Acharya Shri Vinaychandra Gyan Bhandar, Jaipur

Shri Shri Jayanand Kevlino Ras

Manak, Bhim Singh · 2011/07

PDF Proofread

Front matter

No text on this page.

॥प्रस्तावना॥ ॥श्री वीतराग परमात्माएं चे प्रकारनो धर्म उपदेश्यो , जेनी परंपरा धनादिकालथी चाली थावे , तेमा प्रथम सर्वोत्कृष्ट धर्म तो साधुजनने थंगीकार करवा योग्य सर्वत्यागरूप पंचमहाव्रत , ते धर्म सर्वथकी फदेवाय ने थने वीजो देशथकी धर्म ते श्रावकजननें अंगीकार करवा यो ग्य श्री सम्यक्त्व मूल बारव्रत रूप ने तेमा कोइएक श्रावक तो संपूर्ण बा रे व्रत अंगीकार करे , कोइएक, दितीयव्रतादि संपूर्ण थंगीकार को बे. कोइएक वली प्रत्येक व्रत महेिलो जेटलो जेटलो नाग तेनाथी पलाश फाय , तेटलो नागज थगीकार करे ने एम जे जेटलां व्रत अथवा जे व्रतमांदेलो जेटलो विनाग पालवाने शकिमान थाय जे, ते तेटलो विनाग थगीकार फरे ने ए श्रावकनां वार व्रत थथवा ते मांदेलो कोई पण विनाग जे सेवन करवो ते यतिनां पांच माहाव्रत सेवन करवा रूप कार्यनु कारण ने एटले यतिधर्म कार्य धने प्रावकधर्म तेनु कारण ते कारण रूप श्रावक धर्मने सेवन करनारा एवा अनेक उत्तम जीवो पण डेवट यतिना पांच महाव्रत रूप कार्यधर्मनी प्राप्ति करी ते धर्मनु सेवन फरी मोक्षरूप नगरें पदोंच्या बे,तेवा लक्षावधि महान्पुरुषोनां चरित्री श्री जैनग्रंथोमा परंपरायें हरदमेश चाल्यां थावे थने था मध्यम कालमा एटले थाज वर्तमान समयमां पण तेवां चरित्रो मांदेला सहस्रो गमे चरित्र विद्यमान , जे मांदेला थनेक ग्रथोना नाम दररोज व्याख्यान करनारा तथा श्रवण करनारा साधु थने श्रावक जनोने स्मरणमा पण, तथापि ते सर्व ग्रथोनी पंक्तिमा प्रथम गणना करवा योग्य था श्रीजयानद केवलीनी कथा के कारण के एमणे शुभ अज्ञान पूर्वक थतिचार न लगाडता यत्नस दित शूरवीर पणे आवकनां व्रत सेवन कस्यों ने ए मदा पुरुपना जन्म नि वाणादि सर्व, नवमा श्री सुविधिनाथ परमात्माना तीर्थमा ययेला ले ए प्रतापी पुरुषना चरित्रनी परंपरा जोता एमनु नेनु चरित्र सवत् पन्नर सेंना शैफामा श्रीजैनशासनोन्नतिकारक,त्रिदश तरिंगणीथादिक शेकडो ग्रंथो ना फी श्रीमुनिसुदर सूरि माहाराजें सस्कृत नापामा र ले परंतु दालमा घणा ग्रथोने पद्यबंध रास रूपें रचवानो चाल वधारे पसंद दोवाथी मुनि २ श्रीपद्मवियनी महाराज ए ग्रंथनीजूदी जूदी देशियोमा वशेने वे ढाल करीने रास रूपें रव्यु , जेथी ए कथा नाग सर्व वाचनार सादेवोने घपोज स देखायी समजवामां थावशे या महान प्रतापी पुरुपना चरित्रमा मुख्यत्वें करी, आवक व्रत पाल वाना फलन महात्म्य सपूर्ण दीनामां थावशे, ए श्री जयानवली थागत मतिसुंदर नामे प्रधानना नवमा श्रावकने धाचरवा योग्य प्राणातिपातादिक द्वादश व्रत शुभ अक्षान पूर्वक पाल्यां, तेमना फल पण तेमने तेवान मयां डे प्रथमतो देवादिकनां सुख जोगवीने फरी देवोने पण जिंतवाने उलन एवा महा पराक्रमी श्रीजयानदनामें राना थया ने, जेना प्रबल प्र ताप विषयिक महा थत थने थार्थय कारक बांचनारना हृदयमाथा नद उपजावनारी एवी नवा नवा कौतुको सहित चमत्कारिक कथा था चरित्रना नवे खममां सपूर्ण दीठामा थावशे नविन बोधबीजनी प्राप्ति वासनार नव्य नीवोने था चरित्र वांधवा थी तथा श्रवण कनाथी,श्रावक व्रत पासवाना फलनो निश्चय थशे, तेमन यति धर्म पालवाथकी जे उत्तम सुखोनी प्राप्ति थाय , ते पण स्पष्ट दृष्टि गोचर थो, तथा गतनवें जे स्वल्प मात्र पण शुनाएन कस्य थाचरण फस्नु होय तेना सुरष 5 खादि शुनाशुन फल पण अवश्य नोगवां पडे ने ते पण प्रत्यक्ष समजवामां श्रावशे, जेथको तेमने बोधि पामवी सुलन थशे ए श्री जयानदजी पूर्वकत पुण्यानुसारे, वाम गम सर्वकार्यनी सिदि पाम्या ,तथा नवी नवी राज कन्या परस्या ,तेमज राजादिको साथै युद्ध करवामी जय पाम्या, ते तो साधारण वात ले परंतु केटलाएक वखत देव देवीयोनीसाथै सयाम करी तेमने पण जितीने पोताना सेवक करवा ने एवा ए मदा पराक्रमी थपा एमनी जेटली प्रशता करिये एटली थोडीन, था चरित्र बापता प्रथम एना चौद फारम सुची तो एकल प्रति म हारे हस्तगत थ दती, थने त्यार पनी बोजी प्रति मजी थावी तेथी सं शोधन करवाने थनुकूलता थर, तथापि दृष्टिदोष, कंपोस करनारनी चू क थने महारी स्वल्पबुद्धिने सीधे जे नूल थ दोय ते सुझानियें सुधारी वांचवी, मादारा उपर नूल चूकनी क्षमा करवी एवी महारी प्रार्थना में प्रावक नीमसिंद मायक ॥ श्री गोडीपार्श्वनाथाय नमः ॥ ॥ अथ ॥ ॥ पमितश्री पद्मविजयनीविरचित ॥ ॥ श्रीजयानद केवलीनो रासप्रारंन । ॥ दोहा ॥ ॥ प्रथम प्रथम प्रणमुं प्रचु, सोहे असें जास ॥ कुंतल कनक कलश शिरें, नील कमल मनु न्यास ॥ १ ॥ सिझारथ सुह तिविदछ, वदू तिवि हा वीर।जनक सिदारथ विद जिन, धरणीधर पर धीर ॥ २ ॥ कल्या के जस सुर करे, श्रवनी कलप थविशेष ॥ ते सुगुणा वरतो सवे, ज यवता जिन शेष ॥३॥ मात परें पद मांझवा, शास्त्र मारग समजाय ॥ शिशुपरे कविनें शीखवे, प्रणमु सरसति पाय ॥ ४ ॥ गुरु उत्तमगुणगण नया, मुज उपकार महेत ॥ प्रणमुं पदकज प्रेम, श्राणी हरख थत्यंत ॥ ५॥ श्रीजयानद सोनागीया, केवल लखमी कत ॥ धर्म उविध थारा धिने, शिवमुख जे साधत ॥ ६ ॥ नव्यप्रतिबोधन नगी, चरित्र नाम विचार ॥ नवखंमें करी निर्मलो, रचशु रास उदार ॥ ७ ॥ प्रिया सहित पू रवनवें, समकेतनें वली शीत ॥ दान धर्म वली दाखवु, लहे जिम लखमी लील ॥ ७ ॥ चमत्कारकारी चरित, मुणतां दोशे स्वाद ॥ 5 ख दोहग दू रें जशे, विकथा मूकी वाद ॥ ए॥ ॥ ढाल पहेली ॥ चोपार्शनी देशी ॥ ॥ जबुदीप लख योजन मान, सात क्षेत्र तेहमा परधान, सात वरप पण षट वर्ष धरो, चमत्कारी ए वातें खरो ॥१॥सखमी राखण विधियें करो, जगती कोट अ योजन धनो ॥ खाई लवण सायरनी करी, सर्व दीप जस रहा थनुसरी ॥ ५ ॥ तेहमां नरत दक्षिण दिशे कह्यो, वैता ढघ दम लेनें रह्यो ॥थापद वारण मानु एह, पट खमें शोनित ने जेह ॥३॥ खम क्वेश मली रखे करे, तिणे धाता विचे धाडज धरे । ग गा सिंधुने वली पाढ, वैताढ्य रजत तो यतिगाढ ॥ ४ ॥ शह निन

२
केवलीनो रास.
.
जयानंद
वर पमुहा होय, मध्य खम ते एहवो जोय ॥ रतिवईन तिहां नगरीथ
जे,स्वर्ग तणी शोना तेह पढें ॥ ५॥ फटिक कुन तिहा चैत्यने शिरें,
अधकार ते दूर करे॥पूनम थमासनो वहेरो नही, सयल अनीति गऽ दू
रें वही ॥६॥ नृप गजशालायें कलह ते कह्यो, बधन नारि धमिल्ने रह्यो ।
वम प्रासादनें मस्तक होय, स्नेह हानि दीपका नोय ॥ ७ ॥ तुहिया
मदिर दीसे घणा, खडग माहिं रह्यां निर्दयी पणां ॥ को रणी नहीं ते नगर
मकार, पण कोरणी घर घरनें वार ॥ ॥ अलकापुरी परें तेदनो जोस,
पण बढ़ ईश्वर तिहां नहीं दोष ॥ नूति घणी तस मदिर वली, धनद बढ़
रहे नेला मली ॥ ए ॥ तिहां नरवीर थने राजान, ठकुराई जस इ समा
न । कटक रजें ढाक्यो जब सूर, तस प्रताप उद्योत करें नूर ॥१०॥रा
पी गुणवती बढ जास, कोनिमुदरी पटराणी तास ॥ मतिसुदर तेहनें
परधान, चतुराईनो तेह निधान ॥ ११ ॥ रूपवत बढ़ शास्त्रनो नाण, तुर
गुरु नीत्यो चुक्षि प्रमाण ॥ जीवमात्र ते मार्नु रह्यो, यथें जीव तिवं ए
करो ॥ १२ ॥ गुणयाहीने बहु दातार, क्षमा प्रमुख गुणवत अपार ॥ वि
नयी न्यायी ज्ञाता जेह, नृपति जगतो यति सप्तनेह ॥ १३॥ मत्रीश्वर
महोटो जे कवी, राज्य नार तेदने शिर नवी ॥ श्राप निचित निर्नय थ
राय, रात दिवस नोगें लयलाय ॥१४॥ मत्रीश्वरनें कामिनी दोय, प्रीति
सुवरी पदेली तिदा होय ॥ गुणसुंदरी बीनी तस नाम, रूप कसाथी थ
ति थनिराम ॥१५॥ वेवितणु सवि ले रूप, विमन थइ माने निजरूप ॥
ते खें नवि निज्ञा करे, देवी स्वाप रहित तिणे फिरे ॥ १६॥ वृक्षपणे
विक्लव विधि थयो, ए अपवाद विदारण नयो ॥ निपजावी ए करी विज्ञा
न, शक्ति देखाहे निज असमान ॥ १७॥ दान शीलाविक गुण बढ तास,
जिम धानरणे माणक वास ॥ नृपर्ने एक पुरोदित वत्ती, वसुसार नामें ते
बजी ॥ १७ ॥ अतीत धनागत वातो कहे, निमित्त वो ते सगु सबहे ॥
धर्म योग्य राजा परधान, मत्री नारी पण गुण्द निधान ॥ १५ ॥ पण
सामग्री नवि नह्या कोय, तेणें मिथ्यात्वी सघतो दोय ॥ पुरोहित नास्ति
क मत घणी, तेदनी वात सवे निर्गुणी ॥२०॥ श्रीजयानद केवलीनोरा
स, नातां मुगा लीलविलास ॥ श्रीगुरु उत्तमविजयथी लदी, प्रथम
ढाल इम पने कही ॥ २१ ॥

-- प्रथमखम. ॥दोहा॥ ॥ नास्तिक मत निश्चय करी, काढे नोगमां काल ॥ पुरोहित महा पा पायो, श्राखे फोगट थाल ॥ १ ॥ जीवादिक नव तत्त्व जे, नवि माने निर धार । खावु पीतु सुख गणे, परनवनो न प्रकार ॥२॥ ॥ ढाल बीजी ॥ करेलडां गड दे रे ॥ ए देशी॥ ॥ एक दिन मत्रीने घरे, त्रस्य हान सयुत ॥ मुनिवर फिरता गोचरी, रूप थति अनुत॥ नविक जन नमीये रे ॥१॥ नव नव सचित पाप, सवि निर्गमीय रे ॥ एथाकणी ॥ पुस्यराशि मनु ढग कयो, मयगल परें मदारा ज ॥ मासखमणने पारणे,थाव्या महा कपिराज ॥ न० ॥ २ ॥ मत्री मुनि देखी करी, शुनलक्षण शुन वान ॥ मन चिंते मुज नाग्यथी, थाव्या एक अचान ॥10॥३॥ प्रथम नारिने म कहे, थापो मुनिनें वान ॥ दान घणु तस वालढुं, दरखी चित्त निदान ॥ न॥४॥ खीर खाम ते नीपना, मदोटा नाजन माहि ॥ तेहाथी का लेइ करी, थावे मुनिवर ज्यादि । न० ॥ ५ ॥ लीलायें लटके करी, वचमां ढोलती तेह ॥ श्रावी मुनिने वी नवे, सुदर थाहार ल्यो एह ॥ ज० ॥ ॥ मुनि वोले व्रत वतने, नवि सू जे ए थाहार ॥ तव ते मूकी लावती, कूर यति मनोहार ॥ जा पण अनि कपर रघु, नाजनमाथी थाण ॥ सूजे नहीं मुनिवर कहे, थ तिशय मीठी वाण ॥ ज० ॥ ७ ॥ सचित्त ढांकणु ढोकीन, तेदथी लावी घाल ॥ए पण मुज सूजे नहीं, मुनि कहे वयण रसाल ॥ न० ॥ एक ए कपर रघु घृत वली, मुनिवर न जीये तेद ॥ कण मिश्रित वलीश फैरा, शुक्ष्मान नहीं एद ॥ न० ॥ १० ॥ दो दिन नपर दधि जिको, न वि लीये मुनिवर सोय ॥ ते पण मूक्यू तेणीयें, वली जे घरमा होय ॥१०॥ ॥ ११॥ गत कालें मोदक करया, नावें लावी नारि ॥ मुनि कहे श्रम सू जे नहीं, एद मोदक इण वार ॥ ज० ॥१२॥ नारी मत्री मली, न धामह कीध ॥ श्राशय थपजाणे थके, पण मुनिवरें नवि लीध ॥०॥ ॥ १३ ॥थालेतां देखी करी, मनमां अपनो खेद ॥ थप मगल चित्त चिं तवी, बोले इणिपरें भेद ॥ ज० ॥ १४ ॥ मोदक थमृत सारिखा, मो न वि सूजे एह ॥ तो किम विप तुज सूजशे, किंवा नेत्र गयां देव ॥ न० ॥ ॥१५॥ पहेली स्त्री कहे जैनना, यतिने दाक्षिण्य नाहि ॥ दाक्षिस्य रामकुळे , । जयानद केवलीनो रास. हुए, एहनु कुल कुण माहि ॥ न ॥ १६ ॥ वीजी कहे ग्योतमां, जो नवि सूजे काय ॥ तो थापो ए श्रधने, जिन्न न तुम जाय ॥ न । ॥१७॥पात्र घणा ए नयरमां, तेहनें देशु दान ॥ मगल करगु थापणे, वेणुं थादर मान ॥ न० ॥ १७ ॥ जिहां तिहा दीधु दान जे, ते निष्फल न वि जाय ॥ पात्रे दीधु दान ते, सहस कोडिगुणु थाय । न० ॥ १ ॥ वाक्ये ते प्रण जणे, वायु कर्म कठोर ॥ रोप शोष पिण मुनि हवे, नी कलीया तप घोर ॥ ॥ २० ॥ एक श्रावक मत्रि घरे, थाव्यो कार्य विशेप ॥ पण ते मत्रीमित्र जे, थतर नहीं तस रेख ॥ न० ॥ २१ ॥ धर्मरुचि ते नामयो, पापी बासन तास ॥ उचित वयण सतोपिने, वात क हे दवे खास ॥ न ॥२॥ श्रीजयानदना रासमा, नांखी बीजी ढाल । ॥ पश्न कदे श्रोता घरे, दोजो मगत माल ॥न ॥ २३॥ सर्वगाथा॥५५॥ ॥ दोहा॥ ॥नाई को मुल घरजणी,थाव्यो निकु एक ॥ जैन यति जाणी करी, विनयें धरी विवेक ॥ १ ॥ प्रियायें प्रारथना करी, देवा मामय दान । उ तम नोजन थापवा, बहु थावर व मान ॥ ॥ श्राज प्रथम मुज थां गणे, थाव्यु पातर एद ॥ वीण तीधे वाली वती, समजण नाही सनेह ॥ ३ ॥ अप मगल कर उसस्यो,कोण हतो कहो नाय ॥ तखो तो था खो तुमें, श्रावक कहे समजाय ॥ ४ ॥ दमणां मलीया देनशु, मुनिवर ते मदिराण ॥ प्रणम्या में प्रेमें करी, लखीया थसमान ॥ ५ ॥ कान देने जे कहूं. सांजलो चतुर सुजाण ॥ चित्रकारी जस चरित्र , सुणतां श्रावे शान ॥ ६ ॥ ॥ ढाल त्रीजी ॥ वाडी फुली थति नली॥ मन नमरा रे ॥ ए देशी॥ ॥ सिंधूदेश सोदामणो, मुनि नमी रे ॥ सौवीर नगर मकार ॥ पाप निगमी रे ॥ वलिथतिबल राजी ॥ मु०॥ तस सम नही शिरदार ॥ पा० ॥ १ ॥ तास सनामा थन्यदा ॥ मु०॥परदेशी नट थाय ॥ पा०॥ मामघु नाटक थनिनवु ॥मु॥ देखता थचरिन थाय ॥ पा ॥२॥ देखी सगर चक्की तणु ॥ मु०॥ नाटक पुत्र वियोग ॥ पा०॥पीडा तेदनी देखी ने । मु० ॥ ध्याये चित्त शुनयोग ॥ पा० ॥ ३ ॥धदो नव खमय दे खोयें । मु० ॥ ज्या ते महाराय ॥पा निजमुत वालकनें ववी ॥ मुक ए प्रथमखम ॥ राज्य तखत निरमाय ॥ पा ॥ ४ ॥ धमाकर गुरु सन्निधे ॥ मु० ॥ दीक्षा लीये महाधीर ॥ पा० ॥ उविध शिक्षा थन्यासता ॥ मु०॥ बदु श्रुत थया गनीर ॥ पा० ॥ ५ ॥थचुत वैराग्यनो धणी ॥ मु० ॥ वारसविद तप सार ॥ पा० ॥ थप्रमादी नित्य विचरता ॥ मु० ॥ लब्धि तणा नंमार ॥ पा० ॥ ६ ॥ काय असाध्य न तपथकी ॥ मु०॥ योग्य जाणी गुरु पा य ॥पा० ॥ एक विहार थाणा करे ॥मुणा सद्गुरु करिय पसाय ॥ पा ॥ ॥ सिंह परे ते विचरता ॥ मु० ॥ परिसदने उपसर्ग ॥ पा० ॥ ते मृगथी बीहे नहीं ॥ मु॥साधता अपवर्ग ॥ पा॥ ॥ गनपुर श्राव्या थन्यदा ॥ मु० ॥ ध्यान तपें वेद लीन ॥ पा० ॥ उद्याने रह्या मुनिवरु ।। ॥ मु० ॥ निज थातम करे पीन ॥ पा० ॥ ए ॥ विविध अतिशय गुण थकी ॥ मु० ॥ सुखीया होय सवि जीव ॥ पा० ॥ नीमराय तिहां राजी 3॥ मु० ।। शत्रुनें नीम थतीव ॥ पा० ॥ १७ ॥ राजस गुण धारे स दा ॥ मु० ॥ सर्व दर्शननो राग ॥ पा० ॥ मतिसार मत्री तेहनें ॥ मु०॥ बुद्धिनिधि महानाग ॥ पा० ॥ ११ ॥ राज्यनार धोरी कह्यो । मु०॥ राज मूरति मानुं एह ॥ पा ॥ थोडे अपराधे करी ॥ मु०॥ मारे तस्कर तेद ॥ पा० ॥ १२॥ थकाम निहाराथी थयो । मु० ॥ निसार व्यतर सार ॥ पा० ॥ ज्ञानविनगें पालो ॥ मु०॥जव दीगे थविकार ॥ पा० ॥ ॥ १३ ॥ पुरस्यवत राजा नणी ॥ मु०॥ न शक्यो परानव देण ॥ पा॥ गज मरगी अति थाकरी ॥ मु० ॥ कीधी कारण तेण ॥ पा० ॥ १४ ॥ नृप मन खेद लदे घणो ॥ मु०॥ करे अनेक उपाय ॥ पा० ॥ पण नवि शांति दुइ किमें ॥ मु॥ मत्रीने कहे राय ॥ पा० ॥ १५ ॥ करो उपाय को वेग ॥ मु०॥ तस पण चिंता थाय ॥ पा० ॥ व्याने गयो श्रन्यदा ॥ मु० ॥ गीत वाजिन सुणाय ॥ पा॥ १६ ॥ विस्मित चित्तथी यावी ॥ मु० ॥ मत्री मुनिने पास ॥ पा० ॥ देवी नाटक तिहां देखी ॥ मु॥ हाव नाव सुविलास ॥ पा० ॥ १७ ॥ महाप्रनाव झपिराननो ॥ १० ॥ नाणी नमी पाय पा० ॥ पद फरसित रज लेइने ॥ मु०॥थाव्यो ते निज गय ॥पा ॥१॥ सवि गज रेणुतिलक करखां ॥ मु० ॥ मरगी नाती जाय ॥ पा०॥ ते वृत्तात यावी कहे ॥ मु०॥ हरख थकी निजराय ॥ पा० ॥ १॥ ॥ मुनिवर स्तवना वढ करे ॥ मु० ॥ तव वव करे राय ॥ पा॥

४ जयान केवलीनो रास. हुए, एड्नु कुल कुण माहि ॥ न ॥ १६ ॥ वीजी कहे द्योतमा, जो नवि सूजे काय ॥ तो थापो ए अधने, निन्न भणी तुम जाय ॥ ज० ॥ ॥१॥ पात्र घणा ए नयरमां, तेहने देशु दान ॥ मगल करगु थापणे, देशु थादर मान ।। न ॥ १७॥ जिहां तिहां टीधु दान जे, ते निष्फल न विजाय ॥ पात्र दोधु दान ते, सहस कोडिगुणु थाय ॥ न० ॥ १ ॥ वाक्ये ते त्रए जणे, वायु कर्म कठोर ॥ रोप शोष विष मुनि हवे, नी कलीया तप घोर ॥ न० ॥ २० ॥ एक श्रावक मत्रि घरे, थाव्यो कार्य विशेप ॥ पण ते मत्रीमित्र , थतर नहीं तस रेख । न० ॥१॥ धर्मरुचि ते नामयी, यापी थासन तास ॥ उचित वयण सतोपिने, वात क हे दवे खास ॥ ज०॥२२॥ श्रीजयानदना रासमा, नारखी वीजी ढाल ॥ ॥ पम कहे श्रोता घरे, दोनो मगल माल ॥न० ॥ २३॥ सर्वगाथा॥५५॥ ॥ दोहा॥ ॥नाई कोई मुज घरजणी,थाव्यो निकु एक ॥ जैन यति जाणी करी, विनयें धरी विवेक ॥ १ ॥ प्रियायें प्रारथना करी, देवा मामयु वान ॥ त्तम नोजन थापदा, बहु थादर बद्दु मान ॥ ५ ॥ थान प्रथम मुज यां गणे, श्राव्यं पातर एद ॥ वीण लीधे वत्ती वली, समजण नांदी सनेह ॥ ३ ॥ थप मगल कर उसस्यो,कोण दतो कदो नाय ॥ Jलखो तो था खो तुमें, श्रावक कहे समजाय ॥ ४ ॥ दमणां मलीया देनश्चं, मुनिवर ते मदिराण ॥ प्रणम्या में प्रेमें करी, उत्तरखीया थसमान ॥ ५ ॥ कान देने जे कर्बु, सनिलो चतुर सुजाण ॥ चित्रकारी जस चरित्र , सुणतां श्रावे शान ॥ ६ ॥ ॥ ढाल त्रीजी ।। वाडी फूली थति नली॥ मन नमरा रे ॥ ए देशो॥ ॥ सिंदेश सोदामो, मुनि नमी रे ॥ सौवीर नगर मजार ॥ पाप निगमीय रे ॥ वलिथतिबल राजी।मु०॥ तस सम नही शिरदार ॥ पा० ॥ १ ॥ तास सनामा थन्यदा ॥ मु॥परदेशी नट थाय ॥ पा० ॥ मामघु नाटक थनिन ॥१॥ देखता थचरिन थाय ॥ पा० ॥२॥ देखी सगर चक्री तणु ॥ मु॥ नाटक पुत्र वियोग ॥ पापीहा तेदनी देखी में ॥ मु० ॥ ध्याये चित्त शुनयोग ॥ पा०॥३॥थदो नव 5 खमय दे खोये ॥ मु० ॥ ज्या ते महाराय ॥पा०॥ निजमुत वालकनें ववी ॥ मु , प्रथमखम. कार रे लो॥थहो हुए। उन्धव रंग वधामणां, हूथा घर घर बार रेलो ॥ अहो हू ॥ १० ॥ अहो तप महिमा थचिंत्य , चक्रीन सैन्य चूरे रे लो ॥ अहो च० ॥ कोधथी वली सुप्रसादथी, तस झझे पूरे रे लो॥ थहो तम् ॥ ११॥ यत ॥ मुनयश्चक्रिण सैन्य, मपि कुमादहत्यहो ॥ तप प्रनाव तस्तस्य, समृमि दर्शयंतिच ॥ १ ॥ ढाल पूर्वती ॥ राय प्रमुख मुनिरायनें, नमीयाने स्तवीया रे लो॥ यहो न० ॥ मुनिदर्शित धर्म यादरे, शकति न गोपवीया रेलो॥श्रदो श० ॥ १२॥ विहार करी मुनि तिहां थकी, केमा पुरी उद्याने रे लो॥ अहो के० ॥हान ध्यानमादि रह्या, नहीं थाहारनें पा न रे तो॥ श्रहो न ॥ १३ ॥ मासखमणने पारणे, थाव्या नयर मकार रेलो॥ अहो था॥ घर घर निदाने फरे, सेवा शुरु थाहार रेलो॥थहो ले ॥१४॥ गोखें बेगे तिहां कणे, एक पुरोहित पुत्त रे लो ॥थहो ए॥ जिनधर्मक्षेषी श्राकरो, मिथ्यात्व थाकूत रे लो ।। थ दो मि० ॥ १५ ॥ धन यौवन मद याकरो, थावी मुनिवर पासें रे लो। बहो था॥मस्तक खा सहां मारीयां, मुनि समता विलास रे लो ॥ श्रादो मुण् ॥ १६ ॥ यत ॥ मृगमीनसतानानां, वृजलसतोषविहितवृत्तीनां ॥ सुब्धकधीवर पिञ्जुना, निष्कारणवैरिणोजगति ॥१॥ कहल तजे न श्यामता, सजान तजे न देत ॥ हरिजन तजे न कुटिलता, एह जाणो सकेत ॥शाकोकिलानां स्वर रूपं, स्त्री णां रूपं पतिव्रता ॥ विद्यारूपं कुरूपाणां कमा रूपं तपस्विनी ॥३॥ढाल॥ कोप करे नही मुनिवरा, मेरुपरेधीर रे लो॥श्रहो मे ॥ ते उपर करता रूपा, कृश तपथी शरीर रे लो॥श्रदो रु० ॥१॥ इपिजी चाल्या थागलें, तव तपनें जोरें रे लो॥श्रदो त० ॥ कोप्या शासन देवता, बांह्यो बिद्ध तोरे रेलो॥थदो बांध ॥ १७ ॥थदृश्य रही क्रोधे करी, थाकंद करावे रे लोथ दो श्रा॥ पीडा बहु उपजे तिणे, मावित्र तिहां थावे रे लो।थहो मा॥ ॥१॥वात सवे मावित्रने, पोतानी सुणावे रे लो॥श्रदो पोतेपण खेद फरी कहे, धिग धिग तुज थावे रे लो ॥ श्रदो धि॥२०॥ कोइछपाय सूजे न दी, थावे मुनिवर पासें रेलो ॥थहो था ॥ प्रणमी करजोडीकहे, तुम थी उख जाशे रे लो॥श्रदो तु॥३१॥ तुमें बहु महिमाना धणी, तुम शक्ति थगाध रे लो ॥ श्रहो तु॥ तुमें धर्चित प्रण जगतनें, तुमथी निराधाध रे लो॥ थहो तु० ॥ २२ ॥ तेजमयी सूरय तुमें, बाल धूक समान रेलो ॥

Lor जयानंद केवलीनो रास. पति मत्री बिहु उछवे ॥ मु० ॥ थावे मुनिवर पाय ॥ पा० ॥२०॥ मु नि प्रणमीने उपविशे ॥ मु०॥ पारे मुनिवर ध्यान ॥ पा० ॥ धर्म ला न वे हवे ॥ मु०॥ करे देशना दान ॥ पा०॥ २१॥ श्रीजयानदना रा समां ॥ मु०॥ नाखी त्रीजी ढाल ॥ पा० ॥ पद्मविजय कहे सोनलो ॥ मु०॥थागल वात रसाल ॥ पा० ॥ २२ ॥ सर्वगाथा ॥ ३ ॥ ॥ दोहा ॥ ॥ ऽविध धर्म तिहां दाखवे, वर्णव करी विस्तार ।। गुणधर मुनिवर गृही तणो, सम्यग शुझाचार ॥ १ ॥ वृज्या नूप मत्री विदु, बीजा पण बदुलो क॥ धर्म यथाशकतें करी, थाव्या निज निज 3क ॥शा मुनिवर सयम मा ल्हता, श्रप्रतिबथणगार ॥ पृथिवीने पावन करे, वरते उपविहार ॥३॥ ॥ ढाल चोथो ॥ मालीकेरे वागमें, दोय नारिंग पके रे लो । श्रदो दोय० ॥ ए देशी॥ ॥ वीरपुरें दवे थावीया, तिहां बे नरमारी रे लो॥ अहो ति ॥ बल सार तेदनो राजी, प्रना पीडा थपार रे लो॥ थदो प्र॥ १ ॥ देखी उपाय करे घणा, पण न य शांति रे लो॥अहो प० । एक दिन नीम नरेंनो, दूत तिहां थायात रे लो॥ थदो दू०॥ ५॥ सद्याने मुनि देखी था, नलवी प्रणमत रेलो ॥ श्रदो ३० ॥ राज्यसनामा श्रावीन, प्र णमेनूकत रे लो॥थहो प्र०॥ ॥ राय कहे किम थावतु, कार्य तेद वा खो रे लो॥ यदो का० ॥ राज कान सवि वारता, होय ते तुमें वाखो रेलो ॥थहो दो० ॥ ४ ॥ तेणे पण वात कदेता थकां, कऍ एम प्रसगें रे लो॥ थहो क० ॥ गजमरगी गई नीमनें, मुनि मदिमा रंगें रेलो ॥ यहो मु०॥ ५ ॥ ते तुम नाग्ये तुम तणा, तथानमां थाव्या रे लो॥यहोवा मेंप्रणम्या महानाम्यथी, मुज मनमा नाघ्या रेतो॥थहो मु०॥ ६ ॥ विस्मय लदी नृप दरखी, राज्य उत्तर देइरे जो॥थदो रा॥विसरज्यो ते में, सत्कार करे रे लो॥थहो स॥७॥ मुनि मदिमा ते नयरमा, घोषणा करता रेलो ॥ थदो स० ॥ ते उद्घोषण सनिली, चित्तमा सहु धरता रे लो ॥ श्रदो चि ॥ ७ ॥ मुनि फरतित रज जई करी, करे तिल क ते ना रे लो॥ अहो का ॥राय रांक सड सारिखा, थाप थाप सं जाले रे लो॥ थदो था ॥ ५ ॥ मरगी गई सवि नयरपी, हुd जयजय प्रथमखम. (ए ॥ ढाल पांचमी । वालम वहेला थावजो ॥ ए देशी॥ ॥धर्मरुचि श्रावक इम कहे, सुणो मत्री तुमें वाणि रे ॥ कल्पतरु सम एह महामुनि, मदिमावत गुण खाणि रे॥ धर्मरुचि ॥१॥ सुगुण श्राक र्पित सुरवरा, करे नित्य जस सेव रे ।। पूजा निदा करे एहनी, तेहनें फल ततखेव रे ॥ ३० ॥ २ ॥ तूसे रूसे नहीं ए कदा, इम मुणी तस वाणी रे । बहु पश्चात्ताप नय विव्दलो, प्रिया दोय तिम जाणी रे ॥ध ॥३॥ सचिव कहे विस्मित इणी परें, दादा मुनि अपराध रे ॥ कीधलो एद थ जाणतें, फल तास अगाध रे । ध० ॥ ४ ॥ में तथा टोय नारी मली, कखो थतिय थाक्रोश रे ॥ एहनां फल कहो श्यां थशे, श्म मत्री करे शोष रे ॥ ध० ॥ ५॥ यत ॥ साधूनां दर्शन पुस्य, तीर्थनूतादि साध व ॥ कालेन फलते तीर्थ, सद्य साधुसमागम ॥ १॥ ढाल ॥ जैन मु निनो थमें नवि लदु, वगर अन्यास थाचार रे ॥ बीक लागे एह मुनि थकी, देशे शाप ए वार रे॥ध ॥ ६ ॥ धर्मरुचि कहे एह मुनिवरु, द यावत शिरदार रे ॥ शाप नवि कोयनें ए दीये, पाले शुरू याचार रे ॥१०॥ ॥ ॥ हेलना पण अणगारनी, वनयलोक 5 खदाय रे ॥ नई खमावो तिपणे ए मुनि, पापशांति ते थाय रे ॥ध० ॥ ७ ॥ मत्री कहे एह करशृं । सवे, पण एक कहो वात रे ॥ पायस प्रमुख सद्गु थापता, नवि लीधु कि ण नात रे ॥ ध० ॥ ॥ श्रावक कदे हु जोई कद्रु, जब जूवे तिण गण रे॥ खीर विंध्यें बढ़ कीटिका, पगें होय तस हाण रे ॥ध ॥ १॥म त्रीने तेह देखावतो, दया नवि रहे एण रे ॥ थगनि विराधना क्रूरथी, ३ त्यादिक कहणेण रे॥ध ॥ ११ ॥ थात वधि वली मूकीने, मूकीथल तानु पोतुं रे ॥ उज्ज्वल सूक्ष्म जीवनें, मत्रीनें कहे जो तु रे ॥४॥ ॥ १२ ॥ नविथ लीधुं ण कारणें, दवे मोदक वात रे ॥ नवि ग्रह्मा तेह जाणु नहीं, मुनि कहेशे साक्षात रे ॥ध ॥ १३ ॥ एहवु सांजली देखी में, मत्री विस्मय पामे रे ॥ सूक्ष्म धर्म थहो जैननो, नवि दौठो को वामे रे ॥ १० ॥ १४॥ दान बह पात्रमा में दीयां, जम्यो शास्त्र थनेक रे ॥ निरीहता एदवी जिहां दोये, तेहवु गण न एक रे ॥ध० ॥ १५ ॥ श्रा वक कहे मुनि वदवा, जय थापण नाय रे ॥ जनम कतारथ कीजीयें, वली नव इख जाय रे ॥ १०॥ १६ ॥ मत्री कहे हु अपराधीयो, मुख

G
जयानद केवलीनो रास.
॥ अदो बा ॥ नवि उलख्या तिणे मूरखें, फीधु एथपमान रे लो ॥ श्र
हो की० ॥२२॥ तुम अपराध करयो घणो, खमो कृपा निधान रे लो॥थहो
ख० ॥ मोहोटा रोप राखे नहीं, एतो बहु अज्ञान रे लो ॥ थहो ए० ॥
॥ २४ ॥ तुम शरणे श्राव्या नणी, थनुकपा कीजें रे लो॥ थहो यः॥
वालना कर साजा करो, सेवक गणी लीजें रेलो ॥ थहो से० ॥ २५॥तु
मविण को दूनो नही, जेहनें जइ कहोये रे लो॥ अहो जे ॥ मुनि कहे
रोप न मादरे, त्रण का कश्ये रे लो॥ श्रदोत्र ॥ १६॥ पण ए शास
न देवता, एहनें शिक्षा दीधी रे लो॥ अहो ए॥ थाकारों परगट था, त
व वाणी कीधी रे लो॥ अहो त ॥ २७ ॥ पापीने साजो नवि करु, पू
ज्यनें 5 ख दीधु रे लो॥ अहो पू० ॥ पूजा प्रमुखे सतुष्टथी, फरी वचन ते
कीधु रे लो॥थहो फ० ॥२॥ मुनि पासें दीक्षा लीये, तो सानो करीये रे
लो॥अहो तो ॥ ते पण तेणें थगीकस्यु, देवी वयण थादरीये रे लो॥थ
हो दे ॥ २५ ॥ ठेवीय शक्ति याचिंत्यथी, कर नूतन कीधा रे लो ॥ अहो
क० ॥ तव दरखित भया सह तिहा, मनोवलित सीधा रे लो॥अहो म॥
॥३०॥ मुनि शिर उपर फूलनी, थर वृष्टि अत्यंत रे लो॥थहो थ० ॥ प
चाप्तापें खमावीया, मुनिवर माइत रे लो ॥ श्रहो मु० ॥३१॥ श्रीजयानद
ना रासमां, कही चोथी ढाल रे लो॥यहो क० ॥ पद्म कहे मुनि प्रणमतां,
होये मगल माल रेखो॥थहो हो ॥ ३२ ॥ सर्वगाथा ॥ ११ ॥
॥ दोहा ॥
॥ दिये मुनिवर तव देशना, समज्यो चतुर मुजाण ॥ मावित्र थापे
अनुमति, दीक्षानु करे वाण ॥१॥ थिविर कल्पमा थापीथा, शिक्षा म
दण सकेत ॥ मुनि प्रणमी मावित्र मुख, चमत्कार चित्त चेत ॥ ३ ॥नूप
प्रमुख बहु नाविधा, जैनधर्म जगसार ॥ पाम्या तेद प्रशसता, गया ते
निज धागार ॥ ३ ॥ पारण करीने पांगया, मास खमण मुनिराय ॥श्रा
व्या विचरता थहीं, निर्ममर्ने निरमाय ॥४॥ उद्याने श्रवनी तलें, ध्यान
निश्चल मुनि ध्याय ।। श्ववधिज्ञान वली कपनो, शुक्ष्योग समुदाय ॥ ५ ॥
ते मुनि थाव्या तुन घरें, शुरू गवेषे साध ॥ मासांतर करे मास तिम, निर्ले
पनिरबाध ॥६॥

प्रथमखम. ११ ॥ ढाल नही । मादारु मन मोयु रे माधव देखवा रे ॥ए देशी। ॥ अमिय समाणी रे वाणी मुनि कहे रे, सुग मत्रीसर वाण ॥ था क्रोश क्रोध कखो तुमें इणि परें रे, नयन मरूप धजाण ॥ थ० ॥१॥ सम ता नावें रे में खमीन सवे रे, हवे श्रावक परधान ॥ विदुमली पूरे रे स्वा मी नाखीय रे, मोटक केरु निदान ॥ थ ॥ २ ॥ मुनि कहे रात्रं दासी ये रांधता रे, चूला ऊपर रह्यो नाग ॥ धूमें पाकुल व्याकुल ते थयो रे, नाखि गरत थताग ॥थ ॥३॥ तिहां चदरुथा रे केरे अनावथी रे, विषमयो मोदक थाय ॥ घरनां लोके काय जास्यु नहीं रे, जेर तणो समु दाय ॥ १० ॥ ४ ॥ सयम घात कारण नवि में लीथा रे, मत्रीय सान ली तेह ॥ दासी पाम मगाव्या लामुथा रे, परीक्षा कारण एह ॥ थप ॥ ५ ॥ मांखी भरती देखी जाणीयुं रे, मुनिनु सानु रे ज्ञान ॥ थहो थ हो ज्ञान मुनि तुम केरडं रे, थमचु बहु रे अज्ञान ॥ अ॥ ६॥ एह मोदकथी कुटुब सहित थमें रे, मरण लहत ततखेव ॥? तरणिन किम था छ कहो रे, नो करु यहोनिश सेव ॥ 4 ॥ ७ ॥ मित्र वचनथी सद्ध लामु तिहां रे, परतवीया ते एकांत ॥ प्राणायक में शरण मुनिवरू रे, मु निवरने कदे खांत ॥ १० ॥ ७ ॥ ए उपगार कस्खो तुमें मोटको रे, हवे दाखो अपदेश ।। मुनि नांखे सुण धर्म ते जैननो रे, सर्व अधर्म जे शेष ॥ १०॥ ए॥ देव गुरु वली धर्मनें ग्लखी रे, अक्षा ते प्रतीत ॥ श्रधा सहि त विरति दोय दथी रे, सर्व देशे धरो चित्त ॥थ ॥ १० ॥ोत्यादि फ वशधा मुनिराजनो रे, बादशधा गृहिधर्म ॥ थूल प्राणातिपात प्रमुख कह्यो रे, इत्यादिक सवि मर्म ॥ थ० ॥ ११ ॥ सांजली प्रतिज्यो ति हां मत्रवी रे, तिम तेदनी दोय नारि ॥ सर्व विरति स्वामी न करी शकु रे, देशयो यो अणगार ॥ 4 ॥ १२ ॥ मुनि पण दादश व्रत उच्चरावी यो रे, शीखवे थावश्यक सार ॥ दानादिक गुण तिम उपदेशिया रे, पाम्या श्रा याचार ॥ श्र० ॥ १३ ॥ मुनि वदन करी सहुये घरें गया रे, मुनि थाशातना जेह ॥ निंदा गर्दा बालोचना मुखें रे, कर्म खपावे वढु तेद ॥थ ॥ १४ ॥ तो पण कायक शेप रघु खरु रे, नोगवशे एक वार धर्म रुचि प्रमुखा सद्गु मुनि नमी रे, पोहोता निज घर वार ॥॥ १५ ॥मा सखमण मुनिने पूरुं यता रे,मत्री करे नित्य सेव ॥ श्रावक सगयी पूरण १० जयानंद केवलीनो रास केम देखाय रे ॥ श्रावक कहे मुनि दरिशणें, कीसी लाज कराप रे ॥४॥ ॥१७॥दोप तो एह देखे नही, इम कही सदु जाय रे । मुनिवर प्रामी या नक्तिथी, चित्त हरख न माय रे ॥ध ॥ १७ ॥ दे धर्मनान संतोषी या, मत्री कहे कर जोडी रे ॥ स्वामी थपराध में वह करो, खमो एह मुज कोही रे ॥ध० ॥ १५॥ कोटि नर नस्म क्षणमा करे, तप तेजें मुनि राय रे॥ गुणनिधि करो रुपा श्रम नणी, थमें रज तुम पाय रे ॥ध० ॥ ॥ २७ ॥ दोय नार्या पण मुनि नमी, पश्चात्ताप करती २ ॥ मुनि खमावे निज निवती, घणी नक्ति धरती रे ॥ ध० ॥ २१ ॥ मुनि कहे कोप नहीं मादरे, तुमें नय मत थाणो रे ॥ दृष्टि स्वरूप जाणो नहीं, तेह शुभ पि बाणो रे ॥ १०॥ २२ ॥ श्रीजयानदना रासमां, कही पाचमी ढाल रे ।। पद्मविजय कदे सनिलो, मुनि वात रसाल रे॥ध॥३॥सर्वगाथा॥१५॥ ॥ दोहा॥ ॥थाखि कहो थणगारजी, मत्री कहे श्म जाम ॥ दोय नेद दे दृष्टिना, मुनिवर श्म कहे ताम ॥ १ ॥ चरमरूप थूल चटु जे, समजो वाह्य सुजा ण ॥ धन्यतर दवे उलखो, ज्ञान वर्शन गुण जाण ॥॥ दोप बेतालीश देखि ये, थाहार तणे अधिकार ॥दोय दृष्टि तेणें देने, उपयोगें लग थाहार॥२॥ गते बेंतालीश दोषना नाम गाथायें करी कहे जे-गाया॥श्राहाकम्मुर हेसिथ, २ पूश्कम्मेथ ३ मीसजाए॥४॥ तवणा ५ पादुहिधाए ६, पाउथ र ४ कोय पामिच्चे ए ॥ १॥ परिश्रष्टिए १० थनिहड् ११, निन्ने १३ मालोदडेथ १३ थठिक १४ ॥ थणिसिहे १५ थनोयर १६, सोल स पिमुग्गमे दोसा॥२॥धाई १ दुई निमित्त ३, थाजीव ४ वणिमगे ५ तिगिहाय ६ ॥ कोहे प्रमाणे माया ए, लोनेय १० दवति दस एए ॥३॥ पुर्वि पक्षासथव ११, विया १३ मतेश्च १३ चुन्न १५ जोगेथ १५॥ उपायणा दोसा, सोलसमे मूल कम्मे थ ॥३॥ एव बत्रीश ॥ सकिन्छ ? मरिकथ २ निस्सित ३, पिदिय । साहरिश्च ५ दायगु ६ म्मीसे ॥ श्रप रिणय लिन ए बिमिथ १०, एसण दोसा दस दवति ॥ ५॥ एव वेता लीश ॥ सजोयणा १ पमाणे ५, गाले ३ घूम ४ कारणे ५ इति ॥ ग्रासैप ण दोषा ॥ एव सुडतालीश दोपगाथा || प्रथमखम. ११ ॥ ढाल बही ॥ मादारुं मन मोह्यु रे माधव देखवा रे ॥ए देशी ।। ॥श्रमिय समाणी रे वाणी मुनि कहे रे, मुणं मत्रीसर वाण ॥ था क्रोश क्रोध कस्यो तुमें इणि परें रे, नयन मरूप अजाण ॥ थ ॥१॥सम ता नावें रे में खमीन सवे रे, हवे श्रावक परधान ॥ विडंमली पूढे रे स्वा मी नारखीयें रे, मोदक केरु निदान ॥ थ ॥ ५॥ मुनि कहे रात्रं दासी ये रांधता रे, चूला कपर रह्यो नाग ।। धूमें श्राकुल व्याकुल ते थयो रे, नाखि गरल थताग ॥१०॥३॥ तिहां चदस्था रे केरे घनावथी रे, विषमयी मोदक थाय ॥ घरनां लोके काय जाण्यु नहीं रे, जेर तणो समु दाय ॥ य० ॥ ४ ॥ सयम घात कारण नवि में तीथा रे, मत्रीय सान ली तेह ॥ दासी पान मगाव्या लामुथा रे, परीक्षा कारण एह ॥ १० ॥ ५॥ मांखी मरती देखी जाणी रे, मुनिनु साचु रे ज्ञान ॥ श्रदो थ हो ज्ञान मुनि तुम केरडं रे, थमचु बहु रे अज्ञान ॥ अ॥ ६ ॥ एद मोदकथी कुटुब सहित अमें रे, मरण लहत ततखेव ॥दै तरणि किम था शु कहो रे, नो करु यहोनिश सेव ॥ १० ॥ ७ ॥ मित्र वचनयी सद्ध सामु तिहा रे, परतवीया ते एकांत ॥ प्राणदायक नें शरण मुनिवरू रे, म निवरनें कदे खांत ॥थ ॥ ७ ॥ ए ठपगार कस्यो तुमें मोटको रे, हवे वाखो अपदेश ।। मुनि नांखे सुण धर्म ते जैननो रे, सर्व अधर्म जे शेष ॥थ ॥ ए ॥ देव गुरु वत्ती धर्मनें लखी रे, अक्षा ते प्रतीत ॥ श्रधा सहि त विरति दोय नेदथी रे, सर्व देशे धरो चित्त ॥थ ॥ १० ॥ोत्यादि फ दशधा मुनिराजनो रे, बादशधा गृदिधर्म ॥ थूल प्राणातिपात प्रमुख फह्यो रे, इत्यादिक सवि मर्म ॥ थ० ॥ ११ ॥ सनिली प्रतिबज्यो ति दां मत्रवी रे, तिम तेदनी दोय नारि ॥ सर्वविरति स्वामी न करी शकु रे, देशथी यो थणगार ॥ अ० ॥ १२ ॥ मुनि पण दादश व्रत उच्चरावी यो रे, शीखवे थावश्यक सार ॥ दानादिक गुण तिम उपदेशिया रे, पाम्या श्राम श्राचार ॥ १० ॥ १३ ॥ मुनि वदन करी सद्धये घरें गया रे, मुनि थाशातना जेह ॥ निंदा गर्दा श्रालोचना मुखें रे, कर्म खपावे बद्ध तेह ॥थ ॥ १४ ॥ तो पण कायक शेप रघु खरु रे, नोगवशे एक वार ॥धर्म रुचि प्रमुखा सट्ठ मुनि नमी रे, पोदोता निज घर वार ॥॥ १५ ॥ मा सखमण मुनिने पूरुं यतां रे,मत्री करे नित्य सेव ॥ आवक सगयी पूरा २२ जयानंद केवलीनो रास. आवक थया रे, जास्या जीवादिक देव ॥थ ॥ १६ ॥ शास्त्राल्यास इतो पूर्वे घणो रे, वसी जिनधर्म प्रसग ॥ न खलाये मति सूक्ष्म अर्थमा रे, जिनधर्म दृढरंग ॥थ ॥ १४ ॥ न चलावे सुरपति पण धर्मथी रे, पर वादीनो करे अंत ॥ जिनशासन शोनावे बद्ध परें रे, कोइ न तास बसंत ॥ ॥ १७ ॥ पारण दिवस लाणी निमत्रणा रे, करे मुनिने सुरसाल ॥ करिय कृपा मुनिवर पण यावीथा रे, नि स्टह परम दयाल ॥ १० ॥ ॥ १५ ॥ मत्री दोय नारी बहु नावथी रे, थापे शुकथाहार । परमन्नादि क तिहां परगट थयां रे, पंचदिव्य मनोदार ॥ १० ॥ २० ॥ पाणी सुग ध वर पुष्पवृष्टि थरे, वली दोवे वसुधार ॥ उनिनाद बहो दानघोष णा रे, मुनिवर करे तिहां बादार ॥ १० ॥ २१ ॥ दान प्रनावें त्रस्प ज रों वांधीयु रे, नोग करम थति गाढ ॥ मुनि उद्यान जड कायस्सग्ग रह्या रे, ध्यान निश्चल जिम पाढ ॥ १० ॥ २२ ॥ निस्वर मुणी नृप पूनावी वीन रे, निजनर कहे ते वृत्तांत ॥ नृप चिंते धिगधिग मुजनें शहाँ रे, एद वा मुनिवर माहत ॥ १० ॥ २३ ॥ एदवा मुनिवर माहारा नयरमा रे, हुँ नवि जाणु रे काय ॥ प्रातसमय वर्ड परिवारथी रे, इम करता दिन जा य ॥थ ॥ २४ ॥ रातें मुनिवर पक श्रेणी करी रे,ध्याये शुकल ने ध्या न ॥ सर्व प्राणीहित वडक पामीया रे, निर्मल केवल ज्ञान ॥ १० ॥ २५ ॥ श्रीजयानवना रासमा ए कही रे, बही ढाल रसाल ॥ पंमित तमविजय रुपा थकी रे,पविजय कहे बाल ॥॥२६॥सर्वगाथा॥१७६॥ ॥ दोहा॥ ॥ मुनिवर केवल पामीया, नानु सदयें परनात॥ नाद ययो देवठंडनि, मना हरख न मात ॥ १ ॥ ज्ञादिक सुर थावीया, गीत वाजित गवाय ॥ परगट दृष्टि पुष्पनी, सुवर्ण कमल सुर नाय ॥ २ ॥ तिहां बेग केवली तदा, देखी दिव्य उद्योत ॥ नूपति पूजे भ्रांतिथी, जूट ए शी ने ज्योत ॥३॥ तव मत्री नर ततक्षणे,श्रावी कहे श्रवदात ॥ रायनें प्रणमी रंगो, वानवे सुणो ते वात ॥ ४ ॥ स्वामी सुणे ए साधुनें, अपनु केवल थाम ॥ जय वदो बदु गति, करो कृतारथ काम ॥ ५ ॥ जैनधर्म नथी जाणतो, नक नावी नूप ।। नक्ति थाधर्य जराई, थवनीपति अनुप ॥ ६ ॥ सा मत मत्री सामटा, परवरित परिवार ॥ गज वेगे यति गेलछ,वा जिवना बहु प्रथमखम १३ कार ॥ ७ ॥ उद्याने थवनीपति, प्रणमे मुनिना पाय ॥ सुर नर थसुर स ना मली, बेठा बेसण नाय ॥ ॥ धर्मलान देश धर्मनी, देशना दीये मु पींद ॥ थालस श्रग उतारीने, सांजलजो सुखकद ॥ ए॥ ॥ ढाल सातमी ॥ वात म काढो दो व्रत तणी॥ ए देशी ॥ ॥ एह ससार असारमा,दोहेलो नरनव पामी रे॥ धर्म करो नवि प्राणी श्रा, उखहानी सुखकामी रे ॥ नाव धरी नवि थादरो ॥ १ ॥ एषांक णी ॥ समकित सार ससारमा,उर्लन पामवु प्राणी रे॥चितामणि परें जा णियें, इष्ट दीये गुणखाणी रे ॥ ना० ॥ २ ॥ यत ॥ मूल दारं पश्चाण, श्रादारो नायण निही । उक्कयस्तावि धम्मस्त, सम्मत्तत्तवि थादियं ॥१॥ ॥ ढाल ॥ देवगुरुने रे धर्मनी, अक्षा कीजें सुजाण रे ॥ दोष थढार रहित सदा, थापे शिवपुर गण रे ॥ना ॥३॥ हास्यादिक पट वेगला, क्य फस्या चार कपाय रे ॥प्रेम पंचाश्रव मद नदी, केलि श्रढार ए थाय रे॥ ॥ जा० ॥ ४॥ एहवा देवनें सेवीयें, जे ससारना रोग रे ॥ तेहना वैद्य शोदामणा, गत सयोग वियोग रे ॥ ना० ॥ ५॥ रत्नत्रयीयुत गुरु कह्या, अथवा महाव्रत धार रे ॥ शय्यावस्त्रने पात्र जे, शुभमान तीये श्रा हार रे ॥ ना० ॥ ६ ॥ सम्यक धरम दायक वली, थाप तरे पर तारे रे॥ पंच महाव्रत धर्म ते,हिंसा प्रमुखने वारे रे ॥ ना० ॥ ७॥ बादश व्रत गृ दिधर्म , थूल हिसानृत चोरी रे ॥ स्वदारा सतोषथी, नवि श्छे पर गोरी रे ॥ ना ॥ ॥ धन परिमाण करे सदा, ए थाव्रत कह्यां पंच रे ॥ दि शि परिमाण वली करे, नोगोपनोग प्रपंच रे ॥ ना॥ ए॥ त्याग अनर्थ दम नारखीज, गुणव्रत एद उदार रे ॥ अणुव्रतने जेद गुण करे, हवे शिक्षा व्रत धार रे ॥ ना०॥ १० ॥थवसरें सामायिक करे, रात्रै थने वली दीत रे ॥ सक्षेप बघा वतनु, वशमु व्रत कहे ईश रे॥ ना० ॥ ११ ॥ पर्वतिर्थे रे पोसह करे, कोइ दिवस तथा रात्र रे ॥ कोइथदोरात्रि श्रादरे, इम नावे तिक्षांत रे ॥ ना० ॥ १२ ॥थतिथिनें दिये दान जे, शिक्षा चोधु ए धार रे॥ वालक शीखे जिम फिरी फिरी, तिम शिक्षा व्रत सार रे॥ ना० ॥ ॥ १३ ॥ तिम पट थावश्यक नित्य करे, दान शीयल तप नाव रे ।। धर्म करो ए श्रावक तणो, यथाशक्ति तणे दाव रे ॥ ना ॥ १४ ॥धारा ध्यां दीये इष्टनें,परनव नृप चक्रि शनि रे ॥ स्वर्गनां सुख वली जे दीये, थ २२ जयानद केवलीनो रास. आवक थया रे, नाल्या जीवादिक देव ॥थ ॥ १६ ॥ शास्त्रान्यास इतो पूर्वं घणो रे, वली जिनधर्म प्रसग ॥ न खलाये मति सूक्ष्म अर्थमा रे, जिनधर्मे दृढरग ॥१०॥ १७ ॥ न चलावे सुरपति पण धर्मथी रे, पर वादीनो करे यंत ॥ जिनशासन शोनावे बहु परे रे, कोइ न तास उलंत ॥थ ॥ १७॥ पारण दिवस जाणी निमत्रणा रे, करे मुनिने सुरसाल ॥ करिय रुपा मुनिवर पण श्रावीधा रे, निस्टह परम दयाल ॥ १० ॥ ॥ १५ ॥ मत्री दोय नारी वह नावथी रे, थापे शुकथाहार ॥ परमन्नादि क तिहा परगट थयां रे, पंचदिव्य मनोदार ॥ १० ॥ २० ॥ पाणी सुग ध वर पुष्परष्टि था रे, वली होवे वसुधार ॥ निनाद यहो दानघोप पा रे, मुनिवर करे तिहा थाहार ॥ ॥ २१ ॥ दान प्रनावें त्रस्य ज परों वांधीयु रे, नोग करम थति गाढ ॥ मुनि उद्यान जई कामस्सग्ग रह्या रे, ध्यान निधन जिम पाढ ॥ १० ॥ २२ ॥ उनिस्वर सुणी नृप पूवी वोउरे, निजनर कहे ते वृत्तांत ॥ नृप चिंते धिगधिग मुजनें इहां रे, एक वा मुनिवर माईत ॥ १० ॥ २३ ॥ एदवा मुनिवर माहारा नयरमा रे, हुँ नवि जाणु रे काय ॥ प्रातसमय वर्ड परिवारथी रे, इम करता दिन जा य ॥थ ॥ २४ ॥ रातें मुनिवर पक श्रेणी करी रे,ध्याये शुकल ने ध्या न ॥ सर्व प्राणीहित वनक पामीथा रे, निर्मल केवल ज्ञान ॥ थम् ॥ २.५ ॥ श्रीजयानवना रासमा एकही रे, बही ढाल रसाल ॥ पंक्ति तमविनय रुपा थकी रे,पविजय कहे बाल ॥॥२॥सर्वगाथा॥१६॥ ॥ दोहा॥ ॥ मुनिवर केवल पामीया, नानु उदय परमात ॥ नाद थयो देवउंग्लनि, मनमा दरख न मात ॥ १ ॥ शशविक मुर थावीया, गीत वाजिन गवाय ॥ परगट वृष्टि पुष्पनी, सुवर्ण कमल सुर वाय ॥ ५ ॥ तिहां बेग केवली तदा, देखी दिव्य उद्योत ॥ नूपति पूजे ब्रांतिथी, ज् ए शी ने ज्योत ॥३॥ तव मत्री नर ततपों,यावी कहे श्रवदात ॥ रायनें प्रणमी रंगई, वानवे मुणो ते वात ॥ ४ ॥ स्वामी मुणो ए साधुनें, अपनु केवल थाम ॥ जय वदो बह जुगतिरों, करो कतारथ काम ॥ ५ ॥ जैनधर्म नथी जाणतो, नक नावीनूप ॥ नक्ति थाश्चर्य नराई, थवनीपति अनुप ॥ ६ ॥ सा मत मत्री सामटा, परवरित परिवार ॥गज बेगे अति गेलधु,वाजितना बद्ध २५ प्रथमखम. घटे काय ॥ ल ॥ जीव होय तो सवि घटे, परलोकें कुण जाय ॥॥ ॥थ ॥ ७ ॥ जेटलुं नयणें निरखीयें, इख्यि गोचर एह ॥ ल ॥ लोक एटलो नाणी, वृकपदनी परें तेह ॥ लम् ॥थ ॥ ७ ॥ खा पी सु खथी रमो, समुदाय मात्र ए देह ॥ लम् ॥ काल गयो थावे नही, इम निजनारी कह ॥ल ॥ १० ॥ ॥ यत ॥ पिब खाद च चारुलोचने, यवतीत वरगात्रि तन्न ते ॥ नहि नीरु गतं निवर्तते, समुदयमात्रमिद कले वरम् ॥ १ ॥ ढाल ॥थालोक सुख बोमी करी, परनव सुखनी थाश लि॥ तप कर। बे नव दारता, जब्बू करे तस पास ॥ ल० ॥थ॥ १० ॥मांस पेशी तटें जमीनें, मीन लेवा जिम जाय ॥ ल० ॥ गृह मांस लेई गयो, ज लमा मीन मूवाय ॥ ल० ॥थ ॥ ११॥ उनयघ्रष्ट जबुक ययो, ति म हां बोमो लोग ॥ लम् ॥ परनव श्राशायें दोडता, नयघ्रष्ट होये लो गल॥ थ॥१२॥ कष्ट करे इह लोकमां, परनव थाशा चित्त ॥ ॥ला ॥ जीव विना परनव नहीं, एतो मोहोटी अनीति ॥ ल० ॥१०॥ ॥ १३ ॥ कर्मसूचि सम सांजली, पुरोहित वचन नूपाल ॥ ल ॥ गोपवे रोष गनीर ते, मत्री मुखर्दु जाति ॥ ल० ॥थ ॥ १४ ॥ विद्यावत मत्री कदे थनुनव सिम ए जीव ॥ ल० ॥ रे मूरख देखे नहीं, उलवे केम थ तीव ॥ल ॥१०॥ १५ ॥ पुत्रनो जन्म सुणी करी, खिळ पण लहे सु ख ॥ १० ॥ तास मरण वली सनिली, मुखमा किम लदे 5 ख ॥ ल॥ ॥ य० ॥ १६ ॥ मातु कश मुज थग ए, ए स्वामी मति केम ॥ ल० ॥ नू प पृथिवी परें जिन्न ए, जीव शरीर ए नेम ॥ ॥थ ॥१७॥ जीव वलो ए शाश्वतो, तिणें परनव पण जाय ॥ लम् ॥ पुस्य पाप पण सगुन खां, मुख ख फल पण याय ॥ ज० ॥ य० ॥ १७ ॥ दानथी देवलोक पामीये, तपथी थाये सि ॥ ल ॥ हिसा प्रमुखें जाये नरकमां, ए शास्त्रे परसिह ॥ ल० ॥थ० ॥ १७ ॥ हेतुर्तित सुगतें करी,हत प्रतिहत को तास ॥०॥ लोकसनामें निनबीन, तादरो श्यो विशवास ॥ लाथा॥ ॥ २० ॥ नरपतियें थपमानी, लाज्यो तेद थत्यंत ॥ ल॥ राजसनामा थावे नहीं, ते दिनयी धरी भ्रांत ॥ लम् ॥ १० ॥ २१ ॥ मत्रीने सतकार ता, लोक तथा नरराय ॥ल ॥ स्तवना करता मनु गयां,हरखी निज निज ठाय || ॥ध ॥२॥ श्रीजयानदना रासमा, नारखी थामी ढाल ॥

