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Uska Sapna

Kamar Mewari · 2011/03

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उसका सपना कमर मेवाडी की कहानिया

मृत्य
तीस रुपये
प्रथम सस्करण 1990
प्रवाशक
सम्बोधन प्रकाशन, कारोली 313 324 (राज)
मुद्रव
मगल मुद्रण, चेटक सकिल, उदयपुर 313 001 (राज)
मावरण
पारस दासोत
USKA SAPNA (Short Stories)
by Qamar Mewari
Rs 3000

कवि एव कथाकार श्री मधुसूदन पाण्ड्या के लिए

क्रम
बदलते रिश्ते 19
मुक्ति /14
उनकी जीत /20
इतने सारे सुख /25
अलविदा जगल /31
उसका सपना 136
मातक 142
सूरज पिर निकलेगा 149
घुघ म फसे लोग/55
नयी सुबह 160
फमला /65
पुजारिन /69
एक जीनियम वा अत/75

नयी सुबह का कवि-कहानीकार कमर मेवाडी की कहानिया पढते हुए यह याद करने की जरूरत न भी हो तब भी किसी न किसी तरह यह प्रगट होता है कि वे मवि है। मैने उनकी ज्यादा कहानिया नहीं पढी हैं लेकिन यह जानने की मेरी इच्छा रही है कि वे अपनी कहानिया को कविता से किस तरह और कितनी दूर रख पाते हैं। दरअसल मैं कविता और कहानी के बीच अतर करता हूँ जो केवल विधा को या विस्तार को लेकर नही है जसे यह कि किसी कविता को कुछ फैला दें तो वह कहानी हो जायगी और कहानी को कुछ सिकुड जाने दें तो बहा कविता की सम्भावना नजर आन लगेगी। मेरी दृष्टि मे यह अतर दुनिया और मनुष्य को देखने म है। कवि जिस तरह दुनिया और मनुष्य को देखता है और उनके रिश्ते को तात्विक रूप से ग्रहण करता है कहानीकार उस तरह नही लेकिन आकाश में उड़ने वाली पतग को जरा सी इधर-उधर करते पूरे विस्तार में और हिलने डुलने के कौतुक म देवता है । बहरहाल वमर ने इन कहानियो मे जिदगी को पतग को उडने के लिए छोडी तो है लेकिन पूरी तरह नहीं इसलिए कहानिया अपने आकार में न केवल छोटी रह गयी है कि एक अनुभव के सघन होने के पहले ही सिमट जाती है । कमर की ये कहानिया कम पेचीदा और कोताहल रहित हैं। उनमे व्यवस्था में संघर्ष करते लाग जहा पहुचते है वहा भी छोटे और नीच नहीं होत पार यद्यपि वे किसी प्रकार की राजनीति से प्रेरित उपदेश नहीं देते फिर भी उनकी जिन्दगी, गलपन या किसी की हत्या कर देना हम मे दुनिया उनका हार जाना, उनका बदलने की इच्छा जगाता है . 'सूरज फिर निक्लेगा' की सु. खिया एक मामूली स्त्री है। भकाल के दिनो में वह अपने बीमार वेट शकर के साथ किसी तरह दिन काटती है। किन्तु जब शकर की जान बचती नजर नही गती तब वह हार कर सेठ के पास पैसे भागने जाती है। दिन में तो सेठ उसे दू स्कार देता है लेकिन साझ होते होते वह रपये लेकर उस के घर पहुच जाता है, यहा सुखिया के साथ उसका यह सवाद होता है- 'सठ यहा क्या पाए हो?' मुखिया ने बिना सहमे हुए पूछा। दिया। 'रुपया देन ।' सेठ ने जवाब "दिन के उजाले में क्या साप सूघ गया था जो अब रात के अधेरे मे माए हो 'रात के अधर म इमलिए । Irया है कि बदले मे तुम से कुछ वसूल कर सकू एवं गरीब औरत के पास से सब कुछ सरीदा जा सकता है यह 'महाजनी सभ्यता सा तक है। मुपिया सठ व हत्या कर के इस ता को उलट देती है। के साथ मेरी कोई तकरार नही है लेकिन एक बात इग यहानी वी मूल सपदना मन स्त्रियां इतनी यहादुर नहीं होती और राद में ता पर रि हिन्दुस्तान म ममूनीय होते हैं। दूसरी यह रि कस्बे की जिदगी फोट, कचहरी वे एक्ट ममहा मरता यी यही एन शलीन हानीरारा को नजर क्यो हमारी जिदगी 'रा गलियां माविपत हैं, उही म से हम अपने म स्त्री या यातना दो की हार मध्य मा गुनन से सपा कतराये, 7 हमार पाम-राग दुग और धुपम पम पम | गरिया मपपात की दो मोर पहानियो है- उमा सपना, नागपना है जमीन पौर युथ मे फ्मे का मौर प्रदूरी रो मुति। दोना पहानियों के पात्रों का ET मा गाना है य घुमा मा पागल हो जाने की मनस्थिति में भी अपने मारा पूरा नही हाना प गानी न पा है- + मरा यह सपना पूरा होगा तथा पा की ही काम मात्र प्रामा पानी।

लेकिन क्वू भार तुलछा व्यवस्था के वडी साजिश के शिवार होते हैं। दरअसल वकू और तुला जैसे भोले भाले लोग एक ए जीवादी देश म कानून की लाचारी और अरमण्यता नहीं समझते । मास्टरजी उह 'वधुवा मजदूरो' को मुक्ति के समाचार सुनाते हैं और वकू-तुलछा इस मुक्ति के एहसास म पागल से हो जाते है । जब जमीदार का कारिदा बुलाने आता है तो तुलछा रहता है 'मैं नहीं पाता। कह देना ठाकुर से । अव में ठाकुर का गुलाम नहीं। अब मै आजाद हूँ। सरवार न पिछला सारा वज माफ कर दिया है। मास्टरजी अपवार म स पढकर सुना रहे थे ।' थोडे दिनो बाद मास्टरजी का कत्ल कर दिया जाता है और इस हत्या की साजिश में तुलछा को तलाश करने पुलिस वाले घूमते हैं यद्यपि 'दक्षिण पट्टी के लोग अच्छी तरह से जानते थे कि मास्टर दयाराम का कातिल दान है, पर वै भयावात और मोन थे और भय के कारण पीपल के सूखे पत्ते की तरह वाप रहे थे।' कमर ने इस कहानी म हमारे जनतत्र और याय की वास्तविक्ता पर व्यग किया एक पगु और निरीह कानून के अन्तगत कोई मुक्त नहीं हाता । ठाकुर के लोग मास्टर का कत्ल कर देते हैं क्योकि वह जनता की चेतना का मेरुदण्ड ह । कमर की एक और कहानी का जिक्र करना मरे लिए प्रावश्यक ह । यह कहानी शहर की जिदगी से उबे हुए पति-पत्नी की ह जा त म एक दूसरे स मुक्त हो गाना चाहते हैं। वे हो भी जाते है। सुबह जव पत्नी उठी, उसने चाय बनाकर मेज पर सजाई पार पति की तरफ देखा तो वह देखती रह गयी। पति का निर्जीव शरीर पलग पर पड़ा था आर पत्नी का चिढानी हुइ पास ही जुरकी पड़ी थी नीद की गोलिया की सानी शीशी।' शहर के अनात्मीय हाते हुए रिश्ता को कई कहानिया हि दी में लिपी गई किंतु यह अनुभव हमारे लिए पुस्तका से आया था। दरअसल भारत में महानगरो का फ्लाव नहीं हुआ और न उस प्रथम प्रौद्योगिव विकाम ही हझा हूँ जिमरे रतिम नतीजा म सिप मान या खुदवशी नजर आती है।

ग मी म 'पारम हरया' मा हादसा 'यारियत' ये कारण हाता है लेक्नि 'यारियस' मया? मगर में माम पुष भी रहा हागा। मेरा एक अनुमान ऊपर दम है सेति में एक दूसरा और गम्भीर प्रमान भी सगा सकता है। मैं मामान सगाता हरि उनकी 'योरिमत' या मारण शायद जवान दराजी है क्यानि यह पढ़ लिस पर समाने साने सग गई है। यमर उन राणाकारा म है जो हमारी गर बरावरी वाली व्यवस्था के सतरा प्रार मयिरोघा को जानते हैं इन कहानिया मे ये कडवे प्रराग मौजूद हैं लेकिन उनकी पद-चाप धीमी है और मैं यह नहीं मानू गा कि कमर मेवाडी के दुनिया बदलने का सपना कामयाक्रिया मोर हताशा म विलीन हो रहा है । उनकी कहानिया मे बार बार 'नयी सुबह' का जिक्र प्राता है, वे दरअसल हैं भी 'नयी सुवह वे ही कवि वहानीकार । 30, महिंसापुरी उदयपुर नद चतुर्वेदी बदलते रिश्ते बम स्टॉप पर उतरत ही पूटा था ग्रीन वाटेज के लिए। पूरा पता मालूम कर नन के बाद यह वहा से चल पडा और अब ग्रीन पाटेज को सामने पाकर थाडा हिचकिचा उठा। न जाने प्रदर कौन-कौन लोग हो और वे क्या समझ वठे। पर अपने म थोडा साहस वदार वह अदर दाखिल हो गया है । फाटक वा पार कर सीढिया चढता हुआ सीधा एक कमरे मे पहुच गया । लोहे के पलग पर एक मोटा गद्दा साफ सुथरी धुली चादर, खूबसूरत तक्यिा, मफेद कपडा से ढका जिस्म, दूध धुले सफेद बाल और झुरियो मे से भाक्ता एक प्यारा सा क्लीन शेव्ड चेहरा । वह दस साल बाद पिताजी को देख रहा था । उसे देखते ही उनके चेहरे पर खुशी के गुलाव खिल उठे। वे उठन की कोशिश करने लगे पर उठने मे प्रसमथ । वह उनके नजदीक पहुचा । फिर से उह बिस्तर पर लिटा दिया और श्रद्धा से उनपे चरण स्पश किए। उसवे ऐसा करने पर वे आसुओ की बाढ़ को रोक नहीं पाए। उनका सम्पूण चेहरा पासुमा से भीग गया। उसने अपना चेहरा दूसरी पार फेर लिया। बेंत की एक कुर्सी खीचकर वठ गया और वात का रुख बदलने के लिए पूछ वठा- 'अब आपका स्वास्थ्य क्मा है?' 9 'अन्याहू व तपाा ने बोते। वह जानता है व अच्चे नही है। अगर वे अच्छ हात ता उम यहा मान की जरूरत ही क्या थी? वह विचारा तान बान जाइन लगा। वमरममन्नाटा छा गया। लगा जम उमक पान के वक्त कमर म ना एक विशेष प्रार की सुशवू पनी हुद पी उमकी जगह उदामी ग्रार मनहमियत न ल ली है। पिताजी शायद यह मव भाप गा पार कमर का घुटन स ज्वारन के लिए घटी म ममय देयन नग। फिर कुछ भाच कर वान- 'गामेश दवा ममय हो गया। गमाचार प्रा रह होग । उमन टी वी चालू कर दिया । . टी वी ना हमशा मुक की मुशहाली ग्रार तरक्की + गीत गाता ह प्राज प्राग उगल रहा था। अहमदाबाद म दगा हा गया है। वहा किमी एक वग में लागा व जुलूम पर मर वग के लागो न पत्थर के पार दगा भडक उठा। दग की प्राग म क्या हिद् और क्या मुसलमान सभी भेट चट रह है। 7 उसन साचा एसा क्या हो रहा है। एमा क्यो हाता है एक ही मुल्क म रहन वाले लाग, जा अापम म भाई भाई ह अलग अलग मजहर का मानत हुए भी जिनकी रगो म एक ही तरह का पन वहता ह, एक दूसरे के दुश्मन बनकर मपन ही खून व प्याम हो गए है। साचत साचत उमकी निगाह पिताजी की पार उठ गई । उसे लगा पिताजी की पाषा मे फिर कोई सलाब उमडन वाला है। उस भूनी बिसरी वह बात याद मा गई जब दिल्ली म ण्मा ही एक भयानक दगा हुअा था और उमको मा उम दगी मेंट चढ़ गई। मा याद प्रात हा उसकी प्राखोस भी प्रासुप्रा की उसन टी वी वो एक भटके व साथ रद कर पिया। दूर टपक परी। मकी निगाह दीवार पर टगी एप तम्वीर पर अटक गई, जिसम पिताजी पार मा अपन त्रिी वान मरान क नातान म मिया पर वठे चाय पी रह है 10 पार सामने मेज पर एक व मूरत टी मेट रता है। इम मवान के साथ उसको भी कई यादें जुड़ी हैं । उसन अपनी जिन्दगी की बीम बहतरीन यहारे यहा गुजारी थी। पर अव य मव अतीन की बात है, जिह याद करने से सुप नहीं मिलता मिफ कनजे पर चाट लगती है। उन दिना जन उमे मा के स्वगवाम का नार मिला था तब वह बहुत रोया था । उस इस बात या भी बड़ा मदमा रहा कि वह घर स इतना दूर हान ये कारण मा वे अतिम दशन तक नहीं कर सका। उस वक्त उमे उन तमाम म्यार्थी नताग्ग पर बडा गुस्मा आया था जो देश की प्रशिक्षित पार भाती भाली जनता को भडका कर दग करवात है। वह मोचता था उसका वश चले ता वह एस नागा यो जो मुल्क को नस्तनाबूद करन पर तुने हुए हैं एक लाइन म पडा बरवे गाती मार दे । पर वह जानता था वह एमा नही माना। मुबह जब वह उठा ता धूप के चक्त कमर म बिछे हुए थे और ठडी ठडी हवा खिडकी क रास्ते अदर पा रही थी। उसे पिताजी के कमर म किसी स्त्री के वातचीत करने की आवाज कान म पड़ी। वह नाइट मूट पहने हुए ही पिताजी के कमरे म जा पहुंचा। देवा पिताजी तक्यि का महारा लिए वठे हुए हैं भार सामन गहुए रग की अच्छ नार नक्श वानी एक प्रवड महिला कुर्सी पर बैठी उनसे बात करने म तल्लीन है। वह क्षण भर म ही मारी स्थिति ममभ गया । उम देस पिताजी वाल उठे, 'प्रानो मोमेश इनसे मिलो, य रेहाना वगम ह । तुम्हारी मा के स्वगवाम के बाद से ये ही मेरी देय भाल कर रही हैं। यह मकान भी इही या है।' पिताजी ने ज्याही वात गरम की, उसने झुर कर चरण स्पश दिए तो वह पाशीवादी मुद्रा मे बाली, 'जीते रहा वेटा।' फिर कुछ क्षरण मौन छाया रहा । दवा का वक्त हा चुरा था। उमन पिताजी को दवा पिलायो और बाहर निक्लने को मुडा ही था कि वह वाल उठी- 'मोमेश कहा चन दिये ?' 'जी मैं जरा नहा लू, फिर तयारी भी करनी है।' 'कहा की तयारी" 'प्राज शाम के प्लेन से जाना चाहूगा ।" 'इतनी जल्दी? दस साल बाद अपन पिताजी मे मिने हा, क्या इनके साथ कुछ दिन गुजराने को जी नहीं चाहता ?" 11 'जी तो बहुत चाहता है, पर मजदूरी है।' 'ऐसी पपा मजबूरी है" 'मुझे पल ही जादन परना है।' चुट्टियां यहवायी जा रारती है ?' 'यह नामुमकिन है।' 'फिर मुमकिन क्या है 'मरा जाना।' वह मुस्वराया । 'अगर माज तुम्हारी मा होती तो क्या तुम दम तरह चले जात" यह चुप हो गया। उसके पास इस सवाल या था जवाब नहीं था। पिताजी घुप, लगातार शूय में पूर चले जा रह थे। उनके चहरे पर उनामी और वेचारगी के चिह भलक पाए । व इस मारी बातचीत स अपन का अव तक प्रसम्मृत्त रमे हुए थे। वह वहा से चुपचाप यिमक लिया । याथरूम से निकल कर कपडे पहने और एक एक कर मारा मामान मूटम म जमाने लगा। फिर साने की मज पर जा पहुंचा। पिताजी, जो पहले स ही गम्भीर बने वठे थे, उहांने चेहरे पर झूठी मुस्कान वियर ली। खाने के समय कोई कुछ नहीं बोला। पिताजी और रेहाना वेगम अपने अपने गमगीन चेहर लिए क्सिी सोच के समदर मे डुबकिया लगा रह थे । उस लगा जम व दाना सिफ उनका साथ भर दे रहे है, कुछ खा पी नही रह । इस एहसास के जगत ही उसका भी जी सान से उचट गया और वह वहा मे उठ खडा हुआ । वाशवेसिन पर हाथ मुह साफ कर लने के बाद अपने कमरे में जाकर पलग पर बिछ गया । कई प्रकार के विचार मस्तिष्क म उथल पुथल मचात रह पर दिशा नहीं मिली। सिप काल पीले दायर दिखाई देत रह। महसूस होता था वह इन दायरा के बीच फंस गया है और इनस बाहर निक्लन का काई रास्ता नहीं है । अनायास टेवसी के हान को आवाज सुनकर उसके विचार ततु टूट गए। सूटकेम क हैडिल का उसकी हथेली न मजबूती से जक्ड लिया । थाडी ही देर म वह पिताजी के सामन खडा उनस प्रतिम विटा ल रहा था । देख रहा था पिताजी उसस पाखें मिलान स भी कतरा रह है। उनके चेहर पर विवशता तथा इक्लोत वटे के सो जान के भाव स्पष्ट रुप म अक्ति हैं । वे कुछ नहीं बोल सिप उनका दाया हाथ उपर उठा और वर मी का अलविदा समझ 12 कर बाहर की गार मुड गया। तभी रेहाना बगम उसके सामने जमीन पर गिर पड़ी। वह हतप्रभ सा उनकी पार एक टक देयता रह गया। उनकी आखा में पासुमा ना सलाव उमड पाया। वे कुछ बोलना चाह रही थी पर उनका गला गया। फिर वे अटक अटक कर सिमकियो के बीच जो कुछ वोली, उसमे से वह कवल इतना ही सुन पाया- 'सामेश बेटा मुझ से कोई गुनाह हो गया हो तो उसे माफ कर देना। उस स्वप्न म भी इस बात की उम्मीद नहीं थी कि जाने के वक्त उसे इतना न्यनीय हाना पडेगा। उनकी अपनी आखो म भी प्रासू तर पाए, पर किसी न किमी तरह वह उह रोके रहा । उसने रेहाना बेगम को जमीन से उठाया और अपनी उगली से उनके पाम् पोछ डाले । फिर बारी बारी से श्रद्धा के साथ दोना के कदमा मे भुर गया और कमरे से बाहर निकल आया । टैक्सी से उतर कर जव प्लेन पर सवार हुअा ता वह हका हो चुका था। उमे इस बात की खुशी थी कि उसके माता पिता दोना जिदा है और वह उनस मिल कर अपन नियुक्ति स्थान पर जा रहा है । प्लेन मे वठे बठे ही उसने प्लान बनाया कि प्रब की बार जब दीवानी की छुट्टिया होगी तब वह अपने माता पिता के पास अधिक दिन रूकेगा। उसने सूटकेस खोला, उममे से नए साल की डायरी निकाली और गिनन लगा कि दीवाती की छुट्टियो मे अब क्तिने दिन शेष है। 13

