Agarchand Bhairondan Sethiya Jain Parmarthik Sanstha, Bikaner
Rahiman-vinod
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। सुगम साहित्य माला भरया-१९
रहिमन-विनोद
सम्पादक
श्रीयुत प०, अयोध्याप्रसाद शर्मा, 'विशारद'
प्रकाशक
हिन्दी-साहित्य सम्मेलन, प्रयाग
}
--
स०१०८४निक
{सजिदका
मूल्य 10
-
०००
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. निवेदन हीम कवि की कविता यद्यपि हिन्दी में अभी तक यहुत थोडी प्राप्त हुई है, पर तु वह हिन्दी के पुराने कवियो म एक विशेष महत्व का स्थान रसती है। क्योकि हिन्दी के पुराने मुसम्मान करियों में रहीम के दोहो का हिन्दी भाषी जनता के अन्दर जितना अधिक प्रचार है, उतना शायद अन्य किसी मुसलमान कवि की कविता का प्रचार नहीं है। पढ़े रिसे रोगों की बात तो जाने दीजिए-देहातो में, झोरडियो के रहनेवाले, देहाती निरक्षर गार भी रहीम के दोही से परिचित है, और गोस्वामी तुलसीदास जी के दोहे-चोपाइयो तथा गिरिधर कविरायजी की कुंडलियो की तरह रहीम के दोहे भी अपनी प्रति दिन की मामूली बातो में दृष्टान्त के तार पर कह दिया करते हैं। रहीम की कविता पढने से ही मालूम हो जाता है कि उन्होंने अपने को पूर्णतया हिन्दू-भावों में मिला 1. या था । हिन्दू धर्म, हिन्दू-समाज, हिन्दू-सभ्यता को पूर्णतया उन्होंने अपो जीकृत कर लिया था। यदि ऐसा उन्होंने न किया होता, तो उनके हृदय से -ऐसी हिन्दू-स्वभावोक्तियों से निकल सकती थीं । भारतेन्दु हरिश्चन्द्रजी ने ऐमे भगवद्गा मुसल्मान कवियो को लक्ष्य कर के ही कहा है कि "इन एक एक हरिजनन पै कोटिन हिन्दू वारिये", भार यह बिलकुल सच है। क्योंकि मुसल्मान धर्म का पालन करते हुए भी यदि कोई मुसल्मान हिन्दी भाषा, हिन्दू-मन्दिरो, हिन्दू-देवी-देवताओं, हिदू-सम्यता आर हिंदु- भावो में भी अपने को तल्लीन कर सकता है-इन सब को अपने ही धार्मिक भावो-यल्कि उनमे भी अधिक-आदर देता है, तो यह हिन्दू .
-हिन्दु रोग (२) जाति के लिए वन्दनीय "साधु" है। ऐसे मुसल्मान साधु कवि की स्वभावोक्तियाँ क्यो न हिन्दू रदयो के अन्दर अपना घर करेगी। भ दुलरहीम यानरवाना मुमामानी राजत्वार में अकसरी दरवार के एक बड़े राज्याधिकारी थे, परन्तु मैं उनके लिए "साधु" कहता हूँ, क्योंकि वे आजक्ल के राज्याधिकारियो की तरह "अय निज परोति" की भेदनीति के पक्षपाती न थे, किन्तु वे "वसुधैव उटुग्यकम्" का आचरण करनेवाले उदारचरित पुरप , और ऐसे पुरप राज्यशासक हो, और चाहे जगल में रहकर तपस्या करनेवाले हा-वे मुमरमान हो, हिन्दु हो, अथवा और कोई तीसरे धर्म या समाज के उनको साधु ही कहकर अपनाएँगे। यही हिन्दुधर्म की व्यापक विशेषता है, जिसने खानपाना को मुग्ध कर लिया था। उपर्युक्त कारण से ही "रहिमन विनोद" को प्रकाशित करते हुए लाज हमको अत्यन्त हर्प हो रहा है। रहीम कवि की कविता अन्यत्र भी प्रकाशित हुई है। परन्तु “हिन्दी साहित्य-सम्मेरन" इसको क्यों प्रकाशित कर रहा है, इसका कारण इस पुस्तक के सम्पादक प. अयोध्याप्रसादजी शर्मा के "वक्तव्य" से पाठको को विदित हो जायगा । वास्तव में शर्माजी इस "विनोद" को बड़ी योग्यता के साथ सम्पादित किया है, ओर रहीम की कविता के विद्यार्थियों तथा परीक्षार्थियों के लिए इसमें ऐमी ऐसी सुवि. धाएँ कर दी है, जो अन्य पुम्मकों में बहुत कम पाई जाती हैं। पूर्व प्रका- शित पुस्तको के अतिरिक्त अपनी कुशाग्रबुद्धि और अन्वेपण-कौशल से भी पडित अयोध्याप्रसादजी विशारद ने इसम बहुत कुछ काम लिया है। अतएव विश्वास है कि रहीमकवि की कविताओ का यह संग्रह विद्यार्थियो तथा सर्व- साधारण कविता प्रेमिया के लिए विशेष उपयोगी और विनोद वह क होगा। लक्ष्मीपर वाजपेयी साहित्य मत्री - .
वक्तव्य हित्यक्षेस अनुदिन वृद्धि करता जा रहा है । काशी- नागरी प्रचारिणी सभा के हस्तलिसित प्रथो के खोज-कार्य ने साहित्य-ससार में हलचल सी मचा रश्खी है। ऐसी ऐसी बातें प्रकाश में आरही है जिनसे साहित्य का इतिहास रिसने में बडी भारी सहायता प्राप्त होगी। इस कार्य के प्रभाव ही मे हिन्दी हितैपियो की अभिरचि अनुदिन साहित्य-क्षेत्र को सनापूर्ण बनाने की ओर युफती जा रही है और उसी के फल स्वरूप साहित्य के प्रत्येक अङ्ग पर प्रथ सम्पादित हो होकर धड़ाधड़ निकल रहे हैं। परन्तु यह निश्चित है कि जो प्रथ पूर्ण विवेक व विचार के साथ सम्पादित होकर इस क्षेत्र में आगे वही चिरस्थायी होग और साहित्य के मणि-मुकुट में स्थान पायेगे । बाजारू ग से आये हुए प्रथ "ज्यो 'रहीम' भादो निसा, चमकि जात खद्योत" की तरह भविष्य के गर्भ में अन्तलान हो जायेंगे। इसी विचार को मामने रखता हुआ आज मैं अपने पाठकों के सामने अदुसरहीमला सानसाना की प्राप्य कविता रेकर उपस्थित हो रहा हूँ। कवि के जीवन-चरित्र से पाठको को उसकी सम्पूर्ण स्थिति का ज्ञान हो जायगा । यहाँ केवल इतना ही कहना पर्याप्त है कि जिस प्रकार कवि अपनी बुद्धिमत्ता से प्रकार का महामती धनगया और अपनी वीरता मे सम्पूर्ण दक्षिण भारत में घाफ जमा गया उमी प्रकार वह अपनी साहित्य- विद्वता की प्रतिभा से साहित्य क्षेत्र को भी देदीप्यमान कर गया है। कवि के चुटीले दोहे, जो किमी एक ही विषय पर नहीं, स्न्तुि भक्ति, मान, वैराग्य, हार, नीति, प्रेम, दान और दामिमान आदि भिन्न भिन्न विषयो .
पर कहे गये हैं, प्रसाद गुणार कृत, बड़े ही मर्मस्पर्शी और चमत्कार-पूर्ण है, आर डाको शिक्षित ओर अशिक्षित सभी अपनाये हुये है। ऐसे दोही की सरया यद्यपि ७०० सुनी जाती है, परन्तु अय तक फेवल २६९ ही प्राप्य है । रहीम की कविता पर अब तक जो प्रथ निकर चुके हैं वे ये है ---रहिमन शतक-५० सूर्यनारायण दीक्षित द्वारा सम्पादित -रहीम रत्नाकर-१० उमरामिह त्रिपाठी द्वारा सम्पादित ३-रहिमन विलास 1-40 राधामण द्वारा रचित रहीम के दोही पर कुण्डलियाँ ५-रहिमन शतक-५० नवति चतुर्वेदी द्वारा रचित रहीम के दोहीं पा कुदलियाँ -रहिमन के दोहे*--श्री वियोगी हरि द्वारा सम्पादित ६-~-रहीम-१० रामनरेश त्रिपाठी द्वारा सम्पादित ७--रहिमन विरास--वा० बजरत्नदास द्वारा सम्पादित उपयुक्त पुस्तकों में म०६ और ७ को छोड़कर शेप में केवल दोहे ही है। सबसे बडा मह 'रहिमन विलास है । साहित्य क्षेत्र में इस समय स. ५, ६ आर ७ के ही प्रथ चल रहे हैं। इनर्म टीका- टिप्पणी भी की गई है। इन सग्रहों के होते हुए भी मरा विचार एक नये मग्रह के सम्पादन परने का क्यों हुआ उसके उत्तर में में पाठका से यही कहूँगा कि भत्र तक रहीम के जो सग्रह निकले हैं उनमें पाट यहुत गड़बड़ है। श द रग्यने में इस बात का किचिन्मान विचार नहीं किया गया है कि उनक कुछ अर्थ हो सकता है या नहीं, शाब्दिक अर्थ और टिप्पणियाँ सरह दोहे की ही अधिक दी गई हैं। अन्यो को शिथिल श्रेणी में डाल कर टाल होने के कारण यह सस्करण नष्ट कर दिया गया। कई वर्ष है भप्राप्य है। सा० म०। । - । । (५) मटूल की गई है । शाब्दिक अर्थ और टिप्पणियाँ भी ऐसी दी गई है जिनसे बहुत जगह अर्थ का अनर्थ हो गया है। मैं प्रत्येक पुस्तक से कुछ ऐसे ही उदाहरण उद्धत करता हूँ जिनसे पाठक स्वय अनुमान लगा सके । 1-रहीम-~सम्पादक ५० रामनरेश लिपाठी-इसमें २५२ दोहे और सोरठे है । परन्तु कुल ३२ शन्दो के अर्थ दिये गये हैं। इनमें भी दशाश शन्दार्थ अशुद्ध है। नमूना देखिये "दाग दिवावत आपु तन, सही होत असपार" इसमें 'सही शब्द का अर्थ निशानी या दस्तखत है, परन्तु सम्पादक ने अर्थ किया है 'साईस। व--"माह मास लहि टेसुआ, मीन पर थल आर" इसमें 'टेसुआ' का मतलप 'टेसूराजा' से है जिनकी मूरत धनाकर लड़के धार की पूर्णिमा को विवाह कराते हैं, परन्तु सम्पादक ने इसका अर्थ 'टेमू या पलाम' दिया है, जो यहाँ युकिमगत नहीं है । इत्यादि । इस पुस्तक के सम्पादन में भी पाठ की ओर विशेष ध्यान नहीं दिया गया - २-रहिमन विलास-सम्पादक यायू धजरत्नदास । इसम २६५ दोहे और सोरठे हैं। शदार्थ व टिप्पणी भी अच्छी सग्या में दी गई है । कुछ नमूने देखिये अ--"अनुचित वचन न मानिये, जदपि गुराइसि गाढि" इसमें 'गुराइसि' शब्द का अर्थ 'गुरुजनों की आज्ञा' है, पर सम्पादक ने इसे गुराइस श द मान इस 'गुराइम गादि का अर्थ किया है 'गुर के ऐमा गादा। ब-"फल स्यामा के उर लंग, फूल स्याम उर माहि" इसमें 'फूल' शब्द का अर्थ है 'आनन्द'। सम्पादक ने 'कमर यी माए।' अर्थ दिया है, जिससे दोहे पा सौष्ठव और कवि का भाव ही नष्ट हो गया है।
. स-"बड़े बड़े बैठे लसी, पथ रथ-कृवर छाँह" इसमें 'रथ कूपर' का अर्थ 'स्थ में बैठने का स्थान है, क्योंकि रथ में ठने की जगह पर कुबड़ी छत से छाया की जाती है । सम्पादक ने इसका र्थ दिया है-'रथ का वह भाग जिस पर जुआँ बाँधा जाता है'--'हरसा', कुनडा', जो युक्तिसगत नहीं है द-"हम तन ढारत हेकुली, सींचत आपन खेत" इसम 'ठेकुली' शब्द का अर्थ दिया है-'गदारी, जिस पर से रस्मी माती जाती है । यह युक्ति-संगत नहीं है। इसी प्रकार दोहा न० १९, ५,५६,८५,१०८,१२१,१४९,१६९ ओर २४७ आदि पर भी टिप्पणी व शब्दार्थ विचार पूर्ण नहीं दिये गये हैं। दोहो के पाठो की तरफ इसमें भी ध्यान नहीं दिया गया है । इसमें भी दोहा नं. ६६,१०३ एक ही है, परन्तु थोड़े से शाब्दिक परिवर्तन के साथ दो माने गये हैं। . है अब यदि दोहा-मख्या पर विचार किया जाय तो यह निश्चित है कि नहीम ने अपने दोहो में 'रहीम' या 'रहिमन' उपनाम अवश्य रक्पा जो उनके दोहो के लिये कसौटी का काम देता है। यद्यपि मैंने भी इस पग्रह में ऐसे दोहे दिये हैं जिनमें रहीम की छाप नहीं है, पर जय तक यह सिद्ध न हो जाय कि वे रहीम के नहीं, अमुक कवि के हैं, तभी तक रहीम की सम्पत्ति है । यही सर्व-सम्मति भी है । परन्तु 'रहिमन विलास' में दोहा न. २,४०,८८,९८ और १४४ ऐसे हैं जो रहीम की सम्पत्ति में सम्मिलित नहीं किये जा सकते, क्योंकि न. २ और १४५ को यद्यपि सम्पादक ने दो श्लोकों के आधार पर बना हुआ बताया है जो रहीम के ही लिसे हुए है, परन्तु इनमें 'रहीम' की छाप नहीं है, यदि कवि अपने लिये श्लोकों के आधार पर दोहे बनाता तो अपनी छाप अवश्य .
खता । रहीम की छाप का न होना ही इनको अन्य कवि के बनाये हुए पद करता है - " न० ४० ओर ९८ में यद्यपि रहीम की छाप है, पर १० गमनरेश सिपाठी यह कथन xx जिनमें रहीम का नाम नहीं है वे दोहे तो सशयास्पद ई है, किन्तु कई नामवाले दोहे भी वृन्द, तुलसी और अन्य कवियो है। इसमे जान पड़ता है कि रहीम के दोहो का आदर इतना इ चला था कि अन्य कवियों के दोहे भी उनके नाम से प्रसिद्ध कर हेये गये।" यथार्थ में सत्य है। इनमें ४०,९८ नम्बर के दोहे वृन्द कवि के । देपो वृन्द-मतसई भारतजीवन प्रेस, फाशी द्वारा सन् १८९१ की 1, पृष्ठ ३ और ६ । न. ८८ के दोहे में रहीम की छाप भी नहीं है र न कह रहीम का है। यह दोहा भी वृन्द कवि का ही है। देखो वृन्द तसई पृष्ट २ । मैंने जो इस 'विनो' म ०६८ दोहे दिये है उनमें से २६० तो हले की सम्पादित पुस्तकों के ही हैं, शेष ६ में से • लाला भगवानदीन रा सम्पादित सूक्ति-सरोवर पृष्ट ४०६ और ४१५ से, १ रामचरितमानस । भूमिका पृष्ट ३० से, जिम्पके ऐबक बापू श्यामसुन्दरदास बी० ए० और प्रकाशक इडियन प्रेस, प्रयाग है, 1, सवत् १८४३ के हस्तलिखित टकर संग्रह से और ३ याज्ञिक अधुओ के 'माधुरी' फाल्गुन संवत् १९८१ रुप से लिये गये है। दोहो का पाठ अधिकतर 'रहिमन के दोहे', होम' या हम्नलिखित फुटकर समूह के आधार पर दिया गया है। रहीम के सम्पूर्ण दोहो को इन चार भागों में विभाजित किया गया है- H~-धर्मगुच्छ-इममें ईश्वर, ज्ञान, वैराग्य आर मति विपयक समी हि एकसित कर दिये गये हैं, जिनको पदकर पाठको के मुख से महमा यही (१०) जी ज्योतिपी काशी की कृपा से प्राप्त हुआ है और पाठान्तर प० यनवारीला दीक्षित व्याकरण शास्त्री इकनार द्वारा प्राप्त हुआ है। रहीमकाव्य सम्पादन में भी पाठ की ओर 'रहिमन विरास' के सम्पादक ने किचिन्मा ध्यान नहीं दिया है। ऊपर जो कुछ लिखा गया है उसपे मेरा आशय किसी की त्रुटियाँ दिसाना नहीं है। बल्कि रहीम के काव्य में प्रेम होने के कारण जसा मैने उसको समझा है उसका केवल दिग्दर्शन-मास कराया है। यह तो में स्वय स्वीकार करता हूँ कि रहीम की कविता के भूतपूर्व सम्पादको के सहारे से ही में यह 'विनोद', जसा कुछ बन पड़ा, उपस्थित कर रहा है। मुझमे भी ऐसी ही भूलें रह जाना सम्भव है, जिनका आगे चलकर कोई महानुभाव स्पष्टीकरण कर डालेगे। फिर भी साहित्य सेवा के विचार सही में यह 'विनोद' पाठकों के सामने रसता हूँ भार आशा करता हूँ कि मेरी अक्षम्य भूलो को भी पारक सुधारकर 'रहीम-प्रेमियो' का उपकार परंगे। में उन महानुभावी का परम कृतज्ञ हूँ जिनके द्वारा मुझे नये उन्द मिले हैं, अथवा जिनकी सम्पादित पुम्नको मे मुझे इस सगृह के सम्पादन में सहायता मिली है। सिवाय इसके श्रीमान् ५० रामशरण तिवारी वी० ए० श्रीमान मिलवर प० भागीरथप्रसाद दीक्षित 'विशारद' का भी परम पृतज हूँ, जिनकी सहायता व प्रोत्साहन से मै इस पुस्तक को इस रूप में लेकर पाठको के सामने उपस्थित हो रहा हूँ। अन्त में काव्य-मर्मज्ञ पं० कृष्ण बिहारी मिश्र बी० ए०, एल एल० बी० के प्रति, जिन्होंने घरवनायिका-भेट को देसकर अपनी सुसम्मति से मेरी अभिलापा पूर्ण की है, कृतज्ञता प्रकर करता हुआ, में अपने वक्तव्य को समाप्त करता हूँ। ओ३म् शम् । क्योटा-(इटावा). } अयोध्याप्रसाद शर्मा, विशारद कवि का परिचय पूर्वज रुपने चरित नायक का सविस्तर वर्णन लिसने से पहले मैं यह आवश्यक समझता हूँ कि प्रथम उनके पूर्वजो का संक्षिप्त परिचय दे दिया जाय ताकि उन- का मुगल-वश मे घनिष्ट सम्बन्ध भी प्रकट हो जाय और साथ ही उनकी जीवनी पर प्रकाश डालने में भी सुगमता हो। वश-परिचय-मुआसिर-उल-उमरा के लेखक ने कवि को जाति तुकमान और श का नाम करायल्लू लिखा है। इससे प्रकट है कि चे) तुर्कमान जानि के करायल नामक धरो में से थे । पूर्वज परिचय-इनके पूर्वज आजर वायजान म, जो ईरान का एक सूया र ओर जिसको अन अरमीनियों कहते हैं, रहते थे। संवत् १९३२ में सुल्तानहुसेन इल्फानी ने तुर्कमानों पर चलाई करके ये गढ़ और नगर छीन लिये जो उनके सरदारों के अधीन थे। तत्पश्चात् सुलानहुसेन के पुस सुल्तान अहमद जलायर ने करामुहम्मद के ५ हजार तुर्कमानो की सहायता में अपने भाई शेखमली को भगाकर यगदाद पर अधिकार जमा लिया भार जिसको संवत् १४५० में अमीर तैमूर ने सुल्तान अहमद से छीन लिया। परन्तु जब अमीर तैमूर तुरान की ओर चला गया तो उसने पुन बगदाद पर अधिकार जमा लिया। इसके पश्चात् १४५६ ५७ में अमीर तैमूर ने ईरान वापस आकर यगदाद छीन लिया और सुस्ता अहमद को मय अपने सहायक क्गयसुफ हुक्मान के मिन देश को भाग जाना पड़ा, जो पुन अमीर तैमूर की मृत्यु सुनकर सवत् १४६१ मे ईशन वापस आया । वापस आते ही सुल्तान अहमद ने बगदाद पर और करायूसुफ ने तवरेज पर अपना अपना अधिकार जमा लिया । सवत् १४६७ में मुल्तान अहमद ने तवरेज भी लेना चाहा, पर वह युद्ध में मारा गया और बगदाद पर भी करायूसुफ का ही अधिकार हो गया। इसी समय मे कराकूयल तुर्कमानो म बादशाही आई और करायूसुफ इस घराने का पहला यादशाह हुआ। यद्यपि नैमूर के बेटे पोते इससे मार इसकी मतानो से बराबर झगडते ही रहे , परन्तु तो भी तुर्कमानो का राज्य ६५ वर्ष तक उत्तरोत्तर बढ़ता ही गया और वह सवत् १५२५ में जाकर समाप्त हुआ। करायल्लू वश की शाखाओं में एक शाखा 'बहार ' भी थी जिसके अमीर अलीराकर बैग को करायूसुफ ने हमदान, देनूर और गुर्दिस्तान के इलाके जागीर मे दिये थे आर जो तुर्कमानो का राज्य चले जाने के पीछे तक अलीशकर की विरायत कहलाते रहे। यही अलीराफर येग हमारे चरित नायक का मूल पुरप था। करा कूयल यश से यादशाहत चले जाने पर इनके पुत ने तैमूर वशीय सुस्तात अमईद के यहाँ नौकरी कर ली, जिसके ज्येष्ठ पुल महमूद मिरगा ने इसकी यहिन यशानेगम मे विगह पर दिया । इस सम्बन्ध से बहारल-वंश की मुगर वश से पूर्ण घनिष्टता हो गई भार इनकी गणना उनके निजके अमीरी में होने लगी। भलीफर को मतानी में पीरभरी ही वीर और साहसी था। वह पहले तो हिसार शादमा म महमूद मिरजा के पास रहा, पर फिर ईरान चला गया। वहाँ पर ममय पाकर निज का राज्य स्थापन हेतु उद्योग भी किया, पर विफर मनोरम होने पर सुरामान चला गया आर यहीं गृत्यु को प्राप्त हुभा । इसका पुरा यारयेग, जो ईरान म रहना था, संवत् १५५७ में शाह इस्माईल पानी के अधिकृत हो जाने पर यदनमा पला भाया और यहाँ मे कुन्दुज आकर अमीर पुमरो के पास रहोगा। पर .
जब सवत् १५६१ म बायर बादशाह फरगाने को त्यागकर वढखशाँ आया तो खुमरोशाह ने बदायशा का सूपा उमके अधिकार मे दे दिया। तर मे यार वेग भी अपने पुत्र सेफअरी समेत बार बादशाह की नौकरी करने लगा। बाबर की सेवा में रहते समय ही बदखशाँ म सेफअली के एक पुत उत्पन्न हुआ जिसका नाम वैरम बेग रक्सा गया जो पीछे से पैरामखाँ ग्वानवाना कहलाया। यही हमारे चरित-नायक के पिता थे। इनके जन्म मवत् का निश्चित पता किसी इतिहास में नहीं लगता है ओर न यही ज्ञात होता है कि यह हुमायूँ बादशाह के पास आकर का नोकर हुये । केवल इतना ज्ञात है कि बैरम बेग ने यदग्पशा से बलम्व जाकर विद्याध्ययन किया आर १६ वर्ष की आयु में हुमायूँ गादशाह की सेवा में पहुंचकर नौकरी कर ली, जिसमें बढ़ते बढ़ते प्रधानमसी के प तक उन्नति पाई। हाँ, अकबर के उस पल के आधार पर, जो इनके विद्रोही होने पर उसने लिया था कि-"xxx हमको यह भरोसा है कि तुमने अपनी समश मे इनमें से कोई काम नहीं किया। xxx परन्तु तुम्हीं कहो कि क्या ४० वर्ष तक स्यामिभक्ति से सेवा करने, प्रतिष्ठा से परमपद को पहुंचने और जगत् में कीर्ति पाने के पीछे भी इस शेपावस्था में स्वामिद्रोही यनोगेxxx।" यह कहा जा सकता है कि विद्रोही होने के समय यह ५६ वर्ष के होगे। इसी आधार पर इनका जन्म मवत् १५६० के लगभग माना जा सकता है। 'वानखाना' की उपाधि के विषय में भी यह निश्चयारमा नहीं कहा जा सकता कि वह कब मिली। अरयता इतना ज्ञात है कि 'रयाँ' की उपाधि इंसन के बादशाह ने इह मवन् १६०१ मे दी थी जय यह हुमायूं के साथ यहाँ गये थे। इसी मे यह अनुमान किया जा सकता है कि 'म्यानपाना' की उपाधि हुमायूँ यादशाह के ईरान से आफर फ धार, काह या हिन्द ऐने के पीछे मवत् १६०२ से १६१२ तक रिमी वर्ष में मिली होगी।
( ४ ) यह बड़े वीर और साहसी थे। द्वितीय बार हुमायूँ को हिन्द पर विजय इन्हीं के कारण प्राप्त हुई थी। इसके अलावा इन्होने बहुत से युद्धों में विजय प्राप्त की थी। पूर्वज-परिचय पढ़ने से पाटको को यह भली प्रकार विदित हो गया होगा कि रहीम की मुगलो के साथ घनिष्टता कालान्तर से चली आ रही थी । वह इनके समय म और भी दृढ़ हो गई। जन्म-काल-जन द्वितीय वार हुमायूँ हिन्द में आया तो उसने ईरान के बादशाह तुहमास्प सफवी के कथनानुसार' जमीदारों की पुसियो मे अपने अमीरों के विवाह कराये । आपने भी हिन्द के सय से बड़े जागीरदार हसनखा मेवाती के चचेरे भाई जमालसाँ की दो कन्याओ में एक का अपने साथ ओर दूसरी का बेरामसा खानसाना के साथ विवाह किया, जिससे मगसर सुदी १४ सोमवार सवत् १६१३ को पुलोत्पन्न हुआ, आर जिस का नाम अकार बादशाह ने 'अन्दुर रहीम' रसवाया । वाल्यकाल-इनके पिता रामसा, जो अन्तिम समय में विद्रोही हो गये थे, पकडकर बादशाह अकबर के सामने लाये गये। पर क्षमा याचना के साथ, मका जाने की इच्छा प्रकट करने पर, दयालु अकबर ने इन्हें क्षमा करके हज के लिये जाने की आज्ञा दे दी। इन्होंने सपरिवार मक्के को प्रस्थान किया, पर गुजरात के पहननगर में माघ सुदी १५ सवत् १६१७ को मुबारक साँ नामक पठान ने इन यध कर डाला। बालक रहीम उस १-शाह ने कहा था कि आपने हिन्दुस्तान के जमीदारों से रिश्तेदारी नहीं की ओर अजनयी में बने रहे, इसी से आप के पर नहीं जमे । अय जो पुन यादशाही मिले तो दो काम जरूर करना-एक तो पठानों को व्यापार में रगाना, दूसरे वहाँ के राजाओं और जमीदारी से रिश्तेदारी करना।
समय केवल ४ वर्ष का था। इनकी मृत्यु सूचना जर बादशाह को मिली तो सानखाना को मृत्यु पर बादशाह ने बहा शोक प्रकट किया और बालक रहीम को सपरिवार अपने पास बुला लिया, जहाँ पर इनके पदाने लिखाने ओर सभ्यता सिसाने में किसी प्रकार सुटि नहीं होने पाई। युवाकाल-यड़े होने पर बादशाह ने इन्हें 'मिरजायाँ' की उपाधि प्रदान की भार अपनी धाय माँ की बेटी माहबान से इनका विवाह कर दिया। इस सम्बन्ध मे बाप की तरह इनकी भी शाही घराने से घनिष्टता यह गई। अर यह शाही कामो म योग देने योग्य हो गये थे। अत जय नाद शाह ने गुजरात पर चढ़ाई की तब यह भी साथ थे। इस समय बादशाह ने इन्हें पाटन की जागीर प्रदान की। इसी प्रकार इन्होंने गुजरात के कई युद्धो में सहायता दी, जिसके कारण बादशाह ने सवत् १६३३ में इनको गुजरात की सूबेदारी पर नियुक्त किया। इसके पश्चात् यह दो वर्ष तक मेगद प्रान्त म युद्ध करते रहे, इसी समय इनके घर की वेगमें एक यार राजपूतो के हाथ पड़ गई, पर राणा प्रताप ने बड़े ही आदर के साथ उन को रहीम के पास भेज दिया। तभी से राणाजी पर इनकी वही श्रद्धा हो गई और इसी के प्रत्युपकार में इन्होंने बादशाह से प्रार्थना करके मेवाड़ पर एक यही चढ़ाई रक्या दी पी। यह सदैव रागा के स्वाभिमान ओर देशभक्ति की प्रशमा किया करते थे। मेवाड़ मे वापस आने पर इनके गुणों पर मोहित हो ओर सब प्रकार मे योग्य समझ संवत् १६३७ में इन्ह मीर अर्ज के पद पर नियुक्त किया। इस पर से इनके ऐश्वर्य और सम्पत्ति दोनों की वृद्धि हुई ! या समय इन के भाग्योदय का था, इसीमे यह बड़ी शीघ्रता से उन्नत होत जा रहे थे। मोर भर्ज होने के ८ मास पश्गत् ये अजमेर के सूबेदार बनाये गये और माघ यदी ३ संवत् ११३८ के दरबार में उच्च पद प्रदान क्यिा गया । इस .
