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संस्कृतप्रबोधः प्रथमो भागः

Sharmaa Badariidatt · 2006/03/08

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मुद्रणाधिकाराः स्वायत्ताः Valeraorderalorealerat rior 0 TOTOXICO भोइन संस्कृतप्रबोधः तत्रायम् प्रथमोभागः ३१ बदरीदत्त शर्मणाः संस्कृतभाषापरिचयेसूनाम् नकालय उपकाराय प्रतिभाषय C6/२ 1.IE raitsel 17 SANSKRIT PRARAD Or Sanskrit Grammar PART I. Sorebraleraoraorabjeerabad by P. Badari Datt Sharma. por medio de done SWAMI (MACHINE) PRESS MEERUT प्रथमाधत्ती १००० मूल्यम् =) * लयबाबयरलायन hin ओ३म् भूमिका संस्कृत व्याकरण का विषय महान् है, उस को जत- लाने के लिये संस्कृत में अनेक ग्रन्थ एक से एक उत्तम और विशद विद्यमान हैं, परन्तु दैवदुर्विपाक से वा समय के प्रभाव से संस्कृत का प्रचार लुप्त हो जाने से सर्वसाधारण उन से यथेष्ट लाभ नहीं उठा सकते। हिन्दी भाषा में भी, जिस का प्रचार आजकल हमारे देश में सर्वत्र अधिकता से है, संस्कृतव्याकरण के विषय में आज तक कई पुस्तक बन चुके हैं, जिन में से अधिक- तर तो सन्धि और विभक्ति तक ही समाप्त हो जाते हैं । यदि किसी ने साहस करके समास, आख्यात,तद्वित और कृदन्त जैसे व्याकरण के गम्भीर विषयों पर कुछ लिखा भी तो वह क्षुधित को पूर्ण के समान होता है, जिस से उस की भूख और भी प्रचण्ड हो जाती है। किसी २ ने अष्टाध्यायी और कौमुदी आदि ग्रन्थों के अनुवाद भी किये हैं, परन्तु उन के भी क्लिष्ट एवं भाषा प्रणाली के प्रतिकूल होने से भाषा जानने वालों के लिये व्याकरण का मार्ग वैसा ही जटिल और दुर्बोध रहता है, जैसा कि उन के लिये संस्कृत में होने से था ॥ निदान हिन्दी भाषा में भाज तक ऐसा कोई सर्वाङ्ग सम्पन्न व्याकरण का पुस्तक नहीं छपा कि जिस से एक हिन्दी भाषा का जानने वाला संस्कृत व्याकरण के प्रायः सब ही उपयोगी विषयों में क्रमशः आवश्यकतानुसार विज्ञता प्राप्त कर लेवे । बस इसी अभाव को दूर करने के

२
भूमिका
लिये कतिपय सज्जनों की प्रेरणा से मैं इस पुस्तक को
प्रकाशित करता हूं। मेरा विचार इस के चार भागों में
व्याकरण के सम्पूर्ण आवश्यक और उपयोगी विषयों को
समाप्त करने का है, जिन में से यह प्रथम भाग है, जिस
में वर्णोच्चारणशिक्षा, सन्धि, संज्ञा, षड्लिङ्ग और कारक
के विषय यथाक्रम दिये गये हैं। शेष भागों में लिङ्गा-
नुशासन, अव्यय, स्त्रीप्रत्यय, समास, आख्यात (क्रिया),
तद्धित और कृदन्त तथा इन के अवान्तर भेद इत्यादि
विषय यथाक्रम ऐसी सरल रीति पर उपन्यस्त किये
जावेंगे कि जिस से पाठकों तथा विद्यार्थियों को
संस्कृत व्याकरण का मर्म एवं रहस्य बड़ी सुगमता से
अनायास विदित हो सकोगा । यदि संस्कृत के प्रेमी और
हिन्दी भाषा के हितैषी इस प्रषम भाग को प्रेम और
आदर की दृष्टि से देखेंगे तो इस के शेष भाग भी (जिन
में से दूसरा तो लगभग तयार है ) मैं कृतज्ञतापूर्वक
अपने पाठकों की भेंट करूंगा।
दूसरी प्रार्थना गुणग्राहक पाठकों की सेवा में यह
है कि यदि इस में मुद्रणादि के दोष से अथवा मेरी ही भूल
से कहीं पर कोई त्रुटि रह जावे या क्रम व्यतिक्रम हो
जावे तो पाठक क्षमा करेंगे और मुझे उस की सूचना
देंगे। मैं उन की सम्मति ग्राह्य होने पर यथासम्भव
दूसरे संस्करण में उस का संस्कार करूंगा और विधापक
का कृतज्ञ हूंगा।
किं बहुना विशेषु-
बदरीदत्त शर्मा

भो३म्
Sanjbalarabrabaleratoleraferent
अथ संस्कृतप्रबोधः
सामानव
प्रथमोभागः
तत्र प्रथमाध्यायः
१-भाषा उसे कहते हैं जिस के द्वारा मनुष्य अपने मन
के भावों को दूसरों पर प्रकट करता है।
२-भाषा वाक्यों से बनती है, वाक्य पदों से और पद
मक्षरों से बनाये जाते हैं।
३-यद्यपि व्याकरण का मुख्य विषय शब्दानुशासन है
तथापि विना वर्णज्ञान के शब्दरचना असम्भव है,
अतएव प्रथम वर्णों का उपदेश किया जाता है।
अथ वर्णोपदेशः
४-वर्ण, शब्द के उस खण्ड का नाम है जिस का विभाग
नहीं होसकता, उसी को अक्षर भी कहते हैं, उस के
समझने के लिये बुद्धिमानों ने प्रत्येक भाषा में कुछ
सङ्केत मियत कर दिये हैं और उन्हीं को वर्ण या अक्षर
के नाम से व्यवहार करते हैं ।

संस्कतप्रबोधे- ओ, औ। ५-संस्कृत भाषा में सब मिलाकर ४२ वर्ण हैं जो सामान्य रीति पर दो भागों में विभक्त हैं। (१) अच वा स्वर (२) हल् वा व्यञ्जन ॥ ६-जो विना किसी की सहायता के स्वयं बोले जाते हैं वे स्वर और जिन का सच्चारण स्वरों की सहायता से होता है वे व्यञ्जन कहलाते हैं । स्वर बा अच অন্তু एकाक्षर-अ, इ, इ, उ, उ, ऋ, ल। सन्ध्यक्षर-ए, ऐ, व्यञ्जन वा हल ख, ग, छ, ज, भ, ठ, ड, द, थ, द, घ, फ, ब, भ, अन्तःस्थ-य, र, ल, ऊष्म श, स, 8-सक्त वर्णों में भ से लेकर औ तक वर्ण स्वर वा भच मच और क से लेकर ह पर्यन्त ३३ वर्ण व्यञ्जन वा हल् कहलाते हैं। ८-उक्त र स्वरों में पहले पांच एकाक्षर और पिछले चार संध्यक्षर कहलाते हैं। क्योंकि अ+ मिल कर 'ए' कवर्ग- क, चवर्ग- च, टवर्ग-ट, तवर्ग- त, पवर्ग- प, ह

वर्णोपदेशः
और + ए मिलकर 'ऐ' तथा + से मिलकर 'मो'
और म+ ओ मिल कर 'औ' बनते हैं।
-स्वरों के तीन भेद हैं, ह्रस्व , दीर्घ और ग्लुत । फिर
इन में से प्रत्येक के तीन २ भेद होते हैं उदात्त, अनु-
दात्त और स्वरित॥
१०-जो शीघ्र बोले जावें वे ह्रस्व, हस्व से दुगुने काल
में बोले जावें वे दीर्घ और जो हस्व से तिगुन्ने काल
में बोले जावें वे प्लुत कहाते हैं ।
११-ऊंचे स्वर से उदात्त, नीचे स्वर से अनुदात्त और
मध्यम स्वर से स्वरित बोला जाता है।
(क) उक्त रीति से एक २ स्वर नौ २ प्रकार का
होता है । यथा-
१-हस्वोदात्त ४-दीर्घोदात्त ७-लुतोदात्त
२-हस्वानुदात्त ५-दीर्घानुदात्त
५-दीर्घानुदात्त ८-प्लुतामुदात्त
३-हस्वस्वरित ६-दीर्घस्वरित -लुतस्वरित
( च ) फिर अनुनासिक और अननुनासिक भेद से एक २
स्वर अठारह २ प्रकार का हो जाता है अर्थात् भेद
अनुनासिक के और अनुनासिक के ॥
( ट ) इस रीति पर अ, इ, उ, ऋ; इन चार स्वरों के
अठारह २ भेद होते हैं, तु के दीर्घ न होने से
बारह ही भेद होते हैं और ए, ऐ, ओ, औ; ये
चारों भी इस्त्र के न होने से बारह र प्रकार के हो?
वर्णोच्चारणस्थानानि
१२-मुख के जिस भाग से किसी वर्ण का उच्चारण होता
है वह उस का 'स्थान' कहलाता है।

६
संस्कतप्रबोधे-
।
१-भ, कवर्ग, ह और विसर्ग इन का कण्ठ स्थान है।
२-इ, चवर्ग, य और श इन का तालु स्थान है।
३-ऋ, टवर्ग, र और ष इन का मूढी स्थान
४-तु, तवर्ग, ल और स इन का दन्त स्थान है।
५-उ, पवर्ग और उपध्मानीय इन का ओष्ठ स्थान है।
६-जिहामूलीय का जिह्वामूल स्थान है।
-ए, ऐ, इन दोनों का कगठ तालु स्थान है।
-मो, भी, इन दोनों का कण्ठोष्ठ स्थान है।
-वकार का दन्तोष्ठ स्थान है।
१०-छ, अ, ण, न, म, इन का स्वस्थवर्गीय स्थानों
के अतिरिक्त नासिका स्थान भी है।
११-अनुस्वार का केवल नासिका स्थान है।
१३-अनुस्वार और विमर्ग सदा अच् से परे आते हैं
जैसे-मंस्यते । यशः॥
१४-यदि क, ख, से पूर्व विसर्ग हों तो वे जिहामूलीय
और प, फ, से पूर्व हों तो उपध्मानीय होजाते हैं।
यथा-य: करोति । य: पठति ।
१५-'' से लेकर 'म' पर्यन्त. पांचों वर्गों के वर्ण स्पर्श
कहलाते हैं । य, र, ल, व की अन्तःस्थ और श, ष,
स, क, की अष्म संज्ञा है।
१६-जहां दो वा दो से अधिक हलों में अच नहीं रहता
वहां सन की संयोग संज्ञा है अर्थात् वे अन्त के
अच
में मिल जाते हैं। जैसे-* अग्निः " में ग न का
-.

वर्णोपदेशः
“इन्द्रः" में न्द्र का और “ कारस्य॑म् में र् त् स्
न य का संयोग है।
१७-संयोग से पूर्व वर्ण यदि इस्व भी हो तो वह गुरु
बोला जाता है जैसे- अग्निः " में 'अ' “इन्द्रः" में
'इ' और "उष्ट्र: में 'उ' की गुरु संज्ञा है।
१८-जो वर्ष मुख और नासिका से बोले जाते हैं उन को
अनुनासिक " कहते हैं जैसे-ड, म, ण, न
म
.
और अनुस्वार।
१९-जिन वर्गों के स्थान और प्रयत्न समान ही वे पर.
स्पर “सवर्ण कहलाते हैं जैसे क-ह,इ-श इत्यादि ।
२०-अच् और हल् तुल्यस्थानीय होने पर भी परस्पर
सवर्ण नहीं होते जैसे-अ-ह, इ-श इत्यादि।
२१-ऋ और स्वभिन्नस्थानीय होने पर भी परस्पर सवर्ण हैं।
२२-सुखात ( संज्ञा) तिङन्त (क्रिया ) इन दोनों की
‘पद संज्ञा है।
२३-पदों को मिलाकर प्रयोग करने का नाम "संहिता
है। यथा-विद्ययाऽर्थमवाच्यते।
२४-पदों का विग्रह करके पृथक २ जो उच्चारण किया
जाता है, उस को “ अवसाम मे कहते हैं। यथा-
विद्यया-अर्थम्-अव-आप्यते ॥

८
संस्कतप्रबोधे-
-
द्वितीयाध्यायः
सन्धिप्रकरणम्
२५-दो वर्षों के परस्पर मिलाप का नाम सन्धि है। संयोग
और सन्धि में इतना भेद है कि जहां वर्ण अपने
स्वरूप से विना किसी विकार के मिलते हैं उसे संयोग
और जहां विकत होकर अर्थात् उन के स्थान में कोई
और आदेश होकर मिलते हैं उसे सन्धि कहते हैं।
२६-संस्कृत भाषा में सन्धि का विशेष प्रयोजन पड़ता है
क्योंकि इस में प्रायः पद सन्धियुक्त ही प्रयुक्त होते हैं।
२७-सन्धि तीन प्रकार की है १-अच् सन्धि २-इल सन्धि
३-विसर्ग सन्धि ।
२८-अचों के साथ अच् का जो संयोग होता है उसे अच्-
सन्धि कहते हैं।
२-अच वा हल के साथ जो हलों का संयोग होता है
उसे हलसन्धि कहते हैं।
३२-अच् संयुक्त हलों के साथ जो विसर्ग का संयोग होता
है उसे विसर्गसन्धि कहते हैं।
१अचसन्धिः
३१-अच्सन्धि ७ प्रकार की होती है, ९-यण २-अयादि-
चतुष्टय ३-गुण ४-वृद्धि ५-सवर्णदीर्घ६-पररूप-पूर्वरूप
१ यण
३२-हस्व वा दीर्घ इ, उ, ऋ, से परे कोई भिन्न अच् रहे
तो इ, उ, ऋ, को क्रम से य, व, र, आदेश हो जाते
हैं और इसी को यणसन्धि कहते हैं ।
मीचे के चक्र से इस का भेद विदित होगा
.

খি पूर्व वर्ण दोनों को मि- इलाकर जो एक असिद्ध सन्धि सिद्ध सन्धि आदेश हुवा य ETT खी+अढ़ा अति+ऋणम् aaaa aalo Kol. AAMRAHIMAN दधि+अशनम् दध्यशनम् देवी+मर्थः देव्यर्थः अनि+आगतः अभ्यागतः मही+आलम्बनम् | मह्यालम्बनम् अति+उत्तमः अत्युत्तमः सुधी+उपासनम् सुध्युपासमम् प्रति+ऊहः प्रत्यूहः रूयूढा अत्यृणम् कुमारी+ऋतुमती कुमार्यतुमती प्रति+एकः प्रत्येकः कृती+एधते कृत्येधते अति+ऐश्वर्यम् अत्यैश्वर्यम् हस्ती+ऐरावतः हस्त्यैरावतः पचति+ओदनम् । पचत्योदनम् सती+ओजः सत्योजः अपि+ औदार्यम् । अस्यौदार्यम् प्रधी+औ प्रध्यौ অপু चमू+अवस्थानम् चस्वस्थानम् सु+आगतः स्वागतः खल+आ खलप्या ऋत्विक यो यो अनु+अर्थम् जमा घा वि ऋतु+इकू संस्कृतम्रबोधे- पूर्व वर्ण दोनों को मि- लाकर जो एक प्रसिद्ध मन्ति AR सिद्ध सन्धि आदेश हुवा वि वी धू a44 Savatarra व वे वे वो वो प्रध+इच्छा अनु+ईक्षा चमू+ईशः वसु+ऋणम् वधू+ऋतुः अनु+एजनम् वध+एकत्वम् वस्तु+ऐक्यम् वधू+ऐश्वर्यम् तनु+भोकः चमू+ओघः अनु+औषधम् पुनर्भू+औरसः पितृ+अनुमतिः मातृ+मात्रा स्वस+इङ्गितम् दुहित+ईहा मर्तृ+उपदेशः मत+अढा धात एकत्वम् चास+ऐश्वर्यम् या+मोकः कर्तृ+औत्कराव्यम् ভিন্নতা अन्वीक्षा बम्वीशः वस्तृणम् वध्वतुः अन्वेजनम् वध्वेकत्वम् धस्त्वैक्यम् वध्वैश्वर्यम् तम्बोकः चम्दोघः अन्वौषधम् पुनभ्वारमः पित्रनुमतिः मात्राज्ञा स्वस्त्रिङ्गितम् दुहिनीहा भनुपदेशः मढ़ा न औ जाऔ वी र vaan धात्रेकत्वम् ऋामो श्वात्रैश्वर्यम् यात्रोकः शत्रौत्समध्यम् मो যমিজ २ मयादिचतुष्टय ३३-ए, ओ, ऐ, भी, इन से परे यदि कोई अच् हो तो इन को कम से अय, अक्, आय, आव, ये आदेश हो जाते हैं या ओ, औ से परे प्रत्यय का यकार हो तो भी इन को अव, आव भादेश होते हैं। निम्नलिखित चक्र को देखो:- आदेश जो पूर्व वर्ण को होता है असिद्ध सन्धि सिद्ध सन्धि आ ओ ओ चे-अनम् भो-मनम् hvarya पूर्व वर्ण - औ अ पौ-अका अय अघ आय आव अय अव माय आव अय पो-त्रः वै-इति सौ-हतः ते-उद्गताः चयनम् भवनम् नायकः पावकः तयिह, तइह * पवित्रः वायिति भावितः तयुद्गताः वा त उद्गताः * बन्धवृत्तिष्ठ वा बन्घसत्तिष्ठ * अस्मायुद्धर वा अस्माउधर* द्वावुपमिती वा द्वाउपमिती ओस अव बन्धो-उत्तिष्ठ आय अस्मै-उधर औस भाव दौ-उपमिती १२ संस्कृतप्रबोधे- आदेश जो पूर्व वर्ण को होता है मसिद्ध सन्धि पूर्व वर्ण पर वण सिद्ध सन्धि कप-ए धेनो-ए भो AAAAA अय अव आय आव अय अव आय रै-ए नौ-ए और आव ए अय् ओमो कपये धेनवे राये नावे सर्वे-ऐतिहासिकाः सर्वयैतिहासिकाः पटो-ऐः पटवैः कस्मै-ऐश्वर्यम् कस्मायैश्वर्यम् वा कस्मा ऐश्वर्यम् * द्वी-ऐतिहासिकौ द्वावैतिहासको विश्वे-ओ विश्वयोः गो-ओः गवोः रे-ओः रायोः नी-ओ नावोः ते-औरस्याः तयोरस्याःवा त औरस्या:* गो-औ गावी रै-औ रायो नौ-औ नावी गव्यम् नाध्यम् अव ऐ भो आय औ ओ औ आव ए अय ओ औ ऐ औ औऔ ओ य औ अव आय आव भव आव गो-यम् नौ-यम् * जहां २ यह चिन्ह है वहां २ एक पक्ष में पदान्त के यकार वकार का लोप हो जाता है।