मुक्ति
मै आपको उनका नाम नहीं पताऊगा यस प्राजक्ल नाम म रानी क्या है।
वे दोनो पई साला से दोस्त थे पर उनके बीच पिछले एक साल में पति पनी का
सम्बध था।
एक साल मे ही वे एक दूसरे मे इतन बोर हा गय ये दि दवत ही वाटन |
दोडते थे।
पति को प्राय बीम मिनिट ही चुव थे । पर पत्नी अपन कमर म इटी हुई थी।
उहान बृट के तम्मे ग्योले फिर माजे उतारे और कपडे बटनर पलग पर पमर
उह चाय पी तलब जोरा मे सता रही थी।
पर उनके हाल चाल पूरने
वाला कमरे म कोई नहीं था ।
गये ।
जब
वे पलग पर पड़े-पडे क्सममाते रह पार अपनी किस्मत का मातम मनान रह ।
वे मोच रहे थे वि विस तरह उहांने इतना बडा जजाल पान निया।
अले थे तो कितने मस्त थे। हर वक्त उन चेहर पर मुस्कराहट अउम्पनिया
दिया करती थी। और अब गलत यह हा गइ है कि शीश म चेरा दपते है
ता परिचय का एहमाम घण्टा तक साता रहता है।
14

ग्रापिर नहाने कौन सा कह टा दिया था। मिफ इतना ही ता कहा था कि पढी लिखी हो पार गुद कमाती हा । इसका मतलब यह नहीं कि मामने वाले को कुछ भी नहीं समझा। यम यही बात काट की तरह उमरे मन म अटक कर रह गयी । सप्ताह भर से रानी जी का मिजाज मातवे प्राममान पर। और उसके हर त्रियाकलाप से उपक्षा की 1 उडी उदी फिर रही । अब अगर वह पदी नियोह और माती है तो मैं क्या क्र । मै तो उसकी कमाई म हिम्मा नहीं बगता। मन चाह जस उलजलूल खर्चे करती है। नित नयो साडिया गरी कर जाती है। इतनी माडिया है उसके पास कि चाहे तो माडिया की प्रागनी आयाजित कर सकती है। घर में रहेगी तब तक एक माट झाटे की साडी पहने रहगी पर जब बाहर निक्लेगी ता ऐसा लगगा माना फशन कम्पीटीशन म हिम्मा लव जा रही है । पनग पर पटे पडे उनौ मस्तिप्य म ऐम देरा विचार चकरघिन्नी साते रहे और वे इन वडो मीठे विचारो वे अथाह मागर म डुबक्यिा लगात रहे । वे पलग मे इस सतवता से उठे कि विल्कुल आवाज न हा फिर दव पाव गलरी पार कर पनी व कमर व बाहर जा खडे हुए । दे उहोंने देगा पत्नी पर न म व्यस्त है। पीच जा पडे हुए। चुपनाप बिना ग्राहट क्यि पत्नी के पानी को पता भी नहीं चला कि कार्य उमर कमरे मे पाया ह। उह तग प्रा गया। भाट र शिताव को फश पर पर दिया। पत्नी न अचवना पर उनकी नरफ दबा । उनको प्रावे ब्रोध से फनफना रही थी। -यह क्या हा रहा है 7 हान पूछा। ---प्रापको नीय नहीं रहा। उमन जमार दिया। में परम भागा हुआ है। -~-मुझे नहीं मामा -~-मानूम होगा रम! तुम्ह विताग मे पुमन मिा नय न । -- IS 7 ----या मतलब है प्रापया, पढू नहीं ? -~-मैन कब मना क्यिा? -~-तब फिर क्या बात है। -मैन अभी तक चाय नही पी। -ता मैं क्या करू मापने ही तो कहा था। चाय नहीं बनगी। -हा, मैंने कहा था। पर क्या तुम नहीं जानती हा कि मैं चाय के बगर रह नहीं सकता। ---क्या शहर पी मारो होट बद है ? ---तमीज से बात करो। उह फिर प्रोध आ गया । क्या, क्या मैं तुम्हारी कोई जर खरीद लौंडी हूँ - कमाल कर रही हो यार अर बाबा तुम समझती क्या नहीं कि मुझे तुम्हारे हाथ से बनी चाय के बिना मजा आता ही नहीं। --और किस बात के बिना मजा नही पाता ? ---रहने भी दो। वात वा बतगड मन बनायो। चाय बनाकर पिलानी ह तो पिला दो। ---अच्छा बाया पिलाती हूँ अब चुप भी करा। 7 . ज्योहो वह चाय बनाने के लिए उठी वि पति ने उसे बाहा म भर कर प्राममान की ओर उठा लिया । फिर गाल और हाठा का चुम्बन लेकर उमे सीन मे चिपकाया और जोर से भीच लिया। पत्नी के चेहरे पर अव मुस्कराहट पूट रही थी। उसने पाच मिनिट मे नाय बनाकर टेवल पर सता दी। पति ने किताव उठावर चाय पर ढकनी और पत्नी को आया मे कुछ टूढन लगा। पत्नी को फिर गुम्सा आ गया। -~-क्या बात है चाय नहीं पीनी? --यह बात नहीं। -फिर क्या बात है? चाय ठण्डी हो रही है । -मुझे नहीं पीनी तुम्हारी चाय वाय । -यह भी कोई बात है यार । तुम्हारी कोई बात मेरी समझ म नही पानी । प्रनी कह रहे थे चाय पीनी है। अब कह रहे हो नहीं पीनी है। --हास में यह रहा है। नहीं पीनी है। -मरी पीनी यी तो फिर बनवाई क्यो?

7 -लो फेंक देता है। -ए बाबू । फेंकना मत | बडी अच्छी चाय बनी है। ले पीके तो देख। पत्नी चाय का मग पति के होठो तक ले जाती है। पति मुस्करा पडता है और चाय पीने लगता है। एक दो धू ट चाय पीने के बाद पति के चेहरे पर उदासी की गहरी परत बिछ जाती है। और वह चाय का मग टेबल पर रख देता है। पत्नी उसके चेहरे की ओर देखती है ता पति को आखो से आंसुओ की बडी बडी बूदें टपकने लगती है। पति का पूरा चेहरा आसुप्रो से नहाया हुआ लगता है। पत्नी पूछती है- --अब क्या बात है -कुछ नहीं यार। कुछ है तो सही। कुछ भी तो नहीं। ---क्या बात १ बतायो न । --सुनो, मुझे यह रात दिन की खट-पट अच्छी नहीं लगती। --कौन-सी खट पट? ---यही तुम्हारा नाच नचाना । प्रासिर में भी आदमी हू यार। यह रोज रोग का नाटक मुझ में नहीं खेला जाता। तो मैं क्या करू? ----सुनो ! हम दोनो पढे लिखे और इटलेक्चुअल हैं। हम आज कुछ न कुछ निणय कर लेना चाहिये। ---चाय ठण्डी हो रही है। चाय पी लीजिए फिर निणय भी कर लेंगे। -नही, पहले निणय होगा। -~-धमाल करते हो यार । क्या मैं मरी जा रही हूँ। -तुम, क्यो मरो। तुम्हारी जगह ईश्वर मुझे मौत दे । ---कुछ का कुछ बर देते हो। तुम्ह शम नहीं पाती। --शम तो तुम्हें पानी चाहिये । --प्रब चुप भी करो। हर वक्त लेक्चर भाडते रहते हो। --मेरी भी वितनी अच्छी स्मित है जो तुम से पाला पड़ा। देख लेना । एर दिन पछतामोगे। हा, मच रह रही है। ---ज्यादा घमण्डी मत बना। मैं जानता हूँ कि तुम पढी लिगी और माऊ पत्नी हो। लोग ममभते होंगे कि देपो ये क्तिने मस्त है । दोनो कमाते हैं 17 है और दोनो साते हैं। अगर कोई नजदीक आकर देखें तो पूरे गगैर पर फफोले दिखाई देंगे। मेरी तो जिदगी ही नरव वनकर रह गयी है। भगवान इस नरव की जिन्दगी से मुक्ति प्रदान कर । --क्यो बिला वजह भगवान को कोम रह हा । जिस जीना नही आता वह तुम्हारी तरह भगवान से मरन की दुपाएं ही मागता है । -~-अव यस भी करो। मुझे मान दी। नीद पा रही है । दोनो पति-पत्नी अपन अपने पलग पर लट कर नीद आने का अभिनय परत है। पर है नीद नहीं पाती। पत्नी वरवट बदलकर पति की तरफ मुह कर लेती है और बोलती है- ~~या सो गय? हुन, नीद नहीं पा रही। ---सुना, एक बात बहू। कहा, क्या बात है। पानी थोडा और पति के निकट खिसक आयी। सीन स चिपक गयी। बोली- --एक बात कहूँ। अगर तुम्ह मजूर हो। -~-कहो, मुझे सब मजूर है। -देखो हम काफी दिनो स एकरम जिन्दगी जी रह हैं । अब अच्छा नहीं लगता। --तुम ठीक रहती हो। वास्तव म अव अच्छा नहीं लगता। तुम क्या सोचते हो? "तुम क्या सोचती १ है। १ ~~पया हम फिर से अलग नहीं हा सक्न। मैं जहा चाहू जाऊ ग्राऊ । जम चाहू रहू। तुम भी फिर से अपन दग पर जिगी जीना शुरु करा । दुध लिगो-पढो और अपना नाम राशन करा -मागिर तुम कहना क्या चाहती हा -तुम मुझे मुक्त कर दा। मुझे छोड दी। पर यह मर अच्छा नही लगता। अपन माप स पृष्णा-मी हान सगती है। ठी है, मुवह निणय करेंगे। भव सा जापा। पनि ने भौर करवट बरासी। पत्नीन लाइट-प्रॉकरी और वह ना मो गयी। 18

सुबह जब पत्नी उठी, उमने चाय बनाकर मेज पर सजाई और पति की तरफ
देखा ता वह देखती ही रह गयी ।
पति का निर्जीव शरीर पलग पर पडा था और पत्नी को चिढाती हुई पास ही
लुरवी पडी थी नीद की गोलियो की खाली शीशी।

उनकी जीत
सुबह जय कासिम बिस्तर से उठा तो उम लगा कि उसका पूरा बदन दद
कर रहा है।
उसन मुह हाथ पाकर शीशे म अपना चेहरा देखा ता पा चय
चक्ति रह गया। पीला-पीला मा मरियल और बीमार चेहरा देख कर वह
सोच में पड़ गया कि एसा तो वह कभी नहीं था।
माज काम पर निकलने म पहन उसन चाय भी नहीं पी। एमा आज तर कमी
नहीं हुआ।
बिना गाय पिय वह घर म निक्लता ही नहीं था। सकीना तडवे
जादी उठ जाती थी। फ्जर की नमाज अदा करन व बाद वह उसके लिए
चाय बनाती।
फिर रात की बची राटी और चाय वा गिलाम उसके सामन
रख देती।
वह कभी चाय वे घट ये माथ राटी चुनरता। अभी ठण्डी राटी
को मसल कर गम चाय म मिना रना प्रार बरेठाट व माय चम्मच से साता।
इत मबम उसे बडा मजा पाता।
इस तरह पामिम की जिदगी गुजर रही थी। पिन कुछ दिना स वह बहुत
परेशान भोर सम्ता हाल था। सीना बदलिना म बीमार चल रही थी।
उमा हतीम साहब न ज स नकर गड-ताबीज नय करवा लिय पर
बीमागे दफा हान र बजाय वदतीची जा रही थी। पिछली रात को
20

वह हाजी पीर की दरगाह पर भी मकीना को जियारत के लिए ले गया था। सकिन कोई फायदा नहीं हुया । पाठ-दम दिन से तो सकीना की हालत बहुत ज्यादा सगय हा गई थी । वह निस्तर से उठ भी नहीं पा रही थी। कभी कभी ता वह द स छटपटाने लग जाती। कासिम से उमकी यह हालत दरवी नहीं जा रही थी । उसके दोस्त किशन ने उसे अग्रेजी दवापान के डॉक्टर का दिवान की राय दी थी पर कासिम की मस्ता माली हालत उस अग्रेजी दवापान मे कदम रखने की इजाजत नहीं देती थी। वह अपनी किम्मत पर बेचारगी के चार मासू टपका कर हत्या हा जाता । कासिम की दिली ख्वाहिश थी कि वह सकीना का अंग्रेजी दवाखान के डाक्टर को दिखाय । उसका बस चतता तो वह सकीना के इलाज मे अपना सब कुछ न्यौछावर कर देता। लेकिन अब कासिम के पाम उमको अकेली जान के अलावा कुछ भी ता शेष नहीं है। थाडा बहुत जो कुछ भी उस पाम था वह मकीना की बीमारी की भेंट चढ चुका था । आज घर म भू जी भाग के लिए भी कुछ नहीं था। इचर उसका मालिक इलाही वस्श तीन महीने से पूरी मजदूरी नहीं दे रहा था । पगार के वक्त थोडा बहुत दे दिला कर उसे चलता करता। बीच में जब भी वह उसमे माग बठता तो वडी चालाकी से बहाना बना कर टरका देता। बेचारा कासिम मन मसोस कर रह जाता। सकीना की बीमारी ने कासिम का तोड दिया था। वह अदर ही अर घुटता रहता। इनहरे बदन का खूबसूरत कासिम बीमार और मरियल दिखाई देने लगा था। वह चिडचिडा और गुस्मल भी हा गया था। इलाही वरश जसा प्रावदार आदमी भी इन दिना उससे घबराने लगा था। कोई ऐसी बात होती तो भी वह उस टात जाता और हर मुमकिन कोशिश करता कि कासिम से उसका सामना न हो । लकिन कासिम न आज अपन मन म तय कर लिया था कि वह अपनी मजदूरी के वाबत मालिक स जरर बात करेगा। कासिम के पात ही इनाही बरश के दिन फिर गय थे। इलाही वरण की ग्वदान सफेर मावल की खदान न रह कर चादी की खदान म तब्दील हा गई थी। 21 नाही बाग अपा यापप जमार की एक पुगनी साईरित पर बैठ पर गान पर पाना था। पिन भव यह मानि यार म उहता फिरता है। यह मर यागिम ने हाया वा यमाल था। यासिम या ता महर बदन या गा, पर गजब का दिमाग था उमर पारा । इलाही वा पहनी नजर में ही भाप गया था कि प्रादमी काम का है और उमन उग रग लिया था । इलाही वस्श वा सुपद प्राश्नय हुमा था कि कामिम का हाय गत ही मदान ग बडे डेनॉर निवाग । पार हताही यश की सदान 'ए' क्वालिटी व मावन के लिए पूर इसाये म मशहूर हा गई थी। जहा पहले एक ट्रय मात्र चार पाच हजार पिय म विक्ता था उतना ही माल प्रब पचाम मार हजार रुपयो म विक्ने लगा। तभी ता इलाही वस्श के हाथ स मह पुरानी माईक्लि हद गई और उमवी जगह मारति बार न ल ली। उहान अपने पुगन दरवनुमा घर को गिरा वर एक पालीशान इमारत म यदा दिया। जिमम मभी आधुनिक उपकरण मौजूद थे। चक्मर चक्कर बीडी पिया करत थ । अव उनके हाठा वेत्रीच वीमती गिगार दबा रहता। गते चीक्ट पटानी जगह अब खादी ने चयन वस्त्र उनव शरीर की शाभा बढा रहे होत । मादी क सपंद पडाम व किसी नता से थम नहीं तगत थे। धन बी वृद्धि के माथ-साथ उनकी यश वृद्धि भी आसमान छने लगी थी। कई बडे बडे नेता उनके यहा महमान बनने लगे थे। गुजरे साल वे मक्का की याया भी कर प्राय । अव इलाही वरश हाजी इलाही बरश बन गये थे। इनाही बरश गगू तेली मे राजा भोज बन गय थे। उनकी जिदगी म जबरन बदलाव आ गया था। न बदला था तो यामिम और उसकी जिदगी। वही दुवला इवहर बदन का कासिम, किराये का घर, बीमार सकीना, प्रभावो और परेशानियों से जूभत दो सीना बिस्तर पर थी और कासिम उमकी तीमारदारी में दिन रात लगा रहता था, वह दौड दौड कर उसके लिए ताबीज गडे बनवाता, हवीम वद्य को दिखाता। लेक्नि सकीना की बीमारी ठीक होने का नाम ही नहीं से रही थी। पासिम तित तिल कर मदर ही अदर जल रहा था। लेक्नि अब कासिम अदर ही प्रदर नही जलेगा । आज उमन पक्का इरादा कर लिया है। वह मालिक से जरूर बात करेगा। मालिक से नही रहेगा तो फिर क्सिको क्गा अपन दिल की बात । एक अकेना 22 कासिम ही नहीं। मालिक का सभी मजदूरावे माथ एक ही व्यवहार है। वह कभी किमी को पूरी पगार नहीं देता। जब सब हाड ता महनत करत है, तब पूरी पगार क्यो, नही? 11,402 आज पगार का दिन है। वाइल उसन सभी मजदूर साथिया को इक्ट्ठा करके यह वात बता दी है कि वह आज माति म पूरी पगार दने पार पिछला वकाया चुकाने की बात करेगा। सभी ने उमका मार दन का वादा किया है । . वह मन ही मन साच रहा है। जब वह इस खदान पर पाया था, तब मालिक 4 पास क्या था एक पुरानी टूटी साईक्लि । प्रार प्राज वाज मालिक के पास सव कुर ह पार यह सब कुछ हम मजदूरा की बदालत है। लक्नि मालिक का मन हमारी गरीवी पर नहीं पसीजता। यहा तक कि वह हमारी मजदूरी भी पूरी नहीं चुकाता। शायद उस हमारे गरीब बने रहन में ही मजा आता है। पारी खत्म हो चुकी है। सभी मजदूर मालिक की बठक की तरफ वढत है। वासिम भी उनके साथ हो जाता है, मुनीम सभी स हाजरी पर दस्तखत और अगूठा लगवा रहा है। मालिक भी सामन बठा ह । आज मालिक अच्छे मूट भवस पहल कासिम का नाम पुकारा जाता है । 'मातिक । पिना बकाया भी चुका दें प्राज?' कामिम कहता है । 'नही मालिक, पिछला पहले ' वासिम फिर कहता ह मालिक को चुप देयकर । मभी मजदूर कामिम की बात का समर्थन करते मालिक का बैग से नोट निकालता हाथ वही का वही रुक गया, उसकी आखे फटी की फटी रह गई । कुछ देर पहले वाना मालिक का अच्छा मूड हवा हो गया है। वह पाश्चय से मजदूरा के चेहरों का पढने की कोशिश कर रहा है, मजदूरा के चेहरे तने है, मुटिठया भिची और उनकी प्राखा में लाल-लाल डोर उतरते-चढत दिखाई दे 1 हाजी इलाही वरश के अदर विचार का ताना बाना बन बिगह-रहा है । उसके हाठा पर एक कुटिल मुस्कान अठखेनिया करन लगती ही शायद उमने कोई हल दू ढ लिया है, पर अचानक उनके हाठो की वह पुटिल मुस्कान न जाने कहा तिराहित हो जाती है।

