Adarsh Library, Jaipur

Manorama

Prem Chand Munshi · 2011/03

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मनोरमा । गर १ मुभी वज्रधर सिंह का मकान बनारस में है। आप हैं तो राजपूत, पर अपने को 'मुंशी निघते और कहते हैं। 'माकुर' के साथ आपको गंवार: 'का बोध होता है . बहुत छोटे पद से सलमी करते-करते आपने ३न्त में सीलदारीकाच्च पद प्राप्त कर लिया था। पि आप कालान् । तीन मास से अधिक न रहे और उतने दिन भी केवल एपज पर रहे; पर प अपने को साविक तहसीलदार' लिखते थे और मुहल्ले वाले भी उन्हें खुश रने को तहसीलदार साहब' ही कहते थे। यह नाम सुनकर आप पुशी से कड़ जाते थे, पर पेंशन केवल 25) मिलती थी; इसलिए तहसीलदार साहब बाजार-हाट सुद ही करना पड़ता था। घर में चार प्राणियों का पर्व था। क सड़को थी, एक लड़का और स्त्री। लड़के का नाम चक्रधर था। यह इतना हीन था कि पिता के पैगन के जमाने में घर से किसी प्रकार की सहायता न लि सकती थी, केवल अपने बुद्धि बल से उसने एम० ए०की उपाधि प्राप्त कर थी। मुंशीजी ने पहले ही से सिफारिश पहुंचानी शुरू की थी। दरवारदारी कला में वह निपुण थे। कोई नया हाकिम आये, उससे जेट रनर-जन र लेते थे । हुकाम ने चघर का ख्याल करने के यादे भी किये थे लेकिन व परीक्षा का नतीजा निकला और मुंशीजी ने पत्रघर से कमिश्नर के यहाँ लिने को कहा, तो उन्होंने जाने से साफ इनकार किया। मुशोजी ने त्योरी पढ़ाकर पूछा-क्यों ? क्या घर बैठे तुम्हें नौकरी मिल रायगी? चक्र-मेरी नौकरी करने की इच्छा नहीं है । आजाद रहना चाहता हूँ। वा-आबाद रहना पा तो एम० ए० पयो पास किया। उम दिन से पिता और पुत्र में आये-दिन यमचष मपती रहती थी। गोजो बार-बार झुंझलाते और उसे काम-चोर. पमण्डी, मूर्य कहकर अपना हुस्सा उतारते रहते थे। पक्रधर पिता का अदव करते थे, उनको जवाब तो न देते, पर अपना जीवन सार्थक बनाने के लिए जो मार्ग तय कर लिया पा, उमसे वह न हटते थे। . । । ५ - -- लेकिन जब दो साल गुजर जाने पर भी भूत के उतरने को उन्हें यह हास्यास्पद मालूम होता था कि आदमी केवल पट पास.. आधी उम्र पढ़ने में लगा दे। विद्या को जीविका का साधन बनाते उन्हें ल... आती थी। वह भूखों मर जाते, लेकिन नौकरी के लिए आवेदन-पत्र लेका कहीं न जाते । विद्याभ्यास के दिनों में भी वह सेवा-कार्य में अग्रसर रहा का थे और अब तो इसके सिवा उन्हें कुछ सूझता ही न था। दोनों की सेवा जो सहायता में जो आनन्द और आत्मगौरव था, वह दफ्तर में बैठकर कलम पि.. में कहाँ? मुंशी वज्रधर ने समझा था। जब यह भूत इसके सिर से उत्तर जायगा, शादी-ब्याह की फिक्र होगी तो आप-ही-आप नौकरी की तलाश में दौड़ेगा। दिया, तो एक दिन उन्होंने चक्रधर को खूब फटकारा । चक्रधर अव पिता की इच्छा से मुंह न मोड़ सके। उन्हें अपने कालेज में ही कार जगह मिल सकती थी। लेकिन वह कोई ऐसा धन्धा चाहते थे, जिससे थोड़ी देर रोज काम करके अपने पिता की मदद कर सकें। संयोग से जगदीशपुर के दीवान ठाकुर हरसेवक सिंह को अपनी लड़की को पढ़ाने के लिए एक सुयोग्य और सच्चरित्र अध्यापक की जरूरत पड़ी। उन्होंने कालेज के प्रधानाध्यापक को इस विषय में एक पत्र लिखा । उन्होंने चक्रधर को उस काम पर लगा दिया । काम बड़ी जिम्मेदारी का था, किन्तु चक्रधर इतने सुशील, इतने गंभीर और इतने संयमी थे कि उन पर सबको पूरा विश्वास था। मनोरमा की उन्न अभी १३ वर्ष से अधिक न थी, लेकिन चक्रधर को उसे गढ़ाते हुए बड़ी उप होती थी। एक दिन मनोरमा वाल्मीकीय रामाषण पढ़ रही था। उसके मन में सीता के वनवास पर एक शा हुई। वह इसका समाधान करना चाहती थी। उसने पूछ-मैं आपसे एक बात पूछना चाहती हूँ, आज्ञा हो तो पूर्छ? चक्रधर ने कातर भाव से कहा-क्या बात है ? मनोरमा-रामचन्द्र ने सीताजी को घर से निकाला, तो वह चली क्य गयीं? और जव रामचन्द्र ने सीता की परीक्षा ले ले ली थी और अन्तःकरण रे उन्हें पवित्र समझते थे, तो केवल झूठी निन्दा से बेचने के लिए उन्हें घर निकाल देना कहाँ का न्याय था? चक्रधर यदि सीता जी पति की आज्ञा न मानतीं, तो वह भारतीय सर के आदर्श से गिर जाती और रामचन्द्र को राज-धर्म का आदर्श भी तो पाल करना था! मनोरमा---यह ऐसा आदर्श है, जो सत्य की हत्या करके पाला गया है यह मादर्श नहीं है, चरित्र की दुर्वलता है । मैं आपसे पूछती हूँ, आप रामचंद्र जगह होते, तो क्या आप भी सीता को घर से निकाल देते? ६ च घर नहीं, मैं तो शायद न निकालता। मनोरमा--आप निन्दा की परवा न करते । चमधर-नहीं, मैं झूठी निन्दा की जरा भी परवा न करता । मनोरमा की आयें घुशी से चमक उठीं, प्रफुल्लित होकर बोली -यही मात मेरे मन में थी। उम दिन से मनोरमा को चक्रधर से कुछ स्नेह हो गया । जब उनके आने का समय होता तो वह पहले ही से आकर बैठ जाती और उनका इन्तजार करती । अब उसे अपने मन के भाव प्रकट करते हुए सोच न होता । टाकर हरसेवकसिंह की आदत थी कि पहले दो-चार महीनो तक नौकरी न वेतन ठीक समय पर देते; पर ज्यो-ज्यों नौकर पुराना होता जाता था, उन्हे इसके वेतन की याद भूलती जाती पी। चक्रधर को भी इधर चार महीनो से कुछ न मिला था। न यह बाप ही-आप देते थे, न चक्रधर संकोचवश मांगते थे। घर घर में रोज तकरार होती थी : आखिर एक दिन चघर ने विवश हो गकुर साहब को एक पुरजा लिखकर अपना वेतन मांगा। ठाकुर साहब ने पुरजा नोटा दिमा-पर्य को लिखा-पढ़ी की उन्हें फुरसत न थी और-उनको जो कुछ हना हो युद आकर कहें । चक्रधर शरमाते गये और बहुत-वृक्ष शिप्टाचार नाद रुपये मांगे । ठाकुर साहब हंसकर बोले-याह बाबू जी, वाह ! याप भी ही मौजी जीव हैं । चार महीने से वेतन नहीं मिला और आपने एक बार भी हा मोगा। आपको महीने-महीने अपना वेतन ले लेना चाहिए था। सोचिए, तुझे एक मुक्त देने में कितनी असुविधा होगी! खैर जाइए; दस-पांच दिन में रुपये मल जायेंगे। पक्रधर कुछ न कह सके । लौटे तो मुष पर घोर निराशा छाई हुई थी। मनोरमा ने उनका पुरजा अपने पिता के पाम ते जाते हुए राह में पढ़ लिया बा। उन्हें उदास देखकर पूछा-दादाजी ने आपको रूपये नहीं दिये? चारधर उसके सामने रुपये-पैसे का जिक्र न करना चाहते थे। मुंह लाल हो गया, बोले-मिल पायग। मनोरमा-आपको १२०) नाहिएं न ? चक्रधर-इस वक्त कोई जरूरत नहीं है । मनोरमा--जरूरत न होती तो आप मांगते ही न 1 देखिए, मैं जाकर.. पक्रधर ने रोक कर कहा-नहीं-नहीं, कोई जरूरत नहीं। मनोरमा ने न मानी । तुरन्त घर में गयी और एक क्षण में पूरे पये लाकर मेज पर रप दिये। वह तो पढ़ने वैठ गयी; लेकिन चक्रधर के सामने यह समस्या आ पड़ी कि परेलू, या न तूं। उन्होंने निश्चय किया कि न लेना चाहिए । पाठ हो चुक्ने पर वह उठ खड़े हुए और विना रुपये लिए बाहर निकल आये। मनोरमा रुपये १ +- नए हुए पीछे-पीछे वरामदे तक आयी । बार-बार कहती रही-~-इसे आप लेते इये, पर चक्रधर ने एक न सुनी और जल्दी से बाहर निकल गये। २ चक्रधर डरते हुए घर पहुंचे तो क्या देखते हैं कि द्वार पर चारपाई पड़ी हुई है, उस पर कालीन विछी हुई है और एक अधेड़ उम्र के महाशय उस पर बैठे हुए हैं। उनके सामने ही एक कुर्सी पर मुंशी वज्रधर बैठे फर्शी पी रहे थे और नाई खड़ा पंखा झल रहा था। चक्रधर के प्राण सूख गये । अनुमान से वह ताड़ गये कि महाशय वर की खोज में आये हैं। निश्चय करने के लिए घर में जाकर माता से पूछा, तो अनुमान सच्चा निकला । वोले- दादा जी ने इनसे क्या कहा? निर्मला ने मुस्कराकर कहा-नानी क्यों मरी जाती है, क्या जन्म भर क्वारे ही रहोगे ! जाओ बाहर बैठो; तुम्हारी तो वड़ी देर मे जोहाई हो रही है। चक्रधर-- यह हैं कौन ? निर्मला-आगरे के कोई वकील हैं; मुंशी यशोदानन्दन । चक्रधर-मैं तो घूमने जाता हूँ । जब यह यमदूत चला जाएगा, तो आऊंगा। निर्मला-दाह रे शील ! तेरा-सा लड़का तो देखा ही नहीं। आ, जर सिर में तेल डाल दूं, वाल न जाने कैसे विखरे हुए हैं । साफ कपड़े पहनकर जर देर के लिए वाहर जाकर बैठ। इतने में मुंशीजी ने पुकारा-नन्हें, क्या कर रहे हो ? जरा यहाँ चक्रधर के रहे-सहे होश भी उड़ गये। बोले-जाता तो हूँ, लेकिन कहे दे हूँ, मैं यह जुआ गले में न डालूंगा। जीवन में मनुष्य का यही काम नहीं है विवाह कर ले, बच्चों का बाप वन जाये और कोल्हू के बैल की तरह आँखों पट्टी बांधकर गृहस्थी में जुत जाए। चक्रधर बाहर आये तो, मुंशी यशोदानंदन ने खड़े होकर उन्हें छाती से लिया और कुर्सी पर बैठाते हुए बोले-अव की 'सरस्वती' में आपका देखकर चित बहुत प्रसन्न हुआ। इस वैमनस्य को मिटाने के लिए आप उपाय बताये हैं वे बहुत ही विचारपूर्ण हैं । इस स्नेह-मृदुल आलिंगन और सहृदयता-पूर्ण आलोचना ने चक्र मोहित कर लिया ! वह कुछ जवाव देना ही चाहते थे कि मुंशी वज्रधन पोआज बहत देर लगा दी। राजा साहब से कुछ बातचीत होने लगी आओ।

यह कहकर मुंशीजी घर में चले गए तो यशोदानन्दन बोले-अब आपका क्या काम करने का इरादा है ? चक्रधर---अभी तो निश्चय किया है कि कुछ दिनो आजाद रहकर सेवा- कार्य करूं। यशोदा--आप जैसे उत्साही युवकों का ऊँचे आदर्शों के साथ सेवा क्षेत्र में माना जाति के लिए सौभाग्य की बात है। आपके इन्हीं गुणों ने मुझे आपकी ओर खीचा है। चक्रधर ने आंखें नीची करके कहा लेकिन मैं तो अभी गृहस्थी के बन्धन में नहीं पड़ना चाहता। मेरा विचार है कि गहस्थी में फंसकर कोई तन-मन से सेवा-कार्य नही कर सकता। यशोदा--मैं समझता हूं कि यदि स्त्री और पुरुष के विचार और आदर्श एक-से हों, तो स्त्री-पुरुष के कामों में वाधक होने के बदले सहायक हो सकती है। मेरी पुत्री का स्वभाव, विचार, सिद्धान्त सभी आपसे मिलते हैं और मुझे [रा विश्वास है कि आप दोनों एक साथ रहकर सुखी होंगे । सेवा कार्य में वह हमेशा मापसे एक कदम आगे रहेगी। अंग्रेजी, हिन्दी, उर्दू, सस्कृत पढ़ी हुई है। र के कामों में कुशल है। रही शक्ल-सूरत वह भी आपको इस तस्वीर से मालूम हो जाएगी। यशोदानन्दन तस्वीर चक्रधर के सामने रखते हुए बोले --स्त्री में कितने को गुण हों, लेकिन यदि उसको सूरत पुरुष को पसन्द न आयो, तो वह उसको नजरों से गिर जाती है और उनका दाम्पत्य जीवन दुखमय हो जाता है । मैं तो यहां तक कहता हूं कि वर और कन्या में दो-चार बार मुलाकात भी हो जानी चाहिए। कन्या के लिए तो यह अनिवार्य है। पुरुष को स्त्री पसन्द न आयी, तो वह और शादियां कर सकता है। स्त्री को पुरुष पसन्द न आया, तो उसकी सारी उम्र रोते ही गुजरेगी। चक्रधर के पेट में चूहे दौड़ने लगे कि तस्वीर षयों कर ध्यान से देखू । वहाँ देखते शरम आती थी, मेहमान को अकेला छोड़कर घर में न जाते बनता था। कई मिनट तक तो सब किये बैठे रहे लेकिन न रहा गया। पान की तश्तरी और स्वीर लिए हुए पर में चले आये। अपने कमरे में आकर उन्होंने उत्सुकता से चत्र पर आंखें जमा दीं। उन्हें ऐसा मालूम हुआ, मानो चित्र ने लज्जा से आँखें ची कर ली है, मानो वह उनसे कुछ कह रही है। उन्होंने तस्वीर उलटकर रख दिया और पाहा कि बाहर चला जाऊं लेकिन दिल न माना, फिर तस्वीर उठा ती और देखने लगे। आंखों को तृप्ति ही न होती थी। चित्र हाप में लिए हुए वह भावी जीवन के मधुर स्वप्न देखने लगे। यह ध्यान ही न रहा कि मुंशी यशोदा. दिन बाहर अकेले बैठे हुए हैं। अपना व्रत भूल गए, सेवा-सिद्धान्त मूल गये, भादशं भूल गये, भूत और भविष्य वर्तमान में तीन हो गए, केवल एक ही सत्य लिए हुए पीछे-पीछे बरामदे तक आयी। बार-बार कहती रही--इसे आप लेते जाइये, पर चक्रधर ने एक न सुनी और जल्दी से बाहर निकल गये। । २ चक्रधर डरते हुए घर पहुंचे तो क्या देखते हैं कि द्वार पर चारपाई पड़ी हुई है, उस पर कालीन बिछी हुई है और एक अधेड़ उम्र के महाशय उस पर बैठे हुए हैं। उनके सामने ही एक कुर्सी पर मुंशी वज्रधर बैठे फर्शी पी रहे थे और नाई खड़ा पंखा झल रहा था। चक्रधर के प्राण सूख गये । अनुमान से वह ताड़ गये कि महाशय वर की खोज में आये हैं। निश्चय करने के लिए घर में जाकर माता से पूछा, तो अनुमान सच्चा निकला । वोले- दादा जी ने इनसे क्या कहा? निर्मला ने मुस्कराकर कहा-नानी क्यों मरी जाती है, क्या जन्म भर क्वारे ही रहोगे ! जाओ बाहर बैठो; तुम्हारी तो बड़ी देर मे जोहाई हो रही है। चक्रधर--- यह हैं कौन ? निर्मला-आगरे के कोई वकील हैं; मुंशी यशोदानन्दन । चक्रधर-~- मैं तो घूमने जाता हूँ। जब यह यमदूत चला जाएगा, आऊंगा। निर्मला-बाह रे शर्मीले ! तेरा-सा लड़का तो देखा ही नहीं। आ, जरा सिर में तेल डाल दूं, बाल न जाने कैसे विखरे हुए हैं । साफ कपड़े पहनकर जरा देर के लिए बाहर जाकर बैठ। इतने में मुंशीजी ने पुकारा-नन्हें, क्या कर रहे हो ? जरा यहाँ तो आओ। चक्रधर के रहे-सहे होश भी उड़ गये। बोले-~जाता तो हूँ, लेकिन कहे देता मैं यह जुआ गले में न डालूंगा। जीवन में मनुष्य का यही काम नहीं है कि विवाह कर ले, बच्चों का वाप बन जाय और कोल्हू के वैल की तरह आंखों पर पट्टी बांधकर गृहस्थी में जुत जाए। चक्रधर बाहर आये तो, मुंशी यशोदानंदन ने खड़े होकर उन्हें छाती से लगा लिया और कुर्सी पर बैठाते हुए बोले- अब की 'सरस्वती' में आपका लेख देखकर चित बहुत प्रसन्न हुआ। इस वैमनस्य को मिटाने के लिए आपने जो उपाय बताये हैं वे बहुत ही विचारपूर्ण हैं । इस स्नेह-मृदुल आलिंगन और सहृदयता-पूर्ण आलोचना ने चक्रघर को मोहित कर लिया ! वह कुछ जवाव देना ही चाहते थे कि मुंशी वज्रधर बोल उठे-माज बहुत देर लगा दी। राजा साहब से कुछ वातचीत होने लगी क्या। - यह कहकर मुंशीजी घर में चले गए तो यशोदानन्दन बोले-अब आपका क्या काम करने का इरादा है ? चक्रधर-अभी तो निश्चय किया है कि कुछ दिनों बाजाद रहकर सेवा. कार्य करूं। यशोदा-आप जैसे उत्साही युवकों का ऊँचे आदशों के साथ सेवा-क्षेत्र में माना जाति के लिए सौभाग्य की बात है। आपके इन्हीं गुणों ने मुझे बापकी ओर खीचा है। चक्रधर ने आंखें नीची करके कहा लेकिन मैं तो अभी गृहस्थी के बन्धन में नहीं पड़ना चाहता । मेरा विचार है कि गृहस्थी में फंसकर कोई तन-मन से सेवा-कार्य नहीं कर सकता। यशोदा-मैं समझता हूँ कि यदि स्त्री और पुरुष के विचार और आदर्श एक-से हों, तो स्त्री-पुरुष के कामों में वाधक होने के बदले सहायक हो सकती है । मेरी पुत्री का स्वभाव, विचार, सिद्धान्त सभी आपसे मिलते हैं और मुझे पूरा विश्वास है कि आप दोनों एक साथ रहकर मुखी होगे । सेवा-कार्य में वह हमेशा यापसे एक कदम आगे रहेगी। अंग्रेजी, हिन्दी, उर्दू, संस्कृत पढ़ी हुई है। घर के कामों में कुशल है। रही शक्ल-सूरत वह भी आपको इस नस्वीर से मालूम हो जाएगी। यशोदानन्दन तस्वीर चक्रधर के सामने रखते हुए बोले -स्त्री में कितने ही गुण हों, लेकिन यदि उसकी सूरत पुरुष को पसन्द न आयो, तो वह उसकी नजरों से गिर जाती है और उनका दाम्पत्य जीवन दुःखमय हो जाता है । मैं तो यहाँ तक कहता हूं कि घर और कन्या मे दो-चार बार मुलाकात भी हो जानी चाहिए। कन्या के लिए तो यह अनिवार्य है । पुरुष को स्त्री पसन्द न आयी, तो वह और शादियां कर सकता है । स्त्री को पुरुप पसन्द न आया, तो उसकी सारी उम्र गेते ही गुजरेगी। चक्रधर के पेट में चूहे दौड़ने लगे कि तस्वीर श्यों कर ध्यान से देखू । वहाँ देयते शरम आती थी, मेहमान को अकेला छोड़कर घर में न जाते वनता या। कई मिनट तक तो सब किये बैठे रहे, लेकिन न रहा गया। पान की तश्तरी और तस्वीर लिए हुए घर मे चले आये । अपने कमरे में आकर उन्होंने उत्सुकता से चित्र पर आंखें जमा दीं। उन्हें ऐसा मालूम हुमा, मानो चित्र ने लज्जा से भीखें नीची कर ली हैं, मानो वह उनसे कुछ कह रही है। उन्होंने तस्वीर उलटकर रख दिया और चाहा कि वाहर चला जाऊं लेकिन दिल न माना, फिर तस्वीर उठा ली और देखने लगे। आंखो को तृप्ति ही न होती थी। चित्र हाप में लिए हुए वह भावी जीवन के मधुर स्वप्न देखने लगे। यह ध्यान ही न रहा कि मुंगी यशोदा- नंदन बाहर अकेले बैठे हुए हैं। अपना व्रत मूल गए, सेवा-सिद्धान्त मूल गये, आदर्श भूल गये, भूत और भविष्य वर्तमान में सोन हो गए, केवल एक ही सत्य लिए हुए पीछे-पीछे बरामदे तक आयी। बार-बार कहती रही--इसे आप लेते जाइये, पर चक्रधर ने एक न सुनी और जल्दी से बाहर निकल गये। २ चक्रधर डरते हुए घर पहुंचे तो क्या देखते हैं कि द्वार पर चारपाई पड़ी हुई है, उस पर कालीन विछी हुई है और एक अधेड़ उम्र के महाशय उस पर बैठे हुए हैं । उनके सामने ही एक कुर्सी पर मुंशी वज्रधर बैठे फर्शी पी रहे थे और नाई खड़ा पंखा झल रहा था। चक्रधर के प्राण सूख गये । अनुमान से वह ताड़ गये कि महाशय वर की खोज में आये हैं। निश्चय करने के लिए घर में जाकर माता से पूछा, तो अनुमान सच्चा निकला । बोले- दादा जी ने इनसे क्या कहा? निर्मला ने मुस्कराकर कहा-नानी क्यों मरी जाती है, क्यों जन्म भर क्वारे ही रहोगे ! जाओ बाहर बैठो; तुम्हारी तो बड़ी देर मे जोहाई हो रही है। चक्रधर-~~ यह हैं कौन ? निर्मला-आगरे के कोई वकील हैं; मुंशी यशोदानन्दन । चक्रधर-~~ मैं तो धूमने जाता हूँ। जब यह यमदूत चला जाएगा, तो आऊंगा। निर्मला-दाह रे शर्मीले ! तेरा-सा लड़का तो देखा ही नहीं। आ, जरा सिर में तेल डाल दूं, बाल न जाने कैसे विखरे हुए हैं । साफ कपड़े पहनकर जरा देर के लिए बाहर जाकर बैठ। इतने में मुंशीजी ने पुकारा -नन्हें, क्या कर रहे हो ? जरा यहाँ तो आओ। चक्रधर के रहे-सहे होश भी उड़ गये। वोले-जाता तो हूँ, लेकिन कहे देता हूँ, मैं यह जुआ गले में न डालूंगा । जीवन में अनुप्य का यही काम नहीं है कि विवाह कर ले, बच्चों का वाप वन जाये और कोल्हू के वैल की तरह आँखों पर पट्टी बांधकर गृहस्थी में जुत जाए। चक्रधर बाहर आये तो, मुंशी यशोदानंदन ने खड़े होकर उन्हें छाती से लगा लिया और कुर्सी पर बैठाते हुए वोले-अव की 'सरस्वती' में आपका लेख देखकर चित बहुत प्रसन्न हुआ। इस वैमनस्य को मिटाने के लिए आपने जो उपाय बताये हैं वे बहुत ही विचारपूर्ण हैं । इस स्नेह-मृदुल आलिंगन और सहृदयता-पूर्ण आलोचना ने चक्रधर को मोहित कर लिया ! वह कुछ जवाब देना ही चाहते थे कि मुंशी वज्रधर बोल उठे- आज वहुत देर लगा दी। राजा साहब से कुछ बातचीत होने लगी क्या। 1 , यह कहकर मुंशीजी घर में चले गए तो यशोदानन्दन बोले-अब आपका क्या काम करने का इरादा है ? चक्रधर- अभी तो निश्चय किया है कि कुछ दिनों बाजाद रहकर सेवा- कार्य करूं। यशोदा-आप जैसे उत्साही युवकों का अंचे आदर्शों के साथ सेवा-क्षेत्र में आना जाति के लिए सौभाग्य की बात है। आपके इन्ही गुणों ने मुझे आपकी ओर खींचा है। चक्रधर ने आँखें नीची करके कहा लेकिन मैं तो अभी गृहस्थी के बन्धन में नहीं पड़ना चाहता । मेरा विचार है कि गृहस्यों में फंसकर कोई तन-मन से सेवा-कार्य नहीं कर सकता। यशोदा-मैं समझता हूँ कि यदि स्त्री और पुरुष के विचार और आदर्श एक-से हों, तो स्त्री-पुरुप के कामों में वाधक होने के बदले सहायक हो सकती है । मेरी पुत्री का स्वभाव, विचार, सिद्धान्त सभी आपसे मिलते हैं और मुझे पूरा विश्वास है कि माप दोनों एक साथ रहकर सुखी होगे । सेवा-कायं मे वह हमेशा मापसे एक कदम आगे रहेगी। अंग्रेजी, हिन्दी, उर्दू, सस्कृत पढ़ी हुई है। घर के कामों में कुशल है। रही शक्ल-सूरत वह भी आपको इस तस्वीर से मालूम हो जाएगी। यशोदानन्दन तस्वीर चक्रधर के सामने रखते हुए बोले-स्त्री मे कितने ही गुण हों, लेकिन यदि उसकी सूरत पुरुष को पसन्द न आयो, तो वह उसकी नजरों से गिर जाती है और उनका दाम्पत्य जीवन दुःखमय हो जाता है । मैं तो यहां तक कहता हूं कि घर और कन्या में दो-चार वार मुलाकात भी हो जानी पाहिए। कन्या के लिए तो यह अनिवार्य है। पुरुप को स्त्री पसन्द न आयी, तो वह और शादियां कर सकता है। स्त्री को पुरुष पसन्द न आया, तो उसकी सारी उम्र गेते ही गुजरेगी। चक्रधर के पेट में चूहे दौड़ने लगे कि तस्वीर क्यों कर ध्यान से देखू । वहाँ देखते शरम आती थी, मेहमान को अकेसी छोड़कर घर में न जाते बनता था। कई मिनट तक तो सब किये बैठे रहे लेकिन न रहा गया । पान की तश्तरी और तस्वीर लिए हुए घर में चले आये। अपने कमरे में आकर उन्होंने उत्सुकता से चित्र पर आंखें जमा दी। उन्हें ऐसा मालूम हुआ, मानो चित्र ने लज्जा से आंखें नीची कर ली हैं, मानो वह उनसे कुछ कह रही है । उन्होंने तस्वीर उलटकर रख दिया और पाहा कि बाहर चला जाऊँ लेकिन दिल न माना, फिर तस्वीर उठा सी और देखने लगे। आँखों को तृप्ति ही न होती थी। चित्र हाथ में लिए हुए वह भावी जीवन के मधुर स्वप्न देखने लगे। यह ध्यान ही न रहा कि मुंशी यशोदा- नंदन बाहर अकेले बैठे हुए हैं। अपना व्रत मूल गए, सेवा-सिद्धान्त भूल गये, आदर्श मूल गये, भूत और भविष्य वर्तमान में लीन हो गए, केवल एक ही सत्य . और वह चित्र की मधुर कल्पना थी ! सहसा तबले की थाप ने उनकी समाधि भंग की। बाहर सगा । मुंशी वज्रधर को गाने-बजाने का शौक था। गला तो रसीला न था, पर ल स्वर के ज्ञाता थे। बाहर आये तो मुंशी जी ने धुरपद की एक तान छेड़ दी ।। पंचम स्वर था, आवाज फटी हुई, सांस उखड़ जाती थी, बार-बार खाँस- र गला साफ करते थे, लोच का नाम न था, कभी-कभी वेसुरे भी हो जाते थे, पर साजिन्दे वाह-वाह की धूम मचाये थे। आधी रात के करीव गाना बन्द हुआ । लोगों ने भोजन किया। जव मुंशी यशोदानन्दन वाहर आकर बैठे तो वज्रधर ने पूछा-आपसे कुछ वात-चीत - यशोदा०-जी हाँ हुई, लेकिन नहीं खुले। वज्रधर-विवाह के नाम से चिढ़ता है। यशोदा०-अव शायद राजी हो जायें । प्रातःकाल यशोदानन्दन ने चक्रधर से पूछा-क्यों बेटा, एक दिन के लिए मेरे साथ आगरे चलोगे? चक्रधर-मुझे तो आप इस जंजाल में न फंसायें, तो बहुत अच्छा हो । यशोदा०-~-तुम्हें जंजाल में नहीं फंसाता वेटा, तुम्हें ऐसा सच्चा सहायक और मित्र दे रहा हूँ, जो तुम्हारे उद्देश्यों को पूरा करना अपने जीवन का मुख्य कर्तव्य समझेगी। यो तो मैं मन से आपको अपना दामाद बना चुका; पर अहल्या की अनुमति ले लेनी आवश्यक समझता हूँ। आप भी गायद यह पसन्द न करें कि मैं इस विषय में स्वेच्छा से काम लूं। चक्रधर बड़े संकट में पड़े। सिद्धान्त-रूप में वह विवाह के विपय में स्त्रि. को पूरी स्वाधीनता देने के पक्ष में थे, पर इस समय आगरे जाते उन्हें व संकोच हो रहा था। यशोदानन्दन ने कहा मैं आपके मनोभावों को समझ रहा हूँ। पर मह उन चंचल लड़कियों में नहीं है, जिसके सामने जाते हुए आपको शरमाना आप उसकी सरलता देखकर प्रसन्न होरे । मैं तो उसी को लाकर दो-चार के लिए यहाँ ठहरा सकता हूँ; पर शायद आपके घर के लोग यह पस - • . चक्रधर ने सोचा-अगर मैंने और ज्यादा टालमटोल की, तो की महाशय सचमुच ही अहल्या को यहाँ न पहुंचा दें। बोले-जी नहीं, मृ नहीं मालूम होता । मैं ही चला चलूँगा। घर में निर्मला तो खुशी से राजी हो गयी। हाँ, मुंशी वजधर संकोच हुआ, लेकिन यह समझकर कि यह महाशय लड़के पर लटूह कोई अच्छी रकम दे मरेंगे, उन्होंने भी कोई आपत्ति न की । अव केव १० हरमेवक सिंह को सूचना देनी थी। जब चघर पहुंचे तो ठाकुर साहय अपनी प्राणेश्वरी लॉगी से कुछ बातें कर रहे थे । मनोरमा की माता का देहान्त हो चुका था। लौगी उस वक्त लौडी थी। उसने इतनी कुशलता से पर ममाला कि टाकुर साहब उस पर रीझ गये और उसे गृहिणी के रिक्तस्थान पर अभिपिक्त कर दिया । नौगी सरल हृदय, सदय, हंस- मुख, सहनशील स्त्री थी, जिसने सारे घर को वशीभूत कर लिया था। यह उसी की सज्जनता थी, जो नौकरों को वेतन न मिलने पर भी जाने न देती थी। मनोरमा पर तो वह प्राण देती थी । ईर्ष्या, क्रोध, मरसर उसे छू भी न गया था। वह उदार न हो; हर कुपण न थी । ठाकुर साहब कभी-कभी उस पर भी विगड जाते थे, मारने दौड़ते थे, दो-एक बार मारा भी था, पर उसके माथे पर जरा भी पल न याता था। ठाकुर साहब का सिर भी दुवे, तो उसकी जान निगल जाती थी। वह उसकी स्नेहमयो सेवा ही थी, जिसने ऐसे हिंसक जीव को जकड रखा पा। इस वयत दोनों प्राणियों में कोई वहस छिड़ी हुई पी । ठाकुर साहब पल्ला- भल्ला कर बोल रहे थे; और लौंगी अपराधियों की भांति सिर झुकाये बड़ी धी कि मनोरमा ने आकर कहा-बाबू जी आये हुए हैं, आप से कुछ कहना चाहते ठाकुर साहब की भौहे तन गयी। बोले-कहना क्या चाहते होंगे, रुपये मांगने आये होंगे। अच्छा, जाकर कह दो कि बाते हैं, वैठिए । लौंगी-इनके रुपए दे क्यों नहीं देते ? वेचारे गरीब आदमी हैं। संकोच के मारे नहीं मांगने पाई महीने तो चढ गये । यह याहकर लौंगी गयी और रुपये गाकर ठाकुर साहब से बोली-लो, दे याओ। मुन लेना, शायद कुछ कहना भी चाहते हों। ठाकुर साहब ने सुंझलाकर रुपये उठा लिए और बाहर पले। लेकिन रास्ते में क्रोध शान्त हो गया । चक्रधर के पास पहुंचे, तो विनय के देवता बनें . हुए थे। -- चयर-आप को कष्ट देने आया हूँ। ठाकुर-नहीं-नहीं, मुझे कोई कष्ट नहीं हुआ । यह लीजिए आपके रुपये । चक्रधर-मैं इस वक्त एक दूसरे ही काम से आया हूँ ! मुझे एक काम से आगरा जाना है । शायद दो-तीन दिन तगंगे। इसके लिए क्षमा चाहता हूँ। ठाकुर हो, हो, शौक रोजाइए; मुझसे पूछने की जरूरत न पी। ठाकुर साहब अन्दर चले गए, तो मनोरमा ने पूछा- आप आगरे क्या करने जा रहे है। पऋधर-एक जरूरत से जाता हूँ। • मनोरमा-पोई बीमार है क्या?

चक्रधर-नहीं, वीमार कोई नहीं है। मनोरमा-फिर क्या काम है, बताते क्यों नहीं ? जब तक न बतलाइयेगा; मैं जाने न दूंगी। चक्रधर-~~लौटकर बता दूंगा । तुम किताब देखती रहना। मनोरमाजी नहीं, मैं यह नहीं मानती, अभी वतलाइए। आप अगर मुझसे विना बताये चले जायेंगे, तो मैं कुछ न पढूंगी। चक्रधर-~~यह तो बड़ी टेढ़ी शर्त है । वतला ही दूं। अच्छा, हंसना मत । तुम जरा भी मुस्कराई और मैं चला। मनोरमा में दोनों हाथों से मुंह वन्द किये लेती हूँ। चक्रधर ने झेंपते हुए कहा-मेरे विवाह की कुछ बातचीत है। मेरी तो इच्छा नहीं है, पर एक महाशय जवरदस्ती खींचे लिए जाते हैं। यह कहकर चक्रधर उठ खड़े हुए। मनोरमा भी उनके साथ-साथ आयी । जब वह बरामदे से नीचे उतरे, तो प्रणाम किया और तुरन्त अपने कमरे में लोट सायी । उसकी आँखें डबडवायी हुई थीं और बार-बार रुलाई आती थी, मानो चक्रधर किसी दूर देश जा रहे हों! " ३ संध्या समय जव रेलगाड़ी बनारस से चली, तो यशोदानन्दन ने चक्रधर से कहा- मैंने महल्या के विषय में आप से झूठी बातें कही हैं । वह वास्तव में मेरी लड़की नहीं है। उसके माता-पिता का हमें कुछ पता नहीं । चक्रधर ने बड़ी-बड़ी आँखें करके कहा-तो फिर आपके यहाँ कैसे आयी? यशोदा--विचिन कथा है। 15 वर्ष हुए, एक बार सूर्यग्रहण लगा था। हमारी एक सेवा-समिति थी। हम लोग उसी स्नान के अवसर पर यात्रियों की सेवा करने प्रयाग आये थे। वहीं हमें यह लड़की नाली में पड़ी रोती मिली। बहुत खोज की; पर उसके मां-बाप का पता न लगा। विवश होकर उसे साथ लेते गये । ४-५ वर्ष तक तो उसे अनाथालय में रखी; लेकिन जैव कार्यकर्ताओं की फूट के कारण अनाथालय बन्द हो गया तो, अपने ही घर में उसका पालन-पोपण करने लगा । जन्म से न हो, पर संस्कारों से वह हमारी लड़की है । उसके कुलीन होने में भी संदेह नहीं । मैंने आप से सारा वृत्तान्त कह दिया । अव आप को मस्ति- यार है, उसे अपनाये या त्यागें। हाँ, इतना कह सकता हूँ कि ऐसा रत्न आप फिर न पायेंगे । मैं यह जानता हूँ कि आपके पिताजी को यह बात असह्य होगी; पर यह भी जानता हूँ कि वीरात्माएँ सत्कार्य में विरोध की परवाह नहीं करती और यन्त में उस पर विजय ही पाती हैं। चक्रधर गहरे विचार में पड़ गये। एक तरफ अहल्या का अनुपम सौन्दर्य १२ । और उज्ज्वल चरित्र था, दूसरी ओर माता-पिता का विरोध और लोकनिन्दा का भय, मन में तर्क-संग्रह होने लगा। यशोदानन्दन ने उन्हें बसमजस में पड़े देखकर कहा- आप चिन्तित देख पड़ते हैं और चिन्ता की बात भी है। लेकिन जब आप बसे सुशिक्षित और उदार पुरुप विरोध और भय के कारण कर्तव्य और न्याय से मुंह मोड़ें, तो फिर हमारा उद्धार हो चुका । आपके सामाजिक विचारों की स्वतत्रता का परिचय पाकर ही मैंने आपके ऊपर इस वालिका के उदार का भार रखा है और यदि आप ने भी अपने कर्तव्य को न समझा, तो मैं नहीं कह सकता, उस अबला की भया दशा होगी। पक्रधर रूप-लावण्य की ओर से तो माँखें बन्द कर सकते थे, लेकिन उदार के भाव को दवाना उनके लिए असम्भव या । वह स्वतत्रता के उपासक थे और निर्भीकता स्वतंत्रता की पहली सीढ़ी है । दुढ भाव से बोले-मेरी ओर से आप जरा शका न करें। मैं इतना भीरु नहीं हूँ कि ऐसे कामों में समाज-निन्दा से टरूं । माता-पिता को प्रसन्न रखना मेरा धर्म है। लेकिन कर्तव्य और न्याय की हत्या करके नहीं । कर्तव्य के सामने माता-पिता की इच्छा का मूल्य नहीं है । यशोदानन्दन ने चक्रधर को गले लगाते हुए कहा-मैया, तुमसे ऐसी ही भाशा थी। गाड़ी आगरे पहुंची, तो दिन निकल आया था। मंशी यशोदानन्दन अमी कुलियों को पुकार ही रहे थे कि उनकी निगाह पुलिस के सिपाहियों पर पड़ी। चारों तरफ पहरा था। उन्होंने आश्चर्य से पूर्ण -क्यो साहब, आज यह सन्ती क्यो है ? थानेदार-आप लोगो ने काटे बोये हैं, उन्हीं का फल है। शहर मे फिसाद हो गया है। इतने में समिति का एक सेवक दौड़ता हुआ या पहुंचा। यशोदानन्दन ने आगे बढ़कर पूछा-क्यों राधामोहन, यह क्या मागला हो गया। राधा-जिस दिन आप गये उसी दिन पजाब से मौलवी दीनमुहम्मद साहब का आगमन हुआ। तभी से मुसलमानों को कुरबानी की धुन सवार है। इधर हिन्दुओं को भी यह जिद है कि चाहे खून को नदी वह गाय, पर कुरवानी न होने पायेगी। दोनों तरफ से तैयारियां हो रही है। हम लोग तो समझाकर हार गए। यशोदानन्दन ने पूछा-श्वाजा महमुद कुछ न बोले। राधा-उन्हीं के द्वार पर तो कुरबानी होने जा रही है। यशोदा०-स्वाजा महमूद के द्वार पर कुरवानी होगी! इसके पहले या तो मेरी कुरयानी हो जायेगी, या ख्वाजा महमूद को । तांगे वाले को बुलाओ । राधा-बहुत अच्छा हो कि आप इस समय यही ठहर जायें। यशोदा०-वाह-वाह ! प्रहर में आग लगी हुई है और मम कटते तो मैं ।

यहीं रह जा। जो औरों पर बीतेगी, वही मुझ पर भी वीतेगी, इससे क्या भागना । तुम लोगों ने बड़ी भूल की कि मुझे पहले से सूचना न दी। तीनों आदमी तांगे पर बैठकर चले। सड़कों पर जवान चक्कर लगा रहे थे। मुसाफिरों की छड़ियां छीन ली जाती थीं। दो-चार आदमी भी साथ न खड़े होने पाते थे । दूकानें सव वन्द थीं, कुंजड़े भी साग बेचते नजर न आते थे। हां, गलियों में लोग जमा हो-होकर बातें कर रहे थे । कुछ दूर तक तीनों आदमी मीन धारण किये बैठे रहे। चक्रधर शंकित होकर इधर-उधर ताक रहे थे। लेकिन यशोदानन्दन के मुख पर ग्लानि का गहरा चिह्न दिखायी दे रहा था । जव तांगा ख्वाजा महमूद के मकान के सामने पहुंचा तो हजारों आदमियों का जमाव था । यद्यपि किसी के हाथ में लाठी या डण्डे न थे; पर उनके मुख जिहाद के जोश से तमतमाये हुए थे । यशोदानन्दन को देखते ही कई आदमी उनकी तरफ लपके; लेकिन जब उन्होंने जोर से कहा-मैं तुमसे लड़ने नहीं । कहाँ हैं स्वाजा महमूद ? मुमकिन हो तो जरा उन्हें बुला लो, तो लोग । आया - हट गये। . जरा देर में एक लम्बा-सा आदमी, गाढ़े की अचकन पहने, आकर खड़ा हो गया । यही ख्वाजा महमूद थे। यशोदानन्दन ने त्योरियाँ बदलकर कहा-क्यों ख्वाजा साहब, आपको याद है, इस मुहल्ले में कभी कुरवानी हुई है ? महमूद---जी नहीं, जहां तक मेरा ख्याल है, यहां कभी कुरबानी नहीं हई। - . यशोदा०-- तो फिर आज आप यहाँ कुरबानी करने की नयी रस्म क्यों निकाल रहे हैं ? महमूद-इसलिए कि कुरबानी करना हमारा हक है । अब तक हम आपके जजयात का लिहाज करते थे, अपने माने हुए हक को भूल गये थे; लेकिन जव आप लोग अपने हकों के सामने हमारे जजबात की परवा नहीं करते, तो कोई वजह नहीं कि हम अपने हकों के सामने आपके जजवात की परवा करें। यशोदा०---इसके यह मानी हैं कि कल आप हमारे द्वारों पर हमारे मन्दिरों के सामने कुरवानी करें और हम चुपचाप देखा करें? आप यहां हरगिज कुर- वानी नहीं कर सकते और करेंगे, तो इसकी जिम्मेदारी आपके सिर होगी। यह कहकर यशोदानन्दन फिर तांगे पर बैठे। दस-पांच आदमियों ने तांगे को रोकना चाहा; पर कोचवान ने घोड़ा तेज कर दिया। जव तांगा यगोदा. नन्दन के द्वार पर पहुँचा तो वहां हजारों आदमी खड़े थे । इन्हें देखते ही नारों तरफ हलचल मच गयी। लोगों ने चारों तरफ से आकर उन्हें घेर लिया। यशोदानन्दन तांगे से उत्तर पड़े और ललकार कर बोले-~-भाइयो, आप .

दंगे। । जानते हैं, इस मुहल्ले में आज तक कभी करवानी नहीं हुई। अगर याज हम यहां कुरबानी करने देंगे, तो कौन कह सकता है कि फल को हमारे मन्दिर के सामने गौ-हत्या न होगी! कई आवाजें एक साय प्रायो-हम मर मिटेंगे, पर यहां कुरबानी न होने भादमियों को यों उत्तेजित करके यशोदानन्दन आगे पढ़े और जनता 'महावीर' और 'श्री रामचन्द्र' की जय-ध्वनि से वायुमण्डल को कम्पायमान करती हुई उनके पीछे चली । उधर मुसलमानों ने भी इण्डे संभाले। करीब था कि दोनों में मुठभेड़ हो जाय कि एकाएक चक्रधर आगे बटकर यशोदानन्दन के सामने खड़े हो गए और विनीन, किन्तु दृढ भाव से बोले-आप अगर उधर जाते हैं, तो मेरी छाती पर पाव रयकर जाइए । मेरे देयते यह अनर्थ न होने पायेगा। शोदानन्दन ने चिढ़कर कहा-हट जाओ। अगर एक क्षण को भी देर हुई तो फिर पछनाने के सिवा और कुछ हाथ न आयेगा। चक्रधर-मित्रो, जरा विचार से काम लो। कई आवाजें--विचार में काम लेना कायरो का काम है। चक्रधर-तो फिर जाइए, लेकिन उस गौ को बचाने के लिए आपको अपने एक भाई का खून करना पड़ेगा। सहसा एक पत्थर किसी तरफ से आकर चक्रधर के सिर में लगा । पून धारा यह निकली; लेकिन चक्रधर अपनी जगह से हिले नहीं। सिर थामकर बोले-अगर मेरे रक्त से आपकी क्रोधाग्नि शान्त होती हो, तो यह मेरे लिए सौभाग्य की यात है। यशोदानन्दन गरजकर बोले-यह कौन पत्थर फेंक रहा है। अगर वह बड़ा वीर है, तो क्यो नही आगे आकर अपनी वीरता दिखाता' पीछे सडा पत्थर क्यों फेंकता है ? एक आवाज-धर्म-द्रोहियो को मारना अधर्म नहीं है। यशोदानन्दन-जिसे तुम धर्म का द्रोही समझते हो, वह तुमसे कही सच्चा हिन्दू है। एक भावाज-सच्चे हिन्दू वही तो होते हैं, जो मौके पर वगलें झांकने लगे और शहर छोड़कर दो-चार दिन के लिए खिसक जाय। यशोदानन्दन -आप लोग सुन रहे हैं, मैं सच्चा हिन्दू नही हूँ, मैं मोग पड़ने पर बगलें झांकता हूं और जान बचाने के लिए शहर से भाग जाता है। ऐसा आदमी आपका मन्त्री बनने के योग्य नहीं है। आप उस आदमी को भर मन्त्री बनायें, जिसे आप सच्चा हिन्दू समझते हो। यह कहते हुए मुंशी यशोदानन्दन पर की तरफ .