বঙ্কাি ३ गुण ३४-इस्त्र अपवा दीर्च मकार से परे ह्रख वा दीर्घ , उ, ऋ रहें तो अ+ मिल कर "ए" अ+उ मिलकर "ओ" और अ+ मिल कर "अ" आदेश होता है और इसी को गुणादेश कहते हैं। पूर्व वर्ण दोनों को मि. लाकर जो मसिद्ध सन्धि पर वर्ण आदेश हुवा सिद्ध सन्धि भ आ अ 44444AR ए सप+इन्द्रः उपेन्द्रः पर+ईशः परेशः ए यथा+इच्छसि | यथेच्छसि ए महा+ईश्वरः महेश्वरः ओ जन्म उत्सवः जन्मोत्सवः ओ नव जहा नवोढा ओ महा+उरस्कः महोरस्कः ओ | गङ्गा+ऊर्मिः गङ्गोर्मिः अर्ब्रह्म+ऋषिः ब्रह्मर्षिः अर् | महा+ऋषिः महर्षिः OTT ४ वृद्धि ३५-इस्व अथवा दीर्घ अकार से परे ए ओ, ऐ, भौ रहे तो म+ए वा अ+ऐ मिल कर ऐ" और अ+ओ वा + औ मिल कर "औ आदेश होता है और इस को बद्धि कहते हैं। कहीं २ अ और मिल कर "भार वृद्धि हो जाती है।

१४ संस्कृतप्रबोधे- पूर्व वर्ण दोनों को मि- लाकर जो एक पर वर्ण आदेश हुवा असिद्ध सन्धि सिद्ध सन्धि माए अ ए उप+एघते उपैधते अ | ऐ परम+ऐश्वर्यम् परमैश्वर्यम् यथा+एव यथैव महा+ऐश्वर्यम् । महैश्वर्यम् ओ तिल+ओदनम् | तिलौदनम् भी तव+औदार्यम् तबौदार्यम् आओ औ महा+ओजः महीजः आ औ| औ विश्वपा+औ विश्वपी भार प्र+ऋणम् प्रार्णम् भार मुखेन+ऋतः सुखार्तः * ५ सवर्णदीर्घ ३६-यदि हस्व वा दीर्घ अ, इ, उ, ऋ से उस का सवर्ण अक्षर परे रहे तो दोनों मिल कर एक दीर्घ आदेश हो जाता है और इसी को सवर्णदीर्घ कहते हैं । असिद्ध सन्धि पर वण सिद्ध सन्धि आदेश हुआ दोनों मिल प्रभाकर जो एक 22 पूर्व वर्ण भ पुरुष+अर्थः पुरुषार्थः ममात्मजः मम आत्मजः * यह तृतीयासमास में वृद्धि हुई है।

सन्धिप्रकरणम् पूर्व वर्ण दोनों मिल मसिद्ध सन्धि कर जो एक आदेश हुमा पर वर्ण सिद्ध सन्धि आ अ आ बपार्थः आ आ SARI यथा+अर्थः विद्या+आलयः | विद्यालयः अधि+इतः अधीतः अधि+ईश्वरः अधीश्वर महती+इच्छा | महतीच्छा मही+ईशः महीशः बहु+उन्नतः बहूनतः लघूर्मिः पुनभू+उत्तरः पुनर्भूत्तरः वधू+ऊढा वधढा पितृणम् लघु+कर्मिः पितृ+ऋणम् ६ पूर्वरूप ३७-यदि पदान्त के ए, मो से परे हस्व अकार रहे तो वह अकार ए और ओ में ही मिल जाता है, उस पूर्व रूप में परिणत हुवे अकार को (क) इस चिन्ह से बोधित करते हैं। यथा-मुने-अत्र=मुनेत्र । गुरो-अव-गुरोग्य ॥ पररूप ३८-जैसे परवर्णका पूर्व वर्णमें मिल जामा पूर्वरूप कहलाता है, इसी प्रकार पूर्ववर्ण का परवर्ण में मिल जाना पर- रूप कहलाता है। पररूपसन्धि का कोई विशेष नियम

संस्कतप्रबोधे-
नहीं है, यह कहीं गुण, कहीं वृद्धि और कहीं सवर्ण
दीर्घ के स्थान में भी हो जाया करती है।
गुण के स्थान में पररूपा यथा-
पररूप। यथा-ददा-3ददुः ।
पपा--पपुः । यया-3=ययुः ।
वृद्धि के स्थान में पररूप । पया-प्र-एनवेजते।
उप-ओषति-उपोषति । बह-ए-बहेव । का-मोम्
कोम् । अद्य-ओढा अद्योढ़ा । स्थूल-मोतु स्थूमोतुः ।
बिम्न-मोष्ठः-बिम्बोष्ठः ॥
सवर्णदीर्घ के स्थान में पररूप। यथा-शक-अन्धुः=
शकन्धः । कुल-अटा-कुलटा । सीम-अन्तःसीमन्तः ।
पच-अन्तिपचन्ति । यज-अन्ति-यजन्ति ।
८ प्रतिभाव
३९-इन के अतिरिक्त प्रायः स्थल ऐसे भी हैं कि जहां
सन्धि नहीं होती, उस को प्रकृतिभाव करते
जहां पूर्व और पर वर्णों में कोई विकार नहीं होता
किन्तु वे अपने स्वरूप से स्थित रहते हैं वहां प्रकृति.
भाव होता है यथा-इ-इन्द्रः । मुनी-हमी । अमी-
भासते। अझे-ईशाः । इत्यादि उदाहरणों में ,
मुनी, अमी और अहो इन शब्दों की प्रगृह्य संज्ञा
होने से सवर्णदीर्थ, यण और अव आदेश न दुवे
किन्तु प्रतिभाव हो गया ।
४०-जहां प्लुत से भागे अच् रहे वह भी सन्धि नहीं
होती। जैसे-एहि शिष्य ३-अत्रछात्राः पठन्तिा यहां
प्लुत संधक प्रकार के होने से सवर्षदीर्घ भादेश न
हुभा किन्तु प्रकृतिमाव हो गया ।
-

सन्धिप्रकरणम् १७ २ हल्सन्धिः संस्कृत में हल्सन्धि के भनेक भेद हैं जिन में से कुछ एक नीचे लिखे जाते हैं। ४१-यदि सकार और सवर्ग को शकार और चवर्ग का योग हो तो उन को कम से शकार और पवर्ग ही हो जाते हैं । यपा-कस+शेते कशेते । कस+चित- कश्चित् । उत्-शिष्टः उच्छिष्ट: । सत्+चित सञ्चित् । उत+छिल-उच्छिकः । उत्+ज्वल:-उज्ज्वलः । श- अन्+जयति-शत्रजपति॥ ४२-यदि सकार और तवर्ग को षकार और टवर्ग का योग हो तो उन को क्रम से षकार और टवर्गही होजाते हैं। यथा-कस्+षष्ठः षष्ठः । वृक्षस+टो. कते वृक्षष्टीकते । पेष+ता-पेष्टा । प्रतिष+था प्रतिष्ठा । पूष+नः पूष्णः । उत+टङ्कनम्-उह. ङ्कनम् । उत्+हीनः उड्डीनः ॥ ४३-यदि तवर्ग से डकार परे रहे तो उस को लकार ही आदेश होजाता है। तत्+लयः तम्लयः । भवान्+ लिखति भवॉलिखति । यहां अनुनासिक न को अतु- मासिक ही लँ हुवा। ४४-यदि किसी वर्ग के प्रथम वा वतीय वर्ण से कोई अनु- नासिक वर्ण परे रहे तो पूर्व वर्ण को उस के ही वर्ग कासानुनासिक वर्ण होजाता है। वाग+मपम्पादन यम् ।सबाट-नयति-समारनयति। जगत्- नाग- मायः । चित्-मात्रः-चिम्मानः । तद्-मया तन्मयः । * यहां ४७ वें नियम से 'श' को 'छ' हो गया । ।

१८ संस्कृतप्रबोधे- - ४५-यदि किसी वर्ग के पहले वर्ण से उसी या अन्य वर्गों के तीसरे चौथे वर्ण अपवा अच् परे रहे तो उस को अपने वर्ग का तीसरा वर्ण होजाता है। यथा-प्राक्- गमनम्=प्रागगमनम् । वाक्-दण्डः वाग्दण्डः । स- म्यक-धृतः सम्यग्धृतः। उदक-अयनम्-उदगयनम् । अच-भन्तः-अजन्तः । उत्-गमनम्-उद्गमनम् । अत्-अन्तःअदन्तः।उत्-भवनम्-उद्भवमम् । अप- जा-अब्जः॥ ४६-यदि किसी वर्ग के पहले, दूसरे, तीसरे और चौथे वर्ण से इकार परे रहे तो उस को उसी वर्ग का च. तुर्थ वर्ण होजाता है यथा-बाग- हसति वाग्यसति । अच+हल-अज्मल् । तर+हरणम्=उदुरणम् । अप- हरणम् =अउरणम् ॥ ४७-वर्ग के पहले और तीसरे वर्ण से शकार परे हो तो उस को छकार हो जावे, यदि उस से परे कोई अच् वा अन्तःस्य वा अनुनासिक वर्ण हो । बाक्-शरः वा- क्छरः । इत्-शयः हृच्छयः। महत्-शृङ्गम् मह- - - ४८-यदि वर्ग के तृतीय वर्ण से परे वर्ग के प्रथम, द्वि. तीय वर्ण रहें तौ तृतीय वर्ण को भी प्रथम वर्ण हो जाता है यथा-उद्-थानम्-उत्थानम्।उद्-तम्भनम्- उत्तम्मनम् ॥ ge-यदि ह्रस्व मच से परे छकार हो तो वह कार से संयुक्त हो जावे । यथा-परि-छेदः परिच्छेदः । भव-छेदः अवच्छेदः । गृह-छिद्रम्-गृहच्छिद्रम् । तह-छाया-तरुधछाया।

-
सन्धिप्रकरणम्
१०
५०-यदि अपदान्त अनुस्वार से परे पांचों वर्गों में से
किसी वर्ग का कोई वर्ण हो तो उसे उसी वर्ग का
अनुनासिक वर्ष हो जाता है । यथा-अं-कितः=
अङ्कितः । वं-चितः वञ्चितः। कुं-ठितः कुण्ठितः।
नं-दितः नन्दितः। कं-पितः कम्पितः। पदान्त
में विकल्प से होता है यथा-त्वं करोषि । त्वङ्करोषि ॥
५१-पदान्त मकार को यदि उस से कोई इल् परे हो
तौ अनुस्वार आदेश हो जाता है। यथा-गुरुम्-
वन्दे-गुरुं वन्दे । बनम्-यासि-वनं यासि । धनम्-
देहि धनं देहि ॥
५२-अपदान्त मकार को यदि उस से कोई हल, अनु-
नासिक और अन्तःस्थ वर्णों को छोड़ कर परे हो तो
उस को भी अनुस्वार आदेश होजाता है। यथा-पया.
न्-सि-पयांसि । यशान्-सियशांसि । मन्-स्यते
मंस्यते । इत्यादि।
३ विसर्गसन्धिः
५३-यदि इकार उकार पूर्वक विसर्ग से परे क, ख, वा
प, फ, रहें तो विसर्ग को प्रायः मूर्द्धन्य ष हो जाता
। निः-कपटकः निष्कण्टकः । निः-क्रयः निष्क.
यः। निः-पापा-निष्पापः । निः-फलम् निष्फलम् ।
दुः-कर्म=दुष्कर्म । दुः-पीतम् दुष्पीतम् । दुः-फलम् =
दुष्फलम् ॥
५४-च, छ, परे हों तो विसर्ग को 'श्' औरत, परे हो तो
'स्' भादेश हो जाता है। निः-चयः निश्चयः। निः-
-

संस्कृतप्रबोधे-
-
चलः निश्चला। निः-छल-निश्छलः । निः-तार:-
निस्तारः।
५१-यदि विसर्ग से वर्ग के तृतीय, चतुर्थ वर्ष या अन्तःख,
और अनुनासिक वर्ण परे हों तो विसर्ग को 'ओ'
आदेश हो जाता है। सपा-ममः-गतः मनोगतः ।
मनः-जवा मनोजवः । यशः-दा-यशोदा। पयः-
दः पयोदः। अश्वः-धावति-अश्वोधावति। मनः-
भवः मनोनवः । नरः-याति-मरोयाति। मनः-
रथः मनोरथः । मनः-लयः-मनोलयः । पवन:-
वाति-पवनोवाति । मनः-हर मनोहरः । मनः-
नीतःमनोनीतः। तेजः-मयः तेजोमयः । इत्यादि।
५६-यदि इस्व अकार से परे विसर्ग हों और उस से परे
फिर इस्व अकार हो तो विसर्ग को 'ओ' आदेश हो
जाता है और पर अकार उसी में मिल जाता है।
यथा-मनः - अवधानम् मनोग्वधानम् । शिष्यः-
• अत्र-शिष्योऽत्र । शिवः-अध्यः शिवोऽयः । धर्म:-
अनुष्ठेयः धर्मोऽनुष्ठेयः ।
५७-यदि भकार को छोड़ कर अन्य स्वरों से परे विमर्ग
हों और उन से परे वर्ग के तृतीय, चतुर्थ वाह, य,
व, ल, न, म, वा स्वर वर्ण हों तो विसर्ग के स्थान
में रेफ आदेश होता है । यथा-नि:-गुणः निर्गुणः।
निः-जलम् निर्जलम् । निः-झरः निरः । दुः-
दान्तः दुर्दान्तः । नि:-धनः निर्धनः । तरोः-वनम्
तरोर्वनम् । नि-प्रयः-निर्भयः । निः-हरणम्-निहर.
णम् । निः-यातः निर्यातः । मिः-वचनम् निर्वचनम्।
दुः-गः=दुर्गः । निः-नया निर्णयः । निः-मड
निर्मलः । नि:-अर्थः निरर्थः । मिः
-आकार:-

संजानिरूपणम्
निराकारः । निः- निरिच्छः । निः-ई
निरीहः । निः-उपाय: निरुपायः। नि:-औष.
धम्=निरौषधम् । इत्यादि
५८-भ, , उसे परे विसर्ग हों और उन से परे रकार
हो तो विसर्ग का लोप होकर उस से पूर्व वर्ण को
दीर्घ हो जाता है। यथा-पुनः-रक्तम्-पुनारक्तम् ।
निः-रसः नीरसः । निः-रुजः नीरुजः । इन्दुः-
राजते इन्दूराजते॥
५-अ से परे विसर्ग का लोप हो जाता है जब कि उस
से परे हस्व 'अ' को छोड़ कर कोई स्वर रहे । यथा-
कः-आस्तेक आस्ते। यः-ईशः यईशः। सः-उत्सवः-
सउत्सवः। वः-ऋषिः व ऋषिः। सूर्यः-एकः-सूर्य एकः।
-ऐक्षतस ऐक्षत । यतः ओषधिः यत ओषधिः ।
६०-सः और एषः के विसर्ग का इल् परे हो तो भी लोप
हो जाता है । यथा-सः-गच्छति। सगच्छति ।
एषः-क्रीडति-एषकीडति । इत्यादि ।
तृतीयाऽध्यायः
अथ शब्दानुशासनम्
६१-जो कानसे सुनाई देवे उसे शब्द कहते हैं वह दो
प्रकार का है (१) सार्थक, (२) निरर्थक । सार्थक
पद संजा और उसी का विवेचन व्याकरण
शाख में किया गया है।
६२-पद के दो भेद हैं १ संघा २ किया ।।