मजदरा के संगठित इरादे को इलाही वस्श का अनुभवी और घाघ दिमाग बहुत जल्ट भाप जाता है। दुमरी ग्वदाना पर पिछले दिना हुई हडतालें और इक्लाब जिदाबाद के नारे उमके कानो से टकरान लगते हैं। वह मन ही मन निणय करता है। मजदूरो के अन्दर की इस आग को ज्यादा हवा देना अच्चा नहीं पार वह सबसे मुखातिब होता है- 'दास्तो । कासिम ठीक रहता है । दमकी बात मुझे अच्छी लगी। हम सब बाल बच्चेदार है। पमे की जरूरत सभी को रहती है। कुछ महाना से मान का पसा अटका हुआ था। अब पमेट या गया है । क्ल आप सबका पिटना बकाया चुका दिया जाएगा और एक खुशखबरी और 'अगले माह की पगार से सभी के पचास रुपये की बढोत्तरी कर दी जाएगी । इनाही बख्श की बात सुनकर सभी मजद खुशी मे झमने लगते हैं। तालिया की गडगडाहट के बीच कामिम भाई- जिदाबाद के नारे से प्री मान गूज उठती हैं । सभी मजदूर खुशी खुणी घर लौट रहे है । मजदूरी की जीत से कामिम का चेहरा भी दमक रहा है। वह जब घर पहुचा नो सकीना दद म छटपटा रही थी। उसकी हालत देख कर कासिम की आखें भर आई। सकीना को ढाटस वधाता बोला- 'मकीना। फिर मत कर अब तू बहुत जल्दी अच्छी हो जाएगी। शाम वा धु घलका घरती पर अपनी चादर फलाने लगा था और दूर पश्चिम म मावाश पर दूज का चाद दिखाई दे रहा था। 24 इतने सारे सुख मानद जर तुम सीढिया चढते थे। तब मेरे दिल की घडरन तेज हो जाती थी। लगता था तुम सीढिर्या नहीं चढ रहे, मेरे दिल मे दस्तक दे रहे हो । और देयत ही देयत तुम सामने प्रा सडे होते। मैं तुम्ह देप कर गुलाब के फूल की तरह मिल जाती। तुम मुझे अपनी बतिष्ठ बाहो के घेरे मे कस लेते । और मैं छुई मुई सो तुम्हारे सीने से चिपक जाती और न जाने कब तक तुम्हारे शारीर की मादक गध को अपने नथुनो से पीती रहती। फिर तुम कोने मे रखी कुर्सी पर बट जाते और मुझे पीच कर अपने पहलू में बिठा लेते। बठे बैठे घण्टो गुजर जाते पर तुम मुझे अपने से अलग नहीं करते। मैं सोचा क्रती काश ! प्यार के इन लमहा को एक पूरी उम्र मिल जाती। पर सोचने वाले की प्रारजुए क्व पूरी होती है। एक भयकर तूफान आया और हमारे प्यार का मामला निनवे तिनके होकर उस तूफान की भट चढ गया । आज जब इस सून कमर मे बठकर गुजरी यादो के झरोखे म भावती हूँ तो सिवाय एक बियावान जगल के कुछ मोर दिसाई नहीं देता। तुम क्या जाना जुदाइ का गम कितना ददना होता है। मैंन अपनी कई राते और दिन क्तिनी वदवामी में गुजारी है, यह मेरा दिल जानता है। 25 चारा और राशनी जब तुम पाते थे, तब मेरा पूरा घर सुभी से झूम उठता था। की किरण पल जाती थी और मैं एक अविस्मरणीय स्वगिर यान द म डुवती इतराती रहती थी। तुम्हार प्रान से पहले मरी नजरें घडी के काटे पर टिकी रहती। शरीर माग की भट्टी की तरह तपता रहता और जब तुम मुझे अपन सीने से लगा लत तब लगता मैं किसी ठण्ड पानी के झरा की गोद म यठी हूँ। जर तुम चले जाते तव पूर माहाल म फिर वही मूनापन समा जाता जा तुम्हार प्रान पहल कमरे म तर रहा होता था। तुम्हार मीढिया उतरन के साथ ही में दूसरे दिन तुम्हार लाटने का इन्तजार शुरू कर देती थी। वह कितने खबसूरत और प्यार भरे दिन थे जव जिदगी में खुशियां ही खुशियां थी। हम खुशिया में नहीं सुशियाँ हमारे पीछे भागती थी। तुम्ह याद होगा जब हम संक्डो हजारा मील दूर उस पहाडी के शिखर पर बन मन्दिर म गये थे। और अनायास ही तुम्हार हाथ प्राथना के लिए उठ गये थे। पता नही तुमने उससे क्या मागा था । पर जब तुम वहीं से मुडे तब तुम्हारी ऑखा की कोर भीगी हुई थी तब मैंने महसूसा था कि तुम्हारे जसे नास्तिक + शरीर मे भी एक कमजोर दिल है । मुझे तुमसे क्सिी प्रमाण की जरूरत नहीं थी। क्योकि मुझे अपने पाप पर पूरा विश्वास था और मैं तुम्ह अपनी मम्पूण प्रामा स प्यार करती थी। फिर तुम मुझे मुकम्मल तौर पर हामिल थे। इमलिए प्यार के जारी रहने म मुझे कही कोई एशय नहीं था। क्याकि तुम मुझे हर वक्त अपनी निगाहो के दामर मे कद रखना पाहत थ । मेरा जरा भी दूर रहना तुम्हें बचैन कर देता था और तुम्हारी हरकतें पागलपन की हद तर को लाघ जाती थी। तुम काफी सरल तथा सहृदय थे। पर तुम गुस्सल भी थे। गुस्स में तुम पर एमा जुनून सवार होना था कि तुम अपना आपा सो बटने थे। पर इसरो मुझे दुप नहीं सुग मिलता था। मैं एस मुरम लिए बग्मा स तरम गयी थी। 26 जब तुम्हारा गुस्सा ठण्डा पडता तय लगता चिलचिलाती गर्मी से झुलसते बदन को ठण्डी हवा के झोवे ने सरसा दिया है। मन हलका-हलका हो जाता और वातावरण मे रात रानी की भीनी भीनी सुगध पल जाती। शायद तुम्ह याद हो। जर हम एक प्रसिद्ध पवतीय स्थल पर धूमो गये थे। तव हम प्यार वे सागर में बहुत गहरे तक डूब गये थे। वही तुमने होटल के कमर म मुझे अपनी भांगिनी बना लिया था यह तुम्हारा अपना स्वीकार था। वर्ना मैं तो बहुत पहले से ही तुम्ह अपना सवस्व मान चुकी थी। मुझे वहां की एक घटना प्राज भी ज्यो को त्यो याद है। हम एक शाम सन सेट पाइट देखने गये थे। पहाडी के एव ऊँचे स्थान पर अच्छा सा एकान्त देख कर हम वठे थे। चारा पार की पहाडिया पर सकडा लोग थे। आदमी और औरता का एक सलाच सा आ गया था जमे। अधिकतर जोड़े जवान लडके लडक्यिा ये थे। सब अपने आप में मगन और मस्त । हम एक दूसर का बाहुपाश में जकडे थे। और सूय को अतर्धान होते हुए देख रहे थे। लकिन हमे पता तक नहीं चला कि कब सूर्यास्त हुना। हमे पता तब चला जब अधेरे ने अपनी चादर मोटी करनी शुरू की। पार आस पास से झिगुरा की आवाज ने हमारी त द्रा वो तोडा । चारो ओर स नाटे का साम्राज्य स्थापित था, पहले जो शोर गुल और भीड-भाड थी वह अव समाप्त हो चुकी थी। सभी लोग जा चुधे थे। न जान वक्त का क्तिना वहा रेला हमारे ऊपर से गुजर गया । जब हम पहाडी से नीचे पाये। तब घोडे वाला लम्बी इन्तजार के बाद वापस लौट रहा था। तुमने उसे ग्रावाज दी । वह हकबका कर रुक गया तथा तुम्हारे चेहरे को तीखी निगाहो से तक्ने लगा। तुमने उससे माफी मागी और मुझे घोडे पर चढा दिया। मैंने घोडे पर बठ जाने के बाद तुमसे कहा था- 'चलो प्लेन पर न सही तुमने थोडे पर ता मुझे बिठा दिया।' इस पर तुमने इठलाते हुए कहा था- 'बहुत जल्द हम प्लेन से यात्रा परगे।' तुम्हारी इस बात से मेर चेहरे पर एक साथ 27 हजारो फुलझडिया जगमगा उठी थी। और मेरे चेहरे पर उटी फुलझडिया की वह जगमगाहट तुम्हारी मांसा से भी नहीं बच सकी थी। उस रात प्यार के जारी रहने के लिए तुमने न जाने किससे अनगिनत दुपाए मागी थी। लेकिन अचानक हमारी जिन्दगी में ऐसी गमगीन सुबह पाई कि उस सुबह तुम मुझे अपने साथ एक लारो मे बिठा कर एक दूर-दराज और अपरिचित इलाके म छोड पाये। काश । हमारी जिन्दगी में वह बदसूरत सुबह कभी नहीं पाती और न तुम मुझे उस अपरिचित इलाके म छोड़ पाते। इससे तो अच्या हाता तुम मुझे समन्दर में डुबो देत या किसी ऊँचे पहाड से नीचे धकेल दतै ताकि मेरी हड्डिया तक का पता नहीं चलता। और मुझे तुम्हारे विछोह की तडपन से मुक्ति मिलती। मैं आज तक इस पहली को नही सुलभा सकी कि तुमने ऐसा क्या क्यिा, पता नही तुम्ह इतनी जल्दबाजी क्यो थी कि तुमने अपने सारे निणय तुरत फुरत कर लिय तथा बडी बरहमी से मुझे अपने से अलग कर दिया । और अपने इद गिद एक ऐसी लक्ष्मण रेखा खीच दी कि मैं चाहूँ तब भी उस लाघ नहीं सक् । मुमैं नहीं मालूम था, कि तुम इतन कायर ग्रार डरपोक इसान हो, जो बरसो तक साम की तरह मेरे साथ रहने के बावजूद किसी के भयानात करने पर मुझस विरक्त हो जानोगे, और मेरे मन की थाह तक नही लोगे कि मैर अन्दर क्तिना वडा तूफान मचल रहा है । मै सोच भी नही सक्ती कि जिस इन्सान का मैं इतना बाल्ड समभती थी। वह मदर से इतना लिज लिजा हागा, वि अपन सारे जजवात देखते ही देखत नाग की भेंट चढा देगा। नामद तुम सोच रहे होंगे, पानद कि मैं माज भी तुम्हारे लोट पाने का इलजार कर रही हूँ। भगर तुम ऐसा कुछ सोच रहे हो तो यह तुम्हारी गतमफहमी है । और यही गलतफहमी एक दिन तुम्ह वर्वाद कर देगी। वस तुम्हार लौट प्राने सभी वाद मुझ प्राज भी अच्छी तरह याद हैं। मैंने तुम्हार उन वाला का 28 एक दिन यादो की उस गठरी चुन चुन कर यादो की गठरी मे वाघ लिया है। को मैं किसी समन्दर में डुबा माऊँगी। अव जव कुछ कहने ही लगी है, तब सब कुछ कह ही डालू ऐसा मेरा मन कह रहा है। सुनो, तुम पाकर जिस कुर्सी पर वठा करत थे, मैंने उसे हटा दिया है । कुर्सी ही क्या वह हर चीज जो तुम्ह अच्छी लगती थी, मैंन नष्ट कर दी ह । और कमर को पूरी तरह बदल डाला है। कुसिया की जगह साफा सेट ने ले ली है । फश पर दरी की जगह गलीचा बिछा दिया है। तुम जिन वतना मे खाना खाते थे, जिस मग मे बडे चाव से चाय पीते थे और वह प्यारा सा काच का गिलास जिसके वगर तुम्हारे हलक में पानी नहीं उतरता था, सभी तोड फोड दिये है । और उनका स्थान मॉडन बावरी ने ले लिया है। - तुम्हारी कुर्सी के सामने जहाँ टेवल पड़ा रहता था वहा अय एक खूबसूरत फ्रिज रखा है। तथा सामने वाले कोने में वेस्टन का कलड टी वी शोभायमान ह । पार सुना हमारे नाम मारुति कार एलाट हो चुकी है और पानद तुम तो मुझे कुछ दे नही सके । सिवाय झूठे अाश्वासना के पर उहांने गाधी नगर मे जो पलेट खरीदा है, वह मरे नाम कर दिया है। हम बहुत जल्द उस नय फ्लेट में शिफ्ट करा वाले है । बोलो ! तुम्ह भूल जान के लिए इतने सारे सुख क्या कम है 7 अब उठती हूँ, बहुत सारे काम करने हैं, कहने के लिए मेरे पास अभी बहुत कुछ है पर तुम्हारे जसे खुदगर्ज और गर जिम्मदार इसान के लिए अपने बहुमूल्य शदा का सजाना सच क्यो क्रू । दिन ढलन लगा ह, शाम घिर रही है, खूबसूरत और पुरबहार, मुझे नहा कर तपार होना है, उन पान का वक्त हा गया है, वे आते ही मुझे अपनी बाहो म भर लेंगे और चुम्बनो की बौछार कर देंगे। उनके पाने के बाद हम एक पार्टी मे जायेगे, जहा एक रगीन पाम अपने सम्पूर्ण यौवन के साथ हमारा इतजार कर रही होगी, तुम तो जानन हा मै डिपस नहीं करती, पर पार्टी मे म जम कर जाम चढाऊगी, क्योकि माज की ऊंची सोसायटी में शराब पीना आधुनिकता का पर्याय बन गया है । 29 मानद अाज में बहुत पुगहू, मेरे पास गब बुछ ह, सिफ तुम्हारे अलावा । मैंने ये सारे खूबसूरत सपने तुम्हारे साथ देखे थे, सपने तो पूरे हो गय, लेकिन तुम मुझमे छिन गये, और तुमने जो जरुम मुझे दिये प्राज भी उनवा दद रह रह कर टोमना रहता है, और मैं इतने सारे सुखा के बावजूद पानी साली मन लिए किसी अभिशप्ता की तरह पगलायी सी इधर-उधर डोलती फिरती हूँ। 30 अलविदा जंगल जगल इतना सवमूरत, दिलकश और प्यारा था कि अगर वहा किसी प्रादमी का क्ल भी कर दिया जाता तो उसे खुशी होती, वह कभी नाखुश नहीं होता। उस उम जगल मे रहत हुए करीब पन्द्रह साल गुजर चुके थे और बिना किसी कष्ट के चार पाच साल और गुजार जा सक्त थे, पर अचानक न जाने उसे क्या हो गया था कि वह वहा से भाग जाना चाहता था । उन लगन लगा था कि यदि उसने जगल का माह नही त्यागा तो उसका दिमागी तवाजन विगड जायगा, वह पागल हो जायगा या फिर किसी दिन ऐसा भी मुमकिन ह कि उसका दम घुट जाय और वह मृत्यु का ग्रास बन जाय। उसने फैमला कर लिया था कि अव जगल को देरवाद कह देना ही फायदेमन्द रहेगा। मुग्तिा पदह बरस उसन बड़ी मस्ती और शान में गुजारे ये पर दो माह से यह बुध उपडा उपहा रहने लगा था । इस उदामी की वह सर पहुचन के लिए उसन साग सर मारा, पर समझे हाथ सुध नहीं लगा। 31 वह अपनी मजिल से अनजान या फिर भी जगल से भाग जाना चाहता था। वह अपने पूरे परिवेश से उक्ता चुका था और उसकी उक्ताहट्ट धीरे धीरे नफरत की सीमा लाधन लगी थी। उस सब कुछ बरदाश्त के बाहर लगन लगा था। जब कोई उससे मुखातिब होता और बतियाता तो उसे लगता, मामने वाला भाले की नोक से छैद डालना चाहता है। लागो की निगाह इतनी जहर पालूद होती थी कि उसे अपने अदर नश्तर के पवस्त हो जाने का अहसास हान लगता। थूक उसके हलक से अटक जाता । चेहरा निस्तेज और असहाय हा जाता। एसे वक्त उसकी निगाह नीची हो जाती और वह दूसरी सिम्त की ओर चल पडता। तब उसे महसूस होता कि उसका पूरा शरीर वफ की सिल्ली म तवदील हो चुका है। उसन सोचा अब यहां से निकल भागना चाहिए। घर उठा उठकर उसने जीरो लाइट वा बन जता दिया। नगे फ्श पर जब पाव ठिठुरन लग तब उसने चप्पलें पहिन तो फिर एक निगाह पलग की मोर पकी। उसमा एक हाथ ठुड्डी में नीचे था और दूसरा गोने पर। चेहरे पर पिछी मियाह बाला की एए तर उसकी गूयमूरती में चार चांद लगा रही थी, यह गही नीद म प्रामस्न माई पड़ी थी पिर भी उसकी मुम मुद्रा यापी मारपर मग रही थी। उमा पसा मी मार मपन बम बदाय माता पमतन्नन बार गफा नारा मोर भूम से। पर यम बन्पर उगरे पायब गये। वह मुरगया पोर बिना उमरी पार गवाना गोगगर बाहर पा गया । मोरापपान यामी गर। उगनाम मालागि मोरनर-नारदमाग परापीरता पापानमा!

