Agarchand Bhairondan Sethiya Jain Parmarthik Sanstha, Bikaner

Prachina-gurjar-kavyasangraha-1

C.d.dalal,m.a. · 2011/07

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Published by Janardan Bakbaram Rudalkar, M. A., LL. B., Curator of State Libraries, Barods, for the Baroda Goverament, and Printed by Manlal Itcharsra Desai, at The Gujarati Printing Press, No. 8, Sassoon Bulldlogs, Circle, Fort, Bombay. Price Rs. 2-4-0 FOREWORD. Owing to the uplimely death of Mr. C. D. Dalal, M.A.; the editor, this work is published for the present without its Intorduction and Notes. We arc also aware that owing to the great pressure of other work that Dalat had on his hands at the time he was editing this work, he could not correct the several mistakes that have crept in the text. Scholars of old Gujarati are only a few in number and those few are not free or prepared to undertake to complete this work just at present. Hence this First Part of the work containing only the Text is sent out to the public with a promise that it will be followed soon with a Second Part which will contain a critical Introduction and Notes written by the veteran old Gujarati scuolat Mr. Keshav Harshad Duruva, B.a., of Ahmedabad. 10-4-20 J.S. KUDALKAR. Curator of State Libraries,

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प्राचीनगुर्जरकाव्यसंग्रहः अनुक्रमणिका. Page- पद्यसंग्रहाः 1, 8 ... ... ... ... 11 ... ... ... ... ... 27 38 41 ... ... ... ... ... ... ... 47 ... ... ... चिनगिरिराम নিহণ वरसमान्पहाणपण्पप समराराम मिथिलिभरपाणु जासामिपरिष ममारािसु पएलीराम ... 59 ... ... ... 62 ... ... ... ... 07 ... ... ... ... ... ... ... ... ... 74 ... ... 78 ... ... एदामा এতে ... ... 83 ... ... ... ... ... ... मम्पन्धमाहि ... भीने मिनापाणु ... 86 गद्यसंग्रहः ... ... 87 ... ... ... ६8 ... ... ... ... ... ... 82 भाराधना ... ... ... ... ... 9 ... भनिचार मताधिनमस्कारस्तान ... 9 ... ... ... ... ... 13 ... ... ... ... ... नवसारध्याख्यानम् भतिचार पृप्तीपदचरित्र सारतरपटावरीपटपमानि 2 APPENDICES. Page. 1 ... ... 8 ... ... ... ... ... . 10 ... ... 12 ... ... ... 15 ... ... ... ... I श्रीरसपावतीधयापारर्णनम् II रेवाप्पसंखो IIT मन्तिप्तर. IV समयमतमानीकरः V सामः VI भमिकादेवला. VII पीगिरिनारा TII Inscription of the Reign of Alapkhan in the temple of Sthambhana Pirsranatha at Cambay IX Inscriptions on the Satrunjaya Hill pertaining Samarl's installation of the image of Adish rara X पाराण 17 ... ... ... 19 ... ... ... 22 23 ... ... ...

ॐ
प्राचीनगूर्जरकाव्यसङ्ग्रहः
प्रथमो भागः
रेवंतगिरिरासु
परमेसरनित्येसरह पयपंकय पणमेवि ।
भणिसु रामु रेवनगिरे अंयिकदिपि सुमरेवि ॥१॥
गामागरपुरवणगहणसरिसरपरि सुपपसु ।
देवभूमि दिसि पच्छिमह मणहरू सोरटदेस ॥२॥
जिणु तहिं मंटलमंडणउ मरगयमउडमहंतु।
निम्मरसामलसिहरभरे रेहद गिरि रेतु ।। ३ ।।
ससु सिरि सामिउ सामलर मोहगसुंदरमाम् ।
जाइयनिम्मलकुलतिलाउ नियसद नेमिफुमारू ।। ४ ।।
तसु मुहदसणु दसदिसि वि देसदेमंतम संघ ।
आवह भावरसालमण हलि रंगतरंग ॥५॥
पोरयाफुलमंडणउ नंदणु आसाराय ।
यस्तुपाल घरमंति तहिं तेजपालु दुइ भाय ॥ ६॥
गुरजरधरधुरि धयलफि धीरधवलदेवराजि ।
विए बंधवि अवयारियउ समू इसममाझि ॥७॥
नायलगच्छह मंडणा विजयसेणरिराउ ।
उपएसिहि बिहु नरपवरे धम्मि परिउ दिदु भाउ ॥८॥
तेजपालि गिरनारतले तेजलपुन नियनामि ।
कारि गढमढपयपवर मणहरू घरि आरामि ॥९॥

प्राचीनगूर्जरकाव्यसवहः
तहि पुरि सोहिउ पासजिणु आसारायविहारू ।
निम्मिउ नामिहि निजजणणि कुमरसरोवर फारु ॥ १० ॥
तहि नयरह पूरवदिसिहि उग्रसेणगढदुग्गु ।
आदिजिणेसरपमुहजिणमंदिरि भरिउ समग्गु ॥ ११ ॥
वाहिरिगढ दाहिणदिसिहि चउरियवेहिविसालु ।
लाइकलहहियओरडीय तडि पसुठाइकरालु ॥ १२ ॥
तहि नयरह उत्तरदिसिहि सालथंभसंभार ।
मंडण महिमंडल सयल मंडप दसह उसार ॥ १३ ॥
जोहउ जोहड भवियण पेमि गिरिहि दुयारि ।
दामोदर हरि पंचमउ सुवन्नरहनहपारि ॥ १४ ॥
अगुण अंजण अंबिलीय अंबाडय अंकुछु ।
उंयम अंबम आमलीय अगम असोय अहहु ॥ १५ ॥
करयर करपट फरुणतर करवंदी करवीर।
फुहा कहार कपंय कर फरय कदलि कंपीर ॥ १३ ॥
येपटु यंजण्टु यउल यही घेटस यरण विहंग।
यामनी योरिणि विरह पंसियालि यण यंग ॥ १७ ॥
मॉममि मिचलि मिरममि मिथुवारि मिरचंड ।
मगल मार माहार मय मागु मिगु मिणदंट ॥ १८ ॥
पलपलकसमिप रेहद नादि यणराइ ।
महि उनिलनलि घम्मियह उहद अंगि न माइ ॥ १॥
बोलावी मंवहनीय कालमेघगरपंथि।
मन्दाविप नहिं दिन पीय यातपाल यरमंति ॥२०॥
(प्रथम कम्)
इविटि गुरदगे रिसरापविष्णु ।
कृमारा मान्दु जिणमामणमंहगु ।
मेग मंदारिनो मुग्याटियो।
अंदा मि मिरिमालकृमगंभयो।
पाज मुशिमाल निगि नरिग।
अंधान पाय माविय ॥१॥

रेवंतगिरिरामु
धनु सु धवलह भाउ जिणि पाग पयासिय ।
पारविसोत्तरवरसे जसु जसि दिसि यासिय ।
जिम जिम घडई तडि फडणि गिरनारह ।
तिम तिम अडई जण भवणसंसारद ।
जिम जिम सेउजल अग्गि पालाट ।
तिम तिम कलिमलु सयलु ओहह ए॥२॥
जिम जिम घायद घाउ तहि निज्झरसीयलु।
तिम तिम भवदुहृदाहो तरफ़णि तुइ ।
निपल फोइलफलपलो मोरफेकारयो ।
सुंमए महुपरमहुरगुंजारवो।
पाज घडतह सावयालोयणी।
लापारामु दिसि दीमए दाहिणी ॥३॥
जलदजालयवाले नीझरणि रमाउलु ।
रेहद उनिलसिहर अलिकमलसामलु ।
पहलयुष्टधातुरसभेउणी।
जत्य उलदलइ सोयन्नमद मेउणी।
जत्य दिप्पंति दिवो सही मुंदरा।
गुहिर यर गम्य गंभीर गिरिवंदरा ॥४॥
जाइ कुंदु चिहसंनोज कुसुमिहि संकुलु।
दीसह दस दिमि दिवसो किरि तारामंडलु ।
मिलियनरलयलिदलकुमुमालहालिया।
ललियसुरमहियलपचलणतलतालिया।
गलियथलकमलमयरंदजलकोमला।
विश्ल मिलयट सोहंनि तहिं मंमला ॥५॥
मणहरघणवणगहणे रसिरसिय किंनरा।
गेउ मुटुम गायंतो मिरिनेमिजिणेमरा।
जत्य सिरिनेमिजिणु अच्छप अनारा ।
अमुरमुरउरगनिरयविन्वाहा ।
मउडमणिफिरणपिंजरिपगिरिसेहरा ।
हरमि आवंति बटुभत्तिभरनिन्भरा ॥६॥

प्राचीनगूर्जरकाव्यमहहः
सामियनेमिकुमारपयपंकयलंबिउ ।
घरधूल वि जिण घन मन पूरइ चंछिउ।
जो भव कोडाकोहि
अन्नु सोवन्नु धणु दाणु जउ दिए ।
सेवउ जडकम्मघणगंठि जउ तिन्नए।
तउ उचितसिहरु पावित्रए ॥७॥
जम्मणु जोय जीविय तसु तहिं कयत्यू ।
जे नर उर्जितमिहरू पेरकइ वरतित्यू ।
आसि गुरजरधरय जेण अमरेसम् ।
सिरिजयसिंघदेउ पचरु पुहवीसम् ।
हणवि सोरटु तिणि राउ पंगारउ ।
ठविउ साजणु दंडाहिवं सारः ॥८॥
अहिणवु नेमिजिणिंद तिणि भवणु कराविउ ।
निम्मल चंदन विबे नियनाउं लिहाविउ ।
धोरविरकंभवायंभरमाउलं।
ललियपुत्तलियकलसकुलसंकुलं ।
मंडपु दंडघणु तुंगतरतोरणं ।
धवलिय वज्झिरुणझणिरिकिंकणिघणं ।
इकारसयसहीउ पंचासीय वच्छरि ।
नेमिभुयणु उहरिउ साजणि नरसेहरि ॥९॥
मालवमंडलगुहमुहमंडणु ।
भावडसाहु दालिधुखंडणु ।
आमलसारसोवन्नु तिणि कारिउ ।
किरि गयणंगण सूरु अपयारिउ ।
अवरसिहरवरकलस झलहलइ मणोहर ।
नेमिभुयणि तिणि दिइ दुह गलइ निरंतर ॥ १० ॥
(द्वितीयं कडवम्)
दिसि उत्तर कसमीरदेसु नेमिहि उम्माहिय ।
अजिउ रतन दुइ बंध गरुय संघाहिव आविय ॥१॥

रेवतगिरिगम
परमयमिण पणकलम भरिपि ति न्यणु करता।
गदित लेयमु नेमिवियु जलधार पटना ।।२।।
मंपादियुमण महिउ निपमणि मंनपिउ ।
हाहा विगु धिगु मह विमलयालगंजणु आविउ ॥३॥
मामिपमामलधीरपरण मह सरणि भवंतरि ।
म परिहरि आहार नियम लहड संघधुरंधरि ॥ ४ ॥
पपपीमि उपयामि सामु अविदिपि आयिय ।
पभणास पमर देयि जय जय महाविप ॥५॥
उयिणु मिरिनेमिवियु हलिउ तुरंतर ।
पचा मन जोएमि या तुं भवणि यनंतर ॥६॥
ण वि अंपि"रण यलाणइ ।
वियु मणिमउ सहिं आणइ ॥७॥
पदमभवणि देहलिहि देउ छुटि पुदि आरोविउ ।
मंचादिवि हरिमेण सम दिमि पाल जोहा ॥८॥
टिउ निपट देहलिहि देव मिरिनेमिफुमारो।
कुसुमयुष्टि मिल्देवि देवि किउ जइजइकारो॥९॥
परमाहीनिमह पुंनयतिण जिणु थपिउ ।
पच्छिमदिमि निम्मविउ भवणु भयदृहतर कपिउ ॥१०॥
नहवणयिलेवनणीय घट भपियणजण पूरिय ।
मंचाहिय मिरिअजितुरतनु नियमि पराइय ॥ ११ ॥
मयलवित्ति फलिकालि फालकल्लुसे जाणवि छाहिउ ।
मलहलंति मणिविवति अंबिकृम आइप ॥ १२ ॥
ममुद्दविजयमियदेविपुत्तु जायवकुलमंडणु।
जरामिंधदलमलणु मयणभइमाणविहंटणु ।। १३ ।।
राइमईमणहरण रमणु सिवरमणि भणोहम्।
पुनयंत पणमंनि नेमिजिणु.सोहगुसुंदर ॥१४॥
पस्तपालि परमंति भूयणु कारिउ रिसहेमा ।
अहाययमंमेयसिहरवरमंटपुमणहरु ॥ १५ ॥
फरटिजकु भन्देवि दुह वि तुंगु पासाइउ ।
घम्मिय मिर घृणंति देव वलियि पलोइउ ॥१६॥

६
प्राचीनगूर्जरकाव्यसदहः
तेजपालि निम्मचिउ तत्य तिहुयणजणरंजणु ।
कल्याणउ तर तुंगु मुयणु लंबिउगयणंगणु ॥ १७ ॥
दीसइ दिसि दिसि कुंडि कुंडि नीझरणउमालो।
इंद्रमंडपु देपालि मंत्रि उद्धरिउ विसालो ॥ १८॥
अइरावणगयरायपायमुद्दासमटंकित ।
दिठ गयंदमु कुंड विमलुनिज्झरसमलंकिउ ।। १९ ।।
गयणगंग जं सयलतित्यअवयास भणिन्नइ ।
पकालिवि तहि अंगु दुरू जलअंजलि दिनइ ॥ २० ॥
सिंदुवारमंदारकुरवककुंदिहि सुंदरू ।
जाइजुइसयवत्तिविनिफलेहि निरंतम् ॥ २१ ॥
दिछ य छनसिलकडणि अंबवणु सहसारामु ।
नेमिजिणेसरदिफनाणनिव्वाणह ठामु ॥ २२ ॥
(वृतीयं कडवम्)
गिरिगण्यासिहरि चडेवि अंववाहिं बंवालिए।
संमिणी ए अंबिकदेविदेउलु दीठु रम्भाउलं ए॥१॥
वजइ ए तालकंसाल वजह मदल गुहिरसर ।
रंगिहिं नचइ वाल पेखिवि अंविकमुहकमल ॥ २ ॥
सुभकर ए ठविउ उच्छंगि विभकरो नंदणु पामिक ए।
सोहइ ए ऊजिलसिंगि सामिणि सीहसिंघासणी ए ॥ ३॥
दावइ ए दुरूहं भंगु पूरह ए वंछिउ भवियजण ।
रकइ ए चउविहु संधु सामिणि साहसिंघासणी ए॥४॥
दस दिसि ए नेमिकुमारि आरोही अवलोइउं ए।
दोनई ए तहि गिरनारि गपणंगणु अपलोणसिहरो ॥५॥
पहिलइ ए सांपकुमार वीजइ सिहरि पन्जून पुण ।
पणमई ए पामहं पार भवियण भीसण भवभमण ॥६॥
टामि ठामि रयणसीवन विंव जिणेसर तहिं ठविय।
पणम पते नर धन जे न कलिकालि मलमयलिया ए॥७॥
जं फलु प सिहरसभेयअट्टावयनंदीसरिहिं ।
सं फलु ए भयि पामेइ पेसेविणु रेवंतसिहरो ॥ ८॥

रेवंतगिरिरामु गहगण ए माहि जिम भाणु पव्ययमाहि जिम मेमगिरि । बिहु भुयणे तेम पहाणु तित्थंमाहि रेवंतगिरि ॥९॥ धवलघय चमर भिंगार आरत्ति मंगलपईच । तिलय मउड कुंडल हार मेघाडंबर जापियं ए॥१०॥ दियहिं नर जो पयर चंद्रोय नेमिजिणेसरवरभुयणि । इद भवि ए भुंजवि भोय सो तित्थेसरसिरि लहइ ए॥ ११ ॥ चउवि ए संधु करेइ जो आयह उचिंतगिरे। दियिस यह रागु फरेइ सो मुंच चउगइगमणि ॥ १२ ॥ अठविह प जय करंति अठाई जो तहिं फरह ए। अठविह ए फरम हर्णति सो अठभवि सिन्झइ ए॥ १३ ॥ अंबिल ए जो उपवास एगासण नीवी करई ए। तसु मणि ए अध्इं आस इभव परभय विवाहपरं ॥ १४॥ पेमिहि मुणिजण असह दाणु धम्मियवच्छलु करई ए। नसु कही नहीं उपमाणु परभाति सरण तिणउ ॥१५॥ आवइ ए जे न उचिंति घर घरह धंधोलिया ए। आविही पहोयह न जंति निष्फल्टु जीविउ सासुतण ॥ १६ ॥ जीविउ ए सो जि परि घठ तासु संमच्छर निच्छणु प। सो परि ए मासु परि धनु यलि हीजद नहि यासर ए॥ १७ ॥ जहिं जिणु ए उजिलठामि सोह्गसुंदर सामलुए। दीसह ए तिहणसामि नयणसटूणउं नेमिजिणु ॥ १८॥ नीझरण चमर ढलंति मेघावर मिरि धरीई। तित्थह एसड रेपंदि सिंहासणि जयइ नेमिजिणु ॥ १९॥ रंगिहि प रमह जो रासु सिरियिजयसेणिरि निम्मपिउए। नेमिजिणु तृसइ तासु अंविफ पूरइ मणि रली ए ॥२०॥ (चतुर्य कडवम् ) ॥ समनु वनगिरिगगु॥

प्रागीनगुणाकालमवाः
नेमिनाथचतुष्पदिका
सोह्गसुंदर घणलाय सुमरवि सामिउ मामलबन्नु ।
सग्नि पति राजल चडि उत्तरिय बारमाम सुणि जिम बनरिय ॥१॥
नेमिकुमरु सुमरवि गिरनारि सिही राजल कमकुमारि ॥ आंकिगी॥
श्रावणि सरवणि फड़यं मेहु गन्नइ विरहिरि झिज्झइ देहु ।
विज्जु झबकह रकसि जेब नेमिहि विणु सहि महिया केम ॥२॥
सम्खी भणइ सामिणि मन झुरि दुखणतणा म वंछित पूरि ।
गयउ नेमि तउ विणठउ काइ अछइ अनेरा वरह मयाह ॥३॥
योलइ राजल तउ इहु वयणु नत्थी नेमिसमं वररथणु ।
धरह तेजु गहगण सवि ताय गयणि न उग्गइ दिणय जाय ॥४॥
भाद्रवि भरिया सर पिरकेवि सकरुण रोअइ राजलदेयि ।
हा एकलडी मइ निरधार किम ऊपिसि करुणासार ॥५॥
भणइ सखी राजल मन रोइ नीठुरु नेमि न अप्पणु होइ ।
सिंचिय तरुवर परि पलयंति गिरिवर पुण कड डेरा हुंति ॥ ६॥
साचउं सखि चरि गिरि भिजति किमइ न भिन्नइ सामलकंति ।
घण परिसंतइ सर फुति सायम पुण घणुओह डुलिंति ॥ ७ ॥
आसोमासह अंसुप्रयाह राजल मिल्हइ विणु नमिनाह ।
दहइ चंदु चंदणहिमसीउ विणु भत्तारह सउ वि परीउ ॥ ८॥
सखि नवि खीना नेमिहिरेसि मन आपणपत्रं तरं खय नेसि।
जिणि दिकाडिउ पहिलउं छेहु न गणिउ अभवंतरनेहु ॥९॥
नेमि दयालू सखि निरदोसु कोजइ उग्रसिणऊपरि रोस ।
पसुयभराविउ भूकर बाडु मुझु प्रियसरिसउ कियउ विहाड ॥१०॥
कत्तिग क्षितिग ऊगइ संझ रजमति झिझिउ हुइ अतिझंझ ।
राति दिवसु अछह विलवंत वलि बलि दय करि दयकरि कंत ।। ११
नेमितणी सखि मूकि न आस कायरु भग्गउ सो घरवास ।
इमइ इसी सनेहल नारि जाइ कोइ छंडवि गिरनारि ॥१२॥
फायर किम सखि नेमिजिणंदु जिणि रिणि जित्तउ लकु नरिंदु ।
फुरइ सासु जा अग्गलि नास ताय न मिल्ह नेमिहि आस ॥ १३ ॥

९ মামলায় পুmি मगसिरि मन्गु पलोगह पाल इपापरि पभणह नपणपिसात। जो मह मेनइ नेमिफुमार तसुणी घेल बहउ सथियार ॥ १४॥ पर फदामा तर मग्यि मिलिट फरिसि काइ तिणि नैमिहि हिल्लि। महिपावित जो फिर मालि हे हे फु फरइ टोहणकालि ॥ १५॥ अठभव सेविड सपि मह नेमि तसु जमाउ किम न फरेमि । अवगन्नेसह जद मद मामि लग्गी अमिम तोड़ ससुनामि ॥ १६ ॥ पोसि रोस मयि टिवि नाद राति राखि मरमपणह पाह। परइ मीउ नयि रयणि विहाइ लदिय छि६ मवि दुरस अमाइ ।। १७ ॥ ममि नेमि तू करतो मुनि जुध्यणु साइन जाणिसि सुधि । पुरिमरपणभरिपत्र संसार परणि अनेरउ फुड भत्ताम् ॥ १८ ॥ भोली नउ सम्बि परी गमारि परि अच्छतइ नेमिकुमारि । अन्तु पुरिसु फुइ अप्पणु नटइ गइयम सहि कुरासभि पडद ॥१९॥ माहमामि मारह हिमरासि देवि भणइ मह प्रिय लंह पासि । मा विशु सामिय दाइ तुसाम मयनयनारिहि मारह मास ॥२०॥ हरु सम्पि रोमि मह अरहित्यि कि जामइ धरणउ फग्नि । सउन पती जिमि माहरी माई सिद्धिरमणिरत्त नमि जाइ ॥ २१ ॥ फंनि धमना दियटामादि पानि पहीज किमह लसाइ । सिद्धि जाइ मउ फाइत योद्द सरसी जाउ त उससेणधीय ॥ २२॥ फागुण घागुणि पर पति राजलदुरिक कि तम रोयंति । गम्भि गलिपि हउँ काइन मूप भणइ विहंगल धारणिधूय ॥ २३ ॥ अजिउ भणिउ करि सम्वि पिम्मामि अछह भला वर नेमिहि पास । अनु मग्वि मोदक जउ नवि हुंति हिय सुहाली किन पंति ॥२४॥ मयाद पामि जइ पहिलउ हो नेमिष्टि पासि ततल न कोई। जह मवि घरउँ त मामल पीक घणविणु पियह कि चात नीर ॥२५॥ चनमामि यशसह पंगुरइ घणि पणि कोपल रहका कारह। पंचयाण करि धनुष धरवि येझइ मांडी राजलदेवि ॥ २६ ॥ जुह सखि मानउ मा यसंतु इणि विलिजइ जइ हुइ कंतु । रमियह नव नव करि सिणगार लिबइ जीवियजुष्यणसार ॥२७॥ सुणि सवि मानिउ मुगु परिणयणु नपि अपरि घिउ संधवषयणु । जह पटियना धुषार नेमि जीविय जुम्यणु जलणि जलेमि ॥ २८॥ २ प्राचीनगूर्जरकाव्यसवहः घइसाहह विहसिय यणराह मयणमित्तु मलयानिल बाद । फुधिरि हियडा माझि वसंतु विलवह राजल पिरिकउ कंतु ॥ २९ ।। सखी दुरफ वीसरिया भणइ संभलि भमरउ किम रुणझुणइ । दीस पंच थिरु जोव्वणु होइ खाउ पियउ विलसउ सहु कोइ ॥ ३०॥ रमणि पसंसह राजल कन्न जीह कंतु यसि ते पर धन्न । जसु प्रिउ न करइ किमइ मुहाडि सा हउं इकाज भुंडनिलाडि ॥ ३१ ॥ जिट्ट विरहु जिम तप्पइ सरु घणविओगि सुसियं नइपूरू । पिरिकउ फुल्लिउ चंपइविल्लि राजल मूछी नेहगहिल्लि ॥ ३२॥ मूछी राणी हा सखि धाउं पडियउ खंडह जेब घाउ । हरिय मूछ चंदणपवणेहिं सखि आसासइ प्रियवयणेहिं ॥ ३३ ॥ भणइ देवि विरती संसार पडिखि पडिखि मइ जादयसार । नियपडियन प्रभु संभारि मइ लइ सरिसी गढि गिरिनारि ॥ ३४ ॥ आसाढह दिङ हियर करेवि गज्जु विज्जु सवि अवगन्नेवि । भणइ चयणु उग्रसेणह जाय फरिसु धम्मु सेविसु प्रियपाय ॥ ३५ ॥ मिलिउ सखी राजल पभणंति चिणय जेम नमिरिय ग्यचंति । अउगी अच्छि सखि झखि मन आल तपु दोहिला त सुकुमाल॥३६॥ अठ भव विलसिउ प्रियह पसाइ किमइ जीयु सम्चि सुग्य न ध्राइ । हिव मिय सरिसञ्जीविय मरणु इण भविपरभवि निमि जु सरण॥३७॥ अधिक मासु सवि मासहि फिर छरितुकेरा गुण अणुहरइ । मिलिया मिय ज्याहुलि द्वय सउ मुफलाविउ उग्रसेणध्य ॥ ३८ ॥ पंच सीसइ जसु परिचारि प्रिय ऊमाही गइ गिरिनारि । सम्वीसहित राजल गुणरासि लेइ दिस परमेसरपासि ॥ ३९॥ निम्मल केवलनाणु लहेवि सिडी सामिणि राजलदेयि। रयणसिंहॉरि पणमयि पाय बारह मास भणिया मह भाय ॥ ४० ॥ नेमियमा सुमरयि गिरनारि सिही राजल कनयमारि । इति श्रीविनय चन्द्रमूरिकतनेमिनायपतु मदिकाः ॥

उवाएममालकहाणयउपय उपएसमालकहाणयछप्पय छप्पयछंद विजय नरिंद जिणिवीरहत्यिहिं घय लेविणु । धम्मदासगणि नामि गामि नयरिहिं विहरह पुणु । नियपुत्तह रणसोहराय पडिबोहणसारिहिं । फरद पस उवएसमालजिणवयणवियारिहिं । सयपंचच्यालगाहारयणमणिकरंट महियलि मुणउ । सुहभावि सुद्ध सिद्धतसम सवि सुसाहु सायय सुणउ ॥ १ ॥ रिसहनाह निरहार परिस विहरिउ अपमत्तउ । पडमाण एम्मास करइ तप गुणहि निम्त्तउ । अपर वि जिणयर दिरक लेवि तव तवइ सुनिम्मल । तिणि कारणि उपदेशमाल धुरि तप किय यहुफल । नियसत्तिसारि अणुसारि इणि तपआदर अहनिसि करउ । भो भविय भावि जम्मणमरणदुहसमुद्द दुत्तर तरउ ॥२॥ सव्य साहु तुम्हि मुणउ गणउ जग अप्पसमाणउ । कोद कह वि परिहरउ घरउ समरस सपराणउ । तिहुयणगुरु सिरियोर धीर पण धम्मधुरंधर । दासपेसदुव्ययण सहइ घणदुसह निरंतर । नरतिरियदेवउवसग्ग यहु जह जगगुरु जिणवर खमइ । तिम ग्वमा वंति अग्गलि करी जेम्म रिउदलवल नमइ ॥ ३ ॥ सव्य मुणइ जिणययण नयणउल्हासिहिं गोयम । जाणह जह वि सुपत्थ तह वि इच्छइ पहु कटु किम । भएकचित्त पवित्त पढम गणहर सुयनाणी । न करइ गव्य अपुय्य करवि मनि मन्नइ याणी। छंडीइ मान जानहतण विणउ अंगि इम आणीइ । गुम्भत्ति काह वि नवि मिल्हीइ ग्रंथकोडि जइ जाणीइ ॥४॥ दहिवाहणनिवध्य वीरजिणपदमपवत्तणि । चंदनवाल विसाल गुणिहिं गन्नद गुहिरप्पणि ।

१२ प्राचीनगरकान्यमहः अहनिसि रायकुंयारिसहस सेवई पय भत्तिहिं । जाणइ नाणनिहाण माण पुण नाणद चित्तिहि । दिणदिकिय देकिय आवतु द्रमक साधु सा ऊठि करी । अभिगमण नमण वंदण विणय सुणइ धयण आणंदभरी ॥५॥ चाणारसिनयरीनरिंद नामिहिं संवादण | पुर अंतेउर पवर अवर हय गय वह साहण । कन्नासहस सुरूव अछइ पुण पुत्त न इकाय । राय पत्त पंचत्त लच्छि लियइ रिज दुकय । नेमित्तिवयणि राणीज्यरि कुंयर जाणि पहिहिं चविउ । तिणि अंगवीरि अरि त्रासुवी रज्जवंध सहु राहविउ ॥ ६ ॥ कियसिंगारउदार अंग आरीसइ पिरका । पाणी पडी मुंद्रडी सयल तणु तिणिपरि दिकइ । अंतेउरआवासि पासि भववासि विरत्त। भरहेसर घरझाण नाण केवल संपत्तउ। एउ चकवादि विसयारसिहिं रमइ रंगि जणु इम गणइ । तसु अप्पकन्न अप्पिहिं सरित्रं किं परजणजाणावणइ ॥७॥ सेणिय करइ पसंस दुमुहदुब्वयणि निवारइ । रायरिसि कासग्गि रहिउ रणि अरिअण मारइ । सिरकन्जि सिरि हत्य घल्हि संजम संभालइ । मनिहिं बद्ध बहु पाप आप आपिहि परकालइ । गति कहइ वीर सत्तम नरय मगहराय अचरिज भयउ । तिणि समइ देव जय जय भणई प्रसनचंद केवलि जयउ॥ ८॥ भरहसरिसु यल झुज्झि युज्झ संजम अणुसरयु । कुण चंदद लाभाय ठाय तिणि कासग्ग फरयु । इह पानं नाण माण धरि घच्छर रहियु । सहइ मुत यह दुक तह विन हु केवल लहियु। नियवाहिनियंभिसुंदरिचयणि मयमयगल जब परिहरइ । रिसहेसरनंदणबाहुबलि सपल कन्न तरूणि सरह ॥९॥ फहिप इंदि अतिरूप सुणिय सुर भणदेसिहिं । पुहयि पत्त मन्त्रणइ रूप पेराई सुविसेसिहिं ।

उवएसमारकहाणयठप्पय १३ कियसिणगार सणकुमार नरनाह निरंतम् । हकारह अत्याणि जाणि आवि देसनरू। म्वणि देहि हाणि इम ययण सुणि रज छडि संजम गहिउ । सयसत्त परिस चारित्तथर सहह रोग लडिहिं सहिउ ।।१०।। फरह रन कंपिलनपरि छरहवंहनरेसर । जाइसमरणि जाणि पुण्यभयगंधव मुणिवर । योहइ बहु उपएस सहसि पुण तोइ न युज्मद । भोग भयंतरि घर तिण विसपारम मुज्झइ । सो यंभदत्त भणि किउ अंघ अधिक पानग फरी। संपत्तउ सत्तर सत्तमनरगिसु जि साधु पत्त सिडई पुरी ॥११॥ सेणियफुलि कोणियनरिंदसुप निवइ उदाइय । पाइलिपुरि गुरुभत्त रत्त पोमहसामाइय। ग्यत्तियपुत्त जाणि तिणि देसह फट्टिउ । उन्नेणि पन्नोपराप ओलगह अणिदिउ । इणि ययरि अवर अलईत छल परिस बार मत धारयुं । तिणि दुष्टि तह यि अवसर लहयि निव उदाइ निसि मारपु ॥१२॥ पंपापुरि सुनार नारिमयपंचद सामी। मासिमत्त अदरत्ति गेह नपि एंड फामी। तिणि मारी इक नारि अवरनारिहिं मो मारीउ । पदम भान नररूपि विप्पकुलि मो पुण नारीउ। सयपंच भन्न जे घोर तम परणि इफमा नारिहय। पहुपीरपामि पुच्छर सु नर जा मा मा मा विप्पय ॥१३॥ फोसंबी समि मगर पीर यंदर मरिमाणय । मिग्गय महासत्ति जंत चंदण नपि जाणा । निमि एकाही जाइ पाइ लग्गेयि यमापद । पटियनइ निपदोम रोम मिल्हा मिल्हायद । सुहभाषि शुरु फेयल भयु भुजग यिनाणिहि जाणियउ। जिम पपराणी म भवपार गय विनय अगि निम भाणिपाड १४॥ अनूपुमर पिलामभवणि परियोहर भन्ना। प्रभव पंचमयमुत्त परा सहिं परपणालाह।

प्राचीन गमागमन फगयनवाणुंफोडि घोदि प्राय सुटमणि। में पिरावि तसु गाणि मगल पहिगुम गाणि । सगीमअधिकमानामि रामगिहि मंगम लगा। मो दममि पंगमगणहरह मीम गरिमोयलि भएर ॥ १५ ॥ सुंरतुमरागिहिं रत्तपत्त गगग्गितिनगरिहिं । दास चिलारपुत्त जुत्तमणपरि पहुगोरिति । फुरि करीय करि ना पट अपिहिं अणुमरिउ । बाहर पत्त पुहि मिटि पुत्तिहिं परियरिउ । मो रिफि दिक्षि निहु अक्षरिति मागमीम इंटर फरम । कीदियाई कहि अदद दिवमि महरमारि दीमह परम ॥ १३ ॥ जापवपुत्त जिणिंदमीम दण गुणजुग्गह । अंतराय जाणिइ लेइ नियसद्धि अभिग्गह। चारवई छम्मास भमइ गुणि रमद समिडउ । मुक दुक बहु सहइ लहह आहार न सुदउ । मोदफसीहकेसरसहिय कर्म कृटि केवल कलिउ । संपत्त सिद्धि संपत्ति सुह तपनम् इम पुफिय फलिउ ॥ १७ ॥ हुँति जि पंडियपवर अवरदुव्ययणि न कृप्पड़ । ग्वंदगसूरिसुसीस जेम आयार न लुप्पड़ । पालयकयउयसग्ग लग्ग मण तीहं सज्झाणिहिं । जंनिहिं जीविय चत्त पत्त सवि सिद्धह ठाणिहिं । सो अग्गिव नरगिहिं गपउ वाडव भव भमिसिइ घणउ । भो भविय भावि इम कोह अरि खंतिखग्गि हेलां हणउ ।। १८॥ पुजा सुरवर पाय राय नितु नमइं निरग्गल । तपि सिज्झई नवनिद्धि सिद्धि सवि सरई समग्गल । तपह लेस हरिएसबलह जिम जगि जस होवइ । न कुलकम न पसिद्धि रिद्धि नवि तसु कुइ जोवइ । तिंदु जरक पयतलि लुलइ बहुवंभण घोहिय बलिहिं । कोसलियधुयपरिणीति जीय भजीय सुद्धि अच्छिपकलिहिं ॥१९॥ एसु साहुआचारसार जइ लोभि न हल्लइ । वघरसामि संपत्त नयरि पाडल सम तुल्लद ।

उपएममालपाणयपय सुणवि तासु गुणवत्तं रत्त धणसिट्टिकुमारी । कणयकोटिसंजुत्त पत्त सासई घरनारी। गुरुरयणवयणपडियोह सुणि सुद्धसीलसंजमि रहि । जिम तेणि मुमतिम मुफीद रमणि रयणफोडिहिं सही ॥२०॥ नंदिसेण दोहगनडिउ निधणभणसुय । भवयिरत्त चारित्त गहवि तव तवह अचम्भुय । घेयावचपसंम इंदकियकसिहिं पहुत्तउ । बंधिय अंनि नियाण सम्गि सत्तमि सो पत्त। दसचउरसारनरषयरधूयसहसबहुत्तरिरमणियर । सोहग्गसार यमुझेव हय हरिकुल यंसपपासकर ॥ २१ ॥ पत्त दिवसि चारित्त कन्हलहुबंधव रयणिहिं । गयसुकुमाल मसाणि रहिउ कामगि जिणपयणिहिं । चंभणि बंधवि पालि सीसि यइसानर दिहउ । सिरह सरिस सुषम्म हवि मुणि तरकणि सिडउ । तस दृदृदुरियभारभूरिय उयर फुट नरय गमत् । जिम सहिउ तेणि तिम संसह लह लछि सुपरफामह ॥ २२ ॥ थूलभगुग्ययणि कोसयेसाहरि पत्तउ । चित्तसालि पउमासि रहिउ रसविगहनिरत्तउ। पुग्ववेर मंभारि समर समरंगणि जित्तः । जिणसासणि जययंत मुहड सुपरिहिं विदित्तउ । खरग्बग्गधारमिरि संचरिउ सरिउ सीह जिम इफमन । जे सीलभाव दुडर धरई ने सुसाटु ते धन धन ॥ २३ ॥ तवमी इक उपकासगेहि गिउ गुरु अपमरिय। थूलभदमुणिमरिसु करिसु तय इम मनि मनिय । अत्यलाभ सुणि ययण रयणकंवल भणि चहा। सहाय अपत्य सुपत्य आणि थेमाकरि मिनाद। चंपेवि ग्वालि पष्टियोहिउ सुगुरपामि पत्तउ भणः । निंदीह लोफि सो गुम्ययण अणमाण हा जो कुणा ॥२४॥ गुणिअणसरिस गव्य म करि मरग्य मारि पमि। नहुनिव्यटइ ममन्य जद वि गदह गयमरकमि।

१६ प्राचीनगूर्जरकाध्यमहः सुहडभणी संभूतविजय दुधार ति पसंसिर । तसु सीसिहिं पुण थूलभद्दमुणियरगुण निसिय। तिणि कम्मि कोसवेसिहिं नडिक चडिउ इत्य दुतणनणइ । अपकित्ति अलिय अन्न वि अजस महिमंडलमाहि मणझगड़ ॥२॥ म करउ मच्छर माण जाण सरिसउ जगि कोइ । पूरउ पुण्य प्रभावि पावि पुण होणउ होइ । बाहुसुबाहु मुसाहु सुणवि गुण किड मनि मच्छर । तिणि होणतण पत्त पीढमहपीढिहिं दुहकर । परजम्मि वंभिसुंदरि सुधूय महि महिला महियलि मुणउ । सिरिरिसहभरहवाहुबलिहिं बिहुँ प्रभाव पुन्नहतणउ ॥ २६ ॥ अणगल नीर विपार सुहम जीवाइअरकण। इण कारणि बहुक अप्पफल कहइ वियस्कण। छट्टिहिं सद्विसहस्स वरिस तप तपइ अज्ञानिहिं । पारण पुण इकवीसवारजलधोइयधानिहिं । सो तामलि रिसि एरिस तपी मास दुन्नि अणसणि सरिउ । ऊपान्न इंद्र ईसाणि तिणि मुस्कमग्ग न हु अणुसरिउ ॥ २७ ॥ कंबलरयणविनाणि जाणि जग उत्तमर्चगिम । नरवरपिरकणि जाइ माइ पुत्तह पभणइ इम । आवि इक खण पुत्त पत्त सेणिय तुह मंदिर। लेउ क्रियाणां माइ ठाइ ठावउ जिणि तिणि परि । न प्रायाणउं कुह एउ सामि तुम्ह सालिभद्द य थयण सुणि। भववासविरत्त चरित्त लिइ छंडि सुक सहु कणयमणि ॥२८॥ अपवंतीसुकुमाल नयरि उज्जेणि पसिडउ । नलिणीगुलमविचार सुणवि तरुणि पडिबुद्धउ । अनसुहत्यिमुर्णिदहत्यि वय लेवि मसाणिहि । कासगि रहिउ सीयालि ग्बद्ध मण लग्गु विमाणिहिं । सुहझाणि ठाणि तिणि सुर हुओ रमणि बत्तिसे व्रत लिउ । तसु नंदणि तिणि धानकि पछइ महाकालदेउल किउ ।। २९ ।। रायग्गिहि मेयन्न भन्ननवयर विवहारिउ । पुष्यमित्त सुरि बोहि दिरक दुरितहिं लेवारिउ।

पालसणगर श्य मिना निरिमांना. मंदिरि । मान पर जर पर यस परत मिणि मग मिरि। रमा दिहिया नीकलीप दलिग धरणि निषण भपा। मग निमाण रक्षा परी धरी थान मिरिदि गप3 ॥१०॥ भणगिरिपाणिगुनंददगरि जाप जाईगर । एम्मामि पिपामि पधर मंपरा पपर। मम ममापि मुणिकधि गुति पापण अणुजाणीग । भरा गीगिरिमीम अति मयि ग पाणीप । माणगण मनि परिहरी मुगुम्रपण इम महाद । ने मुझ माधु मुनीण मपिगुणनिशाण गुम्पटि लाई ॥ ३१ ॥ गंगमगरि गिलाण पामि गंजमयिति राट् । जम्मान गम माम दा गुग्दाम निरिणा। वित्तवितार मषित पिर अंगुलि दिपंनिय । निम्पपाव मितु मरतु अगणु दीवय मणि चिनिय । मन मुनि अप गगुण निगुण भणयि गुरु परिभयइ । पारंपगार पण मा करि मम्मदिहि सुर मिररुवइ ।। ३२ ।। परमाण विरारंन नगरि मापत्यिहिं आयई। गांगाल पउगाल, आप मिन्धर भणाया। मंग्वलिपुतगम्य का पाठ पुभिाउ गामिहि । जिणयरसमुह मुफ नेउलेमा तिणि रीमिहि । पिति मुगुगपरिभय अगाः सुनफत्त मुनि विधि थपउ । निणि नेभि दह आराधना करवि मग्गि अच्युति गपउ ॥ ३३ ॥ नायियादि नरिंद नपरि मतंयी पएमी। पामीम यिारंत पत्त नहिं गणहर फेगी। भरपगमणि कचित्त मुगुम्बपणिहि पडियोहिउ । मायपधम्म सुरम्म करवि तिणि अप्पर मोहि । पहफालि काल परि मुजि मरिउ मरिआभमुविमाणि सुर । हम दुरिगदरत दुरिहिं हणी मयल सुरु माधइ सुगुरु ॥ ३४ ॥ तुरमिणिपुरीनारद दत बंभणफुलि यवन्न । माउलयानिगम्पिामि पुन्छ जसह फल ।

प्राचीनगर्भरकाव्यसहहः अंगपीड अंगमिय सुगुरु सचं चिय अपड् । जागि जीववधि नरय सुणवि सुजि कोपई कंपइ । अहिनाण जाण सरामदियसि मलप्रयेश मुहि तुझनणइ । दरिकन दुष्टभय परिहरिय धम्मपयण मुणि इम भणइ ॥ ३५ ॥ आमि मरीड़ मुणिंद भरहसुय नियवय संदह । कियपरियायगवेम रिसदपटुमरिम त हिंडइ । पदियोदइ बहुलोय दिरा जिगपामि लियारइ । अगदिशमि अमिफुटिल कपिल तसु पपण विचारह। नगु शिष्यतानि पुनयि फार उन्य उधि बहु धम्म छ। भर कोरिमागर भमि हुइ पोरगिण मउ पछ३ ॥ ३६ ।। पनामगि मला नया सय तुंगियगिरिगिरि । कार गरणहरिण रहा अहनिमि रिपिपरिगरि। जातिहार परा पनि मान पारद। हिमाल आणविशि मुणि गूगम आया । ओदिशा दान भी मुहलाओ विदगुण मनि मिया । गिरि पाडाद ममसाल निहं संभलोग गुग्गति या ॥३७ पामिद्धिमिलगामि दिनादिगा। दंग माजनालग लिभागि नि । वामिनाकार दावित पारिरि माद गमागानि पनि गि मामि गह मिला। मिनट तर मगद दिन ॥८। ममुभागरिकार रिमाममारमा । रामिागमाननिमारममा र मरि गारमा FAEEnfirming | frrrrrr मासा ना? मग नागिन"" परमपर। FireTaman यएममारकहाणयछापय १९ दीवअवधि कासग्ग करिय निचल हुइ पालह । दासी पुण दीवेल घल्लि चउपहर उजालह । पूरिय प्रतिज्ञ प्रहउग्गमणि परम प्रीति पामिउ पयर । सुकुमालअंग सुहझाणमण सग्गलोद संपन्न सुर ॥ ४०॥ सावय सागरचंद रहिउ कासम्गि महायनि । कमलामेलाहरणवैर नभसेन धरइ मनि । घल्लड मिरि अंगार सह वि मोझाणनिरत्तउ। पोसहयय हद पालि टालि दुष्ट सग्गि पाहत्राउ । सहति दुसह उयमग महइ म गिहत्य मुफमालतणु । सा अइडरचारित्तघर माह पेम न महनि पुण ॥ ४ ॥ चंपापुर अदारकोटिधणयह काटुंबिय । पोसह करि कामगि रहिउ निमि भुज आलंबिय । इंद्रप्रमंस असह्यात अमरहिं परिरिरुय । मरागइंदभुयंगधोररफमभय दरिकय । नहु पलिउ मेरुचूलाअचल कामदेय गिहयह सुधिर । पहुवीर पयामिउ महसमह सीसवग्गभग्गलि सुविर ॥४२॥ रायग्गिहि इक रंक अपद अदुरिकर अग्गइ । उनाणी जण जत्त पत्त तहिं भिरक सु मग्गह। अलहनउ अदरोमि दोमि नियम्मिहिं नरिउ । गरिसु लोग सगरम पम चिनिय गिरि पटिउ । टोलेद टोल परयतमणा गटयपाट सुणि नट्ट महु । पापाणि तेणि मी पंपिऊ नरयदुत पामि दुसटु ॥ ४ ॥ पडमाण पय लिड जाच घीजज घरमाल। मुंष्ट तुंर मंडेवि पुंटि बिलगऊ गोसालज। जिणवपणिहिं विधि साणी तेजलेल्या सपि साधी। सह अटुंगनिमित्त पद घिमिना मिण साधी । उम्मग्गारि अनरधरिउ गुग्दी गरविहिं नहि। मंग्यलिसुप मोघ फिरोम करि दुहमापरि दुत्तरि पटिउ ॥४४॥ हदपहारि पर पार जाइ फुसपटिमिडं चोरिहि । ग्वीरकनि धान विप्प मारिउ निणि घोरिहिं ।

. प्राचीनगूर्जरकाव्यसङ्ग्रहः वंभणभन्न सगम्भ हणिय बालक फुरकंतर । पिकवि भवयेरग्गि लेइ संजम दिपंतउ । संभरणअवधि मंडिय असण तिणि जगामिछम्मास रहि । अफोस बंधवह दुसहसह सिद्धि पत्त दुधम दहि ॥ ४५ ॥ वीरसेणसेवक सहसमल त्ति पसिहउ । कालसेनरिउराय जेण बिबाहिहिं बहउ । तिणि गुणि संग्यनरिदि किड सामंत विदित्तउ । घेरगिरि व्रत लेवि तीण अरिदेसि पटुत्ताउ । पयारिग पूरय बाहुबल कालसेनि फुटाविउ । सत्यमिरि सुरयर सरिउ कोह कह वि तम नाविउ ॥ ४ ॥ मायीनियरणयकेतुसुय मंदग नामिहि । शिश सेवि जिणकाप करइ विहरह पुरगामिहि । ग्रत लिहा तम ताप नेहि मिरि प्रत धरायद । म. वि अमर बंधुपागि कतीपुरि आवइ । मग यहिन मुनंदा रापथरि मग्गि जंतु तिणि दिह मुणि । नायरि अनीशंका परिय हरिप प्राण तम तिणि रगणि ॥ ४७ ।। दयगि दरमित गुदगी मपणातुरि । बंमदतनियादाण दापर समाह। मापन मंनि गुग्गर्मगि रमिट परमिति । किरिया शिरिय महिमशिरा गुण लद गुगंनिहिं । र कर को न यार भयगाप नगि । महियां जिम मातिय मगद का पर सहना ॥ १८ ॥ नेगलि निव कायल पउमापद राणी। मंत्री नलियम गनम पुहिल नाणी। मार मस मदिरा गर निगमभिमगा। गती मंनि कोधिएक गुण गाया। नानार समन मुनि गा गप माना किया। माना हिलमुग्याति परिपुरा लिपि ॥ रिम मनि माविमार पटुता गमरंगगि। परनिति गहिदिहिहिहिहिणि अममलयाहाणयहापय रोमि चदि रणि चका भरह भाइसिरि मित्हइ । धिग विसपारसि लुद्ध मुद्ध सासयसुह ठिहाइ । इम चित्ति चिंति मंजम सरल पाहुबलि फासगि रहिउ । भरहेसर पत्त अवज्मपुरि भायनेह कित्तिम कहिउ ॥ ५० ॥ भन्ना विसयविकारिभारि पइमारणि पहाइ । सरियत फलत भत्तभीतरि विस घालइ । रायपपसि सुधम्म रम्म पोसहवय पारिय । फरह पारण जार ताव तकणि पिसि धारिय । मुघझाणि ठाणि निअ आणि मण सग्गलोइ संपन्न सुर । दुधमचारि मा नारि पुण भमइ भूरि भव भीभर ॥ ५१ ।। पीरवयणि जाणेयि नरय सेणिप चिनइ मनि । कोणिय रन्न ठयेसु लेसु संजम जाई पनि । हलविवाह हार गुम्यगयवरसिउ दिद्धः । फूट करी कोणिपि रायसेणिय तप बडउ । नियताय फटपंजरि घरी ग्वाण पाण वे राय।। मयपंच घाय दिणि दिणि दियह पुत्तनेह परिस हवद ॥५२॥ पणियपुत्त चाणिया फवद यहबुद्धि वियाणइ । पंदगुत्तमाजिकलि पथ्यपनिय आणइ । तममरिमी अतिप्रीति परीय अरिकंटय दालिय। नंदनरिंदद रजनपरि पाइलि उद्दालिय । चिमकल जाणि परिणाविउ मो वि मित्त जमपुरि लयउ । नियमन फरवि विद्दष्टिउ पछद मित्तनेर परिस भयड ।। ५३ ।। परसुराम जमदग्गियुत्त रेणुपअंगुन्भम । कत्तविरिय नरनाह एणइ मामीसुय दृह्म । अपण पद हस रज्ज लेवि हत्यिणपुरि रहिपाउ। ग्वत्तिययंस असेस फरसुझालिहिं तिणि दहियउ । नियघरणि नट्ट पच्छन टिय तस सुभम सुय चयावइ । निहलइ म भणतणउ निययनेह परिस हवद ॥ ५४॥ अनमहागिरिमारि भूरिभवपापनिवारण । गिह जिणकप्पि फरंति तस्स तुलणा अहदारण ।

२२ प्राचीनगर कायसवादः कुलघरनियमहसयणसंग निस्सा सवि इंडिय। अपडियद्धविहारसार संजमगुणमंडिय । सावयघरि अन्नसुहत्यि गुरि गुणपसंस हरपिहिं करिय । अइआदर दिरिक सुकारणिहिं पाडलपुर तिणि परिहरिय ॥ ५५ ॥ सेणियधारणिपुत्त मेह भजट्ट विमुकिय । वीरपासि वय लिड बुन्हि निसि संजम चुधिय । पुव्वजम्म परिकहिय पुण वि थिर किद्धउ चीरिहिं । बहुजइजणसंघ सहई अइदुसह सरीरिहिं । सो रायसअवयंसमणि मणिन अप्प तृणसम गणइ । चापरइ विजययेमाणि सुह रहिउ सिद्धि घरअंगणइ ॥ ५६ ॥ चेडयधूयसुजिट्टसुद्धमहासइअंगुभम । विजाहरपेढालपुत्तु विजावलदुद्दम । खायगसम्महिहि अंग इग्यारइ जाणड । तह वि विसयरसरंगि अंगि अतिदृषण आणइ । उजेणि उमावेसावसिहि करवि फूड हेला हणिउ । सो सव्वइ सचई नरय गय विसयदोस परिस भणिउ ॥ ५७ ॥ यारचईपुरि पत्त नेमिपहु केवलनाणी । दसदसारनरनाह कन्ह निसुणइ जिणवाणी। सहसअढार मुणिंदचंद विधिवंदणि वंदद। नरयभूमि चिहुदुरफररक निम्मूल निकंदह । तित्ययरगुत्त पंधइ सुदृढ असुहकम्म हेला हरइ । पूजाप्रणामपंदणविणय सगुणसाहुसंगति करइ ॥ ५८ ॥ चंडमद गुग रद्दरोसि रीसाल विदित्त । उन्नणीउनाणि सगुणसीसिहिसिउं पत्ता । नवपरणीत कुमार हसिय पभणइ दिउ दिसा । मरि मीस तस चंपि केस लुचिय दिय मिरमा । मोमीसभावि मंजम लिया मगि लग्गि गुरु सिर धरी । निम सहइ धाय दृष्यपण जिम लहइ वेउ फेयलसिरि ॥१९॥ गपकलमें परिवरिउ सयर मुमिणइ मुणि दिर। निणि अहिनाणि सुसीससहिय पुण फुगुरु अणिहर ।

