Sanmati Library, Jaipur
Shrimaddayanand Chitravali Arthat Aarya - Chitravali (vol - Iii)
Front matter
5.7 अपि-निर्वाण भई शतान्दि संस्करण- យយយយខ្ញុំ! ----- ... 13 ग.२८१७ - dra आ३म् . श्रीमद्दयानन्द चित्रावली आर्य-चित्रावली b cabubbbb៦៦៦៦៦៦៦៦៦៦៦ ២ का. तृतीय संस्करण .. सम्पाटक- ANHAI - गोविन्दराम-आर्यसेवक कलकर.।। PUR Lucrsastustastastosta सर्वाधिकार सुरक्षित तृतीयवार मूल्य २) श्रीमदयानन्दान्द १०६ विक्रमाद १९९० ११०० इको films A အ कल प्रकाशक- गोविन्दराम हासानन्द २०, कार्नवालिस स्ट्रीट, कलकत्ता। दिका कालय ल २०, 21 OR मुद्रक- गोविन्दराम हासानन्द "वैदिक प्रेस" २०, कार्नवालिस स्ट्रीट, कलकत्ता ।
ग.२०१७
* ओ३म् ।
-ईश्वर-प्रार्थना
ओ३म् चित्र देवानाउदगादनीकं चक्षुभित्रश्य वरुणस्याग्नेः । आमा-
द्यावापृथिवी अन्तरिक्ष यात्मा जगतस्तस्थुपश्चा स्वाहा ॥ यजुः ॥
हो
ऐसी ॥
प्रभो ! तुम्ही हो जगतके कर्ता ॥
तो सृष्टि मेरी विचित्ल कर दो ॥
गुजर गये सो गुजर गये दिन ॥
बस आजसे सच्चरिन्न कर दो ।
पवित्रता प्रदान
पवित्र हो गुप्क्ष कर्म जिससे ॥
पवित्र उस कर्मसे बचन हो ।
वचनसे मनको पवित्र कर दो ॥
स्वभाव. गुणा. कर्म लक होचित्रित॥
तभी तुम्हारी
चित्रकारी॥
खिंचा है कागज पैचित्र जिनका ॥
उन्हींका हम सबकी विश कर दो।
तर
---
*
ओ३म् कृतं मे दक्षिणे हस्ते जयो मे सव्य
आहितः। गोजितु भूयासमश्वजिद् धनंजयो
हिरण्यजित् ॥ अथव०७। ५०। ८॥
मेरे दाहिने हाथमें सत्य अथवा सुकर्म है और
बायें हाथमें विजय है। मैं गौ, अस्व, धन, धान्य
और सुवर्णका विजेता (स्वामी) वनं। भावार्थ
यह है कि जो सलादि सत्कर्म करता है वही
सर्वत्र विजय और सांसारिक विभूतियोंको प्राप्त
करता है।
IYAPAN
Pomen-s- श्रीमद्दयानन्द-चित्रावली भूमे मातार्ने देहि मा भद्रया सुप्रतिष्ठिम् । संविदाना दिवा कवे श्रिया माधेहि भूत्याम् ॥अथर्व०॥ भारत माता SANTO SHRI pon ओ३म् " h RO C-N- 5 । maran . 8 , उत्तिष्ठत जाग्रत प्राप्य वरान्निवोधत।
No text on this page.
ऋषि-मडल श्रीनदयानन्द-चित्रावली- श्रीमद्दयानन्दाष्टकम् जग वेदाऽभ्यासपरायणोमुनिवरोवेदैकमार्गेरतः । नाम्नायस्यदयाविभातिनिखिलातत्रैवयोमोदते ॥ ये नाम्नायपयोनिधेर्मथनतः सत्यपरंदर्शितम् । लब्धं तत्पदपद्मयुग्ममनघं पुण्यैरनन्तैमया ॥१॥ भाषा छन्द-सवैया (१)-उत्तम पुरुष भये जो वह धर्मके हेतु धरै जग देहा। धन धाम सभी कुर्वान करें प्रमदा सुत मीतरु कांचन गेहा ।। सन्मार्गसे पग नाहि टरे उनकी गति है भव भीतर एहा। एक रहे दृढ़ता जगमें सब साज समाज यह होवत खेहा ॥ (२)-इनके अवतार भये सगरे जगदोश नहीं जन्मो जगमाहीं। सुखराशी अनाशी सदा शिव जो वह मानवरूप धरे कभी नाहीं ॥ मायिक होय वही जन्मे यह अज्ञ अलीक कहें भवमाहीं। यह मत है सब वेदनका वह भाष रहे निज वैननमाहीं ॥ (३)-धन्य भई उनकी जननी जिन भारत - आरतके दुखटारे । रविज्ञान प्रकाश किया जगमें तव अंध निशाके मिटे सब तारे।। दिनरात जगाय रहे हमको दुःखनाशक रूप पिता जो हमारे। शोक यही हमको अब है जब नींद खुली तव आप पधारे ॥ (४)-वैदिक भाष्य किया जिनने जिनने सब भेदिक भेद मिटाए । वेद ध्वजा करमें करके जिनने सत्र वैर विरोध नसाए । वैदिक धर्म प्रसिद्ध किया मत वाद जिते सव दूर हटाए । डूबत हिन्द जहाज पिखा अव जासु कृपा कर पार कराए ॥
श्रीमद्दयानन्द-चित्रावली
-
योगीराज
महर्षि दयानन्द सरस्वती।
REPARRER
( भी)
No text on this page.
श्रीमदयानन्द-चित्रावली-
(५)-जाप दिया जगदीश जिन्हें इक और सभी जप धूर मिलाए।
धूरतधर्म धरातलपै जिनने सब ज्ञानकी आग जलाए ।
ज्ञान प्रदीप प्रकाश किया उन गण महातम मार उड़ाए।
डूवर हिन्द जहाज पिखा अब जासु कृपाकर पार कराए ।
(६)-सो शुभ स्वामी दयानन्दजी जिनने यह आर्य धर्म प्रचारी।
भारतखण्डके भेदनका जिन पाठ किया सब तत्व विचारा॥
वैदिक पंथ पै पांव धरा उन तीक्ष्णधर्म असीकी जो धारा।
ऐसे ऋषिवरको सज्जनों कर जोड़ दोऊ अब बंद हमारा ॥
(७)-व्रत वेद धरा प्रथमें जिसने पुन भारत धर्मका कीन सुधारा ।
धन धाम तजे जिसने सगरे और तजेजिसने जगमें सुतदारो।
दुःख आप सहे सिर पे उसने पर भारत आरतका दुःख टारा।
। ऐसे ऋषिवरको सजनों कर जोड़ दोऊ अब बंद हमारा ॥
(८)-वेद उद्धार किया जिनने और गप्पमहातम मार विदारा ।
आप मरे न टरे सत पंथसे दीननका जिन दुःख निवारा ॥
आन उद्धार किया हमरा जो गिरें अब भी तो नहीं कोई चारा।
ऐसे ऋषिवरको सज्जनों कर जोड़ दोऊ अब बंद हमारी ॥
-अ.यमुन
श्रीमदयानन्द-चित्रावली-
(चित्रपरिचय)
शिवरात्रित्रत और ऋषिबोध ।
भजन
टैक-प्रत करिये शोच विचार, बुद्धी दिया है ईश्वर तुमको ।
मातु पिताकी आज्ञामानी, व्रत शिवरात्रिकी हृदय में ठानी।
ना कीने कुछ फलहार, बुद्धी दिया है ईश्वर तुमको ।
बत बच्चेने इक कीना, जो फल सब भारतको दीना।
टारे अविद्या अन्धकार, बुद्धी दिया है ईश्वर तुमको ।
अनुभव चुहे मूर्तिसे पाई, उस पर ज्ञान दृष्टि दौड़ाई।
क्या इक निकरी शब्द पुकार, बुद्धी दिया है ईश्वर तुमको॥
अविद्या अंधकार मिटाओ, वेदोंका परकाश बढ़ाओ।
इन पोप पाखण्डको टार, बुद्धो दिया है ईश्वर तुमको ।
खुले नेत्र सब भये उजाला, हरिदत्त उठ खड़ा निराला ।
चलें स्वामी दयानन्द चिन धार, बुद्धी दिया है ईश्वर तुमको॥
दयानन्द जीवनसाव्यसे
उधृत
श्रीमद्दयानन्द-चित्रावली- 4M - -- rate . .. - - -- . M- PM dia ---- --- शिवरात्रि जागरण और ऋपिवोध । ..
श्रीमद्दयानन्द चित्रावली-
-
MH
।
-
।
--
L
,
.
"
C
II
anान सकता।
श्रीमइयानन्द-चित्रावली-
.
.
,
(चित्रपरिचय)
भग्नि और चचाकी मृत्यु समय विचार तरंग।
॥ भजन ॥
टेक-क्या करना हृदय गुमान, जिन्दगीका नहीं ठिकानां ॥
सवका कालने किया सँहारा, जो जन्मा सो सभी पधारा ।
दो दिनका मिहमान है, फिर आखिर सभीको जाना ॥
क्या करना हृदय गुमान जिन्दगीका०
धनी वीर अझ सानुकारे और तपस्वी सभी पधारे।
भगनी चचा किये पयान, ऐसे हमको भी है जाना ॥
क्या करना हृदय गुमान जिन्दगीका
उनइस वर्षका बचा भाई, ज्ञानकी दृष्टी रहा लड़ाई।
सब कहते निर्दय जान, जरा हृदय दरद न आना ॥
क्या करना हृदय गुमान जिन्दगीका
नहिं हृदय जरा दुःख लाया, नहिं आंग्वसे नीर बहाया।
हरिदत्त अमर वे लिया किया पयान बालक हृदयमें अपने मना ।
क्या करना हृदय गुमान जिन्दगीका.
धन दौलत पित मातको त्यागे, पर उपकारमें चितको पागे ।
स्वामी दयानन्द चितठान अपनी देह खाक सम जाना ।।
क्या करना हृदय गुमान जिन्दगीका०
दगानन्द जीवनकाव्यसै उद्धृत
.
श्रीनशानन्ह-नियावली-
(चित्रपरिचय)
पिताले अन्तिम भेट।
शिवरात्रि व्रतसे तथा भग्नि और चाचाकी अकाल मृत्युसे बालक मूलशङ्कर
अत्युञ्जय अमृत फलको खोजके निमित्त १६ वर्षकी अल्पायुमें घरद्वार छोड़ योगी
तपस्वियोंको खोजमें घुमता २ सिद्धपुरके महामेलेमें जहां अनेक साधु सन्त इकडे,
हुए हैं आ पहुंचे।
स्वामीजीके पिताने भी किसी परिचित व्यक्तिसे समाचार पाकर कुछ पहरेदार
साथ ले सिद्धपुर मलेमें पधार पुत्र मूलशङ्करको इस भेवमें देख क्रोधित हो कहते हैं।
। छन्द
करि क्रोध अरुणारे नयन पितु वयन तीक्षण बोलेऊ। .
हा कलंकी शंकना तोहि कुल कलंकको खोलेऊ ॥
करि क्रोध गेल्या वसनको गहि फारि महिमें डारेऊ।
अरु कर कमण्डल पटकि महि धरि वांह दोऊ झटकारेऊ॥
लख कमल पदं पितुके परे, अह हाथ जोरि सुनावऊ ।
हरिदत्त कहे आसक्त कद हम चलत साथ पधारेज ॥
चौपाई
यद्यपि कहें चलहिं हम ताता। तदपि न मान्यो यह कछु बाता।
पहरा हेतु करन रखवारी । उभै सिपाही को बैठारी ॥
दीन सूचना भागि न जाहीं। वैठि रहे पर कछु आँचाहीं ॥
तृणते कुलिश कुलिश तृण करहीं। तासु उपासक कव बंध रहहीं ।
जेहि तेहि करिकें रैनि सिरानी। भोर होत दृग सब अलसानी ॥
आहट लिये गये सब सोई। तवहीं चत्यो सबहि मुखगोई॥
लोटा हाथ नीर भरि लीने । शौच कर्म मिस चित उत दीने ।
चितवत इतउत चंचल धावें। छिपन हेत कहुं ठाम न पावें ॥
यहि विधि कछुक दृरि चलि गयऊ । वर विशाल इकदीखत भयऊ॥
न्य नन्द जीवनकावते उन्था
श्रीमदयानन्द चित्रावली
-
Porn
Ben daha hapo tena na
ar
AMMAR
.
PumanAN
सिद्धपुरके मेलेमे शुद्धचंतन्य ब्रह्मचारी और पिताजीसे अन्तिम भेट ।
श्रीमदयानन्द-चित्रावली
T
4..
--
.
.
AM
-
m
-
7
TILI
गुरु विरजानन्द के समीप विद्याध्ययन ।
-चित्रावली-
(चित्रपरिचय)
गुरु सेवा और विद्याध्ययन ।
HTAS
चौपाई
मन क्रम करै गुरूकी सेवा । इनहि त्यागि नहिं मानहिं देवा ॥
प्रति दिन जाय यमुनाके तीरा । गुरू हेत आनहिं भरि नीरा ॥
स्वच्छ नीर स्नान करावें । पोवन हेत डुवि मध्यते लावै ॥
करहिं परिश्रम दौर लगावै। ऐसे कई मोल लौं जावै ॥
मन्दिर केर किवाड़ लगाई। कसरत करहिं परिश्रम लाई॥
व्यर्थ नहीं वकवाद सुहावै । नारि देखि भगि दूर लौ जावै ॥
विद्यारथिहिं सिखावहिं योगा। ब्रह्मचर्य साधन उपयोगा॥
लखि ब्राह्मण शिक्षा यह देहीं। सन्ध्या तर्पण यज्ञ सनेही ॥
भजन
गुरु मिले जो विरजानन्द आनन्दके देने वाले ॥
विद्या भण्डारकी चाभी दीने, देश उधारको शिक्षा कीने ।
तन मन अर्पण करि लोने, श्रीस्वामी दयानन्द आधर्मके फन्द हटाने वाले।
गुरु मिले जो विरजानन्द आनन्दके देने वाले ॥
गुरुजी अपने चिनमें ठानी, स्वामी जो पर दयाको आनी।
चेला करे हरे दुख भारतके, द्वन्द वेड़ा धर्मके खेने वाले ॥
गुरु मिले जो, जैसा चहिये चेला करना । वैसेही गुरुने शिक्षा करना
गुरुके प्रणको राखे चेला, हटा नहीं हर बन्द आधर्मकी ध्वजा हिलाने वाले।
गुरु मिले जो विरजानन्द आनन्दके देने वाले
मुनि-इन्दु-अङ्क-मयङ्क-विक्रम-वर्ष, कार्तिक-मास था,
तव, एक आया छात्र, जो धारे हुए “संन्यास" था;
. उस ने सुनी श्रुनि-प्रिय सु-शंसा पूर्व विरजानन्दकी,
इस हेतु आ, कुटिया गहो उस 'शुद्ध-सुपनाकंद' की,
धोबणानन्द-चित्रावली २ दीपावली काली-निशामें जव चमक चमका चुकी, औ, उस अमामें अँधेरी फैल कर, सहसा रुकी, बन-बस्तियों में जय अँधेरेके सजे सथ साज थे, जब झाँकते ऊपर छिपे-से दूज को द्विज-राज थे, ३ उस 'मोरवी' को मेदिनीसे उस हिमालय-शीर्ष तक- तप-तप्त-तनुजो "सत्य-शिव" को खोजता, बैठान थक रमता हुआ 'योगी' वहीं आया कुटीके द्वार पर ! धीरे किंवाड़े खटखटाने बह लगा जिज्ञासु-वर !! ४ मुनिने कहा- "है कौन ?" "मैं हूँ-दयानन्द सरस्वती; "क्या चाहते।" "विद्या", "कहो-कुछ हो पढ़े ?,';- -बोले व्रती:- "सारस्वतादिक व्याकरण के ग्रन्थ मैंने हैं पढ़े"; कुंडा खुला तय, और वे अालिका-ऊपर चढ़े ! ५ पादाभिवन्दन कर, हुए उपविष्ट ऋषि-निर्देश से, महाराज ने कुछ ली परीक्षा आप प्रश्न-विशेष से; महाराज बोले फिर-"पढ़ा बहु ग्रन्थ-भाग अनार्ष है सुन्दर, सरल औ सत्य हे बटु ! अन्य शैली आर्ष हैं ! ६ "तुम चित्तसे यह सर्वथा दोगे कु-पद्धति त्याग जब, उस आर्ष-पद्धति-मर्म का गौरव सकोगे जान तब !
श्रीमदयानन्द-चित्रावली पिपर 11 Ms- - . . . R । . . Moon AMAP Home - PM श्री गुरु विरजानन्द सरस्वती। प्रज्ञाचक्ष । (उ)
No text on this page.