- रोकना चाहा, लेकिन उन्होंने एक न मानी। उनके जाते ही यहां आपस तू' 'मैं-मैं होने लगी। चक्रधर ने जब देखा कि इधर से अब कोई शंका नहीं है, तो वह लपक कर सलमानों के सामने आ पहुंचे और उच्च स्वर से बोले-हजरत, मैं कुछ अर्ज रने की इजाजत चाहता हूँ। एक आदमी-सुनो, सुनो, यही तो अभी हिन्दुओं के सामने खड़ा था। चक्रधर-अगर इस गाय की कुरवानी करना आप अपना मजहबी फर्ज समझते हों, तो शोक से कीजिए। लेकिन क्या यह लाजमी है कि इसी जगह कुरबानी की जाए ? इस्लाम ने हमेशा दूसरों के जजबात का एहतराम किया । अगर आप हिन्दू जजबात का लिहाज करके किसी दूसरी जगह कुरवान करें, तो यकीनन इस्लाम के वकार में फर्क न आएगा। एक मौलवी ने जोर देकर कहा-ऐसी मीठी-मीठी बातें हमने बहुत सुनी हैं । कुरवानी यहीं होगी। ख्वाजा महमूद बड़े गौर से चक्रधर की बातें सुन रहे थे। मौलवी साहब की उद्दण्डता पर चिढ़कर बोले-क्या शरीयत का हुक्म है कि कुरवानी यहीं हो ? किसी दूसरी जगह नहीं की जा सकती ? मौलवी साहब ने ख्वाजा महमूद की तरफ अविश्वास की दृष्टि से देखकर कहा-मजहब के मामले में उलमा के सिवा और किसी को दखल देने का मजाज नहीं है। ख्वाजा-बुरा न मानिएगा, मौलवी साहब ! अगर दस सिपाही आक: यहां खड़े हो जाय, तो बगलें झांकने लगिएगा! मौलवी-भाइयो, आप लोग ख्वाजा साहब की ज्यादती देख रहे हैं । आ ही फैसला कीजिए की दीनी मामलात में उलमा का फैसला वाजिव है, या उम का! एक मोटे-ताजे दढ़ियल आदमी ने कहा--आप बिस्मिल्लाह कीजि उमरा को दीन से कोई सरोकार नहीं। यह सुनते ही एक आदमी बड़ा-सा छुरा लेकर निकल पड़ा और कई अं गाय की सौंगें पकड़ने लगे। गाय अव तक तो चुपचाप खड़ी थी। छुरा देख वह छटपटाने लगी। चक्रधर यह दृश्य देखकर तिलमिला उठे। उन्होंने ते लपककर गाय की गरदन पकड़ ली और वोले-आज आपको इस गौ एक इन्सान की भी कुरवानी करनी पड़ेगी। सभी आदमी चकित हो-होकर चक्रधर की ओर ताकने लगे। मो क्रोध से उन्मत होकर कहा-कलाम-पाक की कसम, हट जाओ, वरन हो जाएगा। की यही मरजी है कि आज गा हो जाने दीजिए । खुदा मेरी भी कुरबानी हो। ख्वाजा कसम खुदा की, तुम जैसा दिलेर आदमी नहीं देखा । तुम कलमा क्यों नहीं पढ़ लेते? चक्रधर-मैं एक खुदा का कायल हूँ। वही सारे जहान का घालिक और मालिक है । फिर और किस पर ईमान लाऊ? ख्वाजा-वल्लाह, तब तो तुम सच्चे मुसलमान हो। हमारे साथ खाने-पीने से परहेन तो नहीं करते? चक्रधर-जरूर करता हूँ, उसी तरह, जैसे किसी ब्राह्मण के साथ पाने से परहेज करता हूँ, अगर वह पाक-साफ न हो। स्वाजा-काश, तुम-जैसे समझदार तुम्हारे और भाई भी होते । मगर यहाँ तो लोग हमें मलिच्छ कहते हैं । यहाँ तक कि हमे कुत्तो से भी नजिस समाते है । वल्लाह, आपसे मिलकर दिल खुश हो गया । अव कुछ-कुछ उम्मीद हो रही है कि शायद दोनों कीमों में इत्तफाक हो जाय । अब आप जाइए । मैं आपको “यकीन दिलाता हूँ कि कुरयानी न होगी। स्वाजा महमूद ने चक्रधर को गले लगाकर रखसत किया। इघर उसी वक्त गाय की पगहिया खोल दी गई । वह जान लेकर भागी। और लोग भी इस 'नौजवान' की 'हिम्मत' और 'जामर्दी' की तारीफ करते हुए चले। घनघर को आते देखकर यशोदानन्दन अपने कमरे से निकल आये और उन्हें छाती लगाते हुए बोले- मैया, बाज तुम्हारा धैर्य और साहस देखकर मैं दग रह गया। तुम्हें देखकर मुझे अपने अपर लज्जा आ रही है । तुमने आज हमारी लाज ररा ली। उन्हें कमरे में बिठाकर यशोदानन्दन ने घर मे जाकर अपनी स्त्री वागीश्वरी से कहा-आज मेरे एक दोस्त की दावत करनी होगी? भोजन खूब दिल लगा. कर बनाना । यहल्या, आज तुम्हारी पाक-परीक्षा होगी। अहल्या-वह कौन आदमी या दादा, जिसने मुसलमानो के हायो गौ-रक्षा यशोदा.-वही तो मेरे दोस्त हैं, जिनकी दावत करने को कह रहा हूँ। यहाँ सैर करने आये हैं। अहल्या-(वागीश्वरी से) अम्मां, जरा उन्हें अन्दर बुला लेना, तो दर्शन पडोस में एक डाक्टर रहते थे। यशोदानंदन ने उन्हें बुलाकर घाव पर .पट्टी बंधवा दी। धीरे-धीरे सारा मुहल्ला जमा हो गया । कई श्रद्धालुजनों ने तो चक्रधर के चरण छुए। भोजन के बाद ज्यो ही लोग चौके से उठे, अहल्या ने कमरे की सफाई की। इन कामों से फुरसत पाकर वह एकान्त में बैठकर फूलों की एक माला पने को? करेंगे।

लगी। मन में सोचती थी, न-जाने कौन है, स्वभाव 'शितना सरल है ? लजाने में तो औरतों से भी बढ़े हुए हैं । खाना खा चुके, परं सिर न उठाया । देखने में ब्राह्मण मालूम होते हैं । चेहरा देखकर तो कोई नहीं कह सकता कि यह इतने साहमी होंगे। सहसा वागीश्वरी ने आकर कहा- वेटी, दोनों आदमी या रहे हैं। साड़ी तो बदल लो। महल्या 'ॐ' करके रह गई।हीं, उसकी छाती में धड़ान होने लगी। एक क्षण में यशोदानंदनजी चक्रधर को लिगे हए कमरे में आये। वागीश्वरी और महल्या दोनों खड़ी हो गयी। यशोदानंद ने चक्रवार को कालीन पर बैठा दिया और खुद बाहर चले गये । वागीश्वरी पंखा जलने लगी, लेकिन अहल्या मूर्ति की भाँति खड़ी रही। चक्रधर ने उड़ती हुई निगाहों ने बहल्या को देखा। ऐसा मालम हुआ, मानो कोमल, स्निग्ध एवं मुगन्धमय प्रकाश की लहर-सी आँखों में गयी । बागीश्वरी ने मिठाई की तस्तरी सामने रखते हुए पहा-~-कुछ जल-पान कर लो भैया, तुमने कुछ खाना भी तो नहीं खाया। तुम-जैसे वीरों को सवा सेर में काम न खाना चाहिए । धन्य है वह माता, जिसने ऐसे बालक को जन्म दिया ! अहल्या, जरा गिलास में पानी तो ला । भैया, जब तुम मुसलमानों के सामने अकेले लड़े थे, तो यह ईश्वर से तुम्हारी कुगल मना रही थी। जाने किननी मनौतियां कर डालीं। कहाँ है वह माला, जो तूने नूंधी थी ? अब पह- नाती क्यों नहीं? अहल्या ने लजाते हुए कांपते हाथों से माला चक्रवर के गले में डाल दी, और आहिस्ता से बोली-~~-या शिर में ज्यादा चोट आयी? चक्रधर नहीं तो; बाबूजी ने स्वाहमख्वाह पट्टी बंधवा दी। चक्रधर मिठाइयां खाने लगे। इतने में महरी ने आकर कहा-बड़ी बहूजी, मेरे लाला को रात से खाँसी ना रही है। कोई दवाई ये दो। वागीश्वरी दवा देने चली गयी। अहल्या अकेली रह गयी, तो चक्रधर ने उसकी ओर देखकर कहा-आपको मेरे कारण बड़ा कष्ट हुआ । मैं तो इस उपहार के योग्य न था। अहल्या-यह उपहार नहीं, भक्त की भेंट है। वागीश्वरी ने आकर मुस्कराते हुए कहा-मैया, तुमने तो आधी भी मिठाइयां नहीं खायीं। क्या इसे देखकर भूख-प्यास बन्द हो गयी? यह मोहनी है, जग इससे सचेत रहना। "अहल्या-अम्माँ, तुम छोटे-बड़े किसी का लिहाज नहीं करतीं ! चक्रधर यहाँ कोई घण्टे-भर तक बैठे रहे। वागीश्वरी ने उनके घर का सारा वृत्तान्त पूछा- के भाई हैं, के वहिनें, पिताजी क्या करते हैं, बहनों का - - विवाह हुआ या नहीं ? चक्रधर को उसके व्यवहार में इतना मातृ-स्नेह भरा मालूम होता था. मानो उससे पुराना परिचय है। चार बजते-बजते खाजा महमूद के जाने की खबर पाकर चक्रधर बाहर चले जाये।जोर भो कितने ही बादमी मिलने आये थे । शाम तक उन लोगों से बातें होती रही । निश्चय हुआ कि एक पचायत बनायी जाय और आपस के झगड़े रखी के द्वारा तय ना करें। चक्रधर को भी लोगों ने उस पचायत का एक मेम्बर बनाया। रात को जर अहल्या और वागीश्वरी छत पर लेटी, तो वागीश्वरी ने पूछा- अल्पा, तो गयी क्या? बहल्या-नही बम्मा, जाग तो रही हूँ। वागीश्वरी हाँ, नाज तुझे क्यो नीद आगी ! इनमें बाह को गी? तुम्हारे बाबूजी तुममे मिलाने ही के लिए इन्हें काशी से लाये है। इनके 'पाम | और कुछ हो या न हो, हृदय अवश्य । और ऐसा हृदय, जो बहुन कम लोगो के हिस्ने मे आता है। ऐसा स्वामी पाकर सम्हारा जीवन सफल हो जायगा । बहल्या ने चढवायी हुई आँखो में पागीश्वरी को देवा, पर नहु । कुछ बोली । कृतज्ञता शन्दों मनाकर शिष्टाचार का रूप धारण कर लेती है ! ने.सका मौलिक रूप वही है, जो आंखों से बाहर निकलते हुए कारता और न मेरेशाता है। बना ४ मुशी भजधर उन रेल के मुसाफिरों मे थे, जो पहले तो गाडी में खड़े होने की भयह मांगते हैं, फिर बैठने की फिक्र करने लगते हैं और अन्त में सोने की तैयारी कर देते हैं । चक्रधर एक बडी रियासत के दीवान की लड़की को पढ़ाये और वह इस स्वर्ण-सयाग स लाभ न उठाये । यह क्योकर हो सकता था,। दीवान साहब को सलाम करन आन-जान लगे । वाते करन म तो निपुण थे ही, दो-ही-चार मुलाकातों में उनका सिक्का जम गया। इस परिचय ने शोध ही मित्रता का रूप धारण किग एक दिन दीवान साहब के साथ वह रानी 'जगदीशपुर के दरबार में जा पहुंचे और ऐसी लच्छेदार बाते की, अपनी तहसील- दारी को ऐसी जीट उडायी कि रानीजो मुग्ध हो गयी । सोचा-इस जादमी को रख लूं. तो इलाके की आमदनी बढ़ गय। ठाकुर साहब से सलाह की। मेवहाँ तो पहले ही से सारी बाते सधी-बधी थी। ठकुर साहब ने रग और भी चीन कर दिया। दूसरी ही सलामी मे मुशीजी को समास्कि को तहसीलदागे मिल गयो । मुह-मागी मुराद पूरी हुई। सवारी के लिए पोहा श्री मिल मा । सोने में सुहागा हो गया । अब मुभीजी की पापो अंगुली घी में थी ! जहाँ महीने

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? शिकायत कर ही दी। राजा साहब ने त्योरी बदलकर कहा- मेरे पास तो आज तक कोई असामी शिकायत करने नहीं आया। आप उनकी तरफ से क्यों वकालत कर रहे हैं ? चक्रधर उन्हें आपसे शिकायत करने को क्योंकर साहस हो सकता है राजा-यह मैं नहीं मानता। जिसको किसी बात की भखर होती है, वह चुप नहीं बैठा रहता। चक्रधर-तो आपसे कोई आशा न रचूं? राजा-मैं अपने कर्मचारियों से अलग कुछ नहीं हूँ। चक्रधर ने इसका और कुछ जवाब न दिया। मुंशीजी राजभवन में इन्हें देखकर बोले-तुम यहाँ क्या करने आये थे? अपने लिए कुछ नहीं कहा ? चक्रधर---अपने लिए क्या कहता? सुनता हूँ, रियासत में बड़ा अंधेर मचा । वज्रधर-यह सब तुम्हारे आदमियों की शरारत है । तुम्हारी समिति के आदमी जा-जाफर असामियों को भड़काते रहते हैं। चक्रधरहम लोग तो फेवल इतना ही चाहते हैं कि असामियों पर सन्दी न की जाय और आप लोगों ने इसका वादा भी किया था; फिर यह मार-धाड़ क्यों हो रही है ? वज्रधर-~इसीलिए कि असामियों से कह दिया गया है कि राजा साहब किसी पर जन्न नहीं करना चाहते । जिसकी खुशी हो दे, जिसकी खुशी हो न दे । तुम अपने आदमियों को बुला लो, फिर देखो कितनी आसानी से काम हो जाता है । तुम आज ही अपने आदमियों को बुला लो। रियासत के सिपाही उनसे तरह विगड़े हुए हैं। ऐसा न हो कि मारपीट हो जाय। चक्रधर यहां से अपने आदमियों को बुला लेने का वादा करके तो चले; लेकिन दिल में आगा-पीछा हो रहा था। कुछ समझ में न आता था कि क्या करना चाहिए । इसी सोच में पड़े हुए मनोरमा के यहाँ चले गये। मनोरमा उन्हें उदास देखकर वोली-आप बहुत चिन्तित-से मालूम होते हैं ? घर में तो सव कुशल है ? चक्रधर-~-क्या करूँ मनोरमा, अपनी दशा देखकर कभी-कभी रोना आ जाता है । सारा देश गुलामी की वेड़ियों में जकड़ा हुआ है, फिर भी हम अपने भाइयों की गर्दन पर छुरी फेरने से बाज नहीं आते। राजा साहव की जात से लोगों को कैसी-कैसी आशाएं थीं, लेकिन अभी गद्दी पर बैठे छ: महीने भी नहीं हुए और इन्होंने भी यही पुराना ढंग अख्तियार कर लिया । प्रजा से डण्डों के जोर से रुपये वसन्न किये जा रहे हैं और कोई फरियाद नहीं सुनता। सबसे ज्यादा रोना तो इस बात का है कि दीवान साहब और मेरे पिताजी ही राजा साहब के मन्त्री और इस अत्याचार के मुख्य कारण हैं । - सरल हृदय प्राणी अन्याय की बात सुनकर उत्तेजित हो जाते हैं । मनोरमा ने उद्दण्ड होकर कहा- आप असामियो से क्यों नहीं कहते कि किसी को एक कोड़ी भी न दें। कोई देगा ही नही तो ये लोग कैसे ले लेंगे? चक्रधर को हंसी आ गयो। बोले--तुम मेरी जगह होती, तो बसामियो को मना कर देती? मनोरमा अवश्य । खुल्लम-खुल्ला कहती, खवरदार ! राजा के आदमियों को कोई एक पैसा भी न दे। मैं राजा के आदमियों को इतना पिटवाती कि फिर इलाके में जाने का नाम ही न लेते। चक्रधर ये बातें सुनकर पुलकित हो उठे। मुस्कराकर बोले-अगर दीवान साहब बफा हो जाते? ..मनोरमा-तो खफा हो जाते ! किसी के सफा हो जाने के डर से सच्ची वात पर परदा थोड़े ही डाला जाता है। इस विपय पर फिर कुछ बातचीत न हुई, लेकिन चक्रधर यहाँ से पढ़ाकर चले, तो उनके मन में प्रश्न हो रहा था-क्या अब यहाँ मेरा बाना उचित है ? माज उन्होंने विवेक के प्रकाश में अपने अन्तस्तल को देखा, तो उसमे कितने ही ऐसे भाव छिपे हुए थे, जिन्हें यहा न रहना चाहिए था। १० गही के कई दिन पहले ही से मेहमानों का आना शुरू हो गया और तीन दिन वाकी ही पे कि सारा कैम्प भर गया। दीवान साहब ने कैम्प में ही बाजार लगवा दिया था, वही रसदपानी का भी इन्तजाम था। राजा साहब स्वयं मेहमानों की खातिरदारी करते रहते थे; किन्तु जमघट बहुत बड़ा था। आठों पहर हरयोग-सा मचा रहता था। मेहमानों के आदर-सत्कार की तो धुम पी और वे मजदूर, जो छाती फाड़. फाड़कर काम कर रहे थे, भूखों मरते थे । काम लेने को सर्व पे, पर भोजन को पुछने वाला कोई न था। धमार पहर रात रहे घास छीलने जाते, मेहतर पहर रात से सफाई करने लगते, कहार पहर रात से पानी पीचना शुरू करते, मगर कोई उनका पुरसाहाल न था। चपरासी बात-बात पर उन्हें गालियां सुनाते; क्योकि उन्हें युद बात-बात पर डोट पड़ती थी। चपरासी सहते थे; क्योंकि उन्हें दूसरे पर अपना गुस्सा उतारने का मौका मिल जाता था। बेगारों से न सहा जाता था, इसलिए कि उनको अति बलवी घों । दिन-भर धूप मे जलते, रात- भर क्षुधा की आग में । असन्तोप बढ़ता जाता था। नजाने कर भव-के-सब जान पर खेल जाये, हड़ताल कर दें। सन्ध्या का समय था। तिलक का मुहूर्त निकट आ गया था। हमनक तयारी हो रही थी । सिपाहियों को वर्दी पहनकर बड़े हो जाने की आज्ञा दे दी गयी थी कि सहसा मजदूरों के बाड़े से रोने-चिल्लाने की आवाजें आने लगीं। किसी कैम्प में घास न थी और ठाकुर हरसेवक हंटर लिए चमारों को पीट रहे थे। मुंशी वज्रधर की आंखें मारे क्रोध के लाल हो रही थीं। चौधरी ने हाथ बांधकर कहा- हुजूर, पास तो रात ही को पहुंचा दी गयी थी। हां, इस वेला अभी नहीं पहुंची। आधे आदमी तो मांदे पड़े हुए हैं । मुंशो-बदमाश ! झूठ बोलता है, अभी पोलो खेल होगा, घोड़े विना खाये कैसे दौड़ेगे? एक युवक ने कहा- हम लोग तो विना खाये आठ दिन से घास दे रहे हैं, घोड़े क्या विना खाये एक दिन भी न दौड़ेगे? चौधरी डण्डा लेकर युवक को मारने दौड़ा; पर उसके पहले ही ठाकुर साहब ने झटपट उसे चार-पांच हंटर सड़ाप-सड़ाप लगा दिये । नंगी देह, चमड़ी फट गयी, खून निकल गया। चौधरी ने ठाकुर साहव और युवक के बीच में खड़े होकर कहा- हुजूर क्या मार ही डालेंगे? लड़का है, कुछ अनुचित मुंह से निकल जाय तो क्षमा करनी चाहिए । राजा को दयावान होना चाहिए। ठाकुर साहब आपे से बाहर हो रहे थे। एक चमार का यह हौसला कि उनके सामने मुंह खोल सके । वही हंटर तान कर चौधरी को जमाया। बूढ़ा आदमी, उस पर कई दिन का भूखा, खड़ा भी मुश्किल से हो सकता था, हंटर पड़ते ही जमीन पर गिर पड़ा। बाड़े में हलचल पड़ गयी। हजारों आदमी जमा हो गये। कितने ही चमारों ने मारे डर के खुरपी और रस्सी उठा ली थी और घास छीलने जा रहे थे। चौधरी पर हंटर पड़ते देखा, तो रस्सी-खुरपी फेंक दी और आकर चौधरी को उठाने लगे। ठाकुर साहब ने तड़पकर कहा-~-तुम सब अभी एक घंटे में पास लाओ, नहीं तो एक-एक की हड्डी तोड़ दी जायेगी। एक चमार बोला-हम यहां काम करने आये हैं, जान देने नहीं आये हैं। एक तो भूखों मरें, दूसरे लात खायें। हमारा जन्म इसीलिए थोड़े ही हुआ है ? जिससे चाहे काम कराइए, हम घर जाते हैं । मुंशी-~-जिसने वाड़े के बाहर कदम रखा, उसकी शामत आई। तोप पर उड़ा दूंगा। लेकिन चमारों के सिर पर भूत सवार था। बूढ़े चौधरी को उठाकर सब- के-सव एक गोल में वाड़े के द्वार की ओर चले। सिपाहियों की कवायद हो रही थी । ठाकुर साहब ने खबर भेजी और वात-की-बात में उन सवों ने आकर बाड़े का द्वार रोक लिया। सभी कम्पों में खलबली पड़ गयी । तरह-तरह की अफवाहें उड़ने लगीं। राजा साहब अपने खेमे में तिलक के भड़कीले-सजीले वस्त्र धारण - । ४० कर रहे थे। यह खवर सुनो, तो तिलमिला गरे । काध से पावले होकर वह अपनी बन्दूक लिए खेमे से निकल आये और कईआदमियों के साथ वाड़े के द्वार पर जा पहुंचे। चौधरी इतनी देर में झाड़-पोछकर उठ वंठा या। राजा साहब को देखते ही रोकर बोला-दुहाई है महाराज की। सरकार, बड़ा अन्धेर हो रहा है । गरीब लोग मारे जाते हैं। राजा-तुम सब पहले वाड़े के द्वार से हट जामओ, फिर जो कुछ कहना है, मुझसे कहो। अगर किसी ने बाड़े के बाहर पांव रपा, तो जान से मारा जायगा। चौधरी-सरकार ने हमको काम करने के लिए बुलाया है कि जान लेने के लिए? करेगी। राजा-काम न करोगे, तो जान ली जायगी। चौधरी-काम तो आपका करें,बाने किसके घर जायें ? राजा-क्या वेहूदा बातें करता है, चुप रहो। तुम सब-के-सब मुझे बदनाम करना चाहते हो। तुम नीच हो और नोच लातो के बगैर सीधा नहीं होता। पौधरो-क्या अब हमारी पीठ पर कोई नही कि मार खाते रहे और मुंह न खोलें? अब तो सेवा-समिती हमारी पीठ पर है। क्या वह कुछ भी न्याय न राजा-अच्छा ! तो तुमे सेवा-समिति वालों का घमण्ड है ? चौधरी हुई है, वह हमारी रक्षा करती है, तो क्यों न उनका घमण्ड करें? राजा साहब ओठ चबाने लगे तो यह समिति वालों की कारस्तानी है। पक्रधर मेरे साथ कपट-चाल चल रहे हैं, लाला चक्रधर ! जिसका बाप मेरी खुशामद की रोटियो पाता है। देखता हूँ, वह मेरा क्या कर लेता है। इन मूर्यो के सिर से यह घमण्ड निकाल हो देना चाहिए। यह जहरीले कीड़े फैल गये, तो बाफत मचादेंगे। पौधरी तो ये बातें कर रहा था, उधर बाड़े में घोर कोलाहल मचा हुआ था। सरकारी आदमियों को सूरत देखकर जिनके प्राण-पधेरू उड़ जाते थे, वे इस समय निःशक और निर्भय बन्दूको के सामने मरने को तैयार खड़े थे। द्वार से निकलने का रास्ता न पाकर कुछ बादमियो ने वाहे की लकड़ियां और रस्सियां काट राती और हजारों आदमी उधर से भड़भड़ाकर निकल पड़े, मानो कोई उमड़ी हुई नदी बांध तोड़कर निकल पड़े। उसी वक्त एक ओर से सशस्त्र पुलिस के जवान और दूसरी ओर से चक्रधर, समिति के कई युवकों के साथ आते हुए दिखाई दिये। उन्हें देखते ही हड़तालियों में जान-सी पड़ गयी, जैसे बदोश बामक ४१ - माता को देखकर शेर हो जाय । हजारों आदमियों ने घेर लिया---'भैया आ गये ! भया आ गये !' की ध्वनि से आकाश गूंज उठा। चक्रधर ने ऊँची आवाज से कहा-क्यों भाइयो, तुम मुझे अपना मित्र समझते हो या शत्रु? चौधरी-भैया, यह भी कोई पूछने की बात है । तुम हमारे मालिक हो, सामी हो, सहाय हो! चक्रधर इस भीड़ से निकल कर सीधे राजा साहब के पास पाये और वोले-महाराज, मैं आप से कुछ विनय करना चाहता हूँ। राजा साहब ने त्योरियां वदल कर कहा-मैं इस वक्त कुछ नहीं सुनना चाहता। चक्रधर--आप कुछ न सुनेंगे, तो पछतायेंगे। राजा--- मैं इन सवों को गोली मार दूंगा। चक्रधर .. दीन प्रजा के रक्त से राज-तिलक लगाना किसी राजा के लिए मंगलकारी नहीं हो सकता । प्रजा का आशीर्वाद ही राज्य की सबसे बड़ी शक्ति है । मैं आपका शुभचिन्तक हूँ। इसीलिए आप की सेवा में आया हूँ। यह सारा तूफान अयोग्य कर्मचारियों का खड़ा किया हुआ है। ये सभी आदमी इस वक्त झल्लाये हुए हैं। गोली चलाकर आप उनके प्राण ले सकते हैं। लेकिन उनका रक्त केवल इसी वाड़े में न सूखेगा, यह सारा विस्तृत कैम्प उस रक्त से सिंच जायगा; उसकी लहरों के झोंके से यह विशाल मण्डप उखड़ जायगा और यह आकाश में फहराती हुई ध्वजा भूमि पर गिर पड़ेगी। सारी रियासत में हाहा- - कार मचजायगा। राजा साहब अपनी टेक पर अड़ना जानते थे; किन्तु इस समय उनका दिल काँप उठा । बोले-~-इन लोगों को अगर कोई शिकायत थी, तो इन्हें आकर मुझसे कहना चाहिए था। मुझसे न कहकर इन लोगों ने हेकड़ी करनी शुरू की, रात घोड़ों को घास नहीं दी और इस वक्त भागे जाते हैं। मैं यह घोर अपमान नहीं सह सकता। चक्रधर-आपने इन लोगों को अपने पास आने का अवसर कव दिया? आपको मालूम है कि इन गरीबों को एक सप्ताह से कुछ भोजन नहीं मिला ? राजा-यह आप क्या कहते हैं ? मैंने सख्त ताकीद कर दी थी कि हर एक मजदूर को इच्छा-पूर्ण भोजन दिया जाय । क्यों दीवान साहब, क्या बात है ? हरिसेवक-धर्मावतार, आप इन महाशय की वातों में न आइए । यह सारी आग इन्हीं की लगायी हुई है। मुंशी-~दीनबन्धु, यह लड़का विलकुल नासमझ है । दूसरों ने जो कुछ कह दिया, उसे सच समझ लेता है। राजा-मैं इसकी पूछ-ताछ करूंगा। ४२ , हरसेवक-हुजूर, इन्हीं लोगो ने आदमियो को उभारकर सरफश बना दिया है। ये लोग सबसे कहते फिरते हैं कि किसी को तुम्हारे कपर राज्य करने का अधिकार नहीं है, किसी को तुमसे बेगार लेने का अधिकार नहीं। जमीन के मालिक तुम हो । जो जमीन से वीज उगाये, वही उसका मालिक है । राजा तो तुम्हारा गुलाम है। राजा-बहुत ठीक कहते हैं । वास्तव मे मैं प्रजा का गुलाम हूँ, बल्कि उसके गुलाम का गुलाम हूँ। हरसेवक- हुजूर, मैं इन लोगों की बातें कहाँ तक कहूँ। कहते हैं, राजा को इतने बड़े महल में रहने का कोई हक नहीं । उसका ससार मे कोई काम ही नहीं। राजा--बहुत ही ठीक कहते हैं । आखिर मैं पड़े-पड़े खाने के सिवा और क्या करता हूँ। चक्रधर ने झुंझलाकर कहा-मैंने प्रजा को उनके अधिकार अवश्य समझाये हैं। लेकिन यह कभी नहीं कहा कि राजा को संसार में रहने का कोई हक नहीं; क्योकि मैं जानता हूँ, जिस दिन राजाओं की जरूरत न रहेगी, उस दिन उनका अन्त हो जाएगा । राजा-मैं तो बुरा नहीं मानता, आपने कोई ऐसी बात नहीं कही, जो और लोग न कहते हो। चक्रधर को मालूम हुआ कि राजा साहब मुझे बना रहे हैं। गरम होकर बोले-अगर आपके ये भाव सच्चे होते, तो प्रजा पर यह विपत्ति ही न बाती। राजाओं की यह पुरानी नीति है कि प्रजा का मन मीठी-मीठी बातों से भरें और अपने कर्मचारियो को मनमाने अत्याचार करने दें। वह राजा, जिसके कानो तक प्रजा की पुकार न पहुंचने पाये, आदर्श नहीं कहा जा सकता। राजा--किसी तरह नहीं । उसे गोली मार देनी चाहिए। जीता चुनाव देना चाहिए । प्रजा का गुलाम है कि दिल्लगी। चक्रधर यह व्यंग्य न सह सके । उनको स्वाभाविक शक्ति ने उनका साथ छोड़ दिया। चेहरा तमतमा उठा। बोले-जिस बादशं के सामने आपको सिर झुकाना चाहिए, उसका मजाक उड़ाना आपको शोभा नहीं देता। मैंने कभी यह अनुमान न किया था कि आपके वचन और कर्म में इतनी जल्द इतना बड़ा भेद हो जाएगा। क्रोध ने अव अपना यथार्थ रूप धारण किया। राजा साहब अभी तक तो व्यम्यों से चघर को परास्त करना चाहते थे; लेकिन जब चक्रधर के वार मर्म- स्थल पर पड़ने लगे, तो उन्हे भी अपने शस्त्र निकालने पड़े। उपटकर बोले- बच्छा, बाबूजी, अब अपनी जवान बन्द करो। मैं प्रजा का गुलाम नहीं' मेरे पैरो को धूल है । मुझे अधिकार है कि उसके साथ जमा ४३ मलूक करूं। किसी को हमारे और हमारी प्रजा के बीच में बोलने का हक नहीं है। आप अब कृपा करके यहाँ से चले जाइए और फिर कभी मेरी रियासत में कदम न रखिएगा; वरना शायद आपको पछताना पड़े। जाइए। मुंशी वैज्रधर की छाती धक-धक करने लगी। चक्रधर को हाथों से पीछे हटाकर बोले-हुजूर की कृपा-दृष्टि ने इसे शोष कर दिया है। अभी तक बड़े आदमियों की सोहबत में बैठने का मौका तो मिला नहीं, बात करने की तमीज कहाँ से आये। लेकिन चक्रधर भी जवान आदमी थे, उस पर सिद्धान्तों के पक्के, आदर्श पर मिटने वाले, अधिकार और प्रभुत्व के जानी दुश्मन, वह राजा साहब के उद्दण्ड शब्दों से जरा भी भयभीत न हुए । तने हुए सामने आये और बोले-आपको अपने मुख से ये शब्द निकालते हुए शर्म आनी चाहिए थी । आप प्रजा पर अपने को अर्पण कर देना चाहते थे। आप कहते थे, मैं प्रजा को अपने पास वेरोक-टोक आने दूंगा, उनके लिए मेरे द्वार हरदम खुले रहेंगे । आप कहते थे, मेरे कर्मचारी उनकी और टेढ़ी निगाह से भी देखेंगे, तो उनकी शामत आ जायगी । वे सारी बातें क्या आपको भूल गयों ? और इतनी जल्द ? अभी तो बहुत दिन नहीं गुजरे। अव आप कहते हैं, प्रजा मेरे पैरों की धूल है। राजा साहब कहां तो क्रोध से उन्मत्त हो रहे थे, कहां यह लगती हुई वात सुनकर रो पड़े। क्रोध निरुत्तर होकर पानी हो जाता है। मगर एक ही क्षण में राजा साहब सवेत हो गये । प्रभुता ने आंसुओं को दवा दिया। अकड़कर बोले- मैं कहता हूँ, यहाँ से चले जाओ ! चक्रधर-जब तक आप इन आदमियों को जाने न देंगे, मैं नहीं जा. सकता। राजा-मेरे आदमियों से तुम्हें कोई सरोकार नहीं है। उनमें से अगर एक भी हिला, तो उसकी लाश जमीन पर होगी। चक्रधर--तो मेरे लिए इसके सिवा और कोई उपाय नहीं है कि उन्हें यहाँ से हटा ले जाऊं? यह कहकर चक्रधर मजदूरों की ओर चले । राजा साहब जानते थे कि इनका इशारा पाते ही सारे मजदूर हवा हो जायगे, फिर सशस्त्र सेना भी उन्हें न रोक सकेगी। तिलमिलाकर बन्दुक लिए हुए चक्रधर के पीछे दौड़े और ऐसे जोर से उन पर कुन्दा चलाया कि सिर पर लगता तो शायद वहीं ठण्डे हो जाते । मगर कुशल हुई । कुन्दा पीठ में लगा और उसके झोंके से चक्रधर कई हाथ पर जा गिरे । उनका जमीन पर गिरना था कि पांच हजार आदमी वाड़े को तोड़कर, सशस्त्र सिपाहियों को चीरते, बाहर निकल आये और नरेशों के कैम्प की ओर चले। रास्ते में जो कर्मचारी मिला, उसे पीटा। मालूम होता था, - कैम्प में लूट मच गयी है। दूकानदार अपनी दुकानें समेटने लगे, दर्शकगण - अपनी घोतियां संभालकर भागने लगे। चारों तरफ भगदड़ पड़ गयी । जितने बेफिके, शोहदे, लुच्चे तमाशा देखने वाए थे, वे सब उपद्रवकारियों मे मिल गये। यहाँ तक कि नरेशों के कैम्प तक पहुंचते-पहुंचते उनकी संख्या दूनी हो गयी। राजा-रईस अपनी वासनाओ के सिवा और किसी के गुलाम नहीं होते। वक्त की गुलामी भी उन्हें पसन्द नहीं। वे किसी नियम को अपनी स्वेच्छा में बाधा नहीं डालने देते । फिर उनको इसको क्या परवाह कि सुबह है या शाम । कोई मीठी नीद के मजे लेता था, कोई गाना सुनता था, कोई स्नान-ध्यान में मान था और लोग तिलक-मंडप जाने की तैयारियां कर रहे थे। कही भंग घुटती यी, कही कवित्त चर्चा हो रही थी और कहीं नाच हो रहा था। कोई नाश्ता कर रहा था और कोई लेटा नौकरी से चम्पी करा रहा था। उत्तरदायित्वहीन स्वतन्त्रता अपनी विविध लीलाएं दिखा रही यी । अगर उपद्रवी इस कम्प पहुंच जाते, तो महा-अनर्थ हो जाता। न जाने कितने राजवंशो का बत हो जाता, किन्तु राजाबों की रक्षा उनका इकवाल करता है । अग्रेजी कैम्प में १०-१२ आदमी अभी शिकार खेलकर लौटे थे । उन्होंने जो यह हंगामा सुना, तो बाहर निकल आये और जनता पर अन्धाधुन्ध बन्दुक छोड़ने लगे। पहले तो उत्तेजित जनता ने बन्दूकों की परवा न की, उसे अपनी संख्या का बल या। जनता उत्तेजित होकर आदर्शवादी हो जाती है। गोलियों की पहली बाढ़ आई। कई आदमी गिर गये। चौधरी- देखो भाई, घबराना नहीं। जो गिरता है उसे गिरने दो; आज हो तो दिल के हौसले निकले हैं। जय हनुमानजी को ! एक मजदूर-बढ़े आयो, बढ़े आओ, अब मार लिया है। आज ही तो... उसके मुंह से पूरी बात भी न निकलने पाई थी कि गोलियों की दूसरी बाढ़ बायी और कई आदमियों के साथ दोनों नेताओं का काम तमाम कर गयो । एक क्षण के लिए सबके पर रुक गये । जो जहाँ या, वहीं खड़ा रह गया। समस्या पी कि आगे जाये या पीछे? सहसा एक युवक ने कहा-मारो, रुक क्यो गये ? सामने पहुंचकर हिम्मत छोड़े देते हो! वढ़े चलो। जय दुर्गामाई की ! अग्रेजी कैम्प से फिर गोलियों की बाढ़ आयी और कई यादमियों के साथ पह आदमी भी गिर गया, और उसके गिरते ही सारे समूह में खलबली पड़ गयो । बभी तक इन लोगों को न मालूम था कि गोलियो किधर से बा रही हैं। समझ रहे थे कि इसी कैम्प से आती होगी। अब शिकारी लोग बढ़ आये थे बोर साफ नजर आ रहे थे। एक चमार वोला-साहब लोग गोली चला रहे हैं । चलो, उन्ही सवों को पयें ? मुर्गी के अंडे खा-खाकर खूब मोटाये हुए हैं। दे अग्रेजी कैम्प की तरफ मुड़े और एक ही हल्ले में अग्रेजी कैम्प के फाटक वक ना पहुंचे । अग्रेज योद्धा अभी तकतो मोरचे पर पड़े बन्दूकें छोड़ रहे थे; ४५ लेकिन इस भयंकर दल को सामने देखकर उनके औसान जाते रहे। दो-बार तो भागे, दो-तीन मूळ खाकर गिर पड़े। केवल पांच फौजी अफसर अपनी जगह पर उटे रहे। उन्हें बचने की कोई आशा न थी इसी निराशा ने उन्हें अदम्य साहस प्रदान कर दिया था। सामने पहुँचकर लोगों ने आगे बढ़कर पत्थर चलाने शुरू किये । यहाँ तक कि अंग्रेज चोट खाकर गिर पड़े। एक का सिर फट गया था, दूसरे की बाँह टूट गयी थी। केवल तीन आदमी रह गये थे और वही. इन आद- मियों को रोक रखने के लिए काफी थे। लेकिन उनके पास भी कारतूस न रह गये थे। इधर हड़तालियों के हौसले बढ़ते जाते थे। शिकार अव बेदम होकर गिरना चाहता था। हिंसा के मुंह से लार टपक रही थी। सहसा एक आदमी पीछे से भीड़ को चीरता, वेतहाशा दौड़ता हुआ आकर बोला-वस, वस, क्या करते हो ! ईश्वर के लिए हाथ रोको ! क्या गजव करते हो ! लोगों ने चकित होकर देखा, तो चक्रधर थे। सैकड़ों आदमी उन्मत्त होकर उनकी ओर दौड़े और उन्हें घेर लिया । जय-जयकार की ध्वनि से आकाश गूंजने - एक मजदूर ने कहा-हमें अपने एक सौ भाइयों के खून का बदला लेना चक्रधर ने दोनों हाथ ऊपर उठाकर कहा--कोई एक कदम आगे न बढ़े। खबरदार ! मजदूर-~~यारो, बस, एक हल्ला और ! चक्रधर--हम फिर कहते हैं, अब एक कदम भी आगे न उठे। जिले के मैजिस्ट्रेट मिस्टर जिम ने कहा-बाबू साहब, खुदा के लिए हमें बचाइए। फौज के कप्तान मिस्टर सिम वोले-हम हमेशा आपको दुआ देगा। हम सरकार से आपका सिफारिश करेगा। एक मजदूर-हमारे एक सौ जवान भून डाले, तव आप कहां थे? यारो, क्या खड़े हो, वावूजी का क्या विगड़ा है। मारे तो हम गये हैं न? मारो वढ़ के। चक्रधर ने उपद्रवियों के सामने खड़े होकर कहा-अगर तुम्हें खून की ऐसी प्यास है, तो मैं हाजिर हूँ। मेरी लाश को पैरों से कुचलकर तभी तुम आगे बढ़ मजदूर-भैया, हट जाओ, हमने वहुत मार खाई है, बहुत सताये गये हैं, इस वक्त दिल की आग बुझा लेने दो ! चक्रधर-~-मेरा लहू इस ज्वाला को शान्त करने के लिए काफी नहीं है ? मजदुर--भैया, तुम सान्त-सान्त वका करते हो; लेकिन उसका फल क्या होता है। हमें जो चाहता है, मारता है; जो चाहता है, पीसता है; तो क्या । सकते हो। . ४६ नी सान्त बैठे रहे? सान्त रहने से तो और भी हमारी दुर्गत होती है । हमे न्ति रहना मत सिखाओ। हमें मरना सियाओ, तभी हमारा उदार कर कोगे। चक्रधर--अगर अपनी आत्मा की हत्या करके हमारा उदार भी होता हो तो हम आत्मा की हत्या न करेंगे। संसार को मनुष्य ने नहीं बनाया है, ईवटर ने चनाया है । भगवान् ने उतार के जो उपाय बताये हैं, उनसे काम लो और ईश्वर पर भरोसा रखो। मजदूर-हमारी फांसी तो हो ही जायगी। तुम मांफी तो न दिला सकोगे। . .. . मिस्टर जिम-हम किसी को राजा न देंगे। चक्रधर---इनाम मिले या फांसी, इसकी क्या परवा। अभी तक तुम्हाग दामन यून के छीटो से पाक है, उमे पाक रखो । ईश्वर की निगाह मे तुम निर्दोष हो । अब अपने को कलकित मत करो, जाओ। मजदूर--अपने भाइयों का पून कभी हमारे सिर से न उतरेगा; लेकिन तुम्हारी यही मरजी है, लौट जाते हैं । आपिर फांसी पर तो पढ़ाना ही है । एफ क्षण में मारा फैम्प साफ हो गया। एक भी मजदूर न रह गया। दन आदमियों के जाते ही वे लोग भी इनके साथ हो लिये, जो पहले लूट सा -पानी आ जाने से कोई मेला उठ जाता है .... उसीमा ए.... को ज्वाला निकल रही थी। राजा सा. भादमी उसके सामने चुपचाप पहे मानो किसी मृतक की दाह-in. अंधेरा छा गया था। घायलों के कराहने की आवाजें आ रही थीं। चक्र और उसके साथ के युवक उन्हें सावधानी में उठा-उठाकर एक वृक्ष के नीचे - कर रहे थे। कई आदमी तो उठाते-उटाते मुरलोक सिधारे । कुछ सेवक उन्हें जाने की फित्र करने लगे। एकाएक कई सिपाहियों ने आकर सक्रधर को पकड़ लिया और 4 कैम्प की तरफ ले चले। पूछा, तो मालूम हुआ कि जिम माहब का यह हम वहाँ कनहरी लगी हुई थी। सशस्त्र पुलिग के मिपाही, जिन्हें अब न फुरसत मिल चुकी थी, द्वार पर गंगी गढ़ाये गड़े थे। अन्दर मिस्टर जिम मिस्टर सिम रौद्र रूप धारण किये मिगार पी रहे थे, मानो क्रोधाग्नि निकल रही हो। राजा साहय मिस्टर जिम के बगल में बैठे थे। दीवान क्रोध में आप लाल किये मंत्र पर हाय रखें कुछ पह रहे थे और मुनी हाथ बांधे एक कोने में गड़े थे। को देखते ही मिस्टर जिम ने कहा-राजा साहब नहता है 1 .

सव तुम्हारी शरारत है। चक्रधर आवेश में आकर बोले-अगर राजा साहब, आपका ऐसा विचार है, तो इसका मुझे दुःख है । हम लोग जनता में जागृति अवश्य फैलाते हैं, उनमें शिक्षा का प्रचार करते हैं, उन्हें स्वार्थान्ध अमलों के फन्दों से बचाने का उपाय करते हैं, और उन्हें अपने आत्म-सम्मान की रक्षा करने का उपदेश दे देते हैं। हम चाहते हैं कि वे मनुष्य बनें और मनुष्यों की भांति संसार में रहें। वे स्वार्थ के दास बनकर कर्मचारियों की खुशामद न करें, भयवश अपमान और अत्याचार न सहें । अगर इसे कोई भड़काना समझता है, तो समझे। हम तो इसे अपना कर्तव्य समझते हैं। जिम-तुम्हारे उपदेश का यह नतीजा देखकर कौन कह सकता है कि तुम उन्हें नहीं भड़काता? चक्रधर-यहाँ उन आदमियों पर अत्याचार हो रहा था और उन्हें यहां से चले जाने का या काम न करने का अधिकार था। अगर उन्हें शांति के साथ चले जाने दिया जाता, तो यह नौवत कभी न आती। राजा हमें परम्परा से वेगार लेने का अधिकार है और उसे हम नहीं छोड़ सकते । आप असामियों को वेगार देने से मना करते हैं, और आज के हत्याकाण्ड का सारा भार आपके ऊपर है। चक्रधर-कोई अन्याय केवल इसलिए मान्य नहीं हो सकता कि लोग उसे परम्परा से सहते माए हैं। जिम-हम तुम्हारे ऊपर बगावत का मुकदमा चलायेगा । तुम dangerous (खतरनाक) आदमी है। राजा-हुजूर, मैं इनके साथ कोई सख्ती नहीं करना चाहता, केवल यह प्रतिज्ञा लिखाना चाहता हूँ कि यह अथवा इनके सहकारी लोग मेरी रियासत में त जायें। चक्रधर-मैं ऐसी प्रतिज्ञा नहीं कर सकता । दीनों पर अत्याचार होते देख- कर दूर खड़े रहना वह दशा है, जो हम किसी तरह नहीं सह सकते। मिस्टर जिम ने सव-इन्स्पेक्टर से कहा-इनको हवालात में रखो, कल इजलास पर पेश करो। वज्रधर ने आगे बढ़कर जिम के पैरों पर पगड़ी रख दी और वोले-हुजूर, यह गुलाम का लड़का है । हुजूर, इसकी जांवख्शी करें। मिस्टर जिम-ओ! तहसीलदार साहब, यह तुम्हारा लड़का है ? तुमने उसको घर से निकाल क्यों नहीं दिया? सरकार तुमको इसलिए पेंशन नहीं देता कि तुम वागियों को पाले। हम तुम्हारा पेंशन बन्द कर देगा। राजा बाबू चक्रधर, अभी कुछ नहीं बिगड़ा है। आप प्रतिज्ञा लिखकर . शौक से घर जा सकते हैं। मैं आपको तंग नहीं करना चाहता । हां, इतना ही मनोरमा-३ - ४८ हता हूरहनामनहा। चक्रघर---राजा साहय, क्षमा कीजिएगा, जब तक असन्तोप के कारण दूर - होगे, ऐसी दुर्घटनाएं होगी और फिर होंगी। मुझे बाप पकड़ सकते हैं, कैद कर सकते हैं। इससे चाहे आपको शान्ति हो; पर वह असन्तोप वणुमात्र भी कम होगा, जिससे प्रजा का जीवन असह्य हो गया है। असन्तोप को भड़काकर नाप प्रजा को शात नहीं कर सकते। हो, कायर बना सकते हैं। अगर आप उन्हे काले सियार और 1 होगी, न ईश्वर ? ११ संख्या हो गयी है । ऐसी उमस है कि सांस लेना कठिन है, और जेल की कोठरियों में यह उमस और भी असह्य हो गई है। एक भी खिड़की हो, एक भी जंगला नहीं। उस पर मच्छरो का निरन्तर गान कानों के परदे काड़े डालता है। यहीं एक कोठरी में चक्रधर को भी स्थान दिया गया है। स्वाधीनता की पी अपने सच्चे सेवकों को यही पद प्रदान करती है। वह सोच रहे हैं यह भीषण उत्पात क्यो हुआ ? हमने कभी भूलकर भी कसी से यह प्रेरणा नहीं की। फिर लोगो के मन में यह बात कैसे समायो ? प प्रश्न का उन्हें यही उत्तर मिल रहा है कि यह हमारी नीयत का नतीजा है। हमारी शाति-शिक्षा की तह मे द्वेष छिपा हुआ था। हम भूल गए थे कि सगठित स्ति आग्रहमय होती है। अत्याचार से उत्तेजित हो जाती है। अगर हमारी यत साफ होती, तो जनता के मन में कभी राजाओं पर चढ दौडने का आवेश - होता; लेकिन क्या जनता राजाओं के कैम्प की तरफ न जाती, तो पुलिस उन्हे चना रोक-टोक अपने घर जाने देती? कभी नही, सवार के लिए घोड़े का अड़ ना या विगड़ जाना एक बात है । जो छेड-छड़ कर लड़ना चाहे, उससे कोई योकर बचे? फिर, अगर प्रजा अत्याचार का विरोध न करे, उसके संगठन से यदा ही क्या? इसीलिए तो उसे सारे उपदेश दिए जाते हैं । कठिन समस्या । या तो प्रजा को उनके हाल पर छोड़ दूं, उन पर कितने ही जुल्म हों, उनके नकट न जाऊँ या ऐसे उपद्रवों के लिए तैयार रहूं। राज्य पशु-बल का प्रत्यक्ष =प है । वह साधु नहीं है, जिसका वल धर्म है; वह विद्वान नहीं है, जिसका बल जर्क है । वह सिपाही है जो डण्डे के जोर से अपना स्वार्थ सिद्ध कराता है। इसके सिवा उनके पास कोई दूसरा साधन ही नहीं। यह सोचते-सोचते उन्हे अपना ख्याल आया। मैं तो कोई आन्दोलन नहीं - , कर रहा था। किसी को भड़का नहीं रहा था। जिन लोगों की प्राणरक्षा के लिए अपनी जान जोखिम में डाली, वही मेरे साथ यह सलूक कर रहे हैं। इतना भी नहीं देख सकते कि जनता पर किसी का असर हो। उनकी इच्छा इसके सिवा और क्या है कि सभी आदमी अपनी-अपनी आंखें बन्द कर रखें, उन्हें अपने आगे- पीछे, दायें-वायें देखने का हक नहीं । अगर सेवा करना पाप है, तो यह पाप तो मैं उस वक्त तक करता रहूँगा, जब तक प्राण रहेंगे। जेल की क्या चिन्ता ? सेवा करने के लिए सभी जगह मौके हैं। जेल में तो और भी ज्यादा। लाला जी को दुःख होगा, अम्माजी रोयेंगी; लेकिन मजबूरी है । जब बाहर भी जवान और हाथ-पांव बांधे जायेंगे, तो जैसे जेल वैसे वाहर । वह भी जेल ही है। हां, जरा उसका विस्तार अधिक है। मैं किसी तरह प्रतिज्ञा नहीं कर सकता। वह इसी सोच-विचार में पड़े हुए थे कि एकाएक मुंशी वज्रधर कमरे में दाखिल हुए। उनकी देह पर एक पुरानी अचकन थी, जिसका मैल उसके असली रंग को छिपाये हुए था। नीचे एक पतलून था, जो कमरवन्द न होने के कारण खिसककर इतना नीचा हो गया था कि घुटनों के नीचे एक झोला-सा पड़ गया था। संसार में कपड़े से ज्यादा वेवफा और कोई वस्तु नहीं होती। तहसीलदार साहव चक्रधर के पास जाकर बोले- क्या करते हो, वेटा ? यहां तो बड़ा अंधेरा है। चलो, बाहर इक्का खड़ा है; वैठ लो। इधर ही से साहब के बंगले पर होते चलेंगे । जो कुछ वह कहें, लिख देना। वात ही कौन-सी है। हमें कौन किसी से लड़ाई करनी है । कल ही से दौड़ लगा रहा हूँ। वारे आज दोपहर को जाके सीधा हुआ । पहले बहुत यों-त्यों करता रहा, लेकिन मैंने पिंड न छोड़ा। या वहाँ न चलना चाहो, तो यहीं एक हलफनामा लिख दो। देर करने से क्या फायदा। तुम्हारी अम्मा रो-रोकर जान दे रही हैं। चक्रधर ने सिर नीचा करके कहा-अभी तो मैंने कुछ निश्चय नहीं किया। सोचकर जवाव दूंगा । आप नाहक इतने हैरान हुए। वज्रधर-कैसी बातें करते हो, वेटा? यहाँ नाक कटी जा रही है, घर से निकलना मुश्किल हो गया है और तुम कहते हो-सोचकर जवाव दूंगा। इसमें सोचने की बात ही क्या है ? चलो; हलफनामा लिख दो। घर में कल से आग नहीं जली। चक्रधर--मेरी आत्मा किसी तरह अपने पांव में वेड़ियां डालने पर राजी नहीं होती। चक्रधर जब प्रतिज्ञा-पत्र पर हस्ताक्षर करने पर राजी न हुए, तो मुंशीजी निराश होकर बोले-अच्छा वेटा, लो, अब कुछ न कहेंगे । मैं तो जानता था कि तुम जन्म के जिद्दी हो, मेरी एक न सुनोगे, इसीलिए आता ही न था; लेकिन तुम्हारी माता ने मुझे कुरेद-कुरेद कर भेजा। कह दूंगा, नहीं आता । जितना रोना हो, रो लो।

