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Sbhasyaattwarthdhigam Sutram

Sharma, Thakurprasad · 2010/1

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शा. नरसीभाई तेजसी तरफथी
पोताना स्वर्गस्थ पिता
श्री तेजसी नत्थुना स्मरणार्थ
श्रीमदुमाखातिरचित
सभाष्यतत्त्वार्थाधिगमसूत्र
नामक
परमोत्तम ग्रन्थ, भाषानुवाद
तैयार कराववामां
अने
छपाववामां सहायतारूपे
रु. २५०) अढीसोनी रकम
रायचंद्रजैनशास्त्रमालाने
अर्पण कीधी छे.

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ॐ नमः सिद्धेभ्यः। उत्थानिका। तत्वार्थसूत्र । तत्त्वार्थसूत्र, जिसका अपरनाम तत्त्वार्थाधिगममोक्षशास्त्र भी है, जैनियोंका परममान्य और मुख्य ग्रन्थ है । इसमें जैनधर्मके सम्पूर्ण सिद्धान्त बड़े लाघवसे संग्रह किये गये हैं। ऐसा कोई भी जैनसिद्धान्त नहीं है, जो इसके सूत्रोंमें संगठित न हो। सिद्धान्तसागरको एक अत्यन्त छोटेसे तत्वार्थरूपी घटमें भर देना यह कार्य इसके क्षमताशाली रचयिताका ही था। तत्त्वार्थके छोटे २ सूत्रोंके अर्थगांभीर्यको देखकर विद्वानोंको विस्मित होना पड़ता है, और उसके रचयिताकी सहस्रमुखसे प्रशंसा करनी पड़ती है। तत्त्वार्थसूत्रके प्रथम चार अध्यायोंमें जीवतत्त्वका, पांचवेंमें अजीव (पुद्गल ) का, छहे सातवेंमें आस्रवका, आठ बंधका, नवमेंमें संवर और निर्जराका और अन्तके दशवें अध्यायमें मोक्ष- तत्त्वका वर्णन है। इस प्रकार इसमें जैनियोंके माने हुए सप्ततत्त्वोंका विवरण है । यथा--- पढम चउक्के पढमं पंचमे जाण पुग्गलं तचं । छहसत्तमेसु आसव, अहमे बंधं च णायत्रो । णवमे संवरणिज्जर दहमे मोक्खं वियाणेहि । इह सत्ततच भणियं दहसुत्ते मुणिवारदेहिं ।। तत्त्वार्थसूत्रके मूलक" भगवत् उमाखामि अथवा उमास्वाति हैं। इन्हें दिगम्बर और श्वेताम्बर दोनों ही पूज्य मानते हैं, और इसी प्रकार उनके बनाये हुए मोक्षशास्त्रको भी आदरणीय 'समझते हैं। दोनों ही सम्प्रदायोंके आचार्योंने तत्त्वार्थसूत्र पर बड़े २ भाप्य और टीकासन्ध र हैं । और मैं समझता हूं, तत्त्वार्थसूत्रपर जितने भाष्य और टीकाग्रन्य बने हैं, कदाचित ही दिली सरे ग्रन्थपर बने हों । सुतरां कहा जा सकता है कि, तत्वार्थमूत्र अन्य जैसा अद्वितीय पना लोगोंने २.र भी उसका वैसा ही किया । तत्त्वार्थसूत्रपर आज तक कितने भाप्य और टीकासन्ध लिखे गये हैं. माधनाभाश्मे उन नबरा ल्लेख न करके मैं यहां कुछ टीका ग्रन्थोंकी सूची देना है, जो अनेक भंडारों नजीर पोटोंसे तयार की गई है। । स + १ दिगम्बर समाजमे उमारवामि नामका और तारममा उमाम्यागि नाम "" 1 है, परन्तु ग्रन्थों में प्रापः उमास्वाति ही आता है। सागोग गना ... Morntry, स्वामिनः" आदि प्रयोगोंमे उमान्यानि नाम भी मरतीय। ।

दिगम्बरसम्प्रदाय । १ गन्धर्हस्तिमहाभाष्य-भगवत्समन्तभद्रखामिविरचित । श्लोक संग्या-८४०००। २ सर्वार्थसिद्धिटीका-श्रीमत्पूज्यपादखामिविरचित । श्लो० सं० ५५०० । ३ राजवार्तिकालंकार-श्रीमद्भट्टाकलंकदेवरचित । श्लो० सं० १६००० । ४ श्लोकवार्तिकालंकार-श्रीमद्विानंदिप्रणीत । श्लो० सं० १८००० । ५ श्रुतसागरीटीका-श्रीश्रुतसागरसूरिरचित । श्लो० सं० ८००० । ६ तत्त्वार्थस्यसुखबोधिनीटीका-द्वितीय श्रुतसागरसूरिरचित । ७ तत्त्वार्थटीका-श्रीविबुधसेनाचार्यप्रणीत-लो० सं० ३२५० । ८ तत्त्वप्रकाशिकाटीका-श्रीयोगीन्द्रदेव । ९ तत्त्वार्थवृत्तिः-श्रीयोगदेव गृहस्थाचार्य । 4 १ दुःखकी वात है कि, आज यह ग्रन्थ उपलब्ध नहीं है, परन्तु आजमे सौवर्ष पहलेके प्रायः सम्पूर्ण रहे२ विद्वानों और आचार्योंने इस ग्रन्थका अस्तित्व स्वीकार किया है, और उसको जगह २ प्रमाण दिय है। इस भाष्यके प्रारभमें समन्तभद्रस्वामीने जो ११५ श्लोकोंमें मगलाचरण किया है, उसे देवागमलोत्र अथवा भाप्त. मीमांसा कहते हैं। आतमीमांसापर श्रीमनहाकलंकने अष्टशती ओर श्रीमद्विद्यानन्दि स्वामिने अष्टसहस्री ऐसे दो भाष्य बनाये हैं, जिन्हें देखके बढे २ नैयायिक विद्वानोंको विस्मित होना पटता है । विद्वान् पाठक विचार करें कि, जिसके मगलाचरण मात्रपर वडे २ कठिन माय रच डाले गये, वह सम्पूर्ण अन्ध कैसा गौरवशाली और विलक्षण न होगा। उदयपुर तथा जयपुरादि नगरोंके भडारोंमें जैनपुस्तकालयों में गन्धहस्तिमहाभाष्यका अस्तित्व सुना जाता है। । परन्तु उक्त भडारोंके अध्यक्षोंके प्रमादसे अथवा हम लोगोंके दुर्भाग्यसे कहिये; आज उस अमूल्यरत्नकैदर्शन दुर्लम हो गये । और वढे सेदको बात है कि ऐसे २ ग्रन्थरलोकी शोधमें प्रयल करनेवाला भी आज कोई दृष्टिगत नहीं होता। २ समन्तभद्रस्वामिका अस्तित्व विक्रमसवत् १२५ के लगभग माना जाता है। आराधनाकथाकोपमें आपके जीवनकी एक प्रभावोत्पादक कथा मिलती है। ३ यह टीका मुद्रित हो चुकी है, और प्रायः सर्वत्र पुस्तकालयों में मिलती है। ४ पूज्यपादस्वामि नन्दिसपके आचार्य थे । देवनन्दि और जिनेन्द्रबुद्धि ये दो नाम भी इन्हींके है । गणरल. महोदधिने कर्त्ताने आपका नाम चन्द्रगोमि भी बतलाया है। विक्रम सवत् ३०८ जेष्ठ सुदी १० को आपका जन्म हुआ था, ऐसा पहावलियोंसे प्रतीत होता है । जैनाभिपेक, समाधिशतक, चिकित्साशास्त्र और जैनेन्द्र उमाकरण आदि ग्रन्ध मी आपके वनाये हुए है। ५ विक्रमकी छठी शताब्दिके लगभग श्रीमट्टाकलकदेवका जन्म खेट नामक नगरमें हुआ था। आप न्यायके अभूतपूर्व और अद्वितीय विद्वान् थे। राजा हिमशीतलकी सभामें एक बडे भारी वौद्धाचार्यको जिसकी ओरसे उसकी तारा नामका देवी याद करती थी, आपने परास्त किया था । यह कथा सर्वत्र प्रसिद्ध है । अकलंदेनव- नाके आचार्य थे, और मट्ट आपका पद या । अकलंक नामके और भी अनेक आचार्य हो गये है। परन्तु अष्टशी, वृहमयी, लघुत्रयी आदि प्रमिद्ध ग्रन्थ भट्टाकलकडेवके ही बनाये हुए हैं। ६ श्रीविद्यानन्दिलामी वि० मवर ६८१ के लगभग हुए है। आपका बनाया हुआ अष्टसहस्री ग्रन्थ नैया. बिग द्विानोंके गर्वको सर्व करटेनेवाला है। 1 - . । ५ श्रीश्रुतसागरनार नि० से. १५५० में वर्तमान थे। यशस्तिलकचम्पू महाकान्यकी यशस्तिलकचन्द्रिका समान फलानी आप ही है। - Bhandarkar 3 th 1096 . २ । १८॥ " २३ ॥ " १० तत्त्वार्थटीका-श्रीलक्ष्मीदेव गृहस्थाचार्य । ११ तात्पर्यतात्त्वार्थकीटीका-श्रीअभयनन्दिसूरि (तृतीय) प्रणीत । १२ तत्त्वार्थसूत्रव्याख्यान-(कर्णाटकीमाषामें) भाषाटीकायें। १३ सर्वार्थसिद्धिभाषा-पं० जयचन्द्रजीरचित । श्लो० सं० १००००। १४ अर्थप्रकाशिका-६० सदासुखदासजीरचित । श्लो. सं. १०८७२ । १५ राजवार्तिक-पं०फतहलालजी और पं० पन्नालालजी रचित । १६ सूत्रदशाध्याय-(श्रुतसागरीके अनुसार) पं० टेकचन्द्रजी प्रणीत । १७ सूत्रदशाध्याय वचनिका-पं. जयवन्तजी । श्लो० सं० ४२७० । पं० शिवचन्द्रजी । श्लो० सं० ४०००। १९" पं० सदासुखजी । श्लो० सं० १९००। २० सूत्रदशाध्याय वचनिका-पं० फतहलालजी । २१॥ पं० देवीदासजी। २२॥ पं० मकरन्दजी। पं० प्रभाचन्द्रजी। २४ पं० वख्तावर-रतनलालजी । २५ सूत्रदशाध्याय (छन्दोबद्ध) पं० हीरालालजी । पं० छोटेलालजी। २७ तत्त्वार्थबोध पं० विधीचन्दजी (बुधजन)। श्वेताम्बरसम्प्रदाय। १ गजगन्धहस्तिमहाभाष्य-श्रीसिद्धसेनदिवाकर । २ श्रीसिद्धसेनगणिरचितटीका-(श्लोकसंख्या १८२८२) १ श्रीमभयनन्दिसूरि तीसरे वि० स०७७५ में हुए हैं। आपने जैनेन्द्रव्याकरणको बृहद्धृत्तिकी रचना की है। २ यह व्याख्यान श्रीलक्ष्मीसेन मट्टारक पट्टाचार्य कोल्हापुरके पुस्तकालयमें पेटी न. १४ में मौजूद है। ३ इस बातसे कोई सज्जन अप्रसन्न न होवे कि, यहापर दिगम्वरियोंकी अपेक्षा श्वेताम्बरी टीकाग्रन्थ बहुत कम बतलाये गये हैं। क्योंकि हमारा अभिप्राय किसीको निन्नोन्नत बतलानेका नहीं है, जो कुछ सग्रह हो सका, हमने वही किया है। श्वेताम्बरीय सम्प्रदायमें टीका ग्रन्थोंकी कमी नहीं है, परन्तु श्वेताम्बरीयसननोंका ध्यान इस ओर कम होनेसे परिश्रम करनेपर भी हमको उनके नाम नहीं मिल सके, यह खेदकी वात है। शीघ्रताके कारण इस विषयकी खोजकेलिये बहुत समय नही दिया जा सका, सो पाठकगण क्षमा करें। ४ दक्षिणदेशके प्रतिष्ठानपुर नामक नगरमें महावीर सवत् ५०० के अनुमान श्रीसिद्धसेनदिवाकरका स्वर्ग- वास हुआ था, ऐसा कहा जाता है । द्वात्रिंशतिका, एकविंशतिगुणस्थानप्रकरण, शाश्वतजिनस्तुति, और कल्याणमन्दिरस्तोत्र आदि ग्रन्थ उक्त आचार्यके बनाये हुए प्रसिद्ध हैं । परन्तु महापुराणकारके "कवयो सिद्धसेनादि" पदसे स्मरण किये हुए सिद्धसेन इनसे पृथक् प्रतीत होते है। ५ यथा,-अष्टादशसहस्राणि द्वेशते च तथा परे । अशीतिरधिका द्वाभ्या टीफाया. शेकसग्रहः । इति । ६ ऐसा प्रसिद्ध है कि, यह टीका श्रीहरिभद्रसूरिने प्रारभ की थी, परन्तु उनका देहोत्सर्ग हो जानेमे उनके शिष्यवर्य श्रीयशोभद्रसूरिने पूर्ण की थी। २६॥ -- ।

३ तत्त्वायटीका-श्रीहरिभद्रमुरिरचित । (सोनं० ११०००) ४ समाध्यवत्तार्याधिगन-श्रीमावाविवाचक गिल्वर जलवायनी पट्टालियाने अनुसार, कातन्शुला ८ विक्रनशन १०६ में भगवदुना- खामि नंदिसंघाने पट पर विराजमान हुए थे। उन्होंने चालीसवर्ष ८ दिन आनन्दर नति रहने परमपरनन्ना उरदेश निया । १९ वनी बल्लने आपने जिनतीक्षा ग्रहन की और २५ दकित रहने पश्चात् आचार्य पर लम लिया। इस प्रकार विक्रम २० ५७ जनुमान आपने बनलेकर इन देशनो पवित्र नियम, ऐश जान पड़ता है। भगवान नहायार. तोवर निनिक अनन्तर आचार्य परम्परामा ऋन पहावलीन इस प्रना दिया है। विनिशाने पूर्व। केवली-ौनसानी, सुधनासानी, बन्लानी, श्रुतवली-विष्णुकुमार, नन्दिन्त्रि, जागजितगोवर्धन हु। ग्यारह अंग और दशापूर्वक पाठी-वैशाखाचार्य, नक्षत्राचार्य, नागनाचार्य, जयनाचायल- झापांचगर्ग, धृतनाचार्य, विजाचार्य, बुद्धिलिंगाचार्य, देशवाय, धर्मनाचार्य । ग्यारह मंगके पाठी-नक्षत्राचार (दूसरे), जययात्राचार्य, पंडशवाय, कंसाचार्य। दशभंग-उन्नाचार्य। नवमंग-यगोन्द्राचार्य। विनशनके पश्चात् । आoनंगपाठी-मन्वाहाग (लो) विमान४३ १४ जो आचार्य पदार साल हुए। साग-लोहाचार्य (इनन्ने नन्यने प्राव सापित हुशा)। एक अंग-अहद्वति, भावनन्द, धन, पुष्पदन्त, मृतवति । भावार्य भूत्वालके पार मंगलना विच्छेद हो गया । उनन्ने पीछे मागुन नदी १४ विक्रम- गन्न २३ गुमिगृति, भाचिन सुनी १४ वि.दा. ३६ को भावनन्दि, मागुनमुद्री १४ कि .. में निनचन्द्र और पैरवद्री ८ नि. ४१ ने अन्न अन्योंके रचयिता नपान कुन्दकुन्दाचार्य भन्ने आग पदपर काल हुए और नन शष्य भानुनातानी ले .. १०१ में हुए जैना निराजन है।

५ हुआ? श्रीकुन्दकुन्दस्वामीके पद्मनन्दैि, एलाचार्य, वक्रग्रीव, गृहपिच्छ आदि अनेक नामान्तर है। और इसी प्रकार कोई २ कहते हैं कि, उमास्वामि मी उन्हींका एक नाम हैं । परन्तु इस विषयमें कोई बलिष्ठ प्रमाण नहीं मिलनेसे एकाएक विश्वास नहीं किया जा सकता । इसके अतिरिक्त कुन्द- कुन्दस्वामीके उपर्युक्त नामोंमेंसे एक गृपिच्छ नामको उमास्वामिका वाचक भी मानते हैं । जैसे, तत्त्वार्थसूत्रकर्तारं गृद्भपिच्छोपलक्षितम् । वन्दे गणीन्द्रसंयातमुमास्वामिमुनीश्वरम् ॥ परन्तु किंचित् विचार करनेसे गृपिच्छोपलक्षित यह उमास्वामिका नामान्तर नहीं किन्तु विशेषण प्रतीत हो जाता है। गृद्भपिच्छ (कुन्दकुन्द ) गुरुके नामसे उपलक्षित अर्थात् गृद्भपिच्छ है, गुरु जिसका ऐसा युक्तियुक्त अर्थ उक्तपदका बन जाता है । और ऐसा माननेमें भी कोई विरोध नहीं आ सकता कि, अपने गुरुकी नाईं वे भी गृङकी पिच्छी रखते थे, उनका नाम गृद्रपिच्छ नहीं था। यहांपर पाठकोंको कौतुक उत्पन्न होगा कि, गृद्भपिच्छ ऐसा नाम कुन्दकुन्दस्वामीका कैसे सो इस विषयमें गुरुपरम्परासे एक कथा प्रसिद्ध है उसे हम यहां लिखदेना उचित समझते है:- एक वार कुन्दकुन्दखामी खमनोगत किसी शंकाका निवारण करनेके लिये चारण ऋद्धिके वलसे आकाशमार्गके द्वारा विदेहक्षेत्रस्थ तीर्थकरभगवान्के समवशरणमें जा रहे थे। मार्गमें अचानक उनकी मयूरपिच्छिका हाथसे छूटकर गिर गई, और उसी समय आकाशमें जाते हुए एक गृहकी पिच्छि पड़ी। तब मुनिवेषकी रक्षाकेलिये उन्होंने उसे ग्रहण कर ली। और विदेहक्षेत्रको गमन किया । कहते है, तवहीसे उनका नाम गृपिच्छ हो गया । उमास्वामिका अपरनाम गृहपिच्छ माननेवाले उपयुक्त कथाको उमास्वामिकी ही बतलाते हैं, और ऐसा मानकर वे उमास्वामिको चारणऋद्धि प्राप्त मी मानते हैं। कुन्दकुन्दस्वामीके बनाये हुए ८४ प्राभूत (पाहुड़) ग्रन्थ प्रसिद्ध हैं, जिनमेसे नाटकसमयसार पंचास्तिकाय, प्रवचनसार, रयणसार, षट्पाहुड़ आदि अनेक प्राकृत ग्रन्थ मिलते हैं । परन्तु उमा- स्वामिका एक तत्त्वार्थसूत्र अन्थ ही मिलता है, जो कि संस्कृत है और इसके अतिरिक्त उनका कोई दूसरा ग्रन्थ सुननेमें भी नहीं आया । १ पद्मनन्दि नामके धारण करनेवाले और भी ७-८ आचार्य हो गये हैं। उनमेंसे पंचविंशतिका, जम्बूद्वी- पप्रज्ञप्ति, आदिके कर्ता विशेष प्रसिद्ध हैं। २-तस्यान्वये भूविदिते वभूव य. पन्ननन्दिप्रथमाभिधानः । श्रीकुन्दकुन्दादिमुनीश्वराख्यः सत्सयमादुद्गतचारणार्द्धिः । अभूदुमास्वातिमुनीश्वरोऽसा-वाचार्यशब्दोत्तरगृहपिच्छः । तदन्वये तत्सदृशोऽस्ति नान्य-स्तात्कालिकाशेषपदार्थवादी ॥ इन श्लोकोंसे यह जान पडता है कि कुन्दकुन्दका पभनन्दि प्रथम नाम था, पश्चात् कुन्दकुन्दादि अनेक नाम हुए । और उमास्वाति उनके पीछे आचार्य हुए, जिनको गृद्धपिच्छ भी कहते थे। सो इससे कुन्दकुन्द और उमास्वातिके एक होनेकी शका तो सर्वथा मिट जाती है, रही गृद्धपिच्छ सशकी वात सो दोनोंके घटित हो सकती है। ३ कुन्दकुन्द नामके एक दूसरेभी आचार्य हुए हैं, जिन्होंने वैद्यगाहा नामक प्राकृत वैधकग्रन्थ पनाया है। वैषगाहामें ४००० गाहा (गाथा) हैं । ४ उमास्वामिरचित श्रावकाचार तथा पंचनमस्कारस्तवन ऐसे दो ग्रन्थ और प्रसिद्ध है, परन्तु वे लघु उमास्वामिके है, जो कि उनसे पीछे हुए । बहुत है। २ ६ तत्त्वार्थसूत्र ग्रन्थकी रचनाके विषयमं कर्णाटकभापाकी तत्त्वावमृत्ति नाम रटी प्रमा एक बड़ी मनोरंजक कथा लिखी है, वह इस प्रकार है कि:- सौराष्ट्र (गुजरात) देशके किसी नगरम एक पवित्रान्तःकरण औ मिनति में तत्पर श्रद्धावान् द्वैपायक नामक श्रावक रहता था । वह बड़ा विद्वान था । और धर्मग नातामा कि किसी उत्तमग्रन्थकी रचना करू, परन्तु गाईल्यजजालंके कारण अनार नहीं सकता था। निदान एकदिन उसने प्रतिज्ञा ती कि, प्रतिदिन जय एक मत्र दना , रही भोजन कसंगा, अन्यथा उपवास करंगा । और मोक्षगान वनानका निक्षय ककन "दर्शनज्ञानचारित्राणि मोक्षमार्गः" यह प्रथम सूत्र बनाया । तमा विमान हो जाना अपने घरके एक खंभेपर उसे लिख दिया । इसके पश्चात् दूसरे दिन वह श्रावक किसी कार्यके निमित्त कहीं अन्न्त्र नागग और मोर एक मुनिराज आहारके लिये आये । मुनिके दर्शनसे द्वैपायककी नदीला गुपनी भगंन अत्यन्न प्रसन्न होकर नवधामक्तिपूर्वक उन्हें भोजन कराया। भोजनोपरान्त नुनिगमन संभ कि वह सूत्र जो द्वैपायकने लिखा था, देखकर किचित् विचार पिया और ताल ही उना पहले सम्यक् विशेषण लिखकर वहांसे चल दिया । तदनन्तर जब द्वैपायन, आया, तो उसे अपने लिखे हुए सूत्रमें सम्यक् विशेषण अधिक लिखा देखकर बड़ा आश्चर्य हुआ, और नाय की नसी शुद्धता निर्दोषतासे आनन्द भी हुआ । भार्याके पूछनेसे विदित हुआ कि, नुनिराज आहारक निनित पधारे थे, कदाचित् वे लिख गये होंगे । तब श्रावक उसी समय बडी आतुरतामे उन इंदनको निकला ! यत्र तत्र बहुत भटकनेके पश्चात् एक रमणीक वनमें उसे उक्त मुनिगजके दर्शन हुए। एक बड़े मारी मुनियोंके संघके नायक थे। उनकी मुद्राके दर्शनमानसे यह पात्रक जान गया कि इन्हीं महात्माने मेरे सूत्रको शुद्धकरनेकी कृपा की होगी। और गदगद होके उनके चरणोंरर पड़गया, वोला, मगवन् ! उस मोक्षशास्त्रको आप ही पूर्ण कीजिये । ऐसे महान् अन्यके रचनेका मामय नहाने नहीं है । आपने बड़ा उपकार किया, जो मेरी वह वडी भारी भूल सुधार दी। सच है दर्शन, ज्ञान और चारित्र मोक्षका मार्ग नहीं है. किन्तु सम्यग्दर्शन, सन्यज्ञान और सन्या चारित्र ही मोक्षमार्ग है। अतएव “सम्यग्दर्शनज्ञानचारित्राणि मोक्षमार्गः' ही परिपूर्ण आरै विशुद्ध सूत्र है । पात्रको उक आग्रह और प्रार्थनाको मुनिराज टाल नहीं सके, और निदान उन्होंने इस तत्त्वार्थन मोक्षशास्त्रको रचके पूर्ण किया । पाठक ! वे मुनिराज और कोई नहीं, हमारे इस लेखके मुख्यनायक भगवान् उमास्वामि ही थे। वे दिगम्बरीय अन्योंके द्वारा जितना संग्रह हो सका, ऊपर लिखा जा चुका । अब श्वेताम्बर सन्प्र- दायमें आपके विषयमें कितना इतिहास मिलता है, देखनेका प्रयत्न किया जाता है। श्वेनान्वर सम्प्रदायमें इस तत्वार्याधिगममाप्यके कर्ता भी उमावामि माने जाते हैं, जैसा कि, या कहा जावेगा और यदि वे मूलतत्त्वार्थके कर्ता ही हों, तो उनके माता, पिता, जन्मस्थानादिक विषय विशेष प्रयत्न करनेकी आवश्यकता नहीं है। तत्त्वार्थाधिगमके अंतमें जो प्रशस्ति दी है, उसीसे सष्ट होता है कि, उमास्वाति आचार्य ग्यारह अंगके ज्ञाता व श्रीवोपनन्दिक्षमणके शिष्य और वाचकनुल्य शिवत्रीके प्रशिष्य थे । तथा वाचनापसे महावाचकक्षमण मुण्डपादके शिष्य वाचकाचार्य मृलनामके शिष्य थे । आपके पिताका नाम स्वाति और माताका वात्सी था।

७ - न्यग्रोधिकानगरीमें आपका जन्म हुआ था, परन्तु यह अन्य आपने कुसुमपुर (पाटलिपुत्र ) में विहार करते हुए बनाया था। कहते हैं कि, आपने एक वार सरस्वतीकी पाषाणमूर्तिसे शब्दोचारण करवाये थे। जम्बूद्वीपसमासटीकामें आचार्य श्री विजयसिंहजीने लिखा है कि, उमास्वातिकी माताका नाम उमा और पिताका स्वाति था, इससे उनका नाम उमास्वाति हुओ ! अनेक विद्वानोंका मत है कि, आप बड़े भारी वैयाकरण भी थे। कलिकालसर्वज्ञ श्रीहेमचन्द्रसूरिने अपने शब्दानुशासनमें अनु और उपको उत्कृष्टताके अर्थमें विधान करते हुए उमास्वातिका नाम उदाहृत किया है। श्वेताम्बर सम्प्रदायमें उमास्वातिके बनाये हुए प्रशमरति, यशोधरचरित्र, श्रावकप्रज्ञप्ति, जम्बूद्वीपसमास, पूजाप्रकरण आदि अनेक ग्रन्थ मिलते हैं। श्रीजिनप्रभसूरिने अपने तीर्थकल्प नाम ग्रन्थमें तथा श्रीहरिभद्रसूरिने प्रशमरतिकी टीकामे आपको पांचसौ ग्रन्थोंका प्रणेतो बत- लाया है । इससे सिद्ध है कि, आप एक असाधारण शक्तिशाली विद्वान् थे। श्वेताम्बराचार्योंकी पट्टावलियोंमें उमास्वातिका नाम कहीं नहीं मिलता, इससे वे किस शताब्दिमें हुए थे, इसका यथार्थ निर्णय नहीं हो सकता, परन्तु इसमें सन्देह नहीं है कि, परिश्रमपूर्वक नाना- ग्रन्थोंका पर्यालोचन करनेसे कालान्तरमें यह कठिनता दूर हो जावेगी । डाक्टर पिटर्सनकी रिपोर्टमें वीर निर्वाणके ३०० वर्ष पीछे उमास्वातिका होना बतलाया है, परन्तु जबतक इस विषयमें पूरे २ प्रमाण न दिये जायें, तबतक विश्वास नहीं हो सकता । क्योंकि ऐतिहासिक दृष्टि से ऐसी अनेक शंकायें उपस्थित होती हैं, जिनसे उमास्वातिका विक्रमके बहुत पहले होना वन नहीं सकता। यदि दिगम्बरियोंके माने हुए उमास्वाति ही तत्त्वार्थसूत्र मूलके कर्ता हैं, और उन्हें श्वेताम्बरी माई भी मानते हैं, तो इसमें सन्देह नहीं है कि, वे एक ही थे, और उनका समय भी एक ही था। ऐसा नही हो सकता कि, श्वेताम्बरियोंके उमास्वाति किसी समयमे हुए और दिगम्बरियोंके और किसी समयमें । क्योंकि तत्त्वार्थसूत्र एक ही है। ऐसी दशामें दिगम्बरीय सम्प्रदायमें माना हुआ समय अर्थात् विक्रमकी प्रथम शताब्दि मान लेने में कोई हर्ज नहीं है। हां यह दूसरी बात है कि, उमास्वाति श्वेताम्बरी थे अथवा दिगम्बरी परन्तु अब मैं समझता हूं, इस विषयमे विवाद करनेकी आवश्यकता नहीं है, दोनोंको ही अपने २ कहके मानना चाहिये और पूजना चाहिये । उनके ग्रन्थोंने दोनोंका ही अनन्त उपकार किया है। इतनेपर भी यदि किसीको उक्त विवादके निर्णय करनेकी इच्छा हो, तो वह प्रसन्न- तासे निर्णय करे । नाना ग्रन्थों और ऐतिहासिक ग्रन्थोंके पाठसे उसकी इच्छा पूर्ण हो सकती है। मैं इस विषयमें और कुछ नहीं कहना चाहता। तत्त्वार्थसूत्रमें भिन्नता। तत्त्वार्थसूत्र दिगम्बर श्वेताम्बर दोनों सम्प्रदायोंमें मान जाता है, परन्तु इससे ऐसा नहीं समझ- लेना चाहिये कि, दोनों सम्प्रदायोंमें वह एकसा है, नहीं। उसके अनेक सूत्रोंमे भेद है, जो कि, एक पृथक् दिये कोप्टकसे विदित होगा । परन्तु इसमें सन्देह नहीं है कि, मगवदुमाखातिने एक ही । १ .....अस्स सग्रहकारस्योमा माता स्वातिः पित्ता तत्सम्बन्धादुमास्वातिः... २ उपोमास्वातिसगृहीतारः (अध्याय २ पाद २ मत ३९ ।) ३ इहाचार्यः श्रीमानुमास्वातिपुत्र पधशनप्रसन्धप्रणेता वाचकमुख्यः . . .। .

८ तत्त्वार्थशास्त्र वनाया है पीछे अपने २ मान्य पदायीके प्रतिपादन दिन नामको पद करना पड़ा ! प्रायः ऐसा होता है कि, जो ग्रन्थ बहुत उत्तम होता ६, नमाFATER र मान्य और प्रतिभाशाली प्रसिद्ध होता है, उस ग्रन्थ नया आचार्यको प्रतीक माग सताया चाहते हैं, और थोड़ा बहुत पाठमेद करके वे अपने मनोरथको पूर्ण करने । माया है, तत्त्वार्थसूत्रमें पाठभेद इसी खेंचातानीसे हुआ है, और आज इस बात का गिय करना ना हो गया है कि, आचार्यकी असली कृति कौन है । अस्तु । पाठभेदका जो कोप्टक दिया गया है, उसमें केवल दिगम्बरसम्प्रदायमापनों और हर भाष्यके सूत्रोंका विभेद बतलाया है। परन्तु कहते हैं कि, श्वेताम्बरामायके अन्न टीकामान्यों में इस भाष्यमें भी बहुत कुछ सूत्रोंका पाठभेद हैं । जो हो, मुझे अन्वटीकाग्रन्योंकि हमनमा माय नहीं मिला, इसलिये कुछ नहीं कह सकता । परन्तु दिगम्बरी टोशालागेका नुवादमें एक नाम है। तत्त्वार्थाधिगमभाप्य। पहले जिन टीकाग्रन्थोंकी सूची दी गई है, उन सबमेंसे जहांतक मैं जानता है, मत सर्वार्ध- सिद्धि तथा और दोतीन भाषाटीका ग्रन्थोंको छोड़के शेष सब अप्रकाशित है । और उन दो तीन जो छपे हुए हैं, वे केवल दिगम्वर सम्प्रदायके पदायोंके कहनेवाले हैं, वेताम्बर सम्प्रदायर टीका- ग्रन्थ अभीतक कोई भी प्रकाशित नहीं हुए, और इस कारण उनके प्रकाशित होनेकी थावस्यकता थी। हर्षका विषय है कि, इसी बीचमें वंगालकी एशियाटिक सुसाइटीने अपनी संस्कृतान्य सीरीजमें तत्त्वार्थाधिगममाष्य प्रकाशित करके जैनसम्प्रदायका गौरव बढ़ानेकी कृरा की । परन्तु हमारे समाजमें संस्कृतविद्याका एक प्रकारसे अभाव होनेके कारण उक्त मूल अन्य कुछ लाम नहीं पहुंचा सकता था, अतएव श्रीपरमश्रुतप्रभावकमंडलके स्वामियोंने व्याकरणाचार्य पं० ठाकुर- प्रसादजीसे इसकी सार्वदेशिक हिन्दी भाषाटीका करानेका मनोरथ किया, और हर्पका विषय है कि, वह पूर्ण होके आज आपके समक्ष प्रस्तुत है । इस तत्त्वार्याधिगम भाष्यके कर्ता श्रीउमास्वातिवाचक हैं। और अनेक विद्वानोंका मत है कि, मूल तत्वार्थसूत्रके कर्ता उमास्त्राति ही भाष्यके कर्ता हैं, अर्थात् श्रीमदुमास्वातिने स्वयं ही अपने अन्थपर उक्त भाष्यके रचनेकी कृपा थी, परन्तु अन्यान्तरोंसे इस विषयका कोई पुष्ट प्रमाण नहीं मिलता, इसलिये सहसा विश्वास करनेको जी नहीं चाहता ग्रन्धकी रचनाप्रणाली और प्रतिपाद्य विष- यकी असूक्ष्मता पर ध्यान देनेसे मैं समझता हूं, बहुत थोड़े विद्वान् इस वातको स्वीकार करेंगे कि, यह भाप्य मूलग्रन्धक का ही है। क्योंकि मूलग्रन्थकर्ताकी टीका कुछ विलक्षण ही होती है। वह ऐसे सूक्ष्म विपयोंपर अपनी लेखनी घिसता है, जिसको अन्य विद्वान् कहनेका सामर्थ्य नहीं रखते । सो वह वात इस अन्यमें दिखाई नहीं देती। और कदाचित् मेरा यह भ्रम मात्र हो, तो विद्वज्जन निर्णय- करें, मेरे लेखको किसी प्रकार पक्षपातपूर्ण न समझें । इस विषयको यहीं समाप्त करता हूं, और साथ ही एक दो प्रार्थना किये देता हूं कि, जैन- समाजमें अच्छे विद्वानोंका अभाव होनेके कारण इस ग्रन्धकी हिन्दीटीका एक भिन्नधर्मी विद्वान्से बनवाई है। यद्यपि वे जैनधर्मके तत्वोंके जाननेवाले तथा परिचयी हैं, परन्तु भिन्नधर्मी होनेके कारण यदि नहीपर टीकामें मूल रह गई हो, और ऐसा संभव भी है तो आप लोग भूलके अनुसार पार्थमिहिमापा रायचन्द्रयान्नमालाद्वारा भीत्र ही प्रकाशित होनेवाली है। अब मैं - । सुधारके पढ़ें। आजकलकी पद्धतिके अनुसार इस ग्रन्थकी भूमिका विद्वद्वर्य पं० ठाकुरप्रसादजीको ही लिखनी चाहियेथी, परन्तु उनकी अनुपस्थितिके कारण प्रकाशक महाशयके आग्रहसे भूमिकाका कार्य मुझे करना पड़ा है। इसमें मेरी अल्पज्ञता तथा प्रमादसे कुछ मूल हुई हो, तो उदार पाठक क्षमा करें । अन्तमें श्रीपरमश्रुतप्रभावकमंडळके सभ्योंको मैं सम्बे हृदयसे धन्यवाद देता हूं, जो जैनधर्मके अपूर्व अन्थभंडारको प्रकाशित करनेमें दत्तचित्त हैं । इत्यलम् विद्वद्वरेषु- चंदाबाड़ी-गिरगांव वम्बई । २०-१-०६१ ई० जिनवाणीका सेवक- देवरी (सागर) निवासी. नाथूराम प्रेमी.

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दिगम्बर और श्वेताम्बरानायके सूत्रपाठोंका भेदप्रदर्शककोष्टक । x x x x प्रथमोध्यायः। सूत्राङ्क। दिगम्बरानायीसूत्रपाठ। सूत्राङ्क। श्वेताम्बरानायीसूत्रपाठ। १५ अवग्रहहावायधारणाः । १५ अवग्रहहापायधारणाः । २१ द्विविधोवधिः। २१ भवप्रत्ययोवधिदेवनारकाणाम् । २२ भवप्रत्ययो नारकदेवानाम् । २२ क्षयोपशमनिमित्तः षड्विकल्पः शेषाणाम् । २३ यथोक्तनिमित्तः....... ............... २३ ऋविपुलमाती मनापर्ययः । २४ पर्यायः । २८ तदनन्तमागे मनःपर्ययस्य । २९ ...पर्यायस्य । ३३ नैगमसग्रहव्यवहारर्जुसूत्रशब्दसमभिरूद्वैवम्भूता ३४ सूत्रशन्दा नयाः। नयाः । ३५ आद्यशब्दौ द्वित्रिभेदौ । द्वितीयोऽध्यायः। ५ ज्ञानाशानदर्शनलब्धयश्चतुस्त्रित्रिपञ्च भेदाः स- दर्शनदानादिलब्धयः........... म्यक्त्वचारित्रसंयमासयमाश्च । ........... १३ पृथिव्यप्तेजोवायुवनस्पतयः स्थावराः १३ पृथिव्यवनस्पतयः स्थावराः। १४ द्वीन्द्रियादयस्त्रसाः । १४ तेजोवायू द्वीन्द्रियादयश्च त्रसाः। १९ उपयोगः स्पर्शादिषु । २० स्पर्शरसगन्धवर्णशब्दातदर्थाः । २१ .....शब्दास्तेषामर्थाः । २२ वनस्पत्यन्तानामेकम् । २३ वाय्वन्तानामेकम् । २९ एकसमयाविग्रहा। ३० एकसमयोऽविग्रहः। ३. एकं द्वौ त्रीवाऽनाहारकः । ३१ एकं द्वौ वानाहारकः । ३१ सम्मूर्छनगोपाद जन्म । ३२ सम्मूर्छनगर्मोपपाता जन्म | ३३ जरायुजाण्डजपोतानां गर्भः । ३४ जराय्वण्डपोतजानां गर्भः। ३४ देवनारकाणामुपपादः । ३५ नारकदेवानामुपपातः । ३७ पर पर सूक्ष्मम् । ३८ तेषां पर परं सूक्ष्मम् । ४. अप्रतीपाते। ४१ अप्रतिपाते। ४६ औपपादिक वैक्रियकम् । ४७ वैक्रियमोपपातिकम् । ४८ तैजसमपि। ४९ शुभ विशुद्धमव्यापाति चाहारक प्रमत्तसंय- ४९ ...... ...चतुर्दशपूर्व- धरस्यैव । १ भाष्यके सूत्रोमें सर्वत्र मनःपर्ययके वदले मनःपर्याय है। X x x X तस्यैव ।

१२ X X X X X X ५२ शेषात्रिवेदाः । ५३ औपपाविकचरमोत्तमदेहाःसङ्खयेयवर्षायुषोऽ- ५२ औपपातिकचरमदेहोत्तमपुरुषासमधे .... नपवायुपः। ........1 तृतीयोऽध्यायः। १ रत्नशर्करावालुकापङ्कधूमतमोमहातमः प्रभाभू १...............सप्ताघोऽधःपृथुतराः। मयो घनाम्बुवाताकाशप्रतिष्ठाः सप्ताधोऽध: २ तातु नरकाः। २ तासु त्रिंगत्पञ्चविंशतिपश्चदशदशत्रिपञ्चोनैक- नरकशतसहस्राणि पश्च चैव यथाक्रमम् । ३ नित्याशुभतरलेश्या... ३ नारका नित्याशुमतरलेश्यापरिणामदेहवेदना ........... विक्रियाः। ७ जम्बूद्वीपलवणादयः शुभनामानोद्वीप स. ७ जम्बूद्वीपलवणोदादयः शुभनामानो द्वीप- मुद्राः। समुद्राः। १० तत्र भरत........ १० भरतहैमवतहरिविदेहरम्यकहरण्यवतैरावतवर्षाः .......1 क्षेत्राणि । १२ हेमार्जुनतपनीयवैडूर्यरजतहेममयाः। १३ मणिविचित्रपार्था उपरि मूले च तुल्यवि- स्ताराः। १४ पद्ममहापद्मतिगिञ्छकेसरिमहापुण्डरीकपुण्ड- रोका हृदास्तेषामुपरि। १५ प्रथमो योजन सहस्रायामस्तदर्घविष्कम्मो हृदः) १६ दशयोजनावगाहः । २७ तन्मध्ये योजनं पुष्करम् । १८ तद्विगुणद्विगुणा हृदाः पुष्कराणि च । १९ तन्निवासिन्यो देव्यः श्रीहीधृतिकीर्तिबुद्धि- लाम्यः पल्योपमस्थितयः ससामानिकपरि- पत्काः । २० गङ्गासिन्धुरोहिद्रोहितास्याहरिद्धरिकान्तासीता- सीतोदानारोनरकान्तासुवर्णरूप्यकूलारतार- कोटाः सरितस्तन्मध्यगाः । २१ दयोदयोः पूर्वाः पूर्वगाः। २२ दोषान्त्वपरगा.। २३ चतुर्दशानदीसहलपरिवृत्ता गङ्गासिन्ध्वादयो x X x x x x x x x x X X x x xxx x x २४ भरत. पड्डिातिपञ्चयोजनगतविस्तारः पट् चकोनविशतिमागा योजनल । x x १३ x x X x x x x x x x x x X x २५ तद्द्विगुणद्विगुणविस्तारा वर्षधरवर्षाविदेहान्ताः। २६ उत्तरा दक्षिणतुल्याः । २७ भरतैरावतयोर्वृद्धिहासौ षट्समयाभ्यामुत्सर्प- ण्यवसर्पिणीभ्याम् । २८ ताभ्यामपरा भूमयोऽवस्थिताः । २९ एकद्वित्रिपल्योपमस्थितयो हैमवतकहारिवर्षक- दैवकुरुवकः । ३० तथोत्तराः । ३१ विदेहेषु सङ्खयेकालाः । ३२ भरतस्य विष्कम्भो जम्बूद्वीपस्य नवतिशत. भागः । ३८ नृस्थिती परावरे त्रिपल्योपमान्तर्मुहूर्ते । १७ .........परापरे..................। ३९ तिर्यग्योनिजानां च । १८ तिर्यग्योनीनां च । चतुर्थोऽध्यायः। २ आदितस्त्रिषु पीतान्तलेव्याः । २ तृतीयः पीतलेश्यः। ७ पीतान्तलेश्याः। ८ शेषाः स्पर्शरूपशब्दमनःप्रवीचाराः । प्रवीचारा द्वयोर्द्वयोः । १२ ज्योतिष्काः सूर्यचन्द्रमसौ ग्रहनक्षत्रप्रकीर्णक- १३ .......... ...........प्रकीर्ण X x x x ८ तारकाचा तारकाः। .. १९ सौधर्मेशानसानत्कुमारमाहेन्द्रब्रह्मब्रह्मोत्तरला २० सौधर्मशानसानत्कुमारमाहेन्द्रवरालोकलान्तक- न्तवकापिष्टशुक्रमहाशुक्रशतारसहस्रारेष्वानत महाशुक्रसहस्रारे......... प्राणतयोरारणाच्युतयोर्नवसु अवेयकेषु विज- यवैजयन्तजयन्तापराजितेषु सर्वार्थसिद्धौ च । .....सर्वार्थसिद्ध च। २२ पीतपद्मशुक्ललेश्या द्वित्रिशेपेषु । २३ .......लेल्या हि विशेषेषु । २४ ब्रह्मलोकालया लौकान्तिकाः । २४ .लोकान्तिकाः। २८ स्थितिरसुरनागसुपर्णद्वीपशेषाणां सागरोपम- २९ सितिः । त्रिपल्योपमार्द्धहीनमिताः ३० भवनेषु दक्षिणार्धाधिपतीनां पल्योपममपन् । ३१ पाणां पादोने। ३२ अनुरेन्द्रयोः सागरोपममधिक च। २९ सौधर्मशानयोः सागरोपमेऽधिके। ३३ सोधर्मादिषु यथानमन् । ३४ नागरोपने। ३५ अधिणेच ३० सानत्कुमारमाहेन्द्रयोः सप्त । ३६ स तानत्कुमारे। x xxx x X X X X X ३ x x x x x x X X १४ ३१ त्रिससनवैकादशत्रयोदशपञ्चदशमिरधिकानितु।। ३७ विशेषत्रिसप्तदशैकादशत्रयोदशपञ्चदशभिरधि- कानि च। ३३ अपरा पल्योपमधिकम् । ३९ अपरा पल्योपममधिकं च । X x ४० सागरोपमे। x x ४१ अधिके च। ३९ परापल्योपमधिकम् । ४७ परापल्योपमम् । ४० ज्योतिष्काणां च । ४८ ज्योतिष्काणामधिकम् । ४९ ग्रहाणामेकम् । ५० नक्षत्राणामधम् । x x ५१ तारकाणां चतुर्भागः । ४१ तदष्टभागोऽपरा। ५२ जघन्या त्वष्टमागः। 1x x ५३ चतुर्भागः शेषाणाम् । ४२ लौकान्तिकानामष्टौ सागरोपमाणि सर्वेषाम् । पञ्चमोऽध्यायः। २ द्रव्याणि । २ द्रव्याणि जीवाश्च । ३ जीवाश्च । १० सवयेयासङ्खयेयाश्च पुद्गलानाम् । ७ असङ्खयेयाः प्रदेशा धर्माधर्मयोः ८ जीवस्य च। १६ प्रदेशसहारविसर्पाभ्यां प्रदीपवत् । १६ .......विसर्गाभ्यां......। २६ भेटसद्धातेभ्य उत्पद्यन्ते । २६ सङ्घातभेदेभ्य उत्पद्यन्ते । २९ सहव्यलक्षणम् । ३७ बन्धेऽधियों पारिणामिकौ च । ३७ बन्धे समाधिको पारिणामिकौ । ३९ कालवा ३९ कालश्चेत्येके। ४२ अनादिरादिमांश्च । ४३ रूपिष्वादिमान् । ४४ योगोपयोगी जीवेपु। पष्टोऽध्यायः। ३ शुभ. पुण्यस्यागुमः पापस्य । ३ शुभः पुण्यस्य । x अशुभः पापस्य। ५ दिपकपायाप्रतक्रियाः पश्चनुःपञ्चपञ्चवि ३ अप्रतकपायेन्द्रियक्रिया:...... याः पृवंय भेटाः। ( गन्दानामावमायाधिकरणवीय विशेपेभ्य- मोर ...भाववीर्याधिकरणविशेपेभ्य- स्तद्विगेपः । .: rm मानुषम्य । १८ अरपारम्भपरिग्रहत्वं स्वभावमार्दवार्जवं च मानुपस्या x x X x xxx xxx 1 ७ , १५ x x x X x x X X X X x १८ स्वभावमार्दवं च । x २१ सम्यक्त्वं च । २३ तद्विपरीत शुभस्य २२ विपरीत शुभस्य । २४ दर्शनविशुद्धिविनयसम्पन्नता शीलवतेष्वनती- २३ चारोऽमीक्ष्णज्ञानोपयोगसवेगौ शक्तितस्त्या ...भीक्षण....... गतपसीसाधुसमाधिर्वैयावृत्यकरणमहंदाचार्यव. तपसीसङ्घसाधुसमाधिवैयावृत्यकरण-.... हुश्रुतप्रवचनभक्तिरावश्यकापरिहाणिमार्गप्रभा- वना प्रवचनवत्सलत्वमिति तीर्थकरत्वस्य । तीर्थकृत्वस्य । सप्तमोऽध्यायः। ४ वामनोगुप्तीर्यादाननिक्षेपणसमित्यालोकितपान- भोजनानि पञ्च । ५ क्रोधलोमभीरुत्वहास्यप्रत्याख्यानान्यनुवीचिमा- षणं च पञ्च । ६ शून्यागारविमोचितावासपरोपरोधाकरणभैक्ष्य- शुद्धिसधाविसवादाः पञ्च । ७ स्त्रीरागकथाश्रवणतन्मनोहराङ्गनिरीक्षणपूर्व- रतानुसरणवृष्येष्टरसखशरीरसस्कारत्यागा:पश्च। ८ मनोज्ञामनोजेन्द्रियविषयरागद्वेषवर्जनानि पञ्च । ९ हिंसादिष्विहामुत्रापायावद्यदर्शनम् । ४ हिसादिष्विहामुत्र चापायावद्यदर्शनम् । १२ जगत्कायस्वभावौ वा संवेगवैराग्याथम् । ७ जगत्कायस्वभावौ च सवेगवेराग्यायम् । २८ परविवाहकरणेबरिकापरिगृहीतापरिगृहीताग -२३ परविवाहकरणेलरपरिगृहीता..... मनानङ्गक्रीडाकामतीव्राभिनिवेशाः। ३२ कन्दर्पकौकुच्यमौखासमीक्ष्याधिकरणोप २७ कन्दप्पकौकुच्य...... भोगपरिभोगानर्थक्यानि । णोपभोगाधिकत्वानि । ...... ...मन्नारो ३४ अप्रत्यवेक्षिताप्रमार्जितोत्सर्गादानसस्तरोपक्रम- २९ णानादरस्मृत्यनुपस्थानानि । ३७ जीवितमरणशंसामित्रानुरागमुखानुबन्धनिदा- | ३२ निदानकरणानि । अटमोऽध्यायः। २ सकषायत्वाजीवः कर्मणो योग्यान्पुद्गलाना २ ...... ..पुहलानादचे। दत्ते स बन्धः ३ मवन्ध। ४ आयो ज्ञानदर्शनावरणवेदनीयमोहनीयायुनी- मगोत्रान्तरायाः। मोहनीवायुर नाम.......! १ आठवें अधायके १२ वे सूत्र में भी तीर्थकरत्वं च धान, नीशनन x x ............नुपस्थापनानि। नानि । x x १६ १८ ६ मतितावधिननःपव्ययकेवलानान् । ; ७ मत्यानेनाम् । ८... ७ चारचक्षुरवधिकेवलानां निद्रानिद्रानिद्रा ..त्यानद्विवेदनीयानि च। प्रचलनचलाप्रचलल्यानरद्धयश्च । ९ दर्शनचारित्रमोहनीयाकषायाकषायवेदनीया १० ..मोदनीयकपायनोकपाय........ ख्यात्रिदिनवषोडशभेदाः सम्यक्त्वमिथ्यात्व- तदुमयान्यक्रपायक्रषायौ हात्यरत्यरतिगोक तदुभयानि कपायनोकपायावनन्तानुबन्ध्यप्रत्या- भवजुगुप्तास्त्रीपुन्नतकवेदा अनन्तानुवन्ध्य ख्यानप्रत्याख्यानावरणसचलनविकल्याचकश: प्रत्याल्गनप्रत्याख्यानरचलननिकलाश्चैकशः क्रोधमानमायालोमा हात्यरत्यरतियांकनयजुगु. जोधमानमायालोमाः! प्मालीपुन्नपुंसकवेदाः। १३ टानलाममोगोपनोगायीणान् । १४ दानादीनाम् । १६ विशतिर्नामगोत्रयोः । १७ नानगोत्रयोविंशतिः। १७ त्रयस्त्रिंशत्तागरोपमा घायुषः । ....युकत्य। १९ मेषाणामन्तर्नुहूर्ता। २१ नुहर्तम् । २४ नामप्रत्ययाः सर्वतो योगविशेषात्मैकवेत्रा- २५ क्षेत्रा- वगाहसिताः सर्वात्मप्रदेशेवनन्तानन्तप्रदेचाः। वगाढसिताः........... २५ सद्वेद्यशुमायुर्नामगोवागि पुण्यम् । २६ नवेद्यसम्यक्त्तहात्सरतिपुत्पवेदशुभायः... । २६ अतोऽन्यतापम् । नवमोऽध्यायः। ६ उत्तमचमामादवावसत्यशौचनयमतपत्या ६ उत्तमः क्षमा.......... गालिबन्यब्रह्मचागि धनः। १७ एकादगे नाच्या युगपदेकसिन्नेकोनविंशतिः ।। १७ .................विंशतः १८ सामाणिकच्छेदोपसापनापरिहारविशुद्धिम- १८ .............................. सान्रायल्याल्यतमिति चारित्रम् । यथाख्यातानि चारित्रम् । २२ भाले चनप्रतिश्मणतदुभयविवेकव्यलगंतप- ग्छेदपरिहारोरसापनाः। २. उचमसहनलैजानचिन्तानिरोधो ध्यानमान्त - २७ .... हना । २८ आमुहूतात् । ३३ विपरीतं मनोज्ञानान् । ३. विरानं मनोडल्ला १६सायविषयमसानविषयायधर्मन् । ३८ उपशान्तक्षीणकपाययोश्च । ३९ शुढे चाये ! x x २२... स्थापनानि । निरोघो ध्यानम्। .... x x धम्मप्रमत्त संयतसा ४ विटा ४. मोगायोगानाम् । बाने १२ तब्येनकाययोगा............! ....नवितक पूर्व। ४३ ..

दशमोऽध्यायः। कृत्स्नकर्मविप्रमोक्षो ૨ २ बन्धहेत्वभावनिर्जराभ्यां निर्जराभ्याम् । . मोक्षः। x x ३ औपगामिकादि भव्यत्वानां च । ३ कृत्स्नकर्मक्षयो मोक्षः। ४ औपशामिकादिभव्यत्वाभावाश्चान्यत्र फेवल. सम्यक्त्वज्ञानदर्शनसिद्धत्वेभ्यः । x गच्छत्या......। ४ अन्यत्र केवलसम्यक्त्वज्ञानदर्शनसिद्धत्वेभ्यः । ५ तदनन्तरमूर्यं गच्छन्त्यालोकान्तात् । ६ पूर्वप्रयोगादसङ्गत्वाद्वन्धच्छेदात्तथा गतिपरि- माच्च । ७ आविद्धकुलालचक्रवद्व्यपगतलेपालाम्बूवदेर- ण्डबीजवदग्निशिखावच्च । ८ धर्मास्तिकाया भावात्। तगतिः । x x x X १२१ ५ ३१ १ $ ८ १६९ ४ ९ ३८ ११६ ४० ९ ३ १५ ९ ९ ९ ८ १९१ वर्णानुसारी सूत्रानुक्रमणिका। -పండు अध्याय। सूत्र । पृष्टांक ।। ३४ आकागादेकडव्यानि ३५ आचार्योपाध्यायः १ अगार्यनगारश्च १४ १६२/ ३६आदितस्तिमणामन्तरायन्स २ अजीवकाया० १ १२०/ ३७ आद्य संरम्म० ३अणवः स्कन्धाश्च ५ २५ १३१ ३८ आयशन्दी द्विनिमेदी ४ अणुव्रतोऽगारी १६२/ ३९ आये परोलम् ५ अदत्तादानं खेयम् १६१ ४० आद्यो ज्ञानदर्शनावरण. ६ अधिकरणं जीवाजीचाः १४५, ४१ आनयनप्रेष्यप्रयोगः ७ अविकेच ३५ ११६ ४२ आमुहर्तात् ८ अधिकच ४१ ११७ ४३ आरणच्युतादू० ९ अनन्तगुणे परे २ ५१ ४४ आर्त धर्मगुलानि १० अनशनावमौदर्य ९ १९ २१० ४५ आर्तममनोनानां० ११ अनादिरादिमांच ५ ४२ १४१ ४६ आची मिलशश्च १२ अनादिसम्वन्धेच २ ४२ ५२ ४७ आलोचनप्रतिक्रमण १३ अनित्याशरण. १९८ ४८ आस्रवनिरोधः संवरः १४ अनुग्रहाथ० ३३ ४९ आनापायविपाक० १५ अनुश्रेणि गतिः २७ इ. १६ अपरा पल्योपममधिकं च ११७ ५० इन्द्रसामानिक० १७ अपरा द्वादशमुहूर्ता १९ १८७ १८ अप्रतिघाते ई। २ १९ अप्रत्यवेक्षिता० ५१ ईर्याभाषेपणा. १७० २० अर्थस्य १७ १८ २१ अर्पितानर्पितसिद्धेः ५२ उच्चनीचश्च ३१ १३६ २२ अल्पारम्भपरिग्रहत० १८ ५३ उत्तमः क्षमा० १४९ २३ अवनहेहापावधारणाः ५४ उत्तमसंहननस्यै. १५ १७ २४ अविनहा जीवस्य ५५ उत्पादव्यवध्रौव्ययुक्त सत् ૨ २५ अविचारं द्वितीयम् २६ अबतकमायेन्द्रियक्रियाः० ५७ उपयोग. स्पर्मादिषु ६ १४३ १७ अशुम.पापस्य ५८ उपर्युपरि ६ २८ असहयेयाः प्रदेशा ५९ उपशान्तक्षीणकषाययोश्च १२२ २९ असहयभागादिपु० ३० असदभिधानमनृतम् ६० अर्वाधस्तियंग्य १६० ३१ अमुरेन्टयो.. ૨૨ ११५ ऋा आ। ६१ ऋविपुलमती मनःपर्यायः ० धावागन्यानन्ता: ५ १२२ आराधन्यावगाहा १ ९ २१८ २ ४ ९१ ८ ९ १९३ १ १३ ९ ur S १८६ १९३ २१७ १३२ ८ १ ९ ४७ २९ ५६ उपयोगो लक्षणम् ९ ४४ २ ४० २ १९ ४४ १४३ ४ १९ १०५ २१९ ९ ३८ १ १२३ ९ ७ २५ १६८ १ २४ ९ ६२ एकप्रदेगादिपु भाज्यः० १४ १२३ M १९ m or a ९ ६ 2 ३ ४० ४ ४ ४ a २ ३८ ४ ६ ६ ३ ६३ एकसमयो ऽविग्रहः २ ३० ४८ ६४ एक द्वौ वानाहारकः ३१ ९७ जगत्कायखभावी च १५९ ६५ एकादश जिने ११ २०८ ९८ जघन्या त्वष्टभागः ५२ ६६ एकादयो भाज्या० १७ २१० ९९ जम्बूद्वीपलवणादयः ६७ एकादीनि भाज्यानि० १ २७ १०. जराय्वण्डपोतजानां गर्भः २ ३४ ६८ एकाश्रये सवितर्के० ४३ २२० १०१ जीवभव्याभव्यत्वादीनि च २ औ। १०२ जीवस्य च ६९ औदारिकवैक्रियः १०३ जीवाजीवात्रव० २ १ ७० औपपातिकचरमदेहो. १०४ जीवितमरणाशसा० २ ५२ १७२ ७१ औपपातिकमनुष्येभ्यः० १०५ ज्योतिष्काः० २८ ११४ १३ १० ७२ औपशमिकक्षायिको १०६ ज्योतिष्काणमधिकम् १ ११९ ७३ औपशमिकादि० १० २२७ १०७ ततश्च निर्जरा क। ८९१ ७४ कषायोदयात्ती. १०८ तत्कृतः कालविभागः १५ १०४ १५ १४९ १०९ तत्त्वार्थश्रद्धान सम्यग्दर्शनम् । २ ७५ कन्दर्पकौकुच्य० २७ १६९ ११० तथ्येककाययोगायोगानाम् ९ ४२ ७६ कल्पोपपन्नाः० १०५ १११ तत्प्रमाणे १ १० ७७ कायप्रवीचारा० ११२ तत्प्रदोपनिव० ११ १४७ ७८ कायवाडान.कर्मयोगः ६ १ १४२ ११३ तत्र मरत. १० ७९ कालश्वेत्येके ५ ३० १४० ११४ तत्स्थैर्यार्थ १५८ ८० कृमिपिपीलिका० २ २४ १९५ तदनन्तभागे मन पर्यायस्य १ २६ ८१ कृत्स्नकर्मक्षयो मोक्षः १० २२७ ११६ तदनन्तरमूर्ध्व० २२८ ८२ केवलिश्रुतसच. १४ १४८ ११७ तदविरतदेशविरत. ९ ११८ ८३ क्षुत्पिपासा. ९ २०८ ११८ तदादीनि भाज्यानि० २ ८४ क्षेत्रवास्तुहिरण्य. १६८ ११९ तदिन्द्रियानिन्द्रिय. २ १८ ८५ क्षेत्रकालगतिलिङ्ग १२० तद्विभाजिन ११ ग। १२१ तद्विपर्ययो. ८६ गतिकषायलिङ्ग. २ ३९) १२२ तद्भाव परिणामः १४१ ८७ गतिशरीरपरिग्रहा० ૨૨ १०८ १२३ तनावाव्यय नित्यम् ५ ११६ ८८ गतिस्थित्युपग्रहो ५ १७ १२४ १२४ तन्निसर्गादधिगमाद्वा ३ ८९ गतिजातिशरीरा० १२ १८० १२५ तन्मध्ये मेहनाभित्तो. ३ ९. गर्भसमूर्छनजमायम् ४६ ५४/ १२६ तपसा निर्जरा च ९१ गुणसाम्ये सदृशानाम् ३४ १३८, १२७ तारकाणा चतुर्भागः ९२ गुणापर्यायवद्रव्यम् ५ १४० १२८ तामु नरका. २ ९३ प्रहाणामेकम् ११९ १३९ तिर्यग्योनीनां च १३. तीप्रमन्दमातागना ९४ चक्षुरचक्षुरवधि. १७६/ १३१ तृतीयः पीतलेल्या १ ९५ चतुर्भागः शेषाणाम् १२० १३२ तेजोवायू० २ ९६ चारित्रमोहे. १५ २०९ १३३ तेपा परं परं सम्मम् . ३ ६ ९ १० ८. ६ . ४ १ २ । m ८ ४ S २० १३४ तेवत्रिः ३ ५ ३ ८ १ ६ . ९ ४ ४ و द -०-० ३ ८८ १५ ४ S ४० ७७ ३ ३ ३ ४ ११ ७४ : १७० नारकतर्यग्योनमानुपदेवानि ८ १८० ३ १२१ १८७' १७१ निसावस्थितान्यरूपाणि १३५ चलिंगसागरोपमायायुष्कत्य८ १८ ९२/१७२ नित्याशुभतरलेश्या० ३ ६६ १६. वायनिंगलोकपाल. ९ ३४ २१८ द। १५३ निदान च २ १३७ दर्शनविशुद्धिविनयसम्पन्नता०६ २३ १५१, १७४ निरुपभोगमन्त्यम् ११ १३८ दर्शचारित्रमोहनीय० १७६ १७५ निर्देशवामित्व. १० १४६ २०९, १७६ निर्वर्तनानिक्षेप १३९ दर्शनमोहान्तराययो. १४ १ १४० दश वर्षसहवाणि ११९ १७७ निवृत्त्युपकरणे. ४३ ९०। १७८ निःशल्यो व्रती १४१ दशाष्टपद. १३ १६२ १४२ टानादीनाम् १८६ १७९ निःगीलनतत्व च सवैपाम् ६ १९ १४९ १४३ दिग्देशानर्थदण्ड० ૧૬ १६२) १८० निष्क्रियानि च १२१ १४४ दुःखगोकतापा० १२ १४८ १८१ नृस्थिती परापरे० १४. दुःखनेव वा १८२ नैगमसंग्रह १ ३४ ३१ १४६ देवाश्चतुर्निकायाः १ ९० पा १४७ देशसर्वतोऽणुमहती २ १५३ १८३ पश्चनव० १७५ १४८ व्यानि जीवाद २ १२० १८४ पञ्चेन्द्रियागि २ १५ ४२ १४९ द्रव्याच्या निर्गुणा गुणाः १४० १८५ परतः परतः० ४२ ११८ १५० दिनवाटादशे० २ २ १५१ द्विद्विविष्कन्भाः० १८६ परविवाहकरणे. १६८ ५५२. द्वितखण्डे १८७ परस्परोदीरितदुःलाः १२ ८३ १८८ परस्परोपग्रहो जीवानाम् २१ १५३ द्विविधानि १२७ २ १६ ४२ १५४ द्विविधो ऽवधिः १८९ परात्मनिन्दाप्रशंसे० २४ १५२ ។ २१ २२, १५५ घधिशादिगुणानां तु १९. परा पत्योपमम् ११९ १९१ परे केवलिनः २१९ धा १९२ परेऽप्रवीचाराः १. धर्माधर्मयोः कृले ५ १३ १२३ १९३ परे नोव्हेतू २१७ ना १९४ पीतपद्मशक्ललेश्या० २३ १११ १. नमागामधन् ११९ १९५ पीतान्तलेयाः १५८ न पुरनिन्दियाभ्याम् २ १९ १९, १९९ पुलाकवकुन० १.१ न जमन्यगुमानान् २२१ १३८ १९७ पुष्कराधैं च ८४ १६. नदेवाः ६० । १९८ पूर्वप्रयोगादसङ्गत्वा० ११ नारदुर्दग. २२८ ९ २१२' १९९ पूर्वयोन्द्रिाः नाना ९२ ११ १२३ २०० पृथकवा नागारविनि ९ ४१ ११९ १५ ९८७ २०१ पृथिव्यवनस्पतयः स्थावराः२ १९ नमानी १३ १८८ २०२ प्रकृतिस्थित्सनुभाव० १७५ २५ ९८९, २०३ प्रसननन्यत् १२ ८, २०४ प्रदेशतोऽहयेवगुण जानतः ૨ ५१ १८ मुगनि २०५प्रटेशसंहार ५ १६ १२४ ५९ २०६ प्रमत्तयोगात्याणव्यपरोपणं हिंसा पनि दश ४ १५ १६० २०७ प्रमाणनयरधिगमः १ ६९ s ४७ . .. ९ . ९ ४८ २ .in २ ६ २१ ३ २३ . - - १ r ४ ४ . १ ५ ४३ 11 ९ ९ २१६ ३ . ४७ २०८ प्राग्वेयकेभ्यः कल्पा: २४ ११२ य। २०९ प्राग्मानुषोत्तरान्मनुष्या. १४ ८५, २४३ यथोकनिमित्त'. १ २३ २१० प्रायश्चित्तविनय. ९ २१२) २४४ योगदुष्प्रणिधाना० १७० व। २४५ योगवकता० ६ २१ १५० २११ वन्धवधविच्छेदा० २४६ योगोपयोगी जीवेषु ४४ २० १४१ १६६ २१२ वन्धहेत्वभावनिजराभ्याम् १० २ २२६ २१३ वन्ध समाधिको २४७ रन-शर्करा० ३ ३६ १३९ ६४ २४८ रूपिण पुद्गला. २१४ वहिरवस्थिता. ५ १२१ १६ १०५ २४९ रूपिष्ववधे. २१५ वहुवहुविध० ។ २८ २६ १६ २१६ बह्वारम्भपरिग्रहत्वः २५० रूपिष्वादिमान् १४१ ६ १६ १४९ २१७ वादरसपराये सर्वे १२ २०९ २१८ वाह्याभ्यन्तरोपध्यो. २५१ लब्धिप्रत्ययं च २६ २ ४८ २१९ ब्रह्मलोकालया० २५२ लब्ध्युपयोगौ भावेन्द्रियम् २ २५ १८ ११३ ४३ २५३ लोकाकाशे ऽवगाहः भा १३ १२३ व। २२० भरतैरावतविदेहा.. १६ २५४ वर्तना परिणामः० २२१ भवप्रत्ययो नारकदेवानाम् १ २२ १२७ २२ २२ २५५ वाचनाप्रच्छना. ९ २२२ भवनवासिनो २५ २१६ ११ २५६ वाय्वन्तानामेकम् २ २२३ भवनेषु दक्षिणार्धाधिपतीना०४ ३० २३ ४५ ११५ २५७ विग्रहगती कर्मयोग. २ २२४ भवनेषु च ४२ ११९ २५८ विग्रहवती च० २ २९ २२५ भूतव्रत्यनुकम्पा० ६ १३ १४८ २५९ विघ्नकरणमन्तरायस्य ६ २२६ भेदसंघाताभ्या चाक्षुषाः २६ १५३ २८ १३० २६०विचारोऽर्थव्यजनयोगसंक्रान्तिः९ ४६ २२० २२७ भेदादणुः ។ २७ १३२ २६१ विजयादिषु द्विचरमाः २७ ११४ म। २६२ वितर्क श्रुतम् ४५ २२० २२८ मति स्मृतिः० ។ १३ १६ / २६३ विधिद्रव्यदातृ० ३४ १७२ २२९ मतिश्रुतावधि० ९ १५/ २६४ विपरीत शुभस्य २२ १५१ २३० मतिश्रुतयोर्निवन्ध १ २६, २६५ विपरीत मनोज्ञानाम् २१८ २३१ मतिश्रुतावधयो. १ ३२ २९) २६६ विपाकोऽनुभावः २२ १८८ २३२ मत्यादीनाम् १७५/ २६७ विशुद्धिक्षेत्र० २६ २५ १४९) २६८विशुन्धप्रतिपाताभ्या तद्विशेष.१ २५ २३४मारणन्तिकीसलेखनांजोषिता १७ १६४) २६९ विशेषत्रिसप्त. ११६ २३५ मार्गाच्यवननिर्जराथै० २०७, २७० वेदनायाश्च ३२ २३६ मिथ्यादर्शनाविरतिक १ १७३/ २७१ वेदनीये शेपाः १६ २०९ २३७ मिथ्योपदेशरहस्याभ्याख्यान०७ १६६ २७२ वैक्रियमौपपातिकम् २ २३८ मूर्छा परिग्रहः १२ १६१ | २७३ वैमानिकाः। १०५ २३९ मेरुप्रदक्षिणा १४ १०० २७४ व्यञ्जनस्यावग्रहः १८ २४० मैत्रीप्रमोदकारुण्य० ६ १५८/२७५ व्यन्तरा. किन्नर. १२ २४१ मैथुनमब्रह्म ११ १६१/२७६ व्यन्तराणां च ४६ ११९ २४२ मोहक्षयाज्ञा १० २२५/ २७७ व्रतशीलेषु पञ्च. १९ ४७ ४ ९ १ ६ ७ ९ mror १ २३३ माया तैर्यग्योनस्य ६ WR ९ ९ १ । ४७ . ४ ७ २२ ९ ४ १९१ ११६ ५ २४ १८९ २३ ४९ ९ २२२ mo" m" ؟ २० १५० १ २७ ur ३ २ ३० ४३ १० ४ ९ २ ४१ २ १२ ३१ २ २५ ૨૪ २ ४० ४६ ११६ ११७ ११३ २१० १२५ ४ २७ ९ १८ २० ९ १० २०८ शा ३१२ सम्यग्योगनिग्रहो गुप्तिः २७८ शङ्काकांना. १८ १६५, ३१३ सप्त सनत्कुमारे २७९ शब्दवन्यसौम्य. १२९ ३१४ स यथा नाम २८० शरीरवाद्यनः० १९ १२५, ३१५ संयम श्रुत. ३८१ मुझे चाये २९ २१९/ ३१६ सरागसंयम० २८२ शुभं विशुद्धमव्याघातिक २ ४९ ५५/३१७ सर्वद्रव्ययर्यायेषु २८३ शुभः पुण्यस्य १६९ ३१८ सर्वस्य २८४ शेषा. स्पर्शरूप० ९३ ३१९ संसारिणो मुक्ताश्च २८५ शेयाणा समूर्छनम् २.३६ ५० ३२० संसारिणस्त्रसस्थावराः २८६ पाणां पादोने ११५, ३२१ संज्ञिनः समनस्काः २८७ शेषाणानन्तर्नुहृतम् २१ १८८ ३२२ सागरोपमे २८८ श्रुत मतिपूर्व० १ २० १८ ३२३ सागरोपमे २८९ श्रुतमनिन्द्रियस्य २२ ४५ ३२४ सारखता. सा ३२५ सामायिकच्छेदोप- २९०स आत्रवः २ १४२ ३२६ सुखदुःख० २९१ स कयायवाजीव. २ १७४ ३२७ सूक्ष्मसम्पराय० २९२ सपाया. १४३ ३२८ सोऽनन्तसमयः २९: सल्लियासुरो० ५ ७१३२९ सौधर्मादिषु यथाक्रमम् २९४ स गुप्तिसमिति० १९१ २९५ नंचातभेदेभ्य उत्पद्यन्ते ३३० सौधर्मशानः ५ २६ ०९६ महयेयासङ्घधेयाश्च० १३१, ३३१ तेनप्रयोग० २९७ चिननिक्षेपपिधान० १२३ | ३३२ स्थितिः ३१ १७१ २९८ सचित्तगीतसवृत्ता.. ३३३ स्थितिप्रभाव० ४९ २९९ सचित्तसंवद्ध ३३४ त्रिग्धरूसलाद्वन्धः १७१ १०. सत्लहवा. ३३५ स्पर्शनरसनघ्राण. ३०१ सदसतोरविशंपाय. १३ ३३६ स्पर्शरसगन्ध० ३३ ३०२ मटम्टेये ३० ३३७ स्पर्शरस० ९ १७ ३०३ न द्विविधो ह। ३०८ ना० ३३८ हिंसादिष्विहामुत्र. .. मप्ततिर्मोदनीयस्य १९० १८७३३९ हिंसानृतत्वेचविषयः मबन्धः १०. नमुनगर्भारपाता जन्न ३ ३४० हिंसानृतत्तेचा० १७४ २ ३०८ ममनकामनस्काः २ 2...अन्यन्यचारित्र ४१३४१ ज्ञानदर्शनदान० ३. पन्न ३० ३४२ ज्ञानावरणे प्रजाज्ञाने माटियापक. ६/३४३ ज्ञानदर्शनचरित्रोपचाराः २२१ ३४४ ज्ञानाज्ञानदर्शन. ५ ९ १४० २ G SW.in २० ११५ १२६ १६७ ११५ १० २२ २९ २ २२ १०७ ૧ રૂ૭ १ २ ४४ १ ५ १२९ २ २१ ४४ २ ९ ४० ४ ९ १५४ २१८ १५३ १ ४९ २ २ १ ९ २०९ १७ १३ २३ ९ २१४ २ ५

ॐ
रायचन्द्रजैनशास्त्रमाला
श्रीमत्-उमास्वातिविरचितं
सभाष्यतत्त्वार्थाधिगमसूत्रम् ।
हिंदीभाषानुवादसहितम्.
सम्बन्धकारिकाः
सम्यग्दर्शनशुद्धं यो ज्ञानं विरतिमेव चामोति ।
दुःखनिमित्तमपीदं तेन मुलब्धं भवति जन्म ॥१॥
जन्मनि कर्मक्लेशैरनुबद्धेऽस्मिंस्तथा प्रयतितव्यम् ।
कर्मक्लेशाभावो यथा भवत्येष परमार्थः ॥२॥
परमार्थालामे वा दोषेष्वारम्भकखभावेषु ।
कुशलानुवन्धमेव स्यादनवयं यथा कर्म ॥३॥
कर्माहितमिह चामुत्र चाधमतमो नरः समारभते ।
इह फलमेव बघमो विमध्यमस्तूभयफलार्थम् ।। ४ ।।
परलोकहितायैव प्रवर्तते मध्यमः क्रियासु सदा ।
मोक्षायैव तु घटते विशिष्टमतिरुत्तमः पुरुषः ॥५॥
यस्तु कृतार्थोऽप्युत्तममवाप्य धर्म परेभ्य उपदिशति ।
नित्यं स उत्तमेभ्योऽप्युत्तम इति पूज्यतम एव ॥ ६ ॥
तस्मादर्हति पूजामहनेवोत्तमोत्तमो लोके ।
देवर्षिनरेन्द्रेभ्यः पूज्येभ्योऽप्यन्यसत्त्वानाम् ॥ ७ ॥
अभ्यर्चनादर्हतां मनामसादस्ततः समाधिश्च ।
तस्मादपि निम्श्रेयसमतो हि तत्पूजनं न्याय्यम् ॥ ८॥

रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् तीर्थमवर्तनफलं यस्मोक्तं कर्म तीर्थकरनाम । तस्योदयात्कृतार्थोऽप्यहस्तीर्थ प्रवर्तयति ।। ९ ।। तत्स्वाभाव्यादेव प्रकाशयति भास्करो यथा लोकम् । तीर्थप्रवर्तनाय प्रवर्तते तीर्थकर एवम् ॥ १० ॥ यः शुभकर्मासेवनभावितभावो भवेष्वनेकेषु । जज्ञे ज्ञातेक्ष्वाकुपु सिद्धार्थनरेन्द्रकुलदीपः॥ ११ ॥ ज्ञानैः पूर्वाधिगतैरपतिपतितैर्मतिश्रुतावधिभिः । त्रिभिरपि शुदैर्युक्तः शैत्ययुतिकान्तिभिरिवेन्दुः ॥ १२ ॥ शुभसारसत्त्वसंहननवीर्यमाहात्म्यरूपगुणयुक्तः। जगति महावीर इति त्रिदशैर्गुणतः कृताभिख्यः॥ १३॥ खयमेव बुद्धतत्वः सत्वहिताभ्युद्यताचलितसत्वः । अभिनन्दितशुभसत्वः सेन्द्रैलॊकान्तिकैर्देवैः ॥ १४ ॥ जन्मजरामरणाः जगदशरणमभिसमीक्ष्य निःसारम् । स्फीतमपहाय राज्यं शमाय धीमान्मववाज ॥१५॥ प्रतिपद्याशुभशमनं निःश्रेयससाधकं श्रमणलिङ्गम् । कृतसामायिककर्मा व्रतानि विधिवत्समारोप्य ॥ १६ ॥ सम्यक्त्वज्ञानचारित्रसंवरतपःसमाधिबलयुक्तः । मोहादीनि निहत्याशुभानि चत्वारि कर्माणि ॥ १७॥ केवलमधिगम्य विभुः स्वयमेव ज्ञानदर्शनमनन्तम् । लोकहिताय कृत्तार्थोऽपि देशयामास तीर्थमिदम् ॥१८॥ द्विविधमनेकद्वादशविधं महाविषयममितगमयुक्तम् । संसारार्णवपारगमनाय दुःखक्षयायालम् ॥ १९ ॥ ग्रन्थार्थवचनपटुभिः प्रयत्नवद्भिरपि वादिभिनिपुणैः। अनभिभवनीयमन्यैर्भास्कर इव सर्वतेजोभिः ॥२०॥ कृत्वा त्रिकरणशुद्धं तस्मै परमर्षये नमस्कारम् । पूज्यतमाय भगवते वीराय विलीनमोहाय ।। २१ ॥ तत्वार्थाधिगमाख्यं वहथै संग्रहं लघुग्रन्थम् । वक्ष्यामि शिष्यहितमिममहद्वचनैकदेशस्य ॥ २२ ॥ महतोऽतिमहाविपयस्य दुर्गमग्रन्थभाष्यपारस्य । का शक्तः प्रत्यासं जिनवचनमहोदधेः कर्तुम् ।। २३ ॥

mr - सभाष्यतत्त्वार्थाधिगमसूत्रम् । शिरसा गिरि बिभित्सेदुचिक्षिप्सेच्च स क्षितिं दोाम् । प्रतितीर्षेच समुद्र मित्सेच्च पुनः कुशाग्रेण ॥२४॥ व्योम्नीन्, चिक्रमिषेन्मेरुगिरि पाणिना चिकम्पयिषेत् । गत्यानिलं जिगीषेच्चरमसमुद्र पिपासेच्च ॥ २५॥ खद्योतकप्रभाभिः सोऽभिबुभूषेच भास्करं मोहात् । योऽतिमहाग्रन्थार्थ जिनवचनं संजिघृक्षेत ॥ २६ ॥ एकमपि तु जिनवचनाद्यस्मानिर्वाहक पदं भवति । श्रूयन्ते चानन्ताः सामायिकमात्रपदसिद्धाः॥ २७ ॥ तस्मात्तत्प्रामाण्यात् समासतो व्यासतश्च जिनवचनम् । श्रेय इति निर्विचारं ग्राह्य धार्य च वाच्यं च ॥ २८ ॥ न भवति धर्मः श्रोतुः सर्वस्यैकान्ततो हितश्रवणात् । ब्रुवतोऽनुग्रहबुद्ध्या वक्तुस्त्वेकान्ततो भवति ॥ २९ ॥ श्रममविचिन्त्यात्मगतं तस्माच्छ्रेयः सदोपदेष्टव्यम् । आत्मानं च परं च हि हितोपदेष्टानुगृह्णाति ॥ ३०॥ नर्ते च मोक्षमार्गाद्धितोपदेशोऽस्ति जगति कृत्स्नेऽस्मिन् । तस्मात्परमिममेवेति मोक्षमार्ग प्रवक्ष्यामि ॥ ३१ ॥ ॥ इति सम्वन्धकारिकाः समाप्ताः ॥ जो मनुष्य सम्यग्दर्शनसे शुद्ध ज्ञान तथा ( उसकेद्वारा इस संसारसे) विरतिको प्राप्त करता है, (संसारमें) अनेक दुःखोंका कारण होनेपरभी यह जन्म, उस मनुष्यको उत्तम लाभदायक है. ॥१॥ अनेक प्रकारके कर्मोंसे उत्पन्न हुवे क्लेशोंसे निरन्तर संबद्ध इस जन्ममें ऐसा प्रयत्न करना चाहिये कि, जिस्से कर्मजनित क्लेशरहित मोक्षरूप परमार्थ सिद्ध हो. ॥२॥ यदि मोक्षरूप परमार्थका लाभ न हो, तथा जन्मके आरम्भकारी कषायरूप दोषोंकी अस्तितामें, ऐसा प्रयत्न करना चाहिये कि, जिस्से कुशल अर्थात् शुभप्रयोजनसहित, और निन्दारहित ही कर्म हो. ॥ ३॥ अत्यन्त अधम मनुष्य, इस लोक तथा परलोकमें दुःखदायक कर्मोंका ही आरंभ करता है, अधम मनुष्य, इस लोकमें केवल फलदायक कर्मोंका आरम्भ करता है, और विमध्यम श्रेणीका मनुष्य, उभय लोकमें फलदायक कर्मोंको करता है; और मध्यमजन परलोकमे हितकारी क्रिया- ओंमें सदा प्रवृत्त रहता है. परन्तु विशिष्टवुद्धि उत्तम मनुष्य तो केवल मोक्षकेही लिये निरन्तर प्रयत्न करता है. ॥ ४५ ॥ और जो मनुष्य, उत्तम धर्मको प्राप्त करके स्वयं कृतार्थ हो गया है, और अन्य मनुष्योंको धर्मका उपदेश देता है, वह निरंतर उत्तम जनोंसे भी अति उत्तम तथा सबका पूजनीय है ॥ ६ ॥ इस हेतुसे उत्तमोत्तम जो अर्हन् रायचन्द्रजनशास्त्रमालायाम् भगवान् हैं वेही लोकमें अन्य प्राणियोंके पूज्यदेवर्पिनरेन्द्रोसेभी पूजाके योग्य हैं. ॥ ७ ॥ अहंन् भगवान्की पूजासे मनकी प्रसन्नता प्राप्त होती है, और मनके प्रसाद अर्थात् प्रसन्नतासे समाधि प्राप्त होती है, तथा समाधिरूप योगसे निःश्रयस मोक्ष प्राप्त होता है। इस कारणसे अर्हन् भगवान्की पूजाही इस लोकमें उत्तम वस्तु है. (क्योंकि उसीके द्वारा मोलपदकाभी लाभ होता है) ॥ ८॥ तीर्थप्रवर्तनरूप (संसारसे उद्धार करनेवाले) फलदायक जो तीर्थकरनाम कर्म शास्त्रमें कहा गया है उसीके उदयसे यद्यपि तीर्थंकर अर्हन् भगवान् कृतार्थ है, तथापि तीर्थकी प्रवृत्ति अर्थात् संसारसागरसे पार उतारनेवाले. धर्मका उपदेश करतेही है. ॥ ९ ॥ उसी तीर्थकरनामकर्मसे, जिस रीतिसे सूर्य लोकमें प्रकाश करता है उसी रीतिसे तीर्थके प्रवर्तनके अर्थ तीर्थकर लोकमें प्रवृत्त होते हैं. ॥ १० ॥ जो कि अनेक जन्मों में शुभ कर्मोके निरन्तर सेवनसे भावित अर्थात् पूजित भाव, सिद्धार्थ नरेन्द्रोंके कुलमे प्रदीपके समान समुज्वल ज्ञातसंज्ञक इक्ष्वाकुवंशके क्षत्रियोंमें, जन्म लिया. ॥ ११ ॥ तथा अति शुद्ध, और अप्रतिपाती पूर्व जन्मोंमे प्राप्त, मति, श्रुत, तथा अवधि, इन तीन ज्ञानोंसे युक्त होकर ऐसे शोमित हुये जैसे शैत्यद्युति (उप्णतारहित प्रकाश) तथ कान्तिगुणोंसे युक्त होनेसें चन्द्रमा ॥ १२ ॥ तथा शुभ, सार, सत्व, संहनन (शरीर रचनाविशेष) वीर्य्य, और माहात्म्यरूप गुणोंसे युक्त, तथा त्रिदश (अर्थात् शास्त्रोर तीस ) गुणोंसहित जगत्में महावीरस्वामी इस नामसे प्रसिद्ध (इक्ष्वाकुवंशमे उत्पन्न हुये. ।। १३ ।। स्वयमेव सप्त तत्वोंके ज्ञाता, निराकुलताके कारणोंसे जिनका अचल सर अभ्युदयको प्राप्त था, और इन्द्रसहित लोकान्तिक देव जिनके शुभ सत्लकी प्रशंसा किर करते थे ऐसे वे महावीरस्वामी थे. ॥ १४ ॥ तथा जन्म, वृद्धावस्था और मरण पीडित इस असार संसारको अशरण देखके अपने उत्तम विशाल राज्यको त्यागकर बुद्धिमान् महावीरस्वामी शान्तिके लिये वनमें चले गये. ॥ १५ ॥ और अशुभ कर्मोका दमन करनेवाला तथा मोक्षका साधक श्रमणों (जैनमतके मुनियों) के लिङ्ग (चिन्ह) धारण करके, सामायिक कर्मोको करतेहुये विधिपूर्वक सब व्रतोंको करके, ॥ १६ ॥ सम्यग्ज्ञान, चारित्र, संवर, तप, समाधि, और बल इनसे तो युक्त और मान, मोह, लोभ तथा माया इन चार अशुभ कर्मोंका सर्वथा घात करके, ॥ १७॥ पश्चात् स्वयमेव वे प्रभु अनन्त, ज्ञान और दर्शन आदिकी प्राप्तिसे कृतार्थ होनेपरभी इस तीर्थ (जैनधर्म) का उपदेश किया. ॥ १८ ॥ प्रथम प्रमाणनयके अनुसार दो प्रकार, पुनः अनेक प्रकार, वा द्वादशमेदसहित तप आदि धर्म, जो कि - , , ५ यह अर्थ "सत्वहिताऽभ्युद्यताचलितसवः' इस पदका कियागया है परन्तु हमारी समझमें इस पदका "डतोके हितकवास्ते अभ्युद्यत और अविचलित सत्त्वको धारण करनेवाले" ऐसा अर्थ प्रतीत होता है. मंशोधन , सभाष्यतत्त्वार्थाधिगमसूत्रम् । महान् विषयोंसे युक्त, और अमित आगमोंके प्रमाणोंसे युक्त, तथा संसारसमुद्रसे पार उतारने और संपूर्ण दुःखोंके नाशके लिये समर्थ धर्म है उसका उपदेश दिया. ॥ १९ ॥ तथा यह धर्म अनेक ग्रंथोंके अर्थनिरूपणमे प्रवीण, और अति प्रयत्न- शाली निपुण वादियोंसेभी वैसे अखण्डनीय है जैसे अन्य सब तेजोंसे सूर्य ॥२०॥ ऐसे पूर्वोक्त धर्मके प्रवर्तक परमऋषिवरूप मोहादिरहित, तथा सर्वपूज्य वीरभगवान् महावीरस्वामीको मैं ग्रंथकर्ता त्रिकरण (मन वचन तथा काया) की शुद्धिपूर्वक नमस्कार करके, ॥ २१ ॥ अधिक अर्थसे पूर्ण, और अल्पशब्दयुक्त इस तत्त्वार्थाधिगम नामक लघु ग्रंथको जो कि अर्हत् भगवान्के वचनोंकाही एक देश है, शिष्यजनोंके हितार्थ वर्णन करूंगा. ॥ २२ ॥ और महान् तथा महाविषयोंसे पूर्ण, और अपार, जिन भगवान्के वचनरूपी महासमुद्रका प्रत्यास (संग्रह) करनेको दुर्गमग्रंथभाषीभी कौन समर्थ होसक्ता है? ॥ २३ ॥ जो मनुष्य अति विशाल गम्भीरार्थोंसे पूर्ण जिनवचनरूपी महासमुद्रका संपूर्णरूपसे संग्रह करनेकी इच्छा करता है वह मानो शिरसे पर्वतको तोडना चाहता है, पृथिवीको दोनों भुजाओंसे फेकना चाहता है, भुजाओंसे समुद्रको पार करना चाहता है, और उसी समुद्रका कुशाके अग्रभागसे थाह (पत्ता) लेना चाहता है, आकाशमें उछलके चन्द्रमाको लंघन करना चाहता है, मेरुपर्वतको हाथसे कंपाना चाहता है, गतिमें वायुसेभी आगे जाना चाहता है, अन्तिम महासागरको पान करना चाहता है, और निजमूर्खताके कारण वह खद्योत (जुगन् वा आगियाकीडा) की दीप्तिसे सूर्यके तेजकोभी अभिभूत (पराजित) करना चाहता है. ॥ २४।२५।२६ ॥ जिनभगवान्के उपदेशवचनका एकभी पद अभ्यास करनेसे उत्तरोत्तर ज्ञानप्राप्ति- द्वारा संसारसागरसे पार उतार देता है, क्योंकि केवल सामायिक मात्र पदसे अनंत सिद्ध होगये, ऐसा श्रवण करनेमे आता है. ॥ २७ ॥ इस हेतु, शास्त्रप्रमाणसे जिन भगवान्का वचन संक्षेपसे तथा विस्तारसे अभ्यस्त होनेसे कल्याण (मोक्ष) दायक है; इस कारण सन्देहरहित होकर जिनवाणीको ग्रहण करना चाहिये, उसके अनुसार धारण करना चाहिये, और दूसरोंको सुनानाभी चाहिये ॥ २८ ॥ हितवाक्यके श्रवणसे संपूर्ण श्रोताओंको सर्वथा धर्मसिद्धि नहीं होती, परन्तु अनुग्रहबुद्धिसे वक्ताको धर्मसिद्धि अवश्य होती है ॥ २९ ॥ इसकारण अपने श्रमका विचार न करके सदा मोक्षमार्गका उपदेश करना चाहिये, क्योंकि हितपदार्थोंका उपदेशदाता अपने तथा जिसको उपदेश देता है, दोनोंके ऊपर मानो अनुग्रह करता है ॥ ३० ॥ इस संपूर्ण संसारमें मोक्षमार्गके सिवाय अन्य कोई हितोपदेश नहीं है, इस हेतुसे सर्व श्रेष्ठ इसी मोक्षमार्गकाही कथन मै करूंगा ॥ ३१ ॥ इति मोक्षमार्गप्रतिपादक तत्त्राधि- गमसूत्रसम्बन्धप्रकाशकैकत्रिंशत्कारिकाः समाप्ताः ॥

रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् ar प्रथम अध्यायः॥ 1 मूलसूत्रम्-सम्यग्दर्शनज्ञानचारित्राणि मोक्षमार्गः॥१॥ सूत्रार्थः-सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान, तथा सम्यक्चारित्र ये तीनों मिलकर मोनमार्ग है।१।। भाष्यम्-सम्यग्दर्शनं सम्यग्ज्ञानं सम्यक्चारित्रमित्येप त्रिविधो मोक्षमार्गः।तपुरलालक्ष- णतो विधानतश्च विस्तरेणोपदेक्ष्यामः । शास्त्रानुपूर्वीविन्यासार्थ तूहेशमात्रमिदमुच्यते । एतानि च समस्तानि मोक्षसाधनानि । एकतराभावेऽप्यसाधनानीत्यतस्त्रयाणां ग्रहणम् । एयां च पूर्वलाभे भजनीयमुत्तरं । उत्तरलाभे तु नियतः पूर्वलाभः । तत्र सम्यगिति प्रशंसार्थो निपातः समश्चतेर्वा । भावः । दर्शनमिति । शेरव्यभिचारिणी सर्वेन्द्रियानिन्द्रियार्थप्राप्तिरेतत्सम्य- ग्दर्शनं । प्रशस्तं दर्शनं सम्यग्दर्शनं । संगतं वा दर्शनं सम्यग्दर्शनम् । एवं ज्ञानचा. रित्रयोरपि ॥ विशेष व्याख्या:-सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान, और सम्यक्चारित्र (आचरण) यह तीन प्रकारका मोक्षमार्ग है । उस त्रिविध मोक्षमार्गको हम लक्षण तथा परीक्षा भेदनिरूपणपूर्वक आगे विस्तारसे कहेगे; और यहांपर केवल शास्त्रानुपूर्वी (क्रम) की रचनाके प्रदर्शनार्थ केवल उद्देश मात्र कहते हैं । ये तीनों मिलेहुये, अर्थात् सभ्य- ग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान, तथा सम्यक्चारित्र तीनों मिलकर ही मोक्षमार्गके साधक हैं, क्योंकि तीनोंमेंसे एकके भी न होनेपर एक वा दो मोक्षके साधन नहीं हो सकते, इसलिये भगवान् सूत्रकारने तीनोंका ग्रहण किया है । इनमेसे पूर्वका लाभ होनेसे उत्तरको प्राप्त करना चाहिये; (अर्थात् सम्यग्दर्शनका लाभ होनेसे उत्तर सम्यग्ज्ञान, तथा सम्यक् चारित्रको निजप्रयत्नसे प्राप्त करना चाहिये,) और उत्तरके लाभमें तो पूर्वका लाभ अवश्यही नियत है, (तात्पर्य यह कि सम्यग्ज्ञानका लाभ होनेसे सन्यद्ग- र्शनका लाभ अवश्य नियत है, तथा सम्यक्चारित्रके लाभसे दर्शन, ज्ञान दोनोंका लाभ नियत है)। सूत्रमें दर्शन आदिका विशेषण जो सम्यक् पद दिया है वह प्रशंसा अर्थका द्योतक वा वाचक निपात है, (अर्थात् प्रशंसित उत्तम दर्शन आदि मोक्ष मार्गके साधन है)। अथवा सम् उपसर्गपूर्वक अन्न धातुसे किप्प्रत्यय करनेसे सम्यक् बनता है. (व्यभिचारशून्य) अर्थात् अवश्य संपूर्ण इन्द्रिय तथा अनिन्द्रिय के द्वारा जो पदायाँकी प्राप्ति है उसको सम्यग्दर्शन कहते है; यह दर्शन पद दृश धातुसे ल्युट (अन) प्रत्यय करनेसे सिद्ध होता है. । प्रशस्त अर्थात् उत्तम (निन्दाव्यभिचार आदिसे शुन्य) १. पदायाँक वेवल नाम मात्रके निरूपणको उद्देश कहते हैं~-अनुवादकार:. २.युन्नतिपक्षनेनी सम्यक्पद प्रशंसारूप अर्थका प्रतिपादक होकर दर्शनआदि पदोंका विशेषण होता १ टिये प्रचारान्तर कहते हैं । अर्थात् जो पूर्णरूपसे द्रव्यभावोंका प्राप्त हो वह सम्यग्दर्शन आदि । अनु० ७ सभाष्यतत्त्वार्थाधिगमसूत्रम् । जो दर्शन है उसको सम्यग्दर्शन कहते है. । अथवा संगतं (निरन्तर व्यवधानशून्य) 'जो दर्शन है उसको सम्यग्दर्शन कहते है.। इसी प्रकार ज्ञान तथा चारित्रमेंभी सम्यक् पदकी योजना करनी चाहिये. ॥ तत्त्वार्थश्रद्धानं सम्यग्दर्शनम् ॥ २॥ सूत्रार्थः-तत्वार्थका जो श्रद्धान है वह सम्यग्दर्शन है । भाष्यम्-तत्त्वानामर्थानां श्रद्धानं तत्त्वेन वार्थानां श्रद्धानं तत्त्वार्थश्रद्धानम् तत् सम्यग्दर्श- नम् । तत्त्वेन भावतो निश्चितमित्यर्थः । तत्त्वानि जीवादीनि वक्ष्यन्ते । त एव चार्थास्तेषां श्रद्धानं तेषु प्रत्ययावधारणम् । तदेवं प्रशमसंवेगनिर्वेदानुकम्पास्तिक्याभिव्यक्तिलक्षणं तत्त्वार्थ- श्रद्धानं सम्यग्दर्शनमिति ।। विशेष व्याख्या:-(जिनशास्त्रोंसे प्रतिपाद्य) तत्त्वभूत पदार्थोंका श्रद्धान, अथवा तत्त्वसे जो अर्थोंका श्रद्धान है उसको तत्त्वार्थश्रद्धान कहते है, और उसी तत्वार्थश्रद्धानको सम्यग्दर्शन कहते हैं, तत्त्वसे अर्थात् भाव (यथार्थरूप) से निश्चियको सम्यग्दर्शन कहते है; (तात्पर्य यह है कि, जो पदार्थ जैसा है उसीरूपसे उसका जो निश्चय है उसको सम्यग्दर्शन कहते है)जीव आदि पदार्थ तत्त्व कहेजाते है जिनको हम आगे निरूपण करेंगे। वेही तत्त्वभूत जीवादि जो पदार्थ है, उनका श्रद्धान अर्थात् उनके यथार्थ स्वरूपमें विश्वास करनाही सम्यग्दर्शन है। इस प्रकार प्रशम, अर्थात् रागादिकोंकी उत्कटताका अभाव, संवेग, अर्थात् संसार देह भोग इनका भय, निर्वेद, अर्थात् संसारके पदार्थों में घृणापूर्वक वैराग्य, अनुकम्पा (सर्वभूतदया) और शास्त्रबोधित पदार्थआदिमें अस्तित्वकी अभिव्यक्ति (आविर्भाव) रूप जो तत्त्वार्थश्रद्धान है वही सम्यग्दर्शन है. ॥ २ ॥ तन्निसर्गादधिगमावा ॥३॥ सूत्रार्थ-वह सम्यग्दर्शन निसर्ग तथा अधिगमसे होता है । भाष्यम्-तदेतत्सम्यग्दर्शनं द्विविधं भवति । निसर्गसम्यग्दर्शनमधिगमसम्यग्दर्शनं च । निसर्गादधिगमाद्वोत्पद्यत इति द्विहेतुकं द्विविधम् ॥ निसर्गः परिणामः स्वभावः अपरोपदेश इत्यनर्थान्तरम् । ज्ञानदर्शनोपयोगलक्षणो जीव इति वक्ष्यते । तस्यानादौ संसारे परिभ्रमतः कर्मत एव कर्मणः स्वकृतस्य बन्धनिकाचनोदयनिर्जरापेक्षं नारकतिर्यग्योनिमनुष्यामरभव- ग्रहणेषु विविधं पुण्यपापफलमनुभवतो ज्ञानदर्शनोपयोगस्वाभाव्यात् तानि तानि परिणामा- ध्यवसायस्थानान्तराणि गच्छतोऽनादिमिथ्यादृष्टेरपि सतः परिणामविशेषादपूर्वकरणं ताह- ग्भवति येनास्यानुपदेशात्सम्यग्दर्शनमुत्पद्यत इत्येतनिसर्गसम्यग्दर्शनम् ॥ अधिगमः अभि- १. जो पदार्थ जैसें अवस्थित है तैसा तिसका होना सो 'तत्व' है, और जो निश्चय किया जाये वह अर्थ है; तत्त्वरूप जो निश्चय सो 'तत्वार्थ' है; तात्पर्य कि, जो पदार्थ जिसप्रकार अवस्थित है उसका उमी प्रकारसें प्रहण-निश्चय-होना सो "तत्वार्थ' है-संशोधकः ८ रायचन्द्रजनशास्त्रमालायाम् गम आगमो निमित्तं श्रवणं शिक्षा उपदेश इत्यनन्तरम् । तदेवं परोपदेशाद्यत्तत्त्वाधश्रद्धानं भवति तदधिगमसम्यग्दर्शनमिति ।। विशेष व्याख्या:----यह सम्यग्दर्शन दो प्रकारका होता है, एक तो निसर्गजसम्यग्दर्शन, और दुसरा अधिगमजसम्यग्दर्शन, निसर्ग तथा अधिगम दो हेतुओंसे उत्पन्न होने से दो प्रकारका है। निसर्ग, परिणाम, स्वभाव, और दुसरेके उपदेशादिका अभाव, ये सब एकार्थवाचका, अर्थात् पर्यायशब्द हैं. ज्ञान तथा दर्शनरूप जो उपयोग है उस उपयोगले युक्त होना यह जीवका लक्षण है वह आगे कहेंगे. उस जीवके अनादिकाल सिद्ध इस संसारमें कमसेही भ्रमण करते हुये निजकृतकर्महीका; नारक तिर्यग् मनुष्य तथा देव जन्म ग्रहों में बन्ध निकाचन उदय तथा निर्जराकी अपेक्षा रखनेवाले अनेक प्रकारके पुण्य तथा पाप फलोको अनुभव करते हुवे, उस जीवके ज्ञान तथा दर्शनरूप उपयोग स्वभावसे उन २ परिणाम अध्यवसाय तथा अन्य २ स्थानादिको प्राप्त होते हुवे अनादि कालसे मिथ्यादृष्टि होनेपरभी परिणामविशेष (कर्मोंका परिपाकतासे भावविशेष) से अपूर्व करण ऐसा होता है कि जिसके द्वारा विना किसीके उपदेश आदिके खयं किसी समयमें जो सम्यग्दर्शन उत्पन्न होता है वही निसर्गजसम्यग्दर्शन है । और अधिगम, अभिगम, आगम, निमित्त, श्रवण, शिक्षा, तथा उपदेश, ये सब समानार्थ कही हैं, इन अधिगम परोपदेशादिकेद्वारा जो तत्वार्थश्रद्धान उत्पन्न होता है वह अधिगमज सम्यग्दर्शन है॥३॥ अत्राह । तत्वार्थश्रद्धानं सम्यग्दर्शनमित्युक्तम् । तत्र किं तत्त्वमिति । अत्रोच्यते । अब यहांपर कहतेहैं कि, "तत्त्वरूप अर्थोंका जो श्रद्धान है वह सम्यग्दर्शन है" यहांपर तत्व शब्दसे किस २ का ग्रहण है! इस हेतुसे अग्रिम सूत्रका कथन है. !! जीवाजीचास्रवबन्धसंवरनिर्जरामोक्षास्तत्त्वम् ॥ ४ ॥ सूत्रार्थ:-जीव, अजीव, आस्रव, बन्ध, सम्बर, निर्जरा, तथा मोक्ष, ये सात तत्त्व हैं. भाष्यम्-जीवा अजीवा आस्रवा बन्धः संवरो निर्जरा मोक्ष इत्येष सप्तविघोऽर्थतत्त्वम् । गते वा सप्त पदार्थास्तत्त्वानि । तालक्षणतो विधानवश्व पुरस्ताद्विस्तरेणोपदेक्ष्यामः ॥ विशेष व्याख्या । जीव मनुष्यादि अजीव आकाश आदि आत्रव, बन्ध, संबर निर्जरा तथा मोक्ष इन सप्तभेदोसहित जो पदार्थ है वही तत्व है । अथवा ये जीव आदि मात पदार्थ तत्त्व है। उन सात प्रकारके तत्त्वरूप पदार्थोंको आगे लक्षण तथा भेद निरूपणपूर्वक विस्तारसे कहेगे. ॥ ४ ॥ नामस्थापनाद्रव्यभावतस्तच्यासः॥५॥ मृत्रा:-नाम, स्थापना, द्रव्य, तथा भाव इन अनुयोगोंसे जीव आदि सप्त गयोमा न्याम होता है.

९ सभाष्यतत्त्वार्थाधिगमसूत्रम् । एभिर्नामादिभिश्चतुर्भिरनुयोगद्वारैस्तेषां जीवादीनां तत्त्वानां न्यासो भवति । विस्तरेण लक्षणतो विधानतश्चाधिगमार्थ न्यासो निक्षेप इत्यर्थः। तद्यथा । नामजीवः, स्थापनाजीवो, द्रव्यजीवो, भावजीव इति । नाम, संज्ञा, कर्म इत्यनर्थान्तरम् । चेतनावतोऽचेतनस्य वा द्रव्यस्य जीव इति नाम क्रियते स नामजीवः ॥ यः काष्ठपुस्तचित्रकर्माक्षनिक्षेपादिषु स्थाप्यते जीव इति स स्थापनाजीवो देवताप्रतिकृतिवदिन्द्रो, रुद्रः, स्कन्दो, विष्णुरिति ॥ द्रव्यजीव इति गुणपर्यायवियुक्तः प्रज्ञास्थापितोऽनादिपारिणामिकभावयुक्तो जीव उच्यते । अथवा शून्योऽयं भङ्गः। यस्य ह्यजीवस्य सतो भव्यं जीवत्वं स्यात् स द्रव्यजीवः स्यात्। अनिष्टं चैतत् ॥ भावतो जीवा औपशमिकक्षायिकक्षायौपशमिकौदयिकपारिणामिकभावयुक्ता उपयोगलक्षणाः संसा- रिणो मुक्ताश्च द्विविधा वक्ष्यन्ते । एवमजीवादिषु सर्वेष्वनुगन्तव्यम् ॥ विशेष व्याख्या-नाम आदि जो चार अनुयोगद्वार है उनके द्वारा जीवादि तत्त्वोंका न्यास होताहै, अर्थात् विस्तारसे लक्षण तथा विधान ( अर्थात् भेद संख्याआदि) से ज्ञान होनेके लिये जो व्यवहारोपयोग है वही न्यास वा निक्षेप है । (तात्पर्य यह कि नामआदि निक्षेपोंसे न्यस्तजीवादि पदार्थोंका बोध पूर्णरूपसे होता है। जैसे नामजीव, स्थापना- जीव, द्रव्यजीव, और भावजीव । नाम, संज्ञा और कर्म ये पर्यायवाचक अर्थात् समानार्थक हैं । चेतनावान् अथवा अचेतन द्रव्यकी व्यवहारके लिये जो जीव ऐसा नाम वा संज्ञा की जाती है उसको नामजीव कहते है । और काष्ठ, पुस्तक, चित्रकर्म और अक्षनिक्षेप (फांसा आदिके प्रक्षेपने) में जीवरूपसे स्थापना की जाती है उसको स्थापनाजीव कहते है । देवताओंकी प्रतिमाके सदृश यह इन्द्र है, यह रुद्र है, तथा यह विष्णु हैं, इत्यादि रूपसे जो पाषाण वा धातु आदिकी मूर्तियोंमें स्थापना होती है; वही स्थापनाजीव कहा जाता है । गुणपर्यायरहित और अनादि पारिणामिक भावोंसे युक्त और प्रज्ञा (केवल बुद्धि मात्र) से स्थापित किया जाता है वह द्रव्यजीव है । अथवा यह भङ्ग शून्य है। जैसे अजीवरूपसे विद्यमान द्रव्यका भव्यरूपसे जीवत्व हो सकै वह द्रव्यजीव होगा, किन्तु यह अनिष्ट है। और मावसे औपशमिक, क्षायिक, क्षायौपशमिक, औदयिक, तथा पारिणामिक भावोंसे युक्त और उपयोग लक्षणवाले जीव, संसारी तथा मुक्त ऐसे दो प्रकारके आगे कहे जांयगे. इसी रीतिसे अजीव आदि संपूर्ण पदार्थोमे नामादि निक्षेप विधिका अनुसरण करना चाहिये. पर्यायान्तरेणापि नामद्रव्यं, स्थापनाद्रव्य, द्रव्यद्रव्यं, भावतोद्रव्यमिति । यस्य जीवस्या- जीवस्य वा नाम क्रियते द्रव्यमिति तन्नामद्रव्यम् । यत्काप्टपुस्तचित्रकर्माक्षनिक्षेपादिपु स्थाप्यते द्रव्यमिति तत् स्थापनाद्रव्यम् । देवताप्रतिकृतिवदिन्द्रो, रुद्रः, स्कन्दो, विष्णुरिति । द्रव्यद्रव्यं नाम गुणपर्यायवियुक्तं प्रज्ञास्थापितं धर्मादीनामन्यतमन् । केचिदप्याहुर्यव्यतो द्रव्यं भवति तच्च पुद्गलद्रव्यमेवेति प्रत्येतव्यम् । अणवः स्कन्धाश्च सङ्घातभेदेभ्य उत्पद्यन्त इति वक्ष्यामः । भावतो-द्रव्याणि धर्मादीनि सगुणपर्यायाणि प्रामिलक्षणानि वन्यन्ते। आगमतश्च प्राभृतज्ञो द्रव्यमिति भव्यमाह । द्रव्यं च भव्ये । भव्यमिति प्राप्चमाह । भू २ , रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् १० प्राप्तावात्मनेपदी। तदेवं प्राप्यन्ते प्राप्नुवन्ति वा द्रव्याणि ॥ एवं सर्वेषामनादीनामादिमतां च जीवादीनां भावानां मोक्षान्तानां तत्त्वाधिगमार्थ न्यासः कार्य इति ॥ तथा अन्य पर्यायसे योभी कह सकते हैं कि, नामद्रव्य, स्थापनाद्रव्य, द्रव्यद्रव्य, तथा भावसे द्रव्य,। जैसे जीव वा अजीवका द्रव्य ऐसा नाम किया जाता है वह नामद्रव्य है । तथा जो काष्ठ, पुस्तक, चित्रकर्म, तथा अक्षनिक्षेप आदिमें द्रव्यरूपसे स्थापना की जाती है उसको स्थापनाद्रव्य कहते हैं । जैसे देवताओंकी प्रतिमाके तुल्य यह इन्द्रद्रव्य, यह रुद्ररूप तथा यह विष्णुरूप द्रव्य है । और द्रव्यद्रव्य, द्रव्यगुण- पर्सायोंसे रहित केवल प्रज्ञामात्रसे स्थापित धर्म आदिमेंसे किसी एकको जानना चाहिये. और कोई ऐसा भी कहते है कि, जो द्रव्यनिक्षेपसे द्रव्य होता है वह तो पुद्गलद्रव्यही है ऐसा निश्चय करना चाहिये. अणु और स्कन्ध, संघात भेदसे उत्पन्न होते है ऐसा आगे चलके कहेंगे । और भावसे द्रव्य, गुण, तथा पर्यायसहित, तथा प्राप्ति आदि लक्षणसंयुक्त धर्म आदि आगे निरूपण करेंगे । और आगमसेभी "प्राभृतज्ञ (जीव वा अजीव विधीका ज्ञाता) द्रव्य ही है। यह वचन भी भव्यको कहता है, क्योंकि 'द्रव्यं च भव्ये 'भव्य अर्थमें द्रव्य यह निपात होता है। यहांपर भव्य यह शब्द भी प्राप्य अर्थको कहता है, क्योंकि आत्मनेपदमें भूधातु प्राप्तिरूप अर्थमें है । इस प्रकार गुण- पर्थ्याय आदिसे प्राप्त किये जाय अथवा स्वयं गुणादिको प्राप्त हों वे द्रव्य है। इस रीति अनादि वा आदिमान् संपूर्ण जीवआदि मोक्षान्तपदार्थोंके तत्त्वज्ञानार्थ न्यास अवश्य करना चाहिये। प्रमाणनयैरधिगमः॥६॥ मृत्रार्थः-पूर्वकथित जीवादि तत्त्वोंका ज्ञान प्रमाण तथा नयोंके द्वारा होता है । माप्यम्-पांच जीवादीनां तत्त्वानां यथोहिष्टानां नामादिमिय॑स्तानां प्रमाणनयैर्वि- नगधिगमो भवति ।। तत्र प्रमाणं द्विविधम् परोक्षं प्रत्यक्षं च वक्ष्यते । चतुर्विधमित्येके । नयवा- दान्तरण || नयाश्च नेगमादयो वक्ष्यन्ते ।। मिचान्यन । सिंगप व्याख्या यथा क्रमसे संकीर्तित तथा नाम स्थापना आदि निक्षेप विधिसे उपन्यन्न जीयादि मात नत्त्वांका ज्ञान प्रमाण तथा नयोंसे यथार्थ रूपसे होता है । उसमें गर नया प्रत्यक्ष दो प्रकारका प्रमाण कहेंगे । और कोई प्रत्यक्ष, अनुमान, शब्द, नया गाना-पनयवादम चार प्रकारका प्रमाण कहते है। और नैगमसंग्रह आदि नाम को। गान अन्य भी जीवादिक ज्ञानका उपाय है वा नहीं । सो अन्य भी है :: कान:।

सभाष्यतत्त्वार्थाधिगमसूत्रम् । निर्देशस्वामित्वसाधनाधिकरणस्थितिविधानतः ॥७॥ सूत्रार्थ:-निर्देश (वस्तु नाम संकीर्तन) स्वामित्व, साधन, अधिकरण, स्थिति, और विधान (भेदसंख्या) इनके द्वाराभी जीव आदि तत्त्वोंका ज्ञान होता है । भाप्यम्-एभिश्च निर्देशादिभिः पभिरनुयोगद्वारैः सर्वेषां भावानां जीवादीनां तत्त्वानां विकल्पशो विस्तरेणाधिगमो भवति । तद्यथा । निर्देशः । को जीवः । औपशमिकादिभाव- युक्तो द्रव्यं जीवः । विशेष व्याख्या-ये निर्देश आदि षट् अर्थात् छः जो अनुयोगद्वार है उनसे सब भावोंका जीव आदि तत्त्वोंका विकल्प तथा विस्तारसे वोध होता है। जैसे निर्देश-जीव क्या है? उ० औपशमिक तथा क्षायिक आदि जो भाव हैं उनकरके सहित यह द्रव्यही जीव है ।। सम्यग्दर्शनपरीक्षायाम् । किं सम्यग्दर्शनम् । द्रव्यम् । सम्यग्दृष्टिजीवोऽरूपी नो स्कन्धो नो ग्रामः।। स्वामित्वम् । कस्य सम्यग्दर्शनमित्येतदात्मसंयोगेन परसंयोगेनोभयसंयोगेन चेति वा- च्यम् । आत्मसंयोगेनजीवस्य सम्यग्दर्शनम् । परसंयोगेनजीवस्याजीवस्य जीवयोरजीवयोर्जीवा- नामजीवानामिति विकल्पाः। उभयसंयोगेन जीवस्य नोजीवस्य जीवयोरजीवयोर्जीवानामजी- वानामिति विकल्पा न सन्ति । शेपाः सन्ति ।। साधनं । सम्यग्दर्शनं केनभवति । निसर्गादधिग- माद्वा भवतीत्युक्तम् । तत्र निसर्गः पूर्वोक्तः । अधिगमस्तु सम्यग्व्यायामः । उभयमपि तदा- वरणीयस्य कर्मणः क्षयेणोपशमेन क्षयोपशमाभ्यामिति ॥ अधिकरणं त्रिविधमात्मसन्निधा- नेन परसन्निधानेनोभयसन्निधानेनेति वाच्यम् । आत्मसन्निधानमभ्यन्तरसन्निधानमित्यर्थः । परसन्निधानं वाह्यसन्निधानमित्यर्थः । उभयसन्निधानं वाह्याभ्यन्तरसन्निधानमित्यर्थः। कस्मि- न्सम्यग्दर्शनम् । आत्मसन्निधाने तावत् जीवे सम्यग्दर्शनं, जीवे ज्ञानं, जीवे चारित्रमित्ये- तदादि। वाह्यसन्निधाने जीवे सम्यग्दर्शनं नोजीवे सम्यग्दर्शनमिति यथोक्ता विकल्पाः । उभयसन्निधाने चाप्यभूताः सद्भूताश्च यथोक्ता भङ्गविकल्पा इति ॥ स्थितिः । सम्यग्दर्शनं कियन्तं कालम् । सम्यग्दृष्टिर्द्विविधा । सादिः सपर्यवसाना सादिरपर्यवसाना च । सादि सपर्यवसानमेव च सम्यग्दर्शनम् । तज्जघन्येनान्तर्मुहूतै उत्कृष्टेन षट्षष्टिः सागरोपमानि साधिकानि । सम्यग्दृष्टिः सादिरपर्यवसाना । सयोगः शैलेशीप्राप्तश्च केवली सिद्धश्चेति ॥ विधानं । हेतुत्रैविध्यात् क्षयादित्रिविधं सम्यग्दर्शनम् । तदावरणीयस्य कर्मणो दर्शनमोहस्य च क्ष्यादिभ्यः । तद्यथा । क्षयसम्यग्दर्शनं, उपशमसम्यग्दर्शनं, क्षयोपशमसम्यग्दर्शनमिति । अत्र चौपशमिकक्षायौपशमिकक्षायिकाणां परतः परतो विशुद्धिप्रकर्षः ।। कि चान्यत् । तथा सम्यग्दर्शनकी परीक्षामें सम्यग्दर्शन क्या है ? द्रव्य सम्यग्दर्शन है. सम्यग्दृष्टि जीव रूपरहित नो स्कन्ध तथा नो ( ईषत् ) ग्राम है ॥ स्वामित्व सम्यग्दर्शन किसका है वा किसको होता है ? इस हेतुसे कहते है कि यह सम्यग्दर्शन आत्माके संयोगसे ही आत्मासे भिन्न अन्य पुद्गल धर्म आदिके संयोगसे, तथा आत्मा और अनात्मा उभयके संयोगसे होता है, ऐसा कहना चाहिये । आत्माके संयोगसे जीवको सम्यग्दर्शन होता है, वा जीवका सम्यग्दर्शन अर्थात् सम्यग्दर्शनका खामी जीव है । तथा पर (आत्मासे

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रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम्
१२
मिन्न) के संयोगसे जीवको, अजीव (ईषत् जीव) को, दो जीवोंको, दो अजीवोंको, बहुत
जीवोंको, वा बहुत अजीवोंको होता है; इत्यादि विकल्प है । और उभयके संयोगसे,
अर्थात् आत्मा तथा परसंयोगसे जीवको, नो (ईषत् ) जीवको, दो जीवोंको, दो अजीवोंको,
बहुत जीवोंको, बहुत नो जीवोंको इत्यादि विकल्प नहीं है और शेप विकल्प है। साधन
(जिससे होता है ) जैसे सम्यग्दर्शन किससे उत्पन्न होता है। निसर्ग तथा अधिगमसे होता
है, यह प्रथम कहचुके है। उनमेंसे विसर्गतो कहचुके हैं। और अधिगमतो सम्यग् व्या-
याम है, अर्थात् गुरुआदिके समीप रहनेवाले शिष्यकी जो सम्यग्दर्शनके उत्पन्न करने-
वाली शुभ क्रिया है वही व्यायाम है । निसर्गज तथा अधिगमज दोनों प्रकारका
सम्यग्दर्शन सम्यग्दर्शनावरणीय जो कर्म है उसके क्षयसे उपशमसे अथवा क्षयोपशम दोनोंसे
होता है। अधिकरण तीन प्रकारका है, एक आत्माके सन्निधानसे, दूसरा पर अर्थात्
अनात्माके सन्निधान (सामीप्य ) से, और तीसरा आत्मा और अनात्मा एतदुभय
सन्निधानसे ऐसा कहना चाहिये । आत्माका सन्निधान इसका यह तात्पर्य है कि
आत्माके आभ्यन्तरीय सामीप्य वा सान्निध्यसे, । और पर सन्निधानका तात्पर्य्य आत्माके
बाह्य सन्निधानसे है। और उभय सन्निधानका अर्थ बाह्य तथा आभ्यन्तर उभय सन्निधान
है। आत्माके सन्निधानका उदाहरण जैसे जीवमें सम्यग्दर्शन है, जीवमें ज्ञान है, तथा
जीवमें चारित्र है इत्यादि । और बाह्य सन्निधानका उदाहरण जैसे जीवमे सम्यग्दर्शन,
नो (ईषत् ) जीवमें सम्यग्दर्शन, इत्यादि पूर्वोक्त विकल्प हो सकते है। और उभयसन्नि-
धानमे उभयसन्निधानसे अप्राप्य तथा सद्भूत पूर्वोक्त भङ्गविकल्प होते है। स्थिति जीवमें
सम्यग्दर्शन कितने कालतक स्थित रहता है। जीवकी सम्यग्दृष्टि दो प्रकारकी होती है, एक
तो सादिसान्त अर्थात् आदिसहित और अन्तसहित, और दूसरी सादिअनन्त, अर्थात् उत्पन्न
होकर जिस सम्यग्दृष्टिका पुनः अन्त वा नाश नहीं होता । और सम्यग्दर्शन सादि तथा
अन्तसहितही होता है । वह सम्यग्दर्शन न्यूनसे न्यून अन्तर्मुहूर्त पर्य्यन्त होता है,
अर्थात् कमसे कम अन्तर्मुहूर्त पर्यन्त सम्यग्दर्शनकी स्थिति रहती है । और
अधिकसे अधिक अर्थात् उत्कृष्टतासे किचित् अधिक षट्षष्टि छियासठ ६६ सागरो.
पम कालपर्यन्त रहता है । और सम्यग्दृष्टि सादि अनन्त है। जैसे सयोग अर्थात्
त्रिविषयोगसहित, शैलेशी प्राप्त केवली और सिद्ध हैं। विधान क्षय आदि हेतुओंके
विविध होनेसे तीन प्रकारका है। और यह सम्यग्दर्शनका तीन प्रकारका विधान (भेद)
दर्शनावरणीय क्रमके तथा दर्शन मोहके क्षयादि तीनों हेतुओंसे है । जैसे क्षायिक सम्यग्द-
गेन, औपशामिक सम्यग्दर्शन, तथा क्षायौपशमिक सम्यग्दर्शन, इन औपशमिक, क्षायौ-
पगामिक. और क्षायिक, सम्यग्दर्शनोंमेंसे पर पर अर्थात् आगे आगेके में विशुद्धि और
प्रकरना ( अधिक उत्तमता) है ॥ ७ ॥

सभाष्यतत्त्वार्थाधिगमसूत्रम् । १३ प्रथम कहे हुये इन प्रकारोंके अतिरिक्त अन्य प्रकारोंसेभी सम्यग्दर्शनादि तथा जीवादि तत्त्वोंका ज्ञान होता है यह जनानेके लिये आगेका सूत्र कहते है । सत्संख्याक्षेत्रस्पर्शनकालान्तरभावाल्पबहुत्वैश्च ॥८॥ सूत्रार्थ:-सत् , (अस्तितानिर्देश ) संख्या, क्षेत्र, स्पर्शन, काल, अन्तर, भाव, तथा अल्पवहुत्व इनसे जीवादि पदार्थ तथा सम्यग्दर्शनादिका अधिगम अर्थात् ज्ञान विस्तारसे होता है। भाग्यम्-सत्, संख्या, क्षेत्रं, स्पर्शनं, कालः, अन्तरं, भावः, अल्पबहुत्वमित्येतैश्च सद्भूतप- दप्ररूपणादिभिरष्टाभिरनुयोगद्वारैः सर्वभावानां विकल्पशो विस्तराधिगमो भवति । कथमिति चेदुच्यते । सत् सम्यग्दर्शनं किमस्ति नास्तीति । अस्तीत्युच्यते । कास्तीति चेदुच्यते । अजीवेषु तावन्नास्ति । जीवेपु तु भाज्यम् । तद्यथा । गतीन्द्रियकाययोगकषायवेदलेश्यासम्यक्त्वज्ञान- दर्शनचारित्राहारोपयोगेपु त्रयोदशस्वनुयोगद्वारेषु यथासम्भवं सद्भूतप्ररूपणा कर्तव्या ।। संख्या । कियत्सम्यग्दर्शनं कि संख्येयमसंख्येयमनन्तमिति । उच्यते । असंख्येयानि सम्य- ग्दर्शनानि, सम्यग्दृष्टयस्त्वंनन्ताः । क्षेत्रम् । सम्यग्दर्शनं कियति क्षेत्रे । लोकस्यासंख्येय- भागे । स्पर्शनम् । सम्यग्दर्शनेन किं स्पृष्टम् । लोकस्यासंख्येयभागः । सम्यग्दृष्टिना तु सर्वलोक इति ॥ अत्राह सम्यग्दृष्टिसम्यग्दर्शनयोः कः प्रतिविशेष इति । उच्यते । अपाय- सव्यतया सम्यग्दर्शनमपाय आभिनिबोधिकम् । तद्योगात्सम्यग्दर्शनम् । तत्केवलिनो नास्ति । तस्मान्न केवली सम्यग्दर्शनी, सम्यग्दृष्टिस्तु ॥ कालः । सम्यग्दर्शनं कियन्तं काल- मित्यत्रोच्यते । तदेकजीवेन नानाजीवैश्व परीक्ष्यम् । तद्यथा । एकजीवं प्रति जघन्येनान्तर्मु- हूतै उत्कृष्टेन षटषष्टिः सागरोपमानि साधिकानि । नानाजीवान् प्रति सद्धिा । अन्तरम् । सम्यग्दर्शनस्य को विरहकालः । एक जीवं प्रति जघन्येनान्तर्मुहूर्त, उत्कृप्टेन उपापुद्गलपरि- वर्तः । नानाजीवान् प्रति नास्त्यन्तरम् ॥ भावः । सम्यग्दर्शनमौपशमिकादीनां भावानां कतमो भाव उच्यते । औदयिकपारिणामिकवर्ज त्रिषु भावेषु भवति ॥ अल्पबहुत्वम् । अत्राह सम्यग्दर्शनानां त्रिषु भावेषु वर्तमानानां कि तुल्यसंख्यत्वमाहोखिदल्पबहुत्वम- स्तीति । उच्यते । सर्वस्तोकमौपशमिकम् । ततः क्षायिकमसंख्येयगुणम् । ततोऽपि क्षायौपश- मिकमसंख्येयगुणम् । सम्यग्दृष्टयस्त्वनन्तगुणा इति ॥ एवं सर्वभावानां नामादिभिासं कृत्वा प्रमाणादिभिरधिगमः कार्यः ।। उक्तं सम्यग्दर्शनम् । ज्ञानं वक्ष्यामः । विशेष व्याख्या-सत्, संख्या, क्षेत्र, स्पर्शन, काल, अन्तर, भाव, तथा अल्पबहुत्व, ये सदादि पद, अर्थात् विद्यमान अर्थके प्ररूपणाकारक आठ अनुयोगद्वारोंसे सब भाव तथा तत्वोंका विकल्प तथा विस्तारपूर्वक ज्ञान होता है । कैसे होता है ऐसा कहो तो कहते है ।। सत्-सम्यग्दर्शन है वा नही है ? है ऐसा कहते है। यदि यह प्रश्न करो कि कहां है तो कहते है । अजीव पदार्थों में तोसम्यग्दर्शन नहीं है । और जीवोंमें विभाग करना चाहिये अर्थात् गति, इन्द्रिय, काय, योग, कषाय, वेद, लेश्या, सम्यक्त्व, ज्ञान, दर्शन, चारित्र, तथा आहार, योग, इन अनुयोगों (मार्गणा स्थानों) से यथासंभव सत् आदि प्ररूपणा करनी रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् १४ चाहिये । जैसे मनुष्य आदि चारों गतियोंमें स्त्री पुरुप दोनोंमें शास्त्रोक्त रीतिसे यथा- संभव सम्यग्दर्शन होता है। ऐसेही इन्द्रिय. काय, योगादिसहित जीवोंमें भी आगमके अनुसार सत् आदि प्ररूपणा करनी चाहिये । संख्या-सम्यग्दर्शन कितना है ? क्या संख्येय है. वा असंख्येय है अथवा अनन्त है ? इसका उत्तर कहते है. कि सम्य- ग्दर्शन असंख्येय है । और सम्यग्दृष्टि अनन्त है । क्षेत्र अर्थात् सम्यग्दर्शन कितने क्षेत्रमें है? २०-लोकके असंख्येयभागमें सम्यग्दर्शन है। स्पर्शन-सम्यग्दर्शननें क्या स्पर्श किया है ? उत्तर-लोकका असंख्येयभाग सम्यग्दर्शनसे स्पृष्ट है; अर्थात् लोकके असंख्येय- भागको सम्यग्दर्शनने स्पर्श किया है; और सम्यग्दृष्टिने तो संपूर्ण लोकको स्पर्श किया है। यहां प्रश्न करते हैं कि सम्यग्दृष्टि तथा सम्यग्दर्शनमे क्या भेद है ? उत्तर कहते है- अपाय और सद्रव्यरूपसे सम्यग्दर्शन अपाय चा आभिनिबोधिक है। अर्थात् सम्यग्दर्शनका कदाचित् अपाय (नाश ) होता है और कदाचित् स्फुरण होता है, उस अपायके योगसे सम्यग्दर्शन है वह केवलीको नहीं होता, अतः केवली सम्यग्दर्शनी नहीं है. और सम्यग्दृष्टि तो है । काले निरूपणा-सम्यग्दर्शन कितने कालतक रहता है ? इसका उत्तर कहते हैं । वह कालकी स्थिति एक जीव तथा नाना जीवोंसे परीक्षा करने योग्य है । जैसे जघन्यतासे अर्थात् न्यूनसे भी न्यून एक जीवके प्रति अन्त- मुहर्त पर्यन्त सम्यग्दर्शनकी स्थिति है । और उत्कृष्टतासे अर्थात् अधिकसे अधिक कुछ अधिक छियासठि (६६) सागरोपम इसकी स्थिति है । और नाना जीवोंके प्रति सं- पूर्ण कालमें सम्यग्दर्शनकी स्थिति है, अर्थात् नाना जीवों से किसीनकिसी जीवमें सदाकालमें सम्यग्दर्शन बना ही रहता है । अन्तरकी प्ररूपणा-सम्यग्दर्शनका अन्तर अर्थात् विरहकाल क्या है ? उत्तर-एक जीवके प्रति जघन्यतासे तो अन्तर्मुहूर्त है, और उत्कृष्टतासे उपार्द्धपरिवर्तन काल तक है । और नाना जीवोंके प्रति अन्तर अर्थात् विरह काल है ही नहीं; क्योंकि नाना जीवोमेसे किसीनकिसी जीवमें सदा सम्यग्दर्शन बना रहेगा। भाव प्ररूपणा-औपशमिक आदि भावोंमेंसे सम्यग्दर्शन कौनसा भाव है ? उत्तर- औदयिक तथा पारिणामिक भावोंको छोड शेष तीन भावोंमे अर्थात् औपशमिक, बायोपशमिक, और क्षायिकभावमे सम्यग्दर्शन होता है । अल्प बहुत्व प्ररूपणा औपश- मिक आदि तीन भावोंमे वर्तमान सम्यग्दर्शनोंकी तुल्य संख्या है अथवा अल्पबहुत्व अर्थात् न्यूनाधिक है ? उत्तर कहते है । सबसे न्यून औपशमिकभाव है । और उससे असंख्येयगुण क्षायिकभाव है। और उससे मी धायौपशमिक भाव असंख्येयगुण है। और मन्यग्दृष्टि तो अनन्तगुण है । इसप्रकार सव भावोंका नाम स्थापना आदिसे न्यास करके प्रमाण आदि द्वारा उनका वोध सम्पादन करना चाहिये ।। मन्यदर्शनका लक्षण आदि कचुके । अब आगे ज्ञानके विषयमे कहेगे।

सभाप्यतत्त्वार्थाधिगमसूत्रम् । १५ मतिश्रुतावधिमनःपर्यायकेवलानि ज्ञानम् ॥९॥ सूत्रार्थ:-मति, श्रुत, अवधि, मनःपर्य्यय, केवल ये पांच ज्ञानके भेद हैं भाष्यम्-मतिज्ञानं, श्रुतज्ञानं, अवधिज्ञानं, मनःपर्यायज्ञानं, केवलज्ञानमित्येतन्मूलवि- धानतः पञ्चविधं ज्ञानम् । प्रभेदास्त्वस्य पुरस्ताद्वक्ष्यन्ते ।। विशेष व्याख्या-मतिज्ञान, श्रुतज्ञान, अवधिज्ञान, मनःपर्ययज्ञान, और केवलज्ञान, मूलभेदसे यह पांच प्रकारका ज्ञान है। इनके भेद प्रभेद आगे वर्णन करेगे ॥ ९ ॥ तत्प्रमाणे ॥१०॥ सूत्रार्थ:-पूर्वोक्त पंचविधज्ञान दो प्रमाणों में विभक्त है । भाष्यम् तदेतत्पञ्चविधमपि ज्ञानं वे प्रमाणे भवतः परोक्षं प्रत्यक्षं च ।। विशेष व्याख्या-यह अनन्तर कथित मति, श्रुत, अवधि, मनःपर्याय, तथा केवल- ज्ञान, दो प्रमाण होते है, अर्थात् पूर्वोक्त पंचविधज्ञान ही प्रमाण है, और यह प्रमाण प- रोक्ष, तथा प्रत्यक्ष भेदसे दो प्रकारका है ॥ १० ॥ आद्ये परोक्षम् ॥११॥ सूत्रार्थ:-प्रथमके दो ज्ञान परोक्षप्रमाण है । भाष्यम्-आदौ भवमाद्यम् । आये सूत्रक्रमप्रामाण्यात् प्रथमद्वितीये शास्ति । तदेवमाये मतिज्ञानश्रुतज्ञाने परोक्षं प्रमाणं भवतः । कुतः । निमित्तापेक्षत्वात् । अपायसद्व्यतया मति- ज्ञानम् । तदिन्द्रियानिन्द्रियनिमित्तमिति वक्ष्यते ॥ तत्पूर्वकत्वात्परोपदेशजत्वाच्च श्रुतज्ञानम् ॥ विशेष व्याख्या--आदि आरंभमे जो हो उसको आद्य कहते हैं द्विवचन है. इसलिये 'मति श्रुतावधि' इत्यादि सूत्रक्रमके प्रमाणसे सूत्रकार ही प्रथम तथा द्वितीयज्ञानको परोक्ष रूपसे आज्ञा देते है । इस हेतुसे पूर्वोक्त रीतिसे आदिके दो ज्ञान अर्थात् मतिज्ञान, और श्रुतज्ञान ये दोनों परोक्षप्रमाण होते हैं । क्योंकि-नि- मित्तकी अपेक्षा रखनेसे मति, श्रुतज्ञान, परोक्षप्रमाण ही है । अपाय तथा सद्रव्यरूपतासे मतिज्ञान संज्ञा है । वह मतिज्ञान इन्द्रिय, तथा अनिन्द्रियमन निमित्तक है अर्थात् नेत्र- आदि इन्द्रिय और अनिन्द्रिय मन इनसे उत्पन्न होता है । वह आत्मासे भिन्न निमि- तकी अपेक्षा रखता है इसलिये परोक्ष है । और मतिपूर्वक होनेसे तथा परोपदेशजन्य होनेसे श्रुतज्ञान भी परोक्ष ही है ॥ ११ ॥ प्रत्यक्षमन्यत् ॥ १२॥ सूत्रार्थ:-मति और श्रुतसे अन्य तीनों ज्ञान प्रत्यक्षप्रमाण होते है। भाष्यम्-मतिश्रुताभ्यां यदन्यत् त्रिविधं ज्ञानं तत्प्रत्यक्षं प्रमाणं भवति । कुतः । अती. न्द्रियत्वात् । प्रमीयन्तेऽस्तैिरिति प्रमाणानि ॥ अत्राह । इह अवधारितं द्वे एव प्रमाणे १ कहीं. २. "मन.पर्यय" ऐसे प्रथम यकार हख है, और इस ग्रन्थमे 'पर्याय' दीर्घही लिसा है। " आये" यह

