Adarsh Library, Jaipur

Roop Tapasiya

Shankar · 2011/03

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रूपतापस अनुवाद देवलीना

CollyA
कर
का
विद्या प्रकाशन मन्दिर
नई दिल्ली-११०००२.

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शंकर
शंकर बंगला कथा-साहित्य के समाक्त हस्ताक्षरो मे से
एक । हिन्दी में भी ढेर सारी रचनाएँ अनूदित । हिन्दी
ही क्यो, अन्य भारतीय तथा विदेशी भाषाओ मे भी
इनका कथा-साहित्य चचित एवं अनूदित । शंकर
अनकहा ही कहते हैं । यही उनका वैशिष्ट्य है । 'कितना
अजाना रे', 'चौरंगी', 'निवेदिता रिसचं लेबोरेटरी',
'आशा-आकाक्षा', 'सुवर्ण सुयोग', 'जन आरण्य',
'सीमावद्ध' आदि शंकर की विशिष्ट कृतियां हैं। 'जन
आरण्य' और 'सीमावद्ध' पर प्रसिद्ध निर्देशक सत्यजित
राय ने फिर भी बनायी हैं । यह शकर विषयायी नहीं
हैं। यह समाज के गरल को घोटकर समाज को हो
पिलाने वाले सिद्धहस्त विप-वंद्य हैं।
प्रस्तुत उपन्यास की कथावस्तु एक मूर्तिकार के जीवन
पर आधारित ऐमी रम्य रचना है कि पत्थरों के परिवेश
में से भी आह्लादकारी रस भरता है । जीवन की कोमल
सवेदनाएँ करो प्रस्फुटित और पल्लवित होती हैं-यह
शकर की सिद्धहस्त लेखनी की ही सामध्यं की बात है।
यह वर्ष शंकर के साहित्यिक जीवन का रजत-जयन्ती
वर्ष है।
हमारी हार्दिक शुभकामनाएं | असंख्य वधाइयां !
- साप्ताहिक हिन्दुस्तान

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१०:रूपतापस संगीत, चित्रकला, मूर्तिकला आदि की जितनी ललित कलाएं हैं, उनमें भी शिल्पी या मूर्तिकार की हालत सवसे दयनीय है। छपी हुई किताबों के माध्यम ने लेखक, ग्रामोफोन-रेकाों तथा संगीत-सभाओं आदि की कृपा से संगीतज्ञ, साधारण व्यक्तियों के हृदय में थोड़ी जगह तो पा भी लेते हैं। वे अब जमींदारों तथा राजा-रजवाड़ों के बन्धन से भी मुक्ति पा गए हैं। छपाई-विज्ञान की कृपा और चित्ररसिकों के अनुराग के कारण चित्रकार भी अव कुछ हद तक आजाद हैं । पराधीनता अगर किसी की नहीं मिटी है तो वह वेचारा मूर्तिकार ही है। दीनबन्धु को इस बात का कष्ट था--हमारे देश के मूर्तिकार को अभी भी बहुत अरसे तक पैसे वालों की अभिरुचि तथा राजशक्ति की कृपा पर निर्भर रहना पड़ेगा। दीनबन्धु इन बातों पर दुख प्रकट करते, पर अपने काम के मामले में कभी चुप नहीं बैठते । काम-काज के बीच-बीच में गुरु शिष्य के बीच इस विषय पर चर्चा चलती। कभी-कभी दीनबन्धु जानना चाहते, पश्चिम के लोग जिस आग्रह से कला-संग्रहालय में जाकर मूर्तिकला का रस लेते हैं, बहुत देर तक खड़े-बड़े मूर्तिकार के अव्यक्त भावों को उसकी भंगिमाओं के जरिए जिम आह्वाद मे समझने की कोशिश करते हैं, उसका थोड़ा-सा भी भाव हमारे देश में क्यों नहीं है ? फिर खुद ही वोलते, 'पत्थर, मिट्टी और धातु के इस खेल में आम आदमियों की रुचि होगी भी कैसे ? उन्हें बहलाने के लिए तो ईश्वर के स्टुडियो में रक्त-मांस के गढ़े जीवित गुड्डे और गुड़ियां जो हैं !' लगता है दीनबन्धु की इम आत्म-वेदना का जरूर तर्कसंगत कारण रहा होगा। उनकी स्मृति को निजोरी में न जाने और भी कितनी कहानियाँ इकट्ठी थीं-अभिनेत्री रंजना बोम, वैज्ञानिक सुगत चक्रवर्ती, समाज- सेविका मिगेज पुंटू सेन और ऐने अनेक । पर इनकी कहानियां तो आपने पढ़ी होंगी और आगे भी पढ़ेंगे। इस वार नो थोड़ा कष्ट कर दीनबन्धु की ही बातें मुनिए । मैं इन मूर्तिकार के जीवन के कई स्मरणीय पलों को आपने नाम रखना चाहता हूं। भारो शायद यह प्रमाणित हो जाए कि दीनबन्धु अपने स्वाभिमान के , रूपतापस:११ कारण हम लोगो मे दूर हट गए थे—इमी अभिमान के कारण ही उन्होंने साधारण आदमी के विचारालय में अपना पक्ष नहीं पेश किया था। इससे शायद कम से कम इतना ही प्रमाणित हो जाए कि वस्तुतः हम लोगों के मन में मूर्तिकार के जीवन और उसकी साधना के प्रति श्रद्धा और महानु- भूति का अभाव नहीं है और हम बहुत-सी मीठी-मीठी कहानियों के लालच को छोड़कर उनके सुग्य-दुख का साझी बनने को राजी हैं। कहाँ से शुरू की जाए इस मूर्तिकार की कहानी ! दीनवन्धु का एक अतीत है । उस अतीत ने आज भी दीनबन्धु को गुत्थियो मे उलझा रखा है। शिल्पी दीनबन्धु को हर समय यह बात याद भी नहीं रहती। उनके भाग्य की दुहाई है कि उन्हे मव-कुछ हमेशा याद नहीं रहता, नही तो दीन- वन्धु या तो पागल हो जाते या स्मृति के घुघने चश्मे मे यादो के बादलो से घिरे उन दिनो की ओर टकटकी लगाए ताकते रहते । पर माधवी ऐसा कर मकनी है। उसके लिए भले ही यह अच्छी बात न हो, पर अस्वाभाविक भी नहीं । पर दीनबन्धु ? दीनबन्धु के लिए यह कतई सम्भव नही। उन पर बहुत सारी जिम्मे- दारियां हैं। उनके पास आसिर समय ही कितना है ? यही कुछ चन्द-एक माल ! और सामने है कितना काम ! इसलिए दीनबन्धु साधना में जुटे रहना चाहते हैं । इसलिए हमारे यह प्रतिभा सम्पन्न मूर्तिकार हमेशा काम मे डूचे रहते हैं । फिर भी कभी-कभी ऐसे क्षण आते जब पत्थर भी पानी में तैरते-से दिखाई देते और अतीत के टुकडे वर्तमान के कर्म-प्रवाह को न मानकर अपनी आजादी की घोपणा करने सामने आ खडे होते । मन की ऐसी हालत मे दीनबन्धु धेचैन-से हो जाते । स्टुडियो से निकल- कर घर के पीछे जो बडा-सा चबूतरा था, वही आकर बैठ जाते। दीनबन्धु वहाँ आखिर करते क्या थे? दीनवन्धु के जीवन के किसी एक पल के छोर को पकड़कर चलिए न । हम भी वहीं चलते है। कला- कार दीनबन्धु के साथ हमारी पहली मेंट वहीं पर हो। आइए, हम दीन- वन्धु की कार्यशाला में चलें।

१२:रूपतापस बाहर से देखने से लगता है कोई छोटा-मोटा फिल्मी स्टुडियो है। शहर के किसी कोने में नदी के किनारे यह पुरानी कोठी शायद किसी नारी-लोभी, मौजी जमींदार का प्रमोद-भवन था। धनी भूस्वामी अत्यन्त रसिक थे। इस मकान में घुसते ही दीवारों पर जमी धनी काई से अस्पष्ट अक्षरों को पढ़ने से ही मालूम पड़ जाता है-इस घर का नाम है-'चित चकोर।' दूर से स्टुडियो के लाल रंग का टीन का छप्पर दिखाई पड़ता है। फाटक पार कर घुसते ही एक छोटा-सा कमरा है। एक-दो अधेड़ उम्र के के सोफे पड़े हैं। उसके बाद ही स्टुडियो है-मानो छोटा-सा कोई कार- वाना हो। स्टुडियो के फर्श पर पत्थर के कई नरमुंड पड़े हैं। उनमें से कई हमारे परिचित हैं । जननेता, शहीद, योद्धा, धर्मगुरु, वक्ता, लेखक, कवि, उद्योग- पति, व्यापारी और भी ऐसे अनेक चेहरे दीनबन्धु की प्राणहीन नगरी में में मौन नागरिकता लिए हुए परम शान्ति में वास कर रहे हैं । पत्थर नहीं-ये मूर्तियाँ प्लास्टर की बनी हुई हैं और सफेद प्लास्टर पर धूल की परत ने उन्हें अजीव-सी मटमैली शक्ल दे दी है। नामी लोगों की इस भीड़ को पार करने पर हाल में कोने पर एका मंच-सा बना - हुआ है। मंच पर किसी एक के बैठने लायक जगह बनी हुई है। उसके पार्व में लकड़ी का एक स्टूल जैसा है, जिसे कलाकार लोग 'स्टैण्ड' कहा करते हैं । मंन के ऊपर कई वत्तियाँ हैं । नामी होटलों के सदा नम्र और विनय ने झुके खिदमतगारों की तरह दो-एक घुमावदार वत्तियाँ स्टैण्ड के विल- कुल पास हैं । जैसे भी हो, वगल से, सामने से, पीछे से नीचे की तरफ, या ऊपर की तरफ उन यत्तियों को जरूरत के अनुसार जिस भी तरफ और जिस वस्तु को आलोकित करना हो, किया जा सकता है। कुछ दूर पर मूर्तिकार के लिए और भी एक स्टैण्ड है। इसका इस्ते- माल सम्भवतः दीनबन्धु के शिष्य करते हैं । मंच के उस तरफ एक काला पर्दा लगा है। उसे खींच देने पर इन विशाल स्टुडियो को दो भागों में बांटा जा सकता है और इस तरह से पिछला हिन्मा बाहरी लोगों की दृष्टि रूपतापस:१३ - से अलग कर दिया जा सकता है। पर्दे के उस तरफ भी कई मूर्तियां सीधी या मुंह के बल पड़ी रहती हैं -मानो सौ-सौ साल पहले के किसी संग्रहातय को अभी तुरन्त खोजा गया है। सिर्फ आदमी ही नहीं, जंगली जानवर, यहां तक कि स्वर्ग के देवता भी किसी अलौकिक जादू के पत्यर वनकर यहां किसी ईश्वर-पुत्र की प्रतीक्षा में पड़े हैं। उसके बाद भी थोडी-सी जगह है, जहां दोनो ओर दो दरवाजे हैं। एक दरवाजे को खोलते ही एक छोटा-सा मकान दिखता है। उसके सामने ही अमरुद का एक पेड़ है। बरामदे से हाथ बढ़ाकर अमरूद तोडे जा सकते हैं। बरामदे को पार करते ही बैठक है। इस समय वहाँ एक अजीब किस्म की चुप्पी है । धनी जमीदार के लड़के के इस प्रमोद-भवन मे निश्चय ही कभी बहुत-मे लज्जाहीन नाटक खेले गए होंगे। जवान नर्तकियां और सुन्दर गायिकाओं ने शराब में घुत मालिक तथा उसके दोस्तो के मनो- रंजन की कोशिश में रात पर रात जिस तरह से वेहिमाव शोर-गुल मचाया होगा, उसी के दण्डस्वरूप आज यहाँ अस्वाभाविक स्तब्धता है। अन्दर की तरफ और भी कमरे हैं। पर इस समय वहां जाकर हम समय नही बर्वाद करेंगे। इससे तो अच्छा होगा कि हम स्टुडियो के दूसरे दरवाजे से उत्तर की तरफ योहा झांक लें। दरवाजे को खोलते ही पहले तो चौंकना पड़ता है । यह कहा आ गए कोई पुराना परित्यक्त कब्रिस्तान है क्या? थोडी-मी जमीन दिखाई देती है। कोई छोटा-मोटा फुटवाल खेलने का मैदान भी हो सकता है, पर कोई देखभाल न होने के कारण हरी-हरी घासो से भर गया है-मानो कोई हरा गलीचा बिछा हुआ है । गलीचे की बुनाई बहुत बढ़िया नही कही जा सकती। कही-कही किसी-किसी घास की पत्ती ने सर ऊँचा उठा लिया है, तो कही घास की कोई पत्ती जमीन मे मुंह छुपाए पड़ी है। कुंछ पत्थर के टुकडे इधर-उधर बिखरे पड़े हैं, मानो ये सुप्त हैं या ? मृत हैं।

१४ : रूपतापस ऐसे ही किसी एक निप्प्राण पत्थर पर दीनबन्धु चुपचाप बैठे हैं। अचानक देखने पर लगेगा यह भी कोई मूर्ति ही है । एक किनारे सफेद संगमरमर के पत्थर पर किसी मनमौजी सृष्टिकर्ता ने काले पत्थर की मूर्ति का निर्माण किया है, जिसका नाम लेते ही दीनवन्धु झुककर प्रणाम करते हैं। ऐसा लगता है मानो फ्रेंच शिल्प-गुरु रोंदा ने किसी अदृश्य शक्ति के आदेश से आधी शतक के बाद भी अपनी कव से उठकर आकर हमारे इस भारतीय शहर में एक और अनश्वर 'थिंकर' (रोंदा की प्रसिद्ध कृति का नाम) को पत्थर में गढ़ डाला है। दीनवन्धु ने न जाने कितनी बार अपने शिष्य को रोंदा के उस चिन्तन- शील मानव की तस्वीर दिखलाई है, चारों तरफ से खिची गई चार तस्वीरें -~-सामने का दृश्य, वाई तरफ का दृश्य, दाहिनी तरफ का दृश्य, फिर पीछे का दृश्य। अभी पत्थर के टुकड़े पर दीनबन्धु भी कुछ उसी मुद्रा में बैठे हुए थे। कोहनी मुड़ी हुई, हथेली पर चिवुक टिकाए बैठे थे। जांघ पर कोहनी टिकी थी। चाकू के फलक-जैसी शुक-नासिका पर सुबह की सुनहरी धूप पड़ रही थी। दूसरी तरफ छाया थी। प्रकाश और छाया के विम्ब मूर्ति पर पड़ रहे थे। दीनबन्धु अक्सर रोंदा की बात करते थे। रंगों का खेल दिखलाने का अधिकार केवल चित्र- फार का नहीं है। सफेद संगमरमर, काला पत्थर और यहाँ तक कि कांसे पर भी बड़ी आसानी से कई रंगों की छाया लाई जा सकती है। दीनबन्धु की पापाण प्रतिमावत मुद्रा अब थोड़ी-सी हिली। उन्हें कल की घटनाएं याद आ रही थीं। दीनबन्धु को तब तक उस घटना का आभास भी नहीं था । स्टुडियो फे सामाने सरकारी गाड़ी प्रतीक्षा कर रही थी। विद्यार्थी देवीदास काफी देर से गाड़ी के अन्दर बैठा था और दीनवन्धु स्वयं कपड़े-वपड़े पहनकर तयार होकर मोटर का दरवाजा खोलकर प्रतीक्षा कर रहे थे। वह सोच रहे थे, माधवी शायद अभी तक सज-धज ही रही होगी । रामायण के युग से लेकर अब तक दुनिया की कौन-सी लड़की तैयार होकर ठीक समय पर रूपतापम:१५ । पति के साथ निकल सकी है ? लडकियाँ देर करेंगी ही। देवीदास ने जब आडी नजर से घड़ी देखी, दीनवन्धु समझ गए कि बहुत देर हो रही है । माधवी को जल्दी करने के लिए कहना ही पड़ेगा। लेकिन थोडी देर पहले यह काम माधवी ने ही किया था। दीनबन्धु अपने स्टूडियो में शिप्य के साथ शिल्प-माधना मे डूबे हुए थे । पत्थर पर छेनी और हथौडे की लगातार छिप-छिप, भिप-झिप की आवाजें वरम रही थी। मैदे की तरह सफेद महीन संगमरमर की धूल ने उड़-उडकर गुरू. गियों को पके वालो वाले बूढों मे बदल डाला था। वीच-बीच में छेनी की चोट से पत्थर मे ऐसी चिनगारी निकलती कि यदि मन हो तो सिगरेट भी जलाई जा सकती थी। अन्दर आते ही माधवी ने कहा था, 'तुम लोग अब तैयार हो लो।' माधवी की बातो से दीनवन्धु को ग्याल हुआ कि ममय हो चुका है। काम के समय दीनबन्धु हाथ में घडी नहीं बांधते। घडी कितनी ही चाक- प्रूफ क्यों न हो, पत्थर काटने वाले आदमियो के हाथो में कलाई घडी दस महीने भी नहीं टिकती। दिन मे हजार वार चौक-चौंक कर अन्त में उनका हार्टफेल हो ही जाता है। दीनबन्धु आधै वाजू और गोल गले को मोटी बनियान पहनकर काम कर रहे थे। सर पर से सफेद धूल झाडने हुए उन्होंने जवाब दिया, 'अभी तैयार होता हूं।' माधवी की सजग दृष्टि में दीनबन्धु अपने को पचा नहीं पाते थे, 'इतनी सारी टोपियां बनाकर दी हैं. पहनी क्यो नहीं ?' माधवी ने सवाल कर ही दिया। इस प्रश्न का जवाब देने को जरूरत नहीं थी। एक मोटी- सी हमी विखैर दीनवन्धु ने उस समय के लिए काम बन्द कर दिया। स्नानघर से निकलते ही दीनबन्धु ने देखा, माधवी ने दूल्हे की पोगाक का इन्तजाम कर रखा था । सुनहरे किनारे की सफेद धोती में चुन्नट डाल कर रखा था। पोशाक के मामले मे दीनबन्धु की राय नहीं चलती थी। बहुत वर्षों से छोटे बच्चे की तरह विना प्रतिवाद, दीनबन्धु इस मामले में पत्नी का हुक्म मानते आए थे। उन्होंने धोती पहन कर गरीर पर पहले बनियान डाली, फिर दूध-सा सफेद नमर मिल्क का कुर्ता पहना । पर इम १६:रूपतापस पर भी छुट्टी कहाँ मिलने वाली थी? गर्दन पर रखने के लिए माधवी ने सफेद चद्दर तह लगाकर रख छोड़ी थी। पैर में न्यूकट जूते डालकर दीनवन्धु ने शीशे में अपने चेहरे को देखा। फिर सोचा, माधवी से थोड़ा मजाक ही कर लें । सोचा कि कहें, माथे पर चन्दन का तिलक भी लगा दो। बस लोग कहेंगे, वुड्ढा चला फिर गे शादी रचाने। पर शिष्य के सामने मजाक करने से माधवी खामखा बुरा मान जाएगी । इसलिए दीनबन्धु ने सोचा वह कमरे में जाकर चुपके से माधवी को यह बात सुना जाएंगे। लेकिन माधवी श्री कहाँ ? शायद उसका सजना-संवरना अब भी कुछ वाकी था। यह सोचकर दीनबन्धु बाहर आकर गाड़ी के सामने प्रतीक्षा कर रहे थे। पर माधवी अब तक नहीं आई थी। अब तो जाकर देखना ही पड़ेगा। अमरूद का पेड़ पार कर अन्दर जाकर बाई तरफड्रेसिंग रूम में झांका दीनवन्धु ने । पर कहाँ ? माधवी तो वहां भी नहीं थी। सोने के कमरे का दरवाजा भिड़ा हुआ था। खिड़की से झांककर देखने के बाद दीनबन्धु ने नाराजगी से भौं सिकोड़ ली। माधवी अव भी विस्तर पर पड़ी थी। नरम विस्तर पर माधवी मुंह बन्द किए उलटी पड़ी थी। माधवी का काला जूड़ा (अब भी उसके सर पर घने बाल थे) समतल जमीन पर पर्वत की तरह ऊँचा खड़ा था। दीनबन्धु ने माधवी को पुकारा । पर माधवी उठी नहीं । मुंह उठाए बिना ही बोली, 'तुम जाओ। मुझे माफ करो। मेरी तबियत ठीक नहीं है।' तवियत उसकी सराब नहीं थी। यह सिर्फ एक बहाना था, इतना समझने को बुद्धि ईश्वर ने दीनवन्धु को दे रखी थी। एक बार तो उनकी इच्छा हुई कि वह माधवी को याद दिला दें कि आज का दिन उनके जीवन में कितना स्मरणीय होने जा रहा है। ऐसे दिन में वह माधवी के साहचर्य की साशा तो कर ही सकते थे। पर ये बातें तो माधवी खुद भी भली-भांति जानती थी। आज का दिन दीनबन्धु के जीवन .

रूपतापस:१७
मे मचानक ही नहीं आया था।
अभिमान से दोनबन्धु का गला रुंध आया। किसी तरह से वह बोले,
'अच्छा तो मैं फिर चलता है।'
माधवी जब अपनी इच्छा से ही नहीं आना चाहती तो वह क्यों
मनाए ? किसी को बार-चार मिन्नतें करना दीनवन्धु के स्वभाव में नहीं।
माधवो क्यो नहीं आई, गाड़ी के अन्दर पापाण की तरह निश्चत
होकर दीनबन्धु यही मोच रहे थे। ऐमे दिन में, ऐम स्मरणीय क्षण में,
पति के साथ का विशिष्ट आमन पाने के लिए कौन-मी पत्नी उल्लुक नहीं
होती!
'मास्टर साहब, देवीदाम ने दीनबन्धु को पुकारा। दीनबन्धु गाडी
में सीधे होकर बैठे। पूछा, 'कुछ बोल रहे हो ?'
'आप कुछ सोच मे हैं ?'
'नहीं। क्या मोचूंगा? यह तो सोचने का ममय नहीं है, कहार वह
प्रश्न को टाल गए।
चिवुक से हाथ हटाकर दीनबन्धु ने सर का पसीना पोछा।
'मास्टर माहब, हम लोग पहुंच गए हैं,' देवीदान ने दनदन्यु से
सचेत करते हुए कहा।
'ठीक है, कहकर दीनदन्यु माड़ी ने उतरे।
माधवी अभी माय होती तो वह पिटने मान्छ ।
सामने वो पंक्ति में एक दुती पर उन्हें आदरार बंदर का
आज के म्मरणीय उत्सव में दीनबन्ध को दाना, न बाद
को कार्यकत्ता को मन नकले थे।
ममा का कार्य प्रारही या होकर नगद र
एक-दो मापन दृष, पर दरकन्यु कंद करा
लोक-सेवा-बाबो में माले पट भाग
पाम घोषित हो दानाका
मानना पर मार
उन्हन काया की, " Hernranicatr railway