अचानक उस दिमाग में एक विचार कोष गया कि उसने अपने भागने के बारे मे किसी को कुछ नहीं बताया। लोग क्या मोचेंगे कि आखिर वह गया कहाँ । सम्भव है उसके इस प्रकार गायब हो जान से बेचारा कोई बेगुनाह फिजूल मे ही पस जाय । पर जब उस याद आया कि कल ही उसन अखबारो के लिए अपनी मौत का समाचार तयार कर लिया था तो उसे सन्तुष्टि हुई। उसने अपने प्रोवर कोट की जेब म हाथ डाला तो वहा सभी लिफाफे मौजूद थे। वह खुशी खुशी डग भरता रहा । चौगहा पा चुका था। चौराहे पर खडे लेम्पपोस्ट की मुर्दा रोशनी में लेटरबाक्स ऊध मा रहा था। उमने वे सारे लिफाफे उसमे डाल दिये। उसने सोचा कि क्ल जब लोग अववाग म पढेंगे कि उसका काम तमाम हो गया है तब उह बड़ी खुशी होगी। यह सब माचकर उसने राहत की मास ली। । न जान वह स्तिना चला, उस कुछ याद नहीं । मुबह हो चुकी थी। सूय चा प्रकाश चारो पार फल गया था। वह कहा पहुंच उस कुछ भी मालूम नही था । यह एक वियावान म मडा या। पार पीछे इतिहास की शक्ल म एक खूबसूरत, दिलकश पार प्यारा सा जगल छोड पाया था। गया था। . जब वह धूप तज थी, चेहरे पर पसीना चुहचुहा आया था, उसे याद आया । भागा था-तब रात थी, धना अधेिरा था और कडाके की ठण्ड । इस वक्त दिन है, चारा तरफ प्रकाश फला है और वदन पसीने में सरावोर है। उसने सोचा कि उसने दौडन, भागते पूरी एक मौसम गुजर चुकी है। उमे खुशी हुई कि विना साये पिये, बिना थके हारे वह एक मासम नक जिदा रहा है । जगल पीछे घट चुका था। भब वह एक अलग ही दुनिया में आ गया था। जहा न शोरगुल था, न परिवार वाला की चर-चस थी, न प्रेमिका की फरमाईशें। वहा सिफ ऊँचे-नीचे मैदान थे, पाटिया थी और पहाड थे। -- 33 रास्ते में उसे न कही शहर मिला, न गाव, न कोई आदमी, न प्रादमजाद यही कही दरख्त जरूर नजर प्राए पर उनके सरा पर पत्ते नहीं थे। तालाब पार कुए भी दिखाई दिये पर उनम पानी नही था । अब वह थोडा असमजस मे पड गया था कि आखिर वह कहा आ गया है। वह चला जा रहा है पर उसका यही अत नजर नहीं आता। उजाला है पर सूर्य वही दिसाई नहीं देता आखिर माजरा क्या है । वह एक बड़े मे काले शिलासण्ड पर बठ कर यही विचार कर रहा था कि एक पहाडी की तलहटी म उस कुछ हलचल नजर प्रायो। वह पहाडी की पार बढ़ चला। उसने देखा कि असख्य स्त्री-पुरुष नग घटग अवस्था म एक घरा बना कर नाच रहे हैं नाच के साथ साथ वे अपनी मापा म कुछ गा भी थे। वह पहाडी पर चढ गया और एक अच्छी सी समतल चट्टान पर बठ कर उना नाच दसन तगा। वह एक ऐस स्थान पर बैठा हुआ था कि प्रासानी से उन्हे नाचते हुये देख सकता पर नाचो वाल उस नहीं दब मक्त थ । नत्य अविराम चल रहा था। व स्त्री-पुरुष रात दिन नापत रहन विमा वाय, बिना माय, बिना यक । प्रकार नाचत-नापत यई मासम गुजर गय । पर उनका नाच वर नहीं हुग्रा, न उनके घर थे न परिवार न चान-बच्चे। उनसान पान की चिन्ना थी और न सान की और न पहिनन की। शायर उनकी जिदगी का प्रथ हो सिप नाचता था। हा यह बात जरर थी कि एक अश्य नगाडे की प्रावाज की तार पर उनके पाव उटन थे। पार ये मस्ती म झूम झूम कर नाचत थे । जरग तरप पहारी पर बैठे-बटे उस ३ वरम बीन गय तव वह वहा स नीच उतरा मोर नाचन वाताव निपट जा पहना । 33

वह किमी एक से कोई सवाल पूछता उससे पहले ही नगाडे की मावाज बद हो
गयी।
अचानक गीत के बार चुक गये और नाच बद हो गया।
उसने देखा कि वे असाय स्त्री पुरुष जो वरसा से नाच गा रहे थे एक दूसरे पर
मरे पड़े है, और उनके शरीर से गाढा नाल खून निकल रहा है। खून ने धीरे-
धीरे रक्त नदी का रूप धारण कर लिया है, और अब उस रक्त नदी में उनकी
लाशें तर रही है।
वह टर जाता है और डर के मारे उमो मुह से एक भयानक चीख निकल
पडती
-
उस लगता है कि रात नदी अपने म समटन के लिए उसकी ओर तेजी से बढ़ रही
है। अगर वह यहा से नहीं भागा नो बहुत जल्दी ही उसका शिकार हो जाएगा।
इस ग्रहमास के जगते ही वह भागने के लिए अपने आपको तैयार कर लेता है
प्रोर जिम पार म वह यहा आया ना उसी ओर मुंह करके बेतहाशा भागने
नगता है।
वह भागता रहता है पार पीछे मुडकर नहीं देग्वत्ता।
भागते भागत उसे महसूम हाता है कि वह भयानक माला जगल बहुत पीछे छूट
गया है।
इस
ना
की
है।
को

उसका सपना कालिया मजवत और कडियल जिस्म का मालिक था। मै जिस पक्टी म सुपरवाइजर था कालिया वहा पत्थर तोडने और तराशन का काम करता था । वह एक मावल फक्ट्री थी। बहुत सार मजदूर वहा काम करत ५। विभी मशीन पर एक ट्राली म बडे बडे पत्थर के ब्लाक फिक्स करक चटा यि जाते और तेज धारदार ब्लेडें पत्थर वा सीना चीर कर आर पार निकल जाती। इस इलाके म मावल का सूब भण्डार मिला था। देखते-देवत कई छोटी बडी पक्ट्रिया इस इलाके म स्थापित हो गई थी। पास पास के स्रडा मजदूर इन मावल फक्ट्रिया स जुड गये थे। अब यहा वो घरती साना उगलन लगी थी। दारिया एप ऐसी ही पाट्री म मजदूर था। पक्षा वाला रग, पोलादी शरीर वडी-वडी प्रारों जिनम हर वस्त लाल-सात डोरे पलत मिकुहन रहत। उसकी मामा म देगन पर लगता यहा एवं प्राग मुद्रत स जल रही है और टण्डी हान का नाम नहीं ले रही। --- लेकिन कालिया वडा व्यवहार कुशल और हसमुख व्यक्ति था । बहुत ही पाहिस्ता आहिस्ता और शब्दो को तोलता हुअा वोलता। अपनी बात वह इस ढग म कहता कि आप उमकी विनमता ग्रार सरलता के सामने नतमस्तक हो जाते । उस फस्ट्री में लगभग डेढ सौ मजदूर काम करते थे। जो पास पास के गावा के थे। सुरह गान, दिन भर मजदूरी करते और शाम को हसी खुशी अपने गाव घर लौट जात। इही म कालिया भी एक या। वह रोज घर नहीं लौट सकता था। क्याकि वह बीस किलामीटर दूर के एक पहाडी गाव से पाया था। उमवे साथ उसकी पत्नी चम्पा भी थी। कालिया ने फक्ट्री के सामने वाली पहाडी पर एक भोपडी गडी कर ली थी। उसी भापडी मे वह चम्पा के साथ मौज मस्ती से रहता था । रक्नि अचानक भी कभी हालिया म परिवतन ग्रा जाता उसकी बात करन की लय भौथरा जाती। उसका चेहरा तनावग्रस्त हो जाता। ऐसे समय वह मामने वाले पर प्रारमण करने की मुद्रा में होता । इस दरमियान वह कभी मेरे सामन पडता तो मुझे देखा प्रनदेखा कर निकल जाता या दूसरी तरफ नजर फिरा लेता। " एक दिन जर वह फक्ट्री के बाहर बनी चाय की गुमटी पर बठा सुस्ता रहा था। मैंन उससे पूछा--- 'कहो कालिया क्सी तनीयत है उसने तपाक से जवाब दिया- 'क्या ठीक नहीं लगती प्रापका? क्या हमा मेरी तबीयत को? मै बहुत अच्छा हू साहब, बहुत अच्या उसके जवाब में तलवी थी और थी गर्मागम प्रश्नो की बौछार । मैं कुछ समय चुप रहा । फिर वाता 'चेहरा प्रादमी के अदर का मारा भेद प्रकट कर देता है कालिया।' उसके चेहरे पर हल्की सी मुस्कराहट दौड गई । उसने अपने का सयत किया और बोला- 'आप ठीक रहते हैं साब । अाप अपन भादमी हैं। प्रापम क्या दिपाना।' कुछ देर माहौल में सन्नाटा छाया रहा । वह मन ही मन कुछ सोचता रहा। इस प्रकार था। फिर उसने जो बताया उमका माग 37 वाप उसके बाप के पास कुल जमा दो बीघा जमीन थी। जिस पर वह फमल उगाता। पूरा परिवार उस जमीन पर प्राश्रित था। अचानक उसने बाप का रुपया की जरूरत हुई। वह जमीन एक जमीदार के यहा रहन रस दी गयी। जमीदार के रुपये चुकाये बिना दुनिया में चल यमा । पता नहीं उम बाप न जमीटार स कितना बज लिया था। अब जमीदार का कहना है कि व्याज महित कुन दा हजार रुपये की रकम बनती है। दा हजार चुकें तो जमीन उमकी हो। अव कालिया का मिफ एक ही सपना है-~~ जमीन । जब तक जमीन को जमीदार के चगुल में नहीं छुड़ा लता । नब तक वह मुग की माम नही तेगा। यही वजह है कि वानिया अपन काम म जी ताट मेहनत करता है। महीने म बीस दिन वह ग्रोवर टाइम करता है। जिस दिन वह पावर टाइम करता है उस दिन उमरे चेहर पर यवान का कोई चि ह नहीं होता बनि उसके अग अग से उमग पूरती रहती है । शाम को जब वह पावर टाइम करक अपनी झोपडी म पहुचता है। चम्पा उसके लिए राटिया मक रही हाती है, तब उस छोटी-मी भापडी म एक अनाम ग घ तर रही होती है । को अपनी वरिष्ठ बाहा म उठाार हवा म झुला बता है। फिर चीग्य कर कहा है-- 'चम्पा । अव हम अपनी जमीन वापस लेंगे। तुम देखना बहुत जद जमीन हमारी हो जायगी । बस कुछ दिना की वात और है। फिर हम अपनी जमीन पर फ्मल उगायेंग।' वह मस्ती मे चम्पा और चम्पा मिमटी मिडी कानिया के बालकपन को अवाक् देयती सुनती रहती। तव कालिया चम्पा को सम्बोधित कर कहता-~'तुम कुछ बोलती नही चम्पा । ।" मन चम्पा क्या बालती वचारी गाव की गवार औरत उमकी तो समझ में कुछ नहा पाता। वह कालिया की हरकता मे कभी कभी उलझन म पड जाती। म साचती पानिया जमीन के पीछे बावरा हो गया है। वही यह बोरा गया तो उसका क्या होगा। वह उमको पात पर हम दती और इतना सा और कहती- 'भगवान जाने तुम रात दिन क्या सोचत रहत हो ।' दम पर कालिया कहता--- 'अरे पगली | भगवान तो मब कुछ जानता है। वहीं नो सबका पालनहार है। कोडी यो वण और हायी को मण यही देता है दगनागिन हम अपनी जमीन पर ती नरेंगे। मैं हम चलाऊगा और तुम मेर पिए रानिया पर भानोगो पिर देयना मेत की मह पर वह वर राटी गाने 38

का मजा। ठण्डी राटी और प्याज का स्वाद भी ऐमा लगेगा मानो ठाकुर जी
छप्पन भाग अरोग रहे हो।
पार चम्मा ठठा कर कालिया की बातो पर हस देती। मन में सोचती काश
रामजी कालिया की बाते सुन लें और जमीन एक बार वापस हमारी हा जाये तो
मैं समझू इस जनम का मनरा जण अवारथ नही गया।
एक दिन सध्या का कालिया नाचता कूदता भोपडी म पाया और अपनी आदत
के मुताविक चम्पा को वरती मे उठावर ह्वा मे झुना दिया चम्पा भौचक्की
रह गयी।
'क्या हो गया रे कालिया ?' उसने पूछा ।
'कुछ नहीं।' कालिया न जवार दिया।
'वडा खुश दिख रहा है प्राज ।
'हा, बहुत खुश-बहुत खुश अाज मैं बहुत खुश हू
'ऐसी क्या बात हो गयी जो इतना खुश है रे?' चम्पा ने जानना चाहा ।
'अरे मूरस अपन वो सिरीमाल साहव है न । भगवान सरूप प्रादमी हैं। जिनके
पास मैं अपने स्पय जमा किया करता था। आज वाले, कालिया तरी तपस्या
पूरी हो गयी। मैं कुछ समभा नहीं। तव उनने कहा- भाई मेरे पास तेरे
दा हजार रुपये जमा हो चुके है-- जब तू चाह अपन रुपये मुझसे ले लेना और
अपनी जमीन छुडर लेना।
उस लगा आज उसके चारो
सुनकर चम्पा के चेहरे पर ललाई दौड गयी।
घाम पूर हुए।
जब मैन सुना कि कालिया अगले हफ्त अपनी जमीन छुडान गाव जा रहा है । तो
सुनकर बहुत अच्छा लगा। मैंन सोचा चलो इश्वर ने एक गरीव की इच्छा तो
पूरी की।
वर्ना ईश्वर को फुमत कहा जा गरीबो की सुन । वह तो हरदम
अमीरो को ही सुनता है।
मुझे इस यान की वहद खुशा थी कि कालिया का मपना मावार होन जा रहा था ।
39

- 'साहब, चम्पा बीमार लेकिन एक दिन मुह अपेरे विमी न दरवाजे पर दस्तक दी। मैं बाहर आया तो देसा कालिया एक कोने म पडा है। छूटत ही वाला- रातमर से तडप रही है। उसे अस्पताल ले जाना है' मैंन जल्दी जल्दी कपडे पहने और उसके साथ चल दिया । पक्टी क ड्राइवर को जगाकर जीप बाहर निकलवायी और चम्पा का नेकर अस्पताल पहुंच गया । अस्पताल बूचडखान जसा था। करन का ता यह रेफरल अस्पताल था। वहा राजाताना की जिद के कारण नव निमाण नाम पर अनाप शनाप घन नीचे ऊपर कमरे बनाने म पच किया जा रहा था। चारो पार दुगध फ्ली हुई थी। वार्डो में काफी अफरा-तफरी मची थी। रामन म ही मरीज इधर उधर पिवरे पड़े थे। आन जाने वान मरीजा को नापत फ्लागते एक ओर से दूसरी ओर आ जा रह थे। मेरे परिचय के कारण जल्दी ही एक डाक्टर न चम्पा को देखा और वाड में भर्ती कर लिया। डाक्टर ने एक पर्ची पर कुछ दवा या त्रिवी पार पर्ची कालिया के हाथ में पकड़ा दी। करीब एक माह तर चम्पा अस्पताल म मर्ती रही । इस बीच कभी कभार कानिया पक्ट्री में नजर पा जाता वाकी दिन गत वह चम्पा की मेवा म तगा रहता। उसके जमीन टुडान के लिए इकटठा किय सारे रपय चम्पा की बीमारी की भेंट चढ गये। अब कालिया वह मजबूत और कडियल जिस्म वाला कालिया नहीं रहा था, चम्पा की बीमारी न उसे काफी कमजार कर दिया था। बीमारी वी वि जगत की नाग की तरह बढ़ती ही जा “ही थी। और एक दिन उस बरहम बीमारी न कालिया का सवस्व भी छीन लिया । चम्पा का दा तीन उल्टिया प्रायो और यह मदा के लिए सो गयी। वालिया चीसने चिल्लान नगा । उमन अम्पनाल का सामान इधर उधर पंक गिया। अपने कपड़े फाडो तथा मिरवो दीवार से टकरा टकरा कर लहू तुहान पर दिया। बड़ी मुनिर से अस्पताल में प्रमो ने उसे वश में किया । 40