१६
रायचन्द्रजनशास्त्रमालायाम्
प्रत्यक्षपरोक्षे इति । अनुमानोपमानागमार्थापत्तिसम्भवाभावानपि च प्रमाणानीति केचिन्म-
न्यन्ते । तत्कथमेतदिति । अलोच्यते । सर्वाण्येतानि मतिश्रुतयोरन्तर्भूतानीन्द्रियार्थसन्निक-
पंनिमित्तत्वात् । कि चान्यत् । अप्रमाणान्येव वा । कुतः। मिथ्यादर्शनपरिग्रहाद्विपरीतोप-
देशाच । मिथ्याइष्टेहि मतिश्रुतावधयो नियतमज्ञानमेवेति वक्ष्यते । नयवादान्तरेण तु यथा
मतिश्रुतविकल्पजानि भवन्ति तथा परस्ताद्वक्ष्यामः ।।
विशेप व्याख्या-मति और श्रुत इन दोनोंसे अन्य अर्थात् भिन्न त्रिविध ज्ञान
अर्थात् अवधि, मनःपर्यय, तथा केवल ये तीनों प्रत्यक्षप्रमाण है। क्योंकि ये तीनों अती-
न्द्रिय ज्ञान है । जिनके द्वारा संपूर्ण पदार्थ प्रमाविषयीभूत किये जांय, अर्थात् सा-
क्षात् अनुभवगोचर किये जाँय उनको प्रमाण कहते है। अब यहांपर कहते हैं कि इस
शास्त्रमे अर्थात् जैनशास्त्रमे प्रत्यक्ष तथा परोक्ष दो ही प्रमाण निश्चित किये है। और अ-
नुमान, उपमान, आगम, (शब्द) अर्थापत्ति, संभव, तथा अभाव, इनको भी कोई २ अ-
न्यमतवाले प्रमाणरूपसे मानते है, सो यह दोही प्रमाण आपने कैसे माने ? अर्थात् दो
प्रमाणोंकी व्यवस्था असंगत प्रतीत होती है । अब यहांपर समाधान कहते है । इन्द्रियां
तथा पदार्थोंके सन्निकर्पसे उत्पन्न होनेके कारण अनुमान उपमान आदि ये सब प्रमाण
मति तथा श्रुत ज्ञान जो कि परोक्ष प्रमाणरूपसे कहे गये हैं उन्हीमें गतार्थ अर्थात् अन्त-
भूत है । अथवा अनुमान आदि सब अप्रमाण ही हैं। क्योंकि-इनमें मिथ्या-
दर्शनका परिग्रह है, और विपरीत उपदेश जन्य है । कारण यह कि मिथ्यादृष्टिके मति,
श्रुत, और अवधिज्ञान, ये तीनों नियमसे अप्रमाण ही है ऐसा आगे कहैगे। और यद्यपि
अप्रमाण होनेसे मतिश्रुतमे अन्तर्भूत हैं यह कहनाभी अयोग्य है तथापि नयोंके वा-
दने, अर्थात् त्वरचितार्थप्रकाशनरूप जो नयवाद है उसके भेदसे मतिश्रुतके विकल्प-
(भेट) जन्य जिसप्रकार प्रमाण होते है उसप्रकार आगे निरूपण करैगे ॥११॥
अत्राह । उक्तं भवता मत्यादीनि ज्ञानानि उहिश्य तानि विधानतो लक्षणतश्च परस्ता-
हिरंग वध्याम इति । तदुच्यतामिति । अत्रोच्यते ।
अब यहांपर कहते है कि-प्रथम आप (ग्रन्थकार) ने मतिश्रुतादि पांचो ज्ञानोंको
का और रनको लक्ष्य करके यह भी कहा कि इन (मतिआदि) को भेद तथा लक्षण-
पर आगे कहगे मो अब वही कहना चाहिये । इसलिये आगेका सूत्र कहते है-
मनिः स्मृतिः मंज्ञा चिन्ताभिनिवोध इत्यनान्तरम् ॥ १३ ॥
मन्त्रार्थ:-मनि,नृति, मंत्रा.चिन्ता.अभिनिबोध यह पर्यायवाचक शब्द माने गये है।
मा मनितानं. स्मृतिनानं. गंनानानं, चिन्ताबानं, आभिनिवोधिकज्ञानमित्यना-
निए व्याख्या-~-नतिमान, स्मृतिज्ञान, संज्ञाज्ञान, चिन्ताज्ञान, तथा आभिनिवो-
:::
riभवानक* ॥ १३ ॥

. , सभाष्यतत्त्वार्थाधिगमसूत्रम् । १७ तदिन्द्रियानिन्द्रियनिमित्तम् ॥१४॥ सूत्रार्थः—यह पूर्वोक्त मति तथा स्मृति आदि शब्द वाच्य मतिज्ञान इन्द्रिय और अनिन्द्रियनिमित्तक है। भाष्यम्-तदेतन्मतिज्ञानं द्विविधं भवति । इन्द्रियनिमित्तमनिन्द्रियनिमित्तं च । तत्रे- न्द्रियनिमित्तं स्पर्शनादीनां पञ्चानां स्पर्शादिषु पञ्चखेव स्वविषयेषु । अनिन्द्रियनिमित्तं मनोवृत्तिरोघज्ञानं च ॥ विशेपव्याख्या-मति, स्मृति, संज्ञा, चिन्ता, और अभिनिबोध इन पांचो पर्या- योंसे वाच्य मतिज्ञान दो प्रकार होता है । इन्द्रियनिमित्तक अर्थात् इन्द्रियजन्य, और अ- निन्द्रिय निमित्तक अर्थात् मनःकारणक । उनमेसे इन्द्रियनिमित्तसे उत्पन्न होनेवाला ज्ञान स्पर्शन आदि पांचो इन्द्रियोंके स्पर्श आदि पांचो निजविषयोंमे ही होता है। और अनिन्द्रियनिमित्त अर्थात् मनोजन्य ज्ञान मनकी सब वृत्तियां तथा ओघ अर्थात् अ- विभक्त सर्वेन्द्रियविषयक ज्ञान है ॥ १४ ॥ अवग्रहहापायधारणाः॥१५॥ सूत्रार्थ:-यह मतिज्ञान अवग्रह, ईहा, अपा (वा) य, तथा धारणा, इन चार भागोंमे विभक्त है। भाष्यम्-तदेतन्मतिज्ञानमुभयनिमित्तमप्येकशश्चतुर्विधं भवति । तद्यथा । अवग्रह ईहा- पायो धारणा चेति । तत्राव्यक्तं यथास्वमिन्द्रियैर्विषयाणामालोचनावधारणमवग्रहः । अवग्रहो ग्रहणमालोचनमवधारणमित्यनर्थान्तरम् ॥ अवगृहीते विषयाथैकदेशाच्छेषानुगमनं निश्चय- विशेपजिज्ञासा ईहा । ईहा ऊहा तर्कः परीक्षा विचारणा जिज्ञासेत्यनर्थान्तरम् ॥ अवगृहीते विषये सम्यगसम्यगिति गुणदोषविचारणाध्यवसायापनोदोऽपायः । अपायोऽपगम: अपनोदः अपव्याधः अपेतमपगतमपविद्धमपनुत्तमित्यनान्तरम् ॥ धारणा प्रतिपत्तिर्यथास्वं मत्यवस्था- नमवधारणं च । धारणा प्रतिपत्तिरवधारणमवस्थानं निश्चयोऽवगमः अववोध इत्यनर्थान्तरम् ।। विशेषव्याख्या- यह पूर्वोक्त इन्द्रिय और अनिन्द्रिय उभयनिमित्तक मतिज्ञान एक होनेपर भी चार प्रकारका है । अर्थात् अवग्रह, ईहा, अपाय तथा धारणा ये चार, भेद मतिज्ञानके है । वहांपर ऐसा कहा है कि निज २ विषयोंके अनुसार इन्द्रियोंकेद्वारा पदार्थोंका आलोचन, वा अवधारण, जो है उसको अवग्रह कहते है । अवग्रह, ग्रहण, आलोचन, तथा अवधारण, ये सब शब्द अनर्थान्तर अर्थात् एकार्थवाचक है ॥ अव- ग्रह रूपज्ञानसे गृहीत जो विषय एकदेश है उस पदार्थके एकदेशसे ओपपदार्थके जाननेकेलिये जो अनुगमन है, अर्थात् विशेष निश्चय करनेकी चेष्टाविशेष वा जि- ज्ञासा है वही ईहा है। ईहा, ऊहा, तर्क, परीक्षा, विचारणा, और जिज्ञासा, ये समा- नार्थक शब्द है । और अवग्रह तथा ईहासे गृहीत विषयमे यह सम्यक् है वा असम्यक ३ . रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् १८ अर्थात् योग्य है वा अयोग्य इसप्रकार गुणदोषके विचारका जो उद्योग वा अपनोद है उसको अपा (वा) य कहते है । अपाय, अपगम, अपनोद, अपव्याध, अपेत, अपगत, अपविद्ध, और अपनुत्त, ये एकार्थवाचक है। पदार्थके स्वरूपके अनुसार जो उसकी प्रतिपत्ति, अर्थात् यथार्थबोध, वा वुद्धिकी पदार्थमें युक्त चिरकालार्थ स्थिति, अथवा अवधारणा है उसको धारणा कहते है । धारणा, प्रतिपत्ति, अवधारण, अवस्थान, निश्चय, अवगम, और अववोध, ये शब्द एकार्थवाचक हैं ।। १५॥ बहुबहुविधक्षिप्रानिश्रितानुक्तध्रुवाणां सेतराणाम् ॥ १६ ॥ सूत्रार्थः-बहु, बहुविध, क्षिप्र, अनिःसृत, अनुक्त, ध्रुव और इनसे इतर अर्थात् अल्प, अल्पविध, अक्षिप्र, निःसृत, उक्त, अध्रुव ये १२ भेद अवग्रहादिमें होते है। भाग्यम्-अवग्रहादयश्चत्वारो मतिज्ञानविभागा एषां वहादीनामर्थानां सेतराणां भवन्ये- काः । सेतराणामिति सप्रतिपक्षाणामित्यर्थः । वह्ववगृह्णाति अल्पमवगृहाति बहुविधमवगृहाति एकविधमवगृहाति । क्षिप्रमवगृहाति चिरेणावगृहाति । अनिश्रितमवगृहाति निश्रितमवगृ- हाति । अनुक्तमवगृहाति उक्तमवगृहाति । ध्रुवमवहाति अध्रुवमवगृहाति । इत्येवमीहादीना- मपि विद्यात् ।। विशेषव्याख्या--मतिज्ञानके जो अवग्रह, ईहा, आदि चार विभाग है उन प्रत्येकमें बहु, बहुविध, तथा इनके विरुद्ध अल्प एकविध आदि १२ भेद होते है। यहां " सेतरा- णाम्" इससे वहुआदिके प्रतिपक्ष (विरुद्ध) अल्प, तथा एकविध, इत्यादिसे तात्पर्य है । जैसे वहुत ग्रहण करता है, अल्पग्रहण करता है । बहुविध (बहुप्रकार) से ग्रहण करता है, एकविध ग्रहण करता है । क्षिप्र अर्थात् शीघ्र ग्रहण करता है, चिरकालसे ग्रहण करता है। अनिश्चित (चिन्हादिसे अज्ञात) ही ग्रहण करता (जानता) है. निश्चित (लिङ्ग वा चि- न्हसे ज्ञात) को ग्रहण करता है । अनुक्त विना कहा हुआ ही ग्रहण करता है, उक्त कहा- दुआ ग्रहण करता है । ध्रुव ग्रहण करता है, तथा अध्रुव ग्रहण करता है । इसीप्रकार ईटादिके विषयमें भी बहु, बहुविध, तथा इनके विरुद्ध अल्प, एकविध आदिकी योजना करनी चाहिये । अर्थात् बहुईहा अल्पईहा इत्यादि जानना चाहिये ॥ १६ ॥ अर्थस्य ॥१७॥ नाध्यम्-अवग्रहादयो मतिनानविकल्पा अर्थस्य भवन्ति ।। विपव्याख्या-अवग्रह आदि जो मतिज्ञानके विकल्प (भेद) है, सो अर्थके ही होन: ॥१७॥ व्यतनस्यावग्रहः ॥ १८ ॥ स्तृवार्थ:-व्यजनका नो अवग्रह ही होता है । व्य अनन्यावग्रह एव भवति नहादयः । एवं द्विविधोऽवग्रहो व्यञ्जनस्यार्थस्य या दन्त ।।

- सभाष्यतत्त्वार्थाधिगमसूत्रम् । १९ विशेषच्याख्या-व्यञ्जन (अव्यक्तशब्द आदि) का अवग्रह ही होता है न कि ईहा आदि । इसप्रकार अवग्रह दो प्रकारका होता है. एक अर्थाऽवग्रह और दूसरा व्यञ्जनाऽवग्रह और ईहा आदि तो अर्थके ही होते है ।। १८ न चक्षुरनिन्द्रियाभ्याम् ॥ १९॥ सूत्रार्थः-नेत्रइन्द्रिय तथा अनिन्द्रिय (मन) से व्यञ्जनका अवग्रह नही होता । भाष्यम्-~-चक्षुषा नोइन्द्रियेण च व्यञ्जनावग्रहो न भवति । चतुभिरिन्द्रियैः शेषैर्भवती- त्यर्थः । एवमेतन्मतिज्ञानं द्विविधं चतुर्विधं अष्टाविंशतिविधं अष्टषष्टयुत्तरशतविघं षट्त्रिंशति- शतविधं च भवति ॥ विशेषव्याख्या-चक्षुष नेत्रइन्द्रिय और अनिन्द्रिय अर्थात् ईषत् इन्द्रिय मन, इन दोनोंसे व्यञ्जनका अवग्रहरूप ज्ञान नहीं होता है किन्तु शेष स्पर्शन आदि चार इन्द्रियोंसे होता है । इस रीतिसे इन्द्रिय और अनिन्द्रिय निमित्तसे मतिज्ञान दो प्रकारका होता है, अवग्रह तथा ईहा अपाय और धारणा इन भेदोंसे चार प्रकारका होता है । तथा स्पर्शन (त्वा) आदि पांचइन्द्रियां और मन इन छहोंके प्रत्येकके अवग्रह आदि चार २ भेद मिलके २४ और नेत्र तथा मनको छोडके शेष स्पर्शन आदि चार इन्द्रियोंका चार प्रकारका व्यञ्जनाऽवग्रह सब मिलकर २८ प्रकारका भी मतिज्ञान होता है। और इन्हीं अट्ठावीस २८ भेदोंको बहु, बहुविध आदि छह २ भेदोंसे एकसोअड़सठ १६८ भेद मतिज्ञानके होते हैं । तथा इन्हीं पूर्वोक्त अट्ठावीस २८ भेदोंमेंसे प्रत्येकको बहु, वहुविध, तथा इनके इतर अल्प, एकविध आदिसे बारह भेद करनेसें तीनसोछत्तीस ३३६ भेद मतिज्ञानके होते है ॥ १९ ॥ अत्राह । गृहीमस्तावन्मतिज्ञानम् । अथ श्रुतज्ञानं किमिति । अत्रोच्यते ।। अब कहते है कि मतिज्ञानको पूर्वोक्त भेदोसहित ग्रहण करते है, अब क्रमप्राप्त श्रुतज्ञान क्या है, सो कहिये ? इसलिये श्रुतज्ञानके भेद प्रदर्शन करनेकेलिये अग्रिम सूत्र कहते है। श्रुतं मतिपूर्व व्यनेकदादशभेदम् ॥२०॥ सूत्रार्थ-श्रुतज्ञान मतिपूर्वक होता है, और उसके दो अनेक तथा द्वादश भेद है। भाष्यम्-श्रुतज्ञानं मतिज्ञानपूर्वकं भवति । श्रुतमाप्तवचनसागम उपदेश ऐतिहमानायः • प्रवचनं जिनवचनमित्यनर्थान्तरम् । तहिविधमङ्गबाघमङ्गप्रविष्टं च । तत्पुनरनेकविधं द्वादश- विधं च यथासङ्खयम् । अङ्गबाह्यमनेकविधम् । तद्यथा । सामायिक चतुर्विशतिस्तवो वन्दनं अतिक्रमणं कायव्युत्सर्गः प्रत्याख्यानं दशवैकालिकं उत्तराध्यायाः दशाः कल्पव्यवहारौ निशीथमृषिभापितान्येवमादि ॥ अङ्गप्रविष्टं द्वादशविधम् । तद्यथा । आचारः सूत्रकृतं स्थानं समवायः व्याख्याप्रज्ञप्तिः ज्ञातधर्मकथा उपासकाध्ययनदशाः अन्तकृद्दशाः अनुत्तरौपपातिक- 1 रायचन्द्रजैनशान्त्रमालायाम् २० दशाः अन्नव्याकरणं विपाकसूत्रं दृष्टिपात इति ।। अत्राह । मतियाननुनतानयोः कः प्रति विशेष इति । अत्रोच्यते । उत्पन्नाविनष्टाग्राहकं नाम्पतकालविपत्र मनिशानम । भुटान तु त्रिकालविपर्व उत्पन्नविनष्टानुत्पन्नार्थग्राहकम् ।। अत्राह 1 गृहीमो मनिथुनयानानात्वम् । अथ श्रुतबानत्य द्विविधमनेकद्वादशाविधमिति किं कृतः प्रनिविशेष इनि ! अबोच्यते । विशेषावविव्यम् । यद्भगवद्भिः सर्वनः सर्वदनिभिः परमापभिरजिनल्याभान्यावरनगुनन्द च प्रवचनप्रतिष्टापनफलल तीर्थकरनामकर्मणोऽनुभावाटुक्तं भगवच्छिप्यरतिशयहरनमा- विशयवाग्बुद्धिसंपन्नर्गणधरेहब्धं तदङ्गप्रविष्टम् । गणधरानन्तयादिभिन्त्वन्यन्तविशुहागनः परमप्रकृष्टवाञ्चतिशक्तिभिराचा..कालसंहननाघु पाइल्पशक्तीनां शिष्याणामनुग्रहाय यन्त्रोत तङ्गवाहनिति ॥ सर्वज्ञप्रणीतत्वादानन्याब नेयत्य श्रुतनानं मतितानान्महाविषयम् । तत्स च महाविषयत्वात्तांतानयानधिकृत प्रकरणसमात्यपेझमगोपागनानात्वम् । किं चान्यन् । सुखग्रहणवारणविज्ञानापोहप्रयोगार्थ च । अन्यथा यनित्रद्धमगोपागशः समुद्रप्रतरगवदुरव्य- वसेचं लान् । एतेन पूर्वाणिवस्तूनि प्राभृतानि ग्रामृनप्रामृतानि अध्ययनान्युयाच व्या- त्याताः॥अत्राह ! नतिश्रुतयोत्तुल्यविषयत्वं बन्यति । हन्येवसर्वपाविति । तन्लादेशत्व- मेवात्तिति । अत्रोच्यते । उत्तमतन् सान्प्रतकालविपचं मतिनानं श्रुतज्ञानं तु त्रिकालविपयं विशुद्धतरं चेति । कि चान्यन् । मतिनानमिन्द्रियानिन्द्रियनिमित्तमात्मनो जताभाव्यात्पारि- णामित्रम् । श्रुतत्रानं तु तत्पूर्वकमानोपदेशाद्भवतीति ।। विशेपव्याख्या-भतिज्ञानपूर्वक श्रुतज्ञान होता है । श्रुत. आतवचन, आगम, उपदेश, ऐतिह्य, आन्नाय, प्रवचन, त्या जिनवचन ये सत्र अनन्तर अर्थात् समानार्य- वाचक शब्द्ध हैं । पुनः वह श्रुत दो प्रकारका है । एक अङ्गवाह, और दूनरा अङ्ग प्रविष्ट और दोनो यया संख्याले अर्थात् अङ्गवाह्य अनेक प्रकारका है और अङ्गप्रविष्ट द्वादश १२ प्रकारका है। इनमें अनेकमेदसहित अङ्गवाह्यके कुछ उदाहरण. जैसे:- मामायिक, चतुर्विंशतितव, २१ स्तोत्र वन्दन, प्रतिक्रमण, कायब्युसर्ग, अर्थात् कि हुए पापकी शुद्धता जहां शरीरके त्यागसे वर्णन की गई है, प्रत्याख्यान दशवकालिक, उत्तरमव्याय, दशा, कल तथा व्यवहार, और निशीथ, इत्यादि ऋपियोंने भापित अनेक प्रकारका अङ्गाविव है । अङ्गप्रविष्ट वारह प्रकारका है जैसे:-आचार १ सूत्र- ऋत २ स्थान ३ समवाय 2 व्याल्याप्रज्ञप्ति ५ ज्ञातृवर्मकया ६ उपासकाध्ययनदशा, ७ अन्तकृद्दशा ८ अनुत्तर आयपातिक (उपपात सन्वविनी) दशा ९ प्रनव्यान्तरण १० विणकत्र ११ तथा दृष्टिपात १२ । यहांपर प्रश्न करते हैं कि मतिज्ञान तथा श्रुतज्ञान क्या मंद है ? उत्तर देते हैं कि उत्पन्न होकर जो नष्ट नहीं हुआ है ऐल पदार्यका बनानकालमें ग्राहक तो मतिज्ञान है । और श्रुतज्ञान तो निकालविषयक है, जो पदार्थ उत्पन्न हुवा है, अथवा उत्पन्न होकर नष्ट हो गया है, वा ही नहीं हुआ. किन्तु भविष्यमें उत्पन्न होनेवाल है वा नित्य है उन सबका उत्पन्न भाहन तज्ञान है । यह मेद इन दोनोंसे है । अव पुनः यहांपर कहते हैं कि १ सभाष्यतत्त्वार्थाधिगमसूत्रम् । २१ मति तथा श्रुतज्ञानका नानात्व (भेद ) तो अङ्गीकार करते है, किन्तु श्रुतज्ञान द्विविध (दो भेद) अनेकविध, तथा द्वादशविध अर्थात् १२ भेद सहित है, इस विशेषता क्या कारण है, यह परस्पर भेद किसका किया है ? अब इसका उत्तर देते है कि वक्ताके भेदसे प्रथम दो भेद माने गये है, अङ्गबाह्य और अङ्गप्रविष्ट ये भेद वक्ताओंके भिन्न २ होनेसे माने गये है। जो कि सर्वज्ञ, सर्वदर्शी तथा परमऋषि स्वरूप भगवान् अर्हतोंने परमशुभ, तथा प्रवचन प्रतिष्ठापन फलदायक तीर्थकर नाम कर्मके प्रभावसे तादृश स्वभाव होनेके कारणसे कहा है; उसीको अतिशय अर्थात् साधारण जनोंसे विशेषता युक्त, और उत्तम तथा विशेषवाणी तथा बुद्धि ज्ञान आदि संपन्न भगवान् शिष्य गणधरोंने जो कुछ कहा है वह अङ्ग प्रविष्ट है । और गणधरोंके अनन्तर होनेवाले अत्यन्त विशुद्ध आगमोंके ज्ञाता तथा परमोत्तम वाक् बुद्धिआदिकी शक्तिसम्पन्न आचा- योने कालसंहनन तथा अल्पायु आदिके दोषोंसे अल्पशक्तिवाले शिष्योंके ऊपर अनुग्रहार्थ जो ग्रन्थ निर्माण किये है वे सब अङ्गबाह्य है । सर्वज्ञसे रचित होनेके कारण तथा ज्ञेयवस्तुके अनन्त होनेसे मतिज्ञानकी अपेक्षा श्रुतज्ञान् महान् विषयोंसे युक्त है । अतएव श्रुतज्ञानके महाविषय होनेके कारण उन २ जीवादि पदार्थों का अधिकारकरके प्रकरणोंकी समाप्तिकी अपेक्षा संयुक्त अङ्ग तथा उपाङ्गोंका नानात्व पर्थात् अनेक भेदत्व है । और भी, सुखपूर्वक ग्रहण, धारण, तथा विज्ञानके निश्चय योगार्थ भी श्रुतज्ञानका नानात्व (अनेक भेदत्व) है और यदि ऐसा न हो अर्थात् त्येक विषय निज २ प्रकरणमें निबद्ध न हो तो समुद्रके तरनेके सदृश उन २ पदार्थोंका न दुःसाध्य हो जाय । और इस सुखपूर्वकग्रहणआदि रूप अङ्ग तथा उपाहोंके दस्वरूप प्रयोजनसे पूर्वकालिकवस्तु, प्राप्तव्य जीवादि द्रव्य, तथा जीवादि द्वारा ज्ञेय द्या आदि अध्ययन और उनके उद्देशोंका भी निरूपण हो गया, अर्थात् ज्ञेयकी सुगम- केलिये ही जीवसे ज्ञेय जीवसम्बन्धी ज्ञान, तथा जीवसे बोध्य अचेतन पदार्थों का ज्ञान, सब नाना भेद सहित श्रुतज्ञान द्वारा वर्णन किया गया है। अब यहांपर कहते है । मतिज्ञान तथा श्रुतज्ञानकी तुल्यता "द्रव्येष्वसर्वपOयेषु" ( तत्वार्थसूत्र, अध्याय १ त्र २७) में कहेंगे अर्थात् असर्वपायों ( कतिपय पर्यायों) मे संपूर्ण द्रव्योंमे मतिज्ञान या श्रुतज्ञानका विषय निबन्ध है, तात्पर्य यह कि इस सूत्रद्वारा यह कहा गया है कि पूर्ण द्रव्योंके कुछ पर्याय मतिज्ञान तथा श्रुतज्ञानके विषय हैं, इससे दोनोंकी एकता गई । अब उत्तर कहते है कि यह विषय प्रथम ही कह चुके है कि मतिज्ञान तो मानकालविषयक है, और श्रुतज्ञान त्रिकालविषयक है, तथा मतिज्ञानसे अधिक विशुद्ध र महाविषययुक्त है अर्थात् मतिज्ञानसे तो केवल वर्तमानकालके ही पदार्थ जाने जाते और श्रुतज्ञानसे तीनों कालके पदार्थ जाने जाते है । और दूसरी बात यह भी है कि नो रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् २२ मतिज्ञान तो इन्द्रिय तथा अनिन्द्रिय (मन) को निमित्त मानकर आत्माके सवभाव (जाननेके स्वभाव ) से उत्पन्न होता है अतएव पारिणामिक है: और श्रुतज्ञान मतिपूर्वक है और आप्तके उपदेशसे उत्पन्न होता है; इस हनुस भी दोनोंका भेद है ॥२०॥ अनाह । उक्तं श्रुतज्ञानम् । अथावधिज्ञानं किमिति । अत्रोच्यते ।। अवकहते है श्रुतज्ञान तो कह चुके उसके अनन्तर जो अवधिज्ञानका उद्देश (नाम संकीर्तन ) किया है उसका क्या खरूप है ? इसलिये अग्रिम सूत्र कहते हैं । द्विविधोऽवधिः॥२१॥ सूत्रार्थ:-अवधिज्ञान दो प्रकारका है। भाष्यम्-भवप्रत्ययः क्षयोपशमनिमित्तश्च ।। विशेषव्याख्या-मवप्रत्यय अर्थात् केवल जन्ममात्रके कारणसे उत्पन्न होनेवाला तथा क्षयोपशमनिमित्तसे उत्पन्न होनेवाला, इस रीतिसे क्षयोपशमनिमित्तक तथा भव- प्रत्यय भेदसे अवधिज्ञान दो प्रकारका है ॥ २१ ॥ तत्र- उनमे- भवप्रत्ययो नारकदेवानाम् ॥ २२ ॥ सूत्रार्थः-नारकी जीव तथा देवोंको अवधिज्ञान केवल जन्म निमित्तसे होता है । भाष्यम्-नारकाणां देवानां च यथास्वं भवप्रत्ययमवधिज्ञानं भवति । भवप्रत्ययं भवहे- तुकं भवनिमित्तमित्यर्थः । तेषां हि भवोत्पत्तिरेव तस्य हेतुर्भवति पक्षिणामाकाशगमनवन् न शिक्षा न तप इति ॥ विशेष व्याख्या-नरकमे उत्पन्न होनेवाले जीव तथा देव इनको अवधिज्ञान भव- प्रत्यय होता है । अर्थात् इनके अवधिज्ञान होनेमे नरकयोनि तथा देवयोनिमें उत्पत्ति होना ही एक हेतु है; जैसे पक्षियोंमें जन्म होना आकाशगमनमे हेतु है । अर्थात् जैसे पनियोंका जन्म ही आकाशम गतिका कारण है न कि शिक्षा वा तप आदि, ऐसे ही नारकी तथा देवॉमे उत्पत्तिमात्रसे अवधिज्ञान प्राप्त होता है ॥ २२ ॥ यथोक्तनिमित्तः षविकल्पः शेषाणाम् ॥ २३ ॥ सूत्रार्थ:-अयोपशमनिमित्तक तथा पभेद सहित अवधिज्ञानशेष अर्थात् तिर्यग् योनि और मनुप्य योनियोंमें होता है । भाग्यम्चयोक्तनिमित्तः क्षयोपशमनिमित्त इत्यर्थः । तदेतदवधिज्ञानं क्षयोपशमनिमित्तं पटियं भवनि शेषाणाम् । पाणामिति नारकदेवेभ्यः शेपाणाम् तिर्यग्योनिजानां मनुष्याणां सभाष्यतत्त्वार्थाधिगमसूत्रम् । व । अवधिज्ञानावरणीयस्य कर्मणः क्षयोपशमाभ्यां भवति षडिधम् । तद्यथा अनानुगामिक भानुगामिकं हीयमानकं वर्धमानकं अनवस्थितं अवस्थितमिति । तत्रानानुगामिकं यत्र क्षेत्रे स्थतस्योत्पन्नं ततः प्रच्युतस्य प्रतिपतति प्रश्नादेशपुरुषज्ञानवत् ॥ आनुगामिकं यत्र कचिदु- पन्नं क्षेत्रान्तरगतस्यापि न प्रतिपतति भास्करप्रकाशवत् घटरक्तभाववञ्च ॥ हीयमानक असंख्येयेषु द्वीपेषु समुद्रेषु पृथिवीषु विमानेपु तिर्यगूवमधो यदुत्पन्नं क्रमशः संक्षिप्यमाणं पतिपतति आ अङ्गुलासंख्येयभागात् प्रतिपतत्येव वा परिच्छिन्नेन्धनोपादानसंतत्यग्निशिखा- बत् ।। वर्धमानकं यदङ्गुलस्यासख्येयभागादिषूत्पन्नं वर्धते आ सर्वलोकात् अधरोत्तरारणिनि- थनोत्पन्नोपात्तशुष्कोपचीयमानाधीयमानेन्धनराश्यग्निवत् ॥ अनवस्थितं हीयते वर्धते च वर्धते हीयते च प्रतिपतति चोत्पद्यते चेति पुनः पुनरूमिवत् ॥ अवस्थित यावति क्षेत्रे उत्पन्नं भवति ततो न प्रतिपतत्या केवलप्राप्तः आ भवक्षयाद्वा जात्यन्तरस्थायि वा भवति लिङ्गवत् ॥ विशेष व्याख्या-पूर्व प्रसंगमे जो क्षयोपशमनिमित्त कहा है उस यथोक्त निमित्तसे उत्पन्न तथा आनुगामिक आदि भेद सहित अवधिज्ञान देव तथा नारकियोंसे शेप जो तिर्यग्योनिज और मनुष्य हैं, उनको होता है । अवधिज्ञानावरणीयकर्मके क्षय तथा उपशमसे जो अवधिज्ञान होता है, वह षड्किल्प है, अर्थात् उसके छह भेद है । जैसे १ अनानुगामिक, २ आनुगामिक, ३ हीयमान, ४ बर्द्धमानक, ५ अनवस्थित और अवस्थित । इनमेंसे अनानुगामिक अवधिज्ञान वह है, कि जो जिसक्षेत्रमें स्थित पुरुषको उत्पन्न होता है, उस क्षेत्रसे जब वह पुरुष च्युत होता है अर्थात् गिरता है, तव उसका वह अवधिज्ञान भी गिर जाता है, उसके साथ ऐसा नही जाता जैसे प्रधान पुरुपनिष्ठज्ञान. अर्थात् जैसे निमित्तज्ञानी किसी स्थानविशेषमे ही किसी पुरुपमे ज्ञान प्राप्त कर सक्ता न कि सर्वत्र और सो भी पृष्ट अर्थको ही कह सक्ता है । और आनुगामिक व अनुगामी अवधिज्ञान वह है, कि जो किसी क्षेत्रमें किसी पुरुषको उत्पन्न हुआ उससे अन्यक्षेत्रमें जानेपर भी उस पुरुषसे ऐसे पतित नही होता जैसे सूर्यका प्रकाश घटादिका रक्तभाव । हीयमान अवधिज्ञान वह है, जो कि असंख्यातद्वीप समुद्रोंमे, पृथ्वीके प्रदेशोंमे, विमानोंमे तथा तिर्यक् (तिरछे) ऊर्द्ध व अधोभागमें उत्पन्न हुआ है, वह क्रमसे संक्षिप्त होता हुआ यहां तक गिर जाता है वा न्यून हो जाता है, जवतक अंगुलके असखेय भागको नहीं प्राप्त होता अथवा सर्वथा गिर ही जाता है, जैसे परमित उपादान कारण (ईधन) वाले अग्निकी शिखा । वर्द्धमानक अवधिज्ञान वह है, जो कि अंगुलके असंखेय भाग आदिने उत्पन्न होकर सम्पूर्ण लोकपर्यन्त ऐसे बढता है, जैसे ऊपर नीचेके अरणिके नंधनने उत्पन्न तथा शुष्क ईधनकी राशिपर फैकाहुआ वर्द्धमान अग्नि । अनव स्थित अवधिनान वह है, जो कि तरंगके समान जहांतक उसको बढना चाहिये वहां तक पुनः २ बहता है और छोटा भी यहांतक होता है कि जहांतक उसको छोटा होना चाहिये. उनी १ काष्ठरचित यत्रविशेष.

भाष्यन्ननःपर्यायवानं द्विविधम् । अजुसतिननःपयायज्ञानं त्रिपुलमतिमनःपर्याय २४ रायचन्द्रजैनशानमालायान् तिने वह वार २ बढता तथा न्यून होता और गिरता त्या उत्पन्न होता रहता है. एकरूपर्ने अवसित नहीं रहता किन्तु न्यूनाधिकभावनें सदा अनवस्थितरूप रहता है। और अवस्थित अवधिज्ञान वह है. कि जो जिम क्षेत्रने जितने आकारने उत्पन्न हुआ हो. उस क्षेत्रले केवलज्ञानी प्राप्तिपर्यन्त नहीं गिरता अथवा भवके नाश तक नहीं गिरता र लिङ्ग सनान वह अन्यजाति मी स्थिर रहता है ॥ २३ ॥ उत्तमस्ज्ञिानम् । मनःपर्यायज्ञानं वक्ष्यानः । अवविज्ञान कह चुके अब ननःपर्यायज्ञानता निरूपण करेंगे। ऋजुविपुलमती मनःपर्यायः॥२४॥ नृत्रार्थ:-मनःपर्यायज्ञानके ऋजुमति तथा विपुलमति ये दो भेद हैं। नानं॥ विशेष व्याख्या-ऋजुमतिमनःपर्याय त्या विपुलमतिमनःपर्याय इन ने भेदोंने ननराम्नानक दो नेद हैं। ऋजु अर्थात् ननश्चमकायकी सरलतासे नननं स्थित रूपी- पदार्थ तथा परकं ननमें स्थित पदार्थ जिससे जाने जाते हैं वह ऋजुमतिमनःपर्याय है. और सरल तया कप दूतरेके नन्ने स्थित रूपीपनार्थ जिसे जाने जाते हैं, वह विपुलमनियनःपर्याय है ॥ २१ ॥ ब्याट । कोऽनगे: प्रतिविनय इति । अत्रोच्यते। अब बार कहते हैं कि अजुमतिननःपर्यायज्ञान तथा विपुलनतिमनःपर्यायज्ञान क्यानेद है। यहां कहते हैं। विशुज्यप्रतिपानाभ्यां नहिशेषः ॥ २५ ॥ नृत्रार्थ:-विशुद्धि तथा अप्रतिशत इन दोनों हेतुओंसे ऋजुनति तथा विपुलना मन पर्ययज्ञान विशेष (भद) है। भायम-विशुद्धिकृतवातिपातकृत्तवानयोः प्रतिविशेषः । तद्यथा । अजुनतिननःपर्या बलिदान पर्यायनानं विशुद्धत्तरम् । किं चान्यन् ! अजुनविनतःपर्यायवानं प्रतिपन- बन्यो विपुत्रमनिननःपयायदानं तुन प्रतिपत्तीति ।। विवर व्याख्या--विशुद्धिकृत तय अप्रतिमातहत इन दोनोंने विशेषता है । जैसे नादानी अपना विपुलनतिननःपर्याय विशुद्धतर है, अर्थात् अधिक r: और ऋतिन्नाचायगला गिर जाता है और विपुलनतिननः- टाउन निम्ता ॥२६॥ माविमनापावलानगः प्रतिब्दिोष इति । शिविान नया ननाउायदानने क्या भेद है?

सभाष्यतत्त्वार्थाधिगमसूत्रम्। २५ अनोच्यते । यहां सूत्र कहते हैं। विशुद्धिक्षेत्रवामिविषयेभ्योऽवधिमनःपर्याययोः ॥ २६ ॥ सूत्रार्थ:-विशुद्धि, क्षेत्र, स्वामी तथा विषयकृत अवधिज्ञान और मनःपर्यायज्ञानमें विशेषता है। भाष्यम्-विशुद्धिकृतः क्षेत्रकृतः स्वामिकृतो विषयकृतश्चानयोर्विशेषो भवत्यवधिमनःपर्या- यज्ञानयोः । तद्यथा । अवधिज्ञानान्मनःपर्यायज्ञानं विशुद्धतरम् । यावन्ति हि रूपाणि द्रव्या- ग्यवधिज्ञानी जानीते तानि मनःपर्यायज्ञानी विशुद्धतराणि मनोगतानि जानीते । कि चा- न्यत् । क्षेत्रकृतश्चानयोः प्रतिविशेषः । अवधिज्ञानमङ्गुलस्यासंङ्खधेयभागादिषूत्पन्नं भवत्या- सर्वलोकात् । मनःपर्यायज्ञानं तु मनुष्यक्षेत्र एव भवति नान्यक्षेत्र इति ॥ किं चान्यत् । स्वामिकृतश्चानयोः प्रतिविशेषः । अवधिज्ञानं संयतस्य असंयतस्य वा सर्वगतिपु भवति । मनःपर्यायज्ञानं तु मनुष्यसंयतस्यैव भवति नान्यस्य ॥ किं चान्यत् विषयकृतश्चानयोः प्रति- वेशेषः । रूपिद्रव्येष्वसर्वपर्यायेष्ववधेर्विषयनिबन्धो भवति । तदनन्तभागे मनःपर्यायस्येति ॥ विशेषव्याख्या-विशुद्धिकृत अर्थात् अधिक शुद्धिद्वारा क्षेत्रकृत अर्थात् उत्पत्तिस्थान- द्वारा खामिद्वारा और विषयद्वारा अवधिज्ञान तथा मनःपर्यायज्ञानमे भेद है। जैसे अवधि- ज्ञानकी अपेक्षासे मनःपर्यायज्ञान अधिकतर विशुद्ध है, जितने रूप वा रूपी द्रव्योंको अव- धेज्ञानवाला जानता है, उनको मनःपर्यायज्ञानी अधिकतर शुद्धतासे मनोगत होनेपर भी अधि- कतर शुद्धतासे जान लेता है। और क्षेत्रकृति भी इन दोनों अर्थात् अवधि तथा मनःपर्या- पज्ञानमे विशेषता है । जैसे अवधिज्ञान तो अंगुलके असंख्येय भागादि क्षेत्रोंमें उत्पन्न होकर सम्पूर्ण लोकपर्यन्तमें हो सक्ता है और मनःपर्यायज्ञान मनुष्य क्षेत्रमे ही उत्पन्न होता है न कि अन्य किसी क्षेत्रमें । और इन दोनोंमें स्वामिकृत भी विशेषता है । जैसे अवधिज्ञान तो संयत असंयत सब ही जीवोंको सब गतियोंमे होता है; परन्तु मनःपर्यायज्ञान मनुष्य रोनिमे सो भी केवल संयतीको होता है, अन्य जीवको व असंयत मनुष्यको नहीं। और इन दोनोंमें विषयकृत भी विशेषता है । जैसे रूपवाले द्रव्योंमें असर्वपर्यायोंमें ही वधिज्ञानका विषय निबंध है, अर्थात् अवधिज्ञानी रूपीद्रव्योंके कतिपय पर्यायोंको ही जान सक्ता है, न कि सम्पूर्ण द्रव्य तथा सर्व पर्यायोंको, परन्तु मनःपर्याय ज्ञानका विषय जो उसके अनन्त भागमें भी है । तात्पर्य यह कि जो रूपीद्रव्य अवधिज्ञानसे जाना जाता उसके अनन्तवें सूक्ष्म भागको भी मनःपर्यायज्ञान जान लेता है ।। २६ ॥ अत्राह । उक्तं मनःप-यज्ञानम् । अथ केवलज्ञानं किमिति । अत्रोच्यते । केवलनानं शमेऽध्याये वक्ष्यते । मोहक्षयाज्ज्ञानदर्शनावरणान्तरायक्षयाच केवलमिति ।। अब यहांपर कहते है, कि मनःपर्यायज्ञानका वर्णन तो कर चुके, अब उसके अन- तर क्रमप्राप्त केवलज्ञान क्या वस्तु है ? । यहां कहते है कि, केवल ज्ञानको विरोप- रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् २६ रूपसे दशवें अध्यायमें "मोहके क्षयसे तथा ज्ञानावरणी दर्शनावरणी अन्तरायके क्षयसे केवल ज्ञान होता है,, इस प्रकार कहेंगे। अत्राह । एषां मतिज्ञानादीनां ज्ञानानां कः कस्य विषयनिवन्ध इति अत्रोच्यते । अब पुनः कहते है कि ये जो मतिश्रुतादि ज्ञान हैं, इनसे किसका क्या विषय नि- वन्ध है अर्थात् किस ज्ञानसे कौनसा किस प्रकारका पदार्थ जाना जाता है । इसके उत्तरमें सूत्र कहते हैं। मतिश्रुतयोर्निवन्धः सर्वद्रव्येष्वसर्वपर्यायेषु ।। २७ ॥ सूत्रार्थ:-सम्पूर्ण द्रव्योंके असर्व (कतिपय) पर्यायोंमें मतिज्ञान और श्रुतिज्ञान इन दोनोंका विषय निबन्ध है। भाष्यम्मतिज्ञानश्रुतज्ञानयोर्विषयनिवन्धो भवति सर्वद्रव्येवसर्वपर्यायेपु । ताभ्यां हि सर्वाणि द्रव्याणि जानीते न तु सर्वैः पर्यायैः । विशेषव्याख्या-मतिज्ञान तथा श्रुतज्ञानका विषय कतिपय (कुछ, न कि सब) पर्याय सहित जो कि सम्पूर्ण द्रव्य है, उनमें है अर्थात् इन दोनों ज्ञानोंसे जीव सब द्र- व्योंको जानता है. परन्तु सर्व द्रव्योंके सर्व पर्यायोंको नहीं जानता। अपने योग्य कुछ पर्यायोंको ही जानता है ॥ २७ ॥ रूपिष्ववधेः ॥ २८॥ सूत्रार्थः-कृष्णपीतादि जो रूपवान् द्रव्य है, उन्हींमें अवधिज्ञानका विषय नि- वन्ध है। भाग्यम्-रूपिष्वेव द्रव्येष्ववधिज्ञानस्य विषयनिबन्धो भवति असर्वपर्यायेषु । सुविशु- द्धेनाप्यवधिनानेन रूपीण्येव द्रव्याण्यवधिज्ञानी जानीते तान्यपि न सवैः पर्यायैरिति ।। विशेष व्याख्या--जो पदार्थ व द्रव्य रूपवाले है, वे ही अवधि ज्ञानके विषय है । उन रूपी द्रव्योंमें सम्पूर्ण पर्याय अवधिज्ञानके विषय नहीं है, किन्तु कतिपय पर्याय अत्यन्त शुद्ध अवधिज्ञानद्वारा भी रूपवान् ही पदार्थ जाने जाते है, न कि रूप रहित । और रूपवान् द्रव्य भी सम्पूर्ण पर्यायों सहित नही जाने जाते, किन्तु कतिपय पर्याय सहित ही जाने जाते है ।। २८॥ तदनन्तभागे मनःपर्यायस्य ॥ २९ ॥ सूत्रार्थ:--उसके अनन्तवें भागमे मनःपर्यायज्ञानका विषयनिबन्ध है। भाग्यम् यानि रूपीणि व्याण्यवधिज्ञानी जानीते ततोऽनन्तभागे मनःपर्यायस्य विष यनिनन्यो भवति । अवधिनानविषयस्यानन्तभागं मनःपर्यायज्ञानी जानीते रूपिद्न्यापि मनारम्यविचारगतानि च मानुपक्षेत्रपर्यापन्नानि विशुद्धतराणि चेति ॥

२७ सभाष्यतत्त्वार्थाधिगमसूत्रम् । विशेषव्याख्या-जिन रूपीद्रव्योंको अवधिज्ञानी जानता है, उससे अनन्त भा- गमें मनःपर्यायज्ञानका विषय निबंध है । अवधिज्ञानका विषय जो पदार्थ है, उसका अनन्तभाग अति सूक्ष्मतर मनःपर्यायज्ञानका विषय है । अतएव अवधिज्ञानके विषयके अनन्तवें भागको मनःपर्यायज्ञानी जानता है। और रूपीद्रव्योंको भी जो मनमे रहस्य गुप्त भावको प्राप्त मानुषक्षेत्रमें व्यवस्थित है, उनको जानता है । और मानुपक्षेत्रमे स्थित विशुद्धतर रूपी द्रव्य हैं, उनको मनःपर्यायज्ञानी जानता है ॥ २९ ॥ सर्वद्रव्यपर्यायेषु केवलस्य ॥ ३०॥ सूत्रार्थः-सम्पूर्ण द्रव्य तथा सम्पूर्ण पर्यायोंमें केवल ज्ञानका विषय निवन्ध है । भाष्यम्--सर्वद्रव्येषु सर्वपर्यायेषु च केवलज्ञानस्य विषयनिवन्धो भवति । तद्धि सर्व- भावग्राहक संभिन्नलोकालोकविषयम् । नातः परं ज्ञानमस्ति । न च केवलज्ञानविषयात्परं किंचिदन्यज्ज्ञेयमस्ति । केवलं परिपूर्ण समग्रमसाधारणं निरपेक्षं विशुद्धं सर्वभावज्ञापकं लो- कालोकविषयमनन्तपर्यायमित्यर्थः ।। विशेष व्याख्या-जीवादि सम्पूर्ण द्रव्य तथा उन द्रव्योंके यावत् पर्याय है, सब केवल ज्ञानके विषय हैं । वह केवल ज्ञान संभिन्न लोक तथा अलोक सर्व विषयक है और सर्वभावोंका ग्राहक अर्थात् ग्रहण करनेवाला है। केवल ज्ञानसे बढकर कोई भी ज्ञान नही है । और केवल ज्ञानका जो विषय है, उससे परे कोई ऐसा अन्य पदार्थ भी नही है, जो कि केवल ज्ञानसे प्रकाशित न होवे । तात्पर्य यह है, कि सम्पूर्ण विषय तथा सम्पूर्ण विषयोंके सम्पूर्ण स्थूल तथा सूक्ष्म सर्व पर्याय है, उन सबको केवल ज्ञान प्रकाशित करता है । केवल ज्ञान परिपूर्ण है । समग्र है । असाधारण है । अन्य ज्ञानोंसे निरपेक्ष है अर्थात् निज विषयोंको अन्यकी अपेक्षा न रखके स्वयं सबको प्रकाशित करता है। विशुद्ध है। सर्व भावोंका ज्ञापक अर्थात् जतानेवाला है। लोकालोक विषयक है, अर्थात् लोक अलोक सभी इसके विषय है । तथा अनन्त पर्याय है, अर्थात् सब द्रव्योंके अनन्त पर्यायोंको यह केवलज्ञान प्रकाश करता है ॥ ३० ॥ अत्राह । एषां मतिज्ञानादीनां युगपदेकस्मिजीवे कति भवन्तीति । अत्रोच्यते । अब यहांपर कहते है, कि ये जो मतिज्ञानादि ज्ञान है, इनमसे एक कालम तथा एक जीवमें कितने ज्ञान हो सक्ते है, अर्थात् एक ही कालमें एक ही जीवमें एक या दो अथवा और कितने ज्ञान हो सक्ते है ? इस हेतुसे यह अग्रिमसूत्र कहते है। एकादीनि भाज्यानि युगपदेकस्मिन्ना चतुर्थ्यः ।। ३१ ।। सूत्रार्थ:-एक कालमें तथा एक जीवमें मति आदिज्ञानोंमसे एकसे लेकर चारतक ज्ञान हो सकते है।

२८ रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् भाष्यम्-एषां मत्यादीनां ज्ञानानामादित एकादीनि भाज्यानि युगपरिमीचे दर चतुर्व्यः । कस्मिश्विनीवे मत्यादीनामके भवति । करिमश्चिजीब है भवतः 1 कम्नितिरीणि भवन्ति । कस्मिंश्चिञ्चत्वारि भवन्ति । श्रुतज्ञानस्य तु मतिनानेन नियनः नदभावनापूर्वक- त्वात् । यस्य तु मतिज्ञानं तस्य श्रुतज्ञानं स्वाद्वान वेति । अत्राह । अथ कंवलनानन्य पं. मंतिज्ञानादिभिः किं सहभावो भवति । नेत्युच्यते । केचिदाचार्या व्याचक्षने । नामावः । किं तु तदभिभूतत्वादकिंचित्कराणि भवन्तीन्द्रियवन् । यथा वा न्यभ्रे नम आदिल दिले भूरितेजस्त्वादादित्येनाभिभूतान्यन्यतेजांसि ज्वलनमणिचन्दनक्षत्रप्रभृतीनि प्रकाशन प्रालि चित्कराणि भवन्ति तद्वदिति । केचिदप्याहुः । अपायसान्यतया मतिनानं ना. शुन- ज्ञानमवधिज्ञानमनःपर्यायज्ञाने च रूपिद्रव्यविषये तस्मान्नतानि केवलिनः सन्तीनि ॥f. चान्यत् । मतिज्ञानादिषु चतुर्यु पर्यायेणोपयोगो भवति न युगपन् । मंभिन्नवानदानन्ननु भगवतः केवलिनो युगपत्सर्वभावप्राहके निरपेक्षे केवलजाने केवलदर्शने चानुनमयनुपयोगी भवति ॥ किं चान्यत् । क्षयोपशमजानि चत्वारि ज्ञानानि पूर्वाणि क्षयादेव केवलं । तरगान केवलिनः शेषानि ज्ञानानि सन्तीति ।। विशेष व्याख्या ये जो मतिज्ञानादि ज्ञान कहे है, उनमसे आरंभ (मनिना- नसे लेकर ) एक कालमें तथा एक जीवमें एक ज्ञानसे लेकर चार ज्ञानतक प्राप्त हो सक्त है । किसी जीवमें एक ही ज्ञान होता है, किसीमें दो होते हैं, किनी जीवमें तीन होते हैं और किसी जीवमें चारों ज्ञान होते हैं। तात्पर्य यह है, कि एक कालमें किनी जीवमें एक मतिज्ञान ही होता है। किसीमें मति श्रुत दोनों होते है, अथवा मति अवधि और मति मनःपर्याय होते है, किसीमें मति, श्रुत अवधि ये तीन होते हैं । और किसीमें मति, श्रुत, अवधि तथा मनःपर्याय ये चारों होते है । किन्तु यह अवश्य जानना उचित है, कि जहां श्रुतज्ञान है, वहां उसके साथ मतिज्ञानका पूर्व सहभाव अवश्य नियत है, क्योंकि मतिज्ञानपूर्वक श्रुतज्ञान होता है । अतएव यह नियम है, कि जिसको श्रुतज्ञान है उसको नियमसे मतिज्ञान है; परन्तु जितको मतिज्ञान है उसको श्रुतज्ञान हो भी और न भी हो । अब यहांपर यह कहते है कि, केवल ज्ञानका मत्तिज्ञानादिके साथ सहभाव है कि नहीं है? उत्तर-केवल ज्ञानके साथ मतिज्ञानादिका सहभाव नहीं है । परन्तु कोई २ आचार्य कहते है कि, केवल ज्ञानकी सत्ता दशामें मतिज्ञानादि ज्ञानोंका अभाव नहीं है किन्तु केवलज्ञानसे वे मत्यादि ज्ञान अभिभूत (पराजित ) होनेसे ऐसे अकिंचित्कर है, जैसे कि नेत्रादि इन्द्रियां । केवल दशामें मति- श्रुतादि अन्यज्ञान अमिभूत होकर ऐसे अकिंचित्कर हैं, जैसे मेघ रहित आकाशमें सूर्यके उदित होनेपर अधिक तेजके कारण सूर्य से अभिभूत अग्नि, मणि, चन्द्रमा तथा नक्षत्रा- दिके तेज प्रकाश करनेमें अकिचित्कर है । और कोई ऐसा कहते है कि अपाय सद्रव्यता अर्थात् श्रोत्रादि इन्द्रियोंसे उपलब्ध पदार्थक निश्चयार्थ मतिज्ञानकी प्रवृत्ति होती है ।

L सभाष्यतत्त्वार्थाधिगमसूत्रम् । २९ इस हेतुसे श्रुतज्ञान मतिज्ञान पूर्वक है। अवधिज्ञान तथा मनःपर्याय ज्ञान भी रूपी द्रव्यके विषयमें अपायसद्रव्यतासे ही प्रवृत्त होता है। अतः उनकी सत्तामे मतिज्ञान रह सका है । और केवलज्ञानीको इन्द्रियद्वारा पदार्थोपलब्धि नही होती, इस कारणसे केवलज्ञा- नीको मतिज्ञानादिज्ञान नहीं है । किं चान्यत् । और भी यह बात है, कि मतिज्ञानादि चारों ज्ञानों में पर्याय वा क्रमसे उपयोग होता है न कि एक ही कालमे । और मिलित है ज्ञानदर्शन जिसका ऐसे भगवान् केवलीको तो एक ही कालमे सर्वभावके ज्ञापक वा ग्राहक और अन्यज्ञाननिरपेक्ष केवलज्ञान तथा केवलदर्शन होते है और प्रतिक्षण वा प्रतिसमय ज्ञानोपयोग तथा दर्शनोपयोग होता है। और यह भी है, कि पूर्वमतिज्ञानादि चार ज्ञान तो ज्ञानावरणके क्षयोपशमसे उत्पन्न होते हैं, और केवल ज्ञान क्षयसे ही उत्पन्न होता है; इसलिये भी केवलज्ञानीको मतिज्ञान आदि शेष चार ज्ञान नहीं होते ॥३१॥ मतिश्रुतावधयो विपर्ययश्च ॥ ३२ ॥ सूत्रार्थ:-मति, श्रुत तथा अवधिज्ञान विपर्यय रूप भी होते है अर्थात् ये अज्ञान- रूप भी हो जाते है। (१) नेत्रादि इन्द्रियोसे उपलब्ध जो ईहित पदार्थ है, उसके निश्चयको अपाय कहते है. अर्थात् अवग्रह तथा ईहारूप मतिज्ञानसे गृहीत पदार्थके निश्चयको अपाय कहते है. ऐसा अपाय केवलीको अपेक्षित नहीं है, इस कारण केवलीको मतिज्ञानादिकी आवश्यकता नहीं है। (२) किं चान्यत् इससे अपने दोनो आशयोंको ग्रन्थकर्ती प्रकाश करते हैं, कि मतिज्ञानादि चागे ज्ञानोमें पर्यायसे क्रमसे उपयोग तथा निज २ विषयग्राहिता होती है, न कि एक कालमं । इनमें एक २ का. लमे न तो उपयोग ही है, और न निज २ विषयोमे ग्राहकतारूप व्यापार ही है । जिस समय मतितानी मतिज्ञानसे उपयुक्त है अर्थात् मतिज्ञानरूप उपयोग उसमे है, उस समय अन्यश्रुतादि ज्ञानसे नहीं; और इसीप्रकार जिस समय श्रुतज्ञानसे उपयुक्त है, उस समय अन्यमतिआदि ज्ञानमे नहीं है । और केवलीसे तो क्रमसे एतद्ज्ञानगत उपयोग नहीं है क्योंकि उसके विषयमे यह कहा गया है कि उसके दर्शन नया ज्ञान संमिलित हैं। विशेष ग्राहक ज्ञान और सामान्य ग्राहक दर्शन ये दोनों जिस केवली भगवानके नमिन हैं, अर्थात् सर्वभाव ग्राहक हैं और माहात्म्यादि गुणोसे संयुक्त सर्व द्रव्यपर्यायग्राहक केवल मान जिसने है वह केवली भगवान् है । उनको एक कालमे ही प्रतिसमय उपयोग होता है । सर्वभाव पचाग्निसायासिंग ग्राहक तथा इन्द्रियादिकी अपेक्षासे रहित उसका ज्ञान है । उसम कालकृतव्यवधानसे शून्य निरन्तर उपयोग होता रहता है । 'अनुसमय, पदसे वारंवार उपयोग होता है, यह तात्पर्य है । कोई २ पस्तिमन्य 'सूत्रका अन्यथा व्याख्यान करते हैं वह असगत हैं । कदाचित् यह कहो कि, साझारज्ञान तथा निगशरमान इन शब्दोंमें भेद होनेसे वारंवार एक कालमे ही दर्शनोपयोग तथा ज्ञानोपयोग नहीं हो सका, क्योति प्रमन सामान्य ग्राहक निराकार दर्शन हो लेगा, पश्चात् ज्ञानोपयोग होगा सो भी टीक नहीं है, क्या या भग. वान्का जव ज्ञानावरणी सर्वथा क्षीण हो गया और दर्शनावरणी भी सर्वथा निरवगेप नष्ट हो गया :- रण भेद कहां रहा? भगवान् केवलीका ज्ञान तो सर्वथा और सर्वदा विशेषरूपयो परिधिमा पस ग्राहक है। वहां अष्टविधि ज्ञानोपयोग और चतुर्विधि दर्शनोपयोग यर भी भेट न गा, अपने गिदग, कि केवलीको मत्यादि ज्ञान नहीं होते रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् ३० भाष्यम्-मतिज्ञानं श्रुतज्ञानमवधिज्ञानमिति । विपर्ययश्च भवत्यनानं चेत्यर्थः । ज्ञान- विपर्ययो ऽज्ञानमिति । अत्राह । तदेव ज्ञानं तदेवाज्ञानमिति । ननु च्छायातपवच्छीतोष्णवच तइत्यन्तविरुद्धमिति । अत्रोच्यते । मिथ्यादर्शनपरिग्रहाद्विपरीतग्राहकत्वमेतेपाम् । तत्ला- दज्ञानानि भवन्ति । तद्यथा । नत्यज्ञानं श्रुताज्ञानं विभङ्गज्ञानमिति । अवधिविपरीतो विभड़ इत्युच्यते ॥ विशेषव्याख्या-मतिज्ञान, श्रुतज्ञान तथा अवधिज्ञान ये विपर्यय अर्थात् अज्ञान तरूपताको भी प्राप्त होते है क्योंकि विपर्यय कहनेसे ज्ञानका विपर्यय वा विरोधी अज्ञान हुआ । अब यहांपर कहते हैं, कि वे ही मति आदि ज्ञान और वे ही अज्ञान हैं ऐसा कयन किया सो यह कथन छाया और आतप अथवा शीत और उप्णके समान अत्यन्त विरुद्ध है, अर्थात् एकहीम दो विरुद्ध धर्न कैसे रह सक्ते है ? अब इसका उत्तर कहते हैं कि मिथ्यादर्शनके होनेसे इन मत्यादिज्ञानोंकी विपरीतग्राहकता हो जाती है, इस कार- णसे ये अज्ञान जाते है । जैसे मत्यज्ञान, श्रुताजान, और विभङ्गज्ञान । विपरीताव- विज्ञानको ही विभङ्गबान कहते हैं, अथवा कुमति, कुश्रुत कुअघि वा विमझाववि यों भी मति आदिके विपर्ययको कहते हैं ॥ ३२ ॥ अत्राह । उक्तं भवता सन्यन्दर्शनपरिगृहीतं मलादिज्ञानं भवत्यन्यथा ज्ञानमेवेति मिथ्या- वट्योऽपि च भव्यायामन्याश्चेन्द्रियनिमित्तानविपरीतान्पर्शादीनुपलभन्ते उपदिशन्ति । सशे सर्श इति रसं रस इति । एवं शेषान् । तत्कथमेतदिति । अत्रोच्यते । तेषां हि विपरी- तमेतद्भवति। अब यहांपर कहते हैं, कि आपने यह कहा, कि सन्यग्दर्शनके होनेसे तो मत्यादि ज्ञान हैं और अन्यथा अर्थात् मिथ्यादर्शनके होनेसे विपरीत अर्थात् अज्ञान हो जाते हैं, यह कैसे संगत होता है? क्योंकि मिथ्याष्टिजन भी कोई भव्य हैं. कोई अभव्य हैं वे भी इन्द्रिय अनिन्द्रिय निमित्तक अविपरीत स्पर्शादि विषयोंको प्रात होते है । और स्पर्शको स्वर्ग, रसको रस, तथा रूपको रूप कहते हैं, इसी प्रकार शेष इन्द्रियोंक विषयोंको आपके सनान मिथ्याष्टि भी उपलब्ध करते हैं, तब यह कैसे हो सका है कि आपगृहीत तो मत्यादि ज्ञान है और अन्यंगृहीत अज्ञान है? । अव यहां उत्तर देते हैं कि मिथ्याष्टि- योंक नतिआविज्ञान विपरीत अर्थात् अज्ञान ही होते हैं, क्योंकि उनको विवेक नहीं है । इसलिये यह अग्रिमसूत्र कहते है। सदसनो रविशेषाद्यदृच्छोपलब्धरुन्मत्तवत् ॥३३॥ मृत्रार्थ:-मिथ्याष्टियोंके उन्मत्तके समान सत् तथा असत्की अविशेषसे यह- न्यापूर्वक उपलब्धि होने मत्यज्ञान श्रुताज्ञान विमङ्गज्ञान ही होते है । मयार - सभाण्यतत्त्वार्थाधिगमसूत्रम् । भाज्यम्-यथोन्मत्तः कर्मोदयादुपहतेन्द्रियमतिविपरीतग्राही भवति सोश्वं गौरित्यध्य- वस्यति गां चाश्व इति लोष्टं सुवर्णमिति सुवर्ण लोष्ट इति लोष्टं च लोष्ट इति सुवर्ण सुवर्ण- मिति तस्यैवमविशेषेण लोष्टं सुवर्ण सुवर्ण लोष्टमिति विपरीतमध्यवस्यतो नियतमज्ञानमेव भवति । तद्वन्मिथ्यादर्शनोपहतेन्द्रियमतेर्मतिश्रुतावधयोऽप्यज्ञानं भवन्ति ।। विशेषव्याख्या-जैसे उन्मत्त पुरुष कर्मोके उदयसे इन्द्रियोंकी मति वा शक्तिके नष्ट हो जानेसे विपरीतअर्थका ग्राही हो जाता है और विपरीत ग्रहणके स्वभावसे अश्व को गौ, गौको अश्व निश्चय करता है। पाषाण को सोना, सोनेको पाषाण, माताको स्त्री, तथा स्त्रीको माता, और कदाचित् अविशेषरूपसे घोडेको घोडा, पाषाणको पाषाण, मा- ताको माता, और स्त्रीको स्त्री भी यदृच्छासे जानता है । उसको इस प्रकार अनालोचन- पूर्वक यदृच्छासे अविशेषतापूर्वक पाषाणको सुवर्ण, सुवर्णको पाषाणरूपसे विपरीत निश्चय होनेसे अज्ञान ही है, ऐसे ही मिथ्यादर्शनके आग्रहसे जिसकी इन्द्रियां उपहत (नष्टशक्ति) हो गई है, उसको मति, श्रुत तथा अवधिज्ञान भी अज्ञान ही है ॥ ३३ ॥ उक्तं ज्ञानं । चारित्रं नवमेऽध्याये वक्ष्यामः । प्रमाणे चोक्ते । नयान्वक्ष्यामः तद्यथा । ज्ञानका वर्णन कर चुके, चारित्र नववें अध्यायमे कहेंगे। प्रमाण भी परोक्षप्रत्यक्षभेदसे कह चुके, अब आगे नयका निरूपण करते है । जैसे:- नैगमसङ्घहव्यवहार सूत्रशब्दा नयाः ॥ ३४ ॥ सूत्रार्थः-नैगमादि पांच नय है। भाग्यम्-नैगमः सङ्ग्रहो व्यवहार ऋजुसूत्रः शब्द इत्येते पञ्च नया भवन्ति । तत्र । विशेषव्याख्या नैगम, संग्रह व्यवहार ऋजुसूत्र, तथा शब्द ये पांच नय है ॥ ३४ ॥ उनमें। आद्यशब्दौ द्वित्रिभेदौ ॥ ३५ ॥ सूत्रार्थ:-आद्य अर्थात् प्रथम नैगम नय दो प्रकारका है, शब्दनयके तीन भेद है। भाष्यम्-आद्य इति सूत्रक्रमप्रामाण्यान्नैगममाह । स द्विभेदो देशपरिक्षेपी सर्वपरिक्षेपी चेति । शब्दस्त्रिभेदः साम्प्रतः समभिरूढ एवम्भूत इति ।। अत्राह । किमेपां लक्षणमिति । अत्रोच्यते । निगमेषु येऽभिहिताः शब्दास्तेषामर्थः शब्दार्थपरिज्ञानं च देशसमग्रग्राही नैगमः। अर्थानां सर्वैकदेशसग्रहणं संग्रहः । लौकिकसम उपचारप्रायो विस्तृतार्थो व्यवहारः । सतां साम्प्रतानामर्थानामभिधानपरिज्ञानमृजुसूत्रः । यथार्थाभिधानं शब्दः । नामादिपु प्रसिद्ध- पूर्वाच्छब्दादर्थे प्रत्ययः साम्प्रतः। सत्वर्थेष्वसङ्क्रमः समभिरूढः। व्यसनार्थयोरेवम्भूत इति ॥ विशेष व्याख्या-उन पांच नयोंके मध्यमें आदिमें होनेवाले नैगम नयके दो भेद है। जैसे देशपरिक्षेपी और सर्वपरिक्षेपी । और शब्दनयके तीन भेद है, साम्प्रत, सम- . रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् ३२ भिरूड, एवंभूत । अब इन नयोंके लक्षण क्या है। इसलिये कहते हैं:-निगमों में (शास्त्रोंमें ) जो शब्द कहे गये है, उनके अर्थ, और शब्द तथा अर्थका जो ज्ञान है वह एकदेशसे ग्राही वा समग्ररूपसे ग्राही नैगम है । अर्थोंका सव रूपसे वा एकदेशसे जो संग्रह है, उसको संग्रह कहते है । लौकिकके समान उपचारसे बहुधा पूर्ण और विस्तृत अर्थका बोधक जो है वह व्यवहार नय है । विद्यमान सांप्रतिक अर्थाका अभिधान अथवा परिज्ञान जो है, उसको ऋजुसूत्र कहते है । और यथार्थ वस्तुका कथन वा नाम जो है, उसको शब्दनय कहते हैं। नामादिकमें प्रसिद्ध पूर्व शब्दसे जो शब्दार्थमें प्रत्यय अर्थात् ज्ञान है, वह सांप्रत शब्द नय है । विद्यमान अर्थोंमें जो असंक्रम है, वह सममिरुढ शब्द- नय है । और व्यञ्जन तथा अर्थमें जो प्रवृत्त है, वह एवंभूतनय है ॥ ३५ ॥ भाष्यम्-अत्राह । उहिष्टा भवता नैगमादयो नयाः । तन्नया इति कः पदार्थ इति । नयाः प्रापकाः कारकाः साधका निर्वतका निर्भासका उपलम्भका व्यसका इत्यनन्तरम् । जीवादीन्पदार्थान्नयन्ति प्राप्नुवन्ति कारयन्ति साधयन्ति निर्वर्तयन्ति निर्भासयन्ति उपल- म्भयन्ति व्यञ्जयन्तीति नयाः ।। अव यहांपर कहते हैं, कि आपने नैगम आदि नयोंका संकीर्तन किया, अव उन न- योंमें नयत्व क्या पदार्थ है ? अर्थात् यहां नयशब्दका व्युत्पत्तिलभ्य अर्थ क्या है ? इसका उत्तर कहते है:- नय, प्रापक (अर्थविशेषको प्राप्त करानेवाले) कारक (विशेप कार्यके करनेवाले) साधक, निर्वर्तक, निर्भासक (किसी अर्थके प्रकाशक) उपलम्भक, तथा व्यञ्जक ये सब पर्यायवाचक वा समानार्थक शब्द है । जो जीवादि पदार्थोंको प्राप्त करते है, प्राप्त होते है, कराते हैं, सिद्ध करते है, व्यवहारमें वर्ताते है, प्रकाशित करते है, उपलब्ध करते है, और प्रकट करते है, वे नय है । तात्पर्य यह कि नयशव्दका प्रापक, कारक तथा साधक आदि अर्थ है। भाष्यम्-अत्राह । किमेते तन्त्रान्तरीया वादिन आहोस्वित्स्वतन्त्रा एव चोदकपक्षग्राहिणो मतिभेदेन विप्रधाविता इति । अत्रोच्यते । नैते तन्त्रान्तरीया नापि स्वतन्त्रा मतिभेदेन विप्र- धाविताः । ज्ञेयस्य त्वर्थस्याध्यवसायान्तराण्येतानि । तद्यथा । घट इत्युक्ते योऽसौ चेष्टाभि- निवृत्त ऊर्ध्वकुण्डलोप्टायतवृत्तग्रीवोऽधस्तात्परिमण्डलो जलादीनामाहरणधारणसमर्थ उत्तर- गुणनिर्वर्तनानिवृत्तो द्रव्यविशेषस्तस्मिन्नेकस्मिन्विशेषवति तनातीयेषु वा सर्वेष्वविशेषात्प- रिनानं नैगमनयः । एकस्मिन्वा वहुपु वा नामादिविशेषितेषु साम्प्रतातीतानागतेषु घटेपु मन्प्रत्ययः सङ्ग्रहः । तेष्वेव लौकिकपरीक्षकप्राह्येषूपचारगम्येषु यथास्थूलार्थेपु संप्रत्ययो व्यव- हारः । तेप्वेव सत्सु साम्प्रतेपु संप्रत्यय ऋजुसूत्रः । तेष्वेव साम्प्रतेषु नामादीनामन्यतम- ग्राहियु प्रसिद्धपूर्वकेपु घटेपु सम्प्रत्ययः साम्प्रतः शब्दः । तेषामेव साम्प्रतानामध्यवसाया- व्यञ्जनार्थयोरन्योन्यापेक्षार्थप्राहित्वमेवम्भूत नामो वितर्कध्यानवत् समभिरूढः । तेषामेव, इति ॥

सभाप्यतत्त्वार्थाधिगमसूत्रम् । यहाँपर यह शंका करते हैं, कि ये नय हैं, सो जैनतन्त्र (शास्त्र) से भिन्न जो कणाद आदिके शास्त्र वैशेषिक आदि हैं, उनमें कुशल जो वादी है उनके संकेत है अर्थात् वैशे- विकतन्त्रवादीजन इनको नय कहते है ? अथवा स्वतन्त्र (निज जैनशास्त्र) के संकेतसिद्ध चोदक पक्षपाही अर्थात् दुरुक्त विषयके सूचक पक्षको ग्रहण करनेवाले अयथार्थ अर्थको मतिभेदसे कहनेकेलिये सहसा प्रवृत्त होनेवाले ये नय है? इसका समाधान करते है, कि ये नय कणाद वैशेषिक आदि शास्त्रोंके नही है, और स्वतंत्र मतभेदसे अयथार्थ अर्थके निरूपणकेलिये भी नहीं दौड पडे हैं, किन्तु ज्ञेय जीवादिक पदार्थोंके बोध करानेको उपाय विशेष ये नैगमादि नय हैं । जैसे घट (घटा) ऐसा कहनेपर कुंभकारकी चेष्टाओंसे उत्पन्न उर्ध्वदेशमें कुंडलाकार, विस्तृत, ओष्टसहित, वर्तुलाकार, ग्रीवायुक्त, अधोदेशमें परिमंडलाकार, जलादि द्रवीभूत पदार्थोंके आनयन तथा धारणादि कार्यो में समर्थ, तथा उत्तरोत्तर पाकजनित रक्तादिगुणोंकी समाप्तिसिद्ध जो द्रव्य विशेप है उस एकमें वा उस जातिके सम्पूर्ण घटोंमें अविशेषरूपसे जो परिज्ञान है, वह नैगम नयका विषय है। तथा एक अथवा अनेक वर्तमान, अतीत, अनागत (होनेवाले) नाम आदिसे विशेषित घटोंका जो ज्ञान है, वह संग्रहनय है, अर्थात् संग्रहनयका विषय है। और लौकिक परीक्षाओंसे ग्रहण करने योग्य उपचारसे जानने योग्य उन्ही घटोंमें स्थूल पदार्थोके तुल्य जो ज्ञान है वह व्यवहार नय है । तथा वर्तमान कालमें विद्यमान उन्हीं घटोंमें जो ज्ञान है वह ऋजुसूत्र नयका विषय है । तथा नामादिमेंसे किसी एकके द्वारा ग्राह्य और प्रसिद्धिपूर्वक उन्हीं वर्तमानकालिक घटोमें जो ज्ञान है वह सांप्रत शब्द नयका विषय है। और वितर्क ध्यानके समान उन्हीं सांप्रत घटोंमें अध्यवसाय (निश्च- यात्मक ज्ञान ) का जो असंक्रम है वह समभिरूढ नय है । और उन्हीमें व्यञ्जन तथा अर्थकी परस्पर अपेक्षासे जो पदार्थग्राहकता है, वह एवंभूत नयका विषय है भाष्यम्-अत्राह । एवमिदानीमेकस्मिन्नर्थेऽध्यवसायनानात्वान्ननु विप्रतिपत्तिप्रसङ्ग इति। अत्रोच्यते । यथा सर्वमेकं सदविशेषात् सर्व द्वित्वं जीवाजीवात्मकत्वात् सर्व नित्वं द्रव्य- गुणपर्यायावरोधात् सर्व चतुष्वं चतुर्दर्शनविषयावरोधात् सर्व पञ्चत्वमस्तिकायावरोधान् सर्व षट्त्वं षड्द्रव्यावरोधादिति । यथैता न विप्रतिपत्तयोऽथ चाध्यवसायस्थानान्तराण्येतानि तद्वन्नयवादा इति । किं चान्यत् । यथा मतिज्ञानादिभिः पञ्चभि नैर्धर्मादीनामस्तिकाया- नामन्यतमोऽर्थः पृथक् पृथगुपलभ्यते पर्यायविशुद्धिविशेपादुत्कण न च ता विप्रतिपत्तयः तद्वन्नयवादाः । यथा वा प्रत्यक्षानुमानोपमानाप्तवचनैः प्रमाणैरेकोऽर्थः प्रमीयते स्वविपय. नियमात् न च ता विप्रतिपत्तयो भवन्ति तद्वन्नयवादा इति । आह च- अब यहांपर कहते है, कि एक ही पदार्थमें ज्ञानकी अनेकता (नैगम संग्रह आदि रु. पसे अनेक ज्ञानविषयता) होनेसे विवादका प्रसङ्ग हो गया, अर्थात् कीदृशज्ञानसे ग्रहा- . , ५ ४ रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् ३४ पर घट ग्राह्य है ? इस प्रकार विवाद प्राप्त हुआ। इसका उत्तर कहते है:-- सबै एक ही है, क्योंकि सत्वरूपसे सबमें अभेद है, अर्थात् सद्रूपसे सब अभिन्न है । जैसे जो सन् है धर्म सत् है, अधर्म सत् है, आकाश सत् है, इस प्रकार सत्स्वरूपसे किसीम भेद नहीं है । तथा सब द्विविध है, क्योंकि सब कुछ चेतन और अचेतनमन है, चेतन और अचेतनसे भिन्न कुछ नहीं है, इसलिये चेतन और अचेतन भेदसे सब द्विविध है । तथा सब त्रित्व संख्यायुक्त है; क्योंकि द्रव्य, गुण और पर्यायरूप ही समस्त लोक है । द्रव्य गुण और पर्याय इनसे भिन्न कुछ नही है; इसलिये सब जगत त्रिविध है । तथा सत्र चार संख्या युक्त है, क्योंकि चक्षुदर्शन अचक्षुदर्शन, अवधिदर्शन तथा केवलदर्शन इन चार प्रकारके दर्शनविषयोंमें सब गतार्थ है । तथा सब कुछ पंचसंख्यामय है, क्योंकि जीवास्तिकायादि पंचास्तिकायमें सब गतार्थ है । तथा सब कुछ पसंख्यामय हैं; क्योंकि षड्द्रव्यमें सब अन्तर्भूत है। जैसे एकत्व, द्वित्व आदि विवादके स्थान नहीं हैं, किन्तु कथन तथा ज्ञानकी भिन्न २ परिपाटी है, ऐसे ही नयवाद भी है। किं च दूसरी यह भी वार्ता है, कि जैसे मतिज्ञान आदि पांच ज्ञानोंसे धर्मास्तिकाय आदि पंचास्तिकायोंमें कोई एक अस्तिकायरूप पदार्थ पर्यायविशुद्धि तथा उत्कर्षसे पृथक् २ उपलब्ध होता है; और वह पृथक् २ उपलब्धि विप्रतिपत्ति नहीं है, ऐसे ही नयवाद भी है । अर्थात् पृथक् २ नयसे भिन्न प्रकारसे पदार्थोंके स्वरूप जाने जाते हैं, इसमें कुछ विवाद नहीं है । अथवा जैसे निज २ विषयके नियमसे प्रत्यक्ष अनुमान उपमान तथा आप्तवचनसे एक ही पदार्थ प्रमाण साक्षात् विषयीभूत किया जाता है, किन्तु वह अनेक प्रमाणोंसे एक पदा- र्थकी प्रमिति विवाद नहीं है। ऐसे ही नयवाद भी हैं। अब इस विषयमें संक्षिप्त रुचिवा- लेको बोध करानेके अनुग्रहसे आर्याद्वारा कहते हैं,:- नैगमशब्दार्थानामेकानेकार्थनयगमापेक्षः । देशसमग्रमाही व्यवहारी नैगमो ज्ञेयः ॥ १ ॥ यत्सङ्गृहीतवचनं सामान्ये देशतोऽथ च विशेषे । तत्सग्रहनयनियतं ज्ञानं विद्यान्नयविधिज्ञः ॥ २ ॥ समुदायव्यक्ताकृतिसत्तासज्ञादिनिश्चयापेक्षम् । लोकोपचारनियतं व्यवहारं विस्तृतं विद्यात् ॥ ३ ॥ साम्प्रतविपयग्राहकमजुसूत्रनयं समासतो विद्यात् । विद्याद्यथार्थशब्दं विशेषितपदं तु शब्दनयम् ॥ ४ ॥ इति ।। निगमजन पदमे होनेवाले शब्द और उनके अर्थोंको नैगम, और उन नैगम शब्दाथों- भने एक विशेप तथा अनेक सामान्यविषयों वा अर्थोंके एकदेशसे वा समग्ररूपसे ग्रहण करानमें जो ममर्थ है, उसको व्यवहारी नैगम कहते है ॥ १॥ ६व्यमगृह ।

- सभाष्यतत्त्वार्थाधिगमसूत्रम् । ३५ सामान्य विषयमें वा विशेषके विषयमें जो संगृहीतका वचन अभिधान है, उस संग्रह नयके नियत ज्ञानकी नयविधि जाननेवालेको संग्रह नय जानना चाहिये ॥२॥ समुदाय, व्यक्ति, आकृति, सत्ता और संज्ञा अर्थात् नाम स्थापना द्रव्य और भाव आदिके निश्चयकी अपेक्षा रखनेवाला, तथा लौकिक उपचारसे जो नियत है; उसको वि- स्तृत व्यवहार नय जानना चाहिये ॥ ३ ॥ और संक्षेपसे साम्प्रतविषयका जो ग्राहक है, उसको ऋजुसूत्र नय जानना चाहिये । तथा यथार्थविषयक साम्प्रतसमभिरूड और एवंभूत इत्यादि पदोंसे जो विशेषित उ- सको शब्द नय जानना चाहिये ॥ ४ ॥ भाष्यम्-अत्राह । अथ जीवो नोजीवः अजीवो नोऽजीव इत्याकारिते केन नयेन कोऽर्थः प्रतीयत इति । अत्रोच्यते । जीव इत्याकारिते नैगमदेशसहव्यवहारर्जुसूत्रसाम्प्रतसमभिरूडैः पञ्चस्वपि गतिष्वन्यतमो जीव इति प्रतीयते । कस्मात् । एते हि नया जीवं प्रत्यौपशमि- कादियुक्तभावग्राहिणः । नोजीव इत्यजीवद्रव्यं जीवस्य वा देशप्रदेशौ । अजीव इत्यजीवद्र- व्यमेव । नोऽजीव इति जीव एव तस्य वा देशप्रदेशाविति ॥ एवम्भूतनयेन तु जीव इत्या- कारिते भवस्थो जीवः प्रतीयते । कस्मात् । एष हि नयो जीवं प्रत्यौदयिकभावग्राहक एव । जीवतीति जीवः प्राणिति प्राणान्धारयतीत्यर्थः । तच्च जीवनं सिद्धे न विद्यते तस्माद्भवस्थ एव जीव इति । नोजीव इत्यजीवद्रव्यं सिद्धो वा । अजीव इत्यजीवद्रव्यमेव । नोऽजीव इति भवस्थ एव जीव इति । समग्रार्थग्राहित्वाचास्य नयस्य नानेन देशप्रदेशौ गृह्यते । एवं जीवौ जीवा इति द्वित्वबहुत्वाकारितेष्वपि । सर्वसङ्ग्रहणे तु जीवो नोजीवः अजीवो नोऽजीवः जीवौ नोजीवौ अजीवौ नोऽजीवौ इत्येकद्वित्वाकारितेषु शून्यम् । कस्मात् । एष हि नयः सङ्ख्या- नन्त्याज्जीवानां बहुत्वमेवेच्छति यथार्थग्राही । शेपास्तु नया जात्यपेक्षमेकस्मिन्बहुवचनत्वं ब- हुपु च बहुवचनं सर्वाकारितग्राहिण इति । एवं सर्वभावेपु नयवादाधिगमः कार्यः । अब यहांपर कहते है । जीव, नोजीव तथा अजीव और नो अजीव ऐसा कहनेपर किस नयसे और कौनसा पदार्थ प्रतीत ( ज्ञानविषयीभूत ) होता है ? इसका उत्तर कहते है, कि 'जीव, ऐसा कहनेसे वा पुकारनेसे नैगम, देशसंग्रह, व्यवहार, ऋजुसूत्र, साम्प्रत और समभिरूढ नयोंसे पांचो गतियोंमें किसी एक जीवका ज्ञान होता है, क्योंकि ये नैगम आदि नय जीवके प्रति औपशमिकादि भावयुक्त पदार्थके ग्राहक है । तथा 'नोजीव, ऐसा कहनेसे अजीवद्रव्य वा जीवके देश प्रदेशका बोध होता है। और 'अजीव, ऐसा कहनेसे अजीव द्रव्यका ही ज्ञान होता है । और 'नो अजीव, ऐसा कहनेसे जीव अथवा जीवके देश प्रदेशका बोध होता है । और एवंभूत नयसे तो 'जीव, ऐसा कहनेसे भवस्थजीवका ग्रहण होता है, क्योंकि यह नय जीवके प्रति औदयिक भावका ग्राहक है। जीव इस शब्दकी व्युत्पत्ति यह है "जीवति (प्राणिति) इति जीव" अर्थात् जो दशो १ अवस्था.

रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम प्राणाको धारण करै । और वह प्राणधारणरूप जीवन सिद्धोंमें नहीं होता, इस हेतुसे 'जीव. एमा कहनेसे एवंभूत नयसे तो भवस्थजीवका ही ग्रहण होता है। और 'नो जीव, ऐन्ग कहनसे अजीवद्रव्य अथवा सिद्धका ग्रहण होता है । अजीव ऐसा कहनेसे अजीव द्रव्यका ही ग्रहण होता है, और नोजीव ऐसा कहनेसे संसारस्थ जीवका ही ज्ञान होता है । क्योंकि यह एवंभूत नय सम्पूर्णरूपसे पदार्थका ग्राहक है; इसके द्वारा देश तथा प्र- देशका ग्रहण नहीं होता । इसी रीतिसे "जीवो जीवाः" दो जीव वा वहुत जीव इत्यादि द्वित्व तथा बहुतरूपसे कहनेपर भी संसारस्थ जीवका ही इस नयसे ग्रहण होता है। और सम्पूर्ण जीवमात्रका ग्रहण होनेपर तो जीव, नोजीव (ईषत् जीव ), अजीव, नोऽ- जीव (ईपत् वा किंचित् अजीव) जीव (दो जीव) नोजीव (द्वित्वसंख्या सहित नो- जीव) तथा दो अजीव और दो नोऽजीव इत्यादि एकत्व वा द्विरूपसे कहनेपर शून्यका ही बोय होगा । क्योंकि यह यथार्थवाही नय संख्याकी अनन्ततासे जीवोंके वहुत्वको ही चा- हता है। और पूर्वोक्त उदाहरणमें तो एकत्व तथा द्वित्व ही हैं, अर्थात् एकवचन और द्वि- वचन ही है । और शेष जो नय है, वे तो जातिकी अपेक्षासे एकमें बहुवचन तथा बहुतमें भी बहुवचनको सम्पूर्ण वचनोंसे एक वचनादिसे आकारित उच्चारित विकल्पोंको ग्रहण करनेवाले हैं। इसी प्रकार सब पदार्थोमें नयवादका ज्ञान समझना चाहिये। भाग्यम्-अत्राह । अथ पञ्चानां ज्ञानानां सविपर्ययाणां कानि को नयः श्रयत इति । अत्रोच्यन । नगमादयम्नयः सर्वाण्यष्टौ अयन्ते । ऋजुसूत्रनयो मतिज्ञानमत्यज्ञानवर्जानि पट ।। अत्राह । फस्मान्मतिं सविपर्ययां न श्रयत इति । अत्रोच्यते । श्रुतस्य सविपर्ययस्यो- पात्यात । शब्दनयस्तु हे एवं श्रुतज्ञानकेवलज्ञाने श्रयते । अत्राह । कस्मान्नेतराणि श्रयत न । अत्रोच्यते । मत्लवधिमनःपर्यायाणां श्रुतस्यैवोपग्राहकत्वान् । चेतनाज्ञखाभाब्याञ्च सर्व- श्रीयानां नान्य कधिन्मिथ्याष्टिरजो वा जीवो विद्यते । तस्मादपि विपर्ययान्न श्रयत इति । माना प्रत्यक्षानुमानोपमानाप्रवचनानामपि प्रामाण्यमभ्यनुज्ञायत इति । आह च- ।

सभाष्यतत्त्वार्थाधिगमसूत्रम् । उत्तर कहते हैं, कि मति, अवधि, तथा मनःपर्याय ज्ञानोंको श्रुतकी उपग्राहकता है । तथा सब संसारी जीवोंका चेतनज्ञ स्वभाव होनेसे इस नयकी दृष्टि में कोई मिथ्यादृष्टि अथवा अज्ञानी जीव है ही नहीं । इस कारणसे शब्दनय विपर्ययोंका आश्रय नहीं करेगा। इसी कारण प्रत्यक्ष, अनुमान, उपमान, तथा आप्तवचन इनका भी प्रामाण्य हम स्वीकार करते हैं । और कहा भी है,:- विज्ञायैकार्थपदान्यर्थपदानि च विधानमिष्टं च । विन्यस्य परिक्षेपान्नयैः परीक्ष्याणि तत्त्वानि ॥ १ ॥ ज्ञानं सविपर्यासं त्रयः श्रयन्त्यादितो नयाः सर्वम् । सम्यग्दृष्टान मिथ्यादृष्टेविपर्यासः ॥ २ ॥ ऋजुसूत्रः षट् श्रयते मतेः श्रुतोपग्रहादनन्यत्वात् । श्रुतकेवले तु शब्दः श्रयते नोऽन्यच्छूताङ्गत्वात् ॥ ३ ॥ मिथ्यादृष्टयज्ञाने न श्रयते नास्य कश्चिदज्ञोऽस्ति । ज्ञस्वाभाव्याज्जीवो मिथ्यादृष्टिर्न चाप्यज्ञः ॥ ४ ॥ इति नयवादाश्चित्राः कचिद्विरुद्धा इवाथ च विशुद्धाः । लौकिकविषयातीतास्तत्त्वज्ञानार्थमधिगम्याः ॥ ५ ॥ इति तत्त्वार्थाधिगमेऽर्हत्प्रवचनसङ्ग्रहे प्रथमोऽध्यायः समाप्तः ।। एक अर्थवाचक पदोंको तथा अनेक अर्थके वाचक पदोंको जानकर और इष्ट विधानका विन्यास करके अनन्तर परिक्षेपसे नयोंके द्वारा तत्त्वोंकी परीक्षा करनी चाहिये ॥१॥ आदिसे नैगम आदि तीन नय विपर्यय सहित सब ज्ञानोंका आश्रय करते हैं, उसमें सम्यग्दृष्टिको तो ज्ञान होता है और मिथ्यादृष्टिको विपर्यास होता है ॥ २ ॥ ऋजुसूत्र नय विपर्यय सहित मतिज्ञानको छोड़के शेष पट ज्ञानोंका आश्रय करता है, क्योंकि मतिज्ञानका अभेद होनेसे श्रुतसे ही उपग्रह हो जाता है, शब्दनय तो श्रुत और केवल ज्ञानका ही आश्रय करता है, न कि अन्यका; क्योंकि शब्दनय श्रुतका ही अङ्ग है ।। ३ ।। तथा मिथ्याडष्टि अज्ञानका आश्रय नहीं करता। क्योंकि इसकी दृष्टिमें ज्ञवभाव (ज्ञानी खभाव) होनेसे न तो कोई मिथ्यादृष्टि है, और न कोई अज्ञानी है।॥ ४ ॥ इस रीतिसे विचित्र नयवाद कहीं विरुद्ध सदृश होनेपर भी अति विशुद्ध तथा लौ- किक विषयोंसे परे हैं, इसीसे तत्त्वार्थज्ञानकेलिये इनको जानना चाहिये ॥ ५ ॥ इति तत्त्वार्थाधिगमेऽहत्प्रवचनसङ्गहे आचार्योपाधिधारिपण्डितठाकुर- प्रसादशर्मविरचितभाषाटीकासमलङ्कृतः प्रथमोध्यायः । .

और
,
रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम्
अथ द्वितीयोऽध्यायः।
अत्राह । उक्तं भवता जीवादीनि तत्त्वानीति । तत्र को जीवः कथं लक्षणो वेति ।
अत्रोच्यते ।
यहांपर कहते हैं, कि आपने जीव आदि तत्त्वोंको कहा है, सो जीव क्या और
उसका लक्षण क्या है ? इसलिये यह अग्रिमसूत्र कहते हैं।
औपशमिकक्षायिकौ भावौ मिश्रश्च जीवस्य स्वतत्त्वमौदयिकपा-
रिणामिकौ च ॥१॥
सूत्रार्थ:-औपशमिक, क्षायिक और मिश्रभाव जीवके स्वतत्त्व हैं, तथा औदयिक
और पारिणामिक भी है।
भाष्यम्-औपशमिकः क्षायिकः क्षायोपशमिक औदयिकः पारिणामिक इत्येते पञ्च
भावा जीवस्य स्वतत्त्वं भवन्ति ।
विशेपव्याख्या-औपशमिक, क्षायिक, क्षायोपशमिक, औदयिक तथा पारिणामिक ।
ये पांचभाव जीवके निजतत्त्व अर्थात् निज स्वभाव है ॥ १ ॥
दिनवाष्टादशैकविंशतित्रिभेदा यथाक्रमम् ॥२॥
सूत्रार्थ:-औपशमिक आदि पांच भाव यथाक्रमसे दो, नव, अठारह, इक्कीस तथा
तीन भेदवाले है।
भाप्यम्-एते औपशमिकादयः पञ्च भावा द्विनवाष्टादशैकविंशतित्रिभेदा भवन्ति ।
तद्यथा । औपशमिको द्विभेदः क्षायिको नवभेदः क्षायोपशमिकोऽष्टादशभेदः औदयिक एक-
विशतिभेदः पारिणामिकस्त्रिभेद इति । यथाक्रममिति येन सूत्रक्रमेणात ऊर्ध्व वक्ष्यामः ।
विशेषव्याख्या-पूर्वोक्त औपशमिक आदि पांच भाव जो जीवके स्वतत्त्व है उनके
भेद इस प्रकार है । जैसे औपशमिकके दो भेद, क्षायिकके नव भेद, क्षायोपशमिकके अठा-
रह भेद, औदायिकके इक्कीस भेद, और पारिणामिकके तीन भेद हैं । 'यथाक्रम, इसका
यह तात्पर्य है, कि जिस क्रमसे सूत्रमें उपनिबद्ध है, उसीसे ये भेद है। और जो जिसके
भेद है, उनको क्रमसे आगे कहते है ॥ २ ॥
सम्यक्त्वचारित्रे ॥३॥
मन्त्रार्थ:-प्रथम अर्थात् औपशमिकके सम्यक्त्व चारित्र दो भेद हैं।
भाग्यम्-सम्यक्त्वं चारित्रं च द्वावौपशमिको भावौ भवत इति ।
विशेपव्याख्या-सम्यक्त्व तथा चारित्र ये दो प्रकार औपशमिक भावके है अर्थात्
औपशमिकसम्यक्त्व और औपशमिकचारित्र दो भेद है ॥ ३ ॥
ज्ञानदर्शनदानलाभभोगोपभोगवीर्याणि च ॥ ४ ॥

सभाष्यतत्त्वार्थाधिगमसूत्रम् । ३९ सूत्रार्थ:-दूसरे अर्थात् क्षायिकके ज्ञान, दर्शन, दान, लाभ, भोग, उपयोग, वीर्य सम्यक्त्व और चारित्र ये नौ भेद है। भाष्यम्-ज्ञानं दर्शनं दानं लाभो भोग उपभोगो वीर्यमित्येतानि च सम्यक्त्वचारित्रे च नव क्षायिका भावा भवन्तीति । ज्ञान, दर्शन, दान, लाभ, भोग, उपयोग और वीर्य ये सात तथा च शब्दसे सम्यक्त्व और चारित्र मिलाकर नव प्रकारका क्षायिक भाव होता है, अर्थात् क्षायिक ज्ञान, क्षायिक दर्शन, क्षायिक दान, क्षायिक लाभ, क्षायिक भोग, क्षायिक उपभोग, क्षायिक वीर्य, क्षायिक सम्यक्त्व और क्षायिक चारित्र ॥ ४ ॥ ज्ञानाज्ञानदर्शनदानादिलब्धयश्चतुस्त्रित्रिपञ्चभेदाः सम्यक्त्वचा- रित्रसंयमासंयमाश्च ॥५॥ सूत्रार्थ:-चार प्रकारका ज्ञान, तीन प्रकारका अज्ञान, तीन प्रकारका दर्शन और पांच प्रकारकी लन्धि, तथा सम्यक्त्व, चारित्र और संयमासंयम ये अष्टादश भेद क्षायो- पशमिक भावके हैं। भाष्यम्-ज्ञानं चतुर्भेदं मतिज्ञानं श्रुतज्ञानमवधिज्ञानं मनःपर्यायज्ञानमिति । अज्ञानं त्रिभेदं मत्यज्ञानं श्रुताज्ञानं विभङ्गज्ञानमिति । दर्शनं त्रिभेदं चक्षुर्दर्शनमचक्षुर्दर्शनमवधिद- निमिति । लब्धयः पञ्चविधा दानलब्धि भलब्धिर्भोगलब्धिरुपभोगलब्धिर्वीर्यलब्धिरिति । म्यक्त्वं चारित्रं संयमासंयम इत्येतेऽष्टादश क्षायौपशमिका भावा भवन्तीति । विशेषव्याख्या-मतिज्ञान, श्रतज्ञान, अवधिज्ञान तथा मनःपर्याय मत्यज्ञान, श्रुताज्ञान तथा विभंगावधि ये तीन अज्ञान; चक्षुदर्शन, अचक्षुदर्शन और अवधि- दर्शन ये तीन दर्शन; दानलब्धि, लामलब्धि, भोगलब्धि, उपभोगलब्धि, तथा वीर्य- लब्धि ये पांच प्रकारकी लब्धि; इस प्रकार ज्ञानादि पन्द्रह और सम्यक्त्व, चारित्र, तथा संयमासंयम सब मिलाकर अठारह भेदवाला क्षायोपशमिक भाव है ॥ ५॥ गतिकषायलिङ्गमिथ्यादर्शनाज्ञानासंयतासिद्धत्वलेश्याश्चतुश्चतु: ख्येकैकैकैकषट्भेदाः ॥६॥ सूत्रार्थ:-चार गति, चार कषाय, तीन लिङ्ग, मिथ्यादर्शन एक, अज्ञान एक, अ- संयत एक, असिद्धत्व एक, और लेश्या छहः ये औदयिक भावोंके २१ भेद है । भाष्यम्ातिश्चतुर्भेदा नारकतैर्यग्योनमनुष्यदेवा इति । कपायश्चतुर्भेदः क्रोधी मानी मायी लोभीति । लिङ्गं त्रिभेदं स्त्रीपुमानपुंसकमिति । मिथ्यादर्शनमेकभेदं मिथ्यादृष्टिरिति । अज्ञानमेकभेदमज्ञानीति । असंयतत्वमेकभेदमसंयतोऽविरत इति । असिद्धत्वमेकभेदमसिद्ध इति । एकभेदमेकविधमिति । लेश्या पट्भेदाः कृष्णलेश्या नीललेश्या कापोतलेल्या तजो- लेश्या पद्मलेश्या शुक्ललेश्या । इत्येते एकविंशतिरौयिकभावा भवन्ति । । ज्ञान ये चार ज्ञाना , - ४० , रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् विशेपव्याख्या-नारक, तैर्यग्योनि मनुष्य और देव ये चार गति; क्रोध, मान, माया, तथा लोभ ये चार कषाय; स्त्रीवेद, पुंवेद और नपुंसकवेद ये तीन लिङ्ग; मिथ्या- असिद्धत्व दृष्टिरूप मिथ्यादर्शन एक, अज्ञान एक, अविरत असंयतरूप असंयत एक, एक, और कृष्णलेश्या, नीललेश्या, कापोतलेश्या, तेजोलेश्या पद्मलेश्या तथा शुक्ललेश्या इस प्रकार सब मिलकर इक्कीस प्रकार औदयिक भाव है ॥ ६ ॥ जीवभव्याभव्यत्वादीनि च ॥७॥ सूत्रार्थ:-जीवत्व, भव्यत्व, और अभव्यत्व ये तीनों पारिणामिक भाव है । भाज्यम्-जीवत्वं भव्यत्वमभव्यत्वमित्येते त्रयः पारिणामिका भावा भवन्तीति । आदि- ग्रहणं किमर्थमिति । अत्रोच्यते । अस्तित्वमन्यत्वं कर्तृत्वं भोक्तृत्वं गुणवत्त्वमसर्वगतत्वमना- दिकर्मसन्तानवद्धत्वं प्रदेशत्वमरूपत्वं नित्यत्वमित्येवमादयोऽप्यनादिपारिणामिका जीवस्य भावा भवन्ति । धर्मादिभिस्तु समाना इत्यादिग्रहणेन सूचिताः । ये जीवस्यैव वैशेषिकास्ते स्वशब्देनोक्ता इति । एते पञ्च भावास्त्रिपञ्चाशद्भेदा जीवस्य खतत्त्वं भवन्ति । अस्तित्वाद- यश्च । किं चान्यत्- विशेपव्याख्या-जीवत्व, भव्यत्व, तथा अभव्यत्व आदि पारिणामिक भाव हैं। पारिणामिक भावके तीन ही भेद कहे हैं, तब इस सूत्रमें आदिग्रहण क्यो किया ? इसका उत्तर कहते है,:-अस्तित्व, अन्यत्व, कर्तृत्व, भोक्तृत्व, गुणवत्व, असर्वगतत्व, अनादि- कर्मसन्तानबद्धत्व, प्रदेशत्व, अरूपत्व तथा नित्यत्व; इत्यादि और भी अनादिकालसिद्ध पारिणामिक भाव जीवके हैं। और ये अस्तित्वादि भाव धर्मादिके समान हैं, इसलिये आदिग्रहणसे उनको भी सूचित किया है । जो जीवके वैशेषिक अर्थात् जो विशेष करके जीवमे ही होते हैं, उनको तो पृथक् २ ख शब्दसे कहा है । ये औपशमिकादि पांचों भाव मिलके त्रिपञ्चाशत अर्थात् ५३ भेद जीवके खतत्त्व है, अर्थात् निज विशेष भाव है, जो कि जीवमें ही होते है । और अस्तित्वादि भी जीवके भाव हैं ॥ ७ ॥ और भी कहते है, उपयोगो लक्षणम् ॥ ८॥ सूत्रार्थ:-उपयोगवत्ता जीवका लक्षण है। भाग्यम्-उपयोगो लक्षणं जीवस्य भवति । विशेपव्याख्या-जीवका उपयोग लक्षण होता है अर्थात् जीव उपयोगलक्षणयुक्त होता है ॥ ८॥ स द्विविधोऽष्टचतुर्भेदः ॥९॥ सूत्रार्थः-वह उपयोग दो प्रकारका है। एक अष्टविध है, और दूसरा चतुर्विध है। भाप्यम्स उपयोगो द्विविधः साकारोऽनाकारश्च ज्ञानोपयोगो दर्शनोपयोगश्चेत्यर्थः ।

सभाष्यतत्त्वार्थाधिगमसूत्रम् । ४१ स पुनर्यथासङ्घधमष्टचतुर्भेदो भवति । ज्ञानोपयोऽगोऽष्टविधः । तद्यथा । मतिज्ञानोपयोगः श्रुतज्ञानोपयोगोऽवधिज्ञानोपयोगो मनःपर्यायज्ञानोपयोगः केवलज्ञानोपयोगो मत्यज्ञानोपयोगः श्रुतज्ञानोपयोगो विमङ्गज्ञानोपयोग इति । दर्शनोपयोगश्चतुर्भेदः । तद्यथा । चक्षुर्दर्शनोपयो- गोऽचक्षुर्दर्शनोपयोगोऽवधिदर्शनोपयोगः केवलदर्शनोपयोग इति ॥ विशेषव्याख्या-वह उपयोग दो प्रकारका है। एक साकार और दूसरा अनाकार । अर्थात् पहिला ज्ञानोपयोगसाकार दूसरा दर्शनोपयोगअनाकार । और वह यथाक्रमसे अष्ट- भेद तथा चतुर्भेद है । उनमेसे ज्ञानोपयोगके आठ भेद है । जैसे,:-मतिज्ञानोपयोग, श्रुत- ज्ञानोपयोग, अवधिज्ञानोपयोग, मनःपर्यायज्ञानोपयोग तथा केवलज्ञानोपयोग, मत्यज्ञा- नोपयोग, श्रुताज्ञानोपयोग, और विभङ्गज्ञानोपयोग, । यह अष्टविध ज्ञानोपयोग है। और दर्शनोपयोग चार प्रकारका है । जैसे,—चक्षुर्दर्शनोपयोग, अचक्षुर्दर्शनोपयोग, अवधिदर्श- नोपयोग, और केवलदर्शनोपयोग । यही विविध उपयोग है ॥ ९ ॥ संसारिणो मुक्ताश्च ।। १० ।। सूत्रार्थः-संसारी तथा मुक्त भेदसे जीवके दो भेद है । भाष्यम्-ते जीवाः समासतो द्विविधा भवन्ति संसारिणो मुक्ताश्च । किं चान्यत्- विशेषव्याख्या-जिस जीवका पूर्वमे उपयोग लक्षण कहा है, वह जीव संक्षेपसे दो प्रकारका है। एक तो संसारी जो अनेक प्रकारके जन्मधारणकरके संसारमें भ्रमण क- “रते है, और दूसरे मुक्त जीव वे हैं, जिनका संसारसे सम्बन्ध छूट गया है, तथा जो आवागमनसे रहित हो गये है ॥ १० ॥ और भी,:- समनस्कामनस्काः ॥ ११ ॥ सूत्रार्थ:-जीवके समनस्क और अमनस्क ये दो भेद है । भाष्यम्-समासतस्ते एव जीवा द्विविधा भवन्ति समनस्काश्च अमनस्काश्च । तान्पर- स्ताद्वक्ष्यामः ॥ विशेपव्याख्या-समनस्क तथा अमनस्क, अर्थात् मनसहित और मनरहित ये दो भेद जीवके हैं। हम इनका अर्थात् समनस्क और अमनस्कोंका वर्णन पीछेसे करेंगे। संसारिणस्वसस्थावराः॥१२॥ सूत्रार्थ:-पुनः त्रस तथा स्थावर भेदसे संक्षेपमे संसारी जीव दो प्रकारके है। भाग्यम्-संसारिणो जीवा द्विविधा भवन्ति असाः स्थावराश्च । तत्र- विशेषव्याख्या-संसारी जीव दो प्रकारके होते है, बस और स्थावर । उनमे,:- पृथिव्यवनस्पतयः स्थावराः ॥ १३ ॥ सूत्रार्थ:-पृथिवी, जल और वनस्पति ये स्थावर जीव है । भाण्यम्-पृथिवीकायिका अपकायिका वनस्पतिकायिका इत्येते विविधाः स्थावरा जीवा । - ६ नव वसा रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् १२ भवन्ति । तत्र पृथिवीकायोऽनेकविधः शुद्धपृथिवीशर्करावालुकादिः । अपूकायोऽनेकविधो हिमादि. । वनस्पतिकायोऽनेकविधः शैवालादिः ।। विगेपन्याख्या-पृथिवीकायिक, अप् (जल) कायिक, तथा वनस्पतिकायिक ये विविध जीव स्थावर संज्ञक है । इनमेसे पृथिवीकायिक अनेक प्रकार शुद्धपृथिवी, शर्करा, वालुकादि है । अप्कायिक जो हिम आदि है, सो अनेक प्रकारके है। और वनस्पति कायिक जो शैवाल आदि है वे भी अनेक प्रकार है ॥ १३ ॥ तेजोवायू द्वीन्द्रियादयश्च वसाः ॥ १४ ॥ मुत्रार्थ:-तेजःकायिक, वायुकायिक, और द्वीन्द्रियादि त्रसजीव हैं। भाष्यम्-तेजःकायिका अगारादयः । वायुकायिका उत्कलिकादयः । द्वीन्द्रियास्त्रीन्द्रि- यात्रतुरिन्द्रियाः पञ्चेन्द्रिया इत्येते त्रसा भवन्ति । संसारिणस्नसाः स्थावरा इत्युक्ते एतदुक्तं भवति मुत्ता नैव स्थावरा इति ॥ विशेपव्याख्या-तेजःकायिक अङ्गारादि, वायुकायिक उत्कलिकादि, तथा द्वीन्द्रि- यादि अर्थात् दो इन्द्रियवाले, तीन इन्द्रियवाले, चार इन्द्रियवाले और पांच इन्द्रियवाले; ये सब त्रस जीव कहे जाते हैं। "संसारिणस्त्रसस्थावरा" अर्थात् संसारीजीव त्रस तथा न्यावर हैं, ऐसा कहनेसे यह फलित हुआ कि मुक्तजीव न तो त्रस है, और न स्थावर हैं ॥ १४ ॥ पश्चेन्द्रियाणि ॥१५॥ मुत्रार्थ:-इन्द्रियां पांच है। भाप्यम्-पञ्चेन्द्रियाणि भवन्ति । आरम्भो नियमार्थः षडादिप्रतिषेधार्थश्च । इन्द्रियं । पन्द्रटिशामिन्द्रदिष्टमिन्द्रदृष्टमिन्द्रसृष्टमिन्द्रजुष्टमिति वा । इन्द्रो जीवः सर्वद्रव्येष्वैश्वर्ययोगा- हिपयेषु वा परमेश्वर्ययोगात् । तस्य लिङ्गमिन्द्रियं लिङ्गनात्सूचनात्प्रदर्शनादुपष्टम्भनाढ्यक्ष- नाश जीवन्य लिगमिन्द्रियम् ।। विगेपव्याख्या-इस सूत्रका आरंभ नियमकेलिये है, अर्थात् इन्द्रियां पांच ही हैं, न कि छह अथवा चार, इस प्रकार नियम तथा षट् आदि संख्याका निषेध ये दो अर्थ मिद्ध हो गये । इन्द्रलिद्गम् इन्द्रका लिङ्ग अर्थात् ज्ञापक व बोधक जो है वह इन्द्रिय है, इन्द्रदिष्टम् इन्द्रले निज २ कार्योंमें आज्ञप्त जो है वे इन्द्रिय हैं, इन्द्रदृष्टम् अर्थात् इन्द्रले अवलोकित, इन्द्रमृष्टम् इन्द्रसे सृष्ट, और इन्द्रजुष्टम् इन्द्रसे सेवित । इन्द्र जीवात्माको फाते है. क्योंकि सम्पूर्ण द्रव्यों में इसका ऐश्वर्यका सम्बन्ध है, अथवा सब विषयोंमें प्रधका सन्बन्ध है । जीवात्माके सूचनसे, उसके प्रदर्शनसे, उपष्टम्भ करनेसे अथवा ललकारनं ये इन्द्रिय है।॥ १५ ॥ द्विविधानि ॥१६॥ सूत्रार्थ:-दन्द्रियां दो प्रकारकी हैं।

सभाण्यतत्त्वार्थाधिगमसूत्रम् ।
भाष्यम्-द्विविधानीन्द्रियाणि भवन्ति । द्रव्येन्द्रियाणि भावेन्द्रियाणि च ॥ तंत्र-
विशेषव्याख्या-द्रव्येन्द्रिय तथा भावेन्द्रिय इन दो भेदोंसे इन्द्रियां दो प्रकारकी
है ॥ १६ ॥ उनमे,-
निर्वृत्त्युपकरणे द्रव्येन्द्रियम् ॥ १७ ॥
सूत्रार्थ:-निवृत्तीन्द्रिय तथा उपकरणेन्द्रिय इस रीतिसे दो प्रकार द्रव्यं
इन्द्रियके हैं।
भाष्यम्-निर्वृत्तीन्द्रियमुपकरणेन्द्रियं च द्विविधं द्रव्येन्द्रियम् । निर्वृत्तिरङ्गोपाङ्गनाम-
निर्वर्तितानीन्द्रियद्वाराणि कर्मविशेपसंस्कृताः शरीरप्रदेशाः। निर्माणनामाङ्गोपाङ्गप्रत्यया मूल-
गुणनिर्वर्तनेत्यर्थः । उपकरणं बाह्यमभ्यन्तरं च । निर्वर्तितस्यानुपधातानुग्रहाभ्यामुपकारीति ॥
विशेषव्याख्या-निर्वृत्ति तथा उपकरण ये दोनों मिलकर द्रव्येन्द्रिय है । यहां
पर निर्वृत्ति शब्दका अर्थ रचना है, और वह रचना इस प्रकार है कि अगोपाङ्ग-
नाम कर्मके उदयसे इन्द्रियोंके अवयव होते है, और निर्माणकर्मके उदयसे शरीरके
प्रदेशोंकी रचना होती है । इस रीतिसे अङ्गोपाङ्गनाम तथा निर्माणकर्म इन दोनों कर्म-
विशेषोंसे द्रव्येन्द्रियकी रचना होती है । द्रव्येन्द्रियोंकी रचना अङ्गोपाङ्ग तथा निर्माण-
कर्मके आधीन होती है । तात्पर्य यह कि नेत्र आदि इन्द्रियोंकी बाह्याभ्यन्तर रचनाको
द्रव्येन्द्रिय कहते हैं । बाह्य तथा अभ्यन्तर भेदसे उपकरण दो प्रकारका है। यह
उपकरण निर्वर्तित (रचित) इन्द्रियोंका अनुपघात और अनुग्रहसे उपकारी होता है ।
अर्थात् रचित अङ्गोंका किसी प्रकारसे उपघात नही होने दे वह बाह्य, और उनको निजर
कार्यों में प्रवृत्त होनेमें जिसका अनुग्रह होता है, वह अभ्यन्तर उपकरण है। जैसे,
आंखका बाह्य उपकरण अक्षि पलक आदि है, अभ्यन्तर आलोकादिका दोषरहित
आगमन आदि । इस प्रकार उपकरण सहायक व उपकारी होता है ।। १७ ॥
लब्ध्युपयोगी भावेन्द्रियम् ॥ १८॥
सूत्रार्थः-लब्धि तथा उपयोग ये दोनों भावेन्द्रिय है।
भाष्यम्-लब्धिरुपयोगश्च भावेन्द्रियं भवति । लन्धिर्नाम गतिजात्यादिनामकर्मजनिता
तदावरणीयकर्मक्षयोपशमजनिता चेन्द्रियाश्रयकर्मोदयनिर्वृत्ता च जीवस्य भवति । सा
पञ्चविधा । तद्यथा । स्पर्शनेन्द्रियलब्धिः रसनेन्द्रियलब्धिः घ्राणेन्द्रियलब्धिः चक्षुरि-
न्द्रियलब्धिः श्रोत्रेन्द्रियलब्धिरिति ।
विशेषव्याख्या-लब्धि वह है, जो जीवके गति तथा जातिआदि कर्मोंसे तथा
उनके अर्थात् गतिजात्यादिके आवरण करनेवाले जो कर्म हैं, उनके क्षयोपशमसे और
इन्द्रियोंके आश्रयभूत कर्मोके उदयसे उत्पन्न हो । वह जीवकी लब्धि पांच प्रकारकी है;
जैसे,:--स्पर्शनेन्द्रिय लब्धि १, रसनेन्द्रिय लब्धि २, घ्राणेन्द्रिय लब्धि ३, चक्षुरिन्द्रिय
लब्धि ४, और श्रोत्रेन्द्रिय लब्धि ५ ॥ १८ ॥

, , रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् उपयोगः स्पर्शादिषु ।। १९ ॥ सूत्रार्थः-स्पर्श, रसनादिमे उपयोग होता है । भाष्यम्-स्पर्शादिषु मतिज्ञानोपयोग इत्यर्थः । उक्तमेतदुपयोगो लक्षणम् । उपयोगः प्रणिधानमायोगस्तद्भावः परिणाम इत्यर्थः । एषां च सत्यां निर्वृत्तावुपकरणोपयोगौ भवतः । सत्यां च लब्धौ निर्वृत्त्युपकरणोपयोगा भवन्ति । निवृत्त्यादीनामेकतराभावे विपयालोचनं न भवति । विशेपव्याख्या स्पर्शादि इन्द्रियोंके विषयमें मतिज्ञानका उपयोग होता है। और यह वार्ता तो पूर्व प्रसझमें कह ही आये है, कि उपयोग जीवका लक्षण होता है । उपयोग, प्रणिधान, आयोग, सद्भाव तथा परिणाम ये सब प्रायः एकार्थवाचक हैं। निर्वृत्तिके उपयोग होने पर ही इनके उपकरण तथा उपयोग होते हैं। और लब्धिके होने- पर निर्वृत्ति, उपकरण, तथा उपयोग होते है । और निर्वृत्ति, उपकरण, तथा उपयोग इनमेसे किसी एकके न होने पर विषयका ज्ञान नही होता ॥ १९ ॥ अत्राह ! उक्तं भवता पञ्चेन्द्रियाणीति । तत्कानि तानीन्द्रियाणीत्युच्यते- अब यहांपर कहते हैं कि आपने पांच इन्द्रियां तो कहीं, परन्तु वे पांच इन्द्रियां कौनर है ? इसलिये अग्रिमसूत्र कहते है- स्पर्शनरसनघ्राणचक्षुःश्रोत्राणि ॥ २० ॥ सूत्रार्थ:-स्पर्शन, रसन, प्राण, चक्षुः तथा श्रोत्र ये पांच इन्द्रियां हैं। भाष्यम्-स्पर्शनं रसनं घ्राणं चक्षुः श्रोत्रमित्येतानि पञ्चेन्द्रियाणि ।। विशेपव्याख्या-जिसके द्वारा स्पर्श होता है, अर्थात् जिससे शीतोष्ण तथा मृदु, कठोर आदि स्पर्शका ज्ञान होता है, वह स्पर्शन इन्द्रिय है। ऐसे ही जिसके द्वारा मिष्ट तिक्त आदिका ज्ञान होता है, वह रसन इन्द्रिय है । जिसके द्वारा सुगन्ध दुर्गन्धादिका ज्ञान होता है, वह घ्राण (नासिका) इन्द्रिय है । जिसके द्वारा श्वेतपीतादि रूपका ज्ञान होता है, वह चक्षुरिन्द्रिय (नेत्र) है । तथा जिसके द्वारा शब्दका ज्ञान होता है, वह श्रोत्र इन्द्रिय है ।। २० ॥ स्पर्शरसगन्धवर्णशब्दास्तेषामर्थाः ॥ २१ ॥ सूत्रार्थः-स्पर्श, रस आदि पदार्थ स्पर्शन आदि इन्द्रियोंके अर्थ (विषय) है। भाष्यम्-एतेपामिन्द्रियाणामेते स्पर्शादयोऽर्था भवन्ति यथासङ्घयम् ।। विशेपव्याख्या स्पर्शन इन्द्रियका अर्थ स्पर्श है, क्योंकि स्पर्शन इन्द्रियके सिवाय और किमी इन्द्रियके द्वारा स्पर्श पदार्थका ज्ञान नही होता । रसना इन्द्रियका अर्थ रस, १ किमी २ के मतम यह मूलसूत्र नहीं है, और कोई २ कहते हैं कि ये मूलसूत्र ही है भाध्य नहीं ।

सभाष्यतत्त्वार्थाधिगमसूत्रम् । ४५ (मिष्ट, तिक्तादि) है । घ्राण इन्द्रियका विषय गन्ध है, चक्षुष् इन्द्रियका विषय वर्ण (श्वेतपीतादिरूप) है । और श्रोत्र इन्द्रियका विषय शब्द है ॥ २१ ॥ श्रुतमनिन्द्रियस्य ॥२२॥ सूत्रार्थः-श्रुतज्ञान अनिन्द्रिय अर्थात् मनका विषय है । भाष्यम्-श्रुतज्ञानं द्विविधमनेकद्वादशविधं नोइन्द्रियस्यार्थः । विशेषव्याख्या-दो भेद, अनेक भेद, तथा द्वादशभेद जिस श्रुतज्ञानके कहे हैं, वह अनिन्द्रिय (नोइन्द्रिय) अर्थात् मनका विषय है ॥ २२ ॥ अत्राह । उक्तं भवता पृथिव्यव्वनस्पतितेजोवायवो द्वीन्द्रियादयश्च नव जीवनिकायाः पञ्चेन्द्रियाणि चेति । तत्किं कस्येन्द्रियमिति । अत्रोच्यते । अब कहते है कि आपने पृथिवी, अप, वनस्पति, तेज, वायु और द्वीन्द्रिय आदि अर्थात् पृथिवीसे लेकर वायु पर्यन्त पांच, और द्वीन्द्रिय, त्रीन्द्रिय, चतुरिन्द्रिय तथा पंचेन्द्रिय ये चार इस रीतिसे नव प्रकारके जीवनिकाय कहे और पंचेन्द्रिय भी कहा; सो इनमें किसके कौन २ इन्द्रिय हैं अर्थात् , किस जीवके कितनी और कौन २ इन्द्रियां होती है? इसलिये अग्रिमसूत्र कहते है। वाय्वन्तानामेकम् ॥ २३ ॥ सूत्रार्थः—पृथ्वीसे लेकर वायुपर्यन्त जीवोंके केवल एक ही इन्द्रिय है । भाष्यम्-पृथिव्यादीनां वाय्वन्तानां जीवनिकायानामेकमेवेन्द्रियं सूत्रक्रमप्रामाण्या- प्रथमं स्पर्शनमेवेत्यर्थः । विशेषव्याख्या-पृथिवी, अपू, तेज, वायु और वनस्पति इन पांचों जीवसमूहोंको एक ही इन्द्रिय है; और वह भी सूत्रक्रमप्रामाण्यसे प्रथम अर्थात् स्पर्शन इन्द्रिय पृथिवी- कायिक आदि जीवोंमें है ॥ २३ ॥ कृमिपिपीलिकाभ्रमरमनुष्यादीनामेकैकवृद्धानि ॥२४॥ सूत्रार्थ:-कृमि, पिपीलिका, भ्रमर तथा मनुष्यादि जीवोंके एक २ इन्द्रिय अधिक है। भाष्यम्-कृम्यादीनां पिपीलिकादीनां भ्रमरादीनां मनुष्यादीनां च यथासङ्खयमेकैक- वृद्धानीन्द्रियाणि भवन्ति । यथाक्रमं । तद्यथा । कृम्यादीनां अपादिक-नूपुरक-गण्डूपद्- शङ्ख-शुक्तिका-शम्बूका-जलोका-प्रभृतीनामेकेन्द्रियेभ्यः पृथिव्यादिभ्य एकेन वृद्धे स्पर्शनरसने- न्द्रिये भवतः । ततोऽप्येकेन वृद्धानि पिपीलिका-रोहिणिका-उपचिका-कुन्थु-तुंबुरुक-त्रपुस- बीज-कर्पासास्थिका-शतपद्युत्पतक-तृणपत्र-काष्ठहारकप्रभृतीनां त्रीणि स्पर्शनरसनघ्राणानि । ततोऽप्येकेन वृद्धानि भ्रमर-वटर-सारङ्ग-मक्षिका पुत्तिका-दंश-मशक-वृश्चिक-नन्द्यावर्त-कीट- पतगादीनां चत्वारि स्पर्शनरसनघ्राणचक्षुषि । शेषाणां च तिर्यग्योनिजानां मत्स्योरगभुजङ्ग- पक्षि-चतुष्पदानां सर्वेषां च नारकमनुष्यदेवानां पञ्चेन्द्रियाणीति ।।

, - रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् विशेषव्याख्या-कृमि आदि अर्थात् कृमित्व जाति सहित जीवोंकी स्पर्शनसे अधिक एक रसन इन्द्रिय और है । जैसे अपादिक (पादरहित), नपुरक (कृमिविशेष), गण्डूपद (केंचुआ), शंख, शुक्तिका (सीपविशेप), शम्बूका (घोंघा), जलोका (जोंक) आदि कृमियोंके पृथिवी आदिसे एक इन्द्रिय अधिक है । अर्थात् इनको स्पर्शन और रसन ये दो इन्द्रियां है । और कृमिआदिसे भी एक अधिक पिपीलिका आदिके हैं । पिपी- लिका आदि शब्दसे जैसे,:-रोहिणिका, उपचिका ( दीमक ), कुन्थु, तुंबुरुक, त्रिपुसबीज, कर्पासास्थिका, शतपद्युत्पतक, तृणपत्र, और काष्ठहारक आदि गृहीत हैं। इनके तीन अर्थात् स्पर्शन, रसन, और घ्राण इन्द्रिय है । और उन पिपीलिकादिसे भी भ्रमर, वटर, सारङ्ग, मक्षिका, पुत्तिका, दंश, मशक, वृश्चिक, नन्द्यावर्त, कीट और पतङ्गादिके एक अधिक अर्थात् चार इन्द्रिय स्पर्शन, रसन, प्राण तथा चक्षु हैं । और उनसे भी अधिक शेष तिर्य- ग्योनिवाले मत्स्य, भुजङ्ग, पक्षी, चतुष्पदपशु और नारक, मनुष्य तथा देव आदिके पांचों इन्द्रियां अर्थात् स्पर्शन, रसन, प्राण, चक्षुः और श्रोत्र होती हैं ॥ २४ ॥ अत्राह । उक्तं भक्ता द्विविधा जीवाः । समनस्का अमनस्काश्चेति । तत्र के समनस्का इति । अत्रोच्यते- यहाँपर कहते हैं, कि आपने समनस्क तथा अमनस्क भेदसे दो प्रकारके जीव कहे हैं, उनमेंसे समनस्क कौन हैं ? यह बतलानेकेलिये अग्रिमसूत्र कहते हैं- संज्ञिनः समनस्काः ॥ २५ ॥ सूत्रार्थ:-संज्ञी जीव समनस्क हैं। भाष्यम्-संप्रधारणसंज्ञायां संज्ञिनो जीवाः समनस्का भवन्ति । सर्वे नारकदेवा गर्भ- व्युत्क्रान्तयश्च मनुष्यास्तिर्यग्योनिजाश्च केचित् ।। ईहोपोहयुक्ता गुणदोषविचारणात्मिका संप्र- धारणसंज्ञा । तां प्रति संज्ञिनो विवक्षिताः । अन्यथा ह्याहारभयमैथुनपरिग्रहसंज्ञाभिः सर्व एव जीवाः संज्ञिन इति । विशेषव्याख्या-संप्रधारणसंज्ञाके होनेपर जो संज्ञी जीव हैं, वे ही समनस्क हैं। अर्थात् संप्रधारणस्वरूप जो संज्ञा है उस संज्ञाके होनेसे जो संज्ञी (संज्ञा ज्ञान रखनेवाले) है, वे ही समनस्क अर्थात् मनसहित है । सम्पूर्ण नारक (नरकके जीव) देव, गर्भसे वहिर्गत मनुष्य, तथा कोई २ तिर्यग्योनिसे उत्पन्न जीव संज्ञी होनेसे समनस्क है । यहां- पर ईहा तथा अपोहसे युक्त अर्थात् गहन वा गूढ विषयोंमें कल्पनाशक्तिसे युक्त गुण और दोपके विचारणस्वरूप जो ज्ञानरूपशक्तिविशेप है। वही संप्रधारण रूप संज्ञा है । उसी संज्ञाके प्रति यहां संज्ञीपढ़से विवक्षित हैं । अन्यथा आहार, भय, मैथुन तथा परिग्रहन्प संज्ञाओंसे सब ही जीव संज्ञी हो सक्ते है ।। २५ ॥

४७ सभाष्यतत्त्वार्थाधिगमसूत्रम् । विग्रहगतौ कर्मयोगः ॥ २६ ॥ सूत्रार्थ: -विग्रहगतिमें कर्मयोग होता है। भाष्यम्-विग्रहगतिसमापन्नस्य जीवस्य कर्मकृत एव योगो भवति । कर्मशरीरयोग इ- त्यर्थः । अन्यत्र तु यथोक्तः कायवाड्मनोयोग इत्यर्थः ।। विशेषव्याख्या-विग्रह गतिमें प्राप्त जो जीव है, अर्थात् जीव जब एक शरीरसे अन्य शरीरकेलिये गतिमें समापन्न है, तब इसको कर्मकृत ही योग अर्थात् कार्माण शरीर ही योग होता है । और विग्रहगतिसे अन्यत्र तो काय, वाक् और मनका योग होता है ॥ २६॥ अनुश्रेणि गतिः ॥ २७ ॥ सूत्रार्थ:-जीवोंकी गति श्रेणीके अनुसार होती है । भाष्यम-सर्वा गतिर्जीवानां पुद्गलानां चाकाशप्रदेशानुश्रेणि भवति विश्रेणिर्न भवतीति गतिनियम इति । विशेषव्याख्या-जीव तथा पुद्गलोंकी सम्पूर्ण गति आकाशप्रदेशकी श्रेणीके अनु- सार ही होती है । श्रेणीके विरुद्ध नहीं होती । यह गतिका नियम है ॥ २७ ॥ अविग्रहा जीवस्य ॥ २८ ॥ सूत्रार्थ:-जीवकी अविग्रहगति होती है। भाष्यम-सिध्यमानगतिर्जीवस्य नियतमविग्रहा भवतीति । विशेषव्याख्या-जीवकी जो सिध्यमान गति है, वह नियमपूर्वक अविग्रह अर्थात् कुटिलता रहित होती है ॥ २८ ॥ विग्रहवती च संसारिणः प्राक् चतुभ्यः ॥ २९ ॥ सूत्रार्थ:--अन्य जातिमें संक्रमण करनेमें संसारी जीवकी गति चार समयके पहिले विग्रहवती तथा अविग्रहा भी होती है। भाष्यम्-जात्यन्तरसंक्रान्तौ संसारिणो जीवस्य विग्रहवती चाविग्रहा च गतिर्भवति उप- पातक्षेत्रवशात् । तिर्यगूर्वमधश्च प्राक् चतुर्य इति । येषां विग्रहवती तेषां विग्रहाः प्राक चतुर्यो भवन्ति । अविग्रहा एकविग्रहा द्विविग्रहा त्रिविग्रहा इत्येताश्चतुःसमयपराश्चतुर्विधा । गतयो भवन्ति । परतो न संभवन्ति । प्रतिघाताभावाद्विग्रहनिमित्ताभावाच्च । विग्रहो वक्रितं विग्रहोऽवग्रहः श्रेण्यन्तरसंक्रान्तिरित्यनर्थान्तरम् । पुद्गलानामप्येवमेव ॥ विशेषव्याख्या-जिस समय संसारी जीव एक जातिके शरीरको त्यागकर अन्य जा- तिके शरीर आदिमें संक्रमण करने लगता है, उस समय चतुर्थ समयके पूर्व विग्रहवती गति होती ह । उपपात क्षेत्रके (जन्मस्थानके) वशसे तिर्यक् (तिरछा) उर्द्ध, तथा अधोभागमे गति रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् ४८ होती है । “प्राक् चतुर्व्यः" इसका यह तात्पर्य है कि जिनकी विग्रहवती गति होती है, उनके विग्रहचतुर्थ समयके पूर्व ही होते है। अविग्रहा अर्थात् विग्रहशून्य, एकविग्रहा (एक विग्रह- वाली) द्विविग्रहा (दो विग्रहवाली ) तथा त्रिविग्रहा (तीन विग्रहवाली) ये सब 'चतुःसमय- परा' चार प्रकारकी जीवकी गति होती है। चतुर्थ समयके आगे विग्रहवती गति नहीं होती। इसके परे उस प्रकारकी गतिका संभव ही नहीं है। क्योंकि आगे प्रतिघातका अभाव है और विग्रहके निमित्तका भी अभाव है। यहांपर विग्रहका अर्थ वक्रित (टेढा) है । विग्रह, अवग्रह, श्रेण्यन्तरसंक्रान्ति अर्थात् सरलश्रेणीको त्यागके वक्रश्रेणीसे गमन- ये सब एकार्थवाचक शब्द हैं । संसारी जीवोंके समान पुद्गलोंकी भी इसी प्रकारकी गति होती है ।। २९ ॥ शरीरिणां च जीवानां विग्रहवती चाविग्रहवती च प्रयोगपरिणामवशात् । न तु तत्र वि- ग्रहनियम इति ॥ शरीरधारी जीवोंकी विग्रहवती तथा अविग्रहा दोनों प्रकारकी गति प्रयोगके परिणा- मवशसे होती है; वहांपर विग्रहका नियम नहीं है, किन्तु प्रयोगके परिणामके आधीन है। अत्राह । अथ विग्रहस्य किं परिमाणमिति । अत्रोच्यते । क्षेत्रतो भाज्यम् । कालतस्तु- अब कहते है कि विग्रहका क्या परिणाम है? इसपर कहते हैं कि क्षेत्रकी अपेक्षासे भाज्य (प्राप्य ) है । और कालसे तो- एकसमयोऽविग्रहः ॥ ३०॥ मृत्रार्थ:-विग्रहरहित गति एक ही समयमें होती है। भाष्यम्-एकसमयोऽविग्रहो भवति । अविग्रहा गतिरालोकान्तादप्येकेन समयेन भ- वति । एकविग्रहा द्वाभ्याम् । द्विविग्रहा त्रिभिः । त्रिविग्रहा चतुर्भिरिति । अत्र भङ्गप्ररू- पणा कार्येति ।। विशपव्याख्या-विग्रहशून्यगति लोकके अन्ततक एक ही समयमें होती है । और जिसमें एक विग्रह हो वह गति दो समयोंसे, जिसमे दो विग्रह हों वह तीन समयोंसे होती है, और जिसमें तीन विग्रह गति हों वह चार समयोंके द्वारा होती है। यहांपर भंग-पसे निरूपण करना चाहिये । अर्थात् विग्रह रहित तो एक समयसे होती है, और एक आदि विग्रहवाली दो आदि समयोंसे, इत्यादि ॥ ३० ॥ एक हो वानाहारकः ॥ ३१ ॥ मृत्रार्थः-एक वा दो ममेयतक जीव अनाहारक रहता है । भाष्यम्-वित्रहातसमापन्नो जीव एकं वा समयं द्वौ वा समयावनाहारको भवति । परं बालमनुनमयमाहारयति । कथमकं द्वौ वानाहारको न वहून त्यत्र भङ्गप्ररूपणा कार्या ।। विभपव्याख्या-विग्रह गतिम संप्राप्त जो जीव है, वह एक अथवा दो समयतक । , सभाष्यतत्त्वार्थाधिगमसूत्रम् । ४९ तो अनाहारक रहता है, और शेष कालमें प्रतिसमयमें आहारक होता है । यह अर्थ कैसे हुआ ? ऐसी यदि शंका हो तो यहां भी "एक वा दो समयतक तो अनाहारक होता है न कि बहुत समय पर्यन्त" इस प्रकार भंगसे सूत्रार्थकी व्याख्या करनी चाहिये ॥ ३१ ॥ अत्राह । एवमिदानी भवक्षये जीवोऽविग्रहया विग्रहवत्या वा गत्या गतः कथं पुनर्जायत इति अत्रोच्यते । उपपातक्षेत्रं स्वकर्मवशात्प्राप्तः शरीराथै पुद्गलग्रहणं करोति । सकषायत्वा- ज्जीवः कर्मणो योग्यान्पुद्गलानादत्त इति । कायवाड्मनःप्राणापानाः पुद्गलानामुपकारः नामप्रत्ययाः सर्वतो योगविशेषादिति वक्ष्यामः । तज्जन्म । तच्च त्रिविधम् । तद्यथा- अब यहांपर 'इस प्रकार जब इस समय एक भवका क्षय हो गया, तब अविग्रह वा विग्रह- वती गतिसे यह जीव पुनः कैसे उत्पन्न होता है ? इसका उत्तर कहते है । निज उत्प- त्तिके क्षेत्रपर अपने कर्मोंके वशीभूत होकर जब यह जीव प्राप्त होता है, तब अपने शरीरके अर्थ पुद्गलोंको ग्रहण करता है । "कषाय सहित होनेसे कर्मोके योग्य पुद्गलोंको जीव ग्रहण करता है" काय, वाक्, मन तथा प्राण अपान ये सब जीवोके ऊपर पुद्गलोंके उपकार है । तथा नाम है कारण जिसको, ऐसा सर्वत्र योग विशेषसे सूक्ष्म एक क्षेत्राव- गाहमें स्थित आत्माके प्रदेशोंमें अनन्तानन्त है, इत्यादि आगे कहेंगे । यहां कर्मोके योग्य शरीरकी रचनाकेलिये पुद्गलोंका ग्रहण करना जन्म है । वह जन्म तीन प्रकारका है। यथा:- सम्मूर्छनग पपाता जन्म ॥ ३२ ॥ सम्मूर्छनं गर्भ उपपात इत्येतत्रिविधं जन्म । सूत्रार्थ:-संमूर्छन, गर्भ, और उपपात ये तीन प्रकारके जन्म हैं ।। ३२ ।। सचित्तशीतसंवृत्ताः सेतरा मिश्राश्चैकशस्तद्योनयः ॥ ३३ ॥ सूत्रार्थ:-जीवोंके ये जो तीन प्रकारके जन्म कहे है, उनके सचित्त आदि, तथा सचित्तादिके विपक्षी अचित्त आदि, और मिश्र अर्थात् सचित्ताचित्त आदि एक २ योनि होती है। संसारे जीवानामस्य त्रिविधस्य जन्मन एताः सचित्तादयः सप्रतिपक्षा मिश्राश्चैकशो यो- नयो भवन्ति । तद्यथा । सचित्ता अचित्ता सचित्ताचित्ता शीता उष्णा शीतोष्णा संवृत्ता विवृत्ता संवृत्तविवृत्ता इति । तत्र देवनारकानामचित्ता योनिः । गर्भजन्मनां मिश्रा । त्रिवि- धान्येषाम् ॥ गर्भजन्मनां देवानां च शीतोष्णा । तैजःकायस्योष्णा । त्रिविधान्येपाम् ।। नारकैकेन्द्रियदेवानां संवृत्ता । गर्भजन्मनां मिश्रा । विवृत्तान्येपामिति ।। विशेषव्याख्या-इस संसारमें जीवोंका जो त्रिविध जन्म अभी कहा है, उसके ये अर्थात् सचित्तादि, उनके विरोधी अचित्तादि, तथा मिश्र सचित्ताचित्तादि एक २ योनि होती है ।जैसे; सचित्ता, अचित्ता और सचित्ताचित्ता, तथा शीता, उप्णा और शीतोष्णा, ऐसे ही , ५० रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् संवृत्ता, असंवृत्ता अथवा विवृत्ता, और मिश्र अर्थात् संवृत्तविवृत्ता । उनमें देव तथा ना- रकी जीवोंकी अचित्तायोनि होती है। गर्भसे जन्म होनेवालोंकी मिश्रा होती है। और इनसे जो शेष रहे, उनकी तीनों प्रकारकी योनि होती है । गर्भसे जन्मवाले जीवोंकी तथा देवोंकी शीतोष्णा है । तेजःकायिकवालोंकी उष्णा योनि है । और अन्य जो शेष है उनकी विविध योनि है । नारकजीव, एकेन्द्रियजीव, तथा देव इनकी संवृत्ता योनि है । गर्भसे उत्पन्न होनेवालोंकी मिश्रा अर्थात्, संवृतविवृत्ता योनि है, और इनसे जो अन्य है उ- नकी विवृत्ता है ॥ ३३॥ जराय्चण्डपोतजानां गर्भः॥३४॥ सूत्रार्थ:-जरायुज, अंडज और पोतज इनका गर्भरूप जन्म होता है। भाज्यम्-जरायुजानां मनुष्य-गो-महिषाजाविकाश्व-खरोष्ट्र-मृग-चमर-वराह-गवय-सिंह- व्यावर्ष-द्वीपि-श्व-शृगाल-मार्जारादीनाम् । अण्डजानां सर्प-गोधा-ऋकलाश-गृहकोकिलिका- मत्स्य-कूर्म-नक्र-शिशुमारादीनां पक्षिणां च लोमपक्षाणां हंस-चाष-शुक-गृध्र-श्येन-पारावत- काक-मयूर-मद्गु-वक-बलाकादीनां । पोतजानां शल्लक-हस्ति-श्वाविल्लापक-शश-शारिका-नकुल- मूपिकादीनां पक्षिणां च चर्मपक्षाणां जलूका-वल्गुलि-भारण्ड-पक्षिविरालादीनां गर्भो जन्मेति ।। विशेषव्याख्या:-जरायु अर्थात् मनुष्य, गो, महिष (भैस), अजा (वकरी), अविक (भेड़), अश्व (घोड़ा), खर (गधा), ऊंट, मृग, चमर, शूकर, गवय (नीलगाय), सिंह, व्याघ्र, भालू, गेंडा, कुत्ता, श्रगाल, और मार्जार (बिल्ली) आदि । अण्डज अर्थात्, सर्प, गोह कृकलाश (गिर गिठान व छिपकली) गृहकोकिलिका, मत्स्य, कछुआ, मगर, घड़ियाल आदि जलचर । अनेक प्रकारके पक्षी, लोम पक्षवाले, हंस, नीलकण्ठ, गृध्र (गीध), श्येन (वाज), कबूतर, काक, मोर, टिट्टिम, बक, तथा बलाका आदि । तथा पोतज अर्थात् शाही (सई), हाथी, श्वाविल्लापक, शश सारिका, नकुल, मूषिक, चर्मपक्षवाले पक्षी, जलूका, वल्गुली, तथा भारण्डपक्षी विडालआदिका भी गर्भ ही जन्म है ।। ३४ ॥ नारकदेवानामुपपातः॥३५॥ सूत्रार्थ:-नारक तथा देवोंके उपपात जन्म है ॥ ३५ ॥ भाग्यम्-नारकाणां देवानां चोपपातो जन्मेति । शेषाणां सम्मूर्छनम् ॥ ३६ ॥ सूत्रार्थ:---जरायुज, अंडज, पोतज, नारक तथा देव इनके अतिरिक्त शेष जीवोंका सम्मूर्छन जन्म है। भाप्यम्-जरायबण्डपोतजनारकदेवेभ्यः शेपाणां सम्मूर्छनं जन्म । उभयावधारणं चात्र भवति । जरायुजादीनामेव गर्भः । गर्भ एव जरायुजादीनाम् । नारकदेवानामेवोपपातः। उपपात एव नारकदेवानाम् । शेपाणामेव सम्मूर्छनम् । सम्मूर्छनमेव शेषाणाम् ।। , , - सभाष्यतत्त्वार्थाधिगमसूत्रम् । ५१ विशेषव्याख्या-इस सूत्रसे दो प्रकारके नियमोंका निश्चय होता है, एक तो यह कि जरायुज आदि जीवोंका ही गर्भ होता है, और दूसरा यह कि गर्भ ही जरायुज आदिका होता है। ऐसे ही नारक देवोंका ही उपपात होता है और उपपात ही नारक देवोंका होता है । तथा जरायुज आदिसे जो शेष रहें, उन्हींका संमूर्छन है अथवा सम्मूर्छन ही उनका होता है ।। ३६ ।। औदारिकवैक्रियाहारकतैजसकार्मणानि शरीराणि ॥ ३७ सूत्रार्थ:-औदारिक वैक्रियक आदि पांच प्रकारके शरीर होते हैं। भाष्यम्-औदारिकं वैक्रियं आहारकं तैजसं कार्मणमित्येतानि पञ्च शरीराणि संसारिणां जीवानां भवन्ति । विशेषव्याख्या-संसारी जीवोंके औदारिक, वैक्रियक, आहारक, तैजस, तथा का- मण ये पांचप्रकारके शरीर होते है ।। ३७ ॥ तेषां परं परं सूक्ष्मम् ॥ ३८ ॥ सूत्रार्थ:-उनमेंसे आगे २ के सूक्ष्म होते हैं। भाष्यम्-तेषामौदारिकादिशरीराणां परं परं सूक्ष्म वेदितव्यम् । तद्यथा । औदारिका- द्वैक्रियं सूक्ष्मम् । वैक्रियादाहारकम् । आहारकात्तैजसम् । तैजसात्कार्मणमिति ।। विशेपव्याख्या-उन औदारिक आदि पांच शरीरोंमेसे परं परं अर्थात् आगे २ के पूर्व २५ी अपेक्षासे सूक्ष्म जानना चाहिये । जैसे; औदारिककी अपेक्षासे वैक्रियक सूक्ष्म है, वैक्रियककी अपेक्षासे आहारक सूक्ष्म है, आहारकसे तैजस और तैजससे भी कार्मण सूक्ष्म है ॥ ३८॥ प्रदेशतोऽसङ्घयेयगुणं प्राक् तैजसात् ॥ ३९ ॥ -सूत्रार्थ:-और उन औदारिक आदि शरीरोंमें प्रदेशोंकी अपेक्षासे तैजससे पूर्व २ के शरीर असङ्ख्यगुणें हैं। भाष्यम्-तेषां शरीराणां परं परमेव प्रदेशतोऽसङ्खयेयगुणं भवति प्राक् तैजसात् । औदारिकशरीरप्रदेशेभ्यो वैक्रियशरीरप्रदेशा अखङ्खयेयगुणाः । वैक्रियशरीरप्रदेशेभ्य आहार- कशरीरप्रदेशा असङ्खयेयगुणा इति ।। विशेषव्याख्या-उन पूर्वोक्त शरीरोंमें प्रदेशकी अपेक्षासे तैजसके पूर्वके तीन शरीर पर पर असंखेयगुणें है । जैसे औदारिक शरीरके प्रदेशोंकी अपेक्षासे वैक्रियक शरीरके प्रदेश असंखेयगुणें है । तथा वैक्रियक शरीरके प्रदेशोंकी अपेक्षासे आहारक शरीरके प्रदेश भी असंखेयगुणें है ।। ३९ ।। अनन्तगुणे परे ॥४०॥ सूत्रार्थ:-आहारकसे परे जो दो शरीर है, वे पूर्व २ से अनन्तगुणें है।

, रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् ५२ भाष्यम्-परे द्वे शरीरे तैजसकार्मणे पूर्वतः पूर्वतः प्रदेशार्थतयानन्तगुणे भवतः । आ- हारकात्तैजसं प्रदेशतोऽनन्तगुणम् । तैजसात्कार्मणमनन्तगुणमिति । विशेषव्याख्या-पूर्व तीन शरीरोंसे परे जो दो शरीर तैजस और कार्मण हैं, वे पूर्व २ प्रदेशोंकी अपेक्षासे अनन्तगुणें प्रदेशवाले हैं। जैसे आहारकके प्रदेशोंकी अपेक्षासे तैजस शरीरके प्रदेश अनन्तगुणें हैं, और तैजस शरीरके प्रदेशोंकी अपेक्षासे कार्मण शरीरके प्रदेश अनन्तगुणें हैं ॥ ४० ॥ अप्रतिघाते ॥४१॥ सूत्रार्थ:-और ये अन्तके दो शरीर अप्रतिघात हैं। भाष्यम्-एते द्वे शरीरे तैजसकार्मणे अन्यत्र लोकान्तात्सर्वत्राप्रतिघाते भवतः । विशेषव्याख्या-पूर्व सूत्रसे परेका सम्बन्ध इसमें भी आता है, इसलिये ये अन्तिम दो शरीर अप्रतिघात अर्थात् प्रतिघातशून्य है । तात्पर्य यह कि ये दो तैजस और कार्मण कहीं किसीसे नहीं रुकते, और न ये किसीको रोकते है । परन्तु यह व्यवस्था लोकान्त तक है अर्थात् लोकके अन्तपर्यन्त इनकी गति है, लोकान्तके आगे इनका प्रतिघात हो जाता है ॥ ११ ॥ अनादिसम्बन्धे च ॥ ४२ ॥ सूत्रार्थः-और इन दोनोंके साथ जीवका अनादि सम्बन्ध भी है । भाग्यम्-ताभ्यां तैजसकार्मणाभ्यामनादिसम्बन्धो जीवस्येत्यनादिसम्बन्ध इति । विशेषव्याख्या-तैजस तथा कार्माण शरीर जो हैं, उन दोनोंके साथ जीवका सम्बन्ध अनादिकालसे चला आता है ॥ ४२ ॥ सर्वस्य ॥४३॥ सूत्रार्थः-तैजस तथा कार्माण ये दो शरीर सम्पूर्ण संसारी जीवोंके होते हैं। भाप्यम्-सर्वस्य चैते तैजसकार्मणे शरीरे संसारिणो जीवस्य भवतः । एके त्वाचार्या नयवादापेक्षं व्याचक्षते । कार्मणमेवैकमनादिसम्बन्धम् । तेनैवैकेन जीवस्यानादिः सम्बन्धी भवतीति । तैजसं तु लब्ध्यपेक्षं भवति । सा च तैजसलब्धिर्न सर्वस्य कस्यचिदेव भवति । क्रोधप्रसादनिमित्तौ शापानुग्रहौ प्रति तेजोनिसर्गशीतरश्मिनिसर्गकर तथा भ्राजिष्णुप्रभा- समुदयच्छायानिर्वतकं तैजस शरीरेपु मणिज्वलनज्योतिष्कविमानवदिति । विशेपव्याख्या-सम्पूर्ण संसारी जीवमात्रका तेजस तथा कार्मण शरीरसे अनादि सम्बन्ध है । यह सूत्रका अर्थ है, किन्तु कोई २ आचार्य नयवादकी अपेक्षासे व्याख्यान करते हैं। वे कहते है, कि एक कार्मणका ही अनादि सम्बन्ध है । वही एक शरीर ऐसा' है. जिसके साथ जीवका अनादि सम्बन्ध है। और तैजस शरीर तो लब्धिकी अपेक्षा रखता है और वह किसीको ही होता है । क्योंकि तैजसलन्धि जीवमात्रको नहीं होती किमी २ को होती है । तथा क्रोध और प्रसादके (प्रसन्नताके) कारण जो शाप और सभाष्यतत्त्वार्थाधिगमसूत्रम् । अनुग्रह हैं, उनके प्रति अर्थात् उनकेलिये तेजका उत्पत्तिस्थान और चन्द्रमाके खभावका सम्पादक तथा अति दैदीप्यमान सूर्यकी उदय होती हुई प्रभाकी छायाका उत्पादक शरीरोंमें यह तैजस ऐसे है, जैसे मणियोंसे दैदीप्यमान ज्योतिष्क विमान ।। ४३ ॥ तदादीनि भाज्यानि युगपदेकस्याऽऽचतुभ्यः ॥ ४४ ॥ सूत्रार्थ: -उन दोनोंको आदिलेके एक कालमें एक जीवके चार शरीर पर्यन्त प्राप्य हैं। भाष्यम्-ते आदिनी एषामिति तदादीनि । तैजसकार्मणे यावत्संसारभाविनी आदि कृत्वा शेषाणि युगपदेकस्य जीवस्य भाजान्याचतुर्व्यः । तद्यथा । तैजसकामणे वा स्याताम् । तैजसकार्मणौदारिकाणि वा स्युः । तैजसकार्मणवैक्रियाणि वा स्युः । तैजसकार्मणौदारिकवै- क्रियाणि वा स्युः । तैजसकार्मणौदारिकाहारकाणि वा स्युः ।। कार्मणमेव वा स्यात् । कार्म- णौदारिके वा स्याताम् । कार्मणवैक्रिये वा स्याताम् । कार्मणौदारिकवैक्रियाणि वा स्युः । कार्मणौदारिकाहारकाणि वा स्युः । कार्मणतैजसौदारिकवैक्रियाणि वा स्युः । कार्मणतैजसौ- दारिकाहारकाणि वा स्युः । न तु कदाचिद्युगपत्पञ्च भवन्ति । नापि वैक्रियाहारके युगप- द्भवतः स्वामिविशेषादिति वक्ष्यते ॥ विशेषव्याख्या-तैजस तथा कर्माण जिनकी आदिमें हैं, ऐसे शेष शरीर एक कालमें एक जीवके चार तक भाज्य (विकल्प अथवा प्राप्य) है । तैजस और कार्माण तो संसारी मात्र सब जीवोंमें होनेवाले हैं, उन्हीको आदि लेकर एक कालमें एक जीवको चार शरीरपर्यन्त विकल्पनीय हैं। जैसे जिसके दो ही शरीरकी योग्यता है, उसके तैजस और कार्माण हो सक्ते है। जिसको तीन हो सक्ते है, उसके तैजस कार्मण और औदारिक हो सक्ते हैं, अथवा तैजस, कार्मण, और वैक्रियक हो सक्ते हैं । और चारकी योग्यतामें तैजस, कार्मण, औदारिक और वैक्रियक हो सक्ते है, अथवा तैजस, कार्मण औदारिक और आहारक हो सक्ते है । अथवा तैजसके अनादि सम्बन्धताके खंडन पक्षमें एक ही शरीर जब अनादि सम्बन्ध है, तब केवल कार्मण ही एक हो सकता है। दो १ 'तदादीनि भाज्यानि, इत्यादि सूत्रकी व्याख्या करते हुए भाष्यकारने 'ते आदिनी एपाम्, ऐसा समासका विग्रह किया है। इससे यह ज्ञात होता है कि पूर्व प्रसंगसे प्रस्तुत जो तैजस और कार्मण हैं, वे 'के ते | आदिनी, इस द्विवचनान्त पदसे यहा विविक्षित हैं, अतएव उन्हीको मेढीभूत करके "जिमकार्मणे याव- ससारभाविनी,, ऐसा विवरण किया है। अतएव उन दोनोंको आदिलेके चार शरीरतक एक कालम एक जीवको विकल्पनीय हैं, और ऊपर कहे हुए पाच विकल्प करना जव तैजस अनादिसम्बन्ध रूपसे एक आचार्यके मतमें खण्डन किया है, तव तो एक जीवको एक कालमें तीन ही हो सके है, और 'त' द्विवचनान्त विग्रहसे आचार्यका यह अभिप्राय है कि आश्रयरूपसे तैजस है, अथवा 'तत् कार्मण आदि एषा तानि तदादीनि, ऐसी व्याख्या करना और सात विकल्प करना।

रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् की सत्ता में कार्मण और औदारिक हो सक्ते है, अथवा कार्मण और वैक्रिया हो मन हैं। तथा तीनकी योग्यता, कार्मण, औदारिक, और वैक्रियक हो सक्ते है वा कार्मण, औदारिक और आहारक हो सकते है । और चारकी योग्यता, कार्मण, तजन्य, औदारिक और वैक्रियक हो सक्ते है, अथवा कार्मण, तैजस, औदारिक और आहारक हो सक्ते हैं। परन्तु कदाचित् भी एक कालमें एक ही जीवके पांचों शरीर नहीं होते । और वैक्रियक तथा आहारक भी एक कालमें नहीं होते। क्योंकि क्रियक तथा आहा- रकके स्वामीमें विशेष (भेद) है । यह विषय हम आगे कहेंगे ॥ ४४ ॥ निरुपभोगमन्त्यम् ॥ ४॥ सूत्रार्थ:-अन्तका जो शरीर है, वह उपभोगसे रहित है। भाष्यम्-अन्त्यमिति सूत्रक्रमप्रामाण्यात्कार्मणमाह । तन्निरुपभोगम् । न मुन्धदुःये तेनोपभुज्यते न तेन कर्म वध्यते न वेद्यते नापि निर्जीयत इत्यर्थः ॥ शेपाणि तु सोपमो. गानि । चस्मात्सुखदुःखे तैरुपमुख्येते कर्म वध्यते वेद्यते निर्जीयते च तस्मात्सोपभोगानीति । विशेषव्याख्या-यहाँपर 'अन्त्य, शब्दसे "औदारिकक्रियकाहारकतजमकार्म- णानि शरीराणि" इस सूत्रके प्रामाण्यसे सबके अन्तमें होनेवाले कार्मण शरीरको आचार्य कहते हैं । इस हेतुसे वह कार्मण शरीर निरुपभोग है, अर्थात उपभोगसे वर्जित है: उसके द्वारा सुख अथवा दुःखका उपभोग नहीं होता। कर्मोका बन्धन भी कार्मण शरीरसे नहीं होता, कर्मका ज्ञान भी उससे नहीं होता, कर्मोकी जीर्णता भी उसले नहीं होती । और कार्मणको छोड़के शेप जो औदारिक आदि चार शरीर हैं, वे उपभोगसहित है, क्योंकि उनके द्वारा सुख तथा दुःखका उपभोग होता है । कर्मोका बन्धन होता है. कमौका लाभ वा ज्ञान होता है, तथा कर्मोंकी जीर्णता भी होती है, अर्थात् कर्मोंकी निर्जरा भी शेष शरीरोंसे होती है । इस हेतुसे वे आदिके चार शरीर उपभोग सहित है ॥ ४५ ॥ अत्राह । एषां पञ्चानामपि शरीराणां सम्मूर्छनादिषु त्रिपु जन्मसु कि क जायत इति । अनोच्यते। अब यहांपर कहते हैं कि इन औदारिक आदि पांचों शरीरोंमेंसे संमूर्छन गर्भ तथा उपयात ये जो तीन प्रकारके जन्म कहे हैं, उनमे कौन शरीर कहां अर्थात् किस प्रकारके जन्मसे उत्पन्न होता है ? यहां कहते हैं:- गर्भसम्मृर्छनजमाद्यम् ॥ ४६ ।। सूत्रार्थ:-आदिका शरीर गर्म तथा सन्मूर्छन रूप जन्मसे उत्पन्न होता है । भाष्यम्-आद्यमिति सूत्रक्रमप्रामाण्यादौतारिकमा । तद्गमें सम्मूर्छने वा जायते विशेपच्याख्या-यहां भी सूत्रक्रमके प्रामाण्यसे 'आद्य, शब्दसे आदिमें होनेवाले

५५
,
,
सभाष्यतत्त्वार्थाधिगमसूत्रम् ।
औदारिक शरीरको आचार्य कहते है, वह आद्य औदारिकशरीर गर्भ और सम्मूर्छनरूप
जन्ममें उत्पन्न होता है ॥ ४६॥
वैक्रियमोपपातिकम् ॥४७॥
सूत्रार्थः वैक्रियक शरीर उपपातरूप जन्ममें उत्पन्न होता है ।
भाष्यम्-वैक्रियशरीरमौपपातिकं भवति । नारकाणां देवानां चेति ।
विशेषव्याख्या-वैक्रियक शरीर उपपात जो जन्मका तीसरा प्रकार है, उसमें उत्पन्न
होता है । और उपपातरूप जन्ममें वैक्रियक शरीर नारक जीव तथा देवोंका होता है।
क्योंकि उपपात जन्म नारकी तथा देवोंका होता है, यह पूर्वमें कह चुके है ॥ ४७ ॥
लब्धिप्रत्ययं च ॥४८॥
सूत्रार्थ:-और वैक्रियक शरीर लब्धि प्रत्यय भी है।
भाष्यम्-लब्धिप्रत्ययं च वैक्रियशरीरं भवति । तिर्यग्योनीनां मनुष्याणां चेति
विशेषव्याख्या-वैक्रियक शरीर उपपात स्वरूप जन्मसे होता है, और वह वैक्रि-
यक लब्धि प्रत्यय भी है अर्थात् उसके उत्पन्न होनेमें लब्धि कारण है । और वह लब्धि
वैक्रियक, तिर्यग्योनिज तथा मनुष्योंको होती है ॥ ४८ ॥
शुभं विशुद्धमव्याधाति चाहारक चतुर्दशपूर्वधरस्यैव ॥४९॥
सूत्रार्थः-तथा आहारक शरीर शुभ, विशुद्ध और अव्याघाति होता है, और वह
"चतुर्दशपूर्वके धारियोंके ही होता है ।
भाष्यम्-शुभमिति शुभद्रव्योपचितं शुभपरिणाम चेत्यर्थः । विशुद्धमिति विशुद्धद्रव्यो-
पचितमसावधं चेत्यर्थः । अव्याघातीति आहारकं शरीरं न व्याहन्ति न व्याहन्यते चेत्यर्थः ।
तच्चतुर्दशपूर्वधर एव कस्मिश्चिदर्थे कृच्छ्रेऽत्यन्तसूक्ष्मे सन्देहमापन्नो निश्चयाधिगमार्थे क्षेत्रान्त-
रितस्य भगवतोऽर्हतः पादमूलमौदारिकेण शरीरेणाशक्यगमनं मत्वा लब्धिप्रत्ययमेवोत्पाद-
यति दृष्ट्वा भगवन्तं छिन्नसंशयः पुनरागत्य व्युत्सृजत्यन्तर्मुहूर्तस्य ।।
विशेषव्याख्या-आहारक शरीर शुभ है, अर्थात् शुभ द्रव्यसे वृद्धिको प्राप्त होता
है, शुभ द्रव्यका परिणाम है । तथा विशुद्ध है, विशुद्ध द्रव्यसे वृद्धिको प्राप्त होता है,
अर्थात् दोष निन्दा आदिसे रहित है । और यह आहारक शरीर अव्याघाति है, अर्थात् न
यह किसीका व्याघात करता है और न इसका कोई व्याघात कर सक्ता है । और यह
आहारक चतुर्दशपूर्वधरोंमें ही होता है। जब कोई चतुर्दशपूर्वधर क्लिष्ट तथा सूक्ष्म
विषयके सन्देहमें प्राप्त होता है, उस समय उस सूक्ष्म पदार्थके निश्चयकेलिये
अन्यक्षेत्रमें निवास करनेवाले भगवत अर्हत्के चरणकमलोंके निकट औदारिक शरीरसे
गमन अशक्य है, ऐसा मानकर लब्धिप्रत्यय शरीरको उत्पन्न करता है, अनन्तर
भगवान्को देखकर सन्देहरहित होनेसे पुनः निज आश्रममें आकर अन्तर्मुहूर्तमें उस
शरीरको त्याग देता है ॥ ४९ ॥

૫૬ रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् तैजसमपि शरीरं लब्धिप्रत्ययं भवति ॥ तैजस शरीर भी लब्धिप्रत्यय अर्थात् लेब्धिरूप कारणसे होता है। कार्मणमेषां निवन्धमाश्रयो भवति । तत्कर्मत एव भवतीति वन्धे परस्ताद्वध्यति । कर्म हि कार्मणस्य कारणमन्येषां च शरीराणामादित्यप्रकाशवत् ॥ यथादित्यः स्वमात्मानं प्रकाशयत्यन्यानि च द्रव्याणि न चास्यान्यः प्रकाशकः । एवं कार्मणमात्मनश्च कार- णमन्येषां च शरीराणामिति ॥ कार्मण इन शरीरोंका निबन्ध अर्थात् आश्रय होता है, वह कार्मण कर्मसे ही होता है, ऐसा बन्धके विषयमें आगे कहेंगे । कर्म जो है वह कार्मणका तथा अन्य शरीरोंका भी सूर्यके प्रकाशके सदृश कारण है। जैसे सूर्य अपना भी प्रकाश करता है और अन्य द्रव्योंका भी । किन्तु सूर्यका प्रकाशक कोई नहीं है। अनाह । औदारिकमित्येतदादीनां शरीरसंबानां कः पदार्थ इति । अत्रोच्यते । उग्रतार- मुदारम् । उत्कटारमुदारम् । उद्गम एव वोदारम् । उपादानात्प्रभृति अनुसमयमुगच्छति वर्धते जीर्यते शीर्यते परिणमतीत्युदारम् । उदारमेवौदारिकम् । नवमन्यानि ॥ यथोद्गमं वा निरतिशेषं ग्राह्य छेद्यं भेद्यं दाह्य हार्यमित्युदारणादौदारिकम् । नैवमन्यानि ॥ उदारमिति च स्थूलनाम । स्थूलमुद्गतं पुष्टं वृहन्महदित्युदारमेवौदारिकम् । नैवं शेपाणि । तेपां हि परं परं सूक्ष्ममित्युक्तम् ॥ यहां कहते है। औदारिक आदि जो पांचों शरीर है, उनमें औदारिक आदि संज्ञाओंका शब्दार्थ क्या है ? इस प्रश्नका उतर कहते है कि जो उद्गतार है अथवा जो उत्कटार है, वही उदार है, अर्थात् जो उत्पन्न होकर शीघ्र वृद्धिको प्राप्त हो । अथवा उद्गम (उत्पत्ति) ही उदार है, अर्थात् जो उपादानकारणसे आरंभ करके प्रतिसमय (कालके अल्पतम भागमें) उद्गमन करता है, वढता है, जीर्ण होता है, विशीर्ण होता है और परिणामको प्राप्त होता है, वह उदार है और उदारको ही औदारिक कहते है । अन्य वैक्रियक आदि वर्धन, जीरण, तथा शीरण परिणमन आदिखभाववाले नहीं है । अथवा जैसे; उद्- मके अनुसार विदारण आदि भी निरतिशेष ग्रहण करना चाहिये । जैसे; छेद्य, भेद्य, दाह्य तथा हार्य भी यह है; इस हेतुसे उदारण व विदारण शील होनेसे यह औदारिक है। अर्थात् यह शरीर छेदन, भेदन, दहन, आदिके योग्य होनेसे औदारिक है, उस तरह अन्य शरीर नहीं है । और उदार यह स्थूलका भी नाम है, इसलिये स्थूल, उद्गत, पुष्ट, वृहत्, तथा महान् यह सव उदारके ही अर्थको कहते हैं, इस हेतुसे ये सव औदारिक । क्योंकि जो उदार है वही औदारिक है। इस प्रकार स्थूल, पुष्ट, तथा वृहत्, (वड़ा) आदि अन्य शरीरोंमें नहीं घटते; क्योंकि अन्य शरीरोंके विषयमें तो "परं परं सूक्ष्मम्। आगे २ के एक दूसरेसे सूक्ष्म है, ऐसा पूर्व प्रसंगमें कहा है। १ तपोविशेपसे ऋद्धियोंका प्राप्त होना लब्धि है।

सभाष्यतत्त्वार्थाधिगमसूत्रम् । वैक्रियमिति । विक्रिया विकारो विकृतिविकरणमित्यनर्थान्तरम् । विविधं क्रियते । एकं भूत्वानेकं भवति । अनेकं भूत्वा एकं भवति । अणु भूत्वा महद्भवति । महच्च भूत्वाणु भवति । एकाकृति भूत्वानेकाकृति भवति । अनेकाकृति भूत्वा एकाकृति भवति । दृश्यं भूत्वादृश्यं भवति । अदृश्यं भूत्वा दृश्यं भवति । भूमिचरं भूत्वा खेचरं भवति । खेचरं भूत्वा भूमिचरं भवति । प्रतिघाति भूत्वाप्रतिधाति भवति । अप्रतिघाति भूत्वा प्रतिघाति भवति । युगपञ्चैतान् भावाननुभवति । नैवं शेषाणीति । विक्रियायां भवति विक्रियायां जायते विक्रियायां निर्वय॑ते विक्रियैव वा वैक्रियम् ।। वैक्रियक- विक्रिया, विकार, विकृति तथा विकरण ये सब एकार्थवाचक शब्द हैं। जो विविध प्रकारसे किया जावे वह वैक्रियक है। जैसे; एक होके अनेक हो, अनेक होके एक हो । अणु (अतिसूक्ष्म) होके महान् हो, महान होके अणु हो । एक आकारका होकर अनेकाकार हो, अनेकाकारका होकर एकाकार हो । दृश्य होकर अदृश्य हो, अदृश्य होकर दृश्यरूप हो । थलचर (पृथ्वीपर चलनेवाला) होकर नभचर (आकाश- गामी) हो, नभचर होकर थलचर हो । प्रतिघाति (दूसरेसे रुकनेवाला वा दूसरेको रोकने- वाला) होकर अप्रतिघाति हो, तथा अप्रतिघाति होकर प्रतिघाति हो । एक कालमें जो पूर्वोक्त एक, अनेक, अणु तथा महदादि भावोंको अनुभवन करै वह वैक्रियक है । इस प्रकारके शेष शरीर नहीं है, अर्थात् वे विविध और परस्पर विरोधी आकारोंको नहीं धारण कर सक्ते । जो विक्रिया अर्थात् विकारमें हो, जो विक्रियामें उत्पन्न हो, तथा जो विक्रियामें सिद्ध किया जावे, वह वैक्रियक है । अथवा विक्रिया अर्थात् विकार ही वैक्रियक है। आहारकम् । आहियत इति आहार्यम् । आहारकमन्तर्मुहूर्तस्थिति । नैवं शेषाणि ॥ आहारक-आहारक शरीर वह है, जो कि अल्पकालकेलिये प्राप्त किया जावे वा लाया जावे । इसकी व्युत्पत्ति यह है:,-"आव्हियते इति आहार्यम्" अर्थात् आहार्य किंचित् कालकेलिये जो लभ्य वा स्थापनीय, वही आहारक । उस आहारककी स्थिति केवल अन्तर्मुहूर्त काल पर्यन्त है । अन्य शरीर ऐसी अल्प स्थितिवाले नही है। तेजसो विकारस्तैजसं तेजोमयं तेजःस्वतत्त्वं शापानुग्रहप्रयोजनम् । नैवं शेषाणि । तैजस-तेजका जो विकार है वह तैजस शरीर है, अथवा जो तेजोमय तेजःपूर्ण वा । तेजोरूप ही है वह तैजस है । शाप अनुग्रहरूप प्रयोजन तैजसका वास्तविक निज- तत्त्व है । और अन्य शरीरोंमें यह शाप तथा अनुग्रह करनेका सामर्थ्य नहीं है, इस हेतुसे तैजस उनसे भिन्न है । कर्मणो विकारः कर्मात्मकं कर्ममयमिति कार्मणम् । नैवं शेषाणि ।। कार्मण-जो कर्मका विकार है, कर्मस्वरूप है, वा कर्ममय है; वह कार्मण शरीर , , ५८ रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् है। इस प्रकार अन्य शरीर नहीं है, अर्थात् कर्मके विकारादि नहीं है, इस कारण अन्यसे इसमें विशेषता है। एभ्य एव चार्थविशेषेभ्यः शरीराणां नानात्वं सिद्धम् । किं चान्यत् । कारणतो विपयतः स्वामितः प्रयोजनतः प्रमाणतः प्रदेशसङ्ख्यातोऽवगाहनतः स्थितितोऽल्पबहुत्वत इत्येतेभ्यश्च नवभ्यो विशेषेभ्यः शरीराणां नानात्वं सिद्धमिति । इन पूर्वोक्त विशेष अर्थोसे शरीरोंका नानात्व अर्थात् अनेकविधत्व वा अनेकप्रका- रत्व सिद्ध हो गया । किंच और यह भी है कि कारणसे, विषयसे, स्वामीसे, प्रयोजनसे, प्रमाणसे, प्रदेशकी संख्याओंसे, अवगाहनसे, स्थितिसे तथा अल्पबहुत्वसे भी शरीरोंका नानात्व सिद्ध हुआ। तात्पर्य यह है कि कारण, विषय और स्वामी नव विशेष अर्थ है, जिनसे शरीरोंका नानात्व अनेकत्व सिद्ध होता है। १ इस रीतिसे औदारिक आदि शरीरोंको अन्वर्थसंज्ञक कहके उदार ही औदारिक है, उत्कटार उदार है, इत्यादि अन्वर्थ नाना संज्ञाओंको प्रतिपादन करके अव लक्षण भेदसे एक ही प्रयत्नसे साध्य शरीरोंके नाना- त्वका उपदेश करते हैं । इन्हीं पूर्वोक्त अर्थविशेषोंसे शरीरोंका नानात अनेक प्रकारल इसका तात्पर्य यह है, कि उदार विक्रिया तथा आहार्य आदि जो विशेष अर्थ हैं, उनके लक्षणों तथा स्वरूपोके भेदसे शरी- रोंका नानात्व सिद्ध हुआ। २ किंचान्यत् इसका तात्पर्य यह हैं कि केवल अन्वर्थकी संख्याओंसे ही शरीरोंका भेद नहीं है, किन्तु संख्या आदिसे अन्य भी अतिरिक्त हेतुओंसे भी विशेष है। वे हेतु कारण आदि है; उनमें प्रथम कारण है। जैसे औदारिक शरीर स्थूल पुद्गलोंसे रचित मूर्ति है, और वैक्रियक आदि इसप्रकार स्थूल पुद्गलरूप कारणसे नहीं बने हैं, इसलिये औदारिकमें कारणकृत अन्य शरीरोंसे विशेषता है । क्योंकि "पर २ सूक्ष्म है" ऐसा वचन है । तथा विषयकृत भेद विद्याधरोंके औदारिक शरीरोकेप्रति नन्दीश्वर द्वीपपर्यन्त औ- दारिक शरीरका विषय है, और जमाचारण (ऋद्धि विशेष )के प्रति रुचकवर पर्वतपर्यन्त तिर्यग् लोकमें विषय है, ऊर्ध्व पाण्डुक वनपर्यन्त है । वैक्रियक शरीरका विषय असंखेय द्वीपसमुद्र पर्यन्त है । आहार. कका विषय महाविदेह क्षेत्रपर्यन्त है। और तैजस तथा कार्मणका विषय सम्पूर्ण लोक पर्यन्त है। स्वामीके द्वारा भी विरोप है । जैसे औदारिक शरीरके स्वामी तो तिर्यग्यो निवाले जीव तथा मनुष्य है । वैक्रिय- कके देव नारक तथा कोई २ तिर्यक् और मनुष्य भी है । आहारकके स्वामी चौदहपूर्वके धारक संयत मनुष्य हैं। और तेजस कार्मणके समस्त संसारी जीव खामी हैं । प्रयोजनकृत भी भेद हैं। जैसे आहा. ग्क शरीरके धर्म, अधर्म, मुख, दुख और केवलज्ञानकी प्राप्ति आदि प्रयोजन है । वैक्रियकके स्थूल, सूक्ष्म, एकच, अनेकत्व और आकाश, तथा भूमि जलादिमे गमन आदि लक्षणरूप अनेक ऐश्वर्यकी प्राप्ति प्रयोजन है । और आहारके सूक्ष्म, व्यवहित देश वा कालके व्यवधानमें रहनेवाले पदार्थ और अति गूढ अधाका ज्ञान प्रयोजन है । तैजसका आहारकका परिपाक तथा शाप देने और अनुग्रह करनेका सामर्थ्य प्रयोजन है । और कार्मणका जन्मान्तरमें गति परिणाम प्रयोजन है । प्रमाणकृत विशेष है । जैसे कुछ अ- धिक एक सहव योजन औदारिकका प्रमाण है । वैक्रियक शरीरका एक लक्ष योजन प्रमाण है। व रत्नि (वद्ध- मुद्धिन) मात्र आहारकका प्रमाण है । तथा लोकके विस्तार प्रमाण तैजस और कार्माण हैं। तथा प्रदेशसंरयाकृत भी भेद है, जैसे तैजस शरीरके पूर्व औदारिक आदिसे पर २ प्रदेशकी अपेक्षा उत्तर २ के अनाव्यात गुण प्रदेश है, यह विषय पूर्व प्रसङ्गमें कहा है । और अवगाहनाकृत भी भेद है, जैसे पुर अधिक एक महन योजन पर्यन्त असख्येय प्रदेशामें औदारिक शरीरका भलीभांति अवगाहन (प्रवेश - ।

सभाष्यतत्त्वार्थाधिगमसूत्रम् । ५९ अत्राह । आसु चतसृषु संसारगतिषु को लिङ्गनियम इति । अत्रोच्यते । जीवस्यौदयि- केषु भावेपु व्याख्यायमानेषूक्तम् । त्रिविधमेव लिङ्गं स्त्रीलिङ्गं पुंल्लिङ्गं नपुसकलिङ्गमिति ॥ तथा चारित्रमोहे नोकषायवेदनीये त्रिविध एव वेदो वक्ष्यते । स्त्रीवेदः पुंवेदो नपुंसकवेद इति ॥ तस्मात्रिविधमेव लिङ्गमिति ॥ तत्र- अब यहां कहते हैं कि संसारकी मनुष्यादि चार गतियोंमें लिङ्गका क्या नियम है ? इसका उत्तर कहते है । औदायिक आदि जीवोंके भावोंकी व्याख्यामें कहा है कि स्त्रीलिङ्ग पुल्लिङ्ग तथा नपुंसकलिङ्ग भेदसे लिंगके तीन ही भेद है। और चारित्रमोहनीय नो कषायोंके विषयमें भी तीन ही प्रकारका वेद कहेंगे । जैसे स्त्रीवेद, पुवेद और नपुं- कवेद । इन कारणोंसे लिग तीन ही प्रकार है । उसमे नारकसम्मूर्छिनो नपुंसकानि ॥ ५० ॥ सूत्रार्थ:-नारकी जीव ओर संमूर्छन जीव नपुंसक ही होते है। भाग्यम्-नारकाश्च सर्वे सम्मूर्छिनश्च नपुंसकान्येव भवन्ति । न स्त्रियो न पुमांसः । तेषां हि चारित्रमोहनीयनोकषायवेदनीयाश्रयेपु त्रिषु वेदेषु नपुंसकवेदनीयमेवैकमशुभगति- नामापेक्षं पूर्वबद्धनिकाचितमुदयप्राप्तं भवति नेतरे इति । विशेषव्याख्या-नारक गतिवाले सब जीव और संमूर्छन जन्मवाले नपुंसक ही होते वा पैठ) है । उन प्रदेशोंसे बहुत अधिक असंखेय प्रदेश में एक लक्ष योजनपर्यन्त वैक्रियकका अवगाहन है । और औदारिक तथा वैक्रियकसे बहुत न्यून एक हस्तमात्र ही आहारकका अवगाहन है । तथा तैजस k और कार्माण लोकान्तमे विस्तृत आकाश श्रेणिपर्यन्त अवगाहन है । तथा स्थितिकृत भी विशेष है। ( जैसे औदारिककी जघन्य अर्थात् सवसे न्यूनस्थिति अन्तर्मुहूर्त पर्यन्त है, और उत्कर्ष अर्थात् अधिकसे अधिक ३३ सागर पर्यन्त स्थिति है । तथा अभव्यके सम्बन्धसे तैजस और कार्माणकी प्रवाहके अनुरोधसे अनादि अनन्तकाल स्थिति है । और भव्यके सम्बन्धसे अनादि सान्त है । तया अल्पबहुत्वकृत भी भेद है । जैसे यदि होनेको सभव हो तो आहारक सवसे न्यून होता है, और कदाचित् नहीं भी सभव होता । इसका कारण क्या है? उसका जघन्य अन्तर अर्थात् विरहकाल एक समय है, और यदि सभव हो तो अधि- कसे अधिक छह मास है, इसकारण एकसे आदि लेकर उत्कर्षसे नव सहस्र समय पर्यन्त एक कालमें आहारक शरीरवालोंका उसका अन्तर है । तथा आहारक शरीरसे वैक्रियक शरीर देव नारकियोंके असंख्य होनेसे असख्येय उत्सर्पिणीके समयोंकी राशिके समान सख्यायुक्त असख्येय गुण होते है । तथा वैक्रियक शरीरकी अपेक्षासे औदारिक शरीर असंखेय गुण होते हैं, और वे तिर्यक् शरीर और मनुष्योंके असंख्येय होनेसे असख्येय उत्सर्पिणी तथा अवसर्पिणीके समयोंकी राशिके समान संख्यावाले असख्यात होते हैं। । कदाचित् ऐसा कहो कि तिर्यक् तो अनन्त है, तो अनन्तता होनेपर असख्येय कैसे हो सके है ? उत्तर कहते हैं कि प्रत्येक शरीर तो असखेय है और साधारण शरीर अनन्त हैं, और उनके अनन्तोंका एक शरीर है, इस हेतुसे असंख्येय हैं । अनन्तोंका प्रत्येक शरीर नहीं है, इस कारण असंख्येय कथन योग्य ही है। औदारिक शरीरोकी अपेक्षा तैजस कार्मण अनन्त है, क्योंकि वे सव संसारी जीवोंमें प्रत्येकके होते हैं, इस हेतुसे अनन्त हैं । ऐसा नहीं है कि वहुत जीवोंका एक तैजस वा कार्मण होता है । इस रीतिगे कारण आदि नव विशेपोंसे शरीरोका नानात्व घटपटादि पदार्थोके समान निश्चय करना चाहिये ।

रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् ६० है, वे न तो स्त्री होते हैं, और न पुरुष होते हैं । क्योंकि उनका चारित्रमोहनीय नो- कपाय वेदनीय कर्मोके आश्रयभूत तीन वेदोंमेसे अशुभगति नामके सापेक्ष और पूर्वनि- बद्ध संचित उदयको प्राप्त नपुंसक वेदनीय ही कर्म होता है, न कि अन्य ॥ ५० ॥ न देवाः ॥५१॥ सूत्रार्थ:-देव नपुंसक नही होते । भाष्यम्-देवाश्चतुर्निकाया अपि नपुंसकानि न भवन्ति । स्त्रियः पुमांसश्च भवन्ति । तेषां हि शुभगतिनामापेक्षे स्त्रीपुंवेदनीये पूर्वबद्धनिकाचिते उदयप्राप्ते द्वे एव भवतो नेतरत् । पारिशेष्याच गम्यते जराय्वण्डपोतजास्त्रिविधा भवन्ति स्त्रियः पुमांसो नपुसकानीति ॥ विशेषव्याख्या-चारों निकायवाले देव नपुंसक नहीं होते, स्त्री और पुरुष ही होते हैं। क्योंकि उनके शुभगतिनामकर्म सापेक्ष पूर्व जन्ममें निबद्ध संचितकर्म उदयको प्राप्त स्त्री वेदनीय, तथा पुंवेदनीय ये दो ही होते है, न कि अन्य नपुंसक । और नारक संमू- छैन वालोंका नपुंसक, देवोंका स्त्री तथा पुंवेदनीय होनेसे शेष अर्थात् जरायुज अण्डज, तथा पोतज जीवोंके त्रिविध वेद वा लिंग होते है, अर्थात् इनमें स्त्री पुरुष और नपुंसक तीनों होते हैं ॥ ५१ ॥ अत्राह । चतुर्गतावपि संसारे किं व्यवस्थिता स्थितिरायुष उताकालमृत्युरप्यस्तीति । अत्रोच्यते । द्विविधान्यायूंषि । अपवर्तनीयानि अनपवर्तनीयानि च ।अनपवर्तनीयानि पुनर्द्वि- विधानि ! सोपक्रमाणि निरुपक्रमाणि च । अपवर्तनीयानि तु नियतं सोपक्रमाणीति॥ तत्र--- अव यहांपर कहते हैं कि संसारमें चारों गतियोंमें आयुष् (उमर) की स्थिति व्यव- स्थित है, नहीं है अथवा अकाल मृत्यु है ? अर्थात् नियतकाल ही आयुष् है अथवा अकाल मृत्यु भी है ? इस पर उत्तर कहते है, कि आयु दो प्रकारकी होती हैं एक अपवर्तनीय अर्थात् जिनका न्यूनाधिक भाव हो सकै, और दूसरे अनपवर्तनीय अर्थात् जिनके नियतकालकी स्थितिमें कुछ अपवर्तन(न्यूनीकरण वा खंडनादि) न हो सके । पुनः अनपव- तनीय, सोपक्रम तथा निरुपक्रम भेदसे दो प्रकार हैं । और अपवर्तनीय तो उपक्रमस- हित ही सदा होती है। उनमें- औपपातिकचरमदेहोत्तमपुरुषासङ्खयेयवर्षायुषोऽनपवायुषः॥ ५२ ॥ सूत्रार्थ:-औपपातिक अर्थात् उपपात रूप जन्मसे उत्पन्न होनेवाले अन्तिम देहवाले उत्तम पुरुष, तथा असंख्येय वर्ष आयुप्वाले, ये सब अनपवर्त्य आयुष्वाले होते हैं। भाष्यम्-औपपातिकावरमदेहा उत्तमपुरुपा असङ्खधेयवर्षायुष इत्येतेश्नपवायुषो भवन्ति । तत्रोपपातिका नारकदेवाश्चेत्युक्तम् । चरमदेहा मनुष्या एव भवन्ति नान्ये । चर- नदेहा अन्त्यदेहा इत्यर्थः । ये तेनैव शरीरेण सिध्यन्ति । उत्तमपुरुपास्तीर्थकरचक्रवर्धचक्र- पार्ननः । असद्धेयवायुपो मनुष्याः तिर्यग्योनिजाश्च भवन्ति । सदेवकुरुत्तरकुरुपु सान्तर- - .

सभाष्यतत्त्वार्थाधिगमसूत्रम् । ६१ द्वीपकास्वकर्मभूमिषु कर्मभूमिषु च सुषमसुषमायां सुषमायां सुषमदुःषमायामित्यसङ्ख्यवर्पा- युषो मनुष्या भवन्ति । अत्रैव वाह्येषु द्वीपेषु समुद्रेषु तिर्यग्योनिजा असङ्खयेयवर्पायुषो भवन्ति । औपपातिकाश्चासङ्खथेयवर्षायुषश्च निरुपक्रमाः । चरमदेहाः सोपक्रमा निरुपक- माश्चेति । एभ्य औपपातिकचरमदेहासङ्ख्येयवर्षायुर्व्यः शेषा मनुष्यास्तिर्यग्योनिजाः सोप क्रमा निरुपक्रमाश्चापवायुषोऽनपवायुषश्च भवन्ति । तत्र येऽपवायुषस्तेषां विषशस्त्र- कण्टकाग्न्युदकादशिताजीर्णाशनिप्रपातोद्वन्धनश्वापदवज्रनिर्धातादिभिः क्षुत्पिपासाशीतो- ष्णादिभिश्च द्वन्द्वोपक्रमैरायुरपवय॑ते । अपवर्तनं शीघ्रमन्तर्मुहूर्ताकर्मफलोपभोगः । उपक्रमो- ऽपवर्तननिमित्तम् ।। विशेषव्याख्या-औपपातिक, अर्थात् उपपात संज्ञक जन्ममे उत्पन्न होनेवाले, चरमदेह अर्थात् अन्तिम शरीरवाले, उत्तमपुरुष और असंख्येय वर्ष आयुष्वाले, ये चारों अनपवर्त्य (अपवर्तन न करने योग्य) आयुष्वाले होते है, इनमें देव तथा नारक औपपातिक हैं, यह कह चुके हैं । और चरम देहवाले मनुष्य ही होते हैं; अन्य नहीं। जिस शरीरसे सिद्ध होते अर्थात् मोक्षरूपी सिद्धिको प्राप्त करते हैं वह चरम देह है । तीर्थकर चक्रवर्ती, अर्द्धचक्री आदि उत्तम पुरुष है । तथा असंखेयवर्ष आयुष्वाले मनुष्य तथा तिर्यच होते हैं । देवकुरु उत्तरकुरुओंमें और अन्तरद्वीपवाली अकर्म भूमियोंमें, तथा सुषमसुषमा, सुषमा और सुषमदुःषमाकालमें कर्मभूमियोंमें भी असंख्येयवर्ष आयुष्वाले मनुष्य होते है। और इसी काल तथा इन्ही देशोंमें बाह्यसमुद्र तथा द्वीपोंमें तिर्यग्योनिज जीव भी असंख्येय वर्ष आयुवाले होते है । औपपातिक तथा असंख्येयवर्ष आयुष्वाले उपक्रम रहित होते हैं । और चरम देहवाले उपक्रम सहित तथा उपक्रम रहित भी होते है । और इन औपपातिक, चरमदेह, और असंखेयवर्ष आयुष्वालोंसे शेष मनुष्य तथा तिर्यग्योनिज जो उपक्रमसहित तथा उपक्रमरहित है, वे अपवर्त्य आयुषवाले और अनपवर्त्य आयुप्वाले भी होते हैं। उनमें जो अपवर्त्य आयुष्वाले है, उनकी विष, शस्त्र, कंटक, अग्नि, जल, सर्प, अजीर्ण भोजन, वज्रपात, शूली, हिंसक जीव और वज्रादिके अभिघात आदिसे तथा द्वन्दसे आरंभ होनेवाले क्षुत्, पिपासा, और शीतोष्णादिसे भी आयुष् अपवर्तित (न्यून) होती है। अपवर्तनका, अर्थ है शीघ्र अन्तर्मुहूर्तकालमें ही कर्मोंके फलोंका उपभोग । और उपक्रमका अर्थ है, अपवर्तनका निमित्त ॥ ५२ ॥ १ उत्तम पुरुषसे यहा तीर्थकर, चक्रवर्ती, वलदेव तथा वासुदेव आदिका ग्रहण है । कोई कहते हैं, कि सूत्रमें उत्तम पुरुषका प्रहण नहीं है, तो तीर्थकरादिका ग्रहण कैसे होगा? इसपर कहते हैं, कि चरमदेह ग्रहणसे तीर्थकरादिका ग्रहण होगा । क्योंकि चरमशरीरी उत्तम पुरुष अवश्य होते हैं और उत्तम पुरुषोंको चरमदेह प्राप्य है । इस हेतुसे उत्तम पुरुष ग्रहण अनापं है । दोनों प्रकारके भाष्य है । अनिन्दित होनेसे प्रथम उत्तम पुरुष ग्रहण किया और तीर्थकरादि उसका विवरण किया और पुनः उत्तर कालम उत्तम पुरुषका ग्रहण किया, परन्तु निरुपक्रम सोपक्रम कथनसे यह सन्देह भाष्यसे होता है, अतएव उसी भाष्य- कारके श्रावकप्रज्ञप्तिमें उत्तम पुरुप ग्रहण किया है, यहा भी यही समझना चाहिये। ६ २उपद्रव ।

६२ रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् अत्राह । यद्यपवर्तते कर्म तस्मात्कृतनाशः प्रसज्यते यस्मान वेद्यते । अथास्त्यायुष्कं कर्म म्रियते च तस्मादकृताभ्यागमः प्रसज्यते । येन सत्यायुष्के म्रियते च ततश्चायुष्कस्य कर्मण आफल्यं प्रसज्यते । अनिष्टं चैतत् । एकभवस्थिति चायुष्कं कर्म न जात्यन्तरानुवन्धि तस्मा- नापवर्तनमायुषोऽस्तीति । अत्रोच्यते । कृतनाशाकृताभ्यागमाफल्यानि कर्मणो न विद्यन्ते । नाप्यायुष्कस्य जात्यन्तरानुवन्धः । किं तु यथोक्तैरुपक्रमैरभिहतस्य सर्वसन्दोहेनोदयप्राप्तमा- युष्कं कर्म शीघ्र पच्यते तद्पवर्तनमित्युच्यते । संहतशुष्कतृणराशिदहनवत् । यथा हि संह- तस्य शुष्कस्यापि तृणराशेरवयवशः क्रमेण दह्यमानस्य चिरेण दाहो भवति तस्यैव शिथिल- प्रकीर्णोपचितस्य सर्वतो युगपदादीपितस्य पवनोपक्रमाभिहतस्याशु दाहो भवति तद्वत् । यथा वा सङ्घयानाचार्यः करणलाघवार्थ गुणकारभागहाराभ्यां राशि छेदादेवापवर्तयति न च सङ्येयस्यार्थस्याभावो भवति तद्वदुपक्रमाभिहतो मरणसमुद्धातदुःखातःकर्मप्रत्ययमनाभोगयो- गपूर्वकं करणविशेषमुत्पाद्य फलोपभोगलाघवार्थ कर्मापवर्तयति न चास्य फलाभाव इति ।। किं चान्यत् । यथा वा धौतपटो जलार्द्र एव संहतश्विरेण शोषमुपयाति स एव च वितानितः सूर्यरश्मिवाय्वभिहतः क्षिप्रं शोषमुपयाति न च संहते तस्मिन्प्रभूतस्नेहागमो नापि वितानित- कलशोषः तद्वद्यथोक्तनिमित्तापवर्तनैः कर्मणः क्षिप्रं फलोपभोगो भवति। न च कृतप्रणाशा- कृताभ्यागमाफल्यानि ।। इति तत्त्वार्थाधिगमेऽहत्प्रवचनसङ्ग्रहे द्वितीयोऽध्यायः समाप्तः ॥ यहां कहते है कि यदि बद्ध आयुष्कर्म अपवर्तित अर्थात् न्यून वा नष्ट हो जाता है; तब तो कृतका नाश प्राप्त हुआ। क्योंकि उस कर्म अनुभव नहीं होता; और यदि यह कहो कि आयुप्नाम कर्म तो रहता है और जीव मर जाता है, तो अकृतका अभ्यागम प्राप्त हुआ । अर्थात् आयुप् कर्मके नष्ट होनेपर तो कृत (किये हुएका) नाश प्राप्त हुआ; और आयुष् कर्मके रहते ही मृत्यु होनेपर अकृत (नहीं कियेका) अभ्यागम (आगमन) रूप दोप प्राप्त हुआ; और ऐसा होना अनिष्ट है । आयुष्कर्म केवल एक ही जन्म- पर्यन्त स्थिर रहता है, वह जन्मान्तरके साथ अनुगामी नहीं हैं। इस हेतुसे आयुष्कर्मका अपवर्तन नही होता । अब यहांपर कहते है कि कृतनाश, अकृतका आगमन और फलका अभाव ये कोई भी कर्मके नहीं होते । और न बद्ध आयुष्कर्म अन्यजन्मका सम्बन्धी होता है । किन्तु पूर्वोक्त अपवर्तनके निमित्तभूत विषशस्त्रादि उपक्रमों अर्थात् आरंभोंसे अभिहत (ताडित) जो जीव है उसके सर्व सन्दोहसे अर्थात् समूहरूपमे उदयको प्राप्त जो आयुष्कर्म है; उसका शीघ्र ही परिपाक होता है । यही शीच परिपाक आयुष्कर्मका अपवर्तन कहा जाता है। और यह शीघ्र परिपाक ऐसे होता है, जने घनीभूत शुष्क तृणराशिका अग्निसे दहन । यदि मिले हुए भी शुष्क तृणकी राशिक यही एक २ अवयव जलें, तो चिरकालमें दाह होता है, परन्तु शिथिलता पूर्वक सभाष्यतत्त्वार्थाधिगमसूत्रम् । ६३ इधर उधर विखरे हुए और पवनके झकोरोंसे अभिहत एक कालमें अग्निकी ज्वालासे प्रदीप्त उसी तृणराशिका शीघ्र दाह होता है । अथवा जैसे गणितविद्याका आचार्य क्रियाकी लघुताके अर्थ गुणन तथा भागकी क्रियाओंसे किसी गणनीय पदार्थकी राशिको खण्डआदिके द्वारा शीघ्र अपवर्तन (न्यून) करता है, परन्तु उससे संख्येय पदार्थका अभाव नही होता; इसी प्रकार विष, शस्त्र आदि उपक्रमोंसे अभिहत और मृत्युके समुद्धातजन्य दुःखोंसे पीडित जीव कर्मनिमित्तक आभोगके अभावके योगपूर्वक किसी करणविशेषको उत्पन्न करके फलके उपभोगके लाघवार्थ कर्मका अपवर्तन करता है; किन्तु इससे इसको फलका अभाव नहीं होता, अर्थात् विषादिपीडाजन्य दुःखोंसे शीघ्र ही उसके आयुष्कर्मका परिपाक हो गया, इससे इसने फलको पा लिया। और यह भी है; जैसे धुला हुआ जलसे आर्द्र (गीला) कपडा यदि तह लगाके वा संकुचित करके गृहमें स्थापित कर दो तो चिरकालमें शुष्क होगा; परन्तु उसी वस्त्रको यदि फैलाके खुले मैदानमें डाल दो, तो सूर्यकी किरण तथा वायुसे ताडित होकर शीघ्र ही शुष्क हो जावेगा। और उस वस्त्रके मिले रहनेपर कुछ अधिक जल नही निकलता और न वह फैलानेसे असम्पूर्ण शुष्क होता, किन्तु दोनों दशाओंमें समान ही जल जाता है, केवल चिरकाल और शीघ्र काल मात्रका भेद है। ऐसे ही यथोक्त विष, शस्त्रादि निमित्त भूत अपवर्तनोंसे शीघ्र ही फलोंका उपभोग हो जाता है । इससे आयुष्कर्मका अपवर्तन होने में न तो कृतका प्रणाश (कृत- कर्मका नाश) है, और न अकृतका आगमन और फलाभाव ॥ इति तत्त्वार्थाधिगमेऽर्हत्प्रवचनसंग्रहे आचार्योपाधिधारिठाकुरप्रसादशर्मविरचित- भाषाटीकासमलङ्कृतेः द्वितीयोऽध्यायः । - अथ तृतीयोऽध्यायः। भाष्यम्-अत्राह । उक्तं भवता । नारका इति गतिं प्रतीत्य जीवस्यौदयिको भावः । तथा जन्मसु नारकदेवानामुपपातः । वक्ष्यति च । स्थितौ नारकाणां च द्वितीयादिपु । आस्रवेपु बहारम्भपरिग्रहत्वं च नारकस्यायुष इति ॥ तत्र के नारका नाम क चेति । अत्रोच्यते । नरकेषु भवा नारकाः । तत्र नरकप्रसिद्ध्यर्थमिदमुच्यते-- अब यहां कहते हैं कि हे भगवन् ! आपने औदयिकभावके भेदोंकी गतिमे नर- कादि चार भेद विवक्षामें नारकोंको कहा है, तथा जन्मोंके विपयमे देव और नार- कोंका उपपात रूप जन्म होता है, यह कहा है । और स्थितिके विषयमें नारक जीवोंकी स्थिति द्वितीय आदि भूमियोंमें आगे कहेंगे । और आस्रव प्रकरणमें भी कहेंगे, कि ब- हुत आरम्भ तथा परिग्रह नारकायुप् कर्म बांधता है । इत्यादि अनेक स्थलोंमें नारकांका २० रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् प्रतिपादन किया है। इसलिये कृपाकरके कहिये कि नारक कौन है? और उनका निवास कहां है ? अव इसपर कहते हैं कि जो नरकमे हों उनको नारक कहते है। उसमें नरककी प्रसिद्धिके अर्थ यह सूत्र कहते हैं- रत्नशर्करावालुकापङ्कधूमनमोमहातमाप्रभाभूमयो घनाम्बुवाता- काशप्रतिष्ठाः ससाधोऽधः पृथुतराः ॥१॥ सूत्रार्थ:-रत्नप्रभा, शर्कराप्रभा, वालुकाप्रभा, पङ्कप्रभा, धूमप्रभा, तमःप्रभा, और महातमःप्रभा ये सप्त पृथिवी अधो २ भागमें धनवात, अम्बुवात, तनुवात तथा आकाश प्रतिष्ठित हैं। भाप्यम्-रत्नप्रभा शर्कराप्रभा वालुकाप्रभा पङ्कप्रभा धूमप्रभा तमःप्रभा महातमःप्रभा इत्येता भूमयो घनाम्बुवाताकाशप्रतिष्टा भवन्येकैकशः सप्त अधोऽधः । रनप्रभाया अधः शर्क- राप्रभा । शर्कराप्रभाया अधो वालुकाप्रभा । इत्येवं शेषाः । अम्बुवाताकाशप्रतिष्ठा इति सिद्धे धनग्रहणं क्रियते यथा प्रतीयते घनमेवाम्बु अधः पृथिव्याः। वातास्तु घनास्तनवश्चेति । तदेवं खरपृथिवी पङ्कप्रतिष्ठा पङ्को धनोदधिवलयप्रतिष्ठो घनोदधिवलयं धनवातवलयप्रतिष्टं धनवातवलयं तनुवातवलयप्रतिष्ठं ततो महातमोभूतमाकाशम् । सर्व चैतत्पृथिव्यादि तनु- वातवलयान्तमाकाशप्रतिष्ठम् । आकाशं त्वात्मप्रतिष्ठम् । उक्तमवगाहनमाकाशस्येति । तद- नेन क्रमेण लोकानुभावसंनिविष्टा असङ्खधेययोजनकोटीकोट्यो विस्तृताः सप्त भूमयो रख- प्रभाद्याः॥ विशेपव्याख्या-'प्रभाभूमि' शब्द द्वन्द समासके अन्तमें होनेसे उसका शर्कराआदि सबके साथ सम्बध है । जैसे; रत्नप्रभाभूमि, शर्कराप्रभाभूमि वालुकाप्रभाभूमि इत्यादि । ये रत्नप्रभा आदि भूमियां एक एकके अधोभागमे हैं और धनवात, अम्वुवात, तथा आकाश प्रतिष्ठित अर्थात् धनवात, अम्बुवात तनुवात तथा आकाशके आधारपर हैं। सातों अधो अधो भागमें है । जैसे प्रथम रत्नप्रभाभूमि है, रत्नप्रभाके अधोभागमे वालुकाप्रभा है, उसके अधो भागमें पङ्कप्रभा है, पङ्कप्रभाके अधोभागमे धूमप्रभा है, धूमप्रभाके अधोभागमे तमःप्रभा और तमःप्रमाके नीचे महातमःप्रभा है। ये सब घनाम्वुवात आकाश प्रतिष्ठ है । अव यहां कहते है, कि 'अम्वुवाताकाशप्रतिष्ठाः, ऐसे ही सूत्रसे कार्यसिद्ध होता था पुनः 'धन' ग्रहण क्यों किया? तो धन ग्रहणसे यह निश्चय होता है कि पृथिवीके अधोभागमे घन ही अम्वु है । और वायु तो धन भी है और तनु (सूक्ष्म) भी है। इससे यह सिद्ध हुआ कि खर (शुष्क ) पृथिवी तो पङ्क (कीचड) पर प्रतिष्ठित है और पक घनोदधिवलय प्रतिष्ठ है। धनोदधिवलय धनवातवलय प्रतिष्ठ (आधार) है और धनवातवलय तनुवात (सूक्ष्मवायु) प्रतिष्ठ है, और तनुवातवलयके पश्चात् महात- मोभूत (अन्धकारपूर्ण) आकाश है । यह सब खर पृथिवी आदिसे लेकर तनुवातब- लय पर्यन्त आकाश प्रतिष्ठ है; अर्थात् पृथिवी आदि सब आकाशके आधारपर है। और ६५ सभाप्यतत्त्वार्थाधिगमसूत्रम् । आकाश आत्मप्रतिष्ठ है, अर्थात् आकाशका आधार आकाश ही है । क्योंकि ऐसा कहा भी है.---"अवगाहन देना आकाशका उपकार है" अर्थात् सब द्रव्योंको रहनेका स्थान देना यह आकाशका सबपर उपकार है । सो पूर्वोक्त क्रमसे लोकके अनु- भावसे संनिविष्ट (क्रमसे स्थित) असंख्येययोजन कोटि कोटि विस्तृत रत्नप्रभा आदि सप्त भूमि है। सुप्तग्रहणं नियमार्थ रत्नप्रभाद्या माभूवन्नेकशो ह्यनियतसङ्घया इति । किं चान्यत् । अध. सप्तवेत्यवधार्यते । ऊर्व त्वेकैवेति वक्ष्यते । अपि च तन्त्रान्तरीया असङ्ख्येयेषु लोक- धातुप्वसद्धयेयाः पृथिवीप्रस्तारा इत्यध्यवसिताः । तत्प्रतिषेधार्थ च सप्तग्रहणमिति ॥ "रत्नमभा"-इत्यादि सूत्रमें जो 'सप्त' ग्रहण है वह नियमार्थक है; अर्थात् रनप्रभा आ. दिभूमि अनियत संख्यावाली अनेक नहीं है, और दूसरी बात यह भी है कि अधोभागमें सात ही गृथिवी हैं और ऊपर एक ही है, ऐसा आगे कहेंगे । और अन्यतंत्रके अनुयायी अर्थात् अन्यमतावलम्बियोंने ऐसा निश्चय किया है कि, असंख्येय लोकधातुओंमें असंख्येय पृथिवी प्रस्तार भी स्थित है, उसके निपेध करनेकेलिये भी सूत्रमें 'सप्त' ग्रहण है। सर्वाश्चैता अधोऽधः पृथुतराः छत्रातिच्छत्रसंस्थिताः । धर्मा वंशा शैलाञ्जनारिष्टा माधव्या माधवीति चासां नामधेयानि यथासङ्घयमेवं भवन्ति । रत्नप्रभा धनभावेनाशीतं योजनशतस- हस्र शेपा द्वात्रिंशदष्टाविशतिविशत्यष्टादशषोडशाष्टाधिकमिति । सर्वे घनोदधयो विंशति- योजनसहस्राणि । घनवाततनुवातास्त्वसङ्घयेयानि अधोऽधस्तु घनतरा विशेषेणेति ।। और ये सब पृथिवी अधो अधो भागमें पृथुतर है अर्थात् छत्र अतिच्छत्रवत् अधिक २ विशाल होती गई है । तथा धर्मा १, वंशा २, शैला ३, अंजना ४, अरिष्टा ५, माधव्या ६, और माधवी ७ ये इनके यथासंख्य नाम है । रत्नप्रभा पृथिवी धनभावसे तो अस्सी- लाख योजन है और शेष पृथिवी क्रमसे बत्तीस, अट्ठाईस, वीस, अठारह, सोलह, और कुछ अधिक आठलाख योजन धनभावसे है । सब घनोदधि वीस योजन सहस्र हैं। और घनवात तथा तनुवात तो असंख्येय योजन है; और अधो अधोभागमें विशेषरूपसे धनतर हैं ॥ १ ॥ तासु नरकाः ॥२॥ सुत्रार्थ:-उन रत्नप्रभादि भूमियोंमें नरक हैं। भाष्यम्-तासु रत्नप्रभाद्यासु भूपूर्वमधश्चैकशो योजनसहस्रमेकैकं वर्जयित्वा मध्ये न- रका भवन्ति । तद्यथा । उष्ट्रिकापिष्टपचनीलोहीकरकेन्द्रजानुकाजन्तोकायस्कुम्भायःको- ठादिसंस्थाना वझतलाः सीमन्तकोपक्रान्ता रौरवोच्युतो रौद्रो हाहारवो घातनः शोचन- स्तापनः क्रन्दनो विलपनश्छेदनो भेदनः खटाखटः कालपिलर इत्येवमाद्या अशुभनामान: कालमहाकालरौरवमहारौरवाप्रतिष्ठानपर्यन्ताः । रत्नप्रभायां नरकाणां प्रस्तारास्त्रयोदश । द्वि- ब्यूनाः शेषासु ॥ रत्नप्रभायां नरकवासानां त्रिंशच्छतसहस्राणि । शेषासु पञ्चविंशतिः । ९ रायचन्द्रजेनशाखमालायाम् ६६ पञ्चदश दश त्रीण्येकं पश्चोनं तरकशतसहस्रमित्यापष्ट्याः । सप्तम्यां तु पञ्चैत्र महानरका इति ।। विशेपव्याख्या-पूर्वोक्त रत्नप्रभादि भूमियोमें ऊपर और नीचे एकशः सहस्र २ योजन छोड़के मध्य २ में नरक हैं । जैसे; उष्ट्रिका, पिष्टपचनी, लोहीकर, केन्द्रजानुका, जन्तोक, आयस्कुम्म, तथा अयःकोठादि यंत्रोंके आकारसे रचित, वज्रतलवाले, सीम- तक नाम नरक पर्यन्त रौरव, अच्युत, रौद्र, हाहारव, घातन, शोचन (शोधन वा पाचन) तापन, क्रन्दन, विलपन, छेदन, भेदन, खटाखट, और कालपिजर इत्यादि अशुभ नाम- वाले काल, महाकाल, रौरव, तथा महारौरव अप्रतिष्ठान पर्यन्त है । रत्नप्रभा भूमिमें नर- कोंके त्रयोदश अर्थात् तेरह प्रस्तार हैं। और शेष छै भूमियोंमें दो २ प्रस्तार कम होते गये हैं; अर्थात् शर्करा प्रभामें ग्यारह प्रस्तार, वालुका प्रभाग नौ, पङ्कप्रभा सात, धूम- प्रभामें पांच, तमःप्रभाग तीन, और महातमःप्रभामें एक ही प्रस्तार है । पुनः उनमेंसे रन- प्रभाभूमिमें नरकके निवासस्थान तीस लाख है । और शेषमें पच्चीस, पन्द्रह, दश, तीन, पांचकम एक लाख, इस प्रकार छट्ठी भूमिपर्यन्त हैं, और सप्तमीमें केवल पांच ही नरकके आवास हैं । तात्पर्य यह है, कि रत्नप्रभामें तीसलाख नरकावास है, शर्कराप्रभाम पञ्ची- स लाख, वालुकाप्रभामें पन्द्रहलाख, पंकप्रभामें दशलाख, धूमप्रभामें तीनलाख, और तमप्रभा पांचकम एकलाख (९९९९५) और सातवीं महातमःप्रभामें केवल पांच ही है । सब मिलकर चौरासी लाख हैं ॥ २ ॥ नित्याशुभतरलेश्यापरिणामदेहवेदनाविक्रियाः ॥३॥ मृत्रार्थः-वे नरकावास अधो अधो भागमें नित्य ही अधिक अशुभतर लेश्या, अशु- भतर परिणाम, अशुभतर देहोंकी पीडा, और अशुभतर विक्रियायुक्त होते हैं । भाष्यम्-ते नरका भूमिक्रमेणाधोऽधो निर्माणतोऽशुभतराः । अशुभा रत्नप्रभायां ततो- ऽशुभतराः शर्कराप्रभायां ततोऽप्यशुभतरा वालुकाप्रभायाम् । इत्येवमासमम्याः॥ विशपव्याख्या-वे नरकभूमि क्रमसे अधो अधो भागमें निर्माणकी रीतिसे अशुभतर है। तात्पर्य यह कि रत्नप्रभा नरक अशुभ है, उससे अशुभतर शर्कराप्रभामें है, उ- ससे भी अशुभतर वालुकाप्रभामें हैं, और उससे भी अशुभतर पङ्कप्रभामें हैं। इसीप्रकार और आगे सप्तमी अर्थात् महातमःप्रभातक जानने चाहिये । नित्यग्रहणं गतिजातिशरीराद्गोपाङ्गकर्मनियमादेते लेश्यादयो भावा नरकगतौ नरक, पञ्चेन्द्रियजाता च नैरन्तर्चेणाभवभयोद्वर्तनाद्भवन्ति न कदाचिदक्षिनिमेषमात्रमपि न भ- वन्ति शुभा वा भवन्यतो निया इत्युच्यन्ते ।। "नित्याशुभतरलेण्या-" इत्यादि ऊपरके सूत्रमे 'नित्य ग्रहण इस कारण है, कि गति (नरकगति), जाति (नारकी), शरीर (नारकशरीर), और अङ्गोपाङ्ग कोंके नियमसे ६७ सभाप्यतत्त्वार्थाधिगमसूत्रम् । लेश्या आदि भाव नरकगतिमें तथा नरकके पंचेन्द्रियजातमें उस भवके क्षय पर्यन्त उद्वर्तनसे निरन्तर होते है, एक निमेषमात्रकेलिये भी उनका अभाव नहीं होता। और न वे कदाचित् शुभ होते है। इसी हेतुसे उनको नित्य कहते है। अशुभतरलेश्याः । कापोतलेश्या रत्नप्रभायाम् । ततस्तीव्रतरसंक्लेशाध्यवसाना कापोता शर्कराप्रभायाम् । ततस्तीव्रतरसंक्लेशाध्यवसाना कापोतनीला वालुकाप्रमायाम् । ततस्तीव्रतर- संक्लेशाध्यवसाना नीला पङ्कप्रभायाम् । ततस्तीव्रतरसंक्लेशाध्यवसाना नीलकृष्णा धूमप्रभा- याम् । ततस्तीव्रतरसंक्लेशाध्यवसाना कृष्णा तमःप्रभायाम् । ततस्तीव्रतरसंक्लेशाध्यवसाना कृष्णैव महातमःप्रभायामिति ।। अशुभतरलेश्या-जैसे रक्षप्रभामे कापोतलेश्या होती है, और उससे भी अति तीव्र केश परिणामवाली कापोता शर्करा प्रभामें होती है । उससे भी तीव्रतर क्लेश परिणामवाली कापोतनीलालेश्या वालुकाप्रभामें होती है । उससे भी अति तीव्र क्लेश देनेवाली नीला- लेश्या पङ्कप्रभामें होती है । उससे भी अति तीव्र क्लेश देनेवाली नीलकृष्णालेश्या धूमप्रभामें होती है। उससेभी अति तीव्र क्लेश देनेवाली कृष्णालेश्या तमःप्रभामें होती है; और स- बसे अधिक क्लेशजनिका कृष्णालेश्या ही महातमःप्रभामें होती है । अशुभतरपरिणामः । बन्धनगतिसंस्थानभेदवर्णगन्धरसस्पर्शागुरुलधुशब्दाख्यो दशवि- धोऽशुभः पुद्गलपरिणामो नरकेषु । अशुभतरश्चाधोऽधः । तिर्यगूर्ध्वमधश्च सर्वतोऽनन्तेन भ- -यानकेन नित्योत्तमकेन तमसा नित्यान्धकाराः श्लेष्ममूत्रपुरीषस्रोतोमलरुधिरवसामेदपूया- नुलेपनतलाः श्मशानमिव पूतिमांसकेशास्थिचर्मदन्तनखास्तीर्णभूमयः। श्वशृगालमार्जार- नकुलसर्पमूषकहत्यश्वगोमानुषशवकोष्ठाशुभतरगन्धाः । हा मातर्धिगहो कष्टं वत मुञ्च ताव- द्धावत प्रसीद भर्ता वधीः कृपणकमित्यनुवद्धरुदितैस्तीबकरुणैर्दीनविक्लवैविलापैरातस्व- नैनिनादैर्दीनकृपणकरुणैर्याचितैर्वाष्पसंनिरुद्धार्नस्तनितैर्गाढवेदनैः कूजितैः सन्तापोप्णश्च नि- श्वासैरनुपरतभयस्वनाः ॥ अशुभतरपरिणाम-बन्धन, गति, संस्थान (रचनाविशेष) भेद, वर्ण, गन्ध, रस, स्पर्श, अगुरुलघु और शब्द नामक दश प्रकारके अशुभ पुद्गल परिणाम नरकोंमें है । ये परिणाम नरककी भूमियोंके अधो २ भागोंमें अधिक २ अशुभतर हैं । तिरछे नीचे, ऊपर, और चारों ओरसे अनन्त, भयानक, नित्य तथा उत्तम अर्थात् प्रथम श्रेणीके अन्धकारसे निरन्तर अन्धकारमय, श्लेष्म (नाक तथा मुखसे गिरनेवाला कफ) मूत्र, तथा विष्टाओंके श्रोतसे अर्थात् प्रवाहसे, तथा मल, रुधिर, चर्वी तथा पीबसे लिप्त तल सहित, और स्मशानभूमिके समान अति दुर्गन्धयुक्त सड़ेमांम, केश, अस्थि ( हड्डियां ) चर्म, दांत और नखोंसे ढकी हुई नरककी भूमियां हैं । तथा कुत्ते, शृगाल (गीदड), मार्जार (बिल्ली), नकुल (नेवला) सर्प, मूपक, हाथी, घोडे, गौ और मनुष्य इनके मृतकोंसे पूर्ण अतएव अशुभतर गन्धयुक्त वे नरक रायचन्द्र जैनशास्त्रमालायाम् ६८ स्थान है । तथा हा मातः! धिक्कार हैं ( मुझे)! अहो अतिकष्ट है! खेद है! मुझे छोड़ दो! दोड़ो प्रसन्न होकर मुझे छुड़ा दो! हे स्वामिन् ! मुझ दीनको न मारो!! निर- न्तर इस प्रकार रोदनोंसे, अति तीव्र करुणाजनक दीन आकुल भावोंसे, महाविलापोंसे, आखिरयुक्त शब्दोंसे, दीन कृपण और करुणाजनक याचनाओंसे, आँसुओंसे सन्निरुद्ध गर्जनाओंसे, महावेदनाओंसे कूजित शब्दोंसे, तथा सन्तापोंसे अति उष्ण श्वासोच्छासोंसे, और निरन्तर भययुक्त शब्दोंसे पूर्ण वे नरक भूमि है। अशुभतरदेहाः । देहाः शरीराणि । अशुभनामप्रत्ययादशुभान्यगोपागनिर्माणसंस्थानस्पर्श- रसगन्धवर्णस्वराणि । हुण्डानि निलनाण्डजशरीराकृतीनि क्रूरकरुणवीभत्सप्रतिभयदर्शनानि दुःखभाज्यशुचीनि च तेषु शरीराणि भवन्ति । अतोऽशुभतराणि चाधोऽधः । सप्त धनूंपि त्रयो हस्ताः पडद्भुलमिति शरीरोच्यायो नारकाणां रत्नप्रभायाम् । द्विद्विः शेषासु । स्थिति- बच्चोत्कृष्टजघन्यता वेदितव्या ।। अशुभतरदेह-देह अर्थात् शरीर, अशुभ नाम कर्मके कारणसे अशुभ अङ्गोपाङ्गर- चना, संस्थान (अवयवोंकी स्थिति) और अशुभ ही स्पर्श, रस, गन्ध, वर्ण स्वर सहित तथा हुंडक, छिन्न अण्डज शरीराकार, तथा क्रूर, करुणा, वीभत्स (घृणाजनक ), दर्शनसे भयकारक, दुःखभागी और अपवित्र शरीर उन नरकोंमें होते है। इस हेनुसे अधो २ (नीचे २) की भूमियोंमे अशुभतर ही शरीर होते है । रत्नप्रभा भूमिमें नारक जीवोंके शरीरकी उंचाई सातधनुष् तीनहाथ और छह अंगुल होती है । और शेष पृथिवी भागोंमें दूनी २ वढ़ती जाती है । और स्थितिके समान इनकी भी उत्कृष्टता जघन्यता जाननी चाहिये । अशुभतरवेदनाः । अशुभतराश्च वेदना भवन्ति नरकेप्वधोऽधः । तद्यथा । उष्णवेदना- स्तीमास्तीव्रतरातीत्रतमाश्चातृतीयायाः । उष्णशीते चतुर्थ्याम् । शीतोष्णे पञ्चम्याम् । परयोः शीताः शीततराश्चेति । तद्यथा । प्रथमशरत्काले चरमनिदावे वा पित्तव्याधिको- पाभिभूतारीरत्व सर्वतो दीमाग्निराशिपरिवृतत्व व्यभ्रे नभसि मध्याह्न निवातेऽतिरस्कृता- तपस्य यागुष्णजं दुःखं भवति ततोऽनन्तगुणं प्रकृष्टं कष्टमुणवेदनेषु नरकेषु भवति । पापमाघयोश्च मासयोस्तुपारलितगात्रस्य राम्रो हृदयकरचरणाधरौप्ठदशनायासिनि प्रतिसम- यप्रवृद्धे शीतमारते निरम्याश्रयप्रावरणस्य यादृक्शीतसमुद्भवं दुःखमशुभं भवति ततोऽन- न्तगुणं प्रकृष्टं कष्टं शीतवेदनेषु नरकेयु भवति । यदि किलोष्णवेदनान्नरकादुरिक्षप्य नारक: सुमहत्यगाररागाबुद्दीने प्रक्षिप्येत स किल सुशीतां मृट्ठमारुतं शीतलां छायामिव प्राप्तः सुख- मनुपमं विन्द्यान्निद्रां चोपलभेत एवं कष्टतरं नारकमुष्णमाचक्षते । तया किल यदि शीत- वेदनान्नरकादुमिप्य नारकः कश्चिदाकाशे माघमासे निशि प्रवाते महति तुपारराशौ प्रक्षि- प्येत सदन्तशब्दोत्तमकरप्रकम्पायासकरेऽपि तन सुखं बिन्धादनुपमा निद्रां चोपलभेत एवं कटतरं नारकं शीतदुःखमाचक्षत इति ।। १ यहां नरभूमि इसका अध्याहार है । इस प्रकारके अपार क्लेश नरकभूमियोंमें होते हैं सभाष्यतत्त्वार्थाधिगमसूत्रम् । ६९ अशुभतरवेदना-नरकोंमें वेदना अर्थात् पीड़ा भी अधो २ भागमें अशुभतर होती जाती है। जैसे; तृतीयभूमि पर्यन्त उष्णवेदना तीव्र, तीव्रतर तथा तीव्रतम होती है। और चतुर्थ भूमिमें उष्ण तथा शीत दोनों वेदना होती है । पंचमी भूमिमें शीतोष्ण वेदना होती हैं। और आगेकी दो भूमियोंमें अर्थात् षष्ठी और सप्तमीभूमिमें शीत और शीततर वेदना होती है । प्रथम शरत्कालमें अथवा अन्तिम निदाघ (ग्रीष्म ) में पित्तकी व्याधिके प्रकोपसे ग्रसित शरीर, तथा चारों ओरसे प्रदीप्त अग्निकी राशिसे वेष्टित तथा मेघरहित आकाशमें मध्यान्हके समयमें आतप (धूप) के निवारणसे शून्य अर्थात् छायाशून्य निरावरण स्थानमें प्राप्त जीवको उष्णतासे उत्पन्न जैसा दुःख होता है, उससे अनन्तगुण अधिक कष्ट उष्णवेदनायुक्त नरकोंमें होता है । तथा पौष और माघके मासोंमें तुषार (वर्फ) से लिप्त शरीरवाले, और रात्रिमें हृदय, हस्त, चरण, अधर ओष्ट और दांतोंके खटखटानेवाले प्रतिक्षण शीतकालके पवनके बढनेपर अग्निके आश्रय तथा वस्त्रसे रहित मनुष्यको शीतसे उत्पन्न दुःख जैसा अशुभ होता है, उससे भी अनन्त गुण कष्ट शीतवेदनासहित नरकोंमें होता है । तथा नरककी उष्णतामें इतना कष्ट होता है कि, यदि उष्णवेदनावाले नरकसे नारक जीवको निकालकर अति प्रदीप्त बड़ी भारी अङ्गारकी राशिमें फेंक दें, तो वह मन्द पवनसे अति शीतल छायामें प्राप्तके समान अनुपम सुखको अनुभवन करैगा और निद्रायुक्त भी हो जावेगा । इस प्रकारकी उष्णता नरककी वर्णन की जाती है । ऐसे ही यदि शीतवेदनावाले नरकसे नारकजीवको निका- लकर कोई रात्रिके समय माघ मासमें आकाशमें तुषारकी राशिपर फेंक दें, तो यद्यपि वह तुषार राशि दांतोंको खटखटानेवाली तथा शरीरकम्पा आदिका हेतु है; तथापि वहां पर वह नारकजीव सुखको अनुभवन करैगा और अनुपनिद्राको भी प्राप्त होगा। इस- प्रकार अति कष्टदायक नरकके शीतजनित दुःखको वर्णन करते हैं। अशुभवरविक्रियाः । अशुभतराश्च विक्रिया नरकेपु नारकाणां भवन्ति । शुभं करिष्याम इत्यशुभतरमेव विकुर्वते । दुःखाभिभूतमनसश्च दुःखप्रतीकारं चिकीर्षवो गरीयस एव ते दुःखहेतून्विकुर्वत इति । अशुभतरविक्रिया-नरकोंमें नारकजीवोंकी विक्रिया अशुभतर होती है । शुभ- करेंगे ऐसे विचारयुक्त होने पर भी अशुभतर ही विकारको प्राप्त होते हैं। तथा दुःखोंसे अति प्रस्तचित्त होकर दुःखोंके प्रतीकार अर्थात् मेटनेके उपाय करनेकी इच्छा करते हुए भी महान् दुःखोंहीको उत्पन्न करते है ॥ ३ ॥ परस्परोदीरितदुःखाः ॥४॥ सूत्रार्थ:-नरकके जीव परस्पर एक दूसरेको दुःख उत्पन्न करते है ।

रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् भाष्यम्-परस्परोदीरितानि दुःखानि नरकेपु नारकाणां भवन्ति । क्षेत्रस्वभावजनिना. ञ्चाशुभात्पुद्गलपरिणामादित्यर्थः ।। विशेषव्याख्या-नरकके जीवोंको नरकमें परस्पर उदीरित दुःख होते है अर्थात् क्षेत्रके खभावसे तथा अशुभ पुद्गलपरिणामके कारण वे नारकी अन्योन्य एक दुमको दुःख ही उत्पन्न करते हैं। तत्र क्षेत्रखभावजनितपुद्गलपरिणामः शीतोष्णक्षुत्पिपासादिः। शीतोष्णे व्याख्याते क्षुत्पिपास वक्ष्यामः । अनुपरतशुष्कन्धनोपादानेनैवाग्निना तीक्ष्णेन प्रततेन क्षुदग्निना दन्दह्यमानशरीरा अनुसमयमाहरयन्ति ते सर्वे पुद्गलानप्यास्तीव्रया च नित्यानुपक्तया पिपासया शुष्ककण्ठी- ठतालुजिह्वाः सर्वोदधीनपि पिवेयुर्न च तृप्तिं समाप्नुयुर्वधैयातामेव चपां क्षुत्तृष्णे इत्येवमा- दीनि क्षेत्रप्रत्ययानि ॥ वहां क्षेत्रके स्वभावसे उत्पन्न पुद्गलोंके परिणाम शीत, उष्ण, क्षुत् (भृख) तथा पिपासा आदि हैं । शीत तथा उप्णाका व्याख्यान तो कर चुके है; अब क्षुत् तथा पिपासा कहते है । निरन्तर शुष्क ईधनसे अति प्रज्वलित विस्तृत अग्निके तुल्य अति तीक्ष्ण और चारोंओरसे व्याप्त क्षुधारूप अग्निसे निरन्तर दन्दह्यमान् अर्थात् जलते हुए शरीर- वाले, प्रतिक्षण भोजनकी ही इच्छा करते है, यदि पावें तो वे सब नारकी जीव पुद्गल अ- र्थात् मृत्तिका पाषाणादि भी खा जावें; और सदाकी तीन पिपासासे जिनके कंट, ओष्ट, तालु तथा जिव्हादि शुष्क हो गये है, ऐसे नरकके जीव यदि पावे तो मम्पूर्ण समुद्रोंको भी पी जावें, तथापि तृप्त न हों ! किन्तु उनकी क्षुधा और पिपासा बढती ही जावे । इस प्रकार क्षेत्र अर्थात् नरकस्थानके कारणसे क्षुधा पिपासा आदि होते है। परस्परोदीरितानि च । अपि चोक्तम् । भवप्रत्ययोऽवधि रकदेवानामिति तन्नारकेष्ववधि- ज्ञानमशुभमवहेतुकं मिथ्यादर्शनयोगाच्च विभङ्गज्ञानं भवति । भावदोपोपघातात्तु तेपो दुःख- कारणमेव भवति । तेन हि ते सर्वतः तिर्यगूलमधश्च दूरत एवाजलं दु:खहेतून्पश्यन्ति । यथा च काकोलूकमहिनकुलं चोत्पत्त्यैव वद्धवैरं तथा परस्परं प्रति नारकाः । यथा वापूर्वान् शुनो दृष्ट्वा श्वानो निर्दयं क्रुध्यन्त्यन्योन्यं प्रहरन्ति च तथा तेपां नारकाणामवधिविपयेण दूरत एवान्योन्यमालोक्य क्रोधस्तीत्रानुशयो जायते दुरन्तो भवहेतुकः । ततः प्रागेव दुःखसमु- द्वातार्ताः क्रोधान्यादीपिवमनसोऽतर्किता इव श्वानः समुद्धता वैक्रियं भयानक रूपमास्थाय तत्रैव पृथिवीपरिणामजानि क्षेत्रानुभावजनितानि चायःशूलशिलामुसलमुद्गरकुन्ततोमरासिप- ट्टिशशक्त्ययोधनखड्गयष्टिपरशुभिण्डिमालादीन्यायुधान्यादाय करचरणदशनैश्चान्योन्यमभि- घ्नन्ति । ततः परस्पराभिहता विकृताङ्गा निस्तनन्तो गाढवेदनाः शूनाघातनप्रविष्टा इव महि- पसूकरोरभ्राः स्फुरन्तो रुधिरकर्दमे चेष्टन्ते । इत्येवमादीनि परस्परोदीरितानि नरकेपु नार- काणां दुःखानि भवन्तीति ॥ परस्परोदीरितदुःख-नारकजीव परस्पर दुःखोंको उत्पन्न करते है। पूर्व प्रक- रणमे कहा भी है कि, "भवप्रत्ययोऽवधिदेवनारकाणाम्" अर्थात् "देव तथा नरकके सभाण्यतत्त्वार्थाधिगमसूत्रम् । ७१ जीवोंको अवधिज्ञान भव (जन्म) रूप निमित्तसे ही होता है,, वह अवधिज्ञान नरकके जीवोंको अशुभका ही कारण होता है, और मिथ्यादर्शनके सम्बन्धसे वह (अवधिज्ञान) विभङ्गज्ञान हो जाता है, अर्थात् क्ववधि ज्ञान हो जाता है । और उनके भावरूप दोषके उपघातसे दुःखका ही कारण वह विभङ्गज्ञान होता है; उस अवधिज्ञानसे वे चारोंओरसे अर्थात् तिर्यक् (तिरछा) ऊपर नीचे और दूरसे निरन्तर दुःखोके हेतुओंको ही देखते है । और जैसे काक और उलूक, नकुल और सर्प उत्पत्तिहीसे बद्धवैर होते है । और भी जैसे कुत्ते अन्य अपरिचित कुत्तोंको देखकर निर्दयतापूर्वक क्रोध करते है, तथा परस्परदांतोंका प्रहार करते है। ऐसे ही नरकके जीव भी अवधिज्ञानसे पूर्वजन्मके वैर आदिको स्मरण करके दूरसे ही एक दूसरेको देखकर दुरन्त (बुरा है अन्त जिसका) तथा संसार- के हेतुरूप तीव्र क्रोधयुक्त हो जाते है। इसके पश्चात् मिलनेसे पूर्व ही दुःखोंके समु- द्धातसे अतिशय पीड़ित क्रोधरूप अग्निसे जाज्वल्यमान् चित्त, आकस्मिक विना विचारे कुत्तोंके समान समुद्धत होकर वैक्रियक भयानकरूप धारण करके वहां ही पृथिवीके परिणामसे उत्पन्न, अथवा क्षेत्रके प्रभावसे उत्पन्न, लोहमय शूल, शिला, मुशल, मुद्गर, कुन्त (भाला), तोमर (वी अथवा एक प्रकारके भाले), तलवार, असिपट्टिश (पट्टे वा ढाल), शक्ति, लोहके घन, खड्ग, यष्टि (लट्ठ) परशु, तथा बन्दूकादि अस्त्र शस्त्रोंको लेकर तथा कर चरण (घुस्से, लातें) और दांतोंसे परस्पर हनन करते है। तत्प- श्चात् परस्पर अत्यन्त ताड़ित होनेसे छिन्न भिन्न शरीर होकर महावेदनासे चिल्लाते हुए पशुबद्ध स्थानमे प्रविष्ट महिष शूकर और भेड़ोंके समान उछलते हुए रुधिरके कीचड़मे लोटते हैं । नरकोंमें परस्परसे उत्पन्न (किये हुए) इसी प्रकारके अनेक दुःख नारक जीवोंको होते है ।। ४ ।। संक्लिष्टासुरोदीरितदुःखाश्च प्राक् चतुर्थ्याः॥५॥ सूत्रार्थ:-नरकके जीवोंको संक्लिष्ट परिणामवाले असुरोंसे उदीरित ( उत्पादित) दुःख भी सहन करने पड़ते है, जो चौथी भूमिके पहिले २ होते है । भाष्यम्-संक्लिष्टासुरोदीरितदुःखाश्च नारका भवन्ति । तिसृषु भूमिषु प्राक् चतुर्थ्याः । तद्यथा । अम्बाम्बरीषश्यामशबलरुद्रोपरुद्रकालमहाकालास्यासिपत्रवनकुम्भीवालुकावैतरणी- खरस्वरमहाघोषाः पञ्चदश परमाधार्मिका मिथ्यादृष्टयः पूर्वजन्मसु संक्लिष्टकर्माणः पापा- भिरतय आसुरीं गतिमनुप्राप्ताः कर्मक्लेशजा एते ताच्छील्यान्नारकाणां वेदनाः समुदीरयन्ति चित्राभिरुपपत्तिभिः । तद्यथा । तप्तायोरसपायननिष्टप्तायःस्तम्भालिङ्गनकूटशाल्मल्यग्रारोप- णावतारणायोघनाभिघातवासी क्षुरतक्षणक्षारतप्ततैलाभिषेचनायःकुम्भपाकाम्बरीपतर्जनयन्त्र- पीडनायःशूलशलाकाभेदनक्रकचपाटनागारदहनवाहनासूचीशाद्वलापकर्षणैः तथा सिंहव्याघ्र- द्वीपिश्वशृगालवृककोकमार्जारनकुलसर्पवायसगृध्रकाकोलूकश्येनादिखादनैः तथा तप्तवालुका- वतरणासिपत्रवनप्रवेशनवैतरण्यवतारणपरस्परयोधनादिभिरिति ॥

. रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् विशेषव्याख्या-चतुर्थ भूमिके पूर्व अर्थात् तीन भूमियोंमें संक्लिष्टपरिणामविशिष्ट असुरोंके द्वारा भी नरकके जीवोंको दुःख होते हैं । सो इस प्रकार कि, अम्ब, अम्बरीप, श्याम, शबल, रुद्र, उपरुद्र, काल, महाकालास्य, असिपत्रवन, कुम्भी, वालुका, वैतरणी, खर, खर, और महाघोष; ये पन्द्रह महा अधार्मिक (पापी) मिथ्यादृष्टि, पूर्वजन्मोंमें संक्लिष्ट काम करनेवाले, पापोंमें निरन्तर तत्पर, इसीसे आसुरी गतिको प्राप्त हुए, और कर्मक्लेशसे उत्पन्न होनेवाले असुर है । जो क्लेशदेनेहीके शील (स्वभाव) वाले होनेके कारणसे अनेक प्रकारकी चित्र विचित्र युक्तियोंकेद्वारा नरकके जीवोंको वेदना उत्पन्न करते हैं । यथा, अति संतप्त लोहके रसके पिलानेसे अति संतप्त लोहके खम्भेसे आलिङ्गन करानेसे, मायारचित ( मिथ्याभूत) शाल्मलीवृक्षके अग्रभागमें चढाने और उतारनेसे, लोहके घनसे ताडनादि द्वारा, वसूला तथा पुरे आदिसे अङ्गोंके काटनेसे, अतिक्षार और संतप्त (अति उष्ण) तैलसे स्नान करानेसे, लोहके घडोंमें पकानेसे, भुसीकी अग्निमें भूजनेसे, अनेक प्रकारके (कोल्हू आदि) यंत्रोंमें पीड़नादिद्वारा, लोह रचित- शूल तथा शलाकाओंसे, छेदनभेदनादिसे, आरोंसे अंगोंके चीड़ने फाड़नेसे, अङ्गारा- ग्निमें जलानेसे, तथा अग्नि लादनेसे और सूचीसदृश तीक्ष्ण कटीले घासोंमें घसीटनेसे, अनेक दुःख उत्पन्न करते हैं । तथा सिंह व्याघ्र, चीते, कुत्ते, शृगाल, भेड़िये, कोक, मार्जार, नकुल, सर्प, काक, गृध्र, काकोलूक (घुग्घू वा उल्लू) और वाज आदि हिसक जीवोंसे उनके मांस आदिको खिलानेसे, और अति संतप्त वालूमें चलानेसे, और तरवारके सदृश पत्रयुक्त वनोंमें प्रवेश करानेसे, वैतरणी (विष्टादि पूर्ण नदी) में तैरानेसे, तथा पर- स्पर युद्ध कराने आदिसे असुर नरकके जीवोंको दुःख देते हैं। स्यादेतत्किमर्थ त एवं कुर्वन्तीति । अत्रोच्यते । पापकर्माभिरतय इत्युक्तम् । तद्यथा गो वृपभमहिषवराहमेषकुक्कुटवार्तकालावकान्मुष्टिमल्लांश्च युध्यमानान् परस्परं चाभिन्नतः पश्यत रागद्वेषाभिभूतानामकुशलानुवन्धिपुण्यानां नराणां पराप्रीतिरुत्पद्यते तथा तेषामसुराणां नार कांस्तथा तानि कारयतामन्योन्यं नतश्च पश्यतां परा प्रीतिरुत्पद्यते । ते हि दुष्टकन्दपस्तथा भूतान् दृष्ट्वाट्टहासं मुञ्चन्ति चेलोरक्षेपास्वेडितास्फोटितावल्लिते तलतालनिपातनांश्च कुर्वनि महतश्च सिंहनादानदन्ति । तच्च तेषां सत्यपि देवत्वे सत्सु च कामिकेष्वन्येषु प्रीतिकारण मायानिदानमिध्यादर्शनशल्यतीव्रकषायोपहतस्यानालोचितभावदोषस्याप्रत्यवमर्षस्याकुशलानुः वन्धिपुण्यकर्मणो वालतपसश्च भावदोषानुकर्षिणः फलं यत्सत्वप्यन्येषुप्रीतिहेतुष्वशुभ एव प्रीतिहेतवः समुत्पद्यन्ते । अस्तु, इस प्रकारकी वेदना संक्लिष्ट असुर देते है यह तो माना, परन्तु वे इस प्रका क्यों करते हैं? ऐसा करनेसे उनका क्या प्रयोजन हैं ? इसपर कहते हैं कि वे निर न्तर पाप कर्मोमें ही तत्पर रहते है, यह वार्ता प्रथम कह आये हैं। इसलिये जैसे; गे बैल, महिप, (भैसा), शूकर, मेप (भेड़), कुक्कुट (मुर्ग), नट तथा मुष्टमल्ल (मुष्टिक . , सभाण्यतत्त्वार्थाधिगमसूत्रम् । ७३ प्रहारवाले) जब आपसमें लडते है, और एक दूसरेको मारते है, तब जैसे रागद्वेपसे पूर्ण तथा अकुशलपुण्यके बन्धन करनेवाले मनुष्योंको बड़ी भारी प्रीति होती है, ऐसे ही इस प्रकार कार्य करानेवाले उन असुरोंको भी जब नारक जीव परस्पर लड़ते है, तब उन्हें वैसा देखकर अतिशय प्रीति उत्पन्न होती है। और वे दुष्ट कामनायुक्त असुर इस प्रकार दुर्दशाग्रस्त नरकके जीवोंको देखकर अट्टहास (महाहास्य) करते है, प्रसन्न- ताके मारे वस्त्र फेंकते हैं, तालियां बजाते है, और बडे जोरसे सिंहवत् चिंग्घार मारते हैं । और उनका यह कार्य, यद्यपि देवयोनिमें उत्पन्न होनेसे उनमें देवत्व है, तथा कामियोंके प्रीतिहेतुभूत अन्यकारण भी विद्यमान है, तथापि माया, निदान, और मिथ्यादर्शन इन शल्यों, तीव्रकषायोंके उदय, भावदोषकी आलोचनासे शून्य, विचार सहनशीलतासे रहित, अकुशलतासे सम्बन्ध रखनेवाले पुण्यकर्म, तथा भावदोप सहित बालतपस्याका फल है जो, अन्य अनेक प्रीतिके कारण होने पर भी उनके अशुभ ही प्रीतिके कारण उत्पन्न होते है। इत्येवमप्रीतिकरं निरन्तरं सुतीनं दुःखमनुभवता मरणमेव कासतां तेषां न विपत्तिरकाले विद्यते कर्मभिर्धारितायुषाम् । उक्तं हि । औपपातिकचरमदेहोत्तमपुरुषासङ्घयेयवर्पायुपो- ऽनपायुष इति । नैव तत्र शरणं विद्यते नाप्यपक्रमणम् । ततः कर्मवशादेव दग्धपाटित- "भिन्नच्छिन्नक्षतानि च तेषां सद्य एव संरोहन्ति शरीराणि दण्डराजिरिवाम्भसीति ।। इसप्रकार अप्रीतिकारक परस्परसे तथा असुरोंके द्वारा उत्पन्न निरन्तर अति तीन दुःखोंको अनुभवन करते हुए और उस दुःखसे सदा मरणको ही चाहनेवाले नरकके जीवोंकी अकालमें मृत्यु भी नही होती । क्योंकि कर्मोकेद्वारा उनका आयुप् नियत है । और ऐसा कहा भी है-"औपपातिकचरमदेहोत्तमपुरुपासलयेयवर्षायु- षोऽनपवायुषः" अर्थात् "उपपातरूप जन्मवाले, चरम शरीरी, उत्तमपुरुप और असङ्खचेय वर्ष आयुष्वालोंके आयुष्का अपवर्तन नही हो सकता ।" न तो नरकके जीवोंको इन दुःखोंसे कोई शरण ही है और न वहांसे कही भागके जा सकते है। इस हेतुसे कर्मके वशसे ही उनके शरीर दग्ध होनेपर, फाडे जानेपर, छिन्न भिन्न और अत्यन्त क्षत (अनेक घावोंसे युक्त) होने पर भी पुनः ज्योंके त्यों ऐसे हो जाते हैं, जलमें दंडोंकी रेखा । एवमेतानि त्रिविधानि दुःखानि नरकेयु नारकाणां भवन्तीति ।। इसप्रकार त्रिविध दुःख होते है अर्थात् अशुभतर लेश्या परिणामादिमे उत्पन्न, पर. स्पर कारणसे उत्पन्न, और असुरोंकेद्वारा उत्पन्न, ये तीन प्रकारके दुःख होते है। .. १० ७४ रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् तेष्वेकत्रिसप्तदशसप्तदशद्वाविंशतित्रयस्त्रिंशत्सागरोपमा सत्त्वानां परा स्थितिः॥ ६॥ सूत्रार्थ:-उननरकोंमें जीवोंकी परा अर्थात् उत्कृष्टस्थिति एक, तीन, सात, दश, सत्रह, बावीस और तेतीस सागरोपमा होती है। भाष्यम्-तेपु नरकेपु नारकाणां पराः स्थितयो भवन्ति । तद्यथा। रत्नप्रभायामक साग- रोपमम् । एवं त्रिसागरोपमा सप्तसागरोपमा दशसागरोपमा सप्तदशसागरोपमा द्वाविंशतिसा. गरोपमा त्रयविंशत्सागरोपमा । जघन्या तु पुरस्ताद्वक्ष्यते । नारकाणां च द्वितीयादिपु। दश- वर्पसहस्राणि प्रथमायामिति । विशेपच्याख्या-उन पूर्वोक्त रत्नप्रभादि नरकोंमें जीवोंकी सबसे अधिक स्थिति क्रमसे एक, तीन, आदि सागरोपमा होती है । यथा, -रत्नप्रभामें एक सागरोपमा, शर्करा- प्रभामें तीन सागरोपमा, वालुकाप्रभामें सात सागरोपमा, पंकप्रभामेंदश सागरोपमा, धूमप्रमा सत्रह सागरोपमा, तमःप्रभामें बावीस सागरोपमा, और महातमःप्रभामें तेवीस सागरोपमा परा अर्थात् सबसे उत्कृष्ट स्थिति होती है । यह वर्णन परास्थितिका है, और जवन्या स्थितिका वर्णन आगे करेंगे । यथा “नारकाणां च द्वितीयादिषु" "दशवर्पसहस्राणि प्रथमायाम्" अर्थात् "नरकके जीवोंकी द्वितायादिभूमियोंमें भी इसप्रकार जघन्यस्थिति है" तथा "प्रथम भूमिमें दशहजार वर्षकी स्थिति है" (अध्याय ४, सूत्र ४३,४४)। तत्रास्रवैयक्तैिर्नारकसंवर्तनीयैः कर्मभिरसंज्ञिनः प्रथमायामुत्पद्यन्ते । सरीसृपा द्वयोरा- दितः प्रथमद्वितीययोः । एवं पक्षिणस्तिसृपु। सिहाश्चतसृपु । उरगाः पञ्चसु । स्त्रियः पसु । मत्स्यमनुष्याः सप्तस्विति । न तु देवा नारका वा नरकेपूपपत्ति प्राप्नुवन्ति । न हि तेषां वह्वा- रम्भपरिग्रहादयो नरकगविनिर्वर्तका हेतवः सन्ति । नाप्युद्वर्त्य नारका देवेपूत्पद्यन्ते । न होपां सरागसंयमादयो देवगतिनिर्वर्तका हेतवः सन्ति । उद्वर्तितास्तु तिर्यग्योनौ मनुष्येयु वोत्पद्यन्ते । मानुषत्वं प्राप्य केचित्तीर्थकरत्वमपि प्राप्नुयुरादितस्तिसृभ्यः निवाण चतसृभ्यः संयम पञ्चभ्यः संयमासंयम पड्भ्यः सम्यग्दर्शनं सप्तभ्योऽपीति ।। उनमे आस्रवोंकेद्वारा नरकके जीवोंके संवर्तन (व्यवहार) के योग्य शास्त्रोक्त कोंसे असंज्ञी जीव प्रथम भूमिमें उत्पन्न होते हैं । और सरीसृप (सर्प विशेष) प्रथम तथा द्वितीय भूमिमें उत्पन्न होते है । और पक्षी तीनों भूमियोमें उत्पन्न होते है । सिंह चारों भूमियोंमें होते है । विषधर सर्प पांचोंमें उत्पन्न होते है । स्त्रियां छहों भूमियोमें उत्पन्न होती है । और मनुष्य तथा मत्स्य सातों भूमियोंमें उत्पन्न होते है। किन्तु देव और नारकजीव १ नारकाणां च द्वितीयादिपु, इस सूत्रके पहिले 'परतः परतः पूर्वा पूर्वाऽनन्तरा' कहा है । जिर का अर्थ यह है कि. पूर्व २ खगोम जो उत्कृष्ट स्थिति है वह महेन्द्र कल्पके परे जघन्य स्थिति है।सो इस सूर को अनुगृति 'च' पदकेद्वारा ली गई है, अर्थात् जिसप्रकार महेन्द्रकल्पके परे स्थितिका क्रम है, उसी प्रका द्वितीयादि भूमियोंमेभी पूर्व २ की जो उत्कृष्ट स्थिति है, वह पर २ की जघन्य स्थिति है। - सभाष्यतत्त्वार्थाधिगमसूत्रम् । ৩৭ नरकोंमें उत्पन्न नहीं होते । क्योंकि नरक गतिके साधक अधिक आरंभ और अधिक परिग्रह आदि उन देव और नारकियोके नही है । और नरक गतिसे निकलकर नरकके जीव देवताओंमें भी उत्पन्न नहीं होते, क्योंकि देवगतिके कारण सराग संयमादि हैं, वे भी उनके नहीं हैं। किन्तु नरकयोनिके नियतकालके पश्चात् छूटनेपर वे मनुष्योमें अ- थवा तिर्यग्योनिमें उत्पन्न होते है। और कोई २ आदिकी तीन भूमियोंमेंसे निकलनेके पश्चात् मनुष्यत्व पाकर तीर्थंकर पदवीको भी प्राप्त हो सक्ते हैं । तथा चार भूमियोंसे नि- कलकर निर्वाण प्राप्त कर सकते हैं। पांच भूमियोंसे संयम, छह भूमियोंसे संयमासंयम और सम्यग्दर्शन तो सातों नरक भूमियों से निकलकर प्राप्तकर सकते है । द्वीपसमुद्रपर्वतहदतडागसरांसि ग्रामनगरपत्तनादयो विनिवेशा बादरो वनस्पतिकायो वृक्षतृणगुल्मादिः द्वीन्द्रियादयस्तिर्यग्योनिजा मनुष्या देवाश्चतुर्निकाया अपि न सन्ति । अ- न्यत्र समुद्धातोपपातविक्रियासाङ्गतिकनरकपालेभ्यः । उपपाततस्तु देवा रत्नप्रभायामेव सन्ति नान्यासु । गतिस्तृतीयां यावत् ।। नरक भूमियोंमें द्वीप, समुद्र, पर्वत, हृद, तड़ाग, सर (छोटे तलाब) ग्राम, नगर, और पत्तनादिकोंकी रचना तथा स्थूल वनस्पतिकाय, वृक्ष, तृण, लतादिक और द्वीन्द्रि- यादि जीव, तिर्यश्च, मनुष्य और चतुर्निकायके देव, ये कोई भी नहीं होते। परन्तु समुद्धातमें प्राप्त, उपपात जन्मवाले, वैक्रियकशरीरधारी, साङ्गैतिक और नरकपाल अर्थात् महापापी इन सबको छोड़के । अर्थात् ये नरकभूमियोंमें जा सक्ते है। यहां इतना और भी जानना आवश्यक है, कि उपपातरूप जन्मसे जो देव होते है, वे रत्न- प्रभा भूमिमें हैं, अन्य भूमियोंमें नही । और इनका गमन तृतीयभूमि पर्यन्त हो सकता है, अधिक नहीं। यच्च वायव आपो धारयन्ति न च विश्वग्गच्छन्त्यापश्च पृथिवीं धारयन्ति न च प्रस्पन्दन्ते पृथिव्यश्चाप्सु विलयं न गच्छन्ति तत्तस्यानादिपारिणामिकस्य नित्यसन्ततेर्लोकविनिवेशस्य लोकस्थितिरेव हेतुर्भवति ।। और जो वायुजलको धारण करते है, वे चारों ओर नहीं वहते अर्थात् साधारण वा- युके समान इधर उधर नहीं जाते । और जल जो पृथिवीको धारण करते है, वे भी इधर उधर कहीं फिसल कर नहीं चलते । और पृथिवी भी जलमें नही डूबती, और ऐसा होनेमे अनादिकालसे पारिणामिक तथा नित्य प्रवाहरूपसे जो लोकोंकी रचना है, उसमें लोकस्थिति ही कारण है। , , १ रत्नप्रभाके तुल्य नीचेकी छह भूमियोंमें द्वीप समुद्रादि नहीं हैं । २ पूर्व जन्मके मित्र । ३ सप्तभूमियोम जो घनाम्बुवाताकाश प्रतिष्ठा है उसकी व्यवस्था कहते हैं।

रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् अत्राह । उक्तं भवता लोकाकाशेऽवगाहः । तदनन्तरं उर्व गच्छत्यालोकान्तादिति । तत्र लोकः कः कतिविधो वा किंसंस्थितो वेति । अत्रोच्यते ।। अब यहांपर कहते हैं, कि आपने यह कहा है कि धर्माधर्म तथा जीवादि द्रव्योंका लोकाकाश पर्यन्त अवगाह है, अर्थात् सब द्रव्योंकी लोकाकाश पर्यन्त गति है। और उसके पश्चात् यह भी कहा है कि, वे ऊपर लोकके अन्त तक जाते हैं । सो उक्त विषयम प्रश्न है कि, लोक क्या है? कै प्रकारका है ? और वह किस प्रकारसे स्थित है ? । अब यहां उत्तर कहते है, पञ्चास्तिकायसमुदायो लोकः । ते चास्तिकायाः स्वतत्त्वतो विधानतो लक्षणतत्रोक्ता वक्ष्यन्ते च । स लोकः क्षेत्रविभागेन त्रिविधोऽधस्तिर्यगूज़ चेति । धर्माधर्मास्तिकायाँ लोक- व्यवस्थाहेतू । तयोरवगाहविशेपाल्लोकानुभावनियमात् सुप्रतिष्टकवज्राकृतिर्लोकः । अधो- लोको गोकन्धराधरार्धाकृतिः । उक्तं ह्येतत् । भूमयः सप्ताधोऽधः पृथुतराच्छनातिच्छत्रसं- स्थिता इति ता यथोक्ताः । तिर्यग्लोको झल्लाकृतिः । ऊर्ध्वलोको मृदङ्गाकृतिरिति । तत्र तिर्यग्लोकप्रसिद्ध्यर्थमिदमाकृतिमात्रमुच्यते ।। पंचास्तिकायोंका जो समुदाय अर्थात् समूह है, वही लोक है । और वे पंचास्तिकाय निज- तत्त्वरूपसे, विधानसे और लक्षणसे कुछ कहे हैं, और आगे भी कहेंगे । वह पंचास्तिकाय- समूहरूप लोक क्षेत्रविभागसे तीन प्रकारका है, अर्थात् अधोलोक, तिर्यक्लोक, और ऊर्ध्वलोक । पंचास्तिकायोंमेसे धर्मास्तिकाय तथा अधर्मास्तिकाय ये दोनों लोकोंकी व्यवस्थाके कारण हैं । और इन दोनोंके अवगाहन (गमन व्याप्ति) विशेपसे, लोकके अनु. भावके नियमसे सुप्रतिष्टक वज्राकार लोक है, अर्थात् यह आकार सब लोकका है । अधो लोक गौकन्धराधरार्ध(१)के आकार है। यह कहा भी है। "सातों भूमिअधो २ भागमें विशाल और छत्र तथा अतिच्छत्राकार स्थित है"। इसप्रकार सातों भूमियोंकी स्थिति जैसी है वैर्स कही । और तिर्यग्लोक झल्लरीके आकार है । और ऊर्चलोक मृदङ्गके आकार है उनमें तिर्यग्लोकका केवल आकार मात्र उसकी (तिर्यगृलोककी) प्रसिद्धिके असे संक्षेपसे कहते है ।। ६॥ जम्बूद्वीपलवणादयः शुभनामानो द्वीपसमुद्राः ॥७॥ सूत्रार्थ:-जम्बूद्वीपादि शुभनामवाले द्वीप और लवणसमुद्रादि शुभनामवाले समुद्र हैं भाग्यम्-जम्बूद्वीपादयो द्वीपा लवणादयश्च समुद्राः शुभनामान इति । यावन्ति लोवे शुभानि नामानि तन्नामान इत्यर्थः । शुभान्येव वा नामान्येषामिति ते शुभनामानः । द्वीपा दनन्तरः समुद्रः समुद्रादनन्तरो द्वीपो यथासङ्ख्यम् । तद्यथा । जम्बूद्वीपो द्वीपो लवणोद समुद्रः धातकीखण्डो द्वीपः कालोदः समुद्रः पुष्करवरो द्वीपः पुष्करोदः समुद्रः वरुणवरं द्वीपो वरुणोदः समुद्रः क्षीरवरो द्वीरः क्षीरोदः समुद्रो घृतवरो द्वीपो धृतोदः समुद्रः इक्षुवरं ७७ सभाष्यतत्त्वार्थाधिगमसूत्रम् । द्वीप इक्षुवरोदः समुद्रः नन्दीश्वरो द्वीपो नन्दीश्वरवरोदः समुद्रः अरुणवरो द्वीपोऽरुणवरोदः समुद्र इत्येवमसङ्ख्यया द्वीपसमुद्राः खयम्भूरमणपर्यन्ता वेदितव्या इति ॥ विशेषव्याख्या-जम्बूद्वीपसे आदि लेके द्वीप और लवणसमुद्रसे आदि लेके समुद्र ये शुभनामवाले हैं। इसका यह तात्पर्य है कि लोकमें जितने शुभनाम हैं, उन नामोंसे ये युक्त हैं । शुभ नामवाले, इसका यह तात्पर्य है कि इनके शुभ ही नाम हैं अशुभ नहीं। द्वीपके अनन्तर समुद्र और समुद्रके अनन्तर द्वीपसमुद्र है, इसप्रकार यथासंख्य समझना चाहिये । यथा,:-जम्बूद्वीप नामक द्वीप है, और उसके अनन्तर लवणोद नामक समुद्र है; उसके पश्चात् पुनः धातकीखण्ड नामक द्वीप है, उसके अनन्तर पुनः कालोद नामक समुद्र है; पुनः पुष्करवरद्वीप है, पुनः पुष्करोदनामक समुद्र है; पुनः वरुणवरद्वीप है, पुनः वरुणोद नामक समुद्र है। पुनः क्षीरवर नामक द्वीप है और क्षीरोद समुद्र है; पुनः घृतवर नामक द्वीप है, पुनः घृतोद नामक समुद्र है; पुनः इक्षुवर नामक द्वीप है, पुनः इक्षु- वरोद नामक समुद्र है; पुनः नन्दीश्वर नामक द्वीप है, पुनः नन्दीश्वरवरोद समुद्र है; पुनः अरुणवर नामक द्वीप है, और पुनः उसके अनन्तर अरुणवरोद नामक समुद्र है; इस प्रकार असंख्येय द्वीप समुद्र स्वयम्भूरमण पर्यन्त जानने चाहिये ॥७॥ दिदिविष्कम्भाः पूर्वपूर्वपरिक्षेपिणो वलयाकृतयः ॥८॥ सूत्रार्थ-ये द्वीप समुद्र द्विगुण २ विष्कंभके धारण करनेवाले हैं, तथा पूर्व पूर्व द्वीप समुद्रको पर २ के द्वीपसमुद्र चारों ओरसे घेरे हैं, और सब ही वलयाकार (वृत्ता- कार) हैं। भाष्यम्- सर्वे चैते द्वीपसमुद्रा यथाक्रममादितो द्विििवष्कम्भाः पूर्वपूर्वपरिक्षेपिणो वल- याकृतयः प्रत्येतन्याः । तद्यथा। योजनशतसहस्रविष्कम्भो जम्बूद्वीपस्य वक्ष्यते । तद्विगुणो लवणजलसमुद्रस्य । लवणजलसमुद्रविष्कम्भाहिगुणो धातकीखण्डद्वीपस्य । इत्येवमास्खय- म्भूरमणसमुद्रादिति ॥ विशेषव्याख्या-प्रथम जम्बूद्वीपसे आदि लेके द्वीप और समुद्र सब यथाक्रमसे द्विगुण २ व्यास प्रमाण होते गये है, और पर २ के द्वीप समुद्र पूर्व २ द्वीप समुद्रको चारों ओरसे घेरे है। और वलय (कटक अर्थात् कडे) के आकारके हैं, ऐसा जानना चाहिये । जैसे; एक सहस्रयोजन अर्थात् एकलक्ष योजन विष्कंभ (विस्तार ) । जम्बूद्वीपका कहेंगे। और जम्बूद्वीपसे द्विगुण विष्कंभ लवणसमुद्रका है; और लवण- समुद्रके विष्कंमसे द्विगुण विष्कंभ धातकीखंडका है । इस प्रकार पूर्व २ से पर २ द्विगुण विष्कंभवाले द्वीप समुद्र स्वयंभूरमण पर्यन्त जानने चाहिये । पूर्वपूर्वपरिक्षेपिणः । सर्वे पूर्वपूर्वपरिक्षेपिणः प्रत्येतन्याः । जम्बूद्वीपो लवणसमुद्रेण परि- क्षिप्तः । लवणजलसमुद्रो धातकीखण्डेन परिक्षिप्तः । धातकीखण्डद्वीपः कालोदसमुद्रेण परि- ७८ रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् निमः । कालोदसमुद्रः पुष्करवरद्वीपार्धन परिक्षिप्तः । पुष्करद्वीपाधै मानुषोत्तरेण पर्वतेन परि- क्षिणम् । पुष्करवरद्वीपः पुस्करवरोदेन समुद्रेण परिक्षिप्तः । एवमाखयम्भूरमणात्समुद्रादिति।। पूर्व २ का परिक्षेप करनेवाले है, इसका तात्पर्य यह है, कि सब द्वीप समुद्र अपनेसे पूर्व २ को चारों ओरसे घेरे है। जैसे; प्रथम जम्बूद्वीप अपनेसे द्विगुण विष्कंभवाले लवणोदसमुद्रसे चारों ओरसे घिरा है, और लवणोदसमुद्र अपनेसे द्विगुण परिमाण- वाले धातकीखंडसे घिरा है । ऐसे ही धातकीखंडद्वीप कालोदसमुद्रसे घिरा है। कालोदसमुद्र पुष्करवरद्वीपसे घिरा है । पुष्करार्द्ध मानुषोत्तरपर्वतसे घिरा है । और पुष्करवर द्वीप पुष्करखरसमुद्रसे घिरा है । इसी प्रकार वयंभूरमण पर्यन्त द्वीप समुद्र पूर्व २ पर २ से घिरे है। वलयाकृतयः । सर्वे च ते वलयाकृतयः सह मानुषोत्तरणेति ॥ 'वलयाकृतय.' इसका यह अभिप्राय है, कि सब द्वीप समुद्र मानुषोत्तरपर्वत सहित चलयके आकार हैं ।। ८॥ तन्मध्ये मेरुनाभिवृत्तो योजनशतसहस्रवि- कम्भो जम्बूद्वीपः ॥९॥ मूत्रार्थ:-उन द्वीपसमुद्रोंके मध्यमें मेरुपर्वत ही है नामि जिसकी ऐसा, तथा वृत्ताकार एकलन योजन विष्कंभवाला जम्बूद्वीप है। भाग्य-तेषां द्वीपसमुद्राणां मध्ये तन्मध्ये ॥ मेरुनाभिः । मेरुरस्य नाभ्यामिति मेरुास्य नाभिरिति मेन्नाभिः । मेरुरस्य मध्य इत्यर्थः ॥ सर्वद्वीपसमुद्राभ्यन्तरो वृत्तः कुलालचक्रा- नियोजनशतसहस्रविष्कम्भो जम्बूद्वीपः । वृत्तग्रहणं नियमार्थम् । लवणादयो वलयवृत्ता जन्यूट्टीपस्तु प्रतरवृत्त इति । यथा गम्येत वलयाकृतिभिश्चतुरस्रव्यस्रयोरपि परिक्षेपो विद्यते तथा च माभूदिति ॥ विगंपव्याख्या-पूर्वोक्त असंख्य द्वीप और समुद्रोंके मध्यमे मेरुपर्वतरूप नाभियुक्त, प्रतरवृत्त एकलाख योजन विष्कंभयुक्त जम्बूद्वीप है। वहाँपर 'मेरुनाभि' इस पदसे मेरु जिमकी नाभिने है, अथवा मेरु जिसकी नाभि है, यह आशय है। दोनोंप्रकारके समाससे in जिनके मध्यमें है, यह अभिप्राय है । सब द्वीप और समुद्रोंके आभ्यन्तर वृनाकार अर्थात् कुलालके चक्रसदृश आकारवान् शतसहस्त्र (लाख) योजन विक्रम गहिन जम्बूद्वीप है। यहां पर वृत्त कहना इस नियन्के अर्थ है कि, लवणसे जादि लेक दीप नमुद्र वलयाकार वृत्त है । और जम्बूद्वीप प्रतरवृत्त है। यह कथन इसलिये कि. मदाचित् ऐना ज्ञान न हो जाये कि वलयाकार पदार्थों को चतुष्कोण और त्रिको- जोमानी पग्विष्टन (घिराव) होता है, जो कि न होना चाहिये । मरपि काश्चनन्थालनाभिरिव वृत्तो योजनसहनमधोधरणितलमवगाढो नवनवत्यु , सभाष्यतत्त्वार्थाधिगमसूत्रम् । च्छ्रितो दशाधो विस्तृतः सहस्रमुपरीति । त्रिकाण्डखिलोकप्रविभक्तमूर्तिश्चतुर्विनैम- द्रशालनन्दनसौमनसपाण्डकैः परिवृत्तः । तत्र शुद्धपृथिव्युपलवनशर्कराबहुलं योजन- सहस्रमेकं प्रथम काण्डम् । द्वितीयं त्रिषष्टिसहस्राणि रजतजातरूपाङ्कस्फटिकबहुलम् । तृतीयं पत्रिंशत्सहस्राणि जम्बूनदबहुलम् । वैडूर्यबहुला चास्य चूलिका चत्वारिंशद्योज- नान्युच्छ्रायेण मूले द्वादशविष्कम्भेण मध्येऽष्टावुपरि चत्वारीति । मूले वलयपरिक्षेपि भद्र- शालवनम् । भद्रशालवनात्पञ्च योजनशतान्यारुह्य तावत्प्रतिक्रान्तिविस्तृतं नन्दनम् । ततो ऽर्धत्रिषष्टिसहस्राण्यारुह्य पञ्चयोजनशतप्रतिक्रान्तिविस्तृतमेव सौमनसम् । ततोऽपि षट्त्रिं- शत्सहस्राण्यारुह्य चतुर्नवतिचतुःशतप्रतिक्रान्तिविस्तृतं पाण्डकवनमिति । नन्दनसौमनसा- भ्यामेकादशैकादशसहस्राण्यारुह्य प्रदेशपरिहाणिविष्कम्भस्येति ॥ मेरु भी काञ्चन (सुवर्ण) के थारकी नाभिके समान वृत्ताकार सहस्र योजन पृथिवीमें प्रविष्ट, निन्नानवे सहस्र योजन उंचा, दश सहस्र योजन अधोभागमें विस्तृत, और सहस्र योजन ऊपर विस्तारयुक्त है। तथा तीन कांड सहित, तीनों लोकोंको प्रविभक्तमूर्ति अर्थात् विभाग करनेवाला और भद्रशाल, नन्दन, सौमनस, तथा पाण्डुक नामक चार वनोंसे घिरा है । उन तीनों कांडो (विभागों) मेंसे प्रथमकांड शुद्धपृथिवी, पाषाण (बहुमूल्य पाषाण), वज्र (हीरकादि) तथा शर्करा (वालू) से प्रायः पूर्ण और एक सहस्र योजन प्रमाण सहित है । और द्वितीयकांड प्रायः रौप्य, सुवर्ण तथा स्फटिक मणिसे पूर्ण त्रेसठसहस्र योजन प्रमाण सहित है। तथा तृतीयकांड प्रायः जम्बूनदनामक उत्तम सुवर्णसे पूर्ण और छत्तीससहस्र योजन प्रमाण सहित है । और चवालीस योजन ऊंची, मूलभागमें बारह योजन विस्तारसहित, मध्यभागमें आठ और ऊपर चार योजन विष्कंभसहित इस मेरुकी चूलिका है। और मूल भागमें भद्रशालवन उसको वेष्टित किये (घेरे) है। और भद्रशालसे पांचसौ योजन और चढके वहां तक- प्रतिक्रान्ति (प्रतिव्याप्ति वा प्रतिबिम्ब) से विस्तृत नन्दनवन है । और उसके पश्चात् साढे त्रेसठ सहस्र योजन आगे चढके पांच ही सौ योजन प्रतिक्रान्तिसे विस्तृत सौम- नस वन है। और उस सौमनससे भी छत्तीस सहस्र योजन और आगे चढके चारसौ चौरानवे योजन पर्यन्त प्रतिक्रान्तिसे विस्तृत पाण्डकवन है । और नन्दन तथा सौमनस इन दो- नोंसे ग्यारह २ सहस्र योजन चढके विष्कंभके प्रमाणकी परिहाणि अर्थात् न्यूनता है ॥९॥ १ यह मेरु सर्वत्र सम प्रमाणसे नहीं है, किन्तु प्रदेशप्रमाणकी परिहाणिसे न्यून होता गया है। इस विषयको दर्शाते हैं x x x x x x नन्दनवनसे ऊपर और सौमनसके नीचे मध्यमे ग्यारह २ सहस्र योजन चढके एक सहस्र योजन विष्कमकी न्यूनता होती जाती है। और सौमनसके ऊपर तथा नन्दनके नीचे इन आचार्य- (सूरि )ने नहीं कहीं। ४ x x और यह परिहाणि (न्यूनता) जो आचार्यने कही है, वह गणितके अनुसार किञ्चित भी विश्वासके योग्य नहीं है । क्योंकि सौमनस वनमे अभ्यन्तरका विष्कम तीन सहस्र दो सौ वहत्तर योजन तथा ग्यारहके आठ भाग है। ३२७२६ । और वाह्यविष्कम चार हजार दो सौ वहत्तर योजन तथा ग्यारहके आठ भाग है । ४२७२६ । और आचार्य कयित परिहाणिसे .

रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् तत्र भरतहैमवतहरिविदेहरम्यकहरण्यवतैरा- वतवर्षाः क्षेत्राणि ॥ १०॥ सूत्रार्थः-उस जम्बूद्वीपमे भरत हैमवतादि सात वर्षधर क्षेत्र हैं। भाप्यम्-तत्र जम्बूद्वीपे भरतं हैमवत हरयो(?) विदेहारम्यक हैरण्यवतमरावतमितिसम वंशाः क्षेत्राणि भवन्ति । भरतस्योत्तरतो हैमवतं हैमवतस्योत्तरतो हरय इयेवं शेपाः । वंशा वर्षा वास्या इति चैषां गुणतः पर्यायनामानि भवन्ति । सर्वेषां चैपां व्यवहारनयापेक्षादा- दित्यकृताहिनियमादुत्तरतो मेरुर्भवति । लोकमध्यावस्थितं चाष्टप्रदेशं रुचकं दिग्नियमहेतु प्रतीस यथासम्भवं भवतीति ।। विशेषव्याख्या-जम्बूद्वीपमें भरत १, हैमवत २, हरि ३, विदेह ४, रम्यक् ५, हरण्यवत ६, और ऐरावत ७; ये सात वंशधर क्षेत्र हैं। भरतके उत्तर हैमवत है, और हैमवतके उत्तर हरिनामक क्षेत्र है । इस प्रकार रम्यकादि भी पूर्व २ के उत्तर समझ लेना चाहिये । बंश, वर्ष, तथा वास्य ये इन क्षेत्रोंके गुणसे पर्याय नाम है, अर्थात् ये सात वंशधरपर्वत, वर्षधरपर्वत अथवा वास्यधरपर्वत कहे जा सकते है । और व्यवहार नयकी अपेनासे, सूर्यकृत दिशाके नियमसे, इन भरत हैमवत आदि सब क्षेत्रोंमें मेरु उत्तर दिशामें है। परन्तु लोकके मध्यमें स्थित रुचकाष्ट प्रदेशोंको दिशाभोंका हेतु मानकर यथासम्भव निश्चय दिग्विभाग होता है ॥ १० ॥ तद्विभाजिनः पूर्वापरायता हिमवन्महाहिमवनिषध- नीलरुक्मिशिखरिणो वर्षधरपर्वताः॥११॥ सूत्रार्थ:-उन भरतादि क्षेत्रोंका विभाग करनेवाले पूर्व पश्चिम चौडे हिमवत् आदि छह वर्पधरपर्वत है भाप्यम्-तेषां वर्षाणां विभकारो हिमवान महाहिमवान् निषधो नीलो रुक्मी शिखरी इत्येते पड़पंधराः पर्वताः । भरतस्य हैमवतस्य च विभक्ता हिमवान् हैमवतस्य हरिवर्षस्य च विभक्ता महाहिमवानित्येवं शेपाः ॥ विशेषव्याख्या-पूर्वमें जो भरत, हैमवत, आदि क्षेत्र कहे हैं, उनको विभक्त अर्थात् पृथक् २ करनेवाले हिमवान् , महा हिमवान् , निषध, नील, रुक्मी, और शिखरी ये छह वर्षधर पर्वत है। उनमें भरत तथा हैमवतको पृथक् करनेवाला हिमवान् पर्वत है। और हैमवत तथा हरिका विभाग करनेवाला महाहिमवान् । ऐसे ही शेप भी कोई भी विष्कम नहीं आता । और वह बाह्य तथा आभ्यन्तरके विक्रम प्रनाण असत्य नहीं हो सके, क्योंकि गानने पड़ा है । और भार्यानुसारी गणितशास्त्रवेत्ता परिहाणिको और प्रकारसे वर्णन करते है । नेरु ऊपर एक्लन योजन ऊंचा है । अपत्रचन्यूनतादिसे रहित सहन योजन भूमिमें गड़ा हुआ अट्य है।

सभाष्यतत्त्वार्थाधिगमसूत्रम् । ८१ जान लेना। अर्थात् हरि तथा विदेहका विभाजक निषध है, विदेह तथा रम्यकका विभाजक नील है। रम्यक हैरण्यवतका रुक्मी है, और हैरण्यवत तथा ऐरावत वर्षका विभाजक शिखरी पर्वत है ।। ११ ।। तत्र पञ्च योजनशतानि पड़िशानि पट् चैकोनविंशतिभागा भरतविष्कम्भः । स द्विद्वि- हिमवद्धैमवतादीनामा विदेहेभ्यः । परतो विदेहेभ्योऽर्धाहीनाः ॥ पञ्चविंशतियोजनान्यव- गाढो योजनशतोच्छ्रायो हिमवान् । तद्विमहाहिमवान् । तहिनिषध इति ॥ उनमेसे पांचसौ छब्बीस योजन और छहके उन्नीसवें भाग (५२६९) विष्कम प्र- माण सहित भरतवर्ष है। आगे हिमवत आदि पर्वत तथा हेमवत आदि क्षेत्रोंके वि- कंभ विदेहक्षेत्र पर्यन्त दूने २ होते चले गये है, और विदेहसे परे (आगे) अर्ध अर्ध न्यून होते गये है। उनमें पच्चीस योजन विस्तृत और शतयोजन ऊंचा हिमवान है, और उसका भी दूना निषध है। भरतवर्षस्य योजनानां चतुर्दशसहस्राणि चत्वारि शतान्येकसप्ततानि षद् च भागा विशेपतो ज्या । इपुर्यथोक्तो विष्कम्भः । धनुःकाष्ठं चतुर्दशसहस्राणि शतानि पञ्चाष्टाविंशा- न्येकादश च भागाः साधिकाः ।। और चौदह सहस्र चारसौ योजन तथा इकहत्तरमें छह भाग (१४४००६ योजन) भरतवर्षकी ज्या प्रत्यञ्चा अथवा जीवा है । इषु अर्थात् वाणका विष्कंभ ५२६६६ यो- जन कहा है । और धनुष्काष्ठ अर्थात् चापकी परिधि चौदह सहस्र पांचसौ और कुछ अधिक अट्ठाईसमें ग्यारह भाग योजन विष्कंभ (१४५००३१ ) है । भरतक्षेत्रमध्ये पूर्वापरायत उभयतः समुद्रमवगाढो वैताढ्यपर्वतः षडू योजनानि सक्रो- शानि धरणिमवगाढः पञ्चाशद्विस्तरतः पञ्चविंशत्युच्छ्रितः॥ भरतवर्षमें पूर्वसे पश्चिमकी ओर लम्बा पड़ा हुआ दो ओरके समुद्रमें प्रविष्ट बैताढ्य बैताद्यवा विजया) पर्वत है; जो कि कुछ कोश अधिक छह योजन पृथिवीमें प्रविष्ट है । पचास योजन विस्तृत और पच्चीस योजन ऊंचा है। विदेहेषु निपधस्योत्तरतो मन्दरस्य दक्षिणतः काञ्चनपर्वतशतेन चित्रकूटेन विचित्रकूटेन चोपशोभिता देवकुरवो विष्कम्भेणैकादश योजनसहस्राण्यष्टौ च शतानि द्विचत्वारिंशानि द्वौ च भागौ । एवमेवोत्तरेणोत्तराः कुरवश्चित्रकूटविचित्रकूटहीना द्वाभ्यां च काञ्चनाभ्यामेव यमकपर्वताभ्यां विराजिताः ।। विदेहवर्षमें निषध पर्वतके उत्तर, मन्दरके दक्षिण काञ्चनमय शतपर्वत सहित चित्र- कूट तथा विचित्रकूटसे उपशोभित देवकुरु भोगभूमि हैं । जो कि ग्यारह हजार आठसौ और वियालीसमें दो भाग (११८००३३) योजन विष्कंभ प्रमाण सहित है । इसी प्रकार १ धनुपकी डोरीके तुल्य रेखा. ११ ८२ रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् उत्तरकी और उत्तरकुरु है, किन्तु वे चित्रकूट तथा विचित्रकूटोंसे हीन हैं, परन्तु काश्चनमय यमक नाम दो पर्वतोंसे वे उत्तरकुरु शोभित हैं। विदेहा मन्दरदेवकुरुत्तरकुरुभिर्विभक्ताः क्षेत्रान्तरवद्भवन्ति । पूर्वे चापरे च । पूर्वेषु पोडश चक्रवर्तिविजया नदीपर्वतविभक्ताः परस्परागमाः अपरेऽप्येवंलक्षणाः षोडशैव ।। मन्दर, देवकुरु, तथा उत्तर कुरुओंसे अन्य क्षेत्रोंके सदृश विदेह भी विभक्त (पृथक् किये हुए) है । और उनकी पूर्वविदेह तथा अपरविदेह ऐसी संज्ञा हैं। पूर्व में सोलह विदेह है, जो कि चक्रवर्तीविजय तथा नदी और पवतोंसे विभक्त परस्पर है । और अपर विदेह भी इसीप्रकार लक्षणयुक्त सोलह ही है। तुल्यायामविष्कम्भावगाहोच्छायौ दक्षिणोत्तरौ वैतान्यौ तथा हिमवच्छिखरिणौ महा- हिमवद्रुक्मिणौ निपधनीलौ चेति ॥ दक्षिण तथा उत्तरके वैताब्य विस्तार, विष्कम, अवगाह तथा उंचाईमें समान हैं। ऐसे ही हिमवत् और शिखरी समान है । महाहिमवत् और रुक्मी समान हैं, तथा निषध और नील समान है। क्षुद्रमन्दरास्तु चत्वारोऽपि धातकीखण्डकपुष्कराधका महामन्दरात्पञ्चदशभिर्योजनसह- हीनोच्न्यायाः । पनिर्योजनशतैर्धरणितले हीनविष्कम्भाः । तेषां प्रथम काण्डं महामन्दर- तुल्यम् । द्वितीयं सप्तभिहीनम् । तृतीयमष्टाभिः। भद्रशालनन्दनवने महामन्दरवत् । ततो अर्धपद्पश्चाशयोजनसहस्राणि सौमनसं पञ्चशतं विस्तृतम् । ततोऽष्टाविंशतिसहस्राणिचतु- नवति चतुःशत विस्तृतमेव पाण्डकं भवति । उपरि चाधश्च विष्कम्भोऽवगाहश्च तुल्यो महामन्दरेण । चूलिका चेति ।। और चारों क्षुद्रमन्दर, धातकीखण्डक और पुष्करार्धक अर्थात् धातकीखण्ड तथा पुष्करार्धमे होनेवाले, महामन्दरसे पन्द्रहसहस्र योजन न्यून ऊंचे हैं। और छहसौ योजन धरणीतलमें भी न्यून विष्कंभ हैं। उन क्षुद्रमन्दरोंका प्रथमकांड महामंदरके तुल्य है। द्वितीयक्रांड सातसे न्यून है । और तृतीयकांड आठसे हीन है। भद्रशाल तथा नन्दनवन महामन्दरके समान हैं। उसके पश्चात् साढ़े छप्पन हजार योजन लम्बा तथा पांचसौ योजन विस्तृत सौमनसवन है । और उसके अनन्तर अट्ठाईस हजार योजन लम्बा और चारसौ चौरानवे योजन विस्तृत (चौड़ा) पाण्डकवन है । इसका ऊपर तथा नीचेका विष्कंभ और अवगाह भी महामन्दरके तुल्य है । और चूलिका भी उसीके समान है। विष्कम्मकृतर्दशगुणाया मूलं वृत्तपरिक्षेपः । स विष्कम्भपादाभ्यस्तो गणितम् । इच्छाव- गाहोनावगाहाभ्यन्तस्य विष्कम्भस्य चतुर्गुणस्य मूलं ज्या । ज्याविष्कम्भयोर्वर्गविशेषमूलं विष्कम्भाच्छोध्यं शेपार्घमिपुः । इपुवर्गस्य पगुणस्य ज्यावर्गयुतस्य कृतस्य मूलं धनुःकाष्ठम् । यावर्गचतुर्मानयुक्तमिपुवर्गमिपुविभक्तं तत्प्रकृतिवृत्तविष्कम्भः । उदग्धनुःकाष्ठादृक्षिणं शोध्यं दोपाय बाहुरिति ॥

सभाष्यतत्त्वार्थाधिगमसूत्रम् । ८३ विष्कंभकृत दशगुणका मूल वृत्तपरिक्षेप है; और वह वृत्तपरिक्षेप विष्कंभपादाभ्यस्त गणित है । इच्छावगाह ऊनावगाहाभ्यस्त चतुर्गुण विष्कंभका मूल ज्या है । ज्या और विष्कमका वर्ग विशेष मूल विष्कंभसे शोधनीय है । शेषार्ध इषु है । षड्गुण ज्या वर्ग- युक्त इषु वर्गकृतका षड्गुणमूल धनुःकाष्ठ है । और ज्या वर्गका चतुर्भागयुक्त और इषुसे विभक्त जो इषु वर्ग है, वह प्रकृतिवृत्त विष्कंभ है। और उदग्धनुःकाष्ठसे दक्षिण शोधनीय है । और शेषार्थ बाहु है। अनेन करणाभ्युपायेन सर्वक्षेत्राणां सर्वपर्वतानामायामविष्कम्भज्येषुधनुःकाष्ठपरिमाणानि ज्ञातव्यानि ।। इस कारणरूप उपायसे सब क्षेत्रोंके तथा सब पर्वतोंके आयाम, विष्कंभ, ज्या, इषु, और धनुःकाष्ठ रूप परिमाण जानने चाहिये। द्विर्धातकीखण्डे ॥१२॥ सूत्रार्थ:-जम्बूद्वीपमें जो मन्दर तथा वंशधर पर्वतादि कहे हैं, वे सब धातकी खण्डमें द्विगुण २ हैं। भाष्यम्-एते मन्दरवंशवर्षधरा जम्बूद्वीपेऽभिहिता एते द्विगुणा धातकीखण्डे द्वाभ्या- मिष्वाकरपर्वताभ्यां दक्षिणोत्तरायताभ्यां विभक्ताः । एभिरेव नामभिर्जम्बूद्वीपकसमसङ्ख्याः पूर्वार्धे चापरार्धे च चक्रारकसंस्थिता निषधसमोछायाः कालोदलवणजलस्पर्शिनो वंशधराः सेष्वाकाराः । अरविवरसंस्थिता वंशा इति ।। विशेषव्याख्या-जम्बूद्वीपमें जो मन्दर तथा वर्षधरपर्वतादि कथन किये हैं, सब धातकीखण्डमें दक्षिणसे उत्तरकी ओर लम्बायमान् दो इषुके आकारवाले इष्वाकार पर्वतोंसे विभक्त द्विगुण है । तथा धातकीखण्डके पूर्वार्द्ध और अपरार्द्धमे भी इन्हीं पूर्वोक्त नामोंसे संयुक्त, जम्बूद्वीपके समान संख्यायुक्त, चक्रमें (पहियेमें) आरकके समान स्थित, निषधपर्वतके तुल्य ऊंचे, कालोद और लवणसमुद्रके जलको स्पर्श करनेवाले, अर्थात् कालोदसे लवणसमुद्र तक विस्तृत, और इष्वाकार ये वंशधरपर्वत है । अरोके विवरोंमें (छिद्रोंमें) स्थितके समान है, इस कारणसे ये वंश कहे जाते है ॥१२॥ वे १ ये गणितके पारिभाषिक शब्द हैं, हमारी समझमें पूर्णरूपसे नहीं आये । २ इस विषयमें बहुतसे विद्वान् खय और भी अनेक सूत्रोंकी रचना करके उनका व्याख्यान करते हैं। विस्तार न हो, इसलिये आचार्यने सक्षेपसे यह तत्त्व संग्रह किया है, और इसी हेतुसे शास्त्रनिपुण जन विस्ताररूपसे जो सूत्रोंका कथन है। वह प्राचीन नहीं है, ऐसा कहते हैं। और विस्तार ही इष्ट है, तो लक्ष प्रन्थकी, परिभाषारूपसे जम्बूद्वीपका विस्तार करें, तो भी क्या विस्तार हुआ? अर्थात् कुछ नहीं । अथवा विस्तारार्थीको उन आचार्योंके रचित सूत्रोंसे बहुत गुणयुक्त सिद्धान्त क्या निकल आता है ? इस हेतु उनका अभिप्राय उपेक्षाके योग्य है।

८४ रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् पुष्कराधं च ।। १३ ॥ सूत्रार्थ:-जैसे धातकीखण्डमें मन्दरादिकोंकी संख्यादि विषय कहे, वैसे ही पुष्कराधम भी समझना चाहिये। भाष्यम्यश्च धातकीखण्डे मन्दरादीनां सेवाकारपर्वतानां सहपाविषयनियमः स एवं पुष्कराधे वेदितव्यः ।। विशेषव्याख्या-मन्दरादि तथा इपुके आकारसहित वर्षधरपर्वतका जो द्विगुण संख्यादिका नियम वर्णन किया है, वही नियम पुष्करार्द्ध द्वीपमें जानना चाहिये । ततः परं मानुषोत्तरो नाम पर्वतो मानुपलोकपरिक्षेपी सुनगरप्राकारवृत्तः पुष्करवरग्री- पार्धविनिविष्टः काञ्चनमयः सप्तदशैकविंशतियोजनशतान्युच्छितश्चत्वारि त्रिंगानि कोगं चाधो धरणीतलमवगाढो योजनसहस्र द्वाविंशमधस्ताद्विस्तृतः समशतानि योविंझानि मध्ये चत्वारि चतुर्विशान्युपरीति ।। उसके अनन्तर मानुषोत्तर पर्वत है, जो कि मनुष्य लोकको घेरे हुए है, तथा उत्तम नगरके प्राकार (कोट)के सदृश वृत्ताकार, पुष्कराध द्वीपमें प्रविष्ट, सुवर्णमय, सत्रह सौ इक्कीस योजन उंचा, एक कोस अधिक चारसौ तीस (तेतीस) योजन पृथ्वीके अधो भागमें नीचा, एक हजार बाईस योजन नीचेके अर्थात् मूलके विस्तारसहित और सातसी ५ तेईस योजन मध्यभागमें और चारसौ चोवीस योजन उपरिभागमे ऐसा मानुपोत्तर पर्वत है। न कदाचिदस्मात्परतो जन्मतः संहरणतो वा चारणविद्याधरद्धिप्राप्ता अपि मनुप्या भूतपूर्वा भवन्ति भविष्यन्ति च । अन्यत्र समुद्धातोपपाताभ्याम् । अत एव च मानुपोत्तर इत्युच्यते ॥ इस मानुषोत्तर पर्वतसे परे कदाचित् भी जन्मसे अथवा संहरणसे चारण विद्याधर, और ऋद्धि प्राप्त मनुष्य पूर्वकालमें न हुए और न होंगे, अर्थात्, इस पर्वतके आगे चारणादि न कभी जन्में न मरे और न जन्मेगे न मरेंगे । किन्तु यह नियम समुद्धात और उपपातको छोड़के है, अर्थात् समुद्धात और उपपात वाले मानुपोत्तरपर्वतके आगे भी जा सक्ते हैं। इस कारण इसका नाम मानुषोत्तर है। तदेवमर्वामानुषोत्तरस्यार्धतृतीया द्वीपाः समुद्रद्वयं पञ्चमन्दराः पञ्चत्रिंशत्क्षेत्राणि विंश- द्वपंधरपर्वताः पञ्च देवकुरवः पश्चोत्तराः कुरवः शतं षष्टयधिकं चक्रवर्तिविजयानां द्वे शते पञ्चपञ्चाशदधिके जनपदानामन्तरद्वीपाः पट्पञ्चाशदिति ॥ इस रीतिसे मानुषोत्तरपर्वतके पूर्व ढाई द्वीप, दो समुद्र, पांच मन्दर, पैतीस क्षेत्र, १ जो इस भाष्यको विद्याधर ऋद्धिप्राप्तोंके गमनके निषेधमें लगाते हैं, उनको आगमका विरोध है, क्योंकि सब चारणादि तथा ऋद्धिप्राप्तोंका गमन मानुषोत्तरके आगे मी शास्त्रों में कहा है, परन्तु जन्ममरण बाहिर नहीं होता।

८५ सभाष्यतत्त्वार्थाधिगमसूत्रम् । तीस वर्षधरपर्वत, पांच देवकुरु, पांच उत्तरकुरु, एक सौ साठ चक्रवत्तिविजय, दो सौ पचपन जनपद और छप्पन अन्तरद्वीप हैं ॥ १३ ॥ अत्राह । उक्तं भवता मानुषस्य स्वभावमार्दवार्जवत्वं चेति तत्र के मनुष्याः क चेति । अनोच्यते- अब यहां पर कहते हैं कि, अपने मानुषके स्वभाव मार्दव (मृदुता) आर्जव (सरलता) तो कहे, परन्तु वहां मनुष्य कौन हैं और कहां रहते हैं ? इसके उत्तरकेलिये यहां अग्रिम सूत्र कहते हैं, प्राग्मानुषोत्तरान्मनुष्याः॥ १४ ॥ सूत्रार्थ:-मानुषोत्तरपर्वतके पूर्व ही अन्तरद्वीपोंमें तथा पैंतीस क्षेत्रोंमें जन्मसे मनुष्य होते हैं। भाष्यम्-प्राग्मानुषोत्तरात्पर्वतात्पञ्चत्रिंशसु क्षेत्रेषु सान्तरद्वीपेषु जन्मतो मनुष्या भ- वन्ति । संहरणविद्यार्द्धयोगातु सर्वेष्वर्धतृतीयेषु द्वीपेषु समुद्रद्वये च समन्दरशिखरेविति ।। विशेषव्याख्या-पूर्वमें जिस मानुषोत्तर पर्वतका वर्णन किया है, उसके पूर्व ही अन्तर द्वीपों सहित पैतीस क्षेत्रोंमें जन्म धारण करके मनुष्य होते हैं, अर्थात् मनुष्योंका जन्म मानुषोत्तर पर्वतके पूर्व ही होता है । और संहरण तथा विद्या ऋद्धिके योगसे तो मन्दरके शिखरोंसहित ढाई द्वीपोंमें और दोनों समुद्रोंमें भी मनुष्योंके गमनादि होते है । भारतका हैमवतका इत्येवमादयः क्षेत्रविभागेन । जम्बूद्वीपका लवणका इत्येवमादयो द्वीपसमुद्रविभागेनेति ।। और उन क्षेत्रोंके विभागसे भारतक, हैमवतक, अर्थात् भरत वा हेमवत आदि क्षेत्रोंमें होनेवाले इत्यादि संज्ञा होती है । और जम्बूद्वीपक तथा लवणक इत्यादि संज्ञा द्वीप तथा समुद्रके विभागसे होती है ।। १४ ।। आर्या ग्लिशश्च ॥ १५॥ सूत्रार्थ:-मनुष्योंके आर्य और म्लिश अथवा म्लेच्छ ये दो भेद है। भाष्यम्-द्विविधा मनुष्या भवन्ति । आर्या म्लिशश्च ॥ तत्रायः षडिधाः । क्षेत्रा जात्यार्याः कुलार्याः कार्याः शिल्पार्या भाषार्या इति । तत्र क्षेत्रार्याः पञ्चदशसु कर्मभूमि जाताः । तद्यथा । भरतेष्वर्धषड्विंशतिषु जनपदेपु जाताः शेषेषु च चक्रवर्तिविजयेषु । जात्यार्या इक्ष्वाकवो विदेहा हरयोऽम्बष्ठाः ज्ञाताः कुरवो बुवुनाला उग्रा भोगा राजन्या इत्येवमादयः । कुलार्याः कुलकराश्चक्रवर्तिनो बलदेवा वासुदेवा ये चान्ये आतृतीयादापञ्चमादासप्तमावा कुलकरेभ्यो वा विशुद्धान्वयप्रकृतयः।कार्या यजनयाजनाध्ययनाध्यापनप्रयोगकपिलिपिवा- णिज्ययोनिपोषणवृत्तयः । शिल्पार्यास्तन्तुवायकुलालनापिततुन्नवायदेवटादयोऽल्पसावद्या १ म्लेंच्छाश्चेत्यपि पाठ.।

रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् ८६ आगर्हिता जीवाः । भापायर्या नाम ये शिष्टभाषानियतवर्ण लोकरूढस्पष्टशब्दं पञ्चविधाना- मप्यार्याणां संव्यवहारं भाषन्ते ।। विशेषव्याख्या-मनुष्य दो प्रकारके है, आर्य और मिलश । उनमेंसे आर्य छह प्रकारके हैं, क्षेत्रार्य, जात्यार्य, कुलार्य, कार्य, शिल्पार्य, तथा भापार्य । इनमेंसे क्षेत्रार्य वे हैं, जो पन्द्रह प्रकारकी कर्म भूमियोंमें उत्पन्न है, जैसे भारतवर्पके साढ़े छब्बीस जनप- दोंमें तथा शेष चक्रवर्तीविजयोंमें उत्पन्न हुए मनुष्य । अर्थात् आर्यक्षेत्रोंमें उत्पन्न होनेसे उनकी आर्य संज्ञा हुई है । और जात्यार्य अर्थात् जातिसे आर्य; जैसे इक्ष्वाकु, विदेह, हरि, अम्बष्ठ, ज्ञात, कुरु, बुवुनाल, उग्र, भोग, तथा राजन्य इत्यादि । कुलसे आर्य; जैसे कुलकर, चक्रवर्ती, वलदेव और वासुदेव, अथवा और जो कुलकरोंके तीसरेसे आरंभ करके पंचमसे आदिलेके अथवा सप्तमकुलसे जो उत्पन्न हुए हैं, जिनका विशुद्धकुल और प्रकृति है, वे सब कुलार्य हैं। तथा कार्य अर्थात् कर्मसे आर्य, जैसे; यजन (यज्ञकरना) याजन (यज्ञकराना), अध्ययन, अध्यापन आदि प्रयोग करनेवाले तथा कृषि (खेती), लिपि (लेखन), वाणिज्य (व्यापार), आदि योनि पोषणकी वृत्ति करनेवाले सब कार्य है । और तन्तुवाय (कपड़े वुननेवाले), कुलाल (कुंभार), नापित (नाई), तुन्नवाय (सूत कातनेवाले), और देवट आदि जो अल्पपापयुक्त अथवा अनिन्दित जीविका करनेवाले है, वे शिल्पार्य है। और भाषार्य वे है, जो शिष्टभाषाके नियत वर्णोसे और लोकमें प्रसिद्ध स्पष्ट शब्दोंको जिनको कि पूर्वोक्त पांच प्रकारके आर्य व्यवहार में लाते है, भाषण करते है। अतो विपरीता म्लिशः । तद्यथा । हिमवतश्चतसृषु विदिक्षु त्रीणि योजनशतानि लव- णसमुद्रमवगाह्य चतसृणां मनुष्यविजातीनां चत्वारोऽन्तरद्वीपा भवन्ति त्रियोजनशतवि- एकम्भायामाः । तद्यथा । एकोरुकाणामाभाषकाणां लाशूलिकानां वैषाणिकानामिति ॥ चत्वारि योजनशतान्यवगाह्य चतुर्योजनशतायामविष्कम्भा एवान्तरद्वीपाः। तद्यथा । हयकर्णानां गज- कर्णानां गोकर्णानां शष्कुलिकानामिति ॥ पञ्चशतान्यवगाह्य पञ्चयोजनशतायामवि- एकम्भा एवान्तरद्वीपाः । तद्यथा । गजमुखानां व्याघ्रमुखानामादर्शमुखानां गोमुखानामिति ।। पडूयोजनशवान्यवगाह्य तावदायामविष्कम्भा एवान्तरद्वीपाः । तद्यथा । अश्वमुखानां हस्ति- मुखानां सिंहमुखानां व्याघ्रमुखानामिति ॥ सप्त योजनशतान्यवगाह्य तावदायामविष्कम्भा एवान्तरद्वीपाः । तद्यथा । अश्वकर्णसिंहकर्णहस्तिकर्णकर्णप्रावरणनामानः ॥ अष्टौ योजनश- तान्यवगाह्याष्टयोजनशतायामविष्कम्भा एवान्तरद्वीपाः । तद्यथा । उल्कामुखविद्युजिह्वमेप- मुखविद्युहन्तनामानः ।। नवयोजनशतायामविष्कम्भा एवान्तरद्वीपा भवन्ति । तद्यथा । घनदन्तगूढदन्तविशिष्टदन्तशुद्धदन्तनामानः ॥ एकोरुकाणामेकोरुकद्वीपः । एवं शेषाणा मपि खनामभिस्तुल्यनामानो वेदितव्याः ।। शिखरिणोऽप्येवमेवेत्येवं षट्पञ्चाशदिति ।। और इनके विरुद्ध म्लिश अर्थात् म्लेच्छ हैं। जैसे हिमवानपर्वतकी चारों विदिशा- ओंमें तीनसौ योजन लवणसमुद्रमें प्रवेश करके, चार मनुष्योंकी विजातियों (निंद्य ने सभाष्यतत्त्वार्थाधिगमसूत्रम् । जातियों के निवासार्थ तीनसौ योजन लम्बे चौड़े चार ही अन्तरद्वीप हैं । जैसे; एकोरुक अर्थात् एकजंघावालोंका, अभाषकोंका, लालिकों अर्थात् पुच्छवालोंका, तथा वैषा- णिकों अर्थात् सींगवालोंका अन्तरद्वीप । और चारसौ योजन प्रवेशकरके चारसौ योजन ही आयाम तथा विष्कंभसहित चार अन्तरद्वीप हैं । जैसे; हयकर्ण, गजकर्ण, गोकर्ण, शष्कुलिकर्णवालोंके । तथा पांचसौ योजन प्रवेश करके पांचसौ ही योजन आयाम तथा विष्कंभसहित अन्तरद्वीप है । जैसे; गजमुख, व्याघ्रमुख, आदर्शमुख तथा गोमुखवालोंके । और छहसौ योजन प्रवेश करके छहसौ योजन ही आयाम तथा विष्कंभ प्रमाणवाले अन्तरद्वीप है । जैसे; अश्वमुख, हस्तिमुख, सिंहमुख तथा व्याघ्रमुख- वालोंके । और ऐसे ही सातसौ योजन प्रवेश करके सात ही सौ योजन आयाम विष्कंभ प्रमाण अन्तरद्वीप हैं; जैसे; अश्वकर्ण, सिंहकर्ण, हस्तिकर्ण, और कर्णप्रावरणोंके । और ऐसे ही आठसौ योजन प्रवेश करके आठसौ योजन आयाम तथा विष्कंभ- प्रमाणसहित ही अन्तरद्वीप है। जैसे; उल्कामुख, विद्युजिव्ह, मेषमुख, और विद्यु- दन्तोंके । तथा नव सौ योजन प्रवेश करके नव सौ योजन विस्तार विष्कंभसहित अन्तर द्वीप है। जैसे; घनदन्त, गूढदन्त, विशिष्टदन्त, तथा शुद्धदन्तोंके । अब यहां यह जानना आवश्यक है कि, एकोरुक संज्ञक म्लेच्छोंका एकोरुक नाम अन्तरद्वीप है, आभाषकोंका आभाषक; इसी प्रकार शेष अन्य म्लेच्छोंके उसी २ नामके अर्थात् जो उनके नाम है, उसी नामके अन्तरद्वीप जानने चाहिये । इसी प्रकार छप्पन अन्तरद्वीप शिखरीपर्वत सम्बन्धी भी जानने चाहिये ॥ १५ ॥ भरतैरावतविदेहाः कर्मभूमयोऽन्यत्र देवकुरुत्तरकुरुभ्यः ॥ १६ ॥ सूत्रार्थ:-मनुष्यक्षेत्रोंमे भरत, ऐरावत तथा विदेह ये कर्म भूमियां हैं, देवकुरु तथा उत्तरकुरुको छोड़ करके । भाष्यम्-मनुष्यक्षेत्रे भरतैरावतविदेहाः पञ्चदश कर्मभूमयो भवन्ति । अन्यत्र देवकुरू- त्तरकुरुभ्यः। संसारदुगान्तगमकस्य सम्यग्दर्शनज्ञानचारित्रात्मकस्य मोक्षमार्गस्य ज्ञातारः कार उपदेष्टारश्च भगवन्तः परमर्षयस्तीर्थकरा अत्रोत्पद्यन्ते । अत्रैव जाताः सिद्धयन्ति ना- न्यत्र । अतो निर्वाणाय कर्मणः सिद्धिभूमयः कर्मभूमय इति । शेषासु विंशतिर्वशाः सान्त- रद्वीपा अकर्मभूमयो भवन्ति । देवकुरुत्तरकुरवस्तु कर्मभूम्यभ्यन्तरा अप्यकर्मभूमय इति ।। । विशेषव्याख्या--मानुषोत्तर पर्वतके पूर्व जो मनुष्यक्षेत्र वर्णन किया है, उसमे भरत, ऐरावत तथा विदेहमें पंचदश कर्मभूमि है, किन्तु इनके अभ्यन्तर जो देवकुरु तथा उत्त- . १ यह अन्तर द्वीपका भाष्य प्राय. नष्ट होगया है, कई दुर्विदग्ध छयानवे अन्तर द्वीप भाप्यमें लिखते है, परन्तु यह अनार्ष है, क्योंकि आर्ष जीवागमादि ५६ ही मिलता है । वाचक परपरासे यह भेद नहीं है, क्योंकि सूत्रका उल्लघन नहीं होता । इस लिये इष्ट सिद्धांत भाज्यको नष्ट किया है।

८८ रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् रकुरु भोगभूमियां हैं, उन्हें छोड़ करके । अर्थात् ये दोनों कर्मभूमि नहीं हैं । संसाररूपी अति भयंकर दुर्गके अन्तको प्राप्त करनेवाला सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान तथा सम्यक् चा- रित्र स्वरूप जो मोक्षमार्ग है, उसके जाननेवाले, करनेवाले तथा उपदेशदाता भगवान् परमर्षि तीर्थकर इन्हीं कर्मभूमियोंमें उत्पन्न होते हैं। और इन्हीं कर्मभूमियोंमें उत्पन्न हुए जीव सिद्धि अर्थात् मोक्षसिद्धिको प्राप्त होते हैं, दूसरी भूमियोंसे नहीं । अतएव कर्मभूमि, निर्वाणकेलिये जो कर्म हैं, उनकी सिद्धिकी भूमि हैं। और इनसे शेप जो अन्तरद्वीप सहित बीस वंश अर्थात् क्षेत्र हैं, वे अकर्मभूमि है । और देवकुरु तथा उत्तरकुरु कर्मभूमियोंके अभ्यन्तर प्रविष्ट होने पर भी अकर्मभूमि हैं ॥ १६ ॥ नृस्थिती परापरे त्रिपल्योपमान्तर्मुहूर्ते ॥ १७॥ भाष्यम्-नरो नरा मनुष्या मानुषा इत्यनर्थान्तरम् । मनुष्याणां परा स्थितिस्त्रीणिप- ल्योपमान्यपरान्तर्मुहूर्तेति ॥ सूत्रार्थ:-नृ, नर, तथा मनुष्य, मानुष इन शब्दोंका एक ही अर्थ है । मनुष्योंकी परा अर्थात् उत्कृष्टस्थिति तीनपल्यकी है, और अपरा अर्थात् जघन्यस्थिति अन्तमुहूर्त पर्यन्त है ।। १७ ॥ तिर्यग्योनीनां च ॥ १८॥ सूत्रार्थ:-जो तिर्यग्योनिसे उत्पन्न होते हैं, उनकी भी उत्कृष्टस्थिति तीनपल्य और जघन्य अन्तर्मुहूर्त है। भाष्यम्-तियग्योनिजानां च परापरे स्थिती त्रिपल्योपमान्तर्मुहूर्ते भवतो यथासङ्घय मेव । पृथक्करणं यथासङ्ख्यदोषविनिवृत्त्यर्थम् । इतरथा इदमेकमेव सूत्रमभविष्यदुभत्रय चोरे यथासङ्ख्यं स्यातामिति ॥ विशेषव्याख्या-तिर्यग्योनिसे उत्पन्न होनेवाले जीवोंकी भी परास्थिति तीन पल्योपर है, और अपरास्थिति अन्तर्मुहूर्त पर्यन्त है । परा तथा अपराका, और त्रिपल्योपम तथ अन्तर्मुहूर्तका यथासांख्य है । अर्थात् परास्थिति त्रिपल्योपम है, और अपरा अन्तर्मुहूर्त है और "नृस्थिती,, इत्यादिसूत्र तथा "तिर्यग्योनिजानां च' इस सूत्रको यथासंख्य दोष निवृतिकेलिये पृथक् २ किया है । अन्यथा एक सूत्र होता, और मनुष्योंकी परास्थिति त्रिपल्योपम होती है, और तिर्यग्योनिजोंकी अपरा अन्तर्मुहूर्त कालतककी स्थिति है; ऐस यथासंख्य बोध हो जाता। द्विविधा चैषां मनुष्यतिर्यग्योनिजानां स्थितिः। भवस्थितिः कायस्थितिश्च । मनुष्याण यथोक्ते त्रिपल्योपमान्तर्मुहूर्ते परापरे भवस्थिती । कायस्थितिस्तु परा सप्ताष्टौ वा भवग्रह णानि ॥ तिर्यग्योनिजानां च यथोक्ते समासतः परापरे भवस्थिती । व्यासतस्तु शुद्धपृषि १ तिर्यग्योनिजानां चेत्सपि पाठः।

सभाष्यतत्त्वार्थाधिगमसूत्रम् ।
८९
वीकायस्य परा द्वादशवर्षसहस्राणि । खरपृथिवीकायस्य द्वाविंशतिः। अप्कायस्य सप्त ।
वायुकायस्य त्रीणि । तेजाकायस्य त्रीणि रात्रिंदिनानि । वनस्पतिकायस्य दशवर्षसहस्राणि ।
एषां कायस्थितिरसङ्खयेया अवसर्पिण्युत्सर्पिण्यो वनस्पतिकायस्थानन्ताः। द्वीन्द्रियाणां भवस्थि-
तिद्वादशवर्षाणि । त्रीन्द्रियाणामेकोनपञ्चाशद्वात्रिंदिनानि । चतुरिन्द्रियाणां षण्मासाः।
एषां कायस्थितिः सङ्खयेयानि वर्षसहस्राणि । पञ्चेन्द्रियतिर्यग्योनिजाः पञ्चविधाः । तद्यथा।
मत्स्या उरगाः परिसः पक्षिणश्चतुष्पदा इति । तत्र मत्स्यानामुरगाणां भुजगानां च पूर्व-
कोट्येव पक्षिणां पल्योपमासङ्घयेयभागश्चतुष्पदानां त्रीणि पल्योपमानि गर्भजानां स्थितिः ।
तत्र मत्स्यानां भवस्थितिः पूर्वकोटित्रिपञ्चाशदुरगाणां द्विचत्वारिंशद्भुजगानां द्विसप्ततिः प-
क्षिणां स्थलचराणां चतुरशीतिवर्षसहस्राणि सम्मूर्छिनानां भवस्थितिः । एषां कायस्थितिः
सप्ताष्टौ भवग्रहणानि । सर्वेषां मनुष्यतिर्यग्योनिजानां कायस्थितिरप्यपरान्तर्मुहूतैवेति ।।
इति तत्त्वार्थाधिगमे लोकप्रज्ञप्तिामा तृतीयोध्यायः समाप्तः ।।
और मनुष्य तथा तिर्यग्योनिवालोंकी स्थितिके पुनः दो भेद होते है, एक भवस्थिति
दूसरी कायस्थिति । सो मनुष्योंकी परा तथा अपरा भवस्थिति पूर्वोक्त रीतिसे ही होती
है। जैसे परा भवस्थिति त्रिपल्योपम होती है, अपरा भवस्थिति अन्तर्गतकाल पर्यन्त
होती है । और कायस्थिति जो परा है, वह सात व आठ भवग्रहण पर्यन्त रहती है।
और तिर्यग्योनिजोंकी समास व समृष्टिरूपसे परापर भवस्थिति पूर्वोक्त रूपसे है । और
पृथक् २ रूपसे तो शुद्ध पृथिवीकायकी परास्थिति बारहहजार वर्ष पर्यन्त है, और खर
J पृथिवीकायकी परास्थिति बावीसहजार वर्ष पर्यन्त है । तथा अप्कायकी सात,
वायुकायकी तीन तथा तैजसकायकी तीन रात दिनकी स्थिति है । और
वनस्पतिकारकी दशहजार वर्ष है। तथा इनकी कायस्थिति भी असंखेय है । और वन-
स्पतिकायकी अनन्त अवसर्पिणी और उत्सर्पिणी हैं । दो इन्द्रियवालोंकी भवस्थिति
बारहवर्ष पर्यन्त है । तीन इन्द्रियवालोंकी एक कम पचास अर्थात् उनचास रातदिन है।
चार इन्द्रियवालोंकी छह महिना है, और इनकी कायस्थिति संख्येय सहस्रवर्ष पर्यन्त
है। पांच इन्द्रियवाले तिर्यग्योनिजोंके पांच भेद है, यथा; मत्स्य, उरग, परिसर्प ( चारों
ओर फिसलके चलनेवाले ), पक्षी और चतुष्पद (चौपाये ) । इनमेसे मत्स्य, उरग और
भुजगोंकी एकपूर्वकोटि ही स्थिति है । पक्षियोंकी पल्योपम असंख्येयभाग, और गर्भज
चतुष्पदोंकी तीन पल्योपम स्थिति है। उनमें मत्स्योंकी भवस्थिति पूर्वकोटि है, उरगोंकी
) तिरपन, भुजगोंकी व्यालीस, पक्षियोंकी बहत्तर है । और स्थलचारी संमूर्छनजन्मवालोंकी
चौरासी सहस्र वर्ष भवस्थिति है। और इन सबकी कायस्थिति सात वाआठ भवग्रहण पर्यन्त
है । और सम्पूर्ण मनुष्य तथा तिर्यग्योनिजोंकी अपरा कायस्थिति अन्तर्मुहूर्त ही है।
इति द्विवेापनामकाचार्यपदवीधारिठाकुरप्रसादशर्मविरचितभाषाटीकासमलते
तत्त्वार्थाधिगमसूत्रभाष्ये तृतीयोऽध्यायः ॥ ३॥

९० रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् अथ चतुर्थोध्यायः। अनाह । उक्तं भवता भवप्रत्ययोऽवधि रकदेवानामिति । तथौदायिक भावपु देवग- तिरिति । केवलिश्रुतसङ्घधर्मदेवावर्णवादो दर्शनमोहस्य । सरागसंयमादयो देवस्य । नारक- सम्मूर्छिनो नपुंसकानि । न देवाः । तत्र के देवाः । कतिविधा वेति । अत्रोच्यते- अव यहांपर कहते है कि "भवप्रत्यय अर्थात् भव वा जन्मनिमित्तक अवधिज्ञान देव तथा नारक जीवोंको होता है" (अ० १ सू० २२)। "औदयिक भावोंम देवगति अर्थात् इक्कीस प्रकारके औदयिक भावोंमें देवगति भी एक है" (अ०२ सू०६) "केव- ली भगवान् , शास्त्र, चार प्रकारके संघ, धर्म और भवनवासी आदि देवोंका अवर्णवाद दर्शनमोहके आत्रवका हेतु है" (अ०६ सू०१४)। "सराग संयमादि देवायुके कारण है। (अ० ६ सू० २०)। "नारकजीव तथा सम्मूञ्जेन जन्मवाले नपुंसक होते हैं । देव नहीं होते" (अ० २ सू० ५०-५१) । इत्यादि स्थलॉम आपने देव शब्दका प्रयोग किया । अब प्रश्न यह है कि, देव कौन है ? और उनके भेद कितने हैं ? उत्तरमें यहां सूत्र कहते हैं:- देवाश्चतुनिकायाः ॥ १॥ सत्रार्थ:-देव चार निकायोंसे संयुक्त है। भाष्यम्--देवाश्चतुनिकाया भवन्ति । तान्परस्तावक्ष्यामः ।। विशेषव्याख्या-देवोंके चार निकाय हैं, उन चारोंको हम आगे कहंगे। यहां पर निकाय शब्दका अर्थ समानधर्मवाले प्राणियोंका समूह वा संघ है। तृतीयः पीतलेश्यः ॥२॥ सूत्रार्थः-तृतीय निकाय पीतलेश्यावाला है । भाष्यम् तेषां चतुणी देवनिकायानां तृतीयो देवनिकायः पीतलेश्य एव भवति । क. चासौ । ज्योतिप्क इति ।। विशेषव्याख्या-देवोंके जो चार निकाय अर्थात् समुदाय हैं, उनमसे जो तीसरा समुदाय है, उसके पीतलेश्या ही है । वह तीसरा निकाय ज्योतिप्कदेवोंका है, अर्थात् तीसरे निकायवाले जो ज्योतिष्कदेव है, वे पीतलेश्यावाले होते है। दशाप्टपञ्चद्वादशविकल्पाः कल्पोपपन्नपर्यन्ताः॥३॥ सूत्रार्थः वे देवनिकाय कल्पोपपन्नपर्यन्त क्रमसे दश, आठ, पांच और बारह भेद युक्त हैं। भाप्यम्त च देवनिकाया रथासङ्ख्यमेवं विकल्पा भवन्ति । तद्यथा। दशविकल्पा भवनवासिनोऽसुरादयो वक्ष्यन्ते । अष्टविकल्पा व्यन्तराः किन्नरादयः । पञ्चविकल्पा ज्यो- तिष्काः सूर्यादयः । द्वादशविकल्या वैमानिकाः कल्पोपपन्नपर्यन्ताः सौधर्मादिष्विति ॥

सभाष्यतत्त्वार्थाधिगमसूत्रम् । ९१ विशेषव्याख्या-पूर्वमें जो चार निकाय देवोंके कहे है, वे यथासंख्य नियमसे इस प्रकार विकल्प अर्थात् भेदयुक्त हैं । यथा; प्रथम भवनवासीदेवोंके दश भेद है; वे दश- भेद असुरादिक आगे कहे जावेंगे। द्वितीय व्यन्तरदेवोंके किन्नरादि आठ भेद है। तृतीय ज्योतिष्कदेवोंके सूर्यादि पांच भेद है । और चतुर्थ वैमानिकदेवोंके सौधर्मादि बारह भेद हैं । इस प्रकार कल्पोपपन्न अर्थात् स्वर्गवासी देवों पर्यन्त ही भेद है। इन्द्रसामानिकत्रायस्त्रिंशपारिषद्यात्मरक्षलोकपालानीकप्रकीर्ण- काभियोग्यकिल्बिषिकाश्चैकशः॥४॥ सूत्रार्थः-पूर्वोक्त निकायोंमें प्रत्येकके इन्द्र सामानिकादि दश २ भेद है। भाष्यम्-एकैकशश्चैतेषु देवनिकायेषु देवा दशविधा भवन्ति । तद्यथा । इन्द्राः सामा- निकाः त्रायविंशाः पारिषद्याः आत्मरक्षाः लोकपालाः अनीकानि अनीकाधिपतयः प्रकी- र्णकाः आभियोग्याः किल्बिषिकाश्चेति । तत्रेन्द्राः भवनवासिव्यन्तरज्योतिष्कविमानाधि- पतयः । इन्द्रसमानाः सामानिका अमात्यपितृगुरूपाध्यायमहत्तरवत् केवलमिन्द्रत्वहीनाः । त्रायस्त्रिंशा मत्रिपुरोहितस्थानीयाः । पारिषद्या वयस्यस्थानीयाः । आत्मरक्षाः शिरोरक्षस्था- नीयाः। लोकपाला आरक्षिकार्थचरस्थानीयाः । अनीकाधिपतयो दण्डनायकस्थानीयाः । अनीकान्यनीकस्थानीयान्येव । प्रकीर्णकाः पौरजनपदस्थानीयाः । आभियोग्या दासस्था- नीयाः । किल्बिषिका अन्तस्थस्थानीया इति ।। विशेषव्याख्या-उन देव निकायोंमें एक २ में दश २ भेद सहित देव होते है । यथा; इन्द्र/ सामानिक, त्रायस्त्रिंश, पारिषद्य, आत्मरक्ष, लोकपाल, अनीक वा अनीका- धिपति, प्रकीर्णक, आभियोग्य और किल्बिषिक । ये इन दश भेदोंमें जो इन्द्र है, वे भवन- वासी, व्यन्तर, ज्योतिप्क और विमान प्रत्येकके अधिपति है, अर्थात् प्रत्येक समुदायके अधि- पति वा स्वामीको इन्द्र कहते है । सामानिक इन्द्रके समान होते है, अर्थात् जो अमात्य पिता, गुरु, उपाध्यायोंके सदृश महत्व वा महिमायुक्त होते है, केवल इन्द्रत्व उनमें नही होता, वे सामानिक है । मंत्री पुरोहितादिकोंके स्थानापन्न त्रायस्त्रिंश है । वयस्य अर्थात् मित्रोंके स्थानापन्न पारिषद्य है । शिरकी रक्षा करनेवालोंके स्थानापन्न आत्मरक्ष हैं । जैसे राजाओंके यहां आरक्षक अर्थचर कोतवालादि है, वैसे ही लोकपाल है। , १ जो निज विषयमें सधि तथा रक्षामें नियत हैं, चौरादिको जो पकडते हैं, जैसे राजाओंके यहा कोतवालादिक होते हैं, उन्हींके स्थानापन्न लोकपाल है । २ सूत्रमें केवल 'अनीक' ही का ग्रहण किया है, और भाष्यमें 'अनीकानि' लिखके 'अनीकाधिप- तयः' (अनीकके अधिपत) ऐसा भी लिखा है, परन्तु यहां 'अनीक' तथा 'अनीकाधिपति' इन दोनोंसे एक ही तात्पर्य है । इसी विचारसे भाष्यकारने 'अनीकानि' इसका विवरण (टीका) 'अनीकाधिपतयः' यह किया है, न कि 'अनीक' और 'अनीकाधिपत' दो भेद कहे हैं । और ऐसा न माननेसे दश भेद जो कहे हैं, उनका विरोध होगा, क्योंकि अनीकाधिपतिको भिन्न माननेसे ११ भेद होते है। - ९२ रायचन्द्रजनशानमालायाम् अनीकाधिपति दण्डनायक अर्थात् माजिष्ट्रेट के स्थानापन्न है, और अनीक अर्थात गेनाक स्थानापन्न अनीक है । प्रकीर्णक पुरवामी तथा जनपद (राध्यकी प्रना) के ग्यानापन हैं। आभियोग्य दासोंके स्थानापन्न है । और किल्विपिक अन्तय अर्थात गद व नीर जातिके स्थानापन्न हैं। बायस्त्रिंशलोकपालवा व्यन्तरज्योनिष्काः ॥५॥ सूत्रार्थ:-व्यन्तर और ज्योतिप्कदेव त्रायविंग और लोकपाल वजिनमें भाष्यम्-व्यन्तरा ज्योतिप्काश्चाष्टविधा भवन्ति बायनिंशलोकपालबानि ।। विशेषव्याख्या-चार निकायोंमेंसे व्यन्तर तथा ज्योतिक इन दो निकायों में बाय- स्त्रिंश और लोकपालवर्जित आठ ही भेद है । अर्थात् व्यन्तर ज्योतिप्कों में वायमिंग लोकपाल नहीं होते। पूर्वयोन्द्राः ॥६॥ सूत्रार्थ:-पूर्वके दो निकायोंमें दो २ इन्द्र है । भाष्यम्-पूर्वयोर्देवनिकाययोर्भवनवासिव्यन्तरयोदेवविकल्पानां द्वा हारिन्द्री भवतः । तद्यथा । भवनवासिषु तावद्वौ असुरकुमाराणामिन्दी भवतश्रमरो वलिश्च । नागकुमाराणां धरणो भूतानन्दश्च । विद्युत्कुमाराणां हरिहरिसहश्च । सुपर्णकुमाराणां वेणुदेवो वेणुदारी च । अग्निकुमाराणामग्निशिखोऽग्निमाणवश्च । वातकुमाराणां वेलम्बः प्रभसनश्च । सनितकुमा- राणां सुघोपो महाघोपञ्च । उदधिकुमाराणां जलकान्तो जलप्रभश्च । द्वीपकुमाराणां पूर्णोऽ- वशिष्ठश्च । दिकुमाराणाममितोऽमितवाहनश्चेति ॥ व्यन्तरेप्वपि द्वौ किन्नराणामिन्द्री किन्नरः किम्पुरुषश्च । किम्पुरुषाणां सत्पुरुषो महापुरुषश्च । महोरगाणामतिकायो महाकायश्च । गन्धर्वाणां गीतरतिर्गीतयशाश्च । यक्षाणां पूर्णभद्रो मणिभद्रश्च । राक्षसानां भीमो महाभी- मञ्च । भूतानां प्रतिरूपोऽतिरूपश्च । पिशाचानां कालो महाकालश्चेति ॥ ज्योतिप्काणां तु बहवः सूर्याश्चन्द्रमसन्च ।। वैमानिकानामेकैक एव । तद्यथा । सौधर्मे शक्रः । ऐशाने ईशानः। सनत्कुमारे सनत्कुमार इति । एवं सर्वकल्पेषु खकल्पाहाः । परतस्त्विन्द्रादयो दश विशेषा न सन्ति । सर्व एव स्वतन्त्रा इति ।। विशेषव्याख्या-पूर्वकथित चार निकायोंमेसे पूर्वके जो दो निकाय भवनवासी और व्यन्तर हैं, उनमें दो २ इन्द्र है । यथा; भवनवासियोंमें असुरकुमारोके दो इन्द्र हैं, एक चमर और दूसरा बलि | नागकुमारोंके धरण और भूतानन्द । विद्युतकुमारोंके हरि और हरिसह । सुपर्णकुमारोंके वेणुदेव और वेणुदारी । अग्निकुमारोंके अग्निशिख और अग्निमाणव । वातकुमारोंके बेलम्ब और प्रभंजन । स्तनितकुमारोंके मुघोप और महाघोष । उधिकुमारोंके जलकान्त और जलप्रभ । द्वीपकुमारोंके पूर्ण तथा अवशिष्ट । दिक्कुमारोंके अमित और वाहन । और व्यन्तरोंमें भी किन्नरोंके दो इन्द्र हैं, एक किन्नर और दूसरा किम्पुरुष । किम्पुरुपोंके सत्पुरुष और महापुरुष । महोरगोंके सभाष्यतत्त्वार्थाधिगमसूत्रम् । ९३ अतिकाय और महाकाय । गन्धर्वोके गीतिरति और गीतियश । यज्ञोंके पूर्णभद्र और महाभद्र और राक्षसोंके भीम और महाभीम । भूतोंके प्रतिरूप और अतिरूप । और पिशाचोंके काल महाकाल नामके दो इन्द्र हैं । इस प्रकार भवनवासी और व्यन्त- रोके भेदोमें प्रत्येकके दो २ इन्द्र बतलाये । शेष दो निकायोंमेंसे ज्योतिष्कोंमें अनेक सूर्य तथा चन्द्रमा इन्द्र हैं । और वैमानिकोंमें एक एक ही इन्द्र है । यथा; सौधर्ममें शक इन्द्र है । ऐशानस्वर्गमें ईशान इन्द्र है । सनत्कुमारस्वर्गमें सनत्कुमार इन्द्र है । इसी प्रकार सर्व कल्पोंमें उसी २ कल्पके स्वनामके इन्द्र है । परन्तु कल्पोंके आगे इन्द्रादि दश भेद नहीं है, वहां तो सब ही स्वतंत्र हैं। पीतान्तलेश्याः ॥७॥ सूत्रार्थ:--पूर्वके दो निकायोंमें पीतान्त लेश्या होती हैं। भाग्यम्-पूर्वयोनिकाययोर्देवानां पीतान्ताश्चतस्रो लेश्या भवन्ति ।। विशेषव्याख्या-पूर्वके जो भवनवासी और व्यन्तर ये दो निकाय हैं, उन निकायके देवोंको आरंभसे लेकर पीतपर्यन्त चार लेश्या होती हैं। अर्थात् उनको कृष्णा, नीला, कापोता और पीता ये चार लेश्या होती हैं ॥ ७ ॥ कायप्रवीचारा आ ऐशानात् ॥८॥ सूत्रार्थ:-ऐशान स्वर्गपर्यन्त देवोंके कायप्रवीचार है। भाष्यम्-भवनवास्यादयो देवा आ ऐशानात्कायप्रवीचारा भवन्ति । कायेन प्रवीचार एषामिति कायप्रवीचाराः । प्रवीचारो नाम मैथुनविषयोपसेवनम् । ते हि संक्लिष्टकर्माणो मनुष्यवन्मैथुनसुखमनुप्रलीयमानास्तीत्रानुशयाः कायसंक्लेशजं सर्वाङ्गीणं स्पर्शसुखमवाप्य प्रीतिमुपलभन्त इति ॥ विशेषव्याख्या-भवनवासी देवोंसे आदि लेकर ऐशानवर्ग तकके देव कायप्रवीचार हैं । काय अर्थात शरीरसे जिनका प्रवीचार है, वे कायप्रवीचार । और मैथुन विषयका जो उपसेवन सो प्रवीचार, यह कायप्रवीचारका अर्थ है । सारांश शरीरकेद्वारा मैथुन- विषयका जो उपभोग, संभोग अथवा उपसेवन करते है, वे कायप्रवीचार है । ये अर्थात् भवनवासीयोंसे लेकर ऐशानकल्प तकके देव निश्चयकरके संक्लिष्टकर्मवाले हैं। अतएव मनुप्योंके समान मैथुनके सुखको अनुभवन करते हुए तीव्रकामनासे युक्त होकर काय- सम्बन्धी क्लेशजन्य सम्पूर्ण अंगोका जो स्पर्श है, उस स्पर्शजनितसुखको प्राप्त होकर प्रीतिको प्राप्त होते है। शेषाः स्पर्शरूपशब्दमनःप्रवीचारा योईयोः ।। ९ ॥ सूत्रार्थः-शेष आठ कल्पोंके देवोंमेसे दो २ कल्पोंके देव यथासंख्य करके क्रमसे स्पर्श, रूप, शब्द तथा मनसे प्रवीचार करनेवाले है। . A रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् ९४ भाष्यम्- ऐशानादूर्ध्व शेषाः कल्पोपपन्ना देवा द्वयोयोः कल्पयोः स्पर्शरूपशब्दमन:- प्रवीचारा भवन्ति यथासङ्ख्यम् । तद्यथा । सनत्कुमारमाहेन्द्रयोर्देवान्मैथुनसुखप्रेप्सूनुत्पन्ना- स्थान्विदित्वा देव्य उपतिष्टन्ते । ताः स्पृष्टैव च ते प्रीतिमुपलभन्ते विनिवृत्तास्थाश्च भवन्ति ।। तथा ब्रह्मलोकलान्तकयोर्देवानेवभूतोत्पन्नास्थान्विदित्वा देव्यो दिव्यानि स्वभावभावस्वराणि सर्वाङ्गमनोहराणि शृङ्गारोदाराभिजाताकारविलासान्युज्वलचारुवेपाभरणानि खानि रूपाणि दर्शयन्ति । तानि दृष्ट्वैव ते प्रीतिमुपलभन्ते निवृत्तास्थाश्च भवन्ति ॥ तथा महाशुक्रसहस्रा- रचोर्देवानुत्पन्नप्रवीचारास्थान्विदित्वा देव्यः श्रुतिविषयसुखानत्यन्तमनोहरा शृगारोदारा- मिजातविलासामिलापच्छेदतलतालाभरणरवमिश्रान्हसितकथितगीतशब्दानुदीरयन्ति । ताब. श्रुत्वैव ते प्रीतिमुपलभन्ते निवृत्तास्थाश्च भवन्ति ॥ आनतप्राणतारणाच्युतकल्पवासिनो देवाः प्रवीचारायोत्पन्नास्था देवीः संकल्पयन्ति संकल्पमात्रेणैव ते परां प्रीतिमुपलभन्ते विनिवृ. तास्थाश्च भवन्ति ।। एभिश्च प्रवीचारैः परतः परतः प्रीतिप्रकर्पविशेपोऽनुपमगुणो भवति प्रवीचारिणामल्पसंक्लेशत्वात् । स्थितिप्रभावाभिरधिका इति वक्ष्यते॥ विशेषव्याख्या-ऊपर कहे हुए ईशानवर्गसे ऊपर शेप जो कल्पोपपन्न देव हैं। वे दो २ कल्पोंके क्रमसे स्पर्श, रूप, शब्द तथा मनसे प्रवीचार अर्थात् मैथुन सेवन करनेवाले है । सो इस प्रकार कि, सनत्कुमार तथा माहेन्द्र कल्पोंके देवोंको मथुन मुखके अमिलापी तथा उत्पन्न आस्था (आशा वा कामना) सहित जानकर देवी अर्थात् देवागना उनके निकट आकर उपस्थित होती हैं । उन देवियोंको स्पर्श करनेसे ही वे देव प्री- तिको प्राप्त होते है और कामनानिवृत भी हो जाते हैं। ऐसे ही ब्रह्मलोक तथा लोका न्तकके देवोंको देवाङ्गनायें दिव्य, स्वभावसे ही प्रकाशशील, सवाङ्गमनोहर, श्रृंगारके उत्तम आकार विलासोंसे पूर्ण, तथा उज्ज्वल और रमणीय वेष (वस्त्रादि) और भूप- णादि युक्त अपने रूपोंको दिखाती है। वे देव उनके अति मनोहर रूपको देखते ही प्रीतिको प्राप्त होते है, तथा कामनासे भी निवृत हो जाते है। इसी प्रकार महाशुक्र तथा सहस्रार स्वर्गके देवोंको उत्पन्न मैथुनकी कामनासहित जानकर देवियां उनके निकट आकर उपस्थित होती है, और उनके सम्मुख श्रवण विषयको सुखदायक, अत्यन्त मनोहर शृंगार, उदार ( उत्कृष्ट ) अभिजात विलास अमिलाप छेद तलतालयुक्त, आभू- पणोंके शब्द सहित, हसित कथित गीतके शब्दोंको उच्चारण करती है। उन्हीं शब्दोंके श्रवणमात्रसे वे प्रीतिको प्राप्त होते है और कामनासे भी रहित हो जाते हैं । और आनत, प्राणत तथा आरण, अच्युत कल्पोंके जो देव है, उन्हें जिस समय मैथुन सेवनकी कामना होती है, उसी समय वे देवियोंका संकल्प करते है, और केवल अपने मनके संकल्पमात्रसे ही परमप्रीतिको प्राप्त होते है, और मैथुनकी कामनासे भी निवृत हो जाते है । इन शरीर, स्पर्श, रूप, शब्द तथा मनकेद्वारा मैथुनके उपसेवनोंसे आगे २ के देवोंके प्रीतिका प्रकप विशेष अनुपम गुण है । क्योंकि आगे २ के मैथुनसेवि- , सभाष्यतत्त्वार्थाधिगमसूत्रम् । ९५ योंके अल्पसंक्लेश है । और स्थितिप्रभावादिसे भी अधिक अधिक हैं, ऐसा आगे कहेंगे (अ० ४ सू० २१)। परेऽप्रवीचाराः ॥१०॥ सूत्रार्थ:-कल्पोपपन्नसे परे जो देव है, वे अप्रवीचार हैं। भाष्यम्-कल्पोपपन्नेभ्यः परे देवा अप्रवीचारा भवन्ति । अल्पसंक्लेशत्वात् स्वस्थाः शीतीभूताः । पञ्चविधप्रवीचारोद्भवादपि प्रीतिविशेषादपरिमितगुणप्रीतिप्रकर्षाः परमसुख- तृप्ता एव भवन्ति । अत्राह । उक्तं भवता देवाश्चतुनिकाया दशाष्टपञ्चद्वादशविकल्पा इत्युक्ते निकायाः के के चैषां विकल्पा इति । अत्रोच्यते । चत्वारो देवनिकायाः । तद्यथा । भवनवासिनो व्यन्तरा ज्योतिष्का वैमानिका इति ॥ तत्र- विशेषव्याख्या-यहां पर्यन्त तो आरंभसे लेके कल्पोपपन्नपर्यन्त देवोंके प्रवीचारका वर्णन किया, अब इसके पश्चात् कल्पसे परे अर्थात् कल्पातीतकी व्यवस्था कहते है कि-कल्पोपपन्नोंसे परे जो देव है वे अप्रवीचार होते है, अर्थात् उनके मैथुन सेवन नहीं होता । क्योंकि इन देवोंके संक्लेश अथवा संक्लिष्टकर्म अल्प होते है, अतएव वे वस्थ, शान्त और सदा शीतलभूत रहते है। पांच प्रकारके प्रवीचारद्वारा अर्थात् काय, स्पर्श, रूप, शब्द तथा मनोजन्य मैथुन सेवनकेद्वारा उत्पन्न जो प्रीतिविशेष है, उससे भी अपरिमितगुण अर्थात् पूर्वोक्त पंचविध मैथुनोंसे जो आनन्द होता है, उससे अपरि- मित-अनन्तगुण प्रीति का आनन्दकी अधिकतायुक्त ये देवगण होते है, अतएव पर- मसुखतृप्त ही रहते है ॥ १० ॥ अब यहां कहते हैं कि, आपने देवोंके चार निकाय कहे और क्रमसे प्रथम निकाय दश भेद, द्वितीय आठ भेद, तृतीय पांच भेद और चतुर्थ बारह भेदसहित है, यह भी कहा, तब चारों निकाय कौन २ है तथा उनके दश, आठ, पांच तथा बारह विकल्प भी कौन २ हैं । इसका समाधान यहां कहते है । चार देव निकाय है। सो इस प्रकार कि, १ भवनवासी, २ व्यन्तर, ३ ज्योतिष्क और ४ वैमानिक । इनमें-- भवनवासिनोऽसुरनागविद्युत्सुपर्णाग्निवातस्तनितोदधि- द्वीपदिकुमाराः ॥ ११ ॥ सूत्रार्थ:-भवनवासियोंके असुरकुमार, नागकुमार, विद्युतकुमारादि दश भेद है । भाप्यम्-प्रथमो देवनिकायो भवनवासिनः । इमानि चैपां विधानानि भवन्ति । त- द्यथा असुरकुमारा नागकुमारा विद्युत्कुमाराः सुपर्णकुमारा अग्निकुमारा वातकुमाराः स्तनि- तकुमारा उदधिकुमारा द्वीपकुमारा दिक्कुमारा इति । कुमारवदेते कान्तदर्शनाः सुकुमारा मृदुमधुरललितगतयः शृङ्गाराभिजातरूपविक्रियाः कुमारवञ्चोद्धतरूपवेपभापाभरणप्रहरणा- ९६ , .. रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् वरणयानवाहनाः कुमारवचोल्दैणरागाः क्रीडनपराश्चेत्यतः कुमारा इत्युच्यन्ते । अमुरकुमा- रावासेष्वसुरकुमाराः प्रतिवसन्ति शेषास्तु भवनेपु । महामन्दरस्य दक्षिणोत्तरयोर्दिग्विभाग- योर्बह्रीपु योजनशतसहस्रकोटीकोटीष्वावासा भवनानि च दक्षिणार्धाधिपतीनामुत्तगर्धाधि- पतीनां च यथाखं भवन्ति । तत्र भवनानि रत्नप्रभायां वाहल्यार्धमवगाह्य मध्ये भवन्ति । भवनेषु वसन्तीति भवनवासिनः ।। विशेषव्याख्या-चारों निकायोंमेंसे प्रथम निकाय भवनवासी है। उनके भेद ये है। यथा; असुरकुमार १, नागकुमार २, विद्युत्कुमार ३, सुपर्णकुमार ४, अग्निकुमार ५, वातकुमार ६, स्तनितकुमार ७, उदधिकुमार ८, द्वीपकुमार ९ और दिकुमार १० । ये सब कुमारोंके समान रमणीयदर्शन, सुकुमार, मृदु, मधुर तथा ललित गतिवाले, शृंगार सहित सुन्दर रूप विक्रियायुक्त होते है। और कुमारोंके तुल्य उद्धत रूप, वेष, भाषा, आभरण, अस्त्रशस्त्रादि प्रहरण, वस्त्र तथा यान वाहनादि युक्त होते है । और कुमारॉके ही समान इनका व्यक्त अर्थात् स्पष्टराग क्रीड़ामें तत्पर रहता है; अतएव इन्हें कुमार कहते हैं । इनमें असुरकुमार, असुरकुमारोंके आवासमें रहते है, और शेष भवनोंमें निवास करते हैं। महामन्दरके दक्षिण और उत्तर दिग्विभागोंमें अनेक लाखयोजन कोटी कोटीयोंमें असुरकुमारोंके आवास हैं, और भवन भी दक्षिणार्धाधिपतियोंके और उत्त- रार्धाधिपतियोंके यथावं है । वहां रत्नप्रभामें वहलभागके अर्ध मध्यमें प्रवेशकरके मध्यमें भवन है । भवनोंमें जो रहते है, उन्हें भवनवासी कहते हैं। भवप्रत्ययाश्चैषामिमा नामकर्मनियमात्स्वजातिविशेषनियता विक्रिया भवन्ति । तद्यथा । गम्भीराः श्रीमन्तः काला महाकाया रत्नोत्कटमुकुटभास्वराश्चूडामणिचिह्ना असुरकुमारा भवन्ति । शिरोमुखेष्वधिकप्रतिरूपाः कृष्णश्यामा मृदुललितगतयः शिरस्सु फणिचिह्ना नाग- कुमाराः । स्निग्धा भ्राजिष्णवोऽवदाता वज्रचिह्ना विद्युत्कुमाराः । अधिकरूपग्रीवोरस्काः श्यामावदाता गरुडचिह्नाः सुपर्णकुमाराः । मानोन्मानप्रमाणयुक्ता भावन्तोऽवदाता घटचिह्ना अग्निकुमारा भवन्ति । स्थिरपीनवृत्तगात्रा निमग्नोदरा अश्वचिह्ना अवदाता वातकुमाराः । निग्धाः स्निग्धगम्भीरानुनादमहास्वनाः कृष्णा वर्धमानचिह्नाः स्तनितकुमाराः । ऊरुकटिष्व- धिकप्रतिरूपाः कृष्णश्यामा मकरचिह्ना । उदधिकुमाराः । उरःस्कन्धवाह्वग्रहस्तेष्वधिकप्रति- रुपाः श्यामाचदाताः सिहचिह्ना द्वीपकुमाराः । जवाग्रपादेष्वधिकप्रतिरूपाः श्यामा हस्तिचिह्ना दिकुमाराः । सर्वे विविधवस्त्राभरणप्रहरणावरणा भवन्तीति ।। भवप्रत्ययसे अर्थात् देवयोनिमें जन्म लेनेके कारणसे तथा नामकर्मके नियमसे निज जाति विशेषमें नियत ऐसी विक्रिया इन देवोंके होती है । सो इस प्रकार कि,-गं- भीर, श्रीमन्त अर्थात् शोभादि ऐश्वर्ययुक्त, काले, महाकाय, रत्नजटित मुकुटोंसे प्रकाश- गील चूडामणिसे चिह्नित अमुरकुमार होते हैं । शिर और मुखोंमें प्रतिरूप कृष्ण, श्याम, मृदु तथा ललित गतिवाले शिरमें नागसे चिह्नित नागकुमार होते हैं । चिक्कण, प्रकाशशील, - - सभाष्यतत्त्वार्थाधिगमसूत्रम् । ९७ भाखर शुक्लवर्ण, तथा वजोंसे चिह्नित विद्युत्कुमार होते हैं । अतिसुन्दर ग्रीवा (गला) तथा वक्षस्थल (छाती) से भूषित, श्याम तथा शुद्ध वर्ण, तथा गरुडसे चिहित सुपर्णकुमार होते है । मान-ऊर्ध्वमान और प्रमाण-युक्त, प्रकाशशील, शुद्ध शुक्लवर्ण, और घटसे चिह्नित अग्निकुमार होते हैं । स्थिर-स्थूल तथा वर्तुलाकार शरीरधारी, निमग्न अर्थात् नमित उदरसहित, शुद्ध वर्ण, और अश्वसे चिह्नित वालकुमार होते है । चिक्कण, स्निग्ध, गम्भीर, प्रतिध्वनि और महानाद-संयुक्त, कृष्णवर्ण, और वर्धमानचिहयुक्त स्तनितकुमार होते हैं । जंघा तथा कटिप्रदेशमे अधिक सुन्दर, कृष्ण श्यामवर्ण, तथा मकरसे चिह्नित उदधिकुमार होते हैं । वक्षस्थल, कन्धा, बाहू, और अग्र हस्तोंके विषे अधिक सुन्दर, श्याम शुद्ध वर्ण, तथा सिंहसे चिह्नित द्वीपकुमार होते है । और संघा, और अग्रपादोंमें अधिक सौन्दर्य-सहित, श्यामवर्ण और हस्तियोंसे चिहित देवकुमार होते हैं । सब ए दशौ कुमार अनेक प्रकारके वस्त्र, आभूषण तथा शस्त्र- नस्त्र-आदिसे सम्पन्न होते है ।। व्यन्तराः किन्नरकिम्पुरुषमहोरगगन्धर्वयक्षराक्षसभूतपिशाचा॥१२॥ सूत्रार्थ:-द्वितीय व्यन्तरनिकाय है और उसके किन्नर आदि आठ भेद हैं। भाष्यम्-- अष्टविधो द्वितीयो देवनिकायः । एतानि चास्य विधानानि भवन्ति । अधस्ति- गूर्व च त्रिष्वपि लोकेषु भवननगरेष्वावासेषु च प्रतिवसन्ति । यस्माचास्तिर्यगूर्व च नपि लोकान् स्पृशन्तः स्वातन्त्र्यात्पराभियोगाच प्रायेण प्रतिपतन्यनियतगतिप्रचारा नुष्यानपि केचिद्धृत्यवदुपचरन्ति विविधेपु च शैलकन्दरान्तरवनविवरादिषु प्रतिवसन्त्यतो यन्तरा इत्युच्यन्ते। विशेषव्याख्या-अब द्वितीय जो निकाय है वह व्यन्तर है। और उसके भेद आठ हैं । जैसे-किन्नर १ किम्पुरुष २ महोरग ३ गन्धर्व ४ यक्ष ५ राक्षस ६ भूत ७ और शाच ८ । ये' अधोभागमे, तिर्यग्भागमें, तथा ऊर्ध्वभागमें, तीनो लोकोंमें, भवनोंमें, गरोंमें, तथा आवासोंमें ये व्यन्तर देव निवास करते हैं । इस हेतुसे कि अधोभागमें, ति- प्रेग्भागमें, और ऊर्श्वभागमें तीनो लोकोंको स्पर्श करते हुए स्वतंत्रतासे, और दूसरेके अ- योगसे प्रायः अनियत गतिके प्रचारसे चारों ओर गिरते घूमते रहते हैं, और कोई २ नुप्योंकी भी भृत्यके समान सेवा करते है, तथा विविध (अनेक ) प्रकारके पर्वत, न्दरा, अन्तर्वन और विवर आदिमें निवास करते रहते है, इस हेतुसे ये व्यन्तर हे जाते है। तत्र किन्नरा दशविधाः । तद्यथा-किन्नराः किम्पुरुपाः किंपुरुपोत्तमाः किन्नरोत्तमा हृद- गमा रूपशालिनोऽनिन्दिता मनोरमा रतिप्रिया रतिभेष्टा इति । किम्पुरुपा दशविधाः । १ रत्नप्रभा भूमिका सहस्र योजन अवगाढ जो प्रथमकाण्ड उसके नीचे ऊपर शत २ (मी २) योजन डके मध्यमें असंख्येय लक्ष भूमिनगर तथा आवास हैं। जो व्यन्तरीके निवासस्थान है। ૧૩ रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् ९८ तद्यथा-पुरुषाः सत्पुरुषा महापुरुषाः पुरुषवृषभाः पुरुषोत्तमा अतिपुरुषा मरुदेवा मरुतो मेरुप्रभा यशवन्त इति ।। महोरगा दशविधाः । तद्यथा-भुजगा भोगशालिनो महाकाया अतिकायाः स्कन्धशालिनो मनोरमा महावेगा महेष्वक्षा मेरुकान्ता भावन्त इति ॥ गान्धी द्वादशविधाः । तद्यथा--हाहा-हूहू-तुम्बुरवो नारदा ऋपिवादिका भूतवादिकाः कादम्बा महाकादम्बा रैवता विश्वावसवो गीतरतयो गीतयशस इति ॥ यक्षास्त्रयोदशविधाः । नद्यथा- पूर्णभद्रा माणिभद्राः श्वेतभद्रा हरिभद्राः सुमनोभद्रा व्यतिपातिकभद्राः सुभद्राः सर्वतोभद्रा मनुष्ययक्षा वनाधिपतयो वनाहारा रूपयक्षा यक्षोत्तमा इति ।। सप्तविधा राक्षसाः । तद्यथा- भीमा महाभीमा विना विनायका जलराक्षसा राक्षसराक्षसा ब्रह्मराक्षसा इति । भूता नव- विधाः । तद्यथा-सुरूपाः प्रतिरूपा अतिरूपा भूतोत्तमा स्कन्दिका महास्कन्दिका महावेगाः प्रतिच्छन्ना आकाशगा इति ॥ पिशाचाः पञ्चदशविधाः । तद्यथा -कृष्माण्डाः पटका जोपा आह्नकाः काला महाकालाचौक्षा अचौक्षास्तालपिशाचा मुखरपिशाचा अधस्तारका देहा महा- विदेहास्तूष्णीका वनपिशाचा इति ।। इनमें किन्नर दश प्रकारके होते हैं । जैसे-किन्नर, किम्पुरुष, किंपुरुषोत्तम, किन्नरो- त्तम, हृदयंगम, रूपशाली, अनिन्दित, मनोरम, रतिप्रिय, और रतिश्रेष्ठ । किम्पुरुष भी दश प्रकारके है । जैसे-पुरुष, सत्पुरुष, महापुरुष, पुरुषवृषभ, पुरुषोत्तम, अतिपुरुष, मरुदेव, मरुत, मेरुप्रभ, तथा यशस्वत् । महोरगभी दश प्रकारके है । जैसे-भुजग, भोगशाली, महाकाय, अतिकाय, स्कन्धशाली, मनोरम, महावेग, महेष्वक्ष, मेरुकान्त और भावान् । और गन्धर्व वारह प्रकारके है । जैसे-हाहा, हूहू, तुम्बुरु, नारद, ऋपिवादिक, भूतवादिक, कादम्ब, महाकादम्ब, रैवत, विश्वावसु, गीतरति, और गीतयशस् । यक्ष तेरह प्रकारके है । जैसे–पूर्णभद्र, मणिभद्र, श्वेतभद्र, हरिभद्र, सुमनोभद्र, व्यतिपातिकमद्र, सुभद्र, सर्व- तोभद्र, मनुप्ययक्ष, वनाधिपति, वनाहार, रूपयक्ष और यक्षोत्तम । ब्रह्म-राक्षस सात प्रकारके हैं । जैसे-भीम, महाभीम, विघ्न, विनायक, जलराक्षस, राक्षसराक्षस, और ब्रह्म- राक्षस । भूत नौ प्रकारके है । जैसे-सुरूप, प्रतिरूप, अतिरूप, भूतोत्तम, स्कन्दिक, महास्कन्दिक, महावेग, प्रतिच्छन्न, और आकाशग । पिशाच १५ पन्द्रह प्रकारके हैं । जैसे-कूप्माण्ड, पटक, जोष, आक, काल, महाकाल, उक्षा, अचौक्ष, तालपिशाच, मुखरपिशाच, अधस्तारक, देह, महाविदेह, तूष्णीक और वनपिशाच । तत्र किन्नराः प्रियमुश्यामाः सौम्याः सौम्यदर्शना मुखेष्वधिकरूपशोभा मुकुटमौलिभूप- णा अशोकवृक्षध्वजा अवदाताः । किम्पुरुषा अरुवाहुष्वधिकशोभा मुखेष्वधिकभास्वरा विवि- धाभरणभूपणाश्चित्रनगनुलेपनाचम्पकवृक्षध्वजाः ॥ महोरगाः श्यामावदाता महावेगा: सौम्याः सौम्यदर्शना महाकायाः पृथुपीनस्कन्धग्रीवा विविधानुविलेपना विचित्राभरणभूषणा नागवृक्षध्वजाः । गान्धर्वा रक्तावदाता गम्भीराः प्रियदर्शनाः सुरूपाः सुमुखाकाराः सुखरा मालिधरा हारविभूपणास्तुम्वुरुवृषध्वजाः । यक्षाः श्यामावदाता गम्भीरा तुन्दिला वृन्दा- रका. प्रियदर्शना मानोन्मानप्रमाणयुक्ता रक्तपाणिपादतलनखतालजिह्वौष्ठा भाखरमुकुटधरा or ९ सभाष्यतत्त्वार्थाधिगमसूत्रम् । नानारत्नविभूपणा पटवृक्षध्वजाः । राक्षसा अवदाता भीमा भीमदर्शनाः शिरःकराला रक्त- लम्बौष्ठास्तपनीयविभूपणा नानाभक्तिविलेपनाः खदाङ्गध्वजाः।भूताः श्यामाः सुरूपाः सौम्या मापीवरा नानाभक्तिविलेपनाः सुलसध्वजाः कालाः । पिशाचाः सुरूपाः सौम्यदर्शना हस्तग्री- वासु मणिरत्नविभूषणाः कदम्बवृक्षध्वजाः । इत्येवंप्रकारस्वभावानि वैक्रियाणि रूपचिह्नानि व्यन्तराणां भवन्तीति ।। इन दश प्रकारके व्यन्तरोंमें किन्नर प्रियङ्गुके सदृश श्याम, सौम्यस्वभाव, सौम्यदर्शन, मुखोंमें अधिक रूपशोभायुक्त, मुकुटोंसे शिरोंमें विभूषित, अशोक वृक्षकी ध्वजाधारी और शुद्ध गौर वर्ण होते है । तथा किम्पुरुष जंघा और भुजाओंमें अधिक शोभायुक्त, मुख- देशमें अधिक प्रकाशसहित, विविध प्रकारके वस्त्राभूषणोंसे शोभित, चित्र विचित्र माला तथा अनुलेपनोंसे सज्जित और चम्पकवृक्षकी ध्वजा धारण किये होते है । तथा महोरग श्याम-शुद्धरूप, महावेग, सौम्यस्वभाव, सौम्यदर्शन, महाकाय, विशाल तथा स्थूल स्कंध और ग्रीवासहित, अनेक प्रकारके अनुविलेपन (उबटन आदि) सहित, विचित्र भूषण-व- स्त्रोंसे शोभित और नागवृक्षकी ध्वजासे शोभित होते है। गन्धर्व रक्त-शुक्लवर्ण, गंभीर, प्रियदर्शन, सुरूप, उत्तम मुखवाले, उत्तमखर (शब्दके स्वर) युक्त, मुकुटधारी, हारोंसे भूपित और तुम्वुरु वृक्षकी ध्वजा धारण किये हुए होते हैं । यक्ष श्याम-शुद्धवर्ण, गंभीर, तुंदिल (तोंदवाले), मनोहर, प्रियदर्शन, मानोन्मानप्रमाण-सहित, हाथ तथा पावोंके तलभाग, नख, तालु, जिह्वा और ओष्ठ प्रदेशोंमें रक्तवर्ण, प्रकाशमान मुकटोंको धारण किये हुए, अनेक प्रकारके रत्नमय भूषणोंसे शोभित और वटवृक्षकी ध्वजा धारण किये हुए होते है । राक्षस शुद्धवर्ण, भीम, भीम (भयंकर) दर्शनवाले, शिरोदेशमें अतिकराल, रक्तवर्णके लम्बे २ ओठोंको धारण किये हुए, सुवर्णके आभूषणोंसे शोभित, नानाप्रकारके विलेपनोंसे युक्त और खट्रांगध्वजाधारी होते है । भूत कृष्णवर्ण, अतिसुन्दर, सौम्य, अतिस्थूल, नानाप्रकारके अनुलेपधारी, और सुलस ध्वजाधारी होते है। और पिशाच अतिसुन्दर, सौम्यदर्शन, हाथ तथा गलेमें मणियों और रत्नोंके आभूषणोंसे शोभित तथा कदम्बके वृक्षोंकी ध्वजाओंसे चिहित होते है । इस प्रकारके वैक्रियक स्वभाव, तथा रूप और चिह्न व्यन्तर देवोंके है। तृतीयो देवनिकायः। अव तृतीय देवनिकायका वर्णन करते हैं- ज्योतिष्काः सूर्याश्चन्द्रमसो ग्रहनक्षत्रप्रकीर्णतारकाश्च ॥ १३ ॥ सूत्रार्थ:-तीसरे ज्योतिष्क निकायमें सूर्य, चन्द्रमा, ग्रह, नक्षत्र, और प्रकीर्णक तारा इस प्रकार पांच भेद है। भाष्यम्-ज्योतिष्काः पञ्चविधा भवन्ति । तद्यथा-सूर्याश्चन्द्रमसो ग्रहा नक्षत्राणि प्रकी- रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् १०० र्णतारका इति पञ्चविधा ज्योतिष्का इति । असमासकरणमार्पाच्च सूर्याचन्द्रमसोः क्रमभेदः कृतः यथा गम्यतैतदेवैषामूर्ध्वनिवेश आनुपूर्व्यमिति । तद्यथा-सर्वाधस्तात्सूर्यास्ततश्चन्द्रमस- स्ततो ग्रहास्ततो नक्षत्राणि ततोऽपि प्रकीर्णताराः । ताराग्रहास्त्वनियतचारित्वात्सूर्यचन्द्रम- सामूर्ध्वमधश्व चरन्ति । सूर्येभ्यो दशयोजनावलम्बिनो भवन्तीति । समामिभागादष्टसु योजनशतेपु सूर्यास्ततो योजनानामशीत्यां चन्द्रमसस्ततो विंशत्यां तारा इति । द्योतयन्त इति द्योतीपि विमानानि तेषु भवा ज्योतिष्का ज्योतिपो वा देवा ज्योतिरेव वा ज्योतिष्काः । मुकुटेपु शिरोमुकुटोपगृहितैः प्रभामण्डलकल्पैरुज्ज्वलैः सूर्यचन्द्रतारामण्डलैयथास्वं चिह्नर्विरा- जमाना द्युतिमन्तो ज्योतिष्का भवन्तीति ।। विशेषव्याख्या ज्योतिप्क देव पांच प्रकारके हैं । यथाः-सूर्य, चन्द्रमा, ग्रह, नक्षत्र, और प्रकीर्णक तारका ये पांच प्रकारके ज्योतिष्क देव है । इस सूत्रमें समास न करनेका और आर्ष प्रमाणसे सूर्य तथा चन्द्रमाका क्रमभेद करनेका कारण यह है कि, जिससे यह सूचित होजाय कि इनकी यथाक्रम ऊर्ध्व स्थिति है । अर्थात् आप ग्रन्थोंमें चन्द्रमा पूर्व पठित है और सूर्य पश्चात्, वह यहाँपर इष्ट नहीं है। यहाँपर सूर्यको ही प्रथम कहना है । क्योंकि पाठक्रमानुसार ऊपर इनकी स्थिति नहीं है। किंतु इनकी एकके पश्चात् दूसरेकी ऊपर २ स्थिति है । जैसे-सबके नीचे प्रथम सूर्य है, पश्चात् चन्द्रमा हैं, चन्द्रमाओंके ऊपर ग्रह है, उनके ऊपर नक्षत्र है और नक्षत्रोंके ऊपर प्रकीर्णकतारका है । और ताराग्रह . तो अनियतचारी अर्थात् जिनकी गति नियत नहीं ऐसे होनेसे सूर्य तथा चन्द्रमाके ऊपर तथा नीचे भी भ्रमण करते है. और सूर्यसे दश योजन अवलम्ब होते है अर्थात् सूर्यसे दश योजन दूर रहते है । समान भूमिभागसे आठसौ (८००) योजनपर सूर्य है, सूर्यसे अस्सी (८०) योजनपर चन्द्रमा है, और चन्द्रमासे बीस (२०) योजनपर तारा है। प्रकाशशील विमानोंमें जो है, उनको ज्योतिष्क कहते है । ज्योतिप् (प्रकाश)से होनेवाले देव अथवा ज्योतिष् (प्रकाश) रूप ही जो देव उनको ज्योतिष्क कहते है। उन ज्योतिष्कोंके मुकुटोंमें शिरोमुकुटोंसे आच्छादित और प्रभामण्डलोंके समान उज्वल ऐसे सूर्य, चन्द्र तथा ताराओंके मण्डलरूप अपने २ चिह्न यथाक्रमसे विराजमान है । अर्थात् सूर्य सूर्यमण्डलोंसे, चन्द्रमा चन्द्रमण्डलोंसे तथा तारागण तारामण्डलोंसे चिह्नित है। और वे ज्योतिष्क देव प्रकाशमय है। मेरुप्रदक्षिणानित्यगतयो नृलोके ॥ १४॥ सूत्रार्थ:-ज्योतिष्क दुव मनुष्यलोकमें नित्यगतिरूप होकर मेरुकी प्रदक्षिणा करते है। भाष्यम् --मानुपोत्तरपर्यन्तो मनुष्यलोक इत्युक्तम् । तस्मिज्योतिष्का मेरुप्रदक्षिणा- नित्यगतयो भ्रमन्ति । मेरोः प्रदक्षिणा नित्या गतिरेपामिति मेरुप्रदक्षिणानित्यगतयः । एका- दशवेकविशेष योजनशतेषु मेरोश्चतुर्दिशं प्रदक्षिणं चरन्ति । तत्र द्वौ सूयौँ जम्बूद्वीपे, लवण- सभाष्यतत्त्वार्थाधिगमसूत्रम् । १०१ जले चत्वारो, धातकीखण्डे द्वादश, कालोदे द्वाचत्वारिंशत्पुष्करार्धे द्विसप्ततिरित्येवं मनुष्य- लोके द्वात्रिंशत्सूर्यशतं भवति । चन्द्रमसामप्येष एव विधिः । अष्टाविंशतिनक्षत्राणि, अष्टा- शीतिम्रहाः, षट्षष्टिः सहस्राणि नव शतानि पञ्चसप्ततानि तारा कोटाकोटीनामेकैकस्य चन्द्रमसः परिग्रहः । सूर्याश्चन्द्रमसो ग्रहा नक्षत्राणि च तिर्यग्लोके, शेषास्तूर्ध्वलोके ज्यों- तिष्का भवन्ति । अष्टचत्वारिंशद्योजनकषष्टिभागाः सूर्यमण्डलविष्कम्भः, चन्द्रमसः षट्पञ्चा- शद् , ग्रहाणामधयोजनं, गन्यूतं नक्षत्राणां, सर्वोत्कृष्टायास्ताराया अर्धक्रोशो, जघन्यायाः पञ्चधनुःशतानि । विष्कम्भार्धबाहल्याश्च भवन्ति । सर्वे सूर्यादयो नृलोक इति वर्तते । बहिस्तु विष्कम्भवाहल्याभ्यामतोऽधै भवंति ।। एतानि च ज्योतिष्कविमानानि लोकस्थित्या प्रसक्तावस्थितगतीन्यपि ऋद्धिविशेषार्थमाभियोग्यनामकर्मोदयाच नित्यं गतिरतयो देवा वहन्ति । तद्यथा-पुरस्तात्केसरिणो, दक्षिणतः कुञ्जरा, अपरतो वृषभा, उत्तरतो जविनो- ऽश्वा इति ॥ विशेषव्याख्या-मानुषोत्तरपर्वतपर्यन्त मनुष्यलोक है ऐसा पूर्वप्रकरण अ० ३, सू० १४ में कहा है। उस मनुष्यलोकमें ज्योतिष्क देव नित्यगतिवाले होकर मेरु पर्वतकी प्रदक्षिणा करते हुए भ्रमण करते हैं । मेरुकी प्रदक्षिणारूप जिनकी नित्य गति है उनको मेरुप्रदक्षिणानित्यगतिवाले कहते है । ए ज्योतिष्क देव मेरुसे गेरासौ इक्कीस (११२१) योजन दूर चारों दिशाओंमें प्रदक्षिणा करतेहुए भ्रमण करते हैं। तहां जम्बू- द्वीपमें दो, लवणजल (क्षारसमुद्र)में चार, धातकीखण्डमें बारह (१२), कालोद समुद्र में वयालीस (४२) और पुष्करार्द्धमें बहत्तर (७२) सूर्य हैं। इस प्रकार मनुष्यलोकमें एकसौ बत्तीस (१३२ ) सूर्य होते है । चन्द्रमाओंकी भी यही विधि है । इन सब (चन्द्रमाओं)में अट्ठाईस (२८) नक्षत्र, अठासी (८८) ग्रह, तथा छासठ हजार नौसै पछत्तर (६६९७५) कोटाकोटी एक २ चन्द्रमाके ताराओंका परिग्रह है । अर्थात् प्रत्येक चन्द्रमाके (६६९७५) कोटाकोटी तारे हैं । सूर्य, चन्द्रमा, ग्रह और नक्षत्र ए तो तिर्यग्लोक अर्थात् मध्यलोकमें है, और शेष ज्योतिष्क अर्थात् प्रकीर्णक तारा ऊर्ध्व- लोकमें रहते है । अड़तालीस (४८) योजन तथा साठमें एक भाग है. योजन सूर्य- मण्डलका विष्कम्भ है; चन्द्रमाका छप्पन (५६) योजन, ग्रहोंका आधा योजन, नक्षत्रोंका दो कोश और ताराओंमें सबसे बड़ी ताराका अर्ध कोश और सबसे छोटीका पांचसौ १ शेषपदसे यहां प्रकीर्णताराओंसे तात्पर्य है । क्योंकि जो सूर्य, चन्द्र, ग्रह, और नक्षत्र यह चार गिनादिये तो शेष प्रकीर्णतारा रहे; वेही ऊर्ध्वलोकमें रहते है यही अभिप्राय आचार्यका है। परंतु आर्षप्रन्थोमें ऐसा लेख नहीं है। क्योकि वहां तो समस्त ज्योतिष्कोंकी स्थिति तिर्यग्लोकमे ही कही है। और "शेष तारारूप ज्योतिष्क ऊर्ध्वलोकमें होते हैं" यह वृत्तिकारका आशय उनके (वृत्तिकारके) वहुश्रुत होनेसे अविरुद्धही है, क्योंकि अठारहसौ (१८००) योजन ऊचा विर्यग्लोक मानसे तिर्यग्लोकके अधो- भागकी अपेक्षासे ऊर्ध्व दिग्भाव होताही है, इसमे कुछ विरोध नहीं है. अर्थात् ऊलोकका अर्थ उर्वदिशा करनेसे सब विरोध मिटता है.

१०२ रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् धनुष् है । विष्कम्भसे अर्द्धबाहल्य उँचाई होती है । सूर्य आदि सब ज्योतिष्क मनुष्य- लोकमें होते है। और मनुष्यलोकके बाहर तो विष्कम्भ तथा बाहल्यसे अर्द्धभाग होते है। ये ज्योतिष्कदेवों के विमान लोककी स्थितिसे यद्यपि प्रसक्त अवस्थित गति अर्थात् गतिमें तत्पर तथा निवृत्त गतिवाले है तथापि ऋद्धिविशेषके लिये, आभियोग्य नाम कर्मके उदयसे नित्यगतिसे प्रीति करनेवाले देवता इनको भ्रमण कराते हैं। जैसे-इनके विमानोंके अग्रभागमें सिंह रहते है, दक्षिणभागमें गजेन्द्र, पृष्ठभागमें वृषभ (बैल) और उत्तरभागमें अतिवेगशाली तुरङ्ग (घोड़े) रहते हैं। तत्कृतः कालविभागः ॥१५॥ सूत्रार्थ:-नित्यगतिवाले ज्योतिष्क देवोंसे कालका विभाग होता है। भाग्यम्-कालोऽनन्तसमयो वर्तनादिलक्षण इत्युक्तम् । तस्य विभागो ज्योतिष्काणां गतिविशेपकृतश्चारविशेषेण हेतुना । तैः कृतस्तत्कृतः । तद्यथा-अणुभागाश्वारा अंशाः कला लवा नालिका मुहूर्ता दिवसरात्रयः पक्षा मासा ऋतवोऽयनानि संवत्सरा युगमिति लौकि- कसमो विभागः ।। पुनरन्यो विकल्पः प्रत्युत्पन्नोऽतीतोऽनागत इति त्रिविधः । पुनविविध परिभाष्यते सङ्खथेयोऽसङ्खयोऽनन्त इति ॥ विशेपव्याख्याः-'अनन्त समययुक्त, वर्तना आदिलक्षणसहित काल है। ऐस कहा है (अध्या. ५ सू. २२,३९)। उस अनन्तसमययुक्त तथा वर्तना-आदिलक्षण सहित कालका विभाग ज्योतिष्क देवोंकी गतिविशेषकृत है । अर्थात् ज्योतिष्कदेवोंकी संचरण वा भ्रमण विशेषगति है वही कालके विभागमें हेतु है । 'तत्कृत: यहांपर समार 'तैः कृतः उनके गतिविशेपोंसे कृत, ऐसा समझना चाहिये । कालके विभाग, जैसे-अणु भाग (अति सूक्ष्मभाग), चार, अंश, कला, लव, नालिका, मुहूर्त, दिवस, रात्रि, पक्ष मास, ऋतु, अयन (दक्षिणायन वा उत्तरायण) 'छः महीनेका अयन होता है। वर्ष औ युग, यह सव लौकिकके समान कालका विभाग है। पुनः कालका अन्य विकल्प (भाग भी है । जैसे-प्रत्युत्पन्न (वर्तमान), अतीत (भूत) और अनागत अर्थात् भविष्य । य तीन प्रकारका कालका भेद है । वही काल पुनः तीन प्रकारका निर्धारित होता है जैसे-संख्येय, असंख्येय और अनंत । तत्र परमसूक्ष्मक्रियस्य सर्वजघन्यगतिपरिणतस्य परमाणोः स्वावगाहनक्षेत्रव्यतिक्रमकाल समय इत्युच्यते परमदुरधिगमोऽनिर्देश्यः । तं हि भगवन्तः परमर्षयः केवलिनो विदन्ति तु निगिन्ति परमनिरुद्धत्वात् । परमनिरुद्धे हि तस्मिन् भाषाद्रव्याणां ग्रहणनिसर्गये करणप्रयोगासम्भव इति । ते त्वसङ्ख्या आवलिका । ताः सङ्ख्या उछासस्तथा निःश्वासः तो बलवतः पटिन्द्रियस्य कल्यस्य मध्यमवयसः स्वस्थमनसः पुंसः प्राणः । ते सप्त स्तोकः ५ एक प्रकारके ज्योतिप्फ देवही सिंहादिककी आकृति धारण किये होते है। - , , सभाष्यतत्त्वार्थाधिगमसूत्रम् । १०३ ते सप्त लवः । तेऽष्टात्रिंशद च नालिका । ते द्वे मुहूर्तः । ते त्रिंशदहोरात्रम् । तानि पञ्च- दश पक्षः । तौ द्वौ शुक्लकृष्णौ मासः । तौ द्वौ मासावृतुः । ते त्रयोऽयनम् । ते द्वे संवत्सरः। ते पञ्च चन्द्रचन्द्रामिवर्धितचन्द्राभिवधिताख्या युगम् । तन्मध्येऽन्ते चाधिकमासकौ । सूर्यसवनचन्द्रनक्षत्राभिवर्धितानि युगनामानि । वर्षशतसहस्रं चतुरशीतिगुणितं पूर्वाङ्गम् । पूर्वाङ्गशतसहस्रं चतुरशीतिगुणितं पूर्व । एवं तान्ययुतकमलनलिनकुमुदतुद्यटटाववा हाहाहू- हूचतुरशीतिशतसहस्रगुणाः सङ्ख्येयः कालः । अत ऊर्ध्वमुपमानियतं वक्ष्यामः । तद्यथा हि नाम योजनविस्तीर्ण योजनोच्छ्रायं वृत्तं पल्यमेकरात्राात्कृष्टसप्तरात्रजातानामङ्गालोम्नां गाद पूर्ण स्याद्वर्षशताद्वर्षशतादेकैकस्मिन्नुद्धियमाणे यावता कालेन तद्रित स्यादेतत्पल्योपमम् । तदशभिः कोटाकोटिभिर्गुणितं सागरोपमम् । तेषां कोटाकोट्यश्चतस्रः सुषमसुषमा । तिखः सुषमा । द्वे सुषमदुःपमा । द्विचत्वारिंशद्वर्षसहस्राणि हित्वा एका दुःषमसुषमा । वर्षसह- स्राणि एकविंशतिर्दुःषमा । तावत्येव दुःषमदुःषमा। ता अनुलोमप्रतिलोमा अवसर्पिण्युत्स- पिण्यौ भरतैरावतेष्वनाद्यनन्तं परिवर्तेतेऽहोरात्रवत् । तयोः शरीरायुःशुभपरिणामानामनन्त- गुणहानिवृद्धी अशुभपरिणामवृद्धिहानी । अवस्थितावस्थितगुणा चैकैकान्यत्र । तद्यथा- कुरुषु सुषमसुषमा, हरिरम्यकवासेषु सुषमा, हैमवतहैरण्यवतेपु सुषमदुःषमा, विदेहेषु सान्तरद्वीपेषु दुःषमसुषमा, इत्येवमादिर्मनुष्यक्षेत्र पर्यापन्नः कालविभागो ज्ञेय इति ॥ उन कालके विभागोंमेंसे परम सूक्ष्म क्रियावान् , सबसे जघन्य गतिमें परिणत जो परमाणु है उस परमाणुके बीजके अवगाहनक्षेत्रके व्यतिक्रमका जो काल है, अर्थात् जितने कालमें अपने क्षेत्रसे दूसरेमें पलटा खाके स्थित होता है वा केवल पलटा खाता है वह काल समय कहलाता है और वह समयरूप काल सूक्ष्म होनेसे अत्यन्त दुष्प्राप्य है अर्थात् बुद्धिमानोंसे भी दुःखसे जाना जाता है, और "यह ऐसा है," इस प्रकार निर्देश करने योग्य (दूसरेको दर्शानेयोग्य) नहीं है । उस समय- रूप कालको भगवान् परमर्षि केवली (केवल ज्ञानसम्पन्न) जनही जानते है, न कि उसको निर्देशकरके अन्यको दर्शाते है; क्योंकि वह अति सूक्ष्म होनेसे परम निरुद्ध है। परम निरुद्ध उस समयरूप कालमें भाषाद्रव्योंके वाणी वा शब्दादिके ग्रहण तथा त्यागमें करणोंके (इन्द्रियोंके) प्रयोगका असंभव है । और वे असंख्येयसमय मिलके एक आव- लिका होती है। और वे संख्येय आवलिकायें मिलकर एक उच्छवास तथा निश्वास होता है। और वे उच्छास तथा निश्वास मिलकर बलवान्, समर्थ इन्द्रियसहित, नीरोग, युवा, और खस्थ मनवाले पुरुषका एक प्राण है। सप्तप्राण मिलके एक स्तोक होता है । सप्त (सात) स्तोकका एक लव होता है । अड़तीस तथा अर्द्ध अर्थात् साढ़े अड़तीस लवकी एक नालिका होती है । दो नालिकाका एक मुहूर्त होता है । और तीस मुहूर्तका एक रात्रिदिन होता है। पन्द्रह (१५) रात्रिदिनका एक पक्ष होता है । और दो पक्ष शुक्ल १ परम अर्थात् साधारण मनुष्योंकी अपेक्षा अतिशयसहित जनोंसेभी दुर्जेय है।

, रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् १०४ तथा कृष्णपक्ष मिलके एक मास होता है । दो मासका एक ऋतु होता है । तीनऋतुका एक अयन होता है। और दो अयनका एक वर्ष होता है । और वे पांच वर्ष चन्द्रचन्द्रा- भिवति तथा चन्द्राभिवर्धित नामवाले मिलकर एक युग होता है। और उस पंच वर्परूप युगके मध्य और अन्तमें अधिक-मास (दो अधिक-मास ) होते हैं । सूर्य, सवन, चन्द्र, नक्षत्र तथा अभिवर्धित ये युगोंके नाम हैं। और चौरासीसे गुणित शतसहस्र वर्प, अर्थात् एक लक्षको चौरासीसे गुणा करनेसे चौरासी लक्ष वर्ष हुए, और वे चौरामी लक्ष वर्ष मिलके एक पूर्वाङ्ग होता है । और शतसहस्र पूर्वाङ्ग अर्थात् एक लक्ष पूर्वाह्न चौरासीसे गुणित होनेसे चौरासी लक्ष पूर्वाङ्गका एक पूर्व होता है । और वे पूर्व अयुत, कमल, नलिन, कुमुद, तुद्य, टटा, बवा, हाहा इहूसंज्ञक चौरासी शतसहस्र (चौरासी लक्ष ) से गुणित होनेसे एक संख्येय काल होता है। और अब इसके आगे उपमासे नियत काल कहैगे । जैसे-एक योजन चौड़ा तथा एक योजन ऊंचा वृत्ताकार एक पल्य (रोमगर्त- गढ़ा) हो जो कि एक रात्रिसे लेके सप्त रात्रिपर्यन्त उत्पन्न मेषादि पशुओंके लोमा- (रोमों ) से गाढरूपसे अर्थात् खूब ठासके पूर्ण किया जाय तत् पश्चात् सौ सौ वर्षके अनन्तर एक २ रोम उस गढ़े से निकाला जाय तो जितने कालमें वह गढ़ा सर्वथा रिक्त अर्थात् खाली होजाय उसको एक पल्योपमकाल कहते है । और वह पल्योपम दशकोटा- से गुणा करनेसे एक सागरोपम काल होता है । और चार कोटाकोटी सागरोपमकी एक सुषमसुपमा होती है । तीन कोटाकोटी सागरोपमकी सुषमा है। दो कोटाकोटी सागरोपमकी सुपमदुःषमा होती है । बयालीससहस्र वर्ष कम एक सागरोपमकी एक दुःपमसुषमा होती है । इक्कीससहस्रवर्षकी दुःषमा होती है। और उतनेहीकी दुःपमदुःप- माभी होती है । और इन्हीं सुषमसुषमा आदि छहों कालोंकी अनुलोम प्रतिलोमभावसे अवसर्पिणी तथा उत्सर्पिणी होती है । अर्थात् अनुलोम (जिस क्रमसे लिखा) वह तो अवसर्पिणी, और इसके विपरीत क्रमसे अर्थात् प्रथम दुषमदुःषमा १ पुनः दुःषमा २ दुःपमसुपमा ३ सुषमदुःषमा ४ सुषमा ५ और षष्ठ सुषमसुषमा यह उत्सर्पिणी है। ये अनादि अनन्त अवसर्पिणी तथा उत्सर्पिणी रात्रिदिनके सहश भरत तथा ऐरावत वर्षोंमें परिवर्तित होती रहती हैं। अर्थात् एकके अनन्तर द्वितीय निरन्तर चक्र लगाया करती है । जैसे-अवसर्पिणीके पीछे उत्सर्पिणी, और उत्सर्पिणीके पीछे पुनः अवसर्पिणी, यह चक्र धूमा करता है। और इन दोनोंमें शरीर, आयु, तथा शुभ परिणामोंकी अनन्त गुण हानि और वृद्धिभी होती चली जाती है । तात्पर्य यह कि अवसर्पिणी कालमें ज्यों २ दुष्ट कालकी ओर उतरेगे त्यों २ शरीर, आयु और शुभपरिणामोंकी हानि होती जायगी और उत्सर्पिणीमें इनकी वृद्धि होती जायगी । तथा अशुभ परिणामोंकीभी वृद्धि तथा हानि होती जाती है । अर्थात् अवसर्पिणीमें आगे २ के कालमें अशुभ सभाष्यतत्त्वार्थाधिगमसूत्रम् । १०५ परिणामोंकी वृद्धि होती जायगी और उत्सर्पिणीमें इनकी अनन्तगुण हानि होती जायगी। और भरत तथा ऐरावत वर्षके सिवाय अन्यत्र अन्य वर्षों में एक एक गुण अवस्थित रहते हैं। जैसे कुरुवर्षमें सुषमसुषमाही सदा रहती है, हरिवर्ष तथा रम्यकमें सदा सुषमा रहती है। हैमवत और हैरण्यवत वर्षोंमें सुषमदुःषमा रहती है; अन्तर- द्वीपसहित विदेहोंमें दुःषमसुषमा रहती हैं। इसी प्रकार मनुष्यक्षेत्रोंमें कालविभाग सर्वत्र प्राप्त समझना चाहिये । बहिरवस्थिताः॥१६॥ सूत्रार्थ:-मनुष्यलोकके बाहर ज्योतिष्कदेव अवस्थित रहते है। भाष्यम्-नृलोकादहियोतिष्का अवस्थिताः। अवस्थिता इत्यविचारिणोऽवस्थितविमान- प्रदेशा अवस्थितलेश्याप्रकाशा इत्यर्थः । सुखशीतोष्णरश्मयश्चेति ।। विशेषव्याख्या-"ज्योतिष्कदेव मनुष्यलोकमें मेरुकी प्रदक्षिणा करते हुये नित्य- गतिशील रहते है" यह विषय ज्योतिष्कदेवोंके विषयमें पूर्व ( अ. ४ सू. १४) है । अब कहते हैं कि मनुष्यलोकके बाह्य ये विषय स्थित रहते है। इसका तात्पर्य यह है कि संचरण वा विचरणशील न होकर विमानप्रदेशमें अवस्थित रहते है । अर्थात् इनकी लेश्या तथा प्रकाश अवस्थित रहता है । और मनुष्यलोकके बाहर ज्योतिष्कदेवोंकी शीत और उष्ण किरणें सुखदायक होती हैं। वैमानिकाः॥१७॥ सूत्रार्थ:-वैमानिक चतुर्थ देवनिकाय है। भाष्यम्-चतुर्थो देवनिकायो वैमानिकाः । तेऽत ऊर्ध्व वक्ष्यन्ते । विमानेषु भवा वैमानिकाः। विशेषव्याख्या-चतुर्थ तथा अन्तिम देवोंका निकाय वैमानिक है । अब आगे उनका वर्णन करेंगे। वैमानिक शब्दका अर्थ यह है कि विमानोंमें होनेवाले, अर्थात् जो विमानोंमे हों वे वैमानिक कहलाते हैं। कल्पोपपन्नाः कल्पातीताश्च ॥१८॥ सूत्रार्थः-कल्पोपपन्न तथा कल्पातीत ये दो भेद वैमानिक देवोंके है। भाष्यम्-द्विविधा वैमानिका देवाः। कल्पोपपन्नाः कल्पातीताश्च। तान् परस्ताद्वक्ष्याम इति।। विशेषव्याख्या-वैमानिक देवोंके जो कल्पोपपन्न तथा कल्पातीत दो भेद हैं, उनको हम आगे वर्णन करेंगे। उपर्युपरि ॥१९॥ सूत्रार्थ:-वैमानिक देव ऊपर २ स्थित है। । १४ रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् १०६ भाष्यम्-उपर्युपरि च यथानिर्देशं वेदितव्याः । नकक्षेत्रे नापि नियंगयो नि । विशेपव्याख्या-उपरि उपरि यथानिर्देश समझना चाहिये । अर्थान जिम क्रमसे वैमानिकदेव सूत्रमें निर्दिष्ट (दर्शाये गये) हैं उसी क्रमसे वे ऊपर २ एकके ऊपर दुसरे स्थित है । न तो वैमानिक देव एक क्षेत्रमें हैं और न तिर्यग् मागमें है और न अधीमागमें हैं; किन्तु ऊपर २ स्थित हैं। सौधर्मशानसानत्कुमारमाहेन्द्रब्रह्मलोकलान्नकमहाशक्रमहमारवा. नतप्राणतयोरारणाच्युतयोर्नवसु ग्रैवेयेषु विजयवंजयन्तजयन्नापराजि- तेषु सर्वार्थसिद्धे च ॥ २० ॥ सूत्रार्थ:-सौधर्म आदि जो विमान है, उनमें चतुर्य निकाय वैमानिक देव होते हैं, और वे ऊपर २ होते है ऐसा कहभी चुके हैं। भाष्यम्-एतेपु सौधर्मादिपु कल्पविमानेषु वैमानिका देवा भवन्ति । नाथा-माधर्मग्य कल्पस्योपर्यशानः कल्पः । ऐशानस्योपरि सानत्कुमारः। सानत्कुमाग्योपरि माइन्न इत्येवमा- सर्वार्थसिद्धादिति ॥ सुधर्मा नाम शक्रस्य देवेन्द्रस्य सभा । सा तस्मिन्नतीति सौधर्मः कल्पः । ईशानस्य देवराजस्य निवास ऐशान इत्येवमिन्द्राणां निवासयोग्याभिख्याः सर्वे फलाः ।। अवेयास्तु लोकपुरुषस्य ग्रीवाप्रदेशविनिविष्टा ग्रीवाभरणभूता अवा ग्रीच्या प्रवेया अवयमा इति ॥ अनुचराः पञ्च देवनामान एव । विजिता अभ्युदयविनतव एभिरिति विजयजय- न्तजयन्ताः । तैरेव विघ्नहेतुमिन पराजिता अपराजिताः । सर्वेप्वभ्युदयार्थेपु सिद्धाः सर्वायत्र सिद्धाः सर्वे चैषामभ्युदयार्थाः सिद्धा इति सर्वार्थसिद्धाः । विजितप्रायाणि वा कर्माण्यभिन- पस्थितभद्राः परीपहैरपराजिताः सर्वार्थेषु सिद्धाः सिद्धप्रायोत्तमार्था इति, विजयादय इति ।। विशेषव्याख्या-जिनके विषयमें उपरि उपरि स्थिति कहीगई है इन सौधर्मादिकल्प- विमानोंमें रहनेवाले ये वैमानिक देव हैं। जैसे-प्रथमसौधर्मकल्प है, उसके ऊपर ऐशा- नकल्प है। ऐशानके ऊपर सानत्कुमारकल्प है। और सानत्कुमारकल्पके ऊपर माहेन्द्रकल्प है। इसी प्रकार सर्वार्थसिद्धपर्यन्त एकके ऊपर दूसरे विमान है । सुधर्मानामिका शक अर्थात् इन्द्रजीकी सभा है । वह सुधर्मानामिका सभा जिस स्वर्गमें है उसको सौधर्मकल्प कहते हैं। इसी रीतिसे ईशान जो देवराज वा इन्द्र हैं उनका जो निवासस्थान है वह ऐशानकल्प है ऐसेही सब इन्द्रोंके निवासयोग्य अन्वर्थ (सार्थक) नामवाले ये सब कल्प है ।और ग्रैवेय तो लोकपुरुप (पुरुषाकाररूप लोक)के ग्रीवाप्रदेशमें अर्थात् गलस्थानमें निविष्ट (स्थित) हैं, अर्थात् ग्रीवाके आभूपणके समान हैं; ग्रैव, ग्रीव्य, ग्रैवेय, तथा अवेयक ये सब एकार्थ- वाचक हैं । अनुत्तर पंचदेवोंके नाम हैं । और जिन्होंने अभ्युदयमें होनेवाले विघ्नोंको जीत लिया है। वे विजय, वैजयन्त और जयन्त है । और उन्ही विघ्नोंके हेतुओंसे जो पराजित नहीं हुए, वे अपराजित हैं । तथा संपूर्ण अभ्युदयके अर्थोंमें जो सिद्ध हैं वा संपूर्ण वे सभाष्यतत्त्वार्थाधिगमसूत्रम् । १०७ अर्थोसे जो सिद्ध है, अथवा जिनके संपूर्ण अभ्युदयके अर्थ सिद्ध होगये है वे सर्वार्थ- सिद्ध हैं। जिन्होंने संपूर्ण कर्मोंको प्रायः जीतलिया है, अर्थात् जिनका भद्र (उत्तम) समय उपस्थित है वे विजय, वैजयन्त और जयंत हैं, २२ परीषहोंसे जो पराजित नही हुए अपराजित हैं; तथा संपूर्ण अर्थोंमें जो सिद्ध हैं अर्थात् जिनके उत्तम अर्थ सिद्धप्राय हैं, वे सर्वार्थसिद्ध हैं. इस रीतिसे विजय आदि शब्दोंके समासविग्रहार्थ समझलेने । स्थितिप्रभावसुखातिलेश्याविशुद्धीन्द्रियावधिविषयतोऽधिकाः ॥२१॥ सूत्रार्थ:-ये जो सौधर्मादिकल्पोंके देव कहे हैं, वे पूर्व २ की अपेक्षासे पर २ इन स्थिति-प्रभाव आदि-पदार्थों में अधिक २ हैं। भाष्यम्-यथाक्रमं चैतेषु सौधर्मादिपूपर्युपरि देवाः पूर्वतः पूर्वत एमिः स्थित्यादिभिरथैर- धिका भवन्ति ॥ तत्र स्थितिरुत्कृष्टा जघन्या च परस्ताद्वक्ष्यते । इह तु वचने प्रयोजनं येपा- मपि समा भवति तेषामप्युपर्युपरि गुणाधिका भवतीति यथा प्रतीयेत।प्रभावतोऽधिकाः । यः प्रभावो निग्रहानुग्रहविक्रियापराभियोगादिषु सौधर्मकाणां सोऽनन्तगुणाधिक उपर्युपरि । म- न्दाभिमानतया त्वल्पतरसंक्लिष्टत्वादेते न प्रवर्तन्त इति ॥ क्षेत्रखभावजनिताच शुभपुद्गलपरि- णामात्सुखतो द्युतितश्चानन्तगुणप्रकर्षणाधिकाः ।। लेश्याविशुद्धयाधिकाः । लेश्यानियमः पर- स्तादेषां वक्ष्यते । इह तु वचने प्रयोजनं यथा गम्येत यत्रापि विधानतस्तुल्यास्तत्रापि विशु- द्वितोऽधिका भवन्तीति । कर्मविशुद्धित एव वाधिका भवन्तीति ।। इन्द्रियविषयतोऽधिकाः । — यदिन्द्रियपाटवं दूरादिष्टविषयोपलब्धौ सौधर्मदेवानां तत्प्रकृष्टतरगुणत्वादल्पतरसंक्लेशत्वाचा- धिकमुपर्युपरीति ॥ अवधिविषयतोऽधिकाः सौधर्मैशानयोर्देवा अवधिविषयेणाधो रत्नप्रभा पश्यन्ति तिर्यगसङ्खयेयानि योजनसहस्राण्यूद्धमाखभवनात् । सानत्कुमारमाहेन्द्रयोः शर्करा- प्रभां पश्यन्ति तिर्यगसङ्ख्येयानि योजनशतसहस्राण्यूर्ध्वमाखभवनात् । इत्येवं शेपाः क्रमशः। अनुत्तरविमानवासिनस्तु कृत्लां लोकनालिं पश्यन्ति । येषामपि क्षेत्रतस्तुल्योऽवधिविपयः तेषामप्युपर्युपरि विशुद्धितोऽधिको भवतीति ।। विशेषव्याख्या-सौधर्म ऐशान आदि कल्पोंके जो ऊपर २ कल्पोंके तथा जो नव अवेयक आदिक है उन सबमे ऊपर २ के देव पूर्व २ देवोंकी अपेक्षासे स्थिति-प्रभाव- आदिक पदार्थों में अधिक २ होते गये हैं । अर्थात् पूर्व २ देवोंकी अपेक्षा पर २ के देवोंकी स्थिति अधिक कालपर्यन्त है, उनके प्रभाव (महिमा) और सुख आदिभी अधिक है। उनमें स्थिति उत्कृष्ट तथा जघन्य दो प्रकारकी आगे कहैगे। यहां तो इस कथनमें तात्पर्य केवल यह है कि जिनकी समान स्थिति है उनमेंभी ऊपर २ पूर्व २की अपेक्षा गुणसे अधिक है ऐसा भान हो । अब प्रभावसे अधिक वर्णन करते है । जैसे-निग्रह तथा अनुग्रह अर्थात् वशमें लाकर दण्ड देने वा कृपा करनेका सामर्थ्य, विक्रिया (रूपादि- धारणशक्ति) अन्यके ऊपर अभियोग अर्थात् आक्रमण करके पराजय करनेकी शक्ति इत्यादि प्रभाव जैसा सौधर्मकल्पनिवासी देवी देवोंका है, उससे अनन्तगुण अधिक ऊपर २ के १०८ रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् देवोंमें है । किन्तु पूर्वकी अपेक्षासे इनमें मन्द अभिमान होनेसे तथा अति अल्प संक्लिष्ट कर्म होनेसे ये निग्रहानुग्रहादिमे प्रवृत्त नहीं होते । तथा क्षेत्रके स्वभावसे उत्पन्न और शुभ पुद्गलोंके परिणामोंसेभी सुखसे तथा द्युति (शरीरादिकान्ति वा प्रकाश )सेमी सौधर्मकल्पनिवासी देवोंकी अपेक्षा ऊपरके अनन्तगुण अधिक है, अर्थात् उनका मुख और श्रुति इनसे अनन्तगुण प्रकर्षतामें अधिक है । और ऐसेही लेझ्याकी विशुद्धिसभी पूर्व २ की अपेक्षासे ऊपरके देवोंकी लेश्या विशुद्ध हैं। इनकी लेश्याओंके नियम आगे कहैगे । यहां तो इतने कथनमें तात्पर्य है कि जिसमें यह प्रतीत होजाय कि जहांपर विधानसे तुल्य हैं वहांपरभी लेश्याकी विशुद्धिसे अधिक हैं । अथवा कर्मकी विशुद्धिसभी अधिक होते है । अव इन्द्रियोंके विषयद्वाराभी पूर्व २ की अपेक्षा ऊपर २ के अधिक हैं, ऐसा कहते है । जैसे-जो इन्द्रियोंका पाटव (सामर्थ्यविशेष) दूरसे इष्ट विषयोंकी प्राप्तिमें सौधर्मकल्पनिवासी देवोंका है उससे प्रकृष्टतर गुण होनेसे, और अल्पतर संक्लेश होनेसे ऊपर २ के देवोंका अधिक है । अवधिज्ञानके विपयसेभी ऊपर २ के अधिक हैं। जैसे- सौधर्म तथा ऐशानकल्पके देव अवधिविषयसे अधोभागमें तो रत्नप्रभा भूमिको देखते हैं, तिर्यग् भागमें असंख्यात योजन शत-सहस्त्र, और ऊर्ध्व भागमें अपने भवनपर्यन्त देखते हैं। तथा सानत्कुमार और माहेन्द्रकल्पके देव अधोभागमें शर्कराप्रभाको तिर्यक् भागमें असंख्येय योजन सहस्र और ऊर्धभागमें अपपे भवनोंतक देखते हैं। इसी रीतिसे क्रमसे शेष देवोंको अधिक २ अवधिविषयमें समझलेना । और अनुत्तरविमानवासी देव तो अवधिज्ञानसे संपूर्ण इस लोकनाडीको देखते हैं। और जिनका क्षेत्रसे अवधिका विषय समान है, उनका ऊपर २ विशुद्धिसे अधिक है, अर्थात् क्षेत्रमें समानता होनेपरभी ऊपर २ के देवोंका अवधि विषय अधिक विशुद्ध है, ऐसा जानना चाहिये। गतिशरीरपरिग्रहाभिमानतो हीनाः॥ २२॥ सूत्रार्थ:--गति, शरीर, परिग्रह तथा अभिमानसे पूर्व २ की अपेक्षा ऊपर २ के देव हीन अर्थात् न्यून है। भाष्यम्-गतिविषयेण शरीरमहत्त्वेन महापरित्रहत्त्वेनाभिमानेन चोपर्युपरि हीनाः । त- द्यथा--द्विसागरोपमजघन्यस्थितीनां देवानामासप्तम्यां गतिविषयस्तिर्यगसङ्घयेयानि योजन- कोटीकोटीसहस्राणि । ततः परतो जघन्यस्थितीनामेकैकहीना भूमयो यावत्तृतीयेति । गत- पूर्वाश्च गमिष्यन्ति च तृतीयां देवाः परतस्तु सत्यपि गतिविषये न गतपूर्वा नापि गमिष्यन्ति । महानुभावक्रियातः औदासीन्याचोपर्युपरि देवा न गतिरतयो भवन्ति ॥ सौधर्मेशानयोः कल्पयोर्देवानां शरीरोच्छ्रायः सप्तारत्नयः । उपर्युपरि द्वयोर्द्वयोरेकारनिहींना आसहस्रारात् । आनवादिषु विनः । वेयके द्वे । अनुत्तरे एका इति ॥ सौधर्मे विमानानां द्वात्रिंशच्छतस- हनाणि । ऐशानेऽष्टाविंशतिः । सानत्कुमारे द्वादश । माहेन्द्रेऽष्टौ । ब्रह्मलोके चत्वारि शतसw सभाष्यतत्त्वार्थाधिगमसूत्रम् । हस्राणि । लान्तके पञ्चाशत्सहस्राणि । महाशुक्रे चत्वारिंशत् । सहस्रारे षट् । आनतप्राण- तारणाच्युतेषु सप्तशतानि । अधोवेयकाणां शतमेकादशोचरम् । मध्ये सप्तोत्तरम् । उप- र्येकमेव शतम् । अनुत्तराः पञ्चैवेति । एवमूर्ध्वलोके वैमानिकानां सर्वविमानपरिसङ्ख्या चतुरशीतिः शतसहस्राणि सप्तनवतिश्च सहस्राणि त्रयोविंशानीति ।। स्थानपरिवारशक्तिविष- यसंपस्थितिष्वल्पाभिमानाः परमसुखभागिन उपर्युपरीति ॥ विशेषव्याख्या-गतिके विषयसे, शरीरके महत्वसे, महापरिग्रहसे, और अभिमानसे ऊपर २ के देव नीचेके विमानवाले देवोंसे न्यून है । जैसे-दो सागरोपम जघन्य स्थिति- वाले देवोंकी गतिका विषय सप्तम भूमिपर्यन्त है; और तिर्यक भागमें असंख्येय योजन कोटी कोटी सहस्र है । और उससे पर जिनकी जघन्य स्थिति है, अर्थात् तीन चार आदि सागरोपम जिनकी जघन्यस्थिति है उनके गतिका विषय एक २ भूमि न्यून होता जाता है, और यह न्यूनता तृतीय भूमिपर्यन्त होती है। वे देव तृतीय भूमिमें गयेभी हैं और आगेभी जायगे । और इसके आगे यद्यपि इनकी गतिका विषय है तथापि वे ऊपरके देव न तो पूर्वमेही उन भूमियोंमें गये और न आगे जॉयगे । क्योंकि ऊपरके देव महाऽनुभावोंकी क्रियाओंसे और औदासीन्यभावसे गतिमें (निजस्थानसे इधर उधर जानेमें) प्रीति नहीं करते । तथा सौधर्म और ऐशानकल्पके देवोंके शरीरकी उचाई सात अरनि होती है । और ऊपरके सहस्रार कल्पपर्यन्त दो दो कल्पोंके पीछे एक २ अरनि न्यून होती जाती है । और आनतादि विमानोंके देवोंके शरीरकी उँचाई तीन अरनि होती है । अवेयक देवोंकी दो अरनि होती है । और अनुत्तर विमानोंके देवोंकी शरीरकी उच्चता केवल एकही अरनि रहजाती है । तथा परिग्रहके विषयमेंभी प्रथम सौधर्मकल्पमें बत्तीस (३२) शत सहस्र अर्थात् बत्तीस लाख विमान हैं। ऐशानकल्पमें अठ्ठावीस लक्ष हैं । सानत्कुमारकल्पमें बारह लक्ष है, माहेन्द्रमें आठ लक्ष हैं। ब्रह्मलोकमें चार लक्ष हैं । लान्तकमें पचास सहस्रही हैं। महाशुक्रमें चालीस सहस्त्र विमान है। सहस्रारमें छ सहस्र हैं ।आनत, प्राणत, आरण तथा अच्युतकल्पोंमें केवल सातसौ विमान है। और अवेयकोंके अधोभागमें एकसो ग्यारह (१११) विमान है । मध्यमागमें एकसो सात (१०७) और ऊपर केवल शत (१००) विमान हैं। और अनुत्तर देवोंके केवल पांच (५) ही विमान है। इस प्रकार ऊर्ध्वलोकमें चौरासी लक्ष सत्तानबे सहस्र तेवोस (८४९७०२३) विमानोंकी संख्या है । ऊपरके देव स्थान, परिवारशक्ति, विषय, सम्पत्ति सथा स्थितिके विषयमें अल्प अभिमान रखते है; अतएव ऊपर २ परम सुखके भागी हैं। १ कोहनीसे लेकर कनिष्ठिकापर्यन्त हाथकी लम्बाईको अरनि कहते है।

रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् उच्छासाहारवेदनोपपातानुभावतश्च साध्याः । उच्हासः सर्वजघन्यस्थितीनां देवानां सप्तसु स्तोकेषु आहारश्चतुर्थकालः । पल्योपमस्थि- तीनामन्तर्दिवसस्त्रोच्छासो दिवसपृथक्त्वस्याहारः । यस्य यावन्ति सागरोपमानि स्थितिस्तस्य तावत्स्वर्घमासेपूच्छवासस्तावत्वेव वर्षसहस्रेष्वाहारः ॥ देवानां सद्वेदनाः प्रायेण भवन्ति न क- दाचिद्सद्वेदनाः । यदि चासवेदना भवन्ति ततोऽन्तर्मुहूर्वमेव भवन्ति न परतोऽनुबद्धाः सद्वेदनास्तूत्कृप्टेन षण्मासान् भवन्ति ॥ उपपातः । आरणाच्युतादूर्ध्वमन्यतीर्थानामुपपातो न भवति । स्वलिङ्गिनां भिन्नदर्शनानामात्रैवेयकेभ्य उपपातः । अन्यस्य सम्यग्दृष्टेः संयतस्य भजनीयं आसर्वार्थसिद्धात् । ब्रह्मलोकादूर्ध्वमासर्वार्थसिद्धाचतुर्दशपूर्वधराणामिति ।। अनु- भावो विमानानां सिद्धिक्षेत्रस्य चाकाशे निरालम्वस्थितौ लोकस्थितिरेव हेतुः । लोकस्थिति- लौंकानुभावो लोकस्वभावो जगद्धर्मोऽनादिपरिणामसन्ततिरित्ययः । सर्वे च देवेन्द्रा अवेया- दिपु च देवा भगवतां परमर्षीणामहतां जन्माभिषेकनिःक्रमणज्ञानोत्पचिमहासमवसरणनिर्वा- णकालेवासीनाः शयिताः स्थिता वा सहसैवासनशयनस्थानाश्रयैः प्रचलन्ति । शुभकर्मफ- लोदयालोकानुभावत एव वा । ततो जनितोपयोगास्तां भगवतामनन्यसहशीं तीर्थकरनामक- मोद्भवां धर्मविभूतिमवधिनालोच्य संजातसंवेगाः सद्धर्मवहुमानात्केचिदागत्य भगवत्पादमूलं स्तुतिवन्दनोपासनहितश्रवणैरात्मानुग्रहमाप्नुवन्ति । केचिदपि तत्रस्था एव प्रत्युपस्थापनाच- लिप्रणिपातनमस्कारोपहारैः परमसंविनाः सद्धर्मानुरागोत्फुल्लनयनवदनाः समभ्यर्चयन्ति । उच्छास, आहार, वेदना, उपपात, और अनुभाव (प्रभाव) सेमी ऊपर २ के देवोंमें महत्व साध्य है । सबसे जघन्यस्थितिवाले देवोंमें सात २ स्तोकोंमें (कालविशेष) में उच्छास (प्राणक्रिया) होता है, और आहार चौथे कालमें होता है। और पल्योपम स्थितिवालोंका दिनके मध्यमें उच्छ्रास होता है और दिवसके पृथक्त्वका आहार होता है । अर्थात् एक दिन पृथक् करके आहार होता है । तथा जिस देवकी जितनी सागरोपमस्थिति है उसका उतनेही पक्षमें उच्छास होता है । जैसे-दो सागरोपम- स्थितिबालोंका एक मासमें, चार सागरोपमस्थितिवालोंका दो मासमें, इत्यादि । और जितने सागरोपम जिसकी स्थिति है, उसका आहार उतनेही सहस्र वर्षोंमें होता है । देवत्ता- ओंको प्रायः सद्वेदना होती हैं न कि कदाचित् असत् वेदना (अनुभव)। यदि कदाचित् किसी समयमें असद्वेदनायें होंभी तो केवल अन्तर्मुहूर्तकालपर्यन्तही होती हैं न कि उससे अधिक, और अनुबद्ध (संवद्ध वा लगातार) सवेदनाभी अधिकसे अधिक छ मास- पर्यन्त होती है । और उपपात आरण अच्युतके ऊपर अन्यतीर्थों (अन्यमतवालोंका) उपपात नहीं होता है । स्खलिङ्गधारी भिन्न दर्शनवालोंका ग्रैवेयकपर्यन्त उपपात होता है। और अन्य संयत सन्यग्दृष्टिका सर्वार्थसिद्धतक उपपात-होना संभव है। ब्रह्मलोकसे कार्य और सर्वार्थसिद्धपर्यन्त केवल चतुर्दश पूर्वघरोंहीका उपपात होता है । अनुभाव- १ अयन् दनका महत्व उन्हास आहार आदिके द्वाराभी सिद्ध करना चाहिये ।

, सभाष्यतत्त्वार्थाधिगमसूत्रम् । १११ जैसे विमान तथा सिद्धिक्षेत्रकी आकाशप्रदेशमें निरालम्बस्थिति होनेंमे लोककी स्थितिही हेतु (कारण) है। लोकस्थिति, लोकानुभाव, लोकखभाव, जगद्धर्म और अनादि परिणाम- सन्तति, इन सबका एकही तात्पर्य है। सब देवेन्द्र, और ग्रैवेयकके सब देव भगवान् परमर्षि अर्हत्के जन्म, अभिषेक, निष्क्रमण, ज्ञानोत्पत्ति और महासमवसरणमें अथवा निर्वाणकालमें चाहै आसीन (बैठे) हों, सोते हों, वा खड़े हों अथवा अन्य किसी दशामें हों, सहसा अर्थात् अकस्मात् शीघ्रही आसन, शयन, तथा स्थानके आश्रयसहित चलायमान होते है। तात्पर्य यह कि भगवान्के जन्मादि पंच कल्याणोंके समयमें इनके आसनशयनादिके आश्रय कम्पायमान होते हैं । अथवा शुभ कर्मोंके उदयसे, वा लोकके प्रभावसेही चलाय- मान होते हैं । उसके पश्चात् उपयोग अर्थात् ज्ञान उत्पन्न होनेसे भगवान्की अन्यके सदृश अर्थात् अन्य साधारण जनोंको अलभ्य तीर्थकर नामकर्मसे उत्पन्न विभूति (ऐश्वर्य)को अवधिज्ञानसे देखकर संवेग (भक्तिसहित वैराग्य) उत्पन्न होनेसे सत् धर्मके बहुमानसे कोई देव तो आकर भगवान्के चरणमूलके निकट स्तुति, वन्दना, उपासना तथा हितापदेशके श्रवणोंसे अपने आत्माका अनुग्रह प्राप्त करते है । और कोई वहां ही खड़े होकर प्रत्युपस्थापन अर्थात् हाथ जोड़के दण्डवत् प्रणाम, नमस्कार और भेट आदिके समर्पणसे परमभक्ति आदि सम्पन्न होकर सद्धर्मके अनुरागसे विकसितनेत्र- वदनयुक्त भगवान्की अनेक प्रकारसे पूजा करते है। अत्राह । त्रयाणां देवनिकायानां लेश्यानियमोऽभिहितः । अथ वैमानिकानां केषां का लेश्या इति । अत्रोच्यते- अब यहां कहते है कि भवन, व्यन्तर तथा ज्योतिष्क इन तीन निकायोंके लेश्याका नियम तो आपने कहा । अब वैमानिक देवोंमेंसे किनकी कौनसी लेश्या होती है इसपर कहते हैं- पीतपद्मशुक्ललेश्या हि विशेषेषु ॥ २३ ॥ सूत्रार्थ:-सौधर्मादि कल्पोंमें प्रथम दो कल्पोंमें तो पीतलेश्या है, और उसके आगे तीन कल्पके देवोंमें पद्मलेश्या है, और आगे शेष देवोंमें शुक्ललेश्या है। भाष्यम्-उपर्युपरि वैमानिकाः सौधर्मादिषु द्वयोनिषु शेषेषु च पीतपद्मशुक्ललेश्या भ- वन्ति यथासङ्घयम् । द्वयोः पीतलेश्याः सौधर्मेशानयोः । त्रिषु पद्मलेश्याः सानत्कुमारमाहे- न्द्रब्रह्मलोकेषु । शेषेषु लान्तकादिष्वासर्वार्थसिद्धाच्छुछलेश्याः । उपर्युपरि तु विशुद्धतरे- त्युक्तम् ॥ विशेषव्याख्या-चतुर्थनिकायके देवोंमें लेश्याकी यह अवस्था है कि, आरम्भके दो कल्पोंमें तो पीतलेश्या है, उसके ऊपरके तीन कल्पोंमें पद्मलेश्या है । और उनके ऊपरके शेष देवोंमें शुक्र लेश्या है । यहांपर पीत, पद्म, शुक्ल लेश्याका और द्वित्रिशेषका -- रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् ११२ यथासंख्य है । जैसे-दो अर्थात् सौधर्म तथा ऐशानकल्पके देवोंमें तो पीतलेझ्या है, और शेष अर्थात् लान्तकसे आदिलेकर सर्वार्थसिद्धपर्यन्त शुक्रलेश्याही है । और समानलेण्या- ऑमभी ऊपर २ के देवोंकी लेश्या अधिक विशुद्ध है. यह विषय कह चुके हैं अत्राह । उक्तं भवता द्विविधा वैमानिका देवाः कल्पोपपन्नाः कल्पातीतावेति । तनु के कल्पा इति । अत्रोच्यते-- अव यहाँपर कहते हैं कि वैमानिक देवोंके आपने दो भेद कहे है, एक कल्पोपपन्न और दूसरा कल्पातीत । सो उनमें कौन कल्पोपपन्न हैं और कौन कल्पातीत हैं ? । इसपर यह अग्रिम सूत्र कहते हैं- प्राग्वेयकेभ्यः कल्पाः॥२४॥ सूत्रार्थ-अवेयकसे पूर्व कल्प हैं, और उनसे परे कल्पातीत है । भाष्यम्-प्राग्वेयकेभ्यः कल्पा भवन्ति सौधर्मादय आरणाच्युतपर्यन्ता इत्यर्थः । अतोऽन्ये कल्पातीताः ॥ विशेषव्याख्या-सौधर्मसे आदि लेकर ग्रैवेयकके पूर्व अर्थात् आरणाच्युतपर्यन्त कल्प हैं और उन कल्पोंमे जो निवास करते है वे कल्पोपपन्न हैं। और शेप आगेके कल्यातीत है। अत्राह । किं देवाः सर्व एव सम्यग्दृष्टयो यद्भगवतां परमर्षीणामहतां जन्मादिपु प्रमुदिता भवन्ति इति । अत्रोच्यते । न सर्वे सम्यग्दृष्टयः किं तु सम्यग्दृष्टयः सद्धर्मवहुमानादेव तत्र प्रमुदिता भवन्यभिगच्छन्ति च । मिथ्यादृष्टयोऽपि च लोकचित्तानुरोधादिन्द्रानुवृत्त्या पर सरदर्शनात् पूर्वानुचरितमिति च प्रमोदं भजन्तेऽभिगच्छन्ति च । लोकान्तिकास्तु सर्व एक विशुद्धभावाः सद्धर्मवहुमानासंसारदुःखार्तानां च सत्त्वानामनुकम्पया भगवतां परमपणा महतां जन्मादिपु विशेषतः प्रमुदिता भवन्ति । अभिनिःक्रमणाय च कृतसंकल्पान्भगवतो ऽभिगम्य प्रहृष्टमनसः स्तुवन्ति सभाजयन्ति चेति ।। अव यहांपर कहते हैं क्या सब देव सम्यग्दृष्टि होते हैं, जो भगवान् परमर्षि अर्हता जन्म अभिषेक आदिमें प्रसन्न होते हैं ? अव इसका उत्तर कहते हैं कि सब देवता तं सम्यग्दृष्टि नहीं होते किन्तु जो सम्यग्दृष्टि है वे सद्धर्मके वहुमान (अति आदर)सेह अतिप्रसन्न होते हैं और जन्मादिके स्थानोंपर जातेभी हैं । और मिथ्यादृष्टि देव लोकोंके चित्तके अनुरोधसे तथा इन्द्रकी अनुकूलतासे, और परस्परके आनन्ददर्शनसे, तर १ जिनभद्रगति क्षमाश्रमणरचित वृहत्संग्रहणिकी निजटीकामें मलयगिरि कहते हैं कि हरिभद्रसूरि तत्त्वार टोकाचार लिखते हैं "भावलेश्या" यहाँ प्रति निकायमें देवोंको होती है। और वही आचार्य अपनी प्रज्ञापनास (अलकत्तासंस्करण पृ. ३६५) की टीकामें कहता है। जैसे यह विपय प्रमाणवाधित है वैसा तत्त्वार्थटीका निर्धारित किया है उसीसे जानलेना । इस कथनले निश्रित होता है कि मलयगिरिनेभी तत्त्वार्यसूत्र टीका की है।

सभाष्यतत्त्वार्थाधिगमसूत्रम् । ११३ सब देव ऐसा करते चले आये हैं (भगवान् तीर्थकरोंके जन्मादिमे आनन्द मनाते आये हैं) इससे हमको करना चाहिये ऐसा समझकरके प्रसन्नताको प्राप्त होते है और जन्म अभिषेकादिके स्थानमें उत्सवार्थ जातेभी हैं। और लोकान्तिक देव तो सभी विशुद्ध- भाव होते है, अतएव सद्धर्मके बहुमान आदरसत्कारसे तथा संसारके दुःखोंसे पीडित जीवोंके ऊपर दया कर भगवान् परमर्षिस्वरूप अर्हत् तीर्थंकरोंके जन्म अभिपेक आदि उत्सवोंमें विशेष रूपसे प्रसन्न होते है । अभिनिष्क्रमणके लिये अर्थात् तपके अर्थ संकल्प करनेवाले भगवान्को उनके समीप जाकर प्रसन्नचित्तसे स्तुति, तथा बड़ाई प्रतिष्ठा आदि करते हैं। अत्राह । के पुनर्लोकान्तिकाः कतिविधा वेति । अत्रोच्यते- अब यहांपर कहते हैं कि लोकान्तिक देव कौन हैं, और कितने हैं? इस हेतुसे यह आगेका सूत्र कहते है- ब्रह्मलोकालया लोकान्तिकाः॥२५॥ सूत्रार्थ-ब्रह्मलोकमें जो रहते है वे लोकान्तिक है । भाष्यम्-ब्रह्मलोकालया एव लोकान्तिका भवन्ति नान्यकल्पेपु नापि परतः । ब्रह्मलोकं परिवृत्त्याष्टासु दिक्षु अष्टविकल्पा भवन्ति । तद्यथा- विशेषव्याख्या-जिन देवोंका ब्रह्मलोक आलय अर्थात् स्थान है वे ब्रह्मलोकालय अर्थात् ब्रह्मलोकनिवासी देव लोकान्तिक कहे जाते है, न कि अन्य कल्पनिवासी, और ब्रह्मलोकसे परे लोकके निवासी लोकान्तिक हैं । ब्रह्मलोक परिवेष्टित करके आठों दिशाओं- (चार दिशा और चार विदिशाओं)में आठही विकल्प (भेद) इनके होते हैं। जैसे- सारखतादित्यवहयरुणगर्दतोयतुषिताब्यायाधमरुतः (अरिष्टाश्च)२६ सूत्रार्थ-ये सारस्वत आदि आठ प्रकारके देव ब्रह्मलोककी पूर्वोत्तर आदि दिशाओंमें होते हैं। भाज्यम्-एते सारस्वतादयोऽष्टविधा देवा ब्रह्मलोकस्य पूर्वोत्तरादिपु दिक्षु प्रदक्षिणं भ. वन्ति यथासङ्खथम् । तद्यथा-पूर्वोत्तरस्यां दिशि सारखताः, पूर्वस्यामादित्याः, इत्येवं शेपाः ।। विशेषव्याख्या-सारस्वत आदि मरुत् पर्यन्त आठ देव ब्रह्मलोकके पूर्वोत्तर आदि जो अष्ट दिग्विभाग है उनमें प्रदक्षिणरूपसे रहते है । यहांपर सारस्वत आदि देव और पूर्वोत्तरा आदि आठों दिशाओंका यथासंख्य क्रम है। जैसे-पूर्वोत्तर दिशामें सारस्वत देव रहते हैं, अर्थात् पूर्व और उत्तरदिशाके कोण (ऐशानकोण )मे सारस्वत रहते हैं। पूर्व दिशामें आदित्यसंज्ञक देव रहते है। इसी प्रकार अन्य देवोंके विषयमें भी जान लेना चाहिये । अर्थात् पूर्व दक्षिण (आग्नेयकोण )में वहि, दक्षिणमें अरुण, दक्षिण पश्चिम न १५ ११४ रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् (नैर्ऋत्यकोण )मे गर्दतोय, पश्चिममें तुषित, पश्चिमोत्तर (वायव्यकोण)में अव्यावाध, और उत्तरम मरुत् अथवा अरिष्ट देव रहते हैं ॥ २६ ॥ विजयादिषु द्विचरमाः॥२७॥ सूत्रार्थ-विजयादिक विमानोंके देवोंको केवल दो जन्म सिद्धाऽवस्था प्राप्त होनेमें शेष रहते है। भाष्यम्-विजयादिष्वनुत्तरेषु विमानेषु देवा द्विचरमा भवन्ति । द्विचरमा इति तत- युताः परं द्विर्जनित्ला सिध्यन्तीति । सकृत्सर्वार्थसिद्धमहाविमानवासिनः । शेपास्तु भजनीयाः॥ विशेपव्याख्या-विजय आदि जो पञ्च अनुत्तर विमान हैं उन विमानोंके निवासी देवोंके दोही जन्म अन्तके रहजाते है । द्विचरम इसका यह तात्पर्य है कि विजय आदि विमानोंकी स्थितिका काल भोगकर उससे जब च्युत हों तो पुनः संसारमें दो जन्म धारण करके मोक्षरूप सिद्धिको प्राप्त होते हैं । और सर्वार्थसिद्ध नाम महाविमानके निवासी देवता एकही वार संसारमें जन्म लेकर उसी जन्ममें सिद्ध हो जाते हैं । और इनसे शेप जो है उनको सिद्धि कई जन्ममें वा एक दो चार आदि जन्ममें प्राप्य है। अत्राह । उक्तं भवता जीवस्यौदयिकेषु भावपु तिर्यग्योनिगतिरिति तथा स्थितौ तिर्यग्यो- नीनां चेति । आस्रवेषु च माया तैर्यग्योनस्येति । तत्के तिर्यग्योनय इति । अत्रोच्यते- अब कहते है कि आपने औदयिक भावोंमें कहा है कि "तिर्यग्योनि' गति होती है (अ. २ सू. ६) । तथा उत्कृष्ट और जघन्य स्थितिमें तिर्यग्योनिवालोंकी स्थिति बतलाई है (अ. ३ सू. २६) । आत्रवमें कहा है कि माया तिर्यग्योनि वन्धके आस्रवका कारण होती हैं (अ. ६ सू. १७) । इत्यादि स्थानोंमे अनेकबार तिर्यग्योनिकी चर्चा की है । सो नियंग्योनिवाले कौन है? । इसके उत्तरमें अग्रिम सूत्र कहते हैं- औपपातिकमनुष्येभ्यः शेषास्तियंग्योनयः ॥२८॥ सूत्रार्थ-उपपातरूप जन्मसे उत्पन्न होनेवाले तथा मनुष्योंसे जो शेष अर्थात् भिन्न हैं वे सब तिर्यग्योनिके जीव है। भाष्यम्-औपपातिकेभ्यश्च नारकदेवेभ्यो मनुष्येभ्यश्च यथोक्तेभ्यः शेषा एकेन्द्रियादय- लियंग्योनयो भवन्ति ॥ विशेपव्याख्याः-उपपातरूप जन्मसे जो उत्पन्न होनेवाले देव तथा नारकी जीव और मनुष्य इनसे जो शेप एकेन्द्रियादिक जीव हैं वे तिर्यग्योनि जीव कहे जाते है। जवाह । तिर्यन्योनिमनुप्याणां स्थितिरुवा । अथ देवानां का स्थितिरिति । अत्रोच्यते- अब यहां कहते हैं कि तिर्यग्योनि तथा मनुष्योंकी स्थिति तो आपने कही । अब दगी धिति कितने कालपर्यन्त होती है, इस लिये यह अग्रिम सूत्र कहते है- - . - सभाष्यतत्त्वार्थाधिगमसूत्रम् । ११५ स्थितिः॥ २९॥ भाज्यम्-स्थितिरित्यत ऊर्ध्व वक्ष्यते ॥ विशेषव्याख्या-अब इसके आगे देवोंकी स्थितिके विषयमें कहेंगे । भवनेषु दक्षिणार्धाधिपतीनां पल्योपममध्यर्धम् ॥ ३० ॥ सूत्रार्थ-भवनवासी देवोंमें जो दक्षिणार्धाधिपति हैं उनकी अध्यर्थ एक पल्योपम स्थिति है। भाष्यम्-भवनेषु तावद्भगवनवासिनां दक्षिणार्धाधिपतीनां पल्योपममध्यर्ध परा स्थितिः। द्वयोर्द्वयोर्यथोक्तयोर्भवनवासीन्द्रयोः पूर्वो दक्षिणार्धाधिपतिः पर उत्तरार्धाधिपतिः ।। विशेषव्याख्या-दक्षिणार्धाधिपति जो देव है उनकी अर्ध अधिक (सार्द्ध) एक पल्योपम अर्थात् डेढ़ पल्योपम परा स्थिति है । यथोक्त दो दो भवनवासी इन्द्रों से पूर्व २ का इन्द्र दक्षिणार्धाधिपति कहा जाता है, और दूसरा उत्तरार्धाधिपति है। शेषाणां पादोने ॥३१॥ सत्रार्थ-भवनवासियोंमें जो शेष अधिपति हैं उनकी पाद ऊन अर्थात् चौथाई पल्य कम दो पल्योपम परा स्थिति है। भाष्यम्-शेषाणां भवनवासिष्वधिपतीनां वे पल्योपमे पादोने परा स्थितिः । के च शेपा उत्तरार्धाधिपतय इति ॥ विशेषव्याख्या-दक्षिणार्धाधिपतियोंकी तो डेढ़ पल्योपम परा स्थिति कहचुके, अब उनसे शेष अर्थात् जो उत्तरार्धाधिपति है उनकी एक पादसे ऊन अर्थात् पौने दो पल्योपम परा स्थिति है। यहां शेष पदसे उत्तरार्धाधिपतियोंसे तात्पर्य है। असुरेन्द्रयोः सागरोपममधिकं च ।। ३२ ॥ भाष्यम्-असुरेन्द्रयोस्तु दक्षिणार्धाधिपत्युत्तरार्धाधिपत्योः सागरोपममधिकं च यथासङ्घयं परा स्थितिर्भवति॥ विशेषव्याख्या-असुरेन्द्र जो दक्षिणार्धाधिपति तथा उत्तरार्धाधिपति हैं उनकी सागरोपम तथा कुछ अधिक परा स्थिति है। यहांपर दक्षिणार्धाधिपति तथा उत्तरार्धाधिपति और सागरोपम तथा अधिकका यथासंख्य है। अर्थात् असुरेन्द्रोंमें दक्षिणार्धाधिपतिकी सागरोपम परा स्थिति, और उत्तरार्धाधिपतिकी कुछ अधिक सागरोपम परा स्थिति है। सौधर्मादिषु यथाक्रमम् ॥ ३३ ॥ सूत्रार्थ—सौधर्मादिकोंमे यथाक्रमसे परा स्थिति कहैगे। भाष्यम्-सौधर्ममादिं कृत्वा यथाक्रममित ऊर्ध्व परा स्थितिर्वक्ष्यते ॥ विशेषव्याख्या-यहांसे आगे सौधर्म आदिक देवोंकी परा स्थिति यथाक्रमसे कहेगे।

रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् ११६ सागरोपमे ॥ ३४॥ भाष्यम्-सौधर्मे कल्पे देवानां परा स्थिति· सागरोपमे इति ॥ विशेषव्याख्या-सौधर्मकल्पके देवोंकी परा स्थिति दो सागरोपम है। अधिक च ।। ३५॥ भाष्यम्-ऐशाने द्वे एव सागरोपमे अधिक परा स्थितिर्भवति ।। विशेषव्याख्या-और ऐशानकल्पमें कुछ अधिक दो सागरोपम परा स्थिति है । सप्त सानत्कुमारे ॥ ३६॥ भाष्यम्-सानत्कुमारे कल्पे सप्त सागरोपमाणि परा स्थितिर्भवति ॥ विशेषव्याख्या-सानत्कुमारकल्पके देवोंकी सात सागरोपम परा स्थिति है। विशेषत्रिसप्तदशैकादशत्रयोदशपञ्चदशभिरधिकानि च ॥ ३७॥ सूत्रार्थ माहेन्द्रादि कल्पोंमे इन तीन सात विशेषाधिक सागरोंसहित सात सागरोम परा स्थिति है । विशेष तीन, सात, दश, ग्यारह, तेरह, पन्द्रह सागर अधिक सागरोपम परा स्थिति माहेन्द्र आदि कल्पोंमे है। भाष्यम्-एभिर्विशेषादिभिरधिकानि सप्त माहेन्द्रादिपु परा स्थितिर्भवति । सप्तेति वर्तते। तद्यथा-माहेन्द्रे सप्त विशेषाधिकानि । ब्रह्मलोके त्रिसिरधिकानि सप्त दशेत्यर्थः । लान्तके सप्तभिरधिकानि सप्त चतुर्दशेत्यर्थः । महाशुक्रे दशभिरधिकानि सप्त सप्तदशेत्यर्थः । सहस्रारे एकादशभिरधिकानि सप्त अष्टादशेत्यर्थः । आनतप्राणतयोस्त्रयोदशभिरधिकानि सप्त विशति- रित्यर्थः । आरणाच्युतयोः पञ्चदशभिरधिकानि सप्त द्वाविंशतिरित्यर्थः ॥ विशेषव्याख्या यहांपर पूर्वसूत्रसे सप्तकी अनुवृत्ति आती है। इससे यह अर्थ हुआ कि विशेष अधिक सप्त सागरोपमादि परा स्थिति माहेन्द्र आदि कल्पविमानोंमें होती है । जैसे-माहेन्द्रकल्पनिवासी देवोंकी विशेष अधिक सप्त सागरोपम स्थिति होती है। ब्रह्मलोकमें तीन अधिक सप्त सागरोपम अर्थात् दश सागरोपम स्थिति होती है। लान्तकमें सप्त अधिक सप्त अर्थात् चतुर्दश (१४) सागरोपम स्थिति होती है। महाशुक्रमें दश अधिक सप्त अर्थात् सत्रह (१७) सागरोपम स्थिति होती है । सहस्रारमें एकादश (ग्यारह) अधिक सप्त अर्थात् अठारह (१८) सागरोपम स्थिति रहती है । आनत प्राणतमें त्रयोदश (तेरह) अधिक सप्त अर्थात् (२०) सागरोपम स्थिति रहती है। और आरण तथा अच्युत कल्पोंमें पंचदश (पन्द्रह) अधिक सप्त अर्थात् वावीस (२२) सागरोपम स्थिति होती है ॥ ३७॥ आरणाच्युतादूर्ध्वमेकैकेन नवस्तु अवेयकेषु विजयादिषु सर्वार्थसिद्धे च ॥ ३८॥ सूत्रार्थ-आरण और अच्युतके ऊपर नव ग्रैवेयकोंमे, विजय आदिकमें तथा सर्वार्थमिद्धमें देवोंकी स्थिति एक २ सागरोपम अधिक होती जाती है।

सभाष्यतत्त्वार्थाधिगमसूत्रम् । ११७ भाष्यम्-आरणाच्युतादूर्ध्वमेकैकेनाधिका स्थितिर्भवति नवसु अवेयकेपु विजयादिपु स- वार्थसिद्धे च । आरणाच्युते द्वाविंशतिवेयकेषु पृथगेकैकेनाधिका त्रयोविंशतिरित्यर्थः । एव- मेकैकेनाधिका सर्वेषु नवसु यावत्सर्वेषामुपरि नवमे एकत्रिंशत् । सा विजयादिपु चतुर्ध्वप्ये- केनाधिका द्वात्रिंशत् । साप्येकेनाधिका सर्वार्थसिद्धे त्रयस्त्रिंशदिति ।। विशेषव्याख्या-आरण तथा अच्युतके आगे नव ग्रैवेयक, विजय आदि तथा सर्वार्थसिद्धमे एक २ सागरोपम स्थितिकाल बढ़ता जाता है । जैसे-आरण और अच्युतमे तो बावीस सागरोपम स्थिति होती है यह तो कहीचुके है। अब उसके आगे नव ग्रैवे- यकोंमे पृथक् २ एक २ सागरोपम अधिक होती जायगी । जैसे-प्रथम ग्रैवेयकमें तेवीस (२३), द्वितीयमें चौबीस, ऐसेही सबके अन्तमें नवम ग्रैवेयकमे एकतीस (३१) सागरोपम स्थितिकाल है। और विजय आदि चार अर्थात् विजय, वैजयन्त, जयन्त तथा अपराजित इन चारोंमें बत्तीस (३२) सागरोपम स्थितिकाल है। और सर्वार्थ- सिद्धमें वह स्थिति एक सागरोपम और अधिक होती है, अर्थात् सर्वार्थसिद्धविमान- निवासी देवोंकी तेंतीस (३३) सागरोपम होती है ॥ ३८ ॥ अत्राह । मनुष्यतिर्यग्योनिजानां परापरे स्थिती व्याख्याते । अथौपपातिकानां किमेकैव स्थितिः परापरे न विद्यते इति । अत्रोच्यते- अब कहते हैं कि मनुष्य तथा तिर्यग्योनिज जीवोंकी परा तथा अपरा दोनों प्रकारकी स्थितिका वर्णन किया गया । अब औपपातिक अर्थात् उपपातरूप जन्मसे उत्पन्न होनेवालोंकी क्या एकही स्थिति है? अर्थात् इनकी स्थितिमे परा अपरा भेद नहीं है? इसपर यह अग्रिम सूत्र कहते है- अपरा पल्योपममधिकं च ।। ३९ ।। सूत्रार्थ—सौधर्म आदिमें जघन्य स्थिति पल्योपम और कुछ अधिक है। भाज्यम्-सौधर्मादिष्वेव यथाक्रममपरा स्थितिः पल्योपममधिकं च । अपरा जघन्या निकृष्टेत्यर्थः । परा प्रकृष्टा उत्कृष्टत्यनर्थान्तरम् । तत्र सौधर्मेऽपरा स्थितिः पल्योपममैशाने प- ल्योपममधिकं च ॥ विशेषव्याख्या-सौधर्म आदि कल्पोंमें यथाक्रम अपरा स्थिति पल्योपम तथा किंचित् अधिक है । अपरा अर्थात् जघन्या, सबसे निकृष्ट स्थितिका तात्पर्य है । और परा अर्थात् प्रकृष्ट, उत्कृष्ट ये दोनों एकार्थवाचक है। परा सबसे अधिक स्थिति है. उसमे सौधर्मम अपरा स्थिति पल्योपम है, और ऐशानकल्पमें पल्योपम (एक पल्य) तथा कुछ अधिक है। सागरोपसे ॥४०॥ भाष्यम्-सानत्कुमारेऽपरा स्थिति सागरोपमे ।। विशेषव्याख्या-सानत्कुमारकल्पमें अपरा स्थिति दो सागरोपम है ॥ १० ॥ अधिके च॥४१॥ भाष्यम्-माहेन्द्रे जघन्या स्थितिरपिके द्वे सागरोपमे ॥

रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् विशेषव्याख्या-माहेन्द्रकल्पमें अपरा स्थिति कुछ अधिक दो सागरोपम है ।। परतः परतः पूर्वा पूर्वानन्तरा ॥४२॥ सूत्रार्थ-माहेन्द्रकल्पके परे पूर्व अर्थात् पूर्व २ स्वर्गोमें जो परा स्थिति है वह पर २ में जघन्या अर्थात् अपरा स्थिति होती है। भाप्यम्-माहेन्द्रात्परतः पूर्वा परानन्तरा जघन्या स्थितिर्भवति । तद्यथा-माहेन्द्र परा स्थितिविशेषाधिकानि सप्त सागरोमाणि सा ब्रह्मलोके जघन्या भवति । ब्रह्मलोके दुश साग- रोपमाणि परा स्थितिः सा लान्तके जघन्या । एवमासर्वार्थसिद्धादिति । (विजयादिपु चतुर्प परा स्थितिस्त्रयस्त्रिंशत्सागरोपमाणि सा वजघन्योत्कृष्टा सर्वार्थसिद्ध इति )॥ विशेषव्याख्या-माहेन्द्रकल्पसे आगे पूर्व २ की जो परा स्थिति है वह पर २ अर्थात् आगे २ के कल्पोंमें अपरा स्थिति हो जाती है । जैसे-माहेन्द्रकल्पमें परा स्थिति विशेष अधिक सप्त सागरोपम है, वह ब्रह्मलोकमें अपरा अर्थात् जघन्या है। ऐसेही ब्रह्मलोकमें परा स्थिति दश सागरोपम है वह लान्तकमे जघन्या वा अपरा स्थिति है । इसी प्रकार पूर्व २ की परा स्थिति पर २ की जघन्या स्थिति सर्वार्थसिद्धपर्यन्त जाननी चाहिये । (विजय आदि चार विमानोंमें परा स्थिति तेंतीस सागरोपम है. वह सर्वार्थसिद्धमें अजघन्योत्कृष्टा है ।। नारकाणां च द्वितीयादिषु ॥४३ ॥ सूत्रार्थ-नारक अर्थात् नरककी द्वितीया आदि भूमियोंमें भी पूर्व २ की जो परा' स्थिति है वह पर २ की अपरा होती है। भाप्यम्-नारकाणां च द्वितीयादिपु भूमिषु पूर्वा पूर्वा परा स्थितिरनन्तरा परतः परतोऽ- परा भवति । तद्यथा-रत्नप्रभायां नारकाणामेकं सागरोपमं परा स्थितिः साजघन्या शर्करा- प्रभायाम् । त्रीणि सागरोपमाणि परा स्थितिः शर्कराप्रभायां सा जघन्या वालुकाप्रभायामिति । एवं सर्वासु । तमःप्रभायां द्वाविंशतिः सागरोपमाणि परा स्थितिः सा जघन्या महातमः- प्रभायामिति । विशेपव्याख्या:-जैसे देवोंके कल्पविमानोंके विषयमें माहेन्द्रसे परे पूर्व २ की परा स्थिति, पर २ की अपरा होती है; ऐसेही नरककी द्वितीय (शर्करा प्रभा) आदि भूमियोंमें भी पूर्व २ की परा स्थिति, परकी भूमियोंकी अपरा वा जघन्या स्थिति है। जैसे-रत्नप्रभामें नारक जीवोंकी एक सागरोपम परा स्थिति है, वह शर्कराप्रभाग जघन्या स्थिति है। तथा १ यद्दापर यह जानना उचित है कि विजय आदि चार विमानोंमे परा स्थिति वत्तीस सागरोपम है; और मानधन तैतीस सागरोपम अजघन्योत्कृष्टा है, अर्थात् वहां एकही स्थिति है; परा अपरा भेद नहीं है। और भाग्यकार मायसिद्धर्मभी जघन्या वत्तीम सागरोपम है ऐसा जो कहते हैं "आसर्वार्थसिद्धात्" राभिप्राय नहीं ात होता है । कदाचित् यहां आट् (आ) मर्यादावोधक हो अर्थात् सर्वार्थसिद्धको छोडके "नन बिना मर्यादा तन्सहितोऽभिविधिः"। २ विजयादिककी परा स्थिति तो वत्तीसकी (३२) कही है महा अभिप्रायमे यहे यह नहीं जाना जाता । और कहीं २ कोष्टका पाठ नहीं है। क्योंकि अर्थ - सभाष्यतत्त्वार्थाधिगमसूत्रम् । ११९ शर्कराप्रभामें परा स्थिति तीन सागरोपम है वह वालुकाप्रभामें जघन्या स्थिति है । इसी प्रकार शेष सब भूमियोंमे भी समझ लेना चाहिये । तमःप्रभाभूमिमें बावीस (२२) सागरोपम परा स्थिति है वह महातमःप्रभामें जघन्या अर्थात् अपरा स्थिति है ॥ १३ ॥ दश वर्षसहस्राणि प्रथमायाम् ॥ ४४ ॥ भाग्यम्-प्रथमायां भूमौ नारकाणां दश वर्षसहस्राणि जघन्या स्थितिः ।। विशेषव्याख्या-प्रथम भूमि अर्थात् रत्नप्रभा भूमिमें नारकजीवोंकी अपरा स्थिति दशसहस्र (१००००) वर्ष है। भवनेषु च ॥४५॥ भाष्यम्-भवनवासिनां च दश वर्षसहस्राणि जघन्या स्थितिः ॥ विशेषव्याख्या-भवनवासी देवोंकीभी जघन्या स्थिति दश सहस्र वर्ष है। व्यन्तराणां च ॥ ४६॥ भाज्यम्-व्यन्तराणां च देवानां दश वर्षसहस्राणि जघन्या स्थितिः ॥ विशेषव्याख्या-व्यन्तरदेवोंकीभी जघन्या स्थिति दश सहस्र वर्ष है। परा पल्योपमम् ॥ ४७॥ भाष्यम्-व्यन्तराणां परा स्थितिः पल्योपमं भवति ।। विशेषव्याख्या-व्यन्तरदेवोंकी परा (सर्वोत्कृष्टा) स्थिति पल्योपम है। ज्योतिष्काणामधिकम् ॥ ४८ ॥ भाग्यम्-ज्योतिष्काणां देवानामधिकं पल्योपमं परा स्थितिमवति ।। विशेषव्याख्या-ज्योतिष्कदेवोंकी परा स्थिति कुछ अधिक पल्योपम है ग्रहाणामेकम् ॥ ४९॥ भाष्यम्-ग्रहाणामेकं पल्योपमं स्थितिर्भवति ।। विशेषव्याख्या---ग्रहोंकी परा स्थिति एकही पल्योपम होती है ।। ४९ ।। नक्षत्राणामर्धम् ॥५०॥ भाष्यम्-नक्षत्राणां देवानां पल्योपमा परा स्थितिर्भवति ।। विशेषव्याख्या-नक्षत्रोंकी अर्थ अर्थात् आधा पल्योपम परा स्थिति है। तारकाणां चतुर्भागः ॥५१॥ भाष्यम्-तारकाणां च पल्योपमचतुर्भागः परा स्थितिः ।। विशेषव्याख्याताराओंकी परा स्थिति पल्योपमका चतुर्थ भाग है । जघन्या त्वष्टभागः ॥ ५२।। भाष्यम्-तारकाणां तु जघन्या स्थितिः पल्योपमाष्टभागः॥ विशेषव्याख्या-और ताराओंकी जघन्या स्थिति पल्योपमका अष्टम भाग १२० रायचन्द्रजैनशानमालायाग चतुर्भागः शेषाणाम् ॥ ५३॥ भाष्यम्-तारकाभ्यः पाणां ज्योतिष्काणां चतुभागः पल्योपमन्यापग धिनिः । विशेषव्याख्या-ताराओंसे शेष जो ज्योतिप्क देव है उनकी अपग चिनि पन्गी- पमका चतुर्थ भाग है। इति तत्वार्थाधिगमाख्येऽहत्प्रवचनसनह देवगतिप्रदर्शनो गामा- चार्योपाधिधारिठाकुरप्रसादशर्मप्रणीत-भापाटीका- समलमृतश्चतुर्थोऽध्यायः समानः ।। अथ पञ्चमोऽध्यायः। उक्ता जीवाः । अजीवान्वक्ष्यामः॥ जीवपदार्थका निरूपण करचुके अब अजीव पदार्थ कहते है । अजीवकाया धर्माधर्माकाशपुद्गलाः ॥ १॥ सूत्रार्थ-धर्म, अधर्म, आकाश तथा पुद्गल अजीवकाय है। भाष्यम्-धर्मास्तिकायोऽधर्मास्तिकाय आकाशास्तिकायः पुद्गलातिकाय इत्यजीवकायाः । तान् लक्षणतः परस्ताद्वक्ष्यामः । कायग्रहणं प्रदेशावयववहुत्वार्थमद्धासमयप्रतिपधाय च ।। विशेषव्याख्याः-धर्मास्तिकाय, अधर्मास्तिकाय, आकाशास्तिकाय, तथा पुद्गलाति- काय; ये चारों अजीवकाय है । इनको लक्षणपूर्वक आगे कहेंगे । इस मूत्रमे कायशब्दका ग्रहण प्रदेश तथा अवयवोंके वहुत्र बोधनके अर्थ किया है, अर्थात् इनके प्रदेश अवयव बहुत है, इस बातके जतानेके लिये कायग्रहण किया है । और अद्धासमयमै कायल नही है यह जतानेके लियेभी कायग्रहण है ॥ १ ॥ द्रव्याणि जीवाश्च ॥ २॥ सूत्रार्थ-धर्म आदि चार अर्थात् धर्म, अधर्म, आकाश, पुद्गल और संपूर्ण जीव ये पांच द्रव्य है। भाष्यम्-एते धर्मादयश्चत्वारो प्राणिनश्च पञ्च द्रव्याणि च भवन्तीति । उक्तं हि "मति- श्रुतयोनिवन्धो द्रव्येष्वसर्वपर्यायेषु सर्वद्रव्यपर्यायेपु केवलस्य" इति । विशेषव्याख्या:-धर्म आदि चार और पांचवां जीव इन पांचोंकी द्रव्य संज्ञा है कहाभी है--"मति तथा श्रुतज्ञानका विषयनिवन्ध द्रव्योंके असर्व पर्यायों और सव द्रव्योंमे है; और केवल ज्ञानका संपूर्ण द्रव्य तथा संपूर्ण पर्यायमे विषयनिबंध है । अर्थात् मति और श्रुतज्ञानसे संपूर्ण द्रव्य तो जाने जाते है परन्तु सब पर्यायसहित नहीं; और केवल ज्ञानसे संपूर्ण पर्यायसहित सब द्रव्य जाने जाते है." यह विषय प्रथम कहचुके (अ. १ सू. २७,३०) ॥२॥ . , .

- सभाष्यतत्त्वार्थाधिगमसूत्रम् । १२१ नित्यावस्थितान्यरूपाणि ॥३॥ सूत्रार्थ-ये पांचो द्रव्य अर्थात् धर्म आदि चार तथा जीव नित्य अवस्थित तथा अरूपी द्रव्य हैं। भाज्यम् एतानि द्रव्याणि नित्यानि भवन्ति । तद्भावाव्ययं नित्यमिति वक्ष्यते ॥ अव- स्थितानि च । न हि कदाचित्पञ्चलं भूतार्थत्वं च व्यभिचरन्ति ।। अरूपाणि च । नैषां रूप- मस्तीति । रूपं मूर्तिद्ाश्रयाश्च स्पर्शादय इति ।। विशेषव्याख्या-धर्म, अधर्म, आकाश, पुद्गल और जीव ये पांच नित्य द्रव्य हैं। और नित्यका लक्षण "तद्भावाव्ययं नित्यम्" अर्थात् वह वही है ऐसा प्रत्यभिज्ञानका हेतुरूप जो भाव उसको नित्य कहते है । ऐसा आगे कहेगे (अ. ५ सू. ३०)। और ये पांचों अवस्थितरूप हैं । अवस्थितरूप इसका यह अभिप्राय है कि अपनी पञ्चत्वसङ्ख्या तथा नित्यरूप भूतार्थताको कभीभी नही त्यागते । और 'अरूपाणि' इसका यह तात्पर्य है कि धर्म अधर्म आदि द्रव्योंमें कोई श्वेतनीलपीतादि रूप वा वर्ण नहीं है । रूप(मूर्ति) अर्थात् विग्रह और मूर्तिके आश्रयीभूत स्पर्श रस आदिभी इनमें नहीं हैं ॥ ३ ॥ रूपिणः पुद्गलाः ॥४॥ सूत्रार्थ-पुद्गल रूपी है। भाष्यम्-पुद्गला एव रूपिणो भवन्ति । रूपमेषामस्त्येषु वास्तीति रूपिणः ।। विशेषव्याख्या-इन पांचोंमें पुद्गलही रूपी द्रव्य हैं । जिनके रूप है वा जिनमें रूप है वे रूपी है ॥ ४ ॥ आकाशादेकद्रव्याणि ॥५॥ सन्त्रार्थ-धर्मसे लेकर आकाशपर्यन्त एक द्रव्य है। भाज्यम्-आ आकाशाद्धर्मादीन्येकद्रव्याण्येव भवन्ति । पुद्गलजीवास्त्वनेकद्रव्याणीति ॥ विशेषव्याख्या-धर्म, अधर्म और आकाश ये तीनों एक २ द्रव्य है, अर्थात् धर्म अधर्म आकाश इनके अनेक भेद नहीं है किन्तु ये एकही एक है । और, पुद्गल तथा जीव ये तो अनेक द्रव्य है अर्थात् इन दोनोंके अनेक भेद है ॥ ५ ॥ निष्क्रियाणि च ॥६॥ सूत्रार्थ धर्मसे लेकर आकाशपर्यन्त द्रव्य निष्क्रिय भी है। भाष्यम्-आ आकाशादेव धर्मादीनि निष्क्रियाणि भवन्ति । पुद्गलजीवास्तु क्रियावन्तः । क्रियेति गतिकर्माह ॥ . १ "आ आकाशादेकरूपाणि' कहीं २ ऐसाभी सूत्रपाठ है. यहां प्रथम आ शब्द अभिव्याप्ति (पर्यन्त)रूप अर्थका बोधक है । 'आकाशा०' इस पाटमेभी आकाशके पूर्व 'आ' पद है परन्तु दीर्घरूप सन्धि हो गई है। १६ तत्र-- १२२ रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् विशेषव्याख्या-धर्म, अधर्म और आकाश ये तीनों द्रव्य अरूपी हैं और निष्क्रिय भी है; अर्थात् इनमें कोई क्रिया नहीं है । और पुद्गल तथा जीव तो क्रियावान् पदार्थ (द्रव्य) है। यहां क्रियासे गतिकर्मका तात्पर्य है । अर्थात् गतिकर्मको क्रिया कहते हैं। अत्राह । उक्तं भवता प्रदेशावयववहुलं कायसंज्ञमिति । तस्मात्क एपां धर्मादीनां प्रदेशा- वयवनियम इति । अत्रोच्यते । सर्वेषां प्रदेशाः सन्यन्यत्र परमाणोः । अवयवास्तु स्कन्धाना- मेव । वक्ष्यते "ह्मणवः स्कन्धाच" "संघातभेदेभ्य उत्पद्यन्ते" इति ॥ अव यहांपर कहते हैं कि आपने प्रथम यह कहा है कि प्रदेश तथा अवयवोंका बहुल जो है वही कायसंज्ञक है (अ. ५ सू. १) । अर्थात् जिसके अधिक प्रदेश तथा अवयव हों वह पदार्थ कायवान् वा अस्तिकाय शब्दसे कहा जाता है । जैसे-जीवान्तिकाय, धर्मास्तिकाय इत्यादि । सो धर्म अधर्म आदिके प्रदेश तथा अवयत्रोंका क्या नियम है ? अव इसका उत्तर कहते हैं । कि-प्रदेश तो परमाणुको छोड़के सव द्रव्योंके हैं, और अवयव तो केवल स्कन्धोंहीके है । ऐसा आगे कहेगेभी । अणु और स्कन्ध “ए दो पुद्ग- लोके भेद हैं। ये संघातसे, भेदसे तथा संघात-भेदसे उत्पन्न होते हैं ।। ६ ॥ तहां- असवयेयाः प्रदेशा धर्माधर्मयोः॥७॥ सूत्रार्थ-धर्म तथा अधर्मके असङ्खयेय प्रदेश हैं। भाष्यम्-प्रदेशो नामापेक्षिकः सर्वसूक्ष्मस्तु परमाणोरवगाह इति ।। विशेषव्याख्या-प्रदेश पदार्थ सापेक्ष होता है; और परमाणुका अवगाह सर्व- सूक्ष्म है ॥ ७॥ जीवस्य च ॥८॥ भाष्यम्-एकजीवस्य चासङ्ख्येयाः प्रदेशा भवन्तीति ।। विशेपव्याख्या-जीवद्रव्यकभी अर्थात् एक जीवकेभी असंख्येय प्रदेश होते हैं।॥ ८ ॥ आकाशस्यानन्ताः॥९॥ भाष्यम्-लोकालोकाकाशस्थानन्ताः प्रदेशाः । लोकाकाशस्य तु धर्माधर्मेकजीवैस्तुल्याः॥ विशेपव्याख्या-लोकालोकाकाशके अनन्त प्रदेश है । और लोकाकाशके धर्म, अधर्म तथा एक जीवके तुल्य अर्थात् असंख्यात प्रदेश हैं ॥ ९ ॥ १ इस सूत्रकी व्याख्या पाश्चाल विद्वान् सिद्धान्तहृदय इस पदमें पुस्तकका नाम कहके भ्रममें पड़ गये हैं, किन्तु-"तथाचावधृतसिद्धान्तहृदयेन विशेषावश्यककारेण नमस्कारनियुक्तौ शब्दा- नित्यत्वप्रतिपादनेच्छाभावोऽपि' इस वाक्यमें "अवधृतसिद्धान्तहदय" जिनभद्रगणिक्षमाश्रम- पका विशेषग है । अर्थात् वे सिद्धान्तवादी हैं । २ जो कि वस्तुके व्यतिरेक और भिन्नता कदाचितभी उपन्य नहीं होते वे प्रदेश है । ३ जो कि विशकलित परिकलित अर्थात् स्पष्ट मूर्तिमान है, वुद्धिपथमें हिनी मूर्ति सष्ट है, वे अवयव हैं. और वे अवयव, धर्म, अधर्म, आकाश, जीव और अणु इनमें नहीं होते नशा येही प्रदेश और अवयवोंका भेद है। -- सभाष्यतत्त्वार्थाधिगमसूत्रम् । १२३ सङ्घयेयासङ्ख्येयाश्च पुद्गलानाम् ॥ १० ॥ भाष्यम्-सङ्खयेया असङ्खघेया अनन्ताश्च पुद्गलानां प्रदेशा भवन्ति । अनन्ता इति वर्तते ।। विशेषव्याख्या और पुद्गलोंके प्रदेश संख्येय, असङ्ख्येय तथा अनन्तभी हैं। यहाँपर अनन्तशब्दकी पूर्वसूत्रसे अनुवृत्ति आती है ॥ १० ॥ नाणोः ॥११॥ भाष्यम्-अणोः प्रदेशा न भवन्ति । अनादिरमध्योऽप्रदेशो हि परमाणुः ।। विशेषव्याख्या-अणुके प्रदेश नहीं होते । क्योंकि परमाणु आदि, मध्य तथा प्रदेश इनकरके रहित हैं ॥ ११ ॥ लोकाकाशेऽवगाहः ॥ १२ ॥ भाष्यम्---अवगाहिनामवगाहो लोकाकाशे भवति ।। विशेषव्याख्या-जो अवगाही (रहनेवाले) है उनका अवगाह (स्थिति) लोका- काशमें होती है ॥ १२ ॥ धर्माधर्मयोः कृत्ले ॥१३॥ भाष्यम्-धर्माधर्मयोः कृत्स्ने लोकाकाशेऽवगाहो भवतीति ।। विशेषव्याख्या-धर्म तथा अधर्मका संपूर्ण लोकाकाशमें अवगाह होता है ॥ १३ ॥ एकप्रदेशादिषु भाज्यः पुद्गलानाम् ॥ १४ ॥ सूत्रार्थ-पुद्गलोंका आकाशके एक आदि प्रदेशोंमें अवगाह विकल्पनीय है भाष्यम्-अप्रदेशसङ्ख्येयासङ्खयेयानन्तप्रदेशानां पुद्गलानामेकादिष्वाकाशप्रदेशेषु भा- ज्योऽवगाहः । भाज्यो विभाज्यो विकल्प इत्यनन्तरम् । तद्यथा -परमाणोरेकस्मिन्नेव प्रदेशे। द्वषणुकस्यैकस्मिन् द्वयोश्च । व्यणुकस्यैकस्मिन् द्वयोनिषु च । एवं चतुरणुकादीनां सङ्खयेया- सङ्खधेयप्रदेशस्यैकादिषु सङ्ख्येयेष्वसङ्ख्येयेषु च । अनन्तप्रदेशस्य च ॥ विशेषव्याख्या-अप्रदेश, सवयेयप्रदेश, असह्वयेयप्रदेश, तथा अनन्तप्रदेशवाले जो पुद्गल है उनका आकाशके एक आदि प्रदेशोंमे अवगाह भाज्य अर्थात् विभाग करनेयोग्य है । भाज्य, विभाज्य, और विकल्प ये सब समानार्थक है । जैसे-परमाणुका एकही प्रदेशमें अवगाह है। और अणुकका एक तथा दो प्रदेशोंमे अवगाह है । त्र्यणु- कका एक, दो तथा तीन प्रदेशोंमेंभी अवगाह है। इसी प्रकार चतुरणुक आदिके विषयमे । जो एक प्रदेशी है उसका एक प्रदेशमें और जो सङ्खयेयप्रदेशी है उसका एक प्रदेशको आदि लेकर सङ्ख्येयप्रदेशोंमें, असङ्खयेय प्रदेशीका एकको आदि लेकर असङ्खयेय प्रदे- शोंमें, और अनन्तप्रदेशीका एकको आदि लेकर अनन्त प्रदेशोंमें अवगाह है ॥ १४ ॥ असजधेयभागादिषु जीवानाम् ।। १५ ॥ भाष्यम्-लोकाकाशप्रदेशानामसङ्खयेयभागादिषु जीवानामवगाहो भवति । आ सर्व- लोकादिति ॥

१२४ रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् विशेषव्याख्या-लोकाकाशके असङ्ख्येय भाग आदिके विषे जीवोंका अवगाह होता है। यह जीवोंका अवगाह संपूर्ण लोकतक होता है ॥ १५ ॥ अत्राह । को हेतुरसङ्घयेयभागादिषु जीवानामवगाहो भवतीति । अत्रोच्यते- अब यहां कहते हैं कि क्या कारण है कि लोकाकाशके असङ्ख्येय विभागादिमें जीवोंका अवगाह होता है ? । अब इसपर कहते हैं: प्रदेशसंहारविसर्गाभ्यां प्रदीपवत् ॥१६॥ सूत्रार्थ-दीपके प्रकाशके समान जीवोंके प्रदेश संकोचविस्ताररूप होनेसे लोकके असङ्खयेय आदि भागोंमें जीवोंका अवगाह होता है। भाष्यम्-जीवस्य हि प्रदेशानां संहारविसर्गाविष्टौ प्रदीपस्येव । तद्यथा-तैलवर्त्यग्न्युपादा- नप्रवृद्धः प्रदीपो महतीमपि कूटागारशालां प्रकाशयत्यण्वीमपि, माणिकावृतः माणिकां द्रोणा- वृतो द्रोणमाढकावृतश्चाढकं प्रस्थावृतः प्रस्थं पाण्यावृतो पाणिमिति । एवमेव प्रदेशानां संहारविसर्गाभ्यां जीवो महान्तमणुं वा पञ्चविधं शरीरस्कन्धं धर्माधर्माकाशपुद्गलजीवप्रदे- शसमुदायं व्याप्नोतीत्यवगाहत इत्यर्थः । धर्माधर्माकाशजीवानां परस्परेण पुद्गलेपु च वृत्तिन विरुध्यतेऽमूर्तत्वात् ॥ विशेषव्याख्या-प्रदीपके समान जीवके प्रदेशोंके संहार तथा विसर्ग इष्ट हैं । तैल, वर्तिका (बत्ती) तथा अग्निरूप उपादानकारणसे वृद्धिको प्राप्त प्रदीप (दीपक) छोटी । तथा बड़ी शाला (गृह)को प्रकाशित करता है । जैसे-दीपक यदि माणिका (पात्र )से आच्छादित हो तो माणिकाको प्रकाशित करता है, द्रोण (अन्न मापनेके पात्रविशेष )से आच्छादित हो तो द्रोणको प्रकाशित करता है, ऐसेही आढकसे आवृत (ढका हुआ) होनेसे आढक (पात्रविशेष)को, प्रस्थसेआवृत होनेसे प्रस्थ (मापनेके पात्र)को और पाणिसे आवृत होनेसे पाणिको प्रकाशित करता है । इसी प्रकार यह जीवभी प्रदेशोंके संहार तथा विसर्ग अथात् संकोच और विस्तारसे महान् अथवा अणु पञ्चविध शरीरस्कन्ध धर्म, अधर्म, आकाश, पुद्गल तथा जीवके प्रदेशसमूहको अवगाहन करता अर्थात् व्याप्त होता है । और धर्म, अधर्म, आकाश तथा जीवोंकी परस्परसे पुद्गलोंमें गगनागमन- रूप वृत्तिका विरोध नहीं होता, क्योंकि धर्म आदि चारों अमूर्त हैं ।। १६ ॥ अत्राह । सति प्रदेशसंहारविसर्गसंभवे कस्मादसङ्खयेयभागादिषु जीवानामवगाहो भवति नैकप्रदेशादिष्विति । अत्रोच्यते । संयोगत्वात्संसारिणां चरमशरीरत्रिभागहीनावगाहित्वाच सिद्धानामिति ॥ अब कहते हैं कि प्रदेशोंके संहार तथा प्रसर्पणके स्वभावका संभव होनेसे असङ्ख्येय भागादिकमें जीवोंका अवगाह क्यों होता है ? और एक प्रदेशादिमे क्यों नहीं होता? इसपर कहते है कि, संसारी जीवोंको तो योग (शरीरवाड्मनोयोग) सहित होनेसे; और

सभाष्यतत्त्वार्थाधिगमसूत्रम् ।
१२५
सिद्धोंको अन्तिम शरीरसे त्रिभागहीन होनेसे असङ्ख्य भाग आदिमें अवगाह (व्याप्ति)
होती है।
अन्नाह । उक्तं भवता धर्मादीनस्तिकायान् परस्ताल्लक्षणतो वक्ष्याम इति तत्किमेषां
लक्षणमिति । अत्रोच्यते--
अब कहते है कि आपने यह कहा है, कि धर्मास्तिकाय आदिको लक्षणपूर्वक हम
आगे कहेंगे (अ. ५ सू. १)सो इनके क्या लक्षण हैं? । अब इसके उत्तरमें अग्रिम
सूत्र कहते हैं-
गतिस्थित्युपग्रहो धर्माधर्मयोरुपकारः ॥ १७ ॥
सूत्रार्थ-गत्युपग्रह और स्थित्युपग्रह यह धर्म तथा अधर्मका उपकार है।
भाष्यम्-गतिमतां गतेः स्थितिमतां च स्थितेरुपग्रहो धर्माधर्मयोरुपकारो यथासङ्ख्यम् ।
उपग्रहो निमित्तमपेक्षा कारणं हेतुरित्यनर्थान्तरम् । उपकारः प्रयोजनं गुणोऽर्थ इत्य-
नर्थान्तरम् ।।
विशेषव्याख्या गतिमान् जो (जीव पुद्गल) पदार्थ है उनकी तो गतिके और जो
स्थितिमान् (ठहरे हुए जीव पुद्गल) हैं, उनकी स्थितिके उपग्रह अर्थात् सहायरूप
होना यह धर्म तथा अधर्मका जीव और पुद्गलोंके ऊपर उपकार है । यहाँपर गति उपग्रह,
और स्थिति उपग्रह इनका तथा धर्म और अधर्मका यथासङ्घय है। अर्थात् गतिकार-
णता धर्मका और स्थितिकारणता अधर्मका लक्षण है । उपग्रह, निमित्त, अपेक्षा,
कारण, और हेतु ये सब समानार्थक है । और ऐसेही उपकार, प्रयोजन, गुण तथा अर्थ
ये सबभी एकार्थबोधक हैं ॥ १७ ॥
आकाशस्यावगाहः ॥ १८ ॥
सूत्रार्थ-सम्पूर्ण द्रव्योंको अवगाह देना यह आकाशका उपकार है ।
भाष्यम्-अवगाहिनां धर्माधर्मपुद्गलनीवानामवगाह आकाशस्योपकारः । धर्माधर्मयो-
रन्तःप्रवेशसंभवेन पुद्गलजीवानां संयोगविभागैश्चेति ॥
विशेषव्याख्या-अवगाही अर्थात् रहनेवाले पदार्थो अर्थात् धर्म, अधर्म, पुद्गल
और जीव इन सबको अवगाह देना यह आकाशका धर्म, अधर्म, पुद्गल और जीवोंके ऊपर
उपकार है । इनमें धर्म और अधर्मका आभ्यन्तर प्रवेशके संभवसे उपकार करता
है, और पुद्गल तथा जीवोंका संयोग तथा विभागोंसे उपकार करता है । तात्पर्य यह है
कि धर्म, अधर्म, पुद्गल और जीवोंको अवकाश वा अवगाहदानरूपसे तो उपकारक
आकाशही है; किन्तु धर्म अधर्मको प्रत्येकमें अन्तःप्रवेशके संभवसे और पुद्गल तथा
जीवोंका संयोग तथा विभागोंसेभी उपकार करता है ॥ १८ ॥
शरीरवाड्मनःप्राणापानाः पुद्गलानाम् ॥ १९॥

१२६ रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् सूत्रार्थ-शरीर, वाक्, मन, तथा प्राण, अपान ये पुद्गलोंका जीवोंके ऊपर उपग्रह अर्थात् उपकार है। भाष्यम्-पञ्चविधानि शरीराण्यौदारिकादीनि वामनः प्राणापानाविति पुद्गलानामुप- कारः । तत्र शरीराणि यथोकानि । प्राणापानौ च नामकर्मणि व्याख्यातौ । द्वीन्द्रियादयो जिह्वन्द्रिययोगाद्भापात्वेन गृहन्ति नान्ये । संज्ञिनश्च मनस्त्वेन गृहन्ति नान्य इति । वक्ष्यते हि सकपायत्वान्जीवः कर्मणो योग्यान पुद्गलानादत्त इति । विशेषव्याख्या औदारिक, वैक्रियक, आहारक, तैजस, और कार्मण इन पञ्चविध शरीरोंके द्वारा वाक्से, मनसे और प्राण तथा अपानसे पुद्गलोंका जीवके ऊपर उपकार है। इनमेंसे शरीर तो पूर्वमें कहे हैं (अ. २ सू. ३७) और प्राण अपान नामकर्ममें व्याख्यात हैं (अ. ६ सू. ११) और द्वीन्द्रिय आदि जिह्वा इन्द्रियके संयोगसे भाषारूपसे पुद्गलोंको ग्रहण करते हैं, न कि अन्य । संज्ञी मनरूपसेभी ग्रहण करते हैं अन्य नहीं। ऐसा आगे कहेंगेभी कि कषायसहित होनेसे जीव कर्मोके योग्य पुद्गलोंको ग्रहण करता है (अ. ८ सू. २११९)॥ १९ ।। किं चान्यत्त तथा आरैभी- सुखदुःखजीवितमरणोपग्रहाश्च ॥ २० ॥ सूत्रार्थ-सुखोपग्रह, दुःखोपग्रह, जीवितोपग्रह, मरणोपग्रह, इनसेभी पुद्गलोंका उपकार है। भाष्यम्-सुखोपग्रहो दुःखोपग्रहो जीवितोपग्रहो मरणोपग्रहश्चेति पुद्गलानामुपकारः । तद्यथा-इप्टाः स्पर्शरसगन्धवर्णशब्दाः सुखस्योपकारः । अनिष्टा दुःखस्य । स्नानाच्छादनानु- लेपनभोजनादीनि विधिप्रयुक्तानि जीवितस्यानपवर्तनं चायुष्कस्य । विषशखाग्न्यादीनि मरणस्यापवर्तनं चायुष्कस्य ।। विशेषव्याख्या--सुखके उपग्रह, दुःखके उपग्रह, जीवित (जीवन)के उपग्रह, तथा मरणके उपग्रहसे जीवोंके ऊपर पुद्गलोंका उपकार है । जैसे-अपनेको अभीष्ट स्पर्श, रस, गन्ध, वर्ण तथा शब्द ये तो सुखके उपकार है, और अनिष्ट स्पर्श रसादि दुःखके । और विधिसे कृत स्नान, आच्छादन, अनुलेपन (तैल उबटन आदिके मर्दन) और भोजन ये जीवनके अर्थात् आयुके अपवर्तन न होनेके उपकार हैं । तथा विष, शस्त्र और अग्नि आदि मरणके अर्थात् आयुके अपवर्तन होनेके उपग्रह है। अत्राह । उपपन्नं तावदेतत्सोपक्रमाणामपवर्तनीयायुपाम् । अथानपवायुपां - कथमिति । अत्रोच्यते-तेपामपि जीवितमरणोपग्रहः पुद्गलानामुपकारः । कथमिति चेत्तदुच्यते । कर्मणः स्थितिक्षयाभ्याम् । कम हि पौलमिति । आहारश्च त्रिविधः सर्वेषामेवोपकुरुते । किं कारणम् । शरीरस्थित्युपचयवलवृद्धिप्रीत्यर्थ ह्याहार इति ।।

सभाष्यतत्त्वार्थाधिगमसूत्रम् । १२७ अब यहांपर कहते हैं कि जो उपक्रम (आरंभ) सहित तथा अपवर्तनीय (विषादि- द्वारा न्यून करने योग्य) आयुष्सहित हैं उनका तो जीवितोपग्रह और मरण उपग्रहरूप उपकार युक्त है । किन्तु जिनकी आयुष्का अपवर्तन नहीं होता । जैसे-देव तथा नरकके जीव उनका जीवित्त उपग्रह मरण उपग्रहद्वारा पुद्गल किस प्रकारसे उपकार कर सकते हैं ? । अब इसका उत्तर कहते हैं । जिनकी आयुष्का अपवर्तन नहीं होता उनकाभी जीवित उपग्रह तथा मरण उपग्रहरूप पुद्गलोंका उपकार है । यदि कहो कि कैसे ? तो कहते हैं। कर्मोंकी स्थिति और क्षयसे । अर्थात् कर्मोकी स्थिति जीवित उपग्रहरूप उपकार होता है । और कर्मोक क्षयसे मरणोपग्रहरूप उपकार होता है । और कर्म जो है वह तो पौद्गलिक है, अर्थात् पुद्गलसेही कर्म उत्पन्न होते है । तीन प्रकारका जो आहार है वह सबकाही उपकार करता है । इसका क्या कारण है ? । उत्तर-क्यों कि शरीरकी स्थिति, वृद्धि, तथा बल, तेज आदिकी बढ़ानेकी प्रीतिसेही आहारका सेवन होता है ॥ २० ॥ अत्राह । गृहीमस्तावद्धर्माधर्माकाशपुद्गला जीवद्रव्याणामुपकुर्वन्तीति । अथ जीवानां क उपकार इति । अत्रोच्यते- अब कहते हैं कि इस बातको हम मानते हैं कि धर्म, अधर्म, आकाश तथा पुद्गल द्रव्य, जीवद्रव्यका उपकार करते हैं । परन्तु जीवोंका द्रव्यके ऊपर क्या उपकार है ? । इसके उत्तरमें यह अग्रिम सूत्र है- परस्परोपग्रहो जीवानाम् ॥ २१॥ सूत्रार्थ-जीवोंका परस्पर उपकार है । भाष्यम् --परस्परस्य हिताहितोपदेशाभ्यामुपग्रहो जीवानामिति । विशेषव्याख्या-जीव परस्पर आपसमें एक दूसरेका हित तथा अहितके उपदेश- द्वारा उपकार करते हैं । अर्थात् गुरु कर्तव्याकर्तव्यका उपदेश देकर शिप्योंका उपकार करता है और शिष्य गुरुकी सेवा शुश्रूषा आदिद्वारा उसका उपकार करता है । ऐसेही खामी आदि निज-आश्रितोंका पालन पोषण आदिसे उपकार करते है, और आश्रित आदि उनकी आज्ञा पालन आदिसे उनका उपकार करते हैं ॥ २१ ॥ अत्राह । अथ कालस्योपकारः क इति । अत्रोच्यते- अब यहां कहते है कि कालका क्या उपकार है? । इसके उत्तरमें अग्रिम सूत्र कहते हैं- वर्तना परिणामः क्रिया परत्वापरत्वे च कालस्य ॥ २२ ॥ १ ओजस् तेजः (पराक्रमादिकी वृद्धिका हेतु) तथा लोमप्रक्षेपादि और कवल यह तीनों प्रकारका आहार । २ यहां 'सर्वेषाम्' इससे संसारी जीवोंका ग्रहण है, क्योंकि अधिक वेही हैं। ३ यहांपर वर्तना, - रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् १२८ सूत्रार्थ-वर्तना, परिणाम, क्रिया, परत्व और अपरत्व ये कालके उपकार हैं। भाप्यम् तद्यथा-सर्वभावानां वर्तना कालाश्रया वृत्तिः । वर्तना उत्पत्तिः स्थितिः प्रथमसमयाश्रया इत्यर्थः ॥ परिणामो द्विविधः । अनादिरादिमांश्च । तं परसाहक्ष्यामः । क्रिया गतिः । सा त्रिविधा प्रयोगगतिर्विश्रसागतिमिश्रिकेति ॥ परत्वापरत्वे त्रिविधे प्रशंसाकृते, क्षेत्रकृते कालकृते इति । तन्त्र प्रशंसाकृते परो धर्मः परं ज्ञानं अपरो धर्म अपरमनानमिति । क्षेत्रकृते एकदिक्कालावस्थितयोविप्रकृष्टः परो भवति सन्निकृष्टोऽपरः । कालकते द्विरष्टचर्पाद्वर्प- शतिकः परो भवति वर्पशतिकाद्विरष्टवर्पोऽपरो भवति ॥ तदेवं प्रशंसाक्षेत्रकृते परत्वापरत्वे वर्जयित्वा वर्तनादीनि कालकृतानि कालस्योपकार इति । विशेषव्याख्या-वर्तना आदि कालके उपकार हैं। जैसे-सब पदार्थोंकी वर्तना जो है वह कालके आश्रित वृत्ति है। वर्तना अर्थात् संपूर्ण पदार्थोंकी उत्पत्ति, तथा स्थिति अर्थात् प्रथम समयके आश्रयीभूत जो उत्पत्ति स्थिति है वह वर्तना है। परिणाम दो प्रकारका है, एक अनादि परिणाम और दूसरा आदिमान् परिणाम । उस द्विविध परिणामको हम आगे कहेंगे (अ. ५ सू. ४२)। क्रिया अर्थात् गतिरूप क्रिया यहभी कालकाही उपकार है। क्रिया तीन प्रकारकी है । प्रथम प्रयोगगति, द्वितीय विश्रसागति, और तृतीय मिश्रिका वा मिश्रका । (उनमें प्रयोगगति पुरुषप्रयत्न- जन्य, विश्रसागति स्वयं परिपाकसे जन्य और मिश्रिका उभयजन्य है) । परत अपरत्वभी तीन प्रकारके हैं । जैसे-प्रशंसाकृत । क्षेत्र (देश)कृत और कालकृत । उन प्रशंसाकृत जैसे-धर्म पर है, ज्ञान पर है, तथा अधर्म अपर है, अज्ञान अपर है । क्षेत्रकृत जैसे-एक देश कालमें स्थित दो पदार्थोके विषयमे जो दूर है वह तो पर है, और जे समीप है वह अपर है । कालकृत जैसे-शोलह वर्षवालेकी अपेक्षा शत (सौ) वर्षवाल पर है, और शतवर्षकी अपेक्षासे शोलह वर्षवाला अपर है । इस प्रकारसे प्रशंसा तथ क्षेत्रकृत परत्व अपरत्वको छोड़कर वर्तना आदि सब कालकृत है। अर्थात् वर्तना परिणाम, क्रिया और कालिक परत्वापरत्व कालके उपकार हैं ॥ २२ ॥ अत्राह । उक्तं भवता शरीरादीनि पुद्गलानामुपकार इति । पुद्गलानिति च तत्रान्तरीय जीवान्परिभाषन्ते । स्पर्शादिरहिवाश्चान्ये । तत्कथमेतदिति । अत्रोच्यते । एतदादिविप्रति पत्तिप्रतिषेधार्थ विशेषवचनविवक्षया चेदमुच्यते ॥ अब यहांपर कहते हैं कि आपने शरीर आदि पुद्गलोंके उपकार कहे । और पुद्गलोंक अन्य तन्त्रवाले (बौद्ध) जीव कहते हैं। और दूसरे कहते है कि पुद्गल स्पर्श रस आदिरे रहित हैं । सो यह कैसे हो सकता है ? अर्थात् ये स्पर्श आदिरहित होनेसे जीव हैं परिणाम और क्रिया इन तीनों पदोंका विरोध न होनेसे समास करके पढ़ना चाहिये। कोई असमतही पढरे है । सापेक्ष होनेसे परत्वापरत्वका तो समास हेही ।

- -- सभाष्यतत्त्वार्थाधिगमसूत्रम् । १२९ अथवा स्पर्शआदिसहित है? इत्यादि जो विप्रतिपत्ति (विवादविषय) है उसके निषेधके लिये तथा विशेष कथनकी विवक्षासे यह आगेका सूत्र कहते हैं। स्पर्शरसगन्धवर्णवन्तः पुद्गलाः ॥ २३ ॥ सूत्रार्थ-स्पर्श, रस, गन्ध और वर्णलक्षणयुक्त पुद्गल होते हैं । भाष्यम्-स्पर्शः रसः गन्धः वर्ण इत्येवंलक्षणः पुद्गला भवन्ति । तत्र स्पर्शोऽष्टविधः कठिनो मृदुर्गुरुर्लघुः शीत उष्णः स्निग्धः रूक्ष इति । रसः पञ्चविधस्तिक्तः कटुः कषा- योऽम्लो मधुर इति । गन्धो द्विविधः सुरभिरसुरभिश्च । वर्णः पञ्चविधः कृष्णो नीलो लोहितः पीतः शुक्ल इति । विशेषव्याख्या स्पर्श, रस, गन्ध और वर्णवान् अर्थात् स्पर्श आदियुक्त पुद्गल होते है। उनमें स्पर्श आठ (८) प्रकारका होता है। जैसे-कठिन १ मृदु (कोमल) २ गुरु ३ लघु ४ शीत ५ उष्ण ६ स्निग्ध ७ और रूक्ष ८१ रस पांच प्रकारका होता है । कटु १, तिक्त २, कषाय (कशैला) ३, आमिल (खट्टा) ४ और मधुर ५। गन्ध दो प्रकारका होता है एक सुरभि (सुगन्ध) और दूसरा असुरभि अर्थात् दुर्गन्ध । और वर्ण पांच प्रकारका होता है, जैसे-कृष्ण (काला) १, नील २, लोहित (लाल) ३, पीत और श्वेत ५। किं चान्यत्- और यह अन्य विशेषभी- शब्दबन्धसौम्यस्थौल्यसंस्थानभेदतमश्छायातपोद्योतवन्तश्च ॥२४॥ सूत्रार्थ:-शब्द, बन्ध, सौक्ष्म्य, स्थौल्य (सूक्ष्मता तथा स्थूलता), संस्थान, भेद, तम, छाया, आतप तथा उद्योत यह सब पुद्गलके पर्याय है। अर्थात् शब्द बन्ध आदि सब पुद्गलकेही विकार है। भाष्यम्-तत्र शब्दः षड्डिधः । ततो विततो घनः शुषिरो घर्षो भाष इति ॥ बन्धविविधः। प्रयोगबन्धो विश्रसाबन्धो मिश्र इति । स्निग्धरूक्षत्वाद्भवतीति वक्ष्यते ॥ सौक्ष्म्यं द्विविध- मन्त्यमापेक्षिकं च । अन्त्यं परमाणुष्वेव । आपेक्षिकं व्यणुकादिषु संघातपरिणामापेक्षं भवति । तद्यथा-आमलकाद्वदरमिति ॥ स्थौल्यमपि द्विविधमन्यमापेक्षिकं च संघातपरिणामापेक्षमेव भवति । तत्रान्त्यं सर्वलोकव्यापिनि महास्कन्धे भवति । आपेक्षिकं वदरादिभ्य आमलकादि- विति ॥ संस्थानमनेकविधम् । दीर्घह्रस्वाद्यनित्थत्वपर्यन्तम् । भेदः पञ्चविधः । औत्कारिक: चौर्णिकः खण्डः प्रतरः अनुतटइति ॥ तमश्छायातपोद्योताश्च परिणामजाः ॥ सर्व एवैते स्पर्शादयः पुद्गलेष्वेव भवन्तीति । अतः पुद्गलास्तद्वन्तः ॥ विशेषव्याख्या-उनमे शब्द षट् (छ) प्रकारका है। जैसे-तत (वीणादिसे उत्पन्न), वितत (मुरजमृदङ्गादिजन्य), घन (कॉसा वा तालीसे उत्पन्न), शुपिर (वंशी आदिसे उत्पन्न ), घर्ष (संघर्षण-रगड़से उत्पन्न) और भापारूप । बन्ध तीन प्रकारका है। प्रयो- , १३० रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् गवन्ध (पुरुषप्रयत्नसे उत्पन्न ), विश्रसा (अर्थात् स्वतःसिद्ध वा परिपाकजन्य) बन्ध और मिश्रवन्ध 'स्निग्ध और रुक्ष पुद्गलोंके परस्पर स्पृष्ट होनेपर वन्ध होता है ऐसा आगे इसी अध्यायके (३२)वें सूत्रमे कहेंगे। सौक्ष्म्य दो प्रकारका है एक अन्तिम परमाणु आदि निष्ठ और दूसरा सापेक्ष । अन्तिम सौक्ष्म्य तो परमाणुओंमें होता है और दूसरा ब्यणुक आदिमें संघात परिणामकी अपेक्षासे होता है । जैसे-आमलेसे वदर (वेर )में सूक्ष्मता है । यह. संघातपरिणामके सापेक्ष होती है। और स्थौल्यभी दो प्रकारका होता है। एक अन्तिम और दूसरा आपेक्षिक अर्थात् किसीकी अपेक्षासे । उनमें अन्तिम स्थौल्य (स्थूलत्व वा महत्व) सर्वलोकव्यापी महास्कन्धमें होता है और द्वितीय स्थौल्य, जैसे-बदर (वेर) आ- दिकी अपेक्षा आमले आदिमे । संस्थान ( अवयवरचनाविशेप ) अनेक प्रकारका होता है । जैसे-दीर्घ हवसे अनियत्व (निरूपणके अयोग्य ) पर्यन्त होता है । भेद पांच प्रकारका है । जैसे-औत्कारिक (काष्ठादिकको आरा आदिसे चीरना), चौर्णिक (चूर्णके द्वारा उत्पन्न. जैसे-दाल आटा), खण्ड (जैसे घटके कपालादिक ), प्रसर (जैसे वादलके टुकड़े) तथा अनुतट और तम (प्रकाशविरोधी), छाया (प्रकाशावरणनिमित्ता), आतप (सूर्य आदिसे होनेवाले उप्णरूप) तथा उद्योत (चन्द्र आदिका प्रकाश) ये सब पुद्गलके परिणामसे उत्पन्न होते है । ये सब स्पर्शसे लेकर उद्योतपर्यन्त पुद्गलोंहीमें होते हैं । इस कारण पुद्गल तद्वान् अर्थात् इनसे युक्त कहलाते है। अत्राह । किमर्थ स्पर्शादीनां शव्दादीनां च पृथक् सूत्रकरणमिति । अत्रोच्यते । स्पर्शादयः परमाणुपु स्कन्धेषु च परिणामजा एव भवन्तीति । शब्दादयस्तु स्कन्धेष्वेव भवन्त्यनकनिमि- ताश्चेत्यतः पृथक्करणम् ॥ अब यहांपर प्रश्न करते हैं कि यदि स्पर्श रसादि तथा शब्दवन्धादि पुद्गलोंहीमें होते हैं तो स्पर्शादिक तथा शब्दादिकके लिये पृथक् २ सूत्र क्यों किया? । अर्थात् स्पर्श रस गंध इत्यादि (२३) तथा शब्द-बन्ध इत्यादि (२४) दोसूत्र क्यों किये ? एकही सूत्रसे कार्य चल जाता। अब इसका उत्तर कहते हैं कि स्पर्श रस आदि जो हैं वे परमाणु- ओंमें तथा स्कन्धोंमें स्वभावसेही होते हैं । और शब्द-बन्ध आदि तो स्कन्धोंहीमें होते है और अनेक निमित्तोंसे होते है, न कि केवल परिणामजन्य, इस लिये पृथक् २ सूत्र किये ॥ २४ ॥ त एते पुलाः समासवो द्विविधा भवन्ति । तद्यथा- ये पुद्गल संक्षेपसे दो प्रकारके होते है । जैसे:- ५ जिसका निस्पण न होसक कि वह ऐसा वा इस प्रकारका है । २ अनुतट वह भेद है जो संतप्त लोहेको घनसे पीटनेसे स्फुलिंग निकलते हैं।

सभाष्यतत्त्वार्थाधिगमसूत्रम् । अणवः स्कन्धाश्च ॥ २५॥ सूत्रार्थ:--अणु तथा स्कन्ध ये दो भेद पुद्गलोंके हैं। भाष्यम्-उक्तं च- इस विषयमें अन्यत्र कारिकाओंके द्वारा कहाभी है। कारणमेव तदन्त्यं सूक्ष्मो नित्यश्च भवति परमाणुः । एकरसगन्धवर्णो द्विस्पर्शः कार्यलिङ्गश्च ।। इति । वह परमाणु कारण और अन्तिम सूक्ष्मतासहित तथा नित्य है । तथा एक रस, एक गन्ध और एकवर्णयुक्त, दो स्पर्शसहित, और कार्यलिङ्ग है, अर्थात् कार्यसे जाना जाता है। इस प्रकारसे परमाणुके लक्षण कहे है। तत्राणवोऽबद्धाः स्कन्धास्तु बद्धा एव ॥ अणु तथा स्कन्धोंमें परमाणु तो अबद्ध अर्थात् बन्धनरहित हैं, और स्कन्ध बद्ध है ॥ २५॥ अत्राह । कथं पुनरेतद्वैविध्यं भवतीति । अनोच्यते । स्कन्धास्तावत्- अब यहांपर कहते हैं कि पुद्गलोंके ये दो भेद कैसे होते है ? । इस लिये यह अग्रिम सूत्र कहते हैं। प्रथम स्कन्धोंके विषयमें कहते है- संघातभेदेभ्य उत्पद्यन्ते ॥ २६ ॥ सूत्रार्थ:-संघातसे, भेदसे तथा संघात-भेदसे स्कन्ध उत्पन्न होते है ! भाष्यम्-संघातानेदात्संघातभेदादिति । एभ्यखिभ्यः कारणेभ्यः स्कन्धा उत्पद्यन्ते द्विप्रदेशादयः। तद्यथा-द्वयोः परमाण्वोः संघाताहिप्रदेशः । द्विप्रदेशस्याणोश्च संघातात्रिप्रदेशः। एवं सङ्ख्येयानामसङ्ख्येयानामनन्तानामनन्तानन्तानां च प्रदेशानां संघातात्तावत्प्रदेशाः ।। एषामेव भेदाविप्रदेशपर्यन्ताः ।। एत एव संघातभेदाभ्यामेकसामायिकाभ्यां द्विप्रदेशादयः स्कन्धा उत्पद्यन्ते । अन्यस्य संघातेनान्यतो भेदेनेति ।। विशेषव्याख्या संघात आदि जो तीन कारण हैं उनसे द्विप्रदेश (दो प्रदेशोंवाले) आदि स्कन्ध उत्पन्न होते हैं । जैसे-दो परमाणुओंके संघातसे द्विप्रदेश उत्पन्न होता है, तथा द्विप्रदेश और अणुके संघातसे त्रिप्रदेश उत्पन्न होता है । इस प्रकार सङ्खयेय, अस- वयेय, अनन्त और अनन्तानन्त प्रदेशोंके संघातसे उतनेही अर्थात् सङ्ग्येय, असङ्खचेय, अनन्त तथा अनन्तानन्त प्रदेशवाले उत्पन्न होते है। और इन्ही संख्यात संख्यात अनन्त प्रदेशोंवाले स्कन्धोंके भेद करनेसे द्विप्रदेशपर्यन्त स्कन्ध उत्पन्न होते हैं। और येही एक समयमें उत्पन्न संघात तथा भेदसे द्विप्रदेश आदि स्कन्ध उत्पन्न होते है। अन्यके संघात और अन्यके भेदसे ये स्कन्ध उत्पन्न होते हैं ।। २६ ।। अत्राह । अथ परमाणुः कथमुत्पद्यत इति । अत्रोच्यते- अब यहां कहते है कि परमाणु कैसे उत्पन्न होता है । इस लिये यह सूत्र कहते है ।

१३२ रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् भेदादणुः ॥ २७॥ भाष्यम्-भेदादेव परमाणुरुत्पद्यते न संघातादिति ॥ विशेषव्याख्या-अणु भेदसे (किसी वस्तुके खण्डसे) ही उत्पन्न होता है, संचातले कभी नहीं होता ॥ २७ ॥ भेदसंघाताभ्यां चाक्षुषाः ॥ २८ ॥ सूत्रार्थ:-चाक्षुष स्कन्ध भेद तथा संघात दोनोंसे उत्पन्न होते हैं। भाष्यम्-भेदसंघाताभ्यां चाक्षुपाः स्कन्धा उत्पद्यन्ते । अचाक्षुपास्तु यथोक्तासंघा- ताद्धदात्संघातभेदाचेति ।। विशेषव्याख्या-चाक्षुप अर्थात् जो नेत्र इन्द्रियसे प्रत्यन हो सके वे स्कन्ध भेद और संघातसे उत्पन्न होते है । और अचाक्षुप तो पूर्वोक्त संघात, मेद, तथा संघात भेदसे उत्पन्न होते हैं। अत्राह । धर्मादीनि सन्तीति कथं गृह्यत इति । अत्रोच्यते । लक्षणतः ।। अब यहांपर प्रश्न करते है कि धर्म आदि द्रव्य (सन्ति ) अर्थात् हैं यह कैसे ग्रहण किया (जाना) जाता है ? । अब इसका उत्तर देते है कि लक्षणसे । इसपर कहते हैं ॥ २८ ॥ किं च सतो लक्षणमिति । अत्रोच्यते- पुनः इसपर प्रश्न करते है कि सत्का क्या लक्षण है कि जिससे ये जाने जाते हैं। इसपर कहते है- उत्पादव्ययध्रौव्ययुक्तं सत् ॥ २९ ॥ सूत्रार्थः-उत्पाद (उत्पत्ति ), व्यय (नाश ) और ध्रौव्य (स्थिरता) युक्त होना यही सत्का लक्षण है। भाष्यम्-उत्पाव्ययौ धौव्यं च युक्तं सतो लक्षणम् । यदुत्पद्यते यद्वयेति यच ध्रुवं तत्सत् । अतोऽन्यदसदिति ।। विशेषव्याख्या-उत्पाद, व्यय और ध्रौव्यसे युक्त होना सत्का लक्षण है । अर्थात् जो उत्पन्न हो और नाशको प्राप्त हो, तथा ध्रुव हो वह सत् है । और इससे जो भिन्न है वह असत् है। [उत्पादव्ययौ ध्रौव्यं च सतो लक्षणम् । यदिह मनुष्यत्वादिना पर्यायेण व्ययत आत्मनो देवत्वादिना पर्यायेणोत्पादः एकान्तत्रौव्ये आत्मनि तत्तथैकस्वभावतयावस्थाभेदानुपपत्तेः । एवं च संसारापवर्गभेदाभावः । कल्पितत्वेऽस्य निःस्वभावतयानुपलब्धिप्रसङ्गात् । सखभावते त्वेकान्तधौन्याभावस्तस्यैव तथाभवनादिति । तत्तत्स्वभावतया विरोधाभावात्तथोपलब्धिसिद्धेः। वभ्रान्तत्वे प्रमाणाभावः । योगिज्ञानप्रमाणाभ्युपगमे त्वभ्रान्तस्तवस्थाभेदः । इत्यं त्रैवत् अन्यथा न मनुष्यादेवत्वादीति । एवं चमादिपालनानर्थक्यम् । एवं च सति "अहिंसासत्या- १ कहीं २ ऐसा लिखा है कि "उत्पादव्ययाभ्यां ध्रौव्येण च युक्तं सतो लक्षणम्" उत्पादते, व्ययसे, तथा धान्यसे युक्त होना यह सत्का लक्षण है।

सभाष्यतत्त्वार्थाधिगमसूत्रम् । १३३ स्तेयब्रह्मचर्यापरिग्रहा यमाः" "शौचसंतोषतपःस्वाध्यायश्वरप्रणिधानानि नियमाः" इति आगमवचनं वचनमात्रम् । एवमेकान्ताध्रौव्येऽपि सर्वथा तदभावापत्तेः तत्त्वतो हेतुकत्वमे- वावस्थान्तरमिति सर्वदा सद्भावाभावप्रसङ्गः अहेतुकत्वाविशेषात् । न हेतुखभावतयोर्ध्व तद्भावः तत्स्वभावतयैकान्तेन ध्रौव्यसिद्धेः । यदा हि हतोरेवासौ स्वभावो यत्तदनन्तरं तद्भावस्तदा ध्रुवोऽन्वयस्तस्यैव तथा भवनात् । एवं च तुलोन्नामावनामवद्धेतुफलयोर्युगपद्वय- योत्पादसिद्धिरन्यथा तत्तद्वयतिरिक्तेतरविकल्पाभ्यामयोगात् । तन्न। मनुष्यादेर्दैवत्वमित्यायातं मार्गवैफल्यमागमस्येति । एवं सम्यग्दृष्टिः सम्यक्संकल्पः सम्यग्वाम् सम्यग्मार्गः सम्यगा- जैवः : सम्यग्व्यायामः सम्यक्स्मृतिः सम्यक्समाधिरिति वाग्वैयर्थ्यम् । एवं घटव्ययवत्या मृदः कपालोत्पादभावात् उत्पादव्ययध्रौव्ययुक्तं सदिति । एकान्तध्रौव्ये तत्तथैकस्वभावत- यावस्थाभेदानुपपत्तेः । समानं पूर्वेण । एवमेतद्व्यवहारतः तथा मनुष्यादिस्थितिद्रव्यमधिकृत्य दर्शितम् । निश्चयतस्तु प्रतिसमयमुत्पादादिमत्तथा भेदसिद्धेः । अन्यथा तदयोगात्। यथाह- सर्वव्यक्तिषु नियतं क्षणे क्षणेऽन्यत्वमथ च न विशेषः । सत्योश्चित्यपचित्योराकृतिजातिव्यवस्थानात् ॥१॥ नरकादिगतिविभेदो भेदः संसारमोक्षयोश्चैव । हिंसादिस्तद्धेतुः सम्यक्त्वादिश्व मुख्य इति ॥२॥ उत्पादादियुते खलु वस्तुन्येतदुपपद्यते सर्वम् । तद्रहिते तदभावात् सर्वमपि न युज्यते नीत्या ॥३॥ निरुपादानो न भवत्युत्पादो नापि तादवस्थ्येऽस्य । तद्विक्रिययापि तथा नितययुतेऽस्मिन् भवत्येषः ॥४॥ सिद्धत्वेनोत्पादो व्ययोऽस्य संसारभावतो ज्ञेयः । जीवत्वेन धौव्यं त्रितययुतं सर्वमेवं तु ॥ ५ ॥ (एतच्च भाष्यं हारिभद्रवृत्ती व्याख्यातमस्ति न च सिद्धसेनीयायामिति) तदित्थं उत्पाद- व्ययौ ध्रौव्यं चैतत्रितययुक्तं सत्तो लक्षणं । अथवा युक्तं समाहितं त्रिस्वभावं सत् । यदु- त्पद्यते यद्वयेति यञ्च ध्रुवं तत्सत् अतोऽन्यदसदिति ॥ उत्पाद, व्यय, और ध्रौव्य यह सत्का लक्षण है । जिससे इस संसारमें जीवका मनु- ध्यत्व आदि पर्यायरूपसे व्यय होता है, और देवत्व आदि पर्यायरूपसे उत्पत्ति होती है और जीवरूपसे ध्रौव्य है । इस हेतुसे तीनों लक्षणयुक्त होनेसे सत् है । और ( एकान्त) (सर्वथा) ध्रौव्य माननेसे और उसी धौव्यरूप एक स्वभाव होनेसे आत्माकी अवस्था- ओंका भेद अयुक्त है। और जब आत्माकी सदा एकही अवस्था है तब संसार तथा मोक्षके भेदकामी अभाव हुआ, अर्थात् सदा आत्माके एकरूप होनेपर संसारसे मोक्षमे क्या विशेषता है? जिसके लिये अनेक प्रयत्न किये जाते है । और कदाचित् ससाराऽवस्था तथा मोक्षावस्थाके भेदको कल्पित मानो तो आत्माका संसारी स्वभाव न होनेसे उसकी उपलब्धि (प्राप्ति) के अभावका प्रसङ्ग हो जायगा । और जव आत्माका मनुष्यत्व देवत्व आदि संसारी पर्यायस्वभाव है तो एकान्तरूपसे ध्रौव्यका अभाव होगया, क्योकि आत्माही --- रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् १३४ ननुष्य देव आदि पर्यायल्पसे होता है । और देवत्र मनुष्यत्वादि पर्यायकी उपलब्धि स्वभावरूप होनेसे बिना किसी विरोधके सिद्धहीं है । कदाचित् कहो कि संसारी मनुष्य देव आदि पर्यायका माव जो आत्माको होता है यह भ्रान्ति है तो उनके भ्रान्तत्व होनेने कोई प्रमाण नहीं हैं । और जब योगियोंक ज्ञानको प्रमाण मानो तब तो अवस्याभेद प्रतीत हुआ । इस हेतुसे यह अवस्याओंका भेद ऐसाही है । और यदि अन्यथा मानो तो मनुष्यक देवल आदि पर्याय होही नहीं सकते । फिर यमनियमादिका पालनमी निरर्थक है । और ऐसा होनेसे "अहिंसा, सत्य. अस्तेय (बारीका अमात्र), ब्रह्मचर्य, और अपरिग्रह ये पांच यम हैं। तया "शौच, सन्तोष. तप, दाध्याय (पठन पाउन), तथा ईश्वरप्रणिधान, ये पांच नियन हैं। इत्यादि शास्त्र (योगदानक) बचन कंवल कयनमात्रके हैं, अर्थात् व्यये हैं। इस लिये सर्वथा श्रीय आत्मसन्प नहीं है किन्तु मनुष्य देव सिद्ध आदि पर्यायोले अवस्याभेद है । और ऐसेही सर्वथा अधौ- व्यरूपमी आत्माक नाननेसे हानि है । क्यों कि जब सर्वया वह आत्मा न रहा तत्र यम नियम आडिक फलमोग किसको होंगे? इस हेतुसे यहभी निश्चित हुआ कि यथार्थमें हेतुपूर्वक आत्मखनावने अवस्थान्तरकी प्राति होती है । और अहेतुक नानो तो जो स्त्रमाववाली अक्त्या है उसके माव वा अभावका सर्वदा प्रसङ्ग होगा। क्यों कि अहेतु- कता होनमें कोई विशेषता नहीं है । और हेतुखभावतासे सर्वतद्भाव (देवत्वादि भाव) नहीं होता। क्योंकि हेतुखभाव होनेते एकान्तरूपले उसको श्रीव्य होजायगा । और जब हेतुले देवत्व ननुष्यत्वादि स्वभाव होता है और जिस हेतुके अनन्तर वैसे स्वभाव (मनुष्यत्व वा देवत्वादि स्वभाव ) की सत्ता होती है तब ध्रुव आत्मरूपका अवश्य अन्वय है अर्थात् सब दशाने संवन्य है, क्योंकि उसी आत्लाहीका वैसा स्वभाव वा पर्याय हो जाता है। ऐसा होनेसे किसीने जो यह कहा कि तुला (तराजू)ली डांडी जैसे जिस समय एक ओर ऊंची होती हैं उसी सनय दूसरी ओर नीची होती है ऐलेही हेतु और उस हेतुसे उत्पन्न होनेवाले फलके व्यय तथा उत्सादनी एक कालनही सिद्धि होती है और यदि ऐसा न हो तो उनसे मिन्न अन्य विकल्लासे सन्वन्य न होगा । यह कथन संगत नहीं है । क्योंकि एकहीं कालने हेतु और फलकी और व्यय तथा उत्पादकी सिद्धि 'भाननेले ननुष्य आदिसे देवत्वकी प्राप्ति होती है इस आगननार्गकी विफलता प्राप्त हुई । क्योंकि जिस सनय दलप्रातिने हेतुरूप ननुष्यजन्नके अन नियन आदि हैं उस समय पालनी प्राप्ति नहीं है । और अली रीतिसे अव (हेतुविशेपसे) यह सन्यग्दृष्टि है. मन्या संकल्ल है, सन्यवान् , कन्यन्नार्ग, सन्यगार्जव, सन्यग्व्यायान, सन्यवृति, तया सन्यसनाधि, इत्यादि वचन व्य होंगे। इसी रीतिसे घटपर्यायके व्यय (नाश) गली वृत्तिका कणलव्य पर्याय उलाद होनेसे उलाइ, क्य, तथा श्रव्य-युक्त होनेसे सभाष्यतत्त्वार्थाधिगमसूत्रम् । १३५ सत् है। क्योंकि घटपर्यायका व्यय, कपालपर्यायका उत्पाद और मृत्तिकारूपसे ध्रौव्य है। और एकान्तरूपसे ध्रौव्य माननेसे उस वस्तुका उसी प्रकार एक स्वभाव होनेसे अवस्था- ओंका भेद अयुक्त होगा; और सब वार्ता पूर्वके समान यहांभी समझलेनी । इस प्रकार व्यवहारनयसे तथा मनुष्य आदि स्थिति द्रव्यको उद्देशकरके यहां सत्का लक्षण दर्शाया गया । और निश्चयनयसे तो प्रतिसमय पदार्थ उत्पत्ति आदिसहित होनेसे अवस्थाओंके भेदकी सिद्धि है । और यदि उत्पाद तथा व्यय आदि युक्त वस्तु न हों तो पूर्वपर अवस्थाओंका भेद न सिद्ध होगा और इस विषयमें ऐसाही अन्यत्र कहाभी है- संपूर्ण पदार्थमात्रमें चिति तथा अपचिति अर्थात् वृद्धि तथा हासके विद्यमान होनेसे और आकृति (व्यक्ति) तथा जातिके व्यवस्थापनसे क्षण २ मे भेद नियत है और द्रव्य- रूपसे विशेषभी नहीं है।॥ १ ॥ नरक आदि गतियोंका विभेद तथा संसार और मोक्षका भेदभी वस्तुओंके अवस्थाओंके भेदसेही नियत है और इन गतियोंके तथा संसार और मोक्षके भेद होनेमें हिंसा आदि तथा सम्यग्दर्शन आदि हेतु मुख्य है ॥ २ ॥ और नरक आदि गतियोंके भेद तथा संसार और मोक्षके ये सब भेद आदि तभी उपपन्न अर्थात् युक्त होसकते है जब प्रत्येक वस्तु उत्पाद, व्यय और ध्रौव्यसे युक्त है । अर्थात् जब अनेकान्त- वादसे यह निश्चित है कि वस्तुमे पूर्वपर्यायका व्यय (नाश) और उत्तरपर्यायका उत्पाद तथा मूल द्रव्यादिरूपसे ध्रौव्य है । जैसे मनुष्यगतिमें मनुष्यपर्यायका व्यय और देवगति प्राप्त होनमें देवपर्यायकी उत्पत्ति तथा जीवत्वरूपसे जब ध्रौव्य है तभी सब युक्त है; और उत्पाद आदिरहित वस्तुमे उत्पाद आदिके अभावसे नरक गति आदिके भेद तथा संसार और मोक्षके भेद ये सब नयसे नहीं युक्त होसकते ॥ ३ ॥ और उपादानकारण (हेतु) के विना ध्रौव्यरूप एक वस्तुमें उत्पाद नहीं हो सकता, और ऐसेही सदा विक्रिया (सदा अध्रौव्य ) सेभी उत्पाद नही हो सकता; इसलिये उत्पाद, व्यय तथा धौव्य इन तीनोंसे युक्त वस्तुमें ही यह उत्पाद आदि होता है ॥ ४ ॥ और सिद्ध पर्यायमेंभी सिद्धत्वरूपसे उत्पाद है, और इस जीवके ससारका अभाव होनेसे संसार- पर्यायका व्यय जानना चाहिये । तथा जीवत्व अर्थात् शुद्ध जीवत्वरूपसे ध्रौव्यभी है ।। २९ ।। इसप्रकार सब कुछ उत्पाद आदि त्रितय (तीनों) से युक्तही है ॥ ५॥ (यह भाष्य १ एक पुस्तकमें अग्रिम प्रान्त (फुटनोट)में ऐसी टिप्पणी है कि इस २९ वे सूत्रके भाष्यका पाठ दो प्रकारका है । एक तो "उत्पादव्ययौ ध्रौव्यं चैतभितययुक्तं" इत्यादि रूपसे । यह सिद्धसेनजीकी वृत्तिमें है । और द्वितीय पाठ इस प्रकार है "उत्पादव्ययौ ध्रौव्यं च सतो लक्षणम्" यहा “यदिह" इत्यादि जो कोष्ठके भीतर है वह सव सिद्धसेनकी वृत्तिमें है । और किसी पुस्तकमे भाष्यका आरम्भ ऐसे है "उत्पादव्ययध्रौव्ययुक्तं सत्" अर्थात् उत्पाद व्यय तथा ध्रौव्य ये तीनों एक ही पदमें पढे हैं। और कहीं “उत्पादव्ययाभ्यां ध्रौव्येण च युक्तं सत्" ऐसा पाठ है । सर्वथा सूत्रका यह अर्थ है कि उत्पाद-आदिमान अर्थात् उत्पादादिसहित वस्तु सत् है।

, रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् १३६ हरिभद्रकी वृत्तिमें व्याख्यात है, किन्तु सिद्धसेनकी वृत्तिमें नहीं है.) वह भाष्य इस प्रकारसे है कि उत्पाद, व्यय, तथा धौव्य इन तीनोंसे युक्त सत्का लक्षण है । अथवा युक्तका अर्थ है समाहित (सहित) अर्थात् उत्पादादि त्रिस्वभाववस्तु सत् है । जो उत्पन्न हो, जो नष्ट हो, तथा जो ध्रुवभी हो वह सत् है, और इससे अन्य असत् है । अत्राह । गृहीमस्तावदेवंलक्षणं सदिति । इदं तु वाच्यं तत्किं नित्यमाहोखिदनित्यमिति । अत्रोच्यते- अब यहां कहते है कि पूर्वोक्त सत्का लक्षण स्वीकार करते हैं । परन्तु वह सत् नित्य है वा अनित्य है ? । इस लिये यह अग्रिम सूत्र कहते हैं- तद्भावाव्यर्य नित्यम् ॥ ३०॥ भाग्यम्-यत्सतो भावान व्येति न व्येष्यति तन्नित्यमिति । विशेपव्याख्या:-जो सत् स्वभावसे नाशको न प्राप्त होता हो वा न होगा वह नित्य है ।। ३० ॥ अर्पितानर्पितसिडेः॥३१॥ सूत्रार्थ:-पदार्थों की सिद्धि मुख्य और गौण रीतिसे होती है। अर्थात् जो एककी मुख्यता तो दूसरेकी गौणता होती है । भाज्यम्-सच्च त्रिविधमपि नित्यं च । उभे अपि अर्पितानर्पितसिद्धेः । पितं व्याव- हारिकमर्पितमव्यावहारिक चेत्यर्थः । तच्च सञ्चतुर्विधम् । तद्यथा-द्रव्यास्तिकं मातृकापदा- स्तिकमुत्पन्नास्तिकं पर्यायास्तिकमिति । एषामर्थपदानि द्रव्यं वा द्रव्ये वा द्रव्याणि वा सत् । असन्नाम नास्त्येव द्रव्यास्तिकस्य ।। मातृकापदास्तिकस्यापि । मातृकापदं वा मातृकापदे वा मातृकापदानि वा सत् । अमातृकापदं वा अमातृकापदे वा अमातृकापदानि वा असत् ।। उत्पन्नास्तिकस्य । उत्पन्नं वोत्पन्ने वोत्पन्नानि वा सत् । अनुत्पन्नं वानुत्पन्ने वानुत्पन्नानि वा सत् ॥ अर्पितेऽनुपनीते न वाच्यं सदित्यसदिति वा । पर्यायास्तिकस्य सद्भावपर्याये वा सद्भावपर्याययोर्वा सद्भावपर्यायेषु वा आदिष्टं द्रव्यं वा द्रव्ये वा द्रव्याणि वा सत् । असद्भा- वपर्याये वा असद्भावपर्याययोर्वा असद्भावपर्यायेपु वा आदिष्टं द्रव्यं वा द्रव्ये वा द्रव्याणि वासत् । तदुभयपर्याय वा तदुभयपर्याययोर्वा तदुभयपर्यायेपु वा आदिष्टं द्रव्यं वा द्रव्ये वा दव्याणि वा न वाच्यं सदित्यसदिति वा । देशादेशेन विकल्पयितव्यमिति ।। विशेपव्याख्या उत्पाद, व्यय तथा प्रौव्य एतत्रितयरूपभी सत् है और नित्यभी है। और उत्पाद, व्यय, तथा ध्रौव्ययुक्त सत् और नित्य ये दोनों अर्पित तथा अनर्पित भेदले सिद्ध है । अर्थात् जव द्रव्यरूपसे अनर्पित किया और पर्यायरूपसे अर्पित (योजित ) किया तव उत्पादादियुक्त सत्त्व सिद्ध है। और जब द्रव्यरूपसे अर्पित किया और पर्यायरुपसे अनर्पित किया तव नित्यत्व सिद्ध है । अर्पित नाम व्यावहारिक जो व्यव- हारने आंव. और अनर्पित अर्थात् अव्यवहारिक जो व्यवहारमें न आवै । पुनः वह सत् सभाष्यतत्त्वार्थाधिगमसूत्रम् । १३७ चार प्रकारका है । जैसे-द्रव्यास्तिक, मातृकापदास्तिक, उत्पन्नास्तिक, और पर्यायास्तिक । अब इनके अर्थ पद इस रीतिसे है. जैसे--एक द्रव्य वा दो द्रव्य वा बहुत द्रव्य अर्थात् एकत्व, द्वित्व तथा बहुत्व संख्यासहित द्रव्य सत् है; यह द्रव्यास्तिकका अर्थ है । असत् अर्थात् नहीं है । द्रव्यास्तिकका तथा मातृकापदास्तिकका भी ऐसाही है। एक मातृका- पद, दो मातृकापद तथा बहुत मातृकापद सत् है । इसी प्रकार एक अमातृ- कापद, दो अमातृकापद, वा बहुत अमातृकापद असत् है । ऐसेही उत्पन्नास्तिकके विषयमें एक उत्पन्न, दो उत्पन्न अथवा बहुत उत्पन्न सत् है । और ऐसेही एक अनुत्पन्न वा दो अनुत्पन्न अथवा बहुत अनुत्पन्न असत् है । अर्पित अनुपस्थित होनेसे सत् वा असत् कुछ नहीं कहसकते । तथा पर्यायास्तिकके सद्भाव एक पर्याय, दो वा अधिक पर्यायोंमे आदिष्ट (कहेहुए) एक द्रव्य वा दो, वा बहुत द्रव्य सत् है । और ऐसेही एक असद्भावपर्यायमें, वा दो अथवा बहुत असद्भावपर्यायोंमें आदिष्ट एक, दो वा अधिक द्रव्य असत् है । और ऐसेही सदसद् एतद्भाव एक दो वा अधिक पर्यायोंमे आदिष्ट एक दो वा बहुत द्रव्य सत् अथवा असद्रूपसे नहीं कहसकते । अर्थात् वह अवक्तव्य है । तात्पर्य यह है कि देश और आदेशसे वस्तुका विकल्प करना उचित है। अत्राह । उक्तं भवता संघातभेदभ्यः स्कन्धा उत्पद्यन्त इति । तत्कि संयोगमात्रादेव संघातो भवति । आहोखिदस्ति कश्चिद्विशेष इति । अत्रोच्यते । सति संयोगे बद्धस्य संघातो भवतीति ।। अब यहांपर कहते है कि आपने कहा है कि संघात तथा भेद वा संघात-भेदसे स्कन्ध उत्पन्न होते है, सो क्या संयोगमात्रसेही संघात होता है; अथवा कोई विशेषता है ? । अब इस विषयमें कहते है कि संयोग होनेपरही जो बद्ध है अर्थात् जिसका बन्ध है उसका संघात होता है ॥ ३१ ॥ अत्राह । अथ कथं बन्धो भवतीति । अत्रोच्यते- अब कहते हैं कि बन्ध कैसे होता है ? । इसपर यह अग्रिम सूत्र कहते है- लिग्धरूक्षत्वाइन्धः॥ ३२॥ सूत्रार्थ:-स्निग्ध तथा रूक्षत्व हेतुसे बन्ध होता है । भाष्यम्-स्निग्धरूक्षयोः पुद्गलयोः स्पृष्टयोः स्पृष्टयोर्बन्धो भवतीति । विशेषव्याख्या-स्निग्ध पदार्थसे वा भीगे हुये तथा रूक्ष अर्थात् रूखे खरखरे पुद्गल जब आपसमें स्पृष्ट होते ( एक दूसरेसे छूजाते ) है तब बन्ध होता है । ३२ ।। अत्राह । किमेष एकान्त इति । अत्रोच्यते-- १ ऐसा भान होता है कि यह जो सद्रूपता सिद्ध करते है सो निज पर्याय आदिसे तो सत् है और अन्य रूपसे असत् है, तथा एकही कालमे सदसदुभयरूपसे अवक्तव्य है। १८ रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् अव कहते हैं क्या यह स्पृष्ट स्निग्ध रूक्ष पुद्गलोंका बन्ध एकान्ततः अर्थात् नियमसे सदा सब पुद्गलोंका होता है अथवा नहीं ? । इसपर यह आगेका सूत्र कहते हैं- न जघन्यगुणानाम् ॥ ३३ ॥ सूत्रार्थ:-जघन्यगुणयुक्त स्निग्ध तथा जघन्यगुणयुक्त रूक्ष पुद्गलोंका स्पर्श होने- परभी वन्ध नहीं होता ।। भाष्यम् जघन्यगुणस्निग्धानां जघन्यगुणरूक्षाणां च परस्परेण वन्धो न भवतीति ॥ विशेपन्याख्या-जघन्यगुणवाले स्निग्ध वा जघन्यगुणवाले रूक्ष पुद्गलोंका परस्पर वन्ध नहीं होता ॥ ३३ ॥ अत्राह । उक्तं भवता जघन्यगुणवर्जानां स्निग्धानां रूक्षेण रूक्षाणां च स्निग्धेन सह वन्धो भवतीति । अथ तुल्यगुणयोः किमत्यन्तप्रतिपेध इति । अत्रोच्यते । न जघन्यगुणाना- मित्यधिकृत्येदमुच्यते- अब यहांपर कहते है कि जघन्यगुणसे वर्जित स्निग्ध पुद्गलोंका रूक्षके साथ, और ऐसेही जघन्यगुणोंसे रहित रूक्ष पुद्गलोंका स्निग्धके साथ बन्ध होता है ऐसा आपने अभी कहा है । सो क्या तुल्यगुण अर्थात् समान गुणवाले पुद्गलोंका बन्ध सर्वथा नहीं होता। इसपर कहते है कि “न जघन्यगुणानाम्" अर्थात् "जघन्य गुणवालोंका बन्ध नहीं होता" इसका अधिकार करके यह अग्रिम सूत्र कहते हैं- गुणसाम्ये सहशानाम् ॥ ३४ ॥ सूनार्थ-गुणकी समता होनेपर सदृश पुद्गलोंका बन्ध नहीं होता। भाप्यम्-गुणसाम्ये सति सहशानां वन्धो न भवति । तद्यथा--तुल्यगुणस्निग्धस्य तुल्यगुणस्लिग्धेन तुल्यगुणरूक्षस्य तुल्यगुणरूक्षेणेति । विशंपव्याख्या-जव स्निग्धोंका और रूसोंका गुण समान होता है तब स्निग्धोंका निन्धोंके साथ तथा रूलोंका रूझोंके साथ वन्ध नहीं होता । जैसे-समानगुणयुक्त स्निग्ध पदार्थका समान गुणवाले स्निग्ध पदार्थके साथ, तथा समान गुण रूक्ष पदार्थका समान गुण स्तके साथ बन्ध नहीं होता। अत्राह । सहयग्रहणं किमपेक्षत इति । अत्रोच्यते । गुणवैषम्ये सहशानां वन्धो भवतीति ॥ अब कहते है कि इस ३४ वे सूत्रमे सदृशग्रहण किसकी अपेक्षा करता है, अर्थात् गुण वा पदार्थको ? । इसपर कहते हैं कि गुणकी विषमतामें सदृश पदार्थोंकाभी बन्ध होता है । अर्थात् पहले स्निग्धका रूक्ष तथा रूक्षका स्निग्धके साथ बन्ध दिखलाया था. अब महशग्रहणसे यह तात्पर्य है कि गुणकी विषमतामें रूमोंका सूक्षके साथ तथा निन्धोका निग्धके साथभी बन्ध होजाता है ॥ ३४ ॥ अत्राट् । किमवियोपेण गुणवैपम्ये सहशानां वन्धो भवतीति । अत्रोच्यते- अब यहांवर प्रश्न करते है कि क्या अविशेष रूपसे गुणोंके वैषम्यमे वन्ध होता है जया दमका कोई विशेष नियम है ? । इसपर यह सूत्र कहते है- '।

सभाष्यतत्त्वार्थाधिगमसूत्रम् । यधिकादिगुणानां तु ॥ ३५ ॥ सूत्रार्थ-द्विगुण आदिसे अधिक गुणवाले सदृश पदार्थोंकामी बन्ध होता है । भाष्यम्-ध्यधिकादिगुणानां तु सदृशानां बन्धो भवति । तद्यथा-स्निग्धस्य द्विगुणाच- धिकस्निग्धेन । द्विगुणाद्यधिकस्निग्धस्य स्निग्धेन । रूक्षस्यापि द्विगुणाद्यधिकरूक्षेण । द्विगु- णाद्यधिक रूक्षस्य रूक्षेण । एकादिगुणाधिकयोस्तु सदृशयोर्बन्धो न भवति । अत्र तुशब्दो व्यावृत्तिविशेषणार्थः प्रतिषेध व्यावर्तयति बन्धं च विशेषयति ।। विशेषव्याख्या--अब इस विषयको कहते हैं कि रूक्षका रूक्षके साथ, और स्नि- ग्धका स्निग्धके साथभी बन्ध होता है किन्तु रूक्ष तथा स्निग्ध गुणोंकी इस प्रकारसे विषमता होनी चाहिये । जैसे-स्निग्धका अर्थात् सामान्य स्निग्धका द्विगुण आदि अधिक स्निग्धके साथ बन्ध होता है। तथा द्विगुण आदि अधिक स्निग्धका सामान्य स्निग्धके साथ बन्ध होता है; ऐसेही रूक्षका द्विगुण आदि अधिक रूक्षके साथ बन्ध होता है; तथा द्विगुण आदि अधिक रूक्षका सामान्य रूक्षके साथमी बन्ध होता है । तात्पर्य यह कि सामान्य स्निग्ध पदार्थका उससे द्विगुण स्निग्धके साथ बन्ध होजाता है । जैसे-जमे घृतका पिघले घृतके साथ तथा आटेका गुड वा चीनीके साथ । परन्तु यह वैषम्य द्विगुण आदिसे अधिक होना चाहिये । और एक द्विगुण अधिक सदृश पदार्थोंका बन्ध नहीं होता । इस सूत्रमें "यधिकादिगुणानान्तु" यहां जो 'तु' शब्द पठित है वह व्यावृत्ति तथा विशेषणके लिये है । अर्थात् “न जघन्यगुणाना" वा "गुणसाम्ये सह- शानां" इत्याकारक प्रतिषेधकी तो व्यावृत्ति करता है और बन्धको विशेषित करता है॥३५॥ अत्राह । परमाणुषु स्कन्धेषु च ये स्पर्शादयो गुणास्ते किं व्यवस्थितास्तेष्वाहोखिदव्य- वस्थिता इति । अत्रोच्यते । अव्यवस्थिताः । कुतः । परिणामात् ॥ अव यहां कहते है कि परमाणुओंके तथा स्कन्धोंके जो स्पर्श रस आदि गुण प्रथम कहे है वे उनमें व्यवस्थित रूपसे रहते हैं अथवा अव्यवस्थित रूपसे हैं । इसपर कहते है कि वे स्पर्शरसादि अव्यवस्थितही रहते है। क्योंकि वे परिणामसे होते हैं। अत्राह । द्वयोरपि वध्यमानयोर्गुणवत्त्वे सति कथं परिणामो भवतीति उच्यते- अब कहते हैं कि यदि बध्यमान (जिनका बन्ध हो रहा है वे) दोनों पदार्थ गुणवान् हैं तो कैसे परिणाम होता है ? इसपर कहते है--- बन्धे समाधिको पारिणामिकौ ॥ ३६॥ भाष्यम्-बन्धे सति समगुणस्य समगुणः परिणामको भवति । अधिकगुणो हीनस्येति ॥ विशेषव्याख्या-बन्ध होनेपर यदि सम गुण है तब तो समगुणका समगुणवालाही परिणाम होगा और हीन गुणका अधिक गुणवान् परिणाम होगा ॥ ३६ ।। अत्राह । उक्तं भवता द्रव्याणि जीवाश्चेति । तत्किमुद्देशत एव द्रव्याणां प्रसिद्धिराहोस्त्रि- लक्षणतोऽपीति । अन्नोच्यते । लक्षणतोऽपि प्रसिद्धिः । तदुच्यते- RA-

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रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम्
अब कहते हैं कि आपने पूर्वप्रकरणमें यह कहा है कि "धर्म आदि चार तथा
जीव द्रव्य है" (अ. ५ सू. २) सो क्या केवल उद्देशमात्र (नामसंकीर्तन )सेही
द्रव्यकी प्रसिद्धि (सिद्धि) है अथवा लक्षणसेभी ? इस हेतुसे कहते हैं कि नहीं, लक्षणसेभी
द्रव्य (पदार्थ )की प्रसिद्धि है, इस कारणसे लक्षणवोधक सूत्र आगे कहते है-
गुणपर्यायवद् द्रव्यम् ॥ ३७॥
सूत्रार्थ-जिसमें गुण तथा पर्याय हों वह द्रव्य है ।
भाष्यम्-गुणान् लक्षणतो वक्ष्यामः । भावान्तरं संज्ञान्तरं च पर्यायः । तदुभयं यत्र
विद्यते तद्रव्यम् । गुणपर्याया अस्य सन्त्यस्मिन्वा सन्तीति गुणपर्यायवत् ।।
विशेषव्याख्या गुणपर्यायवत्त्व, अर्थात् “गुणवत्त्वे सति पर्यायवत्वं द्रव्यत्वम्"
गुणवान् होके जिसमें कोई न कोई पर्याय हो वह द्रव्य है । गुणोंको लक्षणपूर्वक आगे
कहैगे । और भावान्तर तथा संज्ञान्तर होना यह पर्याय है। अर्थात् एक भावसे दूसरा
भाव हो जाय तथा एक संज्ञासे दूसरी संज्ञा हो जाय यह पर्याय है । जैसे-मनुष्यसंज्ञासे
देवसंज्ञा होजाना । ये दोनों अर्थात् गुण और पर्याय जिसके है वा जिसमे हैं वही
द्रव्य है ॥ ३७॥
कालश्चेत्येके ॥ ३८॥
भाज्यम्-एके त्वाचार्या व्याचक्षते कालोऽपि द्रव्यमिति ॥
सूत्रार्थ-विशेषव्याख्या कोई एक आचार्य ऐसा कहते हैं कि कालभी
द्रव्य है ॥ ३८ ॥
सोऽनन्तसमयः॥ ३९॥
भाज्यम्-स चैष कालोऽनन्तसमयः । तत्रैक एव वर्तमानसमयः । अतीतानागतयो-
स्वानन्यम् ॥
सूत्रार्थ-विशेषव्याख्या-वह काल अनन्त समयरूप है। उसमें वर्तमानकाल तो
एकही है। किन्तु अतीत (भूत) और अनागत (भविष्यत् ) काल अनन्त है ।। ३९ ।।
अत्राह । उक्तं भवता गुणपर्यायवद्रव्यमिति । तत्र के गुणा इति । अत्रोच्यते-
अव कहते है कि आपने यह वर्णन किया है कि गुण तथा पर्याय जिसमे हों, वा
गुणपर्याय जिसके हों वह द्रव्य है ( अ. ५ सू. ३७). सो वे गुण कौन हैं? । इसके
उत्तरमें यह अग्रिम सूत्र कहते है-
द्रव्याश्रया निर्गुणा गुणाः ॥४०॥
सूत्रार्थ-जो व्यके आश्रयमे रहै, और स्वयं निर्गुण हों वे गुण हैं ।
माप्यम्-द्रव्यमेपामाश्रय इति द्रव्याश्रयाः। नैषां
गुणाः सन्तीति निर्गुणाः।
विशेपव्याख्या-जिनका आश्रय अर्थात् रहनेका स्थान द्रव्य हो, और स्वयं निर्गु,
हो, अर्थात् उनमे गुण न हों वे गुण हैं ॥ ४० ॥

सभाष्यतत्त्वार्थाधिगमसूत्रम् । अत्राह । उक्तं भवता बन्धे समाधिको पारिणामिकौ इति तत्र का परिणाम इति । अत्रोच्यते-- अब यहां कहते हैं कि आपने प्रथम यह कहा है कि बन्ध होनेपर समान गुणवालेका समान गुण परिणाम होता है, और हीन गुणका अधिक गुण परिणाम होता है (अ. ५ सू. ३६) । सो परिणाम क्या वस्तु है ? । इसके उत्तरमे अग्रिम सूत्र कहते हैं- तद्भावः परिणामः॥४१॥ सूत्रार्थ-वस्तुका जो भाव अर्थात् स्वभाव वही परिणाम है भाष्यम्-धर्मादीनां द्रव्याणां यथोक्तानां च गुणानां खभावः खतत्त्वं परिणामः । विशेषव्याख्या-पूर्व प्रसंगमें यथोक्त जो धर्म अधर्म आदि द्रव्य है उनका खभाव तथा गुणोंका खभाव अर्थात् निजतत्त्व वही परिणाम है ॥ ४१॥ स द्विविधः। वह परिणाम दो प्रकारका है। जैसे- अनादिरादिमांश्च ॥ ४२ ॥ भाष्यम्-तत्रानादिररूपिषु धर्माधर्माकाशजीवेष्विति । सूत्रार्थ-विशेषव्याख्या-अनादि तथा आदिमान दो प्रकारका परिणाम है । उनमे अनादि परिणाम तो अरूपी द्रव्य जो धर्म, अधर्म, अकाश तथा जीव हैं उनमेही होता है ।। ४२ ॥ रूपिष्चादिमान् ॥ ४३ ॥ भाष्यम्-रूपिपु तु द्रव्येषु आदिमान् । परिणामोऽनेकविधः स्पर्शपरिणामादिरिति ।। सूत्रार्थविशेषव्याख्याःरूपी जो द्रव्य है, अर्थात् श्वेत, कृष्ण और नील आदि रूपवाले जो द्रव्य है, उनमें आदिमान् (सादि) परिणाम होता है । और वह आदिमान् परिणाम अनेक प्रकारका होता है। जैसे-स्पर्श परिणाम, रस परिणाम और गंध परिणाम, इत्यादि ॥ ४३ ॥ योगोपयोगी जीवेषु ॥४४॥ सुत्रार्थ-जीव यद्यपि अरूपी द्रव्य है, तथापि उनमें योग और उपयोग ये आदिमान् परिणाम होते है। भाष्यम्-जीवेष्वरूपिष्वपि सत्सु योगोपयोगौ परिणामावादिमन्तौ भवतः । तत्रोपयोगः पूर्वोक्तः । योगस्तु परस्ताद्वक्ष्यते- इति तत्त्वार्थाधिगमेऽहत्प्रवचनसङ्ग्रहे पञ्चमोऽध्यायः समाप्तः ॥५॥ विशेषव्याख्या:-अरूपी द्रव्योंमे अनादि परिणाम कहा है (अ. ५ सू. ४२)। उसका यह अपवाद वा विशेष वचन है कि जीवोंके अरूपी द्रव्य होनेपरभी उनमे आ-

१४२
रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम्
दिमान् परिणाम योग तथा उपयोग होते हैं | उनमें उपयोग तो प्रथम (अ. २
सू. १९ में ) कह चुके हैं और योग आगे (अ. ६ सू. १. में ) कहेंगे ॥ ४४ ॥
इत्याचार्योपाधिधारिद्विवेदोपनामकठाकुरप्रसादशर्मप्रणीत-भापाटीकासमलते
तत्त्वार्थाधिगमेऽहत्प्रवचनसङ्ग्रहे पञ्चमोऽध्यायः ॥ ५ ॥
अथ षष्ठोऽध्यायः।
अत्राह । उक्ता जीवाजीवाः । अथास्रवः क इत्यास्रवप्रसिद्ध्यर्थमिदं प्रक्रम्यते--
अब कहते हैं कि जीव तथा अजीव पदार्थका निरूपण कर चुके । अव उसके पश्चात्
क्रमप्राप्त आस्रव पदार्थका निरूपण करना चाहिये, इस प्रयोजनकी प्रसिद्धिके लिये इस
सूत्रका आरम्भ करते है-
कायवामनःकर्म योगः ॥१॥
सूत्रार्थ-कायिक, वाचिक, तथा मानस जो कर्म है उसको योग कहते हैं।
भाष्यम्-कायिकं कर्म वाचिकं कर्म मानसं कर्म इत्येप त्रिविधो योगो भवति । स
एकशो द्विविधः । शुभश्चाशुभश्च । तत्राशुभो हिंसास्तयाब्रह्मादीनि कायिकः। सावधानृतपरुप-
पिशुनादीनि वाचिकः । अभिध्याव्यापादेासूयादीनि मानसः । अतो विपरीतः शुभ इति ॥
विशेषव्याख्या:-कायिक कर्म, वाचिक कर्म, तथा मानस कर्म यह तीन प्रकारका
योग होता है । वह प्रत्येक शुभ और अशुम भेदसे दो प्रकारका होता है । उनमेंसे हिंसा
चौर्य (चोरी) तथा अब्रह्मचर्य (मैथुनसेवन ) इत्यादि कायिक अशुभ कर्म योग है।
किसीकी निंदा, मिथ्याभाषण, कठोर वचन, चुगुली इत्यादि वाचिक अशुभ कर्म योग है।
किसीके धन लेनेकी अभिलाषा, मारनेकी इच्छा, ईर्ष्या (जलन), असूया (गुणोंमेंभी
दोपारोपण) तथा अनिष्टचिंतन आदि मानस अशुभ कर्म योग है । और इनसे
विपरीत शुभ है । जैसे-अहिसा अचौर्य आदि कायिक, प्रशंसा सत्यभाषणादि वाचिक
शुभ कर्म योग है। तथा दूसरेकी शुभचिंतनतादि मानस शुभ कर्म है ।। १॥
स आस्रवः ॥२॥
सूत्रार्थ-पूर्वोक्त योग आस्रव है।
भाज्यम्-स एप त्रिविधोऽपि योग आस्रवसंज्ञो भवति । शुभाशुभयोः कर्मणोरास्त्रवणा-
दास्रवः । सरःसलिलावाहिनिर्वाहिस्रोतोवत् ॥
विशेपव्याख्या-कायिक, चाचिक, तथा मानस जो कर्म हैं, यही तीन प्रकारका
जो योग वर्णन किया है वही आलव है । शुभ तथा अशुभ कर्मोंका आस्रव अर्थात्
आगमन होनेसे यह आस्रव कहा जाता है। जैसे-तालाबके जलके ग्रहण तथा निष्का-
मन करनेवाला प्रवाह है वैसेही वह आस्रव है, अर्थात् उसी मार्गसे कर्मोका आगमन
होता है ॥२॥

सभाष्यतत्त्वार्थाधिगमसूत्रम् । १४३ शुभः पुण्यस्य ॥३॥ भाष्यम्-शुभो योगः पुण्यस्यास्रवो भवति ॥ सूत्रार्थ-शुभ योग पुण्यके आस्रवका कारण होता है । विशेषव्याख्या-शुभ योग पुण्यका आस्रव होता है, अर्थात् शुभ योगसे पुण्य आस्रवका आगमन होता है ॥ ३ ॥ अशुभः पापस्य ॥४॥ सूत्रार्थ-अशुभ योग पापात्रवका कारण होता है । भाग्यम्-तत्र सद्वेद्यादि पुण्यं वक्ष्यते । शेपं पापमिति ॥ विशेषव्याख्या-जैसे शुभ योगसे पुण्य आस्रव होता है वैसेही अशुभ योगसे पापात्रव होता है। उनमें शुभ सद्वेद्य आदि पुण्य आगे (अ. ८ सू. ३६ में ) कहेंगे और सद्वेद्य आदिसे जो भिन्न है वह पाप है ॥ ४ ॥ सकषायाकषाययोः साम्परायिकेापथयोः॥५॥ सूत्रार्थ-यह त्रिविध योग सकषाय, तथा अकषायके साम्परायिक तथा ईर्ष्या- पथका आस्रव होता है। भाष्यम्-स एष त्रिविधोऽपि योगः सकषायाकषाययोः साम्परायिकर्यापथयोरास्रवो भवति यथासङ्ख्यं यथासम्भवं च । सकषायस्य योगः साम्परायिकस्य अकषायस्थापथस्यै- वैकसमयस्थितेः ।। विशेषव्याख्या—यह जो कायिक कर्म आदि तीन प्रकारके योग दर्शाये हैं वे सकषाय अर्थात् कषायोंकरके सहित और अकषाय (कषायोंसे रहित) जीवोंके होते है। और वे साम्परायिक तथा ई-पथके आस्रव होते है । यहांपर सकपाय तथा अकषाय इन दोनोंका साम्परायिक और ईर्थ्यापथ दोनोंके साथ यथासंख्य संबंध है । अर्थात् सकषायका योग तो साम्परायिकका आस्रव होता है और अकषायका योग ईर्यापथका आस्रव होता है। क्योंकि अकषाय तथा ई-पथकी ही एक समयमें स्थिति होती है ॥ ५॥ अव्रतकषायेन्द्रियक्रियाः पञ्चचतुःपञ्चपञ्चविंशतिसङ्ख्याः पूर्वस्य भेदाः६ सूत्रार्थ-भावार्थः-पांच, चार, पांच तथा पच्चीस संख्यायुक्त अवत, कपाय, इंद्रिय और क्रिया ये पूर्व आस्त्रवके भेद है। भाष्यम्-पूर्वस्येति सूत्रक्रमप्रामाण्यात्साम्परायिकस्याह । साम्परायिकस्यास्रवभेदाः पञ्च चत्वारः पञ्च पञ्चविंशतिरिति भवन्ति । पञ्च हिंसानृतस्तेयाब्रह्मपरिग्रहाः। 'प्रमत्तयोगात्प्राण- व्यपरोपणं हिंसा' इत्येवमादयो वक्ष्यन्ते । चत्वारः क्रोधमानमायालोमा अनन्तानुवन्ध्यादयो वक्ष्यन्ते । पञ्च प्रमत्तस्येन्द्रियाणि । पञ्चविंशतिः क्रियाः । तत्रेमे क्रियाप्रत्यया यथासङ्घयं प्रत्येतव्याः । तद्यथा-सम्यक्त्वमिथ्यात्वप्रयोगसमादानेर्यापथाः कायाधिकरणप्रदोपपरितापन- ।

१४४ रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् ग्राणातिपाताः दर्शनस्पर्शनप्रत्ययसमन्तानुपातानाभोगाः खहस्तनिसर्गविदारणानयनानव- काहा आरन्भपरिग्रहमायामिध्यादर्शनाप्रत्याख्यानक्रिया इति ।। विशेषव्याख्या--पश्चम सूत्रमे पठित पाठक्रमके प्रमाणसे यहांपर पूर्वसे साम्परायिक आत्रबका ग्रहण है । उस साम्परायिक आलवके पांच अवत, चार कषाय, पांच इंद्रिय तथा पञ्चविंशति (पच्चीस) क्रिया, सव मिलके उनचालीस (३९) मेद हैं । उनमे हिंसा, अनृत (मिथ्याभाषण), स्तेय अर्थात् चोरी, अब्रह्मचर्य (मैथुनप्रसंग) और परिग्रह ये पांच अत्रत हैं। प्रमत्तयोगसे प्राणोंको शरीरसे पृथक् करना यह हिंसा है (अ.१ सू. ८)। इनको आदि लेकर हिंसादिके लक्षण आगे कहेंगे। क्रोध, मान, माया तथा लोभ ये चार कपाय हैं । अनंताऽनुवन्धी आदि भेद आगे (अ. ८ सू. १० में) कहेंगे और पर्शन आदि प्रमत्तके पांच इंद्रिय हैं । और क्रियाके पच्चीस भेद हैं। उनमे ये वक्ष्यमाण क्रिया, प्रत्यय यथासंख्यरूपसे जानने चाहिये । जैसे-सम्यक्त्वक्रिया, मिथ्या- स्त्रक्रिया, प्रयोगक्रिया, समादानक्रिया. उपयक्रिया, कायक्रिया, अधिकरणक्रिया, प्रदोपक्रिया, परितापनक्रिया, प्राणातिपातक्रिया, दर्शनक्रिया, सर्शनक्रिया, प्रत्ययक्रिया, समंतानुपातानक्रिया, अभोगक्रिया, स्वहस्तक्रिया, निसर्गक्रिया, विदारणक्रिया, अनयनक्रिया, अनवकालाक्रिया, आरम्भक्रिया, परिग्रहक्रिया, मायाक्रिया, मिथ्यादर्शनक्रिया, तथा अप्रत्याख्यानक्रिया, ये ३९ भेद साम्परायिक आत्रवके है ॥ ६ ॥ तीव्रमन्दज्ञाताज्ञातभाववीाधिकरणविशेषेभ्यस्तद्विशेषः ॥७॥ नवार्थ-उञ्चालीसभेदसहित इन साम्परायिक आलवोंकी तीन मन्दादिभावोंके विगेपले विपता है। भाष्यम्-सांपरायिकासवाणां एपामकोनचत्वारिंशत्साम्परायिकाणां तीव्रभावात् मन्द- भावानातभावादज्ञावभावाद्वीर्यविशेषाधिकरणविशेपाच विशेपो भवति । लघुर्लघुतरो लघुतमतीवस्तीत्रतरत्तीनतम इति । तद्विशेषाच वन्धविशेपो भवति ।। विगेपव्याख्या-पूर्वोक्त पांच चार आदि भेद सहित जो उन्चालीस भेद मान्परायिक आवोंके कहें है उनकामी तीव्रभाव, मंदभाव, ज्ञातभाव, अज्ञातभावसे तथा वीर्यविशेष, और अधिकरणविशेपसे विशेष है । अर्थात् न्यूनाधिक तारतम्य है। जैस कि लघु, लघुतर तथा लघुतम । एते ही तीत्र, तीत्रतर तथा तीव्रतम हिंसादि। इनके निपने बंधने विशेषता होती हैं ॥ ७ ॥ अनाद । तीत्रमन्दादयो भावा लोकप्रतीताः वीर्य च जीवस्य क्षायोपशमिकः क्षायिको वा भार न्युतम् । अयाधिकरणं किमिति । अत्रोच्यते- अब यहांर कहते है कि नीत्र मंद आदि भाव तो लोकमे प्रतीत (प्रसिद्ध) ही हैं। भाभी नयना बायोपशमिक नथा क्षायिक भाव है यह (अ.२ सू. ४१५ में) पटक । अब अविकरण क्या है ? इम लिये यह अग्रिम सूत्र कहते हैं । - सभाप्यतत्त्वार्थाधिगमसूत्रम् । १४५ अधिकरणं जीवाजीवाः ॥८॥ सूत्रार्थ अधिकरण जीव तथा अजीव है । भाग्यम्-अधिकरणं द्विविधम् । द्रव्याधिकरणं भावाधिकरणं च । तत्र द्रव्याधिकरणं छेदनभेदनादि शस्त्रं च दशविधम् । भावाधिकरणमष्टोत्तरशतविधम् । एतदुभयं जीवाधिकर- णमजीवाधिकरणं च ॥ तन- विशेपव्याख्या-अधिकरण दो प्रकारके होते है । एक द्रव्याधिकरण, दूसरा भावा- धिकरण । इनमें द्रव्याधिकरण छेदनभेदनादि तथा शस्त्र जो कि दश प्रकारका है। और भावाधिकरण एकसौ आठ (१०८) है (अ. ६ सू. ९)। यह दोनों जीवाधिकरण और अजीवाधिकरणभी है ॥ ८ ॥ उनमेंसे:- आयं संरम्भसमारम्भारम्भयोगकृतकारितानुमतकषायविशेषैस्त्रि- स्त्रिस्त्रिश्चतुश्चैकशः ॥९॥ सूत्रार्थ-आद्य अर्थात् प्रथम जीवाधिकरण संरंभादिभेदसे संक्षेपसे तीन प्रकारका, पुनः वह एक २ तीन प्रकारका, पुनः वह एक २ तीन प्रकारका, और पुनः वह एक २ चार प्रकारका है। भाष्यम्--आद्यमिति सूत्रक्रमप्रामाण्याजीचाधिकरणमाह । तत्समासतत्रिविधम्। संरम्भः समारम्भ आरम्भ इति । एतत्पुनरेकशः कायवाडमनोयोगविशेषात्रिविधं भवति । तद्यथा- कायसंरम्भः वाक्संरम्भः मनःसंरम्भः कायसमारम्भः वाक्समारम्भः मन.समारम्भः काया- रम्भः वागारम्भः मनआरम्भ इति ॥ एतदप्येकशः कृतकारितानुमतविशेषात्रिविधं भवति । तद्यथा-कृतकायसंरम्भः कारितकायसंरम्भः अनुमतकायसंरम्भः कृतवाक्संरम्भ कारित- वाक्संरम्भः अनुमतवाक्संरम्भः कृतमनःसंरम्भः कारितमनःसंरम्भः अनुमतमनःसंरम्भः एवं समारम्भारम्भावपि ॥ तदपि पुनरेकशः कपायविशेषाञ्चतुर्विधम् । तद्यथा-क्रोधकृतकायसंर- म्भः मानकृतकायसंरम्भः मायाकृतकायसंरम्भः लोभकृतकायसंरम्भः क्रोधकारितकायसंरम्भः मानकारितकायसंरम्भः मायाकारितकायसंरम्भः लोभकारितकायसंरम्भः क्रोधानुमतकाय- संरम्भः मानानुमतकायसंरम्भः मायानुमतकायसंरम्भः लोभानुमतकायसंरम्भः । एवं वाहन- नोयोगाभ्यामपि वक्तव्यम् । तथा समारम्भारम्भौ ॥ तदेवं जीवाधिकरणं समासेनैकश: पनिशद्विकल्पं भवति । त्रिविधमप्यष्टोत्तरशतविकल्पं भवतीति ।। संरम्भः सकषायः परितापनया भवेत्समारम्भः । आरम्भः प्राणिवधः त्रिविधो योगस्ततो ज्ञेयः॥ विशेषव्याख्या-पूर्वसूत्र (८) क्रमके प्रमाणसे आद्यशब्दसे जीवाधिकरणका ग्रहण है । वह प्रथम संक्षेपसे संरम्भ, समारभ्भ, और आरम्भ इन भेदोंसे तीन प्रकारका है। और यह एक २ काय, वाक्, तथा मनोरूप योगविशेषसे तीन २ प्रकारका है। जैसे-कायसंरम्भ, वाक्संरम्भ और मनःसंरम्भ; पुनकायसमारंभ, वाक्समारम्भ, तथा मनःसमारम्भ; और काय-आरम्भ, वाक्-आरम्भ, वा मन-आरम्भ; इस प्रकारसे प्रत्येकके तीन २ भेद - १९ १४६ रायचन्द्रजनशास्त्रमालायाम् होगये । और इनमेंभी प्रत्येकके कृत, कारित, वा अनुमतके भेदसे पुनः तीन २ भेद हैं। जैसे-कृतकायसंरम्भ, कारित कायसंरम्भ, तथा अनुमत कायसंरम्भ, ऐसेही कृत वाक्- संरम्भ, कारित वाक्संरम्भ तथा अनुमत वाक्संरम्भ, तथा कृतमनःसंरम्भ, कारितमनः संरम्भ, और अनुमतमनःसंरम्भ । इसीप्रकार समारम्भ और आरम्भके साथभी काय आदिके योजनपूर्वक कृत, कारित तथा अनुमतके योजनसे प्रत्येकके तीन २ भेद होते हैं और यह भी पुनः प्रत्येक कपायके विशेषसे चार २ प्रकारके होते हैं। जैसे-क्रोधकृत : कायसंरंभ, मानकृत कायसंरंभ, मायाकृत कायसंरंभ, लोभकृत कायसंरंभ; क्रोधकारित कायसंरंभ, मानकारित कायसंरम्भ, मायाकारित कायसंरम्भ, लोभकारित कायसंरंभ; क्रोधानुमत कायसंरंभ, मानानुमत कायसंरम्भ, मायानुमत कायसंरंभ, लोभानुमत कायसंरंभ | इसीप्रकार वाग तथा मनके साथभी योजित करके कहना चाहिये। जैसे—क्रोधकृत वाक्संरम्भ, मानकृत वाक्संरम्भ, मायाकृत वाक्संरम्भ, तथा लोभकृत वाक्संरम्भ, इसी रीतिसे कारित आदिको लगाके समझलेना । और ऐसेही समारंभ तथा आरंभके भी भेद होगे। इसप्रकार संक्षेपसे जीवाधिकरणके प्रत्येक (संरम्भादि) ३६ छत्तीस २ भेद होते है । और तीनोंके अर्थात् संरंभ आदिके मिलके एकसौ आठ (१०८) हुए । क्योंकि छत्तीसको त्रिगुण करनेसे (१०८) होते है । कपायसहित होनेसे संरम्भ होता है, परितापनासे अर्थात् दुःख आदि संप्रदानसे ममारम्भ होता है, और प्राणियोंका वध करना आरम्भ होता है. इसप्रकार त्रिविध हेतुसे त्रिविध योग समझना चाहिये ॥ ९ ॥ अनाह । अथाजीवाधिकरणं किमिति । अत्रोच्यते- अब यहांपर कहते है कि अजीव अधिकरण क्या है? । इसके उत्तरमें यह अग्रिम सूत्र कहते है- निर्वर्तनानिक्षेपसंयोगनिसर्गा द्विचतुर्दित्रिभेदाः परम् ॥ १०॥ मुत्रार्थ-पर अर्थात् अजीव अधिकरणके निर्वर्तना, निक्षेप, संयोग तथा निसर्ग ये चार भेद संक्षेपसे हैं । और निर्वर्तना आदिके क्रमसे दो, चार, दो, तथा तीन भेद है। भाग्यम्-परमिति सूत्रक्रमप्रामाण्यादजीवाधिकरणमाह । तत्समासतश्चतुर्विधम् । तद्यथा- निवर्तना निक्षेपः संयोगो निसर्ग इति ।। तत्र निर्वर्तनाधिकरणं द्विविधम् । मूलगुणनिर्वर्तना- धिकरणमुत्तरगुणनिर्वर्तनाधिकरणं च । तत्र मूलगुणनिर्वर्तनाः पञ्च, शरीराणि वामनःप्राणा- पानाच । उत्तरगुणनिवर्तना काप्टपुस्तचित्रकर्मादीनि ।। निक्षेपाधिकरणं चतुर्विधम् । तद्यथा- प्रत्यक्षितनिक्षेपाधिकरणं दुःप्रमार्जितनिक्षेपाधिकरणं सहसानिक्षेपाधिकरणमनाभोगनि- अंपाधिकरणमिनि ।। संयोगाधिकरणं द्विविधम् । भक्तपानसंयोजनाधिकरणमुपकरणसंयोज- नाधिकरणं च ॥ निसर्गाधिकरणं त्रिविधम् । कायनिसर्गाधिकरणं वाडिसर्गाधिकरणं मनो- निमगाधिकरणमिति ।

सभाष्यतत्त्वार्थाधिगमसूत्रम् । १४७ विशेषव्याख्या-"अधिकरणं जीवाजीवा" (अ०६ सू० ८)इस सूत्रके क्रमसे यहां 'पर' शब्दसे अजीव अधिकरणका ग्रहण है, और वह निर्वर्तना, निक्षेप, संयोग, तथा निसर्ग, इन चार भेदोंमें संक्षेपसे विभक्त है। उनमें निर्वर्तनाधिकरणके दो भेद हैं । जैसे- मूलगुणनिर्वर्तनाधिकरण तथा उत्तरगुणनिर्वर्तनाधिकरण । उनमें भी मूलगुणनिर्वर्तना पञ्च- विध है, जैसे-शरीर (औदरिक आदि), वाक्, मन, तथा प्राण व अपान । और उत्तरगुण- निर्वर्तनाधिकरण काष्ठ, पुस्त, चित्रकर्मादिक । निक्षेपाधिकरण चार प्रकारका है। जैसे- अप्रत्यवेक्षित निक्षेपाधिकरण अर्थात् विना अन्वेषण किये किसी वस्तुको कही स्थापित करना । द्वितीय दुःप्रमार्जित निक्षेपाधिकरण अर्थात् उत्तमतासे मार्जन ( सफाई ) किये विना कहीं कुछ रख देना । तृतीय सहसानिक्षेपाधिकरण अर्थात् अकस्मात् (एकदम) कुछ रख देना । चौथा अनाभोगनिक्षेपाधिकरण अर्थात् विना शुद्ध किये तथा विना देखे स्थानमें शरीर आदिका रख देना । संयोगाधिकरण दो प्रकारका है । जैसे-भक्तपान (अन्नपान) संयोजनाधिकरण, तथा उपकरण (भोजनसे भिन्न अन्य सामग्री वस्त्राभूषण आदि) संयो- जनाधिकरण । और चतुर्थ निसर्गाधिकरण, तीन प्रकारका है । जैसे कामनिसर्गाधिकरण, वागनिसर्गाधिकरण, तथा मनोनिसर्गाधिकरण । अत्राह । उक्तं भवता सकषायाकषाययोर्योगः साम्परायिकापथयोरास्रव इति । साम्परा- यिकं चाष्टविधं वक्ष्यते । तत् किं सर्वस्याविशिष्ट आस्रव आहोवित्प्रतिविशेपोऽस्तीति । अनोच्यते । सत्यपि योगत्वाविशेषे प्रकृति कृति प्राप्यास्रवविशेषो भवति । तद्यथा- अब कहते हैं कि आपने सकषाय तथा अकषायका योग साम्परायिक तथा ईर्यापथ- का आस्रवरूप ( अ० ६ सू० ५ में ) कहा है 'सो साम्परायिक आठ प्रकारका है। यह आगे ( अ० ६, सू० २६ मे ) कहेंगे। सो यहांपर प्रश्न यह है कि सब योगोंका आस्त्रव अविशिष्ट ( विना किसी विशेषके ) है अथवा कुछ विशेष है ? । इस पर कहते है कि यद्यपि योगस्वरूपमें विशेषता न रहनेपर भी प्रकृतिकी कृतिको प्राप्त होकर आस्रवमे विशेषता होती है । जैसे- तत्प्रदोषनिह्नवमात्सर्यान्तरायासादनोपघाता ज्ञानदर्शनावरणयोः॥११॥ सूत्रार्थ-~-ए तत्प्रदोषादिक ज्ञानावरण तथा दर्शनावरणके आलवके कारण है। भाष्यम्-आस्रवो ज्ञानस्य ज्ञानवतां ज्ञानसाधनानां च प्रदोषो निह्नवो मात्सर्यमन्तराय आसादन उपघात इति ज्ञानावरणाखवा भवन्ति । एतैर्हि ज्ञानावरणं कर्म वध्यते । एवमेव दर्शनावरणस्येति ॥ विशेषव्याख्या-ज्ञान अथवा ज्ञानके साधनों, वा ज्ञानियोंके प्रदोष, निब (ज्ञाना- दिका छिपाना, जैसे-जानते हुए भी कहना कि यह मैं नहीं जानता) मात्सर्य (डाह, देन- योग्य ज्ञानको नहीं देना),अन्तराय (ज्ञानका व्यवच्छेद करना) आमादन (ज्ञान प्रकाश करते and . . , १५० रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् परिग्रह नरककी, माया तिर्यग्योनिकी और अल्पारंम परिग्रह तथा स्वभावमृदुता आदि मनुप्यकी आयुके आत्रक्के हेतु है ( अ० ६ सू० १६-१७-१८-) ॥ १९ ॥ अथ देवस्यायुपः क आस्रव इति । अत्रोच्यते- अव कहते हैं कि देव आयुषके आस्रवका हेतु क्या है ? । इसपर कहते हैं सरागसंयमसंयमासंयमाकामनिर्जरावालतपांसि देवस्य ॥ २० ॥ सूत्रार्थ-सरागसंयम, संयमासंयम, अकामनिर्जरा, तथा बालतप ए सब दैव आयुषके आलब होते हैं। भाप्यम्-संयमो विरतितमित्यनर्थान्तरम् । हिंसानृतस्तेयाब्रह्मपरिग्रहेभ्यो विरतिर्वत- मिति वश्यते ।। संयमासंयमो देशविरतिरणुव्रतमित्यनर्थान्तरम् । देशसर्वतोऽणुमहती इत्यपि वक्ष्यते ।। अकामनिर्जरा पराधीनतयानुरोधाचाकुशलनिवृत्तिराहारादिनिरोधश्च ॥ वालतपः । वालो मूढ इत्यनान्तरम् । तस्य तपो बालतपः । तचाग्निप्रवेशमरुत्प्रपातजलप्रवेशादि ॥ तदेवं सरागसंयम संचमासंचमादीनि च देवस्यायुष आस्रवा भवन्तीति ।। विशेषव्याख्या--संयम अर्थात् विरति, क्योंकि संयम, विरति, व्रत ए सब एकार्थवाचक है ॥ हिसा, अनृत (झूठ), स्तेय (चोरी), अब्रह्म (ब्रह्मचर्यका न होना) तथा परिग्रह इनसे जो विरति (विरक्तता वा निवृत्ति) सो व्रत है ऐसा आगे (अ० ७ सू० १ मे.) कहेंगे, तथा संयमासंयम, देशमे विरति, अणुव्रत ए सब एकार्थवाचक है अतएव देश तथा विदेशमसे हिंसादिविरति अणुव्रत तथा महावत होता है। यहभी (अ० ७ सू० २ में) आगे कहंगे. और 'पराधीनतासे अकुशल (दुष्ट कुकर्मादि) कमोंसे निवृत्ति तथा आहारका निरोध अर्थात् अपनी इच्छा न रहते भी पराधीनताके कारणसे अकुशल कार्योंसे निवृत्त रहना, तथा भोजन विपयादि सेवन न कर सकना' यह अकामनिर्जरा हैं । तथा बाल और मूढ़ एभी समानार्थक हैं । उस मूढका जो तप है उसको वालतप कहते हैं। वह बालतप अग्निने प्रवेश, महावायुका पान वा पर्वतपरसे गिरना अथवा जलमें प्रवेश करना आदि हैं । इस रोतिसे सरागसंयम, तथा संयमासंयमादि दैव आयुषके आस्रवके हेतु होते है ॥२०॥ लय नान्नः क आस्रव इति । अत्रोच्यते-- अव इसके पश्चात् नामक्रमका क्या आनंव है? । यह कहते हैं- योगचक्रना चिसंवादनं चाशुभस्य नाम्नः॥२१॥ भाप्यम्-कायवाड़ानोयोगवक्रता विसंवादनं चाशुभस्य नान्न आस्त्रवो भवतीति ।। मन्त्रार्थ-विशेपव्याख्या-काय, वाग तथा मनोरूप जो योग है उसकी वक्रता , सभाष्यतत्त्वार्थाधिगमसूत्रम् । १५१ अर्थात् कुटिलता और विसंवादन अर्थात् अन्यथा प्रवर्तन कराना ए अशुभ नामके आस्रवके हेतु होते है ॥ २१ ॥ विपरीतं शुभस्य॥ २२॥ सूत्रार्थ—पूर्वकथितसे विपरीत शुभनामका आस्रव है । भाष्यम्-एतदुभयं विपरीतं शुभस्य नाम्न आस्रवो भवतीति ॥ किं चान्यत्- विशेषव्याख्या-पूर्वकथनसे विपरीत अर्थात् काय, वाग् तथा मनोरूप योगकी सरलता, और अविसंवादन (यथार्थप्रवर्तन) ए सब शुभ नामके आस्त्रबके हेतु है ॥ २२ ॥ तथा- दर्शनविशुद्धिविनयसंपन्नता शीलवतेष्वनतिचारोऽभीक्ष्णं ज्ञानोपयो- गसंवेगौ शक्तितस्त्यागतपसी सङ्घसाधुसमाधिवैयावृत्यकरणमहदा- चार्यबहुश्रुतप्रवचनभक्तिरावश्यकापरिहाणिर्मार्गप्रभावना प्रवचनवत्स- लत्वमिति तीर्थकृत्त्वस्य ॥ २३ ॥ सूत्रार्थ-दर्शनविशुद्धि व विनय सम्पन्नताआदि तीर्थकरनामके आस्रव होते है, अति- प्रकृष्ट अर्थात् सर्वोत्तम दर्शनविशुद्धि (शुद्धता), विनयसम्पन्नता ( चार प्रकारके विनयका साहित्य), शीलवतोंमें सर्वथा अनतिचार अर्थात् प्रमादका अभाव, निरंतर ज्ञानोपयोग, तथा संवेग (संसारसे वैराग्य और धर्मसे अनुराग), शक्तिके अनुसार त्याग (दानादि) तथा तप, सङ्घ (चातुर्वर्ण्यसमूह ) तथा साधुओंकी समाधि और वैयावृत्य (अनेक प्रकारकी सेवा शुश्रूषादि करना) अर्हत् , आचार्य, बहुश्रुत, तथा शास्त्रकी परमभावोंकी विशुद्धिसे भक्ति, सामायिकादिक आवश्यककी अपरिहारणि (अत्याग), मार्गप्रभावना (जैनधर्मके महत्वका प्रख्यापन ) और प्रवचनवत्सलता ये सब गुण तीर्थकर नाम कर्मके आस्त्रव है । भाष्यम्-परमप्रकृष्टा दर्शनविशुद्धिः । विनयसंपन्नता च । शीलवतेष्वात्यन्तिको भृशम- प्रमादोऽनतिचारः । अभीक्ष्णं ज्ञानोपयोगः संवेगश्च । यथाशक्तितस्त्यागस्तपश्च । सङ्घस्य साधूनां च समाधिवैयावृत्यकरणम् । अर्हत्वाचार्येषु बहुश्रुतेषु प्रवचने च परमभावविशुद्धियुक्ता भक्तिः । सामायिकादीनामावश्यकानां भावतोऽनुष्ठानस्यापरिहाणिः । सम्यग्दर्शनादेर्मोक्षमा- र्गस्य निहत्य मानं करणोपदेशाभ्यां प्रभावना । अर्हच्छासनानुष्टायिनां श्रुतधराणां बाल- द्धतपस्विशैक्षग्लानादीनां च सङ्ग्रहोपग्रहानुग्रहकारित्वं प्रवचनवत्सलत्वमिति । एते गुणाः समस्ता व्यस्ता वा तीर्थकरनाम्न आस्रवा भवन्तीति ।। विशेषव्याख्या-दर्शन (सम्यक्दर्शन ) की परमोत्कृष्ट विशुद्धि, विनययुक्तता, शीलन- तोंमें अनतिचार अर्थात् शीलव्रतोंका अतिचार (दोप)रहित पालन करना, अभीक्ष्णं अर्थात् सदा ज्ञानोपयोग तथा संवेग, तथा यथाशक्ति दान (सुपात्रोंको दान) तथा तप, सद्ध १ जो खधर्मी हो वह चातुर्वर्ण्यसमुदाय संघशब्दसे विवक्षित भान होता है । , रायचन्द्र जैनशाखमालायाम् १५२ तथा साधुओंकी समाधि और वैयावृत्यकरण अर्थात् संघकी समाधि (समाधान) और माधुओंका वैयावृत्यकरण अर्थात् शरीर, वाक् तथा मनोयोगसे सेवा टहल करनी । तथा अर्हत्परमर्पियोंम, आचार्योम, बहुश्रुतों अर्थात् सर्वशास्त्रज्ञानसम्पन्नों में,और शास्त्रों में परमभाव- विशुद्धियुक्त भक्ति । और आवश्यक अर्थात् सामायिक आदिकी परमशुद्धभावसे अनुष्ठानद्वारा अपरिहाणि अर्थात् त्यागका अभाव । और सम्यग् दर्शन आदि जो मोक्ष- मार्ग हैं उनके अनुष्ठान तथा उपदेश आदिसे उनकी प्रभावना, अर्थात् उनकी महिमाको सवपर प्रगट करना । और अर्हत्शासनके अनुष्ठान करनेवाले श्रुतघरोंके ऊपर तथा बाल वृद्ध तपस्वी और शैक्षग्लान आदिके ऊपर संग्रह (मेल) उपग्रह (उपकार) तथा अनुग्रह आदिका जो करना है वह प्रवचनवत्सलता है। ये पूर्वोक्त सब गुण मिलित तथा पृथक् २ अर्थात् ये दर्शनविशुद्धि, विनयसम्पन्नता आदि सब गुण मिलते हों वा इनमेसे यथासंभव एक दो चार हों तो तीर्थकर नामकर्मका आस्रव होते है । अर्थात् इन गुणोंसे तीर्थकर कर्मका वध होता है ।। २३ ॥ परात्मनिन्दाप्रशंसे सदसद्गुणाच्छादनोद्भावने च नीचैर्गोत्रस्य ॥ २४ ॥ सूत्रार्थ-दूसरोंकी निदा व अपनी प्रशंसा, सद्गुणोंका आच्छादन और असद्गुणोंका उद्भावन अर्थात् प्रकट करना ये सव नीचैर्गोत्र (नीचकुल) के आस्त्रव होते है । भाप्यम्-परनिन्दात्मप्रशंसा सगुणाच्छादनमसद्गुणोद्भावनं चात्मपरोभयस्थं नीचैर्गोत्र- स्यास्रवा भवन्ति ॥ विशेपव्याख्या-सर्वत्र आत्म-(अपनी) प्रशंसा वा अन्य पुरुषोंकी निदा, तथा अन्यप्राणियोमें जो उत्तम गुण विद्यमान है उनका तो आच्छादन करना अर्थात् छिपाना और अपने जो उत्तम गुण नहीं है उनको उत्तम गुण करके लोकमे प्रगट करना तथा अपने असद् अर्थात् निद्यगुणोंको गुप्त रखना, ये नीचेगोत्र (नीचकुल) में उत्पत्तिके आववके हेतु हैं ॥ २४ ॥ तद्विपर्ययो नीचैवृत्त्यनुत्सेको चोत्तरस्य ।। २५॥ भाष्यम्-उत्तरस्वेति सूत्रक्रमप्रामाण्यादुच्चैर्गोत्रवाह । नीचैर्गोत्रास्रवविपर्ययो नीचैर्वृत्ति- रनुत्सकश्चोबर्गोत्रस्यानवा भवन्ति ।। सूत्रार्थ-विशेषव्याख्या-नीचैर्गोत्रके जो आवव कहे है, उसके विपर्याय अर्थात् अपनी निदा और दूसरोंकी प्रशंसा, दूसरोंके असद्गुणोंका गोपन और मत् (उत्तम) गुणोंका। प्रकट करना, सबसे नीचैवृत्ति अर्थात् नम्रताका वर्ताव रखना, तथा अनुत्सेक अर्थात् निर्मान गर्न न करना, ये सब गुण उच्चैर्गोत्र (उच्चकुल)म उत्पत्तिके आस्रव होते है ॥२५॥ , , १ नौनि उसयो कहते है कि-विनवप्रवण (विनयकी ओर झुकीहुई) वाकूकायचित्तता अर्थात् मन, सन्म नम्र वर्ताव करना.