१८:रूपतापन . कि वह हमारे पितृतुल्य उस महामानव की मूर्ति का अनावरण करें।' इसके साथ ही सबकी नजर चम्पई रंग के सिल्क के पर्दे में छिपी हुई मूर्ति पर पड़ी। मुख्यमंत्री के अनुरोध पर महामहिम राष्ट्रपति जी उठे। फोटोग्राफरों ने खटाखट फोटो खींचना शुरू किया। थोड़ी ही दूर पर सर- कारी दूरदर्शन का कैमरा भी सजग था। मधुर मुस्कान के साथ राष्ट्रपति जी ने टेवल के ऊपर के विजली का बटन दवाया। पलश बल्बों की चमक और चलचित्र कैमरों के प्रकाश को अमान्य कर पर्दा वड़ी उत्कंठा के बीच धीरे-धीरे सिमटता गया। पर्दा पूरा उठ जाने के बाद भी थोड़ी देर तक हाल में चुप्पी छाई रही। आज के अनुष्ठान के जो मुख्य अतिथि थे, वह सिर्फ राष्ट्र के प्रधान ही नहीं थे, प्रज्ञा और पांडित्य में भी वह सबसे श्रद्धेय थे । मोटे चश्मे के अन्दर से उनकी अनुभवी आंखों ने मानो कोई आश्चर्यजनक वस्तु खोज की थी। उनकी ओजपूर्ण वाणी, लाउडस्पीकर से होकर चारों तरफ सुनाई पड़ने लगी। हजारों लोगों ने भी उसी क्षण अपनी राय दे दी और चारों ओर उल्लास का गुंजन होने लगा। पहले-पहल पितृतुल्य महामानव, जिनकी मूर्ति का अनावरण हुआ था, उनका जय-जयकार हुआ। इस मरणासन्न जाति के हृदय में वल, मुंह में वाणी और वाजू में शक्ति इन्होंने ही दी थी। सभी एक-स्वर में बोल रहे थे, 'अपूर्व ! अद्भुत ! हमारे स्वर्गीय महामानव को इतने आश्चर्यजनक ढंग से कौन इस दुनिया में वापस उतार लाया है ?' अभिभूत राष्ट्रपति ने शिल्पी को देखने का आग्रह किया। जनता ने भी उल्लास के साथ मूर्तिकार को देखने का आग्रह किया। दीनबन्धु का शरीर कांप रहा था। उनके मन में बड़ा संशय था। उनकी कल्पना के महामानव के साथ इस विशाल देश के करोड़ों आदमियों की कल्पना का मेल बैठेगा या नहीं? जिस दृष्टि से उन्होंने महामानव को देखना चाहा था, क्या उपस्थित जनता भी उन्हें उनी रूप में देखना पसन्द करेगी? माज की जयध्वनि दीनबन्धु के शरीर में बिजली पैदा कर रही थी। उन्हें लगा वह इसी क्षण टूटकर चकनाचूर हो जाएंगे। वह मानो चलने रूपतापम: १६ की शक्ति भी खो रहे थे। पर राष्ट्रपति ने स्वयं आगे बढ़कर दीनबन्धु के हाथ पकड़ लिए और मंच पर माइक के सामने उन्हें लाकर बोले, 'यही हैं आप लोगो के चिरशिल्पी--आप लोगो की तरफ मे मैं उन्हें हृदय में लगा रहा हूँ।' दीनबन्धु को राष्ट्र-प्रधान ने आन्तरिक भाव मे गले लगाया। जनता ने फिर से जय-जयकार की तुमुल ध्वनि की। राष्ट्रपति अभिभूत होकर वोले, 'मैं कैसे इस शिल्पकला का वर्णन कहँ ? फास के कला रसिक मन्त्री याद्रे मालरो यदि यहां मौजूद होते तो वह शायद सफलतापूर्वक कर भी सकते थे । मुझे तो सिर्फ ऐसा लगता है कि यह कोई कास्य स्वप्न है । लगता है जैसे हमारी प्रार्थना मे अभिभून होकर हमारे स्वर्गीय पितृव्य सचमुच ही इस धरती पर फिर में उतर आए राष्ट्रपति बोले, 'मुझे बहुत बार राष्ट्रपिता के करीब आने का मौका मिला था। मैंने उनकी अनेक तस्वीरें भी देखी हैं, पर उनके देहावमान के बाद आज पहली बार मुझे लगा कि मैं उन्हे पूर्ण रूप मे ग्रहण कर पा रहा हूँ। हमारे राष्ट्रपिता की वाणी और उनका जीवन जिम तरह आने वाले कल में भी मानवमात्र को मच्ची राह दिखनाएगा, उसी तरह युग-युगान्तर तक यह मूर्ति हमारी भावी पीढ़ियो को अनुप्राणित करेगी।' दीनबन्धु सबकी कुतूहल भरी दृष्टि के मामने इस तरह मे कभी बड़े नहीं रह सकते थे । खासकर वह अपने अतीत को कमे भूल जाते ? पर चाहने पर भी वह यहां से भाग नहीं सकते थे। सभा के समापन पर राष्ट्र के प्रधान प्रधान व्यक्तियों ने उन्हें घर लिया था। ये सभी एक स्वर से कह रहे थे कि महामानव की यह प्रतिमा दीनबन्धु के श्रेष्ठ शिल्प का कीतिमान मानी जाएगी। जिज्ञासा थी-'इस काम में कितना समय लगा?' दीनबन्धु अपनी दृष्टि को अन्तर्मुखी बनाने की कोशिश करते हुए वोले, 'समय तो लगा ही है। तीन साल फसे कट गए, पताही नहीं चला) 'तीन साल ही क्यों, इस मूर्ति को बनाने में अगर बारह साल भी लग जाते तो भी कोई आश्चर्य की बात नहीं होती ।' किसी ने फिर पूछा, 'इस मूर्ति को थोड़ी देर तक देखने के बाद ऐसा लगता है जैसे हमारे महामानव २०:रूपतापल कुछ पूछना चाह रहे हैं।' दीनवन्धु खुश होकर बोले, 'मुझे लगता है मेरा परिश्रम व्यर्थ नहीं गया । जो सिर्फ मेरे स्वप्न में था, वह अब यथार्थ रूप ले सका है। महा- मानव जैसे सच ही कुछ पूछना चाह रहे हैं !' कैमरे के पलैश कई वार चमक उठे। किसी पत्रकार ने पूछा, 'प्रेरणा के विना क्या ऐसा कीर्तिमान सम्भव है ?' दीनबन्धु का उत्तर था, 'हमारे अंधेरे जीवन को जिन्होंने प्रकाश की किरणों से आलोकित किया, इस पराधीन देश को मुक्ति के मन्त्र से अनु- प्राणित कर हमें स्वतन्त्रता के द्वार तक जिन्होंने पहुंचाया, जिन्होंने हमारे सभी पाप, हमारी सारी गलतियों, सारी नीचता को अपने शरीर में धारण कर हमें अमृत-पथ का राही बनाना चाहा, उनके शरीर की तो कल्पना से ही किसी शिल्पी का शरीर रोमांचित हो उठता है। प्रेरणा सहज ही रसने लगती है।' किसी कला-आलोचक ने राय प्रकट की, 'हम राष्ट्रपिता की और भी मूर्तियाँ भिन्न-भिन्न नगरों में देख चुके हैं, पर आज पहली बार ऐसा लगा जैसे वह कुछ पूछना चाहते हैं । क्या हैं वह प्रश्न ?' दीनबन्धु थोड़े सकपकाए। थोड़ी देर सोचने के बाद संकुचित होकर बोले, 'काल के विचारालय में खड़ा होकर आदमी कितना-कुछ पूछ सकता । शायद युग के साथ प्रश्न भी बदल जाएँ। अभी जो प्रश्न उनके चेहरे पर है, हो सकता है अपने नाले युग में ये ही प्रश्न अंकित न रहें। देशवासी कल. दसरेनी पर पगे। है । । दीनबन्धु जब घर लौटे, माधवी विस्तर से नहीं उठी थी। सोई हुई माधवी के गम्भीर चेहरे की तरफ देखकर उमके ऐमा करने का कारण दीनबन्धु ढूंढ कर भी नहीं पा सके इसके पहले भी तो दीनवन्धु जय किमी अनुष्ठान से लौटते थे, तब माधवी न केवल दोडकर दरवाजा खोलती थी, बल्कि पति के कन्धे पर में प्यार से चादर उतारती थी, तरह-तरह के सवाल पूछती थी । दीनबन्धु जवाब देते-देते हांफ उटते थे हाल की ही बात है जब राष्ट्र के इस विदेह की मूनि बनाने का भार दीनदन्ध को सौंपा गया था, तव माधवी ने एक काण्ड ही कर दिया था। इम उम्र में भी माधवी इसनी चंचल हो उठेगी, दीनबन्धु मोच ही नहीं मके थे, 'मैं आज कुछ नही सुनूंगी।' कहकर माधवी ने करीब पाकर पति को चूम लिया था। दीनबन्धु को लगा माधवी की तुलना मे वह बहुत बूढे हो गए हैं। पति को गोद में सिर छिपाकर माधवी बोली थी, 'अरे यार, याद भी है । मैंने बहन दिन पहले तुमसे क्या कहा था ? दूसरों की तो बात ही छोडो, तुम खुद भी तो यही मोचते थे कि मैं गलत-मलन वक रही हूं!' उसके बाद जिस दिन दीनबन्धु ने महामानव की मूत्ति का मिट्टी का माडर बनाया था, नव उन्होने सिर्फ माधत्री को ही यह वान वनाई थी। माधवी बोली थी 'मैं तुम्हे नहीं छोड़गी । तुम्हे मुझे बताना ही पडेगा कि महामानव के चेहरे पर तुमने कौन-मा प्रश्न उत्तीर्ण किया है ?', २२ :रूपतापस 'प्रश्न तो हर युग में बदलता रहता है, दीनबन्धु बोले थे। 'बदल सकता है, पर आसन्न प्रश्न क्या है ?' माधवी ने जानना चाहा - 'सोचा था। छुपाकर ही रखूगा । किसी को नहीं बताऊँगा। मूत्ति को देखकर दर्शक खुद ही प्रश्न को ढूंढ़ निकालेंगे। पर मूत्तिकार की प्रिया से कुछ गोपन रखना मुश्किल दिखता है।' 'छुपाने में दूंगी ही नहीं !' पति की तरफ देखती हुई माधवी बोली थी। 'प्रश्न वहुत पुराना है। शायद तुम्हारे ध्यान में नहीं रहा, लेकिन बहुत दिन पहले मैंने तुम्हें एक किताब से कुछ पढ़कर सुनाने के लिए कहा था, 'भगवान, तुमने हर युग में, इस दयाहीन संसार के लिए अपना दूत भेजा है।' स्टूडियो के मंच पर आँखें मूंदकर बैठे दीनबन्धु ने उस दिन माधवी को कहा था, 'वे सब क्या कह कर गए हैं ?' 'कह गए हैं सवको क्षमा करना, सबको प्यार करना। दिल से ईया और द्वेप निकाल देना, माधवी ने उत्तर दिया। दीनबन्धु गम्भीर हो उठे। बोले, 'यह सिर्फ टैगोर की कविता में पढ़ी हुई बात नहीं है, माधवी ! मैंने देखा है अज्ञात दुश्मन रात के अन्धेरे में असहाय लोगों को खत्म कर देते हैं।' दीनबन्धु अपने-आपमें बोल रहे थे, 'मेरे महामानव इसीलिए प्रश्न कर रहे है जिन लोगों ने तुम्हारी हवा को जहरीला बनाया है, जो लोग तुम्हारे प्रकाश को अन्धकार में बदल देना चाहते हैं, क्या तुमने उन्हें क्षमा किया है, क्या तुमने उन्हें प्यार किया । - दीनबन्धु थोड़ी देर रके। फिर वोले, जिनके पास आंखें हैं वे समझ सकेंगे कि मैंने एक चीज छोड़ दी है । आपों में आंसू लिए महामानव जो पूछना चाहते है, यही मैने छोड़ दिया है। कारण और अकारण नरम स्वभाव का आदमी आंसू दुलका कर दुनिया के दुख को बढ़ाता ही है। हमारे महामानव आंखों से आंसू गिराएँ, यह मैं नहीं चाहता।' पर लोटकर माधवी को देखकर दीनबन्धु को लगा उनकी गैर- रूपतापम:२३ मौजूदगी में उमने बहुत सारे आंसू दुलकाए हैं। आंसुओं को दीनबन्धु अशुभ मानते थे । ऐसे शुभ दिन क्या किसी की पत्नी आंसू गिराकर अशुभ को निमन्त्रण देती है ? कौन जाने, माधवी क्यों इस तरह स्वयं को और साथ मे पति को इस तरह कप्ट पहुंचा रही थी। स्वाभिमानी दीनवन्ध नै तय कर ही लिया कि वह समस्या की गह- राई में नहीं जाएंगे ! ऐसे विशेष दिन में भी माधवी यदि अपनी ही किमी व्यक्तिगत वात को अधिक तूल देती है तो खामखा वे क्यों उसकी बातों मे अपना सर खपाएँ ? लेकिन ठीक इसी समय उनकर मन किसी के साथ अपनी सुशी वौटने का भी कर रहा था। और कोई दिन होता तो माधवी खुद ही सारी रात गप मारती। पति को सोने ही नहीं देनी। आज की माधवी विस्तर में उनके साथ सोकर हनीमून के उच्छ्वास से उनके साथ बातें करेगी, यह आशा दीनबन्धु खुद भी नहीं करते। पर जीवन के एक ऐसे क्षण में पत्नी की प्रामा, उसका अनुसग, उसका प्रथय कुछ भी नही पाएँगे, यह वह कसे सोच सकते थे? उनका सर दर्द से टनटनाने लगा । नाइट-लम्प वुझाकर दीनबन्धु सो गए । एक बार तो उन्हे ऐसा लगा जैसे माधवी जानबूझ कर उनकी अव- हेलना कर रही है। दीनबन्धु की इच्छा हो रही थी कि वह माधवी को उठाकर पूछे, 'क्या मुझे इतना भी अधिकार नहीं कि आज के दिन तुममे इमरी अधिक अच्छे व्यवहार की अपेक्षा कह ? माधयी, तुम क्या भूल चुकी हो कि तुम क्या थी? कैमे तुम शिल्पी दीनवन्धु की पत्नी बनी थी।' इसके बाद सभी दुगो को हरने वाली निद्रा देवी ने ही आकर उस रात के लिए दीनवन्धु की रक्षा की थी। मुबह जब उनकी नौद खुली तब उन्होंने देखा, माधवी दूसरे दिनों की तरह चाय लेकर आई। चेहरा उमका तब भी गम्भीर था। उसके चेहरे में कल के दुख की छाप स्पष्ट थी। दीनबन्धु ने माधवी की तरफ चौक में देखा ही नही । अपनी तरफ से कोई यात भी नहीं उठाई। उन्होंने तय २६:रूपतापस जवाब दिया। 'तुम्हें कोई आपत्ति तो नहीं ?' दीनबन्धु आश्वस्त होना चाहते थे। 'आपत्ति रहने पर भी चलेगा कैसे? इसके बदले में तो आप मुझे रुपये दंगे! लड़की नि:संकोच कह गई। 'यह काम जितना आसान दिखता है, उतना है नहीं। चुपचाप बैठे रहने में भी धैर्य की जरूरत पड़ती है।' दीनबन्धु लड़की को सतर्क करना चाह रहे थे। 'मैंने पहले कभी मॉडल का काम किया नहीं है, लेकिन मैं पूरी तरह चेप्टा करूंगी।' लड़की ने कहा। पीछे की तरफ बत्ती को बन्द करते हुए दीनबन्धु ने पूछा, 'एक वार आकर भागोगी तो नहीं। जितने दिन मुझे जरूरत पड़ेगी उतने दिन आ सकोगीन?" लड़की ने 'हां' भरते हुए सिर हिलाया। दीनबन्धु जानते थे वह मान जाएगी । अवश्य ही अभाव में होगी। दीनबन्धु ने हीटर पर पानी रखा। स्टूडियो में बैठ कर वह काफी या चाय बनाकर पीते थे। 'तुम क्या लोगी? चाय या काफी ? लड़की कुण्ठित हो रही थी। 'शर्म की कोई बात नहीं। इस समय तुम हमारी सम्मानित अतिथि हो। थोड़ी देर बाद हमारी सहयोगिनी बन जाओगी। हम जो खाएंगे या पीयंगे तुम भी वही खाओगी-पीओगी।' 'देवीदास, तुम ढांचा तैयार करो।' इसी प्रकार के ढांचे से मूर्ति की शुगआत होती है। दीनवन्धु अपने लिए भी ढाना बनाने लगे। लोहे की नींक टेढ़ी करते हुए दीनबन्धु अब कुछ विशेप ही गम्भीर हो उठे। बोले, 'देवीदास, स्टुडियो का दरवाजा बन्द कर दो।' काम के समय बाहर के आदमियों के लिए प्रवेश निपिड है। स्टुडियो की सारी तेज बत्तियां जल उठी। देवीदान इसी बीन मिट्टी कालोदा मान कर ले आया। दीनबन्धु ने पूछा, 'तुम्हारा नाम ?' - रूपतापस:२७ । लड़की बोली, 'रेखा!' 'रेसा। वाह ! बड़ा अच्छा नाम है !' दीनबन्धु अव आंखें बन्द कर मुंह से मन्त्रोच्चार करने लगे। देवीदास समझ गया कि मास्टर साहब विश्वकर्मा को प्रणाम कर रहे है और विश्व के सृष्टिकर्ता से आशीर्वाद को आकाक्षा कर रहे है। उसके बाद वह अपने गुरु को नमन करते हैं । इसके बाद कुछ और ही बन जाते हैं। दीनबन्धु की आंखें कुछ वडी-बड़ी-सी हो गई। इस दीनबन्धु को देखने पर वह कोई दूसरे लोक के आदमी मालूम देते थे। वह अब नि संकोच बोले, 'रेखा, अब तुम्हे वरत्रहीन होना पड़ेगा । अगर मन हो तो कोने वाले उस कमरे में चली जाओ। वहाँ कपडे वगैरह रखने के लिए अलगनी है।' दीन- वन्धु लड़की की पीडा को समझ रहे थे। उसका लजीना अक्षात यौवन आरक्त हो रहा था। 'तुम्हें किसी बात का डर नहीं। यहा और कोई नहीं आएगा!' दीन- बन्यु ने उसे आश्वासन दिया। लड़की कमरे के अन्दर चली गई। कपड़े उतारने मे आखिर कितना समय लगता है। पर लडकी कुछ ज्यादा ही देर लगा रही थी। देवीदास जिस तरह बार-वार घडी की तरफ देख रहा था, उससे लग रहा था वह काफी खिन्न हो गया है। पहले दिन स्त्री-मॉडलो के साथ ऐसा ही होता है। दीनवन्धु अपने लम्बे अनुभव से यह बात जानते हैं। उसके बाद सब ठीक हो जाता है। इतने वर्षों की इस साधना मे उन्होने कोई कम निर्वस्त्र औरतो को नहीं देखा था। वहुत साल पहले एक और लड़की ठीक इसी तरह अपने जन्म-दिन की पोशाक में उनके सामने आने में देर लगा रही थी। ठीक देवीदाम की तरह ही दीनबन्धु भी अधीर हो उठे थे। शरीर के मामले मे आम लोग जो कुछ सोचते हैं, शिल्पी के दिमाग मे वे बातें नहीं होती। लज्जा छोड़कर, हिम्मत वटोर कर निर्वस्त्र रेखा अब कमरे से बाहर आई। दीनबन्धु ने देखा, लज्जा से रेखा का शरीर रह-रहकर पेड को हरी पती को तरह मिहर उठता था। उसने अपनी आखें मृद रखी थं दीनवन्धु रेखा को कुछ भी नहीं बोले। वह अपनी मर्जी की - २८ : रूपतापस - बड़ी रही। उन्होंने सोचा, आवश्यकता पड़ने पर ही वह उसे मंच पर वंटने के लिए कहेंगे । हां, वह मंच सिंहासन ही तो था। इस मुहूर्त में किसी मिल्पी की साम्राजी तो उसको माडल ही होती है। देवीदास भी रेखा की तरफ देख रहा था। दीनवन्धु धीरे से उससे बोले, 'देवीदास अच्छी तरह इसे पढ़ो। प्रत्येक मानव-गरीर ईश्वर द्वारा लिखा हुआ स्वयं में एक सम्पूर्ण महाकाव्य है। सच ही महाकाव्य है । सिर, मुंह, गला, उरोज, नाभि, नितम्ब सब इसके एक-एक सर्ग हैं -और इन सवको जोड़ कर प्रकृति ने अपरूप को रूप में संजोया है। 'फिर वह अपने शिप्य से बोले, 'मैं कुछ भी नहीं कहूँगा। तुम अपनी मर्जी से वनाओ।' लज्जागिता रेखा ने थोड़ा-सा चेहरा घुमा रखा था। दो अपरिचित पुरुषों की शिकारी दृष्टि के सामने वह अपने को असहाय हिरणी की तरह जितना सम्भव हो सकता था, छुपाना चाह रही थी। दीनबन्धु ने प्रकाश की किरणों को रेखा के शरीर के निचले हिस्से से ऊपर के हिस्से की तरफ किया। अंधेरे में छुपा उसका चेहरा रोशनी में एकाएक जगमगा उठा । अनुभवी शिल्ली अब नारी-शरीर के छन्द को पकड़ने की कोशिश कर रहा था। दीनबन्धु की आंखों में क्रमश: एक प्रोफाइल पकड़ में आ रहा था। कंग के कुछ अंश, पीछे बंधा हुआ जूड़ा, कपाल, नाक, आँखें, ग्रीवा, वाजू और उरोजद्वय 'चेहरा जरा-सा इस तरफ घुमा लो, 'दीनबन्धु ने निर्देश दिया। गरीर जैसे ही थोड़ा मुड़ा. निर्वस्त्र नारी के स्तन-युगल और भी उद्भा- मित हो उठे। इस गरीर को हबहू आकृति दे गकते थे दीनबन्धु । वह यह काम सनी जल्दी कर सकते थे कि देवीदास विस्मय-विमूढ़ हो जाता था। दीनबन्धु अपने छात्र को अक्सर याद दिलाते थे कि दिल्ली सृष्टिकर्ता को एक अक्षम प्रनिति होता है । ईश्वर ने जो भी कुछ दिया है, उगी को गिल्ली सुछ मिट्टी में, कुछ पत्थरों में, या कुछ घातु में ढालने की चेष्टा करता है। पर सृष्टिकर्ता ने जो चीज दो ही नहीं, उसे देने का अधिकार या स्वतन्त्रता किमी गिल्पी के पास नहीं होती। - रूपतापस:२६ देवीदास ने लकडी के स्टैण्ड पर ढांचा वंठा लिया था। ढांचे पर मिट्टी का पोतना भी शुरू हो चुका था। देवीदास मूर्ति बनाना चाहता था--सिर से लेकर वक्ष तक। लेकिन दीनबन्धु अब भी उम माडल में अपने लिए किसी वक्तव्य को ढूंढ रहे थे। उन्होंने पास में रखे औजारों के वक्स को छुआ। मिट्टी से मूर्ति बनाने, फिर उस मूर्ति से प्लास्टर के माडल बनाने के औजार पाम ही पड़े थे। उसके पास ही प्लास्टर मे पत्थर पर गुदाई करने के औजार सभी रखे हुए थे। कितने ही तरह के थे ये औजार । प्रलेप देने का चाकू स्पंटुला, पतले, मोर्ट, भौथे, तेज, नुकीले, तरह-तरह के औजार । दीनबन्धु ने लकड़ी का चाकू हाथ में उठाया। पुरानी आदत के मुताविक हज्जाम के उस्तरे की भांति हथेली मे रखकर उसे तेज किया। आटे की लोई को तरह मुलायम मिट्टी से ढांचे को भरना शुरू किया। लेकिन नजर उनकी रेखा पर ही थी। रेखा के नग्न शरीर में कोई खास आकर्षण नहीं था। रेसा की उम्र भी अधिक नहीं थी। पर अभाव और तगी के कारण उसके शरीर मे वसन्त का उत्सव शुरू नहीं हुआ था। इम माडल से देवीदारा खुश नहीं हो पा रहा था। पर हमारे देश मे 'मंडोना' तो माडल बनने के लिए अवश्य ही नहीं आएगी। दीनबन्धु बोले, 'देवीदास, शरीर सिर्फ काव्य ही नहीं, छन्द भी है। हर शरीर की अपनी एक यति है । ईश्वर की सृष्टि मे यति-मग का दीप कभी नही होता। जब हम ठीक से नहीं देख सकने, तव उसमे अनुप्रास ढूंढने लगते हैं, पर हर आदमी का एक ऐमा कोण होता है, जहा से वह मुन्दर दिखेगा ही। उस दृष्टि को ढूंढ पाना ही हम शिल्पियों की आंखों की मवसे बड़ी उपलब्धि है।' मिट्टी की इन छोटी-छोटी लोइयो को विदेश में मासेज कहा जाता है। ढांचे पर एक-पर-एक सासेज चढ़ा रहे थे दीनबन्धु । काम के इस पहले चरण में माडल विशेप दृष्टि से देखने की आवश्यकता नही पडती । मोटे तौर पर एक ढांचा बन जाने के बाद ही मूक्ष्म शिल्प-कर्म शुरू होता है। दीनबन्धु को अव रेखा की आंखों में एक विशिष्ट सौन्दर्य दिवा पड़ा । कन्धे से उसकी बाहे कितनी सहज और सुन्दर ढंग से किमी पर ३०:रूपतापस व्हनियों की तरह निकल आई थीं। उसकी सलज्ज बांहों ने थोड़ा-सा लरज कर अपने अनछुए स्तनों को जरा-सा आच्छादित कर लिया था। 'थक गई हो तो वेदी पर आकर बैठ सकती हो। उसे घुमाया जा सकता है । जरूरत पड़ने पर तुम्हें घूम जाने के लिए कहूंगा, द्रुत गति से अपने कार्य को करते हुए ही दीनबन्धु ने रेखा को निर्देश दिया। निर्वसना रेखा कोई उत्तर न देकर पहले की ही तरह चुपचाप खड़ी रही । शर्म से बेचारी काठ-सी बन गई थी। इतनी देर तक रेखा के शरीर को देखते-देखते दीनवन्धु को एक आइडिया आया। भयंकर सूखा पड़ने के बाद वसन्त आगमन पर प्रकृति के साथ जैसा होता है, वैसा । यौवन के इस वसन्त में कोई उच्छवास नहीं होता, पर न्यूनता भी कुछ नहीं रहती। हां हर मोड़ पर सूखा अपनी छाप जरूर छोड़ जाता है। प्रकृति के राज्य में शायद ऐसा ही होता है। रेखा भी अवश्य अभाव, तंगी और अवहेलना में अपने दिन काट रही थी। उनका शरीर इसलिए पुष्ट नहीं थां, फिर भी यौवन को तो रोका नहीं जा सकता । परम लग्न में सारी बाधा विपत्तियों को तिरोहित कर यौवनेश्वर अपनी इस पुजारिन पर भी रीझ गए थे। बहुत साल पहले दीनबन्धु की सजग दृष्टि ने किसी अन्य युवती के गरीर में रूप को खोजा था । वह भी तो उस समय इतनी ही अपुष्ट पर उसके शरीर से पवित्रता की ज्योति मानो फूट-फूट कर निकल रही थी। निर्वसना नारी को देखते ही दीनबन्धु समझ गए थे कि यह शरीर बिल्कुल अछूता है। फिर भी चेहरे की कौन-सी रेखा, आंखों का प्रकाग और उसकी छाया इस पवित्रता की घोपणा कर रहे थे, इसे ढूंढ़ने में उन्हें बहुत समय लगा था । माधवी को क्या वे बातें याद होगी? रेखा धीरे-धीरे संकोच से अहिल्या बन गई थी । दुर्वल बांहों से वार- वार अपने स्तनों को ढंकने की व्यर्थ कोशिश कर रही थी और दीनबन्धु को याद आ रहा था कि बहुत साल पहले, किसी और एक लड़की को उन्होंने बड़े संकोच से वेदी पर बैठते हुए देखा था। दीनबन्धु की उम्र तव बहुत कम थी। उस समय दीनबन्धु कल्पना के पंख फैलाकर फिडियस, माइकेल थी।

रुपतापस:३१ । एंजेलों और रोंदा की दुनिया मे सैर करते थे। उनके मानस पर अमरावती एलिफेण्टा, खजुराहो तथा कोणार्क के पत्यरो पर उत्कीर्ण स्त्री-पुरुषों की भव्यता अकित थी। वह भी एक अजीव-सा अनुभव था । लाहा फ्री स्कूल का छात्र दीन- बन्धु अपने एक सहपाठी के साथ किसी दिन म्युजियम देखने चला गया था। युग-युगान्तर के मृतको की दानवाकृतियां उन्हे आकृष्ट नहीं कर मकी थी। मिस्र की ममी भी उनका मन नहीं जीत सकी थी। बड़ी देर तक इधर-उधर घूमने के वाद अचानक अति प्राचीन युग की उस नवीना यक्षिणी की मूर्ति पर दीनबन्धु की दृष्टि टिकी । पहली नजर में ही दीनबन्धु ने अज्ञात निरंकुश आकर्षण का अनुभव किया था। बहुत देर तक निहार कर भी उमकी देखने की लालमा नहीं मिटी । कुछ दिनों के बाद दीनबन्धु यक्ष-भार्या में फिर भेंट करने के लिए दुवारा म्यूजियम आ पहुंचे। क्षीण कटि, पीन पयोधरा यक्षिणी की पापाण-मूति के गरीर पर काल-क्षत के तरह-तरह के निप्छर चिह्न बने हुए थे। किती विजयोन्मत्त मेनानी के निष्ठुर परिहाम मे यक्षिणी के दोनों हाथ कट गए थे। किमी लुटेरे ने मायद यक्षिणी की नाक भी काट ली थी। फिर भी मानो यक्षिणी की पवित्रता को वे छू नहीं पाए थे । क्षमा- धील मुन्दर यांवों में यह निष्पाप यक्षिणी आज भी किमी की प्रतीक्षा कर रही थी। नब दक दीनबन्धु को इतना कुछ मम्झने की उम्र नहीं हुई थी। फिर भी तरण दीनबन्धु अपनर इस रहस्यमयी यक्षिणी के दर्शन के लिए व्याकुल हो उठते ये । पर ने उननी दूर जाने के विराए के पैमे अबसर उन्हें घर में नहीं मिलने थे। इसलिए रोज पंदल ही जाना पड़ता था। वह रोज पैदल चलकर म्यूनियर जाने थे। उस पायाणी यक्षिणी को एक बार देव कर तुरन ही वारन घर के लिए रवाना होना पटता या उन्हें, नहीं तो घर लौटने में देर हो जानी। किराए के पदचाने के लिए पैदल चलने पर ना नो पिमना ही, उन्होंने उन के नीचे दाम किम्म की लोहे की कीलें जडदा ली यौं। चलते मन्य टकटक की वादार होती। दोस्ल पूछने, 'जूने प्रोडे गे नार गई है या?' दट्ट ३२: रूपतापस -- नहीं देते, फिर भी दोस्त उन्हें छोड़ते नहीं। उस दिन से दोस्तों के बीच दीनबन्धु घोप का नाम पड़ गया था-अश्वघोप। अश्वघोप एक माने हुए कवि थे। पर कविता में दीनबन्धु की कोई गति नहीं थी। यहाँ तक कि पढ़ने-लिखने से भी उनका जी जल्दी ही ऊब गया । अजायबघर की उरा यक्षिणी से न मालूम किस बुरे क्षण में उनकी मुलाकात हुई थी। मायाविनी ने सचमुच ही दीनवन्धु पर वशीकरण मन्त्र फेर दिया था। कितने दिनों तक कितने ही ढंग से दीनबन्धु ने यक्षिणी की तस्वीर बनाई थी, उसका कोई हिसाब ही नहीं था। कल्पना में यक्षिणी को उसके हाथ और उसकी नाक लौटाकर दीनबन्धु बड़े खुश हुए थे। उसके बाद दीनबन्धु की भेंट उन विख्यात मूर्तिकार से हुई थी। उनका असली नाम कह दूं, तो सभी पहचान जाएंगे। परिचय बताकर भमेला बढ़ाने से कोई लाभ नहीं । यूं समझ लीजिए, उनका नाम था-- रामपाल। पहले तो रामपाल ने दीनबन्धु को डांटकर भगा दिया था। बोले थे, 'बेवकूफी न करके पढ़ाई-लिखाई में मन लगाओ।' पर दीनबन्धु ने आस नहीं छोड़ी। फिर एक दिन वह रामपाल के स्टुडियो में पहुंच गए। विनत होकर बोले, 'गढ़ाई के अलावा मुझसे और कोई काम नहीं होगा। दीनबन्धु की तत्परता देख कर शिल्पगुरु ने अन्त में उन्हें मौका दिया। पर साथ ही दीनबन्धु को मचेत किया, 'भाग्य में तुम्हारे कण्ट ही लिखा है तो मैं क्या कर सकता हूँ ! भोगोगे ही। मैं तो बस निमित्त मात्र हूँ।' ने ठीक ही कहा था । रूप की साधना में उन्हें कम तो नहीं सहना पड़ा था । दीनबन्धु को सहना सारी पुरानी बातें याद हो आई। ठया से आवाज हुई। रेखा मुड़कर सड़ी हुई---रेखा का पार्व भाग प्रकाग मे जगमगा उठा । रेखा की रीढ़ की हड्डी को दीनबन्धु देख पा रहे थे~-मानो नरम पीचड़ पर कोई सांप थोड़ी देर नोकर एक छाप छोड़ कर सरमः गया हो रामपाल के दुनियो में ही नग्न नारी-शरीर के साथ दीनवन्धु की रूपतापस : ३३ वह पहली देखा-देखी थी। बहुन माल पहले के उस दिन को दीनबन्धु अब भी नहीं भूल पाए थे । किमी गित्पी के लिए भुलाना गायद सम्भव भी नहीं था। स्टुडियो के साथियों के बीच उम दिन सुबह से ही उत्तेजना घाई हुई थी। दीनवन्धु के एक दोस्त थे-अप्पाराव । खवर वहीं लाए थे । कहा था, 'आज गुरुजी वाहर से मादल ला रहे हैं।' थोड़ी देर बाद अच्छे कपड़े पहने हुए, देखने में भी भली एक एंग्लो दग्डियन लडकी को गुरजी के कमरे में बैठे देखा गया था। अप्पराब की ही सवर थी कि यह लड़की आर्ट स्कूल मे माडल का काम करती है। स्टुडियो में आकर रामपाल बोले, 'म बाज नग्न माडल के माथ तुम लोगों का परिचय करवाऊँगा । लेकिन याद रखना, नारी तुम्हारे लिए नारी नहीं, प्रगति की प्रतिकृति है । डाक्टरी पटते ममय जिम तरह गद- गल्य आवश्यक है, हम भी उसी तरह जीवन्त जीवो ने गिल्प का उत्पादन मंग्रह करते हैं।' रामपाल ने आगे कहा था, 'इस तरह निल-तिल कर ईश्वर ने अपनी कला की मृष्टि की है-कही से ऊंची, कही ने नीची, कहीं मे बाँकी । हमें भी उमी तरह सौन्दर्य की सृष्टि करनी होगी। वामना की गुदगुदी मे सफाम होने पर कोई भी काम नहीं मधेगा।' विद्यार्थी उम ममय गुरु का भापण मुनने के लिए उत्सुक नहीं थे। वे तो इसके बाद के अध्याय के लिए वैचैन थे। माहत को सामने लाकर गुरु ने छात्रों ने उसका परिचय करवाया। वोले, इसका नाम एड्ना है। एड्ना उस समय सुजी-गवरी थी। एइना के शरीर के लिए मभी के मन में कुतूहल था। उसको कपड़े उतारने के लिए कहकर रामपाल छात्रों को उपदेश के तौर पर बोले, 'गरीर को तुम गिलय के माध्यम मे ममनोगे। याद रखना, दारीर तुम पर कभी हावी न हो जाए !' उमके याद की घटना दीनदन्यु कभी नहीं भूलेंगे। गव-गन्य-कक्ष में नई-नई डाक्टरी पढ़ते वक्त कुछ विद्याथियों के माय भी ऐमा होता है। नग्न एड्ना जब कमर में आकर बैठी, तब रामपाल कमरे में नहीं थे।