( ६ ) समय बादशाह इनकी युद्धिमत्ता पर इतने मोहित हो गये थे कि महत् में महत् पद देते हुये भी किचित न हिचकिचाते थे। इसीसे बडे शाहजार सलीम के शिक्षक व संरक्षक का स्थान रिक्त होने पर इनकी ही उस पर नियुक्ति की गई। इस महत्साभाग्य पर इन्होंने बड़ा उत्सव किया, जिसमें स्वय बादशाह ने आसौज बदी ८ रविवार सवत् १६३९ को इनके घर पर पधारकर इनके मान को बढ़ाया भार सम्पूर्ण जनो को आनन्दित किया । इसके पश्चात् जब बादशाह ने राज्य के सुप्रबंध हेतु शाहजादों में कार्य विभाजित किया तन बढे शाहजादे सुन्तान मलीम के आप सहायका में रक्से गये। गुजरात का युद्ध-इस समय इनका सौभाग्य-चन्द्र पूर्णरूपेण देदीप्यमान हो रहा था। अत बादशाह ने कार्तिक वदी १ सवत् १६४० को एक बड़ी सेना के साथ, जिसमें 1१ अमीरों की भी नोकारी थी, गुज रात विजय करने के लिये पुन भेजा, क्योकि वहाँ का पहला सुन्तान मुजफ्फर, जिसको बादशाह संवत् १६२९ में हराकर बन्दी बना लाये थे, सवत् १६३५ में बन्दीगृह से भाग गया और गुजरात में जाफर उसने पुन उत्पात आरम्भ कर दिये थे। यह यहाँ से प्रस्थान कर माघ बदी १४ बुधवार मवत् १६४० को पाटन पहुंचे, वहाँ की सेना ने आपका सहर्ष स्वागत किया। यहाँ आपने अपनी सेना को सुचारु रूप से सगठित किया और माघ सुदी १४ गुस्वार सवत् १६४० को ससरेज की ओर अहमदाग और नदी के बीच में डेरे डारे और यहीं से म्यूह रचकर युद्ध प्रारम्भ किया । घमासान युद्ध के पीछे इनकी अग्रणी सेना आर उसके पृष्ठ-रक्षक हाथिय भाग खड़े हुए, पर तो भी यह ३०० वीर योद्धाओ - उपलक्ष्य म इन्होंने बड़ा उत्सव किया आर प्रतिज्ञानुसार सम्पूर्ण धन, जो उस समय उनके पास था, अपने सन साथियों में विभाजित कर दिया। इसके पश्चात् इन्होंने मुजफ्फर को, जो स्वभात की ओर भाग गया था, पीटा करके कई जगह पराजय दी । जय बादशाह को मुजफार पर इनकी विजय की सूचना मिली तो उन्होंने यही प्रसन्नता प्रकट की और इस विजय के उपलक्ष्य में इन्हें 'पान-खाना' की उपाधि, एक भारी सरोपा ओर 'पाँच हजारी मसब' प्रदान किया । गुजरात विजय के पश्चात् जेठ यदी १० संवत् १६४१ को अहमदागद आकर देश प्रध म प्रवृत्त हुए और यहाँ विनय के उपलक्ष्य में एक नाग रगवाया और उसका नाम 'फतहवाग' रस्ता जिसको माजरूर 'फतहबाढी' कहते हैं। उसके पश्चात् मुजफर के पुन सिर उठानेपर भडोच विजय को, जामनगर के राजा को अधील किया आर मुजफ्फर को हराया। दरवार का बुलावा आने पर मावन सुदी ३ सवत् १६५२ को अहमदाबाद से प्रस्थान कर भादो अटी ६ संघन् १६४२ को बादशाह की सेवा में उपस्थित हुए। वहाँ से आश्विन नदी ५ सवन् १६४२ को पुन गुजरात नाने की आज्ञा पाकर अहमदागद को रोटे ओर मार्ग में सिरोही और जालोर के अधिपनियों को अधीन करते आर शिकार पेरते हुए गुजरात जा पहुंचे। इस प्रदेश में शान्ति स्थापन कर सवत् १६४४ में शाहजादे मुराद के विवाह में सम्मिलित होने के लिए नादशाह की सेवा में उपस्थित हुए। विवाह के पश्चात् यह बहुत दिनो तक दरबार में रहे। उस समय बादशाह यहुधा इनको दरवारियो के झगड़ो म पच बनाते रहे। इसके पश्चात सवत् १६४६ में जय बादशाह ने कश्मीर को पयान दिया तब इन- को भी माध ऐ गये। कश्मीर से बादशाह कासुल गये और वहाँ से (८) हिन्द को लोटे। हिन्द की वापसी के समय योरत पडाव पर खानसा ।। ने 'वाकआत बारी' का फारसी-अनुवाद बादशाह की सेवा में अर्पित किया, जो पहले तुर्की भाषा में था। इस पर बादशाह ने इनको बहुत धन्यवाद दिया और इनकी इस प्रकार की कार्य दक्षता और नि स्वार्थता से प्रसन्न हो इन्हें पोप बढी १३ सवत् १६४६ को महामली के पद पर नियुक्त किया, जो टोडरमल की मृत्यु हो जाने के कारण रिक्त हो गया था। यह पद मुगल साम्राज्य में सवोपरि माना जाता था। महामती, बादशाह का प्रतिनिधि समझा जाता था। इनके पिता भी इस पद पर . रह चुके थे। इसके पश्चात् गुजरात मिरजा अजीज कोका को जागीर म दिया गया और जौनपुर इनको देकर कधार विनय करने के लिये भेजा गया। इन्होंन प्रस्थान कर मुल्तानवाला मार्ग पकढा जो पहले ही से इनकी जागीर मे था। इन्होने मार्ग ही से बादशाह से प्रार्थना की कि मुझे सिंध विजय की आजा दी जाय । बादशाह ने इनकी प्रार्थना स्वीकार कर फधार विनय के लिए शाहजादे दानियाल को भेज दिया। अत पानसाना ने मुल्तान पहुँच बुद्धिमत्ता से काम ले रस्पी को ले रिया, जो सिध देश का द्वार कहलाता था। एक्खी-दुर्ग की विनय सुन मिरजा जानी, जो सिध का अमीर था, युद्ध के लिये आया, परन्तु घमासान युद्ध के पश्चात् पराजित हुआ, उससे मेविस्तान का जिला, मेहवान दुर्ग, २० जगी गाव और अपनी बेटी मिरजा परच को देना स्वीकार करने पर इन्होंने संधि करली जोर वर्षा स्तु के अन्त में बादशाह की सेना में उपस्थित होने का बचन देने पर पानपाना ने घेरा उठा लिया। सवत् १६४९ में मिरजाजानी को बादशाह की सेवा में उपस्थित करने के पश्चात् इन्हें पुन दक्षिण की अशान्ति मिटाने हेतु भेजा गया। वहाँ शाहजादा-मुराद और इनमें कुछ अनया हो गई, परन्तु यह स पुस दक्षिण ही में रहकर कार्य करते रहे, यहाँ तक कि कार्तिक सुदी १४ सवत् १६६० को अकबर बादशाह का देहान्त भी हो गया और जहाँगीर राज्य सिंहासन पर सुशोभित हो गये। पर दक्षिण मे जब तक शान्ति न हुई, यह नये यादशाह की सेवा में भी उपस्थित नहीं हुए। दो-तीन वर्ष पश्चात् जर कुछ शान्ति हुई, तर यह भादो बढी १२ संवत् १६६५ को यादशाह के चरणो में उपस्थित हुए और लगभग ३ राख रुपये के मोर के हीरा-माणिक उन्हें भेट किये। वृद्धावस्था-इस समय रहीम ५० से ऊपर पहुंच चुके थे, परन्तु उनम उत्साह नवयुवको मे भी बढ़कर था। अत कुछ दिन दरगार में रह दक्षिण विजय की प्रतिनाकर यह पुन दक्षिण को रवाना हुए। इनके जाने के पश्चात् आवश्यकता होने पर बादशाह ने शाहजादे परवेज को भी दक्षिण के लिए रवाना किया, पर बादशाहीदल की पृट के कारण कुछ लाभ न हुआ और लोगों के शिकायत करने पर सानपाना को वापस खुराकर दक्षिण में खानपाना की तैनाती की गई, जहाँ पर कुछ पल 1 निकला । अन अन्त में खानसाना को '६ हजारी मसब उनके बड़े पुत शाहनवाज ग्वाँ को '३ हजारी मसर', घोड़े, हाथी आदि देकर पुन दक्षिण भेजा । शाहनयाज खाँ ने कठिन एड़ाई के पश्चात् मलिक अभ्यर को पूर्ण रीति से पराजित कर दिया। अर सवत् १६७३ में बादशाह ने परवेज को दक्षिण से हटाकर खुर्रम को उसकी जगह तैनान क्यिा आर स्वय माद आया । खुर्रम ने दक्षिण में आशातीत सफलता प्राप्त को, अथात् वीजापुर और गोलकुण्डा के मुल्तानी आर मलिक अम्बर से वश्यता स्वीकार क्रा, मानसाना को खानदेश, यरार और अहमदनगर का सूबेदार नियुक्तकर और शहनवाज मी को विजित प्रान्तों का अधिकार दे, म्वय बादशाह की मेया म माइ, जा उपम्धित हुआ, जहा उसका बड़ा स्वागत हुआ। इस समय याशाह की आनानुसार शाहजहाँ ( खुर्रम) ने शहनयाज माँ की पुषी मे विगह कर लिया । संवत् १६७५ म मानरगना के दरयार में भान पर उन्हें 'मात हजारी प्रमर' टेफर पुन सूबेदारी पर वापस भेजा गया। इसके दसरे ही . । - (१०) वर्ष इनके बड़े पुल की, अत्यन्त मथप होने के कारण, मृत्यु हो गई, जिसका इनको ही नहीं, बादशाह को भी बढ़ा शोक हुआ। इसके १ माल पश्चात ही इनके दूसरे पुत्र रहमानदाद की भी मृत्यु हो गई। इससे इनको और भी सदमा पहुँचा । इनके असमय का श्रीगणेश यहीं से होता है। इन्हीं दिनों सुर्रम ने पिता (बादशाह ) के विरद विद्रोह क्यिा ओर दक्षिण में होने के कारण ग्नानसाना को भी इसका साथ देना पड़ा। इसी समय पर बादशाह ने इनको गमकहराम लिखा है। अब सानसाना के भाग्य चक ने परटा खाया और यजाय उन्नत होने के उन्हें अवनत पथ की ओर अग्रसर किया। इन दिनों यहाँ तक नौयत पहुँच गई थी कि यह "वेदी के लोटे" की तरह कभी इधर (खुर्रम की ओर) और कभी उधर (बादशाह की ओर ) लुढ़कते थे। इसी से पहरे इनको खुर्रम ओर पीछे से महावतखाँ की कैट तक में रहना पड़ा था। इस समय इनके सम्पूर्ण मरातिर के साथ जागीर भी छीन ली गई थी, परन्तु जन वाप-बेटे में सुलह हो गई तर गटशाह ने इन्हें महाक्तखाँ की केद से चुडाकर अपने पास बुला लिया और यह समझाकर कि-"अर तक जो कुछ हुआ, दैव सयोग से हुआ--न कुछ हमारे अस्तियार की बात थी, ओर न तुम्हारे। तुम इसका अधिक शोक-सन्ताप न करो।"--पुन मसब ओर पदवी प्रदान की। इस पर इस वृद्ध सरदार ने तुरन्त यह और पढ़ा था- "मरा लुत्फे जहाँगीरी जे ताई दाते ख्वानी। दोवार जिन्दगी दाद दोवार सानखानानी।" इसका भाव यह है कि ईश्वरीय सहायता मे, जहाँगीर की कृपा ने, मुझे दूसरी बार जीवन और सानखाना की उपाधि दी । इनको खानयाना की उपाधि देकर और कन्नौज का अधिपति बना- कर भेजा गया था, पर महावतमाँ के विद्रोह करने पर इन्हें मार्ग से ही घापस आना पड़ा । जब यह गहोर से सेना लेकर महायतखा पर । चरे तर मार्ग में बीमार पड गये, अर्थात् जब दोबारा इनका भाग्योदय हुआ तर इनकी उन ने साथ न दिया और दिल्ली पहुंचकर अधिक बीमार होने के कारण वहीं ठहर गये और सन् १०३६ हिजरी के पिचर महीनो में सर्वदा को शान्त हो गये। इस समय इनरी आयु ७० वप के लगभग थी। यह कितने दुख की बात है कि मानसाना को मृत्यु तिथि का निश्चित पता अब तक नहीं लगा है। स्वर्गीय मुशी देवीप्रसादजी खानपाना नाम (दूसरा भाग) पृष्ठ ९७ पर लिपते हैं "हर एक सन् हिजरी के बिचले महीने जमादिउल्सानी या रजब माने जा सकते हैं। इस हिसार में पानसाना का देहान्त फागुन सक्न १६८३ या चैत मवत् १६८४ में हुआ होगा । अफमोस है कि तुजुक जहाँगीरी में ग्वानरवाना के मरने की मिती नहीं रिखी ह।" इनके चार पुत्रों म दो पुतो की मृत्यु का वृत्तान्त दिया जा चुका है। तीसरा पुत दरार साँ, परवेज और महावतयाँ के हाथ पकड़ा जाकर मारा गया आर उसका सिर कपड़े म लपेटकर जहाँगीर की इटानुसार पानवाना के पास बन्दीगृह में तरबूज के नाम पर भेंट-स्मरूप भेजा गया, जिसे देखकर वृद्ध ने केवल इतना कहा कि 'तरराज शहीदी' है। दरारयाँ और शाहनवाज सा के पुख पहरे ही मारे जा चुके थे। घाया शासी- पुस था, जो यौवनावस्या ही में मृत्यु को प्राप्त हो गया था । । ऊपर जो कुछ वर्णन किया गया है उसपे प्रकट है कि यह यरे धीर और बुद्धिमान थे-अपने युदि-पाठ मे महामती तक के पद को पहुँच गये थे । वीर होने के साथ ही साथ यह माहिय के कुछ कम प्रेमी न ये। इनकी माहित्यिक निद्वत्ता वीरता के साथ 'मोने म सुगध' की कहान धरितार्थ कर रही है। कवि होने के माय ही साय यह कवियों के आश्रयदाता भी थे। अधुलफजल ने यादशाही दरयार के जितने कर लिए हैं, उनमें में अधि ( १२ ) काश आपके आश्रित रह चुके थे। उरफी, नजीरी और शकी आदि कचियो ने अकबर, जहाँगीर और शाहजादे मुराद की प्रशसा मम कविता की है, परन्तु उससे कही बदर सानसाना की प्रशसा में इन्हें कवियों ने कविता की है, जिससे इनकी उच्च उदाराशयता और काव्य मर्मज्ञता प्रकट होती है। साहित्य-मर्मज्ञ ओर प्रतिभाशाली कवि होने के सिवा ये बड़े दान और परोपकारी भी थे। मुल्ला शकेवी को आपने मीरजानी पर विजय पाने के समय एक मुसहस के लिये दो हजार अशर्फियाँ पुरस्कार स्वरूप दी थीं और 'गग' कवि को एक ही छन्द पर ३६ लाख रुपये दे डाले थे। अपने दोही में भी इन्होने दान की सूप ही प्रशसा की है। यह भी किवदन्ति है कि गोस्वामी तुलसीदास से भी इनका परिचय था। एक बार एक ब्राह्मण को, जो अन्या के विवाह हेतु धन का इच्छुक था, गोस्वामीजी ने इनके पास निम्न आधे दोहे को लिखकर भेजा- "सुर तिय नर तिय नाग तिय, सब चाहत अस होय" रहीम ने ग्राह्मण को धन देकर दोहे की पूर्ति इस प्रकार करके उसे तुलसीदास के पास भेज दिया । "गोद लिये दुलसी फि, तुलसी सो सुत होय" अकबर की नीति अकनर से पूर्व साढ़े तीन सौ से अधिक वर्ष की तुर्क आर पानी की यादशाहत में निरन्तर हिन्दुओ के साथ छेड़ छाड़ और लडाई अगई चल्ते रहे। धर्म-द्वेप के कारण वे हिन्दी को तुम समझते रहे। इसी कारण हिन्दू और मुसलमानो में परस्पर की प्रोति कभी स्थापित न हुई । इन्हीं आन्तरिक उपद्वा मे राम उठाकर एक मुसलमान राजन के बाद दूसरा राजवश इस देश का स्वामी बनता रहा। यद्यपि मुगल भार पठान आदि एक ही धर्म के माननेवाले थे, तो भी राज्य व्यवहार में धर्म के नाते का , कभी विचार नहीं किया गया। अपना राज्य भारत के अधिकाश भाग से उठ जाने के कारण पठान आदि मुगलो के शलु हो रहे थे। इस भय को मिटाने के लिए अकबर-जये नीति निपुण बादशाह ने शाह तहमास की हुमायूँ को दी हुई शिक्षा को कार्य रूप में परिणत करने का निश्चय किया । मुसलमानी कट्टरपन को छोड़कर उसने हिन्दुओ को अपनाया। अकार की इस नीति से भावो के पारस्परिक आदान प्रदान को अच्छी उत्तेजना मिली। अकबरी दरवार अकयर पहला ही मुसलमान बादशाह था जिसने हिन्दी कवियो को आश्रय दिया। कहा जाता है कि अकयर स्वय 'अकयर शाह' के नाम म कविता करता था। अकरर के कई मुमाहर और सरदार भी हिन्दी के कवि थे। महाराजा बीरबल अकरी दरबार के मुसाहय और सरदार थे इन्होंने 'ब्रह्म' के नाम मे कविता की है। यह राज-याज में ही चतुर नहीं थे, बल्यि कविता करने में भी निपुण थे । अकबर ने पीरबल को 'कविराय' की उपाधि दी थी। इनके अतिरिक्त राजा टोडरमल, तानसेन, महाराजा मानसिह, फैजी, अबुल फजल, नरहर, अजयेस कविवर गग और रहीम उसके दरबार में उपस्थित थे । अक्सर के मतियों में भन्दुष्टरहीम माँ बानपाना सब से अधिक प्रतिभाशाली हिन्दी के कवि थे। यह अकबर के पालक चरम माँ ग्वानरपाना के पुस थे। यह अग्यी, फारसी, संस्कृत और हिन्दी के भस्माता थे। यह स्वप कवि थे और कवियों के उदार आश्रयदाता थे। इनको नीति एवं स्फुट विपय-मम्बन्धी यथार्य तया घटकीरे भावो मे पूर्ण दोहे हिन्दी-संसार में प्रसिद्ध है भार विहारीलाल आदि दो चार लोगो को छोड़ और किसी के दोहे इनशी समता नहीं करते । सानमाना की कविता यह भरपी, पारपी, संस्कृत और हिन्दी के भले जाता ये। फारमी, - - ( १४ ) सस्कृत ओर हिन्दी इन तीनो भाषाओ में इन्होने सफलतापूर्वक कविता की है। इनके निम्नलिखित गथ प्रसिद्ध है वाकअत वावरी का फारसी अनुवाद । मूल प्रथ तुर्की भाषा में है । तुर्की भाषा से यावर के इस आत्मचरित का फारसी मे आपने बहुत ही उत्तम आर शुद्ध अनुवाद किया है। पश्चिमी विद्वानों ने आपके इस अनुवाद की बडी प्रशसा की है। दीवान फारसी। इसमें आपकी फारसी कविता का सगह है । सेटकौतुकजातकम् । यह ज्योनिप-सम्बन्धी गूथ है ओर छपा हुआ मिलता भी है । इसमें मगलाचरण के पश्चात् यह ग्लोक है - करोभ्यब्दुल रहीमोऽह, खुदाताला प्रसादत । पारसी पदैर्युक्तम्, सेट कोतुक जातकम् ॥ इसमें सस्कृत शब्दो के साथ पारसी शब्दो की पुट अपने ग की निराली छटा रखती है रहीम-सतसई । १० नकछेदी निवारी ने लिखा है कि इन्होंने 'रहीम सतसई' नामक एक प्रथ लिखा था । यह प्रथ अप्राप्य है। अब तक जो दोहे मिले हैं वे इसी सतसई के बिसरे हुए मोनी माने जाते हैं। ये मुक्तक माहित्य-सागर से टटोल-टटोल कर इकट्ठे किये जा रहे हैं। ऐसी दशा में यह दाने के साथ नहीं कहा जा सकता कि दूसरे कवियो के दोहे इसके है। यद्यपि सानसाना ने अपने दोहो में 'रहीम' या 'रहिमन' की छाप रक्पी है, परन्तु मेरा अनुमान है कि कुछ दोहे ऐसे भी हैं जिनमें भूल से या जान-बूझकर रहीम की छाप तो रख दी गई है, परन्तु चे दुसरे कविया के हैं। जर तक दो-चार पुराो हस्तलिखित संग्रह प्राप्त न हो तब तक दावे के साथ यह कहना कि यह दोहा हीम का है और यह दूसरे का है, एक कठिन समस्या है। मैंने भी दोहावली के नाम से रहीम के २६९ दोहों का संग्रह दिया है। इससे अधिक इस समय प्राप्त नहीं हैं। बरवै नायिका भेद । प्रम का विषय नाम से ही स्पष्ट है । इस साथ नहीं मिले । । मागय को पहले पहल डुमरांव निवासी ५० नकछेदी निवारी प्रकाशित कराया था। इसमें कवि ने रक्षण न देकर उदाहरण मात्र दिये हैं। यह बड़े आनन्द का विषय है कि हस्तलिखित प्रथ मिल जाने से इस बार इस - गूथ की इन्द-सरया ११४ तक पहुंच गई है और पाठ भी शुद्ध हो - गया है। मदनाष्टकं । इमका सम्पादन भी एक हस्तलिखित पुस्तक के आधार पर किया गया है। रास पचाध्यायी। यह प्रथ अप्राप्य है। भक्तमाल की टीका में जो दो पद पाये जाते हैं वे 'रास-पचाध्यायी' के कहे जाते हैं। ये फुटकर- सगह में दिये गये हैं शृगार-सारठ । सालाना के इस गूथ का उल्लेख शिवसिंह सेंगर ने अपने सरोज म क्यिा है परन्तु अब तक यह गन्य प्राप्त नहीं हुआ है । इनके सोरठो में से कुछ सोरठे अलग करके इस ग्रन्थ का म्वरूप खड़ा किया गया है। इसमें सन्देह नहीं कि यह सोरठे इतने चमत्कार पूर्ण हैं कि सानग्याना के दूसर सोरठों के साथ नहीं मिराये जा सकते । ये सोरठे इस बात को प्रमाणित करते हैं कि मारिक सोरठों की रचना रहीम ने अलग ही की होगी। फुटकर-काव्य । रहीम की कुछ हिन्दी की फुटकर कविता भी पाई गई है जो 'फुटकर पान्य' शीर्षक के नीचे एकर कर दी गई है। रहीम काय । इस गन्य में रहीम के संस्कृत शेकों का संग्रह है। 'बेटकातुकजातकम्' से यह तो निर्विवाद सिद्ध है कि रानपाना ने संस्कृत में भी कविता की है। मेरे अनुमान से 'रहीम-पाप्य' नाम का गन्य नो रहीम ने कोई लिखा नहीं परन्तु मनोविनोद के रिये संस्कृत और संस्कृत हिन्दी मिश्रित श्लोको की रचना अवश्य की होगी। इन्हीं लोको का मगर इस नाम का काय अन्य समझना चाहिए।
। काव्य-भापा रहीम-कृत हिन्दी गन्थो में सतसई आर वरव नायिका भेद-यही हो मुख्य है। दोहों की भाषा के सम्बन्ध में या ब्रजरनदास ने रिसाहे-- "दोहों की भापा मुरयत ब्रजभापा ह।" मिश्नयधुओ ने लिखा है- "इन्होने शुद्ध प्रजभाषा में कविता का है और फारसी एक सस्कृत के पूर्ण विद्वान होने पर भी गाग्य भाषा तक का उत्तम प्रयोग करने में ये कृतकार्य हुए है।" ५० रामचन्द्र शुक्ल ने लिखा है-"रहीम ने अवधी भाषा की ओर विशेष रुचि दिखाई। 'बरवेनायिका भेद' इन्होने अवधी भाषा में रिखा ही, अपने नीति के चुटीले दोहो में भी अवधी के भोलेपन का पूरा सहारा लिया ।" यह सर स्वीकार करते हैं कि 'यरवे नायिका भेद' की भाषा अवधी है, परन्तु मेरी राय में दोही की भापा भी न तो शुद्ध ब्रजभाषा हे ओर न मुरयत प्रजभापा । रहीम की रचि पूर्वी हिन्दी की ओर विशेप पायी जाती है। यहाँ पर यह कह देना आवश्यक प्रतीत होता है कि रहीम के दोहो की भापा के सम्बन्ध में तब तक निश्चया मक कुछ नहीं कहा जा सकता है जब तक उनकी सतसई की कोई प्रामाणिक हस्तलिखित पुस्तक प्राप्त न हो, क्योकि अभी तो जन श्रुति ही इसका आधार है। अत भापा का निर्णय करना असम्भव नहीं तो दु साध्य तो अवश्य है। फिर भी सर्वनाम, कारक, विशेषण ओर शन्दो आदि को देखकर कहा जा सकता है कि इनकी विशेष रचि अवधी ही की ओर थी। देखिये- खड़ी बोरी के 'कौन', 'जो' और 'वह' यह तीन मर्वनाम ऐसे हैं जिनका प्रयोग अवधी भाषा में दो प्रकार का पाया जाता है। के, जे, से या ते और को, जो, सो। -
पूर्वी अवधी में के, जे, मे या ते और पश्चिमी अवधी में को, जो, मो
1
रहीम के यहाँ दोनो प्रकार के प्रयोग पाये जाते हैं, पर विशेष झुराव
'पश्चिमी अवधी की ओर पाया जाता है। यह भाषा ग्रनमापा से अधिक
लगाव रसती है। यथा
"को कासो अवरज कहै।
“जोजानत सो कहत नहि।
"जो रक्षक जननी-जठर ।
"प्रभु के सो आपनि कहैं।
रहीम
रघुनाथा
"तुम बिन को भगवान ।
"जानि अनीती जे करे ।
"जे सुलगे ते वुझि गये। -इत्यादि
को, जो ओर सो का रूप कारक-चि ह ग्रहण करने पर प्रजभापा के
समान का, जा और ता होना है। जैसे
"काक काके नवत हम।
"तासों कहा
यसाय ।
"जार
सिर पर ।
"जासों लागे नेन ।
"जापर विपदा परत है।
"तासोदुख सुख कहनकी। इत्यादि
परन्तु के, जे, मे या से कर रूप सामान्य विभक्ति 'हि' के साथ कारक
चिर लगाने पर भी नहीं यदलता।
रहिमन' जेहि के पाप कर ।
"तेहि गइल अकास लौ ॥
-
-
"घट-बढ़े तिहिकर कहा।
"भावी केहि का ना दही।
"केहिक प्रभुता ना घटी । आदि
यही नहीं, रहीम ने व्यक्तिवाचक सर्वनाम भी अवधी भाषा के ही
प्रयोग किये हैं।
हिन्दी के सम्बन्धकारक-चिन्ह में लिङ्ग भेद होता है। ब्रजभाषा में पुलिस
सम्बन्धकारक-चिन्ह 'का' है और स्त्रीलिन सम्बन्धमारक-चिन्ह 'की'।
तुलमी और जायसी दोनो में पुलिम सम्बन्धकारक चिन्ह 'कर' पाया जाता
है और स्त्रीलिङ्ग सम्बन्धकारक-चिन्ह 'के'। उदाहरण
१- राम ते अधिक राम कर दासा ।
जेहि पे कृपा राम के होई। -तुलसी
२-सुनि तेहि सन राजा कर नाऊ ।
पलुही नागवती के वारी। -जायसी
रहीम में भी सम्बन्धकारक के चिन्हों में ऐसा ही लिग भेद है । रहीम
ने पुलिङ्ग में 'के' का प्रयोग किया है और स्त्रीलिङ्ग में 'के' 'कई' या
'करि' का । उदाहरण
"यह वरवै के वान ।
"आज नयन के कोरवा ।
"लै हीग्न के हरवा ।
"वह माया कर दोष यह ।
"जम के किंकर कानि ।
"वाढ़े दिन के मीत सव।
"रहिमन जेहि के याप कर ।
"तन के पीर ।
-
"रेन जगे कइ निदिया। "चेरिया फेरि छोहरिया "पायल फेरि फेंकरिया । "प्रभुक सा आपनि कहै। "पुरष पुरातन के यधू । १० रामचन्द्र शुक्ल ने लिया है कि योलचाल की भवधी में यह लिन- भेद नहीं है। पूर्वी अवधी में मम्भव है न हो, परन्तु पश्चिमी अवधी में भाजकल भी यह लिङ्ग-भेद पाया जाता है। पोल्चार की पश्चिमी अवधी में पुलि सम्बन्धकारक चिन्ह 'के' 'कर' या 'क्यार है और स्त्रीलिज सम्बन्धमारक चिन्ह 'के', 'कई' या 'फेरि'। जमे---"श्रीकृष्ण के वप्पा आज आये हैं", "यह केहि केर या केहि क्यार बेतु भाय", "श्रीकृष्ण के महतारी कही है" तथा "यह वाग केहि फेरि आय" । इत्यादि योलचाल में उच्चारण संक्षिप्त करने की प्रवृत्ति के कारण अक्षर घिस 'जाया करते हैं । इस प्रवृत्ति के अनुसार 'कर' के स्थान म 'के' और 'कर' के स्थान में 'क' का प्रयोग पाया जाता है । तुलसी, जायसी और रहीम तीनों में ये मक्षित रूप मिलते हैं। यथा- क-धनपति उहै जेहि क ससारू । —जायसी --पितु आयसु सब धरम क टीका । -तुलसी ग-जाति क ऊँच। -रहीम घ--रहति नयन के कोरवा। -रहीम अवधी भाषा की प्रवृत्ति रव्वत शब्दो की ओर अधिक है। रहीम ने अपन दोही में विशेषण अधिकतर लव्वत ही रक्खे हैं। "वह माया कर दोप यह । "धडे छोट जात।
( २० )
"मिले होत रॅग दून ।
"कितो करी बड़ काम ।
"चिंतत ही चड़ लाभ के ।
आदि
यही नहीं, पूरवी शब्दों का प्रयोग भी रहीम ने अपने दोहों
अधिकता से किया है। यथा-
रहिमन रहिला के भली । रहिला=चना
सहि के सोच बेसाहियो । सहि के जान-बूझकर
धीच उखारी रमसरा । रमसरा ईख की शक्ल का एक पे
जाड गये
से काज । जाड-जाडा, सर्दी
अररानी उहि ठाम । अररानी अरराकर बैठ जाना
मत
तोगे
चटकाय | चटकायचटकई, जल्दी
रहिमन भरिन के भये । भरिन भॉवर
गरुये राखि चटोर । गरुयेरू, भारी
जूती खात कपाल । कपाल-कपार, माथा
इत्यादि
काव्य-प्रियता
रहीम के काव्य का लोगों में इतना आदर क्यों है १ कारण स्पष्ट है।
कवि ने जो कविता लिखी है, सरस और प्रसादगुण-पूर्ण होने के साथ
ही साथ हिन्दुओ के प्रति उदारता की एक अपूर्व झांकी उसके अन्तर्गत पाई
जाती है। यद्यपि कयीर व नानक आदि सन्तों ने निगुणोपासना को ही
अभीष्ट मान हिन्दू और मुसलमानों को मिलाने का प्रयत्न किया है आर
इस मिलाप के लिए दोनों मतावरम्बियों की कड़ी से कड़ी आलोचना
करने में वह नहीं हिचके हैं, परन्तु रहीम का मार्ग ही दूसरा है। इन्होंने
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( २१ )
महात्मा तुलसीदास का अनुसरण किया है। इनके नीचे के दोहे पढ़ने से
स्पष्ट प्रकट हो जायगा कि यह भक्ति-मार्ग के द अनुयायी ये
राम नाम जान्यो नहीं, जान्यो सदा उपादि।
कह रहीम' तिहिं आपुनो, जनम गॅवायो वादि॥
गहु सरनागत राम के, भवसागर कै नाव।
'रहिमन' जगत उधार फर, और न कळू उपाव ।।
'रहिमन' धोखे भाव से, मुख से निकसत राम ।
पारत पूरन परम गति, कामादिक का
'रहिमन' मनहिं लगाइ के, देखि लेहु किन कोइ ।
नर कॉ यस करिवो कहा, नारायन होई॥
इत्यादि
इनका काव्य कोई खला-बद्ध काव्य नहीं है। इन्होंने अनेक विषयो
पर फुटकर दोहे को है और उनमें मनुष्य के नित्यप्रति की व्यावहारिक
वस्तुओ को शिक्षा की सामग्री बनाकर ऐसा सजा दिया है कि यात-वात
वस
-
में मनोवापन प्रकट हुआ
- रहिमन-विनोद दोहावली धर्मगुच्छ मय का प्रभाव सभी पर पड़ता है, चाहे वह किमी विचार व परिस्थिति का व्यक्ति क्यो न हो। स यद्यपि रहीम मुसलमान थे, पर जिम समय में वे हुए और उन्होने कविता की उस समय एकदम राम व कृष्ण की भक्ति का श्रोत धारावाहिक रूप से बह रहा था। फिर भला उनके ऊपर उसका प्रभाव न पड़ता, यह कैसे सभर था । यही कारण है इनकी कविता में उच्च कोटि का वेदान्त ज्ञान नया रामकृष्ण की भक्ति का अनुपम वर्णन पाया जाता है। कवि के इस वर्णन को पढ़कर सहसा, स्वर्गीय भारतेन्दुजी का, यही पद्य मुख में निकल पडता है-"इन्ह मुमम्मान हरि जनन पे, कोटिन हिन्दू वारिय" देखिये, सृष्टि और सृष्टा के सम्बन्ध को पवि ने कैसे चमकार पूर्ण शन्दी में वर्णन किया है विन्दु में सिंधु समान , को कासों अवग्ज़ कहै । हेरनहार हेरान , रहिमन' आपुहि' आप में ॥१॥ पाठ 1-अपुने भापते [ रहि.] कबीर ने इसी भाव को इस प्रकार प्रकट किया है हेरत हेरत हेरिया, 'कविरा' रयो हेराय । बुन्द समानी समुदम, मो कित हेरी गाय ॥ - २ [रहिमन विन . . याज देइ ॥ - ईश्वर अगम्य है रहिमन' यात अगम्य के, कहन सुनन के नाहिं। जो जानन सो कहत नहि, कहत सोजानतनाहिं ॥२। ईश्वर पर भरोसा रक्सो अमरयेलि चिनु मूल कै, प्रतिपालत जो ताहि । 'रहिमन' ऐसे प्रभुहि तजि , खोजताफिरिये काहि ॥३। रन यन न्याधि विपत्ति में, 'रहिमन' मरउ न रोइ। जो रक्षक जननी-जठर , सो हरि गये न सोइ ॥४। काम न काह |आव ही, मोल रहीम न लेइ । वाजू, टूटे के, साहेव चाग ईश्वर दीनबधु है 'रहिमन' बहु भेषज फरत , व्याधि न छोड़ति साथ । खग मृग बसत अरोगवन , हरि अनाथ के नाथ ॥६॥ सपतिवान काँ, सब कोऊ सव' देह । दीनवधु विनु दीन कै, को 'रहीम सुधि लेइ॥७॥ समय दशा कुल देखि के, लोग करत सनमान । 'रहिमन' दीन अनाथ के , तुम बिन को भगवान ॥ ८॥ दीन' ल्खै सब जगत काँ, दीनहि लखैन कोइ । जो रहीम' दीनहि लसै , दीनयधु सम सोइ ॥९॥ पाठा० ३-१ है [ रहि०, २०] -:'कि [ रहि०, रादो०] ७-१ सतत सपति जान के, सर को मन का देत [रहि०, २०) २ यरु [२९ दो ९-१धीन सयन को छखत है [र, गहि०] होय [रहि०, र.. सतत - , .
धर्मगुन्छ] . राम-महिमा राम नाम जायो नहीं , जान्यो सदा उपादि। कह रहीम' तिहि आपुनों, जनम गॅवायो बादि ॥ २० ॥ रहिमन" राम न उर धरै, रहत विषय लपिटाइ । पसु सरि खात सवा सो , गुरु गुलियाये साइ ॥ ११ ॥ गहु मरनागत राम' के, भयमागर के नाव । रहिमन' जगत उधार फर , और न फछ उपार ॥ १२ ॥ 'रहिमन' धोसे भार से , मुख ते निकसत राम। पावत पूरन परम गति , कामादिक के धाम ॥ १३ ॥ राम नाम जानेउ नहीं, भइ पूजा में हानि । कह रहीम' क्यों मानि है , जम के किंकर कानि ॥ १४ ॥ मागे मुकुरिन का गयो , केहि न त्यागियोसाथ । मगत आगे सुस ल्यो , ने 'रहीम' रधुनाथ ॥१५॥ दुख नर सुनि हॉसी करें , नाहि धरावत धीर । कही सुने सुनि दुख हरे , 'रहिमन' वे रघुगीर ॥१६॥ मनि मानिक महेंगे किये , ससते तृन जल नाज। 'रहिमन' याते कहत हैं , राम गरीय नेवाज ॥ १७॥ .१० ११-१ राम नाम नहि लेत है, रहो विषय सपिटाय। घास चरै पमु आप ते, गुड़ गुपिया खाय ॥ [र० दो०] १३-इसीके समानार्थक महारमा सुएसीदासजी का यह दोहा है 'तुलसी' जिनके मुसन मे, धोबेहु निकसत राम । तिनके पग की पगतरी, मरे. सन को चाम । 9-इसी भाव को 'तुलसीदास' ने निम्न प्रकार व्यक्त किया है मनि मानिक महंग किये, सहग ट्रेन जल नाज । 'तुलसी' ये तो जानिये, राम गरीव-नवाज ॥ .