चम्पा की मौत के बाद कमी कालिया दिखाई नहीं दिया ।
बाद मे सुना कालिया पागल हो गया ।
मुनकर मुझे बेहद दुख हुना। मुझे लगा मेरा अपना ही कोई आत्मीय मानो
बिछुड़ गया हो ।
मैं कानिया में मिलने मेटल अस्पताल गया था। मुझे देखते ही उसके मुरझाये
चेहरे पर एक हल्की-सी मुस्तान फल गयी। पर वह बोला कुछ नही। शरीर
से वह काफी अशक्न नग रहा था। पर जब मैंने उमकी प्राखो मे झाका तो मुझे
वहा वही चिर परिचित आग जलती हुई दिखाई दी।
जब मैं वहा से लौटने लगा तो उसने मेरी बाह पकड ली और मेरे कान में
फुसफुमान लगा 'साहब मैं जल्दी ही वापस माऊगा। खूब मेहनत करू गा।
चम्पा तो चली गयी। पर मुझे अपना सपना पूरा करना है। मेरा यह सपना
पूरा हागा तभी चम्पा की प्रामा को शाति मिनेगी।
मैंने उसका क्या थपथपाया और बाहर आ गया। बाहर सन्नाटा था। बा
खामोश और चुप । सिफ मेरी प्राखा की कोर भीगी हुई थी।
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।
-
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आतंक
मी वेहद तेज थी पर माहौन मे बर्फानी हवाए धुमड रही थी।
बडी थी और उसका नगा फर्श वफ की सिल्ली की तरह सद था।
सारे लोग गरिया की तरह वैतरतीव से इधर उधर दुवई पडे थे ।
इमारत बहुत
फिर भी देर
इमारत की खिडक्यिा खुली थी। खिडविया के रास्ते हवा के तेज भोके के
साथ लाशो की दुगघ चारो ओर पल जाती और नथुना के रास्तै शरीर में प्रवेश
कर जाती।
फिर वे एक दोष
लाग चुपचाप मुदों की तरह पडे थे। उनके जिदा होने का अहसास सिफ उस
वक्त होता था जब हवा का कोई बदबूदार झाका उनके नथुनो से टकराना।
फिर भी उनकी जगान नहीं खुलती। उनरे चेहरे पर एक विशेष प्रकार के
भाव उगते, उनकी निगाह अापस म एक दूसर से टकराती।
निश्वास छोटते और फ्यूज होते वल्व की तरह बुझ जाते ।
सब चुप थे। बूते जवान पार बच्चे। आश्चय ता इस बात का मा कि चौरीसो
घण्ट बह-यह परन वाली स्त्रिया भी चुप थी और दुध मुहै बच्चे भी ।
पान सपने मुह एव साप क्मिी ने मित्र दिय हैं।
लगता
42
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कही कोई हरकत नहीं थी। पूरी इमारत मे भयानक सन्नाटा पसरा पड़ा था। धीरे धीरे अधेरा गहराने लगा। एक कोने में कुछ खुसर-फुसर हुई। एक युवक माहिस्ता से उठा पार एक-एक कर इमारत की खिडकिया बद करने लगा। जब वह सभी खिडकिया बन्द कर चुका, तो उसने बिजली का बटन दवा दिया। बटन दबते ही जीरो वाट की मरी-मरी रोशनी चारों ओर बिखर गई। इतने मे एक बूढा अपनी जगह से उठा और उसने अपने कापते हाथों से उस युवक के दोनो बाजू पकड लिए। फिर फुसफुसाया-- 'क्या सभी को मार डालने का इरादा है। बत्ती बुझा दो, और अपनी जगह जाकर वैसे ही चुपचाप बठ जामो।' 'ठीक है ।' उस युक्क ने कहा और बत्ती बुझा दी। फिर सह्म कर एक ओर कठ गया। जसे राशनी करना कोई गुनाह हो । पूरी इमारत अधेरे में गक हो गई थी। कुछ भी दिखाई नहीं दे रहा था। फश पर किसी के क्दमा की प्राट्ट जरूर सुनाई दे रही थी। वह पाहद भी एक जगह जाकर बद हो गई। कुछ देर बाद एक खिडकी के खुलने का अहसास हुआ। फिर दूसरी, फिर तीसरी। इस तरह एक के बाद एक सभी खिडकिया खुल गई। । थोड़ी देर बाद बन्दूक से गोली चलने की आवाज सुनाई दी। खिडकी के पास से एक ददनाक चीख उठी और अन्धेरे को चीरती हुई उस इमारत के सीने में चापू की तरह पवस्त हो गई । 1 पूरी इमारत यक्बारगी जसे हिल गई। ऐसा लगा मानो इमारत के किसी एक भाग म बम फटा हो । इमारत में पड़ी बेतरतीब गठरिया अपनीअपनी जगह पर वापी और उस ठण्डी रात में भी उनकी पेशानी पर दहशत की वजह से पसीने की बूदे निकल भाई । । सुबह जव मूरज निकला और उजाला फ्ला तो मैंने देखा रात वाला दम-घोटू सन्नाटा दूट चुका है। गठरिया हिल डुल रही हैं भोर इमारत म उनको चहल- दमी जारी है। सग कुछ लोग खिडकी के पास एक लाश के इद गिद जमा हैं और खिस विसावर वातें कर रहे हैं । यह उसी बूढे की लाश थी जिसने रात एक युवक को वाजुमा से पकड कर वत्ती बुभाने की सलाह दी थी और बत्ती बुझने के वार हुद खिडकिया सोलने लगा था और सिडकिया सोलते खोलते गोली का निशाना बन गया। उसके कपड़े खून से रग गये थे और पास-पास फर्श पर गाढा गाढा काना खून जम गया था। एक बीमार बूढे का लोगो मे अफरा तफरी मची थी। चाय तो वहुत दूर की बात है पानी का नल भी बद था-भूख और प्यास की वजह से सब वैहाल थे। पूरा शरीर गदगी से लथपथ था। रान ही का उमने दम नोड दिया था। मक्खिया उस पर मिनभिना रही दी। पल की हलार हुई एक मा के दूध मुह बच्चे ने भूख से बिलविलाते हुए अपनी दादी की सूसी छातियों का अपने दाता से कुतर डाला था और अब वहा से खून टपक रहा था। दादी बेचारी द के मारे मिमक्यिा भर रही थी। पूरी इमारत एक नरव वाडे की तरह लग रही थी। मरे अन्दर भी भूग्व का ज्वालामुखी उमडने लगा। लक्डी की एक मेज पर चर कर मैंने रोशनदान के रास्ते गली मे झाा। पूरी गती साय साय कर रही थी। दूर तिराह पर एक मिपाही व दूक लिए गश्त लगा रहा था। मैं मज से उतर कर एक सम्बे के सहारे खडा हो गया । और जेब से निकाल कर पन्तिम सिगरट मुलगाने लगा। धूप के बावजूद ठण्ड वढ गई थी। और शरीर बफ की सिल्लो म तब्दील हान नगा था। मैंने सिगरट का एक क्श सीचा तो खाली पेट म एक झुरझुरी सी दौड गई। तीन-चार तेज-नेज कश खीचने के बाद मुझे लगा कि ठण्ड का असर कुछ कम हुआ है। दोपहर दो बजे व क्रीय किसी टक के ग्रान और उसके रुकने को प्रावाज सुनाई पर किसी ने भी बिहको म बाहर मुह नहीं निकाला। सभी दम साध पपनी अपनी जगह चिपके रह । भाडी देर बाद इमारत के दरवाजे पर डण्डी टवटव की वनी के साथ एक रावीली अावाज सुनाई दो-- 'दरवाजा यालो हम तुम्हारी मदद के लिए प्राय पर वाई अपनी जगह स हिसा ता नहीं। दो-तीन बार इसी तरह 1 44 प्रावाज इमारत के सनाट को तोडती रही। फिर भूख-प्यास से बेहाल एक मिजोर-सा प्रादमी कापता हुमा मेज पर चढ कर गली मे झाक्ने लगा। और प्राश्वस्त होकर नीचे उतर आया। लोगो से उसकी निगाह मिली और पाखो ही पाखो म इशारे हो गये। कुछ लोग अपनी जगह पर खडे हो गये। और कुछ अब भी गठरी बने बैठे जा प्रादमी मेज पर चढ़ा था, आगे बढा और उसने दरवाजा खोल दिया। दरवाजा खुलत ही पुलिस की वरदी पहने एक इसपेक्टरनुमा आदमी ने दरवाजा सोलने वान प्रादमी का कालर पकड कर दो थप्पड जड दिये- 'स्सालो ) दरवाजा खोलने मे हो थप्पड साने वाला प्रादमी जमीन पर गिर गया। इस्पेक्टर ने उसे उठाने की कोशिश की तो वह फिर जमीन पर गिर पडा- 'अरे । स्साला यह तो बेहोश हो गया। इस्पेक्टर ने कहा । इमारत मे वापस म नाटा छा गया । गरियो को पानी पर पसीने की बून्दें चमकने लगी और बदबू के साथ साथ सम्पूर्ण वातावरण मे दहशत फैल गई। इस्पेक्टर ने एक बार चारो ओर नजर फेंक कर वातावरण को सूधा। उसे मबकुछ ठीक अक लगा तो वह बोला- 'जल्दी से जल्दी यहा से निकलो । नीचे ट्रक सड़ा है। उसमे जाकर बठो ताकि तुम्हे सुरक्षित स्थान पर पहुचाया जा सके। इन्पेक्टर की यात का विमी पर कोई असर नहीं हुआ। जब एक भी प्रादमी अपनी जगह से नहीं हिता तो इस्पेक्टर फिर घुडका- 'साना। जल्दी करो, दगाई यहा मा पहुचे तो तुम में से एक भी जिन्दा नहीं बचेगा। परदर से यह कहते ही चार सिपाही अन्दर मा गये और परह-पक्ड पर सबको माहर निकासो सगे। n जितन साग र म मा सब उहीने भर लिये। बातो कारस्पेक्टर ने यह कहते एमोनिया- 'माग जामो महा से, भाग जाप्रो और मपनी जान बचानो।'

इस्पेक्टर का समेत पाते ही ट्रक एक दिशा की प्रार चल पड़ा।
खदेडे गये लोगा म, में भी शामिल था।
जगह-जगह लाशें पड़ी थी।
उन पर कुत्ते चिचिया रहे थे। और लाशो की
दुग य चारो ओर फली हुई थी।
हम सब एक साथ थे। और मोच रह थे कि कहा जायें। इतन में एक ऊची
बिल्डिंग से गालिया चलने की आवाज प्राई पार हमारे तीन चार साथी जमीन पर
गिर कर तहपने लगे । और फिर वही ढेर हो गए। हम कुछ देर मक्ते की
हालत मे खडे रहे। फिर जिसस जिघर बन उधर भागने लगा।
के
मैं लगातार नागते-भागते थक गया था। और हाफ्ने लगा था। सुम्तान
लिए एक जगह का तो वह दिखाई दे गई। मैं फिर भागने ही वाला था कि
उसकी आवाज सुनाई दी- 'डरा मत और ऊपर या जानो।'
मैंने इस बार उसकी ओर देखा । वह एक युवती थी। जो अपने मवान की
खिडकी में खड़ी थी और मुझसे मुग्यातिब थी।
उसने अपनी बात फिर दुहराई ।
मैं काफी थक गया था। भूख और थकान से इतना अशक्त था कि अगर उस वक्त
मुझे भी कोई गोली मार देता तो मैं उसका बडा आभार मानता।
पर इस बार मेरे सामने बदूर नही एक युवती थी। और वह मुझे बुला
रही थी।
जय में अपर पहुचा तो वह बालो-
-~-क्या बात है, बहुत डरे हुए हो?
-बया?
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- तुम्हें पता नहीं, शहर में दगा हो गया है ?
हता पता है कि दगा हो गया है ।
पर यह पता नही कि दगे का कारण
मुझे भी नहीं मालूम।'
किरदनने से हए क्यो हा
'मोन समान नही उरता।"
हि मालूम है में यहा प्रती है।
-रहै।
-'मर बारे में तुम मया मोचते हो" उसने पूछा। मैंने मय उसकी भोर
मान म दगा उनी पानी पर गिन्दी लगी थी और मोग में सिन्दूर भरा
सुम भी मगर मुझे मारना चाहो तो मार मानो हो, पर मैं काफी
पाहवा और भूगर'
-
या दो मिनट दो। तुम्हार लिए गाना साती है।' यह रसोई में
६। पिर पाना पेज पर मगाती हुई मोती-
-मही नगमगी है। बागम गा मा पोर पहा से भाग जापौ।'
Mrunा गापौर उमा गुरिया मल परता इपा महर पर
fn7पाता। पग पर भरा मा-पोर में माना मामना हिम्मत रे
परगा।
Earnार मुनेगरि शेरी मावार मुन पर पीछे
और TET मारपीनाम मैं पनी गाना गात
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अचानक बदूक की आवाज के साथ एक ददनाक् चीस मेरे काना के पर्दे चीरती हुई न जाने कहा खो गई। में अपने आपको सम्भाल नहीं पाया और वेहोश हाकर वही गिर पड़ा। और जब होश आया तो मैंने देखा। कुछ पुलिस वाले मेरी उम बहिन की खून से तरबतर लाश को लारी म चढा रहे है । मेरी आखो से प्रासुन्ना की बाढ़ उमड पड़ी और मैं फफक फफम कर रो पड़ा। .