३४:रूपतापस - आर्ट-स्कूल के किराए की माडल एड्ना के लिए नग्न होना कोई विशेष घटना नहीं थी । अनावृत्त शरीर में उसने एक सिगरेट सुलगाई। बोली, 'सारी मैन, तुम्हारे काम में दिक्कत होगी, पर स्मोक किए बिना मैं नहीं रह सकती । जब हमारे होंठों को बनाने लगोगे तो कह देना, मैं सिगरेट फेंक दूंगी। नारी-शरीर के प्रति दीनबन्धु के बचपन से संजोए हुए स्वप्न को एड्ना के बहु-व्यवहृत, अपरिप्कृत शरीर ने चाबुक-सी चोट पहुंचाई। एड्ना बोली, 'आर्ट स्कूल के विद्यार्थी तो वारी-बारी से मुझे खिलाते- पिलाते हैं, सिगरेट की कीमत भी देते हैं। तुम लोग भी मुझे खिलाना- पिलाना।' दीनवन्धु को एकाएक मितली-सी आने लगी। दो-चार क्षण के लिए उनकी आंखों के सामने अँधेरा छा गया। फिर वह कब जमीन पर बैठ गए, इसका उन्हें ख्याल ही नहीं रहा । अप्पाराव के बुलाने पर उन्हें होश आया । नग्न एड्ना भी सकपका गई । आकर उनका कन्धा पकड़ कर झक- भोर कर बोली, 'हैलो मैन, क्या हुआ तुम्हें ?' नब तक दीनवन्धु अपने को संभाल चुके थे। वोले, 'सारी ! एड्ना खिलखिला कर हंस पड़ी। वोली, 'सचमुच, अव भी मैं छोकरों के सर में चक्कर ला सकती हं!' यह घटना रामपाल के कानों तक भी पहुंची थी। उन्होंने दीनबन्धु को एकान्त में ले जाकर उनसे पूछा था, 'क्या हुआ था ? मुझे बताओ, दीनवन्धु ! वह कुछ जवाव नहीं दे पाए थे। फिर रामपाल खुद ही गम्भीर भाव से बोले थे, 'शरीर के बारे में तुम्हारी जो भी कल्पना थी, उसके साथ मेल नहीं बैठा न ? पर यह तो शुरुआत है।' पहली चोट इतनी तीव्र क्यों हुई थी, यह आज के अनुभवी दीनबन्धु समझ नहीं पाते । पर गुरु ने ठीक ही कहा था, उनके सौन्दर्य की खोज उनी दिन ने शुरू हुई थी। पुरुष तथा नारी की कितनी ही अनावृत्त देह-यप्टियों में दीनबन्धु की आँखों ने परिक्रमा की थी-रूप को ढूंढ़ती फिरी थीं, अपरूप को हृदय में पकड़ रखने की कोशिश की थी। तब जो , ।

रूप की तपस्या शुरू हुई थी, उसका अन्त आज भी इस रूपतापस के लिए नही हुआ था। दीनबन्धु अचानक वर्तमान में लौट आए । उनका मन आज वार-बार अतीत मे भागना चाह रहा था। उन्होने निर्वस्त्र रेखा की तरफ नजर उठाई। रेखा वेचारी बडी थकी-थकी-सी लग रही थी। उन्होंने सोचा, उसे थोड़ी देर के लिए छुट्टी दे देनी चाहिए। अगर उसके चेहरे का स्वाभाविक शान्त सौन्दयं नहीं लौटा, तो वह किसे उत्कीर्ण करेंगे? रेखा छुट्टी की अनुमति मिलते ही लपक कर कमरे के अन्दर चली गई । अपने अनावृत शरीर को पुम्प की धधकती आंदो के आगे से हटा सकने पर बेचारी ने चैन की सांस ली होगी। चाय बना कर दीनबन्धु ने आवाज दी, 'रेखा, तुम्हारे लिए चाय तैयार है। कपडे पहन कर आचल को संभालती रेसा मामने आकर बैठ गई। चाय का प्याला वढाते हुए दीनबन्धु ने पूछा, 'तुम्हें वहृत कष्ट हो रहा है न रेसा बोली, 'नही, कोई खास नहीं।' दीनबन्धु रेखा के घर के बारे में पूछताछ करने लगे। घर में रंगा के कई भाई-बहन थे । बीमारी-सीमारी भी चल रही थी। रुपयो की मस्त जरूरत थी। ब्लड-बैक मे खून देकर वह कई वार रूपए ले आई थी। वह अच्छी राह ही जाना चाहती थी । 'ठीक है, तुम आराम करो। समय पर तुम्हे फिर बुलवा लूंगा।' कह कर दीनबन्धु ने रेखा को वापस भेज दिया। दीनबन्धु को याद है कि नग्न शरीर के पाठ के बारे मे शुरू में उनके मन मे भी वडी शंकाएँ थी । अपने गुरु मे वह पूछते भी थे, 'हमारा देश पश्चिम का देश नही है । हम जितनी मूर्तियों बनाएंगे, वे तो मव प्रख्यात लोग होगे । वे तो हमारे सामने बनावृत्त होकर आएंगे नहीं। फिर निर्वस्त्र माडलों पर इतना जोर क्यों दिया जाता है ?' रामपाल हंस पड़े थे। बोले, 'मैडिकल के विद्यार्थी भी ठीक इसी तरह के प्रश्न करते हैं । जीवित व्यक्तियों की चिकिरमा करने के लिए मुर्दे की " ।

३६ :रूपतापस दृढ़ शरीर से चीर-फाड़ करने की क्या जरूरत है ? पर जरूरत है। जव और अनुभवी वनोगे, तव समझोगे कि मानव-शरीर ही शिल्पी का विश्वविद्यालय है।' रामपाल ने सच ही कहा था । इतने वर्षों के बाद भी, जब भी समय मिलता था, दीनबन्धु विद्यार्थी की निष्ठा से माडल को देखते थे । शक्ति के उन्मेप से उद्वेलित, कठिन पेशियों से मण्डित पुरुप के प्रेरित होते। पीनोन्नत पयोधरा रमणी की देह-वल्लरी से भी वह तत्व ग्रहण करते । शैशव, कैशोर्य, यौवन, प्रौढ़त्व, वार्धक्य, मानो एक-एक ऋतु हैं-नारी और पुरुप के शरीर की बगिया में वे अपनी छाप छोड़ जाते हैं। संसार के अनुभव सिर्फ चेहरे पर ही नहीं, शरीर के अणु-परमाणु पर भी अदृश्य छाप छोड़ जाते हैं। प्रत्येक रेखा, हर उभार एक-एक कहानी की याद दिलाता है। दीनवन्धु ने चाय के कप से चुस्की ली। मास्टर साह्न के उदास चेहरे में देयीदास पढ़ नहीं पा रहा था कि वह क्या सोच रहे हैं। कितना कुछ सोच रहे थे दीनबन्धु । सोचने का कहीं कोई अन्त भी है। माधवी का चेहरा उन्हें असमंजस में डाल रहा था-~-वार-बार उसका चेहरा उनकी आंखों के आगे आकर सामने रखी तस्वीर को अस्पष्ट-सा बना रहा था। उनकी दृष्टि बार-बार ठोकर खा रही थी।

रेखा किराकर सजी हुई। दोनबन्धु निर्वसना रेखा की नाभि मो तरफ देख रहे थे। पहले लम्हा या पैरो से शरीर का वृक्ष उपर की तरफ वटा है। पर पर ही क्तिको भी मूर्ति या चैतेरा मना हुआ रहता है। यह दिनों के अनुभव से दीनभु यह जान पार थे कि नाभि ही शरीर का मन्त्र है। नाभि से ही शरीर रूपी वृक्ष कार की तरफ उठा है. नाभि के नीचे का अंश उसकी जड़ है । अपर मुखारविन्द खिता हुआ होता है। गीले कपडे के आवरण को अपूर्ण पाटी की मुरत से उतार कर दीन- वन्धु काम शुरू करने ही वाले थे। ठीक उसी रागय बाहर गे व जोगगे दरवाजे की घण्टी बजी। बिजली की सरग की तरह दीनबन्धु कालना-लोक की तस्वीर टूट कर बिखर गई । बेचारी रेला भी चौक उठी। बाहर झांक कर देवीदारा घबराया हुआ योगा, 'गारटर साहब, आग एक बार घर के अन्दर जाइए। पाची की तबियत सायद टीक नही 24 लकडी का चाकू फेंक कर, पतीले में रख पानी से हाथ धो कर दीन- बन्धु जल्दी से अन्दर चले गए। घर में एक नौकरानी थी। उसी ने था का बताया, 'माजी तो कसे ही कर रही हैं।' माधवी विस्तर पर पडी-पटी वेचनी गे छटपटा रही थी। पारीर बीच-बीच में टेढा-मा हो रहा था। बब मवल हाथो मे दीनबन्धु ने माधवी : जानेगावाने पकड़ कर योडा-मा मनोरा । माधवी है बचनन थपीग लगा कर अपने गरीर को पत्थर दनादा था।

३८ :रूपतापस - उसका शरीर तकलीफ से सिकुड़ रहा था और उसी हालत में वह अनजाने में कातर स्वर में पुकार रही थी, 'वावू, ववुआ मेरे !' थोड़ी देर चुप रहकर वह फिर दर्द से कराह उठी। 'बाबू, बबुआ मेरे !' बहुत दिनों के बाद ये शब्द दीनबन्धु के कानों में पड़े। उन्हें याद आया, शरीर के ऐसे ही अवर्णनीय कष्टों को झेल कर माधवी वबुआ को दुनिया में लाई थी। उस दर्द की तस्वीर दीनबन्धु के मन से अभी तक मिटी नहीं थी- सच्ची बात तो यह थी कि उनकी एक बार इच्छा हुई थी कि मां की प्रसव- वेदना को वह अपने शिल्प का विषय बनाएं। सिर्फ एक दिन नहीं, बेचारी माधवी ने कई दिनों तक सन्तान को जन्म देने के लिए बड़ा कप्ट सहा था। अनभिज्ञ दीनबन्धु खुद भी पागलों की तरह दौड़-भाग कर रहे थे। डाक्टर ने कहा था, 'पहली सन्तान के जन्म के समय बहुतों को कुछ ज्यादा ही कष्ट होता है।' जीवन और मृत्यु के सन्धि-स्थल पर खड़े हो कर अन्त में माधवी ने बवुआ को जन्म दिया। उन कुछ ही दिनों में माधवी का शरीर मानो आधा रह गया था। दीनबन्धु को लगा कि जिस दिन वह अस्पताल से कमजोर माधवी और अपनी नवजात सन्तान को अपने गरीवखाने में लाए थेवह कल की ही बात है। उनकी गरीबी, उनकी अक्षमता उस दिन उन्हें बड़ी अखरी थी। पर माधवी ने कभी उनका सर झुकने नहीं दिया था। 'क्या सोच रहे हो ?' बच्चे को सुला कर माधवी पूछती। रक्तहीन माधवी के ओठों की तरफ देखते हुए दीनबन्धु बोलते, 'देख रहा हूँ, मां बनना कोई आसान काम नहीं है।' 'ॐ हूँ। तुम कुछ और भी सोच रहे हो, माधवी क्षीण स्वर में बोलती 'वाप बनना भी कोई आसान बात नहीं, पिछले कुछ दिनों में तुम भी बड़े दुवले हो गए हो।' दीनबन्धु अपने को संभाल नहीं पाए। बड़े उदास भाव से बोले, 'माधवी, तुम्हारी सन्तान एक ऐसे घर में पैदा हुई है, जिसमें सही देखभाल करने की सामर्थ्य तक मुझमें नहीं।' - रूपतारस:२३ 'छि: ऐमा नहीं बोलते !' माधवी दृढ़ विश्वास के साथ बोली थी, "मेरा लड़का एक ऐसे आदमी के घर में पैदा हुआ है, जो कभी बड़ा नाम कमाएगा, सारे देश के लोग उसे पहचानेंगे।' दीनवन्धु को माधवी की बातें सुन कर और भी ठेम पहुंचती। उनकी ऐसी हालत थी कि साना पकाने के लिए वह किसी को रख भी नहीं सकते थे । अपने काम से फुर्सत पाते ही किसी तरह से कुछ पका लेते। इतने पर भी दीनबन्धु कभी गरीबी से घबराए नहीं। इस देश में जो शिल्प की साधना करना चाहता है, वह अमीर बनने का स्वप्न नहीं देखता । पर साधारण आदमी की तरह जीने का हक तो उसे है। बीमार और मद्यः प्रसूता पत्नी और बच्चे ने दीनबन्धु की गरीबी को असहनीय बना दिया। माधवी के सामने रखी कुर्सी पर बैठ कर दीनबन्धु बोले, 'मुझमे शादी करके तुमने बड़ी गलती की है, माधवी ।' माधवी की बड़ी-बड़ी आंखें संनो से बातें किया करती थी। मोठो पर अंगुली रखकर आगे और कुछ बोलने के लिए मना करते हुए वह बोली, 'बच्चे की नीद टूट जाएगी। फिर शंतानी भरी नजरो से बोली थी, 'गलती तुम्ही ने की है। माडल से शादी करने पर वाद अफसोस तो होता ही है।' 'ओह !' दीनबन्धु ने माधवी को चुप करना चाहा था। पर माधवी चुप नहीं रही। धीरे-से बोली, 'मुवन डाक्टर ने ढलती उम्र मे नसं से शादी की थी। अब पत्नी को भगाने के लिए तरकीबें ढूंढ रहा है।' 'यह बात है !" तकिए के बल बिस्तर पर बैठ कर माधवी बोनी, 'एक दिन ऐसा आएगा, जब तुम भी बहुत बड़े बनोगे। अपनी मूर्तियाँ बनाने के लिए राजा-महाराजा भी तुम्हारे पास दौडे आएंगे। तव !' 'तब क्या?' पति की गोद में सर रख कर माधवी वोली थी, तब मैं तुम्हें भाऊँगी?' उस दिन माधवी कितनी शान्त, कितनी सौम्य दिवस ३८:रूपतापस उसका शरीर तकलीफ से सिकुड़ रहा था और उसी हालत में वह अनजाने में कातर स्वर में पुकार रही थी, 'बाबू, बबुआ मेरे !' थोड़ी देर चुप रहकर वह फिर दर्द से कराह उठी। 'बाबू, बबुआ मेरे !' बहुत दिनों के बाद ये शब्द दीनबन्धु के कानों में पड़े। उन्हें याद शरीर के ऐसे ही अवर्णनीय कष्टों को झेल कर माधवी वबुआ को दुनिया में लाई थी। उस दर्द की तस्वीर दीनवन्धु के मन से अभी तक मिटी नहीं थी- सच्ची वात तो यह थी कि उनकी एक बार इच्छा हुई थी कि मां की प्रसव- वेदना को वह अपने शिल्प का विषय बनाएं । सिर्फ एक दिन नहीं, वेचारी माधवी ने कई दिनों तक सन्तान को जन्म देने के लिए बड़ा कष्ट सहा था। अनभिज्ञ दीनबन्धु खुद भी पागलों की तरह दौड़-भाग कर रहे थे। डाक्टर ने कहा था, 'पहली सन्तान के जन्म के समय बहुतों को कुछ ज्यादा ही कष्ट होता है।' जीवन और मृत्यु के सन्धि-स्थल पर खड़े हो कर अन्त में माधवी ने बबुआ को जन्म दिया। उन कुछ ही दिनों में माधवी का शरीर मानो आधा रह गया था। दीनवन्धु को लगा कि जिस दिन वह अस्पताल से कमजोर माधवी और अपनी नवजात सन्तान को अपने गरीवखाने में लाए थे- -वह कल की ही बात है। उनकी गरीबी, उनकी अक्षमता उस दिन उन्हें बड़ी अखरी थी। पर माधवी ने कभी उनका सर झुकने नहीं दिया था। 'क्या सोच रहे हो ?' बच्चे को सुला कर माधवी पूछती। रक्तहीन माधवी के ओठों की तरफ देखते हुए दीनवन्धु वोलते, 'देख रहा हूँ, मां बनना कोई आसान काम नहीं है।' 'ॐ हूँ। तुम कुछ और भी सोच रहे हो,' माधवी क्षीण स्वर में बोलती 'बाप बनना भी कोई आसान बात नहीं, पिछले कुछ दिनों में तुम भी बड़े दुबले हो गए हो।' दीनबन्धु अपने को संभाल नहीं पाए। बड़े उदास भाव से बोले, 'माधवी, तुम्हारी सन्तान एक ऐसे घर में पैदा हुई है, जिसमें सही देखभाल करने की सामयं तक मुझमें नहीं।' - हपतापग:३६ 'छि: ऐमा नहीं बोलते !' माधवी दृढ विश्वास के साथ बोली थी, 'मेरा तड़का एक ऐसे आदमी के घर में पैदा हुआ है, जो कभी बड़ा नाम कमाएगा, सारे देश के लोग उसे पहचानेंगे।' दीनबन्धु को माधवी की बातें सुन कर और भी ठेस पहुंचती। उनकी ऐसी हालत थी कि खाना पकाने के लिए वह किमी को रख भी नहीं सकते थे । अपने काम मे फुमंत पाते ही किमी तरह से कुछ पका लेते। इतने पर भी दीनबन्धु कभी गरीबी से घबराए नही। इस देश में जो शिल्प की साधना करना चाहता है, वह अमीर बनने का स्वप्न नहीं देखता । पर नाधारण आदमी की तरह जीने का हक तो उने है। बीमार और सद्यः-प्रसूता पत्नी और बच्चे ने दीनबन्धु की गरीबी को अमीर बना दिया। माधवी के सामने रखी कुन पर देऊ कर दीनबन्धु बोले, 'मुन्ने शादी करके तुमने बड़ी गलती की है, माधवी !' माधवी की बड़ी-बडी आवें ननों में वा किया करती थी। कोतों पर अंगुली रखकर आगे और छ बोलने के लिए नना कर हा दह बोली, 'बच्चे की नीद टूट जानी। फिर मंतानी नरी नजरों में वानी यो, 'गलती तुम्ही ने की है। माइन में गादी करने पर वाद अन्सोन ना होता 'ओह !' दीनबन्धु ने नारी को करना चाहा था। पर भावी चुप नहीं रही। धीरे से दोगी, 'मुदन डाक्टर ने उनी उम्र में नर्म में गादी की थी । अब परनी की नगाने के लिए तुरका ढुट न्हा है।' 'यह बात है!" तकिए के बल दिन्नर पर दंटकर माधवी दोषी, 'एक दिन का आएगा, जब नुन नी दट्टन दई दनांन। आनी दिनां बनाने के गित राजा-महाराजा नी तुम्हारे पास दो बान्द ..!' 'तव का?' पति की गोद में मर न्द कर भाषी दोनी दी, दर दृन्हें भाऊगी? उस दिन मायवी विनुनी मान्न,विनोद विहीरीत्र ४० :रूपतापस वही माधवी दर्द से विकृत चेहरा लिए विस्तर से छटक कर बाहर गिरना चाह रही थी। दर्द उसके सारे शरीर को तोड़-मरोड़ कर अव शायद थक चुका था। थकान से माधवी शायद अव सोना चाहती थी। नींद में डवने के पहले वह वृदचुदाई, 'बाबू, बवुमा मेरे...' इन शब्दों ने मानो दीनवन्धु को नींद से जगा दिया। माधवी के कातर स्वर से पति के सारे शरीर में तेज पावर की बिजली-सी दौड़ गई, 'बाबू, बबुआ, बबुआ!' दीनबन्धु वुदबुदाए। फिर चींक कर उन्होंने दीवार पर टंगे कलेण्डर पर नजर दौड़ाई। उन्हें लगा, जैसे लाल रंग में लिखी २ तारीख ने मानो कोई बड़ा-सा आकर ले लिया है। डेढ़ इंच के आकार की टाइप में लिखा २ नवम्बर धीरे-धीरे बड़ा होता हुमा सारी दीवार पर छा गया है। सारी दीवार पर दीनवन्ध लाल रंग का २ देख पा रहे थे। उस तारीख के शरीर से खून टपक रहा था। लेकिन यह क्या हुआ ? लाल खून सूख कर अब काला पड़ रहा था माकाग के काले बादल पागलों की तरह दीनबन्धु के कमरे में घुस पड़े थे अब यह नम्भ सके कि माधवी कल क्यों नहीं घर मे निकली थी। आज सुवह भी जब वह अपनी नाराजगी हाव-भाव से जाहिर कर रहे थे, तर माधवी ने क्यों उस तरह से उनकी तरफ देखा था। उनको अब याद अ. रहा था कि यह विचित्र तारीख ही कभी माधवी और उनके जीवन सबसे बड़े दुख को खींच लाई थी। बबुआ का निष्प्राण शरीर इसी पलंग पर कोने में पड़ा हुआ था । आज की तरह उस दिन भी माधवी वेहोट होकर पत्थर-सी बन गई थी। निष्ठुर मृत्यु लुटेरे की तरह उनका सर कुछ लूट ले गई थी। अव दीनबन्धु को मारी बातें समझ में आ रही थीं। साधन के नशे बुत बन कर इस दानवीय दिन की असलियत को वह मूल बैठे थे। लेवि माधवी उसे नहीं भूली थी। उसने याद रखा था। इतने दिनों के बाद : २ नवम्बर किसी भयंकर जल्लाद की तरह माधवी के मन में बैठा था मं वह अपने को नहीं संभाल की थी।

रूपतापस:४१ पर यह तो बहुत दिन पहले वो वातें थी। एक, दो, तीन, चार या पांच वर्ष नही~-निष्ठुर मृत्यु ने उनके बीच बहुत वर्षों का व्यवधान हाल दिया था। दीनबन्धु ने अपने को समझाने की कोशिश की, पर कोशिश मात्र से ही क्या मन कुछ समझ पाता है-- मन क्या हर वक्त तर्क को मानता है ? ख्याति, प्रतिष्ठा, सफलता-आज दीनबन्धु और उनकी पत्नी के पास मब कुछ था। आज वह सुख और चैन की सोने की चाभी अपनी पत्नी के आंचल में बांध सकते थे। ऐसे समय में यह क्या हुआ? 'माधवी !' कातर स्वर में दीनबन्धु ने पुकारा । लेकिन माधवी कुछ भी नहीं बोली । वह बुरी तरह से भयभीय हो उठे और माधवी के करीब आ कर खड़े हुए, 'नहीं, वे ही तो सांमें हैं माधवी की।' उमका रिक्त वक्ष अपनी बाह्य गरिमा खोए बिना यथावन धोकनी की तरह उट-बैठ रहा था। 'माधवी !' दीनबन्धु ने अपराधी कण्ठ से पुकारा । कोई जवाब नहीं आया। माधनी सारे दुस-ददों से दूर नीद की नगरी से पहुंच चुकी थी। स्टूडियो मे रेखा और देवीदास तब भी दोनवन्धु को प्रोक्षा में बैठे थे। वहां जा कर दीनबन्धु ने देवीदास से कहा, 'मैं अब और काम नहीं काँगा । तुम अगर चाहो तो माडलिंग का काम चालू रस मक्ते हो।' देवीदास बोला, 'नही मास्टर साहब, काम माय ही करेंगे।' 'तुम आज जा सकती हो रेया। दीनदन्धु ने रेषा को छुट्टी दे दी। इतनी जल्दी छुट्टी पा जाने पर रेखा बुरा ही हुई। उसने पमरे में कर झटपट कपड़े पहन लिए। उनके हाथ मे दम पर देर दरम्यु बोले, 'कल फिर आना।' देवीदास भी चला गया । दीनबन्यु ने रेखा की टुंमन्ट रिट की भूति की तरफ नजर उठाई। बहुत दिन पहले, ठीक इसी तरह में रिपोरमाटरटेगरी कहा था, 'पह लो रुपये, कल फिर आना।' आज की गिनती में वे सभी वनदेस्टि: - ४२:रूपतापस भार्ग भी इतना प्रशस्त नहीं था। तव के दीनवन्धु और माज के दीनबन्धु एक तो नहीं थे! वह स्त्री-माडल भी तिल-तिल कर मूर्तिमती हो उठी थी। उसके जाने के बाद भी दीनबन्धु ने मिट्टी से अपने को अलग नहीं किया था। उनकी एक आदत थी । जो सामने नहीं रहता, वह कल्पना में उसी चेहरे को देखने की कोशिश करते। उसी कल्पना की छवि से अपनी कृति को मिला कर देखना चाह रहे थे, पर मिला नहीं था। जो मूर्ति अभी-अभी साड़ी-ब्लाउज पहन कर बाहर गई थी, उसकी कोई छाप इस नरम मिट्टी के पिण्ड पर नहीं पड़ पाई थी। - . कितनी पुरानी बात थी । दीनवन्धु को अच्छी तरह से याद आ रहा था, दूसरे दिन सुबह वह लड़की फिर आई थी। निर्वस्त्रा हो कर वेदी पर बैठने के बाद हैरत से उसने देख कर पूण था, 'कल जिसे बनाया, वह कहाँ है ?' 'उसका खून कर डाला है !' युवक दीनवन्धु ने कहा था । लड़की तव भी आंखें फाड़ कर देख रही थी। 'पसन्द नहीं आई इसलिए तोड़ डाला!' दीनबन्धु हा ''हा 'कर हंस उठे थे। माधवी उन्हें गलत समझ बैठी थी। उसने सोचा, दीनबन्धु को शायद माडल ही पसन्द नहीं था। बड़े उदास भाव से बोली, 'कोई चीज पसन्द न आने पर क्या उसे नष्ट किया जा सकता है ?' यह क्या कह रही थी लड़की ! दीनबन्धु थोड़े हैरान तो हुए, फिर भी हल्के भाय से बोले, 'अपनी सृष्टि को ले कर मेरी जो मर्जी, मैं करूंगा।' लेकिन सृष्टि को ले कर किसी एक को 'जो मर्जी' करने की आजादी ही कभी उनके दुःख का कारण बन सकती थी, यह दीनवन्धु समझ नहीं पाए थे। इस समय उनकी आंखें गीली हो गई थीं। बहुत दिन पहले श्मशान में खड़े हो कर रुंधी आवाज में शोक सन्तप्त दीनबन्धु ने पूछा था, है ईश्वर, अपनी सृष्टि को ले कर तुम्हारी 'जो मर्जी' करने का तुम्हें क्या अधिकार है ?'

पर इतने दिनों के बाद भी सिरमौतमकोई नाम नामा पा। जयाय पायद कभी भाएगा भी नहीं । भगनी Hit चंठना भी दीया को भारी पड़ रहा मा भग 11114। माधयी तय भी सो रही थी। पोई रहे! Tith fonnt it in निद्रा कम-रो-यग गमिष्टर पेला पारी पासवी मोगी। दे! यह उसे संग नहीं करेंगे लेकिन यह माधवी को विनिमयदेमmun10 गो नहीं पहुंच रही थी? कही गमी मानती aftion नहीं । उनकी पती गावी finी, Ithiताने वहुत वर्ष पहले, शायद कभीग गागरी, मानी। नींद के गृपद आश्रय में माधवी मामी रही थी। मीठी गुमान गमका grint ori था। क्या मालूम मापी कौन- गानी उग दिन भी माय मा yo this में मर गा कर योगी पी, 'मग रह artindin मुच तुमने मुझग शादी की रिपोr.shame बनी के धागगी मी मरकी गं शुमाhifalta दीनबन्च पा रहे। परमात्री भूप नही रही। ओमपी भी 4 mitmanna डिया के दरबार र.आ करपट्टीपी, जो nिtent मंत्रोच के में दहती थी, या, माया को गोही । काम अधिकार दिया था, भाभीकोपीगी दाना कम वाली थी, 'याय को मही देने ? इतनीमिया ने, मोदरदुर्ग ने ही की नाही का?' भाप नावट मरती की हिदीनयाय उगग भीमकी दिशी मदकी ममा कर दें। बरी की, 'तुम जिगणे गादी करोगे, मिग : दिहाल नाराका।' अनि ईन्कन्द महीना पा रहे थे। मापी योगी मानिरहनामनिट माइन बदन दाई दी धौरान .

