Bharatiya Vidya Bhavan Library, Mumbai
Vedmata (rigveda Bhugool)
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विषय सूचि
...
वेदमाता (ऋग्वेदिक भूगोल)
विषय
पृष्ठ
१ अष्ट दिशाये, पृथिवि, सीमायें
२ पर्वत
६-६
३ नदियों
१०-२२
४ वैदिक पुरुषों के स्थान
२२-३१
५ वैदिक ऋषियों की वस्तियों
३१-४६
६ विशेष स्थान
७ अहि मानवों की वस्तियाँ
५८-५६
८ मध्य एशियाई शिधांत गलत
५६-६६
है जल्प्या
१००-१२२
१० वृष्टि यज्ञ
१०३-२३६
--
अर्चना
वेदमाता नाम की यह रेतु किता उन देशों, प्रांतों,
पर्वतों, नदियों, स्थानों, ऋपिग्रामों का वर्णन करती है जिनसे
प्राचीनतम मानर मूल पुरुषों का, देव ऋपियों का, असुर
और राक्षसों का समंध रहा है। इस पोथि में मध्य येसियाई
सिद्धांत का पंडन किया गया है ताकि जन साधारण को,
विद्यार्थियों को, अध्यापकों को मूलस्थान के बारे में निश्चय
करने का सुभीता प्राप्त हो। अल्प्या और वृष्टियन का वर्णन
ऋग्वेद में होने से, इनको प्रकाश में लाया गया है । माधारण
तौर पर देखने से पृथिवि निर्जीव प्राण रहित मानी जाती है।
वेदक्ष नियों का मत है कि इस ब्रह्मांड में जो कुछ भी दृश्य
प्रश्य है, उन सर मे ईश्वर का अंश और शक्ति है। अतः
अतिवृष्टि से पृथिवि माता को कष्ट होता, जैसा कि अति
अधिक भोजन से प्राणियों को, या यों पहिये 'अपचन हो
जाता है, उल्टी होने लगती है। इसी तरह अनावृष्टि से भूमि
सूरने लग जाती है, कमजोर हो जाती है, मुर्मा जाती है
मानो यह स्वयं विभूक्षित होकर अन्न उत्पादन करने में
असमर्थ हो जाती है। इसलिये अनावृष्टि होने पर मधुर वी
के लियें यज्ञ किये जाते थे।
इस अंधसि की यह इच्छा थी कि ऋग्वेदिक विचारों को
ऐमो भाषा में प्रकट किया जाय जिसे मर्व साधारण मरलता
पूर्वक पढ़ मरे, ममम मरे, और यह भाषा ऋग्वेद की भाषा
अति निरुट भी हो। गढ़-गुमाऊं की यालियों में निकटता
(स ) का गुण होने पर भी, उनका प्रचार अधिक सीमावद्ध है, और इस जमाने में वह किताबी भाषा का पद त्याग चुकी है। सस्कृत अति निकट होने पर भी अति विकट है। वह पिजड़े के भीतर वसनेवालि चिडिया की तरह कैद रहती है, और साधारण जन उससे अनभिज्ञ हैं। यदि ऋपियों के विचारों को इंदुदेश मे प्रचार करना है तो और सो भी येक ही भाषा के द्वारा तो, हिन्दी के अतिरिक्त इस अभिप्राय को पूर्ण करने में अन्य भाषायें असमर्थ सी दीखती है। यह मानी हुई बात है। ऋग्वेद समस्त मानव जाति का पैतृक धन है और विना भेद भाव के उसके विचारों को प्राप्त करने की सयको सुविधा मिलनी चाहिये। यदि यह विदित हो जाय कि ऋग्वेदिक ज्ञान की कामना जागृत हो उठी है, ऐसा करने में भी कोई कठिनता न होगी। इस समय तो ऋग्वेद को लोग भूल जैसे गये है। यहां, यह प्रकट कर देना आवश्यक है कि ऋग्वेदिक शब्द, माहवरे और तरज प्रामों की प्रचलित हिन्दी में अब भि विद्यमान है। उदाहरण के लिये कुछ नमूने यहाँ उद्धृत किये जाते है-पा, को, जल्या, समतु, दुर्मतु, मन्यु, गणेशु, पियारू, कुणारु, जयार, दशा, तूजी, लक्ष्मा, चंद्रा मंगु रावत, अच्छा, जानति, श्रायन वे, रे, अरे, भारि, सीद सादनं (बैटो बेटी जाय), चार चनु (चारों श्रास), वृष्टिं वनाव, वृष्टि पनि, यज्ञमा, जनिमा, आनजे (आना जाना) योनिमा,नव यो नति (LE का फेर)। इससे साचित है कि ऋग्वेदिक युग में ऋग्वेदिक भापा ग्राम निवासियों की बोल- चाल की भाषा थी।
(ग)
हिंदी
दुसरा प्रबल कारण अपनी फितव-केतुओं को हिंदी में
लिखने का यह भी है कि यह भाषा उत्तर भारत में प्रधानता
प्राप्त कर चुकी है, और अब तो इसको राष्ट्र भापा का श्रेष्ठ
पद पाने योग्य स्वीकार किया गया है। इसके अलावा उत्तर
प्रदेश की सरकार हिंदी में डिग्री कक्षाओं के लिये विविध
विषयों पर पाठ्य पुस्तकें लिसवाने के लिमे पुरस्कार भी
देने को है। अब से पेश्तर भी हिंदी के लेखकों को पुरस्कार
भी दिये जा चुके हैं। अतः सरकार धन्यवाद की पात्र है,
इसमे संदेह नहीं, लेकिन यह मालूम नहीं हो रहा है कि
सरकार की इतनी सहायता, सहानुभूति होने पर भी उत्तर प्रदेश
के राज्य की सीमाओं के भीतर अंग्रेजी अब भी वैसी ही
घुड़दौड़ लगाती रहती है, जैसी कि अंग्रेजों के प्रभुता के
समय। कभी कभी सुना जावा है कि सरकार के भाषा
विशारद विशेषज्ञ सलाहकार यह सलाह देने को असमर्थ
हैं कि अंग्रेजी का प्रचलन राज्य मे विना विलंब बंद किया
जाय । इसका सबर यह बतलाया जाता है नवीन शब्दों का
गढना जारी है। समाचार पत्रों से सबर मिली है कि सीम्यंट
के लिये वन चूर्ण बना है, न्यकटाई के लिये कंठ लंगोट
कहकर कंठ की शोभा बढ़ जायगी। जनता ऐसे शब्दों को
मनोरंजन का साधन समझे तो आश्चर्य नहीं। क्या सरकार
ऐसे शब्दों को अपनायेगी ? सिम्यंट और न्यकटाई तो येक
लंबे समय से देश की भाषाओं में स्थान प्राप्त कर चुके है,
इन्होंने ऐसा कौनसा अपराध किया है तो ये देश से निकाले
जाय। भारत तो शरणागत कमल रहा है, अन्य देशों के
निवासियों के वंशो को यहां रहने को सरकार ने कन्सेशन दे रक्से है। हमारे देखने में तो अंग्रेज १६४५ मे चले गये थे, तर से यह विलय वालक की तरह पुष्ट होता हुआ अष्ट घर्प का गोरे चमड़े चेहरे का हो चुका है। यह इतना आर्पफ है कि दैनिक पत्रों के संपादक ही नहीं, राज्य के अधिकारी भी इसके मोहिनी रूप से मोहित है, मानो इसे चिरायु होने की पाशिर्वाद देते रहते हैं। क्या यह कहना गलत होगा कि वि-लंब तो अपनी वि विशेपता से लंबाई नापता है, यह किसी की सहायता पाने के लिये किसी की खुशामद नहीं परता ? हमारा तो नम्र निवेदन यह है कि इस उडता के रूप विलय को समर्थवान् विपलता के गहरे कूप मे धकेल सकते है, लेकिन यह उनकी इन्त्रा पर निर्भर करता है परंतु इच्छा बलवान होनी चाहिये । इसीका प्रभाव सदक रहा है। ऋग्वेद हमे बतला रहा है कि संसार की सभी भाषायें उसकी छंदमय भाषा से उत्पन्न हुई है-अपागम्नस्थान- अफगानिस्तान प्रौफगौनस्टेशन येक ही अर्थ रयते है, कपर्दि से ही कप, कैप संबंधित है। शब्द सादृश्य जो अन्यत्र इसी पोथी मे दिया गया है, इसका प्रमाण है । इसलिये, सभि भापायें आपस में स्वसार है, अर्थात् येक साथ अच्छि तरह सरक्ती है, सरक सकती है। येक ही स्रोत से उत्पन्न होने से उनको येक दूसरे का विरोधि या शत्रु सममना गलत है। यदि किसी भाषा में कोई कमी है तो अन्य भापानी की सहायता से पूर्ण की जा सकती है। लेकिन कहा जाता है कि देवनागरी मे फारशी अंग्रेजी शब्दों को लिखकर उनका सही
स्यारण नहीं हो मस्ता और यदि उनको लेना है तो फारशी और
रोमन लीपि में लिखना होगा। यह दलील गलत है, निहायत
गलत है, पल्के गफलत है। स्त्री पति की पत्नि होने पर मिस
का मिसज हो जाती है, कुमारी से सयाणि-शयनी होकर
अपना ढंग बदलने पर प्रसन्नचित्त रहती है। यदि पति की
मापा उमको मातृ भाषा नहीं है तो उसको भी शीघ्र ही
ग्रहण कर लेती है। अंग्रेजी का पक्ष लेने वालों की चाल
वकील की सी होती है, जो केवल अपने पक्ष का समर्थन करने
में उसके अवगुणों को प्रकट नहीं करता। यह यह देसना
नहीं चाहता कि अंग्रेजों ने गंगा का गंजेज, मथुरा का मटरा
वारणारसि का बनारस, हुकहिंगोड़ का होकी, कानपुर का
कायनपोर, लीपो का लीपोइंग बनाकर स्वीकार किया, लेकिन
देवनागरी में लिसने से इनकार किया। इसी तरह इंदुदेश
वासियों ने भी होस्पिटल का अस्पताल, सीक्रेटीज का
शुकरात, अरिस्टोटल का अरस्तु, वियरर का वैरा, रिपोर्ट
का रपट, लोर्ड का लाटा स्टेवल का अस्तवल, परेड का परेट
बनाकर स्वीकार किया और कुछ शरल शब्द तो ज्यों के त्यों
कबूल कर लिये गये, जैसे-पार्क, फुटवील, मार्च, रोड और
अंग्रेजी के महिनों के नामों को अपने ढंग में लाकर अपनाया
गया। पल्टन और पुलिश में ट्रेनिंग के शब्द वही हैं जो
पहिले थे। यह पद्धति स्वाभाविक है । अन्य भाषायों के
जो शब्द हिंदी में स्थान पारेंगे उनका उधारण स्वयं ही,
अनायाम ही हिंदी के रंग टंग का हो जायेगा । परदेशी
उच्चारण की, ढंगडोल की आवश्यकता ही नहीं बल्के परदेशी
उच्च रण प्रशोभनीय है ।
सार्वजनिक होने के लिये, भाषा मधुर शरल होने से
-
( च )
आसानी से सीसी जाकर उसका प्रचार भी सर्व साधारण में
विना प्रयास ही होना सभव है। इस तरह सर्व गुण सपन्न
होने के लिये उसको व्याकरण के जटिल बंधनों से नहीं
जकड़ने से वह तीन गति से अग्रगामी होने में समर्थ हो
सकती है। यही मुख्य कारण है कि वौद्धों के समय पाली
भापा श्रागे वढी, और इस समय सूरदास और तुलसीदास
सर्व प्रिय हैं। 'मुग्वेदिक काल मे ऋग्वेदिक भाषा ऐसी ही शरल
थी और इस सर्वोत्तम गुण के कारण वह इस भूमडल मे
सर्वत्र श्रादरीणीय हुई और संसार की सभी भाषाओं की
वह जन्म देनेवाली जननी है। हिंदी भी उसी सार्वजनिक
भापा की सुता प्रसूता, तोक तनया है। हिंदी का व्याकरण
भी शरल है। ऋग्वेदिक भाषा छदमय कविभापा होने से
व्याकरण से स्वतन ही थी। बालक बालिकाय अपनी मात
भापा को मिना व्याकरण के ज्ञान के शुद्ध बोलते ही है।
इसलिये सचिवालय मे, राजभवन मे, मनी गृहों में हिंदी को
सिंहाशनारूढ करने में विलव को उसी तरह पदाघात करने
मे हित है, जैसे कि वस्वधु गृहस्त के स्वर्गद्वार देवीद्वार में
प्रवेश करने को सप्त दोषों को अपने निकट न पाने के लिये
सप्त पदी के संस्कार में उनको लात मारते है, घसीट कर
वाहर फेकते हैं।
चेस्टिटि (Chastity)
इस समय भाषा की चेस्टटि पर बहुत जोर दिया जा
रहा है। यह गलत है, निहायत गलत है, वल्के हानिकारक
है। यदि चेस्टिटि के पोषक वेदमाता भूमि के पस्चसगौणो
चसगाणो शब्दों पर और इनसे सबंधित अग्रेजी के शब्द
च्यस (chess, च्यस्ट (chest), चेस्ट (chaste) और
,
चेस्टाइज पर विचार करें तो उनको हृदयंगम हो जायगा कि
चेस्टिटि का प्राशन इतना अधिक ऊंचा है जैसा कि
आसमान में दियः लोक जहां केवल येक देव के अन्य कोई
नहीं पहुँच सकता।
चेस्टिटि शब्द का अर्थ होता है, अपनी कामनाओं को
स्वतंत्रता को चेस्टाइज करके ऐसी पवित्रता प्राप्त करना जैसि
कि पति पलि में होनी चाहिये-'तू मेरे लिये, मैं तेरे लिये"
अर्थात इंपति अपनी स्वतंत्रता को जलाकर, उससे उत्पन्न
अग्नि से दो अंगों का येक अंग बनाकर पवित्रता का आदर्श
संसार के सामने रखकर दुनिया का हित कर सकते हैं।
स्वतंत्रता को साफ में मिलाने का यही माव च्यस्ट और च्यस
दर्शाते हैं। च्यस्ट का अर्थ होता है येक बड़ा डब्या जिसके
भीतर मानो परदे में पति पनि प्रेम से रहते हैं । च्यस बोर्ड
का खेल दो ही व्यक्ति पेलते हैं। अपने मनोरंजन के लिये
दंपति ने इस सेल को जन्म दिया था। इस लिये इस खेल
का संबंध भी चेस्ट और चेस्टिटि से हैं। अब रसष्ट हो जाना
चाहिये कि पति पलि अपने को दंड देकर मानो कोड़े लगा
कर चेस्ट बनकर चेस्टिटि को प्राप्त करने में समर्थ होते हैं।
भाषा दंपतियों की सी घरेलू चीज नहीं
चेस्टिदि
लागू
हो सके। चेस्टिटि प्राप्त करने के लिये भाषा
को चेस्टाइज करना दंड देने का अर्थ होता है, उसकी
स्वतंत्रता को नष्ट करना, उसकी वृद्धि को रोकना। जिस
तरह आत्मा शरीर के लिये है, उसी तरह भाषा राष्ट्र
लिये है। यसिष्ट वंशजों ने श्रात्मा का वर्णन किया है
"सहसवर थभि संचरति ......अप्सरस" अर्थात आत्मा
सहस्रों शाराओं से अप्सरानों की तरह संचालन करता रहता
जिस पर
( ज )
हे" । वस ठीक यही उपमा लागू होती है भाषा पर क्योंकि
उसने तो प्रत्येक घर की ही नहीं, प्रत्येक राज्य विभाग की
शोभा घढानी है, उनको उन्नत करना है। अत. चेस्टिटि का
प्रश्न ही न सडा किया जाय इस निवेदन का मतलब यही है।
अन्य लीपिया
अन्य लीपियों से हमारी द्वेष भावना नहीं है। जहा
उनका घर है, वहीं रहने मे उनकी शोभा है। यदि हमारे
देश में अन्यों ने उनको अपने प्राधिपात्य का साथी बनाया
तो, उस आधिपत्य के उठते ही उनका उठना भी अनिवार्य
है। लेकिन देखा जा रहा है कि बहुत से जोरदार लोग जोर
लगाने मे अथक परिश्रम कर रहे है, इसलिये कि ये परदेशिया
के आधिपत्य के चिन्ह अव भी मौज उडाते रहें ।
स्वदेश मे अन्य लीपिनों को घुसेड़ने का मतलब होता
है, स्वदेश की लीपि पर छुरा घुसेडकर उसको निर्जीन करना
जैसा कि वृक्ष को काटकर सुसाकर उसका काठ बना देना।
येक देश मे येक ही लीपि का प्रचार करने का अर्थ होता है
उस देश की येकता को सुदृढ़ बनाये रसना, उस देश के
लोगों को सिकस्त सिकस्ता से सुरक्षित रखना। इस विचार
को आदर न देने का अर्थ होता है अपने पैर पर स्वय ही
कुठाराघात करना। जो लोग यह जानते हुये, न जानते
हुये, भूल से, या कुत्सित विचारों से देश के लिये, राष्ट्र के
लिये अन्य लोपियों के पक्षपाति बनते है उनको देश हितपि,
देश भक्त, राज भक्त हरगिज नहीं कहा जा सकता, और
न वे देश को येकता के पक्षपाति माने जा सकते । जिनको
अन्य देश के साहित्य, लोपियों का शौक है, वे उनको
अपनाने में स्वतंत्र अवश्य हैं लेकिन इस संबंध में उनको
राजकोप से सहायता देना अन्याय है, श्रीपजम्पट है और
शत्रु पक्ष का बल बढ़ाना है। अतः राज्य के भीतर अन्य
लोपियों को राज दर में, राज्य के दफ्तरों में घुसेड़ना
हानि कारक है, बालकों पर अधिक बोझ लादना है क्योंकि
मभी को मरकारी अफसरों से, दफ्तरों से काम पड़ता ही है,
बहुन से तो सरकारी दफ्तरों में काम करके अपनी श्राजीविका
भी चलाते हैं। सरकार ने रजिस्ट्रेशन के दफ्तरों में फार्शि
लिपि धुसेड़ पर क्सि तरफ करवट बदली है, इस पर वही
विचार करे। हमारा तो विचार है कि उत्तर प्रदेश की
श्रादरणीय सरकार बहुत अछि तरह जानती है कि राज्य का
कार्यपत्र व्यवहार दो लोपियों में चलाना असंभव है, और
व्यर्थ का व्यय बढ़ाकर धन का दुरुपयोग करना है। लेकिन
ऐसा मालूम हो रहा है कि सरकार इस बात को भूल गई है
कि थपीजम्यंट से शांति नहीं होती है, वह भयानकता के
व्याघ्र की ग्नाव का और अधिक चौड़ा बलवान करता है।
इतिहास में इसके दृष्टांत भयानक अक्षरों में चेतावनी देते
रहते हैं । यदि पद्माति के दर्शन एक कामातुर को न कराये
जाते तो उसको कामनाम्नि में घृत की आहुति देकर बेवारि
अपला को रश्य अपनी बाहुति न देनी पड़ती। सोमनाथ के
पुजारियों की अपीजन्यंट की पॉलिशि सोगनाथ को बचाने में
श्रममर्थ रही, तिलक की अपीजन्यंट ने देश विभाजन की
सहायता की। कौरयों को अपीजम्यट का मीठा म्याद चया
कर कुरुक्षेत्र का गटल सका । दृमरों को अपीनम्यंट का
साद चापागाला अपने लिये विपक्ष की उपत्ति करना है,
ये दृष्टांत इस सिद्ध करते है। राज्य की रक्षा, उन्नति, येता
और दृढ़ता ये प्रायुधों के द्वारा हो सक्ति है न मिश्रपीजम्यंट
( अ ) से। अन्य लोपियों के प्रचार में सहायता देना अपने को धोखा देना है। जिस चिनगारि ने प्रज्वलित होकर देश विभाजन किया, वह चिनगारी सरकार की सहायता पाकर बलवान होती जाती है। यह राजनीति गलत है। जिन ऋपियों ने विश्वव्यापि महान् साम्राज्य की स्थापना की थी, उनके विचार ऐसी राजनीति का विरोध करते हैं। इस देश में फारशी लीपि के पक्षपाति प्रयक्षणा करने में नहीं थकते कि फारशी में लिसी उर्दू भाषा प्रत्येक सरकारी विभाग में शोभा का पद ग्रहण करे और दृष्टात दिया जाता है कि युरोप के येक छोटे से देश में तीन भाषायें येक साथ कार्य करती रहती हैं, यहां उत्तर प्रदेश में भी ऐसा ही क्यों न हो। ये चतुर डिप्लोमेट जानते हुये भी यह प्रकट नहीं करते कि उस देश में ये तीनों भापायें येक ही लीपि में लिखी जाती हैं। येक कोमल हृदय शास्त्रि जी ने ऐलान भी किया कि उर्दु तो हिंदी की येक तरज मात्र है लेकिन देश की लीपि में लिखने से ही उसे यह इज्जत मिल सकती है। यहां यह भी प्रकट कर देना ठीक होगा कि रुश में विशति भाषायें हैं लेकिन लीपि येक ही राज्य करती है। येक लीपि का महान् लाभ इसमें है कि सभी देशवासी सोचने समझने में अति निकट आते रहते हैं। लेकिन फारशी लीपि के पक्षपाति तो प्रचलित अग्नि के चिनगारे से सरकार को भयभीत करके देश की येकता को नष्ट करने पर तुले हुये हैं जब कि खतरे की खड्ग देश के शिर के ऊपर लटक रही है और सरकार देश की येकता को येक लीपि द्वारा सुदृढ़ करने का प्रयत्न कर रही है। . हमारा तो निवेदन है कि उड़दू उर्दू को भापा का पद देने का अर्थ होता है अपनी अज्ञानता का प्रदर्शन करना।
उर्दू तो उई की दाल से भी संबंधित नहीं है। वह तो उड़दू
हे जो कि चिड़ियों के मानिंद उड़ती हुई उड़ते हुये लोगों की
चोली होते हुये उसका अाधार कहीं है ही नहीं । लस्करीयों
की बोली जो हुई । यह किसी देश की भाषा नहीं । इसको
उर्दू कहना भी गलत ही नहीं है अपभ्रंश ही नहीं है, यह तो
फारशी लीपिका चोगा पहिन कर उसके भीतर कटार छिपा
कर देश की येकता को मृत्यु शय्या पर पहुंचाना ही इसकी येक
मात्र अभिलाषा है और इस कार्य को अपना परम पुनीत
कर्तव्य मानती है। फूट ने देश को येक सहम्न वर्ष तक
गुलामों का देश बनाया, जयचंद मत बनो। सावधान !
सावधान !!!
भाषा का पद प्राप्त करने को किसी याचा को भी कर्म
शक्ति में वलयान होना चाहिये । इस भाव को प्रदर्शन करने
के लिये कहा करते है कि भाषा को कृयमाण शक्ति संपन्न होना
चाहिये । इस उड्दू में इस सर्व गुण संपन्न शकि का
विल्कुल ही अभाव है।
उधार-पुधार लेकर चमक दमक दिखाने से, फिल्म का
सा स्टार बनकर ही, राज्य मापा, रामभाषा का पद कभी
हासिल नहीं हो सकता।
दूसरा विचारणीय विषय यह है कि उर्दू (नकि उड़दू)
नामकर्ण हुश्रा या प्रामों की उस बोली का जिसे प्राम
निवासि जनता घोलती थी लेफिन परदेशियों ने देश को हिंद
पदार उनकी भाषा को भी हिंदी यह दिया । जिस तरह
भोजन पदार्थ भात रोटी को जई की दाल स्यादिष्ट बनाठी
है, यही भाव दर्शाने के लिये प्रामों की भाषा को उई कहते
थे।
( 7 )
जब येक ब्रह्मापि कलकत्ते में धारा प्रवाह सस्कृत मे
उपदेश देते थे, येक दिवश, ब्रह्मा समाज के प्रवर्तक
श्री केशवचद्र सेन उनसे मिले और कहा कि तुम्हारी सस्कृत
को साधारण लोग समझ नहीं सकते, अच्छा यही होगा कि
अपने विचारों को लोगो के सामने हिंदी में प्रकट कर देश मे
समाजिक सुधार पर जोर दो, उस जमाने में भी यह था मत
एक अंग्रेजी के महान् विद्वान् धगाली का । इन्हीं सब बातों
ने हमको उत्साहित किया है ऋग्वेदिक विचारों को हिंदी में
लिखने के लिय । "पियो का जगद् व्यापि साम्राज्य" और
गापियों की फिलोसफि को समझने के लिये ऋग्वेदिक इतिहास
और वेदमाता, श्राशा की जाती है कि अग्रगण्य दूता फे
सदृश प्रेपित दिये जा रहे है । उत्तर प्रदेश की महा मनासि
सरकार से अत मे निवेदन किये बिना नहीं रहा जाता कि
दुनिया मे शाति के लिये वेदिक रिसर्च स्तूप (Vedic
Research Institute) की स्थापना में अपने दक्षिणा के
दक्षिण हस्त से “अयंशिवाभि मर्शन " से 'प्रयं अरपा
असा' यह मंसा प्ररप हो का आशिर्वाद देवे । श्रत में
घमा प्रेस वागन यो धन्यवाद दिये विना नहीं रहा जाता
निमये कार्य कर्मयों ने बडा लगन और उत्सा- मे वेदमाता
को सूर्य के दर्शन करा रहे है । प्राय प्रम।।
हीराम धस्माना
पो० चादगान (रोटी) लखनऊ
.
मनमिधु सनम
देखापन
बमा साम
.
मो
..."".-
मग देवरसंशा
भि
वेदमाता
वेदोक्ता ऋपियों की रचनाओं को संग्रह करके वेद
संहिता बनी है। जिस भूमि में उन्होंने पद्य रचना की है, उस
भूमि को वेदमाता कहते हैं। उस भूमि को ऋग्वेदिक ऋषि
परमव्योमन और दिवः१ कहते थे। उसी भूमि को अथर्व वेद के
समय वेदमाता की पदवी प्रान हुई। इसकी महिमा गाई गई
है कि वह तो द्विजों को पवित्र करने वाली है, वेदाध्ययन
की तरफ प्रेरणा दिलाती है, वहीं ब्रह्मलोक है क्योंकि ब्रह्म
के गीत यहां गाये जाते हैं, स्तुतियां की जाती है । वेदमाता
से स्तुति की जाती थी "हमें दीर्घायु प्राण, सन्तान, पशु,
कीर्ति, धन और ब्रह्मवर्चस प्रदान करो" 12
१ परमव्योमन् और दिवः उस देवलोक को
भी कहते हैं जहां येक देव सहस्त्रों ज्योतियों से
प्रकाशित रहता है जब ब्रह्मांड भुन कर नाश हो जाता
है और सुन्य हो जाता है।
* स्तुना मया 'वरदा पदमाता, प्रमोदयति
पावनी दिजानाम् । श्रायु, प्राणं, प्रजा, पशु, कीर्ति,
द्रविणं, ब्रह्मवर्चसें । मह्य दत्वा प्रजत ब्रह्म लोकं ॥
श्रथ वेद १६.७१.१०
अष्ट दिशायें।
वेदमाता तो परमव्योमन् हिमालय की दिवः भूमि का
येक अंग अंश है। ऋषियों ने दिशाओं का, पृथिवी का मापदंड
हिमालय को स्वीकार किया और उसकी लम्बाई से पूर्व
पश्चिम दिशाओं की स्थापना हुई। इसके उत्तर में जो ध्रुव
है, उसको उत्तर ध्र व नाम मिला, जो ध्रुव नीचे निचान
देशों की तरफ है, उसको कहा गया दक्षिणि ध्रुध । जिन देशों
के निवासि निमत थे, ऋत व्यवहार को जानते ही नहीं थे,
उन देशों को कहा गया नै मृत्य कोण के निमति देश । समस्त
पृथ्वी पर शांति स्थापना की गरज से जिन देशों का ईशानत्य
हिंसाकारी मरीचियों को दिया गया, उसको नाम मिला ईशान
कोण। जिन देशों में जाकर हमारे ऋपि पितर अग्नि दुग्धा
हुये, उनकी दिशा को कहा गया आग्नेय कोण । जिन देशों
का वायु स्वदेश हिमालय की सुखदाई वायु के महश था और
जो ऋपियों को प्रफुल्लित करता था, उस तरफ को यहा वायव्य
कोण। इस तरह पर स्थापना हुई थी चतस्त्र प्रदिशा
विदिशों की।
पृथ्वी।
क्योंकि प्राणियों को भोग्य पदार्थ भूमि से प्राम होते हैं,
उसी परघे यसते हैं, उनसी मीड़ा का क्षेत्र, भूमि ही होती है
उसी मे वे मुग दुग भोगते है, इसलिये वेदमाता के
भूगोलिक वर्णन के सम्बन्ध में यह यतलाना आवश्यक समगा
गया है कि भूमि की उत्पत्ति कैसे हुई । इस विषय में अपनी
मननशक्ति और दिव्य दृष्टि के द्वारा शपियों ने जो शान प्राम
फरये अपनी रचनायों में मुरछित पर रखा है, उसका
संक्षिप्त वर्णन किया जाता है। यहां यह वा भी उद्धृव की
जाती है, जिसके समक्ष वेद निंदकों ने भी शिर झुकाया है,
और अभिमानियों का गर्व भी गारत हुआ है।
विश्वतः चनुस्त, विश्वनो मुसो, विश्वतो बाहुम्न विश्वतम्मात् ।
स बाहुभ्यां धमति स पती, द्यावा भूमि जनयन देव एका ।
१०.८१.३
अर्थ-येक देव के चनु सब तरफ है, मुन्न सब तरफ हैं,
घाटु सा तरफ है, पाद सब तरफ है। उसने बाहुओं से धम
किया, मानो सुपर्ण ने अपने पंख फड़फड़ाये और निमिप मात्र
मे दावा भूमि का जन्म हो गया। धमति शेट यह भी
उनलाता है किधीकनी के धम धम करने से उसे चिनगारे
आसमान की तरफ उठते हैं, भूमियों के पिंड आसमान में
प्रकट हो गये जिनको नक्षत्र कहते हैं। या जैसे आतिशबाजी
के गोले पर आग लगने से धम धम होते हुए ग्राममान
अमरय चिनगारों से भर जाता है, वैसे ही, नक्षत्र मंडल
से प्रासमान भर गया। ऐसा होते हुये भी येक ऋपि ने प्रश्न
* इस ऋचा में कवि ने अपनी कविता शक्ति
का परिचय तो दिया ही है, लेकिन येक देव की
अद्वितीय शक्ति का प्य एक ही धमति शब्द में मर
कर संमार को चकित कर दिया है । येक देव के
मात्र चक्षु, मुष, बाहु पाद फैले हुये हैं कह कर
ईसर की मर्यव्यापकना, मर प्रकार की महान् शक्ति
का विचित्र चित्र खींचकर अभिमानियों का अभिमान
इम तरह चूर्ण कर दिया है मानो वे विद्युत से
चलनेवाली चशी में पीम दिये गये हैं।
( ४ )
किया था कि यह पृथ्वी रूपी घर कैसे सामान से बना और
वह आया कहां से? इसका उत्तर ऋग्वेद मे विविध प्रकार
से दिया गया है। येकने कहा कि यदि मनन शक्ति से काम
लो तो मालूम हो जायगा कि पृथ्वी को वही येक देव धारण
करता है, अन्य ने कहा कि पृथ्वी के भीतर वही बसा हुआ
है, लेकिन ऋग्वेद मे जो वर्णन येक देव का मिलता है, उसी
की सहायता से इसका उत्तर दिया जा सकता है, वह इस
प्रकार है:-
ईश्वरं सीमा रहित समुद्र की तरह, राई के दानों के
सदृश रज कणों से भरा है, उन्हीं से भूमियों के पिंड बने है ।
ये पहिले धूमकेतुओं के रूप में प्रकट हुये और घूमने लगे।
इनके अतरिक्ष मे ईश्वरीय शक्ति अग्नि (Energy) विद्यमान
थी। लासों घर्प परिक्रमा करते हुये ये धूमकेतु ऐसे द्रव रूप
मे हो गये जैसा कि ईख रस, फिर यह पकते पकते गुड
की तरह दृढ़ होकर कहीं पर्वत, कहीं सरोवर, कहीं समुद्र, कहीं
सरिताये हो गये। छोटे छोटे पिड हर समय रात दिवस गिरते
रहते हैं और उनसे धूल जैसे कण पृथिवी पर पढते रहते।
यह भी पैदिक विचार का समर्थन करता है।
वेदमाता भूमि की सिमायें ।
सीमा जानने का अर्थ होता है किसी देश की दिशाओं
का ज्ञान प्राप्त करना । साधारणतया दिशायें चार मानी जाती
हैं, विदिशाओं सहित पाठ भी मानते हैं। नीचे ऊपर लगारर
दश भी मानते हैं। लेकिन ऋपियों ने अपनी जन्म भूमि पी
सीमाओं का वर्णन इस तरह नहीं किया है । उस दिव्य भूमि का
वर्णन उनकी पा रचनात्रा में पई तरह से मिलता है।
(२) काश्यप मारीच कहता है, उसके तो सात दिशा हैं जिनसे
ऋपिवीर नाना सूर्य जैसे पाया जाया करते हैं । अष्ट दिशामा
के बजाय सप्त दिशा और एक मूर्य के स्थान पर नाना सूर्य ।
सप्तदिशो नाना सूर्याः । ६.११४.३.