१४ रे जयानंद केवलीनो रास. नुक्रमें लहे तेह तिहि रे ॥ना॥१५॥ उलटा तेहिन नवें,साधु मोक्ष ते पाम रे ॥ बारमु स्वर्ग गृहस्थनु, उत्कृष्ट लहे ठाम रे ॥ ना० ॥१६॥ बिदुनें स्वर्ग जघन्यथी, पहेतु देवलोक जाणो रे ॥ एदमा एक थगीकरो, निज निज शक्ति प्रमाणे रे ॥ ना॥१४॥ एहवी देशना सानती, पाव क व्रत धरे राय रे ॥ केशक चारित्र थादरे, नव उदवेग निर्माय रे ॥ना॥ ॥ १७ ॥ देशविरति के थादरे, केशक समकेत खास रे ॥ राय प्रमुख मु नि प्रणमीने, थावे निज श्रावास रे ॥ ना० ॥ १ ॥ वदु परिवार ज्ञानी गुरु, उपगारी करे विहार रे ॥ नवि रहे एकण थानके, रवि परें करे ठप गार ॥ ना० ॥ २० ॥ श्रीजयानदना रासमां,नांखी सातमी ढाल रेप पविजय कहे सांजलो,थागल वात रसाल रे॥ना॥१॥सर्वगाया॥२०॥ ॥ दोहा ॥ ॥ पुरोहित महापापी, कोरो कर्म कठोर ।। उषध नाही असाध्यनें, जो होय वैद्यनु जोर ॥ १ ॥ नास्तिकता ही नहीं, मत्री हवे महाजाण ॥ स्वपर समय समजावतो, नरपतिनें निरवाण ॥ २ ॥ नरपति मत्री सानि घे, धर्मे दृढता धार ॥ सामत मत्री प्रमुख सना, पृथिवीपति पुर प्यार ॥ ॥३॥ मणिसिदासन मलपतो,विशद बत्रवर धार ॥ चचल शोनित चाम रें, बेठा सङ दरबार ॥ ४ ॥ ॥ ढाल थामी ॥ ललनांनी देशी ॥ ॥चात प्रसगें वर्णवे, साधुना गुण नरराय ॥ ललना ॥ श्रावक गुण सो हामणा,दियडे हरख न माय ॥ लम् ॥१॥ श्रदो जिनशासन जग न यो । ए थांकणी ॥ धन्य मुनीश्वर जैनना, जे निरमम निरमाय ॥ ल० ॥ साधे जे परलोकनें, निरवांडक मुनिराय ॥ लम् ॥ १० ॥२॥ इत्यादिक नृप वचन ते, भिक मक समान ॥ ॥ लाग्यं पुरोहितनें तदा, थ वसरे बोल्यो अज्ञान ॥ ल ॥थ ॥३॥ इजालीथानी परें, वचे लो क अपार ॥ ज० ॥ बीदिक दाखे परलोकनी, जैनना जे यणगार ॥ज॥ ॥थ ॥ ४ ॥ लोक जोलो कुशास्त्रथी, नोग तजावे थाप ॥ लम् ॥ विवि ध तपस्या करावता, म करो कोई पाप ॥ ल॥०॥५॥ पूजा मानने ६ ता,खोटु घरे अनिमान ॥ लम् ॥ पुरस्यनें पाप देखावता, फल शुन था न अमान ॥ जय० ॥६॥ पण जगा जीवज नथी, तिणे ए न - प्रथमखम मंत्रिने रे, कथनरयनो विचार॥ लखमीप्राण जातां लगें रे उद्यम सुख दाता र॥१०॥ १२॥ यत ॥ उपायातीयते वाई,ध्ये ते च हरिक्षिपौ॥उपायामि रिमुलध्य, किमुपायान्न सिवयति॥१॥ ढाल ॥खोले बल हवें मत्रीनां रे, पण चिते वली एम ॥ जैनधर्मी नर रायने रे, इ नास्तिक करु केम ॥ सु॥ ॥ १३ ॥ जैनगुरु पासें जा रे, शीख्यो किरिया कलाप ॥ कपटी श्राव क पक्ष हवे रे नृपछ करे बालाप ॥ सु० ॥ १४ ॥ मत्रीनी परें कपट थी रे, दाखवे शुरू श्राचार ॥ धर्म कपटें नृपनें उग्यो रे, जिम ते थनय कुमार ।। सु ॥ १५ ॥ मत्रो माया लागतो रे, नवेख्यो नरराय ॥रा जमानीतो जाणीने रे, न चले कोई उपाय ॥ सु०॥ १६ ॥ धर्मशास्त्र नित्य उपदेशे रे, विचे विचे कामनी वात ।। पुरोहित रायने रीजवे रे, फ पटथकी साक्षात ॥ १० ॥ १७ ॥ धर्म राग-थति दोदिलो रे, तुरत पा पनो राग ॥ रंग गतीनो जिम होये रे, नही तिम मनीनो लाग॥ १०॥ ॥ १७ ॥ कामरागें रंगाइन रे, धर्मराग दुइ हाणि ॥ मजित काजल सगें यथा रे, लसए अगर परे जाण ॥ मु०॥ १५ ॥ एकदिन मत्री घरें गयो रे, को कारय वमुसार ॥ थासन दान बोलावतु रे, बहु थावर सतका र ॥९॥ २० ॥ घर थाव्या मिथ्यात्वीने रे, करवो पडे सतकार ।। शुं कहीयें नृपमान्यनु रे, एतो उचित प्रकार ॥ सु० ॥ २१ ॥ यक्तं ॥ गेहागयाण चचियं, विसणावहि थाण तह समुधरण ॥ उहिया ए दया एसो, ससि सम्म धम्मो ॥ १ ॥ ढाल ॥ श्रीनयानं दना रासमा रे, लांखी नवमी ढाल ॥ पनविजय कहे सनिलो रे, श्रोता वात रसाल ॥ सु० ॥ २२ ॥ सर्वगाथा ॥ २६ ॥ ॥दोहा॥ ॥था अवलुं अवलोकतां, निरखी मत्री नार ॥ रति प्रोति रूपें करी, सुगुण स्त्री शिरदार ॥१॥ मंत्रीने धन्य मानतो, रमणी देखी रूप ॥ नो ग योग एहनें नला, एहनें थति अनुरूप ॥ २ ॥ मुज चिता अथवा मि टी, कार्य प्रत्युत्तर कीप ॥ थायो घरे उतावलो, समजे कारय सि॥३॥ लगन बजें नूपालनें, कहे थनागत काय ॥ राजाने श्मरीजवी, नित्य वेसे नृप पाय ॥ ॥ विश्वासी वसुसारने, पूठे प्रश्न उदार ॥ तु मुज राज्ये थवे, सपूरण किमु सार ॥ ५॥ ३ २६ जयानद केवलीनो रास. लगा पद्मविनय कहेनविजना,धर्मथाठजमालालगाया॥५॥ ॥ दोहा॥ ॥ मना विसर्जि शुन परें,स्नान नोजन सनाला नोजन करी बदुनाति नो, साधे सर्व स्वकाल ॥ १ ॥ नित्य मत्रीने नरपति, चितवे धर्म विचार।। सखरो शासन रागीयो,परधाने करयो प्यार ॥२॥ काल गयो म केटलो, नरपतिने एक दिन ॥ माती वेदन मस्तकें, अतिशय ते ठप्पन्न ॥३॥ थो पध प्रमुख उपाय ते, वैयें नव नव कीध ॥ पण उपशम पामी नही, पा म्यो बन्द प्रति ॥ ४ ॥ पुरोहित तव पाधरो, सानरीयो ससनेह ॥ एह उ पाय जाणे अवत, मत्र विद्यानो मेद ॥ ५ ॥ ॥ ढाल नवमी ॥ झर श्रांबा थांवली रे ॥ ए देशी ॥ ॥ पुरोहितने तेडावी रे, नरपति यादर थाण ॥ मत्रादिक उपचार थी रे, वेदनानी करी हाण ॥ सुगुणि नर, कर्मना विचित्र प्रकार ॥ १ ॥ गुण जाणे परनो कस्यो रे, मोहोटा पुरुप जे होय ॥ श्रावे नित्य कचेरी ये रे, तेदने वारे न कोय ॥ सु० ॥ २ ॥ जन पण श्रादर बढ करे रे, प रजा राज प्रमाण ॥ धर्म मिश्रित नीति कामना रे, शास्त्र सुणावे जाण ॥ ॥ १० ॥३॥ राजानु चित्त रीजवे रे, यो विश्वासी तेद ॥ ते देखी म त्री कहे रे, शी संगति करो एह ॥ सु० ॥४॥ स्वामी चमाल ए नास्ति को रे, नूप सुणी रह्यो मौन ॥ क्रोधे उर्बुधि धमधम्यो रे, उष्ट ए सरिखो कोण ॥ ९ ॥ ५ ॥ ब्राह्मण कुल दु उपनो रे, मुजनें कहे चमाल ॥रा जमान मद बढ्नु करे रे, एद मत्री वाचाल ॥ सु० ॥ ६ ॥ दादा परानव वगु कस्यो रे, मुजने सना समक्ष ॥ पुरवलो नीवाडी रे, श्वं परानव प्रत्यक्ष ॥ सु०॥ ॥ जो अपमान ए सही रदु रे, तो मुज अधमता थाय ॥ माखीने परानव थकी रे, प्राण समूलां जाय ॥ १० ॥ ७॥ य त ॥ वरं प्राणपरित्यागो, न मानपरिखमन॥प्राणनाशात् कृण अखं, मा ननगादिने दिने ॥१॥ ढाल ॥ दीगु करे रूसे नहीं रे, तूसे न कीधे न व्य ॥ ते नर कोइ लेखे नहीं रे, गणतीमा सध्या पसष्य ॥ ९ ॥ए ॥ पंक ते मरदे पगथको रे, पण नवि श्रगनिने कोय ॥ तेज देखावू एदने रे, ते जस्वी नमे सद् कोय ॥ सु० ॥ १० ॥ पराक्रमी मातु करे रे, तो पण चाहे तास॥घरबाले पण थनलने रे,पदण करे नित्य स्वास॥॥११॥कोई धपायें प्रथमखम. ए दी सकीये ते कहो रे । लाज न आवे तास रें। प्रा० ॥ १६ ॥ स्वामि य की उजु करे रे, वेष दान ने गेह ॥ लोग अधिक सेवक घ रे रे, क्षण क्षण साले तेह रे॥ प्रा०॥ १७ ॥ ए नवि समज्यो जो कदा रे, स्वामी नक्ति नहीं न्याय ॥ तो तस कामिनी अपहरी रे, शिक्षा देवी थाय रे ॥ प्रा० ॥ ॥१७॥ राय वचन सुणी विप्रनां रे,जाग्यो यतर काम ॥ पण चिंते पर नारीनु रे, मुज पञ्चरकाण उद्दाम रे॥ प्रा० ॥ १ए ॥ तेतो नवि लोपु क दारे, वाले उत्तर तास ॥ अवसरें सवि वनी श्रावशे रे, विसरज्यो सुविला ॥प्रा० ॥ २०॥ श्रीजयानंढना रासमा रे, दशमी ढाल रसाल ॥प मकदे श्रोता सुणे रे, धन धन ए नूपाल रे॥प्रा० ॥ २१॥सर्वगाथा॥२॥ ॥दोहा॥ ॥ नृपनी अनुमति पामीनें, चैत्य करे चित्त लाय ॥ मत्रीश्वर मन नाव तुं, प्रतिमा पण प्रतिष्ठाय ॥ १ ॥ सामो वत्सल करे साम?, निमयो नर राय ॥ तस पन्नी जोवा तणी, उत्कता पण थाय ॥ ॥ इष्ट वैद्य उपदे शि, जाणी चतुर सुजाए ॥ श्रवनीपति थाव्यो तुरत, मत्रीघर ममाण ॥३॥ नोजन सामग्री सरस, प्रिया सहित परधान॥ थारनी पाचमनथी, सद्य करे तिम नान ॥ ४ ॥थासन कनकना थापीओ, मणिना थाल मह त ॥ रतन कचोला रगडूं, थाणीने धरपंत ॥ ५॥ विश्वासे विनता विद्ध, पीरसवा थावे पाण ॥खाद्य नोज्य व्यंजन सखर, वलो घृत यधिक वरखा ण ॥६॥ विजे मत्री वायरो, श्रादर करी थपार ॥ नक्ति नावथी नलि परें, सतोषे शिरदार ॥ ७॥ ॥ ढाल थगीथारमी ॥ देखी कामिनी दोय के कामें ध्यापी रेके० ॥ ए देशी॥ ॥ देखी कामिनी दोय के कामें वश थयो रेके ॥ का० ॥ पुरोहित च पर वचन, विश्वास ते धावियो रे ॥ वि ॥ तोपण गोपवी निज, श्राकार भोजन करें रे॥श्रा ॥ तद्गत चित्त नोजन रस, मनमा नवि धरे रे के ॥म॥१॥ तांबूल वस्वानरण, प्रमुखें सतकारिया रे ॥ प्र० ॥ याव्या निलघर राय के, चित्त विकारिया रे के ॥ चि ॥ एकातें एक दिन के, सारनें कहे रे के ॥ ५० ॥ ताहरी वात साची कहो, कोण न सहहे रे के ॥ को ॥ २ ॥ विप्र कहे कोण सेवक, स्वामीने उगे रे के ॥ स्वाला वी मूको थतेवर, जिम कोड नवि चगे रे के ॥ जि० ॥ राय कहे किम क ॥ वसु १७ जयानंद केवलीनो रास. ॥ ढाल दशमी ॥ कपूर होये थति उनको रे ॥ ए देशी ।। ॥ पुरोहित कहे तुम राज्यमा रे, गज रथ तुरग थपार ॥ कामज थधि क वखाणीयें रे, पुरुपारथमा सार रे॥ प्रापी, जू जू कपट विचार ॥ उर्गतिनु ए बार रे॥प्रा०॥ तिहां नही कोइ थाधार रे ॥ प्रा० ॥ जू० ॥ ॥१॥ एत्रांकणी ॥ धर्म थरथ जे साधीय रे, ते एक कामनें काज | काम साधन नार्या कही रे, ते नहि तुमचे रान रे॥प्रा०॥ ५ ॥ नारी विना नि प्फल सवे रे, राज शहि परिवार ॥ विस्मय सही नृप वोली रे, किम क हे जूत ए वार रे ॥ प्रा० ॥ ३ ॥ रूपवतीने गुणवती रे, माहारे वे बद्ध नारि ॥ विप्र कहे तुज सारिवी रे, एदमा न ही कोई सार रे ॥प्रा० ॥ ॥४॥ नाममात्रथी झुं होये रे, कोइव पण कहे थाहार ॥ वाकला पण वस्व थानके रे, काचादिक अलंकार रे॥ प्रा० ॥५॥ पण घेवर सुरज प्यने रे, स्वर्ण माणिकनें तोल ॥ नवि थावे तिम तुज प्रिया रे, नवि था वे काय मोल रे ॥ प्रा० ॥ ६ ॥ राय कहे मुज नारिथी रे, अधिकी कोण स रूप ॥ दीतीने वली सानती रे, जगमा थति थदनूत रे ॥ प्रा० ॥ ४॥ वि प्र कहे दीनी बिगु रे, थदनूत रूपें निधान ॥ ते पागल तुज नारीने रे, तृण पण नदी उपमान रे॥ प्रा०॥ ७॥ तिणे रूपें जीती रमा रे, हरि नवि मा ने तास ॥ ते परतें थई थाथरता रे, लखमी न एक निवास रे॥ प्रा० ॥ ॥ए । म सानली नृप बोलीयो रे, कोने ने थाधीन ॥ परणिके कन्या थडे रे, नाखो विप्र प्रवीण रे॥प्रा० ॥ १० ॥ तव ब्राह्मण कहे पापी, रे, ए सपूबो स्वाम ॥ अनुद्यमी समर्थने रे, रूहुँ थनास्यु काम रे॥ प्रा० ॥ ॥ ११ ॥ मुज शक्ति किदां न वि फरे रे, राय कहे कदो तेह ॥ इष्ट कामें स द्यम नहीं रे, तेह कहो ससनेह रे ॥ प्रा० ॥ १२॥ विप्र कहे मुणो स्वामी जी रे, तुज थाधीन ए दोय ॥ तुज प्रधाननी वनना रे, वानन ते घणु होय रे ॥ प्रा० ॥१३॥ तुज किंकर ए तेहमा रे, अ पराक्रमर्नु काम । उद्यम करी बोलाविनें रे, मूको यतेवर धाम रे ॥ प्रा० ॥ १४ ॥ नारी तु ज थनुरूप ने रे, ए विण निष्फल सर्व ॥ हय गय राज्य तो किस्यो रे, फोकट करवो गर्व रे ॥प्रा०॥ १५॥ यतः ॥ स्त्रीरन नाति नास्थाने, स्था ने नाति च योजित ॥ ऐने कठे मणिघटा, वाजते नतु गाईने ॥ १ ॥ ढा ल ॥ शूर अधिक नवि सहि शके रे ॥ प्रिया अधिक तुज दास॥ किम त प्रथमखम. २२ न सीमने काजें, विरोध थयोथति रे ॥ वि०॥ १३॥ ते कारण नरवीर, राजा निज नरें रे॥रा०॥ दरवाजे लेखदारक, मुंशोधन करे रेके ॥नु॥ हवे ब्राह्मण थपकार, करण मत्री नणी रे ॥ क० ॥ अवसर जाणी कू ट, लेख लिखे श्राफणी रे ॥ ले ॥ १४ ॥ दवे को इव्य रहित दिज, इव्ये लोनवी रे के ॥६० ॥ जूठी माया शीखवी, बलदीये नोलवी रे के ॥ द० ॥ सोनाना पल चार, दीये प्रपचथी रे ॥ दी० ॥ ते पण सुवर्ण लेख लेइ, चाल्यो सचथी रे के ॥ चा० ॥१५ ॥ गामांतर जश्याव्यो, दर वाजे ते फरी रे ॥ द० ॥ दूरदेशथी थाव्यो, शरीर रजें नरी रे ॥ श०॥ रोक्यो जब दरवाने, नूपाल पुरुष मलीरे ॥ ० ॥ शोधन करतां सुवण, लेख दीगो वली रे के ॥ ले० ॥ १६ ॥ पूछे तास स्वरूप के, तव बोले नहीं रे के ॥ त ॥ सोंप्यो रायनें ताम, नई तिणें गहगही रे ॥ ज० ॥राय पू ने तुं कोण , तव ते इम कदे रे के ॥ त ॥ निईव्य ब्राह्मण वित्त, सपा जवा मन रहे रे ॥ 3 ॥ १७ ॥ तुम नगरें वसता में, सानफ्यु एकदा रे के ॥ सा ॥ समरवीर नृप गिरि,सगम नगरें सदा रे ॥सं० ॥ विप्रथ पूर्वनें कनक, चतुष्टय पल दीये रे ॥ १० ॥ तु पण लोनें गयो तिहां, द रख घणो दीये रे के ॥ हा ॥ १७ ॥ दीपी थाशीष पूढे तव, किहांथी श्रावीया रे के ॥ कि० ॥ में कसु रतिवईन, पुरथी तुम नावीया रे ॥पु०॥ तव तिणे स्वर्णने लेख, श्राप्यो दर्खे करी रे ॥ था॥ मतिसुदर मत्रीने, देजो इम उच्चरी रे ॥ दे० ॥१५॥ मत देजो ए पत्र, कोश्ना दाथमा रे के॥को ॥ लेख कनक लेथाव्यो, एकाकी न साथा रे ॥ ए॥दु नवि जाएं ए पत्र, मांदे तिणें शुलिख्यु रे ॥ मां० ॥ तो जाणु जेटलु, ते तु मने नव्यु रे के ॥ ते० ॥ ५० ॥ विप्र विसरजी लेख, वांचे दवे नूपत्ति रे ॥ वा० ॥ पनविजय ग्यारमी, ढाल ए जिम दती रे के ॥ ढा० ॥ श्रीनया नदना रासा, एक कपट कथा रे के ॥ ए० ॥ तेह सनिलो वात, लिल्यु ते दा यथा रे ॥ लि० ॥ २१ ॥ सर्व गाथा ॥३१॥ ॥ दोहा ॥ ॥ स्वस्तिश्री प्रणमी प्रनु, लिखे राजाधिरान ॥ श्रीगिरिसगम नगरथी, समरवीर शिरताज ॥ १ ॥ श्रीमति रतिवनपुरे, मतिसुंदर जस नाम ॥ महामत्री मुन मित्र, लिखु बेख धनिराम ॥२॥प्रीति सहित थालि . ० जयानंद फेवलीनो रास. री, कारन एह रे॥थ० ॥ परनारी पञ्चरकाण, नंगें उगते जवु रे ॥ ॥३॥ लोकमांहे थपवाद, थजश बहु विस्त रे रे ॥२०॥ एक ल मलिनता हेतु के, वात नविस्तरे रे के ॥ वा० ॥ वत्ती मुन मंत्रि सु श्रावक, स्वामी जको घणो रे के ॥ स्वा० ॥ धर्मनु साहाय्य देवे, उपका री ए मुज तो रे ॥ तप० ॥ ४ ॥ विनयनें न्यायी पराक्रमी, बुध्येि या गलो रेके ॥ ॥ निर्दोपीने दोप, थारोपण नहिं नलो रे ॥था० ।। वली विश्वासनो घात ते, पाप मोहो? कायु रेके ॥ पा॥ पापमूल परनारि, विरुष ए किम ग्रह रे ।। वि० ॥५॥ एह सुणी बुंदि, पुरोहित चिंतवे रे ।। पु० ।। अतर उष्ट कहे दवे, नृपनें कैतवें रे के ॥ न० ॥ वात विचार करो पण, नीति नाणो नहीं रे के ॥ नी० ॥ जे जे रत्न दोये निज देशमा, ते ते रहे श्रही रे के ॥ ते॥॥ तरु धान्यादिक सर्वना, स्वामी तुमें प्रस्तुरे के ॥स्वा॥ तुज देशमा उपनी ए, नारीनो तु विचरे के ॥ ना ॥ ए सपती स्त्री ताह री, परस्त्रोन ताहरे रे के॥५०॥ एहमां पाप होय तो, ते शिर मादरे रे के ॥ ते ॥४॥ नारी न थापे केम जो, स्वामिनको होये रे के ॥ स्वा० ॥ सु पी वली वात ए वयरी, थंतें तुं जोये रे के ॥थ ॥ ते तुं काले जाणीश, दम शुं कहु रे के ॥ द० ॥ तेहनें स्वामी नक्तो, कहे केम सर्दु रे ॥ का ॥ ॥ मायावी प्रीतिर्नु, सरल ने नवि घटे रे के ॥ स ॥चिंतवे ता हो होद के, श्रावक किण सटें रे के ॥ श्रा० ॥ साहायकारी तुज एड, वि श्वास पमाडवा रे ॥ वि० ॥ एदवा उर्जन लोक, ते निधय जाडवा रे के ॥ नि० ॥ ए॥ करशो जो विश्वास तो, थतें जाणशो रे के ॥ ५० ॥ स वि देखाडगं परगट, ताम वखाणशो रे के ॥ ता० ॥ सांजली विस्मय खे द, थानद राजा सहे रे ॥ था० ॥ किम ए सत्य के जूठ, पुरोहित मुज कहे रे ।। पु० ॥ १० ॥ कहे पुरोहितने कर, वात ए चित्त धरी रे के ॥ वा० ॥ विसरज्यो म विप्र, चित्त सशय करी रे के ॥ चि॥ ते दिनयी दवे नरपति, सशय पामीयो रे के ॥ सं०॥ बाह्य मित्राने तास,प्रियानो का मीयो रे ॥ प्रि॥११॥खल पेतो करे नाश, समानतापलो रे ॥ स० ॥ इस चचु करे नेद, खीर नीरज तणो रे के ॥ स्वी० ॥ १५ ॥ 5ष्ट ते शिष्टनें कष्ट, नणी होये सदा रे ॥ न०॥ सकनने उर्जन दीये, पण आपदा रे के ॥पू०॥ दवे गिरिसगम नगरें, समरवीर नरपति रे । स॥ एक रि प्रथमखम. यो तिवार रे । मुश दीधी मंत्री गृहें, माने धन अवतार रे ॥सना विस जें सवार रे, मत्री चिंते तिवार रे,नरपति श्रधम शिरदार रे । जु०॥ ७ ॥ पति नवि होये थापणा, करिये जो सहस उपगार रे॥ सघलो ए परपंच कस्यो, हरवा माहररी नार रे ।। नृप करतो जब थाहार रे, दीनो में दृष्टि विकार रे, तेहिज कसो यणाचार रे ॥ जु० ॥ ए ॥ सपने खल वली नपति, थामने जमराय रे ॥ याचक शस्त्रने नामिनी, विधि में विप वलीखाय रे ॥थपथ्य जोजन वली प्राय रे, पोताना नवि थाय रे, करिये कोडी उपाय रे । जु० ॥ १० ॥ कुलवतो नीति जाणतो, जैनां कु शल कहाय रे ॥ निर्दोपी मुज कपरें, कीधो एद अन्याय रे॥ धिग् ए कद पराय रे, देव गुरु माय ताय रे, धर्मनें पण न गणाय रे ॥ जु० ॥ ११ ॥ तपजप किरिया रे तिहां लगें, जिहां लगें कदर्प बाण रे॥ नवि लागां जसथ गा,लागे तो लीये प्राण रे ॥माह्या दोये थजाण रे,न गणेवाण कुठगण रे, लघुता लहे महाराण रे ॥जु ॥१२॥ यत ॥ तीर लगो गोला लगो, ल गो मरमके घाय ॥ नैना किसीकों मत लगो, उनका नहीं उपाय ॥ १ ॥ नास्ति कामसमोव्याधि, नास्ति कोषसमोऽनल ॥ नास्ति ज्ञानसममुख, नास्ति मोहसमोरिपु ॥१॥ विष वेश्या नारी नदी, थनि जुधारी काल । ए साते नहीं थापणा, वली विशे नूपाल ॥१॥ मित्रवउद्यमाझेया, बाल स्य मित्रवदिपु ॥ विपञ्चानृता विद्या, परस्त्री चामृतं विषम् ॥ १ ॥ ढाल । अहिल्यामुलागीयो,धाता पुत्रीशुंलग्ग रावण सीताने ले गयो, ते जा रो सद्गुजग्ग रे॥शिर चुथ्या जस कग्ग रे, नवि चाले जेद मग्ग रे, तेहने किहां थीदोय सग्ग रे ॥ जु० ॥१॥अथवा पुरोहित दोप ए, नहीं नृपनो तिल मात रे ॥ श्रों सद्धयें ए कोधलु, राय प्रेखो इणी वात रे ॥ नास्तिक करे एह घात रे, अथवा कर्म थायात रे, कोनो वांक न थात रे ॥ जु० ॥१॥ किम करे कलुषित थातमा, कर्मथी अधिक न कोय रे। ताहरां कीधा ते था वीयां, कर्म करें तेद होय रे ॥ श्याने मूढ तु रोय रे, पुस्य पाप साहामु जोय रे, उपशमे कर्मनें धोय रे ॥ जु० ॥ १५॥ नूप थयो इम चौकडो, हवे नदी को थाधार रे ॥ नारीनुं शील एखमशे, शरण ते धर्मनु सार रे । शासन सुर सुखकार रे, थावशे थामा ए वार रे, नहीं कोई धन परि वार रे ॥ ७ ॥ १६ ॥ जे दिनथी में अगीकस्यु, शासन जैननु एद रे ।।

जयानंद केवलीनो रास. गर्ने, खेम कुशल वे यत्र ॥ नित्य नित्य बांड तुम तणा, खेम कुशजना प त्र॥३॥ साचा थतर मित्र गे, तुमथी थधिक न कोय ॥ तिखजो ते थ म सारिख, जे तुम कारय होय ॥ ४ ॥ समाचार एक प्रौठजो, तुम थमनें कस्यु जाण ॥ नूप विश्वासमा नाखीनें, पकडी सेशु थचान ॥ ५ ॥ राज्य ते तुमनें श्राप थवसर लही ततकाल ॥ तुमें सवि सामग्री सहित, था वजो अवसर नाल ॥ ६ ॥ परिकर नेद करु अतु, ते सवि करजो काम ।। सावधानर हेजो सदा, लिखजो दिवसनु नाम ॥ ॥ ते दिन ऊपर थावशु, सर्व ले अनिसार ॥ राज्य थर्ड तुम नांखीयु, देश ते निर्धार ॥ ७॥ सदे ह रहित ते जाणजो, तुमें मोटा परधान ॥ काम काज कदेवरावनो, सर्वस मय सावधान ॥८॥ ॥ ढाल वारमी॥ लाल सुरंगा रे प्राणीया ॥ए देशी॥ ॥ पत्र वांचीने रे नूपति, विस्मय क्रोध नराय रे ॥ दीतु सनिब्यु नहीं कदा, हा किम एहवु थाय रे ॥ मत्री श्रावक नाय रे, एतो नवि सनवाय रे, कोयन कपट ए प्राय रे ॥१॥ जुन जुवात ए कर्मनी॥ एयांकणी॥थ थवा लेवी एहनी प्रिया, शहां शी वात विचार रे ॥ लोकनें जणवी ने लीजी यें, लाधु एहनु कार रे॥ नूख्योने जिम थादार रे, नहीं अपवादनु तार रे, इहित थयु निरधार रे ॥जु०॥ ॥ श्म चिंति दोये पत्रने, मत्री दाथमा राय रे, मत्री जोनें चिंतवे, पुरोहित कपट ए थाय रे ॥ खल दोये 5 खदाय रे, खल करे प्रसन्न घाय रे, काम ते मलिन कराय रे ॥ ७ ॥॥ मत्री क हे नररायनें, कोइए देषीन काम रे ॥ क्रोध नराणो रे नूपति, वोले निठुर ताम रे ॥ कपट करे रे तुं थाम रे, घिजाईन तुं धाम रे, चाले मुजथको वाम रे॥०॥४॥ पोतें वोष ते थाचरी, नाखे परशिर ढाल रे ॥ ताहरे वि श्वासें कै रहूँ, तुं मल्यो वयरी नूपाल रे ।। राय सनाने निहाल रे, लेख दे खावे ततकाल रे, छठ ए वात निदाल रे ॥ ॥ ५॥ ते पण सगु च च चिंतवे, सनवे वात न एह रे॥ पण कोई खबर पडे नहीं, मत्री धर्मनु गे द रे॥ सूज पडे नही रेद रे, गजब थयो मत्री देह रे, मौन करी रह्या तेद रे॥०॥६॥ राजा काम को करी, निजनर हुकम ते कीध रे ॥ बेडी घा सी मत्री प्रत्ये, बदीखाणे ते दीप रे॥ तस नामिनी दोय लीध रे, कदपै दूज गि रे, माने कारय सिमरे ॥ ४० ॥७॥ मत्रीनो परिवार जे, नाशीग .

प्रथमखम. श्य मोकली नावि ॥१॥ कास्सग्ग पारी कोमन, भावी नृप थासन्न ॥ तव जोवे नरपति तुरत, तरुणी के तन्न ॥ २ ॥ पद मुख मूकी पाधरु, संघ तास शरीर ॥ कोटें व्यापित कामिनी, देखी थयो दिलगीर ॥३॥ पार्थि व तेहनें पूजतो, कोढ ए थयो किवार ॥ चिरकालीन बजे चतुर, वैद्य थ साध्य विचार ॥४॥ बीजीने बोलावतो, सुगंध देवें कीध ॥ नाक मरडी ने नरपति, देवें पुठज वीध ॥ ५॥ तेहनें पण पूछे तुरत, कहो ए गध किवार, कर्मथकी बढ़ कालनो, वैद्य असाध्य विचार ॥ ६ ॥ चित्रशालायें चित्तथी, महीपति मोकले ताम ॥ श्रदो दैव ए झं थयु, थबलाने किम श्राम ॥ ॥ खेद लही क्षण चिंतवे, नोजन वेला नाम ॥ जोइ पण ना णी नदी, एदवीने वली थाम ॥ ॥ वस्त्रावादित वेगर्नु, न लत्यु वात निदान ॥ पुरोहित महा पापी, जल्पी वात थजाण ॥ए । ॥ ढाल तेरमी ॥ वाहालो मादारो वाय जे वांसली रे ॥ ए देशी॥ ॥ नूपति णी परे चिंतवे रे, दोष देखाडी एण ॥ पाप अघोर करावी ये रे, बूटीश दवे कहो केण ॥ १॥ वाहालो महारो पाप निंदा करे रे ॥ ए थांकणी ॥ कष्ट दीधु ए मत्रीप्रत्ये रे, नारी तणे सकेत ॥ कीर्तिनें कुल जश धर्मनें रे, मलिन कलां एह हेत ॥ वा० ॥ ॥ मत्री मन्यो वयरी प्र त्यें रे, ए कोण माने वात ॥ एद कपट पुरोहित तणुं रे,जाणे जग विख्या त ॥वा ॥३॥ एह थधर्मी कपटी घणो रे, मत्रीय कस्यो तिरस्कार । पापीते कर्म करता था रे, बीहे नहीं ते लगार ॥ वा ॥ ४ ॥ प्रात स मयें निश्चय करी रे, बुद्धि तणे रे उपाय ॥ निर्दोपी करी मत्रीने रे, था' पूरव नाय ॥ वा० ॥ ५ ॥ एदनी प्रिया पाली थापलं रे, देश उर्जन दम ॥श्म टलवनता रयणी गरे, खेद याश्चर्य प्रचम ॥ वाण॥६॥ प्रात समय दवे रानी रे, बेठो सना मफार ॥ महेंता मुसद्दी सदये मन्या रे, तेडयो तिहा लेखदार ॥ वा० ॥ ॥रे तु साचु मुज बोलजे रे, लेख दी] तुज केण ॥ नवि बोल्यो जय लही करी रे, मार देवराव्यो तेण॥ वा॥6॥ मार खातां तेद बोली। रे, मारो सुधा केम मुक॥ वद् इव्ये दु लोनावी अरे, एद पुरोहित गुरु ॥ वा ॥ ए॥ पुरोहित थक्षर जोइ करी रे, नि चय कस्तो निरधार ॥ एह थकर्म इरों करघु रे, पुरोहित उष्ट श्वपार ॥ वा०॥ ॥१०॥ निगढ नगावी मत्र तणी रे, तास खमावे राय ॥ वस्त्राभरणे स श्४ जयानंद केंवलीनों रास. जो न विराध्यु होये मनें, समकेत शीन ते रेह रे ॥ तो थधिष्ठायक जेह रे, श्रापद टालो मुन तेह रे, म कही कास्सग करेहरे । जु० ॥१७॥ ते कारस्सग्ग प्रनावथी. शासन देवता थाय रे॥ते कहे पारो काउस्सग्गर्ने, थापद गई ते पलाय रे ।। नृप सत्कार कराय रे, विहाणे तेडीने राय रे, तव जाणशो तुमें नाय रे, जिनशासन सुपसाय रे ॥ जु०॥ १७ ॥ श्म क ही देवता गइ दवे, पारे कावस्सग ताम रे ॥ विस्मय पामीनें मत्रवी, ना री अतेवर नाम रे ॥ ते पण चितवे थाम रे, नृप थातुर थयो काम रे, नांगशे शील निराम रे ॥ जु०॥ १५ ॥ राजा दासीने मोकले, मूकी कु ल मरयाद रे, चाटु वयण ते वोलती, धिक्कारनो करी साद रे॥ काठी तिहाँ थी थविवाद रे, पामी थति विषवाद रे, किहां नयें फरीयाद रे ॥ ४० ॥ ॥ २०॥ चित्रशालामां वेतीयकी, माने ते कारागार रे ।। शीलनग करशे हवे, विरद थयो नरतार रे ॥ दूर रह्यो परिवार रे, मरवु निश्चय निरधार रे, पालवु शील सवार रे । जु०॥ २१॥ यत ॥ वर प्राणपरित्यागो, नतु शी लस्य खेमन ॥ प्राणत्यागे कण इख, नरक शीलखमने ॥१॥ ढाल । पामे परानव कोयथी, नृपनें शरणे ते जाय रे ॥ बांझे मरयादा नरपति,तो श्रामो कुण थाय रे दवे एक धर्म उपाय रे, सकट विकटें सहाय रे, अवर नहीं सुखदाय रे ॥ ॥२२॥ समकित शीत जो मनयकी, न विराघ्यु थमें रेप रे ॥ तो सही शासन देवता, टालो विघ्न विशेष रे अमचु ३ ख तुमें देख रे, दूर करो नृपक्षेप रे, रद्धं बु काउस्सग्ग वेष रे ॥ जु० ॥ २३ ॥ ध्यान बलें थावी देवता, बोली प्रत्यक्ष वाच रे ॥ शीलरक्षा तुमची यशे, माने जो एद साच रे, अमचोजूट एह नाच रे, शोत राखो जिम पाच रे, ए हमा नहीं खल खाँच रे॥जु ॥ २४ ॥ कायस्सग्ग पारो तुमें सुखें, देवता था विसराल रे ॥श्रीजयानवना रासमा, नाखी बारमी डाल रे॥ पद्मवि जय सुरसाल रे, शीलथी सही विशाल रे, शीलथी मगत माल रे, शील पालो उनमाल रे, वदित फले ततकाल रे, व्याल दोये फुलमाल रे, जाये दूर जंजाल रे, हरि करि नासे विकराल रे, जल होय अमिनी माल रे ॥२५॥ सर्व गाथा ॥३३॥ ॥दोहा॥ ॥राते कामारत पको, तेवरमा धावि ॥ तेहने वासी तेडवा, नूपें श्य किवार, प्रथमखम मोकली नावि ॥ १॥ कानस्सग्ग पारी कोमन, श्रावी नृप थासन्न ॥ तव जोवे नरपति तुरत, तरुणी केरुं तन्न ॥ ३ ॥ पद मुख मूकी पाधरु, सघ लु तास शरीर ॥ कोठें व्यापित कामिनी, देखी थयो दिलगीर ॥३॥ पार्थि व तेदनें पूजतो, कोढ ए थयो किवार ॥ चिरकालीन थडे चतुर, वैद्य य साध्य विचार ॥४॥ वीजीने बोलावतो, सुगंध देवें कीध ॥ नाक मरडी में नरपति, दैवें पुठज वीध ॥ ५ ॥ तेदने पण पूजे तुरत, कहो ए गध कर्मथकी बडु कालनो, वैद्य थसाध्य विचार ॥ ६॥ चित्रशालायें चित्तथी, महीपति मोफले ताम ॥ श्रदो दैव ए थयु, श्रवलाने किम श्राम ॥ ७॥ स्नेद लही क्षण चितवे, नोजन वेला नाम ॥ जोइ पण जा णी नही, एहवीनें वली थाम ॥ ॥ वस्त्राक्षादित वेगनु, न लत्यु वात निवान ॥ पुरोहित महा पापीठ, जल्पी वात थजाण ॥ ए॥ ॥ ढाल तेरमी ॥ वाहालो मादारो वाय वे वासली रे ॥ ए वेशी॥ ॥ नूपति श्णी परे चिंतवे रे, दोष देखाडी एण ॥ पाप अघोर करावी में रे, लूटीश दवे कहो केण॥ १ ॥ वाहालो महारो पाप निंदा करे रे ॥ ए श्रांकणी ॥ कष्ट दीधु ए मत्रीप्रत्यें रे, नारी तणे सकेत ॥ कीर्तिनें कुल नश धर्मनें रे, मलिन कस्यां एद देत ॥ वा० ॥ ॥ मत्री मल्यो वयरी प्र त्य रे, एकोण माने वात ॥ एद कपट पुरोहित तणुं रे,जाणे जग विरल्या त ॥ वा ॥३॥ एह श्रधर्मी कपटी घणो रे, मत्रीय कस्यो तिरस्कार ॥ पापी ते कर्म करता था रे, बीहे नहीं ते लगार ॥ वा०॥ ॥ प्रात स ममें निश्चय करी रे, बुद्धि तणे रे उपाय ॥ निर्दोपी करी मत्रीने रे, यापुं पूरव नाय ॥ वा० ॥ ५ ॥ एदनी प्रिया पाठी थाप रे, देश उर्जन दम ॥ श्म टलवलता रयणी गई रे, खेद याश्चर्य प्रचम ॥ वा॥६॥ प्रात समय हवे राजी रे, वेठो सना मकार ॥ महेंता मुसही सद्ये मल्या रे, तेडयो तिहां लेखहार ॥ वा० ॥ ॥रे तुं साचु मुज बोलजे रे, लेख दीगतुज केण ॥ नवि बोल्यो जय लही करी रे, मार देवराव्यो तेण ॥ वा०॥॥ मार खाता तेद वोली रे, मारो सुधा केम मुज ॥ बगु इव्ये दुलोनावी रे, एद पुरोहित शुरू ॥ वा ॥ ए॥ पुरोहित थर जोइ करी रे, नि अय को निरधार ॥ एहथकर्म इरों करयु रे, पुरोहित उष्ट अपार ॥ वा०॥ ॥१०॥ निगड नगावी मत्र तणी रे, तास खमावे राय ॥ वस्वानरणे स . . A ४ २४ जयानंद केंवलीनों रास. जो न विराध्यु होये मनें, समकेत शील ते रेह रे ॥ तो थधिष्ठायक जेह रे, थापद टालो मुज तेह रे, श्म कही काठस्सग्ग करेह रे ॥ जु० ॥१॥ ते कास्सग्ग प्रनावथी. शासन देवता थाय रे॥ते कहे पागे काठस्सग्गर्ने, थापद गइ ते पलाय रे ॥ नृप सत्कार कराय रे, विदाणे तेडीने राय रे, तव जाणशो तुमें नाय रे, जिनशासन सुपसाय रे । जु०॥ १७ ॥इम क दी देवता गइ हवे, पारे कास्सग्ग ताम रे ॥ विस्मय पामीने मत्रवी, ना रोयतेवर ठाम रे॥ ते पण चिंतवे श्राम रे, नृप थातुर थयो काम रे, नांगो शील निराम रे ॥ जु०॥ १५ ॥ राजा दासीने मोकले, मूकी कु ल मरयाद रे, चाटु वयण ते वोलती, धिक्कारनो करी साद रे ॥ काठी तिहां थी थविवाद रे, पामी थति विषवाद रे, किहां जयें फरीयाद रे ॥ जु० ॥ ॥ २०॥ चित्रशालामा वेठीयकी, माने ते कारागार रे ॥ शीलनग करशे हवे, विरद थयो जरतार रे ॥ दूर रह्यो परिवार रे, मरवु निश्चय निरधार रे, पालवू शील उदार रे॥ नु० ॥ २१॥ यत ॥ वरं प्राणपरित्यागो, नतु शी लस्प खमन ॥ प्राणत्यागे ण उख, नरक शीलखमने ॥१॥ ढाल ॥ पामे परानव कोयथी, नृपनें शरणे ते जाय रे ॥ बांझे मरयादा नरपति,तो श्रामो कुण थाय रे हवे एक धर्म उपाय रे, सकट विकटें सहाय रे, अवर नहीं सुखदाय रे ।। जु॥२२॥ समकित शील जो मनथकी, न विराध्यु श्रमें रेप रे ॥ तो सही शासन देवता, टालो विघ्न विशेष रे श्रमचु 5 ख तुमें देख रे, दूर करो नृपदेष रे, रतुं बु काठस्सग वेष रे ॥ जु० ॥ २३ ॥ ध्यान बलें थावी देवता, बोली प्रत्यक्ष वाच रे ॥ शीलरक्षा तुमची यशे, माने जो एद साच रे, अमचोजूd एह नाच रे, शोज राखो जिम पाच रे, ए हमां नहीं खल खाँच रे ॥ ॥ २४ ॥ कायस्सग्ग पारो तुमें सुखें, देवता था विसराल रे ॥ श्रीजयानवना रासमा, नाखी बारमी ढाल रे ॥ पनवि जय सुरसाज रे, शालथी सही विवाल रे, शोलथी मगल माज रे, शील पालो उनमात रे, वदित फले ततकाल रे, व्याल होये फुलमाल रे, लाये दूर जंजाल रे, हरि करि नासे विकराज रे, जल होय थमिनी माल रे ॥२५॥ सर्व गाथा ॥३४॥ ॥ दोहा ॥ ॥ रातें कामारत थको, यतेवरमा बावि ॥ तेहनें वासी तेउवा, नूपें प्रथमखम. दीये सुपात्रे दान ॥ ६ ॥ मंत्रीश्वरनी मानिनी, पण करे पुस्य प्रधान ॥ केशक कोडी वरस करे, धर्म ते सद् सावधान ॥ ७॥ ॥ ढाल चौदमी ॥ सोनलजो हवे कर्म विपाक कहे मुनि रे ॥ए देशी ॥ ॥ एक दिन थतिवल केवली तिहाँ पाठ धारिया रे, वनपालक तिहां थावि वधाव्यो राय रे ॥ दान दे तस संतोपी परिवारगं रे, सामत मत्री लं मुनि वदन जाय रे ॥ १ ॥ सनिलजो तमें कर्मविपाक केवली कहे रे ॥ ए श्रीकए। ॥ प्रदक्षिणा देश वदना करी वेग सहु रे, धर्मलान दे गुरु पण दीये उपदेश रे । सुखना थरथी प्राणी ते रिहतना रे, धर्मथो पा मे लघलां सुख सुविशेप रे ।। सां० ॥ २ ॥ नोग शरीर थनित्य वली लख मी राज्यनी रे, नित्य धर्म ते जजीयें मोक्षनें काज रे ॥ सांजली नूपादिक सवेगें वासीया रे, पूजे मत्री निज पूरव नव साज रे ।। सां० ॥३॥ (ज नपूजा महिमानें तस प्रतियोधवा रे, केवाली कहे मत्री पूरव नव वात रे॥णे नरतें रत्नसचय नगरें नृप हून रे, नरदत्त नामें शत्रु विनाश वि ख्यात रे ॥ सां० ॥४॥ नृप मानीतो मालीनदन नामथी रे, सुनंदा सु नगा दोय नारी तास रे ॥ मालती जाइ चपक वृक्षणं रे,नृप दीधा थाराम ते पाले खास रे ॥ सां० ॥ ५॥ फूल गुां अणगुथ्यो नृपने था पतो रे, देवपूजा तिम थगनोगर्ने काम रे ॥ मुक्कुट प्रमुख थलंकार तथा घर फूलना रे, कुसुमनी शय्या करी थापे थनिराम रे ॥ सांग ॥ ६ ॥ ति ए उद्याने रुपनदेवनु देहरु रे, नगर लोक तिहां पूजे करे बद्ध मान रे ॥ ते देखीने चिंते माली ए मोटको रे,एदनें पूज्या घरच्या फल असमान रे ॥ सां० ॥ ७॥ प्रनु थागल फल ढोतां जननें देखीने रे, वीजोरु नावें करी ढोरं एक रे ॥ ते दिन फल थानरणे राना रीजी रे, बद्ध परसादक सो नृपें धरिय विवेक रे॥ सा ॥ || माली माने फल फल मुल ए थडे रे, ते दिनथी फल कुसुम पत्र सुविशेप रे ।। पूजा करे थरिहंतनी गु ण अजाणतो रे, राज्य मानादिक थधिक थधिक फल देख रे ॥सां० ॥ ॥३दोय प्रिया पण इमदिन जिनपूजा करें रे, फल दी कहो था लस कोण करे जीव रे ॥ नाम सुकत चाकर एक कठिन श्राशय धणी रे, फूल नार ते पुरमा सावे सदैव रे ॥ सां० ॥१०॥ एकदिन पुष्प नार ले। पुरमा थावर्ता रे, साहमो माली मलीच ते कहे एम रे ॥नूपपूलानो थ २६ जयानंद केवलीनो रास. कारियो रे, दीये तेहनी दोय नार ॥ वा ॥११॥ गन बेसारी दोय ना रिछ रे, राजतना सयुत्त ॥ घर पोहोंचाडघा थाम्बरें रे, जैखाणे तेह त ॥ वा० ॥ १२॥ मत्री तथा हवे दोय प्रिया रे, करे परस्पर वात ॥ देव ता वाणी प्रमुख सवे रे, धर्मे दृढता थात ॥ वा० ॥ १३ ॥ करि धिमा रनें क्रोधथी रे, दमी ते वसुसार ॥ देशथी काढे ते नूपति रे, माथे ते से खहार ॥ वा० ॥ १४ ॥ राज्यविरोध मिटाविउ रे, मत्री बुद्धि निधान ॥ मत्री संगें वली वर्ततो रे, ठमी कुसग निदान ॥ वा ॥ १५ ॥ एक दि न बेसी कचेरी रे, मत्रीनें कहे राय ॥ बीजी प्रिया परणे नहीं रे, ते हनुं कारण काय ॥ वा ॥ १६ ॥ मत्री कहे जुतु नवि कहु कह रे, तुम था गल मदाराज ॥ निर्दूषण मुज नारया रे, नारी सवे शिरताज ॥ वा० ॥ ॥ १७ ॥ पण कोइ शासन देवता रे, कीपो ए प्रतिकार॥ कावस्सग्ग प्रमु ख सवे कडं रे, धुरथी सवि अधिकार ॥ वा ॥ १७ ॥ राय विचारे मु ज नाग्यथी रे, अनुकपा मुज कीध ॥ जस्म को नहीं मुझने रे, इणी परें समनण दीध ॥ वा ॥ १५ ॥ धर्म महिमा प्रशसतो रे, मत्रीने सर्व समद ॥ थाप थकारय नींदतो रे, नूपति थइ घणु दद ॥ वा० ॥ २०॥ समकित शील मदिमा दवे रे, जाणी नगरी माहि ॥ विस्ताखो बढ वर्ष थी रे, थरिहंत धर्म उष्ठाहि ॥ वा ॥ २१ ॥ बहुजनें तेह थगीकसो रे, गुरु पासे एक दिन ॥ पाप थालोइनें नूपति रे, प्रायश्चित प्रतिपन्न ॥ वा० ॥ ११ ॥ श्रीजयानवना रासमा रे, नांखी तेरमो ढाल ॥ पद्मविन य कहे धर्मथी रे, होवे मगल माल ॥ वा० ॥ २३॥ सर्व गाथा ॥३०॥ ॥ दोहा॥ ॥ नरपति दवे नीपजावतो, राखी धमै रंग ॥ नगर ग्राम पुर नवनवां, चैत्य जैनना चग ॥ १ ॥ साधर्मिक मुखीया कमा, देश इष्ट वरदान ॥ कर मूकी कारय फखां, मुनिजननें दिये मान ॥१॥ गुरुपूजा गुरु नक्ति थी, धान थनय वातार ॥ निनदेशे नीपजावतो, पुल्य तणा परकार ॥३॥ जगत पूरे श्म नश यकी, काढे इणिपरें काल ॥ सघली करणी सचिव पण, साचवतो संजाल ॥ ४॥ प्रिया सदित परधान ते, शक्तें पु एय संगालि ॥ थरिदत पूना थादरी, त्रएप काल ततकाल ॥ ५ ॥ दोय टकना दिन प्रत्ये, पडिकमा पश्चरकाण ॥ काठस्सग्ग पोसह वली करे, प्रथमखम. २७ दीये सुपात्रे दान ॥ ६ ॥ मंत्रीश्वरनी मानिनी, पण करे पुण्य प्रधान ॥ केशक कोडी वरस करे, धर्म ते सह सावधान ॥ ७ ॥ ॥ ढाल चौदमी ॥ सांसजो दवे कर्म विपाक कहे मुनि रे ॥ ए देशी ॥ ॥ एक दिन थतिबल केवली तिहा पाठ धारिया रे, वनपालक तिहां श्रावि वधाव्यो राय रे ॥ वान वे तस सतोपी परिवार रे, सामंत मत्री शु मुनि वदन जाय रे ॥ १ ॥ सांजलजो तमें कर्मविपाक केवली कहे रे ॥ ए थांकणी ॥ प्रदक्षिणा देश वदना करी बेग सद् रे, धर्मलान दे गुरु पण दीये उपदेश रे ॥ सुखना श्ररथी प्राणी ते थरिदतना रे, धर्मथो पा मे सपला मुख सुविशेष रे ॥ सां० ॥ ॥ जोग शरीर थनित्य वली सख मी राज्यनी रे, नित्य धर्म ते जजीयें मोक्षनें काज रे ॥ सांगली नूपादिक सवेगें वासीया रे, पूजे मत्री निन पूरव नव साज रे ॥ सां० ॥३॥ जि नपूजा महिमानें तस प्रतिबोधवा रे, केवली कहे मत्री प्रव नव वात रे॥णे नरतें रत्नसचय नगरें नृप हून रे, नरदत्त नामें शत्रु विनाश वि ख्यात रे ॥ सां० ॥ ॥ तृप मानीतो मालीनदन नामथी रे, सुनंदा सु जगा दोय नारी तास रे ॥ मालती जा व चपक वृक्षणं रे,नृप दीधा थाराम ते पाले खास रे ॥ सौ ॥ ५॥ फूल गुंथ्यो थणगुप्यां नृपनें श्रा पतो रे, देवपूजा तिम थगनोगर्ने काम रे ॥ मुकुट प्रमुख थलंकार तथा घर फूलना रे, कुसुमनी शय्या करी थापे थनिराम रे ।। सां० ॥ ६ ॥ ति ण उद्याने रुपनदेवनु वेहरुं रे, नगर लोक तिहां पूजे करे धनु मान रे ।। ते देखीने चिंते माली ए मोटको रे,एदनें पूज्या थरच्या फल असमान रे ॥ सांग ॥ ७॥ प्रज्जु थागल फल ढोतां जननें देखीने रे, बीजोतं नावें करी ढोयु एक रे ॥ ते दिन फूल थानरऐ राजा रीजी रे, बद्ध परसाद क स्त्रो नृपें धरिय विवेक रे॥ सां० ॥ ॥ माली माने फलनु फल मुज ए थयु रे, ते दिनथी फल कुसुम पत्र सुविशेप रे ॥ पूजा करे थरिहंतनी यु ण थजाणतो रे, राज्य मानादिक अधिक अधिक फल देख रे ॥ सो० ॥ ॥ ए॥ दोय प्रिया पण महिन जिनपूजा करें रे, फल दी कहो था लस कोण करे जीव रे॥ नाम सुकत चाकर एक कठिन थाशय धणी रे, फूल नार ते पुरमा लावे सदैव रे ॥ सां० ॥१०॥ एकदिन पुष्प नार ले पुरमा थावतां रे, साहमो माली मलीच ते कहे एम रे ॥नूपप्रजानो थ

श्त
जयानंद केवलीनो रास.
वसर जाय उतावलो रे,वेडीयें घाव्यो कोश्ये नाव्यो केमरे ॥ सा ॥११॥
ते सांगलीने चाकर तिहा रोपे करी रे, नाखी नारने चाल्यो वीजे देश रे
॥ तादृश सगथकी ते तापस व्रत यहे रे, कष्ट करे थज्ञान त सुविशेष
रे ॥ सां० ॥ १२ ॥ माली पण थति कोप करी उवेखो रे, पोते फज
ले जा दीघां राय रे ॥ जैनधर्म प्रनावें तस लक्ष्मी वधी रे, कल्पलता
परें द नव पण सुख दाय रे ॥ सां० ॥ १३ ॥ तेहथी नाव अधिक नि
त्य नित्य पूजा करे रे, माली यायु पूरु करी थयो तु प्रधान रे । पूरवनव
पत्नी ते तुज पत्नी थ रे, तापस कष्ट करीने तप थज्ञान रे। सां॥१॥
थायुक्ष्य पुरोहित ययो वसुसार ए रे, पूरवनव श्रन्यासें देपी तुऊ रे ।।
डी घाल्यो वयणथी तें धिकारियो रे, तेणें तुज वेडी प्रपंचथी ए फल यु
करे॥ सांग ॥ १५ ॥ कर्म करे जे वयणथी ते नर नोगवे रे, कर्म साक्षा
त् पणे श्म जाणी नव्य रे ॥ कर्म न कीजें सांजली इम मत्री हवे रे, प्रिं
या सहित लहें जातिस्मरण नय रे॥ सां० ॥ १६ ॥ केवलीने कहे में प
ए दी ए सवे रे, पण अव्यक्तपणे पूजा फल एद रे॥ व्यक्त पणाना
फलनु तो कहे, किश्गुं रे, स्वर्ग तथा थपवर्गनां फल दीये जेह रे ॥सां॥
॥१॥मत्री नृप नवनीरु लदा सवेगनें रे,धर्म यथाशक्त यही केवलीपास
रे॥ नृप मत्री मत्री प्रिया सद् प्रणमी मुनि रे, परम सवेगें पोहोतां निजथा
वास रे ॥ सां० ॥१७॥ श्रीजयानदना रासमां पद्मविजय कदी रे, कर्मवि
पाक तणी वर चौदमी ढाल रे ॥ कर्म शुनागुन जेहनें जेदवां श्राचा रे,
तेदने तेदवां थायां उदय विशाल रे॥ सां० ॥ १५ ॥ सर्वगाया ॥३०६ ॥
॥दोहा॥
॥ नरपति मत्रीने पणा, कला संजय कुमार ॥ रूप यौवन मद राग
थे, परस्या प्रेम थपार ॥ १॥ एकदिन नूप थमात्य दो, धर्म विचारी धार
॥ निज निजसुत निज पदें श्वे,सुदर जास शरीर ॥॥ नववैराग्य नावे घ
गु, सचित्त त्याग शुनचित्त ॥ ब्रह्मचर्य पाले वरत, नूप मत्री नवनीत॥३॥
थरिदत गुरु तपासता, पुण्यवत परिवार । एकदिन पौषध बालये, पौष
ध करे अतिप्यार ॥ ४ ॥ रातें कारस्सग्गे रह्या, पो अगनि अनंत ॥
पवन प्रचमें प्रेरित, हाहाकार दवत ॥ ५॥

शए प्रथमखं. ॥ ढाल पंदरमी ॥ तोरणथी रथ फेरी रे हां ॥ ए देशी ॥ ॥ लागती अगनि थावी तिहां रेदा, लोक करे पोकार ॥ मेरे सादिवा, उलवे धूलि जलें कर रे दो, पण ते न शमे लगार ॥ मे ॥ १ ॥ लोक दे खे बढ़ वाधती रेहां,श्रावी पौषधागार ॥ मे॥ पोसहमा परिवार जे रेहां, नयथी कहे सिणवार ॥ मे ॥ ॥ अग्नि चिटुं दिशि फरी वली रेहां, मं त्री सहित तुमें राय ॥ मे ॥ नीकलो प्राण ठगारवा रेहां, एदमा हठ न वि थाय ॥ मे ॥३॥ राय मंत्री तव चिंतवे रेहां, थाज प्रतिज्ञा कीध ॥मे ॥ ते कामस्सग किम नांगी रेहां, जे पञ्चस्काण प्रसि ॥ मे ॥ ॥४॥ जीवन मरण होये इण समे रेहां, पण नवि व्रत लोपाय ॥ मे ॥ जीवित थधिक ए धर्म ने रेहां, पामवो उलन थाय ॥ मे ॥५॥ प्राण तो नव नव सोहिला रेहां, राखवो धर्म दृढाव ॥ मे ॥ नृप मत्री ते बिनु ज या रेहां, नवि चूके ते दाव ॥ में ॥ ६ ॥ बीजा पौषधना धणी रेहां, सट्ठ नीकलीया तेह ॥ मे ॥ अगनि पसस्त्रो जन रव मुणी रेहां, निश्चित मर ण करेह ॥ मे ॥॥सागारी थणसण करी रेहां, तव नवि श्रगनि देखाय मे ॥ कोलादल पण को नहीं रेहां, सह परिवार रह्या नाय ॥ मेाणा थमने दोन पमाडवा रेहां, कीy ए सवि काम ॥ मे॥ विस्मयथी म चि तवे रेहां, कोक सुरवर ताम ॥ मे ॥॥ लवृष्टि विर्ल्ड कपरें रेहां, करतो दिशि उद्योत ॥ मे ॥ बोले तुम व्रत दृढपणुं रेहां, नवसायरें जिम पोत ॥ मे ॥ १० ॥ सौधर्म वखाणियुं रेदा, सुरवर सना मफार ॥ मे० ॥ दुश्रण मान्ये थावी रेहां, कीधी परीक्षा सार ॥ मे ॥ ११॥ तुमें प्रति ज्ञा निर्वही रेहां, तुमनें दो परणाम ॥ मे ॥ श्म कही जुम्लनि वजाहतो रेदां, विस्मय लही तिण गम ॥ मे० ॥१२॥ कनक रयण वरसी दवे रे हां, प्रणमी जाय निनवास ॥ मे ॥ काठलग्ग पोसद पारिज रेहां, धर्म सुणे गुरु पास ॥ मे ॥ १३ ॥ पारणं पाप वारण करे रेहां, मुनिवर देश दान । मे० ॥ लोक प्रशंसा वट्ठ करे रेदां, रायनी तिम प्रधान ॥ मे ॥ ॥१३॥ एकदिन श्रावकनी वहे रेदां, प्रतिमा जे धगीधार ॥ मे० ॥ राय प्रधान विट्ठ जणा रेहां, उर्वलतनु सुकुमार ॥ मे ॥ १५॥ यत ॥ दस ए वय सामाश्य, पोसह पहिमा श्रवन सचिने । थारंन पेस दिए, वजा ए समण नूएय ॥ १ ॥ ढाल ॥ शुरू करी थाराधना रेहां, पंच परमेष्टी ध्या

॥
३०
जयानंद केवलीनो रास.
नमेगा मरण समाधि सहे तदा रेहां, पञ्चरकी अन्नने पान॥मे ॥१९॥
शुक कल्पें दोय अपना रेहां,शक सामानिक देव ॥ मे॥ मत्री प्रिया पण
णी परें रेहा, सम्यग फरी धर्म सेव ॥ मे ॥ १०॥ मित्र पणे सुर पिर्छ
थया रेहां, सातमे देवलोकें तेद ॥ मे ॥ जय जप रव सुरवर करे रेहां,
स्तवना करे सुरि नेह । मे० ॥ १७ ॥ देवनी उत्पत्ति केरा रेहां, विधि
पूर्वक करी कान ॥ मे० ॥ वचन थगोचर सुख तिहां रे हां,नोगवे सुर सा
म्राज्य ॥ मे ॥ १५ ॥ नदीश्वरादिक तीर्थनी रेहां, यात्रा करे सुविवेक ॥
मे॥ तीर्थकर पासें सुणे रेहा, देशना समकित टेक ॥ मे० ॥ २० ॥
मुख जोगवतां तेदने रेहां, जातो न जाणे काल ॥ मे० ॥ दान दी मत्री
जवें रेहां, मुनिवर थसराल ॥ मे० ॥१॥ तिणे अधिक काय, नोगवे
रेहां, देवपणे सुख सार ॥ मे० ॥ दवे पुरोहित काढयो तदा रेहां, अन्या
ये वसुसार ॥ मे ॥ २२ ॥ देश थनेक जम्यो तिहां रेहां, नविलयो
किदांये ताम | मे ॥ नोला लोकनें जोलवे रेहां, उट वासना काम ।।
। मे ॥ २॥ पार्न रौष ध्याने मरी रेहां, रतन प्रनायें जाय ॥ मे0 वे
दना त्रिविध सही तिहा रेहां, पूर्व कर्म पसाय ॥ मे ॥ ५४॥ तिहाथी
तिर्यचा नम्यो रेहा, वार थसख्याती तेद ॥ मे०॥ दरिहीस्वी दोनागी
रेहां, विप्र थयो वली एह ॥ मे ॥ २५॥ ते खथी दवेगी रेहां
परिव्राजक वनी थाय ॥ मे ॥ धूमकेतु ज्योतिषी थयो रेहां, मिथ्याती
र राय ॥ मे ॥ २६॥ दवे ते अतिबल केवली रेहां, रान शषि करे विहा
र ॥ मे ॥ जिणे नृप मत्री बोधीया रेहा, तिम बट्ठ जन ठपगार ॥मे॥
॥२७॥शैलेशी करी शिव वस्त्रा रेहां, एम पानादिक धर्म ॥ मे ॥ पारि
अधर्म तिम वरणग्यो रेहा, जेद वीये शिवशर्म ॥ मे॥२॥श्रीजयानं
बना रासमां रेहा, पन्नरमी ए ढाल ॥ मे०॥ प्रथम संग प्रण थयो रेहां,
पूरवनव सुरसाल ॥ मे ॥रा सवेगी शिर सेदरो रेहा, सत्यविजय पन्या
से ॥ मे ॥ कपूर विजय तेहना कवि रेहा, खिमाविजय शिष्य तास
॥ मे॥३०॥ जिनविलयो जगमा जयो रेहां, तास शिष्य वड नाग
॥ मे० ॥ तेदना उत्तमविजयजी रेदा, बहुश्रुत महावैराग ॥ मे ॥३१॥
तास शिष्य पग्ने कह्यो रेहा, प्रेमें पहेलो खम ॥ मे० ॥ श्रोता जन सु
पता थका रेहां, पामो पुल्य असम । मे॥२३ ॥ सर्व गाथा ॥४२॥

वितीय खम ३१ ति श्रीमत्संविज्ञपदीय पंमितप्रवर पंमित श्रीवत्तविजय जिजणिविनेय पंमित पद्मविजयगणिविरचिते प्रारुतप्रवं धे श्रीजयानंदकेवलिचरित्रे तत्प्राग्नवमत्रिजीव बो धिवीजलानातिवल राजर्षि केवलिदृष्टांतसूचितयतिधर्मफ लवर्णनादि नवत्रय नरवीर नृप नवक्ष्य वमुसार पुरोहित स्वरूपातिवल राजर्षि मोहगमनवर्णन नामा प्रथम खम समाप्त ॥१॥सर्वगाथा ॥ १४३ ॥उक्त गाथा॥ श्लोक ॥ ॥ अथ वितीय खंम प्रारंन ॥ ॥दोहा॥ ॥ सीमंधर स्वामी नमुं, विचरंता नगवान ॥ सीमंधर ए सारिखो, नही कोई जगत निधान ॥१॥ प्रथमखम पूरण करो, बीजानो दवे बहार ॥ श्रोताजन सुपजो सवे, बालस उघ उतार ॥२॥जबूदीप लख जोयणो, जरत क्षेत्र तिहां जाल ॥पर्वत जोयण पंचास ते, वैताढघ नाम विशाल ॥३॥ पचवीश उचो पण कह्यो, पूर्वापर जस प्रांत ॥ रूपानो रलियाम पो, शोना तो निशांत ॥४॥ । ढाल पहेली॥श्रादीश्वरनी विनतिनी देशी॥ श्रीरिसदेसर देव रे, शेजा धणी ॥ ए देशी ॥ ॥ उचो जोयण पचवीश रे, गिरिवर ए कह्यो॥ एथिवीथी दश जोयणा ए॥१॥ विद्याधरनी श्रेणी रे, उत्तर दरिकणे, शान पचाश नगर तिहां ए॥॥अरिहंतना गुण गाय रे, गीत सुकवथी, खेट युगल तिहां कीड ता ए॥३॥ कनक रतनमयी गेह रे, नगरमा शोनतो, तिहाथी दश जो यण गइए॥ ॥ दोय श्रेणी तिहां होय रे, सौधर्म इना,लोकपालना देवता ए॥५॥थानिागकनां वाण रे, मणिमय रुथडां, सुरालय ते जा णीयें ए॥ ६ ॥ तिहाथी जोयण पांच रे, गिरिशिर कपरें, सिवायतणादिक बजे ए॥ ३ ॥ नवकूट थात मनोदार रे, देवदेवी तिहां, कीडा करे अतिर गई ए॥ ७ ॥ हवे उत्तरश्रेणि माहि रे, गगनवल्लन पुरे, कनकमणिमय मेह से ए॥ ए॥ ते माणगृह उद्योते रे, नेद दिन रयणीनो, न लहे लोक कोकन लहे ए॥ १०॥ विद्याधरनो स्वामी रे, सहलायुः नामें, तेह नगर ५

३०
जयानंद केवलीनो रास.
नमे॥मरण समाधि सहे तवा रेहां, पचरकी अन्नने पान।।मे ॥१६॥
शुक्र कल्पें दोय कपना रेहा,शक सामानिक देव ॥ मे०॥ मंत्री प्रिया पण
णी परें रेहां, सम्यग करी धर्म सेव ।। मे ॥ १७॥ मित्र पणे सुर बिई
थया रेहा, सातमे देवलोकें तेह ॥ मे ॥ जय नय रव सुरवर करे रेहां,
स्तवना करे सुरि नेद ॥ मे० ॥ १७ ॥ देवनी उत्पत्ति केरा रेहां, विधि
पूर्वक करी काज ॥ मे० ॥ वचन अगोचर सुख तिहां रे हां,नोगवे सुर सा
नाज्य ॥ मे ॥ १५ ॥ नदीश्वरादिक तीर्थनी रेहां, यात्रा करे सुविवेक ॥
॥ मे॥ तीर्थकर पासें सुणे रेहां, देशना समकित टेक ॥ मे०॥ २० ॥
मुख नोगवतां तेहनें रेहां, जातो न जाणे काल ॥ मे ॥ दान दी, मत्री
नवें रेहां, मुनिवरने थसराल ॥ मे ॥२१॥ तिरों अधिकु काय, नोगवे
रेदा, देवपणे सुख सार ॥ मे ॥ हवे पुरोहित काढयो तदा रेहां, अन्या
ये वसुसार ॥ मे ॥ २२ ॥ देश थनेक नम्यो तिहां रेहा, नवि सयो
किदांये नाम ॥ मे ॥नोला लोकनें जोलवे रेहां, उष्ट वासना काम ।।
॥मे ॥ २३ ॥थार्च रोष ध्याने मरी रेदां, रतन प्रनायें जाय ॥ मे ।
दना त्रिविध सही तिहां रेहां, पूर्व कर्म पसाय ॥ मे ॥ ५४॥ तिहाथी
तिर्यचा नम्यो रेहा, वार थसंख्याती तेह ॥ मे०॥ दरिही खी दोजागी
रेदी, विप्र थयो वली एह ॥ मे॥ २५ ॥ ते 5 खथी उदवेगी रेहां
परिव्राजक वली थाय ॥ मे ॥ धूमकेतु ज्योतिषी यो रेदां, मिथ्यात्वी सु
र राय ॥ मे ॥ १९ ॥ दवे ते अतिबल केवली रेदां, रान झषि करे विड़ा
र॥ मे ॥ निणे नृप मत्री बोपीया रेदा, तिम बढ़ जन उपगार ॥मे॥
॥ २७ ॥ शैलेशी करी शिव वस्ना रेहां, एम दानाविक धर्म ॥ मे ॥ चारि
त्र धर्म तिम वरणव्यो रेहां, जेह दीये शिवशर्म ॥ मे ॥ २७॥ श्रीजयानं
दना रासमा रेहा, पन्नरमी ए टाल ॥ मे० ॥ प्रथम खम पूरण थयो रेहा,
प्रवनव सुरसाल ॥ मे० ॥ए। सवेगी शिर सेहरो रेदा, सस्यविजय पन्या
स॥ मे ॥ कपूर विजय तेदना कवि रेहां, खिमाविजय शिष्य तास
॥ मे॥३०॥ निनविजयो जगमा जयो रेहां, तास शिष्य वड नाग
॥ मे ॥ तेदना उत्तमविजयजी रेहां, बद्दश्रुत महावैराग ॥ मे० ॥३१॥
तास शिष्य पने फह्यो रेदा, प्रेमें पहेलो खम ॥ मे ॥ श्रोता जन सु
एता था रेहा, पामो पुण्य असम ॥ मे० ॥२२ ॥ सर्व गाथा ॥४॥

%D वितीय खंम ३१ इति श्रीमत्संविज्ञपक्षीय पंमितप्रवर पंमित श्रीवत्तविजय जिजाणविनेय पंमित पद्मविजयगणिविरचिते प्राकृतप्रबं घे श्रीजयानदकेवलिचरित्रे तत्प्राग्नवमत्रिजीव बो धिवीजलानातिवल राजर्षि केवलिदृष्टांतसूचितयतिधर्मफ लवर्णनादि नवत्रय नरवीर नृप नवक्ष्य वमुसार पुरोदित स्वरूपातिवल राजर्पि मोगमनवर्णन नामा प्रथम खम समाप्त ॥१॥सर्वगाथा ॥ ३ ॥ उक्त गाथा॥ श्लोक ॥ ॥ अथ दितीय खंम प्रारंन ॥ दोहा॥ । सीमंधर स्वामी नमुं, विचरंता नगवान ॥ सीमधर ए सारिखो, नदी को जगत निधान ॥ १ ॥ प्रथमखम पूरण करो, बीजानो हवे बहार ।। श्रोतानन मुजो सवे, थाजस उघ उतार ॥२॥जबूदीप लख जोयणो, नरत क्षेत्र तिहां नाल ॥ पर्वत जोयण पंचास ते, वैताढच नाम विशाल ॥३॥ पचवीश नचो पण कयो, पूर्वापर जस प्रांत ॥ रूपानो रलियाम यो, शोना तो निशांत ॥४॥ ॥ ढाल पहेली॥थादीश्वरनी विनतिनी देशी॥ श्रीरिसहेसर देव रे, शेजा धणी ॥ ए देशी ॥ ॥ उचो जोयण पचवीश रे, गिरिवर एकहो ॥ एथिवीथी दश जोया ए॥१॥ विद्याधरनी श्रेणी रे, उत्तर दस्किणे, शाउ पचाश नगर तिहां ए॥॥ श्ररिदतना गुण गाय रे, गीत सुकंवथी, खेट युगल तिहां कीड ता ए॥॥ कनक रतनमयी गेह रे, नगरमां शोनता, तिहाथी दश जो यण गइ ए॥॥दोय श्रेणी तिहां दोय रे, सौधर्म इना,लोकपालना देवता ए॥५॥धानिनागकना ठाण रे, मणिमय रुबडां, सुरालय ते जा एगी ए॥ ॥ तिहाथी जोयण पांच रे, गिरिशिर कपरें, सिकायतणादिक थळे ए॥ ४ ॥ नवकूट थांत मनोहार रे, देवदेवी तिहां, कीडा करे अतिर गो ए॥ ७ ॥ हवे उत्तरणि माहि रे, गगनवलन पुरे, कनकमणिमय मेह ने ए॥ ए ॥ ते माणगृह उद्योते रे, नेद दिन रयपीनो, न सहे लोक कोकन पहे ए॥ १०॥ विद्याधरनो स्वामी रे, सहलायु नामें, तेह नगर . .

॥ ३२ जयानंद केवलीनो रास. नो राजीयो ए॥११॥रय परें तपे तेह रे, पण ए नित्य तपे, रवि विपरी त ते देखीये ए॥१२॥मालिनी नामें तास रे, शील गुण मालिनी, कांता थनुरक्ता घएं ए॥ १३॥ सुपनें चक्री देखि रे, कहे जरतारने, राति स मय ते धन्यदा ए॥१४॥ चक्रीसम तुन पुत्र रे, होगे पति कहे, सान जीते दरखी घणु ए ॥ १५ ॥ नरवीर नृपनो जीव रे, शुक्रयकी चवी, ते हनी कूखें उपनो ए॥ १६ ॥ शुनमुहूर्ने गुन दिन्न रे, जनम थयो हवे, लक्षण लक्षित देहडी ए ॥ १७ ॥थग तेजें उद्योत रे, दश विशि दाख तो, जनम महोत्सव नृप करे ए ॥ १७ ॥ वाजिन नाद विनोद रे, दा न दीये घएं, वधामणां वह थावतां ए ॥ १५ ॥ मात सुपन अनु सारें रे, चक्रायुर नाम, सोनागी मुतनुं वे ए ॥ दिन दिन वाघे कुमार रे, प्रियदर्शन घj,पच धावि पालीजतो ए॥ २१ ॥ प्रजा मनोरथ साथ रे, कल्पांकुर परें, अनुक्रमें ते मोदोटो थयो ए ॥२२॥ नवा मूक्यो पुत्र रे, थवसर जाणीने, कष्ट विना ते शीखतो ए॥ २३ ॥ कला शस्त्र में शास्त्र रे, बहु धन्यासतो, साखी मात्र गुरु करे ए ॥२४॥ विनयवतो दवे जाणी रे, निधि सौनाग्यनो, विद्या थापे पुत्रने ए ॥२५॥ प्रज्ञप्ति वेथादि रे, महाविद्या वीये, सहस गमे गनीरने ए॥ २६ ॥ सवि साधे कुमार रे, लीलायें करी, विधि पूर्वक उद्यम करी ए २७ ॥ स स्वनाम्यथी तास रे, सिम यई सवे, सिमि तेदने वश थडे ए ॥ २७ ॥ विष्य शस्त्र बद्नु नाति रे, ते पण सीपला, पुण्यनें 5 कर को नहिं ए॥२॥ स्वयंवरा कन्या ताम रे, विद्याधर तणी, रूपें रंन दरावती ए ॥ ३० ॥ ब हुशत संख्या तास रे, नृप परणावतो, तेदयं सुख विलसे सदा ए॥३१॥ चारण श्रमण मुणिद रे,एक दिन यावीया, वनानद नामें गुरु ए॥३॥ ज्ञानवत गुरु तेद रे, शिष्य परिवना, सहस्रायुध दवे रानी ए॥२३॥ बहुविद्याधर साथ रे, कई परिवसो, प्रणमी धर्म सुणे तिहां ए ॥३४॥ पामी ते प्रतिबोध रे, लघुकर्मा हवे, चकायुध राज्ये नवी ए॥ ३५ ॥ गुरु ध रणे सोपे वीक्षा रे, नूपचकायुध, समकेतादिक बादरे ए ॥ २६ ॥ बीना पण बदु जीव रे, यथाशक्ति करी, धर्म धादरी घर गया ए ॥ ३७॥ बीजे खमें एह रे, ढाल प्रथम कही, पप्रविनय प्रेमें करी ए ॥३८ ॥ ते वितीय खम ३३ ॥ दोहा ॥ ॥ सहस्रायुध हवे साधुजी, विचरे गुरुछ वेग ॥ शिक्षा विध शीखे स दा, सत्य सयम संवेग ॥१॥श्रग पूरव थन्यासीयां, जाणी गुरुजी यो ग्य ॥थाचारय पद थापियु, गुणवता गतरोग ॥ ५ ॥ चक्रायुध नरपति चतुर, विक्रमवत वखाणि ॥ विद्या देवीये वेगछु, प्रगट चक्र दियुं पाणि ॥३॥ सान्वय नाम सोदामj, कृत्रिम बीजां कीध ॥ रयणविद्याना जो रथी, सत्य चक्रीपणु सि६ ॥४॥ ॥ ढाल बीजी ॥ श्रष्टापद गिरि जात्रा करणकुंए देशी॥ ॥ नदीश्वरवर जात्रा करणकु, एकदिन चक्री थाया । प्रिया सहित पूजा करी नक्कें, वाजिन नाद वजाया ॥ १ ॥ श्रीजिनपूजा कीजें लाल, नरनव सफल करीजें ॥ ए थोकणी ॥ नाटक चक्रवर्ती करे सुंदर, प्रिया वाजित्र वजावे ॥ गीत गाये जिनवरना नक्ते, नाटक तान मिलावे ॥ श्री० ॥२॥ नाटक देखी कोश्क सुरवर, तुष्टमान थयो शक्ते ॥ कामित करी विद्या तल थापे, श्रीनिनराजनी नक्ते ॥ श्री० ॥ ३ ॥ साधन विधिशु विनय करीने, वि द्या लीधी रंगें ॥ प्रलु प्रणमी ते देव नमीनें, थावे निजपुर सगें ॥ श्री० ॥ ॥ ४ ॥ ते विद्या साधवा दवे एकदिन, शावल वनामा ॥ तप ध्यानें ति हां परवत उपरें, धन्य काम सवि बामे ॥ श्री० ॥ ५ ॥ इणि अवसर सं कानो राजा, शतक नाम सोहावे ॥ प्रिया सहित मेरु जिन नमीनें, वलतां ते तिहां श्रावे ॥ श्री० ॥ ६ ॥ विद्या साधता सातमो दिन जे, तास विमा न खलाय ॥ हेत जूए तव देखी तेहनें, कोध मांहि ते नराय ॥ श्री० ॥ ॥७॥ नागपाश विद्यायें विक्कुर्वी, बांध्यो तरुथी गाढो ॥ तो पण निज ध्याने ते चक्री, कोइ थयो नवि टाढो ॥ श्री० ॥ ७ ॥ विद्या सिह था ते नृपति, बेटा ते नागपाश ॥ देवी कहे तुज सत्त्वे तूठी, फलशे ताहरी थाश ॥ श्री। ए॥ काम पडे मुजने सनारे, श्म कही गई निज गमें ॥ प्रज्ञप्तिथी लकापतिनी, चेष्टा खबर ते पामे ॥ श्री०॥ १०॥ चकी निजपुर थाव्यो ते हवे, दोय विद्याधर श्रावी ॥ कन्या श्राव अयोध्यापतिर्ने, ते वात सुणा वी ॥ श्री० ॥११॥ नारीमाही जिम ते सर्वोत्तम, पुरुपमा रुप तुमारु ॥ जो तुमें परणोतो होय सुदर, हृदय ते माने थमारु ॥ श्री० ॥१॥ पहिला पण दिग्यात्रा मनोरथ, वली ए वातें प्रेसो ॥ प्रौढसेना लेकीय प्रयाणु, ૫ ३४ जयानद केवलीनो रास. काम नृपतियें पेयो ॥ श्री० ॥१॥ जश्थयोध्या पुरी उद्याने, त्रास पमारे नयरी । तेह्नो श्रीचशाना बली, दूत मोकळे वयरी | श्री० ॥ १४ ॥ कन्या श्रावने दम ते बापो, नही तो युद्ध सह था ॥ न्यायथी उस नक हे ते कारण, जे कद् ते दिल सा ॥ श्री० ॥ १५॥ ते पण महामानी व हु विक्रम, कन्यादान तो दुरे ॥ दम न था सन्मुख थावी, सडन थाल द पूरे ॥ श्री० ॥ १६ ॥ सैन्य सन्मुख नीकलीयो, घोर महारण लाग्यु ॥ श्रीचड्रायें विक्रम तिम कीधु, खेट सैन्य जाय नाग्यु॥ श्री० ॥ १७ ॥ च की क्रोधथकी हवे पोते, धनुर्वर्म शिरत्राण ॥ नृपनां वेदी थाकुल कीधो, करी सयाम ममाण ॥ श्री० ॥ १७ ॥ पूर्व थाराघ्यो सुर सनायो, थाव्यो ते ततकाल ॥ चक्रीने बांधी थाणी थापो, सुरनें कहे नूपाल ।। श्री० ॥१॥ सुर कहे नाग्यवतो ए खपति, में एहशुं नवि चाले ॥ नृप कहे मुन गुरु पासें मूको, निम मुन दीदा थाले ॥ श्री० ॥२०॥ जिम इह नव परनव पर परिजव, पुस्य नवि मुल थावे॥तव सुर चक्री शस्त्र समुदय, निज शक्के बनावे ॥ श्री० ॥२१॥ तेदन पुर उपवनमा गुरुनी, पासें भूक्यो राय ॥ संवेगी राजा सुणी धर्मनें, यति सवेग नराय ॥ श्री० ॥ २२ ॥ चरम शरीरी य नि सगी, धीर तीये तव दीदा। गुरु पासें तव शीखे विदा, ग्रहण थासेव न शिक्षा ॥ श्री॥३॥श्रीजयानदना रासमानांखी, वीजे खमें ढाल ॥बीजी पविजय थति थनोपम, सुणतां मगलमाल ॥श्री॥श्थासर्वगाथा ॥७॥ ॥ दोदा ॥ ॥ शस्त्र थन्या सनालीने, नृप पण नवि देखाय ॥ चकी मनमा चिंतवे, ए श्यो थयो उपाय ॥ १ ॥ तेह स्वरूप जोवा तिहां, मूके विद्याधर ताम ॥ तेह स्वरूप थावी तवा, थाखे विस्मित श्राम ॥ ५॥ सैन्य बिट्ठ तिहां सा मटु, मतीने विस्मित जाय॥ चक्री गुरु शुन चित्तयं, विनय वदे पाय ॥२॥ राज झषि वदे वाली, देखी मुनि देदार ॥ पांचशे परिव्रज्या अहे, मत्री प्रमुख मनोहार ॥४॥श्रवनीपति अंतेधरी,थावी राग अत्यंत ॥ मुनि प्रतिषोधी महागुणी, पंचसया प्रव्रजंत ॥५॥ प्रणमी राजज्ञपि प्रतें, तास पुत्र तस ना ण ॥ थापी तास वचन थकी, परणे कनीप्रमाण॥६॥ोच नरपतिसार खो, नूचर जीयोनूप ॥ कीट कुटन दवे कुण करे,थवर जीस्यायनुरूप॥॥

३५ क्षितीय खंम ॥ ढाल त्रीजी॥ जोहो जायं थवधि प्रयुंजीने ॥ ए देशी ॥ ॥जीदो चक्रायुध दवे चितवे, लाला विद्याधर बलवत ॥ जोहो जीती ने करुं वश सवे, लाला दाखु तेज थनत ॥ १ ॥ नविक जन नोजो पुस्य प्रकार ॥ जीहो पुरस्यवलें सवि सपजे, लाला वडित सुख निरधार ॥ न० ॥ ॥ ॥ जोहो म करता ते सानखो, लाला लंकापति शतखम ॥ जीहो चा व्यो ते कपर हवे, लाला जाणी थति मन्नंग ॥ ज० ॥३॥जीहो थावतो जास्यो चरथकी, लाला विद्यायें करी तेद ॥ जीदो शान योजन निजपुर थ की, लाला अमिनो कोट करेद ॥ ज० ॥ ॥ लोहो अग्रसैन्य ते दानतु, लाला थावी कहे निज स्वामि ॥जीदो ज्वालिनी विद्यायें कोटने, लाला लवे चकी ताम ॥न०॥ ५॥ जीदो चक्की चाल्यो थागलें, लाला जाणे श तक राय ॥ जीदो वर्प धरी निज सैन्य, लाला तेहनी सादामो थाय ॥ ॥न ॥ ६ ॥ जीदो विश्व जयंकर बेहुनें, लाला लाग्युं रणथतिघोर ॥ जी हो दय गय पत्ती पडया घणा, लाला दाखवे थतिशय जोर ॥ न० ॥॥ जीहो एम करतां लंकेशन, लाला बल नाग्यु ययुं दैन्य ॥ जीदो तव पोतें कम्यो तवा, लाला सक करी निज सैन्य ॥०॥७॥ जोहो विविध बाण तिहां वरसते, लाला मेघ परें थसराल ॥ जोहो चकी सैन्य मद सद्द गल्यो, लाजा गजपद निम दरिबाल ॥ न० ॥ एn जोहो हस्ती कदलीवनपरें, ताला चक्की सैन्य गयुं नान ॥ जीहो उठयो चक्रायुध तिहां, लाला क्रोधव शें महाराज ॥ न० ॥ १०॥ जीदो पहेला ध्यानमादि रह्यो, लाला दी ता दरु थाम ॥ जीदो हवे थापण बेद मल्या, लाला प्रगट तु कर निज धाम ॥न ॥११॥जीहो मर्म तणां वच सनिली, लाला शतक क्रोध नराय॥ जीहो वाण ममप रचियो तदा, लाला रवि थातप नवि थाय न॥१॥ जीदो धनुष लकापतिनुं शरें, लाला दे चक्री नरीद ॥ जीदो तव नवु ला वी जूजतो, लाला ते पण बेदे अमद ॥०॥ १३ ॥ जीहो सात धनुष ईम वी, लाला तव शतकत राजान ॥ जीदो विव्हल था विद्या बलें, ताला मृके नाग श्रमान ॥ ज०॥ १४ ॥जीदो गारुड विद्याथी तवा, साला स पनें दीधो रे त्रास ॥ जोहो थाग्नेयादिक शस्वनें, लाला मूके विद्याविला सन॥१५॥जीहो प्रतिशस्त्रे दणे ते सवे, लाला चक्री रोप रसेण ॥ नीहो सकापति चक्री प्रतें, लाला यो क्रोधवशेण ॥ न० ॥ १६ ॥जी .