१४:रूपतापस तुम्हारी हृदयेश्वरी!' "ऐसा ही होता है। दीनबन्धु प्रश्न को टाल गए थे। 'मैं जानती हूँ, तुमने मुझसे क्यों शादी की!' माधवी के स्वर में पत्नी वाला दर्प था। 'बोलो क्यों ?' दीनबन्धु ने हंस कर ही पूछा था, पर मन-ही-मन थोड़ा घबराए भी। 'लोग कहते हैं, तुम्हारे मन में दया है, इसीलिए तुमने मुझसे शादी की, क्योंकि मेरे पिता शायद मेरी शादी कर ही नहीं सकते थे। कोई शराबी, विधुर, या फिर किसी की तीसरी पत्नी वनना ही मेरे भाग्य में लिखा था। तुमने तो मुझ पर दया की है।' दीनबन्धु ने चैन की सांस ली। वह खामखा घबरा रहे थे। माधवी को क्या पता ? इस विवाह के पीछे जो आकस्मिकता थी, जो कारण या घटना थी, वह सिर्फ उन्हें और किसी एक और को ही ज्ञात थी। सामयिक रूप से अपने को खतरे से बचा कर दीनबन्धु माधवी के प्रति कृतज्ञ थे । वहुत देर तक माधवी को प्यार करते रहे, 'मैं कोई महान क्ति नहीं हूँ, माधवी ! मुझसे ही शादी कौन करता, बोलो? जो तस्वीरें बनाता है, पत्थर काटता है, उसका भविष्य ही क्या है ? मां-बाप के खाते में वह खर्च के हिसाव में या फिर ऋण के खाते में लिखा जाता है। लोग सोचते हैं, लड़का वर्वाद हो गया।' माधवी को उनकी बातों पर यकीन नहीं हुआ था। जैसे वह पहले से ही जानती थी कि दीनबन्धु कभी प्रसिद्धि प्राप्त करेंगे। ताज्जुब है । अनि- श्चित भविष्य के लिए जब कभी दीनबन्धु आशंकित हो उठते थे, तब माधवी स्वप्न देखा करती थी कि उसके पति की साधना सफल और सार्थक होने जा रही है। पैसों के लिए दीनबन्धु छुप-छुप कर थिएटर के सीन बनाते थे । माधवी नाराज होती थी, 'यह सब काम तुम किसी की हालत में नहीं करोगे। तल- वार से कहीं कोई पंसिल छीलताहै।' दीनबन्धु कहते, लेकिन माधवी रुपयों की तो बड़ी जरूरत है। मुझ जैसे अप्रसिद्ध मूर्तिकार मे बड़े लोग मूति क्यों बनवाने के लिए आएंगे? ।

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४६:रूपतापस - 'त्रिमूर्ति, खजुराहो के 'मिथुन', जावा के 'प्रजापरमिता' को जिन शिल्पियों ने गढ़ा था, उनके नाम तक तो हम जानते नहीं।' माधवी में एक सहज स्वाभाविक बुद्धि थी। झट-से बोली, 'जिनके नाम जानते हो, उन्हीं की बात सुनायो।' 'माइकेल ऐंजलो की सृष्टि पर मैं मोहित हूं। उन्हें सबसे बड़ा बताने का लोभ मन को होता है, दीनबन्धु वोले थे। माधवी में उत्साह की कमी नहीं थी। पूछा, 'वह कहाँ के रहने वाले थे? कव जन्मे थे ? उन्होंने क्या-क्या काम किया था ?' फिर सब जान लेने के बाद वोली, 'माइकेल की पत्नी के बारे में कुछ पाहो । उनकी पत्नी क्या अब भी जीवित है ? 'धत् ! यह कैसे हो सकता है ? चार-पाँच सौ साल तक कोई जिन्दा भी रह सकता है भला!' फिर कुछ रुक कर बोले। 'तो तुम्हें सच बात बतानी पड़ेगी। तो सुनो! कई फालतू निखट्ट, रिश्तेदार माइकेल ऐंजेलो के मत्थे खाते थे। शादी उन्होंने की नहीं थी। लेकिन लोगों को वह कहते थे, 'मेरी शादी मेरी कला के साथ हो चुकी है -मेरी कृतियां ही मेरी सन्तान हैं ।' तुम समझ सकती हो मैंने तुम्हें झूठ नहीं कहा है। माधवी दुःख से बोलती, 'महा, बेचारा!' दीनबन्धु बोले थे, 'मैं तुम्हारा बड़ा आभारी हूँ माधवी ! तुम्हारा आत्मविश्वास मुझे हिम्मत और भरोसा दिलाता है।' उस दिन के दीनबन्धु ने कोई झूठ नहीं कहा था, उसकी गवाही आज के दीनबन्धु देंगे । उस दिन का अप्रसिद्ध शिल्पी माधवी की स्नेह-छाया में ही बाज का इतना महान कलाकार बन पाया था। क्या ही परीक्षा के दिन थे वे ! कभी-कभी दीनवन्धु को लगता, अव वह टूट जाएंगे। कला की साधना छोड़ कर कलाकार दीनबन्धु शायद अव चाकर दीनबन्धु बन जाएंगे। उन्होंने एक चाकरी जुटा भी डाली थी। आफिटेक्ट के दफ्तर में माडलर का काम था। पर माधवी राजी नहीं हुई, 'हगिज नहीं ! मैं तुम्हें नौकरी नहीं करने R- रूपतापम:४७ माधवी ने कड़ा प्रतिवाद किया था, 'तुम ने ही तो मुझे बताया था कि जो लोग शुरू के दिन मे कष्ट झेलते हैं, बाद में उनके हिस्से में बडा मुख लिखा होता है।' ववुआ के जन्म के बाद ही दीनवन्धु ने नौकरी खोजनी शुरू कर दी थी। पर माधवी ने साफ कहा था, 'रत्ती भर के इस बच्चे के एक कटोरे दूध के लिए तुम्हे पानी में हुबकी लगाने की जरूरत नहीं।' दीनबन्धु ने गौर किया था, माधवी के मन में कही कोई कृतज्ञता थी। कभी-कभी उन्हें लगता जैसे माधवी अपने को उनकी सहमिणी या उनका साथी भी नहीं समझती थी। लगता था जैसे महाजन दीनवन्धु से उमने र-सारा कर्ज लिया हो और उस कर्ज को उतारने के लिए अपनी सारी ताकत जुटा रही हो। दीनबन्धु के मन में कई वार आया कि वह पूछे कि वह पति मे कों कभी कुछ भी नहीं मांगती। माधवी दीनबन्धु को असमर्थता के प्रति सजग थी, क्या इसीलिए उमने कभी कुछ नही चाहा। हर समय कर्तव्य और विवेचना का बोध दीनबन्धु को अच्छा नहीं लगता था। अगर माधवी थोड़ी नासमझ होती, उन पर थोडा हक जताती, थोडा दावा करती तो उनको अच्छा ही लगता। पर उस समय दीनबन्धु कितने मूर्ख थे। भाज के दीनबन्धु से अगर उम दिन के दीनबन्धु की भेंट होती तो वह इम अप्रिय मत्य को उगल ही जाते। । जिस तरह से उनके दिन गुजर रहे थे, बाकी के दिन भी उसी तरह गुजर जाते तो दुनिया का क्या विगडता? सुप्न माधवी की ओर देखकर दीनबन्धु ने ईश्वर से कातर प्रार्थना की। दुनिया के लालची लोग न जाने ईश्वर से क्या-क्या मांग कर उन्हें तग करते हैं, पर माधवी ने तो उनसे कुछ नहीं मांगा था। जो कुछ उसे मिला था, वह उसी को ले कर सुखी थी। फिर भी ऐसा क्यो हुआ? ववुआ को दे कर भी उन्होने क्यो उसे छीन लिया? दीनबन्धु की इच्छा हुई कि वह अभी इमी क्षण माधवी को नीद से ४८:रूपतापस - जगा कर कहें, 'माधवी देखो, तुम मुझे जैसा समझती हो, मैं वैसा नहीं हूं। देखो, ईश्वर के प्रति में भी अभियोग प्रकट कर रहा हूँ । हृदय से उनके अन्याय का प्रतिवाद कर रहा हूँ।' लेकिन यह क्या ? अचानक माधवी ने आँख खोली। वह इस तरह से उन्हें क्यों देख रही थी? 'माधवी' कह कर दीनबन्धु चीखने ही जा रहे थे कि वह दूसरे ही क्षण समझ गए कि माधवी ने नींद में ही आँखें खोल ली थी। माधवी ने फिर आँखें मूंद लीं। पर दीनबन्धु के मन में एक भय-ता हुआ। माधवी की आंखों में उन्होंने अविश्वास और सन्देह की छाया देखी। - 'मैं क्या कर सकता हूँ ? दोप तो विधाता का है। विश्वास करो माधवी, प्लीज !' दीनवन्धु ने आहिस्ते से मन-ही-मन कहा। पर माधवी की नींद टूटी नहीं। पाँच वर्ष के बेटे के सोने के पुतले जैसे शरीर को भस्म कर जिस रोज दीनबन्धु घर लौटे थे, उसके वाद तो । बहुत दिन बीत चुके थे। एक दिन, दो दिन, एक महीना, दो महीना, एक साल, दो साल कर बहुत-से साल गुजर चुके थे। 'माधवी, माधवी मेरी ! प्लीज सुनो -समय नाम की भी एक चीज है। एक निर्दिष्ट समय के बाद वहुत-सी बातों को दुवारा उठाया नही जाता।' दीनबन्धु बड़े कातर भाव से बोले । माधवी की ओर से कोई उत्तर नहीं आया था। 'एक बात बताओ माधवी, अगर तुम्हें कुछ कहना था तो तुमने उस दिन क्यों नहीं कहा ?' मन-ही-मन दीनबन्धु ने माधवी से पूछा, 'बल्कि तुमने तो बड़े ही आश्चर्यजनक रूप से अपने शौक पर काबू पा लिया था। मैं तो सोच भी नहीं सकता था। अपनी औलाद खो कर भी तुम कठोर काठ-सी बनी रहीं। सन्तान से तुमने पति को अधिक वड़ा कैसे माना, माधवी ? मैं तो तोचता ही रह जाता था।' दीनबन्धु उन दिनों की यातें भूल नहीं थे। माधवी ने दीनबन्धु को टूटने से बना लिया था। बोली थी, 'काम नहीं करोगे तो चलेगा कैसे ?' उसने अपने हाथों से पति को कमण्यता के हाथों सौंप दिया था।

रूपतापस:४६ दीनबन्धु बुदबुदा कर बोले, 'माधवी तुम यकीन करो, उसके लिए मैं तुम्हारा आभारी हूं। उस चरम संकट से तुम उस दिन अगर मुझे नहीं उवारती तो मिल्सी दीनबन्धु उसी दिन खत्म हो जाता ।पर माज इतने वर्षों के बाद तुमने मेरी तरफ इस तरह से क्यों देखा ? मुन्ने को मृत्यु, वह तो बहुत पहले की बात है। 'माधवी, तुम मुझे माफ करना । मेरा काम अभी बहुत बाकी है, दीनबन्यु के स्वर में कातर अमहायता थी। बोले, 'मैं जानता हूँ, २ नवम्बर की वादलो से पिरी उस मनहूस शाम को मृत्यु ने आ कर हमे रिक्त कर दिया था। इतने दिनों तक तुमने अपनी रिक्तता को छुपा कर रखा, पर आज, आज हो यो तुमने इस तरह मे मेरी ओर देखा?'

नरम मिट्टी के ढेर और मूर्ति के ढांचे के पास दीनबन्धु सुवह ही से बैठे थे। पत्थर काटने का काम अभी बाकी पड़ा था। बहुत बड़े पत्थर के टुकड़े से उद्योगपति रमाकान्त बोस की मूर्ति अस्पष्ट-सी निकल आई थी। अचानक देखने पर लगता था मानो चलते-चलते रमाकान्त को किसी ने पत्थर के साथ गोंद से चिपका दिया है और वह उस पत्थर के बन्धन को तोड़ने के लिए छटपटा रहे हैं, पर अपने को छुड़ा भी नहीं पा रहे हैं । किसी और तरफ ध्यान न दे कर दीनबन्धु ढांचे पर मिट्टी चढ़ाने लगे। थोड़ी देर मिट्टी चढ़ाने के बाद काम रुक गया। वह आगे नहीं बढ़ पा रहे थे। वह लकड़ी के चाकू को हल्के ढंग से अपने सिर पर ठोकने लगे । काम अटक जाने पर दीनवन्धु सदा ही ऐसा करते थे। यह बुरी आदत उन्होंने अपने गुरु रामपाल से सीखी थी। किसी-किसी दिन तो उनके सिर पर चन्दन की तरह मिट्टी का टीका लग जाता था। और फिर काम करते- फरते अनमने होकर वह बाएं हाथ से पसीना पोंछते तो मिट्टी का टीका और फैल जाता। आंखें मूंद कर स्मृति के अन्धकारमय संग्रहालय में दीनवन्धु कुछ ढूंढ रहे थे । अब उन्होंने आँखें खोल कर ढांचे पर थोड़ी मिट्टी चढ़ाई। उसके बाद वह स्टैण्ड से काफी दूर हट आए, ताकि मूर्ति ठीक से दिखाई पड़े।

रूपतापस:५१ नजदीक सड़ रहने पर दीनबन्धु कई बार जायजा नहीं ले पाते थे। दूरी हो कता को और भार्थक बनाती है। दूर सरकते ही रमाकान्त की मूर्ति के साथ दीनबन्धु हल्के से टकराए। उन्होंने तुरन्त हाथ जोड़ कर प्रणाम किया, मानो वह क्तिी जोषित झादमी से टकरा गए हों। दीनबन्धु को याद आया, रमाकान्त बोस का जन्म-दिवन आने ही वाला था। देशमान्य इस उद्योगपति की मूर्ति उन्हें कुछ ही महीनों में पूरी करनी थी। बोन एण्ड टामम के कर्मधार रमाकान्त बोत असन्तुष्ट भाव से दीन- बन्धु को निहार रहे थे। दीनबन्धु ने मन ही मन सोचा, यह उनके लिए स्वाभाविक ही था। रमाकान्त वोत बड़े अस्थिर स्वभाव के व्यक्ति थे। काम देने के तुरन्त बाद ही कान हुआ या नहीं, पूछने लगते थे। आज अगर वह किनी काम के लिए कह गए हैं तो अगले दिन वह काम हो ही जाना चाहिए। तभी उनको खुश रखना सम्भव था। शायद इसी कारण वह जीवन में इतनी तरक्की कर पाए थे। अंग्रेजी साम्राज्य के स्वर्णिम दिनों में भी यहूदी बच्चों के साथ लड़ कर अपने प्रप्ठिान को जना पाए थे रमाकान्त बोस। दोनबन्धु विचलित नही हुए। बड़े आकार की मूति के सामने सीधे खड़े होकर उन्होंने बड्यहा कर मूर्ति को याद दिला दिया कि दीनबन्धु रमाकान्त बोस के कोई कर्मचारी नहीं। इत्तलिए यहां उनका हुक्म नहीं चलेगा। जब उनका मन होगा तभी वह पत्थर काटने का काम शुरू करेंगे। इतना कुछ कह कर दीनबन्धु ने अपने को थोड़ा हल्का सा महसूस किया। फिर अपने काम में जुट गए। दुनिया के कितने ही अनगिनत लोग उनको स्मृति में अपनी छाप छोड़ गए थे, पर दीनबन्धु सभी को, यहाँ तक कि माधवी को भूलकर एक अस्पष्ट से नेगेटिव को आंखो की रोशनी के सहारे पूरी तरह देखने की कोशिश में लगे थे। पर दीनबन्धु किसी भी हालत में उसे पृथक रूप मे देख नहीं पा रहे ये। माधवी को गोद में बैठा बबुआ हंस रहा था, यही तस्वीर वारस्वार उनकी आंखों के आगे छा रही थी। ये बातें कितनी पुरानी थी, पर दीनबन्धु ५.२:पतापग को लगा उन्हें उसी अतीत को रपट करना होगा। जो तस्वीर रा रागय दीनबन्धु देख पा रहे थे, वह थी माधवी की, जो बबुआ गले संभाल नहीं पा रही थी। माधयी बोल रही थी, 'यह तुम्हारे पारा आना चाहता है। मापनी ने शरीर के रगत और मांस को काट कर कंजूस विधाता ने बबुआ रमा भा। वक्षमा होने के पहले माधवी की सेहत कितनी अच्छी भी । गाउल गाणवी रागदारीर को आड़ी नजरों से देख कर जब दीन- यापुगे शिल्प-साधना की थी तब उन्हें लगा था, माधवी माडलिंग की आता प्रतिपाति है। यहीं से कोई जुम्बिग नहीं। नरम मिट्टी की बनी मापनी गो शरीर के सामने ना को हाथों में लेकर कितनी ही बार दीन- वा ने सोना था----अराग्भव ! हरा गिसी भी अंग से थोड़ी-सी मिट्टी का गांरा उग लेने गार गोई उपाय नहीं। थोड़ी-सी भी छुरी चल जाए तो सामंजरगनार हो जाएगा। किन जादि सप्टाने कितनी आसानी से कान्ति ला दी। सन्तान- पारिणी मापनी के शरीर में परिवर्तन की लहर आ गई। क्षीण कटि पारिणीमागनीमारीरका तारा छन्द गभिणी माधवी के बीच खो गया। भीमरान की बड़ी इछा थी कि यह माधवी के शरीर के इस परिवर्तन के साम-साम अपनी बनाई माधवी-मूर्ति में भी परिवर्तन करते जाएँ । लेकिन मापनी उस का माडल बनने के लिए राजी नहीं हुई थी। बोली, 'तुम्हारी राष्टिको पुनिया में निरापद लाना ही इस समय मेरे लिए सवत्ते मक्षा काम है।' मीना गुरणारा पर बोले, 'माडल को पली बनाया जा सकता है। लेकिन पलीको माडल बनाना भी सम्भव नहीं। मामी बोली, 'काम बड़ा आसान है-मेरी उस मूर्ति में मन भर मिली पोष दो।ती तग जैसी फूल गई हूँ !' परमहलम पीरे-धीरे पिक गया। माधवी के जो गरीर को हर देने के लिए दीनदको माधवी की मूर्ति पर से काफी देर तक मिट्टी परोपनीको मोमी गोरसे यमुनानग मार कर उतरना चाहता मामला दास भोनया मानो तद देख पा रहे । अपने रूपतापस:५३ विचित्र लहजे में बबुआ मानो कुछ दोल भी रहा था। माधवी बबुआ को रोकने की कोशिश कर रही थी। बोल रही थी, 'नही, अभी पिताजी के पास नहीं जाना है। अभी उन्हें काम करने दो।' दीनवन्धु का काम करने का जरा भी मन नहीं था। उन्हें बबुआ से वातें करने का मन हो रहा था । और आज इस समय वह बबुभा के नाक, कान, मुंह, आँखें, केश हर अवयव को याद करने की साधना मे लीन थे। माधवी अब अपने को थोड़ा संभाल चुकी थी। वह कल की घटना शायद भूलने की कोशिश कर रही थी। कमरे से उठ कर वह मीधे स्टुडियो आई । बोली, 'तुम इतने चुपचुप क्यों हो, जो ?' 'नहीं तो!' माधवी असहाय-सी बोली, 'मुझे क्या हो गया था, बताओ तो? अचानक ही तबियत काबू से बाहर हो गई थी।' 'तुम्हे कुछ भी तो नही हुआ था !' दीनबन्धु ने माधवी को समझाने की कोशिश की। 'कुछ तो हुआ ही था। सिर में असह्य दर्द था। उसके बाद लगा पेट से एक दर्द धीरे-धीरे ऊपर की तरफ उठ कर मुझे बेचैन रहा है।' 'वह दर्द का अनुभव जीवन में एक ही बार हुआ था, वहुत पहले, वोलते-बोलते माधवी का चेहरा पीला पड़ गया । दीनबन्धु समझ गए कि माधवी बबुआ के जन्म-क्षण की बात कह रही थी। प्रसंग बदलना जरूरी था। माधवी ने अब दीनबन्धु के पास रन्ने स्टंण्ड की तरफ देखा। बोली, 'किसी का वस्ट बना रहे हो?' 'हां,' दीनबन्धु बोले। उन्होंने सोच लिया कि इससे अधिक इन समय वह कुछ बोलने भी नहीं । इसे बिल्कुल छुपा कर रखेंगे। उसके बाद एक दिन माधवी को चौंका देंगे। माधवी को समझा देंगे कि दीनदन्यु के लिए मायवी के अवचेतन मे जो भावना है, सही नहीं है। पत्थर पर काम करते रहने पर भी उनके पति का दिल पत्थर का नहीं दन गया है । वह बबुना को भूल ५४ :रूपतापस नहीं हैं। फिर भी दीनवन्धु को डर लग रहा था। माधवी अगर कल की तरह अन्तर्मेंदी दृष्टि से देखेगी तो दीनवन्धु के लिए काम करना मुश्किल हो जाएगा। जिन हाथों से वह भीषण पापाणों को अपनी बात मनवाने पर मजबूर कर सकते हैं, दीनबन्धु के वही हाथ अक्षम हो जाएंगे। माधवी के वहां से चले जाने पर दीनबन्धु ने चैन की सांस ली। लेकिन कभी ऐसा दिन भी था जव यदि माधवी वीच-बीच में न आती, तव दीनबन्धु के लिए काम करना मुश्किल हो जाता था। पास ही में जननेता (नाम बताने की आवश्यकता नहीं) जिन्हें हम देशमित्र के नाम से जानते हैं, की प्लास्टर की मूर्ति रखी हुई थी।. दीन- बन्धु के किसी शुभपी ने उन्हें यह काम ला कर दिया था। बोले, 'इसे अच्छी तरह बनाना । तुम्हारा नाम होगा। उनकी प्रतिष्ठा है। इसके चलते दूसरे नेताओं का भी काम मिल जाएगा।' सुन कर दीनवन्धु को गुस्सा आ गया। बोले थे, 'सच्चा कलाकार हमेशा हर काम को अच्छी तरह से ही करता है। हर काम में वह अपने को उड़ेल देता है।' देशमित्र को आठ दिनों तक बहुत पास से देखने का सौभाग्य दीन- वन्धु को मिला था। अपने बहुत सारे चमचों को लेकर ही वह हर रोज सिटिंग देने आते । मूर्ति बनाते समय दीनवन्धु अपने को खो देते थे। लेकिन मूर्ति बनाने के बाद वह उनके भक्तों को पसन्द नहीं आई। बोले, 'यह कैसी मूर्ति बनी है ? भविष्य में लोग इस मूर्ति को देख कर मुंह विच- काएंगे।' कलाकार की सबसे बड़ी परीक्षा यही है। जिसकी मूर्ति बनाई गई है, उनकी पत्नी, या उनके भक्तों को संतुष्ट करने का सौभाग्य बहुत कम कलाकारों को प्राप्त होता है। उस समय दीनबन्धु को यह मालूम नहीं था। सोचते थे, यह दुर्भाग्य सिर्फ उन्हीं का है। बाद में उन्हें पता चला था कि मूर्तिकार के जीवन में यह कोई नई घटना नहीं थी। शिल्पगुरु रोंदा ने दुनिया के श्रेष्ठ उपन्यास- कार वालज़ाक की जो मूर्ति बनाई थी वह लोगों को पसन्द नहीं आई थी।

रूपतापस:५५ एप्स्टाईन के भाग्य में भी बार-बार यही दुख लिखा था। लेकिन उससे शिल्प का क्या आया गया ? रोदा के वालजाक, एप्स्टाइन के आस्कर वाइल्ड क्या इनसे छोटे सावित हो गए? कभी-कभी डर लगता है, माइकेल एंजोलो ने मेदचि कुल के स्वर्गीय कौतिमान-पुरुप लारेंजो की जो अनश्वर मूर्ति बनाई थी, वह अगर जीवित होते तो उन्हे भी शायद अपनी मूर्ति पसन्द नहीं आती। इतिहास के लारेंजो दी मंर्गानफिसेण्ट मूर्तिकार की छनी से और भी मंगनिफसेन्ट बने थे, उसे प्रमाणित करने के लिए कई शताब्दियों की जरूरत पड़ी थी। उस रात को वात दोनवन्धु कभी नही भूल सकते। उनके जीवन में वह एक संकट का मुहूर्त था। माधवी ने पूछा था, 'क्या बात है ? इसने गुमसुम क्यो हो ?' माधवी को अपनी समस्या बताते हुए दीनवन्धु बोले थे, 'इस समय मैं जो निर्णय लूंगा, उसी पर मेरे सारे शिल्प का भविष्य निर्भर करता है।' माधवी बोली थी, 'मैं अनपढ हूँ। इतना कुछ समझती-बुझती भी नहीं । लेकिन इतना समझती हूँ कि तुम्हारे शिल्प का भविष्य अलग- तो नहीं। दीनबन्धु का चेहरा चमक उठा था । वोले, 'माधवी, तुम्हारे प्रति मैं वाकई बहुत कृतज्ञ हूँ। तुमने मुझे सही रास्ता दिखाया है। शिल्प को छोड कर मेरा दूसरा कोई भविष्य नहीं हो सकता।' फिर गहरी वेदना के साथ दीनबन्धु बोले थे, 'दुनिया के अधिकतर लोग या उनके रिश्तेदार या फिर उनके प्रशंसक मूर्तिकार से चाटुकारिता की उम्मीद रखते हैं । वे चाहते हैं कि मूर्तिकार उनकी मर्जी की माफिक मूर्ति को पवित्र, सुन्दर और महान बनाए।' माधधी बोली, 'इस मांग मे हैरान होने की कोई बात नही है।' 'लेकिन मांगने से ही देना पड़ेगा, ऐसा भी तो कोई कानून नही है। आदमी महाकाल के सामने झूठ बोलने के लिए मूर्तिकार नही बनता है !' दीनवन्धु का स्वर गूंज उठा। मापदी कुछ समझी नही । वह दीनबन्धु की तरफ देखती रह गई। दीनबन्धु बोले, 'मुझे दो घटनाएं याद आती है, माधवी ! मास्टर - ५६: रूपतापस साहब से सुना था, हेनर नाम के एक यशस्वी कलाकार ने किसी धनी बुढ़िया की मूर्ति बनाई थी। वृद्धा को वह मूर्ति पसन्द नहीं आई। उसके अनुसार उसने पूरी कीमत चुकाई थी, इसलिए चीज उसकी मर्जी-माफिक होनी चाहिए थी। मूर्ति को वापस करती हुई वृद्धा बोली थी, 'यह मूर्ति मुझ-जैसी नहीं है।' हेनरं ने गम्भीर हो कर जवाव दिया था, 'श्रीमतीजी, कभी आपके उत्तराधिकारी हेनर की सृष्टि को एक अपूर्व कलाकृति के रूप में पा कर अपने को धन्य मानेंगे। आप ठीक इसी मूर्ति की तरह थीं या नहीं, इस बात को लेकर माथापच्ची नहीं करेंगे।' माधवी वोली, 'इस बात में अहंकार की बू आती है।' माधवी सच्चे अर्थों में सहचरी थी। 'तुमने ठीक पकड़ा है माधवी,' दीनबन्धु वोले। 'दूसरी तरफ लारेंस मैकडोनाल्ड को देखो। अपने युग के वह बड़े प्रिय मूर्तिकार थे । इंग्लण्ड के नामी-गरामी लोग पत्थर की अपनी मूर्तियां बनाने के लिए उन्हें ढेर सारे रुपए देते थे। पर आज उनकी कोई कीमत नहीं रही। उन्होंने पत्थर पर बड़े निर्लज्ज ढंग से अपने ग्राहकों की खुशामद की। वे सभी के सभी इतने महान लोग थे कि कोई बच्चा भी उन मूर्तियों को देख कर बोल देगा कि मैकडोनाल्ड भरोसे के लायक नहीं।' दीनबन्धु ने आगे कहा था, 'माधवी, मैं तुम्हारा आभार प्रकट कर सकू, ऐसी भापा मैं नहीं जानता। मैं सौन्दर्य को ढूंढ़ता फिरूंगा, फिर भी किसी अमीर के मनोरंजन के लिए मिथ्याचार नहीं वरतूंगा।' देश मित्र के भक्तवृन्दों ने दीनबन्धु पर बाद में भी आक्रमण किया था। इस पर दीनबन्धु बोले थे-'इस मूर्ति में मैंने देशमित्र की चारि- त्रिक विशिष्टताओं को स्थापित करने की कोशिश की है। देशमित्र के माडल की तरफ इशारा कर दीनवन्धु बोले थे, 'सिर के कबड़-खाबड़ हिस्से को देखिए-मानो आश्विन की सर्वनाशा आंधी से ध्वस्त कोई गांव-यह प्रमाणित करता है कि वह विद्रोही हैं । गिर पर बलि रेखा है, थके-हारे किसी विद्रोही का ही चेहरा है वह । गन्ना थोड़ा मोटा है, देश मित्र को अगर कोई ध्यान से देखें तो यह ग्रुटि साफ- साफ दीखती है । त्रुटि कही जाए या उनकी विगेपता-वह बड़े ही जिद्दी .