इस ऋचा में दिशा का अर्थ द्वार है। मानावर्प की
सीमाओं पर सप्तद्वार है, मानाद्वार, नीतिद्वार, नीलमद्वार,
कोटद्वार, हरद्वार, गुरद्वार और देवलद्वार। यह येक पहिचान
है मूलस्थान को जानने की।
(२) सप्त सिंधुन् १.३२.१२ मानारर्प की मुख्य नदियां
सात हैं। इन पर हमेशा सेत मूल बनाये रसने की
आवश्यकता होती थी। वर्षा काल में ये अतर हो जाती है।
इनके अतिरिक्त ६६ असंख्य स्रोत है जिनको गाड़ गंगा,
गधेरा कहते हैं। नव चयन् नवति स्रवंति। १.३२.१४
१०.१०४.६ भी इन सप्त सिंघवों में गंगा भी है जिसको
समरत मभ्य संसार जानती है यह है दूमरा तरीका प्रपियों
की जन्म भूमि का पता लगाने का।
(३) माना यर्प पर्वतीय प्रांत है और माना माम में वर्ष
में तीन ही ऋनु होती है, शरद, हेमंत और वसंत । इससे भी
मूल स्थान का परिचय मिलता है।
(3) शूपियों के स्थान तो बहुत हैं । पायु और अगस्त
वैदिक पि हैं।पायु की पोड़ी और पगस्त का अगम्तमुनि यहुन
प्रसिद्ध स्थान हैं। यह है गौथा मार्ग मूलग्यान के परिचय का।
(७) यह को जगन प्रसिद्ध है कि येदिक ऋपि मोमरम
पीते थे। जय सोम और उमर मादिशो नाना मर्य दिग्विजय
से लौटे थे तो उनरा स्वागत सिया गया। शर्यणायति और
आर्जिकिया प्रांत की सोम वनस्पति का सोमरस उनको पिलाया
गया था। ६.११३.१२, पर्वतान् शर्यणावतः वाक्य भी बेद मे
है। इन दो नदियों का वर्णन प्रियमेघ ने भी किया है। इससे
भी मूलस्थान का परिचय मिल सकता है।
(६) अहि (नाग) वंश से इन्द्र को बहुत युद्ध लड़ने
पड़े जिनका वर्णन ऋग्वेद में है। नागपुर नाम का प्रख्यात
प्रांत गढ़वाल में है। इससे भी मूलस्थान का पता लग
सकता है।
(७) रुद्र संवधि सूक्त और ऋवाओं से स्पष्ट है कि
राजा रुद्र की प्रजा अहिमानव थे। विष्णु, सूवा राष्ट्रि थे
(१०.१२५.३१७) यह मोटी बात है कि केदारनाथ, बद्रिनाथ
गढ़याल मै है । ये सप्प सूत्र है प्रथम सभ्य मानर के मूलस्थान
की सीमाओं को निश्चित करने के।
वैदिक पर्वत
शर्यणावत १९.३५.२
गढवाल में शरणाग्राम, और शरणा का डांडा चंद्रबुध्न
में हैं। इसी पर्वत से शरणा की गाड (शर्यणापति ) नीचे
को बहती है जिस पर पांथर के शूर दधिचि और वृष्णु इन्द्र
ने वृत्रासुर को ललकारा था। इस पर्वत की प्रतिष्ठा मातन
सिंधुन के समान मानी गई थी।
हिमवंत १०.१२१४
हिमालय के चतुष्टि शृंग के समीप जल्प्या के समय
सप्त ऋषियों की प्राण रक्षा हुई थी। इसी पर्वत में ऋपियों के
.
स्थान है, मात सिंघव नवतिं च नव खोत इमी की देन हैं,
ऋग्वेद की रचना यहीं हुई। सभ्य मानव के देशांतरगमन का
केन्द्र यहीं था । सप्त चुघ्न यहीं है । पर्वतान् वृहतो हिमालय को
भी कहते थे। सप्त पर्वत यहीं है।६.५४.२१४.१७.७. ।
मरीचि प्रयतो १०.५८.६
मरीचि पर्वत ही माना पर्वत है जहां मरीचि के वंशज
मारिचा मार्दा रहते हैं।
वृहत दिवः पर्वत ५.४३.११
यह दीवा का डांडा चंद्रवुघ्न में है। यहां उगनेवाली
सोम वनस्पति को दिवः शिशु कहते थे।
व्यामापर्वतान् १.३६.३.
इस नाम के दो पर्वत है, एफ तो व्यासपाट के पास,
और दूसरा अल्मोड़ा जिले मे । वेद व्यास गढ कुमाऊ में रहे ।
दोधत सानु १.८०.५
यह दुधातोली पर्वत है जहां से दूधयति नदी निकलती
है । यहां के यत्रों को जवन करके अर्चन्नु स्वराज की घोषणा
हुई थी।
दम्युं पर्वत ८.७०.११
यहां दम्यु रहते थे। दशौलि प्रांत गढवाल में है, दशौली
ग्राम पुंगरा मे, दशज्यूला पट्टी भी है।
पलस्य मानु ६.३६.६
चल राक्षस जिस भूभाग का स्वामि या उसे वालिफंडार
स्यु अव भी कहते हैं। बलस्य अद्रिवो रिल ( १.११५) को
इन्द्र ने छिन्न भिन्न करके देववशियों की उस्राओ को छुडाया
था। यह पट्टी गढवाल के राष्ट्रकूट मे है।
शम्बर गिरि (ऋ. ६.२६.५)
इन्द्र ने पर्वत में रहने वाले शम्बरवशी का हनन किया
था क्योंकि वह सेवकात् प्रजाजनों को कष्ट पहुँचाता था।
शम्बरवशि वधान गढवाल में रहते थे।
मुंजावत पर्पत ऋ १०.३४.१
यह पर्वत सोम के लिये प्रसिद्ध है और दिव पर्वत की
एक सासा है। मोजो ऋपि के कारण इसका नाम मौजवत
है। मुजावत का हिमालय में होना महाभारत भी सिद्ध
करता है।
बडित्था पर्वतानां ऋ ५.८४.१
बडेथ के डाण्डे गढवाल मे दो हैं एक चन्द्रकूट मे दूसरा
ढागु मे कवि कह रहा है कि बडेथ के पत्थरों में सह
(घास पात ) खून उगता है लेकिन साथ ही पर्वतीय समभूमि
में जनता के लिये अन अधिक से अधिक होता है।
पर्शानामः गिरयः ६.७३४
साधारण जन इसे बनस्ट पर्यत रहते हैं। इसकी शक्ल
सोमस्यैर मौजरतम्य भक्षो ऋ १०.३४.१
गिरिहिंमत पृष्ट मुंजारन् नाम पर्वतः एक प्रसिद्ध
वाक्य है।
पशी को होने से ही इसका नाम पनिाम हया है। यह हिमालय के नन्दादेवीग के निकट है। विवम्य पर्वतान् १.१८७.७ श्यादि काल में पिता विवस्वत पर्वतों को गया। वहां मधुर अन्न रमान को गया । वैवस्वन जल्प्या से पहिले यमनोत्तरी को कहते थे। यम और वैवस्वत के माना मे रहने के कारण माना पर्यत को विवस्व पर्यन् कहने लगे। वेद में हिमालय के हिमान्दादिन पर्वतों का वर्णन इसलिये श्राया है कि प्रलय के समय जय भगदड़ हुई थी तो प्राणियों की प्रारण रक्षा हिमालय जैसे पर्वत के ऊँचे शृगों पर हुई थी। इसी कारण वेद कहता है “यस्येमे हिमवन्तो महिला" (ऋ १०, १२१, ४), मरिचि पर्वत, चतुर्भष्टि श्रृंग, पशी पर्वत सास हिमालय ही में हैं। दिवः पर्वत, मुजावत पर्वत, शर्यणावत पर्वत, व्याम पर्वत, और दुधातोलि पर्यत हिमालय के ही 'बाहरी अंग है। इन मब पर्वतों का वर्णन ऋग्वेद की रचनाओं मे इस लिये श्राया है कि वहाँ हमारे वैदिक पूर्वजों का कर्म शेत्र था।
वैदिक नदियाँ
माना मानस के २४ सरिताओं के नाम और अन्य छ नदियों के नाम ऋग्वेद मे वर्णन किये गये
हैं। इनमें से सिंधु, सरस्वति, पुरुपिण, शर्यणावति और पार्जिकीया का महत्व वैदिक काल मे
अधिक रहा। इन नदियों के यैदिक' नाम और प्रचलित नाम नीचे दिये जाते हैं।-
वर्णन निरोप
वैदिक नाम प्रचलित नाम
१ रसा 1 नदाग
2 नितभा श्वेता श्वेतापरि 2 धौली-शेतगगा
३ कुमा
४ नमुकरमु
५ सिंधु
६ सरयु गगा 3 पिडर
4 बालकनन्दा
--
देर प्रयाग से नीचे सिंधु का
प्रचलित नाम गंगा है।
mahetm ar वर्ण विशेष वैदिक नाम ७ पुरीपिणि पुरुष्णि ८ सरस्वति ६ शर्यणाति शृणुहि १० ला धु ११ अन्शुमति १. श्रार्जिकीया (किमिदिनि) १३ पस्तयारति प्रचलित नाम पूर्विनयार सरस्वति शरणा की गाड़ पश्चिमि नयार अनुशया किमगडी गाड इसको शेराभि कहते हैं। पारता का गधेरा ( १ ) भेदगड (मधुगंगा) युणि गाड सरजू १५ रोहिणि १६ सूयवसीनी-सजू १७ धेनुमति १८ इरावति १६ मरुट्यधा २० तृष्टामया ये पचनद वृहद् मानेससंड में बहती हुई सिंधु की वृद्धि करती हैं। पूर्वि रामगगा कोशि पश्रिमि रामगगा (दूधवति) वैदिक नाम प्रचलित नाम वर्णन विशेष २१ सुपोमा मछलाड २२ ऋजित्यनी देव राष्ट्रसरी पर्वत के नाक पर है। ये दोनों स्रोत उसके उभय पक्षस्थलों का जल एकतृत करके मत्स गगा को जन्म देते है। २३ यमुना २४ शुतुद्रि यमुना अलका ( )। असि २५ प्रसिनि २६ वितस्ता २७ गोमति ( देवहुति) २८ देव निरव २६ देव नेष्टर ३० दानवी शुतुद्रि और विपाशा के मेल से सिंधु वनी। ये अशक्त गधेरे वाराणसि को जन्म देकर सिंधु नदी मे मिलते हैं। लसनो होकर सिधु में मिलती है। वर्णा गोमति नीपर (Dnieper) निष्टर (Dmmester) šrolet (Danube) ये नदिया योरप की है।
।
( १४ )
कुम्भज भी कहलाया। कुम्भज के वंशज कुम्भड़ी ब्राह्मण
गढ़वाल के नागपुर प्रांत में पाये जाते हैं।
४ क्रुमु ऋ ५,५३,६॥१०,७५,६
दानपुर के पिण्डारी गलशिर से प्रवाह होने के कारण इसका
प्रचलित नाम पिण्डर है। केदारखण्ड मे पिंडारका नाम है।
कर्ण प्रयाग में अलकनन्दा से सम्बन्ध करती है। इस नदी का
वैदिक नाम क्रुमु (कुरमु) हमारा ध्यान कुमाऊ की तरफ
आकर्षित करता है। इसका उत्पत्ति स्थान है भी कुमाऊ मे
यद्यपि वह गढ़वाल में बहती है। कुर्मस्त आयुअजरं
(ऋ १०, ५१, ७) कुर्म की आयु जरा रहित है। यह वाक्य
क्रुमु नदी पर भी लगता है, क्योंकि नदियो नाबालिका
होती है।
५ सिन्धु ऋ ५,५३,६||१०,७५,१-४-६
सर्व साधारण इसे अलकनन्दा करके पुकारता है और
इसके जन्मस्थान को अलकापुरी नाम देता है । इसके दो नाम
आलाक्ता (ऋ६०, ७५, ३५) और शुतद्रि (ऋ ३, ३१, १)
हैं। पालाक्ता-नदियों मे जिसकी सर्वोच्च प्रतिष्ठा-प्रशंसा है।
शुतद्रि-अद्रिसुता ।यह विष्णु के स्थान होकर वहती है, इसलिये
विष्णुपदि की पदवी धारण करती है । इसको सिन्धुः
हिरण्यवर्तनी (ऋ८, २६, १८) भी कहते हैं क्योंकि इसके
रेत को धोकर मुवर्ण निकलता था। एक समय था जब
श्रीनगर के धुनारों की श्राजीविका इसी व्यवसाय से चलती
थी और उतका नाम ही धोनेवाला-धुनार हो गया। यद्रिनाथ
की सरस्वति-विपाशा की अपेक्षा इसमे जल सदा बहता रहता
है । इसलिये इमको सदानीरा भी कहते थे। “विपाछुतुद्रि पयसा जते' (ऋ३, ३३, १) की ऋचा यतला रही है कि विपाशा और शुतुदि का संगम पर्वतों में है। यही कवि फिर शुनुद्रि को सिन्धु नाम देकर कहता है कि सिन्धु और विपाशा एक माय होकर आगे यहती हैं। अतः सिन्धु और शुद्रि एक ही नदी के दो नाम है। कवि ने वर्षा ऋतु का वर्णन किया है, इसलिये उसने बन्धन मुक्त नदी को विपाशा नाम दिया है जिसको प्रन्य समय सरस्वती कहते हैं। उसका जल रेतेली करेली भूमि में विलीन होकर सिन्धु में मिलता है। इमीलिये कवि सरस्वती सिन्धुभिः पिन्यमाना (६, ५२, ६) का भी वर्णन करता है। ६ सरयुः (ऋ ५,५३,६) (गंगा) यह सयाल किया जाता है कि तृविष्टप (तिब्बत) के मानसरोवर का जल इसमें निमृत होना है। जन्हु प्रदेश में यहने से इसी को जान्हवी कहते हैं। इसका वैदिक नाम गंगा भी है (प्रा. १०, ४, ५)। इसका सम्बन्ध प्रलकनन्दा से देवशमी के देवप्रयाग में होता है। पौराणिको ने गंगा की महत्ता बढ़ा दी है। वैदिक समय में मरस्पति, सरयुः, सिन्धु तीन नदियों की महत्ता अधिक थी और तीनों को वक्षणी नाम देकर मावित किया गया है कि ये पर्वतों के यशस्थलों का जल बहाती हैं और गर्जना करती हुई पर्वतीय नदियों के सहारा भर भार कली है १० ६४, ८ देवमया में सरस्सनि गुम मानी गई है। येदिक ममय में यहां घेधाध्ययन होता था। ७ पुरीपिणि ५,५३, कि पुराष्णि और प्यमा एक ही साल के दोनों नरफ से गय करती हुई, मध्य भू भाग को चन्द्राकार बनानी हुई -
( १६ )
कमन्द नौगाऊ मे मिल जाती है, इसलिये इन दो नदियों को
पूर्वी नयार और पन्छिमी नयार कहते है। पनि नयार
के किनारे हमारे वैदिक पूर्वजों ने रथों के वहन
करने योग्य मार्ग वनार पुरुषार्थ दिखलाया तो इससे
पुरपार्थवति और रथवाहिनी भी कहने लगे । परुणि, पुरुपति,
पृपति एक ही नदी के भिन्न नाम है। जिस स्थान पर पुरविण
और ध्वस्रा का सम्बन्ध होता है वहा से प्रागे नदी को नयार
कहते है। नयार और अलकनदा (गगा) व्यासवाट में
मिल जातो है। पौराणिकों ने इस सगम को सप्तसिन्धु तीर्थ
नाम के बजाय सप्त सामुद्रिक तीर्थ रहा है। उन्होंने सिन्धु का
अर्थ समुद्र किया।
इन्हीं सात मुख्य नदियों के कारण हमारे ही नहीं मानव
जाति के मूलस्थान को सप्तसिन्धु (हम हिन्दु) कहते है।
यदि यह कहा जाय कि गढवाल ही सपसिन्धु देश है तो
नानकार कह सक्त है कि गढवाल मे तो असख्य गाड गगा
है जिनके गड्ढों के कारण उसको गढवाल कहते है । गढवाल
में अनगिनत जल स्रोत अवश्य हैं। इस बात को मानते हुये ।
भी वेद इन्हीं मुख्य सप्तसिधवों को “सप्तापो देवी सुरणा
अमृता कह कर उनकी प्रशसा करता हुआ स्पष्ट करता है
कि इनमे भी "नवनि स्रोत्या नव च स्रवन्ती" ६६ यानी
असख्य स्रोत है।
८ सरस्वति १०.७५.५;६.६७१०
ऋग्वेद सरस्वति को सिन्धुमाता (७, ३६, ६) की
श्रेष्ठ पदवी देता है। इसका अर्थ यह है कि उसी के मेल से
* ऋ१०.१०४.८
अलकनन्दा को सिन्धु नाम मिला। सरवति ही ने उससे
मर्वप्रथम मन्यि की । सरम्यती को मप्रस्त्रमासुजुष्टा (६.६१.१०)
भी कहते हैं अर्थात् उसकी मात बहिने सप्तमिन्यु देश की सात
मुख्य नदियाँ है और यह न्ययं सबसे ज्येष्ट और प्रतिष्टित,
अष्टम है। पद्रिनन की सरस्वती में तीन विशेषता है। प्रथम
यह सर मे सोती रहती है, इमलिये सरस्वती कहलाती है।
द्वितीय वह कभी कभी वन्यनों को मानो तोड़ती है तो विपाशा
(ऋ३. ३३. ३) हो जाती है। सूतीय यह पटरानी जमी
रहती है, जो बहुत कम बाहर निरलती है। पौराणियों ने
उसे बिन्दुमति नाम दिया है क्योंकि यह मिन्दुसर में मोती
है। विन्दु का अर्थ है अल्प जल का सरोवर । यह गुण
निन्दुमर और सरस्वती दोनो में विद्यमान है। सरस्वती को
विपाट (पर्दा रहित) (ऋ. ३. ३३. १) कहा है। वन्धन
में रहना और वन्धन से मुक्त होना, ये दोनों बातें लागू
होती है. यद्रिनाथ की सरस्वती पर । जिन्हें देसना हो वर्षा में
और जब वर्षा नहीं रहती, देय मकते हैं। मुमतिं यनियानाम
और गुमति नदीनाम् याक्य सरम्पती पर लगते है और इन्हीं
के कारण उसे विद्यादेवि और यज्ञ की देवी भी कहते है।
प्रथम गुरपालय यद्रिनाथ के निकट की सरग्यती के ही तट
पर स्थापित हुना था। इसी कारण विन्दुमति को मुमति
और विद्यादेवी कहा गया। मरम्पति को अंधसि और अमूर्या
भी रहते थे।
शर्यपाति १.७४.१३-१४
इस नदी के तट पर पृत्रासुर का पर्वतीय प्रांत में
हुश्रा था। यह शर्यणापर्यन (
शटाएटा) से निकलती
है। वहीं शरणा ग्राम भी है। यर्नमान ममय में इस संरा
( १ )
कहते है । शर्यणावति का सोमवनस्पति भी प्रसिद्ध था
( ११३. १) शरणा का पर्वत, शरणा, सेरा चन्द्रकूट
(चौन्दकोट) में है। सोम तो पर्वतों में उगता है ।
इसी के निकट श्रार्जीकीया और सुपोमा भी है। इन तीनों
नदियों के पार्श्व मे जो पर्वतीय भूमि में उगता है, उसका रस
इन्द्र को प्रिय और प्राहादजनक लगता था (८.६४ ११)।
१० घस्त्रा ६.५८.३
(पुरीपिणि पर जो व्यारसा है उसको देखो)। ध्वस्रा मे
सीरों (अश्यालस्यु में) से बहने वाला स्रोत मिलता है।
वह वर्षी मृतु मे उग्र रूप होकर "श्रतणत पृथिव्या"
(ऋ ४. १६७८) घास पात उखाडकर वहा ले जाता है।
इस नदी को सुसा (१०.७५ ६) भी कहते थे क्योंकि इसके
तट पर शर्याति का स्थान सरासु है।
११ अंशुमति ६.६६.१३-१४
इसी स्रोत पर अनि क्षीर अनशुया का वैदिक स्थान था
यहीं हिम मे श्रति सताया गया था। अशुमति नागपुर गढवाल
मे है। हिम से सताया जाना हिमाच्छादित पर्वत ही में हो
सक्ता है। यह स्थान प्रनि की पत्नि अनशुया के नाम से
मशहूर है।
१२ आर्जिकीया ८७.२६
इस नदी का वर्णन शर्यणाति के साथ बहुत मृचाओं
में आया है यह इनके निकट सम्बधित होना भी जाहिर करता
है। अति उत्तम सोम भी इन्हीं के तट पर सन्न होता है ।
ये दोनों चन्द्रकूट (चौन्दकोट ) की नदियाँ हैं और इन्हीं के
(१६)
संगम पर वृत्रासुर का शव गिरा था 1 महान् मायावी वृत्र
को इन्द्र ने सूति से नदियों की सन्धि में सुलाया।
१३ पम्त्यावति ८.७.२६*
यह एक छुद्र स्रोत है। पास्ता का गधेरा कहलाता है
जो बदलपुर गढ़वाल में है। यह पूर्वि नयार में मिलता है।
१४ कृष्णा १.६२.३.
कृष्ण पर्यव का जल इसमे बहता हुआ पूर्विनयार में
मिलता है। इसका वर्णन बहुत अचाओं में आया है ऋ७,
६३.१३, ऋ १.६२.६, ऋ ८.८५.३ ओर ऋ ८.७३.१८ । कृष्णा
पर्वत को काला डांडा कहते हैं। वह नदी रेतपुर होकर दनगल
में पुरिपणी से मंगम करती है।
१५ रोहिणि ८.६३.१३
यह लैन्डोन और रिउणि के बीच यहती है। कृष्ण पर्वत
If इन्द्र महां सिंधुमाशयानं मायाविनं वृत्रमस्फुरत्रिः।
ऋ २.११.६
* महाभारत में वर्णन है कि मत्स देश में राजा
कोई नहीं था, ब्राह्मणों को राज्य था । सुपोमा (मत्स),
शर्यणावति, आर्जिकीया, पस्त्यावति उस देश की चार
मुख्य मरिता है जहां मरुत सेना चक्कर लगाती थी।
वहां पंचजना ब्राह्मणों का पंचायति राज्य था। सुपोमे
गयेणावत्याजिक पम्त्यावति । ययुः निचक्रया नरः।
८.७.२० । ये मरुत विन थे जो राजा की प्रार्थनाओं
को श्रवण कर उनको मुखी करते थे। ८.७.३० ।
( २० )
के दक्षिणि ढाल का जल इसमे बहता है । और रिउरिण
(रोहिणि) ग्राम के पर्वत का जल भी इसी नदी मे वहता है।
१६ सूयासिनी ७.६६.३
इश नदी के प्रात मे सूया जाति के असुर रहते थे जिनको
इन्द्राविष्णु ने वहाँ से भगाया था और वे अल्मोडे जिले के
उस प्रात में बस गये जिसे सोर कहते है । सूयरसिनी स्वय
पतला रही है कि सूया वहाँ पसते थे। शुम्भगढ भी यहीं
है। शुम्भ के ही वन्धु वान्धव सूया थे। सूयवसिनी को सुयमा
भी कहते थे और इसकी गणना सरस्वती के साथ की गई है
(ऋ.८१४)। सूयावसिनी के दानवों को होस मे लाने के
लिये इन्द्र को सरयु को पार करना पड़ा था ( ४.३० १८)।
इसलिये दानपुर की मुख्य नदी के दो नाम है-सूयवसिनी और
सरजू । शुभगढ दानपुर ही का एक प्रसिद्ध ग्राम है। दानपुर
का इलाका वर्तमान अल्मोडे जिले का अग है और गढवाल
के पूर्व में है।
१७ धेनुमति ७६६.३
अल्मोडे जिले के कत्यूर परगने से प्रवाह मार्ग बनाती
हुई वागेश्वर में दानपुर की सरजू से सगम करती है। वर्तमान
समय में इसे गोमती कहते हैं। इसके तट पर अर्ण ( वर्तमान
अण्णा ग्राम है)। कत्यूर भी गढवाल से पूर्व दिशा में है।
गोमति के निकट गोशालाये रहती थी (र ७.३२ १०)।
१८ इरावति ७६६.३
मान समय में पूर्व राम गगा कहते है।
शुभ पर्वत से तीन नदियां बहती है। पिंडर, सूया, शामा ।
यही शाम है।
इस नदी को
( २१ )
१३ मरुद्द्धा १०.७५.५
यह कौशिकी-कोशी नदी है कुशिकों की राज्य की वृद्धि
करने वाली ! यह कुशिफ पर्वत के जल को वहाती है। सोमेसर
विद्यालय इमी के तट पर था।
२० तृष्टामया १०.७५.६
मानो तृपित होकर भिक्षाटन के लिए भितु शयण को
जाती है । दोधत सानु (दुधातोली) का जल यहता है इसमे
ऊपर वर्णित पांच नदियाँ मानस खंड में हैं।
२१ यमुना १०.७५.५
यम और यमी का जन्म यमनोत्तर प्रान्त में हुआ था।
गंगा से इलाहाबाद मे संगम ।
२२ सुपोमा २३ ऋजित्यनी । १०.७५.५
इन दो स्रोतों के जल से मत्सजालनद्या नदी बनी है
जिसको मछलाड़ कहते है। इसीम श्रुणुहि और कीमिदिनी का
जल येक साथ रहता है।
२४ शुतुद्रि २०.७५.५
अलका के स्रोत को शुतुद्रि कहते थे। वर्तमान समय में
इस भूमि को अलकापुरी कहते है ।
निचान देश की नदियां
२५ असिकनी २६ वितस्ता
इनके नाम बतलाते हैं कि अशक्ति है और तारण शक्ति
इनकी बीत गई है।
।
( २४ ) डूबने से या नाश होने से बचाया (ऋ १.१५४.१) उत्तर में स्थित हिमगिरि से अभिप्राय है । शतपथ के उत्तरगिरि का भी यही अर्थ है। राजा रुद्र ७.४६.३३ गढ़वाल मे रुद्रप्रयाग और रुद्रनाथ पर्वत राजा रुद्र का स्मरण बाज भी दिला रहे है। वे वैद्य भी थे। उनके राज्य में सहस्त्रों उत्तम भेपज थे। क्योंकि उनके केदार प्रांत में उत्तम लाभकारी औषधियां उत्पन्न होती है । उनके स्मारक पंच केदार गढ़वाल में है। रुद्र गाधपति (ऋ १.४३.४) थे अर्थात् संगीत शास्त्र में प्रवीण ही नहीं थे, उसको जन्म देने वाले थे। गढ़वाल में उनका डमरू श्रर भी प्रसिद्ध है। रुद्र शरीरधारि देववंशि राजा थे। अतः वेद उनके गुणों का वर्णन करता है कि ये तो स्थिर धन्या साहमना, क्षिप्रेपवे, तिग्मायुधि हैं (ऋ १.४६.१) रुद्र की प्रजा नागवंशि क्षत्रियों की थी, इस लिए उनके राज्य का नाम नागपुर हो गया । इन्होंने मरुत सेना को जन्म दिया तो इनको पितर्मरुतां भी कहा गया। रुद्रं जलापभेषजम् (ऋ १.४३.४) घतला रहा है कि रुद्र ने जल चिकित्सा को जन्म दिया था। सम्भवतः इसके कारण स्नान करने की श्रद्धा और महत्ता वृद्धि को प्राप्त हो गई ।। दिवस्पति इन्द्र ऋ८.६८.४.६ उन्द्र ने देवराष्ट्र की स्थापना की थी। द्वीराड़ि ग्राम इसकी तरफ संकेत कर रहा है। यह स्थान चन्द्रकूट के दिवः पर्वत की धार पर है। वहीं देवराष्ट्रेश्वरी का भी स्थान है जिसका वर्णन केदार सण्ड में भी है । इन्द्र ने जब दरयु जाति का सहस्र ते स्वपियांत भेपजा ऋ७.४६.३
हनन करके उनकी प्राचीन बस्तियों को तोड़ा फोड़ा और
दरराष्ट्र की स्थापना की तो नृमेध ऋषि ने इन्द्र को पतिर्दियः
की उपाधि से विभूषित किया है। दिवः पर्वत, देवस्थल,
शर्यणावत पर्वत और मुंजारत पर्वत चन्द्रट प्रांत के मुख्य
पर्पत है। इन्द्र को धृष्णु भी कहते थे।
येक ममय में तीन ही श्रेष्ट पुरुप माने जाते थे जिनका
इम भूमण्डल पर उन अधिकार था ये थे रुद्र, विष्णु और
इन्द्र ।। इन्द्र चन्द्रपुर के राजा विष्णु के वस मे रहता था ।
पिटीनस् ऋ ६.२६.६
गढ़वाल में यह दस्तुर प्राचीनकाल से चला पाना है कि
श्रेपुरुपों को पिठाई लगाई जाय। उनको टीका भेट दिया जात
है। राजा राहु ऐसे ही श्रेष्ट पुरुषों मे थे, इसलिये उनका नाम
ही पठिनी कहते कहते प्रसिद्ध हो गया और उनके स्थान का
नाम मैठाशि जो गढ़वाल के राममूट प्रांत में है। हो सकता
है, कि उनका समार उप रहा हो और याज्ञान मानने
बालों को ये पीटते या पिटाते रहे हों, परन्तु वे श्रेष्ट पुरुष
अवश्य थे और उन्होंने ६० सहस्र सेना देकर इन्द्र की महायता
की थी। सम्भव है उनके उग्र कर्मों की वानाओं को सुनकर
हो पौराणिकां में उनको राक्षस कहा । उनके साथ
उनका केतु (घजा) भी फहराता रहता था। केतु नाम का
ऋपि भी था (१०.१५६) | उसकी प्रज्ञा भी थी। इनको किनव
+ त्वं हि शवतीनामिन्द्र दर्ता पुरामसि । हन्ता
दस्योमनोवृधः पर्तिदिवः । ऋ८.६८.६
* पुरुथन्द्रस्य त्वमिन्द्र वस्त्र ! ऋ ६.३६.४
( २२ )
२७ गोमति
लसनऊ होकर बहने वाली नदी को पीलिभीत मे देउवा
कहते हैं। यही वैदिक देवहुति है। हेमंत ऋतु मे हिरण्यस्तूप
यहाँ आया करता तो यह प्रांत ही पीलीभीत कहलाया। चक्र
तीर्थ भी यहीं है । शारय शास्त्र को जन्म देने वाला शाख्य ऋपि
यहीं रहता । उसको जननी देवहुति के नाम को देउवा चिरस्मरणीय
किये हुये है। निचान देश में परेयिवासियों के साथ देवहुति
यहाँ आइ तो उसकी स्वरित के लिये प्रार्थना की गई थी। १०.
६३.११ वह पंचजना ऋपियों से यज्ञ कराति थी। गोजाता.
गोमातर कप भी यज्ञ में भाग लेते थे २०५३.३ ५.
२८ देव निरप
भारतियों ने योरप के दलदलों से इसका सिरजन किया ।
२६ देव नेष्ठर
इसका नामकरण भारतियों ने किया जब उन्होंने इसके
तट पर अपने नेष्ट बनाये।
३० डेन्यूब-दानवी
इस नदी के प्रदेश में अपनी दानशीलता से गोमातर
पृश्निमातरों ने हंगि अप्रि अगारा जैसे अधिवासियों को अपने
अधीन किया।
वैदिक पुरुषों के स्थान
इस सम्बन्ध मे उन महापुरुषों से सम्बधित भूगोलिक
नाम नीचे दिये जाते हैं जिन्होंने पद्य रचना नहीं की है, वल्के
जिनकी प्रशंसा के गीत वेद मे पाये जाते है । वैदिक कवियों
.
( २३ )
ने मूल स्थान के नदी पर्वतों का ही वर्णन नहीं किया है वल्के
अपने समय के महान् श्रात्मानों की श्रुतियों की रचना करके,
उनका गुण-गान करके वैदिक इतिहास पर भी प्रकाश डाला
है। ये महापुरुष अध्यक्ष, राजा सेनानी, अश्विनी, मरुत,
वैद्य इत्यादि की श्रेरिण के हैं।
विष्णु अधिष्टाता ७.६६.१००, १.१५४.१५६
इनका जन्म स्थान वही भूमि है जहां इनका स्मारक
यद्रिनाथ की महिमा का द्योतक है। उसी के निकट अलकनन्दा
में उप्ण जल मिलने से विष्णजल रहता है । इसी कारण
उनका नाम विष्णु पड़ा । उप्ण जल स्रोत और अलकनन्दा
के संगम पर उन्होंने जलस्थम्भ विद्या का अभ्याश किया था
और जलशायी भी कहलाये । जलरथम्भ विद्या की श्राधार
शिला इन्होंने ही डाली । चन्द्रपुर के राजा करके भी इनका
वर्णन किया गया है ये जव कहीं गमन करते थे तो
अश्वारोही सेना इनके आगे रहती थी । चन्द्रपुर के निकट
श्राद्यवद् ि(श्राद्वद्रि) में सबसे प्रथम सर्व साधारण से इनका
परिचय हुआ वहीं उनका प्रथम स्मारक भी स्थापित हुआ।
गढ़वाल में इनके पांच स्मारक हैं जो पंचवद्रि कहलाते हैं।
विष्णु की प्रशंसा में दीर्घतमा ऋषि ने कहा है कि प्रलय
(हिमर्पण) में उन्होंने उत्तर में स्थित को थामा अर्थात्
*पों यथा नः मुवितस्य भूरेरश्वावतः पुरुरचंद्रस्य
रायः । ऋ ७.१००.२. जिस तरह प्रातःकाल की भूरि
किर्णे सविता के श्रागमन का परिचय देती है, उसी
तरह अश्वारोही सेना चंद्रपुर के राजा की सवारी के
आने की सूचना देती है।
-
(२८)
(ग) तेरे प्रयत्रों से सग्गाभाव से योग देकर घृणु ने
यम से तेरे शत्रुओं को भगाया।
(घ) साहसी जोशीले धृष्टा ने संग्राम में स्थिर रहर
यातुधानो को भगाया।x
धृष्णु देवस्थल पर्वत पर रहता था। उसका प्राम उसये
समय के पश्चात् मजुकुला स्रोत के कारण पैरा पड़ने से टूट
फूट गया तो उसके वंशज धृष्णव वृन्माण उस स्थान को चले
गये जिसे धसाणि ग्राम कहते है। यह गान गढवाल की
पिंगलायाला पट्टी में है। धृष्णुवंशि प्रजा से कर वसूल
करते
थे (१६४७२)।
अश्विनी १.३४.१.११२
अश्वारोहियों की प्रशसा लगभग ५०० ऋचाओं में वर्णित
है। इनकी तीन कक्षा थी, नामत्या और दत्रा, निस्रा इनके
वंशजों को सावलि पिष्ट, अश्वाल और घुर्दोडा कहते है।
इनकी तीन जागीरों की पट्टियाँ सावलि, आश्वालस्यु और
धुडदोडस्यु है। अश्विनी हिमालय प्रदेश के रहने वाले थे।
इनको निश्विना कहते थे १३४५६।
तव प्रानेन युज्येन सख्या, बज्रण धृष्णो अप
ता नुदस्व ऋ ६.२१.७
* श्रोजियो धृष्णो स्थिरमा तनुष्य, मा त्या
दमन् यातुधाना दुखोः ऋ १०.१२०.४
“युवोहियं हिम्येव वाससोऽम्यामसेन्या भवतं
मनोपिभिः । ऋ १.३४.१
( २६ )
महत सेना ८.२०.१७१ ५.५२ से ५.६१
मरने मारने में समर्थ ममतों को जन्म देने वाले राजा
द हैं। इमलिये इनको कहते हैं कि "रुद्र के पुन तो देवलोक
में वसते है" + हमारे पूर्वज अपने को देव कहते थे और
अपने मूल स्थान को दिवः । इनके वीरतापूर्ण कार्यों का वर्णन
वेद की ५०० ऋचाओं में किया गया है। इन्हीं के वंशज मरा-
मोर्य है। ये घोर वर्पसा होते थे। मरा (महर-महरा) जाति
के लोग गढ्याल कुमाऊ' में श्रव भी पाये जाते हैं। महत
पर्वतीय देश के रहने वाले थे। । देश में इनके वंशज मुराऊ
हैं। एवया मस्त प्रसिद्ध थे।
मेपज १.११६.१५
अश्वारोह सेना और मस्त सेना में भी अश्यीभेपज
और मरतभेपजों को टोलियों होती थीं। राशि विश्पला की
जांच टूटने पर यह विला विलम्ब ठीक कर दी गई थी।
विश्पला दूसरे ही दिन रणांगण में चली गई और विजयी
होकर पाई। इनके घंशज गढ़वाल के बुटोला रावत है। ये
सहन्नों की संख्या में प्रजा के रोगों को दूर करने के लिये देश
में भ्रमण किया करते थे। इनके वंशज मिलम में भी हैं।
इडा १.३१.११
महाराणि इड़ा को वेद मनुष्य शासनी की पदवी देकर,
भारत के नाम को पवित्र करने वाली तीन देवियों में गणना
रुद्रस्य सूनयो दिवो यसति ऋ८.२०.१७
++ त्यं नु मारुतं गणं गिरिष्टां वृपणं हुवे । ऋ८.