२२ संस्कतप्रबोध- ६३-संज्ञा वस्तु के नाम को कहते हैं और वह लिङ्ग वचन और कारक से सम्बन्ध रखती है। जैसे-" अश्वत्थः यह एक वृक्ष विशेष का नाम भानम् यह एक फल विशेष का नाम है। शुण्ठिः * यह एक ओषधि विशेष का नाम है। ६४-क्रिया का लक्षण यह है कि जिस से कुछ करना पाया जाय और वह काल, पुरुष और वचन से सम्बन्ध रखती है। क्रिया का सविस्तर वर्णन तीसरे भाग में होगा। ६५-संज्ञा और क्रिया के सिवाय सार्थक शब्दों में अव्यय की भी गणना है । अव्ययों का वर्णन दुसरे भाग में होगा। संज्ञा ६६-संज्ञा के तीन भेद हैं-रुढि, यौगिक और योगरूढ़ि ॥ ६७-रूढि संज्ञा उसे कहते हैं जो किसी वस्तु के लिये नियत हो और उसका कोई खण्ड सार्थक न हो। जैसे-"निम्बः यह एक वृक्ष विशेष की संज्ञा है यदि इस में से निम् और बः को अलग २ कर दिया जाय तो इन का कुछ अर्थ न होगा। ६०-यौगिक संज्ञा उसे कहते हैं जो दो शब्दों के योग से अथवा शब्द और प्रत्यय के योग से बनी हो । यथा- प्रियंवदः । मनोरमः । जलचरः । वक्ता । कामुकः । लोलुपः । इत्यादि। ६-योगरूढि संज्ञा वह कहलाती है जो स्वरूप में तो यौगिक के समान हो, पर अर्थ में यौगिक के समान अवयवार्थ को न लेकर संकेतितार्थ का प्रकाश - संजानिरूपणम् २३ करती हो । जैसे-पङ्कजः । जलदः । हिमालयः। वर्षाभूः । इत्यादि। मोट-यद्यपि पङ्क से कमल के अतिरिक्त और भी अनेक पदार्थ उत्पन्न होते हैं परन्तु पङ्कज केवल कमल की ही संज्ञा है। एवं जल को नदी, कूप तड़ागादि भी देते हैं परन्तु “जलद" केवल बादल की ही संज्ञा है। तथा हिम और भी अनेक स्थानों में होता है परन्तु "हिमालय" केवल उसी पर्वत का नाम है जो भारतवर्ष की उत्तरीय सीमा में विद्यमान है। इसी प्रकार वर्षा में अनेक जन्तु उत्पन्न होते हैं परन्तु “ वर्षाभू " केवल मेडक की ही संज्ञा है। 90-इन के अतिरिक्त संज्ञा के ५ भेद और भी हैं जिन के नाम ये हैं १-जातिवाचक २-व्यक्तिवाचक ३-गुण- वाचक ४-भाववाचक ५-सर्वनाम । ७१- -जातिवाचक संज्ञा वह है जिससे जातिमात्र (जिन्सार) का बोध हो अर्थात् उस से सब समानाकृति व्यक्तियां जानी जावें । जैसे-मनष्यः। अश्वः । गौः। वक्षः। पुस्त. कम् । वस्त्रम् । इत्यादि । ७२-व्यक्तिवाचक संज्ञा वह है जिस से व्यक्ति (जाति के एक देश ) का ग्रहण हो । जैसे-देवदत्तः । विष्णु मित्रः । इन्द्रप्रस्थः । गङ्गा । यमुना । आदि । ७३-गुणवाचक संज्ञा वह है जिस से किसी वस्तु का गुण प्रकट हो, अतएव इस को विशेषण भी कहते हैं। यह संशा अकेली नहीं आती किन्तु अपने विशेष्य के साथ में माती है। यथा-नीलोत्पलम् । कृष्णसर्पः। पीतवर्णः । वक्र चन्द्रः। उच्चैःस्वरः। उत्तमपुरुषः। इत्यादि। ।

२४
संस्कृतप्रबोधे-
9-भाववाचक संजा वह है जो पदार्थ के धर्म एवं स्वभाव
को बतलावे अथवा उस से किसी व्यापार का बोध
हो। यथा-गौरवम् । लाघवम् । जाडयम् । पाण्डित्यम्।
मानुष्यम् । इत्यादि।
१५-सर्वनाम संज्ञा उसे कहते हैं जो और संज्ञाओं के बदले
में कही जावे जैसे-तद्, यद्, एतद्, इदम्, अदम्,
युष्मद्, भस्मद्, अन्य, अन्यतर, इतर, कतर, कतम,
किम् , एक, द्वि, इत्यादि ॥
नोट-सर्वनाम संजा का प्रयोजन यह है कि इस
से वाक्य में लाघव और लालित्य आजाता है और पुन
रुक्ति नहीं होती अर्थात् एक ही शब्द का वार २ प्रयोग
नहीं करन्य पड़ता । यथा-"देवदत्त आगतः सच स्वकीयं
पुस्तकं गृहीत्वा गतः देवदत्त आयाथा और वह अपना
पुस्तक लेकर गया। यहां उत्तर वाप में पुनः देवदत्तशब्द
का प्रयोग नहीं करना पड़ा किन्तु "त सर्वनाम से उस
का परामर्श होगया॥
७६-सर्वनाम शब्दों में लिङ्गनियत नहीं होता किन्तु जिन
के स्थान में वे भाते हैं उन का जो लिङ्ग होता है वही
सर्वनाम का भी । यथा-एषा शाटी । एषोऽश्वः एतत्
पुस्तकम्।
७७-बोनों पुरुष मिन का क्रिया में काम पड़ेगा इन्हीं
सर्वनामों से निर्देश किये जाते हैं। यथा- अस्मद्
से उत्तम पुरुष, युष्मद् से मध्यम पुरुष और मस्मद्
युष्मद् से मिस और किसी सर्वनाम से प्रथम वा अन्य
पुरुष का निर्देश किया जाता है ।

संशानिरूपणम्
लिङ्गानि
७८-संस्कृत भाषा में तीन लिङ्ग होते हैं जिन के नाम
ये हैं-पुंलिङ्ग, स्त्रीलिङ्ग और नपुंसकलिङ्ग ।
७९-पुरुष के लिये लिङ्ग, बी के लिये स्त्रीलिङ्ग और
दोनों से विलक्षण व्यक्ति वा द्रव्य के लिये प्रायः
नपुंसक लिङ्ग का प्रयोग किया जाता है। यथा-
गुरुः । विद्या । सूत्रम् ॥
८०-संस्कृत में प्रायः शब्द नियतलिङ्ग होते हैं, जिनका
विशेष परिचय लिङ्गानुशासन के अवलोकन से होगा,
जोकि इस पुस्तक के दूमरे भाग में दिया जायगा ।
वचनानि
८१-संस्कृत में लिङ्ग के ही समान वचन भी तीन होते
हैं, एकवचन, द्विवचन और बहुवचन ।
८२-जिस के कहने से एक व्यक्ति वा वस्तु का बोध हो
यह एकवचन, जो दो पदार्थों को जनावे वह द्विव.
चन और जो दो से अधिक वस्तुओं के लिये प्रयुक्त
होता है, वह बहुवचन कहलाता है । यथा-वृक्षः ।
वृक्षौ । वृक्षाः ॥
८३- जाति के अभिधान में एकवचन को बहुवचन भी हो
जाता है । यथा-मनुष्यः मनुष्याः अश्वः अश्वाः ।
८४-युष्मद् और अस्मद् शब्द के एकवचन और द्विवचन को
भी पक्ष में बहुवचन हो जाता है । यथा-अहं ब्रवी-
मिवयं ब्रूमः । आवां वः वयं ब्रूमः । त्वं गच्छसि-
यूयं गच्छथ । युवां गच्छथः यूयं गच्छथ ।

२६ संस्कृतप्रबोचे- यथा- ८५-आदरार्थ में भी एक वचन को बहुवचन होजाता है। यथा-गुरुरभिवादनीयः=गुरखोऽभिवादनीयाः ॥ प्रातिपदिकानि ८६-धातु प्रत्यय से वर्जित केवल अर्थवान् शब्द को प्राति. पदिक कहते हैं और उसी की रूढ़ि संज्ञा भी है। कुण्डम् " यह किसी द्रव्य का नाम है। कपिशः. यह किसी गुण का वाचक है ॥ ८७-कृदन्त, तद्वितान्त और समासान्त की भी प्रातिपदिक संज्ञा है। कदन्त-शिष्यः स्तुत्यः। इत्यादि। तद्धितान्त- औपगवः । आदित्यः । इत्यादि । समासान्त-राज- पुरुषः । विचित्रवीर्यः । इत्यादि । ८८-प्रातिपदिक (संज्ञा) से विभक्तिसूचक स्वादि २१ प्रत्यय होते हैं। विभक्तियां सात हैं प्रत्येक विभक्ति के तीन रवचन होते हैं जिन के प्रत्यय २१ हैं । विभक्तिसूचक स्वादि २१ प्रत्यय विभक्तयः एकवचनम् द्विवचनम् बहुवचनम् औ द्वितीया अम् औ शसअस् तृतीया भ्याम् भिस् चतुर्थी है भ्याम् भ्यस पञ्चमी डसअस भ्याम् भ्यस् षष्ठी ङस-अस् ओस् आम् सप्तमी डि मुप-सु प्रथमा सु-स जस-अस् टा=मा -ए ओस् अजन्त पुलिङ्गम् २७ दह-प्रथमा के एकवचन सु से लेकर सप्तमी के बहु- वचन " सुप् " तक २१ प्रत्यय होते हैं। इन के समा- हार को सुप् प्रत्याहार कहते हैं। ये जिन के अन्त में हो उस को सुबन्त कहते हैं और उस की पद संज्ञा भी है। -अब हम अजन्तादि क्रम से सुप् प्रत्याहार का (प्रा- तिपदिक ) संज्ञा शब्दों के साथ योग होने से जो परिणाम होता है उसे ६ भागों में विभक्त करके दिख- लायेंगे। १-अजन्तपुंल्लिङ्गम् प्रथमा अकारान्त 'देव' शब्द विभक्तयः एकवचनम् द्विवचनम् बहुवचनम् कारकाणि देवः देवी देवाः कर्ता द्वितीया देवम् देवी देवान् कर्म तृतीया देवेन देवाभ्याम् देवैः करणम् चतुर्थी देवाय देवाभ्याम् देवेभ्यः सम्प्रदानम् पञ्चमी देवात् देवाभ्याम् देवेभ्यः अपादानम् षष्ठी देवयोः देवानाम् सम्बन्धः सप्तमी देवे देवयोः देवेषु अधिकरणम् हे देव ! हे देवी! हेदेवाः ! सम्बोधनम् १९-प्रायः सब अकारान्त शब्द देव शब्द के ही समान विभक्तियों में परिणत होते हैं केवल सर्वनाम संजक मकारान्त शब्दों में कुछ भेद होता है । देवस्य प्रथमा २ संस्कृतप्रबोधे- सर्वनामसंज्ञक " सर्व" शब्द " १-सर्वः सर्वो सर्व कर्ता २-सर्वम् सर्वान् कर्म ३-सर्वेण सर्वाम्याम् सर्वैः करणम् -सर्वस्मै सर्वेभ्यः सम्प्रदानम ५-सर्वस्मात अपादानम् ६-सर्वस्य सर्वयोः सर्वेषाम् सम्बन्धः 9-सर्वस्मिन् सर्वेषु अधिकरणम् ८-हे सर्व ! हे सा! हे सर्व ! सम्बोधनम् ए२-प्रायः सर्व के ही समान अन्य अकारान्त सर्वनामों के भी रूप होते हैं परन्तु पूर्वादि शब्दों के प्रथमा के बहुवचन तथा पञ्चमी और सप्तमी के एकवचन में दो २ रूप होते हैं। यथा-पूर्व-पूर्वाः । पूर्वस्मास्= पूर्वात् । पूर्वस्मिन् पूर्वे । शेष सब सर्व के तुल्य । इसी प्रकार पर, अवर, दक्षिण, उत्तर, अपर, अधर, ख और अन्तर शब्दों के भी समझो । उभशब्द केवल द्विवचनान्त है। -जिन अकारान्त शब्दों में कुछ भेद है अब उन रुप लिखते हैं। निर्जरशब्द- द्विव० बहुवा निर्जरी, मिर्जरसी निर्जराः, निर्जरसः २-निर्जरम् ,निर्जरसम् निर्जरान् ३-मिर्जरण, निर्जरसा निर्जराभ्याम् ? १-निर्जर " निर्जरैः पादेभ्यः,पद्भ्यः अजन्तबिम -निर्जराय, निर्जरसे मिर्जराम्याम् निरभ्य। ५-निर्जरात, निर्जरसः -निरस्य, निर्जरयोः सीः निर्जराणाम् मिर्जरमाम ७-निर्जरे, निर्जरसि मिरे सं०-हेनिर्जर ! इत्यादि प्रथमावत् पाद शब्द १-पादः पादौ पादाः २-पादम्, पादाम् , पद ३-पादेन,पदा पादाभ्याम् ,पद्भ्याम् पादः, पद्भिः ४-पादाय, पदे ५-पादात्-द्, पदः ६-पादस्य, पादयोः, पदोः पादानाम् , पदाम् 9-पादे, पदि पादेषु, पत्सु सं० हे पाद ! इत्यादि । दन्त शब्द १-दन्तः दन्ती दन्ताः १-दन्तम् दन्ताम्, दतः ३-दन्तेन,दता दन्ताभ्याम्भ्याम् दन्तैः, दद्भिः ४-दन्ताय,दते दन्तेभ्यः, दय ५-दन्तात्-द्दतः -दन्तस्य, दम्तयी, दतोः दन्तानाम् ,दताम् -दन्ते, दति दन्तेषु, दत्त मं०-हेदन्त ! इत्यादि।