N [रहिमन . 'रहिमन' हम तुम सोंकरी, करी करी जो तीर। बाढे दिन के मीत सव', गाढे दिन रघुवीर ॥ १८ श्रीकृष्णचन्द्रजी के प्रति ते' 'रहीम' मन आपुनो , कीन्हों चारु चकार । निसि बासर लाग्यो रहै , कृष्णचन्द्र की ओर ॥ १९ ॥ 'रहिमन' काऊ का कर, ज्वारी चोर लबार। जो पत-राखनहार माखन-चाखनहार ॥२०॥ लक्ष्मी की अस्थिरता कमला धिर न रहीम' कह , यह जानत सब कोइ । पुरुष पुरातन कै वधू, क्यों न चचला होइ ॥२१॥ कमला थिर न रहीम' कह , लखत अधम जे काइ । प्रभु कैसो आपनि कहैं , क्यों न फजीहति होइ॥ २२ ॥ है सा पाठा० १८-१ जैसी तुम हम सों करी [ रहि०, २०] । 'र० दो०' में जैसी' के स्थान पर ऐसी है। 16-२ हो [ रहि०, २०] पाम १९-१ जिहि [२०] २.---इस भाव को 'रसखान' ने इस प्रकार कहा है कहा करै 'रसखान' को, कोऊ चुगल लवार । जो पै राखनहार है, माखन चासनहार ।। - - जर्मगुन्छ] , . चन्द्र-कलङ्क 'रहिमन' जेहि क बाप कर , पानी पियत न काह । तेहि के गइल अकास लों', क्यों न कालिमा होइ ॥ २३ ॥ भक्ति तनु रहीम' है कर्म-बस , मनु राखौ उहि ओर।। जल में उलटी नाव ज्यों , खेचत गुन के जोर ॥२४॥ धन दारा औ सुतन में', रहत लगाये चित्त । 'क्यों रहीम' खोजत नहीं, गाढे दिन कर मित्त ॥ २५ ॥ आप. अहै तो हरि नहीं , हरि तो आपन नाहि । 'रहिमन' गलि है साँकरी , दोनो नहिं ठहराहि ॥ २६ ॥ भजउँ तो काका मैं भजउँ, तजउँतो का है आन । भजन तजन ते विलग है , तेहि रहीम' त जान ॥ २७ ॥ ठा० २३-१ म [२०] (२३) इसी भाव पर 'जादव' ने निम्न प्रकार कहा 'जादव जाके नीर को, कयौं न अचवत कोय। ताको पूत कपूत यह, कस न कलकी होय ।। In० २४-1 ओहि [ रहि० ], २ योर [२० दो०] ठा० २५-१ मो, रग्यो रह नित चित्त । २ नहि 'रहीम' कोऊ लख्यो। रहि.] २७--'कबीर' ने इसी भाव पर इस प्रकार कहा भजू तो को है भजन को, तजू तो को है आन । भजन तजन के मध्य मे, सो 'कबीर' मन मान | ओर 'तुलसीदास ने निम्न प्रकार कहा है घर कीन्हें घर जात है, घर छोड़े घर जाय । 'सुलमी' घर-यन बीच हो, राम-प्रेम पुर आय ।। - . - [रहिमन-बिना १ . 'रहिमन' मनहिं लगाइकै , देसि लेहु किन कोइ । नर काँ बस करिवो कहा , नारायन यस होइ ॥२८॥ अजन देह तो किरकिरी, सुरमा दियो न जाइ । जिन ऑसिनसों हरिलख्यो , रहिमन'बलिवलिजाइमा २९॥ म्वासह तुरिय जो उच्चरे , तिय है निहचलचित्ता र "पूत परा घर जानिये, 'रहिमन' तीन पवित्त ॥ ३०॥ भक्ति का भगवान के प्रति उपालम्भ 'रहिमन' कीन्ही प्रीति , साहब का भाव नहीं। जिनके अगनित मीत , हमे गरीवन को गनै ॥ ३१ ॥ परि रहिवो मरिवो भलो, सहियो कठिन कलेश। बावन हुइ बलि काँ छल्यो , भल दीन्हेउ उपदेश ॥ ३२ । खेचि चदनि ढीली दरनि . कहह कौन यह प्रीति । आज काल्हि मोहन गही , सादिया के रीति ॥ ३३॥ जो 'रहीम' करिवो हुतो , व्रज कर यह हवाल तो नाहक कर पर धन्यो, गोवर्धन गोपाल ॥३४॥ हरि रहीम' ऐसी करी, ज्यों कमान सर पुर। खेचि आपुनी ओर को, डारि दियो पुनि दूर ॥ ३५] ज्ञान ज्यों रहीम' इक' दीप ते, प्रगट सवैनिधि होय । तनु-सनेह कैसे दुरै, दृग-दीपक जहें दोय ॥ ३६ पाठा०२८- मनहि लगाइ रहीम' प्रभु । पाठा० ३४-१ यही [२०], २ तोफत मानहि दुस दियो, गिरवरध गोपाल [२०] । 'नाहक' की जगह 'काहे' [रहि. पा० ३६-१ कहि, ३ दुति, ५ जर [रहि.] २ गति [२० दो.] १ - र्मिगुन्छ ] इयों 'रहीम' तनु-हाट म, मनुआ गया विकाय । इज्यों' जल में काया परे, छाया भीतर नाय ।। ३७ ॥ जो 'रहीम' तनु हाथ है , मनसा कहुँ किन जाहिँ। जल में ज्यों छाया परे, काया भीजति नाहि ॥ ३८ ॥ कहु रहीम' केतिक रही , केतिक गई विहाय । ममता मोह में , अत चले पछिताय ॥ ३९ ॥ रहिमन' भेषज के किये , फाल जीत जो जात । बडे बडे समरथ भये , तीन कोउ मरि जात ॥ ४० ॥ माया माया रहिमन' उतरे पार , भार झोंकि के भार में। जिनके सिर पर भार , वे चूडे मॅझधार में ॥ ३१॥ चरन छुए मस्तक छुए , तऊ' न छॉडतिपानि हिये छुनत प्रभुछाडि , कहु रहीम' काजानि ॥ ४२ ॥ देह की असारता 'रहिमन' गठरी धूरि के, रही पवन ते पूरि । गाँठि युक्ति के खुलि गई, अन्त धूरि कै धूरि ॥४३॥ पाग० ३७-१ ज्यों जल में छाया परे, काया भीतर नॉय । [ रहि.] पाय० ३८-१ मनुवा गये ते काहि [ र० दो०] पारा० ४१-१ [रहि.] 'अहमद' के यहाँ यह दोहा इस रूप में पाया जाता है। 'अहमद' उतरे पार, भार झोकि सब भार में। जाके सिर पर भार, वे चूड़े मझधार ॥ पाटा० ४२-- तेहु नहि । २ छोडिदै [रहि.]
[रहिमन विनोद । खस कागद कागद को सो पूतरा, सहजहि में धुलि जाय । रहिमन' यह अचरज लसो, सोऊ संचत वाय॥४४॥ ते 'रहीम' अब कौन है , एती खेचत वाय। को पूतरो, नमी माहिं खुलि जाय ॥ ४५ ॥ ससार कर्मक्षेत्र है सोदा करो सो करि चलहु , 'रहिमन' याही हाट'। फिर सोदा पैही नहीं, दूरि जान है वाट ॥ ४६॥ ससार आवागमन का क्षेत्र है सदा नगाग कूचकर , वाजत आठो जाम । 'रहिमन' या जग आइ के , को करि रहा मुकाम ॥ ४७ ॥ (४४) इस भाव पर 'उस्मान' कवि ने निम्न प्रकार कहा कोन भरोसा देह का, आहहु जतन उपाइ । कागद की जम पूतरी, पानि परे घुलि जाइ । पाठा० ४६-१ बाट [रहि.] - .
शृङ्गार-गुच्छ *टक यह न समझ कि रहीम कवि उन्च कोटि की फिलोसफी ही डाँटते रहे है । उन्होंने 2 गार विषयक यद्यपि यहुत थोडे दोहे कहे हैं, परन्तु जो कहे है वे पाठकों की तयियत में एक खास तरह की चुलबुलाहट T कर देते हैं। देखिए कुच्च-वर्णन मनसिज माली के उपज, रहिमन' कहीन जाय । फल स्यामा के उर लगे, फूल स्याम उर माँय ॥४८॥ जो अनुचित कारी तिन्हें , लग अक परिनाम । रसे उरज उर वेधियत , क्यों न होय मुसस्याम ॥ ४९ ॥ नेत्र-वर्णन "रहिमन' मन महराज क , ग सा नहीं दिवान । देखि जाहि गझै नयन , मन तेहि हाथ विकान ॥ ५० ॥ 'रहिमन' चोट सु तीर के , चोट साइ यचि जाइ । नैन-यान के 'चोट ते, धनवन्तरि न बचाइ ॥ ५१ ॥ यो 'रहीम' जग मारियो , नेन-चान के चोट । भगत भगत कोइ चि गये , चरन-कमल के ओट ॥ ५२॥ P० ५०- मन से कहाँ रहीम' प्रभु, हग सों कहाँ दिवान । देखि हगन जो आदरै, मन तेहि हाथ यिकान ॥ [रहि०, २० दो.] , .
[रहिमन विनो M-AN . , . मैन सलोने अधर मधु , कहु रहीम' घटि कौन । मीठा भाव लोन पर , अरु मीठे पर लौन ॥ ५३ ॥ याँकी चितवनि चितगठी , सूधी तो कछु धीम। गगरमी ते बढि होत दुख , काढि न कढत रहीम' ॥ ५४॥ कमल पसरि पत्र अपहि पितहिं , सचिदेत ससि सीत। कह 'रहीम' कुलकमल के , को घेरी को मीत ॥ ५५ ॥ रहिमन' सो न कछ गने, जासो लागे नैन । सहि के सोच बेसाहिया , गया हाथ कर चेन ॥ ५६॥ विरह रूप घन तम भयो , अवधि आस उद्योत । ज्यों रहीम' भादो निसा , चमकि जात खद्योत ॥ ५७ ।। प्रीतम छवि नैनन बसी, पर छवि कहाँ समाइ । भरी सराय रहीम' लखि , आप पथिकफिरिजाइ ।। ५८॥ कहा करो कुठ ले, कल्पवृक्ष के छॉह । ' 'रहिमन' ढाक सराहिये , जो प्रीतम-गल-बॉह ॥ ९ ॥ जे सुलगे ते धुझि गये , धुझे ते संलगे नाहि । 'रहिमन' दाहे प्रेम के , 'चुझिबुझि के सुलगाहिँ ॥६० (५८) 'रसनिधि' ने इस भाव को यो व्यक्त किया है पथिक आपने पथ लगो, इहाँ रहा न पुसाइ। 'रसनिधि नेन सराय में, यस्यो भावतो आइ ।। पाठा० ५९-१ 'रहिमन' दाख सुहावनो, जो गल पीतम-बाह ॥ यह दोहा अहमद के दोही मे भी पाया जाता है। अन्तर केवल 'रहिमन' की जगह 'अहमद' है। पाठा०-६०-१ बूझि-बूझि [२०] [रहि०] शृङ्गार-गुच्छ] १ . - याते जान्या मन भयो , जगि बरि भस्म बनाइ । रहिमन' जाहि लगाइये , से रूसो हुइ जाड ।। ६३ ।। रूप रहीम' विलोकतहिं , मन जहें जहॅ लगिजाइ । थास्यो ताकहिं आप बहु , लत छुडाइ-छुडाइ ॥ ६॥ रहिमन' इक दिन वे रहे , वीच न सोहत हार । वायु जो ऐसी बहि गई , वीचन परे पहार ॥ ६३ ॥ ६२-१ रूप विलोकि 'रहीम' तहँ [ रहि.] रूप रहीम' विलोकि तेहि [२०] २ थाके [रहि, २०], थाके ना कहि [२० दो०] ६३-घनानन्द में इस भाव को यो व्यक्त किया है "तर हार पहार से लागत हे, अय जाय के बीच पहार परे" TER नीति-गुच्छ । हीम ने सबसे अधिक दोहे नीति विषयक कहे हैं। इस विषय पर कवि की पैनी निगाह व बारीशी देखते ही बन आती है। अनुभव भी कितना बढ़ा चढ़ा है, इसका अनुमान इसी एक यात में किया जा सकता है कि कवि की निगाह छोटी से छोटी बात से लेकर बड़ी से बड़ी बात तक पहुंची है आर सर पर ही प्रकाश डारा है। पाठक कवि की अनासी सूझ ओर गन-बात में चोज पेदा करने वाली प्रतिभा-पूर्ण कविता को पढ़कर स्वय ही अनुमान कर सकेंगे कि कवि ने गागर ग मागर भरने का चमत्कार पूर्ण प्रयत्न किया है। परोपकारी जन धन्य है तरुवर फल नहिं खात है, सरवर पियत'न पानि । कहि रहीम पर काज हित , सम्पतिसुचहिं सुजान ॥ ६४ ॥ वे' रहीम' नर धन्य हैं , पर उपकारी बाँटनवारी के लगे, ज्यो मेहेंदी का रंग ॥६५॥ पाठा० ६४-१ पियहि न पान [ रहि०, २०] धरै [ २० दो०] महात्मा तुलसीदास जी का निम्न दोहा इसी का समानार्थक है 'तुलसी' सन्त सुअम्न तरु, फूर फरहि पर हेत । इतते ये पाहन हन, उतते चे फर देत ॥ पाठा० ६५--१ यों रहीम सुख होत है, उपकारी के अंग । [२०] । अग। , ।
नीतिगुच्छ] १३ . 'रहिमन' पर उपकार के , करत न पारै' बीच । माँस दियो सिवि भूप ने , दीनों हाड दधीच ॥ ६६ ॥ बट-बरेह । आफ्न'काज रहीम' कह, गाढे वधु सनेह । 'जीरन होनहिं पंड ज्यों, थाँभै घरहिं बरेह ॥ ६७ ॥ जाति-गौरव यों' रहीम' मुस होत है , बढत देखि निज गोत । ज्योयड़ीसिया निरसि, ऑसिन काँसुस होत ॥ ६८॥ रहिमन' अपने गात कहें , सबै चहत उतसाह । मृग उछग्त आकास कह , भूमि खनत बाराह ॥ ६९ ॥ दान ही जीवन है तवहीं लगि जी। भला , दीवो पर न धीम। चिन' दीवो जीयो जगत ,'हमहिन रुचें रहीम' ॥ ७० ॥ , पाटा० ६६-१ यारी [ रहि.] ६७-१ आवत काम 'रहीम' है, वधु लि गहि मोह । जीरन पेइहि के भये, राखत यरहि यरोह ॥ ६८- सुप रहीम' अति होत है, प्रदत आपने गोत । [२०, दो.] • अखियानि रखि [२० दो०] ७०-१ग में रहियो कुचित गति, उचित न होय रहीम' [रहि०, २०, दो.]
रहिमन विनोद P ममय लाभसम लाभ नहिं , समय चूक सम चूक । चतुरन चित रहिमन' लगै , समय चूक के हक ॥९५ ॥ हस की इच्छा मानसरोवर पर क्यो है। /मानसरोवर ही मिले , हसनि मुकता भोग । सफरिन भरे 'रहीम' सर, वक'-यालकनहिं जोग ॥९६ ॥ राज्य-प्रणाली 'रहिमन' राज सराहिय ,ससि 'समसुखद जो होइ । कहा यापुरो' भानु है , तपे' तरेयनि खोइ ।। २७ ॥ गम्भीरता भूप गनत लघु गुनिन कॉ, गुनी गनत लघु भूप। 'रहिमन' नभाते भूमि लो , लखौ तौ एकहि रूप ॥ ९८ ॥ प्रेम-प्रीति प्रेम पथ ऐसा कठिन , सब काउनिवहत नाहि । 'रहिमन" मैन-तुरग चढ़ि, चलियो पावक माहिं ॥ ९९ ॥ ९५..-इसी भाव का तुलसीदास जी का भी यह दोहा है लाभ समय को पालिबो, हानि समय की चूक । सा विचार चारु मत, सुदिन कुदिन दिन दूक ।। पाठा० ०६-१ बिपुल बलाकनि [२०] ९७–१ जो विधु की विधि होय [ २० दो०] २ निगोड़े तरनि को [२० दो०] ३ तप्यो [रहि०, २०, र० दो०] ९८-१ गिरि [ रहि०, र० नो०] ९९-१ चदि के मैन-तुरग पर [ २०, २० दो०] 'रहि०' में 'रहिमा' की जगह 'लारन' है। - .
नीति-गुन्छ] १ ९ . ना रहिमन' मारग प्रेम कर , मत' मतिहीन मॅझाव । जो डिगिहा तो फिर कहें, नहिं धरिये को पॉर ॥ १० ॥ रहिमन' धागा प्रमकर, मत तारउ चटकाइ । हटे से फिरि ना मिल , मिले गाँठि परि जाइ ॥ १०१॥ मीन काटि जल धोइये , खाये अधिक पियास । रहिमन' प्रीति सराहिये , मुयेउ मीत के आस ॥ १० ॥ रहिमन' प्रीति सराहिये , मिले होत रॅग दून ! ज्यों जरदी हरदी तजै , तजै सपेदी चून ॥ १०३ ।। जलहिं मिलाइ रहीम' ज्यों, कियो आप सम छीर । गवहि आपुहि आपु लसि, सकल आँच क भीर ।। १०४ ॥ रहिमन' प्रीति न कीजिये , जस खीरा ने कीन । ऊपर से नो दिल मिला , भीतर फांक तीन ॥ १०५॥ "रहिमन' खोजो ऊस में , कहाँ नरम कैसानि । जहाँ गाँठि तह रस नहीं , यही प्रीति के हानि ॥ १०६ ॥ पाटा० १००-१ दिन मै मति जाव । [२०, र० दो०] १०१-१ तोड़ो छिटकाय [ रहि.] १०२०-इसी भाव पर एक अन्य कवि न निम्न प्रकार कहा ह प्रेमी प्रीति न छाँइहीं, होत न प्रन ते हीन । मरे परे हु उदर म, जर चाहत हे मीन ॥ [२० स०] १०५-वृन्द ने इस भाव को निम्न प्रकार व्यक्त किया है ऊपर दरमै सुमिल सी, अन्तर अनमिल आँक । क्पटी जन की प्रीति है, सीरा की मी फाँक ॥ १०६- 'रहिमन' जग की रीति, म देवी रस ऊस में । ताह में परतीति, जहाँ गाँठि तह रस नहीं। [ रहि०, २० दो.] १ २० [ रहिमन विनोद -- रहिमन' यह न सराहिये, लेन-देन कै प्रीति । प्रानहिं' वाजी रासिये, हारिहोइ के जीति ॥ १०७ ॥ मरहिमन' यहाँ न जाइये , जहाँ कपट कर हेत । हम तन ढारत' देकुली , सीचत आपन खेत ॥ १०८ ॥ वह प्रीति नहिं रीति वह , नहीं पाछिलो हेत। घटत घटत 'रहिमन' घटै , ज्यो कर लीव्हें रेत ॥ २१९ ॥ कह रहीम' या जगत तें , प्रीति गई दै टेरि। में अब' रहीम नर नीच में , स्वारथस्वारथ हेरि॥ ११० ॥ 'सब कह सव काऊ करै, के सलाम के राम । हित रहीम' तब जानिये , जय कछु अटकै काम ॥ १११ ॥ जहाँ गॉठि तह रस नहीं, यह जानत सब काय । । मड़ये तर के गाँठि में, आठ गॉठि रस होय ॥ ११२ ॥ दादुर भोर किसान मन , लगे रहें घन माहि । पे रहीम' चातक रटनि, सरवर के काउ नाहि ॥ १३॥ पाठा० १०७-१ प्रानन [ रहि०, २०] १०८-१ द्वारत [ २०, २० दो०] २ अपनो [ रहि०, २०] १११-१ रहि [ रहि.] १११-१ सर कोऊ सब सों कर, राम गुहार सराम । हित अनहित तद जानिये, जादिन अटके काम ।। [२०] ११२-१ यह 'रहीम' जग जोइ [ रहि०, २० दो०] • गॉठि-गोठि [ रहि०, २०, २० दो०] .
नीति-गुच्छ] २१ कोकिल पावस देखि रहीम' मन, कायल साधी मोन । दादुर वक्ता भये , हम कहें पूछत कान ॥ ११४॥ - अब इष्ट प्रकृति मन्दन के मारेहु' गये,ओगुनगुन नसिराहिं। ज्यों 'रहीम' वाधहु बधे , मुरहा' हुइ अधिकाहि ॥ ११५ ॥ 'रहिमन' लास भलीकये, अगुनी अगुन न जाइ । राग सुनत पय पियत , साँप सहज धरि खाइ ॥ ११६ ।। कुम्हार का धाक रहिमन' चाक कुम्हार कर, मॉगे दिया न देइ। छेद में डडा टारि के, चहै नदि लइ लेइ ॥ ११७ ॥ . पाठा० ११४-तुलसीदासनी ने इसी भाव पर निम्न प्रकार कहा है 'तुलसी' पारस के समय, धरी कोकिलन मान । अब तो दादुर योलि है, हमाहि पूछि हे कान ॥ ११५-~~१ मरिह [ रहि० ], २ गनि [२०], ३ सराहि [ रहि.] ४ बाँधहु बंधे [ रहि.], ५ मरहा [ रहिक, २०] ११६-~महात्मा तुलसीदासजी की निग्न चौपाई का भाव भी ऐमा ही है भला कर सल पाय सुमग । मिटहि न मलिन स्वभाव अभगू।
[रहिमन विनोद www रहिमन' पेटे सों कहत , क्यों नभये तुम पीठि २२ देसी स्वान नहिं रहीम' कछु रूप गुन , नहिं मृगया अनुराग । देसी म्यान जो राखिये , भ्रमत भूख ही लाग ॥ १८ ॥ मूर्ख 'रहिमन' नीर पखान , भीजै' पे सीझै नहीं। तैसे मूरख शान , वूझै पे सूझ नहीं ॥ ११९ ॥ मूढ-मडली में में सुजन , ठहरत नहीं विसेखि । स्याम कचन से मेत प्यों , दूरि कीजियत देखि ॥ १२० ॥ पेट . . मान विगारह , भरे विगारहु डीठि ॥ १२१ ।। 'रहिमन' मैं' या पेट सों, बहुत कहेउ समुझाइ । जो तू अनखाये रहै , का' काऊ' अनखाइ ॥ १२२ ।। बड़े पेट के भरन में है 'रहीम' दुरावादि। या ने हाथी हहरि के , दये दाँत दुइ काढि ॥ १२३ ॥ पाठा० ११९-१ धृड [ रहि० ] १२१-१ 'रहिमन' कहत सु पेट सों, क्यान भयो तू पीठ । रीते अनरीत करत, भरे बिगारत दीठ ॥ [रहि०,०] १२२-१ भैया [ र०, र० दो० ], २ कय [२०] ३ काहू [ र० दोन १२३-१ को [ २० दो०] नीति गुच्छ] २३ - - 'रहिमन' बहरी वाज, गगन चलै फिरि क्योत पेट अधम के काज , फेरि आइ वचन परै ॥ १२४ ॥ मौर काज परे कछु और है , काज सरे कछु ओर । 'रहिमन' भरिन के भये , नदी सिरावत मौर ॥ १२ ॥ बैंबूर आपुन का काम के , डारपात फल मूर' । ओरन १२ रोकत फिरें , 'रहिमन' कर चबूर ॥ १२६ ॥ चिन्ता अन्तर दान लगी रहै , धुओं न प्रगट सोइ । "कै जिय आपन जानहीं, के जिहि पीती होइ ॥ १२७ ॥ रहिमन' कठिन चिताहुते' , चिन्ता कहें चिनचेत । चिता दहति निर्जीव कहें, चिन्ता जीव समेत ॥ १२८ ॥ पुनर्जन्म रहिमन' मुधि सरतेभली , लगै जो बारम्बार । चिरे मानुष फिरि मिलें, यह जान अवतार ॥ १२९ ॥ पाठा० १२५-१ तिरे [रहि.] १२६-१ फूल [गहि० ], २ को [ रहि०, २०] ३ पेड़ [ रहि.] १२७-१के जिय जान आपुनो [ रहि०, २०] २ जासिर [रति०] १२.-, चिनान [रहि०] .
२४ [रहिमन विनोद -N - पर - - . चापलूसी छोटे' काम वहे करें, तो न बड़ाई होइ । ज्यो रहीम' हनुमत कहें, गिरधर कह न कोइ ॥ १३० ॥ अह अड न बौड 'रहीम' कह , देखि सचिकन पान । हस्ती-ढवा कुल्हडिन , सह ते तरुवर आन ॥ १३ ॥ खिजाव रहिमन' थोरे दिनन कहें, कौन कर मुंह स्याह । नहीं छलन कहे पर तिया, नहीं करन कहें ध्याह ॥ १३२ ॥ दीनता दिव्य दीनता के रसहि , का जानै जग अधु । भली विचारी दीनता , दीनबंधु से बधु ॥ १३३ ॥ कहि रहीम' धन वढि नटे , जाति धनिन के वात ।। घट बर्ड उनकर कहा , घास बेचि जे खात ॥ १३४ ॥ चढत रहीम' धनाढ्य धन , बनहु धनी कर जाइ।/ घटै पढे तिहि कर कहा , भीख मागि जो खाइ ॥ १३५ ॥ मृदङ्ग प्यारा जगत में , छाला हित का लेइ ज्यों 'रहीम' आटा लगै , त्यो मृद्रग सर टेइ ॥ १३६ ॥ पाठा० १३०-~, थोरो किये बड़ेन की, यही अड़ाई होई। [रहि०, २० दो०] १३६-लाला भगवानदीन ने इसी भाव पर निम्न प्रकार कहा है राजी होय न जगत में, को जन भोजन पाय । मिरदगहु मुख लेप रहि, मधुरे सुरन यताय ॥ , चारा . . , - , जोति-गुच्छ ] २५ कुपत जो' रहीम' गति दीप के, कुल कपूत के सोइ । बारे उजियारा फरै, घडे अँधेरा होइ ॥ १३७ ॥ - सुपृत जो रहीम' गति दीप के , सुत सपूत के सोइ । बडो उजेरो तेहि रहै , गये अधेरो होइ ॥ १३८ ॥ हाथी रहिमन' करिसम यल नहीं, मानत प्रभु के धाक । दाँत दिखापत टीन हुइ , चलत घिसावत नाक ।। १३९ ॥ उछारत सीस पर , कढरहीम'किहि काज । जिहि ग्ज मुनि पतनीतरी , तिहि सोजत गजराज ॥ ४० ॥ निकट सम्बन्ध नात नेह दूरी भली, लो 'रहीम जिय जानि । निकट निरादर होत है , ज्यों गडही कर पानि ॥ १४१ ।। छार पाग० १३७-१ ज्योर०] १४०-१ धूर धरत नित सीम पे [ रहि०, २०] गन रजद्दत गरिन म[२० दो०] १४:-तुलसीदासजी ने इसी भाव को इस प्रकार व्यक्त किया है मयाग दूरहि रहे, 'दुलमी' किये विचार । निकट निरादर होत हे, जिमि सुरमरि वर वार ॥
२६ रहिमन विनोद ~~.... - कहा वसाइ॥ १४४॥ 1 बेबसी की दशा खर्च वढो रोजी घटी, नृपतिनिठरमन कीन।' रहिमन'२ वे नर का करें , ज्यों थोरे जल मीन ॥ १४२॥ सर सूखे पछी उड़े, औरे सरन समाहि। मीन दीन विनु' पन्छ के, कहु रहीम' कहें जाहि ॥१४३॥ कहु रहीम' कैसे बने , अनहोनी हुइ जाइ । मिला रहै ओ ना मिले , तासों भावी प्रबल है जो 'रहीम' भावी' कतो , होति आपुने हाथ । राम न जाते हरिन सँग, सीयनरावन साथ ॥ १४५॥ जो 'रहीम' होती कहूँ , प्रभु गति अपने हाथ । तो को धो केहि मानतो, आपु बड़ाई साथ ॥ १८६ ॥ जेहि नभ सर पजर कियो, 'रहिमन'वल अरसेप । सो अर्जुन वैराट घर , रहे नारि के भेष ॥ १४७ ॥ पाठा० १४२-१ खर्च बढ्यो उद्यम घट्यो [रहि.] २ कहु 'रहीम' कैसे जिये, थोरे जल की मीन [रहि.] १४३-१ परन की [२०] २ पहुँ[ रहि.] १४५-१ भावी कप्त होतो अपने हाथ [२० दो०] २ सिया [र० दो०] १७-1 महि [रहि० २०] , .
नीति गुन्छ] २७ ~~ आइ आन। लिखी 'रहीम' लिलार में, कै पद कर काटि बनारसी, पहुँचे मगहर' थान ॥ १०८ ॥ निज कर क्रिया रहीम'कह , सुधि भावी के हाथ । पाँसे अपने हाथ में , दाँर न अपने हाथ ॥ २४९ ॥ भाषी ऐसी प्रवल है , कह रहीम' सा जान । भागी केहि का ना दही , भावी दह भगवान ॥ १५० ॥ भारी या उनमान के, पाडर वनह 'रहीम' । जदपि गौरिसुनि वाझ है , डर है मभु अजीम ॥ १५१ ।। ज्यो नाचति कठपूतरी, करम नचावत गात । अपने हाथ रहीम' त्यो', नहीं आपुन हात ॥१५॥ सासारिक ज्ञान जो विपया सतन तजी, मूढ ताहि लपटात । ज्यों नर डारत यमन करि , स्वान स्वादु मो खात ॥ १३ ॥ १४८-१ हुई आन की आन [२०] • मगहस्थान [२० दो०] मगरस्थान [ रहि.] १५०-1 यह [ रहि० ], २ काहू [ रहि०, २०, २० दो०] ३ दही पुर [२०, २० दो०] १५२-! ज्यों [ रहि०] १५३---कीर ने इस भाव पर इस प्रकार कहा है जो विभूति साधुन तजी , तेहि विभूनि रपटाय । जोन यमा करि मारिया , म्बान म्बाद करि वाय ॥ मे 2017 २८ [रहिमन-विनर 7 . . - ससि के सीतल चाँदनी , सुन्दर "सबहिं 'सुहाइ । लगै चौर चितम लटी, घटिरहीम"मन आइ ॥ १५४ सरवर के सग एक मे, प्रीति' याढिनहिंधीम्। व मराल के मानसर, एकै ठार 'रहीम ॥१५५) सीत हरत तम हरत नित', भुवन भरतनहि चूक । 'रहिमन' तेहि रविकर कहा, जो घटि लखे. उलूक ॥ १५६ । जद्यपि अवनि अनेक हैं , तोयवंत' सर ताल ! रहिमन' मान सरोवरहि, मनसा करत मगल ॥ १५७ । पाठा० १५४-१ ससि की सुखद सु चाँदनी, सुदर सवे सुहाति लगी चोर चित ज्यों लली, घट रहीम मन काँति [२० दो०] पाठा. १५५-१ यादन प्रीति न धीम [ रहि.] ३ को [ रहि०] १५६-१ जेहि [7. दो०], २ कछु'रहीम रवि घटि गयो जो धटि लग्यो उलूक [२० दो०] [१५६] बृन्द कवि का यह दोहा भी इसी भाव का है मूरख गुन समुझे नहीं , तो न गुनी में चूक । कहा भयो दिन को विभो, देखै जो न उल्क ॥ पाठा० १५७-१ कूपवत [ रहि० ], २ एके मानसर [२०] [१५७] तुलसीराम जी ने इस भाव को निम्न प्रकार व्यक्त किया है - यद्यपि अवनि भनेक हैं, तोय तासु रस ताल । सतत तुलसी मानसर , तदपि न तजहि मराल ॥ - .
नीति-गुच्छ] २९ ज्ञान 'रहिमन' विद्या बुधि नहीं, नहीं वरम जस दान । जन्म पृथा भू पर धरेउ , पसु विनु पूछ विपान ॥ १५८ ॥ सबल की निर्बलता जे रहीम' विधि बड़ किये, को कहि दूपण काढि । चन्द दूवरो कृवरो , तऊ नसत ते बाढि ॥ १५९ ॥ भिन्नता भीत गिरी पाखान के , अग्रानी उहि' ठाम । अवारहीम' धोखो यह को लागै केहि काम ॥ १६० ॥ मॉगना बुरा है 'रहिमन वेनर मरिचुके , 'जे कहुँ माँगन जाहि। उनसे पहिले चे मरे , जिनमुस निकसत नाहिं ॥ १६१ ॥ 7. १५८-निम्न श्लोक का भाव भी यही है येपा न विद्या न तपो न दान , ज्ञान न शीर न गुणो न धर्म । ते मृत्युलोके भुवि भार भूता , मनुष्य रूपेण मृगाश्चरन्ति । -~मर्तृहरि शतक १५९---तुलसीदासजी के इस दोहे का भी यही भाव है होहि यड़े लघु समय सहि , ता लघु सकहिँ न कादि । चन्द दूयरो कूबरो , तऊ : नग्यत ते । वादि । १६०-१ का काय, २ भयो, ३ ठाय [२०] १६१---कबीर के निम्न दोहे का भी यही भाव है माँगन गये सो मरि रहे , मरे।मो मांगा जाहि । तिन से पहिले वे मरे , होत करत जो नाहि ॥ .
३० [हिमन-विनो नाम ॥ १६३ 1 'रहिमन' याचकता गहे , बड़े छोट हुइ जात । नारायनह को भयो , बावन ऑगुर गात ॥ १६२ माँगे घटत रहीम' पट , कितो कर्य चड़ काम । तीन पैग बसुधा करी, तक बावने रहिमन' माँगत बड़ेन के, लघुता होति' अनूए । यलि मख माँगन हरि गये, धरि वावन कर रूप ॥ १६४ सच्चे मित्र की पहिचान मथत मथत माखन रहै , दही मही विलगाइnt रहिमन' साई मीत है, भीर परे ठहराइ ॥ १६५ कह रहीम' संपति-सगे , बनत बहुत बहुरीत । विपति कसौटी जे' कसे, सेई साँचे मीत ॥ १६६ जाल परे अलजात वहि, तजि मीनन कर मोह । 'रहिमन' मछरी नीर कर, तऊँ न छाँइति छोह ॥ १६ पाठा० १६२--वृन्द के दोहे का भी यही भाव हे है माँगिये , या में फेर न सार । बरि पे जाचत ही भये , बावन तन १६४-१ को [ रहि.] १६५-दीनदयाल गिरि ने इस भाव पर यो कहा है माँगत ही में बहेन को , लघुता होति अनूप । यलि-मख जाँचत ही धरै , श्रीपति हू, लघु रूप ॥ पाय० १६६-१ जो कर्म, कहिये सोई मीत [र. हो.] १६७-१ तऊँ 'रहीम' तु मीन जद, जल को छो छोह । . १ सब ते करतार" - . [२० दो ति-गुच्छ] ३१ . धनि रहीम'गति मीन के , जलविछुरत जिय जाय । जियत कज-तजि अत पसि , कहा भार कर भाय ॥ १६८ ॥ - प्रेमी से कुछ छिपा नही रहता जेहि रहीम' तन मन लियो, कियो हिये विच भोन । तामों सुख दुख कहन की , रही पांत अव कोन ॥ १६९ ॥ सङ्गति कदली सीप भुजङ्ग मुस, स्वाति एक गुन तीन । जैसी सगति वेठिये , तैसोई फल दीन ।। १७० ॥ रहिमन' जो तुम कहत है।', मगति ही गुन होइ । वीच उखारी रमसरा , रस काहे ना होइ ॥ १७१ ॥ 'रहिमन' नीचन सग बसि , लगत कलङ्क न काहि । दूध' कलारी कर गहे , मदहि कह सय ताहि ॥ १७२ ॥ पाग० १७०---निग पद्यों का भी यही भाव है मीप गयो मुक्ता भयो , कदली भयो कपूर । अहिफन गयो तो विप भयो , मगति को फर 'सूर' ॥ 'सूरदास' तरो क्ल बोल कल भापिन के स्वाति सुन्द जहाँ जाय पन्यो तहाँ तेसोई समूर है म्याल मुस विप ज्या, पियूप ज्यो पपीहा मुग्य, सीपी मुग्प मोती, कदली मुख कपूर है ॥ 'देव' १७१-1 ते [२०, २० दो०] १७२-१ दूध कलारिन हाथ एपि, मद समुझहि सन ताहि । [ रहि०, २०] १७२-वृन्द ने इस भाव को या कहा ह पिहि प्रमग दूखन लो , तजिये ताको साथ । मदिरा मानत ह जगत , दूध कलाली हाथ ॥ । . ।
३२ [रहिमन विनोद -~- नैना' " नीर चुरावत . रहिमन" ओछे सग ते , माध् यचते । नाहि! " सैना फरत है, उरज उमेठे' जाहिं ।। १७३ ॥ रहिमन' नीच प्रसंग ते,नित प्रति लामवेकार । सम्पुटी , मारु महत ' परियार || १७४। बसि कुसग चाहत कुसल , यह रहीम' अपसोस। महिमा घटी समुद्र के , रावन बसा परास ॥ १५ ॥ 'रहिमन' उजलीप्रकृति कहें , नाहिं नीच कर संग। करिय वासन कर गहे , करिखा लागत अङ्ग ॥ १७६ ॥ पाटा० १७३-१ कुटिरन मग रहीम काहे [रहि, र०] २ ज्यो नैना मैना करे [ रहि०, २०] . । , . १७३---तुलसीदास जी के दोहे का भी यही भाव ह 'तुलसी' ओछे मग ते , माधु बाँचते नाहि । ठकठना नैना करें, उरज उमेठे जाहि ।। १७४-निम्न दोहो का भी यही भाव है ओछे नर के मग ते , निसदिन होत विकार । नीर चुरावै सम्पुटी , मार खात धरियार ॥ 'तुलसी' साधुन हू को होय दुस , सग गरे अति सोट । घटी पास जल को हरे, पर घटी पर चोट ॥ - . दीनदयाल गि - १७५-- पाठा० १७५-१ जिय सोस [ रहि०, २० दो०] वृन्द ने इस भान पर इस प्रकार कहा ह दुर्जन के ससर्ग ते , सजन लहत कलेस । ज्यों दसमुख अपराध तें , यन्धन ल्यो जलेस । पाठा० १७६-१ का [२०] को [रहि.', • कारिख [ रहि नीति-गुन्छ] ३३ wwwrawin- . . , । जो' रहीम' उत्तम प्रति, का करि सकत कुसंग। चन्दन विप व्यापत नहीं , लपिटे रहत भुजङ्ग ॥ १७७ ॥ मुश्ता कर करपूर कर, चातक जीवन जोय । एतो वहो रहीम' जल, व्याल पदनविप होय ॥ १७८ ॥ ओछे कर सतसग , रहिमन'तजॲगार ज्यों। तातो जार अङ्ग, सीरे पे कारो करैः ॥ १७९ ॥ कह रहीम' केसे निभै , और घेर कर वे 'डोलत रस आपुने , उनके फाटत अङ्ग ॥१८॥ पूरुप पूजह देवरा , तिय पूजइ रघुनाथ । कह' रहीम' कैसे बने , पटो घेर कर साथ ॥ १८१ ।। 'रहिमन' जिल्ला वावरी, कहि गइ सग्ग पताल । आपु तो कहि भीतर भई , जूती खात कपाल ॥ १८२ ॥ पाटा० १७७-१ 'रहिमन' उत्तम प्रकृति को [ २० दो०] १७७--वृन्द ने इस भाव को यों कहा है मुजन कुसगति सग ते , मजनता न तजन्त । ज्यो भुजङ्ग गन मग तउ, चा विष न धान्त ॥ हर सोय [२० दो०], २ कुथल परे [२० दो०] १७९---अहमद के दोहों मभी यह सोरटा पाया जाता है ओछे को सग साथ , 'अहमद तजे भगार ज्यों। तातो जोरै हाय , सौरे 4 कालो करें। पाग - वेतौ होलत सहज ही [२० दो०] 16~-1 यह रहीम दोउन यन [रहि.] २ भैम [२०, २० टो०] .