हपतापस:५७ है। किमी काम के पीछे पड़ जाने पर उसे पूरा करके ही छोड़ते है। किमी जिद के कारण सिर थोडा झुकाए हुए हैं। आने वाले कल के लोग समझ नकते हैं कि वह किसी अन्याय के विरुद्ध कैसे प्रतिवाद करते थे।" लेकिन देशमित्र के भक्तो को वह मूर्ति पसन्द नही आई थी। वे बोले थे, "यह कोई मूर्ति बनी है ? बिल्कुल वकवास, बदशक्त! दीनबन्धु का जवाब था, "भूति मैं नहीं बदलूंगा। अगर लेने की इच्छा न हो तो,न लें।" मनि उन लोगो ने नही ली । माधवी के सान्निध्य में दीनबन्धु ने अपने को सम्हाल लिया था, पर 'बदशक्ल' शब्द उनके मन में चुभ-सा गया उसके बाद से तो कई दिनों तक दीनबन्धु सुन्दर और असुन्दर के मूल्याकन मे जुटे रहे । मारी जिन्दगी के अनुभव ने उन्हें यही समझाया कि कला के क्षेत्र मे जिसके पास चरित्र है, वही सुन्दर है, जिसके पास कोई चरित नही, जिसके बाहर या अन्दर से किसी सत्य का आभास नही मिलता, वही असुन्दर है। आज भी इस मुहर्त में मिट्टी को लोई हाथो मे लेकर दीनबन्धु सुन्दर और सत्र का आह्वान कर रहे थे, पर बाज दीनबन्धु कुछ भी नही पकड़ पा रहे थे । आज का दिन,दीनबन्धु की साधना के इतिहास मे शायद सबसे असफल दिन था। काम बन्द कर दीनबन्धु थोडी देर तक चुपचाप बैठ गए। उनकी मानी औताद जिसे वह इतना प्यार करते थे, आज वह क्यो नही पकड में था रही थी? दीनबन्धु प्रकाश के लिए दर्द का अनुभव कर रहे थे। उनको याद आ रहा था, बथुआ अपनी मां को गोद से उनके पास आना चाहता है। अगर उन समय का वह एक फोटो रखते तो बुद्धिमानी का काम करते और इस तरह से आज अन्धेरे मे उन्हें गोता नहीं लगाना पड़ता ! लेकिन वह उस समय फोटो खिचाते भी कैस? उन दिनों तो रोजमर को जिन्दगो चलानी भी मुश्किल थी। फोरो की तो बात ही नही उठ कती थी।

५८ :रूपतापस । . फिर भी दीनबन्धु ने एक बार वबुआ का फोटो खिचवाने का प्रस्ताव रखा था, पर माधवी मुकर गई थी। बोली थी, "उन पैसों से तुम्हारे काम का एक-आध औजार खरीदा जा सकता है। फोटो खिंचवाने का समय कुछ खत्म तो हो नहीं गया है।" लेकिन समय सचमुच ही खत्म हो गया। कितनी जल्दी सब कुछ खत्म हो गया। अन्त का भी कोई अन्त होता है, दीनबन्धु का ऐसा ही कुछ ख्याल था । पर वहां भी दीनबन्धु ने गलती की थी-इतने दिनों के बाद पुराना घाव हरा हो रहा था। कितने दिन पहले की बात है. -लेकिन दीनवन्धु को लग रहा था, मानों कल की ही बात है, जब वह बबुआ को हमेशा के लिए विदा दे कर घर लौटे थे। शहर के एकान्त में अन्धेरी गली का अन्धकारमय वह घर और आज का घर एक-जैसा नहीं है । सफलता ने आ कर दीनबन्धु के पर चूमे थे । अपनी जिद पर अड़े रहने के बावजूद कलाकार दीनवन्धु व्यर्थ नहीं हुए थे, लेकिन माधवी का जीवन तो अपूर्ण रह गया । पिछले कई वर्षों में दीनबन्धु ने कई अच्छी कला-कृतियों का निर्माण किया था । पर आज उन्हें लग रहा था, वे नारे बेकार के काम थे--असल काम तो बाकी रह गया था। मूर्तिकार दीनवन्धु ने रात-दिन एक करके संगमरमर, पत्थर और कांसे पर कितने ही लोगों के शोक को शान्त किया था, कितनों को स्मृति अक्षय बनाई थी, पर कर्ता की अपनी ही छत टूटी पड़ी थी। बबुआ के लिए उन्होंने कुछ भी नहीं किया था। या उससे भी पहले का वह महाअपराध ? दीनबन्धु चौंक उठे। दीनवन्धु शायद उसी समय दौड़ते हुए जा कर माधवी को बोलते, "माधवी, मुझे माफ करना । विश्वास करो, मेरी कोई गलती नहीं थी !" लेकिन इसी बीच वाहर दरवाजे की घण्टी बज बठी। जरूर रेखा आई होगी! उनको लगा अगर वह आज रेखा को न आने के लिए कह देते तो अच्छा रहता । आज अपना सारा काम बन्द रखते तो ठीक रहता। लेकिन रेखा को भी तो रुपयों की जरूरत थी। "रेखा, आज तुम बड़ी गुम-सुन दिख रही हो । क्या बात है?" दीनबन्धु ने पूछा। । - रूपतापस:५९. रेखा वोली,"नहीं, एमी कोई बात नहीं।" रेसा मम्पूर्ण नग्न हो कर स्टूडियो में आई थी। पूछा "वेदी पर बडूं?" "जैसी तुम्हारी मर्जी"-दीनबन्धु काम शुरू करने के पहले वोने। "किसी एक जगह पर नहीं बैटने से दिक्कत नहीं होगी?" देवीदान ने पूछा। रोंदा अक्सर अपने स्त्री या पुरुष-माइनों को अपनी मर्जी के अनुसार चलने-फिरने के लिए कहते थे। वह चुपचाप सई हो कर देखते रहते। कोई सास अदा या नंगिमा पसन्द आने पर कहते, 'स्टेच्यू !' माइल उसी वक्त उसी अवस्था में खड़ा हो जाता और रोदा कट से मिल मे उस अदा को उतार लेते। रेखा स्टुडियो के कमरे में चल-फिर रही थी। दीनबन्धु उसके अनावृत शरीर की नरम मांसपेगियों को गतिविधियों पर नजर गडाए हुए थे। गिल के माध्यम से इस गति को समझना एक कठिन साधना । गति है क्या ? एक अवस्था से दूसरी अवस्था में पहुंचने का पहला क्षण। परीर का प्रत्येक अणु-परमाणु उस समन शरीर को गति देने में सहायता करता - विक्टर ह्य गो ने नारी-गरीर को शिल्प का आदर्श माडल कहा था। इस दृष्टि में भी दीनबन्धु ईश्वर की पांचों अंगुलियों की पर छाप देख पा रहे थे। रेखा थोडी पीछे की तरफ झुक कर खडी थी । दीनबन्धु सहसा अपने विद्यार्थी से बोले, "देखो-देखो, देवीदास ।" "रेसा थोड़ी देर तक तुम इसी मुद्रा मे खडी रहो दीनबन्धु ने मिट्टी की मूर्ति को छोडकर स्केचिंग के लिए कागज और पेंसिल निकाली। फिर देवीदास से बोले, "मैं चाहूंगा तुम इमी मुद्रा को एक मूर्ति बनाओ। रोदा कहते थे, "नारी का धड तक का शरीर एक कली है-उस बनी सर. जूडे और स्तन-कलश के पद्म खिलते है।' और शरीर को दे। मानो धनुप मे तीर कसा हुआ है। -इम तीर से ही प्रेम के देवता " करते हैं।" "आप कुछ नही बनाएंगे।" देवीदास ने पूछा।

६० :रुपतापस "मेरी दृष्टि एकाग्न नहीं हो पा रही है, देवीदास ! रेखा में कल मैंने जो कुछ देखा था, आज वह खो गया है। आज लग रहा है, कल जो कुछ बनाया था, वह गलत था। उसे तोड़ना पड़ेगा।" देवीदास ने रेखा की कल वाली मूर्ति को तोड़ कर फिर से मूर्ति बनाने की सलाह अपने गुरू को दी । पर दीनबन्धु इतना सब कुछ करने की मनःस्थिति में नहीं थे। "रेखा में आज आप क्या देख रहे हैं, मास्टर साहब ?" "आज उसमें शंका दिखाई दे रही है । अनिश्चित आशंका सौन्दर्य को नष्ट कर देती है, देवीदास !" दीनबन्धु को इस समय बातें करना भी अच्छा नहीं लग रहा था। रेखा को छुट्टी देकर वह वबुआ के पास लौटना चाहते थे। बबुआ की अस्पष्ट मूर्ति उन्हें बार-बार पुकार रही थी। लेकिन उन्हें लग रहा था जैसे दुनिया के सभी लोग पड्यन्त्र रच कर आज उन्हें ववुआ से रहे थे। बाहर दरवाजे पर फिर घण्टी बज उठी। दीनवन्धु ने रेखा को बुलाया। बोले, "थोड़ी देर रुको। यह लो अपने रुपये। पूरे सप्ताह के हैं । इस सप्ताह और आने की जरूरत नहीं। लेकिन याद रखना, अनावश्यक चिन्ता चेहरे की सुन्दरता को विनष्ट कर देती है। मनुष्यों के सारे सौन्दर्य को नष्ट करने के लिए ही शंतान ने दुश्चिन्ता को दुनिया में भेजा है।" ले जा ।

"वे लोग आ गए हैं," देवीदास ने आकर कहा । "जनरत इंडस्ट्रीज के पी० आर० ओ० मिस्टर चटर्जी और उनके साथी। उनके जी० एम० भी उनके साथ आए है।" दीनबन्धु को याद आ गया, कुछ दिन पहले इस कम्पनी ने उनके पास एक प्रस्ताव भेजा था। वे लोग जनरल इंडस्ट्रीज के मालिक मिस्टर सेन की पत्नी की एक कासे की मूर्ति बनवाना चाहते थे। "नमस्ते मिस्टर घोप" पी. आर० औ० मिस्टर चटर्जी बोले। दीनवन्धु ने भी हाथ जोडकर प्रतिनमस्कार किया। जन-सम्पर्क अधिकारी ने कहा, "हमारे कारखाने को केन्द्र बनाकर जो नया शहर बना वही पर हम लोग मूति की स्थापना करना चाहते "कौन-सी जगह है ?" दीनवन्धु ने पूछा। "शहर का नाम बदलकर नया नाम 'सुतपा नगर' रख रहे हैं । सुतपा नगर के ठोक बीच मे जो पाकं है, उसी जगह पर यह मूति स्थापित की जाएगी। इसके लिए हम चन्दा भी इकट्ठा कर रहे हैं। कर्मचारी लोग स्वेच्छा से चन्दा दे रहे हैं।' दीनबन्धु की इच्छा थी कि यह काम वह थोड़े दिनो के वाद हाथ मे लें।

६२:रूपतापस - पर ऐसा करना मुश्किल था, क्योंकि लेडी सुतपा सेन विलायत जा रही थीं। उसके पहले सिटिंग का काम खत्म करना ही था । "आपने जो रकम मांगी है, वह कमेटी ने मंजूर कर ली है। राष्ट्र- पिता की जो मूर्ति आपने बनाई थी, उस पर हम फिदा हैं।" "दीनबन्धु ने यह काम थोड़े दिनों के बाद शुरू करने का आग्रह किया, पर वे लोग नहीं माने। "लेडी सुतपा की उम्र भी ढल रही है, यह आपको नहीं भूलना चाहिए। आदमी की बात, कब है, कब नहीं, कुछ नहीं कहा जा सकता।" दीनबन्धु अन्ततोगत्वा मान ही गए। उन लोगों ने उनको सेन की कोठी में जाकर सिटिंग लेने के लिए कहा था, पर दीनवन्धु ने कहा, "कलाकार के स्टूडियो में बड़े-बडे लोगों के पैरों की धूल पड़ती रहती है। सुतपा देवी अगर यहाँ आ सकी तो अच्छा रहेगा। हाँ, यदि वह अस्वस्थ हैं तो वात दूसरी है।" लेडी सुतपा चूंकि बीमार नहीं थी, इसलिए दूसरे दिन से वह स्वयं सिटिंग के लिए आएंगी, ऐसा तय पाया। ..- . "यह हैं हमारे चेयरमैन की धर्मपत्नी एवं हमारी शिल्प-संस्था की प्राण-लेडी सुतपा सेन और यह हैं मूर्तिकार दीनबन्धु घोप," पी० आर० ओ० ने रस्मी परिचय करवाया। सभी के सामने उन दोनों में नमस्कार का आदान-प्रदान हुआ। पी० आर० ओ० ने कहा, "हम चाहते हैं कि आप एक ऐसी मूर्ति वनाएँ, जो आपके कलाकार जीवन की श्रेष्ठ शिल्प-साधना हो।" "मेरे हाथों में कुछ नहीं है । अगर ईश्वर ने चाहा, तो ऐसा ही होगा, दीनबन्धु ने यह बात अपने हृदय से कही। "एक सिटिंग में तकरीवन कितना समय लगेगा?" "कुछ नहीं कहा जा सकता। अगर उन्हें जल्दी हो तो वह जव चाहें, जा सकती हैं।" "नहीं-नहीं, हमें कोई जल्दी नहीं। शिल्पी जितनी देर चाहेंगे, मुझे समय देना पड़ेगा," श्रीमती सेन बोली, "फला एक साधना है, सुमन्त !

स्पतापस :६३ लेडी सुतपा ने जनसम्पर्क अधिकारी को याद दिलाया ! सभी ने सहमति प्रकट की, "मपमुच कला मे भी कही ममय का हिमाव-किताब होता है ?" "लेकिन आपकी तबियत ? काफी देर तक एक ही मुद्रा में बैठना पड़ेगा।" कइयों ने चिन्ता प्रकट की। लेडी सुनपा मेन ने उन लोगों को चिन्ता करने के लिए मना किया। उसके बाद फोटोग्राफर ने आगे बढकर मूर्तिकार दीनबन्धु और उनके कला के विषय मुतपा देवी का एक फोटो खीपा। मेडी मुतपा ने अब सभी लोगो को चले जाने का गम्भीर भाव से आदेश दिया। बोली, "गाडी यहाँ रहेगी ही। मैं ममय पर घर पहुंच जाऊंगी।" दीनबन्धु ने देवीदाम को भी छुट्टी दे दी। उसके बाद वह लेडी से को लेकर धीरे कदमो से स्टुडियो में आए। दीनबन्धु ने अन्दर मे दरवाजा बन्द कर लिया। "अन्दर बडा अन्धेरा है," मुनपा बोली। "अन्धकार अभी दूर हो जाएगा।" दीनबन्धु ने विजली का बटन दवाया । तेज प्रकाश से सारा कमरा जगमगा उठा। "मैं और भी माड़ियां अपने साथ लाई हूँ। जरूरत पड़ने पर बदल मकनी हूँ," सुतपा ममय बर्बाद न कर झटपट बोल गई। "आप उम कुर्मी पर वैठिए।" 'आप वैठिए,' वोलते समय दीनबन्धु के होठ काप गए। तो क्या इतनी देर तक ये दोनो लोगो के मामने अभिनय करते रहे थे? प्रकाश को साक्षी मानकर दीनबन्धु और सुनपा दोनो ही थोडी देर तक एक-दूसरे की तरफ चुपचाप देखते रहे। निस्तब्धता के इस बर्फ के टुकड़े को कौन तोडे ? दोनो ही मानो भाषा सोकर युग-युगान्तर से एक- दूसरे के आमने-सामने खड़े थे। दीनवन्धु कुछ बोलना चाहते थे, फिर उन्होंने चुप रहना ही ठीक भमझा।

६४ : रूपतापस - . सुना था कि लेडी सुतपा रेन रानी की तरह ही सिंहासन पर बैठीं। और तव बर्फ गलनी शरू हुई । सुतपा खुद ही बोली, "आप कैसे हैं, दीन दा ?" प्रकाश को सुतपा पर फोकस करते हुए दीनवन्धु गम्भीर भाव से बोले, "जहाँ तक मुझे याद है, तुम मुझे 'तुम' कहा करती थी।" "कितने वर्ष पहले की बात है ! पर अभी तक तुम्हारा गुस्ता नहीं गया, दीनू दा?" "मैंने सुतपा सेन हमारे स्टुडियो में आ रही हैं । पर रमा, सुतपा बन गई है, यह मैं कैसे जानता ?" स्टुडियो की तेज रोशनी में सुतपा की कजरारी आँखें बन्द-सी होने लगीं। "उस रमा और आज की सुतपा में बहुत वर्षों का व्यवधान है । तुम्हें सब कुछ याद है, दीनू दा?" सुतपा ने फुसफुसा कर पूछा। "इस समय याद न रहे, इसी की कोशिश कर रहा हूँ। मुझे लेडी मुतपा सेन की मूर्ति का माडल बनाना है । उस मिट्टी की मूर्ति से प्लास्टर का ढाँचा बनेगा और फिर प्लास्टर से गलाए हुए कांसे में लेडी सुतपा की अक्षय मूर्ति बनेगी। इस समय मुझ पर काम का बहुत भार है । यह मेरे उद्वेलित होने का समय नहीं।" दीनबन्धु जो कुछ बोल रहे थे, उसमें कोई छल-कपट नहीं था। दीनबन्धु ने स्टैण्ड पर ढांचा बना कर रखा । उसके बाद बोले, "रमा, अपना चेहरा मेरी तरफ से हटा कर क्या उधर दीवार की तरफ करोगी?" "भिन्न-भिन्न कोणों से मुझे देखोगे, यही न ?" सुतपा बोली, "उसके लिए तुम्हें बहुत समय मिलेगा। इस समय थोड़ी बातें ही कर लें । आज- कल तुम्हारा कितना नाम है । न्यूयार्क के मैट्रोपालिटन म्यूजियम तक में तुम्हारी पला पहुँच नुकी है।" "सारी जिन्दगी काम तो कुछ कम नहीं किया है। उनके लिए भी तो कही आश्रय चाहिए ।'दीनबन्धु बोले । "चीनू दा, तुम बाद में मुझे अच्छी तरह देख लेना। इस समय जरा मेरी बात सुनो। मेरी क्या इच्छा है, जानते हो? मुझे लेकर तुम एक - .

पतापरा: ६५ ऐसा काम करो, जो तुम्हें हमेशा जिन्दा है।" दीनरन्धु को हंसी आ रही थी। याद आ रहा था, कभी रणाको उन्होने स्वयं ही कहा था, "रमा, भैरा स्वप्न पपा है, जागती हो। तुम्हे सामने बैठा कर एक ऐसी मूर्ति यनाऊँगा, जो हम दोनो पोभार कर देगी।" रमा को भी यह यात याद थी। धोली, "कभी यह प्रस्ताय माही मेरे सामने रसा था!" बहुत देर हो चुकी थी। पर तेडी गुतपा को यह राव कहने का मषा फायदा? सुनपा के मा भै शायद कोई शक था। यह गंकोच से धोनी, "आर्डर से शायद कभी कोई ५ड़ा काम नहीं होता। हैन ? तुम्ही न एक बार यताया था।" "उग रामप तुम्हे जो पुरख वाहा था, गलत कहा था, मा।" दीनवन्धु का जवाब गुनपर रमा पौंक उठी। रमा का विस्मय दीनमाधुग छिपा नहीं रहा। फिर भी गहन साथ से वह योगते गए, "उग याा मंगे उन पर थी, वहुन कुछ नही जानता था। बाद में ही में जान गवा कि दुनिया की गजाननग कला मानगि आईर पर ही होगका था। आर्डर मिलने के बाद ही मरणीय कालाकारी नेयपनी प्रतिभा का थैवा माल दिया था।" "वया मनलय रमा ने विरामय में पृष्ठा। "कभी फिशियम को किती ग्रीक गमन (हा गाना पहावय परिस्लिम रद हों) ने पहा था, मिटा फिरियम, पायनान बीfr. कलाना कीजिए।" जीवन के बाप मान नक फिदिम गहवाम पर चलते रहे और दुनिया के दोनों को पानान मिला।" योटी देर का दीनबन्ध फिरवाव, “किरी ने 7 का की होली-मिटर दा विधी, मृग्लग और सदा टगा होग। माकन दरी, टोटादलोंगदिली, गभी ने मेहमा कालिदो गाना दल-दिती एन्ट वा सादर लिए दला, जहाथ वादना, मी हाव पाया । -4 ६६:रूपतापस नपए मांगने में वह बिल्कुल नहीं झिझकते थे।" सुतपा बोली, "इन विषयों पर तुम्हारी तरह और कौन खबर रखेगा,. दीनू दा? जब तुम बोल रहे हो तव मानना ही पडेगा कि कलाकार या मूर्तिकार ऐसे ही लोग होते हैं । लेकिन ऐसे कलाकार भी तो होंगे, जिन्होंने अपने हृदय की प्रेरणा से महान काम किया हो।' दीनबन्धु सुतपा को देखते हुए बोले, "आर्डर ने ही विटोफज ने अपने एगमण्ड ओवरचर सी सृष्टि की थी। हैंडेल को जब कहा गया कि आप 'लार्गो' बनाइए, तभी उन्होंने 'लार्गो' की सृष्टि की।" दीनबन्धु पैनी नजर से सुतपा को देख रहे थे । रमा ने सुतपा बन कर अच्छा ही किया था, क्योंकि सुतपा को बुढ़ापा छू रहा था । इस सुतपा में दीनबन्धु रमा को नहीं ढूंढ़ पा रहे थे ! दीनबन्धु को दुख हो रहा था। प्रकृति में कोई हिसाव नहीं । नारी के सौन्दर्य-राज्य में हानि की कोई सीमा नहीं, नहीं तो उस दिन की उस रमा की यह दुर्दशा? रूप ! रूप से झुलसता चेहरा देकर ईश्वर ने रमा की सृष्टि की थी। रमा वीनस का दूसरा संस्थारण थी। दुनिया के लोगों के रूप की प्यास को बुझाने के लिए भरको विश्वकर्मा अपने स्टुडियो में कभी-कभी अपने हाथों से माडल बनाते हैं। मांस के बदले रमा के लिए उन्होंने शायद गाय के दूध के मक्खन का इस्तेमाल किया था। रमा के शरीर का चमड़ा इतना माफ, इतना स्वच्छ था मानो अन्दर तक दिखाई पड़ता था। वह इतनी गर्मीली थी जने दूसरों की दृष्टि के ताप से उसके सुन्दर गरीर का माधुर्य मानो पिघल जाएगा। गवारी रमा को हिरणी-से काले कजरारे नयन, लम्बे घने काले केरा, लम्बी ऊँनी ग्रीवा, स्तनशोभित वक्ष और कृश. पाटि-दीनबन्धु अपने मानस-चक्षुओं से देखे जा रहे थे। उस दिन दीन- बन्धु ने रमा फे होंठों में स्वर्गीय लालित्य की जिस सुपमा को झरते हुए. देगा था। उसे वह आज भी भूल नहीं सके थे। जिस दिन अप्रकाश वायू सरपेन्टाइन लेन में दीनबन्धु के साथ वाले मकान में किराएदार की हैसियत से आए थे, वह बहुत पुरानी बात नहीं पी। दीनबन्धु के सिर पर उस समय तक शिल्प का भूत नहीं सवार हुआ - रूपतापस :६७ था। लेकिन जब किशोरी रमा पर उनकी नजर पडी, तब दीनबन्धु आँखें हटाना भूल गए थे। रमा को रूप देकर भी ईश्वर ने उसकी सरलता नहीं छीनी थी। रूप के धन से धनी लड़कियां बदी जल्दी अपने स्वाभाविक मुर को सो बैठनी हैं । सरपेन्टाइन लेन में पडोसी परिवारों के बीच जो आन्तरिक्ता और आत्मीयता पनपी थी, उसी के फलस्वरूप दीनवन्धु और रमा मै भी स्वा- भाविक स्नेह का एक बन्धन पैदा हो गया था। म्यूजियम से लौटकर एक दिन दीनबन्धु अपनी छत पर बैठे-बैठे मिट्टी की यक्षिणी बनाने की कोशिश में लगे थे । अचानक रमा छन पर चली आई। बोली, "क्या कर रहे हो, दीनू दा" रमा की आवाज सुनकर दीनबन्धु चौंक उठे। रमा फिर बोली, "वाह ! वडी अच्छी गुडिया बना लेते हो तुम।" "अच्छा " दीनबन्धु वोले थे। "रथ-यात्रा के दिन अगर बाजार में जाकर बैठोगे तो आधे घण्टे में एक टोकरी गुडिया विक जाएंगी।" रमा वोली थी। उस समय दीनवन्धु यही स्वप्न देखते थे कि रथ-यात्रा के दिन बाजार मै वह रंग-बिरंगे गुड्डे-गुडियो को लेकर बेचने के लिए बैठे हैं । उनको बनाई गुडियो के लिए बाजार में मारा-मारी हो गई है। इससे अधिक कल्पना करने की शक्ति दीनवन्धु या रमा, किसी में नहीं थी। उसके बाद रमा और दीनबन्धु बडें होने लगे। दीनबन्धु के घर वाल ने उन्हे समझा दिया कि ससार गुडियो के खेल की जगह नहीं । रुपए-आने- पैसे की दुनिया में नाचने वालों और फोटो बनाने वालो की कोई कीमतों नहीं। पर रमा ने कुछ समझना नहीं चाहा । एकमात्र रमा ने ही विश्वास नही किया कि दुनिया मे कलाकार की कोई कद्र नहीं। लेकिन नहीं । यह क्षण विख्यात शिल्पी दीनबन्धु पोप के लिए अतीत में गोता लगाने का अवसर नहीं था। सुनपा बोल रही थी, अपनी घर-गृहस्थी के बारे मे तो तुमने कुछ बताया नहीं।" H ६८:स्पतापस । "शादी की थी--माधवी से," दीनवन्धु मशीन की तरह बोल गए। "माधवी ! लगता है उसे मैंने तुम्हारे इस स्टुडियो में ही देखा था। बस्ती से माडल बनने के लिए आती थी।" "तुम्हें ठीक ही याद है। हालांकि वह मुझसे बार-बार पूछती थी कि मैंने अचानक उससे शादी क्यों की?" "क्यों की?" "क्यों की, का कोई जवाब नहीं है। एक दिन उसकी थोड़ी-बहुत जानकारी ली। पता चला, गरीव की लड़की है। पेट के लिए माडल बनने आई है । और भी बहने हैं।" मैंने उससे पूछा, "मुझसे शादी करोगी। कलाकार हूँ, भाग्य में क्या लिखा है, मालूम नहीं, लेकिन एक पैतृक मकान है। अपने बिगड़े हुए लड़के को भूख से मरने से बचाने के लिए पिताजी अनिच्छा से हो मेरे लिए यह मकान छोड़ गए हैं।" "उसके तो जरूर भाग्य ही खुल गए होंगे। सच में ईर्ष्या करने लायक भाग्य है माधवी का !" सुनपा बोली। "माधवी ने मुझ से कई बार पूछा है कि मैंने क्यों उसी से विवाह किया। मुझमे कोई जवाब न पाकर माधवी ने यह भी सोचा है कि मैंने उसकी गरीवी पर नरम खाकर उसने शादी की है। पर अमली जवाव तो तुम ही दे सकती हो, रमा !" रना का चेहरा उदाग हो उठा। "इतने दिनों के बाद भी तुम मुझे कट दे रहे हो, दीनू दा?" नहीं, आज दीनबन्धु रमा को हतप्रभ नहीं करेंगे। लेकिन पहले न जाने कितनी बार उन्होंने सोचा होगा कि अगर रमा से उनकी कभी भेंट होगी तो उससे कहेंगे कि समाप्तप्राय मिट्टी की मूर्ति के पास बंटी। तुम्हारी प्रतीक्षा में मैंने बहुत नमय काटा है, रमा ! वस अगर एक दिन और आ जाती तो मेरा काम पूरा हो जाता। बस एक ही दिन का काम बाकी था। माधारण मध्य वर्ग के घर में कंजून विधाता ने अपने हाथों से रमा को स्तना रूप दिया था, यह सोचने के लिए भी दिल कबूल नहीं करता।

रूपतापम:६६ - कई बार मन मे शक होता कि हो न हो स्कूल मास्टर अप्रकाश वाबू किसी राजकुमारी को ही चुरा लाए हैं । पर अप्रकाश दावू की लड़की ही तब क्या जानती थी कि रूप के बाजार मे वह कभी ऊंचे दामो पर बिकेगी? वह नही जानती थी, तभी तो उसने दीनबन्धु से प्यार किया था। दीनबन्धु की शिल्ल-साधना को जब सारे लोगों ने पागलपन की संज्ञा दी थी, उन दिनों दीनबन्धु को रमा ने ही उत्साह और सान्त्वना दी थी। रमा बोली थी, "दीनू दा, तुम शायद कोई जादू जानते हो। तुम्हारी अंगुलियों के बीच मे आकर मिट्टी कैसे गुड़िया बन जाती है !" मिट्टी से गुडिया बनाने के इस खेल को रमा घण्टों चुपचाप बैठी देखती रहती थी। दीनबन्धु कभी कहते थे, "ऐ रमा, जाओ घर जाकर पढो। चाचाजी कहेगे, मेरे साथ रहकर तुम भी बिगड़ रही हो।" जो कभी शोक का विषय था, वही नशे के समान दीनबन्धु पर छा जाएगा, यह शायद दीनबन्धु ने खुद भी नहीं सोचा था। अप्रकाश बाबू तव तक मकान बदल कर किसी दूसरे मोहल्ले मे जा चुके थे। बगल के मकान मे इस तरह तो कितने ही किरायेदार आते-जाते हैं। पर घर बदलने के साथ-साथ वह दोस्ती खत्म भी हो जाती है। दोनबन्धु का अप्रकाश बाबू और रमा के साथ भी ऐसा ही कुछ हो सकता था। कुछ हद तक ऐसा हुआ भी। पर एक दिन अचानक हो रमा मे दीनबन्धु की मेंट हो गई। दीनबन्धु म्यूजियम से लौट रहे थे। अचानक उन्हें मुनाई पडा, "अरे दीनू दा!" मुंह घुमाकर दीनबन्धु ने रमा को सामने पाया। रमा गोकरी अन्तिम सीढी पार कर यौवन की राजसभा मे पैर रख चुकी थी। "अरे रमा तुम !" दीनबन्धु भी विस्मय में बोल पड़े थे। "हम लोग कालेज की तरफ से म्यूजियम देखने आए थे।" "तुम भी म्यूजियम आने लगो हो?" दीनबन्धु ने पूछा। "तुम्हारा क्या हाल है, दीनू दा ?" रमा ने पूछा। दीनबन्धु बोले,"यही समझ लो, मुझ से कुछ होगा-बोगा नहीं। पत्थर ७०:रूपतापस काटने के लालच में पड़कर सवका कहना टाल कर रामपाल के स्टुडियो में दाखिल हुआ। थोड़ा-बहुत काम सीखा भी है, पर काम कहां है ?" "घर का क्या हाल है ?" "बिल्कुल अच्छा नहीं। माँ-बाप दोनों को खो कर अब बिल्कुल आजाद हूँ| किराए के कुछ रुपए मिल जाते हैं, उसी से गुजर कर लेता रमा चुपचाप खड़ी रही। गृहस्थी के इस तरह के हाल-चाल से स्कूल- मास्टर की लड़की अपरिचित नहीं थी। रमा वोली, "वैर तुम कलाकार बन सके, यह मेरा गर्व है, दीनू दा!" अपनी चुटिया को सामने लाकर रमा ने कहा । "मैंने अपना एक स्टुडियो भी बनाया है, रमा ! काम कुछ मिले या न मिले, आयोजन में कमी नहीं है।" "तुम्हारा अपना स्टुडियो ? वाह ! बड़े मजे की बात है ! एक दिन हमें वहां ले चलोगे, दीनू दा?" रमा ने पूछा। "अगर तुम आ सको तो मैं वाकई बड़ा खुश हूँगा", दीनवन्धु ने अपने मन की बात कह डाली। "वाह ! आऊँगी क्यों नहीं ? तुम्हारे स्टुडियो में तो तुम्हारे न बुलाने पर भी जबर्दस्ती आऊंगी।" नए सिरे से यह जो नई भेट हुई, यहीं से एक नया अध्याय भी हुआ। रमा दीनबन्धु के स्टुडियो में आई थी। सारा कुछ बड़े ध्यान से दखा। फिर सिर्फ एक बार नहीं, रमा अकसर दीनवन्धु से पास आने लगी। "कला पैसे वाली को ही शोभती है । है न, दीनू दा? पर मेरे दिमाग में यह भूत कैसे सवार हुआ कहो तो?" रमा ने एक बार पूछा था। "दुनिया की हर अच्छी चीज पर पैसे वालों का ही अधिकार है, ऐसी एक धारणा हम लोगों के दिमाग में बैठाई गई है," दीनबन्धु बड़े दुख के साथ बोले थे। थोड़ा स्ककर दीनबन्धु फिर बोले, "तकलीफ उठाकर तुम जो यहाँ आती हो, इसके लिए मैं तुम्हारा बड़ा आभारी हूं, रमा !"