उपएममालाहाणयपये २३ निसि पंप अंगार मृगविण मन्नइ प्राणिउ । तय अंगारयमद हरि अभषिय इम जाणि । से मीस मवे निवपुत्तष्टय गरि फरह परफरभरिउ । तिहिं देखि सयंचरि आयते पुण्यजम्म नसणि मरिउ ।। ६० ॥ पुष्फयासुय पुष्फल भइणी माह भया। मुमिणि नरपत देवी पुष्फला पपमना । अग्निपसुपगुमानि वीणजंघापार जाणी। आणती सा भत्तपाण हय फेवलमाणी । पुच्ने गरि मह नाण फाहिमु पण गंगभीतरि फहद । सय दुष्टदेषि उवमग्ग मति मुगुरु तत्व फेवल माइ ।। ६ ।। मिडि परा मम्देषितपिदिविणु इणि आयणि। के विकरति पमाय ति पणि अजरममम पिणि । जिणि फारणि पुष्यमि जम्मि धापरलम्भीमहि । घोरिमंगि यह अंगि सहिए दुष्ट पाम्म पिनिवरि । सहभाथि पावि परिमुषामण मरलगार संतोगमप । जिणणि नाभिकुलगरधरणि रिमा शणि नियाणि गए ।। ६२ ॥ एसि पत्त परोप पुड सुहासिफि समाणा। अचोरयसमता पद फिषि ते मनि आणः । निहिमंपत्ति म पित्ति परपि पिपरमार सामग्गी परिहरिप पारिग पानग निर दंए । फरपंमुहनामिनग्गः पिपरित निनिय सुपरि । धरि धम्म रम्म उनमासहिय मुशमाए भपमाप करि ॥६॥ ममगभमगनियपुपरहिणि सुषमातिर पुमरी । पंपापुरि पारिसर पिहिं किर अमरी। फिर गण मम पामि रागिरता गपगमणी। रसदश्य येउ र निणि अणमण ममणी। पादिपमिमापि नपि मरणाप आणि पनि पानी। ओमहपिरमि सुजिगत कारि मन्यपाहि गरिणिती ॥१४" मुबहुमीमपरिपारगार मिनविदिता। महरापुरि मिरिमंगुरि मणिदिजिए।

२४ प्राचीनगरेकाव्यराट्वहः नयरग्वालि उप्पन्न जरक बहु दुक निहालह । सुविहियजणपडियोहकनि नियजीह दिग्यालइ । जिप्पह मुणिंद रसणिदियह अणजित्तइ परिम हुआ। जग्गह जि जोग जुगतिहिं मदा म म म मोहनिद्रां मुउ॥ ३॥ गिरिसुय ग्रहिउ पुलिंदि पुप्फसुय तयसी सेवह । सुयडा अडवीमज्झि अहद पकोदर वेवइ । इक भणइ लिउ मारि अवर पुण विणय पयासह । अंतरसंगविसेसि दोस गुण नरनइपासह । इम जाणि निगुणसंगति तिजउ सगुणमंग अणुदिण कर। झगमगह जेम जगमज्झि जस भवसमुद्द तरकणि तरउ ॥ १६ ॥ सिरियावयापुत्तमरि सुकमरि अणुपामि । सेलगभूरि पमायपंकि पडियर अइदुद्दमि । गया सीस सवि छडि पधा पंथग मुणि रहिउ । खामंतई पगि लागि पन्ववासरि तिणि कहियउ । मियमहुरवयणि सुनिपुणपणइ ठविउ सुडसंजमि स गुरु । सो सरि पुण वि चारित्त परि सित्तुंजय सिद्धउ सधर ॥ ६७ ॥ सेणियनंदण मंदिसेण वारस संवच्छर । वीरसीस वय छंडि वेस धरि वसइ समच्छर। दस प्रतिबोध्याविणु न लेइ आहार निरंतर । इफ न युज्झइ भणइ वेस दसमा तुम्हि सुंदर । इण बेसययणि पुण वेसधर चरण वरवि सुर संपजइ । श्य जस्स सत्ति देसुणतणी अहह सो वि संजम तिजइ ।। ६८॥ घरससहस तव कट्ट करिय कंडरियन सुद्धउ । अति दुट्टपरिणाम कामवश नरयनिवडर। अचिरकालि परिपालि सुद्ध संजम संपत्त। पुंडरीक सम्वट्टसिद्धि सुहयुडिनिमत्ता । यर दुक महवि नवि लह सुद्द अप्प दुति बहुसुग्व लहिउ । विष्ट बंधय एवड अंतरउ भावभेदि भगवति कहिउ ।। ६९ ॥ नयरि कुसुमपुरि राप भाय दुइ ममि सरप्पह । मसी न मन धम्म रम्म मन्नइ विमयासुह ।

उपमालपाणयउपय मपजपविण मा पत्त नरगिनीजह दुहतत्तउ । फरवि सर मुहपर सम्गि मत्तमह म पत्तउ । ममि र सरसुरजग्गलिहिं नणु तच्म्यि दुद दिसयउ । मो भणः जीव विणु मणु दहिहिं नरयदुरफ़ फिम ररिकवउ ॥७॥ सुग्गहमागपईच नाण ने दियई निरुप्पम । निहं गुम किंपि अदेय नत्यि जगमज्झि जगुत्तम । दिड जेम पुलिंदि मिवगजरसद नियलोयण । मिण सरिसं सुर यत्त फरह भत्तह दिय पोयण । फेयन दाणि तमइ न गुरु अंतरंगभत्तिहिं परइ । निणि कारणि बिहुपरि फरि विषय जिम वाहिरि तिम अंतरइ ॥७२॥ अवधार पंडाल घटिउ अभपटकरि कंपइ । दय नामिणी सुविन मज्झइम सेणिउ जंपइ । विणयविवन्निय विनकाल फरिवइ नवि जग्गइ । मिहासणि यइमारि भारि गुरु करि सो मग्गइ । ओ कहर विज ओ लहइ फल विहुह कब तस्कणि मरिउ । पण फारणि जिणमासणि विणय सुगुरु मीस अणुपामि करिउ ॥७२॥ दगएपर निदंडि तामलित्ती पुरि अच्छद। नापिनपामि मु विन लेवि देमंतरि गच्छइ । महिमा मोहिम पत्त दंड गयणंगणि रहियउ । पुच्छिउ नरवरि जाम ताम सबउ नवि कहियउ । गुम्लोपि कोपि विना गई गयणदंट गडपडि पडिउ । लज्जियउ लोकि हमिउ मयलि इम सु नाणनिन्हवि नडिउ ॥७३ ।। यंभण एक अनेककृडकवडाइनिमत्तउ । उज्जैणिहिं फट्टियउ देमि चम्मारि म पत्तउ । निहुं गामहं विद्यालि फरइ मप घेसि त्रिदंडी। भगतलोकघरमार मुमइ निसि सु जि पाखंडी। अहच हिउ हत्यि नरवरतणइ नयण कट्टि नडियो घणउ । बहु सुर अति सोगह मु चिर निंदइ नियफुहरकणउ ॥ ७४ ॥ दुरंग परदेय फुटिरूपिहिं पहु पंदइ । छींक फरड जव पीर नाम मरि कहि अभिणंदह । ४ २६ प्रागीनगरकाम्यममा सेणियप्रनि निर जीव अभयमति जापड विपरित कालसरपति कहइ म मरि म म जीविग अणुमरि । मगहेसर पुह ए करणु कवण पम परमन्य पुण। जिण भणइ विप्पसेयचरिय चिटु प्रकारि नरमाचरण ७॥ परि अंगमीद मरण सरण जिणधम्म धरिना। जियहिंसा पुण घोर घोरदुहहेउ न किन्नद । फालसरियह पुत्त सुलम जिम पाय निवारउ । परपीडा परिहरह तरह संसार असार । कुलकारण किं पि म लिकपउ गुणह रूप गुम्याडि घरउ । परलोगमग जाणउँ सुपरि कुपरि कुकम्म म आयरउ ॥ ७॥ हेजिड़ हित अरिहंत कह वि नवि प्राणि करावद । तं पुण दिइ उपदेस जेण किडइ सुख आयद । जं सुरवइ सुरवग्गि सरिंग एरावणवाहण । जं भरहाहिब रज्जसन भुंजइ सुहसाण । जे जं अवर वि सुरअसुरनरमुक सुरक माणइ घणउ। तिहुयणह मजिस तं सपल फल जिणवरउयएसहतण ॥ ७ ॥ खत्तियकुंडि जमालि वोरजामाइ ग्वत्तिः । सुईसणभत्तार सार वयभारपवत्तिउ । नवि मन्नइ किज्जंत किड इय आगमवाणी। निन्हयि तेण कुदिहि दुट्टि किय बहु गुणहाणी । नियकित्ति मुसिप सुर किन्विसिय मिलिउ मिच्छमइ मोहियउ। सयपंच साहु साहुणि सहस ढंकसट्टि पुण बोहियउ ॥ ७८ ॥ जिम मासाहस पंखि मुखिहिं मा साहस जंपई। घग्धवयणि पइसेचि मंस लिंतउ नवि कंपद। तिम अवरह उचएस दिति किवि फुडवयणकरि । पणि अप्पणि न करंति रम्म जिणधम्म तणीपरि। बेरग्गवाणि नड उच्चरइ जलाहि जालिं पाणी गलइ । इम कम्मभारि भारिय भणी जाइ भूर भवजलतलइ ॥ ७९ ॥ धम्मत्रीय जिणराइ आणि दोवंतर दिउ । अविरति सपल यि खद्ध देसविरते अध खहर।

२७
समगगम
पासत्धे पुण खुहि वित्ति ग्याइव सहु हारिउ !
संजमि ए मुभग्वित्ति सव्य यायीय घडारिउ ।
नि भेदि जीव ते फरसणी राजदंडि अप्प दहह ।
मुविहियमुणि रायपसाययसि मुग्न सुगालि ली लहइ ।। ८० ॥
इणिपरि सिरिउपएसमालफहाणय।
तयसंजमसंतोसविणयविज्लाइ पाहाणय ।
साययसंभरणत्य अत्यपय एप्पयदिहि ।
रयणसींहसरीससीस पभणइ आणंदिहिं।
अरिहंतआण अणुदिण उदय धम्ममूल मत्थह हुई ।
भो भविय भत्तिसत्तिहि महल सपल सचिलीला साउ ।। ८१॥
॥ इति श्रीउपदेशमालासस्थानापया ।
समरारासु
पहिला पणमिउ देव आदीसम सेतुजमिहरे ।
अनु अरिहंत सख्ये पि आराह यभरिभरे ॥१॥
सउ मरसति सुमरेवि मारयमसहरनिम्मलीय ।
जसु पयकमलपसाय मूम्पु माणइ मन रलिय ॥२॥
संघपतिदेसम्पूट भणिसु परिउ समरानणउ ए ।
धम्मिय रोल निवारि निसुणउ प्रयणि सुदायणउ ए ॥३॥
भरह मगर दुइ भूप गमायति त हा अतुलपल ।
पंध्य पुदयिमचंद तीरशु उधरह अनिमयल ॥४॥
जावडतणउ मंजोग हमउं मु मम मप उदए ।
समद भलेरइ सोह मंनि याहदेर उपजए॥२॥
हिय पुण नषी य ज पान जिणि दीहारा दोहिला।
पत्तिय पग्गु न लिनि माहसिया मासु गदा ॥ ६ ॥
तिणि दिणि दिन दिउ ममरमीहि जिणधम्मपणि ।
तमु गुण कर उद्योउ जिम अंधारद फाटिकमणि ॥७॥
सारणि अमिपतणीप सिणि पहावी मरमंडटिहि ।
किउ लजुगअपनार कटिजुगि जीत पाएरले. ॥ ८॥

في يوة نية هنر و هنرلند به 4 ، ال يعني مشية لأي من نرنطینه ها Hecta ilk de tubong and tegen heart at تجنيد منه وسي نشطة في عدة متياز ما ۱ عة بنيت شنط هو ما نيابة عن ا ا ، إلا كيمنننه ينلملرره بنية بأة بنع متعددة ما تتفتیغه ملفتة مني ليلة السلطالع ط ۱ و ۱۱ ممتنعة عدم مره سلسة مذوالء الله ما | عنتره اننونية ويطة به غزل انا لله ماله ما || لا لا تستكملو بلنه شوه للأرطاله لاله ما | منلنفطيتانيا عامة بؤلي مدينة ملاها بد | 16 شقة فية للسيطری را در ماه ها حملة نعة مخططة به واورئ رة ا / 4 || وفد يدخلننال فنية للعناية ا) نشیلنطرة ونفط الخللها خليطا ودر ژله به . 14 منية بعملعلاة وللغيه بنيليارد تي بها لة هل تعلمية عملية المعلم، وما ليللمبا ما 11 8 11 والعداز مدة ماليلل ولا ملغلې شوا ما | همدلته وشاليه الحالة به للسلعا ارنال مد 1 منية بالتسلسلين به الثوم الملا عدا دلار به نام جدا مثلية متمعا العطري مد ال غ || ملا بدنشتوالماردلعها للفن عللفنلنداد ها بليط بالعلم اور علاج مع الله ور بد 1 : 1 شعللت بتطلع به قل للملحنا بما لللللللللللنلا لنطنطنطنط ما ! طلالة بقنا ولغا من المعجزة ظ ط له مانغافلة للطظطها بطلة مهرع ا فيه ) पाहणरु मुप्रमोधु पुमनलोपद निलउ । कलिनुगि काला पालि चांद्रिण सरावरिहिं ॥९॥ ओमवालकुति चंदु उदयउ एउ समानु नही । মীনামঃ २९ ममगगगु पभाषा-रतनकुपि फुलि निम्मली य भोलीपुत्तु जाया। सहजउ साहणु समरसोह बहुपुस्मिहि आया ॥१॥ सहअलगद सुविचारचतुर सुविवेक सुजाण । रत्नपरीक्षा रंजवह राप अनु राण ॥२॥ तर देसल नियकलपईच ए पुत्र सधन । रूपवंत अनु सीलपंत परिणाविप फार ॥३॥ गोसलसुति आवासु कियउ अणहिलपुरनयरे । पुन लहइ जिम रयणमाहि नर समुद्रह लहरे ॥ ४ ॥ परासी जिणि पउहटा वरवसहि विहार । मह मंदिर उत्तंग पंग अनु पोलि पगार ॥५॥ तहिं अछद भूपतिहिं भुवण सतपणिदि पसत्यो। विश्वकर्मा विज्ञानि करिउ घोइड नियहत्यो ॥६॥ अमिपसरोवर सहसलिंगु इकु घरणिहिं कुंडलु । कित्तिपम फिरि अपररेसि मागइ आग्मंडलु ॥७॥ अज्ज चि दीसह जत्य धम्म फलिकालि अगंजिउ । आचारिहिं इह नयरतणइ सचराचर रंजिउ ॥ ८॥ पानसादि मुरताणभीषु तहिं राजु करेई । अलपग्वानु हीदअह लोय घणु मानु जु देई ॥९॥ साहु रायदेसलह पूतु तमु सेवह पाय । फला करी रंजविउ ग्वानु बहु देह पमाप ॥१०॥ मीरि मलिकि मानियह समझ समरधु पभणीजइ । परउवयारिपमाहि लोह जसु पहिली य दीजइ ॥११॥ जेटमहोदरि सहजपालि निज प्रगटिउ सहजू । दक्षणमंडलि देवगिरिहि किउ धम्मह पणिजू ॥ १२ ॥ घउवीसजिणालय जिणु टविउ सिरिपामजिणिंदो। धम्मधुरंधर रोपियउ घर घरमह कंदो ॥ १३ ॥ माणु रहिपत पंभनयरिसायरगंभीरे। पुण्यपुरिसकीरितितरंह पूरह परतीरं ॥१४॥ यभापा-निसुणऊ ए समइप्रभावि तीरथरापह गंजणउ ए। भवियह ए करणारावि नीठुरमनु मोहि पडिउ ए।

समरऊ ए साहसधीक वाहविलग्गउ वह अ जण । बोलई ए असमवीरू दृसमु जीपइ राउतवट ए अभिग्रह ए लियइ अविलंबु जीवियजुब्वणवाहबलि। उधरज ए आदिजिणवियु नेमुन मेल्हा आपणउ ए। भेटिऊ ए तउ पानपानु सिम धूणइ गुणि रंजियउ ए ॥ २॥ वीनती ए लागु ला वानु पूछए पहुता केण कने । सामिय ए निसुणि अडदासि आसालंबणु अम्हतणउए। भइली ए दुनिय निरास ह ज भागी य हींदृअतणी ए। सामिय ए सोमनयणेहिं देपिउ समरा देइ मानु ॥ ३ ॥ आपिऊ ए सव्ववयणेहिं फुरमाणु तीरथमाडिया ए। अहिदर ए मलिकआएसि दीन्ह ले श्रीमुखि आपण ए। पनमत ए पानपएसि किउ रलियाइतु घरि संपत्तो । पणमई ए जिणहरि राउ समणमंघो नहि वीनविउ ए॥४॥ संघिहिए कियउ पसाउ बुद्धि विमामिय यहयपरे । मामण एयर सिणगारु यस्तपालो तेजपालो मंने। दरिमण प यह दातार जिणधर्मनयण ये निम्मलाए। आइमी प रायसुरताण तिणि आणीय फलही य पयर ॥५॥ दमम पसणी य पुणु आण अवमरो कोई नही मसुतण ए। १६ जुग प नही य थीमासु मनुमाने इय किम छ । तर तुप पुनप्रकामु करि उयरि जिणवरघरम् ॥ ६ ॥ पर्पभाषा-मंधपतिदेमन्द हरपियर अनि घरमि मनो। पगमद मियमुरिपपकमलो ममरागरमहिनी। बीनती अम्हमी प्रमो अवधार पर। तुन्द पमाः माल किया मन्दि मनोरहनेक ॥१॥ मेनुजनीय जसरिया र भायो। पकमरोयनु आगार तुम्हि दिपा महार। मदनु पंरितु आदमु मावि आगमणि पहनः । गुगुरवपतु मनमाथि परिर गार भनि रूपा ॥२॥ रागमगि पर मदिपाया गया। जीपदागि जागिता जो पी. मग | समराग पातउ नामिहि मंनियरोतसुनणइ सुरज्जे। चंद्रकन्हई पकोग जिसर मारह यकज्जे ॥ ३ ॥ राणउ रहियउ आपुणपई पाणिहि उपकंटे। टफिय याहह गप्रहार भांजा घणगंटे। फलाही आणिप समरचीरि ए अतिबहुजपणा। ममुद्र विरोलिउ पाएगिदि जिम साचा रयणा ॥ ४॥ फूभारमि उप्रयु अउ निमांगमइनहरे । फलही देविउ धामियह रंगु माद न गहरे । अभपदानि आगलउ फरणारमपित्ती । गोत्ति मेन्दायह पदरालुआ आपद पदयितां ॥५॥ भांह आच्या भाउघणउ भविमायण पूजा । जिम जिम फलाही पूजिजए सिम सिम कलि भूना । पेला नाच नपलपरं घाघरिरघु झमकर । अपरिउ दैपिउ धामिपर फर चित्तु न चमयाह ॥ ६॥ पालीवाणइ नपरि मंशु फलही य पधायद । पालपंद्र मुनि येगि पयम कमठाउ फरावह। किं कपरिहि घटीय देह पीरमरायरमारिति॥७॥ मामियमूरति प्रकट शिप एप करित मंमार । मागी दीन्ह पधापणी य मनि हरपुन माए । देगलया. परिधि मह रलिपातु पाए ॥ ८॥ पचमी भाषा-संशु यशुमतिहि पाटि ययमारित्र। लगनु गणिउ गणपरिहि विचारित। पीमाहाराल पमारण देयए । परिघरमुनि मपि समाहे ए॥१॥ परिययमयि करी ये वि मागपिया। फे पिपम्मिपहरमि धम्मिप पारपा। यादिमि पाठपिप कुमपनिया। संग मिला यमली य समाइया ॥२॥ मुहगुगिपारिपामि रिसिपिर। संघपति पम्पनर अभिप जिम निषित ।

प्राचीनलंगामा कुलदेवत ममिया वि मुजि अवतरह । महब सेम भरई तिलकु मंगल करं ॥३॥ पोमवदि सातमि दिशमि सुमुहसिहि । आदिजिगु देवगलप ठपिउ सुनितिहिं । पम्मपोरी र पुरि धवल ह जुराया। कमािरि कामनुपुराण ॥४॥ गनिमगारगि गाडिउ गंगारए । गरगिरि गाविसाल निहालए। minा नगद रागिरा। ILalyuan فنلنوه أزلهما علللللللد | fgafmनिम मिलिग लोग गणा॥५॥ मला mo pratimfr ITU ITU" I मामिलागु अवताfree मुनिला मारी गंगा ॥ पोशाक निगाहगा। Liftinyutupura خشة تلة فن إحباط هاالنلا ) लामो मारता : मार मण सम्म नासिर ثمة هنئة بعيد الغيط وإبل YListrikin Haya سعينا لنهمه ي عنقه زد حقيبة معه قه بار jhiniskayi समरारामु आगेवाणिहि मंचरण मंधपति माहदेमला। युडिचंतु यापुंनियंतु परिफमिहिं सुनियन ॥३॥ पावाणिहि मोममीटु माहुसहजापूतो। सांगणुसार दणिगह पतु मोमजिनिजुनी। जोट परी असवारमाहि आपणि समरागम । पीप हीट गहुगमे जो जो संघभमुहकर ॥ ४ ॥ सेरीसे पुजिया पासु फलिफालिहिं मकली। सिरपेजि थाइउ धवलफए मंधु आयिउ मयली । धंधूफा अनिकमिउ ताम लोलियाणइ पटुता । नेमिमुवणि उपयु फरिउ पिपलालीप पत्ता ॥५॥ भापा-मंघिहि पाउरा दीन्हा सहि नपरपरिगरे । अलग अंगि न माप दीठ पिमलगिरें । पूजित परपतराउ पणमिउ घटुभत्तिहि। देमलु देयए दाणे मागणजणपंतिहि ॥ १ ॥ अजिपजिणिदजुहारो मनरंगि परपि । पणमइ सेटजमिहरी मामिउ सुमरेयि ॥२॥ पालीवाणइ नपरे मंघ भयलि प्रयेसु । हलममरायरतार किउ गंपनियतु । पानमहाप सहभाप सा आदिपर मिलेयि ॥॥ महजउ माहणु नीहि प्रिन्ट गंगप्रपाह । पासु अनद मिण पीरो पंदिउ सरसारिहि । पंपि करद जलयेलि मम भरिउ परनीति ॥४॥ सेनुजमिहरि परषि गंगु मामि ऊमाहित। गुललिमजिणगुणगीते सदेह रोमंपिउ । मोपलो पापा पागो भषदार भोलाया। माडीप नमिए मगदेषि मंनिभुषणि मंगु जाए ॥५॥ जिणप्रिया पूजेषी फलिए झारण। अशुपममररिहाई परला मदुपारे । मारणतलि परगने पणदाणि गंधप। भेटिर आदिनानाही मंदिर पाटमायो॥॥ १

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समराराम आगेवाणिहि संचरए संघपति साहुदेसाल। युजितु बहुपुनितु परिकमिहिं सुनिक्षलु ॥३॥ पाठेवाणिहि सोमसीहु साटुसहजापूतो। सांगणुसाह लूणिगह पतु सोमजिनिजुत्तो। जोड करी असवारमाहि आपणि समरागरु । घडीय हीड पहुगमे जोइ जो संघअसुहकर ॥ ४॥ सेरीसे पूजियउ पासु कलिकासिहि सफलो । सिरपेजि थाइड धवलकए संधु आवित सयलो। धंधूकर अतिमामिउ ताम लोलियाणइ पटुतो। नेमिभुवणि उछ करिउ पिपलालीय पत्तो॥५॥ सप्तमीभापा-मंघिहिं चउरा दीन्हा तहिं नयरपरिसरे। अलजउ अंगि न माए दीठउ विमलागिरे। पूजिउ परवतराउ पणमिउ बहुभत्तिहिं । देसलु देयए दाणे मागणजणपतिहिं ॥१॥ अजियजिणिंदजुहारो मनरंगि फरेवि । पणमइ सेटजसिहरो सामिउ सुमरेवि ।।२।। पालीनाणइ नयर संघ भयलि प्रवेसु । ललतसरांवरतीर कि मंघनियेसु । कानसहाय लहुभाय लहु आयिपर मिलेयि ॥३॥ सहजउ साहणु तीहि प्रिन्हइ गंगप्रवाह । पासु अन जिण धीरो पंदिन सरतीरिहिं । पंपि करइ जलकेलि सरु भरिउ घहुनोरिहिं ॥४॥ सेतृजसिहरि चडेवि मंधु सामि ऊमाहिउ । मुललितजिणगुणगीते जणदेहु रोमंचित । मोयलो घायए याओ भयदाहु ओल्हायए। माडीय नमिय मगदेवि संतिभुचणि संघु जाए ॥५॥ जिपाविइ पूजवी कयडिजररु जुहारए। अणुपमसरतडि होई पहुता सोटदुपारं। सोरणतलि घरसंते घणदाणि संघपत्ते। भेटिउ आदिजगनाहो मंडिउ पनीठमण्यो ॥ ६ ॥ vNE ३४ प्राचीनगूर्जरकाध्यसदद अष्टमी भापा-चलउ चल सहियडे सेजि चडिय ए। आदिजिणपनीठ अम्हि जोड़सए। माहसुदि चउदसि दूरदेसंतर संघ मिलिया तहिं अति अवाह॥१॥ माणिके मोतिए चउकु सुर पूरइ रतनमइ धेहि सोवन जवारा। अशोकवृक्ष अनु आम्र पल्लवदलिहि रितुपते रचियले तोरणमाला ||२|| देवकन्या मिलिय धवलमंगल दियह किंनर गायहि जगतगुरो। लगनमहरतु सुरगुरो साधए पत्रीठ करइ सिधसरिगुरो ॥३॥ भुवनपतिव्यंतरजोतिसुर जयउ जयउ करइ समरि रोपिर दिदु धरमकंदो। इंदुहि वाजिय देवलोकि तिहुअणु सीचिउ अभियरसे ॥ ४ ॥ देउ महायज देसलो संघपते ईकोतरु फुल ऊधरए । सिहरि घटिव रंगि रूपि सोपनि धनि धोरि रतनि वृष्टि विरचियले ॥५॥ रूपमय चमर दुइ छत्त मेघाडंवर चामरजुयल अनु दिन्नदुन्नि । आदिजिणु पूजित सहलकतिहिं कुसुम जिम कनकमयाभरण ॥६॥ आरनिउ धरियले भाबलभत्तारिहिं पुन्यपुरिस सरिंग रंजियले । दानमंडपि घिउ समर सिरिहि यरोसोवनसिणगार दियइ याचफजन ॥७॥ भत्ति पाणी य वरमुनि प्रतिलाभिय अचारिउ पादह दुहियदीण । धाविउ सुधम वितु सिडखेनि इंद्र उच्छयु करि ऊतरण ॥ ८॥ भोलीयनंदणु भलइ महोत्सयि आविउ समझ आयामि गनि । तेरहकह सरह तीरथउडाम यउ नंदउ जाय रविसमि गयणि ॥९॥ नयमी भाषा-संयवाछलु करी पीरि भले माल्हत जिप दरिसण पाय । सुणि सुंदर पूजिप दरिसण पाय । मोरटदम मं मंचरित मा० उंहे रयणि यिहाइ ॥१॥ आदिभक्तु अमरेलीयह माल्दं० आविउ देसलजाउ। अन्गर अल जवि मिला माहं मंडलिय मोरठराउ ॥२॥ हामि टामि उच्य दुइ माह गति जुना गंप। महिपालदेउ राउण्ड आयए माई मामुदउ मंघमणुरशु ॥ ॥ महिषु ममा बिउ मिलिय मोह मा किरि जना गोविए। जि अगंजिट नेशनपुरे मा० गरिर मंचमार्ग । सुणिः ॥ ४ ॥ पाथलीमावाहिका मामारी पगहमादि जिलारिवानिया ए मान्दं पाविहगंबदमाहिराणि ।

दामोदर हरि पंचमउ माल्हं० कालमेयो क्षेत्रपाल। राणि । मुबनोदा नदी तहि पहा माई तम्यरतण झमातु ॥५॥ पान पटना धामियह मा० प्रामि मि सुफुल पिलसंति । सुणि । उत्पीय पटिपए गिरिफाणि मा० नीपी य गति पोति ।।६।। पामि जादपरापमुयशु मा० प्रिनि प्रदक्षिण देह । मियदेयितु भेटिउ फरिउ मा० उतरिया मदमाहि । सुणि। पालम भरेपिणु गपंदमा मा० नेमिन्दियणु फरेइ । पूज महापन देउ फरिउ मा० सत्र घमर मेल्हेद ॥ ७ ॥ अवाई अपतीपणमिाहरे मा० माविपज्जूनि पर्दति । सुणि। महमाराम मनोहर ए मा० पिहमिय सयि यणराइ । सुणि। फोडलमा, मुगापणउ एमा० निसुणियइ भमरझंकार । सुणि॥८॥ नेमियामरतपोवनु एमा० दुह जिय टान लइति । सुणि। इमा भारधि निष्ठपणदुलभे मा० निसिदिनु दान दिपंति ॥९॥ ममुदयिजपरापफुलतिलप मा० धीननदी अवधारि । सुणिः । आरतीमिमि भविपण भणई मा० चतुगमिफेरडउवारि सुणि॥१०॥ जह जगु पपु मुटु जोड्या मा० ग्रिपति न पामिपइ तोइ । सुणि। सामलधार नमार फरे मा० पलि पलि दरिसणु देजि। सुजि०॥११॥ रसीपरंयपगिरि अमरिउ एमा० समरडो पुरुषप्रधानु । घोउ मीकिरि मांकलिप मा० राउर दिया यहुमानु । सुणि० ॥१२॥ दशमी भाषा-रितु अयतरिपर महि जि पसनो सुरदिपुसुमपरिमल पूरंतो समरह पाजिय विजयदया। मागुग्मेन्टमाइसच्छापा फेमपपुरयकार्ययनिकाया मंघसेनु गिरिमाह पहप । यालीय पपई तम्यरनाम पाट आयई नव नब गाम मपनीझरणरमाउसई ॥१॥ देवपटणि देवालउ आयद मंघह मरयो सर पूरापद अपूरवपरि जादि एफ हुई। महिं आयड मोमेसरशी गउरवकारणि गरज पहतो आपणि राणउ मृधराजो ॥२॥ पान फूल फापट ग्रह दीजो गुणसमरं फारु गणीजह जमाधिहि सिम लिंपिपए।

प्राचीनगूर्जरकाव्यसवहः ताल तिविल तरविरियां वाजई ठामि ठामि थाकणा करीजई पगि पगि पाउल पेपण ए॥३॥ माणुस माणुसि हियर्ड दलिजइ घोडे वाहिणिगाहु करीज हयगय सूझइ नविजणह। दरिसणस देवाला चल्लइ जिपासासणु जगि रंगिहिं मल्हा जगतिहिं आव्या सिवभुवणि ॥४॥ देवसोमेसरदरिसणु फरेची कवडिबारिजलनिहिं जोएवी मियमेलइ संघु ऊतरित। पटुचंदप्पहपय पणमेवी कुसुमकरंडे पूज रगवी जिणभुवणे उच्छत्रु किया ॥५॥ सिवदेउलि महाधज दीधी सेले पंचे वनसमिती अपूरवु उच्च्यु कारविउ। जिनवरघरमि प्रभावन कीधी जयतपताका रवितलि बडी दीनु पयाण दीयभणी। कोहिनारिनिवासणदेवी अंबिक अंबारामि नमेयी दीवि येलाउलि आविया ॥६॥ एकादशी भापा-मंधु रयणापरतोरि गहगहरा गुहिरगंभीरगुणि । आविर दीयनरिंदै सामुहर ए मंबपतिमय सुणि ॥१॥ दरपिउ हरपालु चौति पहुत ए मंधु मालबिफरे । पभई दीवद नारि मंयह ए जोमण असायली ।। भाउलां यादिन धादि येगुलद ए पलावि प्रिय घेटली ए ॥२॥ किमत सुपुतपुरिपु जोइउ ए नयणुलां गाल फरउ । निवारणा नेग्नि करेगु उतारिग ए कपरि उमारणाए। वडीय डीप ओहियलिया की पंधिपारी ॥३॥ सैर देयाट उमादि यइटर ए मंधपति गंयमहि । स्टहरिमागई आगामि प्रयह जाए विमान जिम । अलवरना और नयरंग गम माम ॥१॥ निमुद प्रवेमुदीमई पपरला पपारदर। नि अन्य माविहार REE माणा निणगुपण । सायंकर मारपशिकिए गपंग आदिभित्र।

समराराम दीटउ येणियच्छराजमंदिर ए मेदनीउरि धरित। अपूरयु पेपिउ संघु उसारिऊ ए पहली तडि समुदला ए॥५॥ बादशी भाषा-अजाहरवरतीरविहिं पणमिउ पासजिणिंदो। पूज प्रभावन तहिं करहिं अनिउ ए अनिउ ए अनिउ सफल सुएंदो॥१॥ गामागरपुरयोलिंतो यलिउ सेतुजि मंपत्तो। आदिपुरीपाजार पडिज ए पंदिप पंदिऊ ए पंदिऊ ए मग्देयिपूतो ॥२॥ अगरि फरिहिं चंदणिहि मृगमदि मंटणु फीय । फसमीराकुंकुमरसिहं अंगिहिं ग अंगिहिं ग अंगो अंगि रचीय । जाइयउलविहसेवनिय पूजितु नाभिमल्हारो। मणुयजनमुफल पामिऊ ए भरियज प भरियऊ ए भरियक सुकृतभंडारो॥ मोहग उपरि मंजरिय धीजी य सेजि उधारि । ""ठिय प समरऊए समरऊए समझ आविउ गुजरात। पिपलालीप लोलियणे पुरं राजलोयु रंजेई । हे पयाणे संपरए राणपुरे राणपुरे राणपुरे पहुचेई ॥ ४ ॥ पदयाणि न विलंयु किउ जिमिउ फरीरे गामि । मंडलि होईउ पाटलए नमियएनमिया नमियऊ नेमि मुजीपनमामि। मंसेसर मफलीयकरणु पूजिउ पामजिणिदी। सहजुमाहु नहिं हरपियउ ए देपिऊ र देषिक देपिउ फणिमणिपुँदो ॥५॥ इंगरि हरिउ न बोहि पलिउ गलिउ न गिरपरि गयो । मंधु सुहेला आणि मधपती ए मंगपती मंघपमिपरिहिं अपुग्यो। ६॥ मनण मन्त्रण मिलीय महि अंगिह अंगु लिने। मनु पिटमह उलटु पण मोटर नोडर माटर कठि ठयंने ॥ ७॥ मंत्रिपुप्रा. मीरत मिलिग अनु पवहारिणमार। मंघपनि मंशु बधावियाउ कंटिरिए कंटिसी र कटि पालिए अपमाल । तुग्गिघाटनरयरि य न ममरर फरा प्रयेमु । अणहिलपुरि घडामण: 7 अभिनयु । अभिनयुए अभिनय पुरनिपामch मंपचारिपारा पापित रिमाजिणिदी। प्रवदि साममि पहुन परे नंद नंदकानंद का पिपंदी ॥१॥ पामगरिति गणाग अगानियामा । सीसिहि अंपदयगरिहि रपिप ग रचिपका रपिप समरारामा। मार

३८
प्राचीनगूर्जरकाव्यसददः
पहु रासु जो पढइ गुणह नाचित्र जिणहरि देह ।
अवणि सुणइ सो बयठऊ ए तीरथ ए तीरथ ए तीरथजात्रफलु लेई ॥ १० ॥
इति श्रीसंघपतिसमरसिंहरासः॥
सिरिथूलिभद्दफागु।
पणमिय पासजिणंदपय अनु सरसइ समरेवी।
धूलिभद्दमुणिवइ भणिसु फागुवंधि गुण केवी ।। १ ।।
अह सोहगसुंदरख्ववंतु गुणमणिभंडारो।
कंचण जिम झलकंतकंति संजमसिरिहारो।
थूलिभद्दमुणिराउ जाम महियलि बोहंतः।
नयररायपाडलियमाहि पहुत विहरंतउ ॥२॥
परिसालइ चउमासमाहि साह गहगहिया।
लियइ अभिग्गह गुरह पासि नियगुणमहमयिा ।
अन्नविजयसंभूयसरि गुरु वय मोकलावइ ।
तसु आपसि मुणीस कोसवेसाघरि आवइ ॥ ३ ॥
मंदिरतोरणि आविषउ मुणिवर पिकेयी ।
चमकिय चित्तिहि दासडिय वेगि जाइ वधावी ।
बेसा अतिहि ऊनावलि य हारिहि लहकती
आविय मुणियररायपासि करयल जोडती ॥ ४ ॥
भास-धर्मलाभु मुणिवह भणिसु चित्रसाली मंगेवी ।
रहियउ मीहकिसोर जिम धीरिम हियइ घरेवी ॥५॥
निरिमिरि शिरिमिरि शिरिमिरि ए मेहा परिमंति ।
ग्वलहल बलहल बलाहल ए थाहला यति ।
अवशय यशव अवशय ए यीनुलिय शवाद।
थरहर थरहर धरहर । विरहिणिमणु कंपद ॥६॥
माहुरगंभीरमरण मेह जिम जिम गाजते ।
पंययाण निप फुसुमयाग निम निम साजने ।
जिम जिम येतक्रि महमहंम परिमल पिहसायद ।
निम निम यामि य परण लगि नियरमणि मनाया ॥७॥

मिरिलिभासागु मीपलकामलसुरहि पाप जिम जिम पाते। माणमटफर माणणि प निम तिम नापते । जिम जिम जलभरभरिय मेह गयणंगणि मिलिया। तिम निम कामीतणा मयण नीरिहि झलहलिया ॥८॥ भास-मेहारयभरऊलटि य जिम जिम नाचा मोर। तिम निम माणिणि पलभलाइ साहीना जिम चोर ।।९।। अइ भिंगार फरह पेस मोटइ मनऊलादि । रहपरंगि बहुरंगि चंगि चंदणरसऊगटि । पंपयकेनकिजाइफुसुम सिरि पुंप भरेह । अनिआउ सुकमाल धीरु पहिरणि पहिरंद ॥१०॥ सहलह लहलह लहलह ए उरि मोतिपहारी । रणरण रणरण रणरण ए पगि नेउरसारी। झगमग झगमग झगमग ए फानिहि वरकुंटल। सलाहल इलाहल झलाहल ए आभरणहं मंडल ॥११॥ मयणग्वन्ग जिम लहलहंत जसु घेणीदंयो। सरसर सरल उ सामलउ रोमावलिंदंडी। तुंग पयोहर उससह सिंगारथयफा। फुसुमपाणि निप अमियकुंभ किर थापणि मुपा ॥ १२ ॥ भास-काजलि अंजिपि नयणजुय सिरि संथा फाई। घोरीपावहिकांयुलिय पुण उरमंडलि ताडे ॥ १३ ॥ कमजुपल जसु सहलहंत फिर मयणहिंडोला । चंचल चपल सरंगचंग जसु नपणकचोला । सोहह जासु कपालपालि जणु गालिमसरा । कोमल विमल सुकंतु जासु पाजइ संग्यतूरा ॥ १४॥ लपणिमरसभरफूवडिय जसु नाहिय रहा । मपणराय किर विजपखंभ जसु ऊरू सोहा । जसु नहपल्लर कामदेवअंकुस जिम राजह । रिमिझिमि रिमिशिमि ए पापफमलि घारिप सुवाजइ ॥१५॥ नयजोवनविलसंतदेह नघनेहगद्दिष्टी । परिमललहरिहि मपमयंत रहकेलिपहिली ।

४० प्राचीनगूर्जरकाव्यसदहः अहरविंव परवालखंड चरचंपावन्नी । नयणसलूणी य हावभावबहुगुणसंपुन्नी ॥ १६ ॥ भास-इय सिणगार करवि वर जव आवी मुणिपासि । जोएवा करतिगि मिलिय सुरकिंनर आकासि ॥ १७॥ अह नयणकडस्कहं आहणए वांकउ जोवंती। हाव भाव सिणगार भंगि नवनवि य करंति। तह विन भीजइ मुणिपवरो तउ वेस बोलावइ । तवणुतुल्लु तुह देह नाह मह तणु संतापइ ॥ १८ ॥ वारहवरिसहंतणउ नेहु किणि कारणि छंडिउ । एयड निठुरपणउ कंइ मूसिउ तुम्हि मंडिउ । थूलिभह पभणेइ येस अह खेहु न कीजइ । लोहिहि घड़ियउ हियउ मज्झ तुह वयणि न भीजह ॥ १९ ॥ मह विलवंतिय उपरि नाह अणुराग धरीजइ । एरिसु पावसु कालु सयलु मूसिउ माणीजइ । मुणियह जंपइ वेस सिद्धिरमणी परिणेचा। मणु लोणउ संजमसिरीहिमुं भोग रमेया ॥ २० ॥ भास-मण कोस साउ कियउ नवलइ रायह लोउ । मूं मिल्हियि मंजमसिरिहि जउ राता मुणिराउ ॥ २१ ॥ उवममरसभरपूरियर रिमिराउ भणे । चितामणि परिहरवि कयणु पत्यम गिहे। निम मंजमसिरि परिवयि यधम्मसमुनल। आलिंगइ तह क्रांस कयणु पमरंतमहायल ॥ २२ ॥ पहिला हियहा कोम कहा मुख्यणफलु लीनद । सयणंतरि मंजममिरीहि मुह मुहिण रमीजह । मुणि योला जि मह लिगमं लिपउ ज हो । कपशु सु भच्छ मुवतले जो मह मणु मोदइ ।। २३ ।। भागनगारि कोगा अवगगिय थलिमामुणिराद । मा धारिम अययारिकरि पमकिप गिति सुहाद ।। २४ ।। आवलपंतु गु मोहरा जिशि माणिनियाहित।

अथमामिवाय माणन हग्गिण मपणसुभट ममरंगणि पाडिउ । फुसुमयुटि सुर फरह तुहि हुउ जयजयकारो। धनु धनु पटु जु यूलिभ६ जिणि जीत मारो ॥ २५ ॥ परियोहियि तर कोमयेस चउमासिअणंतर । पालिप भिग्गह सलिय पलिप गुरूपासि मुणीसरु । दुपारदुपारफारगु त्ति रिहि सु पसंसिर । मंत्रमनुनलजसु लमंतु सुरनरहं नमंसिउ ॥ २६ ॥ नंद मो मिरिपूलिभद जो जुगद पहाणो । मलिप जिणि अगि मालमहरइवल्लाहमाणो । परतरगठि जिणपदमररिकियफागु रमेव । गेला नायर नमामि रंगिहि गावेयउ ॥२७॥ । मिरियलिभरपागु ममत्तु ।। जंसामिचरिय जिण पाउवीमद पय नमेयि गुरुचलण नमेयी। जंयूमामिहिनण परिय भविउ निमुणेयी । करि मानिध मरमत्तिदेवि जिम रयं कहाण । जनमामिहिं गुणगहण संखेपि यपाणउं ॥१॥ जंयूदीपद भरहस्वित्ति निहिं नपरपहाण । राजगृह नामेण नयर पहुवि परकाण। राज करइ सेणियनरिंद नरवरहं जु सारो। तामुतणइ पुत्त बुद्धिमंत मंति अभयकुमारो॥२॥ अमदिणंतरि पझमाण विहरंत पहतर । मेणिउ पालिउ चंदणह यहुभत्तितुरंतु । मागि यहंतु माहाराज येस पेखेइ । भोगविरत्तउ पसनचंद बहुतयण तवेइ ॥३॥ धनु धनु माया पहरसि पसंसिउ घंदा । दुमुपययणि सो पलिउ ध्यानि कुमारगि चला। धम्मलाभ नवि दीयइ जाम मुनिहुर अभाओ। ६ ४२ प्राचीनगूर्जरकाव्यसवहः ईहं सहू को एक मानि रंको अनु राओ ॥ ४॥ सामिय वंदिउ वडमाण सेणीयं पूछीई। जइ पसनचंद हिय करेइ काल कीछे ऊपजड़ । मन जाणेविण पसनचंद सामी वोलीजइ । नरगावासह सातमए नीछई उपजड़ ॥५॥ वीजी पूछहं मणुय होइ त्रीजी अणउत्तर । दुंदुहि वाजी देवकीय चालीय तिहिं सुरवर । सेणिउ पूछइ सामिसाल कांहां जाईजइ । केवलमहिमा पसनचंद देवे कीजीजङ् ॥ ६॥ सेणिउ मनि चिंताचडिओ सामी वलि पूछ । जं प्रभु तम्हे बोटीयां तं अम्हे न बूझिउं । सेणिय तम्हि पूझियउं तमं तिसरं त होए। मणपरिणामह विसमगति जीवहं पुण होइ ॥७॥ केवलनाणउ भरहसेति केतूं यरतेसिद । मामी दापीउ विज्जुमालियउ छेदु होसिइ । घउमहि देवे परियरिउ चग्देवे सहीउ । अतिमहं दीसड देहकति सेणीनिति चटीउ ॥८॥ देवहं नवि हुइ पहु नाणु यउ किम होएसिइ । आजना दीह मातमए इणि नपरि चयेसिइ । किंकारण पुण पहकति किंख्यह अतिसः । फयणद धम्महतणइ भावियउ देवभइसउ ॥९॥ टयणि-महाविदेहतणः विजय धोतसोप नपरी । पद्मरथ नामेण राउ यनमाला धरणी। माम ऊपरि उपना पुत्र मुरलोयहांत । पर नामि मियकुमार यहगुणिहिं मंगुता ॥१०॥ पुम्बभवनातमा नहि मागरमणि पाहतु । आवीर पंदण मियकुमार यहुभरितुरंग। हर जागरन मुगिहिं ना, की मई दीटर। पर जन्म मापमवि मत मा: पहलइ ॥११॥ माहिमाम पालियर भय दिखा।

अपृमामिपरिग सा मई मुंफी सुरह रिदिपा फीणई लेवई। तु पितापिउ सिवकुमार अधिरउ संसारो। भवनिनामण रेडमि अम्दि मंजमभारो॥१२॥ माद न मेल्हई एकपूत मो मुनिहिं पाई। दृदयम्मेण मायएण जापवियोलाबीउ । पारि पारि दाम्म भगद अम्ह भणीउ कीजह । दुलभ घेटी मणुरजम्म जननिदि रापीजद ॥ १३ ॥ कारद धम्म मो मुणिहि जाम ससु यषण मनेई । बिष्टुं उपयासहं पारणइ ए आंबिल पाई। फासुपयेमण भत्तपाण धम्मो आणइ । मादि धीउ अंतेउरई सो मील ज पालइ ॥१४॥ नवफरयालीतीपधार फरमं सवि सटइ। निदणद मोहफंदपराउ भरपरीयण मोडह । यारहं परमहंतणइ अति आपूं पूरीजह । पंचमदेवलोकि सिवकुमार सो देव ऊपजइ ॥१५॥ करणह नारिहितणइ उपरि पह जीव चवेसिइ । फयण वापरतण फुलि एउ मंडण होसिइ । उमभदत्तसेठिहिं घरणि धारणिरि नंदण । होमिद नामिइं जंयुमामि तिद्वयणि आणंदण ॥ १६ ॥ ऊठोर देव अणादिड दरपिइं नाचेई । धनु धनु अमहतणां कुल पसु पुरा होसिह । चविउ विमाणह बंभलोय धारणिरि आविउ । सुमिणप्रभाविहं उसभदत्त अंगेहि न माईउ ॥ १७ ॥ जायउ पुट पहाण जाम दमदिसि उदयंतउ। यह नामिहिं घुसामि गुणगहण करंतु । अठयरीमा हउ जाम गुम्पामि पहतु । ब्रह्मचारि सो लियइ नीम भयवामचिरत्तर ॥१८॥ जोयणवेमह पहुतु जाम कन्ना मग्गायइ । बीजा ध्या पाठवा तस विवारा थय । मन देजितम्हि अम्ह देसु अम्दि इसरं करेश।

४४ प्राचीनगूर्जरकाव्यसङ्ग्रहः सांझहं परणी महह जाम नीछई व्रत लेसिउं ॥ १९ ॥ माय दुल्लंघीय तणई वयणि परिणेवर मन्नीउ । आठइ कन्या एकवार परिणीय धरि आवीउ । आठइ परणी भृगनयणी बूझवणइ बहटा । पंचसएचोरेहंसिउं प्रभवउ घरि पइठ ।। २० ।। नीद्र अणावीय सोयणीय आभरण लोयंता । ते सवि अछइं थंभीया दगमग जोयंता। प्रभवउ भणइ हो जंयुसामि एक साठि ज कीजम् । बिहुं विनापडई एक विन्न थंभणीय ज दीजद ॥ २१ ॥ हिय हूं कहि नवि ज लेवि पुण किस करेसो। आठइ परिणी ससिवयणी नोछई मन लेसो। रूपयंत अणुरत्त रमणि एउ एम चएसिइ । अणहंतासुतणी य आस मुझ जीय करसिह ॥ २२ ॥ गयटु अंगर नरहं होइ प्रभवउ चितेई । मंगरमि जर गय मन प्रभपउ पूई। मिडिरमणिऊमाहीया तम्हि मंजम लेमिउ । कम्गई विलय माइबप्प किम किम महमिउ ॥ २३ ॥ इंदिपाल नवि जाणीद ए को किम होमिड़। अदार नानां गकवि जयस्यामि कहे। पिन नम्हारा जंयुसामि किम नृपनि लहंशदं । पिंट पर सोयनगद ए ऊभा जोमिदं ॥२४॥ या मरवि भमुहुउ पुषजन्मिहणीनद । रणरि माया पिलातृमि तिणि धीर कीनर । अगहनामुदती ग माम महमिय। निा कामणि निम काटन भणा अपनरला कोशिर ॥२५॥ नारशिलाम कर देवि मगर । हत्यिावर का जिम भयगायर निप। बोनी कट कीनाराम गि। निजि वासिम पानाच पनि मि॥२५॥ विदुममा विगपगुफ आदा मि।

मंचूमामिपग्यि
इंगालवाहग जेम तुम्हि तृस किम न छोपद।
घोजी फलन भणइपि नाह जउ अम्ह छांडेसिउ।
तिणि जंयुकि जिम साणहार याहुसेद करेशउ ।॥ २७ ॥
उतर परि ऊतर यह य संसेवि कहीजई।
पिलखी हुई ते सब्धि पाल जंयूमामि न मुझई।
आमातम्बर सुपा नाम अम्हि इशर्ड करेगा।
नेमिहिमिदं राहमह जिम ययगण फरेगा ॥ २८ ॥
आठ कलयह चूहावीय पंचमयसिउं मभयउ ।
माइ बाप घेउ भणई ताम अम्ह माधुसरीसउ ।
व्यणि-मह पिहसइ सुविहाण प्रभवु विनयह जंयुमामि ।
सजनलोक मोकलावि तम्हिसि संजम ऐसि ॥२९॥
पण एक पडपाएयि राय मोकलावण पालीप ।
तु मुद्दडसमूह फरवि भुई कंपदं भडभरपाई ॥३०॥
जस भय धसकद राउ जस भय नींद्रन यपरीया।
पसउ प्रभवउ जाइ नरनारी जोयण मिलीय ।
पहत रापपारि परिहारिई यांलायीउ ।
येगिहं राउ भेटावि अम्हि अपडे उत्सुफमणा ए ॥३१॥
पुत्रातणउ यिश राय मुम्ह दरिमणि उमाहीउ ओ।
कारण जाणीउ राय येगिदि सो मेल्हापीउ ओ।
देटिन बंद राउ मभयउ देपी आवतार ।
माचर भटियाउ पुगपह आकृति जाणीद ए॥१२॥
रूपगुणे मंपत रायगमणिमन पोरनु ओ।
सोहा निमपंद जदय कोणी प्रणमीउ ।
नुतर अहसीय शरीर जा कोइ जणणोजाइ ।
नपणे एएं नीर संपेगजलहरि परिसित।
मामी पमि अपराध अम्हे लोक मंमायोया ए॥५॥
परिपज योलह राउ कोणी मनि भाणंदिपर।
घर पनुनी माइ इमिउ पुत्र जिणि जाई भो।
तो मोपलाची राउ चौरपाटी मासंपरए ।
मजनह कहीई पर अम्हे संजमदाडे ॥ ४ ॥