३४ [रहिमन-विनोद विपत्ति 'रहिमन' विपदा भली , जो थोरे दिन होइ । हित अनहित या जगन में, जानि परत सब कोइ ।। १८३ ॥ अब 'रहीम' चुप करि रहउ, समुझिदिनन करफेर । ‘जव दिन नीके आइ हैं , बनत न लगिहै देर ।। ३८४ ॥ दुरदिन परे 'रहीम' कह , दुरथल जैयत भागि। ठाडे हजत घर पर , जब घर लागत आगि ॥ १८५ ॥ समय परे ऑछ यचन , सव के सहर' रहीम । सभा दुसासन पट गहे , गदा रहे' गहि भीम ॥ १८६ ॥ '-- दुरदिन परे 'रहीम' कहि , भलत सब पहिचानि । सोच नहीं वित हानि कर, जोन हाय हित हानि ॥ १८७" जो 'रहीम' दीपक दसा तिय रासति पट ओट । समय परे ते होत है, वाही पट की चोटः ॥ १८८ दुरदिन परे 'रहीम' कह , बडेन किये घटि काज । पॉच रूप पांडव भये , रथ-वाहक असमय परे रहीम' कह , मॉग जात तजि लाज । ज्यों लछमन माँगन गये, पारासर के नाज ॥१९॥ नलराज ॥ १८॥ पाठा० १८४-१ 'रहिमन' चुप हे बेठिये, देखि [रहि०, २०] १८६-~- सहे [ रहि० ], २ लिये रहे [ रहि.] १८८-इसका पाट इस प्रकार भी पाया जाता है- जेहि अचल दीपक दुस्यो , हत्यो सो ताही गात । 'रहिमन' असमय के परे , मिव शायु ह जात ॥ [२०, - .
. . नीति-गुच्छ] ३५ ......... विपति भये पन ना रहे, होय जोलास करोर। नभ तारे छिपि जात हैं , जिमि रहीम' भै भोर ॥ १९ ॥ 'रहिमन' असमय के परे, हित अनहित हुइ जाइ । यधिक वधै मृग वान सों, रुधिरे देत बताइ ॥ ३९२ ॥ चित्रकूट ' में रमि रहे, रहिमन' अवधनरेस । जापर विपदा परति है , सो आवत यहि देस ॥ १९३ ॥ 'कोउ रहीम'जनि काहु के , द्वार गये पछिताइ । सपति के सा जात है, विपति सबै ले जाइ' ॥ १९४ ॥ सतोप 'जैसी परै सो सहि रहै , कह रहीम' यह देह । धरती ही पर परत है , सीत धाम ओ मेह ॥ १९५ ॥ काह कामरी पामरी, जाड गये से काज । 'रहिमन' भूस धुताइये , केसर मिलै ज नाज ॥ १९६ ॥ निरभिमान (देनहार कोउ ओर है , भेजत सो दिन रेन । लोग भरम हम प धरै, या ते नीचे नेन ॥ ९७ ॥ पाठा० १९१-१ रहे [ रहि० ] १९३-1 आये राम रहीम' कह, किये मुनिन को भैस । जर जाको विपा परै, सो फटती तुव देस ॥ [२०] १९४-१ को रहीम पर द्वार पर जात न जिय पटतात [२०] २ जात[२०] १९५-- धरती कमी रीति है, मौत धूप घन मेह । जेमी पर सु सहि रहे, स्यों 'रहीम' यह देह ।। [र० दो०] , १६ [रहिमन विनोद स्वार्थी जगत २ , बैठे जब लग वित्त न आपने , तब लग मित्र न कोइ । 'रहिमन' अम्बुज अम्बुनिनु , रवि' ताकर रिपु होइ ॥ १९८ ॥ - स्वारथ रुचत रहीम' कह आगुन ह जग माहि। बड़े बड़े लसहु , पथ रथ कृयर अहि ॥ १९९ ॥ बहो की महिमा जे' गरीर पर हित करे , ते, 'रहीम' वड़ लोग। कहा सुदामा यापुरो , कृष्ण मिताई जोग ॥ २०० ।। जो बड़ेन कहं लघु कहे , नहिं रहीम' घटि जाहि । गिरधर, मुरली धर कहे , कछु दुसमानत नाहि ॥ २०१ ॥ 'रहिमन' कबहुँ बड़ेन के, नाहिं गरव कर लेस । ( भार धरे ससार कर, तऊ कहावत सेस ॥ २०२॥ बड़े बड़ाई करें , बड़े न बोलें बोल । 'रहिमन' हीरा कर कहै , लाख टका है मोल ॥ २०३ ॥ नाठा० १९८-१ रवि नाहिन हित होइ [ रहि०] तुलसीदासजी ने इम भाव पर यो कहा है आपन छोड़ो साथ जर , ता दिन हितू न कोय । 'तुलसी' अम्बुज अग्नु चिनु , तरनि तासु-रिपु होय ॥ १५१-१ रचत [ रहि.] २ सय [ रहि०, २०] २००-१ जो गरीब को आदरै, सो [२० दो०] २०१-१ बड़ेन सो कोऊ घटि कहे, घटि जाहि । - ना नहि वे । र० दो०] २ कछु 'रहीम' दुस नाहि [र० दो०] २०३-१ बढो [रहि.]
नीति-गुच्छ ३७ प , , . १ यों रहीम' सुख दुख सहत , बडे लोग रह साति। उक्त चन्द जेहि भांति सों, अथवत ताही भाँति ।। २०४ ।। 'ऊगत जाही किरन मों, अथवत ताही काति। त्यों रहीम' सुसदुस सहै' , बैठे एकहि भौति ॥२०॥ । यो 'रहीम' गति पड़ेन के ज्यों तुरग व्यवहार । दाग दिवारत" आपु तन , सही होत असवार ॥ २०६ ।। बडे दीन के दुस सुने , लेत दया उर आनि । हरि हाथी सों कव हुती, कहु रहीम पहिचानि ।। २०७ ।। 'रहिमन रिमसहि तजतनहिं, बडे प्रीति कर पारि। मूकन मारत आवई , नींद विवारी दारि ॥ २०८ ।। ना तजे, लघु रहीम' इतराइ । फरोदा होत है, कटहर होत न गइ ॥ २०९ ।। होय' न जाकर छोह ढिग , फल रहीम'अति दूर । गाढेहु सो निन काज ही, जैसे तार बडे' बड़ाई राइ . सजूर ।। २१०॥ पाटा० २०४-सह [ रहि०, २० ], २ वाही [२०] २०५~१ सबै, बढ़त एक ही भौति । [ रहि.] २०९--१ जो 'रहीम' ओहो यहै, गली गली इतराई । [२० दो०] २१. छह तो वाकी कग्नि है, . पादयो सो दिन काज को, [२० दो०] कीर ने इस भाव पर यो कहा है यड़ा हुआ तो क्या हुआ, जैसे पेड़ ग्वजूर । पथी को छाया नहीं , फर राग अति दूर ॥ - .
३८ [रहिमन-विनोद मढ़ो दमामा - . 'रहिमन' छोटे नरन से, होत चड़े नहि काम। जात' है , कहुँ । च्हे के चाम ।। २११॥ अनुचित उचित 'रहीम'लघु', करहिं घडेन के जोर । ज्यों ससि के संजोग'ते, पचात आचि चकोर ॥ २१२ ॥ होत कृपा जो बड़ेन कै, सो कदाचि घटि जाइ। 1 तो 'रहीम मरिवो भलो, यह दससहयोन जाइ ॥ २१३ ॥ सूक्तियाँ रहिमन' सीधी' चाल सों, प्यादा होत वजीर । फरजी साह न हुइ सके , गति टेढी तासीर ॥ २१४ ।। 'रहिमन' विगरी आदि के , बने न खरचे दाम | हरि वाढे आकास लो, तऊ बावने नाम ।। २१५ ॥ • छिमा बड़ेन कह चाहिये, छोटेन कहँ उत्पात । का 'रहीम' हरिकर घटेउ , जो भृगु मारी लात ॥ २१६ ॥ पाठा० २११-१ ना यर्ने , २ सो [ रहि.] तुलसीदासजी का निम्न दोहा भी इसी भाव का ह 'तुलसी' ओछे नरन ते , होत बड़ो नहि काम । मदत नगारा नहि नै , सो चूहे के चाम ॥ २१--~, कहि, २ फरत, ३ रस भोगते [ २० दो०] दीनदयार गिरि ने इस भार पर यो कहा है लहि के घर बलवीर को , निबल वली संसार । ज्यों चकोर पर चन्द के, चायत निचे अंगार ॥ २१४-१ सीधे, • हो सके [ रहि.] [२१६ ]न्द का यह दोहा भी इसी भाव का है नीति अनीति बढ़े सह, रिसमरि देत न गारि । भृगु उर दीनी रात की , कोनी हरि मनुहारि ॥ - - + नीति-गुच्छ ] ३९ . जहाँ काम उरपर युच जैसे पृटे 'छोटेन सों सोहैं बड़े , कह रहीम' यह रेस। सहसन के हय वॉधियत , ल दमरीक मेस ।। २२७ 'रहिमन' देखि वटेन कहें , लघु न दीजिये डारि । आव सुई , कहा करे तग्वारि ॥१८॥ गुरुता फरइ रहीम' कह , फरि आई है जाहि । नीके लगे, अनत बतौरी आहि । २१९ ।। रहिमन" यहि ससार में , सदुखमिलत अगोट | K. नगद के , परत दुहुँन सिर चोट ॥ २२० । चिगरी यात चनै नहीं , लारा करै किन कोइ । 'रहिमन' विगरे दुध कहें , मथे न मासन होइ ॥ २२१ ।। 'रहिमन' निज मन के निथा , मन ही रासहु गोइ । सुनि अटिलहैं लोग सव , वोटि न लहै कोइ ।। २२२ ॥ रहिमन' सोटी आदि के , सो परिनाम लसाइ । जेसे दीपक तम भवै , कजल वमन कराइ ॥ २२३ ॥ पाठा० २१७-१ बड़े सु छोटेन मो बध्यो, २ लेम्ब, ३ काही [२० दो.] वृन्द ने इस भाव पर निम्न प्रकार कहा है छोटे नर ते रहत है, सोभायुत रिमल राखे चाँदनी, जेने २२०-१ जन लगि जीवन जगत में, सुख दुस मिल्स अगोट । 'रहिमन' फूटे गोट ज्यो, परत हुन सिर चोट । [रहि.] सरताज। पायन्दान॥ २ सुम्ब [ २०, २०दो.] २२१-१ पाटे [रहि.]
४० [रहिमन-विनोद . . - जाइ॥ २२७॥ . . .. अरज गरज माने नहीं , 'रहिमन'ये जन चारि । रिनियाँ राजा मांगता , काम आतुरी नारि ॥ २२४ ॥ रहिमन' जहँ रहियो चहै , कहे वाहि जो' भाव । जो वासर कह निसि कहै , तो फचपची दिसाय ॥ २२५ ॥ यह रहीम' माने नहीं , दिल से नयो' जो होइ.।। चीता चोर कमान के , नये ते आगुन होइ ।। २२६ ॥ जो 'रहीम' ओछो' चढे, तो अति ही इतराइ । प्यादे । सो फरजी भयो , टेढो टेढ़ो 'रहिमन' घरिया रहॅट के, त्यों ओछे के डीलि। रीतिहिं सम्मुख होति है , भरी दिखाये पीठि ।। २२८ ॥ 'रहिमन' रिसकह छाडिकै, फरहु गरीवी भेस । मीठे बोलहु ने चलहु , सबै तुम्हारो देस ।। २२९ ॥ जो 'रहीम' पगतर पर। , रगरि नाक औ सीस । निठरा आगे रोइयो, आँसु डारिवो खीस ॥ २३० ।। साधु सपहै माधुता , जती जोखिता जान ।। 'रहिमन' सॉचे सूर कर , ये रहीम' कीके दुऔ, महाजानि "ज्यों तिय आपन फुच गहे , आप बड़ाई आपु ॥ २३२ ॥ पाटा० २२५-१ के दाव [ रहि०, २० दो ] २२६-१ नवा [ रहि० २० ], २ चिता जोर कमान के [२०] एक अन्य कवि ने इसी भाव को यो कहा है नवन नवन बहु अंतरा , नवन नवन बहु वान । ये तीनो बहुते नवें , चीता चोर कमान ।। २२७–१ छोटो, २ बढत करत उत्पात, ३ तिरछो तिरछो जात २३०-१ परयो [ २० दो० ], परो [रहि० ] २ गारियो [रहि०,] . raneouniy वैरी करें वखान ॥२३१॥ सतापु।
ति . - अमृत ऐसे बचन में, 'रहिमन'रिम' के गाम । से मिसिरिहु में मिली, निरस पास कफॉस ॥ २३३ ॥ रीति प्रीति सन सों भली, पर न हित मित गोन । 'रहिमन' याही जनम के , बहुरि न सगति होत ॥ २३४ ॥ 'रहिमन' वित्त अधर्मकर , जात न लागै वार । चोरी करि होरी रची, भई छिनक में छार ॥ २३५ ।। जो घर हो मे धुसि रहे , कदली सुवन सुडील । तो 'रहीम' तिन ते भले , पथ के अपत करील ।। २३६ ॥ करमहीन 'रहिमन' लसहु , धंसो घड़े घर चोर । चिन्तत ही यह लाभ क, जागत हुइ गा भोर ।। २३७ ॥ 'रहिमन'' जगजीवन बढे, काह' न देखे नेन । “जाद दसानन अछत ही, कपि लागे गढरे हैन ॥ २३८ ॥ जानि" अनीती जे करें; जागत ही रह सोइ । ताहि । सिसाइ जगाइयो , रहिमन'उचित न होइ ॥ २३९ ॥ ठा० २३३-१ विप, • मनिक [२० दो० ] २३५---१ जरत [ रहि०, र० दो।] २३८-१ का, • गय [ रहि०, २० दो०] २३९-१ अनकीन्हीं पाते कर, सोक्त नागै जोय । [रहि०, २० नो] निम्न दोहो का भाव भी यही है समुझि सुनीति कुनीति रन, जागत ही रह सोय । उपदेमियो जगाइनो, 'तुलसी' उचित न होय ॥ 'तुलसी' जानि यूझ अजुगत कर , तासों कहा यसाय । जागत ही सोक्त रहै, तेहि को सके जगाय ॥ . .
४२ [रहिमन विं 14 उरग तुरंग नारी नृपति , नीच जाति हथियार। रहिमन' इन्हें सॅभारिये , पलटत लगे न यार ।। २४० 'रहिमन' ओछ' नग्न ते, तजहु वैर औ प्रीति । काटे चाटे स्थान के , दुहुँ भौति विपरीति ॥ २४६ माह मास कर भिनुसारा, मीन सुसी नहि सार । हो ज्यो 'रहीम' जगना जियइ , विठुरे आपन ठोर ॥ २४२ माह मास लहि' टेसुआ , मीन परे थल और। त्यों रहीम' जग जानिये , छूटे आपन ठोर ॥ २४३ करत निपुनई गुन विना , 'राहेमन'निगुन' हुजूर। मानहुँ टेरत विटप चढि , यहि प्रकार हम फूर ॥ २४४ गरज आपनी आप सों, रहिमन' कहीन जाइ । जेसे कुल के कुल वधू , पर घर जात लजाइ ॥ २४॥ ससिसकोच' साहससलिल, मान सनेह रहीम'। बढत बढत बढ़ि जात हैं , घटत घटत घटि मीम ॥ २४६ [२४] तुलपीदास जी के निम्न दोहे का भी यही भाव है उरग तुरंग नारी नूपति , नर नीचो हथिशार । 'तुलसी' परखत रहय नित, नइहि न पलटत मार ॥ पाठा० २४१-१ सोटे जनन [२० दो०] २ सो, वैर भयो ना प्रीति [ रहि.] २४३-१ रहि टेसुआ[र० टो०], २ भार [२०] २४४-१ गुनी [२०, र० दो०], निपुन [ रहि०] २४५-1 काहु [र० दो.] २४६-१ सुकेस [रहि०], २ साजि [२० टो०] -नीति-गुन्छ] ४३ . , - 'रहिमन' यह तन सूप है , लीजे जगत पछोर । हल्लुफन कह उडि जान दे , गरुय रासि बटोर ॥ २४ ॥ दृटे सुजन मनाइये , जो टूट सो धार । 'रहिमन' फिरिफिरिपोहिये, हटे मुकुन्ताहार ॥२८॥ अधम वचन ते' को फल्यो , बेठि तार के छोहि । 'रहिमन' फाम न आवहीं, ये नीरस जग माहि ॥ २४९ ॥ हित अनहित रहिमन'करै, जाकै जहाँ विसात । ना' यह रहै न वह रहे , रहे फहन कह पात ॥ २५० ।। अनुचित वचन न मानिये , जदपि गुगइसि गाढि । है 'रहीम' रघुनाथ ते, सुजस भरत कर वाढि ॥ २५१ ॥ सबै कहावे लसकरी, जो' लसकर कह जाँइ । रहिमन'२ सेल्ह जोई सह , सोइ जगीरे साँइ ॥ २५२ ॥' पात पात कर सीचियो , घरी घरी कर लौन । 'रहिमन' ऐसी बुद्धि ते', काज सरैगो कौन ॥ २५३ ।। पाठा० २४७-१ या [ रहि० ], २ जातु है [ र० दो० ] २४९-१ के [ रहि० ], २ आय है [ रहि.] २५०-१ हित 'रहीम' इतऊ करे [ २०, रहि० ], इतऊ की जगह कितऊ [२० दो०] २ ना की जगह 'नहि ' [रहि० ] और 'म' [२०] और नहर रहै न घर रहै [२० दो०] २५२-१ बीर कोउ कहि जाय [२० दो०] २ मेल सड़ाके जो सह [२०] २५३-१ को, कहौ घरंगो कान [रहि.]
[रहिमन विनो -- . , . - एकै साधे सब सधै, सव साधे सब जाइ । 'रहिमन' साँचै' मूल काँ, फूलई फलइ अधाइ ॥ २५४ खैर खून खॉसी खुशी, वैर प्रीति मद-पान । 'रहिमन' दावे ना दवै , जानत सकल जहान ।। २५५ 'रहिमन' अब वे विरछ कहें, जिनकै छॉह गंभीर । यागन विच विच देखियत , सेहुँड फुटज' करीर ॥ २५६ रहिमन' आटा के लगे, वाजत है दिनयत । घिउ सकर जे खात है , तिनके कहा विसात ॥ २५७ यह 'रहीम' निज' सग लै, जनमत जगत न कोइ ! वैर प्रीति अभ्यास जस, होत होत ही होइ ॥ ०५८ गुन ते लेत 'रहीम' जन' , सलिल कूप ते काढि । कूपहुँ' ते कहुँ होत है, मन काह कर याढि ॥ २५९ है - पाठा० २५४-१ मूलहि सोंचियो [ रहि.] कबीर के दोहों में भी ग्रह दोहा पाया जाता केवल उसमें 'रहिमन' की जगह 'जो तू' है। [२५५] निम्न दोहो का भाव भी यही है धन गुन जोवन रूप मद , दुरै न एका संच। ज्यो हाँसी साँसी बहुरि , रोके रहत न रच ॥ इश्क मुश्क साँसी खुनस , सैर खून मद-पान । चतुर टिपावत है सही , आप परत है जान ॥ 'कोई क २५६-१ कुज [२० दो०], कज [२०, रहि.] २५८-१ सय [२० दो०] २५९-१ कहि [२० दो.] २ काहू को मन होयगो, कहा कृप ते यादि । [२० दो। .
ति-गुच्छ] . . 'रहिमन' तीन प्रकार ते , हित अनाहत पहिचान । परवस परे परोस यसि , परे मामिला जानि ।। २६०॥ 'रहिमन' यहि संसार में , सर सों मिलिये धाइ । ना जाने केहि रूप में, नारायन मिल जाइ ॥ २६१ ॥ विवाह-निषेध 'रहिमन' ब्याह वियाधि है , सकहु तो जाहु यचाइ । पाइन बेरी, परत है, ढोल बजाइ बजाइ ।। २६२ ।। अनुभव अव रहीम' मुसाकेल परी , गाढ़े दोऊ साँचे से तो जग नहीं , झूठे मिले न राम ॥ २६३ ॥' थोथे चादर कौर के, ज्यों रहीम घहरात । धनी पुरुप निर्धन भये , करें पाछिली बात ॥ २६०॥ . काम। परिशिष्ट दोहे की प्रशसा दीरय दोहा अर्थ के , आसर थोरे आहिँ । ज्यों रहीम' ना कुडली , सिमिटि कूदि कढि जाहि ॥ २६ ॥ [२६२] निग्न दोहे का भी यही भाव । उले पूरे वे फिर, जिन को भायो च्याउ । 'सुलसी' गाय बजाय के , देत काठ में पाउ 'मुलामी [ રહિમનની www vunt रूप कथानक' चारु' पद', किंचन दोहा लाल । ज्यों ज्यों निरखत अलुप त्यों, मोल रहीम' विसाल ॥ २६६ तान विधना यह जिय जानि के, सेसहि दियेन कान । सव डोलि , तानसेन के तान ।। २६७ . घरा मेह घर डर गुरु डर बंस डर , डर लजा डर मान । डर जेहि के जिह में यसै , तिन पाया रहिमान ॥ २६८। पाठा० २६६-१ कथायक [२० दो०], कथा पद [रहि०] २ चारि [२०, २० दो०] ३ पट [ रहि०] ४ कचन [र०, रहि०, २० दो०] ५ सूक्ष्मगति [रहि.] २६८--इस दोहे का पाठ इस प्रकार भी है 'रहिमन' जा डर निसि परै , ता दिन डर सिर कोय । पल करके लागते , देषु कहा धौं होय ॥ . - पर [रहि.] दूसरा पाठान्तर- पर यारिस डर परम गुरु डर करनी में सार । सोजी दर सो ऊपर गाफिल पाव मार॥
- बरवै नायिका-भेद दोहा कविन कथो दोहा कहो, तुल्यो न छप्प छन्द । विरन्यो यहै रिचारि के, यह बरवे रस छद' ॥१॥ वेधक अनियारे बड़े, यह यरवे के यान । सुनन जाहि चित चाव पै, समुझे चतुर सुजान ॥२॥ भगलाचरण यन्दो सरदवा, पद जोरि। रनन वरवना, लगइ खोरि ॥१॥ जिस सुदर सो को देखते ही हृदय में झारस का उदय हो 'नायिका' कहते हैं । यथा - रहरत लहर लहरिया , लहर मोतिन जरी किनरिया , विथुरे स्वाभाविक धर्मानुमार नायिका के तीन भेद माने गये हैं कोया, २ परकीया ओर ३ गणिका । स्वकीया रजाशील ओर पति से प्रेम करनेवाली नायिका को 'स्वकीया' कर काव्य न वहार। यार॥२॥ . ते है । यथा 7. दोहा न० १-१ रस-कन्द (१०) बना (1) दोहा न.. और बरवा न हस्तलिखित में अधिक हैं। (२) बरवा नं. २ 'रहि.' आर 'र०' में मुग्धा के उदाहरण में गया है।
[ हिम । . छाय। अहटाय ॥३॥ - मुग्धा, २ मध्या और ३ प्रादा। रहति नयन के कोग्या, चितवनि चलत न पगु पैजनियाँ , मगु स्वकीया के तीन भेद होते हैं मुग्धा जिसके अनन्यष्टि में योवनागम के चिन्ह प्रकट होने लगे हा उप 'मुग्धा' कहते हैं । यथा लागेउ आनि नवेलियहिं , मनसिज वान । उकसन लाग उरोजवा, दृग तिरछान ॥४॥ मुग्धा के दो भेद होते हैं। -१ अज्ञात योवना ओर ज्ञात यावना । अज्ञात-यौवना जिसे योवनागम का ज्ञान न हो उसे 'अज्ञातयोवना' कहते हैं। । . यथा - कउन रोग धो' छतियाँ, उकसेउ आइ । दुखि दुखि उठइ करेजवा , लगि जनु जाइ ॥५॥ ज्ञात यौवना जिसे यातनागम का ज्ञान हो गया हो उसे 'ज्ञात यौवना' कहते हैं यथा - - औचक आइ जोवनवा , मोहि दुख दीन्ह । छुटिगा सग गोइयवाँ, नहि भल कीन्ह ॥६॥ यरवा म० ३ 'रहि.' आर '२०' में मध्या के उदाहरण में दिया गया है . पाटा० ५-१,दुहुँ, २ उपजेउ [ रहि०, २०] ३ लाय [ह.]
स्वै नायिका-भेद] ४२ - - . भात-याचना के अवस्था-भेद से दो रूप माने जाते हैं फ-नवोढा ओर स्व-विधधनयोदा। नवोढा भय और गज के कारण जो पति से दूर भागती हो उसे नवोदा हते हैं । यथा पहिरति चूनि चुनरिया , भूपन भावा नेननि देति कजरवा , फूलनि चार ॥ ७ ॥ विश्रब्ध नवोढा पति के प्रति जो कुछ कुछ अनुराग मा विश्वास दिग्गने लगी हो 'वित्र ध नवोढा' कहते हैं यथा - जघन जोरति गोरिया, करति कठोर । छुअन न पावइ पियवा , कहुँ कुच कोर ॥ ८॥ . . मध्या जिस नायिका में एजा ओर काम समान माला में पाय जात हो ने 'मध्या' कहते है । यथा निसु दिन चाहति चाहन, श्री ब्रजगज। लाज जोगवरि हुइ यस , करति अकाज ॥९॥ प्रौढा पति से अनुराग करने वाली नायिका को 'प्राटा' कहते हैं । यथा मोरहि वोलि कोइलिया, चढवति ताप । 'घरी। एक घरि!! अल्यिा, रहु चुपचाप ॥१०॥ पास १०-१ घरि घरि एक घनिअदा [ रहि०, २०] - ५० [रहिमन विनोद परकीया पर पुरप से प्रेम रसने वाली नायिका को 'परकीया' कहते हैं यथा सुनि'धुनि कान्ह मुरलिया , गगन भेद । गइल न छाँड़ति गोरिया , गनति न खेद ॥ ११ ॥ परकीया के दो भेद है --उड़ा ओर २- -अनूढा ऊढा नायिका व्याही किसी मे हो ओर प्रीति किसी दूसरे से रखती हो उसे 'ऊढा' कहते है। यथा निसु दिन सासु ननदिया , मुहिं घर घेर' । सुनन' न देत मुरलिया , ना धुनि' टेर ॥१२॥ अनूढा जो किसी पुरुप से प्रेम करती हो पर अविवाहिता हो उसे 'अनूठा' कहते हैं। यथा मोहिं वर जोग कन्हैया , लागउँ पाय । तुहुँ कुल पूज देवतवा , होहु परकीया के ओर भी छ भेद होते हैं -(१) गुप्ता, (२) विदग्धा, (३) लक्षिता, (४) कुलग, (५) मुदिता ओर (६) अनुशयना । गुप्ता अन्य पुरप की प्रीति को छिपानेवाली स्त्री 'गुप्ता' कहलाती है। इसके तीन भेद होते हैं -(१) भूत सुरति संगोपना, (२) वर्तमान सुरति सगोपना ओर (३) भविष्य सुरति संगोपना । पाग. ११-१ सुनि सुनि कान मुरलिया [ रहि०, २०] १२- हेर, २ सुनइ, ३ मधुरी [ रहि०, २०] यरमा न.10...' म परकीया के उदाहरण में दिया गया है। सहाय ॥१३॥ .
नव नायिका भेद ] 1 , भूत-सुरति-सगोपना है यीतो हुई रति को छिपानेवाली नायिका 'भूत-सुरति-संगोपना' हराती है । यथा चूनत फूल गुलववा , डार कटील। टुटिगा बंद अॅगियवा , फट पट नील ॥१०॥ अवनहिं तोहि बढ़ावउँ, सुगना मार। पग्गिा दाग अधरवा , चोंच चुटार ॥१५॥ वर्तमान-सुरति-सगोपना वर्तमान समय की रति को छिपानेवाली नायिका 'वर्तमान-सुरति संगोपना' कहलाती है । यथा मुहिं तुहिं हरयर आवत, भा पथ-सेद। रहि रहि लेत उससरा, यहत प्रसेद ।। १६ ॥ भविष्य-सुरति-सगोपना भावी रति को टिपानेवाली नायिश को 'भविष्य सुरति-मगोपना' 1 कहते हैं। यथा जइहों चुनन युसुमिओँ , सेत बडि दुर। वेरिया करिछोहरिया', मो' सग कर ॥ १७ ॥ पाग०१५-आयेमि क्वनेउ ओरग [ रहि०, २०] यरवा स०१६'२०'मअन्य-सम्भोग दुसिता के उदाहरण में दिया गया है। ना [रहि०, २०], छोकरिया [..] ३- मुहि, मोहि [रहि०, २०] पाय०१७-१ ।
[रहिमन विनो वचन विधा भार विदग्धा विदग्धा नायिका के दो भेद होते हैं -(१) (२) क्रिया-विग्धा। वचन-विदग्धा अन्य पुरुष के प्रति वाक्य चातुरी द्वारा प्रेम प्रकट करनेदार नायिका को 'वचन विदग्धा' कहते हैं । यथा होइ आइ कारि वरिया , वरखत पाथ । जइयो घन अमरैया , सग न साथ ॥१८॥ क्रिया-विदग्धा अन्य पुरुष के प्रति किया-चातुरी द्वारा प्रेम प्रकट करनेवाली नायिक को 'क्रिया-विदग्धा' कहते हैं । यथा तोरेसि नाफ नथुनिया , मित हित नीक । कहेसि नाक पहिरावहु , चित दै सींक ॥ १९ ॥ चाहेर लै के दियवा , यारन सासु ननद ढिग पहुँचत , देति बरवा स०१८ 'रहि' और 'र०' में सुरति सगोपना के उदाह में दिया गया है। पाठ इस प्रकार है होइ कत आइ बदरिया , बरसहि पाथ । घन अमरैया , सुगना साथ ॥ यरवा स० १९ 'रहि' आर '२०' में 'वचन विदग्धा ' के उदाह में दिया गया है। पाठ इस प्रकार है सनिक सी नाक नथुनिया , मित हित नीक । कहति नाक पहिराबहु , चित द मीक ॥ , जाइ । घुताइ ॥ २०॥ .