-चित्रावली- बहु क्षुद्र, जो हठ-वश गए कर ग्रन्थ-ग्रन्थन-कार्य है, सुनिए-उन्हीं में एक 'अनुभूति-स्वरूपाचार्य' हैं। त "पण्डित सुपण्डित-मण्डली से बाद में जब लीन थे, तब ''सु'-"क्षु" कहा गया, वे वृद्ध दन्त-विहीन थे। रोका 'अशुद्ध-प्रयोग' पण्डित-मण्डली ने जब वहाँ, हठ से स्वकीय-अशुद्धि की तब वृद्ध ही ने की न हाँ, ८ "प्रत्युत तभी रच एक "सारस्वत” दिया पोथा नया। चाहे न जगमें 'पुक्षु' उसका शुद्ध वह माना गया । बुड्ढा रहा निर-लज्ज हो कर, झूठ पर ही वह डटा । वह भ्रष्ट-पुस्तक रच, मरण तक वह नहीं हठ से हटा ॥ m 0 इन सब अनार्ष-कु-पुस्तकों को जो नदी में दो वहा, तो, आर्ष-पुस्तक हम पढ़ाए", तब वटुक ने यों कहाः- -गुरुदेव ! शुभ आदेश शिर पर धारता हूं मैं यही ! ब्रह्मर्षि ने जिज्ञासु से फिर उस समय ही यों कही: १० अब आर्ष-ग्रन्थों का वटुक उपदेश वे पाने लगे; उपदेश-रवि से आन्तरिक वे कक्ष खिल जाने लगे। श्रीमान की उपदेश-सारस-स्रग रहीं सौरभ-सनी; वटु की वर-वृत्तियां भ्रमरी बनीं; ११ आनन्द-प्रद-गुरु का अतुल-अनुराग ज्यों उद्विक्त था- होता वटुक-मस्तिष्क त्यों पीयूष-वृष्ट्यभिषिक्त था ! निज-शिष्य की श्रीमान उत्कट तर्क-शैली देख कर, होते प्रभूत प्रमुग्ध, पुलकित, प्रेमपूर्ण, प्रहर्ष-पर ॥ उस काल मत्त-सी
-
श्रीमदयानन्द-चित्रावली
१२
विद्या-विनोद-प्रमोद-वश हो शिष्य औ गुरु-वर कभी-
युक्ति-प्रयुक्ति-पृषत्क-वर्षा बैठते जय कर कभी-
मुत्-पूर्ण होता दर्शकोंका उस समय हत्-स्थान था !
होता तभी द्रोणाऽर्जुनीय सु-रम्य-रणका भान था !!
१३
गुरुदेव तब उस शिष्य की करते सुशंसा भी, अहा ।
ब्रह्मर्षिने यों भी किसी दिन प्रेममें आ कर, कहा:-
"कोई करे क्या याद तुम से, कालवाक् तुम हो महा ।
तुम
में कुमत विध्वंस हित है पूर्ण वाग्वल आ रहा ॥
"
"सब पर बली है काल जिस विधत्यों तुम्हारी तर्क है ।
होता हमें हे भद्रप्रज्ञ,
प्रतीत भद्रोदक है॥
नाना पढ़ाए छान, पर पाया न यह आह्लाद था।
ऐसा किप्ती के भी पढ़ाने में न आया स्वाद था ॥"
कवित्त
पढ़िके वेदान्तसूत्र महाभाब्य अब्दाध्याई औरहुं प्रकार ग्रन्थ चित्त माहि धारे हैं।
विदा होन मथुरासे भेट लिये गुरु हित आधा सेर लौंग कर मधुरे उचारे हैं।
वोले कर जोरि प्रिय अमिय रस बोरि, गुरु काह देव दक्षिणा न पासहू हमारे है।
हरिदत्त अतिही असक्त हूं गुरुजी, काह देउ दक्षिणान मिलत संसारे हैं।
or
शिष्य सचा तुम देहु भेंट बच्चा मैं मांगता हूं दक्षिणा जो देनेके योग्य हो।
करो विद्या प्रचार सारे घूमिके संसार उपकारःनाहि त्यागेहु जो स्वर्गहूको भोग हो।
सत्यशास्त्रोंका उद्धार मतमतान्तरोंको टार वेद धर्मको अधार जो डूवा लगा रोग हो।
हरिदत्त पुस्तक कसौटीनात्यागो कभी चले स्वामी दयानन्द सोवते जनु जाग हो।
दयानन्द जीवनसाव्यसे उधृत
श्रीमदयानन्द-चित्रावली- - . , -- र । + son h 4- R- -- M A- -- गुरु-दक्षिणाका अपूर्व दृश्य ।
--
>
A
माम
SAPAR
न
wimmelan
।
अद्वितीय व्याख्याता स्वामी दयानन्द सरस्वती।
(फोटो महाराजा शाहापुरासे प्राप्त)
श्रीमद्दयानन्द-चित्रावली-
( चित्रपंरिचय)
विद्या पढ़ कर, महर्षि दयानन्द धर्म प्रचार में प्रवृत्त होते हैं।
भजन
क्या चला वीर अलवेला जो धर्मकी झण्डा फहराता है ।
गुरुकी मणिको उरपर धारी क्षमा पैन जो लिये कटारी।
स्वामी विरजानन्दका चेला, वो चला अकेला जाता है ॥ क्या
वेद सार जो बनी भुशुण्डी धीरज बख्तर पहिरके डण्डी ।
मन शुद्ध अश्व ले ठेला, धर्म अस्त्र वरसाता है ॥ क्या चला.
साधन श्वांसा किला बनाये मुखद्वारा जो मारु लगाये।
ब्रह्म अस्त्रसे झेला, तहं नकली वीर भगाता है ॥ क्या चला वीर
जहां डटे तहं किला ढहाये, नकली नृपतिको मारि भगाये।
क्या धर्म युद्ध वो खेला, वो जरा हार ना लाता है ॥ क्या०
गुरुकुल शिक्षा हेत बनाये, विद्याको अंधकार नशाये।
वेदमणीके उजाले जहं देखो साफ दिखाता है ॥ क्या चला.
सुनो आर्य अब मेरे प्यारे, गये किले अब मिले तुम्हारे ॥
रक्षा करो कर मेले, नाहिं धर्म किला फिर जाता है । क्या.
पोप सिपाही सों बच रहिये आलस निद्रा सदा नशइये ।।
सत्यके वख्तरके उरलेले, कोई अस्त्र न शस्त्र विधाता है ॥ क्या०
धर्म किला जो गया तुम्हारा, मिलना था यह हु मै करारा ।
हरिदत्त स्वामीदयानन्द दुखझेले तव ओम्को झंडा फहराता है।
क्या चला बीर अलवेला जो धर्मकी झण्डा फहराता है ॥
दयानन्द जीवनकाव्यसं उद्धृत
हरिगीतिका।
वह मत-मतान्तर की न हटती क्यों अन्धेरी -रात फिर ?
होता न वैदिक-धर्म का क्यों दिव्य-पुण्य प्रभात फिर ?
होती न अन्ध-परम्परा किस भाँति आप समाप्त वह ?
होती सफलता क्यों न सन्मुख हाथ-बाँधे प्राप्त वह् ।
-
श्रोमदयानन्द-चित्रावली
कर्नल ब्रूक और स्वामीजीका वार्तालाप ।
कनल व्रक एक विख्याता । एजंट गवर्नर जनरल पाता।
गेरुवा देखि होय रिशिभारी ! अरुण नयन करि दें बहुगारी॥
एक दिवसका सुनहु हवाला । टे स्वामी बाग रसाला ।
कुर्सी डारि वागके माहीं। आवत साहब परे लखाई ॥
दोहा-सवै कहे हठि जाहु ऋषि, और डटे मग आय ॥
स्वामी ताजमिके रगड़को, समुझि रहे मनमाय ॥
आवत देखि उठे अगुवाई। टहरन लगे बाट महं जाई ।।
टोपी शिरते दियो उतारी। मिले स्वामिसों हाथ पसारी॥
बैठे दोउ जन कुरसी डारी। वार्तालाप किये तहं भारी॥
स्वामी पूछे साहय पाहीं। मानन धर्मको हो की नाहीं॥
तब साहब अस कह्यो वुझाई । धर्म स्थापन है मन पाहीं ॥
पर नुकसान लाभ पर सारा । धर्म अधर्मको करहिं विचारा॥
जामें लाभ सोई है धर्मा। हानि पापका मानत कर्मा।
दयानन्द बोले हरषाई। साहबसों यह प्रश्न उठाई ।।
भला करहुतुम लाभकी हानी । शोंचहु यामें बहुत गलानी ॥
दोहा-साहब तब पंछत भयो, कहो मोहिं समुझाय ॥
स्वामी तब बोलत भयो, तुम कहँ नाहिं लखाय ॥
अहै लाभ कि है कछु हानी। गौरक्षामें कही बखानी॥
अहै लाभ कछु हानि नहीं है। आपने सत्यहि सत्य कही है।
फिर क्यों मारत गाय विचारी । भला तुमारी काह विगारी॥
साहब कह यह सत्य बतावै । काल्हि हमारे बँगले आवें ॥
होइहि बात चीत तेहि ठाहीं। साहब अस कहि गयो तहाहीं॥
दुसरे दिवस स्वामिके पासा। आये घोड़ा गाड़ी खासा ।
रामस्वरूप ज्योतिषी साथे। स्वामी चले धर्मके गाथे ॥
गये प्रविशि बँगलाके माहीं । बैठायो स्वामिहिं धरि बाहीं॥
दोहा-गौरक्षाके विषय पर, होत वार्तालाप ॥
वेद शास्त्रते घेरिकै, स्वामी लीन्हें छाप ॥
श्रीमदयानन्द-चित्रावली
-
*
M.4-
NOM
--
.
--
.
man
राजस्थानके पोलिटिकल एजेन्ट कनल ब्रूकसे गोरक्षापर वार्तालाप ।
श्रीमदयानन्द-चित्रावली- . . b-in- میرم . T A KOULiisa सर्वत्यागी दयानन्दपि। हरिहार कुम्भ मेलेकी समाप्तिपर सर्वस्त्रयाग।)
श्रीमदयानन्द-चित्रावली- ( चित्रपरिचय) संवत् १९२४ के हरिद्वारके कुम्भ मेले पर सत्योपदेश और सर्वस्व त्याग। चौपाई। जबतक मेला रहे अपारे । वेद धर्मको स्वामि प्रचारे । भये समाप्त विचारमें पागे। धर्म पुरातन शोचन लागे । पुनि शोचन लागे मनमाहीं । यह अन्धकार हरहिंकी नाहीं ॥ तबतक हृदयसे शब्द सुनाई । विद्या पढ़हु बहुरि चितलाई ॥ करहु धीर धरि तप मन लाई । तब कछु करिहौ शब्द सुनाई। "सर्व वै पूर्ण स्वाहा” । करके सत्र निश्चय यह चाहा ।। जो कुछ रहा भवनके माहीं । दीन वांटि संबको तेहि ठाहीं॥ वर्तन पलँग पीताम्बर धोती । शाल दुशाल और जो होती॥ रोकड़ सहित सवै वटवाई। केवल आप लँगोटी लाई ॥ महाभाष्य अरु वस्त्रहुं साथे । गुरुपहं दीन भेजि कोउ हाथे । दोहा-बानी अवधूम मूनि तह, माथे भस्म लगाय ॥ तहते स्वामी चलि बसे, गङ्गातट नियराय ॥ चौपाई। तब लोगोंने पंछन लागे। क्यों स्वामी ऐसे क्यों पागे। तव स्वामी अति निर्मल बानी । बोलि उठे उत्कठा जानी॥ सत्य ग्रहणकी करहिं उपाई। याते सबका देत बिहाई॥ यह जंजाल-जाल करि भारी । निबहन देत न सत्य सँघारी ॥ सवैया भारतकी लखि दीन दशा दुखमाशन हेन लिये इन टीका । त्यागि दिये पुर वस्त्र नहीं तन एक नंगोर सोऊ नहिं नीका ।। भारतके अब संकट टारन वेद प्रबारनको सुख फोका ।' हरीदत्त सत्य पराक्रमके हित लोटत चालू में देखो ऋषीका ॥ दयानन्द जीवनकाव्यसे उधृत , - - । A श्रीमदयानन्द-चित्रावली- (चित्रपरिचय) करणवास में स्वामीजीका प्रचार तथा कण्ठी, तिलक छापकी निन्दापर ठाकुर कर्णसिंहका क्रोध और स्वामीजी पर तलवारका वार । तव चोले रईस क्रोधातुर । मन स्वामी ढिग चल न सरवर ॥ कहि कछु कटुक रीस उर आनी। बोला वचन भृङ्ग अस बानी॥ तुमरे सरिस गुरू कह दासा । सनमुख होहु न चलि है श्वासा ॥ स्वामी हँसि बोले मृदुवानी। शास्त्रार्थ हित लावहु आनी ॥ नहिं आवे तो हमही चलि हैं। हैं जो गुरू तो क्योंकर डरिहैं । यह सुनि ठाकुर गयो रिसाई। अनुचित शब्द कहत अकुलाई ॥ जो मम खंडन मंडन करिहों । तो तुमरे हित नोक न धरि हों। बुन्द अयात सहै गिरि जेसे। स्वामो ववन सहे तहं तैसे। दोहा- महामत गजयूब महं, पंचानन चलि जाय । स्वामि हृदय कछु शंकना, बोले वचन बढ़ाय ॥ शैर-इतना सुन कर करणसिंह क्रोधकर खोचली है तलवार ।। उसका था साथी एक जो सामने आकर हाथ उठाया। स्वामोजो भार धक्का उसको पोछे हटाया ॥ करना है अगर युद्ध तो जयपुर जोधपुर पास जावो । अगर करना हो शास्त्रार्थ तो हमारे पास ही आवो ॥ आपके जो गुरु रंगा चार्यको बुलावो ॥ वृन्दावन रहते हैं वहां पर किसीको पठायो । तो कठोर वचन सारे नयने फैल कर ॥ हिलाया सबके दिलको धम्को जैलकर ॥ सुनकर ठाकुर कृष्णसिंह आये हाथ लट्ठले ॥ कहे करणसिंहसे कृष्णसिंह पटुले ॥ छेडोगे अगर साधुको तो दिल में जान भी लेना || मचेगी आफन तुम्नपर भूल जाय ध्यान भी देना ।।
श्रीमदयानन्द-चित्रावली- -- क flower ason- Worl - Mus- राव कर्णसिंहका स्वामीजीपर तलवारका वार और स्वामीजीका नखार दो टुकड़े कर गवको फटकारना।
श्रीमदयानन्द-चित्रावली-
mom
-
.
1
--
.
.
-:
पानमें विप देनेवालको यह कहकर छुड़ाना कि “मैं ससारम किसोको कैद करवाने
नहीं आया किन्तु सबको मुक्त कराने आया हूं।"
-चित्रावली-
(चित्रपरिचय
अनूपशहरमें श्री स्वामीजी महाराज पधार मूर्तिपूजादि पाखण्डका खण्डन करते
। इससे स्वार्थी लोग चिढ़ गये। एक दिन एक दुष्ट स्वामीजीके समीप आ
र कर पान खानेके लिये भेट धरा। स्वामीजीने सहज स्वभावसे मुखमें पान
लिया, परन्तु रस लेते ही वे जान गये कि इसमें विष है। इसी घटनाको क
प्रकार वर्णन किया है।
चौपाई
वारीक विषयमा बुद्धिमें आवै। रज शक्कर गजना अलगावै ॥
ब्राह्मण दुष्ट तहां इक आयो। खण्डन मूर्तिपै क्रोध लिवायो ।
दुष्ट पानमें जहर मिलाई। धर्म मूर्तिको दियो खिलाई।।
विदित भये की जहर खिलाये। न्यौलिक्रिया करि ताहि नशाये॥
हा मतिमन्द मूढ़ अज्ञानी। लाभहानि तुम सक्यो नजानी॥
हित अनहित पशु पक्षिहु जाना। व्है मानुष्य धुद्धि ना आना ॥
दोहा-जाको रक्षक ईश है, का करि सकै मनुष्य ।
धर्म धुरंधर स्वामिपर, नाहिं चली कछु वश्य ॥
तहसीलदारको मालुम भयऊ। कैद कियो ताकहूँ तेहि ठयऊ ॥
शय्यद अपने हृदय विचारे । स्वामी अस सुनि होंहि सुखारे ॥
स्वामी ढिग जब शैयद डोले। पर स्वामी कछु मुखहु न बोले ॥
शैयद कारण पूछन लागे। तब स्वामी बोले अनुरागे ।
कैद करन हित ना जग आये। जगत कैदको तोड़न आये ॥
यदि वह दुष्टपना ना त्यागा। भलमन्सी त्यागहि केहि लागा ॥
ब्राह्मणको दीन्यो छुड़वाई । भवन गयो ब्राह्मण हर्षाई ॥
खण्डन श्राद्धकी स्वामी करहीं। शिक्षा सबहिं साथ अनुसरहीं ॥
दयानन्द जीवनकाव्यसे उधृत
mA
श्रीमदयानन्द-चित्रावली
4
-
(चित्रपरिचय)
विषधर सर्प और स्वामी दयानन्द
पौराणिक पद्धतिले विषधर सर्प भी एक पूजनीय देवता
माना जाता है। एक बार एक सर्प यूजक ब्राह्मण स्वामीजीसे
शास्त्रार्थ करने आया। उसने अपने पास एक बड़े डिव्वेमें एक
विषधर सर्प नित्य पूजाके लिये रख छोड़ा था। शास्त्रार्थ में
अपनी निर्बलता जान सबके सन्मुख स्वामीजीपर यह कहकर
उस विषधरको फंक दिया-"लो, महादेव आप ही न्याय कर
देगें कि तुम सचाईपर हो या मैं"। वह सर्पद्वारा स्वामी-
जीकी समाप्ति कराना चाहता था, परन्तु ईश्वरको अभी ऐसा
करना स्वीकार नहीं था। इसपर स्वामीजोने एक ही झटके में उस
विषधरको, जो उनके पैरों में लिपट गया था, परे केंक दिया
तथा तत्काल उसका सिर अपनी एंडीसे कुचल दिया, साथ ही
उस ब्राह्मणकी ओर मुख कर कहा, 'तेरे देवताने बहुत देर
लगाई और मैंने फैसला शीघ्र कर दिया।" पुनः उपस्थित.