संस्कृतप्रबोधे- १-मासः मासाः " मास शब्द मासी २-मासम् मासान, मासः ३-मासेन,मासा मासाभ्याम्, माभ्याम् मासैः, माभिः ४-मासाय,मासे मासेभ्यः माभ्यः ५-मासात-द्मासः ६-मासस्य, मासयोः,मासोः मासानाम्,मासाम् -मासे, मासि मासेषु,मास्सु,माः सं०-हे मास ! इत्यादि । यष शब्द १-यूषः यूषो यूषाः २-यूषम् यूषान्, यूष्णः ३-यूषेण,यूष्णा, यूषाभ्याम्,यूषभ्याम् यूषैः, यूषभिः ५-यूषाय, यूष्णे, यूषेभ्यः, यूषभ्यः ५-यूषात्-द्, यष्णः ६-यूषस्य, यूषयोः,यूष्णोः यूषाणाम् ,यूष्णाम् 9-यूषे.ष्णि यूषेषु, , यूष सं०-हे यूष ! इत्यादि। आकारान्त "विश्वपा" शब्द । १-विश्वपाः विश्वपाः २-विश्वपाम् विश्वपः ३-विश्वपा- विश्वपाभ्याम् विश्वपातिः " " " " " विश्वपौ. A १ अजन्तपुलिङ्गम् 8-विश्वये विश्वपाभ्याम् विश्वपाम्यः ५-विश्वपः ६-" विश्वपोः विश्वपाम् 9-विश्वपि विश्वपासु १-हे विश्वपाः ! हे विश्वपी। हे विश्वपाः CY-विश्वपा के ही समान अन्य सबमाकारान्त शब्दों के रूप होते हैं। हस्व इकारान्त “अग्नि" शब्द अग्नी २ अग्निम् अग्नीन् ३ अग्निना अग्निम्याम् अग्निभिः ४ अग्नये अग्निभ्यः १ अग्निः अग्नयः ५ अग्नेः ६ ७ अग्नी १ हे भग्ने । अग्न्योः अग्नीनाम् अग्निषु हे अग्नी! हे अग्नयः ! ५-प्रायः हस्ख इकारान्त शब्दों के रूप अग्नि शब्द के तुल्य होते हैं परन्तु सखि, पति, कति, त्रि और द्वि शब्दों में कुछ भेद है। हस्व इकारान्त "सखि" शब्द १ सखा सखायो २ सखायम् सखीन् ३ सख्या सखिभ्याम् सखिभिः सखायः ३२. संस्कलपबोई- सखिभ्याम् सखिभ्यः ७ सख्योः सखीनाम् . सख्यो सखिषु १ हे सखे ! हे सखायो ! हे सखायः ! १६-पति शब्द में इतना भेद है कि उस के तृतीया, चतुर्थी, पञ्चमी, षष्ठी और सप्तमी के एकवचन में सखि शब्द के समान और शेष सब रूप अग्नि शब्द के समान होते हैं। कति और त्रि शब्द बहुवचनान्त हैं उन के रूप इस प्रकार होंगे-कति १ । कति २ । कतिभिः३। कतिभ्यः४ । कतिभ्यः ५। कतीनाम् ६। कतिषु । त्रयः । जीन् २। त्रिमिः ३ । त्रिभ्यः ४ । त्रिभ्यः ५। त्रयाणाम् ६। त्रिषु ७ । द्वि शब्द केवल द्विवचनान्त है उस के सप इस प्रकार होंगे । द्वौर द्वाभ्याम् ३ द्वयोः २ ॥ दीर्घ ईकारान्त “प्रधी" शब्द प्रधीः प्रध्यौ प्रध्यः २ प्रध्यम् ३ प्रध्या प्रधीभ्याम् অঘীwি: प्रधीम्यः ४ मध्ये ५ प्रध्यः ६ मध्योः " प्रध्याम् प्रधीषु . 3 मध्यि १ हे प्रधीः ! हे प्रध्यौ ! प्रमः होते हैं परन्तु . अजन्तपुझिङ्गम् ३३ -प्रायः ईकारान्त शब्दों के रूप 'प्रधी' शब्द के समान 'पपी" शब्द के द्वितीया के एकवचन और बहुवचन तथा सप्तमी के एकवचन में क्रमशः-पपीम् । पपीन् । पपी । ये रूप होते हैं। शेष सब सूप 'प्रधी' के समान हैं। ' सुधी' शब्द में कुछ विशेष है। १-सुधीः सुधियों सुधियः २-सुधियम् ३-मुधिया सुधीभ्याम् सुधीतिः ४-सुधिये, सुधियै सुधीभ्यः ५-सुधियः, सुधियाः ६- १ सुधियोः सुधीनाम् ,सुधियाम् 9-मुधियि। सुधियाम् सुधीषु १-हे सुधीः ! हे सुधियो ! हे मुधियः ! हस्व उकारान्त “वायु" शब्द १-वायुः वायू २-वायुम् वायून् ३-वायुना वायुभ्याम् ४-वायवे ५-वायोः वाच्यः वायूनाम् वायु १-हे वायो ! हे वायू ! हे वायवः ! -वायु के ही समान प्रायः सब उकारान्त शब्दों के रूप होते हैं परन्तु कोष्टु' शब्द में कुछ भेद है ॥ वायवः वायुभिः वायुभ्यः 9-वायौ संस्कृतप्रबोधे- १-क्रोश १-पुन ः काष्टारो क्रोष्टारः २-कोष्टारम् कोष्टन् ३-क्रोष्ट्रा, कोष्टुना क्रोष्टुभ्याम् कोष्टुभिः ४-क्रोष्ट्र, कोष्टवे कोष्टुभ्यः ५-कोष्टुः, कोष्टीः क्रोष्ट्रीः । क्रोष्ट्वोः कोष्ट नाम् 9-क्रोष्टरि, कोष्टी -हे क्रोष्टः ! हे क्रोष्टरी हे कोष्टारः। दीर्घ ऊकारान्त “पुनर्भू " शब्द पुनभ्वौं पुनर्वः २-पुनर्वम् ३-पुनभ्यो पुनर्भूभ्याम् पुनर्भूभिः पुनर्भूभ्यः ५-पुनर्वः पुनवाः पुनर्वाम् 9-पुनर्वि पुन षु हे पुनर्भूः । हे पुनवौं ! हे पुनर्वः ! ce-पुनर्भू के ही समान खलपू , वर्षाभू, इन्भू और करभू आदि अन्य ऊकारान्त शब्दों के रूप होते हैं। स्वयम्भू शब्द में कुछ विशेष है। १-स्वयम्भूः स्वयम्भुवी खयम्भुवः २-खयम्भुवम् ३-खयम्भुवा स्वयम्भूम्याम् অক্ষুঝি ४-पुनवें " 9- १-धाता धातारः ३-धात्रा " मजन्तलिङ्गम् ४-खयम्भुवे स्वयम्भूभ्याम् स्वयम्भूभ्यः ५-स्वयम्भुवः स्वयम्भुवोः स्वयम्मुवाम् -स्वयम्भुवि स्वयम्भूषु १-हे स्वयम्भूः ! हे स्वयम्भुवौ ! हे स्वयम्भुवः ! ऋकारान्त धात" शब्द धातारी २-धातारम् धातन् धातृभ्याम् धातृभिः ४-धात्रे धातृभ्यः ५-धातुः धात्रोः धातृणाम् 9-धातरि धातृषु हे धातः ! हे धातारौ ! हे धातार! १००-धातृ शब्द के ही समान नप्त, त्वष्टु, क्षत्त, होत,पोत, प्रशास्त्र और उद्गात आदि ऋकारान्त शब्दों के रूप होते हैं, परन्तु पित, भ्रातृ,जामात और न शब्दों की उपधा को प्रथमा के द्विवचन से लेकर द्वितीया के द्विव- चन तक दीर्घ नहीं होता। यथा-पितरौ । पितरः । पितरम् । पितरौ। इसी प्रकार भ्रातृ जामात और नृ शब्द में भी समझो। तथा “ नृ शब्द को षष्ठी के बहुवचन में नृणाम् । नृणाम् । ये दो रूप होते हैं । शेष सब रूप धातृ शब्द के तुल्य समझने चाहिये।

संस्कृतप्रबोधे-
२-रायम् रायौ
रायः
राभ्यः
ओकारान्त “गो" शब्द
१-गौः। गावी। गावः । ३-गाम् । गावी। गाः ।
३-गवा । गोभ्याम् । गोमिः ४-गवे । गोभ्याम् । गोभ्यः
५-गोः । गोभ्याम् । गोभ्यः । ६ गोः । गवोः । गवाम् ।
9-गवि । गवोः । गोषु । सं०हे गौः ! हे गावौः ! हे गावः!
१०१ -अन्य भोकारान्त शब्दों के रूप भी गो शब्द के
समान ही होते हैं।
ऐकारान्त “रै" शब्द
१-राः रायो रायः
३-राया राभ्याम् राभिः ४-राये
राभ्याम्
५-रायः राभ्याम् राभ्यः ६-रायः रायोः
रायाम्
-रायि रायोः रासु हे राः ! हे रायौ ! हेरायः !
१०२-सब ऐकारान्त शब्दों के रूप रे के समान होते हैं ।
औकारान्त "ग्लौ" शब्द
१-ग्लौः ग्लायो ग्लायः २-ग्लावम् ग्लावी ग्लावः
३-ग्लावा ग्लौभ्याम् ग्लौमिः४ - ग्लावेः ग्लौभ्याम् ग्लोभ्यः
५-ग्लावः ग्लोभ्याम् ग्लौभ्यः ६-ग्लावः ग्लावोः ग्लायाम्
8-ग्लावि ग्लावोः ग्लोषु १-हेग्लौः हेग्लावी हेग्लावः!
२-अजन्तस्त्रीलिङ्गम्
आकारान्त “विदया" शब्द
१-विद्या विद्ये विद्याः
कर्ता
२-विद्याम् विद्य विद्याः कर्म

" " m- मजन्तस्त्रीलिङ्गम् ३-विद्यया विद्याभ्याम् विद्याक्षिः करणम् ४-विद्यायै विद्याभ्यः सम्प्रदानम् ५-विद्यायाः अपादानम् विद्ययोः विद्यानाम् सम्बन्धः s-विद्यायाम् विद्यासु मधिकरणम् विद्ये ! हे विद्ये! हे विद्याः ! सम्बोधनम् १०३-विद्या के ही समान प्रायः अन्य आकारान्त स्त्रीलिङ्ग शब्दों के रूप होते हैं, केवल अम्बा शब्द के सम्बोधन में हेअम्ब ! होता है। जरा शब्द में कुछ विशेष है। १- जरा जरसौ, जरे जरसः, जराः २-जरसम्, जराम् ३-जरसा, जरया जराभ्याम् जराभिः ४-जरसे, जराय ५-जरसः, जरायाः जरसोः,जरयोः जरसाम्,जराणाम् 9-जरसि,जरायाम् जरासु १- हे जरे! हे जरसी! हेजरे ! हे जरसः ! हजराः ! १०४-आकारान्त सर्वनाम सर्वा' शब्द के चतुर्थी के एक- वचन में “सर्वस्यै” पञ्चमी और षष्ठी के एकवचन में " सर्वस्याः षष्ठी के बहुवचन में । सर्वासाम् और सप्तमी के एकवचन में “ सर्वस्याम् " रूप होंगे शेष सब रूप “विद्या" शब्द के तुल्य । सर्वा के ही समान विश्वा, उमा, अन्या, अन्यतरा आदि आकारान्त सर्व. नामों के रूप होते हैं । द्वितीया और तृतीया शब्दों के चतुर्थी, पञ्चमी, षष्ठी और सप्तमी के एकवचन में " जराभ्यः " ६- " " ४ ३८ संस्कृतप्रबोधे- " निशा" शब्द १- निशा ६-" " दो २ रूप होते हैं, एक विद्यावत् और दूसरे सर्वावत् । शेष विद्यावत् ॥ आकारान्त निशे मिशाः २-निशाम् निशः,निशाः ३-निशा,निशया निड्भ्यानिशाभ्यानिभिः,निशामिः ४-निशे,निशाय निभ्यःनिशाभ्यः ५-निशः,निशायाः निशोः,निशयोः निशाम्,निशानाम् 9-निशि,निशायाम् निम्,निटत्सु,निशासु १-हे निशे ! हे निशे ! हे निशाः ! १०५-गोपा, विश्वपा और निधिपा आदि आकारान्त की लिङ्ग शब्द पुल्लिङ्ग “विश्वपा के ही सदृश हैं । इकारान्त "श्रुति" शब्द श्रुती श्रुतयः श्रुतीः ५-श्रुत्या श्रुतिभ्याम् श्रुतिभिः ४-श्रुत्ये, श्रुतये श्रुतिभ्यः ५-श्रुत्याः, श्रुतेः श्रुतिभ्याम् अतिभ्यः ६. अत्योः श्रुतीनाम् ७-श्रुत्याम्, श्रुती श्रुतिषु १-हे श्रुते ! हे श्रुती ! १०६-श्रुति के ही समान प्रायः अन्य सब ह्रस्व इकारान्त स्त्रीलिङ्गशब्दों के रूप होते हैं। त्रिशब्द बहुवचनान्त है १-श्रुतिः २-श्रुतिम् - हे श्रुतयः असन्ततीलिङ्गम् ३९ उस के रूप इस प्रकार होंगे। तिस्त्रः २। तिमभिः । तिसभ्यः २ । तिसृणाम् । तिसषु । “चतुर यद्यपि रेफान्त है परन्तु रूप उस के त्रिशब्द के समान होते हैं यपा-चतस्त्रः २। चतसृभिः । चतसृभ्यः २ । चतरुणाम् । चतसुषु “द्वि" शब्द द्विवचनान्त है उस के रूप त्रीलिङ्ग में इस प्रकार होंगे। द्वे २। द्वाभ्याम् ३ । द्वयोः २ ॥ ईकारान्त “नदी" शब्द १-नदी नद्यौ नद्यः ५-नद्याः नदीभ्याम् नदीभ्यः २-नदीम् नदीः६- नद्योः नदीनाम् ३-नद्यानदीभ्याम् नदी मिः-नद्याम् नदीषु ४-नये नदीभ्यः।-हे नदि ! हे नद्यौ! हे नद्यः ! १०७-नदीके ही समान प्रायः अन्य ईकारान्त स्त्रीलिङ्गशब्दों के रुप होते हैं । लक्ष्मी, तरी, तन्त्री आदि में इतना भेद है कि इन के प्रथमा के एकवचन में विसर्ग का लोप नहीं होता-लक्ष्मीः । तरीः । तन्त्रीः । शेष सब रुप नदी के समान । “ स्त्री द्वितीया विभक्ति के एकवचन और बहुवचन में दो २ रूप होते हैं-स्त्रियम् , खीम् । त्रियः, स्त्रीः । शेष सब नदीवत् । "श्री" शब्द के द्वितीया के एकवचन में “श्रियम् बहुवचन में “श्रियः चतुर्थी के एकवचन में “श्रियै- “प्रिये पञ्चमी और षष्ठी के एकवचन में “ श्रियाः • “श्रियः षष्ठी के बहुवचन में “ श्रीणाम् " " श्रियाम् " और सप्तमी के एक- शब्द की ४० संस्कृतम्रोधे- धेनूः ६-" । चम्योः चमूनाम् वचन में “श्रियि "श्रियाम्" ये दो २ रूप होते हैं। शेष सब लक्ष्मीवत् ॥ उकारान्त धेनु " शब्द १-धेनुः धेनू धेनवः५-धेन्वाः,धेनोः धेनुभ्याम् धेनुभ्यः २-धेनुम् " धेन्योः धेनूनाम् ३-धेन्वाधेनुभ्याम् धेनुमिः -धेन्वाम्,धेनौ धेनुषु ४-धेन्वै,धेनवे" धेनुभ्यः१-हेधेनो ! हेधेनू ! हेधेनवः ! इसीके समान उकारान्त स्त्रीलिङ्गशब्दों के रूप होते हैं दीर्घ अकारान्त "चमू” शब्द १-चमूः चम्बो. चम्वः ५-चम्वाः चमूभ्याम् चमूम्यः २-चमूम् चमूः ३-चम्बा चमूभ्याम् धमूमिः -चम्बाम् चमूषु धमूभ्यः १ हे चमू ! हेचम्बौ! हे चम्बः ! १०८-* चमू के ही समान वधू शरयू आदि जकारान्त शब्दों के रूप भी होते हैं । १०६-" स्वयम्भू • " पुनर्भू" आदि शब्द ब्रीलिङ्ग में भी पुल्लिङ्ग के ही समान होते हैं । ११० -ऋकारान्त खीलिङ्ग "स्वसू शब्द पुल्लिङ्ग धात' शब्द के समान है। केवल द्वितीया के बहुवचन में "स्वसः" होता है। मात शब्द तुल्य केवल द्वितीया के बहुवचम में “ मातः " होता है। भाव के ही सदृश याद और ननान्दू आदि शब्द भी हैं १११-ओकारान्त " यो " शब्द " गो के तुल्य है । '२" शब्द यहां भी पुंलिङ्ग के समान है और नी' शब्द 'ग्लो' के तुल्य है। Y-चम्वै . " पित ३-अजन्तनपुंसकलिङ्गम् । अकारान्त “फल" शब्द १-फलम् । फले। फलानि ! २-फलम् । फलें । फलानि । ११२-शेष सब कारकों के सब वचनों में पुंलिङ्ग देव शब्द के समान रूप होते हैं । इसी के सदृशं सब मका- रान्त नपुंसक लिङ्गों के रूप होते हैं । केवल कतर, कतम, अन्य, अन्यतर और इतर इन पांच सर्वनामों के प्रथमा और द्वितीया के एकवचन में कतरत, कतमत्, अन्यत्, अन्यतरत् भौर इतरत् ये सूप होते हैं। शेष सब सर्वे के समान ।। अकारान्त नपुंसकलिङ्ग " हृदय” शब्द- १-हृदयम् हृदये हृदयामि हृन्दि ३-हृदा, हृदयेन हृद्भ्याम्, हदयाभ्याम् हृद्धिः,हृदयैः ४-हृदे,हृदयाय हृद्भ्यः,हृदयेभ्यः ५-हृदः, हृदयात्-द् हृदयस्य हृदोः,हृदययोः हृदाम्,हृदयानाम् -हदि,हृदये हत्म,हृदयेषु १-हे हृदय ! हे हृदये ! हे हृदयानि! अकारान्त नपुंसकलिङ्ग “उदक" शब्द- १-उदकम् . उदके उदकानि उदामि ३-उद्ना,उदकेन उभ्याम् , उदकाभ्याम् उदक्षिा,तदकैः २- - - १२ संस्कृतप्रबोधे- ६ 2 ४-उने,उदकाय उदभ्याम् उदकाभ्याम् उदभ्यः, उदकेभ्यः ५-उद्नः उदकात्- " उदकस्य तद्नोः,उदकयोः तद्नाम्,उदकानाम् 9-उनि, उदनि,उदके उदसु, उदकेषु १-हे उदक ! हे उदके ! हे उदकानि ११३-नपुंसकलिङ्ग में आकारान्त शब्द भी इस्व होकर अकारान्त के ही समान हो जाते है । यथा-मधुपा शब्द-मधुपम् । मधुपे । मधुपानि । इकारान्त “ वारि ” शब्द १ वारि वारिणी वारीणि ५ वारिणः वारिभ्यां वारिभ्यः " वारिणोः वारीणाम् ३ वारिणा वारिम्यां वारिभिः ७ वारिणि " वारिषु ४ वारिणे वारिभ्यः १ हे वारि ! हे वारे ! १४-प्रायः इकारान्त नपुंसकलिङ्ग वारि शब्द के समान होते हैं। परन्तु अस्थि,दधि, सक्थि और अक्षि शब्दों में कुछ भेद है-तृ० १ अस्थ्ना। च० १ अस्थ्ने । पं०१ अस्नः । १०१ अरश्नः । ष०२ अस्थनोः । १० ब० अस्थमाम् । स०१ अस्टिन,अस्थनि । स०२ अस्थ्नोःशेष सब रूप वारि शब्द के तुल्य हैं । दधि, सक्थि और मक्षि शब्दों में भी अस्थि के ही समान परिवर्तन होता है। सुधी और प्रधी शब्द नपुंसकलिङ्ग में हु. स्वान्त होकर वतीया विभक्ति से आगे एक पक्ष में तौ वारि शब्द के समान होते हैं और दूसरे पक्ष में लिङ्ग सुधी और प्रधी शब्द के समान । यथा- अधिना । सुधिया। मधिना । प्रध्या । इत्यादि। - । । । हलन्तलिङ्गम् उकारान्त “मधु" शब्द प्रथमा-मधु । मधुनी। मधूनि । द्वितीया-मधु । म. धुनी । मधूनि । तृतीया-मधुना। मधुभ्याम् । मधुभिः। धतुर्थी-मधुने । मधुभ्याम् । मधुभ्यः । पञ्चमी-मधुनः मधुभ्याम् । मधुभ्यः । षष्ठी-मधुनः। मधुनोः। मधू. नाम् । सप्तमी-मधुनि । मधुनोः । मधुषु । संबोधन- हे मधु ! हे मथो । इत्यादि । १९५-इसी के समान समस्त उकारान्त नपुंसकलिङ्ग शब्दों के रूप होते हैं। दीर्घऊकारान्त शब्द भी ह्रस्व होकर इस्वतकारान्त शब्दों के समान होजाते हैं। यथा-" सुलू " शब्द-सुलु । सुलुनी । सुलूनि । इत्यादि ॥ ऋकारान्त धात" शब्द- १-धात। धावणी। धातृणि।२-धात्। धातृणी। धातृणि। १९६-शेष विमक्तियों में एक पक्ष में वारि शब्द के समान और दूसरे पक्ष में पुल्लिङ्ग धातृशब्द के समान रूप होंगे। यथा-धातुणा, धात्रा । इत्यादि। इसी के समान अन्य ऋाकारान्तशब्दों के भी रुप होंगे ॥ एकारान्त और ऐकारान्त नपुंसक शब्द ह्रस्व होकर इकारान्त के समान और ओकारान्त और औकारान्त शब्द इस्व होकर उकारान्त के समान होजाते हैं। ४-हलन्तपुंल्लिङ्गम् हकारान्त “ मधुलिह" शब्द- १-मधुलिट् , मधुलिङ् मधु लिही मधुलिहः ।