६४.१२
( ३० )
करता है। ये तीन देवियों है- इडा, सरस्वति और भारति
(ऋ६५.८)।
इडा के नाम के स्थान गढवाल-कुमाऊँ में अनेक हैं।
इडा मवालस्यु, इड़ा मौदाडस्यु', गड नदी चन्द्रकूट में है।
इडवालस्यु उसके वन्धु वाधवों की जागीर है। उसका खतन
राज्य भी था जिसमे इडियाकोट नाम का दुर्ग अव भी प्रसिद्ध
है । इडयोट नाम का स्थान पूर्वि कुमाऊँ मे है। इडा ग्राम
पालि पछाऊँ मे भी है। दक्षिण पूर्वि गढवाल मे इडा के
गीत गाये जाते है । वह सुनीरा थी (ऋ६६१.१७)।
राजा खेल १.११६.१५
खेला और साल्यु नाम के स्थान गढवाल-कुमाऊँ में
मिलते है। खेल और उनकी पत्नि विश्पला ने इन्दु नदी के
पश्चिम के उन इलाकों के उपद्रवी लुटेरे डाकुओं से युद्ध लडे
जिनको आप्रीता (आमोदी) कहते हैं। इस सग्राम में खेल की
पनि विश्पला ऐसी सकटावस्था मे फैसि कि उसकी जघा पति
के पख के समान छिद गई अर्थात् उखड गई थी। ऐसी
अवस्था में सेना के साथ जो भेपज थे उन्होंने शीघ्र ही उसको
आयस-इरपात की जघा पहिना कर ऐश्वर्य प्रामि के लिये
सपाम मे आगे बढने के लिये भेज दिया और वह शत्रुओं
से धन लूट कर लौटी। यह अद्भुत चमत्कार हिमालय की
अमूल्य औषधियों के बल पर हो सका । जो इलाका उन्होंने
विजय किया वहाँ पृश्निमातरो ने जगल काटकर खेती भी
की। इस कारण यहाँ के जकाखेल, जगनवेल, इशाखेल
इत्यादि नाम आज भी खेल की याद दिलाते है।
इस सभ्यता के युग मे तो इतिहास को बनाने वाले अपनी
दिनचर्या भी लिखने लगे हैं जिमसे इतिहास लिग्मने वालों का
मार्य चुर हल्का अवश्य हो जाता है। अब उन वैदिक कवियों
के स्थानों का वर्णन किया जाता है जिनकी रचनायें हमको
वैदिक इतिहास की मोकि देसने को उद्यत करती हैं।
इनके स्थान जिस देश में मिलेंगे वही प्रांत हिमालय प्रदेश का
ममिन्धु (हपतहिन्दु) माना जा सकेगा। प्रत्येक कवि अपने
देश का गुणगान करके उसका प्रेम पुजारी बन जाता है और
अपने एतिहासिक रनों को देवत्व प्रदान करके ही सांस
लेता है।
वैदिक ऋपियों की वस्तियां
ऋपि स्थानों की वृहद् भूमि रहती थी। वह भूमि
मोमरनस्पति के वृक्षों से घिरी रहती थी जो धारिदार श्रीर
कंटीले होते हैं। कहीं कहीं पत्थर की दीवालें भी घेरे रहती
थीं। उम धेरे के भीतर गोशाला, पाठशाला, नृत्यशाला यज्ञ
मंडप और कृपि के लिये भूमि भी रहती थी। अति और
यमिष्ट के पुरों में शतद्वार छात्रालाय
ये
मौजमान १०.३४
मुजानत पर्वत मौजो ऋपि का ही चिरकाल से स्मरण
कराना है। इमी पर्वत से मनुकुला स्रोत निकलता है जिसका
निवर्णन केदार यण्ड ग्रंथ में भी मिलता है। इमीनोत
से मूल लेजाकर तृपित गोवम को जलपान का सुभीता दिया
( ३२ )
गया था। उसकी गायों के लिये पुष्कर बनाया गया था।
मौगाडि (मौदाडि) मौदाडस्यु उसीये वशन मोंदाडों का
भूमि है ! मु जानत पर्वत मोहाडी मज्यूलि चन्द्रसूट क
अन्तरगत है । अक्ष कितर की प्रशंसा इस सूक्त में हैं। इसीको
पीटनस् , राहुकेतु भी कहते है।
अगरतमुनि नाम का स्थान मदाकिनी के तट पर उत्तर
गढनाल में है। अगस्त को कुम्भन भी रहते है । कुम्भडी
नाह्मण उसी इलाके में रहते हैं। कुभा पर जा विवरण
लिसा गया है उसे भी देसो । अगस्त के स्थान से गुजरते हुये
नासत्या अपनी सन्तान को भी यानन्द से अपने गृह को लेगया
११८४५
अग्रय धिप्णय १०६
धृग्णु के पशज आग्नेय अस्लों का सचालन करते थे तो
अग्नयधिष्णाय भी कहलाने लगे। सामवेद के समय धृष्माणा
शद का रूपान्तर धस्माना हो गया था । धस्मानों की वरित
को धस्मणि कहते है । धृपा पर विवरण देखो।
ऐश्वरा ६,१०६
एगाशर में देवेश्वर का मदिर है। अब उसे एक्श्वर
कहते हैं । यह स्थान चन्द्रकूट के वेस्थल पर्वत (देवता का
डाएडा) पर हैं।
स्थौर अग्नियुत १० ११६
स्थौर ऋपि अपने वराज स्थौर थाठओं की रक्षा के लिये
इन्द्र से प्रार्थना की है। थारू जाति का मूल स्थान स्थरालि
(थरालि) वधान मे है। इन्द्राविष्णु ने थरु लोक की रक्षार्थ
-
..
पकित रहता
को बुध्याचल भी कहते हैं । वेद मे उच्च वुझ्न भी इसीको कहा
गया हो, क्योंकि यह पर्वतीय देश है।
पविराधेय ५.१६.१-५
इस ऋपि का नाम हमारे ध्यान को गढ़वाली बोली के
यत्री वद्रो शब्द की तरफ ले जाता है । इसकी रचना में भी
व वत्रि. शब्द आये है। गढ़वाल मे वि या बनो
कहते हैं मकान की नीचे की मजिल को खियां नीचे के ही
मजिल में प्रसव काल से नामकर्ण के समय तक रहती हैं।
यह ऋपि भी सम्भवतः एक ही मजिल के मकान में रहता
था और यही कारण उसके पतिः नाम का है क्योंकि ऋपियों
के बहुधा द्वि मंजिल मकान होते थे। वह कहता है कि वनि
तो पत्रि में रहने वाले नव जात शिशु की तरह
है, देखता ही रहता है। लेकिन बालक तो माता की गोदि
में उपस्थित होकर चेष्टा करने लग जाता है। वह आगे कहता
है कि फर्मशील लोग तो सतत. परिश्रम करके चितित होकर
धन कमाते और उसकी रक्षा करते हैं, तब ही दृढ़ पुरियों में
बस सकते हैं। वनि ने प्रकट किया है कि वह घासफूस के
भोपडे में जंगल मे रहा। उसका पत्थर चिना मकान भी
नहीं है । उसका स्थान वुवासाल था। वह गढ़वाल में रहता
था, उसकी भाषा और नाम संकेत कर रहे हैं। शब्द परिवर्तन
घतला रहा है कि वनि, यनि-उपि, यवरी, यवराय का मूल
एक ही है । यवराय जाति पंजाब में है। महान नदियों का
जल भी वत्रिवांस होता है अर्थात् नीचे ही नीचे वहता है
अभ्यवस्थाः प्रजायन्ते प्रवचे निश्चिकेत उपस्थे
मातुर्वि चेप्टः । ५.१६.१
(६.६१.२२) जल नीचे ही रहता है इसलिये वनिवास है।
शासो भारद्वाजः १०.१५२.१-५
शास पि का शासों नाम का प्राम गढ़वाल की पट्टी
मयालस्यु में है। इसको पद्य रचना में यतलाया गया है कि
शास तो अपने देश में महान है और वह अपने अमित्रों को
थारपर्यकारी तरीकों से सा जाता है। उसका मित्र तो न
मारा जा सका और न पराजित किया जाता है। शासने मन्यु
की भी प्रशंसा की है। मन्यु का मनकोट भी मवालस्यु में है।
शास पोर मन्यु समकालीन रहे होंगे। मालम होता है कि
शास को कुछ राज्याधिकार प्राप्त था जिसके कारण उसके
मित्र निर्भय रहते थे।
मन्युः १०.८३-८४
मन्यु मयालस्यु गढ़वाल का इन्द्र था। उमका मुख्य
स्थान उसी पट्टी में मनफोट था। उसने बुध्याचल के दस्युओं
को पराजित किया तो उसके विरोचित कार्यों के कारण
उसे जागीर दी गई जो उनके नाम का स्मरण अब मि
दिलाती है। इसकी जागीर को कहते हैं मन्यारम्यु। उसके
पंराज मन्यारि अब भी उस पट्टी के थोकदार हैं। मन्युरिन्द्र
शाम इत्या महाँ अस्यमित्रसादो अतः । न
यस्य हन्यते सखा
न जीयने फदा चन ॥
१०.१५२.१
* हमार दम्पूरुत वोम्यापे । १०.८३.६ देसन
चाले शत्रुओं का हनन करो।
की प्रशंसा में कहा है कि वह तो देववशि श्रेष्ट पुरुप है,
यज्ञ करने वाला होता है, वरूण जातवेदा है और उसकी
मननशील प्रजा उसकी स्तुति करती है-यह जोपीला कर्मयोगी
प्रजा की रक्षा करेxx
सुतम्भर आत्रेयः ५०.११-१४
सुतम्भर सुन्दर पर्वत को सुन्दरई मे रहता था। यह
अग्नि पूजक था। उसने वैष्णर और शैवियों की शिकायत की
है कि ये अशिवा हो गये हैं और सरल चित्त वालों को असत्.
मार्गों का उपदेश करके अपने आप भी नाश को प्राप्त होते
विश्ववारा ओत्रयी ५.२८५-६
• विश्वनारा ऋपिका थी। वह यज्ञ करती थी। वह
अतिथि सत्कार करता थी। उसका स्थान यस्युर पट्टी मौडऽस्यु
चन्द्रकूट में है। कवि के वशज वस्युर में रहते है।
कवि भार्गर ६,४७-४६
कवि सपि कविस्थलि (करतोली) मे रहता था, लेकिन
वह विश्वावारा के स्थान को चला गया और वहाँ उसकी
xxमन्युरिन्द्रोमम्युरेवास देवो मम्यु)ता वरुणो
जातवेदाः । मन्यु पिश ईडते मानुपीयर्याः पाहिनो मन्यो
तपसा सजोपाः ॥ ऋ १०.८३.२ ॥
सखायस्ते विपुणा अग्र एते शिवासः संतो
अशिवा अभुवन् । अधूर्पत स्वयमेते वचोभिजूयते
वृजनानि वचंतः। ऋ५०.१२.५ विपुणा-विष्णुव ।
मामहोपान
.
५
समाय
"शवित्री
कामना माताति)
Bf
रामदेव
ayaka
भगुप
मागे
Vanagar
उपाय
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माम
विषयानप
--
17
Anas
सन्तानोत्पत्ति हुई। उसके वंराज कवित-अयण (कवत्वाण)
है । उसको रचनायो से स्पष्ट है कि उसके प्रांत मे वृष्टि कम
होतो थी। यह वर्णन चन्द्रकूट पर अधिक लागू होता है
जिसमें कविस्थलि और वस्यूर दोनों स्थित है। कविस्थलि
के दोनों तरफ जल स्रोत है तो सही लेकिन उचाकोट के
उचथ्य की ऊंची भावनामों के कारण और विश्वावारा से
आकर्षित होकर, कपि ऋषि वस्यूर को चला गया । कविस्थलि
और उचध्यकूट मजुकूला के समीप हैं । उचथ्यकूट से एक
मील उपर पातल ग्राम है। यह भी मंजुकूला के तट
पर है।
उचथ्य ६.५०-५२
उचथ्य उचथ्यकूट (उचाकोट) मे रहता था। उसने
वर्णन किया है कि दिवः पर्वत (देवता का डाएडा) के उत्तम
सोम से बने पीयूप को इन्द्र के लिये अभिपुत करो। देवता
का डाण्डा मुजावत पर्वत का ही एक अंग है जिसके सोम
की प्रशंसा सायणचार्य ने भी की है।
अरिष्टनेमि
अरिष्ट को उड़ानेवाले को अरिष्टनेमि कहते हैं। नेमि
शब्द नमसा से संबंध रसता है जिसका अर्थ होता हे भजण।
अरिष्ट को दूर करने के लिये दान दिया जाता था, जो उसे
प्रहण करते थे उनको अरिष्टनेमि यहते थे। "इंद्रो पाताल्यो
ददतां शरीतो अरिष्टनेमे अभि नः गचस्व ।" ३.५३.१७ ॥
इंद्र ने पातल प्रोम शिति मे अरिष्टनेमियों को दिया था और
उन्होंने महयोग किया।
तायः १.१७८.१
अरिष्टनेमि फे सदयाई में रहने के कारण से उसे वार्य
।
( ३ )
(वलशालि) भी कहते थे। तथ्याड ग्राम मजुकूला के दाहिने
पार्श्व मे है । जो अरिष्ट को साने में समर्थ हो वह वलशालि
ही नहीं, प्रतिहिसक भी पहा जा सकता है। इसलिये तार्य
की सहायता की आवश्यक्ता सममि जाति थी अपने कल्याए
के लिये।
अमहीयु ६.६१.१-३०
अमहीयु अमहीयु पर्वत पर रहता था। यह चन्द्रकूट
पर्वत की एक सासा है और सर्व साधारण उसे अमेली का
डाण्डा कहते है। इस ऋषि ने वर्णन किया है कि सोम
वनस्पति सिन्धु में उत्पन्न होती है । कवि ने यह दर्शाया
है कि जिस देश मे सिन्धु (अलकनन्दा) वहती है वही देश
सोम का भी जन्मस्थान है। अमहीयु के वंश में उरुक्षय हुश्रा
वह भी वहीं रहता रहा होगा (ऋ १० ११८) ।
कुत्स १.६४-६८
कुत्स के नाम का कुक्स प्राम गढवाल की अश्वालस्यु
पट्टी में है। इसने अपनी पद्य रचना में यह दर्शाया है कि इन्द्र
मूलस्थान से पश्चिम दिशाओं के राजाओं को उपदेश देता
था कि सत्मार्गों का अनुसरण करते हुये प्रजाजनों पर शासन
करें। देववशियों ने सप्तद्वारों से मुस्यत. पश्चिमी देशों में
उपनिवेशों की स्थापना करना प्रारम्भ किया। उस समय
विजनोर से वगदेश तक और तराई-भावर से विन्ध्या की
मध्य भूमि जलनिमग्न थी।
अस्वस्तये ताद_मिहा हुवेम | ऋ १०.१७८.१
४ दशक्षियो मृजंति सिन्धुमातरम् १६६६.७
( ३६ )
कक्षिवान् १.११६-११३
कक्षिवान् ने अश्विनी अश्वारोहियों की प्रशंसा में पद्य
रचना की। इसका जन्म स्थान कुत-कुक्स होने की अधिक
संभावना है क्योंकि वह अश्वालों की जागीर में निवास करता
था और यह याजिय ही था कि वह उनकी प्रशंसा पद्यों में
करता।
कृष्ण श्रांगरिस ७.८५-८७
कृष्ण नाम के कृष्ण विश्व और कृष्ण घुम्न भी हुये हैं।
छप्प पर्वत (कालों का डाएडा) गढ़वाल मे है। इसी पर्वत
पर काली जाति के प्राह्मणों की 'यस्तियाँ हैं। पंजाय और
दक्षिण में भी पाये जाते हैं। कृष्ण नाम के पियों ने
अश्विनी की स्तुतियों की हैं।
नोधा ८.८८७.५८-६४
नोधा गोतम का वंशज । यह चन्द्रगुट के नीचरण (नोधा-
अयण) में रहता था। उसने मरुतों को रुद्रसनु और रुद्र मर्या
कहकर यतलाया है कि राजा रुद्र ने ही मरुत सेना को जन्म
दिया है। इसकी रपनाओं में जनश्रुत पाक्य भाये हैं।
राजा पृष्टीनामसि मानुपीणा; युधादेवेभ्यो यरिवधार्य;
स्वराङ्इन्दो दम का विश्यमूर्तः, पति न पन्नीरसतीदरान्त ।
जेता १.११
जेता थपि जेठार ये और मधुर छन्दों में पद्य रचना
फरने से मधुधन्दा भी फहलाये। ये जैवोलि (जेतास्थली) में
रहते थे। इनकी पीरता के कारण इनको जैतोलस्यु दी गई
थी।इनके पोज दिलाने पर इन्द्र ने पत्रामुर को वध करने
.
(४० )
की योजना बनाई और सफलता प्रान की। जेता ही ने.सर्व
प्रथम मूल स्थान को सिन्धु (सिन्धु देश) नाम दिया (१.११.
६) इनके वंशज जैतोला राजपूत है। जैतीलगांव-अश्वालरयु
में है। ये लोग निर्वल होने पर जैतोलस्यु से अन्यत्र चले
गये।
जुहू १०.१०६
जुहू ऋषि जुबई में रहता था। इसने ब्रह्मजाया के विषय
उसके चरित्र पर पद्य रचना की है और सावित किया है
कि वैदिक समय की सप्तसदस्यों की न्याय सभा के समक्ष राजा
को भी शिर झुकाना पड़ता था। जुबई ग्राम पुरुप्णि (पूर्वि-
नयार) के तट पर है।
शंयु ६.४४-४६
शंयु ऋपि वृहस्पति का वंशज है । इसके ऋषि स्थान
में घोड़दौड़ की विस्तृत भूमि थी अब वहाँ सिंचाई के खेत
हो गये है। उसके स्थान का नाम शंयुकुटी (शंगलाकोटी)।
उसने वेन्य की प्रशंसा की है ( ६.४४.३)। वेन्य सम्भवत
वेनो है (ऋ १०.१२३) जो देवता करके भी माना जाता है।
वेनो १०.१२३
वेनो ऋपि भृगुवंशि है। इसके नाम का बिनसर ग्राम
मवालस्यु मे है। इसकी पूजा के दो मन्दिर भी है । एक
भवालस्यु में और दूसरा चौयान में। इसके नाम की विनौ-
नदि भी है। इसकी महिमा का कारण यह है कि वह मनु
को देव समाज में लाया (ऋ८.६३.१) ।
( १ ). इटो १०.१७१ इटो और वेनो के स्थान के निकट ही हैं। इटो के स्थान पोस्टोसी कहते है। ये दोनों एक ही वंश के हैं । इटो ने येनो की महिमा गाई है और उसे बुध्नाय वेन्यम् कहा जिससे स्पष्ट है कि जनता में उसकी मान्यता थी और उसको मूल पुरुप जैमा मानते थे। यही कारण है उसकी मान्यता का श्रीर उसके स्मारक स्थापित करने का । उसकी रचना मे चन्द्र- यूट को "सोमिनो गृहम्" कहा गया है । ( १०.१७१.२) । इटो वेनों दोनों चन्द्रकूट प्रांत के निवासी थे। उत्किल ३.१५-१६ उकिल का रथान उसीके नाम से यंदकिल हो गया है। यह देवस्थल पर्वत के दाहिने पक्ष पर स्थित है और गुरुराष्ट्र के समीप है। इसीके वंश मे मारकण्डेय और हिमदाव हुये है। यह कहता है कि पायु तो प्रथम यज्ञ का नेता था। उत्किल सयं भी अग्नि पूजक था । पायु ६.७५;१०.८७ यातुधानों ने इसे बहुत कष्ट पहुँचाया । तर उसने रसोहा अग्नि यज्ञ किये। पायु पौड़ी में रहता था। इसके पडोसि चमुरि, धनी, मृग राक्षस थे। इनके दुष्ट वर्तावा से पायु के वंशज मामा गृह को चल गये और पायव मामतेय कहलाये । वर्तमान समय में इनको ममगोई कहते है। इन तीन राक्षसों का वर्णन आगे किया जायगा! मामकाना ममगाई देवासुर संग्राम मे लड़ने को इन्द्र की देव सेना में सामिल थे। *यज्ञस्य नेता प्रथमस्य पायोः ऋ ३.३५.४ ।
(४२) शर्याती १०.६२ पुराणों मे शांती और उसकी पुत्री सुकन्या का वर्णन तो है लेकिन केदार खण्ड में जो उसकी कथा दी गई है. उससे विदित होता है कि पश्चिमि नयार (ध्वस्वा) के तटवर्ति सरासु मे वह रहता था और चमनाव (च्यवन नाव) पर्वत के निवासी च्यवन ऋपि को उसकी कन्या व्याही गई थी। शर्याती पुनहीन होने से उसने च्यवन से सहायता ली और चयनाव के निकट की शर्यणावति पर पुष्टि यज्ञ किया गया । शर्यणा के कारण भी उसको शर्याती का नाम मिलना सम्भव है। उसने विश्वेदेवाओं की स्तुति की है। सरासु से शर्यणा सीधे ६७ मील की दूरी पर है। च्यवन १०.१६ च्यवन की रचना आवर्तन पर है अर्थात स्वदेश परदेश मे घसना और फिर लौटकर पाना । इस सूक्त मे मूल स्थान से चारों दिशाओं की भूमि मे उपनिवेशों की स्थापना का वर्णन है च्यान के स्थान का वर्णन शर्याति पे सम्बन्ध में हो चुका है। च्यवन तो धृष्णु और मुमिन जैसा शूर वीर था। उसने चीन की तरफ रायाधिकार प्रान दिया था और मुमिन ने मुमात्रा मे न्यनन पे वशन च्यवन चौहान हैं। ज्यान का स्थान प्रारोग्यवर्धन जल कुण्ड पे लिये प्रसिद्ध था। गढ़वाल मे जल पुण्ड की नार कहते है । च्यवन-नाव चमनावसरा स्थान था। श्या निवर्तन वतर्य नि निवर्तन वर्तय । भूम्य- चतस्रः प्रदिशम्ताम्य एना निवर्तय । १०.१६..
मथित १०.१६
मथण, मैठाणा नाम के ग्राम में गढवाल में मौजूद है।
मयण चन्द्रसूट मे भी है। मिथुनायों ने रिमगडी के यातु
धानों को भस्म करने के प्रयन रिये थे (स १०.८७ २४)।
शिरिम्बिठो १०.११५
शिरिविठ चन्द्रयूट शिरण्ड प्राम का निवासी था।
उनकी पद्य रचना से विदित होता है कि चन्द्रयूट मे दुर्भिक्ष
होते थे। वर्पा कम होने से दुर्भिक्ष वहाँ अब भि होते ही रहते
है। वह कहता है कि घासपात के अकुरों के नाश होने से
इधर उधर से चेतावनी-ताडना मिल रही है दुर्भिक्ष को देसने
की (१०.१५५.२) वह यह भी बतला रहा है कि हमारे
पूर्वजों ने दणदणाट करने वाली तोपें यना ली थीं जिनसे
इन्द्र के सभी शत्रु वर्षा के बूंद बूंद जैसे नाश होकर पृथ्वी
पर मुलाये जाते थे ( १० १५५४)।
ऐरम्बद १०.१४६
पेरम्बद ऐरोलि में रहता था। उस समय में अरण्य
अधिक होने से, उसने अरण्य पर गीता की रचना की तो
उसका नाम ही ऐरम्बद हो गया क्योंकि वह अरण्य सम्बधि
गीत बोलता रहता था। उसने पहिलि दो ऋचाओ मे वनाग्नि
का वर्णन किया है कि यह तो वनों मे प्रवेश करके नाश ही
करती है और वनों से घिरे जो ग्राम रहते हैं उनकी भी कुत्र
नहीं पूछती और न वह भय को जानती है। वह अग्नि तो
बलशालि पभ की तरह जिसे भी पाती है उसीसे सम्बन्ध
कर लेती है। जिनका बल कभी नहीं घटता,
श्ररण्यों में धायन करती हुई महान हो जाती है। यह साबित
कर रहा है कि उसका निवास स्थान जंगल मे था।
उनकी तरह
मृडीको १०.१५०
मृडिको मुडयाप ग्राम का निवासी था। हो सकता है.
कि मृडिक, का अपभ्रश मु डक हो। मुण्डण पर्वत ध्वस्रा
(पश्चिम नयार) के दाहिनी तरफ चन्द्रकूट से दिखलाई
देता है।
शिवि, काशिराज १० १७६
शिवि नाम का स्थान रद्रप्रयाग और कर्णप्रयाग के
वीच यानालाइन पर है। काशिराज धन्वन्तरी को कहते थे
जो प्राचीनतम काशि का राजा था। काशि के नष्ट भ्रष्ट होने
से उसे साम्प्रति गुप्तकाशि कहते है। गुप्तकाशि पर्वत पर
अमूल्य औषधियों होती है जिनका प्रयोग गोधन पर किया
गया था। तभी काशिराज का नाम धन्वन्तरी हुप्रा । प्रतस्य
या सदने कोशे अध्ने स १०१००१० चतला रहा है कि
काशि मे यज्ञ होता था और यहाँ तौषधियों होती है।
शैलेषु १०.१२६
शैली थोर शालोट ग्राम और शैली और शैलाल
जातियां गढवाल में है । शैनुपि स्वय यतला रहा है कि यह
पर्वतीय था।
पर्वत काएर ८.१२
केदारमएड पे 'प्रनुसार एप पि का आश्रम नद
प्रयाग के निकट था। जो एपपशि वहाँ रहा होगा उसका
पर्वत काएव नाम से प्रसिद्ध होना ठीर ही है । उसने पृनामुर
पे वध पर भी प्रकाश डाला है । (ऋ८१२२२-२५२६)।
उसने "इयता हरी' हरनौल अश्वों का भी उलेमरिया है
जो सृष्टिप से गारे जाने ३ (१२०५२६२७,२८)
( ४५ )
सुनु १०.१७६
सुनो नाम का ग्राम वधान मे है। समुम्मों के वंश में
मुनु का जन्म हुया था। सन्याल, सन्वाल उसी के वंशज हैं।
अपाला ८.४१
श्रपोला, ग्राम गढ़वाल की दक्षिणि सीमा पर है । वहाँ
मोम वनस्पति नहीं होती, इसलिए जामुण का रस पीते थे
(E १ १७६.२) । इस ऋपिका ने अपनी पद्य रचना में वर्णन
किया है कि कन्या कैसे पति के साथ विवाह करे। वह कहती
है कि रजोवति होने के पश्चात् केवल सन्तानोत्पत्ति के हेतु
हर प्रकार से बलशाली ऐश्वर्यवान् पुरुप को पति करे।
सावित्री १०.८५
सावत्री को सूर्या की पदवी इसलिए दी गई है कि उसने
सूर्य की उन किरणों का पता लगाया जो रात को अश्विनी
नक्षत्र को प्रकाशित करती है। उसकी उसने गणित निकाली।
यह शव्य वंश की थी और सावली पट्टी में रहती थी। उसके
दो वाक्य बहुत प्रसिद्धि पा चुके है। "सूर्यायाऽश्विनावरा'
और "पतिमेकादशंकृधि"।
वरु १०.६६
वर नाम के पि बडेथ और वडोली में रहते थे।
ऐसे ग्राम दक्षिणि गढ़वाल
एक
अधिक है । इस सूक्त
मे हरि की स्तुति है। इस लिये वरु को हरिवेन्द्र भी
.
कहते हैं।
बुषिच्छकत्कु वित्करत्कुपिनो वत्यमस्कन् । कुवि-
त्पतिदिपो यतीरिन्द्रेण संगमामहो ऋ ८६१.४ ।
( ४६ )
हिरण्यस्तूप १.३१-३५६.४
हिरण्यस्तूप चन्द्रयूट की पिंगलापारवा पट्टी मे रहता था।
गुरुराष्ट्र (गुण्ड) के सोमवशियों का पुरोहित, धर्माचार्य
उपदेशक था । उसो को योजना के अनुसार इन्दुवशियों ने
दिग्विजय किया । इन्दु नदी, इन्दुदेश, इण्डस, इण्डिया,
इण्डियन, ईद शब्दों को जन्म देने वाला यही राजकुल है।
मनु ६.१०१-१०६ । ८.२७-३१
मनु को यम, वैवस्वत कहते है अर्थात् मनु यमनोत्तरी
से आया और माना प्रात मे उसकी रक्षा हुई। सप्त मूल
पुरुषों में मनु की भी गणना है, इसलिये वेद इनके लिये
कहता है कि माना के ये तो सुनु है माना प्रत ही मे
सिन्धु, सरस्वति, विष्णुलोक, वह्मिलोक, चतुर्भूष्ठि, मरीची
पर्वत हैं। दिनाथ की यात्रा करने पर यह स्पष्ट हो जाता है।
मनु को विष्णु ने वरण करके कनुभवाले प्रात को भेजा
जिसको मानसरबएड कहते है। माना ही से यह भेजा गया
था और मनु करये अधिक प्रसिद्ध हो गया। वैसे तो सन
ऋपियों को सन मनु रहना चाहिये। मनु यज्ञ धर्म का
प्रचारक था। यम भी मनु का नाम है ( १०५१३५),
मनु सावरण उसी को पहते हैं (ऋ८५११)।
मारीच कश्यप ११३-११४
मारीचातू कश्यपा जाता पुराणो वाक्य भी है। मरीचि
मनोमानेना ( १.११७.११) इदं यमस्य सादनं
देवमान यदुच्यते (१०.१३५.१) परिपतम् देवमानेर
चित्रम् १०.१०७१।
(४७ ) और कश्यप हिंसा के वोधक हैं। हिरण्यकश्यप के हिंसक कर्मों का वर्णन पुराणों में पाया जाता है। यह ऋपि काश्यप वंश का जन्मदाता है और मरीचि पर्वत और माना से सम्बन्ध रखता है। उसके कारण गढ़वाल को केदारे यश मण्डलम् भी कहते हैं। देवाः १०.१३३ द्योतलि (देवस्थली), देवस्थल पर्वत चन्द्रस्ट में, देवराणा ग्राम अजमेर पट्टी में है। यह सूक्त वतला रहा है कि देव- वशियों ने सुगम मार्ग बना लिये थे। तय देवराणा मे देवशियों की परित हुई। देवा ऋपियों की रचना में 'अश्मन् यति रीयते' (१०.५३.८) पत्थरों से गंगलोड़ो से भरी नही की उपमा दी गई है जो सावित करता है कि देवा, देवहूति ने यज्ञ पर्वतीय देश में किया था जोकि बुध्न मूल स्थान गढवाल है। पैजान १०.५१-५३ पेजवन वंशियों की वस्तियां पजेरा, पंज्याण है । पजई जाति मि गढ़वाल में मौजूद है । "पंजवनस्य दाना" वैदिक वाक्य है। यम १०.१४ यम यमनोत्तर प्रांत का रहने वाला था। यम को यमुना- भ्राता भी कहते है। इसकी रचना सावित कर रही है कि यम को ही चैवस्वत कहते थे । यम वैवस्वत ने उपनिवेशों की *मुगान्यथः क्षणुहि देवयानान् ऋ १०.५१.५ 7 वैवस्वतं संगमनं जनानां यमं राजानं हविपा दुवस्य ऋ १०.१४.१ । यम बम्पत राजा के साथियों सहित भोजन से सत्कार किया गया ।
स्थापना की थी। उसकी बहिन को यमी वैवस्वती कहते थे।
यम अपनी वहिन यमी-सहित माना को पाया, इस कारण
उसका सदन माना मे कायम हुआ था। इद यमस्य सादन
देवमानम् यदुन्यते । १०.१३५७ । यमनोत्तरी और माना
गढवाल में हैं।
यमी-चैवस्वती १०.१०
यमी और यम का सम्बाद सावित कर रहा है कि एक
ही माता पिता से उत्पन्न भाई बहिन में विवाह सम्बध नहीं हो
सक्ता । यम की तरह यमी-वैवस्वती भी यमुनोत्तर से पार
माना में सुरक्षित रही। यमी ने सप्त उपासनापो का वर्णन
किया है।
मनु और शंभु १.४६.१३
विवस्वति मे रहने वाले मनु और शंभू सोमरस पीने
के लिये पुकारे जाने पर, पागये। पिवस्नति शब्द माना फे
लिये प्राया है। शभू-सयंभू विष्णु का वाचक है। यथा मनो
विनस्पति ८५२१।
भिक्षुः १०.११७
भितु भिरिसया सैण पालो पदाऊँ का निवासी था।
वहा धानों की फसल थन्त्री होती है। यह धानों का दान
स्यिा परता था। इस सूक्त में धानानसान की प्रशंसा है।
पूर्व काल में पाली पदाऊँ गहवाल पा ही पूर्थि भाग था।
मत्म्या जालन्दा १०.६७
यह ऋपि मदला नदी में जाल डालता रहा होगा।
मदला नही चन्द्रकूट में है। शर्यणावति इत्यादि नदिया या
जल इसी में होरर पुरराि में मिलता है।
(४६ )
।
पुरुरवा १०.६५
पुरुरवा वुध का पुत्र है । बुध का निवास स्थान वधान
(बुध-अयन) मे था, इस लिये पुरुरवा की राजधानी वधान
की सीमा के भीतर पतिस्थान में थी जिसे साम्प्रति पांति-
पागतो कहते है। पुराणों में इसी स्थान को प्रतिष्ठानपुर
नाम दिया गया है। इस स्थान पर इला ने बुध को अपना
पति स्वीकार किया था, इस लिये इसका नाम पति स्थान
इया था।
कुशिक गाथि ३.१६-२२
कौशानी पर्वत के राजवंश को कुशिक वंश कहते है।
यह इन्दुवंश की एक सासा है । कोशानी पर्वत अल्मोड़े जिल
मे है इसी पर्वत से कोशी नदी निकलती है। गाथि की स्त्री
का नाम भी कोशी था। गायि के वंशजों कौशिक भी
कहते हैं।
वैदिक
समय की वस्तियों का संक्षिप्त वर्णन उपर
हो चुका है। इनमे से अधिकतर वस्तियाँ गढ़वाल जिले के
चन्द्रकूट प्रांत में है जिसने इन्दुवंश को जन्म दिया और
जिसके कारण हमारा देश इन्दु-इण्डिया बहाता है।
plilalselilality
( ५० )
विशेष स्थान
चन्द्रपुर ७.७२.१
इस नाम का दुर्ग और प्रांत गढ़वाल मे है । वैदिक
समय के पश्चात् वहाँ के राजा को वोलांदो वद्रिनाथ कहने
लगे । पूर्व युग मे वहाँ का राय-राजा विष्णु था। ७ १००.२ ।
वहाँ सवारि के लिथे अश्व और वृपभ काम मे आते थे।
इस प्रांत मे सोना चॉदि बहुत निकला था। इस लिये इसको
पुरश्चद्र और हिरण्यगर्भ प्रदेश भी कहते थे।
अद्रिवुन १०.१००.७
सांप्रति इस स्थान को श्रादवद्रि कहते है। यहाँ से असुर
गायों को चुराकर ले गये और उनको रेकुपद मे छिपाया था।
अलका मे जंघार पडा था जब सरमा वहाँ गई।
किल्विप १०७१.१०
किल्वास नाम के दो स्थान गढवाल मे है। येक तो
राष्ट्रकूट में है, जहाँ राव-राजा राहु ज्योतिप का ज्ञान प्रचार
करता था। दूसरा किलवास चद्रकूट में है, जिसको देव
किल्विप (१०६७.१६) और ब्रह्म किल्विष भी कहते थे
(१०.१०६.१) देव समाज के शिष्य वहा ज्ञान प्राप्त करते थे
तो उसको देय क्लिविप कहने लगे। वहाँ के विद्वानों को
ब्राह्मण की पदवी मिलि तो वह स्थान ब्रह्म क्लिविप नाम से
प्रसिद्ध हो गया । ब्रह्मजाया का सबध ब्रह्म किलूविप से था।
सोमेसर ७१०३.७
कौशिकी नदी के तट पर सोमेसर वृहद् मानसखड में
.
