंचष्म् चधुनः अर्थतः पुरुषार्थतः पुरुषार्थ परसरविरोधिनामपित्रया गांगुणा नावृत्तिर्भवति॥१३ केवलसत्वगुणकाल और प्रकाशरूपमा ख्यके आचार्य कहते हैं औररजोगुणको परंभकऔर चलरुपकहतेहैउपहुंभकना मवर्ति बढाउने कोजेसेसोंक औरभारीका प्रचलावनेकोजैसेदंडा और केदार जल लेजानेके वास्ते मृतिका खोदनेकोजैसेखु रपि कुदारकोउपष्टंभक कहते हैं औरतमो गुणको गुरुनामभारी और आवर्ण रुपक इतेहैं और पुरुषार्थकनिमित जैसे वत्ति नैलअग्निपरखरविरोधीभी हैं मिलकर प्रदी पकाकामकरतेहैं पुनःजैसे कफवात पित्त परसर विरोधीभीहैं मिलकर शरीर धारण करत नसे तीनोगुणपरस्परविरोधीभी तथापिपुरुषार्थक निमिन मिलकर तीन गुणकी रति होतीहै ॥१३॥ मूलम् साव्य कारिका १९ अविवेकादेःसिडिलैगुण्या तदिपर्ययाभावातू॥कारण गुणात्मकत्वाकार्यस्याव्यक्त मपिसिंहम् ॥१४॥ अन्वयः अविवेकिलादेः मिडिर्भवति कस्मात् नै गुण्यात् तद्विपर्यये अविवक्यादिविपर्य ये पुरुपे वैगुण्याभावात् अव्यक्तसिडिवि ना कुतःनडर्मस्याविवेक्यादेःसिद्धिःअ व्यतमपिसिइंभवति कस्मात् कार्यस्य कारणगुणात्मकत्वात् ॥१४॥ रीको अविवेकित्वादिकधर्मकीसिहि होतीहै का हेते जोजोसुखदुःखमोहरूपत्रिगुणात्मक वलुहैं सोसवजस्सह जडते विपर्यय पु रुपमेनीनोगुणके अभावते अव्यक्तकेसि दिविना कैसे अव्यक्त केधर्मअविवेकिला दिककी सिद्धि होतीहै अव्यक्त कीभीसि डिहोतीहै काहेते कार्यकोकारणके गुण के अनुरूपहोयेते जैसे रक्तसूत्रकारतव ण नीलमत्रकानीलवर्ण पट होते हैं जैसे २० साइभव्य कारिका कार्यरुपमहदादिकको सुखदुःख मोहरूस होयेते कारणभी सुखदुःखमोहरूपजाना जाताहै ॥ भेदानांपरिमाणात्समन्वयाच्छ नितःप्ररनेवाकारणकार्य विभागादविभादेश्वरूप्यस्य॥१५॥ अन्दयः भेदानाम् महदादीनाम् मूलकारण मव्यक्त मस्ति इनिहितीयेनान्वयः कुतः भेदानाम् महदादीनाम् परिमाणात अ. व्यापित्वात् पुनःकुतःसमन्वयात् भिन्ना नां सरूपतासमन्वयः तस्माद च पुनःका रणशक्तिनः कार्यप्रवनेः कारणकार्यवि भागात् वैश्वरूपस्य अविभागात्॥१५॥ टीका पुरुषपुरुषप्रतिवर्तमान भित्रभित्रमह दादिक तत्वकामूलकारण अव्यक्त है यह दूसरे श्लोकमैं अन्नयहै काहेते एथक प थकुमहदादिक तत्वकेपरिमाणते नाम पूर्णना अव्यापकताने और प्रकृतिते भिन्न हैं ॥१५॥ हैं। सामव्यकारिका २१ बुध्यादिकतत्व के प्रतिकेसमानजोरूप त्रिगुणात्मकभाव सोइजोप्रतिके कार्य में समन्वयत्ताते और कारणके शक्तिते का के प्रति होयेते कारणसे कार्यकोविभा गते और संपूर्णनानारूपकार्यको प्रकृति से अविभागते जैसे मृतसुवर्णादिकने घरकुंडलादिक नामरूपकरके पृथकभी और मृतमुवर्णादिकतत्वते पथकलही मूलम् कारणमस्त्ययनंप्रवर्ततेत्रिगु णतःसमुदयाचापरिणामतः सलिलवस्यतिप्रतिगुणाश्रय विशेषात्॥१६॥ अव्यक्तं कारणमस्ति यतःप्रतिसावस्था यामपि त्रिगुणतःप्रवर्तते सत्यादीसमुद्र यात् गुणप्रधानभावेनसमेत्यउदयःसमु दयःतस्मात् कथम् परिणामतःसलिलव प्रवर्तने कुतःप्रनिप्रतिगुणाश्रयविशे षात् ॥१६॥ टीका प्रतिकीखस्पसिकरके अवप्रकृति h २२ साङ्ख्यकारिका के प्रवृत्तिकामकारकहतेहैं अन्यक्तकारण है मुष्टिआदिककालमेंन्यूनअधिकभाव करके गुणों को मिलके जोउदय,तिसको कहियेसमुदय तातेमहदादिकनवअने करूपहोयकवर्तते हैं कौनप्रकारते जैसे एकही मेघकाजल आम्रअम्ली इक्षु तार और मिरच आदिक फलपर गिरक अनेकप्रकाररसहोताहै काहेते एकए क गुणके आश्रय करके जो विशेष न्यू नअधिक भाव नाते ॥१६॥ मूलम् संघातपरार्थलात्रिगुणादिवि पर्ययादधिधानात्पुरुषोऽस्ति भोलभाकालेवल्यार्थप्रश्तेश्व ॥१७॥ अन्वयः अन्यक्तादेर्यतिरिक्ष पुरुषोऽस्ति कुतःसङ पानपरार्थलात् चपुनः त्रिगुणादिविपर्ययो न अधिष्ठानान भोक्तभावात् कैवल्यार्थे प्रवृत्तः॥१७॥ टीका रेहादिकोआत्मामानने वाले पुरुषकोकह साङ्मयकारिका २३ हैं किभव्यक्तआदिकते भिनआत्माहै का हेते अव्यक्तमहदअहंकारादिकसंघातको देहगेहकेनाई परायेके अर्थ होयेते आत्मा को त्रिगुणादिकतेविपर्ययहोयते देहगेह को अधिष्ठातारूपआत्माके अधिष्ठानही येते पुनःआत्माको सुख दुःख मोहके भो- ताहीयेते और आत्माके देवल्पके अर्थ सु ख दुःख माहलेवियोगकेअर्थ श्रुनि स्मृतिम हर्षिन को प्रवन्त होयते॥१७॥ मूलम् जनममरणकरणानांप्रतिनि यमादयुगपुलर सेवापुरुष वहसिईवयुज्यविपर्यया वैव॥१॥ पुरुषबहुत्व सिदभवति कुतः जननमरण करणानीप्रतिनियमात् चपुनः अयुगप प्रवृत्तः चपुनः त्रैगुण्यविपर्ययादेव टीका पुरुषवरन हैं सोसिन्दताते हैं काहेते देहा दिककासबोगरूपजन्य पन देहादिककावि २४ साव्य कारिका योगरूपमरणाऔरवुयादिक इंद्रियको पुरुष पुरुषप्रति पृथक पृथक के नियमते और- खाने पीने चलने फिरने सोने जागनेमे थक् पृथक काल में प्रस्तहोयेते पुनःती- गोगुणके पर्यायते देव मनुष्य पशु आदिक तीनप्रकार पृथक पथक योनिधारण कर नेते एवनामनिश्चयकरके ॥१८॥ तरमाञ्चविपर्यासासिइंसाक्षि त्वमस्य पुरुषस्य॥कैवल्यमा ध्यस्थेदंष्टुत्वम कर्तृभावश्च॥१९॥ अन्वयः चपुनः तस्मात् त्रिगुणमविवेकि विषयः इत्येतस्मात् प्रकृतिलक्षणात विपर्यासान् अस्यपुरुषस्य साक्षिलम् कैवल्यम् माध्य स्थम् एवम् चपुनः अकर्तृभावः सिई भवति॥१९॥ टीका त्रिगुण अविवेकि विषय यहजोमहति कालक्षण ताते विपर्यय होयेते यह पुरुष कोअत्रिगुणत्व विवेकित्व अविषयत्व साइभव्यकारिका २१ चेतनत्वादिकसिद्धभया चेतनत्वादिकसिद्ध होयेते साक्षित्व औरद्रष्त्वसिड्भया अत्रै गुण्यहोयेते कैवल्य माध्यस्थसिदभया औरअविवेकिल अप्रसवधर्मित्वहोयेते अकर्तृलसिड्भया ॥१९॥ तस्मातत्संयोगादचेतनचेतन वदिवालिङ्गमगुणकर्तृत्वेच तथाकर्तवभवत्युदासीनः॥२०॥ अन्वयः यस्मात् प्रतिचैतन्ययाःसमानाधिकर ण्यम् अस्मिन्यतेनावकसते चेतनस्या कर्तृत्वात कर्तुश्वाचेतनत्वात् यस्माच्च तन्यकर्टले भिन्नाधिकरणेयुक्तितःसिडे तस्मात् तत्प्रकृतिपुरुयोःसंयोगात् अचे ष ननंलिङमहदादिसक्ष्मपर्यंतम् चेतनव दिवभवति तथाचउदासीनः त्रिगुणकर्ट तेकीइवभवति॥२॥ टीका जातेकवचेतनत्वकोसमानता यह सां ख्यमतम नहीकल्पनाहोताहै चेतनको २६ साइयकारिका मूलम अकाहीयेते कर्ताको अचेतनहीयेते जा तेचेतनख और कर्वव इनदोनोके आधार एथक युनिने सिह ताते प्रकृति पुरुष के संयोगते जैसे अचेतन लिंगशरीर उन बीस ९तत्वका चेतनके नाईहै तैसे गुण के कर्तृत्वमें उदासीन जोआत्मासोक- के सदृश है ॥२॥ पुरुषस्यदर्शनार्थकैवल्यार्थत थाप्रधानस्य॥पवयवदर्भ योरपिसंयोगरतलेतासगाशा पड्क-धक्दुभयोः प्रकृतिपुरषयोः संयोगो- भवति किमर्थम् प्रधानस्यदर्शनार्थम् - नथायुरुषस्य कैवल्यार्थम् नत्वतःसयो- गतःसर्गोभवति॥१॥ टीका कुहुँ जानेकेनिमित्त पंगु अंधाकाजैसेस योग होता है तैतप्रकतिपुरुषका संयोग है काहे के निमित्त प्रकतिको अपना स्व मेय पर आगेटेस्वावकाप्रयोजन?