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समनिरामु सप्तक्षेत्रिरासु सपि अरिहंन नमेवी सिद्ध सरि उपाय । पनरकर्मभूमिमाह तीह पणमिय पाय ॥ १ ॥ लिणसासणहमाहि जो सारो चउदह पूरयतणउ समुधारो। समरिउ पंचपरमिष्ठि नयकारो सप्तक्षेनि हिव फहउ विचारो॥२॥ धुनु धुन ते जि संसारे जीहं जिणवम स्वामी । गुरु सुसाहु जिणभणि धम्मु सुग्गइगामी ॥ ३ ॥ वारि अगि दुलहु मणुजम्मु अनी अ विशेपिहि जिणवरधम्मु । सम्मन रयणु चिनि निचसद जीह सोहग ऊपरि मंजरि तीह ॥४॥ पुणु जिणसामणु दुलह जीय संभलि कथनु निरुपमु । नाणुपदाणु एकु जि जिनयरधम्मु ॥५॥ भरहम्पित्ति ग्वट्पटह धित्ति केवलनाणि जिणवर जपति । धनाढयपरहां प्रिन्नि ग्वंट होइ तहि धरमनामु नियरतन तोइ ॥ ६ ॥ उल्या निष्ठु ग्वंष्टि धित्ति केवलि हम आपइ । सीहमांहि दुनि पंदने पटिया पापट् ॥ ७॥ मज्झिम पंड इफ यहनी महिउ तेउ बिहुभागि पाछइ पडि । चउधर भाग धरमन लागे तेज जोईजइ मयमइ भागे॥८॥ ते अ नयाणयह भाग साह मिय्यातिहि जटिलं । धाकत कुमतिकुपोधियगुरुगहि पडिउं ॥९॥ थोडा जीव घेई दीसते जे जिणभणि मनिहि करति । हिय तिष्ट्रपणिहि सारु ममिकच पामिउ जीवि जिनमणिउ नयतच ॥१०॥ बार घरत नई पामिउ जे जिणयरि युत्ता। सुगइ निबंधण मत्ता जीय मुगनि दीयंता ॥ ११ ॥ प्राणातिपानवतु पहिल होई वीजउ मत्यवचनु जीव जोई। श्रीज प्रति परधनपरिहारो चउथइ शीलतणउ सचारो ॥१२॥ परिग्रहणउं प्रमाणु चतु पांचमह कीजइ । इणपरि भवह ममुद्दो जीव निधय तरीजह ।।१३।। छठ व्रतु दिसिरण प्रमाणु भोगुवभोगवन मातमद जाणु । अनरपवतु दंड भाटम होइ नवम वन मामायकु मोह ॥ १४ ॥ -- प्राचीनगरकान्यसहः देसावगासी दसमुं व्रतु नथी मूल । पोपधवतु इग्यारमउ संजमसमतूलु ॥ १५ ।। व्रतु बारमउं अतिथिसंविभागुउ तोह मुकतिनयर न न मागो । जे ईणइ मारगि चालइ संसारे धनु सक्रियारथ ते नरनार ॥ १६ ॥ समकितमूल व्रतु वारइ गहियधरमि पालेवउ । सप्तक्षेत्रि जिनभणिया तिह चित्तु यावेवउ ।। १७ ॥ सप्तक्षेत्रि जिन कहिया महामुनि वितु यावेजिउ विवहपरे । जिनवचनु आराधीउ अवक्रमु साधिउ लहइ पाम संसारुसरे ॥ १८॥ ससक्षेत्रि जिनसासणिहि सबली कहीजई। अधिक रिधि धनु द्रव्यु वीजउ तहि जि वावीजइ । तेहि क्षेत्रि यावेत्रणा थानकि लाभइ देवलोकी । कणनी थाहरु मुक्तिफलो पामउ निसंदेहो ॥ १९॥ पहिल क्षेत्र सु जिणह भुवण करावउ चंगू । जीछे महिमा करइ सहु श्रीयउविहसंघू । मूलगभारउगूढमंडपुछकुचउकोसहिउ । आगइ कीजइ रंगमंडपु जो पुस्लकि कहिउ ॥२०॥ तहिं आतरह बलामणु कीजइ आवेरउ । जिम जिनभवनह नालिमाहि दीसह नीकेरउं । उत्तंगतोरणु धंभयोग धांदु अतिनीकर । कहीपद नानाविधि रूपि साम चार सहि नीमलु जडिउ ॥२१॥ बिटु पक्ष फरती देहरी कीजइ अनिरूही। योजद मूर्ति जिनहतणी माहि तेयह तेवही। फगयकलम दंड घांटीई पज पूरीय किपजह । छोहपकतमामातु भलर जीय नीपाइजह ॥२२॥ ताहि जिनगरि कमाइ भला कीना अनिमुविधा। मारआर र प्राग प जो आयह मंपुर । नानां कृची मारली अभिनीमल कीजद। जर आपमह जाइगर मा मंगुट दीगड ॥२३॥ अनिमा जिला भुपशु शिरि गमाविमाशु ! दीमा गालियामराग माहिनिएपणुभाणु।

सप्तशेविराम फवणुरूप भीतरागतणु जोद कपणु विशेषु। अठ प्रतिहारि ज जिणाहतणइ वृक्ष होइ अशोक ॥२४॥ भामंडलुसुरकुसुमपृष्टिसीदासणुछ । भेरियमरदेचंगुणिहिण जोह कयणु प्रभुत्तू। ए घिति एमी पीनराग मेल्ही अपर न होई । सादिक जिनसेव करई नपि मगलइं जोई ।। २ ।। सर जिनजीर्णउडाग भघि जीव विशोपिदि करीयद । भागउ लागउ जिणह भुवणि तेउ मोह ममुडरिया। लीपिउ धरलीउ भीगु देह पीयासु लिपीजह । इणपरि भुपणु समारीय जन्मह फन्टु सीजह ॥ २६ ॥ अनीउ जु काई किंपि ठामु जिणभुयण मीदाइ । सं निशिई फरावीयए बहुफल योलाइ । आपणि मामिउ पीतरागु ईणपरि भणेह । जीर्णोद्धारहनणा पुण्य तेह अंगन होइ ॥ २७ ॥ घोज रोष्ट सुजिनह पिंयु ते इहां विचारो। मणिमय रयण सुवर्णमए विव रूपम कारी। हिब जिनभुवणह गृहीत्यदेवरा स पाहीमः । फोजद कणभिंगार कलम जे नीर भरीमह ॥ २८ ॥ सउ सोलमद फरापीया जिनमपन ठपीजह । पारद पीपलमद भला मिहमि पूजीजा । घरि देवालाई फराषिप नीकार मोहर । जी तिपणसरण गामि पूजीसह जिणपर ॥२९॥ सुगंधि नीरि मनाशु पर जिण जीणि आदि। से मंगारह कसमला माविकीपर विदिय । अंगदाणे गम करर मुफरां यमला। नियनिपसफिकरापिपा बीजे देवंगनुमां ॥१०॥ कीमा ओरतु रूपरा मिरार पारेपा। कपूरपर पार्टी कार जिनमुगि दवा। मुंण्ड मिणभुपणिहि धाति भनिनी पी। पालानी पंजणी पानी पी॥॥

५०
प्राचीनगूर्जरकाव्यसङ्ग्रहः
अतिसुगंधिहि सिरखंडिहि कपूरिहि आंगी।
कीजइ सामी वीतराग प्रभु नवनवभंगी।
कस्तूरिहिं कुंकुमिहि तिल निलाडिहिं सामी।
ते पुण वितपति करइ भली अतिनीकइ धामी ॥३२॥
तर आभरण चडावियइ सोवणमय घडिया।
होरे माणिकि मोतीए बहुरयणे जडिया।
अतिख्यड आभरणउ भल कीजद संपूरउ ।
नीक सिहर पूठि हतलि अनइ मसूरउ ॥ ३३ ॥
कानिहि कुंडल सिरि मुकुट किरि अगिउ भाणूं।
जाणे तिहयणि सयल लोक अभिनव बिहाणूं।
उरह माल कठि सांकल मुक्तावलिहार ।
नयणि निहालिन वीतरागु ख्यड सुरसार ॥ ३४॥
बाहुजुयलि बेउ बहिरग्या अतिनीका सोहई ।
टोलू श्रीवत्सु सारुयार भवियण मणि मोहइ ।
मोनाकेरी पालठी कीजइ जिनपत्ते ।
सोहइ वीजउर रूपडउं सामीजिणहत्ये ॥ ३५ ॥
इणि विवेकिहि यहु य विशेपिहि जिणवरपूज सलकणी य ।
करउ मनरंगिहि नवनयभंगिहि श्रीसंघनयणसुहामणी य ॥३९
एती अजोड आभरणनणी पूजा नीपती।
हिय आरंभिसु जिणह अंगि सुरहां कुसमन्त्री ।
कीजह फुसमे चंगेरीया पूज कारणि स्यदी।
पापरीइ दी देयकाजि अन्नइ घाजी एयडी ॥ ३७ ॥
रापपु केतकी लाइ सेवाग्री परिमल ।
यालि मिरीवाला अन् अनु करणी पाहल ।
मौलउग्री विधि पूजमाहि मोहइ अनिषंगी ।
विपति दीमह रूप निणि नयनयभंगी ।। १८ ।।
नीका कायम पूनमादि यरणफि मोहंती।
परिमानु पमरद पुसुमतानि पाउद विहगंती ।
बुद्ध अना मुपद या नई परिजाते।
एमे मुमि परउ पूज सुम्हि मिपणपरी ॥३॥

समझेनिगम सुरहउ सरूपउ यायची अनः पन्हार । सहपइ सोहइ वीतराग मामी सुरसार । नीलउत्री नागवेलि पानमाहि जा मोहद । ईणपरि पूजइ मामिमाल नरनारी धन्न ॥ ४० ॥ एहि रामणीय पूज ताइ नीकी मोहंती। तउ नक्षपाहतणी माल दीवाश चंगी य । रोलीयइ माहि भुपण जिणयिंचहरी । आणी फुसुमे पूजिया ने मयि मंग्यी ॥ ४ ॥ समोसरणु जो पूजीया जो सिसिपया। चिटु पग्नि दीमद पीतरागु जाहि मिटपणमाम् । तउ पूजा नीपली पूठि धूपउटगाउ प्लीजद । पीजणिय ऊरोपितु गुरु महि घंटी पानद ॥ ४२ ॥ धूप अगुग सातिवारमिलावती जि पीतः । दंदामणे अनिरुपडे जिणगुवणु पुंजीजम् । आरोरिहिं मंगम भली असय पउकीयट । दोदउ आग्ने फरउ भली प मंगलीक आट य ॥ ४ ॥ घडमाणु परफन्टसु अनह भद्दामणु एत्तू। दमणु नंदापरतु सहि साधिउ श्रीपत्र । अट मंगलीक तीण पाटि भरिपद जिनभागह। पणपरि जं धन थेपीद पलेयर सागर ॥४४॥ दीया कीजद जिनभुपणि एमपर दीजा। पमर दलंने पातरात नहि धनु ऐपीजद । ते उलोग काराषिपद सिणभुषणमगरे । पापाटा मरयर अलंग पीला सिनयारे ॥४॥ तोरण पंगुरपाली पारि गापि जिणभुपणि । पूजा मोर मह फोर पर माणि मिणि। पूजा जोरपा शिणा. मुगणितो गुरगुम भाग। साउ मंघिहि आप परीर सापिप ॥१८॥ परपर पेला परमभु मri उपसमि। संघपपशु मानपि मुगुर मिमि मि पाई।

५२ प्राचीनगूर्जरकाव्यसवहः तिणि वेलां बहसणां पाटि जोड़ पाटल्ला । चउकीवटि वासंति सुगुरु तर भावइ भल्ला ॥४७॥ वइसई सहइ श्रमणसंघ सावय गुणवंता। जोयह उच्छयु जिनह भुवणि मनि हरय धरता । तोछे तालारस पडइ बहु भाट पढ़ता। अनइ लकुटारस जोइई खेला नाचंता ॥४८॥ सविह सरीपा सिणगार सवि तेवड तेवडा । नाचइ धामीय रंभरे तर भावइ रूडा । सुललित वाणी मधुरि सादि जिणगुण गायंता। तालमानु छंदगीत मेलु वाजिंत्र वाजंता ॥४॥ तिविला झालरि भेरु करडि कंसालां वाजई । पंचशब्द मंगलीकहेतु जिणभुवणई छाजइ । पंचान्द पाजंति भाटु अंबर बहिरंती। इणपरि उच्छयु जिणमुवणि श्रीसंघु करंतर ॥५०॥ तर आरती पम्गुणउं कोडं आरती पटऊपरि। ऊठिउ संघपनि विधिहि सहिउ तर साही बिहुकरि । नीर लुण उतारिया कुसुम उतारी। मंधपति ऊटी सेमि भरई मदहत्यिहि माडी। मंधपति आरती हिया हुइ जउ यार घडेरी । आरती जोगी थांभली अ आणउ गमारी ॥११॥ पाद जिणगुण गाद पटर मह पाल लोक। श्रीगंधु सीह अदानु दियई जीह जेमा जोग। मारी आरती साद मंधपति मदहरमित । रोमांगीमारीमतहि जिणदंगणु दानी ॥ ५२ ।। मंगी मारीगण घट थानर गई। श्रीगंधु करा प्रमारना जिगमागि गई। ना विधि वांदिया पामराग श्रीगंगु मारी। मुशलमंटना मगजीविदि भरिणत ॥५॥ जिन मुषायां गरोद दिया। ने गायकगविण्यमविदोपिदिगदिया।

सपशेनिगम
५.
अनि अ ज पाई कोई ठामु महइं घीसरिपउं ।
तेउ तुम्हि भविप फरावि जि अ सहइ सांभरियां ॥५४॥
उप जिनभुवयणि हरपि नियमणि करइ संघु जयवंत ।
नितु हिव श्रीजउ क्षेत्रु कहिस पवितू सुणउ जीय जे जिणभणितृ॥५५॥
श्रीजउ क्षेत्र सु संभलए घरलोयणे जं भणि धीयराइ ।
गुणगंभीर सो जिणह ययणु मृगलोपणे तसु नवि ऊपम फाइ ।। ५६ ।
वचन इकेका मूल नही परलोयणे जं बोलइ भगवंतु
निहु भुवणे पूडामणिय मृगलोयणे सह जाणइ अरिहंतु ॥५७||
पट फायण व्याप जिनवचनतणउ पर० युज्झइ लोकु अलोक।
सर जि सिद्धत जसलाहीमा एमृग० देभइ सिद्धिसंजोगु॥१८॥
गणघर फरद जं पुन्यधर पर० सुपफेचलिहि करंतु ।
दसपूरयधर जं करइ मृग० तं भणियउ यह सिदितु ।। ५९ ।।
बिहु भुवणदतण जाणियह वर० आगममादि विचार ।
घउदपूरय इग्यार अंग मृग० करइ गोतमु सुतिहाम्॥६० ॥
सत्रहार तहि निउछणा ए पर० जिणि जाणिउ एउ सूत्र ।
विपदी आपो य पीरनाधिद मृग० आप गोतम यूतु ॥ ११॥
फेवलनाण युच्छिति गयर पर० गया सवि पूरवधर ।
ने टुंता गुरु प्रज्ञघण मृग० गया सुते मुनिवरा ॥ २ ॥
अल्पमजह नयि थाहरण पर० जिणययणुं निरूपम् ।
मीण कारणि श्रीसंघ मिलीय मृग० पोधे ठवीउ आगमु ।। ६३ ।।
भक्षाभक्ष सो युझिया घर० अग्नी गम्मागंमु ।
कृत्यायन्य परीछियए मृग० जाणीयद धर्माधर्मु ॥ ६४ ॥
धन जीवी लाहुउ लिउ ए पर० युज्झियह एह विचार ।
श्रीमितु लिग्यावियए मृग० जोउ निष्ठभुषण साम् ॥६५॥
श्रीजउ क्षेट इस यावीया पर० चित्ति मंयेगु धरेउ ।
येथीउ वित्त लिम्बावियए मृग० श्रीसिद्धान्त जएउ ॥६६॥
चादंट पोय कराए पर० पोधीय नीकी य सोइ ।
जानलगइ सवि लाभ हुइ मृग पह विचार तूं जोह ।। ६७ ।।
पाठां दोरी पीटणां घर पर मिडांतह भत्ति।
पानीदोरा उतरीय मृगलोपणे पोधीय पोधीप सत्ति ॥ ६८॥

प्राचीनगरमाध्यमहरः
श्रीजउ क्षेनु इम यावउ निमाम लिया सामु ईनानणः |
जिम अट्टकम्म गंजीउ भवदुद भंजीर मिहिनयरि सेमिः मुणउ ।'
हिव श्रीश्रमणसंवभत्ति करउ जीव तुम्हि ययासक्ति ।
पहिलउ कीजह तोड़ पाययणा अनी य विशपिहि आयरियठवण
इणपरि श्रमणुभेनु याचीजइ निभय भवसायम नरीजइ ।
जे जिनयरि मुनि कहिया आगमि क्रियामार अनइ परतर मंजमि।
पंचमहव्ययभारु धरंता दस अनु च्यारि उपगरण यहंता ।
नव कल्पिइ विहार करता ते मुनि भणियद चारित्तयंता ।। ७२ ।।
जे मुनि पंच समिति छह समिना ग्रिाहि गुसिहि जे अछह गुपिता।
सीलंग सहसअढार यहंता ते मुनि भणियह उपसमना ।। ७३ ॥
जे मुनि निम्मल निरहंकार सदाचार दीसद सुविचार ।
जे धुरि जूता गणगच्छभारा ते मुनि भणिया गुणह भंडारा ॥ ७४
ईणपरि भल्ला क्षेत्र विशेपि दियउ दानु तुम्हि भवि हरखि ।
जिम तु छूटउ भवना भार पामउ सिवसुखु निम्पमसाम ॥ ७९ ॥
जे जिनआण सदा छइ रत्त वावीस परीसह सहइ अपमत्त ।
जिनआदेसु धरइ सिरिऊपरि ते जि महामुनि नमीयइ सुरवरि ।।७६ ॥
वईतालीसदोपसुविसुद्धा लियइ आहार जे जिणवरि दिट्ठः।
इंदियविपयव्यापिनवि गूचइ तवि नीमि संजमि ग्वण विनमूचइ ॥७॥
किसुं घणउं हां कहउ विचारो मुनिरयणगुण न लहडं पारो।
अनुव्रतु चालइ जे जिनआण ते मुनि भणीयइ मेरुसमाण ॥ ७८ ॥
प्रसंसोइ मुनि जिहि गुणि सहिया ते गुण जिणवरि श्रमणी कहिया।
एक विशेष पुण श्रमणी दीसइ यहइ उपगरण तोइ पंचवीसइ ।। ७९
चालइ खड्गधार तोइ ऊपरि सीलवंत ति नमीई सुरवरि ।
महासती जे छइ अपमत्त धारा भणइ हूं तेहि पवित्त ॥ ८० ॥
जीह जिनआण हियइ परिणमी ते श्रमणी तोइ मेरह समी।
जे सिद्धी जिणआण करती धनु धनु श्रमणी ते महासती ।। ८१ ।।
जिणसासणु जेहि य इम उन्नालिउ कसिमल पावपंकु पखालिउ ।
एउ साह अनइ श्रमणी वित्त वाविन धामी हुईउ सवित्त ॥ ८२ ।।
जा हिवडांतूं संपति अच्छइ इसीय धराप न पामिसि पछइ ।
जउ भलखेत्रिहि वित्त नवाविसि पाछपरभवि किसउ लुणाविसि॥३॥

দায়ি यराप टली पितु याविसि साग जगिमिम्मटमन्यु याइ फतवार । जउभरक्षेनि घरापहं पापिसि तउ इफुगुणद अर्णनगुणं पाथिमि ॥८॥ ए भलं क्षेत्रं जिनपरि कहिया पाये धम्मी भायणमदिया । सउ सोचे अनुमोदनापाणी जिम हुइ मफली गय निम्याणी ॥ ८॥ ईणपरि यावीजह मुनिग्येशु दीजई भत्ता पानु मनंत । विद्यादानुं जउ दीजई माम जिणु भणह तेह पुन्य नहीं पाम ॥ ८ ॥ ओपधादि मष्ट्र रामनउ में दीजई निपपरिन । अनिउज फाई मुनि उपगरह तं मृहातूं पहर करा ॥८॥ जंज मुनि जोअइ सूझन में मं दीनई निराधमई । गुरु आफ्ना फीजइ अभिगमण दीजह भक्ति भाभयंदनः ॥ ८८ ॥ यिनउ येयायघु अनीउ विशेपिउ कीजइ भाउ मामुनि देगी। पर्युपास्तितही कीजद घणीय जिम जिम जिनपरि आगमि भणीपाद पहज परिश्रमणी जाणेयी कर भक्ति सुम्हि हरिव धरपी। ने यह महामुनि दीजह से संभ्रमणी कीजा ॥५०॥ आगह तोह पर्यिहि मुणीलाइ धनु धनु मारथयात काहीजद । घीउ पिहिरापिउ जिणि मुणिदउ तिणि फालि हराउ परम जिणंद ।।१।। हधिणारि नपरि प्रति पारायिउ रिपुमुधुमिति। मिणि फलि निण भयि यल जानु दिन भयिक मनिपरि दानु॥५॥ पा जिर्णमर पट्टा माम पंदण पागया कामार। नाणि दानि शिय संपनि पामी दियर दानु तुमि अनुबन मामा ॥5॥ जान मंगमि का मुनि पागपाउ मा ग्वार पाउ । तिणि फलिनु माधमिडि पामा पागि मियागामा ४ ३ भाउ गेत पावर पितृ अनिफार मवर्गाचम् । मिया मंपादन भनि मामिगद आम भपिणि ।...॥ रियन प्रापकरण झनु भयो म । जर जिणमामणमणा गमि भनिभर? मामिल। किमर सुधापक जाणिपा जिणमामाभिरि । श्रीपानरागमणीय भाष माना मिनि ॥ .. म्ममतिमल मार पाल पाला नरमारि। निपमा पिपरा बानगु .f मुरसार ।

प्राचीनकाम कामदेव जिम गलद नही पीतरागद धर्म । धीरनाटु जिणवर दियह ससुनी जाम्म || 20॥ सदानाम सुविनाम कुमलु अनह निरहंकार । शीलवंत निकलंक अनइ दीनगणाधार । जिनह पनि निम मातयातु जीह श्रावक भेदी। जाणे तीह गर्भवासयेलि मुलटुंनि छेदी ॥ १८ ॥ जाणइ ऊचितु सह काय साचर यिवहार । विधा सुद्धि मनमाहि यसह इकु निश्च सार । उत्सर्ग अनइ अपवाद पह जाणइ सविसेपू । भणियह श्रावकतणी भावीय मूलिइ सा जीह पहु विवेक ॥१०॥ जे पुण श्रावकतणा भविय कहीयह जिणमासणि । ते गुणु जिण भणइ श्रावियह जाणेवा नियमा॥१०० ॥ विधा सुद्धि घीतराग यसइ मनभीतरि जीह । सुलहउ सिवपुरतणउ वासु तो श्रावक तोह । पढइ गुणइ जिणवयणु सुणइ संवेगि संपूरिय । सील सनाहि पहिरिइ क्रमपरि सूरी ॥ १० ॥ ईहं तु श्रावकतणउ क्षेत्रु वायु सवि दोस । जे तुम्हि भवियउ अच्छइ काइ धर्मतणी जगीस। जिम भरयेसरि वायी रिसहेसरनंदणि । गृहवासऊपरि ज्ञानु जासु पसरीउ तिहुयणि ॥ १०२ ।। तिम तुम्हि पावेउ भलीपरि भविउ इउ वित्तु । लहिसउ फल निरवाणनयरि तिम तिहां बहतु । पहिलं कीजइ महाविनउं गुणश्रावक जाणी। पाय पपालीय सइहाधि लेउ कुंकुम वाणी ॥ १०३ ॥ पाछइ भोजनुं भलीयभक्ति सविवेकिहि सहियउ । दीजइ श्रावकश्राविकां एउ आगमि कहिउ । ऊपरि ऊगटि फल पान कापड अनुमानिय । दीजइ निजभक्ति भलां गख्यइ बहुमानि ॥ १०४ ॥ भरयेसर जिम श्रावकह दीजइ आवासे। लोणा जे जिनययणि अछइ घणगुणह निवास । .

समशेविराम बाछिलनी परि एक कोसा परि हुअह असंख। विधिमानु फरसह साह कोइ नरनारी दुरम्य ।। १०५ ।। पाछिलनी परि एकजीभ हडं फहिडं न सफ। एकह पारु सार सक तुम्ह फहीउ अज मू किरें। जं फोजइ फुणयकाजि अतिभला भलेरा। ता कीजड़ सामिप मति अजी अधिकेरां ॥ १०६॥ कीधे काजे कुटंबनणे अतिघणउ संमारो। जं कीजद साहमिभकेरउ फाजि ते परत भंडारी । इणपरि पाछिल प्रापकह कीजइ सुरचंगू। हव ने कहीइसिह जिणभवणि याछिल अंतरंग ॥ १०७ ॥ जिणपरि लोग समाराअप सपि साहमिअके। थाक्द जिम संसारमझि चलि चलि पउ फेस। कोजह पायकलाविकारहि घरपोपधशाल। जीछे करिसिइ घरमध्यान तु हरपि सपि काले ।। १०८॥ पहजीवरक्षा मयि काल तीछे दीमंती। ममकितमिरं यार गबन जीय अनेकिड लहंती। प्रनिमा नाम अभिग्रह मंपनह निणि हार। अनंकि मुन पजइ कुहियाफईवरमाट ॥ १० ॥ नाडे मुगुम यपाणु कर आगमभंडार। मह ममाधियट मांभलड व्यथ नरनारे । भापनाचार्य चउकीयद मिहामण कीजह । नाडकरवाली निरवला महुपत्नी मुंशीजह ॥ १०॥ मंधारा जनरउट पाटि कीज पुंष्णा। को पीमाल पाटला अनढ दंडारणा। काजामन्तणी य पउंजणी य काजाचरणी । पोपधमालहनणड दामि ॥ काजह करणी ॥१॥ कोजा कमली टवी य चानीज मिडांतु। जान पढ़ना जीव नाहा कर्मक्षग अनंतु । जा ज्ञान पटिलेहया मारवाडी य में नाई। दीसई आग्पर पटवटा अनइ जहणा हाई ॥ ११२ ।।

५८ प्राचीनगरकाश्यमहरः ईइ सातह क्षेत्र इम बोलीया आगमभणुमारे । पुण तुम्हे याचीयं भलीयपरि वित्त आपणरे ।। ११३ ॥ न्यायनीति वितु लिई तीउ थानकि याये । जिणसासणि वेयीतु कुलि कमल सु घडावे । संघसमुदाइ सह कोई नीरथ चंदावे । देवजान गुमजान करीइ तउ भलाउ भगाये ॥ ११४ ॥ इम वितु सु येवउ धम्म सु संचउ अप्पं जीव म यंगसुड। वली न लहिसउ प्रस्तावु एमः करउ सफलु भय माणसउ ॥ ११९ ।। सातक्षेत्र इम वोलिया पुण एकु कहीसिइ । कर जोडी श्रीसंघपासि अविणउ मागीसह । काईउ ऊणं आग बोलिउं उत्सन्छ । ते बोल्या मिच्छा दुकडं श्रीसंघविदीतुं ॥ १६ ॥ मूं मूरप तोइ एकुण मात्र पुण सुगुरुपसाऊ । अनइ ज त्रिभुवनसामि सइ हियडइ जगनाहो। तीणि प्रमाणिइ सातक्षेत्र इम कोधऊ रासो। श्रीसंघु दुरियह अपहरउ सामी जिणपासो ॥ ११७ ॥ संवत तेरसत्तावीसए माहमसवाडइ । गुरुवारि आवी य दसमि पहिलइ पग्ववाडइ । तहि पूरु एक रासु सिव सुख निहाणूं। जिण चवीसइ भवीयणह करिसिइ कल्याणूं ॥ ११८॥ जां सिसि रवि गयणंगणिहि ऊगइ महिमंडलि । ता वरतउ एउ रासु भविय जिणसासणि । निम्मल ज ग्रह नक्षत्र तारिका व्यापइं। गयवंतु श्रीसंघ अनह जिणसासणु ॥ ११९॥ इति सप्तक्षेत्ररासः समाप्तः। .

पालीगमः
कट्टलीरासः
जिम दुरीउपिटणु रोलनिवारणु तिहयणमंटणू पणमवि मामीउ
पामजिए।
रमारिहिं पंसो पोजीमाहा. पंनिसु रामो धमीय रोदु नियारीउ ।
जिम मदीयलि जाण अटारमा देसु यपाणई गांउलि पति
रमाउर॥
इमंभम परमार राज फर नहि मविचार आवृगिरिपग नहिं पयरो।
वसहीं आदिजिणंदो अपलेयर मिरिमागिरि पंदो नगुमति
नपरीप पाणीपणा
णनपणद यम्मणमली फरली फिरि संपधिमाली मरम्पयायि
मणीरी॥
पस्त-नम्ति नपरी पनमिः नपरी ग पमई यह लोप ।
चिंतामणि जिम पुचीयां दी दानु माविषेय रिमिए।
मई मीलि पवाहर फटफपटु नवि ने य जाण।
गली जन्य पार्टी पी पम्मम्मि अणुरल।
एकजीर किम परी कारली सु पविश ।।
हिमगिरिधवनर जिग्मु कपिगमा गुग्मंटपु पुतलीयपिणाग पासमपशु
पीपामग
भपीपा गुरमणि आणंद आणा जमानाम परिमाणा गरि मदि
माम परिपाटा
यितिमगि मिरिपारि गुण गाना उपवाम की पोता दिल
मांदित पर।
सारणदेवगिरण आया र प्रानि गुर बहाः कपिरकार धाप.
मुरि दिना।
मालारोपण कीनामा नर पार पजमा समितिमा
पारनंदणु वर गणप: EP ममाविला।
सापणापामाnिy भागमपिशादिया।
एग्रीमी गुरगति गतः आगो नियाविर मिला।
गर

प्राचीनगरकाशसहः माणिकपहुसूरि नामूश्रीयसरिप्रतीछीउ कलीपुरि पासजिणभूयणि अहिली सावयलोय करई तमु भत्ती नवनवधम्ममहमवजुत्ती । श्रीयसरि आरासणिअठाही अणसणविहि पहतउ सुरनाही। निवीय आंविलि सोसीय नियकाया माणिकपहरि बंदउ पाया। विणठदेह जस धवलह राणी पायपखालणि हुई य पहाणी । माणिकसरि जे कीघ जिणधम्मपभावण इकमुहि ते किम बन्नउ भवपात पणासण। काल आसन्नु जाणेवि माणिकसरि नयरिकछुलि जागवि गुणमणिगिरि । सेठि बासलसुर वादिगयकेसरी विरससंसारसरिनाहतारणतरी । संधु मेलवि सिरिपासजिणमंदिरे येगि नियपाटि गुरु ठविउ अइसइ परं। उदयसिंहसरि कीउ नामि नाचती ए नारिगण गच्छभरु सयलु समपीजए। सूरु जिम भवियकमलाई विहसंतओ नयरि चड्ढावली ताव संपत्तो ।। वन्न चत्तारि वरवाणि जो रंजए राउलो धंधलोदेउ मणि चमकए। कोइ कम्माली पाऊयारूढओ गयणि खापरिथी भणइ हर वादीओ। पंडित बंभणे तापसे हारियं राउलोधंधलोदेविहिं चिंतियं । वादिहिं जीत नयरोनवि कोउहरावइ उदयसूरि जह होए अम्हमाणु रहावइ । यस्त-जिस नयरि य जित्त नपरि ५ सयलमुणिसीह । नीरंतई नीस पडो गल्पदंडडंबर करंतई। धंधल राउल चिन्नपद सामिसाल पह मझि संतई। चंभण तपसीय पंडीया जंतन बंधई बाल । सु गुरु कम्मालिउ निजणीउ अम्ह अप्पर वरमाल । धंधलजिणहरि सवि मिलिय राणालोय असेस । उदपसूरि संघिहि सहीउ निवसह ए निवसद ए निवसइ घरहरि पीठि॥ सत्थिपमाणी हरायीउ मंत्रिहिं ए मंनिहिं ए मंत्रिहिं वादुकमठो ।। सेपवर त हिय रहिजे जे गुरु सिडिहिं चंडो। विसहरु आवतु परिपलि जे लंपीउ ए लपीउ ए लंपीउ दंड पयंडो॥ तर गुरि मुहंता मिल्हिकरि होई गरड पणेण । घाउ लीघउ चंचुपडे गिलीउ गिलीउ ए गिलीउ छालभुयंगो॥ पापिल्लि यि संमुहीय डरडरंतु धीउ यायो। जोवणहार सवि पलभलीप हीयाई पहोपडई ए हीया पडीउ दायो ।

मालिभदकक गुरि मूकीउ रयहरणु कीघउ सीढ़ करालो। सा दृरि थीउ हरिसीउ एहरिसीउ ए हरिसीउ नयम सवालो। स्वंतरि मुणि गयणठिय तसु सिरि पाहीय ठीव । पालीउ कालमुद्दो लोकिहिं ए लोकिहिं प लोकिहिं याईप बूंव ।। इंटीउ माणु कपालघरो घाईउ यंदह पाय । चमि सामि पसाउ करी जीत एजीत ए जीतउ नई मुणिराप। ताव संघीउ ताव संधीउ ठीय मंतेण। गणहरि करि फम्मालीयह भिग्वभरीउ अप्पीउ मुद्दत्तिण। रामिहिं जिम यायसह इछ निजुत्त सुदरीउ मत्तीण। धारावरसि फयंतममिभिंडीउ डिभीउ साम । प्रतपर कोटि घरीम जिनउदयसरिरवि जाम ॥ घडायलिहिं पिहरीउ प्रमु पहुनउ मेवाडि । पासु नमंमीउ नागदहे समोसरीउ आहाष्टि। जालु फुदालिय नीमरणी दीवउ पारउ पेटि। पादीय टोटक पद धरण पत्ता पमणउ पेटि । फेवलिमुफति न जिणु भणए नारिहि मिडि मजाणि। उदयसरि पमणउ पलीउ जयत सरायअाणि ॥ फेवलिमुकनि म भंति फरे नारि जति भुव मिहि। तिममपमिडा पनि जीय सी आहार पिसुड ।। पीच पीर दीठंतु दीड जितु नंदिमुणिदेखि गगकुंभयलि आमहीय पदममिड मयि ॥ पिपरणु पिंडयिमुद्धि कीउ धमयिहिग्रंथ प्रमिह । पीपयंदणदीयाग रणीय गणहर मणि अमिर ।। अम्हां माजणाटे एम्मामा कालो। यमतिणि ज्यरि ऊपना पदि टापिजि पानी।। तेरदुरोत्तग्यरिमे अपर मा। पडायलि दिविही जगि लिया। काइली जाणयि परमकल सु गाभाग। पंचम परिम पहंति मजणनंदणु दावार । दयाएस सहषि गाठीप सत्तम परिस सरो।

प्राचीनगर्नकाव्यसवहः
चउदीसि मेलीउ संघु आरीठवणउं विविहपरे ।
गोतमसामिहिं मंत्रु आपात्रीजइ दिणी दीइए ।
जोगवहाणु बहेवि अंग इग्यारइ सो पढए ।
त संजमि रणि जीतु सयरह चुकर पंचसरो ।।
गूजरघर मेवाडि मालव ऊजेणी वह य ।
सावय कीय उवयार संघपभावण तर्हि घणी य॥
सात्रीसइ आपाडि लग्वमण मयघरसाहुसूओ।
छयणीनयरमझारि आरिठवणउं भीमि किओ।
कमलसरि नियपाटि सई हयि प्रज्ञासुरि ठवीओ।
पमीउ पमावीउ जी अणसणि अप्पा सूधु कीओ।
पणि पहुत्तउ सुरलोड गणहरू गंगाजलविमलो ।
तासु सीसु चिरकालु प्रतपउ प्रज्ञातिलकसूर ॥
जिणसासणिनहचंदु सुहगुल भवीयहं कलपतरो।
ता जगे जयवंत उम्हाउ जांजगि ऊगइ सहसकरो।
तेरनिसठह रासु कोरिटापडि निम्मिउ ।
जिणहरि दिंतसुणंतं मणवंछिय सवि पूरवउ ॥
फलीरासः समातः ॥
सालिमद्दकक
भलि भंजणु फम्मारिवल वीरनाहु पणमेयि ।
पउमु भणइ कारकरिण सालिभदगुण केह ॥१॥
फत्य पच्छ कुवलयनयण सालिमा सुकमाल ।
भधा पमणइ देव तुष्ट कह घिउ इत्तिययार ॥२॥
कामक्षामपनीरनिहि ममयसरणि लिउ मामि ।
अग्नु माइ महं यदिपउ पोरनाह मियगामि ॥३॥
पर कुटुसा पुरा कहि का दमण किय योरि ।
काय अन्यु यावाणिइउ कंचणगीरमरीरि ॥४॥
म्यारममुह मागला मार कहिउ संमार।
मंजमपयहाहाग तसु किमान सम्मा पार ॥५॥

मास्मिरण
गपममत्त पीरियपवर जे जगि पुरिसपहाण ।
सालिभ६ भद्दा भणह संजमु सोहइ ताण ॥६॥
गारयजिउ विश्व काइउ मग माइ।
जय मोकलउ तर प्रतु लिप तुम्हह पाय पसाई ॥७॥
घणकुंकुमचंदणरसिण तुद तणु पासिउ पच्छ ।
पयह परीसह किम साहिसि मुणि गंगाजलसच्छ ॥८॥
पाणइ पीलिय पंचसई मंदगरिहि सीस।
साहु माइ दुस्सहु सहई परिस धम्म जिगीस ॥९॥
नवि पर लिमहतरणपणि सालिभ६ सुकुमाल ।
महु फुलमंटण कुलतिलय कुलपईच फुलयाल ॥१०॥
माउंगग्विहिं फुलतणई पाविनइ भवछेउ ।
माइ मरीचि भव भमिउ पडमाणजिणुदेउ ॥११॥
परणु लेसिजह पुत्त तुहु नंदण नीयपवीण ।
रोअंती भदा भणहं मई किम मेल्हिसि दीण ॥ १२॥
पायधिश्वलदेव तह पासुदेव वलयंत ।
माइ तडि टिय परियणर फडिउ लेइ कयंतु ॥ १३ ॥
एण महलंछणसमवयण तुह भन्ना यत्तीस।
ते विलयंती पेमभरि किम करिसि कुलईस ॥ १४ ॥
छाग जेम उइइ सपट अंतेउस घरमाम।
माइ जीयु जउ संचरह मंडेविणु दंदाम ॥१५॥
जणणि भणइ जांबालपणु तां पुत्तह पडिबंधु।
साम्बाइ पुल्लाविअउ याहु उन्नाइह कंधु ॥ १६ ॥
जाणिउ देह असारयल भरहिं मूकर मोहु ।
साव माइ तसु विहिडियउं केवलनाण निराहु ॥ १७ ॥
झलकतर कंचणघडिउ सत्तामिपासाउ।
यिहवह कोडाकोटि घण कहि कोई जण ठाउ ॥२८॥
झाणानलि जिणि कम्मवणु यालिउ गहिउं नाणु ।
पीरनाहु महु हिव सरणि रिडि रमणि अपमाणु ॥ १९॥
नरबह सेणिउ तुम्ह पर सुरगोभद्दु सुताउ ।
नि नवलं आभरणु कहि को चित्ति विसाउ ॥२०॥

प्राचीनगर्जरकाव्यसदहा
नाइकु सेणिउ तुम्ह महु जइ किरि कहिहउ भाइ ।
ता घणु कंचणु गेहबलु खण विन चित्ति सुहाइः॥ २१ ॥
टलटलेसि धम्मत्य पुण धम्मगहिल्ला बाल ।
धम्म करेवा महु समउ तुहु धणुरकण घाल ॥ २२ ॥
टालिसि चरण म माइ मई देइ महावयसिक ।
घरमाणजिणवरकिरिहिं पुन्निहिं लगभइ दिक ॥ २३ ॥
ठणकइ पुत्त सु चित्ति महु पुत्तविहणिय नारि ।
विहवह मुच्चइ दुहु सहइ दीणी परघरवारि ॥ २४ ॥
हामि ठामि जिउ हिंडिइउ भव चउरासीलक ।
माइ जि सहिया नरयदुहु ताह कु जाणइ संख ॥ २९॥
डरपिसि सुणियइ सीहसरि निसुणिसि सिवफिक्कार ।
भुस्किइड तिसिइउ पच्छ तुह किम हिंडिसि नरसार ॥ २६ ॥
डालिहि चडिया डालिसउ माइ महल्लावेउ ।
पच्छइ कहि हां चरण कहि वडमाणुजिणदेउ ।। २७॥
दलई चमर वर पुत्त तुहु सीसि धरिजई छत्तु ।
मणिसीहासणि बइठण किणि कारणि वइचित्तु ॥ २८॥
दाउ विलग्गउ माइ महु सिवपुरि रजहरेसि ।
घोलावउ विउ वीरजिणु रहिसु न भवह किलेसि ॥ २९॥
नवउं अंतेउरु नवउं घम नवजोवणु नवरंगु ।
सालिभहु नवकणयतणु दल करि चरणपसंगु ॥ ३० ॥
नाशु रसापणु करिसु हउँ कम्मिघणदाहेण ।
तिणि आऊरिसु माइ तणु जरा न दुइ जेण ॥ ३१ ॥
सम्भरतलि आवासु मुणि भिकह भोयणु पाणु ।
मंडलि आमणु मयणु यच्छ मरणु दुहठाणु ॥ ३२ ॥
ताला मंजिवि पइसरह माइ गेहि जमराउ ।
छुः यान्तु न युटु जणु पडद्द अचिंतिउ घाउ ॥ ३३ ॥
पलहूंगर पारण मयण कबार कंद तुसार ।
पागल्यन्निर गुरि महिउ हिहिमि फेम कुमार ॥ ३४ ॥
धादररहिन मधुमशु माइ कहिउ त सम्मु ।
पीरनाg जिणु क्यहरउ ऐमु गरणु धणु धम्मु ॥ ३॥

गालिभरकश दहि पम्मु फरेंसि किम किम सोसिसि निय अंगु। यह तह ता दोहिल होसिद तुद सोलंगु ।। ३६॥ दाणसीलनयभावणह अणु न सोसिउ जेहिं । माह मणूभवु दुलदउ आलिहि हारिउ तेहि ॥ ३७॥ धम्म विदर जिम रिसहजिणि तिम फिलइ सुअ इत्यु । पहिला माग्निहिं पसरिउ अंति पयासिउ तित्यु ॥ ३८॥ घाटउ जमरापहतणउ पडइ अचिंतिउ माइ। फहिउ लिन जीयु तिणि युं न पादर काई ।। ३ ।। नपप्पूरिहि पूरिया नंदण कोमर केस । केतगियार पासिया किम उद्धरिसि असेस ॥ ४० ॥ भारापणयंघ निसुणि तहिं दिणि दिरिकर याल । मोसु अग्गि दुस्सदु सहइ माइ सु गयसुकुमार ॥४१॥ पE मुअतई पहरिपां रमिप दिव्य अहार। मुअ उच्यामिहिं मोसिपा फेम फरसि विहार ॥ ४२ ॥ पालिनु पंच माहबई पारस अंग पढेसुं। पोरनाहिसं माद ई नवकपिहि विरेसु ॥ ४३ ॥ फणिरायह सिरि पुत्त मणि मुलेण य घटुमुल्ल ! सा गिपहंता पाणहर संजममम तस तुल्टु ॥४४॥ फादिनद करयतु सिरि पाइनइ कधीर । माइ पुरक नारय सुणिउ मटु उद्धसइ सरोग॥ ४५ ॥ पत्तीसहं पाई कि त सयणु करइ नितु जाइ । इंगरि कामुगि फरिसि किम बलि किन्न तह काय ॥ ४६॥ धार मास कामग्गि रहिउ बाहपलि मुणिराउ । माणह कारणि तिणि सहिउ मीलू जन्तु पाउ॥४७॥ भमिसि विहारिहिं भारिओ नंदण हुं सुफुमाल । धीर जिणंदह परणु पुणु मुणि चायन्न कालु ४८ भार माइ मुखिय यहइ रासहयसहपमुक। आरकुमकसि ताडियई ताहं जाणइ दुरु ।। ४९ ॥ मपलंधण जिम तारयहं सपरहं किल भत्ताम। तं यत्तीसहं पहुअरई पण देव आधार ॥५०॥ .

प्रानीनगूर काममा
माइ महामुणि धीमजिणु कुलगुरु मह मनाणि।
तसु मई अपं अणि निम सुख होइ नियामि ॥ ५॥
यह त संजमु लेसि सुभ मेल्डिवि मपन्दु मिणेष्ठ ।
ता गोभहु अभागिदार हा विगु छहर गेटु ॥२२॥
याइवनाइगु नेमिजिणु गुणसोहम्गनियासु।
माह सिद्धिपणि गपउ मेल्हेविणु गियासु ॥ २३ ॥
रहि रहि नंदण वयणु सुणि मा मा महं संतायि ।
तुह यिणु नितु कुण पूरिसह मुफाहरणह यावि ॥ ५४॥
राहडि पूरिय माइ तई महुकेरी सविवार ।
दिक दियावह जिणभणिय जा तियलोअह सार ।। ५९ ॥
लहकइंस संजमु लियए नंदसेणु मुणिराउ ।
सो संजमुप्पव्वइपडिउ सुअ भोगह कम्मपसाय ॥५६॥
लाहई विणिज करेसु हां छेहउ भाइ चएसु ।
ईणि असारि देहडि य संजमु सारु गहेसु ॥ ५७ ॥
वच्छ ति नारी दुरूनिहि जाहं न कंतु न पुत्तु ।
महत्तई नंदण जाइयई हिंय आवि निरुत्तु ॥ ५८॥
वार स माइ सलकणीय तं मुहुत्तु सुपवितु ।
धन्न ति बंधव जणइजण चरणु लेइजइ पुत्त ।। ५९ ॥
सहसाकारिहिं गहियपउ सुमइ कंडरिएण।
नंदण तेण य नरहदुह पामिय भट्ठवएण ॥ ६ ॥
सारउ साटउं मिलिय मुह माइ कहिउ तउ सम्म ।
वीरनाहु किउ ववहरओ लेसु चरण धणु रम्मु ॥ ६१ ॥
पलह मणोरह पूजिसई सजण होसिइ सोसु ।
नंदण तुं थाइसि समणु एउ महु कम्महं दोसु॥१२॥
पाससासवेपणपमुहवाहि माइ तणु मूलू ।
जीयु तेहिं धंधोलिया उइ जिम लहु तूल ॥ १३ ॥
समल देह कप्पड समल रत्तिदिवस गुरुआण ।
होइसिहं तुं महा भणइ परआइत्त पराण ॥ ६४ ॥

हामातृका
सालिभडु जंपइ जणणि ए महु कहिउ जिणेण ।
संजमविणु भवभयहरणु ताणु न किमद फेण ॥६५॥
हसतरोअंता पाहुणउ ताम हसंता होउ ।
सालिभद्द संजम लियइ महु युझिअइ पमोहु ॥ ६६ ॥
हारमउडकुंडलकलिउ घटिज पुरिसयिमाणि ।
पीरपासि पहुतउ फुमा जण दिनई दाणि ॥ ६७ ॥
क्षमासमणि भद्दातणइंदिरिफड जिणिहि कुमार।
सालिभदु बहु तयु फरइ आगमु पदइ अपार ॥ ६८ ॥
क्षामेविण जिण मुनिसहिउ अणसुणु गहिउ उपए।
सहह सिडिहि गयउ सालिभ६ तहिं घर ॥ ६९॥
महाविदेहि सु मुणि गहयि फेयलनाणु लहेपि ।
सासपसुरु वि पायिसहि भविपाद धम्मु कहेपि ॥७॥
इह कहियउ कयाह कुलउ इकहत्तरि कपाद ।
भयिपउ संजमु मणि धरउ पदह गुण निमुणे ॥ ७॥
सालिभरखाक समाप्त.
द्वहामातृका
भले भलेयिणु जगतगुरु पणमई जगह पहाणु ।
जासु पसाई मूद जिय पाप निम्मलु नाणु ॥१॥
उँफारिहि उपरउ परमिहिहि नयपार ।
सियमंगस्टु फरसाणकरो जासु वि नामुपार ॥२॥
नयनिहि धम्मिति संपरए समागमहरिरिजि।
धम्मु इफा करि धीर जिय सह कर आया मिरि॥३॥
मणगपया हाणुंकुमिण ताणि भाणउ ठा।
जह भंजेसह सीलपणु करिगद मियफलराणि ॥४॥
मिसाइ तमु मपि कलर असु हियर भरितु ।
पितामणिसारिा जिय एड महाराष्ट्र मंतु ॥५॥
धंधा पटिपर जीप तुहं गणि गणितुर भाउ।
दुग्गड कोरन ररिफमा म न पंप नार॥६॥

६८ মীনালাগা अणहंता पयहेसि तुद्ध दोस पराया मूढ । नियदोसण पव्ययमरिस ते सधि कारिस गृह ॥ ७॥ आइ किजिय जिणधम्मु करि सुत्यह संबन्नु लेवि । अग्गइ किंपि न पामिसग अत्यद भरिया गेह ॥ ८॥ इण भवि लन्ही रिद्धि पइ परवि केय लहेमि । अच्छिसि तिणि घणि मोहिया जइ न सुपत्तह देसि ॥९॥ ईसम देकिउ कोई नम नीधिणु मणि दमेह । एउ न जाणइ मूढ जिउ जणु यावियउं लुणेइ ॥ १०॥ अप्पलदलजलविंदु जिव तिब चंचलु तणु लच्छि। घणु देखता जाइसए दइ मन मेलत अच्छि ॥११॥ अयर जउ भरिव कुपुरिसह तो भरियउ भंडाम। इकि जीव पुन्निहि पवर लकह कोडि आधार ॥ १२॥ रिणि राउलि जलि जलणि धरि तकरि घणु घणु जाइ। धम्मकलि जउ मग्गियए ताय परमुह थाइ ॥ १३ ॥ रोस करंता जीव रोह अच्छइ अवगुण तिन्नि । अप्पड ताविसि परु तयसि परतह हाणि करेसो ॥ १४ ॥ लिहियां लगभइ सिरतणउं जइ चालियइ समुदु । लच्छिहि केसयु संगहिउ तिणि विसि धारिउ रुद्दु ॥ १५ ॥ लीलइ धम्मु जु होइंसए सेवंता जिणनाहु । तं नवि मिच्छत्तिहि सहिड जइ तपु करिसि अवाहु ॥ १६ ॥ एकहि ठावि घसंतडा एवड अंतर होइ । अहिडंकिउ मह्यिलु मरए मणि जीवइ सहु कोइ ॥ १७ ॥ ऐ आणाइ समतण जीव न बूझइ हेव । हिंडइ रोसिं पूरिया न करइ उपसमसेव ॥ २८॥ ओदउ तहु लोभहतणउ जोय न फिटइ निच्चु । अहनिसि तेण भमाडिपउ न गणइ किच्यु अकिच्चु ॥ १९ ॥ औसरि नेह अभिग्ग पुणु पिच्चिस ह्यि भन्नति । चंदपल किरणेहि तहि दूरठिया विहसंति ॥ २० ॥ अंघउ अंघइ ताणियए कवणु कहेसइ मागु ।

हामाया . फे.परिपष्ट नियणि गउ धम्म मननरि भागु ॥ २१ ॥ अफगधम्मि जह माणुमह र नवफाम चि अंति। निणि पुसिहि मार देवगह अहया मुत्ति न भंनि ॥ २२ ॥ फरिहि माया मूद जिउ पंचद लोउ अपाणु । तिणि पायिहि भवि भपि हिप नवि पावइ निव्याणु ॥ २३ ॥ पमा कालु फयंत जगि यो अन्न वि को कटि। मंजमि गपपरि आगहिउ सिडिसरणि जिप पल्लि ॥२४॥ गयवरमरा जेम हिय मा हिंडसि नरसीह । इणि फसाय दमि इंदियइ गणिया सभइ दीह ॥ २५ ॥ घटिप न सम्भद अग्गलिप इंदह अराइ यीम। पर जाणि जिणधम्मु करि जायद यह सरीम् ॥ २६ ॥ रवि जाणिमा मो दिवसु जणु पुणु मरइ निरुतु । पहेषिणु घरदासोहला धम्म फरेया जुत्तु ॥२७॥ पंच गितु पयंगु जिम पपपंधण न घरेसि । पम्मारामि विणामियइ मूढा हत्य मलेसि ॥२८॥ पर पपड जीय तुहं उसमु फरि जिणम्मि । मुहियं दुहिय माणुसह पामु न मेल्हह फम्मु ॥ २९ ॥ जरजसरि देटी हुई प पंदरि हपा फेस । अरि जिय धम्मु करेजि त गइय स पालिययेस ॥३०॥ मलहलंत जिणवरपडिम जेह करायइ दयि । मग्गपवरगहतणा मुह ते पामेसइ सब्धि ॥३१॥ महु चितंना पिहयसिण फजु अनेर होइ । राउलि बलिया दुग्यलउ देव न यलियउ फोह ॥ ३२ ॥ दला मेग नियठाणाह जइ पच्छिम उग्गाह सम। पुख्य किया तो मयि चलइ फम्ममहाभरपूर ॥ ३३ ॥ ठगियउ हिंडिसि जीव तुष्ट पारिउ विसि मिच्छत्ति । सम्मतह रपणह रदिउ न लहसि सिवसंपत्ति ॥ ३४॥ टणउ जेम्व गलि संकलिउ भवि भयि पुणवर जीव । नयि छुहिन तो यि तह जइ लंपिजह दीषु ॥ ३५ ॥ दणदणंति इंदिय तुरय पाडेसह भवखोहि ।