३६
जयानंद केवलीनो रास.
हो लोहनार दनारनो, लाला मोघर मस्तकें दीध ॥ जीहो तेदची परानव
नवि थयो, लाला पण काय मूळ कीध ॥ ज० ॥ १७॥ नीहो अगमती
नारी परें, लाला मूर्धा मूकी दूर॥ जोहो वव मुजरे लंकापति, साता दस्यो
पीडा थइ नूर ॥ ज० ॥ नानीहो रुविर जरे मूर्या लह्यो, लाला निगडि
तकीधो रे दीन ॥ जीहो वडदे पशुनी परें, लाला बांध्यु बंधन पीन
॥०॥ १५ ॥ जोहो चकी शक पराक्रमी, लाला मूको तिहां रखवाल ।।
जीहो धैर्य देइ तस सैन्यने, लाला नि शकित नूपाल ॥ न० ॥ २० ॥
जीहो निज सैन्य थावी करी, लाला सुख निा करे तेह ॥ जीहो तव शत
कंत चित्त चितवे, लाला थाणीधर्मस्नेह ॥ न॥ २१॥ जोहो निजरूत क
में सहे थदो, लाला सुखड ख इह पर लोक ॥ जीदो में परानव ध्याने क
खो, लाला तेदन फल ए रोक ॥ न० ॥२॥जीहो दोष ए माहारो मूल
गो, लाला फली मुज ततकाल, नीदो थाम्नादिक इणी परें, लाला फल
शे मुज जलाल ॥ न० ॥ २३ ॥ जीदो राज्य थारननु मूल ने, लाला ए
म करी ते थालोच ॥ जीदो दीक्षा लेट एम चितवी, लाला पंच मुष्टिक
रे लोच ॥ न० ॥ २४ ॥ जीदो नाव मुनि थया तेहने, लाला शासन देव
ता ताम ॥ जीहो बधन छेदीने दीयो, लाला मुनिवर वेश उहाम ॥न ॥
॥५५॥ जोहो इष्यनावथी मुनि थया, ताला तिहाहीज काठस्सग्ग नाय ।।
॥जीदो समता दृष्टि करी रह्या, लाला निर्ममने निर्माय ॥न० ॥ २६॥
जीदो श्रीजयानदना रासमा, साला बीजे खमें रे सार ॥ नीदो प ढाल
श्रीनी कदी, लाला धन्य राय कृषि थपगार॥न॥२०॥ गाथा ॥ १० ॥
॥ दोहा ॥
॥धारक थानन थकी, सोनली विस्मित थाय ॥ सेना इय संयुत
हवे, पोहोतो मुनिवर पाय ॥१॥ तुमें तो मोदोटा मादाव्रती, तुम बल तुम
ची पान ॥थमें न थाये एदनु, मुनिने कहे महाराज ॥ २ ॥ खमावे खां
तें करी, लीलायें सका जाय ॥ श्रीकंठ सुतनें सौंपतो, राज्य करी तस रा
य ॥३॥ थाण मनावी थापथी, तेदनी दीधी ताम ॥ कन्या शतनो कर
ग्रहे, कीथु थापणु काम ॥ ४ ॥ श्रन्यदीप थवनीपति, नमीया चकी ना
म॥ वधू सघली ले वल्यो, वैताढ विमाम ॥ ५ ॥

, क्षितीय खं. ३७ ॥ ढाल चोथी॥ सोनानी जारी है॥ए देशी ॥ ॥ दक्षिण श्रेणी है, साहेब माहारा सरोवर तीर ॥ मेरा तंबू दीध, सह स्स कन्या तिहां कीडतोजी ॥ रूपगुणवती है, सा० ॥ निज थनुरक्त, जा णी थपहरी तेह, मनमथ मनमा पीडतीजी ॥१॥ कन्या कचुकी हे,सा॥ चक्रीनी वात, जणवे कन्या ताय, तेह श्रावी संगर करेनी ॥ नाग ते सह ए, सा० ॥ दक्षिण स्वामि, बगु खेचर करें सेव, वन्दिवेग रथनूपुरेजी ॥२॥ सनु जर तेहने है, सा० ॥ नांखी वात, वन्दिवेग तव दूत, मोकली कहे वरावे इयुंजी ॥ हाथी कन्या हे, सा० ॥ लोधी ते मूक, नहीं तो करो स ग्राम, थन्यायें न करो किश्युंजी ॥३॥ तेद सांनती है, सा० ॥ मान्यो सग्राम, नूरल्याने जिम थाहार, करे निमत्रणा तिणीपरेंजी ॥ रथनूपुर हे, सा० ॥ नगरें थाय, वन्हिवेग पण ताम, सैन्य लेख्ने नीसरेनी ॥३॥ बलमदथी तेह हे, सा० ॥ ते दिन जोर, वारुण थयो सग्राम, ते बिटुं जश करने तिहाजी ॥ वन्दिवेग तव हे, सा० ॥ देखे एम, बढ़ गन पायक था दि, मरण जह्या प्राणी जिहांजी ॥ ५॥थति दयावतो हे, सा० ॥ चक्री ने एम, नांखे वाणी रसाल, आपण थरिहंत मत धणीजी ।। शुम श्राव क दे, सा० ॥ न घटे एह, जिणे हत्याविक जीव, समुदय होय मरण न पीजी ॥ ६ ॥ युद्ध करीयें है, सा० ॥ श्रापण दोय, वीर मानी करो गु ६, शाने लोक मरावीयेंजी ॥ शूर न वाले हे, सा० ॥ जय संविनाग, थं गोकरे दोय ताम, निज निज बलने गवीयजी ॥ ७॥ बागने खेमे दे, सा॥ दम गदाय, सम विक्रम तेह वोय, लहतां कोई न हारियोजी ॥ दोय सिह लहता है, सा० ॥ जीते न कोय, चक्री पाम्यो खेद, ज्वलतुं धक सनारीपुंजी ॥ ॥ श्राव्युं ततण दे, सा० ॥ हृदयें मारि, मूर्धा ल ह्यो वन्दिवेग, धरणी पडयो वायें तुम यथानी ॥ जाणी साधर्मिक है, सा० ॥ चक्री ताम, थंचलें धाले वाय, जिम सझा पामे तथानी ॥ ए॥ करे लडाइ हे, सा० ॥ धरता एम, दया हृदयमा जोय, धन्य जिनशासन जग जयोनी ॥ ठग्यो बलियो हे, सा ॥ जे वजकाय, चिर मूनविदो य, जिम आवक स्त्री परि थयोजी ॥ १० ॥ देखी चक्रीने दे, सा० ॥चि ते तेद, ए मुज तात समान, करे उपगार एणी परेंजी ॥ एह परानव है, सा ॥ नवि देखत, वीक्षा लीधी होत, जे नव तारणी सुख करेनी ।।

३७ जयानंद केवलीनो रास. ॥ ११ ॥ण अवसर है, सा० ॥ चक्रथी मुज, मरण थावत निरधार,तो उर्गति जातो सहीजी ॥ पुण्य हीनने हे, सा० ॥ सद्गति नादि, राजाने तो विशेष, सद्गति थारने नहीजी ॥ १२॥ चक्री रूपातु है, सा० ॥ वारस व्यवत, सतोषी ए राय, थवसर योग्य करु दवेजी।इम चितवी है, सा०॥ वोले वाणि, ताहारी रूपा श्रदनूत, एणे थाचरणे सूचवेजी ॥ १३ ॥ बां धव साथें है, सा० ॥न करु युर, लीजें माहरु राज्य, हुतो दीक्षा श्राव रुजी॥ चक्री वोले हे, सा ॥ नहीं मुज काम, जोगवो सुखथी राज्य, दु नवि लेउ तादरुनी ॥ १७ ॥ हुतो है, सा० ॥ एक प्रणाम, धुरथी की घो तेह, तव प्रार्थना करी निनपुरेंजी॥ धारयो चक्री है, सा० ॥ निज प र जेह, कन्यानो समुदाय, पांचशे दीये चक्री करेंनी॥१५॥ लोधी पूरवें हे, सा॥ हाथी तेह, थापे तेदना तात, दर्प करीने हेजशुजी ।। दक्षिण में णिना हे, सा०॥ सर्व राजान, थावी प्रणमे पाय, देखी सयुत तेजगुनी ॥ १६॥ दयगय नेटण हे, सा ॥ करता तेह, थाझा मानी तास, सहस गमे कन्या दीयेजी॥ वन्दिवेगनें हे, सा॥थापे ताम,मुख्य नगर जे थाउ, दरख धरीने ते तीयेजी॥ १७ ॥ बीजा खेटने हे, सा० ॥थापे शेष, हवे उत्तर श्रेणी श्राय, लीलायें जीते नरवरूजी। थापे कन्या हे, सा० ॥ ते राजान, सदन तणे परिमाण, यौवन रूप मनोहरूजी ॥ १७॥ पूर्वापर सद्ध ए, सा० ॥ शोल दजार, राणीनो समुदाय, जीते शेष वैरी वजीजी ॥ श्म जय करीने हे, सा॥ नोगवे राज्य, निनपुर थावी सार, मार्नु च कीनी झवि मतीजी॥१५॥ वन्दिवेग दवे हे, सा०॥ पूर्णसंवेग, गुरु सयो गधनाव, रहे पडघु घरमा तिणेजी। महावेग मुनिवर है, सा० ॥ जे नि न तात, चचनाणी अद्यान, समवसमा गुरु तिहां किरोनी ॥ २० ॥सांन ली दरख्यो दे, सा०॥ गुरु कनें जाय,प्रणमी गुरुना पाय, तेह पासें व्रत बादरेजी, सातशे पुरुषशु हे, सा० ॥ सातशें नारि, परवरित परिवार, नि रतिचार सयम धरेली ॥ २१ ॥ श्रीवन्दिवेग हे, सा ॥ श्रीचराय, सहस्त्रा युध नर नाथ, प्रणे राजवी तिण नवेंनी॥पामी केवल दे, सा० ॥ अहो घदो एह, वरीया थष्याबाध, सकल करमनें क्ष्य थवेजी॥ २२ ॥लका पति पण हे, सा ॥ चारित्र पाली, पंचम नवें लहे तिदि, यहो चारित्र महिमा वडोजी ॥श्म प्रावफनो हे, सा॥ साधुनो धर्म, पालता लहे शि वितीय खंम ३ए वशर्म, तिणे जैन महिमा ए वडोजी॥३॥ बीजे खमें हे, साणा चोथी ढाल, श्रीजयाननें रास, चक्रायुध थधिकार एजी॥ पद्मविजय हे,सा॥ नारख्यो रसाल, सुणतां मगल माल, होवे जयजयकार एजी॥२॥ सर्वगाथा॥१३३॥ ॥ दोहा॥ ॥ण नरतें अवनी तलें, विजयपुर मुवखाण ।। विधिये कीधी वानकी, सर्ग तणी सुख खाण ॥१॥ स्वर्ग थर्थी सहन जिके, परगट कीजें पु एय ॥ थादर करवा एणी परें, निरति कीधी नुन्न ॥ २॥ कोट चैत्यनें क जे, वापी वनश्री विशेप ॥ जेहनी शोना जोस्ने, नाकी थया थनिमेष ॥३॥ ॥ ढाल पांचमी ॥धा लालनी देशी॥ ॥ तिहां जय नामें राय, युवराजा तस नाय, थाने लाल विजयनामें जितशत्रुर्नेनी ॥ १ ॥ पृथिवी पाले न्याय, चइ सूर्य समुदाय, थाम् ॥ क्याहिं श्रनीतितम नवि रहेजी ॥ २॥ मित्र शत्रुनें दोय, त्रुग रूठा हो य, था॥ क्षिति थापे थचरिज थहोजी॥३॥ जयनें विमला नारि, वि जयने कमला धारि, था ॥ नयन ते राज्य लक्ष्मी तणांजी॥॥ रति प्रो ति दोय नारि, हरदग्ध थनग विसारि,था ॥ सुख यर्थे थावी श्दांजी ॥ ५॥ एकदिन सूती राति, सुपने सूथर साक्षात, था ॥ हरि युत खोले श्रावी रह्योनी ॥६॥ सुश्रर मूकी ताम, दरि गयो को नाम, था०॥ जागी कहे जरतारनेंजी॥ ७॥ पुत्र ते सूथर समान, दोशे कहे राजान, था॥ यन्यनें दरि सम सुत यशेनी ॥ ॥ पण बेद्धनें यशे प्रीत, साथै विचरशे नित्य, था० ॥ सानली खेद दरख लहेजी ॥ ए॥ वसुसार जीव ति हां थाय, पूरण करी सुर थाय,था ॥ तेहनी कूखें उपन्योजी ॥१०॥ हिंसा जोहादिक नाव, मायने दोहद प्रभाव, था० ॥ क्रूरता प्रमुख घण थजी ॥११॥ अनुक्रमें जनम ते थाय, दासी वधाइ खाय, श्रा० ॥ दा न नरिंदें बद्द वीयोजी॥ १२ ॥ जनम महोत्सव करे राय, दरिदर्शन चि न लाय, था० ॥ सिहसार थनिधा तव्युंजी॥ १३ ॥ कमला पण एक दि न, सुर्ता रयणी सुपन्न, था॥ सिह सूथर दीठा बिटुंजी ॥ १४ ॥ नय न सौम्य बलवत, उत्संगें रह्यो सत, था० ॥ कोल गयो धन्य थानकेंजी ॥ १५॥ संजलावे जरतार, सानली दर्प थपार ॥ था ॥ सुपन तणु फल ते कहेनी ॥ १६ ॥ तादरे सिह समान, गुणथी ते असमान, था०॥

४० जयानट केवलीनो रास. बीजीने सूअर सारिखोजी ॥ १५ ॥ वयण सुणीने तेहाइपवती श्र वेद, था० ॥ कमला कमलमुखी तदाजी ॥ १७॥ सत्तर सागर थाय, मत्री जीव सुर राय, था॥ सातमा देवलोकयी चवीजी ॥ १५ ॥ तास कुठे अवतार, गुन दोहला तेणी वार, था० ॥ उपजे धर्म करण तणानी ॥ ॥ २० ॥ पूरे ते युवराय, धानद भंग न माय, था० ॥ अवसरे पुत्र जन म थयोनी ॥ २१ ॥ शुन लग्ने शुन वार, नासुर थति देदार, श्रा० ॥ रव दिशें सूरज परेंजी ॥ २॥ इण समे शंख पुरीश, मानवीर नरईश, था ॥ ते उपरें नय नृप चढेजी ॥ २३ ॥ विनय निवारी राय, चडीया तव युवराय, था० ॥ जय करी बाधी लावीयानी॥ २४ ॥ दासी वधावे ताम, कमला सुत थयो स्वामि, था॥थावी वीजी दासी तदाजी॥२५॥ दोय वधाया राय, नाल निक्षेपनें वाय, था० ।। पुत्र जनमने थवसरेंनी ॥ २६ ॥ नीकल्यो कुन निधान, हरख्या वेद राजान, था॥ तिहा मगा वी जोश्योनी ॥ २७ ॥ तात नामांकित तेह, देखी चितवे जेह, था॥ पु पुस्य गयो निधि नडयोनी ॥ २८ ॥ शत्रुजय थयो एम,लखमी श्रावी नेम, श्रा० ॥ पुत्र जनम कारण थयोनी ॥२॥ दासी सतोपी वान, देश तास थमान,थाबीजे खंमें एमकदीजी॥३०॥पाचमी ढाल रसाल,सुण तो मगल माल,श्रा०॥ पद्मविनय प्रेमें कदीजी॥३१॥सर्वगाथा॥१६६॥ ॥ दोहा ॥ ॥ वधामण वर थावता, बंदी बिरुद बोलाय॥युगपत जय जय रव होये, गीत नाटक गवराय ॥ १ मूल्या बदी मोकला, दान मादा देवाय ॥ दशदि श वाजिन नादथी, प्रमोद प्रजा बढ़ पाय ॥२॥ इष्ट थर्थ थाग मनथी, प्रीतें थाशीष पढाय ॥ हर्षे पुत्रना देतथी, जगमा जनम जणाय ॥३॥पडिवजी थाणा प्रेमथी, मानवीर मदाराय ॥ दम लेश्ने ईन विनु, शीख दीये समनाय ॥४॥ शत्रुजय सद्ध जीवनें, थानव आपणहार ।। श्रीजयानद सलान मली, वीधु नाम उदार ॥ ५ ॥ । ढाल बची। फत्तमल पापीठाने जाय॥ए देशी॥ ॥ नरपति श्रीनयानद कुमार, सिंहसार साथै वधे ॥ न० ॥ घावें पाली नता तेह, तात मनोरथ नित्य सधे ॥ १ ॥न ॥ पांमक्रीडा करे साथ, तिम बीजी रामत सम करे ॥ न० ॥ थया कलाने योग, नृप कलाचार्य ४१ क्षितीय खंग पासें धरे ॥ ॥न ॥ शस्त्र शास्वनी जेद, शीखवे कला नली परें॥न॥ नाग्य प्रमाणे तेह, पाम्या उद्यम पर परें॥ ॥ न ॥ बद्दु धन थापी रा य, कलाचार्य संतोषी न०॥ यौवन पाम्या दोय, काम राय जिहां पोषी ॥४॥न० ॥ वापी वन थाराम, मित्र साधे कीहा करे ॥ न० ॥ सामग्री सम दोय, पण प्रकृति निन्नज धरे ॥यान ॥ सदुनां कर्म विनिन्न, सिदसा र क्रूरन घणो ॥ न० ॥ लोकनें करे उदवेग, लागे सवि चलखामणो ॥ ॥६॥ न॥ दोनागी थविनीत, थप्रियनावी अधर्मियो ॥ न॥श्रीजया नद कुमार, सोलागी घणो धर्मियो ॥ ॥न०॥ लावस्य लीलावत, त्यागी शूर सोनागीयो । न० ॥ न्यकृत मनमथ रूप, सद्जन जेहनो रागीयो ।। ॥ ॥ न॥प्रकर्ते उदार कृतज्ञ, प्रियवादी उपगारीयो ॥ ॥ सर्वने दित करनार, गुण गणनो ते धारीयो गान॥ लोक मुखें जस वाद, सि इसार तस सानले ॥ न० ॥ खेद लहे चित्तमांदि, कारमी प्रीति करीन में ॥ १० ॥ न ॥ सरल ते श्रीजयानंद, साचु करीने सबहे ॥ न०॥ सा ची प्रीति धरेह, तस गुणमाहि नजर रहे ॥ ११ ॥ न० ॥ गुणी गुण देखे सर्व, निर्गुणी ते थवगुण महे ॥ न० ॥ एकदिन कीडा उद्यान, वसत झतें पादिर रहे ॥ १२ ॥ न ॥ रातें सुणे विष्य गीत, वाजितध्वनि मीगे घ j॥ न ॥ तव साहसिक ते दोय, चाल्या धरत धीरयपणुं ॥ १३ ॥ ॥ न ॥ कौतुकें पोहोच्या दूर, क्रीडा पर्वत उपरें ॥ न ॥ कायस्सग्गमा तीन, कोइक शषि ध्यानज धरे ॥१धान०॥ कोसुर दिव्य स्वरूप, देवीयुत देखे तदा ॥न ॥ पटह वजावे देव, नृत्य करे एक सुरी यदा ॥ १५ ॥ ॥न ॥ एक वजावे ताल, वीणाघोपवती वली। न० ॥ वश वजावे एक, मुनि थागल मननी रुली ॥१६॥ न०॥ गावे मुनिगुण नक्ति, नाटक बेट्ट हरखें जुवे ॥ना विश्वमोहन धदनूत, करता कर्मकादव धूवे ॥न॥१॥ मुनि समता नमार, शुक्लच्यान श्रे0 चढचा ॥०॥ पाम्या केवल ज्ञान, घाती कर्म साय वढया ॥१७॥ नामहोत्सव करवा काज,चार निकायना देवता ॥ न ॥ मलिया वाजिन नाद, करता केवली सेवता ॥ १ ॥ न० ॥ कनक कमल रचे तक्ष, केवली तिहां बेसी करी ॥ न ॥ सहुनें देश धर्म प्लान, देशना दिये चित्तमां धरी ॥ २०॥ न ॥ समकेत थावत थादि, सानली देशना हितं करे ।। न० ॥ श्रीजयानंद कुमार, वफया सम YO जयानद केवलीनो रास. बीजीने सुधर सारिखोजी ॥ १७ ॥ वयण सुणीन तेह,हर्षवती थइ देह, था० ॥ कमला कमलमुखी तदानी ॥ १७ ।। सत्तर सागर थाय, मत्री जीव सुर राय, था० ॥ सातमा देवलोकयी चवीजी ॥ १५ ॥ तास कुखें अवतार, शुन दोहता तेणी वार, था ॥ उपजे धर्म करण तणानी । ॥ २० ॥ पूरे ते युवराय, थानद धग न माय, था० ॥ अवसरे पुत्र जन म थयोजी।। २१॥ शुन लग्ने शुन वार, नासुर थति देदार, था० ॥पू रव दिशें सूरज परेंजी ॥ २२॥ इण समे शंख पुरीश, मानवीर नरईश, था ॥ ते उपरें नय नृप चढेजी ॥ २३ ॥ विनये निवारी राय, चडीया तव युवराय, था० ॥ जय करी बाधी लावीयानी॥ २४ ॥ दासी वधावे ताम, कमला सुत थयो स्वामि, था॥थावी बीजी दासी तवाजी॥२५॥ दोय वधाया राय, नाल निदेपनें गाय, थाम् ॥ पुत्र जनमनें थवसरेंनी ॥ २६ ॥ नीकल्यो ठुन निधान, दरख्या वेढ राजान, था० ॥ तिहां मगा वी जोश्योजी ॥ २७ ॥ तात नामांकित तेद, देखी चितवे जेद, श्रा०॥पु त्रपुर गयो निधि जडघोजी ॥ २७ ॥ शत्रुजय थयो एम,लस्वमी श्रावी नेम, था ॥ पुत्र जनम कारण ययोजी ॥श्णा दासी सतोपी दान, देश तास थमान,था॥बीजे खमें एम कहीनी॥३०॥पाचमी ढाल रसाल,सुण तां मगल माल,या॥ पद्मविजयें प्रेमें कहीजी॥१॥सर्वगाथा॥१६६॥ ॥ दोहा॥ ॥वधामण वर श्रावता, बंदी विरुद बोलाय॥ युगपत जय जय रव होये, गीत नाटक गवराय ॥ १ मूक्या बदी मोकप्ता, धान मादा देवाय ॥ दशदि श वाजिब नादथी, प्रमोद प्रजा बन पाय ॥ ॥ इष्ट अर्थ थाग मनथी, प्रीतें श्राशीष पढाय ॥ दर्षे पुत्रना देतथी, जगमा जनम जणाय ॥३॥पडिवजी आणा प्रेमथी, मानवीर मदाराय ॥ दम लेने देन विनु, शीख दीये समजाय ॥ ४ ॥ शत्रुजय सद्ध जीवनें, थानद थापणहार ।। श्रीजयानद सकन मली, दीधु नाम ठदार ॥ ५ ॥ ॥ ढाल बाफतमल पापीठाने जाय॥ए देशी॥ ॥ नरपति श्रीलयानद कुमार, सिंदसार साय वधे ॥न ॥ धावें पाली नता तेह, तात मनोरथ नित्य सघे ॥ १॥न ॥ पासुकीडा करे साथ, तिम बीजी रामत सम करे ॥ न० ॥ थया कलाने योग, नृप कलाचार्य वितीय खंग. ४३ जीवडा, परस्त्रीगमन करे जेह हो ॥ सुं॥ ग० ॥ १० ॥ सु० ॥ पंचेंक्ष्यि वध श्राचरे, तेहने नरकमा गण हो । सुंगा हिंसा न करे जे नरा, तस सुख जस कल्याण हो ॥ ॥ ग० ॥ ११ ॥ सुं०॥ श्रारोग्यता बल था खु, पामे लक्ष्मी रूप हो ॥ मुंा परनवें सुरवर सुख होये, अनुक्रमें मो सरूप हो । मुं०॥ ग ॥ १५ ॥ सु० ॥ सानली धर्मनें बूझोया, सम कित पामे सार हो ॥१०॥ प्रथम श्रावत थावरे, वली पञ्चरके मौसादार होगसुंणागण॥१३॥ सु० ॥ हरखें थमने वदीया, पोहोता निन थावास हो । सु०॥ श्राहोनिश ते व्रत पालता, माने जीवित खास हो ॥ सु० ॥ |ग ॥ १४ ॥ सु० ॥ राय मुणे ते वारता, मिथ्याली शिरदार हो ॥ सु०॥ हिंसकपरिणामी घणो, कोप करी तिणी वार दो ॥सुंग॥१५॥ सुं॥ मृगया करी मृगासने, लावो निन्न निन्न दोय हो । सुंगा मुन मृगमांस खावा तणी, श्राज हा ले जोय हो ॥सु॥ ग० ॥ १६ ॥सुं० ॥ नृप था णा अगीकरी, चाल्या दोय ते ताम दो ॥सु०॥ बाज तो मृग लार्धा नहीं, उत्तर देशु स्वामी हो ॥सुं०॥ ग० ॥ १ ॥ सुं० ॥ वना दोय गया हवे, मृग दीवा तेणे ताम दो ॥१॥ जीम चिवे चित्तमा तदा, मृग दणीयें मां स काम हो॥७॥ ग ॥ १७ ॥ मु० ॥ तो व्रत नांगे मूलगु, पण दोये कोप नरीद हो ॥९॥ दोष नहीं परवश पणे, इम कहे श्रीजिनचव हो। सुग॥१॥ मुा व्रत तो का फल दीये, थाजन फल नृप कोप हो। सु० ॥ सोमें वास्यो पण नवि रह्यो, कीधो व्रतनो लोप हो ॥सुंग०॥२०॥ ॥सुगामृग दणी मांस लेश्वल्यो, श्रीजयानवनें रास हो॥॥बीजे खमें पने कहो, सातमी बाल विलास हो ॥ सु०॥ग ॥ २१ ॥सर्वगाथा ।। २२० ॥ ॥ दोहा॥ ॥ प्राण जाय परलोक जो, पण व्रत नवि लोपाय ॥ बीजो तो इम ब दु परें, सोम चित्त समजाप ॥१॥ प्राण राखवा थापणां, परनां न दणु प्राण ॥माहारा वादाला मुनने, परने तिमन प्रमाण ॥ २ ॥राजा रूसो मुज ठपरें, प्राण धरो परदेश ॥ मृगर्ने दु माहारी करी, लोपु नहीं व्रत ले श॥२॥ यत ॥ निदतु नीतिनिपुणा यदि वा स्तुवत, लक्ष्मी समाविश तु गवतु वा यथेष्ट ॥ श्रयैव वा मरणमस्तु युगांतरे वा, न्यायात्पथोन विचल ति कदापि धीरा ॥१॥ निमित्तमासाद्य नवेन किंचन, स्वधर्ममार्ग विसृजति ४३ जयानंद केवलीनो रास. केत थादरे॥ २१ ॥२०॥श्रीनयानवने रास,बीजे खमें एकही ॥२॥ बही ढाल रसाल, पप्रविनय गुरुथी लदी ॥ २२ ॥ सर्वगाथा ॥ १४॥ ॥ दोहा॥ ॥ श्रीनयानद पूछे इयुं, सुर ए स्वामी कवण ॥ नाटक कीधु निर्मलु, वात कहे मुनि वयण ॥१॥ वैताढयें खेचरवई, नाम जयंत निदान ॥ रय ग्रहणे समजियो, दीक्षा करूं थादान ॥ २ ॥ ज्ञानवत ययो गुरुपकी, थापी मुजने थाण ॥ एकाकीनी श्रवनीय, विचरूं अवसर जाण ॥३॥ विंध्यगुफामा थावीयो, चोमासुं चउमास ॥ कर उपवास तिहां किणे, र यो ढुं रीजी नन्नास ॥ ४ ॥ तिहाथी दोय लोयण तदा, नयरगिरिजर्ग नाम ॥ सुनद तिहां नूपति सदा, राज्य करे थनिराम ॥ ५ ॥ ॥ ढाल सातमी। सुदर पापस्थानक कयुं सोलमु ॥ ए देशी ॥ ॥ सुदर दोय सेवक ने तेहनें, नीम सोम शनिधान हो । सुदर ।। एक गाव ते गुफाथकी, रायनु गोकुल थान हो ॥ १ ॥ सुदर ॥ गति परिमारों मति दोये ॥ ए धोकणी ॥ १० ॥ राय बाणाथी बिट्ठ जणा, पामी नृप थादेश हो । मु० ॥ गोकुलमा चासो वसे, शूरवीर सुविशेष हो ।मु०॥ ग०॥२॥सु०॥ मृगया थरथे एकदा, थाव्या गुफानें पास हो ॥१॥ म गयूथ देखी बहु तिहां, मूके बाण ते तास दो।मु०॥ ग० ॥ ३ ॥ सु०॥ को मृगने नवि लागायु, वाण ते यया निराश हो ॥सु०॥ विस्मय ते बिछ पामीया, मृग याव्या मुन पास हो ॥सुणाग०॥ ॥९॥ मुज पासें पुणे देशना, मृग पू- ते दोय हो । मु०॥ श्राव्या मुज देखी करी, तास विचार ते होय दो॥ सु० ॥ग०॥५॥सु०॥ ए मुनिना महिमाथकी, मृगर्ने न लाग्यो बाण दो ॥ सु०॥ ए तपसी कपिरानीया, करे उपकारने हाण दो ॥ सु॥ग ॥ ५ ॥ सुं०॥ मनमा बीदीना यतिघणु, काधो मुज परणा म हो ॥ सु०॥ कहे थपराध ए श्रम तणो, खमो तुमें तपसी स्वामि दोसुग॥७॥ सु०॥ श्रमें तुम मृग नहीं मारीयें,मत करजो श्रमराप हो ॥१॥ मुनि धर्म लान वे कहे, नय नवि बाणो सराख हो ॥ सु॥ ॥ ग॥ ७ ॥सु० ॥ तुमनें थनय बे पण मुणो, धर्मतत्व एकांत दो। मु० ॥ सुखश्ष्ठक सद्ध जीवडा, जीवबु सङ इथेत दो ॥ सु०॥ ग० ॥ ५ ॥ सुतेदना प्राण जे अपहरे, नरकें जाये तेह हो । सु । मांसाहारी

वितीयखम.
४५
कोइ शस्त्र लागे नही रे, तेहनें अंग विशाल रे ॥क० ॥ १५ ॥ पुष्पवृष्टि
थाकाशयो रे, यश वली उंऽनि ध्वान ॥ ते दिखी विस्मित हदें रे, उना
रहे तिण थान रे॥क ॥ १६ ॥ तव पाषाण पडे तिहां रे, मस्तक परें
तास ॥ ते ते पथरे मारीजता रे, बुंब करे जिम दास रे ॥ १७ ॥क० ॥
जय विव्हल नाग तिहा रे, नृपनें कहे सवि वात ॥ देवी परगट सोमने
रे, दिव्य शरीर विख्यात रे॥ कण् ॥ १७ ॥ देडकी सघली अपहरी रे, तु
टमान यज्ञ तेह ॥ धीर पारो कास्तग्गनें रे, दीगे तुज व्रतनेद रे ॥ को
॥१॥ में तुज परीक्षा कारणे रे, देडको वरिसण दीध ॥ तुजनें काले परो
डीये रे, राज्य थशे प्रसिभरेक॥॥श्रीजयानदना रासमा रे,नांखी थान
मी ढाल ।। बीजे खमें पग्न कहे रे, श्रागल वात रसाल रे ॥०॥१॥३५॥
॥दोहा॥
॥ महाव्रतवता मुनि फनें, रहेजे जश्ने रात ॥ एम कहीने बहश थ,
सोमने यह सुखशात ॥ १॥ पायो काउस्सग्ग प्रेमथी, हियडे दरख न मा
त ॥ प्रणमे जाणी मुज प्रतें, उपसर्गनो धवदात ॥ २॥ रातें पूजे रागीयो,
मुजनें कहो मुनिराय ॥जीवाडयो मुजर्ने निणे, माहारी कोण ते माय ॥३॥
में नारख्यु माहारी घणु, नगतिवती नलि नांति ॥ समकेत पामी ए सुरी,
श्रम पासें एकांत ॥४॥
॥ ढाल नवमी ॥ निणदल वींदली दे॥ए देशी॥
॥ तुमें धर्म पाम्या एम जाणी, पूजे मुजनें सपराणी हो॥ नविजन धर्म
करो॥ व्रत पालशे के ए नाही, मुजने नाखो ते थाही दोन ॥१॥ में
कर्पु विराधशे नीम, थाराधशे सोम ए नीम दो न०॥ तुज परीक्षा करवा
श्रावी, तुज धैर्य देखी या नावी हो ॥ ना ॥ २ ॥ तव सोम सुणी मु
ज धर्म, चितवे जीवादिक मर्म हो ॥ ज०॥ दवे नूपति सोमनी वात, देव
ता कृत साह्य विख्यात हो ॥ ज० ॥३॥ ते सनिली विस्मित नूप, ययु
मांस अजीर्ण थनप हो ॥न० ॥ थइ गूढ विचिका ताम, तेह रातिमा
गयो यमधाम हो ॥ न० ॥ ४ ॥ बीजी नरकें उत्पन्न, महापापथी तेद
धन्य दो ॥ ज० ॥थति सय पुण्य के पाप, फले तुरत ए शास्त्रे बाप हो
॥ज० ॥ ५॥ स्वामीन मानु नीम, करी पाप थघोर निसीम हो
॥ज० ॥ तेदज नरके गयो तेह, व्रतनग तणु फल एह हा ॥०॥ ६ ॥

४४ जयानंद केवलीनो रास. बालिशा ॥ तप श्रुतज्ञानधनास्तुसाधवो, न याति कमोपगमेपि विक्रिय । ॥ ॥ दोहो ॥ सोम विचारी सत्त्वथी, मृग नवि मत्रो तेण ।। हर रायने थापीयो, श्रमनें न जडपो एए ॥ ४ ॥ ॥ ढाल थामी ॥ पुण्य प्रशंसी । एदेशी ॥ ॥ सोम थाव्यो निन घरनणी रे, नोम प्रवासे राय ॥ मृग थामिष जे थाणी रे, खा, उदर नराय रे ॥ कर्म विटवणा ॥१॥में जुट होय रे, उर्गति नेटणा ॥ कर्म न टूटे कोय रे, नवनव 5 खिउ सोय रे ॥ क० ॥ ए थोकणी ॥ नीमने पूढे नूपति रे, सोम न सायो रे केम ॥ तव ईर्ष्यायें नोखीयु रे, एहने ने ए नेम रे ॥ क० ॥ ॥ मृग ला प ण नवि दण्या रे, तव रूतो नरराय ॥ मुन थाणा लोपी णे रे, बांधी लावो जाय रे ॥ क० ॥ ३॥ गाम एक तुन थापर्छ रे, तव दवे लोनथी तेह ॥ सुनट सार्थे तस घर गयो रे, मारण चित्त घरेह रे । फ० ॥ ४ ॥ कल शस्त्र करी हाथमा रे, थाव्यो तिहां किण जाम ॥ सोम शकावत धु रथकी रे, वात सुणी वली ताम रे। कल ॥५॥ सोम नाठो घरची हवे रे, परवत जावु रे धारि ॥ नगर वाहिर जब नीकल्यो रे, नीम पण पद अनुसार रे ॥ क०॥ ६ ॥ नीम पू- सोम थागलें रे, लग जग मलिया रे तेह ॥ सोम विव्हल नय नासतो रे, जाणे थाव्या एद रे॥क० ॥७॥ सुनट कहे किहा जाय रे, करी नृपनो अपराध ॥ किहां जाइश तुं ना शिनें रे, रूठो राय अगाध रे ॥ क० ॥ ॥ कडा वयण सुणी श्या रे, जय' वाणी मनमादि । यति उतावलो नासतो रे, मनथी गतववाह रे ॥क ए॥णे अवसरे मारग विचे रे, देडकी सूक्ष्म अपार ॥ चालती के के थिर रही रे, देखे मोम तिवार रे॥क० ॥१०॥ लस्कोगमे पग मू कवा रे, न मले नाम विचाल ॥ केम जाउं इम चितवे रे, सोम महा कि रपाल रे। क० ॥११॥ पर्वत श्राव्यो ढूंकहो रे, पदोचु शीघ्रथी तेष ॥ सु नटें नाव पकहाई रे, पण ममुकी मरे एथ रे ॥ क० ॥ १२ ॥ पण मुज प्राण जैतांयका रे, व्रत लो' किण रीत ॥ इत्यादिक ध्याता थका रे, करे थणसण ते अजीत रे ॥ ॥ १३ ॥ फासस्सग्ग करीने रह्यो रे, परमेष्ठी फरे ध्यान । एदवे नीमादिक सहुरे, थाष्या जट ते थान रे।। ॥क० ॥ १४ ॥ विविध शस्त्र मूके तदा रे, क्रूर महा विकराल ॥ पण

.
वितीयखम.
४५
कोई शस्त्र लागे नही रे, तेहने अंग विशाल रे ॥ क॥ १५ ॥ पुष्पवृष्टि
श्राकाशथी रे, थइ वली उनि ध्वान ॥ ते दिखी विस्मित हदें रे, नना
रहे तिण थान रे॥क ॥ १६॥ तव पाषाण पडे तिहां रे, मस्तक परें
तास ॥ ते ते पथरे मारीजता रे, बुब करे जिम दास रे ॥ १७ ॥क ॥
जय विव्हल नाठा तिहां रे, नृपनें कहे सवि वात ॥ देवी परगट सोमने
रे, दिव्य शरीर विख्यात रे॥ क० ॥ १७ ॥ देडको सघली थपदरी रे, तु
टमान थइ तेह ॥ धीर पारो काठस्तग्गनें रे, दीठो तुज व्रतनेद रे॥
॥१॥ में तुज परीक्षा कारणे रे, देडको वरिसए दीध ॥ तुजनें काले परो
डीये रे,राज्य थशे प्रति रेक॥२॥श्रीजयानदना रासमा रे,नाखी थान
मी ढाल ।। बीजे खमें पन कहे रे, श्रागल वात रसाल रे ॥कण॥२१॥ २३५॥
॥ दोहा॥
॥ महाव्रतवता मुनि कनें, रहेजे जश्ने रात ॥ एम कदीने थदृश था,
सोमने थइ सुखशात ॥१॥पाखो कामस्सग्ग प्रेमथी, हियडे हरख न मा
त॥ प्रणमे जाणी मुज प्रते, उपसर्गनो थवदात ॥ ३॥ रातें पूछे रागीयो,
मुजनें कहो मुनिराय ॥ जीवाडयो मुजनें जिरों, माहारी कोण ते माय ॥२॥
में नरिव्यु माहारी घणु, जगतिवती नलि नांति ॥ समकेत पामी ए सुरी,
श्रम पासें एकांत ॥३॥
॥ ढाल नवमी ॥ निणदल बदली दे॥ए देशी ॥
।। तुमें धर्म पाम्या एम जाणी, पूजे मुजनें सपराणी हो ॥ नविजन धर्म
करो॥ व्रत पालशे के ए नाहीं, मुजने नांवो ते थोड़ी दो ॥ न० ॥१॥ में
का विराधशे नीम, श्राराधशे सोम ए नीम हो ॥न०॥ तुज परीक्षा करवा
थावी, तुज धैर्य देखी थइ नावी हो ॥ न० ॥ ५ ॥ तव सोम सुणी मु
ज धर्म,चितवे जीवादिक मर्म हो । न० ॥ दवे नूपति सोमनी वात, देव
ताकत साह्य विख्यात हो ॥ न० ॥ ३ ॥ ते सनिली विस्मित नूप, थयु
मांस थजीर्ण अनूप हो ॥ न० ॥ थइ गूढ विचिका ताम, तेह रातिमा
गयो यमधाम दो । न ॥ ४ ॥ बीजी नरकें उत्पन्न, महापापथी तेह
अधन्य हो ॥ ज० ॥थति तय पुस्य के पाप, फले तुरत ए शास्त्रे बाप हो
॥ज० ॥ ५॥ स्वामीन मानु नीम, करी पाप थघोर निसीम हो
॥न ॥ तेहज नरकें गयो तेह, व्रतनग तणु फल एद हा ॥न ॥ ६॥

. ४६ जयानंद केवलीनो रास. मृतकारज करी दवे विहाणे, थपुत्रीयो नृप ए टाणे दो ॥न ॥ स्वोखेद वे योग्य राजान, राज्य ममलीने परधान हो ॥ न० ॥ ७॥ पंच दिव्य प्रग टकरी वासे, नगरीयो बाहीर निकासे हो ॥ ॥ परवत पासे जाय ना म, सोम कुटुब खवरनें काम हो ॥ न० ॥ ॥ जाय 2 नगरीमाहि, गज रायें दीगे चाहि हो। न० ॥ तिहां कलशनु जल शिर नामे,थारोपे एट ने नामें दो ॥ न० ॥ ए॥ वली उन चामर वीलाय, हैपारव तुरंग कराय हो ॥ न ॥ श्राफाशें देवी ते वोली, सनिलो सद्ध हियड खोली हो । न० ॥ ॥ १० ॥ सोम नाम ए तुमनें राय, में थाप्यो गुण समुदाय हो॥ ज० ॥ ए हनी जे खमशे थाण, तस जमघरे देश ठाण हो । न॥ ११ ॥ इम कही थदृश थइ देवी, सनु हरख्या तेह सुणेवि हो ॥ न० ॥ तेहनें सलु क रे प्रणाम, सद्व माने रायनें गम हो॥न०॥ १२॥ वाजिनध्वनि नन न वि माय, बदीजन विरुद बोलाय हो॥न ॥ महा शक्थिी प्रवेश उक्किहा, बावी सिहासने बेठा दोन ॥ १३ ॥ न्यायें परजानें पाले, दया धर्म घ यो यजुश्राले दो ॥ ॥ सोम दृढधर्मा दया पाली, इण नव पण सु खनी थाली हो । न० ॥ १४ ॥ नीम हिसायें गयो नरकें, पापी किम जा ये सरगें हो ॥ ज० ॥ मुज नमवा नूपति थायो, निज देशे थमारी बजा यो हो ॥ न० ॥ १५ ॥ सेवे गुरु तिम शुद्ध धर्म, प्रत्यक्ष दीगे जिणें मर्म हो ॥ ॥ एम धर्ममयी राज्य पाली, सौधमै गयो 5ख गाली हो । ॥ न० ॥ १६ ॥ ते सामानिक थयो देव, में विहार कस्यो ततखेव दो ॥ ॥ ज० ॥ ॥ फरी थाव्यो हु इण थान ॥ देवता जुवे श्रवधिज्ञान हो ॥ न ॥ ॥१७॥थाप्यो उपकार सनारी, प्रणमी नाटक करे नारी हो ॥ न० ॥ गुरु सेवाने थहिंसा, तेदनां फल स्वर्गमां शस्या हो ॥ ॥१७॥ जली कहे श्रीनयानद, जसु धर्मे बुद्धि थमद हो॥ न० ॥ सुधाविक का रण टाली, स्थूल दिसा नहीं करु नाली हो ॥ ज० ॥ १५॥ परस्त्रीनो त्या ग में कीधो, समकित व्रत तुमथी लीधो हो ॥ ज० ॥ गुरु कहे तु सम्प ग पाले, ए कल्पवृक्ष सम नाले हो ॥ ज० ॥२०॥ एहयी थशे तुज क ल्याण, कहे कुमर स्वामी परमाण दो॥न० ॥ निज थात्म कृतारथ जा णे, मुनि प्रणमी गया घर विहाणे हो ॥ न० ॥२१॥ गुरुकर्मा ते सिह सार, नवि प्रणम्यो धर्म लगार हो ॥ ॥ सुर प्रमुख ते गया निज था . वित्तीयखम. ४७ न, लही श्रक्षा प्रमुख प्रधान हो ॥ न ॥१॥ थलगें मुनि करे विहार, युवराज नंदन दवे सार हो॥न०॥जीधो ते धर्मनें पाले, गुरु देव नक्ति श्रज्जुवाले हो ॥न॥३॥ ढाल नवमी वीजे खमें,कही धर्मनो राग थखमें हो ॥ना गुरु उत्तमविजयनो बाल, कहे पद्मविजय सु रसाल दो ॥२४॥ • ॥ दोहा ॥ ॥ एक दिन जय अवनीपति, पूजे प्रश्न प्रकार ॥ सामुहिक घणुं समज यो, कुण मुलण कुमार ॥१॥ निमित्तियो दोय निरखीने, सर्वांगें मुनरीति ॥ नृपनें कहे निमित्तियो, निर्णय कीधो नीति ॥२॥ सिहसारनां सानलो, तुमें ल पण ततकाल ॥शनरथ स्वजननें थापशे, लोक आप जिम काल ॥ ३ ॥ क्रूर बुद्धि कृतघ्न करो, पदें पदें थापद गेह ॥ उर्गतिगामी 5 ख लदे, धर्म नो प धरेद ॥४॥ श्रीजयानद सोनागीयो, सुन लक्षण सांग ॥ मुख कर्ता सवि विश्वनें, चक्रधारी ए चग ॥५॥त्रण खमनो थधिपति, बहुराजा बलवत ॥ सेवा एदनी सारशे, उपकारी एथनत ॥६॥ न्याय धर्ममा निपुण ए, जस प्रताप जयवत ॥ शिवगामी सुस्वर धणी, एहना गुण जे श्रनत ॥ ॥ विसरजे वारु परें, निमित्तियो नरनाह ॥ धरणीपति धारी करी थनुजने कहे उन्माद ॥७॥ गोप्य थवे पण गायें, तुज बागल तहकोक ॥ सिहसार तो शुन नहीं, श्रीजयानद सश्रीक ॥ ए॥ ॥ ढाल दशमी ॥ रामचके वाग ॥ ए देशी॥ ॥ एणे समें दासी एक, राय तेबोल तणी री ॥ जाणी विश्वासी सेह, वात ते सर्व सुणीरी ॥१॥ अवसर पामी राय, नाना प्रकार करीरी॥परी का कीधी तास, नैमित्त वचन धरीरी ॥॥ निभय कीघो तास, दवे सिह सार पुरें री॥कीडतो करे उन्माद, लोकनें 5 ख धरे री ॥३॥शका न ध रे काय,स्वेचायें विचरे री। नर नारी थानरण, चूंटी तीये सुपरें री॥ फोडे नारीना कुन, नारी सुरूपा हरे री ॥ शकट लूटी लूटी नाय, बडु अन्याय करे री ॥ ५ ॥ तुरंग खेलावे तेह, मारगर्माहि नवरी ॥ कोप्या नगरना लोक, वीनवे नई नरवरी॥ ६ ॥ लोकनें करी सत्कार, मोकले थाप घरें री॥ कुमर निघ्रजी राय, थति थपमान करे री॥ ४ ॥ इणी परें वे त्र वार, वासो पण न रहे री ॥ एक दिन दासी तेह, जाती वे खी कहे ॥७॥ शुं ले जाये एह, ते कहे केम खले रो॥ नृप थरथे ,

.
UG
जयानंद केवलीनो रास.
तंबोल, सुणी तिणे लाधु व री॥ ॥ ॥ रूठी कहे रे उट, नैमित साप
वदे री॥ कुमरें नोनावी तास, कहे तु जेह हृदे ॥१०॥ दासी कहे ह
सांत, सघलो जेह थयोरी । कुमरें धारी वात, जर्मन तेह नयोरी ॥११॥
यत ॥न तरुस्तटिनीतटे चिर, न खले प्रीतिरघात्मनींदिरा ॥ नच धर्मर
सोतिलोनके, नच गृढ हदि तिष्ठति लिया ॥१॥ ढाल ॥ दासी क
ही सवि वात, कुमरें श्रन्याय करयो री ॥ रायें बोलावी ताम, जांखे को
धनखोरी ॥१२॥ रे पापी थन्याय, नगरमा नित्य दमे री ॥ लोक करे पो
कार, सदुनें तुं न गमे री ॥१॥ घरमा पण ए रीति, कुलमा कलक स
मोरी ॥ जा हवे नगरथी दूर, देशांतरमा नमोरी ॥१॥ रदीश जो नगरी
माहि, तो दु नाहिं सदुरी ॥ कापीश नाकनें कान, पुत्र पण ए कडु री
॥१॥चिते सिदकुमार, जाउ परदेश यदा री ॥ श्रीजयानद कुमार, नूपति
थाये तदा ॥ १६ ॥ रागी लोकनें राय, एहनो देखु सहीरी ॥ लेई ना
उ परवेश, तो रहे दूध दहीं री॥ १७ ॥ राज्य वेलायें मुङ, बोलावे हर्ष
धरी री ॥त्रीजो नहीं कोई योग्य, एहिज वात खरी री ॥१॥ म चिति
एक दिन, मायावत वदे री ॥ सांजली श्रीजयानव, यापण एक हदें री
॥१॥ वेशांतर चलो नाय, जिदा थाश्चर्य दोवेरी ॥थतुल कला शीरवा
य, नाग्य परीक्षा नोवे री ॥ २०॥ तीर्थ अनेक वाय, तनु ए क्लेश
सहे रो॥ धूर्तथी नवि वधाय, उकीन सयण लहेरी॥१॥ एम अनेक
गुण थाय, नहीं एक नाण रह्यां री ॥ तुज विरहो न खमाय, तिणे ए व
यण कमारी॥शा श्रीजयानदने रास, दशमी ढाल कही री।। खमबी
जे कहे पन्न, कपटें सिदि नही री॥२३॥ सर्वगाथा ॥३०५ ॥
॥दोहा॥
॥ ते कारण चालो तुमें, विश धारी कोइवेश ॥ पित्रादिक अण पीने,
वारु कर विशेष ॥१॥ सरल ते जाणे सङ खलं, पुस्यवत परपान ॥ सु
कृतिमाहे शिरोमणि, मान्यं वचन प्रमाण ॥ २ ॥ रातें चाल्या रंग, पिईये
करी बनाव ॥ खज्य सखाइ खांता, जावे कांश्क जाव ॥३॥ कथा प्रसं
ग करता थका, वारु धर्म विचार ॥ श्रीजयानद कहे सुणे, पुचे सर्व प्र
कार ॥ ४॥ पुरस् लखमी पामीयें, पायक सेवे पाय ॥ जस कीरति जग
जागती, सुकमें जन्म सवाय ॥ ५ ॥

वितीय खम. ए ॥ ढाल अगीयारम। ॥ सप्तरसुं पापनुं नाम ॥ ए देशी ॥ ॥ धरमें सुख पामे प्राणी, बापदा जाय सर्व उजाणि ॥ सुर नरमां कीर ति गवाणी दो लाल ॥१॥ धर्म करो नवि प्राणी ॥ए थोकणी॥ खाम्यो टथिवीने तरु जे थापे, मणिश्व्यनें फल 5 ख कापे ॥ ए धर्मथकी नही पापें हो साल ॥ध० ॥ ॥ थरिदतनो धर्मज रूडो, बीलो जाणे सह कूडो॥ नवि माने अधर्मी नूडो हो लाल ॥ ध० ॥ ३ ॥ हवे बोले तिहाँ सिंहसार, नाई तुम वचन उदार ॥ सत्य मानु हुँ निरधार दो लाल ॥॥ ॥४॥ पण वात एक अवधारो, अधर्मी ने इष्य वधारो ॥ हमणां धधर्म सुखकारो हो लाल ॥ ध० ॥ ५॥ धर्मी जन रखीया दीसे, ए वात वे विश्वावीशे ॥ श्रधर्मीथी ख जाय रीशे हो लाल ॥ध॥ ६ ॥ तव श्रीज यानंदजी बोले, मूरख नही तादरे तोले ॥ तु खोटो वातमा मोले होला ल ॥ ३० ॥ ७ ॥ पापानुवधी पुस्य, तेणे लखमी होये श्रगस्य ॥ तुं देखे हृदयया शून्य दो साल ॥०॥ ॥ वला पुण्यानुवधी पाप, तेणें था नवमा सताप ॥ ए परनव कीधला थाप हो लाल ॥ध०॥ ए॥ण नव मा जे जे करशे, तेदनां फल थागल जोगवशे ॥ वावशे ते कालें फलशे दो लाल ॥ध० ॥ १० ॥ तव उष्ट कहे सिहतार, वाद ते प्रेमनो हरनार ॥ नाई म करो वाद विचार हो लाल ॥ध ॥ ११ ॥ कोइ निपुणनें पूढीयें वात, ते नाखे जे अवदात ॥ ते धारिये निश्चय त्रात दो लाल ॥५०॥ ॥१॥ ते श्रीजयानदजी माने, वीजो उष्ट ते एम मन जाणे ॥ एहने राय प्रजा सट्ठ माने हो लाल ॥ ५० ॥ १३ ॥ राज्य योग्य ट तेम करी, ए वातमा पण काय धरी ॥ एदनां नेत्र कदि अपहरियें दो लाल ॥ध०॥ ॥१॥ पठी राज्य ते माहरे थावे, एम चितवी कहे इंण दावें ॥ना प ण विना काम न थावे हो लाल ॥ १०॥ १५॥ जे हारे ते थापे नयण, एम सिहसार कहे वयण ॥ श्रीजयानद माने सयण दो लाल ॥ १० ॥ ॥१६॥ को गाममादि हवे पेठा, गामाकुर लोक वेग ।। सिहसारे ते सह दावा दो लाल ॥ध ॥१॥ तस प्रणमीनें कहे एम, दुपापथी शुन कद नेम ॥ श्रातो धर्मथी कहे ए केम दो लाल ॥ ५० ॥ १७ ॥ ते रूप वेष तस देखी, माया नाटक वली पेखी ॥ वोले गार सवि वेखी हो लाल ॥ १० ॥१॥ नाई ताहरी वात ते साची, तांजली सिह मनमा मा ५० जयानंद केवलीनो रास. चौ ॥ नायं चाल्यो हवे नाची हो लाल ॥ध० ॥ २० ॥ आगल जाने त्र ते जाचे, कहे श्रीजयानद एम वाचें ॥ गामडीयाने वयणे माचे हो लाल ॥ध० ॥२१॥बीजे खमें थग्यारमी ढाल, कही पविनय सुरसान, धर्मथी होय मगलमाल दो लाल ॥ध० ॥ २२ ॥ सर्व गाथा ॥३३शा ॥ दोहा॥ ॥ गामडीया ने गमार ए, धर्म न लहे थधर्म ॥ कूड सारखी केवल कह्या, मूरख न लहे मर्म ॥ १ ॥ जूतु बोले ए नढा, श्यो एहनो विश्वास । गाम डियानो मत गणे, कोई विश्वास चकास ॥ २ ॥ इस काग दृष्टांत दे, सानल जे तुं सीह ॥ श्रीजय कहे ते सांगलो, बहु गनीर थवीह ॥२॥ ॥ ढाल बारमी॥ रसीयानी देशी ।। ॥धन्य पुरे एक इह मोहोटो अने, तिदा वहु मत्स्यनी नाति।सुबंधवा मीन लेवा एक काग पडयो तिहा, मीन तो जलमाहे जात॥5॥१॥ गाम डीयानो विश्वास न कीजीयें ॥ ए थांकण ॥ कागनी पाखो जलनीनी पई, न तराये न उमाय ॥ मु॥ जसमाहे हवे बुडशे कागडो, इण समे थधरज थाय ॥ सु०॥ गा० ॥ २॥ हसी हसने कहे सुणो स्वामीजी, कागडो चूरे डे एद ॥॥ नीचें पेशी पूवें धरी तुमें, काढो करुणा रे नेह।मु० ॥ गा॥॥ तेमज कम्यं तिरों फाकने काढीयो, स्वस्थ थयो दवे काग ॥१॥प्रार्थना कर हंसी युत हंसनें, तुमें उपगारी महानाग ॥ सु० ॥ गा० ॥ ४ ॥ एम कही पोतानें वह त गयो, वातो करी विवेक ॥ ॥ चचुपटें फल लावी थापीयां, वावरे प्रीति विवेक ॥ सु० ॥ गा० ॥ ५ ॥ हंसी सहित हवे ई सलो उडवा, मामे जेटले ताम ॥ ९॥ काक कहे रे प्रियातु जाय किहा, हंसी रोकी ते नाम ॥ १० ॥ गा० ॥ ६ ॥ हंस कहे माहारी ए नारी , ताही ए नदि नारी मुगा तो मिश सरिखो मदा श्याम , एतो शशीय नुहार । सु०॥ गा॥ ॥ काफ कहे तेदनो श्यो मेल , परकुलनी दोये ना र ॥ सु०॥ नगिनी होय तो समरूपें होय, एक कूखें अवतार ।। सु०॥ गा० ॥ ॥७॥जो नवि माने मुज ए वातही, तो ए गामना लोक ॥सु०॥ हुए परस्यो तव सद् दोसतो, मली मली सद्धयें रे थोक ॥१॥ गा॥ ए॥ ते कदेशे तो मानशो के नहीं, दसे मानी ते वात ॥१०॥ पित्राविकनें सोंप्यो हंसलो, काक ते ग्रामें थायात ॥ १० ॥गा०॥ १०॥ प्राप्त विवाद मुणामो लोक में, मर

ते
वितीय खंम
जाखें कहे वाणी ॥ सु०॥ कूडी साखें मुज साचो करो, नहीं तो तुम कर
हाण ॥ सु॥ गा॥११॥ नारी शिरें घट ईथनाच करूं, पशु व्रण खोरे
तेम ॥ सु० ॥ पीहा उपजावु यति थाकरी, कहेशो न का रे केम ॥९॥
गा॥१२॥ नर नारी शिर वेसी बडी जालं,तावड मूक्यां जे धान ॥१०॥
कपनक्षण करु वस्ती वालथी, करु थशनादि यादान ॥९॥ गा० ॥
॥ १३ ॥ बीजा पण थनरथ हु बहु करूं, करो घर लोक अन्याय ॥ १० ॥
मनुष्य वाणी सुणी विस्मय पामीया, बीहिना सढु समुदाय ॥१॥ गा०॥
॥ १४ ॥ धर्माधर्म विचार कस्यो नहीं, मानी कूडी रे साख ॥ सु० ॥ धिग
ए काक तथा धिग लोकनें, करे थन्याय ए नाख ॥१०॥गा ॥ १५ ॥
दवे ते काक इस नेला मली, पूले थावी रे न्याय ॥ ९॥ लोक कहे थ
में परणता देखीयो, सुणि हंस थति रखी थाय ॥९॥ गा॥ १६॥ का
क कदे दवे इसने सनिलो, ल्यो ए तुम प्रिया सार ॥९॥ प्राण दीया तुमें
मुजनें तुम तणो, न करूं छोद लगार ॥१०॥गा० ॥ १७ ॥ गामडीया पर
ख्या इण रीतिगं, ग्राम्यनें कहे हवे काग ॥सुमारे मूरखो तुमें थोडे कारण,
कयो कूडी साख लाग ॥ सु॥ गा॥ १७ ॥ इह नव परनव तुमनें 5 ख
घणां, कूडी साख सम पाप ॥९॥ नहीं जगमा जेहयो सवि कपजे, हिंसा
दिकनो रे व्याप ॥सु० ॥ गा० ॥ १९ ॥ देस काग मती क्रोधथकी हवे,
चाचे लावी रे थाग ॥ सु० ॥ वरशीयगाराने बालीया, तेहना घर नहीं
ताग ॥ सु॥गा ॥ २० ॥ मरण सही ने छर्गतिमा गया, कूडी साख प्र
नाव ॥१॥ एद कथा गामडीयानी सुणी, मत विश्वास तु जाव ॥९॥
गा० ॥ २१ ॥ वात सुणी कहे सिह नाई मुणो, कूड कथा कदी मुज ॥
मु॥ मनुष्य परें पशु नवि बोले कवा,न गावं वातें तुक सुमागा॥२५
श्रीजयानद कहे ए सत्य , सांगलो कारण तास ॥ ॥ वीजे खंमें पा
रमी ढाल ए, पर कहे मुक्लिास सु०॥ गा० ॥ २३॥ सर्वगाया ॥२५॥
॥दोहा॥
॥ श्रीमुख यच वसे इहां, अर्चे लोक थगाघ ॥ नदी यह नदी पुरे, वि
दु मित्र निर्वाध ॥ १ ॥ श्रीमुख नदीघर सुखें, पोहोतो धारी प्रीत ॥ कदे
नदीने किम नवि, मुज घर थावो मित्त ॥ २॥ नदी कदे नालु तिणे, गा
मडीया जे गमार ॥ तेहनी वीक धरी तथा, विगत विवेक विचार ॥३॥

ԱԾ जयानंद केवलीनो रास. चो ॥ नाश्यं चाल्यो दवे नाची हो लाल ॥ध० ॥ २० ॥ श्रागल म ने त्र ते जाचे, कहे श्रीजयानद एम वाचे ॥ गामडीयाने वयणें ईमाचे हो साल ॥ध ॥१॥ बीजे खमें थग्यारमी ढाल, कही पनविजय सुरसाल, धर्मथी दोय मगलमाल हो लाल ॥ध० ॥ २२ ॥ सर्व गाथा ॥३३शा ॥ दोहा॥ ॥ गामडीया ने गमार ए, धर्म न सहे थधर्म ॥ कूड साखी केवल कह्या, मूरख न लहे मर्म ॥ १ ॥ जूतु बोले ए जडा, श्यो एदनो विश्वास ॥ गाम डियानो मत गणे, कोई विश्वास चकास ॥ २ ॥ इस काग दृष्टांत हे, सोनल जे तुं सीह ॥ श्रीजय कहे ते सांनलो, वद गनीर थवीह ॥३॥ ॥ ढाल बारमी॥ रसीयानी देशी ॥ ॥धन्य पुरे एक इह मोहोटो थठे, तिहां बहु मत्स्यनी नाति।मुबंधव।। मीन खेवा एक काग पडयो तिहा, मीन तो जतमाहे जात ।मु० ॥१॥ गाम डीयानो विश्वास न कीजीयें ॥ए आंकणी ॥ कागनी पौरखो जलनीनी थई, न तराये न वमाय ॥ ॥ नलमाहे हवे बुडशे कागडो, इण समे अधरज थाय ॥ सु० ॥ गा० ॥ २॥ हंसी हसने कहे सुणो स्वामीजी, कागडो बूडे ने एह ॥ सु॥ नीचें पेशी पूवें घरी तुमें, काढो करुणा रे नेह॥ ॥ गा॥॥ तेमज कम्यं तिरों काकने काढीयो, स्वस्थ थयो दवे काग ॥१॥प्रार्थना करी इसी युत हंसनें, तुमें उपगारी महानाग ॥ मु० ॥ गा० ॥ ४ ॥ एम कही पोताने वड सर गयो, वातो करी विवेक ॥8॥ चचुपटें फल लावी यापीयो, 'वावरे प्रीति विवेक ॥ सु० ॥ गा०॥५॥ईसी सहित दवे ई सलो उडवा, माझे जेटले ताम ॥ सु०॥ काफ कहे रे प्रियातुं जाय किहा, हंसी रोकी ते गम ॥ 5 ॥ गा० ॥ ६ ॥ दंत कहे माहारी ए नारी, ताहरी ए नहि नारी ॥९॥ तो मिश सरिखा महा श्याम , एतो शशीथ नुहार ।मु०॥ गा॥ ४॥ काक कहे तेदनो श्यो मेल , परकुलनी होये ना रसु०॥ नगिनी होय तो समरूपें होय, एक कूखें अवतार ॥ सु॥गा ॥ ॥७॥ जो नवि माने मुज ए वातही, तो ए गामना लोक ॥१०॥ 8 ए परस्यो तव सनु दासलो, मली मत्तीसगुयें रे थोक ॥१॥गा॥ एतेकदेशे तो मानशो के नहीं, दसे मानी ते वात ॥सु॥ पित्रादिकने सोप्यो हंसलो, काक ते मामें घायात ॥ सु० ॥गा ॥ १०॥ श्राप विवाद सुणाभो लोक में, नर .

५३ वितीय खंम. धर्म जयवत ला॥4॥१॥ म चिंती कहुं धुरथी साचु, थाप्यं घरे| कतारी जाचु ला ॥ 3 ॥ दरख धरी ते तस्कर माल्या. नूप ते वनर्मा बागल चाल्या ला० ॥ श्रा० ॥११॥ तापस थाश्रम पामीने वेसे, कुलप ति कहे किम थाश्रमें पेसे ला॥था ॥ कोण तुं किम इहां थायो नाई, तव नृप कहे सवि चित्त लगाइ ला ॥चि ॥१॥ कुलपति कहे मुण रा इस एक, इण वन वसतो नांही विवेक ला० ॥ ना ॥ तापस विण माण सनें मारे, तेणें तुं तापस वेशने धारे ला ॥ वे ॥१॥ एम कही तापस वेशने थापे, नृप पण निज श्रगें ते थापे ला ॥ १०॥ करी फल थाहा रने सरोवर यावे, न्हावाने जव सज ते थावे ला ॥ स॥१४॥ तव रा इस श्रावी कहे एम, निकु नवो तु श्राव्यो बे केम ला ॥ श्रा० ॥ माह री वात सोनल तु एक, नर नखी दिन एक राहु टेक ला ॥ रा० ॥ ॥१५॥ बत्रीश लक्षणो नखोयें राजा, एक वरस लगे रहीये ते ताजा ला० ॥ एदवो नृप नंदीपुर स्वामी, पण रहे नित्य नित्य परवस्यो धामी ला ॥ १०॥ १६ ॥ तेणे माहारो कोई दाव न फावे, पण एक वात सुणी श्णे रावें ला ॥ सु ॥ तुरग हरी घटवीमा लावे, एह वात खरी होय तो फावे ला० ॥ हो ॥ १७ ॥ जाणतो होय तो कहे मुज वात, सानली चिंतवे नूप विख्यात ला० ॥ साचु कलु तो ए मुज खाये, जूतु कहूँ तो व्रत मुन जाय ता ॥ ७० ॥ १७ ॥ थथवा प्राणने अरथें जूतु, बोलु तो लागे पाप थपूतु ला० ॥ पा० ॥ प्राणथी थधिको धर्म ए मोदो टो, नवि कहूँ जून न थाउ खोटो ॥ ता० ॥ था० ॥१५॥ मुज तनु दे बीजा उगारूं, लाल मोहोटो दोये थातम तारुं ला ॥ था ॥ दोशे दया एक वरस प्रमाण, निश्चय करो इम थाप विन्नाण ला ॥श्राम ॥ ॥ २० ॥ राय कहे हुँ तेहज राय,कर तु ताहरे जे मन नाय ला जे॥ ते कहे मुनि नवि मारु कहे साचु, खरो तापस के काय बे काचु लाम् ॥ ॥ का० ॥ ३१ ॥ नृप कहे मुनियें थाप्यो ने वेश,कोप कदे तुज नखिये विशेष ला० ॥न । इष्ट देव सनार तु रंग, नृप पण निज वोसिरावे श्र ग ता० ॥ वो ॥ २२॥ पंच परमेटिनु ध्यान ते ध्याय, राक्षस घोररूपें तिहां पाय ला ॥ रू०॥ अट्टाह हास्य स्थूल ते दत, खावा थाये नृप यदोन वत जा ॥थ ॥ २३ ॥ राक्षस थटवी राणा न देखे, निज .