"तुम बड़े बनावटी किस्म के आदमी यन गए हो, दीनू माय शोगों के बीच उठना-बैठना पड़ेगा, इसीलिए दरामा अभी रो अभ्यास कर रहे हो क्या? तकलीफ को क्या बात है ? मारोग से पर मोटो रात में ही तो तुम्हारा स्टुडियो है।" ईश्वर ने रमा को सिर्फ सुन्दरता ही नहीं दी थी। उसो परिमा चेहरे से आँसो को तृप्त करने वाली प्रकाश की किरण गिरा रही थी। दीनवन्धु ने सर झुकाकर रमा की फटकार सुन ती । धीरे-धीरे दोनवन्धु ने अपने सापार-जीयन की सारी यारों रगा गो बता दी । म्यूजियम मे रखी यक्षिणी की कहानी भी रमा को गुगाई। रमा ने पूछा था, "कौन थी यह यक्षिणी ? गुभ रो उरामा परिणग करा दोगे?" दीनबन्धु रमा को वहां ले गए थे। हैरत भरी गजरो से रमा ने यही देर तक यक्षिणी देखा था। फिर सडक पर आफर रमा बोली थी, "उस मूर्तिकार ने भी तो किसी-न-किसी को देखकर ही यक्षिणी की मूति बनाई होगी।" "यह तो है ही । शरीर और मन या आश्चर्यजनक रूप से संगम हुआ है इसमे," दीनबन्धु का उत्तर था। रमा थोड़ी देर चुप रहने के याद बोली, "उस माडल की यात सोच- सोचकर वही ईर्ष्या होती है, जिसे देखकर मूर्तियार गे छग यक्षिणी को गढ़ा होगा।" दीनबन्धु बोले, "बहुतों की धारणा है कि पुराने जमाने में नारी और भी सुन्दर थी। जो नारियां फिढिपस के स्टुडियो में मादल बनने आती थी, वैसी इस युग में मिलनी दुर्लभ हैं।" "तुम्हारी क्या राय है ?" रमा ने जानना चाहा। "मैं ऐसा नहीं मानता। ग्रीम या अमरावती यी रमणियाँ सुन्दर अवश्य थी, पर उनके सौन्दर्य में आधा हिस्सा शिली की कल्पना का था। दे आधी मानवी थी, आधी नितान्त काल्पनिकः।" क्या दीनबन्धु भी आधी कल्पना से रमा को परिपूर्ण समझ बैठे थे ? नहीं । अवश्य ही दीनबन्धु के साथ यह बात नहीं थी। रमा उनको प्रेरणा ७२: रुपतापस की स्रोत थी। रमा ने ही कहा था, "लोग कुछ भी कहें, दीन दा, तुम्हें बिना किसी भी तरफ देखें आगे बढ़ना होगा। बहुत बड़ा बनना होगा। तुम यदि आँखें उठाकर देखोगे तो असुन्दर भी सुन्दर हो जाएगा।" पर दीनबन्धु ये अपनी कल्पना के पंख ज्यादा ही फैला लिए थे। वह स्वप्न देखते थे कि रमा उनकी जीवन-साथी बन गई है । महान से महान- तम सृष्टि की तरफ रमा ही उन्हें हाथ पकड़ कर ले जा रही है। अपने मन में तुम ने कौन-सा स्वप्न संजो कर रखा है, दीनू दा?" रमा ने एक दिन पूछ ही लिया। "मेरा एकमात्र स्वप्न है, पत्थर में प्राण-प्रतिष्ठा करूं। मैं प्रमाणित करना चाहता हूँ कि ग्रीक कलाकारों की तरह शरीर का जयगान करने पर हम पत्थरों में भी प्राण फूंक सकते हैं।" "तो फिर करते क्यों नहीं?" रमा ने पूछा था । संकोची दीनबन्धु ने उत्तर दिया, "हमारे यहां माडल कहाँ है ? रुपयों के लिए जो माडल बनने आती हैं, उनके पास शरीर का ऐश्वर्य कहाँ ?" -- इसके जवाब में रमा ऐसा प्रस्ताव रखेगी, दीनबन्धु ने कभी सोचा भी नहीं था। रमा बोली थी, "दीनू दा, मुझे डर नहीं लगता, ऐसा तो मैं नहीं कह सकती, लेकिन यदि मैं तुम्हारे किसी काम आ सकूँ तो मैं तुम्हारी माडल बनने से 'ना' नहीं करूंगी।" "क्या कह रही हो, रमा? तुम जानती हो इसमें कई तरह की विपत्तियां हैं । यदि तुम्हारे घर के लोग जान गए तो?" "अगर जान ही गए तो क्या होगा? तुम तो हो न !" दीनबन्धु ने सोचा था, रमा का चेहरा छोड़कर पहले उनका एक धड़ गढ़ेंगे। उसके बाद अलग से रमा का चेहरा बनाएंगे। यह रमा को किसी मुश्किल में नहीं डालना चाहते थे। महान कलाकारों में कई, हाथ या मस्तकविहीन मूर्ति (जिन्हें वे टोरसो कहते हैं) बनाकर अक्षय सम्मान के अधिकारी बन गए थे। दीनबन्धु का 'टोरनो' भी किसी शिल्प-प्रदर्शनी में हलचल मचा देगा। उसके बाद जिस दिन ख्याति प्राप्त मूर्तिकार दीनबन्धु ।

रूपतापस:७३ दूल्हे के देष मे रमा को जीवन साथी बनाकर ले आएंग, उमी दिन रात को 'टोरमों के ऊपर सिर को जोड़कर उसे सम्पूर्ण कर देंगे। रमा याई थी। सब की नजरें बचाकर अपने दीन दा के स्टुडियो मे। शिलागिल्पी की आंखो के मामने शरीर का ताला तोड़कर उसने अपने यौवन के ऐश्वर्य को पमार दिया था। 'मेरे लिए इतनी जोखिम तुम न उठाती तो ठीक करती, रमा !" रमा के निर्वस्त्र शरीर की नकल करते हुए दीनबन्धु बोरे थे। उन्होंने यह यात हृदय से ही कही थी। "पहले अपना काम पूरा कर लो। इन बातों का जवाब मैं वाद में दे दे दूंगी।" माडल के सिंहासन पर बैठकर रमा बोली थी। रमा के कोमल नग्न दारीर और नरम मिट्टी के ढेर के बीच शिल्पी दीनबन्धु मानो खो-गए। रमा ने अपने प्रफुल्न व्यक्तित्व को लज्जा और संकोच के ऊपर सहज ही उठा लिया था , जैसे सुबह-सुबह सूर्यमुखी जितने स्वाभाविक भाव से अपने अनावृत्त शरीर से मूर्य को प्रणाम करती है । रमा ने पूछा था, "शरीर के बिना कला की साधना तुम लोगों की पूरी नहीं होती?" दीनबन्धु बोले थे, "आदमी के मन की तरह शरीर भी युग-युगान्तर से विश्व के केन्द्र पर खड़ा है। तरह-तरह के विश्लेपणों के बावजूद शरीर की अनदेखी नहीं की जा सकती।" रमा बोली, "यह तो मनुष्य की अक्षमता का ही प्रमाण हुआ।" दीनबन्धु मूर्ति बनाते हुए बोले, "जानती हो रमा, प्राचीन युग कलाकारों ने समाधि-खण्डहरों में शरीर को विकृत और कुत्सित रूप से आका है। उनकी धारणा थी, शरीर को कुस्मित दिखाकर ही आत्मा की प्रधानता तथा उसके सौन्दर्य को लोगो तक पहुंचाया जा सकता । इसी के प्रतिवाद के रूप में पुनर्जागरण के कलाकारो ने बाहरी शरीर पर गौर किया। शरीर की सुन्दरता और सुपमा को यूरोप के लोगों ने पूजना शुरू किया। अब फिर समन्वय की साधना शुरू हुई है। हम कहना चाहते हैं कि हम भावनाओं के लिए शरीर खत्म होने से बचा लेंगे और बारीर की खातिर भावनाओं की कद्र करना भी नहीं भूलेंगे।"

. रमा कई दिनों तक लगातार स्टूडियो में आती रही थी। उसका चौंधिया देने वाला रूप दीनबन्धु को किसी और ही स्वप्न की दुनिया में ले गया था। अनुप्रमाणित हो कर शिल्पी दीनबन्धु किसी विराट सृष्टि की साधना के समुद्र की अतल गहराई में डुबकी लगा बैठे थे। दीनबन्धु सुबह से ही काम शुरू कर देते थे। कव खाने का समय बीत चुका होता, उन्हें इसका ख्याल ही नहीं रहता। दीनबन्धु एक मधुर स्वप्न में विभोर थे। शरीर के किसी प्रयोजन की तरफ उनका ध्यान नहीं बंटा । और शिल्पी की यह साधना और उसका स्वप्न और भी मोहक बना रहे, इस साधना में रमा जुटी रही। उसे मूख-प्यास का एहसास तक नहीं होता। एक दिन जब ख्याल आया तव दीनवन्धु ने कुछ खाना मंगवाया। ढीले-ढाले से एक गाउन के बीच अपने शरीर को छुपा कर रमा ने चाय की प्याली में चाय रखी। दीनबन्धु बोले, "तुम्हें आज भी कालेज में अनुपस्थित रहना पड़ा?" "उसने बड़ा काम यहां हो रहा है," रमा ने कहा था। वह समाप्त- प्राय टोरको को एकटक देख रही थी। "क्या देख रही हो रमा?" दीनबन्धु ने पूछा । "आइने में अपने को तो रोज ही देखती होगी।" "तुम्हारी आँखों में जाने को देखने की इच्छा पूरी कर रही हूं, दीनू दा!"

सतापस:०५ रमा के जाने के बाद दोनबन्धु ने गोले कपडे से टोरसो को सपेट कर रखा था। दो दिनो के बाद रमाके फिर आने की बात थी। उस दिन दीनबन्धु कपड़े पर पानी छोट कर रमा की प्रतीक्षा में बैठे रहे, पर रमा नहीं आई। दीनबन्यु ने सोचा, वह अचानक किसी काम से अटक गई होगी। यह दूसरे दिन फिर प्रतीक्षा मे बैठे रहे, पर रमा नहीं आई। रमा अब और नहीं आने वाली थी। रमा के रूप पर मोहित होकर कहां के किस धनी लड़के ने उसे अपने राड़के को बहू बनाने की इच्छा प्रयाट की थी। अप्रकाश बाबू को इसमे आपत्ति न होना ही स्वाभाविक था। पर दीनबन्धु को सबर मिली कि इस विवाह मे रमा फो भी पोई आपत्ति नहीं थी । इतने दिनो मे उन्होने रमा से गो उम्मीदें यांधी थी, राब झूठी हो उठी। जिसने आशा दी थी, निराश करने का हम भी उसे अवश्य ही था। दीनबन्धु इसरो विचलित नहीं हुए। उनकी आत्मिक पीड़ा का कारण मूर्ति का अधूरा रह जाना था। दोन- वन्धु ने मन ही मन केवल इतना ही कहा था, "जब तुमने इतनी ही बैठय दी थी रमा, तब एक दिन और आ जाती तो क्या बिगड जाता? रगा, तुम खुद भी तो आ कर कह सकती थी कि तुम बड़े घर की बहू बनने जा रही हो। दुनिया की हर सुन्दर चीज पैसे वालों के लिए ही तो बनी है । ससार का यही नियम है। पर दीनबन्धु के मन मे कही एक क्षीण-सी आशा थी कि रमा आएगी। रमा की प्रतीक्षा मे दीनबन्धु मिट्टी के 'टोरगो' को भिगोए हुए कपड़े मे लपेटकर उसकी आने की राह देखते रहे। पर रमा नही ही आई। उसके बदले एक दिन अप्रकार यायू आए । उन्होने कहा, "बेटे दीनबन्धु, तुमने सुना होगा कि रमा की शादी हो गई है। तुम पांच जनो के आशीर्वाद से रमा को कल्पनातीत सौभाग्य मिता है।" फिर थोडा रक कर अप्रकारा बाबू बोले, "पर मे यह क्या सुन रहा हूं, बेटे ! तुमने रमा की कोई मूर्ति बनाई है ?" दीनबन्धु का हाथ पकड कर अप्रकाश बाबु बोरो, "तुम तो मव सगझते हो बेटे, अगर कभी कही ७६:रूपतापस किसी की नजर पड़ जाए...।" "नजर में नहीं जाएगी," दीनवन्धु ने वचन दिया था। फिर भी जाने के पहले अप्रकाश बाबू बोले थे, "जीवन में तुम्हें कितनी ही मांडल मिलेंगी बेटे, मेरी लड़की का घर वर्वाद मत करना !" आज इतने दिनों के बाद अप्रकाश बाबू का चेहरा भी दीनवन्धु की आंखों के सामने स्पष्ट हो उठा। पर दीनवन्धु मन ही मन विगत सुन्दरी सुतपा के चेहरे का 'डिटेल' पकड़ने की कोशिश करने लगे। रमा बोली, "दीनू दा, उन लोगों ने ही मेरा नाम बदल कर सुतपा रखा।" "वाह ! बड़ा मीठा नाम है।" "जानते हो दीनू दा, ससुराल में बहुत पैसा है । मेरे ससुर ने रिचर्डसन साहब के साथ मिलकर व्यापार शुरू किया था। पहले तो छोटा-सा एक कारखाना था, पर बाद में बढ़ते-बढ़ते मेरी आंखों के आगे ही वह विशाल कारखाने में बदल गया। अब तो हजारों लोग इस प्रतिष्ठान में काम करते - "तुम्हारे ससुर को इस देश में सभी जानते हैं, सुतपा! उनके नाम पर अभिजात कालोनी में सड़क का नाम रखा गया है। अंग्रेज लोगों ने उन्हें सिताब दिया है। काशी के संस्कृत के पण्डितों ने उन्हें मानपत्र दिया है। सुना है, प्राथमिक विद्यालय में उनकी जीवनी पाठ्यपुस्तक में रखी गई है," इतना कहकर दीनबन्धु चुप हो गए। मुतपा बोली, "मेरी सास से जब उन्होंने शादी की थी तब वह एक मामूली कर्मचारी थे । मेरी सास देखने में भी अच्छी नहीं थी।" "तभी तो लड़के के लिए उन्होंने व्याज के साथ सुन्दरता भी ली है।" "ससुरजी मुझे अपने प्राणों से भी अधिक मानते थे।" 'ससुर के पुत्र भी सुन्दरी सुतपा को उतना ही मानते होंगे,' कहना चाह कर भी दीनबन्धु को यह कहना अच्छा नहीं लगा । अगर सुतपा सुखी हुई है, अपार ऐश्वर्य और सुख ने अगर उसके शारीरिक सौन्दर्य को और सार्थक किया है, तो खुशी की ही बात है। "तुम्हारे भाई लोग क्या कर रहे ?" दीनबन्धु ने जानना चाहा।

. संतापरा: "मुन्ने को तो तुम जागते ही थे। इस समय हमारे 'ए' यर्स का मैनेजर है । और वोत्री का तो कुछ हुआ गया नहीं। तीन-तीन बार आई.' एम.सी. में फेल हो गया। अन्त में उसे विलायत भेज दिया गया। अब हमारे लन्दन के आफिम का चार्म सम्भाल रहा है। कुछ भी हो, है तो अपना ही भाई न ! फेल हो गया है, इसलिए सड़क पर तो निकाल नहीं सकतीन!" • रमा ने अच्छा ही किया था। सिर्फ अपने भाइयों को ही नहीं, चचेरे फुफेरे, ममेरे सभी भाइयों को बड़े-बड़े ओहदों पर बैठा दिया था। बहनों की कारखाने के छोटे अफसरो के साथ शादी कर दी थी। रमा का. सौन्दयं विभिन्न तरह से दुनिया के बहुत-से लोगों के काम में आया था। लेकिन जिस रूप ने रमा से इतना सब कुछ करवाया, वही रूप रमा को छोड़ कर अब कहां भाग गया था। अब सिर्फ रमा ही रह गई थी। दीनबन्धु को हंसी आ रही थी। "भुतपा नगर मे तुम एक बार जरूर आना, दीनू दा ! मैं अपनी रोल्स गाडी भिजवा दूंगी । देखना कि हमने अपने साधारण श्रमिकों को भी रहने के लिए कैसे पधार्टर दिए हैं," सुतपा बोलती रही। दीनबन्धु बोले, "इसीलिए तो वे लोग चन्दार इकट्ठा कर तुम्हारी मूर्ति बनवा रहे हैं।" "अफसर लोग तो चाह रहे थे कि मूर्ति का सारा खर्च वे ही उटाएं, पर मैंने कह दिया है कि साधारण कर्मचारी से चन्दा सेना पड़ेगा।" "तुमने अच्छा ही किया, रमा ! मैं भी तो पैसे वालों के प्रमों पर ही जी रहा हूं । साधारण लोगों मे आज भी कला या पूर्ति बना के प्रति रुचि नही जगा सके, इसीलिए हमारी पराधीनता भी नहीं गई," टीमन्त्र काम करते-करते बोल रहे थे। रमा थोडी वेचन-मी होने लगी। दोली, “तुम आई क्यों देख रहे हो?" मूर्ति पर से मिट्टी को थोड़ी पल निकम "गुरुजी ने हमें इसी तरह में कान करना सिदार सी मिट्टी लगाते रहना और बने विmrer" ५८:रूपतापस "यदि तुम्हारी सब्जेक्ट बांकी युवती होती तो तुम्हारी टेढ़ी नजर पर पागल हो उठती! दीनबन्धु की इच्छा हुई कि वह सुतपा को याद दिला दें कि जवान उम्र में वह भी उनकी सब्जेक्ट बनी थी। पर वह चुप ही रहे । सुतपा ने दो-तीन बार रूमाल से अपने मोठों को पोंछा। फिर वैनिटी बैग से छोटा-सा आइना निकाल कर अपने बाल ठीक किए। सेण्ट के सुगन्ध लगे टुकड़े से सिर का पसीना पोंछती हुई शिकायत भरी आवाज में बोली, "दीनू दा, तुम्हें अपना स्टूडियो एयर-कण्डिशण्ड बनवाना चाहिए था। थोड़ी देर सिटिंग देने के बाद शरीर भारी-भारी-सा लगने लगता ।" दीनबन्धु ने सोचा, वह सुतपा को याद दिला दें कि अप्रकाश बाबू के किराये के मकान में हवा या रोशनी कुछ भी नहीं घुसती थी। पंसे की बात तो दूर रही, घर में बिजली की बत्ती तक नहीं थी। पर उन पुरानी बातों को याद करने की फुर्सत सुतपा को कहां थी। उसने मुद ही पहा, "एक सलाह दूं ? अगर दिक्कत न हो तो मेरे घर पर क्यों नहीं आ जाते। हर कमरे में एयर-कण्डिशिनर लगा है । मन लगा कर काम कर सकते हो। वहां तुम्हें कोई टिस्ट नहीं करेगा।" "मैं सब समझता हूं, रमा ! लेकिन स्टूडियों के इरा वातावरण के अलावा मुझे और कहीं काम की प्रेरणा नहीं मिलती। एक बार सिर्फ लालच में आकर शरतचन्द्र को देखने के लिए देवानन्दपुर गया था। उस समय वह उपन्यारा लिखने में व्यस्त थे। मुझे आंखों के आगे बैठा देख कर वह हिस्टर्ड हो सकते हैं, यह सोच कर मैं उनके कमरे के बाहर बरामदे में अपना सामान-वामान लेकर बैठा था। एक-एक वार उठ कर दरवाजे से मांग कर उन्हें देखता और चेहरे का एक अंग मन में बैठा कर झटपट मूर्ति पर मिट्टी चढ़ाता। उसके बाद फिर जा कर देखता।" "तुम्हें दिपात नहीं होती थी ?" रमा ने पूछा। "दिक्फत रो क्या मैं इस मौके को छोड़ देता? "यह बहत-से रुपये दे रहे होंगे?" रमा ने जिज्ञासा की। दुनिया की हर चीज को रुपयों में तोलने की अभ्यस्त हो चुकी थी स्पतापस:५९ सुतपा । रुपयो के हुक्म से ही रमा को सुतपा बना देने में वह झिझको नहीं थी। दीनबन्धु बोले, "भरतचन्द्र की मूर्ति बनाने के लिए मुझे एक पैसा भी नहीं मिला था । वह नहीं चाहते थे कि मैं उनकी मूर्ति बनाऊं- पत्थर की मूर्ति के बिना भी वह अमर रहेंगे, यह जानते थे। पर मैं सोचता था, जो आदमी मानव-चरित्र के मन की बात कागज पर उतार सकता है, मैं उसका शतांश भी अगर अपनी छनी से पत्थर पर उतार पाऊं!" ठीक इसी तरह से रोंदा ने विक्टर ह्य गो को मूर्ति बनाई थी। एस्टा- इन कन्धे पर सामान लादकर लेखक कानराह के घर इमी तरह से जाकर हाजिर हुए थे। पर ये बातें धनी घर को पुषयघू सुतपा सेन को कहने से क्या फायदा? मुतपा बोली, "कितने दिनो के बाद तुम्हारे यहां आई हूं, दीनू दा। बड़ा अच्छा लग रहा है।" दीनबन्धु मन ही मन हंस पडे । अगर रमा यह पूछे, 'तुम्हें कैसा लग रहा है, तो दीनबन्धु मुश्किल में पड़ जाएंगे। कभी ऐसा दिन था जब सुतपा को देखने पर यह अनुप्रमाणित हो हो उठते थे। पर ये बातें तो वडी पुरानी थी। रमा की असमाप्त मूर्ति को सामने रस कर वह कितने ही दिन प्रतीक्षा करते रहे थे। यह सोचते, कम से कम एक बार छुप कर रमा उनसे मिलने जरूर आएगी। मन को किसी ऐसी ही हालत मे माधवी उनके स्टूडियो में आई थी। गरीब घर की लडकी स्टूडियो में माडल का काम कर दो पैसे कमाने के लिए आई थी। दीनबन्धु के मानसिक तनाव पर उमकी नजर पड़ी थी, पर वह मुह से कुछ बोली नहीं थी। असमाप्त मिट्टी की मूर्ति को देखकर माधवी ने पूछा था, "इम मूनि को अधूरी छोड़कर दूसरी बनाएगे? दीनबन्धु प्रश्न को टाल गए । वोले थे, "कोई बात नही।" नहीं । यह समय स्मृति के समुद्र में डुबकी लगाने का नहीं था। दीन- .:रुपतापस - - न्धु ने अपने को सम्हाल लिया। सुतपा बोली, "दीनू दा, तुमने शादी काब की? मेरे साथ आखिरी मेंट के तुरन्त बाद ही ?" गिसी तरह 'हूं' कह कर दीनवन्धु गम्भीर हो गए। उनका हाथ रुक गया। रमा से बोले, "आज और काम करने की इच्छा नहीं हो रही है।" "अच्छा मैं कल आ जाऊंगी," कह कर सुतपा चली गई। सुतपा ने सोचा था कि दीनबन्धु उसे गाड़ी तक छोड़ने आएंगे, पर उन्होंने ऐसा किया नहीं। चुपचाप अपनी कुर्सी पर बैठे रहे । स्टूडियो की वत्ती बुभा कर दीनबन्धु चुपचाप अकेले अंधेरे में बैठे रहे। थोड़ी देर पहले उन्हें रोने की इच्छा हो रही थी। अगर सचमुच ही जी खोल कर थोड़ा रो पाते तो मन शायद हल्का हो जाता और उस हल्के मन से वह फिर रूप की साधना में जुट जाते। पर उनके पत्थर की छाती से आंसू नहीं निकले। - इतने वर्षो के बाद लगता था माधवी शायद पागल हो जाएगी। पागलपन के लक्षण उसमें स्पष्ट दिखाई दे रहे थे। लोगों के बेटे क्या मरते नहीं? यदि सरकारी आंकड़े देखे जाएं तो हर रोज हजारों बच्चे मां की गोद से बिछुड़ जाते हैं । दीनबन्धु तो बचपन से ही सुनते आए थे कि इस देश के बच्चों की मरने की संख्या सबसे अधिक है। कब की एक वेदना के मन में इस तरह जिला कर रखने से कोई अपने को इस तरह से जमा बनाता है ? उस बीच जब दीनबन्धु माधवी के सामने आए तव ओठों से दांत में कर माधवी बोली, "तुम पारा गत आना। तुम्हें चेतावनी दे रही हूँ, पास मत आओ।' "क्या कह रही हो, माधवी? तुम ऐसी तो नहीं थीं!" दीन मातर भाव से बोले। "उस समय मैं क्या जानती थी कि तुम एक सूनी हो । अगर उ तो क्या मैं तुमसे गादी करती?" "माधवी !" दीनबन्धु आर्तनाद कर उठे।

रूपतापग: .. "ठीक कह रही हूँ। हमार बार कहेंगी। नी गे भी बदार आदमी हो तुम । नही तो मेरे बच्चे को तुग धेच आत?" उसके बाद माधवी ने भगरे में जाकर पहाम से दरवाजा बन्द कर लिया। दीनबन्धु को बड़ी मिगतों के बावजूद गायी ने दरवाजा नहीं सोला था। हारे-यये, निरास दोनयन्धु अपने रहियोगं पोट आए थे। सोन अरामापा मूर्तियां एक गाय पड़ी थी। योग एण्ड टोगरा इण्डस्ट्रीज में मोरा साहय, लेडी सुतपा और उनका ययुमा । लगता था दीनबन्धु किसी पल्प-चियिरगफ मी राह लगातार तीन रोगियों को बेहोश फर एक ही साथ उनका आपरेशन करेंगे। उनकी अवहेलना और देरी के कारण ही कांग सरम होने पर पहले ही तीनों पार. यार होश में आ रहे थे। तीनों पाराह रहे थे। इसमें ययुगा की आवान उनके कानो में आ पर बिंध रही थी। मह बावाज दीनबन्धु पो ठीक-ठीक याद पी। अगर गतिभावाम रिकार्ड की जा सकती सो उरा रिकार्ड को गुग कर गाथपी हैरान रह जाती। उन दिनों स्टूडियो में ययुआ टालटलारी कदमों से इपर-उधर गुगा करता था । माधवी कहती, "सावधान हो जाओ। तुम्हारी सारी पीमें सोह-ताई कर देगा।" पर उतना-गा यवुआ अपने पिता की याया की पीगत गानो गमता था। वह कोई तोड़-फोर नहीं मरता था, बल्कि अवाफ भौगों से राय भूप देवा करता। जय यह थोड़ा और बड़ा हा राय स्टुहियो को ही अपने मेलने न्यूदने का कमरा गममा धैठा। उसके पिता ही उगल मे साधी "नहीं, ययुमा, तुम मिट्टी से मन मली। हायगर गन्दे हो जाने पर तुम्हारी मा नाराज होगी।" पर ययुपा नहीं स्ट्रहियो नहीं छोड़ता था। यहता, "तुम भी तो दिन-रात मिट्टी से गलत हो ? मां तुम्हें तो नहीं टोटती है।" दीनबन्धु बैट यो दुलारते हुए बोलते, "मिट्टी रो सेलना ही तुम्हारे पिडा का काम है। मैं जितनी मिट्टी हाथ में लगाऊँगा, तुम्हारी मा उसनो ५२:ल्पतापस ही खुश होगी।" ववुमा चेहरे का ऐसा भाव वनाता, मानो वह सब कुछ समझ गया है। कभी दीनबन्धु पूछते, "बड़े हो कर तुम क्या वनोगे, बबुआ?" "हाथ से मिट्टी सानूंगा," ववुआ झटपट बोलता। कौन जानता था कि किसी महान कलाकार की सुप्त प्रतिभा उनकी सन्तान में छुपी हो। रूपलोक के जिस स्वर्ग में प्रवेश का स्वप्न तक दीन- वन्धु नहीं देखते, ववुआ शायद वहीं महल खड़ा करने की क्षमता रखता हो। छोटा-सा बबुआ मिट्टी के ढेर पर नाचता रहता और फिर थोड़ी-सी मिट्टी लेकर स्टुडियो के किसी कोने में बैठ जाया करता । माधवी डर जाती, कहती, "इस पर कड़ी निगरानी रखना। लालची लड़का है, मिट्टी ही सा जाएगा।" ! ववुआ मिट्टी खाता नहीं था, पर सूंघता जरूर था। भीगी मिट्टी की सौंधी-सोंधी महक से बबुआ परिचित हो चुका था। मिट्टी की महक एक- जैसी नहीं होती। मिट्टी को सूंघने के बाद बबुआ उसकी पेड़ी बनाता और उसके थोड़ी देर बाद चिल्लाता, "पिताजी, बिल्ली।" घर की बिल्ली को नन्हा कलाकार रूप देने की कोशिश करता। दीन- बन्धु कहते, "वाह ! बहुत खूब ! बड़ी अच्छी बनी है ।" फिर खुद ही विल्ली बना देते । बबुआ खुशी से तालियां बजाता। बबुआ ने सारे औजारों को भी पहचान लिया था। पिता के काम के समय वह चुपचाप बैठा रहता। आँखें फाड़कर अंगुलियों का काम देखता। उसे खाना-पीना भी याद नहीं रहता। माधवी नाराज होती । गम्भीर होकर माहती, "तुम्हारा शागिर्द बड़ा अच्छा है।" दीनबन्धु पाहते, "ऐसा भक्त शिप्य मिलने पर कोई भी गुरू अपने को धन्य मानेगा।" माधवी कहती, "तुम दूसरा शागिर्द ढूंढो । मैं अपने लड़के को बिगाड़ने नहीं दूंगी !" दीनबन्धु हंस पड़ते । बबुआ को देख कर सोचते, "इस नन्दे शागिर्द ।