प्राचीनगरकाध्यमाः देविणु घरसंजमिकविउ अरि जिय सग्गि निरोहि ॥ ३६ ।। णयि हसंतु विजोइयए निचन्दु झाणु घरचि । ता दीसह जिम जगतगुरु सहजाणंदु सु देउ ।। ३७ ॥ त एकहउ सहसि जिय खाएसई परिवार । वियु विहंचिउ लेइ जणु पाच न बिहचणहारु ।। ३८ ॥ थपोसइ घणु सयणु जणु कोइ न सरिसउ जाए। पाबु पुनु तं अनियए तं परि अग्गइ थाइ ॥ ३९॥ देइ देइ मन आलसु करि महुरालाविहि दाणु । चलिय देह हिय विवसिण करि सफलउ अप्पाणु ॥ ४० ॥ घर उपवइ केवि नर परउययारसमत्य । कह देइ के कम्मवसि जणजण उड्डइ हत्य ॥ ४ ॥ नइ बहमाणी सधणजल सुकद इयर तलाय । दायर व रिद्धिडी मरगण निधण थाइ ॥ ४२ ॥ पढिउ गुणिउ घणु तयु तविउ संजमु किउ चिरकाल। जह कसाय नवि वसि करसि ता सह इंदियजालु ॥ ४३ ॥ फल दिरिकर तरवरतण दिहि म घल्लिसि वाल । तं नवि पाविसि पुन्नविणु छडिसि पारी लाल ॥ ४४ ॥ बलि किन तह सुहगुरुह जा जगु मारगि लाइ । उम्मग्गह दंसणि गमणि जण पुणु पुहवि न माइ ॥ ४५ ॥ भरहेसरि आयरिसघरे उप्पन्न वरनाणु । भावण सव्वहि अग्गलि य तपु संजमु अपमाणु ।। ४६ ॥ मयणु न खीण जाहतणि ते नवि वंभचारि । मयणविह्वणह संजमि लुचणि छारि न दोरि ॥ ४७ ॥ जसि धवलिउ जगु जेहि मुणि नाउँ लिहाविउ चंदि । फम्म हणवि जे सिद्धि गय ताह चलण नितु चंदि ॥ ४८ ॥ रे वाहा मग्गेण वहि मा उम्मूलि पलास । कल्हे जलहरु थधिसए कयण पराई आस ।। ४९ ॥ लह वयभर परिहरवि घरु भंजिवि भवनियलाई। जाव न पटुच्चह तुज्झतणि जमरावस्स दलाई ॥ ५० ॥ ययणु न जंपउ दीणु कसु जं भावह तं धार।

परिका . अधिरकडेवरकारिणिहि कहि किम विजह काउ ॥५१॥ सुमिणंतरि मेलापडउ अहनिमि पहर चियारि । पसरिय निय निय दिसिपलए अरिजिय सुमणु विचारि ॥५२॥. परफिसोर मत्तगरि दमइ फरि करविणु कटु । निय जीयु कोवि न पसि करण घिउ गलियाम पिघटु ॥ ५ ॥ संजमि नियमिहिं जे गया ते गणि सारा दीह । अवर जि पायारंभि गप तार फुमिनउ लीह ॥५४॥ हिंडेपिणु भयकोटिसह लसउ माणुमजम्मु । तत्व वि विसयह मोहियउ न करइ जिणयरधम्मु ॥ ५५॥ क्षणभंगुरू देहहतणउं अरि जिय कोइ यिमातु । भाव न मुबह जिणु मणह जाप फुरपाइ सार॥५६ ॥ मंगलमहासिरिसरिसु सिवफलदायगु रम्मु । दृहामाई अरिफयह पउमिहिं जिणवरधम्मु ।। ५७ ॥ इनि श्रीधर्ममाना मगाता । चर्चरिका जिण पउयीस नमेरिणु मरसइपप पणमेपि । आराहउं गुरु अप्पणउ अपिपलु भाउ घरैपि ॥१॥ फर जोडिउ मोलणु भणइ जीविउ मफट फरसु । तुम्हि अपधारह धंमियर पपरिहा गापसु ॥२॥ मणि उमाहउ अंमि राष्ट्र मोशालि करिउ परमार । जिम्य साइपि उभिमगिरि पंदर विपणना ॥३॥ नइ विममी टुंगर पणा पूल दुहेला मागु । भूपटियाह यामि तुहं दलि होगद अंगु ॥४॥ याला जोपणि न गिया अंमि जिम गिरिनारि। ते मंसरि दधिपा हिंसा परपरयारि ॥५॥ इंभ अमारी देहरी अंमि जि पिटा मारः। तिणि फारणि उनिगिरि पद नमिभार ॥६॥ फरि फरयती पूपटी मिरि पोटली टरेपी ।

४२ arthamir मितिमा पEिTT॥७॥ इह गड्या गारदीगर मीनिमाणु। रेनला गोगा मुकागि ८॥ जा पा जिस दिन । दिति दिति मिजिगु गदिशा गिरिमिति ॥९॥ पादप का नालाल पाई। ने फापर ले लिया ने मादमिर ले जाई ॥१०॥ मालिया मरगयलिहिं गिरणगंतु । अशिलि जमिए गुंशित मिहिं मरद ॥११॥ सहजिगारि पोलेपिणु गंगिलपुर पहा। माटी फहिनि मंदमात अंनु निणेने पुणु ॥ १२॥ जद मम्मामीयम योलि पेनिधि यह प पलाम । तर हियनियर शिर्ड मुग फुटुंबार आम ॥ १३ ॥ यिममिप दोत्तदिनद धणिय टुंगर नन्धि टेक। दियट नेमि ममप्पिपउं भावह निय नेऊ ॥ १४ ॥ करवंदियालं पोलियां अणंतपुरु जहि टाई। दिनउ तहि आवासटउ हियां विद्धि पाई ।। १५ ।। नालियरीटुंगरितडिहिं बहुचोराउलिठाई। धम्मियडा योलिउ गिया अमुलनणइ सहाई ॥ १६ ॥ भालडागदुसुंनउ अवियड बसेइ । धम्मिय किया वीसावर सुरधारडीघरहिं ॥ १७ ॥ ओ दीसइ उहुंधला सो डुंगरु गिरनार । जहिं अच्छइ आवासियउ सामिर नेमिकुमार ॥ १८॥ मंगूखंभि न मणु रहिउ अनु वहडेउ दिहु । खडहड अंगु पखालियं गोवाडलिहि पहुटु ॥ १९ ॥ भादनई जह वोलिउ नाचइ धमिउ लोउ । उजिलि दीवउ वोहियउ सुरठडिय हउ जोउ ॥ २० ॥ खंडइ देउलि जउ गिया सांकलि वोलिवि। धंमिय कियउ आवासडर वंचूसरितलि नेई ॥ २१॥ ऊजिलमग्गि वहंता रजु लागइ जसु अगि ।

परिका बलि कितउं तसु धमियह इंदु पसंसह सम्गि ॥ २२ ॥ जे मलि महला पहियहा ते महला म भणेजे। पायमली जे मइलिया ते मइला हसुणेजे ।। २३ ।। एउ याउह लोहा कोट तलि गिरिनाम। ओ दीसह पवणधली धवलिपहुंगपपार ।। २४ ॥ घर पुर देउल धपलिया धज धवली दीसंति । धमी मा चवणधली अजिलितलि निवसंती ॥ २५॥ पउपाथली मेलेविण जर लागउ गढमग्गि। तर धमिउ आणंदियउ हरिसु न माइउ अंगि ॥ २६ ॥ रिमजिणेसर दिपउ गदि आपासु करची। मारह मिउ हरसियउ हिया नेमि घरेपी ॥ २७ ॥ गह घोली जउ चालीयउ तर मणि रिय आस । घलि किन जंघडिय जोयण चूद पंचास ॥ २८॥ टोलह उपरि मागहर सोलंधणउन जाइ । पाउ ग्विसिपर विसभर पटइ हिप विअडई थाई ।।२।। अंधणयाणी नइ यहह दिट्ठ दमोदर देउ । अंजणसिलहिं जि अंजिया धान ति नपणा वेध ॥ ३०॥ तरपस्तणइ पलांचहे मदउ मागु जंघेधि। कालमेघु जाहारिपउ यत्रापदि जाएगी ॥ ३१ ॥ अंबाजंयूराइणिहिं बहु यणराइ विचित्त । अविलिए करवंदिपहिं मजालि सुपयित्त ।। ३२ ॥ नीझरपाणि बलहलह धानर करहिं पुकार । फोहरसष्टु मुहावण तहिइंगरि गिरिनारि ॥३३॥ जउ महं दिट्टी पाजदी उंच दिह घडाऊ। तर धमिउ आणंदिप लामिवपुरि लाउ ॥ ३४ ॥ हियडा जंघड जे पहईना अजिति पहेजे। पाणिउ पीउ गइंदवइ दृष्ण जसंजलि देजे ।।३५ ।। गिरियाई अंशोडिपड पाय थाहर न लहति । फटि प्रोडई फाडि पी हियर सोसह जति।। ३६ ॥ जापन धंधलि घल्लिया लघुपत्तीपाण ।

मापीनगर: तार कि सम्महि गिनिया हिगडा अगत्ताग || ३७॥ हुंगरदा गयो फरि लगा मीपलिया। हप पुणं नयहढी अमुलि किया पमाऊ ॥ ३८॥ परिका गमाता मातृकाचउपई त्रिभुवनसरणु सुमरि जगना जिम फिर भयदयं दुदाहु । जिणि अरि आठ करम निर्दलीय नमो जिन जिम भवि नायऊ यलिय ॥१॥ आंचली-सवि अरिहंत नमियि सिर सरि उज्ज्ञायय माह गुणभूरि । माईयवावनअक्षरसार पउपयंधि पढिउं सुविचार ॥१॥ भले भणेविणु भणीअइ भल तिष्यणमाहि सारु एतलउँ । जिनु जिनवचनु जगह आधार इतीउ भूकिउ अवरु अस्साम ॥२॥ मीडर्ड पडिउं भवनागमा जउ समिकत्ति लोणु आतमा । जिनह वयणि करिजे निहु ठाउ हृदय रहरि तिहुयणनाहु ॥३॥ लीह म लंपिसि जिणवरिभणी जो रिधि वच्छह सिबसुहतणी। चहुंगति फोटइ फेरउ घडउ पाच्छद जाइउ सिवगढि चडउ ॥४॥ लीहं धीजी वे उपरि करे देवु गुरु हीयडइ संभरे । क्षणु एक मन करिसि प्रमादु जिम तुम्हि पामउ मुक्तिसवादु ॥५॥ ॐकारि सुमरि अरिहंतु जो अठकमहं कालु कियंतु । अनु सिवसुरुतणउ दातारु मनह म मेल्हिसि तिहयणसारु ॥६॥ नव निहाण ते पामई तिम जीह जिणवयणु हियइ परिणमइ । सिवसंपत्ति तीहहकड़ी जीह जिणआण हियइंसउं जडी ॥७॥ मनु चंचलु जे अविचलु करहं जिणह आण सिरपरि धरई। हणई फसाय इंदीय संवरई ते सिवनयरि सुखि संचरई ॥८॥ सिद्ध काजु सहू तीहतणउं जेहि जीवि कीघउंजिणवरभणि। छेदिउ आठकरमनी वेति गया मुक्ति दुई पेलावेलि ॥९॥ बंधई पडिया दीह मन नमउ अप्पारामि जिणवरिस रमउ। भयह तापु नवि लागई अंगि उदु बहुफल पाम सिवसंगि ॥१०॥ -

भाषा
अनुन जिना माण मनि घरे उपसमु विवेक संप करें ।
अरिपगु अंगरंगु निमहे ऽणि परि जीय सुकतु संग्रहे ॥ ११॥
आदिदि आटोउ म संपिमि किमहजे जिनुषपणु हियई त गमइ ।
करमुपंधु पटना पीतये भापासमि पि सहजि अनुभषे ॥१२॥
इणि संगारि पभारि सहन सोय काप धम अगारि ।
घोरागि जं आगमि फहीउ फर सह जि यणु भावनसद्दीउ ॥१३॥
ईमा म फारमि पूटर मोसु मोरक्ष जिनद पपणि करि तोसु।
जोदर आगमनणउ पिचार पास भरिन परतभंडाम ॥१४॥
उप्पलदलरपरि जिम नीर ते सरपंचलु जीप सरीरु।
पशु का माशु लिम मह दीसह धम्मु पषु घर रह ॥ १५॥
उपरि देवि देव न एमाणु तेरदि तिमणि कोइ न सनायु ।
नामीउ परसिजान जिनमरणि जिम न पामीमह जमणमरणि ।। १६ ॥
रिनिहितणउ लामु इम लेजि सानिदि पेति धीतु पायेजि ।
उपर सिरे भावनानीरि यगमग नाही जिम ताहरइ सीरि ।। १७ ।।
राण दी ते पगति भइ जे जिन पीतरागु नवि नमइ ।
मोदी का घरमयामना ने नही जाई मुक्किासना ॥१८॥
लिपावीद मुतु सीरंतु तेह लाभ नषि लाभद अंतु ।
शाननणउ गुण पयष्टु कोह पोनराग तु ज्ञानलगु होइ ॥ १९ ॥
सोलअमन संमातरंसि जइ जीव जिनधमु पाहुणु लेसि ।
मुगुरनी जाम पिलगीउ करी जान जीव भवसाइक तरी ॥२०॥
एकाद परि पामिमि भवपाम जइ ममिकन कर अंगीकाम।
पीरनायु फहइ आगमि तोह विणु समिकल सिद्धि नवि होई ॥२१॥
ए अपचनु जोह जिणवरतणुं तहि ऊपमा किसी हुई भगाउं ।
जिणहं पहण न ऊपम का त्रिभुवनतणी सुद्धि जेह माहि ॥ २२ ॥
ओघहं पटी पापु ले फरिसि सउ संसार अनंतर फिरिसि।
जोई उ पणु मिन विचार करिसि धम्मु तउ पामिसि पार ॥ २३ ॥
ओपधु फरे जीव जिनि भणिउं अछह दुपु अठकरमहत्तण ।
याहिजि ओपदि कोई सुधाइ घरमोपविणु दूपुन जाइ ॥२५॥
अंत न लाभई इह संसार का तु जीव ही न विचार ।
एकजु धमु फरे सपाइ लेउ मेल्हइ सिवनभरीमाहि ॥ २५ ॥

७६
प्राचीनगूर्जरकाव्यसवः
अनुदिनु भत्ति करे जिनराय पूजि निकाल तासु पहुपाय।
मानपतु दोहिलई पामेसि पाच्छह जिनपति काहा नमेसि ॥ २६ ॥
कपदिहि मायां वंचई लोकु ते नवि लहई सिद्धिसंजोगु ।
भमडइं जीव चहुंगतिहि मज्झारि इणपरि भव पूरई संसारि ॥ २७ ॥
खनइ जगु एड कालकु अंति एह एतला नही काइ नंति ।
जिणह वइणु विडिजा इकमणउ भउ फीटिसइ क्रितांतहतणउ ॥२८॥
गम्भवासि जो दिल जाण तउ तउं माने जिनवरआण ।
फेडइ दुपु सह जिनराउ तउ सिवनइरि अ पावइ ठाउ ॥ २९ ॥.
घरि घरु हिंडिसि जीव अणाहु जइ न नमिसि जिनु तिहअणनाहु ।
जिनुघमविणु सुपु
संसारि अवर टमालि दीस मन हारि ।। ३० ।-
उश्चई सरिसु धम्मु जइ करिसि तउ भंडोक परत नउ भरिसि ।
जे यणु लागिसि लोकप्रवाहि रडभड हुइसइ चुडंगतिमाहि ॥ २१ ॥
चक्रवति पदपंडह धणी हंती रिद्धि तीहंनइ घणी ।
जो रिद्धिहिं परिताणु होउ त वंभु संभुमु निरगि नवि जंत ॥ ३२ ॥
छविह जीव करेजे रप जइ तुम्हि जिणसासणि छउ दप ।
आतमयतु जीव सवि गणे धम्मह तउं सारु इउ मुप्पे ॥ ३३ ॥
जगगुरु जगरपणु जगनाहु जगबंध जगसथवाहु ।
जगतारणु जिउ जगआधारु जिणविणु अवरि नही भवपारु ॥ ३४॥
जड पापु जिम तमसरि पनु जइ मनमाझि वसई इकु जिनु ।
जापुलसेपुलि कांई करेसि जिनि एकलई मुकति पामेसि ॥ ३५ ॥
प्रसिदिन्न पंचमिष्ठि सुमरजि इणपरि असुझं करमु पपेजि ।
सुभ करम पायजे पण जिम सुपु लह सिवनगरीतणजे ॥ ३६ ॥
टल मेग जो परयतराजु जो रवि पच्छिम ऊगई आजु ।
जो सायम मिल्हह मनाइ तोह जिनभासिर अलीउ न थाइ ॥ ३७॥
टगीमिरापे कुगुरि फुयोधि जिनकमयही लेजे सोधि ।
पूजयानी आग्रतणी रिधि मंगहे सुमितनी घणी ।। ३८ ॥
समीह कालम्भंगमि लोक तेह नवि सागई औपषजोगु ।
पानराग मंत्रवादी य यिण विसु पमरह अठारमहतणउं ॥ ३९
दलिए पाम देने दार घणकगजीयन करिमि म गाउ।
जगमग पे इंदीमाल करे पमु परहरीउ टमाटु ॥ ४० ॥

मापावाद
पणयपरि गम भरनाग मामीभ फरिउ अम्हारी प सार।
अमरणमरण सुजि जगनाह भपि पहंत अम्द देने याहु ॥४१॥
मनु मनु जीउ जीयनु जोई रिरि समिति सइअणु सह फोह।
दिपर पार मेलायर होइ पारद पलीउ न दीसह फोह ॥४२॥
परपर संपर पादरविण देपोउ मुनिपर मादासत्त ।
धारा मराम जे जाण पालई दीपमहीउ जिणाण ॥ ४३ ॥
दमिदिम दुग्गामार एगीउ लिमई सुमित सपिवार ।
जेन जिणिमिनिणयपणपिचारि देमिइंदपु बहसंसारि ॥४४॥
परमप्यानि परि निमन्द्र चितु जिम एद जीय जनमु सुपवितु ।
धमिलिमिपह मापमंपत्ति धमिदि पलीउ न भयि उतपत्ति ॥४९॥
नर नीतु नमो नौमि जिणनाः आठफरम जिणि दिन्हो दाउ ।
मोहरा रिणि भंजीउ परी मीलई सई मामि मियपुरी॥ ४६॥
पर गुणः परमाणई मुनु पुणु पुरदं नहीं तोइ तत् ।
रागु पु मनभीसरि घरह ईमद येग्यविटंबर करई ।। ४७ ।।
पाला करमु परभयाहमण जइ रिडिरहि जीउ हीडइ घण।
सुपु सुपु मह पद लागम आवह सिजिउं सरिसु आतमा ॥ ४८ ॥
पलि कीउ जीयोउ सोहं मंगारि जे दिन गमइ पापव्यापारि ।
मफन्दु जनमु सीहं नरनारि जे जिनधमि द्विद चित्तमझारि ॥ ४९ ।।
भायं मयु योल जीय अनंत जाणई नही पइणु अरिहंत ।
न मुण अंतर पायह पृष्ठ तीहं सोरल काई सिरिज्या कान॥५०॥
महशु जि मारा ते जगि सर जे मारीय महणि ते भूर ।
धीरा सुभट मत यह मारीउ मपणु ना नीटवई ॥५१॥
पफर सणु नीमु मंत्रमु तीदं दुर्गतिन नही कोई गंमु ।
जोहं म रोई हुई जिनमु पिलमई मुकतिसोपु निरपंमु ॥५२॥
रहिमिदं पून पालत घरवास रहिमिह सहणु मह परियास।
रहिमि घणुफणुरहणुभंडार जीउ एकल जाइ निधाम ।। ५३ ॥
सर मिनदीप मकि संमार आठकरम दहीउ फरि छाम ।
निम्पम् एपु मियनहरीतण सहिसि जीव आगमि जिनमणि ॥५॥
पानध्यापु जोह जिणपरतणउ अरथ गंभीर अच्छह सहिं घणउ ।
जो साहरि जलविंदहं पाक न लभह सिइंतविचार ॥ ५५॥

प्रापीनाम:
पारउपरि मूहा मन पेलि जिनामुलाया पाहम ठेली।
तिहअचिंतामणि जिनधम्मु करीन जीय भाजड़ मयनंम् ॥११॥
पणि पणि आउ गलंतर देपि भवि पदंतु आम ज्वेपि ।
फरि न धम्मु जं केवलिकहीउ जा मियपुरि लेपर्ड विषहीउ ॥२३॥
सहजि जीउ भवगूनलि फरह कर्म युद्वरादाणी यणु घरह।
जे कर्मतणउ नही य ऊयार भयगोतिहिं दुखु महिसि अपार ॥२८॥
हरिपु विपादु करिमि मन कोइ जद जीय आपद संपदं होइ ।
अवशु फलीसह पुरभवकिउं नं भोगये कोइ अणकि ॥१९॥
जंघई दीव पुरयि समुह गिरिकंदरा भमइ बहुराद ।
रिद्धिकाजि इत्तीउ रझमडइन करै धम्मु जिणि रिधि संपडइ ।। ६० ।।
क्षुणभंगुरू एउ सहइ जाणि म करिसि जीव धरमनी काणि ।
विणसइ सहु कहद्द आगम्मु अविनसुन एकु जिणधम्मु ।। ६१ ॥
मंगल कर सवि अरिहंत जे अच्छई सिवलच्छीकत ।
मंगल सिद्धि सरि उधज्झाय मंगलं कर साहुणा पाय ॥ ६२॥
मंगलमूल सहिं आगम्मु जो जगमाहि अच्छइ निरुपम्मु ।
जसु अतिसइ न लाभइ अंतु मंगल करउ सोइ जि सिहंतु ॥ ६३॥
जा ससिसूरु भूयणु व्याप्पंति जा ग्रह नक्षत्र तारा हुँति ।
जा परतइ वसुब्यापारु तां सिवलच्छि करउ मंगलाचार ॥ ६४॥
मातृकाषउपइ समाता
सम्यकत्वमाईचउपद
भले भणउं माईधुरि जोइ धम्मह मूल जु समिकतु होइ ।
समकतुविणु जो क्रिया करेइ तातइ लोहि नीर घालेइ ॥१॥
ऊंकारि जिणु पणमेसु सतगुरुतण वय' पालेसु ।
आगम नवतत बूज्झिसि तिमई समिकतु रयणु होइ तमु तिमइ ॥२॥
नर नवकाम सुमरि जगसारु चउदह पुव्यह जो समुद्धारु ।
समिकत जद्द लाभइ संसारिं जाणे छुरी पडी भंडारि ॥३॥
मनु चंचलु अझाणि पहेइ घडियमाहि सातमिय ६ नेई ।
मनु मयगल शुभ ध्यानु फरंति प्रसंनचंद जिम सिडिहिं जंति ॥ ४ ॥

AMIT
पिरिगुण अगि मार को मा सममिस्तु जर हिरा रहा ।
(रमियर णिशायद मधम नियंका होमद मोह ॥५॥
पर जिगुरपारपउ परनि गुपिणु ममिग्नु किमान एति ।
महा पण गमिफतु फरमे पुदगल अरथमाहि मिमि पिनेइ ॥ ६ ॥
मामाहाणि ममा ममिस्तु रपणु न लाभह किमइ ।
इगर, मुगुर अंगमन पराइणि भारणि पाउगति गिज फिरह॥७॥
भागमयपणु पंगमद अगर पदनाणु प्रभय हुा परह।
मा फालिमिपलरसपिरात नर जाणे जगद पयिरा॥८॥
पणि भविपरमपि मुफ परेड मनगुम्तण यपणु पालेहु ।
पीनाग जर पंदिमि पाग जर पापु होइ निम्मल फाय ॥९॥
दिया जागिदीमा लामाल न ( एटइ फोह ।
परममा जाइ मरिमट पार गगा सा मुफ माणेइ ॥१०॥
उगममा जेनर दीर्मनि पजणधि पष्टिया ने जति।
मुफिर किए ये मरिमा पल मजनमीन योलायो पलई ॥ ११ ॥
ओगरि पाविपासामु न नि मजादु होइ योजह पूर्फति ।
एप दान मुनिति जो देश मंगममणउ सामु मो लेइ ॥ १२॥
रिशिक्षितण सामु जगि लेतु दम रोये तुम्हि धन पायेहु ।
दीनादाना. मातु मनोद गुपानि दीन्हा याहुफलु होइ ॥ १३ ॥
सनिहि दाना, नधी नियार उपितु दान दोजह सवियार ।
मनभपमित जउपर वारंति पाप्रविसेपिहि पीर स दिति ॥ १४ ॥
निरिगं जगि मोर मउ फोह पुपाट पिमहरसादसु होइ ।
पीर आणि जउ मुनि घातिया पामयिसेपिहि ससु विसु घियह॥१५॥
मोहन लंघई मनगुरतणी मिया पर जा आगमि भणी ।
विधिमारगु मान मविपार जाणउं जा घटउं मंसार ॥ १६ ॥
पहफरपनर संसारि विग्नि पार जउ डिउ बिहारि ।
पानराग जउ भणित करेसु दम आसातन नितु रारोतु ॥ १७ ॥
२. थार मेलिदा जिणु पूजेसु रपणिहिं रमणिगमणु पारे ।
नयणु त दिजति निमिभरि रहई तं विहिमंदिर सतगुरु फाहह ।।१८।।
आदीमा मंदिर जगि साम धम्मरपणकेर भंडार
परासी आमासन नितु रापेसु मंदिरि दिपसह यलि दोपसु॥ १९ ॥

দীনকাস ओया दीसई बहुत गमार धमहतणी न पूई मार । जिण गरि दीठइ दूरिहि जति दुलहु माणुमुजमु आलि गर्मनि ॥३॥ अंतरु विधि अविधिहि जाणनि मंदिर पहल निसिहि न करंति । तालारासु रयणि न हु देह लउडारसु मूलह पारेइ ॥ २१ ॥ अइसउ मंदिर जगि प्रयहणु होइ मिउ लोउ चडइ सुह कोइ । पंचममिहिनी जापर करउ संसारसमुद् जिम लीलई तरउ ॥२२॥ कहियइ थूलिभा मुणिराउ मयण घरड भंजइ भडिवाउ। छ विगइ सोजन चिन्नसाली रहइ जगमाहिथुलिभदुली लहइ ॥२३॥ खडभड रापि न इणि संसारि जुगमधान जोह घंमु विचारि। सुद्धउ घरमु करिसि जइ किमइ जमणमरणह रुटिसि तिमइ ॥ २४ ॥ गलइ आउ जिम अंजलिनीरु सोलु जु पालइ सो नर धीरू । कपिलनारि पेलइ चिन्नाणि सोलु सुदरसणतण वखाणि ॥ २५ ॥ घडतड फोडतउ पार न लाइ कम्र्मतणी विसमी गति काइ । जं जं करमु करइ त होइ लपमणि दससिरु जोतउ जोइ ॥ २६ ॥ निच्छइ साहसिउ बजकुमार इंदु पसंसइ जो दयसारु । सुर वे आविया जउ सत पडइ कुमरु पारेवास घडि चडइ ॥२७॥ चल्लइ सवलवाहणु नरनाहु वीरचंदन हुउ अतिघणुं भाउ । दसाणभटु अतिगरवु करेइ इंदिहि जीत रिधि दाखेइ ॥२८॥ छंडइ राजु रिद्धि पणमाहि इंदि जीत तं न सुहाइ। वीरपासि संजमुभरु लेह इंदिहिं हारिउ चलण नमेह ॥ २९॥ जनमु वयरसामिउ त्तिमसमइ छ मास रोयतउ रहइ न किमइ । घणगिरि विहरतु पहुतउ घरेइ साति पूतु हिव झोली धरेइ ॥ ३० ॥ झटकह तउ झोली घातियउ भारि गुरुह लेउ समपिउ । गुरु पभणइ पउ तिणि आपेहु कुमर आवी सार करेहु ॥ ३१ ॥ निच्छइ जुगप्रधान जिउ होइ इह गुणवनणु सकइ न कोई। पालणइ मृतउ श्रयणि सुणेइ इगारअंग तर आणावेइ ॥ ३२ टलह न पावज फुमरह किमद मायडी झगहर मांडियउ तिमह । राज विदीतु पूतु हलेसु मंदिर नेता परिणावेसु ॥ ३३ ॥ ठघर मिलिया अगडउ करई कुमम अणावी तउ विचि धरई। यणफल रमणा सा ढोपइ धणगिरि रजोहरणु दापेइ ।। ३४ ॥

८१
মৰমাৰ
रगष्टगनउ मनु रहा न फिमद मापदी भवि भपि लाभइ तिमह ।
मुगुम्मेलापउ दुलाउ ति पंचमहावन सीहगिरि दिति ॥ ३५ ॥
पाहा फोपर्ड यालकुमारि मोहगिरिता हालिया पिहारि ।
मोम भई अगः पपण कु देइ पपरड मुनि तुम्ह काजु फरेद ।। ३६ ।।
न गण अपरमीम जयमीह सीलगिरितणा सोस हुइ लीह ।
अभिनपदीपितु पयण पु. देह मोहगिरितणउं पयणु मानेइ ॥३७॥
सपु मंजमु किउ परिममहस्सु जीवदया पालिय गुणह निवासु।
अंगपालि अाणि पनि फंडरीक सातमियहं जंति ॥ ३८ ॥
पुंटरीफ परिससहसु फीउ रज्जु घिउ घटियहं तर सारिज फज्ज।
पायज ले गुग संमुहर पाद पंचयिमाणे पुंडरीक जाइ ॥ ३९ ॥
दम दिमि पसरिउ जगि जसवाउ नयभंगयित्तिकरण गुगराउ।
भणि पप्पिड पामजिणंदु पणमटु सुहगुरु अभयमुर्णिदु ॥ ४० ॥
धनु मु जिणपाल परफाणि नाणरयणवेरी छइ खाणि ।
पहनालीमसुद्द पिंट विरेइ विविधु मंदिग जगि प्रगटु फरह ॥४१॥
नर निमुणष्ट मनगुर परमाणु अंतस यश घिउ सुजाणु ।
गुरपाणि नउ पिमु उतरेइ सुगुरवाणि जउ अमिउ झरेइ ।। ४२ ।।
परिणइ अ नारि परि लेड झवणइ यइटर का कहेइ ।
मभयु चोर. मंदिर परमेह असुपणनिंद मपलजण देइ ।। ४३ ॥
फार जंयुकुमम हम भणइ वियाहुमहाच्छयु प्रभवु न गणइ ।
जंयुकुमम जउ इमउ भनि मवि भिया टगमग जोपंति ॥ ४४
यंधर अम्हसळ माटि करंज बिहुं विद्यापटइ इक धभणी देज ।
पुमा भण यिचा किम करंसु रिडि परिहरी प्रहह बतु लेसु॥
भणइ प्रभयु नवजोवण नारि परणिय पुसपमिण मंमारि ।
कामभोग भांगधि इणि ममद जायण गइ व्रतु लेजे तिमइ ॥ ४६
मयणु घरह मां मई यमि कि मोहराउ पाहिउ नाधिया।
मधुपिंदमादम इहु संमार. निसुणि प्रभव तुष्टु जोइ विचार ॥४
जगु पिंडाणु मयल यरने तुह विणु पितरट पिट्ट कु दे।
महेसरदताया जउ कारइ प्रभउ मांभलिउ मनमाहि रहइ ॥
रतिपनि जाणउं नई यमि किया नामानणउं संबंधु फिम घिय
नानाकथा फहमि प्रभयु माभली तर झंति ॥ ४५ ॥

८२ प्राचीनगूर्जर काव्यसवटः लहणउ लाभइ इह जगमाहि जंयुमामिगरि रिदिन माइ। हंती रिद्धि कुमम परिहरह प्रभयु पराई लेवा फिरड् ॥ ५० ॥ घयणु कहउ पुणु नीजइ वाइ जंयुकुमर तुह परिणिउं काई । बालकुमारउ त व्रतु लियत नियनियमंदिरि अदृय रहत ॥५१॥ सांभलि प्रभव ज काइ हुंत जइ घरि रह त संसारि पड़त। कथा कहिउ प्रतिबोधेसु नारि वलिउ न आवई इणि संसारि ॥५२॥ पडभड केही रिद्विहितणी नयाणवइ कोडि मोना छई घणी। जीमणइ हाधिहि तउ हउँ देसु मणछिय मागण पूरसु॥५३॥ सा सिवकाजउ प्रगुणी करइ दानु दियंतउ तउं नीसरह । माय वापु अट्ठनारि चडंति पंचसयसहितु प्रभवु बइसंति ॥ ५४॥ हल्लिय सिविका गाजे रली पन्जिय ढक युक काढली । सिबिका उत्तरिउ चलण नमंति सुहमसामि सई हथि व्रतु दिति ॥५५॥ लंघिउ सायम जउ व्रतु लिउ पंचमगतिप्रस्थान किया। जंबुसामिउच्छवु देखेइ बहुतु लोकु जाइ व्रतु लेइ ॥ ५६ ॥ खयां पापु जउ पावज लई घरसंसारचिंत तउ गई। मनि जीतइ इंद्रिय वसि धाई करम जिणिय नर सिद्धिहि जाई ॥१७॥ मंगल पहिलउ सोहमसामि बीजउ मंगल जंबूसामि। अगणिउ मंगल प्रभव भणंति चउत्थउ मंगलु नारिहि हुंति ॥ ५८ ॥ गणियइ जुगवरु सोहमसामि बीजडउ जुगवरु जंबूसामि । श्रीजउ जुगवरु प्रभयु भणंति सिझंभवु चउथउ जाणंति ॥ ५९॥ लंछणि सीह गोयमु पुच्छति जुगप्रधान जगि केता हुंति । विसहस चउँ आगला कहेइ छेहिलउ दुपसहु तर जाणेइ ॥ ६० ॥ मंनउं जुगवरु जिणेसरसरि पाबु पणासह दरिसण दरि । संदेहु म करहु जिमसमिकतु रहइ भवि भवि बोधिवीजु जिउ लहइ॥३१॥ हासामिसि धउपईवंधु कियउ माईतणउ छेटु मह नियउ । अणउ आगला किंपि भणेउ जगह भणइ संघु मयस्लु ग्वमे ॥ ६२॥ श्रीनंदर समुदायरि रहह नंदउ विहिमंदिरु कवि कहइ । नंदउ जिणेसरसूरि मुणिंदु जा रवि ऊगइ ऊगइ चंदु ॥ ६३ ॥ माईतणउ आवसम धुरि कियउ चडसठियउपइया बंधु थियउ । सुडइ मनि जे नर निसुणंति अणंतसुरकु सिडिहि पार्वति ॥ ६४॥ सम्यकलमाईचउपइ सम्पूर्णा.

Data isilas
श्रीनेमिनायफागु
मिजिपा यि sini
पार्षषि पाणिनिगुण ॥
माममायणमा जाTeri
पागणगामार पारपार mfemmmms
गादपिगारमिपति irnfirmti
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मेरपतिम भागrs for wrter
गामि mafrainfine
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मरणरण Trailife anter
मारपालि दीया 4
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جنزدهم نه تویند اثر مهد علفه
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माजीनामा अहर पाल निरंत कठुरामलमर कहा लागु गीगु रणगई जायलाहला ॥९॥ मरटनरल मुगलरिग मिहणीmjग । उदरमि संकाली ग गोटा शिमलतुरंग ॥ १० ॥ अह कोमल विमल नियमिंग फिरि गंगापुनिया करिकर ऊरि हरिण जंग पास रगरगा। मलपति मालति गेलहीण मला हराया संसारागु अगालि माल नहरिणि करायः ॥११॥ सहजिहि लरदीप रायमा सुलपण सुरुमाला घणउं गणेर गहगहए नयगुल्यण याला । भंभरभोली नेमिजिगयीयाद सुई नेहगहिली गोरही हियटर विदसे ॥ १२ ॥ सावणसुफिलमहि दिणि यापीमम जिणंदी थाहर राजलपरिणयण कामिणिनपणाणंदी ।। १३ ॥ अह सेयतुंगतरलतुरद रहरहि पद कुमारी कन्निहि कुंडल सीमि मउ गलि नवमरहारी। चंदणि ऊगटि चंदवलकापडि मिणगारी केवडियालउ खुपु भरवि बंकुडउ अनिफारो ॥ १४ ॥ धरहि छत्तु वित्तु चमर चालहिं भृगनयणी लूणु उत्तारिहिं वरवहिणी हरिमुबलवयणी । चहुपरि बइसइ सारकोडि जादवभूपाला हयगयरहपायकचकसीकिरिहिं झमाला ॥ १५ ॥ मंगल गायहिं गोरडीय भह जयजयकारो उग्गसेणधरनारि वरो पहुतउ नेमिकुमारो ॥ १६ ॥ अह सहिय पर्यपय हल सहि ए तुह वल्लहर आवइ मालिअटालिहिं चडिउ लोउ मण नयणु सुहावइ । गउखि वइठी रायमए नेमिनाहु निरखइ पसइपमाणिहिं चंचलिहिं लोअणिहिं कडम्बई ॥ १७ ॥ किम किम राजलदेवितण सिणगारु भणेवउ । चंपइगोरी अधोइ अंगि चंदनुलेवउ । . .

आरामना पु भराविउ जाइकुसमि फसतूरी सारी सीमंता सिंदूररेह मोतीसरि सारि ॥१८॥ नवरंगि कुंकुमि तिलय किय रयणतिला तसु भाले । मोतीकुंडल फनिधिय विवालिय करजाले ॥ १९ ॥ अह निरतीय कलरेह नयणि मुहकमलि तंयोलो नगोदरकंठलउ कंठि अनु हार पिरोलो। मरगदजादर फंघुपर फुडफुल्लहं माला फरि कंकण मणिवलयपूट ग्यलकायइ याला ॥ २० ॥ रुणुमुणु ए रुणुझुण ए रुणुझुणु ए फटि घपरिपाली रिमिझिमि रिमिझिमि रिमिझिमिए पपनेउरजुयली। नहि आलत्तउ पलवलउ सेभंसुयकिमिसि अंग्खडियाली रायमए मिउ जोइ मनरसि ॥२१॥ पाडउ भरिउ जीवडहं टलवलंत फुरलंत । अहठकोटिरूं उद्धसिप देपइ राजलकतो ॥२२॥ अह पूछह राजलकंतु काई पसुबंधणु दीसह सारहि योलह सामिसाल तुह गोर हुस्पाइ । जीव मेल्हायइ नेमिकुमर सरणागह पाला घिगु संसार असाग इस्य इम भणि रतु पाला ॥२६॥ समुदविजय सियदेयि रामु फेसयु मसायद नइपयाह जिम गयउ नेमि भवभमणु न भावः । धरणि धसमद पटइ देयि राजल विहलंघल रोभइ रिसइ सु याहु माइ निप्पट ॥ २४ ॥ उग्गसेणधूप इम भणइ दपहिं दाउद देही का पिरता केन तुहं नपणिहि लाइपि नही ।। २ ।। आसा पूरह निभुयण मूम कारि यामी दप फरि दप फरि देय मुम्ह ह भ दामी। सामि न पाला परियार तर कासु काहीजा मयगलु उपट संपरए शिणि कानि गहीजद ॥२६॥ नेमि न माह ने दो मंपपरदा' ऊजलगिरि संजम टिपर एप पे.पटना।

प्राचीनगूनगम राजलदेविम मिलि गयउ मो देउ गुणीना मलहारिहिं रायमिहरमरि किउ फागु रमीजद ॥ २३ ॥ शो जीनेमिनायागु. प्राचीनगद्यसङ्ग्रहः आराधना (संवा १३३० मा लगेरा ताडपत्रमांधी) ज्ञानाचारि पुस्तकपुस्तिकासंपुटसंपुटिकाटीपणांकयलोतरीय दोरीप्रभृतिज्ञानोपकरणअवज्ञा, अकालिपठन अतिचार ..... अमरूपणु अश्रद्दधानमभृतिक आलीयहु । दर्शनाचारि देवद्रव्यु उपेक्षितु प्रज्ञाहीनत्यु जिनमुवनआशानमा अधोयति देवपूजा ग्रहणु गुरुनिंदा द्रव्यलिंगिएसई संसर्ग विवाशातना स्थापनाचा तना शंका आकांक्षा विचिकित्सा मिय्यादृष्टिप्रसंसा मिथ्याष्टिपा पांच अतिचार आलोय । चारि आचारि प्राणातिपात मृपावाद अब मैथुनपरिग्रह ए पांच अणुव्रत दिगुविरति भोगपरिभोगविरति अ विरति ए तिन्नि गुणवत । सामायिकु देसावकासिक पौफ्धु अतिथि ए च्यारि सिक्ष्यावत; ईहतणइ विपइ जु कोइ अतिचारु आसेवियर आलोयहं । तपाचारि अनशन ऊनोदद्रिता वृत्तिसंक्षेषु रसत्याग के संलीनता पविधबाह्यतपतणइ विपइ प्रायश्चित्तु विनउ वैयामृत्यु कायोत्सर्ग पविधआभ्यंतरतपतणइ विपइ जु अतीचारु सु हुं आलो धीर्याचारि संतह बलि संतइ वोर्जि अ धर्मानुष्ठानि उद्यम नहीं कि हुँ आलोयहुं । सम्यक्त्वप्रतिपत्ति करहु, अरिहंतु देवता सुसाधु गुरु णीत धर्म सम्यक्त्वदंडकु ऊचरहु, सागारमत्याखानु ऊचरहु चहु पइसरहु । परमेश्वरअरहंतसरणि सकलकर्मनिर्मुक्तसिद्धसरणि संस वारसमुतरणयानपात्रमहासत्त्वसाधुसरणि सकलपापपटलकवलनकला केवलिप्रणीतुधर्मुसरणि सिद्ध संघगण केवलि श्रुत आचार्य उप- सर्वसाधु व्रतिणी श्रावक श्राविका इह ज काह आशातना की हुंती मिच्छा मि दुफाडं । पुढविकाइ जीव आउकाइ जीप तेउकाइ जीव वा जीव यणस्पइकाइ जीव बेइंदिय दिय चरिंद्रिय जलचर स्थलचर सर्वतीर्थनमरधारस्तवन जिजंतु तार मिना मि दुपार । पनर फर्मभूमि जि मनुष्य त्रोस अमर्मभूमि नज मनुष्य सोहि मिच्छा मि दुपार। छप्पनअंतरदिपतणा मनुष्य मीहं मि- या मि दुपाई । सालनरफनणा नारकि दशयिध भवनपति अष्टविध व्यंतर विविध जोदसी देयिध धैमानिकदेया कि यहुना । दृष्ट अइष्ट ज्ञात अज्ञात सुन अटल स्वजन परजन मिधु शत्र प्रत्यक्षि परोक्षि जे केइ जीव चतु- रासी लक्षयोनि अपना पतुर्गसिकि संसारि भ्रमंता मई हुमिपा पंचिया सेहिया सारीविया हसिया निदिया किलामिया दामिया पाछिया किया भवि भवांतरि भयसति भयसहनि भवलक्षि भवकोटि मनि पचनि काई सह सर्वहई मिच्छामि दुफाई अदार पापस्थान योसिरापइ इहुसळू प्राणा- नेपात सर्च मृपावाद सर्च अदत्तादान् सर्च मैथुन स» परिग्रह सर्छ धू मर्दू मान सर्वई माया सधैं लोभू प्रेमु पु फलाहु अभ्याख्यान रति अरनि पेशन्यु मिथ्पादर्शनशल्यु परपरिवाद अदार पापस्थान प्रिविधिहि नानि यचनि फाइ फरणि करायणि अनुमति परिहरउ । अतोतु निंद वर्तमान मंयरहु अनागतु पावरकड पंचपरमेष्टिनमस्कार जिनशासनिसाम चतुर्दश- समुघरू संपादितसफलकल्याणसंभाग विहितदुरितापहार क्षुद्रोपद्रय- सर्वनवनमहार सोलादलितसंसार सु तुम्हि अनुसरहु, जिणि कारणि चतु- शपूर्वधर चतुर्दशपूर्वसंबंधित ध्यानु परित्यजिउ । पंचपरमेष्ठिनमस्कारु मरहि, तर तुम्हि विशेपि स्मरंधर, अनइ परमेश्वरि तीर्थकरदेवि इसउ मर्यु भणियउ अच्छद, अनई संसारतणउ प्रतिभउ म फरिसर, अनइ दिनमस्कार इहलोकि परलोकि संपादिपइ ॥ आराधना समालेति ॥ पदक्षरं परिभ्रष्टं मात्राहीनं च यद्भवेत् । सन्तव्यं सदुधैः सर्व कस्य न सवलते मनः।। संवत् ११३० वर्षे आधिनसुदि५ गुरावोह भाशापहयाम् । अतिचार (संवत् १३४० ना अरसामा लसायला जणाता ताडपत्रमाथी) कालवेला पढां, यिनपहीणु यहुमानहीणु उपधानहीणु गुरुनिपहव अने. कहां पदां, अनेरई कहई व्यंजनकूड अर्थकृष्ट सदुभपकड फूडउ अरफर काना मात्रि आगला ओछउ देपंदणवांदणइ पडिफमणा सझाउ करता, ८८ . प्राचीनगूर्जरकाव्यसहहः पढतां गुणतां हुउ हुयइ, अर्थकूड कहई हुइ, सूनु अर्यु वेउ कूडां कयां ज्ञानोपकरण पाटी पोथी कमली सांपुडं सांपुडी आशातन पगु लागर लागउं पढतां प्रदेप मच्छरु अंतराइउ हउं कीघउ हुई, तथा ज्ञानद्रव्यु उपेक्षितु प्रज्ञापराधि विणास्य विणासित ऊवेख्य हुँती सक्ति सारसं कोधियइ, अनेरह ज्ञानाचारिउ कोइ अतीचारु हुउ सुक्ष्मवादरु मनि काइ पक्षदिवसमांहि तेह सवहि मिच्छा मि दुक९ ॥ सातमइ भोगोपभोगवति सचित्तद्रव्यविगइ खासहाइ पाणही फोफलि वइसणि आसणि सयणि न्हाणुअइ अंगोहलि फलि फूलि आच्छादनि जु कोइ अतिचारु हुयउ पक्षदिवसमांहि यारि भेदि तपु छहि भेदि वाद्य अणसण इत्यादि उपवास नीविय एकासणु पुरिमट्ट व्यासणं यथाशक्ति तपु, तथा ऊनोदरितपु संखेषु । रसत्यागु कायकिलेसु, संलेखना कोधी नहि, तथा प्रत्याख्यान एका- सणां विपुरिमट्ट साढपोरिसि पोरिसिभंगु अतीचार नीविय आंबिलि उपयासि कीघद विरासई सचित्त पाणीउ पोध हुयइ पक्षदिवसमाहि प्रतिपिद्ध जीवहिंसादिकतणइ करणि कृत्य देवपूजा धर्मानुष्ठाननणार अकरणि जि जिनवचनतणइ अश्रद्दधानि विपरीतपरुपणा एवं बहुमकारि जु कोइ अतीचारु हुयउ पक्षदियसमांहि ॥ सर्वतीर्थनमस्कारस्तवन (मंवत् १३५८ मां लखायेला फागठना पुस्तकमांयी) .. पहिल त्रिकालु अनात अनागत पर्तमान यहत्तरि तीर्थंकर सर्वपाप- क्षयंकर ६ नमस्कार। तदनंतर पांचे भरते पाये परपते पांच महायिदेहे सरारिसर उars पालि विदमाग नमस्कार। तर पहिला माघम्मि देवलोकि यतीम साय, योजइ ईसानि देवलोकि अमावीम लाप, ग्रीना मनतकुमारि देवायोकि यारलाग, घउत्यइ माह देवलोकि आर माय, पाथमा प्रायदयालोकि च्यारि साय, घर सांता , नागारन्याख्यानम् ८९ देवलोकि पंचास सहस, सातमइ शुफदेवलोकि च्यालीस महस, आठमइ सहकारि देवलोकि छ सहस, नवमइ आगति देवलोकि चिमइ, दसमः प्राग- ने देवलोकि विसइ, इग्यारमइ आरणि देवलोकि बारमद अच्युतदेवलोकि बिह उदु दउडु सउ, अनइ हेटिले ग्रिह भैयेपके इन्यारोत्तर मउ, माहिले विष्ट अवेयके सत्तोत्तर सर, पहले मिह प्रेयेयकि एफ सउ, पंच पंचोतरवि. माने, एवंकारइ स्वर्गलोकि चउरासी लाग्न सत्ताणपइ माहम ग्रंथीम आगला जिनभुवन वांदङ । अनंतम् भुवनपतिमझे असुरकुमारमग्ने पहिलार, मागमारमज्झे पउरासी लाख, सुचनकुमारमझे यहत्तरियाय, पाय- भारमाझे उन्नयइ लाख, दीयफुमार दिमाकृमार अहिदकुमार पिग्मुफुमार पुणिपकुमार अग्गिकुमार छह मध्यभागे छहत्तरि एहरि साप, प्यार मानादलोकि सातकोडि यहत्तरिलाग्य जिनमंदिर स्लपई। अप मनुष्पलोषि नंदीमर परि दीपि यापन्न, च्यारि फुलपल्गि, च्यारि पकि पल्लिा, प्यारि मानुपोत्तरि पर्वति, च्यारि क्षार पर्वति, पंच्यासी पाने मेरे, धोम गजदंग पर्वति, दस फुरपर्वति, प्रीस सेलमिहरे, अमीय क्षारगेटगिरे, गरि- मा पेनापर्वति, एवं च्यारि सह निमहि जिणालापटिम, पयं भाट मोदि एप्पन्न साप ससाणयइ सहम च्यारि सदहियानिय नियन्तुएं शास्वतानि महामंदिर निफाल सीह नमस्कार करउं ।। पतीनगरवासनानम्। नवकारव्याख्यानम् नमो अरिमाणं ॥१॥ माहर नमस्कार अति rमिाजि भरिहंत; रागडेपपिमा अरि यपरी जेरिणिपा, अपना पनुपदि :- संबंधिनी पूजा महिमा भरिता लि उत्पादिपविमरपलकाम. परप्रीम अनिशपि समन्धित, अष्टमहामाविशार्पशोभापमान माविता मेधि विहरमान तीह असिंत भगवंत मारा नमस्कार उ ॥१॥ नमो मिसाणं ॥२॥ मारउ नमस्कार मिाि जि मिर टाटफर्मक्षा करिज, जि मोतिया । भाउ बम विमा भनिएFAN. गोड १ दरिगणापरणीड पेट्नी मोनीउ ४ भायु मानुन अंगराज आठकर्म सरिर नि मिरिया। रिमी र दोसणा भविभागि पंपाम तापजिम्माणि जिगई इन ९० पसोपंच नमोकारो ॥ ६॥ एउ पंच परमेष्टिनमस्कार । पंचपरमेष्ठि प्राचीनगरमाध्यमददः तिसह आकारिज मिडिमिला, अमलनिर्मर जलमंशाम जु अजगर स्थानु, तेह अपरि योजनसंबंधियइ गोममद य विभागि जि मिड अर सुखलीण ति सिद्ध भणियह । तीह मिड मादरउ नमस्कान हर ॥२॥ नमो आपरियाणं ॥३॥माहरड नमस्कार आचार्य हु। किमा नि आचार्य; पंचविधु आचार जि परिपालइ नि आचार्य भणियह । किमउ पंच- विधु आचारु । ज्ञानाचार, दर्शनाचाम, चारियाचार, तपाचार, वीर्या- चारु, यउ पंचविधु आचाम जि परिपालइ नि आचार्य भणिइ । भीड़ आचार्य माहरउ नमस्कार हउ ॥ ३॥ नमो उवज्झायाणं ॥४॥ माहरउ नमस्कार उपाध्याय हुउ । किमा जि उपाध्याय; द्वादशांगी जि पद पदावइ । किसी ज हादशांगी; आचा- रांगु ? सुयगड २ ठाणांगु ३ समवाउ ४ विवाहपत्ति ५ ज्ञानाधर्मकथा उवासगदसा ७ अंतगडदसा ८ अणुत्तरोववाइयदसा ९ पण्यागरण ? विपाकश्रुतु ११ दृष्टिवादु १२ ए बार आंग जि पढइ पढावद ति उपाध्याय भणियइ । तीह उपाध्याय माहरउ नमस्कार हुर ॥४॥ नमो लोए सव्यसाहणं ॥६॥ईणि लोकि जि केई असइ साधु! यउ लोड च किसउ भणियइ । अठाई दीपसमुद्र पनर कर्मभूमि जि किसी; पांच भरत पांच परवत पांच महाविदेह खेत्र, ईह पनर कर्मभूमिमाहि जि केई अच्छा साधु । किमा जि माधुः रलवा जि सायद । किस रलवर ज्ञान दर्शन चारिष्ट यउ रलवउ जि साधइ ति साधु भणियइ । तीह साधु पंचमहा- वनपरिपालक । पंचमहावन किमा भणियह । प्राणातिपातु १ मृपावाहुर अदत्तादानु ३ मैथुनु ४ परिग्रह ५ रात्रीभोजनु । जि विवर्जइ ति साधु भणियइ । तीह माधु मर्यहीं माहरउ नमस्कार हु ॥५॥ किसा । जि पूर्वोक्तभणिया अरिहंत ? सिद्ध २ आचार्य ३ उपाध्याय ४ माधु ५ इह पंचपरमेष्टिनमस्कार भावि क्रियमाणु हुंत किस करइ ॥ ६ ॥ सम्चपावपणामणो ॥ ७ ॥ मर्वपापप्रणासकारिया हुई । इणि जीवि चतुर्गतिक संसारि भवभ्रमणु करतइ हुंतइ जि असुभलेश्या उपायो पार मु ईणि पंचपरमेष्टिनमस्कारि महामंनि मुमरीनइ हुँतइ क्षउ हुयह ॥७॥ मंगलाणं च सम्बेमि पढम होइ मंगलं ॥ ८॥ इणि संसारि दधिचंदन दादिक मंगलीक भणियइ । तीह मंगलीक सर्वहीमांहि प्रथम मंगल पर।