कठोर-ते-कठोर हृदय में भी मातृ-स्नेह की कोमल स्मृतियां संचित होती हैं। चक्रधर कातर होकर बोले-आप माताजी को समझाते रहियेगा। कह दीजिऐगा, मुझे जरा भी तकलीफ नहीं है। वज्रधर ने इतने दिनो तक योंही वहसीलदारी न की थी। ताड़ गये कि चवको निशाना ठीक पड़ा । बेपरवाई से बोले-मुझे क्या गरज पड़ी है कि किसी के लिए झूठ बोलूं । जो आंखों से देख रहा हूँ, वहीं कहूंगा । रोयेंगी, रोयें; रोना तो उसकी तकदीर ही में लिखा है। जब से तुम आये हो, एक चूंट पानी तक मुंह में नही डाला । इसी तरह दो-चार दिन और रही, तो प्राण निकल जायेंगे। चक्रधर करुणा से विह्वल हो गये । विना कुछ कहे हुए मुंभोजी के साथ दफ्तर की ओर चले । मुशीजी के चेहरे की झुरियों एक क्षण के लिए मिट गयी। चक्रधर को गले लगाकर बोले-जीते रहो बेटा, तुमने मेरी बात मान ली। इसमे बढ़कर और क्या खुशी की बात होगी। दोनों आदमी दफ्तर में आये, तो जेलर ने कहा-क्या बाप इकरार-नामा लिप रहे हैं ? निकल गयी सारी शेखी ! इसी पर इतनी दूने की लेते थे। चक्रधर पर पड़ों पानी पड़ गया । मन की अस्थिरता पर लज्जित हो गये जाति-सेवकों से सभी दृढ़ता की याशा रखते हैं, सभी उसे आदर्श पर बलिदान होते देखना चाहते हैं । जातीयता के क्षेत्र में आते ही उसके गुणों को परीक्षा अत्यन्त कठोर नियमों से होने लगती है और दोपों की सूक्ष्म नियमो से। परले सिर का कुचरित मनुष्य भी साघुवेश रखने वालों से ऊंचे आदर्श पर चलने की आशा रखता है, और उन्हें आदर्श से गिरते देखकर उनका तिरस्कार करने में संकोच नहीं करता। जेलर के कटाक्ष ने चक्रधर को झपकी हुई आंखें खोल दी। तुरन्त उत्तर दिया-मैं जरा वह प्रतिज्ञा-पन्न देखना चाहता हूँ। चक्रधर ने कागज को सरसरी तौर से देखकर कहा-इसमे तो मेरे लिए कोई जगह ही नही रही । घर पर कंदी ही बना रहूंगा। जब कैद ही होना है, को कैदवाना क्या बुरा है ? अब या तो अदालत से बरी होकर आऊँगा, या सजा के दिन काटकर। यह कहकर चक्रधर अपनी कोठरी में चले आये। किन और कोई नामे या न आये, किन्तु मनोरमा रोज ठीक दस बजे कचहरा ना जाती और अदालत के उठने तक अपनी जगह पर मूर्ति की भाति बैटरी रहती। उसके मुख पर दह संकल, विशाल करना, अलौकिक धर्व और गहरी चिन्ता का फोका रग छाया हुआ था।

- - सन्ध्या का समय था। आज पूरे १५ दिनों की कारवाई के बाद मिस्टर जिम ने दो साल की कैद का फैसला सुनाया था। यह कम-से-कम सजा थी, जो उस धारा के अनुसार दी जा सकती थी। चक्रधर हँस-हंसकर मित्रों से विदा हो रहे थे । सवकी आँखों में जल भरा हुना था। मजदूरों का दल इजलास के द्वार पर खड़ा 'जय-जय' का शोर मचा रहा था। कुछ स्त्रियां खड़ी रो रही थीं। सहसा मनोरमा आकर चक्रधर के सम्मुख खड़ी हो गयी । उसके हाथ में फूलों का एक हार था। वह उसने उनके गले में डाल दिया और वोली-अदालत ने तो आपको सजा दे दी, पर इतने आदमियों में एक भी ऐसा न होगा, जिसके दिल में आपसे सौगुना प्रेम न हो गया हो। आपने हमें सच्चे साहस, सच्चे आत्म-बल और सच्चे कर्तव्य का रास्ता दिखा दिया । जाइए, जिस काम का वीड़ा उठाया है, उसे पूरा कीजिए, हमारी शुभमाकनाएं आप के साथ हैं। चक्रधर ने केवल दवी आंखों से मनोरमा को देखा, कुछ बोल न सके । उन्हें शर्म आ रही थी कि लोग दिल में क्या ख्याल कर रहे होंगे। सामने राजा विशालसिंह, दीवान साहब, ठाकुर गुरु हर सेवक और मुंशी वज्रधर खड़े थे। वरामदे में हजारों आदमियों की भीड़ थी। धन्यवाद के शब्द उनकी जवान पर आकर रुक गये। वह दिखाना चाहते थे कि मनोरमा की यह वीर-भक्ति उसकी वालक्रीड़ा मात्र है। एक क्षण में सिपाहियों ने चक्रधर को वन्द गाड़ी में विठा दिया और जेल की ओर ले चले। १२ चक्रधर की गिरफ्तारी के दूसरे दिन मनोरमा, राजा विशालसिंह को पट- कार सुनाने गई थी। उसकी दोनों आंखें वीर बहूटी हो रही थीं, भवें चढ़ी हुई। उस समय राजा साहब कोप-भवन में मारे कृोध से अपनी मूछे ऐंठ रहे थे । सारे राजमहल में सन्नाटा था। मनोरमा उनके सामने चली गयी और उन्हें सरोप नेत्रों से ताकती हुई वोली-उसका कण्ठ आवेश से कांप रहा था-महाराज ! मैं आपसे यह पूछने आई हूँ कि क्या प्रभुता और पशुता एक ही वस्तु है, या उनमें कुछ अन्तर है ? मुझे आश्चर्य होता है कि जिन्हें मैं देवता समझती हूं, उन पर आपके हाथ क्योंकर उठे? मनोरमा के मान-प्रदीप्त सौन्दर्य ने राजा साहब को परास्त कर दिया। सौन्दर्य के सामने प्रभुत्व भीगी विल्ली वन गया। विशालसिंह ने अपने कृत्य पर पश्चाताप करते हुए कहा-मनोरमा, बाबू चक्रधर वीरात्मा हैं और उनके साथ मैंने जो अन्याय किया है, उसका मुझे जीवन-पर्यन्त दुःख रहेगा। ५२ मनोरमा के सौन्दर्य ने राजा साह्य पर जो जादू का-सा नसर बाला या, वही बसर उनकी विनय और शालीनता ने मनोरमा पर दिया । जब वह कमरे से चली गयी तो विद्यालसिंह द्वार पर बडे उसकी ओर ऐसे तृपित नेत्रो से देखते रहे, मानो उसे पी जायेंगे। उनके हृदय में एक विचित्र नाकाक्षा बबुरित हुई। दीवान साहब से पहले वह बिचे रहते थे। अब उनका विशेष बादर-सत्कार करने लगे। दो-तीन बार उनके मकान पर भी गए और ठाकुर साहब की भी कई बार दावत की । आपस मे घनिष्ठता बढ़ने लगी। हपं की बात यह थी कि मनोरमा के विवाह की बातचीत और कही नहीं हो रही थी। मैदान खाली था। इन अवसरो पर मनोरमा उनके साथ कुछ इस तरह दिल खोलकर मिली कि राजा साहब की आशाएं और भी चमक उठी। हां, अगर शंका थी, तो लोगी की ओर से धो । वह राजा साहब का आना-जाना पसन्द न करती थी । वह उनके इरादो को भांप गयी थी और उन्हे दूर ही रखना चाहती थी। यही एक कंटक था और उसे हटाये बिना वह अपने लक्ष्य पर न पहुंच सकते थे। वैचारे इसी उधेड़-बुन में पड़े रहते थे। आखिर उन्होंने मुशी जी को अपना भेदिया बनाना निश्चय किया। दूसरे दिन प्रातःकाल मुशीजी दीवान साहब के मकान पर पहुंचे ! दीवान साहब मनोरमा के साथ गगा-स्नान को गये हुए थे। लोगो अकेली बैठी हुई थी। मुशीजी फूले न समाये । ऐसा ही मौका चाहते थे। जाते-ही-जाते विवाह की बात छेड़ दी लौंगी को यह सम्बन्ध किसी भी तरह स्वीकार नहीं था । अभी बात-चीत हो हो रही थी कि दीवान साहब स्नान करके तौट आये। लोगी ने इशारे से उन्हे एकान्त में ले जाकर सलाह की। थोड़ी देर बाद दीवान साहब ने आकर मुंशीजी से कहा-बाप राजा साहब से जाकर कह दीजिए कि हमें विवाह करना मजूर नहीं। मुंशीजी ने सोचा, अगर राजा साहब से कहे देता हूं कि दीवान साहब ने साफ इन्कार कर दिया, तो मेरी किरकिरी होती है। इसलिए आपने जाकर दून होकनी शुरू की-हुजूर, बुढ़िया बला कि चुडैल है। हत्पे पर तो आती ही नहीं, इधर भी झुकती है, उधर भी; और दीवान साहब तो निरे मिट्टे के ढेले हैं। राजा साहब ने अधीर होकर पूछा-~-आखिर आप तय क्या कर आये? मुंशी-हुजूर के एकवाल से फतह हुई, मगर दीवान साहब खुद आप से मादी की बातचीत करते झेंपते हैं । आपकी तरफ से बातचीत शुरू हो, तो शायद उन्हे इमार न हो।

की। पहले तो वह सहमी-सी बड़ी रही, फिर वोली-पिताजी से तो अभी आपकी बातें नहीं हुई। राजा अभी तो नहीं, मनारमा ! अवसर पाते ही करूँगा; पर कहीं उन्होंने इन्कार कर दिया तो? मनोरमा-मेरे भाग्य का निर्णय वहीं कर सकते हैं। मैं उनका अधिकार नहीं छीनंगी। दोनों आदमी वरामदे में पहुंचे, तो मुंशीजी और दीवान साहब खड़े थे। मुंगीजी ने राजा साहब से कहा- हुजूर को मुवारकवाद देता हूँ। दीवान-~~-मुंशीजी मुंशी-हुजूर, आज जलता होना चाहिए। (मनोरमा से) महारानी, आपका सोहाग सदा सलामत रहे। दीवान-जरा मुझे सोच" मुंशी-जनाव, शुन काम में सोच-विचार कैसा । भगवान् जोड़ी सलामत रखें! सहसा बाग में बैंड बजने लगा और राजा के कर्मचारियों का समूह इधर- उघर से बा-आकर राजा साहब को मुवारक देने लगा। दीवान साहब सिर झुकाये बड़े थे। न कुछ कहते बनता था, न सुनते। दिल में मुंशीजी को हजारों गालियाँ दे रहे थे कि इसने मेरे नाय कैसी चाल चली ! आखिर यह सोचकर दिल को समझाया कि लोगो से सव हाल कह दूंगा। भाग्य में यही वदा था, तो मैं करता क्या ? मनोरमा भी तो खुश है । ज्योंही ठाकुर साहब घर पहुंचे, लांगी ने पूछा -वहाँ क्या बातचीत हुई ? दीवान-शादी ठीक हो गई और क्या? सुनकर लोगो ने अपना कपाट पीट लिया। उसे दीवान साहब पर बड़ा क्रोध आया। उन्हें खूब खरी-खरी सुनाई। मुंशीजी की भी सात पुश्तों को खवर ले डाली। लेकिन शादी तो ठीक हो ही गई थी। अब बात फेरी नहीं जा सकती थी, इसलिए लोगी मन मारफर उसी दिन से विवाह की तैयारियां करने लगी। यो तीन महीने तैयारियों में गुजर गए। विवाह का मुहूर्त निकट आ गया। सहसा एक दिन शाम को खबर मिली कि जेल में दंगा हो गया और चक्रधर के कन्धे में गहरा घाव लगा है। बचना मुश्किल है । मनोरमा के विवाह की तैयारियां तो हो ही रही थीं और यों भी देखने में वह बहुत खुश नजर आती थी; पर उसका हृदय सदैव रोता रहता था । कोई अज्ञात भय, कोई बलक्षित वेदना, कोई अतृप्त कामना, कोई गुप्त चिन्ता, हृदय को नथा करती थी। अन्धों की भांति इधर-उधर टटोलती थी, पर न चलने का मार्ग मिलता था, न विधाम का आधार | उसने मन में एक बात निश्चय की थी और उसी में सन्तुष्ट रहना चाहती थी, लेकिन कभी-कभी वह जीवन इतना ५४ । - शून्य, इतना अंधेरा, इतना नीर रहती, मानो कही कुछ नहीं है, यह भयानक समाचार सुनते ही मनोरमा को होलदित-सा हो गया। पाकर लोगो से वोली-लोगी अम्मा, मैं क्या करूं? वाचूजो को देखे बिना अब नहीं रहा जाता। क्यों अम्मा, घाव अच्छा हो जायगा न? लोगी ने करुण नेत्रों से देखकर कहा-अच्छा क्यो न होगा, बेटी ! भगवान् पाहगे, तो जल्द अच्छा हो जायगा। लोंगी मनोरमा के मनोभाव को जानती थी। उसने सोचा, इस अवला को कितना दुःख है । मन-ही-मन तिलमिला कर रह गयो। हाय ! चारे पर गिरने वाली चिड़िया को मोती चुगाने की चेष्टा की जा रही है । तड़प-तड़पकर पिंजड़े में प्राण देने के सिवा वह और क्या करेगी ! मोती मे जो चमक है, वह अनमोल है। लेकिन उसे कोई खा तो नहीं सकता। उसे गले में बांध लेने से क्षुधा तो न मिटेगी। १३ चक्रघर को जेल में पहुंचकर ऐसा मालूम हुआ कि वह नयी दुनिया में वा गये । उन्हें ईश्वर के दिये हुए वायु और प्रकाश के मुश्किल से दर्शन होते थे। भोजन ऐसा मिलता था, जिसे शायद कुत्ते भी सूंघकर छोड़ देते । वस्त्र ऐसे, जिन्हें कोई भिखारी परों से ठुकरा देता, और परिश्रम इतना करना पड़ता या जितना बैल भी न कर सके। जेल शासन का विभाग नही, पाराविक व्यवसाय है । आदि से अन्त सारा व्यापार घृणित, जघन्य, पशाचिक बोर निन्ध है। अनीति की भी अक्ल यहाँ दग है, दुष्टता भी यहां दांतों तले उंगली दवावी है। मगर कुछ ऐसे भी भाग्यवान हैं, जिनके लिए ये जेल कल्प-वृक्ष से कम नहीं। बल बनाज पैदा करता है, तो अनाज का भूमा खाता है। कंदी बैल से भी गया- गुजरा है । वह नाना प्रकार के शाक-भाजी और फल-फूल पैदा करता है; पर सब्जी, फल और फूलों से भरी हुई डालियाँ हुक्काम के बंगलों पर पहुंच जाती हैं। केदी देखता है और किस्मत ठोंक कर रह जाता है। चक्रधर को चक्की पीसने का काम दिया गया। प्रात.काल गेहूं तोलकर दे दिया जाता और सन्ध्या तक उसे पीसना जरूरी था। कोई उन या वहाना न मुना जाता था। बीच में केवल एक बार खाने की छुट्टी मिलती थी। इसके बाद फिर चक्को मे जुत जाना पड़ता था। वह वरावर सावधान रहते थे कि किसी कर्मचारी को कुछ कहने का मोका न मिले, लेकिन गालियों में बातें करना जिनको आदत हो गयी हो, उन्हें कोई क्योंकर रोकता । किन्तु विपत्ति का बन्त यही तक न था। कैदी लोग उन पर ऐसे अश्लील, जायगी, बभी सिपाही बन्दूक चलानी शुरू कर देंगे, लाशों के ढेर लग जायेंगे। अगर हिंसक भावों को ददाने का कोई मौका हो सकता है, तो वह यही मौका है । ललकार कर बोले-पत्थर न फेंको, पत्थर न फेंको, ! सिपाहियों के हाथों से वन्दूक छीन लो। सिपाहियों ने संगीनें चढ़ानी चाहीं; लेकिन उन्हें इसका मौका न मिल सका। एक-एक सिपाही पर दस-दस कैदी टूट पड़े और दम-के-दम में उनकी वन्दुकें छीन ली। यह सब कुछ पांच मिनट में हो गया। ऐसा दांव पड़ा कि वही लोग जो जरा देर पहले हेकड़ी जताते थे, खड़े दया-प्रार्थना कर रहे थे, घिघियाते थे, मत्ये टेकते थे बोर रोते थे, दारोगाजी की मूरत तस्वीर खींचने योग्य थी। चेहरा फल, हवाइयां उड़ी हुई, यर-थर कांप रहे थे कि देखें, जान बचती है या नहीं। कैदियों ने देखा इस वक्त हमारा राज्य है, तो पुराने बदले चुकाने पर तैयार हो गये। धन्नासिंह लपका हुआ दारोगा के पास आया और जोर से एक धक्का देकर वोला-क्यों साहब, उखाड़ लूं डाढ़ी का एक-एक बाल? चक्रधर-धन्नासिंह, हट जाओ। धन्नासिंह-मरना तो है ही, अव इन्हें क्यों छोड़ें? चक्रधर-~-मेरे देखते तो यह अनर्थ न होने पायेगा। हां, मर जाऊं तो जो चाहे करना! धन्नासिंह-अगर ऐसे बड़े धर्मात्मा हो, तो इनको क्यों नहीं समझाया? देखते नहीं हो, कितनी सांसत होती है। इतने मे सदर फाटक पर शोर मचा । जिला-मैजिस्ट्रेट मिस्टर जिम सशस्त्र पुलिस के सिपाहियों और अफसरों के साथ ना पहुंचे थे। दारोगाजी ने अन्दर जाते वक्त किवाड़ बन्द कर लिये थे, जिसमें कोई कैदी भागने न पाये । यह शोर सुनते ही चक्रधर समझ गये कि पुलिस आ गई। बोले-अरे भाई, क्यों अपनी जान के दुश्मन हुए हो? वन्दुके रख दो और फौरन जाकर किवाड़ खोल दो। पुलिस आ गयी। धन्नासिंह-कोई चिन्ता नहीं। हम भी इन लोगों का वारान्यारा किये डालते हैं। मरते ही हैं, तो दो-चार को मार के मरें। कैदियों ने फौरन संगीनें चढ़ावी और सबसे पहले धन्नासिंह दारोगाजी पर झपटा। करीब था कि संगीन की नोक उनके सीने में चुभे कि चक्रधर यह कहते हुए 'धन्नासिंह, ईश्वर के लिए..." दारोगाजी के सामने आकर खड़े हो गये। धन्नासिंह वार कर चुका था । चक्रधर के कन्धे पर संगीन का भरपूर हाथ पड़ा। माधी संगीन धंस गयी । दाहिने हाथ से कन्धे को पकड़कर बैठ गये। कैदियों ने उन्हें गिरते देखा, तो होश उड़ गये। आ-आकर उनके चारों तरफ खड़े हो गये । चोर अनर्थ की आशंका ने उन्हें स्तंभित कर दिया। भगत को चोट आ गयी- - ये शब्द उनकी पशु-वृत्तियों को दबा बैठे। धन्नासिह ने बन्दूक फेक दी और फूट- फूटकर रोने लगा। ग्लानि के यावेश में बार-बार चाहता है कि वहीं संगीन अपनी छाती में चुभा ले लेकिन कैदियों ने इतने जोर से उसे जकड़ रखा है कि उसका कुछ वस नही पलता। दारोगा ने मौका पाया तो सदर फाटक की तरफ दौड़े कि उसे खोल दें। धन्नासिह ने देखा तो एक ही झटके में वह कैदियों के हाथों से मुक्त हो गया और बन्दूक उठाकर उनके पीछे दौड़ा। करीब था कि दारोगाजी पर फिर वार पड़े कि पक्रधर फिर संभलकर उठे और एक हाथ से अपना कन्धा पकड़े, लड़खड़ाते हुए चले । धन्नासिंह ने उन्हें बाते देखा, तो उसके पांव रुक गये । भगत सभी जोते हैं, इसकी उसे इतनी खुशी हुई कि वह बन्दूक फेंककर पीछे की ओर चला और उनके चरणों पर सिर रखकर रोने लगा। चक्रधर ने कहा-सिपाहियों को छोड़ दो। धन्नासिंह-बहुत अच्छा, भैया ! तुम्हारा जो कैसा है ? सहसा मिस्टर जिम सशस्त्र पुलिस के साथ जेल में दाखिल हुए। उन्हे देखते ही सारे कैदी भय से भागे । केवल दो आदमी चक्रधर के पास खड़े रहे। धन्ना- सिंह उनमे एक था। सिपाहियो ने भी छूटते ही अपनी-अपनी बन्दूक सभाली और एक कतार में खड़े हो गये। जिम-वेल दारोगा, क्या हाल हैं ? दारोगा-हुजूर के अकवाल से फतह हो गयी। कंदी भाग गये। जिर-यह कौन आदमी पड़ा है ? दारोगा-इसी ने हम लोगों की मदद की है, हुजूर, । पत्रधर नाम है । जिम-इसी ने कैदियों को भड़काया होगा? सिमझा-बुझाकर शात किया । T पहले कैदियो को भड़काता है, दारोगा--देखने में तो हुजूर, बहुत सीघा मालूम होता है, दिल का हाल खुदा जाने। जिम-पदा के जानने से कुछ नही होगा; तुमको जानना चाहिए । यह आदमी कैदियों से मजहब को बातचीत तो नही करता? दारोगा-मजहब की बातें तो बहुत करता है हुजूर! जिम-ओह ! तव तो यह बहुत ही खतरनाक बादमी है । जब कोई पढा- लिखा आदमी मजहब की बातचीत करे, तो फौरन समझ लो कि वह कोई साजिश करना चाहता है । Religion (धर्म) के साथ Politics (राजनीति) बहुत खतर- नाक हो जाता है । यह मादमी कैदियों से बढ़ी हमदर्दी करता होगा? सरकारी हुक्म को खूब मानता होगा? कड़े-से-कड़ा काम खुशी से करता होगा? ।

दारोगा-जी हाँ। जिम-ऐसा आदमी निहायत खौफनाक होता है । उस पर कभी एतवार नहीं करना चाहिए। हम इस पर मुकदमा चलायेगा । इसको बहुत कड़ी सजा देगा । सिपाहियों को दस्तर में बुलाओ। हम सबका बयान लिखेगा। दारोगा-हुजूर, पहले उसे डाक्टर साहब को दिखा लूं । ऐमा न हो कि मर जाय, गुलाम को दाग लगे । जिम~वह मरेगा नहीं। ऐसा खौफनाक आदमी कभी नहीं मरता; और मर भी जायगा, तो हमारा कोई नुकसान नहीं। यह कहकर साहब दफ्तर की ओर चले । धन्नासिंह अब तक इस इन्तजार में खड़ा था कि डाक्टर साहब आते होंगे । जव देखा कि जिम साहब इधर मुखा- तिव भी न हुए, तो उसने चक्रधर को गोद में उठाया और अस्पताल की ओर - । चला। - - चक्रधर दो महीने अस्पताल में पड़े रहे। दवा-दर्पन तो जैसी हुई वही जानते होंगे; लेकिन जनता की दुआओं में जरूर असर था। हजारों आदमी नित्य उनके लिए ईश्वर से प्रार्थना करते थे और मनोरमा को तो दान, व्रत और तप के सिवा और कोई काम न था। जिन बातों को वह पहले ढकोसला समझती थी, उन्हीं वातों में अव उसकी आत्मा को शान्ति मिलती थी। कमजोरी ही में हम लकड़ी का सहारा लेते हैं। चक्रधर तो अस्पताल में पड़े थे, इधर उन पर नया अभियोग चलाने की तैयारियां हो रही थीं। ज्यों ही वह चलने-फिरने लगे, उन पर मुकदमा चलने लगा। जेल के भीतर ही इजलास होने लगा । ठाकुर गुरु हरसेवकसिंह आजकल डिप्टी मजिस्ट्रेट थे। उन्हीं को यह मुकदमा सिपुर्द किया गया। ठाकुर साहब सरकारी काम में जरा भी रू-रिआयत न करते थे, लेकिन यह मुकदमा पाकर वह धर्म-संकट में पड़ गये । अगर चक्रधर को सजा देते हैं, तो जनता में मुंह दिखाने लायक नहीं रहते। मनोरमा तो शायद उनका मुंह भी न देखे । छोड़ते हैं, तो अपने समाज में तिरस्कार होता है, क्योंकि वहाँ सभी चक्रधर से खार खाये बैठे थे। मुकदमे को पेश हुए आज तीसरा दिन था। गुरु हरसेवक बरामदे में बैठे सावन की रिम-झिम वर्षा का आनन्द उठा रहे थे । सहसा मनोरमा मोटर से उतरकर उनके समीप ही कुरसी पर बैठ गयी। गुरुसेवक ने पूछा-कहां से आ रही हो ? मनोरमा-घर ही से आ रही हूँ। जेलवाले मुकदमे में क्या हो रहा है ? गुरुसेवक-अभी तो कुछ नहीं हुआ। गवाहों के बयान हो रहे हैं। मनोरमा-बाबूजी पर जुर्म सावित हो गया? गुरुसेवक-जुर्म का सावित होना या न होना दोनों वरावर है, और मुझे ६० ।

मुलजिमों को सजा करनी पड़ेगी। अगर बरी कर दूं, तो सरकार अपील करके उन्हें फिर सजा दिला देगी। हां, मैं वदनाम हो जाऊँगा। मेरे लिए यह आत्म- बलिदान का प्रश्न है । सारी देवता-मण्डली मुझ पर कुपित हो जायगी। मनोरमा-वावूजी के लिए सजा का दो-एक साल बढ़ जाना कोई बात नहीं, वह निरपराध हैं और यह विश्वास उन्हें तस्कीन देने को काफी है, लेकिन तुम कहीं के न रहोगे ! तुम्हारे देवता तुमसे भले ही सन्तुष्ट हो जायं; पर तुम्हारी आत्मा का सर्वनाश हो जायगा। गुरुसेवक-चक्रधर विल्कुल वेकसूर तो नहीं हैं । पहले-पहल जेल के दारोगा पर वही गर्म पड़े थे। वह उस वक्त जन्त कर जाते, तो यह फिसाद न खड़ा होता। मनोरमा--उन्होंने जो कुछ किया, वही उनका धर्म था। आपको अपने फैसले में साफ-साफ लिखना चाहिए कि बाबूजी वेकसूर हैं । आपको सिफारिश करनी चाहिए कि वह महान् संकट में अपने प्राणों को हथेली पर लेकर, जेल के कर्मचारियों की जान बचाने के बदले में उनकी मीद घटा दी जाय । गुरुसेवक ने अपनी नीचता को मुस्कराहट से छिपाकर कहा-आग में कूद पड़ मनोरमा-धर्म की रक्षा के लिए भाग में कूद पड़ना कोई नयी बात नहीं है। आखिर आपको किस बात का डर है ? यही न, कि आपसे आपके अफसर नाराज हो जायेंगे । आप शायद डरते हों कि कही आप अलग न कर दिये जायं । इसकी जरा भी चिन्ता न कीजिए। गुरुसेवक अपनी स्वार्थपरता पर झेंपते हुए बोले- नौकरी को मुझे परवा नही है, मनोरमा ! मैं इन लोगो के कमीनेपन से डरता हूँ! इनका धर्म, इनकी राज- नीति, इनका न्याय, इनकी सभ्यता केवल एक शब्द मे वा जाती है, और वह मान्द है-'स्वार्य ।' जानता हूँ, यह मेरो कमजोरी है, पर क्या करूं? मुझमें तो इतना साहस नहीं। मनोरमा-भैयाजी, आपकी यह सारी शंकाएं निर्मूल हैं । गवाहों के बयान हो गये कि नहीं? गुरुसेवक-हो, हो गये। अब तो केवल फैसला सुनाना है । मनोरमा-तो लिखिए, मैं विना लिसवाये यहां से जाऊंगी ही नहीं। यही इरादा करके आज आयी हूं। सहसा दूसरी मोटर आ पहुंची। इस पर राजा साहब बैठे हुए थे । गुरुसेवक बड़े पाक से उन्हें लेने दौड़े। राजा ने उनकी ओर विशेष ध्यान न दिया । मनोरमा के पास आकर गेले-तुम्हारे घर से चला आ रहा हूं। वहां पूछा तो मालूम हुआ-कहीं गयो हो; पर यह किसी को मालूम न था कि कहाँ । वहाँ से पार्क गया, पाईसे चौक पहुँचा, सारे जमाने की खाक छानता हुआ यहां पहुंचा हूं। मैं कितनी बार कह चुका हूं कि घर से चला करो, तो जरा बतला दिया करो। - यह कहकर राजा साहब ने मनोरमा का हाथ आहिस्ता से पकड़ लिया और उसे मोटर की तरफ खींचा । मनोरमा ने एक झटके से अपना हाथ छुड़ा लिया और वोली-मैं न जाऊँगी। राजा-आखिर क्यों? मनोरमा-अपनी इच्छा ! गुरुसेवक-- हुजूर, यह मुझसे जवरदस्ती जेलवाले मुकदमे का फैसला लिखाने बैठी हुई हैं । कहती हैं---विना लिखवाये न जाऊँगी। गुरुसेवक ने तो यह वात दिल्लगी से कही थी, पर समयोचित वात उनके मुंह से कम निकलती थी। मनोरमा का मुंह लाल हो गया। समझी कि यह मुझे राजा साहव के सम्मुख गिराना चाहते हैं। तनकर बोली-हाँ, इसीलिए वैठी तो फिर ! आपको यह कहते हुए शर्म आनी चाहिए थी । अगर मैं समझती कि आप निप्पक्ष होकर फैसला करेंगे, तो मेरे बैठने की क्यों जरूरत होती । आप मेरे भाई हैं, इसलिए मैं आपसे सत्याग्रह कर रही हूँ। आपकी जगह कोई दूसरा आदमी बाबूजी पर जान-बूझकर ऐसा घोर अन्याय करता, तो शायद मेरा वश चलता तो उसके हाथ कटवा लेती । चक्रधर की मेरे दिल में जितना इज्जत है, उसका आप लोग अनुमान नहीं कर सकते। एक क्षण के लिए सन्नाटा छा गया । गुरुसेवक का मुंह नन्हा-सा हो गया, और राजा साहब तो मानो रो दिये । आखिर चुपचाप अपनी मोटर की ओर चले। १४ हुक्काम के इशारों पर नाचने वाले गुरुसेवकसिंह ने जब चक्रधर को जेल के दंगे के इल्जाम से बरी कर दिया, तो अधिकारी मण्डल में सनसनी फैल गयी। गुरुसेवक से ऐसे फैसले की किसी को आशा न थी। फैसला क्या था, मान-पत्र था, जिसका एक-एक शब्द वात्सल्य के रस में सराबोर था । जनता में धूम मच गयी । ऐसे न्याय-वीर और सत्यवादी प्राणी विरले ही होते हैं, सबके मुंह से यही बात निकलती थी। शहर के कितने ही आदमी तो गुरु- सेवक के दर्शनों को आये और यह कहते हुए लौटे कि यह हाकिम नहीं, साक्षात देवता हैं। अधिकारियों ने सोचा था, चक्रधर को 4-5 साल जेल में सड़ायेंगे, लेकिन अब तो खूटा ही उखड़ गया, उछलें किस विरते पर? चक्रधर इस इल्जाम से वरी ही न हुए, बल्कि उनकी पहली सजा भी एक साल घटा दी गयी। मिस्टर जिम तो ऐसा जामे से बाहर हुए कि बस चलता, तो गुरुसेवक को गोली - । मार देते । और कुछ न कर सके, तो चक्रधर को तीसरे ही दिन आगर भेज दिया। कर्मचारियों को सस्त ताकीद कर दी गयी थी कि कोई कैदी उनसे बोलने तक न पाये, कोई उनके कमरे के द्वार तक भी न जाने पाये, यहाँ तक कि कर्म- चारी भी उनसे न वोलें। साल-भर में दस साल की कैद का मजा चखाने की हिम्मत सोच निकाली गयी। मजा यह कि इस धुन में चक्रधर को कोई काम भी न दिया गया। बस, आठो पहर उसी चार हाथ लम्बी और तीन हाथ चौड़ी कोठरी में पड़े रहो। चक्रधर के विचार और भाव इतनी जल्दी वदलते रहते थे कि कभी-कभी उन्हें भ्रम होने लगता था कि मैं पागल तो नही हुआ जा रहा हूं। अत को इस अन्तद्वन्द्र में उनकी आत्मा ने विजय पायो । मन पर आत्मा का राज्य हो गया। मन अन्तर्जगत् की सैर करने लगा। वह किसी समाधिस्थ योगी की भांति घण्टो इस अन्तर्लोक में विचरते रहते । शारीरिक कप्टो से अब उन्हें विराग-सा होने लगा। उनकी ओर ध्यान देना वह तुच्छ समझते थे। कभी-कभी वह गाते। मनोरजन के लिए कई सेल निकाले । अधेरे मे अपनी लुटिया लुढ़का देते और उसे एक ही पोज में उठा लाने की चेष्टा करते । अगर उन्हें किसी चीज को जरूरत मालूम होती, तो वह प्रकाश था, इसलिए नहीं कि वह अधकार से कब गये थे; वल्कि इसलिए कि वह अपने मन में उमड़ने वाले भावों को लिखना चाहते थे। लिखने की सामग्रियों के लिए उनका मन तड़पकर रह जाता । धीरे-धीरे उन्हें प्रकाश की भी जरूरत न रही । उन्हें ऐसा विश्वास होने लगा कि मैं अंधेरे में भी लिख सकता हूं। लेकिन लिखने का सामान कहाँ; बस, यही एक ऐसी चीज थी, जिसके लिए वह कभी-कभी विकल हो जाते थे। चक्रधर के पास कभी-कमी एक बूढा वार्डर भोजन लाया करता था। वह बहुत ही हंसमुख आदमी था। चक्रधर को प्रसन्नमुख देखकर दो-चार बातें कर लेता था। उसने उन्हें बन्धुत्व-सा हो गया था। वह कई वार पूछ चुका था कि चाबूजी चरस-तम्बाखू की इच्छा हो, हमसे कहना । चक्रधर को ख्याल आया, क्यों न उससे एक पेसिल और थोड़े से कागज के लिए कहूं। कई दिनो तक तो वह इसी संकोच मे पड़े रहे कि उससे कहूं या नहीं। आखिर एक दिन उनसे न रहा गया, पूछ ही बैठे-क्यों जमादार, यहां कही कागज-पैसिल तो मिलेगी? बूढ़े वार्डर ने सतर्क भाव से कहा-मिलने को तो मिल जाएगा; पर किसी ने देख लिया, तो क्या होगा? इस वाक्य ने चक्रघर को संभाल लिया। उनकी विवेक-बुद्धि, जो क्षण-भर के लिए मोह में फंस गयी थी, जाग उठी। बोले- नहीं, मैं यों ही पूख्ता था। इसके बाद उस वार्डर ने फिर कई वार पूछा-कहो तो पिसन-कागज ला दूं? मगर चक्रधर ने हर दफा यही कहा-मुझे जरूरत नहीं । बाबू यचोदानन्दन को ज्योही मालूम हुधा कि चक्रधर आगरा जेल में मा ए हैं, वह - उनसे मिलने की कई बार चेष्टा कर चुके थे; पर ।। साधारणतः कैदियों को छठे महीने अपने घर के किसी प्रांणी से मिलने की ताजा मिल जाती थी। चक्रधर के साथ इतनी रियायत भी न की गई थी, पर अशोदानन्दन अवसर पड़ने पर खुशामद भी कर सकते, थे। अपना सारा जोर लगाकर अन्त में उन्होंने आज्ञा प्राप्त कर ही ली-अपने लिए नहीं, अहल्या वे लिए । उस विरहिणी की दशा दिनों-दिन खराब होती जाती थीं । जव से चक्रध ने जेल में कदम रखा, उसी दिन से वह भी कैदियों की सी जिन्दगी बसर करन लगी। ईश्वर में पहले भी उसकी भक्ति कम न थी, अव. तो उसकी धर्मनिष्ठा और बढ़ गयी । जब वह हाथ जोड़कर आँखें बन्द करके ईश्वर से प्रार्थना करती करती, तो उसे ऐसा मालूम होता कि चक्रधर स्वयं मेरे सामने खड़े हैं । उसे अनु- भाव होता था कि मेरी प्रार्थनाएँ उस मातृ-स्नेह-पूर्ण अंचल की भांति, जो बालक को ढक लेता है, चक्रधर की रक्षा करती रहती है। जिस दिन अहल्या को मालूम हुआ कि चक्रधर से मिलने की आज्ञा मिल गयी है, उसे आनन्द के बदले भय होने लगा। यह भी शंका होती थी कि कही मुझे उनके सामने जाते ही मूळ न आ जाय, कहीं मैं चिल्ला-चिल्लाकर रोने. लगं। प्रातःकाल उसने उठकर स्नान किया और बड़ी देर तक वैठी वन्दना करती रही। फिर यशोदानन्दन जी के साथ गाड़ी में बैठकर जेल चली। जेल में पहुंचते ही एक औरत ने उसकी तलाशी ली और उसे पास के एक कमरे में ले गयी । अहल्या का फलेजा धड़क रहा था। उस स्त्री को अपने समीप बैठे देखकर उसे कुछ ढाढस हो रहा था, नहीं तो शायद वह चक्रधर को देखते ही उनके पैरों से लिपट जाती। सिर झुकाये बैठी थी कि चक्रधर दो चौकीदारों के साथ कमरे में आये। उनके सिर पर कनटोप था और देह पर एक आधी आस्तीन का कुरता; पर मुख पर आत्मवल की ज्योति झलक रही थी। उनका रंग पीला पड़ गया था; दाढ़ी के बाल बढ़े हुए थे और आंखें भीतर को धुसी हु थीं; पर मुख पर एक हल्की-सी मुस्कराहट खेल रही थी। अहल्या उन्हें देखक चौंक पड़ी, उसी आँखों से वे-अख्तियार आंसू निकल आये । शायद कहीं औ देखती तो पहचान भी न सकती । घबरायी-सी उठकर खड़ी हो गयी। अव दे के-दोनों खड़े हैं, दोनों के मन में हजारों बातें हैं, उद्गार-पर-उद्गार उठते दोनों एक दूसरे को कनखियों में देखते हैं, पर किसी के मुंह से शब्द न निकलता । अहल्या सोचती है, क्या पूडूं, इनका एक-एक अंग अपनी दशा अ सुना रहा है । चक्रधर भी यही सोचते हैं, क्या पूर्वी, इसका एक-एक अंग इस तपस्या और वेदना की कथा सुना रहा है। इसी असमंजस और कण्ठावरोध की दशा में खड़े-खड़े दोनों को १० मि हो गये। यहां तक की उस लेडी को उनकी दशा पर दया आयी, घड़ी देख ६४ •U वोली-तुम लोग यों ही कब तक पड़े रहोगे ? दस मिनट गुजर गये, केवल दस मिनट और वाकी हैं। चक्रधर मानो समाधि से जाग उठे। बोले-अहल्या, तुम इतनी दुबली हो? बीमार हो क्या? अहल्या ने सिसकियों को दबाकर कहा- नही तो, मैं विल्कुल अच्छी है। आप पलवता इतने दुवले हो गये हैं कि पहचाने नही जाते । चक्रधर-खर, दुबले होने के तो कारण हैं। लेकिन तुम क्यो ऐसी घुली जा रही हो? कम-से-कम अपने को इतना तो बनाए रयो कि जब मैं छूटकर आऊ तो मेरी कुछ मदद कर सको । अपने लिए नहीं तो मेरे लिए तुम्हें अपनी रक्षा करनी चाहिए । बाबूजी तो कुशल से हैं ? अहल्या- हाँ, बाएको वरावर याद किया करते हैं। मेरे साथ वह भी आये हैं। पर यहां न आये। आजकल स्वास्थ्य भी विगड़ गया है। पर आराम करने को उन्होंने कसम या ली है । बूढ़े ख्वाजा महमूद से न जाने किस बात पर मनवन हो गयी हैं । आपके चले जाने के बाद कई महीने तक व मेल रहा; लेकिन अब फिर वही हाल है। अहल्या ने ये बातें महत्व को समझकर न कहीं, बल्कि इसलिए कि वह चक्रधर का ध्यान अपनी तरफ से हटा देना चाहती थी। चक्रधर विरखत होकर बोले-दोनी आदमी फिर धर्मान्धता के चक्कर में पड़ गये होंगे । जब तक हम सच्चे धर्म का अर्थ न समझेगे, हमारी यही दशा रहेगी। पर का तो कोई समाचार न मिला होगा? अहल्या-मिला क्यों नही, बाबूजी हाल ही में काशी गये थे। जगदीशपुर के राजा साहब ने आपके पिताजी को ५०) मामिक बांध दिया है, आपको माता जी रोया करती हैं । छोटी रानी साहवा की आपके घर वालो पर विशेष कृपा- दृष्टि है। चक्रधर ने विस्मित होकर पूछा-छोटी रानी साहिबा कौन ? अहत्या-रानी मनोरमा, अभी थोड़े ही दिन हुए, राजा साहब का विवाह चक्रधर-यह तो बड़ी दिल्लगी हुई, मनोरमा का विवाह विशालसिंह के साय? मुझे तो अब भी विश्वास नहीं भाता । बाबूजी ने नाम बताने में गलती की होगी। बहल्या-बाबूजी को स्वयं आश्चर्य हो रहा था। काशी में भी सोगों को बड़ा आश्चर्य है । मनोरमा ने अपनी खुशी से विवाह किया है, कोई दवाव न था! सुनती हूँ, राजा साहब बिल्कुल उनको मुट्ठी में हैं। जो कुछ वह कहती हैं, कही होता है । बाबूजी चन्दा मांगने गये थे, वो रानी जी ही ने पांच हजार दिये। प्रसन्न मालूम होती थीं। हुआ है।

- गए हैं, वह उनसे मिलने की कई वार चेष्टा कर चुके थे; पर आज्ञा न मिलती थी। साधारणतः कैदियों को छठे महीने अपने घर के किसी प्राणी से मिलने की आज्ञा मिल जाती थी। चक्रधर के साथ इतनी रियायत भी न की गई थी, पर यशोदानन्दन अवसर पड़ने पर खुशामद भी कर सकते थे। अपना सारा जोर लगाकर अन्त में उन्होंने आज्ञा प्राप्त कर ही ली-अपने लिए नहीं, अहल्या के लिए । उस विरहिणी की दशा दिनों-दिन खराब होती जाती थी। जब से चक्रधर ने जेल में कदम रखा, उसी दिन से वह भी कैदियों की-सी जिन्दगी बसर करने लगी। ईश्वर में पहले भी उसकी भक्ति कम न थी, अब तो उसकी धर्मनिष्ठा और बढ़ गयी । जब वह हाथ जोड़कर आँखें वन्द करके ईश्वर से प्रार्थना करती, करती, तो उसे ऐसा मालूम होता कि चक्रधर स्वयं मेरे सामने खड़े हैं । उसे अनु- भाव होता था कि मेरी प्रार्थनाएँ उस मातृ-स्नेह-पूर्ण अंचल की भांति, जो वालक को ढक लेता है, चक्रधर की रक्षा करती रहती है। जिस दिन अहल्या को मालूम हुआ कि चक्रधर से मिलने की आज्ञा मिल गयी है, उसे आनन्द के बदले भय होने लगा। यह भी शंका होती थी कि कहीं मुझे उनके सामने जाते ही मूर्जन आ जाय, कहीं मैं चिल्ला-चिल्लाकर रोने न लगे। प्रातःकाल उसने उठकर स्नान किया और बड़ी देर तक वैठी वन्दना करती रही। फिर यशोदानन्दन जी के साथ गाड़ी में बैठकर जेल चली। जेल में पहुंचते ही एक औरत ने उसकी तलाशी ली और उसे पास के एक कमरे में ले गयी । अहल्या का कलेजा धड़क रहा था। उस स्त्री को अपने समीप वैठे देखकर उसे कुछ ढाढस हो रहा था, नहीं तो शायद वह चक्रधर को देखते ही उनके पैरों से लिपट जाती। सिर झुकाये बैठी थी कि चक्रधर दो चौकीदारों के साथ कमरे में आये। उनके सिर पर कनटोप था और देह पर एक आधी आस्तीन का कुरता; पर मुख पर आत्मवल की ज्योति झलक रही थी। उनका रंग पीला पड़ गया था; दाढ़ी के बाल बढ़े हुए थे और आंखें भीतर को धुसी हुई थी; पर मुख पर एक हल्की-सी मुस्कराहट सेल रही थी। अहल्या उन्हें देखकर चौंक पड़ी, उसी आँखों से वे-अख्तियार आँसू निकल आये । शायद कहीं और देखती तो पहचान भी न सकती । घवरायी-सी उठकर खड़ी हो गयी। अव दो- के दोनों खड़े हैं, दोनों के मन में हजारों वाते हैं, उद्गार-पर-उद्गार उठते हैं, दोनों एक दूसरे को कनखियों में देखते हैं, पर किसी के मुंह से शब्द नहीं निकलता । अहल्या सोचती है, क्या पूछं, इनका एक-एक अंग अपनी दशा आप ..सुना रहा है। चक्रधर भी यही सोचते हैं, क्या पूडूं, इसका एक-एक अंग इसकी तपस्या और वेदना की कथा सुना रहा है। इसी असमंजस और कण्ठावरोध की दशा में खड़े-खड़े दोनों को १० मिनट हो गये। यहाँ तक की उस लेडी को उनकी दशा पर दया आयी, घड़ी देखकर । - ६४ बोली-तुम लोग यो ही कब तक खड़े रहोगे? दस मिनट गुजर गये, केवल दस मिनट और वाकी हैं। चक्रधर मानो समाधि से जाग उठे । वोले-अहल्या, तुम इतनी दुबली हो? बीमार हो क्या? अहल्या ने सिसकियों को दवाकर कहा- नही तो, मैं बिल्कुल बच्छी हूँ। आप अलवत्ता इतने दुबले हो गये हैं कि पहचाने नहीं जाते। चक्रधर-घर, दुबले होने के तो कारण हैं; लेकिन तुम क्यों ऐसी घुली जा रही हो ? कम-से-कम अपने को इतना तो बनाए रखो कि जब मैं छूटकर आऊँ तो मेरी कुछ मदद कर सको। अपने लिए नहीं तो मेरे लिए तुम्हें अपनी रक्षा करनी चाहिए । वावूजी तो कुशल से हैं ? अहल्या-- हाँ, आपको बरावर याद किया करते हैं । मेरे साथ वह भी आये हैं। पर यहाँ न आये। आजकल स्वास्थ्य भी बिगड़ गया है। पर आराम करने की उन्होंने कसम खा ली है। बूढे ख्वाजा महमूद से न जाने किस बात पर अनवन हो गयी हैं । आपके चले जाने के बाद कई महीने तक खूब मेल रहा; लेकिन अव फिर वही हाल है। अहल्या ने ये बातें महत्व की समझकर न कही; बल्कि इसलिए कि वह चक्रधर का ध्यान अपनी तरफ से हटा देना चाहती थी। चक्रधर विरक्त होकर बोले-दोनों आदमी फिर धर्मान्धता के चक्कर में पड़ गये होंगे । जब तक हम सच्चे धर्म का अर्थ न समझेंगे, हमारी यही दशा रहेगी। घर का तो कोई समाचार न मिला होगा? अहल्या-मिला क्यों नही, वावूजी हाल ही में काशी गये थे। जगदीशपुर के राजा साहब ने आपके पिताजी को ५०) मासिक बांध दिया है, आपकी माता जी रोया करती हैं । छोटी रानी साहवा की आपके घर वालों पर विशेष कृपा- चक्रघर ने विस्मित होकर पूजा-छोटी रानी साहिवा कौन ? यहरया-रानी मनोरमा, अभी थोड़े ही दिन हुए, राजा साहब का विवाह हुआ है। चक्रधर- यह तो बड़ी दिल्लगी हुई, मनोरमा का विवाह विशालसिंह के साथ? मुझे तो अब भी विश्वास नही माता । बाबूजी ने नाम बताने में गलती अहल्या-बाबूजी को स्वयं आश्चर्य हो रहा था। काशी में भी लोगों को बड़ा आश्चर्य है। मनोरमा ने अपनी युशी से विवाह किया है, कोई दवाव न था। सुनती हूँ, राजा साहब बिल्कुल उनकी मुट्ठी मे हैं। जो कुछ वह कहती हैं, वही होता है। वावूनी चन्दा मांगने गये थे, तो रानी जी ही ने पांच हजार दिये। बहुत प्रसन्न मालूम होती थीं। की होगी।

सहसा लेडी ने कहा-वक्त पूरा हो गया। वार्डर, इन्हें अन्दर ले जाओ। चक्रधर क्षण-भर भी और न ठहरे । अहल्या को तृष्णापूर्ण नेत्रों से देखते हुए वले गये । अहल्या ने सजल-नेत्रों से उन्हें प्रणाम किया और उनके जाते ही फूट- फूटकर रोने लगी। १५ - फागुन का महीना आया, ढोल-मजीरे की आवाजें कानों में आने लगीं। मुंशी वज्रधर की संगीत-सभा भी सजा हुई। यों तो कभी-कभी-बारहों मास बैठक होती थी; पर फागुन आते ही विला नागा मृदंग पर थाप पड़ने लगी। उदार आदमी थे, फिक्र को कभी पास न आने देते। अपने शरीर को वह कभी कष्ट न देते थे। लड़का जेल में है, घर में स्त्री रोती-रोती अन्धी हुई जाती है, सयानी लड़की घर में बैठी हुई है; लेकिन मुंशीजी को कोई गम नहीं। पहले 25) में गुजर करते थे, अव 75) भी पूरे नहीं पड़ते । जिससे मिलते हैं हंसकर, सवकी मदद करने को तैयार । वादे सबसे करते हैं, किसी ने झुककर सलाम किया और प्रसन्न हो गये। दोनों हाथों से वरदान बांटते फिरते हैं, चाहे पूरा एक भी न कर सकें। अपने मुहल्ले के कई वेफिकों को जिन्हें कोई टके को भी न पूछता था, रियासत में नौकर करा दिया--किसी को चौकीदार, किसी को मुहरिर, किसी को कारिन्दा । मगर नेकी करके दरिया में डालने की उनकी आदत नहीं। जिससे मिलते हैं, अपना ही यश गाना शुरू करते हैं और उसमें मनमानी अति- शयोक्ति भी करते हैं । मुंशीजी किसी को निराश नहीं करते, और न कुछ कर सकें, तो वातों से ही पेट भर देते हैं। जो काम पहुंच से बाहर होता है, उसके लिए भी 'हाँ-हाँ कर देना, आँखें मारना, उड़न घाइयां बताना, इन चालों में वह सिद्ध है । मनोरमा का राजा साहब से विवाह होना था कि मुंशीजी का भाग्य. सूर्य चमक उठा । एक ठीकेदार को रियासत के कई मकानों का ठीका दिलाकर अपना मकान पक्का करा लिया, वनिया वोरों अनाज मुफ्त में भेज देता, धोबी कपड़ों की धुलाई नहीं लेता। सारांश यह कि तहसीलदार साहब के 'पौ बारह' हैं। तहसीलदारों में जो मजे न उड़ाये थे, वह अव उड़ा रहे हैं। रात के ८ वज गये थे। झिनकू अपने समाजियों के साथ आ बैठा । मुंशीजी मसनद पर बैठे पेचवान पी रहे थे। गाना होने लगा। इतने में रानी मनोरमा की मोटर आकर द्वार पर खड़ी हो गयी । मुंशीजी नंगे सिर, नंगे पाँव दौड़े। जरा भी ठोकर खा जाते तो उठने का नाम न लेते । मनोरमा ने हाथ उठाकर कहा-दौड़िए नहीं दौडिए नहीं। मैं आप ही के पास इस वक्त एक बड़ी खुश- खवड़ी सुनाने आयी हूँ । वावूजी कल यहाँ आ जायेंगे। मुंशी-क्या लल्लू ? ६६ - - - ।