साइरव्य कारिका और पुरुषको कैवल्यके अर्थमतिकैसे गकाप्रयोजनहै काहें कि प्रकृतिकैसंग विज्ञानाननहीं होसकताहै और संयोग काकीयासर्गहै काहेते महदादिक सर्ग विनाज्ञानकीउत्सतिनहीं होसकतीहै ।।२१॥ प्रकृतेर्महान्ततोऽहबारस्त. स्मादणमषोडशकःनिरमा. दपिषोडशकारपञ्चभ्यःपञ्च भूतानि॥२२॥ परुनेर्महान्भवति नतोमहतोऽहसरो भवति तस्मात् अहङ्कारात् पञ्च ज्ञानेन्द्रि याणि पञ्चकर्मेन्द्रियाणि एकंमनः पञ्चत मात्राइतिषोडशकोगोभवति तस्माद पिषोडशकादपहरेभ्यः पञ्चभ्यः तन्मा वेभ्यः पञ्चभूतानिआकाशादीनिभवन्ति प्रतिसे महत्तत्वहोताहै महत्तत्वसे अहंकार अहंकारते पंचज्ञानेंद्रिय पंचक मैंद्रिय एकमन पंचत यात्रा यसबषोडश ॥२२॥ रीका २८ साव्यकारिका गणहोते हैं और षोडशगणसेभी पश्चात केतन्मात्रात आकाशादिक पंचमहाभूत होतेहैं शदत्तन्मात्रासेमाकाशहोताह जिस मैंशब्दगुणहै औरशब्दतन्मात्रासहित स्पर्शतन्मात्रासेवायुहोताहै जिसमें शब्द सर्शदोगुण, पुनःशब्द स्पर्श तन्मात्रास हितरूपतन्मात्रासे तेजहोताहै जिसमें शब्द स्पर्शरूपतीनगुणहै और शब्दस्य शरूसन मात्रासहितरसतयात्रासेजल जिसमें शब्दस्पर्शरूपरसचारगुणहैं फिर त्र शब्दस्पर्शरूपरसतन्मास हितगन्धत. भावासेपथिवी जिसमें शब्दस्पर्शरूप रसगंध पाँचगुणहै ॥२२॥ अध्यवसायोबुद्धिधर्माज्ञानं विरागऐश्वर्यम्सालिकमे नद्रपंतामसमरमादिपर्यस्त म्॥२३॥ अन्वयः अध्यवसायोबुडिर्भवति तस्याःसालिक काममभेदेन अधीधर्माभवन्ति तत्रध साङ्मयकारिका २९ मौज्ञानविरागऐश्वर्यमिति एतच्चतुष्टयंसा लिकरूपभवति अस्माच्चतुष्टयाहिपर्यस्त. विपर्ययरूपम् अधर्मो ज्ञानमविराग अ नैश्वर्य इति चतुष्टयंतामसंभवति ॥२३॥ टीका व्यक्तों मैं ज्ञानकासाधन प्रथमबुड़िकाव स्पकहते हैं औरक्रियाकरनेवाले को अभे । क्रिया ददृष्टिकरके कहने हैं निश्चयनाम शुभा शुभ को निश्चयकरनेवाली बुद्धिका स्वरूपहै बु दिक सात्विक तामस भेदकरके आठधर्म हैं तिसमें धर्म ज्ञान विरागऔर ऐश्वर्य य हे चारों सात्विक पुनः यह चारोते विर्य ये धर्म अज्ञान अविराग और अनैश्वर्ययै चारों तामस हैं और अधिभूत रूपकरकेनो महत्तल है सोईअध्यात्मकरके बुद्धिनाम है॥२३॥ अभिमानो हंकारस्तस्माद्वि- विधःप्रवर्ततेसर्गः॥एकादश कश्वगणस्तन्मात्रापेचकश्चैव ॥२४॥ अन्वयः अभिमानोऽहंकारोभवति तस्मादहंकारात् Audio मेन्टिय साह-व्यकारिका हिधासर्गःप्रवर्तते एकादशकोगण इंद्रि याणाम् चपुनः पंचकोगणः तन्मात्रः॥२४॥ टीका देह गहमें ममत्वकरना औरअपने को देह गेहकाखामीमानना अहंकारकहाना है हंकारते दिप्रकारमुष्टि होतीहै पंचज्ञानेंद्रि > या एकमन येएकादशइंद्रियोंकेगण एक प्रकार पंचतन्मात्राकागण एकप्रकार॥२६॥ सात्विक एकादशकःप्रवर्तते रुतादहंकारात भूतादेस्तन्मा सतामसरलेजसादुभयम्॥२५॥ अन्वयः सालिकःएकादशक इंद्रियमणः वैकता. दहङ्कारात्मवर्तते युलामसल मात्र स्मभू तादेर हङ्काराप्रवर्तते नैजसातैजस सहा- यात् उभय प्रवर्तते ॥२५॥ तरीका सालिकरूप एकादशइंद्रियोंकेगण वैका रिकनाम सालिक अहंकारते उत्पन्न होते हैं और जोनामसरूप पंचत-मामाकेमण सोभू
है
साइरव्य कारिका
३१
नादिनाम तामसअहंकारतेउत्पन्नहातेहैं।
पुनः जसनामराजसअहंकारकेसहाय
ते इंद्रियऔरतन्मात्रादोनोगणउत्पन्न होते
॥२५॥
बुद्धीट्रियाणिचक्षुः श्रोत्र प्राण
रसनत्वंगारव्यानिवाक्पाणि
पादपायूपस्थानिकर्मेद्रियाण्या
हुः॥२६॥ अन्वयः
चक्षुःश्रोत्रघाणरसनत्वगारव्यानि बुद्दीन्द्रि
याणि आहःसारख्याचार्याः वाक पाणि पाद
पायुउपस्थानि इतिकर्मेन्द्रियाण्याहुः॥२६॥
रीका
सारख्यके आचार्य चक्षुःथोत्र घ्राणरमन-
वक इन पाँचोंकोज्ञान इंद्रिय कहते हैं और
वाक पाणिपादु पायुउपस्थ इन पोचौकोक
मैंद्रियकहतेहैं ॥२६॥
मूलम्
उभयात्मकमत्रमन संकल्पक
मिद्रियवसाधातागुणपरि
णामविशेषातनानावंबायमे
दाय॥२७॥
साइप्रख्यकारिका अन्वयः अत्रैकादशसु इन्द्रियेषुमनःउभयात्मकम् बुद्दीन्द्रियकमैंद्रियेच भवति बुडीट्रियाणाम् चक्षुरादीनां वागादीनां कर्मेन्द्रियाणांच म नाधिष्ठितानां स्वस्व विषयेषुप्ररत्तेः चपुनः संकल्पक इन्द्रियम् कुतःसाधात् एक. स्मात्सा विकाहंकारात कथमेकादशेंद्रिया णि गुणपरिणामविशेषात् नानात्वंभवंति चपुनः बाह्यभेदाः पृथिव्यादयः एकस्मात् तामसाहंकारात् नानात्वंभवति॥२७॥ टीका इन एकादशेंद्रियों में मन,ज्ञानेंद्रिय और - कर्मे द्रिय दोलाप्रकारहै चक्षुरादिकज्ञानेंद्रि याँको औरवागादिक कम द्रियों को मन कर के युक्त होनेसे अपने अपने विषयमें प्रा. तिते और संकल्पकनाम शुभाशुभ विचार की और इंद्रियह काहेने चक्षुरादिकई द्रियों के साथ सात्विक अहंकारसे उत्पन्न हो येते एकसाविक अहंकारसे कैसे एकादेश इंद्रियें होते हैं गुणौके परिणाम भेदते नाना प्रकार होतेहैं जैसाही पृथिव्यादिक पेच ।
साइभव्य कारिका महाभूतभी एकतामसअहंकारसेनानाप्र कारहोते हैं ॥२॥ शब्दादिषु पंचानामालोचनमा अमिष्यतेतिः॥वचनादानवि हरणोत्सर्गानंदाश्चपंचानामा॥ अन्वयः शब्दादिषु शब्दस्पर्शस्परसगन्धेषुपंचवि षयेषुपंचानां श्रौत्र लकचक्षुर्जिला प्राण इ ति ज्ञानेद्रियाणाम् आलोचनमात्र समुग्ध- वस्तु मात्र दर्शनम् इनिरिष्यते चपुनः पं चानां कर्मेत्रियाणाम वाक पाणि पादपायूप स्थानांववादानविहरणोत्सर्गानेदाः रत्नेय इष्यते॥२०॥ टीका शब्दस्पर्शरूपरसगन्ध पाँच विषयों में श्रोत्र लक्चक्षु जिला प्राण यैपंचज्ञान इन्द्रियों को बालकके सदृश वस्तुमात्र को देखना वृत्ति है और पंच कर्मेन्द्रिय वाक पाणि पाद पायुपस्थका बोलना लेनदेन- करना चलना मलादिक त्यागकरना और. स्त्रीभोगके सुखकोजानना यह सब पंचवृति हैं॥२८॥ ३४ साव्य कारिका मूलम् स्वालक्षण्यत्तित्रयस्यसैपा भवत्यसामान्या सामान्यकर परतिःप्राणाद्यावायवःपंचा। अन्वयः खम् असाधारणलक्षणेयेषांतानि तेषाम् भावःस्खालक्षण्य त्रयस्यमहदादेई तिव्या- पारसस्वालक्षण्यभवति साएषातिरसा मान्याभवति प्राणाद्यावायवःपञ्चसामा• न्यकरणवृत्तिःभवति सामान्याचासोक- रणतिश्चेति ॥२९॥ रीका तीनमहदादिकतत्वकीप्तिस्वालक्षण्यह जैसे महत्तत्वका यथार्थ वस्तुको निश्चयकर ना अहंकारकाअभिमान और मनकास- कसस्पतिहै सो यह तिअसाधारण नाम दूसरे में नहीं है और प्राणादिक पाँच 'न वायु तीनों इंद्रियों के जीवरुप यति ति. समें प्राण वायुकीरति नासिकाके अग्रभा महदयनाभि चरणों के अंगुष्ठों मैं हैं अपा नवायुकीरतिकमरमें पपगुदा उपस्थ साइनव्य कारिका ३५ पार्श्वमैं है समानवायुकीति हदय नाभि सर्वसंधिमैं है उदानवायुकीरति हृदय के तालु मूर्धा भूकेमध्यम है और व्यानवा युकी रतित्वचा है॥२॥ मूलम् युगपच्चतुष्टयस्यरतिक्रम शथतस्यनिर्दिशाहटतथा प्यदृष्टेवयस्यतपूर्विकारतिः ॥३०॥ अन्वयः यथा दृष्टेऽर्थेचतुष्टयस्य चतुर्विधकरण स्य रतिः युगपनिर्दिश साइ-रव्याचार्यः चपुनः तस्य चतुर्विधकरणस्य रतिःत्र मशःनिर्दिश तथा अदृष्ोत्रयस्य अंतःपि करणस्य युगपत् क्रमेणवा रतिः तत्पूर्वि काहष्ट पूर्विकाभवति अनुमानागमरम. तयोहि परोक्षार्थदर्शन पूर्वी प्रवर्ततेना- न्यथा॥३०॥ टीका सारख्यके आचार्य सब जैसेदृष्टवस्तुमें कोई क एवायइंद्रियसहित तीनों अंतःकरणकी रति एक कालमैंकहतेहैं पुनःतिनसव चारो इंद्रियों कीरति क्रमकरकेभीकहते सारख्यकारिका ३६ हैं तैसेही अदृष्ट वस्तु भी तीनौ अंतःक रणकीरति एक कालमें अथवा क्रमक रके दृष्टपूर्वक होतीहै, काहेते अनुमान आगम स्मति सब परोक्ष अर्थमेंभी ज्ञा. नुपूर्व कहि होते हैं अन्य प्रकारन हिंहोते. मूलम स्वास्वा प्रतिपाते परस्परा: कूतहेतुकीरतिम॥पुरुषार्थ एवेहेतुर्नकैनचित्कायतेक रणम्॥३१॥ अन्वयः करणानि स्वाखारतिंप्रतिपद्यन्ते कथं भूताम् परस्पराकूतहेतुकाम् तत्रवत तिप्रतिपंदने पुरुषार्थएव हेतुकरणके नचिन कार्यते ॥३९॥ टीका करणनामइन्द्रिय सब अपने अपनेर तिको प्राप्तहोते हैं कैसी तिहै. पुरस्प रइंद्रियों की अभिप्रायही जिसमें कार है जैसे अनेकप्रकारके अस्त्रले के नेक योद्धारणमैं जाते हैं युद्धकालमैं पर साझज्यकारिका ३७ स्पर एक को देख कर एक अपनी अस्त्रले के युद्ध करताहै तैसे पुरुपके भोग और पवर्गके अर्थ इंद्रिय सब अपने अपने विष यमवर्तते हैं और अपने अपने पुरुषका अर्थ जो मुक्ति मुक्ति सोई कारण है इंद्रियाँ का प्रेरक दूसरा कोई नहीहै ॥३१॥ करणत्रयोदशविधतदाहरण धारणप्रकाशकरम्॥कार्यचत स्य दशधाहार्थ धार्यप्रकाश्य च॥३२॥ अन्वयः कारकविशेषःकरणम प्रयोदश विघंमा वति तच्च करणं आहरण धारण प्रकाश करभवति तस्यच कार्य दशधाभवति. कथंभूतं हार्य धार्य प्रकाश्यच ॥३२॥ का बुद्धि अहंकार मन् पाँच ज्ञानेंद्रिय पाँच कर्मेंद्रिय यैकरण तेरह १३प्रकारहै सो करण अाहरणधारण प्रकासकेकरता. हैं करणकै कार्यभीदशप्रकार, के सेहैं ३८ साड्मयकारिका आहरण धारण और प्रकाराके योग्य हैं. तिसमें वागादिक कर्म इंद्रियाका विषयदि व्यादिव्यभेदकरके दशप्रकार आहार्य हैं बुद्धि अहंकार मनये तीनो इंद्रियाँ अपने के रतिकरके पाणादिक द्वारा पंचभौतिक. शरीर और शब्दादिकविषय दिव्य अदि व्यभेदकरके दश १ प्रकार धार्यहैं और ही दियकोशब्दादिकविषय दिव्या दिव्य. भेदकरके दश प्रकार प्रकाश्यहैं ॥३२॥ मूलम अंतःकरण विविधंदशधावा यंत्रयस्यविषयाव्यम्॥साप तकाल वायं त्रिकालमाभ्यंत रंकरणम्॥३३॥ अन्वयः बुडिरहंकारोमनइति शरीराभ्यन्तरव तिवांदत्तःकरणं त्रिविधंभवति पञ्चज्ञाने. द्वियम पञ्चकर्मेंद्रियमिति दशधावात्यमि दियभवति कथंभूतम् त्रयस्यातःकरण. स्प विषयमारख्यातीनि विषया ख्यम् से कल्पाभिमानाध्यवसायेषु कर्तव्यषुरारी साड-रख्यकारिका भवन्ति बुद्दींद्रियाणिआलोचनेन कर्मेंद्रि याणिव्यापारेण पुनरपियो विशेषमाह सा म्प्रतकालं वर्तमानकालं यात्यम् इन्द्रियम्भव ति आभ्यन्तरं करणं त्रिकालं भवति ॥३३॥ दीका बुद्धि अहंकार मन यह सब अंतःकरणती नप्रकार हैं पाँचज्ञानेंद्रिय पौचकमद्रिय ये दस बाल्यकरण हैं कैसे हैं तीनों अंतः करणके विषयकै जनावनेवाले हैं संक ल्प अभिमान अध्यवसाय विषे हारभूतहैं ज्ञानेंद्रिय देख सुनकरके कर्मेंद्रिय कर्तव्य करके औरभी दोनोकरणकाभेदकहने हैं म मी पभूतभविष्यवर्तमानकालको बाय कर, जानते हैं और तीन अंतःकरण तीनो कालको जानते हैं ॥३॥ बुद्धीट्रियाणितेषां पंच विशेषा विशेषविषयाणि॥वाग्भवति शब्दविषयाशेषाणितुपञ्चवि षयाणि॥३४॥ अन्दयः साव्यकारिका तेषां दशानां बाह्येन्द्रियाणां पञ्चबुद्धीदिया- जिभवति कयम्भूतानि विशेषा विशेषावि पयाणि विशेषाः स्थूल शब्दादयः अविशे पाः तन्मात्राणिसूक्ष्म शब्दादयः तेविष. याः येषातानि कर्मेद्रियाणामध्ये वाकम्यू •शब्द लविषयाभवति शेषाणितु चलारिपायूप स्थ पाणि पादाख्यानि पञ्चविषयाणिभव. ति पाण्याचाहार्याणां घटादीनां पञ्चशब्दा यात्मकलादिनि ॥३॥ टीका इन दश बाह्यइंद्रियों के मध्य में पांचज्ञा दियह कैसेहैं स्थल शब्दादिक दोनोको जानते हैं तिसमें स्थूल शब्दादिककोहम सबके इंद्रिय आनतेहैं सुक्ष्म शब्दादिक- को योगियों के दिव्यइंद्रिये जानते हैं और कर्मेंद्रियकेमध्य वाक स्थूल शब्दकोजा- नतीहै और शेषजीचारइंद्रिय गुदाउप. स्त्रपाणि पाद सो पाँचौ शब्दादिकविषयों कोजानते हैं करचरणादिकते ग्रहण क से योग्य घटपटादिवस्तुको शब्दादिकपा व विषयरूपहीयेने ॥३४॥ और सस्मशब्दादिका
साव्यकारिका
४१
सान्तःकरणाबुद्धिःसर्व विष
यमवगाहतेयरमात्॥तरमा
त्रिविधंकरण द्वारिदाराणि
शेषाणि ॥३५॥
अन्वयः
सान्तःकरणा मनोऽहङ्कारसहिताबुद्धिाय
स्मात सर्व विषयं अवंगाहते अध्यवस्य
ति तस्मात् त्रिविधंकरणं झरिनामप्रथा
नंभवति शेषाणिदशवायेट्रियाणि द्वारा
णिनाम गौणानिभवति ॥३५॥
टीका
मनअहंकार सहितबुद्दि जातेसर्व वि
पयको निश्चयकरतीहे नाते तीनों अंतः
कुरणप्रधान है और शेषजोदशवाय इंद्रि
यसोगोण हैं नाम तीनों अंतःकरणाके
आधीनहैं ॥३५॥
मूलम्
एतेप्रदीपकल्पाःपरस्परविल
क्षणागुणविशेषालालंपुर
पस्यार्थप्रकाश्यबुध्यप्रयच्छति॥३६॥
साव्यकारिका
अन्वये
एनेगाखेदि यमनोहङ्काराः पुरुष स्वहस्न
म् अर्थम् प्रकाश्यचुर्थे प्रयच्छन्ति कपम्भू
ना एते गुणविशेषाः परस्पर विलक्षणाः प्रदी
पकल्याः॥३॥ सैको
तीनअंतःकरणों का प्रधानकहकर अवमन
अहंकारनेभी बुद्धि कोमधानकहते हैं जैसे ए.