१ अनिवार गि कारणि सुभनार्यआदि पहिला सुमरेवर्ड, जिव ति कार्य एहतण प्रभावद प्रतिमंना हुयद। पउ नमस्कार अतीतअनागतवर्तमानचवीसी आदिजितिसार, मुतुम्हे यिसेपाइ हिवहातगइ प्रस्तावि अर्थयुक्तु ध्ये घातव्यु गुणेवर पटवउ । जु किमा। मिणमामणस्स सारी पउदसपुल्याण जो समुहारो। जस्म मणे नवकारो संसारो तरस किं कुणइ । अनद पहनमम्माम स्मरता इहलोकतणा भय नासह । पटुत्तं अटविगिरिरनमज्झे भयं पणासेइ चिंतिओ संतो। रसद भवियसयाई माया जह पुत्तभंडाइ ।। पाहिजलजलपानधारहरिकरिसंगामविसहरमपहिं । नामंनि तरकणेणं जिणनयकारप्पभावणं । हियादगुहाए मयकारकेसरी जाण संठिो नियं। फम्मगंटिदोघध्ययं ताण परिनटं ।। नमस्कारस्य स्वरूपं भण्यते । ईणि नवकारि नव पद पांच अधिकार सत्त- महि अक्षर, नोहमाहिए भारी इकमठि लघु। इसई नमस्कारतणउं माहातम्यु। एसो मंगलनिलओ भयपिलओ सयलसंतिसुहाणओ। नवकारपरममंती संनियमित्तो सुहं दे॥ अणुच्चो कपना एमो चिंतामणी य अप्पुथ्यो। जो झाइ मयलकालं मां पापद मिवमुहं विउ । नवकारस्याख्याने समारम् ॥ अतिचार. मग १३६९ मां लपेटा ताटपत्रमांधी. तर तुम्हि ज्ञानाचार दरिसणाचार पारिवाचार तपाचार वीर्याचार पंचविषाचारविपश्या अतीचार आलोउ । ज्ञानाचारि कालबेला पदिड गुणित विनयहीन बहुमानहीन उपधानहीनु गुरुनिन्दयु अनेरीकन्द पदि भनेर कति । व्यंजनफूट अक्षरकूट कानड मान आगरउ ओघा देवयं- दण्ड पडिकमणद माझाओ करतां पदतां गुणता हुमो हुइ, अर्थक्ट तदु- भयकृटज्ञानोपकरणि पाटी पोथी टयणी कमली सपिडा सांपही पतिआमा- तमा पशु लागउ धुकु लागउ पडतां गुणनां प्रदेषु मच्छर अंतराइ इ कोई ९२ . সন্ধান: हुइ भवसगलाहहमाहि तेह मिन्धा मि दुनाई । मृपावादि सामानकारि आलु अभ्याख्यान दीप, रहसमंत्रभेटु फापर, पापदेसु दीघउ, कृष्उ लेख लिखिज, फुहोसाखियापणि मोसउ, कुणहइमर राहि भेडि फरहु विद्याविधि, जु कोइ अतिचार मृपायादि प्रति भवसगलाइनाहि हुउ प्रिविधि निविषि मिच्छा मि दुफड। अदत्तादानि चिराइउं छान फोटु लीयउं दीप बावरित धरि बाहिरि खेत्रि खलइ पाडइ पाडोसि अणमोकलाविउ चोरीलाई बोर- प्रति प्रयोग कीघउ, नवउँ पुराणउ रसु विरसु सजी निजी मेलिङ, कूडी तूल कृडइ धापि कूडउ कहिउ हुइ, अतीचारु अदत्तादानि अति भवसगटाह- माहि हुउ तेह सवहह मिच्छामि दुमडू । मैथुनप्रति लु इपणि आपणा विराणा सील खंडया सिउणइ सिउणांतरि, दृष्टिविपर्यासु, आठमि चउसिनणा नी- मभंगु, अनंगक्रीडा परविवाहकरणु तिमिलापु परिउ छुइ, अनेराजु कोई अतिचारु मैथुनप्रति भवसगलाइमाहि हुअउ तेह सवहइ निविधि निविधि मिच्छामि दुबई । हव हियामाहिं सम्यक्त्व घरउ । अरिहंत देवता, सुसाधु गुरु, जिणप्रणीतु धर्म, सम्यक्त्यदंडकु ऊचरउ । हिव अठार पापस्थानक को सिरावउ । सर्व प्राणातिपात, सर्व मृपावाद, सर्दू अदत्तादान, समैथुनु, सर्व परिग्रह, सर्दू फोधु, सर्व मानु, सर्व माया, सर्व लोभु, राग, द्वेषु, कलहु, अन्याः ख्यान, पैशुन्यु, रति, अरति, परपरिवादु, माया पावाद, मिथ्यात्वदरिसण- सल्युए अढारपापस्थान मोक्षमार्गसंसर्गविधनसमान विविधित्रिविधियोसिरा- घउ, अतीतु निंद्र, अनागतु पञ्चकर, वर्तमान संवरु | सागारपत्याख्यानु । खमिदं ग्वमावि मई खमिउ छविह जीवनिकाय । सिद्धह दिन्ना लोयणा नइ मह वइरु न पा । हिय दुकृतगरिहा कर । जु अणादि संसारमाहि हीडनइ हुनइ ईणि जीवि मिथ्यात्यु प्रवविध । कुतीयु संस्थापित, कुमार्ग प्रापिउ, सन्माए अवलपिउ । हियु ऊपाजि मेल्हि सरीरु कुवु पापि प्रतिउ, जि अधि गरण हल खल घर घरटी खाडो कटारी अरहह पावटा कूप तलाव की कराव्यां अनुमोद्या, ते सर्व प्रिविधि त्रिविधि वोसिरावड देवस्थानि द्रवि वेवि पूजा महिमा प्रभावना कीधी, तीर्थजात्रा रथजात्रा कीधी, पुस्तक लिखाव्यां, सार्मिकयाछल्य कीयां, तप नीयम देववंदन यांदणांइ सज्या, अनेराइधर्मानुष्ठानतणइ विपद जु जमु काउ सु अन्हारउ सफल हुओ! इति भावनापूर्वक अनुमोदउ पृथ्वीचन्द्रचरित्र (घाग्विलास) या विश्वकल्पवहीवालीलया कल्पितपदा । प्रदत्तां चाग्विलामं मे सा नित्यं जैनभारती ॥१॥ धर्मचिन्तामणिः श्रेष्ठो धर्मः कल्पद्रुमः परः। धर्मः कामदुधा घेनुर्द्वमः सर्वफलप्रदः ॥२॥ पुण्पलगह पृथ्वीपीटि प्रसिद्धि, पुण्पलगइ मनवांछितसिदि; पुण्यलर निर्मलयुद्धि, पुण्यलग परि प्रावितिपुण्यलगइ शरीर नीरोग, पुण्यलगइ अ गुरभोग; पुण्यलगइ कुटुंबपरिवारतणा संयोग, पुण्यलगइपलाणीपइंतुरंग, पुणे लगह नयनया रंग; पुण्यलगइ घरि गजघटा, चालतां दीजई चंदनछया, पुन दगद निम्पमरूप, अलक्ष्य स्वरूप; पुण्यलगइ पसिया प्रधान आवास, तुरंग तणी लास, पूजई मन पीतयो आस; पुण्यलगइ आनंददायिनी मूर्ति, अगु- स्कृति: पुण्यलगइ भला आहार, अद्भुत शृंगार; पुण्यलगह सर्पन बहुमान, घर किस्युं कहीयह पामीयइ फेवलज्ञान । एह पुण्यऊपरि राजाधिराज पृथ्वीचंद्रतणउ कथासंबंध भणीयह । ईई राजुम्माणि प्रभावीपोठि असंख्याता दीप समुद्र पतई । ती माहि पहिला जंबूदीप लक्षयोजनप्रमाण जाणियउ । तेह पापलि लवणसमुद्र दिलक्षयोजनप्रमाण जाणिवातेहपाई धातकीखंडदीप च्यारिलक्षयोजनप्रमाण जाणियउ । तेह पापलि कालोदधि समुद्र आठलक्षयोजनप्रमाण जाणिवउ । ते परई पुफरवरदीप सोललक्षपोजनप्रमाण जाणियः । तेह पापलि पुष्करय- रसमुद्र पन्त्रीसलक्षयोजनममाण जाणियउ । आगलि पामणिदीप ६४ लक्षयो- जनप्रमाण जाणिवउ । तेह पापलि यारणीममुद्र एककोडि २८ लक्षपोजनप्रमाण जाणिवउ । ईणिपरि ठाण चिमणा दीप समुद्र जाणिवउ । कयण फयण क्षीर- दीप क्षीरसमुद्र घृतदीप पृतसमुद्र इक्षुदीप श्चममुद्र नंदीसररदीप नंदीम- रसमुद्र अरणदीप अरुणसमुद्र अरुणवरदीप अगणवरसमुद्र अग्णयरायमास- दीप अरुणयरायभामसमुद्र इत्यादिक दीपसमुद्र असंख्यात । तेहमादि पहिल जे जंबूदीप, तेहनी नाभिई मेगपर्यत जिसिउ प्रदीप, तेहतुं दक्षिण उत्तरई सानक्षेत्र पऊद महानदी छ पर्पघर पर्यंत पतई। .

९४ स्पर ८८ सीवीर ८९ मुराष्ट्र ९० सुहड ९१ अस्मक ९२ हूण ९३ हर्मोक ९८ मुगदिसुं धनगिरि सीकोत्तर चोलनाट पांड्य तालीउ बिहति भोट महामोर भला नगर, जिहां न मागीयई कर । दुर्ग, जिस्या हुइ स्वग; धान्य, न नोप प्राचीनगूर्जरफाव्यसङ्ग्रह किसा ते क्षेत्र । भरतक्षेत्र १ हैमग्रतक्षेत्र र हरिचर्पक्षेत्र ३महाविदहक्षेत्रा रम्यकक्षेत्र ५ ऐरण्यवतक्षेत्र ६ ऐरवतक्षेत्र ७। किसी महानदी । गंगा १ सिंपुर रोहिताशा नदी ३ रोहिता ४ हरिकांता नदी ५हरिसलिला नदी ६सीनोदा सीतानदी ८ नारीकांता ९ नरकांता १० रूप्यकूला नदी ११ सुवर्णकूला नदी ११ रक्तवती १३ रक्तानदी १४ । किस्या किस्या वर्षधर । हिमवंतपर्वत १ मा हिमवंत २ निषध ३ नीलवंत ४ रुक्मीपर्वत ५ शिखरीपर्वत । हिव जे कहि भरतक्षेत्र तेहमाहि २५ योजनप्रमाण वैताठ्यपर्वत ३२ सहस्र देश । हिमाहि साढापंचवीसदेशआर्य, थाकताअनार्य जाणिवा । कपभदेवतणां पुत्रतणे नामिहं सयलदेश जाणिवा । ते कुण कुण काश्मीरदेश १ कीर २ कावेर ३ कांबोज' कमल ५ उत्कल ६ करहाट ७ कुरु ८ काण ९कथ १० कोशक ११ कोसल १२ केशी १३ कास्त १४ कारूप १५ कछ १६ कर्णाट १७ कोकट १८ केकि १९ कौलगिरि २० कामरूप २१ कूकण २२ कुंतल २३ कालिंग २४ करकूट २० करकंठ २६ केरल २७ पस २८ पर्पर २९ पेट ३० गौड ३१ अंग ३२ गौप्य ३३ गांगक ३४ चौड ३६ चिल्लिर ३६ चैत्य ३७ जालंधर ३८ टंकण ३९ कोडि. याण ४० डाल ४१ तुंग ४२ ताजिक ४३ तोसल ४४ दशार्ण ४५ दंडक ४३ देवसभ ४७ नेपाल ४८ नर्तक ४९ पंचाल ५० पल्लव ५१ पुण्ड्र ५२ पांडु १५ प्रत्यग्रथ ५४ अर्बुद ५५ वभु ५६ वंभीर ५७ भट्टीय माहिष्मक ५९ महो- दय ६० मुरुड ६१ मुरल ६२ मेद ६३ मरु ६४ मुद्गर ६६ मंकन ६६ मल्लवर्त महाराष्ट्र ६८ यवन ६९ रोम ७० रादक ७१ लाट ७२ ब्रह्मोत्तर ७३ ब्रह्मावत ७४ ब्राह्मणवाहक ७५ विदेह ७६ वंग७७ वैराट ७८ वनवास ७९ बनायुज थाल्हीक ८१ यल्लव ८२ अवंति ८३ वह्नि ८४ शक ८५ सिंहल ८६ सुम्ह हर्मोज ९५ हंस ९६ हुहुक ९७ हेरक ९८ एवं देश अट्टाणू अनइ आदन हाथ पीण महाचीण यंगाल पुरसाण मन्ध यच्छ गाजणाप्रमुष अनेक देश वर्तई । तीहमाहि वपाणीपइ मरहट्ठदेस । जीणइ देसि ग्राम, अत्यंत अभिराम जइ सामान्य; आगर, सोनारूपातणा सागर । जेह देसमाहि नदी वहई, लो सुपई निर्वहई । इसिउ देश, पुण्यतण निवेश, गरूम प्रदेश । तीणि देखि पहुटाणपुर पाटण यतई, जिहां अन्याय न वर्तई । जीण नगरि कउसीसे कर सदाकार पापलि पोटा प्राकार; उदार, प्रतोली बार; पातालभणी घाई, महा ९५ पृथ्वीचन्द्रचरित काय पाई, समुद्र जेहतु भाई; जे लिइ कैलासपर्वतसिड पाद, इस्या सर्वज्ञदेव- तणा भासाद; फरई उल्लास, लक्षेश्वरीकोटीध्वजतणा आवास; आनंदहं मन, गरुडं राजभवन, परि अपंड, सुवर्णमय दंड, ध्वजपटल लहलहई प्रचंड । जेह पाटणमाहि अनेक आश्चर्य वापरई, चउरासी चउहदां कलकलाट करई। किस्यां ते चउहदां। सोनीहटी १ नाणायदहदी २ जयहरीहदी ३ सौगंधीयाहटी ४ फोफलिया ५ सूधिया ६ पडसत्रिया ७ धोया ८ तेलहरा ९ दंतारा १० पलीयार ११ मणीयारहटी १२ दोसी १३ नेस्ती १४ गांधी १५ कपासी १६ फडोपा १७ फडोहटी १८ एरंडिया १९ रसणीया २० प्रयालीया २१ प्रबहटा २२ सांपहडा २३ पीतलगरा २४ सोनार २५ सीसाहडा २६ मोतीमायां २७ सालवी २८ मीणारा २९ कुंआरा ३० चूनारा ३१ तूनारा ३२ फूटारा ३३ गुलीयारा ३४ परीपरा ३५ घांची ३६ मोची ३७ सुई ३८ लोहटिया ३९ लोदारा ४० चीत्राहरा ४१ सतूआरा ४२ कागलीया ४३ मद्यपहटी ४४ वेश्या ४९ पणगोला ४६ गांडा ४७ भाडभुजा ४८ वीवाहडा ४२ प्रांबडीया ५० मइंसायन ५१ मलिन नापित ५२ चोपा नापित ५३ पाटीवणा ५४ प्रांगडीया ५९ वाहीवा ५६ फाटवीठीया ५७ चोपावीठीया ५८ सूपडीया ५९ साधरीया ६० तेरमा ६१ घेगडीया ६२ पसाह ६३ सांथा ६४ पेरूआ ६९ आटीआ ६६ दालीया ६७ उढीआ ६८ मुंजकूटा ६९ सरगरा ७० भरधारा ७१ पीतलहडा ७२ फंसारा ७३ पत्रसागीआ ७४ पासरीआ ७५ मंजीठीया ७६ साकरीया ७७ सागर ७८ लोहार ७९ सूत्रहार ८० घणकर ८१ तंयोली ८२ कंदोई ८३ युद्धि- इटी ८४ फुत्रिकापणहटी एवं चउरासी पउहटा जाणिया । जीणई नगरि अनेक पामीयई रत्न, जीदतणां कीजई यत्न । किस्यां ते रत्न । अभ्यरत्न गजरत्न पुरुपरत्न नीरत्न अनइ पद्मराग पुष्पराग माणिक सींघलिया गुरुडोहारमणि मरकत फर्केतन पन हर्ष पन्द्रकांत सूर्पकांत जलकांत शियकांत चंद्रप्रभ साकरमभ प्रभानाप अशोक वीतशोफ अपराजिन गंगोदक मसारगल्ल हंसगर्भ पुलिक सौगंधिक सुभग सौभाग्यकर विपहर धृतिकर पुष्टिकर शत्रुहर अंजन ज्योतीरस शुभचि शलमणि अंगुकालि देवा. नंद रिष्टरल कोटपखि कमाउला धूमराइ गोमूत्र गोमेद लमणीया नौला मृण- घर वगइ पनधार पट्कोण कणो चापडी पिरोजा प्रवाला मौक्तिमयमुग्ध रत्नकरी दीसई भरिपां हाट, अनेकसुवर्णमय घाट, पिटुली पाट, पालइ घोडा- तणां घाट, लोकनई नहीं किसिउ ऊघाट । जिहां पुण्य पिशाल, सीसी पोसाल फट ६ अत्यंत मीठ । किम ते स्वप्न । इसिउं जाणइ नरेश्वर सुवर्णवर्ण- रिहामांगलिसांय मगर आंकार हा नियलितणा दोकार, मृदंगमय प्राचीनगुजरकाव्यसवहः जिहां छात्र पढई चउसाल, तिसी नेसाल; जिहां अध्यात्मतणी वात दृढ तिस अनेक मह; जिहां लोक जिमई अपार, तिसा सकार; जिहां पाणी पियइ सर्व, तिसी पर्व: जिहां रमलि कीजई स्वभावि, तिसी वायि; जिहां आनंद हुआ, तिसा कूआ; पद्मवनखंडमंडित प्रवर, महाकाय सरोवर; जिहां रंगि कोई रयवाडी, तिसी वाडी; जिहां सीतल फुरकई पवन, तिसां पापलियां वन; इवें अन्यायरहई दाटण, पृथ्वीपीठि प्रसिद्ध पुहिठाणपुर पाटण । तोणि पाटणि राजाधिराज पृथ्वीचंद्र इसिई नामिइं राज्य प्रतिपाल, भुजवलिकरी वइरी वर्ग टालई । जीणि राजा गौडदेशनउ राउ गांजिउ, भो. टनउ भांजिउ; पंचालनउ राउ पालउ पुलई, कानडादेसनउ कोठारि गला ढोरसमुद्रतउ ढोयणां ढोयइ, वावरउ वारि बइठउ दगमग जोयइ; चौडनउ दी चांपिउ, कास्मीरनउ कांपिउ; सोरठीयउ सेवइ, तुडि न करई देवई; अंगरे- सनउ अंगि ओलगइ, जालंधरनउ जीवितव्यकारणि रिंग; घणुं किस्युं कही- यइ, रिपुकुलकालकेतु शरणागतवज्रपंजर पंचम लोकपाल । जीणं रिपु सर्वे नि- दियां दुर्ग सर्वे आपणा कीधा, क्यरीनई देसवटा दीधा। इसि निकंटक मा. प्राज्य प्रतिपालइ । तेह नरेश्वरनई बुद्धिनिधान, परमहंसनामि प्रधान; जेउ सहि जिई रूपिइं रूडउ, पाटरहिं नहीं फहउ; राउलउ अर्थ सारई, लोक जगार, पपरविग्रह पार; पालइ दीन दुस्थित निराधार, करइ साधुजन उपगार शाग्नि फुगल अपार, गुहिर गंभीर, अतिहिं धीर मुहि मीठ भापई, का फोघां जि दापद; चिहुं युद्धितण निधान, सवितुं अमात्यमाहि मूलिगु प्रधान रायतण प्रनिशरीर, इमिडं ते मंत्रीश्वर; नरेश्वररहई, शियमय सुपमय ल्याणमय दियम अतिक्रमई । अन्यदा प्रस्तायि राजा रातितणई प्रस्तावि स्वप्न एक दीठउ, जेहन कांति, देवरहई मन भ्रांति; पलकते नेउरि झलकते कुंडलि हाधि परमाल अर्द्धचंद्रममभाल; पि विशाल, इमी यालदेवी देपद भूपाला जेतलइ तेहती परमाला कंटिकंदनि मागी, तेतलई रायनइं निद्रा भागी; जागिउ नरेश्वर, पीतयः अनयेमर । किमिउ स्वप्ननणउ घटइ विचार, सेतलइ प्रभातायम पोंगर; महलमा मांगलिस्यप्पनि, राजा आनंदिउ मनि शुभहेतु स्वप्ना मनि विधार परी, पायंक परिदरी;क्षतु एक राजा महापाटद आव्या । म शनि पृथ्वीचन्द्रचरित्र सिउ विनोद नीपजाच्या पडद लानमन्जनादिक प्रभातफरणीय कीर्छ, याचकर- हद्द दान दीघ । ति बारें गणनायक दण्डनायक पायक पृत्तिनायक बहीवाहक नलवर माइम्बिक कौटुंबिक इन्द्रजाली फूलमाली धातुर्षादी मन्त्रवादी तन्त्र- बादी यन्त्रवादी कपटाइत चपटाइत अङ्करक्षक अङ्गमर्दक मीठायोला सुहायो- का कयायोला साचायोला जूठायोला अनइ अनेक राजराजेश्वर मण्डलेश्वर सा- सन्न संत्रपाल तलवर्ग घउरासीया महामात्य मन्त्रीश्वर श्रीगरणा वगरणा माधिगरणा सेनाधिपति आगरीया व्यवहारीया राजदारिक भण्डारी बोटारी कापडभण्डारी गभण्डारी रसोईया पाणहरी श्रेष्ठि सार्थवाह पीठमर्द रिवधू पीणकार वंशकार उतिकार आउजी पवाउजी पढाउजी आलवणकार क्षिणिक तार्किक छान्दसिक मुखमाङ्गलिक चैद्य ज्यौतिपी पाद्री पङ्गधर नधर धनुर्धर छत्रधर बालकहार सेजपाल धईयात पण्डित कवि लेखक उप महायोघ माल मसाहणी पाण्डव परंतारममुखसकललोकि करी सश्रीक जा राजसभां बईठा। राजसभा फिसो छ । जीणि राजसभां कुंकुमजलि छटा दीधी एइ, विधमुक्ताफलि चतुपक पूरिया छई, कर्पूरतणा शंख आलिप्या एई, कृष्णा- -जवाधितणा परिमल महमहई छई,मोतीतणी सिरि लहलहइंछई, फूलपगर रेया घई, फटीप्रमाणपायपीठसंयुक्त पुरुषप्रमाण सुवर्णमप सिंहासन दिउं एई। तीणि सिंहासणि राजा बइठा । किसउ राजा दीसह छह, नकि श्वेतातपत्र छह पासई दलई चामर पवित्र, पाजई विचित्र चादित्र, कि मुगट, कानि कुण्डल, हदपि हाराईहार, महाउदार, धनदतणड नार, रुपसणु भण्डार । घण किसिर कहीपइ । जिसउ पृथ्वीलोकतणा - जिसउ सोलकलासम्पूर्ण पन्द्र, इसउ दीसह ए पृथ्वीचन्द्र नरेन्द्र । सद अवसरि प्रनीहार आविउ प्रणाम नीपजापित । राजांसाली दृष्टि मो, अणि धोनती कीधी; जी अपोध्यानगरीहंता इत सम्हारइ सारांतरि वेउ मनितणई उत्साहि, जइ हुइ आदेस तु मेल्ह माहि । उ राजा- उ आदेस, दृति कीध सभामादि प्रयेस । रापरहइ कीपर जुहार, अल- योग्य आसण उदार। राजा इतरहइ याहुमान दीपउँ, फुशल प्रभ । आनन्द अपनउ अत्यन्त, हिय दल पीनयइ कार्य विशेष पन्न। लोकरहई नही किमिउ प्लेश, जिहा नही पहरीनणउ प्रवेश, पुण्यनणा श; अनेक ग्रामनगर, सोनारूपातणा आगर मनोदर पण कोसलास विहितवपरीकुलविध्वंस निजकुलकमलराजहंस अतुलवल पराक्रम विवि. प्रागीनगागमारः। तिहां छई नगरी अयोध्या किमी ते नगरी । पनानाममा, पृथ्वी पोटि प्रसिह अत्यंत रमणीय, माललोरहणीयपृथ्वीरूपिणीकामिनीरा इं तिलकायमान, सर्वमादयनिधान; सामीलीलानियास, मरस्वती यास; अतुलदेवकृलि मंडित, परचमि अग्नंदित, मदा सुठारि पालित, रमणी पराजमार्गि शोभित, उत्तंगमाफारवेष्टिन; सदा आशना निलय, यमुधार नितायलय, निम्पमनागरिकतणउं ठाम, मनोभिराम; जनितदुर्जनक्षोभ, मा. नोत्पादितशोम; पुमपरत्नोत्पत्तिरोहिणाचल, कुलवकल्पलतारत्नानला जीप नगरी देवगृह मेरुगिपरोपमान, घवलगृह स्वर्गविमानसमान; अनेक गवाहा वेदिका चउकी चित्रसालीजाली निकलमा तोरण घयलगृह भूमिगृह भांडागार फोठागार सत्रागार गढ मह मंदिर पढ़यां पटसाल अपहृदां फहददां दंडकलस आमलसार आंचली वंदरवाल पंचवर्ण पताका दीपई । सर्वोसर मंत्रोसर मांजणहरां ससदारांतर प्रतोली रायंगण घोडाहदि अपाउ गुणणी रंगमंडप सभामंडपसमूहि करी मनोहर एवंविध आवास । जेह नगरिमाहि दोमी नेस्ती साह वसाह पदउलीपा पडसृत्रिया पजूरीमा बीजरीमा कणसारा भग- सारा मपारा नवकर भोजकर भला लामा अनेक लोक वसइ । पांचसई व्यव. साईया व्यवसायविपइ उल्लसइ । जेह नगर पापलीया अनेकि कृया धावि सः रोवर नइ नोक निरुपम उद्यान आंब नींव जांबू जंबीर वीजपूरप्रमुख वृक्षावली करी प्रधान च्यारि पोलि, प्रधान कोसीसातणी ओलि, प्रभातसमइ सूर्यतणे किरणेकरी प्रासादतणे शिपिरि धजकलश झलकइ, धजऊड लरकइ । घणर्ड किसूं कहीइ, जिसी होइ अमरावती भोगावती अथवा अलका लंका इसी नगरी अयोध्या वपाणीइ । तीणि नगरी इक्ष्वाकुवंशावनम फ्रमसमान राजा श्रीसोमदेव राज्य प्रतिपालइ,प्रजा संसालइ, अन्याय टालइ। जे राजा सत्यवाचा राजा श्रीहरिचंद प्रतिज्ञा राजाश्रीयुधिष्ठिर निर्भय भीम आपन्न जीमूतवाहन विद्या बृहस्पति लावण्य लवणार्णव रूपि कंदर्प मार्तड औदायि बलि राजा अद्भुतदानि चिंतामणि सेवकजनकल्पवृक्ष चतुरंग वाहिनीसमुद्र। घणउ किशिउ कहीइ महासासनु अरडकमल्लजगझंपण प्रता पलंकेश्वर परराष्ट्रीरायहृदयशल्य इसिउ प्रतापी राजा राज्य प्रतिपालइ । तेह राजातणउ अंत:पुरिमाहि प्रधान गुणनिधान भारतणी भक्तिविषय महासा- घधानि स्त्री कमललोचना इसिई मामि पहराज्ञी वह जेह राणी, सहिनि प्रताप

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प्राचीनगूर्जरकाव्यसवः।
५९ लोकव्यवहार ६० यशीकरण ६१ वारितरण ६२ प्रश्नप्रहेलिकार
धर्मध्यान ६४ ए कहीयई सर्वकलाविज्ञान, जाणइ सफल शान
घरसहि विज्ञान।
रवि श्रीमश्चलान् श्रीमाणिग्यसुन्दरसूरिविरविते श्रीध्वोपन्द्रपरित्र
पामिलासे प्रथमोल्लासः।
दितीयोल्लासः
दिव ते गुमरि, यही पौयनिभरि; परियरी परिकरि, फ्रीय
नरनयी परिइगि अयसरि आविउ आपात, इतरगुणि संघात; क
मोर, मग मिरोहा छागि पाटी, पाणी पीपाइ माटी; वि
य, ने पंधीनगर काल, नाटय दुफाल । जीणिइ पांकालिमा
ir mar, भिक्षनणा भय भाजइ, जाणे सुभिक्षभूपनि आयनों -
पामा विहं दिगि पीत अलहालय, पंथी घरभणी पुल; विपरीत अ
मंड पारिपाम; राति अंधारी, पय तिमिरी; सरनउ ऊनपण,
Per; दिमि घोष, नागई मार; गधर, परमर धारापर; पाणीगा
पाटो, बाहिरि ना यलो, पीपलि पालतां शाट गाई,
मन मंरि बला: नदी महरि आयई, पीपीट प्राप; नयां
rri, बटारितान नहला बालीक मागह, महागा या
मईपनवा नाशरण विटा, मरिण गरीयर पनिया
गरर मामांवर काविर मया माणु, गमुद्राममा; पण
रा, गहारा भाग: गजा मनि नर, गरोयर जश
इंटर भरि मगरा, TRE आनंदभा; जोगी नेहा महागार
पं, अट नापिकान मागि माग
माधमः कस्टारर हाम. विदागा; भार , मामि
मा लिएर समाली, पाला ग Tami
Free दिपक दिन मानाचा
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परम भरनाम पर

पृथ्वीचन्द्रचरित्र मोमशर्म श्रीधर देवधर गंगाधर गदाधर लक्ष्मीधर श्रीवच्छ पद्मनाभ पुगपो. समप्रमुख ब्राह्मण मिलिया, शांति फरिवानई कारणि कलिफलिया; गले धागा, वेदयानि उचरिया सागाजे ब्रामण १८ पुराण १८ स्मृति जाण । ते किरया पुराण । भागवतपुराण ? भविष्योत्तरपुराण २ मत्स्यपुराण ३ मार्कंडेयपुराण ४ विष्णुपुराण ५ चाराहपुराण ६ शिवपुराण ७ पामनपुराण ८ प्रभपुराण ब्रह्मांडपुराण १० ग्रामवैवर्तपुराण ११ आनेयपुराण १२ पापुराण १३ निंग. पुराण १४ नारदपुराण १५ स्कंदपुराण १६ फूर्मपुराण १७ गम्टपुराण १८ । ते किसी स्मृति। मानवीस्मृति ? आग्रेयोरप्ति २ पप्णपोरगृति : हारीतकोस्मृति ४ याज्ञवल्कीस्मृति ५ शनमरोस्मृति ६ अंगिगरगृमि आपस्नबीस्मृति ८ सांवतकोस्मृति ९ कात्यापनीति १० पृहस्पतीगृति ११ पारासरीस्मृति १२ शंखीस्मृति १३ लिम्वितारराति १४ दासीरभूमि १५ गौनमीरमूनि १६ शातातपीस्मृति १७ याशिष्ठीस्मृति १८ । तिसिइरनमंजरी फुभरिराजारहई पोनप्ती करापी, मिहांकुमिग जापा आयो । जेहतणइ परियारि, सपी अनेरुमकारि; कस्तृरिया कारिका सीमावी पायती चंद्रावती गंद्रउली चंपू हंसी सारी याालीममुप अनेक गावः। सीई सहित तिहां आयी। पिताराई प्रणाम नीपमापी उत्गि पटी, विष्ण रूप देपी रापतणइ मनि निता पठी। पहयोग्य कपण पर, विनर, जिविता. घर, इसी पीतपतई नरेभ्यर, मरांपरभणी टि दीधी । तु निर्मन्न जलि, पाटा समलि; हंस करई रमति, पारद दिसि पासी परिमति, पारंर कुरंज राम इस फलगलई,ताप टलः मोर पामई, सर्प नामद; आदि पंपोमा तर, प्राण स्नान कर माहिशनपत्र महरपत्र कमलपन, दीगतां प्रीति पमा मन; देरी दंडकालम ललई, लहरि अलहम जो राजांम एक परोपदी घाटा राजासण हागि, निहालित नरनाधिका रूप, RTE मोहामण; वेत, सापण्यापेत; जिमि समीपतात नमर. सीमri यई अमर, कुंदकुसुमरलयबासमान प्रधान पक्षिरलापनर मिरांग पुति. गरी कुमारी ली3, THा सीधा । जपला जोभा पुमरी, मंगलात जिमणो पाप पिस्तारी: कुमरि पापभारिपाती, भारि माती । rein. नयाल पपिंगु । भसमा उठि गा, परति যি ঘর। যানবাগ থমথ, বা ঝি মিলি গণ, বাল १०२ प्राचीनगूर्जरकाव्यसवहः घरभणी ऊजाणा; दुबै नाठा, सवे त्रिवाडी त्राठा। धुंब पडी राउ घायउ हंस पूठिई जेतलई, हंस धाई पठउ कमलमाहि तेतलई । जे वारू, ते पइठा सर घर माहि तारू समग्न सरोवर गाहिउ, पणि हंस न साहिउ। निश्वास मेल राउ पाछउ पलिज, परिघउ परिवार मिलिउ । राणी ते वात जाणी, मूब पामी सपाणी, सचेत कीधी छोटी छोटी पाणी; राजा आवासी आव्य कन्यातणु दुःख धरता छ मास अतिक्रमाया । तिसिइ आयिउ वसंत, हउ शीततणउ अंत, दक्षिणदिसितणउ शीन घाउ वाई, विहसई वणराई । सव्वे भल्ला मासड़ा पण चइसाह न तुल्ल । जे दवि दाधा रूंपडां तीह मायइ फुल्ल ॥ मउरिया सहकार, चंपक उदार; बेउल बकुल, भ्रमरकुल संकुल, कर रख करई कोकिलतणां कुल । प्रवर प्रियंगु पाडल, निर्मल जल, विकसित क मल; राता पलास, सेवंत्री वास; कुंद मुचकुंद महमहई, नाग पुन्नाग गहगह- सारसतणी श्रेणि, दिसि वासीई कुसुमरेणि; लोकनणे हाधि वीणा, वस्त्राई झीणा; धवल शृंगार सार, मुक्ताफलतणा हार; सर्वांगसुंदर, बनमाहि रम भोग पुरंदर । एकि गीत गवारई, दान दिवारइं; विचित्र वादिन वाजई, रमति तणां रंग छाजई । एकिवादिई फूल चूदई, वृक्षतणा पल्लव पूंटई; हीडोलई हीच झीलतां धादिई जलिई सींचई; केलिहरां कतिग जोभई,प्रीतमंत होयइ । वनप लकि अवसर लही वसंत अवतरियातणी वाती कही । राजा सोमदेव आए धनमाहि, तह जि सरोवर देपी कुंअरि सांभली मनमाहि । तेतलई पुरु एकई तेह सरोवरहंतुं एक कमल लेड रायरहा दोध, राजा हाथि लीघर तेतलई तह जि कमलमध्यहंती नासरी रत्नमंजरी कुमरि, दीठी नरेश्वरि दुपतर्णा व्याप धरियां, लोक आश्चर्य पूरिया। नगरमध्य वानां जणावी, रार कमललोयना आयो । दीठी बेटी, हुइ परमानंदनी पेटी, परिवरी चेटी। ति मांडिया पधामणां, महोत्मवि करी मुद्दामणा; विचिन यादिन याजिया लागा ते कयण कयग । वीणा विपंची यालको मालोष्ठी जया विनित्रिका हस्लिय फरयादिनी फुन्निका घोपवती मारंगी उदंबरी निमरी झंपरी आलपि छकना गयणहल्या भाल माल घंट जयचंट घालरि उंगरि पुरकचि कमर पायरी हार टार टाक शृंग नीमाण सांपकी कहालि मेहरू कांसी पार्ट - आविड । हिच तुम्हे तिहां पाउ धारउ, ए चीनती अवधारउ, राजासोमदेवताह उंचासणा परीणा। जोपर्ड महा. यारिया : पांकी द्वेठी, मभर पति घोट फाने, सभइ पानिः महरनी ललयलाई, नीटनी कलाई, धनणी आम पृथ्वीचन्द्रचरित्र सांप मांगी मदन काहल भेरी धुंकार सरवरा । ईणिपरि मृदंगपटुपडहममुप प्रधाज्यां, दुप दरि ताज्यां । इकवीस मूर्छना इगुणपंचास तान, इस्पां गीन गान; पाचक योग्य प्रधान यन्त्रदान किस्यां ते वानसधिला संग्रा. दाडिमां मेघवनां पांडुरा जादरा काला पीपला पालेवीयां ताकसीनीयां रोयां कस्तुरीयां पदीयां चउकीयां सलवलीयां ललवलीयां ईसयटि जबडि उडसाला नर्म पीठ अटाण कताण झूना झामरतली भइरय सहभइरय लीबद्धममुग्य घग्न जाणियां । इणिपरि महोत्सयभार, साथि फुमरि, नरेश्वर पहुना नगरि । मननणइ उल्लासि, आल्या आवासि । रायरहह फुमरीतणर्ड स्वरूप विमासतां अपनी आकाशवाणी, ए यात कटिस्पई केवलनाणी। राजा तां आर्य धरतई तह प्रधान तेडाविउ, तिहां आविउ । ते प्रणाम फरी वइ- उस राजा बोलाविउ हे मंत्रीश्वर विचारि, पाणिग्रहणयोग्य हुई रत्नमंजरी कुमारि । तु मंटावीय स्वयंवर, मेलीयई सये नरेश्वर, कन्या आपणी इच्छा पद पर । इसिउ आलोच कीघउ, तु राजा सबिष्टुं दूतरदई आदेश दीघउ, जु को पृथ्योपोटि राय नइ राणा, तम्हे जाणउ, ते समग्र ईणि स्थानकि आणउ । नियारपटिई स्वयंवरमंटप सत्रधारपाहिं फराविया मंडायिउ, हुं तुम्हकन्हइ मनि आनंद पधार। इसी यार्ना मांभली दुताई वहुमान देतु कटक लेइ राजा पृथ्वीचंद्र स्वपंचरभणी चालिज, कटफभारि पातालि शेप नाग हालिउ । हाधीया घोडा, नहीं घोटा।किस्याने तापीयादा मिहलदीपनणा, जाजनगरतणा, भाजातीर, उष्टलिनसुहादंड, प्रचंड, पर्यनममान, जलपरवान, पपलपान, मदजल झरना, आलि करता, अतुलबल, उच्मुग्यल, गलगवित करता गजेंद्र मांगरिया, नर- सतेजी सरवरिया। किस्या हयाणा भयाणा कणा कास्मीग हपठाणा पट. टाणा सरमईया मीधउरा फेकाइला जाइला उत्तरपंधा पाणीपंथा नाजा तेजी तोरका काच्छला कांबोजा भाडेजा आरह पाल्हीकज गांधार पापप सतिल पैगर्त आजग कांदरेण दाद मापीर क्षेत्रशुद्ध प्रमाणशुद्ध पपल मरल माल साई पलाणतणी मामंत्राईः पांकी तुंचालि, याहुली पेटयालि, मुहिक १०४ प्राचीनगूर्जरकास्यसङ्कहः आसणि सूधा, हसमंत हयहेपारवि अंबर बधिर करता । सरवीर साहसिक कालूआ किरडिया किहाडा नीलडा सेराहा कविला धूसरा मांकडा दोरीया वोरीया द्वादशावर्त्तव्यंजनगुणि शोभित शालिहोत्रशास्त्रप्रणीतलक्षणलक्षिन । ससई धसई, साटि पइसई, जुई, दउडई। जिस्या सूर्यतणा रथ छूटा हुई तिस्या अनेक तुरंगम सांचरिया । तउ पायक पहटिया । किस्या ते पायक । सरकार विक्रांत दुर्दात पट्न पेडे लीधे श्रमई, पयरीरहई आक्रमई, पवनवेगिपुलिदं, योप जुई, सेल कुंत तोमर ताकई, ययरीरहई हाकई; बेला लामी, न मेला स्वामी; नयनयां आयुध लिहं, एक यार आकाश पडतां धाड दिइ । किला न दीमा थामा, जीह लगद हुइ जयपताका; जे धाई पुलई अच्छलई । स्या पापस्नी मिली कोरि, जीह माहि नहीं पोडि । हिव रथ विस्तरिया । किस्पा ते रथ । पपलतुरंगमजूता, सुखिई सुभट चालई माहि या मता; पीले दंडापु भरिया, थायुर्वेगि सांवरिया घडहडाटि घरामंडल धंघोलई, रजमादि रविविध रोलर; परि धज लहलहई, जाणे देवसंबंधीपां विमान गहगार पांट पाजा, पपरी भाजई; मूत्तियता जिस्या मनोरथ, इस्या अनेक मांगरिया रथा ईणिपरि चतुरंग दल पालनांहता नरेश्वररहई पाटइं अनेक ग्राम नगर आयर, स्टोक मयनयां भेदणां नापजावइ । मार्गि जानां आयी एक अरवी । दिय ने किमीपरि पर्णयियी । जेह अदय माहितमाल ताल नाल माल्दर मर्जर अर्जुन चंदन पर यकृल विधिकिल महफार कांचनार जांच जबीर पानीर कपीर कीर फेलि कदंय निंब नारिंग नालीगरि द्वाप दादिमी देवदार. अंकल कंफिलि नाग पुमागही यूधिका मालमी मापी जा मरवा दमनक. पारधि केसकी मुराद कुंद मंदार तगर रोपनी रागिरि मिग मावलि मिाघ माममि माग हमार आफ आमदार कपिल पील वहित करा वाण पत्र पदिर पलान यर यंटम पीपल पापरि ऊपर कारपर शारी घाम पीर पंजर पारी का कांश याद योगरी भामटी शामिणी वारि गोरि गोगटागामुम क्षारला दगई, पीला ग from मनपाम। अमित मिवाना पगार, पसगा भागार पा मार, न मामा यार ना पार; माहिपानापपरा TORY, मदम गलगल मिटनामामात मगल परमार। जिला विदामा शनि भलामा ,पात्रा पुरा पेमा जिसि, दापार मा.विमल यूविषगामी महाग पी।