परच नायिका-भेद] - लक्षिता जिस नायिका का अन्य पुरुप सम्बन्धी प्रेम किमी चिह द्वारा प्रकट होता हो उसे 'लक्षिता' कहते हैं। यथा आज नयन के कोरया , औरै भाँति । नागरनेह नवेलियहि, मंदिन जाति ॥२१॥ कुलटा अनेक पुरपी से प्रेम रखनेवारी नायिका को 'कुलटा' कहते हैं। यथा , । । . जस मदमातल हथिया , हुमकत जाइ। चितति छैल तरुनियाँ, मुँह मुसुकाइ ॥ २२ ॥ चितवति चिअटरिया, दहिने वाम। लासन लसत विदेसिया, हुइ बस काम ॥ २३ ॥ मुदिता जो नायिका अपने अनुकूल समय या कार्य को देखकर मुदितमना हो उसे 'मुदिता' कहते हैं। यथा जइही कान्ह' नेवतवा , भा दुख दून यह फरै रखवरिया , है' घर सून ॥ २४ ॥ पाग-२१-१ कजरा, २-नवेलिया, ३-सुदिने [रहि०, २०] २२-१ जाति [ रहि०, २०] घरवा सं. २३ 'रहि.' और 'र०' में मुदिता के उदाहरण म दिया गया है। पास इस प्रकार है- चितवति चि अटरिया , लासन एग्यत विडियवा , लसी सकाम ॥ २४-१ काए, २-गाँव, ३~सय [ रहि०, २०] याम।
[रहिमन विनोह नेवतहि गइल ननदिया , मैके सास। दुलहिन तोरि सररिया, ओ पिय पास ॥ २५ ॥ अनुशयना संकेत स्थान नष्ट हो जाने के कारण दुखिता नायिका का 'अनुशयना' कहते हैं । इसके तीन भेद है (१) प्रथम अनुशयना (मकेत विवहना), (२) द्वितीय अनु शयना (भावी संकेत नष्टा ) और (३) तृतीय अनुशयना ( रमग गमना)। प्रथम अनुशयना सकन-स्थान के नष्ट हो जाने से दुग्नी नायिका को 'प्रथम अनु शयना' कहते हैं । यथा जमुनातीर तरुनिअहिं, लसि भा सूल । झरिगा कुअ' वेइलिया , फुलत न फूल ॥२६॥ प्रीपम दहत' दयग्यिा , कुन कुटीर । तिमितिमि तकन तरुनिअहि,बाढति पीर ॥ २७ ॥ पाठा० २५---१ आचै आसु [ रहि०, २०] स० २६ और २७ के यरवै रहि ' और '१०' में 'द्वितीय अनुशयना के उदाहरण में दिये गये हैं। पाठा००६-१रूख । पाठा० २७-१ दवत, २-यादी [ रहि०, र०] घरपा न. २८ और २९ 'रहि०' और '१०' में प्रथम 'अनुशयना' उदाहरण में दिये गये हैं। . . .
रखे नायिकाभेद] - . द्वितीय अनुशयना भावी संकेत-स्थान की चिन्ता में दुपित होनवाली नायिका को 'द्वितीय अनुशयना' कहते है। यथा धीरज धरु किन गोरिया, करि अनुराग । जात जहाँ पिय-देसवा , घन बन याग ॥ २८ ॥ जनि मरु रोय दुलहिया , करि मन अन । सघन पुञ्ज ससुररिया , औ घर सून ॥ २९ ॥ तृतीय अनुशयना नायिका सफेत-स्थान में समय पर पहुंचने में चूर जाने के कारण दुखी हो उसे 'तृतीय अनुशयना' कहते हैं । यथा मितवा करत 'मुरिया, सुमन सपात । फिरिफिरि तफत तरुनिया, मन पछतात ॥ ३० ॥ मित उतते फिरि आयेउ , देखि' अराम । मैं न गई अमरइया , लहेड न काम ॥ ३१ ॥ गणिका केवल धन के लिये अनुराग करनेवाली नायिका को 'गणिका' . कहते है । यथा लसिलसि धनिक नयकना, वनवति भेख । रहि गइ हेरि अरसिया, कजय रेख ॥ ३ ॥ उपयुक्त नायिकाओं के तीत भेद और होते हैं (1) अन्य-सुरति-दु खिता, (२) मानिनी, और (३) वमोक्ति आविता . माग०३१-१ देषु न राम [रहि.] आर लरोउ न राम [२०] [रहिमन विनो www - अन्य-सुरति-दु खिता जो नायिका प्रीतम की प्रीति के दूसरे म चिन्ह देखकर दुखित होतं है वह 'अन्य-सुरति-दु खिता' कहलाती है । यथा मैं पठई जेहि फजवा , आएसि साधि । छुटिगा सीस जुरवना , दिढ करि बाँधि ॥ ३३ ॥ वक्रोक्ति-गर्विता इसके दो भेद है -() प्रेम-गर्विता और (२) रूप-गर्विता। प्रेम-गर्विता प्रियतम के प्रेम का गर्व करनेवाली नायिका को 'प्रेम-गर्विता' कहते हैं । यथा आपुहि देत जयकवा', गूंधत चुनि पहियइ चुनरिया , प्रान अउरन पाय जवकवा , नाइन दीन्ह । मोहिं पगआगर गोरिया , आनन कीन्ह ॥ ३५॥ रूप-गर्विता जिस नायिका को अपने रूप का गर्व हो उसे 'रूप-गर्विता' कहने हार। अधार॥३४॥ हैं। यथा वरवा स० ३३ 'रहि०' में 'वर्तमान-सुरति सगोपना' के उदाहरण में दिया गया है। पाठ इस प्रसार हे मैं पठयेउ जिहि कमवाँ , आयेसि साध । छुटिगा सीस को जुरवा , कसि के घाँधि ॥ '२०' में भी उपर्युक्त ही पाठ दिया गया है पर उदाहरण अन्य सुरति-दु सिता का ही माा गया है। पाठा० ३५-१ केजरवा [ह.]
व नायिका भेद] ८७ खीन मलिन विख भइया , आगुन ती। मोहि कहि वद-बदनिया , पिय मति हीन ॥ ३६ ॥ रातुल भएसि मुगउआ , निरस पसान । यह मधु भरल अधरवा, करसिसमान ॥ ३७॥ अवस्था-भेद के अनुसार स्वकीया, परकीया और गणिमा के उम-दस 'मेद होते है (१) प्रोषित-पतिका, (२) खण्डिता, (३) करहान्तरिता, (५) पिपलधा, (५) उत्करिता, (६) वासकमना, (७ ) स्वाधीन- तिय, (0) अभिसारिका, (१) प्रवस्यत्पतिका भार (१०) आगत- पतिका। प्रोपित-पतिका जिम स्त्री का प्रियतम विदेश में हो और वह वियोग-दुखिता हो उसे 'प्रोपित-पतिका' कहते हैं। 1 मुग्धा प्रोपित-पतिका का सो कहउँ मॅदेसवा , पिय परदेसु । लगेउ चत नहिं फूलइ , नेहि यन देसु ॥ ३८ ॥ मध्या प्रोपित-पतिका का तुम जुगल तिरियवा , झगरति आइ । पियविनु मनहुँ अदरिया , मोहिं न सुहाइ ॥ ३९ ॥ पाय० ३६- मोहि कहत विधु यदनी [ रहि०, २०] ३७-१ दातुम भैस सुगरवा [हि०, २०] • गुमान [ रहि०, २०] [रहिमन विनो . प्रौदा मोयित-पतिका तै अव जाइ येइलिया, बरि जरि मूल । विनु पिय सूल करेजवा , लसि तुब फूल ॥४०॥ खंडिता प्रियतम के शरीर पर अन्यल रमण के चिन्ह देख दुखित होकर करनेवाली नायिका को पिडिता' कहते हैं। मुग्धा-खडिता सखिसिखसीख'नवलिया, कीन्हेसि मान । पियलखि कोपभवनवाँ , ठानेसि अन ॥ ४१ ॥ सीस नवाइ नवेलिया, निचवइ जोइ । छिति खन छोरछिगुनिआँ, सुसुकति रोइ ॥ ४२ ॥ मध्या खडिता गिर गई पीय पगरिया , आलस पाइ । पवदउ जाइ चरोठवा , सेज बिछाइ ॥४३॥ पोछह अधर कजरवा , जावक भाल । 'उपटेउ पीतम छतियाँ, विनुगुन माल ॥४४॥ प्रौढा खडिता पिय आवत अॅगनैया, उठि के लीन । विहॅसत चतुर तिरियवा , वैठक दीन ॥ ४५ ॥ पौदह पीय पलॅगिया , मीजउँ रैन जगे कइ निदिया , सब मिटि जाय ॥ ४६ ।। पाठा० ४१-१ मानि, २ निनु [ रहि०, २०] [ रहि०, २०] १४-1 उपजेड [रहि०, २०] पाय । ४३-१ डसाद स्वे नायिका भेद] १ ९ +ry परकीया खडिता जेहि लगिसजन सनेहिया, छुट पर वार । अपने होत पिअरवा , साँच परार ॥४७॥ गणिका खडिता मितवा ओठ कजरवा , जावक भाल। लिहेसि काढि वइरिनियाँ, तकि मनिमाल।। ४८ ॥ कलहान्तरिता । प्रियतम ये कलह फरक बाट को अनुनाप करनेवाली नायिका को फलहान्तरिता' कहते हैं। मुग्धा कलहान्तरिता आयेहु अपहि गवनवाँ , तुरतहि मान । अबरसलागि गोरिअवा, मन पछतान ॥४९॥ मध्याकलहान्तरिता मैं मतिमन्द तिरियवा , परलिउ' भारि । ते नहिं क्न्त मनावत , तेहिं कछु खारि ॥ ५० ॥ Pro ४७-१ आपन हित परिवावा, सोच परार [ रहि०, २०] ४९-१ जुल्ने, २ लागिहि गोरियहि [ रहि०, २०] ५०- परलेउ भोर [रहि०, २०] २ तेहि नहि कन्त मनवले, तोहि क खोर [रहि०, २०] .
६० [रहिमन-विनर -- होत . प्रौढा कलहान्तरिता थकिगा'करिमनुहरिआ, फिरिगा पीर । मैं उठितुरति नलायेउँ, हिमकर हीव ॥ १ ॥ परकीया कलहान्तरिता जेहि लगिकीन्ह विरोधमा', ननद जेठानि । रखेउ न लाइ करेजवा , तेहि हित जानि ॥ ५२ ॥ गणिका कलहान्तरिता जेहि दीन्हेउ बहु विरियाँ , मोहिं मनिमाल । तेहि ते रुठिउँ सखिया, फिरि गये लाल ॥ ५३॥ विपलब्धा सफेत-स्थान में प्रियतम को न देसकर जो नायिका व्याकुर है उसे 'विप्ररब्धा' कहते हैं। मुग्धा विप्रलब्धा मिलेउ न कन्त सहेटवा , लखेउ डेराइ । धनियाँ कमल-बदनियाँ , गइ कुम्हिलाइ ॥ ५४॥ मध्या विपलब्धा दीख न केलि भवनयाँ, नन्दकुमार। ले ले चि उससवा , हुइ विकरार ॥ ५५॥ पाठा० ५१-१ गइ मन वन हरिया [ रहि०, २० ], २ रुठि [२०] र०' में मध्या कलहातरिता के उदाहर में दिया गया है ५२-१ यिरोगरा [ह. ५Y-1 फिरि दुबराय [ रहि०, २०] . - घरवा न. ५१ ] खे नायिका भेद] ११ प्रौढा विपलब्धा देखि न कन्त सहेटया, भा दुस पूर' । रोचन नैन कजरवा , होइगा परकीया विप्रलधा चैरिनि मह अभिसरवा , अति दुस दानि । नापर मिलेउ न मितवा , भइ पछतानि ॥ ५७ ॥ गणिका विप्रलधा करिके सोरह सिंगरवा , अतर लगाइ। मिलउ न लाल सहेटवा , फिरि पछिताइ ॥ ५८ ॥ उत्कठिता प्रियतम के आने में मिलम्ब होता देखकर जो स्त्री चितित होती है . उमे 'उत्कठिता' कहते हैं। मुग्धा उत्कठिता . गइ'जगजाम जमिनिया , पिय नहिं आय । राखेउ कउनि सवतिया, धौ विल्माय ॥ ५९॥ मध्या उत्कठिता जोहति परी' पलेंगिआ , पिय के बाट । बेचेउ चतुर तिरिअवा, धो केहि हाट ।। ६० ।। ०५६-- मौतन नैन कजरवा, है गो घर [ रहि०, २०] ५७-१ भो, • प्रातउ [रहि०, २०] ५९-१ भो [२०], भा [ रहि० ] २ रहि [ रहि०, २०] ६०-१तीय भवनवा, २ केहि के [रहि०, २०] .
६२ [रहिमन विनोद इतवार ॥ ६॥ खाट ॥२॥ । प्रौढा उत्कठिता पिय पथ हेरत गोरिया, भा भिनुसार। चलें न करहिं पिअरवा , तुव परकीया उत्कठिता उठि उठिजात खिरकिया, जोहति बाट। कत वह आइहि मितवा, सूनी गणिका उत्कठिता कठिन नींद भिनुसरवा , आलस आइ' । वन दै मूरख मितवा , रहल लोभाइ ॥ ६३ ॥ बासकसज्जा प्रियतम का आगमन जानकर मभोगकी तैयारी करनेवाली नायिका 'बासकसजा' कहते हैं। मुग्धा बासकसज्जा हरुए गवन नवेलिया, दीटि बचाइ। पौढी जाय पलॅगिया , सेज बिछाइ॥६४ ॥ मध्या बासकसज्जा सुभग विछाइ पलॅगिया , सिंगार। चितवति चाकि तरुनिऑ, दै डग द्वार॥६५॥ पाटा०६१-१ चाहुन करिहि तिरियवा, [रहि०, २०] ६२-1 कतहुँ न आवत मितवा, सुनि सुनि बाट । [रहि०, ६३-१ पाई [ रहि०, २०] अग वै नायिकाभेद ] १३ , प्रौढा बासकसज्जा हॅसि रहि हेरि अरसिआ , सहज सिंगार। उतरत चढत पलेंगिया, तिय कत पार ।। ६६ ॥ परकीया वासकसज्जा सोनत सव गुरलोगवा , जानेउ वाल। दीन्हेसिसोलि सिरकिया, उठि के हाल ॥ ६७ ॥ गणिका घासकसज्जा कीन्हेसि सरै सिंगरवा, चातुर चाल। आहे प्रान पियरवा , ल मनि माल ॥ ६८ ॥ स्वाधीन पतिका जिस स्त्री का पति मता उपके वश में रहे उसे 'स्वाधीन पतिका' . , मुग्धा स्वाधीन पतिका आपुहि देत जवकवा, गहि गहि पाइ । आपु देत मोहिं पियवा , पान खनाइ॥६९॥ मध्या स्वाधीन पतिका पीतम करत पियरवा , कहल न जात । रहत गढायत सोनवा, हियइ सिरात ॥ ७० ॥ प्रौदा स्वाधीन पतिका मैं अरु मोर पियरया , जस जल मीन । नजत परनना, रहत अधीन ॥ १ ॥ बिछुरत ६४ [रहिमन-विन परकीया स्वाधीन पतिका पिय जग नेन चकोरवा , मो मुख चंद । जानति हैं पिय अपने , मोहिं सुख कन्द ॥७२॥ गणिका स्वाधीन पतिका लै हीरन के हरवा, मोतिन माल । मोहिं रहत पहिरावत , बस हुइ लाल ॥ ७३ ॥ अभिसारिका प्रियतम के पास सभोग के लिये सकेत स्थान में जानेवाली सकेत स्थान में उसे बुलानेवाली नायिका को अभिसारिका' कहते हैं मुग्धा अभिसारिका चली लिवायनवेलिअहिं , सखि सर संग । जस हुलसत गुदगुदवा, मत्त मध्या अभिसारिका पहिरे लाल अछुअवा , तिय गज पाइ। चढि के नेह हथवा हुलसत जाइ ।। ७५ ॥ प्रौढा अभिसारिका चली रैन अँधिअरिया , साहस गादि । पायेल फेरि फेंकरिया , डारेसि कादि ।। ७६ ॥ स०७४--कविवर मतिराम के इस दोहे का भाव भी ऐसा ही है अली धली नाहिले, पियरे साज सिंगार । ज्यो मतग अददार को , लिये जात गडदार ॥ मतग ॥ ७४॥ - नायिका भेद] . . परकीया अभिसारिका नील मनिन के हरवा , नील सिंगार । किये रैन ॲधिअरिया , धन अभिसार ॥ ७ ॥ गणिका अभिसारिका धन हित कीन सिँगरमा , चातुर बाल । चली सग लै चेरिया , जहवा लाल ।। ७८ ॥ शुक्लाभिसारिका सेत कुसुम के हरवा, भूपन सेत । चली रैन उजिअरिया, पिय के हेत ॥ ७९ ॥ दिवाभिसारिका पहिरि वसन जरतरिया , पिय के हेत । चली जेठ दुपहरिया , मिलिरविजोत ॥ ८० ॥ प्रवत्स्यत्पतिका प्रियतम का विदेश जाना सुनकर आकुल होने वाली स्त्री को अवस्य पतिका' कहते हैं। मुग्धा प्रवत्स्यत्पतिका परिगा कान सखिअवा, पिय कर गोन । बैठी कनक पलेंगिआ, होइ के मोन ॥ ८१ ॥ मध्या प्रवत्स्यत्पतिका सुठि सुयुमार तरुनिआँ, सुनि पिय गोन । लाजन पोदि ओवरिया, होइ के मौन ॥ ८२ ॥ - ६६ ६ [रहिमन विनो +4 - . मौटा प्रवत्स्यत्पतिका यन घन फूलहिं टेसुआ , यगिअन वेलि । तव' पिय चलेउविदेसा, फागुन फेलि ॥ ८३॥ परकीया प्रवत्स्यत्पतिका मितया चलेउ विदेसना, मन अनुरागि। तिय' की सुरतिगगरिया , रहि मग लागि ॥ ८ ॥ गणिका प्रवत्स्यत्पतिका पीतम इक सुमिरिनियाँ, मोहिं दइ जाहु । जेहि जपि तोर विरहवा , करव नियाहु ॥ ८५ ॥ श्रागतपतिका विदेश में प्रियतम के आगमन पर प्रसन्न होनेवाली नायिका 'भागतपतिका' कहते हैं। मुग्धा आगतपतिका यहुत दिवस पर पियवा , आयेउ पुलकित नवल दुलहिया', कर गृह-काज ॥ ८६ ॥ मध्या आगतपतिका पियवा पारि' दुअरवा , उठि किन देखु । दुरलभ पाइ विदेसिया, जियके लेग्यु ॥ ८७ ॥ पाठा० ३-१ चलेउ विदेस पिअरचा, फगुआ फेलि [ रहि० ] म 'फेलि' की जगह 'पेलि' है ८४-१ पिय [ रहि०, २०] ८६-१ यधुइमा [..] ८७-1 आय २-मुद अवरेख [रहि०, २०] आज। , एवं नायिका-भेद ] ६७ . प्रौढा आगतपतिका आवन सुनत तिरिअवा, उठि हरवाड । तलफत मनहुँ मछरिया, जनु जल पाइ ॥ ८८॥ परकीया आगतपतिका पूछन' चली सररिया, मितवा तीर। हसिन अतिहितिरिअगा,पहिरति चीर ॥ ८ ॥ गणिका आगतपतिका नोलगि मिटहिन मितवा, तन कर पीर। जो' लगिपहिरिन हरया, जटित सुहीर ॥ ९० ॥ नायिका गुणों के अनुसार निम्न लिखित नीन घेणियों में विभाक - की जाती है। यथा - (१) उत्तमा (0) मध्यमा और (३) अधमा । उत्तमा प्रियतम के अवगुणों को देखकर भी जो नायिका रुष्ट नहीं होती यह 'उत्तमा' है। यथा लखि अपराध पिअरवा , नहिं रिस कीन्ह । विहसतचनन चकिया, चैठक दीन्ह ॥९१ ।। , मध्यमा प्रियतम के गुण-दोप के अनुसार मान ओर कोप करनेवाली नायिका मध्यमा' कहलाती है । यथा बाय ८८-1 यौवन प्रान पिअरवा , आई। नल्फत मीन तिरिभवा , जिमि जल पाइ ॥ [ह.] ८९--1 पूछत, २ नहर खोज , ३ पहिरि सुचौर । [१०] ९०~१ जौलगिपहिरिनखतिया , नख नग चीर ॥ [ह. .]
[रहिमन निर - । परवा से० ९५ हस्तलिखित पुस्तक में नहीं है। हमारी धारक विन गुन पिय उर हरवा, उपटेउ हेरि । चुप हुइ चित्र पतुरिया , रहिचख फेरि ॥ ९२॥ । अधमा प्रियनम के आदर करने पर भी जो गुमान ही करती रहती है वह नायिका 'अधमा' कहलाती है। यथा वार' बार गुरु मनवा , जनि करु नारि । मानुष औगज मोतिआ, जो लगि वारि ॥ ९३ ।। नायक-वणन स्त्रियाँ जिपे सानुरारा देख वह 'नायक' हे । यथा सुन्दर चतुर धनिकना , जानिक ऊँच । केलि कला परविनवा, सील समूच ॥ ९४॥ नायक के तीन भेद हैं ---(1) पति (२) उपपति और (३) चैमिक । पति पति उपपति वैसिकवा , त्रिविधि बखान । विधि से व्याहोगुरु जन, पति सो जान ॥ ९५॥ पाठा० ९२~१ मुख [ रहि०, २०] ९३-१ वेरहि बेर गुमनवा, २ मानिक और गज मुकुता [हि, . यथा - , --- है कि यह यरवा निमाकित दोहे के आधार पर यना हे पति उपपति यसिक तिविधि, मिधि सो व्याहो पति कई , कधि-कोविद मत जानि ।। नायक भेद यखानि। .
वै नायिका भेद] ले के सुघर पुरुषवा' , आपन' साथ । छपरो' एक छतरिया , वरखत पाथ ॥ ९६॥ पति के चार भेद होते हैं -(0) अनुपूर (२) दक्षिण (३) शठ र (४) धृष्ट। अनुकूल पर-स्त्री विमुख नायक 'अनुकूल' कहलाता है । यथा करत नहीं' अपरधवा , सपनेहु पीउ । मान करन काँर सधवा, रहिगा' जीउ ॥ ९७॥ दक्षिण अनेक पत्नियों से समान प्रीति रखनेवाला नायक 'दक्षिण' कहलाता यथा सरमिलि' करहिं निहोरवा, हम कहें देहु । चुनि चुनि चम्पक चुरियाँ, उच से लेहु ॥२८॥ शठ अपराध करनेवाला कपटी, परन्तु मिष्टभाषी, नायक 'शठ' कहराता यया . छाड़ेउ लाज डगरिया, ओ फुल-कानि । करत रोज' अपरधवा, परि गइ यानि ।। ९९ ॥ १० ९६-१ पुरपिया, २ पिय के, ३ छहरे [ रहि०, २०] ९७-१ न हिय, २ को धेरियाँ, ३ रहि गइ होय [ रहि०, २०] ५८-1 मोतिन [रहि०, २०] ९९-१ जात [रहि०, २०] रहिमन विनोद । - । धृष्ट जो अपराध करता है किन्तु जरा भी लजित नहीं होता, वह नायक 'ट' कहलाता है। यथा जह्या जगेड' रइनियाँ, तहवा जाह जोरि नयन निग्लजचा , कन मुसुका ॥ १०० ॥ उपपति परकीया के प्रेम पास नायक को 'उपपति' कहते हैं । यथा झाकि अगेखे गोरिया , आसिन जोर। फिरि चितवनिचित मितवा, करत निहोर ॥ १०१ ।। वैसिक गणिका के प्रेमी नायक को 'बैंसिक' कहते है । यथा लटकी नीलजलुफिया , बसी भाय। मो मन वार वधुझ्या, मीन उपर्युक्त नायका के अतिरिक्त नायक के तीन भेद और होते हैं (१) मानी (२) वचन-चतुर ओर (३) क्रिया चतुर । मानी नायिका से मान करनेवाला नायक 'मानी' कहलाता है। या अवनजनमभरससिया, ताको वोहि । ऐंठलि गइ अभिमनिया , तजि गइ मोहि ॥ १०३ ।। पाठा० १००-१ जात [रहि.] १०२-१ जनु अति नील अरकिया, २ लाय [ रहि०, २०] १०३-१ अब मरि जनम महेलिया, तकब न ओहि । [रहि०,० . वाय ॥ १०२॥ , , प्रवर्शन और (8) साक्षात् दर्शन । दिया गया है। पाठान्तर सिर्फ 'तिय' की जगह "पिय' है। वै नायिका भेद] वचन-चतुर वार चातुर्य से अपना काम सिद्ध करनेबारा नायक 'वचन चतुर लाता है। यथा- सघन कुज अमरैया, सीतल छाँहि । झगग्त आइ कोइलिया, फिरि उडि जाहि ॥ २०४॥ क्रिया-चतुर छल क्रिया से अपना काम मिल करनेवाला नायक 'रिया चतुर' राता है। यथा- सेलत जानेसि टोलिआ', नन्दकिसोर । छुइ वृषभान युरिया , होइगा चोर ॥ १०५ ॥ प्रोपित नायक विदेश में विरह-वश भ्याकुल होनेवाले नायक को 'प्रोपित नायक' करिये ऊँचि अटरिया, तिय-सँग केलि । कर धो पहिरि गजरया, हार चमेलि ॥ १०६ ॥ दर्शन दर्शन ४ तरह के होते हैं -(0) स्वप्नदशन (२) चिखदशन (३) 'यरवा क. १०५ और १०५ १०' में मानी के उदाहरण मे दिय गये हैं। पार० स० १०५-१ टोरवा [ रहि०, २०] परवा स० १०६ 'रहि' और 'र.' में 'सिक' के उदाहरण में . कहते हैं। यथा - -- [रहिमन दिनी १ स्वप्नदर्शन पीतम मिलेउ सपनवाँ, भा सुख-खानि ! 'आनि जगाएसि चेरिया, भइ दुसदानि ।। १०७ ॥ चित्रदर्शन पिय मुरति चितसरिया, देखत' घाल । सुमिरत ओधिवसेरवा , जपिजपि वाल' ॥ १०८ ॥ अवणदर्शन आयेउ मीन विदेसिया , सुनु सखि तोर । उठि किन करलिसिंगरवा, सुनिसिख मोर ॥ १० ॥ साक्षातदर्शन विरहिनि अउर विदेसिया, भे इक ठोर । पिय मुसहेरि तिरिअवा, चन्द चकोर ॥११०॥ सखी-वर्णन सरल स्वभावशाली सुरड़ स्त्रियाँ जिनमे नायक आर नायिकाये किस प्रकार का भेट नहीं रखते 'सखी' कहलाती है। सखियो के कार्य महन, शिक्षा, उपालभ और परिहास यह चार भेद हैं। . मडन नायिका को वस्त्राभूपणादि से शृङ्गार काना 'मडन' हे । यथा पाठा० १०७-१ जाय [ह.] १०- चितवति, २ वितवति, ३ माए 1 [रहि०, २० ] ११०-१ तकत [ रहि०, २०] वे नायिका-भेद ] - सखियन कीन सिंगरवा , रचि बहु भॉति । हेरति नैन अरसिया,मुस' मुसुकाति॥ ११ ॥ शिक्षा नायिरा को विनय आर विरासादि की सिखावन देना 'शिक्षा' यथा- 3 - छाकहु वइठि दुअरिया , मींडहुँ' पाव । पिय तन पेसि गरमियों, विजन डोलाव ॥१२॥ उपालभ नायक या नायिका की ओर से उलाहना देना 'उपालभ है। यथा चुप होइ रहेउ सँदेसवा , सुनि मुसुकाय । पियनिज कर बिछपनमा, दीन्ह उठाय ।। ११३॥ परिहास निस कार्य से नापक ओर नायिका को आनन्द प्राप्त होता हो उसे परिहास' कहते हैं । यथा - - विल्सन भोह चढाये , धनुप' मनोज । लावति उर अवलनियाँ, ऐठिउरोज ॥ १४ ॥ बाटा० ११:- मुरि [ रहि०, २०] १९२-३ मीजहु [ रहि०, र० ] यरवा स. ११३ 'रहि०' में 'शिक्षा' के उदाहरण में दिया गया है। १४- धनुपमनीय । रहि० २ उठिउठि पीय
स्फुट रचनाएँ
मदनाष्टक
मालिनी छन्द
यहति मरुति मन्दम् मैं उठी गति जागी।
शशि कर कर लागे सेल ते पैन बागी ।।
अहह ! विगत स्वामी क्या करो मैं अभागी।
मदन शिरसि भूय , क्या बलाआन लागी॥१॥
हरनयन हुताश ज्वालया जो जलाया।
गति नयन-जलोधे स्याक बाकी बहाया ॥
नदपि दहति चित्तम् मामक क्या करोगी।
मदन शिरसि भूय क्या यला आन लागी ॥ २॥
हिम-ऋतु रति धामा सेज लोटो अकेली।
उठत विरह-ज्वाला क्यों सहारी सहेली ॥
चफित-नयन याला ! तत्र निद्रा न लागी ।
मदन शिरसि भूय क्या बला आन लागी ॥३॥
मनसि मम नितान्तम् आइ के वासु कीया।
तन मन सब मेरा मानह छीन लीया ॥
इति वदति पठानी मन्मथाङ्गी विगगी।
मदन शिरसि भूय क्या बला आन लागी ॥ ४॥
कमल मुकुल मध्ये राति को ऐसयानी।
लखि
मधुकर वधम् तु भई री दिवानी ॥
तदुपरि मधुकाले कोकिला देखि भागी।
मदन शिरसि भूय क्या वला आन लागी ॥५॥
हनाटक] + . तव पदन मयकी ब्रह्म की चोप वाढी। मुस कलसिk 4 चाँदते काति गाढी ॥ मदन मथित रभा देखते तोहि भागी। मदन शिरसि भूय क्या यला आन लागी ॥६॥ नभसि धन धनान्ते घनी केसि छाया । पथिक-जन-यधूना जन्म केता गॅनाया ॥ अति चतुर मृगाक्षी देसते मान भागी। मदन शिरसि भूय क्या बला आन लागी ॥ ७॥ विगत घन निशीथे चाँद की रोशनाई । सघन वन नियुजे कान्ह यशी जाई॥ सुत पति गत निद्रा स्यामियाँ छोड भागी। मदन शिरसि भृय फ्या ग्ला आन लागी ॥ ८॥ गार सोरठ धरे ॥१॥ रहिमन' पुतरी स्याम, मनहुँ जलज मधुकर लसे। * धा सालिग्राम, रूप के अग्घा पलटि' चली मुसुकाय, दुति रहीम' उपजाय अति । वाती सी उसकाय, मानो दीनी दीप की| पाग० २-१ पुलकि २-२ उजियाय [२०] ग [रहिमन विनी M दीपक हिये छिपाय, नवल वधू घर ले चली। फर विहीन पछिताय, कुच लखि निज सीस धुनै ॥३॥ गई आगि उर लाय, आगि लेन आई जो तिय । लागी नाहिं बुझाय, भभकि भभक परि घरि उठे ॥ ४ यक नाही यक पीय, हिय 'रहीम' होती रहै । काहु न भई सरी, रीति न चेदन एक सी ॥५॥ तुरुक गुरुक भरपूर, इवि इयि चातक जातक दूरि, देह दह विन देह को ॥ ६ ॥ गुरु उठे। -4 फुटकर-काव्य कवित्त अति अनियारे,मानोसान दै सुधारे, महा- विष के विपारे, ये करत परत है। ऐसे अपराधी, देख अगम अगाधी, यह साधना जुसाधी, हरि हिये में अन्हात है । स० ३-लला भगवानदीनजी ने इसको दोहे के रूप में निम्न प्रक लिया है। देखिये 'सूक्ति-सरोवर'-पृष्ट ४०७ नवर वधू घर लै चली , अंचल दीप छिपाय । कर न दिये करतार मोहि, मीस धुनै पछिताय । इस सोरठे को अज्ञात कवि का माना है। ।
फुटकर काव्य 3 - । बार बार योरे, यातें लाल लाल डोरे, भये- तोहूँ तो 'रहीम थोरे, विधना सकात है। घाइक घने, दुखदाइक है मेरे, नित- नेन-चान तेरे, उर चेधि घेधि जात हैं ॥१॥ . सवैया सीखी है ऐसी रहीम' फहा, इन नेन' अनोखे धा नेह की नाँधन । ओद भये रहते न यनै कहते न बने विरहानल दाधन ।। पुन्यन प्यारे सो भेट भई ए प भौन कुसग मिल्यो अपराधन । म्याम सुधानिधि आनन की मरिए सखीसूधे चितैयेकीसाधन ॥२॥ कवित्त पट चाहे तन, भेद चाहत छदन, मन चाहत है धन, जेती सम्पदा सगहिवी। तेरोई कहाय कै, रहीम' कहै दीनयन्ध, आपुनी विपति जाय, काके द्वार काहियी। पेट भर सायो चहै, उद्यम बनायो चहै, कुटुम जियायो चद, कादि गुन लाहिवी। जीविका हमारी, जो पं औग्न के फर डारी, ब्रज के विहारी, तौ तिहारी कहा साहियी ॥३॥ - पाटा०२-१ नेनन मोसे ७८ [रहिमन-विनोद T घनाक्षरी बड़ेन सों जान पहिचान, तो' 'रहीम' कहा, जो पे करतार ही, न सुसदेनहार है। सीतहर सूरजसों, प्रीति करी पंकज ने, तऊ कज-यनन को जारत तुपार है ।। उदधि के बीच बस्यो, शकर के सीस यस्यो, नऊन कलंक नस्यो, ससि में सदा रहे। बड़े रिक्षवार हैं, चकोर दरवार देख्यो,' सुधावर यार ए प, चुगत ॲगार है ॥ ४ ॥ ५ सवैया जाति हुती ससि गोहन में मनमोहन को लखि के ललचानो। नागर नारि नई ब्रज की उनहें नंदलाल को रीझियो जानो। जाति भई फिरि के चितई तव भाव रहीम' यह ज्यों कमनेत दमानक में फिरि तीर सों मारि लैजात निमानो ||५|| उर आनी। पाठा० ४-१ के, २ काह, ३ सेश हरि सूरज सो नेह कियो याही हेत तऊ पै कमल जारि झरत तुपा है, ४ छीरनिधि माँहि, ५ वडो रीशिवार हे, ६ ह, कानिधि सौ यार तऊ चाखत अंगार है [२०, रहि०] ५-- पहुतै [२०], २ कमनीय [ रहि.]