सूरज फिर निकलेगा रात वाली घटना से वह बेहद परेशान है । वार बार चाहने पर भी वह उस घटना को अपन मस्तिष्क से निकाल नही पा रहा है। जसे अगर वह चाहे तो दोस्तो के साथ पिकनिक का प्रोग्राम बना सकता है, उस्मान के साथ बठ कर दारू पी सस्ता है और एक बुद्धिजीवी की नरह प्रादश वधार पर अमीर लोगो को गाली दे सकता है, और रात वाली घटना से अपने आपको मुक्त कर सकता है । टोकिय की आवाज म उमके विचार ततु टूट जाते है, वह उठकर डाक मे आई सामग्री को टेबल पर रख देता है, और एक एक चिटठी को ध्यान से देखता है, पाच हिनी अग्रेजी के साप्ताहिक अग्वबार, रचनाए भिजवाने के लिए मुफ्तखोर सम्पादका के तीन पोस्टकाड, एक अतर्देशीय पर उसकी एक पुरानी प्रेमिका का वह पत्र ग्वोल कर नहीं पढ़ता। उसे मालूम है इसम लिजलिजी भावुक्ता से सने कुछ शब्द और फरमाइशा के अलावा कुछ नही होगा। वह रुटिन म चलते इस प्यार स अव ऊब गया है । उसको नजर अव घड़ी पर जा पहुंची है। दो बज रह है, वह कमर के ताला लगाकर बाहर या पाता है, गहर मड़क पर पहुचते ही ठण्डी हवा का एक नाका 49 उसके पूरे शरीर को स्पश कर गुजर जाता है, उम प्रहमास होता है कि इस बार अक्तूबर के प्रारम्भ मे ही सर्दी ने अपना असर दिखाना शुरू कर दिया है । सजा मार्केट को पार कर वह चांदपोल से गुजरता हुआ पुरानी बस्ती की तरफ निकल पडता है। आगे नाला पा जाता है, नाले के दोना पोर भोपड़ियां बनी हैं और गन्दगी या इतना ढेर है कि सांस लेने पर दम घुटता ह, वह जेव से रमान निकाल कर नाव पर लगा देता है। उसके कदम अव जल्दी जल्दी उठने लगत है। उस समझ म नहीं आ रहा है । इस गदगी के टेर मे जहा सास लन में भा दम घुटता ह लोग किस तरह जिदगी बसर कर लेत है। उसे सामने बस्ती के नव धन कुवेरो द्वारा वसायी गई पारादी की ऊंची ऊंची इमारते दिखाई दे रही है। वह प्रापचय चक्ति । कर जा लाग फट हाल ये किस तरह से कारा और बिडिगा के मानिक बन गय, और नानक पास पास वमी झोपडियो के लोग हाड-तोड मेहनत के वावजूद भी गदगी और अधरे माम्राज्य तो दवे रह । दही झोपडियो के बीच किसी एक झोपडी म सुखिया रहती थी। मुखिया जा इस गदी वस्ती मे कमल का एक फूल थी । गाज हवालात मे बदह, रात वाली घटना का 'द्र विदु सुखिया ही है । सुखिया जब नई नई इस वस्ती में पाई थी तब पूरी वस्ती म तरह तरह की चर्बानो और अफवाहा का बाजार गम हा गया भा। काई उसे आवारा व वदचलन समझता तो कोई अच्छे परिवार की महिला बताता। घाई उमे परित्यक्ता नारी बताता ता काई भगाटी स्त्री वता। गरम यदि वस्ती में जितने मुह थे उतनी ही वात थी। दन्ही चर्चामा के आधार पर एक दिन मेरी सुसिया से मिलन की इच्छा हा गयी थी। गता ही वाता म बस्ती मे जम लेती इन अफवाहा का उमस बडे बमन स जिन किया था। मुझे लगा इन चर्चामा स उसके मन का ठेस लगी है। पर मुझे यह अह्माम जार हुआ रि वह बडे हिम्मत वाली औरत है तथा किसी भी कठिनाई का वडी हिलेरी मे मुशवसा कर सकती है। बाता म मुझे बताया कि वह गुजरात के एक गाव की रहन वाली है । मागमी दिन भर शहर म नारी चलाता और शाम का घर ताट प्राता था। र पनि पनी पार घाटा सा वचा शकर, वस यह था उनका छोटा सा परिवार। वर वडे गाराम म दिन गुजार रह थे कि एक दिन उनकी इस छाती उसन वाना ही उसरा वे पर मी गृहम्पी मे तूफान आ गया। एक ट्रक दुर्घटना मे उसके पति की टांग टूट गयी। इस तरह यह छोटा सा परिवार अनाथ और बे-सहारा हो गया। सुखिया बड़े जीवट वाली औरत थी। उसने हिम्मत नहीं हारी। पति का स्थान उसने 7 लिया। वह दिन भर मेहनत मजदूरी करती और अपने परिवार का भरण पोषण करती। इसी तरह दिन गुजर रहे थे कि प्रकृति का भयकर प्रकोप हो गया। एक दिन वह बच्चे को लेकर एक ऊँची पहाडी पर लकडिया बीनने गयी थी। पीछे से अचानव नदी का बाघ टूट गया। देखते ही देखते सारा गाव पानी को भेंट चढ गया । इद-गिद का सारा वातावरण चीखो और चित्कारो से गूज उठा। जो लोग वच सरे वे पहाडियो पर चढ गये, शेप पानी के तज बहाव के साथ वह गये। उमपे अपाहिज पति ने भी जल समाधी इस तरह उसकी बची-खुची दुनिया भी लुट गयी । ने ली। जब बाढ़ का पानी कम हुआ तो मुखिया ने वह गात्र छोड दिया और इस वस्ती मे चली आई। था। सुम्विया की दद भरी दास्तान जान लेन बाद वह उससे हार्दिक स्नेह रखने लगा पर उसका स्नेह फ्लहीन था । बजर घरती पर बीज बिखेर दन जमा । बस्ती म सडक पर मिट्टी डालने से लेकर फमल काटन तक वह सभी काम करने लगी थी। अब वह पूरी तरह बस्ती की हो गई थी। शुरू शुरू में उसके आने के वक्त जो अफवाहो का बाजार गम हुआ था, वह भी अब ठण्डा पड गया था। बस्ती के दूसरे लोगो की तरह सुखिया भी इज्जत की जिदगी जी रही थी और खुश थी। लेकिन कुदरत को कुछ और ही मजूर था । बस्ती अकाल की चपेट में आ गयी। बस्ती में तरह-तरह की बीमारिया फलने लगी। कुए बावडिया का पानी सून गया, ऐस में भी सुखिया हारी नहीं। वह कोई न कोई काम तलाश लेती। इम तरह वह अपने और वेटे शकर का पेट भरने का प्रयत्न करती। इस बीच वह खुद के काम से शहर चला गया था। आज सुबह जब लौटा तो वस्ती में स नाटा रात की घटना पूरी बस्ती की छाती में नासूर बन कर रिस रही थी। उसने रात की घटना के विषय में जो सुना वह इस प्रकार था--- था। अकाल के कारण वस्ती मे भूवमरी फली हुई थी। यही काम धघा नहीं था। लोग बेकार थे। छाटे बच्चे रोटी रोटी चिल्लाते थे। सुग्विया वी दशा भी खराब हो गयी थी। इधर शकर वीमार पड गया । वह उसे लेकर डाक्टर के 51 पास गयी थी। ता उसने बाजार मे गये लिय दवाइया पी पी बनायी। सुगिया पे पास जो थाठी बहुत जमा पूजी थी वह मम मनात मी भेंट चा चुडा थी। कई दिनो स पाटा-दाल भी सेठ को दुवान से उधार पर प्रा रहा था। शयर को जिन्दा रखने की इच्छा मन म लिय वह गेट की दुकान पर रपया जा लेने गयी । सुसिया को अपनी दुवान की तरह मात दमा ता सेठ को मिचमिची प्रामा म चमर पदा हा गयी, वह तपास याला 'क्या चाहिय मुधिमा 'मुझे रपया उधार चाहिय सेठ ।' मुखिया ने कहा । 'क्या क्या मरना ह रपये था। 'मेरा बच्चा बीमार हसठ, उमरे निये दवाई लानी है।' 'मो ता है पर रपया के यदल म क्या लाई हो' 'सेठ मेरे पास वदल म देन वा कुछ नहीं ह, जसे ही म्पया पायगा म ब्याज सहित चुक्ता पर दूगी। 'वाह जस म्पया कोई बरसात का पानी है जा बरमात परसेगी और तुम मुक लीटा दागी। 'सेठ मुझे मालूम है रपया वरमात का पानी नहीं पर मेहनत का पसीना जरूर है । मेह्नत करके मैं तुम्हारी पाई पाई लौटा द्गी।' 'अरे जा जा बडी प्राई पसीना टपवाने वाली।' मैं तुझे खूब जानता हूँ। 'पद्रह दिन स पाटा दाल उधारी पर जा रहा है एक पसा ता लौटाया नहीं माज तक। और रपय लौटा देगी।' सठ तुम्ह रपया उधार दना है कि नहीं' सुतिया की पावान तज थी। 'सुग्विया उधार अवाड स नहीं पिरम स मिलता है । पिरेम से।' यह कह कर सेठ सी पी कर हमन लगा था और उसकी ग्रावा म एक विशेष प्रकार की चमक पदा हो गयी थी। सुखिया समझ गई थी कि सठ उधार दना नहीं वह चुपचाप वहा से लोट पड़ी। लौदत वक्त उस पाव भारी हो उमे गपने आप पर वडा गुस्मा आ रहा था कि वह क्या उधार माने गयी थी। चाहता। गये थे। 52 जब वह घर पहुंची तब तक अधेरा गहराने लगा था। उसने ढिबरी जलाई। क्विाड उदका, एक और कटे हुए पेड की तरह एक फटी पुरानी क्थरी पर बिछ गयी। कुछ देर सोते रहने के बाद उसे लगा कि कोई दरवाजा ठेल कर अदर आ गया है। उसने पाखें खोल कर देखा तो दरवाजे के पास एक छाया सडी दिखाई दी। वह उठ कर खड़ी हो गयी ढिबरी के उजाम मे उसने देखा। सेठ दस- दस वे कुछ नोट मुटठी मे मीचे उमकी और वढ रहा है और उसकी पाषा मे पातान नाच रहा है। 'सेठ यहा क्या आए हो' सुखिया न बिना सहमे हुये पूछा । 'स्पये देने ।' सेठ ने जवाब दिया । 'दिन के उजाले में क्या साप सूध गया था जो अब रात के अधेरे मे पाये हो" 'रात के अधेरे मे इसलिये आया हू वि वदले मे तुममे कुछ वसूल कर सकू ।' 'सेठ जसे आये हा वस ही लौट जानो वना बहुत बुरा हा जाएगा, मै हल्ला कर दूगी तो तुम पकडे जानोगे।' 'मुखिया, मैंने दरवाजे की कुण्डी चढादी है, अदर कोई नही पा सकता। और अगर काई प्रा भी गया ता दरवाजे के बाहर खटे भर लठत उनका काम तमाम कर देंगे। फिर हल्ला करन म तुम्हारी बदनामी नहीं होगी क्या ?' 'सेठ मेरी बदनामी की बात छोट अपनी खैर मना। और चुपचाप यहा से लोट जा नही ता मैं तुझे जान से मार दू गी।' यह वह वर मुखिया ने उसे चले जाने का समेत दिया । पर सह वहा से हिला तक नहीं। उसन फूक मार कर ढिवरी बुभादी और पुर्ती से सुमिया का जा दबोचा व उमे नाचने ससोटन लगा। सुखिया ने सठ का एक धक्का दकर जमीन पर गिरा दिया। इम बीच सुखिया ने अपना सब्जी काटने वाला चाकू हाथ म उठा लिया और दहाड का वोली- 'सठ अब भी वक्त है लाट जा, मेर हाथ मे चाकूह।" सेठ बिना किसी परवाह जिधर स अावाज पाई थी, उधर वढने लगा । ज्याही उसने सुखिया को अपनी बाहो म लेन की काशिश की चाकू मेट वी छाती म पवस्त हो गया। एक चीख रात के सन्नाटे को चीरती हुई पूरी उम्ती का जगा गई। सार मौहल्ले के लाग इक्टठे हो गय थे। लागा न देया दवाया + 67

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धुंध मे फसे लोग गाव की पाठशाला के मास्टर दयाराम ने जब दक्षिण पट्टी के लोगो को बताया रि सरकार ने ब धुना मजदूरी समाप्त कर दी है और पान स कोई व धुश्रा नही रहा, प्राज स सभी बधुमा आजाद है, अब कोई किमी मे जबरदस्ती काम नहीं करवा सक्ता, काम के बदले हर आदमी का यूनतम मजदूरी दनी हागी। साथ ही मास्टरजी ने यह भी बताया कि सरकार व धुमा मजदूरी से मुक्त लागा को सेती करने और मकान बनाने के लिए मुफ्त जमीन और रुपया भी देगी, माताजी के चौतरे पर बठे लगभग सभी लोगो के चेहा पर पाश्चय और अविश्वास का सामाज्य छा गया। कुछ देर लोग एक दूसरे के मुह ताकते रह। फिर प्रापस मे खुमुर फुसुर करने उह विश्वास नहीं हो रहा था कि ऐमा बसे हो सकता है। पर कुछ बूढे लाग कह रहे थे कि जब मास्टर जी कह रहे है ता बात सच ही होगी। अगर पटवारी और तहसीलदार कला तो बात कुछ और ही थी, पर मास्टरजी झूठ क्या बोलन लग । मास्टर दयाराम लोगो की सुसुर फुसुर को बडे ध्यान से सुन रहे और उनले मनोभावा का समझ रहे थे । उहोंन अपन खादी के जक्ट मे से प्रखवार निकाला प्रार पूरा ममाचार सागा का सुना दिया-~~ 'मुग्यमत्री न मत्रिमण्डल की एक । 55 मावश्यक बठप चुनाफर व धुमा मजदुरी को पत्म करन का निणय लिया है।' यही समाचार आT के अखबार में विस्तार से छपा था। पूरा समाचार सुनने दे बाद दक्षिण पट्टी के लोगो के शरीर में रक्त सचार की गति तेज हो गई । अय सर चेहरा पर पापचय और अविश्वास की जगह जग जीत लन की खुशी फली हुई थी। दक्षिण पट्टी के पाठ दस परिवार व घुग्रा मजदूरी वे जाम म फस हुए थे। पत्येन परिवार का एक न एक मदम्य ब घुप्रा था। पर सरस ज्यादा खुशी तुलछा को थी। क्याकि दक्षिण पट्टी का यही एक परिवार एमा था जिसमें दाना के दोनो मदस्य वधुपा थे। यानी तुमचा पार उसकी पत्नी क्क, दाना ही ठाकुर गजसिंह के यहा ब चुना थे। तुलछा दौडता भागता घर पहुचा । घर का दरवाजा उडका या। पडोस की एक औरत ने बताया रिक्कू पानी ने गई है। वह हाफ्ना कापता कुए की ग्रोर दाड पना। पूरा रास्ता सुनसान था। उसे दूर से ही वुए पर एक प्रारत दिखाई दी। उमन वही से बवू को जार से पुकारा। ककू तुलछा की आवाज मुन पर हक्का बक्का रह गई। वह सोचने लगी। रोमी क्या रात हो गयी कि तुरछा कुए पर दौडा पा रहा है । जरूर बुछ अनथ हो गया है। वह भरा घडा सर पर रख कर तेज तज कटमा स घर की पार चल पड़ी। कवू न देखा कि तुलछा दौडता मागता उमकी पार चला आ रहा है। उसके मन म हजारा तरह के खटव जनम लेने लग और उसके दिल की धडकन तेज हो गई। जब ये दोना नजदीक पाय ता तुलछा न पागला की तरह क्कू को अपनी बाहो म भर लिया और खुशी स नाचने लगा। क्लू के सर स घड़ा घिरकर फूट गया। मारा पानी जमीन पर विमर गया। घडे के फूटन दाना के कपड़े भी गीले हो गय । से उन का तुलछा की बाहा की गिरफ्त म पसी थी। उमकी देह लस्त पस्त हो गई यो पर आज उसे बड़ा अच्छा लग रहा था। हर रोज रात को जब तुलछा ठाकुर के यहा स दिन भर मेहनत करके लौटता तो पाते ही बथरी पर विद्या जाता। पथरी पर दुबया पडा तुलछा उसे एक मेमने जसा दिखाई देता था। और जब कभी रात्रि के प्रतिम प्रहर तुलधा की बाह उमे अपन भेरे मे ले लेती तो बबू यो नगता ये वाह तुनछा की नही किमी बीमार प्रादमी की बाहें है । पर पाज न जाने नहा ने तुछा की बाहो म हजार वाहा का बल पा गया था।

-- यह मर से पा सुपद लग रहा था । आज उसके पाव धरती पर नही, कही पौर पर। अद्ध चेतनावस्था में भी वह सोच रही थी-काश पूरी न तुरछा इसे अपनी बाहों में भर कर इसी तरह नाचता रह । तुलदा नाचत नाचत जब थक गया तो उसने अपनी गिरफ्त ढीली को। अब वे दोनो रास्ते के किनार पडे पत्थरो के एक ढेर पर बठ गये और अपनी सासो पर वावू पान की काशिश करने लगे। ? . ~~~ जानती है, आज क्या हुआ? तुलछा ने कहा । -~-क्या हुआ हम प्राजाद हा गय । -~-क्या कह रहा है र तुलछा ठीक से समभा। मेरी तो समझ मे कुछ नही प्रा रहा। -~-अरे पगी। आज हम अाजाद हो गय । ठाकुर की गुलामी से आजाद अब प्राज म न ठाकुर अपना मालिक है न हम उसके चाकर। ---यह क्या बान रहा है रे तुलछा । ग्राज क्या दिन में ही दारू चढा ली तूने। -~हा माज दिन में ही दारु चढा ली मने अब बोल तू, क्या करना है तुलदा देस्वर में प्रावोश था। --अरे नाराज क्या होता है रे । जरा ठीक से समझा ना| मेरी तो समझ में बिल्युन ही नहीं पाता। सरकार माई बाप न कानून बनाकर हमे वधुआ मजदूरी से आजाद कर दिया। मास्टर साब न अखबार मे पढ कर पूरी पट्टी के लोगा को सुनाया। और यह भी बहा कि सरखार हमको सेतो के लिए जमीन और रुपया भी देगी। नया यह सच है रे तुला ? तुझे बिस्वास नहीं होता। -~-विस्वास क्यो नही होता है। विस्वास भी होता, पर वो ठाकुर का बच्चा हमको बच्चा चवा जाएगा रे। से पवा जाएगा। वानून हमारी रच्छा करेगा। समझी पगली । ~पर यो मापा ने वा पाच सो पपिया सबुर से उधार लिया था, उसका क्या । -- । होगा? .

-धुच्छ नहीं होगा उसमा । बुच्छ नहीं। सरकार ने सब बज माफ कर लिया। तुलछा ने उसे प्राश्वस्त करन के लिए कहा । -~-पर ठाकुर मानेगा क्या क्ने गया प्रकट की। -~-अरे, ठाकुर को ऐस्सी की तस्ती। स्साला प्राये मेरे सामन ता काट कर पक दू। 7 . तुलछा की बात सुन कर क्कू हसने लगी। बबू का हसते हुए देख कर उसका भी हसी फूट गई । जब वे घर पहुचे ता अन्धेरा गहराने लगा था । कत राटिया पकान वठ गई । जब वे खा चुपै तो बाहर किसी न अावाज दी। तुला न बाहर निकल कर देखा ता ठाकुर का एक आदमी तेल पिलाई ताठी व थे पर रसे खडा था । --क्या बात है? तुलछा ने पूछा ---ठाकुर न बुलाया है। अभी । लठन न जवाब दिया। -~-वाम है। --म नहीं आता। कह देना ठाकुर से । अब मैं ठाकुर का गुलाम नहीं । अब मैं अाजाद है। तुलछा न प्रोध से फुफकारत हुए कहा । तुलछा की बात सुनकर लठत की मौह तन गई । पर उमन अपने का सभालन हुए पहा- -~-तुझा तू अाजाद हो गया है, यह तो ठाकुर भी जानत है पर तुझे पिछल हिमात्र किताव लिय बुलाया -~ -सा हिमार स्तिाव। मुभ म कोई हिसाव किताव नही ठाकुर का । बोल दना उसको, मरकार न पिछला गारा कज माफ कर दिया है। मास्टरजी अगर म पट वर सुना रह थे । –ता तू मास्टरतीक चार मह। सीधी तरह चलता है कि लगाऊ लट्ठ या यह कहना था जि तुलछा न टूटी हुई दीवार से एक इट सीन कर दे 58 मारी। लठन का सर फूट गया। लाठी हाथ से छूट कर दूर जा गिरी और वह चीखता चिल्लाता उल्टे पाव ठाकुर पट्टी की ओर चल पडा । लठत के चले जाने के बाद तुलछा पर सकता सा तारी हो गया। उसने यह नहीं सोचा था कि आज का आज खून-खराबा हो जाएगा। लेकिन अगर वह ईट नही चलाता ता लठत उम पर अवश्य वार करता। ईट चला कर उसने अच्छा ही किया। पर उसे अब अपनी और ककू की जान खतरे मे लगने लगी। उमने क्कू से कहा- -~-अब हमार निये यहा रहना मौत को यौता देना है। -फिर क्या करे तुलछा। --यहा से निकन चलें। --क्यो? -क्याकि यह ठाकुर अपनी नीचता से बाज नही पायेगा और सरकार माई-बाप तक हमारी गुहार पहुचे उसके पहले ही यह हम जान से मार डालेगा। इसलिए हम इस गाव को छोड देना चाहिये। तुलझा ने क्कू को समझाया । --अब हम जायेंगे कहा? ----अब हम यहा से मेहर मे जायेंगे और मेहनत मजूरी करके अपना पेट भरेंगे । व दोना रात के अधेरे म, प्राग्यो मे ग्रासू लिये अपने गाव से निकल पडे । भुबह जव गाव वाले जगे तो उहोने देखा कि पुलिम के सिपाही गाव मे फले हुए हैं और दक्षिण पट्टी धु घ मे डूबी हुई है। सिपाही दक्षिण पट्टी के एक एक घर की तलाशी ले रहे थे। पूरे गाव मे यह खबर आग की तरह फैल गई थी कि तुलछा ने रात मास्टर दयाराम का कत्ल कर दिया और उनका घर लूट कर भाग गया। दक्षिण पट्टी के लोग अच्छी तरह से जानते थे कि मास्टर दयाराम का कातिल कौन है, पर वे भयात्रान्त और मौन थे और भय के कारण पीपल के भूखे पत्ते की तरह काप रहे थे। ।

नयी सुबह रात के नौ बजे है। अधेरा कितना गहरा गया है। ऐसा लगता ह जस बहुत रात हो गई। दरअस्ल सर्दी की रातें होती ही ऐसी है। सूर्यास्त हुमा नहीं कि अवेरा अपनी चादर फ्लान लगता है। और इस यस्वे या तो यह हाल ह कि आठ बजत बजत बाजार बर | व्यावसायिक मस्वे की यही तो ममस्या है। यार दोस्त भी जल्दी से जल्दी घर पहुचकर अपने अपन गम विस्तरा म दुबर जाना चाहते है । अब मरे जस परत पार बाहरी साग जाय-ता जाये कहा। वस में अपने घर की पोर रवाना हा गया है। पर साचता हूँ इतना जल्द घर पहुचकर भी कर गा क्या? ग्राज सर्दी बहुत तज है। लगता है मौसम की सबसे तज मर्दी प्राज ही पड़ने वाली है। सम्भव वफ भी गिरे । पुरान लाग अक्सर चना करता। एक बार इतनी भयकर बफ गिरी यि पूरे बम्ब म वफ ही-व हो गई। लोग मकाना म पद हाकर रह गय । तीन दिन बाट रास्ता स बफ तब जाकर वहीं प्रावागमन शुभ प्रा। हदा गई।