४४ संस्कृतप्रबोधे- . २- मधुखिहम् मधुलिही मधुलिहा ३- मधुलिहा मधुलिड्भ्याम् मधुलिभिः ४- मधुलिहे मधुलिड्भ्यः ५- मधुलिहा मधुलिहोः मधुलिहाम् मधु लिहि मधुलिस १-हे मधुलिट् ! हे मधुलिड् ! इत्यादि । १९७- इसी के समान तुरासाह शब्द के रूप भी होते हैं। परन्तु पदान्त में दन्त्य 'स' को मूर्द्धन्य 'ष' होजाता है यथा-तुराषाह । तुराषाभ्याम् । गोदुह शब्द में इतना भेद है कि " मधुलिह मधुलिह " में जहां २ ट् हुवा है वहां २" गोदुह " में क् और जहां २ ड् हुवा है वहां २ ग आदेश होगा। यथा-गोधुक, गोधुग । गोधुग्भ्याम् । इत्यादि । मित्रद्रुह् " शब्द " और " गोदुह " दोनों के समान रूप होते हैं । यथा-मित्रध्रुट् । मित्रध्रुड् । मित्रध्रुक् । मित्रध्रुग् । मित्रध्रुड्भ्याम् । मित्रध्रुग्भ्याम् । इत्यादि । तत्वमुह, स्नुह और स्निह् शब्दों के रूप भी "मित्र- " के सुल्य ही होते हैं । " अनडुङ् " और विश्ववाह " शब्दों में कुछ भेद है। यथा- १-अनड्वान् अनहवाही अनड्वाहा २-अनड्वाहम् मनः ३-अनहुहा अनडुद्भ्याम् अनडुद्धिः ४-अनडुहे अनहुभ्यः ५-अनडुहः के “ मधुलिह ४५ १-विश्ववाद, विश्ववाहः हलन्तपुल्लिङ्गम् ६-अनहुहः अनछुहोः मनाहाम् ७-अनहुहि अनडुत्सु १-हे अमड्वन् ! हे अनड्वाही ! हे अनड्वाहः ! विश्ववाही २-विश्वशाहम् विश्वौहः ३-विश्वौहा विश्ववाड्भ्याम् विश्ववामिः ४-विश्वौहे विश्ववाडभ्यः ५-विश्वौहः विश्वौहोः विश्वौहाम् 9-विश्वौहि विश्ववाद १-हे विश्ववाट ! इत्यादि । १९--विश्ववाह के ही समान भारवाह आदि शब्दों के रूप भी होते हैं। १९९-रेफान्त "चतुर" शब्द केवल बहुवचनान्त है । यथा- १ चत्वारः २ चतुरः ३ चतुर्भिः ४ चतुर्व्यः ५ चतुर्व्यः ६ चतुर्णाम् ७ चतुषु ॥ वकारान्त “ सुदिव ” शब्द १-सुधीः मुदिवी सुदिवः ५-सुदिवः मुद्युभ्याम् सुद्युभ्यः २-सुदिवम् ६ सुदियोः सुदिवाम् ३-मुदिवा सुद्युभ्याम् सुद्युमिः ७-सुदिवि सुधुप ४- सुदिवे मुद्युभ्यः १-हे सुद्यौः ! इत्यादि । मकारान्त सर्वनाम “ इदम्" शब्द ३-अनेन आभ्याम् एमिः २-इमम् एभ्यः १-अयम् मौ इमानू ४-अस्मै अनयोः एषाम् राजः " संस्कृतप्रबोधे- ५-भस्मात् भाभ्याम् एभ्यः -अस्मिन् अनयोः एषु ६-अस्य १२०-अन्वादेश में द्वितीया के तीनों वचन, और तृतीया के एकवचन और षष्ठी और सप्तमी के द्विवचन में “इदम्" शब्द को 'एन' आदेश होकर-एनम् । एनौ। एनान्। एनेन । एनयोः २। ये ६ रूप होते हैं । १२१-“ किम् सर्वनाम को "क" आदेश होकर अकारान्त “सर्व शब्द के समान रूप होजाते हैं यथा-कः । की। के। इत्यादि। नकारान्त “राजन् " शब्द १-राजा राजानी राजानः ५-राज्ञः राजभ्याम् राजम्यः २-राजानम् राजोः राज्ञाम् ३-राज्ञा राजभ्याम् राजभिः७-राशि,राजनि, राजसु g-राजे राजभ्यः सं-हे राजन् ! इत्यादि । १२२-" यज्वन् शब्दमें इतना भेद है कि उस के द्वितीया के बहुवचन से लेकर सप्तमी के बहुवचन तक हलादि विभक्तियों को छोड़कर उपधा के अकार का लोप नहीं होता। यथा-यज्वनः । यज्वना । यज्वने। य. ज्वनः २ । यज्वनोः २। यज्वनाम् । यज्वनि । पूषन, मर्य्यमन् और वृत्रहनू शब्द राजन् शब्द के समान हैं परन्तु ब्रह्मन् और आत्मन् शब्द “ यज्वन् शब्द के सदृश हैं । अर्वन् शब्द में कुछ विशेष है । १-अर्वा अर्वन्तौ अवन्तः ५-अवतः अद्भ्याम् अद्भ्यः २-अवन्तम् अर्वतः६ अर्वतोः अर्वताम् ३-अर्वता मर्वद्भ्याम् अर्वद्भिः 8-मर्वति मर्वत्र अर्वद्भ्यः सं०-हे अर्वन् ! इत्यादि । ४-अर्वते ४७ यूनः ६- हलन्तपुंलिङ्गम् १२३- मघवन्" शब्द एक पक्ष में तो राजन् " शब्द के तुल्य है -१ मघवा । मघवानी २ मघवानः। मघ. वानम् । मघवानौ। मघोनः । इत्यादि । द्वितीय पक्ष में " अर्धन " शब्द के सदृश है केवल प्रपमा के एकवचन में * मघवान् " ऐसा रूप होता है । युवन् " शब्द १- युवा युवानी युवानः ५-यूनः युवभ्याम् युवभ्यः २-युवानम् यूनोः यूनाम् ३-यूना युवभ्याम् युवभिः ७-यूनि युवसु ४-यूने युवभ्यः सं०-हेयुवन् ! इत्यादि । श्वन् " शब्द १-श्वा श्वानी श्वानः ५-शुनः श्वम्याम् २-श्वानम् शुनः ६-" शुनोः शुनाम् ३-शुना श्वभ्याम् श्वभिः ७ वसु ४-शुने श्वभ्यः सं०-हेश्वन् ! हेश्वानौ ! हेश्वानः ! " वाग्मिन् " शब्द वाग्मिनी वाग्मिनः २-वाग्मिनम् ३-वाग्मिना वाग्मिभ्याम् वाग्मिभिः ४-वाग्मिने वाग्मिभ्याम् वाग्मिभ्यः ५ -बाग्मिनः वाग्मिनीः वाग्मिनाम 9-वाग्मिनि वाग्मिनोः वाग्मिषु सं०-हे वाग्मिन् ! 'हेवाग्मिनी! हे वाग्मिनः वम्यः " ७-शुनि १-वाग्मी " संस्कतप्रबोधे- पथः " इसी के सदृश दण्डिन् , शान्,ि यशखिन आदि सब इतन्तशब्दों के रूप होंगे । "पथिन्" शब्द १-पन्थाः पन्थानी पन्थानः ५-पथः पथिम्याम्पथिभ्यः २-पन्थानम् ६- " पथोः पथाम् ३-पथा पथिभ्याम् पथिभिः -पथि पथिषु ४-पथे पथिभ्यः सं०-हे पन्थाः ! इत्यादि १२४-"पपिन् के तुल्य ही “ मधिन " शब्द के भी रूप होते हैं। संख्यावाचक "पञ्चन शब्द केवल बहुवचनान्त है। यथा-पञ्च २। पञ्चभिः। पञ्चभ्यः२। पञ्चानाम्। पञ्चसु । इसी के समान सप्तन् , नवन और दशन शब्दों के भी रूप होते हैं। “अष्टन्" शब्द में कुछ भेद है। यथा- अष्टौ २। अष्टाभिः । अष्टाभ्यः २। अष्टानाम् । अष्टासु । एक पक्ष में “पञ्चन के समान भी रूप होते हैं । जकारान्त अश्वयुज " शब्द १-अश्वयुक,ग मञ्चयजी भश्वयुजः २-अश्वयुजम् ३-अश्वयुजा अश्वयुग्भ्याम् अश्वयुग्मिः ४-अश्वयुजे अश्वयुग्म्यः ५-अश्वयुजः ६-" मध्युजोः अश्वयुजाम् 9-अश्वयुजि अश्वयुद्ध सं०-हे मञ्चयुक्! हे अश्वयुजौ! हे अश्वयुजः १२५-इसी के समान ऋत्विज आदि जकारान्त शब्दों के रूप भी होते हैं परन्तु " सम्राज शब्द में कुछ भेद है। यथा- " " हलन्तपुंलिङ्गम् y सम्राजी सम्राजः १-सम्राट २-सम्राजम् ३-सम्राजा ४-सम्राजे सघाड्भ्याम् सम्राभिः सम्राभ्यः ५-सम्राजः सम्राजोः " के सम्राजाम् 9-सम्राजि सम्राट्स सं०-हे सम्राट् ! हे सम्राड् ! इत्यादि । १२६-" सम्राज " के ही समान विभ्राज, परिव्राज और विश्वसृज आदि शब्दों के रूप भी होते हैं । परन्तु विश्वराज " शब्द में इतना भेद है कि हलादि विभक्तियों में " विश्व " शब्द के अकार को दीर्घ होजाता है यथा- विश्वाराट् । विश्वाराड् । विश्वाराडम्याम् । इत्यादि शेष विभक्तियों में सम्राज युष्मद् ” शब्द १-त्वम् युवाम् यूयम् वाम् २-स्वाम् युष्मान् ५-त्वत् युवाभ्याम् युष्मत् वाम् ६-तव युवयोः युष्माकम् ३-त्वया युवाभ्याम् युष्माभिः६-ते वाम् ४-तुभ्यम् युष्मभ्यम् ७-त्वयि युवयोः युष्मासु अस्मद शब्द १-अहम् आवाम् वयम् २-मा नौ २-माम् " अस्मान् ३-मया मावाभ्याम् अस्माभिः तुल्य है। दकारान्त सर्वनाम “ ४-ते वः २-त्वा ५ ५० संस्कतप्रबोध- ४-मे ४-मह्यम् आवाभ्याम् अस्मभ्यम् ६-मम आवयोःअस्माकम् नी नी ५-मत् मावास्याम् अस्मत् 9-मयि भावयोः अस्मासु १२७-ये दोनों शब्द तीनों लिङ्गों में एक से ही रहते हैं। "यद्" शब्द “किम् के तुल्य अकारान्त होकर सर्व के समान होजाता है। यथा-१-यः यो ये २ यम् यो बान् इत्यादि । त्यद्, तद् और एतद् शब्दों के रूप भी " यद् के ही समान होते हैं केवल प्रथमा के एकवचन में अनन्त्य तकार को सकार होकर-स्यः, सः और एषः ये रूप बनते हैं। इदम् और एतद् शब्द को द्वितीया के तीनों वचन और तृतीया के एकवचन और षष्ठी तथा सप्तमी के द्विवचन में यदि अन्वादेश हो तो " एन " आदेश हो जाता है। किसी बात को एकवार कह कर पुनः कहना अन्वादेश कहाता है यथा-अनेन वा एतेन छात्रेण व्याकरणमधीतम् । अथो एनम् छन्दो- ऽध्यापय । इस छात्र ने व्याकरण पढ़ लिया अब इस को वेद पढ़ा मो। अनयोः वा एतयोश्छात्रयोः शोभन शीलम् । अथो एनयोः पवित्रं कुलश्च । इन दोनों छात्रों का स्वभाव उत्तम है और इन का कुल भी श्रेष्ठ है। दकारान्त “ द्विपाद " शब्द १-द्विपात, द्विपाद् द्विपादौ द्विपादः २-द्विपादम् द्विपदः ३-द्विपदा द्विपादुभ्याम् द्विपाद्धिः ४-द्विपदे द्वपाद्भ्यः प्राचः ६-" इलन्तपुंशिङ्गम ५-द्विपदः द्विपाभ्याम् द्विपाद्भ्यः ६-, द्विपदो द्विपदाम् ७-द्विपदि द्विपास्तु सं०-हे द्विपात् ! इत्यादि । १२८-इसी प्रकार सुपाद्, चतुष्पाद्, व्याघ्रपाद् आदि शब्दों के रूप होंगे। चकारान्त " प्राच " शब्द १-माङ् प्राची प्राञ्चः ५-प्राचः प्राग्भ्याम् प्राग्भ्यः २-प्राञ्चम् " प्राची प्राचाम् ३-माचा माग्भ्याम् प्राग्भिः 9-प्राचि प्रादु ४-माचे प्राग्भ्यः १-हे माङ् । हेप्राञ्चौ! हेमावः। चकारान्त " प्रत्यच" शब्द १-प्रत्यङ् प्रत्यची प्रत्यञ्चः २-प्रत्यञ्चम् प्रतीचः प्रत्यग्भ्याम् प्रत्यग्निः ४-प्रतीचे ५-प्रतीचः प्रतीची प्रतीचाम् 9-प्रतीचि प्रत्यक्षु १ हे प्रत्यङ् हे प्रत्यचौ! हे प्रत्यञ्चः ! १२९-"प्रत्यच्" शब्द के ही समान उदच, सम्यच और सध्यच् शब्दों के रूप भी होते हैं। तिर्यच शब्द में कुछ भेद है। ३-प्रतीचा प्रत्यग्भ्यः 2 " " ६ - ५२ संस्कृतप्रबोधे- तिर्यच् " शब्द १-तिर्यक तिर्यञ्ची तिर्यवः २-तिर्यञ्चम् तिरश्वः ३-तिरश्चा तिर्यग्म्याम् तिर्यग्भिः ४-तिरश्चे तिर्यग्भ्यः ५-तिरश्चः तिरश्चोः लिरश्चाम् 9-तिरश्चि तिर्यक्ष ९-हे तिर्य। हे तिर्यचौ ! हे तिर्यञ्चः ! तकारान्त महत् "शब्द महान् महान्तौ महान्तः महतः महद्भ्याम् महद्भ्यः महान्तम् महतः महतोः महताम् महता महद्भ्याम् महद्भिः माति महते महद्भ्यः हे महन् ! इत्यादि । १३०-'महत्' शब्द के ही समान 'अवत' शब्द भी है परन्तु इसके प्रथमा के द्विवचन से लेकर द्वितीया के द्विवचन तक उपधा को दीर्घ नहीं होता। यथा- अवन्ती प्रवन्तः । भवन्तम् । अवन्तौ । शेष रूप महत् शब्द के समान हैं। गोमत् और धनवत् आदि য प्रवत् " शब्द के समान हैं । "ददत् शब्द में इतना भेद है कि इस को प्रथमा और द्वितीया विभक्ति में "नुम् " का आगम नहीं होता। यथा- ददत् । ददतौ । ददतः । ददतम् । ददती। शेष सब भवत् " के समान । ददत्." शब्द के ही तुल्य नक्षत् , जाग्रत् ; दरिद्रत , शासत् और चकासत् शब्दों के रूप भी होते हैं।