कएक ग्रामके तहसीलदार एकपरगनाकेत
हसीलदारको करपाईचाते हैं और परगना
केतहसीलदास एकाजलाकेमालिकको
पहुँचात हैं और जिलाके मालिकराजाको
कर पहुँचाते हैं तैसे यह सववाय इंद्रिय युरु
पके संपूर्ण अर्थकोदेख सुनकरके मनको
अर्पणकरते हैं ममसंकल्पकरके अहंकार
को भर्पणकरताहै अहंकारअभिमान
के बुद्धिकाअर्पणकरताहै यहबायइंद्रिय
मनभहंकारकैसे हैं सत्वरजतमइन तीनो
गुणों के विकाररूप और परस्परविरोधी
भि तथापिप्रदीपकसहश हैं जैसेवत्तितैल
भविपरस्परविरोधिभीहैं तथापि मिलकेप
संपरसोय अंधकार दूरकरके प्रकाशक
साव्यकारिका रते ॥३६॥ मूलम सर्वम्प्रत्युपभोगम स्मात्पुरुषस्य साधयनिवृद्धिासेवचावेशिन टिपुनःप्रधानपुरुषारसूक्ष्मम कुतःवाहाद्रियादीनि ध्यप्रयच्छनि यस्मात् पुरुषस्य सर्वश्रत्युपभोगम् बुदिःसाधयति च पुनःमाहव बुद्धिःप्रधान पुरुषान्तरं सम्म विशिष्टि॥३०॥ टीका का हेते बाये द्रियादिक नुदिको वर्षणकरते जाते पुरुपका संपूर्णविष यउपभोगकोवुद्धि साधन करती है और साई बुद्धि प्रधानथुरुष कामुक्ष्मजीभेद तिमके जमायदेती है विका रस हि प्रधान भिन्न और पुरुष भिन्न है । विवेककरके एक होयरहा | मूलम् तन्मात्राण्याविशेषारतेभ्योभता निपञ्चपञ्चभ्माएतेस्यता विशे पाःशान्तापाराश्रमूनाच॥३८॥ भन्दयः शब्दस्पर्शरूपरसगन्धाइ नि तम्मात्राणि
साङ्-रव्यकारिका
क्ष्माणि अविशेषाभवन्ति तेभ्यःपञ्चभ्यःत
मात्रेभ्यः आकाश वायुअग्निजल पृथिवी
स्पाणि पञ्चभूतानिक्रमेण भवन्ति एतेवि
शेषाः स्मृताः कुतः यतःशान्ताः घोरामूढाश्च
॥३८॥ टीका
बुद्धि आदिक करण वरणनकरके अब वि.
शेष अविशेषकहतेहैं शब्द स्पर्श रूपरस
गंध यह पंचतन्मात्रअविशेष हैं सूक्ष्मरूप
हैं और तीनही पंचतन्मात्रसे आकाश वायु
अग्निजल पृथिवी स्प पंचमहाभूतक्रमहीं
तेहोतेहैं यहि विशेषनामस्थूलकहावतेहैं
काहेतेजानेसत्वगुणके अधिकताकरके शांत
सुख प्रकाश लघुरूपहैं रजोगुणके अधिक
ताकरके घोरदुःख चंचलरूपहैं और तमो
गुणके अधिकता करके मूढविष गुरुरूपहैं स
मूलम्
सक्ष्मामातृपितृजाःसहप्रभूतै
स्त्रिधाविशेषा:स्युःसूक्ष्मारतषा
नियतामातापितजानिवर्तने॥३॥
अन्वयः
विशेषास्त्रिधाःस्युः सहप्रभूतैःमक्ष्मामात
ताते॥३॥
४५ सारख्यकारिका पितृजाइति तत्र सूक्ष्मा एकोनविंशतिर सत्वरूपाःसक्ष्मदेहाः इतिएकोविशेषःमात पितृजाः षाटकौशिकाः तत्रमारतोलोम लोहितमांसानि पितृतस्तुस्नायु अस्थि- मज्जानइतिहितीयोविशेषःमहाभूतानित कार्य घटादीनिचतृतीयो विशेषः तेषांत्र साणा मध्ये रुक्ष्मा नि यताभवन्ति मातृपि तृजास्तुनिवर्तन्ते रसान्तावाभस्मान्तावा वि उत्तावा॥३९॥ रीका विशेषतीनप्रकार हैं महाभूतसहितसूक्ष्म औरमातापितासेजन्मा पाटकौशिकशरीर तिसमें सूक्ष्मशरीर प्रकृतिसहित उनवी से १९तत्वकाहै माता पितासेजमा च६ कोशकाहै पुनःइनमैसेमातासेजन्मा तीन: कोश लोमरुधिर मांस और पितासे जन्मा * ती स्नायु अस्थि मज्जा और तीसरावि शेष पंचमहाभूत और घटयदादिकते ती नो विशेष सूक्ष्म मुक्ति पर्यन्त नित्यहै माता पितासे जन्माशरीर निवृत्तहोजाताहै पंचम हाभूत वाभस्म अथवा मलहोजाताहै॥३९॥ मूलम् मूou ४६ साङ्ख्यकारिका पूर्वोत्पन्नमसल नियतमहदा- दिसूक्ष्मपर्यन्तमसंसरति निरूपभोगंभाचैरधिवासितंलि गम्॥४॥ अन्वयः सूक्ष्मशीनससरति कथम्भूतम् पूर्वोत्पन्न म असतम् नियतम् महदा दिसूक्ष्मपर्यन्त म निकपभोगम्भावरपिचासितम् लिङ्ग- सीका सूक्ष्मशरीरकालक्षणकहते हैं सूक्ष्म शरीरज न्ममरणको प्राप्त होताहै कैसाहै सटिकेआ दिमे पुरुष पुरुषप्रतिप्रकति कामजाह अ सतनामअव्याहत है शिलारक्षमें भीमवे स करताहै नियतनामआदिमर्गते प्रल अपर्यंत नित्य है महदादिक सूक्ष्मपर्यंत कनिसहित उनवीस १२नत्वका है षाड्रोशि कशरीरविनाभोगरहित है धर्म अधर्मज्ञा न अज्ञानु विरागविराग ऐश्वर्यअनैश्व य इनआठौंभावकरके अधिवासितनाम . आदीवासनाकरके युक्त है और प्रकृति काचिन्हहै॥४॥ मूलम् सादारण्यकारिका चिचंयथाश्यमृतेस्थापवादि भ्याविनायथाखायातिदाहिना विशेषैन तिष्ठतिनिराश्रयलि अम् ॥४॥अन्वयः आश्रयमते यथाचित्रवतिष्ठति।स्थावा दिभ्याविना यथाछायानतिशति तथावि शैषैः सूक्ष्मशरीर चिना निराश्रय लिङ्ग-म बुध्यादितत्वभतिष्ठति ॥४१॥ टीका आश्रय विनाजैसे चित्रामनहीं रहताहै वृ क्षतिमा जैस छायानहीं रहती है पैसहीस मशरीदिनानिरालम्बबुध्या दिकतत्वन ही रहते हैं ॥४१॥ मूलम पुरुषार्थहेतुकमिदत्रिमित्तने मित्तिकस नप्रिकृतेविभु खयोगाचवावतिष्ठतेलिङ्ग म्॥४२॥ अन्वयः नवत् यथानटःतान्ताम्भूमिकामादाय रामो वायुधिष्ठिरोवाभव तिनहत पुरुषार्थ हेतु कामिदलिङ्गम् सूक्ष्मशीर व्यवतिष्ठते कथम् निमित्तनैमित्तिकमसड़े-न कस्मात ४८ साइ-व्यकारिका प्रहत विभुत्वयोगात्॥४२॥ टीका जैसे संसारहोताहै वाजिसकारणसे होता है सोकहते हैं जैसेनटलीलाके आश्रयकर केरघुनाथजीका स्वरूप वायुधिष्टिरकास्व रूपहानाहै नैसही पुरुषार्थजीमुक्ति मुक्ति ने दोनोहेतुकरके युक्त यह लिंगशरीरदेवम नुष्यादिकवरूप होताहैकाहे करके तो निमि जो धर्मअधर्मादिक और नैमितिकजोदे वमनुष्यादिकशरीरका संग्रहतेदोनोमें आ सतिकरके काहेते लिंगशरीरको यह सम र्थहै प्रकृतिकै समर्थताके योगते॥१२॥ मूलम् सासिडिकावभावाःमारुति कावैहतिकाचंधमाद्यादृष्टाः करणाश्रयिणःका अयिण श्वकलिलाद्याः॥४३॥ प्राकृतिकाः स्वाभाविका धर्माद्याभावाःसां सिद्धिकाः करणाश्रयिणःदृष्टाः यथाकपि लादीनां च पुनः वैकति का नैमित्तिका ध माइग्यकारिका १९ मायामाचा असामिविकाः देवतोपासनान ठानेनोत्पन्नाः करणाश्रयिणोरष्टाः यथा प्रा चेतस प्रभृतिमहर्षीणाम् च पुनःअधर्मा योप्येवं ज्ञयाः च पुनः कलिला द्याः का प्याश्रयिणानाम शरीरावस्था दृष्टाः॥५३॥ टीका निमित्तनैमितिककाविभागकहतेहैं प्रा कृतिकनाम स्वाभाविक जोधर्मादिकभाव सोसा सिद्धिक करणाधीन देख परताहै जै सेकपिलदेव आदिकको और वैकृतिक नामनैमितिक जोधर्मादिकभावसोज- सां सिद्धिकनामदेवताके उपासनाकरके उत्पन्न सोभीकरणाधीनदेख परताहै जै- सेवाल्मीक आदिकमहर्षिको औरअधर्मा दिककोभी ऐसहीजाननो और कलिलबुद्ध द मांसपेश्यण् अङ्ग प्रत्यंग यसबरचना रूपअवस्था गर्भमैं शरीरको और बाल्य- कौमार योवन वृहादिक अवस्था गर्भ में बाहर शरीरको देखपरताहै ॥४३॥ यमणगमनमूड-मनमधस्ता ५० साव्यकारिका इवत्यधर्मेण॥ज्ञानेनचापवर्गों विपर्ययादिष्यतेबन्धः॥४४॥ धर्मेणऊर्ध्वगमनम्भवति अधणअव रतात गमनम्भवति च पुनः ज्ञानेन अप बइष्यते विपर्ययातनाम अज्ञानात् ब न्धःइष्यते॥१४॥टीका किसनिमित्तकरके कौन मित्तिकहोताहै सोकहते हैं अधर्मकरके स्वर्गादिकलोक में गति होती है अधर्मकरके अनला दिक लोकमें गति होती है ज्ञानकरके मत्ति हो तीहै और अज्ञानसे बंधन होताहै॥४४॥ वैराग्यात्मरतिलयःसंसारोभ तिराजमादागात॥ऐश्वयाद विचाताविपर्ययात्तहिएयासः वैराग्यात् प्रकृतिलयोभवति राजसाता गात् संसारोभवति ऐश्वर्यात अविघाती- भवति विपर्यायानाम अनैश्वर्यात नाहि पय्यीसोनाम इज्छा विधानाभवति ॥
साङरयकारिका ५१ टीका वैरागसे पुरुष प्रतिमेलीनहोताहै रजोगु णीरागस्नेहते पुरुषको संसार होताहै ऐश्व यतेइच्छापूरण होती है अनैश्वर्यते इच्छा. काविघातहोताहे ॥४॥ एषप्रत्ययसविपर्ययाशक्ति तुष्टिसिध्यारव्यः।।गुणवैषम्य लिमदोत्तम्मचभेदास्तुपञ्चाश प्रतीयते नेतिप्रत्ययोबुहिस्तस्याःसर्गः एषप्रत्य यस भिवति कः विपर्ययाशक्ति तुष्टिसिह्याख्यः तु पुनः तस्यसर्गस्यभे दाः पञ्चाशत् भवति कस्मात् गुणवैषम्य विमदीत्॥४६॥ दीका धर्मादिकबुडिके सर्गको संग्रहत्यागकेनि मित्तजनावते हैं यह चार प्रकार बुड़िकी सुष्टि है कौन विपर्याय अशक्ति तुहिसि दियचोरों जिसकानामहैतिसमविपर्ययअश तितुष्टि इन तीनों मैं धर्म अधर्म अज्ञान वैराग्य अवैराग्य ऐश्वर्य अनैश्वर्य यैसात M ५२ साइ-त्यकारिका यथायोग्य अंतर्गत होते हैं सिदिमै ज्ञान अं तर्गत होता है और तिसमष्टिके भेद पचा. सप्रकार काहेते गुणों के जो विषमतान्यू नता अधिकता तिनकरके उद्भव अभिभव होनेते॥१६॥ मूलमा पञ्चविपर्ययभेदाभवन्त्यश तयाकरणवैकल्यात. धाविंशतिभेदास्तुष्टिनवधाष्ट धासिद्धिः ॥४॥ अन्वयः विपययभेदाः पञ्चधाभवंति च पुनः करण पैकल्यात अशत्तयाः अष्टाविंशतिभेदाभ वन्ति तुष्टि नवधाभवनि सिद्धिःअष्टधा भ वति ॥४७॥ दीका पचामौ ५ भेदगणनाकरतेहैं विपर्ययका भेट पाँच प्रकारहैं तम मोहमहामोह ता मित्र अंधतामिस्र जिसको योगशास्त्रमै अविद्या स्मिता रागदेष अभिनिवेशकह तेहैं औरकरणों के विकलताते अशक्तिके अठाईस भेद हैं तुष्टिनवप्रकार सि साइ-व्यकारिका दि अष्ट प्रकारहैं ॥४॥ भेदस्तमसोऽष्टविधोमोहस्यचद शविधीमहामोहः।तामिलोड शदशधातथाभवत्यन्धतामि सः॥४॥ अन्वयः तमसाभेदोष्टविधीभवतिचपुनः मोहस्य भेदोऽष्टविधोभवति महामोहो दश विधाभ वति तामिलो शदशधाभवति तथा अ. तामिस्त्रोऽष्टादशधाभवति ॥१८॥ टीका अव पाँचौ विपर्ययकाभेदकहतेहैं तम ना मअविद्याके भेदआठ प्रकार, अव्यक्तम हद अहंकार पंचतन्मात्र यैआठौं प्राकृतत खोम आत्मबुद्धिहीयेते मोहनाम मितोंके भेदभीआठप्रकार, अणिमा महिमा लधि मा प्राप्ति प्रकाशिता ईशिता वशिता अवशिता यै आठौं ऐश्वर्यको पायके. यह ऐश्वर्य हमारा नित्यहै ऐसा अभि मान करनेते महामोह दशकार, शब्द स्पर्श स्परमगंध ये पाँचो विषयौको
પક साइ-व्य कारिका
दिव्यअदिव्यभेदकरके दशप्रकारहोनेते
तिसमेंरागआशक्तिरूपमहामोहभी दशा
कारहैं और तामिस्रअगरह प्रकार,
दशजोशब्दादिकविषय विषयके उपायसे
पजोआठ अणिमादिकतेअगरह के
प्रतिघातहोनेसे जोदेषसोतामित्रभीअ.
ठरहप्रकारहैं ऐसहीअंधताभिसभीअठा
रहा प्रकारह पूर्वकेकहेभयेशब्दादिक
औरअणिमादिकजोअठारह १८ विषय
तिनके उपघातकनिमित्त जोजसुरादि
नतेभयसोअभिनिवेशरूप अंधतामिस्त्र
भीअठारह प्रकार है और ये पाँचो अविद्या
के अर्थ श्रीधरस्वामीने भागवनमें ऐसाक
हाहै आत्माकेस्वरूपनहीं जाननासो तम
देहादिकमें अहंकार बुद्धि करनासो मोह वि
षयभोगकी इच्छा सो महामाह विषयकैम
तिघातहोयेतेजोक्रोध सातामिस्त्र विषया
दिककेनाशहोनेसे अपनानाशमानना सो
अंधतामिस्र एहीअर्थविष्णुपुराणकासि
हांत है ॥४६॥ मूलम्
एकादशेडियवधा सहबडिव
साङ्व्यकारिका પૂર્ણ
धैरशक्तिरुद्दिष्टासप्तदशवधा.
बुर्विपर्ययास्तुष्टिसिद्धीनाम्-
॥४९॥ अन्वयः
बुविधैःसह एकादशेष्ट्रियवधाः आशक्ति
महिष्टा कतिबुहेर्वधाःसप्तदशबुइवधाभव
न्ति कथम्भूताः तुष्टिसि हीना विपर्याया।
टीका
अलाईसप्रकारअशक्तिकहतेहैं दुहिवस
हित एकादशइंद्रियोकावधअशत्तिकहा.
तीहै कितने बुडिके वधहैं सतरहा हैं कैसे
नंवतुष्टि और आठसिडिकेविपर्ययरूप
॥१६॥
मूलम्
आध्यात्मिकाश्तस्त्रःप्रकृत्युपा.
दानकालभाग्याख्याः॥बाया.
विषयोपरमात् पञ्चनवतुझ्या
भिमताः॥५०॥
अन्वयः
तुष्टयो नव अभिमतासम्मलाभवन्तिकाः
चतनःआध्यात्मिकाः किंसज्ञकाःप्रक
युपादानकालभाग्यारव्या बाह्याःपञ्चक-
स्मात् विषयोपरमात्॥५॥
साइ-रव्यकारिका
दीका
नवप्रकारतुष्टिकहते हैं तुधिनवमकारकी
है यह सारख्यकेआचार्यकासमनहै कौन हैं।
चारप्रकारआध्यात्मिक, क्यानाम, प्रक
तिउपादान कालभाग्य जिनकानामहैं और
बायतुष्टिपाचप्रकारकीहैं शब्दादिकपाँचोवि
षयोंके उपरामहोनेसे जोहोतीहैं आध्यात्मि
कचारोंतुष्टिका लक्षणकहतेहैं जैसे कोई
उपदेशकियाकि अविवेक और विवेकदीना
प्रकृतिका परिणामहै और दोनोको प्रकृति
करतीहै ध्यान अभ्यास करने का कुछ प्रयो
जननहीं है यहसुनकर शिष्यको जोतुष्टि
सोप्रकृतिनाम तुहैि पुनः कोईकहा कि सं.