. , ५२ जयानंद केवलीनो रास. झान बुद्धि गत ए जना, जोवु वदन न योग्य ॥ श्रीमुख कहे किम सत्प ए, फनि परीक्षा विण फोक ॥३॥ तेह परीक्षा तेहनी, करवा कारण वोय ।। इस काग थइ हरखरां, सघतु कीधु सोय ॥ ५ ॥ इस काफ वोट्या हता, सत्य तु जाण सुजाण ॥ न वदे थाणद नृप परें, जून जते पण प्राण ॥६॥ कहे सिह थाणद किश्यो, जेद न बोल्यो जून ॥ श्रीजय कहे तमें सनिलो, उत्तम एहथ ॥ ४ ॥ ॥ ढाल तेरमी ॥ लालननी देशी॥ यथवा पापथानक अगीयारमु कुहु ॥ ए देशी ॥ ॥ नदीपुर नगरें थात शोहे, यापद नरपति जनमन मोहे लालन, जनमन मोहे ॥ श्रीअरिहतना धर्मनो रागी, पापनीरु मोहोटो वडनागी ला० ॥ मो० ॥ १॥ बत्रीश लक्षण थंग बिराजे, थावे बद्ध नृप सेवना काजें ला ॥ से० ॥ कोडी मूलथी उलु न राखे, वानरण ते निन थगें सराखे ला ॥ १० ॥२॥ काढा करवा एकदिन थावे, पुर बाहिर आ जरणे सोहावे ला० ॥ था ॥ विविध गते तव वाजी खेलावे, तुरग तदा ही थाकाशे जावे ला० ॥ था० ॥ ३ ॥सावे थटवीमा नृप एकाकी, पुष्ट जाणी नृप सहन्यो ताकी ला० ॥ 3 ॥ नूमी पडयो दय अदृश्य हू अनमे एकाकी तिहां थचरिज जू ला॥थ ॥ ४॥ सघाडे शस्त्रे चोर ते चार, मलीया नवि खोनाणो जगार ला ॥ खो०॥ चोर कहे थ म नाग्य मलीयो, थलकार युत्त तुज घटकलीयो ला ॥ तु ॥५॥ चरित्र थमारु सानल राय, सूरिपुर नृप सेव कराय जायसे॥ त्रीपुगव काय अपराध कीनो,अमने देश निकाल ते वीनो जानि॥६॥ गुरु कन्दे धर्म सुणी थमें लीधु, नवि लेवु कोन थण दीधु ला ॥ को ॥ पण अमचो निर्वाह न थाय, नूपति विण बीजो पीडाय लाए ॥ बी॥७॥ लक्ष्मी उनी चोरी न करीयें, नित्य परिणाम न हीण्डा धरी ला ॥ही॥ तेणे नृपर्नु धन बहु थमें खेछु, तेदवु नहीं होय तो थमें जावाने दे ला ॥जा॥ना तु कोण ने बानरण श्यां मूलां, सत्य कहो थम वयण थमूला ला ॥ व०॥ व्यो थलकार ए नृप मन चिते, याजीविका करोख व्यतीतें ता। आशा पापर्नु मूल थनृत नवि बोलु, धन के विनाशी तेणें घि त न मोनुं ला० ॥ चि० ॥ धनथी मयुं सुख धर्मे अनत, सस्य समान न वितीय खम ५३ धर्म जयवत ला॥०॥१॥ श्म चिती कायुं धुरथी साचुं, थाप्यं घरेणं फतारी ला॥ ॥ दरख धरी ते तस्कर माल्या. नाचु ते वनमा नूप बागल चाल्या ला॥था ॥११॥ तापस थाश्रम पामीने बेसे, कुलप ति कहे किम श्राश्रमें पेसे ला॥ श्रा० ॥ कोण तु किम इहां थायो नाई, तव नृप कहे सवि चित्त लगा ला ॥चि ॥१॥ कुलपति कहे मुण रा इस एक, इण वन वसतो नाही विवेक ला ॥ ना ॥ तापस विण माण सने मारे, तेणें तुं तापस वेशने धारे ला० ॥ वे ॥१॥ एम कही तापस वेशने थापे, नृप पण निज अगें ते थापे ला ॥ य॥ करी फल थाहा रने सरोवर थावे, न्हावाने जव सज ते थावे ला॥ स ॥१४॥ तव रा इस यावी कदे एम, निदु नवो तु थाव्यो केम ला ॥ था० ॥ माद रीवात साजल तुं एक, नर नखी दिन एक राखंड टेक ला० ॥ राम् ॥ ॥१५॥ बत्रीश लक्षणो नखोयें राजा, एक वरस लगे रहीये ते ताजा ला० ॥ एदवो नृप नंदीपुर स्वामी, पण रहे नित्य नित्य परवस्यो धामी ला॥4॥ १६ ॥ तेणे मादारो कोई दाव न फावे, पण एक वात सुणी णे रावें ला ॥ सु ॥ तुरंग दी थटवीमा लावे, एह वात खरी होय तो फावे ला ॥ हो ॥ १७ ॥ जाणतो होय तो कहे मुज वात, सानली चिंतवे नूप विख्यात ला० ॥ साचु कटु तो ए मुज खाये, जूतु कहूँ तो व्रत मुज़ जाय ला ॥७० ॥ १७ ॥ अथवा प्राणने थरथें बोजु तो लागे पाप थपूतु ला० ॥ पा० ॥ प्राणयी थधिको धर्म ए मोहो टो, नवि कटुं जून न थाउ खोटो ॥ ला ॥ था ॥ १५ ॥ मुज तनु दे बीजा उगारूं, लान मोहोटो दोये थातम तारूं ला० ॥ श्रा० ॥ दोशे दया एक वरस प्रमाण, निश्चय करो इम थाप विना लाम् ॥था ॥ ॥ ५० ॥ राय कहे हुँ तेहज राय,फर तु ताहरे जे मन नाय ला ॥जे॥ ते कहे मुनि नवि मारु कहे साचु, खरो तापस के काय रे काचु ला० ॥ ॥ को० ॥ २१ ॥ नृप कहे मुनियें थाप्यो जे वेश,कोणप कहे तुज नखिये विशेप लाम् ॥ ॥इष्ट देव सनार तु रग, नृप पण निज वोसिरावे श्र गला ॥वो० ॥ २२ ॥ पंच परमेष्टिनु ध्यान ते ध्याय, राक्षस घोररू तिदां थाय सा॥ रू० ॥ थट्टा हास्य स्थूल ते दत, खावा थाये नृप थक्षोन वत सा० ।। अ० ॥ २२ ॥ राक्षस बटवी क्षणामा न देखे, निज . ५४ जयानंद केवलीनो रास. पुर बाहिर क्रीडातो पेखे ला० ॥ की० ॥ सैन्यने नूपण तेह तुरंग, तिम होज देखे पूरव रंग ला ॥ पू० ॥ २४ ॥ पुष्पवृष्टि याकाशथी पाय, इजाल के नवि समजाय ला ॥ गगर्ने देदीप्यमान देव दो दाते, एकक हे सुणो वात जगीशे ला० ॥ वा ॥ २५॥ वीजे खमें तेरमी ढाल, सां नलतां दोये मगलमाल लाम् ॥ म० ॥ श्रीजयानदना रासमा नारखी, प प्रविजय कहे चरित्र के साखी ला० ॥ १० ॥ २६ ॥ सर्व गाथा ॥२५॥ ॥ दोहा॥ ॥ण हिज उद्याने थतु, नदी यद ऽण नाम ॥ मित्र श्रीयदे मुझने, तेहयो दु गयो ताम ॥१॥ कूट साखी परीक्षा करी, गामडियानी गमार ॥ मुजने कहे दवे मित्र ते, कहो तुम नयर प्रकार ॥ २ ॥ में कपु उत्तम माहरा, नयरमां नृप नर नारि ॥ सत्यवादी शुन लक्षणा, श्रीमुख कहे श्री कार ॥३॥ किम मानु साचु करी, इम सदेह धपार ॥धावी परीक्षा थ में करी, सत्यवादी शिरदार ॥४॥ धन्य तु दृढव्रतनो धणी, नवि चूक्यो निज नेम ॥ पामीश श्द नव परनवें, ठित सपद एम ।। ५॥ श्रामयदर मणि थापीयो, खड्ग शत्रुजय खात ॥ थापीनें थदृश थया, सनिली प्रजा प्र शांत ॥६॥ नूपतणी स्तवना नणे, प्रनालोक पुस्यवत ॥ मणिधी रोग ग मावतो, खड्गें विजय खांत ॥ ॥ सम्यक्त्वादिक व्रत सवि, पाली पर ण प्रीति ॥ सात क्षेत्रे धन साचवी, सुरवर थया सुरीति ॥७॥ ॥ ढाल चौदमी ॥ढीयानी देशी ॥ ॥ कहे श्रीजय सुण सिह,वात कई निरबीहाउत्तम नर लही ए, बीयें ति दां सदी ए॥१॥ ते कशे ते साच, करj प्रमाण तस वाच ॥ सिह थं गी करे ए, थागल संचरे ए॥ ॥ श्रीविशालपुर नाम, पोदोता कमें ति प नाम ॥ तास न्यानमा ए, देखता शानमा ए॥२॥ विद्याविलास धनिया न, कलाचारज शुनवान ॥ धनुर्वेदादिका ए, बद्भुत कला जिका ए॥॥ नृप पुत्रादिक जेह, पांचशे वात्रने तेद ॥ शीखवे शुन परें ए, गया तस परिसरें ए॥५॥सिदा श्रीजयानद,नमी तस पद धरावंद ॥ प्रथापनी ए, वा त शुन पापनी ए॥६॥ कहे कलाघारज वात, शास्त्र लोक यवदात ॥ नते धर्मथी ए, थान अधर्मथी ए॥ ४ ॥ सानली श्रीजयानद, पाम्या प रमानद ॥ कुमलाणो वली ए, सिह ते मन वली ए ॥ ७ ॥ कलाधारयनी वितीय खंभ. ए पास, करवा कला धन्यास ॥ जणवा तिहां रह्या ए, वित्तमा गहगह्या ए ॥ ए ॥ कलाचारज वश कीध, बात्रोगानन दरी लीध ॥ विनयादिक करी ए, श्रीजय चित्त धरी ए॥१०॥थल्प दिने नस्यो तेह, सकल कला गुण गे ह॥ श्रनुक्रमें श्राण दीए, कलाचारयनीसदी ए ॥११॥ बात्र जणावे ताम, एम सदु मन थनिराम ॥ सहुनें वजन घणे ए, लागे शोदाम णो ए ॥ १२ ॥ स्पाय सिह, ते पण रातने दीह ॥ बहुदिने थल्प लह्यो ए, नाग्य प्रमाण कह्यो ए ॥ १३॥ नाम विशाल जयराय, पटप ट मासें थाय ॥ परीक्षा सह तणी ए, करतो नूधणी ए॥१३॥ एक दि न थाव्यो तेह, पुत्रादिकनें स्नेह ॥ सद्धनें परखतो ए, नयरों निरखतो ए ॥ १५ ॥ ताड शिरें ठव्यु एक, मोरपिष्ठ अति नेक ॥ वींधे धनुरा ए, तेह कुमरवरा ए ॥ १६ ॥ कह्यो तंतु न दाय, पाठक मन कलपाय ।। थाण श्रीजयनगी ए,करता ते गुणी ए ॥ १७ ॥ वतु बताव्यो जेह, वीं ध्यो श्रीजयें तेद ॥ दरख्या तव सद् ए, देखी कला वट्ठ ए ॥ १७ ॥ यंत्र मुक्तादिक वात, चरित्र मोहे घणी जात ॥ ते तिहाथी लदो ए, हो स प कहो ए ॥ १५ ॥ वीजे खमें ढाल, चौदमी थति सुरसात ॥ पश्यवि जय कही ए, नविजनें सहाही ए ॥ २० ॥ सर्वगाथा ॥ १५ ॥ ॥ दोदा ॥ ॥ कमलपत्र तिहां मामीनें गुरु बतावे जेह ॥ श्रीजय लेवे ते तंतु,खहें न बीजं रेद ॥ १ ॥ वली मूके कर धकनें, बेदे जे सद् ताल, गिरिशिर दूर शि जा रही, चुरे ते ततकाल ॥ ५ ॥ श्रश्वयु६ करता था, सुनट हजारो तेण ॥ मदावोर्यथी जीतिया, श्रीजयें बढु शस्त्रेण ॥३॥ वली धारा गति थश्वनें, वट शाखा विलग्ग ॥ पवन वेग बिदुपगथकी, अश्वने उपाडयो सलग्ग ॥ ४ ॥ श्म गज युके पाडोया, थाधोरणादिक वीर ।। इत्यादिक व दु देखोनें, नूपें जास्यो धीर ॥ ५ ॥ ॥ ढाल पन्नरमी ॥ सादेजा हे॥ए देशी॥ ॥ सादेला दे, ते नूपादिक सर्व, विस्मित मुदित यया हवे हो लाल ॥ सा॥ शिर धूणावता तेद, सिह विना सहुए स्तवे हो लाल ॥ १ ॥ सा० ॥ वीर्य कला गुण देख, पूडे पाठकने नूपति हो लाल ॥सा०॥ ए कोण पुरुप रतन्न, पाठक कहे मुणो सांप्रति हो लाल ॥ २ ॥ सा० ॥ प ५४ जयानंद केवलीनो रास. पुर बाहिर कीहातो पेखे ला॥की० ॥ सैन्यने नूपण तेह तुरंग, तिम दोन देखे पूरव रंग ला० ॥ पू० ॥ २४ ॥ पुप्पष्टि थाकाशथी चाय,६ इजाल के नवि समजाय ला ॥ गगर्ने देदीप्यमान देव दो दीसे, एकक हे सुणो वात जगीशे ला० ॥ वा० ॥ २५ ॥ बीजे खमें तेरमी ढाल, सा जलता दोये मगलमाल ला० ॥म० ॥ श्रीजयानदना रासमा नारखी, प अविजय कहे चरित्र वे सारखी ला० ॥ १० ॥ २६ ॥ सर्व गाथा ॥३ए। ॥ दोहा॥ ॥णहिज उद्याने धनु, नदी यद ऽण नाम ॥ मित्र श्रीय मुख्ने, तेहयो दु गयो ताम ॥१॥ कूट साखी परीक्षा करी, गामडियानी गमार ॥ मुजने कहे दवे मित्र ते, कहो तुम नयर प्रकार ॥ २ ॥ में कपु उत्तम मादरा, नयरमां नृप नर नारि ॥ सत्यवादी शुन लक्षणा, श्रीमुख कहे श्री कार ॥३॥ किम मानु साचु करी, इम सदेह थपार ॥थावी परीक्षा य में करी, सत्यवादी शिरदार ॥॥ धन्य तुं दृढव्रतनो धणी, नवि चूक्यो निज नेम ॥ पामीश इह नव परनवें, इठित सपद एम ॥ ५॥थामयदर मणि थापीयो, खड्ग शत्रुनय खात ॥ थापीने थदृश थया, सांगली प्रजा प्र शांत ॥६॥ नूपतणी स्तवना नणे, प्रनालोक पुस्यवत ॥ मणिथी रोग ग मावतो, खड्गें ट्जिय खांत ॥ ७॥ सम्यक्त्वादिक व्रत सवि, पाली पूर ण प्रीति ॥ सात क्षेत्रे धन साचवी, सुरवर थया सुरीति ॥ ७॥ ॥ ढाल चौदमी ॥ अढीयानी देशी॥ ॥ कहे श्रीजय सुण सिह,वात फगु निरबीहाउत्तम नर लही ए, बीयें ति हां सदी ए॥ १ ॥ ते कहेशे ते साच, करचं प्रमाण तस वाच॥ सिदार्थ गीकरे ए, श्रागल सघरे ए॥ २॥ श्रीविशालपुर नाम, पोहोता कमें ति प नाम ॥ तास उद्यानमा ए, देखता शानमा ए॥॥ विद्याविलास थनिधा न कलाचारन शुनवान ।। धनुर्वेदादिका ए, बद्भुत कला जिका ए॥॥ नृप पुत्रादिक जेद, पांचशे बात्रने तेद ॥ शीखवे उन परें ए, गया तस परिसरें ए॥ ५॥ सिदई श्रीजयानद,नमी तस पद धरावंद ॥ पूछे थापनी ए, वा त शुन पापनी ए॥ ॥ कहे फलाचारज वात, शास्त्र लोक यवदात ॥ न ते धर्मथी ए, यशुन थधर्मथी ए॥ ७॥सांनली श्रीजयानद, पाम्या प रमानद ॥ कुमलाणो वली ए, सिद ते मन वली ए॥ ॥ कलाघारयनी , क्षितीय खंमः पास, करवा कला थन्यास ॥ जणवा तिहां रह्या ए, चित्तमां गहगह्या ए ॥ए॥ कलाचारज वश कीप, बात्रोगानन हरी लीध ॥ विनयादिक करी ए, श्रीजय चित्त धरी ए॥१०॥थल्प दिने जस्यो तेह, सकल कला गुण गे द। अनुक्रमें थाण हीए, कलाचारयनी सही ए ॥११॥ बात्र नणावे ताम, एम सदु मन थनिराम ॥ सहुनें वनन घणे ए, लागे शोदाम णे ए॥ १२ ॥ स्पीयें नऐ सिह, ते पण रातनें दीद ॥ बहुदिने थल्प लह्यो ए, नाग्य प्रमाण कह्यो ए॥ १३ ॥ नाम विशाल जयराय, षट ष ट मासें थाय ॥ परीक्षा सद्ध तणी ए, करतो नूधणी ए॥ १३ ॥ एक दि न थाव्यो तेह, पुत्रादिकनें स्नेह ॥ सदुनें परखतो ए, नयरों निरखतो ए ॥ १५॥ ताड शिरें ठव्युं एक, मोरपिठ थति बेक ॥ वींधे धनुरा ए, तेद कुमरवरा ए ॥ १६ ॥ कह्यो तंतु न दाय, पाक मन कलपाय ।। थाण श्रीजयनपी ए,करता ते गुणी ए ॥ १७ ॥ तंतु बताव्यो जेद, वीं ध्यो श्रीजये तेह ॥ दरख्या तव सद् ए, देखी कला बनु ए॥ १७॥ यत्र मुक्ताविक वात, चरित्र माहे घणी जात ॥ ते तिहाथी लदो ए, श्हा स क्षेप कहो ए ॥ १५ ॥ बीजे खमें ढाल, चौदमी थति सुरसाल ॥ पद्मवि जय कही ए, नविजनें सहही ए ॥ २० ॥ सर्वगाथा ॥ १५ ॥ ॥दोहा॥ ॥ कमलपत्र तिहां मामीनें गुरु बतावे जेह ॥ श्रीजय छेवे ते तंतु,खड़े न बीच रेद ॥ १ ॥ वलो मूके कर चनें, डेवे जे सह ताल, गिरिशिर शि ला रदी, चुरे ते ततकाल ॥ २॥ यश्वयुम करता थकां, सुनट हजारो तेण ॥ मदावोर्यथी जीतिया, श्रीजये बदु शस्त्रेण ॥३॥ वली धारा गति अश्वनें, वट शाखा विलग्ग ॥ पवन वेग बिहुपगथकी, अश्वने उपाडपो सलग्ग ॥ ४ ॥ श्म गज युद्धे पाडीया, थाधोरणादिक वीर ॥ इत्यादिक व दु देखोनें, नूपें जाल्यो धीर ॥ ५॥ ॥ दाल पन्नरमी ॥ साहेला दे॥ ए देशी ॥ ॥ सादेला हे, ते नूपादिक सर्व, विस्मित मुदित यया हवे हो लाल । सा० ॥ शिर धूणावता तेह, सिह विना सद् ए स्तवे दो लाल ॥१॥ सा० ॥ वीर्य कला गुण देख, पूठे पाकनें नूपति दो साल ॥सा॥ ए कोण पुरुप रतन्न, पाठक कहे मुणो सांप्रति दो साल ॥ २ ॥ सा० ॥ प . . ५६ जयानंद केवलीनो रास. रदेशी कोई एह, बांधव सहित कला जणे दो साल ॥ सा०॥ क्षत्री पुं गव शुभ, नवि जाणुं रहे किहां कणे दो साल ॥ ३ ॥सा॥ चितवे नरप ति ताम, राज्य योग्य निश्चय करे हो लाल ।। सा॥ एने राजकुमार, ल क्षण सवि तेहनां धरे हो लाल ॥ ४॥ सा ॥ थादर करिय थपार, पूनी पाठक पर परें हो लाल ।। सा॥ गत्र नणावण थाण, देई नृप गया म दिरे हो लाल ॥ ५॥ सा ॥ श्रीजयानद कुमार, गीत नाटयादिक बढ़ जणे हो लाल ॥ सा ॥ कला बहोतेर विशेष, पामी पसाय गुरुतणे दो साल ॥ ६ ॥ सा० ॥ नात्र नावे नित्य, गुरुनें वीतामो करे दो ला ल ॥ सा० ॥ एकदा परीक्षा निमित्त, रायनो ढंढेरो फिरे हो लाल ।। ४॥ ॥ सा ॥ तेहनें इहित देश, श्रापु जे तोले करो हो लाल ॥ सा ॥ श्री जय तो ताम, गजने नावामां धरी हो लाल ॥ ७॥ सा ॥ जलमा मूके तेह, बूडे तिहां रेखा करे हो लाल ॥ सा ॥ गज उतारी तेह, ना वामां पर नरे हो लाल ॥ सा ॥ ए ॥ रेखा लगें जल याय, तव पत्र र तोले सवे दो लाल ॥ सा० ॥ तेहना नार प्रमाण, दायीनु पण सनवे दो लाल ॥ १० ॥ सा० ॥ नूपति विस्मय पामि, थादरथी घर लावियो हो लाल ॥ सा० ॥ स्नान नोजन शुन रीत, वन गौरव करे नावियो हो लाल ॥ ११ ॥ सा० ॥ सर्व कलामा प्रवीण, गुणवतो पंमित लदी दो लाल ॥ सा ॥ रूप कला गुरों तास, निजपुत्री अनुरूप सही हो ला त ॥ १२ ॥ सा० ॥ था तो पण राय, पुत्री मणिमजरी तणो दो लाल ॥ सा ॥ कोधो हुन विवाह, नृप वायजो थापे घणो दो लाल ॥ ॥ १३ ॥ सा० ॥दय गय रथने पत्ति, देश एक श्रापे वली हो जाल । ॥ सा० ॥ घर उपकरण समेत, मोहोल एक दीये मनरुली दो लास ॥ ॥ १४ ॥ सा० ॥ मणिमजरी नोग, दिन दिन जोगवे भनिनवा दो ला ल ॥ सा० ॥ जीती नूप अनेक, सोंपे नृपने नवनवा हो लाल ॥ १५ ॥ ॥ सा ॥ पामे प्रतिष्ठा सार, दवे एक नृप यूररायनें हो लाल ॥ सा ॥ जीतवा जाता निषेध, करी कहे जीतुं दु जायनें हो लाल ॥ १६॥सा ॥ सेना लेइ गयो तेह, साहमो श्राव्यो नूपति दो साल ॥ सा ॥ युथ { दोय सैन्य, नाग्यो कुमर सेनापति हो लाल ॥१॥ सा ॥ सतया कु मर नरिंद, पुम कम्युं तिहां तेणिपरें हो लाज ॥ सा० ॥ वैरी सेना ना, खा , वितीय खंम ए पूर उपयो तव ततपरें दो लाल ॥ १७ ॥ सा ॥ वाणे बेतु करे यु८, गन दिशो सघली नरी हो लाल ॥ सा ॥ अनुक्रमें सात धनुष, बेदे कु नार शरें करी हो लाल ॥ १५ ॥ सा ॥ नांग्यो रथ वली वर्म, ले इने धावियो हो लाल ॥ सा ॥ कुमरें खड़ें खड़, खम करीने वधावियो हो लाल ॥ २० ॥ सा ॥ मोघरे मोघर लोगी, गदायें गदा चूरण करे हो लाल । सा० ॥ शस्त्र रहित भयो तेह, वाहु युद्ध मननी परें दो लाल ॥ २१ ॥ सा ॥ बढ़ वेला करी युक, शूरनें हृदया ताडियो दो लाल ॥ सा'॥ मूी लदी पडयो नूमि, यश अवर लगें चाडियो हो लाल ॥ २२ ॥ सा ॥ निगडवध करी तास, जीवन बाटी सङ कसो हो लाल॥ सा० ॥ सैन्यने अनय ते दीध, जश् नृपनें पागल धस्यो हो लाल ॥ १३ ॥ सा ॥ कुमर वयरों करी तास, मूक्यो दम लेइ यदा दो लाल ॥ सा ॥ दयावत एम जाणी, मूके शत्रु नभ्यो तदा हो लाल ॥ २४ ॥ सा० ॥ बालें जीत्यो मुक्त, एद वैराग्य धरी मनें दो लाल ॥ सा ॥ पुत्रने थापी राज्य, दीक्षा लीधी गुरु कनें दो लाल ॥२५॥ सा ॥ पाली निरतिचार, केवल सही शिवपद वस्यो हो लाल ॥ सा० ॥ धन्य एहनो थवतार, एए। परें थतर रण कस्यो दो लाल ॥ २६ ॥ सा० ॥ बोजे खमें ढाल, पन्नरमी ए सोदामणी दो लाल ॥ सा ॥ पनविजय कहे एम, धर्म ते जिम चिता मणि हो लाल ॥ २४ ॥ सर्व गाथा ॥ ४५१ ॥ ॥ दोहा॥ ॥नाग्यवत नोगी जला, राज्य वृद्धि करनार ॥ नगर लोक नरपति न णी, वर्ष पमाडण दार ॥१॥ सुखमां काल श्रीजयतणो, जाय नित्य जय कार ॥ खेवाये खर नानु, सिद जिम घूक शिरदार ॥ २ ॥ जखमी था पे नविलीये, ईर्ष्याने थनिमान ॥ यवलु चिते थमी, नावे शान निदा न ॥ ३ ॥ यत ॥खल विद्यतएवान्य, इदिनि सस्कृतोप्यलम् ॥ पश्यन साम्यप्रियं शुष्येत्, सिकोऽपि दि च वासक ॥ १ ॥ दोहा ॥ देशांतरें 5 ख दाखवा, सई जाउ दुलाहार ॥ एम चितीने एम कहे, वात सुणो सुविचार ॥ ॥ निजनयरीथी नीकल्या, देश दर्शननें दूर ॥ मनवठित मनमा रत्यु, पाम्या न कोतुक पूर ॥ ५ ॥थासन्न रहेता थापणे, जाणे मावित्र जाम ।।

जयानंद केवलीनो रास. मावित्र माणस मोकजी, तेढावी लिये ताम ॥ ६ ॥ सुख गिरिधर मुजस थ जो, नहीं थावो मनधार । एकाकी जागु श्रमें,तुज वियोग खत्यार। ।। ढाल शोलमी। एकवीशानी देशी।। ॥ मन चितवे रे, श्रीजयानद शिरोमणि ॥ मुज याशय रे, थाव्यो सई अघगणी ॥ केम एकलो रे, मूकु तेणें नावू खलं ॥ तस नाखे रे, यावा साथै तिम करु ॥ १ ॥ त्रुटक ।। तिम करु एम कही करे सामग्री,वास घ क्षार शाख ए॥ श्रीजयानद लग्वे श्लोकह, तेदमा एम नाख ए॥ यत । रत्वा जलाशयेप्वप्टौ, मासाचित्रेपु कौतुकान् ॥ वासु कुरुते हस , स्वप मानसे रति ॥ १॥ निननारीशु परिवार सदुने, वची खड्न सहाय ए। सिह सायें नीकन्यो ते, नगरथी निरमाय ए॥ २ ॥ पुरयाने रे, फरत इनायें करी ।। जोवे कौतुक रे, इण अवसर मणिमजरी ॥ प्रात समरे रे, चितवे मुन पत्ति किहां गया ॥ पूरे परिकर रे, ते पण सह विलख थया ॥ ३॥ त्रुटक ॥ तेणे पण नपर्ने जणव्यु, मूकी निल नर राय ए। माम नगर उद्यान प्रमुखें, बढु परें शोधाय ए॥खोलता नवि शोध लाधी शोकातुर नृप बढ्नु थयो । ए अवसर श्लोक देखी, मणिमजरी थाणव नयो॥४॥ कहे तातने रे, कौतुकें देश जोई करी, वर्षायें थावशे रे, जपति जाणजो इहां फरी ॥ तव धीरज रे, धरीने राय प्रमुख रह्या ॥ हवे दोय जण रे, चाल्या थागें मन गह गया ॥ ५॥ त्रुटक ॥ सिह एकदा ज यनें नांखे, थधर्मे लनु कष्ट ए ॥ तु सहेशे कष्ट एणि परें, तुतो धर्मे लष्ट ए । कहे श्रीजयानद तादरे, सगें पामु थापदा ॥ पापी सर्गे धर्मवत, सीवा ये जाये सपदा ॥६॥ यत ।। तेजोमयोऽपि पूज्योऽपि, पापिना नीच धातुना । श्रयसा सगतोवन्दि , सहते घनताहनम् ॥ १ ॥ ढाल ॥ कुसंगते रे, म हिमा मोहोटानो नवि रहे ॥ लसण सगें रे, गध कपूर सवे नहे ॥ तव पा पी रे, कोघे बोल्यो एणी परें ॥वाद थापणो रे, हजीव ननाम्यो कोइ नरें ॥ ॥ त्रुटक ॥ फलाचार्यनां वचन बहुविध, तेह नांदी प्रमाण ए॥ विना इव्ये जेद थाणे, श्रशनने वली पान ए॥ तेदनो मत खरो जाणे, पण तो चकुनु थडे । श्रीजयानदें मानी तव, दरख्यो सिह कहे प. ॥ ७ ॥ ॥ त्रुटक ।। शक्ति परीक्षण थान धागल, जाश दुपुर गाम ए॥ तुमें विलं वें थावजो नाई, पूढे नोजन काम ए ॥ जो न साफे काम मुनयो, तो तुमें धितीय खंम पए प. साधनो ॥ श्राज मुजयी काम सीजे, काल तो तमें वाधजो॥ ए ॥ ए म कहीने रे, बागल चाल्यो ते दवे ॥ चमसेन रे, शतकूटगिरिप्रनु एद वे ॥ नदिसाल रे, नगरें थवस्कध कारणे ॥ जाय में तिहां रे, सिह पडयो निन्न मारणें ॥ १० ॥त्रुटक ॥ बांध्यो सिहनें सोनवशथी, पनिपतिने दी ध ए॥ पापी नरकमा पडयो परमा, धामी जिम कीध ए ॥ कोलाहल सु णी श्रीजयानव, दया स्नेह घर करी ॥ शीघ्र थावी कहे जाशो, किदां बांध व मुज धरी ॥ ११ ॥ जुटघा श्रासेरण रे, पश्निपतियें तेहना ॥ युद्ध करवा रे, अग्रसेना नट जेहना ॥ बाण वरशी रे, हत प्रहत सद्भुनें कस्या ॥ च मसेनें रे, थावी सुनट धारय धस्या ॥ १२ ॥ शृंगनादें थया नेला, युद्ध करवानें सद्गु ॥ यु६ करता तेह साथे, मारतो निन्ननें बढु ॥ कालनी परें श्रीजय जास्यो, एद नवि जीताय ए॥ मरण जाणी पनिपति निज, कहे एम मुणो नाय ए ॥ १३ ॥ केम मारे रे, महारा सुनटनें एणी परें, तव ते कहे रे, बांध्यो जेहनें गुन परें ॥ तेदनो छ रे, लघु बांधव मूको ते ॥ नहीं मारु रे, जाउँ प. निर्नय पणे ॥ १४ ॥ त्रुटक ॥ चमसेन क हे नाई ताहरो, लेई मूक सग्राम ए॥थापणे थाजथी प्रीति जाणे, सान ली श्रीजय ताम ए । मूक्युं रण तेरों सिह थाप्यो, पल्मीशे प्रार्थना करी ।। वाण्या पालीमा वोय नाई, कार्य निज चित्तमां धरी ॥ १५ ॥ बिद्व जण करी रे, नोजन सुखमा तिहां कणे ॥ तस थायहें रे, रहिया तेहने वा क्षिणें ॥ श्रीजय कनें रे, शीखे धनुर्विद्या कजा ॥ पनिपति रे, गुण ग्राहक गुण धागला ॥ १५ ॥ त्रुटक ॥ बीजे खंमें शोलमा ए, ढाल कही शोहा मणी ॥ धर्मथी सघले सुरक पामे, धर्म जिम चितामणि ॥ पंमित उत्तम विजय केरो, शिष्य परविजय कहे ॥ जेद प्राणो धर्म उद्यम, करे ते सप व लदे ॥ १४ ॥ सर्व गाथा ॥ ४७५॥ ॥ वोदा ॥ ॥ मृगया चोरी धाडमा, साथें जाये सिह ॥ नीच कर्म नित्य नित्य क रे, बमणु ते निरबीद ॥१॥ सहस्र कूटमा एणे समे, महासेन महाराण॥ चम वैरी चमसेननो, पन्निपति लीये प्राण ॥२॥ एकदिन चमसेन एम, सिद सहित एम साम ॥ वयरों श्रीजयने वदे, करो धमारु काम ॥३॥ स्वार्थ सिनणी स्वामीनी, राख्या के रएकाज ॥ था सखायी स्थिर थइ, जयानंद केवलीनो रास. जाणीये थाप्यु राज ॥ ४ ॥ तास वचन ते ततहणे, मान्यं वचन प्रमाण ॥ उत्तमजन थगी करे, प्रार्थनाय दिये प्राण ॥५॥ सर्व सामग्री सामटो, करी श्राव्यो सहसकूट ॥ शृगशवें सघले तिहां, यात विशे स्फूट ॥ ६ ॥ महासेन निज मानवी, परवस्यो पालीन वादार ॥नीकनियो नट मानपी, क्रोधे जम अनुकार ॥ ४॥ वसन चित्रक करी व्याघ्रना, मृगपशुना महा मान ॥ विविध लता वीटी शिर, मोर पिष्ठ थसमान ॥॥ काहिल नाद को धथी, युद्ध करणने नोध ॥ विविध थायुक्षशु श्राविया, शत्रु करता शोध ॥९॥ ॥ ढाल सत्तरमी ॥ धवल ओठ लेई नेटणुं ॥ ए देशी ॥ ॥ सैन्य मन्यां दोय सामटा, गरिव गिरि गाजे रे ॥ कडथा वचन यदे घणा, वाजिब बहु तिहां वाजे रे ॥ सै० ॥ १ ॥ एक एक शत्रु घोलावता, खड्ग कृतें के मारे रे ॥ वाण ले केइ उधले, शत्रु के सहारे रे ॥ सै० ॥ ॥२॥रण करतां चमसेननु, नागुं सैन्य ते नासे रे ॥ कोलाहल सुणी था वियो, सहसार ते पासे रे ॥ सै॥ ३॥ धीरज देई तेहनें, वरसे बाण थर्खम रे ॥ नित्न नासे ते उपवें, जिम घने रेणु प्रचम रे ॥ सै० ॥४॥ माहासेन ते देखीने, यो निम जमराय रे ॥ वाण वरसे सिह उपरें, नि न ते नाता जाय रे ॥ सै० ॥ ५॥ सिंहनां वाण दे शरें, शत्रु शरण न कोय रे ॥ सिद्धनुष्य छेदी करी, सिह व्याकुल तिहां होय रे । सै० ॥ ६ ॥ बांधीने निज सैन्यमा, मोफले सुनटनें सगे रे ॥ चमसेन ते देखीने, सन्न पबह थ रंगें रे ॥ सै० ॥ ॥ महासेन बोलावियो, कोघे यश विकराल रे॥ बि? धीर स्पथिकी, लडे ज्युं उदर व्याल रे ॥ सै० ॥ ७॥ गाजे ग रिवें गिरिगुफा, घनपरें वरसे बाण रे ॥ घोर समाम कयो तेरों, वीर तणु घणु मान रे ॥ सै० ॥ ए॥ महासेन बलीयो दये, चमसेन धनु धर्म रे ॥ वाणे बेदी विव्हल करो, गयो तेदनो थति नर्म रे ॥ सै० ॥ १० ॥ सेनायें सेना त्रासवी, कुत तौर तरवार रे ॥ चमसेन बीच धनु, जीये श्र ति धीरन धार रे ॥ सै०॥ ११ ॥ वे महासेन तणु धनु, बाणे करीने का पे रे ॥ पापर्ने कापे जेम व्रती, विघन महामत्रने जा रे ॥ सै० ॥ १५ ॥ शिलाखम लेई हवे, चमसेन शिर दीधी रे॥ तेह पीहायें तेढ्नें, पापीयें मू कीधी रे ॥ सै० ॥ १३ ॥ चमसेननें बांधवा, थावे महासेन जेते रे ॥ थकस्मात श्रीनय तिहा, थावी बोलायो तेतें रे॥ सै०॥ १४ ॥ महासे रे '०॥ वितीय खंम. ६२ न पण अमरष धरी, चाप थास्फालें को रे ॥ श्रीजय साहामो धाईने, क हे क्रोध बाटो रे ॥ सै० ॥ १५ ॥ निरपराधी दणुं नहीं, निहलनी जाति विशेषे रे ॥ दत्री कुल दु उपन्यो, लागे कलंक सहु देखे रे ॥ सै० ॥१६॥ जाई माहारो तें बांधीयो, एटलो काल उवेख्यो रे॥ दवे दुमदारीश तुज ने, क्रोधे करीने विशेष्यो रे ॥ सै० ॥ १७ ॥ नहीं तो कय जे दु कडू, मू क माहारो तुनाई रे॥मेल करो चमसेनशे, राज्य लोगव तु सवाई रे ॥ ॥ सै० ॥ १७ ॥ मदासेन कहे मानीपणे, क्षत्रीपणुं दवे लेहेशं रे । म गछ हरिनें मेल श्यो, थागल सङ तुज कहेछ रे। सै० ॥ १५ ॥ हरिथी मृग मूकावशे, एडवो कोण जे धार रे॥ गुणयी वीर वखाणीये, नवि वय रों दोये वीर रे ॥ सै० ॥ २० ॥ स्पर्धायें करी बिलु जणा, महाजट मादा वत्साह ॥ महामानी महापराक्रमी, महायोध धरत उमाह रे ॥ रे। सै० ॥ २१ ॥ बाणयुद्धे ते योधता, पराकमथी पनोता रे ॥ बिहुँ दल पण सन्न थर, रण सग्राममा पोहोता रे ॥ सै० ॥ २॥ श्रीजय बाण समू दथी, सनुदिशे सुनट ते बेता रे ॥ कायर थइ निर्नयपणे, तेदने शरणें पे वा रे ॥ सै० ॥ २३ ॥ एदवो नट नवि को रह्यो, थकित जे नवि कीयो रे ॥ पण श्रीजयें किरपाथकी, यम नृप घर नवि कीधो रे ॥ सै० ॥ ५॥ बल नागु महासेननु, क्रोधे अधिक जराणो रे ॥ बाण निरंतर मूकतो, दे श्रीजय उजाणो रे ॥ सै० ॥ २५ ॥ बखतर धनुष बेदी करी, दे तस तरवार रे॥ शस्त्र रहित मुष्टियकी, श्रीजय हृदयमा मारे रे ॥ सै॥ ॥ २६ ॥ मूर्जी जदी धरणी ढल्यो, जिन पासें बधावी रे ॥ पाणी पाई सल करो, दिये चमसेनने लावी रे ॥ सै० ॥ २७ ॥ बोजे खमें ए कही, सत्तरमी वर ढाल रे ॥ पद्मविजय कहे धर्मथी, होवे मगलमाल रे ॥ ॥ सै० ॥ २७ ॥ सर्वगाथा ॥ ५१२ ॥ ॥ दोहा॥ ॥ श्रीजयानद तस सैन्यने,थाश्वासन बहु थापि ॥ सिंह तेडावी सजा करे, कपरां बधन कापि ॥ १॥ श्रीजग्नी सेवा करे, चातुर ते चमसेन ॥ स्तचना करे सारी पठे, दियडे दर्प नरेण ॥३॥ थदो नाग्य थमारहु, कुलदेवें करी महेर ।। पाम्या तुम सरिखा पुरुप, लेवा लीला लहेर ॥३॥ श्रीजय स्तवना शुन परें, करी पालि निज पाण ॥ कोश्क तिहा थापी क ॥

जयानंद केवलीनो रास. री, सिंह से सपराण ॥ ४ ॥ महासेन से मोजणं, पोहोता थापली पाल ॥ श्रीजयने स्वामी गणे, काढे एणी परें काल ॥ ५ ॥ ॥ ढाल अढारमी॥ चित्रोटा राणा रे ॥ए देशी॥ ॥ महासेन दम से रे, मुक्यो सुख सें२ ॥ श्रीजय न करेइ, कोप तस परें रे ॥ १ ॥ मन चिंते सिंह रे, धिग माहारा दीह रे । दोय वा र श्रवीद, मूकाव्यो जीवतो रे ॥ ५॥ अधिकू ख थायो रे, वधची मूका यो रे ॥ एह वातने वायो, श्रीजय एम वदे रे ॥ ३ ॥ खेद म करो नाई रे, वात ते चित्त लाई रे ॥ जीत हार कमाई, देशादिक लही रे ॥ ४ ॥ सिंद चूको फाल रे, वनमा कोइ काल रे ॥ तोहि महा व्यालने, मारे ते खरो रे ॥ ५ ॥ एम श्रीजय बोल्या रे, पण सिह न मोल्या रे ॥ जस रो ग असाध्य खुल्या, श्रौपध कीगु रे ॥ ६ ॥ श्रीजय ठपगारी रे, काम अ भुतकारी रे ॥ पण उत्सुकता धारी, श्रीजय नही कदा रे॥ ७॥ दोय वा र दियां प्राण रे, पण खल थप्रमाण रे ॥ देवा 5 खगण, विचारे सिंह तदा रे ॥ ७ ॥ जावा परदेश रे, मन कीधु विशेप रे॥ कोण म्लेष्ठ देशमां, रहे एम जाणतो रे ॥ ए॥ श्रीजय के दिन रे, रह्या लही दाखिन्न रे॥ गुण थाकीर्ण, ते करे उपगारने रे ॥ १० ॥ कोई काल व्यतीत रे, रोग प्रतीतें रे ॥ परलोक गतें गयो, पलिपति दवे रे ॥ ११ ॥ तस पुत्र न कोई रे, पालिनो धणी दोइ रे ॥ पराक्रम जोश, श्रीजयनें कहे रे ॥ ॥ १३॥ निम्न मलीने ताम रे, कहे या श्रम स्वाम रे ॥ कुराज्यनो गम, देखीने नवि ग्रहे रे ॥ १२ ॥छे सिह सार रे, श्रन्य नाही तेवा र रे ॥ निलराय उदार ते, थाप्यो सिहने रे ॥ १४ ॥ करे कर्म ते क्रूर रे, गर्व धरतो प्रचूर रे ॥ धरे नूरि प्रमोदनें, पाले पालिने रे ॥ १५ ॥ देशांतर , दुश्हा नवि ग रे ॥ श्रीजयें प्रकाश्युं, तव सिह चिंतये रे ॥ ॥ १६ ॥ मावित्र जो जाणे रे, एहने तेडी परारों रे ॥ थापशे कोइ टा णे, एहनें राज्यने रे ॥ १७ ॥ एम चितवी तेह रे, माया धरी नेह रे॥ तुज विरह न रेद, खमी शकू द् कदा रे ॥ १७ ॥ तव श्रीजय गया रे, एकदिन सिंह राया रे ॥ कहे गर्व नराया, श्रीजयानदने रे ॥ १५ ॥ ह धधर्मकारी रे, पाम्यो राज्य विचारी रे ॥ नूठ चित्तमा धारी, तव श्रीजय कहे रे ॥ २० ॥ पामी खलखम रे, रंक गर्व प्रथम रे ॥ केम मा . जारों रे, वितीय खंम. ६३ न नईम, धरे लगारिक रे ॥ १ ॥ नपनो थति काप रे, पण दीधो गोप २ ॥ पाटोप करे केम, बलीया श्रागलें रे॥ २ ॥ पण मूषक लेवा रे, करे गात्र सखेवा रे ॥ तुपरें देवा रे, सिहना जाजो रे ॥ २३ ॥ हसी प्रेम देखाडे रे, बहु रोज पमाडे रे ॥ बहु दिवस गमाडे रे, एकदिन सि ह कहे रे ॥ २४ ॥ सानलो तुमें भ्रात रे, गिरिकूट नग ख्यात रे ॥ तेह गण रहात, गिरिमालिनी सुरी रे ॥ २५ ॥ एक गाव थाय रे, पश्निपत्ति यें पूजाय रे ॥ कालि चन्दश थाय, श्राज तेणे सांजलो रे ॥ २६ ॥ म त्र जपतां थाय रे, मांहे बद्थतराय रे ।। जो उत्तर साधक थाय,तो का रज नीपजे रे ॥ २७ ॥ मान्युं श्रीजयानदें रे, लेश खड्ड श्राप रे ॥ पूजा सपकरण हदें, सिह ते चालीयो रे ॥ २७ ॥ देवीने धाम रे, श्रीजय थ निराम रे ॥ उपगारने काम, गयो साथै तिहां रे ॥ २ ॥ वीजे खमें थ ढार रे, ढाल थइ सुप्रकार रे ॥ सिहसारनु चरित्र, सुणो हवे जे होये रे ॥ ३० ॥ सर्वगाथा ॥ ५ ॥ ।। दोहा ॥ ॥ पूजी देवी पाधरी, जपतो कपटें जाप ॥ तेदनी बागल ते रही, उष्ट चलावे श्राप ॥ १ ॥ श्रीजय खड्ग सबाहीने, सात्त्विकमा शिरदार ॥ देवा लयनें विद्वं दिशे, करतो तिहां दुकार ॥ २ ॥ त्रास पमाडे नूतनें, प्रेत ते सगु पलाय ।। उत्तर साधक थाफणी, थयो तास थिर थाय ॥३॥ मत्र थयो सिह माहरे, तुम प्रनाव ततकाल ॥ दद पणे दोय पोहोरमा, सिह कहे संजाल ॥ ४ ॥ मत्रजागरिका माहरे, करवी ने तेरो काम ।। सूर्व प्रांत थया तुमें, रक्षक दु थाराम ॥ ५ ॥ ॥ ढाल गणीशमी, नोलीहा हसा रे, विषय न राचीयें।ए देशी॥ ॥ थाशय तेहनो रे थजाणे थके, सूता श्रीजयानद ॥ निशा था वी रे बगु थाकें करी, अवसर लही ते नरीद ॥ १ ॥ पापी उर्जन एणी परें जाणोयें, न गणे काय भपकार ।। सजाननें 5 खदायी कलटो, तेहथी श्वा न श्रीकार ॥ पा० ॥ २ ॥ कन्यो उल सही शस्त्रीय करी, काढयां नेत्र वि शाल ॥ कहे मुज पक्ष अधर्मनें उखवे, तिम मुज राज्य रसाल ॥ पा० ॥ ॥३॥ हाम्रो नेत्र न श्रापे मुजनें, बलथी सीधी में उट ॥ धर्मना फल नो गव हवे थोधला, मरण तणु लहे कष्ट ॥ पा० ॥ ४ ॥ एम कहीने रे था ६४ जयानंद केवलीनो रास. व्यो पालिमा, उर्गतिनु रे प्रस्थान ॥ साधुन नेत्र गयो जे नारवायां. मत्री नवे ते निदान ॥ पा०॥ ५ ॥ श्रद्धाने जे कर्म उपारज्यु, काधे करीने थपा र ॥निदा गर्दा श्रालोचनादिकथकी, क्य कीधु तेणी वार ॥ पा० ॥ ६ ॥ शेप रघु ते रे लोगवतु पड्यु, दवे बहु वेदना थाय । गारवेदी पण मुज में धिक पडो, खल विश्वास कराय ॥पा० ॥ ४ ॥ यत ॥नी नोजन मात्रेय, कपिल प्राणिनां दया॥ वृहस्पतिर विश्वास, पांचाल त्रीपु मार्दव ॥१॥ ढाल ॥ जीवतो राख्यो रे तो पण एम थयो,ते मुज कर्म प्रमाण ॥ कर्म कयां ते रे लोगवे प्राणीयो, निश्चय एह विन्नाण ॥ पा० ॥ ॥ क्षेत्र कालादिक सामयी मले, पाके शुनागुन कर्म ॥ ते सहेता नही हाणी ठे तादरे, क्रोध ते करवोश्रधर्म ॥ पा०॥ ए॥ यत ॥ पुनरपि सहनीयो, उख पाकास्त्वयैव, न खलु नवति नाश कर्मणां सचितानां ॥ इति सह गणयि खा यद्यदा याति सम्यक्, सदसदितिविवेको ऽन्यत्र नूय कुतस्ते॥१॥ ढाल ॥ थापद पामे रे धीरय धारवु, सहननो ए वनाव ॥ वृक्ष कपे पण पर्वत नवि चले, वायुए ए निजनाव ॥पा० ॥ १०॥ कर्मनो क्ष्य दोय ध्यान बलें करी, तेणेंकररी ध्यावु रे तेह ॥ समकित निश्चल सुखदायक थापद अग्निये मेह ॥ पा० ॥ ११ ॥ एम विचारी रे कास्सग्ग धारतो, ध्यातो परमेष्ठि मत ॥ शत्रु मित्र समोवड प्रेवडे, मन एकाम करत ॥पा॥१२॥ समकेत ध्यानबले गिरिमालिनी, कपित श्रासन श्रा य। कहे सुज सुपुरुष केरी श्रापदा, दरवा थावी रे जाय ॥ पा० ॥१३॥ कहे एक पशुये रे पूजा मादरी, कर तुं नयननें काम ॥ कायस्सग्ग पूरी क र पारी हवे, देवीनें कहे श्राम ॥ पा॥१४॥श्रारखने प्राण जा सवि मूलगा, न दणु प्राणीनां प्राण ॥ बलिने नोज्य प्रणाम वली नाचती, दे वी तेह अजाण ॥ पा० ॥ १५॥ समकेत मलिन थवाने कारण, तुं मि च्याविणी जेण ॥न करु तुजने रे कोपी ते तदा, बोली क्रोध नरेण ॥ पा०॥ १६॥ न करे मुजनें प्रणाम पण उरमति, तो तस फल तु रे दे ख ॥ एम कही सर्वर वायु विकूर्वती, रज करे मुविशेप ॥ पा० ॥ १७ ॥ पर्वत शिक्षा रे पडता शब्दथी, बीये देवना वृंद ॥ उपाडीने थाकारों नमा डीयो, पीडा थतिदी श्रमद ॥ पा ॥ १७ ॥ पण न खोनायो रे श्रीजय धर्मथी, पडता जडफे रे तेह ॥ कदे तु तूठी रे तुज सवें करी, तुं गुण ग वितीय खंम. ए मणि गेद ॥ पा० ॥ १५॥ औषधि ले तु सज़ कर नयननें, लेध सी जलमांदे ॥ रेडी थाखमा रे, सल्क थयां नयन ते, धरतो थग उ बाद ॥ पा० ॥ २० ॥ श्रौषधिने मणि मंत्र प्रनाव जे, वयरों नविक देवाय ॥ दिव्य नेत्र थई देवी देखतो, थाणद श्रग न माय ॥ पा० ॥२१॥ देवी कहे ते रे समकित कारणें, क्वेश सह्यो रे अपार ॥ तास स्वरूप कहो मुज साहेबा, तव ते श्रीजयकुमार ॥ पा० ॥ २२॥ देवादिकनु स्वरूप सुविस्तरें, आवकधर्म विस्तार ॥ सौनली पूरवनव सस्कारथी, जाणे थ वर्षे विचार || पा० ॥ २३ ॥ जंगणीशमी ए रे बीजा खममा, नांखी थ नुपम ढाल ॥ पद्मविजय कहे धर्म करो सवे, धर्मथी मगलमाल ॥पा ॥२॥ सर्वगाथा॥ ५४६॥ ॥ दोहा ॥ ॥ मत बंघो तुमें मानवी,सांनलतां श्रीकार ॥ श्रीजयानवजी सारिखा, धनरथ लह्या अपार ॥१॥ समकेत पामी ते सुरी, प्रवनव परवंध ॥ श्रीजयनें कदे सनिलो, धन्य वर्शने थइ अध ॥ २ ॥ समकित धारी प्रावि का, व्रत धारी गुणवत ॥ पुत्र महारो मावो पध्यो, तास उपायने तंत ॥३॥ पूल हूँ लिंगी प्रतें, प्रतिक्रिया परकार ॥ परिव्राजक एक पाधरो, श्राव्यो मुज श्रागार ॥ ४॥ नूत दोष मुज नांखीने, मत्र चूर्णादिक मेलि ॥ साजो कीधो सुत प्रतें, निका देठ मन नेति ॥ ५ ॥ क्षेवा निदा लाज चें, थावी थाखे धर्म ॥ शौच मूलने सांजली, मुज मन पाम्यो नर्म ॥६॥ शौच धर्म साचो दो, अथवा मलमय एह ॥ एम शकादिक थति चरी,समकितमां सदेह ॥७॥ काल बगु एम काढीयो,श्रालोयु नही थाल॥ गिरशिर गिरिमालिनी, देवी थई दयाल ॥ ॥ मिथ्या दृष्टि शिरोमणि, करु कर्म थतिकूर ।। तुज वयणे मुज तम गयु, समकित कम्यो सर॥ ए ॥ ॥ ढाल वीशमी ॥ रहो तो दुरी, खीचडी ए वेशी॥ ॥ स्वामी में पूरवनव माहरो, नाख्यो तुम थागत एद ॥ स्वामी मोरा है, हवे तुम श्राधीन छ रद्ध, कदो मुजने करवु जेद ॥ स्वा० ॥ १॥ उत्त म नर एम नाणी॥ए थोकणी॥ तुज साखें में थादस्यु, नलु समकित जगमा सार । स्वा० ॥ वली निरपराधो जीवनें, दण नहीं कोई प्रका र॥ स्वा० ॥ २०॥ ५ ॥ पण में हिंसा करी घणी, तेह किम क्ष्य थाशे - ६६ ॥ जयानंद केवलीनो रास. मुज ॥ स्वा० ॥ कुमर कहे तुमे देवता, तप प्रमुख न होये तुन ॥स्वा०॥ ॥ ३० ॥३॥ पण श्रीधरिहतना चैत्यनी, करो पूजा निर्मल चित्त स्वा०॥ वली शासननी प्रनावना, धर्म सहाय करो नित्य नित्य ।। स्सा ॥30॥४॥ तेह देवी थगी करे, पठी देवी कहे सुणो स्वामि ॥ स्वा० ॥ तुमें महारा उपकारीया, तुम मूक कहो कुण गम ।। स्वा० ॥ ॥ ५ ॥ कुमर कहे तु धन्य बे, तुननें थयो एम उपगार ।। स्वा० ॥ हेमपुरना उद्यानमा, मुजर्न मूके तु धरी प्यार ॥ स्वा० ॥ 3 ॥ ६ ॥ ततण मूक्यो तिहां जइ, वली थोपा थोपधि दोय ॥ म्वा० ॥ एक विषनी थपहारिणी, नेत्र सज करणी बीजी जोय ॥ स्वा० ॥ 3 ॥ ७॥ दिव्यवस्त्र पथ्य वनी दीयां, तिम बहुमू ला बलकार ॥ स्वा० ॥ करी प्रणाम अहश थई, हवे ते सविथगें धार ।। ॥स्वा० ॥ उ० ॥ ७ ॥ पेगे हवे ते नयरमां, मोह पामे लोकना वृद ॥ स्वा ।। दीना रमता जुवटू, तिहां वेगे मन थापद ॥ स्वा० ॥ 3 ॥ ॥ ए ॥ नूपण पणमां धरी करी, दस दाव रम्यो ते गम ॥ स्वा० ॥ दश लक्ष लीलायें जीतीयो, राजकुमर दावा ते ताम ॥ स्वा० ॥30॥१०॥ हवे दाखाना नयथकी, नवि रमियो कोइ कुमार ॥ स्वा० ॥ हवे गवरावे गधर्वप्रत्यें, जिनवरना गीत उदार ॥ स्वा० ॥ ३० ॥ ११ ॥ दश लाख याचकनें दीयां, एद सानली चरित्र उदार ॥ स्वा०॥ हेमप्रनरायें तेडियो, दी थत थाकार ॥ स्वा० ॥ १० ॥ १२ ॥ दिव्य असरूत वस्त्रनें, व ली अनुत लावण्यरूप ॥ स्वा० ॥ लहें व्यामोह सनाजना, जने तिहाँ प्रणम्यो नूप ॥ स्वा० ॥ ३० ॥ १३ ॥ विस्मय सही थालिंगीयो, कहे थ सिने तु बेश ॥ स्वा० ॥ विनये नवि बेगे तिहा, तेह उचित न चूके ले श ॥ स्वा० ॥ १०॥ १४ ॥ बेगे ते नीचे थासने, नृप पूजे कुशल नेतु ज ॥ स्वा० ॥ ते कहे तुम दरशनथकी, ययुं जनम नयन फल मुज ॥ ॥ स्वा० ॥ ३० ॥ १५ ॥ यत ॥ तीर्थानां प्रथम तीर्थ, नूपतिर्नयपावन ॥ दर्शनादपि योत्राऽपि, दत्तेऽनीष्टामुत्तप्रिय ॥ १॥ ढाल ॥ विनय थाकारा दिक सवे, नोखे तुज गुण श्वसमान ॥ स्वा० ॥ मूरति तुज सरखी नही, एम कदे वारंवार राजान ॥ स्वा० ॥ 8 ॥ १६॥ कुमर कहे तुम दृष्टि थी, द सौनागी थयो धान ॥ स्वा० ॥ एम वातें वेला गमी, थाव्यो शिर उपर दिनराज ॥ स्वा० ॥3॥१७॥ सना विसर्जी राजीये, हवे स्नान , वितीय खम. ६ जन करे राय ॥ स्वाण॥ कुमर सघातें सद् करी, नृप शय्यायें जश् गय ।। स्वा० ॥ ३० ॥ १७ ॥ कुमरने शासन थापीने, कहे नूप सुणो तुमें वा :॥ स्वा० ॥जे कारण तुम तेडीया, ते सोनलो मुज अवदात ॥ स्वा० ॥ न०॥ १५ ॥ बीजा खममा वोशमी, कही पद्मविजय वर ढाल ॥ स्वा०॥ जीजयानदना रासमा, बागल मुणो वात रसाल ॥स्वा०॥3॥ २० ॥ ॥ दोहा॥ ॥ राणी पाचशे रूथडी, माहारे जे मनोहार ॥ ललिता विमला लीला ती, केलि कलादिक सार ॥ १ ॥ शत पुत्रह सोहामणा, नानु नानुधर नाम ॥ नानुवीर मुनानु नें, वरदत्त मुदत्त सुपाम ॥ २ ॥ सुसेन रवितेजा मुगुण, सुनीम सुमुख सुजाण ॥ इत्यादिक उपर बजे, पुत्री रूप निधान शा ललिता पटराणी लहे, गुणोत्तर सरवग ॥ सौनाग्य मजरी सुरलता, सरखी यौवन सग ॥ ॥ ॥ ढाल एकवीशमी ॥ मोहनजी मोकलोनें मोशाला ॥ ए देशी ॥ ॥ ते चोशठ कला निधान, प्रिय मधुर वदे सुप्रधान ॥ तेहनां वर उत्तम कान, बेनो कुलदेवी समाज ॥ १ ॥ मोहनजी सनिलो थरदास ॥ तुम सम नहीं जग सुविलास ॥ मो० ॥ ए थांकणी ॥ रेलणी कुलदेवी नाम, मौन ध्याननें नप गुन गम ॥ त्रीजे दिन तूनी रातें,मुज सुपनमा कहे । ए नातें ॥ मो० ॥ २ ॥ युवराज गृह कार पासें, यूतपदें रमें उबासें ॥ दिव्य वस्त्र थलरुति जास, खडधर दिव्यारुति खास ॥ मो० ॥३॥ दश लक्ष जीती दान देशे, सौनाग्यमजरी पतिवेशे ॥ हरख्यो द्र सानली ते ह, विदाणे पूजी गयो गेह ॥ मो० ॥ ४ ॥ पारणु खवारणु कीधु, ते सुनटोने जाण न दोधु ॥ एदवो नर कोइ यावे, लावजो मुल पासें नावें । मो० ॥ ५॥ ते कारण तुमनें साध्या, देखी श्रम मन घणु जाव्या ॥ प रणो ए मदारी कुमरी, जस रूपथी हारी थमरी ॥ मो० ॥ ६ ॥ कदे कु मर न जाणो वश, गुण थवगुण न हो श्रश ॥ केम थापो कन्या मु न, एमा हाणी धावे ने तुज ॥ मो० ॥ ७ ॥ यत ॥ कुल शील वपुर्वि या, वयोवित्त सनायता ॥ वरे सप्त गुणा मृग्या, स्ततो नाग्यवशा कनी ॥१॥ ढाल ॥ कहे राय देवीनी वाणी, थाकार विनयादिक जाणी।। जास्यो तुम उनम वरा, एहमा नही सशय यश ॥ मो० ॥ ७ ॥ मुज ६न जयानंद केवलीनो रास. प्रार्थना नंग न कीजें, तव कुमरें मौन रहीजें । बाजे ते ढोल बदाम, अन सगर्ने परल्या ताम ॥ मो० ॥ ॥ ॥ दय गयने पायक गाम, दासी दामने पुरवर दाम ॥ राय सौध रहेगाने काम, बहु उपकरण नरे ते धाम ।।मो॥ ॥ १० ॥ तिहा जोगवता वर नोग, नप सेवा करे एनयोग ।। ते दिनपी लखमी वाधे, बहु राय प्रमुख नृप साधे ॥ मो० ॥ ११ ॥ श्रीवर्सन अनि धा थापे, तेहनो नश दश दिशें व्यापे ॥ एक दिन नृप नाखे कुमार, सुणे अमकुल ए थाचार ॥ मो० ॥ १२ ॥ परणीने घटु जरतार, उठवा हर्ष अपार ॥ कुल देवता मासने यतें, पूजे एक पायें सुचितें ॥ मा॥ १३ ॥ चौदशनी रात्रे पूजो, तुम विघन होये ते धूजो ॥ कहे कुमर न काम ए कोजें, थपराध विना न मारीजें ॥ मो० ॥ १४ ॥ यत ॥ नास्ति हिंसा सम पापं, नरकादिप्रदानत ॥ न चाहिसासम पुण्यं, दानात्स्वर्गापवर्गयो ॥१॥ अमृतं नौरगा कात्, नैवापथ्याजदक्ष्य ॥ साधुवादोविवादान्न, न शांति प्राणिनां वधात् ॥ २ ॥ ढाल ॥ नोज्यादिकें नूपति नांखे, परचो जिम विधन न दाखे ॥ कहे कुमर मिथ्यात्विणी एह, तत्त्वज्ञानी पूछ केद ॥ मो० ॥ १५ ॥ जेहनें देव गुरु धर्म राखे, तेदने ३२ थनर्थ न दाखे ॥ ए रांकडीनो श्यो नार, तुमें रहो मुखमा निरधार ॥ मो० ॥१६॥ यत ॥ महा प्रसन्नावशवर्तिन सुरा, न मुष्ठनूपा प्रजवति नो खला ॥ न श्यति विघ्नाविलसति संपदो, यदि स्थितो यत्र जिन सुपूज्यते ॥ १ ॥ ॥ ढाल ॥ जमाईने नवि कहेवाय, थधिकं एम कही घर जाय ॥ कुलदेवी ने कहे एम, तें याप्यो जमाई प्रेम ॥ मो० ॥ १७ ॥ ते पण तुजनें नवि । जे, बीच मुजने नवि सूजे ॥ तूने ते जमाइ जाणो, / करु पण नक्ति न राणो॥ मो॥ १७ ॥ नमी देवीने गयो नूप,कुमरें लापु तास स्वरूप ॥स प्रत्यया देवी जाणी, हवे रयणीय गुणमणिखाणी॥ मो० ॥ १५ ॥ कायक तस शफा करतो, पट्टमा जिनप्रतिमा धरतो ॥ धूप पुष्प सुगध घरोने, बे गे जिनध्यान करीने ॥ मो० ॥ २० ॥ एकवीशमी बीजे खंमें, ढाल नाखी रंग थखमें ॥ धमै दृढ एम मन करनो, कदे पनविजय शिव वरजो ॥ ॥ मो॥१॥ सर्व गाथा ॥६३० ॥ ॥ दोव्हा ॥ ॥श्रप्रमत्त शासन धनु,पोहर वीजे तिहां पेखी॥धूमघटा दश दिक्ष परी, कहो , क्षितीय खम ६ए देवीकृत ए देखी ॥ १ ॥ कोलाहल परिकर करी, वहादशे नागे दूर ॥ कुम र बीहोक मन नवि करे, परमेष्टि ध्यान पमूर ॥ २॥ कामस्सग्ग तव करी रह्यो, धूममयो ते ध्यान ॥ जाज्वल्य मान ज्वाला थई, परगट ते पहिचान ॥ ३ ॥रारूप करी रेट्नणी, मस्तक मूढक समान ॥ थनि ताणशी यां खडी, ताड मान पद तान ॥४॥ पेट बन्यु पर्वत गुफा, कोजक दत क राल ॥ चक्र त्रिशुल खड्ग चगचगे, नीषण अतिशय नाल ॥ ५ ॥ ॥ ढाल बावीशमी ॥ हामानी देशी॥ ॥अट्टाह दास्यनें मूकती ममरूक वजाडे, बकुत्रास पमाडे, कर चकन माडे, मानु थाकाश तल फोडशे रे ॥१॥ में तुजनें नररायनी, लखमी बद्ध दीधी, कन्या प्रसिदि, तादरे कर कोधी, तोहि तें निदा कीधी मादरी रे ॥ ॥ हनीय पूजा कर मादरी, वली कर परणाम, नहीं तो यम धाम, पामिश सूत्राम, राखण काम पण नावशे रे ॥ ३ ॥ तोहे पण को न्यो नही, तव रोश चढावी, अगनि वरसावी, जाला शिर यावी, तो पण लावी कुमरें मन नहीं रे ॥४॥ जिनवर ध्यानधारा धरे, श्रगनि उला य, तव हरि मूकाय, गरिव थाय, नक्षण करवा जाय ते हवे रे ॥ ५ ॥ पुलांछोटे कपावतो, धरतीने जाम, नख थायु६ नाम, दाढा पडो ताम, नख थाम नांगा जिन ध्यानथी रे ॥ ॥ सिह गयो हवे सर्पथी, मूक्या वनु नाग, दुकारनो साग, नरे थंबर नाग, श्यामनो राग नव मेघश्यो रे ॥ ॥ शतगमे मणि घणु दीपता, मानु यम कर दम, फणाटोप प्रचम, वींटे ते थखम, वेदना चम करे रोषथी रे ॥ ७ ॥ फणाटोपें मारे घणु, वली तनुनें मरडे, दशने वली करडे, लालायें खरडे, दत पहे रे तेद नागना रे ॥ ए॥ फणथी मणि त्रुटी पडे, वली नांगे हाड, वायरे जिम जाड, नवि लागे पदाड, कुमर पहाड तनु उपरे रे ॥ १० ॥ नाग सवे विलखा थर, ते नाता जाय, विस्मय सुरी पाय, मन चिते थाय, पीडा उपाय नवि एहने रे ॥ ११ ॥ ध्यान वलें न खोनी शकु, करु ध्यानने पी डा, अनुकूज पणे कीडा, करी पुन कह ईडा, एदमा रे नीहा नहीं मुज ने रे॥१२॥ एम विचारी नारीनु, कीधु वली रूप,थलरुत थनुरूप, मुग्व चद सरूप, कामनो यूप मानू ए बनी रे ॥ १३ ॥ घुघरी चरणे रणनणे, लीला गते चाले, कुमर मुख जाले, निज मानें गाने, बोले रसाखें क्यण , 10 जयानंद केवलीनो रास. एणीपरें रे ॥ १४ ॥ माहारो खम थपराध रे, सात्विक सोनागी, तुजष्ठ लय लागी, मुज नाव नांगी, दु थ रागी हवे ताहरी रे ॥ १५ ॥ एवा पुरुषनें पामवा, में परीक्षा कीधी, ई तुजा गिदी, मुजने कय तीमी, देव नी दिनोगव नरपणे रे ॥ १६॥ गीकार कर मुजनें, हु ताहर) दासी, स्नेही सुविलासी, नित्य नृत्य प्रकाशी, गीत गाशी रे सह तुज थागडे रे ॥ १७ ॥ कामने वयरों न वेधी रे, न चलाव्यु ध्यान, व्रत उपर ज्ञान ।। जिनवर बगुमान, मान न दीधु रे देवीन तेणें रे ॥ १७ ॥ वौजे खर्म वावी शमी, वर नाखी ढाल, प- सुरसाल, परीक्षाने काल, मगलमाल होये थिर थता रे॥ १५ ॥ सर्वगाया ।। ६५४ ॥ ॥ दोहा ॥ ॥ विस्मय पामी व्यंतरी, वोले एहवा वोल ॥ तुज उपर तूठीथड़, खां तें वचनज खोल ॥ १ ॥ हवे उपसर्ग करु नहीं, पण कहे तादी पास ॥ श्यो ने मत्र सोहामणो, परगट तेद प्रकाश ॥ २ ॥ नास प्रनावें मुज जरा, जालिम न चल्यो जोर ॥ कोण धर्म पूजा करे, सनिखं मूकी सोर ॥३॥ दु ताहरी हितकारिणी, पूजे नहीं तू पाणि ॥ कामस्सग्ग पारी कुवर उत्तर थापे थाणि॥४॥ ॥ ढाल त्रेवीशमी ॥ महाविदेहक्षेत्र सोदाम[॥ ए देशी ॥ ॥ कुमर कहे मुण रेमणी, पंच परमेष्ठी ध्यान लाल रे ॥ जगत पूज्यनुं हु करु, केवल अमृत पान लाल रे ॥०॥ १ ॥ त्रिविधं जेद ध्यातां थकां, सकल 5 ख कृय थाय लाल रे ॥ धर्म ते थरिदंतनो करो, सयल जीव हितदाय लाल रे ॥ कु० ॥ ३ ॥ समकेतधारी प्राणीया, मिथ्यादृष्टि जे होय लाल रे ॥ तेदनी पूजा नवि करे,प्राणांते पण जोय लाल रे ॥कुणा ॥३॥ तेमाटे देवी सुणो, वो जो थातम हेत लाल रे ॥ त्रिविधं हिंसा नवि करो, हिंसा नरक सकेत लाल रे॥ कु० ॥ ॥ धर्म थरिदंतनो मुज ने, नांखो करी विस्तार साल रे॥ तव कुमार विस्तर करी, नाल्यो धर्मवि चार लाल रे ॥ कु०॥ ५॥ हिंसानां फल दाखीयाँ, तेमन दयानां विशाल लाल रे । सानली बुजी ते दवे, समकेत महे सुरसाल लाल रे ॥ ७ ॥ ॥६॥ विरमी प्राणीवधयकी, पूर्व जे हिंसा कीध लाल रे ॥ तेह रोगनें टालवा, पध थाकरु दीघ लाल रे ॥०॥ ॥थरिहंतनी पूना करो, ते ,

वितीय खंम
धर्म सदाय करेह लाल रे॥ शासननी परनावना, सघ उपरें ससनेह ला
ल रे ॥ कु० ॥ ७॥ देवी लेवा धर्मथी, कुमर देवी लह्या हर्ष लाल रे ॥
६ कदंबना फूलने, मेघ धारा जिम वर्ष लाल रे ॥ कु० ॥ ए॥ गुरु नक्तं
दिव्यौपधि, आपे महिमावत लाल रे ॥ निज पर शिर थापीथकी, इष्ठित
रूप करत लाल रे ॥ कु० ॥ १० ॥ वस्त्र नूपण वली थापती, वर्षे कनक
मणिराशि लाल रे ॥ देव मुनि वजाडीने, अदृश्य दुई तास लाल रे ॥
॥ कु०॥ ११ ॥ जई राजा बोलावीयो, नघे जागे ले के केम लाल रे ॥
जागु बु नरपति कहे, उघ थावे केम एम लाल रे॥ कु० ॥ १२ ॥ धूम्या
दिक जमाई घरें, देखी 5 ख अपार लाल रे ।। सा कहे सांजल जे कहूँ, तु
ज जमाई उदार लाल रे ॥ कु० ॥ १३॥ अनुकूल प्रतिकूल में कस्या, उप
सर्ग तास थनेक लाल रे ॥ पण सात्त्विक उत्तम घणो, नवि मूकी निज
टेक लाल रे ॥ कुछ ॥ १४॥ जीवदया मूल बादलो, में एक पासें धर्म ला
ल रे॥तु पण धर्म एदनी कनें, लेजे नमो अधर्म लाल रे ॥ कु० ॥ १५॥
एम कही ए अदृश्य थई, दवे विहारों सद्गु थाय लाल रे ॥ राय प्रमुख
रयणी तणो, जोवा कुमरने गय लाल रे ॥ कु०॥ १६ ॥ कुमर थानूपण
वस्त्रयो, दिव्ये देखी दरखाय लाल रे ॥ रत्नपुज देखी करी, थानद श्रग
न माय लाल रे ॥ कु० ॥ १७ ॥ पूजे नूप कुमारनें, श्यो रयणी वृत्तांत
लाल रे ॥ कुमरें यथास्थित नारखीयो, चित्त करी एकांत लाल रे ॥ कु॥
॥ १७ ॥ कुमर सत्त्व प्रशसता, तिम जिन धर्म प्रनाव लाल रे ॥ चमत
कार पामी करी, राय प्रमुख समाव लाल रे॥कु० ॥ १ए ॥ धर्म ग्रहवा
नृप मन करे, उद्यान पालक ताम लाल रे ॥ दीये वधामणी यावीया,
धर्मयशा गुरु नाम लाल रे ॥ कु० ॥ २७ ॥ वद् परिवार परिवस्या, धर्म
मूर्ति मानुं तेह लाल रे ॥ कुमरवयरों राजा दवे, वदे गुरु ससनेद लाल
॥ कु० ॥ २१ ॥ धर्म सांजली थादरे, समकेतादिक शुम लाल रे ॥ राज
पुत्र राज्यवर्गीया, नागर पण प्रतिवु लाल रे ॥कु० ॥ २२ ॥ कुमत
मूकी धर्मी थया, देखी कुमार चरित्र लाल रे ॥ काल काढे एम धर्ममा,
श्रीवर्धन सुपवित्र लाल रे ॥ कु० ॥ २३ ॥ वीजे खमें त्रेवीशमी ,पद्म
कहे एम ढाल लाल रे ॥ श्रीजयानदना रासमा, थागल वात रसाल
लाल रे ॥ ० ॥ २ ॥ सर्व गाथा ॥ ६ ॥

७२ जयानंद केवलीनो रास. ॥ दोहा॥ ॥ एक दिन श्रास्थाने रह्यो, सौधर्म सना समान ॥ शत मृत श्रीवई न सहित, पागीयाने परधान ॥ १ ॥ वन पालक थाची कहे, कीडा वनमा कोड ॥ घोर शब्द घुघुर करे, खराखर करे खोड ॥शा काल रूपें ए कोल , नटने पण दीये नीक ॥ नाशो जाये निहारा, एहमा नहीं थलोक ॥ ३ ॥ अवनीपति उठे यदा, वारे पुत्र विनीत ॥ शत पुत्र उठे सामटा, सन्नमय या शुन रीत ॥ ४ ॥ कुमर पशु जाणी करो, उवेखीयु तमाम ॥ कौतुकची के गयो, बुद्धिमत वलधाम ॥ ५ ॥ ॥ ढाल चोवीशमी ॥ जाजरीया मुनिवर धन धन तुम थवतार ॥ ए देशी ॥ ॥ज सूथर बोलावीयोजी, हय गय परिवत तेह ॥ साहामो सूअर थावीयोनी, क्रोध करालित देह ॥ १॥ नवि नाव धरीने सुजो अचरन वात ॥ए थोकणी ॥ समकालें मृत रायनाजी, वाण श्रेणी वरसत ॥ उन ली उचली ते सवेजी, दाढायें खम करत ॥ नवि॥ ॥ दय गयनें पण पा डियाजी, खड्ड मोघर गदा घात ॥ तेहने थणगणतो थकोजी. बद् सुनट क रे पात ॥ नवि० ॥ ३ ॥ण गगर्ने क्षण धरतीयजी, फाल दीये बलवत ॥ तस्करमा सद्ध देखताजी, थादि मध्ये वलीथत ॥ नवि० ॥४॥ थाकु ल व्याकुल सद्गु थयाजी, राजकुमर तेणी वार ॥ तेदनी रक्षा कारोंजी, श्री जयानद कुमार ॥ नवि० ॥ ५ ॥ शस्त्र रहित ते देखीनेजी, मूके खड्ग तुरंग ॥ बांधी के. बोलावीयोजी, सूधरने निज सग ॥ नवि० ॥ ६ ॥ फाल देश कुमर शिरेंजी, थावे कोल ते जाम ॥ मुष्टिये दणी दोय दाढनेजी, खं मखम करी ताम ॥ नवि०॥ ४ ॥ तो पण सत्त्व पराक्रमेंजी, श्रीजय कपर तेह ॥ पडवा मामपु तेटलेजी, पग पकडी नम देव ॥ नवि०॥ ॥ ते फे रि दूर फेंकी दीयोलो, धीर बली महावीर ॥ सात ताड दूरे पडघोजी, श्री जयशूर कोटीर ॥ नवि०॥ ए॥ नागे बुंबारव करीजी, थयो नख हाडनो नंग ॥ पेगे गहने नाशिनेंजी, पू कुमर गया सग ॥ नवि० ॥ १० ॥ वीनो नहीं ते वराहनेनी, थावतो नए गजराज ॥ श्वेत चार दतुश जी, शो नित थामो समाज ॥ नवि॥ ११ ॥ मोद सहीने नमाडियोनी, मिष्ट ये कीध प्रहार ॥ वश करी शिर उपर चढयोजी, श्रीजयानद कुमार ॥नवि० ॥१२॥ वाले ते हिमपुर नपीजी, पण वन सनमुख धाय ॥ वायुवेगें दूर वितीय खंम. ७३ जश्जी, गगर्ने परखीपरें जाय ॥ नविण ॥ १३ ॥ देखे प्रथिवीय तदाजी, गो पद सम कासार ॥ सदेही शिखर परें नग तदानी, नदीयो नीक यनुहार ।। नवि० ॥१४॥ ग्राम पुरादिक देखतोजी, बालक्रीडा पुर रीति ॥ कुमर वि चारे चित्तमांजी, वैरी कोक दिये नीति ॥ नवि० ॥ १५॥ रखे सायरमा नाखतोजी, वजमुष्टिये कसो घाय ॥ तेदनुं बल न सही शक्योजी, इख पीडा थति थाय ॥ नवि० ॥ १६ ॥ गगनें बॉमीनें गयोजी, समरे औष धि ताम ॥ विन निवारणी नामथीजी, सरोवर पडियो उद्दाम ॥ नवि०॥ ॥ १७ ॥ तेह तरी तीरें गयोजी, मारग जोवा काम ॥ चढीयो एक वड नपरेंजी, दीठो मारग वाली गाम ॥ नवि० ॥ १७ ॥ उतरवा ना करेजी, वडथी जावा जाम ॥ वह उमयो थाकाशमांजी,जय महारणने नाम ॥ नवि० ॥ १ ॥ पर्वतनिकूटे वह रह्योजी, उतस्यो दवे वनाहि ॥पा णी सींच्या वृक्षनांजी, थल दीवां रे उहाहि ॥नवि०॥ ५० ॥ पांचशे ताप सना तिहांजी, थाश्रमें गयो ते कुमार ॥ तिहां एक शय्यायें रह्योजी, व्या घ्र दीगो मनोदार ॥ नवि० ॥ २१॥ वाघ सेवा तापम करेजी, विस्मय ल ह्यो कुमार ॥ तव तापस उना थइजी, थालिंगन दिये सार ॥ नवि० ॥ ॥ २२ ॥ खेम कुशल पूर्व वलीजी, थमृत नरियां नयण ॥ बेसारे वचिता सर्नेजी, कुमर पूजे एम वयण ॥ नविः ॥ २३॥ एह वाघ कहो कोण ने जी, केम सेवा करो तास ॥ तापस कहे मोहोटी कथानी, ते काठ नास निवि॥४॥श्रीजयानदना रासमांजी, चोवीशमी ए ढाल ॥खम बीजे पदमें कहीनी, मुणतो मगलमाल ॥ नविण ॥ २५॥सर्वगाथा॥१॥ ॥ दोहा ॥ ॥ स्नान करीने गुम थया, गौरवथी गुणवत ॥ जोजन करवा नाजने, पायस ते पिरतत ॥१॥ इष्ट फलादिक श्रापियां, जोजन करीने नावि ॥ तापसछु तिहां ततक्षणे, यासन बेग थावि ॥ २ ॥ तापस एक युवान त व, हरिवीर हितकार ॥ कुमरने तेह कथा कहे, व्याघ्रनी करी विस्तार ॥३॥ ॥ ढाल पञ्चीशमी ॥ वींडीयानी देशीमां ॥ ॥ महापुरे नरसुंदर राजियो, गाजीयो शत्रुनय देत रे ॥ हरिवीर छ त्रीमा ब्राजीयो, नृप तेदन दित बहु देत रे ॥ १ ॥ जू जू वात विनो दनी ॥ ए थांकणी॥ नृप बालमित्र सेनापात, निज नदन अधिक प्रमाण . 1 ७२ जयानंद केवलीनो रास. ॥दोहा॥ ॥ एक दिन प्रास्थाने रह्यो, सौधर्म सना समान ॥ शत मत श्रीवई न सहित, पागीयाने परधान ॥ १ ॥ वन पालक थावी कहे, कीडा वनमा कोड ॥ घोर शब्द घुघुर करे,खराखर करे खोड ॥शा काल रूपें ए कोल , नटने पण दीये नीक ॥ नाशी जाये निर्जरा, एहमा नहीं थलोक ॥ ३ ॥ अवनीपति ते यदा, वारे पुत्र विनीत ॥ शत पुत्र उठे सामटा, सन्नथ या शून रीत ॥ ४ ॥ कुंमर पशु जाणी करी, उवेखीयु तमाम ॥ कौतुकथा के. गयो, बुद्धिमत वलधाम ॥ ५ ॥ ॥ ढाल चोवीशमी ॥ नांजरीया मुनिवर धन धन तुम थवतार ।। ए देशी ॥ ॥ज सूअर बोलावीयोजी, हय गय परिवत तेद ॥ साहामो सूबर श्रावीयोनी, क्रोध करालित देह ॥१॥ नवि नाव धरीने मुजो अचरज वात ॥ए थोकणी॥ समकाले सुत रायनाजी, वाण श्रेणी वरसत ॥ उछ ली उठली ते सवेनी, दाढायें खम करत ॥ नवि०॥ ॥ दय गयने पण पा डियाजी, खड मोघर गदा घात ॥ तेहने थणगणतो थकोजी, बगु सुनट क रे पात ॥ नवि० ॥२॥ण गगर्ने क्षण धरतीयजी, फाल दीये बलवत ॥ लस्करमा सद्ध देखताजी, थादि मध्ये वलीथत ॥ नवि० ॥४॥ श्राकु ल व्याकुल सद् थयाजी, राजकुमर तेणी वार ॥ तेदनी रक्षा कारणेंजी, श्री जयानव कुमार ॥ नवि० ॥ ५ ॥ शस्त्र रहित ते देखीनेजी, मूके खड्ग तुरंग ॥ बांधी के. बोलावीयोजी, सूथरनें निज सग ॥ नवि० ॥ ६ ॥ फाल देश कुमर शिरेजी, थावे कोल ते जाम ॥ मुष्टिय दणी वोय वाढनेजी, ख मखम करी ताम ॥ नवि०॥ ॥ तो पण सत्त्व पराकमेंजी, श्रीजय रूपर तेह ॥ पडवा मामपु तेटलेली, पग पकडी 'नम देह ॥ नवि० ॥ ७॥ ते फे रि दूर फेंकी दीयोजो, धीर बली महावीर ॥ सात ताड दुरे पडघोजी, श्री जयश्शूर कोटीर ॥ नवि० ॥ ए॥ नागे बुंबारव करीजी, थयो नख हाडनो नंग ॥ पेठो गहने नाशिजी, पूवें कुमर गया संग ॥ नविण ॥ १० ॥ दीगे नहीं ते वराइनेंजी, थावतो जूए गजराज ॥ श्वेत चार दंतुशखें जी, शो नित थाव्यो समाज ॥ नवि०॥ ११ ॥ मोद सहीने नमाडियोजी, मिष्ट में कीध प्रहार ॥ वश करी शिर उपर चढयोजी, श्रीजयानय कुमार ॥नविन ॥ १२॥ वाले ते हिमपुर जणीजी, पण वन सनमुख धाय ॥ वायुवेगें दूर ७५ . रे वितीय खंमः रथ बेगे कोषयी एम कहे, नाशि गयो तु एकवार रे॥ हवे जाश्यो किहां परबलथकी,वेलु तपे केतिक वार रे ॥॥१७॥ जोगराय कोप करीनें कहे, एक वार चूको दीपीफालें रे, पण वानर मारतां वार शी, परथी तप्यो श्रय तृण वाले रे ॥ जू० ॥ १७ ॥ तेजस्वी थवझा नवि खमे, लाएँ तिहां रण असराल रे ॥ नोगरायनुं धनुष बेद्यं शरें. रथ जांज्यो थइ विकराल ॥जू० ॥ २० ॥ शिरस्त्राण वर्म सवि नेदीयां, नोगराय थयो नोगहीन रे ॥ दरिवारे रथ वच्चे नाखियो, करे युक्ष यश् अदीन रे॥ जूण् ॥ २१ ॥ कहे शूरपाल तुं केम मरे, पर थर्थे कहे तव तेह रे ॥ निजपरना काम स मोवडे, गणे सहन प्राणी जेह रे ॥ जू० ॥ २२ ॥ मरवु तो दैवनें हाथ बे, तुज इछाने न थाधीन रे॥ एम कही शरनो ममप रच्यो, गुरपाल से ना थई दीन रे ॥ जु॥ २३ ॥ पति ते विपत्ति पामीया, रथ रहित य या रथवत रे ॥ एम निज निज वादन सवि गयां, मूक्यां सग्राम महंत रे ॥ जू० ॥ २४ ॥ हय गय नड र्यना नादथी, प्रस्फोट परें थाकाश रे ॥ युद्ध करता जयश्री अंतरें, रही न लह्यो वर थवकाश रे॥ जु० ॥२५॥ वादिहेत परे ते देतीने, दे ते परस्पर यो रे ॥ सात धनुप बेद्यां शूर पालना, धनुक्रमें सेनानीय क्रोध रे ॥ जु० ॥ २६ ॥ तव विधुर चिते तनु कंपतो, जे लेन ते दे एद रे॥ दु थाको एक नवा परें, सेना नागी गइ जेह रे ॥ जू ॥२॥इदा रद तो मरण लइ खरो, नइ पामे जीव नोजीव रे॥लका नहीं शूरथी नासतां, एम चितवे चित्त थतीव रे ॥ ॥२॥ एम चितवी रथ वाल्यो तेणे, मूकी वचमा नट श्रेणी रे ॥ नानगे शूरपाल लेई चमू, नोगराय पूवें थयो तेणी रे ॥ ज० ॥ २॥ ॥ गज घोडा शस्त्र लू टी लीये, मते बकतरनें थलकार रे ॥ नासतां लूटवु शोहतु, तव हुई जय जयकार रे ॥०॥३०॥ बीजे खमें पञ्चवीशमी, ढाल श्रीजयानदने रास रे॥ कहे पद्मविजय पुण्य करी, लहिये नित्य जीलविलास रे ॥ जू० ॥ ॥३१॥ सर्वगाथा ॥ १६ ॥ ॥दोहा॥ ॥ दान याचकनें देयता, सेनानी लइ सग ॥ नोगराय निजपुर नणी, थाव्या श्रति उधरंग ॥१॥ जोगराय माने नछु, जीवनो दायक जाण ॥ से नानीनां शुन परें,वारु करे वखाण ॥ २ ॥ देवा कन्या मोवा, उपकारीने

U
जयानंद
केवलीनो रास.
रे ॥ एहवें निज मानुल नरपति, जोगपुरीमा नोगराजान रे। जूण् ॥ २ ॥
तस वैरी तस पुरे श्राधियो. राजा बलीयो सूरपाल रे ॥ जोगराय ते तेद
शु जूजी, जागु निजवल तिण काल रे ॥ जू० ॥३॥ नोगराय पेठो नि
ज नयरमां, परधान लख्यो ते लेख रे ॥वानो नाणेन तेडावियो, नरसु
दर लेख ते देख रे ॥ जू० ॥ ४ ॥ धीर वीर माने निज धन्यता, थान स्व
जननें श्राव्यु काम रे ॥ करु उपकार हु तेहने, राखु सदुनी एम माम रे
॥ जू० ॥ ५ ॥ यत ॥ किं ताज्य रमा सा किं, यतोनोपरुति परे ॥ स
वैपूपचिकीर्षति, महांत किं पुनर्निजे ।। १ ॥ ढाल पूर्वती ॥ एम चितवी
जावा उद्यम करें, तेटले नृपर्ने निपिछ रे ।। सेनानी कहे नेक उपरें, केम
गरुड पराक्रम सिह रे ॥ ॥ ६ ॥ शूरनगरें जश् शूरपालने, जीती
राखु जोगराय रे ॥ मुज द्यो धादेश तव नूपति, थाण थापे करी मुपसा
य रे ॥ जूण् ॥ ४॥ गजरथ दोयसह ते थापीया, पांच लाख तुरगम
दीध रे ॥ पायक पांच कोडीयु परिवखो, नीसाणे मको काध रे ॥ जू० ॥
॥७॥ हरिवीर चाल्यो नोगपुर नणी, महामानी मादा जोधार रे । शूर
पालने जश् बोलावीयो, नोगरायें जास्यो ते प्रकार रे ॥ जू० ॥ ए ॥३
सैन्यने तेह नेलो थयो,शूरपाल सैन्य दोय साथ रे ॥ लडे तास वाजिव गर्जा
रवें, गाजे जिम सायर पाथ रे॥ जू॥१०॥ गजें गज तुरंगें तुरग लडे,
रथी पायक सम करे युछ रे ॥ शर कुत खड्न न्यायें लडे, हीण शस्त्रे केर
थ कुछ रे ॥ जु० ॥ ११ ॥ बाहु मुष्टियु वली जुजता, पदें पद दतें
वली दूत रे ॥ केशे केश नखें नख वलगता, मस्तकें मस्तक फूटत रे ॥
॥ ॥१५॥ केइ मोघरे रथनें चूरता, पापड परें वली गदाघात रे॥
करी पाहे गज नगटूक ज्यू, जम सरिस्वा ते साक्षात रे ॥ ज० ॥ १३ ॥
दय पग पकडी वळालता, लघु नपल परें वली के रे ॥ पग पकडी सुन
ट नमाडता, जेम शिनु उबाड करे रे ॥ ज० ॥ १४॥ केश मूळ पडया
गृड़ पांखना, पवने सक सुरू कराय रे ॥रणधरति सचर थइ, प्रेतें क
री गगन नराय रे॥ जू० ॥१५॥ एम घोर रणे शूरपालने, सैन्य दोय से
न्यने तेली रे ॥ तव सखा कायक दारधी, रणथन मर्यादा मेसी रे ॥
। जु०॥ १६ ॥ नोगराय कपयो तव रथ चडी, अनिमानथी युद करेय
रे। शूरपाल सैन्य नातु तदा, देखी शूरपाल उठेय रे ॥ जू० ॥ १४ ॥

B वितीय खम. महिला दिययाण मग्गो, तिन्निवि विरता पर्यपंती ॥ १ ॥ रविचरिय गह चरिय, तारा चरिय च राह चरियं च ॥ जाणति बुद्धिमता, महिला चरिय न जागति ॥ २ ॥ दोहा ॥ जामाताने विंबी वाघ, मद्यपानी मूरख थझा त ॥ नगिनीसुत प्रथिवीको नाथ, कीधो गुण नवि जाणे सात ॥३॥ धूता धूते मूढकं, चतुर न धूत्यो जात ॥ नारी धूते चतुरळ, एह बही एक बात ॥ ४ ॥ नूख्यो नाट बगायु ढोर, दाखो जुथारी बांध्यो चोर ॥ राम नामने मातो साढ, ए सातेथी टलीया माम् ॥ ५ ॥ ढाल पूर्वलो ॥ जणव्युं जमाईने तेणें रे, ते थाव्यो ततकाल ॥ उचित प्रतिपत्ति करी रे, सतोप्यो सुरसाल ॥ जू० ॥ १२ ॥ सुनगा कुमलाणी मने रे, दीवी देखी जेम नाग ॥ बाहिर स्नेह देखावतां रे, कहे मुज जाग्यां नाग्य । ॥ जू० ॥ १३ ॥ यत ॥ कबहु वनिता मृड वाच वदे, कबहुँ तिनयं कटु वाच कहे ॥ कबहु मनरग विरंग धरे, कबढुज विरागिनी हूइ रहे ॥ कबद्नु एक बोल सहे न नलो, कबहूँ कटु वोल थनेक सहे ॥ मुनि धन्य कहे जगदीश विना, त्रियकी करणी कहो कौन लहे ॥ १॥ पूर्व ढाल ॥ हवे स्त्री सईने जायवा रे, दरिवीर थयो उजमाल ॥ तव कपटें पहेली थई रे, शिर कपे विकराल ॥ ॥ १४ ॥ अट्टहास्य मुख योजती रे, थांखे बीहाडे लोक ॥ जानन नांगे नाचती रे, मारे बालादि थोक ॥ जुम् ॥ ॥ १५ ॥ निज परने गालो दीये रे, कोइ न ढांके अंग ॥ कारण विए रुवे हसे रे, ताली दीये गाये रंग ॥ नू० ॥ १६ ॥ विच विचमा मादी दोयें रे, वावडीमां करे कीड ॥ खेद लहे पित्रादिका रे, धरता अतिशय बीड ॥ ॥ १ ॥ मत्रवादी तेहपा घणा रे, फरता बहु प्रतिकार ॥ देवी मह प्रेत शाकिनी रे, ध्यतर शका धार ॥ जू० ॥ १७ ॥ सन्निपात उन्मादता रे, जाणी दोष अपार ॥ विविध प्रयोग औषध करे रे, पण गुण न थयो लगार ॥ जू० ॥ १७ ॥ कुलदेवी पूजा करे रे, मात पिता घण राग ॥ हरिवीर पण करे मानता रे, देव देवानी लाग ॥ जू० ॥ २० ॥ गुण न थयो कोयथी दवे रे, विलखो थयो हरिवीर ॥सालादिक हांसी करे रे, चिर रहेता जाय नीर ॥ जु० ॥ ३१॥ रूपवती सती प्रेयसी रे, थनु यायो घणो स्नेह ॥ एम इखणी न खमी शक रे, चितवे जाउं गेह ॥ जु॥ ॥ २२ ॥ परें जाउ एदने मूकीने रे, मित्रादिक करे हास ॥ मुख दावी ६ जयानंद केवलीनो रास. एह ॥ सनाने पूढे सुगुण, कन्या के को गेह ।। ३ ।। मनायक शुरदन ते, बोल्यो एहवा बोल ॥ सुनगा नाम सोहामणी, थावे एहने तोल ॥ ४ ॥ थत कन्या एहवी, माहारे हे महाराय ॥ एकांतें थनुरुप जोश, मनमा मोद न माय ॥ ५ ॥ दरिवीरने दीये दर्पथी, थवनीपति सही थाण ॥ पाणीग्रहण प्रेमें करी, महोत्सव विविध ममाण ॥ ६ ॥ थापे अति थावर करी, करमोचनने काल ॥ शूरदत्त निनशक्तिथी, थनुपम धन थसराल ॥ ॥जोगराय पण नतिथी, थापे वस्त्र थनेक ॥ पुर गाम दिये प्रेमें करी, वारु धरीय विवेक ॥ ॥ काल केतोएक काढतो, जोगवतो सुख जोग । जावा निजपुर जेटले, जुडतो कीधो योग । ए॥ ॥ ढाल बधीशमी ॥ देखो गति देवनी रे॥ ए देशी ॥ ॥ सुनगा कहे एणे अवसरें रे, पेटपीहा मुज थाय ॥ कपट न शीख वर्नु पडे रे, नारीमा सहज ए थाय ॥१॥ जुर्च गति नारीनी रे ॥ नारी कप टन कोय जणाय ॥ जू० ॥ ए थाकणी ॥ मांचे तडफडती पडी रे,पिता करे प्रतिकार ॥ तिम तिम खूब पाडे घणु रे, दाखवे थतिय विकार ॥ जू० ॥२॥ नाग्ययोगें नरता मल्यो रे, उत्तम मुगुण निधान ॥ एणे श्रवसर पीडा थई रे, धिग् मुन पाप निदान ॥ जू० ॥ ३ ॥ सासू ससरा सेववा रे, उत्सुकता रही एम ॥ एम सनिली निज कपरें रे, दानायक लहे प्रेम ॥ जूण् ॥४॥ स्वामी मजवा मन घणु रे, पण टफीयो कोई दिन ॥ पण शाता तस नवि थई रे, खाये नवि वली बन्न ॥ जू॥५॥ काडी कदो कोण शके रे, जागतो उघे जेह ॥ दवे ससरादिक एम कहे रे, साजी थाये जब एद ॥ जु०॥ ६ ॥ तव तुमें तेडवा बावजो रे, नू पर्ने जणव्युं तेद ॥ नू नपर्ने मोकळ्या रे, दय गय थ त जेद ॥ जू॥ ॥ ७ ॥ सेनानी ते लई चक्ष्यो रे, दुई पोहोतो जाणि ।। स्वैरिणी सुनगा दर्षथी रे, साजी थइ तेणे वाय ॥ जु० ॥ ७ ॥ तात चाकर मधुकधु रे, सेवे काम विलास ॥ नाना उपचारे करी रे, ते पण वश तास ॥ जून ॥ ए ॥ मोही तेहना स्वरथकी रे, कीडा करे यासक्त ॥ पण निपुणा तेदनी रे, कोई न जाणे रक्त ॥ जूण् ॥ १०॥ नारी चरित्र न को लहे रे, धाता पण मुजाय ॥ सूरदन दरस्यो घणु रे, सरल ते नारीनो ताय ॥ ॥ ॥ ११ ॥ यत । जलमको मतिपयं, यागासे पंखीपाण पयपती॥ .