सजनोंकी ओर संकेत कर कहा-'जाओ और लोगोंको..
बतलाओ.कि झूठे देवताओंका इस प्रकार नाश होता है”।
इस घटनाका वर्णन स्वर्गीय मैडम ब्लैवैडस्की -(भूतपूर्व
प्रधाना थियोसोफिकल सोसाइटी) कृत 'केस ऐण्ड जंगल्स फौम
हिन्दुस्तान' नामक पुस्तकमें है।
मा
श्रीमदयानन्द-चित्रावली-
IHULE
ASHTRA
एक ब्राह्मण देवताका स्वामीजीपर शिक्के गलेके हार विषधर सर्पको फेंकन
और स्वामीजीका झटककर सर्पको कुचलना और लोगोंको कहना
कि “झ ठे देवताओंका इस प्रकार नाश होता है।"
श्रीमद्दयानन्द-चित्रावली- 57T A MATO NAM- PM Ch . ؟ x . ماما ism Dine - + AAM MA शास्त्रार्थ काशी।
-
-चित्रावली-
( चित्रपरिचय)
काशी शास्त्रार्थ।
दोहा-इस शास्त्रार्थ के सब हालको, जो तुम चाहो जान ॥
'काशी शास्त्रार्थ'को देखिये, लखिये करि भल ध्यान
चौपाई।
पर संक्षेप कहथ कछु गाई । सुनिये आर्य कहों समुझाई ॥ .
प्रथम मूर्ति पूजा चितधारी । शास्त्रार्थ रण सबहिं विचारी।
पण्डित अपने प्रकरण त्यागे। जगतके कारण कर्ता लागे॥
स्वामी उत्तर देन विचारें । पण्डित करिगुल साथ पुकारें।
भये पहर इक शास्त्र भमेले । स्वामी तहां थे आप अकेले ॥
जिमि श्रलालमें सिंह अकेला । ताहि भांति स्वामी रण ठेला ।
पण्डित तहां बहुत हठ लीन्हें । पर भूरति नहिं निश्चय कीन्हें ॥
वार वार स्वामी ललकारे । वेद प्रमाणसे करहु निकारे॥
सोरठा-सुनि स्वामी के दैन, नैन बन्द करि ब्राह्मणन ॥
जाहिं बन्द हो नैन, तबहिं माधवाचार्यने ।
दोहा-काढि संस्कृत पृष्ठ कछु, स्वामिके किये हजूर ॥
कह .असत्य यह वेद है, देख लेहु भरिपूर ॥
चौपाई।
यज्ञ समाप्त करे यजमाना। करै श्रवण वह कथा पुराना ।
गृह्य सूत्रके पृष्ठ निकारी। श्रुतिके मन्त्र कहत यह झारी ॥
सब लोगोंने प्रश्न उठाई । पुराण शब्द अभिप्राय बताई ॥
तब स्वामी अस उत्तर दीने । सुनिये पण्डित सकल:नवीने ॥
पहिले असली संस्कृत पढ़िये । फिर आग पीछ सम्बन्धको मडिये।
स्वामि विशुद्धानन्द अस कीने । पृष्ट उठाय स्वामि कर दीने ॥
प. आप यह कहि धरि दीने । स्वामी कह तुम पढ़हु नवीने ॥
कह्यो विशुद्धानन्द बहोरी। चस्मा पास नहीं घर छोरी ॥
हट कीन्हे स्वामी कर लीन्हें इन्द्रजी अस्ताचल चित दीनें ॥
HAMA
খ্রীষ্মল-অনন্তী- चहुंदिशि भीरि तिमिर चहुं वोरा। स्वामि मांगे दीप अंजोरा ॥ पौराणिक इक बत्ती लाये। जामह एक तरफ लखाये ॥ दोहा-धुंवला नहिं कछु लखि परे, स्वामी कह तहँ टेरि । तनिक रोशनी लाइये, लाये पण्डित हेरि ॥ चौपाई। टूटी ललटेन इक लाये। धुम्र युक्त नहिं साफ लखाये ॥ खड़ा भया ले स्वामी :आगे। पढ़न लगे स्वामो मन पागे॥ लगा दुष्ट वह हाथ हिलाने । लखि चातुरता मन मुसकाने ॥ स्वामी लखत मिनटना बीते । स्वामिविशुद्धा उठि विपरीते ॥ कह नहिं ठहर सके कछु देरी। जीतकी डंका सवही टेरी ॥ स्वामी कह असभ्य यह रीती। शोचनीय हैं करत कुरीती॥ परको सुनइ ऋषीकी बानी। जिमि मेंढक बोलहिं परि पानी ।। ताहि भांति सब शोर मचाये । सुनव कौन उठि सव अगुवाये ॥ दोहा-लखि अनुचित इन्स्पेक्टर, रघुनाथप्रसाद नृप पास ॥ भला काह यह करतहो, शभा घात विश्वास ॥ चौपाई। तुमरे सन्मुख बनि अन्यायी। छूरी स्वामी गरदन लाई ॥ करि प्रवन्ध क्या करी उपाई। सो तो आवतहीं बिगराई ॥ आपको जानि रहे चुप साधी । अब असभ्यता बढ़त उपाधी ॥ यह सुनि नृपति- बांह करडारी। इन्स्पेक्टर युत आप पधारी॥ कहन लगे मारग महँजाई। इससे आपसे काह बुराई ॥ आप भी पूजक मूर्तिके अहहीं । शत्रु ते आपन विजयको लहहीं। समाचार यह पेपर माहीं। छापे सत्य थे दुरयो नाहीं॥ पत्र विपक्षी लखि बलहीना । सत्यहि सत्य प्रकट सो कीना ॥ दोहा-पौराणिक विद्वानके, गये पोल वियराय ॥ काशीकी सव विद्वता, सारी गई लखाय । . 4 दी -
नन्द-चित्रावली-
women
,
m
.
.
अद्वितीय व्य ख्याता स्वामी दयानन्द सरस्वती
[फोटो आर्यसमाज दनापुरसे प्राप्त ]
श्रीमयानन्द-चित्रावली
.
RIF
1
.
!
है
J
भारतके जङ्गी लाई रोवर्टस और निर्भीक सन्यासी।
-चित्रावली- (चित्रपरिचय) लार्ड रोबर्टस और निर्भीक संन्यासी। काशीसे निपटकर स्वामीजी सकरके कुम्न मेलेपर प्रयाग पहुंचे और वैदिक धर्मका प्रचार करने लगे। वहांले चलकर स्वामीजी मिर्जापुर, डुमरांच, आरामें धर्म-प्रचार करते हुए पटने पहुंचे। वहांसे दानापुरमें स्वामीजीके कई व्याख्यान हुए । एक दिन भारतवर्षके सेनापति लार्ड रावर्टस स्वामीजीके व्याख्यानमें पहुंचे। उस दिन स्वामीजीने ईसाई मतखण्डनपर व्याख्यान दिया व्याख्यानके अन्तमें सेनापतिजीने उठकर स्वामीजीको प्रणाम किया तथा उनकी बड़ी तारीफ की और कहा- "When you can speak in this fashion on the Bible in our presence you must care but little, for others. A real Sanyası will fear nothing." अर्थात्-"जव आप हमारी उपस्थितिमें इस प्रकार बाय- बिलपर भाषण कर सकते हैं तो और छोटे मोटे लोगोंकी तो आपको कुछ परवाह ही नहीं होती होगी। ठीक है, सच्चे संन्यासीको संसारमें किसीका भी डर नहीं ॥" .
श्रीनदयानन्द-चित्रावली (चित्रपरिचय) देहली दरवार। चौपाई श्री स्वामी करि सबहिं निमंत्रित । आये सज्जनगण तहँ पूरित ॥ शयनालयमें स्वामि जुहारे। निम्नलिखितगण तहां पधारे ॥ मुन्शी कन्हइयालाल अलखधारीवावू नवीनचन्द्र रायजी तहां पधारी बाबू केशवचन्द्रजी सेन। मुन्शी इन्द्रमणी सुख देन । दोहा-बाबू हरिश्चन्द्र चिन्तामणि, आनरेवुल सर शैय्यद खान ॥ उक्त महाशय जुटि गये, स्वामीजी-किये बयान ॥ कवित्त हम सब इस समय धार्मिक संशोधनमें, हुए हैं कटिवद्ध तो निवारण करें शंकाको। तो सच्चे धर्म शुद्ध भाव करिये सब ग्रहण मिलि, चलिये एक मार्ग शुद्ध भेदभाव वंकाको हषर् कुटिलताको करिये सब त्यागन अब, चलिये पयनीर सम मिलि सब ढंकाको। हरीदत्त सम्मति हमारी एक है यही, कहत स्वामी दयानन्द धर्महूं मयंकाको। , अननस्य दूर करनेका केवल उपाय एक, पहिले विरोध धर्मको दूर कीजिये। नहीं तो उपद्रव अशान्तिकी जड़ हैं, जासों अनुराग सत्य, सुहृद किमि कीजिये। चारों वेद ईश्वरको ज्ञान जो प्रचण्ड हैं, अक्षरशः अनुकूलता अनुयायितापर रीमिये हरीदत्त शंकाजो होय कछु हृदय महँ, हमसे प्रत्यक्षही प्रमाण -आप लीजिये। , नेत्रहीन जैसे संसारको अँधारो लखे, ताके समूर किमि अरसा दिखाइये। बहिरा क्या जाने कि रागसुर कैसे होत, ताके श्रवणलों वेदको सुनाइये। मांसहारी आगे जीव हिंसा व्याख्यान करें, ताके कठोर उर-दया किमि नाइये। ताही भांति हरीदत्त जडवत् चित नृपति सब, उठके पधारे सब कासों लेखाइये। दोहा-सबसों कहे पुकारके, मद्य-मांस श्रुति हीन ॥ यासों -इन्हें न खाइये, वेदसों मतौ प्रवीन । (दयानन्द जीवनकाव्यसे उधृत) ,
श्रीमद्दयानन्द-चित्रावली-
TE
महाराणी विक्टोरियाके दिल्ली राज्याभिपेकके समय ऋापे दयानन्दका श्रापशवचन्न सन, सर
सैय्यद अहमद, नवीनचन्द्र राय प्रभृनि सुधारकों के साथ देशोद्वार विपयार वार्तालाप ।
श्रीमदयानन्द -चित्रावलो
+
شہر
کانفر
इवल
वेट
ईसाई औरमुसलम नोंके साथ सत्यवमविचार ( मेला चान्द,पुर)
र
५ श्रीमदयानन्द-चित्रावली (चित्रपरिचय) मेला चांदपुर। चौपाई। मुन्शी प्यारेलाल रईश । मेला किये कहत सब बाईश ॥ भिन्न भिन्न मत होइ विरोधा। अरु सिद्धान्तमें करते क्रोधा ॥ दोहा-प्रत्येक सम्प्रदाय विद्वानको, लीजै यहां बुलाय ॥ सत्य मत :उपदेशकी, निर्णय करें बनाय ॥ सर्व सम्मतिसे धार्मिक चुनकर। कहहिं मत सबही गुनकर ॥ मुन्शी दृढ संकल्प ये कीने । लिखि अर्जा जो कलक्टर दीने ॥ आज्ञा प्राप्त किये तेहि काला। चांदापुर सब आय रलाला ॥ लिखे पत्र तहँ आय जुहारे । अति आदरसों सबहिं बैठारे॥ स्वामी दायानन्दजी सरस्वती । वैदिक आर्य समाजके हिती। मुन्शी इन्द्रमणी जी मुहम्मदी । मतिके प्रसिद्ध प्रति पक्षवदी॥ पादरी टी० जे० स्टाक साहब । इंजीलानुवादक लाजे शियनसब ॥ पादरी नवल साहव पारकर । साहब पादरी जान टाम्सनर ॥ मौलवी मुहम्मद कासिम उस्ताद ।मौलवी शयद अबुलमन्सूव आजाद दोहा-अपर पंडित सब आयऊ, जहं लगि थे विद्वान ॥ शिक्षित और प्रतिष्ठित, आये तहां महान ॥ मुन्शी प्यारेलालकी औरा । अतिथ्य प्रबन्ध भयो चहुंवोरा ॥ उत्तम अति स्थान सुहाये। अतिहिं विचित्र गये सजवाये ॥ यहांका सम्बाद अक्षरशः छपाई। पुस्तकाकार लखें मगवाई ॥ जाको पढि भये आर्य घनेरे । सदोपदेश Aऋषी जो टेरे ॥ स्वामी किये निरुत्तर सबको। धारा प्रवाह संस्कृत धमको । सन् अट्ठारहसो सतहत्तर । एकतिस मार्चको पाये अवसर ॥ स्वामी आय गये लुधियाने । सत्योपदेश करन तहँ ठाने । सुनि आगमन नगर चहुंवोरा । भद्र पुरुषको भयो बटोरा ॥ दोहा-सुनि २ आवे लोग सब, आप सुनहिं व्याख्यान ॥ प्रति संख्या बढने लगी, आवहिं पुरुष महान ॥ 1 M , । na 'ot
.
श्रीमहयानन्द-चित्रावलो-
( चित्रपरिचय)
पुष्प-वर्षा।
दोहा-अमृतसरते स्वामी जय, जान हुए तैयार ।
पौराणिक तब युक्ति करि, कहे लगे ललकार ॥
शास्त्रार्थ स्वामीसों करि हैं। इनसे काहु भांति ना टरिहैं ।
आर्य समाज दियो विज्ञापन । शास्त्रार्थ हित आइय सब जन ।
ना पौराणिक परे लखाई। तब लोगन अति लजवाई।
भगवानसिंह साहब सर्दार । निश्चय भय इनके दर्बार ॥
षट् सहस्र मानुष्य पधारे। शास्त्रार्थ हित सुनन करारे ॥
आये लगभग रईस तहँ सत्तर । चुने हुए विद्वान जो सुन्दर ॥
सन्मुख चौकी उभै बिछाई। गड़बड़ होय न जामें आई।
वोले नाहिं बीचमें कोई। कियो प्रबन्ध तहां सब सोई ॥
तहँ पर ऋछुक उजड्ड पधारे । जै जै करत शभा पगु धारे ।।
स्वामीके सन्मुख सब जाई। पत्थर ईट रहे बरसाई॥
बहुरि पुलिसकी:भय करि भागे । जान समय यह कहने लागे॥
दोहा-निज सिद्धान्तके पत्रको, काल्हि देहिं पठवाय ॥
स्वामी
कछु शंका नहीं, रहन लगे चित चाय ॥
चौपाई।
आय किप्तीने स्वामिसों भाखी । सर्व भेद कछु गुस न राखी ॥
स्वामि शिक्ख मारनके हेता। अइहैं स्वामी रहैं सचेता॥
जो जो सोक्त वहां पै आई। स्वामी सबसों को बुझाई ॥
यहांसे जाय अनत कहं सोवें। नाहीं तो पाछेसे रोवै॥
पौराणिक अमृतसर कैरे.। वेद नाम नहिं जानत कोरे ॥
सो स्वामीकी संगति पाई। लागे पढ़न वेदको आई ॥
तह के लोग धर्म ना जानैं। सवै इसाई मतको मानें ।
होन ईसाई सवी विचारी। पर स्वामीने जाय उबारो॥
-
श्रीमदयानन्द-चित्रावली-
.
THA
re
andualore udalaa
अमृतसरमे स्वामीजीके व्याख्यानोंमे पत्थरोंकी वर्षा और स्वामीजीका कहना कि मेरे
आक्षेपोंके उत्तरमे प्रतिवादियोंके पास यही पत्थर है, मेरे ऊपर यह फूलोंकी वर्षा है ।
.
im
SM
mins
O
।
.