सर्ग से बचने के लिए मैंने मफतर को गन और मिरस क्सकर बाघ लिया है और हाथो को कोट की दोना जेबा में डाल दिया है। देखता हूँ अब सर्दी मुझ तक किस रास्ते से पहुचती है । धीरे धीरे टहलता मैं गोल मार्केट तब प्रा पहुचा है। पूरे मार्केट में सन्नाटा पमरा पडा है। कही कोई हलचल नही । आज कुत्ते भी गायब है। वर्ना इतनी रात गये कुत्ता को सलामी दिये विना मार्केट से गुजरना कोई आसान काम नहीं। यहा से मेरा घर एर फर्लाग दूर है । जिस तरह गोल मार्ट पहुचन पर लगता है जैसे घर पहुंच गये। उसी दिल्ली या जयपुर से लौटत हुए वस जसे ही गामती चौराहे पर पहुचती है ता लगता है-~घर मा गये। गोल माक्ट इस वस्न की शान है। कहते हैं जिसन इस गोल मार्केट का निर्माण कराया उसने देश के एक प्रसिद्ध डिजाइनर से इसका नक्शा बनवाया था। जसे ही मैं गोल मारेंट को पार कर अपने घर जाने वाली सडक पर पहुचा कि पीछे से एक आवाज आई-- 'सुनिये साहब!' मैं आवाज को अनसुना कर अपनी मस्ती मे चलता रहा कि इस वक्त मुझे पुकारने वाला यहा कौन हो सकता है । लेकिन वही आवाज मुझे काफी निकट से फिर सुनाई दी। मैंन मुडपर देखा ता सामने एक अपरिचित सा प्रादमी नमस्त की मुद्रा म खडा था। मैंने उसे ऊपर से नीचे तक देसा। कपडा से लगा शायद कोई ड्राइवर है। मैंने उससे कहा-'कहिये, पहचाना नही आपको।' उसने एर जोरदार ठहाका लगाया फिर बोला । 'पाप से पहचानेंगे साहब । यह साला वक्त ही मार है। कोई विसी को नहीं पहचानता। हर एक को अपनी पहचान बनानी पड़ती है। लगता है आप यही नये हैं ? बाकी साला पीटर मो इघर कौन नहीं जानता ?' 'तुमने ठीक वहा पीटर । वाकई मैं यहा नया हूँ' मैंने कहा। 'तब तो मजा पा गया साहब, खूब जमेगी जब मिल बढ्ग दीवान दा । लिये, चलिये साहब होटल मे चलकर बैठते हैं", उसने बड़े उत्साह मे कहा।

पोर पहले मुझे वाव ना या दीवाना लगा था। पर उसमी वेलोस वान ने मुके
परी लिया । मुझे घर पहुचन भी जल्दी नहीं थी। फिर पीटर के व्यक्ति व
ने मुझे काफी प्रभावित किया था। इमलिए मैं उमकै माथ चल दिया। मैंने
मोचा जाई की यह दात किटक्टिा देन वाली रात शायद पीटर के साथ गपशप में
बीत जाय।
हात के नाम पर पीटर मुझे जहा लेकर गया पर एक ढाबा था, जो वयम दुध
दूरी पर बना था। टार वे पाहर कई पाटें पड़ी थी। पार उन नाटा पर व
दाइसर पार मलामी रठे माना पा रहे थे या फिर गपगाजी कर रह
पर पानी पाट दमकर हम उम पर वठ गय । यह पाट भट्टी के राजनीक पी
इमतिा शरीर का एक हर ना मी स निजात मिल गयी थी।
में मन ही मन पीटर कापवाद दे रहा था।
पीटर मरे काफी मना करने में वायजूद भी नही माना पार उमन मर fTo नी
गाना मगवा लिया।
गाना गा भुक्न र थार पीटर मरी पार देपा पार मा।
उगन दात म मानिया यी मानि- दमा रह और उममी प्रामा म म
विप प्रकार की चमा थी।
मी चममा निमोदी यानाम बग्मो गारगीरी।
प्रय पीटर मासी गुपिय था। पोर मुग साई प्रमी धुन मा हा
था। उगन जय मे गिफ्ट निरानी और उगे जनाररमा गौचन पगा।
परमा जाय या मानपा
में महा-पोटर, प्राज महा तन ।
गगनहीं
प. याा-सार पानी प्रारगी।
पान में यन गुगा ।
गुली ने माप भाग रहनामा।
नगर।
मान ता मा पित

'जश्न की रात 1 वह से।' मैंन जानना चाहा । उमन मरी आखा मे झाका। जैस कुछ पढ रहा हा । वह मुम्कराया और कहने लगा- | अच्छा " मैंने पूछा 'मैं घीगडा साहब के यहा डाइवर था। सप्ताह भर पहले वहा से मुझे नौररी से निकाल दिया। धीगडा साहब बडे अच्छे आदमी थे। उहोंने मुझे कभी अनिफ से वे नहीं कहा । पर उनकी औलाद साली वडी फटीचर निक्ली साहब हुप्रा समय रहते वैचारे चले गये वरना य उनवे मुह पर क्सिी दिन जरूर भाड मार देते।' 'लेविन पीटर तुम्ह निवाला क्या 'क्या बताऊ साहब, बहुत गडवड झाला करते थे उनके लडवे । शराब, राजा, चरस पार न जाने क्या क्या। मैंने उह ममभान की काशिश की तो उहोन मुझे निवाल वाहर किया । मैं दस माल म उनकी गाडी चला रहा हू और एक भी छोटे म छोटा एक्सीडेंट नहीं दिया। लेकिन अब मैं चाहता हू, इश्वर करे उनकी गाडी का एवमीडेट हा जाय और सब मर जायें। कम से कम धीगडा साहब की प्रात्मा यो ना शान्ति मिलेगी। उनके नाम पर क्लक नहीं लगेगा और लागा को भी नशे म मुक्ति मिलेगी। उसने कहा और एक गहरी निश्वास छाती। 'धोगडा साह्य अच्छा रखते थे तुम्ह पीटर ?' मैन उससे पूछा। 'अच्छा ही नही बहुत अच्छा रयते थे घोगडा माहब मुझे।' पहते थे-- पर पीटर, तरे प्राने से अपना बिजनस जम गया। बहुत खुश रहत थे मुभम । शादी स्योहार पर इनाम इकराम भी देत । उहोंने खुश होकर मेरी पगार तीन सौ रपये कर दी थी। वडा सस्ता जमाना था साहब। सूय मस्ती से रहता था। लविन अय दस रपये रोज म गुजारा नही होता । आप ता जानत ही हैं मस्टररोल पर काम करने वाले मजदूर को भी सरकार चौदह ग्पय रोज देती है । मच्छा हुआ उन नालायका ने मुझे निकाल दिया वरना मैं सुद छोड देता एक सर्दी तन पता ही नही चला पीटर की गपगप म मोर काफी रात गुजर गयो । हो गयी। साटे पाली हो गयी। पई व रयाना हा सुवे थे और पुप रवाना हम माट स उतरवर भट्टी के पास मार बट गये पौर होनी तयारी में थे। गरीर मन लगे।

.
दुध र माहौल में चुप्पी छाई रही । फिर मैंने जिज्ञासा व्यक्त की-'लेकिन
पीटर अव क्या परागे तुम
'डाइवरी करू गा साहब, द्राइवरी । आपको यह सुनकर खुशी होगी कि मुझे पान
ही ग्रड क्या साहब ने अपनी नई गाडी पर ड्राइवर रख लिया है। पगार भी पूरे
पाच मो रूपय महीना । एडवाम भी दिया दो सौ रुपया । माय ही कहा, पीटर
अगर कम हो तो मुझे बाल देना। राजा आदमी है अडक्या
साहब, ईश्वर उया भला करे ।'
खुश होना।
पीटर की बात सुनकर मुझे वहद गुणी हुई और सुकून मिला कि वह बेकार नहीं
है जसा कि मैं कुछ देर पहले उसर वारे म सोच रहा था ।
पीटर जसे नेक इ सान ब लिए मेरे अंदर एक विशप आत्मीयता पना हुई। मैंने
मन ही मन ईश्वर से प्राथना मी कि पीटर हमेशा खुश रह । मैंने पीटर की ओर
दवा तथा मुस्कराया।
पीटर + चैहर पर एक लम्बी मुस्कान थी। उसकी प्रासो म खुशी के प्रामू
पडवा रहे थे। दूर पूरब दिशा में प्रकाश लाल हो गया था। एक खुबसूरत
नयी
सुबह घरती पर उतरने की तैयारी कर रही थी।
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फैसला गाव म चहल पहल शुरु हो गयी थी। सवेरे या सुप मूरज पूरब दिशा की बडी पहाडी की चोटी पर या टिका था। नुक्कड की दो चार दुकाना के माध साय जग्गू की होटल ने भी पट खुल चुके थे। वैसे पौ फटने के बहुत पहले ही जग्गू की होटर पर जमावडा शुभ हो जाता है, पर माज बहुत देर बाद जग्गू न दुकान योली थी। नित्य की तरह जग्गू वा चहरा अाज ग्विला हुआ नही था। शायद रात की पटा का प्रभाव अभी तक उनके मन मनिप्प पर शेप था। फिर भी वह अपन ग्राहा का पूरा ध्यान र रहा था और मान जान वाला ये मवाला के जवाब दे रहा था। इस बार बारिश बहुत अच्छी हुइ थी। मबई यी फमत पूर उठान पर थी। अभी पमल ये क्टन म देर पी। इमतिय जावो होट 7 गाव बाला या मास मला पनी हुई थी। इस वक्त भी दम-बारह बाहर जमे हुए थे जिनम स सात प्राद दुसान पिन्दर चढे पाय मुडर रद् थे मोर गप बाहर की गटी वा पर डटे थे। पाग चाय पार पी चुरे पे मार पर बटेर गप याना मर रह पे मा बीडी पर रह थे।

जग्गू की यह होटल गाव की आवादी में पिछडे इलाके में स्थित थी। जहा अधिकतर गरीब लागा के घर थे, जिनम चमार, रेगर और बुनकर लोग रहत थ । ये सभी लोग खेतीहर मजदूर थे और ठाकुरो की भूमि पर मजदूरी कर अपना पेट पालते थे। यहा की पावादी पूरे गाव वी पावादी का एक तिहाइ भाग था पार पिछडे लागा का यह इलाा वमार टोला के नाम से मशहूर था । नहूवाका का इधर पात देस र जग्गू ने छोटी पेतली म पानी उबलने के लिय रखा और उसम दा चम्मच चाय और शरसर मिलायर बिना दूध की एक गिलास क्डन चाय तयार की। नदू काका इस इलाके के मुखिया थे और पूरा चमरोटा उनका आदर करता था। जग्गू व हाथ स चाय का गिलास थामते हुवे नदू काका ने पूछ ही लिया-~~ 'क्यार जगुवा क्ल मध्या का काहे का शोरगुल हुअा तर हिया' यात पूछ पर पाका ने जग्गू के चेहरे पर अपनी निगाह टिका दी। जगुवा सुन मुन । वह कुछ बोले उमये पहले ही बाल उठा किमाना रगर 'काका ठाकुर रघुवीर व ताड लपाटे चढ पाये थे जगुवा पर और बहत रह वि सात होटत चलानी हा तो सीधी तरह चला नही ता एक दिन आग म भुक्स देंगे। यह मव दस सुन जगुवा का जसे माठ मार गया। एक साल तक नहीं फूटा मुह मे, तर याला रविया--- 'काहे हा वायू साहन क्या धमकाय रहे हा इस बचारे इसका दाम तो बताया? इस पर बिफर उठा था ठाकुर का बडवा लाटा- 'साला अव दास भी हमी का बताना पडेगा क्या । तुम सब माटर म तुम से एक एक म निपट लू गा | दिन रान इस होटत म इसटठ हार पोतीटिक्कम सेलत हो पार हमम पून हा कि दाम क्या है।' भला काया पर तुम्ही बताया क्या हम चाय भी नही पीयें । की वाले वाली कर द गार हम चाय पीन अट्टे हा तो वह इनवू पालीटियक्रम को। ये ठाकुर लाग तो दार लग। रामसर हट पुष्ट और कुछ क्षण मान रहता ह फिर इम चुप्पी यो ताडता ह जगू का छोटा भाई रामेश्वर । जिम गात्र वान प्यार से रामेमर परत है। एक गुम्मत नवयुवर है। वह प्रागरत शहर व कालज म प रा है। वह कला - 'काका भइया का मूर ही क्या है, वग उन्होंने यही ता कहा था कि इम गर मग्पन नमार टाो वा मादमी बनना चाहिय वस, इत्तीसी बात पर 66 ठाकुर टोने माग ग गयी। तुम ही बताना कापा क्या चमार टोने का प्रामी सरपच नही वा मरता 7" 'क्या नहीं बा गरे हरे रामगरवा । जरर बन पर ठाकुर नोगन से और दोन मोल ले।' बूरे वाया न अनुभव के प्रागार पर वहा । जग्गू की हाटल रे पास पास वापी मोड इक्ट्ठी हो गयी थी। कुछ लोग वठे थे। युद्ध पडे धे। दा चार प्रारतें भी जो शायद मेता की प्रार जा रही थी स्क पर बात चीत सुनने लग गयी थी। एक मीटिंग जसा दृश्य उपस्थित हो गया था। 'इसम बर माल लेन को क्या बात ह वाया।' जस्से सुथार ने बात मागे बढायो- 'यह तो अपन अविवार की रात है। वानून कहता है कि हमारे देस माय लोकातर है हर गारमी सरपन वा वोट लेने वटा हो सकता है। फेर चमार टाने या प्रादमी सरपच ययू नहीं बन सकता? 'तुम्हारी वात ठीक है। देस माय कानून है लोकतन्तर है।' काना ने पहा-- 'पर तुम नही जानते इस गाय तर दम का कानून नही पहुचा। हिया ता अभी टाकुरो याही राग-। हम उनकी मरजी के हिसाब से चरना पडता है अगर हम अपनी मरजी मे चनेंगे तो वे इस गाव म हमारा रहना दुभर कर देंगे। वे यह ह कि हमने सरपच के चुनाव में अपना प्रादमी सहा दिया तो वे अपन कुमा स पानी भरना बद कर देग । प्रव तर यही हुआ है। 'अब यह नहीं हागा काका । अगर व हम पानी नहीं भग्ने दगे तो फिर इस साल फ्मन का बटवारा भी नहीं होगा। वे हम पानी नहीं देंगे हम उह अनाज नहीं देंगे।' एन और बालेजियट लडका भीड में से बोन उठा। 'तुम आज कईम नहीं नागे। जमीन तो टाकुरा की है। चाका ने कहा। 'जमीन ठाबुग की नही काका जमीन हमारी है । क्यापि वरमा से हम उस पर अपना खून पमीना एक करने आ रहे है।' रामेमर चीख उठा। यह झगडा वढाने वाली बात ह र रामसर। इससे तो सगरम वडेगा । पाका ने कहा। 'इस बार मरणच हमार टाल का ग्रादमी वनगा यापा। चाह स्थप बरे या घटे।' एक साथ कई युवका की प्रादाजे मूज उठी। अच्छी बात है र भन्या तुम लोगन ने यही साच लिया है तो ठीर है। तुम चाहत हो वि चमार टाने के लागन की ठाकुर के आदमी लटियन मे पीटें तो मैं भता क्या कर सकता हूं।' बड निगा स्वर म चावा ने रहा ।

'काका लाठिया और बता से वायर लोग डरते हैं फिर हमारे हाय मे वाई चूडिया नहीं है। यह फमला तो एक दिन होना ही है। फिर वह प्राज ही क्यो न हो जाय । आपिर कब तक कुछ मुट्ठी भर लोग हमे लाठियो और वदूबा के बल पर अपनी मर्जी के अनुमार हाक्ने रहगे । अब हम ईट का जवान पत्थर से देंगे। रामेमर ने दहाड़ते हुए कहा । 'हा हम ईट का जवाब पत्थर म देंगे।' पडे। वातावरण म एक साथ कई स्वर फूट सूरज का लाल लाल गोला आकाश मध्य म प्रारर व गया था और उनकी तेज किरणे धरती पर सीधी पड़ रही थी। सूय के तेज प्रकाश म चमार टोला के लोगो के चेहरे दमक रहे थे। उनके प्रदर एव नये सक्ल्प के उत्साह का सम दर ठाउँ मार रहा था। उधर ठाकुरो के शात साम्राज्य मे आग लग गयी थी। ठाकुरो के हौसले पस्त थ । ठाकुर टोना ईर्ष्या और वैमनस्य की आग म जल रहा था और वहा मे पाग की मयानक लपटे उठ रही थी।

पुजारिन
हम तीन दिन से पचास लाख की लागत स बनी एक मरवारी इमारत में ठहरे
दस बजे तक वह नहा धोकर तयार हो गयी थी। नहाने के बार उमका रूप
नियर गया था और शरीर की त्वचा में तनाव आ गया था।
मैंन उसकी प्रासो म भाका। मुझे उसकी नीली झील म असख्य किश्तिया
तरती हुई दिखाई दी। चौकीदार चाय के लिए दो बार पूछ गया था पर
पाज दानो बार उसने मना कर दिया ।
--चाय नही पोनी है क्या प्राज?
-नहीं। उसने जवाब दिया ।
मैंने पूछा।
-या?
-तुम्हें नहीं मालूम ।
आज के दिन पूजा मे पहले मैं अपने मुह मे कुछ नहीं
डानती।
-पर आज नाल लो। मैंने उसके सामने अपना सुझाव रया ।