वितीय खंम ए दिक दीये शीख, मुनगा पण अगीकरेजी ॥ जगत उगे जे नारी, मात पिता ते नवि धरेजी ॥ १० ॥ दपती चाल्या दोय, वोलावी सद्वये वल्यांजी ॥ मधुकठ दर्शितमार्ग, ते मार्गे महुये चल्यांनी ॥ ११ ॥ मा न्या इबघा जेह, तेह सफल माने तदाजी ॥ थई मारगें दारवीर, नदी थावी तिहा एकदाजी ॥ १२ ॥ वन निकुज तस तीर, मतस्या नोजन कारणेजी ॥ दपती नोजन कीध, सुनगा कहे चित्त नारोजी ॥ १३ ॥ ए सरिता रमणीक, वन प्रवेश सोदामणाजी ॥ क्रीडा करीयें क्षणेक, मुज मन एदवी कामनाजी ॥१४॥ मधुकन रक्षक एह, थंतर सेवक थापणो जी ॥ लाजजय शहां नाहि, नवि थावे कोइ खोपणोजी ॥ १५॥ पेगे सरितामादि, कामक्रीडा पीयु करेजी ॥ जलक्रीडा करी एम, पेग ते वन गव्हरेजी ॥ १६ ॥कामक्रीडा करे तह, थालिंगन गाईं दीयेजी ॥ वि विध करी रतिक्रीड, एक पोदोर सानपीयेंनी॥ १७ ॥ रक्षा मिश मधुकंत, र थ बेशी फरे चिद्ध दिशेजी ॥ फिकर करे चोकीयात, नीकल्या नहीं कारण कीशेजी ॥ १७ ॥ वीजे खमें ढाल, सत्तावीशमी सोदामणीजी ॥ पद्म क हे मुनिराज, धन्य जेणे नारी थवगणीजी ॥ १५ ॥ सर्वगाथा ॥ ५ ॥ ॥ दोहा ॥ ॥ मुग्ध नाणे मना नहीं, केम इहां करीयें वार || शका लही शब्दज कस्या, चोकीयातें दोय चार ॥ १ ॥ उत्तर नवि थाव्यो किमे, वनमा ज्वे विचार ॥ सेनानी सुनगा तथा, नवि दीपा निरधार ॥ २॥ खड्ड किदायक दीतुं खलं, थनिष्ट यथाशक ॥ मधुकर खोलण मामीयो, नवि लाधो नि शक॥ ३ ॥ शोकात सकुल सद्ध, विकलप विविध विशेष ॥ पगला पण श्रण पेखता, पडती रयणी पेख ॥ ॥ त्रियामा शतयाम परें, काढी उखमां काल ॥ श्रनन्यगति कोहि थागलें, चाल्या नांगती चाल ॥५॥ ॥ दाल अचवीशमी॥ चावलानी देशी। ॥ थनुक्रमें पोदोता महापुरें रे, नमीया जश्नूपाल ॥ श्रखियकी थी स जरे रे, वात कहेता विकराल ॥वात॥ सरूप, शोकवत थयो सांजली नू प॥ सैनादिके करीने चोप, खोलावे बनु दिन ते अनूप ॥ १ ॥जी राजन जी नीरे ॥ लरको गमे नट मोकली रे,शोधाव्यो बढ जाति ॥ वाल मित्र रा ना तणो रे, नवि लाधो एकाति ॥ नवि लाघो एकांत जेवारे, पुत्रथकी ते ॥ ១០ जयानंद केवलीनो रास. शकु केणी परें रे, एके नहीं थवकाश ॥ जू० ॥ २३ ॥ कर्म तणी गति कोण लहे रे, जावु निश्चय धाम ॥ पूढे श्वसुरने ते कहे रे, थावजो फरि तुमें थाम ॥ जू० ॥ २४ ॥ श्राण लही चाव्यो घरै रे, पोहोतो थनुक्रमें तेद ॥ स्वजनने सद् सनलावतो रे, धरतो तास सनेह ॥ ज० ॥२५॥ खमें वीजे बबीशमी रे.पद्मविजयें कही ढाल ॥धन्य मुनिवर जेणें परिहरी रे, नारी उ खजजाल ॥ जू० ॥ २६ ॥ सर्व गाथा ॥ १ ॥ ॥दोहा॥ ॥ कुलदेवी पूजा करे, शकुन देखावे साच ॥ निमित्त पूठे बदु निमि लिया, नारी करावे नाच ॥ १ ॥ कोई सगम स्त्रीनो कहे, इव्यादिक दीये तास ॥ नारी थासक्त नरने होये, सर्व विचार विनाश ॥ २ ॥ सुनगा व ली साजी थई, पूरव रीति पिडाण ॥ तेडवु मूकवु हाथ तस, माद्यपशु सुप्रमाण ॥३॥ पित्रादिक परमोदथी, तेडाव्यो जामात ॥ याव्यो ते क तावलो, नूरख्याने जेम नात ॥ ॥ शूरदत्तादिक साचवे, उचितकृत्य छनमाल ॥ सुनगा दाखवे सुखणी, स्नेह हियामां साल ॥ ५ ॥ ॥ ढाल सत्तावीशमी ॥ राग खनाती ॥ दवे श्रीपाल कुमार ॥ए देशी॥ सुनगा नामें नार, नगापणु ते थाचरेजी ॥ जेम ना कहे नाम, पण अन सगुने करेजी ॥ १॥ कामस्नेद उपचार, करी जरतारनें रीजवे जी॥ वश थयो नारीने तेद, एक दिन एकांतें चवेजी ॥ ॥ जब करी ये प्रयाण, तब मुज तातने मागजोजी ॥ मधुकठ थापो साथ, ए बगु कामनो जाणजोजी ॥३॥ मारगनो ने जाण, ढकडे मारग लइ जशे नी॥ नक्तिवतो ने समर्थ, एहथकी गुण बहु थशेजी ॥ ४ ॥ मानी मूर खें वात, तेमज का ते श्रवसरेंजी ॥ वस्त्रासकार सरकार, दासी दास दीये तस करेंनी ॥ ५॥ मधुकत पण दीयो तास, हवे जावा उद्यम क रेजी ॥ मात पिता पडी पाय, सुनगा थाखें धांसू जरेजी ॥ ६ ॥ मात पिता दीये शीख, जरता देवपरें गणेजी ॥ पालजो शील सवार, बना चार सवि थवगणेनी ॥ ॥ पूर्वे न कीजें शयन, कतायें नरता पूर्वे जी ॥सामु नगदनी नक्ति, करजो जेम 5ख चूरवेजी ॥॥ बधु परिजन जेद, वदन प्रसन्न निज राखजेनी ॥ शोक्य सार्थे धरे राग, पतिवहननें थादर करेनी ॥ ए ॥ पतिपीने सवेखि, शुन थाचार सघरेजी ॥ इत्या वितीय खम. जर शेष ॥ जी ॥ ११ ॥ वाजिव गीत बद थयां रे, बदी मगल बोजे ॥ सानली कुटुव ते थावीने रे, 5 खनां बधन खोले ॥ बंधन 5 खना खो ला पूजे, अचरिज वात कहो ए / डे ॥ नवि दीतुं नवि सनिली , ह स्विीर कहे तमें सनिलो ज्युंजे ॥जी॥ १२॥ कर्मथी बलीयो को नदी रे, फमैं तिरिमा पाल्यो । तेदमाथी तुमें उभरी रे,मानवनो नव थाल्यो। थाल्यो मानवनो नव रूडो, सवि ससारनो मोद ने कूडो ॥ विंड दीये ए क जिम मधुपूडो, सुख माने परमारथें जूमो ॥ जी० ॥ १३ ॥ यत ॥ शौर्ये च धैर्यै च धने च पूर्णे, ऐश्वर्ययोगेऽप्यखिले बसे च ॥ मित्रे च नूपे पि दरौ कपित्वे, नृत्यत्यदो कर्मगतिर्विचित्रा ॥ १॥ यन्मनोरथगतेरगोच रं, यत् स्टशति न गिर कवेरपि ॥ स्वप्नत्तिरपि यत्रमुर्लना, हेलयैव विधा ति कर्म तत् ॥ ५ ॥ पूर्वढाल ॥ वीजे खमें ए कही रे, यावीशमी ढाल ॥ पनविजय कहे सांजसो रे, थागल वात रसाल ॥ थागत वात रसाल सुसार, सनिलता दोय जयजयकार ॥ श्रीजयानदजीने अधिकार, दार वीर कहे निज वात प्रकार ॥जी॥ १४ ॥ सर्व गाथा॥ १० ॥ ॥ दोहा ॥ ॥ प्रेयसी पेतो बनें, तिहां लगें मालिम तुम्ह ।। नावि वात सुणो न j, थतर वन गयां श्रम्ह ॥ १ ॥ स्मरचेष्टा सलापथी, मुंजावे मुन मन्न । मलयगिरि मारुतयकी, टाढुं थाये तन्न ॥ २ ॥ कोकिलरव कार्ने मुगु, बंधुर सता सबंध ॥ नमतां जोतो नामिनी, वोजी करी निबंध ॥३॥ माधवी ममप रम्प ने, थापण रमीय एथ ॥ तास वचन तहत्ति करी, ततक्ष्ण पोतो तेथ ॥४॥ ॥ ढाल गणत्रीशमी ॥ वणजारानी देशी॥ ॥ पनव सायरो पाथरो। सुणो राजा रे ॥कामक्रीडा करी ताम नूपति गुण ताजा रे ॥ तिहां एक कपि देखी करी ॥ सु०॥ मुजनें कहे ते नाम ॥ नू ॥ १ ॥ स्वामी हुँ पापणी यदा ॥ १० ॥ मांदी थइ दोय वार ॥ नूए ॥ मूकी गया तमें मुजनें । सु० ॥ देवथी थयो करार ॥ नू ॥॥ तुम वियोगें 5 ख धरूं ॥ मु०॥ एण समे थावी एक ॥ नू० ॥ परिव्राजि का माही घणी ॥ सु०॥ धरती थंग विवेक ॥ नू ॥३॥ पासें श्रीपति गांउडी ॥ सु० ॥ नाणी एह विचार ॥ नू० ॥ दान इष्ट देवश करी ॥१०॥ -- . GO जयानंद केवलीनो रास. द अधिको धारे ॥ शोक विलाप करे सहु नारे, तेम तेम नूपति घणुं पोका रे॥जी० ॥ २ ॥ सेनानीनु कटुव ते रे, रूहरु बहु काल ॥ प्राणी कर्म नां उदयाथी रे, सहे एकलो खजाल ॥स० ॥ ते राजा, मञ्यादिक प्र तिवोधे जाना ॥ अन्य सेनानी थापे यतिघ्राजा, जेहनी कोयन लोपे मा जा ॥ जी० ॥३॥ अनुक्रमें शोक मूकी करी रे, एकदिन नाये गज लेवा ॥ विध्या अटवी थावीयो रे, सामग्री कलेवा ॥ सामग्रीगु मेरामा बेगे, बद्ध परिवार परिवृत्त जेठो ॥ शवर यावी एक वेगे देठो, वानर नाच करावे कितो ॥ जी० ॥ ॥ वानर वानरी नाचतां रे, विचविच करे धुतकार ॥ वलगे चूबे थालिंगतां रे, यु६ करे ते अपार ॥ यु-१० ॥ ते जोइ, सगुन न चित्तमा अचरज होई ॥ एहवो नाच न टीठो कोई, सह एम कहे ते न यणे पलोई ॥जी॥ ५॥ राजा देखी रीजियो रे, थापे तस बहु दान ॥ तेदमा मुख्य जे वानरो रे, देखी हरखे रानान ॥ राजा देखी वानर रोवे, पाय पडी थासुयें पग धोवे ॥ सगु एहवु अचरिज ते जोचे, राय तणे म न विस्मय होवे ॥जी॥ ६ ॥ चेष्टायें सवि दाखवे रे, पण वचनें न क दाय ॥ श्राशय कोइ समजे नहीं रे, पण काश्क थनिप्राय ॥ कांक अनि प्राय जाणी लेवे, कपिर्नु वृद नूप ततखेवें ॥ इक्षित शवरने धन बहु देवे, नाटकथी नृपनें कपि सेवे ॥जी॥ ॥ केलिवीर पशुपालने रे, थाप्यो शिक्षा देत ॥ राजा केशक दिन रही रे, चाल्यो प्रथिवी नेत ॥ पृथिवीनेत लेई गन वलीयो, निजधामें पोदोतो सुख नलीयो॥ अवसर जोइ केति वीर ते कलियो, नृत्य करावे नृपपुर इलीयो । जी० ॥ ७ ॥ कपि पालक कपिनें दीये रे, मास अधिक नरराय ॥ तत्त्व जाणे नहीं पण तिहां रे, रा ग ते थधिको थाप ॥ थधिका रागथी नूप करावे, कनकमणि घनकार ज डावे ॥ सोनी थानरण लेने आवे, नृत्य यतें नृप बागल गवे ॥जी॥ ॥ ५ ॥नू फलाद सतोषीयो रे, वान देश एन रीति ॥ तेद बानरण प हेराववा निज हाथें धरी प्रीति ॥ प्रीति घरी परेराववा काम, लोदन व लय थ गज ताम ॥ नवीन पडेरावचा का जाम, वानर पुरुष रूप दुस ताम ॥ जी ॥ १० ॥ नूपतिने घरणे नमे रे, सेनानी दरिवीर ॥ उगाही थालिंगीयो रे, नयणे करतो नीर ॥ नयरों नीर फरतो देखी, जोवा रठ थ सर्व उवेखी ॥ तृपें थावास्यो संभ्रम पेखी, यासने वेसारपो सुवि क्षितीय खम G३ ॥ नू०॥ १७ ॥ दोहा॥ और गांग खोली खुले, जब लगें पोहोंचे हाथ ॥ प्रेमात अंतर पडी, सरके शिरके साथ ॥ १ ॥ ढाल ॥ विवाह सदु मना वीयो । सु० ॥ पण मुज राग न कोय ॥ ५० ॥ सद्भुने विश्वास पमाडवा ॥ ॥सु० ॥ स्नेह देखाडयो तोय ॥ नू ॥१५॥ दोहा ॥ सारी नारी किन्न री. चोथा हे जूथा ॥ नागा सो उगस्या, वेध्या सो मूथा ॥ १ ॥ ढाल ॥ वार बिहूँ तुज फेरव्यो । सु० ॥ तोही न समज्यो गमार ॥ नू ॥ परि ब्राजिकदत्त वलयथा ॥ सु० ॥ कपि कोपो एणी वार ॥ ॥नू ॥ २० ॥ नो गव तिरिपणुं मोजमा ॥ १० ॥ समज्यो न मुज थाकूत ॥ नू० ॥ मादा रो दोष इहां नथी । सु०॥ शाने करे ने तूत ॥ नू॥१॥तात वचीला वी बलु । मु॥ जा; काश्क धन लेह ॥ ५० ॥ क्रीडीयं वाथकी ॥ ॥१०॥ तु कपिगणमा रमेय ॥ ४० ॥ २२॥ एम कदी रथ प्रेरियो।सु०॥ ठित विशि नणी तेण ॥ ॥ फाल देई दु वजगीयो ॥ सु०॥ वलीय विवारु नखेण ॥५०॥ २३ ॥ मास्यो परोणे मुक्कानें । सु० ॥ तोहीन मूक तास ॥ ४० ॥ म्यान सहित खडे हस्यो ॥ १०॥ तव कस्यो कोधे निराश। ॥ ॥ २४ ॥ मूर्षित थइ नूयें पडयो । मु० ॥ वातयोगें थयो सका। ॥ नू० ॥ राति गई विदाणु थ\ ॥ सु० ॥ नवि लटुं कल थकल ॥नू॥ ॥ ३५ ॥ वानरीयूथ देखी करी ॥ सु० ॥ निरधारयो यूथेश ॥ नू०॥ वानरी/ क्रीडा करु ॥ सु०॥ यूथपति छ विशेष ॥ ४० ॥ २६ ॥ शबरें पकही एक दिन ॥ सु० ॥ शिखव्युं नाटक मुक्त ॥ नू० ॥ तुम थाप्यो तु में नर कस्यो । सु० ॥ ए मुज वात, गुज ॥ ५० ॥ २४ ॥ मुज पूबा तो नारिनो ॥ १० ॥ कोई न करशो सग ॥ नू० ॥ विषयासक्त जे जे दोये ॥ ॥ सु० ॥थापद लहे एकग ॥ ५० ॥ ३० ॥ बीजे खमें ए कही ।सुगा गणत्रीशमी ढाल ॥०॥ पन कहे ते धन्य मुनि ॥१०॥ जे न जूवे नामिनी नाल ॥ २५ ॥ सर्वगाथा ॥ G५७ ॥ ॥ दोहा॥ ॥ मदोन्मत्त मूढा परें, नष्ट हृदय जोइ नार ॥ सर्वखमा ने सामर्दु, करे विपरीत विकार ॥१॥ वाणी सानली नृप वदे, मत खेवा मन्न ॥ शील वती श्यामा करी, जोगवो नोग थखिन्न ॥ २ ॥ सेनानी कहे सनिलो,ना मिनी मुख्य जोगांग ॥ रात दिवस बीहितो रहूं, सिदिणी जिम सारंग ॥

॥ श जयानंद केवलीनो रास. तूठी कहे मुन सार ॥ ४० ॥ ४ ॥ केम महारी सेवा करे ।। सु० ॥ काम होये ते नाख ॥ नू ॥ सर्व वातें समरथ तु ॥ मुं० ॥ मनमा मत का य राख ॥ नू० ॥ ५॥ में काएं स्वामिनी सजिलो । सु० ॥ रोग या मु न वेद ॥ नू० ॥ विघन करे कामनोगमा ॥ सु० ॥ प्रिय संगम नवि रेद ॥ नू ॥ ६ ॥ महार। विधन दूरे करो ॥ सु० ॥ तव तेणें श्रीपधि जुन । ॥ नू० ॥ लोह वलय मुज थापियु ॥ सु०॥ मुजने एणी पेरें उन ।नू०॥ ॥॥ए धौपधि पासें थकां ॥ सु० ॥ विघन थाये विसरात ॥ नू० ॥ रोग थावे नहीं सर्वथा ॥ १० ॥न परानवे सिंह ध्याल ॥ नू ॥ ॥ सुर नर को न ख दीये ॥ सु० ॥ हरख लइ हूँ अपार ॥ ५० ॥ विसर जी पूजी नमी ॥ सु ॥ महिमा घणे श्रीकार ॥ नू० ॥ ए॥ तेणें तुम सगम मुन थयो॥ सु० ॥ वली धगें नीरोग ॥ ॥ महारे शिव तुम जोयें ॥ सु० ॥ तुम को करु योग ॥ नू॥१०॥ शीके हमणां उतुं ॥ ॥ सु० ॥रतकीहायें फखो खेद ॥ नू॥ थवसरे सद्गु सारु थशे ॥ सु०॥ हमणां सु सुख वेद ॥नू० ॥ ११॥ एम कही देखाडी मनें ॥ ७ ॥ मूकी शीता मूल ॥नू ॥ मूढ थयो एना वयणथी। सु०॥नवि जाणी प्रतिकूल ॥ नू॥ १२॥ करी विश्वासने उघीयो ॥ सु० ॥ मुज कंतें ते दीध ॥ ॥ वैरणी प्रायें निही ॥ सु० ॥ जाग्यो देखी कपि कीप ॥ ॥ नू० ॥ १३ ॥ खेद नह्यो तु मनथकी ॥ मु० ॥ धायो पू- तास ॥ ॥ नू० ॥ रथ बेठी मधुकन्छ । सु०॥ करती लीज विलास ॥ नू ॥ १४ ॥ जाती दीदी स्नेदथी ॥ सु॥ हूँ करतो लाल पाल ॥ नू ॥ ते कहे मूर जाणे नदिमादजीय स्नेहनो काल ॥नू॥१५॥ दोहा ॥ मूरख घर लही घणी,थरु विद्या थकुलीन ॥ महीला माने नीचकुं, वरसो मेद गरीन ॥१॥ पाप होय सब लोनथे, रस थे व्याधिविशेष ॥ थति व उपजे स्नेह थे, त्रिगु बोहे मुख देख ॥ २ ॥ पूर्वढाल ॥ एक पखो कहो निर्वहे ॥१॥ स्नेद ते केतो काल ।। नू० ॥ विवाद प्रमुख पितायें करो ॥ सु० ॥ ते परवश पणे माल ॥ नू० ॥ १६ ॥ बालथी दुतो स्वैरिणी ॥ १० ॥ मधु कत थतिराग ॥ नू॥ मधुरस्वरें मोही षषु ॥ सु० ॥ गीत कलाने ला ग ॥ ४० ॥ १७॥ निजघरमा एदयं रमु । सु०॥ एहज मुन जरतार ॥ ॥ नू० ॥थत रूप तुन देखोनें ॥ 5 ॥ वली तुज चरित्र याचार ।।

वितीय खंम G३ ॥ नू०॥ १७ ॥ दोहा॥ और गांना खोली खुले, जब लगे पोहोंचे हाथ ॥ प्रेमगांव अंतर पडी, सरके शिरके साथ ॥ १ ॥ ढाल ॥ विवाह सदु मना वीयो । सु० ॥ पण मुज राग न कोय ॥० ॥ सहुने विश्वास पमाडवा ॥ ॥सु०॥ स्नेह देखाडयो तोय ॥ नू ॥१५॥ दोहा ॥ सारी नारी किन्न री. चोथा हे जूधा ॥ नागा सो गया, वेध्या सो मूथा ॥ १ ॥ ढाल ॥ वार घिद्वं तुज फेरष्यो । सु० ॥ तोही न समज्यो गमार ॥ नू० ॥ परि वाजिकदच वलयथा ॥ १० ॥ कपि कीयो एणी वार ॥ ॥नू० ॥ ३० ॥ जो गेव तिरिपणुं मोजमा ॥ सु० ॥ समज्यो न मुज थाकूत ॥ नू ॥ माहा रो दोष इदा नथी ।मु०॥ शाने करे डे तुत॥ नू०॥ २१ ॥ तात वची ला वी बनु । सु० ॥ जाणं काश्क धन खेद ॥ नू० ॥ क्रीडी शायकी॥ ॥सु॥ तुं कपिगणमा रमेय ॥ नू ॥ १२ ॥ एम कही रथ प्रेरियो॥९॥ इहित विशि नणी तेण ॥ ॥ फाल देई दु वलगीयो ॥ सु०॥ वलीय विदारु नखेण ॥ नू ॥ २३ ॥ मास्यो परोणे मुड़ानें ॥ १० ॥ तोही न मूल तास ॥ ४० ॥ म्यान सदित खड़े हस्यो ॥ सु०॥ तव कस्यो कोधे निराश ॥जू० ॥ २ ॥ मूर्छित थ नूयें पडयो ॥ सु० ॥ वातयोगें थयो सका। ॥ नू ॥ राति गई विदाणुं ययुं ॥ सु० ॥ नवि जटुं कल थकल ॥॥ ॥ २५॥ वानरीयूथ देखी करी ॥ सु० ॥ निरघाखो यूपेश ॥ न०॥ वानरीय क्रीडा करु ॥ सु०॥ यूथपति दु विशेष ॥ नू० ॥ २६ ॥ शबरें पकही एक दिन ॥ सु ॥ शिखव्युं नाटक मुक्त ॥ ४० ॥ तुम थाप्यो तु में नर करो ॥ सु० ॥ ए मुज वातमु गुळ ॥ नू० ॥ २४ ॥ मुज पूबो तो नारिनो॥ सु० ॥ कोश्न करशो सग ॥ नू० ॥ विषयासक्त जे जे होये ॥ ॥९॥ थापद लदे एकग ॥ ५० ॥ २७ ॥ बीजे खमें ए कही ॥९॥ गणत्रीशमी ढाल ॥ ॥ पग्न कहे ते धन्य मुनि ॥१॥ जे न जूवे नामिनी नाल ॥ २५ ॥ सर्वगाथा ॥ ५ ॥ ॥ दोहा॥ ॥ मदोन्मत्त मूढा परें, नष्ट हृदय जोई नार ॥ सर्वखमा ने सामर्दु, करे विपरीत विकार ॥१॥ वाणी सांगली नृप वदे, मत खेदाउ मन्न । शीन वती श्यामा करी, जोगवो नोग थखिन्न ॥ २ ॥ सेनानी कहे सनिलो,ना मिनी मुख्य जोगांग ॥ रात दिवस वीहितो रहूं, लिहिणी जिम सारग ॥

GU जयानद केवलोनो रास. ॥ ३ ॥ यत ॥ श्रन्त साहस माया, मूर्खत्वमतिलोनता ॥ अशौच नि दयत्व च, स्त्रीणां दोपा स्वनावजा ॥१॥ दोहा ॥ नामिनी तजधु नयप की, श्ह परनव सुख थाय ॥ तपोरनमा नइ तप करूं, थाणा तुम बादा य॥ ४ ॥ राय विचारे टदयमा, उपरांगे थयो एह । थथवा देवी एवं वु, कहो विरचे नहीं कह ॥ ५ ॥ ॥ ढाल त्रीशमी॥ बटाउनी देशी ॥ ॥ नूपति मनमा चितवे रे, गज रथ थश्व अनेक ॥ मादारे में पण न वि शक्यो, स्त्री 5 खयो ए व्यतिरेक रे ॥ जीव 5ख सहे थनेक रे, कोइ नहीं थाधार विवेक रे, कर्म वैरी परानव नेक रे ॥१॥ कर्मतणी गति ए हवी मेरे लाल ॥एथोकणी॥ ते कीहो उपजे रे, चकी नरके जाय ॥ नरपति ते पायक होये,धनवत दरिक्षी याय रे ॥ शक्तिवतनी शक्ति जाय रे, सुखीयो ते 5 खनर वाय रे, नोरामय ते सरोगी काय रे ॥ कर्म० ॥ ५॥ सुनग दोनागी नीपजे रे, इण नव परनव एम॥कर्म कसा बूटे नहीं, तेह ऊपर थास्था केम रे, एतो थनियत सुख ले नेम रे, सुख विषयना कपर प्रेम रे, ते तो खरन खनन सुख जेम रे ॥कर्म॥३॥ विषय याशा फोकट करे रे, मृग तृष्णा परें तेह ।। नारी थाडी थानकें, मारे नग मृगनें जेहरे ॥ फोकट धरे तस नेद रे, नारी बाले नरनी देह रे, एतो ख वन कपरें मेह रे ॥ कर्म० ॥ ४ ॥ गीथाची निज तातने रे, तिरि कीधो जरतार ।। एम कोई राणी मुनने, करे तो श्यो तस प्रतिकार रे ॥ एक नारी एम हर घार रे, माहारे तो थनेक ने नार रे, सापण वाघण अनुकार रे ॥ ॥ कर्म ॥ ५॥ नव उदवेग एम नावतो रे, बाष्यो नर को ताम ॥ राय वधाव्यो एणी परें, स्वामी हेमनट तापस नाम रे ॥ परिवार न उद्याम रे, तुम पुर सीमाने ग्राम रे, धरे ज्ञान ध्यान धनिराम रेकर्म॥ ॥ ६ ॥ ते गुरु थाव्या सांजली रे, नृप करतो बड्ड मान ॥ घृतपूरमा सा कर परें, नाणी चाल्यो म्यान रे ॥ वदनानु धारी ध्यान रे, जई वीना त रुतलें थान रे, नमतां दीये शाशीष दान रे ॥ कर्म॥ ॥ तापसनको नूपति रे, सानले तस उपदेश ॥ यायु अथिर धन चपल , स्वारथीयो सहन विशेष रे ॥क्षण क्षण क्ष्य थाय तनु शेष रे, नारी राक्षसणीने वे शरे, ख उपजावे सक्लेष रे ॥ कर्म ॥ ७॥ नूप सुणी ते देशना रे, क्षितीय खम Են यधिक वैराग्य धरेय ॥ राज्य वि निज पुत्रने, साथै हरिवीरादिक लेय रे ॥ तापस व्रत थंगी करेय रे, स्वर्णजट तस थनिधा देय रे, गुरु लाननो दर्प धरेय रे॥ कर्म ॥ ए ॥ पट्टराणी सुर सुंदरी रे, बुजी साथें थाय ॥ तापसणी पण नवि कह्यो, निज गर्न ते व्रत श्रतराय रे ॥ मन धारी पण निरमाय रे, पांचशे तापस समुदाय रे, थमें तप करीये इण नाय रे ॥ ॥ कर्म ॥ १०॥ दिन दिन गर्न प्रगट थयो रे, पूब्यो तास विचार ॥ वा त यथारथ रापीयें, सविनांखी निज जरतार रे॥ प्रसवे पुत्री मनोहार रे, शुन लगन नखेतर वार रे, पाले तापसणी परिवार रे॥ कर्म ॥११॥ लक्षण पुख्य लावस्यवती रे, तापससुदरी नाम ॥ बुदिये जीती शारदा, तस तात शिखावे ताम रे ॥ चोश कला गुणधाम रे, हवे हेमजट श्रा पणे गम रे, स्वर्णजट थापे थनिराम रे॥ कर्म० ॥ १२॥ पल्पक विद्या थापतो रे, साधन विधिये समेत ॥ ते सुरसुख नोगी थयो, कुलपति स्वर्णजट थयो नेत रे॥ तापस पाले धनिप्रेत रे, विद्या साधन सकेत रे, उपवास विधि समवेत रे ॥ कर्म० ॥ १३ ॥ गिरि उपर गिरिचूडनु रे, यदनु देहरु एक ॥ ध्यान थासन करी तिहा रह्यो, जप लाख करे सुविवेक रे ॥ देखी कुलपतिनी टेक रे, तुष्टमान थयो अतिरेक रे, एकवीश दिनें ते नेक रे॥ ॥कर्म० ॥ १३ ॥ गगनगामी दियो ढोलीयो रे, कुलपति प्रणम्यो तास ॥ स्तवना करी पारण करे, पल्यंक राखे निज पास रे । ते कपर करिय निवा स रे, विद्याधर परें उन्नास रे, तीरय वदे श्रति खास रे॥ कर्म ॥१५॥ यौवन पामी कन्यका रे, सौनाग्य अभुत रूप ॥ कमला ते चपला थई, उ खें देखी तास सरूप रे ॥ पडयो तास पिता चिताकूप रे, वर खोलवा तस थनुरूप रे, नमे पत्यकें ऋपिनूप रे ॥ कर्म० ॥ १६ ॥ नूप पुत्र व दु देखतो रे, कोई न थाव्यो दाय ॥ एकनृप रूप देखी करी, व्याघरू थानक थाय रे ॥ पन्यक कपर ते वाय रे, देखी वीदीना शपि समुदाय रे, नाय नाता तेह पलाय रे ॥ कर्मः ॥ १७ ॥ सझायें धीरी करी रे, बो साव्या झपि तेद ॥ नखथीनूमि थर लखी, स्वर्णजट तुम कुलपति जे ह रे ॥ को देव शरापें एह रे, थयो व्याघ्र तो ए देह रे, एहमा मधरो मन संदेह रे ॥ कर्म॥१॥ धर्मतत्त्व ज्ञानीयकी रे, नर थाईश निरधार ॥ खोली लावो तेहनें, बीजे खमें अधिकार रे ॥ सुणे श्रीजयानद कुमार जयानंद केवलीनो रास. रे, ढाल त्रीशमी थति मनोहार रे, कहे पनविनय सुखकार रे, जिनधर्म थी जयजय काररे॥कर्मः॥१॥ सर्वगाथा॥१॥ ॥ दोदा ॥ ॥ अमचा धर्मने कपरें, वरुष्टो नहीं थन्य ।। मत्रविया बहु मामी यां, धर्म ते न थयो धन्य ॥ १॥ थक्ष्पादने उजुकना, सारन्म शैव सह कोय ॥ कनिन थई उद्यम करे, होशे विफला दोय ॥ २ ॥ तापस तव चितातुरा, थाव्यो नही उपाय ॥ मुज थादे देइ सहुमुनि, गिरिचूडनें गया गय ॥३॥ पवित्र पस्ने पाथरखो, दर्न सथारो दक्ष ॥ ध्यानासन बेसी पु रें, जाप करे सुर यच ॥ ४ ॥ उपवासी थादर करी, सलारे सुर तेह ।। आंतें थात उपवासने, भावी पूछे एह ॥ ५ ॥तव बोल्या ते कुलपति, स्वा मी करो स्वरूप ॥ सुर कहे हु समरथ नदी, सनिलो तास सरूप ॥६॥ शक्ति ए महोटा सुर तणी, कहो बीजी कांश्वात ॥ तापत कहे धर्म तत्त्व नो, जाए सावो जोइ नात ॥ ७ ॥ ॥ ढाल एकत्रीशमी॥ रमता फाटो घाघरो रे, दशगज फाटो चीर॥ए देशी॥ ॥ हानीने पूर्वी करी रे, धर्मतत्त्वनो जाए रे प्राणी ॥ सुर कहे जूठी नही वात ए प्रमाण ॥१॥ कणेक जने धावियो रे, कहे मुणो चोये दिन रे तेह ॥ मलशे कही देव, गयो गगर्ने सनेह ॥शा मुज था- तापस सह रे, पारणा दिनथी थाज रे जाणोवाट जोतां चौथे दिने, जाग्य थी पीबास्यो॥३॥ शक्ति होय जो तुम्हमा रे, तो करो ए सपकार रे सा मी ॥ सत करे उपकार, परने पामी ॥ ४ ॥ दरिवीरना मुखथी सुणी रे, ध्याघ्र चरित्र विचित्र रे बोखे ॥ करशुं तुम काम थमें, धर्मया यमोजें । ॥५॥ पण तुमें सर्वज्ञ नारखोयो रे, धर्म फरोगीकार रे रूहो ॥ तो तिरिप पु तेन्जी, काढशु ए कूडो ॥ ६ ॥ ते कहे काम थमारडु रे, करयो तव सुर वयपथी ए जाए ॥ तत्त्व जाण गुरु, सत्य ए वखाप ॥ ४ ॥ लावो वन्दि कुमर कहे रे, वसी फज प्रमुख थनेक ते मगावे ॥ ते पण सर्व लावे, नि तयं स्वनावें ॥ ७॥श्रामबरें ए मानशे रे, एम चितवी वन्हिकुम करो तेणें ॥ स्नान मुभा ध्यान, बासनादिक जेणें ॥ ए॥ वाघ पासें वेसारीने रे, मत्र उमरी करी दोम हाथै फरशे ॥ फूंक दीये जूठ, काम केई फरशे ॥१०॥ मत्रोयथा ॥ नमोऽहन्य हासर्वसप मशीकरेन्य होनम सर्वसिदेच्य ति .

दितीय खम ១១ मानंतचतुष्टयेच्य श्रीनम थाचार्येन्य पंचाचारधरेज्य ॐनम उपाध्यायेन्य सर्वविघ्ननयापहारिन्य नम सर्वसाधुन्य' सर्वइष्टगणोच्चाटनेन्य सर्वा नोटान साधय साधय सर्वविघ्नान स्फुटय स्फुटय सर्वदृष्टानुचाटयोच्चाटय खें फट् स्वाहा ॥ ढाल पूर्वती ॥ रेनणी दीधी उपधी रे, हित रूप था ये तेह मूके दार्थे ॥ लघुलाघवी कला, कररी व्याघ्र माथे ॥ ११ ॥ तास प्र नावें नर दून रे, कुलपतिने नमे तेद मोदें माता॥ स्तवना करे कुमर केरी, तुंदी मात भ्राता ॥१२॥ कुलपति थालिंगन करी रे, कहे तुज हो नमस्का र रे नाई ॥ दास्यो मानव जव ते, तें दीयो ए थाई ॥ १३ ॥ पूजे कुमर ता पस मली रे, कुलपतिने वृत्तांत तव नांखे ॥ कन्यावर थर्थे नमुं, गाम नगर लाखें ॥ १ ॥ पर्यंक सार्थे एकदा, पर्वतशिर पडयो ताम निज देखें ॥ व्याघ्ररूपें तव, 5 खनुं न लेखु ॥ ५ ॥ शिला उपर ध्याने रदया रे, ने न मुनि एक देव तस धागें ॥ चार देवी परिवस्यो तिहा, साधुजीने रा गें ॥ १६ ॥ गीत वाजिब नाटक करे रे, विश्वनें नयणानद रे थाये॥ में चित्यु मुन थपराध को प्रायें ॥ १७ ॥ ए मुनियें मुज नाखीयो रे, प्रण म्यो उ खथी ताम दूं रोतो ॥ निन नाषायें बोलु एम,थाईं थव नोतो ॥ १७॥ श्यो अपराध स्वामी कदो रे, मुज कस्यो वाघ दवे मुजकृपा की जें ॥ खमी अपराध मादारूं, मानवपणुं वीजें ॥ १५ ॥ कल्पना पण छ करु नहीं रे,मुनि कहे मनमा श्रश रे जाणो ॥ पण सुरवर कयु का रो पथी नराणो ॥ २० ॥ नाटक पूरु जब कम्यु रे, में मुनि पूबघा ताम रे स्वामी ॥ कोण ए देव कोप्यो, केम मुजमा खामी ॥ २१ ॥ मुनि कहे सां नल ते कथा रे, बीजे खमें एकत्रीशमा ए ढाल ॥ पद्मविजय कहे, मुणतां मगलमाल ॥ २२॥ सर्वगाथा ॥ १० ॥ ॥ दोहा॥ ॥ विद्याधरमा दु वडो, रमणी तजी वली दि॥ प्रवृज्या में पहिव जी, पढयो थागम परति ॥१॥ एकाकी थाणा लही, विचरु वारुरी ति ॥ प्रतियोधु नव्य प्राणीने, तप तपतो धरी प्रीति ॥ २॥ गगनें जाता गिरिशिरें, एक दिन दीतु एम ॥ सामजनें सिद मारतो, न शक्यो देखी नेम ॥३॥ चतरथी कतस्यो, तप परनावें ताम ॥ सिह नाठो शका धरी, फरि उपकारने काम ॥ ॥ पाप सर्व पञ्चरकावीयां, दीर्धा नवपद . ០៨ जयानंद केवलीनो रास. सार ।। सर्व खमावे सत्त्वनें, पामी गुरु उपगार ॥ ५ ॥ न भ्याने मरी तो हमें,मणिचूड सुर नाम ॥ पंच परमेष्टि प्रनावथी, उत्तम गुण थनिरामा ॥ ढाल ॥ वत्रीशमी ॥ मोरा साहेव हो श्रीशीतजनाथ के ॥ ए देशी। ॥ तेह देवता हो चिते उहीनाण के, पुरव पुण्य में ई कस्यु ॥ तव ना एयो हो महारो उपकार के, वीजा सर्व कामे सयु ॥ १ ॥ बढ़ जाते हो प्रणम्यो मुज पाय के, मुज वृत्तांत सननावीयु ॥ एहवे तुज हो पर्यकनी बाय के ॥ देखी कोधमा थावीयो ॥ २ ॥थाशातना हो मुज पर देखि के, दे शराप 5 खी करो ॥ एम सांजली हो मुनिवरनी वाणी के, ते सुर थागल सचखो ॥ ३ ॥आंसु जरतो दो कहे दीन वचन्न के, मूको स राप करो रूपा ॥ कहे निर्भर हो राज्यादिक नमी के, रे मूढ तु ले गत पा ॥ ॥ मुनि केरी हो थाशातना कीध के, फोकट तप तुं याचरे ॥ जा निज पद हो पर्यकें बेश के, मुज परनावें सचरे ॥ ५ ॥ एक मासें हो धर्मतत्त्वनो नाण के, मूलरूपें करशे तनें ॥ ते पासे हो समनी धर्मत त्त्व के, कन्या तुज देजे मनें ॥ ६ ॥ दुथाव्यो हो तिहाथी एवं नाम के, वात थागल जाणो सवे । ते सोनली दो तापस में कुमार के, विस्मयपी गुण सस्तवे ॥ ४ ॥ करे उत्सव दो मगलनां गीत के, गाये तापसणी घ पु॥ कहे कुमरनें हो समजावो धर्म के, जेम थम जाये मिष्यापणु ॥७॥ विस्तारें दो कुमरें कह्यो धर्म के, साधु श्रावक बद्नु नेदथी। बूघा ताप स हो समकेतचं पक्ष के, थावत लिये गतखेदथी ॥ ५ ॥ कहे कुलप ति दो देवें कह्यो मुक्त के, कन्या नावि वर तुम्हो ॥ तेणें परणो हो करी वयण प्रमाण के, जेम राजी था धम्हो ॥ १० ॥ नवि बोल्या हो मुणी तेद कुमार के, ताम कुसुम वृष्टि थई। देखी तापस हो विस्मय ज ह्या चित्त के, तव गिरिचूड तिहां सुरवई ॥ ११ ॥ थई परगट हो कदे सनिलो वात के, में ते झानी बघा जश् ॥ नर थाशे हो केणी परें कहो स्वामी के, तत्त्वज्ञानी कदे शुनमई ॥ १२ ॥ त त्वज्ञानी दो सगें नर थाय के, में पूज्यु केम नाणी ॥ ज्ञानी बोल्या दो तुन सूधर रूप के, जीतशे एद यहिनाणी ॥ १३ ॥ तव दुनम्यो हो राजधानी अनेक के, कोलरू पण को नहीं ॥ मुन जीत्यो हो तव हेमपुर नाय के, वननंज वार करु तही ॥ १४ ॥ ,

विताय खम.
नए
नूपना सुत दो शत नाना जाय के, विण शस्त्रे एवं जीतियो ॥ गजरू
हो हरि लाव्यो ताम के, कही एम वातो थतीतियो ॥ १५॥ उदारता हो
शौर्यता उपकार के, धर्म प्रमुख गुण एहवो ॥ नहीं बीजो हो जगमा थ
झुत के, अनुनवीयो में जेहवो ॥ १६ ॥ कौतुकें करी हो रही बानो थ
त्र के, सवि जोयुं नयणे करी॥ वली सानयो दो थरिदननो धर्म के, न
वसायरमा ए तरी ॥ १७ ॥ प्रवनव हो सस्कारने जोग के, बज्यो ते तु
में सनिलो ॥ धन्यपुरमा हो धनवत धन्यनाम के, धनदेव थागत सामलो
॥१७॥ प्रिया वसुमती दो श्रावक एक मित्र के, तस सगें वली गुरु मल्या ॥
समकित मूल हो थगो कस्यो धर्म के, गुरु वयणां तेणे सनिल्यां ॥१।। एक
दिन तस हो नारीने रोग के, कपनो ते उपशम नणी॥ तेडचा वैद्यनें हो
कस्या बढ़ उपचार के, पण नवि गुण कीधो मुणी ॥ २० ॥ घणु रागें दो
मत्रवादी तेडि के, ते पण सवि नि फल थया ॥ गाढस्नेहें दो घहेला परें
तेह के, पग पग पूले पति सया ॥ २१ ॥ जटी कापडी दो प्रयोगना जाण
के, जे साजी करे मुज प्रिया ॥ तेहने थापु हो लक सुणी एम वात के, ए
क जटी कहे करु किया ॥ १५ ॥ क्षणमा करु दो नीरोगी नारि के, पण
लेच मुखें जे कां ॥ मानी तेणें हो विनयें करी वाणि के, बोक्युं ते दु नवि
जगु ॥ १३ ॥ जोई नारीनें हो तेणें कीध उपाय के, रोग गयो थनुक्रमें
वही ॥ तेद देखी हो विस्मय लह्यो चित्त के, साचो ते एदन सही ।
॥ २४ ॥ करी थाग्रह हो राख्यो एक मास के, तेणें जैनधर्मे शिथिल क
स्रो ॥ जेणें पाम्यो दो व्यंतर नव एह के, शेठ ते दु उति धस्यो ॥ २५॥
तापस साथे दो समकित लघु थान के, धर्मतणी वाणी सुणी ॥ गुरु माथे
दो फूलनी करी वृष्टि के, ए सरिखो जग नहीं गुणी ॥ २६ ॥ बीजे खमें दो
बत्रीशमी ढाल के, पद्मविजय एणि परें कही। मुणे श्रोता हो चित्त राखी
वाम के, निज्ञ विकथा सवि जदी॥ २७ ॥ सर्व गाथा ॥ ए४३ ॥
॥दोहा॥
॥ देव कहे द्यो एदने, यौवन कन्या योग ॥ सुरवरें नारख्यो ए सखर, सू
धो ए सयोग ॥१॥पवयी उपगारीने,परणावो धरी प्रेम ॥ थाणु कता
रथ एणी परें, जाय फिकर वली जेम॥ २॥ कुलपतियें अगीकरयु,कुमरने
प्रार्थना कीप ॥ सामयी सुरवर करे, प्रत्युपकार प्रसि ॥ ३ ॥

. जयानंद केवलीनो रास. ॥ ढाल तेत्रीशमी ।। जुमखडानी देशी ॥ ॥ कनक ममप तिहां सुर रचे, रयणमयी रचे थन ॥ सोनागी सान लो॥ तोरण मुक्तामालना, देखी होय थचन ॥ सो० ॥ १ ॥ देवी तापस णी मली, गावे मगल गीत ॥ सो० ॥ निनाद वजावता,कुसुममाल सु रनीत ॥ सो॥२॥ बिरुदावली सुर वोलता, विद्याधर सञ्जुत्त ॥ सो० ॥ उत्सव सुर तिहां वद करे, उपकारी थाकूत ॥सो॥३॥ कन्या तापस सुं दरी, दिव्यनूपण वस्त्रधार ॥ सो० ॥ तापसें परणावी तदा, कुमरे परणी नारि ॥ सो ॥ ४ ॥ कुमरने थापे देवता, वस्त्रानरण अनेक ॥ सो ॥ ग गनगामि दीये ढोलियो, कुलपति धरिय विवेक ॥ सो०॥ ५ ॥ ते वन रमणी कमां रचे, गिरिचूड देव विशाल ॥ सो० ॥ सप्तनूमि शोनामयी, महोल ति दो ततकाल सो॥६॥ स्वर्गविमान ज्यु शोलतो,तेह कुमरने कान सो॥ खादिम स्वादिम पूरीयो, सर्वांगें सुखसान ॥ सो० ॥ ७ ॥ बढ़ सुरना परि वार,सेवा करे सुप्रकार ॥सो॥ अप्सरा सरखी नारिशु,नोगवे लोग कुमा र॥ सो० ॥ ७ ॥ तीर्थ अनेकनें वांदता, पख्यकनें व तेह ॥ सो०॥कोश दिन नारी विना जाये, कोई दिन नारी नेद ॥ सो० ॥ ए॥ नदी वनमा क्रीडा करे, वली तापसने कुमार ॥ सो ॥ जैन धर्म विधि शीखवे, सम्यक जेद प्रकार ॥ सो०॥१०॥ उपदेश चारित्रनो दीये, ज्ञानतणु फल सार ॥ सो० ॥ उचित नण्या ते अनुकमें, जाणे क्रिया व्यवहार ॥ तो॥११॥ दक्ष थयां जिनशासनें, चारित्र श्वावत ॥ सो० ॥ नववैराग्यथा ते रहे,नि त्य वैराग महंत ॥ सो० ॥ १३ ॥ बीजे खेमें ए कही, तेत्रीशमी वर ढाल ॥ सो ॥ श्रीजयानद रासें थयो, बीजो खम रसाप्त ॥ सो० ॥१३॥ स त्यविजय पन्यासना, कपूर विजय वर शिष्य ॥ सो॥ खिमाविजय वर तेह ना, चढती जास जगीश ॥ सो॥ १४॥ जिनविजयो जगमा जयो, तेद ना शिष्य थनेक ॥ सो० ॥ सत्तमविजय तेदमा थया, पंमित वारू विवेक ॥ १५ ॥ तस पवपंकज थलि समो, पविजय जसु नाम सो॥ तास रुपाथी नाखीयो, खेम बीजो थनिराम ॥ सो० ॥ १६ ॥ ॥ इति श्रीमत्सविज्ञपक्षीय पमितप्रवर पमित श्री उत्तम विजयजीजलि विनेय पंमित पद्मविजयगणिविरचिते प्राकृतप्रवधे श्रीजयानदकेवलिच रित्रे सहस्त्रायुधादि राजर्पिचतुष्टयचरित्रेण चारित्रधर्मवर्णन आइधर्मक ॥ सोग तृतीय खंम. एए लितचक्रायुधचरित्रवर्णन प्रथमव्रतपालनमहात्म्यसूचकनीमसोमदृष्टांत श्रीजयानंदप्रतिबोधादिवर्णन हसकाकनिदर्शनेन श्रीमहानदराजदृष्टांते न च वित्तीयव्रतपालनफलदर्शन श्रीजयानदकुमारकलाग्रहण मणिमजरी प्रथमपत्नीपरिणयन श्रीजयानदकुमारस्य महासेनपानीशविजयगिरिमालि नीदेवीप्रतिबोध तदर्पितमहौषधिक्ष्यलान हेमपुरपुरागमन सोनाग्यमन रोक्तिीयपन्नीपरिणयन रेनणोदेवीप्रतिबोधतदर्पितकामितरूपकारी महौष धिप्राप्ति हेमप्रननूपादि प्रतिबोधलानादि श्रीजयानदकुमारस्य देशांतरचर्या यो हेमपुरपुरोद्यानगतपु:यकोलविनयतापसाश्रमगमन सुवर्णजटकुलप त्यादि तापसपंचसतीसहित गिरिचूडयप्रतिवोध कुलपतिपुत्रीतापसमुंदरी तृतीयपन्नीपरिणयनकुलपतिदत्तपल्यंक विद्यान्वितगगनगामिपत्यकवलेन ना नातीर्यनमस्करणादिवर्णनोनामा वितीय खम समाप्त ॥प्रथमखंभे गाया ॥४३॥ दितीयखमे गाथा ॥ ए६२ ॥ सर्वमली गाथा ॥१४०५॥ तथा प्रथमखमे वक्त श्लोक ॥१३॥ धने वितीयखमे वक्त श्लोक ॥ १॥ सर्व श्लोक ॥ ३२ ॥ तथा सवईयो एक डे इति क्षितीयखम समाप्तः ॥ ५ ॥ , ॥ श्रीशातीश्वरोजयति॥ ॥ श्रथ ॥ ॥श्रीतृतीयखमप्रारन ॥ ॥ दोहा ॥ ॥ शासन नायक समरीये, वर्षमान विख्यात ॥ देवारयनें व्यगुण, स र्व नाषा विख्यात ॥ १ ॥ वीजोखम वह नांति, विगत वरणव्यो एम ॥ त्रीजो खम कनु तुरत, सनिलो श्रोता प्रेम ॥ ५ ॥ सुपे ने थति थालम, शिशु रमवे करे शान ॥ थाहुंनें वलु जूवे, वक्ता / करे व्याख्यान ॥२॥ नयनें नयन मेलावीने, वदन विकस्वरवत ॥ वाणी सुणे वक्ता तणी, ते दीये दर्प थत्यंत ॥ ४ ॥ तेमाटे निजमति तजी, सानलो चतुर सुजाण ॥ श्रीजयानदना रासमां, थागल कह थाख्यान ॥ ५ ॥ ॥ ढाल पहेली ॥ जीरे माहारे जाग्यो कुमर जाम ॥ ए देशो ।। ॥ जीरे मादारे एकदिन सातमी नूमि, वेग रयण सिहासने जीरेनी॥ .

. ए जयानंद केवलीनो रास. ॥नी० ॥ गगनें निरखे कुमार,थावतो देखे निनकनें जीरेनी ॥१॥जी॥ परिव्राजक सुरूप, योवनवय थाव्यो तिहा नोरेनी । जी० ॥ देइ वासीय वत, कुमर कहे रहो तो किहां जीरेनी ॥ २॥ जी० ॥ कोण तुमें सेहेत, थाव्या ते कारण कहो जोरेजी ॥ जी० ॥ की ते तुम काम, थान कता रथ थमें थदो जीरेजी ॥ ३ ॥ जी० ॥ जाणी न करे काम, थावे कलंक दाता नणी जीरेनी ॥ जी० ॥ तेह रूतारथ जाण, थाश पूरे यायक त एणी जीरेजी ॥ ४ ॥ जी० ॥ अवलु मुख फरी जेह, याचक देखीने रह्या जोरेजी ॥ जी० ॥ हुम गिरि समुश् न नार, ते धरतीने नारे कह्या जीरे जी ॥ ५ ॥ यत ॥ दीयतां कथमनीप्सितमेषां, दीयता जुतमयाचित मेव ।। तं धिगस्तुकलयन्नपि वांडा, मर्थिवागवसर सहते य ॥ १ ॥ ढाल पूर्वली॥ ॥ जी० ॥ कुमर चितवे एम, केम बोल्या विए जाणी जोरेजी ॥जी॥ परिव्राजक कहे ताम, तु शूरवीर कुलखाणीयें जीरेजी ॥ ६ ॥ जी० ॥तु जथसाध्य न काय, परउपकारी तुं वडो जीरेजी ॥ जी० ॥ तुज समय वर न कोय, तु जगमा जेम केवडो जीरेजी ॥ ७ ॥ जी० ॥ सांजल माहा री वात, गगातटें मुज गुरु रहे जीरेजी ॥ जी० ॥ नदच थनिधान, जे थाम्नाय बनु लहे जीरेजी॥ ॥ जी ॥ द गगदत्त तस शिष्य,औषधि कल्प गुरु वीये जीरेजी ॥ जी० ॥ मलयकूटें बहु तेह, उलखु सघली ले ही ये जीरेजी॥ ए॥जी॥ जाणु सम्यक् ताम, साधुविधियी ए यदा जोरे नी॥जी० ॥ नई तिहां बहु वार, साधवा मामी में तदा जीरेजी ॥ १० ॥ ॥ जी ।। मलयमात क्षेत्रपाल, ए पर्वतनो थधिपति जीरेजी ॥जी॥ बीवरावे मुज तेद, करे उपसर्ग वली पति जीरेजी ॥१॥जी॥ पाव लेप गुरु दीघ, तेद थाम्नायथी थबरें जीरेजी ॥जी॥ योजन एक उतपात, जाउ ह ए शक्तिवरें जीरेजी ॥ १५ ॥जी॥ बायो इण वन माहि, वी, धाम कनकतएं जीरेनी ॥ जी० ॥ पूबी तापसनें वात, सत्तर सुणी हरल्यो घणु जीरेजी ॥ १३ ॥ जी० ॥ लोकोत्तर तुज वात, मुर पण तुज नवि ज य करे जीरेनी ॥ जी ॥ जाचवा तुमची पास, स्वार्थसिदि तुम वाशरे जी रेजी ॥ १३ ॥ जी० ॥ योग्यनें याचना जेड, सेहमा लाज श्रावे नही जी रेनी ॥ जी० ॥ जो समरथ बो ताम, उत्तर साधक हो वही जीरेजी ।। ॥ १५॥ जी० ॥ कृयर बोल्पा ताम, एहमा झुं नारे घने जीरेजी ॥जी॥

तृतीय खंभ ए३ एम जीती करुं काम, तेहथी सक्नु हलका पके जीरेजी ॥ १६ ॥ जी० ॥ परिव्राजक कहे ताम, ए सवि तुममा सनवे जीरेजी ॥जी॥ पण शो यो जन दूर, पर्वत इहाथी होय जवे जीरेजी ॥१७ ॥ जी० ॥ बारशे मामको मात्र, पूरी होय त्रयेणे दिने जीरेजी ॥ जी० ॥ जो निरविघ्नं था य, चौदशने दिन सिह बने जीरेजी ॥ १७ ॥जी॥ वदि थाम ले था ज, सल था विहाणे चालीयें जीरेजी ॥ जी० ॥ ख) बेसाडी तुज, जा तांत्रण दिन जालीयें जीरेजी ॥ १५ ॥ जी० ॥ हसीनें कहे कुमार, स्वार्थ साधो तुमें जाउ सुखें जीरेजी ॥ जी० ॥ बारशें थावयं प्रनात,निज शके जाणे सुखें जीरेजी ॥ २०॥ जी० ॥ म धरो सवेद लगार, वयण सयण ना नवि चले जीरेजी ॥ जी० ॥थचला मेरुदृष्टांत, सांजली तेह दरखज धरे जीरेजी॥ २१ ॥जी॥ जणवी मलया नाम,परिव्राजक थानक गयो जीरेजी ।। जी० ॥ नारिनें कहे कुमार, पर उपकार अवसर थयो जीरेजी ॥ २२ ॥ जी० ॥ दिवस थशे मुज त्रण, कार्य करी थातु खरो जीरेजी॥ जी०॥ पुरस्य यश थशे तुज,तातनो विनय तुमें करो जीरेजी ॥३॥जी॥ एकादशीनी रात, कुमर पल्यंके थावीयो जीरेजी ॥जी॥पल्यंक गोपवीत ब, साधकनें मल्यो नावीयो जीरेजी ।। २४ ॥ जी० ॥ त्रीजें खमें एह,प हेली ढाल सोहामणी जीरेजी ॥ जी ॥ पद्मविजय कहे वात, थागल घ णी रजियामणी जीरेनी ॥ २५ ॥ सर्वगाथा ॥३०॥ ॥ दोहा॥ ॥ कुमर ते साधकनें कहे, मुखमा विद्या साध ।। तेणे पण मांझी ततद रों, विधियें करी विण बाध ॥ १ ॥ श्रीजय सायुध थति सुनट, विधन करे विसराल ॥ पूवदिशि निशि पेखतो, घूम बदु धूधाल ॥ २ ॥ श्रधित विशि मुख थति थयु, देवी श्रौषधि दीध ॥ ते सनारे ततणे, नमस्कार वली नि ॥ ३ विलय थयो वारु परें, अगनि देखे थाप ॥ यहाहहास्य नीपण थति, ततण थापे ताप ॥ ॥ तोपण छोन्यो ते नहीं, धीरज हृदयें धार ॥ श्रबर वाणी एहवी, सानले थतिहिं श्रसार ॥ ५ ॥ ॥ ढाल बीजी ॥ वन्यो रे कुंवरजीनो सेहरो ॥ ए वेशी॥ ॥ कहे तो पहेला साधक नखु, के उत्तर साधक एह रे कुमार ।। तवत्र टकी श्रीजय बोलीयो, खा पर ए नगेह रे सुरिंद ॥ १॥ श्रीजय देव;