श्रीमदयानन्द-चित्रावलो-
impr
।
ushrestha
U
जालन्धरमें वल-ब्रह्मचारीका ब्रह्मचय-बलका प्रदशन ।
भीमायानन्द-चित्रावली-
(चिनपरिचय)
बाल ब्रह्मचारीला अनन्त चल ।
अमृतसरमें ४० नक्युवकों को ईगाई बननेसे बचाया। पुनः
वहांसे गुरुदासपुरमें वैदिक नाद वजांत तुप तथा समाज स्थापित
करते हुए स्वामीजी जालंधर गार और मदार विक्रम सिंहकी
कोठीमें लगातार गाल्यान दिये तथा समाज स्थापित हो
गया । गक दिन मरदार महाशयन सामीजीरा कला-"आप तो
ब्रम्पयर्यकी महिमा यहुन यनाते हैं।' उत्तरमें स्वामीजीने कहा,
"हां, शास्त्राम जो प्रअनयता वर्णन किया गया है, वह सब
सत्य है।" दम पर मरदार नहाशगने पुनः कहा,-स्वामीजी,
आप भी बाल बमचारी पर आ तो वैसा पल प्रतीत नहीं
होता।" तप आपने कहा कभी देखा जायगा।" जब सरदारजी
स्वामीजीको नमस्ते कद कर विद्धा ही अपनी फिटिन पर चड़े
और कांचवानको गाडी हांकन कदा तव स्वामीजीने सहजसे उठ
कर फिटिनको हायसे पकड़ लिया-कोनवान घोड़ोंको चाबुकपर
बाबुक लगाता जाता था पर वाई टमसे मस म हुए।
उन्होंने मुख फेरकर पीछे देग्वा ताम्बानीजीको बग्गी पकड़े पाया।
सामीजोने तब यह कहते हुए गाड़ी छोड़ दी कि-"लो, तुम्हें
प्रात्मभयंका दृष्टान्त मिल गया। सरदारजी चकित हो चले गये।
, Fलामन्छ- विधावली ( चित्रपरिचय) वेश्यागामी नरेशको फटकार । दोहा-एक दिवस गुरुराज जब, पहुंचे राज-आवास, वेश्या नन्ही जान को, देखा राजन-पास ॥ राजा जीने लख मुनि आवन, तुरतहि नन्हीजान छिपावन । देखत अस कुदृश्य मुनेशा, वोले पुरित धर्म आवेशा॥ महा-'होकर सिंहों की सन्तान, कैसा नीच कर्म करते हो। "होते राजा सिंह समान, राजन सिंहो की सन्तान; कैले कुतिया का कर मान, अपनी लोक लाज हरते हो। करते कुतियाको तुम प्यार, तज कर हा कुलवन्ती नार, प्रबल ऐसा पाप प्रहार, भू को पापों से भरते हो। हाजन ! पजर जाओगे आप, सहकर दुर्व्यसनोंका ताप, गिर पर चढ़ बोलेगा पाप, क्यों इस अग्नि में जरते हो। छोड़ो छोड़ो एसे कर्म, धारो सद मर्याद सुधर्म, कीजे वैदिक कृत्य सुकर्म, क्षत्राई का दम भरते हो। दोहा-इस प्रकार उपदेश कर, लौटे रिषी तुरन्त । उत अक्षर अक्षर हुआ, राजा हृदय भरन्त ॥ चौपाई-नन्ही चल आई घर हांपन । खावत बल सम फणियर सांपन । जान रिषी उपदेश प्रभावा। अवश नरेश देय विसरावा॥ कुतियाकी उपमा सुन स्यानी। वैर प्रचंड धार रिस्यानी ॥ अस उपाय मन लगी सुझानी । जस प्रभु जीवन ज्योति बुझानी ॥ नन्ही अन्य द्रोहि मिल सारे। रिषि जीवन नसान मन धारे ॥ जगन्नाथ नौकर विश्वासी । रहत सदा रिषिके दिग पासी ॥ चार वर्षसे रह रिषि साथा। नित भोजन पकात निज हाथा ॥ सोहि नन्ही निज भवन बुलाई। बोली प्रेम सहित अकुलाई ॥ दोहा-बहु भारी इक काम है, जासु बुलाए आप । करके काम कठोर तू, करो दूर सन्ताप ॥
श्रीमदयानन्द-चित्रावली १% T- AAZ -4 N जोधपुरके राजमहलमे निर्मीक सन्यासीको वेश्यागामी नरेशको फटकार ।
श्रीमदयानन्द-चित्रावली-
T
.
रान
Hit
.
--
.
.
विप देनेवाले जगन्नाथ पाचकको (प्रणरक्षा) रुपये दे विदा करना।
"
नन्द-चित्रावली-
( লিবিয়)
विषदाताको प्राण दान ।
॥चौपाई॥
बहुतक देर बात रहिं होतो, बींध दिया कुल्टा ने मोती।
कनक कामिनी से अंधियाई, नयन-विवेक गए चुंधियाई ॥
चतुर्दशी अश्विनी वदीसा, दुष-सम्बत उन्नीस चलीसा ।
दुग्ध मांहिं विष विपम मिलाई, ऋषिवर को हा दिया पिलाई ॥
एकहि तस रातरि के अन्ता, कीए बहुत धमन मुनिवन्ता ।
जलन और व्याकुल्ता भारी, भई वेदना शूल अपारी ॥
रुग्ण भए अस अवसर हेटे, रहे अन्त तक ही मुनि लेटे।
जगन्नाथ को प्रात बुलाई, बोले रिषि इकन्त अकुलाई ।
॥ दोहा।
"जगन्नाथ यह क्या किया, विष सह दुग्ध पिलाय ।
काम न मम पूरा भया, पूर्वहि दिया बिलाय
॥चौपाई॥
सुनतहि अस रिषिवर की यानी, विप्रगात अरु मन कम्पानी ।
नैन नीर भर बोला पापी, 'नाथ किया अनहित मैं आपी ॥
पुन सब हाल सुनाया, सुन उमड़ी रिषिवर की दाया।
रिषि ने रुपे बहुत से लेकर, पापी के हाथन में देकर ।
कहा, 'अब विप्र विलम्ब न लावो, ले यह द्रव्य भाग द्रुत
ভাঙ্গা
'जाओ राज नेपालहि भागी, कहिं पकड़ा नहिं जाय अागी"
लेकर द्रव्यगात अति कम्पत, पापी हुआ वहां से चम्पत ॥
॥दोहा॥
मात बढ़ बहु वेदना, शूल और अतिसार ।
सूर्यमलजी डाक्टर, आए
रोरो
करन उपचार॥
भीनहसाबन्द-चित्रावली-
(चित्रपरिचय)
मृत्यु शय्या।
दोहा-कार्तिक कृष्ण चौदशी, बढी व्यथा अत्यन्त।
छाले सव हि गात पर, निकल पड़े इक्यन्त ।
रोवन लागे भक्त जन, सिसक सिसक अत्यन्त ।
दो दुशाल दो सौ रुपये, रिषि मंगवाय तुरन्त ।
चौपाई-एक शाल सौ रुपये लेकर, पंडित भीम सेन को देकर ।
पुन इक शाल रुपे सौ लेई, आत्मानन्द भक्त को देई ।
लक्षमणदास डाक्टर को वाहा, रिषि ने द्रव्य देन कुछ चाहा।
तीनहु फूट फूट कर रोई, लौटाई वस्तु सब सोई ॥
पुन सब भक्त शिष्य जन भागे, खड़े हुए आ रिषि के आगे।
प्रेम सहित सब को मुन देखा, सबहु ने रिषि ओर परेखा ।
पुन आदेश रिषि का पाई, खड़े पीठ पीछे भए जाई ।
पंडित गुरुदतादि सब जन्ता, पीछे खड़े दुखित अत्यन्ता ।
दोहा-उत्तम स्वर ध्वनि से रिषि, वेद मंत्र बहु गान ।
ब्रह्म-भक्ति-आनन्द का, समां बांध भगवान ॥
चौपाई-संस्कृत अरु भाषा में गाई, धन्यवाद ईश्वर का लाई ।
किया जाप गायत्री गाके, हो प्रसन्न आनन्द मनाके ।
पुन कुछ काल मौन रहे स्वामि, होय समाध अवस्था गामी॥
कछुक काल पीछे मुनिराई, धीमे इस प्रकार उचराई ।
"हे सर्वज्ञ सर्व शक्तिमन, हे कृपालु
"है यह सचमुच तेरी इच्छा, पूर्ण होय प्रभु तेरी इच्छा"
कह इतना कर प्रणव नादा, भए प्रभु मौन सदा को वांदा ॥
शतशः नर बहु शोक मनाई, किया दाह अगले दिन जाइ ॥
शाहपुरेशहि का उद्याना, तीर ताल जो "सागरआना"
अस्थी सब-रिषिवर की चयनी, सोहिं उद्यान गाढ़ सब दयनी॥
दयालु. भगवन"
श्रीमदयानन्द-चित्रावली
MMA
-
---
.
-
-
.
-
।
-
1
--
--
antar
J
.
।
M
.
veda
Dr.
M
महपि दयानन्द सरस्वती मृत्यु सय्यापर।
TI
No text on this page.
श्रीमदयानन्द-चित्रावली-
शोक-प्रकाश।
कः पदमिनीनां वद तिग्मदीधिति-
धर्मः परः कः कविवाचिकः स्थितः ।
का कण्ठभूवा न यमाद्विभेति कः
स्वामी दयानन्द सरस्वती यमी ॥
भावार्थ-प्रश्न-बताओ, पटुमिनियोंका सूर्य क्या है ? उत्तरः-स्वामी"
प्र०-श्रेष्ठ धर्म क्या है ? उ०-"दया"
प्र०-कवियोंकी वाणी में क्या रहता है ? उ०-"आनन्द"
प्र०-कण्ठका आभूषण क्या है ? उ०-- "सरस्वती"
प्र०-यमराजले कौन नहीं डरता है ? 30-"यमी"
इन पांचों प्रश्नोंका क्रमशः उत्तर श्लोकके चतुर्थ पादमें यह आ गया
है कि "स्वामी दयानन्द सरस्वती यमी" ॥
दोहा-नभ चवग्रह शशि (१९४०) दीप दिन दयानन्द सहसत्व ।
वय उनसठ वत्सर विच, भयो तन पञ्चत्व ॥
मनहर छन्द।
जाके जी है जोरते प्रपंच फिलासिनको अस्त सो समस्त आर्य मंडल ते मान्यो मैं ।
वेदके विरुद्धि बुद्धि सत्यके निरुद्धि सदा मन्द मन्द्र आदिन सिंह अनुमान्यो मैं।
शाता षट शास्त्रनको वेदको प्रणेता जेता आर्य विद्या अर्कगत अस्ताचल जान्यो मैं।
स्वामी दयानन्दजू के विष्णुपद प्राप्त हूते पारिजात को सो आज पतन पर मान्यो मैं।
(यह वाक्य साक्षात् श्रीमान् महाराणा सज्जन सिंहजी उदयपुर नरेश विरचित है)
योगको अगार गिरधार दृढ़ आसनको शिक्षक महीपनको त्रिदिवस सिधाइगो।
कुटिल कुराहिनको वाम मत चाहिनको हाय पशु हायनको इष्ट दिन आइगो।
करें जयकरण चार वर्णके विवरणको धर्म निज दयानन्द परम गति पाइगो।
तीन वेद शासनको सुमति प्रकाशनको आज सत्यभाषण वासन विलाइगो।
( कवि श्यामल दासजी)
.
..
+
शीमदयानन्द-चित्रावली- देश हितैषी। दयानन्द देश हितकारी तेरी हिम्मत पै बलिहारी। अविद्या जगमें छाई थी गफलत की नींद आई थी। तेरा आना था गुणकारी तेरी हिम्मत की बलिहारी। पातञ्जलि व्यास हो गुज़रे, भारत के दारा धो गुज़रे। तेरे आने की थी बारी॥ तेरी हिम्मत० ॥२॥ तू वेदों का प्यारा था तू भारत का सितारा था। तेरे दर्शन की बलिहारी॥ तेरी हिम्मत०॥३॥ तेरे जो पास आते थे, दिली संशय मिटाते थे। सभी भारतके नरनारी ॥ तेरी हिम्मत०॥४॥ तेरे तेजस्वी चेहरे से, तेरी ब्रह्मर्या विद्या से। डरी थी दुनियाँ तो सारी ॥ तेरी हिम्मत०॥५॥ चलाई ब्रह्म की पूजा, समाजें बन गई हरजा । तेरा उपकार है भारी ॥ तेरी हिम्मत०॥६॥ भारतके भाग खोटे थे हुआ स्वामी जुदा हमसे । हुआ दुःख सब को है भारी॥ तेरी हिम्मत०॥७॥ कह क्या कि स्वामी दयानन्द क्या था ? रिषि था फरिश्ता था या देवता था थे विद्या से भरपूर उसके खाजाने, शाहन्शाह था गो बजाहिर गदा था । रहा उन्न भर शेवते हक्क परस्ती। वतनका था शैदा धर्म पर फिदा था। था अखनूरो मसरूर पी जामे वहदत । खुदाका था वह और उसका खुदा था । अंधेरे में जो ठोकरें खा रहे थे। वह उन गुमराहों के लिये रहनुमा था । जिसे हमने गलती से समझा था दुश्मन । वही किश्तीये क़ौम का नाखुदा था। उसी की थी हिम्मत बचाया व गरना। निशां हिन्दुओंका मिटा जा रहा था। जुबां में श्री योगी की तासीर ऐसी। कि उसका रूखुन नवके वे खता था। किया जिसके झोंकों ने सरसब्ज गुलशन | वह बादे बहारी था बादे सवा था। घटाओं में चमका था वह वर्क बन कर। मुजस्सिम तजल्ली था नूरे खुदा. था। ग़रका कोई माने न माने मुसाफिर” । दयानन्द दर्दै वतन की दवा था।
4- भीमदयानन्द-चित्रावली- -४ मानू माधोलालजी माने तो विदितंकियोमा) Rosnसाचा सोरसीद भेजतेहैं और मुंबईकोतिरवदिया है की १०-१९ दिनमें २वेदन कामकेमासानंगी Fट में यहांसेवितीकारकाविचार सामाखदमभोव्याल्याने निलकोताहै माशाप्रसमाजभी जानेहमवान मानंदमें स्वागतयोगले सिरद१८ पणजस्वलती-1 हस्ताक्षर मेरठ تماس با ما دوردور म बाबूमाधालालजी मानन्दितर हो हम वहांतेचलके भाजनपूर्वयाका शा में पहुंचकर महाराजे जान गर के आनन्द बागसें ठहरे हैं यह बाग बहुत अच्छा है हना और जलमहांका जताहै मानसी इस बाग में बात अर ता है महबाग प्रसिद्ध है इसे उहरने के लिये लाभारत ने प्रबंधनगर कला चिली पहुंच पर जैसा मजा बेसा में इसराना है सके और अवश्य लिखने माग सातचिार हो मेरे लिखेजायगे आप लोग भी लिखते रहना सबसे हमा रात कहामिका एक बार मानसरस्वती الراو. ما رو سرخ رزما لورم سر atene मानापुर बाबूमाधोलाल मंत्रीप्रार्थसमान बंगालहाथा EAST INDIA TĦE ADORESS ONLY TO BE WRITTEN ON THIS STOE CIRD ad माशी पिकी हस्तलिपि ।
श्रीमदयानन्द-चित्रावली- महर्षि दयानन्दकी (कही जानेवाली) जरधिकारिणी श्रीमती परोपकारिणी सभाके सभासदगण । --- न .. MAY ve INRS . S हि तालय le 20 2.2 १ महाराजाधिराज सयाजी राय वहादुर गायकवाड़, बड़े टा, प्रधान, २ रायबहादुर श्रीमूलराजजी उप प्रधान ३ श्रीमान् राजाधिराज सर नाहरसिंहजी वर्मा शाहपुरा, मन्त्री, (मृत्यु) ४ श्रीहरिविलासजी सारडा उपमन्त्री ५ श्री स्वामी श्रद्वानन्दजी सभासद, (मृत्यु) श्री राजमार उम्मेदसिंहजी शाहपुरा, ७ श्रीठाकुर परेलातिहजी, ८ महा- राजा श्री राजारामजी छपपनि कल्लापुर, ६ श्री स्वामी विश्वेश्वरानन्दजी, (मृत्यु) २० श्री महात्मा हंसराजजी, ११ श्री लाला लाजपतरायजी, (मृत्यु) २२ श्री रोशनलालजी, २३ श्री रामविलासजी शारदः, (मृत्यु) १४ श्री गङ्गाप्रसाद जी एम, ए १५ श्री गुलगज गोपालजी गुप्त, १६ श्री घासीरामजी, मेरठ; १७ श्री रामदेवजी आचार्य गुरुकुल कांगड़ी, १८ श्री रणछाड़ दासजी भवान, बम्बई, १६ श्री गौरीशङ्करजी अजमेर, २० श्री पुरुषोत्तम नरायणजी, २१-श्री पं. भगवदत्तजी लाहोर, २२- श्री रामगोपालजी।
धर्म बलिदान ।
जिसने वैदिक धर्म दुबारा जिला दिया है।
जिसने भारत सुप्त सुमनसा खिला दिया है।
वे हिन्दू मतिहीन जिन्होंने रक्षक मारा ।
अपने धड़से शीश स्वयं निज हाथ उतारा ॥
दयानन्दने प्राण दे शवमें डाली जान है।
ऋषियोंका सद्धर्म पर यों होता बलिदान है ॥
अन्धाधुन्धी देख यवन लोगोंकी जिसने ।
समझी भेषज शुद्धि सकल रोगोंकी जिसने ॥
खण्डनसे कर खण्ड दीन येदीन किया है।
जिसने अपना अंश पुराना छीन लिया है
खेल कपट इस्लामने हरलो जिसकी जान है।
लेखरामसे वीरका हुआ सत्य बलिदान है ।
बलिदान-मंडल
यही अहिंसा धर्म · आंखमें मिर्चे भरना ?
महा वीरता यही प्राण औरोंके हरना ??