पतापस:३ को स्मरणीय बनाने के लिए कुछ करना जरूरी है।" एक दिन दीनबन्धु ने बबुआ को एक स्टूल पर बैठा दिया था। वह अच्छे बच्चे की तरह बैठा रहा। अचानक मावदी स्टूडियो में पहुंच कर हैरान रह गई। पूछा, "क्या मामला है ? वदुआ क्या कर रहा है ?" "तुम्हारा लड़का मेरे लिए सिटिंग दे रहा है। इस समय रिश्ता पिता- पुत्र का नही, कलाकार और उसके सबजेक्ट का है। ऐसा समझदार विषय मिलना कठिन है।" "गर्दन में दर्द हो रहा है, पिताजी, पोड़ी घुमा लूं?" बबुआ ने पूछा। माधवी बोली, "शंतान कहीं का । जब मोहन हज्जाम बाल काटने के लिए आता है तब तो मिनट भर चुप-चाप नहीं बैठता। रो-रो कर मुहल्ला इकट्ठा कर लेता है और स्टुडियो में आकर धूप सेंकते हुए मगरमच्छ की तरह शान्त है।" "सिटिंग के ममय कलाकार या उसके विषय को तंग नहीं करना चाहिए। इससे काम खराब हो जाता है," दीनवन्धु उस दिन इसी मजाक पर माधवी को स्टुडियो से निकाल कर मूर्ति बनाने का काम करते रहे थे। दीनबन्धु आज भी डिस्टर्व हो रहे थे, पर आज वह माधवी को कैसे हटाएं ! माधवी उनके मन पर छाई हुई थी। उस वार की मूर्ति वाकई वडी सुन्दर बनी थी। मिट्टी का माडल देख कर माधवी उछल पडी थी। वोली थी, "तुमने अब तक जितना भी काम क्यिा है, यह उनमे सबसे बढ़िया है !" दीनबन्धु बोले थे, "तुम्हारी सबमे प्रिय वस्तु की मूर्ति जो है ! इमी- लिए तो नहीं कह रही हो?" "खूब कहा तुमने ! क्यो बला के बारे में मेरी राय की कोई कीमत नहीं है क्या ?" माधवी मूठा गुस्सा दिखा रही थी। "नहीं-नही । मैं गलती के लिए माफी मांगता हूँ," दीनबन्धु ने कहा पा। खुशी से उछल कर माधवी वोली, "मुझे क्या लगता है, जानते हो? यह मूर्ति हाथ से नही बनाई गई है। लगता है जैसे मुन्ने के चेहरे की छाप ६४पतापस ही उतार लीगई है।" "चुप हो जाओ, वरना मुकदमा ठोंक दूंगा!" दीनबन्धु ने मजाक किया। "पयां मतलब?" "मतलब यही कि कभी रोंदा के लिए भी लोगों ने यही शिकायत की थी कि उसकी मूर्तियां इतनी सजीव इसलिए होती हैं, क्योंकि उसने जीवित लोगों के चेहरों की छाप ली थी। अन्त में रोंदा को अदालत की शरण लेनी पड़ी। वह मुकदमा जीत गया ।" "अच्छा बाबा, तुम्हारे मान में हानि पहुंची हो तो माफी मांगती हूँ। लेकिन क्या यह सच नहीं है कि आदमी का साँचा बना कर मूर्तिकार लोग मूर्तियां नहीं बनाते ?" "हाँ, कई बार उन्हें ऐसा करना पड़ता है। फ्रेंच मूर्तिकार दालू उपन्यासकार विक्टर घ गो की मूर्ति बना रहे थे। काम समाप्त होने के पहले घ गो का देहान्त हो गया तब मजबूरन उनके मृत शरीर से सांचा तयार किया गया और फिर उसी साँचे से दालू ने उनकी मूर्ति बनाई थी।" माधवी बोली थी, "तुम इतनी खबर इकट्ठी भी कर सकते हो, वावा ! अब तो हंसो, तुम्हारा काम भी तो पूरा हो गया।" "कहाँ सत्म हुआ? अभी तो मिट्टी का ही मादल बना पाया हूँ। मिट्टी गे गाटल से अब नेगेटिव लूंगा।" बबुआ को भी अपनी मूर्ति से बड़ा प्यार हो गया था। वह हर बस्त अपनी मूर्ति के पास बैठा रहता। एक दिन बबुआ ने पूछ ही लिया, "नेगेटिव क्या होता है, पिताजी ?" "पहले बना लूं फिर देखना," कह कर दीनबन्धु प्लास्टर के डिब्बे से पाउडर निकालने लगे। फिर डिच्चे को एक तरफ रख कर मूर्ति के बीचों- बीच यानी हाथ, कन्धे और सिर के बीच से मिट्टी का पार्टिशन-सा बनाया और उसके बाद मूर्ति के पीछे का हिस्सा अपनी तरफ घुमा लिया। "मेरा चेहरा नहीं दीख रहा है," वयुआ ने शिकायत की। "देखोगे बेटा! पहले काम तो पूरा कर लूं," दीनबन्धु ने मूर्ति पर पाउडर छिड़क दिया। दही के घोल की तरह प्लास्टर घोलकर उसमें कुछ .

रूपतापस:८५ नीले रंग की टिकिया डाल दी, उसके बाद उस नीले .घोल से वबुआ की मृति के पीछे के हिस्से को नहलाने लगे। फिर दीनबन्धु ने दूसरा बर्तन उठाया । वबुआ आंखें फाड़-फाड़ कर देख रहा था। एक पतीले पानी मे सफेद प्लास्टर का वेसन की तरह गाढा घोल बना कर दीनबन्धु ने अव स्टुला से मूर्ति पर एक इंच के वरावर लेप लगाया। पीछे का हिस्सा मजबूत बनाने के लिए लोहे की सीक टेढी कर फ्रेम की तरह टिका दी। पोछे की तरफ मोल्ड का काम खत्म कर उन्होने बबुआ के सामने के सिर में ब्रश से तेल लगाया। फिर नीले प्लास्टर का घोल पोता । बबुआ चिल्लाया, "पिताजी मैं खो रहा हूँ।" "तुम खो नहीं रहे हो वेटे, तुम इस घोल के अन्दर हो।" प्लास्टर के बीच ढकी हुई मूर्ति कीचड़ की एक चट्टान-सी लग रही थी। दीनबन्धु अब सारा काम छोड कर बबुआ को लेकर साना खाने के लिए चले गए। दीनबन्धु ने सोचा था, खाना खाने के बाद बबुआ सोने चला जाएगा, पर ववुआ सोना-बोना भूल कर देख रहा था कि किस तरह दीनबन्धु सीम पर लगे प्लास्टर को करीने से निकाल रहे थे। फिर वहां वह आहिस्ते से थोड़ा-थोड़ा पानी डालने लगे। धीरे-धीरे सांचा प्लास्टर से अलग होता गया और दीनवन्धु ने पीछे की टेक हटा ली। बबुआ का चेहरा भीतर छुपा हुआ था। सिर्फ पीछे का हिस्सा साफ- माफ दिसाई पड़ रहा था। अब दीनबन्धु ने छेनी और हथोड़े से मिट्टी की मूनि को तोड़ डाला । अब सिर्फ साँचा रह गया था। यह देख बबुआ गुस्सा गया । वह रो पड़ा था । वोला, "मैं कहां गया?" "तुम हो, बेटे ! तुम इस सांचे में कैद हो अभी।" स्पंज से साँचे के अन्दर का हिस्सा भिगोते हुए दीनबन्धु बोले । "अब माप क्या करेंगे, पिताजी?" "तुम्हारी मूर्ति में मावुन लगाऊँगा," दीनबन्धु हरे सावुन और दाढी बनाने वाले ब्रश से झाग बनाने लगे । थोडी देर बाद उन्होंने मूर्ति पर फिर साबुन लगाया । अब मूर्ति थोड़ी सी चमक रही थी। दीनबन्धु ने बेटे से पूछा, "दाढ़ी बनाने के बाद मैं क्या करता हूँ ?" ।

रूपतापस:०६ 1 - "आप तेल लगाते हैं, फिर नहाते हैं।" "तो फिर लो, तुम्हारी मूर्ति को भी तेल लगा देता हूँ !" दीनबन्धु ने प्रा पर थोड़ा तेल डाल कर सांचे के अन्दर डाला। दो खाली अंशों को जोड़ कर, जोड़ की जगह अच्छी तरह प्लास्टर लगा कर दीनबन्धु ने नोचे के छेद से झांक कर देखा कि कहीं रोदानी पहुंच तो नहीं रही है। उसके बाद उन्होंने प्लास्टर का पतला घोल अन्दर के छेद में डाल दिया, और सांचे को उल्टा रख कर वह वना से गपराप करने लगे। बबुआ को वह चकित कर देंगे, इस ख्याल से उन्होंने उसे उसकी मां के पास भेज दिया। थोड़ी देर के बाद मां और बेटे दोनों ही एक साथ स्टूडियो में लोट आए। दीनबन्धु तव तक सांचे में से वबुआ की मूर्ति निकाल चुके थे। वयुमा चिल्ला कर बोला, "वो तो मैं "हां बेटे, तो तुम ही हो ! पर यह भी पक्के तुम नहीं हो । प्लास्टर पर मोम लगा कर नेगेटिव बनेगा और गरम कांग को गला कर फिर तुम्हारी मूनि बालनी पड़ेगी। फिर कांसे को रगड़-रगड़ कर उसमें चमक लानी पड़ेगी, फिर उसे ऐसिट में डुबो कर उस पर रंग चढ़ाना पड़ेगा। उसके बाद ही तुम अक्षय बन पाओगे !"

"अक्षय बन जाओगे !" इतने वर्षों के बाद अपनी ही बात स्टुडियो की दीवारो से प्रतिध्वनि होकर दीनबन्धु पर व्यंग्य कर रही थी। यबुआ तो अक्षय नहीं हुआ ! लेकिन वयुआ की मूर्ति यहाँ गई ? पुत्र-शोकातुरा माधवी के पति फिर मूर्तिकार बने ही गयो ? माधवी को उपहार देने के लिए तिल-तिल कर यवुआ को वह गढ़ेंगे। कम-रो-कम दीनबन्धु ने ऐसा ही सोचा था। लेकिन दीनबन्धु बबुआ की मूर्ति नहीं बना पा रहे थे। जितना वह बना पाए थे, उन देस कर उन्हें लगा कि वह कुछ भी नही बना पाए है । मिट्टी के उस टुकड़े को तोड़ कर दीनबन्धु नई मूर्ति बनाने लगे। उन्हे अपने ऊपर सन्देह हो रहा था। फिर भी उन्होंने अपने मन को ढाढ़स बंधाया कि पहले भी कई बार ऐमा हुआ है । उन्होंने कोशिश की है। थोडा-कुछ बनाया भी है । और उसके बाद नाराज होकर उमे तोड दिया है । तोड़ने के बाद उन्होने दुवारा जो कुछ भी बनाया, सबने उसकी तारीफ की है। आम लोग तो समझ भी न पाए कि इसके बनाने के पीछे मूर्तिकार के मन में कितनी शंकाएँ थी। दीनबन्धु ने निश्चय किया कि वह इस बार माधवी को मिट्टी का माइल नहीं दिसाएंगे। काम पूरा करने के बाद कामे के वयुमा को घर में प्रतिप्टिम कर देगे। मके वाद वह क्या करेंगे, उसका भी निश्चय कर लिया था उन्होंने । स्टुडियो के अहाते में जब कोई भी नहीं रहेगा, रात की निस्तब्धता जब इस शहर के अमान्त आदमियो को अन्वयार मे छुआ लेगी तब वह अपनी पत्नी का आह्वान करेंगे, "आओ माघवी ।"

८८:रूपतापस .4 । माधवी पूछेगी, "तुम मुझे कहां ले चल रहे हो?" दीनबन्धु चुपचाप कुछ बोले विना माधवी का हाथ पकड़ कर उसे स्टुडियो में ले आएंगे। बत्ती नहीं जलाएंगे । अन्धेरे में ही ढूंढ-ढाँढ़ कर एक मोमबत्ती जलाएंगे और उसके बाद बोलेंगे, "माधवी, देखो मैं किसे लौटा कर लाया ।" उसके बाद दीनवन्धु अपने वन्द हृदय के दरवाजे खोल कर जी भर कर फूट-फूट कर रोएंगे। माधवी को छाती से लगा कर बहुत देर तक सिसकेंगे, जिस तरह बबुआ के प्राणहीन शरीर के आगे वह बेसुध होकर सिसकते रहे थे। लेकिन इसी बीच वाहर दरवाजे पर घण्टी बजी। जरूर सुतपा सेन आई होगी। - । . आज सुतपा सेन बड़ी सजधज कर आई थी। शरीर की सेकेण्डहैण्ड गाड़ी पर रंग चढ़ा कर लेडी सुतपा उसे नई बता कर चलाना चाहती थी। ऐसा अजीव शृंगार करने से क्या फायदा, जिससे शरीर के सारे अंग उभर कर सामने आ जाएँ। दीनबन्धु इस बात को कभी नहीं समझ पाए। ओठों पर, आँखों में, भौं पर सभी जगह सुतपा ने भारी मेकअप किया था। वह शायद भूल गई थी कि वह किसी फोटोग्राफर के पास नहीं, बल्कि एक मूर्तिकार के पास सिटिंग दे रही थी। वह बोली, "मैंने सुना है, हर मूर्ति में तुम अपना एक खास वक्तव्य उत्कीर्ण करते हो। मेरी मूर्ति में कौन-सा वक्तव्य उकेरोगे, दीनू दा?" "वक्तव्य मैं नहीं देता, रमा! शरीर का जो वक्तव्य होता है उसे ही वताने की अनुमति मैं मूर्ति को दे देता हूँ।" "एक बात पूछू ? मेरा शरीर तुम्हें क्या बता रहा है ?" "तुम्हारे शरीर ने किसी कलाकार को कभी क्या कहना चाहा था, यह तुम जानती हो, रमा !" दीनबन्धु ने कहा। "जानती हूँ ! वह भूलने की बात नहीं है, दीनू दा? मेरे शरीर को सामने रख कर तुम फिडियस और माईकेल एंजेलो के साथ बराबरी करना चाहते थे।" "उनकी बराबरी करूं, इतना दुस्साहस मुझ में नहीं है। पर हां, मैं भी रूप की सृष्टि करना चाहता था। इस युग की नारी भी सुन्दर है, मैं रूपतापस :९६ " A . . भविष्य के सामने उमका प्रमाण रखना चाहता था।" फिर थोड़ा रुक कर दीनबन्धु बोले, "पर तुम इतनी उद्विग्न क्यों हो रही हो, रमा? तुम्हारे चेहरे पर उत्कण्ठा को छाया अगर पड़ी तो मेरी मिट्टी की मूर्ति पर भी वही छाप रह जायेगी।" "मूर्तिकार की मर्जी पर दिल में भरोसा नहीं होता। सुविनय पार्क में स्थित सुविनय बाबू की तुमने जो मूर्ति बनाई है, उसे मैंने कल घर जाते समय अच्छी तरह देखा था।" "तुमने उसे देखा है ? बहुत से लोग सुविनय सिंह की मूर्ति को मेरे तीन श्रेष्ठ कामों में गिनते हैं।" "मैं जानती हूँ, दीनू दा कि सुविनय सिंह की मूर्ति बनाने के लिए तुम्हे बड़ी प्रशंसा मिली है। मैं यह भी जानती हूँ सविनय सिंह के चरित्र को प्रधान गुणो को तुम मूर्ति मे उभार सके हो। सुविनय वाबू उच्चा- भिलापी थे, वह मेरे ससुर के पार्टनर थे। तुम्हारी बनाई उनकी मूर्ति को देखने पर उनकी महत्वाकाक्षा को छाप उभर आती है।" दीनबन्धु बोले, "सुविनय सिंह सोधो गर्दन और सिर उठाकर खड़े हैं। उनके सिर का आकार, ऊंचा मस्तक और भी की बनावट देखने से ही मालूम हो जाता है कि वह बड़े घर के लड़के थे। उन्हे छोटे-से बड़ा नहीं बनना पड़ा था और उनके देखने की मंगिमा से साफ समझ सकती हो कि वह नितान्त देवकूफ भी नहीं थे।" "पर असल बात तुम छुपा रहे हो!" इस बार तो रमा ने दीनबन्धु को अवाक ही कर दिया । बोली, "और कोई समझे या न समझे, पर बचपन मे तुम्हारे साथ घूम-घूम कर कुछ खास इशारो को समझने की दृष्टि मेरे पास भी है।" "क्या है बोलो तो?" दीनबन्धु काम करते-करते थोड़ा सहम कर 1 - बोले। "उनके प्यासे ओठ, डबल चिबुक, और थोडी लहर खाती हुई नाक के माध्यम से तुमने जो कुछ चाहा है, मैं उत्ते पकड़ सकती हूँ।" सुतपा थोडा रुकी। उसके बाद बोली, "तुमने मुविनय सिंह के शरीर को भूख को स्पष्ट कर दिया है। मुविनय वाचू के लड़के यह नहीं जानते !

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रूपतापम:६१ लोगों के हजारों किस्म को ममस्याओं को लेकर मैं काफी ध्यस्त रहनी हूँ। अभी अमेरिका जाना है। कई महीनों के बाद लौटूंगी। वहीं अपने फार्म के ऋण की अदायगी करूंगी। कुछ और भी जानना हो तो पूछो, दीनू दा!" मुतपा ने अपने को स्पष्ट किया। दोनबन्धु ने कोई जवाब नहीं दिया। वह फिर बोली, "मुझे तो डर ही लग रहा था, दीनू दा! क्या पता, तुम कहीं यह न कह बैटो कि तुम अभी न्यूडस्टडी करोगे। तुम्हें इसकी जरूरत नहीं पड़ी। जान-में-जान आई।" दीनबन्धु बोले, "आज यही तक काम रहने देते हैं।" सुतपा का टेलीफोन आया, "मूर्ति आज दिसता रहे हो?" "याज आने पर तुम मेरी कल्पना-लोक की मुतपा को देख पाओगी।" "मेरे देसने से पहले किसी और को नहीं दिसलाना, दीनू दा !" "तुम अपने दफ्तर के पी. आर. ओ. को भी ला सकती हो।" "नही नही दीनू दा, पी. आर. ओ, जी. एम. यहां तक कि मेरे पति को भी नहीं दिखलाना 1 मैं अभी आ सकती हूँ?" "इस समय नही, रमा ! शाम को आठ बजे आना । इस समय मैं किसी और काम में व्यस्त हूँ।" "कुल पाच ही मिनट तो लगेंगे!" मुतपा व्याकुल होकर बोली। दीनबन्धु को फिर भी सुतपा को 'ना' करना पड़ा। सुतपा को थोड़ा कष्ट जरूर हुआ होगा, पर दीनबन्धु कर भी क्या सकते थे। बाहर के लोगों को वह कैसे समझाते कि वह किसी गम्भीर और बड़े काम में उतझे हुए थे। जीवन मे वह कभी भी इतने व्यस्त नहीं दीनबन्धु मन-ही-मन बदुआ को पुकार रहे थे, "बबुआ, तुम वहाँ भी हो, एक बार कम-से-कम एक बार आकर मेरी इस मिट्टी की मूर्ति को छू जाओ।" दीनबन्धु अपनी कला मे बबुआ की मुखाकृति को थोड़ा-बहुत ला पाए पे। यह कोई बहुत कठिन कार्य भी नहीं पा। गोल-गोल चेहरे में निराप १२:रूपतापस बड़ी-बड़ी दो आँखें । पतले ओठ, छोटा-सा मुंह, नाक थोड़ी-सी दबी हुई। बचपन में किसी ने उसे तिब्बती कह दिया था। "बबुआ मेरे, राजा बेटे तुम आओ ! अपने चेहरे की स्वर्गीय सुषमा को मुझे पकड़ने दो। !" मूर्तिकार दीनबन्धु-मन-ही-मन प्रार्थना करने -- लगे। दीनबन्धु किसी अफीमची की तरह जागकर भी स्वप्न देख रहे थे। पुराने समय का वह मूर्तिकार-जिनका नाम पिगमलियन था—उसने अपनी कल्पना से एक ऐसी नारी-मूर्ति की सृष्टि की थी कि वह स्वयं उस नारी के प्रेम में पड़ गया। वह उस नारी की सुन्दरता में ही हमेशा खोया- खोया रहने लगा। अन्त में दयावश देवी वीनस ने उसकी प्रार्थना मन्जूर की। पत्थर की मूर्ति मानव-शरीर धारण कर अपने शरीर का सारा सौन्दर्य लिए हुए पिगमेलियन को समर्पित हुई। स्वप्न की लीला-संगिनी को प्रत्यक्ष पाकर मूर्तिकार का जीवन भी सार्थक बना। दीनबन्धु ने मन- ही-मन सोचा-कौन जानता है, उनकी प्रार्थना से बेचैन होकर देवता शायद किसी एक और मूर्तिकार पर कृपा बरसाएँ और बबुआ अचानक सजीव हो उठे अगर सचमुच ही थोड़ी देर के लिए बबुआ उनके पास लौट आए तो दीनबन्धु यह स्वीकार करेंगे कि उनसे बहुत बड़ा अपराध हुआ था। वह ववुआ को प्यार से चूम कर बताएंगे, "मेरे बबुआ, यदि मैं जानता कि तुममें इतना स्वाभिमान है तो मैं वैसा काम करता ही नहीं। तुम तो मेरे पास थे, इसीलिए तो मैं तुम्हारी छाया का मूल्य नहीं जान पाया...' सोचते-सोचते दीनबन्धु का सारा शरीर रोमांचित हो उठा । वह अपनी भूल को कैसे सुधारें? कैसे वह किसी को समझाएं कि उन्होंने पैसों के लिए बबुआ को नहीं बेचा था। उन दिनों पैसों की कमी अवश्य थी। पैतृक मकान के किराए के पैसे यदि न मिलते रहते तो मूर्तिकार बनने का उनका शौक कव का मटियामेट हो जाता। किराए के पैसों से रोजमर्रे का गुजारा हो जाता था। लेकिन रुपये की बड़ी जरूरत थी। एक सफेद पत्थर की जरूरत थी, पर दीनबन्धु के पास उतने पैसे भी नहीं थे। -- रूपतापस:१३ सफेद पत्थर सरोदना बड़ा जरूरी था। उतना बढ़िया सफेद पत्थर दुकानदार सिर्फ पांच सौ रुपयों मे दे रहा था। पत्थर वाले दुकानदार के गोदाम में यह पत्थर बहुत दिनों से एमा। दुकानदार ने कहा भी था, "ले जाइये बाबू, बाद में समझेंगे कि आपने क्या चीज पाई है !" पत्थर वाकई वडा सुन्दर था। उस परपर से बड़ी आसानी से एक पूरे आकार की मूर्ति बन सकती थी। दीनबन्धु सोच ही रहे थे कि इसके लिए यह कहां से पैसे लाएंगे। इसी बीच एक मौका आया। या फिर ईश्वर ने जानबूझ कर जाल बिछा कर दीनबन्धु को फंसाने के लिए उस साहब को उनके स्टुडियो में भेजा था। दूंढ-ढूंढ कर वह साहब दीनबन्धु के स्टूडियो मे पहुंचा था। दीनबन्धु ने पूछा था, "मैं तो एक अज्ञात मूर्तिकार हूँ। आपको मेरे बारे में किसने बताया?" "अज्ञात व्यक्ति ही कभी विख्यात बनता है," साहब ने कहा था, "तुम्हारे देश में इन सब चीजों का अभ्यास कम होता है। इसलिए वाहर से स्टुडियो का नाम पढ कर अन्दर चला आया।" साहब ने धूम-फिर कर सारा कुछ देखा। फिर यबुआ की मूर्ति के पास आ कर खड़े हुए। थोड़ी देर तक मन लगा कर उसे देखते रहे, फिर बोले, "क्या मैं इसका दाम पूछ सकता हूं?" दीनबन्धु को इसके पहले कभी इस तरह से मूति बिक्री का मौका नही मिला था। अचानक उनके मुंह से निकल गया, "छह सौ रुपये।" साहब तुरंत राजी हो जाएंगे, दीनबन्धु को बिल्कुल उम्मीद नहीं थी। वह दुविधा में पड़ गए। साहब ने कहा, "आपने जो दाम मांगा है, मैं उसी दाम पर खरीदूंगा।" "इस मूर्ति को मैं चैचूं या नही, मैं समझ नहीं पा रहा हूँ। यह मेरे बेटे की मूर्ति है !" "आपका बेटा जब आप ही के पास है तब तो आप और भी मूर्तियाँ बना सकते हैं। यह मूर्ति दूसरे के घर पहुंच कर आपकी ख्याति ही बढाएगी।" दीनबन्यु फिर भी सोच रहे थे। एक कार्ड देवर साहब बोले थे, "मैं १४:रूपतापस इस होटल में आज रात के लिए ठहरूँगा। फिर कल सुबह ही चला जाऊँगा । अगर आपकी इच्छा हो तो मूर्ति लेकर होटल में आ जाइएगा। रुपये वहीं मिल जाएंगे।" शाम तक दीनबन्धु ने निश्चय कर लिया। ठीक उसी समय बबुआ दौड़ा हुआ आया और बोला, "पिताजी, चींटी।"... . "चींटी तुम्हें काट रही है ? कहां?" दीनबन्धु को चींटी कहीं नहीं दिखाई पड़ी। अन्न बात उनकी समझ में आई। ववुआ के कांसे की मूर्ति पर चींटी चढ़ी थी, इसलिए वबुआ - . चींटी को हटा कर दीनबन्धु ने झटपट कांसे की मूर्ति को पैक कर लिया। फिर टैक्सी बुला कर बवुआ से बोले, "चलो, थोड़ा घूम आते हैं।" मोटर गाड़ी में बैठ कर बबुआ ने वाहा, "हम तीन जने कहाँ जा रहे हैं ?" वह अपनी मूर्ति को भी व्यक्ति समझता था। "हम एक बहुत बड़े होटल में, एक बहुत बड़े साहब के साथ गपशप करने के लिये जा रहे हैं। उसके बाद चाकलेट, मिठाइयां बहुत सारी खरीदेंगे।" दीनबन्धु को देखते ही साहब बोले, "तो आप आ गये ! वैरीगुड !" फिर मूर्ति को देखते हुए साहब बोले, "आप कभी इसकी कापी तो नहीं करेंगे?" "इस मूर्ति के प्लास्टर के सांचे को मैं खुद तोड़ चुका हूँ। मैं खुद नहीं चाहता इसकी कोई नकल बने।" साहब ने सौ-सौ के छह हरे नोट जेव से निकाल कर दिए थे। नोट ले कर दरवाजे से बाहर खड़े बबुआ का हाथ पकड़ बार दीनबन्धु बोले, "चलो बबुआ!" उन्होंने होटल से बाहर निकल कर दुकान से चाकलेट और बिस्कुट का डन्वा खरीद कर वबुआ को दिया, पर वह मुंह फुलाए खड़ा रहा। अचानक बबुआ ने पूछा, "मुझे आप नहीं ले चलेंगे, पिताजी ?" "तुम तो बेटे, मेरे साथ ही जा रहे हो,” दीनबन्धु ने बबुआ को शान्त करना चाहा, पर बबुआ जल्दी मानने वाला बच्चा नहीं था । उसका , ६पनापन:६५ 1 चेहरा लाल हो उठा। वाहर टिप टिप टिप पानी बरस-रहा था । यदुआ हर ममय नव का कहना मानना था, पर उम दिन अपने पिता का कहना टाल कर यह वापस होटल में घुग जाना चाहता था। दीनबन्धु जबर्दस्ती उमे गोद में ले कर पानी में भीगते हुए बस स्टैण्ड की तरफ दौड़ पड़े थे। ‘पत्यर की दुकान वहाँ से ज्यादा दूर नहीं थी। वहीं रपया जमा करके दोनयन्धु एक कपड़े की दुकान मे गये। वयुआ के लिए चमकीती कमोज खरीदी । फिर भी बयुआ हंगा नहीं। घर या कर भी बबुआ एक ही रट लगाए रहा, "पितानी मुझे कहीं छोड़ आए ? मुझे ले आइए !" दीनवन्धु और माधवी ने ववुआ को कितने ही तरीको से ममभाने की कोशिश की, पर बबुआ रोता ही रहा । उसी रात बबुआ को तेज बुखार माया। माधवी ने पूछा था, "बबुआ क्या पानी मे भीग गया था ?" "नही, कोई सास तो नहीं।" तेज धुसार और बेहोशी की हालत मे भी बवुश्रा वकता रहा, "मुझे कहाँ छोड आए, पिताजी?" शर्म से गढ़ कर दीनबन्धु बोले, "तुम्हें और भी अच्छी मूर्ति बना कर दूंगा, बबुआ !" पर उसका कोई प्रभाव नहीं पड़ा। दीनबन्धु ने ईश्वर से कातर प्रार्थना की। लेकिन सारी प्रार्थना को विफर बना कर बबुआ उन लोगो को हमेशा के लिये छोड़ गया। उमके बाद ही दीनबन्धु के जीवन में सफलता आतन-पाठी उमा कर बैठ गई । लगातार कई अच्छे काम मिले और उन कामों के प्रति उन्हें ख्याति और प्रतिष्ठा मिली। उनके जीवन की धारा ही बदल गई। इस बीच बबुआ की एक और मूर्ति बनाने की बात दीनबन्धु ने कई चार सोची थी। पर माधवी की बात सोच कर ही वह अपनी इच्छा को रूप नहीं दे सके थे। वह सोचते, कही माधवी का मोया हुआ गोक फिर जाग न जाए। और उसके बाद तो काम के बोझ मे मव-कुछ भूल कर दीनबन्धु किमो और ही दुनिया मे खो गये थे। वह यह नहीं समझ सके रूपतापस जो कुछ उन्होंने समझ रखा था वह गलत था। माधवी को हर बात द थी। दोनवन्धु नहीं जानते थे कि शोक का ज्वालामुखी इतने दिनों के द फूटेगा। दीनबन्धु वाकई अपने को अपराधी महसूस कर रहे थे। प्रतिष्ठा के संग्राम के दिनों में संतान-शोकातुरा माधवी ने उन्हें साहस और सान्त्वना दी थी। अपने दुःख को अव्यक्त रख कर वह हमेशा मुस्कराती रहती थी। माधवी ने अपना कर्तव्य पूरा-पूरा निभाया था। पर पुत्रशोकातुरा माधवी को बदले में कला-साधना में रत मूर्तिकार दीनबन्धु क्या दे पाए थे ? बहुत दिन, बहुत वर्षों तक शोक के पत्थर को छाती में दवा कर अन्ततः माधवी टूट ही गई थी। सचमुच इतने दिनों तक दीनबन्धु क्या करते रहे थे ? जो बबुआ उनकी आँखों की ज्योति था, वह कब मन से उतर गया, उन्हें पता ही नहीं चला। इतने दिनों की अधीर प्रतीक्षा के बाद बबुआ ने उनसे मुंह मोड़ लिया था। दीनबन्धु कल्पना में भी उसे पकड़ नहीं पा रहे थे । असफल कोशिश में दीनबन्धु अपनी सन्तान को न जाने कितनी बार तोड़ रहे थे। अग्रगण्य चिरशिल्पी दीनबन्धु अपनी स्मृति से एक सामान्य मूर्ति को आकार नहीं दे पा रहे थे। कोई कैसे विश्वास करेगा ? दीनवन्धु ने दुख प्रकट किया-काश! एक बार अगर पहले की बनाई हुई उस मूर्ति को वह देख पाते। दुनिया के न जाने किस संग्रहालय में नामहीन, परिचयहीन कांसे का बबुआ अपने माँ-बाप के लिए रो रह था। सिर्फ एक बार अगर दीनबन्धु अपनी उस सृष्टि को देख पाते ! पर यह क्या सम्भव था ? जो दुनिया की भारी भीड़ में खो गया था उसे ढूंढ पाना क्या आसान था ? हो सकता था कि इसी शहर में वह कह न-कहीं स्वाभिमानवश निस्तब्ध पड़ा था और उसका पिता पागलों तरह पारसमणि को ढूंढ़ता भटक रहा था। "मास्टर साहब, आपकी तवियत तो ठीक है न?" दीनवन्ध उठे । देवीदास कब आया, उन्हें पता ही नहीं चला।