भाग! दिया। मनोरमा-जी हो, सरकार ने उनकी मियाद घटा दी है। इतना सुनना था कि मुशीजी बेतहाशा दौड़े और घर मे जाकर हांफते हुए निर्मला से बोले-सुनती हो, लल्लू कल आयेंगे। मनोरमा रानी दरवाजे पर यही हैं। यह कहकर उलटे पांव फिर आ पहुंचे। मनोरमा-अम्मांजी क्या कर रही हैं, उनसे मिलती चलूं। मनोरमा घर में दाखिल हुई। निर्मला आँखों में प्रेम की नदी भरे, सिर झुकाए सड़ी यो । जी चाहता था, इसके पैरों के नीचे आंखें विछा दूं। मेरे धन्य एकाएक मनोरमा ने झुककर निर्मला के परो पर शीश झुका दिया और पुलकित कण्ठ से योलो-माताजी, धन्य भाग कि आपके दर्शन हुए ! जीवन सफल हो गया। निर्मला सारा शिष्टाचार मूल गयी । बस, खड़ी रोती रही। मनोरमा के शील भोर विनय ने शिष्टाचार को तृण की भाति मातृ-स्नेह की रगत मे बहा जब मोटर चली गयी, तो निर्मला ने कहा~साक्षात देवी है । दस बज रहे थे। मुंशीजी भोजन करने बैठे । मारे खुशी के फूले न समाते थे। मारे खुशी के साया भी न गया । जल्दी से दो-चार कौर खाकर वाहर भागे और अपने इष्ट मित्रों से चक्रधर के स्वागत के विषय में आधी रात तक बातें करते रहे । निश्चय किया गया कि प्रात:काल शहर मे नोटिस बोटी जाय और सेवा-समिति के सेवक स्टेशन पर बैंड बजाते हुए उनका स्वागत करें। प्रभात के समय मनोरमा अपने कमरे मे आयी और मेज पर बैठकर बड़ी उतावली में कुछ लिखने लगी कि दीवान साहब के आने की इत्तला हुई और एक क्षण मे आकर वह एक कुरसी पर बैठ गये । मनोरमा ने पूछा-~रियासत का बैंड तैयार है न? हरसेधक हो, उसे पहले ही हुक्म दिया जा चुका है। मनोरमा- जूलूस का प्रवन्ध ठीक है न ? मैं डरती हूँ, कही भइ न हो जाय। हरसंवक-श्रीमान् राजा साहब की राय है कि शहर वालों को जलस निकालने दिया जाय, हमारे सम्मिलित होने की जरूरत नहीं। मनोरमा ने रुष्ट होकर कहा- राजा साहब से मैंने पूछ लिया है। उनकी राब वही है, जो मेरी है। अगर सन्मार्ग पर चलने मे रियासत जब भी हो जाय, तो भी मैं उस मार्ग से विचलित न हूंगी। दीवान साहब ने सजल नेत्रों से मनोरमा को देखकर कहा-बेटी, मैं तुम्हारे हो भने को कहता हूँ। तुम नहीं जानती, जमाना कितना नाजुक है। मनोरमा उत्तेजित होकर बोली--पिताजी, इत सदुपग के लिए की बहुत अनुगृहीत हूँ, लेकिन मेरी आत्मा उसे ग्रहण नहीं करती । अभी ७ वजे हैं । ८ बजते-बजते आपको स्टेशन पहुंच जाना चाहिए। मैं ठीक वक्त पर पहुँच जाऊँगी। जाइए। दीवान साहब के जाने के बाद मनोरमा फिर मेज पर बैठकर लिखने लगी। यह वह भापण था, जो वह चक्रधर के स्वागत के अवसर पर देना चाहती थी। वह लिखने में इतनी तल्लीन हो गयी थी कि उसे राजा साहब के आकर बैठ जाने की उस वक्त तक खवर न हुई, जव तक उन्हें उनके फेफड़ों ने खांसने पर मजबूर न कर दिया। हुए उसकी PM मनोरमा ने चौंककर आँखें उठायीं, तो देखा कि राजा साहब बैठे ओर प्रेम-विह्वल नेत्रों से ताक रहे हैं । बोली -क्षमा कीजियेगा, मुझे आपकी आहट ही न मिली। क्या आप देर से बैठे हैं ? राजा-नहीं तो, अभी-अभी आया हूँ। तुम लिख रही थीं, मैंने छेड़ना उचित न समझा । मैं चाहता हूँ, जुलूस इतनी धूमधाम से निकले कि कम-से-कम इस शहर के इतिहास में अमर हो जाय। मनोरमा~यही तो मैं भी चाहती हूँ। राजा-मैं सैनिकों के आगे फौजी वर्दी में रहना चाहता हूँ। मनोरमा ने चिन्तित होकर कहा-आपका जाना उचित नहीं जान पड़ता। आप यहीं उनका स्वागत कीजिएगा। अपनी मर्यादा का निर्वाह तो करना ही ही पड़ेगा। सरकार यों भी हम लोगों पर सन्देह करती है, तव तो वह सत्तू वाँधकर हमारे पीछे पड़ जाएगी। मनोरमा फिर लिखने लगी, और यह राजा साहब को वहां से चले जाने का संकेत था; पर राजा साहब ज्यों-के-त्यों बैठे रहे । उनको दृष्टि मकरन्द के प्यासे भ्रमर की भांति मनोरमा के मुख-कमल का माधुर्य रसपान कर रही थी। सहसा घड़ी में ६ बजे। मनोरमा कुरसी से उठ खड़ी हुई । राजा साहब भी किसी वृक्ष की छाया में विश्राम करने वाले पथिक की भांति उठे और धीरे-धीरे द्वार की ओर चले । द्वार पर पहुँचकर वह फिर मुड़कर मनोरमा से वोले-मैं भी चलूं, तो क्या हरण मनोरमा ने करुण कोमल नेत्रों से देखकर कहा--अच्छी बात है, चलिए। रेलवे स्टेशन पर कहीं तिल रखने को जगह न थी । अन्दर का चबूतरा और वाहर का सहन सब आदमियों से खचाखच भरे थे। चबूतरे पर विद्यालयों के छात्र थे, रंग-विरंग की वर्दियाँ पहने हुए; और सेवा-समितियों के सेवक, रंग- विरंग की झण्डियाँ लिए हुए । मनोरमा नगर की कई महिलाओं के साथ सेवकों के बीच में खड़ी थी। बरामदे में राजा विशालसिंह, उनके मुख्य कर्मचारी और शहर के रईस और नेता जमा थे। मुंशी वज्रधर इधर-उधर पैतरे वदलते और लोगों को सावधान रहने की ताकीद करते फिरते थे। मनोरमा-४ ? , - ठीक दस बजे गाडी दूर से धुआं उडाती हुई दिखाई दी। अव तक लोग अपनी जगह पर कायदे के साथ खड़े थे; लेकिन गाड़ी के आते ही सारी व्यवस्था हवा हो गयी। गाडी वाकर स्की और चक्रधर उतर पडे । मनोरमा भी अनुराग से उन्मत्त होकर चली, लेकिन तीन-चार पग चली थी किठिठक गयी और एक स्त्री की आड़ से चक्रधर को देखा । सेवा-समिति का मगल-गान समाप्त हुआ, तो गजा साहब ने आगे बढकर नगर के नेताओ की ओर से उनका स्वागत किया। सब लोग उनसे गले मिले और यह जुलुस सजाया जाने लगा । चक्रधर स्टेशन के बाहर आये और तैयारियां देखी, तो बोले-आप लोग मेरा इतना सम्मान करके मुझे लज्जित कर रहे हैं । मुझे तमाशा न बनाइये। संयोग से मशीजी वही खड़े थे । ये बाते सुनी, तो बिगड़कर बोले-तमाशा नहीं बनना था, तो दूसरो के लिए प्राण देने को क्यों तैयार हुए थे। तुम्ही अपनी इज्जत न करोगे, तो दूसरे क्यों करने लगे । आदमी कोई काम करता है, तो रपये के लिए या नाम के लिए । अगर दो में एक भी हाथ न आये, तो वह काम करना ही व्यर्थ है। यह कहकर उन्होंने चक्रघर को छाती से लगा लिया । चक्रधर कारक्तहीन मुख लज्जा से आरक्त हो गया था और कुछ आपत्ति करने का साहस न हुआ। चपके से राजा साहब की दुकड़ी पर आ बैठे। जुलूस नदेसर, चेतगज, दशाश्वमेघ और चौक होता हुआ दोपहर होते-होते कवीर पोरे पर पहुंचा। यहाँ मुंपीजी के मकान के सामने एक बहुत बड़ा शामि- याना तना हुआ था। निश्चय हुआ कि यही सभा हो और चक्रधर को अभिनन्दन- पर दिया जाय । मनोरमा स्वयं पत्र पढकर मुनाने वाली थी, लेकिन जब पढ़ने को खड़ी हुई, तो उसके मुह से एक शब्द न निकला। मनोरमा को असमंजस में देखकर राजा साहब खड़े हुए और उसे धीरे से कुरसी पर विठोकर बोले-सज्जनो, रानी जी भाषण मे आपको जो रस मितता, वह मेरी बातों में कहाँ ! कोयल के स्थान पर कौआ खड़ा हो गया है, शहनाई की जगह नसिहे ने ले ली है । आप लोगो को ज्ञात न होगा कि पूज्पवर बाबू चक्रधर रानी साहवा के गुरु रह चुके हैं; और वह उन्हें अब भी उसी भाव से देखती हैं । अपने गुरु का सम्मान करना गिप्य का धर्म है; किन्तु रानी साहवा का कोमल हृदय इस ममय नाना प्रकार के आवेगों से इतना भरा हुआ है कि वाणी के लिए जगह ही नहीं रही। इसके लिए वह क्षम्य हैं । वाबू साहब ने जित धैर्य और साहा से दोनों की रक्षा को, वह आप लोग जानते ही हैं । जेल में भी नापने निर्भीकता से अपने कर्तव्य का पालन किया । आपका मन दया और प्रेम का सागर है । जिरा अवस्था में और युवक धन की उपासना करते हैं, आपने धर्म और जाति-प्रेम की उपासना की है । मैं भी आपका पुराना भक्त हूँ। एक सज्जन ने टोका-आप ही ने तो उन्हें सजा दिलायी थी?

- में राजा-हाँ, मैं इसे स्वीकार करता । राज्य के मद म पुर मैं अपने को भूल गया था। कौन है, जो प्रभुता पाकर फूल न उठा हो । मानवीय स्वभाव है और आशा है आप लोग मुझे क्षमा करेंगे। १६ आगरे के हिन्दुओं और मुसलमानों में बाये दिन जूतियां चलती रहती थी। रा-जरा सी बात पर दोनों दलों के सिर फिरे जमा हो जाते और दो-चार के ग-भंग हो जाते । कहीं बनिये ने डण्डी मार दी और मुसलमानों ने उसकी कान पर धावा कर दिया, कहीं किसी जुलाहे ने किसी हिन्दू का घड़ा छू लिया और मुहल्ले में फौजदारी हो गयी । निज के रगड़े झगड़े साम्प्रदायिक संग्राम के क्षेत्र में खींच लाये जाते थे । दोनों ही दल मजहब के नशे में चूर थे। होली के दिन थे। गलियों में गुलाल के छींटे उड़ रहे थे। इतने जोश से कभी होली न मनायी गयी थी। संयोग से एक मियाँ साहब मुर्गी हाथ लटकाये कहीं से चले जा रहे थे। उनके कपड़े पर दो-चार छोटे पड़ गये। बस, गजव ही तो हो गया। सीधे जामे मस्जिद पहुंचे और मीनार पर चढ़कर बांग दी-ये उम्मते रसूल ! आज एक काफिर के हाथों से मेरे दीन का खून हुआ है । उसके झींटे मेरे कपड़ों पर पड़े हुए । या तो काफिरों से इस खून का बदला लो, या मैं मीनार से गिरकर नवी की खिदमत में फरियाद सुनाने जाऊँ। वोलो मंजूर है ? मुसलमानों ने यह ललकार सुनी और उनकी त्योरियां बदल गयीं। शाम होते दस हजार आदमी, तलवारें लिए, जामे मस्जिद के सामने आकर जमा हो गये। सारे शहर में तहलका मच गया। हिन्दुओं के होश उड़ गये। होली का नशा हिरन हो गया। पिचकारियां छोड़-छोड़ लोगों ने लाठियां संभाली; लेकिन यहां कोई जामे मस्जिद न थी, न वह ललकार, न वह दीन का जोश । सबको अपनी-अपनी पड़ी हुई थी। बाबू यशोदानन्दन कभी इस अफसर के पास जाते, कभी उस अफसर के लखनऊ तार भेजे, दिल्ली तार भेजे, मुस्लिम नेताओं के नाम तार भेजे, लेकि कोई फल न निकला। और अन्त में जब वह निराश होकर उठे; तो मुस्लि वीर धावा बोल चुके थे । वे 'अली' ! 'अली'! का शोर मचाते चले जाते थे बाबू साहब नजर आ गये । फिर क्या था । सैकड़ों आदमी, 'मारो!' कहते लपके । वावू साहब ने पिस्तौल निकाली और शव जों के सामने खड़े हो ग सवाल-जवाब कौन करता। उन पर चारों तरफ से वार होने लगे। पिस्तौल चलाने की नौबत भी न आयी, यही सोचते खड़े रह गये - समक्षाने से ये लोग शांत हो जाये, तो क्यों किमी की जान लू । अहिंसा के आदर्श ने हिंसा का हथियार हाथ में होने पर भी उनका दामन न छोड़ा। वा यशोदानन्दन के मरने की खबर पाते ही सेवा दल के युवकों का जून खोल उठा। दो-सौ युवक तलवार लेकर निकल पड़े और मुसलमान मुहल्लों में घुसे । हिन्दू मुहल्लो मे जो कुछ मुसलमान कर रहे थे, मुसलमान मुहल्लों में वही हिन्दू करने लगे । अहिंसा ने हिंसा के आगे सिर झुका दिया। सहसा सवर उडी कि यशोदानन्दन के घर मे बाग लगा दी गयी है और दूसरे घरों में भी आग लगायी जा रही है । सेवा-दल वालो के कान खडे हुए। दो-ढाई हजार आदमियो का दल डबल मार्च करता हुआ उस स्थान को चला, जहाँ यह बड़वानल दहक रहा था । वहा किसी मुसलमान का पता नहीं था, आग लगी थी, लेकिन बाहर की ओर । अन्दर जाकर देखा तो घर खाली पड़ा हुआ था । वागीश्वरी एक कोठरी मे द्वार बन्द किये बैठी थी। इन्हें देखते ही वह रोती बाहर निकल आयी और बोली-हाय ! मेरी अहल्या ! बरे दोड़ो, उसे ढो, पापियो ने न जाने उसको क्या दुर्गति की ! हाय ! मेरी वच्ची ! एक युवक ने पूछा-क्या अहल्या को उठा ले गये ? वागीश्वरी-हां भया ! उठा ले गये । मना कर रही थी कि एरी बाहर मत निकल अगर मरेंगे तो साथ ही मरेंगे, लेकिन न मानी। जाकर ख्वाजा महमूद से कहो, उसका पता लगायें। कहना, तुम्हे लाज नहीं आती? जिस लड़की को बेटी बनाकर मेरी गोद मे सौंपा था, जिसके विवाह मे पांच हजार बचं करने वाले थे, उसकी उन्ही के पिछलगुओ के हाथों यह दुर्गति ! हाय . भगवान! लोग ख्वाजा साहब के पास पहुंचे, तो देखते हैं कि मुशी यशोदानन्दन की लाश रखी हुई है और स्वाजा साहब बैठे रो रहे है । इन लोगो को देखते ही बोले- तुम समझते होगे, यह मेरा दुश्मन था। खुदा जानता है, मुझे अपना भाई और बेटा भी इससे ज्यादा अजीज नही । फिर भी हम दोनों की जिंदगी के आखिरी साल मंदानबाजी में गुजरे । आज उसका यह अजाम हुआ। हम दोनो दिल से मेल करना चाहते थे; पर हमारी मरजी के खिलाफ कोई गैवी ताकत हमको सड़ाती थी । आप लोग नहीं जानते हो, मेरी इमसे कितनी गहरी दोस्ती थी। कौन जानता था, उस दोस्ती का यह अंजाम होगा। एक युवक-हम लोग लाश को किया-मम के लिए ले जाना चाहते हैं । ख्वाजा-ले जाओ भाई, में भी साय चलंगा। मेरे कन्धा देने में कोई हरज है ! इतनी रिआयत तो मेरे साथ करनी पड़ेगी। में पहले मरता, वो मशोदा सिर पर साक उड़ाता हुआ मेरी मबार तक जरूर पाता । युवक-यहल्या को भी उठा ले गये। माताजी ने आपसे... स्वाजा-क्या बहल्या ! मेरी बहल्या को! क्य? १५१ युवक-आज ही । घर में आग लगाने से पहले। ख्वाजा-कलामे मजीद की कसम, जव तक अहल्या का पता न लगा लगा, मुझे दाना-पानी हराम है । तुम लोग लाश ले जाओ; मैं अभी आता हूं। सारे शहर की खाक छान डालूगा । भाभी से मेरी तरफ से अर्ज कर देना मुझसे मलाल न रखें। यशोदा नहीं हैं। लेकिन महमूद है । जव तक उसके दम- में दम है, उन्हें कोई तकलीफ न होगी । कह देना, महमूद यो तो अहल्या को खोज निकालेगा या मुह में कालिख लगाकर डूब मरेगा। यह कहकर ख्वाजा साहव उठ खड़े हुए, लकड़ी उठायी और बाहर निकल गये। - चक्रधर को आगरे के उपद्रव, वायू यशोदानन्दन की हत्या और अहल्या के अपहरण का शोक-समाचार मिला, तो उन्होंने व्यग्रता में आकर पिता को वह पत्र सुना दिया और बोले- मेरा वहाँ जाना बहुत जरूरी है। वज्रधरजाकर करोगे ही वया ? जो कुछ होना था, हो चुका; अब जाना व्यर्थ है। चक्रधर-कम-से-कम अहल्या का पता तो लगाना ही होगा। वज्रधर-~~यह भी व्यर्थ है । पहले तो उसका पता लगाना ही मुश्किल है, और लग भी गया, तो तुम्हारा अब उससे क्या सम्बन्ध । अव वह मुसलमानों के साथ रह चुकी, तो कौन हिन्दू उसे पूछेगा ? चक्रधर-इसीलिए तो मेरा जाना और भी जरूरी है। वज्रधर-ऐसी बहू के लिए हमारे घर में स्थान नहीं है। चक्रधर ने निश्चयात्मक भाव से कहा-वह आपके घर में न आयेगी। वज्रधर ने भी उतने ही निर्दय शब्द से उत्तर दिया-अगर तुम्हारा ख्याल हो कि पुय-स्नेह के वश होकर मैं उसे अंगीकार कर लूगा, तो तुम्हारी भूल है । अहल्या कुल-देवी नहीं हो सकती, चाहे इसके लिए मुझे पुत्र-वियोग ही सहना पड़े। चक्रधर पीछे घूमे ही थे कि निर्मला ने उसका हाथ पकड़ लिया और स्नेह- पूर्ण तिरस्कार करती हुई बोली-बच्चा, तुमसे ऐसी आशा न थी। अव भी हमारा कहना मानो, के मुह में कालिख न लगाओ। चक्रधर ने हाथ छुड़ाकर कहा-मैंने आपकी याज्ञा कभी भंग नहीं की लेकिन इस विषय में मजबूर हूं। वज्रधर-यह तुम्हारा अन्तिम निश्चय है ? चक्रधर-जी हाँ, अन्तिम ! यह कहते हुए चक्रधर बाहर निकल आये और कुछ कपड़े साथ लेकर स्टेशन की ओर चल दिये। चक्रधर आगरे पहुंचे तो सवेरा हो गया था । एक क्षण तक वह खड़े सोचते ७२ - हमारे कुल रहे, कहां जाऊं ? वाबू यशोदानन्दन के पर जाना व्यथं था। वन्त को उन्होंने स्वाजा महमूद के घर चलना निश्चय किया। ख्वाजा साहब के द्वार पर पहुंचे, तो देखा कि हजारों आदमी एक लाश को घरेखड़े हैं और उसे कब्रिस्तान ले चलने की तैयारी हो रही है । चक्रधर तुरत तागे से उतर पड़े और लाश के पास जाकर खड़े हो गये । कही ख्वाजा साहब वो नही कल कर दिये गये। वह किसी से पूछने हो जाते थे कि सहसा ख्वाजा साहब ने याकर उनका हाथ पकड़ लिया और आंखो मे आंसू भरकर बोले- खूब आये बेटा, तुम्हे आंखें टूट रही थी, जानते हो यह किसकी लाश है ? यह मेरा इकलौता बेटा है, जिस पर जिन्दगी की सारी उम्मीदें कायम थी । लेकिन खुदा जानता है, उसकी मौत पर मेरी आँखो से एक वूद मामू भी न निकला उसने वह खेल किया, जो इन्सानियत के दरजे से गिरा हुआ था । तुम्हें अहल्या के बारे मे तो घबर मिली होगी? चक्रधर-जी हा, शायद बदमाश लोग पकड़ ले गये। ख्वाजा-यह वही बदमाश है, जिसकी लाश तुम्हारे सामने पड़ी हुई है। वह इसी की हरकत पी। मैं तो सारे शहर मे अहल्या को तलाश करता फिरता घा, और वह मेरे ही घर मे कैद यो । यह जालिम उस पर जब करना चाहता था। आज उसने मौका पाकर इसे जहन्नुम का रास्ता दिखा दिया -छुरी सीने में भोंक दी। पक्रधर-मुझे यह सुनकर बहुत अफसोस हुा । मुझे आपके साथ कामिल हमदर्दी है, बापका-सा इन्साफ-परवर, हकपरस्त आदमी इस वक्त दुनिया में न होगा। अहल्या अव कहा है ? ख्वाजा-इमी घर में । मुबह से कई वार कह चुका हूं कि चल तुझे तेरे घर पहुंचा जाळ,पर जाती ही नही । वस बैठी रो रही है। लाश उठायी गयो । शोक समाज पीछे-पीछे चला । चक्रधर भी वाजा साहब के साथ कब्रिस्तान तक गये। जिस वक्त लाश कब मे उतारी गयी, ख्वाजा साहब रो पड़े। यह क्षमा के आंसू थे। चक्रधर भी आंसुओं को न गेक सके ? दोपहर होते-होते लोग घर लौटे । स्वाजा साहब जरा दम लेकर बोले- आओ बेटा, तुम्हें अहल्या के पास ले पर्ने। यह कहकर स्वाजा साहब ने पक्रधर का हाथ पकड़ लिया और अन्दर चले- चक्रधर का हृदय बामो उछल रहा था। हल्या के दर्शनों के लिए वह इतने उत्सुक कभी न थे । वह एक खिड़की के सामने खड़ी बगीचे की ओर ताक रही पी। सहसा चक्रधर को देखकर वह चौंक पड़ी और पूंघट में मुह छिपा लिया। फिर एक ही दाण के बाद वह उनके पैरों को पकड़कर अथ धारों से धोने लगी। ७३ - चक्रधर बोले-अहल्या ! मुझे तुम्हारे चरणों पर सिर झुकाना चाहिए, । बिल्कुल उल्टी बात कर रही हो। यह कहकर उन्होंने अहल्या का हाथ पकड़ लिया, लेकिन वह हाथ छुड़ा र हट गयी और कांपते हुए स्वर में बोली नहीं-नहीं, मेरे अंग को मत स्पर्श जीजिए। सूघा हुआ फूल देवताओं पर नहीं चढ़ाया जाता आपकी सेवा करना मेरे भाग्य में न था, मैं जन्म ही से अभागिनी हूं, आप जाकर अम्माँ को समझा दीजिये । मेरे लिए अब दुःख न करें । मैं निर्दोष हूं, लेकिन इस योग्य नहीं कि आपकी प्रेमपात्री वन सकू। चक्रधर से अब न रहा गया। उन्होंने फिर अहल्या का हाथ पकड़ लिय और वोले-अहल्या, जिस देह में पवित्र और निष्कलंक आत्मा रहती है, व देह भी पवित्र और निष्कलंक रहती है। मेरी आंखों में तुम आज उससे कहीं निर्मल और पवित्र हो, जितनी पहले थीं। अहल्या कई मिनट तक चक्रधर के कंधे पर सिर रखे रोती रही। फिर बोली-तुम केवल दया-भाव से और मेरा उद्धार करने के लिए. यह कालिमा सिर चढ़ा रहे हो; या प्रेम-भाव से ? चक्रधर का दिल बैठ गया। अहल्या की सरलता पर उन्हें दया आ गयी। यह अपने को ऐसी अमागिनी और दीन समझ रही है कि इसे विश्वास. ही नहीं आना, मैं इससे शुद्ध प्रेम कर रहा हूं। वोले-तुम्हें क्या जान पड़ता है अहल्या? . अहल्या-तुम्हारे मन में प्रेम से अधिक दया का भाव है। चक्रघर-~-अहल्या, तुम मुझ पर अन्याय कर रही हो। अहल्या-जिस वस्तु को लेने की सामर्थ्य ही मुझमें नहीं है, उस पर ह न बढ़ाऊँगी। मेरे लिए वही बहुत है, जो आप दे रहे हैं। मैं इसे भी अफ धन्य भाग समझती हूं। फिर सहसा अहल्या ने कहा- मुझे भय है कि मुझे आश्रय देकर बदनाम हो जायेंगे। कदाचित आपके माता-पिता आपका तिरस्कार करें। मेरे लिए इससे बड़ी सौभाग्य की बात नहीं हो सकती कि आपकी दासी लेकिन आपके तिरस्कार और अपमान का ख्याल करके जी में यही आ कि क्यों न इस जीवन का अन्त कर दूं। चक्रधर की आंखें करुणा हो गयीं। बोले-अहल्या, ऐसी बातें न अपनी आत्मा की अनुमति के सामने मैं माता-पिता के विरोध की पर करता। मैं तुमसे विनती करता हूं कि ये वातें फिर जवान पर न अहल्या ने अवकी स्नेह-सजल नेत्रों से चक्रवर को देखा । शंका जो उसके मर्मस्थल को जलाये डालती थी, इन शीतल आई शब्दों से नाला शान्त होते ही उसकी दाह-चंचल दृष्टि स्थिर और चक्रधर की सौम्य मूर्ति, प्रेम की आभा से प्रकापमान, आखो के सामने बड़ी दिखायी दी। बाबू यशोदानन्दन के क्रिग-कर्म के तीसरे ही दिन चक्रधर का अहल्या से विवाह हो गया। चक्रघर तो अभी कुछ दिन टालना चाहते थे; लेकिन वागीश्वरी ने बड़ा आग्रह किया। विवाह में कुछ धूमधाम नहीं हुई। जिस दिन चक्रघर बहल्या को विदा कराके काशी चले, हजारो यादमी स्टेशन पर पहुंचाने आये । यागीश्वरी का रोते-रोते बुरा हाल था। जब अहल्या आकर पालकी पर बैठी तो वह दुधिया पछाड़ खाकर गिर पड़ी । अहल्या भी रो रही थी, लेकिन शोक से नहीं; वियोग में । वागीश्वरी की गर्दन में उसके करपाम इतने मुढ़ हो गये कि दूसरी स्त्रियों ने बड़ी मुश्किल से छुड़ाया। लेकिन चकधर के सामने एक दूसरी ही ममस्या उपस्थित हो रही थी। वह घर तो जा रहे थे; पर उस घर के द्वार बन्द थे । पिता का क्रोध, माता का तिरस्कार, सम्बन्धियों की अवहेलना, उन सभी शकाओं से चित्त उद्विग्न हो रहा था। सबसे विकट समस्या यह थी कि गाही से उतरकर जाऊंगा कहाँ ? इन चिन्ताओं से उनकी मुप-मुद्रा इतनी मलिन हो गयी कि अहल्या ने उनसे कुछ कहने के लिए उनकी ओर देखा तो चौंक पडी । उसकी वियोग व्यथा अव शान्त हो गयी थी और हृदय में उल्लास का प्रवाह होने लगा था; लेकिन पति की उदास मुदा देखकर वह घबरा गयी। वोली- आप इतने उदास क्यो हैं ? क्या अभी से मेरी फिक सवार हो गयी? चक्रधर ने संपते हुए कहा-नही तो, उदास क्यो होने लगा यह उदास होने का समय है, या आनन्द मनाने का मगर चक्रधर जितना ही अपनी चिन्ता को छिपाने का प्रयत्न करते थे. उतना ही यह और भी प्रत्यक्ष होती जाती थी, जैसे दरिद्र अपनी साख रखने की चेष्टा में और भी दरिद्र हो जाता है। अहल्या ने गभीर भाव से कहा- तुम्हारी इच्छा है, न बताओ; लेकिन यही इसका आशय है कि तुम्हें मुप्त पर विश्वास नहीं । यह कहते-कहते अहल्या की बाय सजल हो गयी | चक्रघर से अव जन्त न हो सका । उन्होंने संक्षेप मे सारी बात कह गुनायी और अन्त में प्रयाग उतर जाने का प्रस्ताव किया। अहल्या ने गर्व से कहा-अपना घर रहते प्रयाग वर्षो उतरें? मैं घर चलूगी। वे कितने ही नाराज हो, हैं तो हमारे माता-पिता! याप इन चिन्ताओ को दिल से निकाल डालिए । उनको प्रसन्न करने का भार. मुझ पर छोड़ दें, मुझे विश्वास है कि उन्हें मना लूगी। चक्रधर ने अहल्या को गद्गद् नेत्रो से देखा और चुप हो रहे। रात को दम बजते-बजते गाड़ी बनारस पहुची । यहत्या के आ जासन देने पर भी चक्रधर यहुत चिन्तित हो रहे थे कि कैसे क्या ७५ 7 व उहाग - -- कतना आश्चय हुआ। र उनकी राह देखते पाया। पिता के इस असीम, अपार, अलौकिक वात्सल्य । उन्हें इतना पुलकित किया कि वह जाकर पिता के पैरों पर गिर पड़े। शीजी ने दौड़कर छाती से लगा लिया और उनके श्रद्धाधुओं को रूमाल से छते हुए स्नेह कोमल शब्दों में वोले-कम-से-कम एक तार तो दे देते कि मैं केस गाड़ी से आ रहा हूं। खत तक न लिखा । यहाँ वरावर दस दिन से दो वार स्टेशन पर दीड़ा पाता हूं और एक आदमी हरदम तुम्हारे इन्तजार में विठाये रहता हूं कि न-जाने कब, किस गाड़ी से आ जाओ। कहां है बहू.? वलो, उतार लायें । बहू के साथ यहीं ठहरों। स्टेशन मास्टर से कहकर वेटिंग रूम खुलवाये देता हूं। मैं दौड़कर जरा वाजे-गाजें, रोशनी, सवारी की फिक करूं। वहू का स्वागत तो करना ही होगा । यहां लोग क्या जानेंगे कि बहू आयी है। वहां की वात और थी, यहाँ की बात और है। भाई-बन्दों के साथ रस्म-रिवाज मानना ही पड़ता है। यह कहकर मुंशीजी चक्रधर के साथ अहल्या के डिब्बें के द्वार पर खड़े हो गये । अहल्या ने धीरे से उतरकर उनके चरणों पर सिर रख दिया। उसकी आंखों से श्रद्धा और मानन्द के आंसू बहने लगे। मुंशीजी ने उनके सिर पर हाथ रखकर आशीर्वाद दिया और दोनों प्राणियों को वेटिंग रूम में बैठाकर बोले -किसी को अन्दर मत आने देना । मैंने साहव से कह दिया है। मैं कोई घण्टे भर में आऊँगा। चक्रधर ने दवी जवान से कहा- इस वक्त धूम-धाम करने की जरूरत नहीं । सवेरे तो सब को मालूम हो ही जायगा। मुंशीजी ने लकड़ी संभालते हुए कहा-सुनती हो वहू, इनकी बातें ? सवेरे लोग जानकर क्या करेंगे? दुनियां क्या जानेगी कि वह कब आई ? मुंशीजी चले गये, तो अहल्या ने चक्रधर को आड़े हाथों लिया । बोली ऐसे देवता-पुरुष के साथ तुम अकारण ही कितना अनर्थ कर रहे थे। मेरा तो जी चाहता था कि घण्टों उनके चरणों पर पड़ी हुई रोया करूँ । चक्रधर लज्जित हो गये । इसका प्रतिवाद तो न किया; पर उनका मन कह रहा था कि इस वक्त दुनिया को दिखाने के लिए पिताजी कितनी ही धूम- धाम क्यों न कर लें, घर में कोई न कोई गुल खिलेगा जरूर। मुंशीजी को गये अभी आधा घण्टा भी न हुआ था कि मनोरमा कमरे के द्वार पर आकर खड़ी दिखायी दी। उसने कहा-वाह वावूजी, आप चुपके-चुपके वहू को उड़ा लाये और मुझे खवर तक न दी ! मुंशीजी न कहते, तो मुझे मालूम ही न होता । आपने तो अपना घर बसाया, मेरे लिये भी कोई सौगात लाये ? यह कहकर वह अहल्या के पास गयी और दोनों गले मिलीं। मनोरमा ने था। रूमाल से एक जड़ाऊ कंगन निकालकर बहल्या के हाथ में पहना दिया । अहल्या ने उसे कुर्सी पर बिठा दिया और पान-इलायची देते हुए बोली- आपको मेरे कारण बड़ी तकलीफ हुई । यह आपके आराम करने का समय चक्रधर मौका देखकर बाहर चले गये थे। उनके रहने से दोनों ही में सकोच होता। मनोरमा ने कहा-नही बहन, मुझे जरा भी तकलीफ नहीं हुई। मैं तो यो भी बारह एक के पहले नही सोती । तुमसे मिलने की बहुत दिनों से इच्छा पी । तुम बड़ी भाग्यवान हो । तुम्हारा पति मनुष्य में रत्न है, सर्वथा निदोप एवम् सर्वथा निष्कलक। अहल्या पति प्रशसा से गर्वोन्नत होकर बोली-आपके लिए कोई सौगात तो नहीं लाये ! मनोरमा-मेरे लिए तुमसे बढ़कर और क्या सौगात लाते । मैं ससार में अकेली थी। तुम्हें पाकर दुकेली हो गयी जाऊंगी। अहल्या-मैं इसे अपना सौभाग्य समझूगी। इतने में बाजों की घों-धों पों-पों सुनायी दी । मुशीजी बारात जमाये चले आ रहे थे। अहल्या के हृदय में बानन्द की तरंगें उठ रही थीं। कभी उसका स्वागत इस ठाठ से होगा, कभी एक बड़ी रानी उसकी सहेली बनेगी, कभी उमका इतना आदर-सम्मान होगा, उसने कल्पना भी न की थी। मनोरमा ने उसे धीरे-धीरे ले जाकर सुखपाल मे बिठा दिया। वरात पली । पक्रधर एक सुरंग पोड़े पर सवार थे। ७ शत्र राजा साहब विशाल पुर आते; तो इस तरह भागते, मानो किसी के घर आए हों। रोहिणी को राजा साहब को यह निष्ठुरता असह्य मालूम होती थी। वह उन पर दिल का गुबार निकालने के लिए अवसर ढूंढती रहती थी; पर राजा साहब भूलकर भी अन्दर न आते थे । आखिर एक दिन वह मनोरमा पर ही पिल पड़ी । वात कोई न धो ! मनोरमा नै सरल भाव से कहा-यहां बाप लोगों का जीवन बड़ी शान्ति से कटता होगा। शहर मे तो रोज एकन एक झंझट सिर पर सवार रहता है। रोहिणी तो भरी बैठी ही थी। ऐठकर बोली-हाँ बहन, क्यों न शे! ऐचे प्राणी भी होते हैं, जिन्हें पड़ोसी के उपवास देखकर जलन होती है। उन्हें ७७ -- - . पकवान बुरे मालूम होते हैं, हम अभागिनों के लिए सत्तू में भी बाधा। मनोरमा ने फिर उसी सरल भाव से कहा -अगर तुम्हें वहां सुख-ही-सुख मालूम होता है, तो चली क्यों नहीं आती? अकेले मेरा भी जी घबराया करता है। तुम रहोगी, तो मजे से दिन कट जायेंगे। रोहिणी नाक सिकोड़कर बोली-भला, मुझमें वह हाव-भाव कहाँ हैं कि इधर राजा साहब को मुट्ठी में किये रहूं, उधर हाकिमों को मिलाये रखू। यह तो कुछ लिखी-पढ़ी, शहरवालियों को ही आता है, हम गंवारिने यह त्रिया- चरिन क्या जानें। मनोरमा खड़ी सन्न रह गयी। ऐसा मामूम हुआ कि ज्वाला पैरों से उठी और सिर से निकल गयो । वह दस-बारह मिनट तक इसी भांति स्तम्भित खड़ी रही । राजा साहब मोटर के पास खड़े उसकी राह देख रहे थे। जव उसे देर हुई तो स्वयं अन्दर आये । दूर ही से पुकारा-नोरा, क्या कर रही हो ? चलो, देर हो रही है। मनोरमा ने इसका कुछ जवाब न दिया। तब राजा साहब ने मनोरमा के पास आकर हाथ पकड़ लिया और कुछ कहना ही चाहते थे कि उसका चेहरा देखकर चौंक पड़े। वह सर्पदंशित, मनुष्य की भांति निनिमेप नेत्रों से दीवार की ओर टकटकी लगाये ताक रही थी, मानो आंखों की राह प्राण निकल रहे हों। राजा साहब ने घवरा कर पूछा-नोरा, कैसी तबीयत है ? मनोरमा ने सिसकते हुए कहा-अब मैं यहीं रहूँगी; आप जाइए । मेरी चीजें यहीं भिजवा दीजिएगा। राजा साहब समझ गये कि रोहिणी ने अवश्य कोई व्यंग्य-शर चलाया है। उसकी ओर लाल आँखें करके वोले-तुम्हारे कारण यहां से जान लेकर भागा फिर भी तुम पीछे पड़ी हुई हो। वहाँ भी शान्त नहीं रहने देती। मेरी खुशी है, जिससे जी चाहता है, वोलता हूं; जिससे जी नहीं चाहता, नही वोलता । तुम्हें इसकी जलन क्यों होती है ? रोहिणी-जलन होगी मेरी वला को। तुम यहां ही थे, तो कौन-सा फूलो की सेज पर सुला दिया था । यहाँ तो 'जैसे कन्ता घर रहे, वैसे रहे विदेश । भाग्य में रोना बदा था, रोती हूँ। राजा साहव का क्रोध बढ़ता जाता था, पर मनोरमा के सामने वह अपन पैशाचिक रूप दिखाते हुए शर्माते थे । वह कोई लगती हुई वात कहना चाहाँ थे, जो रोहिणी की जवान बन्द कर दे, वह अवाक रह जाय । मनोरमा को क वचन सुनाने के दण्ड स्वरूप रोहिणी को कितनी ही कडी वात क्यों न कही जाय यह क्षम्य थी। बोले-तुम्हें तो जहर खाकर मर जाना चाहिए । कम- तुम्हारी ये जली-कटी बातें तो न सुनने में आयेंगी। रोहिणी ने आग्नेय नेत्रों से राजा साहब की ओर देखा, मानों वह उसव वाला से उन्हें भस्म कर देगी, मानों उसके घरों से उन्हें वेध डालेगी, और नपककर पानदान को ठुकराती, लोटे का पानी गिराती, वहां से चली गयी। राजा साहब बहुत देर तक समझाया किये, पर मनोरमा ने एक न मानी । बसे शका हुई कि ये भाव केवल रोहिणी के नहीं हैं, महाँ सभी लोगों के मन न यही भाव होंगे। यह सन्देह और लाठन का निवारण यहां सबके सन्मुप रहने ही हो सकता था और यही उसके सकल्प का कारण था । अन्त में राजा नाहब ने हताश होकर कहा-तो फिर में भी काशी छोड़ देता हूं । मुझसे केले वहाँ एक दिन भी न रहा जाएगा। एकाएक मुंशी वज्रघर लाठी टेकते आते दिखायी दिये । चेहरा उतरा हुआ था, पाजामे का इजारबन्द नीचे लटकता हुआ। आंगन में खड़े होकर नोले--रानीजी, आप कहां हैं ? जरा कृपा करके यहा माइएगा, या हुक्म हो, नो में ही आऊँ। राजा साहब ने चिढ़कर कहा-क्या है. यही चले आइये। आपको इस वक्त थाने की क्या जरूरत थी? सब लोग यही चले आये, कोई वहाँ भी तो चाहिए। मुंशीजी कमरे में आकर बड़े दीन भाव ने बोले- क्या करू, हजूर, घर वाह हुआ जा रहा हु । हुजूर से न गेऊ, तो किससे रोऊ ! लल्लू न जाने नया करने पर तुला है। मनोरमा ने सशंक होकर पूछा-क्या बात है, मुंशीजी ? अभी तो आज पाबूजी वहाँ मेरे पास आये थे, कोई भी नई बात नहीं कही। मुंशी-वह अपनी बात किसी से कहता है कि आपसे कहेगा । मुझसे भी कभी कुछ नहीं कहा, लेकिन आज प्रयाग जाने को तैयार बैठा हुआ है। बहू को भी साप लिये जाता है। मनोरमा-नापने पूछा नही कि क्यों जा रहे हो? जरूर उन्हें किसी बात से रज पहुंचा होगा नहीं तो बहू को लेकर न जाते । घर मे किसी ने ताना तो नहीं मारा? मुंशो-इल्म की कसम खाकर कहता हूं, जो किसी ने चू तक की हो। ताना उसे दिया जाता है , जो टरपि । वह तो सेवा और शील की देवी है;. उमे कोन ताना दे सकता है। हां, इतना जरूर है कि हम दोनों आदमी उसका शुभा नहीं पाते? मनोरमा ने सिर हिलाकर कहा- अच्छा, यह बात है ! भला , बाबूजी पह का पर्दास्त करने लगे। मैं अदल्या की जगह होती, तो उस घर मे एक क्षन भी न रहती । वह न जाने कैसे इतने दिन तक रह गयी। मुंशी ~आप जरा बलार उसे समझा दें। मुझ पर इतनी दया करें । सनातन से जिन बातों को मानते आये हैं , वे जब छोड़ी नहीं जाती।

. - के साथ मनोरमा-तो न छोड़िए, आपको कोई मजवूर नहीं करता । आपको अपना धर्म प्यारा है और होना भी चाहिए। उन्हें भी अपना सम्मान प्यारा है और होना चाहिए । मैं जैसे आपको बहू के हाथ का भोजन ग्रहण करने को मजबूर नहीं कर सकती , उस भांति उन्हें भी यह अपमान सहने के लिए नहीं दवा सकती। आप जानें और वह जानें , मुझे वीच में न डालिए। मुंशीजी बड़ी आशा बांधकर यहां दौड़े आये थे। यह फैसला सुना तो कमर टूट-सी गयी । फर्श पर बैठ गये और अनाथ-भाव से माथे पर हाथ रख- कर सोचने लगे-- अब क्या करू ? मनोरमा वहां से चली गयी। अभी उसे अपन लिए कोई स्थान ठीक करना था, शहर से अपनी आवश्यक वस्तुए मंगवानी थीं। रात आधी से ज्यादा वीत चुकी थी, पर मनोरमा की आँखों में नींद न आयी थी। उसे ख्याल आया कि चक्रधर बिल्कुल खाली हाथ हैं। पली साथ, खाली हाथ, नयी जगह, न किसी से राह, न रस्म, संकोची प्रकृति, उदार- हृदय, उन्हें प्रयाग में कितना कष्ट होगा? मैंने बड़ी भूल की । मुशी मुझे चली जाना चाहिए था । बाबूजी मेरा इन्तजार कर रहे होंगे । उसने घड़ी की ओर देखा। एक बज गया था। उसके मन में प्रश्न उठा- क्यों न इसी वक्त चलू ? घण्टे-भर में पहुंच जाऊँगी। लेकिन फिर ख्याल आया, इस वक्त जाऊँगी तो लोग क्या कहेंगे। वह फिर आकर लेट रही और सो जाने की चेष्टा करने लगी। उसे नींद आ गयी लेकिन देर से सोकर भी मनोरमा को उठने में देर नहीं लगी। अभी सब लोग सोते ही थे । कि वह उठ बैठी ओर तुरंत मोटर तैयार करने का हुक्म दिया । फिर अपने हैंडबैग में कुछ चीजें रखकर वह रवाना हो गयी । चक्रधर भी प्रातःकाल उठे और चलने की तैयारी करने लगे। उन्हें माता- पिता को छोड़कर जाने का दुख हो रहा था, पर उस घर में अहल्या की जो दशा थी, वह उनके लिए असह्य थी। गाड़ी सात बजे छूटती थी। वह अपना बिस्तर और पुस्तकें बाहर निकाल रहे थे। भीतर अहल्या अपनी सास और ननद के गले मिलकर रो रही थी, कि इतने में मनोरमा की मोटर आती हुई दिखाई दी। चक्रधर मारे शर्म के गड़ गये। मनोरमा ने मोटर से उतरते हुए कहा-वाबूजी, अभी जरा ठहर जाइए । यह उतावली क्यों? जब तक मुझे मालूम न हो जायेगा. कि आप किस कारण से और वहां क्या करने के इरादे से जाते हैं. मैं आपको न जाने दूंगी। चक्रधर~आपको सारी स्थिति मालूम होती, तो आप कभी मुझे रोकने की चेष्टा न करती मनोरमा-तो सुनिये, मुझे आपके घर की दशा थोड़ी-बहुत मालूम है। ये लोग अपने संस्कारों से मजबूर हैं । न तो आप ही उन्हें दवाना पसन्द करेंगे। -- ८० क्यों न बहल्या को कुछ दिनों के लिए मेरे नाप रहने दें? मैंने जगदीशपुर मे ही रहने का निश्चय किया है । आप वहाँ रह सकते हैं । मेरो बहुत दिनो से इच्छा है कि कुछ दिन आप मेरे मेहमान हों। वह भी तो आप ही का घर है। मैं इसे अपना सौभाग्य समझूगी। चक्रधर-नही मनोरमा, मुझे जाने दो। मनोरमा-अच्छो बात है, जाइए; लेकिन एक बात आपको माननी पडेगी मेरी यह भेंट स्वीकार कीजिए। यह कहकर उसने अपना हैडवेग चक्रधर की तरफ बढ़ाया। चक्रधर-अगर न ले तो? मनोरमा-तो मैं अपने हाधो से आपका वोरिया-बपना उठाकर घर मे रख आऊंगी। घधर---आपको इतना कष्ट उठाना पड़ेगा। मैं इसे लिये लेता हूं। शायद वहाँ भी मुझे कोई काम करने की जरूरत न पड़ेगी। इस वेग का वजन ही ववला रहा है। मनोरमा घर में गयी, तो निर्मला बोली -माना कि नहीं, बेटी? मनोरमा-नहीं मानते । मनाकर हार गयी। मुंगी--जब आपके कहने से न माना तो फिर किसके कहने से मानेगा? वांगा आ गया । चक्रधर बोर अहल्या उत पर जा बैठे, तो मनोरमा भी अपनी मोटर पर बैठकर चली गयी। घर के बाकी तीनो प्राणी द्वार पर खड़े रह गये। १८ सार्वजनिक काम करने के लिए कही भी क्षेत्र की कमी नहीं, केवल मन में निःस्वार्थ सेवा का भाव होना चाहिए । चक्रधर प्रयाग मे कभी अच्छी तह जमने भी न पाये थे कि चारों ओर से उनके लिए खीचतान होने की । पोड़े ही दिनों में वह नेताओं की श्रेणी में आने लगे। उनमें देव का बनराव पा. काम करने का उत्साह था बोर सगठन करने की योग्यता पोवार गट्टर में एक भी ऐसा प्राणी न था, जो उनकी भांति निस्सह हो। और जन जागा फासतू समय ही सेवाकार्य के लिए दे सकते । दान का उद्देश्य था। चक्रधर को इस काम के सिवा बार कोई किन 21 ज्दन पहर के निकास पर एक छोटा-सा मकान किरातियार किफायत से गुजर करते थे। वहां रूपये का नित्य नाम ज्ञापमा अब शात होने लगा कि गृहस्थी में पड़कर नहायाने अनेक वह माहिए । अपने लिए उन्हें कोई चिन्ता न थी, लेकिन अहल्या को द्रता की परीक्षा में डालना न चाहते थे। अगर चक्रधर को अपना ही खर्च संभालना होता, तो शायद उन्हें बहुत कष्ट होता; क्योंकि उनके लेख बहुत अच्छे होते थे और दो-तीन समाचारपत्र लिखकर वह अपनी जरूरतभर को पैदा कर लेते थे। पर मुशी वज्रघर काजों के मारे उनकी नाक में दम था। चक्रधर को बार-बार तंग करते, और उन्हें विवश होकर पिता की सहायता करनी पड़ती। अगहन का महीना था। खासी सरदी पड़ रही थी, मगर अभी तक चक्रधर जाड़े के कपड़े न वनवा पाये थे। अहल्या के पास तो पुराने कपड़े थे पर चक्रधर के पुराने कपड़े मुशीजी के मारे बचने ही न पाते। या तो खुद पहन डालते, या किसी को दे देते । वह इसी फिक्र में थे कि कहीं से रुपये आ जायँ, तो एक कम्बल ले लू। आज बड़े इन्तजार के बाद लखनऊ के एक मासिक-पत्र के कार्यालय से 25) का मनीआर्डर आया था और वह अहल्या के पास वैठे कपड़ों का प्रोग्राम बना रहे थे। इतने में डाकिए ने पुकारा । चक्रधर ने जाकर खंत ले लिया और उसे पढ़ते हुए अन्दर आये । अहल्या ने पूछा-लालाजी का खतं हैं न ? लोग अच्छी तरह हैं न? चक्रधर-मेरे आते ही न-जाने उन लोगों पर क्या साढ़ेसाती सवार हो गयी कि जब देखो, एक-न-एक विपत्ति सवार ही रहती है। अभी मंगला वीमार :, अब अम्माँ बीमार हैं । वावूजी को खाँसी आ रही है। रानी साहवा के यहाँ : अब वजीफा नहीं मिलता है । लिखा है कि इस वक्त 50) अवश्य भेजो।" अहल्या-क्या अम्मांजी बहुत बीमार हैं ? चक्रधर-हां, लिखा तो है। अहल्या-तो जाकर देख ही क्यों न आमो? चक्रधर-- मुझे बाबूजी पर बड़ा क्रोध आता है । व्यर्थ मुझे तंग करते है अम्मा की बीमारी तो वहाना है सरासर वहाना। अहल्या-यह वहाना हो या सच हो, ये पचीसों रुपए भेज दो। बाकी लिए लिख दो कोई फिक्र करके जल्दी ही भेज दूंगा। तुम्हारी तकदीर में वर्ष जड़ावल नहीं लिखा है। पूस का महीना लग गया । जोरों की सरदी पड़ने लगी । स्नान करते ऐसा मालूम होता था कि पानी काट खएगा; पर अभी तक चक्रधर जड़ान बनवा सके । एक दिन वादल हो आये और ठण्डी हवा चलने लगी । सन मारे चक्रधर को नींद न आती थी, एक बार उन्होंने अहल्या की ओर वह हाथ-पांव सिकोड़े, चादर सिर से ओढ़े एक गठरी की तरह पड़ी हुई कण हृदय रो पड़ा। उनकी अन्तरात्मा सहस्रों जिह्वाओं से - तिरस्कार करने लगी। तेरी लोक सेवा केवल भ्रम है; कोरा प्रमाद । जब तू इम रमणी की रक्षा नहीं कर सकता, जो तुम पर अपने प्राण तक अपंग कर सकती है , तो तू जनता का उपकार क्या करेगा? दूसरे दिन वह नाश्ता करते ही कही वाहर न गये ; बल्कि अपने कमरे में जाकर कुछ लिखते पढ़ते रहे । शाम को सात बजते-बजते वह फिर लौट आये और दम बजे तक कुछ लियते रहे । आज से यही उनका नियम हो गया । नौकरी तो वह कर न सकते थे चित्त को इससे घृणा होती पो; लेकिन अधि कांश समय पुस्तकें और लेप लिखने में विताते । उनको विद्या और युनि अब सेवा के अधीन नहीं , स्वार्थ के अधीन हो गयी। पहले ऊपर की खेती करते थे, जहाँ न धन था, न कोति । अव धन भी मिलता था और कीति भी। पत्रों के सम्पादक उनसे आग्रह करके उनसे लेप लिखवाते थे। लोग इन सेयो को बडे चाव से पडते थे। भापा भी अलकृत होती थी , भाव भी सुन्दर, विपय भी उपयुक्त । दर्शन में उन्हें विशेप रूचि थी। उनके लेख भी अधिकांश दासनिक होते थे। पर चऋघर को अब अपने कृत्यो पर गर्व न था। उन्हें काफी धन मिलता पा । योरप और अमेरिका के पत्रों में भी उनके छपते समाज में उनका आदर भी कम न था; पर सेवा कार्य में जो सन्तोप और शान्ति मिलती थी वह अब मयस्मर न थी। मरने दीन, दुषी एवं पीडित बन्धुओं की सेवा करने में जो गौरव-युक्त आनन्द मिलता था, वह अब सभ्य समाज की दावतो में न प्राप्त होता था। मगर अहल्या सुपी थी। वह अब सरल बालिका नही, गौरवशील युवती थी . गृह प्रबन्ध मे कुशल, पति सेवा में प्रवीण, उदार, दयालु और नीति चतुर । मजाल न थी कि नौकर उसकी आय बचाकर एक पंसा भीया जाए । उसकी सभी अभिलाषाएं पूरी होती जाती थी। ईश्वर ने उसे एक सुन्दर वालक भी दे दिया। रही-सही कसर भी पूरी हो गयी। इस प्रकार पांच साल गुजर गये। एक दिन कामी से राजा विशालसिंह का तार आया। लिया पा- 'मनोरमा बहुत बीमार है । तुरन्त आइए । बचने की कम आशा है।" बहल्या-यह हो क्या गया है ? अभी तो लालाजी ने लिखा था कि यहाँ सब कुगल है। चकार--नया कहा जाप ? कुछ नहीं , यह सब गृह-कलह का फल है । मनोरमा ने राजा साहब से विवाह करके बड़ी भूल को । सोतो ने तानो से घर- घेकर उनकी जान ले लो। अहल्या-कहो तो में भी चलू ? देखने को जी चाहता है। उनका केन और स्नेह कभी न भूलेगा। पक्रयर--योगेन्द्र वायु को साध लेते चलें । इनसे ज.