सभाष्यतत्त्वार्थाधिगमसूत्रम् । १५३ विघ्नकरणमन्तरायस्य ॥ २६ ॥ सूत्रार्थ-विघ्न करना अंतराय ( कर्म )के आस्रवका हेतु होता है । भाष्यम्-दानादीनां विघ्नकरणमन्तरायस्यास्रवो भवतीति । एते साम्परायिकस्याष्ट- विधस्य पृथक् पृथगास्रवविशेषा भवन्तीति ॥ इति तत्त्वार्थाधिगमेऽर्हत्प्रवचनसङ्हे भाष्यतः पष्ठोऽध्यायः समाप्तः ।। विशेषव्याख्याः-दानादिकके विषयमे जो विघ्न आदिका करना है वह अंतराय कर्मका आस्रव होता है । यह दर्शनावरण आदि अष्ट (आठ) प्रकारके साम्परायिकके पृथक् २ आस्रव दर्शाये गये ॥ २६ ॥ इत्याचार्योपाधिधारिठाकुरप्रसादशर्मप्रणीतभाषाटीकासमलङ्कतेऽर्हत्प्रवचन- सङ्ग्रहे भाष्यतः षष्ठोऽध्यायः॥ ६॥ -- अथ सप्तमोऽध्यायः। अत्राह । उक्तं भवता सद्वेद्यस्यास्त्रवेषु भूतव्रत्यनुकम्पेति, तत्र किं व्रतं को वा व्रतीति । अत्रोच्यते- अब यहांपर कहते हैं 'आपने प्रथम यह कहा कि सब प्राणियोंपर तथा व्रतियों में विशेष अनुकम्पा, तथा दानादि सद्वेद्य कर्मका आस्रव होता है (अ. ६ सू. १२), सो व्रत क्या है ? । और व्रतको धारण करनेवाले व्रती कौन है ? । इसके उत्तरमें यह अग्रिम सूत्र कहते है:- हिंसातस्तेयाब्रह्मपरिग्रहेभ्यो विरतिव्रतम् ॥१॥ सूत्रार्थ-हिंसा और असत्य भाषण आदिसे निवृत्त होनेको व्रत कहते है। भाष्यम्-हिसाया अनृतवचनात्स्तेयादब्रह्मतः परिग्रहाच्च कायवाड्मनोभिर्विरतिर्बतम् । विरति म ज्ञात्वाभ्युपेत्याकरणम् । अकरणं निवृत्तिरुपरमो विरतिरित्यनान्तरम् ।। विशेषव्याख्या-हिंसासे, अनृत ( मिथ्या भाषणादि )से, स्तेय अर्थात् चोरीसे, अब्रह्म अर्थात् मैथुनप्रसंगसे और परिग्रह अर्थात् पदार्थसंचयसे शरीर, वाणी और मनके द्वारा जो विरति अर्थात् उपरम है उसको व्रत कहते है। विरति शब्दका अर्थ है कि किसी पदार्थको जानकर उसे तद्नुसार स्वीकार करके त्यागना । और अकरण (न करना), उपरम तथा निवृत्ति, विरति ये सब समानार्थवाची शब्द हैं। देशसर्वतोऽणुमहती ॥२॥ भाष्यम्--एभ्यो हिंसादिभ्य एकदेशविरतिरणुव्रतं सर्वतो विरतिर्महाव्रतमिति ।। सूत्रार्थ-विशेषव्याख्याः-इन हिंसा आदि पांच पापोंसे एकदेशविरनि तो अणुव्रत होता है और सर्वथा हिंसादिसे निवृत्ति होजानेसे महावत होता है ॥ २ ॥ २०

रायचन्द्रजनशास्त्रमालायाम्
१५४
तत्स्थैर्यार्थ भावनाः पञ्च पञ्च ।। ३ ।।
सूत्रार्थ-उन व्रतोंकी स्थिरताके निमित्त प्रत्येककी पांच २ भावना करनी चाहिये।
भाष्यम्-तस्य पञ्चविधस्य व्रतस्य स्थैर्यार्थमेकैकस्य पञ्च पञ्च भावना भवन्ति । तद्यथा-
अहिसायास्तावदीर्यासमितिर्मनोगुतिरेपणासमितिरादाननिक्षेपणसमितिरालोकितपानभोजन-
मिति ।। सत्यवचनस्यानुवीचिसापणं क्रोधप्रत्याख्यानं लोभप्रत्याख्यानमभीरुलं हान्यप्रत्या.
ख्यानमिति ॥ अलेयस्यानुवीच्यवग्रहयाचनमभीक्ष्णावग्रहयाचनमेवावदित्यवग्रहावधारणं
समानधार्मिकेभ्योऽवग्रहयाचनमनुज्ञापितपानभोजनमिति ॥ ब्रह्मचर्यस्य त्रीपशुपण्डकसं
सक्तशयनासनवर्जनं रागसंयुक्तस्त्रीकथावर्जनं बीणां मनोहरेन्द्रियालोकनवर्जनं पूर्वरतानु.
स्मरणवर्जनं प्रणीतरसभोजनवर्जनमिति ॥ आकिञ्चनस्य पञ्चानामिन्द्रियार्थानां स्पर्शरस
गन्धवर्णशब्दानां मनोजानां प्रामौ गायवर्जनममनोज्ञानां प्राप्नो द्वेपवर्जनमिनि ॥
कि चान्यदिति।
विशेषव्याख्या-वह जो अहिंसा आदि पांच प्रकारके व्रत कहे है, उनकी स्थिरता
अर्थात् दृढताके अर्थ प्रत्येक व्रतकी पांच २ प्रकारकी भावना करनी चाहिये । जैस-प्रथम
अहिंसा व्रतकी स्थिरताके अर्थ ई-समिति १ मनोगुप्ति २एपणासमिति ३.आदान-निक्षेपणस-
मिति, ४ और आलोकितपानभोजन ५, तथा सत्य व्रतकी स्थिरताके लिये अनुवीचिभाषण
(अनिद्यभापण)१ क्रोधप्रत्याख्यान (क्रोधका त्याग) २ लोभप्रत्याख्यान (लोभका त्याग,
३ अभीरुत्व अर्थात् भयका अमाव ४ और हास्यका प्रत्याख्यान ( अभाव ) ५।
अचार्य व्रतके स्थैर्यके लिये भी अनुवीचि-अवग्रह-याचन (अनिंद्य पदार्थका ग्रहण
तथा याचन) १ निरंतर अनिघ याचन २ इतना ही हमारे लिये पर्याप्त होगा इस प्रकार-
के विचारपूर्वक पदार्थोका ग्रहण ३ समानधर्मियोंसे ही अवग्रहयाचन ४, और अनु-
ज्ञापित (आज्ञा दिए हुए पदार्थोका) पान तथा भोजन ५, तथा ब्रह्मचर्य व्रतकी स्थिरताके
लिये श्री, पशु और नपुंसकके संबंध वा संपर्कवाले शयन, शय्या आदि और आसन-
का वर्जन १ रागयुक्त वियांकी कथाका वर्जन (निषेध)२ स्त्रियोंके मनोहर अझोंकेदर्शनका
निध ३ पूर्वकालमें किये हुए स्त्रीप्रसंग आदिक स्मरणका निषेध ४ तथा अति-
पुष्टिकारक वा कामोत्पादक भोजनका निषेध (अभाव) ५ तथा अकिचन अर्थात्
अपरिग्रहवतकी स्थिरताके अर्थ पाँचो इंद्रियोंके जो अर्थ (विषय) स्पर्श, रस, गंध. वर्ण तथा
शब्द है: वे यदि मनोज्ञ (अपनेको इष्ट वा अभिलपित) प्राप्त हों तव तो गार्य अर्थात
लोलुपता वा लुब्धताका वर्जन और यदि अमनोज्ञ (अनिष्ट) प्राप्त हों तव द्वेपका वर्जन
अर्थात् निषेधरूपसे भावना न करनी । इस रीति पांचो व्रतोंकी दृढताके लिये प्रत्येकक
अर्थ पांच २ भावना दर्शाई गई ॥ ३ ॥ और भी-
हिंसादिविहामुत्र चापायावद्यदर्शनम् ॥४॥

सभाप्यतत्त्वार्थाधिगमसूत्रम् । १५५ सूत्रार्थ-हिंसादिक जो पांचो है उनमें इस लोक तथा परलोकमे भी अपाय (श्रेय स्कर कार्योके नाश)का प्रयोग तथा अवद्य (निदा) दर्शनकी भावना करै ॥ १ ॥ भाष्यम्-हिंसादिपु पञ्चस्खास्रवेष्विहामुत्र चापायदर्शनमवद्यदर्शनं च भावयेन । तद्यथा । हिंसायास्तावत् हिंस्रो हि नित्योद्वेजनीयो नित्यानुवद्धवैरश्च । इहैव वधवन्धपरि- केशादीन्प्रतिलभते प्रेत्य चाशुभां गतिं गर्हितश्च भवतीति हिंसाया व्युपरमः श्रेयान । तथानृतवाद्यश्रद्धेयो भवति । इहैव जिह्वाछेदादीन्प्रतिलभते मिथ्याभ्याख्यानदुःवितेभ्यश्च बद्धवैरेभ्यस्तदधिकान्दुःखहेतून्प्राप्नोति प्रेत्य चाशुभां गतिं गर्हितश्च भवतीत्यनृतवचनायु- परमः श्रेयान् ॥ तथा स्तेनः परद्रव्यहरणप्रसक्तमतिः सर्वस्योद्वेजनीयो भवतीति । इहव चाभिघातवधबन्धनहस्तपादकर्णनासोत्तरौष्ठच्छेदनभेदनसर्वस्वहरणवध्ययातनमारणादीन्प्रति- लभते प्रेत्य चाशुभां गात गहितश्च भवतीति स्तेयायुपरमः श्रेयान् ।। तथाऽब्रह्मचारी विभ्रमो- द्भान्तचित्तः विप्रकीर्णेन्द्रियो महान्धो गज इव निरङ्कुशः शर्म नो लभते । मोहाभिभूतन कार्याकार्यानभिज्ञो न किचिदकुशलं नारभते । परदाराभिगमनकृतांश्च इहैव वैरानुवन्धलिङ्ग- च्छेदनवधबन्धनद्रव्यापहारादीन्प्रतिलभतेऽपायान्प्रेत्य चाशुभां गति गतिश्च भवतीत्य- ब्रह्मणो व्युपरमः श्रेयानिति ॥ तथा परिग्रहवान् शकुनिरिव मांसपेशीहस्तोऽन्येषां ऋव्या- दशकुनानामिहैव तस्करादीनां गम्यो भवति ॥ अर्जनरक्षणक्षयकृतांश्च दोपान्प्राप्नोति । न चास्य तृप्तिर्भवतीन्धनैरिवाग्नेर्लोभाभिभूतत्वाच कार्याकार्यानपेक्षो भवति । प्रेत्य चाशुभां गनि राप्नोति लुब्धोऽयमिति च गर्हितो भवतीति परिग्रहाद्वथुपरमः श्रेयान् ।। कि चान्यन विशेषव्याख्या-हिंसा तथा मिथ्याभाषणादि पांचोंके आत्राम इम लोक तथा मृत्यु श्चात् परलोकमें अपायदर्शन तथा अवद्यदर्शनकी भावना करै । अर्थात् हिसादिके विषे इन लोकमें तथा परलोकमें भी श्रेयःप्रणाश तथा निदायुक्तकी दृष्टि रक्खे, कि-ये जीवके श्रेष्ठ कार्योंके नाशक तथा निंद्यके जनक हैं । जैसे-हिंसाकारी जीव नित्यही भय उद्वेगादिमे नित्य राणियों में बद्धवैर होता है । अत एव हिंसाशील जीव इसी लोकमे वध तथा तथा वं- रन आदि क्लेशोंको प्राप्त होता है, और मृत्युके अनंतर परलोकम अशुभगतिको प्राम होता है और उभय लोकमे निन्दित भी होता है, इत्यादि कारणोंले हिमामे निवृति होना ही कल्याणकारक है । इसी प्रकार असत्यवादी भी इस लोकमें विश्वासक अयोग्य होता है । और यहांही पर राजा आदिके द्वारा जिहा आदिक. छेदन नया कारागृह क्लेशोंको प्राप्त होता है और मिथ्याकथनसे दुःखित लोगोंने नदा बयर होनी उनके द्वारा उनसेभी अधिक दुःख हेतुओंको प्राप्त होता है. मरणके अनंतर अगम तिको प्राप्त होता है और उभय लोकमे निन्दितभी होता है. इत्यादि हनुमान मेथ्याभाषणसे उपरम होनाही कल्याणकारक है, इसी प्रकार चोरी करनेवाला प्राणीभी 'सरोंके द्रव्यके अपहरण करनेमे आसक्तत्रुद्धि होनेने सबस रजनीय अर्थात् प्राम भार- नादिके पात्र होता है और इसी लोकने राजा तथा चोरीन टुम्नि जान नादिन ।

रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् १५६ वंधन, हस्त, पाद, कर्ण, तथा नासिका और ओष्ठके छेदन-भेदन, सर्वस्वहरण, तथा वध मारणआदि पीडाओंको प्राप्त होता है और मृत्युके अनंतर अशुभ गतिको प्राप्त होता है तथा उभय लोकमें निन्दितभी होता है । इत्यादि कारणोंसे चौर्यकर्मसे निवृत्त होनाही कल्याणकारक होता, है इसी प्रकार अब्रह्मचारी अर्थात् व्यभिचारी (परस्त्रीगामी) जन विभ्रमसे सदा उद्भान्तचित्त अर्थात् विभ्रमसे पूर्ण, इंद्रियोंकी लोलुपतासे पूर्ण अत एव मदांध हाथीके समान निरङ्कुश (स्वेच्छाचारी) होनेसे शांतिको कदापि नहीं प्राप्त होता है और मोहग्रस्त अज्ञान वा अविवेकसे पूर्ण अकर्तव्य तथा कर्तव्यसे अनभिज्ञ, अर्थात् क्या हमारा कर्तव्य है और क्या अकर्तव्य है इस प्रकारके विवेकसे शून्य होनेसे कौनसे अकुशल (दुष्ट) कर्मका आरम्भ नहीं करता ? अर्थात् सभी दुष्कर्मोंका आरंभ करता है और इसी लोकमें परस्त्रीगमनआदिसे उत्पन्न वैरानुबंधसे लिङ्गच्छेदन, वध, बंधन, तथा द्रव्यादिके अपहरणआदि अनेक क्लेशोंको प्राप्त होता है, इस प्रकारके अनेकविध पूर्ण क्लेशोंको भोगकर मरणके पश्चात् परलोकमे अशुभ गतिको प्राप्त होता है और उभय लोकमे निन्दित होता है, इत्यादि हेतुओंसे परस्त्रीआदिगमनसे निवृत्त होनाही कल्याण- कारक है । और ऐसेही परिग्रहवान् प्राणीभी तस्करों (चोरों )से अभिगमनीय (प्रापणीय वा लूटनेके योग्य ) होता है, जैसे मांस लिये हुए साधारण पक्षी अन्य मांसा- हारी जीवोंसे तथा धनके उपार्जन, रक्षण वा नाशसे उत्पन्न अनेक दुःखोंको प्राप्त होता है और कितना ही धनका संग्रह करे परन्तु धनोंसे इसकी तृप्ति ऐसे नही होती जैसे इंधनोसे अग्निकी, तथा अतिपरिग्रहके लोभसे ग्रस्त होनेके काण कर्तव्य अकर्तव्यके विवे- कलेभी शून्य हो जाता है और मृत्युके अनंतर अशुभ गतिको प्राप्त होता है और यह प्राणी अतिलोमी है इस प्रकार निन्दितभी होता है, इत्यादि हेतुओंसे परिग्रहसे उपरत ( अलग) होना हो कल्याणदायक है । इत्यादि भावना करनेसे अहिसादि बहुत दृढ होते हैं ॥ ४ ॥ और भी- दुःखमेव वा ॥५॥ मृत्रार्थ-अथवा 'हिंसाआदि पांच पापोंमे दुःखही दुःख है। ऐसी भावना करनी चाहिये। भाग्यम् -दुःग्यमेव वा हितादिपु भावयेत् ।। यथा ममाप्रियं दुःखमेवं सर्वसत्त्वाना- मिनि हिमाया व्युपरमः श्रेयान । यथा मम मिथ्याभ्याख्यानेनाभ्याख्यातस्य तीवं दुःखं भन भवनि च तथा सर्वसत्त्वानामिति अनृतवचनाद्वयुपरमः श्रेयान् ॥ यथा ममेष्टद्रव्य- वियोग ठर भूतपूर्व भवति च तथा सर्वसत्त्वानामिति स्तेयाद्वयुपरमः श्रेयान् ॥ तथा गोदामकरमान्मधनं दु ग्यमेव । स्यादतत्म्पर्शनसुखमिति नच्च न । कुतः । व्याधिपती- दानापग्गिनवधानामव्याविप्रनीकारत्वादसुखे धम्मिन्सुखाभिमानो मूढस्य । तद्यथा- ।

सभाष्यतत्त्वार्थाधिगमसूत्रम् । १५७ तीव्रया त्वक्छोणितमांसानुगतया कण्ड्डा परिगतात्मा काष्ठशकललोष्टशर्करानखशुक्तिभिर्वि- च्छिन्नगात्रो रुधिराः कण्डूयमानो दुःखमेव सुखमिति मन्यते । तद्वन्मैथुनोपसेवीति मैथुना- द्वघुपरमः श्रेयान् ॥ तथा परिग्रहवानप्राप्तप्राप्तनष्टेषु काङ्क्षारक्षणशोकोद्भवं दुःखमेव प्राप्नोतीति परिग्रहाद्युपरमः श्रेयान् । इत्येवं भावयतो तिनो व्रते स्थैर्य भवति ॥ किं चान्यत् । विशेषव्याख्या--जैसे दुःख मुझे अप्रिय है और प्राणोंको शरीरसे पृथक् करना मुझे इष्ट नहीं है, ऐसेही संपूर्ण जीवोंको दुःख अप्रिय है इस हेतुसे हिंसासे उपरम- ही कल्याणकारी है । जैसे मिथ्याभाषणसे मुझे दुःख होता है अर्थात् मेरे विषयमें यदि कोई मिथ्याभापण करे तो मुझे अतिदुःख होता है और प्रथमभी इससे दुःख हुआ है, ऐसेही अन्य प्राणीके विषयमें मिथ्याभाषणसे उस अन्य प्राणीकोभी दुःख होगा इस हेतुसे मिथ्याभापणसे विरत होनाही उत्तम है । तथा जैसे मुझे इष्ट पदार्थोंके वियोगसे दुःख होता है और पूर्व हुआ भी ऐसेही यदि चोरी करके उनका इष्ट पदार्थसे वियोग कर देवेंगे तो सब प्राणीमात्रको दुःख होगा, इत्यादि हेतुओंसे चोरीसे पृथक् होनाही कल्याणदायक है । ऐसेही रागद्वेषसे पूर्ण होनेसे मैथुनप्रसंगभी दुःखही है। कदाचित् यह कहो कि-मैथुनमें जो स्पर्शन इंद्रियसे सुख होता है वह दुःख नहीं है, सो यह कथन भी असंगत है । क्योंकि यह व्याधिका प्रतीकार अर्थात् रोगका प्रतीकार होनेसे कण्डू (खुजली )से व्याप्त मनुष्यको संघर्षण (खुजलाहट ) आदिद्वारा उसको प्रतीकार (उपाय)के समान मैथुनेच्छारूप व्याधि (रोग )के प्रतीकारके होनेसे सुखसे रहित इस मेथुनमे स्पर्शजन्य सुखमे मूढ़ पुरुषको सुखका अभिमान है, यथार्थमें सुख नहीं होता। जैसे- अतितीव्र त्वचा रुधिर तथा मांसमें व्याप्त कण्डू (दाह आदि खुजलाहट )से व्याप्त प्राणी काष्ठके खण्डसे, लोहके खण्डसे, कंकणसे, तथा नख, शुक्ति (सीप) आदिके संघर्षणसे अर्थात् इन पदार्थोसे खुजलानेसे छिन्न शरीर और रुधिरसे व्याप्त होनेपरभी खुजलाता हुआ दुःखकोही सुख मानता है, ऐसेही मैथुनका सेवी भी दुःखको ही सुख मान बैठता है, इस हेतुसे मैथुनसे उपराम होनाही कल्याणकारी है। ऐसे ही परिग्रहवान् प्राणी भी अप्राप्त पदार्थके प्राप्त होनेकी आकाड्ला तथा अर्जनादिसे प्राप्तके रक्षणसे और प्राप्त होकर नष्ट होनेके शोकसे उत्पन्न दुःखकोही पाता है, इन कारणोंसे परिग्रहसे उपराम होनाही कल्याणदायक है। इस प्रकार हिंसाआदि पंच पापोंमे दुःखकीही भावना करनेसे व्रतीकी व्रतमें स्थिरता होती है । और भी- १ शका होसकती है कि-मैथुन तो स्पर्शद्वारा सुखकाही जनक है, उसमे स्त्रीपुरुषोमें किसीकोभी दुःख नहीं होता, किंतु दोनोको सुखही होता है ? इसका उत्तर "स्यात्" इत्यादिसे देते हैं। २ यहा पर "तत्" (सो) इस पदसे स्पर्शजन्य सुखसे तात्पर्य है ॥ ३ "इत्येवं भावयतो०" 'इस रीतिसे भावना करनेवाले' इत्यादि वाक्यमें जो (इत्येवं) यह पद दिया है इससे सूत्रकी समाप्ति दर्शाई है. इससे जो कोई भाष्यकोही 'व्याधिप्रतीकारत्वात्कण्डूपरिगतत्वाचाब्रह्मेति, तथामाप्सनष्टेषु कालाशोको प्राप्तेषु च रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् १५८ मैत्रीप्रमोदकारुण्यमाध्यस्थानि सत्त्वगुणाधिकक्लिश्यमाना विनयेषु ६ सन्नार्थ-सव जीवोंमें मैत्री, गुणाधिकमें प्रमोद, क्लेशयुक्तमें करुणा, तथा अशिक्षित दुष्ट जीवॉम औदासीन्यकी भावना करनी चाहिये। भाग्यम्-भावयेद्यथासङ्ख्यम् । मैत्री सर्वसत्त्वेषु । क्षमेऽहं सर्वसत्त्वानाम् । क्षमयेऽहं सर्वसत्त्वान् । मैत्री मे सर्वसत्त्वेपु । वैरं मम न केनचिदिति ।। प्रमोदं गुणाधिकेषु । प्रमोदो नाम विनयप्रयोगो बन्दनस्तुतिवर्णवादवैयावृत्त्यकरणादिभिः सम्यक्त्वज्ञानचारित्रतपोधिकेपु साधुपु परात्मोभयकृतपूजाजनितः सर्वेन्द्रियाभिव्यक्तो मनःप्रहर्ष इति ॥ कारुण्यं क्लिश्य- मानेपु । कारुण्यमनुकम्पा दीनानुग्रह इत्यर्थः । तन्महामोहाभिभूतेषु मतिश्रुतविभङ्गाज्ञानप- रिगतेपु विषयतर्षाग्निना दन्दह्यमानमानसेपु हिताहितप्राप्तिपरिहारविपरीतप्रवृत्ति विविधदु:- खार्दितपु दीनकृपणानाथवालमोमुहवृद्धेषु सत्त्वेपु भावयेत् । तथा हि भावयन् हितोपदे- शादिभिस्ताननुगृहातीति ।। माध्यस्थ्यमविनेयेपु । माध्यस्थ्यमौदासीन्यमुपेक्षेत्यनर्थान्तरम् । अविनेया नाम मृत्पिण्डकाप्ठकुड्यभूता ग्रहणधारणविज्ञानोहापोहवियुक्ता महामोहाभिभूता दुष्यावग्राहिताश्च । तेपु माध्यस्थ्यं भावयेत् । न हि तत्र वक्तुर्हितोपदेशसाफल्यं भवति ।। विशेपव्याख्या-मैत्री, प्रमोद, कारुण्य, तथा माध्यस्थ, इन चारोंका सलमात्र, गुणाधिक, क्लिश्यमान, और अविनेय इन चारोंके साथ यथासंख्य है। अर्थात् सत्व आदिमें मैत्री आदिकी भावना चाहिये । जैसे-संपूर्ण जीवोंमें मैत्री (मित्रता )की भावना करे । जैसे-सब जीवोंके अपराध आदि मै क्षमा करता हूं और संपूर्ण जीवोंसे अपना अपराध क्षमा करता हूं । तात्पर्य यह कि-सब जीवोंपर मैं मित्रताकी दृष्टि रक्खू और सब जीव मेरे ऊपर । मेरी मित्रता संपूर्ण जीवोंमे हो और मेरा वैर (विरोध) किसी प्राणीसे नहीं हैं ऐसी भावना करे। तथा जो अपनेसे अधिक विद्या आदि गुणसम्पन्न है उनमे प्रमोदकी भावना करनी चाहिये । प्रमोद कहते है विनयका प्रयोग अर्थात् स्तुति, वन्दना, वर्णवाद (प्रशंसा) तथा वैयावृत्यकरण अर्थात् सेवा शुश्रूषा आदि करनाः सम्यक्त्व, ज्ञान, चारित्र, और तप आदिमे अधिक जो साधु है उनने अन्य पुरुष तथा अपनेसे कृत जो पूजाआदि सत्कार है उस पूजाआदिसे उत्पन्न संपूर्ण इन्द्रियोंने प्रकट मनका प्रहर्प (अधिक आनन्द) होना यही गुणाधिकोंमे प्रमोन है, मो इन प्रमोदकी भावना गुणाधिकोंमें करनी चाहिये । तथा जो क्लिश्यमान है अर्थात् हपयुक्त है उनमे करुणाकी भावना करनी चाहिये । कारुण्य अर्थात् अनुकम्पा दया. दीनोक ऊपर अनुग्रह करना है । वह कारुण्य महामोहग्रस्त, मति श्रुत विभङ्ग आनए अज्ञानमे पूर्ण, विषयल्प तृष्णाकी अग्निसे रात्रि दिन दन्दह्यमान (अत्यन्त जाने रण) चित्तवालोंमें कि-जिनकी प्रवृत्ति हिताहितकी प्राप्ति तथा परिहार (त्याग समुपभोगवनुमिरिनि दम नायको जो सूत्र मानकर पढ़ते है वेह अनार्य है । यदि ये दोनों सूत्र 7ी नारया होती. यह नहीं है इमलिये टनको मन मानना यह अनार्प है।

. सभाष्यतत्त्वार्थाधिगमसूत्रम् । १५९ अर्थात् हितकी प्राप्ति, अहितका परिहार इनमें विपरीत है, तथा जो नानाप्रकारके दुःखोंसे दुःखी है उनपर तथा दीन, कृपण, अनाथ, बाल तथा अत्यन्त मोही वृद्ध जीवोंपर करनी चाहिये तथा ऐसी भावनाका चिन्तवन करता हुआ उनको हितोपदेशा- दिकके द्वारा अनुग्रहीतभी करे । और अविनेयोंमे माध्यस्थ्य अर्थात् उदासीनता रखनी चाहिये । माध्यस्थ्य उदासीनता तथा उपेक्षा, ये सब एकार्थवाचक शब्द है। जो मृत्तिकाके पिण्डके समान वा काष्ठ, भित्ति वा पाषाणके समान उपदेशादिके ग्रहण धारणमे असमर्थ, विज्ञान तथा ऊहापोह (प्रतिभा वा कल्पनाशक्ति )से रहित है, और महामोहसे ग्रस्त अथवा किसी पदार्थको दुष्टता वा विपरीतरूपसे ग्रहण किये हैं वा किसीसे विपरीत ग्रहण कराये गए है, वे अविनेय हैं। ऐसे जीवोंके विषयमें उदासीनताकी भावना करे । क्योंकि ऐसे जीवोंको उपदेश देनेसे वक्ताके हितोपदेशकी सफलता नहीं होती ॥ ६॥ कि चान्यत् । और यह भी है। जगत्कायखभावौ च संवेगवैराग्यार्थम् ॥७॥ सूत्रार्थ-संवेग तथा वैराग्यकी प्राप्तिके लिये जगत् तथा काय (शरीर)के स्वभा- वोंकी भावना करनी चाहिये ॥ ७॥ भाष्यम्-जगत्कायस्वभावौ च भावयेत् संवेगवैराग्यार्थम् । तत्र जगत्स्वभावो द्रव्या- णामनाद्यादिमत्परिणामयुक्ताः प्रादुर्भावतिरोभावस्थित्यन्यतानुग्रहविनाशाः । कायस्वभावोऽनि- त्यता दुःखहेतुत्वं निःसारताऽशुचित्वमिति ॥ एवं ह्यस्य भावयतः संवेगो वैराग्यं च भवति । तत्र संवेगो नाम संसारभीरुत्वमारम्भपरिग्रहेषु दोषदर्शनादरतिधर्म बहुमानो धार्मिकेपु च धर्मश्रवणे धार्मिकदर्शने च मनःप्रसाद उत्तरोत्तरगुणप्रतिपत्तौ च श्रद्धेति ॥ वैराग्यं नाम शरीरभोगसंसारनिर्वेदोपशान्तस्य बाह्याभ्यन्तरेषूपाधिष्वनभिष्वङ्ग इति ।। विशेषव्याख्या-संवेग और वैराग्यके अर्थ जगत् व कायके स्वभावोंकी भावना करै । उनमे प्रथम जगत्के स्वभावके विषयमें कहते है, जगत्के स्वभाव यह है कि- सम्पूर्ण द्रव्योंके अनादि तथा आदिमान् परिणामोंसे युक्त प्रादुर्भाव (प्रकट होना), तिरोभाव (लुप्त होना), अवस्थिति (पदार्थोकी कुछ कालस्थिति), परस्पर उपकार तथा विनाश, ऐसी भावमा करे । और कायखभाव क्या है कि-शरीरकी अनित्यता, दुःखों- की हेतुता, निःसारता, तथा मलादिसे युक्त होनेके कारण अपवित्रतादि । इस रीतिसे भावना करनेवाले जीवके संवेग तथा वैराग्य होते है । उनमेंसे संवेग नाम संसारसे भीरुता (भय वा डर), आरम्भ परिग्रहादि दोषोंके देखनेसे अरुचि, धर्ममें बहुमान, तथा धार्मिक प्राणियोंमें धर्मके श्रवणमें तथा धार्मिक पुरुषोंके दर्शनमे मनकी प्रसन्नता, और उत्तरोत्तर रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् उनके गुणोंका ज्ञान होनेपर उनमें अविक श्रद्धा, इत्यादि संवेग है। तथा शरीरमे, भो- गोले. संसारसे ग्लानि होनेपर शान्त पुरुषकी वाह्य तथा आभ्यन्तरकी जो उपाधियां हैं उनमें अनासक्ति, अर्थात् संसारसे शरीरसे भोगादिसे सर्वथा शान्त होकर आभ्यन्तर क्रोधादिक तथा विषयाम जो अप्रीति है वही वैराग्य है ॥ ७ ॥ अत्राह । उक्तं भवता हिसादिभ्यो विरतितमिति तत्र का हिसा नामेति । अत्रोच्यते । अव यहांपर कहते है कि आपने (श्रीआचार्यने) यह कहा है कि हिंसा आदि पांच महापापोंने जो निवृत्ति है वही व्रत है (अ. ७ सू. १); सो उन पांच पापोंमसे हिंसा क्या वस्तु है ? इसके उत्तरमें यह अग्रिम सूत्र कहते है:- प्रमत्तयोगात्प्राणव्यपरोपणं हिंसा ॥८॥ सूत्रार्थ-प्रमत्तयोगसे जो प्राणोंका शरीरसे पृथक्करण है उसको हिसा कहते हैं।॥८॥ भाष्यम्-प्रमत्तो यः कायवमनोयोगैः प्राणन्यपरोपणं करोति सा हिसा । हिसा मारणं प्राणातिपातः प्राणवधः देहान्तरसंक्रामणं प्राणव्यपरोपणमित्यनर्थान्तरम् ।। विशेषव्याख्या–प्रमत्त (कपायसहित) होकर काय, वाक् तथा मनोयोगोसे जो प्राणोंका व्यपरोपण अर्थात् प्राणोंका वध करना है; वही हिसा है। हिंसा, मारण, प्राणवध, प्राणातिपात, एक देहसे दूसरे देहमें जीवका संक्रामण और प्राणोंका व्यपरोपण, ये सब समानार्थक शब्द हैं ॥ ८॥ अन्नाह । अथानृतं किमिति । अत्रोच्यत- अब कहते है कि अनृत क्या है ? इसका उत्तर कहते है- असदभिधानमनृतम् ॥९॥ सूत्रार्थ-असत् अर्थात् मिथ्या जो कथन है उसको अनृत कहते है ॥ ९ ॥ भाष्यम्-असदिति सद्भावप्रतिषेधोऽर्थान्तरं गर्हा च ॥ तत्र सन्नावप्रतिषेधो नाम सद्भू- तनिह्नवोऽभूतोद्भावनं च । तद्यथा-नात्यात्मा नास्ति परलोक इत्यादि भूतनिह्नवः । श्यामाकतण्डुलमात्रोऽयमात्मा अङ्गुष्ठपर्वमात्रोऽयमात्मा आदित्यवर्णो निःक्रिय इत्येवमाच- मभूतोनावनम् ।। अर्थान्तरं यो गां ब्रवीत्यश्वमश्वं च गौरिति । गहेंति हिंसापारुष्यपैशुन्या- दियुक्तं वचः सत्यमपि गर्हितमनृतमेव भवतीति ।। विशेपव्याख्या--असत् पदसे यहांपर सद्भावका निषेध, अर्थान्तर, (जैसा यथार्थम हैं उससे अन्य अर्थ ) तथा गर्दा निन्दाका ग्रहण है, उनमे सद्भावका निषेध नाम सद्भूत अर्थका अपहब (छिपाना) और असत्का उद्भावन (प्रकटीकरण) । जैसे-'आत्मा नहीं है. परलोक नहीं है, इत्यादि सद्भूत पदार्थका अपहव अर्थात् निषेध है। और श्यामा (सना वा मेवई वा अतिसूक्ष्म चावलविशेष ) तण्डुलमात्र यह जीवात्मा है, ॥ अष्टके पर्वमात्र यह आत्मा है, आदित्यवर्ण है, निष्क्रिय है इत्यादि असद्भुत वस्तुका सभाष्यतत्त्वार्थाधिगमसूत्रम् । प्रकटीकरण है । अर्थान्तर वह है-जैसे गौको अश्व कहे और अश्वको गौ । गर्दा; हिंसा, पारुष्यवचन (कठोर मर्मवेधी वचन) तथा पैशुन्य (चुगुली) आदि युक्तवचन, यह यद्यपि सत्य हो तथापि गर्हित (निन्दित)होनेसे असत्यही है । अर्थात् गर्हित सत्यमी असत्यवत् है ॥ ९॥ अत्राह । अथ स्तेयं किमिति । अत्रोच्यते- अब यहांपर कहते है कि स्तेय क्या है ? इसके उत्तरमें यह सूत्र कहते हैं। अदत्तादानं स्तेयम् ॥१०॥ सूत्रार्थन दिये हुए पदार्थका ग्रहण करना स्तेय है ॥ १० ॥ भाष्यम्-स्तेयबुद्ध्या परैरदत्तस्य परिगृहीतस्य तृणादेव्यजातस्यादानं स्तेयम् ।। विशेषव्याख्या-स्तेय(चौर्य) बुद्धिसे अदत्त अर्थात् जिनसे वह पदार्थ सम्बध रखता है उन पुरुषोंके बिना दियेहुए परिगृहीत जो तृणसे आदि लेके यावत् द्रव्य है उनका ग्रहण करना अर्थात् लेलेना, इसीको स्तेय चोरी कहते है ॥ १० ॥ अत्राह । अथाब्रह्म किमिति । अत्रोच्यते- अब इसके पश्चात् कहते हैं कि 'अब्रह्म' क्या है ? इसपर यह कहते है- मैथुनमब्रह्म ॥११॥ भाष्यम्-खीपुंसयोमिथुनभावो मिथुनकर्म वा मैथुनं तदब्रह्म । सूत्रार्थ-स्त्रीपुरुषका जो मिथुनभाव वा मैथुनकर्म अथवा मैथुन (स्त्रीप्रसङ्ग) उसको अब्रह्म अर्थात् मैथुनसेवन कहते है ॥ ११ ॥ अत्राह । अथ परिग्रहः क इति । अत्रोच्यते- अब यहांपर कहते हैं कि इसके पश्चात् परिग्रह क्या है ? इसपर कहते हैं। मूर्छा परिग्रहः ॥१२॥ सूत्रार्थ मूर्छाको परिग्रह कहते हैं ।। १२ ।। भाष्यम्-चेतनावत्वचेतनेषु च बाह्याभ्यन्तरेषु द्रव्येषु मूर्छा परिग्रहः । इच्छा प्रार्थना कामोऽभिलाषः कांक्षा गाय मूर्छत्यनर्थान्तरम् ॥ विशेषव्याख्या-चेतनावान् हों वा अचेतन हों, ऐसे चेतनाचेतन बाह्य तथा आ- भ्यन्तर द्रव्योंमे जो मूर्छा (तदर्जन रक्षणआदिकी अभिलाषा) है उसको परिग्रह कहते । इच्छा, प्रार्थना, काम, अभिलाष, कांक्षा, गाय, परिग्रह, तथा मूर्छा ये सब समानार्थक शब्द हैं ॥ १२ ॥ अत्राह । गृहीमस्तावद्वतानि । अथ व्रती क इति । अत्रोच्यते- अब यहांपर कहते है कि-व्रतोंको जैसा आपने कहा वैसा हम ग्रहण करते है, परंतु व्रती कौन है ? इसके उत्तरके लिये यह सूत्र है- , २१ १६२ रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् निःशल्यो व्रती ॥१३॥ सूत्रार्थ-शल्यांसे जो रहित है, वही व्रती है ॥ १३ ॥ भाष्यम्-मायानिदानमिथ्यादर्शनशल्यविभिर्वियुक्तो निःगल्यो व्रती भवति । व्रता. न्यत्र सन्तीति व्रती । तदेवं निःशल्यो व्रतवान् व्रती भवतीति ।। विशेषव्याख्या-मायाशल्य, निदानशल्य तथा मिथ्यादर्शनशल्य इन तीन प्रकारके शल्योंसे जो रहित है तथा निःशल्य अर्थात् जिसके शल्य निकलगये हैं वही ब्रती है। तथा पूर्वोक्त अहिंसा आदि व्रत जिसमे हैं वह व्रती है । इस प्रकार जो निःशल्य तथा ऋतवान् (त्रतयुक्त) हो सो व्रती होता है ॥ १३ ॥ अगार्यनगारश्च ॥१४॥ भाष्यम्स एष व्रती द्विविधो भवति । अगारी अनगारश्च । श्रावकः भ्रमणश्चत्यर्थः ॥ सूत्रार्थ-व्रतीके दो भेद होते है । एक अगारी (गृही) अर्थात् श्रावक और दूसरा अनगारी अर्थात् श्रमण ॥ १४ ॥ अत्राह् । कोऽनयोः प्रतिविशेष इति । अत्रोच्यते- अब यहां कहते हैं कि इन दोनों अर्थात् अगारी तथा अनगारी इनमें क्या भेद है? इसपर यह स्त्र कहते हैं- अणुव्रतोऽगारी ॥ १५॥ सूत्रार्थ-अणुव्रतवाला अगारी है ॥ १५ ॥ भाष्यम्-अणून्यस्य ब्रतानीत्यणुव्रतः । तदेवमणुव्रतधरः श्रावकोऽगारी ती भवति ॥ विशेषव्याख्या-जिसके व्रत अणु अर्थात् लघु वा छोटे हैं वह श्रावक अगारी कती होता है ॥ १५॥ किं चान्यन्- और अगारी तोके विषयमे यह वक्ष्यमाण विशेष भी हैं- दिग्देशानर्थदण्डविरतिसामायिकपोषधोपवासोपभोगपरिभोगा- तिथिसंविभागन्त्रतसंपन्नश्च ॥ १६॥ मुत्रार्थ तथा विव्रत, देशत्रत आदि जो व्रत हैं उन तोसे जो संपन्न अर्थात् युक्त हो वह अगारी बनी होता है ॥ १६ ॥ भाष्यम्-एमित्र दिग्त्रतादिभिरुचरनतैः संपन्नोऽगारी ती भवति । तत्र दिन्नत नाम तिर्यपूर्वमयो वा दशानां दिशां यथाशक्ति गमनपरिमाणाभिग्रहः । तत्परतश्च सर्वभूते- प्वयनोनयतश्च सर्वसावधयोगनिक्षेपः ।। देशत्रतं नामापवरकगृहप्रामसीमादियुं यथाशक्ति प्रत्रिचाराय परिमाणाभिग्रहः । तत्परतश्च सर्वभूतेष्वर्थतोऽनयंतच सर्वसावधयोगनिक्षेपः ॥ अन्यदण्डो नामोपमोगपरिभोगावत्यागारिणोतिनोऽर्थः। तत्र्यतिरिक्तोऽनर्थः। तदर्थो दण्डो- उनदण्डः । द्विरवित्रतम् ॥ सामायिकं नामाभिगृह्य कालं सर्वसावद्ययोगनिक्षेपः ॥ पाप- - विशेषव्याख्या पौषधोपवासव्रत, . , सभाष्यतत्त्वार्थाधिगमसूत्रम् । १६३ धोपवांसो नाम पौषधे उपवासः पौषधोपवासः । पौषधः पर्वेत्यनन्तरम् । सोऽष्टमी चतुर्दशी पञ्चदशीमन्यतमा वा तिथिमभिगृह्य चतुर्थाशुपवासिना व्यपगतस्नानानुलेपनगन्धमाल्यालं- कारेण न्यस्तसर्वसावद्ययोगेन कुशसंस्तारफलकादीनामन्यतमं संस्तारमास्तीर्य स्थानं वीरा- सननिषद्यानां वान्यतममास्थाय धर्मजागरिकापरेणानुष्ठेयो भवति ॥ उपभोगपरिभोगवतं नामाशनपानखाद्यखाद्यगन्धमाल्यादीनामाच्छादनप्रावरणालंकारशयनासनगृह्यानवाहनादी- नां च बहुसावद्यानां वर्जनम् । अल्पसावद्यानामपि परिमाणकरणमिति ॥ अतिथिसंविभागो नाम न्यायागतानां कल्पनीयानामन्नपानादीनां द्रव्याणां देशकालश्रद्धासत्कारक्रमोपेतं परयात्मानुग्रहबुद्धया संयतेभ्यो दानमिति ॥ -दिग्व्रत, देशव्रत, अनर्थदण्डव्रत, सामायिकवत, उपभोगपरिभोगव्रत, तथा अतिथिसंविभागव्रत, ये जो उत्तरव्रत है इनसे सम्पन्न (युक्त) अर्थात् इन व्रतोंके करनेवाला भी अगारी ब्रती है। इनमेसे दिग्वतका लक्षण यह है कि-तिर्यग् ( इधर उधर) आठों दिशाओंमें ऊपर (पर्वतादिके ) और अधोभागमे गमनके परिमाणका नियम करना और उससे परे सब जीवोंके विषयमे सार्थक वा निरर्थक संपूर्ण सावद्य (निन्दित) योगोंका त्याग करना, यही दिग्बत है । देशव्रत वह है कि-अपनेके अपवरक (सब ओरसे आवृत करनेवाले, घेरनेवाले ) जो गृह, ग्राम तथा सीमा आदि है उनमें यथाशक्ति प्रविचार (गमनागमन ) के लिये परिमाणका । अभिग्रह अर्थात् नियम करना । और उस सीमासे परे संपूर्ण प्राणियोंके विषे अर्थसे वा अनर्थसे संपूर्ण सावध (निन्दा वा दोषसहित) काय, वाक् तथा मनोमय योगोंका त्याग करना । अनर्थदण्ड-नाम उपभोग, तथा परिभोग इस अगारी व्रतीके अर्थ है और उससे भिन्न अनर्थ है, उस अनर्थके लिये जो दण्ड है उसको अनर्थदण्ड कहते है । इस हेतुसे उस अनर्थदण्डसे जो विरति अर्थात् उपराम वा निवृत्ति है उसको अनर्थदण्डव्रत कहते हैं । सामायिक वह है कि किसी नियत कालके लिये सम्पूर्ण सावध अर्थात् गर्दा वा निन्दनीय योगोंका त्याग । पौषधोपवास, इसका अर्थ यह है कि-पौषध अर्थात् पर्वम जो उपवास (भोजनादिका त्याग) वह पौषधोपवास है । पौषध तथा पर्व ये दोनों समानार्थवाचक शब्द है । यह पौषधोपवास अष्टमी, चतुर्दशी, अथवा पूर्णिमा अमावास्या इनमेंसे किसी एक तिथिको वा सबको नियम करके चतुर्थकाल आदि उपवास करनेवाले प्राणीको स्नान अनुलेपन (उबटनाआदि सुगन्धित द्रव्य जो शरीरमे लगाये जाते है) गन्ध, अतर, तैल आदि, माल्य अर्थात् पुष्पमाला आदि तथा आभूपणोंके त्यागसहित और संपूर्ण सावध योगोंसे भी रहित होकर, कुश, चटाई वा पाटा इनमेंसे किसी एक आसनके ऊपर वीर, पद्म, अथवा स्वस्तिक आदिमेसे किसी एक आसनसे वैठकर धर्म- जागरिकामें तत्पर होके अर्थात् धर्मार्थ जागरणमे परायण होके अनुष्ठान करनेयोग्य है । तात्पर्य यह कि-इस पूर्वोक्त नियमसे पौषधोपवासका अनुष्ठान करना चाहिये । , , . , ये रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् १६४ उपभोगपरिभोगत्रत वह है कि-जिसमें भोजन, पानआदि खाद्य पदार्थोंका, खाद्य अर्थात् प्रिय आनन्ददायक गन्धमाल्य आदि पदार्थोका, आच्छादन ( वस्त्रादि ) अलङ्कार, शय्या, आसन, गृह, यान (सवारी घोड़े हाथी बग्गीआदि), वाहन वैलआदि पदार्थोंका जो कि बहुत सावध है अर्थात् निन्दादोषादिसहित है उन सबका त्याग करना । और इन भोजन, पान, गन्धमाल्य, वस्त्र, अलङ्कार, शय्या, गृह यानादिमसे जो अल्प- दोषादियुक्त है उनका भी परिमाण करना कि-इतनेसे अधिक नहीं रक्खेंगे, अर्थात् अल्प दोषवालोंमें भी आवश्यक पदार्थोकी गणना करके वर्तावमें लाना, यह उपभोगपरि- भोगवत है । अथितिसंविभागवत वह है कि-न्यायसे प्राप्त अर्थात् धर्मसे उपार्जित कल्पनीय (सम्पादन) करनेके योग्य जो द्रव्य हैं उनका देश, काल, श्रद्धा तथा सत्कारके क्रमसे युक्त होकर अतिअनुग्रहबुद्धिसे संयत अर्थात् संयमी पुरुषोंको देना, मात व्रतभी अगारी व्रतीके होते है ॥ १६ ॥ कि चान्यदिति। और यहभी है:- मारणान्तिकी संलेखनां जोषिता ॥१७॥ मृन्त्रार्थ-ब्रती (अगारी व्रती) मारणान्तिकी अर्थात् मरणसमयकी संलेखनाका जोपिता अर्थात् सेवी होना चाहिये ॥ १७॥ भाग्यम्-कालसंहननदौर्बल्योपसर्गदोषाद्धर्मावश्यकपरिहाणिं वाभितो जालावमौदर्यच- तुर्थपष्टाष्टमभक्तादिभिरात्मानं संलिख्य संयमं प्रतिपद्योत्तमव्रतसंपन्नश्चतुर्विधाहारं प्रत्याख्याय यावज्जीव भावनानुप्रेक्षापरः स्मृतिसमाधिवहुलो मारणान्तिकी संलेखनां जोषिता उत्तमार्थ- स्याराधको भवतीति । विशेपव्याख्या-काल, संहनन (शरीरकी स्थितिविशेष), दुर्बलता तथा उपसर्ग (पीडाआदि उपद्रवों )के दोपसे आवश्यक कार्यकी परिहाणिको सब ओरसे जानकर अवमार्य, (अल्प अशन ), चतुर्थ, पष्ठ, तथा अष्टम कालमे भक्त (भात )आदिके द्वारा आत्माको नियममे लाके संयमम प्राप्त होके उत्तम व्रतसम्पन्न हो, चारों प्रकारके आहारोंको त्यागकर, जीवनपर्यन्त भावना तथा अनुपेक्षामे तत्पर स्मरण तथा समाधिमे बहुधा परायण होके, मरण समयकी संलेखनाला सेवी उत्तम अर्थका आराधक होता है । एनानि दिन्नतादीनि शीलानि भवन्ति । निःशल्यो व्रतीति वचनादुक्तं भवति व्रती नियतं सन्यगष्टिरिति ।। जो दिन्नतादि कहे है वे सब शीलसंज्ञक है । निःशल्य व्रती होता है इस वचनसे यह सिद्ध है कि व्रती नियमसे सम्यग्दृष्टिवाला होता है।

सभाष्यतत्त्वार्थाधिगमसूत्रम् । १६५ तहां- शङ्काकाहाविचिकित्सान्यहष्टिप्रशंसासंस्तवा: सम्यग्दृष्टेरती- चाराः॥ १८॥ सूत्रार्थ-शंकाआदि पांच सम्यग्दृष्टि पुरुषके अतिचार है ॥ १ ॥ भाज्यम्-शङ्का काला विचिकित्सा अन्यदृष्टिप्रशंसा संस्तवः इत्येते पञ्च सम्यग्दृष्टेरती- चारा भवन्ति । अतिचारो व्यतिक्रमः स्खलनमित्यनर्थान्तरम् ॥ अधिगतजीवाजीवादितत्त्व- स्यापि भगवतः शासनं भावतोऽभिप्रपन्नस्यासंहार्यमतेः सम्यग्दृष्टेरर्हत्प्रोक्तेपु अत्यन्तसूक्ष्मे- ध्वतीन्द्रियेषु केवलागमग्राह्येष्वर्थेषु यः संदेहो भवति एवं स्यादेवं न स्यादिति सा शङ्का ।। ऐहलौकिकपारलौकिकेषु विषयेण्वाशंसा काटा । सोऽतिचारः सम्यग्दृष्टेः । कुतः । कासिता ह्यविचारितगुणदोषः समयमतिकामति ॥ विचिकित्सा नाम इदमप्यस्तीदमपीति मति- विप्लतिः ॥ अन्यदृष्टिरित्यहच्छासनव्यतिरिक्तां दृष्टिमाह । सा द्विविधा । अभिगृहीता अनभिगृहीता च । तद्युक्तानां क्रियावादिनामक्रियावादिनामज्ञानिकानां वैनयिकानां च प्रशंसासंस्तवौ सम्यग्दृष्टेरतिचार इति । अत्राह । प्रशंसासंस्तवयोः कः प्रतिविशेप इति । अत्रोच्यते । ज्ञानदर्शनगुणप्रकर्षोद्भावनं भावतः प्रशंसा । संस्तवस्तु सोपधं निरुपधं भूताभूतगुणवचनमिति ॥ विशेषव्याख्या-शंका, कांक्षा, विचिकित्सा, अन्यदृष्टिप्रशंसा तथा संस्तव, ये पांच सम्यग्दृष्टि पुरुषके अतिचार (दोष ) है । अतिचार, व्यतिक्रम तथा स्खलन, ये सब एकार्थवाचक शब्द हैं । जीव अजीवआदि तत्त्वोंके ज्ञाता भगवान्के शासनको भावसे अभिप्राप्त और असंहार्यमति (असंहृतबुद्धि) अर्थात् जिसकी बुद्धि सब स्थानोंसे हटके जिनप्रोक्त पदार्थो में दृढतासे निःसन्देहपूर्वक स्थिर नहीं हुई है ऐसे सम्यग्दृष्टि पुरुषको अर्हत् भगवान्से कथित अतिसूक्ष्म, अतीन्द्रिय तथा केवल आगमप्रमाणसे ग्राह्य (जाननेयोग्य ) पदार्थोमें जो सन्देह है कि-ऐसा भगवान्ने कहा है वैसा हो सकता है, वा नहीं, ऐसा जो विचार है उसको शंका कहते है। तथा इस लोकके और परलोकके विषयोंमें जो प्राप्त होनेकी अभिलाषा है वह कांक्षा है । वह शंका तथा कांक्षा करनेवाला दोनो सम्यग्दृष्टिके अतिचार है । क्योंकि जिसने गुणदोषको नही विचारा है ऐसा पुरुष समयका उल्लंघन करता है। और विचिकित्सा वह कि ऐसा भी है और ऐसाभी है, अर्थात् अर्हद् भगवान्ने जो कहा है यह भी यथार्थ है और अन्यदृष्टि अर्थात् कपिल आदिका जो कथन है यह भी यथार्थ है, इस प्रकारकी मति (भ्रांति) होना । तथा अन्य दृष्टिसे यहां अर्हत्शासनसे भिन्नदृष्टिसे तात्पर्य है। वह अन्यदृष्टि दो प्रकारकी होती है, एक तो अभिगृहीत (स्वीकृत) और द्वितीय (दूसरी) अनभिगृहीत (अस्वीकृत)। उस अन्यदृष्टिसे युक्त क्रियावादी हों अथवा अक्रियावादी हों, तथा अज्ञानी (जिनके

रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम्
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हिताहितकी परीक्षा नहीं है ऐसे ) हों अथवा वैनयिक अर्थात् सम्पूर्ण देव तथा सम्पूर्ण
शास्त्रों को समान माननेवाले हों, उनकी प्रशंसा तथा संस्तव करना । ये प्रशंसा तथा
संस्तव दोनो सम्यग्दृष्टिके अतीचार है। अब यहां प्रश्न करते हैं कि-प्रशंसा तथा
संस्तव (तुति) इन दोनों में क्या भेद है ? इस शंकाका उत्तर कहते है कि-भावसे
ज्ञानदर्शन गुणकी प्रकर्षता (उच्चता वा अधिकता)का जो उद्भावन अर्थात् सबपर
प्रकट करना है, यह तो प्रशंसा है । और सोपध वा निरुपध वा भूत और अभूत अर्थात्
यथार्थ वा अयथार्थ गुणोंका जो संकीर्तन है वह संस्तव अर्थात् संस्तुति है । ये शंकाआदि
पांचों सम्यग्दृष्टि जनके अतीचार अर्थात् व्यतिक्रम हैं ॥ १८ ॥
इस अग्रिम सूत्रसे व्रत तथा शीलोंके अतीचारोंकी संख्या (गिनती) कहते है-
व्रतशीलेषु पञ्च पञ्च यथाक्रमम् ॥ १९ ॥
सूत्रार्थ-अहिंसाआदि पांच (५) व्रतोंमे और दिग्वतआदि सात (७) शीलोंमे
भी पांच (५) २ अतिचार होते है ॥ १९ ॥
भाप्यम्-व्रतेषु पञ्चसु शीलेषु च सप्तसु पञ्च पञ्चातीचारा भवन्ति यथाक्रममिति
अर्व यद्वक्ष्यामः । तद्यथा--
विशेपव्याख्या-अहिंसाआदि व्रतोंके तथा दिग्नतआदि शीलोंके पांच २ अती-
चारोंको अर्थात् प्रथम अहिंसाआदि व्रतोंके और पीछे दिग्वतआदि शीलोंके पांच २
अतीचारोंको हम आगे कहेंगे। जैसे-
बन्धवधविच्छेदातिभारारोपणानपाननिरोधाः ॥२०॥
सूत्रार्थ-बन्ध, वध, छेद, अतिभारारोपण, अन्नपाननिरोध ये पांच अहिंसात्रतके
अतिचार है ।। २० ॥
भाष्यम्-त्रसस्थावराणां जीवानां वन्धवधौ त्वक्छेदः काष्ठादीनां पुरुषहत्यश्वगोसहि-
पादीनां चातिभारारोपणं तेपामेव चान्नपाननिरोधः अहिंसात्रतस्यातिचारा भवन्ति ।।
विशेपव्याख्या-त्रस तथा स्थावर जो जीव है उनका वध १ तथा वन्धन २, तथा
काष्ठआदिकी त्वक् (छाल आदि)का छेदन ३, पुरुष, हस्ती (हाथी), अश्व, गौ तथा
महिप (भन )आदिके ऊपर अतिभार अर्थात् उचितसे अधिक भारका आरोपण
(लादना ) ? और उन्हीक अर्थात् पुरुष, हस्ती. अश्व आदिके अन्नपानआदि आहारका
निरोध करना (गेकता) ५, ये पांचो अहिसावतके अतिचार है ॥ २० ॥
मिथ्योपदे रहस्याभ्याख्यानकूटलेखक्रियान्यासापहारसाकार-
मन्त्रभेदाः ।। २२ ॥
त्रा--मिध्या उपदेश, रहन्यान्याख्यान (गोप्य वार्ताओंका प्रकट करना),
मानिया, न्यामापहार तथा साकारमंबभेद, ये पांचों सत्य व्रतके अतीचार है ॥२१॥

. सभाष्यतत्त्वार्थाधिगमसूत्रम् । १६७ भाष्यम्-एते पञ्च मिथ्योपदेशादयः सत्यवचनस्यातिचारा भवन्ति । तत्र मिथ्योपदेशो नाम प्रमत्तवचनमयथार्थवचनोपदेशो विवादेष्वतिसंधानोपदेश इत्येवमादिः ॥ रहस्याभ्या- ख्यानं नाम स्त्रीपुंसयोः परस्परेणान्यस्य वा रागसंयुक्तं हास्यक्रीडासङ्गादिभी रहस्येनाभिशं- सनम् ॥ कूटलेखक्रिया लोकप्रतीता ॥ न्यासापहारो विस्मरणकृतपरनिक्षेपग्रहणम् ॥ साकारमन्त्रभेदः पैशुन्यं गुह्यमत्रभेदश्च ।। विशेषव्याख्या-मिथ्या उपदेश, आदि सत्यभाषणव्रतके पांच अतीचार अर्थात् व्यतिक्रम वा स्खलन हैं । जैसे-प्रमत्तवचन, अयथार्थवचनका उपदेश, तथा विवादोंमे अतिसन्धान अर्थात् सन्धान (सम्बन्ध )को उल्लंघनकरके अर्थात् असम्बद्ध वा प्रकरण- विरुद्ध जो उपदेश है इत्यादि सब मिथ्या उपदेश है। रहस्याभ्याख्यान अर्थात् स्त्री पुरुषका परस्परके द्वारा अथवा अन्य किसीके रागसंयुक्त विषयको हास्य क्रीडाआदिसे रहस्यरूपसे जो कथन है वह रहस्याभ्याख्यान है । कूटलेखक्रिया-संसारमें प्रसिद्ध ही है अर्थात् मिथ्या लेख वा जाली तमस्सुकआदि बनाना, यह सब कूटलेखक्रिया है । न्यासापहार-विस्मरण आदिके द्वारा धरोहररूपसे स्थापित पदार्थको हरलेना, यह न्यासापहार है । साकारमन्त्रभेद-पैशुन्य (चुगली करना) और गुह्यमन्त्र (सलाह) का भेद करना (भंडाफोड़ करना) है । ये सब सत्यभाषणवतके व्यतिक्रम है ।। स्तनप्रयोगतदाहृतादानविरुद्धराज्यातिक्रमहीनाधिकमानोन्मान- प्रतिरूपकव्यवहाराः ॥ २२ ॥ सूत्रार्थ-स्तेनप्रयोग, तदाहृतादान, विरुद्धराज्यातिक्रम, हीनाधिकमानोन्मानादि, तथा प्रतिरूपकव्यवहार, ये पांचो अस्तेय (अचौर्य )व्रतके अतीचार है ।। २२ ।। भाष्यम्-एते पञ्चास्यव्रतस्यातिचारा भवन्ति । तत्र स्तेनेषु हिरण्यादिप्रयोगः ॥ स्तेनैराहतस्य द्रव्यस्य मुधा क्रयेण वा ग्रहणं तदाहृतादानम् ॥ विरुद्धराज्यातिकमश्चास्तेयव्रत- स्यातिचारः । विरुद्ध हि राज्ये सर्वमेव स्तेययुक्तमादानं भवति ।। हीनाधिकमानोन्मानप्रति- रूपकव्यवहारः कूटतुलाकूटमानवञ्चनादियुक्तः क्रयो विक्रयो वृद्धिप्रयोगश्च । प्रतिरूपक- व्यवहारो नाम सुवर्णरूप्यादीनां द्रव्याणां प्रतिरूपकक्रिया व्याजीकरणानि चेत्येते पञ्चास्ते- यत्रतस्यातिचारा भवन्ति । विशेषव्याख्या-स्तेनप्रयोगआदि अस्तेय व्रतके अतीचार हैं। उनमें चोरोंमे सुवर्ण- आदिका लेन देन करना, यह स्तेनप्रयोग है। तथा चोरोंसे लाया हुआ जो द्रव्य है उसको यों ही वा अल्प मूल्यसे लेलेना, यह तदाहृतादान है । तथा विरुद्ध राज्यम अतिक्रम करना, अर्थात् विरुद्ध राज्यमें क्रमका उल्लंघन करना । क्योंकि:-विरुद्ध राज्यमें सब स्तेययुक्त ही ग्रहणआदि होता है । तथा हीनाधिकमानोन्मानादि यह हैं कि कूटतुला अर्थात् मिथ्या (झूठी ) तराजूसे कपटपूर्वक माप, वञ्चना (धोखा) आदिसे युक्त, क्रय विक्रय व्यवहार, अर्थात् झूठी तराजूसे, झूठे मापसे, तोलसे, दूसरोंको धोखा .

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देकर न्यून (कम) देना और अधिक लेना । तथा हीनाधिक परिमाणसे वृद्धि करना ।
और प्रतिरूपकव्यवहार यह है कि-सुवर्ण तथा रूप्य (रूपा-चांदी) आदि द्रव्योंकी
प्रतिरूपकक्रिया, अर्थात् सोने चांदीके समान (मुलम्मेआदि अन्य )द्रव्योंको बनालेना
तथा अन्य प्रकारके कपट व्यवहार करनेको भी प्रतिरूपक क्रिया कहते हैं । ये स्तेन-
प्रयोगआदि पांच अस्तेय व्रतके अतीचार हैं ॥ २२ ॥
परविवाहकरणेत्वरपरिगृहीतापरिगृहीतागमनानङ्गक्रीडातीत्रका-
माभिनिवेशाः॥२३॥
सूत्रार्थ--परविवाहकरणादि ब्रह्मचर्य व्रतके अतीचार हैं । अर्थात् परविवाहकरण १
व्यभिचारिणी वा दूसरेकी विवाहितासे संग करना २ जिसका विवाह नहीं हुआ हो ऐसी
कन्याआदिसे गमन करना ३ अयोग्य अङ्गसे क्रीडा करना ४ कामके वेगका तीव्र होना
यह पांच (५) ब्रह्मचर्य व्रतके अतीचार है ।। २३ ।।
भाष्यम्-परविवाहकरणमित्वरपरिगृहीतागमनमपरिगृहीतागमनमनङ्गक्रीडा तीव्रकामा-
भिनिवेश इत्येते पञ्च ब्रह्मचर्यव्रतस्यातिचारा भवन्ति ॥
विशेपव्याख्या-परविवाहकरण, अन्यकी विवाहिता कुलटा स्त्रीसे गमन करना,
अपरिगृहीता ( अविवाहिता कुमारी या वेश्याआदि) स्त्रियोंके साथ गमन करना, अनङ्ग-4
क्रीडा अर्थात् अङ्गोंसे भिन्न अङ्गोंमे क्रीडा करना, अतितीत्र कामनाका अभिनिवेश (वेग)
अर्थात् अत्यन्त कामी होना; ये पांच ब्रह्मचर्य व्रतके अतीचार हैं॥ २३ ॥
क्षेत्रवास्तुहिरण्यसुवर्णधनधान्यदासीदासकुप्यप्रमाणातिक्रमाः ॥२४
सूत्रार्थ क्षेत्र, वास्तु, हिरण्यआदि वस्तुओंके प्रमाणका अतिक्रम करना, इत्यादि
पांच इच्छापरिमाण वा अपरिग्रह व्रतके अतिचार है ॥ २४ ॥
भाष्यम्-क्षेत्रवास्तुप्रमाणातिक्रमः हिरण्यसुवर्णप्रमाणातिक्रमः धनधान्यप्रमाणातिक्रमः
दासीदासप्रमाणातिक्रमः कुप्यप्रमाणातिक्रम इत्येते पञ्चेच्छापरिमाणव्रतस्यातिचारा भवन्ति ।।
विशेपव्याख्या-क्षेत्र, वास्तु, खेत तथा गृहको प्रमाणसे अधिक संग्रह करना १
हिग्य सुवर्णादि वस्तुओंको प्रमाणसे अधिक संग्रह करना २ धन, धान्य व अन्य
प्रकारक धन तथा अन्न वृक्षादिका प्रमाणसे अधिक संग्रह करना, ३ दासी दासआदिको
प्रमाण अधिक नियत करना ४ और कुप्य अर्थात् भाण्ड वर्तनादि पदार्थोको प्रमाणसे
अधिक संग्रह करना ५ ये पांचो इच्छापरिमाण वा अपरिग्रह व्रतके अतिचार है ॥२४॥
जोधस्तिर्यग्व्यतिक्रमक्षेत्रवृद्धिस्मृत्यन्तर्धानानि ॥ २५ ॥
मृत्रार्थ-व्यतिक्रम, अधोव्यतिक्रम, तिर्यग्व्यतिक्रम, क्षेत्रवृद्धि तथा स्मृतिका
न. ये गंनों दिग्त्रतादि (श्रील)के अतिचार है ॥ २५ ॥

- सभाष्यतत्त्वार्थाधिगमसूत्रम् । १६९ भाष्यम्-ऊर्ध्वव्यतिक्रमः अधोव्यतिक्रमः तिर्यग्व्यतिक्रमः क्षेत्रवृद्धिः स्मृत्यन्तर्धानमित्येते पश्च दिग्व्रतस्यातिचारा भवन्ति । स्मृत्यन्तर्धानं नाम स्मृतेभ्रंशोऽन्तर्धानमिति ॥ विशेषव्याख्या-अहिंसाआदि पांच व्रतोंके अतीचारोंका व्याख्यान होगया, अब दिग्व्रतादि सत्वशीलोंके पांच २ अतीचार क्रमसे कहते हैं। उनमें प्रथम दिखतके जो नियम बांधे है, सो ऊर्ध्वभागका व्यतिक्रम अर्थात् नियत किये हुए स्थानसे अधिक गमनादि ऐसे ही अधोभागमें (नीचेकी ओर )परिमाणसे अधिक गमनादि अधोव्यतिक्रम है २ आठों दिशाओंमें परिमाणसे अधिक देशमें गमनादि तिर्यग्व्यतिक्रम है ३ नियत परिमाणसे अधिक क्षेत्र (देश )की सीमाको बढ़ालेना यह क्षेत्रवृद्धिनामा अतिचार है ४ तथा स्मृतिका अन्तर्धान अर्थात् कहांतक सीमा की थी उसकी स्मृति न रहना, विस्मृत होके अधिक देशमें गमनागमनादि व्यवहार करना ५ यह स्मृत्यन्तर्धाननामा पञ्चम दिग्वतका अतीचार है ।। २५ ।। आनयनप्रेष्यप्रयोगशब्दरूपानुपातपुद्गलक्षेपाः ॥ २६ ॥ सूत्रार्थ-आनयन १ प्रेष्यप्रयोग २ शब्दानुपात ३ रूपानुपात ४ तथा पुद्गलक्षेप; ५ ये पांच देशव्रतके अतीचार है २६ ॥ भाज्यम्-द्रव्यस्यानयनं प्रेष्यप्रयोगः शब्दानुपातः रूपानुपातः पुद्गलक्षेप इत्येते पञ्च । देशव्रतस्यातिचारा भवन्ति । विशेषव्याख्या-किसी आते जाते हुए मनुष्यके द्वारा अभिलषित द्रव्य नियत देशकी सीमासे बाहरके देशसे मँगवा लेना यह आनयनातिचार है । १ भृत्य (नौकर) आदिके द्वारा सीमासे बाहर अपने न जानेके देशसे कार्य निकाल लेना, यह प्रेष्यप्रयोग है २ तथा नियत देशसे बाहर स्वयं न जाकर शब्दके द्वारा कार्य निकाल लेना, यह शब्दानुपात अतिचार है ३ तथा ऐसे ही परिमाणसे बाह्य देशमें अपना रूप (फोटो-तसबीरआदि)दिखाके कार्य चला लेना, यह रूपानुपात है ४ और इसी प्रकार परिमाणसे बाह्य देशमे पुद्गल अर्थात् ढेला पाषाणआदि फेंककर कार्यका निर्वाह करलेना, यह पुद्गलक्षेपनामा पञ्चम देशव्रतका अतीचार है ॥ २६ ॥ कन्दर्पकौकुच्यमौख-समीक्ष्याधिकरणोपभोगाधिकत्वानि ॥२७॥ सूत्रार्थ-कन्दर्प १ कौकुच्य २ मौखर्य ३ असमीक्ष्याधिकरण ४ और उपभो- गाधिकत्व ५ ये पांच अनर्थदण्डविरतिव्रतके अतीचार है ॥२७॥ भाष्यम्-कन्दर्पः कौकुच्यं मौखर्यमसमीक्ष्याधिकरणमुपभोगाधिकलमित्येते पञ्चानर्थ- 'दण्डविरतिव्रतस्यातिचारा भवन्ति । तत्र कन्दर्पो नाम रागसंयुक्तोऽसभ्यो वाक्प्रयोगो हास्यं च ।। कौकुच्यं नाम एतदेवोभयं दुष्टकायप्रचारसंयुक्तम् ॥ मौखर्यमसंवद्धवहुप्रला- पित्वम् ।। असमीक्ष्याधिकरणं लोकप्रतीतम् ॥ उपभोगाधिकत्वं चेति ॥ २२ - . रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् १७० विशेपव्याख्या-कन्दादि पांच अनर्थदण्डविरतिव्रतके अतिचार हैं। उनमें रागसंयुक्त और तथा असभ्य वाणीका प्रयोग करना अर्थात् रागपूर्ण तथा सभ्यताविरुद्ध भापण, हास्य करना, यह कन्दर्पनामा अतिचार है १ । और ये ही दोनों, अर्थात् रागसंयुक्त असभ्य भाषण और हास्य यदि दुष्ट कायके (शरीरके )संचारसहित हों तो वह कौकुच्य अतिचार है २। असम्बद्ध (परस्परविरुद्ध तथा निरर्थक )अधिक प्रलाप करना, यह मौखर्यनामा अतिचार है ३ । और असमीक्ष्याधिकरण तो लोकमें प्रसिद्ध ही है; अर्थात् विना विचारे आवश्यकसे अधिक सामग्री एकत्रित करलेना, यह असमीक्ष्याधिकरण है ४ । और उपभोगसे अधिक वस्तुका रखना, यह उपभोगाधिकत्वनामक पञ्चम अ- तिचार है ५ ॥ २७॥ योगदुष्पणिधानानादरस्मृत्यनुपस्थापनानि ॥ २८ ॥ सूत्रार्थ कायदुष्प्रणिधान, १ वाग्दुष्प्रणिधान, २ तथा मनोदुष्प्रणिधान, ३ अना- दर ४ और स्मृत्यनुपस्थान ५ ये पांच सामायिक व्रतके अतिचार हैं ॥ २८ ॥ भाप्यम्-कायदुष्पणिधानं वाग्दुष्पणिधानं मनोदुष्प्रणिधानमनादरः स्मृत्यनुपस्थापन- मियेते पञ्च सामायिकव्रतस्यातिचारा भवन्ति ।। विशेपव्याख्या-कायआदि तीनों योगोंका दुष्प्रणिधान अर्थात् जिस प्रकार सावधा- नीसे विधिपूर्वक कायआदि योगोंको सामायिकके समयमें लगाना चाहिये उस प्रकार न लगाना यही काय, वाग् तथा मनोरूप योगोंके दुष्पणिधान हैं अर्थात् काययोग दु- प्रणिधान १ वाग्योग दुष्प्रणिधान २ मनोयोग दुष्प्रणिधान ३ हैं तथा अनादर, सामायि- कको आदरसे न करना, किन्तु वेगारसी टाल देना यही अनादर अतिचार है । ४ । और पूर्णरूपसे सामायिककी विधि कैसे करनी चाहिये तथा किसका ध्यान, किस आसन वा किस विधिसे इत्यादि विषयोंकी स्मृति (सरण )न रहना अथवा सामायिक करना ही भूलजाना यह स्मृत्यनुपस्थाननामा पञ्चम अतिचार है । ५ । तीन योगोंका दुष्प्रणिधान- चतुर्थ (चौथा) अनादर, और पश्चम स्मृत्यनुपस्थान ये पांचो सामायिक व्रतके अतीचार अर्थात् व्यतिक्रम जानने चाहिये ॥ २८ ॥ अप्रत्यवेक्षिताप्रमार्जितोत्सर्गादाननिक्षेपसंस्तारोपक्रमणानादस्मृ- त्यनुपस्थापनानि ॥ २९॥ मूत्रार्थ- अप्रत्यवेक्षित तथा अप्रमार्जित स्थलमें उत्सर्ग १ अप्रत्यवेक्षित तथा अ- प्रमार्जित पदार्थका आदान तथा निक्षेप, २ अप्रत्यवेक्षित तथा अप्रमार्जित संस्तारोपक्रम ३ अनादर ४ तथा स्मृत्यनुपस्थान, ५ ये पांच पौषधोपवासव्रतके अतिचार हैं ।। २९ ॥ भाष्यम्-अप्रत्यवेक्षिताप्रमार्जिते उत्सर्गः अप्रत्यवेक्षिताप्रमार्जितस्यादाननिक्षेपौ अप्र- १७६१५ , सभाप्यतत्त्वार्थाधिगमसूत्रम् । त्यवेक्षिताप्रमार्जितः संस्तारोपक्रमः अनादरः स्मृत्यनुपस्थानमित्येते पञ्च पौषधोपवासस्या- तिचारा भवन्ति । विशेषव्याख्या-अप्रत्यवेक्षित और अप्रमार्जित, अर्थात् विना पूर्णरूपसे देखे और विना स्वच्छ (साफ)किए हुए स्थानमें मलमूत्रादिका करना १ यह अप्रत्यवेक्षित तथा अप्रमार्जित स्थलमे उत्सर्गनामा अतिचार है, ऐसे ही अप्रत्यवेक्षित अर्थात् विना अच्छी रीतिसे देखे, और अप्रमार्जित अर्थात् विना शुद्ध किये हुए किसी पदार्थको ग्रहण करना अथवा कहीं स्थापित करना वा फेंक देना; यह अपत्यवेक्षिताप्रमार्जितादाननिक्षेप- नामा द्वितीय अतिचार है २ तथा विना देखे और विना शुद्ध किये विस्तरआदिपर गमन शयन, आसनादिक करना यह तृतीय अप्रत्यवेक्षित-अप्रमार्जित-संस्तारोपक्रमनामा अतिचार है ३ अनादर पौषधोपवासमें कर्तव्य अनुष्ठानमें आदरका अभाव यह चतुर्थ अ- तिचार है। ४ । और पौषधोपवासमें कर्तव्य विधिकी विस्मृति होना, अथवा पौषधमे उप- वास ही भूलजाना यह पौषधोपवासका पञ्चम अतिचार है। ५ । इस प्रकार पौषधोप- वासके पांच अतिचार हैं ॥ २९ ॥ सचित्तसंबद्धसंमिश्राभिषवदुष्पकाहाराः॥३०॥ सुत्रार्थ—सचित्ताहार १ सचित्तसंबद्धाहार २ सचित्तसंमिश्राहार ३ अभिषवाहार, ४ और दुष्पक्वाहार, ५ ये पांचों प्रकारके आहार उपभोगव्रतके अतिचार है ॥ ३० ॥ भाष्यम्-सचित्ताहारः सचित्तसंबद्धाहारः सचित्तसंमिश्राहारः अभिषवाहारः दुष्पकाहार इत्येते पञ्चोपभोगव्रतस्यातिचारा भवन्ति । विशेषव्याख्या-सचित्त अर्थात् चित्तसहित वस्तुका भोजन करना यह सचित्ताहार है। १ । तथा चित्तसे संबद्ध (संबन्ध रखनेवाली )वस्तुका आहार सचित्तसंबद्धाहार है ।२। चित्तसहित जो पदार्थ है, उससे मिलित पदार्थोंका आहार सचित्तसंमिश्राहार है । ३ । अभिषव अर्थात् पुष्ट अथवा रससंयुक्त आहार यह अभिषवाहार है। ४ । और (अच्छी तरह न पकाये हुए)पदार्थका जो आहार है वह दुष्पकाहार उपभोगव्रतका अती- चार है । ५। ऐसे पांच अतीचार है ॥ ३० ॥ सचित्तनिक्षेपपिधानपरव्यपदेशमात्सर्यकालातिक्रमाः॥३१॥ सूत्रार्थः-सचित्तनिक्षेप १ सचित्तपिधान २ परव्यपदेश ३ मात्सर्य ४ तथा का- लातिक्रम ५ ये पांच अतिथिसंविभागवतके अतिचार हैं ॥ ३ ॥ भाष्यम्-अन्नादेव्यजातस्य सचित्ते निक्षेपः सचित्तपिधानं परस्येदमिति परव्यपदेश- मात्सर्य कालातिक्रम इत्येते पञ्चातिथिसंविभागस्यातिचारा भवन्ति ॥ विशेषव्याख्या-अन्नआदि जो द्रव्यसमूह है उसको किसी सचित्त वस्तुपर रखदेना यह सचित्तनिक्षेप है। १ । अन्नआदि पदार्थको सचित्त वस्तुसे ढकदेना, यह सचित्तपि- ११७२ रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् धान है। २ । यह पदार्थ पराया अर्थात् अन्य मनुष्यका है, यह परव्यपदेश है । ३ । मात्सर्य अर्थात् अन्य देहीके गुण आदिसे ईष्या करना यह मात्सर्यनामा चौथा अतीचार है । ४ । तथा दानआदिके समयका उल्लघंन करना यह कालातिक्रमनामा अतिथिसंवि- भागवतका पञ्चम अतिचार है । ५ ॥ ३१ ॥ जीवितमरणाशंसामित्रानुरागसुखानुबन्धनिदानकरणानि ॥ ३२ ।। मृत्रार्थ-जीवितानुशंसा १ मरणानुशंसा २ मित्रानुराग ३ सुखानुबन्ध ४ तथा निदानकरण ५ ये पांच मारणान्तिकी संलेखनाके अतिचार हैं ॥ ३२॥ भाप्यम्-जीविताशंसा मरणाशंसा मित्रानुरागः सुखानुवन्धो निदानकरणमित्येते मार- णान्तिकसंलेखनायाः पञ्चाविचारा भवन्ति । विशेषव्याख्या-जीवनकी आशंसा (अमिलाषा) यह जीवितानुशंसा १ तथा मृ- त्युकी आशंसा यह मरणानुशंसा २ मित्रोंमे प्रीति यह मित्रानुराग ३ है। सुखका सम्बन्ध रखना अथवा सुखका स्मरण करना यह सुखाऽनुबन्ध ४ है । आगामी विषयभोगोंकी आकांना करना निदानकरण ५ पञ्चम अतिचार है। तदेतेपु सम्यक्त्वत्रतशीलव्यतिक्रमस्थानेषु पञ्चषष्टिध्वतिचारस्थानेषु अप्रमादो न्याय इति। इन अतिचारोंसे व्रत तथा शीलोंकी पूर्णता नहीं होती, इस हेतुसे सम्यक्त्व व्रत तथा गीलके व्यतिक्रम स्थान जो पूर्वकथित पैंसठ (६५) अतिचार स्थान हैं उनमे अप्रमाद क- ग्ना चाहिये । अर्थात् प्रमादसे ये अतिचार न होने देने चाहिये ॥ ३२॥ अवाह । उक्तानि व्रतानि तिनश्च । अथ दानं किमिति । अत्रोच्यते- अब यहांपर कहते है कि व्रत तथा व्रतियोंका निरूपण किया । अव दान क्या है ? इसके लिये यह अग्रिम सूत्र कहते है- अनुग्रहार्थ खस्यातिसर्गो दानम् ॥ ३३ ॥ मत्रार्थ अनुग्रहार्थ अपनी वस्तुका त्याग करना दान कहलाता है। आत्मपगनुग्रहार्थ स्वस्य द्रव्यजातस्यानपानवस्त्रादेः पात्रेऽतिसर्गो दानम् । विज्ञपव्याख्या-अपने तथा अन्यके ऊपर अनुग्रह (अनुकम्पा )के अर्थ जो निज- द्रव्यमूह, अन्नपान. तथा वस्त्रआदि पदार्थोका पात्रोंने त्याग है उसको दान कहते हैं ३३ किच-- और इसके त्रिययम यह विशेषता भी कही है- चिघिद्रव्यदातृपात्रविशेषात्तद्विशेषः॥४॥ नत्राय-बधि, द्रव्य, दाता, तथा पात्र, इनके विशेपसे दोनोंकी विशेषता ॥ १४ ॥ माया-विधिनिषाद द्रव्यविशेषाद दातृविशेषात्पात्रविशेपाच तस्य दानधर्मस्य वि-

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सभाप्यतत्त्वार्थाधिगमसूत्रम् ।
१७३
१५
शेषो भवति । तद्विशेपाच फलविशेपः ॥ तत्र विधिविशेषो नाम देशकालसंपच्छ्रद्धासत्कार-
क्रमाः कल्पनीयत्वमित्येवमादिः ॥ द्रव्यविशेषोऽन्नादीनामेव सारजातिगुणोत्कर्षयोगः ।।
दातृविशेषः प्रतिग्रहीतर्यनसूया, त्यागेऽविषादः अपरिभाविता, दित्सतो ददतो दत्तवतश्च
प्रीतियोगः, कुशलाभिसंधिता, दृष्टफलानपेक्षिता, निरुपधत्वमनिदानत्वमिति ॥ पात्रविशेषः
सम्यग्दर्शनज्ञानचारित्रतप:संपन्नता इति ।
इति तत्त्वार्थाधिगमेऽहत्प्रवचनसङ्ग्रहे सप्तमोऽध्यायः समाप्तः ।।
विशेपव्याख्या-विधिके विशेपसे, द्रव्य अर्थात् दातव्य पदार्थक विशेषसें, दाता
(देनेवाले)के विशेषसे, और पात्र अर्थात् जिसको दान दिया जाता है उसके विशेष (वै-
लक्षण्य )होनेसे दान धर्ममें भी विशेष (वैलक्षण्य व भेद) होता है । उन विशेषोंमेंसे देश,
काल, संपत् अर्थात् उत्तम देश, काल, सम्पत्ति, श्रद्धा, तथा सत्कारके क्रम इन सब
विशेष रूपोंसे कल्पना करना यह विधिविशेष है । और द्रव्यविशेष क्या है कि अन्न
आदि जो देय पदार्थ है उनमे सारजातीय (उत्तमजातीय)गुणके उत्कर्षका सम्बन्ध क-
रना । अर्थात् उत्तम जाति तथा उत्तम गुणसंयुक्त वस्तु देना; यह द्रव्यविशेष है । दा-
ताकी विशेषता यह है कि दाताकी ग्रहणकर्ता पुरुषमें असूया (गुणोंमें दोषदृष्टि वा स्पर्धा)
न हो । तथा त्याग (दान देने)में विषाद (शोक)न हो अनादर न हो, अर्थात् आदरपूर्वक
दान दे देनेकी इच्छा करते हुए, तथा दे चुकनेपर भी प्रीतियोग हो; दान देनेमें कुशल
(कल्याणमय)अभिप्राय हो; किसी दृष्ट फलकी आकांक्षा न हो, उपधा ( उपाधि )विशेषसे
वर्जित हो; तथा निदानरहित हो, यह सब दातृ (दाता)के विशेष है । और सम्यग्दर्शन,
ज्ञान, चारित्र तथा तपसे सम्पन्न होना; यह पात्र (दानके योग्य पुरुष)की विशेषता है।
इस प्रकार विधि आदिकी विशेषतासे दानमें विशेषता होती है ॥ ३४ ॥
इत्याचार्योपाधिधारि-ठाकुरप्रसादद्विवेदिप्रणीतभाषाटीकासमलङ्कते
तत्त्वार्थाधिगमेऽहत्प्रवचनसंग्रहे सप्तमोऽध्यायः ।। ७ ।।
अष्टमोऽध्यायः।
उक्त आस्रवः बन्धं वक्ष्यामः । तत्प्रसिद्ध्यर्थमिदमुच्यते ।
आस्त्रवका निरूपण कर चुके । अब इसके अनन्तर बन्धका व्याख्यान करेंगे। उस
बन्धकी सिद्धिके अर्थ यह अग्रिम सूत्र कहते हैं-
मिथ्यादर्शनाविरतिप्रमादकषाययोगा बन्धहेतवः ॥ १ ॥
सूत्रार्थ-मिथ्यादर्शन १ अविरति २ प्रमाद ३ कषाय ४ और योग ५ ये
पांचों बन्धके हेतु हैं ॥ १ ॥

रायचन्द्रजंन्शास्त्रनालाया १७४ भाग्यम् निगान अविरतिः प्रमाइः कमाया योगा इसते पञ्च वन्यत्रो भवन्ति। नत्र सन्यग्दर्शनाहिपाजें मिथ्याशनम् । व् द्विविधनभिगृहीवननभिगृहीतं च । स्त्राभ्यु- पंगसन्यागनारिनहोऽनिगृहीतनज्ञानिकादीनां त्रयाणां त्रिषष्टानां कुवादिशतानाम् । शेष- ननभिग्रहीतम् ।। चोकाया बिरजेविपरीताविरतिः ॥ प्रमानः स्तुसनवत्यानं क्रुशलेम्वनाइरो गेगानिधानं वैप नादः ।। पारा मोहनाये बन्यन्ते योगविविधः पूर्वोतः॥ एषा नियादर्शनादीनां कलहनुनां पूलिन्यूलिन्सति नियतनुचरेषां भावः । उत्तरोत्तरभावे तु पूर्वगनियन इति । विपव्याख्या निम्यान आदि वन्वने हेतु हैं, उनमें सन्यदर्शनले जो विपरीत भर्यात् विल्द है बह निमार्शन है । वह निय्याइर्शन दो प्रकारका है-एक अनिगृहीत और चूनरा अननिगृहीत । उनमें महानिकाहि तीन तथा तीनसा साठ असन्यर्शनपूर्वक बीमार (जे दूमके उन आदिले वोहन) होते हैं वह अनिगृहीत और शेष (अनादिकालका) मनानगृहीत है । हिंसादिने जो पूर्वनिरति कही है उसने विपरीत अ- वित है। तया न्चति (लाणोली अनवतियाने, अर्यात् स्वनिता नाश वा अभाव, कुशल कृन्गने मनाइर तया रोगांना प्रणिधान, ये मत्र प्रनाद हैं। पाय नोहनीय कनाने शहेंगे (अ. ८ . १०. और योग, काय वान् त्या ननोख्य तीन प्रकारका पूर्वप्रकरणने नद चुन है । जो निष्पाइर्शन आदि पांच प्रकारके वन्य हेतु कहे हैं इनमें पूर्व रके होनेना पाली नियति अवश्य होती है, जैसे-निय्याननक होनेपर अविरति जत्ता अवश्य होती है, अविरतेने होनेन नाइकी नमा अवश्य होती है: एला ही आगे भी जानो। उन्न उत्तर (आगेर) होनेर पूर्वरकै बन्ने हेतुभानी स्थिति नियन नहीं है कि- लय हो। जैसे अविरतिनी नत्नाने यह निश्न नहीं है कि निय्याइर्शन अवश्य हो; अर्थात् भनिरनित्री मनाने नियादर्शन हो नी सकता है और नहीं नी ॥ १ ॥ सकपायत्वानीः कर्मणो योन्यान्युजलानादत्ते ॥२॥ मन्त्रायकवायसहित होनेने जीव कनक योन्य पुगलोंको ग्रहण करता है।॥ २ ॥ भाग्यम्-कपारगनीनो रोगन पुजलाम् माइते। कनयोग्यानिति सविध पुनमारगरीरहस्योन्यानियः । नानश्या सर्वच योगविनेयानिति कल्यते ।। विपच्याख्या गदित होने कारण जी कनयोग्य पुद्गलाशो ग्रहण करता दिनमा र अनिता है कि लत्रिय पुनलग्रहणशरीर हैल्पले ग्रहणयोन्य बयान तिम किराना है उनकारीर निनोपयोग्य पुनलोंजो ग्रहण करता नान्तर नाहिये कारण जिसतो लबनें योगविशेष नान एक क्षेत्रागाहने बाल कानमन्तानन्त प्रदेश है ऐना नहो(अ.८०.२५) [RI मयन्य:॥३॥ सारंगपुरानो न्यो भवति । ava - A सभाष्यतत्त्वार्थाधिगमसूत्रम् । १७५०५ सूत्रार्थ-वि०व्याख्या -वही यह कर्म शरीरार्थ जो पुद्गलका ग्रहण तत्कृत बन्ध होता है । तात्पर्य यह कि-कर्मोके शरीरार्थ जो जीव पुद्गलोंको ग्रहण करता है वही बन्ध है ॥ ३ ॥ स पुनश्चतुर्विधः। वह बन्ध वक्ष्यमाण भेदोंसे चार प्रकारका है जैसे- प्रकृतिस्थित्यनुभावप्रदेशास्तद्विधयः ॥४॥ सूत्रार्थ-प्रकृति, स्थिति, अनुभाव और प्रदेश यह चार उस बन्धके प्रकार हैं । भाष्यम्-प्रकृतिवन्धः स्थितिबन्धः अनुभाववन्धः प्रदेशबन्धः इति । तत्र- विशेपव्याख्या-प्रकृतिबन्ध, स्थितिबन्ध, अनुभावबन्ध तथा प्रदेशबन्ध, ये चार बन्ध है। जैसे- आद्यो ज्ञानदर्शनावरणवेदनीयमोहनीयायुष्कनामगोत्रान्तरायाः ॥५ भाष्यम्-आद्य इति सूत्रक्रमप्रामाण्यात्प्रकृतिवन्धमाह । सोऽष्टविधः । तद्यथा । ज्ञाना- वरणं दर्शनावरणं वेदनीयं मोहनीयं आयुष्कं नाम गोत्रं अन्तरायमिति । किं चान्यत्- सूत्रार्थ-विशेषव्याख्या-इस पूर्वोक्त चतुर्थ सूत्रके क्रमके प्रमाणसे आद्य मर्थात् प्रथम जो प्रकृति-बन्ध है उसको कहते है। उसके आठ भेद है। जैसे- नावरण १, दर्शनावरण २, वेदनीय ३, मोहनीय ४, आयुष्क ५, नाम ६, गोत्र ७, और अन्तराय ८, ये आठ प्रकृतिबन्ध हैं। और यह भी विशेष है ॥ ५ ॥ पञ्चनवद्यष्टाविंशतिचतुर्द्विचत्वारिंशविपञ्चभेदा यथाक्रमम् ॥ ६॥ भाप्यम्स एप प्रकृतिवन्धोऽष्टविधोऽपि पुनरेकशः पञ्चभेदः नवभेदः द्विभेदः अष्टा- वैशतिभेदः चतुर्भेदः द्विचत्वारिशद्भेदः द्विभेदः पञ्चभेद इति यथाक्रमं प्रत्येतव्यम् । त उत्तरं यद्वक्ष्यामः । तद्यथा सूत्रार्थ-विशेषव्याख्या-जो यह प्रकृतिबन्ध आठ प्रकारका वर्णन किया गया है उन आठों भेदोंमें भी प्रत्येकके ये भेद है । जैसे-ज्ञानावरणके पांच (५) मेद, दर्शनावरणके नौ (९) भेद, वेदनीयके दो (२)भेद, मोहनीयके अष्टाविंशति अर्थात् अट्ठाईस (२८)मेद, आयुष्कके चार (४)भेद, नामके बयालीस (४२)भेद, गोत्रके दो (२)मेद, और अन्तरायके पांच (५)भेद है, इस प्रकार यथाक्रमसे जानना चाहिये ॥ ६ ॥ अब इसके पश्चात् जिन प्रकृतिभेदोंको आगे कहेंगे उनको ऐसे जानना. जैसे- मत्यादीनाम् ॥ ७॥ भाज्यम्-ज्ञानावरणं पञ्चविधं भवति । मत्यादीनां ज्ञानानामावरणानि पञ्च विकल्पां- चैकश इति ॥ सूत्रार्थ-विशेषव्याख्या-ज्ञानावरण जो प्रकृतिबन्धका प्रथम भेद है वह पांच .

रायचन्द्र जैनशास्त्रमालायाम् १७६ कारका होता है । मतिश्रुतादि जो ज्ञान हैं उनके भेदसे पांच प्रकारका ज्ञानावरण होता है । जैसे—मतिज्ञानावरण १ श्रुतज्ञानावरण २ अवधिज्ञानावरण ३ मनःपर्यायज्ञानावरण ४ तथा केवलज्ञानावरण ५ इस प्रकार प्रत्येक ज्ञानके साथ आवरणके विकल्प (भेद)समझने चाहिये ॥ ७ ॥ चक्षुरचक्षुरवधिकेवलानां निद्रानिद्रानिद्राप्रचलाप्रचलाप्रचलास्त्यान- गृद्धिवेदनीयानि च ॥ ८॥ सूत्रार्थ-चक्षुरादि नवभेद दर्शनावरणके हैं। भाग्यम्-चक्षुर्दर्शनावरणं अचक्षुर्दर्शनावरणं अवधिदर्शनावरणं केवलदर्शनावरणं निद्रावे- दनीयं निद्रानिद्रावेदनीय प्रचलावेदनीयं प्रचलाप्रचलावेदनीयं स्त्यानगृद्धिवेदनीयमिति दर्श- नावरणं नवमेदं भवति । विशेपव्याख्या-चक्षुर्दर्शनावरण १, अचक्षुर्दर्शनावरण २, अवधिदर्शनावरण ३, के वलदर्शनावरण ४, निद्रावेदनीय ५, निद्रानिद्रावेदनीय ६, प्रचलावेदनीय ७, प्रचलाप्रच- लावेदनीय ८, स्त्यानगृद्धिवेदनीय ९, ये नौ (९) भेद दर्शनावरणके है ॥ ८ ॥ सदसद्धेद्ये ॥९॥ सूत्रार्थ-वेदनीय आवरणके सत् असत् दो भेद हैं। सद्वेद्यं असद्वेद्यं च वेदनीयं द्विभेदं भवति । सूत्रार्थ-सद्वद्य १ तथा असद्वेद्य २ इन भेदोंसे वेदनीय दो भेदसहित है ॥ ९ ॥ दर्शनचारित्रमोहनीयकषायनोकषायवेदनीयाख्यास्त्रिद्विषोडशनव- भेदाः सम्यक्त्वमिथ्यात्वतदुभयानि कषायनोकषायावनन्तानुबन्ध्य- प्रत्याख्यानप्रत्याख्यानावरणसंज्वलनविकल्पाश्चैकशः क्रोधमानमाया- लोभाः हास्यरत्यरतिशोकभयजुगुप्सास्त्रीपुनपुंसकवेदाः॥१०॥ भाष्यम्-त्रिद्विपोटशनवभेदा यथाक्रमम् । मोहनीयवन्धो द्विविधो दर्शनमोहनीयाख्यश्चा- रित्रमोहनीयाख्यञ्च । तत्र दर्शनमोहनीयाख्यस्त्रिभेदः । तद्यथा । मिथ्यात्ववेदनीयं सम्यक्त्व- वेदनीयं सम्यग्मिथ्यात्ववेदनीयमिति । चारित्रमोहनीयाख्यो द्विभेदः कषायवेदनीयं नोकषाय- वदनीयं चेति । तत्र कपायवेदनीयाख्यः पोडशभेदः । तद्यथा । अनन्तानुवन्धी क्रोधो मानो माया लोभ एवमप्रत्याख्यानकपाय: प्रत्याख्यानावरणकपायः संज्वलनकषाय इत्येकशः क्रोधमानमायालोमाः पोडश भेदाः ॥ नोकपायवेदनीयं नवभेदम् । तद्यथा । हास्यं रतिः अरतिः गोक: भयं जुगुप्सा पुरुषवेदः बीवेदः नपुंसकवेद इति नोकषायवेदनीयं नवप्रका- ग्म । तत्र पुरुपवेदादीनां तृणकाप्टकरीषानयो निदर्शनानि भवन्ति । इत्येवं मोहनीयमष्टा- विविभेदं भवति ॥ दृप्रार्थ-विशेषव्याख्या-तीन, दो, पोडश (सोलह) तथा नत्र भेद यथाक्रमसे 4 सभाष्यतत्त्वार्थाधिगमसूत्रम् । १७७ दर्शनमोहनीय आदिके हैं। प्रथम मोहनीयबन्ध दो प्रकारका है; एक (१)दर्शनमोहनीय और दूसरा (२) चारित्रमोहनीय । अब उनमें प्रथम दर्शनमोहनीय नामक जो बन्ध है उसके तीन (३)भेद है। जैसे-मिथ्यात्ववेदनीय १, सम्यक्त्ववेदनीय २, तथा सम्यग्मिथ्यात्व-एतदुभ- यवेदनीय ३ और चारित्रमोहनीयके दो (२)भेद है, एक (१)कषायवेदनीय १ और दूसरा नोकषायवेदनीय २। उनमे भी कषायवेदनीयके षोडश अर्थात् सोलह (१६)मेद है । जैसे- अनन्तानुबन्धी क्रोध, मान, माया, तथा लोभ, अर्थात् अनन्तानुबन्धीक्रोधकषाय, अनन्ता- नुबन्धीमानकपाय, अनन्तानुबन्धी मायाकषाय, तथा अनन्तानुबन्धी लोभकषाय। इसी प्रकार अप्रत्याख्यानकपाय, प्रत्याख्यानावरणकषाय, तथा संज्वलनकषाय है । तात्पर्य यह कि- जैसे-अनन्तानुबन्धीकी क्रोधआदि प्रत्येकके साथ योजना हुई है ऐसे ही अप्रत्याख्यान आदिकी भी होती है । जैसे-अप्रत्याख्यानक्रोधकषाय, अप्रत्याख्यानमानकषाय, अप्रत्याख्या- नमायाकषाय, तथा अप्रत्याख्यानलोभकषाय । इसी रीतिसे प्रत्याख्यानावरण, तथा संज्वल- नकी प्रत्येकके साथ योजना करनेसे क्रोध, मान, माया तथा लोभ ये सोलह प्रकारके होजाते हैं । नोकषायवेदनीयके नौ (९)भेद हैं । जैसे-हास्य, रति, अरति, शोक, भय, जुगुप्सा, पुरुषवेद, स्त्रीवेद, और नपुंसकवेद। उनमें पुरुषवेदादिके तृण, काष्ठ, तथा करी- पकी अग्निके निदर्शन अर्थात् दृष्टान्त क्रमसे होसकते है। इस प्रकार मोहनीयप्रकृतिके अठाईस (२८) भेद हुए; अर्थात् तीन ३ दर्शनमोहनीयके, चारित्रमोहनीयमेंके कषायके १६, नोकपायके ९. इनमेंसे तीन वेदके निकालनेसे अठ्ठाइस होते है। अनन्तानुबन्धी सम्यग्दर्शनोपघाती । तस्योदयाद्धि सम्यग्दर्शनं नोत्पद्यते । पूर्वोत्पन्नमपि च प्रतिपतति । अप्रत्याख्यानकषायोदयाद्विरतिर्न भवति । प्रत्याख्यानावरणकषायोदयाद्विरता- विरतिर्भवत्युत्तमचारित्रलाभस्तु न भवति । संज्वलनकषायोदयाद्यथाख्यातचारित्रलाभो न भवति ॥ अब इनमें अनन्तानुबन्धी कषाय सम्यग्दर्शनका उपघाती होता है । उस अनन्तानु- बन्धी कषायके उत्पन्न होनेसे सम्यग्दर्शन उत्पन्न ही नही होता, और यदि अनन्तानुबन्धी कषायके उदयके पूर्व सम्यग्दर्शन उत्पन्न होगया हो तो उसके उदयके पश्चात् वह सम्य- ग्दर्शन विनष्ट होजाता है । अर्थात् पूर्वकालमें उत्पन्न भी सम्यग्दर्शनका इस कषायके उदय होनेसे प्रतिपात (नाश हो जाता है। अप्रत्याख्यानकषायके उदयसे विरति (हिंसा- दिसे विरति) नही होती । और प्रत्याख्यानावरणकषायके उदयसे विरताविरति तो होती है परंतु उत्तम चारित्रका लाभ नहीं होता। क्रोधः कोपो रोषो द्वेषो भण्डनं भाम इत्यनन्तरम् । तस्यास्य क्रोधस्य तीव्रमध्यविमध्य- मन्दभावाश्रितानि निदर्शनानि भवन्ति । तद्यथा । पर्वतराजिसहशः भूमिराजिसदृशः वालु- काराजिसहशः उदकराजिसदृश इति । तत्र पर्वतराजिसदृशो नाम । यथा प्रयोगविस्रसा- मिश्रकाणामन्यतमेन हेतुना पर्वतराजिरुत्पन्ना नैव कदाचिदपि संरोहति एवमिष्टवियोजना- २३ " १९७८ रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् निष्टयोजनाभिलपितालाभादीनामन्यतमेन हेतुना यस्योत्पन्नः क्रोध आमरणान्न व्ययं गच्छति जायन्तरानुवन्धी निरनुनयस्तीत्रानुशयोऽप्रत्यवमर्शश्च भवति स पर्वतराजिसदृशः। तादृशं क्रोधमनुमृता नरकेपूपपत्ति प्रामुवन्ति ॥ भूमिराजिसदृशो नाम । यथा भूमेर्भास्कर- रश्मिजालातत्नेहाया वाय्वभिहताया राजिरुत्पन्ना वर्षापेक्षसंरोहा परमप्रकृष्टाप्टमासस्थिति- भवति एवं यथोक्तनिमित्तो यस्य क्रोधोऽनेकविधस्थानीयो दुरनुनयो भवति स भूमिराजि- सदृशः । तादृशं क्रोधमनुमृतास्तिर्यग्योनावुपपत्ति प्राप्नुवन्ति ॥ वालुकाराजिसहशो नाम । यथा वालुकायां काष्ठशलाकाशर्करादीनामन्यतमेन हेतुना राजिरुत्पन्ना वायवीरणाद्यपेक्षसं- रोहार्वाग्मासस्य रोहति एवं यथोक्तनिमित्तोत्पन्नो यस्य क्रोधोऽहोरात्रं पक्षं मासं चातुर्मास्यं संवत्सरं वावतिष्ठते स वालुकाराजिसघशो नाम क्रोधः । तादृशं क्रोधमनुमृता मनुष्येषूपपत्ति प्रानुवन्ति ॥ उदकराजिसदृशो नाम । यथोदके दण्डशलाकाङ्गुल्यादीनामन्यतमेन हेतुना रालिरुत्पन्ना द्रवत्वादपामुत्पत्त्यनन्तरमेव संरोहति एवं यथोक्तनिमित्तो यस्य क्रोधो विदुषोऽ प्रमत्तस्य प्रत्यवमर्शनोत्पत्त्यनन्तरमेव व्यपगच्छति स उदकराजिसदृशः । तादृशं क्रोधमनु- मृता देवेपूपपत्ति प्राप्नुवन्ति । येषां त्वेष चतुर्विधोऽपि न भवति ते निर्वाणं प्राप्नुवन्ति । क्रोध, कोप, रोष, द्वेप, भण्डन तथा भाम ये सब एकार्थवाचक शब्द है । इन अनेक पर्यायोंसे वाच्य कपायसंज्ञक क्रोधके तीव्र, मध्यम, विमध्यम, तथा मन्दभावके आश्रित ये दृष्टान्त होते है । जैसे-~-पर्वतराजिसदृश अर्थात् पर्वतके ऊपर रेखाके समान, भूमि- राजि (भूमिके ऊपर रेखा)के समान, वालुकाराजिसमान, तथा जलराजिसमान । ये चार (४) दृष्टान्त है । इनमेंसे 'पर्वतराजि'का यह तात्पर्य है कि जैसे पुरुपके प्रयोगसे अर्थात लोहेकी टांकी आदिके द्वारा, वा स्वयं किसी प्रकारसे, अथवा पुरुषके यत्न इन तीन हेनुआमसे किसी एक हेतुसे यदि पर्वतकी शिलापर रेखा उत्पन्न होगई हो तो वह कदापि नहीं नष्ट होती। ऐसे ही इष्टके वियोग, अनिष्टके संयोग, तथा अभिलषित पदार्थक लाभ न होनेसे, इन तीन हेतुओंमेसे किसी एक हेतुसे जिस पुरुपके क्रोध उत्पन्न हुआ यह यदि मरणपर्यन्त नष्ट न हो, किन्तु जन्मान्तरमे भी वह उस प्राणीके साथ है जाय. किमी प्रकारले शान्त न हो, न दूर कियाजाय, तीन आशय संयुक्त, और क्षमावे अयोग्य हो वह क्रोध पर्वतराजि (रेखा)के सहश है। इस क्रोधके पश्चात् जो जीव मृत्युको प्राम होते है वे नरकोंमे जन्म पाते है । तथा भूमिराजिसश, सूर्यके किरणोंसे आदता (नीलापन )सहित, तथा वायुले ताडित होनेसे भूमिपर यदि रेखा उत्पन्न होगई नो बह गया प्रायवर्षा कालतक रहेगी। इस हेतुसे अधिकसे भी अधिक आठ मास पन्ती थिति रहेगी। एन ही जिसका क्रोध पूर्वोक्त किसी हेतुसे उत्पन्न हुआ और वर अनेक प्रा स्थित होन योग्य है, अर्थात् कई वर्प रहे, अथवा दो चार वर्ष . दा परकीय ग, और दुग्यने दर करने योग्य हो, वह क्रोध भूमिरेखाके समान इन प्रकारके, गोधक अनन्तर मृत्युको प्राप्त जो जीव है वे तिर्यग्योनियों सभाष्यतत्त्वार्थाधिगमसूत्रम् । १७९१५ उत्पन्न होते हैं । वालुकाराजिसदृश, जैसे बालूमे काष्ठ, लोहादिकी शलाका वा कंकरआदि हेतुओंमेंसे किसी भी कारणसे राजि (रेखा) उत्पन्न होगई हो तो वह पवन आदिके झकोरोंसे वा अन्य हेतुओंसे एक मासके पूर्व ही नष्ट होजाती है। ऐसे ही पूर्वकथित इष्ट- वियोग आदि किसी हेतुसे यदि किसीके क्रोध उत्पन्न होगया तो वह क्रोध रात्रि, दिन पक्ष, मास, चतुर्मास वा अधिकसे अधिक एक वर्ष स्थित रहे तो वह क्रोध वालुका- रेखाके समान है। इस प्रकारके क्रोधके उत्पन्न होनेके अनन्तर मरणको प्राप्त प्राणी मनु- प्योंमें उत्पन्न होते है। उदकराजिके सदृश, जैसे जलमें दण्ड, शलाका तथा अङ्गुली आदि हेतुओंमेंसे किसी एक हेतुके द्वारा यदि रेखा उत्पन्न हो तो वह उस (जल)के द्रवी- भूत होनेसे उत्पत्तिके अनन्तर ही मिट जाती है । इसी रीतिसे पूर्वनिमित्तोंसे जिस अप्र- मत्त विद्वान्को क्रोध उत्पन्न हुआ और वह विचार तथा क्षमा करनेसे उत्पत्तिके अनन्तर ही नाशको भी प्राप्त होजाता है तो वह क्रोध उदकराजि (जलरेखा) के समान है। इस प्रकारके क्रोध होनेके अनन्तर जो मृत्युको प्राप्त हुए वे देवताओंमें उत्पन्न होते है । और जिनको इन पूर्वकथित चारों प्रकारके क्रोधोंमे कोई भी क्रोध नहीं उत्पन्न होता वे तो निर्वाण (मोक्ष) को प्राप्त होते है । मानः स्तम्भो गर्व उत्सेकोऽहंकारो दर्पो मदः स्मय इत्यनर्थान्तरम् । तस्यास्य मानस्य तीब्रादिभावाश्रितानि निदर्शनानि भवन्ति । तद्यथा। शैलस्तम्भसदृश अस्थिस्तम्भसदृशः दारु- स्तम्भसहशः लतास्तम्भसदृश इति । एषामुपसंहारो निगमनं च क्रोधनिदर्शनाख्यातम् ॥ मान, स्तम्भ, गर्व, उत्सेक, अहङ्कार, दर्प, मद, तथा स्मय; ये सब शब्द भी एका- र्थवाचक हैं । इन अनेक पर्यायोंसे वाच्य मानके भी तीव्र, मध्यम, तथा मन्दभावोंके आश्रित चार दृष्टान्त होते है। जैसे-शैलस्तम्भसदृश (पाषाण वा पर्वतोंके खम्भेके समान ) अस्थिस्तम्भसदृश (हाड़के खम्भेके तुल्य ) दारुस्तम्भसदृश (काष्ठके खम्भेके तुल्य) और लतास्तम्भसदृश (बेलोंके खंभेके तुल्य) इन चार प्रकारके मानोंके उप- संहार (संग्रह तथा समाप्ति) और निगमन (दृष्टान्तद्वारा उनकी सिद्धी) क्रोधोंके ही दृष्टान्तोंसे व्याख्यात समझलेनी उचित है। माया प्रणिधिरुपधिनिकृतिरावरणं वञ्चना दम्भः कूटमतिसन्धानमनार्जवमित्यनन्त- रम् । तस्या मायायास्तीवादिभावाश्रितानि निदर्शनानि भवन्ति । तद्यथा । वंशकुणसदृशी ' मेपविपाणसदृशी गोमूत्रिकासहशी निर्लेखनसदृशीति । अत्राप्युपसंहारनिगमने क्रोधनिद- शनाख्याते॥ ऐसे ही माया, प्रणिधि, उपधि, निकृति, आवरण, वञ्चना, दम्भ, कूट, अतिसन्धान, तथा अनार्जव; ये सब शब्द भी एक ही अर्थक बोधक हैं । इस प्रकार अनेक पर्यायोंसे वाच्य इस मायाके भी तीन आदि भावोंके आश्रित दृष्टान्त होते है । जैसे-वंशकुण- ३१८० रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् सहशी माया, मेपविषाण (भेड़के सींग ) सहशी, तथा निलेखनसहशी । इसके भी उपसं- हार तथा दृष्टान्त क्रोधके दृष्टान्तोंसे व्याख्यात (वर्णित ) समझलेने चाहिये। लोभी रागो गार्थ्यमिच्छा मूर्छा स्नेहः कांक्षाभिष्वङ्ग इत्यनान्वरम् । तस्यास्य लोभस्य तीब्रादिभावाश्रितानि निदर्शनानि भवन्ति । तद्यथा लाक्षारागसदृशः कर्दमरागसदृशः कुसुम्भ- रागसदृशो हरिद्रारागसदृश इति । अत्राप्युपसंहारनिगमने क्रोधनिदर्शनैर्व्याख्याते ।। लोभ, गाय, इच्छा, मूर्छा, स्नेह, कांक्षा तथा अभिषङ्ग इत्यादि सब एकार्थवाचक शब्द है । इस प्रकार राग आदि पर्यायोंसे वाच्य इस लोभके भी तीन मध्यम आदि भा- वोंके आश्रित दृष्टान्त है। जैसे-लाक्षारागसदृश (लाख वालाहके रंगके समान)-कर्दम, (कीचड़) रागसदृश, कुसुम्भरागसदृश, तथा हरिद्रा (हल्दी ) रागसदृशः ये चार प्रकारके रंग लोभके दृष्टान्त है। इनके भी संग्रह नाशादिकी रीति क्रोधके दृष्टान्तोंसे व्याख्यात समझलेनी चाहिये। एपां क्रोधादीनां चतुर्णा कषायाणां प्रत्यनीकभूताः प्रतिघातहेतवो भवन्ति । तद्यथा । क्षमा क्रोधस्य मार्दवं मानस्यार्जवं मायायाः संतोषो लोभस्येति । इन क्रोध आदि चार प्रकारके कषायोंके प्रतिपक्षभूत इनके नाशक हेतु ये होते हैं। जैसे-भमा क्रोध कपायके नाशमे हेतु है, मार्दव (मृदुता वा नम्रता) मानकपायके ना- शमें हेतु है, आर्जव (सरलखभाव वा कपटराहित्य व्यवहार) मायाका प्रतिपक्ष तथा उसके नाशमें हेतु है । और सन्तोष ( यथाप्राप्त वस्तुमे तृप्ति) लोभका प्रतिपक्ष और उसके नाशम कारण है । इस कारण क्रोधादि कपायोंके नाशार्थ क्षमा आदिका धारण अवश्य कर्तव्य है ।। १०॥ नारकतैर्यग्योनमानुषदैवानि ॥ ११ ॥ सूत्रार्थनारक, तैर्यग्योन, मानुष और दैव यह चार आयुपके भेद है। भाप्यम्-~~आयुष्कं चतुर्भदं नारकं तैर्यग्योनं मानुपं दैवमिति । विशेपव्याख्या-अव पञ्चम उत्तरप्रकृति जो आयुष्क (आयुप् ) है उसके नारक, तर्यग्योन, मानुप और देव इन भेदोंसे चार भेद है ॥ ११ ॥ गतिजातिशरीराङ्गोपाङ्गनिर्माणवन्धनसङ्घातसंस्थानसंहननस्पर्शर- सगन्धवर्णानुपूर्व्यगुरुलघूपधातपराघातातपोद्योतोच्छवासविहायोगतयः । प्रत्येकशरीरत्रससुभगसुस्वरशुभसूक्ष्मपर्याप्तस्थिरादेययशांसि सेतराणिर नीर्थकृत्त्वं च ॥ १२ ॥ भाष्यम्-मानिनाम जातिनाम शरीरनाम अङ्गोपाङ्गनाम निर्माणनाम वन्धननाम संभातनाम मन्थाननाम संहनननाम स्पर्शनाम रसनाम गन्धनाम वर्णनाम आनुपूर्वी- नान गुग्लयुनाम उपयातनाम पराधातनाम आतपनाम उद्योवनाम उच्चासनाम विहा- - “१८५ सभाप्यतत्त्वार्थाधिगमसूत्रम् । योगतिनाम । प्रत्येकशरीरादीनां सेतराणां नामानि । तद्यथा । प्रत्येकशरीरनाम साधारण- शरीरनाम सनाम स्थावरनाम सुभगनाम दुर्भगनाम सुखरनाम दुःस्वरनाम शुभनाम अशुभनाम सूक्ष्मनाम बादरनाम पर्याप्तनाम अपर्याप्तनाम स्थिरनाम अस्थिरनाम आदेयनाम अनादेयनाम यगोनाम अयशोनाम तीर्थनाम तीर्थकरनाम इत्येतद्विचत्वारिंशद्विधं मूल- भेदतो नामकर्म भवति । उत्तरनामानेकविधम् । तद्यथा। गतिनाम चतुर्विधं नरकगति- नाम तिर्यग्योनिगतिनाम मनुष्यगतिनाम ॥ जातिनान्नो मूलभेदाः पञ्च । तद्यथा । एके- न्द्रियजातिनाम द्वीन्द्रियजातिनाम श्रीन्द्रियजातिनाम चतुरिन्द्रियजातिनाम पञ्चेन्द्रियजा- तिनामेति ॥ एकेन्द्रियजातिनामानेकविधम् । तद्यथा । पृथिवीकायिकजातिनाम अपका- यिकजातिनाम तेजःकायिकजातिनाम वायुकायिकजातिनाम वनस्पतिकायिकजातिनामेति ।। तत्र पृथिवीकायिकजातिनामानेकविधम् । तद्यथा । शुद्धपृथिवी-शर्करावालुकोपल-शिला- लवणायखपु-ताम्र-सीसक-रूप्य-सुवर्ण-व-हरिताल-हिड्डुलक-मनःशिला-सस्यकाञ्चन- प्रवालकाभ्रपटलाभ्रवालिका जातिनामादि गोमेदक-रुचकाङ्क-स्फटिकलोहिताक्ष-जलावभा- स-वैडूर्य-चन्द्रप्रभ चन्द्रकान्त-सूर्यकान्त-जलकान्त-मसारगल्लाश्मगर्म-सौगन्धिक-पुलकारि- ट-काञ्चनमणिजातिनामादि च ॥ अप्कायिकजातिनामानेकविधम् । तद्यथा । उपल्लेदाव- श्याय-नीहार-हिम-घनोदक-शुद्धोदकजातिनामादि । तेजःकायिकजातिनामानेकविधम् । तद्यथा । अङ्गार-ज्वाला-लाताचिमुर्मुर-शुद्धाग्निजाटिनामादि ॥ वायुकायिकजातिनामानेक. विधम् । तद्यथा। उत्कलिका-मण्डलिका-शझकायन-संवर्तकजातिनामादि ॥ वनस्पतिका- यिकजातिनामानेकविधम् । तद्यथा । कन्द-मूल-स्कन्ध-वक्-काष्ठपत्र-प्रवाल-पुष्प-फल- गुल्म-गुच्छ-लता-वल्ली-तृण-पर्वकायशेवाल-पनक-वलक-कुहन जातिनामादि ॥ एवं द्वीन्द्रियजातिनामानेकविधम् । एवं त्रीन्द्रियचतुरिन्द्रियपञ्चेन्द्रियजातिनामादीन्यपि ।। सूत्रार्थ-अब इसके आगे नाम प्रकरणके ४२ भेदोंका वर्णन करते हैं । जैसे- गतिनाम, जातिनाम, शरीरनाम, अङ्गोपाङ्गनाम, निर्माणनाम, बन्धननाम, संघातनाम, संस्थाननाम, संहनननाम, स्पर्शनाम, रसनाम, गन्धनाम, वर्णनाम, आनुपूर्वीनाम, अगुरुल- घुनाम, उपघातनाम, पराघातनाम, आतपनाम, उद्योतनाम, उच्छासनाम, विहायोगतिनाम (आकाशगतिनाम ) और प्रत्येक शरीरादिके तथा उनके प्रतिपक्षोंके नाम; जैसे-प्रत्येक शरीरनाम, साधारणशरीरनाम, बसनाम, स्थावरनाम, सुभगनाम; दुर्भगनाम, सुस्वरनाम, दुःखरनाम, शुभनाम, अशुभनाम, सूक्ष्मनाम, बादरनाम, पर्याप्तनाम, अपर्याप्तनाम, स्थिरनाम, अस्थिरनाम, आदेयनाम, और अनादेयनाम, यशोनाम, अयशोनाम, तथा तीर्थकरनाम, इस प्रकार मूलभेदसे बयालीस (४२) भेद नाम कर्मके है । और उत्तर- नाम तो अनेक प्रकारके है। जैसे-गतिनामके चार भेद है नरकगतिनाम, तिर्यग्योनिग- तिनाम, मनुष्यगतिनाम, तथा देवगतिनाम, जातिनाम कर्मक मूल भेद पांच है । जैसे- एकेन्द्रियजातिनाम, द्वीन्द्रियजातिनाम, श्रीन्द्रियजातिनाम, चतुरिंद्रियजातिनाम, तथा पञ्चेन्द्रियजातिनाम । अब एकेन्द्रिय (एक स्पर्शन इन्द्रियवाले) जातिनाम भी अनेक - - . ३१८२ रायचन्द्रजनशामगाठायाम प्रकारके हैं। जैसे-पृथिवीकायिकजातिनाम, आपकामिकामानिनाम, Amitarमार, वायुकायिकजातिनाम, वनस्पतिकायिकमानिनाम, श्री. नीryfat नामके भी अनेक भेद है । जैसे-शुमपृथिवीजानिनाम. mirmiran, पृथिवीजातिनाम, उपलगृथिवीजातिनाग, मिन्यामिनामानिनाम, .maitram अयसू (लोह ) पृथिवीजातिनाग, ऋ ( गंगा ) पHिit सीसकपृथिवीजातिनाम, रुप्यटथिवीजानिनाम, गुरगामिनार नाम, हरितालपृथिवीजातिनाम, हिमुलक (गक वर्णका गांगर मैं (उपधातुभेद ) जातिनाम, ऐसे ही मन्य अनेकाध मा. . . अभ्रवालिका पृथिवीजातिनाम आदि और भी ममकाममा नगर, न... टिक, लोहिताक्ष, जलावभास ( मौक्तिक). मर्य, नमन, ना. म.न. कान्त, मसारगल्ल, अश्मगर्भ, सौगन्धिक, एलकारित. नया का मांगिनी जातिनाम समझना चाहिये । अप्कायिकजातिनाम भी अनेक प्रार.TT क्लेद अप्कायिकजातिनाम, अवश्याय (कुहिरा वा आंग) कायानिनाम. मोतार- जातिनाम, हिमजातिनाम, घनोदकजातिनाम, तथा शुद्धोकाजानिनाम. नादिना भी अपकायिकजातिनामके अवान्तर भेद समझलेने । तेजःकाविकजातिनाम भी भनेर रका है। जैसे-अङ्गारतेजःकायिकजातिनान, ज्वालातेज.काविकजामिनार. अामा. यिकजातिनाम, अर्चिस्तेजःकायिकजातिनाम, भ्रमरतेज.नायिकनातिनान. नया मलाल तेजःकायिकजातिनाम आदि अन्य भी जानने चाहिये । वायुकायिक नातिनानक भी श्रमा न्तर भेद अनेक है । जैसे-उत्कलिकावायुकायिकजातिनाम. मण्डलिकावायुकागिर जाति नाम, झन्झकायनवायुकायिकजातिनाम, तथा संवर्तकवायुकायिकजातिनाम आदि अन्य मी हैं । और ऐसे ही वनस्पतिकायिकजातिनाम कमके अवान्तर अनेक भेद है। जैसे- कन्दवनस्पतिकायिकजातिनाम, मूलवनस्पतिकायिकजातिनाम, न्कन्धवनम्पतिकायिकजानि नाम, वरवनस्पतिकायिकजातिनाम. ऐसे ही काष्ठ, पत्र, प्रवाल, पुप्प, फल, गुल्म गुच्छ, लता, वल्ली, तृण, पर्व, कायशेवाल, पनक, वलक, तथा कुहनवनम्पतिकायिक जातिनाम आदि अन्य भी समझलेने । इसी रीतिसे द्वीन्द्रियजातिनाम भी अनेक भेद सहित हैं । और इसी रीतिसे त्रीन्द्रिय, चतुरिन्द्रिय, तथा पञ्चेन्द्रियजातिनाम भी अनेर अवान्तर-भेद सहित है। शरीरनाम पञ्चविधम् । तद्यथा । औदारिकारीरनाम वैक्रियशरीरनाम आहारकशरीर १ यहांले लेके पुलकारिष्ट काचनपर्यन्त सबके आगे पृथिवीकायिकजातिनाम इतना जोड़के पढ़ना तर समझना चाहिये, जसे सस्य पृथिवीकायिकजातिनाम, काचन पृथिवीकायिकजातिनाम, प्रवाल पृथिवीमायिक नाम इत्यादि आगे भी ऐसे ही समझना ।

सभाष्यतत्त्वार्थाधिगमसूत्रम् । १८३५ नाम तैजसशरीरनाम कार्मणशरीरनामेति ॥ अङ्गोपाङ्गनाम त्रिविधम् । तद्यथा । औदारि- काङ्गोपाङ्गनाम वैक्रियशरीराङ्गोपाङ्गनाम आहारकशरीराङ्गोपाङ्गनाम। पुनरेकैकमनेकविधम् । तद्यथा । अङ्गनाम तावत् शिरोनाम उरोनाम पृष्ठनाम बाहुनाम उदरनाम' पादनाम ।। उपाङ्गनामानेकविधम् । तद्यथा । स्पर्शनाम रसनाम घ्राणनाम चक्षुर्नाम श्रोत्रनाम । तथा मस्तिष्ककपालकृकाटिकाशङ्खललाटतालुकपोलहनुचिबुकदशनौष्ठभूनयनकर्णनासाधुपाङ्गना- मानि शिरसः । एवं सर्वेषामङ्गानामुपाङ्गानां नामानि ॥ जातिलिङ्गाकृतिव्यवस्थानियामकं निर्माणनाम ॥ सत्यां प्राप्तौ निर्मितानामपि शरीराणां बन्धक बन्धननाम । अन्यथा हि वालु- कापुरुषवदवद्धानि शरीराणि स्युरिति ॥ वद्धानामपि च संघातविशेषजनकं प्रचयविशेषात्सं- घातनाम दारुमृत्पिण्डायःसंघातवत् ॥ संस्थाननाम षड्विधम् । तद्यथा । समचतुरस्रनाम न्यग्रोधपरिमण्डलनाम साचिनाम कुब्जनाम वामननाम हुण्डनामेति ॥ संहनननाम षड्वि- धम् । तद्यथा । वज्रर्पभनाराचनाम अर्धवर्षभनाराचनाम नाराचनाम अर्धनाराचनाम कीलिकानाम मृपाटिकानामेति ॥ स्पर्शनामाष्टविधं कठिननामादि ॥ रसनामानेकविधं तिक्त- नामादि । गन्धनामानेकविधं सुरभिगन्धनामादि ॥ वर्णनामानेकविधं कालकनामादि । गतावुत्पत्तुकामस्यान्तर्गतौ वर्तमानस्य तदभिमुखमानुपूर्व्या तत्प्रापणसमर्थमानुपूर्वीनामेति । निर्माणनिर्मितानां शरीराङ्गोपाङ्गानां विनिवेशक्रमनियामकमानुपूर्वीनामेत्यपरे ॥ अगुरुलघु- परिणामनियामकमगुरुलघुनाम ॥ शरीराङ्गोपाङ्गोपघातकमुपघातनाम स्वपराक्रमविजया- ग्रुपघातजनकं वा । परत्रासप्रतिघातादिजनकं पराघातनाम ॥ आतपसामर्थ्यजनकमात- । पनाम ॥ प्रकाशसामर्थ्यजनकमुद्योतनाम ॥ प्राणापानपुद्गलग्रहणसामर्थ्यजनकमुच्छासनाम। लब्धिशिक्षर्द्धिप्रत्ययस्याकाशगमनस्य जनकं विहायोगतिनाम ॥ शरीरनाम कर्म पांच प्रकारका है । जैसे-औदारिकशरीरनाम, वैक्रियकशरीरनाम, आ- हारकशरीरनाम, तैजसशरीरनाम, तथा कार्मणशरीरनाम । अङ्गोपाङ्गनाम तीन प्रकारका है । जैसे-औदारिकअङ्गोपाङ्गनाम, वैक्रियशरीरअङ्गोपाङ्गनाम, और आहारकशरीरअङ्गो- पाङ्गनाम, पुनः ये औदारिकशरीराङ्गोपाङ्गनाम आदि एक २ अनेक प्रकारका है। जैसे- प्रथम अङ्गनाम कहते है-शिरोनाम, उरो (छाती) नाम, पृष्ठ (पीठ) नाम, बाहुनाम, उदरनाम तथा पादनाम, उपाङ्गनाम भी अनेक प्रकारका है । जैसे-स्पर्शनाम, रसनाम, प्राणनाम, चक्षुर्नाम, तथा श्रोत्रनाम । और मस्तिष्क, कपाल, कृकाटिका, शङ्ख, ललाट, तालु, कपोल, हनु, चिबुक (ठोड़ी), दशन (दांत), ओष्ठ, भ्रू ( भौह ), नयन, कर्ण, नासा, आदि शिरके उपाङ्गनाम है । जैसे-मस्तिष्कनाम, कपालनाम, तथा ललाटनाम इत्यादि रूपसे समझना । इसी रीतिसे सम्पूर्ण अङ्ग तथा उपाङ्गोंके नाम जानने चाहिये ।। जाति, लिङ्ग तथा आकृतिकी व्यवस्थानियामक निर्माणनाम । है उन २ शरीर, अङ्ग, ङ्गनाम कर्मकी प्राप्ति होनेपर निर्मित ( रचित) शरीरोंका जो बन्धक (बांधनेवाला) है उसको वन्धननाम कहते है । और यदि बन्धननाम कर्म न हो तो बालूके पुरुषके समान सब शरीर अबद्ध अर्थात् बन्धनरहित हो जायेंगे। तथा बद्धशरीरोंका भी प्रच- , उपा- , , १८४ रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् यविशेषसे जो संघात (समूह) विशेषको उत्पन्न करनेवाला है उसको संघातनाम कर्म कहते हैं । जैसे कि-काष्ठमृत्पिण्ड, तथा लोहका संघात होता है, ऐसे ही शरीरोंका भी होता है । संस्थाननामके षट् (छ) भेद है । जैसे-समचतुरचनाम, न्यग्रोध (वटवृक्ष) परिमण्डलनाम, साचिनाम (तिर्यसंस्थाननाम), कुलनाम, वामननाम, तथा हुण्डनाम, संहनननामके भी छ (६) भेद है । जैसे-वर्षभनाराचनाम, अर्धवज्रर्पभनाराचनाम, नाराचनाम, अर्धनाराचनाम, कीलिकानाम, मृपाटिकानाम । स्पर्शनामके आठ भेद हैं। जैसे कठिननाम, मृदुनाम, उप्णनाम, शीतनाम, इत्यादि । रसनामके भी अनेक भेद है । जैसे-तिक्तनाम, मधुरनाम, कटुनाम, आम्रनाम, तथा कयायनाम आदि और भी हैं। गन्धनामके भी अनेक भेद हैं। जैसे सुरभिगन्धनाम तथा दुरभिमानगन्धनाम, इत्यादि । वर्णनाम अनेक भेदसहित हैं । जैसे-कालनाम, पीतनाम, तथा अरुणनाम आदि । गतिमे उत्पन्न होनेकी कामनायुक्त और अन्तर्गतिमें जो वर्तमान है उसके ( उस गतिके ) अभिमुख आनुपूर्वीसे जो उस जीवको प्राप्त करनेमे समर्थ है उसको आनुपूर्वी नाम कहते है। और निर्माण नामसे निर्मित (रचित) जो शरीरत्व था अङ्गोपाङ्ग है, उनके विनिवेशक्रम अर्थात् यथायोग्य स्थानमें संस्थापक क्रमको ही कोई २ नियामकको आनुपूर्वी नाम कहते हैं। अगुरुलघुपरिणामके नियामकको अगुरुलघुनाम कहते हैं । शरीर, अङ्ग तथा उपाङ्गोंके उपघातकको उपघातकनाम कहते है। अपने पराक्रम तथा विजय आदिके उपघातका जो जनक (उत्पन्न करनेवाला) अथवा परके त्रासके प्रतिघा- तका जो जनक है उसको पराघातनाम कहते है । आतपसामर्थ्य (शक्ति) का जो जनक ( उत्पादक ) है वह आतपनाम है, प्रकाशके सामर्थ्यका जो जनक है वह उद्यो- तनाम है । प्राण अपान पुद्गल ग्रहण करनेकी शक्तिका जो उत्पादक है वह उच्छशासनाम है । तथा लब्धि, शिक्षा, और ऋद्धि है कारण जिसका ऐसी जो आकाशगति है उस आकाशगतिका जो जनक है वह विहायोगतिनाम है । पृथक्शरीरनिर्वर्तकं प्रत्येकशरीरनाम । अनेकजीवसाधारणशरीरनिर्वर्तकं साधारणशरी- रनाम । त्रसभावनिर्वतकं त्रसनाम । स्थावरभावनिर्वर्तक स्थावरनाम । सौभाग्यनिर्वर्तक सुमगनाम । दौर्भाग्यनिर्वर्तकं दुर्भगनाम । सौखर्च निर्वतकं सुस्वरनाम । दौस्वर्यनिर्वर्तक दुःखरनाम । शुभभावशोभामाङ्गल्यनिर्वर्तकं शुभनाम । तद्विपरीतनिवर्तकमशुमनाम । सूक्ष्मशरीरनिर्वर्तक सूक्ष्मनाम 1 वादरशरीरनिर्वर्तकं वादरनाम ॥ पर्याप्तिः पञ्चविधा । तद्यथा । आहारपर्याप्तिः शरीरपर्यामिः इन्द्रियपर्यानिः प्राणापानपर्यामिः भापापर्याप्तिरिति । पर्यामिः क्रियापरिसमाप्तिरात्मनः । शरीरेन्द्रियवासिनःप्राणापानयोग्यदलिकंद्रन्याहरणक्रिया- परिसमानिराहारपर्याप्तिः । गृहीतस्य शरीरतया संस्थापनक्रियापरिसमाप्तिः शरीरपर्याप्तिः । १ आकारविशंपको संस्थान कहते हैं। शरीर तथा सवयवोंकी सन्धिविशेषशे संहनन कहते है।

१८५५ सभाष्यतत्त्वार्थाधिगमसूत्रम् । संस्थापनं रचना घटनमित्यर्थः । त्वगादीन्द्रियनिर्वर्तनक्रियापरिसमाप्तिरिन्द्रियपर्याप्तिः । प्राणा- पानक्रियायोग्यद्रव्यग्रहणनिसर्गशक्तिनिवर्तनक्रियापरिसमाप्तिः प्राणापानपर्याप्तिः । भाषायो- ग्यद्रव्यग्रहणनिसर्गशक्तिनिवर्तनक्रियापरिसमाप्तिर्भाषापर्याप्तिः । मनस्त्वयोग्यद्रव्यग्रहणनि- सर्गशक्तिनिर्वर्तनक्रियासमाप्तिर्मन:पर्याप्तिरित्येके । आसां युगपदारब्धानामपि क्रमेण समा- प्तिरुत्तरोत्तरसूक्ष्मत्वात् सूत्रदार्वादिकर्तनघटनवत् । यथासङ्घयं च निदर्शनानि गृहदलिक- ग्रहणस्तम्भस्थूणाद्वारप्रवेशनिर्गमस्थानशयनादिक्रियानिर्वर्तनानीति । पर्याप्तिनिर्वर्तकं पर्याप्ति- नाम अपर्याप्तिनिवर्तकमपर्याप्तिनाम अपर्याप्तिनाम तत्परिणामयोग्यदलिकद्रव्यमात्मनानो- पात्तमित्यर्थः ॥ स्थिरत्वनिवर्तकं स्थिरनाम । विपरीतमस्थिरनाम । आदेयभावनिर्वर्तकमा- देयनाम । विपरीतमनादेयनाम । यशोनिर्वर्तकं यशोनाम । विपरीतमयशोनाम । तीर्थकरत्व- निर्वर्तकं तीर्थकरनाम । तांस्तान्भावानामयतीति नाम । एवं सोत्तरभेदो नामकर्मभेदोऽनेक- विधः प्रत्येतव्यः॥ पृथक् २ शरीरोंको जो उत्पन्न करनेवाला सामर्थ्य विशेष है, वह प्रत्येक शरीरनाम है । अनेक जीव साधारण शरीरका जो साधक है वह साधारणशरीरनाम है । त्रस (भय उद्वेगआदिसहित जीव ) भावका जो साधक है वह त्रसनाम है । स्थावर भावका जो साधक वा उत्पादक है उसको स्थावरनाम कहते हैं । सौभाग्यका जो जनक है उसको सुभगनाम कहते हैं । दुर्भाग्यका जो सिद्ध करनेवाला है वह दुर्भगनाम है। उत्तम स्वरका जो निर्वर्तक ( साधक ) है वह सुस्वरनाम है। दुष्ट (खराब) स्वर (आवाज) का जो साधक है वह दुःस्वरनाम है । शुभ भाव, शोभा तथा माङ्गल्यका जो साधक है वह शुभनाम है । और उससे विपरीत अर्थात् अशुभ भाव, अशोभा तथा अमङ्गलका जो साधक है वह अशुभनाम है । सूक्ष्म शरीरका निर्वर्तक (जनक) सूक्ष्मनाम है । उससे विरुद्ध बादर (स्थूल) शरीरका जनक है वह पादरनाम है। पर्याप्ति पांच प्रकारकी है। जैसे-आहारपर्याप्ति ( पूर्णता), शरीरपर्याप्ति, इन्द्रियपर्याप्ति, प्राणापानपर्याप्ति, तथा भाषापर्याप्ति । यहां पर्याप्ति शब्दका अर्थ आत्माकी क्रियाकी परिसमाप्ति अर्थात् पूर्णता है । इनमें शरीर, इन्द्रिय, वाग, मन, तथा प्राण अपानके योग्य दलके जो दुव्य है, अर्थात् जिन द्रव्योंसे शरीरआदि रचनाकी योग्यता होती है उन द्रव्योंके आहरण (आनयन) क्रियाकी जो समाप्ति है वह आहारपर्याप्ति है। और ग्रहण किये हुए द्रव्यकी शरीररूपसे संस्थापनक्रिया होती है उस क्रियाकी परिसमाप्ति, शरीरपर्याप्ति संस्थापनका अर्थ है । रचना अथवा घटना, अर्थात् शरीररूपसे रचना । त्वग (स्पर्शन ) आदि इन्द्रियोंके निर्माण (रचना) रूप क्रियाकी परिसमाप्ति जो है वह इन्द्रि- थपर्याप्ति है। प्राण अपान (श्वास उच्चास ) क्रियाके योग्य द्रव्योंका ग्रहण तथा त्याग जो है उस प्रहण तथा त्याग शक्तिको सिद्ध करनेवाली जो क्रिया है उसकी परिस- माप्ति जो है वह माणापानपर्याप्ति है । भाषाके योग्य जो द्रव्य है उस द्रव्यके ग्रहण २४ रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् तथा त्यागशक्तिको सिद्ध करनेवाली जो क्रिया है उस क्रियाकी जो समाप्ति है वह भाषा- पर्याप्ति है । मनस्त्र (मन) के योग्य (मनोनिर्वाणके योग्य ) जो द्रव्य है उस व्यके ग्रहण तथा त्यागशक्तिको सिद्ध करनेवाली जो क्रियाकी समाप्ति है वह मनःपर्याप्ति है. ऐसा किन्ही आचार्योंका कथन है । यद्यपि ये सब पर्याप्तिक्रिया एकही कालमें आरम्भ की जाती है तथापि समाप्ति क्रमसे होती है । क्यों कि उत्तरोत्तर सूक्ष्म है । जैसे सूत्र काष्ठ आदिके काटनेकी क्रिया एक कालमें भी प्रारब्ध होकर क्रमशः समष्टि होती है। इनके यथासंख्य ये दृष्टान्त है । जैसे-गृहदलके ग्रहण में प्रथम स्तम्भ आदि आनयनक्रि- या निवर्तन अनन्तर स्थूणा ( कड़ियोंका रखना) पुनः द्वारप्रवेश, तथा निर्गमस्थान क्रि- यानिवर्तन, और पुनः शयनादिक्रियानिर्वर्तन, ये सब क्रमसे होते है, ऐसे ही शरीरादि पर्याप्तिमी है । पर्याप्तिका साधक जो है उसको पर्याप्तिनाम कहते है । अपर्याप्तिका जो माधक है वह अपर्याप्तिनाम है । अपर्याप्तिनामका यह अर्थ है कि उस परिणामके योग्य दलिक ( उपयोगी दलके ) द्रव्यको आत्माने नहीं ग्रहण किया । स्थिरत्वका जो उत्पादक है यह स्थिरनाम है । इसके विपरीत अस्थिरनाम है। आदेय (ग्रहणयोग्य) भावका जो साधक है वह आदेयनाम है ।उसके विरुद्ध अनादेयनाम है। यथा यश (कीर्ति) का जो उत्पादक है वह यशोनाम है। उसके विपरीत अर्थात् अपयशका जो उत्पादक है वह अयशो- नाम है । और जो तीर्थकरत्वको सिद्ध करनेवाला कर्म है वह तीर्थकरनाम है। उन २ भावोंको जो नाम करावे अर्थात् उन २ भावोंके प्राप्त करानेमें हेतुरूप जो है वह नाम है. दस प्रकार उत्तरभेदसहित नामकर्मभेद अनेक प्रकारका जानना चाहिये ॥ १२ ॥ उच्चैनीचैश्च ॥ १३ ॥ भाप्यम् ---त्रिं नीचर्गोत्रं च । तत्रोच्चैगोत्रं देशजातिकुलस्थानमानसत्कारैश्वर्याद्युत्कर्ष- निकम । विपरीतं नीचैर्गोत्रं चण्डालमुष्टिकव्याधमत्स्यवन्धदास्यादिनिर्वर्तकम् ।। मृवार्थ-विशेपव्याख्या--सप्तम प्रकृतिवन्ध गोत्रकर्म है। उस गोत्रके दो भेद एक उचगांत्र, और द्वितीय नीचाँत्र । उनमे उच्चैर्गोत्र जो है वह देश, जाति, कुल, न्धान, गान, नत्कार तथा ऐश्वर्यआदिकी प्रकर्पता ( उच्चता)का साधक है। और उससे ति जो है वह नाचगांत्र चाण्डाल. नट, व्याध, मत्स्यबन्ध तथा दास्यआदि नीच in उत्सन्न करता है ।। १३ ॥ दानादीनाम् ॥ १४॥ नृवार्थ-दानादिन जो विनका साधक है वह अन्तराय कम है ॥ १४ ॥ --अन्नगायः पावथ. । तयथा । दानस्यान्तगयः लाभस्यान्तरायः भोगस्या- मागम्यानगर. बीयांन्नराय दनि ।। विमान्या-नगय पाच (५) प्रकारका है । जैसे-दानका अन्तराय, , सभाष्यतत्त्वार्थाधिगमसूत्रम् । अर्थात् जो दान देनेमें प्रतिबन्धक है, लाभान्तराय-अर्थात् जो लाभ होनेमें प्रतिबन्धक है वह लाभका अन्तराय है, भोगका जो प्रतिबन्धक है वह भोगका अन्तराय है; उपभोगका प्रतिबन्धक उपभोगान्तराय है; और जो वीर्यका अन्तराय है अर्थात् प्रतिबन्धक है वह वीर्यान्तराय है ॥ १४॥ उक्तः प्रकृतिबन्धः । स्थितिबन्धं वक्ष्यामः । प्रकृतिबन्ध कह चुके, अब इसके आगे स्थितिबन्ध कहेंगे- आदितस्तिमृणामन्तरायस्य च त्रिंशत्सागरोपमकोटीकोव्यः स्थितिः॥१५॥ भाष्यम्-आदितस्तिसृणां कर्मप्रकृतीनां ज्ञानावरणदर्शनावरणवेद्यानामन्तरायप्रकृतेश्च त्रिंशत्सागरोपमकोटीकोट्यः परा स्थितिः ।। सूत्रार्थ-विशेषव्याख्या-आदिसे अर्थात् "आयो ज्ञानदर्शन." (अ. ८ सू. ५) इस सूत्रके आरम्भकमसे जो तीन कर्मप्रकृति ज्ञानावरण, दर्शनावरण तथा वेदनीय हैं, उनकी तथा अष्टम अन्तरायरूप कर्म प्रकृतिकी त्रिशत् (तीस ३०) सागरोपम कोटिकोटि परा स्थिति है । अर्थात् अधिकसे अधिक ये चार कर्मप्रकृतियां जीवके साथ ३० सागरोपम कोटिकोटि रहसकती है ॥ १५ ॥ सप्ततिर्मोहनीयस्य ॥१६॥ भाष्यम्-मोहनीयकर्मप्रकृतेः सप्ततिः सागरोपमकोटीकोट्यः परा स्थितिः॥ सूत्रार्थ-मोहनीय जो कर्मप्रकृति है उसकी परा स्थिति सत्तर (७०) सागरोपम कोटिकोटि है ॥ १६ ॥ नामगोत्रयोविंशतिः ॥१७॥ भाष्यम्-नामगोत्रप्रकृत्योर्विंशतिः सागरोपमकोटीकोट्यः परा स्थितिः ॥ सूत्रार्थ-विशेषव्याख्या-नाम तथा गोत्रप्रकृतिकी परा स्थिति बीस (२०) सागरोपम कोटिकोटि है ॥ १७ ॥ त्रयस्त्रिंशत्सागरोपमाण्यायुष्कस्य ॥१८॥ भाष्यम्-आयुष्कप्रकृतेस्त्रयविंशत्सागरोपमाणि परा स्थितिः ॥ सूत्रार्थ-विशेषव्याख्या-आयुष्कप्रकृतिकी परा स्थिति तेतीस (३३) सागरोपम है ॥ १८ ॥ अपरा द्वादश मुहूर्ता वेदनीयस्य ॥१९॥ भाष्यम्-वेदनीयप्रकृतेरपरा द्वादश मुहूर्ताः स्थितिरिति ॥ सूत्रार्थ-विशेषव्याख्या-वेदनीयप्रकृतिकी अपरा स्थिति अर्थात् न्यूनसे न्यून स्थिति द्वादश (बारह १२) मुहूर्त कालपर्यन्त है ॥ १९ ॥ .