है । वैदिक समय में प्रापि और सवत्सरि शिष्य यहाँ अध्ययन
करते थे। वलराम भी द्वापर युग में सोमेसर होकर सरजु
में स्नान करने गये थे।
थर्णा ४.३०.१८
श्रण और श्रीकृत शब्द वेद में आये हैं। इसी अर्गा
में मनु को राजधानी थी। पुराणों ने इसको पहिष्मति नाम
दिया है । कत्युरि राजाओं की राजधानी यहीं थी, इस लिये
इस रमणीक भूमि को कार्तकेयपुर कहते है । श्रणा नाम का
प्रसिद्ध ग्राम यहीं है।
चैत्ररथ (४.३०.१८)
यह स्थान अति आकर्षक है। चैत्रमास वसंत के से दृश्य
अद्वितीय होते हैं। यह वधान में है, जेठा गर्क इत्यादि
स्थान यही है। राजा पुररवा भी इस धन को मनोरंजन के
लिये पाता था।
चंद्र घुम्न १.५२.३
मव्य प्रांगिरस चंद्रगुट का निवासि था। उसने जो
वर्णन किया है वह गुण्ड से मिलना है । वह कहता है "म
ही द्वरिपु वन उनि चंद्र बुध्नो मद् वृद्धो मनीपिमि"। उस
आनंद को वृद्धि करने वाले मनीपि चंद्र का जन्म स्थान उधनी
की नरह गुम है और अनेक द्वारों से सड में जैसे नीचे उसमें
। जाते है। "वृहद् गभीर तर मोम धाम" वाक्य भी यही
सावित करता है। देय स्थल पर्यत से यह दिखाई नहीं देता।
-
गुएद है भी सड में।
( ५४ )
पैदल पाया है, नगीन गीतों से उसको प्रसन्न करो। ये माना
के नवीन मर्ता और देव उसी के साथी हैं, उनको सुन्दर रुचि-
कर गाथायें दंत-कथायें मुनाघो ।
उपर कथित उदाहरण जल्प्या से संबंध रखते हैं।
उस भगदड़ मे मानः के निवासियों ने सहस्रों शरणार्थियों
को अन्न देकर जीवन दान दिया था।
माना है कहाँ ? क्षीर सागर कहाँ है ?
(क)--माननेव तस्थिवां अंतरिक्षे (५.८५.५) जिस
तरह माना अंतरिक्ष (गहरे सड, पाटी) मे सुदृढ़ता से स्थित
है। अंतरिक्ष मे स्थित होने की अस्लियत माना में जाकर
सावित हो जाती है।
(स)--माना के पास ही सिंधु, विष्णु लोक अंत्र भी
देखे जा सकते हैं। यहाँ क्षीर सागर भी अवश्य था प्रथम
लिखा गया है । "मम योनि अप्सु अंतः समुद्रे"। और
"वर्षमणोप स्पृशामि" वाक्य सावित करते हैं मानावर्ष मे
समुद्र (जलाशय) था। "यह समुद्र सिंधु के जल से अंतरिक्ष
मे है और एकपात् अज (विष्णु) की महिमा वहाँ विद्युत
जैसी तनकर विराजमान है" । समुद्र सिंधु रजो अंतरिक्षं अज
एक पात् तनयित्नुः अर्णवः । १०.६६.११. सिंधु आपः समु-
द्रियः वाक्य पहिले उद्धृत किया जा चुका है। कालांतर मे
सिंधु के वहाव से वहाँ का चट्टान जो उसके जल को रोके
हुआ था किन्न-भिन्न हो गया और क्षीर सागर भी लोप हो
गया।
कुर्माचल
कुर्म ऋपि वैदिक काल में हुये । पुराणों में कुर्म
अवतार की महिमा गाई गई है। कुर्माचल पर्वत कुर्माकार
परने । इसको यव द्वीप कहते थे और यहां के अधिवासियों
(.५५ )
रमणीक भूमि का प्रांत है। यहाँ भी ग्रणी और माना की
तरह समुद्र (सरोवर) था। ये सभी लोप हो गये हैं। देश
में कूमि कौम कूर्म पि के वंशज हैं।
योरप (१०.१८.२)
थप स्वभाव वर्तावा के भारतीय पृश्निमातर गोमतरों
की यस्तियाँ जिस देश में वृद्धि को प्राप्त हुई वह देश “यो
अरपों" प्रसिद्ध होकर योरप नाम प्राप्त कर गया। यह महान्
पदयी उम देश को इÉवशियों ने प्रदान की।
रूश (५.३०.६-१५)
रोपिले स्वभाव के रूश में भारतीयों का आधिपत्य
था। ऋणचर्य ऋपि वहाँ कर संग्रह करते थे।
ग्राम्का-अलास्का (१.१८६.२१५)
यह अमेरिका में है। इस समय इसे अलास्का कहते
है। अगस्त चंशियों को अध्यक्षता में नागवंशि वहाँ गये ।
क्योंकि वाराह भगवान के समय में मंगल प्रदेश में अधिक
मभ्यता फैल गई थी।
सुमित्रा (१०.६५.३)
शूर सुमित्र का थाधिपत्य यहाँ था।
जाभा
यवया वधं । जवार को यहाँ भेजा गया था शासन
--
को यवन।
अहिर्बुध्न १.१८६.५
अहि वंश का मूल पुरुप राजा रद्र की शरण में गया।
वहीं इस वंश ने अगस्तवंश के सहयोग से देव समाज में
स्थान प्राप्त किया। कृष्ण सर्प ही राजा रुद्र का वीरभद्र है
जिसने पौराणिकों के अनुसार दक्ष का यज्ञ विध्वंश किया।
रुद्र के राज्य को नागपुर नागवशि प्रजा के कारण कहते हैं।
देव माना
माना ही सभ्य मानव का मूलस्थान। इसीकी बदौलत
मानव, मनुष्य मनु, मनसि शब्दों का जन्म हुआ और इसीने
जननी जनक की तरह मानव को मननशील बनाकर उसकी
बुद्धि का विकाश किया। तीसरी अवस्था के लोगों का पालन
पोपण यहीं राष्ट्रि विष्णु करते थे और उनके पास ज्ञान
प्राप्त करते । यही सिंधु का उद्धम स्थान है। उसके ही जल
से क्षीर सागर की उत्पत्ति हुई थी जिसमे विष्णु जलस्थंभ
अभ्याश करते थे। सिधुः आप. समुद्रियः (१० ६५.१३)
विष्णु मानावर्ष से सागर के तट पर निवास करते हुये
शासन चक्र चलाते थे (१०.१२५७)। नीचे लिखे वेद वाक्य
माना की महिमा स्थिति का वर्णन करते हैं:-
१ -इद वेश्म पुष्करणीन देव मानेव चित्र (१०.१०७
१०) यह वस्ति तो देवमाना की फुलवाडी के सदृश चित्र
विचित्र पुष्पों से सजी हुई है।
२-इम यमर सादन देवमानं यत् उच्यते १०.१३५.७
यम का सदन देवमाना में था।
३-ऋपियों को सूनोमानेन (१ ११७.११) माना का
.
( ५३ )
मुन् कहते थे क्योंकि जलमापन के समय उनकी प्राण रक्षा
'माना मे हुई थी।
४-अपश्यं ग्राम यह मान श्रारान ऽचक्रया स्वयया
अर्नमान । लिपपर्यः प्रयुगा जनानां । सद्य. शिश्ना प्रमिनानी
नवागन् (१०.२७ १६)
प्राण रक्षा के लिये भागते हुये प्राणि माना ग्राम को
देख कर वहाँ पहुँचने के लिये सीय तीर की तरह दौडे और
मिपरते हुये युगल स्त्रो पुम्पों ने नवीन शिश्ना को तोड़ा-
मीना अन्छि तरह।
५--देवानांम् माने प्रथमा अतिष्टन (१०.२७.२३) देव
ममाज के वी पुरप माना पहुँचे तो वहीं ठहर गये।
६ यत् पंचजन्यया दिशेंद्रे घोपा अमृक्षत । असणाद् यहणा
रिपोर्यो मानस्य स क्षय | ( ६३७) पचजना की प्रजा अपने
इद्र सहित माना मे पहुचे तो उन्होंने हल्ला रिया शरण पाने
के लिये । इन वाहर से आये हुओं ने माना की भूमि मे तृण
घास उपाड़ के अपना निवास स्थान बनाया।
७- अयोचाम निवचनानी अस्मिन् मानस्य सूनुः
सहसाने अग्नी । वय सहस्र ऋपिभि सनेम विद्यां इप वृजन
जीर दानुम् । १.१८६८
इस पराजयकारि यज्ञ मे माना के पुनो (माना निना-
सिया) से निश्चित वचनों से निवेदन करते है हम सहस्रों
सपियों को अन्न प्राप्त करके जीवन प्रदान करो।
८-अनर्वाण वृपभ मजिहं वृहस्पति वर्धया नव्य
अं । गाधा न्यः सुरुचो यस्य देवा श्राशृण्यति नव मानस्य
माः । १.१६०१ मद्रजिता वृपभ वृहस्पति जो माना में
वोरनियो
वेनो भार्गव यहाँ राजपाल था। ऋग्वेदिक इतिहास
देसो।
मानिला (१०.१५३.३)
यह मन्युरिव इद्र का रमारक है--निति देश में ।
वैलस्थान-महावैलस्थ (१.१३३.१६३)
निमृति देश स्थित वालि द्वीप है जहाँ महा द्रोहियों
का दहन ऋपियों ने किया था क्योंकि वे कष्टदायी थे।
वट्टरिणा (१.१३३.२)
इसको महावरिणा पद भी कहते थे । अद्रिव इद्र ने
यातुधानों की सी मंति के शत्रुओं के शिर्पा-शिरों को कुचल
डाला था। यही वटैभिया है। यहाँ के आधिवासि वटोइयों
को मार्गों पर नहीं चलने देते जब तक उनसे पथ कर वसूल
न होता था। वटैभिया मे क्टोई भयभीत रहते थे।
गिनु (१.१६४.३२)
देव वंशियों ने इस देश को कहा हिरु गिन्नु, विष्वगेनो
(१०.३६.६) क्योंकि यहाँ के अधिवासि हूर और विपैले जैसे
थे। ये सप्त देश नैऋत्व कोण में है और निऋति देश
कहलाये क्योंकि यहाँ के लोग ऋत का पालन नहीं करते थे।
सुजाता वहीं कहलाता था जो ऋत का वर्तावा करता था।
रोहिदश्वदेश १०.६८.६
वर्तमान रोहिलखंड उत्तर प्रदेश का भूभाग, रोहतक
और रोहिताश्वगढ़ पंचनंद देश के प्रसिद्ध स्थान है।
।
३
ज्योतिष्मति (१.१३६
प्रादित्ययंशि मिन वरुण श्रयमा इस प्रांत का प्रबंध
करते थे, दान देते थे इस लिये दानुनस्पति पहलाये । इसके
बहुत नाम है और टमकी प्राचीनता को सिद्ध करते हैं।
जोतिपपुर, प्राग्ज्योतिपुर, जोतिमर्म और अन जोशीमद
इसीको कहते हैं । यह उत्तर गढ़वाल में है।
पान देश (१.३१.१४-१६)
यह प्रांत समुद्र के तट पर दक्षिण भारत में है।
अर्वावति ८.३३.१०
श्रीर्य और श्रोमान निह्य ऋपियों का आधिपत्य
यहाँ था।
पपिया १०.६.८
यहाँ से पृपति अवं आते थे। यहाँ भारतियों का
रज्यि था।
सवितम्य भूम (जापान) १०.११.
जापान को Land of Rising sater सूर्योदय की
भूमि मर्य प्रथम ऋषियों ने कहा । वे इन द्वीपों को देखने
अपने पां नपान में गये थे। जिस तरह यर (अन्न) के
जहाज के कारण यय द्वीप कहा गया, नपात के कारण
जापान को नेपन कहने लगे।
1
अहियों की वस्तियां । डोटी २.१०.५ धौती नाम के आहियों का हनन करके पथों को अरिए कर मुक्त किया । सर्प जाति के सरपा नेपाल में हैं। चमुरि चमाडी, चमराडा, चामी चमदेवल मे इस जाति की यस्तियाँ थीं। धुनि पौडी के निकट धनक में यह रहता था। मृग पौडी के निकट मरगना इस जाति का निवास था। कुयव कुयव का कौव वघान में हैं। शुष्ण (शुभ) सूया जाति का शुभगढ दानवपुर अल्मोड़ा जिले में है। . चलस्य सानु यालि कडारस्यु गढवाल मे है। दुधौत सानु इस रमणीक पर्वत की अपनी विशेषता है। इसके मध्य मे पू० रामगगा रहती है। यह नदी दूधवती है। गढ-
( ५ )
घाल में यह वनस्थी जल वायु में, म्बास्थ के लिहाज से,
अपने मनोहर वक्षस्थलों के कारण सर्वोत्तम है। पूर्व काल
ने यहाँ वृनों का पट्टा था।
कुण्ज
माधारण लोग इसे कुणज ग्पाल के नाम से जानते
हे । कुणार, पियांरू को इद्र ने हस्त रहित, पाद रहिन
फिया था।
कौलतिर
यह यधान का पुलसारी ग्राम क्रमु के तट पर है।
निमुचि
निमुचि बाजार नेपाल में है। निमुचि प्रांत सिकम में।
* मध्य एशियाई शिधांत गलत *
अपने पूर्वजों का अपने देश का गलत इतिहास, भूगोल
अपने बालकों को सिसाना मानों अपनी सभ्यता संस्कृति
को अग्निदग्ध करना है। प्रसंग बसात् इसका येक उदाहरण
यहाँ दिया जाता है। वर्तमान समय में हमारे अवोध बालकों
की इतिहास और भूगोल की पाठ्य पुस्तकों में लिसा मिलता
है कि पंजान देश ही सप्तसिंधु देश है और ऋग्वेदिक नदियों
पंजार की समभूमि को सींचती है। यहाँ तक की ऋग्वेद
वर्णित युद्ध नदियों को चित्र द्वारा भी दिग्पलाया जाता है
चालकों के हृदय पर अंकित करने को । इन पुस्तों में वर्त
मान नाम और ऋग्वेदिक नाम देकर यह सावित करने की चेप्ठा
. वर्तमान नाम ये है पाठ्य पुस्तको मे नाम। की गई है कि मध्य ऐशिया से हमारे पूर्वज आये और वही हमारा बुध्न है और हमारे पूर्व पुरुपा पहिले पजाव मे बसे। पंजाब की नदियाँ ग्वेदिक नाम १- सिंधु सिंधु २-वितस्ता मेलम ३-असिन चेनाय दिये ४-विपाशा व्याप्त हुये ५-शुतुद्रि सतलज ६.-सरस्वति सरस्पति दृपद्धति ७-पुरविण रावि ८-कुमा कावुल ६-मु खुर्रम १०-गोमति गोमाल सात अन इन नदियों के नामों पर विचार किया जाता है ताकि पाठकों को मानूम हो जाय कि अस्लियत क्या है। १-सिंधु ! किसी भी नदी को प्रारभ ही से सिंधु नहीं कहा जाता, अन्य नदियों से मिलने पर उसे सिधु वह सस्ते है । समुद्र को भी सिंधु इसी सेयर कहा जाता है कि उसमें अन्य जल सधि करते है। इसलिये इंदु नदी में पजाय को नदिया के सधि के कारण सिंधु श्रत में पहलाई इंदु ही। यदि यह नदि अपने उद्गम स्थान के निकट ही से सिधु होती तो इंदु, इंडत, इंडिया, इंदियन शादी का प्रचार वहा से ९१-स्वेता ( ६१ ) होता, लेक्नि गढवाल की अलाता (शुतुद्रि) वर्पात में मिधु हो जाती है माना के पास विपाशा के कारण जो कि अलकापुरि से थोडि ही दूर नीचे है । अस्लि सिधु नाम मिलता है विष्णु प्रयाग से जिसे सिधु तीर्थ कहते थे । पच तीर्थों में यह प्रथम तीर्थ है। प्रियमेध की त्रिसप्त नदियों में विपाशा की गणना नहीं है। इसका कारण यही है कि विपाशा (विपा) क्षण भंगुर है । जब वर्षा हुई तो सरस्वति विना पाश होकर विपाशा हो जाती है, वर्षा बंद हुइ कि सरस्वति अपनी अस्लि अवस्था को प्राप्त हो जाती है और असूर्या और अधसि होकर सर की सय्या मे पाशवद्ध हो जाती है। ऋग्वेदिक सिंधु की विशेषता यह है कि उसकी २१ नदियाँ सहायक है जिनका वर्णन प्रियमेध ने किया है । गगा, यमुना सजू (सरज) और गोमति ऐसे नाम हैं कि जिनका ज्ञान सर्व साधारण को है कि ये नदियाँ उत्तर प्रदेश में बहती हैं, गगा यमुना का उद्गम स्थान गढ़वाल मे है, सरजू दानवपुर से निकलती है । प्रसिद्ध गोमती दो हैं, एक तो लखनऊ होकर वहती है और दूसरी अर्णावृत्त से निकल कर वागेश्वर में सरजू में समाप्त होती है जिसको ऋग्वेद घेनुमति भी कहता है। इसलिये प्रियमेध ने लग्यनऊ की गोमती को ही सिंधु की सहायक नहा है । ये चत्वारि सुप्रसिद्ध सारितायें अपने जल को उत्तर प्रदेश की मुख्य नदी मे यहाती हैं । इसलिये मानना पडता है कि प्रियमेध यर्णित शेष १७ नदियाँ भी उसी मे यहती हैं, जिसको ऋपियों ने सिंधु नाम दिया है, उसके विष्णुपदि होने से उसको त्रिसप्त धनेवों (सरिताओं) की माता म्बीगर किया है, उस पर पचतीर्य होने से उमरो परमाणि माना है (४ ११६) और अलाफा का अलोक्जिल उसमे प्रधान होने से उमको नदियों में प्रथम पद दिया है।
इसलिये ये २१ नदियाँ पजान की इदु या सिंधु की
सहायक नहीं मानी जा सकति और पजान की सिंधु ऋग्वेदिक
सिंधु नहीं है।
२-वितस्ता और ३ असिकि, वितस्ता का अर्थ होता है
वीत गई है तारण शक्ति जिसकी, इसलिये इसको विदग्धा
भी कहते है अर्थात् जिसकी वहन शक्ति दग्ध है। पाठ्य
पुस्तको मे झेलम को वितस्ता नाम दिया गया है जो कि
गलत है । वितस्ता तो ऐसी छुद्र नदी हो सक्ति है जो निस्ताना
सदृश पर्वतीय स्थान के निकटवर्ति हो । असिक्ति शब्द सन
से संवधित है अर्थात् अशक्त असिनि शक्ति हीन है। यह भी
छुद्र गधेरा हो सकता है जिसका सवध सक्रोलि प्राम, सकिनो
साग वनस्पति से हो जो गढवाल में पाये जाते है। इस
लिये चेनाव को असिक्रि कहना गलत है।
यह भी विचारना है कि ऐसे छुद्र स्रोतों गधेरों का
वर्णन प्रियमेध ने क्यों किया ? यह हम मानते है कि महान्
व्यक्तियों, स्थानों और घटनाओं के कारण छुद्र स्रोतों की
मान्यता प्रसिद्ध हो जाती है। प्रसूर्या सरस्वति की मान्यता
हुई प्रथम विद्यालय के कारण, शर्यणाति की प्रसिद्ध हुई,
उसके तट पर वृत्रासुर का वध होने के कारण, वर्ण और
असि प्रख्यात हो गई काशि के कारण और उसका उपनाम
वापरसि ही अधिक प्रचलित हो गया अपभ्रंस बनारस के
के द्वारा । सनोलि मे शक्तिवान् अरिष्टनेमि के वशज रहते
है, इस कारण उसके निकटस्थ असक्रिस्रोत की ख्याति
हो गई।
प्रियमेध की रचना से ऐसा मालूम हो रहा है कि उसका
( ६३ )
समय यमुना, गगा, सरस्नति के मगम से था' और निसप्त
सरितायों के वर्णन में उसने इनको प्रधानता दी। वाराणसि को
वह जानता था इसलिये उमने अपनि करिता सम्पन मापा
मे वरण को रितस्ता और असी को असिनि नाम दिये उनकी
लघुना के समय । प्रियमेध यह भी कहता है कि ये नदियों
मरधा है अर्थात् इनमे पातु की वृद्धि है । इस लिये अधिक
मभावना यही है कि रितस्ता पर्णा है और असिनि प्रसी।
वेर कहता है "अमिया यनमानो न होवा” (४ १७ १५)
निस नदी से सिंचाई नहीं हो मानि उसको अाराधना कोई
नहीं करता।
"-विपाशा, ५ शुतुद्रि पाठ्य पुस्तरों में ये व्यास,
मतलन मानी गई हैं । पहिले लिया जा चुका है कि विपाशा
थोर शुतुद्रि पा सगम पर्वतीय पाटी में है, लेक्नि पजार की
व्याम प्रोर मतलन का मेल मम भूमि मे है जहा पर्वत हैही
नहीं। इमलिये विपाशा और शुतुद्रि को व्यामा और सतलज
पाहना गलत है। इस प्रसंग में यह कहने की प्रारयस्ता
है कि जो पहिले से पाशी से बंधा हुआ है, पाशी के टूटने
१-यमुना गंगा के मंगम पर भारद्वाज श गुरु
यालया और प्रियमेघ मगीग्य के परचान् का है।
विष्णु प्रयाग के ज्योतिपपूर का अनुसरण करके
गंगा यमुना के गंगम यो ज्योनिपपुर नाम मिला पही
वर्तमान समय की भूशि है । प्रयागो
सारण दोनों
म्यानो यो प्राग्ज्योनिपपुर कहने लगे थे। भरतो ये
मृतप है। मां लोग इनसे पुनसारित कर मरेंगे?
-
( ६४ )
पर स्वतन्त्र होने पर, उसको विपाशा नाम मिल सकता है।
पजाव की व्यासा ऐसी नहीं है, इसलिये उसको विपाशा
कहना निहायत गलत है । व्यासा नाम तो उस व्यास के नाम
से पड़ा जिसने उसके तट पर व्यास गद्दी की स्थापना की।
हो सकता है कि सत्यति पुन व्यास जन पजाब मे रहने
लगे तो उनके सवध के कारण भि उसको व्यास नाम प्राप्त
हुआ।
६ सरस्वति, पाठ्य पुस्तकों के चित्र मे चित्रित की
गयी है कि दृपति को सरस्नति की पदवी मिली या यों कहो
कि हपति ने सरस्वति मे समाधि ले ली। मनु के अनुसार
दृपद्वति ब्रह्मावर्त की पश्चिमी सीमा पर है और उसको ही
सरस्वति भी कहते है। इसलिये हो सकता है कि द्वापर युग
के उत्तरार्ध मे ब्रह्मावत के विद्वानों ने या सत्यवति पुन त्र्यासने
या उनके शिष्यों ने उसके तट पर ज्ञान प्रचार किया और
विद्यालय की स्थापना की और दृपद्वति को ही सरस्वति की
पदवी आदरार्थ दी गई और वहा की शिक्षित समाज सारस्वत
ब्राह्मणो के नाम से मशहूर हो गई । इसलिये वह सर मे सुप्त
रहने वाली सरस्वति नहीं है जैसि माना की या यमुना, गगा
सगम की सरात । पजाब की सरस्वति को असूर्या अधसि
नहीं कह सकते जो कि सरस्वति के विशेष विशेषण हैं।
निर्णय यह है कि पजाब की सरस्वति ऋग्वेदिक सरस्पति
नहीं है।
-पुरणुि, इसका उल्लेख दोनों श्वावाश्व और प्रिय
मेध ने किया है। पाठ्य पुस्तकों मे रावि नदी को पुरुणि
नाम मिला है । चूकि पुरुप्णि श्वावाश्व के प्रात की पुरुपार्थि
लोगों की मुख्य नदी है श्यावाश्व की रचनाओं में इसका
.
वर्णन पाया है (४५२६,४५३१) यसिस्ट की रचनाओं
मे भी ममरी के सबंध में पमणि को अदिति कहा है
(७१८८६) यामदेव ने भी परपिण प्रात की प्रशसा की है
(१२२२)। श्वावारन का जन्म स्थान चन्द्रबुध्न की शालि
पट्टी में है, बशिष्ट का अगरतमुनि और वामदेव का वमोलि
चवुध्न । ये सन रथान गढवाल में हैं। शावाश्व ने स्पष्ट
कर दिया है कि परणि पुरष्णि परीपिणि पर्वतों की नदी है।
वह कहता है कि परप्णि के निवामी जो शुद्ध पाचरण के
है, उएपिवा और प्रोजसा हैं पर्वतों का छेदन भेदन करके
श्रत पया, 'प्रनुपथा बनाते है रथों के वहन करने के लिये
(४५२ ६।१०)। ऐसे पुरुपार्थि लोगों के कारण उस नदि का
नाम नामकरण हुया पुरपार्थवति पणि । इमसे पूर्यि नयार
पहते है जो च्यामा पर्वतान की घाटी में 'पलाता (सिधु) से
संगम करये सप्तसिंधु तीर्थ को जन्म देती है। अत: सिद्ध
हुअा, परुप्णि को पजार की रावी नदी कहना गलत है।
नावारन को यमुना नदी का ज्ञान था (५५२२) लेकिन
उमयो उसने सप्तमिधयों में स्थान नहीं दिया यद्यपि यह यम
के कारण यहुत प्रमिद्ध है। इसका मवय यह है कि यमुना
पर्वतों से बाहर निकल कर मातृभूमि को त्याग कर सिंधु मै
समाप्त होती है उम ममभूमि में लिसे वर्तमान समय में
यमुना-गगा संगम और प्रयागराज पदते है। इसलिये भी
मप्समिधु देश पर्वतीय प्राव है न रि पनार सदृश सममूमि !