तो भी वैदिक वीर नहीं मरनेसे डरते।
आ देखे जिनराज धर्म पर इस विध मरते ।
जैसे तुलसीरामने त्यागे अपने प्राण हैं।
धर्मवेदि पर आर्यवर यों होते बलिदान हैं।
कौशिक मुनिका यज्ञ रामने यथा रचाया।
पतित उठाने हेतु आपने पैर बढ़ाया।
रामचन्द्रका नाम सार्थक आज कमाया।
महाजनोंका पन्थ यही हमको थतलाया ॥
मेघोंके उद्धारमें अपनी झोंकी जान है।
जगको यह दिखला दिया यों होता बलिदान है
. ३ भोमदयालन्द-चित्रावली- ( चित्रपरिचय) धर्मवीर यक लेखरामजीका संक्षिप्त परिचय । तहसील चकवाल जिला झेलमके एक अप्रसिद्ध गांवमें जिसका नाम सैयदपुर है ८ चैत्र सन् १९१५ विक्रमी शुक्र वारके दिन एक मुहियाल ब्राह्मणके घर जन्म हुआ। १५ वर्षकी अवस्था तक अपने गांवमें ही पढ़ते रहे। १५ वर्षकी आयुके वाद पं० लेखरामजी अपने चचा श्री गंगारामजीके पास पुलिसका : काम सिखने चले गये । सन् १८७६ ई. के लगभग पुलिसमें नोकर होकर धीरे २ नकशानवीस सारजन्ट बन गये। पण्डितजीमें धर्मकी पिपासा पहलेहीसे थी। नोकरी करते हुए रोटी केवल एक समय अपने हाथसे बनाकर खाते और कृष्ण कृष्णका जाप. किया करते तथा गीताका पाठ नित्य करते रहते। माता पिता विवाहके लिये कहते किन्तु यह नहीं मानते एक समय जब २०-२२ वर्षके थे तब माता-पिताने विवाहके लिये अधिक जोर दिया तब ये नौकरी छोड़ मथुरा वृन्दावनकी ओर जानेको उद्यत हुए। इनकी दृढ़ताके आगे माता-पिताको इनके विवाहका विचार त्यागना पड़ा। पं० लेखरामजी फारसीके अच्छे विद्वान थे और मुसलमानी मतके ज्ञाता तथा हिन्दू धर्मपर पंडितजीको अटूट श्रद्धा थी मुरादाबाद निवासी इन्द्रमणोजीकी पुस्तकोंसे वे परिचित थे तथा मुसलमानोंके साथ शास्त्रार्थ भी समय २ पर किया करते थे। श्री अलखधारीजीको (जिसको कि ऋषि दयानन्दने शुद्ध किया था) पुस्तकमें ऋषि दयानन्दको प्रशंशा पढ़कर ऋषिकृत पुस्तकें मंगवाकर अध्ययन करना आरम्भ किया। ज्यों ज्यों धर्मके मर्म अधिक मालूम होते गये त्यों त्यों ऋषि दर्शनके लिये उत्कण्ठा बढ़ने लगी। अन्तमें सन् १८८१ ई० में आर्यसमाज - पेशावर स्थापित करके नौकरीसे एक मासको छुट्टी लेकर स्वामी दयानन्द सरस्वती जी महाराजसे मिलने अजमेर चले गये । स्वामीजीसे वार्तालाप करके कुल संशय निवारण कर पेशावर लौटे और "धर्मोपदेश" नामक पत्र निकालना आरम्भ किया तथा व्याख्यान और शास्त्रार्थों द्वारा प्रचार कार्य करने लगे। प्रचार कार्यमें सरकारी नौकरी वाधा देती प्रतीत हुई अतः सन् १८८४ ई० में त्याग पत्र देकर दासत्वसे पृथक हुए।
श्रीमदयानन्द-चिवावन्नी...
---
+
.
some
.
-
है
--
.
-
स
LAR
M
...
धर्मवीर व लेफगमजी भार्यमुमाफिर ।
(2)
No text on this page.
भोमायानन्द-चित्रावली-
सरकारी नौकरीसे स्वतन्त्र दो कर बड़े ही उत्साह पूर्वक लेखों एवं व्याख्यानों
द्वारा प्रचार कार्य करते रहे, इनके लग्न व व्याख्यान प्रायः मुसलमानों द्वारा हिन्दू
धर्मपर किये गये आक्षेपोंके उत्तर नया मुसलमानी मजबकी कमजोरियोंके विषयमें
होते रहते इससे स्वार्थी मुल्ला-मौलवी चिढ़ते रहते थे पं० जीकी पुस्तकोंपर मुकदमें
भी चलाये किन्तु सवम हार ग्नाकर पण्डिनजीको कतल करनेकी धमकियाँ देते
रहे अन्तमें-
६ मार्न सन् १८६७ ई. की सन्ध्याले एक कठोर हृदय मुसलमान जो
शुद्धिका बहाना करके उनके पान आगा था उनके गृहमें धोनेसे छुरी उनके पेट में
शुसेड़कर भाग गया। दो बजे रातको अच्छीसे अच्छी चिकित्सा होने पर भी
गायत्री मंत्रका जाप करते हुए धर्मवीर पं० लेखरामने इस नाशवान शरीरको छोड़
कर अपने सच्चे देशको पधार गये और आगीको अन्तिम संदेश यह दे गये कि
"खका काम यन्द न होने पावे"।
पण्डितजीका गुणानुवाद
(inti--पीना शर्मा)
धम्म धारो पीर बैरी से कभी इरते नहीं।
पुण्य के प्रतिाल पूजा पाएकी करते नहीं।
नामसी मन मान मन मोहको भरते नहीं
जालियांम जन्म लेनके लिये मरते नहीं।
यस इमी उदंगको उर लाय पंडित लेखराम ।
तर गये जगदीशके गुण गाय पंडित लेखराम ॥
--
आलसी के ठार ठाली माहसी सोते नहीं।
मृढ़ मंडल में विवेकी काल को खोते नहीं ॥
भोगियों की भांति योगी राति दिन रोते नहीं।
कायरों के पक्षपाती सरमा होते नहीं॥
इस महामन्तव्य का फल पाय पंडित लेखराम।
तर गये जगदीश के गुण गाय पंडित लेखराम ॥
r
L
सोमयानन्द-चित्रावलो-
वनगये विद्या विशारद धर्म का धन जोड़कर ।
योग का आनन्द लूटा योगियों की होड़कर ॥
मेलका मेला लगाया फूट का शिर फोड़कर ।
खुलपड़े परतन्त्रता के बन्धनों को तोड़कर ॥
श्री दयानन्दरिपि के गहि पाय पंडित लेखराम ।
तरगये जगदीश के गुण गाय पंडित लेखराम॥
वेद का उपदेश देते देशमें फिरने लगे।
दम्भ सारे दुर्दशाके घेरमें घिरने लगे।
लेख मन माने मतोंपर वजसे गिरने लगे।
झक्कड़ों के झुंड चारों ओरको चिरने लगे ॥
जाल ग्रन्थों में लगालिपिलाय पं० लेखराम ।
तरगये जगदीश के गुण गाय पंडित लेखराम ॥
पोल खुलते ही पुराणों का महातम हटगया।
बुद्ध की विधि बँधगई मद जैन मतका घटगया।
जी जला इंजीलका बिल बायविलका फटगया।
दम घुटा तौरत का छलबल ज़बूरी कटगया ॥
पड़गये मुसहफ के पीछे धाय पं. लेखराम ।
तर गये जगदीश के गुणगाय पंडित लेखराम ॥
सामने कुरआन के ले वेद चारों अड़गये ।
मार मन्त्रों की पड़ी पर आयतों के झड़गये॥
डूबकर वहरे दलाइल में गपोड़े सड़गये।
कुल हदीसों के हवाले भी भमर में पड़गये ॥
इस तरह इसलाम का घर ढाय पंडित लेखराम।
तर गये जगदीश के गुणगाय पंडित लेखराम ॥
--
श्रीमदयानन्द-चित्रावली
mom
-
।
M
.
.
।
पण्डित लेखराम और घातक ।
श्रीमदयानन्द-चित्रावली
,
Rel
...
,
4.
i
पण्डित लेखराम मृत्यु-शय्या पर ।
से
S
--
4-
"
T
--
,
-चित्रावली-
चिढ़गये वैदिक बटोही से मियाँ सब हारकर ।
चलपड़े अपनी पुरानी चाल पै तकरार कर ॥
एक पाजी आमिला भत वेद का स्वीकार कर ।
अन्तको भागा कलेजे में कटारी मारकर ।।
नीचको अपनाय धोखा खाय पंडित लेखराम ।
तर गये जगदीश के गुणगाव पंडित लेखराम ॥
केसरी पर घात गीदड़ की अचानक चलगई।
कामना विश्वासघाती सर्व खल की फलगई।
नाम को इसलामके शिर से बलासी दलगई।
आग इस ज्वालामुखी छलकी जगतमें जलगई।
यनगये बलिदान दलके राय पंडित लेखराम।
तरगये जगदीश के गुणगाय पंडित लेखराम ।।
क्या चिकित्साकी चली उर शूलसे गढ़ते रहे।
प्राणतन को त्यागने की चाल पै चढ़ते रहे।
प्रेम पूरित शब्द मुख से अन्त लों कढ़ते रहे।
धर्म को धर ध्यान में गुरु मंत्र को पढ़ते रहे ॥
चलवसे परलोक में तजकाय पंडित लेखराम।
तरगये जगदीश के गुणगाय पंडित लेखराम ॥
धर्म के मगमें अधरमी से कभी डरना नहीं।
चेतकर चलना कुमारग में कदम धरना नहीं ॥
शुद्ध भावों में भयानक भावना भरना नहीं।
वोध वर्द्धक लेख लिखने में कमी करना नहीं ।
दे मरे हम को मुनासिब राय पंडित लेखराम ।
तरगये जगदीश के गुणगाय पण्डित लेखराम ॥
। श्रामदयानन्द-चित्रावलो- उस प्रान्तक २०००० मेघोंका उद्धार किया गया है। १५ शहीद पं० तुलसोरामजोका परिचय नये आर्य समाज स्थापित हुए हैं तथा चार पाठशालये पं० तुलसीरामजी पञ्जाब प्रदेशकी फरीदकोट रिया-खोली गयी है। सनके निवासी थे। वह एन. डब्लू रेलवेमे स्टेशनमास्टर शहीद म राजपालजोका परिचय थे। इनका प्रायः जैनियोंसे वार्मिक विषयों पर वार्तालाप हुआ करता था। एक दिनकी वान है कि यह कही जा आपका जन्म अमृतसरमे एक निधन घरानेमें हुआ। रहे थे। इनके विलक्षण तर्क-विनर्कले परास्न हो कई जैनी आप बचपनसे ही परिश्रमी एवं व्यवहारके सच्चे थे, इनसे बेहतर चिड़े रहा करते थे । स्थान निर्जन था, समय | इसी कारंग जिसके यहां इन्होंने कार्य किया वे इनसे मी वेढब धा-एक जैनीने पीछेसे आकर बालूमे लाल | संतुष्ट रह। सर्व प्रथम इन्होंने अमृतसरमें ही एक वैद्यके मिर्चका चूर्ण मिलाकर इनके दोनों नेत्रों में फेंक कर भर | यहां १२) मासिक पर कार्य किया। बाद इसके महात्मा दिया और जब वह दोनों नेत्रोंसे देखनेमे असमर्थ होगये मुंशीरामजीके यहां “सद्धर्म प्रचारक जालन्धरमें २५) तब ऊपरसे और भी खूब भीतरको मार मारी, यहां तक मासिक पर कार्य करते रहे। १९०६ ई० में महात्म.जीने कि उस स्थान पर बेहोश होगये। और वे सब वहांसे | पत्रको उर्दू हिन्दूमें कर दिया। महाशय राजपालजी उन्हें छोड़ भाग गये। पुलिस नथा आर्य-माइयाँको खबर. हिन्दी न जाननेके कारण वहांसे पृथक् होकर लाहोरमें मिली-सव आये, उन्हें उठाकर अस्पताल ले गये । पंडित ! म कृष्णजीक "प्रकाश" पत्रमें मैनेजरके कार्य पर २०) जी चैतन्य होने पर गम्नीर शब्दोंमे बोले- भाई ! जै- रुपये मासिक पर कार्य करते रहे। “प्रकाश पत्रका नियोंका दया धर्म और 'अहिंसा परमोधर्मः' यही है जो कार्य करते हुए रात्रि अवकाशके समय अपना निजी मुझपर इया की है।" औषधोपचार बहुन किया गया पुस्तक प्रकाशनका कार्य आरम्भ किया ! पुस्तकोंका परन्तु चिरकालके लिये धर्मवीर “ओ३म् शान्तिः" का पाठ वीर “ओ३म् शान्तिः" का पाठ काम बढ़ जानेसे नौकरी छोड़ दी। आपको प्रायः हर कर परमात्माकी गोदमें जा विराजे। प्रकारकं विपयों पर नई २ पुस्तकें लिखवाने और उन्हें शहीद पं. रामचन्द्रजीका परिचय सुन्दर छपवाने का शौक था। निन नये पुस्तक जनताकी भेंट करके देश सेवा कर रहे थे। परन्तु ईश्वर-इच्छा श्री धर्मवीर रामचन्द्रजी जम्बू प्रान्नके निवासी नधा कुछ और ही थी। "रंगीला रसुल' नामक एक पुस्तक एक महाजनके सुपुत्र थे और तहलीलमें खजांचीका काम छापनेस यवन जातिका पारा ऊपर चढ़ गया। भारत स- करते थे। आर्यसमाजके आप साधारण सभासद थे पर रकारने अभियोग चलाया। उसमे आप मुक्त हो गये, पर वैदिक धर्मकी आपको लगन थी। पूर्वते ही दलितोंकी मतान्ध मुसलमान आपका जीवन लेने पर उतारू होगये दुर्दशापर दुखिन रहा करते थे। जम्बूसे अखनूरको बदली थे । २६ सितम्बर १९२७ को खुदाबख्श नामक एक मु- होते ही इलिनोद्वारकी ज्वाला उनके हृदयमे धधक उठी | सलमानने आपपर वार किया ! छुरेसे छः जख्म किये, और सब काम साग इसीमे निमग्न होगये। अखनूरके परन्तु ईश्वरने जान बचा ली। ६ अक्टूबर १९२६ को पास बुटेहार एक ग्राम है वहांक मेवाम धर्मवीरजीने प्रचार | इसी दुकानपर “अब्दुल अजीज ने हमला किया। वह. भारम्भ कर दिया। मेघांक लिये एक पाठशाला स्थापित भूलसे स्वामी सत्यानन्दजी महाराज पर हो गया। ६. करना ही चाहते थे कि ग्रामके राजपूतोंने ऐसा विरोध | अप्रैल १९२६ को दो बजे दिनके "इलमदीन' नामक नौ- किया कि उनका अन्त ही कर छोड़ा। धर्मवीर रामचन्द्र जवानने दुकान अन्दर बैठे हुए आक्रमण किया। छुरा जी इस जगत नहीं है पर उनके मेवोद्धारके उद्देश्यका | ऐसी तेजी और बलसे छाती पर मारा, कि तत्क्षण प्राण मार्ग खुल गया । वही मेयोद्वारके कंटक राजपून भाई अब पखेल शरीरसे उड़ गये और आप हमेशाके लिये हमसे पाठशालाक लिये जमीन दे रहे हैं तथा विविध प्रकारसे | जुदा होगये । सहायक बन गये हैं और अब परिणाम यह हुआ है कि
श्रीमद्दयानन्द-चित्रावली-
धर्मवीर तुलसीरामजी।
धर्मवीर रामचन्द्रजी।
शहीद म० राजपालजी लाहोर ।
श्रीमदयानन्द-चित्रावली-
name
स्व जीके पिता श्रीनानकचन्दजी
जन्म १८८४ वि०
नृत्यू १६४३ वि०
मुन्शीरामजी
गयत्र तहसीलदार वरेली
मुन्शीरामजी वकील जालन्धर
AMA
--
महात्मा मुन्शीरामजी
मु० गुरुकुल कांगड़ी
स्वामी श्रद्धानन्दजी सन्यासी।
-
.