. र नहीं है। दस बजते-बजते ये लोग यहाँ से डाक पर चले । अहल्या खिड़की से पावस नोहर दृश्य देखती थी, चक्रधर व्यग्र हो-होकर घड़ी देखते थे कि पहुंचने में नी देर है और मुन्नू खिड़की से कूद पड़ने के लिए जोर लगा रहा था। चक्रधर जगदीशपुर पहुंचे, तो रात के आठ बज गए । राजभवन के द्वार पर तारों आदमियों की भीड़ थी। अन्न-दान दिया जा रहा था । और कंगले क पर एक टूटे पड़ते थे। सहसा मोटर की आवाज सुनकर मुंशी वज्रधर ने बाहर आकर देखा, तो जीड़ को हटाकर दौड़े और चक्रधर को गले लगा लिया। अहल्या पति के पीछे खड़ी थी। मुन्नू उसकी गोद में बैठा बड़े कुतूहल से दोनों आदमियों का रोना देख रहा था। अभी दोनों आदमियों में कोई बात न होने पायी थी कि राजा साहब दौड़ते हुए भीतर से आते दिखायी दिये। सूरत से नैराश्य और चिन्ता झलक रही थी। शरीर भी दुवंल था। आते ही आते उन्होंने चक्रधर को गले से लगा- करपूछा -मेरा तार कब मिल गया था। चक्रधर-कोई आठ बजे मिला होगा। पड़ते ही मेरे होश उड़ गये । रानी जी की क्या हालत है? राजा-वह तो अपनी आँखों से देखोगे, मैं क्या कहूं । अव भगवान् ही का "रोसा है । अहा ! यह शंखधर महाशय हैं। यह कहकर उन्होंने बालक को गोद में ले लिया और स्नेह पूर्ण नेत्रों रखकर बोले- मेरी सुखदा विल्कुल ऐसी ही थी। ऐसा जान पड़ता है, य उसका छोटा भाई है। उसकी सूरत अभी तक मेरी आखों में है। मुख विल्कुल ऐसी ही थी। अन्दर जाकर चक्रधर ने मनोरमा को देखा । वह मोटे गद्दों में ऐसीर गयी थी कि मालूम होता था कि पलंग खाली है, केवल चादर पड़ी हुई चक्रधर की आहट पाकर उसने मुह चादर से निकाला। दीपक के क्षीण प्र में किसी दुर्वल की आह असहाय नेत्रों से आकाश की ओर ताक थी! राजा साहब ने आहिस्ता से कहा-नोरा, तुम्हारे बाबूजी मा गए मनोरमा ने तकिये का सहारा लेकर कहा-मेरे धन्य भाग ! आइए जी आपके दर्शन भी हो गए। तार न जाता तो आप क्यों आते ? चक्रधर-मुझे तो विल्कुल खवर ही न थी ।तार पहुंचने पर हाव मनोरमा-~-(वालक को देखकर) अच्छा ! अहल्या देवी भी आई मना - यहाँ तो लाना अहल्या ! इसे छाती से लगा लूं। राजा-- इसकी सूरत मुखदा से बहुत मिलती है, नौरा ! बिल्कुल उसका छोटा भाई मालूम होता है। 'मुंखदा का नाम मुंनकर अहल्या पहले भी चौफी थी। अब को वही शब्द सुनकर फिर चौकी ! वाल-स्मृति किसी भुले हुए स्वप्न की मांति चेतना क्षेत्र में आ गयी। उसने घट की आड़ से राजा साहब की ओर देखा । उसे अपने स्मृति पट पर ऐसा ही आगर खिंचा हा मासूम पड़ा। बालक को स्पर्श करते ही मनोरमा के जजर शरीर में एक स्फूर्ति सी दौढ़ गयी। मानो किसी ने बुझते हुए दीपक की बत्ती उकसा दी हो। बालक को छाती से लगाये हुए उसे अपूर्व आनन्द मिल रहा था। मानों बरसों से तृपित कण्ठ को शीतल जल मिल गया हो, और उसकी प्यास न बुझती हो । वह बालक को लिए हुएं बैठी और बोली-बहल्या, मैं अब यह लाल तुम्हें न दूंगी। यह मेरा है । तुमने इतने दिनों तक मेरी सुध न ली, यह उसी को सजा है। राजा साहब ने मनोरमा को सभालकर कहा- लेट जालो । देह में हवा लग रही हैं। क्या करती हो... किन्तु मनोरमा बालक को लिए हुए कमरे से बाहर निकल गयो । राजा साहय भी उसके पीछे-पीछे दौड़े कि कही वह गिर न पड़े। कमरे में केवल पर और अहल्या रह गए । अहल्या धीरे से बोली- मुझे अब याद आ रहा है कि मेरा नाम सुखदा था । जव में बहुत छोटी थी, तो लोग मुझे सुयदा कहते थे। चक्रधर ने कहा-चुपचाप बैठो, तुम इतनी भाग्यवान् नही हो। राजा साहब की मुखदा काही पोपी नहीं, मर गयी होगी। राजा माय इसी वक्त बालक को गोद मे लिए मनोरमा के साप कमरे में आये । चक्रधर के अन्तिम शब्द उनके कान में पड़ गए। बोले-नहीं बाबूजी, मेरी सुखदा मरी नहीं, त्रिवेणी के मेले मे गयी पी । आज बीस साल हुए, जब मैं पली के साथ त्रिवेणी स्नान करने प्रयाग गया पा। वही मुखदा पो गयी थी । उसकी उस कोई चार साल की रही होगी। बहुत दवा पर कुछ पता न चला । उसको माता उसके वियोग में स्वर्ग सिधारी। मैं भी वरमों तक पागल बना रहा । अन्त मे सब करके बैठ रहा । अहल्या ने सामने आफर निरसंफोन भाव से कहा- मैं भी तो त्रिवेणी के स्नान में यो गयी थी। बागरा की सेवा समितिवालों ने मुझे कही रोते पाया, और मुझे आगरे ले गये ।' पावू यशोदानन्दन ने मेरा पालन-पोषण किया। -तुम्हारी बया उम्र होगी, बेटी? अहल्या-चोवीसवां नगा है। - तुम्हें अपने घर को कुछ याद है ? तुम्हारे द्वार पर फिन पीत्र का पेड़ था। राजा- महल्या--शायद वरगद का पेड़ था। मुझे याद आता है कि मैं उसके गोदे. चुनकर खाया करती थी। राजा-अच्छा, तुम्हारी माता कैसी थी ? कुछ याद आता है ? अहल्या-हां, याद क्यों नहीं आता! उनका सांवला रंग था, दुबली-पतली, लेकिन बहुत लम्बी थीं। दिन-भर पान खाती रहती थीं राजा-घर में कौन-कौन लोग थे? अहल्या-~~-मेरी एक बुढ़िया दादी थी, जो मुझे गोद में लेकर कहानी सुनाया करती थीं। एक बूढ़ा नौकर था, जिसके कन्धे पर मैं रोज सवार हुआ करती थों। द्वार पर एक बड़ा-सा घोड़ा बंधा रहता था। मेरे द्वार पर एक कुआं था. और पिछवाड़े एक वुढ़िया चमारिन का मकान था। राजा ने सजल नेत्र होकर कहा-बस-बस, बेटी आ; तुझे छाती से लगा लूं। तू ही मेरी सुखदा है । मैं बालक को देखते ही ताड़ गया था। मेरी सुखदा मिल गयी ! मेरी सुखदा मिल गयी ! चक्रधर--अभी शोर न कीजिए । सम्भव है कि आपको भ्रम हो रहा हो। राजा-~~-जरा भी नहीं, जौ-भर भी नहीं; मेरी सुखदा यही है। इसने जितनी बातें बतायों, सभी ठीक हैं। मुझे लेश-मात्र भी सन्देह नहीं । आह! आज . तेरी माता होती, तो उसे कितना आनन्द होता! क्या लीला है भगवान् की! मेरी सुखदा घर बैठे मेरी गोद में आ गयी। जरा-सी गयी थी, बड़ी-सी आयी। अरे! मेरा शोक-सन्ताप हरने को एक नन्हा-मुन्ना बालक भी लायी। आओ, भैया चक्रधर, तुम्हें छाती से लगा लूं । आज तक तुम मेरे मित्र थे, आज मेरे पुत्रं. हो। याद है मैंने तुम्हें जेल भिजवाया था ? नोरा, ईश्वर की लीला देखी? सुखदा घर में थी, और मैं उसके नाम को रो वैठा-अब मेरी अभिलाषा पूरी हो गयी। जिस बात की आशा तक मिट गयी थी, वह आज पूरी हो गयी। यह कहते हुए राजा साहब उसी आवेश में दीवानखाने में जा पहुंचे। द्वार पर अभी तक कंगालों की भीड़ लगी हुई थी। दो-चार अमले अभी तक बैठे दफ्तर में काम कर रहे थे। राजा साहब ने बालक को कन्धे पर बिठाकर उच्च-स्वर से कहा-मित्रों! यह देखो; ईश्वर की असीम कृपा से मेरा निवासा घर-बैठे मेरे पास आ गया। तुम लोग जानते हो कि बीस साल हुए, मेरी पुत्री सुखदा त्रिवेणी के स्नान में खो गयी थी? वही सुखदा आज मुझे मिल गयी है और यह बालक उसी का पुत्र है । आज से तुम लोग इसे अपना युवराज समझो। मेरे बाद यही मेरी रियासत का स्वामी होगा। गारद से कह दो, अपने युवराज को सलामी: दे। नौबतखाने में कह दो, नौवत बजे! आज के सातवें दिन राजकुमार का अभिषेक होगा। अभी से उसकी तैयारी शुरू करो। यह हुक्म देकर राजा साहब वालक को गोद में लिये ठाकुरद्वारे में जा पहुंचे वहाँ इस समय ठाकुरजी के भोग की तैयारियां हो रही थीं। साधु, सन्तों की ८६ ।

मण्डली जमा थी। पुजारीजी ने कहा-भगवान् राजकुवर को पिरजीव करें! राजा ने अपनी हीरे की अंगूठी उसे दे दी। एक वावाजी को इसी वाशी- दि के लिए १०० बीघे जमीन मिल गयो। ठाकुरद्वारे से जब वह घर में आये, तो देखा कि चक्रधर आसन पर बैठे भोजन कर रहे हैं, और मनोरमा सामने पड़ी याना परस रही है । उसके मुय- मण्डल पर हादिक उल्लास को कान्ति सलक रही थी। कोई यह अनुमान ही न कर सकता था कि यह वही मनोरमा है, जो अभी दस मिनट पहले मृत्यु शम्या पर पड़ी हुई थी। १९ राजा विधाससिंह ने इधर कई साल से राज-काज छोड़-सा रया था। भुशी वयधर और दीवान साहब की चढ़ वनी घो। प्रजा के सुख-दुःख की चिन्ता अगर किसी को थी, तो वह मनोरमा पी। राजा साहब के सत्य और न्याय का उत्साह ठण्डा पड़ गया था। मनोरमा को पाकर उन्हें किसी पोज की सुधि न यो । लेकिन इस शासक ने आकर राजा साहब के जीवन में एक नवीन उत्साह का संचार कर दिया। अब तक उनके जीवन का कोई लक्ष्य न था। मन में प्रश्न होता था, किसके लिए करूं? अव जीवन का लक्ष्य मिल गया था। फिर वह राज-काज से क्यों विरक्त रहते ? मुंशीजी मब तक तो दीवान साहब से मिलकर अपना स्वार्थ साधते रहते थे, पर अब यह कब किसी को गिनने लगे थे ! ऐसा मालूम होता था कि अब वही राजा हैं। दीवान साहब अगर मनोरमा के पिता पे, तो मुंशीजी राजकुमार के दादा मे। फिर दोनों में कोन दवता? कर्मचारियों पर कभी ऐसी फटकारें न पड़ी थी। मुगीजी को देखते ही वेचारे पर-पर कांपने लगते थे । मगर कोई अमला उनके हुक्म की तामील करने में देर करता, तो जामे से बाहर हो जाते । वात पीछे करते, निकालने की धमकी पहले देते। सुनने वालों को ये बातें जरूर दुरी मालूम होती थीं। चक्रधर के कानो मे कभी ये बातें पड़ जाती, तो वह जमीन मे गड़-से जाते थे। वह आजकल मुंशीजी से बहुत कम बोलते थे। अपने पर भी केवल एक बार गये थे। वहां माता की बातें सुनकर उनकी फिर आने की इच्छा न होती थी। मित्रों से मिलना-जुलना उन्होंने बहुत कम कर दिया था। वास्तव में यहाँ का जीवन उनको लिए असहए हो गया था। यह फिर अपने शान्ति-कुटीर को लोट पाना पाहते थे। यहां याये दिन कोई न कोई बात हो ही जाती थी, जो दिल उनके चित्त को पप रखने को काफी होती थी। कहीं कमवारिणों में ८७ - र होती थी, कहीं गरीव असामियों पर डांट फटकार, कहीं रा -झगड़ होती थीं, तो कहीं इलाके में दंगा-फिसाद। उन्हें स्वयं कभी-कभी चारियों को तम्बीह करनी पड़ती, इस बार उन्हें विवश होकर नौकरों को रना भी पड़ा था। सबसे कठिन समस्या यही थी कि उनके पुराने सिद्धान्त 1. होते चले जाते थे। वह बहुत चेष्टा करते थे कि मुंह से एक भी अशिष्ट ब्द न निकले; पर प्रायः नित्य ही ऐसे अवसर पड़ते कि उन्हें विवश होकर ग्ड-नीति का आश्रय लेना ही पड़ता था। लेकिन अहल्या इस जीवन का चरम सुख भोग कर रही थी। बहुत दिनों तक दुःख झेलने के बाद उसे यह सुख मिला था और वह उनमें मग्न थी। अपने पुराने दिन उसे बहुत जल्द भूल गये थे और उनकी याद दिलाने से उसे दुःख होता था । उसका रहन-सहन विल्कुल बदल गया था। वह अच्छी-खासी अमीर- जादी बन गयी थी। सारे दिन आमोद-प्रमोद के सिवा उसे दूसरा काम न था। अब चक्रधर अहल्या से अपने मन की बातें कभी न कहते थे। यह सम्पदा उनका सर्वनाश किये डालती थी। क्या अहल्या यह सुख-विलास छोड़ कर मेरे साथ चलने पर राजी होगी.? उन्हें शंका होती थी कि कहीं वह इस प्रस्ताव को हँसी में न उड़ा दे, या मुझें रुकने के लिए मजबूर न करे । इसी प्रकार के प्रश्न चक्रधर के मन में उठते रहते थे और वह किसी भांति अपने कर्तव्य का निश्चय न कर सकते थे। केवल एक बात निश्चित थी-वह. इन बन्धनों में पड़कर अपना जीवन नष्ट न करना चाहते थे, सम्पत्ति पर अपने सिद्धान्तों को भेट ना कर सकते थे। एक दिन चक्रघर मोटर पर हवाः खानेः निकले। गरमी के दिन थे। जी बेचैन था ? हवा.लगी, तो देहात:की तरफ जाने का जी चाहा। बढ़ते ही गये यहां तक कि अंधेरा हो गया। शोफर को साथ न लिया था। ज्यों-ज्यों आ वढ़ते थे, सड़क खराव आती-जाती थी। सहसा उन्हें रास्ते में एक बड़ा सौ दिखायी दिया। उन्होंने बहुत शोर मचाया, पर साँड़ न हटा । जव समीप पर भी सौड़ राह में खड़ा ही रहा, तो उन्होंने कतराकर निकल जाना चा पर सांड़ सिर झुकाये फों-फों करता फिर सामने आ खड़ा हुआ । चक्रधर हाथ में लेकर उतरे कि उसे भगा दें, पर वह भागने के बदले उनके पीछे दौड कुशल यह हुई कि सड़क के किनारे एक पेड़ मिल गया। जी छोड़कर और छड़ी फेंक, पेड़ की एक शाखा पकड़ कर लटक गये । सांड़ एक तक तो पेड़ से टक्कर लेता रहा; पर जव चक्रधर न मिले, तो वह मो पास लौट गया और उसे सींगों से पीछे को ठेलता हुआ दौड़ा । कुछ वाद मोटर सड़क से हटकर एक वृक्ष से टकरा गयी । अव सांड़पूंछ उठा कर कितना ही जोर लगाता है, पीछे हट हटकर उसमें टक्कर मारता तह-जगह से नहीं हिलती। तब उसने बगल में जाकर इतनी जोर से - लगायी कि मोटर उलट गयी। फिर भी सांड़ ने उसका पिंड न छोड़ा। कभी उसके पहियों से टक्कर लेता, कभी पीछे की तरफ जोर लगाता। मोटर के पहिये फट गये, कई पुरजे टूट गये; पर सांड बरावर उस पर आपाव किये जाता था। सांड़ ने जब देखा कि शत्रु की धज्जियां उड़ गयों बोर अब वह शायद फिर न उठे, तो डकारता हुआ एक तरफ को पला गया। तब चक्रधर नीचे उतरे और मोटर के समीप जाकर देखा, तो वह उलटी पड़ी हुई थी। जब तक सीधी न हो जाय, यह पता कैसे चले कि क्या-क्या चीजें टूट गयी हैं, और अब यह चलने योग्य है या नहीं । अकेले मोटर को सीधी करना एक आदमी का काम न पा। पूर्व की ओर थोड़ी ही दूर पर एक गांव पा। चक्रधर उसी तरफ चले। वह बहुत छोटा-सा 'पुरवा' था। किसान लोग अभी थोड़ी ही देर पहले अख को सिंचाई करके आये थे। कोई वैलों को सानी-पानी दे रहा था, कोई याने जा रहा था, कोई गाय दुह रहा था। सहसा चक्रधर ने जाकर पूछा-यह कौन गाँव है? एक आदमी ने जवाब दिया--मैसौर । पधर-किसका गांव है ? किसान-महाराज का । कहाँ से बाते हो? चक्रधर- हम महाराज ही के यहाँ से आते हैं । वह बदमाश साह किसका है, जो इस वक्त सड़क पर घूमा करता है ? किसान--यह तो नहीं जानते साहन; पर उसके मारे नाकोंदम है। चक्रधर ने सांड़ के माक्रमण का जिक्र करके कहा-तुम लोग मेरे साप पलकर मोटर को उठा दो। इस पर दूसरा किसान अपने द्वार से गोला-सरकार, भला रात को मोटर उठाकर क्या कीजिएगा? वह चलने लायक तो होगी नहीं। चक्रधर-तो तुम लोगो को उसे ठेलकर ले चलना पड़ेगा। पहला किसान सरकार, रात भर यही ठहरे, सवेरे पलेंगे। न चलने लायक होगी, तो गाड़ी पर लादकर पहुंचा देंगे। चक्रधर ने मल्लाकर कहा-कैसी बातें करते हो जी ! मैं रात-भर यहाँ पड़ा रहूंगा! तुम लोगों को इसी वक्त चलना होगा। पक्रयर को उन आदमियो में कोई न पहचानता था। सममे, राजाओ के यहाँ सभी तरह के लोग बाते-जाते हैं, होंगे कोई। फिर वे सभी जाति के ठाकुर पे, और ठाकुर से सहायता के नाम से जो काम पाहे ले लो, वेगार के नाम से उनको त्योरियां बदल जाती हैं । किसान ने कहा-साहब, इस बयत तो हमारा जाना न होगा । अगर वेगार पाहते हो, तो वह उत्तर की ओर दूम व है, यहाँ पसे पाइए । बहुत पमार मिल जायेंगे।

लूं और - - यह कहकर वह घर में जाने लगा। चक्रधर को ऐसा क्रोध आया कि उसका हाथ पकड़कर घसीट ठोकर मारते हुए ले चलू; मगर उन्होंने जन्त करके कहा- मैं सीधे से कहता हूँ, तो तुम लोग उड़नघाइयाँ बताते हो। अभी कोई चपरासी आकर दो घुड़- कियां जमा देता, तो सारा गांव भेड़ की भांति उसके पीछे चला जाता। किसान वहीं खड़ा हो गया और बोला-सिपाही क्यों घुड़कियां जमायेगा, कोई चोर हैं ? हमारी खुशी, नहीं जाते। आपको जो करना हो, कर लीजिएगा। चक्रधर से जब्त न हो सका। छड़ी हाथ में थी ही । वह बाज की तरह किसान पर टूट पड़े और एक धक्का देकर कहा-चलता है या जमा दो-चार हाथ ? तुम लात के आदमी वात से क्यों मानने लगे ! चक्रधर कसरती आदमी थे। किसान धक्का खाकर गिर पड़ा । यो वह भी करारा आदमी था। उलझ पड़ता, तो चक्रधर आसानी से उसे न गिरा सकते; पर वह रोब में आ गया । सोचा, कोई हाकिम हैं, नहीं तो उसकी हिम्मत न पड़ती कि हाथ उठाये। संभलकर उठने लगा। चक्रधर ने समझा, शायद यह उठकर मुझ पर वार करेगा । लपककर फिर एक धक्का दिया। सहसा सामने वाले घर में से एक आदमी लालटेन लिये वाहर निकल आया और चक्रधर को देखकर बोला-अरे भगतजी! तुमने यह भेष कब से धारण किया ? मुझे पहचानते हो, हम भी तुम्हारे साथ जेहल में थे। चक्रधर उसे तुरन्त पहचान गए। यह उनका जेल का साथी धन्नासिंह था। चक्रधर का सारा क्रोध हवा हो गया। लजाते हुए बोले- क्या तुम्हारा घर इसी गाँव में है, धन्ना? धन्नासिंह हाँ साहब, यह आदमी, जिसे आप ठोकरें मार रहे हैं, मेरा सगा भाई है । खाना खा रहा था । खाना छोड़कर जब तक उडूं, तब तक तो गरमा ही गए । तुम्हारा मिजाज इतना कड़ा कव से हो गया ? कहाँ तो दारोगा को बचाने के लिए अपनी छाती पर संगीन रोक ली थी, कहाँ आज जरा-सी बात पर इतने तेज पड़ गए। चक्रधर पर घड़ों पानी पड़ गया। वह अपनी सफाई में एक शब्द भी न वोल सके । उनके जीवन की सारी कमाई, जो उन्होंने न जाने कौन-कौन से कष्ट सहकर वटोरी थी, धन्नासिंह ने अपने भाई का हाथ पकड़कर बैठाना चाहा, तो वह जोर से 'हाय ! हाय !' करके चिल्ला उठा । दूसरी बार गिरते समय उसका दाहिना हाथ उखड़ गया था । धन्नासिंह ने समझा उसका हाथ टूट गया है । चक्रधर के प्रति उसकी रही-सही भक्ति भी गायब हो गयी। उनकी ओर आरक्त नेत्रों से देखकर बोला--सरकार, आपने तो इसका हाथ ही तोड़ दिया। (ओठ चवाकर) क्या कहें, अपने द्वार पर आए हो और कुछ पुरानी बातों का ख्याल है, नहीं तो - यहाँ लुट गयी।

इस समय क्रोध तो ऐमा आ रहा है कि इसी तरह तुम्हारे हाय भी तोह हूँ। बभी जाकर महाराज के द्वार पर फरियाद करें, तो तुम खड़े-खडे बंध जाओ वाबू चक्रधर सिंह का नाम तो तुमने सुना ही होगा? अब किसी सरकारी बादमी की मजाल नहीं कि वेगार ले सके, तुम बेचारे किस गिनती में हो! तुम्हारे ही उपदेश से मेरी पुरानी आदत छूट गयी। गांजा और घरस तभी से छोड़ दिया, जुए के नगीच नहीं जाता। जिस लाठी से संकडों सिर फोड़ डाले होगे, यब वह ट्टी हुई पड़ी है । मुझे तो तुमने यह उपदेश दिया और नाप लग गरीबो को कुचलने । मन्नासिंह ने इतना ही न कहा था कि रात को यही रहर जानो, सवेरे हम चलकर तुम्हारी मोटर पहुंचा देंगे। इसमें क्या बुराई थी? चप्राधर ने ग्लानि वेदना मे व्यथित स्वर में कहा--धन्नासिंह, मैं बहुत लग्जित हूँ, मुझे क्षमा करो। जो दण्ड पाहो, दो; सिर झुकाये हुए हूँ, जरा भी सिर न हटाऊँगा, एक शब्द भी मुह से न निकालूंगा । यह कहते-कहते उनका गला फंस गया। धन्नासिंह भी गद्गद् हो गया। बोला-अरे भगतजी, ऐसी बातें न कहो। भैया, भाई का नाता बड़ा गहरा होता है । भाई पाहे अपना मन भी हो, लेकिन कोन आदमी है, जो भाई को मार खाते देखकर त्रोध को रोक सके ? मुझे अपना वैसा ही दास समतो, जैसे जेहल मे समझते थे। तुम्हारी मोटर कहाँ है ? पलो, मैं उसे उठाये देता हूँ, या हुक्म हो तो गाड़ी जोत ? पक्रधर ने रोककर कहा-जब तक इसका हाच वच्छा न हो जाएगा, तब तक में कही न जाऊँगा, धन्नासिंह ! हो, कोई आदमी ऐसा मिले, जो यहाँ से जगदीशपुर जा सके, तो उसे मेरी एक चिट्ठी दे दो। धन्नासिंह-जगदीशपुर में तुम्हारा कोन है, भया? क्या रियासत में नौकर हो गये हो? चक्रधर-नौकर नहीं हूँ। में मुंगो वयधर का लडका हूं। धन्नासिंह ने विस्मित होकर कहा-सरकार ही बाबू परधरनिह हैं । धन्य भाग्य पे कि सरकार के आज दरसन हुए। यह कहते हुए यह दौड़कर घर में गया और एक चारपाई लाकर द्वार पर डाल दी। फिर लपककर गांव में घबर दे आया । एक क्षण में गांव के सब बादमी बाकर पकघर को नजरें देने लगे। पारों ओर हलचल सी मच गयी। सब-के-सब उनके यश गाने लगे। जब से मरकार आये हैं, हमारे दिन फिर गए हैं, आपका शील-स्वभाव जैसा मुनते थे, वैसा ही पाया । आप साक्षात भगवान है। धन्नासिंह ने कहा-मैंने तो पहचाना ही नहीं 1 क्रोध मे ने जाने क्या-नया वक गया। दूसरा ठाकुर बोला-सरकार अपने को गोल देते, वो हम मोटर को का पर लादकार से पलते।

चक्रधर को इन ठकुरसुहाती बातों में जरा भी आनन्द आवा.था। इन्हें उन पर दया आ रही थी। वहीं प्राणी, जिसे उन्होंने अपने काम का लक्ष्य बनाया था, उनके शोर्य और शक्ति की प्रशंसा कर रहा था। अपमान को निगल जाना चरित्र-पतन को अन्तिम सीमा है। और यही खुशामद सुनकर हम लट्ट हो जाते हैं। जिस वस्तु से घृणा होनी चाहिए, उस पर हम फूले नहीं समाते । चक्रधर को अब आश्चर्य हो रहा था कि मुझे इतना क्रोध आया कैसे ? आज उन्हें अनुभव हुआ कि रियासत की कितनी गुप्त और अलक्षित रूप से उन में समाती जाती है कितने गुप्त और अलक्षित-रूप में उनकी मनुष्यता, चरित्र और सिद्धान्त का ह्रास हो रहा है। चक्रधर को रात-भर नोंद न आयी । उन्हें बार-बार पश्चाताप होता.था कि मैं क्रोध के आवेग में क्यों आ गया। जीवन में यह पहला ही अवसर था कि उन्होंने एक निवल प्राणी पर हाथ उठाया था। जिसका समस्त जीवन दीनजनों की सहायता में गुजरा हो, उसकी यह कायापलट नैतिक पतन से कम न थीं। चक्रधर तो इस विचार में पड़े हुए थे, और अहल्या अपने सजे हुए शयनागा में मखमली गद्दों पर लेटी अंगड़ाइयां ले रही थी। जब चक्रधर ने कमरे में कदम रखा तो अहल्या त्योरियां चढ़ाकर बोली-अब तो रात रात-भर आपके दर्शन ही नहीं होते। चक्रधर -कुछ तुम्हें खबर भी है । आध घण्टे तक जगाता रहा, जब तुम जागी, तो चला गया। यहां भाकर तुम सोने में कुशल हो गयीं! अहल्या-क्या मैं सचमुच बहुत सोती हूँ ? चक्रधर---अच्छा, अभी तुम्हें उसमें सन्देह भी है ! घड़ी में देखो ! आठ बज गये हैं। तुम पांच बजे उठकर घर का धन्धा करने लगती थीं। अहल्या-तब की बातें जाने दो । अव उतने सवेरे उठने की जरूरत ही क्या है? चक्रधर---तो क्या तुम उन-भर यहां मेहमानी खाओगी? अहल्या ने विस्मित होकर कहा- इसका क्या मतलब ? चक्रधर-इसका मतलब यही है कि हमें यहां आए हुए बहुत दिन गुजर गये । अब अपने घर चलना चाहिए। अहल्या-अपना घर कहां है ? चक्रधर-अपना घर वहीं है, जहाँ अपने हाथों की कमाई है । ससुराल की रोटियाँ बहुत खा चुका । खाने में तो वह बहुत मीठी मालूम होती हैं, पर उतसे बुद्धि भ्रष्ट हो जाती है । इतने ही दिनों में हम दोनों कुछ-के-कुछ हो गये । यहाँ कुछ दिन और रहा, तो कम-से-कम मैं तो कहीं का न रहूंगा। कल मैंने एक गरीब किसान को मारते-मारते अधमुना कर दिया। उसका कसूर केवल यह था कि वह मेरे साथ आने पर राजी न होता था। ! १२ अहल्या-यह कोई बात नही, गवारों के उजापन पर कमी-कभी क्रोध आ हो जाता है । में ही यहां दिन-भर लौदियों पर झल्लाती रहती हूं, मगर मुझे तो कभी यह ख्याल ही नहीं माया कि घर छोड़कर भाग जाऊ । घधर-तुम्हारा घर है, तुम रह सकती हो, लेकिन मैंने तो जाने का निश्चय कर लिया। अहल्या ने अभिमान से सिर उठाकर कहा- तुम न रहोगे, तो मुझे यहां रहकर क्या लेना है । मेरे राज-पाट तो तुम हो, जब तुम्ही न रहोगे, तो अकेली पड़ी-पड़ी में क्या करूंगी? जब चाहे, चलो। हो, पिताजी से पूछ लो। उनके बिना पूछे वो जाना उचित नहीं, मगर एक बात अवश्य पहूंगी। हम लोगों के जाते ही यहाँ का सारा कारोबार चौपट हो जायगा । रियामत बेरवार हो जाएगी और एक दिन वेचारे सल्ल को ये सब पापड़ बेलने पड़ेंगे। भक्रधर समम गए कि अगर मैं आग्रह करू, तो यह मेरे साथ जाने पर राजी हो जाएगी। जन एश्वयं और पति-प्रेम, दो में से एक को लेने और दूसरे को 'त्याग करने की समस्या पड़ जाएगी, तो अहल्या किस और मुकेगी, इसमें लेशमात्र भी सन्देह नही था; लेकिन वह उसे कठोर धर्म सकट में डालना उचित न समझते थे। आग्रह से विवश होकर वह उनके साथ चली हो गयी तो का? जब उसे कोई कष्ट होगा ; मन-ही-मन झुंझलाएगी और वात-बात पर कड़ेगी और सल्लू को यहां छोड़ना ही पड़ेगा । मनोरमा उसे एक क्षण के लिए भी नहीं छोड़ सकती। राजा साहब तो शायद उसके वियोग में प्राण त्याग दें। पुष को छोड़कर अहल्या कभी जाने पर तैयार न होगी ओर गयो भी तो बहुत जल्द लौट आएगी। चक्रधर बड़ी देर तक इन्ही विचारों में मग्न बैठे रहे । अन्त में उन्होंने बिना किसी से कुछ कहे-मुने चले जाने का संकल्प किया। इसके सिवा गला छुड़ाने का कोई उपाय ही न सूझता था। चयर ने अपने कमरे में जाकर दोचार कपड़े और कितायें समेटकर रस दी । कुल इतना ही सामान पा, जिसे एक आदमी आसानी से हाप में लटकाये लिये जा सकता था । उन्होने रात को चुपके से यकवा उठाकर चले जाने का निश्चय किया। यात्रा की तैयारी करके और अपने मन को अच्छी तरह समझाकर चक्रधर बरने शयनागार में नीद का बहाना करने लगे। वह पाहते थे कि यह सो जाय, तो मैं चुपके से अपना याचा उठाऊ और लम्ग हो जाऊँ; मगर निद्रा दिला. सिनी बहल्या की बायों से बाज नीद कोसों दूर थी। वह कोई न कोई प्रसन पेटकर वा करती जाती थी । यहाँ तक को जब जाधी रात से अधिक वीत गयो, वो चक्रधर ने कहा-भाई, वय मुझे सोने दो ; आज तुम्हारी नीद महो भाग गयी?

उन्होंने चादर ओढ़ ली और मुह फेर लिया। गरमी के दिन थे। कमरे में पंखा चल रहा था। फिर भी गरमी मालूम होती थी। रोज किवाड़ खुले रहते थे। जव अहल्या को विश्वास हो गया कि चक्रधर सो गये, तो उसने दरवाजे अन्दर से बन्द कर दिये और बिजली की बत्ती ठण्डी करके सोयी । आज वह न जाने क्यों इतनी सावधान हो गयी थी। पगली । जाने वालों को किसने रोका है? रात भीग ही चुकी थी। अहल्या को नींद आते देर न लगी । चक्रधर का प्रेमकातर हृदय अहल्या के यों सावधान होने पर एक वार विचलित हो उठा। वह अपने आँसुओं के वेग को न रोक सके । यह सोचकर उनका कलेजा फटा जाता था कि जब प्रात:काल वह मुझे न पायेगी, तो क्या दशा होगी। चारों ओर सन्ताटा छाया हुआ था। सारा राज-भवन शांति में विलीन हो रहा था। चक्रधर ने उठकर द्वारों को टटोलना शुरू किया; पर ऐसा दिशा- भ्रम हो गया था कि द्वार का ज्ञान न हुआ । आखिर उन्होंने दीवालों को टटोल- टटोलकर बिजली का बटन खोज निकाला और बत्ती जला दी । चुपके से बाहर के कमरे में आये , अपना हैंडवेग उठाया और वाहर निकले । बाहर आकर चक्रधर ने राज-भवन की ओर देखा ! असंख्य खिड़कियों और दरीचों से विजली का दिव्य प्रकाश दिखाई दे रहा था । उन्हें वह दिव्य भवन सहस्र नेत्रों वाले पिशाच की भांति जान पड़ा, जिसने उनका सर्वनाश कर दिया था। वह कदम बढ़ाते हुए आगे चले ।वह दिन निकलने से पहले इतनी दूर निकल जाना चाहते थे कि फिर उन्हें कोई पा न सके । दिन निकलने में अब बहुत देर भी न थी । तारों की ज्योति मन्द पड़ चली। चक्रधर ने और तेजी से कदम बढ़ाया। सहसा उन्हे सड़क के किनारे एक कुएं के पास कई आदमी बैठे दिखाई दिये। उनके बीच में एक लाश रखी हुई थी 1 कई आदमी लकड़ी के कुन्दे लिये पीछे आ रहे थे । चक्रधर पूछना चाहते थे-कौन मर गया है.? धन्नासिंह की आवाज पहचानकर वह सड़क ही पर ठिठक गये । इसने पहचान लिया तो बड़ी मुश्किल होगी। धन्नासिंह कह रहा था-कजा आ गयी, तो कोई क्या कर सकता है ? वाबूजी के हाथ में कोई डण्डा भी तो न था । दो-चार घूसे मारे होंगे और क्या मगर उस दिन से फिर वेचारा उठा नहीं। दूसरे आदमी ने कहा-~-ठांव-कुठांव की बात है । मन्ना को कुठांव चोट लग गयी। धन्नासिंह-वावूजी सुनेंगे, तो उन्हें बहुत रंज होगा । जेहल में हम लोग उन्हें भगतजी कहा करते थे। एक बूढ़ा आदमी बोला~भया, जेहल की बात दूसरी थी। तव दयावान - - रहे होंगे। राज पाकर दयावान रहें,तो जानों। धन्नासिंह-दादा, वह राज पाकर फूल उठने वाले बादमी नहीं है । तुमने देखा, यहा से जाते ही जाते माफी दिला दी। बूढ़ा-- अरे पागल, जान का बदला वही माफी से चुकता है ? तुम वावूजी को दयावान कहते हो , मैं उन्हें सौ हत्यारो का एक हत्यारा कहता हूं। राजा हैं, इमसे बचे जाते हैं ; दूमरा होता तो फासी पर लटकाया जाता । चक्रधर वहाँ एक क्षण भी और पड़े न रह सके । उन आदमियों के सामने जाने की हिम्मत न पडी। पांच साल गुजर गये ; पर चक्रधर का कुछ पता नहीं । फिर वही गर्मी के दिन हैं. दिन को लू चलती है, रात को अगार वरतते हैं, मगर बहल्या को न अव पवे की जरूरत है, न यम की टट्टियों की । उस वियोगिनी को अब रोने के मिवा दूसरा काम नहीं है। वह अपने को बार-बार धिक्कारती हैं कि वह चक्र घर के साय क्यो न चली गयो? शषधर उससे पूछता रहता है-मम्मा, वाबूजी कब आयेंगे? वह क्यों चले गये, अम्माजी? रानी अम्मा कहती है, वह आक्ष्मी नही देवता है । यो अम्ना जी, क्या वह देवता हैं ? फिर तो लोग उनको पूजा करते होंगे अहल्या के पान इन प्रश्नों का उत्तर रोने के सिवा और कुछ नहीं है । शखधर कभी-कभी आले बैठकर रोता है ! कभी-कभी अकेले सोचा करता है कि पिताजी कसे आयेंगे। शखधर का जी अपने पिता की कीति मुनने से कभी नहीं भरता। यह रोज अपनी दादी के पास जाता है और वहां उनकी गोद में बैठा हुना पटो उनकी बातें मुना करता है। निर्मला दिन-भर उमकी राह देखा करती है। उसे देखते ही निहाल हो जाती है । शयघर ही अव उनके जीवन का आधार है। अहल्या का मुह भी वह नहीं देखना चाहती। मुंगो जी को अब रियासत से एक हजार करया महीना वसीका मिलता है। राजा साहब ने उन्हें रियामत के कामो मे मुस्त कर दिया है । इसलिए मुगी जी अव अधिकार घर पर ही रहते हैं। मराव की मात्रा तो धन के माय नही बढ़ी, बल्लिा और पट गयी है। लेकिन सगीत-प्रेम बढ़ गया है । उनके लिए सबसे आनन्द का समय वह होता है, जब वह शवधर को गोद में लिये मुहल्ल- भर के बालकों को मिठाइयां और पैने यौटने लगते हैं । इससे बड़ी पशी की वह कल्पना ही नही कर सकते । एक दिन गयधर 9 बजे ही पहुंचा । निर्मला उग सनय स्नान करके तुनमी को उन चला रही थी। जब जल चढ़ाकर आयी, तो पयधर ने पूछा-दादीजी तुम पूजा पयों करती हो? निर्मल ने शखधर को गोद में लेकर कहा-टा, भगवान से मनाता हूँ कि मेरी मनोकामना पूरी करें। शपथर-भगवान सबके मन की बात जानते हैं ?

- । - निर्मला-हाँ बेटा, भगवान सब कुछ जानता। दूसरे दिन प्रातः काल शंखधर ने स्नान किया लेकिन स्नान करके व जलपान करने न आया। न जाने कहां चला गया । अहल्या इधर-उधर देखन लगी, कहां चला गया। मनोरमा के पास आकर देखा, वहां भी न था । अपने कमरे में भी न था । छत पर भी न था। दोनों रमणियां घबरायों कि स्तान करके कहाँ चला गया। लौंडियों से पूछा तो उन सबों ने भी कहा हमने तो उन्हें नहाकर आते देखा। फिर कहाँ चले गये, यह हमें नहीं मालूम चारों और तलाश होने लगी। दोनों वगीचे की ओर दौड़ी गयीं। वहां भी वह न दिखायी दिया। सहसा वगीचे के पल्ले सिरे पर, जहाँ दिन को भी सन्नाटा रहता था उसकी झलक दिखायी दी। दोनों चुपके-चुपके वहाँ गयों और एक पेड़ की आड़ में खड़ी होकर देखने लगी । शंखधर तुलसी के चबूतरे के सामने आसन मारे, आँखें बन्द किये ध्यान-सा लगाये बैठा था। उनके सामने कुछ फूल पड़े हुए थे। एक क्षण के लिए उसने आँखें खोली, कई बार चबूतरे की परिक्रमा और तुलसी की वन्दना करके धीरे से उठा । दोनों महिलाएं आड़ से निकल कर उसके सामने खड़ी हो गयीं। शंखधर उन्हें देखकर कुछ लज्जित हो गया और विना कुछ बोले आगे बढ़ा। मनोरमा-वहाँ क्या करते थे, वेटा? शंखधर-कुछ तो नहीं । ऐसे ही घूमता था । मनोरमा-नहीं, कुछ तो कर रहे थे। शंखधर-~-जाइए, आपसे क्या मतलब ? अहल्या-तुम्हें न बतायेंगे । मैं इसकी अम्मां हूं, मुझे बता देगा.। मेरा लाल मेरी कोई बात नहीं टालता। हाँ वेटे, बताओ क्या कर रहे थे ? मेरे कान में कह दो । मैं किसी से न कहूंगी। शंखधर ने आंखों में आंसू भरकर कहा-कुछ नहीं, मैं वावूजी के जल्दा से लौट आने की प्रार्थना कर रहा था। भगवान पूजा करने से सवकी मनोकामना पूरी करते हैं। सरल बालक की यह पितृ-भक्ति और श्रद्धा देखकर दोनों महिलाएं रोने लगीं। इस वेचारे को कितना दुःख है। शंखधर ने फिर पूछा-क्यों अम्मा तुम बाबूजी के पास कोई चिट्ठी क्यों नहीं लिखती ? अहल्या ने कहा-कहाँ लिखू वेटा, उनका पता भी तो नहीं जानती २० इधर कुछ दिनों से लौंगी तीर्थ करने चली गयी थी। गुरुसेवकसिंह ही. कारण उनके मन में यह धर्मोत्साह हुआ था। जवसे वह गयी थी, दीवान साहब दीवाने हो गये थे। यहां तक कि गुरुसेवक को भी कभी-कभी यह मानना पड़ता - पा कि लोगो का घर में होना पिताजी की रक्षा के लिए जरूरी है परभर कोई नोकर एक सप्ताह से ज्यादान टिकता धा, किराने की पहली ही पारपार छोड़कर भागते थे । भराव की मात्रा भी दिनोदिन यती नासीरी, निगम होता था कि कोई भयकर रोग न खडा हो जाय, भोजा या भय पर गोडा करते थे। लौंगी दिन-भर मे दो दाई सर दूध उनके पेट में भर दिया गती थी, आध पाव के लगभग पी भी फिसी-न-किसी तरह पापा ही देतीपी। इस कला में वह निपुण थी । पति-सेवा का वह यमर सिमान्त, जो पासी गारानी अवस्या के बाद भोजन को योजना ही पर विशेष आग्रह करता है, देष उसकी आंखो के सामने रहता था । ठाकुर साहब लोगो की अव सूरत भी नहीं प्रगा चाहते थे, इसी बाशय के पत्र उनको लिखा करते हैं । हर एक पत्र में यह स्वास्थ्य का विवरण अवश्य करते थे। उनकी पाचन-शक्ति अव यस पछी गयी थी, रुधिर के बढ़ जाने से जितने रोग उत्पन्न होते हैं, उनकी बप का सम्भावना न थी। दीवान साहब की पाचन शक्ति अच्छी हो गई हो; पर विचार-शक्तिना जरूर क्षीण हो गयी थी। निश्चय करने की अब उनमे सामयं ही न थी । . ऐसी गलतियां करते थे कि राजा साहब को उनका बहुत लिहाज करने पर भी गर-चार एतराज करना पड़ता पा। वह कार्यदक्षता, वह तत्परता, वह विधा. शीलता, जिसने उन्हें. पपराची से दीवान बनाया पा, यब उनका मायर गयी थी। लोगों को मापचयं होता था इन्हें क्या हो गया है। गुरुसेवा कानी सायद मालूम होने लगा कि पिता की बाड़ में कोई दूसरी ही शस्ति मित का संचालन करती थी। एक दिन उन्होंने पिताजी से कहा-लोनी कब तक यायेगी? दीवान साहब ने उदासीनता से नहा-उसका दिल जाने, कर आने में तो कोई खास जरूरत नहीं मालूम होती। अच्छा है, अपने कमों का ही कर ले । यहाँ बाकर क्या करेगी? उसी दिन भाई-बहन में भी इनी पिर पर बात हुई। नग्मा- भैया, क्या तुमने लोगो कम्मो को मुला ही दिया? दासी को हो कि नहीं? सुधार कारा हो गये है। जब यम्माज का नारा दादाजी ने अपने को महायों कर दिया । लोनी में काम अम्मा जी के नोकदार काम दे देते। नैनं किती सामने इतनी पवि-मसिनहीं देना। मरमादामी को पत्र लागी अम्मीनेनार नागो! गुवक-गबाना तो बहुत नुकल है : मनोरना-या। समापफा -11 गुरदेवर-वह नारंगो, मान्दिन इन्ही में t - सिर चढ़ जायगी। उसका मिजाज और भी आसमान पर जा पहुंचेगा। मनोरमा-अच्छी बात है, तुम न जाओ; लेकिन मेरे जाने में तुम्हें कोई आपत्ति नहीं है? गुरुसेवक-तुम जाओगी? मनोरमा-क्यों, मैं क्या हूं ! क्या भूल गई हूँ कि लौंगी अम्माँ ही ने मुझे गोद में लेकर पाला है ? जब मैं बीमार पड़ी थी, तो वह रात-की-रात मेरे सिरहाने बैठी रहती थी । क्या मैं इन बातों को भूल सकती हं? माता के ऋण से उऋण होना चाहे सम्भव हो, उसके ऋण से मैं कभी उऋण नहीं हो सकती, चाहे ऐसे-ऐसे दस जन्म लू। गुरुसेवक लज्जित हुये । घर आकर उन्होंने देखा कि दीवान साहव लिहाफ ओढ़े पड़े हुए हैं। पूछा-आपका जी कैसा है ? दीवान साहब की लाल आंखें चढ़ी हुई थीं। बोले-कुछ नहीं जी, जरा सरदी लग रही थी। गुरुसेवक-आपकी इच्छा हो, तो मैं जाकर लौंगी को बुला लाऊँ ? हरसेवक-तुम ! नहीं तुम उसे बुलाने क्या जाओगे। कोई जरूरत नहीं उसका जी चाहे, आये या न आये । हुंह ! उसे बुलाने जाओगे ! ऐसी कहां की अमीरजादी है ? दूसरे दिन दीवान साहब को ज्वर हो आया । गुरु सेवक ने तापमान लगा- कर देखा, तो ज्वर 104 डिग्री का था । घबराकर डाक्टर को बुलाया। मनोरमा यह खबर पाते ही दौड़ी आई । उसने आते-ही-आते गुरुसेवक से कम मैंने आपसे कल ही कहा था, जाकर लौंगी अम्मां को बुला लाइए; लेकिन आप न गये । अब तक तो आप हरिद्वार से लौटते होते । अब भी मौका है। मैं इनकी देखभाल करती रहूंगी, तुम इसी गाड़ी मे चले जाओ और उन्हें साथ लामो ।. वह इनकी बीमारी की खबर सुनकर एक क्षण भी न रुकेंगी। वह केवल तुम्हारे भय से नहीं आ रहीं हैं। दीवान साहब मनोरमा को देखकर बोले-आओ नोरा, मुझे तो आज ज्वर आ गया। गुरुसेवक कह रहा था कि तुम लौंगी को बुलाने जा रही हो । वेटी, इसमें तुम्हारा अपमान है । भला दुनिया क्या कहेगी? सोचो, कितनी बदनामी की बात है। मनोरमा--दुनिया जो चाहे कहे, मैंने भैया जी को भेज दिया है। हरसेवक-सच ! यह तुमने क्या किया ! लौंगी कभी न आयेगी। मनोरमा-आयेगी क्यों नहीं। न आयेगी, तो मैं जाऊँगी और उसे मना लाऊंगी। हरसेवक- तुम उसे मनाने जाओगी? रानी मनोरमा लौंगी कहारिन को मनाने जाएगी। .