न्यासलेनेहींस मुत्तिहोतीहै ध्यान अभ्यास
काक्याप्रयोजनहै यह मुनकर उपादान नाम
तुधिहोतीहै कोइ कहाकिकालके आधीन
जैसे मुखदुःख होताहै सही कालपायके
बंधमोक्षभीहोते हैं साधुनकरने का क्या का
महै यह सुनकर जोसतोष होना सो का.
लसंज्ञक तुष्टि कहातीहै और कोइकहा
विसुखदुःखबंध मोक्षसबभाग्यमहोते हैं
साड्रव्य कारिका ५५ उपायकरनेसे कुछनहीं होतायहसुनकर साधनकोछोडदेना सौभाग्यसंज्ञकतुष्टिक हातीहै और नवतुष्टिकानाम शास्त्रामे क्रम सेकहतेहैं अंभ सलिल ओघ वृष्टि चा आ ध्यात्मिक तुष्टिकानामहै और द्रव्यके अर्ज- मरक्षण क्षय भोग हिंसा यै पाँचौ दोष देख करजोतुष्टि सो पार सुपार पारपार अनुत्न माम उत्तमांमकहातीहै ॥५०॥ उह शब्दोध्ययनंदुःश्वविधातास्त्र यःसुहत्प्राप्तिादानंचसिड्यो शेसिंहःपूर्वोकुशास्त्रिविधः॥५१॥ सिद्धयो ष्टोभवन्ति काःसिड्यः अध्ययनम् च पुनःशब्दः उहः सुहत्प्राप्तिः दानम् त्रयोदुः ख विघाताः इति पूर्वःपूर्वोतः विपर्यययाश क्ति तुष्टिरूपः त्रिविधः सर्गः सिद्धेः करिण्याः अंकुशः निवारकःअत एव हेयः॥५१॥ रीका अब गौण मुख्य भेदकरके औरहेतु हेतुम भावकरके अष्टप्रकारसिद्धि तिसमै आ ५८ साड्त्यकारिका यकीअध्ययन रूपासिरिकेवलहेतुहै और अंतके तीनो दुःखके विधातरूपासिडिकेव लहेतुमतीहैं मध्यके चार सिद्धि हेतुहतुम नी दोनोहैं विधिपूर्वक गुरुसे अध्यात्मविद्या की अक्षरराशीग्रहणकरना अध्ययनना म सिहितारक हातीहै अर्थग्रह नकरनाश बदनाम सिडिसुतारकहातीहै यैदोनो श्रव गके अंतर्गतहैं ये दोनों में संशयकरके पू पक्षनिराकरण करके शास्त्रोक्तउत्तरम रता क्ष स्थापनकरलाऊहानाम सिद्धितारक हा नी है जिसको वेदांती मनन कहतेहैं गुरु ब्रह्मचारीके साथ संवाद करके अर्थको रद्ध करना सुहत्प्राप्तिनाम सिड्रिम्पक कहा नीहै वासनासंशय विपर्ययरहित आदर पूर्वक दीर्घकाल करके यथार्थ विवेक ज्ञान कीप्राप्ति दाननाम मिहिमहामुदित कहा तीहै और तीन प्रकार मुख्य सिद्धि दुःख त्रय विधान रूप हैं जिनकानाम प्रमोद मु दित मोद मान कहतेहैं ॥१॥ A ANSAR नधिनाभावैलिभाविनालिडे साड़-ख्यकारिका नभावनिवृत्तिःलिकारयाभावारव्य स्तस्मातहिंविधःप्रवर्ततेसर्गः॥५॥ अन्वयः भावै धर्मादिभि विना लिड-नभवति लिङ्गेन. विनाभाव निर्वृत्तिनभवति तस्मा सिङ्गारव्यः भावाख्यः हिविधः सर्गःप्रवर्तते॥५२॥ टीका भौग्यरूप शब्यादिक तन्मात्रविना अथवा भो गस्थान स्थूल सूक्ष्म शरीर विना भोगरूपपुरु पार्थ सिह नहीं होसत्ताहै नाते तन्मात्रका सर्ग होनाचाहिये ऐसही भोगोपकरणअनाःकार ण इंद्रिय विनाभि भौग सिट नहीं होसक्ता है और धर्मादिक विना इंद्रिय और अपवर्गका- कारण विवेक भीसिड्नहीं होसत्ताहै तातेध मादिकरूप प्रत्यय सर्गभी होना चाहिये ताने ग्रंथकार कहतहैं धर्मादिकके सष्टिविना तन्मा त्रकी सष्टि नहीं होतीहै और तन्मात्रके सृष्टि विना धर्मादिक कीमष्टि नहीं होतीहै तातेत यात्र सर्गधर्मा दिकसर्ग दोनों होते हैं ॥५२॥ मूलम अशविकल्पोदैवरतर्यग्योन्यश्च ति॥५३॥ ६ सामव्यकारिका पञ्चधाभवतिमानुपकविधः समासतोभौतिकःसर्गः॥५३॥ देव देवसर्गःअधविकल्पोभवति ने मुग्योन्यः पञ्चधाभवति मानुषः मनुष्यसर्गः एकविधी भवति समासनोभौतिकःसर्गः त्रिविधीभव टीका देवसर्गआठप्रकार, नाट्य प्राजापत्य ऐंद्र पैत्र गांधर्व यक्ष राक्षस पैशाच तिर्थ- ग्यो नि पाँचप्रकार हैं पशु मृगा पक्षी सरीख प स्थावर मनुष्यतर्गएकप्रकारहै ब्राह्म गरवादिकजातिशडकर चारोवरणका ए- कआकार होनेते संक्षेपते भौतिकसर्ग तीन मकारहै सो आगेके श्लोकर्मे कहते हैं ॥५३॥ मूलम् जर्वसत्वविशालतमोविशाल- अमूलतःसर्गः॥मध्येरजोविशा लोब्रह्मादितम्बपर्यन्तः॥५४॥ ऊयुप्रभृति सत्या सोलोकसत्व बहुलोभ वति लमो विशामवसर्गो मूलतो भवति साड्-व्यकारिका रजो विशालःसर्गामध्येभवति क्यम्भूतःस र्गःब्रह्मादिस्तम्बपर्यन्तः॥५॥ टीका अधिकसात्विकसर्गब्राल प्राजापत्त्य ऐंद्र- पैत्र गांधर्व यक्ष राक्षस पैशाच यैआटप्र कारके देवसर्ग ऊपर स्वर्गलोकमैहै अधिक तमोगुणसर्ग पशुआदिक नीचेको अधि- रजोगुणसर्ग मनुष्यादिक मध्य पृथिवीमह बमासे आदिले के स्थावरंपर्यंत सर्गतीनही कारहैं ॥५४॥ मूलम् तबंजरामरणरुतंदुःरंदप्राप्नोति चेतनःपुरुष लिङ्ग स्थाविनिवृत्त स्तरमा हुःवस्वभावन॥५॥ अन्वयः तत्रशरीरादौ चेतनःपुरुषःजरामरणहतं दुःखम्प्राप्नोति कुतः लिङ्ग-स्या विनिवृत्तः य तः पुरुषाढ़ेदाग्रहात् लिङ्गधर्मानात्मन्येवा- ध्यस्यति तस्मात हाच स्वभावन प्रायोति hપણી दीका शरीरादिक विषजरामरण निमित्तिकदुख चेतनपुरुष प्राप्त होताहै काहे से लिङ्ग पारीर साइ-व्यकारिका को आत्मासे पृथक नहिँ होनेसे और लिंगशरी रको पुरुषसेअभेद ग्रहण करनेते लिंगशरीर काधर्मात्मामें मानताहै तातेदुःखस्वभावही करके पुरुषप्राप्त होताहै ॥५॥ इत्येषप्रकृतिकतोमहदादिविशेषभू तपर्यन्तः॥प्रतिपुरुषविमोक्षार्थ स्वार्थइव परार्थआरंम्भः॥५६॥ इत्येष प्रारम्भः सर्ग:प्रतिकृतः कथंभूतःम हदादिविशेषभूतपर्यन्तः किमर्थम् प्रतिपुरुष विमोक्षार्थम् कव स्वार्थेयथा तथापरार्थे- आरम्भः॥५६॥ दीका यह तन्मात्रमर्गप्रकृतिका किया है कैसाहै म हत्तवसे आदिलेके पृथिवीपर्यंत चौबीस२४ तलकाहे काहेकैनिमित्तहै पुरुष पुरुष प्रति मोक्ष निमित्त है किसकेनाईहै अपने वास्ते जैसे कोई थारंभकरे तैसे परायेके पर्थहै। ॥५६॥ वाविरिनिमिक्षीरस्यय थान बहिरज्ञा पुरुषविमोतनिमि-
साङ्ख्यकारिका
६२
तंतथाप्रति प्रधानस्य॥५०॥
वत्सविडिनिमित्तं यथा अज्ञस्य क्षीरस्यम
वृतिर्भवति तथा पुरुष विमोक्षनिमितं मया
नस्य प्रवृत्तिर्भवति ॥५॥
टीका
अचेतनकोभी प्रयोजनकरके कार्यमें प्रवृत्ति
देख परतीहै सोकहते हैं वत्साके वृडिके अ
र्थजैसे जडक्षीरकी प्रवृत्ति होतीहै तैसे पुरुष