----क्या
7
--इसलिए कि अव में इनन वडे शहर म तुम्हार नि मगवार का वहा म योज
बरलाऊ।
-तुम्ह खोजने की जरूरत नहीं है ।
-~-फिर क्या दिन भर भूपी ही रहागी।
-हा।
--मेरे साय यह नहीं च नगा ।
---तुम खाना खा लेना।
-मैंने कहा न मरे साथ यह सर नहा चनगा ।
-चलेगा चलेगा और चनेगा, गुम्मे ये वारण उसके गार चेहर पर प्राग की
लपटें लपलपाने लगी।
-मेरे साथ तुम्ह यह सर छोडना पडेगा रानी ।
-सुनो अनिल । मैं सब कुछ छाड सक्ती है पर अपना प्रत पार पूजा-पाठ
नही छाड सक्ती।
-देगो, खाने पीन के मामले म जिद नहीं दिया करत ।
--इसम बोनसी जिद ह?
~~~क्या यह जरूरी है कि मफर म भी प्रत पार पूना पाठ किया जाये।
~~यह कौनसी किनाब म लिखा ह कि सफर म अत और पूजा पाठ व द है ।
---तुमसे बहम पिजून है ।
---फिर वरते क्या हो ।
म चुप लगाकर चल गया और उसके प्रागे र यत्रम का स्तजार करन लगा।
वह सज धज कर तैयार बठी थी फिर भी उनन एर पार और आइने मे भाना
और अपने चेहरे को परमा फिर आदेश के स्वर म बालो-
-चलो, अव बाहर निकलत है।
7
--उठो तो मही।
70

मैं आदेश पावर एक मासूम बच्चे की तरह कमरे से बाहर आ गया । उसने दरवाजा बद कर कमर के ताला लगा दिया और चाची को अपने पस म रख कर सट-बट सीढिया उतरो लगी। अब हम सटक पर थे। उमने इधर उधर नजरें फनी जसे कुछ तलाश रही हो मैं उसका मतलब समझ रहा था और मन ही मन भल्ला रहा था। उसने जाते हुए एक आदमी को रोक लिया और पूठा-- --यहा पास पास कोई मदिर ह? --हा ह, उस आदमी न जवाब दिया । . वो जो सामने लाल रंग की बिल्डिंग दिखाई दे रही है उसके पीछे एक छोटा सा मदिर है। -किसका ह वह मदिर -यह तो पता नहीं। पर रोज म उधर से गुजरता हू इसलिए मुझे मालूम है । उस अपरिचित प्रादमी ने कहा । अच्छा घयवाद। घयवाद देन म वह काफी मुक्त हस्त है । कुछ दे यह सोचती रही फिर मुझस वाली- ? --चलो उधर चलते हैं। -विघर? मन जानना चाहा। -उस ला पिल्डिग र पोखे । --जाने से पायता तुम हमगा फायदा मार नुामान ही देखते रहागे या मै कहगी वमा करागे। उसके चेहरे वो रगत फिर बदतन लगी थी। -- जाो विमका मन्दिर होगा, मैन टाउन के प्रदाज मे वहा । -तुम्ह मस वया? न मही मन्दिर पाडा घूमता ही हा जापगा। 71 १ -- कुछ ही देर -~फिजूल घूमन क्या रखा है -फिर तुम यही रको, में ही हो पाती है। उसकी अावाज म तल्खी थी और चेहरा गुस्स से तमतमा गया था। -अरे बाबा । गुस्सा क्या हाती हा, चला म भी चलता हूँ । चनने के बाद मदिर हमारे सामने था। मदिर पर दृष्टि पडत ही उसके चेहर पर खुशी की लहर दौड़ गई । वही पास की दुकान से उसन एक नारियल खरीदा फिर अगरबत्ती की पुडिया, फिर खुश खुश मदिर में प्रवेश किया। पूरा का पूरा नारियल चढाने के बाद उसने अगरबत्ती जलाई और कुछ दर इधर उधर घूम फिर कर वह मन्दिर का निरीक्षण करती रही, फिर बाहर प्रा गई। अब उसकी आखो मे विजय को चमक थी और मैं अपने आपको शर्मिदा महसूम कर रहा था। कुछ देर हम चुपचाप चलत रहे, वह अपने आप मे इतनी मगन थी कि जिधर उमका मुह था उधर ही चनी जा रही थी, बिना बोले, बिना थके । कोई और दिन रहा होता तो वह कह देती जल्ली से वाई टेम्पो वगरा कर लो अब हमसे नहीं चला जाता । 'पर प्राज वह इतनी ज्यादा खुश थी माना किसी विजय अभियान से लौटी हा । जब काफी वक्त गुजर जान के बावजूद भी उसके मुह से कुछ नही फूटा तो मुझे ही बालना पडा- ? -क्या हम इसी तरह चलत रग -हा या नहीं, जस वह नीद स जगी हो । -फिर? -अब हम खाना खा ल । उसका यह प्रस्ताव मुझ वेनर पम द पाया। मरी पाठ बजे खान की आदत है, और इस वक्त दिन का एक बज रहा था। भून और पदल चलने के कारण मेरी हालत पतनी हो रही थी। वह भी इस बात को अच्छी तरह जानती थी कि मैं भूय एक मिनट भी बनाश्त नहीं कर मक्ता, जयकि वह ती तीन दिन तक भूखी रह सकती है। हम एक होटल में जा पहुच । वह माग पूड़ी की हाटन थी। दो सब्जी, गोभी मटर प्रौर बमन गट्टे । म बमन गरदे पमर नहीं। मेरी तरह वह भी माने के मामा म पड़ी चट्टी। मैंने एक प्लेट की और मगवा लिया। दही और 72 प्याज तथा टमाटर उसे सान के साथ मिल जाय तो उसे ऐसा लगता है मानो स्वग मिल गया है। 2 ? ? तुम्ह ईश्वर म विश्वास है खाना खात-खात वह मुझसे पूछ बैठती है । -नही ! -क्या? -इसलिए कि मैं नहीं मानता कि ईश्वर नाम की काई चीज भी हाती है । -क्यो नही मानत -यह मेरी मर्जी है। -तुमने अमी देखा नही दि ईश्वर भी हाता है ? -कहा -मदिर म । -हा मन्दिर म हा हा हा क्या। वात को हवा म मत उडामा अनिल । तुम तो कह रहे ये न इतने बडे शहर म कहा स मै तुम्हार लिए भगवान को खोज कर लाऊ । हा, कह रहा था। -तुम्ह तो सोजने नहीं जाना पडा न, सडर पर प्रात ही भगवान मिल गए। वह चहक उठी। ---ता मैं क्या करू, मैने भिडक दिया उस । -क्या अब भी तुम्हार मन मे ईश्वर प्रति आस्था नही जगी? -कभी जगेगी भी नहीं। . -क्या 7 - इसलिए कि झूठे, मक्कार और कमजार मन के लोग अपन स्वार्थो की पूर्ति के लिए ईश्वर और खुदा रूपी हथियार का इस्तमाल करते हैं । -- यह झूठ है। -यह शत प्रतिशत सच है । -तुम्ह मालूम ह सच पार झूठ म दूध पार पानी जितना अतर है। --मुझे मालूम है । क्या तुम्हे यह भी मालूम है कि मैं तुम्ह ईश्वर की तरह पूजती हू । बोलते बोलत उसकी आवाज़ भरी गई थी और गला रुघ गया था । 73 - यह बात हर हिन्दुस्तानी औरत कहती है और जब तक उमे इस भूबनापूर्ण सस्कार से मुक्ति नहीं मिलती वह दुनिया ये निमी भी देश की स्त्री के माय सर उठा कर नहीं चल सकती। यह बात कह पर मैंन उसकी ओर देपा, लगा उसकी झोल जैसी गहरी मासो में तूफान बरपा हो गया है और उसकी वजह से कुछ प्रारदार मोती उसबै सुनाईदार गालो पर बिखर गये हैं। 74 एक जीनियस का अत और आन गजाघर चल बसा। मजार का पाप नहीं जानत। मैं भी नहीं जानता था गजाधर को लेकिन पाप यह ता जानत ही हैं कि इस लम्बी चौडी दुनिया मे कुछ ऐसे लोग भी होते हैं जो एक दूसर वा प्रापस म परिचय बरा कर अपने वडप्पन का अहसास कराते रहत है। गजाधर की कहानी में आपको सुनाऊ इसके पीछे भी परिचय का वही सिलसिला है। दरअसल इसका सम्पूण श्रेय कमल को है। वमल गजाघर का मित्र है और मरा परिचित । कमत स मैं प्रतिदिन मिलता है, फिर भी मैं उसको अपना मित्र नही मानता, क्योकि अगर मै उसका अपना मित्र मानने लगा तब मैं भी गजाधर वाली गलती दाहराऊगा । फिर कमल मेरे वार मे भी लोगो को अनाप शनाप बताता फिरेगा। और फिर मुझ पर भी कोई कहानी लिखने वठ जाएगा । ऐसा नहीं है कि अपने यार मे किसी के कहानी लिखने रा मैं डरता हू, बिल्कुल नहीं डरता। सन पूछे तो ऐसी कहानी नियने मे भारी सतरा है। अक्सर 75 होता यह है कि ऐसी कहानिया खुद लेग्यर के जीवन के ईद गिद ही घूमने लगती और कहानी का असली पान वही दूर थ य में विलीन हो जाता है। लेकिन फिलहाल आज गजाधर की कहानी सुनिये। मैं अपनी कहानी आपको फिर कभी सुनाऊगा। जमा किमत न बताया- गजाधर तीस-चालीस घरा वाले एक छोटे से गाव का गावद लडका था । विद्यालय म उसकी स्थिति एक बुद्ध लडके जसी थी । गाव के विद्यालय की पटाई समाप्त होत होते उसके गरीब और वृद्ध माता पिता स्वग सिधार गये थे। कोलेज की शिक्षा उसवे एव दूर के चाचा ने पूरी करवाई। कानेन को हवा उमको विल्कुल नही तगी। यहा भी वह गाव जसा ही दव्य बना पर यहा एक फक जस्र प्राया। अपनी एवात प्रियता के कारण वह मध्ययनशील हो गया पार पूरे काज म वह प्रतिमावान छात्र के रूप में जाना जाने लगा। यही कारण था कि प्रोफेसर गिडवानी न उम अपन प्रिय छाया में शामिल कर लिया। यदा बना वह प्रोफेसर माहब पे निवास पर भी माने जाने लगा। सविन उमरे स्वभाव का दबूपन बरसरार रहा । प्रापेमर माहब को एप सूयमूरत नयी थी। नाम था प्रमला। ममला सी दय को दयी थी। पनी पला, भरा नरा बदन, पाले लम्ब ये 7, हिरनी जसी प्रारों और गोगे गुगत याह जा हर वक्त किसी का अपन मौन स लगा लेन का प्रामत्रए दनी र"ती। गतापरतिम ममता ने अपना म्यान बना लिया था। लेकिन यहा मी उगरा दम्भूपन मामा प्रा पहा होता। यह अमला म मिाना चाहता था। गग वातना गहता था। पर मामना होत ही यह गया जाता। मोर समनाम मम गवर अपनी पार निवाई में सगी रहती। हेम्पोटोग्न तपारी मध्यरत थी। भाय वर रिगी TARATोपाई गमारा गई थी। गर्मी मी पहिया रही *म गांव नहीं गया । हाराम रह पर मान सिटी प्रतीक्षा कर रहा था। फिर वहा गाव मे उसके लिए बैठा ही कौन था। यहा कम से कम प्रोफेसर माहब और उनकी बेटी अमला तो थे। अव उमका ज्यादातर समय प्रोफेसर साहब ये यहा गुजरता । गजाधर मन ही मन अमला को प्यार करने लगा था। वह सोचता कोई उससे पूरी दुनिया माग ले और बदले में उसे अमला दे दे तो वह हिच-विचाएगा नहीं। पर यह सब उसके वश म कहा था । काश ! ऐसा सम्भव होता । नेशिन विधाता को कुछ और ही मजूर था। गजाधर अदर ही अदर घुटता रहता। अमला से इस तरफा प्रेम मे उसके दिन का चन और राता की नीद हराम हो गई थी। उसके देखने और बात करने का अदाज बदल गया था। उसके बदले व्यवहार को देख कर प्रोफेसर माहब ने उससे किसी अच्छे डॉक्टर मे क सल्ट करने को कहा तो गजाधर ने उनके सुझाव को हसी मे उडा दिया । अब वह इस ताक मे रहता कि अमला कही एकात में मिले तो वह उसे अपने दिल की बात कहे। जब ऐसा कोई सयोग नही बठा कि वह अमला को अपने दिल की बात बता सके, तो यह बेचन और परेशान हो गया । उसकी नीद तो पहले से ही गायव थी। अब उसका खाना पीना भी छूट गया। कपडे गदे रहने लगे। चेहरे पर दाढी बढ़ गई । एक दिन इसी तनाव ग्रस्त स्थिति में उसने अपने शरीर के पडो को तार तार कर दिया। प्रोफेसर साहब उसकी इस दुदशा से अत्यधिक दुग्वी थे, उ हान गजाधर को खूब ममझाने की कोशिश की, पर उनके समझाने का कोई परिणाम नहीं निकला। चरिक दिन ब दिन गजाधर की बेहूदा हरक्तो में बढोतरी होने लगी। प्रोफेमर साहब ने थक हार कर उसे मेटल हास्पिटल म एडमिट करा दिया। पूरे एक माह बाद गजाधर को हास्पिटल से छुट्टी मिली। उसके दूर के रिश्ते के चाचा आ गये थे। डाक्टर ने उह सलाह दी कि जितना जल्द हो सके गजाधर की शादी कर दी जाय । ताकि दूसरे अटेर मे उसे बचाया जा सके । 77

गजाधर अपने चाचा के साथ उनके गाव चला गया । उसका रिजल्ट आ गया
था। उसने प्रथम श्रेणी में उत्तीण किया था। उसके चाचा ने शुभ मुदत देरा
कर एक सीधी सादी लडकी से उसका व्याह कर दिया।
शादी के दसवें दिन गजाधर को नौकरी का परवाना मिला।
गजाधर की खुशी मा ठिकाना नहीं रहा। उसे एक साथ इतनी खुशिया मिली
कि वह मस्त हो गया तथा अपने को समार का सबसे भाग्यणाली व्यक्ति समभन
लगा।
वह अपना विगत भूल चुका था। और वतमान से अत्यधिक प्रसन था। दब्बू
और चुप्पा ता वह अव भी या मगर ना बात वह यह नहीं पाता था उस मय
वह क्लम से यह देता।
लारियन की नौकरी क कारण उसे पुस्तकें पढ़ो का रव अवसर मिलता ।
देसन ही देगते वह एक बहुत बडा लेसक बन गया। उसकी लिसी कहानिया
देश के प्रतिष्टित असवारा और पत्रिकामा में छपन लगी। उसकी कहानिया र
पर्न सक्लन भी पा गय और अपने लपन के शंशय वाल म ही उमे राज्य स्तरीय
पुरस्कार भी मिल गया।
पर उसकी महत्वाकाशाए वत बा गई थी।
यह गात जागत स्याता की दुनिया म साया रहता।
प्रय यह स्वय पो दर एव यहुन बड़ा माहित्यकार समभन सगा था । यहा तर
fr उगने निाट म मिना ग भी मिलना जुलना छोड दिया था ।
पय यह पूरी तरह माम पतिा हा गया था। उस गिता उगराइटर
पी बी मा से प्रारमहा रहा है। पभी समता उगी नहाती 'वामिन
पात्र मी।
कार" पर बाई सी चिम पा रही हानी ता उस
उमीमी पहाता पर यनी है।
पायाला मनाई
पप गाा मोर HIT गन या याग मट्टावाय ग अपनी पहानिया पर बात
पामारा पर गान पर पाता।
"गूगोता
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हर माल उसकी कहानी पर की कोई न कोई फि म गो डन जुबली मनाती । अव गजाधर एक काल्पनिक दुनिया मे विचरण कर रहा था। जिस दुनिया म वह सबसे अधिक सम्मानित एव धनाढ्य व्यक्ति था । गजाधर या लेखन चूक गया था। उसके मस्तिष्क ने उसका साथ देना बद कर दिया। वह सिफ रयालो वी दुनिया में खोया रहता। अचानक एक दिन गजाघर की इस काल्पनिक दुनिया मे भूचाल आ गया। जब उसने असबार में पता कि अमला उसके शहर मे क्लक्टर वन पर आ गई है। उसकी विलुप्त स्मृतिया ताजा हो गई । सोये अरमान जाग उठे । एक दिन वह अमला में उसके निवास पर मिलने गया। अमला के नौकर-चाकर और शाही ठाठ देख कर गजावर दग रह गया। अमला उमे अप्रतिम सौदय की स्वामिनी लगी। अमला अभी तक कुमारी थी और वह एक रुग्ण तथा मरियल पत्नी का पति और दो बच्चो का बाप । गजाघर का सारा अहम रेत के महत की तरह ढह गया । उसका बरसा पुराना दब्यूपन जाग उठा । अमला के समक्ष वह अपने को अत्यधिक बौना महसूस करने लगा। अमला से वह ज्यादा बातचीत भी नहीं कर पाया। जल्दी जल्दी चाय सुडक कर वह कलक्टर निवास से बाहर निक्ल पाया। पद्रह साल बाद वह अमला से मिला था। उसे पूरी दुनिया वदनी हुई नजर आने लगी। उसका मन उवाट हो गया। वह अपन को दुनिया का सबसे बदकिस्मत और असहाय व्यक्ति समझने लगा। अव वह अपनी बनाई कारपनिक दुनिया के खोन मे वाहर आ गया था तथा जमान की सच्चाइयो से स्वर हो रहा था। उम दुनिया नमजा और फिजूल लगन लगी। गजाधर के दिन का चन और रातो की नीद फिर हराम हो गई । उमका व्यवहार बदल गया । खाना-पीना छूट गया। चेहरे पर दाढी बढ गई। और वह फिर से बैटूटा हरक्त करने लगा। कई दिनों से वह तनाव ग्रस्त बन रहा था। 79 और आज यह चलनमा । गजाधर के मित्र कमल न जब यह सूचना दी नर मुझे काई पाश्चर्य नहीं हुआ क्यानि यह ता होना ही था। एस जीनियस व्यक्ति जिनकी महत्वाकाक्षा अतृप्त रह जाय वे या तो पागल हा जात है या फिर ग्रामहत्या कर लेत है। गजावर की यह मौत भी अात्महत्या स तिमी मायने म कम नहीं थी। अच्छा हुना जो गजाधर चल बमा । मगर वह लिदा रहता तो उसका पागलपा हम सबका भी पागल बना देता।

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Uska Sapna

Author
Kamar Mewari
Title
Uska Sapna
File name
Uska Sapna
Text
OCR done
Citation
1965
Published
2011/03
Publisher
Sanmbodhan Prakashan Kankaroli Rajasthan
Language
Sanskrit
Pages
84
Library
Shree Jubilee Naagari Bhandar Bikaner
Classification
Literature
DLI number
551169
Barcode
4990010031937.00
Scanning centre
C-DAK, Kolkata
Digital publisher
Digital Library Of India
VMLT id
PCQWTiDHgJk
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