फुटकर-कान्य] ७२ -- दीन चहै करतार जिन्हें सुस, कौन रहीम' सके तिहिं टारे। उद्यम' कोउ करो न करो, धन आवत है विन ताके हकारे॥ देव हँसै सव' आपुस में विधि के पापच न कोउ' निहारे । येटा भयो वसुदेव क धाम आ दुंदुभी चाजत नन्द के द्वारे ॥६॥ जेहि कारन बार न लाये फल, गहि सम्भु सरासन दोय किया । न' हुनो समयों बनवासह को पै निकास पिता वनवास दिया ।। भजि' भेद रहीम' रह्यो न क करि रासी हुती उन हार हिया। विधियों न सिया रसपारसिया करपार सिया पियसार लिया ॥७॥ दोहा तारायन ससि रैन प्रति, सूर होहिं ससि गैन । नदपि अँधेरो है सखी, पोउ न देसे नेन || भजन छपि आगन मोहनलाल की। लाल काछनी काछे कर मुरली पीत पिठोरी साल की। एक तिलक फेसर को किये युति मानो विधु-बाल की। विसरत नाहिं सती मो मन ते चितानि नयन विसाल की ।। पाग० ६-१ अद्यम पौरुप कोने दिना धन आवत आपुहि हाथ पसारे, २ अपनी अपना, ३ जात विचारे। [२०, रहि.] ७-१ गयो गेहहि त्यागि ताहि ममै सो निकारि पिता यावास दिया । 3- कह बीच रहीम रह्यो न कडू जित कीनो हुतो विन हार डिया ॥ [२०, रदि०] ।
[रहिमन विनोद ८० नीकी हॅसनि अधर सधरनि की छवि छीनी सुमन गुलाल की। जल सों डारि दियो पुरइन पर डोलनि मुकुता माल की ॥ आप मोल बिन मोलनि डोलनि बोलनि मदनगोपाल की। यह सरूप निरसे सोइ जाने इस रहीम' के हाल की ॥९॥ - कमल-दल नैननि की उनमानि । विसरत नाहिं ससी मो मन ते मंद मद मुसुकानि ॥ यह दसनन दुति चपला ते महाचपल चमकानि । बसुधा की बसफरी -मधुरता सुधा पगी बतरानि ।। चढी रहे चित उर विसाल की मुकुतमाल थहरानि । नृत्य समय पीताम्बर की फहरि फहरि फहरानि ॥ 'भावति श्री वृन्दावन ब्रज ते अनुदिन आवन जानि । छवि रहीम' चित ते न टरति है सकलस्याम की वानि ॥१०॥ वरवै या झरमें घर घर में , मदन हिलोर । पिय नहिं अपने कर मैं, करमै खोर ॥११॥ ओंठ की चनन केवरिया, जो हो बाट। उडिग सोन चिरैया, पिंजर सुनिये विटप प्रभु पुहुप तिहारे हम राखिये हमें तो सोभा रावरी वढाइहैं। तजि हो हरप तो विरप है न चारो कछू जहाँ जहाँ जेहें तहाँ दुनी छवि पाइहैं । -१ अनुदिन, २ आवन [रहि०, २०] ३ जावन [२०] हाथ ॥१२॥ .
फुटकर-काव्य ] फलित ललित माला अलि धन सुरन चढ़ेंगे सुर नरन चढ़ेंगे हम सुरुवि रहीम' हाथ हाथ ही विकार है। देस में रहेंगे परदेस में रहेंगे काह मेष में रहेंगे परावरे कहाइ हें ॥१३॥ या जवाहिर जडा था। चपल चसन वाला चाँदनी में खडा था । कार तरविच मला पीत सेला नवेला। अलबेला यार मेरा अफला ॥१४॥ कठिन कुटिल कारी देख दिल्दार जुल्फे। अलिकलित निहारें आपने दिल की युलफे ॥ सकल शशिकला को रोशनी हीन लेखा। अहह ! ब्रजलला को किस तरह फेर देखा ॥१५॥ हग छकित छवीली छैलरा की छरी थी। मडि जटित रसीली माधुरी मुंदरी थी॥ अमर कमल ऐसा कहि न सकता जैसा स्याम फा हस्त देसा ॥१६॥ । जरद वसन वाला गुल चमन देराता था। झुक झुक मतवाला गावता रेखता था॥ से फुडले झमते थे। तमाशे मस्त ६ घूमगे थे॥७॥ तरल तरनि सी तीर सी गोदा। अमल कमल सीधी दिल बिया ॥ यूय से सूब देखा। श्रुतियुग चपला नयन कर १५-१ अरक, २ बिधारी। १६-१ छवि, सकी। .
૮૨ [रहिमन रिनोद नटवर । मधु मधुप हेरे माना मम्ती न गखे । विलमति मन मेरे मुन्दरी श्याम आँप ॥१८॥ भुजग जुग किया है काम कमनेत मोहैं । तव मोहैं याँकुरी मान भौहे ।। सुनु ससि मृदयानी वे दुरुस्ती अकिल में सरल मरल सानी के गई सार दिल में ॥१९॥ पकरि परम प्यारे माँपरे को मिलाओ। अमल अमृत प्याला फ्यों न मुझको पिलाओ॥ x x x x x x x x x x x x x x ४॥२०॥ . १ रहीम-काव्य आनीना नटवन्मया तव पुर श्रीकृष्णया भूमिका । न्योमाकाश खखावराब्धि वसुबत् त्वत्प्रीतयेऽद्यावधि । प्रीतत्व यदि चेनिरीक्ष्य' भगवन् स्वं'प्रार्थित देहिमे । नोचेद यूहि कदापि मानय पुनरत्वेतादृशी भूमिका ६॥ (अर्थ)-हे श्रीकृष्ण ' मैं तुम्हारे आगे इस भेप (नाट्यरूप) मेंनट के समान उपस्थित हुआ है और आज तक तुम्हारे प्रसन्नतार्थ ही मैंने ८५ रक्ष रूप धारण किये हैं। भगवन् । यदि इस नरूप से आप प्रसन्न हैं नो जो मैं माँगता हूँ दीजिये ( मुक्त कीजिये )। यदि न प्रसन हो तो पाठा०१८-१ मार। १-१ चेन्निरीक्ष, २ स्व [ रहि.]
रहीम-काव्य] 1-4 ध्यानेन घुद्धे परता परेशरे जात्याजताक्षन्तुमिहार्हसित्व ||en कहिय फिर कभी ऐसी भूमिका मन आओ, अर्थात् नागगमन स रहित कीजिये। रत्नाकरोऽस्ति सदन गृहिणीच पद्मा कि यमस्ति भवते जगदीश्चगय ॥ राधा गृहीत मनसे मनसे चतभ्य, दत्तं मया निज मनस्तदिद गृहाण ॥२॥ (अर्थ)-हे जगदीश्वर । आपस समुद्र (रत्नाकर ) घर ह, रक्ष्मी गृहिणी है । इसलिये आप क्या देने योग्य हे ? अधान् कुछ नहीं । परतु आप का मन राधा न चुरा लिया है। यह आप के पास नहीं है। अत आपके रिक्त मन के स्थान में मैंने अपना मन दिया। उमे ग्रहण कीजिये ।। अहिल्या पापाण प्रति पधुरासीन कपि चमू । गुहोभून्चाडालस्त्रितयमपि नीतनिज पदम् ॥ अह चित्तेनाश्मा' पथुरपि तपर्चादि करणे। ननामुद्धरसि किम् ॥३॥ अर्थ-अहिल्या पापाण होने से प्रति ह, बन्दरो की मैना पशु ह, आर गुह चाद्वार या । परन्तु नीतो को आपने निज लोक में स्थान रिया। घर में चित्त से पथर हूँ, आपकी पूजादि फरने में पशु हूँ आर प्रिया करने में चाढाल हुँ । जब मुझ में उन तीनो गुण हैं फिर भी हे राम ! मेरा यद्यानया व्यापकता हताते भिदेकता वापरता च नुत्या' क्रियामिश्चाडालो रघुवर . उदार क्या नहीं करते। पाग०३-1 चित्तनाश्म ५- स्तुत्या, २ परेश [रहि० ]
[रहिमन विनोद
तो
-
अर्थ-हे परमात्मन् । जय हम आपकी याता के लिये नीों में जात
हे तो हम मान देते हैं कि आप यही नहीं है। इसमे आपकी
व्यापरता नष्ट करते हैं । नमस्कारादि करने से जीव ओर ग्रस की एकता
व वाणी मे परे होने की क्षमता नष्ट करते हैं। यदि एक माना जाय
नमस्कार कार किम को कर, जो वाणी से परे है उसमे नमस्कार आदि
कधन व स्तुति कैसे की जा सकती है । हे परेश । ध्यान करने से बुद्धि
से परे होने के गुण को नष्ट करते हैं और अवतार मानने से आपकी अजता
को नष्ट करते हैं । अत इन कृयो पर हमें क्षमा कीजिये । फितना गुद्र
भाव भरा हुआ है।
दृष्ट्वातत्र विचित्रता,
तरलता, मैं था गया वाग में।
काचित्तत्र पुरगशावनयना, गुल तोड़ती थी सडी ।।
उन्नत' भ्र. धनुपा कटाक्ष विशिख घायल किया था मुझे।
नरसीदामि सदैव मोह जल धौ, हे दिल गुजारो शुकर ॥
अर्थ-माग में विचित्र वृक्ष और सताओं को देखकर गया था।
कोई मृगशावकनयनी वहाँ यही फूल तोड रही थी। धनुपाकार सनी
हुई भी पर कटाक्षरूपी बाण रखकर उसने मुझे घायल किया। उसमे
सदैव मोह-समुद्र म इबा दुख पा रहा हूँ। हे दिल, उसका धन्यवाद कर ।
एकस्मिन्दिवसाचसान समये, मे था
काचित्तत्र फुरग वाल नयना, गुलतोडती थी पड़ी।
ता हवा नवयौवनां शशिमुखी, मोह में जा पड़ा।
नो जीवामित्वया विना धिणु प्रिये, तृ यार कैसे मिले ||६||
गया बाग में।
पाठा० ५-१उन्मद।
२६-१ शशिमुखी [ रहि. ]
अर्थ-हे गगाजी । पुण्यवानो को तारना, जो अपने पुण्य -प्रताप मे ही तर जाते हैं, इसम तुम्हारा क्या महत्व है। यदि यवन से -हीम-कान्य] अर्थ -एक दिन संध्या के समय में याग में गया था कोई मगशावक- यिनी स्त्री फूल तोड़ रही थी। उस शशिमुसी नग्यापना को देख कर मै मोह में जा पा । है प्रिये सुन । तेरे गिना में न नीउँगा ! नत , हे मिर। - किस प्रकार मुझे मिलेगा। प्राप्य चलानधिकारान् शत्रुषु मित्रेपु वधुवगपु । नापत नोपस्त नोपरन्तं कि मृत तेन ॥ ७॥ अर्थ-चचल ( अस्थिर ) अधिकारी को पाकर यनि शसुओ का भएकार न किया, मियो का उपकार न किया भार भाई बंधी का भी उपरार न किया तो उसने क्या किया अर्थात् कुछ नहीं किया । अच्युत चरण तरङ्गिणि, शशि शेखर मौलि मालती माले। ममतनु वितरण समये, हरता देया न मे हरिता ॥८॥ भयं-रहीम गंगाजी से प्रार्थना कर रहे हैं कि विष्णु भगवान चरणो से प्रवाहित होनेवाली है गरें । मुझे तारने के समय शकर नाना, जिससे मैं तुम्ह मिर पर धारण कर सा, विष्णु मत पनाना । 'भगति मुनिकन्ये तारये पुण्यवत, सतरति निज पुण्यैस्तत्र किन्ते महत्वम् । यदिह यवन जातं पापिन मा पुनीहि । तदिह तर महत्व त महत्त्व महत्वम् ॥९॥ के - " पाग० ९-१ सुर धुनि, २ पुण्यवत मुनीपे, ३ पुनातु ।
[रहिमन-विनीत AM- ---- उत्पन्न हुयं (मुम) पापी को तारो तो तुम्हारा महत्व भी है। यही मह महत्व है। पाठक मुसलमान होते हुए भी रहीम के य भाव कितने सम्म हृदयमाही ओर भत्ति-पूर्ण है।
टिप्पणियाँ दोहावली १-हेरान = खो जाना, लीन हो जाना । अर्थ- -यह तो सब जानते हैं कि समुद्र में यूँद समा जानो ह, पर बात थोडे ही जानते हैं कि समुद्र बिन्दु म ममा जाता है। अरा म कहते हैं कि इस आश्चर्य को फोन मि से वह, क्योकि खोजने व्य तो अपने आप ही में टीन हो जाता है। २-नगम्य (अ+गम्य) जहाँ तक किसी की पहुँच न हो अर्थात् चर। 3- कादि = किमको। ४-~-जननी-जठरः = माता का पैट। ५-~यामू - डैना, पर । याज = एक शिकारी चिडिया । साहेन । लिक, ईश्वर । ६च्याधि% रोग। भेपनम् दवाई। ७-~संतत = सदैव । सुधि = खबर । ९-दीन लप मर जगत का = दीन सम ससार को देखता है, भर्यात् व का मुंह ताकता है। मे। 10-उपादि- उपद्रव, झगड़ा । तिहि = उसने । यादि - व्यर्थ । ११ बरि - खली । गुरु गुह । गुलियामे गोली यनाकर । १२-जगत उधार कर संसार मे पार होका। १३-पूरन = पूर्ण । परम गति = मोक्ष । धोखे भाव से = भूल को-धाम = काम शोध आदि में सत्य मा रहने भी पूर्ण मोक्ष पा जाता है। पावत
८८
[रहिमन विनोद
१४-~-जम के किंकर = यमदूत । कानि = लिहाज, मर्यादा
१५---मुकरि - इनकार । मान-भिखारी।
१६-कही सुनै = कही हुई सुनते हैं
सुनि दुप हरै सुा कर दुख दूर करते हैं।
१७-नेवाज = रक्षक ।
१८-अर्थ-हे रघुबीर जब हाथी पर गाढ़े दिन थे, अर्थात् गजमाई
युद्ध में जर वह इयने पर था, उस समय आपकी ही उसने प्रार्थना का यी
वही (प्रार्थना) मैं इस समय कर रहा हूँ, क्योकि अच्छे दिनो के सभी मिय
होते हैं, बुरे दिन आने पर आप ही सहायता करते हैं।
फरी = कर रहा हूँ। करी की है। करी-हाथी । तीर = किनारा
यहाँ जल के किनारे मे मतलब है। गढ़े दिन = अच्छे दिन । गाढ़े दिन में
बुरे दिन ।
१९-अर्थ-हीमजी अपने ही को संबोधन करके कह रह
कि-हे रहीम ' तू ने अपो मन को सुन्दर चकोर बना डाला है । चको
सदैव चन्द्र पर दृष्टि रखता है और तेरा मन-चकोर श्रीकृष्णचन्द्र
लगा रहता है।
चकोर
= एक पक्षी का नाम है । यह अपने दो गुणों के लिये कवि-
जगत् में प्रसिद्ध है । एक चन्द्रमा की ओर देखना दूसरे अंगार खाना ।
२०-पत- इज्जत ।
ज्वारी = जुआ सेरने वाला, श्री कृष्णजी ने शकुनी और कारवा
जुआरियो से पांडवों की रक्षा की थी।
चोर = ब्रह्माजी । उन्होंने ग्वाल बालो मार गायों का हरण किया था
जिनसे उन्हें श्रीकृष्णजी ने ही छुडाया था।
लवार = दुशासन आदि इन कोरवों से द्रोपदी की रक्षा की थी।
प्पणियाँ]
८९
.
छत रक्षामजी कहते है कि ऐ मनुलासससार रूप जल-प्रयाह में पारीर
सनौका कर्मवश यही जाही।
२१-अर्थ-रहीमजी कहते हैं, यह सभी जानते है कि रक्ष्मी
चला है । क्यो न चचल हो, आदिपुरप (नारायण) की स्त्री है न
वृद्धावस्था में निराह करनेवालो को इससे शिक्षा ग्रहण करनी
हिये।
पुस्प पुरातन = आदि पुरप (नारायण)
२२-फजीहति = दुर्दशा ।
नोट-पर स्त्री या पूज्य स्त्री को अपनी स्त्री समझनेवालो की
अवश्य दुर्दशा होती है।
पाठक २१, २२ न० के दोहों को ध्यान पूर्वक देखेंगे तो
ता चलेगा कि जो भाव व शब्दो का भोज २१ न० के दोहे मे है वह २२
10 के नोहे में नहीं है। सभव है यह रहीम का न हो, किसी अन्य कवि
का हो~अर रहीम की छाप आ जाने से रहीम की सम्पति मानी
२३-अर्थ प्रश्न यह है कि चन्द्रमा म श्यामता क्या है इसके
उत्तर में रहीमजी कहते हैं कि चन्द्रमा के नीच सानान को तो देखो।
इसके बाप का कोई पानी तक नहीं पीता है । यह तो पूरा स्याह धन्या
की होता अगर इतने स्तों को न पहुंचता । यह यहा आदमी हो गया है,
आकाश तक इसकी पहुंच है, इसमे स्याही घुल गई ह, पर असलियत कहाँ
भावे । कुछ श्यामता अब भी शेष है।
तेहि के गइल भकास हो = उसकी आकाश तक पहुंच है।
२५-अर्य-नाव जल प्रवाह के साथ तो आसानी से यही चली
आती है पर प्रवाह के विपरीन ले जाने में उस रस्सी मे खींचना पड़ता है।
इस मोर (परमात्मा की भोर)
।
बाती हो।
-
[रहिमन विनोद -~-- - पाँच अर्थात् मन रस्सी को परमारमा मे बाँध (रगा) और फिर इस शरीर रूप नौका को यजाय ससार प्रवाह में बहने देने के परमात्मा से मिला। उहि भोर = उस ओर अर्थात् परमात्मा की ओर । जल में उस नाव ज्यो = जैसे जल प्रवाह के प्रतिकूल नाव चलाने में । गुन = रस्सी। २६-अर्थ-जहाँ अहकार (अहम) होता है वहाँ परमात्मा का बाम नहीं होना आर जहाँ परमात्मा का यास है वहाँ फिर अहधार नहीं रह सकता । अत रहीमजी कहते है कि रास्ता तग है दोनों का गुजर, एक साथ नहीं हो सकता ! आप, आपन = आपा, अहंकार । २७---आन = आर, दुमरा । बिलग-अलग। -अर्थ-कवि ने इस दोहे म नीन भावो पर सुलनात्मक विचार दिया है। देखिये रहीम कहते हैं कि यदि में आँसों में भजन लगाता हूँ, अर्थात् आर्य भाव से ईश्वरोपासना करता हूँ तो कष्टसाध्य है ( यहाँ कवि का आशय योगादि क्रियाओ से है जिफा प्रयोग करना कठिन होता है, में लगाने से कुछ किरकिरापन भी माटम होना है), और सुरमा लगाना है, अर्थात् मुसलमान प्रणाली से आराधना करता हूँ तो मन अनिरम प्रकट करता है, अर्थात् ठीक ढग प्रतीत नहीं होता। भत जिन नेतों से हरियाली अर्थात् हरि (भगान) के दर्शन होते हैं उन्हीं नेसो पर में निछावर हो जाता हूँ। विशेष-अजन, सुरमा और हरि (हग्यिाली) तीनों नेसो की सुख कारक वस्तुएं हैं । अजन और सुरमा का सूक्ष्म रूप होता है अत आँखें में लगकर दिखाई नहीं देते हरियारी स्पष्ट टिगोचर होती है और उसको देखकर आँखों को शान्नि भी मिलती है। हरियाली को वैद्य भाग डाक्टर दोनों ने आँखो के लिये उपयोगी बताया है। अजन ऑस्यों
स्टेप्पणियाँ]
1 इस भाव से लक्षणों द्वारा सगुण हरि की उपासना को निर्गुण ईश्वरो-
-नामना (चाहे वह आप प्रणारी से हो अथवा यागी प्रणारी) मोना मे
इत्तम टहराया है।
रहीम के अन्य क्यनी से भी इसी भाव की पुष्टि होती है।
अर कवि की तीन दृष्टि का तो विचार कीजिये कि इस छोटे मे
एक दोहे म ती प्रकार के महान सिद्धान्तों पर सुलगात्मक विचार करके
अपनी भावनानुसार अतिम निर्णय कितनी सुन्दरता से कर दिया है । कविता
के भाव की उत्कृष्टता चरम सीमा को पहुंची हुई है।
अंजन = सस्कृत आप शन्द ओर आँखो में एगाने की एक दवा का
नाम है जो काजल आदि से बनाया जाना है ।
। सुरमा = पारसी भाषा का शब्द ह, यह भी आँखो में लगाया
जाता है।
। हरि-पाराणिक सस्कृत शब्द है और यही हरियाली भार भगवान दोनों
अर्थों में प्रयुक्त हुआ है।
३०-अर्थ -जय प्राण समाधिस्थ होकर पविय परा के अन्दर जाकर
लग पाते हैं तर तीनो वृत्तियों (पश्यन्ति आदि) निश्चर हो जाती हैं आर
मन, बुद्धि, अहकार शुद्ध होने से आत्मा ब्रह्मानन्द को प्राप्त कर पवित
कवि के उच्च कोटि के वेदान्त ज्ञान को तो देखिये '
रिय-वह अवस्था, जिसमें जागृति, सुप्ति और सुषुप्ति तीनो का
हो जाता है।
मल हो अर्थात् समाधि ।
तियः
कम-पवित्र ।
परा--
तीन (पश्यन्ति, मध्यमा, थैसरी)।
-
-तीनों गुण ( सत, रज, तम ) मे रहित ।
८
२२ [रहिमन-पिनहे Arrrrrr- . . ३०-अर्थ-रहीम जी कहते हैं धर्म के लिये पड़कर अपना शरीर नपा देना, मर जाना भार कठिन कलेस सह लेना अच्छा है क्योंकि यह तो आप का उपदेश है । पर क्षमा कीजियेगा प्रभो । धर्म पर सब कुछ अपंग करनेवाले राजा बलि को आपने 'बामन' रूप धारण करके छला। प्रमों, आचरण द्वारा आपने यह अच्छा उपदेश दिया । कैसी मधुर चुटकी है । "ऊच निवास नीच करतूती" वालो की कैमी- मोठी भर्त्सना है । "पर उपदंश कुसल बहुतेरे, जे आचरहि ते करने घनेरे" का क्या ही मार्मिक चिल खींचा गया है। ३३-अर्थ-रहीमजी कृष्णचन्द्रजी को उपालभ देते हुए कह से, हैं कि मोहन ! यह आपकी प्रीति की रीति अनोखी है। आपकी प्रीति- क्या है, आकाशी दिया है। अपनी ओर खींचने से आप दूर भागत है। परन्तु ढील दिसाने से आप पास ही आ उपस्थित होते हैं, अर्थात् जय मल आप मे मिलने का प्रयत्न करता है तब आप दो नहीं देते हैं और जैस ही वह आप मे सिंच बैठता है, आप सामने आ उपस्थित होते हैं। विशेष-कहते हैं कि रहीमजी एक बार कृष्ण-दर्शन के लिये वृन्दा यन गये थे पर मुसलमान होने के कारण इन्हें मन्दिर में नहीं घुसने दिया गया । अत्त यह क्रोधित हो घूमकर बैठ गये। तन श्रीकृष्णचद्रजी ने इन स्वय दर्शन दिये जिस पर इन्होंने यह दोहा कहा था। घसदिया = आकाशी दिया, कार्तिक मास में रोग प्रत्येक रातिको एक खड़े हुये औंस के ऊपर डोरी के महारे दिया टाँगते हैं। यह दिया होरी खींचने से ऊपर चढ जाता है और डोग दीरी करने से नीचे आ जाता है। ३५-अर्थ---जय इन्द्र ने ग्रज पर कोप करके मूसलाधार जल भर साना प्रारंभ किया था तब श्रीकृष्णचंदजी ने गोवर्धन पर्वत उठाकर
प्पणियाँ]
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९३
।
इसके नीचे मज-वासियो की रक्षा की थी, पर अब यही प्रज-रक्षक श्रीया
बदनी प्रन को त्यागकर द्वारफा जा बसे तो प्राघालाभा की ओर से
उपाएम देते हुए रहीमजी कहते हैं-हे गोपाल (कृष्ण) भगर मज
की पेमी ही अवस्था करनी थी अर्थात् सूना ही छोड़ना था तो गोवर
पहाइ उठाकर पहले उसकी रक्षा ही क्यों की आपका कष्ट उठाना व्यर्थ
था और हम से यह कष्ट उठाया नहीं जाता।
हवाल - दशा । नाहक = व्यय, मिला प्रयोजन
३५-पूर - चढ़े हुए, रकग्ने हुए।
३६-अर्थ-रहीमजी कहते हैं कि मनुष्य इस शरीर के मोह को
छोड़ सकता है जिसमें नेस रूपी दो दीपक सदैव जलते रहते हैं भार
नप्रभा मे सासारिक पदार्थो की मुग्धकारी छटा का ज्ञान कराते रहते
नव कि एक दीपक अधकार का नाश करके दीपक-युक्त स्थान के सन
या को प्रकट कर देता है।
३७--मनुआ-मन । नॉयनहीं।
३८-मनुष्य को इच्छाओं का दास नहीं होना चाहिये ।
मनसा = इच्छाएँ।
नोट-पाठक नं. ३० और ३८ के दोहों को यदि ध्यानपूर्वक
ग तो पता चलेगा कि जो शब्द-योनना न भाव की उत्कृष्टता न० ३८
दोहे में है वहन. ३७ के दोहे में नहीं । सभव है, न० ३७ का दोहा
म का न हो।
३९-केतिक = कितनी । विहाय = व्यतीत होना ।
मन-मृत्यु-समय ।
१०-भेपजापधि । समरय%
समर्थ ।
-मार = गोझ (माया का यधन) । भार = माड, आग की भट्टी
[रहिमन विनोद ९४ जैसे ही हवा और मिट्टी की गाँठ खुली फिर केवल मिट्टी ही मिट्टी रह जाती है । रहीमजी ने यही भाव मनुष्य शरीर पर घटाया है जिसमें स्थ मिट्टी आदि का सयोग ह । पाठक कवि की पैनी निगाह को तो देखिये ४५-पूतरा पुतला । वाय% वायु, हवा । नमीसील, सर्दी नोट- :-०४४ ओर ४५ के दोहे समानार्थक है।न० ४५ भरती का ज्ञात होता है । सभव है, यह रहीम का न हो। ५६--अर्थ-देव, गधर्व, इन्द्रादि लोक केवल भोग्यलोक माने है, अर्थात् वहाँ पर जीव अपनी रणियों का फल भोगते हैं कुछ कर्म करते हैं । परन्तु यह ससार, जो मृत्युलोक कहलाता है इसमें प्राणी भो भी है और करता भी है, इसीसे इमको कर्मक्षेस भी कहा है। देवादि भी पुण्य क्षीण होने पर इसी लोक में जन्मते हैं । कम होने के कारण इसी लोक से मुक्ति मिल सकती है और लोकों से न इसीसे रहीमजी ने कहा है कि यह संसार एक वाजार है जिसम -अर्थ-रहीमजी कहते हैं कि घरण छुए अर्थात् अनेक प्रकार से अनुनय विनय की आर मस्तफ दुये अर्थात् सासारिक मान प्राप्त कर विचार स्यिा परन्तु माया ने पिण्ड नहीं छोड़ा। जैसे ही ईश्वर न हृदय छुआ अर्थात् ईश्वर ने हृदय में यास किया वैसे ही माया ने साथ छोड़ दिया। माया ईश के आधीन है। ४३-धरि मिट्टी। पूरि% पूर्ण। विशेष-यहुधा ऐसा दृष्टिगोचर होता है कि हवा और मिट्टी को एक गाँठ सी धंध जाती है । इसे लोग यगृला या यवटर कहते हैं । यह बहुत । दूर तक चकर साता शीघ्रता से उडता चला जाता है, आस-पास के तिनक आर कागज आदि भी इसके चक्कर में पड़ कहीं के कहीं जा पठते हैं, पर अर्थात् अनुचित कार्य का परिणाम अच्छा नहीं। इसी से रहीम जी कहने टिप्पणियाँ] ~~ नाधिका के उर पर फल (कुच) लगाये तब इहैं देखकर कृष्णजी के उर कर पाले।मो भी पक यहाँ तो दूसरा वहाँ। पुण्य ही सौदा हैं । अस ऐ मनुष्यो । जो सोदा तुम्हें मरीदना है अर्थात् जो 'कर्म करने हैं कर ले। आगे जाकर फिर सोदा नहीं मिलेगी और रोका में सो केवल भोगना ही भोगना है। रास्ता भी दूर का ते करना है । न जाने फिर कय इस कर्मक्षेत्र में आने का माभाग्य प्राप्त हो । सादा - चीज वस्तु अर्थात् पाप पुण्य । हाट याजार अर्थात् जगत । याट रास्ता । ४७---अर्थ-रहीमजी कहते हैं-इस संसार में दिन-रात धूच का नगाहा यजता रहता है आर हर घड़ी इस पडाव मे मुसाफिर कूच करते हते हैं। इस संसार में आर क्या कोई अब तक मुकाम करपे हरा हुआ दिखाई देता है ? यह जगन् तो आवागमन का क्षेत्र है आठो जाम = आठा पहर अर्थात् दिननात । ४८-अर्थ- -मसार में यही नियम दृष्टिगोचर हो रहा है कि पहिले पल लगता है नय उसी जगह फल लगता है। पर रहीमजी ने इस दोहे में अमगति अरकार की अनोखी टा दिपलाई है। रहीमजी का भाव रहीमजी कहते हैं कि काम माली ऐमा चतुर है कि पहिले उसने में पूल ( आनन्द्र) हुआ । यही तो चमत्कार है कि फल पहिले लगे और ५०-~-कुची का अप्रभाग ( मुस) कालरा क्या होता है ? - सुनिये रहीम में सुनिये जो अनुचिन कार्य करनेवाले हैं वह अत में नागो हो ही जाते हैं ९६ [रहिमन विनोद -- - । है - हैं कि कुच दूमरों के हृदयों को येधते (सारते ) है अव उनका मुन्न काला होगा ही चाहिये। भक = पाप, अपराध, चिन । परिनाम - अंत ५०-~-रहीमजी कहते हैं मन-महाराज का आँखो के समान दीवार ओर कोई नहीं है। आँखें जिसे देखकर रीझती है, घम मन-महारान में उसके हाथ यिक ही जाते हैं। ठीक ही है। नफे-नुकसान का जिम्मेवा दीवान है, मन महाराज तो कौंस्टीट्य शनल महाराज हैं। ५३----रहीमजी कहते है कि मेसो में तो नमक है और अधरों में मधु । अत दोनो में किसको कम दरजे का यतलार्वे यह जरा टेढा सवाल क्योकि मोठे पर नमकीन अच्छा लगता है भोर नमकीन पर मीना । एव से तृप्ति नहीं होती। दोनो चाहिये दोनो। ५४-बाँकी चितयन = तिरछी नजर । गर्मी - जलन, तार पाठक देस, कवि ने कटाक्ष के वर्ग में कैसा कमाल किया है। सलोने = सुन्दर, नमकीन ५५-सूर्योदय होने पर कमल बिकसित होकर पितहि (जल अपुनी पखुडियों से ढककर सूर्य-ताप से रक्षा करता है और चन्द्रोदय हो पर सिकुड़कर उपे (जल को ) चन्द्र किरणों को शीतलता देकर आनन्दि करता है। सुपूत कमल तो अपने पिता के सुरस हेतु ही विकसित होत भोर सिकुड़ता है --उसका न कोई शलु है और न मिस । कवियों ने सूर्य को कमर का मिस और चंद्रमा को शतु माना है, ' रहीमजी की उक्ति सम से निराली और अनोखी है। कुल-कमल र श्रेष्ठ, सुपूत । ५६-साहि के जानबूझ कर । बेसाहियो = साहना, खरीपन मोल लेना चैन = आराम । को ,
९
७
,
'यहा विचारणीय समस्या है।
हो गये।
सिवि काशी के राजा थे। यह यश-स्था में आये हुये कवृतर के रक्षार्थ
टिप्पणियाँ ]
५५-विरहिणी नायिका के हृदय यो विरह ने अधकारमय बना
दाल है। अवधि बीतने पर नायक से मिलना होगा, यस यही एक आशा
उसके अंधेरे हृदय में रहनहकर चमक जाती है। जैसे भादा की अंधेरी
रात में रह रहकर जुगनू चमक उठते हैं।
विरह अधकार के धनत्व को आशा-खद्योत कहाँ तक दूर कर सकती है,
६०-सुलगे = जले । बुझि-शि-४ हो होकर । बुझि गये = ठड
६१-भस्म को लोग पानी में घोलकर रगाते हैं, पर यह सूखकर
लाहुए स्थान को भी रूखा कर देती है। इसी से रहीमजी कहते हैं
कि यह मन तो यनाय ( यिएकुल) जल भुनकर भस्म हो गया है
क्यांकि इसको जिससे लगाइये वही रूखा हो जाता
बनाय% यिर कुल।
६२-विलोकतहि = देखते ही । थायो - थक जाता है।
तारहि = देवते हो। आप-मन के लिये कहा है ।
६४-सम्पति सुचहि - धन इकट्ठा करते हैं।
६५-चाटनगरी% पीसनेवाली।
६६-पार यीच = आलस्य करना, दील डालना । महावरा-वीचु न
नरे पाव
सिवि आर दधीच की कथा पुराणों में विस्तार पूर्वक वर्णन की गई
-
maamuktav
अपना सिर तक देने को उद्यत हो गये थे' तर भगवान ने प्रसन्न हो इन्ह
पने लोक भेज दिया था। दधीचि मुनि थे। इहोंने देवताओं के
[रहिमन विनोद
।
+
-
रक्षार्थ अपना शरीर त्याग दिया था। इनकी हड्डी सेवन बनाया गया जिम
से लासुर मारा गया था।
६७-गादे = कठिन समय में था - यामती हैं, 'खड़ा रखती हैं।
बरहि = बरगद को।
बरेह - वट-वृक्ष की जटाओ को बरेह कहते हैं।
६८-गोत- वश । ब्रहरी-बड़ी ।
६९-मृग- हरिण, चन्द्रमा के रथ में हरिण जुते हैं। सनत -
सोदते है।
वाराह - सुअर । पुराणों में वाराह के दाँत पर पृथ्वी स्थित यतलाई
गई है।
७०-धीम = कम, न्यून । रचै = अन्छा लगना ।
७१--नाद - स्वर, गाना। रीझि= प्रसन्न होकर ।
७२--दर दर = दरवाजे-दरवाजे । मधुकरी-सात घर से गाने के
लिये माँगने की वृत्ति को कहते है।
विशेष---ऐसा ज्ञान होता है कि यह दोहा कवि ने नादशाह की
अप्रसनता के समय जब वह दीनावस्था
याचको ये कहा था।
७३-~दानिदानी । दरिद्र तर = दरिद्री से दरिद्री । सनावत
खुदवाते हैं। मरितन सूनी परे - नाटियो के सूख जाने पर।
विशेष-नदी जन सूस जाती है तो उसके तट वासी उसकी धार
गढ़े सौद लेते हैं। उनमें पानी निकलता है, जिमको वे अपने काम में रा-
हैं । कवि ने इन्हीं को कुआ अताया
इस दोहे से रहीम के भाव दानी के प्रति कितने उच्च ज्ञात होते हैं
७४+वल शारीरिक बल में रश्मी प्राप्त नहीं होती। लक्ष्मी मा
अपना निर्वाह कर रहा था
टिप्पणियाँ]
का काम करता।
गरण कर राह ने अमृत पी रिया तर भगवान ने चक्र से उसके दो
लिये ओर भी साधन चाहिए । अगर ऐसा होता तो क्या भीम
के समान वली पुरप राजा विराट के घर अपना पेट भरने के लिये रसोइया
जर पाँचो पांडव १३ वे वर्ष गुप्त भेष में राजा विराट के यहाँ रहे थे
तब भीमसेन ने रसोइया का रूप धारण किया था।
७५-सुहाइ - अरछा लगना । रु = चाहे ।
७६-समु भये जगदीस-समुद्र मथन के समय सरसे प्रथम
लाहल विप निकला था जिसकी गर्मा से संसार में साहि त्राहि मच गई
ग सब महादेव जी से प्रार्थना की गई उन्होने उमे पी लिया और जगदीम
राहु कायो सीस-अमृत वितरण के समय जर छर मे देवता रूप
कहलाये।
किडे कर दिये जो राहु तथा केतु कहलाय ।
७७-रहिला-चा।
५८ ८ पानी = मान, जल, आय। सून - सूना, शून्य । ऊचर = अन्या
त होना।
७९-समूच - पूरा पूरा, यथोचित । दौल = कमी।
८०-ययान (प्रयाण) = प्रस्थान, चरने का उद्योग ।
८१-भरम = प्रतिष्ठा, गौरव । गँवाइ के = सोकर ।
६२-धीम = लुप्त । प्रभुता - ऐश्वर्य, बड़प्पन ।
= पास । बसे रहे कछु नाहियने रहना व्यथाह ।
८५-घर-घद । खेत क्षेत्र, भूमि ।
८६का घात - क्या प्रात । चियरन = फटे कपड़े। मोहात
-
%3D
[रहिमन विनोद
८७-युग्म सहि जिये क्लाइ = घुस सह फर कभी न जीना चाहिये।
महावरा-"दुख महकर मेरी या जिय"
--अर्थ-रहीम जी कहते है कि है मजनो, पन्नगलि और
पतियता स्त्री से रति (प्रेम) की इच्छा फरना यहा ही नाजुक है।
तुपार के प्रेमालिंगन को सहा न करके पन्नगरि वैचारी स्वय जल
मरती है। परन्तु सती मे क्लुपित प्रेम की इच्छा करनेवाला पुरप ही मम्म
हो जाता
.