ए। . जयानंद केवलीनो रास. जुजतो ॥ ए थोकणी ॥ नहीं ताहरे वश थमे दोय बु, केम केशरीने मृग खाय रे सुरिंद ॥ अथवा सिहें मृग राखियो, तेह साहमुं नवि नोवाय रे सुरिंद ॥ श्री० ॥ २ ॥ जीतु दु शक समाननें, तो तादरी केही वात रे मुरि व ॥ फरि देव बोल्यो थाकाशमां, तु मानव कीटक मात रे कुमार ॥ श्री॥ ॥३॥ कोण मूरख कोइ माटें मरे, तुं नवि जाणे काय बाल रे कुमार ॥ केम सुरनें जीत मानवी, ए जाणे बाल गोपाल रे कुमार ॥ श्री० ॥ ४ ॥ जा दूरे तु तुजनें नही हणु, तु निरपराधी जेण रे कुमार ॥ तु रक्षक बते पण मारछु, साधक सापराधी तेण रे कुमार ॥ श्री० ॥ ५॥ मुन प र्वत श्रौषधि छतो, विद्या साधे वे एह रे कुमार ॥ मुज थर्चाविक न कस्नु एणों, तेणें मारीश नि सदेह रे कुमार ॥ श्री० ॥ ६॥ तव बोले कुमर ह सी करी, शुं अदृश्य रही करे वात रे सुरिंद ॥ जो वीरपण चित्तमा धरे, तो परगट था साझात रे सुरिंद ॥ श्री॥ ७ ॥ एम तर्जित थमर को पें करी, थयो कोलरूपें परगट्ट रे सुरिंद ॥ पादादत कपित गिरि, साहामो बायो रण सट्ट रे सुरिंद ॥ श्री० ॥ ७ ॥ देवी दोधी श्रौषधि बलें, कुमरे कस्यु सूत्र ररूप रे सुरिंद ॥ को करी यु६ वेढ करे, महाउपर रोक्ष सरूप रे मुरिंदा ॥ श्री० ॥ ए ॥ घोर घुर्घर गरजे घणु, तेणें गिरिगुफा करती गाज रे सुरिंद ॥ मांदो माहे ते विदारता, तेम नख कर्कश थति साज रे मुरिंद ॥श्री०॥ ॥१०॥ महाकायनें महापराक्रमी, स्पर्शवत बेड वलगत रे सुरिंद॥प वंत धरती कपावता, उबजे वजी देव पहंत रे सुरिंद ॥ श्री० ॥ ११ ॥नी पण रण एपीपरें बहु कयुं, देवता सूअरनी वाढ रे सुरिंद ॥ कुंधर कोखें जांगी तिहां, जेदनी हती थतिशय गाढ रे सुरिंद ॥ श्री० ॥ १३॥ करी बुबारव नाशी गयो, कुवर कोलथी मुरकोल रे सुरिंद ॥ करी हस्तीनुं रूप प्र गट थयो, उबालतो सूट कलोल रे सुरिंद ।। श्री० ॥ १३ ॥ तव हस्तिरूप कुथर करी, करे गुरू चलावे नूमि रे सुरिंध ॥ गिरिशृग पडे गारवें, मानु फूटशे हमणां व्योम रे मुरिंद ॥ श्री० ॥ १४ ॥ इतनांगा सूढ पीडा थइ, नागे सुर करिवर ताम रे ॥ सुरिंद ॥ तिम सिदरूपें बेगु जूजता,सुरकेशरी दास्रो ते वाम रे सुरिंद ॥ श्री० ॥ १५॥ एम सर्व युझे सुर दारियो, तव क्रोध चढयो अत्यंत रे सुरिंद॥ नीषण रूप करे दवे, यतिरीक्ष बिनस्स दे खंत रे सुरिंद ॥ श्री० ॥ १६ ॥ ताट वच्च स्थूल जंघा धनी, गिरिकदरा उद ए तृतीय खम र वखाण रे सुरिंद ॥ एधु लांबी शिला सम हृदय , लांबी कश कोटि प्र माण रे सुरिंद ॥ श्री० ॥ १७ ॥ वडशाखा सम जुजा जेहनी, स्थूल रडु समी नसा जाल रे सुरिंद ॥ नीसातरा सम जस थंगुती, थंजन सम वणे काल रे सुरिंद ॥ श्री० ॥ १७ ॥ कीलक सम दतावली, श्रगनि स्थानक स म नयन रे सुरिंद ॥ स्थूलने लघु चिपट्ट नासिका, कटाह समान वदन्न रे सुरिंद ॥ श्री० ॥ ॥ १५ ॥ शिर त्रकोण मूढक समु, स्थूल काबरा जेहना केश रे सुरिंद ॥ बिल कान गाल बेशी गया, नादें गाजे शैलेश रे सुरिंद ॥ ॥ श्री० ॥ ५० ॥ डमरुक वजावे कर यकी, स्फुटाटोप करे वाली नाग रे सुरि द ॥ मोघर करवाल धयां करें,एम चार दाथनो लाग रे सुरिंद ॥श्री॥२१॥ नुजास्फोट घटाट्ट हास्यें दवे, सानल रे दु क्षेत्रपाल रे सुरिंद ॥ मलयमा ल नामें वडो, करु वैरीनो हु काल रे सुरिंद ॥ श्री० ॥ २२ ॥ तुजछु में युद्ध कस्युं जिके, ते पुक्क्रीडाने काज रे सुरिंद ॥ मत जाणजे द्वजोत्यो थबु, सुर न जीताये को व्याज रे सुरिंद ॥ श्री० ॥ २३ ॥ हजी का ग युं नया ताहरु, मरे परनें थरथें केम रे सुरिंद ॥ मुज बालने मारता ज स नहीं, जीवतो मूक्यो जा खेम रे सुरिंद ॥ श्री० ॥ २४ ॥ कहे कुमर ता हरे कोहा थइ, मादरे थयो परम्पकार रे सुरिंद ॥ सुर थसुरपति पण न वि गणु, मुज धागल तुज श्यो नार रे सुरिंद ॥ श्री० ॥ २५ ॥ जीतायें तेजें न वययकी, नगशिर दीये पद रविबाल रे सुरिंद ॥ धीर मरण श्छे उ पकारयो,मत मरणनी बीहीक देखाड रे सुरिंद ॥ १६ ॥ यत ॥ दस्तिस्थू लतम साकुशवश किं दस्तिमात्रांकुशो, वजेणापिहता पतति गिरय किं वजमात्रोगिरि ॥दीप प्रज्ज्वलिते प्रणश्यति तम किं दीपमात्र तम, स्तेजो यस्य विराजते स वलवानस्थलेषु क प्रत्यय ॥१॥ ढाल पूर्वती ॥ जय मर ए जाणशं युके करी,फरि युछ करो जो होश होय रे सुरिंद ॥ एम तर्जि त क्रोध लही करी, धायो थति मोघर लइ सोय रे सुरिंद ॥ श्री० ॥२७॥ कुमरें कस्यु रूप ते सारिखु, सनारी तव नवकार रे सुरिंद ॥ लेई खड्ग धायो सुर ऊपरें, दोय घा वचावे तेवार रे सुरिंद ॥ श्री० ॥ २७ ॥ एम खड्गयु ६ बहुविध करी, उर्जय जास्यो ए कुमार रे सुरिंद ॥ करी नागनें करडे कु मारनें, एक हाथें धरी तरवार रे सुरिंद ॥ श्री०॥ २५ ॥ एकदाथें मोघर ले ई फरी, एक हाय वजावे तूर रे सुरिंद ॥ सर्वशक्ते जूजे चत करें, तव श्री . ए जयानंद केवलीनो रास. जय पण अतिशूर रे सुरिद ।। श्री० ॥ ३० ॥ विघ्नहर श्रौषधिना बलथ की, वली धर्म पराक्रम तास रे सुरिद ॥ करवालें ममरुक नेदियु, खमोर्ख म कस्या नागपाश रे सुरिंद ।। श्री० ॥ ३१ ॥ खगने मोघर पण चूरीयां, तव वृद नपाडे देव रे सुरिंद ॥ कुमरे पण ते चूरियो, पुल्ये करी तस त तखेव रे सुरिंद ॥ श्री० ॥ ३२ ॥ एम नव नव वदे जूजोया, वली स्यून गिला सुर लोध रे सुरिंद ॥ कुमरे पण की तेणी परें, देवनें पण विस्मय दोध रे सुरिंद श्री० ॥ ३३ ॥ हवे वल युथी जूझता, वध नुज शिर स्फो ट करत रे सुरिंद ॥ पदयी धरती कपावता, कुर्कट परें उपरे पडत रे सुरि द ॥ श्री० ॥ ३४ ॥ करे मुष्टिप्रदार वेहु जणा, पडे उपडे पण न जण य रे सुरिंद ॥ बालोटे एथिवी कपरें, कपर हेग्ल वली थाय रे सुरिंद ॥ ॥ श्री० ॥ ३५ ॥ युद्धे पण मले विउडे यदा, तव राग परें परवाय रे स. रिंद ॥ सिदनादने मुष्टिप्रहार जे, स्कधाघात जास्फोट कराय रे सुरिंदा ॥ श्री० ॥ ३८ ॥ तस नादें विश्व कपावता, गिरि गाजे पृथिवी चलत रे सुरिंद ॥ दिश बहेरी नदीयो विसस्थूला, सायरनी वेली वधत रे सुरिंद ॥ श्री० ॥ ३४ ॥ पडे वृदयी फल त्रूटी करी, नगशृगयी तेम शिला पात रे सुरिंद ॥ प्रेत नाचेनें वली नासता, प्रीतिने वली नय थापात रे सुरिंद ॥ श्री० ॥ ३० ॥ मुष्टचादिकें श्रीजयानदजी, करी प्रांत तीलायें तास रेसु रिंद ॥ उलाली दूर नारखी दियो, पडयो शिला कपर 5 खराशि रे सुरिंद ॥ ॥ श्री० ॥ ३५ ॥ घोर शदे ने शिना चूरण थई, पीडा थइ तास थत्यत रे सुरिंद ॥ पण देव माटे खम नवि थयो, सुर चमक्यो चित्त बनत रे सु रिंद ॥ श्री० ॥ ४० ॥ तस महिमा पराक्रम देखीने, माने मुज जीत्यो एण रे सुरिंद ॥ कदे वीर तु जगमा एक डे, निज रूप प्रगट करी तेए रे सुरिंद ॥श्री॥१॥त्रीजे खमें पूरण थइ, ए बीजी ढाल रसाल रे सुरिंद ।। कहेप प्रविनय पुस्करी,सघले लहे मगतमाल रे सुरिंद॥श्रो॥४शासर्वगाथा॥७॥ ॥ दोदा ॥ ॥ नवी नीत्यो सुनने किणे, जीत्यो मुजने जेण ॥ जग जीत्यो ते जा समी, तुजनें मानुं तेण ॥१॥ मत्रधर्म तादरो मनें, कहे मुज करुणा था ए॥ जिण बलथी तु जींतीयो, मोदोटोनें मादाराण ॥ ५ ॥ जाए। श्रीज यानंदनी, धर्मथकी धरे शांत, धरी सहजारुति धर्मनें, नांखे थति नाग्य तृतीय खंभः ए वत ॥३॥ वीतराग मुज देव ,सयमी गुरु सुजाण ॥ अरिहंत नापित था वरु, सार धर्म सपराण ॥ ॥ तेणें दु तुजने जीतीयो, मुणी धर्म विस्ता र ॥ सुर कहे बज्यो समी परें, पोहोंचाडपो नवपार ॥ ५ ॥ ॥ ढाल त्रीजी ॥ मुनिमन सरोवर ईसलो ॥ ए देशी ॥ ॥ श्रीजयानदजी सजिलो, धर्मदत्त इण नामें रे॥पाबले नव ढुं श्रावक द्रुतो, झदि घणी मुज धामें रे ॥ श्रीजया० ॥ १॥ एक दिन दोगे उद्यान मां, माम पण करनार रे ॥ परिव्राजक निश्चलासनी, ध्यान लीन सुविचा र रे ॥ श्री० ॥ २॥ नाम धनेश्वर तेहनु, चार कोडी धन त्यागी रे ॥ माद रो मित्र गृहस्थमा, लोक वदन श्रावे रागी रे ॥ श्री० ॥३ ॥में परशस्यो तेहनें, श्रदो तप त्यागनें ध्यान रे ॥ श्राद प्रशसित कारणे, राय प्रमुख दि ये मान रे ॥ श्रो० ॥ ४ ॥ एम समकितमा लगाडियो, चोयो में अतिचा र रे ॥ बद्नु मिथ्यात्व व वियु, वर्शन हास्यो तिवार रे ॥ श्री० ॥ ५ ॥ थ यो मिथ्यात्वी देवता, समकेतवत जो होय रे ॥ वैमानिक सुर कपजे, नही सदेह ते कोय रे ॥ श्री ॥६॥ यत । सम्मदिही जीवो, विमाणवक नबधए धान ॥ जइ नवि सम्मत्त जहो, थहव न बाठ पुचि ॥ १ ॥ ढा ल॥ बोधि विराधीने पजे, नीच देवमाहे प्राणी रे ॥फरी समकित लहे दोहिनु, बढुनव नमे कहे नाणी रे ॥ श्री० ॥ ॥ धर्म थाराध्यो थतिच री, न गयो ऽर्गति तेरों रे॥ तुजयकी समकित पामीयो, पूर्व सस्कार हतो जेणे रे ॥ श्री० ॥ ७ ॥ ज्ञाने जाणीने नाखीयु नेणें मुज तुं उपकारी रे ॥ तुहिज मित्र बाधव गुरु, दे समकित निरधारी रे॥प्रो० ॥ ९॥ योग्य निय म वलीथापियें, तांजली तेद कुमार रे ॥श्रीजय कहे तुं धन्य ले, तुज सफ ल थवतार रे ॥ श्री० ॥ १० ॥ समकित्त तेदने थापीयु, हिंसानो नियम श्रापे रे । सुर कहे धर्मदायक तुमें, तुऊ झण केणीपरें कापे रे ॥ो० ॥ ॥ ११ ॥ वर मागो का मुखथकी, देई पूजु तुम पाय रे ॥ क्वमर कहे को खप नहीं, तो पण सांजल नाय रे॥ श्री० ॥ १२ ॥ साधक पुरुपने चौप धि, थापो वानित जेह रे ॥ उद्यम श्रम विदु एहनो, सफल करो तुमें तेद रे ॥ श्री० ॥ १३ ॥ देव कहे वेशु सही, पण नहीं रहे एह पासे रे । ना ग्य बिना दरिका घरे, रयण निधान न नशे रे ॥ श्री० ॥ १४ ॥ में था णा करी एहनें, थोपधि व्यो मन नावे रे ॥ पमित औषधि कम्पमा, गुरु १३ ए जयानंद केवलीनो रास. कीधो सुप्रस्तावें रे ॥ श्री ॥ १५ ॥ पण तुं सार थोपरि ल, मुजने कर उपकार रे ॥ गुरु पूजा होये माहरे, कुमर वोया तेवार रे ।। श्री० ॥१॥ पांच श्रौषधि दोये देवता, श्रीजयकुमरे ते लोधी रे ।। सुर कहे महिमा सो नलो, एहवी नग परसिदिरे ॥ श्री० ॥ १७ ॥ वे श्रांगुन जाडी वली, लांबी बागुल चार रे ॥ पीली ते मत्र जपे थके,सीजे चार हजार रे । ॥ श्री० ॥ १७ ॥ मत्रश्चायं ॥ महानैरवी का दो छ श्रियं वितर वि तर स्वाहा ॥ ढाल ॥ रत्न पांचशे थापशे, था दिन दिन हवे बीजी पण एहवी, वरणे राती जेह रे ॥ श्री ॥ १५ ॥ तेहनो महि मा पूज्यायकी, शु थापे एम नाखे रे ॥ माग्याथी वमणु लियो तुमें, त्यो त्रिगुणु एम दाखे रे ॥ श्री० ॥ २० ॥ कहे पण थापे कोई नही पण कौतुक एह दीसे रे ॥ पूरव परें एहनी साधना, सुणता हियहु दीसे रे ॥ ॥ श्री० ॥ २१ ॥ मत्रश्वाय ॥ महावादिनी फ्री में प्रो महाश्रिय वद वद स्वाहा॥ ढाल ॥ त्रीजी उजलो थौषधी, परवयी थई माने रे ॥ एह नी साधना काइ नथी, पण महिमा सुणो काने रे ॥ श्री०॥ ॥ स्थावर जगम विप दणे, रोग सवे मटी जाय रे ॥ घात व्रणादिक एदना, जाये नी र सींचाय रे ॥ श्री० ॥ २३ ॥ थई मानें चोथी एहथी, औषधि वरवं नी ती रे ॥ पूर्वपरें मत्र साधना, साधे काम एकेली रे॥ श्री० ॥ २४ ॥चेतन अथवा पूतली, मस्तकें श्रौषधि दीघी रे ॥ अतीत अनागत वारता, पूर्वी कहे सवि सीधी रे ॥ श्री॥ २५॥ मत्रो यथा ॥ मादाघटे चमे चमशा सिनि प्रश्नार्थ वद वद के स्वाहा ॥ ढाल ॥ चोथी ए ज्ञानी समी कहे, दवे पा चमी जेद श्याम रे॥ दृष्ट कामण मत्र चूर्ण जे, टाखे ए अनिराम रे ॥ ॥ श्री० ॥ २६ ॥ए विधि मदिमा जे नाखीयो, कुमरें धाख्यो विलासें रे ।। क्षेत्रपालशं थावीया, साधक पुरुषनें पासें रे ।। श्री ॥५४॥ त्रीजे खमें त्रीजी कदी, ढाल थधिक सन्नासें रे ॥ पद्मविजय कदी पुस्यनी, श्रीजयान वनें रासें रे ॥ श्री० ॥ २८ ॥ सर्वगाथा ॥ ११०॥ ॥ दोहा ॥ ॥ सुर कहे साधक सानलेले धौषधि मन लाय ॥ ध्यान मूकी धारी करी, न जे मनमा नाय ॥ १ ॥ एद कुमर धनुनाव , सनिली सुर ५ जेय ॥ निर कुमर नमी कहे, श्रीजयानद मुणेय ॥१॥ काम परे सम तृतीय खंग. (UU रण करे, पूबी प्रणमी पाय ॥ निज थानक निर्भर गयो, साधक हवे सजा य॥३॥नमि नमिनें मन नावती, श्रौषधि लीये अपार ॥ नाग प्रमा ऐ नली परें, विधि पूर्वक अवधार ॥ ॥ साधक कुमरनें कहे मुणो, सघ लु सीधु काज ॥ तुम पसायथी ततणे, माहारं ए महाराज ॥ ५॥ तु म थाणायें जातं तुरत, निज थानक निरधार ॥ परउपगार प्रमोदथी, करे याणा ते कुमार ॥ ६ ॥ पल्यंक वेशी कुमर पण, यावे थवर राह ॥ रतन पुरनें ऊपरें, उपवनमा थबाद ॥ ४ ॥ ॥ ढाल चोथी॥ राय कहे राणीप्रत्ये ॥ ए देशी॥ ॥ तिहां जिनचैत्य मनोहरु, देखीने विचारे ॥ उल्लंघन आशातना, रखे थाय केवारें ॥ दु वारी एह जिणदनी, जे नव ख वारे ॥ १॥ 8 तरी पेसे चैत्यमां, विधियें प्रणमतो ॥ योग्यता जाणी ढोलीयो, किहां यक गोपंतो ॥ टु वारी० ॥ ॥ विधि सामग्री मेलवी, जिनध्यानमा लीनो ॥ त्रण उपवास करी तिहां, मत्र जापज कीनो ॥ हु ॥३॥त्रणे मत्र ते साधीया, प्रनु रुपननी पासें ॥ जिनवर पूजी नावच्छ, पाणी हर्ष उनासें ॥ दु० ॥ ५ ॥ पारणु फलथी करे हवे, थाद्य थौषधि पासें ॥ पां चशे रत्न ते पामीयो, जेहथी। ख नासे ॥ हूँ॥ ५ ॥था महोत्सव ते हनो, करी पुरमा थावे ॥ निर्धन श्रावकनें घरे, नाहु जे थावे ॥ ॥ ६ ॥ आपी तेदनें घिर रहे, मन हर्ष ते थाणी ॥ गोशीप चदननी करे, प्रतिमा गुणवाणी ॥ दु० ॥ ४ ॥ ते लघुप्रतिमा गुरु कनें, प्रतिष्ठावी थापे ॥ नित्य पूजा करे तेहनी, अत्ति श्रानद व्यापे ॥ दृ॥ ॥ौपधि प्रतिमा एकनी, माघडामा मूके ॥माबडो गर्नगृहें वे, तस विधि नवि चूके ॥ दु० ॥ ५ ॥ पांचशे रत्न ते नित दीये, पहेली श्रौषधि जेद ॥ थर्थ कामने धर्म ते, सा घे ससनेद ॥ द्व०॥ १० ॥ श्रा-६ कुटुब सेवा करे, कुमरनी नक्तं ॥ दान दी ये तेणे वश सगु, श्रढलक श्रतिशक्ते ॥ दु०॥ ११ ॥ बहु परिवार को ति हां, देतो याचक दान ॥ राज्य पंथे ते करावतो, वेशी गीत गान ॥ दु० ॥ ॥ १२॥ मूल नाम थणनाणते, लोकें दो नाम ॥ श्रीविलास सान्वय प णे, इष्ठित करे काम ॥ हु० ॥ १३ ॥ तिण नगरीनो राजीयो, रत्नरथ इति नाम ॥गांनीर्य शौर्य ऐश्वर्यता, बद विद्या ठाम ॥ द्व० ॥१४॥ विजय या त्रायें जेहनें, अचला चल थाय ॥ रतिमाला गणिका तिहा, रूपें रंन हराय 100 जयानंद केवलौनो रास ॥ दु०॥ १५॥ तरुण पुरुप मन जीपती,कला चोशन धाम ॥ च जीती पद नख मिशे, कराचे परणाम ॥ दु० ॥ १६ ॥ राय तणु चित्त रीजव्यु, कमें पु त्री श्रावी ॥ पूर्व पुत्री श्रनावथी नृप चित्त अति नावी ॥ दु०॥ १३ ॥ जन्ममहोचव नूपति करे, लक्षण रूपवती ॥ रतिरनादिक नारीने,लावरस्य जी पती ॥ दु० ॥ १७ ॥ स्वजन जमाडी थापतो, रतिसुदरी नाम ॥ चापेक रूपवेली परें, बधती अनिराम ॥ दु० ॥ १५ ॥ वय स्पर्धा नित्य वधे, गु ण विनयने रूप ।। सुदरता लावण्य वली, दादिस्य अनूप ॥ दु० ॥ २० ॥ योग्य थ कला ग्रहणने, कलाचारय पास ॥ जणवा मूके नूपति, करवा अन्यास ॥ ढुं० ॥ २१ ॥ प्रझायें जीते सरसती, जणी थोडा दिनमा ॥ त्रण वर्गना शास्वनी, जाण थइ सद्ध जनमा ॥ दुः॥ २२॥ पदर्शननां रहस्य ते, जाणे रूडी रीतें ॥ नारतो विद्ध रूपें थई, मानु श्रावी प्रीतें ॥दु॥३॥ पूरव नव सस्कारथी, वली जैनी नणावे ॥ तेणे जिन शासनमा यई,पशु ते दृढना ॥ दु० ॥ २५ ॥ सरसती पुस्तक लेई करें,मानु जोवे एम ॥ ए हवी कोय यइ के थशे, एम जाणवा नेम ॥ दु० ॥ २५॥ त्रीजे खमें चो थी कही, पविजयें ढाल ॥ कुमरी गर्व रहित पशु, जैनना रसाल ॥ ॥ द्व० ॥ २६ ॥ सर्वगाथा ॥ १४३ ॥ ॥ दोहा॥ ॥ वर जोवा वारू परें,रूप देखीने राय ॥ विशो दिश मूके दूतनें,जोवा ते पण जाय ॥ १॥ अन्य राणीनी रेषा, जाणी नुप मुजाण ॥रतिमाला पुर बादिरें, नवी थावासने गण ॥ ५ ॥ कलास्थैर्यनें कारणे, रतिमुद रीने राय ॥ पासे राखे प्रेमशु, श्रापे व्य श्रमाय ॥ ३ ॥ नृप कुलदेवी नामयी, उपवन माहें थचन ॥ चडेश्वरी चैत्यमा रहे, नित्य थाये पूजन वस्न ॥४॥ उपकारी श्रणगारनी, चोमासु चित्त लाय ॥ चोमासी तप याचरी, श्रावासे को श्राय ॥ ५ ॥ सबाय ध्यानशुलीन जे, ते सुणी देवी ताम ॥ गुणरागीरीजी घणु, थावर करे तबाम ॥ ६ ॥ ॥ ढाल पांचमी ॥ वीर वखाणी राणी चेजा जी ॥ ए देशी॥ ॥ पुरवनव तस सानोजी, सनिलो नाखीये तेह ॥ विप्रदेवशर्मा न दी पूरें नी, नदिनी पुत्री स ख रेह ॥ १ ॥ कर्म विचित्रता सोनलो जो॥ एघोकणी ॥ परणी मुशमी वाडव प्रत्ये जी, दैवषी वरष थर्स एक॥मर तृतीय खंम १०१ ए लयु तास पति धन्यवा जी, निकट थालयमा श्रायात ॥ क०॥॥ दे प्रतिबोध श्राविका करी जी, समकित थपुवत शीन ॥ धर्ममा दृढव्र ती ते थई जी, साध्वी पासें रहे लोल ॥क ॥३॥ तात थाणायें तप ते करे जी, षट थावश्यक करे नित्य ॥ देवगुरु नक्तिवती घणु जी, अल्प थारंन सुविनीत ॥ क० ॥ ४ ॥ काम घरना दवे तस पिता जी, नविकरा वे तस पास ॥ धर्ममा विधन जाणी करी जी, करे हवे धर्म चन्नास का ॥ ५॥ एम करता हवे अन्यदा जी, गुरु प्रमुख तणे रे घनाव ॥थासन मत परिव्राजिका जी, तास सयोग सनाव ॥ क० ॥ ६ ॥ गोठ तेदध बनी तेहनें जी, मधुर वयणे करे वात ॥ समकित मलिन अतिचारयो जो, पा खमो परिचय ख्यात ॥ क० ॥ ४ ॥ प्रीति थई ते पिता वारतो जी, पण नवी मूके तस सग ॥ एह स्वनाव में स्त्री तणो जी, सग सरिखो होये रं ग ॥ ० ॥ ७॥ एवं समे सावित्री ब्राह्मणी जी, जे पाडोसण तस पुत्र ॥ यज्ञदत्त श्रजना तस प्रिया जी, पण नहीं प्रीति सयुत ।। क० ॥ए । पर नव गयो नदिनी पिता जी, यवत्त देखी तस रूप ॥ मोहीयो पण नवि ते मला जी, खेद पामे प्रतिरूप ॥ क० ॥ १० ॥ दिन दिन दूबलो ते हो ये जी, पूजे तस सावित्री माय ॥ लाज मूकी कायुं मातनें जा, मात कहे शानें खेवाय ॥ क० ॥ ११ ॥ तुज मनोरथ सफला फलं जी, हवे एक दिन तस माय ॥ नदिनीने एकांतें कहे जी, दे विश्वास शुन गय क०॥ ॥ १५ ॥ मादारो पुत्र तुज चतो जो, यौवनवय स्मर रूप ॥ धन्य तु तेह अगीकरी जी, यौवन सफल अनुरूप ॥ क० ॥ १३ ॥ नारीना नोग विण विफल ले जी, रूप लावस्य सोनाग ॥ यौवन विनव नि फल सवे जी, तेणे धर मुज मृत राग ॥ क० ॥ १४ ॥ वृक्षवयें तप करवु घटे जी, तरुणपणु फोक मत हार ॥ पति मरणे कापु पांचने जी,थन्यपति करण वि चार ॥ क॥ १५ ॥ ययुक्त॥ नटे मृते प्रवृजिते, क्लीवे च पतिते पती ।। पंचस्वापत्सु नारीणां, पतिरन्यो विधीयते ॥ १ ॥ ढाल ॥ सांजली तेद कोधे चढी जी, मूढ तुजनें रे विकार ॥ कर्णकटुक ए तु शु लवी जी, 3 गैतिनो अधिकार ॥ क० ॥ १६ ॥ सतीय ते शील लोपे नहीं जी, जो क दी दोय प्राणांत ॥ इह परलोक विरुर तेजी, वाचरे केम निब्रांत ॥ ॥ १० ॥ १७ ॥ तक्तं ॥ वरं प्रविष्ट ज्वलिवं दुताशन, नचापि लमं सु २00 जयानंद केवलीनो रास ॥ दु०॥ १५ ॥ तरुण पुरुप मन जीपती,कला चोरात धाम ॥च जीती पद नख मिशे, करावे परणाम ॥०॥ १६ ॥ राय तणुं चित्त रीजव्यु, कमें पु त्री प्राची पूर्व पुत्री अनापथी नृप चित्त श्रति नागी ॥ दु०॥ १७ ॥ जन्ममहोघव नूपति फरे, लक्षण रूपवती ॥ रतिरनादिक नारीने,लावल्य जी पती॥ दु० ॥ १७ ॥ स्वजन जमाढी थापतो, रतिसुदरी नाम ॥ थापे क पवेली परें, वधती श्रनिराम ॥ दु० ॥ १ ॥ वय स्पीयें नित्य वधे, गु ए विनयनें रूप ॥ सुदरता लावण्य वत्ती, दाक्षिण्य अनूप ॥ दु० ॥ २० ॥ योग्य थइ कला ग्रहणने, कलाचारय पास ॥ नवा मूके नूपति, करवा अन्यास ॥ दु० ॥ २१ ॥ प्रझायें जीते सरसती, नणी थोडा दिनमा ॥ त्रण वर्गना शास्त्रनी, जाण थइ सहु जनमा ॥ दु०॥ २२ ॥ पट्दर्शनना रहस्य ते, जाणे रूडी रीतें ॥ नारतो बिड रूपें थई, मानु भावी प्रीतेंदु॥२३॥ पूरव नव सस्कारथी, वली जैनी नणावे ॥ तेणे जिन शासनमा थई,घणु ते दृढनावें ॥ दु० ॥ २४ ॥ सरसती पुस्तक सेई करें,मानुं जोवे एम ॥ ए हवी कोय थइ के थशे, एम नाणवा नेम ॥ दु०॥ २५॥त्रीजे खमें चो थी कही, पनविजयें ढाल ॥ कुमरी गर्व रहित घणु, जैननावें रसाल ॥ ॥ दु॥ २६ ॥ सर्वगाथा ॥ १४ ॥ ॥ दोहा॥ ॥ वर जोवा वारू परें,रूप देखीने राय ॥ दिशो विश मूके दूतनें,जोवा ते पण जाय ॥ १॥ अन्य राणीनी झषा, जाणी नूप सुजाण ॥रतिमाला पुर बाहिरें, उवी थावासने ठाण ॥ ॥ कलास्थैर्यनें कारणे, रतिमुद रीने राय ॥ पासे राखे प्रेमशु, थापे इव्य श्रमाय ॥ ३ ॥ नृप कुलदेवी नामथी, उपवन माहें अचल ॥ चद्देश्वरी चैत्यमा रहे, नित्य थाये पूजन वन ॥४॥ उपकारी थपगारजी, चोमासु चित्त लाय ॥ चोमासी तप याचरी, श्रावासें को श्राय ॥ ५ ॥ सबाय ध्यानशु लीन जे, ते सुणी देवी ताम ॥ गुणरागीरीजी घणु, थादर करे सहाम ॥ ६ ॥ ॥ ढाल पांचमी । वीर वखाणी राणी चेलणा जी ॥ ए देशी॥ ॥ पुरवनव तस सानखोजी, सांजलो नांखीये तेद ॥ विप्रदेवशर्मा न दो पूरे जी, नदिनी पुत्री खरेद ॥ १॥ कर्म विचित्रता सोनलो जो॥ एथोकणी ॥ परणी सुशर्मा वाटव प्रत्यें जी, देवधी वरप पहुं एक ॥ मर तृतीय खंग १०१ ए लघु तास पति धन्यदा जी, निकट श्रालयमा आयात ॥ कण्॥२॥ दे प्रतिबोध श्राविका करी जो, समकित अणुव्रत शान ॥ धर्ममा दृढव्र तो ते थई जी, साध्वी पासें रहे लोल ॥ क ॥३॥ तात थाणायें तप ते करे जो, षट थावश्यक करे नित्य ।। देवगुरु नक्तिवती घणुंजी, अल्प थार्रन सुविनीत ॥ क० ॥ ४ ॥ काम घरना दवे तस पिता जी, नविकरा वे तस पास ॥ धर्ममा विघन जाएी करी जी, करे हवे धर्म वनास का ॥ ५॥ एम करता हवे अन्यदा जी, गुरु प्रमुख तणे रे थनाव ॥ श्रासन मठ परिव्राजिका जी, तास सयोग सनाव ॥ क० ॥ ६ ॥ गोठ तेवा बनी तेहनें जी, मधुर वयणे करे वात ॥ समकित मलिन अतिचारयो जो, पा खमी परिचय ख्यात ॥ क० ॥ ७ ॥ प्रीति थई ते पिता वारतो जी, पण नवी मूके तस सग ॥ एह स्वनाव में स्त्री तो जी, सग सरिखो होये र ग॥ ० ॥ ७ ॥ एवं समे सावित्री ब्राह्मणी जी, जे पाडोसण तस पुत्र ॥ यज्ञदत्त श्रजना तस प्रिया जी, पण नहीं प्रीति सयुत ॥ क० ॥ ॥ पर नव गयो नदिनीपिता जी, यज्ञदत्त देखी तस रूप ॥ मोहीयो पण नवि ते मला जी, खेद पामे प्रतिरूप ॥ क० ॥ १० ॥ दिन दिन दूबलो ते हो ये जी, पूढे तस सावित्री माय ॥ लाज मूकी कयुं मातनें जा, मात कहे शाने खेवाय ॥ क० ॥ ११ ॥ तुज मनोरथ सफला करु जी, हवे एक दिन तस माय ॥ नदिनीने एकति कहे जी, वे विश्वास शुन गय ॥०॥ ॥ १५ ॥ मादारो पुत्र तुज सतो जी, यौवनवय स्मर रूप ॥ धन्य तु तेह थगीकरी जी, यौवन सफल थनुरुप ॥क० ॥ १३ ॥ नारीना नोग विण विफल जी, रूप लावस्य सोनाग ॥ यौवन विनव नि फल सवे जी, तेणे धर मुज सुत राग ॥ क० ॥ १४ ॥ वृक्षवयें तप करवु घटे जी, तरुणपणु फोक मत हार ॥ पति मरणें का पांचने जी,श्रन्यपति करण वि चार ॥क० ॥ १५ ॥ यमुक्त ॥ नटे मृते प्रवृजिते, क्लीवे च पतिते पती॥ पंचस्वापत्सु नारीणा, पतिरन्यो विधीयते ॥ १ ॥ ढाल ॥ सांजली तेद क्रोधे चढी जी, मूढ तुलनें रे धिक्कार ॥ कर्णकटुक ए तु शु लवी जी, 5 गतिनो थधिकार ॥ क० ॥ १६ ॥ सतीय ते शील लोपे नहीं जी, जो क दी होय प्राणांत ।। इह परलोक विरुक्ष तेजी, थाचरे केम निनांत ॥ ॥ क० ॥ १७॥ तहक्कं ॥ वरं प्रविष्ट ज्वलितं दुताशन, नचापि न सु , . 100 जयानंद केवलीनो रास. ॥ हु ॥ १५ ॥ तरुण पुरुप मन जीपती,कला चोशम धाम ॥ च नीती पद नरख मिों, करावे परणाम ॥ हुँ० ॥ १६ ॥ राय तऍचित्त रीजव्यु, कमें पु त्री प्रावी ॥ पूर्व पुत्री अनावथी नृप चित्त अति नावी ॥ दु० ॥ १ ॥ जन्ममहोघव नूपति करे, सदण रूपवती ॥ रतिरनादिक नारीन,लावण्य जी पती ॥ दु० ॥ १७ ॥ स्वजन जमाडी थापतो, रतिसुदरी नाम | थापे क पवेली परें, वधती श्रनिराम ॥ दु०॥ १५ ॥ वय स्पीयें नित्य वधे, गु ण विनयनें रूप ॥ सुदरता लावण्य वली, दाहिएय थप ॥ दु०॥ २० ॥ योग्य यश कला ग्रहणनें, कलाचारय पास ॥ जणवा मूके नूपति, करवा थन्यास ॥ दु० ॥ २१ ॥ प्रझायें जीते सरसती, नणी थोडा दिनमात्रण वर्गना शास्वनी, जाण थइ सदु जनमा ॥ दु०॥ २२॥ पदर्शननां रहस्य ते, जाणे रूही रीतें ॥ नारतो बिटु रूपें थई, मानु श्रावी प्रीतें ॥दु॥२३॥ पूरव नव सस्कारथी, वली जैनी नणावे ॥ तेणे जिन शासनमा थई,घणु ते दृढनावें ॥ हूँ ॥ २४ ॥ सरसती पुस्तक लेई करें,मानु जोवे एम ॥ ए हवी कोय थइ के थशे, एम जाणवा नेम ॥ दु०॥ २५॥त्रीजे खमें थो थी कही, पनविल ढाल ॥ कुमरी गर्व रहित घणु, जैननावें रसाल ॥ ॥दु० ॥ २६ ॥ सर्वगाथा ॥ १४३ ॥ ॥ दोहा॥ ॥ वर जोवा वारू परें,रूप देखीने राय ॥ दिशो दिश मुफे दूतनें,जोवा ते पण जाय ॥ १॥ वन्य राणीनी इषा, जाणी नूप सुजाण ॥रतिमाला पुर बाहिरें, नवी थावासनें गण ॥ २॥ कलास्थैर्य में कारणे, रतिसुद रीने राय ॥ पासे राखे प्रेमशु, थापे इव्य श्रमाय ॥ ३ ॥ नृप कुलदेवी नामयी, उपवन माहें अचल ॥ चश्वरी चैत्यमा रहे, नित्य थाये पूजन वन ॥४॥उपकारी थरंगारजी, चोमासु चित्त लाय ॥ चोमासी तप याचरी, श्रावासें कोई श्राय ॥ ५ ॥ सघाय च्यानशु लीन जे, ते सुणी देवी ताम॥ गुणरागीरीजी घणु, श्रादर करे राहाम ॥ ६ ॥ ॥ ढाल पांचमी ॥ वीर वखाणी राणी चेलणा जी। ए देशी॥ ॥ पूरवनव तस सोनखोजी, सोनलो नांखीये तेह ॥ विप्रदेवशर्मा न वो पूरे जी, नदिनी पुत्री मुख रेह ॥ १ ॥ कर्म विचित्रता सनिलो जो॥ ए थोकणी ॥ परणी मुशर्मा वाव प्रत्ये जी, वैवषी वरष पहुं एक ।। मर - -- तृतीय खंम. २०३ मीजी, उत्तम एह वर ढाल ॥ श्रीजयानना रासमांजी, पद्मविजय सुर साल ।। क० ॥३४॥ सर्वगाथा ॥ १३॥ ॥ दोहा ॥ ॥ ब्रह्म पासंती ब्राह्मणी,कूतरी था किरतार ॥ कष्ट सरपुं ते किहां गयुं, ए को थवर प्रकार ॥ १॥ मुज पण एम मत नापजे, जोगबु तेणें दु नोग ॥ थावी निज थागारमा, लक्षणे जाणे लोग ॥ २ ॥ सावित्री गित सवे, परगट एणो परें पेखी, पूरव परें कहे पापिणी, मणिम नही कां रेख ॥ ३ ॥ नदिनी कहे नारी प्रतें, सावित्री सुण वाणि ॥ बांधवथी बीहुँ बढु, वारु करो विन्नाण ॥ ४ ॥ सावित्री कहे साचलु, जाशुं तीरथ जात ॥ श का जेम नवि सपजे, ए बलनो अवदात ॥ ५॥ नोगव नोग नली परें, देशांतरेंजर दक्ष ॥ इव्य पितानु दोधलु, निज हस्ते करी न्यद ॥ ६ ॥ एम कही इस उपार्जना, पुत्र मूके परवेश ॥ पीपर मोकले वढू प्रतें, वाडवी करती वेश ॥ ॥ नदिनीने सेवा निमित्त, जाणी घरे रही जाम ॥ सुव्रता थार्या तिणे समे, थाव्यां थवसर पाम ॥ ७ ॥ ॥ ढाल बही ॥ सुण बेहेनी पियुडो परदेशी ॥ ए देशी॥ ।। पूरव परिचित थार्या श्राव्यो, नविनी मनमा नाव्यां रे ॥ नंदिनी प्र एमी तव ते पूले,धर्म वात तुम ने रे ॥ पू०॥ १॥ वात प्रसगे स्वाशय नाख्यो, थार्यायें तव दाख्यो रे ॥ नोली रे तुं केम मूजाणी, एतो नरक नीताणी रे ॥ पू० ॥२॥श्ररिहत मारगा तु साचो, कल्पित वात सां माची रे ॥ रागी षो मूढ जे प्राणी ते कल्पित कहे वाणी रे॥ पू० ॥३॥ पूरवनवन ज्ञान न एहनें, कपट पाटव के जेहनें रे ॥ पुत्रथी स्वर्ग लहे जो को, तो उत्तर मुण सोइ रे ॥पू०॥॥ नागिण कुर्फटीने वली शूकरी, गईनी शुनीने बकरी रे ॥ स्वर्गं तेह जशे सद् पदेला, व्रत तप जप करे घ देला रे ॥ पू० ॥ ५ ॥ ते कारण जिनमत लही साचो, जेदवो हीरो जा चो रे ॥ तेणे शीलें मन मम कर काचो, वीतरागमतें राचो रे ॥पू० ॥ ६ ॥ यत ॥ रागा पाहा, मोहादा वाक्यमुच्यते ह्यनृतं ॥ यस्य तु नैते दो पा, स्तस्यानृतकारण किं स्यात् ॥ १॥ पूर्वढारत ॥ शोलखमनथी जिनवर ना खे, थापद एणे नव चाखे रे । परनव नरक निगोदमा जावे, उचो दोदी जो थावे रे ॥३०॥ ॥ वली तीर्थचणी गईनी थाये, तुरगी मृगी उख २०२ जयानंद केवलीनो रास. जनाचित व्रत ॥ वरहि मृत्यु शुचिगुरुकमणा, नचापि शीलस्वलितस्प जीवितम् ॥ १ ॥ पूर्वढाल ॥ काम शास्त्रोक्त किरिया थकी जी, नरकगति नवि धवराय ॥ शोलखमनथको निश्चयें जी, प्राणीयो नरकमा जाय ॥ ॥क० ॥ १७ ॥ एम प्रतिहत करी तेहनें जी, मौन करी गइ निजगेड ॥ दोय त्रण वार एम का घणु जी, पण विलखी थइ तेह ॥ क० ॥ १५ ॥ कार्य थसाध्य निनथी सही जी, तेह परिव्राजिका पास ॥ नदिन। तास वश जाणीने जो, सेवना करती उन्नास ॥ क० ॥ २० ॥ पूछे परिवाजिका एकदा जी, केम करे सेवना मुह ॥ सावित्रीय सघj का जी, मोहवशे साध्य तुझ ॥क० ॥ २१ ॥ अगीकरी तास विसर्जती नी, हवे करे ता स उपाय | कूतरी एक तेणें वश करी जी, श्रशनपानादिक दाय ॥ कण् ॥ ॥ २२ ॥ पादपतनादि चेष्टा प्रतें जी, शीखवे थतीय थन्यास ॥ नदिनी देखता एकदा जो, कूतरी तेही निज पास ॥ क० ॥ २३ ॥ चटुमा चूर्ण नारख्यु यदा ना, तेह करती थश्रुपात ॥ पाय लगाडी शुनीप्रत्ये जी, नदि नी देखी साक्षात ॥ क० ॥ २४ ॥ पूरे परिव्राजिकाने तदानी, एदशु कौतु कथाज ॥ सा कहे पूर्वनव सोनलो जी, मुजशु एदने जे काज ॥ क० ॥ ॥ २५ ॥ एथिवीपुरे दत्त ब्राह्मण वसे जो, तेदने टीकरी दोय ॥ प्रथमने अमिदत्त परणीयो जी, पुत्र त्रण तेहनें होय ॥ क० ॥ २६ ॥ पति मूवे था परिवाजिका जी, नगिनी लघु ते पण ताम ॥ थनिशर्मानें ते परती जी, मास पटें विधि थयो वाम ॥ क० ॥ २७ ॥धव मरी गयोतिरूपि पीजी, श्छतो दरिदत्त तास ॥ सा न श्छे हरिदत्तनेंजी, शील खहुँनही खा स ॥क ॥ १७ ॥ धूर्त उपदेश तस चिच वस्योजी, नविलहे नोग अतरा य ॥ वनगिनीने फहे व्रत वीयोनी, ते कदे नवीय अपाय ॥ क ॥श्या अपुत्रिणी नहीं व्रत योग्पनेंनी, तेह वारी पण एम ॥ नवि रही थर परि ब्राजिकानी, नवि श्छे कोयनें तेम ॥ १० ॥ ३० ॥ थायुपूरें थई कूतरी नी, देखी मुन जाति सनारि ॥ पाय पडे ए रोती थकीजो, दुग मनुष्य नवहार ॥ क० ॥३१॥ नोग अंतरायनें शोचती जी, तेपों मुणी नदिनी घातं ।। प्रार्थना नग नवि कोनीयेंनी, जोग अंतराय बधात ॥क ॥३२॥ कपटणी एम कपटें करीजी, नोलवी नदिनी नार ॥ हीणी संगतिथी हो पापएनी, थावता नवि करे वार क० ॥ ३३ ॥ खम त्रीने कदी पांच २०५ तृतीय खंम वीने, नसुणे श्रन्यनु नाम ॥५॥ दासीयो दूर करे, पुरुष ने थावे पास ॥पू रवनवपति पामवा, थादरीयो थल्यास ॥ ६ ॥ ॥ ढाल सातमी ॥ एवं अवसर तिहां बर्नु रे ॥ ए देशी ॥ ॥ एक दिन नाटकणी तिहां रे, श्रावी विजया नाम रे ॥ चतुर नर ॥ निज योग्य बदु परिवार रे लोल॥ श्रावी महाराष्ट्र देशथी रे, नृपघर पो लने गम रे॥ च॥ चारी ने नीर मूके तदा रे लोल ॥१॥ नाटकें जीते मुजनें रे, पासी था तास रे ॥ १०॥ नहीं तो तस दासी कर रेलोल ॥ एह प्र तिज्ञा माहरी रे, उद्घोषणा करे खास रे ॥ च ॥ नृप पण पडह वजाव तो रे लोल ॥ २ ॥ पण नवि कोइ परगट भयो रे, नगरमा जीतणहार रे ॥ ॥१०॥ राय विषाद लई करी रे लोल ॥ चितवे मुज पुरमा नहीं रे, कोई क लानमार रे॥ च ॥ रतिसुंदरी ते जाणीने रे लोल ॥३ ॥ तातनो खेद निवारवा रे, कहे जीतुं एह नारी रे ॥ १० ॥ पण नरपरखदमा नदी रे लोल ॥ नृप कहे नर दूर रहे रे, तव सा करे थंगीकार रे ॥ च ॥ दिव स ठरावी घरें गहरे लोल ॥ ३ ॥ सक्त दिने नरपति दवे रे, विजया तेहा वे तल रे ॥ च ॥ रतिसुदरी नृप थाणथी रे लोल ॥ बेसी प्रवर सुखास ने रे, उपकरण नृत्य सब रे ॥ च० ॥ दासीयो नर दूर करे रे लोल ॥५॥ बढ़ परिवार परवरी रे, पण चित्त चितवे एम रे ॥ च ॥ मुल नाटकने सारखी रे लोल । वीणावादिका कोई नहीं रे, तेणें करशु कहो केम रे ॥ च ॥ श्रीविलास चोहटें रह्या रे खोल ॥ ६ ॥ देखी अचरज पामी में रे, पूढे कोइकनें वात रे ॥ च० ॥ ते पण सवि मामी कहे रे लोल ॥ना टक जौवा कौतुकी रे, पण नरथी न जवात रे ॥ च ॥ रूप करे तव नारीनु रे लोज ॥ ७॥ मनगमती वीणा तदा रे, मागी लाव्यो को पास २॥०॥ तेद पेटकमाहे जली रे तोल ॥राय सनामां ते गई रे, धर ती मन उन्लास रे ॥ १० ॥ थोडी सनायें नृप उपविशे रे लोल ॥ ७॥को तुक जोनारा जिके रे, ते नर राख्या दूर रे॥च० ॥ विजयाने नृप बाणा करे रे लोल ॥ विजयायें नाटक मामियु रे, नाना करणादि पूर रे॥च०॥ गीत वालित्रयं मेलवी रे लोल ॥ ए॥ रीफवे ते सघली सना रे, वशनन्ना में नाच रे ॥ १० ॥थति बुरिकायें तेम वली रे लोल ॥ तंठलपुजें सूच! उवी रे, ऊपर फूलनो ताच रे । च० ॥ नाटक कस्यु तेह कपरे रे लोल ।।

१०४ जयानंद केवलीनो रास. दाय रे ।। सूश्ररणी उंदरडीख सहेती, जार घणो तिहाँ वहेती रे ॥पू० ॥ ७॥ कुरूपीने कडुई वाणी, योनिरोगें थकुलाणी रे ॥ कोठरोग दीनांगने विकला, निकलाने वली उकुना रे ॥ पू० ॥ एउष्ट जीवित अल्पायु पामे पुत्र वियोग सुख वामे रे ॥ कुशीत कर्म किमे नवी लूटे, न वनव 5 ख नवि त्रूटे रे ॥ पू० ॥ १० ॥ वात सुणी ते नरकथी बोहोनी, सा धवी वयरों नीनी रे ॥ स्थिर धर्म शीसें था वोले, नावे कोई तुम तोले रे ॥ ७ ॥ ११ ॥ उर्गति पडती मुजनें राखी, जिनवचनामृत नाखी रे ॥ मुष्टबोध विपनो कखो नाश, न पडु दवे को पास रे ॥ पू०॥ १२ ॥ ए णी परें कहीनें प्रणमो पाया, निजघर माहे धाया रे ॥ वली सावित्री ता स बोलावे, तेहनें कहे इण रावें रे ॥ ५० ॥ १३ ॥ हवे तु नीच श्राचार न सेवु, मत कहे मुजने एहवु रे ॥ जो ए वात कहीश हवे मुजनें, 5 व दे वरावीश तुजने र ॥ पू॥१४॥ नदिनी चातथी बीहीती नासे, ग निज पुत्रनी पासे रे ॥ थन्यदेशे गयां साधवी विचरी, धर्ममा तत्पर इतरी रे ॥पू० ॥ १५ ॥ तप करे मुक्तावली रत्नावली, पाखम सग तजे जाली रे ।। परपारखानो परिचय पामी, समकिता था खामी रे ॥ पू० ॥ १६॥ त दर वरस श्रावक धर्म पाल्यो, पण नवि कर्मने गाल्यो रे ॥ मरण सदी चश्वरी देवी, थई अल्प शदि कहेवी रे ॥ पू० ॥ १७ ॥ वैमानिक सुख थी वचाणी, विराधितनी कमाणी रे ॥ तेणे मुनिवदन करीने देवी, निज थवदात कदेवी रे ॥पू० ॥ १७ ॥ समकित पामी मुनिवर पासें, सेवा करी चधमासे रे ॥ मुनि विचरे सघ साहाय्य करती, विधन ते सहना ह रंती रे ॥ पू०॥ १५ ॥ ही ढाल ए बीजे खंमें, नाखी रंग यखमें रे ॥ पद्मविजय कहे उत्तम सगें, उत्तमता होये रंगे रे ॥ पू० ॥ २० ॥३१॥ ॥ दोहा ॥ ॥ सप्रनावा देवी सुशी, रतिसुदरी अनुरुप ॥ नर्ता मले एम नावती, नजन चिता नूप ॥१॥ थरचे देवी धादरें, तुष्टमान थर तेद ॥ सुपरें जांखे स्फुट परें, सनिलजे ससनेह ॥ ३ ॥ नरपति थागल नाचता, पूत ती वोय प्रधान ॥ तरी थनयी थावशे, चामर लेई थाचान ॥२॥ वीं एवादकनें वींजो, प्रवनव पति तेह ॥ वासुदेव सम वरणव्यो, श्द नव जरता एद ॥ ४ ॥ जागीने जिनराजनी, पूजा करे प्रणाम । दया पूजे दे १०५ तृतीय खम वीने, नसुणे श्रन्यनुं नाम ॥ ५॥ दासीयो दुरे करे, पुरुष न थावे पास ॥ पू रवनवपति पामवा, यादरीयो श्रन्यास ॥ ६ ॥ ॥ ढाल सातमी ॥ एवं अवसर तिहां मूंबनु रे ॥ ए देशी ॥ ॥ एक दिन नाटकणी तिहां रे, श्रावी विजया नाम रे ॥ चतुर नर ॥ निज योग्य बद परिवारो रे लोल॥ श्रावी महाराष्ट्र देशथी रे, नृपघर पो लने गम रे॥ च०॥ चारीने नीर मूके तदा रे लोल ॥१॥ नाटकें जीते मुजनें रे, दासी था तास रे ॥ च० ॥ नहीं तो तस दासी करु रे लोल ।। एह प्र तिज्ञा मादरी रे, उद्घोषणा करे खास रे॥ च० ॥ नृप पण पडह वजाव तो रे लोल ॥ ॥ पण नवि कोइ परगट थयो रे, नगरमा जीतणदार रे ।। ॥ च ॥ राय विषाद लई करी रे खोल ॥ चितवे मुज पुरमा नहीं रे, कोई क लानंमार रे॥ १० ॥ रतिसुंदरी ते जाणीने रे लोल ॥३ ॥ तातनो खेद निवारवा रे, कहे जीतुं एह नारी रे ॥ च ॥ पण नरपरखदमा नदी रे लोल ॥ नृप कहे नर दुरे रहे रे, तव सा करे थंगीकार रे ॥ च ॥ दिव स तरावी घर गइ रे लोल ॥ ४ ॥ उक्त दिने नरपति दवे रे, विजया तेडा वे तह रे ॥१०॥ रतिसुदरी नृप थाणथी रे खोल ॥ बेसी प्रवर मुखास ने रे, उपकरण नृत्य समरे ॥ च ॥ वासीयो नर दूर करे रे लोल ॥५॥ बद्ध परिवार परवरी रे, पण चित्त चितवे एम रे ॥ च ॥ मुज नाटकने सारखी रे सोल ॥ वीणावाविका कोई नहीं रे, तेणें करशु कहो केम रे॥च ॥ श्रीविलास चोइटें रह्या रे लोल ॥ ६ ॥ देखी थचरज पामी में रे, पूजे कोश्कनें वात रे ॥ च० ॥ ते पण मवि मांझी कहे रे लोल ॥ना टक जौवा कौतुकी रे, पण नरथी न जवात रे ॥ च ॥ रूप करे तव नारी रे लोल ॥ ॥ मनगमती वीणा तदा रे, मागी लाव्यो को पास रे॥ च ॥ तेद पेटकमांहे नली रे लोल ॥ राय सनामा ते गई रे, धर ती मन उस्मास रे ॥ च॥ थोडी सनायें नृप उपविशे रे लोल ॥ ॥को तुक जोनारा जिके रे, ते नर राख्या दूर रे॥ च०॥ विजयाने नृप थाणा करे रे लोल ॥ विजयायें नाटक मामियु रे, नाना करणादि पूर रे॥०॥ गीत वानित्रा मेलवी रे लोल ॥ ए॥रीमवे ते सघली सना रे, वशनाना ये नाच रे ॥ १० ॥थति बुरिफा तेम वली रे लोल ॥ संकुलपुजें सूच। नवी रे, कपर फूलनो ताच रे॥ च ॥ नाटक कस्यु तेह कपरे रे लोल ।। + १०४ पामे पुत्र जयानट केवलीनो रास. दाय रे ॥ सूअरणी उदरडी मुख सहेती, जार घणो तिहां बहेती रे ॥ ५० ॥ ७ ॥ कुरूपीने कहुई वाणी, योनिरोगें थकुलाणी रे ॥ कोठरोम हीनांगने विकता, निकलाने वली उकुना रे ॥ पू० ॥ ॥ उष्ट जीवित अल्पायु वियोग सुख वामे रे ।। कुशीत कर्म किमे नवी लूटे, न वनव सुख नवि त्रूटे रे ॥ पू० ॥ १० ॥ वात सुणी ते नरकथा बोहोनी, सा धवी वयणें नीनी रे ॥ स्थिर धर्म शीसें थइ वोले, नावे कोई तुम तोलें रे ॥ पू० ॥ ११ ॥ उर्गति पडती मुजने राखी, जिनवचनामृत नाखी रे ॥ मुटबोध विपनो को नाश, न पडु दवे कोइ पास रे । पू० ॥ १२ ॥ ए पी परें कहीने प्रणमो पाया, निजघर माहे थाया रे ॥ वली सावित्री ता स बोजावे, तेहनें कहे इण रावें रे ॥ पू० ॥ १३ ॥ हवे तु नीच श्राचार न सेवु, मत कहे मुजने एदवु रे ॥ जो ए बात कहीश दवे मुजनें, 5 व दे वरावीश तुजने र ॥ पू० ॥ १४ ॥ नदिनी नातथी वोहीती नासे, गऽ निन पुत्रनो पासें रे ॥ श्रन्यदेशे गया साधवी विचरी, धर्ममा तत्पर इतरी रे ॥पू० ॥१५॥ तप करे मुक्तावली रत्नावली, पाखम सग तजे नाली रे ॥ परपाखानो परिचय पामी, समकतमां थइ खामी रे ॥ पू० ॥ १६ ॥ स इस्ल वरस श्रावक धर्म पाल्यो, पण नवि कर्मनें गाल्यो रे ॥ मरण जही चश्वरी देवी, थई थल्प शदि कहेवी रे ॥ पू० ॥ १७ ॥ वैमानिक सुख थी वाणी, विराधितनी कमाणी रे ॥ तेणे मुनिवदन करीने देवी, निज अवदात कहेवी रे ॥पू० ॥ १७ ॥ समकित पामी मुनिवर पासें, सेवा करी चधमासे रे ॥ मुनि विचरे सघ साहाय्य करती, विधन ते सगुना द रंती रे ॥ पू० ॥ १५ ॥ बही ढाल ए त्रीजे खमें, नारखी रंग अखौ रे ॥ पद्मविजय कहे उत्तम सगें, उत्तमता होये रगें रे ॥ पू० ॥ २० ॥२१॥ ॥ दोहा ॥ ॥ सप्रनावा देवी सुएगी, रतिसुदरी धनुरूप ॥ नर्ता मले एम नावती, नजन चिता नूप ॥ १ ॥ थरचे देवी वादरें, तुष्टमान अश्तेद ॥ सुपरें नोखे स्फुट परें, सनिलजे ससनेह ॥ २ ॥ नरपति बागल नाचतां, पूत ली वोप प्रधान ॥ उतरी थनयी थावशे, चामर लेई याचान ॥ ३ ॥ वीं वादकनें वीजशे, प्रवनव पति तेद ।। वासुदेव सम वरणष्यो, हि नव जरता एद ॥ ४ ॥ जागीनें जिनराननी, पूजा करे प्रणाम ॥ दक्षा पूजे दे तृतीय खम. २०७ ॥ च ॥ पूरव नवना रागथी रे लोल ॥ २१ ॥ नारी रूप धरी करी रे, वेती तस घर बार रे ॥ च० ॥ दासीयो देखीने उत्सखी रे लोल ॥ रतिसुंदरीने व धामणी रे, दीधी तव अलंकार रे ॥ च ॥ बहु मूला दीये दासीने रे लोल ॥ ॥२२॥ साहामी जइ रतिसुदरी रे, लागी तेदने पाय रे ॥ च ॥ कग वे वनु हर्पथी रे लोल ॥ कुशल तुजने हे सखी रे, माहारी जीवितदा य रे ॥ च ॥ अनुकपा करी मादरी रे लोल ॥ २३ ॥ चालो घरमांहे दवे रे, सावी ते घरमांह रे ॥ च ॥ पल्पके वेसारीने रे लोल ॥ धर्म शास्त्र कला तणा रे, करे विनोद उत्साह रे ॥ च ॥ निज हस्ते न्हवरावती रे लोल ॥ २४ ॥थमृत सम नुजाविने रे, पोते वावरे थाहार रे ॥ च० ॥ नक्तियें निजघर राखती रे लोल ॥ ते पण पूर्वमोहें करी रे,रही हवे बिलु ने प्यार रे॥१०॥ दिन दिन थधिकेरो धरे रेलोल ॥ २५॥ सातमीत्री जा खममा रे, पद्मविजय कदी ढाल रे ॥ च ॥ श्रीजयानदना रासमां रे लोल ॥धर्म काम अर्थ शास्वनी रे, वातो करे सुरसाल रे ॥ च०॥ पूरव नवना प्रेमयी रेजोल ॥ २६ ॥ सर्वगाथा ॥ २४३ ॥ ।। दोदा ॥ । बगुदिन काढे एम बिट्ठ, रतिसुदरी सुप्रसन्न ॥ सामुहिक साचु लहे, एम चिते एक दिन ॥ १ ॥ सण जोतां दृ लखु, चकी सम से चेन ॥ ना रीपणे तो नवि होये,जाची ठे वत्ती जैन ॥ २ ॥ गति चेटा स्वर मुख गु णा, पुरुप योग्य परधान ॥ कोश्क कारणथी कस्खु, नारी रूप निदान ॥३॥ एम निश्चय करीथाखती, स्मेरमुखी ससनेह ॥ जाणु दु जुगतें करी,तहत्त करी सुणो तेद ॥ ४ ॥ देवी वयणे दाखीयें,पूरव नवपति प्रेम ॥ कला दे खावीय कारमी, कृत्रिम रूपें केम ॥ ५ ॥ अनुयद कीजें थम नणी,स्वाना विक था स्वामि, स्नेहथकी साचुं कहे, प्रियानो धाग्रह पामि ॥ ६ ॥ शश स्मरथी थधिक श्री, देखी तास देदार ॥ रोमांचित रमणी थई, थानद थग अपार ॥ ॥ ॥ ढाल थामी ॥प्रेमनां वादल वरश्यां दाहाडा सोहिला॥ ए देगी। ॥थाज थानद थयो, पुरवनव पति मलियो धन्य दिन थाजनो । ए थांकणी ॥थान पूरवपुल्य विनव फलियो,थएचित्यो चितामणि मलियो ॥था ॥ कहे श्रीजयानद मुणो नारी, तुज सौनाग्यता वावडी सारी ।।

२०६ जयानंद केवलीनो रास. ॥१॥ नाटक नाटके नृप दीये रे, दान भने बहुमान रे ॥३०॥ नाटक करता तेदने रे लोल ॥ नख श्रगति नगना रे, विपरीत थयां तेणें थान रे ॥ ॥ च ॥ रतिसुंदरी सङ्घनें वाखवे रे खोल ॥ ११ ॥ नृप था रतिसुदरी रे, नाटक करे अद्भुत रे ॥ च० ॥ देवता पण मोही रहे रे लोल ॥ कुमर नारी वजावती रे, वीणा नृत्य थाकूत रे ॥ च ॥ ते ध्वनि श्रवण सुधा समीरे लोल ॥ १२॥ नाद तथाविध कठीयो रे, देवने उलन जाण रे॥ ॥ च ॥ हय गय पशु पण थिर रह्या रे लोल ॥ तो नरनु कहेतु किश्यं रे, नाटक पण तिणें नाग रे ॥ च ॥ रना इरावती सुदरी रे लोल ॥ ॥ १३॥ विजयानो नारन किश्यो रे, तिहां देवी प्रनाव रे ॥ च ॥ म णिपूतली दोय कतरी रे लोल ॥ वीजे सवीणा नारीने रे. सह लह्या वि स्मय ताव रे ॥ च० ॥ रतिसुदरी चिन चितवे रे लोल ॥ १४ ॥ देवी क यु ते सवि मत्यु रे, पण जरता केम नारी रे ॥ च० ॥ माया इहां कोई सनवे रे लोल ॥अथवा जाणगु धागो रे, नानो निरधार रे ॥ १० ॥ पण राखवी पासे सही रे लोल ॥ १५ ॥ पद्म तंतु ऊपर करे रे, विजया नाटक सार रे ॥ च ॥ रतिसुदरी तव नाचती रे लोल ॥ लूता तेतुक पर सही रे, जीता ए निरधार रे ॥ च० ॥ जय जय रव परगट थयो रे लोल ॥ १६ ॥ रतिमाला नृप थाणथी रे, करे उत्सव सुप्रकार रे ॥ च० ॥ निजघर लावे पुत्रीने रे लोल ॥ रतिसुंदरी तव मोकप्ले रे, तेडवा कुवर नारि रे ॥ च० ॥ निज प्रतिदारियो मानथी रे लोल ॥ १७ ॥ केटली नू मिश्राविया रे, नारीरूपें कुमार रे ॥ च ॥ नागरूपें तेश्रावीने रे लोल ॥ थाव्या स्वरूपें निजघरें रे, दवे विजया जे नारि रे ॥ १० ॥ दासी थई दम धारणा रे लोल ॥ १८ ॥ वासीयो खोले कुमारने रे, पण नवि वीठी ते नारि रे ॥ १० ॥ रतिसुदरीने ते सवि का रे पोल ॥ सनिली 5 वणी ते थई रे, करे प्रतिज्ञा सार रे ॥ च० ॥ भारतध्याने ते पडी रे लोल ।। ॥१॥ न मले ए नारी जिहां लगें रे, तिहां लगें न करूं थादार रे ॥०॥ थाक्ल ष्याकुल सद्ध थयां रे लोल ॥ रतिमाला मुख बद्ध कहे रे, न करे थाहार जेवार रे ॥ १० ॥ वासीयो नृपने ते जर कहे रे लोल ॥ २० ॥ त्रण दिन नगर शोधावी रे, न जडी कोई उपाय रे॥ च० ॥ कुमर हवे चोथे दिने रे लोल ॥ एका मुल रागिणी रे, श्राहार विना मरी जाय रे तृतीय खंम. २०७ ॥ च ॥ पूरव नवना रागथी रे लोल ॥ २१॥ नारी रूप धरी करी रे, बेठी तस घर बार रे ॥ च० ॥ दासीयो देखीने उलखी रे लोल ॥ रतिसुंदरीने व धामणी रे, दीधी तव थलकार रे॥ च०॥ बहु मूला दीये दासीन रेजोल॥ ॥ २२ ॥ सादामी जइ रतिसुदरी रे, लागी तेदने पाय रे ॥ च ॥ का वे वह हर्पथी रे लोल ॥ कुशल तुजने हे सखी रे, माहारी नीवितदा य रे ॥ च ॥ अनुकपा करी माहर। रे लोल ॥ २३ ॥ चालो घरमांदे हवे रे, जावी ते घरमांह रे ॥ च ॥ पन्यंके बेसारीने रे लोल ॥ धर्म शास्त्र कला तणा रे, करे विनोद उत्साह रे ॥ च ॥ निज दस्ते न्हवरावती रे लोल ॥ २४ ॥थमृत सम नुजाविने रे, पोतें वावरे थाहार रे ॥ च०॥ नक्तियें निजघर राखती रे लोल ॥ ते पण पूर्वमोहें करी रे,रही हवे बिट्ठ ने प्यार रे॥च॥ दिन दिन अधिकेरो धरे रे लोल ॥ २५॥ सातमीत्री जा खेममा रे, पद्मविजयें कही ढाल रे ॥ च ॥ श्रीजयानदना रासमा रे लोल ॥ धर्म काम थर्थ शास्वनी रे, वातो करे सुरसाल रे ॥ च ॥ पूरव नवना प्रेमथी रेलोल ॥ २६ ॥ सर्वगाथा ॥ २३ ॥ । दोदा ॥ ॥ बहुदिन काढे एम बिनु, रतिसुदरी सुप्रसन्न ॥ सामुहिक साचु लहे, एम चिते एक दिन्न ॥ १ ॥ लक्षण जोतां दु लखु, चकी सम चेन ॥ ना रोपणे तो नवि दोये,जाची ने वली जैन ॥ २॥ गति चेष्टा स्वर मुख गु णा, पुरुप योग्य परधान ॥ कोश्क कारणथी कस्तूं, नारी रुप निदान ॥३॥ एम निश्चय करी थाखती, स्मेरमुखी ससनेह ॥ जाणु दु जुगतें करी,तहत्त करी सुणो तेह ॥ ४ ॥ देवी वयरों वाखीये,पूरव नवपति प्रेम ॥ कला दे खावीय कारमी, कृत्रिम रूपें केम ॥ ५ ॥ श्रनुयद कीजें थम नणी,स्वाना विक था स्वामि, स्नेहथकी सायूँ कहे, प्रियानो धाग्रद पामि ॥ ६ ॥ स्मरथी थधिक श्री, देखी तास देवार ॥ रोमांचित रमणी थई, थानद थगथपार ॥ ॥ ॥ढाल थामी । प्रेमनां वादल वरश्यां दादाडा सोहिला॥ ए देशी।। ॥थाज थानद थयो, पुरवनव पति मलियो धन्य दिन थाजनो । ए थांकणी ॥ श्रान प्रवपुस्य विनव फलियो,थणचित्यो चितामणि मलियो ॥था ॥ कहे श्रीजयानद सुणो नारी, तुज सौनाग्यता वावडी सारी ॥

२०६ जयानंद केवलीनो रास. ॥१॥ नाटक नाटके नृप दीये रे, दान थने बद्धमान रे॥१०॥ नाटक करता तेहनें रे लोल ॥ त्रू नख थलि नगना रे, विपरीत थयां तेणें थान रे ॥ ॥ च० ॥ रतिसुदरी सद्धर्ने दाखवे रे लोल ॥ ११॥ नृप थादेशे रतिसुंदरी रे, नाटक करे यद्नुत रे ॥१०॥ देवता पण मोही रहे रे लोल ॥ कुमर नारी वजावती रे, वीणा नृत्य थाकूत रे ॥ च० ॥ ते ध्वनि श्रवण सुधा समी रे खोल ॥ १२ ॥ नाद तथाविध कवीयो रे, देवनें उर्सन जाण रे ।। ॥ च० ॥ दय गय पशु पण थिर रह्या रे लोल ॥ तो नरनु कहेवु किश्यं रे, नाटक पण तिणें वाण रे ॥ च० ॥ रना दरावती सुदरी रे लोल ।। ॥ १३ ॥ विनयानो नारज किश्यो रे, तिहां देवी प्रनाव रे ॥च० ॥ म पिपूतली दोय कतरी रे लोल ॥ वींजे सवीणा नारीने रे. सह लह्या वि स्मय ताव रे ।। च ॥ रतिसुदरी वित्त चितवे रे लोल ॥ १४ ॥ देवी क यु ते सवि मत्यु रे, पण नरता केम नारी रे ॥ च ॥ माया इहां कांश सनवे रे लोल ॥अथवा जाणगु धागलें रे, नानो निरधार रे ॥ च ॥ पण राखवी पासे सही रे लोल ॥ १५ ॥ पद्म तंतु कपर करे रे, विजया नाटक सार रे ।। च० ॥ रतिसुंदरी तव नाचती रे लोल ॥ लूता तेतु क पर सही रे, जीती ए निरधार रे ॥ च ॥ जय जय रव परगट थयो रे लोल ॥ १६ ॥ रतिमाला नृप पाणथी रे, करे उत्सव सुप्रकार रे ॥ १० ॥ निजघर लावे पुत्रीने रे लोल ॥ रतिसुदरी तव मोकले रे, तेडवा कुवर नारि रे ॥ १० ॥ निज प्रतिदारियो मानयी रे लोल ॥ १७ ॥ केटली नू मि थाविया रे,नारीरूपें कुमार रे ॥ च ॥ नागरूपें तेधावीने रे लोल ॥ थाव्या स्वरूपें निजघरें रे, हवे विजया जे नारि रे ॥ १० ॥ दासी थई दम धारणा रे लोल ॥ १७ ॥ वासीयो खोले कुमारने रे, पण नवि दीवी ते नारि रे ॥ १० ॥ रतिसुदरीने ते सवि का रे लोल ॥ सानली 5 खणी ते घई रे, करे प्रतिज्ञा सार रे ॥ च ॥ श्रारतध्याने ते पडी रे लोल । ॥१॥ न मले ए नारी जिदा लगें रे, तिदा लगें न करूं थाहार रे ॥१०॥ थाकुल व्याकुल सद्गु थयां रे खोल ॥ रतिमाला मुख बहु कहे रे, न करे श्राहार जेवार रे ॥ १० ॥ वासीयो नृपने ते जइ कहे रे लोल ॥ २० ॥ त्रण दिन नगर शोधावीयु रे, न जडी कोई उपाय रे॥ १०॥ कुमर हवे चोथे दिने रे लोल ॥ एकांतें मुज रागिणी रे, थाहार विना मरी जाय रे तृतीय खं. २०७ ॥ च०॥ पूरव नवना रागयी रे लोल ॥ २१॥ नारी रूप धरी करी रे, बेनी तस घर बार रे ॥ च० ॥ दासीयो देखीने लिखी रे लोल ॥ रतिसुंदरीने व धामणी रे, दीधी तव अलंकार रे ॥ च० ॥ बढ्नु मूला दीये दासीने रे लोल॥ ॥ १२ ॥ साहामी जइ रतिसुदरी रे, लागी तेदने पाय रे ॥ च ॥ मता वे वद हर्पथी रे लोल ॥ कुशल तुजने हे सखी रे, माहारी जीवितदा य रे ॥ च ॥ श्रनुकपा करी मादरी रे लोल ॥ २३ ॥ चालो घरमांदे हवे रे, तावी ते घरमांह रे ॥ १० ॥ पल्पके वेसारीने रे लोल ॥ धर्म शास्त्र कला तणा रे, करे विनोद उत्साह रे ॥ च ॥ निज दस्ते न्दवरावती रे लोल ॥ २४ ॥ थमृत सम नुनाविने रे, पोते वावरे थाहार रे ॥ १० ॥ नक्तियें निजघर राखती रे लोल ॥ ते पण पूर्वमोहें करी रे,रही हवे विदु ने प्यार रे ॥ १०॥ दिन दिन थधिकेरो धरे रे लोल ॥ २५॥ सातमीत्री जा खममा रे, पद्मविजयें कही ढाल रे ॥ च ॥ श्रीजयानदना रासमा रे लोल ॥ धर्म काम थर्थ शास्त्रनी रे, वातो करे सुरसाल रे ॥ च०॥ पूरव नवना प्रेममी रेलोल ॥ २६ ॥ सर्वगाथा ॥ २३ ॥ ।। दोहा ॥ ॥ बनुदिन काढे एम बिह, रतिसुंदरी सुप्रसन्न ॥ सामुहिक साचु लहे, एम चिते एक दिन्न ॥ १ ॥सण जोतां दुलखु, चक्री सम ने चेन ॥ना रीपणे तो नवि दोये,जाची ने वली जैन ॥ २ ॥ गति चेष्टा स्वर मुख गु गा, पुरुप योग्य परधान ॥ कोश्क कारणथी को, नारी रूप निदान ॥३॥ एम निश्चय करी थाखती, स्मेरमुखी ससनेह ॥ जाणु दु जुगतें करी,तदत्त करी सुणो तेद ॥ ४ ॥ देवी वयणे दाखीयें,पूरव नवपति प्रेम ॥ कला दे खावीय कारमी, कृत्रिम रूपें केम ॥ ५॥ श्रनुयह कीजें थम नणी,स्वाना विक थाउ स्वामि, स्नेहथकी सायूँ कहे, प्रियानो थायद पामि ॥ ६ ॥ इस्मरथी अधिक श्री, देखी तास देदार ॥ रोमांचित रमणी थई, थानद थग अपार ॥ ४ ॥ ॥ दाल बातमी ॥ प्रेमनां वादल वरश्यां दाहाडा सोहिला॥ ए देशी ॥ ॥थाज थानद थयो, पूरवनव पति मलियो धन्य दिन थाजनो । ए थांकणी ॥थाज प्रवपुस्य विनव फलियो,थणचित्यो चितामणि मलियो ॥ था० ॥ कहे श्रीजयानद मुणो नारी, तुज सौनाग्यता वावडी सारी ।।

០២ जयानंद केवलीनो रास. ॥ घा० ॥ १ ॥ मुन मन कल हंस तिदा रमियो, नपि पकिलजल मुज में गमियो ॥ था ॥ रतिमाला दासी मुखें नाणी, यावी तणा करतो ठजाणी ॥ था ॥ २ ॥ दस नइ वासी कहे राय, तुम पुत्री पति थान प्रगटाय ॥था० ॥रायें तस वीधु वनुदान, वली मोकले तेढवा प रधान ॥ था० ॥ ३ ॥ कुमर पण नृपति कने नावे, ठठी थालिंगन क रे नृप नावे ॥था ॥ कां प्रेममा थतर नवि राखे, तो पण वयणें एणी परें नोखे ॥धा॥॥ तुन रूप थनुत्तर दु देवी, थयो तीन घणुं सविल वेखी॥ या ॥ तुम सेवा कहो शीशी करीयें, तुम सुनगता थम मनहु दरीयें ॥ था० ॥ ५ ॥ तुम कुल पूर्वणन नहीं काम, नवि देवी वाणी क हे वाम ॥ था ॥ पण जनमें पवित्र फरी नयरी, तुमें ते कहो अमनें सवि विवरी ॥ थाम् ॥ ६ ॥ दु विजयपुरी नयरीवासी, कहे कुमर सान लो तल्लासी ॥ श्रा० ॥ कौतुक जोवाने नीसरीयो, देश गम गम में न रीयो ॥ था० ॥ ॥ फरतो फरतो तुम्ह पुर थाव्यो, इत्यादिक सर्वे सन लाव्यो॥ था० ॥ दवे स्नान नोजन साथै राय, करे दर्प दियामा नवि माय ॥ था ॥ ॥ कहे तृप मुज कन्या परणो, एहनें ए संघा अन्य नवि वरणो ॥था॥ कुवर कहे जस कुल नवि नाणो, तस कन्या देवा श्यो टाणो ॥ था॥ए ॥ कहे नृप एक तो देवीवाणी, वली प्रति था कति गुणनी खाणी ॥था ॥ एम कुल जाप्युं अमें तुम तणं, तमें वचन प्रमाणो श्रम ता॥था ॥ १०॥ तव मौन कुमर करे ज्यारे, हवे लग न जोवराधे नृप त्यारें ॥ था॥ परावे नृप रतिसुदरी, गज घोडा दिये मनोहार करी ॥ था॥११॥ तेइमा कुमार न ले काय, तव थामद अति करीने राय ॥ था ॥धान नगर थापे घणु मनोहार, ते श्रापे पियाने ने ह धार ॥ था० ॥ १३ ॥ रतिसुवरी सोंपे मातने, तस चिंताना थ वदातनें ॥ था० ॥रदे नूपति दीधा धावासे, मुख जोगवे विषयनां सन्ना से॥ था० ॥१३॥ कदी वापी वनमा करे क्रीडा. नवि देवे कोई जननें पीडा ॥था ॥ कवी नृत्य करावे प्रिया पासें, पोतें वाथ वजावे सुविला सें ॥ था॥१४॥ करे देवगुरुना गुण्याम, याचकनें बढ़ थापे वाम ॥ ॥ था॥ दीनादिकनें वीये थति दान, जहे कीर्मि धर्म ते प्रमाण ॥ ॥ था ॥ १५॥ जिमे देव गुरुनी पून करी, जिमे दान सुपात्रं तेद घ तृतीय खेम. २०ए री॥श्रा० ॥ करी उरडी देहरासर माहि, गोपवा प्रतिमा उपधि त्यांहि ॥ ॥ था० ॥ १६ ॥ तालु दे नारीने दीये कूची, सा थानूषणमा गुप्त मू ची॥था॥ निज जीवितनी परे रखवाले, ते पण नित्य पांचशे रत्न था से॥था० ॥ १७ ॥ निज नारीने रत्न दीये तेह, तेतो एकजीव मान दो दे ६॥ या० ॥ निज पुत्रीप्रमें रतिमाला, नित्य थावे ह सुक्खमाला ॥श्रा० ॥ ॥ १७ ॥ पुर थान तणुंजे इव्य थावे, थापे निज पुत्रीनं चावें॥था ॥ एकदिन चिते विस्मय पामी, नृप दीधा धननो ए नहीं कामी ॥ था० ॥ ॥ १५ ॥ पुर थापना धननुं न नाम ग्रहे, मागवु तो ते दूर रहे ॥था० ॥ वान नोग करे सुरनी परें, एह अचरिज वात हृदय धरे ॥ श्रा० ॥ २० ॥ धन थागम मारग नवि लगु, ए वात एहनें पूर्व सह ॥ था ॥ पूढे श्रीज यनें रतिमाला, तव श्रीजय बोले रढीयाला ॥था ॥१॥ ते कहे मु न तात दीधु धन्न, में पण उपराज्यु बहु दिन्न ॥था ॥ ते वात सुणी मा नी नहीं, तेणीयें निज पुत्रीनें कही ॥ था० ॥ २२॥ धन किदापी काढे डे ए घणु, मादारु ए टाल कौतुक पणु ॥ था० ॥ पुत्री कहे प्रश्ननु यं का म, इक्षित पूरे जे थनिराम ॥ या ॥ २३ ॥ श्रीजे खंमें थामी ढाल, कहे पद्मविजय मुणो सुरसाल ॥था ॥ दवे वेश्या श्यो परपंच करे, निज जाति देखावे एणी परें॥था॥ २४ ॥ सर्व गाथा ॥ २४ ॥ ॥ दोदा ॥ ॥ पुत्रीने पस्यांगना, क्रोध करी कहे एम ॥ एमदीज में उदरें धरी,को तुक न कहे केम ॥ १ ॥ सरल घणु रतिसुदरी, थाखे दाक्षिण थाण ॥ ना णु दु ते जम्पिये, सानल मात सुजाण ॥ ॥ देहेरासरथी दीपता, र न तणो से राशि ॥ तालु देई निसरे तथा, कूची वे मुन सकाश ॥३॥ वावरता जे वाधीयां, थापे मुजने थावि ॥ वीजु कां बूकुं नहीं, जुगतो जेह जमाव ॥ ५ ॥ वेदरासरमा दाखीयो, एगी एह उपाय ॥ पुत्रीने ए म प्रेम, चिती कहे चित्त साय ॥ ५॥ ॥ दाल नवमी। बीजु पापनु स्थान ॥ ए देशी॥ ॥ देरासर देखडाव, ए मुज कोम पूराव ॥थान हो रतिसुदरी कहे मत वोलो तुमें मातनी रे ॥ १ ॥ मरणांत पण एह, वात थाये कदो केह ॥ ॥ था० ॥ वेश्या रे कहे तो मुज कूची थापी रे॥ २ ॥ एह मनोरथ तु १० जयानंद केवलीनो रास. ॥ था ॥ १ ॥ मुज मन कस हंस तिहां रमियो, नवि पकिलजल मुज में गमियो ॥ था। रतिमाला दासी मुखे जाणी, थावी जूनणा करती जाणी ॥ था ॥ ५ ॥ हो जश् दासी कहे राय, तुम पुत्री पति आज प्रगटाय ॥था ॥ रायें तस दीधु बहुदान, वली मोकले तेउवा प रधान ॥ था० ॥३॥ कुमर पण नृपति कनें जावे, ग्ठी थालिंगनक रे नृप नावें ॥था० ॥ कांड प्रेममां थतर नवि राखे, तो पण वयणे एणी परें जांखे ॥था॥॥ तुन रूप थनुत्तर दु देखी, थयो लीन घणुं सविक वेखी ॥ था ॥ तुम सेवा कहो शी शी करी, तुम सुनगता थम मनहुँ हरीयें ।। था० ॥ ५ ॥ तुम कुल पूठणन नहीं काम, नवि देवी वाणी क हे वाम ॥ था ॥ पण जनमें पवित्र फरी नयरी, तुमें ते कहो थमनें सवि विवरी ॥ श्रा० ॥ ६ ॥ विजयपुरी नयरीवासी, कहे कुमर सान लो उनासी ॥ था ॥ कौतुक जोवाने नीसरीयो, देश गम गम को न रीयो ॥ था० ॥ ॥ फरतो फरतो तुम्ह पुर थाव्यो, इत्यादिक सर्वे सन लाष्यो ॥ श्रा० ॥ दवे स्नान नोजन सार्थे राय, फरे दर्प दियामा नवि माय ॥ था॥ ॥ कहे नृप ए मुज कन्या परणो, एदनें ए संधा अन्य नवि वरणो ॥था ॥ कुवर कदे जस कुल नवि जाणो, तस कन्या देवा श्यो टाणो॥था॥ ए ॥ कहे नृप एक तो देवी वाणी, वली प्रति था कृति गुणनी खाणी॥था ॥ एम कुल जायुं धमें तुम तशु, तमें वचन प्रमाणो श्रम तणु॥था० ॥ १०॥ तव मौन कुमर करे ज्यारें, हवे लग न जोवरावे नृप त्यारें ॥था॥ परणावे नृप रतिसुदरी, गज घोडा दिये मनोदार करी ॥ श्रा॥११॥ तेहा कुमार न ले काय, तव बायह अति करीने राय ॥ था ॥था नगर श्रापे घणु मनोहार, ते थापे पियाने ने ह धार ॥ बा ॥ १३ ॥ रतिसुदरी सोंपे मातने, तस चिंताना अ वदातनें ॥था ॥रदे नूपत्ति दीधा थावासें, सुख नोगवे विषयना राना सें॥ था० ॥ १३ ॥ कदी वापी वनमां करे क्रीडा, नवि देवे कोई जननें पीडा ॥ था० ॥ कदी नृत्य करावे प्रिया पासें, पोतें वाय वजावे सुविला सें ॥ था॥१४॥ करे देवगुरुना गुणमाम, याचकनें बढ़ थापे वाम ॥ ॥ था । दीनाविकने दीये थति वान, लहे कीर्ति धर्म ते सप्रमाण ॥ ॥श्रा०॥ १५ ॥ जिमे देव गुरुनी पूज करी, जिमे दान सुपा तेह ध १११ तृतीय खम रे॥ २० ॥ त्रीजे खमें ढाल, नवमी कदी सुरसाल ॥श्रा० ॥ पद्मविजयें ह वे सोनलो वात सोहामणी रे॥ २५ ॥ सर्वगाथा ॥३०॥ ॥दोहा॥ ॥ एक दिन नारीने एम कदे, मूकी कूची मन थाण ॥ जननी तुज दे खे यथा, जूवे ते मनमां जाण ॥१॥ दूर रही तु देखजे, जाणे नहीं एजे म ॥ तेमन करे ते ततों, प्रेयसी श्राणी प्रेम ॥॥ रतिमाला जुवे रंग , ध्याये देखी ध्यान ॥ बमणां रत्न वनावद्यु, सावेंए थमिलान ॥३॥ एक दिन विस्मय थाणिनें, देवपूना क्षण दाव ॥ सानले वात सोहामणी, नणे जे थौषधि नाव ॥ ४ ॥ पूरव थौषधि पासथी, नवि लह्या रत्न नि दान ॥ विधि साध विण विफल ते, एम नवि लहे अज्ञान ॥ ५ ॥ उताव जमा में थवर,श्रौषधि लीधी एह ॥ वीजी साची बाहिरे,रही न वीठी रेह ॥ ६॥ अर्थषकी थापे अधिक, एदने थौषधि एह ॥थवसर पामी एहनो, बदलु बिंदुयें नेह ॥ ४ ॥ चितामणि पामी चतुर,कांकरे तसे कोण ॥थ वसर पामो एकदिने, ग्रहे ते मूकी गौण ॥ ॥ हर्पित यया कुंवर हवे, चित्तमा करे विचार ॥ वाक्पटु थोपधि वालों, करि उपाय किवार ॥ ए ॥ ॥ ढाल दशमी॥ लाल रंगावो वरना मोलीयां ।। ए देशी। ॥ दवे गणिका थौषधि पूीने, रत्न मागे पण नवि श्रापे रे ॥ नवि वो से साधन विधि विना, पण पानी तामें न थापे रे ॥ १ ॥ नवि पुण्य विना फल पामी ॥ए थोकणी॥ करे खेद घणो विधि जावा, नवि वदन राग पलटावे रे ॥ करे सासू जमाइ गोठडी, धूरतें धूरत केम फावे रे ॥ न० ॥२॥ प्रीत तिहां करतां वातडी, कुवरने गणिका पूठे रे ॥ वत्स शंशु विज्ञान जा यो में, कहे कुमर काम तुम शुबे रे ॥ न ॥३॥ जाणु विविध प्रकार नी थोपधि, वली सकल कला पण जाणु रे ॥ विज्ञान विविध लहु मत्रने, कुरूपने रूप दे ना रे ॥न० ॥४॥ रूप दोये तो अधिकेरू करू, रूडा विधिथी जो थाराधे रे ॥ सौनाग्यने यौवन नित्य रहे, मन इक्षित वरने साघे रे ॥ न ॥ ५ ॥ सासू कहे मुज एहवी करो, जेहथी नूपति मुन मा ने रे॥ जेम मान मई सवि शोक्यनु, कोने न बोलावे शाने रे ॥ न०॥६॥ कहे कुमर मूमावो शिर तुमें, वदनें वली मशिका लीपो रे ॥ उपवास करो दैयडे धरी, वतीमत्र देठ ते जंपो रे ॥ न०॥ ७॥रुरुधुरु रुरुधुरु धुरु धु . १२० जयानंद केवलीनों रास. ज, सीके न जीवता मुज ॥ था० ॥ रतिसुंदरी कहे तूसो यथवा रुसनो रे॥ ३ ॥ोह न करु जरतार, प्राण सोप्या तस सारथा ॥रतिमाला ये निश्चय जाएयो पुत्रीनो रे ॥ ४ ॥ कपटे देई विश्वास, एक दिन मुरा व इहास ॥ था ॥ पाई रे वधियोलमा तव मूर्ण सही रे ॥ ५॥ सूती प ल्यंके तेह, जोई पुत्री वेद ॥ था० ॥ लाधी रे कूची तव तालु कघाडीपुं रे ॥ ६ ॥ जूवे देहरासर जाम,यौपधि दीनी ताम ॥था० ॥ रत्नदायक जा पीने से पानी वली रे ॥ ४ ॥ तालू दे तय, कूची मूके हती जव ॥ ॥ श्रा० ॥ चेतना सही जागी रतिसुदरी तेटले रे ॥ ॥ सपनु दीतु तेम, शका न थावी एम ॥ था ॥ धूतारे कोण नवि बचाये मानवी रे ॥ ५ ॥ बीजे दिने ते कुमार, पूजा करीने प्यार ॥ था ॥ थोषधि पूजवा जुवे तो नवि लाधी तदा रे ॥ १०॥ तव पूरे निज नारि,चित्तमांशका धारािाथा॥ चतुरा रे चमकी तव पतिनें वीनवे रे ॥ ११ ॥ नहीं कोनो परवेश, कूची न तु श्रन्यदेश ॥ था ॥ मात दीधी सुरा काल तेणें द थचेत थई रे ॥१२॥ तेणे जाणु बल मात, बीजी न जाणु वात ॥ था० ॥ गित था कारें करी ए निश्चय हशे रे ॥ १३ ॥ प्रभादिक सवि वाच, कही देखारी साच ॥था० ॥ कुमरे पण निश्चय कसो सामुयें दरी रे ॥ १४ ॥ सासूनें फहे वात, था श्या ने थवदात ॥ था ॥गणिका रे कहे कान ढांकीने एणी परें रे ॥ १५ ॥ आप तो रघु दूर, फलक चढावो नूर ॥ था ॥ राजा ने वली तुमें मुज श्टकारी बता रे ॥ १६॥ चोरी करु शे काम, मुज परिवार पण नाम ॥ था० ॥ चोरी- नवि जाणे न थावे इकडा रे ॥ १७ ॥ पुगे तमें निज नारि, साचवे जे रति धारि॥था ॥ शका नो होये मनमा तो टालो परी रे॥ १७ ॥सानली श्रीजयानद, चितवे धिक् ए मद ॥ था० ॥ निजपुत्री शिर वोष दिये पोते करी रे ॥ १९ ॥ देशे न वगर सपाय,शिक्षा दे ठ एणे गय ॥ था ॥ एम चित्तीने कहे जो बीजे स्थलं रे ॥२०॥ वर्ष लही सुणी तेद, गइ निज थानकें नेह ॥था ॥ देहेरासरमा बीजे दिन के वर गया रे ॥ २१ ॥ बाना सदल रतन, मूके करीने जतन्न ॥ था० ॥ जीरे जिन पट्ठवाक् थौषधि पूजतो रे ॥२२॥ पांचमी पौषधि पास, मागे रत्न उमास ॥ था॥ औषधि कहे तु रन सदस ले रीजथी रे ॥ २३ ॥ ले इरन इनार, निकलीयो तेवार ॥ था॥ पूरव परें तानु प्रमुख दे करी .