-
श्रीमदयानन्द-चित्रावली आर्यसमाजके आदर्श नेता स्वामी श्रद्धानन्दजीका परिचय स्वामी श्रद्धानन्द सन्यासीका जन्म फालगुन कृष्ण | मुशीरामजी को पुलीसकी नौकरीमे लगानेका न था परन्तु त्रयोदशी सवत १६१३ विक्रमीके दिन ग्राम नलवन जब परीक्षामे असफलना हो गयी तब उन्होंने इन्हे पुली- (जिला जालन्धर, पञ्जाब) में लाला नानकवन्दजीके | समे नौकर रखानेका विचार किया। उन दिनों लाला घर हुआ था। लाला नानकचन्द नी वर्तम न लौकिक | नानकचन्दजी शहर वरेलीके कोनवाल थे। बरेली व्यवहारकी दृष्टिसे जातिके विज खत्री थे और जिस कमिश्नर मि० एडवर्डस इनके पुराने मेहरबान थे। समय उनके घर छठी सन्तानका जन्म हुआ उस समय | उनसे प्रार्थना की गयी तो उन्होंने मुशीरामजीको बरेलीका वह ब्रिटिश सरकारकी सैनिक पुलिसमें रिसालदारके | ही नायब तहसीलदार बना दिया। पद पर नौकर थे। बादको सैनिक पुलीमके बरखास्त नायब तहसीलदारी अभी केवल अस्थायी रूपसे कर दिये जाने पर उन्होंने संयुक्त प्रांतकी सिविल पुली- मिली थी कि मुशीरामजीने अपने स्वतंत्रता स्वाभिमान समें नौकरी कर ली और अपने परिवारको भी अपने और आत्मसम्मानके भावोंके कारण तीन महीनेमें ही पास ही बुला लिया। ऊपर जिस वालकके जन्मके | सरकारी नौकरीसे सदाके लिये अपना नाता तोड लिया विषयमें लिखा गया है उसका नाम मुंशीराम रखा गया | इनकी नायब तहसीलदारीके समयमे बरेलीके समीप था । यही मुंशीराम आगे चलकर हिंदू समाज और | किसी स्थानपर अग्रेजी फौजने पडाव डाला । नौजवान उनके देश हिन्दुस्थानके प्रसिद्ध और प्रतिष्ठिन नेता नायब तहसीलदारको हुक्म हुआ कि फौजको रसद स्वामी श्रद्धानन्द सन्यासी बने। आदि पहुंचानेका बन्दोवस्त करे। फौजके पडावमें खाने शिक्षण पीनेक सामानकी दुकाने लगानेका बदोबस्त किया गया लाला नानकचन्दजीके संयुक्त प्रानकी पुलीसमें | परतु शुरुआतमे ही सेनाके गोरे सिपाहियोंने एक अण्डोंक नौकर होनेके कारण, उनके पुत्र मुंशीरामका बाल्य काल दुकानदारके अण्डे विना दाम चुकाये लूट लिये। जब भी उस प्रान्तके वरेली, वदायूं, बनारस, वादा और बरेली | यह शिकायन नये नये न्यायप्रिय नायब तहसीलदार के पास पहुंची तो उसने जाकर सेनाके करनलसे मना कि आदि जिलों में ही बीता। इनकी शिक्षा मुख्यतः बनार तो अण्डों वालोंको उनके दाम दिये जाय, नहीं तो सके क्वींस कालेज तथा जयनारायण हाइस्कूलमें और इलाहाबादके म्योर सेण्ट्रल कालेजम हुई थी। तिल्लीम ठोकर लगाने के आदी करनल यह कैसे सह सव दूकाने उठवा दूंगा। काले हिंदुस्थानियोंकी यद्यपि इनके पिताजी इनको उच्च शिक्षा दिल कर ग्रेजुएट सकते थे। बोले, इस बअदवीका क्या मतलब, खबरदार बनाना चाहते थे परन्तु विद्यार्थी जीवनके साथ साथ अपने पिताजीकी आज्ञानुसार घरके धन्धोंमें लगे रहने | तुम ऐसा करोगे तो नुकसान उठाओगे । वह इतना कुछ कुछ अपनी बेपरवाहीके कारण भी इन्हें परी- कह कर आगेको बढ़ना ही चाहते थे कि नौजवान नायव साहबने अपने हण्टरकी एक फटकार लगाई और दौड़ क्षाओंमें सफलता नहीं हुई और एफ० ए० तक ही पढ़ कर घोडे पर सवार हो वहासे उडब्बू हो गये । गोरे कर अपने विद्यार्थी जीवनका अन्त कर दिया। करनल साहबक इस प्रकार अपमान करनेके कारण नायब तहसीलदारी इनको नायब तहसीलदारीको जल्द ही नमस्कार करना विवाह इनका विद्यार्थी अवस्थामे ही वीस वर्षकी / पड़ा। इसके अनन्तर एक बार फिर सरकरी ने करीमा उनमें जालन्धरके सबसे बड़े रईस राय शालिग्रामकी | अवसर आया था और उसके लिये मालो उच्च अफमा कन्या शिवदेवीके साथ हो गया था। विद्यार्थी जीवन | सी० पी० कारमाइकेल साहवसे वान चीन होकर सब कुछ समाप्त हो जानेके अनन्तर इनके पिताजीको इन्हें किसी से भी हो गया था परन्तु मुंशीरामजीका विचार बदल रोजगारमें लगाने की चिंता हुई । पहिले तो उनका विचार गया और वकील बनकर स्वतन्त्र आजीविका कमानेका या मैं और प्रचार करते थे। - श्रीदयानन्द-चिनावली- निश्चय कर लिया। ... .मुखतारी किसी मुहल्लेमें चले जाते और वहां आर्यसमाजका इस निश्चयके अनुसार लाला मुशीरामजी संयुक्त प्रचारकी लगन प्रान्त छोडकर अपने जन्म-प्रान्न पञ्जावमे ही आगये और लाहोर पहुंचकर मुखतार वननेकी तैयारी करने एक वर्षके वाद लाला मुन्शीरामजी जालन्धर लगे। लाहोरमे रहने हुये ही आर्यसमाज, और ब्राह्मस- वापिस आ गये और वहीं रहकर मुखतारीका काम माज और अन्य भी धार्मिक संस्थाओंके सम्पर्कमे | फिर आरम्भ कर दिया। अब यह जालन्धर आर्यसमा. आनका अवसर मिला जिससे मनमे धार्मिक प्रश्नोंपर जके प्रधान वन चुके थे इस कारण आर्यसमाजका प्रचार विचार करनेकी प्रवृत्ति हो गयी। एक दो वारकी असफ़.- | बढ़ाने के साथ विरोधियोंके आक्षेपोंका और विघ्नोंका लनाके अनन्तर मुखनार बनकर जालन्धरकी अदालनोंमे प्रतिकार करनेका. भार भी इन्हीं पर आ पड़ा और मुखतारीका काम आरम्भ भी कर दिया। थोड़े दिन बाद वकालतकी परीक्षाकी चिन्ता अभी सिरपर होते हुए भी फिल्लौर नामकी निला जालन्धरकी एक तहसीलको लाला मुन्शीरामजीन इस सारे कामको ऐसी योग्यतासे जालन्धरकी अपेक्षा अपने लिये अधिक अनुकूल क्षेत्र निवाहा कि जालन्धरके शास्त्रार्थों और आर्यसमाजकी समन कर जालन्धरस फिल्लौर चले गये, परन्तु दो जलसोंकी पञ्चाव भरमें धूम मच गयी। दो एक वर्षके तीन मासके बाद ही घरके काम काजके कारण मुखनारी | अनन्तर जव मुन्शीरामजी वकालत पास कर चुके तव बन्द करके अपने पिताजीक साथ फिर संयुक्त प्रांतकी | उन्होंने अपनी सारी शक्तिया धर्म-प्रचारके कार्यमें लगा यात्रा करनी पड़ी। दी। जालन्धर जिका तो कोई प्रसिद्ध कसबा ऐसा आर्यसमाजमें प्रवेश नहीं बचा जिसमें जाकर लाला- मुन्शीरामजीने प्रचार और आर्यसमाजकी स्थापना न की हो। इसके अतिरिक्त इस यात्रास लौटकर वकील बननेके लिये फिर पंजावके भी बहुतसे स्थानोंमे जहांसे आर्यसमाजकी लाहोर चले गये। लाहोरमे रहते हुए जहां वकालतकी पुकार आती वहीं जाकर प्रचार करते ! जालन्धरमें तैयारी होने लगी वहा धार्मिक प्रश्नोंका मनन और | आर्यसमाजका कोई. विरोधी ऐसा नहीं बचता था अध्ययन भी साथ साथ होता रहा। आर्यसमाज और जिसका समाजकी ओरसे मान-मर्दन न किया जाता हो ब्राह्मसमाज दोनोंक ही साप्ताहिक अधिवेशनोंमे नियम लाला मुन्शीरामजीको इस कार्यके विरुद्ध जाति-बहिष्कार पूर्वक सम्मिलित होते रहे । पहिले तो ब्राह्मसमाजकं | आदि कई प्रकारकी धमकियां दी गयीं और उनके विचारोंका मन पर अधिक प्रभाव पड़ा परंतु पीछे पुन- रास्तम अनेक विन डाले गये परन्तु वह दृढ़तासे अपना जन्मक प्रश्नने आर्यसमाजका पक्ष बलवान बना दिया काम करते चले गये। और सवत १९४१ विक्रमीक माघ मासमे एक आदित्य वारको आर्यसमाजमे प्रविष्ट हो गये । गुरुकुलकी स्थापना आर्यममाज प्रवेश करते ही धार्मिक ग्रन्थोंके सम्वत् १९५० मे आर्यसमाजमे दो दल हो गये। इस स्वाध्यायका और भी अधिक चाव हो गया। स्वामी | समय लाला मुंशीरामजीने अपने सिद्वान्तों पर दृढ़ता दयानन्दस्त 'सत्यार्थप्रकाश' आदि ग्रन्यांक पड़नेसे दिखलायी। यह सदाचारकी शुद्धता, वैदिक सभ्यताके आचार व्यवहार की शुद्धताके महत्वका मनमे दृढ़ विश्वास पुनरुद्वार और धर्म प्रचार पर बहुत बल दिया करते थे हो गया और माम मदिरा आदि अभय पदार्थोको जब इन्होने देखा कि दयानन्द ऐङ्गलो वैदिक कालिजके सर्वदाक लिये त्याग दिया; साथ ही अपने धार्मिक संचालकोंसे ये काम नहीं हो सकेंगे तो इन्होंने दूसरे दल समाज के विचारोंके प्रचारके लिये इतना उत्साह हुआ का साथ दिया और अपने अध्यवसाय, परिश्रम, त्याग कि वकालतकी परीक्षाकी तैयारी करते हुए भी सप्ताहमें ! और साहस आदि गुणोंसे इस दलका प्रमुख नेतृत्व प्राप्त - r +
श्रीमद्दयानन्द-चित्रावली
पर
,
.
.
+
1
N
श्री स्वामी श्रद्धानन्दजी महाराज।
(य)
No text on this page.
श्रीमदयानन्द-चित्रावली- किया। सम्बत् १६५६ में लाला मुशीरामजीनं 'सद्धर्म- का स्वभाव था कि जनताको सेवाका कोई भी अबसर प्रचारक नामका साप्ताहिक पत्र आरम्भ किया था। वह देखकर पीछे नहीं रह सकते थे। अपने इसी स्वभावके पत्र जहा धर्म प्रचारक समाचार प्रकाशित करना था वहा कारण स्वामीजीने अपने सन्यास जीवनके १-१० वर्ष विरोपियों के प्रहारोंसे भी समाजकी रक्षा करता था और के थोडेसे समयमे इतनी विविध सार्वजनिक सेवायें की है इसके अतिरिक्त समय समय पर आर्यसमाजके लिये उप-1 कि इन पक्तियोंमें उनमेसे मुख्य २ का निर्देश मात्र हो योगी नये नये विचारों और कार्योक लिये आन्दोलन | सकेगा। करता रहता था। इसीके आन्दोलनक फलसं सम्बा १९५८ म आर्य प्रतिनिधि सभा पसाबने गुरुकुल खोलने सन १९१९ की सेवायें का निश्चय किया। यह संस्था यद्यपि आर्य प्रतिनिधि सम्बन १६७६ वि० (अर्थात् सन १९१६) में रौलट सभा पञ्जावकी कही जाती है, तथापि इसको खोलने और एक्ट के विरुद्ध आन्दोलन आरम्भ हुआ, महात्मा गांधीने चलानका सोलह आना श्रेय लाला मुशीराम नीको है। इस कालकानूनके विरुद्ध सत्याग्रह आरंभ किया। जनना उन्होंन किस प्रकार घरसे बाहर रहकर सरथाक आरम्भ में उन दिनों बड़ी उत्तेजना थी। स्वामीजी तुरन्त आगे के लिये ३०००० तीस सहस रुपया इछा किया, से आये और देहलीकी जनताका नेतृत्व स्वीकार करके उस अपना जीवन अर्पण करके संस्थाका प्रबन्ध किया, स| विकट परिस्थितिम वड़ी वीरता, धीरता और गम्भीरता समय परनं पर अपना सर्वस्त्र संस्थाक लिये दान कर से कार्य किया से कार्य किया। जब देहली शहरमे गुग्खा सेनाओंका दिया और कैसे इसकी विरावियांके आक्रमगास रक्षा की पहरा लगा हुआ था तब जनताको शान्त रखना स्वामी- इत्यादि हालन इतने मनोरमा और विस्तृत ह कि जीका ही काम था। उस समय वह जनताको पीछे करके उनका इस छोटस परिचयम लिखा जाना :असम्भव है। आगे स्वयं डण्डा हाथमें लेकर चले। घण्टाघरके आगे संक्षेपम गुरुकुल विश्वविद्यालयका आज तकका तमाम एक मतवाला गुरखा सिपाही जब लोगोंको गालिया देकर इतिहास उनके जीवन की कहानी है। इन्ही त्यागां और शस्त्रका भय दिखाने लगा तब स्वामीनीने आगे बढ़कर संवाओंके लिये आर्य जनताने आपको महात्माका साक, अपनी छाती उसकी सङ्गीनके सामने कर दी कि पहिले अपनी सङ्गीनसे मेरी छातीको वींध दे नव तू किसीको हाथ लगाना । गुरखा सिपाही अपनी कायरता पर भैर सन्यास ग्रहण कर पीछे हट गया। इस उत्तेजित जनताको लेकर रवामीजी जामा मसजिदमे पहुचे और यह स्वामीजीका सम्वत् १६७४ के अन्तमे महात्मा मुशीरामजीने ही महत्व था कि उनसे मुसलमानों के सबसे बड़े और अपना वानप्रस्थाश्रम समाप्त करके सन्यास लिया और पवित्र मुम्बर परसे वेद मन्त्रोचारण पूर्वक हिन्दू वह श्रद्धानन्द नाम धारण करके गुरुकुल और आर्यस- | और मुसलमान दोनोंको उपदेश करनेकी प्रार्थना की माजके संकुचित क्षेत्रको छोड़कर मनुष्यमात्रकी सेवाक गयी। देहलीकी इन घटनाओंके अनन्तर स्वामीजीने लिये निकल पड़े । सन्यासी बनकर सबसे पहले उन्होंने पावमे जाकर राष्ट्र-सेवा और जननामे चेतनता उत्पन्न आर्यजनताको ब्रह्मचर्य और सदाचारकी शुद्धताका उप-करनेका कार्य किया। वहा फौजी कानूनके शासनक देश करनेका और आर्यसमाजका इतिहास लिखनेका कारण लोग बहुत ही बुरी दशामे थे। ऐसी कठिन परि- वीड़ा उठाया। अभी इस कार्यको कठिनतासे एक वर्ष स्थितिमे भी अमृतसरमे सफलना पूर्वक काग्रेस करना कर पाये होंगे कि धौलपुर आर्यसमाजका झगड़ा खड़ा आपका ही काम था । हो गया। वहाके मुसलमान मन्त्री आर्यसमाजका मदिर शुद्धि और संगठत गिराकर वहा मसजिद बनवाना चाहते थे। स्वामीजीने बहा जाकर सत्याग्रह कर दिया और इन मुसलमान इस राष्ट्रीय सेवाके वाद आपको फिर गुरुकुल काजी मन्त्रीजीकी अकलको ठिकाने लगाया। स्वामीजी | कागड़ीका भार अपने ऊपर लेना पड़ा। परन्तु शरीरके विशेषण दिया था।
। श्रीमदयानन्द-चित्रावली- लगानार अस्वस्थ रहनेक कारण विवश हो वह कार्य | काम करते रहे। उन्होंने इन धमकियों पर ध्यान तक छोड़ दिया। इसी समय स्वामीजीका ध्यान हिन्दू जाति नहीं दिया । की दुर्दशा की ओर गया इसके लिये आपने आंदोलन बलिदान आरम्भ किया ही था कि फिर पंजाबमें सिखोंके गुरु- पर जिन लोगोंकी ओरसे ये धमकियां दी गयी थीं द्वारा आन्दोलनकी ओरसे पुकार हुई । आर वहा भी वे वीरताका सम्मान करने वाले न थे। ता० २३ दिस. पहुंचे परन्तु ब्रिटिश नौकरशाहीने वहां पहुंचते ही म्बर सन १९२६ के शामको चार वजे स्वामीजी अपने आपको जेलम बन्द करके सेवाका अवसर न दिया। विस्तरमे आराम कर रहे थे क्योंकि वह उससे दो एक इस कैदसे मुक्त होनेपर फिर अपने स्वभावके अनुसार दिन पूर्व ही भयकर रोगसे मुक्त होकर चुके थे-कि अपने इस कामको ऐसी प्रबलतासे किया कि मुसलमा- अवदुलरशीद नामके एक क्रूर मुसलमानने अत्यन्त कुटि- नोम हलचल मच गयी। जब गांवके गाव नौमुसलिम ललासे उनके समीप तक पहुंचकर उनका गोलीसे वध शुद्ध होकर हिट्ट वनने लगे तब मुल्ला मौलाना डाहके मारे शीनर भीनर जलने लगे। उन्होंने कई एक लेखों और स्वर्गवासी हो गये परतु उनकी शवयात्रामे लाखों हिंदू कर दिया।- रवामीजी अबदुलरशीदकी गोली खाकर छोटी छोटी पुस्तकोंमे स्वामीजीके प्राण लेनेकी धमकिया, जनताने सम्मिलिन होकर इस वातका प्रमाण दे दिया दी, कई गुप्त वेन.म चिट्ठिया उनके पास इसी आशयकी कि उनकी कीर्ति उनके पीछे भी अमर है और अमर पहुंची, परन्तु स्वामीजी हड़ना और शातिसे अपना रहेगी। CE , 4 . A- M - M म्वामीजीके हत्यारेको पकड़ने वाले श्री धर्मपालजी विद्यालकार (स्वामीजीके मन्त्री) हत्यारको पानी पिलाने वाले स्वामीजीके सेवक श्री धर्मसिंहजी (इनको भी हत्यारेकी गोली लगी थी) - - - श्रीमदयानन्द-चित्रावलो- C -- - ( . H New- -- कर + wadium श्री रवामी श्रद्धानन्दजी महाराज गुरुकुल कागड़ीके स्नातकोंके बीचमे ।
17
HANNy
.