मनोरमा-मनोरमा लोंगी कहारिन का दूध पीकर बड़ी न होती, तो आज रानी मनोरमा कैसे होती? हरसेवक का मुरझाया हुआ चेहरा खिल उठा, वप्ती हुई बांयें जगमगा ठी, प्रसन्नमुप होकर बोले- नोरा, तुम सचमुच दया की देवी हो । देखो, अगर जोगी आये और मैं न रहूं, तो उसकी खबर लेती रहना । उसने बड़ी सेवा की । मैं कभी उसके एहसानो का बदला नही चुका सकता। गुरुसेवक उमे तायेगा, उसे घर से निकालेगा; लेकिन तुम उस दुपिया की रक्षा करना । मैं हूं, तो अपनी सारी सम्पत्ति उसके नाम लिख सकता है। लेकिन लोगो कुछ लेगी। वह दुष्ट मेरी जायदाद का एक पंसा भी न छुएगी। वह अपने गहने- ते भी काम पड़ने पर इस घर में लगा देगी। बस, वह सम्मान चाहती है। ई उससे बादर के माप बोले और उसे लूट ले । वह घर को स्वामिनी वन- र भूपों मर जायगी, लेकिन दासी बनकर सोने का कोर भी न पायगी। रा, जिस दिन से वह गयी है, में कुछ और ही हो गया । जान पड़ता है, री आत्मा कहीं चली गयी है । तुम्हें अपने बचपन की याद आती है, नोरा? मनोरमा-बहुत पहले की बातें तो नही याद हैं, लेकिन लोंगी अम्मा का से गोद में लाना पूर्व याद है; अपनी बीमारी भी याद आती है, जब नांगी मम्मों मुझे पंखा ला करती थीं। हरमेवक ने अवरुद्ध कण्ठ से कहा-उससे पहले की बात है नोरा, जब रमेवक तीन वर्ष का था और तुम्हें तुम्हारी माता साल-भर का छोडकर नल सी पी। मैं पागल हो गया था । यही जी में आता था कि आत्महत्या कर । उस दशा में इसी लोगो ने मेरी रक्षा की । उमको सेवा ने मुझे मुग्ध कर दया । उमे तुम लोगों पर प्राण देते देखकर उस पर मेरा प्रेम हो गया। म्हारी माता मी तुम लोगो का लालन-पालन इतना तन्मय होकर न कर कती थी । गुरुमेवक को न जाने कौन सा रोग हो गया था । खून के दस्त आते और तिल-तिल पर । इसके बचने की कोई आशा न थी। गलकर कोटा हो या था। यह लोंगी ही थी, जिसने उसे मौत के मुंह से निकाल लिया । और आज गुरुमेवक उसे घर से निकाल रहा है, समझता है कि लोगी मेरे धन के गोभ से मुझे घेरे हुए है । मूर्य नही सोचता कि जिस समय लोगी उसका गजर गोद में लेकर रोया करती थी, उस समय धन कहाँ था । सन पूछो, तो हो सक्षमी भी सोगी के समय ही आयो । क्यों नोरा. मेरे सिरहाने कौन पडा s? कोई बाहरी आदमी है ? कह दो, यहाँ से जाय । मनोरमा- यहां तो मेरे सिवा और कोई नहीं है । आपको कोई कष्ट हो रहा है ? डापटर को बुलाऊँ? हरमेवर-मेरी दवा लोगो के पास है । उस सती का कमा प्रताप पा! जब तक यह रही, मेरे सिर में कभी ददं नही हुआ । मेरी मूर्यता देयो कि जब उसने तीर्थयात्रा की बात कही, तो मेरे मुह से एक बार भी न निकला तुम मुझे किस पर छोड़कर जाती हो? अगर मैं यह कह सकता, तो वह कभी न जीती। यह कहते-कहते दीवान साहब फिर चौंक पड़े और द्वार की ओर आशंकित नेत्रों से देखकर बोलें--यह कौन अन्दर आया, नोरी ? ये लोग क्यों मुझे घेरे हुए हैं ? मुझे कुछ नहीं हुआ है । लेटा हुआ वातें कर रहा हूं। मनोरमा ने धड़कते हुए हृदय से उमड़ने वाले आंसुओं को दवाकर पूछा- क्या आपका जी फिर घबरा रहा है ? हरसेवक-वह कुछ नहीं था, नोरा ! मैंने अपने जीवन में अच्छे काम कम किये; बुरे काम वहुंत किये। अच्छे काम जितने किये ३ लौंगी' ने किये। बुरे काम जितने किये, वे मेरे हैं। उन दंड का भागी मैं हूं। लौंगी के कहने परं चलता, तो आज मेरी आत्मा शान्त होती। मनोरमा आंसुओं के वेग को रोके हुए थी। उसे उस चिर-परिचित स्थान में आज एक विचित्र शंका का आभास हो रहा था । ऐसा जान पड़ता था कि सूर्य-प्रकाशं कुछ क्षीण हो गया, मानो सन्ध्या हो गयी है । दीवान साहब के मुख की ओर ताकने की हिम्मत न पड़ती थीं। दीवान साहब छत की ओर टकटकी लगाये हुए थे, मानो उनकी दृष्टि अनन्त के उस पार पहुंच जाना चाहती हों। सहसा उन्होंने क्षीण-स्वर में पुकारा-नोरी! मनोरमा ने उनकी ओर करुण नेत्रों से देखकर कहा-खड़ी हूं, दादाजी ! दीवान-जरा कलम-दवात लेकर मेरे समीप आ जाओ। कोई और तो यहां नहीं हैं ? मेरा दान-पत्र लिख लो । गुरुसेवक की लौंगी से न पटेगी। मेरे पीछे उसे बहुत कष्ट होगा। मैं अपनी सब जायदाद लौंगी को देता हूं। जाय- दाद के लोभ से गुरुसेवक उससे दवे। तुम यह लिख लो और तुम्हीं इसकी साक्षी देना। यह वसीयत तुम अपने ही पास रखना। मनोरमा अन्दर जाकर रोने लंगी। अब आंसुओं का बैंग उसके रोके न रुका; थोड़ी देर में राजा साहब आ पहुंचे। अहल्या भी उनके साथ थीं । मुशी वज्रधर को भी उड़ती हुई खबर मिली । दौड़े आये । रियासत के सैकड़ों कर्म-: चारी जमा हो गये । डाक्टर भी आं पहुंचा। किन्तु दीवान साहब ने आँखें न खोली । अचेत पड़े हुए थे; किन्तु आंखों से आंसू की धारें वह-बहकर गालों पर आ रही थीं। एकाएक द्वार पर एक बग्घी आकर रुकी और उसमें से एक स्त्री उतरकर घर में दाखिल हुई । शोर मच गया-आ गयी, आ गयी ! यह लौंगी थी। मनोरमा-७ १० लोगो आज ही हरिद्वार से चली घो। गुरुसेवक से उसको भेट न हुई पी। इतने आदमियों को जमा देखकर उसका हृदय दहल उठा । उसके कमरे में आते हो योर लोग हट गए। केवल मनोरमा, उसफी भाभी और अहल्या रह गयी। लौंगी ने दीवान साहब के सिर पर हाथ रखकर भर्रायी हुई आवाज में -प्राणनाथ | क्या मुझे छोड़कर चले जाओगे? दीवान साहय को आयें पुल गयो । उन आँखों में कितनी अपार वेदना थी, किन्तु कितना प्रेम! उन्होने दोनों हाय फैलाफर कहा-लोगी, और पहले क्यो न नायी? लोगी ने दोनों फैले हुए हाप के बीच में अपना सिर रख दिया और उस अन्तिम प्रेमालिंगन के आनन्द में विह्वल हो गयी। आज उसे मालूम हुआ कि जिसके चरणों पर मैंने अपने को समर्पित किया था, वह अन्त तक मेरा रहा । यह शोकमय कल्पना भी कितनी मधुर और शान्तिदायिनी थी। वह इसी विस्मृति की दशा मे थी कि मनोरमा का रोना सुनकर चौंक पड़ी और दीवान साहब के मुख की ओर देया । तब उसने स्वामी के चरणो पर सिर रप दिया और फूट-फूटकर रोने लगी। एक क्षण में सारे घर में कुहराम मच गया। टाकुर हरमेवकसिंह का क्रिया-कर्म हो जाने के बाद एक दिन लोंगी ने अपना कपड़ा-लत्ता बांधना शुरू किया। उसके पास रुपये-पैसे जो कुछ थे, सब गुरसेवक को सौंपकर बोली-भैया, में अब किमी गाव में जाकर रहूंगी, यहाँ मुझसे नहीं रहा जाता। वास्तव में लोंगी से जब इस पर में न रहा जाता था। घर की एक-एक चीज उसे काटने दौड़ती पी। 25 वर्ष तक इस घर को स्वामिनी बनी रहने के बाद यह किसी की बाश्रिता न बन सकती पो । वैधव्य के शोक के साप यह भाव कि मैं किसी दूसरे की रोटियों पर पड़ी हूँ, उसके लिए असहाय था । हालांकि गुरसेवफ पहले से अब कहीं ज्यादा उसका लिहाज करते थे, और कोई ऐसी बात न होने देते पे, जिससे उसे रंज हो । फिर भी कभी-कभी ऐमो पाते हो ही जाती थी, जो उसकी पराधीनता की याद दिला देवी पो। इसीलिए अव वह यहाँ से जाकर किसी देहात मे रहना चाहती है। आपिर जब ठाकुर साहब ने उसके नाम कुछ नहीं लिया, उसे दूध की मरथी की भांति निकालकर फेंक दिया, तो वह यही क्यों पड़ी दूसरों का मुह जोहे ? उसे अब फूटे बोपड़े और एक टुकड़े रोटी के सिवा और कुछ नहीं चाहिए। गुरसेवक ने कहा-बाविर सुनें तो, कहाँ जाने का विचार कर रही लोगो-जही भगवान से जायेगे, वहां चली जाऊंगी; कोई नहर या दूसरी

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मनोरमा ने पिर दवाते हुए कहा-रानी जहाँ हूँ. यहाँ हूँ, यहाँ तो तुम्हारी गोद की पेलायी नोरा हूं। याज तो मैयाजी यहा से बाकर तुम्हारे कार बहुत विगडते रहे । में उसकी टांग तोड दूंगा, गर्दन काट लूंगा । कितना चूछा--कुछ बताओ तो, वात क्या है ? पर गुस्म में कुछ मुनें ही न । भाई हैं तो क्या, पर उनका अन्याय मुझसे भी नहीं देया जाता ! दादा जी उनको नियत को पहले ही ताड़ गए थे। मैंने अब तक तुमसे नहीं कहा अम्माजी, पर आज उनकी बात सुनकर कहती हूँ कि पिताजी ने अपनी सारी जायदाद तुम्हारे नाम लिय दी है। लौंगी पर इस सूचना का जरा भी असर न हुआ। किसी प्रकार का उल्लास उत्सुकता या गवं उसके चेहरे पर न दिखायी दिया। वह उदासीन भाव से पारपाई पर पड़ी रही। मनोरमा ने फिर कहा-मेरे पास उनको लिपापी हुई वसीयत रखी है। और मुझो को उन्होने उसका साक्षी बनाया है । जब यह महाराय वसीयत देखेंगे तो मांखें पलेंगी। लोगी ने गम्भीर स्वर मे कहा--नोरा, तुम यह पसीयतनामा ले जाकर उन्ही को दे दो। तुम्हारे दादाजी ने व्यपं ही वसीयत लिखाणे। मैं उनकी जायदाद की भूधी नहीं थी; उनके प्रेम की भूघी थी। और ईश्वर को साक्षी देकर कहती हूँ बेटी, कि इस विपय में मेरा जैसा भाग्य बहुत कम स्त्रियों का होगा। मैं उनका प्रेम-धन पाकर ही सन्तुष्ट है। इसके सिवा अब मुझे और किसी धन की इच्छा नहीं है । गुरुसेवक को मैंने गोद में मिलाया है, उसे पाला पोसा है । यह मेरे स्वामी का बेटा है। उसका हक में किस तरह छीन सकती हूँ ? उनके सामने की पाती किस तरह सोच सकती हूँ ? वह फाडकर फेंक दो। यह कागज लिवकर उन्होंने अपने साथ और गुरसेवक के साथ अन्याय किया है। गुरसेवक अपने बाप का बेटा है, तो मुझे उमी बावर में से ।। वह मुझे माने या न माने, मैं उसे अपना हा समझता हू । तुम सिरहाने बैठी मेरा सिर दवा रही हो, क्या धन में इतना सुख कभी मिल सकता है। गुरुवक के मह में अम्मा सुनकर मुझे वह युशी होगी, जो ससार की रानी वनकर भी नहीं हो सकवी, तुम उनसे इतना ही कह देना। यह कहते-कहते लोगो को आयें सजल हो गयी। मनोरमा उसकी पोर प्रेम, पता, गवं बोर माश्चयं पे ताक रही थी, मानो वह कोई देवी हो। २१ जगदीशपुर के ठाकुरद्वार में नित्य साधु महात्मा गाते रहते थे। मंचघर ज्नो पास जा घंटता और उनको बातें बड़े ध्यान से सुनवा । उसके पास ससुराल है, जिसका नाम बता दूं? गुरुसेवक-सोचती हो, तुम चली जाओगी तो मेरी कितनी बदनामी होगी? दुनिया यही कहेगी कि इनसे एक वेवा का पालन न हो सका। मेरे लिए कहीं मुंह दिखाने की भी जगह न रहेगी । तुम्हें इस घर में जो शिका- यत हो वह मुझसे कहो; जिस बात की जरूरत हो, मुझसे बतला. दो। अगर मेरी तरफ से उसमें जरा भी कोर-कसर देखो, तो फिर तुम्हें अख्तियार रहे, जो चाहे करना । यों मैं कभी न जाने दूंगा। लौंगी-क्या वाँधकर रखोगे? गुरुसेवक-हां, बांधकर रखेंगे। अगर उम्र-भर में लौंगी को गुरुसेवक की कोई वात पसन्द आयी, तो उनका यही दुराग्रह-पूर्ण वाक्य था । लौंगी का हृदय पुलकित हो गया। इस वाक्य में उसे आत्मीयता जान पड़ी। उसने जरा तेज होकर कहा-बांधकर क्यों रखोगे ? क्या तुम्हारी वेसाही हूँ? गुरुसेवकहाँ, बेसाही हो ! मैने नहीं बेसाहा, मेरे बाप ने तो बेसाहा है । वेसाही न होतीं, तो तुम तीस साल यहाँ रहती कैसे ? मैं तुम्हारे पैर तोड़कर रख दूंगा । क्या तुम अपने मन की हो. कि जो चाहोगी करोगी और जहाँ चाहोगी, जामोगी, और कोई न बोलेगा? तुम्हारे नाम के साथ मेरी और मेरे पूज्य बाप की इज्जत बंधी हुई है। लौंगी के जी में आया कि गुरुसेवक के चरणों पर सिर रखकर रोऊँ और छाती से लगाकर कहूँ-बेटा, मैंने तो तुझे गोद में खेलाया है, तुझे छोड़कर भला मैं कहाँ जा सकती हूँ ? लेकिन उसने ऋद्ध भाव से कहा-यह तो अच्छी दिल्लगी हुई। यह मुझे बाँधकर रखेंगे। गुरुसेवक तो झल्लाये हुए बाहर चले गये और लौंगी अपने कमरे में जाकर, खूब रोई । गुरुसेवक किसी महरी से क्या कह सकते थे-हम तुम्हें बांधकर रखेंगे? कभी नहीं; लेकिन अपनी स्त्री से वह यह बात कह सकते हैं। क्योंकि उसके साथ उनकी इज्जत बँधी हुई है। थोड़ी देर के बाद वह उठकर एक महरी से बोली-सुनती है रे, मेरे सिर में दर्द हो रहा है। जरा आकर दवा , दे। सहसा मनोरमा ने कमरे में प्रवेश किया और लौंगी को सिर में तेल डलवाते देखकर वोली-कैसा जी है अम्मां ? सिर में दर्द है क्या? लौंगी-नहीं बेटा, जी तो अच्छा है । आओ, वैठो। मनोरमा ने महरी से कहा- तुम जाओ मैं दवाये देती हूँ। महरी चली गयी । मनोरमा सिर दवाने वैठी, तो लौंगी ने उसका हाथ पकड़ लिया और वोली-नहीं वेटा; तुम रहने दो । दर्द नहीं था, यों ही तुला लिया था। कोई देखे तो कहे कि बुढ़िया पगला गई है, रानी से सिर दववाती है। १०२ :

1 मनोरमा ने सिर दवाते हुए कहा-रानो जहाँ हूँ, वहाँ हूँ, यहाँ तो तुम्हारी गोद की खेलायो नोरा हूं। बाज तो भंपाजी यहां से जाकर तुम्हारे कार बहुत बिगड़ते रहे । मैं उसकी टांग तोड दूंगा, गर्दन काट लूंगा । कितना पूछा--कुछ बताओ तो, वात क्या है ? पर गुस्से में कुछ सुने हो न । भाई है तो क्या, पर उनका अन्याय मुझसे भी नहीं देपा जाता । दादा जी उनको नियत पहले ही तार गए थे। मैंने अब तक तुमसे नहीं कहा जम्माजी, पर आज उनकी बातें सुनकर कहती हूँ कि पिताजी ने अपनी सारी जायदाद तुम्हारे नाम लिप दी है। लोगी पर इस सूचना का जरा भी बसर न हुआ । किसी प्रकार का उल्लास उत्सुकता या गवं उसके चेहरे पर न दिखायी दिया। वह उदासीन भाव से पारपाई पर पड़ी रही। मनोरमा ने फिर कहा-मेरे पास उनको लिखायी हुई वसीयत रखी है। और मुझी को उन्होने उसका साक्षी बनाया है। जब यह महाशय वसीयत देखेंगे तो आये गुलेंगी। लोगी ने गम्भीर स्वर में फहा-नोरा, तुम यह वसीयतनामा ले जाकर उन्ही को दे दो। तुम्हारे दादाजी ने प्पयं ही वसीयत लिया। मैं उनकी जायदाद की भूखी नही थी; उनके प्रेम की भूषी थी। और ईश्वर को साक्षी देकर कहती हूँ बेटी, कि इस विषय में मेरा जैसा भाग्य बहुत कम स्त्रियों का होगा। मैं उनका प्रेम-धन पाकर हो सन्तुष्ट है। इसके सिवा अब मुझे बोर किसी धन की इच्छा नहीं है । गुरुमेयक को मैंने गोद मे खिलाया है, उस पाला पोसा है । वह मेरे स्वामी का बेटा है। उसका हक में किस तरह छीन सकती हूँ ? उसके सामने की पाली किस तरह यीच सकती हूँ ? वह फाडकर फेंक दी। यह कागज लिखकर उन्होंने अपने साथ और गुस्सेयक के साप बन्याय किया है । गरसेवक अपने बाप का बेटा है, तो मुझे उमी भादर मे रस ।। यह मुरे माने या न माने, मैं उसे अपना हा समझता हूँ। तुम सिरहाने बेठी मेरा सिर दवा रही हो, क्या धन में इतना सुख कभी मिल सकता है। गुरमेवक के मुह में अम्मा सुनकर मुझे वह युगी होगी, जो समार की रानी बनकर भी नहीं हो सकती, तुम उनसे इतना ही कह देना। यह कहते-कहते लोंगो को आ सजल हो गयी। मनोरमा उसकी ओर प्रेम, धडा, गवं और आश्चर्य से ताफ रही थी, मानो यह कोई देवो हो। २१ जगदीशपुर के ठाकुरद्वारे में नित्य साधु महात्मा आते रहते थे। भयपर उनके पास जा पैटता और उनको बाते बड़े ध्यान से मुनता । उमगे पास - चक्रधर की तस्वीर थी; उससे मन-ही-मन साधुओं की सूरत का मिलान करता; पर उस सूरत का साधु उसे न दिखायी देता था। किसी की भी बातचीत से चक्रधर की टोह न मिलती थी। एक दिन मनोरमा के साथ शंखधर भी लौंगी के पास गया । लौंगी बड़ी देर तक अपनी तीर्थ-यात्रा की चर्चा करती रही । शंखधर उसकी बातें गौर से सुनने के बाद बोला-क्यों दाई, तो तुम्हें साधु-सन्यासी बहुत मिले होंगे। लौंगी ने कहा-हां वेटा, मिले क्यों नहीं। एक संन्यासी तो ऐसां मिला था कि हूबहू तुम्हारे वाबूजी से सूरत मिलती थी। बदले हुए भेस में ठीक तो न पहचान सकी, लेकिन मुझे ऐसा मालूम होता था कि वही हैं। शंखधर ने बड़ी उत्सुकता से पूछा-जंटा बड़ी-बड़ी थीं ? लौंगी-नहीं, जटा-सटा तो नहीं थी, न वस्त्र ही गेरुआ रंग के थे। हाँ कमण्डल अवश्य लिये हुए थे। जितने दिन मैं जगन्नाथपुरी में रही, वह एक बार रोज मेरे पास आकर पूछ जाते-क्यों माताजी, आपको किसी बात का कष्ट तो नहीं है ? और यात्रियों से भी वह यही बात पूछते थे। शंखधर बोला-दाई, तुमने यहां तार क्यों न दिया? हम लोग फौरन पहूँच जाते। लौंगी-अरे, तो कोई बात भी तो हो वेटा, न जाने कौन था, कौन नहीं था । विना जाने-बूझे क्यों तार देती ? शंखधर-मैं यदि उन्हें एक बार देख पाऊँ, तो फिर कभी साथ ही न. छोड़ । क्यों दाई, आजकल वह सन्यासीजी कहाँ होंगे.? मनोरमा-अव दाई यह क्या जाने ? सन्यासी कहीं एक जगह रहते हैं, जो वह बता दें? शंखधर-अच्छा दाई, तुम्हारे ख्याल में संन्यासीजी की उम्र क्या रही होगी? लौंगी-मैं समझती हूँ, उनकी उम्र 40 वर्ष की रही होगी। शंखधर ने कुछ हिसाव करके कहा-रानी अम्मां, यही तो बाबूजी की भी उम्र होगी। मनोरमा ने बनावटी क्रोध से कहा-हा-हाँ, वहीं संन्यासी तुम्हारे बाबूजी हैं, बस, अव माना । अभी उम्र 40 वर्ष की कैसे हो जायगी ? शंखधर समझ गया कि मनोरमा को यह जिक्र वुरा लगता है । इस विषय में फिर मुह से एक शब्द भी न निकला; लेकिन वहां रहना अब उसके लिए असम्भव था । पुरी का हाल तो उसने भूगोल में पढ़ा था; लेकिन अब उस अल्पज्ञान से उसे सन्तोष न हो सकता था । वह जानना चाहता था कि पुरी को कौन रेल जाती है, वहां जाकर लरेरा. ठहरते. कहाँ हैं ? घर के पुस्तकालय में शायद कोई ऐसा ग्रन्थ मिल जाय, यह सोचकर वह बाहर आया और शोफर १०४ - से बोला-मुझे घर पहुँचा दो। घर आकर पुस्तकालय में जा ही रहा था कि गुरुसेवकसिंह मिल गये । शंखधर उन्हें देखते ही बोला-गुरुजी, जरा, कृपा करके मुझे पुस्तकालय से कोई ऐसी पुस्तक निकाल दीजिये, जिसमे तीर्ष स्थानों का पूरा-पूरा हाल लिया हो। गुरुसेवक ने कहा-ऐसी तो कोई कितार पुस्तकालय में नहीं है। शषधर-बच्छा, तो मेरे लिये कोई ऐसी किताव मंगवा दीजिये। यह कहकर वह लोटा ही पाकि कुछ सोचकर बाहर पना गया और एक मोटर तयार कराके शहर पला । बभी उसका तेरहवा ही साल था, लेकिन परित्र में इतनी दृढ़ता पी कि जो वात मन में ठान लेता, उसे पूरा करके छोड़ता। शहर जाकर उसने अंग्रेजी पुस्तको की कई दुकानों में तोपं यात्रा सम्बन्धी पुस्तकें देखी और कितावो का एक बण्डल लेकर घर आया। राजा साहब भोजन करने बैठे, तो गयधर वहां न था। अहल्या ने जाकर देया, तो वह अपने कमरे में बैठा कोई किताब देख रहा था । अहल्या ने कहा- चलकर खाना या लो, दादाजी बुला रहे हैं। शवधर-अम्माजी, आज मुझे बिल्कुल भूख नहीं है। अहल्या-कोई नयी किताव लाये हो क्या ? अभी दूध नही है । कौन-सी किताब है! अहल्या ने उसके सामने से युती हुई किताब उठा ली और दो-चार पक्तियों पढ़कर बोली- इसमे तो तीर्यों का हाल लिया हुआ है-जगन्नाप, बदरीनाय, काशी और रामेश्वर । यह किताब कहाँ से लाये? संबधर-आज ही तो बाजार से लाया हूँ। दाई कहती पोकि बाबूजी की सूरत का एक सन्यासी उन्हें जगन्नाप में मिला था। अहल्या ने पयधर को दया-सजल नेत्रो से देखा; पर उसके मुख से कोई बात न निकली । आह ! मेरे लाल । तुममे इतनी पित-भक्ति क्यो है ? द पिता के वियोग में क्यों इतना पागल हो गया है ? तुझे तो पिता की मूरत भी याद नहीं । तुझे तो इतना भी याद नहीं कि कब पिता की गोद में बैठा था, उनकी प्यार को बातें सुनी थी। फिर भी तुझे उन पर इतना प्रेम है ? और वह इतने निर्दयी हैं । मांसुओं के वेग को दवाती हुई वह बोनी-बेटा, तुम्हारा उठने का जी न पाहवा हो, तो यही साऊं। शंघधर-अच्छा या सूमा अम्मा, किसी से पाना भेजवा दो, तुम क्यों नामोगी। अहल्या एक क्षण में छोटी-सी पाली में भोजन लेकर मावी और शय. घर के सामने रयकर बैठ गयी। संघधर को इस समय पाने की रूचि न यो, यह बात नहीं थी। उसे अब १.५ तक निश्चित रूप से अपने पिता के विषय में कुछ मालूम न था । वह जानता था कि वह किसी दूसरी जगह आराम से होंगे। आज उसे यह मालूम हुआ कि वह संन्यासी हो गये हैं । अब वह राजसी भोजन कैसे करता? इसीलिए उसने अहल्या से कहा था कि भोजन किसी के हाथ भेज देना, तुम न आना । अब यह थाल देखकर वह बड़े धर्म-संकट में पड़ा । अगर नहीं खाता; तो बहल्या दुखी होती है और खाता है तो कौर मुंह में नहीं जाता । उसे ख्याल आया, मैं यहाँ चांदी के थाल में मोहन-भोग उड़ाने बैठा हूं और बाबूजी पर इस समय न जाने क्या गुजर रही होगी। वेचारे किसी पेड़ के नीचे पड़े होंगे; न जाने आज कुछ खाया भी है या नहीं। वह थाली पर बैठा; लेकिन कौर उठाते ही फूट- फूट कर रोने लगा। अहल्या उसके मन का भाव ताड़ गयी और स्वयं रोने लगी कौन किसे समझाता ? आज से अहल्या को हरदम यही संशय रहने लगा कि शंखधर पिता की खोज में कहीं भाग न जाय । उसने सवको मना कर दिया कि शंखधर के सामने उसके पिता की चर्चा न करें। कहीं शंखधर अपने पिता के गृह त्याग का कारण न जान ले। कहीं वह यह न जान जाय कि बाबूजी को राज-पाट से घृणा है, नहीं तो फिर इसे कौन रोकेगा। उसे अब हरदम यही पछतावा होता रहता कि मैं शंखधरको लेकरस्वामी के साथ क्यों न चली गयी ? राज्य के लोभ में वह पति तो पहले ही खो बैठी थी; कहीं पुत्र को भी तो न खो बैठेगी। शंखधर का नाम स्कूल में लिखा दिया गया है । स्कूल से छुट्टी पाकर वह सीधे लौंगी के पास जाता है और उससे तीर्थयात्रा की बातें पूछता लोग कहाँ ठहरते हैं, क्या खाते हैं, जहाँ रेले नहीं हैं, वहाँ लोग कैसे जाते हैं, चोर तो नहीं मिलते ? लौंगी उसके मनोभाव को ताड़ती है; लेकिन इच्छा न होते हुए भी उसे सारी बातें बतानी पड़ती हैं। वह झुझलाती है, घुड़क बैठती है; लेकिन जब वह किशोर आग्रह करके उसकी गोद में बैठ जाता है तो उसे दया आ जाती है । छुट्टियों के दिन शंखधर पितृगृह के दर्शन करने अवश्य जाता है। वह घर उसके लिए तीर्थ है । निर्मला की आँखें उसे देखने से तृप्त ही नहीं होती। दादा और दादी दोनों उसकी वालोत्साह से भरी बातें सुनकर मुग्ध हो जाते हैं; उनके हृदय पुलकित हो उठते हैं, ऐसा जान पड़ता है, मानो चक्रधर स्वयं वाल- रूप धारण करके उनका मन हरने आ गया है। एक दिन निर्मला ने कहा-बेटा, तुम यहीं आके क्यों नहीं रहते? तुम चले जाते हो, तो यह घर काटने दौड़ता है। शंखधर ने कुछ सोचकर गम्भीर भाव से कहा- भाव से कहा-अम्माँजी तो आती ही नहीं । वह क्यों कभी यहाँ नहीं आती, दादीजी ? १०६ । यात्री . - मिली है। निर्मला -क्या जाने वेटा, मैं उसके मन की बात क्या जानू ? तुम कभी कहते नहीं । बाज कहना, देखो क्या कहती हैं ? शयधर-नही दादीजी, यह रोने लगेंगी। जय पोड़े दिनों में में गद्दी पर बढेगा, तो यही मेरा राजभवन होगा। तभी यम्मांजी जायेंगी। जब वह चलने लगा, तो निर्मला द्वार पर यही हो गयी। सहसा शयघर ड्योढ़ी में खड़ा हो गया और बोला-दादीजी आपचे कुछ मांगना चाहता हूं। निर्मला ने विस्मित होकर सजल नेत्रों में उसे देया और गद्गद् होकर बोली |--क्या मागते हो, पेटा? शपधर-मुझे बार्शीवाद दीजिए कि मेरी मनोकामना पूरी हो ! निर्मला ने पोते को कंठ में लगाकर कहा–भैया, मेरा तो रोयो-रोयो तुम्हें आर्शीवाद दिया करता है। ईश्वर तुम्हारी मनोकामनाएं पूरी करें ! शपधर घर पहुंचा तो अहल्या ने पूछा- आज इतनी देर कहाँ लगाई बेटा मैं कब से तुम्हारी राह देय रही हूँ। शायघर-अभी तो ऐसी बहुत देर नहीं हुई, अम्मा ! जरा दादीजी के पास चला गया था । उन्होने तुम्हें आज एक सन्देशा कहला भेजा है। अहल्या-क्या सन्देशा है, सुन ? कुछ तुम्हारे बापूजी की यवर तो नहीं शवधर-नहीं। बाबूजी को यवर नहीं मिली । तुम कभी-कभी वहाँ क्यों नही चली जाती? अहल्या ने उपरी मन से हो तो कह दिया, लेकिन भाव से साफ मालूम होता था कि यह वहाँ जाना उचित नहीं राममती । शायद यह कह सकती तो कहती-वहाँ से तो एक बार निकाल दी गयी, अब कौन मुह लेकर जाऊँ? क्या अब मैं कोई दूसरी हो गयी हूँ! अहल्या तश्तरी में मिठाइयो और मेये लायी और एक लौंगे ने पानी लाने को कहकर बेटे से बोली-वहां वो कुछ जल-पान न किया होगा, पालो, आज तुम इवने उदास क्यो हो? शयधर ने तारी की ओर विना देखे ही कहा-इस वक्त तो पाने का जी नहीं पाहता, अम्मा ! एक क्षण के बाद उसने कहा-क्यों अम्मा जी, बाबूजी को हम लोगों की याद भी कभी आती होगी? अहल्या ने सजल-नेत्र होकर कहा-क्या जाने वेटा, याद आती तो कारे कोसों बैठे रहते ! मंधधर--क्या यह बड़े निष्ठुर है बम्मा ? बहल्या रो रही थी, कुछ न बोल सकी। उसका कंठ-स्वर बागर - . इदा जा रहा था। शंखधर ने फिर कहा मुझे तो मालूम होता है, अम्मांजी कि वह बहुत ही निर्दयी हैं, इसी से उन्हें हम लोगों का दुःख नहीं जान पड़ता । मेरा तो कभी कभी ऐसा चित्त होता है कि देखू तो प्रणाम तक न करू, कह -आप मेरे होते कौन हैं, आप ही ने तो हम लोगों को त्याग दिया है। अब अहल्या चुप न रह सकी; कांपते हुए स्वर में बोली-बेटा, उन्होंने हमें त्याग नहीं दिया है। वहाँ उनकी जो दशा हो रही होगी, उसे में ही जानती हूँ । हम लोगों की याद एक क्षण के लिए भी उनके चित्त से न उतरती होगी। खाने पीने का ध्यान भी न रहता होगाः। हाय ! यह सब मेरा ही दोप है, वेटा ! उनका कोई दोप नहीं। शंखधर ने कुछ लज्जित होकर कहा-अच्छा अम्मांजी, यदि मुझे देखें, तो वह पहचान जाय कि नहीं? अहल्या-तुझे ? मैं तो जानती हूँ, न पहचान सकें । तव तू जरा-सा बच्चा था । आज उनको गये दसवाँ साल है। न-जाने कैसे होंगे । भगवान् करें जहाँ रहें, कुशल से रहें । वदा होगा, तो कभी भेट हो ही जायगी। शंखधर अपनी ही धुन में मस्त था । उसने यह बातें सुनी ही नहीं । बोला लेकिन अम्मा जी, मैं तो उन्हें देखकर फोरन पहचान जाऊँ। वह चाहे किसी वेप में हों , मैं पहचान लूगा । अहल्या--नहीं बेटा, तुम भी उन्हें न पहचान सकोगे। तुमने उनकी तस्वीरें ही तो देखी हैं । ये तस्वीरें वारह साल पहले की हैं । फिर, उन्होंने केश भी वढ़ा लिए होंगे। शंखधर ने कुछ जवाव न दिया ! बगीचे में जाकर दीवारों को देखता रहा फिर अपने कमरे में आया और चुपचाप बैठकर कुछ सोचने लगा । वह यहां से भाग निकलने के लिए विकल हो रहा था। एकाएक उसे ख्याल आया, ऐसा न हो कि लोग मेरी तलाश में निकलें, थाने में हुलिया लिखायें, खुद भी परेशान हों, मुझे भी परेशान करें, इसलिए उन्हें बता देना चाहिए कि मैं कहाँ और किस काम के लिए जा रहा हूँ। अगर किसी ने मुझे जबरदस्ती लाना चाहा, तो अच्छा न होगा। हमारी खुशी है; जब चाहेंगे आयेंग; हमारा राज्य तो कोई नहीं उठा ले जाएगा । उसने एक कागज पर पत्र लिखा और अपने विस्तर पर रख दिया । आधी रात बीत चुकी थी। शंखधर एक कुर्ता पहने हुए कमरे से निकला वगल के कमरे में राजा साहब आराम कर रहे थे। वह पिछवाड़े की तरफ वाग में गया और एक अमरूद के पेड़ पर चढ़कर बाहर की तरफ कूद पड़ा । अव उसके सिर पर तारिकामण्डित नीला आकाश था, सामने विस्तृत मैदान और छाती में उल्लास, शंका और आशा से धड़कता हुआ हृदयं । वह बड़ी तेजी से १०८

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जाओ न । आगे वो बहुत दूर तक कोई गांव नहीं है । शंखधर-आपकी इच्छा है माता, तो यहीं ठहर जाऊँगा । मला, माता- जी यहाँ कोई महात्मा तो नहीं रहते ? दूसरी रमणी ने कहा-अभी कई दिन हुए, एक महात्मा नाकर टिके थे; पर वह साधुओं के भेप में न थे। वह यहाँ एक महीने-भर रहे । तुम एक दिन पहले यहाँ आ जाते, तो उनके दर्शन हो जाते। एक वृद्धा वोली-साधु-सन्त तो व त देते ; पर ऐसा उपकारी जीव नहीं देखा । तुम्हारा घर कहाँ है, बेटा? शंखधर-कहाँ बताऊँ माता, यों ही घूमता-फिरता हूँ। वृद्धा-अभी तुम्हारे माता-पिता हैं न वेटा? शंखधर-कुछ मालूम नहीं माता ! पिताजी तो वहुत दिन गये । मैं तव दो-तीन वर्ष का था। माताजी का हाल नहीं मालूम । वृद्धा-तुम्हारे पिता क्यों चले गये? तुम्हारी माता से कोई झगड़ा हुए कहीं चले हुआ था? शंबधर-नहीं माताजी, झगड़ा तो नहीं हुआ। गृहत्यी के माया-मोह में नहीं पड़ना चाहते थे। वृद्धा--तो तुम्हें घर छोड़े कितने दिन हुए ? शंखधर-पांच साल हो गये, माता ! पिताजी को खोजने निकल पड़ा था; पर अब तक कहीं पता न चला। एक युवती ने वृद्धा से कहा-अम्मां, इनकी सूरत महात्मा जी से मिलती है कि नहीं, कुछ तुम्हें दिखायी देता है ? वृद्धा-हाँ रे, कुछ-कुछ तो मालूम होता है । क्यों वेटा, तुम्हारे पिताजी की क्या अवस्था होगी? शंखधर-40 वर्ष के लगभग होगी। वृद्धा-आँखें खूब बड़ी-बड़ी हैं ? शंखधर-हां माताजी, उतनी बड़ी आँखें तो मैंने किसी की देखी ही नहीं। वृद्धा-लम्बे-लम्बे गोरे आदमी हैं ? शंखधर का हृदय धक-धक करने लगा। वोला-हाँ माताजी, उनका रंग बहुत गोरा है। वृद्धा-वेटा, जिन महात्मा की मैंने तुमसे चर्चा की है, उनकी सूरत तुमसे वहुत मिलती है। शंखधर-माता, कुछ बता सकती हो, वह यहां से किधर गये ? वृद्धा-यह तो कुछ नहीं कह सकती; पर वह उत्तर ही की और गये हैं। शंखधर ने कांपते हुए हृदय से पूछा-उनका नाम क्या था माताजी? वृद्धा-नाम तो उनका था भगवानदास, पर यह उनका असली नाम नहीं -११० मालूम होता था; असली नाम कुछ और ही था। एक युवती ने कहा-यहाँ उनकी एक तस्वीर भी तो रखी हुई है ! शपघर का हृदय शतगुण वेग से घडक रहा था। बोला-जरा वह तस्वीर मुझे दिखा दीजिए , आपकी बड़ी कृपा होगी। युवती लपकी हुई घर गयो, और एक क्षण में तस्वीर लिए हुए लौटी। माखधर ने दोनों हाथों से हृदय को संभालते हुए तस्वीर पर एक भय- कम्पित दष्टि डाली और पहचान गया नहीं, यह चक्रधर ही की तस्वीर थी। उसको देह शिथिल पड गयो । हृदय का धडकना शान्त हो गया। आशा, भय, चिन्ता और अस्थिरता से व्यग्र होकर वह हतबुद्धि-सा खड़ा रह गया, मानो किसी पुरानी बात को याद कर रहा हो । सहसा उसने निद्रा से जगे हुये मनुष्य को भांति पूछा -~वह इधर उत्तर ही को और गये हैं न? आगे कोई गांव पडेगा? चुदा-हाँ बेटा, पांच कोस पर गांव है! भला-सा उसका नाम है, हाँ साई- गज, लेकिन आज तो तुम यही रहोगे? शयधर ने केवल इतना कहा-~-नही माता, आज्ञा दीजिए। और खजरी उठाकर चल खड़ा हुआ। रामि के उस अगम्य अंधकार में शखधर भागा चला जा रहा था ! उसके पैर पत्थर के टुकडो से छलनी हो गये थे । सारी देह पककर चूर हो गयी थी, भूख के मारे आंखो के सामने अधेरा छाया जाता था, प्यास के मारे कण्ठ में काँटे पड़ रहे थे, पर कही रखता था, पडते कही ये, पर वह गिरता पड़ता भागा चला जाता था। अगर वह प्रात.काल तक साईगज पहुंचा, तो सम्भव है, परधर कहीं चले जायें और फिर उस अनाथ की पांच साल की मेहनत और दौड़-धूप पर पानी न फिर जाय । हिंय पशुओं का भयकर गर्जन मुनाई देता था, अंधेरे में खड्ड और खाई का पता न चलता था, पर उसे अपने प्राणो की चिंता न थी। उसे केवल यह धुन थी--'मुझे मूर्योदय से पहले साईगज पहुंच जाना चाहिए।' गगन-मण्डल पर ऊपा का लोहित प्रकाश छा गया। तारगण किसी के हुए पपिक की भांति अपनी उज्ज्वल आंखे बन्द करके विश्राम करने लगे। पक्षी गण वृक्षों पर चहकने लगे; पर साईगज का कही पता न चला। सहसा एक बहुत दूर की पहाड़ी पर कुछ छोटे-छोटे मकान बालिकाओ के घरोदे की तरह दिखायी दिये। यह साईगज आ गया । शवधर का कलेजा धक- धक करने लगा। उसके जीणं शरीर में यद्भुत स्फूर्ति का संचार हो गया, परों में न जाने कहाँ से दुगना बल आ गया। पहाडी को चढ़ाई कठिन थी। शवधर को ऊपर चढने का रास्ता न मालूम था,न कोई आदमी ही दिखाई देता था, जिमसे रास्ता पूछ सके । वह कमर बांध कर चढने लगा। गांव के आदमी ने ऊपर से आवाज दी-इधर से कहाँ आते हो, भाई ? रास्ता तो पश्चिमी ओर से है ! कहीं पैर फिसल जाये, तो 200 हाथ नीचे जाओ। और सिर झुकाकर लेकिन शंखधर को इन बातों के सुनने की फुरसत कहाँ थी? दम-के-दम में वह ऊपर पहुँच गया और पूछा-वावा भगवानदास अभी यहीं हैं न ? किसान-कौन बाबा भगवानदास ? शंखधर-बाबा भगवानदास को नहीं जानते ? वह इसी गांव में तो आये ? साईगंज यही है न ? किसान-साईगंज ! अ-र-र ! साईगंज तो तुम पूरव छोड़ आये । इस गांव का नाम बेंदो है। शंखधर ने हताश होकर कहा-तो साईगंज यहां से कितनी दूर है ? किसान-साईगंज तो पड़ेगा यहाँ से कोई पाँच कोस ; मगर रास्ता बहुत बीहड़ है। शंखधर कलेजा थामकर बैठ गया। पांच कोस की मंजिल , उस पर रास्ता वीहड़ । उसने आकाश की ओर एक बार नैराश्य में डूबी हुई आंखों से देखा सोचने लगा- -यह अवसर फिर हाथ न आयेगा? अगर आरा- ध्यदेव के दर्शन आज न किये, तो फिर न कर सकूगा। बैठने का समय फिर आयेगा । आज या तो इस तपस्या का अन्त हो जायेगा, या इस जीवन का ही । वह उठ खड़ा हुआ। किसान ने कहा-क्या चल दिये भाई ? चिलम-विलम तो पी लो। लेकिन शंखधर इसके पहले ही चल चुका था। वह कुछ नहीं देखता, कुछ नहीं सुनता, चुपचाप किसी अन्य शक्ति की भाँति चला जा रहा है। रास्ते में जो मिलता, उससे वह पूछता, साईगंज कितनी दूर है ? जवाब मिलता-वस, आगे साईगंज ही है। लेकिन जब आगे वाली बस्ती में पहुंच कर पूछता यही साईगंज है, तो फिर यही जवाव मिलता-बस आगे साईगज है। आखिर दोपहर होते-होते उसे दूर से एक मन्दिर का कलश दिखायी दिया । एक चरवाहे से पूछा-यह कौन गांव है ? उसने कहा-साईगंज आ गया । लेकिन ज्यों-ज्यों गांव निकट आता था, शंखधर के पांव सुस्त पड़ते जाते थे। उसे यह शंका होने लगी कि वह यहां से चले न गये हों। अब उनसे भेंट न होगी। वह इस शंका को कितना ही दिल से निकालना चाहता था; पर वह अपना आसन न छोड़ती थी। साईगंज दिखायी देने लगा । स्त्री-पुरुप खेतों में अनाज काटते नजर आने लगे । अब वह गांव के डांड़ पर पहुँच गया। कई आदमी उसके सामने से होकर निकल भी गये ; पर उसने किसी से कुछ नहीं पूछां । अगर किसी ने ११२ - क्या - ! आज सकता था। कह दिया-वावा जी हैं, तो वह क्या करेगा? इसी बसमंजस में पढ़ा हुआ वह न्दिर के सामने के चबूतरे पर बैठ गया। सहसा मन्दिर में से आदमी को नकलते देखकर वह चौक पड़ा, अमिनेप नेत्रो से उसकी ओर एक क्षण देखा, फिर उठा कि उस पुरुष के चरणों पर गिर पड़े पर पैर परथरा गये, मालूम हुआ , कोई नदी उसकी ओर बही चली आती है-वह मूर्छित होकर गिर शासपर को होश आया, तो अपने को मन्दिर के बरामदे में चक्रधर को गोद में पड़ा हुआ पापा । चक्रधर चिन्तित नेत्रो से उसके मुह की ओर ताक रहे थे। गांव क कई आदमी आस-पास पड़े पखा पल रहे थे । आह कितने दिनों के बाद शंघघर को यह शौभाग्य प्राप्त हुआ है ! वह पिता की गोद में लेटा हुआ था। शंखधर ने फिर आखें बन्द कर ली। चक्रधर ने स्नेह-मधुर स्वर में पूछा--बयों वेटा, अब कसी तबीयत है ? कितने स्नेह-मघर नन्द थे ! किसी के कानों ने कभी इतने कोमल शन्द सुने हैं ? उसने कोई उत्तर नहीं दिया । उसका जी चाहा, इन चरणों पर सिर रयकर पूब रोंगे । इससे बढ़कर योर किसी सुख की वह कल्पना हो न कर चक्रधर ने फिर पूछा-बयो बेटा, कैसी तबीयत है ? मायधर ने कातर स्वर से कहा-जव तो अच्छा हूँ। आप ही का नाम चावा भगवानदास है? चक्रधर-हो, मुझी को भगवानदास कहते है। शपथर-मैं आप ही के दर्शनो के लिए आया है। आपके दर्शन हुए, मैं कृतार्थ हो गया । अब मेरे सकट कट जायेंगे। वाप मेरा उद्धार कर सकते चक्रधर का चित अस्थिर हो गया। उस युवक के रूप और वाणी में न- जाने कौन-सी बात थी, जो उनके मन में उससे बात-चीत करने की प्रबल इच्छा हो रही पो । बरा पूछना चाहिए कि यह युवक कोन है ? क्यों मुझसे मिलने के लिए इतना उत्सुक है? कितना सुशील चालक है ! इसकी वाणी में फितना विनय है और स्वरूप देवकुमारों का-मा है । एक आदमी पानी लाया । गयधर ने मुह हाय धोया और चाहता था कि पाली पेट पानी पी ले; लेकिन पञ्घर ने मना किया-हा-हा, यह क्या ? पानी न पिपो आओ, कुछ भोजन कर लो। शखधर-बड़ी पास सगी है। पक्रधर-पानी कही भाषा को नहीं जाता। कुछ । भी इतना नहीं कि पेट में पानी डोतने नगे। ११३ शंखधर-दो ही पूँट पी लू, नहीं रहा जाता। चक्रधर ने आकर उसके हाथ से लोटा छीन लिया और कठोर स्वर में कहा- अभी तुम एक वूद पानी नही पी सकते । क्या जान देने पर उतारू हो गये हो! शंखघर को इस भर्त्सना में जो आनन्द मिल रहा था, -वह कभी माता की प्रेम-भरी बातों में भी न मिला था। मन्दिर के पीछे छोटा-सा बाग और कुआँ था। वहीं एक वृक्ष के नीचे चक्रधर की रसोई बनी थी। चक्रधर अपना भोजन आप पकाते थे, वर्तन भी आप ही धोते थे, पानी भी खुद खींचते थे। शंखधर उनके साथ भोजन करने गया, तो देखा कि रसोई में पूरी, मिठाई, दूध, दही, घी सब कुछ है । उसे कितना आश्चर्य हुआ, जब उसने देखा कि ये सारे पदार्थ उसी के लिए मैंगवाये गये हैं। चक्रधर ने उसके लिए खाना पत्तल में रख दिया और आप कुछ रोटियाँ और भाजी लेकर बैठे, जो खुद उन्होंने बनायी थीं। शंखधर ने कहा-आप तो सब मुझी को दिये जाते हैं, अपने लिए कुछ रखा ही नहीं। चक्रधर-मैं तो बेटा, रोटियों के सिवा और कुछ नहीं खाता । मेरी पाचनशक्ति अच्छी नहीं है । दिन में एक बार खा लिया करता हूँ। शंखधर-अगर आप न खायेंगे, तो मैं भी न खाऊंगा। आखिर शंखधर के आग्रह से चक्रधर को अपना सोलह वर्षों का पाला हुआ नियम तोड़ना पड़ा । उन्होंने झुझलाकर कहा-भाई, तुम बड़े जिद्दी मालूम होते हो । अच्छा, लो, मैं भी खाता हूँ। उन्होंने सब चीजों में से जरा-जरा सा निकालकर अपनी पत्तल में रख लिया और बाकी चीजें शंखधर के आगे रख दी। शंखधर-आपने तो केवल उलाहना छुड़ाया है। लाइए मैं परस हूँ। चक्रधर-अगर तुम इस तरह जिद करोगे, तो मैं तुम्हारी दवा न करूंगा। शंखधर-मुझे क्या, न दवा दीजिएगा । तो यहीं पड़ा-पड़ा मर जाऊँगा । कौन कोई रोने वाला वैठा हुआ है ? यह कहते-कहते शंखधर की आँखें सजल हो गई । चक्रधर ने विकल होकर कहा- अच्छा लाओ, तुम्हीं अपने हाथ से दे दो । अपशब्द क्यों मुंह से निका- लते हो? शंखधर ने सभी चीजों में से आधी से अधिक उनके सामने रख दी, और आप एक पंखा लेकर उन्हें झलने लगा । चक्रधर ने वात्सल्यपूर्ण कठोरता से कहा-मालूम होता है, आज तुम मुझे बीमार करोगे । भला, इतनी चीजें मैं खा सकूँगा? शंखधर-इसीलिए तो मैंने थोड़ी-थोड़ी दी हैं। ११४ चघर--पह पोड़ी-थोड़ी हैं । तो क्या तुम सब को मन मेरे ही पट स देना चाहते हो ? अब भी कटोगे या नहीं? महो पसे की जरूरत नहीं । मायधर---आप खाईये, मैं तो आपकी जूठन पाऊंगा। उसकी आंखें फिर सजल हो गयी। पक्रधर ने तिरस्कार के भाव से कहा- क्यों भाई, मेरी जूठन क्यो पायोगे ? अब तो सब बातें तुम्हारे ही मन को हो शखधर-मेरी बहुत दिनों से यही आकाक्षा थी। जव से आपकी कोति सुनी, तभी से यह अवसर पोज रहा था। चक्रधर को फिर हार माननी पड़ी। वह एकान्तवासी, सयमी, प्रतधारी योगी मान इस अपरिचित दोन बालक के दुराग्रहो को किसी भाति न टाल सकता था। घनधर जब भोजन करके उठ गये, तो उसने उसी पत्तल में अग्नी पत्तल की चीजें डाल ली और भोजन करने वैटा । ओह ! इस भोजन में कितना स्वाद था! क्या मुधा में इतना स्वाद हो सकता है ! चमघर हाथ-मुंह धोकर गद्गद् कण्ठ से बोले-तुमने जान मेरे दो नियन भग कर दिये । विना जाने से किसी को मेहमान बना लेने का यही फल होता है । मैं ऐसे जिद्दी लड़के को अपने साथ और न रपूगा। तुम्हारा घर कहाँ है ? यहाँ से कितनी दूर है ? शयधर-मेरे तो कोई पर ही नहीं। धधर--माता पिता तो होगे? यह किस गांव में रहते हैं ? शयधर-यह मुझे कुछ नहीं मालुम । पिताजी तो मेरे बचपन ही में घर से चले गये पे और माता जी का पांच साल से मुझे कोई समाचार नहीं मिला। चक्रधर को ऐसा मालूम हुआ, मानो पृथ्वी नीचे खिसकी जा रही है, मानो यह जल मे बहे जा रहे है । पिता वचरन ही मे घर से चले गये और माताजी का पाच साल से कुछ समाचार नहीं मिला ? भगवान, क्या यह यही नन्हा मा बालम है जिग अपने हृदय से निकालने की चेष्टा करते हुए आज 16 वर्षों से अधिक हो गये। उन्होने हृदय को संभालते हुए पूछा-तुम पांच साल तक कहा रहे बेटा, जो घर नही गये? अपयर-पिताजी को योजने निरूला पा और जब तक वह न मिलेंगे, लौटकर पर न बाळगा। चकार को ऐमा मालूम हुभा, मानो पृथ्यो उगमगा रही है, मानो ममस्त ब्रह्माण्ड एकप्रामारी रात मे आन्दोलित हो रहा है। यह मापवान के स्तम्भ के सहारे बैठ गई और ऐसे स्वर में बोत, को जाता और भय के वेगो थी। को दबाने के कारण क्षीण हो गया था। यह प्रश्न न था वल्कि एक जानी हुई वात का समर्थन मात्र या । तुम्हारा नाम क्या है बेटा ? वह घड़कते हुए हृदय से उत्तर की भोर कान लगाये थे, जैसे कोई अपराधी अपना कर्मदण्ड सुनन के लिए न्यायाधीश की ओर कान लगाये खड़ा हो। शंखधर ने जवाब दिया-मेरा नाम तो शंखधर सिंह है। चक्रधर-और तुम्हारे पिता का क्या नाम है ? शंखधर-उन्हें मुंशी चक्रधरसिंह कहते हैं। चक्रधर-घर कहां है ? शंखधर-जगदीशपुर! सर्वनाश ! चक्रधर को ऐसा ज्ञात हुआ कि उनकी देह से प्राण निकल गये हैं, मानो उनके चारों ओर शून्य है । 'शंखधर !' बस, यही एक शब्द उन प्रशस्त शून्य में किसी पक्षी की भांति चक्कर लगा रहा था । 'शंखधर !' वहीं एक स्मृति थी, जो उस प्राण-शून्य दशा में चेतना को संस्कारों में बांधे हुए शंखधर को अपने पिता के साथ रहते एक महीना हो गया। न वह जाने का नाम लेता है, न चक्रवर ही जाने को कहते हैं। शंखधर इतना प्रसन्न चित्त रहता है मानो अब उसके लिए संसार में कोई दुःख, कोई वाधा नहीं है। इतने ही दिनों में उसका रंग-रूप कुछ और हो गया है। मुख पर यौवन का तेज झलकने लगा और जीर्ण शरीर भर आया है। मालूम होता है, कोई अखण्ड ब्रह्मचर्य व्रतधारी ऋषिकुमार है। चक्रवर को अपने हाथों कोई काम नहीं करना पड़ता। शंखधर कभी उन्हें अपनी धोती भी नहीं छांटने देता। दोनों प्राणियों के जीवन का वह समय सबसे आनन्दमय होता है, जब एक प्रश्न करता है और दूसरा उत्तर देता है। वावाजी अपने जीवन के सारे अनुभव, दर्शन, धर्म, इतिहास की सारी बातें घोलकर पिला देना चाहते हैं। दूसरों से उसकी सज्जनता और सहनशीलता का वखान सुनकर उन्हें कितना गर्व होता है ! वह मारे जानन्द से गद्गद हो जाते हैं, उनकी आंखें सजल हो जाती हैं । सब जगह यह बात खुल गयी है कि यह युवक उनका पुत्र है। दोनों सूरतें इतनी मिलती हैं कि चक्रधर के इन्कार करने पर भी किसी को विश्वास नहीं माता । जो वात सब जानते हैं, उसे वह स्वयं नहीं जानते और न जानना ही चाहते हैं। शंखधर को कभी-कभी प्रबल इच्छा होती थी कि पिताजी के चरणों पर गिर पडू और साफ-साफ कह दूं। उसी के मन में यह इच्छा नहीं थी। चक्रधर भी कमी-कभी पुत्र-प्रेम से विकल हो जाते और चाहते कि उसे गले लगाकर कहूँ-बेटा, तुम मेरी ही आंखों के तारे हो; तुम मेरे ही जिगर के टुकड़े हो । वह शंखधर के मुख से उसकी माता की विरह-व्यया, दादी के शोक और दादा मनोरमा-७ - - के क्रोध की कथाए मुनते कभी न थकते थे। रानी जी उममे कितना प्रेम फरती थी, यह चर्चा मुनकर चार बहुत दुपी हो जाते थे। इस तरह एक महीना गुजर गया और अब शवधर को यह फिफ हुई कि इन्हे किस बहाने से पर ले चलू । महा, कैसे आनन्द का समय होगा, जब में उनके साथ पर पहुँचूंगा। लेकिन बहुत सोचने पर भी उसे कोई वहाना न मिला । तब उसने निश्चय किया कि माता जी को पत्र लिपार यही क्यों न बुला लूं? माता जी पत्र पाते ही सिर के बल दौड़ी बायेंगी । वह पछताया कि मैंने व्यपं ही इतनी देर लगायी । उमी रात को उसने अपनी माता के नाम पर डाल दिया। वहां का पता-ठिकाना, रेल का स्टेशन सभी याते स्पष्ट करके लिए दी! एक महीना पूरा गुजर गया और न अहल्या ही आयो, न कोई दूसरा ही। संपधर दिन-भर उसकी बाट जोहता रहता। रेल का स्टंशन वहां से पांच मोल पर था। रास्ता भी साफ था। फिर भी कोई नही जाया। चक्रधर जब कही चले जाते, तो यह चुपके से स्टेशन की राह लेता और निराम लोट आता। आपिर एक महीने के बाद तीसरे दिन उसे एक पत्र मिला, जिमे पढ़कर उसके शोक की सीमा न रही । अहल्या ने लिया या-मैं बडो अभागिनी हूँ। तुम इतनी कठिन तपस्या करके जिम देवता के दर्शन कर पाये, उनके दर्शन करने की परम अभिलाषा होने पर भी मैं हिल नहीं सकती। एक महीना से वीमार हूँ, जीने की आशा नहीं। अगर तुम आ जाओ, तो तुम्हे देख लू, नही तो यह अभिलाया भी माय जायगी । मैं कई महीने हुए, नागरे में पड़ी हूँ। जी घबराया करता है। अगर किसी तरह स्वामीजी को ला सको, तो अन्त समय उनके चरणो के दर्शन भी फर लू। मैं जानती हूँ, वह न आयेगे। व्यर्थ ही उनसे आग्रह न करना; मगर तुम आने में एक क्षण का भी विलम्ब न करना । शयपर डाापाने के सामने गडा देर तक रोता रहा। उसका मुख उतरा हुआ देखकर चक्रधर ने पूछा- यो वेटा, बाज दास क्यों मालूम होते हो? मायधर-माता जी का पत्र आया है, वह बहुत बीमार है। मैं पिता जी को ग्रोजने निकला या। वह तो न मिले, माताजी भी चली जा रही है। आपके पास बड़ी-बडी आशाएं लेकर आया या; पर बापने भी अनाप पर दया न को। आपको परमात्मा ने योगरल दिया है, आप चाहते, तो पिताजी की टोह नगा देने। चक्रपर ने गम्भीर स्वर में कहा- बेटा, में योगी नही , पर तुम्हारे पिताजी की टोह नगा चुका हूँ, उनसे मिल भी चुका हूँ। यह गुप्त रीति ने तुम्हे देश भी चुके हैं। गयघर-बापने पिताजी से भेंट की और मुझसे पूछन । ".