पाणीपात्र irantr नमागणां पटा नना माग, मलाइ नदीमणा साग; न का पानी पी, न को जाण मापी विषम पर्यनमाला, डायो जिमणी दवाणी नाला, गई म पगारिया ना पाला, तेतला दीसिपा लागा भील मोल माला निवारांगनायोट गानपिउं आयी विषम पेला, जई थाई ग. मा अफिम शारीमा, जा परदन नमारोपई। जेतलई राजा इसि पीत- विनय ने पटरा अयोपरि पारि पर्नु, मनि गदगातुं। आगलि नगर देर पूणण पदम पाटीपा लोक आभर्य घरई, परस्परई मी पान का पति का जाणि, एकटफ इहां कुणि आणि3; देव पर पुणि दिप दाणर फार मृदा जीण पपटुं सानिध्य कोपर, हेलांमात्र परमा: गोपअधया राजा पृथ्वीचंद्र पन्य, जेहनुं गरू पुण्य । जेह कारणि इन्युं काटा गया पिमि, पटिया लेशि; साणीया पाणोनइ परि, मानाम्या मारिया मारि,रमिण विपपरि; धरियां राइ, भेल्पा धणे पाइ, मुगरिया मोगे, तापिया रोगे; पाटिया यदि, पटिया विदि; सीहं सपिहुं- ना धर्मना आधार, ए मा विचार । लोरहाई इसी यात करतां राजाई विहां आवाक्षरेटलि आला, तारा नोपजाव्या । सेनलइ धातु, पुलतुः पास जोनड, फायरपणह रोत; पुगप एक नरेश्वरतणइ शरणि पइटम तेतलइ माआरितायता, इणिणि भणी हाकता; केई पुरुष आप्पा । तेहइ राजा यातायाापुर पोर, महाकठोर, जे पहनई रापइ ते दोर। तियारई राजातणे म. पहिउँ अरे एकहींई राजा पृथ्वीचंद्र, पास्युं पहुची न सकई इंद्रा तिवा- गते पुरूष कहिया लागा नरेश्वर पहिलपात अवधारउ, सउ चोर जगार। भन्हे सलार, फर नगरतणी मार । पुणि ए चौर, दुदान्त अपार; ए विवि- पनि हेर, योलायिउ योल फेरहा घटइ मालि अटालि, पइसइ परनालि पाति; शमाट अघाट, पुणि मृतु कोइ न जगाइ, अघोर निद्रा दिइ; कान- कोटना आमरण लिद; कटारी पापबंधन पादर, पर्वतमाय केकाण फाइ; पहिलं पोर पयाई, राउला भंडार फार; दीसइ दिसि शांत, पुणि रात्रि पक्षात् तान्न; यिणामीन न मानई चोरी, यांधइ घादी जाइ दोरी; लोहे मांकन प्रोटा, धष्टी न रहई पोडरहाकिर ऊजाह, संधिर धसी धाइ, फरि भोपड़ करयालि, जाइ लोकलक्षविचालि; गढमंदिर फाइं, धीजि अह । इस्यु ए चोर गढना परनालि पल्सतर लाधर, पाड़ी यांघर, दांत दोर प्रोधि १०६ प्राचीनगरकाव्यसलहर नाटड, तुम्हनई शरणइ पहछउ । पुणि ए पापी, जीणि प्रजा संतापी; ए तुम्हम धापड, अम्हरहई आपउ । नहींतु घायमहार देसिड, प्राणिहिं लेसि । अमा रउ ठाकुर सपराणउ, तेह आगलि कोई राय नइ राणउ । सांभलउ ए वाल, " आगलि दीसइ पद्मपुरनगर महाविख्यात । तिहां छह राजा समरकेतु, अति सचेत, पयरी प्रति साक्षात् केतु । जेतला तेउ ए वात जाणिसिइ, तेतला ताहरा अहंकारतणउ अंत आणिसिह । एह कारणि घोर आपी निर्दोष था, पछह तुम्हे भावह तिहां जाउ। इसी वार्ता सांभली आपणां सुभटसाम्हउँ जों राजा पृथ्वीचंद्र हस्या, तर ते सुभट उल्हस्या । जठिया ते वीर, ताकवा लामा तोमर तीर । नाठा तलार, नासता पूठिई वाजद प्रहार; नीठ ते जई नगरमा हि पाठा, तु नाभिई सास बइठा । जइ चीनविर समरकेतु राउ, देपाड प्रा- पणउ घाउ । समरकेतु राजा कीघउ कोप, हउ दलवई निरोप; तत्काल साम- हि दल, मिलई सुभट सबल; वाजई प्रयाणभेरी, वीहई वपरी; पारदस्ति गु- घिउ, तेहपरि राजा चडिउ । रथ हथियार भरिया, तुरंगम पापरिपा, पाग संचरिया; चतुरंग दल नौकलिलं, याहिरि एकठाउं मिलि; दोसई नका, उसलाई रजातउ तेह दूत मांगलिउ तिहां रही, तीणे पृथ्वीचंद्रमतिई इसी पान कही।तुंपिपारह देमि पइम, अन्याय करी इहां ययमतरतुं अजाण, अजी मानि स्वामीममरयनुतणी आण, नहींतु प्रकटि प्राण; चोरदंड तुझनई होसिई, लोक काउनिग जोइमिह । ईण यान इन अपमानी याहिरि काडी राजा पृथ्वी दल मामहावि, ए आपण पर्य आबि । पात्यां येउ दल, उपदई लिए: हल को आप पर विभाग यायद नहीं, पितापुत्र सनद नहींनिजाणी आपण दन्द, न जाणो पिग दन्ट, न जाणीपद मनल, न जाणो नभोमंडल, नगागीर पर्यन जागाइ पधिम एकाकार ह । विहंदल मिलते मादल यानी, जपा पाजी, पण काहली पाजी; रणतर याजियां। न्यंयकतणे प्रावहाटि जाणे निन्दा निमुदन नलिया लागा, भेरीगणे पाटि मुहि मिलिदि कारी पालने कोलाहलं पापा कमाया, नीमागत निनादि त्याप्रया सानिए, HTN मंति,दिगा हिमा, दाम्य पाती, पंधारय फाटी, यि दणि पाटने मेनाग मलबालिः, मापला गणित, शर्म करोदि भाग गंगा पानाभरिमन्नाविभागीयाणामाप,Triv; Frieोगदायुष पाला। गिगां । पनपत्र.२ पनुमा पुल मनि गर्य आणे, माहरी यान न जाणे।कियाग गर्ग पूर्वाभिम पदप मांडर समुद्र मर्यादा यांसा: मेरदला. आकाशमा नक्षनराशि गा.पापापा- परि घम्म पला, पाणीमारि अग्नि प्रज्वला भूमाल परभरा. कुनापटपन पहा अमृमहमा थिए भार. पृथ्वी राममि सार: पणि दानदातापुणि मुमकनार प्राणि शरणागत गांग किम गला । निधार्ग आदिर : भरणि, ते लागु राजामणे गणि. स्पामा पन्य जाति ना जगारित. । नहातु सलारे हंतु मारित: परमर मंगारि मनुप्पजन्माना । १०७ . पृथ्वीचन्द्रचरित्र ५ छुरिका ६ तोमर ७ कुंत ८ निशूल ९भाला १० भिंडमाल ११ मु. १२ मक्षिक १६ मुद्गर १४ अरल १५ हल १६ परशु १७ पछि १८ गावि- कणय २० कंपन २१ फर्तरी २२ तरयारि २३ कुदाल २४ दुस्फोट २९ 7२६ मलय २७ फाल २८ नारान २९ पाश ३० फल ३१ यंत्र १२ इम २ दंड ३४ लगड ३५ कटारी ३६ यहि । इस्यां धीआर झलाहल, फायर नई। रथ जूदंता दूरापाती लघुमंधानी शब्दवेधी धनुर्धर धाया, याण मेल्हते आकाश साया । पकि घोडे पडई, एकि ऊतावला पटई; कायर रद, सुभट भिटई, योघ जुई । घोटा मुह मूफी घाई, यूटे पगि ऊजाई; हस्तीनणा मुंदादंष्ट भूटा, एकिना शिर फूटइं । इमिइ युद्धि प्रवर्तता हुंनइ राजा पृथ्योपंद्रमj दन पपरोए एकवार भागं, नामिया लागं । समरकेत एउ सानंद, पृथ्योपंड हर निरानंद, चीनवह ए किसी यात, माहरा दलरहा कादं हउ उपचान । राजा चीतयतह तह पोर एक आकाशमार्गि आविउ, तीणई फउतिग पिना. विउ । नीणं दीटइ पयरीना हायतु हथियार पष्टियां, पृथ्वीचंद्रना पटपर पहियां । राजासमरकेतु यांधी पृथ्योचंद्रतणे पगाली आणिउ, पुण से पार नियारपूटिदं पुणही न जाणि: । तत्काल जयजयारय ऊालिग, राजापृथ्यो. पंदना धारवर्ग मिलिउ। इति श्रीअचलग श्रीमाणिक्यमुंदरसूरिविरचित श्रीध्वीयपरिक विमीयोहास । तृतीयोल्लासः जह मान मोटिउ. ना समरयेतु यंभहनउ पोटिउ. पिहराया पोला। गिर, जानु मनामि । विपारि ने नया । भग - , १०८ प्राचीनगूर्जरकाव्यसवहः देशि श्रीपुरिनगर, तिहां श्रेष्ठि लक्ष्मीधर, श्रीलक्ष्मीई सघर । तेहतणु पुत्र हुं श्रीपति, पणि विषम दैवगति; दसकोडि द्रव्य हंती, पणि वापुजीसापि पहुती।पिता परोक्ष हुआ पूठिई जं वाहणमाहि घाति, तं समुद्र साति; कई चाणउत्रे ग्रसिङ,हाट चोरे मुसि;धलबटनउ थलवटइरहिडं, काईठाकुरे ग्रहि घर बलिउँ, समग्र मंडाण टलिज समग्र द्रव्य निस्तरिर, एकलक्ष द्रव्य ऊगरिर। पछइ अवर काजकाम छांडिलं, प्रवहण पूरिवा मांडिउं । भलइ दिवसि प्रवहण पूरिउ, त्रिन्नि सई साठि क्रियाणां चडाव्या, सप्तविध पकवान नाडा- व्यां; सप्तविध करवा लिया, पोतां सपाणी भरिया, देवसमुद्र वायस पूजाच्या पाभिल मादल वाजिवा लागा, वावरि कोलणि नावा लागी, गलेला हेलाहेल करवा लागा; कूउपभउ ऊभउ कीघउ, नागरउ पाडिउ, सिढ ताडिउ; घामती घामतउ लीचइवा लागु, वाऊरीऊ तलि पइठउ, नीजामउ नालिवइठउ।आउला पडई, सृकाणी सृकाण चालवई, मालिम वाहण जालवई; सुरवर लहलमा वादिननादि समुद्र गाजी रह्या । हिव आगलि जाता हूंता चिली वाय वायां, आकाशि हुई मेछाया; अडिउ पवन प्रबल, समुद्र हउ उच्श्रृंखला कल्लोल आकाशि ऊपडई, योहतां लोकरहई डीया चड, वेला लामी, वस्तु वामी; एक हा दैव करइ, एक देवध्यान धरई । वाहणि पर्वत आफली भागडे, श्रीपतिः हाधि पाटीउ लागउं । तेहनइ आधारितरतउ तरतउनिहु दिवसि पारि आविर, वनमाहि सरोवरि जल पीउ, फलभक्षण नीपजाविउ । आगलि जाता दीडर पोगी एक, मइ साचविउ नमस्कारतणउ विवेक। जोगी कहिउं तृरहिर एक देस, योजउ लेइस।मई कहिउँ दिइ,पछइ भुज निर्द्धनकन्हई जं देपइ तं लहिएं। जोगी यंघोडणी विद्या देह मस्तकि मागि । मई चीतवइ, यली पूर्व भवपातक जागिउं । जोगी धायु पूठि, मइ नासिवा यांधी मूठि । नासतु ईणि नगरि आयी रानिइं गढ़तणइ पालि पयसी रहिउ, तलारके ग्रहिउ; तइ रापि, मोटर उपगार दापिउ। छामिईयरउ आफम दासिहयोग नह । कंयलकर मोली पिसत न लागह पेय ।। माहरी लक्ष्मी इहमरीपी हुई, तउ कहीह। आभानणी छांह, कुपरिमाणी याह आनिउ तर, नदीनं पर टाकुरनउ प्रमाद, माझडनउ विपाद; यहीना पहीगण, गपड़ाना उटीगण; दीयानु नेज, मान हेज; दामान स्नेह, दार -- - मनायंत, महात्मा ते क्षमायंत, प्रामाद ते जे ध्वजायन, वाट ते जे यूथयंत, जेनलं अंतर दही नद छामि, जेतलं अंतर मधुरध्वनि नइ धामिः तलूं अंतर समुद्र नहक्रया. जनल अंतर मोनहगा ना ख्या, जनहूं अंतर बाप नहफयाः जनलं अंतर नंबर नह आहार, जेतलं अंतर रूपा नद कार जैनलं अंतर मुवर्ण नद माटी, जेतलं अंतर चार मीनि नइ प्राटी: जेन मंतर पटउन्ला नई छारी; जेनलं अंतर पडात्र मह मतली, जतलं अंतर पना माणम नह पृतली. जतलं अंतर ग्वा नइ हुरी, जेतलं अंतर संदल अंतर साह नह मीआल, जेतलं अंतर प्रभात नइ वीआट: जेतलं अंतर प्रवीचन्द्रपरिम कालनु मेह; पोश मेहनउ प्रेट, पहिलु आवइ लेह । लक्ष्मीतणउं त न्याय औरना, हिव पराग्य अपन33; तापमदीक्षा लेसु हिय, जिम हुइ सदासिय । हिय ममरयेतु राजा ते यात मांभली मनि वैराग्य पामि, राजापृथ्वीचं. मनिहं शिरगामि अनदमी पात कही, नाहरू पुण्य अद्भुत सही। तृरहिह कोद अष्ट देवता सानिध्य फरा, मर्व विस हरह। ताहरू अद्भुत भाग्य, मुझ- न पनु धरान्य। घिमामी जोयुं नउ असार, मंसार। जिशि पीपलनुं पान, जशि गजेटनु कान; जिशि मध्यानु राग, जिशिउ भमरीनु पाग, जिशि मांकहनु वैराग; जिमिउ पीजन झया, जिसिउ पोइणिनह पाति पाणी. मा टयार, जिशिउ समुद्रनु कालोल, जिशिउ धजनु अंचल, तिसिउ सं. मार पंचल । तुं एक कहिउँ फरि, माह राज्य अंगीकरी । हउं तापसी दीक्षा समु, तप फरिमु, मंमार मरिमु । पृथ्वीचंद्रि तीहं बिष्टुप्रति कहि तुम्हे कम्यउ धर्म, पणि नयी जाणता मम । सांभलउ धन ते पर्णवोइ जे पृक्षयंत, नदी ते जे नीरयंत, कटक तेज पीरयंत, सरोवर ते जे कमलयंत, मेघ ते जे हार ते जे यस्तुयंत. घाट ने जे सुवर्णयंत, भाट ते जे पचनयंत, मठ ते जे मुनियन, गढ ते जे अभंगयंत. देव ते जे अरागयंत, गुरु ते जे मियायंत, यचन ते जे मन्ययन. शिष्य ने यिनयन, मनुष्य ते जे धर्मयंन, तुरंगम ते जे जयन, हस्ती न ज भद्रजातिवंत, प्रधान ते जे युद्धियंत, कर ते जे पाय- यंत, राय ने ज न्यायवंत, व्यवहारीया ते जे मयावंत, धर्मी ने जे दयावंन । अहो महाभागउ. हायान लोचन जागउ । जेतलं अंतर गणी अनइ दासि, पुरी; जतलं अंतर सर्प नह ताग, जेनल्टुं अतर माकर नइ पारा जनलं अंतर सायलि नः माग. जेनलं अंतर अलमला नद इ कोडि १० प्राचीनगूर्नरकाव्यसवः नेतलं अंतर हंस नइ काग; जेतलइ लूण नइ कपूर, जेतलइ पजूया नइ सूर बेतलइ डाकिली नइ तूर, जेतलइ खाल नइ गंगापूर; जेतलइ साधु नइ चोर तलइ हार नइ दोर; जेतलइ गजेंद्र नइ ससा, जेतलइ गुरुड नइ मसा; जेत नइ सवा विशा, जेतलइ काविला घाट नइ गोहीस; जेतलइ मोट क्ष नइ रोहीस, जेतलइ व्यवसाय नइ कुठाकुर सेय; तेतलूं अंतर अपरदैवर निइ श्रीसर्वज्ञदेव । एह कारणि इसउ मनि निश्चियु आणिवउ । जिम श्री मर्यपापड दिवस ही, पुण्यपापइ सौख्य नहीं, पुत्रपापइ कुल नही, गुरूपदेशपापइ विद्या नही यशुद्धिपापइ धर्म नही, भोजनपापिइ त्रिपति नही, साहसपायइ सिद्धि ही, कुलस्त्रीपापइ घर नही, पृष्टिपापइ सुभिक्ष नही, तिम श्रीवीतरागपापा गति नही । अनइ जिहां हिंसा, तिहां नही धर्मनणी प्रशंसा । जेह कारणि सिउं कहिहं । जिम विलंब विणसइ काज, कुठकुरि विणसइ राज, मार्जा- प्रचारि विणसइ छाज, अणबोलिई विणसइ व्याज; पडपि विणसइ दान, -संगति यिणसइ संतान, स्वरपापड विणसइ गान, लूई विणसइ मइपान, नाधिई विणसइ वान, कुमरणि विणसह अवसान; कुपंडित विणसइ मात्र, यणि विणसइ गात्र; पीपलि विणसइ प्रासाद, सिंदूरि विणसइ साद; आक- धे विणसइ नेत्र, तोडे विणसद नीपनु क्षेत्र; चीभडी विणसइ कणकनु पाक, पइप्रयोगि विणसइ रमवीनगउ पाक; वरमालइ विणसइ शन्न, पगरी णमा पन्न; जिम कुव्यमनि विणमइ मत्कर्म, निम जीवहिंसा विणसह में। राजा पृथ्वीचंद्र ममकेतु श्रीपनिपनिइ कहिइ छ । सांभलु परमार्थ प, टालिउ मिथ्यात्यतणी देय; आदर दयाधर्म नः श्रीअरिहंत देव, रउ सद्गुरनी सेव; जिम टलइ पापफर्मतणा लेव । ए यातां मामली माह बिहुँरहि मिथ्यात्यतणी भ्रांति टली, जैनदीक्षा बाहु मनि कली । तेनला भान्ययोगि देवमयोगिई चारण अमगमाहरमा कनिहां आविउ, नहे मयि मेहर प्रगाम नापजाविउ । पगि लागी, दीक्षा गी; मीणि दीधी, पांधिलया मीधी । नियारपटिई तेहे पापीश्वरं राजा बरलायी विहारमम कोष, नरेश्वरि आवउ पाणउ दीपपहिष्टुं पहनुपमः रे, गोक हप पमाहिया मलापरिनिहां परमहंम प्रधान स्थापित, कर्णधारनु र आपिाहिय राजा पृथ्वीगंद्र तह नगरहना माते पीयाणे अयोध्या नगरी फिरिया, राप मपिटुं योग्य आकारण नीपजाव्या; मोटे आडंयरि समग्र नरेश्वर मंटपमादि आया। जिस्या देवलोफसंबंधीया हुदं देव, तिस्था दीसई सवि मनि इमिउशंकामाय पइटार्ज एउ सही कन्या परिसिइ, अम्हार आदि. प किमिइ फरिमिह । राजातणद मस्तकि छत्र, अनइ घमर ढलई मशस्यदिशिमाहि उत्तरककुभ: अचलमाहि भूमंडल, क्षमायंतमाहि भूमंडल; जिम नागमाहि शेषनाग, रागमाहि श्रीराग: जिम ध्यानमाहिशुल ध्यान, दानमादि अभयदान: मंग्रीवरमाहि. अभयकुमार प्रधान, पानमाहि नागर- खंदउ पान; ज्ञानमाहि केवलमान, विमानमाहि मवार्थमिडि विमान; गरू- तिवारपूठिई राजा मोमदेवि प्रतीहारपाहि कन्यारतई तेडर दिवराविउ, तर सधव रबीए धवलमंगलपूर्व कन्याहुएं मांगलिक स्नान करावि । अंगरू- नरेश्वर सिंहासणि पइटा हेय । तिसिइ अवसरि राजा पृथ्वीचंद्र, जिसिर पवित्र । राजा पृथ्वीचंद्र देपी सकललोक इसिउ यिमासहं । जिम अक्षरमाहि पाणिमाहि पदरागम: दीपमाहि जंयुद्धीप, प्रदीपमाहि रत्नमदीप; पर्वतमाहि मेर- आमाहि गगन, पवित्रमाहि पवन, दर्शनमाहि जनदर्शन; जिम देवमादि इंद्र, क्षण अनंतर कन्या सदश धेन कपट पहिरियां, आमरणे अंग उपांग अलं- पृप्यीपन्द्रपत्रि एमा, स्वपरि आच्या दोठा राय सये गहगहता । राजा सोमदेवि साम्हई मादी महोत्सव पारी माहि लिया, भला नारा दिया। तेतलई सनहारे स्वपंवरमंटप नोपायु, पोरणिने पाने घायु । कर्पूर कस्तूरी महमहई, ऊपरि पज लहलाई; मातणी पिचिप्राइ, पूतलीनणी काविलाई; थंभकुंभीतणा मनोहर घाट, पटद भाट रत्नमई तोरण नइमोतीसरि, अलंकरिउ कुसुमतणे मारि; पादिन पाजई, मांगलिक्यगीत छाजई; आरीसा झलमई, चालतां मीना नेउर पलयई इसिद मंडपि राययोग्य मांडगं नामांकित सिंहासण, मागणदारनई पगि पगि दोज पासणा तु राजासोमदेवदूत सांगरिया, ऊतारे पक्षात् हुए इंद्र। इसिउ आवी स्वयंवरि सभामादि यहठउ, सविहुं रायतणे ओंकार, मंत्रमाहिहीकार, गंधर्षमाहि तुंबर वृक्षमाहि सुरतरु, सुगंधवस्तुमाहि कार, पात्रमादि पाटणनई पीर, वीरमादि शद्रकयीर, गढमांहि कालिंजर, घर, जीवनहेतुमाहि जलधर; जिम हस्तीमाहि ऐरावण, मंडलेश्वरमाहि रावण; नुरंगममाधि उचाया तुरंग, हरिणमादि करनृरीउ कुरंग; धयलमाहि सृपभ, ग्रहगणिमाक्षि चंद्रतिसिउ सपिएं रायमाहि दीसह पृथ्वीचंद्र नरेंद्र।

प्राचीन पारिगं । किरयां रियां ते आमरण । हार हार निमा मात्र प्रवकटी मृत्र कांची कलाप रमना फिरीट मुकुट पा शेपर गामगि मुशि का दामुद्रिका मेयूर फटक फरुण या गंगुलीया गंगम्यान हेमजाल मणि- जाल रत्नजाल गोपुक उरत्रिक निना तिलक दल अनमना कर्णपीठ इस्तसंकली नपुरप्रमुग भाभरण गाणियां । इंटमादित्री योग्याभरगि कन्या हुई अलंकृतगाम, ईमपतणउ पात्र, मनकि परियां मीकिरिनणां पत्र फन्यानणद सिरि मिहरि भरिउ माग, मुबि तांगूलराग; आदि नाविमान, तोणि पडी ते पाली देवांगनासमान । आगलियादिप्रयनि अनइ गोल गान । ईणिइं परिई सकललोका आथर्य करती, हाथि यरमादा परती; महो त्सवसहित कुमार, पती मंटपन दारि । ते देषी नरवर मये मारवजा मनाविया हारि, चीतवह ए रंभा कि तिलोत्तमानणद अवतारि । तेहतणा पाणिग्रहणतणी यांधा धरई, विविध चेष्टा करई। पकि राय आपणा हीयानर द्वार हलावई, एकि याहतणा पहिरपा चलायई पकि रत्नमय दहा ऊलालई, एकि छुरी ऊछालई; एकि मित्रसि वार्तालाप मांडई, पकि दृष्टिरहई विनोद ऊपजावई, क्षणु एक पांडई, एकि संभालई कानि कुंडल, इंगिपरि विविध चेष्टा करई राजमंडल । तिमि समइ जि जोइया आल्या आकाश देव अनइ दानव, पृथ्वीपीठि संख्या नहीं मानवमिलिया सिद्ध अनइ किंनर, संख्या नहीं विद्याधर । हिव कन्या आमरणितेजि उहहमती, रंभारहई हसती; स्वपं- वरमंडपमाहि आवी, तु यशोधरा इसिइं नामिई प्रनीहारीई वोलावी । अहे कुमरि, अद्भुत गुण ताहरा संसारि, जेहे आकर्षिया हुंता आसमुद्रांतपृथ्वी- तणा राय मिलिया, इसिउं जाणि जेहरई तुं वरसि तेहना मनोवांछित पासा ढलिया, मनोरथ फलिया। हिब जोह तुझ आगलि दसलक्षमगघदेसतणउ नरेश्वर, सहिजिई अल- वेश्वर; राजगृहनगरतणउ राजा मकरध्वज इसिइ नामि दीसइ । जेह राजा. तणई कृपाणि राज्यलक्ष्मी वसइ, मुखि सरस्वती उल्लसइ तृठउ दारिय हरह, दीठउ आनंद करइ; रणांगणि गयवरतणी गुडि गांजइ, शत्रुभट भांजइ; इस्यु भूपाल, एहतणइ कठि घाति वरमाल । अथवा ए जोइ वाणारसीतण राउ, मांजइ वयरीतणउ भडिवाउ; ए सरागदृष्टि अवलोकी, जैहतणउ प्रताप प्रसि- दुउ त्रिहुं लोकि; जेहतणइ गजदलि चालतइ हुंतइ इंद्रहुंइ सपक्षपर्वततणी उलटिउ आनंदमागर, मनि चीतव पउ मही गुणनणउ आगर । तिवारई দুষীঘায় शंका नापजहं । जेहमणइ तरलतुरंगमि प्रसरह हुंतह पहरीरदतइमलपकालोह- ससमुद्रकालोलनणी शंका नोपजह । इसिउ प्रचंडवल, अखंडभुजबल; अकल, सकता फर्मचंद्रनामा नरेश्वर परि, माद कहिउं करि । अथवा विदर्भदेस कुं- दिनपुरनगरीनणउ नरपति निहालि, जे विपमकालि; घहइ कर्णदानेश्वरतणउ अवतार, धनुर्धरपणई हर अर्जुननणा कीर्तिप्राम्भार; जेहतणइ अतुल भंडार, मवलकोटार, इमारतण नही पार; फरइ शष्टसंहार, करइ भE कइयार; म- हवार, महाउदार, कंठि परमाल पाती एमकरध्वज राजा अंगीकरि भार । भयका गौरदेस हंसपुरपाटणनु स्वामी सिंहरथ राजा जोइ, जीणि दीठइ आणंद हो । जेह राजासंबंधीपर कुंदमचकुंदकुमुदकेतकीकरघयलि कोर्ति में- रलिप्रमरतद नई नयी मृष्टि स्थापी, तं अंजनाचलपर्यतरह फैलासपततणी पदयी आपो; यमुनानणइ स्थानकि कीघउ गंगामयाहु, मित्र कोघा चंद्र नह राष्ट्र मरीपा कीघा हार नइ नाग, अंतर टालि बग नइ काग; ईश्वरहुई नीलकंठपण यालिर, विष्णुहुई कृष्णपण पपालिउ; बलदेव पांधवपण उजुआलिउँ । गिपरि जीणि नामातणी सृष्टि फेरी, तेहनी किसी यात चपाणीपइ अनेरी। इमिड अलयेश्वर, सिंहस्थ नरेश्वर, करि तुं आपणउ जीवितेश्वर । इणिपरि तीणई पनीहारीयई राजा हरिकेतु सिंहकेतु मकरकेतु धूमकेतु पद्मरथ वीर्यवाहु गुवर्णवाट शंग्यध्वज पनदेव पनानंद क्षेमंकर पृथ्वीधर सुबाहु रत्नांगद हेमां- गद हेमरथ मणिरय मणिशेपर रत्नोग्यर चंद्रमोम सोममम सूरमभप्रमुख नश्वर वर्णव्या पाण्या, पणि रत्नमंजरी कुंभरि मनइमाहि ना आण्या। हिय आगलि दीठउ राजा पृथ्वीचंद्र, निहालिउ नेहतणा मुपचंद्र, मनीहारीयई कहिउं हे कुमरि मांभलि, पुरा पूर्वई सगर चमयति हर वि. ग्यात वसुधातलि । जेह सगरचक्रवर्तितणइ पउगमी लाप हरती, जीहतणि गनि महाप्रशस्ती; चउरामी लाप तुरंग, अललता जिस्या हुई फुरंग, परासी लाप रथ महिजिई सुरंग; चउरासी लाप नीमाण यानई, पयरीना भड्याउ भाजह; अत्यंत अभिराम, छन्न कोटि ग्राम; गाम घोडउं फादनां छन्न कोटि साहण मिलई, छन्न फोडि पापक कलकलई; पऊद महस्र संवाघ, पम्द सहर अमात्य अत्यंत साधु; जेहनइ पदरत्न, देवता करइ यत्न; नवनिधान, यहत्तर सहन नगर प्रधान न्यायरहई दाटण, अष्टनालीस सहस्र पारण: जेहे पस ११४ प्राचीन गमवायसहद अनेक कुटंब, इस्या चवीस सहन मय; जीहना वर्णननणी कीजइ जेट, इसा सोलसहस्र पेट; जेह चमावर्तितणइ सवाकोदि व्यापारी, रिद्धि अत्यंत सारी; चरणि रुणझुणइ नेउर, इस्या धउसहि सहन अंतेउर विहिनोल्लास, अट्ठावीस- उलाप पिंदविलास; यत्तीससहस्र राय, प्रभाति प्रणमई पाय; प्रत्यक्ष, पंचवी- ससहस्र यक्ष; पीससहस्र सोनारूपानणा आगर, नयकोटि ध्वजाघर, छत्रीस लाप दीवटीया उदार, निनिसई साठि मृार। एवंविष प्रचंडभुजदंद, सापित भरतक्षेत्रपदपंड; निरुपमस्फत्ति, अदुतमूर्ति, इसिउ हउ समरचक्रत्ति । हिब भगीरथ राजा हउ सगरतणउ पुत्र, जीणई गंगा समुद्रि धानि रापिउ आफ्- णउं चरित्र । तीणई राज्य पालिउ अनेक कोडियरस, तेहनइ पुत्र हुआ दस । तेहमाहिइ एकरहई कुंतल इसिउं नाम, तेह कुंतलरहई दीघउं मरहठदेसि ठाम। तेह कुंतलतणइ वंसि जयवंत जयध्यज देवचंद्र देवानीकमनुख राय हुआ, तेहना प्रघहक कुणइ वर्णवाइं जूजुया । देवानीकतणउ पुत्र हउ राजा पृथ्वीशे- पर । जीणि पुहिठाणपुर पाटण थापि, स्वर्गतणउ दर्शन प्रत्यक्ष आपिउ । हिव मधुरवाणि, तेहतणउ राजा पृथ्वीचंद्र जाणि । एउ नरेश्वर, ऐश्वर्यगुणि सा- क्षात् सुरेश्वर, धैर्यगुणि मेरु महीधरु, दानिगुणि नवीन जलघर, गांभीर्यगुणि क्षीरसागर; निर्मलपणइं गंगाजल, सौम्यपणइं शशिमंडल; रूपिगुणि अश्वि- नीकुमार, परकलत्रपरिहरणगुणि गांगेयतणउ अवतार; विवेकगुणि राजहंस, चातुर्यगुणि वृहस्पतितणीपरि लब्धप्रशंस; पृथ्वीभारवहणि शेषनाग, एहजपरि धरि तु अनुराग, इहां छइं ताहरउ लाग । घण किसि कहीई। एह राजा विक्रमाक्रांतक्षोणीमंडल, शौर्यश्रीवदनारविंदप्रद्योतन, सकलमहीपाललीला- ललितशासन, पालिनश्रीजिनशासन, तुज परिवा योग्य छइ । ते रत्नमंजरी कुमारि प्रतीहारितणां इस्यां वचन सांभली अंगि रोमांच घरती, नेउरतणा झमझमकार करती; हर्पभर यहती, राजाकडी पुहती । लाज ठेली, कंठकदलि वरमाल मेल्ही; तत्काल जयजयारव ऊछलिया, लोक फलकल्या; विद्याधर पुष्पवृष्टि करइं, भद्द जपजपशब्द उच्चरई; गंधर्व गीत गाई, वादिनीया वादिन वाई; वापरइ धवलमंगल, हुई महामहोत्सव विपुल । इति श्रीअंचलगच्छे श्रीमाणिक्यमुन्दरसूरिकृते श्रीपृथ्वीचन्द्रचरित्रे दाखिलासे ततीय स्टामः ।

विनानक १० कणमंतानक ११ सोम १२ सहित १३ अश्वासन १४ रुत १५ संपवणाम २२ फंस २३ फंसनाभ २४ कंसवांभ २५ नील २६ नीलाव. केतु ३९ हरि ४० पिंगल ४१ युध ४२ शुम ४३ वृहस्पति ४४ राहु ४२ अगस्ति ४६ माणव४७फामस्पर्श ४८ धुर ४९ ममुख ५० विकट ५१ विसं. पिकल्प ५२ प्रकल्प ५३ जटाल ५४ अरूण ५५ अग्नि ५६ काल ५७ महा- डाटि हमह, घरामंडलि धमद; मस्तकि अंगीठा बलह, भैरया जिम শাখা चतुर्थ उल्लासः हिव तिमिह अयसरि ते राजालोकमाहि जे धूमकेतु राजा कहिउ तेह- रहई धूमकेनुदेयतणा मंत्र स्फुरद, मीणई जं चीतयइ सं करइ । धूमकेतुदेव भरामीग्रहमाहिला जाणिव । कवण फवण । अंगारक १ विकालिक २ लोदिनांक ३ जनयर ४ आधुनिक ५ माधुनिक ६ कण ७ कणकणक ८ कणक ९ गर्योपग १६ पर्युरक १७ अंजकरक १८ दुंदुभक १९ शंख २० शंग्वनाभ २१ भास २७ गप्य २८ सप्यायभास २९ भस्मक ३० भस्मराशि ३१ तिल ३२ निलपुष्पवर्ण ३३ दक ३४ दफयर्ण ३५ काय ३६ वंध्य ३७ इंद्राग्नि ३८ धूम- काल ५८ स्वस्तिक ५० मायस्तिक ० पर्द्धमान ६१ प्रलंय ६२ नित्यालोक ६३ नित्योद्योन ६४ स्वयंप्रभु ३५ अवभाम ६६ श्रेयस्कर ६७ क्षेमंकर ६८ आरंमकर प्रभंकर 90 अरजा विरजा ७२ अशोक ७३ वीतशोक ७८ वितप्त विवग्न ७६ विशाल ७७ शाल ७८ सुबत ७१. अनिवृत्ति ८० एकजटी ८१ दिजी ८२ कर ८३ करिक ८४ राजा ८५ अर्गल ८६ पुष्प ८७ भावयेतु ८८ । इह अध्यामीग्रहमाहि धूमकेतु जाणिवउ । जियारह पृथ्वीचंद्रराजानणइ कटि वरमाला पडी, तेतलइ धूमकेतुराजा- दुई रीस चही। रोम हउ विकगल, धूमकेतुदेवनानणउ मंत्र स्मरीनइ अगालि करयाल । ने बट्न फीटी हउ वेताल, जे उंचउ नयनाल; कंठापिलवितांड. माल, फरतलि कपाल; बुभुक्षाभिभूत, जिमिउ यमदत; कान टापरा, पग परा; ऑपि अंडी, पेटि फंडी; आंपि रानी, हाधि कानी; विकराल येश, मोकला केश; कलकलह । इसिउं रूद्र रूप, केतलं पपाणीयर तेहनं स्वरूप । इसिउ येताल देपी सह भयभ्रांत हउ । तेतलई धूमकेतुराजा ऊटी कन्या उपाही रवि धातिय लागउ । तेतलई राय राणा धसमसिया लागा। नेतलई तेह जि वेतालहता

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' श्वीचन्द्रचरित्र जना पडई, कायर रडई। इम पूजि विकूटी, पछह सभाविचालि पृथ्वी फूटी। विवर नोपर्नु । तेह ज माहि तेज प्रगट हु । जोना हतां तेद विवरमाहि दिशा पधारिणी सिंहासणि यइटी नी एकि दीसिया लागी । तेह बीनणद उत्मगि शोभमान तेजभारि, दोटी रत्नमंजरी कुमारि । सह आर्यपुरिन हुई। मीण कोई विहं हाथि कुंभरि आदी वाहिरि मेल्ही, आपणपई माहि गई, पृथ्वी बली निसीइ जि हुई। असमाधि फेटी, राजा भरि आधी तेही। निधार लोकनणा मेला, यात पूरियातणी नहीं पेला । हिप हरि लोक कलकटिया, विदोषतु उपाय लिया । राजा कुमारि अमाप माहित आयामि पटुता । राप ऊनार या भोजन मंटपनि REMEn, विवाहमहोत्मय गहगहिया ।हुई यलगान, नीनां परमान; योगपीय मान, स्वजनहुई यहुमान; पापाई पान, जिमाडीपई जान । कामकामा वणी पलपटि यांधी होइ आफूला, मेलई चाउरी पाणा | भग भारणी, दिय भोजननी मांडणी । यइटी पानि, जिमणार परामर विहराई पनि । पहिला परीया फलायली पंरपा पार, Ter परी उपहा अनमा विशालन्यालि, परीमीमालिदालिक पतली नाटि.पालि. लणी पालि परि पार पाया दही पापर, इणिपरियोग भोजन करा मनमनंतर दीधा फारमिन योह, लक्ष्मीपंगणे गरे पातु गजा मril हिए येन्द्राजारि राजाच्या फरापिड मंगारनान, dिari Teri परमधान । मर्याग ,गार परित, गाणे इंद्र अपरिगति, तिम बी पापित गरी TT पनि गिरावट RITY माहि पातु । आगारNिITENT, उरीमार मारि मांगलि. मेलापणई दान पण राजामविया गजर तुरंगमान vi, TM- वीदिमहराति रानमंजरीण पाणिurriver पर्पन उपयुक्त मागणी पाrs, सार समिनिटाना पाणा प्रयोग भपलकि पडाणा रत्नमंजसपाई कर ex भाग्य, पकि माणा गांभाप: कि पापा ATTENriर, परियार गरियाणा Hi Tr, पनि पाणा हाण, दि पnिi शान. . पिज, AANEE आनंद महाविs instantri प्राचीनगरकाम्यगादः कीमी । कुग हुई घोड, कुग हुई हाधित; फुण हुई आभरण, कुण रुई पटकन इनिपरि भक्ति की । राम सये आपणे आपणे नगरि पता । रामापी चंड मोमदेवनरेश्वरतणइ भावासि नितु नयनये गौरवि शियमय सुबमा दिवम अनिरमही अन्नदा प्रस्तायि राजाश्थ्योगंद्र अनइ राजासोमदेय रागसभा एका नाता। किमी ते राजसभा। जीणि सभा पात्र नागई, यिनांस या पुलाव गांग: माल महरिगा मांटिया मागई, रागश रापाई रंग रहाविधा रागो. गाशुभ गोली स्गमीको माउ पाई, हा धागह गिरकाल पर गमेर पागः । इसी ममा, निएं नरेभरि फरि पली पायी ETIRE गरिमारि पता पनपाल, तीणि पीनपित श्रीमो मामिन भाषETIनयनिश्रीधर्मनाथ तीर्थकरदेय पार पारिला, sinha प्रिमुगन आनंद परिण । हिय अयसरि गायि, भीर নাসন্ধি, গ, সবিস্তাহাবীথিমবয়সি । মনা, या नामिना । निज निर्मिनांचा भानुनामा रंभा । . भरपगी, मुत्रता :मि नामिजाणीभगता मरताधिलागि Tit आ. ” মােন, মনসা নি, সা দাশ। বিপশিয়া भिग्राम मगन मा गर म दादांग महारा! शरभ मिट स.मा पलमाला गर्ग , Tilm मगर मन • frमान नवनिमयानर Prij. माना गभरा मान गतिाराराणी प्रमोटा rist frrer: म नि मागप्रतिदिन, Trailery; for earn Hrs, मेशिका, महान मनारमा मात्र अजाय imm, TRAI বা : কান না, সা; শশা, Tarik ETAL htimat far | RRENT, Fariram from Refrientifer amritafairs This wrimizmastirmir;free. Haramin. tim ETC, arth + मानपरिमल एवं विध दीठउ मालायुग्म ५। तउ दीठउ चंद्रमा। ते किमीउ चंद्र- धमक्या कहई, लोक पाटविशेष लहर, मेघ मल्हारगाडामांदि अनेक कानपत्र सहस्रपत्र सक्षपन्न कोटिपत्र सूर्यशी कोमट पिहिमई, पत्रपाक, उल्हस एवंविध प्रग्वरकिरणनिकर, दीठउ महयफर सादीटर पज। पृथ्वीचन्द्रचरित्र वललोचन; जिसिउ पालता हुइमासाद, अधया कैलासपर्वतस्युं लिइ वाद । इसिड अत्यंत शुभ, दीठउ पभ २ । तर राणीयइ दीठ3 सीहु । किसिर से सीह । रूप्यपिडपांवर, अहुतप्रभाडंबर, रक्तोत्पलसुफुमालताल, तालून लागी आरक्त जिल्हा जिसिर हुइ अशोकप्रयाल । विस्तीर्णकेशरसटाशोभित- कंप, वनसारशरीरबंध; प्रपरपीपरप्रकोष्ट, कमलदल रकोप्ट, तीक्ष्णदादापिडं- बिनवदन, पराममनणर्ड सदन; पुच्छच्छदां पृथ्वी आस्कालतउ, पीतलोचनि भूमिकांति निहालतर, मूपागतसुवर्णसमान फिरतां पिंजरनेत्र, शौर्यत्ति- लणड क्षेत्र; अकल अगंजित, सबल अपराजित; अबीह, एवंविध दीठउ सीह ३ । तु दीटो देवी लक्ष्मी । ते किसी । हिमवंतपर्वततणइ शिपरि, महानग्यरि; पद्म- हमादि योजनप्रमाणविमलकमलि संनिविष्ट, चंद्रसमानवदन, कमलसमान- लोचन, निर्जितसूर्यमंडल, देदीप्यमानकुंडल; उदारमलंवितहार, अद्भुतभंगार; दिग्गजेंद्रे अमृतकलसिकरी अभिपिच्यमान, पगतलि चांपी रही नयनिधान एवंविष सकलकल्याणपात्र, मनोज्ञगात्र, देवी लक्ष्मी दोटी ४ तदनंतर अशोक एक नाग पुन्नाग प्रियंग पाडल सेवत्री जाइ जूही घेउल घाल श्रीदमणा मरूआ मंदार मुचकंद केनकीप्रमुखयनस्पतीतणे फुसुमि निप्पन्न भ्रमरभरभुज्य. माराभितण समपि उदपि करी, सकल ताप हरी; रोहिणीरमण यामिनीजी- वितेम्वर अमृतमयमूर्ति उज्वलयल, प्रोणितरकोरकुल, एविध पंद्रमंटल नउ दीठ श्रीसूर्य । किसिउ ते मर्य । प्रभाततणइ समइ जेट श्रीगनणद उदह मासादतणां दार ऊघडई, देवहुई पूजा पडद; पंध सये पह, मुनीश्वर सिउ ते ध्वज । कृताहाद, कोई एक गम्ज प्रासाद; भापरि, नेहमण: शिपरि भवंड, सुवर्णमयदंड तेजि करी अंकुश. फनसमय कला; भली, रत्नमय गदली; तिहां जिसी स्वर्गमउ ऊदाली, मी फाली; निम्पम स्वरूप, नितम तणउं रूपा इसिउ घंटागणि गहगहना याद तहलातु निर्मल नीरज, राणी HERS दीटउ पूर्णफास्टम । पि.मिउ ते पूर्णकलम । सुवर्णपरित रत्न टिप्पमाला प्यापिन: माहि भगनारिन प्राचीनगूर्जरकाव्यसङ्ग्रहः कीयो । कुग हुई घोडउँ, कुग हुई हाथिउ; क्रुण हुई आभरण, कुण हुई पटकूल। ईणिपरि भक्ति कोधी । राय सवे आपणे आपणे नगरि पहुता । राजापृथ्वी. चंद्रहुई सोमदेवनरेश्वरतणइ आयासि नितु नवनवे गौरवि शिवमय सुम्बमय दिवस अतिक्रमई। अन्यदा प्रस्तावि राजापृथ्वीचंद्र अनइ राजासोमदेव राजसभां एकता बइठा । किसी ते राजसभा। जीणि सभा पात्र नाचई, विद्वांस बइठा पुस्तक वांचई; माल मल्लविद्या मांडिया माचई, रागज्ञ रायहुई रंग रहाविया राचई; सुहायोला शुभ बोली स्वामीकन्हे पसाउ याचई, कूडा झाग चिरकाल दि. याद करी स्वयमेव पाचइ । इसी सभा, विहुं नरेश्वरि करि चली बाधी प्रभा । तिसिइ अवसरि हर्षप्रसरि पहुतउ यनपाल, तीणि चीनविउ श्रीसोम- देव भूपाल । स्वामिन् आपणइ उद्यानवनिश्रीधर्मनाथ तीर्थंकरदेव पाउ धारिया, जीणि परमेश्वरि त्रिभुवन आनंद वधारिया । हिय अवसरि आविड, श्रीम नाधतणउं कहिय, चरित्र, महापवित्र । ईणि भरतक्षेत्रिप्रवरगुणि करी मनोहर, रत्नपुर नामिई नगर । तिहां ऐश्वर्यनिर्जितसुरेश्वर भानुनामा नरेश्वर । तेह. तणइ पटराणी, सुव्रता इसिइं नामिइंजाणी ।अन्यदा प्रस्तायि तीणि राशी आ: पणइ आवामि, मनतणइ उल्हासि, पल्यांक पउढी हुंती विपार रात्रिसम निद्राभरि वर्तमान हतीइं घऊद महास्या दीठां । किस्यां ते महास्याम । गज १ पभ २ मिह : लक्ष्मी ४ पुष्पमाला ५ नं ६ गर्य ७ ध्वज ८ पूर्णकलम ? मरोबर १० ममुद्र ?? यिमान १२ रत्नराशि १३ निर्धम श्वानर १४॥ईह मनुः ददामहाम्बमनाउं मांभल जूज़ वर्णन व्यतिकर । राणी प्रथम दीठउ गजेंद्र। किमिड गजेंद्र । चतुर्दन, विनयवंत, मसांगप्रतिष्ठित, गजद्रगुणि अधिष्ठिन; विधानमामल, बिलोलकणांचल; उदंडगुंडादंड, नेजि करी प्रचंड, मदनाम यामित कपालमल, भ्रमाफुल अनुकूल; परित्यक्तमालदोप, उत्पादितमाल जननपनमंना. प्रधान, गायणगजममान; महाकाय, पर्वतमाग; भरजातीय, अद्वितीयः जेहनणा गनि प्रगानी, पयंपिय दीठा हस्ती ? | उ दीर गृपम । किमिटने यूपन । निजलधारापरपयल, विकमित काशगुमगाः अवन्ट, विटाटात. मंदाकिरानागारि विशद गाममुम्मालरोमगनिपिग- मान, नियनिदागमान: भग:गमलशृंग, गुंदरममामगंगोपांग; इंदन, ननिहाभिन प्रगपापारगाणगंनिगेश; प्रमभयदन, - .. पृथ्वीचन्द्ररित्र बन्लोगन जिसिउ पाटन हुइमामाद, अधया केलामपर्यनस्यु लि. पाद । तर अत्यंत शुभ, दीटउ पभ २ । नउ राणीप दीठा मीठ । किमिड मोह। कप्पपिंटपांडुर, अडसमभादंबर, पोपटसुपुमान्दनाल, माटः बगी आरत जिता जिमिद अशोषप्रयाल । यिम्मीर्णयाग्मानाभित. संघ, यसमारशरीरवंश; प्रवरपीपरप्रकोट, कमन्ददल पोट, ताणादायि. चितवदन, पराममनण सदन, पुनाट यो आमालगड, पीपनि गमित्रांनि निहालतउ, मूगागत सुवर्णपमान फिरणां पिंजग्नेग्रजानि. मण क्षेत्र अफल अगंजित, मयल अपराजिम; अबी, गमिष दीया मी। तु दीटी देवी लक्ष्मी।से किसी।हिमपंगपर्यतगणा शि. म. द्रहमादि गोगनप्रमाणविमलयमलि मंनिपिष्ट पंगमानयदन, समसमान. सोगन, निजिंतर्गमएल, देदीप्यमान उदारमायिना. भगा: दिग्गजो अमृतफलमि परी अभिपिनयमान, पगालि गांधी मलिन एपंविष मसलकन्याणपाय, मनोजगार, देवी गमी दाटी राम Mir पंपर नाग पुराग मियंग पारट मेपनी जार मी पेट पा! आ मंदार मुलकंद फेतकीमगुपयनरपतीलणे गुमिनिला मारा. गनपरिमल विध दीटर मायायुग्म 13 दी Inferiz. मारामिण गमयि उदगि करी. गर नाrn nrritreauitी. বিনষং সমণি চাষ, এfuণা ref৭ শ । ना दीटर श्रीगर्ग । तिमि । प्रभातमा गाभाग उदर मामादE TER. दया पार ९y na crare धर्मशा कm. m. पाnि orm म. merrfan नागपत्र मात्र mra from man .mmm ferre उन्हमां: Afry ferman amarun : कि.मिनाहार काई mm • It refRE: गडगुपणादर Rfromin prmer पारा; fonfirm AR! RREE Err far गण Harir me rrr. Crorrform दोठा पर Imran fefnarranger- Trnfrirnfor fh more Fr Sim १२० प्राचीनगूर्जरकाम्पसङ्कटः विराजमान, आम्रफलप्रधान; मांगलिक लक्ष्मीप्रदानतणइ विपइ अनलस, दीठ पूर्णकलस ९। तउ दीठउं सरोवर, वृक्षतणउ परिकर; पालिउन विस्तर, देहरी नउ समहर, पाणीनउ आकर । चउकी चपंडी झलहलई, परइ बाइ लहरि अच्छलई, ऊपर जाण भरीयई, पड फूइ तरीयइ। अमृतोपम नीर, दीटई ठरण शरीर; सारस कुरल कपिंजल कलहंस कलगलई, तापतणा व्याप टलइं; राज हंस रमई, भ्रमर भमई; चकोर चक्रवाक कूजई, जलकेलिना कोड पूजई; मोर यासई, सर्प नासई; आडि पंखीया तरई, ब्राह्मण स्लान करइं; आस्तिक लोक नित्य सारई, कश्मल निवारह; संध्याविधि साघई, अधमर्पणमंत्र आराघरं धोतीयां धोयई, कमंडल दोयइं । सिसिरगुणतणउ सहवास, जलदेवतात निवास । देहरी दंडकलस आमलसारा झलकह, जलहारिणीकुलवधूतणां नपुर पलकई तडि कीर्तिस्तंभ दीसइ, हीयउं विहसइयग थलइ जाइइ, मेव मल्हार गाइइ । माहि अनेक शतपत्र सहस्रपत्र लक्षपन कोटिपत्र सूर्यवंशी सोमवंशी कमलवन विकाश पामई, देवता जिहां फ्रीडा कामई । एवंविध उदार, वृत्ताकार अत्यंतसार; महामनोहर; दीठउं पद्मवनवंडमंडित सरोवर १० । तउ दीठ ममुद्र । किसिउ ते समुद्र ! अनंतजल, अनंतकल्लोलकोटीसंकुल । माहि मत्स्य महामत्स्य नम चम पाठीन पीठ तिमिगिलितणां फुल पडइ, एकि ऊपर लहरि याजई, पाणी गाजई; दक्षिणावर्तशंग्वतणां यूय फिरई, माहि अनेक प्रयहण मांचरई । पकि पूरीई, पकि नांगरीयई, याबण थाहणरहइं पकि मिलि- तां आफल । मोतीपयाला आगरथको लीजइ, किहां एकाइ मेघि पाणी पी ज। इमिउ आश्चर्यनण निलय, पृथ्वीपोटाइ वलय; गुहिर गंभीर, अनंतनीर ममुह, राणीयइ दीठ ममुद्र ११ । तर दीठ विमान । किसि विमान । मुवर्णमपतित्ति, रत्नमयविच्छित्ति, प्रशस्यकलशि करी शोभमान, गगनलः क्ष्मीहुई कुंटलममान; जेहमाति अनेक देव देवी रमलि फरई, पकि श्रुति पर- ई पकि गान गापई, कि यादिन पाई; हीपई हर्ष न माई । अनेकामुम- मा प्रकर, पंझावणा निकर; मोनीनणी मरि सहकई, कपूरफस्तृरीगणा परिमल यहाई पजा महलहई, मन गहगहई। गर्यविध वियुधयधृजनीया- स्थान, तेशपलि निर्जिनभानुप्रधान, दीठ यिमान १२।तर दीटर रत्नरा- तिविमिड ते रनरानिा अनेक यम घर्ष गंडकांग जलमांत पुष्पराग प- भराग मरकत कातन पंद्रमाम माररमम प्रमानाथ भगोक यौनशोक अप- - १८ आनंदा १९ नंदवहिनी २० विजया २१ धैजयन्ती २२ जयंती २३ अप- १२१ पवीपानी गजिन गंगोदय, ममाग गगर्भ मोहिनाक्षगुणारत्नतण राशि पिर. मिशिगणी मननणद महामित दीठ निर्गम पैचा- रादिमिडभानर । शांनिभरकमनीय, प्रदक्षिणाय-ग्याला फरीप रम- पीर; मधुरतपनारिपिपमान, परनिदेवनागुग्ग्यमान; मरहित, रोज- मगि; मांगनिया, विश्वानुयल मयर, एपंयिष दीठउ पैश्वानर ४१॥ पर्वा कपी गणी जागो, निहाभागी, मनि यिमामिया लागी। मनपद मुर्मिणां दीया, दमणां फल दृसिद अत्यंतमीठां । सर स्या- भीकतार जागु.नि: पातु दिमि घिमामी पर न योलायी दासी; सम्पी महिनी मधि पाली, गणी स्वपमेय पाटी। मगति हरपिई गहगहती, जिहां गजा निri पानी जपविनय करती । रापई निद्रा टाली राजानणद आदेसि महामनि यही पमपाता मांसली राजा फन्, फदिर, राशी हदपि अहिउं । तियार पाटि आपण स्परधानपि. आयी, पल्पंफ यहसी सम्वीसहित धर्मजाग- रिका नपनायी। भाति नपरि मतामादि स्यानपाठकपाहिई विचार करा. विड, दान देड मिमितीवर्ग अदरित नीपजाविउ । संपूर्ण दिवस अतिप्रामे हते परमेश्वग्नउ उ अपनार, देयता करई जयजयकार । दनि श्रीमदलग श्रीमाणिस्यमुन्दामूरिविरचित श्रीपृथ्वीचन्द्रपरि याग्विलास पतुर्योहामा पचमोल्लासः मन्याल मनतणी रली, एप्पन दिकुमारिका मिली।ते कयण फवण भोग- करा ? भोगवती २ सुभोगा ३ भोगमालिनी ४ तोयधारा ५ विचित्रा ६ पुष्प. माला ७ आनंदिता ८ मेघंकरा : मेघवनी १० सुमेधा ?? मेघमालिनी १२ मुपन्मा १३ घत्ममित्रा १४ यारिपेणा १५ यलाहका १६ नंदोत्तरा १७ नंदा राजिना २४ समाहारा २९ सुप्रदत्ता २६ सुमबुद्धा २७ यशोधरा २८ लक्ष्मी- यती २०शेपयती ३० चित्रगुप्ता ३१ वसुंधरा ३२ इलादेवी ३३ सुरादेवी ३४ पृथ्वी ३६ पनायती ३६ एकनाशा ३७ नवमिका ३८ भद्रा ३९ सीता ४० अलंयुमा ४१ मितकेशा ४२ पुंष्टरीका ४३ यारणी ४४ हासा ४५ सर्वप्रभा ४६ १२२ प्राचीनगूर्जरफाव्यसङ्कटः श्री ४७ ही ४८ सुतारा ४९ चित्रकनका ५० चित्रा ५१ सौत्रामणी ५२ रूप ५३ रूपांसिका ५४ सुरूपा ५५ रूपयती ५६ एवं अधोलोकनिवासिनी ८ अर्ब लोकनिवासिनी ८ रुचकपर्वतचतुर्दिशिनिवासिनी प्रत्येक ८, ८, विदिसिनिवा- सिनी ४ मध्यरुचकनिवासिनी ४ इणिपरि छप्पनदिक्कुमारिका आवी । तेहे सतिकर्मतणी समग्ररीति नीपजायो। तदनंतर सौधर्मादिकदेवलोकइंद्ररहई आसनप्रकंप नीपनउ । पहिलउं इंद्रहुई कोप ऊपनउ । वज्र ऊलालिउं, ज्ञानदृष्टि निहालिउँ । जाणिउं परमेश्वरतणउ अवतार, ऊलटिउ भक्तिभार । इंद्र मनि गहगहिउ, आसण छांडी उत्तरासंग करी गूड़े थइ मस्तक हाथ जोडी शक्र. स्तव कहिउ । इंद्रि आसणि वइसी हरिणगमेसी देव वोलाविउ, तत्काल आविउ । इंद्रतणइ आदेसि सुघोपा घंटा आस्फालीनइ देवलोकि जणाविउँ । इंद्र लक्षयोजनप्रमाणि पालंकि विमाने चडी पंचरूपि परमेश्वर लेउं मेरुपर्व- ति आविउ । चउसठि इंद्र मिलिया, देवसमूह हर्षि फलकलिया । आठ सहस्र चउसहि आगला कलसि करी निर्मलजलि भरी स्नान कीघउं । तदनंतर अंग- रूक्षण करी विलेपन २ वस्त्रयुगल ३ यासपूजा ४ पुप्पारोहण ५ माल्यारोहण ६ वर्षारोहण ७ चूर्णारोहण ८ ध्वजारोहण ९ आभरणारोहण १० पुष्पग्रह ११ पुष्पप्रकर १२ अष्टमंगलकरण १३ धूपोत्क्षेप १४ गीत १५ नृत्य १६ वादिन १७ सत्तरभेदपूजातणउं करणीय सीधुं । तीणि अवसरि गगन गाजियां, इगुणपंचासभेदि वाजिन वाजियां । क- वणकवणपरिहं । उद्धमंताणं शंखाणं संगीयाणं खरमुहीयाणं परिपरियाणं अहम्मंताणं पणवाणं पडहाणं अप्फालिजंताणं भंभाणं हारंभाणं तालिजं. ताणं भेरीणं झल्लरीणं दुंदुभीणं आलिप्पंताणं मुस्खाणं मुत्तिगाणं नदीमुत्तिगाणं घटिलंताणं कच्छभीणं चित्तवीणाणं आमोडिजंताणं झुकाणं नउलाणं छिप्पं- ताणं दुंदुफीणं चिंपाणं वाइचंताणं करडाणं डिडिमकाणं उत्तालिनंताणं त. लाणं तोलाणं कंसतालाणं घटिजंताणं रिफिसिकाणं सुंसरिकाणं दुंदुकीणं . मिन्नताणं यंसाणं येणूणं एकमाईणं एगूणवन्नाए पवाइज्जंताणं । ईणि युक्तिई: भावभक्तिई, आत्मशक्तिई, परमेश्वरहुई.स्नानमहोत्सव करी पुनरपि पंचरूपिइं इंद्र होई देव मातातणई समीपि मुंकिउं । बग्रीस यत्रीस स्थाल सिंहासनादिक चत्रीसकोडि सुवर्णरत्नतणी वृष्टि करी, स्वामीतणइ दक्षिणहस्तांगुष्टि करी अमृत संचारी, वस्त्रयुगल कुंटल श्रीदाम मेल्ही इंद्र स्वस्थानकि पहत ।