रूपतापस:१० "देवीदास, तुम मेरा एक उपकार कर सकोगे। एक बार अखबार के दफ्तर में जा सकोगे?" "जरूर जाऊँगा!" दीनबन्धु से उनका मन्तव्य समझ कर देवीदास चला गया। "मैं आ सकती हूँ?" रोल्स रायस की अधिकारिणी सुतपा सेन ठीक आठ बजे स्टूडियो में पहुंच गई। मानो ठीक समय पर पहुँचने के लिए वह बाहर खड़ी प्रतीक्षा ही कर रही थी। "आओ!" दोनबाधु ने सादर आमन्त्रण दिया। अघेड उम्र की सुतपा गाढी गुलाबी रंग की चमकदार सिल्क की साड़ी बांध कर आई थी। साड़ी का पल्लू सम्हालती हुई बोली, "तुम्हारे यहां आने का रास्ता इतना संकरा है कि रोल्स को यहाँ लाना एक कठिन काम है, पर अब्दुल ड्राइवर बडा पक्का हाइवर है। उसके अलावा इस गाड़ी को मैं किसी दूसरे को हाथ भी नहीं लगाने देती।" "अच्छा ही करती हो, रमा ! कोई भी चीज किसी एक के हाथ में ही रहने पर अच्छी रहती है और टिकती भी अधिक है," दीनवन्धु बोले। "अच्छा दीनू दा, एक बात बताओ, आज क्या तुम्हारी तबियत खराब है ?" रमा की आवाज मे उत्कण्ठा थी। "नही कोई खास नही," दीनबन्धु बोले। सुतपा बोली, "दुरा मत मानना दीन दा, पर तुम कमे ही तो हो गए हो। जिस दीनू दा के स्टुडियो में मैं बहुत साल पहले आती थी, उस दीनू दा-जैसे तुम अब रहे नहीं !" गहरा दु.ख प्रकट करते हुए दीनबन्धु चोले, "दुनिया की हर चीज बदल जाती है। सिर्फ पत्थर, कांमा आदि नहीं बदलते। और इन्ही के बल पर मूर्तिकार दुनिया में टिका है।" सुतपा बोली, "मैं इतना कुछ नही समझती। इतने दिनों में स्टुडियो आ रही हूँ, फिर भी तुमने भाभी से परिचय तक नहीं करवाया।" "माधवी अस्वस्थ है, रमा", दीनवायु बोते। "क्या? क्या हुआ है उमे?"

१८:रूपतापस "समय पर सव जान जाओगी", दीनवन्धु सुतपा के प्रश्न को टाल गए। . - "हमारे चीफ मेडिकल अफसर काफी होशियार और नामी डाक्टर हैं । कहो तो उन्हें भिजवा दूं !" "जरूरत पड़ी तो तुम्हें जरूर कहूँगा।" "मेरा माडल तैयार है ?" : "हाँ तुम तैयार हो गई हो!" दीनवन्धु ने सफेद कपड़े से ढंकी एक मूर्ति की तरफ इशारा किया। फिर दीनवन्धु स्वयं जाकर मूर्ति के पास खड़े हो गए। मानो वह कोई जादूगर हों और कोई खास खेल दिखलाने के लिए सुतपा को स्टेज पर बुला रहे हों। "अपनी कला को दिखाने के पहले अपने मन की बात बताओ, दीनू. दा", अनुरोध के स्वर में सुतपा बोली। "रमा, तुम तो जानती हो, मूर्तिकला एक ऐसी कला है, जिसके लिए शब्दों की जरूरत नहीं पड़ती। यानि किताब, कुंजी, टिप्पणी आदि से जिस सौन्दर्य को समझा जाता है, वह मुझे पसन्द नहीं। फिर भी अगर तुम चाहती हो कि मैं अपने मन की बात बताऊँ, तो मैं यही कहूँगा कि हर मुश्किल को झेलकर भी मैंने इस काम में अपना सारा मन-प्राण लगा दिया है। मिट्टी से जब यह कांसे में ढाली जाएगी तब यह और भी सुन्दर हो उठेगी। काँसे पर कहीं-कहीं हरे रंग के छींटे डाल दूंगा।" . "कांसे पर तुम चाहे कोई भी रंग चढ़ा सकते हो?" सुनपा ने पूछा। "यह एसिड पर निर्भर करता है। लिवर आफ सलफर से मूर्ति को नहलाने पर साफ, लेकिन हल्का पीला रंग चढ़ेगा। कौपर सल्फेट देने पर मटर की तरह हरा रंग चढ़ेगा। यूरिक एसिड देने पर गहरा हरा होगा। अगर तुम्हारी इस मूर्ति को कुछ दिनों तक मिट्टी के नीचे गाड़कर फिर उसके बाद यूरिक एसिड दिया जाए तो कहीं-कहीं हरे छीटों के निशान आएँगे और बीच-बीच में गाढ़े भूरे रंग का दाग पड़ेगा।" सुतपा को यह सब जानना या सुनना अच्छा ही लग रहा था, पर मूर्ति को देखने के लिए वह वेचैन हो उठी, मानो सुहाग रात में पहली बार चूंघट उठाया जा रहा था। रक्त-मांस की सुतपा और मिट्टी की सुतपा के स्पतापम् : बीच चार आंखों का मिलन होगा। दीनबन्धु ने आहिस्ते से मूर्ति पर से सफेद कपड़े के आवरण को हटा दिया। एक बोर्ड पर, दोनो परों को पीछे की तरफ मोड़ कर विगत यौवना सुतपा जन-विहीन निर्जन मे बैठी हुई थी। सुतपा के कण्ठ से एक आर्तनाद-सा उठा। उस आर्तनाद से स्टूडियो की निस्तब्धता भंग हो गई। "यह क्या? यह क्या किया है तुमने?" कातर कण्ठ से लेडी सुतपा रो पड़ी। स्रष्टा दीमवन्धु धीरे-धीरे अपने मन में अंग्रेजी मे बोल रहे थे : 'Ah traitorous old age! Where is my white forehead, my golden hair, my beautiful shoulders ? These breasts these hips---these limbs---dried and speckled as sausages).' (आह...निष्ठुर बुढापा! कहाँ गया मेरा गोरा मुखड़ा, मेरे सुनहरे केश, मेरे सुन्दर कन्धे ? ये मेरे उरोज, मेरी कटि, मेरी बाहें-सूखी और बदरंग ।) -- "नही ! नहीं, यह मैं नही हूँ ! इसका तुमने कहाँ से आविष्कार किया है, दीनू दा?" मूर्ति की शक्तिहीन बाहे, पतली ग्रीवा, सिकुडे हुए चनारे की तरफ वह देख नहीं पा रही थी। उसने अपनी आंखें बन्द कर सी।रि कुछ देर बाद अखें सोल कर अजीब निरर्थक दृष्टि से देखती रही। को नीरव आँखें मानो पूछ रही थी, "शरीर का ऐश्वर्य सोरहिम धमण्ड लेकर तुम अब भी जी रही हो?" दीनबन्धु ने सुद भी नहीं सोचा था कि वह इतनी जाएंगे। यह क्षण हर कलाकार के लिए सबसे अधिक लेकिन लेडी सुतपा के ऊपर उसकी इतनी करी वह नहीं समझ पाए थे। क्या सुतपा माने जाने है ? अगर देखती है तो उसे जानना चाहिर सुसपा को छोड़कर बहुत पहले ही बाकी दीनबन्धु बोले, "सुतपा कानी १०० : रूपतापस शरीर में थी, यह भाव भी मूर्ति की आँखों में है।" "आँखों की जगह उस गड्ढे में मानो दो गोल अंगूर बैठा दिए गए हों," किसी तरह सुतपा बोल पाई। "हमारे मास्टर साहब कहते थे, प्रत्येक की आंखें एक जोड़ी अंगूर की तरह हैं । अंगूर की चारों तरफ आँख का जो कोष्टक है उसकी विशिष्टता ही अनुभूति तथा भावों को प्रकाश में लाती है।" सुतपा पसीने-पसीने हो रही थी। वह एक कुर्सी खींचकर उसमें धम्म से बैठ गई । बोली, "दीनू दा तुम बड़े निष्ठुर हो। इतने वर्षों के बाद भी तुम मुझे माफ नहीं कर पाए। आज इस तरह से मुझसे बदला ले रहे हो?" "तुम क्या कह रही हो, रमा? तुम ने ऐसा क्या किया था कि मैं तुम से बदला लेने की सोचूंगा?" "दीनू दा, मेरी आँखों के सामने तुम उस बुढ़िया को तोड़कर चूर-चूर कर दो!" दीनवन्धु ने थोड़ी देर चुप रहने के बाद अपना सिर उठाया । बोले, "रमा, मैं कुछ समझ नहीं पा रहा हूँ। क्या तुम आइने में अपने को नहीं देखती हो?" "देखती क्यों नहीं, दीनू दा ? देखती हूँ तभी तो दूसरे सभी मूर्तिकारों को छोड़कर मैं तुम्हारे पास आई थी। एकमात्र तुम ही थे जो खोई हुई रमा को वापस लौटा सकते थे। लेडी सुतपा सेन को सहना पड़ता है, इसलिए सहती हूँ, लेकिन रमा को मैं इस दुनिया में छोड़ जाना चाहती हूँ, दीनू दा!" सुतपा की आवाज में मिन्नत थी। दीनबन्धु हतप्रभ होकर खड़े रहे। "तुम इतना कुछ समझते हो, दीनू दा ! आदमियों के मन की इतनी खबर रखते हो और इतनी-सी बात तुम्हारे दिमाग में नहीं आई !" रोल्स रायस की मालकिन लेडी सुतपा सेन असहाय-सी अपना अभियोग प्रस्तुत कर रही थी, मानो दीनवन्धु स्वयं सृष्टिकर्ता हों। "सुतपा सेन की इस मूर्ति में रमा भी छुपी हुई है, तुम अच्छी तरह से तो देखो!" दीनबन्धु के स्वर में अनुरोध था।

रूपतापस :१०१ सुतपा ने मूर्ति पर फिर नजर दौडाई, "तुम क्या कहते हो दीनू दा, मेरी समझ में कुछ नही आया। एक बुढ़िया से तुम रमा का खून करवाना चाहते हो ?" दीनबन्धु बोले, "विश्वास करो, तुम्हारे इस शरीर मे मैं ममग्र विश्व को देख पा रहा हूं-~मनुप्य का शरीर तो नित्य वृन्दावन है।" "काव्य की बात छोड़ो, दीनू दा ! मनोजगत का कौन-सा ऐश्वर्य तुम ने उस बुढ़िया को दिया है, उसमे मुझे जरा भी दिलचस्पी नहीं । सेन परि- वार मन के ऐश्वर्य के लिए अप्रकाश बाबू की लड़को को बहू बनाकर नहीं ले गए थे!" दीनबन्धु यह कैसी विपत्ति में पड़ गए ! आमतौर पर जो सम्भव नहीं है, समय के प्रवाह को भी दीनदन्धु ने मुठपा की मूर्ति में पकड रखने 'की कोशिश की थी। शरीर को विकृत किए बिना ही परम सती मुद्रपा को ममं वाणो को उन्होंने मूर्ति में मुखरित विपापा। दृदा नुवमा में यौवनावती रमा की मर्म वाणी को ही उद्घाटित कर पाए।गरीर की सीमा मे रहकर ही शारीरिक विकृति, मनुष्य का अस्तित्व, वृद्धि, परिमांट और विनाश सब कुछ उन्होंने उकेराया। प्रतिगरीर ही हीन होकर अन्त में विनष्ट हो जाता है ! रमा तो ऐसी रूप की लोभी कभी नहीं थी। दीनन्द ने कहा, "रमा ! अगर तुम्हारी मूर्ति की तरफ कोई देदे दो दह रूद मुदेन्द पाएगा। तुम्हारी दोनों आंखें सब कुछ बता रही हैं। कनीनबीन लाड़ली हो तुम। बचपन के उन दुलार को छापानी : उसके बाद दुनिया ने तुम्हारे सामने अपने पापा आँखों ने सूर्य को उगते देखा,लों को देना, ना कोटका कोने में तुम गुड़िया लेकर खेलनी यों, नन्दायर उसके बाद तुम बड़ी हने लगी। दुनिता नाम- आई, तुम शरीर की सम्भावनात्रा प्रति कम दस तुम्हारी आँखें कह रही है, शरीर के ऐन्दा १०२ : रूपतापस कार के साथ म्यूजियम में यक्षिणी की मूर्ति को देखने गई थी। उसके बाद तुम सुतपा सेन बन गई । वहुत धन मिला तुम्हें । लेकिन तुम्हारा मोह टूट गया । सब कुछ पाकर भी तुम्हें मानो कुछ भी नहीं मिला । अगर कोई ठीक से देखे तो ये सारी बातें वह इस मूर्ति में देख पाएगा।" दुख और वेदना से सुतपा का चेहरा विकृत लग रहा था। बोली, "उस दिन का सच और आज का सच एक नहीं है।" "जब तक मैं जिन्दा हूं, यह मूर्ति कहीं भी स्थापित नहीं होने दूंगी।" "यह तुम्हारी मर्जी है, रमा ! पसन्द न होने की वजह से मेरी बनाई हुई वहुत-सी मूर्तियों को कहीं भी जगह नहीं मिली है। पर उससे अब मेरे मन को ठेस नहीं लगती।" "दीनू दा, तुम मुझे गलत मत समझना।" "मैं किसी को गलत नहीं समझता सुतपा! मेरा मन आज कई कारणों से बड़ा अशान्त है। आज मुझे छुट्टी दो। सिर्फ एक बात याद रखना-जो चीज अधिक दिनों तक नहीं टिकती, उसके प्रति मोह बढ़ाने से दुख ही मिलता है । यौवन सबसे बाद में आता है, पर सबसे पहले चला जाता है।" !

उस दिन सुतपा चली गई थी, पर उसने पूरी उम्मीद छोडी नही थी। बह फिर आऊँगी' कह कर गई थी। दीनबन्धु एक महान संकट से गुजर रहे थे। उन्हें लगता था जैसे बबुआ और सुतपा दोनों उन्हें जकड कर खत्म करने पर तुत गये थे। बबुआ की इतनी मिन्नतों के बावजूद वह पकड़ में नहीं आ रहा था और मुनपा मिन्नतें कर रही थी, पर दीनबन्धु उसकी पकड़ में नहीं आ रहे थे। काश! उन्हे अगर कही से थोड़ी शान्ति मिल पाती। इम घुटन भरे वातावरण से यदि कोई उन्हें कोही देर के लिए भी दूर ले जा सकता तो दीनबन्धु जरूर जाते । अगर ऐसे समय में उनका ऐसा अपना होता, जिसके मागे वह अपने को पूरी तरह से सोल पाते तो कितना अच्छा होता ! दुनिया में एक ही ऐमी थी जिसने उनके विषम संकट के दिनों में हमेशा हिम्मत बंधाई थी उसका नाम था माधवी । पर आज तो वह रह कर भी नहीं पो। पति को सफलता के दरवाजे तक पहुंचा कर उसने अपने सन्ताप की कारा में बन्द कर लिया था। दीनबन्धु में इतनी शक्ति भी नहीं यो कि वह माधवी को यह ममझाते कि बबुआ की मूर्ति उन्होंने यों ही वेन दी थी। उनको इसका जरा भी आभास होता कि इससे लड़के के मन में इतनी गहरी चोट लगेगी तो वह हगिज-हगिज ऐमा कदम नहीं उठाते। और इसके लिए तो उन्हें दण्ड भी काफी मिल चुका था। पर उन पर दया किसे थी? क्या कोई बवुमा को मूर्ति उन्हें फिर मै देखने से लिए दे सकता था? और मुनपा? उसके पाम तो अपार ऐश्वर्य था। दुनिया में १०४ : रूपतापस ऐसे मूर्तिकारों की कमी नहीं थी, जो उसका मनोरंजन कर पाने का मौका पा कर अपने को धन्य मानते। दीनबन्धु ने मन ही मन सुतपा से विनती की, "मुझे तुम रिहाई दो। मैं थोड़ी शान्ति से रहना चाहता हूँ। विश्वास करो, जवानी के दिनों में तुमने मेरे साथ जो अन्याय किया था, उसका मैं बदला लूं, मेरे पास इतना भी समय नहीं !" - किंग-किंग कर टेलीफोन की घण्टी बज रही थी। दीनबन्धु ने रिसीवर उठाया, "आपने आज अखबार में कोई विज्ञापन दिया है ? किसी बच्चे की मूर्ति के मामले में ?" "हाँ-हाँ, दिया है। कोई खवर है क्या ?" "मेरे पिताजी ने कुछ साल पहले किसी साहब के यहाँ से एक मूर्ति खरीदी थी। उस पर मूर्तिकार का नाम नहीं हैं। पर साहब ने कहा था, खरीद कर रख लीजिए। एक दिन आपको जरूर इसकी कीमत मिलेगी।" टेलीफोन करने वाले का पता नोट कर दीनबन्धु ने जानना चाहा था कि वह इसी वक्त उसके पास आ सकते हैं या नहीं? "जल्दबाजी की कोई जरूरत नहीं। आप फुर्सत से आइए.।" "अगर आपको दिक्कत न हो तो मैं इसी वक्त आना चाहता हूँ!"" दीनवन्धु अपनी उत्तेजना नहीं छुपा सके। ढूंढ-ढांढ़ कर हांफते हुए दीनबन्धु मिस्टर कलवार के यहाँ पहुँचे ।। मिस्टर कलवार पक्के व्यापारी थे। दीनवन्धु के आग्रह को वह भांप गए थे। बोले, "यह मूर्ति मैंने आइजक साहब से खरीदी थी। इसके लिए मैंने बहुत रुपया दिया था।" "आप मुझे वह मूर्ति एक बार दिखलायेंगे ?" दीनबन्धु कातर कण्ठ से वोले। कलवार दीनबन्धु को परख रहे थे। पर विनय से बोले, "अगर मूर्ति आप खरीदेंगे तो देखेंगे भी। अच्छी तरह से देखना भी चाहिए। पर इस समय आप उस मूर्ति का फोटो ही देखिए। आप ठीक उसी मूर्ति को ढूंढ रहे हैं या नहीं, यह भी तो देखना है न ?" 1 - रूपतापस:१०५ फोटो देखते ही दीनबन्धु उस पर टूट पडे । फोटो बिल्कुल अच्छा नहीं था। किसी अनाडी फोटोग्राफर की खीची हुई तस्वीर थी फिर भी दीन- वन्धु को वबुआ को पहचानने में देर नही लगी। मिस्टर कलवार दीनबन्धु को पैनी नजर से देख रहे थे । दीनबन्धु की उत्कण्ठा से उसके व्यापारी मन को उत्कण्ठा भी बढ रही थी। उसने साफ-साफ पूछा, "यह मूर्ति किस चीज की बनी है ? इसमे सोना तो नहीं है न? संसार में सोने से भी कीमती चीजें हैं, यह वात दीनबन्धु कलवार को समझाते भी तो कैसे ? दीनबन्धु बोले, "यह कांसे की मूर्ति है।" "कांसे मे सोना मिला हुआ है ?" कलवार का शक पूरा-पूरा मिटा नहीं था। "तांबा, टीन और जम्ता, इन इन तीनो को मिला कर कांसा बनता है। इसमें सोना रत्ती भर भी नहीं होता।" अचानक कलवार ने एक नई चाल चली। बोले, "फिलहाल मेरा उस भूति को बेचने का कोई इरादा नहीं है।" "आपको इसकी कितनी कीमत चाहिए?" दीनवन्धु ने पूछा। रुपए की बात सुन कर कलवार थोडा नरम पड़े। नम्र भाव से बोले, "मैंने बहुत रुपए दे कर इसे साहब से खरीदा था। आपको फिलहात सिर्फ बीस हजार रुपए देने पडेंगे।" "इतनी-सी मूर्ति के बीस हजार रुपए ?" दीनबन्धु आर्तनाद कर उठे। कलवार मुस्करा कर वोले, "ये कलाकृतियां है, वजन से इनकी कीमत नहीं की जाती !" पर दीनवन्धु वीस हजार रुपए कहां गे लाते ? बीच-बीच मे उन्हें काफी रुपए मिले थे। पर वह अधिकतर अपनी सच्चाई और निष्ठा को कायम रखने के लिए अपने खर्चे से मूर्ति बनाते थे। कई बार जो लोग आर्डर दे कर मूर्तियां बनवाते थे, वे उन्हे लेने भी नहीं आते थे। "जल्दी की कोई बात नहीं। घर जा कर सोच लीजिएगा," कलवार बोले। उन्होंने दीनबन्धु को एक बार मूर्ति दिखाई तक नही । बोले, "पहले १०६:रूपतापस दाम तय कर लीजिए। देखना तो है ही।" घर लौट कर दीनबन्धु वेचनी से चहलकदमी करने लगे। उन्हें लगता था, वह पागल ही हो जायेंगे। इस समय अगर सुतपा आती तो अच्छा रहता। पर इस समय वह आती क्यों? वह तो अपने समय से ही आने वाली थी ! ? सुतपा ठीक समय से ही आई थी। लगता था वह सारी रात सोई नहीं थी। मूर्ति उसके मन के लायक नहीं बनी थी, इस तुच्छ कारण से नींद न आने की बीमारी की विलासता पैसे वालों को ही शोभती है। "दीनू दा, तुम यूरोप तथा अमेरिका चलो। वहाँ तुम्हारी कला की प्रदर्शनी होगी। सारी दुनिया तुम्हें जयमाल पहनाएगी। सारा इन्तजाम मैं खुद करूंगी," सुतपा दीनबन्धु को लालच दे रही थी। इसके बदले में बह दीनबन्धु से सामान्य-सी चीज़ चाहती थी। जिस रूप के बल पर रमा ने सेन-साम्राज्य पर विजय पाई थी, सुतपा काल के आँगन में उसी रूप में जीना चाहती थी। सुतपा बोली, "दीनू दा, तुम्हारे हृदय में क्या जरा भी दया नहीं ? दूसरों की भांति तुमने भी मेरे बाहर के ही ऐश्वर्य को देखा। मेरे अन्दर तुमने झांका नहीं ? क्या पाया मैंने जीवन में ? क्या तुम जानते नहीं कि मेरा पति लम्पट और चरित्रहीन है ? उन्हें मेरा रूप भी शान्त नहीं कर पाया। मेरा कोई नहीं, दीनू दा ! मैं निःसंग हूँ। मुझसे सभी मांगते हैं, कोई मुझे कुछ देना नहीं चाहता।" दीनबन्धु कुछ बोले नहीं। स्टुडियो के गोदाम से धूल हटा कर उन्होंने प्लास्टर का एक 'टोरसो' निकाला। मस्तकविहीन किसी सुन्दरी का यौवन में ढला शरीर । माडल खत्म होने के पहले ही वह प्लास्टर में ढाला गया था। देवीदास ने एक बार पूछा भी था, "इसे आपने अधूरा क्यों छोड़ रखा है, मास्टर साहब ? इतने सुन्दर को अगर कांसे में ढाला जाता तो इसकी कद्र होती।" दीनवन्धु ने कोई जवाब नहीं दिया था। वह यह नहीं बता पाए कि वह क्यों इस मूर्ति को पूर्ण नहीं कर सके थे। क्योंकि उन्होंने कभी किसी सज्जन को वचन दिया था कि वह इसे कभी प्रकाश में नहीं लाएँगे। "पहचान सकती हो?" 'टोरसो' को दिखाते हुए दीनबन्धु ने सुतपा

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१०८ :रूपतापस यातना दे रहे हो ?" सुतपा की आवाज से अभिमान टपक रहा था। वह सोच रही थी, उसका दीनू दा शिल्प के दानव के हाथ पूरी तरह विक चुका है । पर एकाएक वह चौंक उठी। उसे विश्वास ही नहीं हो रहा था कि यह बात उसके दीनू दा स्वयं बोल रहे हैं। दीनू दा बोल रहे थे, "तुम्हारी बात ही रहेगी। पर मेरी माँग कुछ अधिक है । इसके लिए मुझे बीस हजार रुपए चाहिये।" वह राजी हो गई। सुतपा सिंहासन पर बैठ गई। दीनवन्धु विजली की गति से मिट्टी में खोई हुई रमा का चेहरा बनाने लगे। प्रौढ़ा सुतपा के चेहरे की सिकुड़न, थकावट की रेखाएँ और बुढ़ापे के चिह्न थोड़ी ही देर में जैसे गायब हो गए । अव सचमुच उस प्रतिमा में से सुन्दरी रमा झाँक रही थी। उसी रमा को सुतपा तहे दिल से चाह रही थी। जब वह पूरी कीमत चुका रही थी, तब वह छोड़ती भी क्यों ? बोली, "मेरी नाक थोड़ी और नुकीली थी शायद।" दीनबन्धु ने कुछ वोले बिना चाकू से मूर्ति की नाक को और भी नुकीली बना दी । वह लेडी सुतपा सेन के अनुगत चाकर की तरह काम कर रहे थे। "अव पसन्द आई ?" दीनबन्धु निर्लज्ज की तरह पूछ रहे थे। वह की एक-एक अभिलाषा पूरी करने वाले थे। उसको खुश रखने पर ही आज उनका अस्तित्व टिका रह सकता था। इस बार वह सन्तुष्ट हुई। उसके मन में खुशी की कोई सीमा नहीं थी। बोली, "अच्छा मैं अब चलती हूँ। तुम्हारे रुपए मैं घर पहुँच कर भिजवा दूंगी।" दीनबन्धु आज सारी लज्जा पी चुके थे। बोले, "अगर तुम बुरा न मानो तो क्या मैं तुम्हारे साथ चल सकता हूँ? मुझे रुपये अभी दे सकोगी?" सुतपा हक्की-बक्की-सी खड़ी रही। दीनबन्धु घबरा कर बोले, "तुम समझ रही हो, काम खत्म नहीं हुआ तो मैं एडवांस रुपए ले कर कहीं तुम्हें आज सुतपा सुतपा की ।

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११० : रूपतापस
बरसाती निकाल कर उन्होंने मूर्ति को ढंक दिया। बड़े प्यार से पूछा, "कैसे
हो बवुआ?"
बाहर जोरों की बारिश शुरू हुई। दीनबन्धु फुस-फुसा कर बोले,
"बबुआ, घर में तेरी माँ तेरी राह देख रही है !"
जन्माष्टमी में मध्यरात्रि की प्रचण्ड बरसात की परवाह किये बिना
प्रकृति के साथ-साथ खुद भी रोते-बिसूरते रूपतापस दीनवन्धु अपने आत्मज
को गोद में उठाए जनहीन राजा-
(समाप्त)

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Roop Tapasiya

Author
Shankar
Title
Roop Tapasiya
File name
Roop Tapasiya
Text
OCR done
Published
2011/03
Publisher
New Delhi,vidiya Prakashan Mandal
Language
Sanskrit
Pages
112
Library
Adarsh Library, Jaipur
Classification
Geography
DLI number
552033
Barcode
4990010032715.00
Scanning centre
C-DAK, Kolkata
Digital publisher
Digital Library of India
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