इलन्तपुंलिङ्गम् ५३ पकारान्त “गुप्" शब्द १-गुप,गुरू गुपौ गुपः ५-गुपः गुठभ्याम् गुठभ्यः २-गुपम् ६-, गुपोः गुपाम् ३-गुपा गुरुभ्याम् गुडिभः ७-गुपि गुप्त ४-गुपे गुरुभ्यः १-हे गुप् ! इत्यादि १३१-इसी के समान तृप दूप" आदि पकारान्त शब्दों के रूप भी होते हैं। शकारान्त " तादृश्" शब्द १-तादृक ग वादशी तादृशः २-तादृशम् ३-तादृशा तादूग्भ्याम् ताग्भिः ४-तादृशे तादृग्भ्यः ५-तादृशः तादृशाम् -तादृशि तादृक्षु -हे ताक ! इत्यादि १३२-"तादृश् के ही समान यादृश , ईदृश्, कीदृश और स्पश शब्दों के भी रूप होते हैं विश्" शब्द में इतना भेद है कि उस को हलादि विभक्तियों में ट् और इ होते हैं । यथा-विट, विड् । विड्भ्याम् । विड्मिः । इत्यादि । “नश् " शब्द एक पक्ष में तो • के ही समान है , द्वितीय पक्ष में " के समान । यथा-नक, नग, नट, नड् । नग्भ्याम् , नड्भ्याम् । इत्यादि । दक्ष शब्द सकारान्त है पर सूप " तादृश तादृशोः " तादृश ' विश् के ही तुल्य ५४ संस्कृतप्रबोधे- होते हैं। " रत्नमुष्" शब्द भी षकारान्त है पर सूप "विश्के समान होते हैं । षकारान्त “चिकीर्ष" शब्द- १-चिकीः चिकीर्षों चिकीर्षः २-चिकीर्षम् ३-चिकीर्षा चिकीयम् विकीर्ति ४-चिकीर्ष चिकीयः ५-चिकीर्षः चिकीर्षाः चिकीर्षाम् 9-चिकीर्षि चिकीर्षु १-हे चिकीः ! इत्यादि १३३-"पिपठिष" शब्द भी ॥ चिकीर्ष" के समान केवल सप्तमी के बहुवचन में "पिपठीषु होता है। षष " शब्द केवल बहुवचनान्त है यथा-षट् २। षमिः । षड्भ्यः २ । घण्णाम् । षट्स । सकारान्त उशनस् ” शब्द १-उशना उशनसौ २-उशनसम् ३-उशनसा उशमोम्याम् उशनोभिः ४-उशनसे उशनोभ्यः ५-उशनसः उशनसोः ভাষা 9-उशनसि १-हे उशमः ! हे उशन ! हे उशनन् ! इत्यादि । ९३४-इसी के समान " अनेहरू * और पुरुदंशस भादि उशनसः তখন उशनस् के ही तुल्य यह विस- इलन्तपुंलिङ्गम् सकारान्त शब्दों के रूप भी होते हैं। केवट सम्बो- धन में-हे अनेहः ! हे पुरुवंशः ! एक ही रूप होता है।" वेधस् * शब्द भी॥ है, केवल प्रथमा के एकवचम में "वेधाः । र्गान्त रूप होता है । चन्द्रमस , वृद्धश्रवस् , जातधे. दस्, विडोजस , सुमनस्, सुप्रजम और सुमेधस् आदि शब्द भी “वेधस " के ही समान हैं। विद्वस् और पुंस शब्दों में कुछ भेद है सो दिखलाते हैं । १-विद्वान् विद्वांसी विद्वांसः५-विदुषःवितुझ्याविद्वद्भ्यः २-विद्वांसम् विदुषः६- , विदुषोः विदुषाम् इविदुषा विद्वद्भ्याविद्वद्भिः -विदुषि विद्वत्सु ४-विदुषे विद्वद्भ्यः१–हे विद्वन् ! इत्यादि । ९-पुमान् पुमांसी पुमांसः ५-पुंसः पुंभ्याम् पुंभ्यः २-पुमांसम् पुंसः ६ पुंसोः पुंसाम् ३-पुंसा पुभ्याम् पुंभिः ७-पुंसि पुंछ ४-पुंसे पुंभ्यः १-हे पुमन् ! इत्यादि । १३५-विद्वस के ही समान शुश्रुवस और " जग्मिवस् आदि शब्दों के रूप होते हैं । सकारान्त सर्वनाम “अदस्" शब्द १-असी अमू अमी ५-अमुष्मात् अमूभ्याम् अमीभ्यः २-भमुम्" अमून् ६-अमुष्य भमुयोः अमीषाम् अमुना भमूभ्याम् अमीमिः 9-अमुष्मिन् , अमीषु ४-अमुष्मै अमीभ्यः ५-हलन्तस्त्रीलिङ्गम् " हकारान्त उपानह " शब्द १-उपानत्, उपानही उपानहः २-उपानहम् ३-उपानहा उपानद्भ्याम् उपानद्भिः ४-उपानहे उपानद्भ्यः ५-उपानहा उपानहोः उपानहाम् 9-उपानहि उपानत्सु १-हे उपानत् ! इत्यादि १३६-"उष्णिह" शब्द भी " उपानह के समान है केवल हलादि विभक्तियों में कुछ भेद है । यथा- उष्णिक, उष्णिन् । उष्णिग्भ्याम् । उष्णिग्भिः। उष्णिक्षु । इत्यादि वकारान्त 'दिव, “ शब्द ५-द्यौः दिवौ दिवः ५-दिवः धुभ्याम् धुभ्यः २-दिवम् दिवोः दिवाम् ३-दिवा धुभ्याम् धुमिः ७-दिवि धुषु ४-दिवे धुभ्यः सं०-हेद्यौः! हेदिवौ ! हेदिवः । रेफान्त “ गिर " शब्द १-गीः गिरी गिरः ५ गिरः गीाम् गीर्यः गिरोः गिराम् ३-गिरा गीाम् गीर्भिः 9 गिरि गीर्ष ४-गिरे गीयः १ हे गीः ! हेगिरौ! हे गिरः ! इसी के समान पुर और धुर् शब्दों के भी रूप होते हैं। यथा-पूः पुरी पुरः ।धूः धुलैधुरः । इत्यादि । " २-गिरम् ॥ ६ १-इयम् इमे माभिः -अस्थाम् " आभ्यः हलन्तस्त्रीलिङ्गम् मकारान्त सर्वनाम “ इदम् " इदम्" शब्द इमे इमाः ५-अस्याः माभ्याम् आभ्यः २-इमाम् अनयोः आसाम् ३-अनया आभ्याम् आसु ४-अस्यै १३७-"किम्" शब्द को स्त्रीलिङ्ग में "का होकर "सर्वा के तुल्य इसके रूप होते हैं। यथा-का। के । का।इत्यादि तद् यद् और एतद् ये तीनों सर्वनाम भी आका. रान्त होकर सर्वा के तुल्य होजाते हैं। यथा-तद्-सा । ते । ताः । यद्-या । ये । याः । एतद् एषा । एते । एताः । इत्यादि । १३८ -जकारान्त "स्रज शब्द के रूप पुंल्लिङ्ग "ऋत्विज" शब्द के समान होते हैं । यथा-स्रक, स्त्रम्। स्रजः । स्नग्भ्याम् । स्रक्षु । इत्यादि ॥ १३९-चकारान्त शब्द के रूप मी. शब्द के समान ही होते हैं। यथा-वाक्, वाग। वाचो । वाचः । वाचा । वाग्भ्याम् । इत्यादि । इसी के तुल्य ऋच् और त्वच शब्द भी हैं । १४०-शकारान्त दृश् और दिश् शब्दों के रूप पुंलिङ्ग तादृश" शब्द के सदृश होते हैं। यथा-दृक, दृग। दिक, दिग। दृशौ दिशौ । दृग्भ्याम्। दिग्भ्याम् । इत्यादि । १४१-षकारान्त "विष" शब्द के रूप पुंग्लिङ्ग "रत्नमुष" शब्द के समान होते हैं । यथा-स्विट्, विड्। त्विषौ। त्विषः । त्विषा । विड्भ्याम् । इत्यादि । स्त्रज १८ संस्कतप्रबोधे- । १४२-सजुष और माशिष शब्द पुंलिङ्ग "पिपठिष" शब्द के समान हैं। यथा-संजः । सजुषो। सजुषः । सजुषा। साम् । इत्यादि । आशीः।आशिषो । आशिषा । आशीर्थ्याम् । इत्यादि। १४३-पकारान्त "अ" शब्द केवल बहुवचनान्त है। यथा-१ मापः २ अपः ३ अद्भिः ४ अभ्यः ५ अभ्यः ६ अपाम् ७ अप्सु ॥ सकारान्त सर्वनाम “ अदस् " शब्द १-मसी अमू अमूः ५-अमुष्याः अमूभ्याम् अमूभ्यः २-अमूम् " अमुयोः अमूषाम् ३-अमुया अमूभ्याम् अमूभिः -अमुष्याम् " अमूषु ४-अमुष्य अमूभ्यः ६. १ " " ६-हलन्तनपुंसकलिङ्गम् हकारान्त “ स्वनडुह” शब्द प्रथमा-स्वनडुत्,स्वनडु स्वनही स्वनड़वांहि द्वितीया- शेष सब रूप पुंलिङ्ग अनडुह् * शब्द के समान हैं। वार " शब्द १-वाः वारी वारि वारी वारि १४४-शेष सब रूप त्रीलिङ्ग गिर " शब्द के समान यथा-वारा । वाभ्यांम् । इत्यादि । " चतुर" शब्द रेफान्त" २-वाः वारी हैं " हलन्तस्त्रीलिङ्गम् १९ बहुवचनान्त है। यथा-१ चत्वारि चत्वारि शेष पुंलिङ्ग के सदृश है। मकारान्त सर्वनाम किम् और इदम् शब्द-किम् । के। कानि । इदम् । इमे। इमानि ॥ शेष पुंलिङ्गवत् । अन्वादेश में द्वितीया के तीनों वधनों में एनम् । एने। एनानि । ये रुप होंगे। नकारान्त नामन्” शब्द १ नाम नाम्नी,नामनीनामानि नाम्नः नामभ्याम् नामम्यः २"" नाम्नोः नाम्नाम् ३ नाम्ना नामभ्याम् नामभिः ७ नाम्नि " नामसु ४ नाम्ने नामभ्यः सं० हेनाम,हेनामन् ! इत्यादि इसी के समान सामन्, दामन और व्योमन् आदि शब्दों के रूप होते हैं। नकारान्त " अहन् ” शब्द १अहःमही अहनी महानि ५ अहः अहोभ्याम् अहोभ्यः अहोः अहाम् ३ अहाअहोभ्याम् अहोशिः 9 अहि,अहनि" अहसु ४ भन्हे अहोभ्यः १ हे महः ! इत्यादि । १४५-ब्रह्मन् शब्द-ब्रह्मा । ब्रह्मणी । ब्रह्माणि । पुनरपि. ब्रह्म। ब्रह्मणी । ब्रह्माणि । आगे पुंलिङ्ग ब्रह्मन्" शब्द के तुल्य है। "वाग्मिन् शब्द वाग्मि वाग्मिनी वाग्मीनि वाग्मि वाग्मिनी वाग्मीनि १४६-आगे पुंलिङ्ग के तुल्य है इसी के समान स्रग्विन ६ संस्कृतप्रबोधे- " सुपथिन् * शब्द और दण्डिन् आदि शब्दों के रूप भी होते हैं। " शब्द में कुछ विशेष है यथा-सुपथि । सुपथी। सुपन्थानि पुनः-सुपथि । सुपथी। सुपन्थानि शेष पुंलिङ्ग पथिन् * शब्द के समान ॥ १४७-दकारान्त सर्वनाम "तद्” शब्द-तद् । ते । तानि । पुनरपि-तद् । ते। तानि । शेष पुंग्लिङ्गवत् । इसी प्रकार त्यद्, यद् और एतद् को भी जानो। अन्वा. देश में-एनत् । एने। एनानि॥ १४८-तकारान्त "शक" शब्द-शकृत् । शकती। शन्ति पुनरपि - शरुत् । शरुती । शन्ति । आगे पुंलिङ्ग "महत् " शब्द के तुल्य है ॥ १४९-"ददत् शब्द के प्रथमा और द्वितीया के बहुवचन में दो २ रूप होते हैं । यथा-ददति । ददन्ति । शेष सब "शकृत्" के समान हैं । " ददत् " के ही तुल्य शासत्, चकासत्, जाग्रत्, जक्षत् और दरिद्रत रूप भी जानो। १५०-"तुदत शब्द के प्रथमा और द्वितीया के द्विवचन में दो २ रूप होते हैं। यथा-तुदती। तुदन्ती । शेष सब "शक" के तुल्य । “पचत् शब्द का उक्त विभक्तियों में एक २ रूप ही होता है। यथा-प- चन्ती। शेष सब "शकत् के समान । समान ही 'दीव्यत" को भी जानो "यकत्" में कुछ विशेष है। पचत् " के हलन्तनपुंसकलिङ्गम् यकृती १-यात् यन्ति यकानि, " " ३-यका,यकृता यकभ्याम्, यकद्भ्याम् यकभिः, यकृद्धिः ४-यक्र,यकते यकभ्यः यकद्भ्यः ५-यकः, यकृतः यकोः, यकतोः यताम्, यकृताम् 9-यकनि,यक्रि ,यकृति यकसु, यकृत्यु षकारान्त “धनष' शब्द सकारान्त पयस शब्द १-धनुः धनुषी धनषि १-पयः पयसी पयांसि २- २- ३-धनुषा धनुाम् धनुर्भिः ३-पयसा पयोभ्याम् पयोभिः ४-धनुषे धनुर्व्यः ४-पयसे पयोभ्यः ५-धनुषः ५-पयसः धनुषोः धनुषाम् ६ पयसोः पयसाम् ७-धनुषि पयरस १-हेधनुः! इत्यादि ॥ १-हे पयः ! इत्यादि। १५१- धनुष के ही समान यजुष, वपुष' चक्षुष और हविष आदि षकारान्त शब्दों के रूप होते हैं। १५२-"पपस्" के ही सदृश वासस्, भोजस्, मनस, सरस, यशस और तपस आदि सकारान्त शब्दों के रूप भी होते हैं। सर्वनाम “ अदस्" शब्द -अदः अमू भमूनि २-अदः ममू प्रमूनि शेष पुंलिङ्ग " अदस" के समान जानो। धनुष्षु -पयसि ६ चतुर्थाऽध्यायः अथ कारकाणि ११३-क्रिया के हेतु को कारक कहते हैं या यों कहना चा- हिये कि जिसके द्वारा किया और संज्ञा का सम्बन्ध विदित होता है उसे कारक कहते हैं । १५४-कारकों के सात भेद हैं जिन के नाम ये हैं-कर्ता, कर्म,करण,सम्प्रदान, अपादान,शेष * और अधिकरण। १-कर्ता १५५-कर्ता उसे कहते हैं जो स्वतन्त्रतासे क्रिया को सम्पा- दन करे और जो प्रेरणा करके दूसरे से क्रिया करावे उस की भी कर्तृ संज्ञा है। ऐसे प्रयोजक कर्ता को हेतु भी कहते हैं। १५६-कर्तृकारक में यदि क्रिया का फल कर्ता ही में रहे तो प्रथमा विभक्ति होती है। यथा-शिष्यः पठति-शिष्य पढ़ता है। गुरुः पाठयति=गुरु पढ़ाता है । १५७-यदि क्रिया का फल कर्म में जावे तो कर्म में भी प्रथमा विभक्ति होती है । यथा-क्रियते कटः । प्रियते भारः। हियते कालः ॥ १५८-यदि संज्ञा का अर्थ वा लिङ्ग वा वचन वा परिमाण मात्र ही कहना हो तो प्रथमा विमक्ति होती है। यथा-अर्थमात्र-विवेकः स्मृतिः । ज्ञानम्। लिङ्गमात्र- * वैयाकरणों ने शेष को कारक नहीं माना है किन्तु ६ कारकों से जो अवशिष्ट रहजाता है उसको शेष माना है। चाहे शेष को कारक न मानो, परन्तु इसका विषय सब कारकों से बढ़ा हुआ है क्योंकि अन्य कारकों से जो कुछ शेष रहता है वह सब इसी के पेट में समाता है।