८८ रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् नामगोत्रयोरष्टौ ॥ २० ॥ भाष्यम्-नामगोत्रप्रकृत्योरष्टौ मुहूर्वा अपरा स्थितिर्भवति ॥ सूत्रार्थ-विशेपच्याख्या-नाम तथा गोत्र, इन दोनों प्रकृतियोंकी अपरा (हीना) थिति आठ (८) मुहूर्त है ॥ २० ॥ शेषाणामन्तर्मुहूर्तम् ॥ २१ ॥ भाष्यम्-वेदनीयनामगोत्रप्रकृतिभ्यः शेषाणां ज्ञानावरणदर्शनावरणमोहनीयायुष्कान्तरा- यप्रकृतीनामपरा स्थितिरन्तर्मुहूतं भवति ।। सूत्रार्थ-विशेपव्याख्या-पूर्वकथित प्रकृतियोंसे अर्थात् वेदनीय, नाम, तथा गोत्र, इन तीन प्रकृतियोंसे गेप जो ज्ञानावरण, दर्शनावरण, मोहनीय, आयुप्क, तथा अन्तराय; इन पांच (५) प्रकृतियोंकी अपरा स्थिति अन्तर्मुहूर्त है । अर्थात् ये पांच प्रकृतियां न्यूनसे न्यून काल अन्तर्मुहूर्त कालपर्यन्त जीवके साथ रहती हैं ॥ २१ ॥ उक्तः स्थितिवन्धः । अनुभाववन्धं वक्ष्यामः । स्थितिबन्ध जो द्वितीय भेद है उसको कहचुके, अव अनुभावबन्ध कहेंगे। विपाकोऽनुभावः॥२२॥ सूत्रार्थ-काँके विपाकको अनुभाववन्ध कहते हैं ॥ २२ ॥ भाष्यम्-सर्वासां प्रकृत्तीनां फलं विपाकोदयोऽनुभावो भवति । विविधः पाको विपाक: चान्यथा चेत्यर्थः । जीवः कर्मविपाकमनुभवन् कर्मप्रत्ययमेवानाभोगवीर्यपूर्वक कर्मसंक्रमं करोति उत्तरप्रकृतिषु सर्वासु मूलप्रकृत्यभिन्नासु न तु मूलप्रकृतिषु संक्रमो विद्यते बन्धविपाकनिमित्तान्यजातीयकत्वान् । उत्तरप्रकृतिपु च दर्शनचारित्रमोहनीययोः सम्यग्मि- न्यात्ववेदनीयस्यायुप्कस्य जात्यन्तरानुबन्धविपाकनिमित्तान्यजातीयकत्वादेव संक्रमो न विद्यते । अपवर्तनं तु सर्वासां प्रकृतीनां विद्यते । तदायुष्केण व्याख्यातम् ॥ विपच्याख्या-मम्पूर्ण जो कर्मप्रकृति है उनका जो फल है, अर्थात् कर्मोके विपाकका जो उदय है उसको अनुभाववन्ध कहते हैं । विविध अर्थात् अनेक प्रकारसे जो पाता है वह विपाक कहा जाता है । वह विपाक उस प्रकारसेभी होता है, और अन्ययामी होता है । अर्थात् कर्मोके फलभोगपूर्वक होता है और प्रकारान्तरसे में होना । जीव जो है वह कोंक विपाकको अनुभव करता हुआ कर्मनिमित्त ही अना भोगपनियन कानमा संक्रम मूल प्रकृतियोंस अभिन्न उत्तर प्रकृतियोंमें (प्रापण) करता नगलतियोंन संजन है क्योंकि वन्धविपाकके निमित्तसे वे अन्य जातीयक है भीर र प्रनिगेन भी दर्शननोहनीय, चारित्रमोहनीय, मन्यगमिथ्यात्ववेदनीय औ गायक जान्यन्नर अनुवन्ध (अन्यजानिमें भी सम्बन्ध रखनेवाले) विपाक भागमा भी पाठ है। - स तथा 1०५ ति सभाष्यतत्त्वार्थाधिगमसूत्रम् । निमित्तसे अन्यजातीयकत्व होनेसे ( अपनेसे भिन्न जातिमें सम्बन्ध रखनेसे) इनमें संक्रम नहीं है। और अपवर्तन तो सब प्रकृतियोंका होता है। और अपवर्तन हम आयुष्क कर्मके वर्णनमें वर्णन (निरूपण )करचुके है (अ. २, सू. ५२) ॥ २२ ॥ स यथानाम ॥ २३ ॥ भाष्यम्-सोऽनुभावो गतिनामादीनां यथानाम विपच्यते ॥ सूत्रार्थः वह अनुभाव गति नाम आदिके यथानाम विपाकको प्राप्त होता है। अर्थात् गतिविपाक, जातिविपाक, नामविपाक इत्यादिरूपसे विपाकको प्राप्त होता है ॥ २३ ॥ ततश्च निर्जरा ॥२४॥ सूत्रार्थ-विपाकसे निर्जरा होती है ॥ २४ ॥ भाष्यम्-ततश्चानुभावात्कर्मनिर्जरा भवतीति निर्जरा क्षयो वेदनेत्येकार्थ । अत्र चशब्दो हेत्वन्तरमपेक्षते तपसा निर्जरा चेति वक्ष्यते ॥ विशेषव्याख्या-कर्मप्रकृतियोंके अनुभाव अर्थात् विपाक होनेपर कर्मकी निर्जरा होजाती है । अर्थात् विपाकके पश्चात् कर्मोका नाश होजाता है । निर्जरा, क्षय, वेदना, ये समानार्थक शब्द है । इस सूत्रमें जो च शब्द है वह दूसरे हेतुकी अपेक्षा रखता है । अर्थात् "ततः-विपाका अन्यथा च निर्जरा भवति" विपाकसे और अन्य हेतुसे भी निर्जरा होती है । तपसे भी निर्जरा होती है, यह विषय आगे कहेंगे (अ. ९ सू. ३) ॥२४॥ उक्तोऽनुभावबन्धः । प्रदेशबन्धं वक्ष्यामः । अनुभावबन्धको कहचुके, अब प्रदेशबन्धको कहते हैं नामप्रत्ययाः सर्वतो योगविशेषात्सूक्ष्मैकक्षेत्रावगाढस्थिताः सर्वा- त्मप्रदेशेष्वनन्तानन्तप्रदेशाः ॥ २५ ॥ सूत्रार्थ नामहेतुक, सूक्ष्म एक क्षेत्रावगाही,अनन्तानन्तप्रदेशयुक्त, स्थित, कर्मग्रहण- योग्य पुद्गल, सम्पूर्ण आत्मप्रदेशमें सब ओरसे योगविशेषकरके बन्धको प्राप्त होते हैं ॥ २५ ॥ भाज्यम्-नामप्रत्ययाः पुद्गला बध्यन्ते । नाम प्रत्यय एषां ते इमे नामप्रत्ययाः । नामनि- मित्ता नामहेतुका नामकारणा इत्यर्थः । सर्वतस्तिर्यगूलमधश्च वध्यन्ते । योगविशेषात् काय. वाडानाकर्मयोगविशेषाञ्चः बध्यन्ते । सूक्ष्मा बध्यन्ते न बादराः । एकक्षेत्रावगाढा वध्यन्ते न क्षेत्रान्तरावगाढाः । स्थिताश्च बध्यन्ते न गतिसमापन्नाः । सर्वात्मप्रदेशेषु सर्वप्रकृति- पुद्गलाः सर्वात्मप्रदेशेषु बध्यन्ते । एकैको ह्यात्मप्रदेशोऽनन्तैः कर्मप्रदेशैर्वद्धः । अनन्तानन्त- प्रदेशाः कर्मग्रहणयोग्याः पुद्गला वध्यन्ते न सङ्खधेयासङ्खयेयानन्तप्रदेशाः। कुतोऽग्रहणयोग्य- त्वात्प्रदेशानामिति एष प्रदेशबन्धो भवति ॥ १ अपवर्तनका अर्थ है दूरीकरण, जैसे आयुष्कके दो भेद बताये है एक अपवर्तनीय, दूसरा अनपवर्तनीय, जैसे नारक देवादिक आयुष्कका अपवर्तन नहीं होता।

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रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम्
विशेपव्याख्या नामके कारण. अर्थात् नामरूप हेतुसे पुदल वन्धको प्राप्त होते
हैं। नान है प्रत्यय कारण जिनने उनको नामप्रत्यय कहते हैं। नामनिमित्तक, नामहेतुक,
ग नानकारणवाले, यह नामप्रत्यय इसका अर्थ है । सर्वतः अर्थात् तिर्यक् इधर उधर
चारोंओन्ले, सबभागले तथा अधोभागसे सब ओरसे पुद्गल वन्धको प्राप्त होते हैं।
किमसे बन्धको प्राप्त होते हैं, योगविशेषसे, काय, वाक् और मनोरूप कर्मयोगविशेषसे
पुद्गल बन्धको प्राप्त होते हैं । तथा सूक्ष्म पुद्गल वन्धको प्राप्त होते हैं न कि-वादर
(धूल) तथा एकक्षेत्राऽवगाही पुगल वन्धको प्राप्त होते हैं, न कि अन्य २ क्षेत्रोंमें
थित तथा स्थित (स्थितिशील) पुद्गल वन्धको प्राप्त होते हैं न-कि गतिमें प्राप्त । तथा
सन्पूर्ण प्रकृतिपुद्गल सम्पूर्ण आत्माले प्रदेशोंमें वन्धको प्राप्त होते हैं। क्योंकि-एक २
आत्माका प्रदेश अनन्त कनप्रदेशोंसे बद्ध है। तथा अनन्तानन्तप्रदेश (कर्मग्रहणयोग्य)
पुगल बन्धको प्राप्त होते हैं, न कि संख्येयप्रदेश, असंख्येयप्रदेश तथा अनन्तप्रदेशवाले
स्यानि-उन प्रदेशोंक ग्रहणकी योग्यता नहीं है । इस प्रकार नामप्रत्ययसे सर्व
प्रदेशॉन ययोक्त पुलोंकी वन्धप्राप्ति प्रदेशवन्ध है ॥ २५ ॥
सर्व चवदष्ट्रविधं कम पुण्यं पापं च ।
सब यह पूर्वकथित आठ प्रकारका क्रम पुण्य तथा पाप एतदुभयरूप होता है अर्थात्
पुन्य
और पाप दोनों प्रकारके अर्थ है।
उनसे-
सद्यसम्यक्त्वस्यातिपुरुषवेदशुभायुर्नामगोत्राणि पुण्यम् ॥२६॥
भाष्यम्-मद्वेयं भूतव्रत्यनुकन्पादिहेतुकम् सम्यक्तवेदनीयं केवलिश्रुतादीनां वर्णवादा-
दिस्तुरम् धान्यवदनीयं रतिवेदनीयं पुरुषवेदनीयं शुभमायुष्कं मानुपं देवं च शुभनाम गति-
नानादीनां शुभं गोत्रमुचौत्रमित्यः । इत्येतदष्प्रविधं कर्म पुण्यम् , अतोऽन्यत्पापम् ।।
इति तत्वार्याधिगमेऽत्यवचनसंग्रहेऽष्टमोऽध्यायः समाप्तः।।
मृत्रार्थ-विपन्याख्या-सट्टेद्य अर्थात् प्राणिनात्र और विशेषरूपसे व्रतियों में अनु-
ना आटिने होनेवाला नदनीय, कंवली, श्रुतआदिक वर्णवादआदि अर्थात् प्रशंमासे-होने-
मला मन्मल्लवंदनीय. हान्यवेदनीय. रनिवेदनीय, पुल्पवेदनीय तथा शुभआयु, जैसे-
गानुर और देव भावुक. शुभनान अर्थात् गतिनामआदिन शुभनाम और शुभगोत्र, अर्थात् ।
भोरया आठ प्रकारका कनं पुण्य है, और इनसे विरुद्ध पाप है। अतः शुभार्थ उद्योग
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न्याल गम्यिापन्टिन्टाकुरप्रसाद प्रणीतभाषाटीकासमलइन्तेऽहत्प्र-
गवननंग्रहशनोऽध्यायः ॥ ८ ॥

सभाष्यतत्त्वार्थाधिगमसूत्रम् । अथ नवमोऽध्यायः। उक्तो बन्धः। संवरं वक्ष्यामः बन्धका वर्णन करचुके, अब आगे इस नौमें ९ अध्यायमें संवर कहेंगे । आस्रवनिरोधः संवरः॥१॥ सूत्रार्थ-आस्रवका निरोध संवर कहलाता है ॥ १ ॥ भाष्यम्-यथोक्तस्य काययोगादेर्द्विचत्वारिशद्विधस्यास्रवस्य निरोधः संवरः । विशेषव्याख्या-पूर्व प्रसङ्गमें जो काययोगआदि बयालीस (४२) प्रकारका आस्त्रव कहागया है, उसका जो निरोध अर्थात् रोकना है उसको संवर कहते है ॥ १ ॥ स गुतिसमितिधर्मानुप्रेक्षापरीषहजयचारित्रैः॥२॥ सूत्रार्थ-वह संवर गुप्ति, समिति, धर्म, अनुप्रेक्षा, परीषह, जय, तथा चारित्रसे होता है ॥ २॥ भाष्यम्-स एष संवर एभिर्गुस्यादिभिरभ्युपायैर्भवति । किं चान्यत् । विशेषव्याख्या-वह संवर इन गुप्ति आदिसे होता है ॥ २ ॥ और यह अन्य भी हेतु है- तपसा निर्जरा च॥३॥ सूत्रार्थ अर्थात् तपसे संवर और निर्जरा होती है ॥ ३ ॥ भाष्यम्-तपो द्वादशविधं वक्ष्यते । तेन संवरो भवति निर्जरा च ।। विशेषव्याख्या-द्वादश (बारह १२ )प्रकारका तप आगे कहेंगे । (अ. ९ सू. १९।२०)। उस बारह प्रकारके तपसे संवर होता है और निर्जरा भी होती है ॥ ३ ॥ अत्राह । उक्तं भवता गुप्त्यादिभिरभ्युपायैः संवरो भवतीति । तत्र के गुत्यादय इति । अत्रोच्यते- अब यहांपर कहते हैं कि-गुप्ति, समितिआदि उपायोंसे संवर होता है ऐसा आपने कहा है (अ. ९ सू. २) । सो वे गुप्ति आदि कौन है । इसलिये यह अग्रिम सूत्र क- हते हैं- सम्यग्योगनिग्रहो गुप्तिः ॥४॥ सूत्रार्थ-सम्यग् (भलेप्रकार )पूर्वकथित त्रिविध योगोंका जो निग्रह है उसको गुप्ति कहते है ॥ ४ ॥ भाष्यम्-सम्यगिति विधानतो ज्ञात्वाभ्युपेत्य सम्यग्दर्शनपूर्वकं त्रिविधस्य योगस्य निग्रहो गुप्तिः कायगुप्तिर्वाग्गुप्तिमनोगुप्तिरिति । तत्र शयनासनादाननिक्षेपस्थानचंक्रमणेपु कायचेष्टानि- यमः कायगुप्तिः । याचनपृच्छनपृष्टव्याकरणेषु वाड़ियमो मौनमेव वा वाग्गुमिः । सावदा- संकल्पनिरोधः कुशलसंकल्पः कुशलाकुशलसंकल्पनिरोध एव वा मनोगुग्निरिति ।। .

१२ रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् विशेषव्याख्या सम्यग् अर्थात् पूर्ण विधानसे ज्ञानपूर्वक स्वीकार करके सम्यग्दर्शन- पूर्वक काय, वाग् तथा मनोरूप जो तीन (३)प्रकारके योग पूर्व में कहे हैं उनका जो निरोध (रोकना है वह गुप्ति है । वह कायगुप्ति, वाग्गुप्ति, और मनोगुप्ति, इन भेदोंसे तीन (३) प्रकारकी है। उनमें शयन, आसन, आदान (ग्रहण), निक्षेप (त्याग वा किसी वस्तुको एक स्थानसे दूसरे स्थानमें फेंकना वा संचालन करना) तथा स्थानचक्रमण अर्थात इधर उधर स्थानोंमें भ्रमण, इत्यादि कार्योंमे शरीरकी चेष्टाका नियत अर्थात् अनियत रूपसे निरर्थक शरीरकी चेष्टा वा सर्वथा चेष्टा न करनी, यह कायगुप्ति है । याच- नमें, पूंछनेमे, तथा पूछे हुए पदार्थका व्याख्यान करनेमे वाणीका नियम, अथवा स- वथा मौन ही रहना यह वाग्गुप्ति है । तथा निन्दनीय वा दुष्ट संकल्पोंका निरोध, कुशल (उत्तम संकल्प करना, अथवा कुशल और अकुशल दोनों प्रकारके संकल्पोंका जो निरोध है, वह मनोगुप्ति है ॥ ४ ॥ ईर्याभाषैषणादाननिक्षेपोत्सर्गाः समितयः॥५॥ सूत्रार्थ-ईर्या, भाषा, एषणा, आदान, निक्षेप, तथा उत्सर्गः इन भेदोंसे पांच (५) समिति होती हैं ॥ ५॥ भाष्यम्-सम्यगीर्या सम्यग्भापा सम्यगेपणा सम्यगादाननिक्षेपौ सम्यगुत्सर्ग इति पञ्च समितयः । तत्रावश्यकायैव संयमार्थ सर्वतो युगमात्रनिरीक्षणायुक्तस्य शनैय॑स्तपदा गति- रीयांसमितिः । हितमितासंदिग्धानवद्यार्थनियतभाषणं भाषासमितिः । अन्नपानरजोहरण- पात्रचीवरादीनां धर्मसाधनानामाश्रयस्य चोद्गमोत्पादनैषणादोषवर्जनमेषणासमितिः । रजो- हरणपात्रचीवरादीनां पीठफलकादीनां चावश्यकाथै निरीक्ष्य प्रमृज्य चादाननिक्षेपौ आदान- निक्षेपणासमितिः । स्थण्डिले स्थावरजङ्गमजन्तुवर्जिते निरीक्ष्य प्रमृज्य च मूत्रपुरीषादीनाम- त्सर्ग उत्सर्गसमितिरिति ॥ विशेपव्याख्या-यहां पूर्वसूत्रसे सम्यक् पदकी अनुवृत्ति है और उसका संवन्ध पांचों प्रकारोंके साथ है। इसलिये सम्यक् ईर्यासमिति, सम्यग्भाषासमिति, सम्यक् एपणासमिति, सम्यक् आदाननिक्षेपसमिति, तथा सम्यग् उत्सर्गसमिति; ये पांच समिति हैं। उनमें आवश्यक कार्यके हो लिये संयमार्थ युगमात्र (चार हाथ )सर्वत्र देखनेमे जो तत्पर है उसकी शनैः २ अर्थात् धीरे २ चरणोंको रखके जो 'गति (गमन करना )हैं उमको ईर्यासमिति कहते है । सव जीवोंका हितसाधक, परिमित, असंदिग्ध (संदेहर- हित )तथा अनिन्दनीय अर्थके पदोंका जो नियमितरूपसे भाषण है वह भाषासमिति है। अन्न. पान, रजोहरण (झाडूआदि), पात्र (कमण्डलुआदि) तथा वस्त्रादि धर्मसाधन में मारने भारमाकी रक्षा हो उसको गुप्ति कहते है। मागी पोटा दूर करने लिये भले प्रकारको समिति कहते हैं ।

१. , न सभाण्यतत्त्वार्थाधिगमसूत्रम् । ०५ पदार्थोंके, तथा आश्रय( निवासस्थान )के आविर्भाव, उत्पत्ति तथा अभिलाषाआदि दोषों ति जो वर्जन अर्थात् अभाव है वह एषणासमिति है । रजोहरण, पात्र, वस्त्रादि, और पीर तथा तखत आदि आवश्यक कार्यके लिये बैठने सोने आदिके जो पदार्थ है; इन सवको भली भांति देख तथा शुद्ध करके आदान, निक्षेप( ग्रहण तथा त्याग )किया जाय उसको आदाननिक्षेपणसमिति कहते है। तथा उच्चता, अवनतता अर्थात् उँचाई, निचाई आदि दोषोंसे रहित परिष्कृत समधरासत्वसंयुक्त,. तथा स्थावर और जङ्गम जीवोंके संचारसे शून्य स्थानमें देखकर, तथा शुद्धकरके मल मूत्रआदिका जो त्याग है उसको उत्सर्गसमिति कहते हैं । इस प्रकार पांचों समितियोंका वर्णन हुआ ॥ ५ ॥ उत्तमाक्षमामार्दवार्जवशौचसत्यसंयमतपस्त्यागाकिंचन्यब्रह्मचर्याणि " धर्मः॥६॥ सूत्रार्थ-क्षमा, मार्दव, आर्जव, शौच, सत्य, संयम, तप, त्याग, आकिंचन्य, और ब्रह्मचर्य ये दश उत्तम, धर्मके भेद हैं ॥ ६ ॥ भाष्यम्-इत्येष दशविधोऽनगारधर्मः उत्तमगुणप्रकर्षयुक्तो भवति । तत्र क्षमा तितिक्षा सहिष्णुत्वं कोध्रनिग्रह इत्यनर्थान्तरम् । तत्कथं क्षमितव्यमिति चेदुच्यते । क्रोधनिमित्तस्या- त्मनि भावाभावचिन्तनात् परैः प्रयुक्तस्य क्रोधनिमित्तस्यात्मनि भावचिन्तनादभावचिन्त- नाद्वा क्षमितव्यम् । भावचिन्तनात् तावद्विद्यन्ते मय्येते दोषाः किमत्रासौ मिथ्या ब्रवीति क्षमितव्यम् । अभावचिन्तनादपि क्षमितव्यं नैते विद्यन्ते मयि दोपा यानज्ञानादसौ ब्रवीति क्षमितव्यम् । किं चान्यत् । क्रोधदोषचिन्तनाच क्षमितव्यम् । क्रुद्धस्य हि विद्वेपा- सादनस्मृतिभ्रंशव्रतलोपादयो दोषा भवन्तीति । किं चान्यत् । वालस्वभावचिन्तनाच परोक्षप्रत्यक्षाक्रोशताडनमारणधर्मभ्रंशानामुत्तरोत्तररक्षार्थम् । बाल इति मूढमा । परोक्षमाक्रोशति बाले क्षमितव्यमेव । एवंखभावा हि बाला भवन्ति । दिष्टया च मां परोक्षमाक्रोशति न प्रत्यक्षमिति । लाभ एव मन्तव्य इति । प्रत्यक्षमप्याक्रोशति वाले क्षमितव्यं । विद्यत एवैतद्वालेषु । दिष्टया च मां प्रत्यक्षमाक्रोशति न ताडयति । एतदप्यस्ति बालेष्विति लाभ एव मन्तव्यः । ताडयत्यपि वाले क्षमितव्यम् । एवंखभावा हि वाला भवन्ति । दिष्टया च मां ताडयति न प्राणैर्वियोजयतीति । एतदपि विद्यते वालेविति । प्राणैर्वियोजयत्यपि बाले क्षमितव्यं । दिष्टया च मां प्राणैर्वियोजयति न धर्माद्वंशयतीति क्षमितव्यम् । एतदपि विद्यते बालेष्विति लाभ एव मन्तव्यः ॥ किं चान्यत् । स्वकृत. कर्मफलाभ्यागमाच । स्वकृतकर्मफलाभ्यागमोऽयं मम, निमित्तमात्रं पर इति क्षमितव्यम् । किं चान्यत् । क्षमागुणांश्चानायासादीननुस्मृत्य क्षमितव्यमेवेति क्षमाधर्मः ॥ १॥ विशेषव्याख्या-क्षमाआदि यह दश प्रकारका उत्तम धर्म है । अनगार (साधु वा यति)का यह दशविध उत्तम गुण प्रकर्षतासे युक्त होता है। उनमे तितिक्षा व सहन- शीलताको क्षमा कहते हैं । क्षमा, तितिक्षा, सहिष्णुता, तथा क्रोधनिग्रह, ये सब एकार्य- ६ २७४ रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् चिक शब्द हैं । सो क्षमा किस रीतिसे करनी चाहिये यह कहते हैं। प्रयुक्त क्रोधके निमित्तका आत्मामें भाव वा अभाव चिन्तन करनेसे, अर्थात् दूसरोंमें प्रयुक्त जो क्रोधके निमित्त (कारण वा हेतु)उनका आत्मामे भाव चिन्तन करना कि ये जो क्रोधके निमित्त हैं उनकी आत्मामें अस्तिता है, अथवा उसके अभावके चिन्तनसे क्षमा करनी चाहिये। उसमें भावके चिन्तनसे तोयह होगा कि-मुझमें क्रोधके कारणीभूत दोष ही हैं, इसमे यह मिथ्या क्या कहता है ऐसा विचार करके क्षमा करनी चाहिये । और क्रोधके निमित्तके अभावचिन्तनसे भी नमा करनी चाहिये कि ये दोष मुझमें नहीं हैं जिनको कि-यह अज्ञानसे कहता है। अर्थात् इसका मुझमें दोषारोपण अज्ञानसे है, यथार्थमें नहीं है; ऐसा चिन्तन करके भी क्षमा करनी चाहिये । और इससे भिन्न यह भी है कि-क्रोधके दोपोंका चिन्तन करके भी क्षमा करनी चाहिये । क्योंकि-क्रोधयुक्त प्राणीके विद्वेष स्मृतिका नाश तथा व्रतलोप आदि दोप भी होते है ऐसा विचार करके क्षमा करनी चाहिये । और यह भी है। वालखमावचिन्तनसे भी क्षमा करनी चाहिये । और परोक्ष, प्रत्यक्ष, आक्रोश, ताडन, मारण, तथा धर्मभ्रंश इनमेंसे उत्तरोत्तरकी रक्षार्थ भी क्षमा करनी अवश्य कर्तव्य है। वाल इस पदसे मूढसे अभिप्राय है । हमारे परोक्ष (अनुपस्थिति )मे आक्रोशन (निन्दा आदि)करता है, बालक (मूढ ) है इसलिये क्षमा करनी चाहिये । क्योंकि-वालक ऐसा वका ही करते हैं। और यह भी सौभाग्यका विषय है कि हमारे परोक्षमे ही वह गालि- संप्रदान आदि करता है, न कि-प्रत्यक्ष (सम्मुख)। इस हेतुसे लाभ ही समझना चाहिये। और यदि प्रत्यक्षमे गालिआदि संप्रदान वाल (मूढ )करे तो भी क्षमा ही करनी चाहिये । क्योंकि-बालक प्रत्यक्ष भी सवको कुवाच्य कहते हैं। और यह भी सौभाग्य है कि- प्रत्यक्ष कुवाच्य आक्रोशन आदि ही करता है, न कि-मुझे ताडना करता है (मारता) है। और चालक यदि ताडना करे तो भी उसपर क्षमा करनी उचित है । क्योंकि बाल (मूढ )जन ऐसे खभाववाले होते ही हैं, अर्थात् दूसरोंको ताडनाआदि करना यह उनका खभाव ही है, ऐसा मानकर क्षमा करनी चाहिये । और यह भी सौभाग्यका विषय है कि केवल ताडना ही करता है न कि-प्राणोंसे भी मुझे वियुक्त (अलग )करता है । क्योंकि-प्राणोंसे वियुक्त करना यह भी वालों (मूढों) मे है । और प्राणोंसे भी वियुक्त करते हुए बालके ऊपर क्षमा ही करनी चाहिये । क्योंकि यह भी सौभाग्यका विषय है कि तुझे केवल प्राणोंसे ही पृथक् करता है (वध करता है) न कि धर्मसे भ्रष्ट करता (धर्मले च्युत वा पतित करता) है। क्योंकि-धर्मसे च्युत करना यह भी वालों (मूढ जनों) में है। अतः केवल प्राणमात्रसे ही वियुक्त (वधमात्र) करनेसे लाभ ही मानना उचित है, इत्यादि चिन्तन करके क्षमा ही करनी चाहिये । और यह भी है- अपनसे किये हुए कर्मोंके फलके अभ्यागम (आगमन) से भी क्षमा करनी सभाष्यतत्त्वार्थाधिगमसूत्रम् । १९०५ उचित है । ऐसा विचार करना चाहिये कि मेरे ही किए कर्मोके फलोंका अभ्याति गमन है; उन्ही कर्मोंका आगमन हुआ है जिससे हमको यह अनेक प्रकारके क्लेश होते है, दूसरा तो केवल निमित्तमात्र है, इत्यादि विचारोंसे क्षमा करनी चाहिये । और अन्य हेतु यह भी है कि-अनायास अर्थात् आयास परिश्रम आदिके अभाव आदि क्षमाके गुणोंको स्मरण करके क्षमा करनी उचित है । इस प्रकार यह क्षमा धर्म प्रथम कहा गया है ॥१॥ नीचैवृत्त्यनुत्सेको मार्दवलक्षणम् । मृदुभावः मृदुकर्म च मार्दवं मदनिग्रहो मानविधात- श्वेत्यर्थः । तत्र मानस्येमान्यष्टौ स्थानानि भवन्ति । तद्यथा । जातिः कुलं रूपमैश्वर्य विज्ञानं श्रुतं लाभो वीर्यमिति । एमिर्जात्यादिभिरष्टाभिर्मदस्थानैर्मत्तः परात्मनिन्दाप्रशंसाभिरतस्ती- ब्राहकारोपहतमतिरिहामुत्र चाशुभफलमकुशलं कर्मोपचिनोत्युपदिश्यमानमपि च श्रेयो न प्रतिपद्यते । तस्मादेषां मदस्थानानां निग्रहो मार्दवं धर्म इति ॥२॥ नम्रताका वर्तन तथा गर्वराहित्य होना, यह मार्दवका लक्षण है । मृदुभाव वा मृदु कर्म जो है वह मार्दव है । मदका निग्रह अर्थात् धन विद्या आदिसे मद (गर्व ) होता उसका निग्रह और अभिमानका विघात यह मार्दव धर्म है । उसमें मान वा अमि- मानके ये ८ आठ स्थान होते है । जैसे-जाति (ब्राह्मणत्वआदि जाति), कुल (उत्तम कुल), रूप (सौन्दर्य), ऐश्वर्य (धनआदि विभूति ), विज्ञान (अनेक पदार्थविषयक आनुभ- विक ज्ञान), श्रुत अर्थात् शास्त्रसम्पत्ति, लाभ, ऐहिक वा पारलौकिक पदार्थक लाभ तथा वीर्य इन जाति आदि आठों मदोंके स्थानोंसे मत्त होकर प्राणी अन्य जनोंकी निन्दा और अपनी प्रशंसा आदिमें तत्पर होकर तीव्र अहङ्कारसे नष्ट बुद्धि इसलोक तथा परलोकमें भी अशुभ फलदायक पाप कर्मोका ही संग्रह करता है; और उपदेश देनेपर भी मदोन्मत्तताके कारणंसे कल्याणमार्गको नही ग्रहण करता, इत्यादि हेतु- ओंसे जो जाति आदि मनके स्थान अभी पूर्वमें कहे है उनका निग्रह करना यह मार्द- वनामा द्वितीय धर्म है ॥ २ ॥ भावविशुद्धिरविसंवादनं चार्जवलक्षणम् । ऋजुभावः ऋजुकर्म वार्जवं भावदोषवर्जन- मित्यर्थः । भावदोषयुक्तो झुपधिनिकृतिसंयुक्त इहामुत्र चाशुभफलमकुशलं कर्मोपचिनोत्यु- पदिश्यमानमपि च श्रेयो न प्रतिपद्यते । तस्मादार्जवं धर्म इति ॥ ३ ॥ भावकी विशुद्धि तथा वञ्चना, विप्रलम्भ (धोखा देना वा मिथ्या भाषण कपटआदि व्यवहारोंसे दूसरोंको ठगने) का अभाव अर्थात् अविसंवाद जो है वह आर्जवका लक्षण sho १ मृदुका अर्थ कोमल है । उस मृदु शब्दसे भाव वा कर्म अर्थमें तद्धित अण् प्रत्यय होनेसे मार्दव वनता है । मृदोर्भावः कर्म वा मार्दवम् । अर्थात् मृदुका जो भाव या कर्म है वह मार्दव है।

रायचन्द्र जैनशास्त्रमालायाम् । ऋजुभाव तथा ऋजुकर्म, अर्थात् सरल भाव वा सरल कर्म यह आर्जव है । तात्पर्य है यह है कि भावोंके जो दोष है उनका वर्जन (निषेध) दुष्ट भावोंके त्यागपूर्वक सरल भावांका जो ग्रहण है वही आर्जव (सरलता, सिधाई वा कपटराहित्य ) है। क्योंकि भावोंके दोपोंसे युक्त कपट, वञ्चना (धोखा देना) आदिसे संयुक्त पुरुष इस लोक तथा परलोकनें अशुद्ध फलदायक अकुशल (पापमय ) कर्मोका ही संग्रह करता है; और उपदेश देनेपर भी कल्याणको नहीं प्राप्त होता है । इस हेतुसे भावदोषोंका त्यागरूप आर्जव यह तृतीय धर्म है ॥ ३॥ अलोभः शौचलक्षणम् । शुचिभावः शुचिकर्म वा शौचं भावविशुद्धिः निष्कल्मषता धर्मसाधनमात्रास्त्रप्यनभिष्वङ्ग इत्यर्थः। अशुचिहि भावकल्मषसंयुक्त इहामुत्र चाशुभफलम- कुशलं कर्मोपचिनोत्युपदिश्यमानमपि च श्रेयो न प्रतिपद्यते । तस्माच्छौचं धर्म इति ॥४॥ अलोम अर्थात् लोभका अभाव होना, यह शौचका लक्षण है । शुचिका भाव वा शुचि (पवित्र ) क्रम शौच है । भावविशुद्धि (भावोंकी शुद्धता) तथा निष्कल्मषता अर्थात् लोभादि मालिन्यकी रहितता, धर्मसाधनमात्र सामग्रियोंमे भी आसक्तिका अभाव ग्रह शौच है । क्योंकि अशुचि (शौचरहित) जन भावकल्मषोंसे संयुक्त रहनेके कारण इस लोक तथा परलोकमें भी अशुद्ध (दुष्ट) फलदायक अकुशल अर्थात् पापोंसे पूर्ण तथा दुःखप्रद कर्मोंका संग्रह करता है, और उपदेश देनेपर भी कल्याणमार्गको नहीं प्राप्त होता, इस हेतुसे अशौचके त्यागनेसे शौच यह चतुर्थ धर्म होता है ॥ ४ ॥ सत्यर्थे भवं वचः सत्यं सद्भ्यो वा हितं सत्यम् । तदननृतमपरुषमपिशुनमनसभ्यम- चपलमनाविलमविरलमसंभ्रान्तं मधुरमभिजातमसंदिग्धं स्फुटमौदार्ययुक्तमग्राम्यपदार्थाभि- व्याहग्मसीभरमरागद्वेषयुक्तं सूत्रमार्गानुसारप्रवृत्तार्थमय॑मर्थिजनभावग्रहणसमर्थमात्मपरा- नुवादकं निरुपचं देशकालोपपन्नमनवद्यमर्हच्छासनप्रशस्तं यतं मितं याचनं प्रच्छनं प्रश्न- व्याकरणमिति सत् धर्मः ॥ ५ ॥ सत्य अर्थक लिय उत्पन्न जो वचन है वह सत्य है, अथवा सज्जनोंके लिये हितकारक जे वचन है वह सत्य है । वह सत्य मिथ्यादोपसे रहित, परुषता (कठोरता) रहित, अपिशुन अर्थात् सूचकता वा चुगुली आदि दोषवर्जित, असभ्यतारहित, चञ्चलताशून्य, अनाबिल (नालिन्यदोपगन्य वा अकलुषित), विरलतारहित, असंभ्रान्त (भ्रमरहित), पुर, भनिजात (उज्वल या विशद ), असंदिग्ध अर्थात् सन्देहरहित, स्फुट (स्पष्ट ), मेहाय अर्थात् उदारतासंयुक्त वा उच्च विचारसहित, ग्रामीण पढ़ पदार्थ दोपोंसे वर्जित, नगीन. रागद्वयमे वर्जित, मूत्रमार्गके अनुसार प्रवृत्त अर्थसहित, बहुमूल्य : RR रावर मद भाव वा ने अर्धन अन् प्रत्यय होनेसे आर्जव बनता है। ... न .) नकटा जो भार या कम है यह आर्जव है ।

१.०५ . , सभाष्यतत्त्वार्थाधिगमसूत्रम् । वा पूजनीय, अर्थी जनोंको भाव ग्रहण करनेमें समर्थ (योग्य), अपने तथा अन्यके ऊपति अनुग्रह करनेवाला अर्थात् निज आत्मा और अन्य आत्माकी हानिसे वर्जित, छल कपट आदि दोषशून्य, देशकालके अनुकूल, अनिन्दनीय, अर्हत् भगवान्के शासन (शास्त्र)- रीतिसे प्रशस्त अर्थात् अर्हत्-शास्त्रके सम्मत प्रशंसनीय, यत (संयमसहित), मित अर्थात् परिमित, याचन, प्रश्न और प्रश्नके विवरण अर्थात् प्रश्नके उत्तररूप होना चाहिये । इस रीतिसे मिथ्या परुषताआदि दोषोंसे शून्य होनेसे यह सत्य पञ्चम धर्म है ॥ ५॥ योगनिग्रहः संयमः । स सप्तदशविधः । तद्यथा । पृथिवीकायिकसंयमः अप्कायिक- संयमः तेजस्कायिकसंयमः वायुकायिकसंयमः वनस्पतिकायिकसंयमः द्वीन्द्रियसंयमः त्रीन्द्रियसंयमः चतुरिन्द्रियसंयमः पञ्चेन्द्रियसंयमः प्रेक्ष्यसंयमः उपेक्ष्यसंयमः अपहृत्य- संयमः प्रमृज्यसंयमः कायसंयमः वाक्संयमःमनःसंयमः उपकरणसंयम इति संयमो धर्मः॥६॥ योगोंका जो निग्रह है, अर्थात् काय, वाक् तथा मनोरूप जो तीन प्रकारके योग हैं उनका निग्रह अर्थात् अपने वशमें रखना, यह संयम धर्म है । वह संयम धर्म सत्रह (१७) प्रकारका है । जैसे-पृथिवीकायिकसंयम अर्थात् पृथिवीकायिकके विषयमें संयम, अप्कायिकसंयम, तेजस्कायिकसंयम, वायुकायिकसंयम, वनस्प- । तिकायिकसंयम, द्वीन्द्रियसंयम अर्थात् दो इन्द्रियवाले जीवोंके विषयसंयम (योगत्रय- निग्रह), त्रीन्द्रियसंयम, चतुरिन्द्रियसंयम, पञ्चेन्द्रियसंयम, प्रेक्ष्य अर्थात् प्रेक्षण करने- योग्य पदार्थोंके विषयमें संयम, उपेक्ष्यसंयम (उपेक्षा करनेयोग्य पदार्थोंसे संयम), अपहत्यसंयम (निन्दनीय पदार्थविषयक संयम), प्रमृज्य अर्थात् शोधनीय पदार्थवि- षयक संयम, कायसंयम, वाक्यसंयम, मनःसंयम, तथा उपकरणसंयम । सर्वत्र उन२ पदार्थोके विषयमें योगत्रयका निग्रह होनेसे संयम यह षष्ठ धर्म है ।। ६ ॥ तपो द्विविधम् । तत्परस्ताक्ष्यते । प्रकीर्णकं चेदमनेकविधम् । तद्यथा । यववज्रमध्ये चन्द्रप्रतिमे द्वे, कनकरत्नमुक्तावल्यस्तिस्रः, सिंहविक्रीडित द्वे, सप्तसप्तमिकाद्याः प्रतिमाश्चतस्रः, भद्रोत्तरमाचाम्लं वर्धमानं सर्वतोभद्रमित्येवमादि । तथा द्वादश भिक्षुप्रतिमा मासिकाद्या आसप्तमासिक्याः सप्त, सप्तरात्रिक्याः तिस्रः, अहोरात्रिकी, रात्रिकी चेति ।। ७ ।। तप दो प्रकारका है सो आगे कहेंगे (अ. ९ सू. १९,२०) । और प्रकीर्णक अर्थात् विस्तृत तप अनेक प्रकारका है । जैसे-यववज्रमध्य चन्द्रप्रतिमा दो, कनक- रत्नमुक्तावली तीन, सिंहविक्रीडित दो, सप्तमिकादि सात, भद्रोत्तर, आचाम्ल, वर्धमान, तथा सर्वतोभद्र, इत्यादि चार प्रतिमा द्वादश भिक्षुप्रतिमा है । मासिक आदि सप्त मासिकी पर्यन्त सात प्रतिमा है। सप्तरात्रिकी प्रतिमा तीन हैं, जैसे-अहोरात्रिकी, रात्रिकी इत्यादि । इस प्रकार तप सप्तम धर्म है ॥ ७ ॥ ।

F , रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् 'वाह्याभ्यन्तरोपधिशरीरानपानाद्याश्रयो भावदोषपरित्यागस्त्यागः ॥ ८ ॥ बाह्य तथा आभ्यन्तर उपाधि, शरीर, तथा अन्नपान आदिके आश्रयीभूत भाव दोषोंका जो परित्याग है वह त्यागरूप अष्टम धर्म है ॥ ८ ॥ शरीरधर्मोपकरणादिषु निर्ममत्वमाकिञ्चन्यम् ॥९॥ शरीर तथा धर्मके भी उपकरण अर्थात् धर्मसाधन सामग्री आदि हैं; उनमें भी निर्ममत्व, अर्थात् ये मेरे हैं इस प्रकारकी ममताका जो अभाव है उसको आकि- श्चन्य नवम धर्म कहते हैं ॥ ९॥ व्रतपरिपालनाय ज्ञानाभिवृद्धये कषायपरिपाकाय च गुरुकुलवासो ब्रह्मचर्यमस्वातन्त्र्य गुंर्वधीनत्वं गुरुनिर्देशस्थायित्वमित्यर्थ च । पश्चाचार्याः प्रोक्ताः प्रव्राजको दिगाचार्यः श्रुतोद्देष्टा श्रुतसमुद्देष्टा आनायार्थवाचक इति । तस्य ब्रह्मचर्यस्येमे विशेपगुणा भवन्ति । अब्रह्मविरतिव्रतभावना यथोक्ता इष्टस्पर्शरसरूपगन्धशब्दविभूषानमिनन्दित्वं चेति ॥ १०॥ व्रतके परिपालनके अर्थ, ज्ञानकी विशेषवृद्धिके लिये, और क्रोधआदि कषायोंके परि- पाकार्य जो गुरुकुलमें निवास है, उसको ब्रह्मचर्य कहते हैं । ब्रह्मचर्यका अर्थ है अस्वतन्त्रता, गुरुकी आधीनता, अर्थात् स्वतंत्र वा स्वच्छन्दचारी न होकर गुरुके आधीन रहना तथा गुरुके निर्देशमें स्थायित्व, अर्थात् गुरुकी आज्ञामें रहकर विद्यादि गुणोंका उपार्जन करना । आचार्य पांच प्रकारके कहे गये हैं। जैसे—परिव्राजक (यति ), दिगाचार्य, श्रुत (शास्त्र) का उद्देष्टा (पढ़ानेवाला) और आम्नायसिद्ध अर्थोका वाचक । उस ब्रह्मचर्यके ये विशेष गुण है । जैसे--अब्रह्मसे निवृत्ति अर्थात् मैथुनमे निवृत्ति और ब्रतोंकी भावना । उन भावनाओंका वर्णन पूर्वप्रकरणमें कह चुके हैं। तथा मनोहर अभिलषित स्पर्श, रस, रूप, गन्ध, शब्द, तथा आभूषणआदिसे प्रसन्न न होना । इन हेतुओंसे ब्रह्मचर्यकी दशम धर्ममें गणना की, अर्थात् ब्रह्मचर्य दशम धर्म है ।। १० ॥ अनित्याशरणसंसारकत्वान्यत्वाशुचित्वानवसंवरनिर्जरालोकबो- घिदुर्लभधर्मखाख्याततत्त्वानुचिन्तनमनुप्रेक्षाः ॥७॥ सूत्रार्थ-अनित्यानुप्रेक्षा आदि वारह (१२) अनुप्रेक्षा है ॥ ७ ॥ भाग्यम्-एता द्वादशानुप्रेक्षाः । तत्र वाह्याभ्यन्तराणि शरीरशय्यासनवस्त्रादीनि द्रव्या- णि सर्वसंयोगाश्वानित्या इत्यनुचिन्तयेत् । एवं ह्यस्य चिन्तयतः तेष्वभिष्वङ्गो न भवति मा भून्मे नहियोगजं दुःखमित्यनित्यानुप्रेक्षा ॥१॥ विशेपव्याख्या-अनित्यानुप्रेक्षा, अशरणानुप्रेक्षा, संसारानुप्रेक्षा, एकत्वानुप्रेक्षा, अन्य- त्यानुप्रेक्षा, अशुचित्वानुप्रेक्षा, आस्रवानुप्रेक्षा, संवरानुप्रेक्षा, निर्जरानुप्रेक्षा, लोकानुप्रेक्षा, पोधिदुर्लभानुप्रेक्षा, तथा धर्मानुप्रेक्षा, ये द्वादश अर्थात् बारह (१२) प्रकारकी अनु- प्रेश। उनमें बाह्य तथा आभ्यन्तरके यावत् पदार्थ मात्र हैं, उन सबकी अनित्य- १०५ सभाष्यतत्त्वार्थाधिगमसूत्रम् । ताका अनुचिन्तन अर्थात् विचार करना । जैसे- शरीर, इन्द्रियादि, शय्या, आसोत वस्त्र तथा गृहआदि जितने द्रव्य हैं, वे सब संयोगसे उत्पन्न हुए हैं और अनित्य है। ऐसा सदा चिन्तन करे । इस प्रकार चिन्तन करनेवाले प्राणीकी उन शरीरआदि पदा- र्थोंमें आसक्ति नहीं होती । क्योंकि वे अनित्य है तब उनके वियोगसे जनित दुःख हमको न हो; इस प्रकार पदार्थोके वियोगसे उत्पन्न दुःखोंके नाशार्थ जो सबके अनि- त्यत्वका अनुचिन्तन है वह अनित्यानुप्रेक्षा नाम प्रथम अनुप्रेक्षा है॥ १॥ यथा निराश्रये जनविरहिते वनस्थलीपृष्ठे बलवता क्षुत्परिंगतेनामिषैषिणा सिंहेनाभ्या- हतस्य मृगशिशोः शरणं न विद्यते एवं जन्मजरामरणव्याधिप्रियविप्रयोगाप्रियसंप्रयोगेप्सि- तालाभमदारियदौर्भाग्यदौर्मनस्यमरणादिसमुत्थेन दुःखेनाभ्याहतस्य जन्तोः संसारे शरणं न विद्यत इति चिन्तयेत् । एवं ह्यस्य चिन्तयतो नित्यमशरणोऽस्मीति नित्योद्विग्नस्य सांसा- रिकेषु भावेष्वनभिष्वङ्गो भवति । अर्हच्छासनोक्त एव विधौ घटते तद्धि परं शरणमित्य- शरणानुप्रेक्षा ॥२॥ जैसे निराश्रय (किसी प्रकारके आश्रयसे रहित), जनशून्य महा अरण्यानी (बड़े भारी जंगल) के मध्यमें बलवान् , क्षुधाग्रस्त तथा मांसके अभिलाषी सिंहसे अभ्याहत (आक्रान्त) मृग (हरिणआदि पशु) के बच्चेको कोई शरण ( रक्षाका स्थान) नहीं है। इसी प्रकार जन्म, वृद्धाऽवस्था, मरण, अनेक प्रकारके शारीरिक तथा मानसिक रोग, प्रिय प्राणी वा अन्य प्रिय वस्तुका वियोग, अप्रिय वा अनिष्ट वस्तुका संयोग, अभिलषित पदार्थका अलाम (चाही हुई वस्तुका न मिलना), दारिद्य (दीनता, गरीबी), दौर्भाग्य, दौर्मनस्य (वैर विरोध आदि) तथा मरणआदिसे लेके अनेक अनिष्ट हेतु- औसे उत्पन्न दुःखसे आक्रान्त अर्थात् अनेक दुःखोंसे ग्रस्त जीवको कोई भी शरण (त्राण वा रक्षणका स्थान ) इस संसारमें नही है ऐसा अनुचिन्तन सदा करे । इस प्रकारसे नित्य चिन्तन करनेवाले प्राणीको कि-मैं सर्वथा शरणरहित हूं, मुझे जन्म जरा मरणआदि रोगजनित दुःखोंसे कोई भी इस संसारमे नही बचा सकता । उस नित्य उद्विग्न चित्तवाले प्राणीको सांसारिक भावमें अर्थात् संसारके पदार्थोंमे अरुचि वा अप्रीति होती है । तथा इस प्रकारके विचार करनेवाले जीवके चित्तमें यह भी भासता है कि-अर्हत् भगवान्प्रणीत शासन (शास्त्र) में जो कुछ कथित है वह सब इस अनित्यताआदि विधिमें घटित होता है, और उसमें ही प्रोक्त जो नित्य आत्मा है अथवा शुद्ध निश्चयसे आत्मारूप धर्म है, अन्य सब अशरण है, यह द्वितीय अशरणा- नुप्रेक्षा व्याख्यात हुई ॥२॥ अनादौ संसारे नरकतिर्यग्योनिमनुष्यामरभवग्रहणेषु चक्रवत्परिवर्तमानस्य जन्तोः सर्व एव जन्तवः स्वजनाः परजना वा । न हि खजनपरजनयोर्व्यवस्था विद्यते । माता हि भूत्वा १० रायचन्द्र जैनशास्त्रमालायाम् गिनी भार्या दुहिता च भवति । भगिनी भूत्वा माता भार्या दुहिता च भवति । भार्या भूत्वा भगिनी दुहिता माता च भवति । दुहिता भूला माता भगिनी भार्या च भवति । तथा पिता भूखा भ्राता पुत्रः पौत्रश्च भवति । भ्राता भूत्वा पिता पुत्रः पौत्रश्च भवति । पौत्रो भूत्वा पिता भ्राता पुत्रश्च भवति । पुत्रो भूत्वा पिता भ्राता पौत्रश्च भवति । भर्ता भूत्वा दासो भवति । दासो भूत्वा भर्ता भवति । शत्रुभूत्वा मित्रं भवति मित्रं भूत्वा शत्रुर्भवति । पुमान्भूत्वा स्त्री भवति नपुंसकं च । स्त्री भूत्वा पुमानपुंसकं च भवति । नपुंसकं भूत्वा स्त्री पुमांश्च भवति । एवं चतुरशीतियोनिप्रमुखशतसहस्रपु रागद्वेपमोहाभि- भूतैर्जन्तुभिरनिवृत्तविषयतृष्णैरन्योन्यभक्षणाभिघातवधवन्धाभियोगाक्रोशादिजनितानि ती- ब्राणि दुःखानि प्राप्यन्ते । अहो द्वन्द्वारामः कष्टखभावः संसार इति चिन्तयेत् । एवं ह्यस्य चिन्तयतः संसारभयोद्विग्नस्य निर्वेदो भवति । निविण्णश्च संसारप्रहाणाय घटत इति संसारानुप्रेक्षा ॥३॥ अनादि कालसे सिद्ध इस संसारमें नरक, तिर्यग्योनि, मनुप्य, तथा देवोंमे जन्मोंके ग्रहण करनेमें चक्रके तुल्य भ्रमण करते हुए जीवके कोई भी जीव खजन ( अपने) तथा परजन (अन्य जन) नहीं हैं। क्योंकि-चक्रके तुल्य भ्रमण करते हुए जीवके खजन तथा परजनकी व्यवस्था ही नहीं है। कारणकिसी जन्ममें वा इसी जन्ममें जो माता है, वह माता होकर जन्मान्तरमें भगिनी (बहिन ), भार्या (स्त्री) तथा कन्या भी होती है । और भगिनी होकर माता, भार्या तथा दुहिता ( कन्या ) होती है । और ऐसे ही किसी जन्ममें भार्या होकर पुनः जन्मान्तरमें भगिनी कन्या, कन्या तथा माता होती है। इसी प्रकार किसी जन्ममें कन्या होकर पुनः माता, भगिनी तथा भार्या होती है। ऐसे ही कोई जीव किसीका एक वा अनेक जन्ममें पिता होकर पुनः भ्राता, पुत्र, तथा पौत्र (पोता नाती) भी जन्मान्तरमें होता है, तथा भाई होकर जन्मान्तरोंमें पिता, पुत्र और पौत्र होता है तथा पौत्र होकर पुनः किसी जन्ममें पिता, भ्राता, तथा पुत्र होता है और कभी पुत्र होकर अन्य जन्ममे पिता, भ्राता तथा पौत्र होता है । इसी प्रकार चक्रवत् भ्रमणशील इस जन्ममरणमय संसारमें किसी स्त्रीका कोई पति होकर पुनः किसी जन्ममे दास होता है, और दास होकर पुनः कभी वही भर्ती (पति) होता है। ऐसे ही कोई जीव किसीका शत्रु होकर किसी जन्ममे मित्र होता है, और मित्र होकर पुनः शत्रु होता है । इसी रीतिसे किसी जन्ममें पुरुष होकर न्त्री होता है; और नपुंसक भी होता है । और स्त्री होकर पुरुष तथा नपुंसक भी होता है । तथा नपुंसक होके अन्य जन्ममे स्त्री तथा पुरुष भी होता है । इसी प्रकार चौरासी लक्ष योनियों में भ्रमण करते हुए राग तथा द्वेषसे पूर्ण तथा अतितृष्णाके पशीभूत जीव परस्पर ताडन, भक्षण, वध, वन्धन, अभियोग (मिथ्या अभिशाप वा संक) तथा निन्दा, कटुवचनआदिसे उत्पन्न अत्यन्त दुःखोंको प्राप्त होते हैं । अहो!

२० सभाष्यतत्त्वार्थाधिगमसूत्रम् । कैसा द्वन्द्वाराम अर्थात् सुख, दुःख, शीतोष्ण, तथा संयोग वियोग आदि द्वन्द्वोंसे पूरे कष्टस्वभाव यह संसार है; इस प्रकार चिन्तन करना चाहिये । इस प्रकार चिन्तन करते हुए तथा संसारके भयसे उद्विग्न जीवको निर्वेद (वैराग्य) उत्पन्न होता है। और निर्विण्ण (निर्वेद वा संसारसे ग्लानियुक्त) होनेसे संसारके नाशार्थ ही वह प्रयत्न करता है । इस प्रकारसे संसारके स्वभावका चिन्तन यह तृतीय संसारानुप्रेक्षा व्याख्यात हुई ॥ ३ ॥ एक एवाहं न मे कश्चित्वः परो वा विद्यते । एक एवाहं जाये । एक एव म्रिये । न में कश्चित्स्वजनसंज्ञः परजनसंज्ञो वा व्याधिजरामरणादीनि दुःखान्यपहरति प्रत्यंशहारी वा भवति । एक एवाहं स्वकृतकर्मफलमनुभवामीति चिन्तयेत् । एवं ह्यस्य चिन्तयतः स्वजन- संज्ञकेषु स्नेहानुरागप्रतिवन्धो न भवति परसंज्ञकेपु च द्वेषानुबन्धः । ततो निःसङ्गतामभ्यु- पगतो मोक्षायैव यतत इत्येकत्वानुप्रेक्षा ॥४॥ इस संसारमें मै एक अर्थात् एकाकी (अकेला) ही हूं; मेरा कोई भी स्वकीय, अथवा परकीय (अन्य ) नही है । मै अकेला ही उत्पन्न होता हूं, तथा अकेला ही मरता हूं। न तो मेरा कोई खजनसंज्ञक है और न परजनसंज्ञक है, अर्थात् मेरा कोई ऐसा सुहृद् (मित्र ) नहीं है जो व्याधि जरा (वृद्धावस्था) तथा मरणआदि दुःखोंको अपहरण करे, वा ऐसा भी कोई नही है जो मेरा प्रत्यंश लेले । मै तो एकाकी अपने किये हुए कर्मोके फलोंका भोक्ता हूं, अर्थात् मेरे किये हुए कर्मोके फलोंका मुझसे अन्य कोई भी भोगनेवाला नही है, इत्यादि रीतिसे चिन्तन करै । इस प्रकार अपनेको एकाकी अर्थात् सर्वथा असहाय अकेला चिन्तन करते हुए इस जीवको स्वजनसंज्ञक जो स्त्री, पुत्र, भ्राता, मित्रआदि है; उनमे स्नेह अनुरागका प्रतिबन्ध नही होता, और जो परसंज्ञक शत्रुआदि है, उनमें द्वेषका भी अनुबन्ध नहीं होता । इस रीतिसे राग द्वेषके अभावसे निःसङ्गताको प्राप्त जीव मोक्षके ही अर्थ प्रयत्न करता है, इस प्रकार परम्परासे मोक्षसाधिका चतुर्थ एकत्वानुप्रेक्षा वर्णन की ॥ ४ ॥ शरीरव्यतिरेकेणात्मानमनुचिन्तयेत् । अन्यच्छरीरमन्योऽहम् ऐन्द्रियकं शरीरमतीन्द्रियो- ऽहम् अनित्यं शरीरं नित्योऽहम् अझं शरीरं ज्ञोऽहम् आद्यन्तवच्छरीरमनाद्यन्तोऽहम् वहूनि च मे शरीरशतसहस्राण्यतीतानि संसारे परिभ्रमतः स एवायमहमन्यस्तेभ्य. इत्यनु- चिन्तयेत् । एवं ह्यस्य चिन्तयतः शरीरप्रतिबन्धो न भवतीति अन्यश्च शरीरान्नित्योऽहमिति निःश्रेयसे संघटत इत्यन्यत्वानुप्रेक्षा ॥५॥ । आत्माको शरीरसे पृथक् चिन्तन करना चाहिये । शरीर अन्य पदार्थ है, और मै शरीरादिसे विलक्षण अन्य पदार्थ हूं। शरीर तो इन्द्रियोंका विषय है, और मै अतीन्द्रिय हूं, अर्थात् मेरा (शुद्ध आत्माका) स्वरूप इन्द्रियोंका विषय नहीं है । शरीर तो अनित्य (क्षणभङ्गुर) है, और मै (आत्मा) नित्य हूं। शरीर अज्ञ अर्थात् जड है, और मै ज्ञ अर्थात् ज्ञानस्वरूप चेतन हूं। शरीर आदि अन्तवाला है, और मै अनादि अनन्त अवि- २६ है २२ रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् शी स्वरूप हूं। इस संसारमे परिभ्रमण करते हुए अनेक लक्ष शरीर व्यतीत होगये, अर्थात् शरीर तो मेरे बहुत होगये, और मैं वही एक उन शरीरोंसे भिन्नखरूप हूं। इत्यादि रूपसे अपनेको शरीर इन्द्रियादिसे भिन्नरूपसे चिन्तन करे । इस प्रकारसे चिन्तन करनेसे इस जीवको शरीरका प्रतिबन्ध, अर्थात् शरीरमें ममत्वआदि नहीं होता । मैं शरी- रोसे भिन्न नित्यखरूप हूं इस प्रकारके विचारसे मोक्षके ही लिये वह जीव प्रयत्न करता । इस प्रकार यह पञ्चम अन्यत्वाऽनुप्रेक्षा व्याख्यात हुई ॥ ५ ॥ अशुचि खल्विदं शरीरमिति चिन्तयेत् । तत्कथमशुचीति चेदाधुत्तरकारणाशुचित्वादशु- चिभाजनवादशुच्युद्भवत्वाशुभपरिणामपाकानुबन्धादशक्यप्रतीकारत्वाचति । तत्राद्युत्तरकार- णाशुचित्वाचावच्छरीरस्याचं कारणं शुक्रं शोणितं च तदुभयमयन्ताशुचीति उत्तरमाहारप- रिणामादि । तद्यथा । कवलाहारो हि अस्तमात्र एव श्लेष्माशयं प्राप्य श्लेप्मणा द्रवीकृतो. ऽत्यन्ताशुचिर्भवति । ततः पित्ताशयं प्राप्य पच्चमानोऽम्लीकृतोऽशुचिरेव भवति । पक्को वाचाशयं प्राप्य वायुना विभब्यते पृथक् खलः पृथक् रसः । खलान्मूत्रपुरीपादयो मलाः प्रादुर्भवन्ति रसाच्छोणितं परिणमति शोणितान्मांसम् मांसात्मेदः मेदसोऽस्थीनि अस्थिभ्यो मन्ना मजाभ्यः शुक्रमिति । सर्व चैतच्लेष्मादिशुक्रान्तमशुचिर्भवति । तस्मादाद्युत्तरकारणा- शुचित्वादशुचि शरीरमिति ।। कि चान्यत् अशुचिभाजनवान् अशुचीनां खल्वपि भाजनं शरीरं कर्णनासाक्षिदन्तमलखेदश्लेष्मपित्तनूत्रपुरीषादीनामवस्करभूतं तस्मादशुचीति ॥ किं चान्यत् । अशुच्युद्भवत्वान् एपामेव कर्णमलादीनामुद्भवः शरीरं तत उद्भवन्तीति । अशुचौ च गर्ने संभवतीति अनुचि शरीरम् ॥ किं चान्यत् । अशुभपरिणामपाकानुबन्धादातवे विन्दो- राधानात्प्रभृति खल्वपि शरीरं कललार्बुदपेशीधनव्यूहसंपूर्णगर्भकोमारयौवनत्यविरभाव- जनकेनाशुभपरिणामपाकेनानुवद्धं दुर्गन्धि पूतिस्वभावं दुरन्तं तस्माद्शुचि ॥ कि चान्यत् । अशक्यप्रतीकारत्वान् अशक्यप्रतीकारं खल्वपि शरीरस्याशुचित्वमुद्वर्तनरूक्षणस्नानानुले- पनधूपप्रधर्षवासयुक्तिमाल्यादिभिरप्यस्य न शक्यमशुचित्वमपनतुमशुच्यात्मकत्वाच्छुच्यु- पघातकत्वाञ्चेति । तस्मादशुचि शरीरमिति । एवं ह्यस्य चिन्तयतः शरीरे निर्वेदो भवति । निविण्णश्च शरीरप्रहाणाय घटत इति अशुचित्वानुप्रेक्षा ॥६॥ यह शरीर अशुचि अर्थात् अपवित्र है ऐसा चिन्तन करना चाहिये । यदि ऐसा प्रश्न करो कि-किस प्रकार यह शरीर अपवित्र है? तो उत्तर यह है कि-आदि तथा उत्तर कारणके अपवित्र होनेसे, अशुचि अर्थात् अपवित्र वस्तुओंका पात्र होनेसे, अशुचि (अप- वित्र वस्तुओंका उत्पत्तिस्थान होनेके कारण (होनेसे) तथा स्वयं अपवित्र स्थानले उत्पन्न होने कारण, अशुभ परिणामयुक्त परिपाकके सम्बन्धसे, और अशक्य प्रतीकार , (उपाय) होनेसे भी यह शरीर अशुचि अर्थात् अपवित्र है। उनमे प्रथम आदि तथा उत्तर कारणका अशुचिल (अपवित्रता) इस प्रकार है कि शुक्र तथा शोणित, अर्थात् पिताका बौर्य और माताका रुधिर यह शरीरका आदिकारण है, इन्ही दो वस्तुओंसे शरीरका विष्ट प्रथम बनता है, और ये दोनों (शुक्र शोणित,) अत्यन्त अपवित्र है। और उत्तर सभाष्यतत्त्वार्थाधिगमसूत्रम् । ०५ कारण क्या है कि-आहारके परिणाम आदि । क्योंकि-शरीर उत्पन्न होनेके पश्चात् आहारत ही पालित होता है, इससे उत्तर कारण आहार है, और उस आहारके परिणाम अशुचि, हैं। जैसे-कवलाहार ग्रस्त होते ही अर्थात् मुखमें डालकर गलेके नीचे निगलनेके पश्चात् ही श्लेष्माशय (कफ)के स्थानको प्राप्त होकर श्लेष्माके समान द्रवीभूत होकर अत्यन्त अपवित्र होजाता है। उसके अनन्तर पित्ताशय अर्थात् जहांपर पित्त रहता है ऐसे उदरके अन्तर्गत स्थानविशेषको प्राप्त होकर पाकको प्राप्त होता हुआ अम्ल (खट्टे )रूप रसको प्राप्त होकर अत्यन्तही अशुचि (अपवित्र हो जाता है। पुनः उसके अनन्तर परिपक्व अर्थात् जीर्ण होकर वाताशय (वातके स्थानविशेष )को प्राप्त होकर वह आहार वातके द्वारा पृथक् २ भागोंमें विभक्त किया जाता है । अर्थात् वायुसे आहारका खलभाग पृथक हो जाता है, और रसभाग पृथक् हो जाता है । अर्थात् तिल सर्षप आदिको यन्त्रमें (कोल्हू में )डालके पेरनेसे जैसे खल भाग अलग होता है और रस (तेल )भाग अलग होता है, यही दशा मुक्त आहारकी भी पित्तके द्वारा परिपाकदशामें प्राप्त होकर वायुसे खेल (स्थूल ) भाग अलग हो जाता है और रसभाग अलग होजाता है। उसमें भी खलभागसे तो मूत्र, मल (विष्ठा)आदि मल उत्पन्न होते है । और रससे शोणित (रुधिर) परिणाम होता है, अर्थात् रस रुधिररूपमें परिवर्तित (बदल जाता है; रुधिरसे मांस, मांससे मेदा अर्थात् मांससे जन्य और अस्थि (हड्डी )का कारण धातुविशेष उत्पन्न होता है, मेदासे अस्थि, और अस्थिसे मजा ( अस्थिजन्य शुक्रका कारण धातुविशेष ) उत्पन्न होता है; और मज्जासे शुक्र अर्थात् वीर्य उत्पन्न होता है । यह श्लेष्मासे लेकर शुक्रपर्यन्त सब अर्थात् रसादिशुक्रान्त सप्त धातु अत्यन्त अशुचि ( अपवित्र ) है । इसलिये आदि तथा उत्तर शरीरके कारण अपवित्र होनेसे शरीर अपवित्र है। और यह अन्य भी शरीरके अशुचित्वमें हेतु है । जैसे-अशुचिभाजनत्वरूप हेतुसे भी यह शरीर अशुचि है; अशुचि- भाजन इसका यह अर्थ है कि-अशुचि वस्तुओंका पात्र होनेसे शरीर अपवित्र है । अशुचि वस्तुओंका पात्र शरीर इस प्रकार है कि कर्ण (कान), नासिका, नेत्र, तथा दांतोंके मल, प्रस्वेद (पसीना), कफ, पित्त, मूत्र तथा विष्ठा आदि मलोंका यह आश्रयस्थान है अत एव स्वयम् अपवित्ररूप ही है । और यह अन्य भी हेतु है कि-यह शरीर अशुच्युद्भव है; अशुच्युद्भव इसका यह अर्थ है कि-अशुचि जो नासिका नेत्र आदि सप्त ऊपरके छिद्रोंसे और दो नीचेके छिद्रोंसे मल उत्पन्न होते हैं उनका उद्भव अर्थात् उत्पत्तिस्थान है, अथवा अशुचि जो गर्भ है उससे यह शरीर उत्पन्न होता है. इस हेतुसे / -- १ श्लेष्माशय, पित्ताशय, तथा वायुका आशय ये तीन श्लेष्मा, पित्त, तथा वायुजिन तीन धातुओंसे शरी- रकी स्थिति व क्रिया होती है उनके रहनेके स्थान विशेष हैं। ये तीनों भुक आहारको श्लेष्मास्थितिसे क्रमशः वीर्यदशातक पहुंचाते है।

रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम्
हि अशुचि है। और इस शरीरके अशुचि होनेमे अन्य हेतु यह भी है कि यह अशुभपरि-
हैणाम पाकाऽनुबन्ध होनेसे भी अशुचि है, क्योंकि गर्भाशयमें बिन्दु अर्थात् वीर्यरूप विन्दुके
आधान (गर्भाधान )समयसे आरम्भ करके कलल (शुक्रशोणितके संयोगसे गर्भकी अव-
स्थाविशेष), अर्बुद(पिण्डाकार होनेको आरूढ), पेशी (मांसपिण्डाकार),धन (काठिन्ययुक्त
मांसपिण्ड),व्यूह(हस्तपादआदिकी रचनासहित गर्भकी अवस्थाविशेष),सम्पूर्ण गर्भ, कौमार-
यौवन, तथा स्थविर अर्थात् वृद्धमान आदिका जनक (उत्पादक)जो अशुम परिणामविपाक
है उससे अनुबद्ध (सम्बद्ध) दुर्गन्धयुक्त (सड़नेका स्वभाव होनेसे अति दुर्गन्धसहित)
और दुःखमय अन्त होनेसे यह शररि अशुचि है। और अन्य यह भी है कि अशक्य
प्रतीकार ( जिसका असाध्य उपाय है ऐसे )हेतुसे भी यह शरीर अशुचि ( अपवित्र )है।
अशक्यप्रतीकार इसका आशय यह है कि उबटनसे निर्मलीकरण, रूक्षण (रूखा करना),
सान, अनुलेपन, धूप, प्रघर्षण (नखआदिसे घर्षण) औरसुगन्धित इतर तल आदिके
संयोग तथा पुप्पमाला धारण आदि युक्तियोंसे भी इस शरीरकी अपवित्रताको दूर नहीं
कर सकते, क्योंकि यह अशुचिरूप ही है, और अपने सम्बन्धसे पवित्रताका उपघातक
(नाशक)है । इसलिये पूर्वोक्त हेतुओंसे यह शरीर अशुचि है; ऐसा चिन्तन करना चाहिये ।
क्योंकि इस प्रकार शरीरको चिन्तन करनेवाले जीवको शरीरमें ग्लानि तथा वैराग्य
उत्पन्न होता है । निर्वेद (ग्लानि वा वैराग्य )सहित होनेसे वह जीव शरीरके नाश तथा ।
मोबकी प्राप्तिके लिये चेष्टा करता है, इस रीतिसे यह षष्ठ अशुचित्वानुप्रेक्षा कही
गई ॥६॥
आस्रवानिहामुत्रापाययुक्तान्महानदीस्रोतोवेगतीक्ष्णानकुशलागमकुशलनिर्गमद्वारभूतानि-
न्द्रियादीनवद्यतश्चिन्तयेन् । तद्यथा । स्पर्शनेन्द्रियप्रसक्तचित्तः सिद्धोऽनेकविद्यावलसंपन्नो-
ऽग्याकाशगोऽष्टाङ्गमहानिमित्तपारगो गायः सत्यकिनिधनमाजगाम । तथा प्रभूतयवसो.
दक्रममाथावगाहादिगुणसंपन्नवनविचारिणश्च मदोत्कटा वलवन्तोऽपि हस्तिनो हस्तिवन्ध-
कीषु स्पर्शनेन्द्रियसतचित्ताग्रहणमुपगच्छन्ति । ततो वन्धवधदमनवाहनाङ्कुशपाणिप्रतो-
दाभिघातादिजनितानि तीव्राणि दुःखान्यनुभवन्ति । नित्यमेव खयूथस्य स्वच्छन्दप्रचार-
मुखन्य वनवासस्थानुस्मरन्ति तथा मैथुनसुखप्रसङ्गादाहितगर्भाश्वतरी प्रसवकाले प्रसवितु-
माहवन्ती तीवदुःखाभिहतावशा मरणमभ्युपैति । एवं सर्वे एव स्पर्शनेन्द्रियप्रसक्ता इहा-
मुत्र च विनिपातमृच्छन्तीति ॥ तथा जिह्वेन्द्रियप्रसक्ता मृतहस्तिशरीरस्थस्रोतोवेगोडवाय-
सवन् हमनघृतकुम्भप्रविष्टमूषिकवन् गोष्टप्रसक्तहदवासिकूर्मवत् मांसपेशीलुब्धश्येनवत्
बडिमामिपगृद्धमत्स्यवञ्चेति ।। तथा नाणेन्द्रियप्रसक्ता ओषधिगन्धलुब्धपन्नगवत् पललगन्धा-
नुसारिमृपिकवचेति ॥ तथा चक्षुरिन्द्रियप्रसक्ताः स्त्रीदर्शनप्रसङ्गादर्जुनकचोरवत् दीपालो-
फलोलपतङ्गवद्विनिपातमृच्छन्तीति चिन्तयेत् । तथा श्रोत्रेन्द्रियप्रसक्तास्तित्तिरकपोतकपिञ्ज-
उत्रन गीतमंगीतध्वनिलोटमृगवद्विनिपातमृच्छन्तीति चिन्तयेत् । एवं हि चिन्तयन्नास्रव-
निगधाय बटन इति आनवानुप्रेक्षा॥७॥

सभाष्यतत्त्वार्थाधिगमसूत्रम् । २०५ इस लोक तथा परलोकमें भी विघ्नकारक, बड़ी २ नदियोंके प्रवाहके वेगसदृश अति उग्र (तेज वा भयङ्कर ), अकुशल ( मूर्ख ) तथा शास्त्रकुशल पण्डितोंके भी, कर्मों के निर्गरम (आगमन )के द्वारभूत आस्रवरूप इंद्रियोंको, आत्माको कल्याणमार्गसे खण्डित करनेवाले चिन्तन करना चाहिये । अर्थात् “कर्मोके आत्मामें अर्थात् प्रदेशमे आगमनके निमित्त- भूत इंद्रियां निन्दनीय पापकर्मोमें आत्माको फँसाकर उसे कल्याणमार्गसे पृथक् (अलग) करदेती है ऐसा चिन्तन करना चाहिये" जैसे-स्पर्शन इद्रियमें आसक्तचित्त (फॅसाहुआ) अनेक विद्या तथा बलसम्पन्न (सहित) और अष्टाङ्गके महानियमोंके पारङ्गत होनेपर भी सत्यकि गार्ग्य मरणको प्राप्त हुआ तथा नानाप्रकारके अत्यन्त सघन वृक्ष, तृण, जल आ- दिके द्वारा महाक्लेशकारक गणोंसे सम्पन्न ( सहित) वनोंमें विचरनेवाले मदोन्मत्त, अति उद्धत तथा बलवान् हाथी भी हाथियोंके बन्धनमें हेतुभूत दुष्ट हथिनियों (कृत्रिम वा यथार्थ )में स्पर्शन इन्द्रिय (उपस्थ वा शिष्ण )से आसक्त होनेसे ग्रहणदशाको प्राप्त होते है । और इससे (पकड़में आजानेके पीछे) बन्धन, मरण, निग्रह, वाहन (सवारीको वहन करना वा लेजाना) तथा अङ्कुशोंके द्वारा, गण्डस्थलोंमें छेदन भेदन आदि नाना- प्रकारके प्रहारों (चोटों )से उत्पन्न अति कठोर दुःखोंको सहन करते हैं। और सदा अपनी इच्छाके अनुसार अपने झुण्डके बनमें विचरने (भ्रमण करने )के सुख सहित । वनवासको स्मरण किया करते हैं । और इसी रीति ( स्पर्शन इन्द्रियके आनन्दमें फसने )- से मैथुनसुखके कारण गर्भ धारण करनेवाली अश्वतरी (खच्चरी )प्रसूति (बालकजनन ) समयमें प्रसव न कर सकती हुई अतिभयङ्कर महादुःखसे पीडित व अक्श होकर मरण अवस्थाको प्राप्त होती है । इसी प्रकार सभी जो स्पर्शन इन्द्रिय (त्वगिन्द्रिय )के सुखमे आसक्त हो (फॅस )जाते है वे इसलोक तथा परलोकमें भी पतनको ही प्राप्त होते है। तथा इसी (पूर्वकथित) रीतिसे जो प्राणी जिह्वा इन्द्रियके सुखमें आसक्त हो (फँस) जाते हैं वे भी नदीमध्यस्थित मरे हुए हाथीके शरीरपर स्थित (विद्यमान) जलप्रवाहके वेगसे वाहित (बहे हुए) काक (कौवे)के समान, हेमन्तऋतुमें( जाड़े वा शीत कालम) घृतके कुम्भ (घट वा घड़े )मे प्रविष्ट (घुसे हुए) घृतमे निमग्न (फॅसे) मूपक (चूहे )- के तुल्य, गोष्ठ (गौओंके निवासस्थान )में आसक्त हृदनिवासी कच्छप (कछुये ) के सदृश, मांसके खण्ड (टुकड़े )के लोभी बाज पक्षीके समान, तथा कटिये वा वंशीमें लगे हुए मांस (वा पिष्ट आटा आदि)के लोभी मत्स्य (मछली) तुल्य मरणकोही प्राप्त होते है । और घाण इन्द्रियमे आसक्त (फँसे हुए) जन भी औपधके गन्धके लोभी सर्प (सॉप) के समान, मांसके गन्धके अनुगामी (मांसके गन्धको निश्चय करके उसके अनुसार चलनेवाले मूषक (चूहे )के तुल्य मृत्युकोही प्राप्त होते है । और इसी (प्रथम- कथित) रीतिके अनुसार नेत्र (आंख) इन्द्रियके आनन्दम निमग्न (फैले हुए) नीके रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् २०६ दर्शन प्रसङ्गसे अर्जुन चोरके समान, तथा दीपके प्रकाशके लोभी पतङ्गके तुल्य पतन मरण) कोही प्राप्त होते है । इस प्रकारका चिन्तन (विचार) करना चाहिये और इसी प्रकार कर्ण (श्रोत्र वा कान ) इन्द्रियके विषयमें आसक्त तित्तिर (तीतर वा तीतल), कपोत (कबूतर ), कपिल, और गीत तथा वाद्यकी ध्वनिके लोभी मृगके समान विनि- पात (मरण )को प्राप्त होते है, ऐसा विचार करना चाहिये । इसप्रकार चिन्तन करता हुआ यह प्राणी आस्रवके निरोधके लिये समर्थ होता है । इसप्रकार यह सप्तमी आस्त्रवा- नुप्रेला समाप्त हुई ॥ ७॥ संवरांश्च महाव्रतादिगुप्त्यादिपरिपालनाद्गुणतश्चिन्तयेत् । सर्वे ह्येते यथोक्तास्रवदोपाः संवृतात्मनो न भवन्तीति चिन्तयेत् । एवं ह्यस्य चिन्तयतो मतिः संवरायैव घटत इति संवरानुप्रेक्षा ।। ८॥ तथा गुप्ति (मनो, वाक्, काय )आदिके परिपालन रूप गुणोंसे पञ्च महाव्रत स्वरूप संवरोंका इस जीवको विचार करना चाहिये । क्योंकि जिसका आत्मा संवृत है अर्थात् जो संवरगुणसहित है उस जीवको आस्रवके जो सब दोप कहे गये हैं वे सभी नहीं होते ऐसा चिन्तन करना चाहिये । इस रीतिसे चिन्तन करनेवालेकी बुद्धि संवरके लिये समर्थ होती है, यह अष्टमी संवराऽनुप्रेक्षा व्याख्यात हुई ॥ ८ ॥ निर्जरा वेदना विपाक इत्यनान्तरम् । स द्विविधोऽबुद्धिपूर्वः कुशलमूलश्च । तत्र नरकादिषु कर्मफलविपाको योऽबुद्धिपूर्वकस्तमुद्यतोऽनुचिन्तयेदकुशलानुवन्ध इति । तपः- परीपहजयकृतः कुशलमूलः । तं गुणतोऽनुचिन्तयेत् । शुभानुवन्धो निरनुवन्धो वेति । एवमनुचिन्तयन्कर्मनिर्जरणायैव घटत इति निर्जरानुप्रेक्षा ॥९॥ निर्जरा (एकदेश कर्मोका क्षय वा सामान्यरूपसे कर्मक्षय), वेदना (कर्मफलोंका अनु- भव) तथा विपाक (कर्मोका फलयोग) ये सब एक अर्थवाचक शब्द है । वह निर्जरा अथवा विपाक दो प्रकार का है, एक तो अवुद्धि (अज्ञान ) पूर्वक, और दूसरा कुशल (शुभाचरण) मूलक । इनमेसे नरक आदिमें कर्मोंके फलोंका जो विपाक (कर्मफलोंका अनु- भव वा भोग) है उस सवको निन्दनीय समझै और यह चिन्तन करै कि यह सव अकुशल अर्थात् . दुष्ट कर्मोंकाही अनुवन्ध (सम्बध वा फल) है। और द्वादश तप तथा द्वाविंशति (वाईम ) परीपहजयसे जो किया है वह कुशलमूलक अर्थात् शुभाचरणसे उत्पन्न हुआ है । उसके गुणके अनुसार चिन्तन करै; कि यह शुभअनुवन्ध (शुभचारित्रोंसे सम्बन्ध रखनेवाला) है अथवा अनुबन्धरहित है। इस प्रकारसे चिन्तन करता हुआ प्राणी कोंक निर्जरण अर्थात् नाश करनेहीम समर्थ होता है; इस रीतिसे यह नवम निर्जराऽनुप्रेना व्याख्यात हुई ॥ ९ ॥ पश्याग्निकावात्मकं विविधपरिणाममुत्पत्तिस्थित्यन्यतानुग्रहालययुक्तं लोकं चित्रस्वभाव. मनुचिन्तयन । एवं एस्थ चिन्तयतस्तत्त्वज्ञानविशुद्धिर्भवतीति लोकानुप्रेक्षा ।। १० ।। - - सभाष्यतत्त्वार्थाधिगमसूत्रम्। २०७ पञ्चास्तिकाय अर्थात् जीवास्तिकाय आदि पञ्चास्तिकाय स्वरूप अनेक प्रकारके परि- णामों (परिवर्तनों) से संयुक्त, तथा उत्पत्ति, स्थिति, अन्यभावकी प्राप्ति, तथा नाशसे युक्त यह संसार है ऐसा चिन्तन करै । इस प्रकार विचार करते हुए इस जीवकी तत्त्व- ज्ञानकी परिशुद्धता होती है। यह इस रीतिसे दशम लोकाऽनुप्रेक्षा व्याख्यात हुई ॥ १० ॥ अनादौ संसारे नरकादिषु तेषु भवग्रहणेष्वनन्तकृलः परिवर्तमानस्य जन्तोविविधदुःखा- । भिहतस्य मिथ्यादर्शनाापहतमते नदर्शनावरणमोहान्तरायोदयामिभूतस्य सम्यग्दर्शना- दिविशुद्धो बोधिदुर्लभो भवतीत्यनुचिन्तयेत् । एवं हास्य बोधिदुर्लभत्वमनुचिन्तयतो वोधि प्राप्य प्रमादो न भवतीति बोधिदुर्लभत्वानुप्रेक्षा ॥ ११ ॥ अनादिकालसे सिद्ध इस संसारमें, नरक आदिमें, उन २ जन्मोंके धारण करने, अनन्तवार भ्रमण करते हुए, अनेक प्रकारके दुःखोंसे पीड़ित, मिथ्यादर्शन आदिसे नष्ट बुद्धिवाले, तथा ज्ञानावरणीय, दश वरणीय, मोह और अन्तरायभूत कर्मोके उदयसे पराजित इस जीवको सम्यग्दर्शन आदिसे सर्वथा शुद्ध ज्ञानकी प्राप्ति अतिदुर्लभ है ऐसा चिन्तन करै। इस रीतिसे बोधिदुलर्भताका निरन्तर अनुचिन्तन करतेहुए इस जीवको बोधिकी प्राप्ति होती है, और बोधिको प्राप्त करनेसे प्रमाद अर्थात् अशुभाचरण नहीं होता, इस प्रकारसे यह एकादश वोधिदुर्लभत्वाऽनुप्रेक्षा वर्णित हुई ॥ ११ ॥ सम्यग्दर्शनद्वारः पञ्चमहाव्रतसाधनो द्वादशाङ्गोपदिष्टतत्त्वो गुप्त्यादिविशुद्धव्यवस्थानः संसारनिर्वाहको निःश्रेयसप्रापको भगवता परमर्षिणाईताहो व्याख्यातो धर्म इत्येवमनुचिन्त- येत् । एवं ह्यस्य धर्मखाख्याततत्त्वमनुचिन्तयतो मार्गाच्यवने तदनुष्ठाने च व्यवस्थान भवतीति धर्मस्वाख्याततत्त्वानुचिन्तनानुप्रेक्षा ॥ १२ ॥ सम्यग्दर्शनका द्वारभूत, अर्थात् सम्यग्दर्शनकी प्राप्तिका द्वार ( दरवाजा ), पञ्चमहात्रत- रूप साधनोंसे संयुक्त, द्वादश (बारह ) अङ्गोंसे युक्त, सब जीव आदि तत्त्वोंका उपदेश करनेवाला, गुप्ति आदिके अतिशुद्ध व्यवस्थान (व्यवस्था वा मर्यादा) सहित, संसारसे पार उतारनेवाला (अथवा संसारनाशक), तथा मोक्षका प्रापक, भगवान् परमर्पि अईतकरके कथित धर्म कैसा उत्तम है, अर्थात् सर्वश्रेष्ठ है, ऐसा चिन्तन सदा करना चाहिये । इस प्रकारसे धर्मसे कथित तत्त्वको अनुचिन्तन करते हुए इस जीवका मार्ग (धर्ममार्ग) से पतन न होने तथा धर्ममार्गके अनुकूल अनुष्ठान करनेमे व्यवस्थिति ) होती है । इस रीतिसे यह द्वादश धर्मखाख्याततत्त्वानुमेक्षा समाप्त हुई ॥ १२ ॥ ७ ॥ उक्ता अनुप्रेक्षाः । परीषहान्वक्ष्यामः। अनुप्रेक्षाओंको कहचुके, अब इसके पश्चात् परीषहोंको कहेगे। मार्गाच्यवननिर्जरार्थ परिषोढव्याः परीषहाः॥८॥ भाष्यम्-- सम्यग्दर्शनादेर्मोक्षमार्गादच्यवनार्थ कर्मनिर्जरार्थ च परिपोढव्याः परीपहा इति । तद्यथा।

रायचन्द्र जैनशास्त्रमालायाम् २०८ मृत्रार्थ-विशेपव्याख्या सन्मार्गसे न गिरने तथा कर्मोंकी निर्जरा(नाश)के लिये परीपहों (अनेक प्रकारके उपद्रवों वा पीड़ाओं )को सहन करना चाहिये । अर्थात् सम्यग्दर्शन आदि जो मोलमार्ग है उससे अच्यवन (न गिरने) के अर्थ तथा कर्मोंकी निर्जरा (एक- देशी नाश )के अर्थ वक्ष्यमाण द्वाविंशति (२२ वाईस) परीषहोंको सहन करना चाहिये ॥८॥ क्षुत्पिपासाशीतोष्णदंशमशकनारन्यारतिस्त्रीचर्यानिषद्याशय्याक्रो- शवघयाचनालाभरोगतृणस्पर्शमलसत्कारपुरस्कारप्रज्ञाज्ञानादर्शनानिए भाग्यम्-क्षुत्परीपहःपिपासा शीतम् उष्णं दंशमशकं नाग्न्यम् अरतिः स्त्रीपरीषहः चर्या- परीपहः निषद्या शय्या आक्रोशः वधः याचनम् अलाभः रोगः तृणस्पर्शः मलं सत्कारपुरस्कारः प्रनानानेऽदर्शनपरीपह इत्येते द्वाविंशतिधर्मविन्नहेतवो यथोक्तं प्रयोजनमभिसंधाय रागद्वेषौ निहत्य परीपहा. परियोढव्या भवन्ति । सूत्रार्थ-विशेपव्याख्या-क्षुत्परीपह, पिपासापरीषह, शीतपरीपह, उप्णपरीपह, दंगमयकपरीपह, नाग्न्यपरीपह, अरतिपरीपह, स्त्रीपरीषह, चऱ्यापरीषह, निषधापरीषह, शय्या- परीपह, आक्रोशपरीपह, वधपरीपह, याचनपरीपह, अलाभपरीषह, रोगपरीपह, तृणस्पर्श- परीषह, मलपरीपह, सत्कारपुरस्कारपरीषह, प्रज्ञापरीपह, अज्ञानपरीपह, तथा अदर्शनपरीषह; ये बाईस परीपह धर्ममे विघ्नके कारण है; इन परीपहोंको, शास्त्रमें कहे हुए प्रयोजनोंको मनमे अनुसंधान (लक्ष्य) करके और राग-द्वेषको दूर कर सहन करना चाहिये ।। पञ्चानामेव कर्मप्रकृतीनामुदयादेते परीपहाः प्रादुर्भवन्ति । तद्यथा। ज्ञानावरणवेदनी- यदर्शनचारित्रमोहनीयान्तरायाणामिति । पांचो कर्मप्रकृतियोंके उदयसे ये परीपह ( उपद्रव वा पीडा अथवा कष्ट ) उत्पन्न होते हैं । पाचो कमप्रकृतिया क्रमसे ए है ज्ञानावरणीय, वेदनीय, दर्शनमोहनीय, चारित्रमो- दनीय. तथा अन्तराय ॥ ९ ॥ मृत्मसंपरायच्छद्मस्थवीतरागयोश्चतुर्दश ॥ १० ॥ मृत्मसंपरायसंयत छद्मस्थवीतरागसंयते च चतुर्दश परीपहा भवन्ति क्षुत्पिपासाशीतो- दंगनशकचर्यापनाज्ञानालाभगव्यावधरोगतृणस्पर्शमलानि । मृत्रार्थ-विशेपव्याख्या-सूक्ष्मसंपरायसंयत, तथा छमस्थवीतरागसंयत गुणस्था- नतीन चौदह परीपह होते है जैसे.-श्रुत्परीपह, पिपासापरीपह, शीतपरीपह, उष्णपरी- माकप पह, चपरीपह. प्रज्ञापरीपह, अज्ञानपरीपह, अलामपरीपह, शय्यापरीपह, सपट. गेगपरीपद तृणन्पर्शपरीपह, तथा मलपरीपह, ये चतुर्दश (चौदह १४) परीपह उस दोनों गुणस्यानोन होते हैं ॥ १० ॥ एकादश जिने ॥११॥ मान----का परीपहा. नंभवन्ति जिन वेदनीयाश्रयाः । तद्यथा । क्षुत्पिपासाशीतो- ~~न चलायायथरोगतृणम्पर्गमलपरीपहाः ।

सभाष्यतत्त्वार्थाधिगमसूत्रम् । २०९ सूत्रार्थ-विशेषव्याख्या -वेदनीय कर्मप्रकृतिके आश्रयीभूत एकादश (ग्यारह ११:) परीषह जिन (भगवान्) में हो सकते हैं उनके नाम ये हैं । क्षुधा, पिपासा, शीत, उष्ण, दंशमशक, चर्या, वध, रोग, तृणस्पर्श, तथा मलपरीषह, इन ग्यारह परीषहोंका संभव जिन भगवानमें भी है ॥ ११ ॥ यादरसंपराये सर्वे॥१२ ।। भाज्यम्-वादरसंपरायसंयते सर्वे द्वाविंशतिरपि परीषहाः संभवन्ति । सूत्रार्थ-विशेषव्याख्या-बादर-संपराय-संयत गुणस्थानवी जीवमें सब अर्थात् क्षुत्पिपासा आदि २२ बाईसो परीषह होसकते हैं ॥ १२ ॥ ज्ञानावरणे प्रज्ञाज्ञाने ॥१३॥ भाष्यम्--ज्ञानावरणोदये प्रज्ञाज्ञानपरीषहौ भवतः । सूत्रार्थ-विशेषव्याख्या-ज्ञानावरणीय कर्मप्रकृतिके उदयमें प्रज्ञापरीषह तथा अज्ञानपरीषह होते हैं ॥ १३ ॥ दर्शनमोहान्तराययोरदर्शनालाभौ ॥ १४ ॥ भाष्यम्-दर्शनमोहान्तराययोरदर्शनालाभौ यथासङ्घयं दर्शनमोहोदयेऽदर्शनपरीषहः लाभान्तरायोदयेऽलाभपरीषहः । सूत्रार्थ-विशेषव्याख्या-दर्शनमोह तथा अन्तराय नाम कर्मप्रकृतियोंके उदयमें यथासंख्य (क्रम) से दर्शनपरीषह तथा अलाभपरीषह होते है। अर्थात् दर्शनमोह प्रकृतिके उदयमें तो अदर्शनपरीषह (दर्शनाभाव) होता है और लाभाऽन्तरायके उदयमें अलाभपरीषह होता है ॥ १४ ॥ चारित्रमोहे नारन्यारतिस्लीनिषद्याक्रोशयाचनासत्कारपुरस्काराः१५ भाष्यम्-चारित्रमोहोये एते नाग्न्यादयः सप्त परीषहा भवन्ति । सूत्रार्थ-विशेषव्याख्या-चारित्रमोहनीय कर्मप्रकृतिके उदयमे नाग्य आदि सप्त (सात) परीषह होते है । अर्थात् चारित्रमोहनीय प्रकृति जब उदयको प्राप्त होती है तव नाम्न्यपरीषह, अरतिपरीषह, स्त्रीपरीषह, निषद्यापरीषह, आक्रोशपरीषह, याचनापरीपह, तथा सत्कारपुरस्कारपरीषह होते है ॥१५॥ वेदनीये शेषाः ॥१६॥ भाष्यम्-वेदनीयोदये शेषा एकादश परीषहा भवन्ति ये जिने संभवन्तीत्युक्तम् । कुतः शेषाः । एभ्यः प्रज्ञाज्ञानादर्शनालाभनाग्न्यारतिषीनिषद्याक्रोशयाचनासत्कारपुरस्का- रेभ्य इति । सूत्रार्थ-विशेषव्याख्या-वेदनीय कर्मप्रकृतिके उदयमें शेष (बाकी) परीपह जो कि जिन भगवान्में होते है वे होते हैं इनमें शेषत्व कहांसे है इसका अभिप्राय यह है कि ज्ञानावरण २७ , , । रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् प्रकृतिके उदयने प्रज्ञा तथा अज्ञान, दर्शनमोहनीय तथा अन्तरायके उदयमें अदर्शन तथा अलाम चार ये, और चारित्रमोहनीयके उदयमें नाम्य आदि सात-+७=११ । अर्थात् और सत्कार- : प्रज्ञा, अज्ञान, अदर्शन, अलाभ, नान्य, अरति, स्त्री, निषद्या, आक्रोश, याचन, पुरस्कार इन ग्यारहसे जो शेष ग्यारह रह गये वे वेदनीय कर्मप्रकृतिके उदयमें जो कि जिनमे कहे गये है, होते हैं ॥ १६ ॥ एकादयो भाज्या युगपदेकोनविंशतेः ॥ १७ ॥ भाप्यम्-एपां द्वाविंशतेः परीपहाणामेकादयो भजनीया युगपदेकस्सिन् जीवे आ एकोन- विगतेः । अत्र शीतोष्णपरीपहौ युगपन्न भवतः । अत्यन्तविरोधित्वात् । तथा चर्याशय्यानि- पद्यापरीपहाणामेकस्य संभवे द्वयोरभावः । सूत्रार्थ-विशेपव्याख्या-इन वाईस २२ परीपहोंके मध्यमें एकही कालमें एक पुरुषमें एक आदिका विभाग करना उचित है। अर्थात् एकहीसमय एक पुरुषमें एकसे लेकर उन्नीस १९ तक होसकते है । तात्पर्य यह कि किसी एक परीषह होता है किसीमें दो,किसीमें तीन, इस क्रमले उन्नीसपर्यन्त होसकते हैं। परन्तु यहांपर यह भी जानना योग्य है कि एक कालने एकही पुरुषमें शीतपरीपह तथा उप्ण परीपह ये दोनों नहीं होते, क्योंकि शीत तथा उप्णका परस्पर अत्यन्त विरोध है। ऐसे ही चा, शय्या, तथा निषद्या, इन नीन परीपहोमसे जब एककी सत्ताका सम्भव होता है तव शेष दोनोंका अभावही रहता है क्योंकि व- (गति), शय्या (शयन ) और निपटा (स्थिति), इनमें भी विरोध होनेसे जब गमन होगा, तब शयन तथा स्थिति वा निषचा (खड़ा होना) नहीं होस- कता । इसीप्रकार जब शय्या होगी तब निषद्या तथा चा न होगी, तथा जब चा होगी तत्र निपटा तथा शय्या न होगी ॥ १७ ॥ सामायिकच्छेदोपस्थाप्यपरिहारविशुद्धिसूक्ष्मसंपराययथाख्यातानि चारित्रम् ।। १८॥ सामायिकसंयम. छेदोपस्याप्यसंयमः परिहारविशुद्धिसंयमः सूक्ष्मसंपरायसंयमः यथा- न्यानसंयन इति पञ्चविवं चारित्रम् तत्पुलाकादिपु विस्तरेण वक्ष्यामः । मृत्रार्थ-मामायिकसंयम, छेदोपस्थाप्यसंयम, परिहारविशुद्धिसंयम, सूक्ष्मसंप- रायपन, और ययाख्यातसंयम, यह पांच प्रकारका चारित्र है । पुलाकादिप्रकरणमे रन चान्त्रिीले चिन्तारपूर्वक कहगे ॥ १८ ॥ अनशनावमौदर्यवृत्तिपरिसंख्यानरसपरित्यागविविक्तशय्यासनका पशा या तपः ॥ १९ ॥ हवार्य-अनानादि के प्रकारका वाह्य तप है। मारमनमनम अवादयवृत्तिपरिमट्यानं रसपरिलागः विविक्तशच्यासनता काय- सभाष्यतत्त्वार्थाधिगमसूत्रम् । २११ केश इत्येतत्षड्विधं बाह्यं तपः सम्यग्योगनिग्रहो गुप्तिरित्यतः प्रभृति सम्यगित्यनुवर्तते । संयम- रक्षणार्थ कर्मनिर्जरार्थ च चतुर्थषष्ठाष्टमादि सम्यगनशनं तपः ।। विशेषव्याख्या-अनशन (भोजनाभाव अथवा उपवास), अवमौदर्य (न्यूनाहारता), वृत्तिपरिसंख्यान (जीविकाका नियम), रसपरित्याग (उत्तम स्वादिष्ट पदार्थोंका त्याग), विविक्तशय्यासनता (एकान्तमें शयन तथा आसन) और कायक्लेश ( शरीरको क्लेश देना) यह छः प्रकारका बाह्य तप है । 'सम्यग्योगनिग्रहो गुप्तिः' (अध्या० ९ सू० ४) इस सूत्रसे यहांपर “सम्यक" इस पदकी अनुवृत्ति होती है; अर्थात् सम्यक् पद इस सूत्रमें आता है। इससे यह अर्थ है कि जो संयमकी रक्षाके लिये तथा कर्मोंकी निर्जरा (हानि वा- नाश के लिये चतुर्थ, षष्ठ (छठे) वा अष्टम आदि समयोंमें उपवास करना है वह सम्यक् अनशन ( उत्तम उपवास ) रूप बाह्य तप है। अवमौदर्यम् अवममित्यूननाम । अवममुदरमस्य अवमोदरः अवमोदरस्य भावः अवमौ- दर्यम् । उत्कृष्टावकृष्टौ वर्जयित्वा मध्यमेन कवलेन त्रिविधमवमौदर्य भवति । तद्यथा । अल्पाहारावमौदर्यमुपार्धावमौदर्य प्रमाणप्राप्ताकिचिदूनावमौदर्यमिति कवलपरिसङ्ख्यानं च प्राग्द्वात्रिंशद्भ्यः कवलेभ्यः॥ अवमौदर्य्य "अवम" यह न्यून (क्रम ) वाची नाम है, अर्थात् अवम इसका अर्थ न्यून है, इस लिये अवम (न्यून ) अर्थात् खाली है उदर पेट जिसका वह अवमोदर है और अवमोदरका जो भाव है वह अवमौदर्य है । अर्थात् उदरका भारीपन न होना । उत्कृष्ट तथा अवकृष्टको अर्थात् सर्वोत्कृष्टता तथा सर्व न्यूनताको त्यागकर मध्य कवल (मध्यम कवलाहार) से तीन प्रकारका अवमौदर्य होता है। जैसे—अल्पाहार अवमौदर्य ( अल्प भोजनसे पेटका हलकापना), उपार्धावमौदर्य ( अर्द्धभोजनसे अवमौदर्य), तथा प्रमाणसे जो प्राप्त है उससे अवमौदर्य (पेटकी न्यूनता) और इसमें कवलों (ग्रासों) की परिसंख्या (गणना) करनी होती है, जैसे बत्तीस कवलोंसे न्यून आहार करना । घृत्तिपरिसङ्ख्थानमनेकविधम् । तद्यथा । उतिक्षप्तान्तप्रान्तचर्यादीनां सक्तकुल्माषौदनादीनां चान्यतममभिगृह्यावशेषस्य प्रत्याख्यानम् ॥ तृतीय वृत्तिपरिसङ्घयानरूप बाह्य तप अनेक प्रकारका है । जैसे उत्क्षिप्त, तथा प्रान्त, चर्या आदिमेंसे, और सक्तु ( सत्तू), कुल्माष, अर्द्धपरिपक्क गेहूँ चने आदि मिश्रित । (मिलित अन्न) तथा ओदन (भात) इनमेसे किसी एकको ग्रहण करके दूसरोंका त्याग । रसपरित्यागोऽनेकविधः । तद्यथा । मद्यमांसमधुनवनीतादीनां रसविकृतीनां प्रत्याख्यान- विरसरूक्षाद्यभिग्रहश्च.॥ ऐसेही रसपरित्याग चतुर्थ बाह्य तप भी अनेक प्रकारका है। जैसे-मद्य, मांस, मधु, तथा स्त्री आदि रसविकारोंका त्याग, और कुरस रूक्ष आदि पदार्थोंका ग्रहण करना । तथा पञ्चम बाह्य तप विविक्त शय्यासनता है, जिसका तात्पर्य यह है कि एकान्त सव- , २१२ रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् प्रकारको वाधाओरहित, संसर्गशून्य तथा स्त्री, पशु और नपुंसक जीवोंसे वर्जित, जो शून्य गृह, देवालय, सभा तथा पर्वतकी गुहा ( गुफा) है, इनमेंसे किसीएकका समाधिके लिये आश्रय लेना, अर्थात् इन स्थानोंमेंसे किसी एकमें निवास करके समाधिमें निमग्न रहना ॥ विविक्तशय्यासनता नाम एकान्ते ऽनावाधेऽसंसक्ते स्त्रीपशुपण्डकविवजिते शून्यागार- देवकुलसभापर्वतगुहादीनामन्यतमे समाध्यर्थ संलीनता ।। कायक्लेशोऽनेकविधः । तद्यथा । स्थानवीरासनोत्कडुकासनैकपार्श्वदण्डायतशयनातापनाप्रा- वृतादीनि सम्यक्प्रयुक्तानि वाह्यं तपः । अस्मात्पड्डिधादपि वाह्यात्तपसः सङ्गत्यागशरीरलाघवे- न्द्रियविजयसंयमरक्षणकर्मनिर्जरा भवन्ति ।। पष्ठ वाह्य तप कायक्लेश भी अनेक प्रकारका है । जैसे, स्थान (कायक्लेशदायक किसी प्रकारकी स्थिति ), वीरासन (आसनविशेष), उत्कड्ड (टु) क आसन, पार्थ तथा दण्डायत शयन, धर्म (घाम वा धूप ) स्थानमें स्थिति, तथा आवरण (छप्पर ) आदि वृष्टि आदिके निरोध करनेके पदार्थोसे वर्जित स्थानमें निवास आदि, ये सब उत्तम रूपसे किये हुए वाह्य तप हैं । इस छः प्रकारके भी बाह्य तपसे संगका त्याग, शरीरकी लघुता, इन्द्रियोंका जीतना, संयमोंकी रक्षा और कर्मनिर्जरारूप फल होते हैं ॥ १९ ॥ प्रायश्चित्तविनयवैयावृत्त्यस्वाध्यायव्युत्सर्गध्यानान्युत्तरम् ॥ २० ॥ भाप्यम्-सूत्रक्रमप्रामाण्यादुत्तरमित्यभ्यन्तरमाह । प्रायश्चित्तं विनयो वैयावृत्त्यं स्वाध्या- यो व्युत्सर्गो ध्यानमित्येतत्पड्विधमाश्यन्तरं तपः ॥ सूत्रार्थ-विशेपव्याख्या-सूत्रके क्रमके प्रमाणसे उत्तरके जो तप हैं वे आभ्यन्तर है ऐसा कहते है । तात्पर्य यह है कि अनशन आदि जो छः तप बाह्य कहे हैं उनके उत्तर (आगे) के प्रायश्चित्त आदि छः तप आभ्यन्तर (भीतर )आत्मासे सम्बन्ध रखने- वाले, अथवा अनशन आदि पट वाह्य (बहिरङ्ग) तप है, और उनके उत्तरके प्रायश्चित्त आदि छः आन्यन्तर (अन्तरङ्ग) हैं । वे क्रमसे प्रायश्चित्त, विनय, वैयावृत्त्य, स्वाध्याय, व्युत्मग, तथा ध्यान ये ६ आभ्यन्तर तप है ॥ २० ॥ नवचतुर्दशपंचदिभेदं यथाक्रम प्रारध्यानात् ॥ २१ ॥ भाष्यम्-तदाभ्यन्तरं तपः नवचतुर्दशपञ्चद्विभेदं भवति यथाक्रमं प्रारध्यानात् । इत । उरं यहल्ल्यामः। तद्यथा । सवार्थ-विशेपव्याख्या-वह आभ्यन्तर तप ध्यानके पूर्व नव (नौ), चार, दश; पांच तथा हि (दो) भेद सहित यथाक्रमसे जानना चाहिये, अर्थात् प्रायश्चित्त ९ भेद न दिनय मंद, चैयावृत्त्य १० भेद, स्वाध्याय ५ भेद, तथा व्युत्सर्ग २ भेद- १ व इमक अनन्तर उन भेदोंको कहेंगे। जैसे:- " - सभाष्यतत्त्वार्थाधिगमसूत्रम् । २१३ आलोचनप्रतिक्रमणतदुभयविवेकव्युत्सर्गतपश्छेदपरिहारोपस्थाप- नानि ॥ २२॥ भाग्यम्-प्रायश्चित्तं नवभेदम् । तद्यथा । आलोचनं प्रतिक्रमणं आलोचनप्रतिक्रमणे विवेकः व्युत्सर्गः तपः छेदः परिहारः उपस्थापनमिति ।। सूत्रार्थ-विशेषव्याख्या–प्रायश्चित्त नामक आभ्यन्तर तप नौ ९ भेद सहित है। जैसे-आलोचन १ प्रतिक्रमण २ आलोचनप्रतिक्रमण ३ विवेक ४ व्युत्सर्ग ५ तप ६ छेद ७ परिहार ८ और उपस्थापन ९ ॥ आलोचनं प्रकटनं प्रकाशनमाख्यानं प्रादुष्करणमित्यनर्थान्तरम् । प्रतिक्रमणं मिथ्याटु- कृतसंप्रयुक्तः प्रत्यवमर्शः प्रत्याख्यानं कायोत्सर्गकरणं च । एतदुभयमालोचनप्रतिक्रमणे । विवेको विवेचनं विशोधनं प्रत्युपेक्षणमित्यनन्तरम् । स एष संसक्तानपानोपकरणादिषु भवति । व्युत्सर्गः प्रतिष्ठापनमित्यनान्तरम् । एषोऽप्यनेषणीयान्नपानोपकरणादिष्वशङ्क- नीयविवेकेषु च भवति । तपो वाह्यमनशनादि प्रकीर्ण चानेकविधं चन्द्रप्रतिमादि । छेदोऽ- पवर्तनमपहार इत्यनान्तरम् । स प्रव्रज्यादिवसपक्षमाससंवत्सराणामन्यतमानाम् भवति । परिहारो मासिकादिः । उपस्थापनं पुनर्दीक्षणं पुनश्चरणं पुनर्बतारोपणमित्यनर्थान्तरम् । तदेतन्नवविधं प्रायश्चित्तं देशं कालं शक्ति संहननं संयमविराधनां च कायेन्द्रियजातिगुणो- कर्यकृतां च प्राप्य विशुद्धयर्थ यथाहै दीयते चाचर्यते च । चिती संज्ञान विशुद्धयोर्धातुः तस्य चित्तमिति भवति निष्ठान्तमौणादिकं च ॥ एवमेभिरालोचनादिभिः कृच्छस्तपोविशेषैर्जनिताप्रमादः तंव्यतिक्रमं प्रायश्चेतयति चेतयंश्च न पुनराचरतीति । ततः प्रायश्चित्तम् । अपराधो वा प्रायस्तेन विशुध्यत इति । अतश्च प्राय- श्चित्तमिति ।। आलोचन, प्रकटन (लोगोंको अपना कृत्य प्रकट करदेना), प्रकाशन, आख्यान, तथा प्रादुष्करण, ये सब एकार्थवाचक अर्थात् पर्यायशब्द हैं १ । प्रतिक्रमण-मिथ्या पापके कारणसे आलोचना, अर्थात् मिथ्या दुष्कृतके कारणसे जो अवमर्श वा परामर्श वा आलो- चना और उसका प्रत्याख्यान (त्याग) तथा शरीरत्याग है उसको प्रतिक्रमण कहते हैं २ और इन पूर्वोक्त दोनोंको मिलाके आलोचन प्रतिक्रमण कहते हैं ३ । और, विवेक विवे- चन, विशोधन, तथा प्रत्युपेक्षण ये सब एकार्थवाचक शब्द हैं । अर्थात् किसी विषयके विवेचन अथवा विशेष शोधनको विवेक कहते हैं ४ । और यह विवेक वा विवेचन संसक्त अर्थात् मिलित वा किसीसे सम्बद्ध अन्न, पान तथा वस्त्र आदि सामग्रियोंके विषयमें होता है । तथा व्युत्सर्ग और प्रतिष्ठापन ये दोनों शब्द भी एक अर्थके वाचक हैं, अर्थात् प्रतिष्ठापनको व्युत्सर्ग कहते है ५ । यह भी अभिलाषा न करनेके योग्य अन्न (भोजन), पान तथा अन्य प्रकारकी सामग्रियोंके विपयमे तथा अशङ्कनीय (शङ्का न करने योग्य ) वा अशक्य विवेकोंके विषयमें होता है । तथा अनशन आदि बाह्य और ।

रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् २१४ प्रकीर्णक चन्द्र प्रतिमा आदि तप ६ रूप प्रायश्चित्त अनेक प्रकारका है। और छेद, अप- वर्तन तथा अपहार इन शब्दोंके भी एकही अर्थ है । और यह छेद वा अपवर्तनरूप प्रायश्चित्त भी प्रवज्या (गमन), दिन, पक्ष, मास ( महीना) तथा वर्ष इनमेंसे किसीमें होता है ७ | मासिकादि परिहार तथा त्याग है ८ । उपस्थापन, पुनर्दीक्षण (फिरसे दीक्षा ग्रहण करनी), पुनश्चरण (पुनः करना) तथा पुनव्रतारोपण ये सब भी एकार्थवोधक शब्द है ९ यह सब नौ ९ प्रकारके प्रायश्चित्त देश, काल, शक्ति, संहनन (शरीरके रचना विशेषसे सामर्थ्य), व संयमकी विराधनाको तथा शरीर, इन्द्रिय, जाति, और गुणसे उत्पन्न उत्कर्पता (अधिकता वा उत्तमता) को पाकर शुद्धताके लिये यथायोग्य दिये जाते है और किये भी जाते हैं । "चिती" संज्ञाने यह सम्यग् ज्ञान व विशुद्धि अर्थमें धातु है, उस (चिती धातु )से निष्ठाक्त (त) प्रत्यय करनेसे अथवा उणादि 'त' प्रत्यय कर- नेसे "चित्त" यह शब्द सिद्ध होता है। तो इससे यह अभिप्राय सिद्ध होता है कि इन पूर्वोक्त आलोचन आदि ९ प्रकारके क्लेशरूप प्रायश्चित्त नामक विशेष तपोंसे जिसको अप्रमाद अर्थात् सावधानता प्राप्त हुई ऐसा पुरुष व्यतिक्रम (निषिद्धाचरण) को प्रायः जान जाय, और जानकर पुनः उनको जिसके द्वारा नहीं करता उसको प्रायश्चित्त कहते हैं । अथवा प्रायश्चित्त शब्दसे अपराधका ग्रहण है तो जिसके द्वारा अपराधोंसे शुद्ध हों इस कारणसे वह प्रायश्चित्त कहा जाता है ।। २२ ।। ज्ञानदर्शनचारित्रोपचाराः॥ २३ ॥ विनयश्चतुर्भेदः। तद्यथा । ज्ञानविनयः दर्शनविनयः चारित्रविनयः उपचारविनयः । तत्र जानविनयः पञ्चविधः मतिज्ञानादिः। दर्शनविनयः एकविध एव सम्यग्दर्शनविनयः । चारि- विनयः पञ्चविधः सामायिकविनयादिः । औपचारिकविनोऽनेकविधः सम्यग्दर्शनज्ञानचा- रित्राधिगुणाधिकेष्वभ्युत्थानासनप्रदानवन्दनानुगमादिः विनीयते तेन तस्मिन्वा विनयः ।। मृत्रार्थ-विशेपव्याख्या-विनयरूप आभ्यन्तर तप चार प्रकारका है । जैसे-ज्ञान- विनय, दर्शनविनय, चारित्रविनय और उपचारविनय । इनमेंसे ज्ञानविनय पांच प्रकारका है । जैसे-मलिज्ञान विनय, श्रुतज्ञान विनय, अवधिज्ञान विनय, मनःपर्ययज्ञान विनय, तथा केव- लज्ञान विनय । और दर्शनविनय एकही प्रकारका है; जैसे-सम्यग्दर्शन विनय । चारित्रविनय पांच प्रकारका है जैसे-सामायिक, संयमचारित्र विनय, छेदोपस्थाप्य संयमचारित्र विनय, परिहारविशुद्धि संयमचारित्र विनय, सूक्ष्मसंयम चारित्र विनय, तथा यथाख्यात संयम चारित्र विनय । और औपचारिक विनय अनेक प्रकारका है । जैसे-सम्यग्दर्शन, ज्ञान, नया चारित्र आदि गुणोंमे जो अधिक महात्मा जन है उनके विषयमे अभ्युत्थान विनय (उनको देखके खड़े होजाना), आसनप्रदान विनय (उनको आसन देना), वन्दना भेन्यति येन तन्प्रायश्चित्तम् । - ।

सभाष्यतत्त्वार्थाधिगमसूत्रम् । २१५ विनय और अनुगमनादि विनय (उनके चलते समय कुछ दूरतक पीछे चलना इत्यादि) ॥ २३ ॥ आचार्योपाध्यायतपस्विशैक्षकग्लानगणकुलसङ्घसाधुसमनोज्ञाना- म् ॥ २४॥ भाष्यम्-वैयावृत्त्यं दशविधं । तद्यथा । आचार्यवैयावृत्त्यं उपाध्यायवैयावृत्त्यं तपखिवै- यावृत्त्यं शैक्षकवैयावृत्त्यं ग्लानवैयावृत्त्यं कुलवैयावृत्त्यं गणवैयावृत्त्यं सङ्घवयावृत्त्यं साधुवै- यावृत्त्यं समनोज्ञवैयावृत्त्यमिति । व्यावृत्तभावो वैयावृत्त्यं व्यावृत्तकर्म च । तत्राचार्यः पूर्वोक्तः पञ्चविधः । आचारगोचरविनयं स्वाध्यायं वाचार्यादनु तस्मादुपाधीयत इत्युपा- ध्यायः । सङ्ग्रहोपग्रहानुग्रहार्थ चोपाधीयते सबहादीन् । वास्योपाधीतइत्युपाध्यायः । द्विसङ्ग्रहो निर्मन्थ आचार्योपाध्यायसङ्ग्रहः । त्रिसङ्ग्रहा निर्ग्रन्थी आचार्योपाध्यायप्रवर्तिनीसङ्ग्रहा । प्रव- तिनी दिगाचार्येण व्याख्याता । हिताय प्रवर्तते प्रवर्तयति चेति प्रवर्तिनी। विकृष्टो- प्रतपोयुक्तस्तपस्वी । अचिरप्रजितः शिक्षयितव्यः शिक्षः शिक्षामहंतीति शैक्षो वा । ग्लानः प्रतीतः । गणः स्थविरसन्ततिसंस्थितिः । कुलमाचार्यसंततिसंस्थितिः। सङ्घश्चतुर्विधः श्रम- णादिः । साधवः संयताः । संभोगयुक्ताः समनोज्ञाः । एषामन्नपानवलपात्रप्रतिश्रयपीठफल- कसंस्तारादिभिर्धर्मसाधनैरुपग्रहः शुश्रूषा भेषजक्रिया कान्तारविषमदुर्गोपसर्गेष्वभ्युपपत्तिरि- त्येतदादि वैयावृत्त्यम् ॥ सूत्रार्थ-वि०च्या०-वैयावृत्त्य नामआभ्यन्तर तप दश प्रकारका है। जैसे आचार्य्यवैयावृत्त्य १ उपाध्यायवैयावृत्त्य २ तपखिवैयावृत्त्य ३ शैक्षक वा शिक्षकवैयावृत्त्य ४ ग्लानवैयावृत्त्य ५ गणवैयावृत्त्य ६ कुलवैयावृत्त्य ७ सवैयावृत्त्य ८ साधुवैयावृत्त्य ९ और समनोज्ञवैया- वृत्त्य १० । व्यावृत्त अर्थात् सेवा शुश्रूषामें तत्पर उसका जो भाव अथवा कर्म है उसको वैयावृत्त्य कहते हैं। उनमें आचार्य पांच प्रकारके होते है, यह प्रथम कहचुके हैं। इससे आचार्य आदिकी सेवा चाकरी यह आचार्य्यवैयावृत्त्यका तात्पर्य है। अतएव आचार्य- विषयक जो विनय है अथवा आचार्यसे विनयपूर्वक स्वाध्याय यह आचार्य-वैयावृत्त्य है। और जिसके समीप आके प. वह उपाध्याय है। अथवा संग्रह आदि जिसके निकट आके प. वह उपाध्याय है। संग्रह आदि ये है, जैसे द्विसंग्रह, निर्ग्रन्थ, आचार्योपाध्यायसंग्रह, तथा त्रिसंग्रह, निम्रन्थी, आचार्योपाध्यायप्रवर्तिनी संग्रहा। यह प्रवर्तिनी आदिक आचार्यसे ही व्याख्यात है । हितके लिये जो स्वयं प्रवृत्त हो अथवा दूसरेको प्रवृत्त करै वह प्रव- तिनी अर्थात् प्रवृत्त करानेवाली है। और अतिकठोर अथवा उत्तम तथा उग्र (तीव्र ) तप- करके जो युक्त हो वह तपस्वी है, उस तपस्वीके लिये जो वैयावृत्त्य है, अर्थात् तपस्वियोंके अर्थ जो विनय सेवादि है वह तपस्विवैयावृत्त्य है। थोड़े कालसे जिसने संन्यास लिया है तथा जो शिक्षाके योग्य है वह शिक्ष है, अथवा जो शिक्षाके योग्य है वह शैक्ष है उसके .

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रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम्
विषयमें जो वैवावृत्त्य है वह शैक्षवैयावृत्त्य है। ग्लानका अर्थ ज्ञातही है, अर्थात् जो ग्लानि
करनेयोग्य है उसके अर्थ वैयावृत्त्य । गणपदसे यहांपर स्थविरों (वृद्धों) की सन्ततिकी सं-
स्थितिका ग्रहण है उसका वैयावृत्त्य ।और कुलसे आचार्योंकी सन्ततिकी संस्थितिका ग्रहण है।
उसका वयावृत्त्य । सङ्घ श्रमण आदि चार प्रकारका है। उसका वैयावृत्त्य । साधु शब्द करके
जो संयमसहित हैं उनका ग्रहण है, उन साधुओंका जो वैयावृत्त्य है वह साधुवैयावृत्त्य है। और
संभोग करके जो युक्त हैं, वेसमनोज्ञ है, उनका जो वैयावृत्त्य है वह समनोज्ञवैयावृत्त्य है।
इन आचार्य उपाध्याय आदिकी अन्न (भोजन), पान (जलसम्प्रदान आदि), वस्त्र, पात्र
(कमण्डलु तथा अन्य पात्र आदि), स्थान, आसन तथा विस्तर (बिछोना आदि), धर्म-
साधनोंके सम्प्रदान आदिसे सेवा शुश्रूषा, ओषध आदि दान, वन वा अन्य दुर्गम स्थानोंमें
तथा अन्य प्रकारके दुःखोंमें सेवा करनी; इत्यादि सब वैयावृत्त्य है ॥ २४ ॥
वाचनाप्रच्छनानुप्रेक्षान्नायधर्मोपदेशाः॥२५॥
भाष्यम्-स्वाध्यायः पञ्चविधः । तद्यथा । वाचना प्रच्छनं अनुप्रेक्षा आम्नायः धर्मोपदेश
इति । तत्र वाचनं शिष्याध्यापनम् । प्रच्छनं ग्रन्थार्थयोः । अनुप्रेक्षा ग्रन्थार्थयोरेव मनसा-
भ्यासः । आम्नायो घोपविशुद्धं परिवर्तनं गुणनं रूपदानमित्यर्थः । अर्थोपदेशो व्याख्यानमनु-
योगवर्णनं धर्मोपदेश इत्यनर्थान्तरम् ।
सूत्रार्थ-विशेषन्याख्या--स्वाध्याय नामक चतुर्थ आभ्यन्तर तप पांच प्रकारका
है । जैसे-वाचना, प्रच्छना, अनुप्रेक्षा, आम्नाय, तथा धर्मोपदेश । इनमें वाचनासे शिष्यों-
को शान्त्रीका अध्यापन अर्थात् शास्त्रोंका पढ़ाना विवक्षित है । प्रच्छन अर्थात् ग्रन्थके अर्थ
तथा पाठको प्रश्नपूर्वक जान लेना। अनुप्रेक्षासे ग्रन्थ और अर्थका अपने मनसे अभ्यास
करना अर्थात् ग्रन्यको अर्थपाठसहित मनन करना यह तात्पर्य है । आम्नायसे घोषविशुद्ध
परिवर्तन (शुद्ध पाठका परिवर्तन) गुणनरूप दानसे यहांपर तात्पर्य है । तथा अर्थोपदेश,
व्याख्यान, अनुयोगवर्णन और धर्मोपदेश, ये सब एकार्थवाची अर्थात् पर्यायवाचक शब्द
है। तात्पर्य यह है कि धम्मोपदेशसे यहांपर धर्मका व्याख्यान सवको श्रवण करना
अमीर है ॥२५॥
वाह्याभ्यन्तरोपध्योः ॥ २६ ॥
भाग्यम्प्युत्मगों द्विविध: वाह्य आभ्यन्वरश्च । तत्र वाह्यो द्वादशरूपकस्योपधेः ।
माभ्यन्नरः शरीरस्य कपायाणां चेति ।।
सवार्य-विशेपव्याख्या -पञ्चम व्युत्सर्ग नामक आभ्यन्तर तप दो प्रकारका है
नया आन्यन्नर । इनमें बाघ तो द्वादशरूपक उपाधिसम्बन्धी है । और
गेर तथा यायो (ोधमानादि) से सम्बन्ध रखता है ॥ २६ ॥

सभाण्यतत्त्वार्थाधिगमसूत्रम् । २१७ उत्तमसंहननस्यैकाग्रचिन्तानिरोधो ध्यानम् ॥ २७ ॥ भाष्यम्-उत्तमसंहननं ववर्षभमर्धवजनाराचं च । 'तयुक्तस्यैकाग्रचिन्तानिरोधश्च ध्यानम् ॥ सूत्रार्थ-विशेषव्याख्या-वज्र, ऋषभ, अर्द्धवज्र तथा नाराच यह उत्तम संहनन है । उस उत्तम संहनन (शरीर-अवयव-संस्थानविशेष) करके युक्त जो प्राणी है उसका एकाग्र रूपसे जो चिन्ताका निरोध अर्थात् सांसारिक चिन्ताओंका त्याग है उसको ध्यानरूप षष्ठ अभ्यन्तर तप समझना चाहिये ॥ २७ ॥ आमुहूर्तात् ॥२८॥ भाष्यम्-तद्ध्यानमामुहूर्ताद्भवति परतो न भवति दुनित्वात् ॥ सूत्रार्थ-विशेषव्याख्या-वह ध्यान मुहूर्तकालके अभ्यन्तरमें ही होता है न कि परे, क्योंकि मुहूर्तसे परे दुर्ध्यान (दुष्टध्यान) होजाता है ॥ २८ ॥ आर्तरौद्रधर्मशुक्लानि ॥ २९ ॥ भाष्यम्-तच्चतुर्विधं भवति । तद्यथा । आर्त रौद्रं धर्म शुक्लमिति तेषाम् ।। सूत्रार्थ-विशेषव्याख्या-वह ध्यान चार ४ प्रकारका होता है । जैसे-आर्तध्यान रौद्रध्यान, धर्मध्यान, तथा शुक्लध्यान, इन भेदोंसे चार प्रकारका है ॥ २९ ॥ सो अब इनमेंसे यह व्यवस्था है- परे मोक्षहेतू ॥ ३०॥ भाष्यम्-तेषां चतुर्णा ध्यानानां परे धर्मशुक्ले मोक्षहेतू भवतः । पूर्वे त्वातरौद्रे संसारहेतू इति ॥ सूत्रार्थ-विशेषव्याख्या-इन पूर्वोक्त चार प्रकारके ध्यानोंमेंसे परके जो दो ध्यान हैं अर्थात् धर्मध्यान तथा शुक्लध्यान वे मोक्षके कारण होते हैं । और पूर्वके जो आर्तध्यान तथा रौद्रध्यान है वे संसारके कारण है ॥ ३० ॥ अन्नाह । किमेषां लक्षणमिति । अत्रोच्यते- अब यहांपर कहते है कि इन चार प्रकारके ध्यानोंका क्या लक्षण है? इस विषयको आगेके सूत्रोंसे कहते है:- आर्तममनोज्ञानां सम्प्रयोगे तद्विप्रयोगाय स्मृतिसमन्वाहारः ॥३१॥ भाष्यम्-अमनोज्ञानां विषयाणां संप्रयोगे तेषां विप्रयोगार्थ यः स्मृतिसमन्वाहारो भवति तदातध्यानमित्याचक्षते । किं चान्यत् ॥ सूत्रार्थ-विशेषव्याख्या-अमनोज्ञ अप्रिय वा अनिष्ट अथवा अरमणीय विषयोंके सम्प्रयोग अर्थात् संयोग होनेपर (अनिष्ट वा अप्रिय विषयोंके मिल जानेपर ) उन विषयोंके वियोग होनेके अर्थ जो स्मृतिका समन्वाहार अर्थात् चिन्ताका निरोध करके ध्यान है वह आर्तध्यान है ॥ ३१॥ और यह भी है कि:- २८ , mat रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् २१८ घेदनायाश्च ॥ ३२॥ भाष्यम्-वेदनायाश्चामनोज्ञायाः संप्रयोगे तद्विप्रयोगाय स्मृतिसमन्वाहार आर्तमिति । किं चान्यत् ।। । सूत्रार्थ-विशेषव्याख्या-अमनोज्ञ अप्रिय जो वेदना (अनुभवविशेष) है उसके सम्प्रयोग अर्थात् योग होनेपर उससे (अनिष्ट वेदनासे ) छूटनेके अर्थ जो चित्तकी एकाग्रता है वह आर्तध्यान है ॥ ३२ ॥ और यह भी:- विपरीतं मनोज्ञानाम् ॥ ३३ ॥ भाग्यम्-मनोज्ञानां विषयाणां मनोज्ञायाश्च वेदनाया विप्रयोगे तसंप्रयोगाय स्मृतिसम- न्वाहार आर्तम् । किं चान्यत् ।। सूत्रार्थ-विशेषव्याख्या-मनोज्ञ अर्थात् सुन्दर रमणीय तथा प्रिय विषयोंके, और इसी रीतिसे मनोज्ञ प्रियवेदनाके भी वियोग होनेपर उन सबके संयोगके लिये जो चित्तकी एकाग्रता रूप ध्यान है वह भी आर्तध्यान है ॥ ३३ ॥ और यह अन्य भी है:- निदानं च ॥ ३४ ॥ भाप्यम्-कामोपहतचित्तानां पुनर्भवविषयसुखगृद्धानां निदानमार्तध्यानं भवति । सूत्रार्थ-विशेषव्याख्या-कामनाओंसे जिनका चित्त उपहत अर्थात् दूषित होगया इसीसे ऐसे मनुष्योंके अर्थ पुनः संसारके विषयोंकी तृष्णाका कारण वह आर्तध्यान होता है ।। ३४ ॥ तद्विरतदेशविरतप्रमत्तसंयतानाम् ॥ ३५ ॥ भाष्यम्-तदेतदातध्यानमविरतदेशविरतप्रमत्तसंयतानामेव भवति । सूत्रार्थ-विशेषव्याख्या-यह आर्तध्यान अविरत, देशविरत तथा प्रमत्तसंयत- गुणस्थानवर्ती जीवोंको होता है ॥ ३५ ॥ हिंसानृतस्तेयविषयसंरक्षणेभ्यो रौद्रमविरतदेशविरतयोः ॥ ६ ॥ भाष्यम्-हिंसार्थमनृतवचनार्थ स्तेयाथै विषयसंरक्षणार्थ च स्मृतिसमन्वाहारो रौद्रध्यानं तदविरतदेशविरतयोरेव भवति । सूत्रार्थ-विशेषव्याख्या-हिंसाके लिये, अतृत अर्थात मिथ्या वचनके लिये, स्तेय- चौर्य कर्मके लिये तथा विषयकी रक्षाके लिये चित्तकी एकाग्रतारूप रौद्रध्यान अविरत. तथा देशविरत प्राणियोंका होता है | ३६ ॥ आज्ञापायविपाकसंस्थानविचयाय धर्ममप्रमत्तसंयतस्य ॥ ३७ ।। भाप्यम्---आचाविचयाय अपायविचयाय विपाकविचयाय संस्थानविचयाय च स्मृति- समन्वाहारो धर्मध्यानम् । तदप्रमत्तसंयतस्य भवति । किं चान्यत् प्रार्थ-विशेषव्याख्या-~-आज्ञाविचय, आज्ञा अर्थात् जिनशास्त्रकी आज्ञा उसके सभाष्यतत्वार्थाधिगमसूत्रम् । २१९ विचय अर्थात् विवेक तथा विचारके लिये, अपायविचय अर्थात् सन्मार्गसे दूरीकरण वा दूरीभवनरूप अपाय उसके विचय (विवेक वा विचार) के लिये, तथा विपाक अर्थात् कर्मोक फलभोगरूप विपाकके विचयके लिये और संस्थानविचयके लिये जो स्मृति- समन्वाहार (चिन्ताके निरोध)से निरन्तर ध्यान है वह धर्मध्यान है । और यह धर्मध्यान अप्रमत्त-संयत-गुणस्थानवी जीवको होता है ॥ ३७॥ और यह अन्य भी है- उपशान्तक्षीणकषाययोश्च ॥ ३८॥ भाष्यम्-उपशान्तकषायस्य च धर्म ध्यानं भवति । किं चान्यत् सूत्रार्थ-विशेषव्याख्या-उपशान्तकषाय (जिसके कषाय शान्त होगये हैं ऐसा मनुष्य ) तथा क्षीणकषाय अर्थात् जिसके कषाय सर्वथा नष्ट होगये हैं ऐसा मनुष्य, इन दोनोंको अर्थात् उपशान्तकपाय और क्षीणकषाय गुणस्थानवी जीवोंको भी धर्म ध्यान होता है ॥३८॥ और अन्य यह भी है कि- शुक्ले चाये ॥३९॥ भाष्यम्-शुक्ले चाये ध्याने पृथक्त्ववितककत्ववितर्के चोपशान्तक्षीणकषाययोर्भवतः । आये शुक्ले ध्याने पृथक्त्ववितककत्ववितर्के पूर्वविदो भवतः । सूत्रार्थ-विशेषव्याख्या-शुक्ल ध्यानके चार भेद आगे (अ.९, सू. ४१) करेंगे; उनमेंसे पृथक्त्ववितर्क तथा एकत्ववितर्क जो आदिके दो भेद है वे उप- शान्तकषाय और क्षीणकषाय पुरुषोंको होते है । आद्य अर्थात् आदिके जो पृथक्त्ववितर्क और एकत्ववितर्क शुक्ल ध्यानके भेद हैं वे पूर्वविद् अर्थात श्रुतकेवलीको होते है ॥ ३९ ॥ परे केवलिनः ॥४०॥ भाष्यम्-परे द्वे शुक्लध्याने केवलिन एव भवतः न च्छद्मस्थस्य । सूत्रार्थ-विशेषव्याख्या-और परके दो शुक्ल ध्यान अर्थात् सूक्ष्मक्रियाप्रतिपाति और व्युपरतक्रियानिवृत्ति हैं ये केवली भगवानको होते है न कि छद्मस्थको ॥ ४०॥ अत्राह । उक्तं भवता पूर्वे ध्याने परे शुक्ले ध्याने इति तत्कानि तानीति । अनोच्यते अब कहते हैं कि आपने “पूर्वे (आये) शुक्ले," तथा "परे शुक्ले" अर्थात् पूर्वके दो शुक्ल ध्यान तथा परके दो शुक्ल ध्यान ऐसा कहा है, सो वे चारों शुक्ल ध्यान कौन २ हैं, इस हेतुसे यह आगेका सूत्र कहते हैं।- पृथक्त्वैकत्ववितर्कसूक्ष्मक्रियाप्रतिपातिव्युपरतक्रियानिवृत्तीनि ।।४१॥ भाष्यम्-पृथक्त्ववितर्क एकत्लवितर्क काययोगानां सूक्ष्मक्रियाप्रतिपाति व्युपरतक्रिया- निवृत्तीति चतुर्विधं शुक्लध्यानम् । सूत्रार्थ-विशेषव्याख्या-पृथक्त्ववितर्क १ एकत्ववितर्क २ सूक्ष्मक्रियानिपाति ३ तथा व्युपरतक्रियानिवृत्ति ४ यह चार प्रकारका शुक्ल ध्यान है ।। ४१ ।। .

रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् २२० तब्येककाययोगायोगानाम् ॥ ४२ ॥ भाष्यम्-तदेतचतुर्विधं शुक्लध्यानं त्रियोगस्यान्यतमयोगस्य काययोगस्यायोगस्य च यथा- सवयं भवति । तत्र त्रियोगानां पृथक्त्ववितर्कमैकान्यतमयोगानामेकत्ववितर्क काययोगानां सूक्ष्मनियमप्रतिपात्ययोगानां व्युपग्तक्रियमनिवृत्तीति । मन्त्रार्थ-विशेषव्याख्या यह चारो प्रकारका शुक्ल ध्यान, त्रियोगको, तीनोमें एक योगवालेको, काययोगवालेको, तथा अयोगको क्रमसे यथासंख्यकरके होता है। अर्थात् काय, वाक् और मन ये तीनो योग जिसको हैं उसको पृथक्ववितर्क नाम शुक्ल ध्यान होता है, और इन तीनों योगोंमेसे कोई भी एक योग जिसको है उसको एकत्ववितर्क नाम शुक्लध्यान होता है। काययोगवालेको सूक्ष्मक्रियातिपाति नामक शुक्लध्यान होता है, और अयोग अर्थात् सर्वथा योगसे रहित (अयोगकेवली) को व्युपरत- क्रियानिवृति नामक शुक्लध्यान होता है ।। ४२ ॥ एकाश्रये सवितर्के पूर्वे ॥ ४३ ।। भाष्यम्-एकद्रव्याश्रये सवितर्के पूर्वे ध्याने प्रथमद्वितीये । तत्र सविचारं प्रथमम् । सूत्रार्थ-विशेषव्याख्या-पूर्वके जो दो शुक्लध्यान हैं अर्थात् पृथक्त्ववितर्क तथा एकत्ववितर्क वे दोनो एक व्यके आश्रयीभूत तथा वितर्कसहित होते हैं । इनमेसे जो प्रथम पृथक्त्ववितर्क है वह विचारसहित होता है ॥ ४३ ।। अविचारं द्वितीयम् ॥ ४४ ॥ भाष्यम्-अविचारं सवितर्क द्वितीयं ध्यानं भवति ॥ सूत्रार्थ-विशेषव्याख्या और द्वितीय जो एकत्लवितर्क शुक्लध्यान है वह तो विचाररहित तथा वितर्कसहित होता है ॥ १४ ॥ अनाह । वितर्कविचारयोः कः प्रतिविशेष इति । अत्रोच्यते अब कहते हैं वितर्क तथा विचारमे क्या प्रतिविशेष अर्थात् भेद है । इस लिये मागेका सूत्र कहते हैं- वितर्कः श्रुतम् ॥ ४५ ॥ भाष्यम्-यथोक्तं श्रुतनानं वितको भवति ॥ न्थार्थ-विशेषव्याख्या-पूर्वकथित श्रुतज्ञान अर्थात् पूर्वप्रसङ्गम जैसे श्रुतज्ञानका उमण कहा है वही यथोक्त श्रुतज्ञान वितर्क है ॥ १५ ॥ विचारोऽर्थव्यानयोगसंक्रान्तिः॥४६॥ भाष्यम्-अर्थव्यवनयोगसंक्रान्तिविचार इति । नृत्रार्य-विशेपव्याख्या- अर्थ, व्यञ्जन, तथा योगकी जो संक्रान्ति उसको विचार न। यहांन अर्थ शुदने ध्येय पदार्थ वा द्रव्य अथवा पायका ग्रहण है, व्यञ्जनसे सभाष्यतत्त्वार्थाधिगमसूत्रम् । २२१ वचनका ग्रहण है, और योगसे "काय-वाग्-मनाकर्म योगः" इस सूत्रमें कथित तीनो योगोंका ग्रहण है, उनकी संक्रान्ति अर्थात् परिवर्तन । इससे यह सिद्ध हुआ कि जिस ध्यानमें द्रव्य वा पर्याय, वचन (श्रुत) तथा योगका परिवर्तन होता रहता है वह विचारसहित प्रथम है और यह पूर्वकथित (अर्थव्यञ्जनयोगसंक्रान्ति अर्थात् इनका परिवर्त नरूप) जो विचार है उस विचारसे रहित अर्थात् अविचार द्वितीय (एकत्ववितर्क) रूप शुक्लध्यान है॥ तदाभ्यन्तरं तपः संवरत्वादभिनवकर्मोपचयप्रतिषेधक निर्जरणफलत्वात्कर्मनिर्जरकम् । अभिनवकोपचयप्रतिषेधकत्वात्पूर्वोपचितकर्मनिर्जरकत्वाच्च निर्वाणप्रापकमिति ।। यह छः प्रकारका आभ्यन्तर तप संवर होनेसे नूतन कर्मोंके संचयका प्रतिषेधक अर्थात् निषेध करनेवाला है तथा कर्मोंकी निर्जरारूप फल देनेसे कर्मोंका निर्जरणकारक अर्थात् कर्मोंका नाशक भी है । और अभिनव अर्थात् नूतन कर्मके उपचय (संचय वा वृद्धि) का निषेध करनेवाला होनेसे और पूर्वसंचित कर्मोंका निर्जरण (नाशक) होनेसे निर्वाण अर्थात् मोक्षको प्राप्त करनेवाला भी है ॥ १६ ॥ अत्राह । उक्तं भवता परीपहजयात्तपसोऽनुभावतश्च कर्मनिर्जरा भवतीति । तत्कि सर्वे सम्यग्दृष्टयः समनिर्जरा आहोखिदस्ति कश्चित्प्रतिविशेष इति । अत्रोच्यते । अब कहते है कि प्रथम आपने कहा था कि द्वाविंशति २२ परीषहोंके जयसे तथा तपके अनुभाव (प्रभाव )से कर्मोंकी निर्जरा होती है। सो सब सम्यग्दृष्टिपुरुष समान निर्जरावाले होते है, अथवा कोई विशेष है; इस लिये आगेका सूत्र कहते हैं।- सम्यग्दृष्टिश्रावकविरतानन्तवियोजकदर्शनमोहक्षपकोपशमकोप- शान्तमोहक्षपकक्षीणमोहजिनाः क्रमशोऽसवयेयगुणनिर्जराः॥४७॥ भाष्यम्-सम्यग्दृष्टिः श्रावकः विरतः अनन्तानुबन्धिवियोजकः दर्शनमोहक्षपकः मोहो- पशमकः उपशान्तमोहः मोहक्षपकः क्षीणमोहः जिन इत्येते दश क्रमशोऽसङ्खयेयगुणनिर्जरा भवन्ति । तद्यथा । सम्यग्दृष्टेः श्रावकोऽसङ्खयेयगुणनिर्जरः श्रावकाद्विरतः विरतादनन्तानुव- न्धिवियोजक इत्येव शेषाः ।। सूत्रार्थ-विशेषव्याख्या -सम्यग्दृष्टि १ श्रावक २ विरत ३ अनन्तानुव- न्धिवियोजक ४ दर्शनमोहक्षपक ५ मोहोपशमक ६ उपशान्तमोह ७ मोहक्षपक ८ क्षीणमोह तथा जिन १० ये दशो क्रमसे असंख्येय गुणवाली निर्जराको उत्पन्न करनेवाले होते है। जैसे-सम्यग्दृष्टिकी अपेक्षासे श्रावक असंख्येयगुणनिर्जरावाला होता है, श्रावकसे विरत असंख्येय गुणवाली निर्जरासहित होता है; और विरतसे अनन्तानुवन्धिवियोजक असंख्येय-गुण-निर्जरासहित होता है । ऐसेही आगे जिनपर्यन्त समझ लेना ॥ १७ ॥ पुलाकबकुशकुशीलनिग्रन्थस्नातका निर्ग्रन्थाः ॥ १८ ॥ २६ - रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् २२२ भाष्यम्--पुलाको वकुशः कुशीलो निर्ग्रन्थः स्नातक इत्येते पञ्चनिन्थविशेषा भवन्ति। तत्र सततमप्रतिपातिनो जिनोक्तादागमान्निग्रन्थपुलाकाः । नैर्ग्रन्थ्यं प्रति प्रस्थिताः शरीरोप- करणविभूपानुवर्तिन ऋद्धियशस्कामाः सातगौरवाश्रिता अविविक्तपरिचाराश्छेदशवलयुक्ता निम्रन्या वकुगाः । कुशीला द्विविधाः प्रतिसेवनाकुशीलाः कपायकुशीलाश्च । तत्र प्रतिसेवना- कुशीलाः नम्रन्ध्यं प्रति प्रस्थिता अनियतेन्द्रियाः कथंचित्किचिदुत्तरगुणेषु विराधयन्तरश्चरन्ति ते प्रतिसेवनाकुशीलाः । येषां तु संयतानां सतां कथंचित्संज्वलनकपाया उदीयन्ते ते कपायकुशीलाः । ये वीतरागच्छद्मस्था ईर्यापथप्राप्तास्ते निर्ग्रन्थाः । ईर्या योगः पन्थाः संयमः योगसंयमप्राप्ता इत्यर्थः । संयोगाः शैलेशीप्रतिपन्नाश्च केवलिनः स्नातका इति ॥ सूत्रार्थ-विशेषव्याख्या -पुलाक, वकुश, कुशील, निर्ग्रन्थ, तथा स्नातक ये पांच निर्ग्रन्थ है । इनमेंसे निरन्तर जो जिनकथित आगमसे कदापि पतित न होवे पुलाक निर्ग्रन्थ है । तथा निर्ग्रन्थताके प्रति जो प्रस्थित हुए हैं, किन्तु शरीरके उपकरण भूपण आदिके अनुवर्ती हैं, ऋद्धि (ऐश्वर्य्य ) तथा यशकी कामना करनेवाले हैं, अतिगौरवयुक्त, अविविक्त (नातिपवित्रतायुक्त) परिचारसहित, और छेदशवलयुक्त जो है वे बकुश निर्ग्रन्थ हैं । कुशील दो प्रकारके हैं, एक तो प्रतिसेवनाकुशील और द्वितीय कपाय- कुगील । उनमेंसे जो निर्ग्रन्थता सम्पादन करनेके लिये प्रस्थित हैं सो जो अनियत इंद्रिय है, अर्थात् जिनकी इद्रियां सर्वथा स्वाधीन नहीं हैं, और किसी प्रकारसे उत्तरगुणोंमें भी विरोध (विघात) करनेवाले है वे प्रतिसेवनाकुशील निर्ग्रन्थ है। और जिन्होंने अन्य कपायोंको तो जीत लिया है ऐसे संयम युक्त होनेपर भी जिनके कथंचित् ( किसी प्रकारसे) संज्वलनकपाय उद्रेकताको अर्थात् आविर्भावको प्राप्त होजायँ वे कषायकुशील निम्रन्थ है । और जो वीतराग छद्मस्थ है, तथा इ-पथमें प्राप्त है वे निर्ग्रन्थ हैं । यहांपर इ-से योगका ग्रहण है, और पन्था (पथ) से संयमका ग्रहण है, इससे यह तात्पर्य्य सिद्ध हुआ कि जो योगसंयममे प्राप्त है वे निर्ग्रन्थ आचार्य्य हैं। और जो योगसहित हैं तथा जो शैलेशीप्राप्त है वे स्नातक है ।। ४८ ॥ संयमश्रुतप्रतिसेवनातीर्थलिङ्गलेश्योपपातस्थानविकल्पतःसाध्या:४९ भाप्यम्-एते पुलाकादयः पञ्च निम्रन्थविशेषा एभिः संयमादिभिरनुयोगविकल्पैः साध्या भवन्ति । तद्यथा । सूत्रार्थ-विशेपव्याख्या-इन पुलाक आदि पांचो निर्ग्रन्थोंका आगे कहे हुए संयन आदि विकल्पोंसे साधन करना चाहिये । जैसे:- नंथमः । कः कस्मिन्संयमे भवतीति । उच्यते । पुलाकवकुशप्रतिसेवनाकुशीला द्वयोः संयमयोः सामायिके छेदोपस्थाप्ये च । कपायकुशीलो द्वयोः परिहारविशुद्धौ सूक्ष्मसंपराये चा निधन्नातकावेकस्मिन्यथाख्यातसंयमेवा- मनं प्रथम संयमका विचार कहते है-कौन किसम होता है, अर्थात् कौन निर्ग्रन्थ ।

- सभाष्यतत्त्वार्थाधिगमसूत्रम्। २२३ किस संयम आदिमें होते हैं इस विषयको कहते हैं। जैसे-पुलाक, बकुश, तथा प्रतिसेवना- कुशील, ये दो २ संयमोंमें अर्थात् सामायिक तथा छेदोपस्थाप्यमें होते हैं । कषाय- कुशील निर्ग्रन्थ भी परिहारविशुद्धि और सूक्ष्मसंपराय इन दोनो संयमोमें होते हैं। और निर्ग्रन्थ तथा स्नातक केवल एक यथाख्यातसंयममें होते है । श्रुतम् । पुलाकबकुशप्रतिसेवनाकुशीला उत्कृष्टेनाभिन्नाक्षरदशपूर्वधराः । कपायकुशील- निम्रन्थौ चतुर्दशपूर्वधरौ । जघन्येन पुलाकस्य श्रुतमाचारवस्तु । वकुशकुशीलनिम्रन्थानां श्रुतमष्टौ प्रवचनमातरः । श्रुतापगतः केवली स्नातक इति ॥ श्रुतके विषयमें:-पुलाक, बकुश, और प्रतिसेवनाकुशील ये तीन निर्ग्रन्थ उत्कृष्टतासे अर्थात् अधिकसे अधिक अभिन्नाक्षर दश पूर्वधर होते है । कषायकुशील और निर्ग्रन्थ ये दोनों निर्ग्रन्थ विशेष चतुर्दश पूर्वधर होते है । और जघन्यता (न्यूनता )से तो पुलाकका श्रुतकेवल आचारवस्तु है । और बकुश, कुशील तथा निर्ग्रन्थोंका श्रुत जघन्य अपेक्षासे अर्थात् न्यूनतासे केवल प्रवचनकी माता है । और केवली स्नातक तो श्रुतापगत है। प्रतिसेवना । पञ्चानां मूलगुणानां रात्रिभोजनविरतिषष्ठानां पराभियोगाद्वलात्कारेणा- न्यतम प्रतिसेवमानः पुलाको भवति । मैथुनमित्येके । बकुशो द्विविधः उपकरणवकुशः शरी- रबकुशश्च । तत्रोपकरणाभिष्वक्तचित्तो विविधविचित्रमहाधनोपकरणपरिग्रहयुक्तो बहुवि- शेषोपकरणकांक्षायुक्तो नित्य तत्प्रतिसंस्कारसेवी भिक्षुरुपकरणबकुशो भवति । शरीरामि- प्रवक्तचित्तो विभूषार्थ तत्प्रतिसंस्कारसेवी शरीरबकुशः । प्रतिसेवनाकुशीलो मूलगुणानवि- राधयन्त्रुत्तरगुणेषु कांचिद्विराधनां प्रतिसेवते । कषायकुशीलनिर्ग्रन्थस्नातकानां प्रतिसे- वना नास्ति । प्रतिसेवना, पांच मूलगुण, तथा रात्रिभोजनसे विरतिसहित पट्, अर्थात् पांच मूलगुण और रात्रिभोजनसे विरति (उपराम) लेकर छः हुए, इनमेंसे, दूसरोंके अभियोग अर्थात् प्रेरणासे बलात्कार (जबरदस्ती ) से किसी एकका प्रतिसेवन करनेवाला पुलाक होता है। इनमेंसे मैथुनका ग्रहण किसी एक आचार्यके मतसे है । बकुश दो प्रकारके होते है; एक तो उपकरणबकुश और दूसरा शरीरबकुश होता है । इनमेंसे उपकरणों (सामग्रियों) में चित्त लगानेवाला, विविध अर्थात् अनेक प्रकारके विचित्र महाधनवाले 'उपकरणों के परिग्रहसहित, बहुत अधिक उपकरणोंकी अभिलाषा करनेवाला और प्रतिदिन अर्थात् सदा उनके प्रतिसंस्कारोंको सेवन करनेवाला भिक्षुक उपकरण- पकुश कहा जाता है । और शरीरमें दत्तचित्त, विभूषणोंके लिये अर्थात् शरीरको भूषित करनेके लिये जो प्रतिसंस्कारोंका सेवन करनेवाला है वह शरीरवकुश भिक्षुक है। और जो मूलगोंका विराध (विधात) न करता हुआ उत्तरगुणोंमे किसी एक , , २२४ रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् विराधनाका प्रतिसेवी है, वह प्रतिसेवनाकुशील है । और कषायकुशील, निर्ग्रन्थ, तथा स्नातक इन तीनोंको तो प्रतिसेवना होती ही नही है । तीर्थम् । सर्वे सर्वेषां तीर्थकराणां तीर्थेषु भवन्ति । एके वाचार्या मन्यन्ते पुलाकवकुशं. प्रतिसेवनाकुशीलास्तीथें नित्यं भवन्ति शेषास्तीर्थे वातीर्थे वा ।। तीर्थक विषयमें:-सब निर्ग्रन्थ सब तीर्थकरोंके तीर्थों में होते हैं। और कोई २ आचार्य तो ऐसा मानते है कि पुलाक, बकुश तथा प्रतिसेवनाकुशील ये तीनो तीर्थमे नित्य होते है, और शेष (बाकी ) अर्थात् कषायकुशील, निम्रन्थ तथा स्नातक ये तीर्थ वा अतीर्थमें भी होते हैं। लिङ्गम् । लिङ्गम् द्विविधम् द्रव्यलिङ्गं भावलिङ्गं च । भावलिङ्गं प्रतीत्य सर्वे पञ्च नि- ग्रन्या भावलिङ्गे भवन्ति द्रव्यलिङ्गं प्रतीय भाज्याः ॥ लिङ्गके विषयमः-लिङ्ग दो प्रकारका है, एक तो द्रव्यलिङ्ग और दूसरा भावलिङ्ग, उनमेंसे भावलिङ्गको निमित्त मानकर पांचोही निर्ग्रन्थ भावलिङ्गमें होते हैं । और द्रव्यलिङ्गको निमित्त मानकर तो इनका विभाग करना चाहिये । लेश्याः । पुलाकस्योत्तरास्तिस्रो लेश्या भवन्ति । वकुशप्रतिसेवनाकुशीलयोः सर्वाः पडपि । कषायकुशीलस्य परिहारविशुद्धेस्तिस्र उत्तराः । सूक्ष्मसंपरायस्य निर्ग्रन्थस्नातकयोश्च शुक्लैब केवला भवति । अयोगः शैलेशीप्रतिपन्नोऽलेश्यो भवति ॥ लेश्याके विषयमें:-पुलाकको अन्त्यकी तीन लेश्या होती है। बकुश तथा प्रतिसेवना- कुशीलको सब अर्थात् छहो लेश्या होती है। परिहारविशुद्धिस्थानवी, तथा कपाय- कुशीलको अन्तकी तीन लेश्या होती है । सूक्ष्मसंपरायस्थानवर्ती और निर्ग्रन्थ तथा नातकको केवल एक शुक्ल लेश्याही होती है। और अभोग अर्थात् भोगसे रहित जो शैलेशीप्राप्त है वह तो अलेश्य (लेश्यारहित) ही होता है ।। उपपातः । पुलाकस्योत्कृष्ठस्थितिपु देवेषु सहस्रारे । वकुशप्रतिसेवनाकुशीलयोविंश- तिसागरोपमस्थितिवारणाच्युतकल्पयोः । कपायकुशीलनिर्ग्रन्थयोत्रयस्त्रिंशत्सागरोपमस्थि- तिषु देवेषु सर्वार्थसिद्धे । सर्वेषामपि जघन्या पल्योपमपृथक्त्वस्थितिपु सौधर्मे । स्नातकस्य निर्वाणमिति ॥ टपपातके विषयम पुलाक निर्ग्रन्थका उपपात अर्थात् ऊर्ध्वगमन अथवा स्वर्गविशेषमें उत्पत्ति नबसे उत्कृष्ट (उत्तम) स्थितिवाले जो देव हैं उनमे सहस्रारनाम स्वर्गविशेषमें होती है । बकुश तथा प्रतिसेवनाकुशीलका उपपात वाईस २२ सागरोपमास्थितिवाले देवोंने आरण तथा अच्युतकल्पमे होता है। कषायकुशील तथा निग्रर्थका उपपात प्रयनिगन् (२३) सागरोपम स्थितिवाले देवोंमे सर्वार्थसिद्धनामक स्वर्ग वा विमानमे होता * 1 और नवका अर्थात् पांचोंकी जघन्य वा न्यूनसे न्यून स्थिति अथवा उपपात पल्योपम 1 सभाष्यतस्वार्थाधिगमसूत्रम् । २२५ पृथक्त्व स्थितिवाले देवोंमें सौधर्मनामक विमान वा वर्गविशेषमें होता है। और स्नातकको तो निर्वाण ही होता है । स्थानम् । असङ्खयेयानि संयमस्थानानि कषायनिमित्तानि भवन्ति । तत्र सर्वजन्यानि लब्धिस्थानानि पुलाककषायकुशीलयोः । तौ युगपदसङ्खयेयानि स्थानानि गच्छतः । ततः पुलाको व्युच्छिद्यते कषायकुशीलस्त्वसङ्खयेयानि स्थानान्येकाकी गच्छति । ततः कषाय- कुशीलप्रतिसेवनाकुशीलबकुशा युगपदसङ्खयेयानि संयमस्थानानि गच्छन्ति । ततो वकुशो व्युच्छिद्यते । ततोऽसङ्खधेयानि स्थानानि गत्वा प्रतिसेवनाशीलो व्युच्छिद्यते । ततो- ऽसङ्खधेयानि स्थानानि गत्वा कषायकुशीलो व्युच्छिद्यते। अत ऊर्ध्वमकषायस्थानानि निम्रन्थः प्रतिपद्यते । सोऽप्यसङ्खयेयानि स्थानानि गत्वा व्युच्छिद्यते । अत ऊर्ध्वमेकमेव स्थानं गत्वा निर्ग्रन्थस्नातको निर्वाणं प्राप्नोतीति एषां संयमलब्धिरनन्तानन्तगुणा भवतीति ।। इति तत्त्वार्थाधिगमेऽहत्प्रवचनसङ्हे नवमोऽध्यायः समाप्तः ॥ स्थानविषयमें:-कषायनिमित्तक असङ्ख्य संयमस्थान होते हैं। उनमेंसे पुलाक और कषायकुशीलके सबसे जघन्य अर्थात् सबसे निकृष्ट लब्धिस्थान होते है । वे दोनो (पुलाक और कषायकुशील) एक कालमें ही असङ्ख्य स्थानमें जाते हैं । वहांसे पुलाक पृथक् किया जाता है, और कषायकुशील तो एकाकी (अकेला) ही असद्धेय स्थानों में जाता है । उसके अनन्तर कषायकुशील, प्रतिसेवनाकुशील, और बकुश एक कालमें ही असङ्ख्य संयमस्थानोंमें जाते हैं । वहां बकुश पृथक् किया (अलगाया) जाता है। उसके पश्चात् असद्धेय स्थानोंमें जाकर प्रतिसेवनाकुशील पृथक् किया जाता है । इसके ऊपर अकषायस्थान हैं, उनमें केवल निम्रन्थ ही प्राप्त होता है । वह भी असङ्ख्य स्थानों में जाकर रोक दिया जाता है। और इसके ऊर्ध्व (ऊपर) एकही स्थान जाकर निम्रन्थ स्नातक निर्वाण (मोक्ष) को प्राप्त होता है। इनकी संयमलब्धि अनन्त तथा अनन्त गुण होती है। इति श्रीतत्त्वार्थाधिगमेऽहत्प्रवचनसङ्घहे आचार्योपाधिधारिद्विवेद्युपनामकठाकुर- प्रसादशर्मप्रणीतभाषाभाष्ये नवमोऽध्यायः ॥ ९ ॥ अथ दशमोऽध्यायः ॥१०॥ - 1. मोहक्षयाज्ज्ञानदर्शनावरणान्तरायक्षयाच केवलम् ॥१॥ भाष्यम्-मोहनीये क्षीणे ज्ञानावरणदर्शनावरणान्तरायेषु क्षीणेषु च केवलज्ञानदर्शन- मुत्पद्यते । आसां चतसृणां कर्मप्रकृतीनां क्षयः केवलस्य हेतुरिति । तत्क्षयादुत्पद्यत इति हेतौ पञ्चमीनिर्देशः । मोहक्षयादिति पृथकरणं क्रमप्रसिख्यर्थ यथा गम्येत पूर्व मोहनी २९ रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् २२६ कृत्स्नं क्षीयते ततोऽन्तमुहूर्त छद्मस्थवीतरागो भवति । ततोऽस्य ज्ञानदर्शनावरणान्तराय- प्रकृतीनां तिसृणां युगपत्क्षयो भवति । ततः केवलमुत्पद्यते ॥ सूत्रार्थ-विशेषव्याख्या–मोहनीय कर्मके क्षीण होनेपर तथा ज्ञानावरण, दर्शनावरण और अन्तरायके क्षीण होनेपर केवल ज्ञान दर्शन उत्पन्न होता है । इन चारों अर्थात् मोह- नीय, ज्ञानावरणीय, दर्शनावरणीय तथा अन्तराय कर्म प्रकृतियोंका भय केवल ज्ञानका हेतु है, ( मोहनीयक्षयात् ) तथा (ज्ञानदर्शनावरणान्तरायक्षयात्) इनके क्षयसे उत्पन्न होता है. उक्त दोनों स्थलोमें जो पञ्चमी निर्देश है, अर्थात् पञ्चमी विभक्तिका विधान आचार्य्यने किया है वह हेतु अर्थमे पञ्चमी है । तात्पर्य यह है कि चारों प्रकृतियोंके क्षयरूप निमित्तसे केवल ज्ञानकी उत्पत्ति है । और "मोहक्षयात्" यह पृथक् जो पञ्चमी- निर्देश किया है सो उस क्रमकी प्रसिद्धिके अर्थ किया है, जिससे कि यह अर्थ स्पष्ट रूपसे भान हो कि प्रथम सम्पूर्ण मोहनीय प्रकृतिका क्षय होता है उसके अनन्तर अन्तर्मुहूर्त- कालम छमस्थ वीतराग होता है; और छमस्थ वीतराग होनेके पश्चात् ज्ञानावरण, दर्श- नावरण, तथा अन्तराय इन तीनों प्रकृतियोंका एक कालमें ही क्षय होता है। और इन तीनों प्रकृतियोंके क्षयके पश्चात् केवल ज्ञान उत्पन्न होता है ॥ १ ॥ अत्राह । उक्तं मोहक्षयाज्ज्ञानदर्शनावरणान्तरायक्षयाच केवलमिति । अथ मोहनीया- दीनां क्षयः कथं भवतीति । अत्रोच्यते- अव कहते है कि यह तो आपने कहा कि मोहनीय प्रकृतिके क्षय तथा ज्ञानावरणीय दर्शनावरणीय तथा अन्तराय, इन कर्मप्रकृतियोंके क्षयसे केवल (केवलज्ञान) उत्पन्न होता है, परंतु मोहनीय आदि प्रकृतियोंका क्षय किस प्रकारसे होता है ? इसलिये आगेका सूत्र कहते है। वन्धहेत्वभावनिर्जराभ्याम् ॥ २॥ मिथ्यादर्शनादयो बन्धहेतवोऽभिहिताः । तेषामपि तदावरणीयस्य कर्मणः क्षयादभावों भवनि सम्यग्दर्शनादीनां चोत्पत्तिः। तत्त्वार्थश्रद्धानं सम्यग्दर्शनम् तन्निसर्गादधिगमाद्वे- त्युक्तम् । एवं संवरसवृतस्य महात्मनः सम्यग्व्यायामस्याभिनवस्य कर्मण उपचयो न भवनि पूर्वोपचितस्य च यथोक्तनिर्जराहेतुभिरत्यन्तक्षयः । ततः सर्वद्रव्यपर्यायविषयं परमै- मनन्तं केवलं नानदर्शनं प्राप्य शुद्धो बुद्धः सर्वज्ञः सर्वदर्शी जिनः केवली भवति । ततः प्रतनुशुभचनुःकमावशेप आयुःकर्मसंस्कारवशाद्विहरति । सत्रार्थ-विशेपव्याख्या-मिथ्यादर्शन, मिथ्याज्ञान आदि वन्धके हेतु कहे है, उ- नका अर्थात् बन्यके हेतुओंका भी ज्ञानावरणीय आदि कर्मप्रकृतियोंके क्षयसे अभाव होता है, और मन्यादर्शन आदिकी उत्पत्ति भी होती है। "तत्त्वार्थश्रद्धानम् सम्यग्दर्शनम्" तत्त्वार्थ पायदान ही सम्यग्दर्शन है, और निसर्ग तथा अविगमसे होता है; यह विपय प्रथम अध्यायमें - न सभाष्यतत्त्वार्थाधिगमसूत्रम् । २२७ कह आये हैं । इसप्रकार संवरसे संवृत (युक्त) महात्माको सम्यग्व्यायामयुक्त जो नूतन कर्म है उनकी वृद्धि नहीं होती, तथा जो पूर्वकालके सश्चित कर्म है उनका भी यथोक्त (कहेहुए) निर्जराके हेतुओं (तपआदिकों) से अत्यन्त क्षय होता है । उसके अनन्तर अर्थात् कर्मोके सर्वथा क्षय होनेके पश्चात् क्रमसे सम्पूर्ण द्रव्य तथा सम्पूर्ण पर्याय विषयक, अर्थात् सब द्रव्य और सब पर्य्यायोंको साक्षात्कार करनेवाला, परम ऐश्वर्य (सबसे उ-'. त्कृष्ट ऐश्वर्य ) सहित केवल ज्ञान दर्शनको पाकर शुद्ध (सवर्था पवित्र ), बुद्ध (सर्व द्रव्य पायोंका ज्ञाता), सर्वद्रष्टा केवली जिन भगवान् यह प्राणी होता है । और उसके प- श्चात् अति सूक्ष्म शुभ चार कर्म शेषवाला यह अलग रहजाता है, और आयुःकर्मसंस्का- रके वशसे संसारमें विहरता है ॥ २ ॥ ततोऽस्य और इसको:- कृत्लकर्मक्षयो मोक्षः ॥३॥ भाष्यम्-कृत्स्नकर्मक्षयलक्षणो मोक्षो भवति । पूर्व क्षीणानि चत्वारि कर्माणि पश्चाद्वेनी- यनामगोत्रायुष्कक्षयो भवति । तत्क्षयसमकालमेवौदारिकशरीरवियुक्तस्यास्य जन्मनः प्रहा- णम् । हेत्वभावाच्चोत्तरस्याप्रादुर्भावः । एषावस्था कृत्सकर्मक्षयो मोक्ष इत्युच्यते । सूत्रार्थ-विशेषव्याख्या-सम्पूर्ण कर्मोंका क्षयरूप मोक्ष प्राप्त होता है । इस रीतिसे मोहनीय आदि चार कर्मप्रकृति तो प्रथमही क्षीण होचुकी थी, और इसके पश्चात् वेदनीय, नाम, गोत्र, तथा आयु ये चार जो शुभ कर्म शेष रह गये थे, वेभी क्षयको प्राप्त होते हैं। और इन चारोंके क्षयके समकालमे ही औदारिक शरीरसे रहित जो यह जीव उसके जन्मका सर्वथा प्रयाण अर्थात् नाश होता है। क्योंकि हेतु ( शरीरधारणके हेतु) ओंके अमावसे पुनः उत्तरजन्मका प्रादुर्भाव नहीं होता है । इस प्रकार यह अवस्था सम्पूर्ण कर्मोका क्षय- रूप मोक्ष वा मुक्तिस्वरूपसे कही जाती है ॥ ३ ॥ किं चान्यत् । और अन्य यह भी है:- औपशमिकादिभव्यत्वाभावाचान्यत्र केवलसम्यक्त्वज्ञानदर्शनसि- इत्वेभ्यः॥४॥ भाष्यम्-औपशमिकक्षायिकक्षायौपशमिकौदयिकपारिणामिकानां भावानां भव्यत्वस्य चाभावान्मोक्षो भवति अन्यत्र केवलसम्यक्त्वकेवलजानकेवलदर्शनसिद्धत्वेभ्यः । एते हाम्य क्षायिका नित्यास्तु मुक्तस्यापि भवन्ति ॥ सूत्रार्थ-विशेषव्याख्या-औपशमिक, क्षायिक, वायोपशमिक, औदयिक, तथा पारिणामिक भावोंके और भव्यत्वके भी अभावसे मोक्ष होता है, किन्तु केवल सम्यकृत, रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् २२८ केवल ज्ञान, केवल दर्शन, और सिद्धत्वके शिवाय, अर्थात् इनको छोड़कर । क्योंकि ये इसके क्षायिक होते है, और नित्य तो मुक्त जीवके भी ये होते है ॥ ४ ॥ तदनन्तरमूर्ध्व गच्छत्यालोकान्तात् ॥ ५॥ भाष्यम्-तदनन्तरमिति कृत्मकर्मक्षयानन्तरमौपशमिकाद्यभावानन्तरं चेत्यर्थः । मुक्त ऊर्ध्व गच्छत्यालोकान्तात् । कर्मक्षये देहवियोगसिध्यमानगतिलोकान्तप्राप्तयोऽस्य युगपदेकसमयेन भवन्ति । तद्यथा । प्रयोगपरिणामादिसमुत्थस्य गतिकर्मण उत्पत्तिकार्यारम्भ- विनाशा युगपदेकसमयेन भवन्ति तद्वत् ।। उन सब कर्मोके क्षयके अनन्तर, और औपशमिक आदि भावोंके नाशके अनन्तर यह मुक्त जीव लोकान्तपर्यन्त ऊर्ध्व गमन करता है । क्योंकि कर्मोके क्षयके पश्चात् देह- वियोग, सिध्यमान गति और लोकान्तप्राप्ति ये सब इस मुक्त जीवको एकही कालमें होती है। जैसे किसी प्रयोगके परिणामसे उत्पन्न जो गति कर्म है उसकी उत्पत्ति, कार्यारम्भ तथा विनाश एक साथही एक समयमेंही होते है, ऐसेही मुक्त जीवके भी देहवियोग सिध्यमान गति आदि भी एक साथही होती है ॥ ५ ॥ अत्राह । प्रहीणकर्मणो निरास्रवस्य कथं गतिर्भवतीति । अत्रोच्यते- अव यहांपर कहते हैं कि जिसके संपूर्ण कर्म क्षीण हो गये है ऐसे, प्राण व (कर्मोंके आगमनद्वार ) से रहित मुक्त जीवकी ऊर्ध्व गति कैसे होती है ? इस शङ्काके उत्तरमें आगेका सूत्र कहते हैं:- पूर्वप्रयोगादसङ्गत्वाइन्धच्छेदात्तथागतिपरिणामाच तद्गतिः ॥ ६ ॥ भाप्यम्-पूर्वप्रयोगात् । यथा हस्तदण्डचक्रसंयुक्तसंयोगात्पुरुषप्रयत्नतश्चाविद्धं कुलालच- क्रमपरतेष्वपि पुरुषप्रयानहस्तदण्डचक्रसंयोगेषु पूर्वप्रयोगाद्धमत्येवासंस्कारपरिक्षयात् एवं यः पूर्वमस्य कर्मणा प्रयोगो जनितः स क्षीणेऽपि कर्मणि गविहेतुर्भवति । तत्कृता गतिः ॥ किं चान्यन् ॥ सूत्रार्थ-वि०व्या०-'पूर्वप्रयोगात्' जैसे हस्त (हाथ), दण्ड, और चक्र (कुंभारके वर्तन बनानेकी चाक ) इन तीनों के मिलित संयोगसे और पुरुषके प्रयत्न अर्थात् पुरुषके व्यापारसे व्याप्त (पूर्ण वा युक्त) जो कुंभारका चक्र (चाक) है पुरुपके व्यापारके निवृत्त होनेपर भी पु- रुपक व्यापार, हाथ, दण्ड, तथा चक्रके संयोगमे प्रथमके व्यापारसे वह चक्र भ्रमण करता ही रहता है; जब तक कि उसमें पुरुपके प्रथम प्रयोग ( व्यापार ) का संस्कार है, तब तक वन बन्द नहीं होता, ऐमही जो इस जीवके कर्मोंका प्रयोग अर्थात् व्यापार वा प्रयत्न उत्पन्न तुआ है बत् कर्मक नीण होनेपर भी गतिका निमित्त होता है; इसीसे अर्थात् कर्मोके पूर्व उन प्रयोगमे हम मुक्त जीवकी ऊर्च गति होती है । और इसके अतिरिक्त ( शिवाय) बन्न न भी है..

सभाष्यतत्त्वार्थाधिगमसूत्रम् । २२९ असङ्गत्वात् । पुद्गलानां जीवानां च गतिमत्त्वमुक्तं नान्येषां द्रव्याणाम् । तत्राधोगौरवध- मणिः पुद्गला ऊर्ध्वगौरवधर्माणो जीवाः । एष स्वभावः । अतोऽन्यासङ्गादिजनिता गतिर्भ- वति । यथा सत्खपि प्रयोगादिषु गतिकारेणेषु जातिनियमेनास्तिर्यगूर्व च स्वाभाविक्यो लोष्टवाय्वनीनां गतयो दृष्टाः तथा सङ्गविनिर्मुक्तस्योर्ध्वगौरवादूर्ध्वमेव सिध्यमानगतिर्भवति । संसारिणस्तु ॥ कर्मसङ्गादधस्तिर्यगूर्व च ॥ किं चान्यत् । असङ्गत्वातः-असङ्ग होनेसे भी मुक्त जीवकी ऊर्ध्व गति होती है। जैसे पुद्गलोंको तथा जीवोंको गतिमत्त्व अर्थात् गतिवाले कहा है, न कि अन्य द्रव्योंको । उन दोनों द्र- व्योंमें भी अधोभागमें गौरव धर्म धारण करनेवाले पुद्गल द्रव्य होते हैं, और ऊर्ध्व भागमें गौरव धर्म धारण करनेवाले जीव द्रव्य होते है । यह इन द्रव्योंका स्वभाव है । इससे अन्य अर्थात् विपरीत गति जैसे जीवोंकी अधोभागादिमें तथा पुद्गलोंकी ऊर्ध्वादि मागमें गति सङ्ग आदि निमित्तसे उत्पन्न होती है। जैसे गतिके कारण भूत प्रयोग पुरुषप्रयत्न, अथवा व्या- पार आदिके विद्यमान रहते भी पाषाण, वायु, तथा अग्निकी स्वाभाविक गति, क्रमशः अ- धोभाग, तिर्यग् भाग, तथा ऊर्ध्व भागमेंही दृष्ट है, अर्थात् पाषाणकी स्वाभाविक गति अ- धोभागमें, वायुकी तिर्यक् (तिरछे) भागमें और अग्निकी ऊर्ध्व भागमें गतिका दृष्ट है। ऐसेही सङ्गसे विनिर्मुक्त जीवकी भी ऊर्ध्व भागमें गौरव धर्म धारण करनेसे ऊपरकी ही और स्वाभाविक सिद्ध्यमान गति होती है । और संसारी जीवकी तो कर्मोंके सङ्गसे अधोभाग, तिर्यग्भाग तथा ऊर्ध्व भागमें भी गति होती है । तथा इसके अतिरिक्त ऊर्ध्वगतिमें अन्य भी हेतु है:- बन्धच्छेदात् । यथा रज्जुबन्धच्छेदात्पेडाया बीजकोशबन्धनच्छेदाचैरण्डबीजानां गतिईष्टा तथा कर्मबन्धनच्छेदात्सिध्यमानगतिः ।। किं चान्यत् । बन्धच्छेदात्-बन्धके छेदसे मुक्त जीवकी ऊर्ध्व गति होती है। जैसे रज्जुके बन्धनके उ- च्छेदसे पेडाकी, तथा बीजकोश (जिस गुच्छ रूप कोशमे बीजबन्ध रहते है उस एरण्ड- फल ) रूप बन्धके उच्छेद होनेपर अर्थात् कोशरूप बन्धनके टूटनेपर एरण्ड ( अंडी वा रेड़ी) के बीजोंकी गति स्वाभाविक दृष्ट है, ऐसेही कर्मरूप बन्धनके छेद ( नाश) होने- पर मुक्त जीवकी भी स्वाभाविक सिद्ध्यमान ऊर्ध्व गति होती है । और इसके शिवाय अन्य भी ऊर्ध्व गतिमें हेतु है:-। तथागतिपरिणामाच । ऊर्ध्वगौरवात्पूर्वप्रयोगादिभ्यश्च हेतुभ्यः तथास्य गतिपरिणाम उत्प- द्यते येन सिध्यमानगतिर्भवति । अर्ध्वमेव भवति नास्तिर्यग्वा गौरवप्रयोगपरिणामासन- योगाभावात् । तद्यथा । गुणवभूमिभागारोपितमृतुकालजातं वीजोद्रेदाङ्गुरप्रवालपर्णपुष्प- फलकालेष्वविमानितसेकदौहृदादिपोषणकर्मपरिणतं कालच्छिन्नं शुष्कमलाब्बसु न निमन्नति तदेव गुरुकृष्णमृत्तिकालेपैर्घनर्वहुभिरालिप्तं धनमृत्तिकालेपवेष्टनजनितागन्तुकगौरवमप्सु प्र. क्षिप्तं तज्जलप्रतिष्ठं भवति यदा त्वस्याद्भिः क्लिन्नो मृत्तिकालेपो व्यपगतो भवति तदा , २३० रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् मृत्तिकालेपसङ्गविनिर्मुक्तं मोक्षानन्तरमेवोत्रं गच्छति आसलिलोयतलात् एवमूर्ध्वगौरवगति- धर्मा जीवोऽप्यष्टकर्ममृचिकालेपवेष्टितः तत्सङ्गात्संसारमहार्णवे भवसलिले निमग्नो भ- वासक्तोऽधस्तिर्यगृध्वं च गच्छति सम्यग्दर्शनादिसलिलच्छेदात्महीणाष्टविधकर्ममृत्तिकालेप ऊ- ध्र्वगौरवादूर्ध्वमेव गच्छत्यालोकान्तात् ।। तथागतिपरिणामाच-उसी प्रकार गति परिणाम होनेसे भी मुक्त जीवकी ऊर्ध्व गति होती है । जैसे, ऊर्श्वभागमे गौरव (गुरुता) धर्मके धारण करनेसे, और मुक्तिकालमें पूर्वप्रयोग अर्थात् प्रयत्न व्यापार आदि हेतुओंसे इस जीवका वैसाही गति परिणाम दृष्ट होता है जिससे कि इसकी सिध्धमान गति होती है, और वह सियमान गति ऊर्ध्व देशमें ही होती है नकि अधोभाग, और न तिर्यक् भागम; क्योंकि अधोदेश, अथवा तिर्यक् दे- शम गति होनेमे गौरव, प्रयोग (व्यापार वा प्रयत्न) परिणाम तथा सङ्गयोगका अभाव है। जैसे कि गुणयुक्त अर्थात् उत्तम भूमिमे चोया हो, ऋतुकाल ( निज समय ) में उत्पन्न हो, बीजके उद्भेद (बीजसे ॲखुआ निकलेनेके समय ) से अङ्कुर, पल्लव, पत्र, पुष्प तथा फल काल पर्यंत आदर पूर्वक सिचन आदि पालन पोषण आदि कर्मोसे परि- णामको प्राप्त ( अच्छी तरहसे परिपक्क )तथा निजसमयपर तोड़ा हुआ जो शुष्क (सूखा) अलावू अर्थात् लौआ वा तितलौकी (तुंवेका) फल जलमे कदापि नहीं डूबता । और वही अलावू (तुवेका फल ) यदि गुरुतर (भारी) काली मृत्तिकाके लेपोंसे, वा अन्य घनीभूत गुरुतर पदार्थोंके लेपोंसे लिप्त घनीभूत मृत्तिकाके लेपरूप वेष्टनप्राप्त नैमि- त्तिक गुरुता (भारीपन) सहित हो तो जलमें प्रक्षिप्त होनेपर अर्थात् जलमें छोड़नेपर डूब जाता है । और जो कुछ काल पर्यंत जलमे भीगता रहै तो उसके द्वारा इस (फल) की मृत्तिकाका लेप दूर हो जाता है, तब मृत्तिकाके लेपसे विनिर्मुक्त होकर मोक्षके अन- न्तरही पुनः ऊर्ध्व देशमे जलके ऊपर भाग पर्यंत, अर्थात् जलके ऊपरके भागतक ऊपरही जाता है । ऐसेही ऊर्ध्व भागमे खभावसिद्ध गौरवधर्मधारी जीव भी अष्टविध कर्म ख- रूप मृत्तिकाके लेपनरूप वेष्टनवेष्टित होनेसे उन कोंके सङ्गसे संसाररूपी समुद्र में डूबता और इसमे आसक्त होनेसे अनेक जन्मोंमे अधोभाग, तिर्यग् भाग, तथा ऊर्ध्व भागमे भी गमन करता है; परन्तु जब सम्यग्दर्शन आदि जलसे भली भांति आक्लिन्न अर्थात् भीगनेसे अष्टविध कर्मरूप मृत्तिकालेप इसका सर्वथा नष्ट हो जाता है तब ऊर्ध्वगमन गौरव धर्म धारण करनेसे लोकान्तपर्यंत ऊपरकोही जाता है । म्यादेतन् लोकान्तादप्यूर्व मुक्तस्य गतिः किमर्थ न भवतीति । अत्रोच्यते । धर्मास्तिका. यामावान् । धमास्तिकायो हि जीवपुद्गलानां गत्युपग्रहेणोपकुरुते । स तत्र नास्ति । तस्माद्गत्यु- पप्रकारणाभावात्परतो गतिर्न भवत्यप्सु अलावुवत् । नाधो न तिर्यगित्युक्तम् । तत्रैवानुश्रेणि- गचिलकान्तऽवतिष्ठते मुक्तो निःक्रियः इति ।।

सभाष्यतत्त्वार्थाधिगमसूत्रम् । २३१ अब कहते हैं कि ऊर्ध्व गतिके विषयमें तो जो रहा वह उसी प्रकार रहै, अर्थात् उसको स्वीकार करनेमें कोई बाधा नही है; परन्तु लोकान्तके ऊपर भी मुक्त जीवकी गति क्यों नहीं होती ? (क्योंकि ऊर्ध्व गति खभाव होनेसे सर्वथा चलाही जाना चाहिये ) अब इस विषयमें कहते हैं कि लोकान्तसे ऊपर धर्मास्तिकाय पदार्थका अभाव है। क्योंकि ध- मास्तिकाय जीव और पुद्गलोकी गतिमें उपकार करता है, अर्थात् दोनोंकी गतिमें सह- कारी कारण है। वह धर्मास्तिकाय वहां ( लोकान्त वा लोकाकाशके ऊपर) नही है इससे गतिमें उपग्रह ( सहकारी कारण) कारणके अभावसे लोकान्तसे वह जीवकी गति ऐसे नहीं होती जैसे जलमें ऊर्ध्व तलसे परे अलाबू (तितलौकी वा तुंबेके फल) की गति न अधोभागमें हो न तिर्यग् भागमें, यह सब विषय पूर्वप्रसङ्गमे कह चुके हैं; किन्तु उसी लोकान्तमें यह मुक्त जीव अनुश्रेणि गतिसे. निःक्रिय (कर्मरहित) होकर स्थित रहता है ॥ ६॥ क्षेत्रकालगतिलिङ्गतीर्थचारित्रप्रत्येकवुद्धबोधितज्ञानावगाहनान्तरसं- ख्याल्पबहुत्वतः साध्याः ॥७॥ क्षेत्रं कालः गतिः लिङ्ग तीर्थ चारित्रं प्रत्येकबुद्धबोधितः ज्ञानमवगाहना अन्तरं संख्या अल्पबहुत्वमित्येतानि द्वादशानुयोगद्वाराणि सिद्धस्य भवन्ति । एभिः सिद्धः साध्योऽनुग- म्यश्चिन्त्यो व्याख्येय इत्येकार्थत्वम् । तत्र पूर्वभावप्रज्ञापनीयः प्रत्युत्पन्नभावप्रज्ञापनीयश्च द्वौ नयौ भवतः । तत्कृतोऽनुयोगविशेषः । तद्यथा । सूत्रार्थ-वि०व्या०-क्षेत्र १ काल २ गति ३ लिङ्ग४ तीर्थ ५ चारित्र ६प्रत्येकबुद्धबोधित ७ ज्ञान ८ अवगाहना ९ अन्तर १० संख्या ११ तथा अल्प बहुत्व ये द्वादश १२ सि- द्धके अनुयोग द्वार ( व्याख्याके द्वार) होते है । इन बारह अनुयोग द्वारोंसे सिद्ध साध्य साधने योग्य), अनुगम्य (जानने योग्य ), चिन्त्य (विचारके योग्य) तथा व्याख्येय (व्या- ख्या करने योग्य) होता है यह सब एकार्थवाचक शब्द है। उसमें पूर्व भाव प्रज्ञाप- नीय (पूर्व कालके भाव जताने योग्य ) तथा प्रत्युत्पन्नभावप्रज्ञापनीय (वर्तमान समय- में उत्पन्न भाव जताने योग्य ) ये दो नय होते है। उन दोनों नयोंसे किया हुआ अनुयोग विशेष होता है। जैसे:- । क्षेत्रम् । कस्मिन् क्षेत्रे सिद्ध्यतीति । प्रत्युत्पन्नभावप्रज्ञापनीयं प्रति सिद्धिक्षेत्रे सिद्ध्यति । पूर्व- भावप्रज्ञापनीयस्य जन्म प्रतिपञ्चदशसु कर्मभूमिषु जातः सिद्ध्यति । संहरणं प्रति मानुपक्षेत्रे सिद्ध्यति । तत्र प्रमत्तसंयताः संयतासंयताश्च संहियन्ते । श्रमण्यपगतवेद. परिहारविशुद्धिसं- यतः पुलाकोऽप्रमत्तश्चतुर्दशपूर्वी आहारकशरीरीति न संहियन्ते । अजुमूत्रनयः शब्दादय. श्व त्रयः प्रत्युत्पन्नभावंप्रज्ञापनीयाः शेपा नया उभयभावं प्रज्ञापयन्तीति ।। क्षेत्र (के विषयमें)। किस क्षेत्रमें सिद्ध होता है यह; प्रत्युत्पन्नभावज्ञापनीय नयके प्रति २३२ रायचन्द्रजैनशाखमालायाम् है कि सिद्ध क्षेत्रमें सिद्ध होता है, अर्थात् सिद्ध क्षेत्रमे यह जीव सिद्ध, अवस्थाको प्राप्त होता है । और पूर्वभाव ज्ञापनीय नयका (विषय ) जन्मके प्रति जसे पश्चदश कर्मभूमि- योंमें उत्पन्न सिद्धताको प्राप्त होता है । संहरणके प्रति जैसे मानुप क्षेत्रमें सिद्ध होता है। 'उसमें प्रयत्नसंपन्न तथा संयतासंयत समाहृय होते हैं । श्रमणी, अपगतवेद (वेदरहित ), परिहारविशुद्धिसंयत, पुलाक, अप्रमत्त, चतुर्दशपूर्वी तथा आहारक शरीरवाले नहीं समाहृत होते । ऋजुसूत्रनय और शब्द आदि (शब्द, समभिरुढ, और एवंभूत) तीन नय प्रत्युत्पन्नभावज्ञापनीय हैं । और शेप नय अर्थात् नैगम, संग्रह और व्यवहार नय उभय भाव अर्थात् पूर्व भाव और प्रत्युपन्न भावको भी ज्ञापन (वोधन ) करते है। कालः । अत्रापि नयद्वयम् । कस्मिन्काले सिद्ध्यतीति । प्रत्युत्पन्नभावप्रजापनीयन्य अकाले सिद्धयति । पूर्वभावप्रज्ञापनीयस्य जन्मतः संहरणतश्च । जन्मतोऽवसर्पिण्यामुत्सर्पिण्यामन- वसर्पिण्युत्सर्पिण्यां च जातः सिद्धयति । एवं तावदविशेषतः । विशेषतोऽप्यवसर्पिण्या मुप. मदुःषमायां संख्येयेषु सर्वेषु शेषेषु जातः सिद्धयति । दुःपमसुपमायां सर्वस्यां सिध्यति दुःपमसु. षमायां जातो दुषमायां सिध्यति न तु दुःपमायां जातः सिध्यति अन्यत्र नेव सिध्यति । संहरणं प्रति सर्वकालेववसर्पिण्यामुत्सर्पिण्यामनवसर्पिण्युत्सर्पिण्यां च सिध्यति ।। काल (के विषयमें ) इस विषयमें भी दो नय है । किस काल अर्थात् किस समयमें सिद्ध होता है । प्रत्युत्पन्नभावज्ञापनीय नयके विषयसे अकालमें सिद्ध होता है। और पूर्वभावज्ञापनीय नयके बलसे जन्मसे तथा संहरणसे भी (सिद्ध होता है) जन्मसे अव- सर्पिणी, उत्सर्पिणी, तथा अनवसर्पिणी कालमें उत्पन्न जीव सिद्ध होता है। इस रीतिसे अविशेष रूपसे (सिद्धताका वर्णन हुआ) और विशेषरूपसे अवसर्पिणीमे सुपम दुःप- मा कालमे शेष सङ्केय वर्षों में उत्पन्न हुआ जीव सिद्ध होता है; और दुःपमलुपमामें सब कालमें सिद्ध होता है; तथा दुःपमसुषमामे उत्पन्न प्राणी दुःपमामे सिद्ध होता है, न कि दुःषमामे उत्पन्न सिद्ध होता है। इसके अतिरिक्त अन्य कालमें नहीं सिद्ध होता, और सं- हरणके प्रति सब कालमें अर्थात् अवसर्पिणी, उत्सर्पिणी तथा अनवसर्पिणीमे भी सिद्ध होता है। गतिः । प्रत्युत्पन्नभावप्रज्ञापनीयस्य सिद्धिगत्यां सिध्यति । शेपास्तु नया द्विविधा अन- न्तरपश्चात्कृतगतिकश्च एकान्तरपश्चात्कृतगतिकश्च । अनन्तरपश्चात्कृतगतिकस्य मनुष्यगत्यां सिध्यति । एकान्तरपश्चात्कृतगतिकस्याविशेषेण सर्वगतिभ्यः सिध्यति ।। गति (के विषयमें ) । प्रत्युत्पन्नभावज्ञापनीय नयके अनुसार सिद्धिगतिमें सिद्ध होता है। और शेप नय दो प्रकारके है, अनन्तर तथा पश्चात् जिसने गति किया है वह, और एक अन्तर करके जिसने गति किया है वह । अनन्तरपश्चात्कृतगतिक मनुष्यगतिमे सिद्ध होता है । और एकान्तरपश्चात्कृतगतिककी गतिमें तो अविशेष रूपसे सव गतिसे सिद्ध होता है।

1 सभाष्यतत्त्वार्थाधिगमसूत्रम् । २३३ लिङ्ग स्त्रीपुनपुंसकानि । प्रत्युत्पन्नभावप्रज्ञापनीयस्यावेदः सिध्यति । पूर्वभावप्रज्ञापनीय- स्थानन्तरपश्चात्कृतगतिकस्य परम्परपश्चात्कृतगतिकस्य च त्रिभ्यो लिनेभ्यः लिष्यति । लिङ्ग स्त्री, पुरुष, तथा नपुंसक इन भेदोंसे तीन प्रकारके हैं । प्रत्युत्पन्नभावज्ञापनीय नयके अनुसार अवेद अर्थात् स्त्रीवेद पुंवेद तथा नपुंसक वेद, इन तीनों वेदोंसे रहित सिद्ध होता है। और पूर्वभावज्ञापनीयके अनुसार अनन्तरपश्चात्कृतगतिककी और परम्परपश्चात्कृतगतिककी गतिमें तीनो लिङ्गोंसे सिद्ध होता है । तीर्थम् । सन्ति तीर्थकरसिद्धाः तीर्थकरतीर्थे नोतीर्थकरसिद्धाः तीर्थकरतीर्थेऽतीर्थकरसि- द्धाः तीर्थकरतीर्थे । एवं तीर्थकरीतीर्थे सिद्धा अपि ॥ तीर्थ (के विषयमें )। तीर्थकर सिद्ध तीर्थकरतीर्थमें हैं, नोतीर्थ (ईषत्तीर्थकर) सिद्ध ती- थकरतीर्थमें होते हैं, अतीर्थकर सिद्ध तीर्थकरतीर्थमें होते है । और इसी रीतिसे तीर्थ- करीतीर्थमें भी सिद्ध होते है। लिङ्गे पुनरन्यो विकल्प उच्यते । द्रव्यलिङ्गभावलिङ्गमलिङ्गमिति प्रत्युत्पन्नभावप्रज्ञा- पनीयस्यालिङ्गः सिध्यति । पूर्वभावप्रज्ञापनीयस्य भावलिङ्गं प्रति स्वलिङ्गे सिध्यति । द्रव्य- लिङ्गं त्रिविधं स्वलिङ्गमन्यलिङ्गं गृहिलिङ्गमिति तत्प्रतिभाज्यम् । सर्वस्तु भावलिङ्गं प्राप्तः सिध्यति॥ अब लिङ्गके विषयमें पुनः दूसरा यह विकल्प कहते हैं । जैसे द्रव्यलिङ्ग, भावलिङ्ग और अलिङ्ग, इनमें प्रत्युत्पन्न ज्ञापनीय नयके अनुसार तो अलिङ्ग (लिङ्गरहित) सिद्धताको प्राप्त होता है । और पूर्वभावज्ञापनीय नयके अनुसार भावलिङ्गके प्रति निजलिङ्गमें सिद्ध होता है। द्रव्यलिङ्गके तीन भेद है, जैसे निजलिङ्ग अर्थात् अपना लिङ्ग, अन्यलिङ्ग (अलोकालि- ङ्ग) और गृहिलिङ्ग, उसका प्रति भाग करना चाहिये । और भावलिङ्गमे प्राप्त तो सवही सिद्धताको प्राप्त होता है। चारित्रम् । प्रत्युत्पन्नभावप्रज्ञापनीयस्य नोचारित्री नोऽचारित्री सिध्यति । पूर्वभावप्रज्ञाप- नीयो द्विविधः अनन्तरपश्चात्कृतिकश्च परम्परपश्चात्कृतिकश्च । अनन्तरपश्चात्कृतिकस्य यथा- ख्यातसंयतः सिध्यति । परम्परपश्चात्कृतिकस्य व्यजितेऽव्यञ्जिते च । अव्यजिते त्रिचारि- त्रपश्चात्कृतश्चतुश्चारित्रपश्चात्कृतः पञ्चचारित्रपश्चात्कृतश्च । व्यञ्जिते सामायिकसूक्ष्मसांपरा- यिकयथाख्यातपश्चात्कृतसिद्धाः छेदोपस्थाप्यसूक्ष्मसम्पराययथाख्यातपश्चात्कृतसिद्धाः सामा- यिकच्छेदोपस्थाप्यसूक्ष्मसम्पराययथाख्यातपश्चात्कृतसिद्धाः छेदोपस्थाप्यपरिहारविशुद्धिसू- क्ष्मसम्पराययथाख्यातपश्चात्कृतसिद्धाः सामायिकच्छेदोपस्थाप्यपरिहारविशुद्धिसूक्ष्मसम्परा- ययथाख्यातपश्चात्कृतसिद्धाः ।। चारित्र (के विषयमें )। प्रत्युत्पन्न भाव ज्ञापनीयके अनुसार नोचारित्र तथा नोअचारित्र सिद्ध होते हैं। और पूर्व भाव ज्ञापनीय दो प्रकारका है, एक तो अनन्तरपश्चात्कृतिक और दूसरा परम्परपश्चात्कृतिक । उसमे अनन्तरपश्चात्कृतिकके अनुरोधसे यथा- -५ , रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् २३४ ख्यातसंयत (यथाख्यातसंयम चारित्रवाला) सिद्ध होता है । परम्परपश्चात्कृतिकके व्यञ्जित तथा अव्यञ्जित ये दो भेद होते हैं। उसमें अव्यजितमें त्रिचारित्रपश्चात्कृत, चतुश्चा- रित्रपश्चात्कृत तथा पञ्चचारित्रपश्चात्कृत होते हैं । और व्यजितमें सामायिक सूक्ष्म सां- 'परायिक तथा यथाख्यातपश्चात्कृत सिद्ध होते है, तथा छेदोपस्थाप्य सूक्ष्म सम्पराय तथा - यथाख्यातपश्चात्कृत सिद्ध, सामायिक छेदोपस्थाप्य सूक्ष्म सम्पराय तथा यथाख्यात पश्चा- स्कृत सिद्ध, ऐसेही छेदोपस्थाप्य परिहारविशुद्धि सूक्ष्म सम्पराय तथा यथाख्यात पश्चात्कृ- त सिद्ध, और इसी रीतिसे सामायिक, छेदोपस्थाप्य, परिहारविशुद्धि, सूक्ष्मसम्पराय तथा यथाख्यात पश्चात्कृत सिद्ध होते हैं । ( इस प्रकार क्रमसे त्रिचारित्रपश्चात्कृत, चतुश्चा- रित्रपश्चात्कृत तथा पञ्चचारित्रपश्चात्कृत व्यञ्जित भेदमें दर्शाये गये।) प्रत्येकवुद्धबोधितः । अस्य व्याख्याविकल्पश्चतुर्विधः । तद्यथा । अस्ति स्वयंवुद्धसिद्धः । स द्विविधः अर्हश्च तीर्थकरः प्रत्येकवुद्धसिद्धश्च । बुद्धवोधितसिद्धाः त्रिचतुर्थो विकल्पः परवोध- कसिद्धाः स्वेष्टकारिसिद्धाः ।। प्रत्येक-वुद्ध-बोधित (के विषयमें)। इसका अर्थात् प्रत्येक-वुद्ध-बोधितकी व्याख्याका विकल्प ( भेद ) चार प्रकारका है। जैसे स्वयंसिद्ध बुद्ध प्रसिद्ध प्रथम भेद है । उसके (अर्थात् स्वयंवुद्ध सिद्धके ) दो भेद है, एक तो अर्हन् तीर्थकर भगवान् और द्वितीय प्रत्येकवुद्धसिद्ध ) द्वितीय वुद्धबोधितसिद्ध (बुद्धसे बोधन किये हुए सिद्ध) और तृतीय तथा चतुर्थ भेद परबोधकसिद्ध (दूसरोंको बोध करनेवाले सिद्ध) और स्वेष्टकारि- सिद्ध, अर्थात् अपना इष्ट सिद्ध करनेवाले सिद्ध ये चार भेद सिद्धोंके हैं। ज्ञानम् । अत्र प्रत्युत्पन्नभावप्रज्ञापनीयस्य केवली सिद्ध्यति । पूर्वभावप्रज्ञापनीयो द्विविधः अनन्तरपश्चात्कृतिकश्च परम्परपश्चात्कृतिकश्च अव्यजिते च व्यतिते च । अव्यतिते द्वाभ्यां ज्ञानाभ्यां सिध्यति । त्रिभिश्चतुभिरिति । व्यञ्जिते द्वाभ्यां मतिश्रुताभ्याम् । त्रिभिर्मतिश्रुता- वधिभिर्मतिश्रुतमनःपर्यायैर्वा । चतुभिर्मतिश्रुतावधिमनःपर्यायैरिति ।। ज्ञान (के विषयमे )। इस विषयमे प्रत्युत्पन्न भाव ज्ञापनीयके अनुरोधसे केवली (के- वलज्ञान-सहित ) सिद्ध होता है । और पूर्वभाव-ज्ञापनीय दो प्रकारका है । अनन्तर- पश्चात्कृतिक, तथा परम्परपश्चात्कृतिक । इसमें भी अव्यजित तथा व्यञ्जित ये दो भेद समझने । अव्यञ्जितमें तो दो ज्ञानोंसे सिद्ध होता है । तीन और चारसे भी (सिद्ध होता है ) । व्यजितमें दो से अर्थात् मतिज्ञान और श्रुतज्ञानसे । तीनसे मति, श्रुत तथा अवधि ज्ञानसे, अथवा मति श्रुत और मनःपर्यायसे सिद्ध होता है। और चारसे मति, श्रुत, अवधि, और मनःपर्यायसे सिद्ध होता है। अवगाहना । कः कस्यां शरीरावगाहनायां वर्तमानः सिध्यति । अवगाहना द्विविधा उत्कृ- घा जयन्या च । उत्कृष्टा पञ्चधनुःशतानि धनुःपृथक्त्वनाभ्यधिकानि । जघन्या सप्तरत्नयोऽ- सभाष्यतस्वार्थाधिगमसूत्रम् । २३५ कुलपृथक्त्वे हीनाः । एतासु शरीरावगाहनासु सिध्यति। पूर्वभावप्रज्ञापनीयस्य प्रत्युत्पन्नभावप्र- ज्ञापनीयस्य तु एताखेव यथाखं त्रिभागहीनासु सिध्यति॥ अवगाहना ( के विषयमें )। कौन जीव किस अवगाहनामें वर्तमान होके सिद्ध होता है ( अर्थात् किस प्रकारके शरीरमें व्याप्त होकर सिद्ध होता है, यह अवगाहनाका आशय है) वह अवगाहना दो प्रकारकी है, एक उत्कृष्टा अवगाहना, अर्थात् उत्तम अवगाहना और दूसरी निकृष्ट अर्थात् नीच वा हीन अवगाहना । उसमें उत्कृष्ट तो धनुःपृथक्त्व अ- धिक पंचधनुःशत अर्थात् पांच सौ धनुष प्रमाणकी होती है । और जघन्या तो अङ्गुल पृथक्त्व हीन अर्थात् अङ्गुलपृथक्त्वसे (प्रमाणविशेषसे ) कम सप्त अरनिप्रमाण (प्रमाण- विशेष ) की होती है । सो पूर्वभावज्ञापनीय नयके अनुसार इन पूर्वोक्त शरीर अवगा- हनाओंमें, अर्थात् पूर्वकथित प्रमाणसहित शरीरों में व्याप्त जीव सिद्ध होता है। और प्रत्युत्पन्नभावज्ञापनीयके अनुसार तो त्रिभागहीन, इन्हीं शरीरावगाहनाओंमें यथाक्रम सिद्ध होता है। अन्तरम् । सिध्यमानानां किमन्तरम् । अनन्तरं च सिध्यन्ति सान्तरं च सिध्यन्ति । तत्रानन्तरं जघन्येन द्वौ समयौ उत्कृष्टेनाष्टौ समयान् । सान्तरं जघन्येनैकं समयं उत्कृष्टेन षण्मासा इति ।। अन्तर (के विषयमें)। सिद्ध होनेवालोंका अर्थात् सिद्धता दशाको प्राप्त होनेवाले जीवोंका क्या अन्तर (फर्क वा अन्तराल) है यही अन्तरसे तात्पर्य है। उसमें ऐसा समझना चाहिये कि अनन्तरदशामें भी सिद्धताको प्राप्त होता है, और सान्तर (अन्तर- सहित) दशामें भी सिद्ध होता है । उसमें जघन्य (निकृष्ट ) रूपसे दो समय, और उ- स्कृष्टतासे आठ समय (सूक्ष्म कालके भाग) का ग्रहण होता है । और सान्तर जघन्य (निकृष्ट ) रूपसे एक समय और उत्कृष्टतासे षट् मास (छः महीने) ग्रहण करने चाहिये। सङ्खथा । कत्येकसमये सिध्यन्ति । जघन्येनैक उत्कृष्टेनाष्टशतम् ।। संख्या ( के विषयमें )। कितने एक समयमें सिद्ध होते है ? । जघन्यरूपसे तो एकका ग्रहण है, और उत्कृष्टतासे अष्टशत अर्थात् आठसौ (८००) का ग्रहण है। अल्पबहुत्वम् । एषां क्षेत्रादीनामेकादशानामनुयोगद्वाराणामल्पवहुत्वं वाच्यम् । तद्यथा । अल्प बहुत्वके (विषयमें) । इन क्षेत्र काल आदि एकादश अर्थात् ग्यारह ११ अनुयोग- द्वारोंका अल्प बहुत्व (न्यूनत्व तथा अधिकत्व) कहना चाहिये । वह इस प्रकारसे:- • क्षेत्रसिद्धानां जन्मतः संहरणतश्च कर्मभूमिसिद्धाश्चाकर्मभूमिसिद्धाश्च सर्वस्तोकाः संहर- णसिद्धाः जन्मतोऽसङ्खयेयगुणाः । संहरणं द्विविधम् परकृनं स्वयंकृतं च । परकृतं देवकर्मणा चारणविद्याधरैश्च । स्वयंकृतं चारणविद्याधराणामेव । एपां च क्षेत्राणां विभागः कर्मभूमि- रकर्मभूमिः समुद्रा द्वीपा ऊर्ध्वमस्तिर्यगिति लोकत्रयम् । तत्र सर्वस्तोका ऊर्ध्वलोकसिद्धाः २३६ रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् अधोलोकसिद्धाः सङ्घयेयगुणाः तिर्यग्लोकसिद्धाः सङ्घयेयगुणाः सर्वस्तोकाः समुद्रसिद्धाः द्वीपसिद्धाः सङ्येयगुणाः । एवं तावदव्यञ्जिते व्यश्चितेऽपि सर्वस्तोका लवणसिद्धाः कालो- दसिद्धाः सङ्घयेयगुणा जम्बूद्वीपसिद्धाः सङ्ख्यगुणा धातकीखण्डसिद्धाः सङ्ख्येयगुणाः पुष्क- रासिद्धाः सङ्ख्येयगुणा इति ॥ क्षेत्रसिद्धोंके जन्मसे तथा संहरणसे कर्मभूमिसिद्ध और अकर्मभूमिसिद्ध सर्व स्तोक (व्याप्त करते है) और संहरणसिद्ध जन्मकी अपेक्षासे सङ्ख्येय गुण है । संह- रण भी दो प्रकारका है, एक तो परकृत संहरण और दूसरा स्वयंकृत संहरण । उसमें पर- कृत संहरण देवोंके कमसे चारण तथा विद्याधरोंके द्वारा । और स्वयंकृत संहरण चारण तथा विद्याधरोंका ही होता है । इनके क्षेत्रोंका विभाग कर्ममूमि, अकर्मभूमि, द्वीप, समुद्र, ऊर्ध्वभाग, अधोभाग, तथा तिर्यक् इस रीतिसे तीनों लोक है। उसमें सर्वस्तोक ऊर्ध्व- लोकसिद्ध अधोलोकसिद्ध सङ्खयेय गुण है, तिर्यगलोकसिद्ध सङ्घयेय गुण, और सर्वत्तोक, समुद्रसिद्ध, द्वीपसिद्ध संख्येयगुण हैं। इस प्रकार अव्यञ्जित (अव्यक्त वा सामान्य ) रूपमें विभाग वर्णन हुआ, और व्यञ्जित (व्यक्त स्पष्ट वा विशेष ) रूपसे भी सर्वस्तोक, लवणसिद्ध तथा कालोदसिद्ध सङ्खयेय गुण है। जंबूद्वीपसिद्ध सङ्ख्येय गुण, धातकीखण्डसिद्ध संख्येयगुण, तथा पुष्करार्द्धसिद्ध सङ्ख्येय गुण होते है। काल इति त्रिविधो विभागो भवति अवसर्पिणी उत्सर्पिणी अनवसर्पिण्युत्सर्पिणीति । अत्र सिद्धानां (व्यञ्जितानां) व्यजितान्यजितविशेषयुक्तोऽल्पवहुत्वानुगमः कर्तव्यः । पूर्व- भावप्रज्ञापनीयस्य सर्वस्तोका उत्सर्पिणीसिद्धा अवसर्पिणीसिद्धा विशेषाधिका अनवसर्पिण्यु- त्सर्पिणीसिद्धाः सङ्ख्ययगुणा इति । प्रत्युत्पन्नभावप्रज्ञापनीयस्याकाले सिध्यति । नास्त्यल्प- बहुत्वम् । काल इसका तीन प्रकारका विभाग होता है। जैसे अवसर्पिणी, (नीचेकी ओर आ- नेवाली कालकी गति), उत्सर्पिणी (ऊपरकी ओर चढ़नेवाली कालकी गति ) तथा अनव- सर्पिणी-उत्सर्पिणी अब इसमें यहांपर सिद्धोंका व्यञ्जित सिद्धोंका व्यञ्जित तथा अव्य- जित विशेपोंकरके सहित अल्प तथा वहुत्वका अनुगम ( विशेष प्रमाणसहित अनुभव) करना चाहिये । पूर्वभावज्ञापनीयके अनुसार सर्वस्तोक (व्याप्त) उत्सर्पिणीसिद्ध (उत्सर्पिणी वरूप कालम सिद्ध होनेवाले जीव ) अवसर्पिणीसिद्ध (अवसर्पिणी स्व. रूप कालमें होनेवाले सिद्ध जीव )विशेप अधिक है, तथा अनवसर्पिणी उत्सर्पिणी सिद्ध सायगुण हैं। और प्रत्युत्पन्नज्ञापनीय नयके अनुरोधसे अकालमे सिद्ध होते हैं । इस नयी अपेक्षा अल्य बहुत्व नहीं है । गनिः । प्रन्युत्पन्नभावनापनीयस्य सिद्धिगतौ सिध्यति । नास्त्यल्पवहुत्वम् । पूर्वभावप्र- नारम्यानन्तरपश्चात्कृतिकस्य मनुष्यगतो सिध्वति । नास्त्यल्पवहुत्वत् । परम्परपश्चात्क- सभाष्यतत्त्वार्थाधिगमसूत्रम् । २३७ तिकस्यानन्तरा गतिश्चिन्त्यते । तद्यथा । सर्वस्तोकास्तिर्यग्योन्यनन्तरगतिसिद्धा मनुष्येभ्योऽ नन्तरगतिसिद्धाः सङ्घयेयगुणा नारकेभ्योऽनन्तरगतिसिद्धाः सङ्खयेयगुणा देवेभ्योऽनन्तर गतिसिद्धाः सङ्खयेयगुणा इति । गति (के विषयमें ) । प्रत्युत्पन्नभावज्ञापनीयके अनुसार सिद्ध गतिमे सिद्ध होता है। इस रीतिसे इस नयकी अपेक्षा अल्प बहुत्व नहीं है । और अनन्तरपश्चात्कृतिकरूप पूर्व- भावज्ञापनीयके अनुसार तो मनुष्यगतिमें सिद्ध होता है । इस प्रकार इसमे भी अल्प बहुत्व नही है । और परम्परपश्चात्कृतिककी अनन्तरगतिका विचार करते है। वह इस प्रकारसे है। सर्वस्तोक, तिर्यक्योनि अनन्तरगतिसिद्ध होते हैं, अनन्तरगतिसिद्ध म- नुष्योंसे संख्येय गुण है तथा नारक जीवोंसे अनन्तरगतिसिद्ध सङ्खयेय गुण होते है और देवोंसे भी अनन्तरगतिसिद्ध सङ्खयेयं गुण होते है । लिङ्गम् । प्रत्युत्पन्नभावप्रज्ञापनीयस्य व्यपगतवेदः सिध्यति । नास्त्यल्पबहुत्वम् । पूर्वभाव- प्रज्ञापनीयस्य सर्वस्तोका नपुंसकलिङ्गसिद्धाः स्त्रीलिङ्गसिद्धाः सङ्खयेयगुणाः पुल्लिङ्गसिद्धाः सङ्खधेयगुणा इति ॥ लिङ्ग ( के विषयमें अल्प बहुत्व)। प्रत्युत्पन्न ज्ञापनीयके अनुसार अपगतवेद (वेद अ- र्थात् स्त्रीपुंनपुंसक लिङ्गशून्य ) सिद्ध होता है । इसका अल्प बहुत्व नही है। और पूर्वभावज्ञापनीयकी रीतिसे सर्वस्तोक नपुंसकलिङ्गसिद्ध, तथा स्त्रीलिङ्ग सिद्ध सङ्खयेय गुण होते है। और पुंल्लिङ्ग सिद्ध भी सङ्ख्येय गुण है । तीर्थम् । सर्वस्तोकाः तीर्थकरसिद्धाः तीर्थकरतीर्थे नोतीर्थकरसिद्धाः सङ्घयेयगुणा इति । तीर्थकरतीर्थसिद्धा नपुंसकाः सङ्खधेयगुणाः। तीर्थकरतीर्थसिद्धाः स्त्रियः सङ्ख्येयगुणाः । तीर्थकरतीर्थसिद्धा पुमांसः सङ्खयेयगुणा इति ॥ तीर्थ (के विषय अल्प बहुत्व) । सर्वस्तोक ( सम्बन्धी ) तीर्थंकर सिद्ध तीर्थकरतीर्थ- में नोतीर्थकर सिद्ध सङ्खयेय गुण है । तीर्थकरतीर्थसिद्ध नपुंसक सङ्खयेय गुण है । ती- र्थकरतीर्थसिद्ध स्त्रियां भी सङ्घचेय गुण है। तथा तीर्थकरसिद्ध पुरुष भी सवयेय गुण होते है। चारित्रम् । अत्रापि नयौ द्वौ प्रत्युत्पन्नभावप्रज्ञापनीयश्च पूर्वभावप्रज्ञापनीयश्च । प्रत्युत्पन्न- भावप्रज्ञापनीयस्य नोचारित्री नोअचारित्री सिध्यति । नास्त्यल्पवहुत्वम् । पूर्वभावप्रज्ञाप- नीयस्य व्यञ्जिते चाव्यजिते च । अव्यञ्जिते सर्वस्तोकाः पञ्चचारित्रसिद्धाश्चतुश्चारित्रसिद्धाः सङ्खधेयगुणात्रिचारित्रसिद्धाः सङ्खधेयगुणाः । व्यजिते सर्वस्तोकाः सामायिकच्छेदोपस्था प्यपरिहारविशुद्धिसूक्ष्मसम्पराययथाख्यातचारित्रसिद्धाः छेदोपस्थाप्यपरिहारविशुद्धिसूक्ष्मस- म्पराययथाख्यातचारित्रसिद्धाः सङ्खयेयगुणाः सामायिकच्छेदोपस्थाप्यसूक्ष्मसम्पराययथा- ख्यातचारित्रसिद्धाः सङ्खयेयगुणाः सामायिकपरिहारविशुद्धिसूक्ष्मसम्पराययथाख्यातसिद्धाः , रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् २३८ सङ्खधेयगुणाः सामायिकसूक्ष्मसम्पराययथाख्यातचारित्रसिद्धाः सङ्घधेयगुणाः । छेदोपस्थाप्य- सूक्ष्मसम्पराययथाख्यातचारित्रसिद्धाः सङ्खधेयगुणाः । चारित्र (के विषयमें अल्प बहुत्व)। यहां भी दो नय अर्थात् प्रत्युत्पन्नभाव ज्ञापनीय तथा पूर्वभावज्ञापनीय योजित करना ( लगाना ) चाहिये । प्रत्युत्पन्नभावज्ञापनीय नयके अनुसार नोचारित्र (पुरुष) तथा नो चारित्री (स्त्री) वा नो अचारित्र सिद्ध होते है। इसकी अपेक्षा अल्प बहुत्व नही है । और पूर्वभावज्ञापनीयके अनुसार व्यजित तथा अव्यजितमें भी । उसमें अव्यजितमें सर्वस्तोक पञ्चचारित्र सिद्ध तथा चतुश्चारित्र सिद्ध सङ्खयेय गुण होते है । तथा त्रिचारित्र सिद्ध भी सङ्ख्येय गुण होते हैं। और व्यजित ( व्यक्त) रूपमें सर्वस्तोक ( सम्बन्धी ) सामायिक, छेदोपस्थाप्य, परिहारविशुद्धि, सूक्ष्मसम्पराय, तथा यथाख्यात एतत्पंच चारित्र सिद्ध, तथा छेदोपस्थाप्य, परिहारविशुद्धि, सूक्ष्मसम्पराय तथा यथाख्यात, एतत् चतुश्चारित्र सिद्ध संख्येय गुण होते हैं । तथा सामायिक, छेदो- पस्थाप्य, सूक्ष्मसम्पराय और यथाख्यात, एतत् खरूप चतुश्चारित्र सिद्ध संख्येय गुण होते है । तथा सामायिक परिहारविशुद्धि, सूक्ष्मसम्पराय, तथा यथाख्यात एतत्स्वरूप च- तुश्चारित्र सिद्ध सङ्ख्य गुण होते हैं। तथा सामायिक, सूक्ष्मसंपराय और यथाख्यात एतत्स्वरूप त्रिचारित्रसिद्ध सङ्ख्येय गुण होते है । अथवा छेदोपस्थाप्य, सूक्ष्मसंपराय तथा यथाख्यात एतत्स्वरूप त्रिचारित्र सिद्ध सङ्ख्य गुण होते हैं। प्रत्येकबुद्धवोधितः । सर्वस्तोकाः प्रत्येकबुद्धसिद्धाः । बुद्धबोधितसिद्धा नपुंसकाः सङ्घये- यगुणाः । बुद्धबोधितसिद्धाः खियः सङ्खयेयगुणाः । बुद्धवोधितसिद्धाः पुमांसः सङ्घयेयगुणा इति। प्रत्येक वुद्ध बोधित (के विषयमें अल्प बहुत्व ) । सर्वस्तोक ( सम्बन्धी ) प्रत्येकवुद्ध- सिद्ध होते हैं । और बुद्धबोधित सिद्ध नपुंसक सङ्ख्य गुण होते है। तथा बुद्धवोधित अर्थात् बुद्ध सिद्धोंसे बोध कराई हुई स्त्री सिद्ध (सिद्धता दशा प्राप्त स्त्रियां ) भी सय गुण होती हैं । और बुद्धबोधित पुरुष सिद्ध भी सङ्ख्य गुण होते हैं। ज्ञानम् । कः केन ज्ञानेन युक्तः सिध्यति । प्रत्युत्पन्नभावप्रज्ञापनीयस्य सर्वः केवली सिध्यति । नास्त्यल्पवहुत्वम् । पूर्वभावप्रज्ञापनीयस्य सर्वस्तोका द्विज्ञानसिद्धाः चतुर्ज्ञानसिद्धाः सङ्घययगुणाः त्रिज्ञानसिद्धाः सङ्ख्येयगुणाः । एवं तावदव्यजिते व्यजितेऽपि सर्वस्तोका मतिश्रुतज्ञानसिद्धाः मतिश्रुतावधिमनःपर्यायज्ञानसिद्धाः सङ्खयेयगुणाः मतिश्रुतावधिज्ञान- सिद्धाः सङ्घयेयगुणाः ॥ ज्ञान ( के विषयमें अल्प बहुत्वका विचार )। कौन किस ज्ञान युक्त ( सहित ) सिद्ध होता है । प्रत्युत्पन्न भाव ज्ञापनीय नयके अनुसार सब केवली (केवल ज्ञान युक्त )सिद्धता- को प्राप्त होता है । इसकी अपेक्षासे अल्प बहुत्व भाव नहीं है । और पूर्व भाव ज्ञापनीय- सभाष्यतत्त्वार्थाधिगमसूत्रम् । २३९ के अनुसार सर्व लोक द्विज्ञान ( दो ज्ञानोंसे युक्त होनेसे ) सिद्ध तथा चतुर्ज्ञानसिद्ध सं- ख्येय गुण होते हैं। ऐसेही त्रिज्ञान (तीन ज्ञानोंसे युक्त होनेसे ) सिद्ध सङ्खयेय गुण होते हैं । इस प्रकार तो अव्यञ्जित रूपसे अर्थात् अविशेष रूपसे निरूपण हुआ और व्यजित रूपसे भी सर्व लोक मतिज्ञान श्रुतज्ञान सिद्ध, तथा मति, श्रुत, अवधि तथा मनःपर्याय ज्ञान सिद्ध सङ्ख्येय गुण होते हैं । ऐसेही मति, श्रुत, तथा अवधि ज्ञान, (एतद्रूप त्रिज्ञान ) सिद्ध सङ्खयेय गुण होते हैं। अवगाहना । सर्वस्तोका जघन्यावगाहनासिद्धाः उत्कृष्टावगाहनासिद्धास्ततोऽसङ्खयेयगुणाः यवमध्यसिद्धा असङ्खयेयगुणाः यवमध्योपरिसिद्धा असङ्खयेयगुणाः यवमध्याघस्तात्सिद्धा विशेषाधिकाः सर्वे विशेषाधिकाः ॥ अवगाहना (के विषयमें अल्प बहुत्वका विचार ) । सर्वस्तोक जघन्य अवगाहना सिद्ध होते है । और उत्कृष्ट अवगाहना सिद्ध उनसे असङ्खयेय गुण होते हैं । तथा यवमध्य- सिद्ध असङ्खयेय गुण होते है, यवमध्योपरि (जवके मध्यके उपरि भाग प्रमाण शरीरको अवगाहन करनेवाले ) सिद्ध भी असङ्ख्येय गुण होते हैं और यवके मध्य तथा अ- धोभाग सिद्ध विशेषाधिक (असङ्ख्येय ) गुण वा सब विशेष अधिक इस रीतिसे होते हैं। अन्तरम् । सर्वस्तोका अष्टसमयानन्तरसिद्धाः सप्तसमयानन्तरसिद्धाः षट्समयानन्तर- सिद्धा इत्येवं यावद्भिसमयानन्तरसिद्धा इति सङ्खयेयगुणाः । एवं तावदन्तरेषु सान्तरेष्वपि सर्वस्तोकाः षण्मासान्तरसिद्धाः एकसमयान्तरसिद्धाः सङ्खधेयगुणाः यवमध्यान्तरसिद्धाः सङ्खयेयगुणाः अधस्ताद्यवमध्यान्तरसिद्धा असङ्खयेयगुणाः उपरियवमध्यान्तरसिद्धा विशेपा- धिकाः सर्वे विशेषाधिकाः ।। अन्तर ( के वियषमें अल्प बहुत्व ) । सर्वस्तोक अष्ट समय अनन्तर सिद्ध, सप्त समय अनन्तर सिद्ध, षट् समय अनन्तर सिद्ध इसी प्रकार द्वि (दो) समय पर्य्यन्त अनन्तर- सिद्ध सङ्खयेय गुण हैं । इस रीतिसे तो अनन्तरोंमें निरूपण हुआ, और सान्तरोंमें भी सर्व- स्तोक षट् मास अन्तर सिद्ध, तथा एक समय अन्तर सिद्ध सङ्खयेय गुण होते हैं । तथा यवमध्य अन्तर सिद्ध संख्येय गुण होते हैं, और अधोभाग तथा यव मध्य अन्तर सिद्ध भी सङ्ख्येय गुण होते हैं। और उपरि भाग तथा यव मध्य अन्तर सिद्ध विशेष अधिक असङ्ख्येय गुण होते हैं । सब विशेष अधिक इसी प्रकार होते हैं। सङ्ख्या । सर्वस्तोका अष्टोत्तरशतसिद्धाः विपरीतक्रमात्सप्तोत्तरशतसिद्धादयो यावत्पञ्चा- शत् इत्यनन्तगुणाः । एकोनपञ्चाशदादयो यावत्पञ्चविंशतिरित्यसवयेयगुणाः । चतुर्विश- त्यादयो यावदेक इति सङ्ख्येयगुणाः । विपरीतहानिर्यथा । सर्वस्तोका अनन्तगुणहानिसिद्धा असङ्खयेयगुणहानिसिद्धा अनन्तगुणाः सङ्घयेयगुणहानिसिद्धा सङ्घयेयगुणा इति ।। سے रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् २४० सङ्ख्या (के विषयमें अल्प बहुत्व ) । सर्वस्तोक (सम्बन्धी ) अष्टोत्तर शत अर्थात् आठ अधिक सौ १०८ सिद्ध होते हैं, और विपरीत क्रमसे सप्त उत्तर शत अर्थात् सात अधिक शत (सौ १००) सिद्ध आदि पञ्चाशत् ( पचास ) पर्यन्त ये सब अनन्त गुण होते है। और एक ऊन (एक कम ) पञ्चाशत् अर्थात् ओन्चाससे आदि लेके पञ्चविंशति (पचीस) पर्यन्त, ये सब सिद्ध असङ्ख्येय गुण होते है । और चतुर्विंशति (चौवीस २४ )से आदि लेके एक सिद्ध पर्यन्त सङ्ख्येय गुण होते हैं । और विपरीत रूपसे हानि, जैसे सर्व लोक अनन्त गुण हानि सिद्ध, असङ्ख्येय गुण हानि सिद्ध अनन्त गुण होते है, तथा सङ्ग्येय गुण हानि सिद्ध सङ्खयेय गुण होते हैं । एवं निसर्गाधिगमयोरन्यतरजं तत्त्वार्थश्रद्धानात्मकं शङ्काद्यतिचारवियुक्तं प्रशमसंवेगनि- वेदानुकम्पास्तिक्याभिव्यक्तिलक्षणं विशुद्धं सम्यग्दर्शनमवाप्य सम्यग्दर्शनोपलम्भाद्विशुद्धं च ज्ञानमधिगम्य निक्षेपप्रमाणनयनिर्देशसत्सङ्ख्यादिभिरभ्युपायैर्जीवादीनां तत्त्वानां पारिणा- मिकौदयिकौपशमिकक्षायोपशमिकक्षायिकानां भावानां स्वतत्त्वं विदित्वादिसत्पारिणामिकौ- दयिकानां च भावानामुत्पत्तिस्थित्यन्यतानुग्रहप्रलयतत्त्वज्ञो विरक्तो निस्तृष्णस्त्रिगुप्तः पञ्चस- मितो दशलक्षणधर्मानुष्ठानात्फलदर्शनाच निर्वाणप्राप्तियतनयाभिवर्धितश्रद्धासंवेगो भावना- भिर्भावितात्मानुप्रेक्षाभिः स्थिरीकृतात्मानभिष्वङ्गः संवृतत्वान्निरास्रवत्वाद्विरक्तत्वान्निस्तृष्ण- त्वाच्च व्यपगताभिनवकर्मोपचयः परीषहजयाबाह्याभ्यन्तरतपोनुष्ठानादनुभावतश्च सम्यग्द- ष्टिविरतादीनां च जिनपर्यन्तानां परिणामाध्यवसायविशुद्धिस्थानान्तराणामसङ्ग्येयगुणोत्क- प्राप्त्या पूर्वोपचितकर्म निर्जरयन् सामायिकादीनां च सूक्ष्मसम्परायान्तानां संयमविशुद्धि- स्थानानामुत्तरोत्तरोपलम्भात्पुलाकादीनां च निर्ग्रन्थानां संयमानुपालनविशुद्धिस्थानविशे- पाणामुत्तरोत्तरप्रतिपत्त्या घटमानोऽत्यन्तनहीणातरौद्रध्यानो धर्मध्यानविजयादवाप्तसमाधि- बलः शुक्लध्यानयोश्च पृथक्त्वैकत्ववितर्कयोरन्यतरस्मिन्वर्तमानो नानाविधानृद्धिविशेपान्प्रा- प्रोति । तद्यथा। इस पूर्वोक्त रीतिसे निसर्गज तथा अधिगमज, इन दोनोंमेंसे अन्यन्तर ( किसी एक) प्रशम ( अत्यन्त शमता),संवेग (तीव्र-संसार-वासना-राहित्य), निर्वेद (संसारसे ग्लानि- पूर्वक वैराग्य ), अनुकम्पा ( दीन जनादिके विषयमें कृपा आदि), आस्तिक्य (शास्त्र गुरु देव आदिमें आस्तिक्य वुद्धि ) इत्यादिकी अभिव्यक्ति (प्रकटता रूप ) लक्षणयुक्त, श- वा आदि अतिचारोंसे शून्य, तथा विशुद्ध तत्त्वार्थश्रद्धान रूप सम्यग्दर्शन प्राप्त कर- के, और सम्यग्दर्शनकी प्राप्तिसे विशुद्ध ज्ञानको प्राप्त होकर निक्षेप ( नामादिनिक्षेप ), प्र- माण (प्रत्यक्षादि प्रमाण ), नय (नैगम सङ्ग्रह आदि ), निर्देश ( स्वामित्व ) आदि तथा सत् सङ्ख्या आदि उपायोंसे जीव आदि तत्त्वों (जीव अजीव आदि षट्तत्त्वों) के, तथा पारिणामिक, औदयिक, औपशमिक, क्षायौपशमिक, तथा क्षायिक इन सबोंके यथार्थ तत्त्वोंको जानकर, तथा आदिमान् ( आदिसहित ), पारिणामिक, और औदयिक भावोंकी . है , सभाष्यतत्त्वार्थाधिगमसूत्रम् । २४१ उत्पत्ति, स्थिति, अन्यता ( रूपान्तर परिणाम ) रूप अनुग्रह तथा प्रलय ( नाश ) के तत्त्वको ( यथार्थ स्वरूपको) जाननेवाला, अतएव विरक्त, तृष्णारहित, पञ्चसमिति- युक्त ( ईर्ष्या आदि समितिसहित ) तथा दशलक्षण धर्मो अर्थात् उत्तम क्षमा मार्द आदि दशलक्षण धर्मोंके अनुष्ठान और उनके फलके दर्शनसे, निर्वाण ( मोक्ष ) की प्रार, प्तिमें वर्तनोंसे पूर्ण रूपसे वृद्धिको प्राप्त श्रद्धा तथा संवेगसहित, भावनाओंसे (मैत्री क- रुणा आदि भावनाओंसे) भावित आत्मा अर्थात् पूजित आत्मा सहित, द्वादश अनुप्रेक्षा- ओंसे स्थिर आत्मा संयुक्त, इसीसे सर्वथा सङ्गरहित, तथा संवृत (संवरयुक्त) होनेसे तथा आस्रवरहित होनेसे, विरक्त होनेसे, और तृष्णासे वर्जित होनेसे नूतन ( नये ) क- मौके सञ्चयसे रहित, तथा परीषहोंके जयसे, बाह्य तथा आभ्यन्तर द्वादश प्रकारके तपके अनुष्ठानसे तथा अनुभावोंसे भी सम्यग्दृष्टि, तथा विरत आदिसे लेकर जिनपर्यन्त सिद्धोंके परिणाम, अध्यवसाय और विशुद्धि रूप स्थानान्तरोंके असङ्खयेय गुण उत्कर्षताकी प्राप्तिसे पूर्वभवके वा पूर्वकालके कर्मोंकी निर्जरा ( एकदेशकर्मनाश ) करते हुए, तथा सामायि- कसे आदि देके सूक्ष्मसम्परायपर्यन्त संयमविशुद्धिके स्थानान्तरोंके उत्तर उत्तर (आगे२) उपलम्भ (प्राप्ति होने से पुलाकसे आदि लेके निर्ग्रन्थपर्यन्त सिद्धोंके संयमोंके पालनसे विशुद्धियोंके स्थानविशेषोंकी उत्तर २ प्राप्ति वा बोधसे युक्त, आर्त तथा रौद्र ध्यानोंसे सर्वथा रहित, धर्मध्यानके विजयसे प्राप्त समाधिबल, अर्थात् धर्मध्यानकी दृढतासे समाधि- बल जिसको प्राप्त है ऐसा, तथा पृथक्त्व वितर्क और एकत्व वितर्क इन दो प्रकारके शुक्ल ध्यानोंमेंसे किसी एक ध्यानमें वर्तमान महात्माजन नाना प्रकारकी ऋद्धि विशेषोंको अर्थात् अनेक प्रकारकी सिद्धियोंको प्राप्त करता है । वे ऋद्धियां (सिद्धिविशेष ) ये - आमौषधित्वं विप्नुडौषधित्वं सर्वौषधित्वं शापानुग्रहसामर्थ्यजननीमभिव्याहारसिद्धि- मीशित्वं वशित्वमवधिज्ञानं शारीरविकरणाङ्गप्राप्तितामणिमानं लघिमानं महिमानमणुत्वम् । अणिमा बिसच्छिद्रमपि प्रविश्यासीवां । लघुत्वं नाम लघिमा वायोरपि लघुतरः स्यात् । महत्त्वं महिमा मेरोरपि महत्तरं शरीरं विकुर्वीत । प्राप्तिभूमिष्ठोऽगुल्यग्रेण मेरुशिखरभास्क- रादीनपि स्पृशेत् । प्राकाम्यमप्सु भूमाविव गच्छेत् भूमावप्स्विव निमजेदुन्मन्नेञ्च । जहाचा- रणत्वं येनाग्निशिखाधूमनीहारावश्यायमेघवारिधारामर्कटतन्तुज्योतिष्करश्मिवायूनामन्यत- ममप्युपादाय वियति गच्छेत् । वियद्गतिचारणत्वं येन वियति भूमाविव गच्छेत् शकुनिवच्च प्रडीनावडीनगमनानि कुर्यात् । अप्रतिघातित्वं पर्वतमध्येन वियतीव गच्छेत् । अन्तर्धानमा दृश्यो भवेत् । कामरूपित्वं नानाश्रयानेकरूपधारणं युगपदपि कुर्यात् तेजोनिसर्गसामर्थ्य- मित्येतदादि ।। इति इन्द्रियेषु मतिज्ञानविशुद्धिविशेषारात्स्पर्शनास्वादनघ्राणदर्शनश्रवणानि विषयाणां कुर्यात् । संभिन्नज्ञानत्वं युगपदनेकविषयपरिज्ञानमित्येतदादि ॥ मानसं कोप्टवु. द्वित्वं बीजबुद्धित्वं पदप्रकरणोद्देशाध्यायप्राभृतवस्तुपूर्वाङ्गानुसारित्वमृजुमतित्वं विपुलमतित्वं , . रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् २४२ परचित्तज्ञानमभिलपितार्थप्राप्तिमनिष्टानवाप्तीत्येतदादि । वाचिकं क्षीरासवित्वं मध्वास्रवित्वं वादित्वं सर्वस्तज्ञत्वं सर्वसत्त्वावबोधनमित्येतदादि । तथा विद्याधरत्वमाशीविषत्वं भिन्ना- भन्नाक्षरचतुर्दशपूर्वधरत्वमिति ।। आमर्श-औषधत्व ( विचार मात्रसे औषधादि प्रयोग सामर्थ्य), विषय-औषधत्व (जलविन्दुमात्रसे व्याधिनाशसामर्थ्य), शाप तथा अनुग्रह (आशीर्वाद)को उत्पन्न करनेवाली वचनकी सिद्धि, ईशित्व (ऐश्वर्यवत्ता ), अणिमा लघिमा, महिमा, तथा अणुत्व इत्यादि सिद्धि प्राप्त होती हैं। इनमें कमलके सूत्रके छिद्रमें भी प्रवेश करके स्थित होसके इस प्र- कारका अणिमा (छोटापन ) है। लघुत्वको लघिमा कहते हैं, जैसे वायुसे भी लघुतर हो जाय अर्थात् अति हलकापनका सामर्थ्य लघिमा सिद्धि है । महिमा अर्थात् मेरु पर्वतसे भी अधिक बड़ा शरीर करसके, यह महिमा ऋद्धि है। प्राप्ति, पृथिवीपर स्थित होकर अङ्गुलीके अग्रभागसे मेरुके शिखर तथा सूर्य आदिको भी स्पर्श कर (छू ) सकै अर्थात् सर्वत्र प्राप्त होनेका सामर्थ्य यह प्राप्ति नामक सिद्धि है । प्राकाम्य-पृथिवीके समान जल. में भी पैरोंसे चल सकना, और जलके समान पृथिवीपर भी जब चाहै तब डूब जाय, और जब चाहै तव उतराने लगजाय, यह सामर्थ्य अर्थात् इच्छा वा कामनाके अनुसार कार्य करनेका सामर्थ्य प्राकाम्य है । जड्वाचारणत्व-जिसके द्वारा अग्निकी शिखा, धूम, कुहिरा, जलकी धारा, मर्कटी अर्थात् मकरीके सूत ( जाला ) वा किसी ज्योतिर्मय पदार्थके कि- रण, तथा वायु, इनमेंसे किसीको ग्रहण करके अर्थात् अग्निशिखा धूम आदिमेंसे किसी- के आधारसे आकाशमें गमन कर सकता है । और आकाशगतिचारणता कि जिससे आ- काशमें भूमिके तुल्य गमन कर, और पक्षीके समान ऊपर उड़ना तथा नीचे उतरना आदि विशेष प्रकारके गमन आगमन करे । तथा अप्रतिघातित्व (किसी पदार्थसे प्रतिघात-राहित्य अर्थात् अवरोधका सर्वथा अभाव, जिसके द्वारा पर्वतके मध्यमें भी अवकाशसहित आका- शके सदृश चल सकता है । अन्तर्धानत्व, जिसके द्वारा लोगोंकी दृष्टिसे अदृश्य हो सकता अर्थात् लोप हो (छिप जा) ता है । कामरूपित्व, अर्थात् अपनी इच्छाके अनुसार रूप धारण करनेका सामर्थ्य; जिससे कि एकही कालमे नाना प्रकारके आश्रयसे अनेक रूप यह योगी धारण कर सकता है। तथा तेजोनिसर्गसामर्थ्य, विशेष तेज उत्पन्न करनेकी शुचि, इत्यादि सिद्धयां प्राप्त होती हैं। तथा इद्रियोंके विषयों मतिज्ञानकी विशुद्धिकी विशेषता (विलक्षणता वा विचित्रता ) से दूरसेही स्पर्शन, आखादन, प्राण (सूंघना ), दर्शन (देवना ) और श्रवण (सुनना) आदि विषयोंको अनुभव कर सकता है । संभिन्न- धानन्य, एक कालमेंही पृथक् २ अनेक विषयोंका परिज्ञान प्राप्त करना, इत्यादि । और मानम कोष्ठभुदिन्य बीजबुद्धित्व तथा पद, प्रकरण, उद्देश, अध्याय, प्राभूत, वस्तु पदानुमारिता, अजुमनिल, विपुलमतित्व, परचित्तज्ञान (दूसरेके चित्तके अभिप्राय- - सभाष्यतत्त्वार्थाधिगमसूत्रम् । २४३ का ज्ञान ) अभिलषित अर्थात् अपनेको अभीष्ट पदार्थकी प्राप्ति, तथा अनिष्टकी अप्राप्ति इत्यादि सामर्थ्यविशेष सिद्धियां प्राप्त होती हैं। और वाचिक (वागजन्य सामर्थ्य चाणीमें क्षीरस्राविता अर्थात् ऐसा मिष्ट भाषण मानो वचनसे दुग्धप्रवाह झरता है, मधु आस्रावित्व, अर्थात् वचनसे मानो मधुप्रवाह स्रवीभूत (वहता वा झरता) होता है, प्रबल वादियोंसे भी वाद करनेका सामर्थ्य विशेष, सर्वरुतज्ञान अर्थात् सब पशु पक्षी आदिके शब्दोंका ज्ञान । और सब जीवोंका अवबोधन सब जीवमात्रका ज्ञान वा सबको बोधन • (ज्ञान प्रदान करने ) का सामर्थ्य विशेष, इत्यादि सामर्थ्यविशेष वाचिक सिद्ध होता है। तथा विद्याधरत्व (विद्याधरपदप्राप्तिसामर्थ्य ) और भिन्न अभिन्न अक्षर चतुर्दश पदत्व, इत्यादि सिद्धिविशेष उस जीवको प्राप्त होते हैं। ततोऽस्य निस्तृष्णत्वात्तेवनभिष्वक्तस्य मोहक्षपकपरिणामावस्थस्याष्टाविंशतिविधं मोह- नीयं निरवशेषतः प्रहीयते । ततश्छद्मस्थवीतरागत्वं प्राप्तस्यान्तर्मुहूर्तेन ज्ञानावरणदर्शनावर- णान्तरायाणि युगपदशेषतः प्रहीयन्ते । ततः संसारबीजबन्धनिर्मुक्तः फलवन्धनमोक्षापेक्षो यथाख्यातसंयतो जिनः केवली सर्वज्ञः सर्वदर्शी शुद्धो बुद्धः कृतकृत्यः स्नातको भवति । ततो वेदनीयनामगोत्रायुष्कक्षयात्फलवन्धननिर्मुक्तो निर्दग्धपूर्वोपात्तेन्धनो निरुपादान इवाग्निः पून वोपात्तभववियोगाद्धत्वभावाच्चोत्तरस्याप्रादुर्भावाच्छान्तः संसारसुखमतीत्यात्यन्तिकमैकान्तिक निरुपमं निरतिशयं नित्यं निर्वाणसुखमवाप्नोतीति ।। और इसके पश्चात् तृष्णाके अमावसे उन पूर्वकथित अणिमा आदि सिद्धियोंमें आस- कता वा सङ्गरहित, तथा मोहक्षपक ( मोहनीय कर्मको नाश करनेवाले) परिणाम भावमें स्थित इस जीवके अट्ठाईस (२८) प्रकारके मोहनीय कर्म सर्वथा नाशको प्राप्त होते हैं । और इसके अनन्तर छद्मस्थ वीतरागता दशाको प्राप्त इस जीवके अन्तर्मुहूर्त कालमें ही ज्ञानावरणीय दर्शनावरणीय और अन्तराय, ये तीनो कर्मप्रकृतियां एक कालमें- ही सर्वथा क्षीण (नष्ट) हो जाती हैं। इसके अनन्तर संसारके बीजरूप वन्धनसे विनिर्मुक्त, फलरूप बन्धनसे मोक्षकी अपेक्षा करनेवाला, यथाख्यात संयममें संयत, अर्थात् यथाख्यात चारित्ररूप संयमसहित जिन केवली( केवलज्ञानसम्पन्न) सर्वज्ञ, सर्वदर्शी (सर्वद्रष्टा), शुद्ध, बुद्ध, कृतकृत्य (जो कुछ करना चाहिये था वह सब कर चुकनेवाला), स्नातक रूप यह जीव होता है। और इसके अनन्तर वेदनीय, नाम, गोत्र, तथा आयुः कर्मके क्षय होनेसे फलबन्धनसे सर्वथा विनिर्मुक्त (छूटा हुआ), पूर्व कालमें ग्रहण हुए इन्ध- नको भस्म करनेवाला उपादान कारण (सर्वथा इन्धन) शून्य अग्निके समान, तथा पूर्वकालमें ग्रहण किये हुए जन्मोंके वियोगसे तथा हेतु (निमित्त )के अभावसे आगेके जन्मोंके प्रादुर्भाव होनेसे सर्वथा शान्त, और संसारसुखको अतिक्रमण (लंघन) करके आत्यन्तिक (जिसका कभी अन्त न हो ऐसा), ऐकान्तिक (नित्य वा सर्वदा स्थायी) रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् निरुपम ('उपमारहित), निरतिशय (जिससे बढ़के कोई सुख न हो ऐसा), नित्य नि- । वंण जो मोक्षरूप सुख है, उस मोक्षको यह जीव प्राप्त होता है । एवं तत्त्वपरिज्ञानाद्विरक्तस्यात्मनो मृशम् । निरास्त्रवत्वाच्छिन्नायां नवायां कर्मसन्ततौ ॥१॥ पूर्वार्जितं क्षपयतो यथोक्तैः क्षयहेतुभिः । संसारबीजं कान्येन मोहनीयं प्रहीयते ॥२॥ ततोऽन्तरायज्ञाननदर्शननान्यनन्तरम् । प्रहीयन्तेऽस्य युगपत् त्रीणि कर्माण्यशेपतः ॥ ३॥ गर्भसूच्यां विनष्टायां यथा तालो विनश्यति । तथा कर्मक्षयं याति मोहनीये क्षयं गते ॥४॥ ततः क्षीणचतुष्कर्मा प्राप्तोऽथाख्यातसंयमम् । वीजबन्धननिर्मुक्तः स्नातकः परमेश्वरः ॥५॥ शेषकर्मफलापेक्षः शुद्धो बुद्धो निरामयः । सर्वज्ञः सर्वदर्शी च जिनो भवति केवली ॥ ६॥ कृत्सकर्मक्षयादूर्ध्व निर्वाणमधिगच्छति । यथा दग्धेन्धनो वह्निनिरुपादानसन्ततिः ॥ ७॥ दग्धे बीजे यथात्यन्तं प्रादुर्भवति नाङ्कुरः । कर्मबीजे तथा दग्धे नारोहति भवाङ्कुरः ॥ ८॥ तदनन्तरमेवोर्ध्वमालोकान्तात्स गच्छति । पूर्वप्रयोगासङ्गत्वबन्धच्छेदोवंगौरवैः ॥९॥ कुलालचक्रे दोलायामिषौ चापि यथेष्यते । पूर्वप्रयोगात्कर्मेह तथा सिद्धगतिः स्मृता ॥ १० ॥ मृल्लेपसङ्गनिर्मोक्षायथा दृष्टाप्स्वलाबुनः । कर्मसङ्गविनिर्मोक्षात्तथा सिद्धगतिः स्मृता ।। ११ ।। एरण्डयन्त्रपेडासु बन्धच्छेदाद्यथा गतिः । कर्मवन्धनविच्छेदासिद्धस्यापि तथेष्यते ॥ १२ ॥ ऊर्ध्वगौरवधर्माणो जीवा इति जिनोत्तमैः । अधोगौरवधर्माणः पुद्गला इति चोदितम् ॥ १३ ॥ यथास्तिर्यगूर्व च लोष्टवास्वग्निवीतयः । स्वभावतः प्रवर्तन्ते तथोवं गतिरात्मनाम् ॥ १४ ॥ अतस्तु गतिवैकृत्यमेषां कर्मणः प्रतिघाताच प्रयोगाच्च तदिष्यते ॥ १५॥ अधस्तिर्यगथोर्ध्व च जीवानां कर्मजा गतिः । ऊर्ध्वमेव तु तद्धर्मा भवति क्षीणकर्मणाम् ॥ १६ ॥ यदुपलभ्यते ।

सभाष्यतत्त्वार्थाधिगमसूत्रम् । २४५ द्रव्यस्य कर्मणो यद्वदुत्पत्त्यारम्भवीतयः। समं तथैव सिद्धस्य गतिमोक्षभवक्षयाः॥ १७ ॥ उत्पत्तिश्च विनाशश्व प्रकाशतमसोरिह । युगपद्भवतो यद्वत् तथा निर्वाणकर्मणोः ॥ १८ ॥ तन्वी मनोज्ञा सुरभिः पुण्या परमभास्वरा । प्राग्भारा नाम वसुधा लोकमूर्ति व्यवस्थिता ॥ १९ ॥ नृलोकतुल्यविष्कम्भा सितच्छत्रनिभा शुभा । ऊच तस्याः क्षितेः सिद्धा लोकान्ते समवस्थिताः॥ २० ॥ तादात्म्यादुपयुक्तास्ते केवलज्ञानदर्शनैः । सम्यक्त्वसिद्धतावस्थाहेत्वभावाच निष्क्रियाः ॥ २१ ॥ ततोऽप्यूध्वं गतिस्तेषां कस्मानास्तीति चेन्मतिः । धर्मास्तिकायस्याभावात्स हि हेतुर्गतेः परः ॥ २२ ॥ संसारविषयातीतं मुक्तानामव्ययं सुखम् । अव्याबाधमिति प्रोक्तं परमं परमर्षिभिः ॥ २३ ॥ स्यादेतदशरीरस्य जन्तोनष्टाष्टकर्मणः । कथं भवति मुक्तस्य सुखमित्यत्र मे शृणु ।। २४ ।। लोके चतुविहार्थेषु सुखशब्दः प्रयुज्यते । विषये वेदनाभावे विपाके मोक्ष एव च ॥ २५ ॥ सुखो वह्निः सुखो वायुर्विषयेष्विह कथ्यते । दुःखाभावे च पुरुषः सुखितोऽस्मीति मन्यते ॥ २६ ॥ पुण्यकर्मविपाकाच सुखमिष्टेन्द्रियार्थजम् । कर्मक्लेशविमोक्षाच मोक्षे सुखमनुत्तमम् ।। २७ ।। सुखप्रसुप्तवत्केचिदिच्छन्ति परिनिर्वृतिम् । तयुक्त क्रियावत्त्वात्सुखानुशयतस्तथा ॥ २८ ॥ श्रमक्लममदव्याधिमदनेभ्यश्च सम्भवात् । मोहोत्पत्तेर्विपाकाच दर्शनम्नस्य कर्मणः ।। २९ ।। लोके तत्सहशो ह्यर्थः कृत्लेऽप्यन्यो न विद्यते । उपगीयेत तधेन तस्मान्निरुपमं सुखम् ॥ ३० ॥ लिङ्गप्रसिद्धेः प्रामाण्यादनुमानोपमानयोः । अत्यन्तं चाप्रसिद्धं तद्यत्तेनानुपमं स्मृतम् ॥ ३१ ॥ प्रत्यक्षं तद्भगवतामहतां तैश्च भाषितम् । गृह्यतेऽस्तीत्यतः प्राज्ञैर्नच्छद्मस्थपरीक्षया ।। ३२ ॥ इति ॥ इस रीतिसे अर्थात् पूर्वकथित उपायोंसे तत्त्वोंके परिज्ञान अर्थात् पूर्णरूपसे सब जीव आदि तत्त्वोंके ज्ञान होनेसे सर्वथा विरक्तताको प्राप्त इस जीवके आस्रवके अभावसे , रायचन्द्रजनशास्त्रमालायाम् २४६ नूतन ( नये) कर्मके सन्तान (कर्मपरम्परा )के छिन्न होनेपर |॥ १ ॥ और यथोक्त (उ (शास्त्रकथित ) क्षयके निमित्तोंसे पूर्व उपार्जित कमाको भी नाश करते हुए संसारका मो वीजभूत जो मोहनीय कर्म है वह भी सम्पूर्ण रूपसे नाशको प्राप्त हो जाता है, और इस मोहनीयके क्षीण होनेके पश्चात् ज्ञान प्रदर्शन अर्थात् ज्ञानावरणीय, दर्शनावर- णीय तथा अन्तराय ये तीनो कर्म एकही कालमें सम्पूर्ण रूपसे नाशको प्राप्त होते हैं ॥ ३ ॥ और जिस प्रकार गर्भसूचीके नाश होनेपर तालस्तंभ नष्ट होजाता है, इसी रीतिसे मोहनीय कर्मके क्षय होनेपर (शेष)कर्म स्वयं नष्ट हो जाते हैं ॥ ४ ॥ और इसके पश्चात् , अर्थात् मोहनीय तथा ज्ञानावरण आदि तीन कर्मोके नाश होनेके अन- न्तर क्षीणचतुष्का, तात्पर्य यह जिसके मोहनीय, ज्ञानावरणीय, दर्शनावरणीय, तथा अन्तराय, ये चारो कर्म क्षीण (नष्ट ) हो गये हैं, ऐसा यह जीव कहा जाता था होता है, और पुनः आख्यात (यथाख्यात ) संयममे प्राप्त होकर वीजवन्धनसे विनि- मुक्त स्नातक तथा परमेश्वररूपही हो जाता है ॥ ५॥ और पुनः शेपकर्मफलापेक्ष अर्थात् आयुः नाम आदि शेष कर्मोंकी अपेक्षासे शुद्ध, वुद्ध, निरामय, सर्वज्ञ, सर्वदर्शी, जिन तथा केवली 'इत्यादि पवाच्य होता है ॥ ६ ॥ और सम्पूर्ण कर्मोंके क्षयके पश्चात् आयुः नाम आदि सब कर्मोंके नाशके अनन्तर इस प्रकार निवाण (मोन) दशा प्राप्त होती है, जैसे सम्पूर्ण इन्धनोंके भस्म करनेके पश्चात् उपादान सन्तति (उपादानप्रवा- से रहित शुद्ध देदीप्यमान अग्नि ॥ ७ ॥ जैसे वीजके सर्वथा भस होनेके पश्चात् पुनः अकुरका प्रादुर्भाव (उत्पत्तिरूप दर्शन ) नहीं होता है, ऐसेही संसारके बीजभूत कर्मोंके सर्वथा दग्ध (भस वा क्षय) होनेपर पुनः यह जन्मा अथवा संसाररूप अङ्कुर नहीं उपजता (जन्मता वा उत्पन्न होता) है ॥ ८॥ पुनः पूर्वकर्मोंके प्रयोगसे, असङ्ग होनेसे, बन्धनसे विनिर्मुक्त होनेसे, तथा ऊर्ध्व गतिमें गौरव धारण करनेसे आलोकान्त (लोकान्त) पर्यन्त यह जीव ऊर्ध्व गमन करता है ।॥ ९ ॥ कुंभकारके चक्रमे, दोला (हिडोला वा झूलनेके यंत्र )में तथा वाणमें जैसे पूर्वप्रयोगसे भ्रमण गमन आदि क्रिया होती है, ऐसेही सिद्धोंके भी ऊर्ध्वगतिरूप कर्म पूर्वप्रयोगसे कहा गया है ॥१०॥ जैसे मृत्तिका आदिके लेपरूप सगसे विनिर्मुक्त होनेपर अलावु (तुंवीफल)की जलमें ऊर्च गति दृष्ट ( देखीगई ) है, ऐसेही कर्मोके सङ्गसे विनिर्मुक्त (छूटनेपर ) होनेसे जीव- की मी ऊर्ध्व गति होती है ॥ ११ ।। जैसे एरण्डफलके गुच्छके वन्धनसे छूटनेपर एरण्ड- बीजोंकी ऊर्च गति होती है, ऐसेही कर्मरूपी वन्धनसे विनिर्मुक्त होनेपर सिद्ध जीवकी भी ऊर्च गति होती है ।। १२ ॥ उत्तम जिन महात्माओंने ऐसा कहा है कि जीव ऊध्र्वगमनमें गौरव धर्म धारण करते हैं, और पुद्गल अधोमार्गकी गतिमें गौरवधारी दाने हैं ॥ १३ ॥ जैसे पापाण. वाय, और अग्निकी गति स्वभावसे ही अधोभाग, तिर्यक.

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सभाष्यतत्त्वार्थाधिगमसूत्रम्।
२४७
था ऊर्ध्वभागमें क्रमसे होती हैं, ऐसेही जीवोंकी खभावसिद्ध गति ऊर्ध्व देशमेंही
ती है ॥ १४ ॥ और पूर्वकथितके विपरीत (विरुद्ध) जो इन (जीव एनल आदि)
मे होती है यह कर्मसे, प्रतिघातसे तथा प्रयोगसे इष्ट है ॥ १५॥ जीवोंकी कर्मसे
नधोभाग, तिर्यग्भाग तथा ऊर्ध्व भागमें भी गति होती है किन्तु क्षीणकर्म जीवोंकी
पर्थात् जिनके कर्म सर्वथा क्षीण होगये हैं ऐसे जीवोंकी तो स्वाभाविक गति ऊर्ध्व भागमे
होती है, क्योंकि जीव. स्वभावसे ऊर्ध्वगति धर्मवाला है ॥ १६ ॥ जैसे द्रव्य क्रि-
की उत्पत्ति, आरम्भ, तथा नाश साथ ही होते है, ऐसेही सिद्धकी गति, मोक्ष तथा
सारक्षय साथ ही होते है ॥ १७ ॥ जैसे प्रकाशकी उत्पत्ति और अन्धकारका नाश
क कालमें ही होते है, ऐसेही निर्वाण (मोक्ष)की उत्पत्ति तथा कर्मका नाश एक ही
लमे होते है ॥ १८ ॥ सूक्ष्म, मनोज्ञ (अतिरमणीय), सुगन्धपूर्ण, पवित्र, तथा
रमप्रकाशमय, प्राग्भारा नाम पृथिवी इस लोकके शिरपर (लोकाकाशके अन्तमें ऊपर )
प्रवस्थित (वर्तमान) है ॥.१९॥ मनुष्यलोकके समान उसका व्यास है, और यह
थिवी श्वेत छत्रके सदृश अति शुभ (परमशुद्ध श्वेतवर्ण) है, उसी पृथिवीके ऊपर
जोकान्तमें सिद्धगति स्थित हैं ॥ २० ॥ तादात्म्यसम्बन्ध अर्थात् अभेद सम्बन्धसे
वल ज्ञान और दर्शनसे उपयुक्त हैं, तात्पर्य यह कि केवल ज्ञान तथा दर्शनरूप उप-
गमय है, तथा सम्यक्त्व सिद्धता अवस्था सहित है, और कारणके अभावसे निष्क्रिय
र्थात् क्रियारहित हैं ॥ २१ ॥ यदि कदाचित् ऐसी बुद्धि हो अर्थात् उस सिद्धस्थान
। सिद्धशिलाके ऊपर भी ऊर्ध्व गति खभावसे सिद्ध जीवोंकी गति क्यों नहीं होती? यदि
ऐसी शङ्का हो तो, इसका उत्तर यह है कि लोकान्तके ऊपर धर्मास्तिकाय नहीं है,
अतः ऊर्ध्वगति नहीं होती, और धर्मास्तिकाय गतिमे परम हेतु है ॥ २२॥ संसारके सं-
पूर्ण विषयोंसे पर नाशरहित तथा अव्याबाध (सब प्रकारकी बाधाओंसे रहित )
परम सुख मुक्त जीवोंको होता है, ऐसा परमर्षि महात्माओंने कहा है ।। २३
प्रसङ्ग रहा, शरीरशून्य तथा अष्ट कर्मों (मोहनीय आदि)के नाशसहित जीवको
परम सुख (मोक्षसुख) कैसे होता है, यदि ऐसी शङ्का हो तो मुझसे सुनो, अर्थात्
शङ्काका उत्तर सुनो ।। २४ ।। इस लोकमें चार पदार्थों में सुख शन्दका प्रयोग (:
हार किया जाता है) जैसे विषयमें, वेदना (पीडा )के अभावमें, विपाक (परिणाम
तथा मोक्षमें ॥ २५ ॥ अग्नि सुख (सुखदायक ) है, तथा वायु (पवन सुख अर
सुखकारक है) इत्यादि रूपसे विषयोंमें सुख शब्दका प्रयोग किया जाता है, ऐसे
दुःखोंके अभावमें भी मै सुखी स्थित हूं ऐसा पुरुष मानता है ॥ २६ ॥ तथा पुण्यकर्मों
विपाक (फलभोगके समय )में इन्द्रिय तथा पदार्थ से उत्पन्न सुख शब्दले सबको इप्ट कह
जाता है, और कर्मोके क्लेशोंसे विमुक्त होनेपर मोममें सर्वोत्तम मुख होता है ॥ २७ ॥

रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् इस मोक्षके सुखको कोई तो उत्तम सुषुप्ति (गाढ निद्रा)के तुल्य परमशान्तिरूप चाहते (मानते) हैं, परन्तु मोक्षसुखको निद्रासदृश मानना अयोग्य है, क्योंकि सुखके सम्ब- न्धसे वहांपर क्रियावत्ता है ॥ २८ ॥ तथा इसकी अयोग्यता यों भी है कि इस प्रकारके। सुखका सम्भव श्रम, खेद, मद, व्याधि तथा मदन (मैथुन )से भी है, और दर्शनको नाश करनेवाले कर्मके विपाक (मोहकी उत्पत्ति)से भी पूर्वोक्त असङ्गति सिद्ध होती है।।२९|| इस सम्पूर्ण संसारभरमें ऐसा कोई पदार्थ नहीं है जिसके साथ उसकी उपमा दें, इस हेतुसे वह मोलमुख निरुपम अर्थात् उपमाशून्य (सर्वोत्तम ) है ।। ३० ॥ अनुमान तथ उपमानका प्रामाण्य लिङ्गप्रसिद्धि (हेतुप्रसिद्धि )से होता है, सो इनकीयता (अनुमान आदि विषयाभाव)से जो अत्यन्त अप्रसिद्ध है इसी लिये वह कहा गया है ॥ ३१ ॥ और प्रत्यक्षभाव (प्रत्यक्ष ज्ञानकी विषय )ता प्राप्त अहेत् जिनभगवा- नोंको है, इस लिये उनसे कहा हुआ वह प्राज्ञोंसे (मोक्षा ग्रहण किया जाता (जानाजाता) है, न कि छद्मस्थोंकी परीक्षासे उसका होता है ॥ ३२ ॥ यस्त्विदानी सम्यग्दर्शनज्ञानचरणसंपन्नो मिल घटमानः कालसंहननायुर्दोषाद- ल्पशक्तिः कर्मणां चातिगुरुत्वाकृतार्थ एवोपट्स सौधर्मादीनां सर्वार्थसिद्धान्तानां कल्प- विमानविशेषाणामन्यतमे देवतयोपपद्यतेत्र सुकृतकर्मफलमनुभूय स्थितिक्षयात्र- व्युतो देशजातिकुलशीलविद्याविन्यविषयविस्तरविभूतियुक्तेपु मनुष्येषु प्रत्यायातिम- वाप्य पुनः सम्यग्दर्शनादिविधिमवाप्नोति । अनेन सुखपरम्परायुक्तेन कुशलाभ्यासा- नुबन्धक्रमेण परं त्रिर्जसिध्यतीति ।। और जो सम्म, ज्ञान, तथा चरण (चारित्र )से युक्त साधु मोक्षके अर्थ चेष्टा करता है, काल, संहनन तथा आयुःके दोपसे अल्पशक्ति (न्यून सामर्थ्य ) होनेसे औरकी अति गुरुताके कारण विना कृतार्थ हुए अर्थात् मोक्षप्राप्तिरूप कृतार्थताको । होकर उपराम भावको प्राप्त होता है, वह सौधर्म आदिसे लेकर सर्वार्थसिद्ध- जो विमान विशेष है, उनमेंसे किसी एकमे देवता होकर उत्पन्न होता है । और सुकृत कर्मोंके अर्थात् पुण्यकाँके फलको भोगकर, पुनः स्थिति काल (जिस या देवयोनिविशेपमे जितना स्थितिका काल नियत है, उस नियत काल)के निके पश्चात् वहांसे प्रच्युत होकर (गिरनेपर ) देश (उत्तम देश), काल (उत्तम ), जानि (सजाति), शील, विद्या, विनय, विभव (अनेक प्रकारके ऐश्वर्य), विषय क प्रकारले उत्तम विषयोंके मुख ) तथा विस्तार (विस्तार वा विशालता) और योने सहित मनुष्योंमें जन्म पाकर पुनः सम्यग्दर्शन आदि विशुद्ध बोधि, (सम्य- जानचारित्र ) को प्राप्त होता है। इस मुखपरम्परा (सुखश्रेणि )से युक्त कुशल- मंक अनुवन्धक्रमने तीन बार इस संसारमे जन्म लेकर पुनः सिद्धतादशा (मोक्ष- )को ग्राम होता है।

सभाष्यतत्त्वार्थाधिगमसूत्रम् । २४९ वाचकमुख्यस्य शिवश्रियः प्रकाशयशसः प्रशिष्येण । शिष्येण घोषनन्दिक्षमणस्यैकादशाङ्गविदः ॥ १ ॥ वाचनया च महावाचकक्षमणमुण्डपादशिष्यस्य । शिष्येण वाचकाचार्यमूलनाम्नः प्रथितकीर्तेः ॥२॥ न्यग्रोधिकाप्रसूतेन विहरता पुरवरे कुसुमनानि । कौभीषणिना स्वातितनयेन वात्सीसुतेनाय॑म् ॥ ३॥ अद्विचनं सम्यग्गुरुक्रमेणागतं समुपधार्य । दुःखातं च दुरागमविहतमाति लोकमवलोक्य ॥ ४ ॥ इदमुच्चै गरवाचकेन सत्त्वानुकम्पया हब्धम् । तत्त्वार्थाधिगमाख्यं स्पष्टमुमास्वातिना शास्त्रम् ॥ ५॥ यस्तत्त्वाधिगमाख्यं ज्ञास्यति च करिष्यते च तत्रोक्तम् । सोऽव्याबाधसुखाख्यं प्राप्स्यत्यचिरेण परमार्थम् ॥ ६ ॥ जगत्प्रकाशक यशयुक्त शिवश्री नामक वाचकमुख्यके प्रशिष्य (पौत्रशिष्य,) और एकादशा- वेत्ता श्रीघोषनन्दि क्षमणके शिष्य, ॥१॥ तथा वाचनारूपसे महावाचक क्षमण मुण्डपादके गुण्य प्रथित (प्रसिद्ध) कीर्ति वाचकाचार्य मूल नामके शिष्य ॥ २ ॥ स्वाति (तन्नामक रुष )के तनय, और वात्सी (इस नामकी स्त्री)के पुत्र, न्यायोधिका (स्थान )में उत्पन्न, भीषणी नाम गोत्रयुक्त कुसुमपुरमें विहार करते हुए ॥ ३ ॥ भलीभांति गुरुकमसे Tप्त (गुरुपरम्परागत) इस अमूल्य अर्हप्रवचन (शास्त्र )को धारण (जानकर) तथा :खोंसे पीडित और दुष्ट आगमोंसे नष्टबुद्धि संसारको देखकर ॥ ४ ॥ जीवोंके ऊपर पा कर नागरवाचक (नागरवाचक शाखोत्पन्न) पूर्वकथित विशेषणयुक्त श्रीउमाखातिने स विशाल तत्त्वार्थाधिगम शास्त्रको स्पष्ट रूपसे भाषण किया ॥५॥ जो कोई इस त्वार्थाधिगम नामक शास्त्रको जानेगा, और जैसा इसमें लिखा है वैसा करेगा, वह व्याबाध (बाधारहित) परमार्थ सुख, अर्थात् मोक्ष सुखको शीघ्रही पावेगा ॥ शम् ।। इति तत्त्वार्थाधिगमेऽहत्प्रवचनसङ्ग्रहे दशमोऽध्यायः समाप्तः॥ इति तत्त्वार्थधिगमेऽहत्प्रवचनसंग्रहे आचार्योपाधिधारि-प्रयागमण्डलान्तर्गत- हरिपुरनामकवास्तव्य-पूज्यपादमहामहोपाध्यायश्रीदामोदरशास्त्रिप्रधान- शिष्यठाकुरप्रसादशर्मप्रणीतभाषाऽनुवादे दशमोऽध्यायः ॥ समाप्तश्चायं ग्रन्थः ॥ ૨૨

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JAINA
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CENTRAL
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AHL
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出
अहिंसाप
LICHTERAT
PUBLISHER:
KUMAR DEVENDRA PRASAD
Propnetor. THE CENTRAL JAINA PUBLISHING HOUSE,
ARRAH, (India)

Sbhasyaattwarthdhigam Sutram

Author
Sharma, Thakurprasad
Title
Sbhasyaattwarthdhigam Sutram
File name
Sbhasyaattwarthdhigam Sutram
Text
OCR done
Citation
1906
Published
2010/1
Publisher
Bombay, Nirnayasagar Press
Language
Sanskrit
Pages
275
Library
Sanmati Library
Classification
Jain sahitya
DLI number
344482
Barcode
99999990234344.00
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Banasthali University
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