के मुक्तिकेअर्थ प्रकृतिकी प्रवृत्ति होती है।
॥५॥
औत्सुक्यनिवृत्यर्थयथाक्रियासु
प्रवर्ततेलोकः॥पुरुषस्यविमाक्षा
र्थप्रवर्ततेतहदव्यक्तम॥५॥
यथाऔत्सुक्यानिवृत्यर्थ लोक क्रियासु प्रव
नते तहत तथा पुरुषस्य विमोक्षार्थमव्य
तम्प्रवर्ततेपाटीका
जैसेइच्छाके निवत्यर्थ सबजीवकर्ममै प्रवृ
तहोते हैं तैसे पुरुषके मोक्षकेअर्थप्रकृति-
सूपिमै प्रवृत्तहोतीहै ॥५॥
६४ साङ्:व्यकारिका रङ्गस्यदर्शयित्वायथानिवर्ततेन तकीनृत्यात्॥पुरुषस्यतथात्मा नंप्रकाश्यनिवर्ततेप्रकृतिः॥५॥ अन्वयः स्थानेन स्थानिनउपलक्षयति यथारङ्ग-स्य रङ्ग स्थानिनः नर्तनादिकं दर्शयिता नर्तकी नृत्पात् निवर्तते तथा पुरुषस्य आत्मानं श ब्दादिविषयरूपम्प्रकाश्य प्रकृतिःनिवर्तते ॥५॥ टीका जैसेरंगस्थानके पुरुषों को नाच गानादिकदे खलायके नर्तकी नृत्यते निवृत्तहोजाती है तैसे पुरुषौको शब्दादिक विषयरूपआत्माको देखायके प्रति निवृत्त होजाती है ॥५॥ मूलम् नानाविधैरुपायकारिण्यनु पकारिणःपुंसः॥गुणवत्यगुण स्यसतस्तस्यार्थमपार्थकचरति ॥६॥ अन्वयः यथाअगुणस्य अनुपकारिणःखामिनोगु णवान् उपकारीभृत्या निष्फलाराधनंकरो नि तथा गुणवती उपकारिणी प्रतिस्तस्य साड़ग्यकारिका ६५ पुंसः अर्थे अपार्थकेचरति कथंभूतस्य तस्य अगुणस्य अनुपकारिणःसतःकैः नानाविधी उपायः॥६॥ टीका जैसे निर्गुण अनुपकारी स्वामीको गुणना न उपकारीसेवक निष्फल आराधन कर तोहै तैसे गुणवतीउपकारिणी प्रकृति निर्ग अनुपकारि पुरुषाँका प्रयोजन नानामका उपाय करके व्यर्थ करनी है ॥६॥ मूलम् प्रकृतेःसुकुमारनकिञ्चिदस्तीति मेमनिर्भवतियादृष्टास्मीतिपु मर्नदर्शनमुपैतिपुरुषस्य॥६॥ प्रहतेःसुकुमारतरं किश्चिन्नास्तीतिमे मति र्भवति या प्रकृतिः पुरुषेण ष्टारमी ति हेतोः पुनः पुरुषस्य दर्शन मउपैति ॥६॥ रीका जैसेनर्तकी नृत्यसे निवृत्त होकर पुनः पुरु पकै इच्छासे नृत्यादिककरतीहै तैसें प्रकृति भी पुनःसृष्टि आदिक करतीहै यह शंका दूरक ६६ सारख्यकारिका प्रकृति अत्यंत लज्जा मान दूसरा कोई नहीं है यह हमारी संमति है पुरुषहमको देखालि यो इसलज्जासेजोमहानि पुरुषकेसन्मुखन ही होती हैं ।।६१॥ मूलम् तस्मानबध्यतेन्हानमु-यतेनागि संसरतिकति संसरतिवध्य तेमुन्यतेचनानाश्रयाप्रतिः।। ॥६॥ अन्वयः यस्मात् पुरुषः अगुणःअपरिणामी तस्मा अहा साक्षात् कश्चित् पुरुषः नबध्यते नसंसरति नमुच्यते अपितु प्रहतिरेव नाना श्रयासती वध्यते मंसरति मुच्यते॥६॥ दीका जाते पुरुष अगुणअपरिणामीहै तातेसा क्षात कोई पुरुष नबंधताहै नजन्मतामर ताहै नमुक्त होताहै किंतु प्रति हीनानारू पहोकर बंधतीहै जन्मती मरती है भुतही तीहै ने तीनोमवतिके धर्म पुरुषमें उप चार होते हैं जैसे नोकरका जयपराजय मालिक कोक हा जाना है ॥६॥ मूलम् "na Olmes साइ-व्यकारिका सौःसप्तभिरेवतुबभात्यात्मान मात्मनाप्रकातिः॥सैवच पुरुषा प्रतिक्मिोचयत्येकरूपेण॥६॥ अन्वयः प्रकृतिःआत्मनाआत्मानम बभातिकै स- तभिः रुपैः धर्मादिभावैः किमर्थम् पुरुषार्थ प्रतिभोगापवर्गप्रति पुनःसा एवप्रतिः एकरूपेण तल ज्ञानेन आत्मानं विमोचयति टीका बंधनादिके साधनकहते हैं प्रकृतिआप हीअपनेकोबांधतीहै काकरके धर्मअध में विरागंअविराग ऐश्वर्य अनैश्वर्य अज्ञा नये सातो धर्मादिक भावकरके काहे के निमितं भोगअपवर्गरूप पुरुषार्थ के निमित्त औरसोईमलति एकातत्वज्ञानकरके आत्मा कोकोडायदेतीहै ॥१३॥ मूलम् एवंतत्वाभ्यासाचारितनमेनाह मित्यपरिशेषमाअविपर्ययाहि शुईकेवल मुत्पद्यतेशानम्॥६॥ अन्वयः साव्यकारिका एवं तत्वाभ्यासात् ज्ञानम् उत्पयते कथम्भू तम् अविपर्ययादि शुदम केवलम् नास्ति नमेमाहमिति निक्रियाहम् निष्फलोहनिः संगोह मिति अपरिशेषम् ॥६॥ दीका यह प्रकार तत्वों के अभ्यासकरनेसे ग्रह नि पुरुषके साक्षात्काररूपज्ञान उत्पन्नहोता कैसाहै संशय विपर्ययसेरहित विशु है प्रतिसरहित केवल आत्मसम्बन्धिज्ञान है आत्मामेकर्तृत्वनहींहै तातेहम निष्क्रिय हैं आत्माकोस्वामित्व नहीं है नाते हमनिष्फल है आत्मास्वामीनहीं है तातेहमनिःसंग यह ज्ञानते कोई ज्ञानबाकी नहीं है जिसके जाने विना बंधन होय ॥६॥ मूलम तेन निवृत्तप्रसवामर्थवशात्सप्त रूपविनिवृत्ताम्॥प्रकृतिम्पश्य तिपुरुष प्रेक्षक वदवास्थितःस्व च्छः॥६५॥ अन्चयः तेन ईदृशेन तलसाक्षात्कारेण पुरुषः मत तिं पश्यति कथम्भृतःसन् प्रेक्षकवत् भव साङ्ख्यकारिका स्थितइनि निधियःस्वछ:सन कथंभूतांप्रति म निवृत्तप्रसवाम् अर्थवशात् सप्तरूपविनिव ताम्॥६५॥ टीका यहप्रकारतलसाक्षात्कारकरके पुरुषप्रतिको देखता है कैसाहोकरतमासादेखनेवाले केनाई स्थिरनिधिय राजसी तामसी मलिनता वृत्ति सेरहित होकर और प्रकृतिकैसीहे मोग विवे कदोनोकोउत्पन्न करके उत्पन्न करनेते निवृत्त होगईहै और विवेक ज्ञानरूपअर्थक सामर्थ्य ताते धर्म धर्म प्रज्ञान वैराग्य अवैराग्य से श्वर्य अनैश्वर्य मातोप जिसके निवृत्तही गये हैं॥६५॥ मूलम हष्टामयेत्युपेक्षकएकोष्टाहमि- सुपरमत्यन्यासतिसंयोगेऽपि तयोःप्रयोजनंनालिसर्गस्य॥६६॥ मयामकृतिरष्टाइति एक आत्माउपेक्षको वति अहंपुरुषेण दृष्टाइति अन्याप्रशतिः परमति ततःनयोःसंयोगे पिसतिसर्गस्य प्रयोजनेनाक्ति॥९॥ दीका
am
বান্মানি
णासमारव्यातमास्थित्युत्पतिम
लयाश्चिन्यतेयत्रभूतानाम्॥६९।।
अन्वयः
इदं गुयं पुरुषार्थज्ञानं परमर्षिणा कपिलाचा
येण समारख्यातम् यत्र यस्मिन् ज्ञान निमि
ते भूतानाम् स्थित्युत्पत्तिमलयाश्चिंत्यन्ते।
टीका
यह गोप्य पुरुषार्थज्ञान कपिलदेवजीने क
हाँहै जिसज्ञानके अर्थसर्वप्राणियोंके स्थि
ति उत्सत्ति प्रलयों को ऋषिसब वर्णनकर
मूलम्
एतत्पवित्रमयमुनिरासुरयेनुः
कम्पया मददी आसुरिरपिपञ्च
शिवायतेनचबहधारतंतत्र
म्॥७॥ अन्वयः
एतत् ज्ञानम् पवित्रम् दुःवत्रयहेतोःपाव
मम् अग्यम सर्वेभ्यः पवित्रेभ्यः मुख्यम