ফাজালি ६३ तटः। तटी। तटम् । वचममात्र-एकाद्वी। बहवः । परिमाण-द्रोणः । खारी । भादकम् । अपदं न प्रयुञ्जीत इसके अनुसार संस्कृत में वस्तु का नि- देश भी विना विभक्ति के नहीं होता। १५६-( सम्बोधन ) किसी को चिताकर अपने अभिमुख करने में भी १ विभक्ति होती है। हेशिष्य ! भोगुरी। ९६०-कर्म उसे कहते हैं जो कर्ता का इष्टतम हो मर्थात् क्रिया के द्वारा कर्ता जिसको सिद्ध करना चाहे वा करे। वह यदि मनुक्त हो अर्थात् क्रियाफल से रहित हो तो उसमें द्वितीया विभक्ति होती है। यथा- विद्यां पठति। धनमिच्छति । कहीं अनिष्ट की भी, जिसको कर्ता नहीं चाहता, कर्म संज्ञा होती है। यथा-चौरान् पश्यति-चोरों को देखता है। कगट- कानुजङ्घयति-कांटोको खूदता है। इनके अतिरिक्त जहां पर और कोई कारक नहीं कहा गयावहां भी कर्म कारक होता है । यथा-माणवकंपन्यानं पृच्छति बालक से मार्ग को पूछता है। शिष्यं धर्ममनुशास्ति- शिष्य को धर्म का उपदेश करता है । यहां माणवक और शिष्य शब्दों में अन्य कारक अनुक्त हैं इसलिये इन दोनों में भी कर्म कारक होगया ॥ १६१-काल और मार्ग के अत्यन्त संयोग में भी द्वितीया विभक्ति होती है । यथा-मासमधीतोऽनुवाक:= एक महीने तक लगातार अनुधाक पढ़ा । क्रोशं कुटिला नदी-एक क्रोश तक नदी बराबर टेढ़ी है। - -

६४
संस्कृतप्रबोधे-
१६२-मन्तरा और अन्तरेण शब्द के योग में भी द्वितीया
विशक्ति होती है। अन्तरा त्वां च मां च पुस्तकम् -
मेरे और तेरे बीच में पुस्तक है। अन्तरेण पुरुषकारं
नकिञ्चिन्मन्यते-धिना पुरुषार्थ के कुछ नहीं मिलता।
१६३-उसयतः, सर्वतः, अमितः, परितः, समया, निकषा,
धिक, हा और प्रति इन शब्दों के योग में भी द्वि-
तीया विभक्ति होती है। उसयतः ग्रामम्। धिक जा-
ल्मम्।हा दरिद्रम् । बुभुक्षितं न प्रतिमाति किञ्चिद् ।
९६४-कर्मप्रवचनीय शब्दों के योग में भी द्वितीया वि.
भक्ति होती है। यथा-नदीमन्यव सिता सेनानदी
से सेना लगी हुई है। अन्वर्जुनं योद्वारः अर्जुन से
नीचे योद्धा हैं । वृक्षं प्रति विद्योतते विद्युत् वृक्ष
पर बिजली चमकती है। साधुस्त्वं मातरं प्रति
तू माता पर मेहरबान है । इत्यादि ।
१६५-मार्गबाचक शब्दों को छोड़कर गत्यर्थक धातुओं के
कर्मकारक में द्वितीया और चतुर्थी दोनों विभक्तियां
होती हैं। यथा-ग्रामं गच्छति । ग्रामाय गच्छति ।
ग्रामं व्रजति । ग्रामाय व्रजति। ग्रामं याति। चामाय
याति=ग्राम को जाता है। भार्गवाचकों में तो
द्वितीया ही होगी। यथा-मार्ग गच्छति । पन्थान
गच्छति । अध्वानं याति । इत्यादि ।
३-करणम्
१६६-करण कारक ससे कहते हैं जिसके द्वारा कर्ता क्रिया
को सिद्ध करे अर्थात् जो क्रियासिद्धि का साधन हो।

कारकाणि
इस कारक में सदा तृतीया विभक्ति होती है-हस्तेन
गृह्णाति-हाथ से पकड़ता है। पादेन गच्छति-पैर
चलता है । वस्त्रेणाच्छादयति धन से उकता है।
१६७-कर्तृ कारक में भी यदि क्रिया का फल कती में न
जावे किन्तु कर्म में रहे तो तृतीया विभक्ति होती
है । यथा-शिष्येण पठ्यते पुस्तकम् शिष्य से
पुस्तक पढ़ी जाती है। पान्थेन गम्यते पन्थापथिक
से मार्ग जाया जाता है। आचार्यणोपदिश्यते धर्म
आचार्य से धर्म उपदेश किया जाता है- इत्यादि ।
१६८-जहां क्रिया की समाप्ति हुई हो वहां काल और
मार्ग के अत्यन्त संयोग में तृतीया विभक्ति होती
है। यथा-मासेनानुवाकोऽधीतः एक मास में अनु-
वाक पढ़ लिया। योजनेनाध्यायोग्धीतः एक योजनमें
अध्याय पढ़ लिया। जहां क्रिया की समाप्ति न हुई
हो वहां द्वितीया होती है। मासमधीतो नायात
एक महीने तक पढ़ा परन्तु नहीं माया ॥
१६९-सह शब्द या उस के पर्यायवाचक शब्दों का योग
हो तो अप्रधान में तृतीया विभक्ति होती है।पुत्रेण
सहागतः पिता पुत्र के साथ पिता आया। शिष्येण
साकं गत आचार्यः= शिष्यके साथ आचार्य गया।
१७०-जिस विकृत अङ्ग से अङ्गी का विकार उशित होता
हो उस से तृतीया विभक्ति होती है। यथा-अक्षणा
काय= आंख से काणा । शिरसा खल्वाटः शिर
से गंजा। पाणिना कुण्ठः हाप से झुंजा । इत्यादि
।

संस्कृतप्रबोधे-
१७१-जिम लक्षण से जो पहचाना जावे उस से भी
वृतीया विभक्ति होती है। यथा-टाभितापसः-
जटाओं से तपस्वी। यज्ञोपवीतेन द्विजः-यज्ञोपवीत
से द्विज वेदाध्ययनेन विप्रः वेदाध्ययन से ब्राह्मण
१५२-जिस के होने में जो कारण हो उसे हेतु कहते हैं।
हेतुवाचक शब्दों से भी तृतीया होती है । यथा-
विद्यया यशः =विद्या से कीर्ति। धर्मेण सुखम् धर्म
से सुख। धनेन कुलम्धन से कुल ॥
१७३-यदि कोई गुण हेतु हो तो उस से तृतीया और
पञ्चमी दोनों विभक्तियां होती हैं स्त्रीलिङ्ग को छोड़
कर । यथा-ज्ञानेन मुक्तिः । ज्ञानान्मुक्तिः= ज्ञान से
मुक्ति । अज्ञानेन बन्धः । अज्ञानाद्बन्धः । यहां जान
और अज्ञान मुक्ति और बन्ध के हेतु हैं । स्त्रीलिङ्ग में
तौ तृतीया ही होती है यथा-प्रज्ञया मुक्तः । अविद्यया
बदः प्रज्ञा से छूट गया। अविद्या से बन्ध गया।
१७४-इन के सिवाय प्रकृति मादि शब्दों के योग में भी
वृतीया विभक्ति होती है । यथा-प्रकृत्या दर्शनीयः
स्वभाव से दर्शनीय है। प्रायेण वैयाकरणः =प्रायः
वैयाकरण है। गोत्रेण गार्यः= गोत्र से गार्य है।
माना यज्ञदत्तः नाम से यज्ञदत्त है। सुखेन वसति-
सुख से रहता है । दुःखेन गच्छति= दुःख से जाता
है। समेन मार्गण धावति= सम मार्ग से दौड़ता है।
विषमेण पथा याति-विषम मार्ग से जाता है। इत्यादि
४-सम्प्रदानम्
१७५-जिसके लिये कर्ता कर्म द्वारा क्रिया करे अर्थात्

কাজালি कर्म से जिस का सपकार या उपयोग किया जाय उसे सम्प्रदान कारक कहते हैं और इस में सदा चतुर्थी विभक्ति होती है । यथा-विप्राय धनं ददाति= ब्रा. 'हरण के लिये धन देता है। दीनेभ्यो दीयते-दोनों के लिये अन्न दिया जाता है। केवल क्रिया से भी जिस का उपयोग किया जाय उसकी भी सम्प्रदान संज्ञा है । यथा-युद्धाय सन्ह्यते युद्ध के लिये सद्यत होता है। अध्ययनाय यतते अध्ययन के लिये यत्र करता है। कहीं २ पर कर्म की करण संज्ञा और सम्प्रदान की कर्म संज्ञा भी हो जाती है । यथा- हविषा देवान् यजते-हविः देवेभ्यो ददातीत्यर्थः= हविष्य से देवताओं का यजन करता है अर्थात् देव- ताओं के लिये हविष्य देता है । १७६-जो पदार्थ जिस प्रयोजन के लिये है यदि उस से वही प्रयोजन सिद्ध होता हो तो उम को तादर्थ्य कहते हैं। उस में चतुर्थी विभक्ति होती है। यथा-यूपाय दारु = यूप ( यज्ञस्तम्भ ) के लिये काष्ठ । कुण्डलाय हिरण्यम्=कुण्डल के लिये सौना। रन्धनाय स्थाली राधने के लिये बटलोई । मुक्तये जानम् = मुक्ति के लिये ज्ञान । इत्यादि । क्लूपिधातु और उम के पर्याय वाचक धातुओं के प्रयोग में भी तुर्थी विभक्ति होती है। यथा-मूत्राय कल्पते यवागूः शिखरन मूत्र के लिये होती है। धर्माय संपद्यते सुकृतम् = शुभकर्म धर्म के लिये होता है । अधर्माय जायते दुष्कृतम् लिये होता है । हित शब्द के %3D %D अशुभ कर्म अधर्म R संस्कृतप्रबोधे- योग में भी चतुर्थी होती है। ब्राह्मणेभ्यो हितम् । प्रजायै हितम् । उत्पात की सूचना में भी चतुर्थी विभक्ति होती है। यथा-वाताय कपिला विद्युदात- पायातिलोहिनी । पीता वर्षाय विजेया दुर्भिक्षाय सिता भवेत् कपिल वर्ण की बिजली वायु के लिये, रक्त वर्ण की धूप के लिये,पीत वर्ण की वर्षा के लिये, और श्वेत वर्ण की दुर्भिक्ष के लिये होती है। १७७-रुष्यर्थक धातु मों के प्रयोग में प्रीयमाण ( प्रसन्न होने वाला) जो अर्थ है उस की भी सम्प्रदान संज्ञा है। यथा-बालकाय रोचते मोदक. =बालक को लड्ड रुचता है। ब्राह्मणाय स्वदते पायसम्ब्राह्मण को खीर स्वादु' लगती है ॥ १७८-स्पृह धातु के प्रयोग में ईप्सित (चाहाहुवा ) जो अर्थ है उस को भी सम्प्रदान संज्ञा होती है। यथा- पुष्पेभ्यः स्पृश्यति-पुष्पों के लिये इच्छा करता है. १७९-क्रुध, द्रुह, ईर्ष्या और असूयार्थक धातुओं के प्रयोग में जिस के प्रति कोप किया जावे उस की सम्प्रदान संज्ञा होती है। यथा-छात्राय क्रुध्यति-शिष्य पर क्रोध करता है। शत्रवे दुह्यति-शत्रु से द्रोह करता है । संपवाय ईय॑ति-धनवान् की ईर्ष्या करता है । दुष्टाय असूयति दुष्ट की निन्दा करता है । १८०-यदि क्रियार्था क्रिया उपपद हो तो तुमुन् प्रत्यय के कर्म कारक में चतुर्थी विशक्ति होती है। यथा- फलेभ्यो याति । फलान्याहतु यातीत्यर्थः फलों के म कारकाणि यहां ॥ लिये जाता है अर्थात् फलों के लेने को जाता है। भाहर्तुम् " क्रिया क्रिया और "याति सामान्य क्रिया है। १८१-भाववचनान्त शब्दों से भी पूर्व अर्थ में चतुर्थी वि. क्ति होती है। यथा-यागाय याति । यष्टुं पातीत्यर्थः- यज के लिये जाता है अर्थात् यज्ञ करने को जाता है। अध्ययनाय गच्छति । अध्येतुं गहतीत्यर्थः = पढ़ने को जाता है। १८२-नमः, स्वस्ति, स्वाहा, स्वधा, अलम् और वषट् इन अव्ययों के योग में भी चतुर्थी विभक्ति होती है। यथा-देवेभ्यो नमः। प्रजाभ्यः स्वस्ति। अग्नये स्वाहा। पितृभ्यः स्वधा । वषडिन्द्राय। अलं नकुलः सोय सर्प के लिये नकुल समर्थ है । अलं सिंहो नागाय- हाथी के लिये सिंह समर्थ है। १८३-प्राणिवर्जित मन धातु के कर्म कारक में यदि अना- दर सूचित होता हो तो विकल्प से चतुर्थी विभक्ति होती है । पक्ष में द्वितीया भी होती है । यथा- अहं त्वां तृणं मन्ये । अहं त्वां तृणाय मन्ये=मैं तुझ को के बराबर समझता हूं। प्राणी कर्म हो तो द्वितीया ही होगी । अहं त्वां ऋगालं मन्ये= मैं तुझको ऋगाल समझता हूं। जहां अनादर न हो वहां भी द्वितीया ही होगी। यथा-अश्मानं दृषदं मन्ये मन्ये काष्ठमु. लूखलम्=मैं पत्थरको पत्थर मानता हूं और उलूखल को काष्ठ मानता हूं। तृण 90 संस्कृतप्रबोधे- से ५-अपादामम् १८५-जो पृथक करने वाला कारक है उसे अपादाम कहते हैं । अपादान में सदा पञ्चमी विभक्ति होती है। यथा-पर्वतादवतरतिपर्वत से उतरता है । वृक्षा. त्पर्णानि पतन्ति वृक्ष पत्र गिरते हैं। यहां पर्वत और वृक्ष से कर्ता अलग होता है इसलिये इनकी अपादान संज्ञा हुई । जुगुप्मा, विराम और प्रमाद अर्थ में भी अपादान कारक होता है यथा-पापाज्जु. गुप्सते-पाप से निन्दित होता है। श्रमाद्विरमति= परिश्रम से विराम करता है। धर्मात्प्रमाद्यति धर्म से प्रमाद करता है॥ १८५-भय और रक्षार्थक धातुओं के प्रयोग में जो भय का हेतु हो उसकी अपादान संज्ञा है । यथा-चोराद्वि. भेति चोर से डरता है। व्याघ्रादुद्विजते=सिंह से कांपता है। धीरेभ्यखायते= चोरों से बचाता है। हिंसकाद्रक्षति= हिंसक से रक्षा करता है। १८६-परापूर्वक 'जि' धातु के प्रयोग में असह्य जो अर्थ है उसकी अपादान संज्ञा होती है । यथा-अध्यय- नात्पराजयते= पढ़ने से मागता है। पौरुषात्परा- जयते= पुरुषार्थ से भागता है। सह्य अर्थ में कर्म संज्ञा होगी। शत्रून्पराजयते शत्रुओं को १८७-निवारणार्थक धातुओं के प्रयोग में ईप्सित (चाहा हुवा) जो अर्थ है उसकी भी अपादान संज्ञा होती है। हराता है।

कारकाणि ११ यथा-क्षेत्रात गां वारयति क्षेत्र से गाय को निवारण करता है। पाकालयात श्वानं निवर्तयति । पाकालय से कुत्ते को हटाता है। १८८-नियमपूर्वक विद्या ग्रहण करने में व्याख्याता की अपादान संज्ञा होती है। यथा--उपाध्यायादधीते- उपाध्यायसे पढ़ता है। व वक्तः शृणोति-वकासे सुनता है १८९-जनी धातु के कर्ता का जो कारण है उसकी भी अपादान संज्ञा है। यथा-शृङ्गाच्छरो जायते सींग से बाण बनाया जाता है । गोमयाद् वृश्चिको जायते= गोबर से विच्छू उत्पन्न होता है । १९०-भू धातु के कर्ता का जो प्रभव ( उत्पत्तिस्थान ) है उसकी भी अपादान संज्ञा है। यथा-हिमवतः गगन प्रभवति-हिमवान् से गङ्गा उत्पन्न होती है । आकरा- द्विरस्यं प्रभवति खान से सौना पैदा होता है । १९९-ल्यब प्रत्यय का लोप होने पर कर्म और अधिक. करण कारक में भी पञ्चमी विभक्ति होती है। कर्म में-प्रासादमारुह्य प्रेक्षते-प्रासादात्प्रेक्षते-महल पर चढ़कर देखता है अर्थात् महल से देखता है । अधि. करण में-आसने उपविश्य प्रेक्षते-आसनात्प्रेक्षते- भासन पर बैठ कर देखताहे अर्थात् आसनसे देखता है। प्रश्न और उत्तर के प्रसङ्ग में भी पञ्चमी विभक्ति होती है। यथा-कुतो भवान् कहां से आप? पाद- लिपुत्रास्=पटने से । जहां से मार्ग का परिमाण निर्धारण किया जाय वहां भी पञ्चमी होती है -