निकलना । पार= पाद,
रति = प्रेम - इरछा । पन्नगलि = पान की चेलि । सत= सतीत्वपन ।
दहियान = जलनाता है।
८९--कादिये-शिकालिये । भेद = रहस्य ।
९०-प्रमान = मर्यादा । उमदि चल = उमड़ चरना, बद कर मह
किनाग।
९१-अति = ज्यादती, मर्यादा का उल्लंघन । कानि = मर्यादा ।
अर्थ-रहीमजी कहते है कि मनुष्य को अति कभी न करनी
चाहिये। अपनी मर्यादा पर सदैव कायम रहना चाहिये । देसो सहिजन के
वृक्ष में फूट बहुत आते हैं जिसका परिणाम यह होता है कि लोग अप
शन समझकर डाल-पत्तो-समेत काट डालते हैं।
९२-अघाय%3D अधाकर, पेट भर के ।
९३-रहीम इस दोहे में कटुवादियों की सजा तजबीज करते हैं।
९५-कुल्हार = कुल्हारी । दक = टुकड़ा । कसकत रहै - सालती
रहै । हूक = आन्तरिक दुस।
९६-भोग= भोजन । सफरिन = मछलिया से। यक बगुला ।
१४--राजा तो गुणियों को छोटा समझता है और गुणी राजा के
छोटा समझते हैं, परन्तु रहीमजी कहते हैं कि ऊँचे आकाश में लेकर
नीची पृथ्वी तक देखो तो मा एक ही माया है अर्थात् उस परमात्मा की
टेप्पणियाँ]
६०१
गोडा
-
.
गच इस प्रकार सहराई रहती है कि इसके दोनो छोर यारी बारी से नीचे
उपर हो सकते हैं। इसके एक छोर में मिट्टी छोपी या पत्थर दधा रहता
है और दूसरा छोर जो कुएँ के मुँह की ओर होता है, डोली की रस्मी
यी होती है। यह मिट्टी या पत्थर के बोझ से डोल कुएं में मे याहर
और घड़िया का पानी अपनी ओर न ढालकर दूसरी ओर हालते हैं, अत
तसा का ही घमरकार है। यहाँ न कोई छोटा है भार न कोई बड़ा । उसी
रमामा ने किसी को राज दिया है और किमी को गुन ।
९९-नियहत = निराहना, पूरा करना । मैन-तुरग = मोम का
--मप्राव = मझयाना, चलना । डिगिहा = गमगेही, हिलोगे।
101-धागा - ढोरा । चटकाइ = चटकई, जल्दी।
१०२-मछली का प्रेम पानी मेह, अत मारकर काटे जाने पर जल
ही स्वछ होती है और पकाकर खाये जाने पर भी (प्यास के मिस)
गनी ही की इच्छा रसती है।
१०३-हरदी आर चूना मिलकर लाल रंग ग्न जाता ।
१०४---अंगवहि
झेलते हैं, अपने ऊपर सहते हैं।
१०६-सानि:
= भंडार । रम = रस, आनन्द । प्रीति में गाँठि ही
१०७-लेन देन के प्रीति = बजारू प्रीति । यानी= दाँव ।
-टेकुली = सिंचाई के लिये कम गहरे कुए मे पानी निकालने
एक यस जिसमें एक ऊँची लकड़ी के ऊपर एक आदी एकडी यीचा
सूचना-देकुली छोटी-छोटी क्म गहरी कुइयों में चलायी जाती है
हानिकारक है।
भाता है
।
१०२ [रहिमन विनोद पड़ -- Tww दूसरी ओर बैठे मनुष्य की ओर से ढालनेवाले के प्रति यह उक्ति है। पाठक देखें दृष्टान्त का कैसा अच्छा दिग्दर्शन कराया गया है । १०९-रेत- वाल ११०-टेरि = पुकार । हेरि = दिखाई देता है। १११-जब कटु अटकै काम = जब कछु काम -मडये–तर के गॉठि = विवाह-मडप के नीचे वर वधू वन को मिलाकर जो गाँठ लगाई जाती है। भाठ गॉठि = सम्पूर्णरूपमे, मग तरफ से । आठ गाठि एक महावरा है। खुशहाल व्यक्ति आदि के लिये इसक प्रयोग निम्न प्रकार करते हैं "भाई फलाने का बनौका आठो गाँठ बना है। खुरे भाव में भी प्रयोग करते है "आठो गाँठ कुम्मत ह" ११३-सरवर = बरारी, समता । चातक - पपीहा । प्रेम पपीहा का सा होना चाहिये । ११४-वर्षा मस्तु में कोयल का मोन साधना ( न बोलना) तं सभी जानते हैं पर कहना कवि हो जानते हैं। देखिये, रहीमजी कोयल न बोलने का कारण दादुरी का वोएना बताते हैं। कैसी रहस्यमर सोज हे पावस = वर्षास्तु । दादुर = मेंढक । वक्ता बोलनेवाले। ११५-रहीमजी कहते हैं कि मन्द प्रकृति के लोगों को मारने से र्भ उनके अवगुण गुण में परिणत नहीं हो जाते । जैमे याध को फूटने उसकी पेठन पक्की पड़ती है भार वह पढ़ता भी है। ऐव जाता नहीं, उल्ट पपा पड़ता है और यदता है। पाठक देखें, अपर के मेनापनि आर वजीरे आजम की पैनी निगाह कहाँ तक पहुंची है। ।
टिप्पणियाँ] सिराहि होना, बन पड़ना । बाध - मूजकी दोरी, वान । मुरहा- ऐठनदार । मुरहा है - एठनदार होकर । अधिकाहि बढ जाते हैं। विशेष-"भूज बकोठा और गवार, जैमोइ कूटो तैसाइ सार" अर्थात् . मज को जितना ही कूटो उतनी ही वह मुलायम हो जाती है। इसी से यान बनाने के लिये मूंज को सूब फूटते हैं, फिर उसमे यान बटते हैं। यट जाने पर पानी में भिगोकर फिर कुटते हैं जिससे घटने से जो ऐंठन पड़ती है वह इफसॉ बैठ जाती हे भोर रस्सी पक्की हो जाती है। और ऐंठन के कारण जो शिकन पड़ी हुई होती ह यह निकल जाती है आर यान बद्ध कर अपनी पूरी लम्बाई को प्राप्त हो जाता ११६---सद्ज धरि साइ स्वभावही से काट खाते हैं, अर्थात् काटना प्राकृतिक गुण है। ११७दिया = दीपक । नांद = चौपार्यों के चारा रखन का बर्तन, व्याह पादियो भादि के समय इस धर्तन में कदी अथवा साग-तरकारी भी रखते हैं। विशेप युम्हार मिट्टी को अरछी तरह बनाकर चाक पर रसता है। चाक में एक देव होता है। उसमें एकड़ी डालकर पहले वह खूब धुमा देता हे जिसमे चाक देर तक चक्कर काटता रहता है और चाक के घूमते समय उस पर रक्खी हुई मिट्टी से मन चाही चीज यना लेता है। ११८-मृगया अनुराग-शिकार से प्रेम । भ्रमत = घूमता फिरता है। ११९-पत्थर को पानी में डालने वह भीग तो जाता है परन्तु अन्दर से तर नहीं होता ( गलता नहीं)। भत रहीमजी कहते हैं कि यही दशा की भी है। उसकी अक्ल पर सदा पत्थर ही पड़े रहते हैं। परन्तु उसकी ज्ञान दृष्टि को सूझता कुछ भी नहीं, बाद कोई लाभ नहीं उठा सकता। . । m
१०४
[रहिमन विनोद
-
।
पपान - परधर । सी सीझा, तर होना । समझना ।
-दिसना।
१२००-कचन = बालो । विससि (विशेष) अधिक
१२१-होमजी पेट को सरोधन करके कहते हैं कि-भई पेट,
तुम पीठ होते तो अच्छा होता, क्योंकि भूखे रहने से तो तुम लोगो में
स्वाभिमान का नाश करते हो और भरे होने पर दृष्टि को बिगाइते हो
अर्थात् जिनको माल-मसाला साने को मिलता है वह पर स्त्रियों पर
कुदृष्टि डालते हैं और जिन्हें पेट भर खाने को नहीं मिलता वे मान-मर्यादा
का ख्याल न करके इधर-उधर बोस कान्ते फिरते हैं।
१२२-~-रहीम जी कहते है मैंने इस पेट को बहुतेरा समझाया कि
अगर तू बिना ग्वाये रहे तो किसी की क्या मजाल कि नाराजगी दिखावे ।
सच है, यह पेट ही सब कुछ सहाता है।
अनखाये -यिना खाये । अनखाय = नाराज हो।
१२३-हाथी के दो दाँत निकले होते है यह तो सभी जानते है, पर
उन्हें शिक्षा की सामग्री बनाना कवि ही जानते हैं
रहीमजी कहते हैं कि बड़े पेट के भरने में दुख भी बड़ा उठाना
पढ़ता है । देखो न, यद्दे पेटवाले हाधी ने इमी दुख से दहल कर दो दाँत
बाहर निकाल दिये हैं। बेचारा करे क्या, पढ़े पटवारा ठहरा
= घपड़ाकर, दहल जाकर ।
टाँत निकालना टीनता का द्योतक होता है।
१२४-रहीमजी कहते है कि शिकार पर छोड़े हुए बहरी और बाज
आकाश तक चदकर फिर क्यो नीचे गिरते है? स्वतसता प्राप्त करके फिर
क्यों उसे खोते है ? क्या करें येचारे । पेट यड़ा पापी है। पेट के लिये
-
१०८ पचे मेसकर यावरा मत बन, अर्थात् अधिक गव मत कर, हाथियों के टिप्पणियाँ] फिर वधन में भार पड़ते हैं। (शिकार म से शिगारी थोडा हिस्सा उन्हें भी देता है) १२५--का-कुछ। काज सरे = काम पूरा होने पर । भंउरिन - भाँवरे, फेरा । सिरावत = मिरा देते है, डाल देते है, टका कर देत है। प्रयोग- मुमट सरीर नीर धारी भारी भारी जहाँ सूरन उद्याह कूर कादर डरत हैं। 'तुलसी' २६--पूर- निकम्मा, अकर्मण्य, सुस्त । १२७---अन्तरदाव = भीतरी आग, हृदय की जलन । जिहि = जिस पर। १२८-~-हति = जलाती है। १२९-मुसलमान लोग पुनर्जन्म नहीं मानते हैं, अत रहीम ने पुनर्जन्म को इस रूप में सिद्ध किया है कि स्मृति हो आने से ध्यान में उसका चित-रूप नेत्रों के सामने आनाता है। अवतार में प्रत्यक्ष शरीर होता है और स्मृति में संकल्प शरीर । १३० कृष्ण को गिरधर कहना भरि हनुमान को गिरधर न कहना दुनिया की चाटुकारिता का प्रमाण है। १३:--रहीमजी कहते हैं कि अरे अड | अपने चिकने चिकने धक्के और कुल्हाड़ी की चोट सहनेवाले वृक्ष दूसरे ही होते हैं। कैमी अच्छी अन्योक्ति है। मोह: = उन्मत्त होना, पागल बनना । कुल्हदिन दका:धका। %3D १३२-जब वृद्धावस्था में बाल सफेद हो जाते हैं तो बहुत से १०६ [रहिमन विनोद । शाकीन पिजार लगाकर उन्हें काला कर लेने हैं। ऐसे ही शौकीनो को लक्ष्य करके रहोमजी ने लिखा है कि अब थोड़ी सी जिन्दगी के लिये कौन मुंह काला करे। काला मुंह तो उन्हें करना चाहिये जिन्हें दूसरे की स्त्री छलना हो या बुढ़ापे में व्याह करने की हविस हो । देखिये, केमा चुभता हुआ व्यग है। कौन करे मुंह स्याह = काला मुंह कौन कर अर्थात् मिजाव कौन लगाये। १३३-ससारी माया के चकाचौंध में अधे बने मनुष्य सुन्दर दीनता के आनन्द को क्या जानै ? बेचारी दीनता कितनी अच्छी है कि मनुष्य को परमात्मा का स्मरण कराती है और अशरण शरण दीननधु को उसका अधु बना देती है। १३६-~-चारा = भोजन । छाला = साल जैसे मृगछाला । ज्यो- स्वर देइ-मृदंग के पुडो में आटा रगाया जाता है। 'जिससे स्वर अरछा निकलता है। १३७-यारे = जलाने से, लड़कपन में। बढ़े = बुझाने से, बडे होने पर। कवि की सूची तो देखिये । बारे ओर बढ़े-ले हिन्दी के शहरों द्वारा इलेप का निर्वाह किया है, जिसके लिये अन्य कवि सस्कृत शब्दों का आश्रय लेते हैं। १३८-बड़े = बरे, जरने मे, पढ़ा रहता है-जीवित रहता है। गये = न रहने मे नोट----स. १३७, १३८ को ध्यान पूर्वक देवने से पता चलता है कि न० १३७ के दोहे के शब्दों में रवि ने चोज पैदा करके जो अपनी प्रतिमा दिपाई है वह नं. १३८ के दोहे में कहीं है। उसके सामने सो यह दोहा फेवर भरती का जात होता है । मभन है, यह दोहा रहीम या न हो।
धाक:
होना चाहता है।
उसके उपर दाणी की छत बना दी थी जिसमे इन्द्र एक घुद भी पानी की।
टिप्पणियाँ
१३९-बलवान पुरयों को अपने यर का दुरपयोग कभी न करना
चाहिए । सदैव स्मरण रखना चाहिए कि परमात्मा ने यल दूसरों को पीड़ा
पहुँचाने के लिये नहीं दिया है । देगा, हाथी से अधिर बल किसमें होगा?
परन्तु यह कितना नग्न होकर रहता है-अपनी टीनता प्रस्ट करने के
लिये दाँत दिसाता है और नाक रगड़ता हुआ चलता है।
१४०-हाथी के सिर पर धूर डालने का कारण रहीमजी यह
पतात है कि हाथी वह रज ददा करता है जिसके स्पर्श मे मुीि-पनी
(अहिल्या ) ने मोक्ष पाई थी। उस रज का स्पर्श करके वह भी मुक्त
१४१-नात = सयध, नानेदारी। गडही- छोटी तलाई ।
पानि =पानी।
१४२-मोजी- आमदनी।
१४३-समाहिममाना, प्रविष्ट होना । वे परन = बिना पख ।
१४४-अनहोनी = जिसकी सम्भावना न हो। असाय = यस चले,
विशेष-ईश्वर पास रहता है और मिलसा नहीं।
१४६---गति शक्ति । को कौन।धा न जाने। केहि = किसको।
१४७-नमसर-पजर क्यिो- पृथ्वी से लेकर आकाश तक याणों का
अवमेष = अपीम, बहुत ।
अर्जुन ने अपनी माता की पूजा-हेतु ऐरावत हाथी को आकाश
सवाणों का मार्ग बनाकर उतारा था और खाइव वन जलाने के लिये
जोर घरे।
विरा बना दिया।
मदालसका
९
[रहिमन निनाद
१४८-रिलार माथा, भाग्य । बनारमी - बनारस के रहनेवाले।
मगहस्थान = काशी में गगा के उस पार को मघा की पाटी कहते हैं।
लोग कहते हैं, वहीं भरने से मनुष्य नरकगामी होता है।
१४९---इस दोहे की धनि में प्रकट है कि जीव कर्म करने में
स्वतस और फल भोगने में परतत है।
१५०-रहीम कहते हैं इसको सूत्र विचार लो । भावी ऐसी प्रक
है कि इसने मन को जलाया अर्थात् तग किया है आत हे, भगवान्
इस भावी को जल।
१५१-होनहार प्रबल होती है। तभी तो पाडव जैसे वली और
समृद्धशाली व्यक्तियों को भी वन में रहना पड़ा और महाप्रतापी शंभु की
अागिनी होकर भी पार्वती जी बाझ सुनी जाती हैं।
गणेश और स्वामिकार्तिक पार्वती के उदर से उत्पन्न हुए
माने जाते।
१५२-आपने हात-अपने वश में ।
१५३-विषया- वासना, मोह आदि ।
चमन करिके कर।
१५४--एटी-बुरी । घटि-नीच ।
१५५ यादि अधिक । मानसा-मानसरोवर ।
१५६--भुवन भरत -संसार का पालन करता है।
घटिहरी उल्क = उल्लू नहीं देस।
१५७--तोयवन्त = पानीवाले।
-विपान - सींग।
१५९-~-रहीमजी कहते है कि जिनको विधना ने ही बड़ा बन
दिया है, दूपण कहकर उनको कौन घटा सकता है। चन्द्रमा को क्षी
नहीं
dian
टिप्पणियाँ] १०९ +ManArmaan - - कहो, कुरड़ा कहो, परन्तु इसमे क्या दूषण होने पर भी तारागणो से नो वह बढ़ाही रहता है। १६०-पत्थर की भीत अरराकर बैठ गई । भर यही धोया है कि = कान परधर कहाँ किस काम में लगेगा । जो पधर एक साथ कधे से कंधा माये भीत म लगे थे वे अन क्या फिर मिलगे? भीत = दीवार । अररानी यहि ठाम = अरराकर उसी जगह बैठ गई। १६१-निकसति =निकलती है। नाहि = इनकार । १६-याचफता-माँगने की वृत्ति । यावन आँगुर गात से तात्पर्य बामनावतार से है जो यरि से मांगने के लिये भगवान ने धारण किया था। १६३---पंग = हग। १६४-लघुता = छुटाई, छोटापन । अनूप = यहुत । मख- यज्ञ। १६५-विलगाय = अलग हो जाता है। मीर = दुख, विपत्ति। १६६--सगे स्नेही, संबधी। कसौटी = एक प्रकार का काला पाया जिम पर सोना परसा जाता है। मिरता के परसने की कसौटी विपत्ति है। १६५-छोह = प्रेम। १६८---अन्त = अन्यय । माय-प्रेम भाव । कहा भार को भाय = भोरे का प्रेम भाव ही क्या है ? २७०-यदली केला १७१-उखारी: %D उसका खेत । रमसरा= उखारी के बीच में एक पोया जाता है जिसकता औल को सी होती है पर उममें रस नही होता है १७२-कगरी = शराय येचनेवाली। मदहि-शराम ही। म [रहिमन विनोद । । १७३--ओछे - नीच । मैना - इशारा । उरज = स्तन, कुच । उमे जाहि = उमेठे जाते हैं, पकड़कर मसले जाते हैं। १७४-नीर चुरा घरियार । प्राचीन समय में एक वन में पानी भरकर उसमे एक छिद्र-युक्त सम्पुटी (कटोरी) रखते थे। यह सम्पुटी और उसमें का छिन्द इस अन्दाज से बनाये जाते थे जिसमे कटोरी एक घटे में पानी से भरकर सूब जाती थी तब १ घटा माना जाता था ओर घडियाल बजाया जाता था अर्थात् पानी की चोरी तो सग्पुटी (कटोरी) करती है और पिटता विचारा घड़ियाल है। राजा-महाराजाओं के यहाँ अब भी इससे कभी २ काम लिया जाता है। सम्पुटी कटोरी । परियार = घटा। १७६-कारखा- कालोंच, स्याही। १७८--मुकुताकर मोती बनानेवाला। १७९---अंगार - जलता हुआ कोयरा । तातो गरम । सीरे-ठडे। १८४-देवरा - छोटा देव । पड़ो- भैंस का बच्चा । १८२--सरगपत्ताल % ऊँच-नीच अर्थात् भला-बुरा । कपाल-माथा, कपार । १८३-जानि परत-पहचाने जाते हैं, समझ पढ़ते हैं। --चुपकरि रहउ -शात हो जाभो । दिनन कर फेर दिनी का चार अर्थात् पुरे दिन। १८५--घरधूरा, वह स्थान जहाँ पर गाँव का कूड़ा करकट डाला जाता है। १८७--विन-धन हित- स्नेह । -स्त्रिया आम तौर से दीपक अचल-पट से ही धुझाती है। १८९-घटि - नीच । स्य-वारक-स्थ हॉकनेवाले, सारथी । १८४- .
टिप्पणियाँ]
ज्या लक्ष्मण
-
पाँच रूप पादव -पान जर तेरहवे वर्ष गुप्त रूप से रहे थे उस
समय पांचों भाइया ने अपने को छिपाने के लिये अलग-लग पाँच रूप
बना रखे थे। यह कया महाभारत में विस्तार पूर्वक वर्णित ह ।
रथ-वाहक नरराज - जय राजा नर जुआ में राजपाट सर हार गये
ये तर कुछ दिनों के लिये अयोध्या के राजा स्तुपर्ण के सारथी बन
कर रहे थे।
पारासर के नाज । इस कथा का कहीं
उल्लेख नहीं मिलता है
-मोर= सरा।
१९२-यधिक शिकारी । रधिरै - रधिर ही।
नोट-शिकारी हिरण के याण मारता है, हिरण भाग खड़ा होता है
पर शरीर में घुभे हुए परण की जगह से जो रक्त विदु रास्ते में गिरते
जाते हैं उनसे शिकारी को हिरण के मार्ग का पता चल जाता है अर्थात्
जो रक्त, याण लगने के पहले हिरण का पोपक था वही अब शिकारी को
मार्ग बताता हुआ भक्षक यन रहा है। इसीसे रहीम ने कहा है कि
विपत्ति के समय दोस्त भी दुश्मन बन जाते हैं।
१९३---अवधनरेश महाराजा रामचन्द्र
नोट-रीवा-नरेश चितपटपति कहे जाते हैं, क्योंकि उनके पूर्वजों
में प्रथम चित्रकूट पर ही अधिकार किया था।
यह दोहा रहीम ने एक याचक को संतुष्ट करने के लिये रीवानरेश
क्योकि
इस समय बादशाह की अप्रसन्नता के कारण इनकी
को लिखा
होनावन्या थी।
था,
१०६-~पामरी-नीच, तुच्छ । कामरी % कम्बल । जाइ जाड़ा ।
१९७-मरम = मान, प्रतिष्ठा, गौरव ।
[रहिमन विनोद
है
।
नोट-एकवार कवि गग ने रहीमजी को निम्नाङ्कित दोहा लिख
कर भेजा था
सीसे कहाँ नवान जू ऐसी देनी देन ।
ज्या ज्यो कर ऊँचे करौ, त्यो त्यो नीचे नैन ।।
इसी के उत्तर-स्वरूप रहीमजी ने यह दोहा कहा है जिससे आपके
चित्त की निरभिमानता का पता चलता
१९८-अम्बुज = कमल । अम्बु-पानी ।
१९९--महात्मा तुलसीदास के कथनानुसार "काने खोरे फूबरे कुटिल
कुचारी जान" सब ससार कुचडे को बुरा समझता है पर लोग रथ में जिस
जगह बैठते हैं उसके ऊपर कुबडी छत से ही छाया की जाती है फिर भी
लोग उसके नीचे बैठते हैं, इमीलिए तो रहीम ने कहा है कि स्वार्थ
बडी बुरी चीज हैं । स्वार्थ के कारण ही तो ससार में लोगों के अवगुण भी
गुण समझ लिये जाते हैं । कूवर कुवदा।
रथ कूवर = रथ में बैठने का स्थान, जिस पर कुबड़ी छत से छाया
की जाती है।
२००-बापुरोविचारा, गरीब । जोग%= योग्य ।
२०२-रब-गर्व । रेस-किचिन्मास ।
मेस (शेषनाग) = कुछ नहीं।
२०३-बड़े न बोले योल = बड़ी बात नहीं कहते हैं।
२०४-उवत - उदय होता । अथवत = अस्त होता ।
२०६-दाग-धबा, छाप । सही निशानी, उम्तम्मन दाग
अपवार = नम्बर की छाप घोड़े के लगती है पर वह छाप सवार की निशानी
(पहिचान) का काम देती है अर्थात् उस नम्बर से प्रसिद्ध सवार होता है।
विशेप-घोडसवार मेना में यह नियम है कि सवार का नम्बर घोडे
-
टिप्पणियाँ] के ऊपर छाए दिया जाता है। यह प्रथा अक्चर बादशाह के समय से चली है। २०७-गज-ग्राह युद्ध में जन गज पर विपत्ति पड़ी थी नत्र भगवान विष्णु ने ही उसकी सहायता की थी, इमामे रहीम ने कहा कि यडे सदैव दूसरों के दुस से दयाई होकर सहायता करते हैं पहिचान हो, चाहे न हो। 0- २०९- । प्रीति को पारि = स्नेह का द्वार अर्थात् स्नेह । मूकन = मुका, चूंसा । मुको के टर मे नींद दूर नहीं हो जाती बल्कि प्राणी मात को अपनी गोद में स्थान दे सान्त्वना प्रदान करती है। बड़ो का यही नियम है। नाइकरौंदा = एक करौदे की किस्म होती है जो करोंदे से यदा होता है। करौंदा एक छोटा सा सट्टा फल होता है। इतराइ % इतराना, अभिमान करना। २१०-हीम सज़र सरीसे बड़ा से घृणा करते हैं। २.१-दमामा = धींसा, नगाड़ा। २१२-पचवत आगि चकोर = चकोर का प्रेम चन्द्र पर है अत वह उसकी ही ओर देखता रहता है यहाँ तक कि प्रेमावेश में आग को चंद्र #श समझकर खा जाता है। एक अन्य कवि चकोर के आग म्वाने का कारण कुछ और ही बताता प्रिय सो मिला भभूत वनि, ससि सेखर के गात । यह विचारि ॲगार को, चाहि चार चगत ॥ 'कोई कवि' २१३-कदाचिकदाचित् , शायट । २१४-प्यादा पैदल । फरजीवजीर । माह-यावशार। तापीर स्वभाव, आदत, असर से। है [रहिमन विनोद -~~~ - %3D नोट-प्यादा और फरजी शतरज के मुहरे होते हैं। प्यादा सदैव सीधा चलता है और परजी तिरछा सोधा मर तरफ चल सकता है। प्यादा बढकर फरजी न जाता है पर फरजी फरजी ही रहता है। २१६--उत्पात: उपद्रव । जो भृगु मारी रात= एक समय भृगुमुनि इस परीक्षा के लिये निकले कि देखे ब्रह्मा, विष्णु और महेश में कोन बड़ा है उस समय भृगुमुनि ने विष्णु की छाती में रात मारी पर भगवान ने बजाय फ्रोध के शान्ति-पूर्वक मुनि का दर किया। २१७-रेप - निश्चित । मेस- सूंटी। २२०----गुस्ता - गोरव । फाइ- सोहती है। फवि आई है सोहती आई है। अनत- दूसरी जगह । यतौरी एक रोग जिसमें शारी में फोडे की तरह नून की गाँठे सी हो जाती है। २२०--अगोट = भिन्नता ( अगुह) नरद-युग, जोडा। नोट-चापड़ के खेलनेवाले जानते हैं कि जब तक गोटों का जोड़ बँधा रहता है एक भी गोटी नहीं मारी जाती हे जोड़ फूटने पर दोनो मारी जा सकती है। एक कवि ने कहा भी है ---"नर के फूट उठिजात याजी चोपर की"। २२२-विथा (व्यथा)- दुख । गोय - छिपा । अटिछेहैं - हँसी करेंगे। २०३-तम ओर काजल का स्वरूप एक ही होता है। २२४-अरज गरज अनुनय विनय । रिनियाँ - ऋण ऐनेवाला । २२५-भाव - अच्छारगे। कचपची - छोटे-छोटेतारागणों का समूह, कृतिका नक्षव। २२६-नयो = नवना । फर टेप्पणियाँ] चीता = यह शिकार के समय नरता है। चोर = इसका नवना नम्रतापूर्वक चापलूसी की गन करना है। फमानजन तक कमान न नवे, तीर नहीं चल सकता है। अर्थात् इन तीनों का नवना हानिकारक ही है। २२७-इतराइहाराना, टमक दिखाना । नोट-शतरज के विलाही जानते हैं कि प्याला परती नाफर Eरजी ही की चाल चलने रगता है। २२८-परिया = रहँट में लगी हुई छोटी-छोटी टिलिया निनमें पानी नर कर आता हे। रहट = पानी निकालने का कर । रहँट-पानी निकालने का एक प्रकार का कल (यन्त्र) होता है जिसकी गरारी पर होकर हिरियो आती जाती है। इसमें टिलियाँ मालाकार रूप में बाँधी जाती है और रहँट की गिरी पारस्पी होती है। जैसे ही पंच घुमाया नाना है मालकार रिलियाँ ऊपर नीचे आने जाने पाती है। जो रिलिा सीचे जाती है उनका मुँह पानी की ओर होता है और वे माली होती है नमे ही उनमें ईंध में पानी भर जाता है ऊपर को आने लगती है और बनकी पीर पानी की ओर हो जाती है। गरारी पर आपर माली हो गती हैं और फिर उनका मुंह पानी की ओर हो जाना है । करि ने ओले मनुष्य पर इसी भाव को घाया २२९---गीरी = दीनता, मिबाट । वर्ग नग्न यनर चगे। 20-नगरिः रगडकर, घिस कर गिरा फोर हय लिये दूसरे को पीडा का अनुभव न हो। ग्वीम = हीनता । २३१-नौखिना- स्त्री। २३२- पीरम, मना। - है . २३३-निरम = मा । - [रहिमन-विनोद D २३५~ बार = देर । भर राख चोरी करि होगे रची होली में लकडी ई धन आदि लोग चुरान रखते हैं। २३६-कदरी-सुवन केले के पत्ते। सुडील - सुदर शरीरवाले। अपत = बिना पत्ते के। नोट- केले के पत्ते पेडी मे चिपटे हुये निकलते हैं। २३८---जग जीवन बड़े ससार में अधिक जीवित रहने से। अछत जीते जी। नोट-रहीम के पुलो की मृत्यु उनकी जीवितावस्था में ही हो गई थी। मालम होता है इसी से रहीम ने दीर्व जीवन को अच्छा नहीं बताया है। २३९---सोयसोता । सिखाय-शिक्षा देना। २४०---पलटत लगन बार=विद्व होते देर नहीं लगती। २४१--भिनुसार =सरा । सार : रजाई २४३-माह मास लहि टेसुआमाह में टेसू शोभा नहीं देते। इनका समय तो धार में है तभी इनका व्याह कराया जाता है। मीन थल पर जाने से मर जाता है । संसार में स्थान-भ्रष्टो की यही दशा होती है। २४४-निगुन हुजूर - मूर्ख शिरोमणि । दूर कर, कपटी, दुष्ट । विटप = वृक्ष । २४६-सीम = मर्यादा, हद । -पोर - फटकना, सूप में पटक कर साफ करना । हलफन = (हलुक) हलके । गरए = (गरू) भारी । स्टोर इकट्ठा करना। २४८-टूटे = विगाड होने पर । पोहिये पिरोइये । AAP- -- उप्पणियाँ] 1 ।। २४९-अधम वचन - कड्ये बोल । पाल्यो 'परा-पूरा, मानन्दित हानीरमरस हीन । २५०-विमात स चलना २५१-गुराइसि (गुर + आइसि) = यहों की आज्ञा, रद्ध जनो की । . । । गादि -अत्यत द। २५२--रसकरी-पाजी। सेल्ह = साँग । जगीर = इनाम में पाई हुई जागीर को। २५३--धरी घड़िया, मुंग आदि की दाल घंटकर बनाई जानी हा लोन नमक। मरंगो = पूरा होगा। नोट- -जगह-जगह भटकने की अपेक्षा मूए का आश्रय रेना तीक है २५४-खेर = कुशल, भलाई । मद पान = शराब पीना । २५५-विसात = आकात, चलाई। २५६-गुन गुण, रस्मी । यादि बडा, गहरा । नोट-जुए की गहराई को मन की गभीरता मे उपमा दी गई है। २६२-पियाधि = आपत्ति, दुस। मेरी येडी। २६३-वादे कठिन। २६४-योथे यादर = वह मादल जो यरसाती नहीं होते, खाली । हरात = गर्जते हैं। २६५-निन्होने नट को तमाशा करते देखा है वे जानते हैं कि कड़ी के छोटे से घेरे में होकर जिस तरह मोटा ताना करतबी नट शरीर मे तौर कर माफ निकल जाता है इसी तरह रहीम जी कहते हैं ४८ या का जरा सा दोहा छन्द्र भी एक कुपडली हे जिसमें होकर बड़े से हा अर्थ सही सलामत दिला उलझे निकल जाता है।
[रहिमन विनीत जो कवि यद्दे से बड़े गंभीर भावी को दोहे की छोटी कु दली सफाई के साथ निकाल सकते है वही करतत्री नट की तरह श्रेय के मा - $ दोहा छन्द की सा में कविवर रहीम की केसी अच्छी उक्ति है हिन्दी के छन्दी में दोहा छन् का वही स्थान है जो सस्कृत में 'अनुष्ट का भार प्राकृत मे 'गाथा' का २६६--रहीमजी कहते हैं कि दोहा और लार यद्यपि छोटे होते परन्तु दोहे के रूप (शब्द योजनादि), कथा प्रसग और सुन्दर और के रूप, कथा प्रसग (क्सा है, किम खान से निकला है किस-किसके पास रहा है आदि ) नया सुन्दर पहल पर जितनी ही हा दारोगे उतनी ही छिपी हुई पपियाँ नजर आवेगी और दोहा रत्न आँ मणिरत्न का छिपा हुआ मूल्य भी आप की नजरों में बढ़ता जायगा । कथानक - क्या प्रमंग। चार पद = सुन्दर पद, सुन्दर पहल किशा= छोटा । अलुप = अरोप, छुपा हुआ । नोट-~10 ०६६, २६७ के दोही से रहीम की दोहा प्रियता प्रक होती है। १६७-रहीम ने इस दोहे में तानमेन की प्रशसा और तान की पूर्व किम युक्ति से वर्णन की है देखिये -रहीम कहते हैं कि ब्रह्मा ने इसी शेषनाग को कान नहीं दिये हैं क्याकि वह जानते थे कि भविष्य म तान सेन पैदा होगे। कहीं उनकी तान सुनकर शेषनाग सिर न हिला दे नहा ते सारा ससार ही उलट जाय । तान वही है जिसे सुनकर चराचर मस्त हो सिर हिलाने लगे। पाटक देखें, रहीम ने सीधे-सादे शब्दों में पैसा चमत्कार-पूर्ण भाव भर दिया है।