तृतीय खंम. ११३ ताथदोनिशि केलि ॥ १॥ करतां क्रय विक्रय वली, पाम्या लान थपार ॥ सजाने बद्नु सन्मानिया, थधिकी शोन धागार ॥ ॥ पूरणमासें प्रसवि यो, शुनलगनें गुन वार ॥ तिथि करण निर्दोष तेम, योग घणुं जयकार ॥ ॥३॥ वाय सुगधी वाय ते, उनिह नहीं निज देश ॥ जनपद मुखिया ज न सवे, वारु पहेवा वेश ॥४॥ प्रात समय उज्ज्वल पखें, पुण्य प्रनावें पू त ॥ पूरव विशि सूरय परें, शोनावे घरसूत ॥ ५ ॥ ॥ ढाल बगीयारमी ॥ वारी रग ढोलणां ॥ ए देशी॥ ॥ श्रावी वधामणी एहवे हो राज, शेतने दर्ष न माय ॥ सोनागी सुत श्रावियो ॥ घर बादेर बेठो थका दो राज, धापवा धन निरमाय ॥ सो० ॥ ॥१॥ खोले पण धन नहीं तदा हो राज, गेठ चिते मनमादि। सो ॥ दान वेला धन वोहिनु हो रान, होय ते थापे नाहि ॥ सो० ॥ २ ॥श्रा मण दूमणो ते थयो हो राज, नीच मुख करी शेत ॥ सो ॥ अगुजीयें ध रतो खणे हो राज, नजर करीने देव ॥ सो० ॥३॥कीहीनगरा जेटलु दो राज, कोतुं विवर ते नगर ॥ सो० ॥अधिक खणे महोटु पयुं दो राज, दीहुँ सुवर्ण इव्यसार ।। सो ॥४॥धन अनर्गल देखी करी हो राज, चिते चि त मकार ॥ सो॥श्रद्छत नाग्य ए सुत तणु दो राज,श्रापुं चित्त उदा र ॥ सो०॥५॥थापे वधामणी तेदने दो राज, तेहाथी धन लाख ॥ ॥ सो॥ वस्त्र नूपण घृत गुड घणा दो राज, दरिद न राखे सराख ।सो॥ ॥ ६ ॥ दीन श्रनाथने थापतो दो राज, वाजिन वाजे गेह ॥ सो० ॥ साल न लावे पण नेटणां दो राज, हर्ष न माये देह ॥ सो॥ ॥धवलमगल गाये सुवरी हो राज, नाटक नव नव थाय । सो० ॥ एम नव नव उत्सव थकी दो राज, दश दिवस वही जाय ॥ सो ॥ ७ ॥ च सूरय दर्शन करे हो राज, बही नागर वली होय ॥ सो० ॥ एम उत्सव घटे जे दिन दो रा ते ते दिन करे सोय ॥ सो० ॥ ए | शेठ चिते जे दिनयकी हो राल, श्राव्यो ने सुत एद॥सो० ॥ ते दिनथी लखमी सह्यो दो राज, मगल माला गेद ॥ सो ॥ १० ॥ दीनादिक सतोपिया हो राज, तोही न खूटे इव्य ॥ सो० ॥ व्य जह सनसावी हो राज, नृपनें तो दोये जव्य ॥ ॥ सो० ॥ ११ ॥ थन्यथा राय घदन दोये हो रान, श्रावक माटे शेत ॥ । सो ॥ एम चिती खेइ नेटणु होराज, गयो नृप पासें वेव सो॥१॥ १५ २२२ जयानंद केवलीनो रास. मु स्वाहा, तेणीयें हर्षे सह कीधु रे ॥ पामे थाव्या सध्यायें कुमरजी, दोय जाणे वलित सीधु रे ॥ न० ॥ ॥ वदु थामवर देखावतो, थोषधिय सु धरणी कीधी रे ॥ बांधी थाने सांकलथी पापिणी, थापविमादरी लीची रे॥न ॥ ए ॥ पुत्री शिर दोष देखावती, फल नोगर चोरी केरां रे ॥ व्यो थोपधि एम देखावती, तमें दयावतमा धोरी रे ॥ न० ॥१०॥ नारी वयणथी दवे कृपा करी, मूलरूपें कीधी तास रे ॥ यौषधि टेऽ पुत्री ज माइनें, खमावती देई विश्वास रे । न० ॥ ११ ॥ तेदुये पण खमी राखी घरें, एक दिन हवे श्रीजयकुमार रे ॥ सामने धर्म थरथें कहे, खमो मात तुमें पूज्यतार रे ॥ न० ॥ १२ ॥ तुमनें जे विटवना में करी, तुम प्रति वोधननें कान रे । अदत्तनु फल इह परनवेंख थापे उर्गति राज्य रे ।। ॥ न० ॥ १३ ॥ नरके जइये उन ग्यता, वली दरिद पणु ते थावे रे ॥को एछे थवत्त एम जाणीने, कोण थदत्त लेवाने जावे रे ॥ न० ॥ १४ ॥ प्राणनाशें थदत्त न लीजीयें, थोडु पण इहां दृष्टांत रे ॥ लखमीपुन जे म लखमी लह्या, सनिलजो तस वृत्तांत रे ॥ न० ॥ १५ ॥ हस्तिपुरमा राय पुरंदरु, पौलोमी नामें राणी रे, तेतो पौलोमी परें शोनती, शीलवती चातुर जाणी रे ॥ न० ॥ १६ ॥ तिहां शेउ सुधर्मा नामथी, जिनशासन नो घणो रागी रे ॥ दयावतनें गुरुनक्तो घणु, धन्या गेहिनी पति धनुरा गी रे ॥ न० ॥ १७ ॥धन क्षीण थयुं तस थन्यदा, अतराय लाननो था यो रे ॥ पण श्रीअरिहंतना धर्मनें, नवि बामे स्नेही जेम नायो रे ॥ न०॥ ॥ १७ ॥ देवपूजानें आवश्यक प्रमुख जे, ते अंगीकमु नवि चूके रे ॥ एक दिन पुरस्यवत सुत सूचवे, एहतु सुपन नारीने ढके रे ॥न ॥ १५ ॥ पप सरोवर पने बलफसु, जरतारने थावी नाखे रे॥शेत पण तस थर्थ वि चारीन, नारी थागत एम प्रकाशे रे ॥न० ॥ २० ॥ लखमी लावस्य पुस्य वतो वली, सुत दोशे सोनली हर्षे रे ॥ रत्नखाण परें गर्न धारती, प्रिया अंगें शोना वर्षे रे ॥न |॥ २१॥त्रीजे खमें दशमी ढाल ए, कह। पद्मवि जय सुरसालो रे श्रीनयानवना रासमां, सुणतां होये मगलमालो रे ॥ ॥न॥२२॥ सर्वगाथा ॥२५॥ ॥ दोहा॥ ॥अंगें शोना अतिघणी, गर्नप्रनावें गेलि ॥ शेग्नु वारिद गयु सवे,कर D तृतीय खंम. ११३ ताथदोनिशि केलि ॥ १॥ करतां क्रय विक्रय वली, पाम्या लान थपार ॥ सजानें बढ़ सन्मानिया, अधिकी शोन थागार ॥ ५ ॥ पूरणमासे प्रसवि यो, शुनलगने शुन वार ॥ तिथि करण निर्दोष तेम, योग घणुं जयकार ॥ ॥३॥ वाय सुगंधी वाय ते, अनिद नहीं निज देश ॥ जनपद मुखिया ज न सवे, वारु पहेया वेश ॥ ॥ प्रात समय उज्ज्वल परवें, पुष्प प्रनावें ५ त ॥ पूरव विशि सूरय परें, शोनावे घरसूत ॥ ५॥ ॥ ढाल अगीयारमी ॥ वारी रग ढोलणां ॥ ए देशी॥ ॥ यावी वधामणी एहवे हो राज, शेठने दर्प न माय ॥ सोनागी सुत धावियो । घर बाहेर बेठा थकां दो राज, थापवा धन निरमाय ॥ सो॥ ॥१॥ खोले पण धन नहीं तदा दो राज, गेट चिते मनमांदि॥ सो॥ वान वेला धन दोदिनु हो राज, होय ते थापे नाहि ॥ सो० ॥ ॥श्रा मण दुमणो ते थयो दो राज, नीच मुख करी शेत ॥ सो ॥ श्रगुतीय ध रती वणे हो राज, नजर करीने हेत ॥ सो ॥३॥ कीडीनगरा जेटनु हो राज, दीतुं विवर ते नगर ॥ सो० ॥थधिक खणे महोटु पयु हो राज, वीतुं सुवर्ण इव्यसार ।। सो० ॥ ॥धन अनर्गल देखी करी हो राज, चिते चि त मकार ॥ सो० ॥थत जाग्य ए सुत तणुं दो राज,थापु चित्त उवा र ॥ सो॥ ५॥थापे वधामणी तेदने दो राज, तेदमाथी धन लाख ॥ ॥ सो॥ वस्त्र नूपण घृत गुड घणा दो राज, दरिद न राखे सराख ॥सो॥ ॥ ६ ॥ दीन थनाथने थापतो दो राज, वाजिन वाजे गेह ॥सो ॥सल न लावे घणां नेटणां दो राज, हर्ष न माये देह ॥ सो॥ ॥धवलमगल गाये सुदरी हो राज, नाटक नव नव थाय ॥ सो० ॥ एम नव नव उत्सव थकी दो राज, यश दिवस वही जाय ॥ सो० ॥ ॥ चइ सूरय दर्शन करे हो राज, बही नागर वली होय ॥ सो ॥ एम उत्सव घटे जे दिने होरा ज, ते ते दिन करे सोय ॥ सो० ॥ए । शेत चिते जे दिनथकी हो राज, थाव्यो ने सुत एह ॥सो० ॥ ते दिनयी लखमी लह्यो हो राज, मगल माला गेड् ॥ सो० ॥ १० ॥ दीनादिक सतोपिया हो राज, तोही न खूटे व्य ॥ सो० ॥ इव्य जहयु सनलावीयें दो राज, नृपनें तो दोये नव्य । ॥ सो॥११॥ अन्यथा राय श्रदत्त होये दो राज, श्रावक माटे शेत ॥ ॥ सो॥ एम चिती लेइ नेटपु दो राज, गयो नृप पासें ठेठ सो॥१॥ .

१२४ जयानंद केवलीनो रास. वात यथास्थित तिहां कही दोरान, नृपति वोल्यो न्याय ॥ सो० ॥ बार क श्रदत्त ग्रहे नही दो राज, नूपति दर्पित पाय ॥ सो० ॥ १३॥ नाग्य निधि सुत पुस्पथी हो राज, धन प्रगटगु थप्सराल । सो ॥ राख तु पन्य ए ताहरु होरान, तुन हो मगलमाल | सो०॥ १४ ॥राजप्रसाद ली करी होरान, वानते गाजते गेह ॥ सो० ॥ याव्या पुन मुहते हवे रोरा ज, पुत्रनामनें नेह ॥ सो० ॥ १५ ॥ वजन कुटुव जमारिपुं हो राज, भ र्थ धरी मनमाहि ॥ सो० ॥ लक्ष्मीपुन इण नामथो हो राज,पाप्यु हर्ष छ चाहि ॥ सो० ॥ १६ ॥ दिन दिन कल्पांकुर परें होराज, मावित्र उमेदने सा थ ॥ सो० ॥ वाधे सुखदायो घणो दोरान, सह जाणे यम थाप ।सो॥ ।।१७।। दांत थाव्या पग मांमतो दो रान, इत्यादिक सङ गम सो॥ता स पिता उस्तव करे दो राज, बालक्रीडा करे ताम || सो ॥१॥ नीशा ले जणवा तव्यो हो राज, विनय घणो गुरु कीध ॥सो० ॥ पाठक पण तस दर्षथी दो राज, विद्या सघली दीध ॥ सो॥१५॥ विद्या शास्त्र न तेह तु दो राज, जे नवि जाणे कुमार ॥ सो० ॥ साखी मात्र पाठक घयो दो राज,सफल कला मार ॥ सो० ॥ २०॥ तिम जिनधर्म कला सह्यो हो राज, सूक्ष्म बुद्धि सुरूप ॥ सो० ॥ जैनशास्त्र शिरोमणि दो राज, कला विहाननो नूप ॥ २१ ॥ काष्य बद नाटक वली दो राज, प्रश्न प्रहेलिका न्याय ॥ सो० ॥ गीत नाटकनें विनोदमा दो राज, नित्य नित्य काल ग माय ॥ सो० ॥ २२ ॥ एकदिन मित्रे परवयो हो राज, कीडतो उपवन जाय ॥ सो० ॥ मुनिवर एकति रह्या दो राज, देखी प्रणमे पाय ॥ सो॥ ॥ २३ ॥ धर्मलान मुनि दियो हो राज, धर्म मुणे मुनिपास ॥ सो० ॥ बाल कालमा श्रादरे हो राज, समकित व्रत हमास ॥ सो०॥ ५॥त्रीजे खंमें श्रगियारमी हो राज, पविजयें कही ढाल ॥ सो० ॥ श्रीजयानवना रासमा दो राज, सुणता मंगप्तमाज ॥२५॥सो०॥६५॥ ॥दोहा॥ मावित्र वचन माने सदा, समकितने सदाचार ॥ विनय करे वीतरा गनो, गुरुनक्तो गुणधार ॥१॥ यौवन धान्यु जेटले, विवाहन। करे वात, कन्या एहनें, श्रीदेवी साक्षात ॥२॥ धनेश्वरने पृथ्वीधर, कन्या केरा तात ॥ श्रीधर पशोधर श्रीपति, वली धनावर विरमात ।। ३ ।। मेष्ठी ॥

तृतीय खंग १२५ धन ते सातमा, जिनदास श्रातमा जाण ॥ दाता झाता दीपता, ख्याता गु णमणि खाण ॥४॥ शेगनें नमे सोनागीया, नांवे थावी नाप ॥ पुत्री श्रम तुम पुत्रने, थापणनो थनिलाष ॥ ५॥ रूपश्री रूपरेखा, पाव ती पहेंचाण ॥पमा धनश्री पनिणी, वली लखमोनु वखाण ॥ ६ ॥ म दनतिरी लखमीवती, रूपें रति थनुकार ॥ परतु मानो प्रेम , श्रम था मदथनुसार ॥॥ शेव कहे तुमें सोनसो, श्राध्या तुमें श्रम धाम ॥ कन्या उद्देशी कहो, मान्य विशेषे थाम ॥ ॥ पंथीने जोजन परें, तेणें मानी तुम वात ॥ वर्ष लह्या ते होशथी, उत्सवै घर थायात ॥ ए॥ ॥ ढाल बारमी॥ तुमें पीतांबर पहेरोजी, मुखने मरकलडे ॥ ए देशी ॥ ॥ दवे लगन दिवस निरधारेजी ॥ रंगवधामणां ॥ सह सहान तेही घर बारेंजी ॥ २० ॥ निज निज घर उत्सव रंगेंजी ॥२०॥ करे चित्र विचित्र धमगेंजो ॥ २० ॥१॥ तोरण ममप रूडा रचीयाजी ॥२०॥ तेतो साव सोनेरी खचीयानी ॥ २० ॥ पापड वडीयो देवायजी॥ ॥ पक्कान्न विधि ध केलवायनी ॥ २॥ ॥ कंचन मणि घाट घडायनी ॥रं॥ वस्त्र विधि ध प्रकार शिवडायनी ॥ २० ॥ सोपा पत्र मगावेजी ॥ २० ॥ वेदिका व ली नवना वावेजी ॥ २० ॥३॥ रब्यु माहिलं चोरी वधावेजो ॥२०॥ वजी धवल मगल गवरावेजी ॥ २० ॥ एम विवाह सामग्री की पीजी ॥१० ॥ निमित्तिये वेला नसी वीधोजी ॥ २० ॥ ॥ वरघोडे कुवर पहियाजी ॥ २० ॥ ठाम राम दान देवा निडियाजी ॥ २० ॥ मलि{ साजन बढ़ स गेजी ॥ २० ॥ सांबेला बढ समरंगेंजी ॥ २० ॥ ५॥ लामएदीवो माता हाथेजी ॥ २० ॥ जानणी गीत गाये साथेनी ॥ र ॥ कन्या था सम का जी॥ २० ॥ करपोहन कप तेणें ताजी ॥२०॥ ६ ॥ मणि कनक ने रयणे जडियाजी॥ २० ॥ जाणे स्वर्गमाहे ते घडियाजी ॥ २७॥ सस रा सद्धये मली थापेजी ॥ लखमीपुज कुमार पुर थापेजी ॥ २० ॥ ७॥ तारुस्य वय २६ समानजी ॥ २० ॥ शचीतम थान गुनवानजी॥२०॥ जोग जोगवे थतिय रसालाजी ॥ २० ॥ निज तात पसाय विशालाजी।। ॥ २ ॥ ७॥ काय चिता नहीं घरनारजी ॥ २० ॥ पण धर्म न पामे हा रजो ॥ २० ॥श्रावक सण एहनी ॥ २० ॥ एम नीडमां धर्म धरेदजो ॥ २०॥ ए ॥ यत ॥ सामग्गि बनावेवि हु, वसरोवि सुहेवि तह कुसगे १२६ जयानंद केवलीनो रास वि ॥ जस्त न हाय धम्मो, निष्ठय जाण त सई ॥ १॥ पूर्वढाल पर व पुस्यने सुपसायनी ॥ २० ॥ सघले ते सुखिया थायजी ॥२०॥ एम ना ग्यवत गुणवतोजी ॥ २० ॥ जिनधर्म पर दृढचित्तोजी ॥ २० ॥ १ ॥ चाकर पण धर्मी देखीजी ॥रं ॥ धमी या सर्व ठवेखीजी ॥२०॥न वि करे परानव कोईजी ॥ २० ॥ नस पुस्पप्रति दृढ होईजी ॥र॥११॥ जेम वेलही पक्षने वलगे जी ॥ २० ॥ जेम सरिता सायर सलगेनी ॥०॥ तेम लखमी स्वयंवरा भावेजी ।। र॥ थनुरक्त थई स्थिर पावेजी ॥ २०॥ ॥ १२ ॥ मणिमत्रने चूरण जोगेंनी ॥ २० ॥ जिम वश करिये कोइ लो गेंनी ॥ २०॥जेम राशे बांधी राखेजी ॥२०॥ तेम लखमीन में सराखेंनी ॥ २०॥ १३ ॥ अगें जोग सुपात्रे दानजो ॥१०॥ वहुजननें खानने पाननी ॥ २० ॥ सजन वाणोतर कामेंनी॥रंथावे वत्ती धर्म पण पामेजी ॥ रं ॥ १३ ॥ यत ॥ गृहकूपी रुपणाना, लक्ष्मीर्व्यवहारिणां नगरवापी॥ व्यापारिणां च सरसी, तरंगिणीव दितीशानाम् ॥१॥ सा लक्ष्मीयां धर्मकर्मों पयुक्ता, सा लक्ष्मीर्या बंधुवर्गोपचुक्ता ॥ सा लक्ष्मीर्या स्वांगनोगप्रसता, या न्या मान्या सा तु लक्ष्मीरलक्ष्मी ॥ २॥ पूर्वढाल ॥ पुत्रनु पुण्य शेठ दवे जा पीजी ॥ २०॥ दानाविक करे मन थाणीजी र०॥ व्यापार करे ने करा वेजी॥रं ॥ कोडयो गमे लान तिदा थावेनी ॥२॥ १५ ॥ एम धर्म सा धन करी शेवजी ॥रण॥ सौधर्मे सुर थया तेजी ॥२॥माता पण गृहिधर्म पालीनी ॥ २०॥ स्वर्गे गड धर्म थलवालीजी॥२०॥१६॥ तेहनें मरणों पण वाधेजी ॥२०॥ सुख यश स्त्री सुख नवि बाघेजी॥ २० ॥ सुत महत्व प्रमुख नवि उबांजी ॥२०॥ सतने केम होय ते बोबांजी ॥२०॥१॥ पाबली रातें एक दिनजी ॥२०॥ धर्म ध्यानमा तत्पर मनजी॥२॥ केम लखमी जनमथी पाम्योजी॥ ॥ नवि खूटे 5 व सवि वाम्योजी॥ रं॥ ॥ १७॥ एम चितवा एक देवजी॥रं० ॥ परगट थयो करतो सेवजी ॥ ॥ २० ॥ सशय वेदनने नाणीजी॥२०॥मन चिते एकोण प्राणीजी।। ॥र० ॥ १५ ॥ देव दानव के नोगीजी॥र ॥ खेचरपति योगीनी । ॥र० ॥ मन माने ते दो एहनी ॥रं पण तेजस्वी गुणी देहजी ॥२०॥ ॥ २० ॥ निजघरे शत्रु जो थावेनी ॥र ॥ पण पूजवा योग्य ते यावेजी ॥२०॥ तेम एहना गुण नवि जाणुंजी ॥२०॥पण मणिपरें पूजन टायु तृतीय खंग. ११७ नी॥ २० ॥ २१॥ विनय करी करे परणामजी ॥२०॥ तुमें कोणने थाच्या शे कामजी ॥२०॥ किहांथी तुमें थाव्या स्वामीजी ॥२०॥ ते चिते सुर विनय न खामीजी ॥ २० ॥ २५॥ कहे तु बु देवता जाणो जी ॥ २० ॥ पूर्वस्नेह रड बंधाणोजी ॥२०॥ मुज थानकथा वहां श्राव्योजी ॥ २ ॥ तुज सराय मुज मन नाव्योजी ॥२०॥ २३ ॥ ते टा लवा दु हा श्रायोजी ॥ र० ।। कहूं ते सोनल सुखदायोजी ॥ रं॥धा रमी कहो त्रीजे खमेंजी ॥रा ढाल पद्मे रंग थखमेंजी ॥र॥॥३॥ ॥ दोहा॥ ॥ जनरताः जाणीयें, मध्यख मणिपूर ॥ नगरें श्रीपाल नरपति, दुशमन कीधा दूर ॥१॥ धन्य वसे तिहां धनपति, नामें सारयवाद ॥ प्रीतिमती सति तस प्रिया,अगें धरे छलाह ॥ २॥ सूत्राम नामें सुत नतो, गुणधर गिरु जेह ॥ कला बहोतेर केलवे, यौवन पाम्यो जेह ॥ ॥ शेतनी कन्या सामटी, उत्सव करी अपार ॥ परणावे तेहनो पिता, सुख नोगवे श्रीकार ॥ ४ ॥ विविध प्रकारे व्यवहरे, उपराजे बहु थाथ ॥ कोहा करवा एकदा, सजिट मित्र ले साथ ॥ ५ ॥ ॥ ढाल तेरमी ॥ नणदल विंदति दे ॥ ए देशी॥ ॥वनमा सूरीश्वर देखे, क्रीडा करता अनवर्षे हो ॥ नवियण मुनि वदो ॥ मुनि अध्यवसाय शुन ध्यान, चारण मुनिने चार ज्ञान दो ॥ न० ॥१॥ नने मुनि चरणे वदे, मुनि निरखी मन थाणदे हो ॥ न ॥ धर्मनान दिये मुनि तास, जक जाणी सुविलास हो ॥ ज० ॥ ॥श्रणुव्रत पांचे विस्तारें, सर्वविरति कहे सुप्रकारें हो ॥ न० ॥ दृष्टांतने फल देखावे, ते क मर सुरो हुननावें हो ॥ ज० ॥३॥ समकित करे श्रगीकार, करे धन व तणो परिहार हो ॥ ज० ॥ निन उचित अनतकाय वारे, वली श्रदत्त श्रादान व्रत धारे हो॥ न० ॥ ४ ॥ विशे निरतिचार, वली पूजे तास विचार दो ॥ न० ॥ मुनि कहे सांनल तु नाई, ए व्रतनी वात ठराई हो ॥ ॥ ५ ॥ मणिने तृण जे पर केरु, थण श्राप्युन लीजें श्रनेलं दो ॥ न० ॥ मुनि त्रिविध त्रिविध व्रत पाले, गृही ऽविध त्रिविध सनाले हो ॥ ज०॥ ६ ॥ बीजा पण बहु ने गेंद, पण कायर पुरुपना वेट हो ॥ न० ॥ जे ने थावस्तु जेणे, ते पाली मुख समां तेणें हो ॥ न० ॥

१२७ जयानंद केवलीनो रास. ॥ ॥ वली जेणें विराध्युं एह, नवसायर नमिया तेह हो ॥०॥ बंधन पीडा पामे, 5खी दरिडी होये गम तामें हो ॥ न० ॥ ॥ ति 5 खनो नही पार, बिहु लोक विनाशणहार हो ॥ ज० ॥ एम जाणी यदत्त न लीजें, तो जगतजनें पूजीजें हो ॥ ज० ॥ ए॥ धाराधे उनप लोक साधे, दिन दिन दोलत बद वाधे हो ॥ न० ॥ व्रतपी न चले जेम मेरु, तस जस होय नगत घणेरु हो ॥ ज०॥ १० ॥तेजस्वीमा ते रवि ने म, सौम्यमा हिमरश्मि नेम हो ॥ ज०॥एम जाणो व्रत तुमें पालो, मत कोई कारों करो टालो हो॥॥ ११॥ करी तहत्ति श्राध्या निज धाम, गुरु प्रणमी थातमराम हो ॥०॥त्रणे पुरुपारथ साधतो, धर्मार्थ काम अवाधतो हो ॥ न० ॥ १२॥ लखमी वन वे पण नाणे, पर निज जाग्प ए टाणे हो ॥ न ॥ माय ताय प्रिया परिवार, पूजीने थाये तैयार हो ॥न ॥ १३ ॥ करियाणु लेई दूरदेश, गयो लाननो धरी उद्देश हो । न० ॥ प्रथिवी प्रतिष्ठपुर तेद, नेटणा नलां नूपर्ने देह दो॥न ॥ १४ ॥ नृप थाणथीनाडे गेह, लेई पस्य उतारे तेह दो॥न ॥ परिवारथी देव गुरु पूजे, नित्य नित्य ते धर्मे न मुंजे हो ॥न॥ १५॥ वाणोतर लोकने धार्ग, धर्म उपठेशे धर्मरागें हो ॥ ज० ॥ व्यापार करेने करावे, न्याय मारगें सड वरतावे हो ॥ ज० ॥ १६ ॥ व्यवहार शुक्षितो थावे, न्यूनाधिक तोल टला वे दो॥ न० ॥ चोरे थाप्यु जेह न लेवे, चोरने नवि धन कोइ देवे हो ॥नम्॥ ॥ १७॥ न करे नेल सनेल काय, नृपवैरीदेशे न जाय हो ॥जाए पांच थतिचार वर्ने, तो सुखमा धन बहु थर्ने दो॥॥ १७ ॥ तेम करतो पाम्यो प्रतिदि, मदिमा घणो लह्यो बद्ध शदि हो ॥ न० ॥ नृपनें अति शय वश कीयो, शासन उन्नति यश लीधो दोन॥ १५ ॥ दवे तातें ते डाव्यो ज्यारें, नरपति थाणा लदी त्यारे दोन ॥ पूर्व निज साथ मोक लियो, पूवें पोतें नीलियो दो॥ न० ॥ २० ॥ तुरगें दवे थइ यसवार, में चाल्यो शुनवार हो॥न ॥ उत्तघे पुरनें ग्राम, एकदिन वसीयो को गम हो ॥ ज० ॥ २१॥थागल जाये एकदिन्न, बटवीमा दूर थासम्न हो ॥०॥रमणिक दोय कमल दीना, थश्व उपरथी उक्किा हो । न॥श्शा जेम सूर्यपी हष्टि सकेले, तेम नवि जूवे धागल से हो ॥ न० ॥ वीठी धागे मणिमाला, मे रज्जुपरें ततकाला होन० ॥ २३ ॥ मणिरन वे तृतीय खंम १२ए सुवर्णे जरीयो, कुन देखी थागें संचरियो हो ॥ न० ॥ जाणे उपल नया जेम होय, तेम दृष्टि न देवे सोय हो ॥ ॥ २४ ॥ मन चितवे माहरे श्रागें, केम थावे ए त्रण मुज मागे हो। न० ॥ अथवा शी चित ए माहा रे, पण विस्मय चित्तमा धारे हो ॥ न॥ २५ ॥ धन्य एहनी मातने तात, जे पाले व्रत साक्षात हो ॥ ज०॥ कारण मलें मन न मंगायो, ए केणि परें जाय उगायो होना ॥ २६ ॥ खमत्रीजे तेरमी ढाल, पनविजय कही सुरसाल हो ॥ ज०॥ एम सांजली व्रत तुमें पालो, जेम दोवे मगल मालो हो ॥ न ॥ २७॥ सर्वगाथा ॥ ४३० ॥ ॥ दोहा॥ ॥ ततक्षण थाको तुरंग ते, चाले नही ते चाल ॥ उतरियो तव अश्वथी, था ऐ चिते थकाल ॥ १॥ चितवता एम चित्तमा, प्राण गया परें प्राय, दिलगीर थयो देखी करी, यु ए अश्वनें थाय ॥ २ ॥ केम ए तर थाक लो, अथवा मूळ एद ॥ मरण लह्यो थथ मुजनें, कोइ न खवर करेह ॥३॥ देव कुछ कोइ दाखीयें, अथवा मानु एम ॥ देव शरापें खीयो, कहो थकालें ए केम ॥४॥ वक्रवदन वाल्हीक ए,स्वामीनक्त सुजाण ॥चित्त थनिप्रायें चालतो, कर्णकश केकाण ॥५॥ मार्ग सखायी ने सृष्ट, मांसलमध्य संस्थान ॥झदिदातारणमा रहे, वारु करे व्याख्यान ॥६॥ मादरी थपेक्षा मूकीने,या वेला थयो एम ॥अश्व विना हवे थागलें,कहोनें चलियें केम॥॥ ॥ ढाल चौदमी॥ नाव श्रावकना नाखीयें ॥ ए देशी ॥ ॥ पंथी वैद्य कोश मले, करे थोप करी उपकार रे, दातार रे, जीवन जाणु ते सदी ए ॥ १ ॥ थापु धन तेदने बहु, एम करी इत उत ते जोवे रे, होवे रे, एम करतां वेता घणी ए॥ ३॥ पण नवि पथी को धावियो, पण फिरतां तरप ते लागी रे, शक्ति नांगी रे, तो पण नमतो नवि रहे ए ॥३॥ मुदिन लाधी वैद्यनी, नवि लाधु खोलतां पाणी रे, थाक श्राणों रे, बेठो गहि तरुतः ए॥ ॥ एणे समे मसक पाणी नरी, शाखा य वलवित तेह रे, जेद रे, गलती जलने विंध्ये ए ॥ ५ ॥ कोरों ए नीर न रो ग्वी, गयो किदा कहो एदनो स्वामी रे, शिर नामी रे, मागीने जल पी नीय ए॥ ६ ॥ तरप टालु एम चितवी, जोता न जडयो कोय रे, तव जो य रे, शाखायें वेठो सूडलो ए ॥ ॥ नरनापायें ते वदे, ताहरे गितने

१२०
जयानद केवलीनो रास.
श्राकारें रे, जाणुं प्यारें रे, तरप्यो रे तु अतिघणो ए ॥ ॥ पाणी देखे
पण नदि पीये, कहे कारण मुजने तास रे, मुज पास रे, पाहिज पर
मांही घरे ए ॥ ए ॥तु थमचो वे पाहुणो, वली गुणवतमा शिरवार रे,
थाकार रे, देखी ताहरो नारखी ए ॥ १० ॥ घर याओ ते सहजी,
वली तुज सरिखा सुविशेप रे, तु देखी रे, नक्ति करु दु ताहरी ए ॥११॥
जेहनु हो तेहर्नु होय नो. ए पाणी पी नि गक रे, इहां वक रे, लेश मात्र
नहीं ताहरो ए॥ १२ ॥ माहरे थानक ए जल थडे, तेणे आणा श्रापु
रगें रे, उन्हरगें रे, तरप टालो जल पोकरी ए ॥ १३ ॥ तरप्या धर्म न
दोयशे, उत्तटु थाय थार्त ध्यान रे, लावो ज्ञान रे, पनी व्रत दृढपणे
पालनो ए ॥१॥ यत ॥ सब सजम स,नमा थप्पाएमेव रस्किजा ॥
मुच अश्वायान, पुणो विसोही तया विरई ॥ १॥ पूर्व ढाल ॥ कहे कुंथ
र सुण सूडला, तु तत्त्वनी वात न जाणे रे, मुज थाणे रे, हित पण सान
ल वातही ए॥ १५॥ मसकनें जल ताहरु नहीं, थाणा दीये जे दोय स्वा
मी रे, सुखकामी रे, ते लिये तस दूपण नहीं ए ॥ १६ ॥ जेद अवस
लीये नदी, इद परनव सपदा पामे रे, 5 खतामें रे, होय अदत्त जे बाद
रे ए ॥ १७ ॥ सुख यश लखमी लदे नहीं, वात धर्म तणी रहे दूरे रे,
सपूरे रे, हर्गति 5 ख पामे सही ए ॥ १७ ॥ एक वार लोये श्रदत्त जो,
तो जन्मनी कीर्ति दारे रे, प्यारें रे, थापे जल ते नवि लेट ए ॥ १५ ॥
प्राणात पण नवि पीयु, तर मरण एकवार रे, पीयुं वारि रे, मरण
थनत लट्ठ थपत्तथी ए ॥ २० ॥ स्थिरता मन वच कायथी, साननी
शुक बहश थाय रे, तव थाय रे, एक पुरुष अणचितव्यो ए॥ ११॥
सत्यप्रतिज्ञावत तु, तुजनें दो परणाम रे, सत्त्वधाम रे, व्रता हठ तु ए
क ने ए॥ २२ ॥ एम प्रशसा सानली, कुमर वदे एम वाणी रे, गुणवा
णी रे, तुमें गुण अनुमोदनयकी ए ॥ २३ ॥ पण तुमने पूछ अमो, तु
म चरित्र घणु चित्रकारी रे, थवधारी रे, कहो तुमें कोण केम थावीया ए।
॥ २४ ॥ ते कहे सजिलो वातही, वैताढघे विपुला नयरी रे, जितवयरी
रे, चविद्याधर राजीयो ए ॥ २५॥ त्रीजे खमें चौदमी, बाल अधिक
बलासें रें सुविलासें रे, पविजय नारखी मुदा ए ॥ १६ ॥ १२ ॥

तृतीय खम १२ ॥ दोहा ॥ ॥ विशद नाम विद्याधरु, तेह नगरमा ताम॥ रमणीरूपें रुथडी, म णिमाला अभिराम ॥ १॥ मुत तेहनो सुरय थर्बु, कला ग्रही में काल ॥ शास्त्र नस्यो ढुं समजणें, काटु हर्षे काल ॥ २ ॥ विद्या विविध प्रकारनी, थापे पिता थनूप ॥ साधना विद्या सवे, साधु सिसरूप ॥३॥ फरतो पृथिवीमा फरु, विविध कीडा वनाहि ॥ विद्या बा वाल परें, थाणीथ ग सत्साहि ॥४॥ ॥ ढाल पन्नरमी ॥ दीनी हो प्रनु दीठी जगगुरु तुज ॥ ए देशी ॥ ॥ एक दिन दो तिहा एक दिन सानले कान, देशना दो नली देशना वि मल सूरिकनेनी ॥ जया हो मुज ब्रजया नली परें तात, वीक्षा हो लिये दीक्षा राज्य तनी मनेंनी ॥१॥ शिक्षा हो बिर्ल्ड शिक्षा ग्रहे गुरु पास,तपथी हो वली तपथी लब्धि लहे घणीजी ॥ थतिशय हो श्रुत थतिशय गुरुथी पामि,परिसह दो खमे परिसह खमे थप्रमत्त मुगीजी॥॥ पाम्या कमें पाम्या सूरिपद खास,चारित्र दो धरे चारित्र समिति सगथीजी॥ पाम्या हो ऋषि पाम्या ते घछ नाण,बंजवे दो नवि बजवे विचरे रंगधीजी ॥३॥ वसतो दो घर वसतो दु करु राज्य,चोरी दो शिख्यो चोरी तु शिख्यो कुसगथोजी॥ लातु दो धन लावु अनर्गल ताम,नित्य नित्य हो एम नित्य नित्य विद्याथ नगथीजी ॥३॥ नूचर हो नृप नूचरनु हरु व्य, क्रूरता हो थइ क्रूरता मनमां श्राकरीजी॥ बीजा दो बहु दोप श्राध्या निज थग,सन्मति दो गुण सत्य गया मूकी करीनी ॥५॥ नाग्य हो मुज नाग्य प्रेया ताम,थाव्या हो कपि थाव्या विशदसूरीसरूनी॥जाणीदो गयो जाणी विद्याधर साथ,महोत्सवें हो घणे महोत्सवें प्रणम्या जनक गुरुनी ॥६॥ स्तवीया दो मुणी स्तवीया सु णी उपदेश,समकित दो मुख समकितमुख लह्या जन घणाजी ॥ निजनिन दो सद् निजनिन थानक नाय,हितनो दो मुज दितनी नहीं कांइ मणानी ॥४॥ शिक्षा दो मुज शिक्षा बहु प्रकार,देई दो मुज वेई त्री व्रतथापिपुजी। चोरी हो नवि चोरी न करवी कोय,पूज्य हो विधा पूज्य मुज ख कापि युनी॥ ७॥ दीघो दो मुन दीधो तुज दृष्टांत, करवा दो मुज करवा दृढ़ता कारणेजी।बिदु नव दो हित बिदु नव जाणी हेत,पादस्यु दो व्रत श्रादयं 5ख निवारणेंनी ॥॥ चितव्यु हो में चितव्यु परखु तेह, जोउ हो वल।