He
dard haal
T
.
प
npatrika
M
.
श्रीमदयानन्द-चित्रावली-
4
।
IL
IGIODOUJAR SAJIRTIUEIGA
2)
MIGELDO.JCULACCENC.
V
--
1
,
Basini
.
1
PAN
सवत १६७५ में स्वामीजीका देहली जामा
मसजिदकी वेदीपरसे उपदेश ।
सवत १६७५ के अन्तमें रौल्ट एक्ट आन्दोलनके समय दहली
घण्टाघरके नीचे स्वामीजीके साहसका एक अपूर्व दृश्य
- ३ . -- ! -- 7 L . H " : संतजी वर्मा शाहपुराधीश सहित स्वामी श्रद्धानन्दजीका शुद्धहुए मलकानोंके साथ जेष्ठ १९८० वृन्दावनने सह । . . . हत्यारेकी गोलीसे क्य होने के पश्चात् मृत्यु-शय्यापर ( पौष कृष्ण १६८३ वि०) 4
SHRI SANMIT LIKn.,
श्रीमदयानन्द-चित्रावली-
4
3.
.
--
शव-याना श्य।
.
.
--
अन्त्यष्टि संस्कार।
- नरेश-मंडल
SANMARI Lika
श्रीमदयानन्द-चित्रावलो
अपि दयानन्दके सहपाठी।
+
॥
----
श्रा प० नन्दनजो महाराज चतुर्वेदी
(चैबोके गुरु)
श्री पं० हुगलकिशोरजी शास्त्री
(स्व.मीजीके भक्त)
,
NE
Jodhwa
श्री पं गङ्गादत्तजी शास्त्री
श्री ५० वनम.लीलालजी चौबे
श्रीमद्दयानन्द-चित्रावली
."
u
।
..
सर शाहु छत्रपति महाराजा जी, र्स एस, आइ
महाराजा कोल्हापुर।
!
महाराजा सर सयाजा राव गायकवाड़
समशेर वहादुर जी, सी, एस, आइ
वड़ोदा नरेश।
श्रीमदयानन्द-चित्रावली-
C
.
AN
.
-
s
-
स्व० सर नाहरासहजा वमा वहादुर
के, सी, आइ, ई शाहपुराधीश।
.श्रीमान राजाधिराज उम्मेद सिंहजी वर्मा
शाहपुराधीश।
श्रीमदयानन्द-चित्रावली-
2
स्व० माहाराणा सन्नब सिंहजी जी, सी, एस, आइ । उदयपुर ।
स्व० महाराजा सर यशवंत सिंहजी जी, सी, एस, माइ
जोधपुर नरेश।
.
.
M
AR
"
.
.
HAL
"
श्रीमदयानन्द-चित्रावलो-
Kina
.
141
मेजर जनरल महाराजाधिराज सर प्रतापसिंह बहादुर
+, मी, वी, जी, एस, आइ।
ठाकुरा राज श्री चतुरसिंहजी मेड़तिया राठोड़ रूपाहेली नरेश (मेवाड)
+
-----
.
-
भीमायानन्द-चित्रावली-
१
Homethu
.
A
ठाकुर साहेब श्री हमीरसिंहजी खेरडी ( वीरपुर
-काठियावाड़)
हिज हाइनेस सर श्रा राजाराम छत्रपति महाराजा साहेन
(कोल्हापुर.)
- " -- .. ? चित्रावली- श्रीमदयानन्द- श्री पौण्ड्रिक छत्रपतिजी शाहपुरा । श्री लाला सुर्यनारायणजी माथुर ( शाहपुरा) -
श्रीमदयानन्द-चित्रावली-
Fire
पहर
-
स्व. पं. नानूरामजी प्रमभट्ट जोधपुर
महाकवि चन्द घरदाई के पशधर) ये महर्षिके भक थे।
स्व० सदराजा श्री तेजसिंहजी बर्मा र ठर
जोधपुर (मारवाड़)
.
-
।
.
CAM
Aama
"
in ever
।
Pantrartha
-
MIN
श्रीमदयानन्द-चित्रावली-
श्रा कुमार रणजयसिंहजी एलस, एम, एल, सी,
अमेठी (मुलानपुर:)
श्रीमान् राजा अवधेश सिंहजी
कालाकांकर नरेश
. .
.
. भक्त एवं नेता-मंडल
.
।
.
+
PP
me
t
श्रीमदयानन्द-चित्रावली
A
--
-
४
-
८
I
-
.
-
1
.
r
.
वानप्रस्थी प्रधान भागीरथलाल भाटी रईस महेवड़ रुड़की
ठेकेदार रामलालजी तंवर (सैनिक ) फैजाबाद ( अवध)
श्रीमदयानन्द-चित्रावली-
.
AM
N
श्री स्वामी सर्वदानन्द जी साधु आश्रम हरदुआगज
श्री पं० गुरुदत्तजी विद्यार्थी एम, ए।
श्री महात्मा नारायण स्वामी
श्री महात्मा हसराजजी
श्रीमदयानन्द-चित्रावली-
--
M
Sura perlah
स्व० श्री पं० पूर्णानन्दजी
स्व० श्री भगत रेमलदासजी
IYMAT
16
a
-
T
श्री पं० गङ्गाप्रसादजी उपाध्याय (प्रयाग)
स्व. श्री पं० केशवदेवजी शाषी
.
. ANMATI Line श्रीमदयानन्द-चित्रावली- -- । , - , स्व० स्वामी आत्मानन्दजो । स्व० स्वामी विश्वश्वरानन्दजा । % 3D- - Infrate । . स्व० स्वामी नित्यानन्दजी। स्व० स्वामी दर्शनानन्दजी।
Mana- श्रीनदयानन्द-चित्रावली- . Je . . भाई परमानन्दजो एम० ए० श्री प्रोत्सा रामदेवजी -- P ३० मथुराप्रसादनी मोगा ६० भगवत्तदत्तज.व० ए० लाहोर वैदिक रिसर्चस्कालर ।
श्रीमद्दयानन्द-चित्रावली
..
.
श्री स्वामी मुनीश्वरानन्दजी
श्री स्यामा अमयानन्दजी
سيد
स्व. पं० गणपतिजीशर्मा
श्री शान्त स्वामी अनुभवानन्दजी
श्रीमदयानन्द-चित्रावलो-
1
-
.
२
wat...
M
-
4-
--
Jenaphs became with the hash wina and
mv."
_A
स्व. पं० भोजत्तजी शर्मा।
स्व. पं० रामभजत्त चौधरी !
।
*
woman
श्री स्वानी अव्युतानन्दजी सरस्वती।
श्री स्वानो सत्यानन्दजो नाराज!
... m.
.
.
श्रीमदयानन्द चित्रावली-
.nih.ist0
4
-
+
Mha
२०५० तुलसीरामजी म्बामा
(सामवेद-भाव्यकार)
म्ब० ५० शिवदुरजी शर्मा
(ऋावेद भाष्यकार)
'..
11 i As
श्री प० आर्यमुनिजी
(ऋग्वेद-भाप्यकार)
श्री १० झूमकरणदासजी त्रिवेदी
(अथर्ववेद भाष्यकार)
श्रीमदयानन्द-चित्रावली-
.
-
स्व० श्री लाला लाजपतरायजी
स्व० डा० चिरंजीव भारद्वाज
MANMAR
ܢܢ
श्री लाला मूलराजजी एम० ए०
श्री लाला देवराजजी
SHANMAL
LI
श्रीमद्दयानन्द-चत्रावलो-
।
"
।
1y
.
.
--
।
N
-
स्व० पं० पद्मसिंह शर्मा
स्व० श्री पं० रामजीलाल शर्मा (प्रयाग)
--
.
m
ETRIPA
।
Mad
स्व० पं० रुद्रदत्तजा
शर्मा
भूतपूर्व सम्पादक "आर्यमित्र"।
सम्पादकाचार्य
स्व० श्री प० गणेशप्रसादजी शर्मा
सम्पादक “भारत् सुदशा प्रवर्तक ।
श्रीमदयानन्द-चित्रावली
स्व० कविवर पं० नाथुराम शङ्कर शर्मा
स्व. श्री ठाकुर गदाधर सिहजी
TITIVE
।
1
प्रसिद्ध आर्य कवि कर्ण
श्री पं० गौरीशङ्करजी भट्ट (कानपुर)
आलेख्यविद्यानिधि, सुलेखाचार्य ।
श्रीमदयानन्द-चित्रावली-
.
..
-4
.
५० अयोध्याप्रसादजी वी० ए०
स्व० पं० मुरारीलालजी
.
V
"
ए० रामचन्द्रजी देहली
प० कालीचरणजी आगरा
INMAI J Llhtam
श्रीमद्दयानन्द-चित्रावली-
-
4
स्व० पं० नन्दकुमारदेव शर्मा
श्री राधामोहन गोकुलनी
मुंशी चिम्मनलाल वैश्य (तिलहर)
पं० बद्रीदत्तजी जोशी (मुरादाबाद)
श्रीमदयानन्द-चित्रावली-
--
।
स्व० ५० जीवनलाल जी (सिन्य ) सश्वर
स्व० सेठ गुलाबसिंहजी (सिन्ध) हैदराबाद
.
1
-
प
N
स्व० हकीम मंगतरामजी
शिकारपुर (सिन्ध)
प्रो० ताराचन्दजी गाजग शिकारपुर (सिन्ध)
.
ne
-
7
L
SHARU SANMATI
श्रीमहयानन्द-चित्रावली-
-
1.-
LItsh:
दानवीर स्व० मुशी अमन सिंहजी
गुरुकुल कागडी (हरिद्वार) के भूमिदाता ।
६ नवीर स्व० लाला रग्घूमलजी खंडेलवाल
गुरुकुल इन्द्रप्रस्थके सहायक ।
4
द नवीर राजा महेन्द्रप्रताप सिंहजी
गुरुकुल वृन्दावन के भूमिदाना ।
दानवीर ठा० वैजनाथसिंहजी (ब्रह्मा)
श्रीमदयानन्द-चित्रावली-
।
.
,
१
.
-
श्री डा० सत्यपालजी
डा० वालकृष्णजी प्रिन्सिपल
राजाराम कालेज कोल्हापुर।
SAIN WASIL
है
1
श्री खुगालचन्दजी खुरसन्द
सम्पादक “आर्यजगत" "आर्यगजट" तथा
"मिलाप लाहोर।
श्री पं० ठाकुरदत्तजी वैद्य
सम्पादक "देशोपकारक" (लाहोर)।
श्रीमदयानन्द-चित्रावलो-
Con
1.
श्रीआनन्दभिक्षुजी ने
श्रीस्वामी भवानीदयालजी
...
पं० जे० एम० शर्मा (मदुरा)
श्रीमेहता जैमिनिजी वी० ए०
श्रीमदयानन्द-चित्रावली-
।
श्रीमदनमोहनजी सेठ (यू० पी०)
श्रीनेगीपूरणसिंहजी देहरादून
--
--
-
श्री वी० एल० चौधरीजी (लखनऊ)
पं० बन्सीधरजी पाठक (बरला)
1
A
श्रीमदयानन्द-चित्रावली-
ve
.
-
Choonhorn
श्री पं० नरदेवजी शास्त्री वेदनीय
श्री ६० भीमसेनजी शर्मा (ज्वालापुर)
----
-
पं. नन्दकिशोरजी उपदेशक
म्व. पं० प्रयागदत्तनी अवस्थी
श्रीमदयानन्द-चित्रावली-
।
.
स्व० रामविलासजी शारदा (अजमेर)
श्रीमथुराप्रसादनी शिवहरे (अजमेर)
-
"
Paar
1-
श्रीजगदीशसिंहजी गहलोत ( जोधपुर)
श्रीवान्दकरणजो शारदा (अजमेर)
womama
श्वीमदयानन्द-चित्रावली-
!
,
-
.
लालदेवीचन्दजी एम० ए० (होशीयारपुर )
K
.
7
स्वामी चिदानन्दजी (देहली )
पं० विशनलालजी। शमा (वरला )
-
श्रीमद्दयानन्द-चित्रावली- -- i- 41 - -- M - . NE 1 दानवीर सेठ छाजूगमजी चौधरी (कलकत्ता) स्व० संठ जयनारायणजी फेदार (कलकत्ता) 13 १.7 IIVE श्रीमदयानन्द-चित्राक्लो- ६२१ m- . - N स्व० श्रीखासे रावजी यादव ( वड़ोदा) स्व० सठ गणपतसिहजी ( बड़ोदा) " . श्रीक.लीदास के पटेल ( दम्बई) श्री प्रो० माणिकरावजी (बडोदा)
भोमदयानन्द-चित्रावली
स
राजरत्न पं० आत्मारामजी अमृतसरी (बड़ौदा)
भी मानन्दप्रियजी बी, ए, एल, एल, वी (बड़ौदा)
दानवीर सेठ श्री नारायणलाल वंसीलाल पीत्ति (म्बई)
श्रीमदयानन्द-चित्रावली-
पं० धुरेन्द्र शस्त्री न्यायभूपण वांकीपुर, पटन' ।
रायवहादुर चौधरी दीवानचन्द सैनी
वी, ए, एल, एल, वी एडवोकेट गुरुदासपुर (पंजाब)
T
w
.
40
पं0 दीनबन्धुजी आचार्य वेदशास्त्री (कलकत्ता)
दानवीर श्री तुलसीदासजी दत्त (कलकत्ता)
-
+
N
श्वीमद्दयानन्द-चित्रावली
.
F
"
श्राज्योतीस्वरूपजी (दहरादून)
श्रीरामगोपालजी शास्त्री (लाहोर)
Panee
स्व०प० सतरामजी शर्मा (मोगा)
श्रीस्वामी रामानन्दजी (देहली)
श्रीमदयानन्द-चित्रावली
-
ए
-
a
१ मुंशी लक्षमण स्वरुपजी।
२ श्री पं० विहारीलाल शर्मा।
३ श्री प० भगवानदीनजी।
४ श्री सेठ सीतारामजी।
५ श्री वावू आनन्दस्वरूपजी ।
६श्री पं० गङ्गाप्रसादजी एम ए.
(८) श्री वावू गुलराज गोपालजी।
(७) श्री वायू ब्रजनाथजी।
HUSAN MATI LI
श्रीमदयानन्द-चित्रावली-
a
(१) स्व. डा० रक्ष्मीपतिजी दानापुर, (२) स्व०९० जगतनारायणजी शर्मा,
(३) स्व० रायव.हेब जनकपारीलालजी द नापुर ।
*
HALA
जबदर
-
-
N
.
श्राश्यामकृष्गसहाय (राचा)
शङ्करना.जी (क्लकत्ता)
.
श्रीमदयानन्द-चित्रावली
.
।
५
सेठ सुरजी वल्लभदास (बम्बइ )
डा० कल्याणदास जे० देसाई (बम्बई )
-
७० ८० बालकृगजी (बम्बई)
श्रीपरधुभाई वहालाभाई ( बम्बई )
M
श्रीमदयानन्द-चित्रावली Urmina st ८ ho. A . 1. ५ १ श्री पं० बिहारीलालजी सोहागपुर सी० पी० २ श्री प० प्रेमशकर तिवारी सोहागपुर सी० पी० ३ श्री ठाकुर नारायणसिंहजी नागपुर ४ श्री प० महेन्द्रदत्त शर्मा नरसिंहपुर सीपी० ५ श्री ठाकुर रामप्रसादजी नरसिंहपुर सीरी० स्व० यज्ञदेव शर्मा ७ श्री पं० शकरलालजी ८ डालकृषुगुजी दामोदर वशरपाडे ६ श्री प० श्रीधरजी शमा नागपुर श्रीमदयानन्द-चित्रावली ह पर न - T प्टेन डिकी का शुद्धि संस्कार ता० २७ जून १९०६ - , P O श्री शाहपुराधीश राजपून भ्रातृसम्मेलन वृन्दावनम मलक.नोंकी शुद्धिका प्रस्ताव पास करा रहे है.. .