मासिंधु गुग्य नदी है उमी पर्वतीय प्रात की।
पाथ पुग्नरों मे यह भी दर्शाया गया है कि धुमा, अमु,
गोमति, श्वेता या जल ईदु नदी में रहता है। इसलिये इनौं
यायत लिखता हमे पापश्या प्रतीत होता है
-
( ६४ )
पर स्वतन्त्र होने पर, उसको विपाशा नाम मिल सकता है।
पजाव की व्यासा ऐमी नहीं है, इसलिये उसको विपाशा
कहना निहायत गलत है । व्यासा नाम तो उस व्यास के नाम
से पड़ा जिसने उसके तट पर व्यास गद्दी की स्थापना की।
हो सकता है कि सत्यति पुत्र व्यास जन पजाव में रहने
लगे तो उनके सवध के कारण भि उसको व्यास नाम प्राप्त
हुआ
६-सरस्वति, पाठ्य पुस्तकों के चित्र मे चित्रित की
गयी है कि दृपति को सरस्नति की पदवी मिली या यों कहो
कि दृपद्वति ने सरस्वति मे समाधि ले ली । मनु के अनुसार
दृपद्वति ब्रह्मावर्त की पश्चिमी सीमा पर है और उसको ही
सरस्वति भी कहते है। इसलिये हो सकता है कि द्वापर युग
के उत्तरार्ध मे ब्रह्मावत के विद्वानों ने या सत्यवति पुन त्र्यासने
या उनके शिष्यों ने उसके तट पर ज्ञान प्रचार किया और
विद्यालय की स्थापना की और दृपद्वति को ही सरस्वति की
पदवी आदरार्थ दी गई और वहाँ की शिक्षित समाज सारस्वत
ब्राह्मणों के नाम से मशहूर हो गई । इसलिये वह सर मे सुप्त
रहने वाली सरस्वति नहीं है जैसि माना की या यमुना, गगा
सगम की सरस्वति । पजाब की सरस्वति को असूर्या अधसि
नहीं कह सकते जो कि सरस्वति के विशेष विशेषण है।
निर्णय यह है कि पजाब की सरस्वति ऋग्वेदिक सरस्वति
नहीं है।
७-पुरुणुि, इसका उल्लेख दोनों श्वावाश्व और प्रिय
मेध ने किया है । पाठ्य पुस्तकों मे राचि नदी को पुरुष्णि
नाम मिला है । चूकि पुरुपिण श्वावाश्व के प्रात की पुरुषार्थि
लोगों की मुख्य नदी है श्वावाश्व की रचनाओं में इसका
वर्णन पाया है (४.५२.६,४.५३.६) पसिस्ट की रचनाओं मे भी ममरों के संबंध मे परप्णि को अदिति कहा है (५.१८.८१६) वामदेव ने भी परप्णि प्रांत की प्रशंसा की है (१.२२.२) 1 नावाश्य का जन्म स्थान चन्द्रबुध्न की शावलि पट्टी में है, वशिष्ट का अगस्तमुनि और वामदेव का वमोलि चंद्रबुध्न । ये सर स्थान गढ़वाल मे है । शावाश्य ने रपष्ट कर दिया है कि पणि पुरप्णि-परीपिणि पर्वतों की नदी है। वह कहता है कि परष्णि के निवासी जो शुद्ध पाचरण के है, उपविम्बा और भोजमा है पर्वतों का छेदन भेदन करके अंत.पथा, अनुपथा बनाते हैं रथों के वहन करने के लिये (४.५२.६।१०)। ऐसे पुरुषार्थि लोगों के कारण उस नदि का नाम नामकरण हुमा पुरपार्थवति पाणि । इमको पूर्वि नयार कहते है जो व्यामा पर्वतान् की घाटी में 'ग्रलाक्ता (सिंधु) से मंगम करके मनसिंधु तीर्थ को जन्म देती है । अतः सिद्ध हुप्रा, परविण को पंजार की रावी नदी कहना गलत है। सापारव को यमुना नदी का ज्ञान था (५.५२.२) लेकिन उसको उसने सप्तसिंधवों में स्थान नहीं दिया यद्यपि यह यम के कारण बहुत प्रसिद्ध है। इसका मवय यह है कि यमुना पर्यतों से बाहर निकल फर मातृभूमि को त्याग कर सिंधु में ममाप्त होती है उम ममभूमि में जिसे वर्तमान समय यमुनागंगा मंगम और प्रयागराज कहते हैं । दमलिये भी मनमिधु देश पर्वतीय प्रांत है न कि पंजाब सदृश ममभूमि । मामिधु मुख्य नदी है उमी पर्वतीय प्रांत की । पाठ्य पुस्तरों में यह भी दर्शाया गया है कि युभा, क्रम, गोमति, श्वेता का जल इंदु नदी में बहता है। इसलिये इनके पारत लिखना हम आवश्यक प्रतीत होता है:- ८-यूभा नाम स्वय वतला रहा है कि वह किसी ऐसे प्रसिद्ध स्थान से होर वहती है जो कुंभ की सी सूरत का हो। ऐसा स्थान अर्हिवुन प्रात के किनारे प्रगस्तमुनि है जिसका उपनाम उसके स्थान के कारण कुंभज भी है और उसी प्रात के निवासि कु भडि ग्राह्मण भी है । अत. वेदिक समय में मदाकिनी को कुभा कहते थे । श्यावाश्व वर्णित सप्त सिंधवो मे कुभा है। पारखता कि कावुल नदी को पाठ्य पुस्तकों के चित्र मे कूमा नाम देकर उसकी महिमा को अंत कर देना है, यह तो केदार प्रात की मुख्य नदी है और पौरा- णिकों ने उसे देविका और वीरिणि भी कहा है क्योंकि वह कालिमठ की शोभा की भी वृद्धि करती है अपने मंद मुस्कान से । उसके तट पर कार्तिक वीर्य स्रूध का वीरनगर अगस्तमुनि के निकट था, जिसका स्मारक वहीं आकाश से वातें करने वाले पर्वत रसुंग पर है। स्कंध और अगस्त पडोसी थे, इस लिये अगस्त और लोपमुद्रा इतिहास श्रवण करने के लिये स्कंध के पास जाया करते थे। स्कद पुराण मे इन्हीं के आपस का सवाद है। अन कुभा को कावुल कहना गलत है। कुमा के तटवर्ति हविष्माम् सहस्र दक्षिणा दिया करते थे जिसकी स्याति कुभ दान करके हो गई। यही आधार है कुभ के मेलों का। ६-प्रभु । पाठ्य पुस्तक का चिन क्रमु को अफगा निस्तान की खुर्रम नदी वतलाता है। यह केवल नामों की समता है। केवल इसीका आधार लेकर निर्णय करना ठीक नहीं । श्वावाश्व ने अमु की गणना सप्तसिंधुवों में की है, लेकिन पाठ्य पुस्तकों के निर्माता मालूम होता है केवल प्रियमेध के सूक्त का आधार लेते हैं और क्रभु, कुभा को । ( ६७ ). मप्तसिंधवों में स्थान पाने के योग्य मानते ही नहीं। उनके तो पूजनीय देवता परदेशी हैं जो कह बैठे है कि भारतीयों के पूर्वज मध्य एशिया से थाये हैं, न कि भरतम्य पुत्रा इस भूमंडल पर सब तरफ गये और मध्य एशिया को भी गये हम तो क्रमु को बुध्न प्रांत की मुरय नदि मानते हैं क्योंकि यहाँ कर कर्मियों की बाहुल्यता थी जिनकी रक्षा इंद्र ने की अमरों को दंड देकर । विड्दु, बढ़ई, अोड़, कृपक और, श्रमिकों को करकर्मि कहते थे। वायाश्य घृष्णु इंद्र का सम कालीन था। इमलिये उसने बुध्न की पिटर को क्रमु कहा जो "प्रलाका से कर्णप्रयाग में मंगम करती है। अतः क्रम को मधुर्रम मानना ठीक नहीं। १०-गोमति । पाठ्य पुस्तकों के रचयिता गोमति को गोमाल मानते हैं। सिंधु के संबंध में गोमति पर अपमा मत प्रकाशित कर चुके है । घूम घूम कर चलने वाली लग्ननऊ की गोमनि ही मानी जा सकती है। ११-श्वेता । पंजार को मतसिंधु मानने वाले लोग श्वेता को श्यात मानते है । यह केरल शन्द माइप्य है। जब की प्रियमेध की गंगा यमुना मास्नति, वित्तग्ना और अमिति उत्तर प्रदेश की मुग्य नदी प्रलाना में बहती है जैमा कि उपर मिद्ध पिया जा चुका है, अपेदिक कवियों का कविषुधन भी पंजान में नहीं है तो मानना पड़ता है कि प्रियमेकि वेता नीनि प्रांत को नितभा है जिस नाम का उलेम खावाश्य नेरिया है। अतः प्रियमेध की २१ नदियों "पायर्यावर्त पुण्य भूमि मध्य विध हिमालयो" की प्रग्यात मरिता है और सगाव फी मा मरितायें मप्रमिधु देश गढ़वाल की। इन नदियों का संबंध पंजार से नहीं है। 4
-
( ६८ )
गढ़वाल (सप्तसिंधु देश) और मध्य येशिया ।
हमारा मत यह है कि ऋग्वेद के प्रथम युग के पूर्वार्ध,
के समय के निम्नलिसित विषय अचूक निर्णय करते है कि
हिमालय की पर्वतीय भूमि पार्यों का ही नहीं, मानव जाति
का उद्गम स्थान है:-
१-मानर जाति की उत्पत्ति अहि (एति) मंकी से
हिमालय में हुई पहिले कहा जा चुका है । दारवीन भी इसका
समर्थन करता है।
२-'सप्त विप्रा जाये महि प्रथमा' मृग्वेदिक वाक्य है।
ये मानव जाति के सप्तमूल पुरुप है । इनके मूल स्थान सप्त
सिंधु देश, यमनोत्तरी और अर्णावर्त दानपुर में है लिखा
जा चुका है।
३-~योरोपियन कल्पना के अनुसार आर्य जाति का
यस्ति वास स्थान सैंडिनेभिया, लिथुआनिया की भूमि,
दक्षणि पूर्वि रूस या मध्य एशिया था या स्वयं भारतवर्ष ।
यह कोई निर्णय तो नहीं है किसी एक देश के पक्ष मे,
लेकिन यह सिद्ध करता है कि इन सभि देशों को
आर्य ऋपिवीर गये, वृताना ऋपि, यम और शासनी वरुण
गये। इसी कारण आर्य जाति के प्राचीन काल में यहाँ बसने
के चिह्न मिलते है । भारतवर्ष में तो मैसमूलर के मत का
अादर किया जा रहा है कि मध्य ऐशिया प्रायों का उद्गम
स्थान है यद्यपि ऋग्वेद इसका समर्थन विलकुल नहीं करता
लेकिन भारतवर्ष के गन्य मान्य नेता शासक न तो वेद भाषा
की मान्य करते और न ऋग्वेद का अध्ययन । अभि तो
वे अधिकतर अंग्रेजी विचारों के अनुयायी है। हमे इस बात
को नहीं भूलना चाहिये कि जीव ने विकाश के द्वारा उन्नति
करते हुये अंत में मनुष्य योनि का परमपद प्राप्त किया हिमावत में । वहीं सप्त मूल पुरुषों को जन्म भूमि है (देयो मूल पुरुप नामक लेस)। हिमालय की देवभूमि माणावर्प में विष्णु लोक आर्य जाति के उद्भव उन्नति का केंद्र था। वहीं सर म सानेवालि सरस्वति के तट पर विद्यालय भी था। विष्णु को अध्यक्ष, राष्ट्रि और सूवा यहते थे और इन को विष्णु का युज्य सगा। इस कारण माणावपं ही हमारे देशांतर गमन का, उपनिवेशों की स्थापना का केंद्र भी वना। हमारे ऋग्वेदिक वाप दादे लिथुआनिया, स्कैडिनेमिया और जरमनी ही को नहीं गये उन्होंने तो समस्त योरप में सभ्यता फैलाई, लिथुआनिया मे तो वे मूपक रोग से भी पीड़ित हुये वे तो इग्लिश चैनल को पार कर उन टापुयों में भी गये जिन्हें आयर यूटेन (आर्यावर्त) कहते है। इसके अभ्रामक चिह्न ऋग्वेद में विद्यमान है (१०.१२-१६ सूक्त)। (2)-जो विद्वान् मध्य एशिया को श्राों का मूल- स्थान मानते हैं, उनका सबसे महत्वपूर्ण प्रमाण यह है कि वहाँ सोज गुदान करने पर सस्कृत और श्रायुर्वेद के मंथ मिले है । इसका बहुत मरल और पुष्ट उत्तर यह है कि हमारे पूर्वज इन प्रयों को वहाँ तब ले गये जब उन्होने अक्षर लीपिरा निर्माण कर लिया था। इससे प्रथम ही चे तो श्रुतिस्मृति शारीरिक शक्तियों के द्वारा मानोपदेश करते थे। सबसे प्रथम उन्होंने मप्तसिंधनों के मंगमों पर ज्ञान प्रचार किया। जो पि इस भूमंडल पर भ्रमण करते थे और मानो पृत बनाते हुये ग्वदेश यो वापम प्राते थे उनको वृतान? १वताना वृताना इन शन्दों की उत्पति वर्त से है चत पकड़ कर ले जाने हैं. गम्ना दिलाकर श्रीग के मार्ग दर्शक बनने है । वर्त कहते हैं ग्मना को। । ।
( ७० )
ऋषि कहने लगे। इनके शोफे पहिने रहते थे तो इनको
मुशाफिर सफर करने वाले, कष्टों को भोगने वाले कहने की
रीति चल पडि । जो लोग ज्ञान को उपदेशों को श्रवण करते
उनको कहते थे सूर्ते, जो नहीं सुनते उनको असूर्ते । इस तरह
सूर्त असूर्ते, देव अदेवयु की उत्पत्ति हुई (१०८२४)।
दाक्षि का पुन पाणिनी और धन्वतरी प्रथम युग के
भारभिक काल के नहीं है जब अक्षर लीपि का निर्माण ही
नहीं हुआ था, पाणिनी के व्याकरण बनने पर वैदिक भाषा
का सस्कार करके संस्कृत भापा वनी। इसके पश्चात् सस्कृत
में प्रथ लिखे जाने लगे। उपनिवेशों की स्थापना का कार्य तो
इससे पेश्तर ही आरभ हो चुका था । धन्वतरि चद्रवशि तो
काशी का राजा था। उसने आयुर्वेद पर प्रथ रचना प्रारभ
की। अस्लि बात यह है कि धन्वतरि के समय से प्रथम
अथर्वा ने उत्साहित किया विप्र, ब्राह्मणों को औषधियों का
संग्रह करने को और रोग पीडितों की सहायता करने को।
धन्वतरी की काशि (उत्तर काशि) हिमालय मे है, वह
माडलीक राजा था। उसके राज्य में श्रीपधिया प्रचुर मात्रा
मे होती है तो उसने समिति बनाकर औषधियों पर प्रथ
रचना कराई (१०६७) । वुध्न से वाहर निचान देशों मे राज्य
का प्रसार करने के लिये सैकडा सहस्रो अश्विनि भेपन,
अश्विनि कुमार दो दो तीन तीन की टोलियों में निचान देशों
निऋति देशों को भेजे जाते थे (१२४७-६) उनके सुभीते के
लिये उनको अश्व प्राप्त थे इसलिये अश्यनि कहलाये। हमारे
आयुर्वेद प्रथ पहिले पहल मानावर्प में वने, उनकी प्रतियाँ
मध्य ऐशिया मे मिलि तो आश्चर्य ही क्या ?
(५) मध्य एशिया का पक्ष लेने वालों का यह भी
कथन है कि अफगानिस्तान होर सैनर दरें के मार्ग से हमारे
धार्य वाप दादे आये और भारतवर्ष की भूमि से मोहित हो यहीं के निवासी हो गये। मालूम होता है कि इनको और इनके मत के मानने वालों को केवल एक दर्श-द्वार का ज्ञान है। हमारे प्रायें वैदिक पूर्वज तो सप्त द्वारों से इस भूमंडल का चफर लगाते थे। ये सप्तद्वार है-नीलमद्वार, माना द्वार, नीतिद्वार, कोटद्वार, हरद्वार, गुरुद्वार१, और देवलद्वारर । हमारे पिनीर, मरुतसेना, अश्विनी इन्हीं द्वारों से मागा से मुग्यतः विविध दिशात्रयों को जाते थे और इन्हीं से वापस पाते थे। अपने चुघ्न से बाहर जाने में इनको अपनी जन्म- भूमि सिंघवों को पार करने में कष्ट होता था, इसलिये श्वा- यार कहता है कि ये नदियों उनके मार्ग में वाधा न पहुँचावे, न कहीं ठहरावे न रिंगायें । ऐमा निवेदन करके उसने धृष्णु ईद्र का ध्यान आकर्षित किया और इन नदियों पर भूले बनाने की, मरम्मत करने की आवश्यक्ता को प्रस्ट किया । ये शूर चीर जर देश देशांतरों फा दिग्विजय करके पाते थे तो इनका शानदार स्वागत होता था, विजयि सेना और सेना नायकों को हर्पित करने के लिये प्रशंमा की स्तुतियों के साथ उनकी अगवानी होती थी। इनके दर्शनीय रथ सूर्य की सी रश्मियों से चमकते रहते थे। चूंकि ये सप्तसिंधयों और सप्तद्वारों १ गुरुद्वार-देहरादून प्रांत में गुरुद्रोण रहते थे इमसे पेरतर भी पि बान प्रचार करते थे, २ देवलद्वार-मानस संड अायत को जाने का मार्ग है। २ अग्मन् उक्यानि पौस्यें जैमाय हर्पयन् । ६.१११.३॥
( ७२ )
के देश के निवासि थे और सूर्य जैसे तेजस्वी, दर्शनीय और
आभूषणों से जगमगा रहे थे, काश्यप मारीच ने इनको
सम्बोधन किया "सप्तदिशो नाना सूर्य" (६.११४.३) और
क्षपनी मधुर वाणि से सप्त के साथ मानो कड़ा करते हुये
निवेदन किया "यहाँ तो सप्तसिंधु देश के सप्त होतार, सप्त
ऋत्विज, सप्त देव आदित्य सप्तदिशोनाना सूर्यों के स्वागत
के लिये शर्यणावति और आर्जिकीया का सोमरस परिस्रव
कर रहे हैं। इसलिये खैबर द्वार से प्रार्यों का भारत पाना
कोई आधार ही नहीं रखता । ऐसे निहायत गलत विचारों का.
प्रचार हो रहा है उत्तर प्रदेश में पाठ्य पुस्तकों के द्वारा ।
क्या उत्तर प्रदेश के शिक्षक इस पर ध्यान देंगे ?
(६)-मध्य एशिया के सिद्धांत के समर्थक यह घोषणा
भी करते हैं कि आर्य जाति अपने पशुयों के लिये गोचर
भूमि की खोज करते-करते भारत को पाये।
यद्यपि ' यह सच है कि पार्यों के पास पशु धन प्रचुर
मात्रा में होता था और वे अपने पशुओं के लिये चारगाह भी
चाहते थे। लेकिन वास्तविक प्रश्न यह है कि उन्होंने अख्न्यानि
पशुओं को किस देश में ग्रामीण बनाया ? इस प्रश्न का उत्तर
ऋग्वेद और गढ़वाल कुमाऊ का भूगोल देना है । सप्तसिंधु
देश गढ़वाल में अश्व बुध्न है जहाँ के अश्व पालतु बनाये
गये, सवारि और वोझ ढोने के काम में लाये गये । वर
वधु भी अश्वारोहण करते थे (१०.८.३) । अश्वालस्यु और
शावलिर इसकी सबूत हैं । ऋग्वेदिक अश्विनी अश्वनिकुमार,
२शावलि गढ़वाल की एक ऐसी पट्टी है जिसके
पर्वत भृग अव मि कहते हैं कि यहाँ अश्व अपने को
(शेष पृष्ठ ७२ पर)
-
1
श्रसुनीति हमारी सभ्यता के पूर्वार्थ मे हुये । वसुओं ने जगलि
चवर गायों को पालतु बनाया, इमलिये जमदग्नि ऋषि
'प्रदिति गाय को कहता है दुहिता वसूना । वसुधारा यसुओं
का स्मारक माना के पास यद्रिनाथ की भूमि मे है। गो नाम
का ग्राम अल्मोडे जिले के दारमा प्रात में है। वसुओं के
यशन मस्त सेना मे भि भरति होते थे और वसव मस्त
रहलाये । जिम तरह अष्ट यम, अष्ट विश्वामित्र हुये, अष्ट
वमु भी हुये। श्रादि काल के अदिति यश ने गायों को पाला
पोपा और उनत किया, इमलिये जमदग्नि कहता है कि गाय
नो श्रादित्यों की स्वसा है-स्वसादित्याना । ऋपरों के लिये
गाय अत्यादिर उपयोगी सिद्ध हुई, उस पुरीप से क्षेत्रों की
उत्पादन शक्ति बढ गई, गाय के वत्स वृपम कृपि कर्म में
पों पे सहायर हो गये, गाय के दुग्ध घृत से मृफ्क पलिष्ट
हो गये, चे उत्साह पूर्वक डाकु, चोर राक्षसों को दड देने लगे,
भगाने लगे तो ये राज्य की सेना मे भरति दिये गये और
गेद्र रूप धारण करवे शत्रुओं को रलाने लगे टनको रधिर
यमन पराने लगे तो इनसा यश रौद्र, गदा, रुद्राणा करपे
हो गया. इमलिये जमग्नि चहना है कि गाय तो न्द्रों की
माता है-माता रद्रामा । माधारण नया इनको गोमातर
गाय है. माता जिनसी नाम से प्रनिद्धि प्राप्त हो गई। गायो
भी “नति पे करण शरद ऋतु पे चौमास मे तो घृत यो
अधिस्ना हो जाती थी, इम मरव पहत मी गृह लक्मिया
कंबल घृत पा पाहार करति विधौर ममर में शत्रुओं को
मुरक्षिन मममने रहे होंगे । असारलि का गालि
उसी तरह बना जसे अमगार का गवार । ये मभि
शन्द अन्य से मंधित है।
( ७४)
पछाडी थी जैसि पुरवा की विदुपि स्त्री उर्वसि (१०६५.
१६)। बुध का पुन पुररवा वधान का राव राजा था, उसकी
स्त्री ने जंगली अजावय शिशुओं का पालन पोषण करके पालतु
बनाया । इस तरह सप्तसिंधु देश गढवाल में प्रश्न, गाय
वृपभ, भेड, बकरियों की प्रचुरता हो गई। हिमाच्छादित
धादियों में रहने वालों को अधिक क्ट होता था, इसलिये
हेमंत ऋतु में अपने पशुओं को लेकर अन्यत्र चले जाते थे।
तव विष्णु की अध्यक्षता मे यह निर्णय हुआ कि गोमातर.
पृश्रिमातरों का देशातरगमन सावधानि से नियमानुसार किया
जाय, सवसे पहिला उपनिवेश तीन नदियों के देश में हुआ।
इसके पश्चात् इशान पूर्व दिशा के अतिरिक्त, सर्वत्र पार्यों के
आर्यावर्त बने जहाँ सूर्यास्त नहीं होता था। निवेदन का
तात्पर्य यह है कि जिस देश मे जगलि पशु पालतु बनाये
गये१ वही देश भार्यों का बुध्न है न, कि मध्य एशिया या और
कोई अन्य देश । मनुष्यों की प्रधानता में चारों दिशाओं के
देशों को परेयिवासि मारणाव से ही गये। गोपेश्वर निवासि
गोपायन यधुओं ने इस पर प्रकाश डाला है। उनके गीत का
नारा है। मनो जगाम दूर कम् । तत्त श्रा वर्तयामसि इह
क्षयाय जीयसे। (१०५८१ १२)। लोगों में प्रचार किया
गया कि इस संसार में सुखमय जीवन व्यतीत करने के लिये
वहीं दूर देशों को चलो जहाँ मनु जा रहे हैं, प्रायो, स्थान
स्थान पर वर्तमान हो जाओ अपने अपने समूह बनालो।
देश में इसका प्रचार किया गया । उसने अपनि रचना के
प्रथम चा में स्पष्ट कर दिया है कि यम वैवरवत को ही माना
१पशून तांः चक्रे चायन्धान पारन्यान् ग्राम्याश्चये
१०.९०.८
( ७५ ) के कारण मनु भी कहते हैं। गोपायन बांधयों ने यह भी वर्णन कर दिया है कि यह पर्वत हिमालय में वह केंद्र कौन था जहाँ से देशांतर गमन के लिये भूत काल में प्रबंध होता था और भविष्य में भि होता रहेगा। उसके चिन्ह बतलाये गये ई-पतुभ्रष्टि भूमि, समुद्र अर्णव, मरीची पर्यत, श्रीपधियां और जल धाराये । ये सब विष्णु लोक को बतलाते हैं। इसमे संदेह करने को गुंजायश ही नहीं है । इसलिये यह सावित है कि शीत प्रधान देश हिमालय के माणावर्प-सप्त सिंधु देश से पृश्निमातर, गोमातर, त्वष्टा, मरत, ऋषिपुत्र इस भृमण्डल पर फेले न कि मध्य ऐसिया से । उत्तर और वायव्य दिशाओं की ओर जाने में हमारे ये पूर्वज नीलमद्वार माना द्वार और नीतिद्वार से गये और इन्होंने हिमाच्छादित हिमालय को पार किया, और कोटद्वार हरद्वार, गुरद्वार से वे दक्षिण पश्चिम दिशाओं को गये। चंद्रवुन के इदुवंशियों ने शिव- लोक पर्वत श्रेणि को पार कर पांच नदियों के देश को अधिन कृत करके इंदु नदी को अपने माम्राज्य की पश्चिमि सीमा बनाया । साम्राज्य की रक्षा करने के लिये इंदु नदी से पश्चिमि पर्वतीय देशों में राजा सेल के अधीन पुष्ट पुख्ता शरीर के आर्य यसाये गये और देश का नाम ही पास्ता १चतुष्टि भूमि-बद्रिनाथ का चौखंभा, समुद्र अर्णव क्षीर सागर, मरीची पर्वत - जहाँ माय रहते है- माना पर्वत, नीति पर्वत, श्रीपधियाँ-हिमालय तो श्रीपधियों के लिये प्रसिद्ध है । अपा-जलधारायें बद्रिनाप की भूमि में बहुत हैं।
हा गया और वहॉ सेल के कारण जकासेल. इत्यादि नाम ।
इस देश में अधिकार जमाने में तो पेल की राणि विश्पला
की जांध भी कटी थी (१.११६.१५) ।
इसी तरह बिलोचिस्तान मे वल उच्च, वीर सैनिक सुरक्षा
के लिये वसाये गये और उसका नाम कर्ण हुअा बल उय
स्थान जिसका अपभ्रंश विलोचिस्तान है।
हमारे आर्य वीर जो संगीत शास्त्र में भी प्रवीण थे
सैवर के दर्रे से आगे बढ़े और उस भूमि को उन्होंने हराभरा
किया, वहाँ सभ्यता का विस्तार किया और उसका नाम कर्ण
किया गांधार, क्योंकि वहाँ अधिकता हो गई थी गंधर्वो की।
वह देश भी सीमा पर था, वहा भी बलवान आर्य सैनिक
रहते थे। स्त्रियाँ भी रण कुशल थी। इसलिये ब्रह्मवादिनि
रोमशो ऋपिका कहती है, गंधार देश की स्त्रियों के समान
मैं भी सैकड़ों प्रजापूर्ण राज्यों की रक्षिका हो सक्ति हूँ (१.१२६.
१४ १५)। इसी देश को वर्तमान समय कंधार अफगानिस्तान
कहते है। इन देशों से आर्य जाति का इदुयश आगे योरुप
की तरफ बढा। उनकी संतान धीरे धीरे उन द्वीपों की निवासी
भी हो गये जिनको उनके आर्य होने के कारण आयर निटेन
कहते है । वसुकर्ण ऋपि (१०६५.११-१५) ने तो संक्षेप में
वर्णन किया है कि अमरकीर्ति के देववशि श्रेष्ठ पुरप इस
प्रथिवी के विश्व मुपनो को समस्त देशों को प्रस्थान करते हैं
.और य सुटर दान दक्षिणा देने वाले इस पृथिवि पर आर्या
व्रतो का मिरजन करते है योर अपने ब्रह्मज्ञान अनुभव के
द्वाग गाय और प्रश्वों को उत्पन्न करते है, पर्वतो की
२जकाखेल, मूपाखेल, ईशाखेल, दाऊदखेल इत्यादि
मे खेल तो राजा सेल का स्मृति चिह्न है।
-
( ४ ) वनस्पतियों से औषधि बनाते है और वहाँ के जलों से जल- चिकित्सा का प्रचार करते हैं। यार्याप्रतों की भूमि इतनी अधिक विस्तृत है कि यहाँ अाकाश मे सूर्यदेव मदा आरोहण किये हुये रहता है। इतने महान साम्राज्य की स्थापना हुई थी इंद्रा विष्णु के सहयोग से । इमलिये मध्य एशिया का पक्ष लेना निस्सार है। ऋग्वेद में इसके पयान प्रमाण है कि वैदिक ऋपियों ने समीप और दूरस्य देशों में बस्तियों घसा दी थी, इसलिये उनको कहते थे अनपद्यमाना पथिकि, सधिचि, विपुचि, भुवनेषु अंत बरीवर्ति अर्थात् इन मार्ग दर्शक पथिकों का निश्चित स्थान कहीं नहीं है, ये तो चलते ही रहते हैं, सहयोग से रहने वाले, विश्व में मर्वत्र बस्तियों को बसाने वाले, विश्य भुरनों के अंतों छोरो में भी श्रेष्ट जैसे वर्तमान दिखाई देते है। (१.१६४.३१.) इसलिये इंद्र ने अध्यक्ष विष्णु को संबोधन करते हुये ठीक हो कहा था कि तुम्हारि अध्यक्षता में शत्रुओं को ममर में जीतकर इस पृथिवी के चारों दिशाओं के देश मेरे मामने झुक गये है मेरे श्राधीन हैं १०,१२८.१ । (७)-भापा पश्चिम देशों के सभि विद्वान एक मत है कि प्राचीनतम काल में हमारि पृथिवि पर एक ही भापा का प्रचार हुआ, लेकिन वे उस भाषा के मूल स्थान की खोज १देवान् वसिष्टो अमृतान वनंदे ये विश्वा भुव- नाभि प्रतस्युः । ब्रह्म गां अवं जनयंत औषधिः वनस्पतीन् पृथिवीं पर्वतां अपः । सूर्य दिवि रोहयंतः मुदानव ग्रामिता विसतो अधिक्षमि । १०.६५. १५.११ ।
( ७८ ) करने में वैसे ही असमर्थ रहे जैसे कि सप्तसिंधु देश और नदी को अन्वेपण करने में। मूल पुरुष, वुध्न और सप्त सिंधवों पर लेसों द्वारा सिद्ध किया जा चुका है कि गढवाल ही एक मात्र ऐसा देश है जिसे सभ्य मानव जाति का, आर्य जाति का मूल स्थान स्वीकार किया जा सका है । ऋग्वेद का प्राचीनतम अथ होना सर्बमान्य है, उसके वहुत वडे भाग को हम लाखों वर्ष प्राचीन मानते है, इसलिये ऋग्वेदिक भाषा को ही सर्यताति भाषा मानना पडता है और दुनिया की सभी भापायें उससे ही उत्पन्न होकर अपभ्रश रूप मे विद्यमान है। इसका निष्कर्ष यह भी है कि गढवाल में जिस वोली को वहाँ के सव साधारण निवासि आज भी वोलते है, वह वैदिक भाषा के अति निकट होनि चाहिये अन्य भाषाओं की अपेक्षा । इसलिये वैदिक भापा के शब्द, गढवालि भापा और हिंदी के तत्सम शब्द नीचे दिये जाते हैं। सम्वेदिक शब्द गढवालि हिंदी स्या स्त्री के लिये अतूतें अटूट अटूट केन केन किसने समेति समेत सहित यस्थ, इथई इम तरफ उध, उद नीचे उर्ध उब्ध उपर गौर्य गोडीया गायें गौरि गाय गोरो गौडो अगाणि प्रदडा स्या अध गाय आत ऋग्वेदिक शब्द मिथो पृचानः विवाल्यं वधि अस्मा, अस्मा मानुष चम्बो वृथा पर्यति पर्चा गा माण । पन्या मां ( ७६ ) गढ़वाली मिथई मुझको, मेरे पास पिचगाणो निचोड़ना उमाल उफान पत्रि, ववरो नीची मंजिल येमा येमा इसमें इसमें मनिस मनुष्य चफू, चौफला चम्पू विर्था फजूल कलशे में परचो परिचय, पहिचान गधेरों छोटी नदी मारणा १६ मुट्ठी अन्न-१ मागा पथा, पाथो, पाथा ४ माणा-१ पाया दोण १६ पाथा-१ द्रोण खार २० दोण-१ सार मेदा, खाडु मेदा, भेड़ा जीवसे त्वेयु, त्वेमा तुझमें क्या क्या वसरो वकि मनसाय हरादा विट ऊची जाति रिंगाणो घुमाना मिनणों अंगुलियों से पीस देना पाथो द्रोण खार्य मिढान् जीयसे वायु का जिह्वा से वार मनसा विट रीरमाम मिनानो . प्यू सो ऋग्वेदिक शब्द शीपर्णी वरयुरनु सपर्यति रीति, रिते अगोपिण पियूप योनिमा तृप्णा कति तृपाण मोत बात गोष्टे तमि व्यय भव्य जानिमा बघु वपुप बुज सामान्या ( ८०) गढवाली हिंदी शेसणि शैणि स्त्रि, शयनि वस्युरनु, वस्यु रौणो निवास करना सपोडदन, सपोडनो सप सप करते है रीतो रिक्त-साली या पिना अग्रालि अग मिलाना गाढा दूध योनिमा योनि मे तीप प्यास कति कितना प्यासा मौत मृत्यु वथाऊ हवा गोठ मे गौशाला में तमि (उ० गढ०) तुम व्याले गये दिन भोल आनेवाले दिन जननि खिया व्वारि बहु तिपालो बाबु योइ वापु, वाई वुज्या समन्या, समनन झाडि अभिवादन है गढाल मे प्रायने आ गये 7 वि अत, वेत आयन व्यति निपिदन् एनो मानि निसिगे, नेपुडो इनो मानी गये विना अत चला गया, घुस गया ऐसा मान गया मुम्पेदिक शद्ध क्तमत् मिपातय गृतये ( १ ) गढ़वाली हिदी क्तमत् हडनडाना त्रिपो सिसाना गुत्परिणी गुरु की तरह धम काना शिश्नो शिश्णो कांटदार पत्ते पौधे चन छन चैदिक भाषा के शब्दों के अपनश अंग्रेजी, पार्पि, तिव्यति में मिलते है उदाहरण के बतौर नीचे दिये जाते हैं- वैदिक अंग्रेजी वैदिक अग्रेजी चरथ Chariot पथ Path Son नीड़ Kneed पितर Father मातर Mother Daughter स्वसार Sister अगिरा Ignis अग्नि Ignite संत Saint उशत, वेपि Wish चर्चा Church अस्तत Stable पार Superior अहम् I am माय Martal अमर्त्याय Immortai हर्यता हरि Horse कृष्ण Christ वैल Bull उक्षा Ox की Cow सर्प Serpent रा Arrow स्रोत 1 Source Dear महंगा Cent दुहिता दरिद्ध शत सेदु वैदिक अंग्रेजी वैदिक सांवरण Sovereign दिव, दिवस मन mind अर्न येमिरे Aim स्थित दशक Decade नक्त Said आर्य द्वार Door दंत वृजद्भि Breeze स्थान night आगो Ago वैदिक Rope वाम रजिसूया रजिस्ट्रि अंतर Inter, In भ्रातर Brother स्वप्नसुन शरभाय Service रपासि रीदिह Read विवे यामनि Woman मिनंति (जानि) श्राददर्श वैदिक इरानी (पार्पि) वैदिक सप्तसिंधु हप्तहिंदु दुहिता सोम होम सरस्वति हरति भ्रातर पाद सप्ता हपता जानु नेप्टर नेप्टर, नेजर पृक पंच पंज स्था अंग्रेजी Day Earn Stay Nights R Dent Station, Stand अंग्रेजी Balm Register Registration Sleep Report Weave Mice Address इरानी (पार्पि) दुसवर मदर प्रादर पाधा । हरयु हरोयु बेहक इरानी (पार्पि) ( ८३) वैदिक इरानी (पापि) वैदिक पांचाल पंजाब अहि अजही चंद्र अवस्था गेंद अवस्था स्वप्न गत अहुर अंतर अंतरा होता जोता दुरो, द्वार दर्रा यश यरत काव्य कवउस अथर्वन् श्रश्रवा भैतन ग्रेटोना पाहुति आजुनि उपन उशना मित्र मिथ यम यिम अर्यमन आर्यमन नासत्य नौन हैध्य नराशंस नोसंहा शिव शीर्व वैदिक तिव्वति हिंदी मन मानम मी मनुष्य तोक तनय वमो लड़की वामा मुंड (शिर) मुस मुख मुस नमक क्षार वर्तन स्थलि चकथाली दी चांवल (धान) धान मृत्तिका मरिती मिट्टी मकान गुम्फा यर मुम्यो शब्दों की अमृल्यता विद्वान कहा करते हैं शद अनादि है। ऋग्वेद कहता कि वाणि के चार पाद परिमित हैं, इसे मनीपिणि ब्राह्मण तुफ तोक गुहा
( ८४ )
जानते हैं कि उसके तीन पाद बुद्धि रूपि गुहा में स्थित है
और वाणि के तुरीय स्वरूप को बोली बोल कर प्रकट करता
है । (१.१६४.४५)। इसका श्राशय यह है कि शब्द के सूनों
को
मूल
को बुद्धिमान ही समझते हैं, साधारण मनुष्य को
इसका ज्ञान नहीं होता। इसके उदाहरण देकर पाठकों को
सरल हो जायगा शब्द सूत्र को समझना ।
मन्-मन, माना, मनन मनीपिण, मनु, मनुष्य, man,
mankind, manhood, mind, mental, manual
mania, maniac, mind{u).