. - यह प्रकट होता है कि आपको मुझ पर दया नहीं आती। चक्रधर ने कुछ जवाब न दिया । वह अत्यन्त कठिन परीक्षा में पड़े हुए थे । वहुत दिनों के बाद, अनायास ही उन्हें पुत्र का मुख देखने का सौभाग्य प्राप्त हो गया था। वे सारी भावनाएं, जिन्हें वह दिल से निकाल चुके थे, जाग उठी और इस समय वियोग के भय से आर्तनाद कर रही थीं। वह मोह- वन्धन, उसे वे बड़ी मुश्किल से ढीला कर पाये थे, अब उन्हें शतगुण वेग से अपनी ओर खींच रहा था। सहसा शंखधर ने अवरुद्ध कण्ठ से कहा-तो मैं निराश हो जाऊँ ? ' चक्रधर ने हृदय से निकलते उच्छ्वास को दवाते हुए कहा-नहीं वेटा, सम्भव है, कभी वह स्वयं पुत्र-प्रेम से विकल होकर तुम्हारे पास दौड़ जायें । अगर तुम अपने जीवन में ऊँचे आदर्श का पालन कर सके, तो तुम उन्हें अवश्य खींच लोगे। शंखधर-आपके दर्शन मुझे फिर कब होंगे? आपका पता कैसे मिलेगा? मैंने आपको पिता-तुल्य ही समझा है और जीवन-पर्यन्त समझता रहूँगा। इन चरण-कमलों की भक्ति मेरे मन में सदैव बनी रहेगी। आपके दर्शनों के लिए मेरी आत्मा सदैव विकल रहेगी और माताजी के स्वस्थ होते ही मैं फिर आपकी सेवा में आ जाऊँगा। चक्रधर ने आर्द्र कंठ से कहा-नहीं बेटा, तुम यह कष्ट न करना । मैं स्वयं कभी-कभी तुम्हारे पास आया करूंगा। मैंने भी तुमको पुत्र-तुल्य समझा है और सदैव समझता रहूँगा। मेरा आशीर्वाद सदैव तुम्हारे साथ रहेगा। संध्या समय शंखधर अपने पिता से विदा होकर चला। चक्रधर को ऐसा मालूम हो रहा था मानो उनका हृदय वक्षस्थल को तोड़कर शंखधर के साथ चला जा रहा है । जब वह आंखों से ओझल हो गया, उन्होंने एक लम्बी सांस ली और बालकों की भांति विलख-विलखकर रोने लगे। उन्हें ऐसी भावना हुई कि फिर उस प्रतिभा सम्पन्न युवक के दर्शन न होंगे! २३ प्रभागिन अहल्या के लिए संसार सूना हो गया। पति को पहले ही खो चुकी थी। जीवन का एक मात्र आधार पुत्र रह गया था। उसे भी खो बैठी। अव वह किसका मुंह देखकर जियेगी ? वह राज्य उसके लिए किसी ऋषि का अभिशाप हो गया। अहल्या को अब वह राज-भवन फाड़े खाता था। वह अब उसे छोड़कर कहीं चली जाना चाहती थी। कोई सड़ा-गला झोंपड़ा, किसी वृक्ष की छांह, - पर्वत को गुफा, किसी नदी का तट उसके लिए इस भवन से सहस्रों गुना अन्न पा। वे दिन कितने अन्द थे, जब वह अपने स्वामी के साथ पुष को हृदय सगाचे एक छोटे से मकान में रहती थी। रह-रहकर उसको अपनी मोग-लिप्सा पर क्रोध आता था, जिसने उसका सर्वनाश कर दिया था। क्या उस पाप का कोई प्रायश्चित नहीं है? क्या इस जीवन में स्वामी के दर्शन होगे ? अपने प्रिय पुत्र की मोहिनी मूर्ति फिर वह न देय मकेगी? कोई ऐसी युक्ति नहीं है ? राज-मवन अब भूतो का डेरा हो गया है । उसका अब कोई स्वामी नहीं रहा । राजा साहब अब महीनो नहीं बाते । वह अधिकतर इलाके ही में घूमते रहते हैं । उनके अत्याचार को कथायें सुनकर लोगों के रोयें घड़े हो जाते हैं। सारी रियासत मे हाहाकार मचा हुआ है । कही किमी गांव में आग लगायो जाती है, किसी गांव में कुएँ प्रप्ट किये जाते हैं। राजा साहब को किसी पर दया नहीं आती। उनके सारे सद्भाव शषधर के साथ चले गये। विधाता ने अकारण ही उन पर इतना कठोर आपात किया है । वह उस बाघात का बदला दूसरो से ले रहे हैं। अव राजा साहन के पास जाने का किसी को साहस नही होता। मनोरमा को देखकर तो वह जामे से बाहर हो जाते हैं । अहल्या भी उनसे कुछ कहते हुए पर-पर कापती है । अपने प्यारों को योजने के लिए वह तरह-तरह के मनमूवे बांधा करती है लेकिन कहे किससे? उसे ऐसा विदित होता है कि ईश्वर ने उसकी भोग लिप्सा का यह दम दिया है। यदि वह अपने पति के पर जाकर प्रायश्चित करे, तो कदाचित ईश्वर उसका अपराध क्षमा कर दें ! लेकिन हाय हृदय ! इम घोर विपत्ति में भी मान का भूत सिर से नहीं उतरता। जाना तो चाहती है। लेकिन उसके साप यह पतं है कि कोई बुलाये अगर राजा साहब मुंशीजी से इस विषय में कुछ संकेत कर दें, तो उसके लिए अवश्य बुतावा या बाय, पर राजा साहब से तो भेंट ही नहीं होती और भेंट भी होती है. तो कुछ माहने की हिम्मत नहीं पड़ती। इसमे सन्देह नहीं कि वह अपने मन की बात मनोरमा से कह देती, तो बहुत आसानी से काम निकल जाता; लेकिन अहल्या का मन मनोरमा सेन पहले कभी मिला था, न अब मिलता था। उससे यह बात कसे कहती? एक दिन अहल्या का चित्त इतना उद्विग्न हुआ कि वह संकोच और मिस छोड़कर मनोरमा के पास बैठी। मनोरमा के सामने प्राी के रूप में आते हुए उमे जितनी मानसिक वेदना हुई, उसका अनुमान इमो से किया जा सकता है कि सपने कमरे से यहां तक बाने में उसे कम-मे-कम दो पण्टे लगे। कितनी ही वार द्वार तक नाकर लोट गयो । जिमकी मदेव अवहेलना की, उसके सामने जब अपनी गरज लेकर जाने में उसे लग्जा आतो थो; से रे मानव ":

भगवान ने ही उसका गर्व तोड़ दिया था, तो अव झूठी ऐंठ से क्या हो सकता था। अहल्या ने कहा-मैं प्रायश्चित करना चाहती हूं। और आपसे उसके लिए सहायता मांगने भायी हूँ। मुझे अनुभव हो रहा है कि यह सारी विडम्बना मेरे बिलास-प्रेम का फल है और मैं इसका प्रायश्चित करना चाहती हूँ। मेरा मन कहता है कि यहां से निकलकर मैं अपना मनोरथ पा जाऊँगी। यह सारा दण्ड मेरी विलासान्यता का है। आप जाकर अम्माँजी से कह दीजिए, मुझे बुला लें । इस घर में आकर मैं अपना सुख खो गैठी और इस घर से निकल कर ही उसे पाऊँगी।. उसने कहा-~अच्छा, महल्या, मैं आज ही जाती हूं इसके चौथे दिन मुशी वज्रधर ने राजा साहब के पास रुखसती का संदेशा भेजा । राजा साहब इलाके पर थे । सन्देशा पाते ही जगदीशपुर आये । अहल्या का कलेजा धक-धक करने लगा कि राजा साहब कहीं आ न जायं। इधर-उधर छिपती फिरती थी कि उनका सामना न हो जाय । उसे मालूम होता था कि राजा साहब ने रुखसती मंजूर कर ली है; पर अव जाने के लिए वह बहुत उत्सुक न थी । यहाँ से जाना तो चाहती थी; पर जाते दुःख होता था। वह इसी घर को अपना घर समझने लगी थी। ससुराल उसके लिए विरानी जगह थी। कहीं निर्मला ने कोई बात कह दी, तो वह क्या करेगी? जिस घर से मान करके निकली थी, वहीं अब विवश होकर जाना पड़ रहा था। इन बातों को सोचते-सोचते आखिर उसका दिल इतना धवराया कि वह राजा साहब के पास जाकर बोली- आप मुझे क्यों विदा करते हैं ? मैं नहीं जाती। राजा साहब ने हँसकर कहा--कोई लड़की ऐसी भी है, जो खुशी से ससु- राल जाती हो? और कौन पिता ऐसा है, जो लड़की को खुशी से विदा करता हो ? मैं कब चाहता हूँ कि तुम जाओ; लेकिन मुशी वज्रधर की आज्ञा है, और यह मुझे शिरोधार्य करनी पड़ेगी। वह लड़के के वाप है, मैं लड़की मेरी और उनकी क्या बरावरी ? और वेटी, मेरे दिल में भी अरमान हैं, उसके पूरा करने का और कौन अवसर आएगा? शंखधर होता, तो उसके विवाह में वह मरमान पूरा होता। अब वह तुम्हारे गोने में पूरा होगा। अहल्या इसका क्या जवाब देती? दूसरे दिन से राजा साहब ने विदाई की तैयारियाँ करनी शुरू कर दी। सारे इलाके के सोनार पकड़ बुलाये गये और गहने बनने लगे । इलाके ही के दर्जी कपड़े सीने लगे। हलवाइयों के कढ़ाह चढ़ गये और पकवान बनने लगे। घर की सफाई और रंगाई होने लगी। राजाओं, रईसों और अफसरों को निमन्त्रण भेजे जाने लगे । सारे शहर की वेश्याओं को बयाने दे दिये गये। बिजली की रोशनी का इन्तजाम होने लगा । अहल्या यह सामान देख-देख कर .१२० . का वाप दिल में झुसलाती और शर्माती थी। सोचती-कहा-से-कहाँ मैंने यह विपत्ति मोल ले ली ? अब इस बुढ़ापे में मेरा गौना? मैं मरने की राह देख रही हूं. यहाँ गोने की तैयारी हो रही है । राजा विशालसिंह ने जिस हौसले से अहल्या का गोना किया, वह राजाओं रईसी में भी बहुत कम देखने में आता है । तहसीलदार माहब के घर में इतनी चीजों को रखने की जगह भी न थी। वर्तन, कपड़े, शोगे के समान, लकड़ी की बलभ्य वरतुएँ, मेवे, मिठाईयां, गायें, भैसे--- इनका हफ्तों तक ताता लगा रहा । दो हाथी और पांच घोड़े भी मिले, जिनके बाधने के लिए पर मे जगह न पी। पांच लोडिया अहल्या के साथ आपी । यद्यपि तहसीलदार साहब ने नया मकान बनवाया था, पर वह क्या जानते थे कि एक दिन यहाँ रियासत जगदीशपुर की आधी सम्पत्ति आ पहुंचेगी ? घर का कोना-कोना सामानों से भरा हुआ था। कई पडोसियो के मकान भी अँठ उठे। उस पर लाखों रुपये नगद मिले वह अलग । तहसीलदार साहब लाने को तो सब क लाये, पर उन्हें देश- देव रोते और कुढ़ते थे। कोई भोगने वाला नहीं ! दिन में बीसों ही बार चक्रधर पर बिगडते-नालायक ! आप तो आप गया अपने साथ लड़के को भी ले गया । न जाने कहाँ मारा-मारा फिरता होगा, देश का उपकार करने चला है ! सच कहा है पर की रोयें, बन की मोयें । पर के बादमी मरें, परवाह नही ; दूसरे के लिए जान देने को तैयार । अब बताओ, इन हाथी, घोड़े, मोटरो और गाडियो को लेकर क्या करूं? यफेले किस-किस पर बैठू ? बहू है, उसे रोने से फुरसत नहीं। बच्ची की मां है, उनसे अब मारे शोक के उठा नहीं जाता , कौन बैठे। यह सामान तो मेरे जी का जंजाल हो गया है। अहल्या यही जाकर और भी पछताने लगी। वह रनिवास के विलासमय जीवन से विरक्त होकर यहाँ प्रायश्चित करने के इरादे से आची घी , पर वह विपत्ति उसके साथ यहाँ भी आयी। सम्मति से गला छुड़ाना चाहती पो, पर सम्पत्ति उससे और चिमट गयी थी। वह वहाँ कुछ देर शान्ति से बैठ मनाती थी, कुछ देर हँस-बोलकर जी बहला लेती पो । किसी के ताने-मेहने न सुनने पड़ते थे, यहाँ निर्मला वाणों से छेदती और घाव पर नमक छियती रहती थी। बहू के कारण वह पुत्र से वचिर हुई । बहू के ही कारण पोता भी हाप से गया ऐसी बहू को वह पान-फूल से पूज न सकती पो। सम्पत्ति लेकर यह क्या करे। चाटे ? भोजन वह अब भी अपने हापो ही पकाती थी। अहल्या पे. साप बो महाराचिन आयी थी, उनका पकाया हुआ भोजन यह ग्रहण न कर सकती थी, अहल्या से भी वह छूत मानती पो। इन दिनो मगला. आपो हुई उसका जी चाहता था कि यहां की मर चीजें समेट ले। अपनी चीजो को तीन-तेरह न होने देना चाहती थी। . १."

ले; ह शन अनुभव कभी खटपट हो जाती थी। तरह कई महीने गुजर गये ; अहला का आशा-दीपक दिन-दिन मन्द गया। वह कितना ही चाहती थी कि मोह-बन्धन से अपने को छुड़ा 1 पर कोई वंश न चलता था। उसके मन में बैठा हुआ कोई नित्य कहा था~जव तक मोह में पड़ी रहोगी, पति-पुत्र के दर्शन न होंगे । पर स कौन दिला सकता था कि मोह टूटते ही उसके मनोरथ पूरे हो जायेंगे। क्या वह भिखारिणी होकर जीवन व्यतीत करेगी ? सम्पत्ति के हाथ से ल जाने पर फिर उसके लिए कौन आश्रय रह जायेगा? बहल्या वार-बार व्रत करती कि अब अपने सारे काम अपने हाथ से गी, अब सदा एक ही जून भोजन किया करूंगी, मोटा-से-मोटा अन्न खाकर वन व्यतीत करूंगी, लेकिन उसमें किसी व्रत पर स्थिर रहने की शक्ति न गयी थी । विलासिता ने उसकी क्रिया-शक्ति को निर्वल कर दिया था। यहां रहकर वह अपने उद्धार के लिए कुछ न कर सकेगी, यह बात शन- से सिद्ध हो गयी। अव उसे वागीश्वरी की याद आयी । सुख के दिन वहीं थे, जो उसके साथ कटे । असली मैका न होने पर भी जीवन का जो सुख वहाँ मिला, वह फिर न नसीब हुमा । वह स्नेह, सुख स्वप्न हो गया। सास मिली वह इस तरह की, ननद मिली वह इस ढग की , मां थी ही नहीं, केवल वाप को पाया; मगर उसके बदले में क्या-क्या देना पड़ा। अव अहल्या को रात दिन यही धुन रहने लगी कि किसी तरह वागीश्वरी के पास चलू. मानों वहां उसके सारे दुःख दूर हो जायेंगे। आखिर एक दिन अहल्या ने सास से यह चर्चा कर ही दी । निर्मला ने कुछ भी आपत्ति नहीं की। शायद वह खुश हुई कि किसी तरह यह यहां से टले मगला तो उसके जाने का प्रस्ताव सुनकर हपित हो उठी। जब वह चल जाएगी, तो घर में मंगला का राज हो जाएगा। जो चीज चाहेगी, उठा जाएगी। कोई हाथ पकड़ने वाला या टोकने वाला न रहेगा। दूसरे दिन अहल्या वहां से चली। अपने साथ कोई साज-सामान लिया। साथ की लौंड़ियाँ चलने को तैयार थीं; पर उसने किसी को साक्ष लिया। केवल एक बुड्डे कहार को पहुँचाने के लिए ले लिया। और उसे मागरे पहुँचने के दूसरे ही दिन विदा कर दिया। आज 20 साल के बाद अहल्या ने इस घर में फिर प्रवेश किया था आह ! इस घर की दशा ही कुछ और थी, सारा घर गिर पड़ा था। न का पता था, न वैठक का। चारों और मलवे का ढेर जमा हो रहा था पर मदार और धतूर के पौधे उगे हुए थे । एक छोटी-सी कोठरी वच रहे वागीश्वरी उसी में रहती थी। उसकी सूरत भी उस घर के समान ही १२२ गयो यो । न मुह मे दांत, न ओपो में ज्योति ; सिर के बाल सन हो गये थे कमर झुककर कमान हो गयी थी। दोनो गले मिलकर सूब रोयो । जब बांसुओं का वेग कुछ कम हुआ , तो वागीश्वरी ने कहा-बेटो, तुम अपने माप कुछ सामान नहीं लायी क्या? दूसरी ही गाड़ी से लौट जाने का विचार है ? इतने दिनों के बाद बायो भी, तो इस तरह ! बुढ़िया को बिल्कुल भूल ही गयी। पडहर में तुम्हारा जी क्यों लगेगा? अहल्या-अम्मा, महल में रहते-रहते जी जब गया, अब कुछ दिन इस संडहर में ही रहेंगी और तुम्हारी सेवा करूंगी ! जब से तुम्हारे घर से गयी, दुय-ही-दुःख पाया, मानन्द के दिन तो इसी पर में चीते हैं। वागीश्वरी-सड़के का अभी कुछ पता न चला? अहल्या- किसी का पता नहीं चला, अम्मा ! मैं राज्य-सुख पर लटू हो गयी थी। उसी का दण्ड भोग रही हूँ ! राज्य-सुप भोगकर ठो जो कुछ मिलता है वह देव चुकी ; अब उसे छोड़ कर देयूगी कि क्या जाता है ; मगर तुम्हें वो बड़ा कष्ट हो रहा है, अम्म ? वागीश्वरी-कैसा फष्ट, बेटी ! जब तक स्वामी जीते रहे, उनकी सेवा करने में सुख मानती थी। तीयं, अत, पुण्य, धर्म सर कुछ उनकी सेवा ही में पा । अब यह नहीं हैं तो उनकी मर्यादा की सेवा कर रही हूँ। आज भी उनके कितने ही भक्त मेरी मदद करने को तैयार हैं, लेकिन क्यों किसी की मदद ? तुम्हारे दादाजी सदैव दूसरों की सेवा करते रहे। इसी में अपनी उम्र काट दी। तो फिर मैं किस मुह से सहायता के लिए हाप फैलाऊँ ? यह कहते-कहते वृद्धा का मुखमण्डल गवं मे चमक उठा। उसकी आँखो में एक विचित्र स्फूति पलकने लगी ! महल्पा का सिर लज्जा से झुक गया । माता तुझे धन्य है। तू वास्तव में सती है, तू अपने ऊपर जितना गर्व करे, वह योडा वागीश्वरी ने फिर कहा-स्वाजा महमूद ने बहुत चाहा कि मैं कुछ महीना ले लिया करूं। मेरे मैकेवाले कई बार मुझे बुलाने आये। यह भी कहा कि महीने में कुछ ले लिया करो। भैया बड़े भारी वकील हैं, लेकिन मैंने किसी का एहसान नहीं लिया। पति की कमाई को छोड़कर बार किसी की कमाई पर श्री का अधिकार नही होता। चाहे कोई मह से न कहे, पर मन मे जरूर समझेगा ती रही। है। जो जाता. ...ना.ne'. In सी हूँ' उन्होंने किसी बुरे काम में तो धन नही उडाया ! जो कुछ किया, दुसरो के उपर हो के लिए किया। यहां तक कि अपने प्राण भी दे दिये । फिर में क्यों मार" १२३ रोक ! यश सेंत में थोड़े ही मिलती है; न. । चलो, हाथ-मुँह धो डालो, कुछ खा पी लो, तो फिर बात कर । किन अहल्या हाय-मुंह धोने न उठी। वागीश्वरी की आदर्श पतिभक्ति उनकी आत्मा उसका तिरस्कार कर रही थी। अभागिनी! इसे पति- कहते हैं। सारे कष्ट झेलकर वानी की नादा का पालन कर रही है। ले बुलाते हैं और नहीं जाती, हालांकि इस दशा में मैके चली जाती, तो बुरा न कहता। सारे कष्ट झेलती है और खुशी से झेलती है। एक तु है की सम्पत्ति देखकर फूल उठी, बन्धी हो गयी । राजकुमारी और पीछे चल- राजमाता बनने की धुन में तुझे पति की परवा ही न रही । तुने उन्नत्ति के नं पति को कुछ न समझा, उसकी अवहेलना की। वह तुझे अपने साथ ले ा चाहते थे, तू न गवी, राज्य-सुख तुझ न छोड़ा गया ! रो, अपने जनों वागीश्वरी ने फिर कहा-अभी तक तू वैवी ही है। हां, लोडी पानी नहीं यी न, कैसे उठेगी । ले, मैं पानी लाये देती हूँ, हाय नह धो डाल । नद तक तेरे लिए गरम रोटियां सेंकती हूँ ! देखू, तुझे अब भी भाती हैं कि नहीं। तू नरी रोटियों का बहुत बखान करके खाती यो । बहल्या ये स्नेह में सने गन्द सुनकर पुलकित हो उठी। इस 'तू' में जो सुख था; वह 'आप' और 'सरकार में कहाँ । वचपन के दिन बांवों में फिर गये । एक क्षण के लिए उसे अपने सारे दुःख विन्नृत हो गये। बोली-अभी तो भूख-प्यात नहीं है अम्मांजी, वैठिए कुछ बातें कीजिए। मैं आप ले दुःव की कथा कहने के लिए व्याकुल हो रही हूँ । बताइए, नेरा उद्धार कैने होगा? वागीश्वरी ने गम्भीर भाव से कहा-पति-प्रेन से वंचित होकर स्त्री के उद्धार का कोन उपाय है, वेटी ! पति ही स्त्री का सर्वस्व है। जिनने अपना सर्वस्व खो दिया, उसे सुख कैसे मिलेगा? जिसको लेकर तूने पति को त्याग दिया, उसको त्यागकर ही पति को पायेगी। जब तक धन और राज्य का नोह न छोड़ेगी, तुझे उन त्यागी पुरुष के दर्शन न होंगे। अहल्या--अन्मांजी, सत्य कहती हूँ. मैं केवल शंखधर के हिन्द का विचार करके उनके साथ न गयी। वागीश्वरी-उस विचार में क्या तेरी भोग-लालसा न छिपी थी? खूब ध्यान करके सोत्र ! तू इससे इन्कार नहीं कर सकती? अहल्या ने लज्जित होकर कहा-हो सकता है, अन्नांजी, ने इन्कार ना कर सकती। वागीश्वरी-सन्मत्ति यहां भी तेरा पीछा करनी, देख लेना? जो उस भागता है, उसके पीछे दौड़ती है । मुझे शंका होती है कि कहीं तू फिर में न पड़ जाय । एक बार चूकी, तो 14 वर्ष रोना पड़ा, अबक्री की १२४ - बाकी उम्र रोते ही गुजर जाएगी। अहल्या के आने की खबर पाकर मुहल्ले की सैकड़ो औरतें टूट पड़ी। शहर के कई बड़े परों को स्त्रिया भी आ पहुंची। शाम तक ताता लगा रहा। कुछ लोग डेपुटेशन बनाकर सस्थाओ के लिए चन्दे मांगने आ पहुंचे। यहल्या को इन लोगों से जान बचानी मुस्किल हो गयी । किस-किस से अपनी विपत्ति कहे ? अपनी गरज के वावले अपनी कहने मे मस्त रहते हैं, वह किसी की सुनते ही कब हैं ? इस वक्त अहल्या को फटे-हालो यहाँ बाने पर वडी लज्जा आयी। वह जानती कि यहा यह हग्योग मच जायगा तो साथ दस-बीस हजार के नोट नेती आती। उसे अब इस टूटे-फूटे मकान में ठहरते भी लज्जा आती थी। जब से देश ने जाना कि वह राजकुमारी है, तब से वह कही बाहर न गयी थी। कभी काशी रहना हुआ कभी जगदीशपुर । दूसरे शहर में आने का उसे यह पहला ही अवसर था । अब उसे मालून हुआ कि धन केवल भोग की वस्तु नहीं है, उससे यश और कीति भी मिलती है। भोग से तो उसे घृणा हो गयी थी, लेकिन यश का स्वाद उसे पहली ही वार मिला। शाम तक उसने 15-20 हजार के चंदे लिख दिये और मुगी वचघर को रुपये भेजने के लिए पत्र भी लिख दिया। खत पहुंचने की देर थी । रुपये आ गये । फिर तो उसके द्वार पर भिक्ष ओ का जमघट रहने लगा। लगडों-अधों से लेकर जोडी और मोटर पर बैठने वाले भिक्षुक भिक्षा-दान मांगने आने लगे। कही से किसी अनाथालय के निरीक्षण करने का निमत्रण आता, कहीं से टी-पार्टी में सम्मिलित होने का। कुमारी-सभा, वालिका विद्यालय, महिला क्लव आदि सस्थाओं ने उसे मान-पत्र दिये, और उसने ऐसे सुन्दर उत्तर दिये कि उसकी योग्यता और विचार-शीलता का सिक्का बैठ गया । 'आये ये हरिभजन को ओटन लगे कपास' वाली कहा- वत हुई । तपस्या करने आयी यो, यहाँ सभ्य समाज को क्रीडाओ में मग्न हो गयी। अपने अभीष्ट का ध्यान ही न रहा। अहल्या को अव रोज ही किसी न किसी जलसे में जाना पडता, और वह बड़े शौक से आती। दो ही सप्ताह में उसकी कायापलट-सी हो गयी। यश सालसा ने धन की उपेक्षा का भाव उसके दिल से निकाल दिया। वास्तव में वर. समारोही में अपनी मुसीबत्ते भूल गयी । अच्छे-अच्छे व्याख्यान तैयार करने में वह इतनी तत्पर रहने लगी, मानो उसे नशा हो गया है। वास्तव में यह नमा ही पा । यश लालसा से बढ़कर दूसरा नशा नहीं। वागीश्वरी पुराने विचारों की स्त्री थी। उसे बहल्या का यो घूम-घूमकर प्याख्यान देना और रुपये लुटाना अच्छा न लगता था। एक दिन उसने कह ही डाला-मयो री नहल्या, तू अपनी सम्पत्ति लुटा कर ही रहेगी? बहल्या ने गर्व से कहा-और धन है ही किस लिए, अम्माजी? धन में यही बुराई है कि इससे विलासिता बढ़ती है, लेकिन इसमे परोपकार करने की 34 . सामर्थ्य भी है। वागीश्वरी ने परोपकार के नाम से चिढ़कर कहा--तू जो कर रही है, यह परोपकार नहीं, यश-लालसा है। दूसरे दिन प्रातः काल डाकिया शंखधर का पत्र लेकर पहुंचा जो जगदीश- पुर और काशी से घूमता हुआ आया था । अहल्या पत्र पढ़ते ही उछल पड़ी और दौड़ी हुई वागीश्वरी के पास जाकर बोली-अम्मा, देखो, लल्लू का पत्र आ गया। दोनों जने एक ही जगह हैं। मुझे बुलाया है। वागीश्वरी-तो बस, अब तू चली ही जा। चल, मैं भी तेरे साथ चलूगी। अहल्या-आज पूरे पांच साल के बाद खबर मिली है, अम्मांजी ! मुझे आगरे आना फल गया। यह तुम्हारे आशीर्वाद का फल है, अम्मांजी। वागीश्वरी -मैं तो उस लड़के के जीवट को बखानती हूँ कि वाप का पता लगाकर ही छोड़ा। अहल्या-इस आनन्द में आज उत्सव मनाना चाहिए, अम्मांजी। वागीश्वरी-उत्सव पीछे मनाना, पहले वहां चलने की तैयारी करो। कहीं और चले गये, तो हाथ मलकर रह जाओगी। लेकिन सारा दिन गुजर गया और अहल्या ने यात्रा की तैयारी न की। वह अव यात्रा के लिए उत्सुक न मालूम होती थी। आनन्द का पहला आवेश समाप्त होते ही वह इस दुविधे में पड़ गयी थी कि वहां जाऊँ या न जाऊँ ? वहां जाना केवल दस पांच दिन या महीने के लिए जाना न था वरन् राजपाट से हाथ धो लेना और शंखधर के भविष्य को वलिदान करना था। वह जानती थी पितृभक्त शंखधर पिता को छोड़कर किसी भांति न आयेगा और मैं भी प्रेम के बन्धन में फंस जाऊँगा। उसने यही निश्चय किया कि शंखधर को किसी हीले से बुला लेना चाहिए । उसका मन कहता था कि शंखघर आ गया, तो स्वामी के दर्शन भी उसे अवश्य होंगे। इस वक्त वहां जाकर वह अपनी प्रेमा- कांक्षाओं की वेदी पर अपने पुत्र के जीवन को बलिदान न करेगी। जैसे इतने दिनों पति-वियोग में जली है, उसी तरह कुछ दिन और जलेगी। उसने मन में यह निश्चय करके शंखधर के पत्र का उत्तर दे दिया। लिखा-मैं बीमार वचने की कोई आशा नहीं; बस, एक बार तुम्हें देखने की अभिलाषा है। तुम आ जाओ, तो शायद जी उठू, लेकिन न आये तो समझ लो अम्मा मर गयीं। अहल्या को विश्वास था कि यह पत्र पढ़कर शंखधर दौड़ा चला आयेगा और स्वामी भी यदि उसके साथ न आयेंगे तो उसे आने से रोकेंगे भी नहीं। संध्या समय वागीश्वरी ने पूछा-क्या जाने का इरादा नहीं है ? अहल्या ने शर्माते हुए कहा--अभी तो अम्मांजी मैंने लल्लू को बुलाया है। अगर वह न आयेगा, तो चली जाऊंगी। १२६ F वागीश्वरी-लल्लू के सार क्या चकार भी ना जायंगे? तू ऐसा अवसर पाकर भी छोड़ देती है। न जाने तुझ पर क्या विपत्ति बाने वाली है ! अहल्या अपने बारे दुःख भूलकर शवधर के राज्याभिषेक को कलना में विभोर हो गयी। २४ राजा विशालसिंह को हिला-वृति किसी प्रकार शान्त न होती थी। ज्यों- ज्यों अपनी दशा पर उन्हें दुख होता पा, उनके अत्याचार और भी बढ़ते थे। : जरा भी स्थान न था। ।। इधर कुछ दिनो से या। उन्हें निस्सन्तान रयकर, मिली हुई सन्तान उनको गोद से छीनकर देव ने उनके साथ सबसे बड़ा अन्याय किया था। देव के शस्त्रालय में उनका दमन करने के लिए पही सबसे कठोर शरत्र था। इसे राजा साहब उनके हाथों से छोन लेना चाहते थे। उन्होने सातवा विवाह करने का निश्चय कर लिया था। राजाओं के लिए कन्याओं की क्या कमी? कई महीने से इस सातवें विवाह की तैयारियां बड़े जोरों से हो रही थीं। कई राजवैद्य रात-दिन बैठे भांति-भांति के रस बनाते रहते । पौष्टिक औषधियां चारों ओर से मंगायी जा रही थी । राजा साहब यह विवाह इतनी धूम-धाम से करना चाहते थे कि देवताओं के कलेजे पर सांप लौटने लगे। रानो मनोरमा ने इधर बहुत दिनों से घर या रियास्त के मामले में बोलना छोड़ दिया था। वह बोलती भी, तो सुनता कौन? राजा साहब को उसकी मूरत से घृणा हो गयी थी। मनोरमा के लिए अब वह पर नरकतुल्य था चुपचाप सारी विपत्ति सहती थी। उसे बडी इच्छा होती थी कि एक वार राजा साहब के पास जाकर पूर्ण, मुझसे क्या अपराध हुआ है; पर राजा साहब उसे इसका अवसर ही न देते थे। मनोरमा को आये दिन कोई-न-कोई अपमान सहना पड़ता था। उसका गर्व चूर करने के लिए रोज कोई-न-कोई पड्यन्त्र रचा जाता था। पर वह उद्दण्ड प्रकृतिवाली मनोरमा अव धयं और शान्ति का अथाह सागर है, जिसमे वायु के हलके हलके झोंके से कोई आन्दोलन नहीं होता । वह मुस्कराकर सव कुछ गिरोधार्य करती जाती है ! यह विकट मुस्कान उसका साथ कभी नहीं छोड़ती। नयी रानी साहब के लिए सुन्दर भवन वनवाया जा रहा था। उसकी सजावट के लिए एक बड़े आईने की जरूरत थी। हुक्म हुआ छोटी रानी के दीवानवाने का बड़ा आईना उतार लाओ । मनोरमा ने यह हुक्म सुना और मुस्करा दी। फिर कालोन की जरूरत पड़ी। फिर वही हुक्म हुआ-छोटी -- . . रानी के दीवानखाने से लाओ। मनोरमा ने मुस्कराकर सारी कालीने दे दी। इसके कुछ दिनों बाद हुक्म हुआ-छोटी रानी की मोटर नये भवन में लायी जाय । मनोरमा इस मोटर को बहुत पसन्द करती थी, उसे खुद चलाती थी। यह हुक्म सुना, तो मुस्करा दिया। मोटर चली गयी। मनोरमा के पास पहले वहुत-सी सेविकाएँ थीं। इधर घटते-घटते यह संख्या तीन तक पहुंच गयी थी। एक दिन हुक्म हुआ कि तीन सेविकाओं में से दो नये महल में नियुक्त की जाएँ । उसके एक सप्ताह बाद वह एक भी बुला ली गयी। इस हुक्म का मनोरमा ने मुस्कराकर स्वागत किया। मगर अभी सबसे कठोर आघात वाकी था। नयी रानी के लिए तो नया महल बन ही रहा था। उनकी माताजी के लिए एक दूसरे मकान की जरूरत पड़ी। इसलिए हुक्म हुआ कि छोटी रानी का महल खाली करा लिया जाय। रानी ने यह हुक्म सुना और मुस्करा दी । जिस हिस्से में पहले महरियां रहती थीं, उसी को उसने अपना निवास स्थान बना लिया। द्वार पर टाट के परदे लगवा दिये। यहाँ भी वह उतनी ही प्रसन्न थी, जितनी अपने महल में। रात अधिक बीत गयी थी। वाहर बारात की तैयारियां हो रही थीं। ऐसा शानदार जुलूस निकालने की आयोजना की जा रही थी, जैसा इस नगर में कभी न निकला हो। गोरी फौज थी, काली फौज थी, रियासत का फौजी-बैंड था, कोतल घोड़े, सजे हुए हाथी, फूलों से संवारी हुई सवारी गाड़ियाँ, सुन्दर पाल- कियां-इतनी जमा की गयी थीं कि शाम से घड़ी-रात तक उनका तांता ही न टूटे । बैंड से लेकर डफले और नृसिंहे तक सभी प्रकार के बाजे थे। सैकड़ों ही विमान सजाये गये थे और फुलवारियों की तो गिनती ही नहीं थी। सारी रात द्वार पर चहल-पहल रही और सारी रात राजा साहब सजावट का प्रवन्ध करने में व्यस्त रहे। सारे शहर में इस जुलूस और इस विवाह का उपहास हो रहा ण, नौकर- चाकर तक आपस में हँसी उड़ाते थे, राजा साहब की चुटकियां लेते थे, लेकिन अपनी धुन में मस्त राजा साहब को कुछ न सूझता था, कुछ न सुनायी देता था। चार बजते-बजते वारात निकली। जुलूस की लम्बाई दो मील से कम न थी । भांति-भांति के बाजे बज रहे थे, रुपये लुटाये जा रहे थे, पगपग पर फूलों की वर्षा की जा रही थी। सारा शहर तमाशा देखने को फटा पड़ता था। इसी समय अहल्या और शंखधर ने नगर में प्रवेश किया और राजभवन की और चले; किन्तु थोड़ी ही दूर गये थे कि बारात के जुलूस ने रास्ता रोक दिया । जव यह मालूम हुआ कि महाराज विशालसिंह की वारात है, तो शंखधर ने मोटर रोक दी और उस पर खड़े होकर अपना रूमाल हिलाते हुए जोर से बोले-~~-सव आदमी रुक जायें, कोई एक कदम भी आगे न बढ़े ! फौरन महाराज साहब को सूचना दो कि कुवर शंखधर आ रहे हैं। १२. ।