टिप्पणियाँ]
११९
बरवै नायिका-भेद
दोहा न०१-यो न = नहीं जंचा, पसन्द न आया । घिरच्यो
चा, पाया।
दो०२---येधक = येध करनेवाला, छेदनेवाला । अनियारे = अनीदार,
नोकगार, नुकीले। इस दोहे में कवि ने यरवा छन्द की प्रशसा की है।
यरवा नं. १-खोरि दोप।
२-मोती किनारी की साड़ी पहिने, बाल सोले, सुन्दरी इधर उधर
डोच के साथ घूमती फिरती, रहगे की तरह लहरा रही है। सुन्दरी के
नयष्टि में मनोमुग्धकारी लहरी की मी यहार है। विधुरे = फैले, छिटके ।
३-न के कोरवा = नैन कोर । अहटाय = वजना, शन्द होजना।
४-नवयौवना सुन्दरी के अगयष्टि पर कामदेव के विजय चिन्ह प्रकट
ने लग है अथात् आँस में पन और पयोधरों में उभार आ गया
नवेरियहि = नवयौवना सुदरी । उकसन = उभरना, ऊँचे उठना ।
-धौ न जाने । दुघि दुखि उठइ = रह रह के दर्द हो उठता
है। लगि जनु जाय = मानो कुछ लग गया है, किसी प्रकार से चोट
4
है
-
आ गई है।
६-औचक
आइ पकाएक आकर।
गोइयवाँ - ससियों, सहेलियाँ।
७.--चूनि = चुनकर । चार = रुचि, प्रेम । चुनरिया = साड़ी।
1-नयल बयू पति मे मिरने तो आई है परन्तु जांघों को मिलाकर
गती से चिपका सखा है। उसेबर है किवहीं ये उसके कुचो को छू न ले।
९--वाहन - चाहना, प्रेम करना । चाहति बाहती है।
10-प्राहा नायिका रजनी के अंत में कोयल को योरते सुनकर
चदा गइ । से भय हो गया कि प्रियतम से यह वियोग करावेगी, क्योकि
[रहिमन विनोन Puru वे यह जानते ही कि सरेरा हो गया, उठकर चले जायगे । इस कारण ध/- कहती है कि अरी सखी । इतना सबेरे से गोलकर मेरे ताप को वो बढ़ाना चाहती है-~अरी ! मुझ पर दया करके एक घडी तो भार चुपचार रह । “करन लागे खोटी हा परू लाल चोटी के" इत्यादि में भी इसी भाव के उद्गार प्रकट किये गये हैं कोइलिया = कोयल । ताप - विरह-ताप । अल्यिा = सन्नी । ११-कृष्ण प्यारे की मुरली के भिन्न भिन्न रागा को सुनकर सुन्दरी प्रेम-मग्न हो रही ह । मार्ग में ग्वडी हुई न तो खड़े रहने का फ- ओर न आने जानेवालो के लिये मार्ग छोड़ने की उम्म अनुभव करती सुध ह। गनतिन = नहीं समझती। खेद = दुख, कष्ट । १४-चूनत सोडते हुये । अॅगियवा = अँगिया, चोली। १५-सुगा = तोता, सुग्गा । घुटार = चोट पहुँचानेवाली ।। १६-नायिका पसीने पसीने हो रही है और उसके श्वास में भी कुछ वेग है। सामने से उसने अपनी सखी को आते देखा तो कारण छिपाने के लिये चट कहने लगी-मैं तेरे पास जल्दी जल्दी आ रह थी । देखो न पसीन-पसीने हो रही हूँ, सॉस भी नहीं समाती ! सखी मैं तो थक गई। हरवर = जल्दी जल्दी। भा= हुआ । पय-सेद = मार्ग का श्रम उससवा जनी जल्दी श्वास लेना, हाँफना । १७-नायिका सखी से कहती है कि आज मैं कुसुम का पूल देने लिये येत जाऊँगी । यहन, सेत बडी दूर है और दासी की छोरी जो मै साथ जायगी, यही निकम्मी है । अत आज सूर्य थककर घर सौटुंगी यह दिखाना चाहती है परन्तु असली कारण को छिपा कर । कुसुमिओं = फुसुम के फूल, इसमें काँटे होते हैं किसी जमा हे - % 3D - - निर्मित कुटीर का दहन कर रहा था वैसे ही वैसे तरणी के मन में इस टेप्पणियाँ] १२१ कुसुम रग प्राप्त करने के लिये पेतो म पोया जाता था । कर निकम्मी, मुन्त । प्रयोग-सुभट शरीर नीर चारी भारी भारी तहाँ सूरन उदाह कर कादर डरत है । 'तुलसी' १८-पाथ-जल। अमरया-आम का बाग। जो धन भमरया = भमराई जाना आवश्यक १९----तोरेसि तोड़कर। २०-बुताय% युझा देना, गुल कर देना। दियवा = दिया । धारन = जलाने । २१-कोरवा = कोर । २२--हुमक्तः गर्न के साथ पैर रखती हुई। सुन्दरी मद-मम्न हाथी को तरह झूमती झामती इधर उधर नजर फकती मुसक्याती हुई जा रही है । २३--नायिका ऊँची भहालिका से कामातुर हो दायें आर याये आखी विशियो को देखती है। २४-सास अपने पड़ोसी काह से कह रही है कि मैं तो बडी दुसी ए क्याकि मुझे नेवते जाना है, वह अकेटी घर की रखवाली के लिये है और मा घर सूना है। बहू का सूने घर में रहना ही उसकी इच्छा पूर्ति २५-कोई पड़ोसिन नायिका मे कह रही है कि ऐ दुलहिन । तेरी नन नेवते और सास मैके गई है तो क्या हर्ज है ? तेरी सुध लेनेवाला और प्याग तो पास ही है। सरिया - सुध रेनेवाला । पिय = प्रिय, प्यारा । २६-सूर - दुख । द्वारिंगा = मर गया अर्थात् पत्रहीन हो गया। २७-जैसे जैसे ग्रीष्म ऋतु का धधकता हुआ दावानल लता-कुभ का घोतक है। । 7 ।
१२२
रहिमन चिनोई
--
दहन को देख कर दुख बढ़ता था, क्योकि दावानल रता-कुन्जा को जला-
कर उसके सकेत-स्थाना को नष्ट कर रहा था ।
दहत = जहा रहा है । देवरिया = दावानल ।
कुज-युटीर = लता निर्मित कुटियाँ।
२८-करि अनुराग - अनुराग कर, प्रेम कर।
२९-~-नायिका का ब्याह हो गया है। वह नई-नई ससुराल आई है
इसीसे वह उदास बैठी रो रही है कि यहाँ प्रेमी से मिलना कैसे होगा।
कोई चतुर पड़ोसिन इस रहस्य को समझकर सान्त्वना देती है कि
"अगी । दुरहिन इस तरह रोकर प्राण न दे, तू अपना जी क्यो छोटा
करती है ? इस तेरी ससुराल में भी सधन कुओ की कमी नहीं है।
दूसरे तेरे घर में भी तो दूसरा कोई नहीं है।"
जनि = मत । करिमन ऊन- छोटाजी करना, उदास होना।
३०-~-प्यारे कृष्ण की वंशी की ध्वनि कान में पड़ते ही नायिका का मन
पल्लवित हो उठा अर्थात् मिलने की इच्छा करने लगा। परन्तु सहेट से
वह वापस हो चुकी थी, अब यारम्बार फिर-फिरकर उसी ओर देखती है
और मन में पछताती है कि मैं क्या इतनी जल्दी वापस आ गई।
सुमन - सुन्दर मन । सपात = पास-सहित अर्थात् पल्लवित होना,
इच्छायुक्त होगा।
३१-~-अराम = बाग । लहेउ न काम = प्रीतम-सुख लाभ न किया।
३२--अरसिया = शीशा।
३३-~-कनवा = काम के लिये । आणसि साधि = पूरा कर आई।
जुरचना = जूडा । दिद = दृढ़, मजवत ।
३४-अवरुवामहावर ।
३५-पति प्रेम-विता नायिका सखी से कह रही है कि आज तो
मुझे बड़ी शरम उठानी पड़ी दूसरी स्त्रियों के पैरो मे तो नाइन के हाय
,
निप्पणियाँ] MARA- +--- -फा महावर था इसपे क्सिी ने ध्यान नहीं दिया परन्तु भेट नायिकाओ की दृष्टि मेरे पैरो से हटी ही नहीं। ३६-खीर-क्षीण, चद्रमा घटना बढ़ता मलिन नीच, चंद्रमा कलगी है। विस भैया = विप का भाई चद्रमा आर विप नोना ममुद्र मनिकरे हैं। ३७-तुल = लाए । भएसि-हुआ। मुगउआ = मूंगा ।रिम "नि + रम) - सूसा । पसान = परथर । अधग्या - ओठ । 'नोट-मानिनी का उदाहरण अप्राप्त है। ३८--टेसु पलास, ढाक । सँदेसवा = सँदेसा, पबर । ३९-नायिका से दो सखियाँ अारिका पर चरने के लिये आग्रह- पूर्वक अनुरोध कर रही है, परन्तु वह कहती है कि तुम दोनो क्यो इतना भागृह करती हो । मुझे तो प्रियतम के बिना सूनी अट्टालिका म जाना न जाने क्यो अरछा नहीं लगता। ४०-मादा के घर में कोई बेलि लगी है जिसम फूल खिल रहे हैं। पति उसका घर नहीं है, येरि के पुष्पो को देखकर उसकी विरहानि महकनी है अत नैराश्य से पिन्न होकर कहती है कि ऐ बेलि ! त् जड़ महित जलकर भस्म क्यों नहीं हो जाती। तेरे फूलो को देखकर मुस -विरहनी के कलेजे में शूल उठती है। सूल-पीड़ा। सूचना-परकीया प्रोपित-पतिका और गणिका प्रोपित-पतिय । उदाहरण अप्राप्त है। + ४१-सिपशिक्षा । सीख = मानकर । १२-निचवइ ओइ = नीचे को ऐपती ६ । छिति - भूमि । सन = खोदती है। १० १ १२३ [रहिमन विनोद 4 %3D . सुसुकति रोइ% सिसक सिसक कर रोती है। ४३-पतिता नायिका पति को ऊँघते हुए देखकर मीठी सी चुटकी लेती हुई कहती है कि प्रियतम । नीट के वश होने से आप की पगड़ी गिर गई । आप को नींद आ रही है सच्छा हो आप बरोठे में पींग बिलाकर सो रहे । पगरिया % पगड़ी । पद सो रहो। ४४-पढिता नायिका पनि के अपराधी को प्रक्ट न करती हुई उन्हें लजित करने के लिये पते की पाते कहती है --आप के भोटों में काजल' आर मम्तक में महावर लगा हुआ है सो जरा पोंछ डालिये और आप की छाती में यह माला के चिन्ह कहाँ से उपट रहे हैं। यिन गुन माल = मिना सोरी की माला । जावक = महावर । ४५-नायिका ने पति को आते देख उठकर आँगन में ही स्वागत किया और साथ ही उस चतुरा ने आदर पूर्वक बैठने के लिये श्रासन दिया। अँगनैया = आँगन । उठि के लीन - आगे बढ़कर स्वागत किया। बैठक दीन = बैटने के लिये आसन दिया । ५६---नायिका ने पति को वापस आया देखकर कहा कि प्रियतम । पींग पर रेट जाइये, मैं आप के पैर दया दूँ जिससे रात में जगने के कारण जो नीट आप की आँग्वों में बम रही है वह दूर हो जावे । मीजउँ = दया है। निदिया = नीद। -नायिका रहती है कि जिसके प्रेम म फैसकर मैने अपने 'आरमीय, स्नेही और अपना घर बार सभी छोड़ा वह भी अपना न हुआ। यह बिल्कुल सच है कि अपना पति ही होता है। पिभरवा - पति, साँच पगर = मिल्कुर सच । ४८-नायिका ने अपने प्रेमी के ओठ में काजर और मस्तक - ४७- । में.
- टिप्पणियाँ] -- NA । महावर देखकर मन ही मन कहा कि और हुआ सो हुआ परन्तु निगोही ने मणियों की माला भी गरे मे निकाल री है। -तकि- देखकर । ४९ -सुन्दरी का अभी द्विरागमन होकर आया है अर्थात् अभी नई नइ पति गृह में आई है भार पति से मिलते ही मान कर रेटी ह जिसमे पनि भी उनासीन हो गया है । परन्तु कुछ दिन पश्चात् जय नवोढा पर भी काम प्रभाव भरपूर पड़ा तो पछताने लगी कि मैंने क्यो मान किया, नाइक रडी। गवनगाँ द्विरागमन । -सुन्दरी अपनी सखी से कहती है कि मैं बड़ी मूर्ख हूँ, मान रने में मारी रात बिताकर भोर कर दिया । सग्वी ने कहा मारी रात झे मान ही में बीत गई, तभी अब यह नहीं मनाते हैं इसम उनका या नोप पररिउँ भोरि मरा कर दिया। तेहिं कछु खोरि = उनका क्या दोष? 1-पति आर पत्नी में कलह हो गया था। पति मनाते मनाते कि कर अत म लौट गया पर मो मान न छोडा अय पछताने से क्या ? 'मी समय प्रीतम को छाती मे लगाकर हदय को उड़ा क्यों न किया। मनुहरिआ3 = मनुहार । हिम पर हीव = हृदय को ठडा करना। १२-नायिका ने दूसरे मे प्रेम करने के कारण ननद भार जिठानी से र भी बाधा आर उस प्रेमी से कलह भी कर लिया, अत अत्र पश्चात्ताप रनी है कि जिसके लिये ननंद आर जिगनी मे बैर कर लिया। म प्रीतम को करने से क्यों न गाये रक्सा-मनोमालिन्य क्यो -हाय- र रिया । विरोधवा = धैर । करेजवा = कलेजे में। ५३-~जिसने भोक यार मुझे मणियों की मालाये भी होंगी, १२६ [रहिमन विनोद -- - मेरी मूर्पता तो देख, ऐसे प्रेमी से मैंने कलह कर लिया और अप्रसन्न हो पैठ रही । परिणाम यह हुआ कि वे भी रष्ट होकर चले गये। यहुयिरियाँ - बहुत बार । ५४-सहेटवा = संकेत स्थान । --फेलि-भवनयाँ क्रीड़ा-स्थल। विकार चैन । लेचि उससवा लयी लम्बी साँसे ले लेकर ५६-पूरवाद, तूफान, पूरा, यहुत । -अभिसरवा = नायक अथवा नायिश का सकेत (पूर्वनिर्दिष्ट स्थान म गमन | चैरिनि वैरियों के झुड में । ५९--जुग-दो। जाम = पहर । जमिनिया - राति । कउनि: किसे। धों-नजाने । बिलमाय = बिलमाया, रोक रक्खा । । ६०-जोहति = जोहती, बाट देखती, रास्ता देखती। येड- अपने को बेची। केहि - किस । हाट-बाजार । ६१--भा भिनुसार = सौरा हो गया । इतबार विश्वास । ६३-चारी नायिका एक तरफ तो प्रात काल नक इंतजार में बंद कर नींद के थपेड़े खा रही है और दूसरी तरफ धनी प्रेमी का लोभ भी नहीं छोड़ सकती। अत खीसकर कहती है कि सबेरे की नींद मुझे सता रही है परन्तु इस मूर्ख, पर धनी प्रेमी का अब तक कही पता नहीं । ६५-हरुए-धीरे । दीठि बचाइनिगाह यचाकर । ६५-चितवनि दृग द्वाग-जरा से खटके मे चौक पड़ती है और आँखे दरवाजे पर जा पहुँचती हैं। ६६--उतरत कतवार-पति के आने में देर है-अत बार पार पलंग पर से उतर कर देगती है और फिर जा बैठती है और सोचती है, क्या देर है। ६७-गुरलोगवा - गुरुजा, घर के बड़े प्रदे । हाल = झट ।
टेप्पणियाँ] १२७ F - -कहल न जाम- यदा नहीं जाता है। रहत गारत सोनया सुवर्ग भूपण यनवाते रहते है। हिय सिरात हृदय को शाति मिलती है, हट्य शात रहता है। ७१-परनवा प्राणी को। ७२-चोरमा चकोर, इस पक्षी का प्रेम चदमा पर है भत श्रा है ७४-नायिका मुग्धा है अत उसमें समा अधिक है इसी मे सर मखिया उमे प्रियतम के पास लिवाकर घहीं फिर मतवाने हाधी की तरह अकुश देकर अर्थात् जोरावरी गुदगुला गुगुना कर उसे लिगेगा टमी की ओर देखता रहना गुग्गुवा = गोदना, हाथी को, अंकुश ना, किमी कार्य के लिये चार बार जोर देना। ७५-लाल अछुअवा = लार वनों से सजी हुई । अरवाना का अर्थ मनाना या धनासा है। ७६-साहम गादि = हद हिम्मत वालरी । पायेल = पैर में पहाने आभूपण । हारेमि फादि-निकाल हाले । 10-जरतरिया = जरीदार । यसन = वस्त्र । ८१मान (गमन)जाना । -ओवरिया-कोरी। ४३–फागुन फेलि - पागुन छोहकर अर्थात् होली के त्योहार का रसार करके। ४-नायिका का प्रेमी यद्दे उत्माह में विदेश जाने के लिये तयार हुआ। धारी नायिका भी प्रियतम को जान हुम देखने के लिये अन्य- मनस्सा होकर उसी रास्ते चलने लगी जैसे पनिहारी मार्ग चलती जाती पर ध्यान मिर के घड़े पर रसती है। है [रहिमन विनोद ८७-- %3D - ८५ -सुमिरिनियाँ -माला 9--पौरि = ड्योढ़ी। जटित मुहीर सुन्दर हीरो स जड़ा हुआ। ९१-चनन धउकिया = चन्दन की चौकी ९२-चख (चक्षु)- ऑरो। ९३--गुरु मनवा = गुर मान, मान के दो भेद हैं (1) ल्यु, (२) गुरु । पारि आन, घमक। ९४-परयिनवा -प्रवीन चतुर । ९६-छतरिया :क्षत का अपनश। । ९७--सधवा = साधा, इच्छा करता हुआ । रहिगा जीव-दिल रह: गया अर्थात् दिल ने साथ न दिया । ९८----उच शब्द समवाय आर मिश्रण अर्थ में आता है। -जोरि नयन - आँखें मिरीकर । १०२-यसी: -मल्ली पकड़ने का काँटा। ३–बझाय = विधाना, फंसाना । -पलकिया केश, घरारे बाल, जुल्फ । १०३-ताको वोहि = उसको देखूगी। ऐठल गइ अभिमनिया = अभिमारिन ऐट कर चली गयी । १०३-नायक बातो ही यातो में नायिका को निमायण दे रहा है। वह कहता है आम के गाग में अनेको कुज है जिनको छाँह बड़ी ही शीतल हे वहाँ कितनी ही कोयले आ आ कर लद्दती ६ आर फिर उद जाती हे अर्थात् तेरे समान कोकिल कंठी 'यहाँ ,अभिसार के लिये आती हैं। १०५-~यह जानकर कि पास ही वृषभान-नदिनी चोर नामक .
टिप्पणियाँ] १२९ MPAN MAHAA खेल खेर रही हैं नन्दकिशोर भी तुरन्त वहाँ आ राधिकाजी को छू कहने लयो कि से छिपो में चोर बनता हूँ अर्थात् राधिकानी से एकान्त में मिलने की तरकीय निकाल ली। १०७-नायिका स्वप्न में मियतम से मिल स्वाम-सुख का आनन्द ले रही थी इतने में दासी ने आकर जगा दिया। युरा हो उस दामी का। बेचारी नायिका का मुग्व ही नहीं छीना, वरन् बिरहाग्नि को प्रज्वलित करके असीम दुख के गढ़े में दकेल दिया । 'सपना स्वप्न में। आनि जगायेसि चेरिया = दासी मे आकर जगा दिया। -नायिका के पति का चित्र उसकी चितसारी में दंगा है उसे देखकर उसकी विरहाग्नि बढती है। परन्तु क्या करे प्रियतम के आगे के दिनों को माला की तरह बार-बार फेरती हुई अवधि को येनकेनप्रकारेण विता रही है। चित्तसरिया = चिससारी । श्रोधिवसेरवा = अवधि के दिन । ११०९-नायिका बिरह-सतप्त बैठी थी कि ससी ने बाहर से आकर कहा कि ऐ सखी तेरा प्रियतम परदेश से आ गया है। अरी ! उठकर मार क्यों नहीं करती? भोर ११०-पति विरह-संतप्त नायिका भार परदेश से आया हुआ पति, जब दोनो एक जगह एकत्र हुए तो मी पति के मुस को और इस प्रकार तृपित नेसो से देखकर रह गई जिस प्रकार चकोर पक्षी चन्द्रमा की इकटक देखता रहता भेइकठोर = एकत्र हुये। ११-हेरति मुख मुसुकातिगार छा को नायिका दाण में देखती है और मुसक्याती है। ससी नायिका को सिखायन देती है कि दालान में येटर आनन्द १३० [रहिमन विनोद , है 1 ल्टो, प्रियतम के पेर दबाओ और प्रियतम को गरमी लगे तो पखा से हवा करो। छाकहु बटि दुअरिया - दालान में बैठ कर छको अर्थात् आनन्द लूटो । मीडहु पाय = पैर दबाओ । बिजन = बिजना । ११३-नायक ओर नायिका में किसी कारण कलह हो गया नायक ने भीतर का सोना छोड़ रक्खा है आर बाहर सोता है, जिसमे नायिका दुसी है । अत ससी नायिका की ओर से उपालभ देती हुई कहती हैं कि यह क्या तमाशा कर रक्खा है ? इस तरह झगड़े होते ही रहते हैं। चरो अन्दर सोभो । पति भी इस सम्बाद को सुनकर मुसक्याने लगा, पर कहा कुछ नहीं। चुपके से अपने लिये जो बिछौना निछाया था उसे उठा दिया। ११४-सखी कामदेव के धनुप की तरह भौंह चढाये हुए हँसती है और उपस्थिन रमणियो के कुच-स्पर्श करके उन्हें छाती से लगाती है। अर्थात् पति-आलिङ्गन का नाट्य फरके नायिका को हँसाती है। - + 1 मदनाष्टक (१) वहति मरुति मन्दम् = मन्द मन्द हवा चल रही थी। शशि-कर = चन्द्र-किरण । बागी-मवार । विगत = नष्ट मदन शिरमि भूय - कामदेव शिर पर सवार है अर्थात् पीड़ित कर रहा (२) हर नयन हुताश शर के तृतीय नेश की अग्नि । रति नयन-जोधै = रति के नेसो के ऑस् । (३) हिमस्तु सदी का मौसिम '(५) मनसि-मन में । नितान्तम् = अधिक ! भन्यन मनमथानी कमोहीपित अगवाली। -
टिप्पणियाँ]
१३३
-
१२-~-चनन = चन्दन । केवरिया : खिहकी। जोहाँ बाट प्रतीक्षा
कमती हूँ, मार्ग देखती हूँ।
१३-चारो
चारा, उपाय।
१४-या साथ, से। चखुन = चक्षु, ऑम्व ।
१५–कारी- पुर असर । कुल्फ - कए ।
१६-हस्त-हाथ ।
-श्रुति युग = दोनों कानो मा
16-तरल-चचल ।
१९-कमनैत = धनुप धागे। याँकुरी टेदी । सार-प्रभाव, असर
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सूची वर्णानुक्रम से पद्य-सख्या २४९ २५१ प्रारम्भिक अधम वचन से को फल्यो अनुचित उचित रहीम ल्यु अनुचित पचन न मानिये भय रहीम चुप करि रहा अब रहीम मुसकिल परी अमरयलि दिन अमृत ऐसे बचन में अरज गरज मान नहीं मसमय परे रहीम यह आदर घटे नरेस गि आप भहै तो हरि नहीं आपुन काहू काम के भावत काज रहीम कह उरग सुरंग नारी नृपति ऊगत जाही किरन सो एक साधे सब सधै मोठे कर सतसग अंजन देहु तो किरकिरी अंटन पौड़ रहीम कह अन्तर दाव लगी रहै कदली मीप भुजग मुख कमला पिर न रहीम कह, यह जानत २६३ ३ २३३ २२४ १९० ८३ २६ २४० २०५ २५४ २० १२७ ।
२२ २३७ १८० -११४ ४४ १२५ ५ कमला थिर न रहीम कह, लखत करत निपुनई गुन मिना करम हीन रहिमन लसौ कह रहीम या जगत में कह रहीम सपति मगे कह रहीम धन यदि घटे कहा करौं यैकुठले कह रहीम केतिक रही कह रहीम कैसे निर्भ कह रहीम कैसे बने कागद को सो पूतरा काज परे कछु और है काम न काहू आवही काह कामरी पामरी फेहि के प्रभुता नहि घटी कोड रहीम जनि काहु के सर्च बदो रोजी घटी खीरा सिर धरि काटिये सैचि चढनि ढीली ढरनि सैर सून गरज आपनी आप सो गह सरनागत राम के गुन ते लेत रहीम जन गुरुता फ रहीम कह चरन छुये मस्तक छुये चारा प्यारा जगत म १९६ ३३ २५५ गाँसी खुमी ४५ १२ २५९ २१९ १२ १४० १३० २१७ १०४ २३९ चिपट में रमि रहे छार उछारत सोस पर दिमा पदेन कहें चाहिये छोट काम बई कर छोटेन सों सोई बड़े जपि भवनि अनेक नव रग चिरान आपने जाहि मिलाप रहीम ज्यो जही गाठि सह राम नहीं जानि मनीती जे पर बाल परे जर जात यहि जिहि नम सर पजर कियो जे गरीर पर हित करे जे रहीम विधि बढ किये मुग से मुझि गये नेहि अंचल दीपक दुन्यो जेहि रहीम तन मा रियो नसी पर मो महि रहे तो अनुचित कारी ति जो घर ही म घुमि रह जो पुरपारथ ते पहूँ तो यईन फ] एघु कह जो रहीम उत्तम प्रकृति जो रहीम भोको बई जो रहीम करिगे हुतो २०० १५९ १८८ । १९५ जो रहीम गति दीप के, कुल कपूत के सोय २३० १४६ - २४ जो रहीम गति दीप के, मुन सप्न के सोय जो रहोम ता हाथ है जो रहीम पग तर पर जो रहीम भावी कहूँ जो रहीम होती कहूँ जो विपया संतन तजी ज्यो नाचति कठपूतरी ज्यो रहीम गति दीप ने टूटे सुजन मनाइये डर वारिम दर परम गुरु तनु रहीम कर्म यम नव ही रग जीयो भलो तस्पर पल नहि खात है तेहि प्रमान बलियो भलो मैं रहीम अन कान है तें रहीम मन आपुनो थोये वादर फार के दादुर मोर किसान मन दिध्य दीनता के रसहि दीन रसे सब जगत कह दीरघ दोहा अर्थ के दुख नर सुनि हाँसी करें दुरदिन परे रहीम कह, दुरथल जयत भागि दुरदिन परे रहीम कह, बडेन किये घटि काज दुरदिन परे रहीम कह, भूलत सर पहिचान देनहार कोउ ओर है ३ १३ . १८ २५ १६८ धन थोरो इज्जत यड़ी धन दारा भर सुनन सों धनि रहीम गति मीन के पनि रहीम जर पक कह' नहि रहीम कछु रूप गुन नात नेह दूरी भली नाद रीझि तन देत मृग निज कर किया रहीम कह २२ । 189 नैन सलोने अधर मधु ५३ २५३ ११४ १८१ ९९ पन्नगलि पतिव्रता परि रहियो मरियो भरो पसरि पस अपहि पितहि पात-पात कर सींचियो पावस देग्वि रहीम मन प्रीतम छवि नैनन बसी पूरप पूजै देवरा प्रेम-पथ ऐसो कठिन परजी साह न हुइ मकै यह माया कर दोप यह बड़े नीन पर दुख सुने यड़े पेट के भरन में बड़े बदाई ना करें, बड़े न बोरे बोल हे बड़ाई ना करें, लघु रहीम इतराइ स्त रहीम धनादय धन = पसि कुसंग चाहत असल बाँकी चिनवन चित गडी ०१४ ८७ १२३ १३५ १४० २२१ १ १९१ २७ ८५ १५. १६० ९८ १६५ ४। बिगरी यात बन नहीं विधना यह जिय जानि के बिन्दु में सिधु समान बिपति भये धन ना रहे भजउँ तो काको मैं भजउँ भलो भयो धरते छुट्यो भावी ऐसी प्रबल है भावी या उनमान के भीत गिरी पाखान के भूप गनत लघु गुनिन कह मथत मथत माखन रहै मनमिज माली के उपज मनि मानिक महंगे किये मन्दन के मारे गये मानसरोवर ही मिलें मान सहित विप साय के माह मास कर मिनुसरा माह मास रहि टेसुआ माँगे घटत रहीम पद माँगे मुकरि न को गयो मीन काटि जल धोइये मुकुता वर करपूर कर मूद मडली में सुजन यह रहीम निज संग है यह रहीम मान नहीं या ते जान्यो मन भयो ७६ - २४२ २४३ १०. । २५ , २२ । २३२ १२ ७ ६९ २५६ १९२ २५७ ये रहीम दर दर फिर ये रहीम फीके दुओ या रहीम गति यड़ेन के 'यो रहीम जग मारियो यो रहीम तनु हाट म यो रहीम सुख दुस सहत यो रहीम सुख होत है यन च्याधि विपत्ति में रहिमन अति मत कीजिये रहिमन अपन गोत कहें रहिमन अब वे विरछ कह रहिमन असमय के परे रहिमन आटा के लगे रहिमन उजली प्रकृति कह रहिमन उत्तरे पार रहिमन एक दिन वे रहे रहिमन भोछे नरन ते रहिमन भोछे संगते रहिमन असुवा नैन दरि रहिमन कठिन चिताहु से रहिमन काहुँ बड़ेन के रहिमन करि सम ल नहीं रहिमन कोही प्रीति रहिमन कुटिल कुदार ज्या रहिमन कोऊ का करे रहिमन मोजो अब म १७६ ४१ ०११ १७३ ८९ १२८ ૨૦૨ १०६ ૨૪૨ ४३ २२८॥ - २२५ ૨૨ ८० रहिमन खोटी आदि के रहिमन गठरी धूर रहिमन परिया रहँट के रहिमन चाक कुम्हार कर रहिमन चोट सुतीर के रहिमन छोटे नरन से रहिमन जग जीवन यदे रहिमन जहँ रहियो चहे हिमन जिह्वा यावरी रहिमन जेहि के बाप कर रहिमन जो तुम कहत हो रहिमन तब लगि ठहरिये रहिमन नीन प्रकार ते रहिमन थोरे दिनन कह रहिमन दानि दरिद्रतर रहिमन देखि बड़ेन कह रहिमन धागा प्रेम कर रहिमन धोसे भाव से रहिमन निज मन के विद्या रहिमन नीचन सग बसि रहिमन नीच प्रसग ते रहिमन नीर पसान रहिमन पर उपकार के रहिमन पानी राखिये रहिमा प्रीति न कीजिये १३३ २१० २२ ६ ७ रहिमन प्रीति सराहिये १४३ १२१ १२४ २ २१५ १८३ २६२ ५० २८ १६४ १२० रहिमन पेटे सों कहत रहिमन थहरी बाज रहिमन बहु भेषज करत रहिमन यात भगाय के रहिमन विगरी आदि के रहिमन लिपटा हु भरी रहिमन ध्याह यियाधि है रहिमन भेपज के किये रहिमन मन महराज के रहिमन मनहिँ एगाइ के रहिमन मारग प्रेम कर रहिमन माँगत यइन के रहिमन मे या पेट मो रहिमन मोहिन सुहाय रहिमन यह तन सूप रहिमन यह न मराहिये रहिमन यहि ससार में सब दुग्ध रहिमन यहि संसार में सब सो रहिमन याचकता गहे रहिमन रहिनो वा भलो रहिमन रहिला के भी रहिमा राज सराहिये रहिमन राम न उर धर रहिमन रिस कह छोड़ि के रहिमन रिस सहि तजत हि रहिमन लाम्ब भली करहु २४७ है २२० २६१ १६२ ७९ ९७ -- १४४ २३५ १५८ १२९ २६६ १४८ रहिमन वहाँ न जाइये रहिमन वित्त अधर्म कर रहिमन विद्या बुधि नहीं रहिमन चे नर मर चुके रहिमन सुधि मर ने भली रहिमन सो न कछू गर्न रहिमन हम तुम सो राम नाम जान्यो नहीं, जान्यो सदा राम नाम जान्यो नहीं, भइ पूजा रीति प्रीति सत्र सो भली रूप कथानक चारुपद रूप रहीम विलोकतहि लिसी रहीम लिलार में वरु रहीम कानन वसिय वहे प्रोति नहि रीति वह विरह रूप धन तम भयो वे रहीम नर धन्य हैं सदा नगारा कूच कर सब कह सब कोऊ करे स कहावं रसकरी ममय दमा कुल देखिकै समय परे भोछे वचन समय राम सम लाभ नहि सरवर के खग एक से सर सूखे पछी उड़ ससि के मीतल चाँदनी ८४] ६५ १५५ १४३
inted by appar af Th. Alatebod Ian Journal o Altakabos
२४६
१९२
२११
४६
ससि सकोच साहस सलिल
स्वारथ रचत रहीम कह
स्वासह तुरिय जु उच्च
साधु सराहे साधुता
सीत हरत तम हरत नित
सौदा करो सो करि चलहु
सतत संपतिवान का
सपति भरम गॅवाइ के
हरि रहीम ऐसी करी
हित अनहित रहिमन करै
होत
कृपा
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