७२
संस्कृतम्रबोधे-
-
हस्तिनापुरादिन्द्रप्रत्यं पञ्चदशयोजनपरिमितम् =
हस्तिनापुर से इन्द्रप्रस्थ पन्द्रह योजन है ।
१९२-अप माङ् और परि इन कर्मप्रवचनीयों के योग
में भी पञ्चमी विभक्ति होती है। अप और परि वर्जन
अर्थ में और आङ् मर्यादा अर्थ में कर्मप्रवचनीय
संजक होते हैं। यथा----अप त्रिगतभ्यो वृष्टः। परि
त्रिगर्तेभ्यो वृष्टः त्रिगत देशों को छोड़कर बर्मा ।
आपाटलिपुत्रात् वष्टः पटने तक बर्मा । मामुक्त
संसार:=मुक्ति होने तक संसार है।
१९३-प्रतिनिधि और प्रतिदान अर्थ में प्रति उपसर्ग की
कर्मप्रवचनीय संज्ञा होती है, जिस से प्रतिनिधि और
प्रतिदान विधान कियेजायें उसकी भी अपादान संज्ञा
होती है। प्रतिनिधि-कृष्णः पाण्डवेभ्यःप्रति-कृष्ण
पायवों की ओर से प्रतिनिधि है। प्रतिदान-तिलेभ्यः
प्रतियच्छति माषान् =तिलोंके बदले उड़द देता है।
१९४-अन्य , आरात् , इतर , ऋते और दिक् शब्दों के
योग में भी पञ्चमी होती है। यथा-त्वदन्यः तुक
से अन्य । मद्वित: मुझ से भिन्न । यस्मादारात
जिससे समीप । तस्मादितर: उस से और । ऋते
जानात-ज्ञान के विना । पूर्वो ग्रामात्-ग्राम से
पूर्व । उत्तरी ग्रामात्-ग्राम से उत्तर । पूर्वी ग्रीष्माद्
वसन्तः वसन्त ग्रीष्म से पहिला है। उत्तरो ग्रीमो
वसम्तात-ग्रीष्म वसन्त से पिछला है।

কায়ালি
३
१९५-पृथक् , विना और मामा शब्दों के योग में वतीया
और पञ्चमी दोनों होती हैं। यथा-पृथग्देवदत्तन ।
पृथग्देवदत्तात् । इसी प्रकार विना और नाना में
भी समझो।
१९६-अद्रव्यवाचक स्तोक, अल्प, कृच्छ्र और कतिपय
शब्दों के करण कारक में तृतीया और पञ्चमी दोनों
विभक्ति होती हैं। यथा-स्तोकेन मुक्तः । स्तोका-
न्मुक्त: थोड़े से छूटगया। द्रव्यवाचकों में तो तृतीया
ही होगी। यथा-स्तोकेन विषेण हतः थोड़े से विष
से मरगया। अल्पेन मधुना मत्तः थोडीसी मदिरा
से उन्मत्त होगया ।
१९७-दूर और समीप वाचक शब्दों में पञ्चमी और षष्ठी
विभक्ति होती हैं। यथा-दूरं ग्रामात्। दूरं ग्रामस्य=
ग्राम से दूर।समीपं ग्रामात् । समीपं ग्रामस्य ग्राम
के समीप ।
।
६-शेषः
१९८-कर्मादि कारकों से मिन्न जो स्वस्व और सम्बन्ध
मादि का सूचक हो वह शेष है और उस में सदा
षष्ठी विक्ति आती है। यथा-राजापुरुषः= राजा
का पुरुष । गुरोः शिष्या=गुरु का शिष्य । पितुः
पुत्रः पिता का पुत्र ॥
१९-हेतु शब्द के प्रयोग में षष्ठी विभक्ति होती है।
यथा-अनस्य हेतोर्वसति-अन्न के हेतु वसता है।
सर्वनाम के साथ हेतु शब्द के प्रयोग में तृतीया और
षष्ठी दोनों विभक्तियां होती हैं। यथा-केन हेतुमा
वसति, कस्य हेतोर्वसति-किस लिये वसता है?

७४ संस्कृततम्बोधे- -- .. २००-स्मरणार्थक धातुओं के कर्म कारक में षष्ठी विभक्ति होती है। यथा-मातुः स्मरति-मातरं स्मरतीत्यर्थः= माता को स्मरण करता। २०१-कुन धातु के कर्म कारक में यदि उस का संस्कार कर्तव्य हो तो षष्ठी विभक्ति होती है । यथा-उद- कस्योपस्कुरुते-उदकं संस्करोतीत्यर्थः जल को साफ़ करता है। २०२-ज्वरि और सन्तापि धातु को छोड़कर भाववाचक रोगार्थक धातुओं के कर्म कारक में षष्ठी विभक्ति होती है। यथा-अपथ्याशिनः रुजति रोगः अप- भ्याशिमं रोगः रुजतीत्यर्थःबदपरहेज़ को रोग सताता है । ज्वरि और सन्तापि धातु के प्रयोग में तो द्वितीया ही होगी । यथा-निर्बलं ज्वरयति ज्वरः निर्बल को ज्वर सताता है। अविमृश्यकारिणं सन्तापयति तापः विना सोचे काम करने वाले को ताप तपाता है। २०३-व्यवह, पण और दिव धातु यदि समानार्थक हों तो इन के कर्म कारक में षष्ठी विभक्ति होती है। द्यूत और क्रय विक्रय व्यवहार में इन की समानार्थता होती है- शतस्य व्यवहरति । शतस्य पणते । शतस्य दीव्यति सौ का जुवा खेलता है वा सौ का व्यवहार करता है । २०४-कृत्वोर्थप्रत्ययों के प्रयोग में काल भधिकरण हो तो उस में षष्ठी विभक्ति होजाती है। यथा-द्विरहो भुङ्क्त दिन में दो बार खाता है। पञ्चकत्वोर हो:- धोते-दिन में पांचवार पढ़ता है।

কালি - २०३-कृत् प्रत्ययों के योग में कर्ता और कर्म दोनों कारकों में षष्ठी विकि होती है। कर्ता में-पाणिनेःकति पाणिनि की रचना । गायकस्य गीतिः गायक का गाना । कर्म में-अपां स्रष्टा जलों का बनाने वाला। पुरा भत्ता नगरों का भेदन करने वाला ॥ २०६-जिस कृत् प्रत्यय के प्रयोग में कर्ता और कर्म दोनों की प्राप्ति हो वहां केवल कर्म में ही षष्ठी हो, कर्ता में नहीं। यथा-रोचते मे मोदनस्य भोजनं देवदत्सेन मुझे चावल का भोजन देवदत्त से रुचता है। यहां देवदत्त कर्ता में तृतीया ही रही परन्तु ओदन कर्म में षष्ठी होगई॥ २०७-वर्तमान काल में विहित जो 'त' प्रत्यय है उस के योग में षष्ठी विभक्ति होती है यथा-राजा मतः= राजाओं का माना हुवा । विदुषां बुद्धः विद्वानों का जाना हुआ। भूत काल में द्वितीया होगी। ग्राम गतः=ग्राम को गया। नपुंसकलिङ्ग में भावविहित 'त' प्रत्ययके योग में षष्ठी होती है। यथा-छात्रस्य हसितम्- शिष्य का हंसना। मोरस्य नृत्तम्-मयूर का नाचना । कर्ता की विवक्षा में तृतीया भी होगी- छात्रेण ह- सितम् छात्र ने हंसा। मयूरेण नृत्तम् मोर ने नांचा ॥ २०८-कृत्यसंज्ञक प्रत्ययों के प्रयोग में कर्ता में षष्ठी विकल्प से होती है पक्ष में तृतीया होती है-त्वया करणीयम् तव करणीयम्=तुझ को करना चाहिये। २०९-तुल्यार्थवाचक शब्दों के योग में तृतीया और षष्ठी विभक्ति होती हैं तुला और उपमा शब्दों को छोड़ संस्कसप्रबोधे- % कर। यथा-तेन तुल्यः तस्य तुल्याउस के बराबर। केन सदृशः कस्य सदृशः किस के बराबर । तुला भौर उपमा शब्दों के योग में कोयल षष्ठी ही होगी। यथा-ईश्वरस्य तुला नास्ति । तस्योपमापि न विद्यते ईश्वर की तुला नहीं है, उसकी सपमा भी नहीं है। ९९०-आशीर्वाद मर्थ हो तो भायुष्य, भद्र, भद्र, कुशल, मुख, अर्थ और हित इन शब्दों के योग में चतुर्थी और षष्ठी विभक्ति होती हैं । यथा-आयुष्यं ते भू. यात, आयुष्यन्तव भूयात् तेरी वा तेरे लिये बड़ी भायु हो। भद्रं ते भूयात्, भद्रं तव भूयात्-तेरा वा तेरे लिये कल्याण हो । इत्यादि। -अधिकरणम् २९१-जिस में जाकर किया ठहरे अर्थात् क्रिया के आधार को अधिकरण कहते हैं और इस में सदा सप्तमी विभक्ति होती है। अधिकरण तीन प्रकार का है-१ औपल्लेषिक -शकदे मास्ते-गाड़ी में बैठा है। कटे शेते-चटाई पर सोता है। स्याल्यां पति-बट- डोई में पकाता है। इत्यादि। यहां गाड़ी और चटाई में कर्ता का और बटलोई में कर्म का श्लेष मात्र है। २-वैषयिक-व्याकरणे निपुणः व्याकरण में निपुण । सदसि वक्ता सभा में बोलने वाला। धर्ममिनिवेश धर्म में प्रवेश । इत्यादि । यहाँ व्याकरण, सभा और धर्म विषय मात्र हैं।३-अभिव्यापक-तिलेषु तेलम् । पनि घृतम् । सर्वस्मिनामा । इत्यादि। यहां तिलों में तेल, दही में एत और सब में मामा व्यापक हैं।

कारकाणि 99 २१२-निमित्त ( हेतु ) से कर्म का संयोग होने पर भी सप्तमी विभक्ति होती है। यथा- धर्मणि दीपिनं हन्ति दन्तयोईन्ति कुञ्जरम् । केशेषु चमरी हन्ति सीम्नि पुष्कलको हतः ॥ चर्म के हेतु गेंडे को मारते हैं, दान्तों के निमित्त हाथी को, केशों के लिये चामर मृग को मारते हैं और कस्तूरी के कारण पुष्कलक मृग मारा जाता है। यहां हेतु में तृतीया को रोक कर सप्तमी हुई॥ २१३-जिस की क्रिया से क्रियान्तरलक्षित हो उस से सप्तमी विभक्ति होती है। यथा-गोषु दुह्यमानासु गतः।दुग्धा- स्वागतः गायों के दुहे जाते हुवे गया था। दुहे जाने पर आगया । अग्निषु हूयमानेषु गतः । हुतेष्वागतः अग्नि में हवन होते हुवे गया था, हवन हो चुकने % 3D पर आगया॥ २१४-अनादर सूचित होता हो तो जिस की क्रिया से क्रियान्तर लक्षित हो उस से षष्ठी और सप्तमी दोनों विभक्तियां होती हैं। यथा-रुदतः प्रावाजीत् । रुदति प्रावाजी-रोते हुवे का अनादर करके चला गया । २१५-स्वामिन् , ईश्वर, अधिपति , दायाद , साक्षिन् , प्रतिभू, और प्रसूत इन सात शब्दों के योग में षष्ठी मौर सप्तमी दोनों विभक्तियां होती हैं । यथा- गवां स्वामी । गोषु स्वामी । इत्यादि । २१६-जिस से निर्धारण किया जाय उस से षष्ठी और सप्तमी दोनों विभक्तियां होती हैं।जाति,गुण और क्रिया द्वारा समुदाय से एक देशका पृथक करमा निर्धारण कहलाता है। जाति-मनुष्याणां मनुष्येषु वा ब्राहमणः

संस्कृतप्रबोधे-
%3-
श्रेष्ठतमः= मनुष्यों में ब्राह्मण श्रेष्ठतम है । गुण-गवां
गोषु वा कृष्णा सम्पनक्षीरतमा गायों में काली गाय
अधिक दूधवालीहोती है। क्रिया-अध्वगामाम् अध्वगेषु
ar धावन्तः शीघ्रतमा मार्ग चलने वालों में दौड़ने
वाले शीघ्रगामी हैं । परन्तु जहां निर्धारण में
विभाग हो वहां पञ्चमी विभक्ति होती है। यथा-
पञ्चालाः पाटलिपुत्रेभ्यो दृढ़तराः पञ्जाबी पटने
वालों से दृढ़ होते हैं। वाङ्गाः पञ्चालेभ्यः सुकुमार-
तराः । वङ्गाली पञ्जाबियों से नाजुक होते हैं ।
१९०-दो कारकों के बीच में यदि काल और मार्ग वाचक
शब्द हों तो उन से पञ्चमी और सप्तमी विभक्ति होती
है। यथा-अद्य भुक्त्वाऽयं रहे यहाद्वा भोक्ता
आज खाकर यह दोदिन में खावेगा। यहां दो कारकों
के बीच में काल है । धनुर्मुक्तोऽयमिष्वासः क्रोशे को-
शाद्वा लक्ष्यं विध्यति-धनुष से छूटा हुवा यह बाण एक
क्रोश में निशाने को बीन्धता है। यहां दो कारकों
के बीच में मार्ग है ॥
११८-कर्मप्रवचनीयसंज्ञक उप और अधि उपसर्गों के
योग में सप्तमी विभक्ति होती है। अधिकार्थ में उप
की और स्वाम्यर्थ में अधि की कर्मप्रवचनीय संज्ञा
होती है। यथा-उपनिष्क कार्षापणम्-निष्क से का-
पण अधिक होता है । अधि भारतीयेषु हरिवर्षी
या: इडियन लोगों से यूरोपियन समर्थ हैं।
इति कारकाणि
समाप्तश्वायं प्रथमोभागः॥१॥

प्रथमाध्याये ५ विषयानुक्रमः भूमिका वर्णोपदेशः वर्णोच्चारणस्थानानि सन्धिप्रकरणम् अच्सन्धिः हल्सन्धिः विसर्गसन्धिः शब्दानुशासनम् द्वितीयाध्याये १७ १६ तृतीयाध्याये २१ संज्ञा २६ २७ " *- ४९ ४३ प्रातिपदिकानि अजन्तपुसिङ्गम् स्त्रीलिङ्गम् नपुंसकलिङ्गम् हलन्तपुंल्लिङ्गम् स्त्रीलिङ्गम् नपुंसकलिङ्गम् कारकाणि कर्ता कर्म चतुर्षाध्याये ६२ " ६३ ६४ करणम् " " सम्प्रदानम् अपादानम् शेषः अधिकरणम् 9३ ७६

उपनिषदों का सरल भाषानुवाद
उपनिषदों की प्रशंसा हम क्या करें, सारा संसार कर
रहा है, ब्रह्मविद्या की वह पवित्र धारा जिसने भरव
जैसे मरुदेश और यरोप जैसे विषम देशों को भी अपने
भाप्लावन से मुसिक्त और रम्य बना दिया,इन्हों उपनिषदों
के पवित्रोत (चश्मे ) से निकली है, उपनिषदों है।
यद्यपि भाजतक भाषा में भी कई अनुवाद हो चुके हैं,
तथापि किसी ऐसे अनुवाद की अब तक बड़ी आव.
श्यकता थी, जिस में सरल और सुगम रीति से अन्वय.
पूर्वक मूल का अर्थ दिया हो,पुनःसंक्षेप से उसका भाव जो
मूल के माशय को पुष्ट एवं स्पष्ट करता हो, दिया गया हो।
तथा भाषा उसकी सरल,मुबोधऔर प्रचलित भाषाप्रणाली
के अनुसार हो। यह अनुवाद इन सब गुणों से अलंकृत
है-ईश ) केन -) कठ ।) प्रश्न ।) बढ़िया।-) मुण्डक 8)
अबलासन्ताप
वर्तमान में खीशिक्षा के न होने से जैसी कुछ दुर्दशा
हमारी और हमारी सन्तान की हो रही है, उसी का
निदर्शन इस पुस्तक में किया गया है। जीपुरुष दोनों
के लिये यह पुस्तक बड़ा उपयोगी है।
बुकसेलरों को उचित कमीशन भी दिया जाता है
मिलने का पता-
स्वामी प्रेस मेरठ शहर
वा सरस्वती पुस्तकालय मेरठ

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संस्कृतप्रबोधः प्रथमो भागः

Author
Sharmaa Badariidatt
Title
Sanskrxtaprabodh: Prathamo Bhaag:
File name
संस्कृतप्रबोधः प्रथमो भागः
Text
OCR done
Published
2006/03/08
Publisher
Swami Machine Press, Meerut
Language
Sanskrit
Pages
83
Library
University Library,gurukul Kangri Vishwavidyalaya
Classification
LANGUAGE LINGUISTICS LITERATURE
DLI number
477385
Barcode
99999990173240.00
Scanning centre
C-DAC, Noida
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