स्थ-स्थान, स्थानीय, स्थन, स्थित, स्थिति Stay,
stand, station, standard, statuc, stead, stop,
stout, store, stool stone.
फ-कर,-कार, कारु, कारय, कार्य, करण, कनी, कर्म,
करमु-मु, car, carry, carriage.cart, career, carto.
graphy, cartoon, cartridge, carve.
धृप-धर्पण, धृष्णु, धृष्णय, धृष्माण, धृपन्मना, धम् ध्वस्
ध्यस्माना, धस्माना etc. Dis, Disc, distroy, District,
distinction, distruction, distribute etc
गम्-गो, गोनाम् , गति, गानु, गमन, अगन्म, Go,
gone, gate, goal, goad, golf, game, gobble
ctc.
अर-अरी, आर्य, आर्यमन् R. Arable. Arrow,
arm, army, Art, Artizan, Arhmour, armistice,
Armament etc.
इन उदाहरणों से मायित है कि विस मापात्रों की
विश्य जननी ऋग्वेदिक भाषा है। प्राग्वेद में उन पियों की
( ५ )
रचना है जिनके ऋपि स्थान हिमालय में थे। जिन ऋपियों
के रथानों का वंशों का पता लगा है, उनका वर्णन हो चुका
है। वे ऋपि स्थान गढ़वाल में हैं। मूल पुरुपों के बुध्न
वहीं है, सप्तसिंधु नदी गढ़वाल ही मे होकर उत्तर प्रदेश में
बहती है। इसलिये सप्तसिंधु देश कहो मूलस्थान कहो
गढ़वाल ही है।
व्रता-वृता
ऋग्वेद में ये दोनों शब्द थाये है, व्रताना, प्रतानि इनके
परियायि वाचक है। व्रताना ऋपियों के सहयोगि दल होते
थे, इस अवनि पर सदा एक साथ प्रचंड वायु की तरह भ्रमण
करते थे और अपने साथियों रक्षा करते हुये अमर कीर्ति
को प्राप्त हुये।
सनात् सनीढ़ा अवनीरवाता व्रताराते अमृताः सहोभिः ।
१.६२.१०
ऐसे सहयोगि वृतानि दल के लिये भी वरण करने की
प्रथा राजा की आज्ञा से प्रचलित थी (१.६१.३)। ऐसे व्रता
महतो महानि कार्यों को सम्पादन करके अपने राजामजा
दोनों से उत्साहित किये जाते थे और सावासि प्राप्त करते
थे (३.६.५)। वृत्रासुर के आधिपत्य के समय व्रतानी प्रथा
भंग हो गई थी, जब इंद्र ने शर्यणावति पर वृत्रों का जघन
किया तो सिंधयों के देश में वृताना ऋपियों को स्वतंत्रता हो
गई चे परिण हो गये (४.४२.७)। इस दल में ऐसे व्यक्ति
विशेष होते थे जिनके सुश्रश्वहों, ऐश्वर्य, बल, अन्न धन
सम्पन्न हो और नेवा होने के योग्य । ऐसा ही दल मधवा इंद्र
का शरीर रक्षा दल भी होता था, जो उसको समर में जाने
को उत्साहित करता था और वह संग्राम में शत्रुओं को
पराजय करके उनको धूल में मिलाकर विभूति सम्पन्न होता
था (४ ४२.५)। ऐस वृतानाओं को परिज्मा विश्ववेदस भी
कहते थे क्योंकि ये समस्त विश्व का ज्ञान रखने वाले
सर्वत्रगामि परिव्राजक:थे (१०.६३.७ ) और सप्त महाद्वीपों
का पर्यटन करके सुकीर्ति प्राप्त कर दान दक्षिणा देते हुये
अपना नाम यश अमर करते थे। सप्त धामानि परियन्ऽमृत्यो
दाशत दाशुपे सुकृते १०.१२२.३ ।
हमने अपने लेखों में पुराण और स्मृति का साक्ष्य
देने की आवश्यक्ता नहीं समझी है क्योंकि ये बहुत पीछे के
है। इनके समय से ऋग्वेद को अर्थ सहित पढ़ना आवश्यक
नहीं समझा गया, और केवल वेदध्वनि, वेदिक ऋचाओं के
उचारण पर ही विशेष जोर दिया जाने लगा। यह समय
परिवर्तन का था। दक्षिण भारत के भरत पुत्रों ने ऋग्वेद का
अध्ययन किया, उन्होंने उसमें अपने प्रदेश की नदियों, पर्वतों
और स्थानों का वर्णन पाया ही नहीं। उन्होंने समझा कि
यह उनकी मानहानि है, दक्षिण में सामगान का प्रचार अधिक
हुआ, जो यज्ञ ऋग्वेदिक समय में सरलता पूर्वक किये जाते थे
ब्राह्मण ग्रंथों के आधार पर बहुत पेचीदे हो गये, वैदिक
स्थानों के नामों की सूरत मूरत भी बदलने लगी, जोतिपपुर
को ज्योतिर्मट और ज्योतिर्धाम नाम दिया गया । देवमाना
और दियः लोक को पद्रिनाथ नाम से प्रसिद्ध किया गया ।
स्वावाश्य वर्णित सप्त सरिताओं के स्थान पर निम्नलिखित
श्लोक की रचना की गई:-
गंगेश्च जमुनेश्चैव, गोदावरि सरस्वति नर्मदा सिंधु
कावरि जलेस्मिन् संनिधंकुरु ।
इस तरह पर समस्त भारतवर्ष को थार्यावर्त मानना तो ठीक ही हुआ लेकिन लोग अपने मूलस्थान की सरिताओं, पर्वता, भूपि स्थानों को भी भूल गये। शतपय ने मरीचि पर्वत को या हिमालय को उत्तरगिर नाम दिया, और अलक- नंदा (शुतुद्रि) को सदानीरा मानो सदा जल यहाने वालि अन्य नदिया है ही नहीं। इसका परिणाम जो होना था हो गया। सभ्य मानव का प्रथम लीला क्षेत्र कौन था, आर्यों का उत्पत्ति स्थान कहां है, ये प्रश्न जटिल हो गये है। इस छोटि सी पोथि मे इन प्रश्नों को हल करने का प्रयत्न किया गया है। यदि गढ़वाल को सप्तसिंधु देश करार दिया जाय तो प्रश्न यह बड़ा होता है कि जिन महान विद्वानों ने मूलस्थान को सोजने का प्रयास किया है वे अपने कार्य में सफल क्यों नहीं हुये। इनमे पश्चिमि विद्वान और भारतीय विद्वान है। पश्चिमि विद्वानों का असफल होना निश्चित था क्योंकि उन्होंने योरप के प्राचीनतम् साहित्य (classical literature) पर विश्वास ही नहीं किया कि मानव जाति के उत्थान के भू भाग हिमालय मे है । (natakind sprang from the regions of Himalayas)| उन्होंने ग्वेद को सबसे प्राचीन ग्रंथा स्वीकार किया और अध्यापक मैक्समूलर ने तो सदों के सम्बंध में कहा "यह वही है जिस में शब्द के वास्तविक अर्थ में इतिहास मानता है। जो इम अत्यंत एतिहासिक पुरातन ग्रंथ समूह मे परिश्रम करना पसंद करता है उसे खोज करने को अगणित बातें मिल जायेंगी। यह मेरा निश्चय है कि मनुष्यों या आर्य मानव जाति का अध्ययन करने के लिये वेदों के समान महत्वपूर्ण और कोई दूसरी यन्तु नहीं"।
मैक्समूलर ने वेदों की प्रसशा तो की और उनसे यह
प्रभावित भी हुआ लेकिन मूलस्थान को ढूढने मे उसने
खुदानों के द्वारा सोजने के अधुरे प्रयत्नों को अधिक महत्व
दिया। किसी मी अज्ञात भूभाग की गोज मे उसकी नदियाँ
और पर्वत, महापुरपों के स्थान वहा की विशेषताये महान्
सहायता पहुचा सस्ते है। मृग्वेद मे नीचे लिसे नदियों के
नाम आये है.-
(अ) गगा, यमुना, सरस्वति, शुतुद्रि, पुरणि, असिकि
वितस्ता, पार्जिकिया, ऋणुही, मुपोमा, तुष्टामा, सजू, सुसर्तु
रसा, श्वेत्या, कुभा, मु, अरवृधा गोमति, ऋजीति, रशति ।
इन २१ नदियों के नाम प्रियमेध ने दिये है।
(ब) शर्यणावति और पार्जिकिया का उल्लेख काश्यप
मारीच ने किया है। पर्वतों में बहने वाली शर्यणावति पर
वृतासुर का वध उस स्थान पर हुश्रा जहा उसमे एक दूसरि
नदी मिलती है। यह दूसरी नदी प्राजिक्यिा है । इन
दोनो नदियों के निकट अति उत्तम सोम उत्पन्न होता है ।
इनका जल भी पुरष्णि के द्वारा सिंधु मे मिलता है।
(स) शुतुद्रि ओर विपाशा का वर्णन विश्वामित्र ने
किया है।
(द) दृपदति, पापयायी, सरस्वति का वर्णन देववात
देवश्रवा ने किया है (३२३ ४)।
ई) असूर्या और अंधसि का वर्णन वसिष्ट ने
किया है।
(फ) प्रलाता का वर्णन सरमा ने रिया है।
(ज) रसा, नितभा, पुमा, प्रमु सिंधु, सरयु, पुरुपिण
का वर्णन श्वापारस ने किया है।
मरस्पति, पुष्णि, सरयु सिंधु के नाम बहुत अधिक
ऋचाओं मे मिलते हैं।
ऋग्वेद मे सरस्पति ही एक प्रेमी नदी है जिसको कवियों
ने अनेक नाम दिये है। उसके तट पर विद्यालय होने से उसे
सुमति पद मिला, वह विन्दुसर से निकलती तो उसको
पौराणिमा ने विंदुमति कहा, सर मे सोने वाली होने से
सरस्वति, यह दिसलाई नहीं देने के कारण असूर्या, उसका
भूमि के अतरिक्ष मे बहने से उसको कह दिया अधसि अधेरे
में चलनेवालि, उसके किनारे वगड मे पत्थरों के करड पडे
रहते है तो उसको नाम दिया गया हपति, वह पानि में
निवास करती है तो उसकी पदवी हो गई श्रापयायि अर्थात्
जल मे च्याप्त होने वालि, वर्षात मे उसी जलधारा
बहुती हुई दिपलाइ देती है तो कवि ने कह दिया येदि की
शृखलायें टूट गई है, उससे तो मुक्ति मिल गई स्वतत्रता
प्राप्त हो गई है। वह तो पाश चद्ध थी विपाशा हो गई है।
मैक्समुलर ने भी विपाशा का अर्थ क्यिा free trom fetters
परतु यह उसको सोतन में असमर्थ रहा। ये सब नाम ठीक
ठीक घटते है बद्रिनाथ की सरस्वति पर ।
गगा, यमुना तो सर्वत्र विदित है, इन पर ध्यान दिया
जाता तो उत्तर प्रदेश के बाहर मूलस्थान को सोनने का
परिश्रम न करना पड़ता।
यही पान नितिभा पे विषय मे भी कही जा सति है,
सभि जानते है नीति घाटी गढ़वाल म है। अलाप्ता को
श्रलरनदा यदते हा है।
इसलिये सरस्वति गगा, यमुना, नितभा पीर पलाता
.
की भूमि का निरीक्षण करने पर संभव था मूलस्थान का भेद खुल जाता। पर्वतों के नाम पहिल लिखे जा चुके हैं। सप्त पर्वतों के अतिरिक्त और भी पर्वत हैं। तिरश्चिद्यु तान कहता है त्रि सप्त सानु संहिता गिरीणांम् । ८.६६.२ जैसे २१ नदियां है, २१ चे पर्वत भी हैं। तिरश्चि ने सावाश्व की तरह कहा है कि सप्त सिंधव तो मनुष्यों के लिये सुपारा होने चाहिये। तिरश्चि का निवेदन इंद्र के प्रति है। उसके सूक्त की प्रथम दो ऋचाएं दर्शा रही हैं कि जिस देश में त्रिसप्त सानु गिरि है, उसी देश में अस्मा पापोमातरः सप्त सिंधवा" भी हैं। ऋपियों ने अनेक वार इंद्र को अद्रिय नाम से सम्बोधन भी किया है। इससे मूलस्थान पर्वतीय देश है। यह भी एक कला थी मूलस्थान का अन्वेषण प्रारंभ करने के लिये। ऋपि स्थान, ऋपियों के स्थानों के नाम मूल पुरुषों के लेस में दिये गये है। गढ़वाल पर्वतीय प्रांत है। गंगा, यमुना, नितभा, बालकनंदा इत्यादि उसी प्रांत की नदीयां हैं, इसलिये ऋपियों के ग्राम भी वहीं मिलने चाहिये । इस समय गढ़वाल की राजधानी पौड़ी है, वहीं से प्रातःकालीन उपा का अद्भुत दृश्य दिनाथ के चतुभृष्टि शृग पर दिसाई देता है, वहां प्रातःकाल में सूर्योदय विशेषकर हेमंत ऋतु में प्रति मुहारना, मनको लुभाने वाला होता है। जल भी वहां का स्वादिष्ट और यल घर्धक है। हिमालय का अति रमणीक दृश्य सदा सामने रहता है जैसा कि देविधुरा मे । प्रकृति ने उसे नैनिताल और अल्मोड़े की अपेक्षा कितना ही गुणा यरों में यर बना रक्सा है। साधारण कृषक भी पाहता है. ।
(११)
"नांदलो मोना को कंदलो"१ । इमी सुवर्ण तुल्य भूमि का केन्द्र
है पौड़ी। यदि ऐमी श्रेष्ट रमणीक भूमि पर किसी वैदिक
पि की छाप न मिलती तो हमारे आश्चर्य का ठिकाना न
रहना और हम समझते कि चे सन्यास मार्गियों की तरह
कंदरायों में रहते रहे होंगे। लेकिन पौड़ी स्वयं सदारतलाती
रहती है कि वह तो पायु पि को प्रिय पुनी है और अपने
पिता की अमर कीति का अमिट स्मृति चिन्ह । देव सविताः
पायु दंडच (१०.१००.६) यतला रहा है कि यह सविता देव
का भक्त था। धनि, चमुरि मृग अदेवयुओं ने पायु ऋषि को
कष्ट पहुँचाया, ये यातुधान थे, इनके नाश के लिये पायु ने
उसके वंशजों ने रक्षोहा यज्ञ किये (१०.२७.१-२४)। दम सूक्त
मे नियातुधाना इन तीन श्रदेवयुओं की तरफ इसारा कर
रहा है, उनके ग्राम पोड़ी ही के निकट है, उनके नाम है
चमाड़ी, चमराड़, धनक श्रीर मरगदाना । मूलस्थान मे
देववंशियों में और अदेवयु दस्यु जाति आपस मे देवासुर
संग्राम होते ही रहते थे। इस लिये मूलस्थान मे देव और
प्रदेवों की वस्तियां मिलनी चाहिये। ऐसी वस्तियों के नाम
गढ़वाल में मिलते है।
पायु की पौड़ी इदो की इटोसी, कधि की करिस्थलि,
उचण्य का उचाकोट, विश्वापर का वस्यूर, पभि की
रिवाड़ी इत्यादि अनेक ऋपिस्थान गढ़वाल में
१ नांदलम्यु' पट्टीका नाम है। यहां अन्न की
उपज यहुत अच्छी होती है। चमुरि, धनि, मृग इसी
कारण पायर मामतयों को कष्ट पहुंचाते रहे । पायर
मामलेवों की रक्षा' नामक लेख देखो।
यहां पृष्ट
(१२)
पीराण करने की जरूरत नहीं है।
ऋपियों के देश की विशेषता है पंच तीर्थ योर सगम
वत्स काराव कहता है कि पर्वतो की गहरि घाटियों में जहाँ
नदियों का संगम है, वहीं वेदों में प्रविण होकर विनों का
जन्म होता है । पच तीर्थ पच प्रयाग गढवाल की विशेषता है।
इनको कोई अवतक न बदल सका, न मिटा सका । इसलिये
ऋग्वेद में वर्णित नदी, पर्वत, पियों के स्थान, पचतीर्थ और
संगम मूलस्थान को बतलाने में सहायक होते है। केवल
सप्त सरिता या एकादश नदियों को येन केन प्रकारेण पंजाब
मे दिखला कर यह कहना कि पंजान सप्तसिंधु देश है और
आर्य मध्य येशिया से आये भरतवंश के पालकों को भूल
भुलयों में फसाना है।
ऋपियों के देश की दृसरि विशेषता है सोम वनस्पति ।
वे सोमरस पीते थे इसको सभी विद्वान् स्वीकार करते है।
मौजो ऋपि मुजावत पर्वत मे रहता था, उसने स्पष्ट शब्दों
में कहा है कि जो सोम वनस्पति मुंजारत में उत्पन्न होता है
उसका भक्षण शरीर के अंगों मे उसके रस को पहुंचाकर
जागृति उत्पन्न करता है।
सोमस्य मोजवतस्य भक्षों विभीद को जागृविः १०.३४ १।
महाभारत कहता है कि मुजावत पर्वत हिमिगिरि के पृष्ठ पर
है। और उमापपि भगवान वहाँ तपस्या करते है । सोम
हिमाच्छादित पर्वतों की घाटियो ने नहीं उगता है। सिधु
नदि सोम वनस्पति की माता अवश्य है लेकिन अलकनदा
असल में सिंधु हुई है विष्णु प्रयाग से जन उसमे नितभा
बहने लगती है। जहा शीत की अधिक प्रधानता है, वहां
सोग उत्पन्न नहीं होता । इसलिये सोम की मुंमावत पर्वत की
(६३)
पोज यहां करनी पड़ती है, जहां का सोम वैदिक समय में अति
उत्तम माना जाता था। यह भूमि वह है जहां शर्यणावति
नदी, शरणा ग्राम, शर्यणा पर्वत हैं। ये सब चंद्रबुध्न में है।
उसी प्रांत में मंजुला नदी और मंज्यूलि ग्राम भी है। ये
सब देवस्थल पर्वत के उस पक्ष में हैं जिसे इस समय
मोदाइस्यु कहते हैं और, मौदाडि यहां का स्थानि ग्राम
(थानिगांउ) है। ये दोनों शब्द मौजों के संबंधित अपभ्रंश
रूप हैं। संग्रह कर्तायों ने मौजों ऋषि का मौजवान् पि
बना दिया और महाभारत में मुंजावान् पर्वत । ऐसे परिवर्तन
काल देश व्यक्तियों के कारण हुआ ही करते है। मंजुकूला के
स्त्रोत के निकट उमापति का शिव मंदिर भी है जिसका वर्णन
महाभारत में है। शिव मंदिर के कारण साम्प्रति इसे
देवता को डांडो (देवस्थल पर्वत ) कहते हैं। धोतलि
( देवस्थलि) भी यहीं है।
सोम चन्द्रबुध्न ही में नहीं होता, यह सप्त सिंधचों के
शीतोपा घाटियों और पर्वतों में भी होता है। ऋग्वेद के
नवम मंडल में सोम वनस्पति और राजा सोमदेव संबंधि
१गिरिः हिमवतः पृष्ट मुंजायन् नाम पर्वतः ।
तप्यते यत्र भगवान् तपो नित्य उमापति । महा भारत
१८.८.१ वैदिक काल में मंदिर नहीं थे। इस स्थान
में इंद्र का स्मृति चिन्ह था । नदी का नाम मुजापति
था लेकिन उससे गोतम की तृपिक गायों के लिये कूल
निकाल कर पुष्कर बनाया गया तो उसको मंजुएला
कहने लगे।
.
(१४ ) गीत है। ऋचाओं के सग्रह कर्ताओं ने सोम को अधिक महत्व दिया है और पवमान सोम नामकररण करके इसका मडल ही पृथक करने की आवश्यक्ता समझी । हम भी इसी मडल की सहायता से सोम की सप्त मातरों का होना सिद्ध करेंगे। अवत्सार ऋपि कहता है यह सोम जो सूर्य के सदृश चमकता हुआ द्रोण कलपों मे जाने को दौड रहा है वह तो सप्त पर्वतों से आया है, वहा से लाया गया है- अय सूर्य इवोपहग अय सरासि धावति । सप्त प्रवत श्रा दिये । ६५४२ शत वेखान सा कहते है कि हे सप्त सिंधवो । तुम्हारे ही शीर्पो से सोम गमन करता है- तवेमे सप्त सिंधव प्रशिप सोम सिखते।६.६६६ आष्ट भापा मृपि कहता है कि जिस तरह मातायें नर जात शिशु को जानकर धाइयों की सहायता से वढाती है, उसी तरह सप्त ससार सरिताओं के सप्त प्रातों में जन्म धारण करनेवाले सोम वनस्पति के रस को विद्यान् पृश्नि स्त्रियाँ उसकी वृद्धि करती हैं- सप्त स्वसारो अभि मातर. शिशु नवं जज्ञानं जेन्य विपश्चित् । १६६३६ करयप ऋपि कहता है "हे सोम जिस तुझको सप्त नदियों के सटों से लाये है, उसे दी अगुलियों के द्वारा उच्चे तृपला के अपर अवे वारे में मार्जन पर रहे अर्थात् मरोड तरोड कर सोम रस निकाल रहे है- दश स्वधामि अधि सानो अव्ये मुजति त्वा नद्य. सप्त- यही. 1 ६.६२.४ त्रित ऋपिने ही सोम रस छानने के लिये तृपला का निर्माण किया था और इस कारण त्रिन नाम से प्रख्यात हुआ, वह भी कहता है कि सोम को सप्त मातायें जन्म देती है, वह तो सप्तधामों (महाद्वीपों) में भी प्रिय हो गया है, जहां ऋपियों ने यज्ञ का प्रचार क्यिा है और यह शिशु महान् कर्मो को करने का मूल कारण होता है:- फ्राणाः शिशुः महिना, यज्ञस्य सप्त धाममि अध प्रियम्, जज्ञानः सप्त मातरो। १.१०२.१-४ इसलिये सहस्रों ऋपियों का पेय पदार्थ जिस सोम वनस्पति से बनता था, उसका जन्म स्थान चंद्रुवुघ्न, शर्यणावत- पर्वत, मुजावत पर्वत है जो प्रादि काल से प्रसिद्ध है, ये पर्वतीय देश गढ़वाल में है। सोम सप्त सिंधयो के देश में भी होता है। हमारे पूर्वजों ने पंजान को मप्त सिंधयों का देश माना ही नहीं है। जो सप्त सिंधयों का देश है, वह सप्त पर्वतों का त्रिसप्त पर्वतों का भी देश है। पंजार पर्वतीय देश भी नहीं है। यजुर्वेद भी पांच नदियों के देश का वर्णन करता है। यह पंजार ही है- वन नयः मरसतीमपि यति मंत्रीतम सरस्वती पधा सो देशऽयभत् सरिन् । यजु० ३४.११ पंजाय तो पांच नदियों का देश है, और इंदु नदी और मरगति तो उमपी पश्चिमि और पूर्व मीमानों को पतलानी है। पंजार यो मन मरिनाओं के देश होने की कयना करना गलत है। प्राग्वेद मरा समर्थन नहीं पता । इस समय नो भरलाश के प्रयोग यालरों को शपियों के देश का गलत
से तपसा,
( ६६ )
भूगोल और इतिहास पढ़ाया जा रहा है। क्या यह बंद हो
सकेगा?
तीसरी विशेषता ऋपियों के देश की है ऋपियों के वंश
वंशज । वे सामने खड़े हैं, कहते रहते हैं, हमको पहिचानो,
हमारी दीन हीन दशा के कारण हमारी तरफ तो कोई दृष्टिपात
भी नहीं करता क्योंकि देश के गण्यमान्य तो योरपीय कल्पना
को अपनाये हुये है। ऋग्वेद के वाक्य पर ध्यान दो 'तं पाकेन
मनसा पश्यमंति तस्तं माता रीडिह स स रीडिह मातरं ।
अपनी माता को हमको उसी तरह रीड करो।
हमतो शब्द है, सृष्टि रचना के प्रारम्भ में शब्द ही
ऋत, सत्य प्रगट हुये, उसके पश्चात
स्मृष्टि हुई।। शब्द सूत्रों पर ध्यान दो । “तं यदन
ऋतं द्युम्नं सत्यं वदन् सत्यकर्मने श्रद्धया वदन" महान्
महोय माना के महत्वपूर्ण शब्द हैं । इनको वीजमंनों
के रूप मे रीड करो। देयो हम कैसे शब्द है-वर्षमाना-
देवमाना • मनु-मानव; गोदा गोदी-गोधु - गादई - गोद्याल:-
जिप्णु जोप्याणा-जोपि; दभीति-सोभ-डोभाल पथ्यावृपा-पाथ-पंत
पारित कवि-कवतोलि-कवत्यारण; यत-हयालि-हयाल; देवा-
देवराणा - देवरारिण, पायु-पौड़ी-पायय मामतेय ( ममगई);
अश्विनि - असपालम्यु - असवाल, श्वावाश्व-शावलि सावित्री;
शास-शासों-शासनि (इड़ा); रडा--ड़ियाकोट-ड़कोट-इवाल;
जेता-जेतास्थलि जैनोलि-जेतोलस्यु-जैनोला-जैतोलगांऊ मन्यु-
मनकोट - मन्यारी - मनराल - मन्याररयुकुंभज-कुमा युभडि
भीम-भूरि-भरदुलि, भरटुला, सुनंभर-मुदरई-सुदरियाल, वामदेव
वमोलियमोला; बुध-युन-यधान-वधानि; सत्यनां सत्सुङ्गापाल
सति-सोड़ी सतिथपल्याल; यारुणि-बहुज-बडणि इटो-इटोसि
( ६७ ) इदम्बाल, वेनो-वैनोलि विनसरि-विनसर; पेजवन-पजेणा-पनई; मरत-मरः - मरा-महरा • महरः सहसः सहमनाना-साह; स्थौर- स्थरालि-थारु, शैल-शैलपि शैली शैल-शैली शेल्वाल-शिल्मरणा- शलरोट; धरण - धयाडि - धयानि शंयु शंयुकुटी-संगलाकोटी- सगेला; तिरश्ची-तिरश्न्याइंद्र-तिरस्याल; कृष्ण - कृष्ण पर्वत- पृथ्णा (काला डांडा, काला भंडारि, काला ब्राह्मण); च्यवन- चयनाउ - चमनाऊचौहान, परशु-पराशर-परामु-फरामु-परासि- परासि; मौजो-मंजुयूला-मंज्यूलि मंन्याडि सर्व प्रथम इन शब्दों को पाफेन मनसा, ऋतं वदन् गतं धुम्न से रीड करो, उसके फल स्वरूप तर ही स्वमाता वेदमाता को रीड कर सकोगे। तीन विगेपता-पंचतीर्थ, मोम, पि वंशों के साथ साथ युध्न, अश्मयुध्न, अहिर्बुध्न, चंद्रवुन, कचिवुन उचा- युध्न को न भूलोगे तो ममाता के दर्शन अवश्य हो जायेंगे और तब विदित हो जायेगा कि रखमाता ही वेदमाता भी है।
(६८)
गांग, नाभी, कुटि, दारमा मे तीन ही ऋतु होती है ये मतु
है शरद, हेमंत और वसंत ।
शतं जीव शरदो वर्धमानः शतं हेमंतान शतं वसंतान्१ ।
१०.१६१.४।
यह कहने में कोई अतिशयोक्ति नहीं है कि यहाँ शरद
ऋतु मे ही आनंद दायक जीवन व्यतीत होता है, हेमंत ऋतु
में तो वहाँ रहा ही नहीं जा सक्ता और वसंत भी कष्टप्रद
होता है । इसलिये प्रजापति ने शतायुपा के संबंध मे शत
शरदों का ही भोगने का वर्णन किया है।
जव आर्य जाति शीत प्रधान प्रांतों से नीचे के देशों के
निवासि होने लगे तो उन्होंने पांच तुओं को स्वीकार किया
और इसी आधार पर संवत्सरीण तिथि पन का भी जन्म हो
गया जिसको आज दिन भी पंचाग कहते है। सर्व साधारण
भी पांच ही ऋतुओं को मानता है । येक ऋतु को वह हमेशा
चर्तुमास-चौमास ही कहता है और उसके गीत भी गाता है
जिसको प्राम निवासि चौमासा कहते है।
पंचारे चक्रे परिवर्तमाने । १.१६४.१३ पंच पादं पितरं
द्वादशाति । १.१६४.१२ इसलिये द्वादस मास फे पंचपाद
माने गये है।
ऋतुओं को सम बनाने के लिये विद्वानों ने दो दो मास
फी प्रत्येक ऋतु को सूर्य से उत्पन्न हुआ माना और उनसे
यमन्यमल नाम दिया।
पडिन् यमा ऋपयो देयजा इति । १.१६४.१६ ।
।
--
.