दम-के-दम में मारी वारात रुक गयी। कवर साहब आ गये !' पहार वायु के लोके को मांति इस सिरे से उस सिरे तक दौड़ गयी। जहाँ था वहीं पड़ा रह गया। फिर उनके दर्शन के लिए गोग दौड़-दौड़ कर जमा होने लगे। सारा जुलुम तितर-बितर हो गया। विशालसिंह ने यह भगदड़ देयी, तो मममे फुछ उपद्रव हो गया। उसी क्षण गंपधर ने सामने आकर राजा साहब को प्रणाम किया। गयधर को देखते ही राजा साहब घोड़े से कूद पड़े और उसे छाती से लगा लिया। आज इस मुभ-मुहूर्त में वह अभिलापा भी पूरी हो गयी, जिसके नाम को वह रो चुके थे। बार-बार कवर को छाती से लगाते थे; पर तृप्ति हो न होती पी। आंखों से आंसू की झड़ी लगी हुई थी। जब जरा चित्त शात हुआ तो वोले-- तुम आ गये चेटा, मुझ पर बड़ी दया की। चक्रघर को लाए हो न? सयधर ने कहा-वह तो नहीं आए। राजा-आयेंगे, मेरा मन कहता है। मैं तो निराश हो गया था, बेटा! तुम्हारी माता भी चली गयी; तुम पहले ही चले गये; फिर मैं किसका मुय देव कर जीता। जीवन का कुछ आधार चाहिए । अहल्या तभी से न जाने कहा धूम रही है। संघधर-वह तो मेरे साथ हैं। राजा-अच्छा, वह भी आ गयी। वाह मेरे ईश्वर ! सारी पुगिया एक ही दिन के लिए जमा कर रखी थीं। चलो, उसे देखकर आयें ठण्डी कीं। वारात रुक गयो । राजा साहब बौर शंखधर अहल्या के पास आये। पिता और पुत्रो का सम्मिलन बड़े आनन्द का दृश्य था! कामनाओं के वृक्ष, जो मुइत हुई, निरागा-तुपार को मेंट हो चुके थे, आज सहलहाते, हरी-भरी पत्तियों से लदे हुए सामने खड़े थे। आसुओं का वेग शान्त हुआ, तो राजा साहब बोले- तुम्हें यह बारात देखकर हंसो आती होगी। सभी हंस रहे हैं। लेकिन बेटा, यह बारात नहीं है । कमी बारात और कैसा दूल्हा ! यह विक्षिप्त हृदय का उद्गार है, और कुछ नहीं । मन कहता था- जब ईश्वर को मेरी मुधि नहीं, वह मुझ पर जरा भी दया नहीं करते, अकारण ही मुझे सताते हैं, तो मैं क्यों उनमे डा ? जब स्वामी को सेवक की फिक्र नही, वो सेवक को स्वामी की फिक्र क्यो होने लगी। मैंने उतना अन्याय किया, जितना मुमसे हो मका । धर्म और अधर्म पाप और पुष्प के विचार दिल से निकाल डाले । आखिर मेरी विजय हुई कि नहीं? मुशी वधर ने यह मुभ समाचार मुना, तो फौरन घोड़े पर सवार हुए और राज-भवन बा पहुँचे। गंगधर उनके आने का समाचार पाकर नगे पाव दो बार उनके चरणों को सनं किया? मुचीजो ने पोते को छाती से लगा लिया और गद्गद् कण्ठ से बोले- यह शुभ दिन भी देखना बदा था बेटा, इसी से अभी तक जीता हूँ। यह अभिलाषा पूरी हो गयी । वस इतनी लालसा और है कि तुम्हारा राज-तिलक देख लू? तुम्हारी दादी वैठी तुम्हारी राह देख रही हैं। क्या उन्हें भूल गये? शंखधर ने लजाते हुए कहा -जी नहीं शाम को जाने का इरादा था। उन्हीं के आशीर्वाद से तो मुझे पिताजी के दर्शन हुए। उन्हें कैसे भूल सकता मुशी-तुम लल्लू को अपने साथ घसीट नहीं लाये ? शंखधर-वह अपने जीवन में जो पवित्र कार्य कर रहे हैं, उसे छोड़कर कभी न आते । मैंने अपने को जाहिर भी नहीं किया, नहीं तो शायद वह मुझसे मिलना भी स्वीकार न करते । इसके बाद शंखधर में अपनी यात्रा का, अपनी कठिनाइयों का और पिता से मिलने का सारा वृत्तान्त कहा। यों बातें करते हुए मुशीजी राजा साहब के पास जा पहुंचे। राजा साहब ने बड़े आदर से उनका अभिवादन किया और बोले- आप तो इधर का रास्ता ही भूल गये। मुंशीजी-महाराज, अब आपका और मेरा सम्बन्ध और प्रकार का है। ज्यादा आऊं-जाऊँ तो आप ही कहेंगे; यह अब क्या करने आते हैं, शायद कुछ लेने की नीयत से आते होंगे। कभी जिन्दगी में धनी नहीं रहा; पर मर्यादा की सदैव रक्षा की है। राजा-आखिर आप दिन-भर बैठे-बैठे वहां क्या करते हैं; दिल नहीं घबराता? मुंशीजी-अब तो राजकुमार का तिलक हो जाना चाहिए। आप भी कुछ दिन शान्ति का आनन्द उठा लें। राजा-विचार तो मेरा भी है; लेकिन मुशीजी, न-जाने क्या बात है कि जब से शंखधर आया है, क्यों मुझे शंका हो रही है कि इस मंगल में कोई-न-कोई विघ्न अवश्य पड़ेगा। दिल को बहुत समझाता हूं, लेकिन न जाने क्यों यह शंका अन्दर से निकलने का नाम नहीं लेती। मुशीजी-आप ईश्वर का नाम लेकर तिलक कीजिए । जव टूटी हुई माशाएँ पूरी हो गयीं; तो अब सव कुशल ही होगी। आज मेरे यहाँ कुछ आनन्दोत्सव होगा। आजकल शहर में अच्छे-अच्छे कलावन्त आये हुए हैं। सभी आयेंगे। आपने कृपा की, तो मेरे सौभाग्य की बात होगी। राजा-नहीं मुशीजी, मुझे तो क्षमा कीजिए। मेरा चित्त शान्त नहीं है। मापसे सत्य कहता हूँ मुशीजी, आज अगर मेरा प्राणान्त हो जाय, तो मुझसे बढ़कर सुखी प्राणी संसार में न होगा। शोक की पराकाष्ठा देख ली। आनन्द की पराकाष्ठा भी देख ली। अव और कुछ देखने की आकांक्षा नहीं है। डरता कहीं पलड़ा फिर न दूसरी ओर झुक जाय । १३० - नगीरी देवापरासाहब की तस्कोन देते रहे, रिब महिलाओ को बने हो भने कान्सर देकर बोर शवधर को गले लगाकर वह घोडे पर शर होरलाशेब ने चिन्ताओं को कभी अपने पास नहीं पटरने दिलानइच्छा दो, ऐश्वयं की इच्छा थी, पर उनपर जान न देव, नवरना वो उन्होंने सोखा ही न था। घोड़ा मिला तव भी अभाव रहा, बहुत मिला तब मी अभाव व्हावभाव जीवन-पर्यन्त उनका गला न घटा। एक तमय पा, जब स्वादिष्ट भोजनों को तरसते थे। अब दिल बोलकर दान देने को तरसते हैं । क्या पाऊं बोर क्या दे ? बस फिक्र यी तो इतनी ही। कमर झुक गयी थी, बाजों ने सूझता भी कम या; लेकिन मजलिस नित्य जमतो पो, हमी-दिल्लमो करने में भी कभी न चुकवे थे। दिल में कभी किसी से कौना नहीं रखा, और न कभी किसी को बुराई चेतो। दूसरे दिन संध्या समय मुंशीजी के घर बड़ी धूम-धाम से उत्सव मनाया गया। निर्मला पोत को छाती से लगाकर खूब रोयो । उसका जी चाहता था, मह मेरे ही घर रहता। किवना मानन्द होता ! शखधर से बातें करने से उसकी तृप्ति ही न होती पी । अहल्या ही के कारण उसका पुत्र हाथ से गया। पोता भी उसी के कारण हाय से जा रहा है । इसलिए अब भी उनका मन बहल्याने नमिलता था। निर्मला को अपने बाल-बच्चो के साथ रहकर सभी प्रकार कष्ट सहना मंजूर या । वह अब इस अन्तिम समय किसी को बांधोसंटन करना चाहती थी । न जाने कब दम निकल जाय, कब बावं बन्द हो । चारी किसी को देख भी न सके । वाहर गाना हो रहा था। मुंशीजी शहर के रईसों को दावत का इनर कर रहे थे। बहल्या लालटेन ले-लेकर घर-मर की चीजों के देव हमार बरनी चीजों के तहस-नहस होने पर मन-ही-मन मुना रहा सामान चारपाई पर लेटी अवधर की बातें सुनने मे तन्मय हो रही थी। प्रात.काल जब मखधर विदा होने लगे, वो निर्मला -... बहुत दिन न चलूंगी। जब इक जीती हूं, एक बार बार आज राजा साहब के यहां भी उत्सव पा; इतर भी न ठहर सके स्त्रियां निर्मला के चरमों को बचन ने लंद अवघर पड़े हुए । निर्मला ने रोवे हर नहा-का हूँगी।

मले, तो वह . रता है, उससे प्रेम की आशा भी रखता है। अगर उसे प्रेम के बदले प्रेम को हृदय से निकालकर फेंक देगा। वृद्धजनों की भी, क्या. यही आशा होती है ? वे प्रेम करते हैं और जानते हैं. कि इसके बदले में उन्हें कुछ न मिलेगा। या मिलेगी तो दया। शंखधर की आँखों में आंसू न थे, हृदय में तड़प न थी, वह यों प्रसन्न-चित्त चले जा रहे थे, मानो सैर करके लौटे जा रहे हों। मगर निर्मला का दिल फटा जाता था और मुशी वज्रधर की आंखों सामने अँधेरा छा रहा था? २५ कई दिन गुजर गये । राजा साहव हरि-भजन और देवोपासना में व्यस्त थे। इधर ५-६ वर्ष में उन्होंने किसी मन्दिर की तरफ झांका भी न था। धर्म- चर्चा का बहिष्कार-सा कर रखा था। रियासत में धर्म का खाता ही तोड़ दिय गया था। मगर अब एकाएक देवताओं में राजा साहब की फिर श्रद्धा हो आय थी। धर्म-खाता फिर खोला गया और.जो वृत्तियां बन्द कर दी गयी थी, वे फि बांधी गयीं। राजा साहब ने फिर चोला बदला। शंखधर के लौटते ही उन धर्मानुराग फिर जागृत हो गया। सम्पत्ति मिलने ही. पर तो रक्षकों आवश्यकता होती है। इन दिनों राजा साहब बहुधा एकान्त में बैठे,किमी चिन्ता में निमग्न थे, बाहर कम निकलते थे। भोजन से भी उन्हें कुछ अरुचि हो गयी.थी। मानसिक अंधकार जो नैराश्य की दशा में उन्हें घेरे हुए था, अब एकाएक के प्रकाश से छिन्न-भिन्न हो गया था। धर्मानुराय के साथ उनका कर्तव्य जाग पड़ा था। जैसे जीवन लीला के अन्तिम काण्ड में हमें भक्ति की सवार होती है, बड़े-बड़े भोगी भी रामायण और भगवान का पाठ करने हैं, उसी भांति राजा साहब को भी अब बहुआ अपनी. अपकीर्ति पर पश होता था। रात आधी से अधिक बीत चुकी थी। रनिवास में सोता पड़ा हुन अहल्या के बहुत समझाने पर भी मनोरमा अपने पुराने भवन में न आ उसी छोटी कोठरी में पड़ी हुई थी। सहसा राजा साहब ने प्रवेश मनोरमा विस्मित होकर उठ खड़ी हुई। राजा साहब ने कोठरी को ऊपर-नीचे देखकर करुण-स्वर में कहा मैं आज तुमसे अपना अपराध क्षमा कराने आया हूँ। मैंने तुम्हारे अन्याय किया है, इसे क्षमा कर दो। मनोरमा ने सजल-नेत्र होकर कहा~उन बातों को याद न कीजि होता है और मुझे भी दुःख होता है । मेरा ईश्वर ही जानत - १३२

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- । खैर, कल से तुम नये भवन में रहोगी। यह मेरी जाज्ञा है। यह कहते हुए वह उठ खड़े हुए । बिजली के निर्मल प्रकाश में मनोरमा उन्हें खड़ी देखती रही। गर्व से उसका हृदय फूला न समाता था। गर्व इस बात का था कि मेरे स्वामी मेरा इतना आदर करते हैं। प्रेम सहृदयता ही का रसमय रूप है । प्रेम के अभाव में सहृदयता ही दम्मत्ति के सुख का मूल हो जाती है । राजा साहब को अब किसी तरह शान्ति न मिलती थी। कोई-न-कोई भयंकर विपत्ति आने वाली है, इस शंका को वह दिल से न निकाल सकते थे। दो-चार प्राणियों को जोर-जोर से बातें करते सुनकर वह घबरा जाते थे कि कोई दुर्घटना तो नहीं हो गयी। शंखधर कहीं जाता, तो जब तक वह कुशल से लौट न आये, वह व्याकुल रहते थे। उनका जी चाहता था कि यह मेरी आँखों के सामने से दूर न हो । उसके मुख की बोर देखकर उनकी आंखें आप-ही-आप सजल हो जाती थीं। वह रात को उठकर ठाकुरद्वारे में चले जाते और घण्टों ईश्वर की वन्दना किया करते । जो शंका उनके मन में थी, उसे प्रगट करने का उन्हें साहस न होता था । वह उसे स्वयं न व्यक्त करते थे। वह अपने मरे हुए भाई की स्मृति को मिटा देना चाहते थे; पर वह सूरत आंखों से न टलती थी। कोई ऐसी क्रिया, ऐसी आयोजना, ऐती विधि न थी, जो इस पर मंडरानेवाले संकट का मोचन करने के लिए न की जा रही हो; पर राजा साहब को शान्ति न मिलती थी। संध्या हो गयी थी। राजा साहब ने मोटर मंगवायी और मुंशी वजधर के मकान पर जा पहुंचे । मुंशीजी की संगीत मण्डली जमा हो गयी थी । संगीत ही उनका दान, व्रत, ध्यान और तप था। उनकी सारी चिन्ताएं और बारी वाधाएं संगीत स्वरों में विलीन हो जाती थीं । मुंशीजी राजा साहब को देखते ही खड़े होकर वोले-आइए, महाराज ! बाज ग्वालियर के आचार्य का गाना सुना। आपने बहुत गाने सुने होंगे, पर इनका गाना कुछ और ही चीज है। राजा साहब मन में मुंशीजी की वेफिकी पर झुंझलाये। ऐसे प्राणी भी संसार में हैं, जिन्हें अपने विलास के आगे किसी वस्तु की परवाह नहीं । शंखधर से मेरा और इनका एक-सा सम्बन्ध है; पर यह अपने संगीत में मस्त हैं और मैं शंकाजों से व्यन हो रहा हूँ। सच है-'सवते अच्छे मूड़, जिन्हें न व्यापत जगत गति ।' वोले- इसीलिए तो माया ही हूँ; पर जरा देर के लिए आपसे कुछ बातें करना चाहता है। दोनों आदमी अलग एक कमरे में जा बैठे। राजा साहब सोचने लगे, किस तरह बात शुरू करूं? मुंशीजी ने उनको असमंजस में देखकर कहा- मेरे लायक जो काम हो, फरमाइए । आप बहुत चिन्तित मालूम होते हैं। वात क्या है ? राजा-मुझे मालूम हो रहा है कि संसार में मन लगाना ही सारे दुःख का मूल है। जगदीशपुर-राज्य को भोगना ही मेरे जीवन का लक्ष्य था। मैंने अपने जीवन में जो कुछ किया, इसी उद्देश्य को पूरा करने के लिए। अपने जीवन पर - ।

कभी एक क्षण के लिए विचार नहीं किया। जीवन का सदुपयोग कैसे होगा, इस पर कभी ध्यान नहीं दिया। जब राज्य न था, तव अवश्य कुछ दिनो के लिए सेवा के भाव मन में जागृत हुए थे-वह भी बाबू चक्रधर के सत्संग से। राज्य मिलते ही मेरी कायापलट हो गयी। फिर कभी आत्मचिन्तन की नौवत न आयी। शंखघर को पाकर मैं निहाल हो गया। मेरे जीवन में ज्योति-सी आ गयो । में सब कुछ पा गया; पर अब की जब से शंखधर लौटा है, मुझे उसके विषय में भयकर शका हो रही है । बापने मेरे भाई साहब को देखा था? मुशी-जी नहीं, उन दिनो तो मैं यहां से वाहर नौकर था। राजा-भाई साहब की सूरत आज तक मेरी आँखो में फिर रही है । यह देखिये, उनकी तस्वीर है। राजा साहब ने एक फोटो निकालकर मुशीजी को दिखाया । मुंशोजो उसे देखते ही बोले-यह तो शखधर की तस्वीर है। राजा--नही साहब, यह मेरे बड़े भाई का फोटो है । शंखधर ने तो अभी दक तस्वीर ही नहीं खिचवायी। न जाने तस्वीर खिंचवाने से उसे क्यो चिढ़ है ! मुंशी-में इसे कैसे मान ? यह तस्वीर साफ शखधर की है। राजा-तो मालूम हो गया कि मेरी आंखें धोखा नहीं खा रही थीं। मुंशी-तब तो बढ़ी विचित्र वात है। राजा-अव वापसे क्या अर्ज करूं? मुझे बड़ी शंका हो रही है, रात को नींद नहीं बातो । दिन को वैठे-बैठे चौक पड़ता हूँ, दो प्राणियों की सूरतें कभी इतनी नहीं मिलती। भाई साहब ने ही फिर मेरे घर में जन्म लिया है, इसमें मुझे बिल्कुल शका नही रहो । ईश्वर ही जाने, क्यो उन्होंने कृपा की है, अगर शखधर का बाल भी बोका हुआ, तो मेरे प्राण न बचेंगे। मुंगी-ईश्वर चाहेगे, तो सव कुशल होगा। घबराने की कोई बात नहीं। कमी-कभी ऐसा होता है। राजा साहब उठ खड़े हुए और चलते-चलवे गम्भीर भाव से बोले-जो वात पूछने वाया था, वह तो भूल ही गया। आपने साधु-सन्तो की बहुत सेवा की है। मरने के बाद जीव को किसी बात का दुःख तो नहीं होता? मशी-सुना तो यही है कि होता है और उससे अधिक होता है जितना जीवन में। राजा-मूठी बात है, बिल्कुल झूठी । विश्वास नही आता । उस लोक के दुःख-मुख और प्रकार के होंगे। मैं तो समझता हूँ, किसी बात की याद ही न हती होगी । मेरे बाद जो कुछ होना है, वह तो होगा ही, बापसे इतना ही है कि बहल्या को डाल दीजिएगा । मनोरमा की ओर से मैं निश्चिन्त १. सागभी दशाओं में समल सकती है। महल्या उस वज्राघात को न सह . मुंशीजी ने भयभीत होकर राजा साहब का हाथ पकड़ लिया और सजल होकर बोले-आप इतने निराश क्यों होते हैं ? ईश्वर पर भरोसा कीजिए। कुशल होगी। राजा-क्या करूं, मेरा हृदय आपका-सा नहीं है । शंखधर का मुंह देखकर रा खून ठण्डा हो जाता है । वह मेरा नाती नहीं, शत्रु है । इससे कहीं अच्छा कि निस्सन्तान रहता । मुंशीजी, आज मुझे ऐसा मालूम हो रहा है कि निधन होकर मैं इससे कहीं सुखी रहता। राजा साहब द्वार की ओर चले । मुंशीजी भी उनके साथ मोटर तक आये शंका के मारे मुंह से शब्द न निकलता था। दीन भाव से राजा साहब की ओ देख रहे थे, मानो प्राण-दान मांग रहे हों। राजा साहब ने मोटर पर बैठकर कहा-अव तकलीफ न कीजिए, जो वात कही है, उसका ध्यान रखिएगा। मुंशीजी मूर्तिवत् खड़े रहे। मोटर चली गयी। अभी राजा विशालसिंह द्वार पर आकर खड़े ही थे कि अहल्या ने विलाप करके कहा-हाय वेटा ! तुम मुझे छोड़कर कहां चले गये? क्या इसीलिए मुझे आगरा से लाये थे? राजा साहब ने यह करुण-विलाप सुना और उनके पैरों-तले से जमीन निकल गयी। वह अपनी आंखों से जो कुछ न देखना चाहते थे, वह देखना पड़ा और इतनी जल्द! अभी ही वह मुंशी वजधर के पास से लौटे थे । आह ! कौन जानता था विधि इतनी जल्द यह सर्वनाश कर देगा! इससे पहले कि वह अप जीवन का अन्त कर दें, विधि ने उनकी आशाओं का अन्त कर दिया। राजा साहब ने कमरे में जाकर शंखधर के मुख की ओर देखा। उन जीवन का आधार निर्जीव पड़ा हुआ था। यही दृश्य आज से पचास वर्ष, उन्होंने देखा था। उनके मुख से विलाप का एक शब्द भी न निकला। आंखों से आंसू की बूंद भी न गिरी । खड़े-खड़े भूमि पर गिर पड़े और दम निकल गया। २६ शंखधर के चले जाने के वाद चक्रधर को संसार शून्य जान पड़ने सेवा का वह पहला उत्साह लुप्त हो गया। उसी सुन्दर युवक आंखों में नाचती रहती। उसी की बातें कानों में गूंजा करती। भोज बैठते, तो उसकी जगह खाली देखकर उनके मुंह में कौर न घंसता। हर खोये-खोये से रहते । बार-बार यही जी चाहता था कि उसके पास चल 17 चलने का इरादा करते; पर रुक जाते। साईगंज से जा - ना उनका जो नहीं चाहता था। इतने दिनों तक वह एक जगह कभी नहीं रहे। शषधर जिस कम्बल पर सोता था, उसे वह रोज झाड़-पोंछकर तह करते हैं। शंखधर अपनी पजरी यहीं छोडकर गया है। चक्रधर के लिए संसार में इससे बहुमूल्य कोई वस्तु नहीं है । शंखधर की पुरानी धोती और फटे हुए कुरते को सिरहाने रखकर सोते हैं । रमणी अपने सुहाग के जोडे को भी इतनी देख-रेख न करती होगी। संध्या हो गयी है । चक्रधर मन्दिर के दालान में बैठे हुए चलने की तैयारी कर रहे हैं । अब यहाँ नही रहा जा सकता। उस देवकुमार को देखने के लिए आज वह बहुत विकल हो रहे हैं। रात को उन्हे एक भयंकर स्वप्न दिखाई दिया। क्या देखते हैं कि शंखधर एक नदी के किनारे उनके साथ बैठा हुआ है । सहसा दूर से एक नाव आती हुई दिखाई दी। उसमें से मन्नासिंह उतर पड़ा। उसने हंसकर कहा-बाबूजी, यही राजकुमार हैं न? मैं बहुत दिनों से खोज रहा हूँ। राजा साहब इन्हें बुला रहे हैं। मांखघर उठकर मन्नासिंह के साथ चला। दोनो नाव पर बैठे, मन्नासिंह डांड चलाने लगा। चघर किनारे ही खड़े रह गये । नाव थोड़ी ही दूर जाकर चक्कर खाने लगी । शंखधर ने दोनो हाथ उठाकर उन्हें बुलाया । वह दौड़े, पर इतने में नाव डूब गई। एक क्षण में फिर नाव ऊपर आ गयी। मन्नासिंह पूर्ववत डोड़ पना रहा था, शंखधर का पता न चला। धघर जोर से एक चीख मारकर जग पड़े। उनका हृदय धक-धक कर रहा या। उनके मुख से ये शन्द निकल पड़े-ईश्वर ! यह स्वप्न है, या होने वाली बात ! उसी वक्त उठ बैठे, बकुचा लिया और चल पड़े हुए। चांदनी छिटकी हुई पी। चारों ओर मन्नाटा था। पर्वत श्रेणिया अभिला. पाओं की समाधियो-सी मालूम होती थी। वृक्षों के समूह श्मशान से उठनेवाले धुएँ की तरह नजर आते थे। चक्रधर कदम बढ़ाते हुए पथरीली पगडण्डियों पर चले जाते थे। चक्रधर की इस वक्त वह मानसिक दशा हो गयी थी, जब अपने ही को अपनी पदर नहीं रहती । वह सारी रात पपरीले पय पर चलते रहे । प्रातःकाल रेलवे स्टेशन मिला। गाड़ी नायो । उस पर जा बैठे। गाड़ी मे कौन लोग बैठे थे, उन्हे देख-देखकर लोग उनसे क्या प्रश्न करते थे, उसका वह क्या उतर देते थे, रास्ते में फौन-कौन से स्टेशन मिले, कव दोपहर हुई, कब संध्या हुई, इन बातों का उन्हे जरा भी मान न हुआ । पर वह कर वही रहे थे, जो उन्हें करना चाहिये था। किसी को पात का ऊट-पटाग जवाब न देते थे, जिन गाड़ियो पर बैठना न चाहिए पा, उनपर न बैठते पे, जिन स्टेशनों पर न उतरना चाहिए था, वहां न उतरते ये। बम्यास बहुधा चेतना का स्थान ले लिया करता है। तीसरे दिन प्रातःकात गाड़ी काशी जा पहुंची। ज्योंही गाड़ी गंगा के पुल 1 ..

- . हुंची, चक्रधर की चेतना जाग उठी । संभल बैठे। ाली छायी हुई थी। दूसरी ओर काशी का विशाल नगर ऊँची अट्टालि गगनचुम्बी मन्दिर-कलशों से सुशोभित, सूर्य के स्निग्ध प्रकाश से चमकता खड़ा था। मध्य में गंगा मन्दगति से अनन्त की ओर दौड़ी चली जा रही आज बहुत दिनों के बाद यह चिर-परिचित दृश्य देखकर चक्रधर का हृदय ल्ल पड़ा । भक्त का उद्गार मन में उठा। एक क्षण के लिए वह अपनी सारी न्ताएं भूल गये, गंगा-स्नान की प्रवल इच्छा हुई। इसे वह किसी तरह न क सके। स्टेशन पर कई पुराने मित्रों से उनकी भेंट हो गयी। उनकी सूरतें कितनी दल गयी थीं। वे चक्रधर को देखकर चौंके, कुशल पूछी और जल्दी से चले गये। चक्रधर ने मन में कहा--कितने रूखे लोग हैं कि किसी को बातें करने की भी फुरसत नहीं।। दशाश्वमेघ घाट पहुंचकर तांगे से उतरे । इसी घाट पर वह पहले भी स्नान किया करते थे। सभी पण्डे उन्हें जानते थे; पर आज किसी ने भी प्रसन्नचित्त से उनका स्वागत नहीं किया। ऐसा जान पड़ता था कि उन लोगों को उनसे बातें करते जब हो रहा है । किसी ने न पूण, कहाँ-कहाँ घूमे ? क्या करते रहे ! स्नान करके चक्रधर फिर तांगे पर बैठे और राजभवन की ओर चले । ज्यों- ज्यों भवन निकट आता था । उसका आशंकित हृदय अस्थिर होता जाता था। तांगा सिंह-द्वार पर पहुंचा। वह राज्य-पताका, जो मस्तक ऊँचा किये लह- राती रहती थी झुकी हुई थी। चक्रधर का दिल बैठ गया। इतने जोर से धड़कन होने लगी, मानो हथौड़े की चोट पड़ रही हो। ताँगा देखते ही एक बूढ़ा दरवान आकर खड़ा हो गया, चक्रधर को ध्यान में देखा और भीतर की ओर दौड़ा। एक क्षण में अन्दर हाहाकार मच गया चक्रधर को मालूम हुआ कि वह किसी भयंकर जन्तु के उदर में पड़े हुए तड़फ- रहे हैं। किसमे पूछे, क्या विपत्ति आयी है ? कोई निकट नहीं आता। सब दूर । झुकाए खड़े हैं । वह कौन लाठी टेकता हुआ चला आता है ? अरे ! यह तो वज्रधर हैं। चक्रधर तांगे से उतरे और दौड़कर पिता के चरणों पर पड़े। मुंशीजी ने तिरस्कार भाव से कहा-दो-चार दिन पहले न आते बन लड़के का मुंह तो देख लेते । अव आये हो, जबकि सर्वनाश हो गया ! क्र यही मना रहे थे। चक्रधर रोये नहीं, गम्भीर एवं सुदृढ़ भाव से वोले-ईश्वर की इच्छ किसी ने एक पत्र तक न लिखा। वीमारी क्या थी? मुंशी-~अजी, सिर तक न दुखा, बीमारी होना किसे कहते हैं ? ब.

। हार! तकदीर? रात को भोजन करके बैठे एक पुस्तक पढ़ रहे थे कि स्वर्ग की राह ली। किसी हकीम वैद्य की अक्ल काम नहीं करती कि क्या हो गया था। जो सुनता है. दांतो तले अगुली दबाकर रह जाता है। वेचारे राजा साहब भी इस शोक में चल बसे । तुमने उसे भुला दिया था; पर उसे तुम्हारे नाम की रट लगी हुई थी। इस दृनिया में क्या कोई रहे ! जी भर गया। अब तो जब तक जीना है, तब तक रोना है। ईश्वर बड़ा ही निर्दयी है। चक्रधर ने लम्बी सांस घोचकर कहा-मेरे कर्मों का फल है। ईश्वर को दोष नदीजिए। मुशी-तुमने ऐसे कर्म किए होंगे; मैंने नही किए। मुझे क्यों इतनी बड़ी चोट लगायी ? मैं भी अब तक ईश्वर को दयालु समझता था; लेकिन अब वह यदा नहीं रही । गुणानुवाद करते सारी उम्र बीत गयी। उसका यह फल ! उस पर कहते हो, ईश्वर को दोष न दीजिए। ऐसे निर्दयो की महिमा कोन गाये और क्यों गाये ? मुरदे आदमी तुम्हारी नाखों से आंसू भी नहीं निकलते, खड़े ताक रहे हो। मैं कहता हूँ-रो लो, नहीं तो कलेजे मे नासूर पड़ जाएगा। बड़े-बड़े त्यागी देखे हैं। लेकिन जो पेट भरकर रोया नहीं, उसे फिर हँसते नहीं देखा । आओ, अन्दर चलो। बहू ने दीवार से सिर पटक दिया, पट्टी बांधे पड़ी हुई है। तुम्हें देवकर उसे धीरज हो जाएगा। मैं डरता हूं कि वहा जाकर कहीं तुम भी रोन पड़ो, नहीं तो उसके प्राण ही निकल जायेंगे। यह कहकर मशीजी ने उनका हाथ पकड़ लिया और अंत:पुर तक ले गये। बहल्या को उनके आने की खबर मिल गयी। उठना चाहती थी, पर उठने की शक्ति न थी। चक्रधर ने सामने आकर कहा-बहल्या! अहल्या ने फिर चेप्टा की। वरसों की चिता, कई दिनों के शोक भौर उप- वास एव बहुत-सा रक्त निकल जाने के कारण शरीर जीणं हो गया था। करवट पूमकर दोनों हाय पति के चरणों की ओर बढ़ाए; पर वह चरणों को स्पर्श न कर सकी, हाप फैले रह गये; और एक क्षण में भूमि पर लटक गये । पक्रधर ने घबराकर उसके मुख की ओर देखा । निराशा मुरक्षाकर रह गयी थी । नेत्रों में करण याचना भरी हुई थी। चक्रधर ने रंधे हुए स्वर में कहा-अहल्या; मैं बा गया, अब कही न जाऊंगा। ईश्वर से कहता हूं, कही न जाऊंगा। हाय ईश्वर ! क्या तू मुझे यही दियाने के लिए यहां लाया था। बहत्या ने एक पित, दीन एव विस्तारमय नेत्रो से पति की ओर देखा। बायें सदैव के लिए बन्द हो गयी। उसी वक्त मनोरमा वाकर द्वार पर पड़ी हो गयो । चक्रधर ने आंसुओं को रोते हुए कहा--रानीजी, जरा आकर इन्हें चारपाई से उतरवा दीजिए। १३६ ।

मनोरमा ने अन्दर आकर अहल्या का मुख देखा और रोकर बोली-आपके दर्शन बदे थे, नहीं तो प्राण तो कब के निकल चुके थे। दुखिया का कोई भी अर- मान पूरा न हुआ। यह कहते-कहते मनोरमा की आंखों से आंसुओं की झड़ी लग गयी। उपसंहार - कई साल बीत गये हैं । मुंशी वज्रधर नहीं रहे । घोड़े की सवारी का उन्हें बड़ा शौक था। नर घोड़े ही पर सवार होते थे। बाबी, मोटर, पालकी इन सभी को वह जनानी सवारी कहते थे। एक दिन जगदीशपुर से बहुत रात गये लौट रहे थे। रास्ते में एक नाला पड़ता था। नाले में उतरने के लिए रास्ता भी बना हुआ था; लेकिन मुंशीजी नाले में उतरकर पार करना अपमान की बात समझते थे। घोड़े ने जस्त मारी, उस पार निकल भी गया, पर उसके पाँव गड्ढे में पड़ गये, गिर पड़ा, मुंशीजी भी गिरे और फिर न उठे। हंस-खेलकर जीवन काट दिया निर्मला भी पति का वियोग सहने के लिए बहुत दिन जीवित न रही। उनकी अन्तिम अमिलापा, कि चक्रधर फिर विवाह कर लें, पूरी न हो सकी। रानी मनोरमा नये भवन में रहती हैं । उसने कितनी ही चिड़ियां पाल रखी. हैं। उन्हीं की देख-रेख में भव वह अपने दिन काटती हैं । पक्षियों के कलरव में वह अपनी मनोव्यथा को विलीन कर देना चाहती हैं। चक्रधर बहुत दिन घर पर न रहे । माता-पिता के बाद वह घर, घर ही न रहा । फिर दक्षिण की ओर सिधारे, लेकिन अब वह केवल सेवा-कार्य ही नहीं करते; उन्हें पक्षियों से बहुत प्रेम हो गया है। विचिन पक्षियों की उन्हें नित्य खोज रहती है । भवत-जन उनका यह पक्षी-प्रेम देखकर उन्हें प्रसन्न करने के लिए नाना प्रकार के पक्षी लाते रहते हैं। इन पक्षियों के लिए अलग-अलग नाम हैं, अलग-अलग उनके भोजन की व्यवस्था है । उन्हें पढ़ाने, घुमाने व चुगाने का समय नियत है। सोम हो गयी थी। मनोरमा बाग में टहल रही थी। सहसा हीग के पास एक बहुत ही सुन्दर पिंजरा दिखायी दिया । उस में एक पहाड़ी मैना बैठी हुई थी। रानीजी को आश्चर्य हुआ। यह पिंजरा कहां से आया? उसके पास कई पहाड़ी चिड़ियां थीं, जिन्हें उसने सैकड़ों रुपये खर्च करके खरीदा था, पर ऐसी सुन्दर एक भी न थी। रंग पीला था, सिर पर लाल दाग था; चोंच इतनी प्यारी कि चूम लेने का जी चाहता था । मनोरमा समीप गयी, तो मैना बोली-"नोरा! हमें भूल गयी ? तुम्हारा पुराना सेवक हूं।" १४० मनोरमा के आश्चर्य का वारापार न रहा। उसे कुछ भय-सा लगा। इसे मेरा नाम किसने पढ़ाया? किसकी चिड़िया है ? यहां कैसे आयो? इसका स्वामी ववश्य कोई होगा। आता होगा । देखू कोन है ? मनोरमा बड़ी देर तक खड़ी उस आदमी का इन्तजार करती रही। जव अव तो उसने माली को बुलाकर पूछा-यह पिंजरा बाग मे कौन नाया? भी कोई न आया, आ; पर लौटकर न माए रानी --आज फिर आयेंगे? मालीहाँ हुजूर, कह तो गए हैं । रानी-आयें तो मुझे खबर देना। माली-बहुत अच्छा सरकार ! रानी -सूरत कैसी है बता सकता है ? माली-बड़ी-बड़ी बाखें हैं हुजूर; लम्बे आदमी हैं । एक-एक बाल पक रहा है। रानी ने उत्सुकता से कहा-आयें तो मुझे जरूर बुला लेना। रानी पिंजरा लिए हुए चली आयी। रात-भर वही मैना उसके ध्यान में बसी रही । उसको वातें कान में गूंजती रही। चार बजे वह ऊपर के कमरे में जा बैठी और उस आदमी की राह देखने मगी। वहां से माली का मकान साफ दिखायी देता था। वैठे-बैठे वड़ी देर हो गयी। बंधेरा होने लगा। रानी ने एक गहरी सांस ली। शायद अब न आयेंगे। सहसा उसने देखा, एक आदमी दो पिंजरे दोनों हायो में लटकाये बाग में वाया। मनोरमा का हृदय बाँसों उछलने लगा। उसने सोचा, मालो मुझे अभी बुलाने माता होगा; पर माली न आया और वह आदमी वही पिंजरा रखकर चला गया। मनोरमा अब वहाँ न रह सकी । हाय ! हाय वह चले जा रहे हैं। तब वहीं जमीन पर लेटकर वह फफक-फफककर रोने लगी। सहसा माती ने आकर कहा-सरकार, वह आदमी दो पिंजरे रख गया है योर कह गया है कि फिर कभी और चिड़ियां लेकर आऊंगा। मनोरमा ने कठोर स्वर में पूछा तूने मुझसे उस वक्त क्यों नहीं कहा ? माली पिंजरे को उसके सामने जमीन पर रखता हुआ बोला-सरकार, मैं उसी वक्त बा रहा था; पर आदमी ने मना किया। कहने लगा, अभी सरकार को क्यों बुलायोगे? मैं फिर कभी और चिड़ियां लाकर उनसे आप ही मिलूंगा। रानी कुछ न बोली-पिंजरे मे बन्द दोनों चिड़ियों को सजल नेत्रों से देखने लगी। १४ कहानी- वैराग्य " गोरखपुर रेलवे में कोई ऐसा नेक और खुदातरस शख्स नहीं था जैसे पंडित वजरंगनाथ । वहुत पढ़े-लिखे, रोशन खयाल और सीधे स्वभाव के आदमी थे। दफ्तर के सभी आदमी छोटे से बड़े तक उनसे खुश रहते थे। बैसाख का महीना था । मई की पहली तारीख । पंडितजी ने तनख्वाह के अस्सी रुपये पाये और घर में लाकर वीवी के हाथ में रख दिये । वीवी का नाम विध्येश्वरी था। अपने शौहर के मानिंद वह भी दया और प्रेम की देवी थी। शौहर के लिए लोटे का पानी लाकर वोली, "दस तो घर के किराये में जायेंगे और तीस घर भेजने हैं। वजरंग-हां, और दस रुपये दोनों बच्चों के लिए गुरुकुल भेजना होंगे। उनके मुहल्ले के दो बच्चे गुरुकुल आश्रम में पढ़ने गये थे, जिन्हें दस रुपए माह्वार चंदा देने का पंडितजी ने वादा किया था। विध्येश्वरी-हां, और क्या, कम से कम पांच रुपये उस वरहमन को देने चाहिएं जो अपनी लड़की के शादी के लिए कुछ मदद मांगने आया था। वजरंग-हां-हां! मुझे तो उसकी याद ही न रही थी ? गोशाला का चंदा भी तो दो रुपये होगा। विध्येश्वरी-~~और दो रुपये पुत्री पाठशाला का चंदा भी तो है। वजरंग-रुपये तो सव हो गये। तो हम बद्रीनाथ की यात्रा कैसे करेंगे! विध्येश्वरी-इसी में से दस रुपये निकालकर रख दो। हर महीने इतना ही निकालेंगे तो साल में एक सौ वीस रुपये जमा हो जायेंगे। क्या इतने में बद्री- नाथ की जियारत न होगी? बजरंग-~(हिसाव लगाकर) दस रुपये इधर जमा करूंगा तो महीने भर के लिए क्या बचेगा? कुल ग्यारह रुपये तो वचते हैं। विध्येश्वरी-इतना खाने भर को बहुत है। १ ईश्वर से भयभीत २. तीर्थदर्शन १४२ वजरंग--तुम्हारी साड़ी भी देख रहा हूं,पट रही है। विध्येश्वरी-इम महीने चल जायेगी। उन महीने में बन पडेगा तो लूंगी। बजरगे--पर पर सिर्फ चोस रुपये भेजें,अब के एक नौकरानी रप ली जाय। विध्यश्वरी-नही-नही, नौकरानी की क्या जरूरत है ? दो आदमिमों के वैसे ही बर्तन कोन बहुत से होते हैं ! इमी तरह पडित की तनख्वाह हर माह पट जाती पो। महीनो के सोप- विचार के बाद कही जाकर एक जोडा सादी आ पाती थी। लेकिन दोनो सो में पुश थे । उन्हें पैसे का और लालच न था । हा अभी तक उनने कोई लडका नहीं या और दोनो मिपा-बीवी एक सडके के लिए वचन रहते थे। उनकी हमेगा से ख्वाहिश थी कि हमारे एक लड़का होता । सिर्फ एक · उनको मुफुन' को सल्तनत मे बस एक कमी थी। आहिस्ता-आहिस्ता दस माल गुजर गये। पडित बजरगनाय के अस्नी रो एक सौ पचास हो गये। इसी लिहाज से माहाना इयराजात' में भी जियारती हो गयी, लेकिन अपने खर्च के लिए अब भी वह किसी महीने में पचीस रुपये से ज्यादा न लेते थे। और वह भी इसलिए कि इतने दिनो में वक्त बहुत कुछ वस्त घका था और जरूरियात की चीजें महंगी हो गयी थी। विध्येसरी ने अभी तक कोई वतन माजने वाली न रयो पो । पर और सब कुछ हो गया । और उनको औलाद की ख्वाहिश भी पूरी नहीं हुई। वह अब तक अकेले पे। पहले यह स्वाहिश मजही अकाद' के नीचे दबी हुई थी। सिर्फ कभी-कभी उनकी याद आ जाती थी, पर अब इन दिनों को याम तौर से... विध्यश्वरी को अपनी मूनी गोद देखकर दुय और महरूमी' मा एहमास होता था। उनका मजहबी मुकाव पहले पितरी' और रिना सातप का पा। पर अब उसमें लालच मिलता जा रहा था। यह बय दान देकर सरा उस भी हासिल करना चाहते थे। उनमें कभी-कभी बातें होती-ईयर कैसा मुमिफ. है, जो रात-दिन युदर्गाजियों के पककर और हवसनालियों में दूर हुए हैं उन्हें दूध-पूत सभी देता है और हमारी इतनी-सी दुआ भी कवूस नहीं होती। यही भगत का मुकदर है । मजहबपरस्ती में सारी उम्र गुजर गयी और फिर भी कोई सुख नही। हमले तो वही अच्छं हैं जो ऐमो-धाराम में जिन्दगी गुजारा है । १. मानसिक शान्ति २. मासिक पय ३. पिस्वास : अभाग्य ५ प्रातिक ६. सत्यमों का प्रतिफल ७. पापकर्ता . लोलुपताओ .. लेकिन शायद भगवान की भी यही मर्जी है, नहीं तो हमारे ऊपर इतना करम भी न होता भगतों के लिए चारों पुरुषार्थ हाथ बांधे खड़े रहते हैं। यहां कुछ भी नहीं । मोक्ष न जाने होगा या नहीं। जैसा कि इतनी जरा-सी ख्वाहिश पूरी नहीं हुई तो मोक्ष कौन देता है ! पंडित वजरंगनाथ अपनी बीवी को समझाते रहते थे, "भगवान की मर्जी कौन जानता है। अगर विना औलाद होने ही में हमारा कल्याण हो तो...? जव उनकी मेहरवानी होगी, मजहब, औलाद, धन, मोक्ष सभी मिल जाएंगे। भक्तों का फर्ज सिर्फ अपने तन-मन को भगवान के चरणों पर निछावर कर देना है । फल की कोई उम्मीद नहीं करनी चाहिए। हम अपनी महदूद' अक्ल से क्या जान सकते हैं कि हमारे लिए क्या सुदमन्द है और क्या नहीं।" विध्येश्वरी यह उपदेश सुनकर चुप तो हो जाती पर उसके मन को इत्मीनान नहीं होता था और पंडितजी भी खुद साफ दिल से ये बातें नहीं करते थे । लड़के की ख्वाहिश से उनका मन भी चंचल हो जाता था लेकिन वह इस दर्द को ज्यादा जाहिर नहीं करते थे। पंडितजी के पड़ोस में एक बनिया रहता था। दोनों घरों की दीवारें मिली हुई थों, बीच में वनिये ने एक छोटी-सी खिड़की खोल ली थी। कभी-कभी दोनों औरतें खिड़की के सामने खड़े होकर बातचीत किया करती थीं। वनियाइन के कई बच्चे थे, लेन-देन होता था और कपड़े की दुकान चलती थी।दोनों ही ज्यादा और कड़ा सूद लेने वाले ये । वनियाइन खुद भी कुछ लेन-देन किए हुए थी और रुपये पर एक आना सूद लेती थी। उनके दरवाजे पर ऐसा ही कोई भाग्यवान भिखारी होता जो खैरात पा जाता, नहीं तो मुसलसिल' यही जवाव मिलता, फिर मांगो, हाथ खाली नहीं है, वगैरह। भिखारी गालियां देते चले जाते थे। दीवार मिली रहने की वजह से कभी-कभी बनिये के घर की वातें इस घर में सुनाई देती थीं। खास तौर से इसलिए कि वनिये की बीवी की आवाज काफी : तेज थी। एक दिन रात को विध्येश्वरी खाना खाकर आंगन में लेटी हुई थी और पंडित जी कोई समाचारपत्र- पढ़ रहे थे कि इतमें में वनिया दूकान बढ़ाकर घर आया । उसकी बीवी ने पूछा, "आज कैसी विक्री हुई।' बनिया वोला, "आज तो सारे दिन मक्खियां मारता रहा। वोहनी तक नहीं हुई।" वनियाइन-यहां भी न जाने किसका मुंह देखा था कि तेल की हांड़ी - १. सीमित २. निरंतर हाय से छूट पड़ी और सारा तेल वह गया। बनिया-पड़ोस वाली पडिताइन का मुह तो नहीं देखा था? बनियाइन [-हा, खूब याद आया। मैंने उठते ही खिड़की से झाका तो वह नहा रही थी। बनिया-मैंने भी इसी पडित का मुंह देखा था। घर से चला नहाने, तो बंटा मुह घो रहा था। बनियाइन-मैं भी विना दिन चढ़े घर की खिड़की नहीं बोलूंगी। रात की खामोशी आम तौर से ज्यादा गहरी होती है। यही वजह घी या उन दोनों ने इन लोगो को सुनाने के लिए यह वाते की थी, इसका फैसला नहीं किया जा सकता। पर बातें साफ-साफ सुनाई दी, दोनो ने सुन लिया। विध्येश्वरी ने दुखी आखों से अपने शौहर को देखा और फिर सिर झुका लिया। पडितजी ने एक ठंडी सांस ली और अखबार को जमीन पर रखकर आसमान को तरफ देखने लगे। उनकी मजबीयत' कभी भी इतने सख्त इम्तहान से नही गुजरी पी। कुछ देर के बाद विध्येश्वरी ने कहा-"कोई दूसरा घर खोजो।" बजरंगनाथ बोले-"हां, कल ।" घर तो दूसरे ही दिन बदल दिया गया। पर उन बातों से दिल को जो तकलीफ पहुंची थो, उसका इलाज न हो सका। जो आग पहले दबी हुई सुलगती रहती थी उसने अब भड़कना शुरू कर दिया था और उसको लपटें जिन्दगी की ऊंची इक्दार' को छूने लगी थी। अकीदत', वदगी, अमलपरस्ती पर से अब उन का एतमाद उठने लगा था। मजहबी जिन्दगी अब उन्हें एक फरेव मालूम होती यो। शाम का वक्त था। पंडित बजरंगनाथ माहाना तनख्वाह के डेढ़ सौ रुपये बीवी के हाथ में रखते हुए बोले, "अभी तो वक्त है, लाओ टहलता आऊं और गोशाला के पाच रुपये देता आऊ। उधर की पाठशाला का चन्दा भी देता बाऊंगा।" विध्येश्वरी ने रुपये संदूक में बंद करते हुए कहा, “अव से किसी को न दूंगी। क्या फायदा ? क्या और सब लोग खाना-पहनना जानते हैं और हम नही जानते। सिर्फ तीस रुपये घर पर तो भेज दो, चाकी रुपये घर के खर्च में बायेंगे। कल एक कहार तलाश करके रख लो। तप करते-करते आधी उन्न वोत गयी और इसका कुछ फल ही नहीं मिला। अपने पेट खाते, अपने तन पह- नते तो तरकीन होती। दूसरों के लिए वेकार क्यो जान दें। काइनात गुदा की १. धार्मिक निष्ठा २. परम्परागत मूल्य ३. धार्मिक विश्वास, आस्था ४. विश्वास ५. सुष्टि, संसार - .

गये। है। वह इसकी देखभाल करता ही है। हम क्यों अपनी स्वाहिशात को खत्म करें।" बजरंग ने हंसकर कहा-"लाओ, लामो । देता आऊ। लोग क्या कहेंगे." विध्येश्वरी-दुनिया को किसी के कहने का डर नहीं है तो हमी को क्यों हो? किसी को भी और पूत भी। यहां एक से भी गये। वजरंग के दिल में भी यही खयाल पैदा हो चुका था। एक बार और परी दिल से कहा। फिर दो रुपये लेकर कलमी आम लेने वाजार चले आज से दोनों खुद अपनी सेवा में मत हो गये। बच्छे-अच्छे भोजन बनाने लगे । सुन्दर कपड़े पहनने लगे। एक सौ रुपये होते ही क्या है ? खाने-पहनने ही में उड़ने लगे। पहले जितना दया-धरम करते थे, पेट और तन काटकर करते थे। अव मनपसंद भोजन और लिवास का खयाल करने लगे तो महीने के लिए तन- ख्वाह काफी न होती। ईश्वर की माया । जीवन की इस कायापलट के दूसरे ही साल विध्येश्वरी के एक लड़का पैदा हुया। खुशियां मनाई जाने लगीं। वाजे वजने लगे। जश्न की तैयारियां होने लगीं। बच्चे की 'वरही थी। डोमनियां गा रही थीं। वाहर दोस्तों की महफिल थी। शनासानों और रिश्तेदारों को मदु किया गया था। शामियाना तना हुवा था। मल्हार की ताने उड़ रही थीं। एक तरफ दावत का सामान हो रहा या। विध्येश्वरी इस जश्न में खुशी के मारे फूली नहीं समा रही थी। वार-बार नवजायदा बच्चे का मुंह देखती और उसको चूमने लगती । दिल खुश हो जाता। 'मेरे लाल, तुमने आकर मेरा मुंह रोशन कर दिया। अव किसका मुंह है जो मुझे ताने दे सके।" उस पड़ोसी वनिये को भी बुलाया गया था जिसने विध्येश्वरी के खिलाफ अजीयतनाको लफ्जों का इस्तेमाल किया था। वनियाइन कुछ बनमनी- सी बैठी थी और विध्येश्वरी की सास जो घर से इस जश्न का इंतजाम करने आई थी, वार-वार वनियाइन को ताने दे रही थी। विध्येश्वरी बड़ी वेचैनी से इन्तजार कर रही थी कि कव जश्न खतम हो और मैं अपने प्यारेलाल को उसके वाप की गोद में दे। उसकी आंखों में चमक आयेगी। छाती एक गज की हो जाएगी। ग्यारह बज गये थे, मेहमान रुखसत हो गये थे, महफिल उठंचुकी थी, नौकर- चाकर निवटकर खाने वैठे थे। वावू बजरंग वालक का मुंह देखने के लिए वेचैन . । १. इच्छाओं, कामनाओं २. तन्मय ३. परिचितों ४.निमंत्रित ५. सद्यः प्रसूत ६. पीडाजनक १४६ हो रहे थे। मेहमानो को रखसत कराके घर में गये। विंध्येश्वरी नहा-धोकर आ -Tी तार खिला हुआ था। बजरंग ज्योंही घर मे गये, . कितनी सुंदर मोहनी मूरती थी ! गोया आसमानी देवताआ का महरबानास मुजस्सम हो गया हो। बालक को लेकर उसका मनोहर मुखड़ा देखा। आखें जगमगा उठी । छाती से लगाया, छाती फूल उठी। विध्येश्वरी ने कहा, "तुमसे कोई भारी इनाम लूंगी।" "खुदा बच्चे की उम्र दराज करे, यहो तुम्हें मेरा सबसे बडा इनाम है।" इस तरह बातें करते हुए दोनों सो गये। दिन-भर के थके-मादे थे। फौरन नोद आ गयी। मगर थोड़ी देर के बाद बजरगनाथ एक ख्वाब देखकर चौंक पडे, जैसे एक महात्मा आकर बालक के सिरहाने खड़े होकर उनसे कह रहे हो-"ले, अब तेरी दिली स्वाहिश पूरी हो गयी। यह लालच का फल है । इस पर तू इतना कानो मे ख्वाब के अल्फाज गूंज रहे थे। उन्होंने लडके के मुह की तरफ देखकर दिल मे कहा-क्या इससे भी अच्छो कोई शै हो सकती है ? यकीन है । लालच का फल इतना हसीन, दिलखुशकुन है तो खुदा को लगन का फल कितना मनमोहक होगा।" वह फौरन घर से निकले । बच्चे की तरफ बड़ी ददंभरी नजर से देखा और जंगल की राह ली। फिर किसी को उनका पता न लगा। (स्वाधीनता के किसी अंक में छपी हिन्दी कहानी का उर्दू रूप)

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Manorama

Author
Prem Chand Munshi
Title
Manorama
File name
Manorama
Text
OCR done
Published
2011/03
Publisher
Ellahabad,look Bharti Prakashan
Language
Sanskrit
Pages
136
Library
Adarsh Library, Jaipur
Classification
Literature
DLI number
552223
Barcode
4990010032937.00
Scanning centre
C-DAK, Kolkata
Digital publisher
Digital Library of India
VMLT id
PKzg2YOjU1t
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