पृथ्वीचन्द्रपरिष दिव प्रभाति दासीमहिलीए राउ यधाविक, स्वामी तम्हारे पुत्र आविउ । राजा वधामणो दीधी, नगरमाहि सर्व महोत्सयतणी पद्धति कीधी। अलंकरित प्रोसर, शृंगारियां मतोलीद्वार। मंच अतिमंचतणी रचना हुई, स्वर्गपुरीतणी शोभा लई । ध्वजपताका लहकई, पुष्पपरिमल यहकई । नाचई पात्र, राजाभ- पनि आवई अक्षतपात्रा सोमाई भणतां आपई छात्र, लोक अलंकरई आभर- णि गात्र, उत्सव करिया एह ज पात । तीणि वेलां न ऊई फोरण, यांधी- यह तोरण बांधीपई पंदरवाल, उत्सव विशाल; गुलघीउ लाहीपई, मन ऊमा- हापइ । ईणि युक्ति जन्ममहोत्सव हुआ । नामगरणतणइ अवसरि मातादुई होटलह धर्म युडि हुई। पहभणी धर्म इसिउं नाम दीघउँ, परमेश्वरि रमलि करतां वालपणु लोप, योधनययि राजकन्यातणउ पाणिग्रहण कीयउं । अदई लाप वरस कुमारपण पाली पंचामयरस राज्यलक्ष्मी पामी, पद विरकि- युक्त हर स्वामी । नपविघलोकांतिकदेवतणी पीनतीलगा सांयत्सरिकादान दीघर, पछह महोत्सपि महित पारित्र लोध । वि परम उमस्थ फाल अनि मामी, फेवललक्ष्मी पामी; विहारक्रम फरई, भव्यलोक सारई । दिव राजा पृथ्वीचंद्र अनइ सोमदेव उद्यानपालकरहई मादायारलाग्य सुवर्णदान देई समस्तपरियारसाथिई लेई परमेश्वर नमस्करिया मांगरिया, म. फललोक ऊलटि परिया। पृथ्वीरहई अलंकरण, दीठ स्वामीनणउं समोगरण । किसिउँ ते । समग्र देय आपई, समोसरण नींपायई। मां पहिलं यायुकुमारद- यनानिर्मित संयत्तक घायु विस्तरई, ते तृण फाष्ट करयर हरई, आगमि मेप- पटर पसरई, गंधोदकि पृष्टि फरर, पलपगर भरई । गरूअरलमप पोट याधी अरि जानुप्रमाण पंचपर्ण फुगुम परमई, निएं दिमि दिप्य परिमल बिलसई । रत्नमय सुवर्णमय रूप्यमय प्रिसि प्रकार रूपि करी उदार, अनेक प्रसार; मणिरत्ननुवर्णमय फरमीसा मदागार, पारि भनोटोमार । तिहां विर पसे उधस्तर सुवर्णभर स्तंभ, उपरि मणिमय कुंभ धनुपमानमरण, रत्नमय तोरण; प्रत्यक्ष जिसी मांगलिश्यनी पलि, इमी यंदरपालि । ति विचित्र, विशाल एन; उदारस्यरूप, कनामप लोगां का; हे लिपित मिह शाल गन, इस्यां निर्मल नीरज, पंगयर्ण पजारमा मागरणयिषा- लि, मणिद्वपीठि विशालि सकतमांगतियार, गाउ भve; . मिउ प्रत्यक्ष कम्पक्ष, इगिउ यारगुण प्रत्यक्ष । नामणी पाणं रसमय

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प्राचीनगरकाव्यसवः
संहासण, जगन्नाथहुई बहसण । तेजिइं जोई सकीयइ नीठ, इसि रत्नमय
दिपीठ; जिस्यां विकसित सहस्रपत्र, निस्यां पनर छत्रातिच्त्र; अमर, देवहुई
लिई चमर, अधरीकृतआदित्यमंडल, तीर्थकरलक्ष्मीकर्णकुंडल, पूलई झलकई
रामंडल। जेहतणइ दर्शनि मिथ्यात्वपटल टलई, इसिउ आगलि धर्मचक्र
लहलइं; दिव्य दुंदुभि वाजइ, तीणि नि?प गगनांगणि गाजई, परतीर्थिक-
णउ भडवाउ भाजइ । सहस्रप्रमाणयोजन इंद्रधन लहलहई, धूपनणा परिमल
हिमहई, यादिवतणी कोडि दुहहहई। मनुष्यतणी कोडि आवई,मनि रहरह।
णि इसिइ समोसरणि परमेश्वर जगदीश्वर नयसुवर्णकमलि पाय स्थाप-
उ, पूछिया ऊतर आपतुः प्रभाई दसइ दिसि व्यापतउ, भविकलोकहई
पि मूंकावतउ, पूर्वदिसितणइ द्वारि पइसइ, पूर्वाभिमुख सिंहासनि वइसइ
तुर्मुख होइ, भविकसंमुख जोई । संपूरी, बारपरिपदपूरी; मिथ्यात्वमानमूरी,
पिपटलचूरी, सर्वसत्त्वसाधारिणी,अमृतानुकारिणी, मधुरवाणी; लाभ जाणी;
खाण करइ, धर्म मार्ग विस्तरह।
हिव बेउ नरेश्वर मनि गहगहता, समोसरणिमाहि पहुता । श्रीधर्मनाथ-
इं प्रदक्षिणा देउ, आगलि बइठा नरेश्वर बेउ । तिवारे राजापृथ्वीचंद्रि आप
मई विशेपर्वनइं रूपि लावण्ये करी देवदानवइंद्रहुइं आश्चर्य कीy, श्रीधर्मनाधि
तीर्थकरि उपदेश दीधउ । किस्यु ते ।
सदशजन्म गृहिणी स्पृहणीयशीला लीलायितं वपुपि पौरुपभूषणा श्रीः ।
पुत्राः पवित्रचरिताः सुहृदोऽपदोपाः स्युर्धर्मतः ग्यलु फलानि पचेलिमानि॥१॥
अहो भव्य जीव ए इस्यां धर्मनां फल जाणियां । कवण कवण । पहिलं
i उत्तिमकुलि अवतार, ए धर्मनणां फल सार । जइ जीय नीचकुलि अयन:
इ, तु किसिउ पुण्य करइ । एह विश्वमाहि एक माछीतणां कुल, भीलनणां
ल, कोलोनणां कुल । ईणिपरि धोहरी आहेडी वागुरी पाटकी मद्यप घांची
और वेश्या यावरी मेय टुंय पाणपेरणीयांनणां पापतणां कुल जाणिवां । जीव
हे फुले अवतरी पाप करी नरकि जाइ, लाधु मनुष्यजन्म निरर्थक थाइ ।
णि जीवहुई उत्तिम कुल दुर्लभ । कुण तेउ उत्तम कुल ।
यंसाणं जिणवंसो सव्वकुलाणं च सावयकुलाई।
मिडिगई य गईणं मुत्तिमुहं सव्यमुक्याणं ॥ २॥

१२५ वीपदीय पंग ने मिलो गिण अपनार, पंटानणउ फरण पिचार सगाव एवं विष्ट पाहाण मोलंकीयंश पालाश पायेला यापरी- सरपंच मोभटा भाटीया नोदा पांदा दाहिणमा फरम्याद पायर नट मिलार धान्यपालयंश अनंगपाल राजपाल अधिः पाप परमार मारीयंश गादर मैप निपुंभ गुहिलउत्त डोटीवंश रोयाणामाभाणा गहरा मोलणपंश योटाणयंश दहीयावंश प्रमुख पापा ममपंटा जाणिग। अनद प्रामणादिक पुलविशेप ज्ञातिविशेष जापिता । जिम पटियाल प्रामानि परामी जाति योलीयई । किसी ते मानि । श्रीश्रीमानी उमपाल पावरपालीह पुफरयाल डीसावाल मेटत. पाट भाग गगणा समयाल दोलि मोनी पटपट पंढेरवाल पोरूआड गूजर मोद नागर जालारा पाना पोल जांबू पायटा पाय दसरा करहीया नागदा मेपाटा भटेरा पथरा नरसिंहरा हारल पंचमयंश सिरपंडला कमोद रोगी अगरपाल जिणाणी यांभ पांघ पाल्हाउत उचित बगहू अंहिछ- भवान श्रीगउट पाल्मीकि राकी तेलटा तिसरा अठवग्री लाडीसाग्वा यधन- ग मुहष्टपाल पीपू पभापती नीमा जेहराणा माथुर धाकड पालीवाल हरसउरा निवउदा गोला गरियरिया लोहाणा भाटीया नागउरा आणंदउरा सतला फड- फोटापुरी रायवालपेमीपापल्या गोमिग्री नारायणा टीटू गजउडा गोपरूआ अजयमेरा पंडोलीया पायाध सगउटा सीहरा जेसवाल नादेया जाइलयाल- पावेल । पणि मयितुं ज्ञातिधुलयंशमाहि पपाणीइ सुश्रायककुल । जीणि मुआयकतणइ फुलि जीययधु टालीपइ, जीयदया पालोयह मिथ्यात्व परिहरी, पद, सम्परत्य अंगीरीप पाणी भलीपरि गालीयइ, इंधण सोधीज्यालीयह अथाणून रापीइ, अणंतकाई न चापीई; चोरी न कीजइ, सुपात्रि दान दीजइ- मुनायि वित्त पायी लाभ लीजडा आलोषण लेई पाप धोईइ, परिग्रहप्रमाणि पुण्ययंन होई उभयपाल सामायक त्रिकाल देवपूजा समाचरीइ, पुण्यभंडार भरीद; यायीम अभक्ष वीस अणंत काय टालीयइ, आठमि पदसि पूनिम अमावाम उमासी पसण पर्व पालीयई, पुण्यमार्ग उजुआलीयइ। इस मा परतणर फुल, तर पामीपइ जइ पोतइ पुण्प हुइ विपुल । उत्तिमफुलि लाधर एंनद गृहस्थरहाई जय हुइ । फुफलपतणउ संयोग, तु हुइ पुण्यतणउ वियोग। किमी ते त्याला जे चालती फायछि, साची अलछि; आत्मकुटुंब - जवि, परचित्तरंजकि; कपटपिपइ पटिष्ट, अतिहिं अनिष्ट; घोलति छउट जनार रोमई छोरू मारह; जीभई जय छोलइ, अलविइं असंबद्ध योलई, यगाई करती १२६ प्रानीनगर गोद गिलह, परि विनोद करी माहिरि मिला, गोलागी निगा BIAN प्रशती मापिणी, गालनी गीत्रिणी; गुम्पारनी भागल, नगरनी भागल घा फिसिउं फलीपइ । जिसी मिरीनणी ऊगदि, जिमि पालनई पलेवगा जिमी दायग्यरतणी बहिनि, इमी मंतापमारितु मंपजद नारी, जउ जीव पार- फर्मि भारी । अनाद गुरुलत्र, जय पोता शुद्ध पुष्णायिन । किसी ते । सुशील मुलील सदाचार मत्ययंती यिनगयंती थियेवंती पुत्रवेनी बोलपती सुजाणि मधुरयाणि देयगुम्नणा विपद भक्त, पुष्यतणइ विपद आमतमहाजि सलावण्य, इसी गुरुला तु मंपस जा पोतइ पुण्य । अनाज गरीरि संपज लीलायंतपणूं, तं पुण्यतणउंप्रमाणाजंमधुरगतिगालइ, पापघुद्धि पालर सहजि विचक्षण, शरीरि वनीसलक्षण; अलिफुलफजलगामल केगपाश, अष्टमीचंद्र- समान भालस्थल, कामदेयकोदंडाकार भ्रूभंग, पूर्णचंद्रममान यदनमंडल, आद. शतलसमान कपोलयुगल; मौक्तिकणिसमान दशनमाल, यक्षस्थल विशाल; प्रचंड भुजदंड, इसी रूपलक्ष्मी अखंड, तु संपजइ जह पोतइ प्रचुरपुण्यपिंड। अनइ जे द्रव्य ऊपाजियातणइ कारणि पकि लोक देवदेवता आराधई, मंत्र विद्या सधरपणइं साधई; राजसभा युद्धिवंत भणी वइसई, रणक्षेत्रि पहिला पइसइ, व्यापारकला केलवई, घूर्तपणई भलारहई भोलवई जलमार्ग स्थलमार्ग आदरि आक्रमई, भूमंडलि भूजाअलि भमई; जोगीपूठिंई लोभि लुवधा लागई, पकि मोटा ठाकुर मागई; एकि पाला पुलता पंथि चालई, एकि हा देव भणी वइरागरि घाउ घालई; एकि हल पेडई, उलग करई लागा ठाकुरकेडइं; रसकारणि रसकूपिका पडई, एकि कलकलतई समुद्रि चडई; एकि निन्निसई साठि क्रियाण बहुरई, पिरायां कवित्व वहरई; कष्ट सहई विपुल, पुणि लक्ष्मी तु पामई जइ पोतई हुइ पुण्य परिघल; घरि सुवर्ण मणिरता प्रवाल, प्रधान मुक्ताफल, गजरथतुरंगमादिक जाणिवा लक्ष्मीतणा विलास सकल । हिव जं संपजइ सत्पुत्र, एह पुण्यतण चरित्र । एकई तणइ एकि कु- पुन हुई जे बालपणि पालीई लालीई पणि जेतलई यौवनभरि जाई, तेतलई मावीत्रसाम्हा थाई; कृत्य अकृत्य न गिणई, वडांतणां वचन निणई; मावी. साम्हां नीठुर बोल भणई, अहंकारि हणहणई; लक्ष्मीमदि कुपात्रि वरसई, कुस्थानकि विलसई, पिराई भूमि ग्रसई; चाहए वचनि उल्लसई, रूडी वात कहतां साम्हां धसई; स्वाननी परि भसई, अपरहुई हसइं; पापकरी ऊस: सई, धर्मवार्ता हियइ न वसई; इस्यां जं पुत्र अभक्त अजाण, ए पापतणूं -- दुर्जन । पकि जीव, सहजिई उत्तमस्वभाव, पुण्यऊपरि भाव; उपगार फरई, पृथ्वीचन्द्रचरित्र १२७ । अनइ जं पुत्र विवेकीया विचारवंत, सहजिहं संत सौभाग्यवंत, गरू- ने भक्तियंत गुणवंत, देवगुरुधर्मतगइ विपद तत्पर, सुपुत्र पामीयइ जह इपुष्पनणउ भर। हिय तु पामीयइ सुमित्र उत्तम, जइ पोतइ पुण्य हुइ निरुपम । एक व सहजई दुर्जनप्रकृति, पापतणइ विपइ मोटीआकृति; मुहि मीठउ, पित्ति गठर; पिरायां छलाछिद्र जोइ, विणास विण विगोई; उपगारिकेतलईन लीजई, मशंसा मनमाहि पोजह; आपणपउं घणुं देवइ, अवर नहीं किसिई लेखा जन संकटि पाडइ, परदोप ज्याडइ; राउलइ यानइ, देवगुरु अपमानई मूर्ति- बत अधर्म, बोलइ पिराया मर्म । जिसि विपक्षन पन, इसिउ जाणियां परमर्म होपडई धरई; परदोप न प्रकासई, असत्य न बोलई हासई; उन्मानिन पालई, पापयारालई, गुरूपदेश झालई, धर्मतउन हालई; नवे क्षेत्रे येयई धन, जिसिउ यापन चंदन; इस्यां जोहनां सीतल मन, इस्या काहीयइ सन्चन । संपगह सुमित्र सज्जन सुजाण, पुण्यतणउ प्रमाण।इस्यां धर्मफल देपी,प्रमाद ऊपी; आलस परिहरी, आदर करी; पुण्यतणइ विपद भावनासहित लाभ लेयर। जेह कारणि इसिउं कहीइ । जिम प्रासाद शोभा ध्वजापारि, जिम एदप शोभई हारि; जिम गृह शोभई उत्तिम नारि, जिम मस्तफ शोभा शमा- ग्मारि जिम कर्ण शोभइ स्वर्णालंकारि, जिम शरीरि शोभद शीलभंगारि; मरोपरि शोभइ कमलि,पुष्प शोभद परिमलि; मुप शोभइ निर्मलि नेप्रगति, रामि शोभइ चंद्रमंडलि, पिवाह शोभइ पूरि, उत्सव शोभइ तरि, नदी शोभइ पूरि जिम सम्पत्य शोभइ प्रभायना, तिम धर्म शोभइ भापना । पह फारणि भायनासहित पुण्ययंति लाभ लेवउ । जिमिदं पुण्पमभावि मर- सश्रेपकल्याण संपजई। इसिउ उपदेश सांभली, मनतणी म्ली, परमेश्वरमनि यि चरि योनती कोधी पली । हे जगाय! मंदेह भांजिपानई भराय: नुमराटी अपरि संदेह न भाजई. मंदेहभंजन पिग्द मरहई पाई जे पारणि इसि काहीई । समुद्रि उलंघीपर भारंडि न ममा, गजेंद्र विटारीपमीटिन समई; विपरितणां पिप जोरपिपई गुटिन र क्षमिारत पल प्लीज तयाई न करमग्रामभूमि भिडीपा राति न दयाम मंा- रीता भार लिपा भभीष्टि न भष्टपामणां पर्यन रोटमापी .

१२८ प्राचीनगूरपध्यमत नदीला परिन पाइलई, रागन मनि गि रहायोगः प्रयुरिनमाला समुद्रि मेनुबंग गांधीद पर्यने न कागर; दृढगावी पोलि मजिपर गठि मनाकर, गारजननां दरिद्र टालीगई दानारि लक्ष्मीनिन आजन्मति मालदिव भांजीद फेवलीए न मस्मिातेदकारगिस हे स्वामिन सम्हारा मोह टालि, एक संदेह अपनउ मगेवरतणि पालि; पक जाम अटीटानि, एक संग्रामि एफ स्वयंचरि, प मगे मोर भाहरि । मी बीनती मामली जगताय फहद पद अहो नरेन्चर सांभला । हिय कहीद पर पूर्वभव, जिसिर उं अनुमय । ईणय क्षेनि भृगुरुनामि नगर, जिहां नर्मदा नदी प्रवर; प्रौढ धवलगृह, लोक पुण्यविपद मशूट; जीणि नगरि महावर मंडलीक मेट- त्य परवीर राउत दयइत भाषाइन करणादन फलहकार छुरीकार नलीकार कुंभकार सांगडीया सावलीया जेठी यंत्रयाहा भंडारी कोठारीमभृति राज- लोक वसई, सर्वज्ञभवन देपी मन उल्लसइ । जिहां पानीनामि सरोवर, महामनोहर, जिहां राज्य पालई द्रोणनामा नरेश्वर । तेहनगद सागर अना पूरण इसिड़ नामि पवित्रचरित्र, वि पुत्र । ते वेउ नर्मदानदीमाहि बेडी चडी मत्स्य विणासि वाप्रवत्तिया । तिसिह अवसरि मत्स्य एक साम्हउ जोई तीहत तिई बोलिउ । रे दुराचारउ म करउ पाप, नरकि इत्यां हुसिइ संताप, नहीं छूटउ करताइ विलाप; जइ न मानउ ना पूछउ आपणउ वाप। ए वात सांभली बेउ कुमर भयभ्रांत हा । निसिह नदीनइ कठि एक दीउउ मुनीश्वर । तेहे बेडीतउ उतरी नमस्करिउ । वच्छउ तुम्हे म्हारा पात्र, हं पाल चारित्र; तुम्हे करउ अक्षत्र । तीणई सोनई किसिउं कीजई जीगई बेटई कान, तीगई उपाध्यायि किसिउं कीजई जीणइं चूकई ज्ञान, तीणई ठाकुरि किसिउं कोजई जीणई पामीइ पगि पगि अपमान; तीणई धर्मि किसिउ कीजइ जीण वाघ मिथ्यात्ववाद, तीणई वयरई किसि कीजहं जीणि पाछइ ऊपजइ विषवाद, तीणि मिनि किसिउं कीजइं जीणिई थाई प्रमाद; तीणिई घरि किसि कीजई जेहमाहि फफूह साप, तीणइं स्त्रीई किसिउं कीजई जेहतु नितु संताप, तीणई रामतिई किसिउं कीजई जीणि कराइ पाप । वत्स मुझ भक्त व्यंतरि, मत्स्यमुखि अवतरी; तुम्हे जगाडिया, पुण्यमार्गि लगाडिया। हिय पाप परिहरउ, पुण्य करउ । तीणई ऋपीवार पुण्यतणी परठ कही, तेहे विहं ग्रही । आव्या आपणइ घरि, करई पुण्य नयनवीपरि दिइं दान, धरई अरिहंततणउं ध्यान; करइ सुगुरुभक्ति, जाणई विवेकयुक्ति; करावई प्रासाद, १२९ पृथ्वीचन्द्ररित्र पहावई मत्कारि गाद, पाला मम्गस्त्य, जाणइ नवतत्त्व; करई सामायक मार, स्मरत पंरपरमेष्टि नमस्कार, ये फुमार इमीपरि भरई पुण्यभंडार । अन्यदा मनापि द्राणि राजां नीत बिटु राज्य दीप, आपणपई राजी. माहित पारिप्रदीप । निर्मट पारिन पाली भावविशेपि पातालि बलीन्द्र भवनरिक, राणी प्राणि धईनइ तह जि अणसरिउ । द्विव पूरणतणइ पद्मश्री इमिद नामि हुई फल, जे महामरिन । ते सागर पूरण पद्मश्री पुण्य करी पहना देवलोकि, माग्य भोगयी अपनरिया मनुष्यलोकि । सगरतणा जीव हत मामदेव नरेन्द्र, पूरणनउ जीव हउ पृथ्वीचंद्र। पानी ईहां रत्नमंजरी अवतरी । पूर्वतणउं धर्म पतिउ, मर्पमयोग मिलिउ । पिहुं नरेश्वरि इणिपरि उपदेश सांभलिउ, श्रीधर्मनाथतीर्थंकरि वली काहि । हिय माभला ने पटिया मदेह, तेहनु फीजइ छेदा जिसिंह समइ रत- मंजरी मरोवरतणी पालिई पिनानणइ उत्मगि यहठी, फुणरहई देवातणी चिंता पाटी; निमिद अवमरि, चलीवदानवेश्वरि; जानिप्रमाणि, पूर्य जाणी, पुनथ्वीचंद्रनिमित्त रापिया रसमंजरी हंसरूपिई अपहरी आपणइ कन्हइ आगी । इमाम पातालि स्थापी, पछह अवसरि पाठी आपी। राजा पृथ्वीचंद्र- स्वम दीपई, अटयो अनद संग्रामांगणि महासान्निध्य कीघउं । अनइ स्वयं- परि जनलद धूमकेतु राजांघेनालांघकार विस्तारीनइ रामंजरी रथि घाती, सेनलाई बलीद्वतणी इंद्राणी ते मेलिहउ निपाती।छ प्रहर पानालि रापी, प्रभाति भाट करी दापी; उहे दिपाडिउ पूर्वभवस्नेह, एतलई टलियां सवे संदेह । अहो एवीचंद्र साह विशेषवंत छइ भाग्य, अद्भुत सौभाग्य । जेह कारणि गृहम्येपि हारिया घटनां ईणइ जि भवि उपजिसिइ केवलज्ञान, पद भणी ए भाग्य प्रधान । मोमदेवहुई प्रोजई भवि मुक्ति, इसी हुइ युक्ति । पपाती मनि घरी, धायकयोग्य धर्म आदरी, परमेश्वर नमस्करी; वे नरेश्वर सपरिवारि स्वस्थानकि आल्या, परमेश्वरि विहारमम भीपजाव्या। हिट राजा पृथ्योचंद्र सुमरउराउ मोकलायो रसमंजरीसहित आपणाइ पुहिटाणपुरि पाटणि आत्या, प्रधानि प्रदेश महोत्सव कराव्या । सकल लोक हाट पाटण काज काम परिहरी आभरण पृटते, वेणीदंड एटते; पटरले फाटते, घाटहे विणसते; घसमसादि जोडया घाइउ राजा महोत्सवसहित आपणइ आयासि आइज । रसमंजरी पहराणी स्थापी, कोक्तिई जगयी व्यापी राज्यसौभाग्य भोगयतां अयसरि रसामंजरी महीधर इसिहं नामिई १३० प्राचीनगरकाश्यसाद पुत्र जन्मिउ । ते सर्वांगसुंदर, रूपिई पुरंदर विवेकवंधुर राज्यधुरंधर सत्पुरुष- सिंधुर नामि महीघर प्रबर्द्धमान हउ । राजापृथ्वीचंद्ररहई राज्य करतां नव- लाप नवाणयइ सहस्र नवसई नबोत्तर बरस अतिक्रम्यां । तिसिइ अवसर कानडदेसनउ राउ सिंहकेतु इसिइं नामिई अकस्मात् पुहठाणपुरि पाटणि- ऊपरि चडी आविउ, लोकरहई आतंक ऊपजाविउ । तत्काल चरपुतषि पृथ्वी चंद्ररहइं जणाविउ । ते सांभली राजापृथ्वीचंद्र कोपि करी करवाल जलालतु सामहिउ, सुभटवर्ग गहगहिउ; भंभा वाजी, गगनांगण रहिउ गाजी। राजा आप जेतलई हाथि चडिउ, तेतलई मनि विमासण पडिउ । रे आत्मन् हुं बाह्यवइरी पूठिई धाउं, अंतरंगवइरी पूठि न घाउं । कुण ए बुद्धि, किसी शुद्धि, जीतउ जोईयइ फ्रोध,जेहतर चालइ विरोध; जीतु जोईयइ मान, जेह- हुई पर्वतनउं उपमान; जीनी जोईयइ माया, जेहतु पामीयइ स्त्रीनणी काया; जीतु जोईयइ लोभ, जेहतु संसारि समयक्षोभ, जीतु जोईयइ काम, जेहतु फेडई पुण्यतण ठाम । ईणिपरि नरेश्वरहुई चीतवतां ऊपनउं शुक्लध्यान, तत्काल ऊपनडं केवलज्ञान । आन्या देव, करई सेव; वइरी समिउ, आवी नमिउ; वाजई वादिन, महोत्सव विचित्र । देवे वेप दीघउ, राजनपि लीघर; हंसजमलि, बइठउ सुवर्णकमलि; दिइ उपदेश, हउ पुण्यतणउ निवेश । एके आदरिउं सम्यक्त्व, एके श्रावकत्य; एके संयम, एके नियम । ईणिपरि लोक- हुई लाभ देई पृथ्वीमंडलि विहारक्रम करी पृथ्वीचंद्रि राजा सिद्धिसाम्राज्य लीघउ, तेहतणइ पुत्रि महीघरि पहुटाणपुरि अखंडप्रतापि राज्य कीघउं । पृथ्वीचंद्रनरेश्वरतण चरित्र मांभली, मनतणी रली, यली; चली, विवेकवंति पुण्यवंत लाभ लेवउ । जिसिई पुण्यतणा प्रभावत: सकल श्रीसंघहुइं श्रेय- कल्याण ऋद्धिडिपरंपरा संपजई। श्रीमदञ्चलगच्छे श्रीगुरुमाणिक्यस्मृरिणा। पृथ्वीचन्द्रनरेन्द्रम्य चरित्रं घाम निर्मितम् ॥ संस्त् १४७८ वर्षे श्रावण मुदि५ रवौ पृथ्वीचन्द्रचरित्रं पवित्रं पुरुपपपने निमित समर्पितम्। पावन्मेर्मही यावन् यावचन्द्रदिवाकरौ । याच्यमानो जनस्तावदग्रन्योऽयं मुपि नन्दतात् ॥ इति श्रीमपगच्छ श्रीनानिमयमुन्दामूहिकृतं श्रीवीचन्द्रपरित्रे वापिठासे पश्चम दासः।

फरि फायड मुणिमहिवइहि रहिअ अ मंपुग्नभय । जिणदत्तमरिसीहह भयण मयणरडियट विहडि गय॥५॥ खरतरपट्टावलीपदपदानि जिप दिE: आनंदु पर अइराासु पजग्गुणु । जिण दिर फार पाउ मणु निम्मन्नु एइ पुणु । जिण दिर सुधा फड पुखुफिउ नासइ । जिण दिEETर रिद्धि दरि दालिहु पणासइ । निण दिद मा पम्ममद अयुदर फांह उइक्वहहु । पर नयफणमंदिउ पामजिगु अजयमेरि कि न पिक्खहरु ॥१॥ मपण म पारि धरि घणुह पाण पुणि पंचम पपडहि । विष पिन्मपयापि महरिहरू मन पिणदहि । उ पिम्मु ता याग मयण सायरिसहि धगहरु । नयाणमंटिउमीम जाय नहु पिक्विउ जिणवरु । जर पटिहमि पासजिणिंदयसि नाणवंत णिम्मलरयण। मर घणुहर याण न रूप नहि न भुयप्पिम्मु हुइ हइमयण ॥२॥ गयफणिपामजिणिंदु गदिउ अग्नहित जु दिवउ । अजयमेरि मंभरिनरिंदु सा नियमनि तहउ । कंरणमउ अह कलमु मिहरि साणउ रवियउ । जणु सुनरणि मउ मवइ तिप्यु आयासिसउन्नत । जा युज्जुमिमिण दफारविण कर उज्झिवि फरहरइ घर । जिणदनमरि घर धयलि जमि ना पसिमि सुरभवणि कय ॥३॥ देवमारिप नेमिचंदु यहुगुणिहि पमिद्धउ । उन्नापणु नह परमाणु परतरयर लहउ । मुगुरु जिर्णमरमरि नियमि जिणचंदु मुमंजमि । अभयदेव मध्यंगु नाणि जिणयलह आगमि । जिणदत्तमरि ठिउ पटि नहि जिण उजोइउ जिणलणु । मायहि परिक्पियि परिवरिउ मुलि महग्घउ जिम रयणु ॥४॥ घणुटर धयवड धरिय मार सिंगार मुमजिय। मोहग्गिण गुटगुडिय पंच वर पटिम निमन्जिय। नियट अ ते अग्गलिय पिम्मपरिकारनित्तिय। रहरणरहसुचलिए गम्यमाणिण मह अनिय। लफभीसणह धम्मधीरिमसुपिसालह ।

१३२ प्राचीनगूनरफाव्यसहहः संजमसिरभासुरह दुसहवयदाढकरालह । नाणनयणदारुणह नियमनिसनहरसमिद्धह । कम्मकोवणिटुरह विमलपुच्छपसिद्धह । उपसमणउपरधरदुब्बिसह गुणगुंजारवजीहह । जिणदत्तसूरि अणुसरह पय पापकरडिपडसीहह ॥ ६ ॥ जरजलवहलरउद्द लोहलहरिहिं गवंता । मोहमच्छउच्छल्लिज कोवकल्लोल वहंता । मयमयरिहि परिवरिउ पंचवहुवेलदुसंचन । गंथगरुयगंभीर असुहआयत्तभयंकर । संसारसमुदु जु परिसउ जसु पुणु पिक्खिवि सुदरिया । जिणदत्तसरिउवएसु सुणि त परतरंडइ सुतरियइ ॥७॥ सावय किवि कोयलिय केवि खरहरिय पसिद्धिय । ठाइ ठाइ लक्खियहि मूढ नियवित्तिविरुद्धिय । दरहि न किंपि परत्त बेवि सुपरुप्पर जुज्झहि । सुगुरु कुगुरु मणि मुणिवि न किवि पटेलरू युज्झहि । जिणदत्तसरि जिन नमहि पयपउम सच्चु नियमणि पहहि । संसारउयहि दुत्तरि पडिय जि न हु तरंडई चडि तरहि ॥ ८॥ तवसंजमसपनियमि धम्मकम्मिण वावरियउ । लोहकोहमयमोह तह व सपिहि परिहरियउ । विममछंदलग्वणिण सत्यअत्यत्यविसालह । जिणवस्तुहगुमभनिवंतु पपडउ कलिकालह । अग्निहिवि गुणिहि मंपुन्नतणु दीणदुहियउद्धरणु धर । जिणदत्तमरि पर पल्ह भणु तत्तवंत सलहियइ धर ॥१॥ वग्याणियह परमतत्तु जिण पाउ पणासइ । आराहियह त पीरनाह कइपल्हु पयामद । धम्मु न दयमंजुत्त जेण बरगद पाविनइ । घाउ त अणग्वंडियउ जु मंदिण सलाहिबद । जह टाइ न उत्तिममुणियरह पवरयसहिहो घर नर । निम सुगुरुमिरोमणि गरियर परतरसिरिजिणदत्त घर ॥ १० ॥ इति श्रीमहाबलीदादानि । मंवत् ११७० वर्षे अश्वयुगागपो ११ नियो श्रीगागनगयों श्रीमानगर विवियागरकाशिरामविगमिप्रीमिगत्तमीणां सिम्यग निनाशिनमाधुना लिपिनानि ।

नागमोहमधारोह पिमरक्षार्णाधरं भारी॥७॥ कान्तं राहुलनं निरीक्षण निधि माडीभवन्मानमः। मन्त्रीहरपपमित्रमण्डपमपं मारम्भपामामिवान् ॥८॥ APPENDIX 1 श्रीवस्तुपालतीर्थयात्रावर्णनम् भयं क्षुब्धक्षीरार्णवनवसुधासन्निभचिता- नुपाकण्याकर्णानुपदमुपदेशानिति गुरोः । समस्तध्यस्तैना जनितजिनयात्रापरिकरो अकरोत्सुस्थं प्रास्थानिकविधिमधीशो मतिमताम् ॥१॥ साप्पोऽतिसहसहितः स हितः प्रजानां श्रीमान प्रथमतीर्घदेकपिराः। सम्भाषणाद्भुतसुधाभवचाथचार पाचालयारिदपथो स्थापनादः ॥ २॥ सान्द्रम्पर्युपरिवाहपदाग्रजानकूलोपटेझटिति कुष्मितामतिः । मार्ग निम्न्हवरदीधितिधाममो सट्वस्तदा भवनगर्भ इयायभासे ॥३॥ नाभेयप्रभुभक्तिभासुरमनाः कीर्तिमभाशुभिमा- काराः कागदाभिधेश विदधे ती नियामाना। चो चारमना जिनानविधि तवामपर्यनता. रम्भस्तम्भितपिष्टपत्रपजयश्रीधामकामस्मयः ॥ ४॥ पुष्टिभक्तिभरतुष्टया रयादम्बया हततमापदम्यपा । एत्य हरपथमय प्रतिश्रुतं सन्निधि समधिगम्य गोऽचलत् ॥५॥ पामे ग्रामे पुरि पुरि पुयरोसिभिमर्यगुरवः पलसमावेशियविधितता प्याग्नि पदपपनाकाः । मूतः कीर्तीरयममनुत प्रॉटनापश- ध्यापाठोलानुनभुजलतापर्णनीयाः स्वकीयः ॥ ६॥ अध्यावास्य नमस्यफीतिषिभपः धीमहमास्तमः- स्तोमादित्यमुपस्यकापरिमरे श्रीमदेवानुजः । श्रीनाभेयजिनेशदर्शनममुकापटीमन्मानम- सत्र मानमहास्यव्यसनिनं माण्डपति सो मापदमन्दमेतुरलरधानिधिः शरमी গণীননামা मन्त्री मातीशिल जिनपनेभित्रनारिनपात्रं लानं कृल्या कलानुठिनः स्मेरमाश्मीरनीरः। पमे पान्मृगमदमगालेपनस्वर्णभूषा. यः पूजाकुमुमरमने म कल्पगुफलाम् ॥ ९॥ मन्त्रीदोन जिनेश्वरस्य पुरतः कारपूरागुरु- लोपमेद्विनधूपमपटलमा कापि तेने मुदा । पायहरूमहाध्यगमणगिनी स्वलोककल्लोलिनी मिग्रेयं रयिकन्यकेति वियति प्रत्यक्षमुटोश्यते ॥ १०॥ इत्यं तर विराय निर्मलमनाः सन्मानदाननियां सानन्दप्रमदाफुलां कुलनभोमाणिस्यमष्टाहिकाम् । विमोन्मादिकपहियक्षविहितप्रत्यक्षमान्निध्यतः श्रद्धापडितसम्मदादुदतरन्मन्त्रीधरो भूधरात् ॥ ११ ॥ अजाहराख्ये नगरे च पार्श्वपादानजापालटपालपूज्यान । अभ्यर्चयनेप पुरे च कोडीनारे स्फुरत्कीर्त्तिकदम्बमम्बाम् ॥ १२॥ देवपत्तनपुरे पुरन्दरस्तृयमानममृतांशुलाम्यनम् । अर्चयनुचितचातुरीचितः कामनिर्मधननिर्मलद्युतिम् ॥ १३ ॥ प्रीतस्फीतमचिश्चिराय नयनामभ्रयां वामन- स्थल्यामेप मनोविनोदजननं क्लप्तप्रवेशं पुरि। धीमान्निर्मलधर्मनिर्मितिममुल्लासेन विस्मापयन् देवं रैवतकाधिरोहमकरोत्सडेन सड्वेन्चरम् ॥ १४ ॥ (विशेषकम् ) गजेन्द्रपदकुण्डस्य तत्र पीयूपहारिभिः। चकार मजनं मन्त्री वारिभिः पापहारिभिः ॥ १५ ॥ जिनमजनसजसननं कलशन्यस्ततदम्बुकुमम् । अथ सङ्घमवेक्ष्य सङ्कटे विधे वासवमण्डपोद्यमम् ॥ १६ ॥ संरम्भसङ्घटितसजनौघदृष्टामष्टाहिकामयमिहापि कृती वितेने। सद्भूतभावभरभासुरचित्तवृत्तिरुवृत्तकीर्तिचयचुम्बितदिक्कदम्बः ॥ १७॥ लुम्पन रजो विजयसेनमुनीशपाणिवासप्रवासितकुपासनभासमानः । सम्यक्त्वरोपणकृते विततान नन्दिमानन्दमेदुरमयं रमयन्मनांसि ॥१८॥ दानरानन्द्य बन्दिब्रजमसृजदनिर्वारमाहारदानं मानी सम्मान्य साधूनपुपदपि मुखोद्धाटकर्मादिकानि । * .' तडागमागाक्षपहेतुरंतपसर मन्त्री सलिमाभिधानम् ॥१॥ परनुपालवीर्थयात्रावर्णनम् मन्त्री सत्वृन्य देवार्चनरचनपरानर्चयित्वापमुच- रम्बाप्रद्युम्नशाम्बानिति कृतकृतः पर्वतादुत्ततार ॥ १९॥ असाधि साधर्मिकमानदानैरनेन नानाविधधर्मकर्म । अबाधि सा धिकरणेन माया निर्माय निर्मायमनः सुपूजाम् ॥२०॥ पुरः पुरा पूरयता पयांसि धनेन सानिध्यकृना कृतीन्दुः । स्वकीर्तिवन्नव्यनदोर्ददर्श ग्रीष्मेऽतिभीप्मेऽपि पदे पदेऽसौ ॥२१॥ इति प्रतिज्ञामिय नव्यकोतिप्रिया प्रयाणैरतिवाला वीथीम् । आनन्दनिस्पन्दविधिविधिता पुरं प्रपेदे घपलया सः ।। २२ ॥ समं तेजपालान्वितपुरजनैयारधवल- प्रभुः प्रत्युद्यातस्तदनु सदनं प्राप्य मुकृती। पुनः सवेनासी जिनपतिमोत्ताय रथत- स्ततः सहस्पार्चामानयसनायेपरचयत् ।। २३ ॥ अथ प्रसादाइभर्तुः प्राप्य भवमहतम् । मन्नीशा सफलीचमो स्वमनोरथपादपम् ॥ २४ ॥ भक्त्याखण्डलमण्डपं नवनयभीकेलिपटिका. यर्य कारयति स्म विस्मपमयं मन्त्री स शनुसये। पत्र स्तम्भनरवतमभुजिनी शाम्याम्बिकालोपन- मगुम्नमभृतीनि किच शिग्यराण्पारोपपामासिवान् ॥ २९ ॥ गुरुपूर्वजसम्बन्धिमित्रमर्तिकदम्बकम् । तुरद्गमहतं मृत्तिव्यं स्वस्थानुजस्य ॥२६ ।। शानकुम्भमयान पुरम्भान्पा ना न्ययेशपत् । पश्चपा भोगसारयश्रीनिधानकालगानिय ॥२७॥ सौवर्ण दण्डयुग्मं च प्रामाद्वितये न्यधात् । श्रीकीर्तिमन्दयोगसूतनाहरमोदरम् ॥ २८ ॥ कुन्देन्दुसुन्दरग्रापपापनं तोरणदयम् । हेय श्रीमरस्वत्यो प्रवेशाय निर्ममे ॥ २० ॥ अपालितकं ग्राममिह पूजाने ली। श्रीधीरधवलक्ष्मापादापामाम सामने ॥३०॥ श्रीपालिमाय नगरे गरीयस्तरकालीलादलिनानापम् ।

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प्राचीनगूर्जरकाव्यसङ्घहः
हर्षोत्कएँ म केयां मधुरयति सुधासाधुमाधुर्यगर्ज-
त्तोयः सोऽयं तडागः पथि मथितमिलत्पान्यसन्तापपापः ।
साक्षादम्भोजदम्भोदितमुदितसुखं लोलरोलम्बशन्दै-
रब्देव्यो दुग्धमुग्धां बिजगति जगदुर्यत्र मन्त्रीशकीत्तिम् ॥३२॥
पृष्ठपन च सौवर्णं श्रीयुगादिजिनेशितः ।
स्वकीयतेजासर्वस्वकोशन्यासमिवार्पयत् ॥ ३३ ॥
प्रासादे निदधे काम्यकाञ्चनं कलशत्रयम् ।
ज्ञानदर्शनचारित्रमहारत्ननिधानवत् ॥ ३४ ॥
किश्चैतन्मन्दिरद्वारि तोरणं तन पोरणम् ।
शिलाभिर्विदधे ज्योत्लागर्वसर्वस्वदस्युभिः ॥ ३५ ॥
लोकैः पाञ्चालिकात्तसंरम्भस्तम्भितेक्षणैः ।
इहाभिनीयते दिव्यनाट्यप्रेक्षाक्षणः क्षणम् ॥ ३६ ॥
प्रासादः स्फुटमच्युतैकमहिमा श्रीनाभिसूनुप्रभो-
स्तस्याग्रस्थितिरेककुण्डलकुलां धत्तेतरां तोरणः।
श्रीमन्त्रीश्वर वस्तुपाल कलयन्नीलाम्बरालम्बिता-
मत्युञ्चैर्जगतोऽपि कौतुकमसौ नन्दी तवास्तु श्रिये ॥ ३७॥
अन्न यात्रिकलोकानां विशतां बजतामपि ।
सर्वथा सम्मुखैवास्ति लक्ष्मीरुपरिवर्तिनी ॥ ३८॥
यत्पूने निराकृतं सुकृतिभिः साम्मुख्यमुख्ययो-
दैतं तन्मम वस्तुपालसचियेनोन्मूलितं दुर्यशः ।
आशास्तेऽद्भुततोरणोभयमुखी लक्ष्मीस्तदस्मै मुदा
श्रीनाभेयविभुप्रसाद्वशतः साम्मुख्यमेवाऽधुना ॥ ३९ ॥
तस्यानुजय जगति प्रथितः पृधिव्यामव्याजपौरूपगुणप्रगुणीकृतश्रीः ।
श्रीतेजपाल इति पालयति क्षितीन्दुमुद्रां समुद्ररसनावधिगीतकीर्तिः ।। ४० ।
समुद्रत्वं लायेमहि महिमधाम्नोऽस्य बहुधा
यतो भीमग्रीप्मोपभविपमकालेप्यजनि यः ।
क्षणेन क्षीणायामितरजनदानोदकरती
दपावेलाहेलादिगुणितगुणत्यागलहरिः ॥ ४ ॥
घनापथस्य पन्यास्तपस्विनां ग्रामशासनोहारात् ।
पेनापनीय नवकरमनवकर कारपाश्चके ॥ ४२ ॥

क्षोदक्षमा जगति यो विशदी विभातः ॥५०॥ मुद्रापुपोः किमनयोः स्तुमहे महिम्नः । बगारगोगावावयनम् पुप्पोडागपिलामलालमधिया येनान गनुसये श्रीनन्दीधरनीधमर्पितजगत्पाविध्यमारप्रितम् । पतमानुपमामरः परिमरोहदो गिलासराय- प्यानमास्तममुसरपयापरलोलटुसमामम् ॥ ४३ ॥ स्फरसाटिकादर्पणप्रतिमतामिदं गाते मुभातमुवागरापिपपिननोरं सरः। विपरररमरोग्राफरलक्ष्यतो लक्ष्यते या मरिदानापदनविम्यताडम्बरः ।। ४४ ॥ गयो यः मरमी निवेश्य श्रीरयनाद्री प जडाधराणाम् । मामस्प दानेन का निवार्य महस्य सन्तापमपाचकार ॥४९॥ क्षीणोपोटामिपद्रजःकणमियत्पानीपविन्दुः पतिः मिन्पूनामिपदगुलं वियदियत्ताला घ फालस्थितिः । इनभ्यमनि पत्रिभुवने श्रीयस्तुपालस्य तां धर्मस्थानपरम्परां गणयितुं शङ्के न सोऽपि क्षमः ॥ ४६ ॥ पतन्मुवर्णरचितं विधालङ्करणमनणुगुणरत्नम् । महाधीश्वरचरितं हतदुरितं कुम्न हदि संतः ॥ ४७ ।। श्रीनागेन्द्रमुनीन्द्रगातरणिः श्रीमान्महेन्द्रप्रभु- जजे क्षान्तिसुधानिधानकलश: पुण्याधिचन्द्रोदयः । मम्मोहोपनिपातकातरतरे विश्वेऽम्र तोशितः सिद्धान्तोऽप्यविभेद्यतर्कविपमं यं दुर्गमाशिश्रिये ॥४८॥ तमिहासनपूर्वपर्वतशिरमान्तोदपः कोऽप्य- झास्यानस्तसमस्तदुस्तमतमा: श्रीशान्तिसरिमभुः। प्रत्युञ्जीयिनदर्शनातिलसद्व्योधपद्माकरं तेज उप्तदिगम्बरं विजयते तद्यस्य लोकोत्तरम् ॥ ४९॥ आनन्दसरिरिति सस्य बभूव शिष्यः पूर्वापर शमधनोऽमरचन्द्रसरिः। धर्मविपस्य दशनाविव पापवृक्ष- अस्ताघवामयपयोनिधिमन्दराद्वि- प्राचीनगूर्जरकाव्यसदहः वाल्येऽपि निर्दलितवादिगजी जगाद यौ व्याघसिंहशिशुकाविति सिद्धराजः ॥५१॥ सिद्धान्तोपनिपन्निपण्णहृदयो धीजन्ममृस्तत्पदे पूज्यः श्रीहरिभद्रसूरिरभवचारित्रिणामग्रणीः । भ्रान्त्या शुन्यमनायैरिव चिराद्यस्मिन्नवस्थानतः सन्तुष्टै कलिकालगौतम इति ख्यातिर्वितेने गुणैः ॥५२॥ श्रीविजयसेनसूरिस्तत्पहे जयति जलघरध्यानः। यस्य गिरो धारा इव भवदयभवदयविभवभिदः ॥ ५३॥ पञ्चासराहवनराजविहारतीर्य पालेयभूमिधरभूतिधुरन्धरेऽस्मिन् । साक्षाद्घाकृतभवा तदिनीय यस्य व्याख्येयमच्युतगुरुममजा विभाति ॥ ५४ ।। भवोटवनापनीविकटकर्मवंशावलि- च्छिदोलितमौक्तिकपतिमकीर्तिकर्णाम्यरम् । असिधियमशिप्रियदितनमीनतं यद्रत क्षिती विजयतामयं विजयसेनमरिगुः ॥५५॥ शिप्यं तस्य प्रशस्यमशमगुणनिधि रम्यदारण्यदाय- ज्वालाजिदालदीप्तिविकजनविपरहियादः कपर्दी। देयी याम्या निशीथे ममममयमुपागत्य हावी- मेषयामुभिक्षाविति निजगदतुर्गदोदामनादम् ॥ ५६ ॥ नामूबकति नाम मन्ति कनि नो नो या भयिष्यन्ति के किन कापि कदापि मह पुम्यः श्रीयस्तुपालोपमः । पग्रेय प्रहरसदनिकामही मयांभिमारोमुरो येनार्य विजितः फालिदियता सोयेंशयानामयम् ॥५०॥ तस्मादस्य पास्विनः मुपरितं श्रीयम्नुपालाप प. हापास्मारममारया ति पापक्षीयन गया। स्वं श्रीमदपरम थप न पीयपमयडौः यशर भारती मममयः "पने ॥१८॥ पुरवा गलयानयोग्य पोस्टप्रमाणे विहाय यारो.पुग मविनयं नामयम्माणिना।

ग्रीनारदहमदनंदपालयः केनी मन्ति हन्त सकलासु कलासु निष्णाः। नारपरस्य दोगुकयिस्यतात्ययोधाय पुझिविभषस्तु न यस्तुपालात् ॥२॥ विश्वस्पानन्दलक्ष्मीमिति दिशति यशोधर्मरूपं शरीरम् ॥३॥ mpiroin MATERIA माता Frpm पालन निगम ॥५॥ For Urammernamrinपुने Prमामामहे । বলিলাবাখিনি मला मिना विमा हप भान्ति क्षिती ॥६॥ पीपयुदणापत्रपति श्रीमहर्मिण भं पापनानि मारपि ममान्नित्यं परम् । गिन्न धीनरनिभरिद गंशाण पणे जग. पापियामपानराश प्रतिमारपदम् ॥ ६१ ॥ নি যেমন মানেনা বাবামাশা दिवालियापुरे पलपे पायए ऐमापलः । एर पिनुपामिदं गुपतिनापरपापिय- मारभ्यरं निरं पादपतात् फिल्मलक्ष्मीपदम् ।। ६२ ।। rashiभीमराभरिसिं मीभमायनानि भीसहरनिय- कि माये चोरमारतीयात्राममनो नाम पशः सर्गः। मुखमांगे पदतरिमितमुपितं गहभर्तुमरित्रं गचं पावियपा पपिफजनमनारोदविनोदहेतुः । अस्मिनार-पगभामगमरमपनी सत्रां पान्यसार्थाः माप श्रीपस्नुपाल मयरनयरमास्वादमास्वादयन्ति ॥१॥ मैप प्यापारिणः के विदधति करणग्राममात्मकवयं मे मोगमि फलममलमलं केवलं यस्तुपालः । आरपस्थापि धर्माभ्युदयनवमहाकाव्यनाम्ना यदीयं APPENDIX II. रेवयकप्पसंखेवो सिरिनेमिजिणं सिरसा नमिउं रेवयगिरीसाप्पंमि। सिरिवइरसीसभणिभं जहा य पालित्तएणं च ॥ १ ॥ छत्तसिलाइसमीचे सिलासणे दिसं पडियन्नो नेमी, सहसंबवणे बेखा- नाणं, सरकारामे देसणा, अवलोअणं उद्धसिहरे निब्याणं । रेवयमेहलाए कहो मन्ध फरसाणतिगं काऊण सुयन्नरयणपडिमालंकि इअतिगं जी मिणो अंग्रादेयिं च फारेह । इंदो यि यन्त्रेण गिरि कोरेऊण सुवनबलायर रुपमपं भरयणमया पष्टिमा पमाणवप्नोययेया, सिहरे अंया रंगमंहये भा सोमामिहरं यलाणयमंध्ये संयो एपाई कारेइ । सिद्धविणायगो पहिहार, महिम्यं श्रीनेमिमुग्णात् नियोगस्नानं शात्या निर्वाणादनन्तरं । विभं । सहा मत जायया दामोपराणुम्या फालमेह ? मेहनाद २ गिरि- विदारण ३ काट ४ सिंहनाद ५ पोटिक ६ रेयया ७तिव्यसयेणं । मितवाला उपयसा । तम्य य मेहनादो ममट्टिी नेमिपपमत्तिजुत्तो. गिरिविदारणगं कंधणयनागपंमि पंच उडारा विउब्बिा सत्यगं .. उतरदिमाए मत्तहिसमयकमेहिं गुहा । तस्य य उववासतिगेणं । मितं मारिग मझे गिरिविदारणपहिमा। तत्प य कमरणार्ग बलंदर कारिभ मामजिपाहिमाम्यं नमिऊग, उत्तरदिमाए वागनिगं । पदमाग्मिाण कममानिगं गंतृण, गोदोहिासणेणं वामपंचगं ममाम्यं दारणं गते उणाडिऊगं, फम्ममगाशी दधिमिरा, बलापमये दागेण पारिगं यादगि मुबबहाटी टायनियाहिए मिरिगलनाही नेमिजिणिदी वानागपगंला, मगंवायाhण ही कमपालगं। मी ममतामयी। मय परगतिशत मावि शालीमार माहवागी भयाणारेण न सहा । समय मांगाए वियरं । नाय - मnिrin Nriमाए गंगुटमनगं .. TREER ? मा? Imms. - ९ वयकप्पसंखेगे अंबाएसेण पूयणेण बलिविहाणेणं गिण्डियन्वं । तहा य जुण्णकूडे उवयास- लिगं काञ्ण सरलमग्गेण बलिपूअणेणं सिडविणापगो उचलभइ । तत्थ य चिंतिमसिद्धी दिनमेगं ठाएयव्वं । जइ तहा पञ्चरको हवइ तहा रापमईगुहाए कमसएपं गोदोहिआए रसविआ कसिणचित्तपयल्ली राइमईए पडिमा रपणमया अंबाया रूपमपाओ अणेगोसहीओ अचिट्ठति । तह छत्तसिला- रसिलाकोडिसिलातिगं पण्णत्तं । उत्तसितं मझं मझेणं फणयवल्ली सहस्संव- वणमझे रपपसुवण्णमपचवीस लरकारामे धावत्तरीचवीसजिणाण गुहा प. पणत्ता । कालमेहस्स पुरओ सुवण्णवालुआए नईए सट्टकमसपतिगेण उत्तरदि- सार गमित्ता गिरिगुहं पविसिण उदए पहयणं काऊण, विए उयवासपओपहि दुवारमुग्धाहेइ । मज्झे पढमदुवारे सुवण्णखाणी, दुइभद्गारे रयणग्याणी, संघहे अंबाए विविआ। तत्य पण फण्दभंडारो। अण्णो दामोदरसमोये । अंजणसिलाए अहोभागे रययसुवण्णधूली पुरिसपीसेहिं पण्णत्ता। तस्सत्यमणे मंगलयदेवदालीय संतु रससिडी। सिरिवइरोवरकायं संघसमुद्धरणकज्जमि॥ सस्सकडाहं मज्झे गिण्हित्ता कोटिविंदुसंयोगे। घंटसिलाचुण्णयजोयणाभो अंजणसिडी। विज्ञापाहुद्देसाओ रेययफप्पसंसेयो सम्मत्तो।। १.