तीन ऋतुओं का वर्णन सावित करता है कि विष्णु
लोक बद्रिनाथ, अलोकिक महिमा की भलाता की भूमि,
हिमाच्छादित पर्वत की घाटियाँ सभ्य मानव उत्पत्ति का
स्थान है, न कि पंजाब, मध्य एशिया योरया या उत्तरी ध्र व
देश
नोट-हमारि कन्या जो हाई स्कृल में पढ़ती है, उसने
हमे बतलाया कि पाठ्य पुस्तकों मे तो आर्यों का मध्य ऐशिया
से आना और पंजाब में वसना लिया है और पंजान को
ही मप्तसिंधु देश मानते हैं। तय यह लेख लिखा गया है।
हरीराम धस्माना
बड़ा चांदगंज, लखनऊ।
१ हिमाच्छादित प्रांत में शरद ऋतु छ महिने
की होती है, ज्येष्ट से कार्तिक । हेमंत ऋतु तीन महिने
मार्गशीर्ष, पीप, माघ । संत तीन महिने, फाल्गुन,
चैत्र, वैसाख ॥
( १०० )
* जल्प्या १०.८२.७ *
जिस प्रलयकारी जलवर्पण का शत पथ ब्राह्मण ग्रथ मे
जललावन नाम से वर्णन किया गया है, पुराणों मे प्रलय,
जिन्दावस्ता मे तुपारयुग, योरप मे हिमयुग, चाइवल मे नोश्र
की नाव ओर डेल्यूज, ऋग्वेद मे उस प्राकृतिक घटना को
जलप्या नाम से सम्वोधन किया गया है। इस जलवर्पण से
पेश्तर के समय को प्रथम युग और पूर्व युग कहते है। इसके
पश्चात समय को उत्तर युग (१०७२ १२)। जल्प्या की कथा
वार्ता को ब्रह्मकिल्विप के निवासि भी जानते थे। ब्रह्मजाया
के सम्बन्ध मे जो विवाद हुआ था उसकी उपमा प्रलयकारी
तूफान से दी जाती जो सलिल (जल) और मातरिश्वा (वायु)
वहन से हुआ था और जिसको बुद्धिमानों ने पार किया।
जव सिलसिले से पाठ जलपर्पण हुये और उत्तरी ध्रुव
और दक्षिणि ध्रुव से समुद्र ऊपर को उठे और महान देवलोक
हिमालय पर्वत की भी डूबने की सम्भावना होने लगी तो
श्रानन्दवर्धक साहस के साथ पर्वत श्रेणियों को पर्वतीधारों
को छनकार दिया गया, दिन भिन किया गया ताकि हिमालय
के उत्तर की तरफ जिस जल ने शगीरिया और तृविष्टप को
वालुकार्णव और जलनिमग्न पर दिया था यह जल नदियों के
गर्भो मे समा जावे और दक्षिण की ओर वहे । यह कार्य
६
१ तेऽवदन् प्रथमा ब्रह्मफिलिपेपार सलिलो
मातरिश्वा । १०.१०६.१ ।
(१०१ ) हरिविष्णु की अध्यक्षता में हुआ । जिनका स्थान माना व (माना में है। पर्वत श्रेणियों को जहाँ जहाँ काटा गया था उनको छोना अब भी कहते हैं, इन नीची जगहों को पाल भी कहते है, जैसे धील छीना, वाडे छीना सतेड़ा माल इत्यादि । श्रोपिज कक्षियान तो इन्द्र की प्रशंसा में रहता है "हे मृरनायक हर नीले अश्यों में रमण करने वाले इन्द्र ! सुने तो ६ अर्मरन्य कतरों-काटांट से जलों को संधि करने से रोकार" । यदि पर्वत काटे न जाते तो दोनों तरफ के प्रलय- कारी जल दिमावत की पर्वत श्रेणि पर मिल जाते और माना प्रदेश व यद्रिवन भी जल निमग्न हो जाते और जो सूर्ते १ अद्रिभिदुक्षन्-पर्वतों को छन करके, काट करके पाताय्यम् पृधे गोरभमद्-तूफानी अल बड़े वेग से शब्द करता हुआ गमन करने लगा रहने लगा १.१२१.८ । याताप्यम्न्यात-यापं, तूफान में जल और वायु दोनों थे श्रष्टा महो दिव थादो हरी इह द्युम्नामाइममि योधान उत्म । हरी यो मंदिनं दुचन वृधे गोरममम् यदिभिः थानाप्यम् । योधान उत्मन्येकवत जल से युद्ध किया गया, अद्विमि दुन्-िपर्वतों को काट कर । २ त्वं यूरो हरितो रामयो पृन् भरत चक्रमेतशो- नायमिन्द्र। प्राम्यपारं नाविनव्यानांयषि फर्ममार्तयो- ऽयुज्यन् ॥ १.१२१.३ । नवनिनन्यानां पायक- चाओं में रम्नेमाल हुमा हैनर नतिच पाहिद २.१४.४ नानपतिं पुरो ७.६६. २६.1 "
।
( १०४ )
सहायता देवास देववशियों ने की। वे पशुओं के साथ आये
श्रोड भी अपने साथ लाये और वन के वृक्षों को काटकर
उनके लिये लकडी के मकान पर्णकुटिया चनगाई। ये झोपडे
पर्वा के वक्षस्थलोंढालों में बनाये गये । इसलिये इनको
आजदिन भी गढनाल मे वासली (वक्षरणा) कहते है । अन्छे
सुन्दर जल स्रोत इनके निकट थे। वहाँ जो कपटी मनुष्य थे
उनको मुछेलों (जलती लकड़ियों) से भयभीत करके भगा
दिया गया । शतपथ मे वर्णित भनोससर्पण शब्द भी दर्शाता
है कि मनु को भी उत्तरगिरि मे पर्णकुटी मे शरण मिली,
इनके लिये भी पैसा ही प्रवध हुआ जैसा कि प्रवध भागते हुये
लोगों के लिये पतग के अधीनस्थ अधिकारियों ने किया था।
सधीची कर्मचारी वे थे जो साधारण लोगों के लिये प्रवध
करते थे और विपूची कर्मचारी उनको कहते थे जो श्रेष्टजनों के
लिये विशेष प्रबंध करते थे। ऐसे अधिकारी उपनिवेशों में भी
कार्य करते थे
माना वर्प को जो लोग गये उनके सबध में युद्ध वर्णन
ऋग्वेद में हमको मिला है उस पर प्रकाश डालने का प्रयान
किया जाता है।
चरंत-मागों पर चलने वाले। अनिपधमाना जो बिना
निवास स्थान के थे-पैर रसने को भी जिनको स्थान
नहीं था। मरीचि के वंशज मरीचा-माझ॥
२ देवास आयन् परशुविभ्रन् वना पश्चन्तो अमि
विद्भिः यायन् नि मुद्रवं दधतो वक्षणामु यना कृपीट
मनु तद्दहन्ति ॥ १०.२८.८ विभिः ओहकारीगर
सुद्रवं-सुन्दर जल।
विद्यणुप्रयाग में नीती घाटे से नितमा नदी आकर
अलका विष्णुपदी से सगम करती है। जो लोग वद्रिनाथ की
भूमि को गये इस लिये कि यहा उनको सरण मिलेगी वे एक
ऐसे स्थान पर पहुंचे जहाँ से उन्होंने माना ग्राम को देखा।
उसे देसार उनको प्रसन्नता हुई और प्रलयरूपी समुद्र से
वचने के लिये प्रार्य श्री पुरुपो के युगल जोड़े सीधे घूमधूमाव
के रारतों को त्याग कर अपनी सामर्थ से सिपते हुये तीर
की तरह माना में विद्यमान होने के लिये दौडे। ब्राहाणों के
विष्णु भक्त जोडे जब यहाँ पहुंचे तो उनका किस तरह सत्कार
हुआ और उनसे कैसा बर्ताया किया गया उसका वर्णन
श्रादित्य भूपि के शन्दों मे पिया जाता हे-"ब्रह्मज्ञानी श्राप
वेदन स्त्री पुरुषों के जोडों को हम सबसे पहिले नमस्कार
करते हैं। श्राप पथिकों की दशा में यहाँ पाये है श्राप सब
अमरकीर्ति के पियों के पुत्र हैं, हमारि प्रार्थना को मुनिये,
उसे स्वीकार कीजिये और हमारे दिव्याते धामानि में
ठहरिये। पाटये अपना ही स्थान पर ममझ कर पिराजिये
और हमारी ऐश्वर्य वृद्धि के लिये शुभ आसन पर बैठकर
थकारट दर परिये पाराम करिये स्वस्थ हो जाइये । देव
भक देयों को पाने वाले माना निरामियो ने यम की तरह
माना में पाये हुये इस जसा वर्ग का पालन पोपण किया।"
ये परजना पाचवशो के थे और उनसे साथ चतुष्यद् भी थे।
इनको पाँच ऊँचे स्थानों में जगह दी गई । तब उनसे निवेदन
१अपश्यं ग्रामं वह मानं पारात् अचम्या स्वधया
वर्तमानम् । सिपायर्य प्र युगा जनानां । १०.२७.१६
मानं ग्रामं अपत्यम्-माना ग्राम को देख कर, यह वहन
किया-दौड़े।
( १०२ ) असूत२ वहाँ प्राण रक्षा के लिये इन्द्राविष्णु की शरण में, आये थे उनका भी नाश हो जता । श्रुति-वेदों के ज्ञान और वेदों से अनभिज्ञ असूते असूर दोनों श्रेणियों के लोगों की प्राण रक्षा जल्प्या के भयंकर कोप से कनकाचल के माना में उनको वहाँ आश्रय मिला। हिमलय की नदियों के गर्भो में जल्प्या का जल समा गया था और उन विश्वे देवा-देववंशियों की रक्षा हुई थी जो विष्णु के वद्रिवन में येकतृत हुये थे और जिन्होंने अपने को विष्णु के केन्द्रीय स्थान में उसके आश्रित होकर समर्पित कर दिया था३ । देववंशि ऋपि इत्यादि की जीवन रक्षा भी पर्वतों को छिन्न-भिन्न करने से हुई। जो अन्य लोग भी हिमालय के उच्चे स्थानों तक पहुँच सके वे भी इसी कारण वच सके। २ असूते सूर्ते रजसि निपते ये भूतानि समकरा- पन्नि माने । १०.८२.४ रजसि = चमकनेवाला कनकाचलि हिमालय । भूतानिन्भृतकाल में जन्मे लोग अर्थात् पूर्व युग के । माने समकृरावनआश्रय-शरण प्राप्त हुये माना में । वृतमेने अजनन् नम्नमाने जलवर्पण के समय माना में प्रकट हुये मानो उनका दूसरा जन्म हुआ माना नाम के स्थान में १०.८२.१ । ३ तामिद् गर्भ त्रयं दध्र आपो यत्रदेवाः सम- गच्छंत विवे। अजस्या नाभावध्येकमर्पित १०.८२.६ ।
( १०३ )
केदारखण्ड के अनुसार हिमालय में समुद्र का प्रादुर्भाव
विष्णु प्रयाग मे हुआ अर्थात् दक्षिणी ध्रुव से प्रलयकारी जल
विष्णु प्रयाग तक पहुंच सका । पतंग प्रजापति ऋषि के'
अनुसार भी यही सिद्ध होता है । वही उस समय हिमालय
प्रदेश का प्रजापति रहा होगा। वह कहता है "असुर की
माया से जो जल एकतृत होकर जलाशय सा बन गया था
ज्ञानी-समझदार पुरुषों ने उसे देखकर विचार किया और
उस समुद्र के तट से मरीचियों के स्थान प्रांत को देख कर
वहाँ जाने की इच्छा करके दौड़ पड़े। पतंग ऋपि ने मरीचीनां-
पद वाक्य से स्पष्ट किया है कि जहाँ मरीचि ऋपि।
के वंशज मार्दा रहते है उस देश को लोग भगे। विष्णु प्रयाग
से उपर माना और नीति है जहा मरीची के वंशज आदिकाल
से रहते हैं। जिन लोगों का प्राश्रय स्थान ही नहीं रह गया
था, पास और दूर से आये हुए उन पथिकों को अपने पसुओं
और कुटुम्बीजनों के साथ पतंग ने जब देसा तो, उसने
सत्रीची और विपूची राज कर्मचारियों के द्वारा उनको वसाने
में उनके साथ श्रेष्टवावा किया । इन अभागे लोगों की
१ पतंगभक्त असुरस्य मायया हृदा परयंति मनसा
विक्षिपतः । समुद्र अंतः कवयो विचक्षते मरीचीनां
पदमिच्छंति वैधसः ॥ १०.१७७.१ अपश्यं गोपां अनि-
पद्यमानां पाचपराच पथिमिः चरंत । स सधीचीः स
विचिः व साना ग्रावरिवति भुवनेषुग्रंतः ॥ १०.१७७.
२ । पाचपराचन्नजदीक और दूर से भागे हुये पथिभिः
(शेप पृष्ट १०४ पर)
किया गया कि "आप लोग इन ऊँचे स्थानों को अश्वों पर चढ़कर जाइये, आपके पशु वर्तसे वहाँ जायेगे। इन ब्राह्मण स्त्री पुरुषों के वहाँ रहने से वहॉ सत्यज्ञान का केन्द्र हो गया, चालक पढ़ने लगे और अक्षर वर्ण ककारादि ध्वनी क्रम से पुनः पुनः होने लगी१ " अर्थात् वहाँ पाठशाला की स्थापना माना ग्राम के पड़ोस मे हो गई । इस पाठशाला में सप्त अध्यापक श्रेष्ट मस्त शिशवों को अक्षर ज्ञान इस तरह करा रहे थे जैसा कि पुत्रों से घिरे हुये पिता अपने पुत्रों को सत्यज्ञान का उप- देश करते रहते हैं। इससे मरुत और ब्राह्मण या यों कहिये कि गुरु और शिष्य दोनों वर्गों ने एक दूसरे को प्रकाशमान किया और दोनों एक दूसरे को घोपण करने लगेर कवि ने १युजे वाँ ब्रह्म पूर्ये नमोभिः विश्लोक एतु पथ्येव सूरेः । श्टरावन्तु विश्वे अमृतस्य पुत्रा आये धामानि दिव्यानितस्थु ॥ १०.१३.१ दिव्यानि धमानि श्रेष्ट प्रकाशमा धामों में । यमेव यतमाने यदेतं प्रवांगरन् मानुपा देवयंत । यासीदतं स्वमु लोकं विदाने स्वासस्थे भवंत इन्देव नः ।। पंच पदानिरूपो अन्वरोहं चतुप्पदिमन्वेमि व्रतेन । अक्ष- रेण प्रतिमिम एतां ऋतरय नाभावधि मम्पुवामि व्रतेन- वर्तेनन्चटी हुई रस्सी से चतुप्पदि गायें १०.१३,२।३ २ तरंति शिशवे मरुत्वते पित्रे पुत्रामो अप्य- वीष्टतन् ऋतम् । उभे इदस्योभयस्य राजन उभेयतेते (शेप पृष्ठ १८७ पर) ( १०७ ) यहाँ मन्त्त शब्द का प्रयोग करके यह दर्शाया है कि माना के धन अन्य सम्पन्न कुटुम्यों के बालकों का अध्ययन सबसे प्रथम प्रारम्भ हुअा, और यही अध्यापकों का पोपण करने लगे। इन्द्र के यहां आने पर पाचवंशों के ब्रह्मवेत्तायों की प्रजा की प्रार्थना पर माना की श्रेष्ट भूमि से नृण इत्यादि को श्रम पूर्वक वाहर करके उमी प्रजा के लिये निवासस्थान वन- वाये२, जैसा की पतंग प्रजापति ने भी शरणार्थियों के रहने के लिये प्रबंध किया था। उपर वर्णन किया जा चुका है कि पाठ प्रलयकारी जल उभयम्य पुप्यतः । १०.१३.५ मरुत्वेते-मरुतों की सी तरह शक्ति सम्पन्न । दूसरी और पाँचवीं ऋचायें संकेत कर रही हैं कि वैदिक समय में अक्षर लिपि का निर्माण हो चुका था क्योंकि ऋपि साफ-साफ कह रहा है कि वालकों को अक्षर ज्ञान पहिले कराया गया । कागज का काम देने के लिये माना की भूमि में भुजपत्र होता ही है । उसका इस्तेमाल भोजन पात्र के रूप में भी होता था । यह तो पेड़ की छाला है जिसके कितने ही पर्त कागज जैसे . पतले होते हैं। २ यत् पांचजन्यया विशेन्द्र घोपा असूक्षता अस्तृणाद् वर्हणा विपोर्योमानस्य स क्षयः ।। ८.६३.७ यस्मृणात् वृणहीन करके।
( १०८ ) वर्पण प्राचीनकाल में हुये थे और उनके कारण जो उत्स वन गया था उसको तोड़ने फोड़ने को प्रयत्न सवसे प्रथम हरि विष्णु ने किये । अन्य ऋषियों ने जो वर्णन किया है उससे, भी यही सावित होता है कि यह समस्त पृथ्वी उत्तर दिशा के आठ जलवपणों से और दक्षिण के : जलवर्पणों के कारण जल निमग्न हो गई थी और कही कहीं उच्चे पर्वत शृगों में प्राणियों की रक्षा हुई। हिमालय से उत्तर के प्रदेश विल्कुल डूब गये थे। यह स्वाभाविक था कि यहां के निवासी भी प्राण रक्षा के लिये हिमालय की शरण में आते । दूरदर्शि सप्त ऋपि सवसे प्रथम ऊँचे स्थानों को जब गये तो उस समय जो दशा हो रही थी उसका वर्णन वसुक्र ऋपि ने यों किया है:-जब सप्त ऋपि वीरों के सदृश नीचे स्थानों से निचान देशों से उपर को आये उत्तरोत्तर पाठ वर्पणों का जल येक- तृत हो गया और उच्चे पर्वत के पीछे से यानी दक्षिण से . जल वर्पणों के कारण जल ने दशी दिशाओं में स्थिर स्थिति प्राप्त करली और भोक्ता प्राणि तितर वितर हो गये नष्ट हो गये जीवगण विविध मार्गों से पुकारते हुये चिल्लाते हुये श्राये। इनके दो वर्ग थे—एक जो पकाकर साते थे 'प्रोर दूसरे पकाकर नहीं साते थे अर्थात् मनुष्यों के साथ साथ पशु भी भगे। तव सविता देव (विष्णुदेव) ने आज्ञा दी कि यहाँ पृतमय अन्न इन (शरणार्थियों) के लिये वनवाना चाहिये । पशु तो वृक्षों पर यांचे गये और उनको पूरीपाद् (परसाद हलुवा) दिया? १ सप्त वीरासो अधरात उदायन्टोत्तरात्तात सम- जभिरन्ते । नव पश्चातात स्थिविगंत श्रायन् दश ग्रा- 'सानु वितरंतिने ॥ विक्रौशनासो पिप्पंच थायन् (शेष पृष्ठ १०८ पर) ( १०६ ) गया जिस पर वे ऐसे चिपट पड़े जैसे चिड़ियाँ पड़ती है। यह वर्तावा किया गया इन्द्र और ऋषियों के उपदेश से । उस समय तो विश्व भुवन-समस्त पृथ्वी भयभीत हो रही थी। देववंशि ब्राह्मण ऋपि प्रथम माना में विद्यमान रहे ठहरे । भय से बाण होने पर खस्थ होने पर उपर के स्थानों को गये। जब वह अनुपम पृथिवी तीन तरफ से तप रही थी अर्थात् घाम खून चमक रहा था 'पूरियाँ और दो प्रकार के वृदूक वासणे (च्यूड़ा और सत्सु) चना । उनके समीप वहन किये लाये गये। प्रथम वर्णन किया जा चुका है, ब्रह्म ज्ञानि ब्रह्मणों ने ऊंचे स्थान पर पाठशाला की स्थापना की । वह स्थान सरस्वति स्रोत के उद्गम स्थान के उपर की भूमि ही स्वीकार करनी पड़ती है। पचोतिनेमो यहि पनर्ध । अयं मे देवः- सविता तदाह द्रवन्न इत् वनवद् सपिरत्रः ॥ वृक्षे वृक्षे नियता भीमयद्गोः ततो वयः प्रपतान् पूरुपाद । अथदं विश्वं भुवनं भयात इन्द्राय मुन्वत् पये च शिक्षत् ।। देवानां माने प्रथमा अतिष्ठन् कृत्तचात् एषां उपर उदायन् । नूयः तपति पृथिवी अनूपा द्वावृवूकं बहत पूरीपम् ।। १०.२७.१५-१८-२२-२३. वन-भागे हुये प्राणि, अयः तपति पृथिवी-तीन तरफ धाम और चौथी तरफ छाया, पर्वतों में ऐसा ही होता है पूरुषाद-परसाद- हलया, पृथक-युखणे (ये दोनों शब्द गदाल में अब भी प्रचलित है)
( ११० )
शतप्रभदन ने प्रलयकाल वर्णन इस प्रकार किया है।
देवलोक पृथिवी तम के कारण प्राच्छादित देसकर
महान कर्म सामर्थ्यवान् ने कर्म करने के लिये अपनी इन्द्रियाँ
को वलवान करने के हेतु सोमरस पिया। तब उस सचेता
इन्द्र के चल के पीछे समस्त देव समाज ने अनुगमन किया।
इस तम अन्धकार के समय ही विष्णु ने अपने प्रोजसा अंशों
के सहित मधुर अन्न साथ में रसकर कूच किया, देवों के
साथ श्रायुधों को चमकते हुये मधवा इन्द्र भी पुत्र को नारा
करने को चले । जो जल सागर मानो स्पर्धा कर रहा था उसे
प्रकट रूप से देखकर उस एक वीर इन्द्र ने रण को लक्ष्य करके
अपने पुरुपार्थी अनुगामियों से पर्वतों को कटवा कर शत्र
रूपि सागर को जलधाराओं के रूप में नीचे वहा दिया और
नाकों को विस्तृत रूप से अपनी चतुराई से ऊपर ही थाम
दिया । तमसे घिरे हुये जल शत्रु को काट गिराया और
ध्यान्ततम को भी नष्ट कर दिया। इस प्राणरक्षा के कार्य
से इन्द्र सर्व श्रेष्ठ माना गया था।
*शतप्रभदन-जिसने पर्वतों के सैकड़ो भेदन-छेदन
देखे उसने उनका वर्णन किया ।
नोट-नाक-पर्वतों की धार, नो नाक ,जैसे होते
है दो तरफ ढालुवाँ ।
१ तमस्यः यावा पृथिवी सचेतसा विश्वेभिः देवेऽनु
शुप्मंऽवताम् । यदैत् करावानो महिमानं इंद्रियं पीत्वी
सोमस्य ऋतुमा अवर्धत । कर्म करने को जाने के लिये
(शेष पृष्ठ १११ पर)
( १११ )
इन्द्र ने विष्णु से सहयोग करके दो महान् कार्य किये-
(१)-तम का नाम किया । (२)--जिस प्रचुर जल ने हिमा
लय से उत्तर स्थित देशों को पालुफार्णव बनाया था उसको
मुगा दिया । उसके इन कार्यों से सहस्रों लाखों प्राणियों को
जीवन दाना मिला। इन कार्यों की महिमा ऋपियों के द्वारा
स्वीकार की गई। यही कारण है कि उसकी स्तुतियों में
उसकी वीरता के अन्य कार्यों के साथ इन कार्यों का भी उल्लेख
पाया जाता है:-
(१)-इन्द्रेण युजा तमसा परिवृतं वृहस्पते निःपां
श्रीजो अर्णवृम् २.२३,१८ । इन्द्रने वृहत् पालक विष्णु से
योग करके तम से घिरे हुये शत्रु रूपि महासागर को नीचे
गिरा दिया, नाश कर दिया।
(२) यो धृप्णुना शवसा याधते तम इयतिरेणु वृहत्
अर्हरिप्यरिण । १.५६.४ । शत्रु ओं को धर्पण करने वाले इन्द्र
ने तम और वृहत् वेग से चलते हुये तूफान को बलपूर्वक
हमारे पूर्वज सोमरस पिया करते थे । जज्ञान एक व्यवा-
धत स्पृधः प्रापश्यद् वीरो अमि पोस्यरणम् । अश्वत्
अद्रिय मस्यदः सृजत् स्तभनात्राऊं स्वपस्यया पृथन् ।
तमस्यविष्णुः महिमान श्रोजसाशुं दधन्वान् मधुनो
चिराते । देवेभिःइन्द्रो मधवा सयारभिः पुत्रं जघन्या
अमवद्वरेण्यं ॥ पुत्र-जिसने पृथ्वि को वृत जैमा घेर
रक्खा था। पुत्रंयत् उग्रो व्यहरचन् योजसाध्यो विश्रतं
सममा परिवृतम् । वर्ष तमोजदरसे १९.११३.१-२
--
( ११० ) वध किया। (३)- स्वर्मीहडे यन्मद् इन्द्र हाऽहन नि:अयांअब्जो अर्णवम् । १,५६.५। जबकि सोम के मद में इन्द्र ने अपार जल सागर को अच्छी तरह हिडहिडा के हनन् कर दिया और प्राणियों को हर्पित किया। (४)-प्रवनणा अमिनत् पर्वतानाम अंज समुद्रऽव जग्मुश्राप । १.३१.१-२ । इन्द्र ने पर्वतों की कौरवों को उजाडा तव जल शीघ्रता से उस समुद्र को वह गया (जो विष्णु प्रयाग तक उठ गया था)॥ (५)–स प्राचीनान् पर्वतान् दृहत् प्रोजसा अधरस्थीनम् अकृणोत अपाअप । अधारयत् पृथिवीं विश्वघाय से अस्त- भ्रान भायया द्या अवस्रस। २.१७५। उस इन्द्र ने प्राचीन पर्वतों को उजाडा, जलरूपि शन्न को नीची भूमियों में गिराया। समस्त जगत को पोपण करने वाली पृथिवी को अपने कर्म कौशल से भ्रष्ट होने से रोक दिया थाम दिया। (६)- इन्द्रस्य कर्म सुस्ता पुरुणि ब्रतानि देवा न भिनंति विश्वे । दाधारय प्रथियों द्या उतेमां जजान सूर्य उपसं सुदंशा ३३२८ । जलवर्पणों लगातार होने से सूर्य और उपा नहीं दिग्वलाई दिये-जव इन्द्र ने अधकार का नाश किया तव ये प्रकट हुये ॥ सभी विद्वानों ने स्वीकार किया है तुपार और हिमवृष्टि के कारण इस भूमण्टल के अधिकतर निवासियों का नाश हुआ है। ऋग्वेद में वर्णन है कि पूर्वयुग में अर्थात् जल्प्या से पेरतर की विविध प्रकार की स्रष्टि मृत्यु को प्राप्त हो गई तो अदिति के सप्त पुत्रों के प्रयत्न से यह मातएड पृथिवी । .
( ११३ ) सुन प्रजात्रों से भर गई? १८-७२ । उसी सूझ मे जल प्रलय का वर्णन इस प्रकार है:- गये। जव देवता गनिशील होकर दूर तक फैले हुये सलिल के तट पर अच्छी तरह स्थिरता से विद्यमान थे तो उदाँ तीनरेगु अपने श्राप पावर नृत्य जैसा कर रही थी। जव भुवनानि- भूमियाँ जलयर्पण के जल से पूर्ण हो गई, यहाँ तो समुद्र श्रा गया और प्रकाश देकर पोपण करने वाला सूर्य गुप्त हो गया अर्थात तीनरेणु और अतिवृष्टि के कारण सूर्य के छिपने से अन्धकार हो गया। प्राणि सूर्य प्रकार से भी वंचित हो उसी सूक्त में उन मानव जातियो का भी वर्णन है जिनकी मृत्यु प्राणहारक जल्या काल में हुई । अदिति के परे पश्चाद भोजन करने वाले उत्तानपाद और दक्ष ने जन्म लिया। तर दक्ष की दुहिताओं की उत्पत्ति हुई। उनसे देव- ताओं ने अटूट विधन करके अर्थात् विवाह (देसी १०.८५. १-४७)। करके सुख टोयय से रमण क्यिा । आदिकाल में पाठ वंश और फिर सप्त वंश इस मार्तण्ड भूमि-मृत्यु लोक में १ सप्तभिः पुत्रै अदितिःउप प्रैट पूयं युगम् । प्रजायै मृत्यौत्वत् पुनः मातडं ग्रामरत् । १०.७२.६ मानंद-मरणधर्मा पृथियी। २ यदेवा अदासलिले मुमस्या थतिष्टवा । श्रा वो नृत्यतां इस तीनो रेणुः अपायत । तीघरेणु-मलय कारी सूफान । यदे वायतयो यथा भूनानानि अपिन्वत । असा समुद्रया गूढहमा सूर्य अजमन !!
( ११४ ) दूर दूर तक फैले३ । दक्ष का जन्म अदिति के ठहरने के स्थान में हुआ था४ । दक्षेश्वर-दक्ष का स्मारक कनखल में है। उत्तानपाद के वंश और दक्ष प्रजापति की सृष्टि जल्प्या के समय जलं निमग्न होकर अंत हो गई। वैदिक काल में यम नाम का महापुरुप हुआ है। दुनिया में उसकी ख्याति मनु नाम से अधिक है और उसको मानव जाति का मूल पुरुप होने का श्रेय दिया जाता है। माना में रहने के कारण और माना से ही विष्णु की सहायता और आदेश के अनुसार तीन नदियों के देश में उसने उपनिवेश की रथापना की जो भूमि मानसखण्ड नाम से प्रसिद्ध है । ऋग्वेद में यम के माना में पहुँचना तब हुआ जब जल्प्या का अंत हो चुका और सूर्य अपनी पूर्ण ज्योति से देदिप्यमान दृष्टि- गोचर हो चुका था। कुछ ब्राह्मण स्त्री पुरुप भी ऐसे ही समय आये थे । उमका नाम यम स्वयं संकेत कर रहा है कि यमनोत्तरी प्रांत से माना को वह पाया । यम को यमुना भ्राता भी कहते , ३ भूर्जज्ञ उत्तानपादो भुव आशा अजायत । अदिते दक्षो अजायत दक्षात् अदितिःपरि ॥ अदितिय जनिष्ट दक्षया दुहिता तव । ता देवा अनु अजायंत भद्रा अमृत- वंधवः ॥ १०.७२.६।७३,५ अष्टौ पुत्राणो अदितैर्ये जातास्तन्वस्वरि । ४,दक्षस्य जन्म अदिते उपस्थे । १०.५.७) देवां उपप्रैत सप्तभिः परा मार्तडमास्यत् ।। १०.७२.८ १ यमे इस यत माने यदेतं १०.१३.२ ॥
-यमम्य माता ननाश है। यमुना को कहते हैं सूर्य पुत्री । ऋग्वेद में स्पष्ट किया गर्यो है कि वह यम विवस्वत का पुत्र है। पौराणिकों ने मनु को आसमान में प्रमारामान सूर्य का पुत्र स्वीकार किया है, और मनुवंश को सूर्य वश । यम के साथ उसकी बहिन यमी, उसके माता पिता और उसका कुमार श्राये । यम यमी का सम्बाद सुग्वेद में मौजूद है (१० १०.१ १४) । यम की माता भी नाश होने से पच गई- (१०.१७.२) । यम का पुत्मार-पुर कहता है कि उसके विश्पति पिता यम ने पोरे पुराणों को बनाया और पहिले मूल स्थान को प्राकर उसके पश्चात् अपना शयन घर बनाया। यम के इसी सदन निवास स्थान को देव माना कहते हैं । वेद में यह गुलामा दिया गया है कि यमनोत्तरी से धैवस्वती से मैं वन्धु पाधवी महित माना को पाया और वहीं पोपण होने लगे-रहने लगे३ । क्यों पाये ? मृत्यु से बचने के लिगे, जीवन रक्षा के लियो, अपने कल्याण के लिरो३ । "जियातये, न मृत्यये, अरिएतातये" वाक्य खुलासा कर रहे है कि यम अन्य ऋपियों के सदृश जल्प्या के प्ररोप से भयभीत होर विष्णु की शरण में माणा वर्प को पाया। २ मा नो विश्पति पिता पुराणां अनु वेनते। १०.१३५.१ पुरस्ताद् युघ्न याततः पश्चात् निः अयनं कृतम् । इदं यमस्य सादनं देव मानं यत् उच्यते । १०. १३५.६७ विश्पतिप्रजापति ३ यमात् अहम् चैवम्यतात् सुसंघयोःमन थामरम् । जीनातये न मृत्येमध्यो अरिष्टतावये ॥ १०.६०.१० ( ११६ ) पूर्व युग के ऋषियों का दल भीतो जल्ल्या के विजली इप्यादि के कडक तडक से यह अनुमान करने लगे कि भुन न जावे, उनके रोंगटे खड़े हो गये, शरीर से जलन पदा हो गई तो वे द्रुतगति से चल दिये और उनको देसकर अन्य सूर्ते असूते भी देवलोक में पहुंचे और इन सबको माना मे श्राश्रय-शरण मिली । इस पृथिवी पर दूर देश हैं वहाँ से भी देव असुर इस दूर स्थित देव लोक-विष्णु लोक को आये, अर्थात मानव जाति के सभी कक्षा के लोगों ने शभि देशो के निवासियों ने प्रयत्न किया हिमालय में शरण पाने के लिये । इसी तरह यम भी अपने कुटुम्बी प्रिय जनों सहित, उसके साथ या उसके पीछे अन्य भी आये होगे। इस पृथिवी के अन्य ऊँचे पर्वतों मे भी प्राणियों को आश्रय मिला होगा जहाँ तक प्रलयकारी जल न पहुँच सका हो । एक विद्वान् ने लिखा है कि ग्रीश (गिरीश) के पर्वतो की चोटियों पर प्रलयकाल मे प्राण रक्षा हुई । पूर्वयुग ही मे बताना देवों ने इस भूमण्डल पर आर्य वर्गों की स्थापना कर ली थी लेकिन उन्होंने अपना सम्वध अपने मूल स्थान हिरण्यगर्भ प्रदेश से कभी त्याग नहीं किया। उनका आदर्श था जिसे वे अपना कर्तव्य ही समझते थे कि वृद्धावस्था उसी पर्वतीय देश में हो और वहीं श्रत में मृत्यु हो। १ त प्रायजंत-द्राविणं समस्या ऋषय पूर्व जरितारो न भूना । अमूर्ते सूर्ते रजसि निपने ये भूतानि सम कृरावन्नि माने । १०.८२.४ २ परो दिवा परएना प्रथिन्या परो देवेभिः असुरै- यंदस्ति । २०.८२.५
( ११७ )
माना में यज्ञ
तुपार हिमयुक्त जलवर्पण बहुत लम्बे समय तक रहा,
और इस पृथिवी के चारों कोनों से वृताना पि विष्णु की
शरण मे आगये । ध्रुव प्रदेशों को जो गये उनका वहाँ रहना
असम्भव हो गया था। सभ्य देववंशि सहस्रों की संख्या में
माना मे एकतृत हो गये थे। जब लोगों का भय के मार
मन्दन करना वन्द हो गया, जब सूर्य अन्छि तरह प्रकाश
मान हो गया?, अल्प्या का भय जाता रहा, तव यानन्द
प्रमोद के माथ हिरण्यगर्भ प्रदेश के माणा वर्ष के विवस्वत
के सदन पर यज्ञ हुयाः-
प्राणरक्षा के उपलक्ष मे हिरण्यगर्भ के प्रजापति को
धन्यवाद देने के लिये यज्ञ किया गया। उसमे स्तुति की
गई । १०. १२१॥
क्योंकि माना के निवासियों ने प्रलयरूपि यापतकाल
में ब्राह्मण ऋपि इत्यादि का पोपण किया था उनको भी
प्रशंसायुत वचनों के द्वारा शत्रु पराजयकारी यज्ञाग्नि के
ममन धन्यवाद देते हुये ऋषियों ने कहा "आप माना के पुत्रों
ने म महम्रो ऋपियों को अन्न देकर दीर्घजीरन दिया है,
इसका हमे ज्ञान है । हे शत्रु नाशक अग्ने इन माना निवा-
.
१ यंदरसी अामा तस्थमाने
आम एक्षेताम्
मनमा रेजमान । यत्राधि सूर उदितो विभाति १०.
१२१.६ ।
पूर्व युग के ऋपियों का दल भीतो जल्या के विजली इप्यादि के कडक तडक से यह अनुमान करने लगे कि भुन न जावे, उनके रोंगटे खडे हो गये, शरीर से जलन पदा हो गई तो वे द्रुतगति से चल दिये और उनको देखकर अन्य सूर्ते असूर्ते भी देवलोक में पहुँचे और इन सबको माना मे आश्रय-शरण मिली । इस पृथिवी पर दूर देश हैं वहाँ से भी देव असुर इस दूर स्थित देव लोक-विष्णु लोक को आये, अर्थात मानव जाति के सभी कक्षा के लोगों ने शभि देशो के निवासियों ने प्रयत्न किया हिमालय मे शरण पाने के लिये । इसी तरह यम भी अपने कुटुम्बी प्रिय जनों महित, उसके साथ या उसके पीछे अन्य भी आये होगे। इस प्राथवी के अन्य ऊँचे पर्वतों में भी प्राणियों को प्राश्रय मिला होगा जहाँ तक प्रलयकारी जल न पहुंच सका हो । एक विद्वान् ने लिखा है कि ग्रीश (गिरीश) के पर्वतो की चोटियों पर प्रलयकाल मे प्राण रक्षा हुई। पूर्वयुग हा मे बताना देवों ने इस भूमण्डल पर आर्य वों की स्थापना कर ली थी लेकिन उन्हाने अपना सम्बध अपने मूल स्थान हिरण्यगर्भ प्रदेश से कभी त्याग नहीं किया। उनका आदर्श था जिसे वे अपना कर्तव्य ही समझते थे कि वृद्धावस्था उसी पर्वतीय देश में हों और वहीं अत मे मृत्यु हो। १तु प्रायजंत द्राधिणं समस्या ऋपय पूर्वे जरितारो न भूना ! असूतें सूर्ते रजसि निपने ये भूतानि सम कृरावन्नि माने । १०.८२४ २ परो दिवा परएना पृथिव्या परो देवेभिः असुरै- यंदस्ति । २०.८२.५
( ११८ )
1
बढ़ा रहे थे
सियों के शत्रुओं का पराजय कर२।" यज्ञ में वेदज्ञ ऋपि
जन समूहों के रक्षकों की प्रशंसा करने के अनेक उदाहरण
दिये जा सके हैं ऐसे रक्षकों को अवितारा जनानाम् कहते
थे (१.१८१.१) । वैवस्वत माना में कल्याण होने के कारण
स्वप्न में भी जीवित प्राणि बहुधा कल्याणकारी वैवस्वत मे
अपना कल्याण देखते थे। लोगों का इतना प्रभावित होना
स्वाभाविक था । भद्र वैवस्वते चक्ष वहुन्नाजीवितोमनः । १०.