मुनिः कपिलः अनुकूम्पया आसुरूर्य प्रद
भासुरिपि पशिखाय प्रददौ चयुनः
तेन पञ्चशिरताचार्येण बहुधा तत्रम ह
नहैं।६९॥
तमा
दीका
साङ्ख्यकारिका
अध्यात्मादिक तीनोंदुःश्वते पवित्रकरनेवा
ला पवित्राम श्रेष्ठ इसज्ञानको कपिलदेव
जीने दयांकरके प्रामुरिऋषिको दिया
और पासुरिऋषि पंचशिखाचार्यको दिया
जोपंच शिवाचार्यने सारख्यतंत्रबहुतनका
रकियेहैं।॥७॥ मूलम्
शिष्यपरम्परयोगतमीश्वरतणे
नतदाामिनासंक्षिप्तमार्यम
तिनासम्याग्विज्ञायसिंहान्तितम्
॥७१॥
चपुनः ईश्वरकृष्णेशिव्यपरम्परयागतम ए
तत् सारव्यशास्त्रसम्यग विज्ञाय सिद्धान्ति
तम् कथंभूतम् संक्षिप्तम् काभिः आर्याभिः
आ-छन्दोभिः कथम्भूतेन आर्यमतिना॥
टीका
और ईश्वरकृष्णाचार्यने शिष्यपरंपरा क
केप्राप्त यहसौख्यशास्त्रकोअच्छेतरहसे
जानकर सिद्धांतशास्त्रकिया कैसाहै संक्षि
सग्रंथहै काहेकरके आखिंदकरके कैसेई
घरकष्णहैं समीचीन जिनकीबुद्धिहै ॥११॥
साव्यकारिका सप्तत्या किलयेस्ता इल्म स्यषष्टितंत्रस्य।आख्यायिका विरहिताःपरवादविवर्जिताश्चा पि॥७२॥ अन्वयः छत्नस्य षष्टितन्त्रस्य तेएव अर्थाभवन्ति कि लेति प्रसिद्धौ तेके सातत्या येर्थाःसन्ति कथं. भूता आख्यायिका विरहिताः चपुनः परवा दविवर्जिताःnादीका संपूर्ण षष्टितंत्रसाख्यशास्त्रके सोई अर्थप सिद्धहै कौनसत्तरकारिकामैं जोअर्थहें कै सेहैं कथावार्ताकरके रहितहैं दूसरेआचार्य केवादकरके रहिंतहैं॥७२॥ तथाचभोजराजवार्तिके प्रधानास्तित्व मेकत्व मर्थवत्व मथान्यताप रार्थञ्च तथानक्यं वियोगो योगएवच शेषत् त्ति रकर्तृत्वं मौलिकार्थाः समतादश॥१॥- विपर्यायःपञ्चविधस्तथोक्तानवतुष्टयः॥क रणानामसामर्थ्य मशविंशतिधामतम्॥२॥ इतिषष्टिपदार्थानामष्टभिःसहसिडिभिः॥से यंषष्टिपदार्थोनिक्रथिता परमर्षिभिः॥३॥ सकलणस्वकथनानेदप्रकरणमात्रपितुशास्त्रा
साड-व्यकारिका
र्थमेवेदमितिसिद्धम् एकत्वम् अर्थवलम्.
परार्थच प्रधानमधिकृत्योक्तम्॥अन्यत्व
म अकर्तृत्वम् बहुत्वंच पुरुषमधिकृत्य।
अस्तित्वं योगो बियोगश्चेति उभयमधिल
त्याशेषवृत्तिनामस्थितिरितिस्थूलसूक्ष्मम
धिवत्योक्तम्॥ टीका
प्रधानास्तित्वमित्यादिकका यहअर्थहै।
सदकरणात् यहकारिकाकरके प्रतिके अ.
र्थकार्यको सत्यताकहकर॥भेदानांपरिमाणा
त्यैपाँचौहेतुकरके प्रधानकै अस्तित्वनाम
सत्यताकहे।विपरीतमव्यक्तम् इससे प्रथा
नको सकाव कहे ॥प्रदीपवञ्चार्थतोवृतिः
पुरुषार्थएवहेतुः पुरुषार्थहेतुकमिदम् प्रति
पुरुषविमोक्षार्थम् यसबस्थानमै प्रधान जी
रप्रधान कार्यको अर्थवत्वनामप्रयोजन वत्
कहैं। परिणामतःसलिलवत् इससे प्रथा
नको अन्यताकहै ।संघातपरार्थत्वात् इस
से प्रधान और प्रधान कार्यदूसरेके मह ।।
सोकहे॥हेतुमदनित्यमव्यापि इससे मह
दादिकको अनेकताकहे।जननमरणकर
णानाम् इसकारिकासे पुरुषको अनेकलाक
७६
साइभव्यकारिका
है।सैवचविशिनष्टिपुनः इसकारिकासेस
कार्य और प्रधानका पुरुषसे वियोगकह।
तस्मात् तत्संयोगात् इससे महदादिकलिं
गका और पम्वन्धवदुभयोरपिसंयोगः इ
सकारिकासे प्रधानकापुरुषसे योगकहै
॥अन्योन्याश्रय इससे और समुद यात्ई
ससे गुणों के विशेषवृतिनाम अंगअंगीभाव
॥ अवर्नुभावश्च यहकारिकाकरके पुरुषका
अकभावकहे विपर्ययाशतितुष्टि
सिध्याख्यः इसकारिकासे आरंभकरके वि
पर्ययादिकप चास पदार्थकहे। यह प्रकार
षष्टि पदार्थकहें प्रकृतिः'महान'अहं.
कार शब्द स्पर्श रूपे रसगस्य पंचतन्मात्र
पोडश १६ विकार पुरुष'यसब तत्व प्रहते
महान् यहकारिकाकरके कहे॥पंच विप
र्ययभेदाः यहसेसमान।भैदास्तमसोड
एविधः इससे विशेषविपर्ययके खरूपक
हे॥ एकादशेन्द्रियवधाः इस कारिका क
रकै अट्ठाईस अशक्ति कहींहैं ।वाधि
Wम् कुष्टिता अभ्यत्वम् जडता अज्ञता
मूकना कोण्यम् पंगुलम् लैव्यम् उदाव
साव्यकारिका
तत्वम् १० मन्दताअम्मवैकल्यम् १२.
सलिल वैकल्यम् १३ओपवैकल्यम्१४.
महोपवैकल्यम् १५ पारवैकल्यम्१६ सु
पारवैकल्यम् १७ पारपारवैकल्यम १८ अ.
नुत्तमाम्भवैकल्यम् १९उत्तमाम्भवैकल्यम्
२० तारवैकल्यम् सुतारवैकल्यम् २२ -
तारतारवैकल्यम् २३रम्यक वैकल्यम २६
महामुदितवैकल्यम् २५ प्रमोद वैकल्यम
२६ मुदितवैकल्यम् २७ मोदमान कैकल्य
म २८॥आध्यात्मिकैश्चतस्रः यह कारिका
करके नवतुष्टि कही हैं अम्भ सलिल श्रो
घ महोघ पार सुपार पारपार अनुत्तमा
म्भ उत्तमाम्भ इति उहः शब्दोध्ययनम्
यह कारिका करिके सिद्धिकहींहैं। तार
सुतार तारतार रम्य महामुदित प्रमोद
मुदित मोदमान इति षष्टिपदार्थाः कथि
ताः॥सम्पूर्ण षष्टितंत्र कहनेसे यह कारि
कामकरणनहीं है किन्तुसम्पूर्णसारख्यशा
स्त्रहै यह सिर्भया
श्रीरामरामदासांचनमस्हत्यपुनःपुनःासा
अव्यव्याल्यार्णवापारात्मरंचपारंगतोस्म्यहम
प्रस्ताव ७८ यह पुस्तक सांख्यकारिका श्रीपंडित याचस- नि मिश्रका संस्कृतीका कियाहावा अनेक सरी टीकाभी बहुत कालसेरही परंतु विद्यार्थियों को सुग मतासे अभिप्राय ज्ञान होना पदौकाव्याकरणकेरी. लिसे लगाकर भाषासमझना महाकठिनरहा अने कविद्यार्थी मेरे पासपढते रहे जिनकी अभिलाषा- ईकिभापाटीका होकर छप जाय जिसमें विद्यार्थियों कोशोक लगजाय और पदार्थ के अभिप्रायकाय. थार्थ ज्ञान शीघ्रही होजाय निदानस्वात्मारामने उन कामंत्रणा उत्समजान अत्यदिवसों में संपूर्णकारि- काके मूलमति सूधाअन्वय तथा भाषाटीका भाषा ज्याकरणकरीतिविरुद्ध विशदउलथानकरके केवल संक्षेपमूलकै विभक्तियों के अनुकूल मधेदेशी बोल- चालमे पंक्ति लगजानेके अनुसार भाषाकरके उत्तग्रंथ कोबालबोधिनी दीकानाममुशोभितकरके अपने- विद्यार्थियाँका मनोरथ सिरकीया पौरसर्वसाधार- ण अपेक्षक व्यक्तियोंको अतिसुलभसे मिलने के हेतु छापना विचार अपने अयोध्या विदेहीनामक संचाल यमै संभूषणोकितकरके प्रकाशित कीया--- एक्ट२५सन् १८६७ के मौजिवनभरी हुई है इसरजगह मिलन हौंस की M తనకు