संस्थाएवं महिला-मंडल
श्रीमदयानन्द-चित्रावली-
विप
N
श्री शीतलाल जी बैंच भागलपुर
श्रीमछ्यानन्द्र चित्रावलीक प्रस्तावक
श्री छुट्टनलाल स्वामी (मेरठ)
--
विमानमा “चिन याग व रवि
पं० श्यामजी शर्मा भजनोपदेशक आगरा
-- श्रीमदगनन्द-चित्रावलो- तवपर . Jimmali a - डी ए वी कौलेज लाहौर भवन । कौलेज और स्कूलादि । श्रीमद्दयानन्द ऐंगलो वैदिक कौलेज लाहौर-इसमें आश्रम, वैदिक श्रेणी, आयुर्वेदिक श्रेणी, उपदेशक श्रेणी आदि विभाग हैं जहां देवनागरी, संस्कृत और अङ्ग्रेजीकी एम०ए० तककी पढ़ाई होती है। यह कौलेज पञ्जाब विश्वविद्यालयमें प्रथम श्रेणीका है । लगभग २००० विद्यार्थी पढ़ते हैं ६ लाखकी लागतका कौलेज- बिलडिङ्ग है और १५ लाखके लगभग सब प्रकारका कोष है। इसी प्रकारके कौलेज निन्न स्थानोंमें भी हैं-रावलपिंडी, जालंधर, देहरादून, कानपुर और राजाराम को- लेज कोल्हापुर स्टेट । निम्न स्थानोंमें हाई स्कूल भी हैं-मुलतान, होशियारपुर, हा- फिजाबाद, एवटायाद, बटाला, जालंधर, नवाशहर, अम्बाला, रावलपिंडी, वेजय.ड़ा, अमृतसर, बहरामपुर, मुक्तसर, जलालपुर जट्ठन, क्वेटा, पेशावर, दिल्ली, मेरठ, देह- रादून, फैजाबाद, मुजफ्फरनगर, बुलंदशहर, अलीगढ़, काशी, प्रयाग, फतहपुर, कानपुर, झरिया, दानापुर इत्यादि २। लगभग १५० मिडिल स्कूल भी है। , , , श्रीमदयानन्द-चित्रावली - .. र... गुरुकुल इन्द्रप्रस्थ (देहली ) भवन । गुरुकुल तथा ब्रह्मचर्याश्रमादि । ब्रह्मचर्येग तपसा वा मृत्युमुपन्नत ॥ अथर्ववेद ।। निम्न गुरुकुलोंमें शास्त्रविधिसे ६ से ८ वर्षके पालकोंको ब्रह्मचर्य-आश्रममें प्रवेश करा २५ वर्षकी आयुपर्यन्त वेदादि शास्त्रोंकी शिक्षा दी जाती है । गुरुकुल विश्वविद्यालय कांगड़ी (हरिद्वार) तथा भारतवर्षके निम्न स्थानों में भी स्थापित हैं-इन्द्रप्रस्थ, मुलतान, कुरुक्षेत्र, गुजरानवाला, पोठोहार, भटिंडा, भैंस- वाला, रायकोट, झझर, देववन्धु, नालन्द, बेटसोहनी, हरियाना, वृन्दावन, ज्वालापुर, सिकन्दराबाद, सकोट, बदाय, विराल सी, गढ़मुक्तेश्वर, हरपुरजान, वैद्यनाथधाम, मंडावर, होशंगाबाद, शुक्लतीर्थ, (बम्बई ) सोनगढ़, सूपा, मदुरा, मटिंडो, कमा- लिया, चोहा भगताँ, काशी, मण्डूर, धारूपुर, चितौड़,उदयपुर आदिआदि । जिनमें ३००० से भी अधिक चारों वर्णाके बालक वेदाध्ययन कर रहे हैं। , - ---- 'श्रीमदयानन्द-चित्रावली . शि . ' -- ८ زی . . - . श्रीयुत ब्रह्मानन्दजी अनाथालय नरसिंहपुर का प्रबन्ध कर रहे है। अनाथालय । जिनके माता, पिता और ज्ञातिसम्वन्धि कोई नहीं है, इन्हें हड़पनेके लिये वे- श्यायें, मुसलमान और ईसाई मंह वाये बैठे हैं। इन्हीं विधर्मियोंके चंगुल में गोभक्षक बननेसे बचाकर समाज द्वारा इनके पालन पोषण और शिल्प-शिक्षाका प्रबन्ध कर इन्हें पूर्ण नागरिक बना कर विवाह योग्य कन्याओंका गुणकर्मानुसार विवाह करा दिया जाता है और बालकोंका, वालिग होनेपर, बाहर प्रबन्ध कर दिया जाता है। इसी प्रकार भारतवर्ष भरमें निम्न स्थानों में भी अनाथालय हैं जहां ५००० के लग- भग हिन्दू अनाथ बालक-बालिकाओंकी रक्षा की जा रही है। मुजफ्फरगढ़, लाहौर झेलम, दिल्ली, भिवानी, डेरागाजीखां, मांटगुजरी, जालन्धर शहर, अमृतसर, पटि- य.ला, लायलपुर, कोहाट, बरेली, कानपुर, देहरादून, हरिद्वार, वृन्दावन, हृषिकेश, लखनऊ, मेरठ, आगरा, जौनपुर, उरई, पवई, आवागढ़, शाहजहांपुर; अलीगढ़, दा- नापुर; मुंगेर; करक, जगन्नाथपुरी, पुरुलिया; फिरोजपुर; शान्तिपुर; अजमेरजोधपुर; भरतपुर; इन्दौर; फतहपुर; शाहपुरा; नरसिंहपुर; खंडवा; नाडियाद; बडोदा; पंडर- पुर; पूना हैदराबाद; बड़नगर; कालीकट नैटाल आदि आदि । . .
कन्या गुरुकुल एवं पाठशालायें अर्य कन्या पाठशाला (त्यूई-पंजाब) की शिक्षाका एक श्य। वेदादि साशास्त्रोंकी आज्ञानुसार आर्यसमाजने स्त्री शिक्षाकी ओर भी विशेष ध्यान दिया है। सैकड़ों छोटी मोटी कन्या पाठशालाओंके अतिरिक्त कई महावि- घालय और कन्यागुरुकुल भी चल रहे हैं। जिनमें कन्या महाविद्यालय जालन्धर ने इस ओर विशेष ख्याति और जागृति पैदा कर दी है । इस समय तक ३०० के लगभग अध्यापिकायें यहांसे शिक्षा प्राप्त कर भिन्न प्रान्तोंमें कार्य कर रही हैं। आर्य कन्यामहाविद्यालय बड़ौदा-अपने अल्प समयमें ही अपनी अलौकिक शिक्षाके कारण प्रसिद्धि में आचुका है और आरहा है। इस संस्थामें कन्याओंको संस्कृत, हिन्दी, गुजराती और अंग्रेजी चार मुख्य भाषायें सिखाई जाती हैं इसके अतिरिक्त गृहकार्य सम्बन्धी सब प्रकारकी शिक्षाके साथ २ स्वास्थ्य रक्षा सम्बन्धी व्यायाम लाठी भाला तलवार मुग्दल छुरी तथा योगासनोंकी भी शिक्षा दी जाती है। इसके अलावा निम्न स्थानोंमें कन्या गुरुकुल और पाठशालायें प्रस्तुत हैं। कन्यागुरुकुल-देहरादून, हाथरस, ज्वालापुर । पाठशालायें-तो प्रायः सभी पड़ी २ समाजोंके आधीन प्रत्येक ग्राम और स्थानों में प्रस्तुत है ।
1
श्रीमदयानन्द-चित्रावली
माई गङ्गादेवीजी अमृतशहर ।
श्री गङ्गादेवीजी उपदेशिका विधवाश्रम जबलपुर ।
--
.
(D
गा
श्रीमती माई भगवतीजी।
देहरादून ज्योति पाठशालाको संस्थापिका' श्रीमती
च. महादेवीजी कैसरेहिन्द' ध०५० श्रीज्योनिग्वरूपजी
श्रीमदयानन्द-चित्रावली
.
है।
कन्या महाविद्यालय जालन्धर ।
छात्रायें औषधोपचार द्वारा.सेवा-कार्य कर रही है।
---
Madan
-
1.
---
सागमूर्ति श्रीमती गुलाब देवीजी
(गुलावदेवी कन्यापाठशाला अजमेरकी संस्थापिका)
डा० मि. पार्वती देवी गहलोत (जोधपुर)
आर्यकन्या महाविद्यालय बड़ौदाकी दो तेजस्वी कन्यायें ।
31
।
श्रीमदयानन्द-चित्रावलो-
.
-
१
1
--
M
.
.
-
घोडे सवार एक बहिन ।
अनेक प्रकारके व्यायामोंमे निपुणता प्राप्त ३० सुभद्रा कुमारी ।
श्रीमदयानन्द-चित्रावली
आर्य कन्या महा विद्यालय बड़ौदा लाठी व्यायामका एक दृश्य ।
--
TTon
ENAY
12
---
--
आर्य कन्या महाविद्यालय बड़ौदा संगीत वर्ग ।
श्रीमदयानन्द-चित्रावली-
कन्या महाविद्यालय.जालन्धर
छात्राओंको सिलाईका काम सिखाया जा रहा है।
छात्राओंको गायन विद्या सिखायी जा रही है।
श्रीमद्दयानन्द-चित्रावली-
--
AANA
कलकत्तकी प्रसिद्ध-देश सेविका
2
,
.
श्रीमती यशोदा देवी
(धर्मपत्नि म. गोविन्दराम)
भारत प्रसिद्ध गोभक्त स्व० श्री हासानन्दजी वर्मा
जन्म १९२३: वि०
मृत्यु सं० १९८७
आपका जन्म शिकारपुर सिन्धमे हुआ। युवावस्था तक बलोचिस्तान
| व.बम्बईमे रहे सन १८६६ में कलकत्ता पधारकर एक्सचेञ्जकी दलाली की।
सन,१६०३ में एक रात ४ वजे टहलते समय अकस्मात् कसाइयों द्वारा गौ-
ओंके झुण्ड लिये जाते देख आपका हृदय गोसेवाके लिये पिघल गया। तभी
से आप गोसेवा व्रत ले दाताओं द्वारा ८ लाखकी जमीन खरीदवाकर पिंजरा
पोलके आंधीन किया। मथुराकी गोचर भूमिका आंदोलन करते आपको
राजयक्ष्माने आ घरी और अन्तमें.आप कलकत्तमे इसीके शिकार
गोविन्दराम-आर्यसेवक
(प्रकाशक श्रीमद्दयानन्द चित्रावली
-
• हमारी प्रकाशित प्रस्तके . हमारी प्रकाशित पुस्तके आर्य समाजके सिद्धान्तोंके प्रचार तथा आर्यसमाजके प्रगतिको आगे बढ़ाने वाले होते हैं। प्रत्येक आर्य व आर्य समाजके कार्यकर्ताओंसे प्रार्थना है कि उत्सवादि अवसरोंपर प्रचारके लिये पुस्तकें मंगाते समय हमें न भूलें। सत्यार्थप्रकाश '-मा उपयोगी शताब्दि आयपथिक लेखराम संस्करण । इसको बड़े ही अच्छे प्रकारसे छपा है जिससे अमर शहीद श्रीस्वामी श्रद्वानन्दजी द्वारा लिखा हुआ लोग सुगमतासे पढ़ सके तथा प्रत्येक प्रमाण श्लोकादिकी विस्ततृ जीवन वृत्तान्त । अकारादि क्रमसे सूची और अकारादि क्रमसे विपय- वीर संन्यासी श्रद्धानन्द सूची दी गई है जिससे प्रमाण और विषय निकालनेमे जीका विस्तृत अनेक चित्रोंसे युक्त जीवन चरिस सुगमता हो गई है। संस्कार प्रकाश श्रीमद्दयानन्द प्रकाश-भक्त शिरोमणि संस्कार विधि सरल भापा टीका सहित । श्री स्वामी सत्यानन्दजी महाराज द्वारा रचित भूपि वैदिक सिद्धान्त व्याख्यान माला दयानन्दकी जीवनी भक्तिरसमे रंगी हुई तथा ऋषिके आर्य जगन्के प्रसिद्ध संन्यासी तथा "पुरुषार्थ उद्देश्य और भावोंको उनके जीवन चरित्रके साथ इस प्रकाश" नामक अद्वितीय पुस्तकके रचयिता श्रीस्वामी ढंगसे लिखे गये हैं कि पढ़ने और सुनने वालेके मनपर नित्यानन्दजीके उपयोगी २० विषयों पर अति प्रभाव- अच्छा प्रभाव पड़ता है । पुस्तकी बड़े अक्षरोंमे और बड़ी शाली, अकाव्य युक्ति तथा प्रमाणों सहित व्याख्यानों का साइजके मोटे ३२ पौण्डके एण्टिक कागज पर सचित्र संग्रह। छापा है जिससे पुस्तक बहुत बड़ी प्रायः ६०० पृष्टोंकी दर्शनानन्दु ग्रन्थ,माला तथा शासेर वजनकी भारी बन गई है यह पुस्तक श्रीवामी दर्शनानन्दजीके छोटे बडे १८ पुस्तक व प्रत्येक आर्य परिवारके घरमें नित्यपाठ तथा समाजोंके ट्रेस्टोंका .सग्रह है। साप्ताहिक सत्संगों एवं ऋपि बोधोत्सव तथा पिजयन्ती विधवा विवाह मीमांसा के अवसरोंपर साप्ताहिक एव पाक्षिक कथा करनेके बड़ी बङ्गालके प्रसिद्ध, सस्कूनके प्रगाढ़ विद्वान, विधवा उपयोगी है, एफ २ प्रति अवश्य मगावे । विवाहके आदि प्रचारक व विधवा विवाहको कानूनन श्रीमद्दयानन्द चित्रावली-अर्थात आर्य जायज ठहराने एवं कानून पास कराने वाले श्री ५० चित्रावली (आपके हाथमें है) ईश्वरचन्द्र विद्यासागरकी इस पुस्तक विधवा विवाहक विरोधियोंको भी लाजवाव होना पड़ता है ३०० पृष्टोंकी चित्रमय दयानन्द-महर्षि दयानन्दका बड़ी पुस्तक चित्रमय जीवन वृत्तान्त दयानन्द चरित-प्रीदेवेन्द्रनाथ मुखोपा. इसमें विलका इतिहास, पक्ष विपक्षकी दलीलें, कानून ध्याय रचित बङ्गाला दयानन्द चरितका श्रीघासीरामजी और उसका उपयोग, बाल विवाहके पक्ष विपक्षम शास्त्रोंके प्रमाण । एम-ए, वकील मेरठ द्वारा किया हुआ हिन्दी अनुवाद . शारदा बिल इस्लाम कैसे फैला चुकी है) - वीर बच्चोंकी कहानियां प्रचार योग्य सस्ते और उपयोगी ट्रेक्ट इसमें ज्ञानबीर; सत्यवीर रणवीर, कर्मवीर और (१) मांस भक्षणसे हानि (२) तम्बाकूसे हानि धर्मवीर आदि अनेक प्रकारके वीर बच्चोंकी सचित्र (३) चायसे हानि (४) अंग्रेजी शिक्षासे भारतीय कहानियां शिक्षाप्रद ढंगसे सरल भाषामें लिखी गई है सभ्यताका नाश (५) सन्ध्या और अग्निहोत्र (६ प्रत्येक परिवारके कामकी पुस्तक हैं। सत्संग भजनावली (७) मूर्ति पूजा विचार (८) जाति विचार (8) स्वामी दयानन्दका उपकार (१०) श्राद्ध व्यवस्था (११) पुनर्जन्मवाद (१२) नवीन इसके लेखक शहीद श्री स्वामी श्रद्धानन्दजीकी वेदान्ती व आर्याका प्रश्नोत्तर (१३) आस्तिकवाद प्रेरणासे आर्य जगतके प्रसिद्ध व्याख्याता व विद्वान पं० (१४) देह ब्रह्माण्डका नकशा है (१५) पाप और अयोध्या प्रसादजी वी० ए ने इस्लामके मान्य पुस्तकोंके पुण्य (१३) होली सुधार भजनावली (१७) चटपटीभजन, विशेष प्रमाणोंको उद्धरण कर लिखे हैं तथा इस पर नेताओंके चित्र महात्मा गान्धीजीकी 'खरी टीका' व सम्मति भी उद्धृत श्री गुरु विरजानन्दजी की गई है। पुस्तक देखने व विचार योग्य हैं ( जप्त हो महर्षि दयानन्द सरस्वती श्री स्वामी श्रद्धानन्दजी संन्यासी पतितोंकी शुद्धि शास्त्र सम्मत है श्री पं लेखरामजी आ० मु० आदर्श सुधारक दयानन्द श्री पं० गुरुदत्तजी विद्यार्थी इसमें विद्वान लेखकने हिन्दू समाजकी अनेक बुरा- श्री लाला लाजपत रायजी इयोंका वर्णन करके श्मृपि दयानन्दको आदर्श सुधारक महात्मा गान्धीजी स्वीकार किया है इसके कई कारण भी बताये हैं पुस्तक ये चित्र बड़ी . साइज और छोटी देखने व प्रचार योग्य है। ऐतिहासिक भजनावली साइज में छपे हैं। मंत्रोंके रंगीन चित्र व नकशे वीर पुरुष, देविय व बालकोंके ऐतिहासिक भज. नोका खासा संग्रह है। विश्वादि देव प्रार्थनाके आठों मंत्र आर्यसमाजके १० नियम प्रचार योग्य सस्ते और उपयोगी पुस्तकें ओ३म्, नमस्ते, गायत्री आदि १२ (१) आर्य समाजका परिचय-अर्थात आर्ग प्रकारके मोटोज बहुत बढ़िया भरकीले समाज क्या है ? लेखक श्री स्वामी अनुभवानन्दजी ८० उत्सवादि सजाने योग्य छपपाये हैं। पृष्ठोंकी पुस्तक (२) आर्यसमाज संकीर्तन धर्मवीर सव पुस्तकें व चित्रोंके मूल्यके लिये वालक हकीपतराय सचित्र वाल शिक्षा ( स्वामी दर्शना- सूचीपत मंगाइये। नन्द कुन) प्राणायाम विधि (६) पञ्चमहायज्ञ विधि (७) गोकरुणा निधि (८) हवन मन्त्र अर्थ सहित पता-गोविन्दराम हासानन्द २० कार्नवालिस स्ट्रीट, कलकत्ता । 2
No text on this page.