१६४.२।
इस यज्ञ से सम्बंध रखने वाली ऋचायें वतला रहि है
कि यह यज्ञ एक महान् हर्पोत्सव था, रानियाँ निर्मल स्वच्छ
हो गई थी नक्षत्रों के समूह रात की शोभा
और दिन मे दिनकर भगवान की ज्योति पूर्ण प्रकाश दे रही
थी जिससे निश्चय हो गया था कि प्रलयकारी उल वर्पण का
अंत हो चुका है और साधारण स्थिति हो चुकी है और पुनः
चारों दिशाओं में राज्य व्यवस्था ठीक हो सकती है। इस
कारण इस यज्ञ में विवस्वत सदन में देववंशी आनन्द प्रमोद
कर रहे थे। 1 सभी देव असुर प्रेम से उस देवस्थली मे इधर
२ अवोचाम निवचनानि अस्मीन् मानस्य सुनुः
सहसाने अग्नौ । वयं सहस्र ऋषिभिः सनेम विद्यां इपं ।
घृजनं जीरदानम् ॥ १.१८६.८
३ सूर्ये ज्योतिः अदधुः मासि अक्तूननपरि द्योतनि
।
चरतो अजस्रा।
४ यस्मिन् देवा विदथे गातयंते विवस्वतः सदने
धारयंते । १०.१२.७
( ११६ )
-
उधर घूम रहे थे। सप्त ऋषि भी उसी स्थान में हप-मुस प्राप्त
कर रहे थे जिनका पद प्रतिष्ठा इतनी आदरणीय है कि उनके
परे केवल एक विष्णु-विश्वकर्मा ही वतलाया जाता है,
क्योंकि ये तो आर्य जाति, मानव जाति, के सप्तवंशों को
जन्म देने वाले मूल पुरुप हैं।
हमारे प्राचीनतम वैदिक आदर्श हैं “पविनवंता परतः
पुनन्ता" और "शुद्धा पूता भवत यज्ञियास' मातायें, नारियाँ
इनका सदैव ध्यान रखती थी। इसलिये इस आनन्दोत्सव
यज्ञ में भाग लेने के लिये माताओं ने अपने पूतों को विवस्वत
सदन के निकट सदानीरार और विपासा के संगम-सन्धि
पर शुद्ध किया था। इसका वर्णन ज्यों का त्यों दिया जाता है
वयोंकि ऐसे वर्णन हमारी लाग्गों वर्ष पुरानी सभ्यता को
प्रकाश में लाने में सहायक होते है:-
हमारी याताये जल से शुद्ध करती है, घृत से शरीर
को मलकर पविन करती हैं। देवियाँ शरीर के सभी प्रकार
१ तेपां इप्टाने समिपा मदंति यत्रा सप्त पीन्
पर एकं माहुः । १०.८२.२ । इष्टाने स्थाने ।
२ मदानीरा-जिममें मदाही नीर यहता रहता है।
यह नाम अलकनंदा को शतपथ ने दिया है-सदा
नीरेति उत्तर गिरेः निम्घायति । हिमालय के उत्तरी
भाग को उत्तरगिरि नाम दिया है, यहि शतपथ कहता
है कि मनोरयमपर्य उत्तर गिरि में है जहाँ मनु को
शरण मिलि-माना में शररा पाने से यम मनु बना।
पिपामा-बंधनरहितचाति सरस्वति ।
( १२० ) के मलों को विशेषतौर पर वहाती है । उनका प्रयोजन अपने पूतों को शुचि-स्वच्छ करने का होता है। मातायें शुद्ध करते समय कहती हैं-पय वहाने वाली इस नदी में औषधियों के तुल्य पुष्टिकारक रस वहता है । जलों मे जो पय वह रहा है उस पय से मातायें शुद्ध करती हैं। पय के सदृश हिमालय के अन्तरिक्ष में वहने वाली नदियों में सुफेद फेन होता है। इस कारण कवि ने नदी को पयस्वति कहा है । पौराणिक्त भाषा में ऐसी नदियों को क्षीर- नद्या कहते हैं। वद्रिनाथ में वहने वाली नदियों पयस्वतियों की विशेषता यह है कि उनमें पुष्टि कारक रस वहता है जो प्रौपधिसा होता है। ऐसे जल को पान करना और उसमें स्नान करना शरीर की भीतर वाहरी शुद्धता को उन्नत करता है। जैसे जैसे वद्रिनाथ की नदियाँ नीचे आती है, उनकी विशेषता कम होती जाती हैं । अतः बद्रीनाथ की यात्रा की आवश्यक्ता। शरीरों को शुद्ध करने के पश्चात् हश्व मामूल श्रीमान जैसे प्रकट होने को अन्छे वस्त्र पहिनने की आवश्यकता २ आपो अस्मान् मातरः शुद्धयन्तु घृतेन नो घृतप्व पुनंतु । विश्वं हि रिनं प्राहन्ति देवीः उदीदाम्यः शुचिरा पूत एमि ॥ पयस्वति औषधयः पयस्वन् मामकं वचः । अपां पयस्वत इत् पयः तेनमा सह शुन्धत ।। १०.१७.१०।१४ । मा माता शंनोदैविडभिष्टये श्रापो भवंतु पीतये । शंयोऽभि सवंतु नः । १०.६.४ । थापः पृणीत मेपजं वरुथं तन्वे मम । १०.६.७ ।
( १२१ ) ममझी जाती थी । सुन्न पहिन कर यन मे पधारे१ । तर सब लोगों ने यज्ञ में विद्यमान होने के लिये शीवता की और द्रतगति से चल दिये। पूर्व युग के स्कन्द-सेनानियों ने यज्ञ स्थल को प्रथम प्रयाण किया, उन्हीं के समान सप्त होगा--समयपि भी चल दिये । मार्ग में दर्शक उनको जुहार रहे थे । सरस्वतियाँ-विद्वान् ब्रह्मवेत्ता स्त्रियाँ अरव और पृपमों पर सवार होकर आये। ये देवियों अपते माता पिता गुरजनों सहित श्रासनों पर विराजमान हुये। सरस्वतियों से निवेदन मिया गया कि वे पृद्ध जनों के दक्षिण भाग में बैठे यदि या में भाग लेने के इच्छुक हों। पूजा करने के लिये महलों को अर्घ दिया गया। सरस्वत्तनियों को विशेष सन्मान हुश्रा । देव भगों ने उनकी स्तुति पी, अध्वर्य नै उनको मुफट पहिना पर पादर क्यिा, मुझोति के इच्छुक उनसे प्रार्थना पर रहे थे क्योंकि सरस्वति अपने दाशों को वलपीर्य प्रदान १ युग सुगासा परिवीति प्रागात् । वखारायध पेशनानि चमानो । १०.१.६ । २ टुप्पय स्कन्ध प्रयमा धूनिमं च योनिमनु यश पूर्वः । गमानं योनिमनु संचरंतट्रप्नं जहोम्पनु सप्त होगा ।। १०.१७,११ ( १२२ ) करती है। ऐसा प्रादर सत्कार होता था वेदज्ञ स्त्रियों का। इस यज्ञ में उन युवा युवतियों का भी अमृतबंधन हुआ जिनके आपस में स्वच्छ प्रेम हो गया था अर्थात "तू मेरे लिये, मैं तेरे लिये" । इसके पश्चात् सभी स्त्री पुरुषों को अपने अपने गृहों को लौटने का प्रबंध हुआ। वृद्धों को, नव विवाहिता दपतियों को वाहन दिये गये ।। ३ सरस्वति या सरथं द्यद्याथ स्वधाभिः देवि पितृभिः भदंति । आ सद्य अस्मिन् वहिर्पि मादयस्व अनमिवाइप आ धेहि अस्मे ॥ सरस्वति यां पितरो हनते दक्षिणा यज्ञभिः नक्षमाणाः । सहस्रार्ध इडो अत्र मागं रायस्पोपं यजमानेषु धेहि ॥ सरस्वति देव- यंन्तो हवन्ते सरस्वति अधरे तायमाने । सरस्वतिं सुकृतो अहृयंत सरस्वती दातुपे वार्य दात् ॥ १०.१७. ७६ तायमानेन्ताजमाने नक्षमाणा-चित्र-विधित्र ।
( १२३ )
* वृष्टियज्ञ १०.६८.१-१२ *
पूर्व काल में जब वर्षा कम होती थी या नहीं होती थी
"जिससे अन्नोत्पत्ति में कमि पड़ जाती थी, प्रजा को कष्ट होने
लगता, विभुक्षितों की हाय रोटी, हाय रोटी की गगनभेदी
भागाज उठवि रहती थी, विद्वान् लोग कहते रहते थे "विभु.
क्षितं किं न करोति पाएं" के कारण चोरी डाकाजनी, मारकाट
के नाना उपद्रव, पाप अपराधों की वृद्धि होती जायगी यदि
"नराणांच नराधिप" शीघ्र ही दृष्टि यन्त नहीं करते।
१ इससे यह नतीजा निकालना गलत होगा कि
पूर्वकाल में कूल, नहरे, कुये इत्यादि सिंचाई के साधनों
का अभाव था । वैदिक समय में तो पशुयों के चारा-
गाहों में भी निकटवर्ति जलस्रोतों से मरुत सेना कूल
निकालती थी, पुप्फर, जलकुंड बनाती थी । गौतम की
सहस्रों धेनुओं को इसी तरह जल प्राप्त होता था ।
इसकी कथा ऋग्वेदिक इतिहास में दी गई है। वर्तमान
ममय में स्व सरकार भी तो नहर, टैम, तालाब, कूप
इत्यादि बनाकर अधिक अन्न उपजाने का प्रयत्न विविध
प्रकार से करके प्रजा का हित कर रही है। लेकिन
यदि दो चार साल लगातार जलर्पण न हो तो, नहर
कुंड इत्यादि में पानी कम हो जायगा, धरती मग्न
जायगी, इतने महान् प्रयत्न निष्फल से दृष्टि गोचर
(शेप पृष्ट १२४ पर)
,
( १२४)
एक समय राजा शतनु के राज्य में अनावृष्टि के कारण
अन मे कमी हो गई, राजा के अन्न के भडार खाली हो गये,
प्रजा में हाहाकार होने लगा, राजा की निंदा होने लगी।
वेदज्ञ विनों से सलाह ली गई। उन्होंने वहा, राजा का
सर्वोपरि कर्तव्य है कि यह प्रना की उदरपूर्ति के लिये सफलता
पूर्व प्रयत्न करता रहे, वर्ना वह यशस्वी नहीं हो सस्ता।
यदि यह यशस्वी होने की परवाह नहीं करता है
तो प्रजा मे असतोप फैलेगा । प्रजा ही के युवा वीर मरुत
सेना में भरती रहते है, वे न तो राज भक रहेंगे और न
राज्य मे शाति कायम रहेगी। दमाा दुसद, दुप्परिणाम
यही होता है कि ऐसा अयोग्य कुनाम प्राप्त राजा पदच्युत
किया जाता है। अत, मावास्य भी मरुत सेना की प्रशंसा
मे कहता है "तुमतो यजशील पुरुष को प्रजा के हित के लिये
राना बनाते हो।" आजगति कहता है - "जो व्यक्ति
प्रजाजनों की उदरपूर्ति के लिये, सुधा शाति के लिये असीम
चकर लगाकर यश प्राप्त कर सस्ता है, मानव समाज में से
होने लगेंगे। आजकल विद्वान् लोग नकली उपायो
से वर्षा वर्षाने के अनुभव प्राप्त कर रहे हैं, लेकिन
ये बहुत अधिक सर्चीले है । नुमाइस के से मनो-
रंजन के तमागे जैसे इस समय दीख रहे हैं।
२ दम ममय भि सेना के बल से इजिप्ट का नर
नायक (बादशाह) पदच्युत दिया गया है और जनरल
नजीर शामन चक्र चला रहे हैं। युयं गजानं इसे
जनाय विभतष्ट जन यथा यजना ५.५८.४
( १२५ ) वही मननशील घरण होकर राजा वरुण का पद ग्रहण करने के योग्य होता है। . तब वेदज्ञों की शुभ सम्मति के अनुमार वृष्टि यज्ञ करने का निर्णय हुश्रा और येक राजदूत वेद के पूर्ण ज्ञाता ऋषियों के पास देव लोक मानाचर्प को भेजा.गया । वहाँ से देवापि ने यज्ञ के वृहस्पति का पद ग्रहण करके यज्ञ करने के लिये प्रस्थान किया । उधर शंतनु की राजधानी में अक्षसेना, मम्त- सेना गणपति गणेषु की अध्यकृता में विस्तृत यज्ञ का प्रबंध करने लगे। गणपति गणेषु स्वयं विप्रतम कवि होते थे और बिना इनकी विद्यमानता के कोई भी शुभ कार्य निर्विन ममान होना कठिन होता थार। १०.११२.६ । इस महान् अवशरों पर जो प्रबंध किया गया थाउसका वर्णन किया जाता है। १ उत यो मानुषेप्या यशः चक्रे थसाम्या । अस्माकं उदरेया । १.२५.१५. असाम्या चकेअसंख्य चार लगाकर असंख्य प्रयत्न करके यशस्वी होता है। २ वैदिक ममय के गणपति को कहते थे 'विप्रतम कविनाम् .। इनका पद इनस्पेक्टर जनरल पुलिश या फीज का फांदर का मा था । इनका नाम बतलाता है किये मिपाहियों के अपहार थे। प्रत्येक कार्य में इनका पड़ा भादर होता था। याचना करने वाले लोगों से ये मरपामार दर्शाना जानने थे, रग मुगल थे (१०. ११२.६१०)।
( १२६ ) देवापि का स्वागत जब यज्ञ की तैयारि पूर्णरूप से हो चुकी, राजा प्रजा देवापि के आगमन का मार्ग देख रहे थे। देवापि के पहुंचने पर, शंतनु ने देवापि का स्वागत करते हुये निवेदन किया "हे देव दूत युवा? जैसे देवापि मेरे यज्ञ मे पधार कर संसार को चकित करने वाले ज्ञानवल से, इस वृष्टि यज्ञ की चौकसी कीजिये। सव वाह्य विपयों से विमुख होकर, मेरे हित के या कार्य में निमग्न हो जाइये । अपने श्रासन पर विराजिये, अपनी कांतियुक्त वेद वाणियां मुझे प्रदान कीजिये"। शंतनु ने पुनः निवेदन किया-इस यज्ञ में तेरे दर्शनार्थ सहस्रों रथों पर सवार होकर रोहिदाश्व देश के स्त्री पुरुप आये हैं इस इच्छा से कि वे तेरे मुखारविंद से यज्ञ मे वैदिक ऋचाओं का मधुसूद् प्रवचन श्रवण करें । तुझको तो पूर्व काल के ऋषियों की वेद वाणियां आती हैं, सभी अध्वर्यु तुझ वार वार पुकारते हैं, तुझसे सहायता लेते हैं जिससे यज्ञ कर्म सफलता पूर्वक होता रहता है। १०.६८.२।। यज्ञ देश का निरीक्षण क्योंकि यज्ञ का वृहद् भार देवापि पर था, जैसा कि - १ शंतनु ने देवापि को अजिर (अजीर्ण युवा) इसलिये कहा गया है कि उसके शुद्ध पवित्र और इंदिय- जित होने से वह युवा जैसा दिखाई दे रहा था, ब्रह्म- वर्चस उसके चेहरे से टपक रहा था। तब उसने मज्ञ के होतारों का चुनाव किया।
( १२७ ) येक महान साम्राज्य के अधिपति बृहस्पति पर होता है, उसने या देश का निरीक्षण किया। उसने देसा कि प्रत्येक यज्ञ कुंड की परिधि में सप्त वेदज्ञों के लिये सप्त ग्रासन विछे हुये हैं, तृमप्त समिधा सग्रहीत है। सोमरस से और घृत से श्राहुतियों देने के लिये सोम और घृत से भरे पऱ्या या मटके मौजूद हैं। चमसों की आवश्यक संख्या है। यज्ञ स्थल मे पाने जाने के पथ मुगम है। देवीद्वारों की संख्या पर्याप्त है। अष्ट दिशाओं के अष्टद्वार खूब चौड़े है । रोहिदाश्वी इत्यादि देशों से आये हुये दर्शकों के उपरथान मुग्नप्रद है। उनके रयों, अश्यों, वृपभों के लिये अस्त, प्राम, रातत्र्य, जल चा प्रबंध ठीक है। देवापि ने तर भोजनालय की दिव्य भूमि की तरफ पदार्पण किया उसने यहाँ देगा कि ऋत का योगा करने पाले मुजाता नि पुरुषों ने यलपर्भक अन्न संग्रह कर रक्या है। मधु, घृत, नाना प्रकार के साद्य पदार्थों के बड़े-बड़े देरों की वृद्धि हो रही है। शंतनु के देश के स्वयंसेवक जैसे नी पुरुप इस कार्य में महायना दे रहे हैं। अपने घरों से भी मधुर अन्न उन्होंने यहाँ जमा कर रक्या था । तर दयापि ने अतिथि उप गृहों को देगा । यहाँ नियों का ही प्रयंध था। ये वियों सा स्यश्री से शोभायमान, मुपेशा, मधुर मापिणि, विद्वान उजभारा, दर्शनीय थी। प्रबंध यी नारियों पहद गृहम्नों पी चमुकपर्दा, मुशा, पुन प्रतीरा युवतियों थी १ नम्य ही पतनय मुजाता इपो वजाय प्रदिव मर्गत । अधिनाम रोदगि पारमाने पृनं, अनः वा पृधाने मधूनाम् ।। १०.५.४ ।।
( १२८ ) इसके येक किनारे यम नियम से ववरी भूसे प्यासों की इन्छापूति पालन पोषण हो रहा था। इससे ऐसा विदित हो रहा था कि स्त्रियाँ ही पूर्ण राजसि ठाठ वाट से राज्य कर रही है। उन्होंने विभूक्षितों की मागों को पूर्ण करने मे रोप का प्रदर्शन विलकुल नहीं किया। शात चित्त से सव कार्य हो रहा था। इन वत्रियों को कोई नहीं पहिचानता था कि ये कौन है, कहाँ से पाये, और कहाँ जायेंगे। अतरिक्ष से विविध पदार्थ लाकर वारियों की क्षुधा तृष्णा पूर्ण हो रही थी। इनकी तरफ विशेष ध्यान दिया जाता था ताकि देश देशातरों में घूमते हुये ये पनि शतनु का पदनाम न करें। यह येक दृश्य धा, इष्टापूर्ति यज्ञ का । इसके पश्चात् देवापि यह देखने लगा, यज्ञ मे आने वालों से होतार कैसा व्यवहार कर रहे है। ऋतायिनी मायिनी स्त्रियों अपने शिशुओं सहित, पतियों के सग यज्ञ स्थल में पहुँच रहे थे तो होतार कहते जाते थे "पन्निवतों नमस्य १ सप्त स्वश्री अरुपि वानसानो विहान् मघ उज- भारा दृशके । अंतः यमे अंतरिक्षे पुराजा इच्छन् पनि अविदत् पूपणस्य । १०.५.५ । सप्त स्वश्री मधुर भाषण, घृत प्रतीका, सुवासा सुवेशा, विद्वान्, उअमारा, चतुप्क- पर्दा और दृशेकं । ये सप्त स्वश्री कहलाती है । उज- मारा उमड़े हुये स्तन, दृशेकदेखने में येक ही। वनिचयरे में रहनेगला (ग०)। यह चा पतला रही है कि प्रानंद उत्सवों में नारी समाज कैसे उत्साह से कार्य करती थी।
( १ )
नमस्य"
1 इस यज्ञ में पाइये, भाप तो अपने पासन से
परिचित हैं। (यज्ञ में तीन श्रेणि की स्त्रियां जाति थी-भारति,
इडा और सरस्वति)२ | प्रासनों की तीन पतियाँ चिह्नित थी।
पाराशर इन दपतियों की प्रशसा मे कहता है कि ये पति
पनियाँ ऐसे ससा ससी थे कि एक दूसरे की रक्षा करने में
प्रत्येक निमिप सदा ही अपने तन्व को परित्याग करने को
भी तत्पर रहते थे।
यहाँ भवध देसने के पश्चात् देवापि, गणपति, श्रीर
शंतनु पे आपस में गुम वार्तालाप हुया। वय वे प्रष्ट पथों, प्रष्ट
द्वारा को देखने गये,जहाँ श्रम सेना के अनुभवि गुमचर अफरार
नियुक्त थे। पथो उभय पक्ष मे स्तभो की कतार शोमा दे
२ भूतायिनी मायिनी सं दधाते मित्वा शिशु
यज्ञतुः वर्धयति । १०.५.३ । प्रतायिनीऋत व्यवहार
करनेवाली । मायिनी प्रेमपूर्ण ।
सं जानाना उप सीदनभिन्नु पतितो नमस्यं
नमस्यन् । रिरिफायः तत्वः कृपत स्वाः सखा ससुः
निमिपि रखमापा । १.३२.५ ।
इमं नो यज्ञ श्रागमन तिस्त्रो देवी सुपेरास ।
५.८ । सुपेसश-मुंदर पोशाक से गोमायमान् ।
नमोपासा मुपेशसा अस्मीन या उप हये । इदं नो
पहिं थामदे। १.१३७ १ पलियाँ अपने पति के साथ
या में जाती थी जसे राठ के पीछे पीछे उपा जाती
रहती है।
। ( १३० ) रही थी । द्वारों में यह प्रबंध था कि हूर यज्ञ भूमि के भीतर पदार्पण न कर सकें। तव देवापि ने गणपति से कहा-आप तो रक्षमाणा है, कृपा दृष्टि से देखते रहिये, आप तो वसुपति भी है, सव से सखाभाव से वर्तावा करते हुये सवको सखा वनाते रहोगे तोरण करने की आवश्यकता न होगी। हमे यही श्राशा है। यह यज्ञ निर्विघ्न समाप्त होगा। सर्व गण स्वस्ति होती रहेगी। तव देवापि यज्ञ प्रदेश के मध्य भाग मे गया, जहाँ चंगो नृत्य संगीत का महीप्रत चित्र विचित्र, विविध रंग के केतुओं से जगमग जगमग कर रहा था और केतुओं का फर- फराहट मानो श्रानंद हर्ष की सूचना का चिन्ह था। तव इस वृष्टि यज्ञ का यजमान शंतनु यज्ञ के बृहस्पति को अप्नानाना तीर्थ को ले गया । जो सोम वनस्पति मुंजा- चत पर्वत, शर्यणा पर्वत, घस्रा और पुरिप्णि की तटवर्ति भूमि से नदियों मे वहान करके हरद्वार से घीडो मे गाड़ियों में पृपति अश्यों मे वहाँ पहुँचि थी, उसका निरीक्षण किया। अवत्सार पि ने सोम वनस्पति पटवाकर घस्रा और पुरुपंति में तीन तीन सौ तनों के सहस्रों वोमों का बहान कराया था। अमित देवल ने जो वनस्पति भेजी थी, वह पीले रंग की और हरे रंग की दो प्रकार की थी और उससे १ ध्वस्रयो पुरुपंत्योरा सहस्राणि दद्महे । तरत्म मंदी धारति । २ आ ययोः निशतं तना महस्राणि दद्महे । तरत्स मदी धारति । ६.५८.३।४ । - ( १३१) जो रस निकलता था वह तीन तीक्षण था। उसमें मधु अधिक मिलाना पड़ता था। इस वनस्पति के सहस्रों वल्श थे। श्रवत्सार ने वामे बनाकर वहन कराया था लेकिन देवल ने वनस्पति के बड़े बड़े पेड़ों को काटकार सिंधु में तैराया। वनस्पति कहीं-कहीं भौरो में भी फंस गई थी। "अानंद को ' दपकाने याला सोम विपन मे सिंधु की लहरों में सदन वना कर निवास कर रहा है। सोम का फंस जाना यह वाक्य ३ वनस्पति पवमान मध्वा समंग्धि धारया । सहसरल्शं हरितं भ्राजमानं हिरण्ययं । ६.५.१० । वरत् स मंदी धारतियह सोम वनस्पति मंदी चाल से, पानंद से नदी में तैरती हुई धागे धापन कर रही थी। महम्रपत्रांमहसों-यदुत मासों वाली, भ्राजमान- तेज, तीनवा रखनेवाली हिरण्ययं-पीले रंग की, हरितदी। ४ मदच्युत इंति सादने निधो उर्मा विपश्चित् । ६.१२.३। मदच्युतानंद को जुवाना, क्षेति-निवाम करता है, मादनेबादन, विपश्चितमिधु के दोनों पार्स में विपन-चन था, ऐमा था वह स्थान जहाँ मोम बनम्पति जल भ्रमर में फंस गई थी और मिंधु की उमियो से रेंग रही थी।
( १३४ )
इस तरह किया मानो फुल जिम्मेवरी की शक्ति को उसने
धारण कर रखा था। देव के श्रवण करने योग्य वृष्टि बनाने
की ऋचाओं की ध्वनि की रणरणाहट से वाचा वृहस्पति
हमारी इच्छाओं को पूर्ण करे । हे अग्ने ! जव शुशुचान अर्टि
घेण२ देवापि मानव समाज के हित के लिये तुझे प्रज्वलित
करता है, समस्त विश्व के आनदमय देव मेघों के द्वारा वर्षा
को वाते हैं। १० १८७८ । हे अग्ने । ६० सहस्र आहुतियाँ
वर्षा करने वाले इद्र के भोग के लिये प्रानद से दी गई है।
वृष्टिदेव के आने के पथों के विद्वान प्रार्थना मे कहते है कि
प्रत्येक ऋतु मे आकाश को जलरण युक्त मेघ धारण करे।
१०.६८१२।
१० सहस्र आहुतियों के होने पर भी वर्षा नहीं हुई।
यह देखकर अटिपेण देवापि ने सुमति सम्पन्न यज्ञ करने वाले
देव देवियों को सचेत चौकन्ना करके उपदेश दिया कि निष्टा
वान् होकर ६६ हजार (असंख्य) आहुतियाँ अग्निदेव को
समर्पण की जाय । ये पाहुतियाँ निष्ठा से दी जाने लगी
तो शूर जैसे शत्रुओं का नाश करते है, उन दोषों का नाश
हो गया जो वर्षा के वाधक थे। इसका फल यह हुआ कि
उत्तरी और दक्षिण समुद्रों से जल आकाश में पहुँच कर
वृष्टि होने लगी । वृहत् आकाश में मनुष्यो पे उपकार के लिये
जल वर्पण वडी तीनता से होकर भूमियाँ तर पातर होकर
भुमियों में जो जल कु ड सूप गये थे उनसे भी पानी प्राप्त
होने लगा। १०.१८॥१०॥१२ । भागे जो कुछ हुआ पाठन
स्वयं अनुमान कर सकते हैं।
२ शुशुचान-जिसका चेहरा शीशा जैसा चमक
रहा था, यष्टिपेण-इंद्रीयजित, ब्रह्मचारी।
{ १३५ ) चंयो रातकाल में प्रत्येक दिवस रिंग डान्श१ प्रत्येक ऋषि माम में होता ही था। शंतनु देश में भी इस आनंदमय अवशर पर चंवों प्रायोजन बड़े पैमाने पर किया गया । चंचो के स्थानों में शामियाने तनेर हये थे। अप्नाना तीर्थ के नीकट ही, मोमरम पान करके देव मनुप्य मरतों की इति- जारी कर रहे थे। ये लाल पोशाक पहिन कर अपने प्रायुधों को चमकाते हुये चंवों के महीयत मे क्रीडा करते थे। श्राज दिन योरप में वो Round the Table होता है, इदुदेश मे Round the Fire होता था। चम्बो को अनवाणं रथ भी कहते थे। इसमे दो दल होते थे३ । राजा तो प्रजा के संग क्रिड़ा करने में नहीं हिचकिचाते थे। कहीं अश्विनो भी चंयो क्रीड़ा कर रहे थे। यहाँ उस चम्बो दृश्य का भी वर्णन किया जाता है, जिसकी योजना इंद्र के शरीर रक्षकोने, डोली १ जिसमें रेंगते हुये, पैर की आहट से दन दन करते हुये दो दल गीत हुये नृत्य करते हैं। अंग्रेजी के रिंग और डान्श शब्दो को हमारे ही रेंगना और दन दन या दनदनाहट शब्दों ने जन्म दिया । २ तनना शब्द से Tent शब्द की उत्पत्ति हुई। ३ अनवीणं रथं १.३७.१, क्रीडं चंचो विश पूय- मान इंद्र ६.६६.२१, यत् क्रीड़त मस्त ऋष्टिमंत । ये पृपतिमि पि मि साक वासिमि रजिमि १.३७.२ । संवृत्तः धृष्णु उक्यां महीपूवं मदं । ६.४८.२ ॥ +-
( १३२ )
सावित कर रहा है। वनस्पत्ति के ढेर को देखने के पश्चात्
यजमान और पुरोहित उस स्थान को गये जहाँ युवतियाँ
तृपाल के पास हरे सोम को पत्थरों से कूट रहे थे और हिन
हिन का सा शब्द हो रहा था। वहीं तृपला मे रखकर
अभिपुत हो रहा था । कुत्र युनतियों अपने दोनों हस्तों की दश
श्रगुलियों से कूटे हुये हरे सोम को रम निकालने को मरोड़
रही थीं। और साथ ही आनद प्राप्ति के गीत शुभमाना
स्त्रियाँ गा रही थी।
वहीं ऋतायु शुभमाना युगतियाँ भेड़ की ऊन के धर्म
पर बैठकर अपनी हतेलियों से सोम के गूदे को मरोड कर
छान रहे थे। वहीं उसलों मे सोम का गूदा बूटा जा रहा था ।
१२८१४ । हजारो घडे सोम रस से भरे यहाँ मौजूद थे।
विप्र भोज
यज्ञ के कार्य कर्ता अग्निसपि, पिवित्र, होतार इत्यादि
को नाना प्रकार के भोजन पदार्थ दिये गये थे, उस समय
१ एतं त्रितस्य योपणा हरि हिन्नति अद्रिभिः ।
त्रितस्य 'योपणा-उपा के युवतियों तृपला के पास
थी, कुछ तो कूट रही थीं और कूटे हुये मो हपाल पर
रख रही थी।
२ एवं त्यं हरितो दश मर्मज्यंते थपस्व । यामि
मदाय शुभते । ६.३६.२।३।
३ शुभमाना ऋतायुभिः मृज्यमाना गमस्त्यो ।
पते पार अव्ययं । ६.६४.५ ।। शुभमानान्देखने में
मुंदर, तायु-ऋतु प्राप्त युपतियों ।
( १३३ )
निन दो मचाओं का प्रवचन दृश्रा था उनका अनुवाद निम्न
लिग्पित है -हे वृहस्पते । इन दोप रहित शुद्ध विविध प्रकार
के भोजन पदार्थ, पेय पदार्थों को भोग करने वाले हम वेदन
विनों की याचा-याणि इस यज्ञ में विशुन् सदृश हो, जिसमे
शतनु की भूमि मे वृष्टि वन जाने के लिये आपाश से मधुर
जल वर्पण हो । जर देयापि सहित समस्त विटन मडली
हविपा ग्रहण करने को ये तो प्रार्थना की गई हे इद्र । हमे
मधुर वर्मा की सहस्रों जल धारायें प्राप्त होकर इस देश की
भूमि में प्रवेश करे । यहाँ के होतार श्रामन उमाकर दृढ चित्त
ऋतुओं के अनुसार यज्ञ करते रहें। (१०.६८ श४) इन
ऋगानों का प्रवचन होने के पश्चात् भोजन किया गया।
मंगल स्नान
यन कर्म को करने के पेश्तर हो, यतमान शतनु को देन
देवियों ने स्नान कराया। इस ममय जिन ऋचाश्ना का प्राचन
हो रहा था, उनम से येक मचा का अनुवाद यहाँ दिया जाता
है । हे विद्वान् देय देविया ! यनमान को स्वय स्नान यनन
रामो, अप्रचेता-अविद्वान् इस पाय पवित्र यन को कैसे कर
म हैं ? श्रर्यान् यनमान मे पवित्रता कैसे ला साते हैं।
जिस तरह देव देवियाँ ऋतु के अनुसार स्नान करती है, सी
तरह इस मुनाता यजमान के तन्य को मगल स्नान से पार
करो। १०७.६।
यज्ञ
यज्ञ भूमि में देव देवी होतारों का वृत मा लगा हुश्रा
दिपलाई दे रहा था जो यज्ञाहुती दे रहे थे। उनके वीच
शंतनु ये पुरोहित देवापि ने कृपा पूर्वक यन कर्म करना प्रारम
१ देवा देवी यनतां यजियां इह । १०.१०१.६ ।
।
वहन करने वालों ने और पार्षदों में की थी। उनका अस्ली
अभिप्राय यह दिखलाने का था कि उनकी लाल पोशाक फट
गई है राष्ट्र केतु भी उनके पास नहीं है और वे चंयो में
सोमरस पीकर अपनी तृष्णा को पूर्ण करेंगे। इंद्र से निवेदन
किया गया चंवो में शरीक होने को। इद्र के ये सव सेवक
चंवो के स्थान में विद्यमान में । मधुचंदा ने इम चंवो नृत्य
कर वर्णन यों किया है "वहाँ बैठे हुये लोगों ने नियम पूर्वक ।
परिचरण करने के लिये मुस्कराते हुये योजना बनाई और
अग्नि को ऐमा प्रज्वलित किया कि प्रकाश उस समस्त दिव्य
भूमि में फैल गया। सोम पान करने की कामना वालों के
दो दल चंचो के रथ में जुड़ गये । ये थे लालकुर्तिवाले सेवक
जो धृष्णु इंद्र को वहन करते थे। इसका फल यह हुआ जिन
मर्या-मरतो के पोशाक नहीं थी उनको पोशाक मिल गई,
जिनके पास केतु नहीं थे उनको केतु प्राप्त हो गये और वे
सब सप्तरंग की उपा के सदृश प्रकट होकर चमकने लगे।
शत जीव शरदः वर्धमानः ।।
ॐ इति
कंठ करिये
३
१ ऋतस्य ही वर्तनय सुजाता।
२ मत मर्यादाः कवयः ततनु तामां येकां इत् अभ्यं ,
हुरो गात् ।
श्ताय सप्त दधिपे पदानि जनयन् मित्रं नन्द
रका।
ऋत
वास्येच सत्येन श्रद्धया तपमा मुत।
५ , ऋतं वदन् ऋतं द्युम्नं सत्यं वदन् सत्य कर्मन् ।
श्रद्धा वदन् सोम राजन् ।
६ मा देवानां अपि पंथां अगन्म,
यत् गानवाम तदनु प्रयोहम् ।
७ अदेययन् गमरणे जयन्वान् ।
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BHAVAN'S LIBRARY, BOMBAY-7
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