APPENDIXII. रेवयकप्पसंसेवो सिरिनेमिजिणं मिरमा नामि रेवगिरीमामि। सिरियहरमीसमणिशं जहा य पालित्तपणं ॥१॥ छत्तसिलाइसमीय सिलामणे दिरा पडियनी नेमी, महमंत्रयणे केवल नाणं, सरकारामे देमणा, अवलोमणं उन्नमिहरे निल्याणं । रेवयमेहलाए कण्ही तत्य फलाणतिगं काऊग सुयनरयणपटिमालंकि गेहअतिगं जीवनमा मिणो अंयादेयिं च कारइ । दो यि यन्त्रेण गिरि कोरंऊग सुवावलागयं रूप्पमयं भरपणमया पडिमा पमाणवनोययेया, सिहरे अंबा रंगमंडचे अव- लोअणसिहरं बलाणयमंध्ये संयो प्रयाई कारेड । सिद्धविणायगो पडिहारी; तप्पडिरूवं श्रीनेमिमुग्यात् निर्वाणस्थानं ज्ञात्वा निर्वाणादनन्तरं कण्हेण ठा. विरं । तहा सत्त जायया दामोयराणुरुवा कालमेह ? मेहनाद २ गिरि विदारण ३ कपाट ४ सिंहनाद ५ ग्वोडिक व रेवया ७ तिव्यतवेणं कीडणेणं खित्तवाला उपवना। तत्थ य मेहनादो समट्टिी नेमिपयभत्तिजुत्तो चिहइ । गिरिविदारणेणं कंचणवलाणयंमि पंच उडारा विउब्धिआ। तत्वेगं अंबापुरओ उत्तरदिसाए सत्तहिअसयकमेहिं गुहा । तत्य य उववासतिगेणं वलिविहाणेणं सिलं उप्पाडिऊण मज्झे गिरिविदारणपडिमा। तत्य य कमपण्णासं गए बलदेवेणं कारिअं सासयजिणपडिमास्वं नमिऊण, उत्तरदिसाए पण्णासकर्म पारीतिगं । पढमवारिआए कमसयतिगं गंतृण, गोदोहिआसणेणं पयिसिजण, उपवासपंचगं भमररूवं दारुणं सत्तेणं उप्पाडिऊणं, कम्मसत्ताओ अहोमुहूं पविसिऊण, बलाणयमंडवे इंदादेसेण धणयजस्तकारियं अंबादेवि पूइरुण, सुवण्वजालीए ठायब्वं । तत्थढिएणं सिरिमूलनाहो नेमिजिणिंदो बंदिअब्बो ! वोअवारीए एगं पायं पूइत्ता, सवरवावीए अहो कमचालीसं गमित्ता, तत्य की मझवारीए कमसत्तसएहिं कूवो । तत्थ वरहंसटिअत्तेण इहावि मूलनायगो धंदेयम्वो । तइअवारीए मूलदुवारपवेसो अवाएसेण न अन्नहा । एवं कंचण बलाणयमग्गो । तत्थ य अंबापुरओ हत्यवीसाए विवरं । तत्य य अंबाएसैण उववासतिगेण सिलुग्घाडणेण हत्यवीसाए संपुडसत्तगं समुग्गयपंचगं अहो रसकूविआ अमावसाए अमावसाए उघडइ । तत्य य उववासतिगं काऊण रेवयफप्पसंरोवो नवाएसेण पूयणेण धलिविहाणेणं गिहियव्यं । तहा य जुण्णकडे उपवास- निगं काऊण सरलमग्गेण बलिपूअणेणं सिडविणायगो उपलब्भइ । तत्य य चिनिभसिद्धी दिनमेगं ठाएयव्वं । जइ तहा पचरको हवद तहा रायमईगुहाए कमसएणं गोदोहिआए रसविआ कसिणचित्तययल्ली राइमईए पडिमा रपणमपाअंबाया रूपमयाओ अणेगोसहीओ अचिट्ठति ।तह छत्तसिला- रमिलाकोहिसिलातिगं पण्णी छत्तसिलं मझ मज्झेणं फणयवाटी सहस्मंद- वणमझे रययसुवण्णमयचवीसं लकारामे वायत्तरीचउवीसजिणाण गुहा प- प्रणता। कालमेहस्स पुरओ सुवण्णयालुआए नईए सहकमसपतिगेण उत्तरदि- साए गमित्ता गिरिगुहं पविसिऊण उदए ण्हवणं काऊण, विए उययासपोएहिं गरमुग्याह । मज्झे पदमद्वारे सुवण्णखाणी, दुइअदुवारे रयणवाणी घहे अंबाए विउव्यिआ। तत्य पण फण्हभंडारो। अण्णो दामोदरममीये मंजणसिलाए अहोभागे रययमुघण्णधूली पुरिसपीसेहिं पण्णत्ता । तस्सत्यमणे मंगलयदेवदालीप संतु रससिडी। सिरियहरोवरकायं संघसमुद्धरणकाजमि ॥ सस्सकहाहं मज्झे गिहित्ता कोडिबिंदुसंयोगे। घंटसिलायुण्णयजोपणाभो अंजणसिडी। विधापाहुदेसाओ रेवयकप्पसंरोयो सम्मत्ती॥

APPENDIX 111.
श्रीउजयन्तस्तयः
নামমি: গাইবান্না: সামিন।
श्रीनमिपायितं स्तामि गिरिनारं गिरीश्वरम् ॥१॥
स्याने देशः सुराष्ट्रागयां बिभर्ति भुवनेष्यमी ।
पमिकामिनीभाले गिरिरंप विशेषः ॥२॥
हारपन्नि बहारदुर्ग श्रीपभादयः ।
श्रीपार्थस्तेजलपुरं भूपितदुपत्यकम् ।। ३ ।।
योजनमपतुझेऽस्य शी जिनगृहावलिः।
पुण्पराशिरिवाभाति शरचन्द्रांशुनिर्मला ॥ ४ ॥
सौवर्णदण्डफलशामलसारकशोभितम् ।
घाम चैत्यं चकास्त्यस्योपरि श्रीनेमिनः प्रभोः ॥५॥
श्रीशियामनुदेवस्य पादुकाऽत्र निरीक्षिता।
स्पृष्टार्चिता च शिष्टानां पापव्यूहं व्यपोहति ॥ ६॥
प्राज्यं राज्यं परित्यज्य जरतगमिव प्रभुः।
वन्धून्विधूय च स्निग्धान् प्रपेदेऽत्र महानतम् ॥ ७॥
अत्रैव केवलं देवः स पर प्रतिलब्धवान् ।
जगज्जनहितंपी स पर्यणपीच निवृतिम् ॥ ८॥
अत एवात्र कल्याणनयमन्दिरमादधे ।
श्रीवस्तुपालो मन्त्रीशश्चमत्कारितभव्यहत् ॥ ९ ॥
जिनेन्द्रबिम्बपूर्णेन्द्रमण्डपस्था जना इह ।
श्रीनेमेर्मननं कर्तुमिन्द्रा इव चकासति ॥ १० ॥
गजेन्द्रपदनामास्य कुण्ड मण्डयते शिरः ।
सुधाविधैर्जलैः पूर्ण लानार्हलपनक्षमः ॥ ११ ॥
शत्रुचयावतारेऽत्र वस्तुपालेन कारिते ।
ऋपभः पुण्डरीकोऽष्टापदो नन्दीश्वरस्तथा ॥ १२ ॥
सिंहयाना हेमवणी सिद्धबुद्धसुतान्विता ।
कम्राम्रलुम्बिभृत्पाणिरत्राम्बा सह विघ्नहृत् ॥ १३ ॥

११ श्रीजयन्तस्तयः श्रीनेमिपत्पमतमवलोकननामकम् । विलोक्यन्तः शिवरं यान्ति भव्याः कृतार्थताम् ॥ १४ ॥ शाम्यो जाम्बवतीजातस्तुने शृङ्गेऽस्य कृष्णजः । प्रधुम्नश्च महायुम्नस्तेपाते दुस्तपं तपः ॥ १५ ॥ नानाविधीपधिगणा जाज्वलन्त्यत्र रात्रिपु। कि घण्टाक्षरच्छनशिलाः शालन्न उचकैः ।। १६ ।। सम्राम्रवणं लक्षारामोऽन्येपि वनवजाः। मयूरकोकिलाभृगीसगीतिसुभगा इह ॥ १७ ॥ न स वृक्षो न सा यल्ली न तत्पुप्पं न तत्फलम् । नेक्ष्यतेऽनाभियुक्तर्यदित्यैतिषविदो विदुः ॥ १८ ॥ राजीमती गुहागर्भ कैन नामात्र वन्यते । रथनेमिर्ययोन्मार्गात्सन्मार्गमवतारितः ॥ १९ ॥ पूजारनपनदानानि तपधात्र कृतानि । सम्पद्यन्ते मोक्षसाल्यहेतवो भव्यजन्मिनाम् ।। २० ॥ दिग्भ्रमावपि योऽनाद्री फाप्यमार्गेऽपि सञ्चरन् । सोऽपि पश्यति चैत्यस्था जिनाः लपितार्चिताः ॥ २१॥ काश्मीरागतरदोन फूप्माण्ड्यादेशतोऽन च । लेप्यविम्यास्पदे न्यस्ता श्रीनेमेतराइमनी ॥ २२ ॥ नदीनिझरकुण्डानां वनीनां घोरयामपि । विदाङ्करोत्वत्र महयाः सङ्ख्यायानपि क. ग्वटु॥२३॥ आसेचनकरूपाय महातीर्थाय तायिने । चैत्यालङ्कतशीय नमः श्रीरयताइये ॥ २४ ॥ स्तुतो मयेति मरीन्द्रयर्णितापृजिनप्रभः । गिरिनारस्तारहेमसिडिभूमिसुदेऽस्तु यः ।। २९॥ इति श्रीउन्नयन्तस्तयः॥

APPENDIX VI. श्रीउजगतमहातीर्णकन्गः मणिमुरारिमा लो नाम पनगो रामो । गरिमहरे माहित भनीए नम नेमिनिणं॥१॥ अंगार नदेगि पदयणयमापदी । पगामा गाजोगद जेण आपली ॥२॥ गिरिमिहरं कुहरदगनिमारणाराविभाति । जोपर सपा जाट मणिगं पुण्यति॥3॥ पंदणदप्पापरणगापिटयनेमिनारम | नियाणमिला नामेण अधि भुयणमि विगाया ॥४॥ सस्म य उत्तरपामे दमाणुहहिं आहोमुहं वियरं । दारंमि सस्म लिंगं अवगाणे घणु पत्तारि ॥५॥ तस्स पसुमुत्तगंधो अत्यि रमोपलमाण मपतंयं । विधेहि कुणइ नारं ममिकुंदममुबलं सहसा ॥३॥ पुल्यदिसाए घणुतरंसु नस्मेय अत्यि जागयई। पाहाणमया दाहिणदिमागग बारमयहिं ॥ ७॥ दिस्सइ अ तत्य पपडी हिंगुलवण्णां अ दिव्यपवररसो। विधेइ सव्वलोहे फरिसेणं अग्गिसंगेणं ॥ ८ ॥ उज्जिते अत्यि नई विहला नामेण पवई पडिमा । दावेइ अंगुलीए फरिसरसो पब्बईदारं ॥९॥ सफावयार उन्जितगिरिवरे तस्स उत्तरे पाते। सोवाणपंतिआए पारेवयवपिणया पुढची ।। १० ।। पंचगव्येण यद्धा पिंडीधमिआ करेइ वरतारं । फैडइ दरिद्दवाहिं उत्तारइ दुस्तकंतारं ॥ ११ ॥ सिहरे विसालसिंगे दीसंते पायकुटिमा जत्य । तस्सासन्ने सिहरे कब्बडहढपासहो तारं ॥ १२॥ उज्जितरेवयवणे तत्थ य सुदारवानरो अत्थि। सो वामकण्णछित्तो उग्घाडइ विवरवरदारं ॥१३॥ हत्थसएण पविट्टो दिरकइ सोवण्णवणिआ रुरका ।

अपलोभणमिहरसिला अपरेणं सत्य घररमो मया। १३ श्रीउजयन्तमहातीर्यकत्सा नीलरसेण सवंता सहस्सवेही रसो नणं ॥ १४ ॥ तं गहिऊण निभत्तो हणुवंतं छिया यामपाएण। सो दाइ परदारं जेण न जाणइ जणो को वि ॥१५॥ उन्जितसिहरउयरिं कोहंडिहरं खु नाम विरकायं । अवरेण तस्स य सिला तदुभयपासेसु ओसं तु ॥ १६ ॥ सं अपसितिल्लमीसं थंभइ पडिवाययंगिरं पंगं । दोगचवाहिहरणं परितुहा अंविआ जस्स ॥ १७ ॥ येगवई नाम नई मणसिलवण्णाइ तत्य पाहाणा। तो पिटि धमि संते समसुडे होइ परतारं ॥१८॥ उज्जंते नाणसिला तस्स अहो कणयपण्णिभा पुढवी। बोकडयमुत्तपिंडी ग्यहरंगारे भये हेमं ॥१९॥ नाणसिलाकयपुढची पिंडीवद्धा य पंचगव्वेण । हदपाए पसइ रसो सहस्सवेही हयद हेमं ॥२०॥ गिरियरमासनठिअं आणीयं तिलयिसारणं नाम । सिलयगादपोहे घे लरका सत्य दम्माम् ॥ २१ ॥ सेणा नामेण नई सुपण्णतित्यमि लाभपहाणा । परिवाएणय सुपं फरिति हेमं न संदेहो ॥ २२ ॥ विल्लरूपंमि नपरे मरहहरं अस्थि सेलगं दिव्यं । तस्स य मछमि ठिो गणयइरसफुटओ उपरि ॥२३॥ उयवासी फयपूओ गणपइओ पाहिजण पपररमो। पामापेवी अस्थि अभद यंगं न संदेहो ॥२४॥ सहसासयं ति तित्यं करंजगरसेण मणहरं सम्म । सत्यय तुरयायारा पाहाणा तेमि दो भाया ॥२२॥ इको पारपभाभो पिहो सुत्रोण अंधभूमाए । मियो कर नारं उत्तार दुरफतारं ॥ २६ ॥ सुभपरकसरिसपण्णो करेइ सुषं परं हेमं ॥२७॥ गिरिपग्मुरुपपारे अंपिभभासमपपं प नामेग। Hoबि पीभा पुरुषी हिमपाए होर परहेमं ॥२८॥ माणसिला उशिते तस्स प मूलमि महिभापोभा।

१४ प्राचीनगरकास्यमहरुः साहा मिअलेवेणं छायामुपं गुण हेमं ॥ २९ ॥ उज्जितपटमसिहरे आमहि दाहिणेण अवयरि। तिणि धणूमयमित्त पूर्वकरं जं विलं नाम ॥ ३० ॥ उग्याहि बिलं दिरिफमण निउणेण तन्य गंतव्वं । दंडंतराणि यारस दिव्यरसी जंयुफलमरिसो॥ ३१ ॥ जउ घोलिअंमि भंडे महस्सभाएण विधए नारं । हेमं करइ अवस्स हद तं सुंदरं सहसा ॥ ३२॥ कोहंडिभयणपुल्वेण उत्तरे जाव तायसा भूमी। दीसह अ तत्य पडिमा सेलमया वासुदेवस्स ।। ३३ ।। तस्मुत्तरेण दीसह हत्येसु अ दसतु पयई पडिमा । अपराहमुहर अंगुडिआइ सा दायरा विवरं ॥ ३४॥ नवणुहाई पविट्ठी दिसद कूडाई दाहिणुत्तरओ। हरिआललस्कयण्णो सहस्सवेही रसो नूणं ॥ ३५ ॥ उज्जिते नाणसिला विस्काया तत्य अत्यि पाहाणं । ताणं उत्तरपासे दाहिणय अहोमुहो विवरो ॥ ३६ ॥ तस्स य दाहिणभाप दसधणुभूमीइ हिंगुलुयवण्णो । अस्थि रसो सयवेही विंधइ सुचं न संदेहो ॥ ३७॥ उसहरिसहाइकृडे पाहाणा ताण संगमो अत्यि। गयवरलिंडाकिपणा मज्झे फरिसेण ते वेही ॥ ३८ ॥ जिणभवणदाहिणेणं नउई धणुहेहिं भूमिजलुअयरी । तिरिमणुअरत्तविद्धा पडिवाए तंवए हेमं ॥ ३९ ॥ वेगवई नाम नई मणसिलवण्णा य तत्थ पाहाणा । सुच्चस्स पंचवेहं सवंति धमिआ तयं सिग्धं ॥ ४०॥ इय उज्जयंतकप्पं अविअप्पं जो करेइ जिणभत्तो। कोहंडिकयपणामो सो पावइ इच्छिअं सुरकं ॥ ४१ ।। श्रीउजयंतमहातीर्थकल्पः

APPENDIX V
रेवतकल्पः
पछिमदिसाए सुरहापिसा रेपपपव्यपरायमिहर मिग्निमिनाहाग
भवणं उसुंगसिहरं अच्छह तय किर पुच्चि भयवा नेमिनार मिपमई
पदिमा आसि । अन्नपा उत्तरदिनाविभूमणामहारदेगा अजिमायणमा
माणो दुनि संध्या मंघाहियई हां गिरिनारमागणा! नहिं गमयमा
घणमिणरससंपूरिअफलसे िण्डपर्ण कर । गलिआ ऐशमा मिग्निमिना.
पहिमा । तो अईय अप्पाणं मोनेहि तेलि आहागं पायो I rr.
पीमउवधामाणमा सपमा भगवई अविशा देवी । हारिमा ।
नेण देविं दहण जयजयमदी फो। सो भणिय देपीए म यि गिगि
पर पान पिजिभव्यं तमो अजिमगंगाहियाणा igiment
मिरिनमिवियं कंधणालाणए नी पदमभरण भागoिmr.
हरिसभरनिन्भरणं मंपयाणा भागी दिtaf fel
देवीए फुसुमपुट्टी फया अपनपगहो जया पिय पागा fkram
भहिणपफारिभवणे पनिामदिमागुहे टपिक पदाणा । म
का अजिओ मी निभा पोलिशाले पालगलि.
ऊण लाइनमणिमपिंपरस बाती विभागाभा । gare.
राए जपसिंहदेयेणं गारा णि णी arti net पर
अहिण नेमिजिणंदभवणं पगारसमाप विमापा
विभं । मालपदेशात्मणं गाभाषण गोषण भाम जी
पाशिमिरिकुमारपारिदविभागण fairteen.
परशुभषेण पारगमपधीरे विकारांवर पाcिon ! HERIT:
पपारेण भराले पणा भाकित ICT पास जमा राति
सारामा । भणािणे प परrrir भा.
इमरवितण हिमालकानुन
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प्राचीनगूर्जरफाव्यसवादः नाम दुग्गं जुगाइनाहप्पमुहजिणमंदिररेहिल्लं विजह । तस्स य तिणि नाम- धिलाई पसिडाइं । तं जहा उग्गसेणगढ़ ति वा खंगारगढ़ ति वा जुण्णदुग्गं ति वा । गढस्स बाहिं दाहिणदिसाए चरिआईलडअओवरिआपसुवाडया- इठाणाई चिट्ठति। उत्तरदिसाए विसालथंभसालासोहिओ दसदसारमंडवो गिरिदुवारे य पंचमो हरी दामोअरो सुवण्णरेहानईपारे वइ । कालमेहसमीवे चिराणुवत्ता संघस्स वोलाविआ। तेजपालमंतिणा मिल्हाविआ । कमेण उजयंतसेले वत्थुपालमंतिणा सित्तुन्नावयारभवणं अट्ठावयसंमेअमंडवो कव. डिजकमरुदेविपासाया य काराविआ। तेजपालमंतिणा कल्लाणत्तयचेइभ, इंदमंडवो अ देपालमंतिणा उद्धाराविओ। एरावणगयपयमुद्दाअलंकिअं गइंद- पयकुंडं अच्छइ । तत्थ अंगं परकालित्ता दुकाण जलंजलिं दिति जत्तागय- लोआ । छत्तसिलाकडणीए सहस्संबवणारामो, जत्य भगवओ जायवकुलपई. यस्स सिवासमुद्दविजयनंदणस्स दिकानाणनिव्याणकल्लाणयाई संजाआई । गि. रिसिहरे चडित्ता अंविआदेवीए भवणं दीसइ । तत्तो अवलोअणं सिहरं। तत्थ- द्विएहिं फिर दसदिसाओ नेमिसामी अवलोइज्जति । तओ पढमसिहरे संबक- मारो बोअसिहरे पज्नुण्णो । इत्थ पव्वए ठाणे ठाणे चेइएसु रयणसुवण्णमप. जिणवियाई निचन्हविअधिआई दीसंति । सुवण्णमेयणी अ अणेगधारसभे. इणी दिप्ती दोसइ । रत्तिं च दीयउव्य पन्नलंतीओ ओसहीओ अपलोइङति। नाणाविहतम्वरयलिदलपुप्फफलाई पए पए उपलभंति । अणवरयपझरंतनि. ज्झरणाणं खलहलाराया य मत्तकोपलभमरझंकारा य मुघंति ति। उनयंतमहातित्यकापसेमलयो इमो। जिणप्पहमुणिदेहिं लिहिओत्य जहासुकं ।। श्रीरयतकल्प. समातः - APPENDIX VI अम्बिकादेवीकल्पः मिरिमयंगमिहरमेारं पणमिण नेमिजिणं । फाईरिदायिक लिहामि युट्टोपासाओ। अन्धि मुरहापिमये पाणयमंपपजणममिद्धं फोडीगारं नाम नगरं । भन्य मामी नाम रिद्विमिद्धी पम्मपरायणी येयागमपारगमो भणो हत्या कम परिणी अविणी नाम महायसीलालंकारभूसियसरीरा आसि । तमि विमपगुटमणुष्टयनाणं अपना दुये पुत्ता पदमी सिद्धो योभो युद्ध त्ति। मनपा ममागए पिभरपरी भहमोमेणं निमंतिभा यंभणा सहदिणे । फत्य पि ते वेयमचारन्ति, कवि आत्यन्ति पिण्टपयाणं, कत्थ वि होम फरिति रहमदेवं वामपाटि सालिदालियंजणपएमभेअग्वीरग्यपटपमुहा जेमणा । अविणीए अमागुआ पहाणं या पयस तम्मि अयसरे एगो साह मासोपवास- पारणा भिमटा मंपत्तों। पलोइत्ता दरिसभरनिम्भरपुलइअंगी उहिया अविणी । पहिलाभिम सोए मुणियरी भतिबमाणपुज्यं अहापवित्तेहि भत्त- पाणेहि । जाय गहिभिरको साह पलिओ ताय सासुआ वि पदाऊण रसबई- टाणमागपा । न हि पदममिदं । तो तीए कुपिआए पुट्टा बहुआ। भीए जहाष्टिग युत्ते अंगाटिा सा अजूए । जहा पाये किमेयं तर फयं, अन्न वि देयया न पूर्वभा अन्न विन भुसाविआ विप्पा अन्न चि न भरिआई पिटाई अग्गमिहा तर किमत्य मारणो दिन । तर तीए भणिओ सोवि पहभरी मोमभस्म । तेग मंण्टेण अप्पच्छदिन ति निकालिआ गिहाभो। मा परिभवदृमि मि फरंगुलीए धरित्ता युद्धं च फटीए पहाविता पलिआ नपराओ याहिं । पंधे सिमाभिभूपहिं दारगाहिं सलं मग्गिा ।जार मा अंसुजलामलोभणा मयुत्ता साय पुरओ ठिम मुद्यामरोपरं तिम्मा अणायण मीलमाहप्पेणं तकणं जलपूरिअं जाय । पाइा दोषि सीमलं नीर । नमो हिहि भोअणं भग्गिा बालाहिं । पुरओ मुझसदपारतरू तरुणं फलि. आदिवाई कलाई । अपिणी तेमि जापा ते सुत्था जाप सा पुअायाए पोममह साय जं जायं सं निमामेह जतीए यादयाई पदम जेमाविभासि भुतु. लाओ तीए याहिं उज्झिाओ आमि तामओसीलमाहप्पाकपिअमणा मामणदेवयाए मोयनकचोदयस्याओ कगाओ । जे अ उचिट्टमित्याणा भए पडिआ ते मुत्तिाई सपाईआई । अग्गमिहा प सिरे १८ प्राचीनगूर्जरकाव्यसङ्ग्रहः दंसिआ । एअमचन्भु सासुए दट्टण निवेईअं सोमविपस्स सिद्धं च जहा वच्छ सुलरकणा पइच्यया य एसा बहूता पच्चाणोहिं एअं कुलहरं ति जणणीपे- रिओ पच्छायावानलडझंतमाणसो गओ वहुयं वाले सोमभहो। तीए पिट्ठओ आगच्छन्तं दिअवरं निअवरं दट्टण दिसाओ पलोईआओ । दिवओ अग्गओ मग्गयो। तओ जिणवरं मणे अणुसरिऊण सुपत्तदाणं अणुमोअंतीए अप्पा फूर्वमि झंपाविओ। सुहज्झवसाणेण पाणे चइऊण ऊप्पना कोहंडविमाणे सोहम्मकप्पहिढे चाहिं जोअणेहिं अंबीअदेवी नाम महड्डिा देवी विमाणना मेणं कोहंडी वि भन्नइ । सोमभट्टेण वि तीसे महासईए कूचे पडणं द९ अप्पा तत्येव झंपाविओ। सो अमरिऊण तत्येव जाओ देवो। आभिओगिअकम्मुणा सिंहरूपं विउवित्ता तीए चेव वाहणं जाभो । अन्ने भणति अंविणी रेयपसिहराओ अप्पाणं झंपावित्ता नप्पिट्टओ सोमभहो वि तहेव मो । सेसं सं चेय । सा य भगवई चउम्भुआ दाहिणहत्येसु अंबलंबि पास प धारद यामहत्येसु पुण पुत्तं अंकुसं च धारद उत्तत्तकणयसवर्ण च घण्ण- मुव्यहइ सरीर। सिरिनेमिनाहस्स सासणदेवय ति निवमइ रेयइगिरिसिहरे भउडकुंडलमुत्ताहलहाररयणकंकणनेउराइमव्यंगीणाभरणरमणिला पूरेइ सम्म दिट्टीण मणोरहे नियारइ विग्यमंधायं । तीए मंतमंदलाईणि आरोहिताणं भविभाणं दीमंनि अणेगावाओ रिडिमिडिओ, न पहवंति भूभपिसायसा- दीयिसमग्गहा, मंपलंनि पुत्तकलतमित्तधणधारजमिरिओ ति। अंविआमंना इमे। वयधीभमकुलकुलजलहरिहयअनपेआई। पणहणियायायमिनी अंविभदवाड आह मंती ॥१॥ धुयभुवणदेवि मंयुझिपामअंकुमतिलाभपंचमरा । णहमिहिपृलसलामामियमायापरपणामपयं ॥२॥ पागुभयं तिला पाममिनीटार मायास्म । अंनिभाग नमुत्ति आगाणामंतां ॥३॥ एवं अवि अंबादेयाममा अणपरगा वि मपा मुरमणा गुग्गा माग मेमाइगोमग य यहयो चिट्ठति। ते महा मंडलागि अत्यन मणिशानि गंपवियरमए नि गुम्मुदाय नापय्याणि । भं भविषादयोकणं भविभणगिरापिशाणं । यामागुांना पुनि मर्माहिसा अन्या ॥१॥ इति श्रीस्मिाः।

गत प्रयारपुर सिद्धिपिनायागुरमनीर
सम्मतिरूपं पापं पूर्वाभिमुष नितिापाने ।
पत्र हरिमोडमा गिरिः॥९॥
APPENDIX VII.
श्रीगिरिनारकल्पः।
घरधर्मकीर्तिविद्यानन्दमयो यत्र विनतदेवेन्द्रः।
स्वस्तिश्रीनेमिरसौ गिरिनारगिरीश्वरो जयति ॥१॥
नेमिजिनो यदुराजीमतीत्य राजीमतीत्यजनतो यम् ।
शिप्राय शिवायासी गिरि० ॥२॥
स्थामी छनशिलान्ते प्रवज्य पहुचशिरमि पक्राणः ।
नामावलोकनमसी गिरि० ॥३॥
पत्र सहस्रामयणे केवलमाप्पादिशयिभुमिम् ।
लक्षारामे सोऽयं गिरि०॥४॥
नितिनितम्बिनीवरनितम्बसुग्यमाप यनितम्यस्थः ।
श्रीयदुकुलतिलकोऽयं गिरि० ॥५॥
युद्धा कल्याणप्रयमिद कृष्णो रूप्यररममणिपिम्यम् ।
चैत्यत्रयममाऽयं गिरि० ॥ ६ ॥
पविना हरिर्यदन्तर्विधाय पियरं पापाजावत्यम् ।
फाशनयलानरामयं गिरि ॥७॥
सन्मध्ये रत्नमी प्रमाणवर्णान्यिमां पार हरित।
श्रीनेमेसिममी गिरिः ॥ ८॥
स्वकृततविम्ययुनं रिप्रियिम्यं गुराः समयमरणे।
न्पदधन्त पदन्तरमा गिरि॥९॥
शिरोपरि गनाम्याऽपलोग्नगिरमि रहमापके ।
शम्यो पलानकेडमी गिरि॥10॥
गिन्तिासिरिफरोसी गिरि॥॥
पत्र पादपाः मतपतमेपापा
तोतिस्मरणाद
क्षेत्रपामापुरमा गिरिः ॥१॥

२०
प्राचीनगरकाव्यसङ्घदः
विभुमर्चति मेयरवो घलानकं गिरिविदारणश्चने ।
यन्त्र चतुर्वारमसी गिरि० ॥१४॥
यत्र सहस्राब्रवणांतरस्ति रम्या सुवर्णचैत्यानाम् ।
चतुरधिकविंशतिरयं गिरि० ॥ १५ ॥
वासप्ततिर्जिनानां लक्षारामेऽस्ति यत्र तु गुहायाम् ।
सचतुर्विंशतिकासौ गिरि० ॥ १६ ॥
चर्पसहस्रद्वितयं प्रावर्तत यत्र किल शिवासनोः ।
लेप्यमयी प्रतिमासौ गिरि०॥ १७ ॥
लेपगमेऽम्बादेशात्प्रमुचैत्यं यत्र पश्चिमाभिमुखम् ।
रत्नोऽस्थापयतासौ गिरि० ॥१८॥
काश्चनवलानकान्तः समवसृतेस्तन्तुनेह विम्बमिदम् ।
रत्नेनानीतमसौ गिरि० ॥ १९॥
वौद्धनिपिद्धः सड्डो नेमिनतौ यत्र मन्त्रगगनगतिम् ।
जयचन्द्रमादिशदसौ गिरि० ॥२०॥
तारां विजित्य चौद्धानिहत्य देवानवन्दयत्संघम् ।
जयचन्द्रो यत्रायं गिरि० ॥ २१ ॥
नृपपुरतः क्षपणेभ्यः कुमायुदितगाथयाम्बयायत यः।
श्रीसहाय सदायं गिरि० ।। २२ ॥
नित्यानुष्ठानान्तस्ततोऽनुसमयं समस्तसद्देन ।
यः पठ्यतेऽनिशमसौ गिरि० ॥ २३ ॥
दीक्षाजानध्यानव्याख्यानशिवावलोकनस्थाने ।
प्रमुचैत्यपावितोऽसौ गिरि० ॥ २४ ॥
राजीमतीचन्द्रदरीगजेन्द्रपदकुण्डनागझर्यादी ।
यः प्रभुमूर्तियुतोऽयं गिरि० ॥ २५ ॥
छन्नाक्षरघण्टाअनविन्दुशियशिलादि पत्रहार्यस्ति ।
कल्याणकारणमयं गिरि० ॥ २६ ॥
याकृष्यमात्यसमनदण्देशाद्या अपि व्यधुर्यन्न ।
नेमिभवनोबृतिमसो गिरि० ॥ २७ ॥
कल्याणनयचत्यं तेजःपालो न्यवीविशन्मन्त्री।
यन्मेवलागतमसी गिरि०॥२८॥

श्रीगिरिनारकल्पः। शत्रुक्षपसम्मेताटापदतीर्थानि वस्तुपालस्तु । • पत्र न्यवेशयदसौ गिरि० ॥ २९ ॥ यः पइविंशतिपिंशतिपोदशदशकठियोजनाऽनशनम् । अरपटक उधितोऽयं गिरि०॥३०॥ अद्यापि सापधाना विधाना या गीतनृत्यादि। देवाः श्रूयन्तेऽसौ गिरि० ॥ ३१ ॥ विद्यामाभृतकोड़तपादलिसकृताञ्जयन्तकल्पादेः । इति पणितो मयाऽसौ गिरिनारगिरीश्वरो जयति ॥ ३२ ॥ इति श्रीधघोपमूरियतः श्रीगिरिनारकल्पः । Newkan APPENDIX VIII Inscription of the reign of A lapkhan in the templo of Sthambhana Parsrapåtha at Cambay. ॐ अहं संवत् १३६६ वर्षे प्रतापानान्तभूतलश्रीअलावदीनसुरत्राण- प्रतिशरीरश्रीअल्पखानविजयराज्ये श्रीस्तंभतीर्थे श्रीसुधर्मास्वामिसंताननभो. नभोमणिसुविहितचूडामणिप्रभुश्रीजिनेश्वरसरिपालंकारप्रमुश्रीजिनप्रबोधस्मृ- रिशिष्यचूडामणियुगप्रधानप्रभुश्रीजिनचंद्रसरिसुगुरूपदेशेन ऊकेशवंशीयसा- हजिनदेवसाहसहदेवकुलमंडनस्य श्रीजेसलमेरो श्रीपार्श्वनाथविधिचैत्यकारित- श्रीसम्मेतशिखरमासादस्य साहकेसवस्य पुत्ररत्नेन श्रीस्तंभतीर्थे निर्मापितस- कलस्वपक्षपरपक्षचमत्कारिनानाविधमार्गणलोकदारिद्रयमुद्रापहारिगुणरत्नाकर स्य गुरुगुरुतरपुरमधेशकमहोत्सवेन संपादितश्रीशवजयोजयंतमहातीर्थपात्रा- समुपार्जितपुण्यप्राग्भारेण श्रीपत्तनसंस्थापितकोइंडिकालंकारश्रीशांतिनाथवि- घिचैत्यालयश्रीश्रावकपौषधशालाकारापणोपचितप्रसूमरयशासंभारेण भात- साहराजुदेवसाइयोलियसाहजेहडसाहलपपतिसागुणधरपुचरलसाहजपसिं- हसाहजगधरसाहसलपणसाहरत्नसिंहप्रमुग्यपरिवारसारेण श्रीजिनशासनप्र. भावकेण सफलसाधर्मिकवत्सलेन साहजेसलसुश्रावकेण कोडिकास्थापनपूर्व श्रीश्रावकपोपधशालासहितः सकलविधिलक्ष्मीविलासालयः श्रीअजितस्वामि- देवविधिचैत्यालयः कारित आचन्द्रार्फ यावनंदतात् ।। शुभमस्तु । श्री यात श्रमणसंघस्य । श्री।

APPENDIXIX Inseritions on thr Satrunjaya flilt portrining Samari's installa. tist of the image of Adikrata. मंपन् १९७१ वर्षे मारमुदि मोमे श्रीमफेयंशे येसटगोत्रीयसा० मायणपुप्रमा०माजमनपामागोमलभापांगुणमतीकुक्षिसंभयेन संघपति. भागापरानुन मादमीतापजेन मंपपतिसाधुश्रीदेसलेन पुप्रसासरज- पानगराणपालमा मामनमा०ममरसा सांगणप्रमुग्णफुटुम्यसमुदायोपेतेन निजकुलदेयी (मपि ) कामतिः करिता । पापग्रोमनि चंद्रार्को पावन्मेर्म- तिले । लायत् श्री (मय ) का मति: मंपत् १६७१ पर्प मासुदि १४ सोमेशातीपराणकश्रीमहीपाल- पति: मंपपमिश्रीमलेन कारिता श्रीयुगादिदेवचैत्यालये। मंयत् ११७१ प माहसुदि १४ सोमे श्रीमदृकेशवंशे घेसदगोत्रे सा० मतपणपुत्रमा आजतनपसागोमलभार्यासागुणामतिकुक्षिसम्भूतेन संघ- पनिमा० आशारानुजन मा०स्तुणमोहामजेन मंधपतिसाधुश्रीदेसलेन सा.. महजपालमा०माहणपालसा०सामनसायमरसीदसा सांगणसासोममभृ. निफूटुंयमातापांपतेन मातृमंघपनिभासाधरमूर्तिः प्रेष्ठिमाढलपुत्रीसं- घरलश्रीमत्तिसमन्विता फारिता । आशाधरः फल्पतम्बहोयमाशाविक परिन । लंगममाहपुगों युगादिदेयं प्रयतः प्रणीति ॥ चिरं नंदतात् ।। संवत् १४१४ वर्षे घेशापमु १० गुरौ मंधपतिदेसलसुतसा समरस- मरश्रीयुग्मं मा सालिगसा०मजनसिंहाभ्यां कारितं । प्रतिष्ठितं श्रीकशासरि- शिप्यः श्रीदेवगुप्तहरिभिः। शुभं भवतु ॥ .... ॥ शुभं भवतु ॥

APPENDIX X
पेथडरासः
विणयययणि चीनवउं देवि सामिणि वागेसरि
हंसगमणि आकाशभमणि तिहयणि परमेसरि ।
वीरजिणिदह नमीय चलण चउविहुश्रीसंघिहिं
कवडजक जकाधिराज समरीय मनरंगिहिं ॥ १॥
कोडीयनयरनिवासिणी य वं अंविकदेवि ।
शासनदेवति मनि धरीय गुरुचलण नमेवि ॥ २॥
रास रमेवउ जिणभुवणि तालमेल ठवि पाउ।
संघतलायन रोपीउ ए सभगिरि विभगिरि वेवि ॥३॥
निसुंणां धामी एकमनि महीयलिमज्झि पहाण ।
जासं वोध निरवमतिलउ पेथ अगंजीयमाण ॥४॥
पिण एक तस गुण संभलउ संघपति साहसंधीर ।
अकलीअ कलि जिम छेतरीअ गरूउ गुहिर गंभीरं ॥५॥
पोरूआडफुलिमंडणउ वईमाणकुलिलीह।
चांडसीहकुलि अवतरीया पेयपमुह सुतसीह ॥ ६ ॥
जिम कंचण कसवट्टीयए पामिउ वहुगुणरेह ।
पंधवि पेथपरीपीयइ यही कालि घरि एह ॥ ७ ॥
यइसीय पेघड पाटे बंधव बोलावह
नरसीहरतनह कारे मनि मंत्र चलावइ ।
मणूयजन्म अतिदुलह अनइ श्रावयजम्म
जीव लहइ बहुपुण्य जगि जिणवरधम्म ॥ ८॥
घणकणरयणभंडार ते सवि अछद य असार ।
संचह मोहनबंध ते सच्चि जाणे गमार ॥९॥
सारितणउ जउ गरय करेई लीजह राउल छल ह धरैई।
मणूयजनम इयं सफल करीजइ जीविययौवनलाहउ लीजइ ॥ १० ॥
अधिरलाधि किम थिर ह करीज जिणह धंम तस ऊपम दीजइ ।
सेजि रिसहसामि यंदीजद विविहप्रकारिहं प्रभु पूजीजह ॥ ११ ॥

पेपररासः मलि पंधवि कीयउ पयण प्रमाण एफपित्ति सपि समाण जाण । साने पंधि कोयउ पिचार सपिहुं काजि लिउ नरसीम भार ॥ १२॥ घन्मीय निसुण लोपमज्ज्ञि संघतणउ समाहउ भवीअणउ आधुंभ दीजइ भतिजत्ति भयीया सहा लाहउ घणफणउ । पेलमि स्लीपई रंगि रास हयं नयरस नवरंग नयीयपरे सुणि मामाणी संघनणी जो फरइं निरंतर घरहिं घरे ॥ १३ ॥ जोदन देवाल मामुहिउ तोहं माहि सुरेसर जिण ठवीय । देमदेमाउर यरनयर तिहिं लेयि कंकोत्री पाठयीय ॥ १४ ॥ पाटणि पदमीय सामति तहिं फर्णनरेसर भेटीय घीनवीउ । सीरपजाय जापय देव सहिं देसपटउ सपसाउ कीउ ॥१५॥ माहिं येगि लेउ पण आयोउ एसपलसंघ तहिं हरसीय नीपमणि नपर पसाइरउ फोघउ तस्ग्यणि तहिं नाचई कुतिगकुतिगीयां। घरि घरि यहसीय लोय मनायोप साजणसाहसरिस संम्हायी गामागर- पुरपाटणह ॥१६॥ समसमा अहि जिम तिरीयु तारणतरंड रिसह मनि धरीय फल लीजा जनमहतण। एकभायि नर जिणह धम्म परिरिहवरफलीय रमाउलीय ॥ १७ ॥ फेयि फुतिग नर जोइं निरंतर भलां भलेरा अतिहिं यहिला प्रापभवर । कामिणि धामिणि धवल दियंती गायंती गुण जिणवरह । अतिऊमा जान समाहउ करीयल कंनि सुणतीहं य ॥ १८॥ ते चउरा स्टा सध्या ताटी नयानवेरां दीसहं गेहणगण सषण । ते घणाघणेरा समयिसमेरा संग्विन दीसई अमंम्मि पुण ॥१९॥ देवालइ पालीय नयणि यिमालीप दितीय ताली रंगि फिरती हरिमभरे। सहिं नाचई रोला यहुपत येला याला भोला लउडा रसि रमई ॥२०॥ अतिरंगि पूरी दिता भमरी नयपरि नयरंगद तियसपरं । परममहोच्छय कोउ देवालइ फागुणपंचमि पीतमीपालइ प्ररथानं फोयं पपरदिणि ॥२१॥ संधपति सोहटदेउ यीनपोई तीरथजान जाइप गोमामीय। सेलहुत सीपामणह यहुग परपर पणपि रहावीप । पहलमल्ल लेउ पत्तनि आषीय संघ देवालइन रोपीउ ॥२२॥ .

प्राचीनगरकाध्यमद्वहः संघपूज तिहां कोधडं अवारी भायण सयल लोय सवि पूरीय महोच्छव कारवीय ॥ २३॥ लढण ॥ फागुणदसमि दिणंद चलीय संघ दहदिसितणः । हसमस धसमस जोइ मिलीय लोक पण अतिवणउ ए॥ २४ ॥ वहतमल्ल अगेवाण तुरीय ठाठ जोई पापरीय । पुलेहिं पलाण जोइ इकि देवालइ फिरीय ॥ २५ ॥ पहिल दीथी लागि जोइन देवाला संचरई ए। अखंड पीयाणे जाइ पहिल पीलूयाणइ रहीय ॥ २६ ॥ चलीय संघसंजुत्त पहुतउ बेगि डाभलनयरे । तीहं दीन्हा वास भास रास रुलीयामणां ए। देवालह ऊठाहु चैत्रप्रवाडि सोहामणी ए॥ २७ ॥ घडराउत वपाणि करणराउ मनि सलहीहए। देद दयापरजाम वील्हणवंस धपाणीह ए ॥ २८ ॥ पहुत देवालइ तोइ हरसीय संघ प्रसंसीइए। पेथडसम न कोई मारगि मन तुम्हि वीहिसिड ए॥२९॥ दीन्ह पीयाणउं तोह भयगलपरि तुम्हि संचरीय । वेगि पहता तोइ नयरमाहि ते तरवरीय ॥ ३०॥ आंगणि दीन्हा वास देवाला पापलि फिरोय । भविंया पणमउ पास जिणह भूयण सलीयामण । - फीधीय चैत्रप्रवाडि देवदेवांगणि पेपण ए॥ ३१ ॥ मंघह कीउं वत्सल धम्मी नागलपुरतणे ए। चलीय पीपाणइ जाम मारगि माग न जाणीइ ए॥३२॥ मह यालइ गीयं ताम संघपति पेय पपाणीह ए। नयणि निहालइ लोक पुण्यवंत धनयंत तहिं ॥ ३३ ॥ पूजीया जिणभूयणाई भपिया मणोरह चित्ति घर । की पीयाण भावि अम्बलीपछीतीयहारि तहिं ।। ३४ ॥ पथायारह जाइ भेटीय मंडणदेव तहिं । लाप मानममाण मीकिरि आवई गुणपयरी ॥ ३५ ॥ भयु मनि फरियउ तुम्हि मारगि जाउ सम्हि । गिया ते जंयू जाम मंबह पार न पामीप ए।

पेपरासः भेटीय झलु ताम पणवि पीपाण धामीयहं ।। ३६ ।। भटकूप आपास गोहिलसंडउ धरीय मनि । घरगुणवंत सुजाण राण पहतर तेण पणि ॥ ३७॥ संघह दोन्ही धीर पलीय संघपति एकमनि । राणपुरे संपत्त संघ कनालइन द ए ॥ ३८॥ पलीप सरीस उपराण यसहमंष्ट संधपति भणदए। मई मन मेल्हि निरास भाण राणाहं मन हरेगो ॥ ३॥ यहठउ संघपतिपामि रंजीप मलीयायतारिने । गुणगस्त मुग्घराउ लोलीयाणपुरमईपणीय ॥१०॥ घरउ धर्मनस ठाउ भयीय भाषि तीण पार भणीय । दीन्द पीयाणनीयाण उपरि पीपलाहाणीय। पउरा दोन्द पिहाण हूंगरा देपीय मनि ट्रीप ॥ ४॥ दीठाहूंगर इरिधियां पष्टीय मरोपरपाले। संघपति दहं पधामणी हरिपीक पहरिपोज गरिपोर मपनि निशाले ॥४॥ कुकृमि डउ दियारीज ए तर्षि पारीया पाट । पाउलि पाया पूरापी एमपरिपरे परिपर मपरि पर पहुभा ॥ ४॥ पदई भाट संघपति नियुणि पेपर पुपपपवित पंटमीपरि भयतरी गुम्देवे गुरु गुग्गो सुप पापोर हंगर पण तिला फलपगर ने गंग पाउल नारई रंगभर पागंभी पगाती ए गानो मना रंग॥४४॥ फापष्ट करण दिनद सहिं पारगुण पूरी भाग। संपति पर पामण गाली ए पोज पाटी पाटीपना पाला॥ गंगाजल गिम निर्मल लालसागर एपषित। सोधपत्र तीरशामिल निरपर निगरे निससपर मल ॥१६॥ मरदेयि मामिण पर नमीय संगिनार मुररा। पालितारिणनिति र रोग " मोटाए गोरमा जिorrent डूंगरसिरि ने पारीय परिसि। संघ मिनिभ से पाए लिंग परिवंत पार झार. ४८॥ भणुपम र पेविना का सारिकार। মাহী বি যদি কলি - ৰ " চনি ও কাম্য । *, ~ २८ प्राचीनगरकायसङ्ग्रहः अष्टापद अवलोईई ए इंद्रमंडप अतिचंग। नंदीसर अहिणव तहिं देषीऊ ए देपीऊ ए देपीउ मनिहिं सुरंग ॥ ५० ॥ मंडपि पहुतउ पवित्र तहिं लोटींगणां करेउ। पणमीय सामीय रिसहजिण तिन्नि प्रदक्षिण तिन्निमदक्षिण तिन्नि प्रदक्षिण देउ ॥५१॥ दीठहा पद्महकमल निम्मल युगादि जिण पयठला सामी पदमजिण विम. लगिर। भवीयच्छुणंत सामी लागल्ला तम्ह बई नामि नमोय नमो नमो सेजसिहरा१२ थायवद्धामणउं अतिहिं सोहाम' रिसहभूअणि मलीआमणं ए भवीयजन कलस कंचणमय मंडियले ए दुक्ख जलंजलि देयंति कुसुमंजले ।। धुर्णति दीणरीण जीण ऊतारंति जललवण नम्हण करंति सामी सुगंधजले ।। कपूरिपूरि पूरीय तिणि कीय लि मृगनाभिमंडण त्रिजगगुरू गुणनिलज देवाधिदेव जोउ वेलवउ सेवत्रीपाडल बहल कुसुम परमल विपुल पूजहे। वायवडामणं ॥ भवीयमणि यहआणंदि आरती उतारइ जिणिंद पढई भह मंगलिक रिसह- सामि। तिलक भलउ लि कीय ले कंठि वरमाला ठविय ले चाउलि सिरि पद्धावीय लि। धन धामी वडामण" भवीयजण रंजिप मनि दियंति ते दीण दृधीय जण मग्गण दाणु नति नवनवी रमणि घोणसमृदंगमणि नियहि नालनिनाद सुणि पूरीय भवण । यादवढामगुं०॥ आय कि रिमहेमर तम्ह परमेमर मामीमाल चिरकालि मुपियर । तम्हची पाय प कमलभमर भविक जन जयउ जगनाथ तुं जगतगुरो ॥ याय. यहाम०॥ मिद्धि ले मीधयर गोत्र बंधीय ले पूजीयु हरिमा मनि मन मिली। आगम मग्गीय जव पलीय पूर्गय मंत्र मम्लीय मनि नितीय पेयफठिटो. दर दलीउ । याययतामणं० ॥ आपस मगिर पेय ज पालीउ दलीप टोटर मंघपति मोगलायए मयलमयों पहन पामीनाणा घरि घरि माहमीयल कारण।

२९ पेथहरासः बावीय वित्त तिहि सपलसिदिक्षेत्रे जन्मफल लेउ जो बधणयंतई रुपायटी चलीप पीयाणए। वहर संघातिपति लोक पपाणए सेलटीया संघ पहत तहि चलयउ अग्ड पीआणए। जाइ अमरेलीयपीयाणए पहतउ थेगि तहिं पण विक्रीयाणा विसमगिरि सं. घीयउ पूरि मनि आसह ॥ तेजलपुरि अंगणि दीन्हा पास उग्रसेनमंदिर दीठ पगार अपनरफयि भणई गढवि म्यहंगार। गम्भउ दीसए पोलिपगार नरपम नरसी नरआधार ॥ मंटनकि मंडिउ यास तहिं विममए सुरठ परदेस भोल लोक सहि नियमाण । गिरि गुरूउ गिरनार स पसिद्ध ता लहि दमोदरो देय प्रसिद्धउ यदि गोयन. रेग्य नदी जलपूरीप । कालमेघो क्षेत्रपाल गिरिपाहरी मंत्रियाहट देखि पाज फरापीय पयलीय पर परय तीण करापीप। विमम हूंगर गुरूउ गिरनारो घटीप नेमिकृमरि तीपउ संजमभारो दिनि पउपनि घरमाण ऊपजदए जगतिगुरु जिणिह पर तसु मिारे गिमाए ! सीधु सामी सामल तसु मिहरि संघ पहतउ उलट आंगिहि अनिरणउदेपी राजलकंत! सहि नापिनए ए सरिलीप सला गीप गिरिनार राजलियर मलिआमणउ सामलाउ मंसारो। तहिं नाचिनए०॥ अंग पखालि सुगयंदमद ए जल पहरीप धोति प्रथीन । इंदमहोत्सव आपरंभी सहिं यपट लि पाणपंत । तहिं नापिनए महि। इंदमालउच्छाह फरी जो येयीय विभप नीपाणि । मफलमणोरह पूरीय संघपति पदीपलि इन्द्रपिमानि ॥ तहिं नापिनए० ॥ पमरधारि मरतारसपंगी गापंती पाट आगीम सामलमापि फिरि संधपति नंदा परत परीम ॥मरि नाचिनए ॥ गयंदम ए नीरि फस्टस जलभरीप लि कारिति भंगी मराज भागिरीम नय कलीय लि आरती उतारउ मंगप्टिक गएपनि म मरिना। अंपिकि आम मणोरर पूरी अपलोपि अगर सांवपजन गरारीग पलीपा पेप जन्म गुफापा नहिं नागरी पा गई निरिकारि॥ -

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Prachina-gurjar-kavyasangraha-1

Author
C.d.dalal,m.a.
Title
Prachina-gurjar-kavyasangraha-1
File name
Prachina-gurjar-kavyasangraha-1
Text
OCR done
Citation
1920
Published
2011/07
Publisher
Baroda.centrel Library
Language
Sanskrit
Pages
174
Library
Agarchand Bhairondan Sethiya Jain Parmarthik Sanstha, Bikaner
DLI number
312450
Barcode
99999990311030.00
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