२२२ जयान केवलीनो रास. जो थाकार याचारनेजी ॥ दृढता हो व्रते दृढता जोउ तास, जेहना हो गुरु जेहना वखाणे व्यापारने जी ॥१०॥ तेरों में हो तुज तेणें परीक्षा कोष, कुमल दो था कुमल प्रमुखनी जाणजेजी ॥ अव हो करसोधश्च ते अति शय मद, करणी हो माहारी करणीवीजानी मथायजेजी ॥११॥ पाणी हो तु, पाणी न पीधु रेख,तरप्या हो तुमे तरप्या पण थचरिन कप जी ॥ सा ची हो एह साची प्रतिज्ञा तुऊ, कनक हो परें कनक परें व्रत तुमें धरुजी ॥१श गुरुनी हो इहां गुरुनी मलि सवि वात, मिठामि हो तुन मिष्यामि कड दु देवजी ॥ तूगे हो तुज गे मागो काय,थापी हो मुज थापी जनमर्नु फल खेत जी॥१॥ पवित हो सिक्षिपतित तिमि दिये ताम, गगन हो गामी गगनगामिनी विद्या नली जी वीजी हो घणी वीजी विद्या थनेक, थापा दो दवे यापी धन थापे वलीजी ॥१॥ ते दो तव पूढे सारथवाह, केहई हो ए केहनु वित्त ले ते कहो जी ॥ खेचर हो कहे खेचर कांयक मुङ, कार क दो वली कांइक पारकुए लहो जी॥ १५॥ सांजली हो कहे सांगली सा रथवाह, निदित हो कहो निदित वात केणी परें जी ॥ धर्मनी दो कहोप मनी एक तो वात, बीच दो दियो बीजु थदत्त एणी परें जो ॥ १६॥ षो रीये दो श्राव्यु चोरीये ६ पण एद, अशुद्ध हो घणु थ६ मदिरायें जल यथानी ॥ धर्म हो लह्या धर्म जो तातनी पास, मूको हो तुमें मूको लाव्या तिम तथाजी ॥१७॥जाणो दो जेदनु जाणे सानरें जेह, वावसुं हो थप वणवावस्यु ते थापीयें जी॥ तिपथी हो थाय तिणधी बड नक्ष वाद, पुरस्यनो हो वली पुस्यनो सचय थापीयेंनी ॥१॥सानली हो तव सा नली सार्थप वाणि, की हो तव कीधु जेद सवे कसुंनी ॥ साजो हो थयो साजो थश्व तेणी वार, खेचर दो धन खेचर दीये ते नवि लमु जी ॥१५॥ सारवें दो तस साखें कयु धर्माम, पण ते दो कोइ पण ते नवि रामपुं त दाजी॥ पोहोता हो ते पोदोता निलनिन नाम, वरते दो हुँ वरते धर्ममाद सदाजी॥ २०॥ वावरे हो धन वावरे साते क्षेत्र, दीनने दो वीये दीन अनाथनें सपदाजी ॥ पाले दो व्रत पाले निरतिचार, टाले हो वली टाले लोकनी थापदा जी॥ २१ ॥ मेरु दो वली मेरुने गिरनार, सिगिरि हो वली सिदगिरि नदीश्वर करेजी ॥ जात्रा हो करे जात्रा तीरथनी एम, गगर्ने हो जाय गगनें विद्याधर परेंजी ॥ २५ ॥ उत्सव हो करे उत्सव तृतीय खम १२३ जा गीत, सफलो दो करे सफलो मानव नव तिहां जी ॥ धर्म हो करी धर्म दानादिक चार, कपन्यो दो तुं मपन्यो धायु क्ये शहां जी ॥ २३ ॥ तीजे दो खेमें त्रीजे पन्नरमी ढाल, नांखी दो श्रीनांखी श्रीजयानंदराममा जी॥ उत्तम दो गुरु उत्तमविजय पसाय, पदमें होनांखी पद्मविजयें नन्ना सर्मा जी ॥२॥ सर्वगाथा ॥४॥ ॥ दोहा ॥ ॥ विद्याधर गुरु वाणीथी, पाली धर्म प्रपंच ॥ थायुक्ष्य तिहां कप न्यो, सुर महाशक्षिनो संच ॥ १ ॥ व्यंतर पल्य थायु वडो, देवता थयो दयाल ॥ पूवनव व्रत पालिने, तु मिरिवत रसाल ॥ २ ॥ तुला जनमथी ताहरे, घर लखमी घणी होय ॥ प्रवनव कृत पुस्यना, योगयी सघवं जोय ॥ ३ ॥ धर्मस्नेह पूरव धरी, थाव्यो तुज घर थाप ॥ लखमी पूर सख गमे, मोजकी विण माप ॥ ४ ॥ अधिपति व्यतरनो अबु,थाव्यो ए कहेवा थाज ॥ थानूषण वस्त्र थापिनें, स्वघर गयो मुरराज ॥ ५ ॥ दरख्यो लखमीपुज दवे, जाति समरण जात ॥ मुर कत्युं जाणी साचलु, धमै दृढ थई धात ॥ ६ ॥ दान थनर्गल देयतो, मुख जोगवे सुरसाल ॥ सनिलो एकदिन देशना, लह्यो वेराग विशाल ॥ ४ ॥ गुरु पासें दीक्षा ग्र दी, उत्सव करी अपार ॥ श्रग नस्या अगीयार ते, तप वली बहु तपना र ॥ ७ ॥ चोखु पाली चरण ते, सणसण विधे थाराधि ॥ देवलोक बार में देवता, बावीश अयर थबाधि ॥ ए॥ जोगवी थाम्खु सुरनवे, नृप थ यो नरनव पाम ॥ केवलज्ञान लही करी, विचरे नवि विश्राम ॥ १० ॥ सिदि वरे सुख शाश्वता, ए धारी श्रवदात ॥ बौखं व्रत पालो तुमें, सद्ध सहो जिम सुख शात ॥ ११ ॥ ॥ ढाल सोलमी॥ मुजरो व्योने जालिम जाटणी ॥ ए देशी ॥ ॥ सनिली रतिमाला जे कुमर कत्यु, लखमीपुज दृष्टांत ॥ बुनी यद नादान निषेधती, थदत्त न लेन एकांत ॥ १॥ व्रत एम पालो नविक सोहामणु ॥ ए थोकणी ॥ श्रावक धर्म तिहां थंगी करे, दवे सार्मिक थाय ॥ त्रिदु जण प्रीतें सुखमाहे रहे, धर्मे काल गमाय ॥७॥२॥ राति समय एकदिन सूतो थकां, देखे सुपन कुमार ॥ कोक नगरें पर्वत दूकडो, निकुनो अवतार ॥ 5 ॥३॥ काष्ठ नार कपाडयो मस्तकें, कु १३४ जयानंद केवलीनो रास. रूपी शिरदार ॥ चोटामा कनो एम देखीने, जाग्यो तेह कुमार ॥ ran मन चिते ए सुपननु फल किश्यु, चात थसनय एह ।। जमणु लोचन फर क्यु तेणे समे, सुपननी साख पूरेह ॥ ७० ॥ ५॥ चित्तपो तास अपाय वि चारीने, मोहोटो पट एक काध ॥ स्वप्न दातु जिम नगरादिक तणु, तेम थालेखावी लाध ॥ ॥ ६॥ क्रीडा परवत वाव्य सरोवर, चटुटा हाटनें गेह ॥ नव नव रगें चित्रित पट थयो, मनोहर अतिशय एह ॥७॥3॥ तेह नगरनां वाह्य उद्यानमा, चैत्य ते पन जिपद ॥ तेहना मारने मल तु वारणु, शत्रुसालकरद ॥ ७० ॥ ७ ॥ तस थागल एक पीठ करावतो, तेडी वर सूत्रधार ॥ दानशाला ममावी तिहां कणे, दीन अनाथ धार॥ ॥5॥ ॥ चाकर मूक्या तास जिमाडवा, सेवक दक्ष वली जेह ॥ पट विस्तार देखाहे लोकनें, जूवे थति ससनेह ॥ ७॥ १० ॥ जे जूवे दृष्टि करो स्थिर तेहनें, कहे नगरादिक नाम ॥ ते मुनन मेलवजो पुरुपर्ने, पट जालवज्यो सुनाम ॥ ७० ॥ ११ ॥ ते पण सेवक कम तिमहिन करे, वर्णव करे सक्नु लोक ॥ देहरे थावे ते सह देखता, मलि मति थोकें थोक ॥७॥१२॥ एक दिन पंथी थाव्या दूरथी, धूलें खरहित देह ॥देखी प टने विस्मय पामिया, अहो केणे चितस्यो एद ॥ ७० ॥ १३ ॥ पटने जोश जोइ थानद दुवे घणो, सुदर शोनागेद ॥ अमचु नगर वसुं श्रमें एहमा, नामें पद्मपुर जेद ॥ ७० ॥ १४ ॥ पटपालक कहे थाव्या किहांथकी, को ण तुमें किहां वास ॥ ते कहे पद्मपुरथी थाविया, लाव्या ते कुमरनें पा स ॥ ७० ॥ १५ ॥ कुमरे वात मुणी तस मुखथकी, सतोप्या जलीरी ति ॥ कुमर पूछे फरी तास स्वरूपनें, ते पण कहे धरी प्रीति ॥ ७ ॥ ॥ १६ ॥ शो योजन ते नगर शहायकी, पनकूटगिरि पास ॥ राजा पन रथ तिहां राजियो, कोई न जोडी जे तास ॥ ७० ॥ १७ ॥ रूप ऐश्वर्य जीते इपनें, चइ सन्ज्वल गुण जास ॥ पण ते नास्तिक धर्मी आकरो, च कातक परें तास ॥ ७० ॥ १७ ॥सानली कुमरें तास विसर्जिया, दे ई इलित वान ॥ तिण नगरी जावानुं चित्त धरी, नारीने करे सावधान ॥ ॥ 5 ॥ १५ ॥ तीरथ नमीने श्राव जिहां लगें, रहेजो मातानी पास ॥ थड पुर धननुं दान देनो सदा, फरजो कलानो थन्यास ॥ ७० ॥ ५० ॥ खेद लही पण थाणा पालवी, एद पतिव्रताधर्म ॥ मान्युं तव ते बेशी तृतीय खेम. २३५ ढोलीये, गगने चाल्यो सुशर्म ॥ ॥ १ ॥ पनकूट गिरि पोहोतो रंग गं, त्रीजे खमें रे ढाल ॥ पद्मविजयें रंगें कही सोलमी, मुणो दवे वात रसाल ॥ ॥ २२॥ सर्वगाथा ॥ ॥ ॥ दोहा॥ ॥ पल्यंक किदां एक गोपवी, रूप करे कुरूप ॥ निस्ल काष्ठ नारो धरी, चाल्यो मन धरी चूंप ॥ १ ॥ पद्मपुरमा पाधरो, थाव्यो चगुटे थाप ॥ वे चण कनो वेगी, पण मनु मूरति पाप ॥ २॥ ॥ ढाल सत्तरमी ॥ कर्म न छूटे रे प्राणीया ॥ ए देशी ॥ ॥ राजपुरुष तिहां थाविया, देखे निलने ताम ॥ कुत्तल पीत जाहा छ गुं, होत लांबा वली श्याम ॥ १॥ कर्म न छूटे रे श्रातमा ॥ ए थांक णी ॥ मस्तक कडाह तलिया समुं, दतुरनें स्थूल पाय ॥ थारव्यो पीलीने श्यामलो, नाक चिपुट बेसी आय ॥ क० ॥ २ ॥ स्थूल नसाजाल देखीयें, कंकाल नैरव रूप ॥ कुलक्षण सवि थगनां, मानु पिशाच सरूप ॥क ॥ ॥३॥वीटी माथे रे वेलही, वस्त्र ते कोपीन एक ॥ देखी थु थु करे सवे, बो ले एणीपरें बेक ॥ ॥ ॥ बोलावे तुज नूपति, चालो सना मकार ॥ ते कहे हु किहां राना किहां, हुँ नवि थाईं केवार ॥ क० ॥ ५ ॥ जो तुम काष्ठनो खप दोये, तो ब्यो काठनो नार ॥ पण तिहां दुनवि थावणं, त व ते वोले विचार ॥ कल ॥ ६ ॥ बीहीक म कर तुं रे बापडा,राजा फरशे पसाय ॥ तेदनी साथै तव चालियो,देखाडयो तेह राय ॥ क० ॥ ४॥ टणु काष्ठनारा तणु, करीने ननो किरात ॥ पूढे नूपति एणी परें, कोण तु किदांधी थायात ॥ क० ॥ ॥ नाम किश्यं तुज किहां वसे, ते करे पितर मुज नाम ॥ पनकूटगिरिमा वसु, माहरे रहेवा नहीं धाम ॥ क० ॥ ॥ ॥ काटनो नार वेची करी, थाजीविका करु स्वामि ॥ नृप कहे इखि यो मुज नगरमा, केम तु रहे रे थाम ॥ क ॥ १० ॥ ते कहे तुम पु र स्वर्ग ज्यु, दु 5 खीयो वसु एम ॥ सरोवर पाणी न घणु, चातक त रप्यो रहे नेम ॥ ॥११॥ नृप कहे माग जे जोय, ते फहे उदर नु पूर ॥ काठथकी सुखमां होये, नाग्ययी अधिक होय दूर ॥ क० ॥ ॥ १५ ॥ तुमें तूता मुज खप नही, चीवर दोसत दाम ॥ पण नदी धा न्यनी रधनी, थापो तो दोय काम ॥ क० ॥ १३ ॥ नूप कहे दे रधनी, २२६ जयानंद केवलोनो रास. एम कही बोलावे ताम ॥ विनय सुंदरी निज सुता, कहे तेहने नृप बाम । ॥ ॥ १४ ॥ जिनधर्मे तुज सुख होपे, तो नोगवो लोग रसाल ॥ एतु जना में श्रापियो, कर्म फल्यां ततकाल क० ॥ १५ ॥ एहपी तुमने वहु मुख थशे, तव वोली तेह वाणि ॥ तातनु वचन प्रमाण , खेद नहीं शण गण ॥क० ॥ १६ ॥ कुलस्त्रीनो एह धर्म वे, तातें दीधो जे कंत॥ जाणे देव तणी परें, थाराधे मन सत ॥ क० ॥ १७ ॥ पूरवनवना संबंध थी, जो पण दोगे कुरूप ॥ पण तस प्रेम घणो धरे. निल पण तदधनु रूप॥ क० ॥ १७ ॥ कोक ज्योतिपी तिहां रह्यो, वानी कहे एम वात ॥ एह मुहूर्ते परणे निके, ते होये चक्री विख्यात ॥ क० ॥ १ ॥ राणी होये ते तेहनी, स्त्रीमा उत्तम नार ॥ एहनी खवर न को पडे, शुं फल होशे ए वार ॥ क० ॥ २०॥ ईर्ष्या कोपथी नूपति, साहस थतिशय धार ॥ राय स ना मांदे एम कहे, सानललो निरधार ॥क० ॥ २१॥ वरना वेपने सारि खो, लावो वधूनो रे वेप ॥ तव ते पुरुप लेवा गया, रायनी थाण विशेष ।। ॥क० ॥ २॥ वलय लाव्या रे कथीरना, सोहासणीनु निशाण ॥ कोईक नीचना घरथकी, साडी लाव्या पुराण ॥ क० ॥ २३ ॥ पूरव वेश मूकी करी, नवलो पहेरो ते वेष ॥ निल कहे तव रायनें, शी ए वात नरेश ॥ ॥ क०॥ २ ॥ मणिघंटा नवि सोहियें, रासन केरे रे कठ ॥ काणी कूठी ने सामली, दासीद्यो योग्य वन ॥ क॥ २५ ॥ कागर्ने योग्य ते कागडी, ईसाती पामे न सोद ॥ निम्न कहे पण रायनें, नवि लागो पडिबोद ॥ ॥ क० ॥ २६ ॥ विजयसुवरी ए धन्य जे, कीधो नवि मन खेद ॥ एहवी जीस पडे थके, नवि पामी निरवेद ॥ कल ॥ २७ ॥ सत्तरमीत्रीजा संग मां, पविजय कदी ढाल ॥ श्रीजयानदना रासमां, मुणतां मगलमाल ॥ ॥क० ॥ ॥ सर्व गाथा ॥ ५५४ ॥ ॥ दोहा ॥ ॥ रूपसार रंजातणु, करी धाता लेई केलि ॥ तेदने पवनसी लघु तु में, निम कहे करिमन नेलि ॥ १॥ चंचमुखी चोशठ कला, पप्रनेत्रापि कराव ॥ धर्मजाण धर्मचारिणी, नाग्यवती नलो नाव ॥ २ ॥ राजदस गति राजती, रति जीते रूपेण ॥ विनयादिक गुणवत ए, सोनागी सुस्वरे ए ॥३॥ निन्न किदा दोनागीयो, कठीयारोनें कुरुप ॥ लक्षण ही ल तृतीय खम २२७ खी मनें, निल्लने केम यो नूप ॥ ४ ॥ खेद लहे बदु परखदा, हा हा ए शु होय॥ मत्री कहेणनी नहीं मणा, कहे एणी परें सद्ध होय ॥ ५ ॥ पत्य उपर थति क्रोध क्यो, ख थागल देनार ॥ विपदा लहिये विरुम थी, नूपत्ति नणे तिवार ॥ ६ ॥ दोष शाने मुज' दाखवो, जैनधर्मिणी जे ह॥ मंत्री दोष न माहरो, या वरियो एह ॥ ७ ॥ ॥ ढाल थढारमी॥ घरें थावो जी थांबो मोहोरी यो॥ ए देशी ॥ ॥ कहे नूपति सनिलो मत्रवी,नरपतिनी रीति ले एह ॥ निज नाग्य प्र माणे पति वरे, सारखी मात्र पिता होये जेह ॥ १॥ नवि दृष्टिराग तुमें परिहो, दृष्टिराग अनर्थनो नाय ॥ दृष्टिरागें नूपति कहे निबनें, में दी धीते फेर न थाय ॥न ॥ ॥ कलावतीयं सुख भोगव मुखे, तुज सा हेव तूगे जाण ॥ कहे पुत्रीने पंमित माननी, करी कुल थाचारनी दाण ॥ न० ॥ ३ ॥ अवज्ञा पितानी करी घणी, निम्न था वरियो एह ॥ तेह नां फल जोगवो मोजणं, करो थरिहंत धर्मश नेद ॥ ज० ॥ ॥ कहे वि जयसुवरी तातनें, इहां वांक नहीं तुम रेख ॥ सुख उख जे नगमा पामी, ते कर्म तणाने विशेष ॥ ज०॥५॥ यत ॥ सदो पुत्व कयाण, कम्माण पावए फल विवाग ॥ अवराहे सुगुणे सुथ, निमित्त मित्त परो होइ ॥१॥ पूर्वढाल ॥ तुम कुल थवालीश तातजी, एह नर्ता इ समान ।। ते सां नली नप कोधे चढयो, जेम थग्निमा घृत असमान ॥न ॥ ६॥ विष ना वित तांबुल थापियु, त्रण पोहोरें थध ते थाय ॥ नोजन यतें निज पुत्री नें, वरने दोधु सुधि जाय ॥ न० ॥ ॥ नृप कहे जाट निनथानके, सान लीचाल्यो निज थान ॥ बायानी परें नृपनदिनी, चाली जरता थनुमान ॥न ॥ ७॥ राजा कहे सगुनें सनिलो, जे जाशे एहनी साथ ॥ अथवा धन थापशे एहने, तो मारीश तेहने हाथ ॥ न० ॥ ए ॥ तृपक्रोधथी मौ न करी रह्या, सचिवादिक पुरना लोक ॥ देवने उलनो थापता, धरता म नमा थति शोक ॥ न०॥ १० ॥ पुर बाहिर थाव्यां दपती, देवकुलमा कीध थावास ॥पतिपद तत्संगें ले करी, उनांसें निन करें तास ॥न॥ ॥ ११ ॥ ते देखी दूरथी नृप नये, स्तवना करे नारीनी ताम ॥ नृपनी नि दा करे सह जना, नूप मादा थधर्मनु धाम ॥ न॥ १२ ॥ हवे पूछे नि न निज नारिने, तु रूपें रेनसमान । केम मुनने पापी तुज पिता, तव सु १२६ जयानंद केवलोनो रास. एम कही बोलावे ताम ॥ विनय सुंदरी निज सुता, कहे तेल्ने नृप बाम । ॥क० ॥ १४ ॥ जिनधर्मे तुज सुख होये, तो नोगवो लोग रसाल ॥ ए जना में श्रापियो, कर्म फल्यां ततकाल क० ॥ १५ ॥ एइपी तुमने बहु सुख थशे, तव वोली तेह वाणि ॥ तातनुं वचन प्रमाण , खेद नहीं शण गए ॥क० ॥ १६ ॥ कुलस्त्रीनो एह धर्म के, तातें दीधो जे कंत। जाणे देव तणी परें,थाराधे मन सत ।। क० ॥ १७ ॥ पूरवनवना सबंध थी, जो पण दीठो कुरूप ॥ पण तस प्रेम घणो धरे. निल पण तवधनु रूप ॥ का ॥ १७ ॥ कोक ज्योतिपी तिहां रह्यो, वानी कहे एम वात । एह मुहूर्त परणे निके, ते होये चक्री विख्यात ॥ क० ॥ १५ ॥ राणी होये ते तेहनी, स्त्रीमा उत्तम नार ॥ एहनी खवर न को पडे, शुं फल होशे ए वार ॥ क० ॥ २०॥ ईर्ष्या कोपथी नूपति, साहस थतिशय धार ॥ राय स जा मांद एम कहे, सोनलनो निरधार ॥ ॥ २१॥ वरना वेपने सारि खो, लावो वधूनो रे वेप ॥ तव ते पुरुप सेवा गया, रायनी थाण विशेष ।। ॥क० ॥२२॥ वलय लाव्या रे कथीरना, सोहासणीनु निशाण ॥ कोईक नीचना घरथकी, साडी लाव्या पुराण ॥ क० ॥ २३ ॥ पूरव वेश मूकी करी, नवलो पहेरो ते वेष ॥ निम कहे तव रायनें, शी एवात नरेश ।। ॥ ॥ २४ ॥ मणिघंटा नवि सोहियें, रासन केरे रे कन ॥ काणी कूडी ने सामली, दासी यो योग्य व ॥ कम्॥ २५ ॥ कागर्ने योग्य ते कागडी, हंसली पामे न सोह ॥ निम कहे पण रायने, नवि लागो पडिबोह ॥ ॥क० ॥ १६ ॥ विलयसुंदरी ए धन्य बे, कीयो नवि मन खेद ॥ एहवी जीह पडे थके, नवि पामी निरवेद ॥ क० ॥ २७ ॥ सत्तरमी श्रीजा खम मां, पविजय कदी ढाल ॥ श्रीजयानदना रासमां, सुणतां मगजमाल ।। ॥क० ॥ २७ ॥ सर्व गाथा ॥ ५५ ॥ ॥ दोहा ॥ ॥ रुपसार रनातणु, करी धाता खेई केलि ॥ तेदने पवनसी जघु तु में, निम्न कहे करि मन नेलि ॥१॥ चश्मुखी चोशठ कला, पप्रनेत्रापि कराव ॥ धर्मजाण धर्मचारिणी, नाग्यवती नलो जाव ॥ ५॥ राजहस गति राजती, रति जीते रूपेण ॥ विनयादिक गुणवत ए, सोनागी सुस्वरे ॥३॥निम किदा दोनागीयो, कठीयारोनें कुरूप ॥ जरुण होण ल तृतीय खम १७ए दरी तया ॥ सा० ॥ गुण स्तवे मति मलि थोक ॥ गु०॥३॥ पण वीजी कन्या हो ॥ सा० ॥ पेखे नरपति ताम ॥ गु० ॥ कारण पूछे नूपति ॥ ॥ सा० ॥ हसवु शे थयु थाम ॥ गु० ॥ ४ ॥ कुमरी कहे का नही । ॥ सा ॥ तव थायद करे नूप ॥ गु० ॥ विनयसुदरी तव कहे ॥ सा ॥ सांजलो तात थनूप ॥ १० ॥ ५ ॥ वृहस्पति जीत्यो बुद्धिधी ॥ सा० ॥ नीति शास्त्रना जाण ॥ गुण ॥ तुमें थति निपुण बो लोकमां ॥ सा ॥ ज गमा अधिक विन्नाण ॥ गु० ॥ ६॥ मुज नगिनो पद सांजली ॥ सा० ॥ मोद लह्या अतिरेक ।। गुण ॥ तत्त्व न समजे ए सना ॥सा० ॥ प्रशसे थ विवेक ॥ गु० ॥ ॥ तत्त्व बजाणने वागलें । सा॥ जाण ते व केम ॥ गु० ॥ एहवु अचरज देखीने ॥ सा ॥ मुज हसवु थयु एम ॥ गुण ॥ ॥ ॥ राय कहे कुमरी सुणो ॥ सा० ॥ तुमें तत्त्वनां जाण ॥ गु० ॥ पू रो समस्या हवे तुमें ॥ सा ॥ जोश्ये तुम विन्नाण ॥ गु० ॥ ॥ नृप थाणा हवे सही करी ॥ सा ॥ तत्त्ववासित मति जास ॥ गु० ॥ हरखी समस्या पूरती ॥ सा ॥ जैनागम थल्यास ॥ गु० ॥ १० ॥ उदो ॥ जि एवर जसु हियडे वसे, जिण मुणि जिण तत्ता ॥ ते पमिय जिण जन य नव, पिस्कर सुरक सया ॥ १ ॥ पूर्वढाल ॥ एह समस्या सानली ॥ ॥ सा ॥ पाठक पाम्या दर्प ॥ गुज् ॥ सनालोक पण कोइ जना ॥ सा ॥ दरख्या यति उत्कर्ष ॥ गुण ॥ ११ ॥ पण नूपतिना जयथकी। साम् ॥ मौ न करी रह्या तेह ॥ गु० ॥ चमत्कार चित्त पानीया ॥ सा० ॥ अतिशय ध रता नेद ॥ गु० ॥ १५ ॥ नूप पूडे सह लोकनें ॥ सा ॥ बोलो तुमें सद्ध साच ॥ गुणाकेदनी समस्या तत्त्वनी ॥ सा० ॥ केदनी रूडी वाच ॥गुणा ॥१३॥ कहे ते थाय साची कड़ी ॥सा ॥थनुनव सिदए अर्थ गु०॥ विजयसुदरीने कहे ॥ सा० ॥ नूपति तें कयु व्यर्थ । गु० ॥ १४ ॥ रे कटु नाषिणी तु सुता ॥ सा० ॥ बोले लोक विरु६ ॥ गु० ॥ पुत्री वैरिणी ना वथ ॥ सा० ॥ एम बोले नृप कुछ ॥ गु० ॥ १५ ॥ कुमरी कहे में तुम क घु ॥ सा ॥ तत्त्व न जाणे लोक ॥ गु० ॥ दानी दा सघला करे।सा॥ रूड मनावे फोक ॥ गु० ॥ १६ ॥ को राजा कलकली ॥ सा ॥ कहे तु कोण पसाय ॥ गु० ॥ सुख नोगवे तव में कटु ॥ सा० ॥ कर्म प्रसादें राय ॥ गु०॥ १ ॥ सहुये निज निज कर्मथी ॥ सा ॥ सुख दुख सहे २१७ जयानंद केवलानो राम दरी कहे धरी शान || न० ॥ १३ ॥ कहे महोटी कथा वे एहनी, सनिलो पनरथ नूपाल ॥ पद्मपुरमा राज्य करे सदा, थरि काल सवत करवाल ॥ ज० ॥ १४ ॥ प्रजानें सुखदायी सदा, पण नास्तिक मतमां सोय । राणी दोय थतिशय वालही,पदमा कमला नामें होय ॥ ज० ॥ १५॥प दमा पतिधर्म ते थाचरे, कमला जैन गुरु उपदेश ॥ वली श्रावककुलमा छपनी, तेणें जैनधर्म सुविशेप ॥न ॥ १६ ॥ पद्म नामें पुत्र पद्मा तणो, जयसुदरी पुत्री एक ॥ कमलानें तो एक पुत्रिका, नामें विजयसुंदरी मुवि चेक ॥ न०॥ १७॥ दोय कुमरी धाव पाली नती, वधाता थनवा यो ग्य ॥ मिथ्यात्वी पालकनी कनें, पद्मा मूके ते अयोग्य ॥ न०॥ १७ ॥ जे जै नकलाचारय होय, निज पुत्री कमला मूके ॥ तस पासे शास्त्र थल्यासवा, काय विनय विवेक न चूके॥ न ॥१॥ जयसुदरी मात सयोगथी, ते म अध्यापक श्रज्ञान ॥ तेणें कौलधर्मी था याकरी, वीनी जैनधर्म वि झान ॥ ज० ॥ २०॥ ते पाठक बिहु तस मातनें, सोंपे सही यौवन वेद ॥ धन थापे श्रध्यापक प्रन्ये, करे प्रीतिवत गतखेद ॥ न ॥ १ ॥ श्रीजे खमें अढारमी, कही पद्मविजय वर ढाल ।। दृष्टिराग तनो तुमें नविन ना, दृष्टिरागथी बहुजनाल ॥ ज० ॥ २२ ॥ सर्वगाथा ॥ ५७३ ॥ ॥दोहा॥ ॥शणगारी बहू सुता, पाठक नृप पास ॥ पिता वरनी चितवी, नण वानो थन्यास ॥ १ ॥ नोवा मूके जालवी, माता मना थाण ॥ पोहोती नरपति पाउले, सकलकला शुनजाण ॥२॥ बेसाडी सत्सग बिलु, पा तस्वरूप ॥ पाठक बोलावी पडे, नव नव प्रश्न थनूप ॥३॥ ॥ ढाल गएीशमी ॥सादेलहीयांनी देशी॥ ॥ पूजे नृप निजनदिनी ॥ साहेलडीयां ॥ पद समस्यानु एक ॥ गुण वे लहीयां ॥ कहे तमें जो निज शास्त्रमा सा॥मति कीधी होये बेक ।।गुप ॥ १ ॥ (समस्यापद यथा ॥ पेस्कई मुस्क सया) ते जयसुंदरी सानली ॥ ॥सा ॥ तात धरममा जेद ॥ गु०॥ पद समस्यानु प्रती॥ सा ॥ सान तो थागत तेह ॥ गु० ॥ २॥ दो ॥ तुद सकर तुद बन निव, तुह पुरि मुत्तम ताय ॥ तुक पसारण सच पया, पेस्कई सुरक सया ॥१॥ पूर्वढाल ॥ सांजली राजा रजियो ॥ सा० ॥ सट्ठ परखदनां लोक ॥ गु०॥ पाठकनें सु तृतीय खं रए दरी तणा॥ सा ॥गुण स्तवे मनि मलि थोक ॥ गुण ॥३॥ पण वीजी कन्या हों । सा० ॥ पेखे नरपति ताम ॥ गु० ॥ कारण पूजे नूपति ॥ ॥ सा० ॥ हसवु शे थयु थाम ॥ गु० ॥ ४ ॥ कुमरी कहे का नही । ॥ सा० ॥ तव थायद करे नूप ॥ गु० ॥ विजयसुंदरी तव कहे ॥ सा ॥ सोचलो तात अनूप ॥ गु० ॥ ५ ॥ वृहस्पति जीत्यो बुद्धिथी ॥ सा० ॥ नीति शास्त्रना जाण ॥ गु०॥ तुमें श्रति निपुण बो लोकमां सा ॥ ज गर्मा अधिक विन्नाण ॥ गु०॥ ६॥ मुज नगिनो पद सांगली ॥ सा० ॥ मोद लह्या अतिरेक ।। गु० ॥ तत्त्व न समजे ए सना ॥ सा० ॥ प्रशंसे थ विवेक ।। गु० ॥ ॥ तत्त्व थजाणने पागलें । सा॥ जाण ते वर्ते केम ॥ गु०॥ एदवु अचरज देखीने ॥ सा ॥ मुज दसवु थयु एम ॥ गु०॥ ॥ ७ ॥ राय कहे कुमरी मुणो ॥ सा ॥ तुमें तत्त्वनां जाण ॥ गु० ॥ पू रो समस्या हवे तुमें ॥ सा ॥ जोश्ये तुम विन्नाण ॥ गुण ॥ ॥ नृप थाणा हवे सदी करी ॥ सा ॥ तत्त्ववासित मति जास ॥ गु०॥ हरखी समस्या पूरती ॥ सा ॥ जैनागम थन्यास ॥ गु० ॥ १० ॥ उहो ॥ जि पवर जसु हियडे वसे, जिए मुणि जिण तत्ता॥ ते पंमिय जिण उन य नव, पिरकर मुस्क सया ॥१॥ पूर्वढाल ॥ एह समस्या सोनली ॥ ॥ सा० ॥ पाठक पाम्या दर्ष ॥ गुण ॥ सनालोक पण कोइ जना ॥ सा ॥ दरख्या अति उत्कर्प ॥ गु० ॥ ११ ॥ पण नूपतिना जयथकी॥ सा० ॥ मौ न करी रह्या तेह ॥ गु० ॥ चमत्कार चित्त पानीया ॥ सा ॥ अतिशय ध रता नेह ॥ गु० ॥ १५ ॥ नूप पूजे सद्गु लोकनें । सा० ॥ बोलो तुमें सद्ध साच ॥ २०॥ केदनी समस्या तत्त्वनी ॥ सा० ॥ केहनी रूडी वाच ॥२०॥ ॥१३॥ कहे ते श्राय साची कदी ॥सा० ॥अनुनव सिदए अर्थ ॥गु॥ विजयसुदरीने कदे ॥ सा० ॥ नूपति ते कसु व्यर्थ ।। गु० ॥ १४ ॥ कट्ठ जाषिणी तु सुता ॥ सा ॥ बोले लोक विरुद ॥ गु० ॥ पुत्री वैरिणी ना वथी ॥ सा ॥ एम बोले नृप कुछ ॥ गुण ॥ १५ ॥ कुमरी कहे में नुम क पु ॥ सा० ॥ तत्त्व न जाणे लोक ॥ गु० ॥ हाजी हा सघला करेसा॥ राहु मनावे फोक ॥ गु० ॥ १६ ॥ को राजा कलकली ॥ सा ॥ कहे तु कोण पसाय ॥ गु० ॥ सुख जोगवे तव में कयु ॥ सा ॥ कर्म प्रसादें राय ॥ गु०॥ १४ ॥ सद्वये निज निज कर्मथी । सा ॥ सुख सुख लहे रे ते २२७ जयानंद केवलीनो रास. दरी कहे धरी शान ॥ न० ॥ १३ ॥ कहे महोटी कथा ने एहनी, सनिलो पम्नरय नूपाल ॥ पद्मपुरमा राज्य करे सदा, थरि काल सबल करवाल ॥ ज० ॥ १४ ॥ प्रजाने सुखदायी सदा, पण नास्तिक मतमा सोय । राणी दोय अतिशय वालही,पदमा कमला नामें होय ॥ न० ॥ १५ ॥ दमा पतिधर्म ते थाचरे, कमला जैन गुरु उपदेश ॥ वली प्रावककुला कपनी, तेणे जैनधर्म सुविशेष ॥ ॥ १६ ॥ पद्म नामें पुत्र पना तणो, जयसुदरी पुत्री एक ॥ कमलाने तो एक पुत्रिका, नामें विजयसुदरी सुवि वेक ॥ ज०॥ १७॥ दोय कुमरी धाव पाली जती, वधतां चश्नणवा यो ग्य॥ मिथ्याखी पाठकनी कने, पद्मा मूके ते अयोग्य॥ न० ॥ १७ ॥ जे जै नकलाचारय दोय, निज पुत्री कमला मूके ॥ तस पासे शास्त्र थन्यासवा, काय विनय विवेक न चूके। ना ॥ १९ ॥ जयसुदरी मात सयोगयी, म अध्यापक थझान ॥ तेणें कौलधर्मी यथाकरी, वीजी जैनधर्म वि झान ॥ ज० ॥ २०॥ ते पाठक विद तस मातनें, सोंपे सही यौवन वेद ॥ धन थापे अध्यापक प्रत्ये, करे प्रीतिवत गतखेद ॥ ज० ॥ २१ ॥ श्रीजे खंमें श्रढारमी, कही पद्मविजय वर ढाल ॥ दृष्टिराग तजो तुमें नविन ना, दृष्टिरागथी बहुजनाल ॥ न ॥ ५५ ॥ सर्वगाथा ॥ ५७३ ॥ ॥ दोहा । ॥ शणगारी बेंहू सुता, पाठक नृप पास ॥ पिता वरनी चितवी, जण वानो थन्यास ॥१॥ जोवा मूके जालवी, माता मना थाण ॥ पोहोती नरपति पाराले, सफलकप्ता शुनजाण ॥ २ ॥ बेसाही उत्सग बिह, पूले पा स्वरूप ॥ पाठक बोलावी पने, नव नव प्रश्न थनूप ॥३॥ ॥ ढाल ठेगणीशमी॥साहेलडीयांनी देशी॥ ॥ पूजे नृप निजनदिनी ॥ साहेलडीयां ॥ पद समस्यानु एक ॥ गुण वे लहीयां ॥ कहे तमें जो निज शास्त्रमा सा॥मति कीधी होये नेक ॥गु० ॥१॥ (समस्यापद यथा ॥ पेस्कई सुस्क सयाई) ते जयसुंदरी सोनाली ॥ ॥ सा ॥ तात धरममा जेह ॥ गु०॥ पद समस्यानु पूरती ॥ सा ॥ सान जो बागल तेद ॥ गु० ॥ २ ॥ हो ॥ तुद सकर सुद बन निव, तुद पुरि मुत्तम ताय ॥ तुल पसाण सब पया, पेस्कई सुरक सया ॥१॥ पूर्वढाल ॥ सांजली राजा रंजियो ॥ सा ॥ सद्ध परखवना लोक ॥ गु०॥ पाकनें सु तृतीय खंम. १३१ जणा एम रे ॥ ज० ॥॥॥ यधनें श्रापो निनने रे लो, ए पूरव नव वाणि रे ॥ न० ॥ श्रालोमु ने पहिकम्यु रे लो, पश्चात्ताप बनु श्राणि रे ॥ ॥न० ॥ ॥३॥ पण एक नवें जे नोगवे रे लो, तेटवं रयु तस शेप रे ॥ना कर्म करयां लूटे नहीं रे लो,नोगव्या विण ते अशेष रे ॥नाक०॥ ॥ ४ ॥ निनने दीधी थांख्यो गई रे लो, एणे नवें थाव्यु कर्म रे ॥न॥ थाशातनामुनिराजनी रे लो,महा 5 खदायी थधर्म रे ॥ना कण॥ ५ ॥ रायें मूक्या मानवी रे लो,बाना जोवा काज रे ॥ना सर्व वृत्तांत जई का रेलो, सौनलो दरख्यो राज रे ॥नक॥ ६॥ क्रोधी निर्दयीने कदा रे लो, नवि होये पश्चात्ताप रे ॥ न ॥ कमला प्रवें मोकली रेलो,कार्य ठ हेशी श्राप रे ॥॥॥॥ इष्ट विधन शका धरी रे लो, कपट कस्युं एम राय रे ॥ न ॥ कार्य करी थावी हवे रे लो, वात मुणे सवि माय रे ।। ॥नक०॥ ॥ मूर्धा पामीनें पड़ी रे लो,शीतादिक उपचार रे ॥ना दा सी कीघो तेहथी रेलो, पामी चैतन्य तेवार रे ॥नकाणा करिय वि लाप रुदन करे रेलो,पुत्री जोवा काम रे ॥न०॥ रातें वोय दासी सा रेलो, पोहोती तिणहिज गम रे ॥नक०॥१०॥ दूरथी जोइ पानी वली रेलो, क्रोधनें ख अपार रे ॥ ज० ॥ रायनें कहे विग हर्मति रे लो, सर्व विरु ६ करनार रे ॥नक॥११॥ चमाल पण न करे कदा रेलो,निज सता ना प रे ॥ न० ॥ पुत्री विटंबीमाहरी रेलो, वली थधित सुविशेप रे ॥०॥०॥१॥ वात यथार्थ तुजने कही रेलो, श्यो कीधो थन्याय रे ॥ज ॥ निदित कर्मथी तुकने रेलो, नरके निश्चय गाय रे ॥०॥०॥ ॥१३॥ पेट बुरी नाखी मरु रे लो,एम कहो नाखे जाम रे ॥३॥ ते तुरी उहाली लिये रेलो,नरपति वलथी ताम रे ॥नकारा नूप कहे सुण मुदरी रे लो, क्रोध ए कस्यु काम रे ॥न०॥ दवे लोक सचिव निंदा करे रे लो, पग पग मादरी थाम रे ॥नक॥१५॥ तादरी पण प्रेरणाथकी रे लो, पश्चात्ताप घणे थाय रे ॥ न० ॥ विहाणे शोध करावध रेलो, थाण शुं थापणे नाय रे ॥नाक॥१६॥ थोपध माहरे के वली रेलो,श्रधापो जेणें जाय रे ॥ न०॥ ते औषधे सानी करु रे लो, चिता न कर तु काय रे नकण॥१॥ देशु को नृप पुत्रने रेलो, कोधे जे फखु काम रे ॥१०॥ तेह प्रमाण नहीं कदा रेलो,थाश्वासे नृप वाम रे ॥नाक॥१॥ राति - ॥ १३० जयानंद केवलीनो रास. ससार ॥ गु० ॥ तुम प्रसाद जो सुख होये ॥ सा० ॥ के 5 खीया केम धार ॥ गु० ॥ १७ ॥ तव राजा क्रोध चढ्यो । सा॥ कहे जरता कोश तुज ॥ गु० ॥ में कामु जे तुमे थापशो ॥ सा० ॥ देव समान ते ॥ गु० ॥ १५ ॥ कर्म प्रमाणे थापशो ॥ सा० ।। तुम पण मुन जरतार । ॥ गु० ॥क्रोधे कहे मुज जा परी ॥ सा० ॥ थावजे तेढुं तेवार ॥ गु० ॥ ॥ २० ॥ निज थानक वेतु अमें गया । सा० ॥ निन नटने कहे राप ॥ गु०॥ 5 खीयो जे कोइ नयरमा ॥ सा० ॥ ते लावो मुज पाय ॥गु०॥ ॥ २१ ॥ ते पण तुमनें लावीया ॥ सा० ॥ थागल जाणो सर्व ॥ गु० ॥ एम सांजली विस्मय लह्यो । सानिन्न कहे श्रदो गर्व ॥ गुण ॥१५॥ निज थपत्यनें कपरें ॥ सा० ॥ केवुथकारय कीध ॥ गुरु ॥ नास्तिकनें कदो केम होये ॥ सा ॥ जैन विवेक प्रसि ॥ गु० ॥ २३॥ निम्न विचा रे चित्तमा ॥ सा ॥शील तथा वली स्नेद ॥ गुण ।। जोन दृढता एडमा ॥सा ॥ धर्मस्नेह वली जेद ॥ गु०॥ २४ ॥ त्रीजे खमें ए कही सा उगणीशमी वर ढाल ॥ गु० ॥ पद्मविजयें सोदामणी ॥ सा ॥ धर्मे मग लमाल ॥ गु०॥ २५ ॥सर्वगाथा ॥ ११॥ । दोदा ॥ ॥ तांबुल नवियु तेहवु,विप व्याप्यु विकराल ॥ थांख व्यथा पाक री, जिननें कहे जुन नाल ॥ १ ॥ नृप पासें विष ने नवल, जेहपीरियो जाय ॥त्रण पोहोरमा ततकों, वेवन यति वेदाय ॥ ॥ विश्वासी वैरी नणी, थापे यवनीपाल ॥ तंवोलमहि तेदनें, को थई कराल ॥३॥ में परसाद जास्यो मनें, खाधु तंबोल खांत ॥ कर्म शुनाचन कीपला, था वे उदय एकांत ॥ ४॥श्राख्यो जाशे आफणी, देवें अंधापो दीध ॥ केम तुम सेवा करणनो, थशे मनोरथ सि॥ ५ ॥ नारनूत तुमने नई, वधि वेदन तेणी वार ॥ रोवे तेम रोवरावती, वनमा पशुना बाज ॥ ६ ॥ ॥ ढाल वोशमी ॥ कोयलो पर्वत धूपलो रे लो ॥ ए देशी ॥ ॥ कर्म म करजो प्राणीया रे लो, कर्म का नवि जाय रे ॥जविकज न ॥ वचन योगें करी बांधीयां रे लो, काययोगें जोगवाय रे ॥॥१॥ कर्म म करजो प्राणीया रे लो॥ ए थोकणी॥ मत्रीनी स्त्रीयें मुनिमें कपुं रेलो, नवि सुजे तुम केमरे ॥ न ॥ एहवा सूर्य प्रकाशमा रे लो, थप - तृतीय खंम. १३१ जणा एम रे ॥ ज० ॥॥॥ थंधनें थापो निम्नने रे लो, ए पूरव नव वाणि रे ॥ ॥ बालोउं ने पहिकम्यु रे लो, पश्चात्ताप बदु थाणि रे ॥ ॥ ॥ ॥२॥ पण एक नवें जे जोगवे रे लो, तेटतु रत्युं तस शेष रे ॥ना कर्म करयां लूटे नहीं रे लो,नोगव्या विण ते शशेष रे ॥नक॥ ॥४॥ निझने दीधी थांख्यो गई रे लो, एणे नवें श्राव्यु कर्म रे ॥न॥ थाशातनामुनिराजनी रे लो,महा सुखदायी अधर्म रे ॥नाक॥ ५॥ रायें मुफ्या मानवी रे लो,बाना जोवा काज रे ॥॥ सर्व वृत्तांत जई कर्पा रे लो, सनिलो दरख्यो राज रे ॥नक॥ ६ ॥ क्रोधी निर्दयीने कदा रे लो, नवि होये पश्चात्ताप रे ॥ ज० ॥ कमला पूर मोकली रे लो,कार्य देशी थाप रे ॥न०॥॥॥ इष्ट विधन शका धरी रे लो, कपट कयूं एम राय रे ॥ ॥ कार्य करी थावी हवे रे लो, वात मुणे सवि माय रे ॥ ॥०॥०॥ ॥ मूर्धा पामीनें पड़ी रे लो,शीतादिक उपचार रे ॥न॥ दा सी कीयो तेहथी रे लो, पामी चैतन्य तेवार रे ॥न०॥काए। करिय वि लाप रुदन करे रे लो,पुत्री जोवा काम रे ॥०॥ रातें दोय दासी ला रेलो, पोहोती तिणहिज नाम रे ॥जक०॥१०॥ दूरथी जो पानी वली रेलो, कोधनें इख अपार रे ॥ ज० ॥ रायनें कहे धिग धर्मति रे लो, सर्व विरु ६ करनार रे ॥नक॥११॥ चमाल पण न करे कदा रेलो,निज सता नयं देष रे ॥ न० ॥ पुत्री विटंबीमाहरी रे लो, वत्ती थधित सुविशेष रे ॥०॥०॥१॥ वात यथार्थ तुजने कही रेलो, श्यो कीधो थन्याय रे ॥ ॥ निवित कर्मथी तुकाने रे लो, नरके निश्चय गाय रे ॥ नक॥ ॥१॥ पेट बुरी नाखी मरु रे लो,एम कहो नाखे जाम रे ॥ न०॥ ते बुरी अदाली लिये रेलो,नरपति वलथी ताम रे ॥नक॥१४॥ नूप कहे मुण मुदरी रेलो, कोध ए कम्यु काम रे ॥०॥ दवे लोक सचिव निदा करे रे लो, पग पग मादरी थाम रे ॥नक०॥१५॥ ताहरी पण प्रेरणाथकी रे लो, पश्चात्ताप घणो थाय रे । न० ॥ विदाणे शोध करावा रे लो, श्राण शु थापणे गय रे ॥नाक॥१६॥ श्रौपध माहरे वली रेलो,अधापो जेरों जाय रे ॥०॥ ते प्रौपधे साजी करु रे लो, चिता न कर तु काय रे आनाक॥१॥ देश को नृप पुत्रने रेलो, कोधे जे कस्खु काम रे ।।न० ॥ तेह प्रमाण नहीं कदा रेलो,थाश्वासें नृप वाम रे ॥नाक०॥१॥ राति ते मुक। १३० जयानंद केवलीतो रास. ससार । गु० ॥ तुम प्रसाद जो सुख होये ॥ सा ॥ के इस्वीया कम धार ॥ गु० ॥ १७ ॥ तव राना क्रोधं चढ्यो । सा० ॥ कहे जरता कोण तुज ।। गु० ॥ में कयु जे तुमें थापशो ॥ सा० ॥ देव समान ॥ गु० ॥ १ ॥ कर्म प्रमाणे श्रापशो ॥ सा० ।। तुमे पण मुन जरतार । ॥ गु० ॥ क्रोधे कहे मुज जा परी ॥ सा० ॥ यावजे तेहु तेवार ॥ ७ ॥ ॥ २० ॥ निज थानक वेहु अमें गया ॥ सा ॥ निज नटने कहे राप ॥ गु०॥ 5 खीयो जे कोइ नयरमा ॥ सा० ॥ ते लावो मुज पाय ॥॥ ॥ २१॥ ते पण तुमने लावीया ॥ सा० ॥ थागत जाणो सर्व ॥ गु० ॥ एम सानती विस्मय लह्यो । सा॥ निन्न कहे थहो गर्व ॥ गु० ॥१२॥ निज थपत्यनें कपरें ॥ सा ॥ केवुथकारय कीध ॥ गु० ॥ नास्तिक कहो केम होये ॥ सा ॥ जैनविवेक प्रसि ॥ गु०॥ २३॥ निम्न विचा रे चित्तमा ॥ सा ॥ शील तथा वली स्नेह ॥ गुण ।। जोन दृढता एहमा ॥ सा० ॥ धर्मस्नेह वत्ती जेद ॥ गु०॥ २५ ॥त्रीजे खमें एकही ॥सा॥ उंगणीशमी वर ढाल ॥ गु०॥ पद्मविजय सोहामणी ॥ सा० ॥ धर्म मम समाल ॥ गु० ॥ २५ ॥ सर्वगाथा ॥ ११ ॥ ॥दोहा॥ ॥ तांबूल नखियुं तेहवु, विष व्याप्यु विकराल ॥ थांख व्यथा पाक री, निननें कहे जुनाल ॥ १॥ नृप पासें विष ने नवल, जेहपीआरम्पो जाय ॥ प्रण पोहोरमा ततक्षणे, वेवन थति वेदाय ॥ २॥ विश्वासी वैरी नणी, थापे श्रवनीपाल ॥ तंबोलमांहे तेहनें, कोपें थई कराल ॥३॥ में परसाद जाप्यो मनें, खाधु तंबोल स्वांत ॥ कर्म गुनाशन कीपला, था वे उदय एकांत ॥ ॥धारव्यो जाशे श्राफणी, देवें अंधापो दीध । केम तुम सेवा करणनो, थशे मनोरथ सि ॥ ५ ॥ नारनूत तुमने नई, वषि वेदन तेणी वार ॥ रोवे तेम रोवरावती, वनमा पचना बाल ॥ ६ ॥ ॥ दाल वीशमी ॥ कोयलो पर्वत धूपलो रे लो ॥ ए देशी ॥ ॥ कर्म म करजो प्राणीया रेसो, कर्म करना नवि जाय रे॥नविकज न ॥ वचन योगें करी बांधीयां रे लो, काययोगें भोगवाय रे ॥०॥१॥ कर्म म करजो प्राणीया रे लो ।। ए श्रांकणी ॥ मत्रीनी स्त्री मुनिने कर्स रेलो, नवि सूजे तुम केम रे ॥ न ॥ एदवा सूर्य प्रकाशमा रे लो, अंध तृतीय खंम. २३३ ही घणो, गदगद बोले वाणि प्रीतम ॥शु बोल्या ए स्वामिजी, वजाघात समान प्रीतम ॥ का० ॥ ६ ॥ कुलवती कन्या होये,एकज वार देवाय प्रीत म॥ जेह पितायें पति दियो, प्राणांतें न बमाय प्रीतम ॥ का० ॥ ७ ॥ तुमें पति तुमें मति तुमें गति, जेदवा दोय ते प्रमाण प्रीतम ॥ शरण तुमारु श्रादह्यु,यवर ते घात समान प्रीतम ॥ का॥ ७॥ जो तुमें बॉमी मुजनें, तो सयम थाधार प्रीतम ॥ श्रथवा थगनि शरण करु, बीजो को न विचा र प्रीतम । का० ॥ ॥ ॥ वात सुणी निम्न चितवे, दृढशीलने वली स्नेह मुदरी ॥धानवनर निहन वोलियो, सानलजे कड़े जेह सुंदरी ॥ का ॥ ॥ १० ॥ तूनी तुज कुलदेवता, वली मातानीथाशीष सुदरी ॥ पुण्य जाग तां ताहरां, तादरी चढती जगीश सुवरी ॥ का० ॥ ११ ॥ कारिमो निहन हु कारणे, स्वानाविक जो रूप सुदरी ॥ देखाडु तुन माहरु, जो दवे शुद स्वरूप सुदरी ॥ का ॥ १२ ॥ एम कही स्वानाविक करे, थप्सरा मोहे जात सुदरी ॥ तो नारीनु कहेतुं किश्यु, देदीप्यमान थानास सुदरी ॥ ॥ का० ॥ १३ ॥ रत्नोद्योतें देखी करी, धापन थंग न माय सुवरी ॥ वि जयसुदरी एम कहे, ए कौतुक थाय प्रीतम ॥ का॥ १३ ॥ नाना रू पें सुरपरें, मुंजवो केणी परें स्वामि प्रीतम ॥ कुमर कहे सुण सुदरी, क त्रियसुत थनिराम सुदरी ॥ का ॥ १५ ॥ देश नमु कौतुकथकी, कला विज्ञानने हेत सुंदरी ॥ विविध देश नमतां थकां, थयो वट्ठ कला उपेत सु दरी ॥ का॥ १६ ॥ विविध मदिमावत चौपधि, पाम्यो वली देवें दीध सु वरी॥ श्राकाशगामि ढोलीयो, जिपयी मुज प्रसिद सुदरी ॥ का० ॥१॥ गिरि नगरादिक बढ जोस, रत्नपुरे एकदिन्न सुदरी ॥ नूपपुत्री रतिसुदरी, परस्यो प्रव पुस्य मुदरी ॥का॥१॥ नृप दीधा थावासमा जोगबु नोग रसाज सुदरी ॥ स्वप्न वीतु में थन्यदा,निशुरूप विकराल सुदरी का॥१॥ सुपन विधात कारणे, निमरूप कस्नु एद सुदरी ॥ राजपुरुप मुज ला वीया, तुं जाणे सवि तेह सुदरी ॥का॥२०॥ वात कही ते सांगली, हर्षे विकश्वर देव सुदरी ॥ ज्ञानी वचन साचु थयु, एम कहे थहो न सदेह प्री तम का॥१॥ सुणे एक दिन उद्यानमा,थाव्या ज्ञान निधान प्रीतम ॥ गुरु गुणवत दासीयें कह्या, दु गई तेह उद्यान प्रीतम ॥का॥२॥ माता सहित वदन करी, देशना अतें मात प्रीतम ॥ मुज पुत्री वर कोण थो, १३७ जयानंद केवलीनो रास. गई 5 खनी तिहां रे लो, विजयसुदरीना नयण रे ॥ न०॥ जामला हवे नि जफर्मने रे लोनिदे जखिणी वयण रे ॥नाक॥१के जिनवर श्राशा तना रे लो, अथवा गुरु गुणवत रे ॥०॥ गहीं करी थथ सपनें रे लो, उपश्च की अनत रे ॥नक०॥२०॥ हा मुज जनम शाने थयो रे लो, शाने पाली मुहरे॥ ज०॥ केम नवि मूड बालक थकां रे लो,पण ए कर्म नु गृह रे ॥नक॥२१॥ एम ते विलपती देखिने रे लो,रुपा अपनी तव निम रे ॥न ॥ थोपधि पाणी सक करे रे लो, याख्यो थइ ते नवन रे॥नाका॥ वेदना नागी सर्वथा रे लो,दिव्य नेत्र थई तेह रे |न चितवे कर्मथकी लह्यो रे लो, एहवो जरता एद रे ॥ नाक ॥२॥ त्रीने खमें वीशमी रे लो, पद्मविजय कही ढाल रे निण॥ श्रीजयानदना रासमा रे लो, पुल्य मगल माल रे ॥ न० ॥ क० ॥ २ ॥ सर्वगाथा ॥ ४१ ।। ॥ दोहा ॥ ॥ देवसानिध्य पण दोहली,एदवा औपधि एह ॥ नित्न कहे जमतांच कां, गिरि तपर गुणगेह ॥१॥ काठनें अर्थ किदांयके, शवरने वयण ॥ श्रौषधि महिमा उलखु,निरखी चिन्हें नयण ॥ २॥ तीधी विधि पूर्वक लता, राखी रूडी रीति ॥ दमणां ते सफली दुइ, नेत्रदाननें नीति ॥३॥पण द रिडी कवरूप हु, जघन्य थडे कुलजात ।। उत्तम कुल तु कपनी, तादरो नू पति तात ॥ ४॥ निन्न हुनत योग्य नहीं, नवि वटलावू नाम ॥ तु रूमें रंना जिसी, केम करु पाप निकाम ॥ ५॥ ॥ ढाल एकवीशमी ॥ वारी गोडी गामने ॥ ए वेशी॥ ॥ तू सुकुमाल शरीर जे,रविकर परस्या नाहिसदरी ॥ तो केम काष्ट वही के, जा नृप पास उन्हांहिं सुवरी ॥१॥काम विचारी कीजीयें ॥ एथांक णी ॥ रोष शम्यो दोशे दवे, मावित्रने जे क्रोध मुदरी ॥ नवि बढ्दु काल लगें रहे, वाती थपवावें लह्यो बोध मुदरी ॥ का० ॥ २ ॥ तुज माता द त थो, राजकुमर को सार सुदरी ॥ तस परणावशे सत्सवें, सफल थ शे अवतार मुदरी ॥'का० ॥३॥ करमद मात्रज मुन वरी, दुथाणा देव तुज सुदरी ॥ दोष नहीं तुज कोइ इहां, थधिक सबध न मुक सुदरी॥ ॥ का॥४॥ तुज मूकू नृपने घरे, जेम नवि जाणे कोय सुदरी ॥ हुँ जाई शबानो वली, परगट वात न होय सुदरी ॥ का० ॥ ५ ॥ सोनली खेद ल तृतीय खंग १३३ ही घणो, गदगद बोले वाणि प्रोतम ॥ शु बोल्या ए स्वामिजी, वज्जाघात समान प्रीतम ॥ का० ॥ ६ ॥ कुलवती कन्या होये,एकज वार देवाय प्रीत म॥ जेद पितायें पति दियो, प्राणांतें न बमाय प्रीतम ॥ का० ॥ ७ ॥ तुमें पति तुमें मति तुमें गति, जेहवा होय ते प्रमाण प्रीतम ॥ शरण तुमारु श्रादयुं,थवर ते घ्रात समान प्रीतम ॥ का॥ ७॥ जो तुमें मी मुजनें, तो सयम थाधार प्रीतम ॥ श्रथवा अगनि शरण करु, बीजो कोन विचा र प्रीतम ॥ का० ॥ ए॥ वात सुणी निघ्न चितवे, दृढशीलने वली स्नेह मुदरी ॥थानवनर निन वोलियो, सानलजे कर्मो जेद सुवरी ॥का ॥ ॥ १० ॥ तूती तुज कुलदेवता, वली मातानी थाशीष सुंदरी । पुस्य जाग तो ताहरां, ताहरी चढती जगीश मुदरी ॥ का० ॥ ११ ॥ कारिमो निहन छ कारणे, स्वानाविक जो रूप सुंदरी ॥ देखाडु तुज माद, जो दवे शुरू स्वरूप सुंदरी ॥ का ॥ १५ ॥ एम कही स्वानाविक करे, थप्सरा मोहे जात सुदरी ॥ तो नारीनु कहेवु किश्यु, देदीप्यमान थानास सुंदरी ॥ ॥ का० ॥ १३ ॥ रत्नोद्योतें देखी करी, थाणद थग न माय सुंदरी । वि जयसुदरी एम कहे, ए कौतुक थाय प्रीतम ॥ का०॥ १४ ॥ नाना रू पें सुरपरें, मुजवो केणी परें स्वामि प्रीतम ॥ कुमर कहे सुण सुदरी, ६ त्रियसुत थनिराम सुंदररी ॥ का ॥ १५ ॥ देश नमुं कौतुकथकी, कला विज्ञानने देत सुंदरी ॥ विविध देश नमता थका, थयो बहु कला उपेत मु दरी ॥ का० ॥ १६ ॥ विविध मदिमावत श्रौषधि, पाम्यो वली देवें दीप मु दरी ॥ श्राकाशगामि ढोलीयो, जिपयी मुज प्रसिद सुवरी ॥ का ॥१॥ गिरि नगरादिक बहु जोन, रत्नपुरे एकदिन्न सुंदरी ॥ नूपपुत्री रतिसुदरी, परण्यो पूरव पुस्य सुदर। ॥का॥१॥ नृप दीधा थावासमा जोगबु नोग रसाल सुदरी ॥ स्वप्न दातु में थन्यदा,निकुरूप विकराल सुवरी ॥का ॥१॥ सुपन विधातने कारणें, जिनरूप कस्यु एद सुदरी ॥ रानपुरुप मुज ला वीया, तु जाणे सवि तेह सुदरी ॥का॥२॥ वात कही ते सनिली, द विकश्वर देह सुदरी ॥ हानी वचन साचु थयु, एम कहे थहो न सदेह प्री तम का॥२१॥ सुणो एक दिन उद्यानमा,थाव्या छान निधान प्रीतम ॥ गुरु गुणवत दासीये कह्या, द गई तेह उद्यान प्रीतम का॥शा माता सहित वदन करी, देशना अतें मात प्रीतम ॥ मुज पुत्री वर कोण थशे, २३२ जयानंद केवलीनो रास. गई 5 स्वनी तिहारे लो, विजयसुंदरीना नयणरे ॥०॥ कामना दवे नि ज कर्मने रेलोनिदे खिए क्यारे नाकारा के जिनवर श्राशा तना रे लो, अथवा गुरु गुणवत रे। न॥ गहीं करी थय संघने रे लो, उपश्व कीध अनत रे ॥नक॥२०॥ हा मुज जनम शाने थयो रे लो, शाने पाली मुक रे॥०॥ केम नवि बालक थका रे लो,पण ए कर्म नु गुङ रे॥नक०॥२१॥ एम ते बिलपती देखिने रेलो,कृपा अपनी तव निन्न रे ॥ ॥ोपधि पाणी सक करे रे लो, थाल्यो थइ ते नवल रे ॥न०॥॥२२॥ वेदना नागी सर्वथा रे लो,दिव्य नेत्र थई तेह रे ॥०॥ चितवे कर्मथकी लह्यो रेलो, एहवो नरता एह रे ॥ जगाक॥२३॥ त्रीजे खमें वीशमी रेलो, पद्मविजय कही ढाल रे ॥ना श्रीजयानदना रासा रे लो, पुस्य मगल माल रे॥न० ॥ ० ॥ २४ ॥ सर्वगाथा ॥ ६४१ ॥ ॥ दोहा॥ ॥ देवसानिध्य पण दोहली,एदवी औपधि एह ॥ निम्न कहे नमतां प का, गिरि उपर गुणगेह ॥ १॥ काप्ठनें थर्थे किहायके,१६ शवरने वयण ।। थौषधि महिमा उलखु,निरखी चिन्हें नयण ॥ ॥जीधी विधि पूर्वक लता, राखी रूडी रीति ॥ दमणां ते सफली दुइ, नेत्रदानने नीति ॥३॥पण द रिडी कवरूप छ, जघन्य थ कुलजात ।। उत्तम कुल तु कपनी, तादरो नू पति तात ॥ ॥ निम्न द्वनी योग्य नहीं, नवि वटलावू नाम ॥ तुं करें रेना जिसी, केम करु पाप निकाम ॥ ५॥ ॥ ढाल एकवीशमी ॥ वारी दु गोडी गामने ॥ ए देशी ॥ ॥ तू सुकुमाल शरीर ,रविकर परस्या नाहि सुदरी ॥ तो केम काष्ठ वही के, जा नृप पास ठहदि सुवरी ॥ १॥ काम विचारी कीजीयें ॥ ए थोक ए॥ रोष शम्यो दोशे दवे, मावित्रने जे कोध सुदरी ॥ नवि बहु काल लगें रहे, वली थपवादें जह्यो बोध मुदरी ॥ का० ॥ २ ॥ तुज माता द र्षित थो, राजकुमर कोइ सार सुवरी ॥ तस परणावशे उत्सवें, सफल थ शे अवतार सुदरी॥का ॥३॥ करयह मात्रज मुज वरी, दुथाणा देठ तुला सुवरी ॥ दोष नहीं तुज कोई इहां, अधिक सबध न मुक सुवरी ॥ ॥ का ॥४॥ तुज मूकू नृपने घरे, जेम नवि जाणे कोय सुदरी ॥ ९ जाई शबानो वजी, परगट वात न होय सुवरी ॥का०॥ ५ ॥ सजिजी खेद स , तृतीय खंम. १३३ ही घणो, गदगद बोले वाणि प्रीतम ॥ बोल्या ए स्वामिजी, वजाघात समान प्रीतम ॥ का० ॥ ६ ॥ कुलवती कन्या होये,एकज वार देवाय प्रीत म॥ जेद पितायें पति दियो, प्राणांतें न माय प्रीतम ॥ का० ॥ ७ ॥ तुमें पति तुमें मति तुमें गति, जेदवा दोय ते प्रमाण प्रीतम ।। शरण तुमारू श्रादयुं,अवर ते घात समान प्रीतम ॥ का॥ ७॥ जो तुमें बॉमी मुजनें, तो सयम थाधार प्रीतम ॥ अथवा अगनि शरण करूं, बीजो को न विचा र प्रीतम ॥ का० ॥ ए॥ वात मुणी निघ्न चितवे, दृढशीलने वली स्नेह सुदरी ॥धानदनर निल्न वोलियो, सानलजे कहूँ जेह सुंदरी ॥ का ॥ ॥ १० ॥ तूठी तुज कुलदेवता, वली मातानी थाशीष सुंदरी ॥ पुस्य नाग तां ताहरां, ताहरी चढती जगीश सुवरी ॥ का० ॥ ११ ॥ कारिमो निन्न छ कारणे, स्वानाविक जो रूप सुंदरी ॥ देखाहु तुज माहरु, जो हवे शुभ स्वरूप सुंदरी ॥ का० ॥ १२ ॥ एम कही स्वानाविक करे, थप्सरा मोहे जात सुदरी ॥ तो नारीनु कहेतु किश्यु, देदीप्यमान थानास सुंदरी॥ ॥ का० ॥ १३ ॥ रत्नोद्योतें देखी करी, थाणद थग न माय सुंदरी ॥ वि जयसुदरी एम कहे, ए वे कौतुफ थाय प्रीतम ॥ का॥ १४ ॥ नाना रू पें सुरपरें, मुनवो केणी परें स्वामि प्रीतम ॥ कुमर कहे सुण सुंदरी, क्ष त्रियमुत थनिराम सुंदरी ॥ का ॥ १५ ॥ देश नमुं कौतुकथकी, कला विज्ञानने देत सुंदरी ॥ विविध देश नमतो थकां, थयो बहु कला ठपेत सु दरी ॥ का० ॥ १६ ॥ विविध मदिमावत श्रौषधि, पाम्यो वली देवें वीध सु दरी ॥ श्राकाशगामि ढोलीयो, जिपयी मुज प्रसिद सुदरी ॥ का० ॥१॥ गिरि नगरादिक बहु जोन, रत्नपुरे एकदिन्न सुंदरी ॥ नूपपुत्री रतिसुदरी, परस्यो पूरव पुरस्य सुदरी ॥का॥१७॥ नृप दीधा थावासमा नोगवु नोग रसात सुदरी ॥ स्वप्न वीतु में श्रन्यदा,निष्टुरूप विकराल सुदरी का॥१॥ सुपन विघातनें कारों, निमरूप कस्नु एद सुदरी ॥ राजपुरुप मुज ला वीया, तुं जाणे सवि तेह सुदरी का॥२॥ वात कही ते सानली, दे विकश्वर देह सुदरी ॥ ज्ञानी वचन साचु थयु, एम कहे यहो न सह प्री तम का॥१॥ सुणो एक दिन उद्यानमा,याव्या हान निधान प्रीतम ॥ गुरु गुणवत दासीयें कह्या, दु गई तेद उद्यान प्रीतम कामाशा माता सहित वदन करी, देशना अतें मात प्रीतम ॥ मुज पुत्री वर कोण थो, २३२ जयानंद केवलीनो रास. गई खनी तिहां रे लो, विजयसुदरीना नया रे ॥ ॥ जामता भवे नि ज कर्मने रेलो, निवे जखिणी चयए रे नकारा के जिनवर पाशा तना रे लो, अथवा गुरु गुणवत रे॥न० ॥ गहीं करी थप सपनें रे लो, उपश्व कीध धनत रे ॥नक॥२०॥ हा मुज जनम शाने थयो रे लो, शाने पाली मुऊ रे ॥ न०॥ केम नवि मू वालक थको रे खो,पण ए कर्म नु गुल रेनक॥२१॥ एम ते विलपती देखिने रेलो,रुपा सपनी तव निन्न रे ॥न ॥ योपधि पाणी सक करे रे लो, थारख्यो य ते नवा रे ॥नकार॥ वेदना नागी सर्वथा रे तो,दिव्य नेत्र थई तेह रे ॥२०॥ चितवे कर्मथकी लह्यो रे लो, एहवो जरता पद रे॥नाक॥२३॥ त्रीजे खमें वीशमी रे लो, पद्मविजय कही ढाल रे ॥ना श्रीजयानदना रासमा रे तो, पुण्यं मगल माल रे ॥ ॥क० ॥ २४ ॥ सर्वगाथा ॥८४१ ॥ ॥ दोहा ॥ । देवसानिध्य पण दोदली,एहवा थोपधि एह ॥ निन्न कहे जमतो ष कां, गिरि उपर गुणगेह ॥ १॥ काटने थर्थ किहायके, शवरने वयण ॥ श्रौषधि मदिमा उलखु,निरखी चिन्हें नयण ॥ २॥ लीधी विधि पूर्वक सता, राखी रूडी रीति ॥ दमणां ते सफली दुश्, नेत्रदानने नीति ॥ ३॥ पण व रिही कदरूप दु, जघन्य थने कुलजात ।। उत्तम कुल तुं रुपनी, तादरो नू पति तात ॥ ४॥ निम्न दु ना योग्य नहीं, नवि वटलावू नाम ॥ तु करें रंना जिसी, केम करु पाप निकाम ॥ ५॥ ॥ ढाल एकवीशमी ॥ वारी छ गोडी गामने ॥ ए देशी॥ ॥ तू सुकुमाल शरीर ,रविकर परस्या नादि सुंदरी ॥ तो केम काष्ठ वही के, जा नृप पास सहहिं सुदरी ॥ १॥ काम विचारी कीजीयें ॥ ए थोक णी ॥ रोष शम्यो दोशे दवे, मावित्रने जे कोध सुवरी ॥ नवि बद्नु काल लगें रहे, वत्ती थपवा- सह्यो बोध सुवरी ॥ का ॥ ५ ॥ तुज माता ह र्षित थशे, राजकुमर को सार सुदरी ॥ तस परणावशे उत्सवें, सफल थ शे थवतार सुदरी । का० ॥३॥ करयह मात्रज मुज वरी, थाणा देश तुक सुदरी ॥ दोष नहीं तुज को इहां, यधिक सवध न मुल सुवरी ॥ ॥ फा० ॥ ॥ तुज मूकू नृपने घरे, जेम नवि जाणे कोय सुदरी ॥ई जाई शबानो वली, परगट वात न होय सुवरी ॥ का०॥ ५ ॥ सांजली खेद ल तृतीय खंम. १३३ ही घणो, गदगद बोले वाणि प्रीतम ॥ गु बोल्या ए स्वामिजी, वजाघात समान प्रीतम ॥ का० ॥ ६ ॥ कुलवती कन्या होये,एकज वार देवाय प्रीत म॥ जेह पिता पति दियो, प्राणांतें न बमाय प्रीतम ॥ का ॥ ७ ॥ तुमें पति तुमें मति तुमें गति, जेहवा दोय ते प्रमाण प्रीतम ।। शरण तुमारु श्रावस्तूं, अवर ते नात समान प्रीतम ॥ का॥ ७॥ जो तुमें बॉमी मुजनें, तो सयम अाधार प्रीतम ॥ अथवा अगनि शरण करूं, बीजो कोन विचा र प्रीतम ॥ का० ॥ ए॥ वात सुणी निन्न चितवे, दृढशीलने वली स्नेह सुदरी ॥धानदनर निल्न बोलियो, सांजलजे कर्बु जेह सुदरी ॥ का० ॥ ॥ १० ॥ तूती तुज कुलदेवता, वली मातानी थाशीष सुदरी ॥ पुस्य जाग तां ताहरां, तादरी चढती जगीश सुदरी ॥ का० ॥ ११ ॥ कारिमो निहन द्व कारणे, स्वानाविक जो रूप सुंदरी ॥ देखाडु तुज माहरु, जो हवे अक्ष स्वरूप सुंदरी ॥ का० ॥ १२ ॥ एम कही स्वानाविक करे, थप्सरा मोहे जात सुदरी ॥ तो नारीनु कहेतु किश्युं, देदीप्यमान थानास सुदरी ॥ ॥ का० ॥ १३ ॥ रत्नोद्योतें देखी करी, धापद थग न माय सुदरी ॥ वि जयसुधरी एम कहे, ए शु कौतुक थाय प्रीतम ॥ का०॥ १३ ॥ नाना रू – सुरपरें, मुजवो केणी परें स्वामि प्रीतम ॥ कुमर कहे सुण मुकरी, त्रियमुत थनिराम सुवरी ॥ का ॥ १५ ॥ देश नमुं कौतुकथकी, कला विज्ञानने देत सुंदरी ॥ विविध देश नमतां थका, थयो वह कला उपेत सु दरी ।। का ॥ १६ ॥ विविध महिमावत थोपधि, पाम्यो वली देवें दीध मु वरी ॥ श्राकाशगामि ढोलीयो, जिणयी मुज प्रसिद सुदरी ॥ का० ॥१॥ गिरि नगरादिक बढ़ जोत, रत्नपुरे एकदिन्न सुंदरी ॥ नूपपुत्री रतिसुदरी, परस्यो प्रव पुण्य सुदरी ॥का०॥१॥ नृप दीधा थावासमा नोगतु जोग रसाल सुवरी ॥ स्वप्न दातु में अन्यदा,निकरूप विकराल सुदरी फा॥१ए। सुपन विधातनें कारों, निम्नरूप कस्यु एद सुदरी ॥ रानपुरुप मुज ला तु जाणे सवि तेह सुदरी ॥का॥२॥ वात कही ते सांगली, दे विकश्वर वेद सुदरी ॥ ज्ञानी वचन साचु थयु, एम कहे थहो न सह प्री तम का॥१॥ सुणो एक दिन उद्यानमा,याव्या ज्ञान निधान प्रीतम ॥ गुरु गुणवत दासीये कह्या, दु गई तेह उद्यान प्रीतम का॥२॥ माता सहित वटन करी, देशना यतें मात प्रीतम ॥ मुज पुत्री वर कोण थो, वीया, १३४ जयानट केवलीनो रास. नास्तिक कुमरीतात प्रीतम || का० ॥ २३ ॥ मुज पुत्री जैन , सात ने थल्प के राग प्रीतम ।। मुनि कहे धर्मशीला सपो, जेह पो महानान प्रीतम ॥ का० ॥ २४ ॥थई नरतनो अधिपति, तुज पुत्री जरतार प्रीत म।। फरी कहे केम मलशे कहो, तव नाखे थणगार प्रीतम का॥१५॥ शहां उद्याने पननु, चैत्य थठे तेहमाद मौतम ॥ चकेवरी तेदनी, पूजाथी मसशे उत्साह प्रीतम ॥ का०॥ २६ ॥ ते दिनथी पूजा करी, मानु ते तुष्टमान प्रीतम ॥ स्वप्नादिक सवि तेणे सयु, मेलव्यो जोग समान प्री तम ॥ का० ॥ २७ ॥ कुमर कहे जिनधर्मथी, सघलु याय कल्याण सुर री॥ योग थापणे गुन जडयो, सनिलो हवे फटु वाण सुंदरी ॥ का० ॥ ॥२०॥ त्रीजे खमें पूरण थइ, एकवीशमी ए ढाल प्रीतम ॥ पद्मविजय कहे धर्मथी, होवे मगलमाल प्रोतम ॥ का ॥ २५ ॥ सर्वगाथा ॥ ६७५ ॥ ॥ दोहा ॥ ॥ सानती वात सोदामणी, नवि जाणे कोई नाम ॥ तेम हाथी चालो तुमें, नाटके जश्य नाम ॥ १॥ शिक्षा देउ सारी पत्रे, तुन तातने त्यां सी म ॥ प्रगट न था प्रेयसी, सांजली ए मुफ नीम ॥ २ ॥ परगट नहीं उपा य ते, शिक्षा मानें साम ॥ अवसरे शिक्षा वेइ थमें, धर्म तणो करु धाम ।। ॥३॥ थरिहत धर्म उलखाव, कौलपणु करु दूर ॥ उपकार करवो थव रने, सहननु ए शूर ॥ ३ ॥ उपकार धर्म उपर नहीं, फरु एहनें उपकार ।। श्रौषधिषालथी इहां रहे, विघ्न रहित इणवार ॥ ५ ॥ पल्पक थानरण गो पव्या, लेई थावु ब्दार ॥ वस्त्र लावु तुज वासते, नयरीथी निरधार ॥ ६ ॥ ॥ ढाल बावीशमी॥ नटीयाणीनी देशी॥ ॥ मानी नारिये वात, थौषधी देई चाल्यो दो तिहां लेई पक्ष्यंक थानूष एण ॥ पहेरी गयो पुरमाहि, चोहटामाहे वोतो दो काय व्यवहारीना थाप ॥ १॥ कोश शेग्नें दाट, बेसी मागे वख दो वती, थानरणां घणु वीप ता॥ बमण मूला रन, थापीने लीये तेह दो, काय स्वर्ग सबधी जींपत्ता ॥ २ लोनें वाणिक जाति, थायां वस्त्र धमूला हो वली नारीनां थानूष ए घर्णा ॥ नवां कराव्यां तेह, इव्ये यं नवि सीजे हो धरे मनमा जे दोये कामण ॥ ३ ॥ देवकुछे जई तेद,नारीने पहेरावे दो ते वस्त्र धानूपण सो दतां ॥ पल्पके सूतां दोय,ब्राह्म मुहूर्ते नागे हो तव वपण कहे मन मो तृतीय खंम १३५ इतां ॥ ३ ॥ जश्य थाकाशपथ, नारी कहे किहां जाशुं हो तव कुमर कहे सुणो सुंदरी ॥ रत्नपुरें वे नाम, तुज सरखी मुज नारी हो घणुं प्यारी ने र तिसुदरी॥ ५ ॥ विजयसुदरी कहे ताम, तुमें उपकारी महोटा हो तेरों वा त मुणो एक मादरी ॥ कमलपुरें ले नप, कमलप्रन मुज मामो हो दीन श्रनाथनो वाहरी ॥ ६॥ प्रीतिमती प्रिया श्राद्य, तेदने सुत जयसूर हो रोगीने दोनागीयो ॥ वली श्रन्यायी क्रूर, थप्रिय बोले नित्ये हो नहीं सक न कोई पामीयो ॥ ७ ॥ जोगवती बीजी नारि, सोनागिणी मुज माता हो दाता प्रिय वल्लन घणु ॥ तेहनें पुत्री एक, कमलसुदरी रूडी दो रूप धर्मे मुज मम घणु ॥ ॥ वय पण मुज सम तास, पुत्र विजयशूर नामें हो दाता विनयी पराक्रमी ॥ एकदिन पूजे राय,निमितियाने नाखे दो राज्य योग्य कोण उद्यमी ॥ ए ॥ ते कहे जे लघु पुत्र, गुणवतो ते योग्य हो सां जली राजा हरखियो ॥ निमित्तियो दे दान,विसयो ने जाणी हो प्रीतिम ती विषवरषीयो॥ १०॥ चितवे एणी परें चित्त, विजयशूर नीरोगी हो गुण वतो वे जिहां लगें। रोगी माहरो पुत्र, अविनयीने केहवी दो राज्यनी था शा तिहां लगें ॥ ११ ॥ अविनीतने दो ग्य, नृपने पण नदी राग हो वली निमित्तियो एम कहे ॥ चांदे कारनो क्षेप, राजा तो ए धर्मी हो थ वसर लही दीक्षा ग्रहे ॥ १२ ॥ मुजथी तो न लेवाय, शक्ति बनावें तेणें हो शोक्यपुत्र थाये राजीयो ॥ देखीने न खमाय, मुन सुत 5 खीयो देखी हो यद्यपि ए गुण गाजीयो ॥ १३ ॥ मारु कोई उपाय, अथवा अगें ही यो दो करु जेम राज्य न ए लहे॥ कोई कपालिणी देखि,चूरण योगादिक जाणे दो तेहनें एकदिन एम कहे ॥ १५ ॥ सेवा करे तस नित्य, ते कहे भ्याने सेवो हो तुज काम होये ते नारखीयें ॥ ए कहे मुज सुत शाल,काढो एहज काम दो घणु घणु शु तुम दाखीयें ॥ १५॥ कहे ए कपालिनीघल्प, खाधु करपद थप्ने हो दिन तुज चूरण एदवु ॥ नोजनमाद थापि, ताहरा थर्थनी सिहि हो थाशे चित्त ने जेतु ॥ १६ ॥ सनिली दरखी तेद, चूर ए लोधुं तेणीय हो करी सतकार तेहने घो। शोक्य उपर घणे नेह,स त ऊपर दाखवे हो वली ते विश्वासी पषु ॥ १७ ॥थधिक अधिक धरे स्ने ह, उर्जननी गति नाति हो सकन किमही नवि लहे ॥ एकदिन कायक पर्व, पामीने ते शोक्य हो तिम तस पुत्रने एम कहे ॥ १७॥ चालोनोनन का २३६ जयानंद केवतीनो रास. म, धान परवनो दाहाडो दो सजान ते नेला जिमे ॥ सरल स्वनावी तेह, नोजन अर्थ थाव्या दो थासन मामा मनगमे ॥ १९ ॥ गौरव नक्ति के खाय, प्रीतिमती घण नेहें हो विधिये सर्व कारय करे । मोदक प्रमुख जे सा र, कपालिनी दत्त चूरण हो कुमरने सहित दे शुनपरें ॥ २० ॥त्रीने रवमें ढाल, बावीशमी पद्मविजयें हो जोखी एद सोहामणी ॥ श्रीजयानदने रा स, उर्जन सहान पटतर दो एम जाणी सकान था गुणी ॥ २१ ॥ सर्व गाथा ॥ ६०२॥ ॥दोहा॥ ॥जमी उपचा जो करीवली सत्कार विशेष ॥थाव्या घर थाणवमुं, लरव्यु जे थाये लेख ॥ १ ॥ हलुये हलुये दाथ पग, थंनाये जेम थन ।। चूरणना ए चिन्ह , आवे सहुनें थचन ॥२॥ करथी कांइन करी शके, पगें न चाले पंथ ॥ कर्मतणी गति केदवी, श्रागें न चले श्रथ ॥३॥राय राणी व्याकुल रूवे, करे विविध प्रतिकार ॥ वैद्य श्रौपध करे नव ना,गुण नवि थाय लगार ॥ ४ ॥ प्रीतिमती विना सद्ध प्रजा, उख पामी खेदाय ॥ शका थाची सर्वनें प्रीतिमती ए उपाय ॥ ५ ॥ ॥ ढाल त्रेवीशमी ॥ रागधन्याश्री गिरुवा रे गुण तुम तणा॥ ए देनी ॥ ॥ चेष्टा प्रीतिमती तणी, वली नोजन दिन सनारी रे॥ निमित्तियाने पू बीयुं, कहो ए केम फर्मनो नारी रे ॥१॥ कर्म प्रमाणे फल लहे॥ ए या कणी ॥ निमित्तियो कहे नारीथी, थयो इष्ट चूर्णसयोग रे ॥ विविध श्री षधियी नहीं टले,पण थागें थाशे नीरोग रे॥०॥५॥ निमित्तियाने वि सर्जियो, देश घणो सत्कार रे ॥ दासी कह्याथी जाणीयो, प्रीतिमती कपा लिनी प्यार रे ॥ क० ॥ ३ ॥ सुनट मूकी कपालिनी, तेडोनें प्राहना कोधी रे॥ तव ते बोली साचलुं, घूर्णादिक वस्तु जे वीधी रे ॥ ॥ ॥ ४ ॥ कसो धिक्कार सद्ध लने, प्रीतिमतीने नरपति काढे रे॥पीयर गई ते पाधरी, तिहा पण लोक निदे गाढ़े रे ॥ क० ॥ ५ ॥ घोर कटुक फल नोगवे, पाप इह पर नव खवायी रे ॥ पण ए असार ससारमा, एक धर्मज पाय सहायी रे ॥ ७ ॥ ५ ॥ जे धन्यने मातु चितवे,परनें तो नजना जाणो रे ॥ पण एक ने अनिप्रायथी,दोये मुर्गति खनी खास्यो रे ॥ कण ॥ ७॥ नूपतिने रा जवर्गीया,पुरलोक मली कहे वातो रे ॥ अहोघहो स्वीना हृदय,उष्टताने तृतीय खंम २३० साहसघातो रे ॥॥॥ धिक् इह लोकनु सुख था, तेहनें अर्थ करे प्रा पी रे ॥ विविध प्रकारना कर्मनें, करे जिणथी लहे उखरखाण। रे ॥क॥ ॥ ॥ ॥ हवे नूप पडह वजडावतो, कोइक परदेशी थावे रे ॥अथवा कोश निज देशनो, थावीने परगट थावे रे ॥ क० ॥ १० ॥ जे मुज पुत्र साजो करे, तेदनें था' एक देश रे ॥ कमलसुंदरी कन्या देनं, वली कहे ते करूं विशेष रे ॥ का ॥ ११ ॥ एम त्रण त्रण दिन वजाडतो, पनर पनर दिन यतें रे ॥ मामे मुज तेडी घरे, घणुं मुज उपर प्रीतिवते रे ॥ कण् ॥१२॥ सानन्यु में मोशालमा, ए नास्युं ते वृत्तांत रे ॥ कमलसुंदरी मादरे,घणी प्रीति हती एकांत रे ॥ क० ॥ १३ ॥ माहरे एहनें एक पति, करवो एम की ध विचार रे॥ पण नाना शोकथी, नवि वात करी लगार रे॥ कण॥१४॥ विजयसुदरी कहे तेणें तुमें,ते नगर जई सुख कीजें रे ॥ मोशाल सह मुखीयु थशे, जगमा जश मोहोटो लीजें रे ॥ कण् ॥ १५ ॥ मुज लोचन दीधा प की, तुममा निश्चय ने शक्ति रे ॥ शी एहवी वस्तु जगें, कल्पवृक्ष करे नहीं व्यक्ति रे॥ कल ॥ १६ ॥ पर उपकार परम यशे, एद साजो थाशे कुमार रे॥परजाने मुख थापशे, न्याय धर्मी शुन थाचार रे ॥ क० ॥ १७ ॥ ए तुमनें सवि जश थडे, नारीनां सुणी वयण कुमार रे ॥ तिहां जावु श्रगी क रे, करवा तेइने उपकार रे ॥क ॥ १७ ॥ निज नाग्य परीक्षा एम करी, पाम्या एणीरीतें नारी रे ॥ श्रीजयानद मुदित थया, जे नित्य नित्य पर ठ पकारी रे ॥ ७ ॥१५॥त्रीजे खमें वीशमी, ढाल नाखी चढते रंगें रे॥ त्रीजो खम पूरण थयो, ए रासमा रंग थनगें रे ॥ क०॥ २० ॥ सत्यविजय पन्यासना, वर कपूर विजय पन्यास रे ॥ खिमाविजय शिष्य तेहना, पूरव मु नि मुझ जास रे ॥ क० ॥ २१ ॥ जिनविजयो जगमा जयो, जेदना ने शि प्य अनेक रे॥ तेहा उत्तम विजयजी, थया पंमित वारु विवेक रे ॥०॥ ॥२॥ तस पदपकज थलि समो, शिष्य पनविलय जसु नाम रे ॥ तास क पाथीनारखीयो, खंमत्रीजो एथनिराम रे॥ २३ ॥ सर्वगाथा ॥ २ ॥ ॥ इति श्रीमत्सविज्ञ पदीय पंमित प्रवर पंमित श्रीउत्तम विजयजीजणि विनेय पंमित पद्मविजयगणिविरचिते प्रारुतप्रबधे श्रीश्रीजयानद केवलि चरित्रे श्रीजयानदकुमारस्य देशांतरचर्यायां गगत्तपरिवानकोपकार मलय मालक्षेत्रपालजय तदर्पितसमहिममहौपधिपचकप्राप्ति तत्पूर्वमत्रिनवपत्नी २८ ॥ इति १3G जयानंद केवलीनो रास यजीव रतिसुदरी विजयसुदरी महावदातमहोत्सवपाणिग्रहणलोज दृष्टांत तृतीयव्रतपालनादि फलदर्शन कमलसुदरीकरग्रहणप्रस्तावनादि व नोनामा तृतीय खम समाप्त ॥ ॥ प्रथम खंभे गाथा ॥ ४४४ ॥ दितीयसंमे गाथा ॥ ६६ ॥ तृतीय में गाया ॥ ४२ ॥ सर्वमती गाथा ॥ २१३ए ॥ तथा प्रथमखमे उक्त श्लो क ॥१३॥दितीयखमे उक्त श्लोक ॥ १ ॥ तृतीखमे उक्त श्लोक॥११॥ सर्व मली उक्तश्लोक ॥३॥ तथा सवईयो एक,समस्या वे ॥ इति ।। तपा प्रथम खमे ढाल ॥ १५ ॥ वितीयखमे ढाल ॥ ३३॥ तृतीयखमे डाल ॥ २३ ॥ सर्व मली ढाल ॥ १ ॥थई वे तृतीयखम सपूर्णतामगमत् ॥ ॥ अथ चतुर्थखम प्रारभ्यते ॥ ॥दोहा॥ ।। शासन नायक शिवकरण, व3 श्रीवईमान ॥ चोथा खमन चोपच्छ, वर्णवा व्याख्यान ॥१॥ मानलजो श्रोता सवे, थालस दूर उतार ॥ निशा विकथा नवि करो, वाधे जिणथी विकार ॥२॥ प्रिया सहित पत्यकथी,चा व्यो गगन विचाल ॥ थाव्यो कमलपुरें कुथर, करे वलित ततकाल ॥२॥ पल्यंक किहाएक गोपव्यो, उद्याने एकत ॥ बुद्धिनिधि शाबर तणु, रूप करें रुचिवत ॥ ४ ॥ प्रिया शावरी रूपथी,साथै लेई सार ॥ वेप धरी वैद्यज तणो नमता स्वीजरतार ॥५॥ ॥ ढाल पहेली ॥ चोपाईनी देशी ॥ ॥ उपधिनी हवे ग्रथि करी, चाल्यो काखमाहे ते धरी॥थलकार प देखा बहु मूल, बिहु जण धरता सबल उकूल ॥ १ ॥ पेठो नयरीमा अ निराम, साथै ले पातनी वाम ॥ पोहोतो एक शेतनें घर वार, शेग्नें कहे सानलो एणी वार ॥२॥ चित्रशाला यो रहेवा नणी, नाहु यापु सुमनें गणी ॥ शेठ कहे तुमें कोण बो कहो, किदाथी थाव्या किहाँ वासें रहो। ॥३॥ ते कहे निम डं वैद्य सुजाण, टाटुं रोग विविध जाख खाण ॥ कौतुकथी नमु देशांतरे, नारी साय राखू शुन परें ॥ ३ ॥ नयर दीतु ए शदिनु गम, नसवा माय तुमचं घाम ॥ शेव कहें कोपें कलकल्यो, नि

चतुर्थ खंझ.
२३ए
नवाडे जातु हलफल्यो ॥ ५॥ निस्न थाचिने थन्नाण, किहा मुज घरमां
रदेवा गण ॥ किहां मीयांने किहां महादेव, किदां वाणिग घरें तु रहे
हेव ॥ ६ ॥थई लक व्यो नाडं तुमो, थोडा दिन रहेर इहां थमो॥ एम
कदी थाप्यु एक रत्न, शेठ विचार करे शुन यत्न ॥ ७॥ धनद हशे के वि
द्याधरो, के ईश्वर दाने थाकरो। एदवी दान लीला किदां दोय, इव्य देखि
चित्त चलियो सोय ॥॥ शेठ निहने धादर करी,कहे व्यो चित्रशाला मन
हरी ॥ शुचि अनुचि न जाति विचार, गुण ते पवित्र बने ससार ॥ ५ ॥
नारी सहित चित्रशालायें रहे, शेठ देखी चित्तमा गहगहे ॥ रत्नें घर वा
खरी तस दिये, थाणद शेठने न माये दिये ॥ १० ॥ रत्ने मनोरथ पूरा
करे, नारी रूपें रना हरे॥ तेदन नोगवे नवला नोग, श्रीजयानद ते गुन
सयोग ॥ ११॥ विविध लोकनां औषध करे,लोक तणा बद्ध रोगज हरे॥
शबर वैद्य परगट कस्यु नाम, नवि लिये कोई पासेंथी दाम ॥ १२॥ वीणा
प्रमुख वजावे थाप, राग तणा वली करे थालाप ॥ वीण वजावे कोई
दिन नारि, गायन पासें सुणे केश्वार ॥१३॥ नाच करावे नाटकणी पास,
थढलक दान दीये वली तास ॥ नाम शबर वैश्रमण ते कयुं, लोकें हर
पथकी चित्त लघु ॥१३॥ ए नामें थयो लोक प्रसि-६, स्वेचायें विलसे जेम
सि-६ ॥ एक दिन नगर उद्यान मकार, एक ब्राह्मण उत्तम शिरदार ॥१५॥
जरतें कीधा जे थारय वेद, बात्र नणावे वह गत खेद ॥ महाधिवत ते
खोले विप्र,विप्र विना वेद नापे क्षीप्र॥ १६ ॥ एम चितिनें पूजे शेठ, जायं
थमें हवे इहांधी नेठ ॥ घर वाखरी सोंपी लेई नारी, नीकलीयो हवे रात
मकार ॥ १७ ॥रात रह्यो हवे तेह उद्यान, विप्ररूप कीधु असमान ॥ ब्रा
मणीरूपें नारी करी, हेतु तास कह्यो चित्त धरी ॥ १७ ॥ यौवनवय पहेलो
थलकार, पेठा विदाणे नगर मजार ॥ वणिकगृहें पूरवनी परें, नाह थापी
रहे गुन परें ॥१॥ घर वाखरी तेणे पण दीध,बनु दास दासी तिहां वली
कीध ॥ परीक्षा करी वृक्ष स्त्री वली एक, राखी नारी पासें सुविवेक ॥२॥
विनय उपाध्यायनो करी दवे, पूजा करवा रतन ते नवे ॥ उपाध्याय नावे
तास, वेद ते नीति धरम प्रकाश ॥ २१॥ चोथे खमें पहेली ढाल, श्रीज
यानदनु चरित्र रसाल ॥ पद्म कहे सुणो वाल गोपाल, सुपता होवे मगल
माल ॥ २२ ॥ सर्व गाया ॥ २७ ॥

१४० जयानंद केवलीनो रास. ॥ दोहा ॥ ॥ नाग्यथी अल्प दिने नस्यो, प्रज्ञावत प्रधान ॥ पदानुसारिणी पामी यो, सकल वेद सावधान ॥ १ ॥ प्रगसा वह पामीयो, गुरु पूजे गुरुदान ।। दाने नात्र प्रमोदिया, चमक्या सद्ध पहिचान ॥ २॥ नोग रसाला नोगये, पूव परें प्रसिद्ध ॥ ब्रह्मवैद्य विख्यातथी, सहुमा थयो समृक्ष ॥३॥ करे उपकार कोडयो गमे, गीत नाटकने गान ॥ राजपथे रलीयामणो, देवे व तिशय दान ॥४॥ वेद्य वैश्रमण कह्यो वली, दाने थतिदातार || रूप सु वर्णने रत्ननु, लेखु नहीं लगार ॥ ५ ॥ ॥ ढाल बीजी ॥ नाव श्रावकना नाखीयें ॥ ए देशी ॥ ॥ पटह वाजतो एकदिने, सनिलीयो निन कानें रे, बगुमाने रे, नवि थाव्यो राजाकनें ए॥१॥ कन्या लोन शका धरी, दवे लोक कहे गु ए देव रे, नहीं टेव रे, श्रधर जावानी एहने ए ॥ २ ॥ अश्वनीपुत्र ए पण नही, एह रहे नित्य एक रे, सुविवेक रे, दाता एह धनद जिस्यो ए ॥२॥नेषन दान लीला वली, सकल कला नमार रे, जूठ प्यार रे, एहवा दीग न सां नल्या ए॥४॥ पहेला निन्न एक एहवो, दीगे तेहवो एह रे, गुणगेद रे, मानु रूपांतरे थावियो ए॥ ५॥ एम विकल्प सहु करे, एकदा बढुजन प रिवारें रे, शुन तारें रे, बेगे राज्यपंथें नए ॥६॥ वीणा वजावे कौतुकी, बद्ध मित्रशु गावे दर्षे रे, श्रुति वर्षे रे,अमृत रस शुन स्वस्थकी ए ॥ ॥ वासी व दवे जायती, पाणी नरवा काम रे, ताम रे, कुब्जा वासी एक ने ए॥ ७॥ गीत रसें कनी रही, पूजे ब्राह्मण तास रे, किहां वास रे, ता हरोने तुं कोण ने ए॥ ए॥ दासी कहे सुण साहेबा, नोगवती नृप राणी रे, तस जाणी रे, बु कुब्जा वासी घरें ए॥१॥ किम कुब्जा ब्राह्मण नणे, सा कहे मुज वायुदो रे, विप्र नाषे रे, वैद्य कदो को नवि मम्मो ए॥ ११ ॥ सा कहे बद्नु उषध कखां, पण न मल्यो तुम सम को रे, मुज दोइ रे, जाम्य मद ते कारणे ए ॥१॥ तेडी दासी ठूकडी, जोश नसा जाल मर्म रे, शुन कर्म रे, मुष्टिय हणी हणी सज करी ए॥१२॥ तेल सरल थई दरपती, बोले एम ते वाणी रे, बद्ध प्राणी रे, नाग्ययकी तुमें थाविया ए ॥ १४ ॥थावो नरपतिने घरें, तस पुत्र नीरोगी को रे, लीजें रे, पूजा नूपति लोकनी ए॥ १५॥ विज कहे ना ताहरे घरे, नहीं राज्य , . ,

चतुर्थ खंम.
२४१
कुल मुज काम रे, राणी धाम रे, थावी ते उतावली ए ॥१६॥राणी कहे.
तु कोण , कहे दु कुब्जा तुम दासी रे, नहिं हांसी रे, राणी कहे केम स
रल तुं ए॥१॥ तव कहे वैद्य वैश्रवणनी, वात ते थचरजकारी रे, मनो
हारी रे, सांजली वात राणी वदे ए॥१॥ किदां ने तव दासी कहे, श्री
पंथे ले तेह रे, नेद रे,थाणीने राणी कहे ए॥१॥ पुत्र साजो करे के नहीं,
तव दासी कहे जग ते नहीं,जे यहीं नहीं,शक्ति ते थचुत देखीये ए॥२०॥
राणी कहे जई रायनें, राजा मूके परधान रे, बहुमान रे, करीने तेदने
तेडवा ए॥ २१ ॥ तव थाव्यो नृप परपदा, उषधिगांठडी जेई रे, सुखसेई
रे, यज्ञोपवीतादिक धरी ए॥२॥थाशीष दीये नरनाथने, दित मितनही
वामशायी रे, निर्मायी रे, गदपरे शत्रुजय करो ए ॥ २३ ॥ यत ॥ नुजा
नोहितमितपक्कमेव सात्म्य कुर्वाण , श्रममुपसीह वामशायी। स्त्रीसेवा नि
समलमूत्रशल्यमुचन्, नूतांतर्गदगणवळयारिचक्रम् ॥ १ ॥ पूर्व ढाल ॥ श्रा
शीर्वादमा सनिली, नैषज्यतत्त्वनी वात रे, हर्ष जात रे, कनक शासन
बेसाडीयो ए ॥ २५ ॥ नृप पूडे न कोण हो, थाव्या किहाथी बुद्धिनि
धान रे, पुरवान रे, तुम थावे वाध्यो घणुं ए॥ २५॥ ते कहे ब्राह्मण
बु श्रमें, गिरिपालें वसे मुज तात रे, तस ज्ञात रे, उपदेशे बह षधि ए
॥ २६ ॥ पर्वत वनमा बढ़ जम्यो,उलखी उपधि बहु सीधी रे, कोपी रे, नी
रोगी जन श्रेणीने ए॥ २७ ॥ गाम नगर फरतो फरू, एक कौतुक परउप
कार रे, धागार रे, थाव्यो एणी परें तुमतणे ए॥२॥ चोथे खमें एक
ही, पद्मविजय वर ढाल रे, रसाल रे, बीजी सुदर रासमा ए॥२५॥ ११ ॥
॥ दोहा ॥
॥ राय कहे रुडु कखु,याव्या पर उपकार ॥ वोल्या ते पालो वली,तुम
उत्तम थवतार ॥ १॥ मादरे सुत महा रोगीयो, सकोचाणु शरीर॥ श्री
पध शक्ति श्रचित्यथी, परी करो मुज पीह ॥ २॥ तुम थाकार वचन तथा,
महाशय प्रकृति महत, उपकारी श्रवनीतलें, प्रगटया तुमें पुस्यवत ॥३॥
नवन तुमचो निरखीये, वाडव बोले वाणि ॥ साध्य दो तो साधशु, प्रथम
करु पहिचाण ॥ ४॥ मत्री राय वाडव मुखा, साथै लेइ सनूर ।। निजनदन
निरखाववा, दितथी फरसो दजूर ॥ ५ ॥

. १४२ जयानट केवलीनो रास. ॥ बाल त्रीनी ॥ जांजरिया मुनिवर धन्य धन्य तुम अवतार || ए रेशी। ॥ माया विप्र कहे सुणोजी, रोग ए विपम विकार ॥ उपधि साध्य के वल नहींजी, जोश्ये मत्र प्रकार ॥ १ ॥ सुविवेक साजन, जू जू शकि चित्य ॥ए आंकणी ॥ मत्र उपध प्रकारथीजी, टाला रोग महत ॥ मत्रपूजामा जोयेंजी, उपकरण थत्यंत ॥ सु० ॥ २॥ रानायें पण थाणीयोनी, पूनानो सामान ॥ वधाची परथाच वलीजी, थामवर बस मान ।। सु० ॥ ३ ॥ लोक करावी वेगलानी, ममल रचियु ताम ॥ चदन होमी अमिमांजी, मत्र वोले हवे थाम । सु० ॥ ४ ॥ नमो बहते वलीजी, हैं ही सिम सनाह ॥ नमो उपद इत्यादिकाजी,मत्र उबरे निर बाह ॥ सु० ॥ ५॥ ध्यान मुश थासन करेजी, अगर कपूरनें फल । होम करी वलि नाखतोजी, दश दिश तेह थमूल ॥ सु० ॥ ६ ॥ ममल पासें थापीयोजी, नदन नृपनो तेह ॥ थोपधि जलधारा थकीजी, सींचे तेदनो वेद ॥ सु० ॥ ७ ॥ सक थयो कुवर हवेजी, परिथचि काठी जा म ॥ कुवरने जोवा नणोनी, नरपति थाव्यो ताम ॥ सु० ॥ ॥ कती कुमर सादामो जयजी, प्रणमे नरपति पाय ॥ राजा पण सुत वैद्यनेंजी, गाढ थालिंगन दाय ॥ १० ॥ ए ॥ सोवन थासन कपरेंनी, त्रिनु बेग तेणी वार ॥ मत्री सामत सदु मल्यानी, दियडे हर्ष अपार ॥ १० ॥ ॥१०॥ विविध वाजितना शब्दयीजी, गाजी रघु थाकाश ॥ गीत गान गायन करेजो, मोद नरे मुविलास ॥ सु॥ ११ ॥ सोहासए मगल तणां जी, गाये गीत रसाल ॥ हर माता लुबणाजी, धरती मोद विशाल ॥ ॥ १० ॥ १२ ॥ माया विप्र नणी कहेजी, हर्षित ते नूपाल ॥ नाम्य थमारु मोटकुजी, जेणें तुमें मलिया क्यास ॥ सु० ॥ १३ ॥ मत्रवादी तुमें मोटकाजी, श्रदो नषधि महिमाय ॥ तुम सम उपकारी नहींजी, जगमोहे को गाय ॥ सु०॥ १४ ॥ सर्व राज्य तुम थापताजी,करणीया न थवाय ॥ पण श्रमें श्रापु शक्तिथीजी, लेथम्द दर्ष कराय ।। सु०॥ ॥ १५ ॥ जे तुमनें मनमा गमेजी, देश उत्तम व्यो एक ॥ एम कही नू पति मनवीनी, वीना पण जे थनेक ॥सु०॥ १६॥ वस्त्रादिक बहु मू लनाजी, रत्न तण बलकार ॥ देवा तैय्यारी करीजी, विप्र नणे नाकार ॥ सु० ॥ १७ ॥ मायाविप्र कहे सुणोजी, करी परनें सपकार ॥ पुरुप चतुर्थ खंझ. २४३ अर्थे श्छे नहीं जी, सहान प्रत्युपकार ॥ सु० ॥ १७ ॥ करी चिकित्सा अर्जीयुंजी, पूर्व धन थसराल ॥ करु निर्वाह तेणें हवेजी, अधिक करु श्राल ॥ मु० ॥ १५ ॥ लानें लोन वधे घणोजी, सतोष सुखनु मूल। मात्रादीन जिते नहीजी, मात्राधिक प्रतिकूल ।।मु० ॥ ३० ॥ थकी यधिको कह्योजी, सोपी सुखलीन ॥ देश ते माहरा धर्ममांजी, विघन करे थति पीन ॥ सु० ॥ २१ ॥ राजतीर्थमा ए कह्योजी, धर्म वत्ती लोक ने हर्षे ॥ तेदमा कम हवे वरपियें जी, केम भंगारानो वर्ष ॥ १० ॥१२॥ तो पण अवसरे जाणजी, चोथे खमें ढाल ॥त्रीजी पनविजय कहीजी, सुपता मगलमाल ।मु०॥ २३ ॥ सर्वगाथा ॥ नए ॥ ॥ दोदा ॥ ॥ इत्यादिक वाणीथवल,निरखी वली निरीह ॥ दान थधिक दीपे घj, लह्यो धनाढपमा तीह ॥ १ ॥ नूपति कहे एमज नलु, पण कदो एह प्र पंच ॥ किदां रहो तव ते कहे, सघलो नाटकसच ॥ २॥ नारीशुं रहूँ लु नरपति,अवनीपति कहे एम ॥मुजघर रहियें मोजणुं,किहाँयें रहो हवे केम ॥३॥ वितं ते मान्यु वचन, नरपति तेडवा नार ॥ सुखासन तव सन्मुखें, मोकने महापरिवार ॥ ४ ॥ तात प्रिया दासी तथा, वस्तु वीणादिक सर्व, चित्रशाला तेदनें उचित, थापे राय थगर्व ॥ ५॥ चाकर प्रमुखनें चोपणुं, मोकने सेवा मांहिं॥ जोजन स्नानादिक नला,अधिक करे उत्साहि॥ ६ ॥ ॥ ढाल चोथी॥ जीरे जी ॥ ए देशी॥ ॥ जीरे म्हारे एकदिन ते नरनाथ, बुधिवत मत्री मली जीरेनी॥जी॥ नोगवती वली नारि, बेग विचार करे वली जीरेनी ॥ १ ॥ जी ॥ देशु महोटो देश, तेदमां का दाणी नही जीरेजी ॥ जी० ॥ कन्या देशु केम, किदां कत्री ब्राह्मण कहीं जीरेजी॥ २॥ नी० ॥ निदाचर कुळे एह, राज कन्या केम दीजीयें जीरेजी॥जी॥विण दीघे जाये बोल, जगमा थप यश लीजा जीरेजी॥३॥जी॥ नरपति वचन थमोघ, व्याघ्र नदी न्याय थावीयो नीरेजी॥ जी० ॥ कहे मत्री श्यो खेद, ए मुज मनमा नावीयो जी रेजी ॥an जी ॥ विप्र मात्र नही एह, लक्षण शौर्य पराकमें जीरेजी॥ जी० ॥ एदना गुण नृप योग्य, बीजे नाम न होये किमे जीरेनी ॥ ५ ॥ जी० ॥ कमलमुदरी नाम, कन्या दीजें एहनें जीरेजी ॥ जी० ॥ कन्या नाग्य २४४ जयानंद केवलीनो रास. प्रमाण, पीना तो सारखी तेल्ने जीरेजी ॥ ६ ॥ जी० ॥ नूपं मानी गात, राणीपण थगीकरे जीरेजी ॥ जी० ॥ नगर पदमपुर नाम, तिहां एक वात ण थवसर जीरेनी ॥ ७ ॥जी॥ तिहां पदमरथ राय, पुत्री रूपवती घणुं जीरेनी ॥जी॥ ते कपर करी रोप, वली अतिशय रानम पाणु जीरे जी॥ ॥जी॥ताश निनने दीध, बद्ध उबको मत्री दीये जीरेजी। ॥ जी० ॥ राणी पण करे सोर,तव नृप धरे अनुशय हिये जीरेजी ॥ए । जी०॥ निन्नने शोधवा ताम, निन्नवाडे नर नीकल्या जीरेजी जीगा शोध करी बद्ध तास, पण नवि को थानके मल्या नीरेजी ॥१०॥ जी० ॥ नाना पुरवर गाम, पालि मिरि वन निजनरें जीरेनी ॥ जी ॥ शोध करा वे राय, पण नवि लाधा को परें नोरेजी ॥ ११ ॥ जी० ॥ स्नेह सुतानो थाणि, शोच करे नृप 5 ख धरी जीरेनी ॥ नी० ॥ श्रनुक्रमें वारी शोक, बेगे जे परपद करी जीरेजी॥ १२ ॥ जी० ॥ एणे अवसर नरसिह, नयर पुरंदरनो धणीजीरेजी ॥जी॥ नर कुजर तस पुत्र,थाव्या तिहां सेवा जणी जीरेनी ॥ १३ ॥ जी० ॥ जयसुदरी नृप धूय, राग थयो तेह उपरें जीरेजी ॥जी॥रायें दीधी तास, उत्सव मामघो नली परें जीरेनी ॥ १४ ॥ ॥जी॥ निजनयरें गयो तेद, नोग नोगवे तेदर जीरेजी ॥ जी० ॥ क मला नयणें देख, सुख शलक्यु घण नेदयं जोरेनी ॥ १५ ॥जी॥ निज पुत्रीनी शोध, नवि साधी वत्ती शोक्यनी जीरेजी ॥ जी० ॥ पुत्रीनो विवा ह, देखि वियोग विलोकिनी जीरेनी॥ १६ ॥ जी० ॥ रुवन करी बढ़ का ल, राय कपर क्रोधे नरी जीरेनी ॥जी॥ पुत्री विडबी मुका, कांश मिल न श्राशा धरी जीरेजी ॥१॥जी॥ केशक दिवस गमाय, देखी जयस दरी तणो जीरेजी ॥जी॥ विवाह शोकनें मोद, वाजित्रादि उत्सव घणो जीरेजी॥१॥जी॥ क्रोध ईर्ष्याने शोक, इखथी तिढा नवि रदी शकी जीरेजी॥जी॥ई निज परिवार, रायतणी थाहा थकी जीरेजी ॥१॥॥जी॥ चाली तातने गेह, नयर व्याने धावी रही जीरेजी ॥जी॥ दासी मोकली ताम, निज नाई पासें वही जीरेजी ॥२०॥ ॥जी॥तेसर परिवार, लेई नृप सादमो गयो जीरेजी ॥जी॥ प्र रामे बहेनना पाय, देखी जखीयो थति थयो जीरेजी ॥२१॥जी॥ खथी रोती ताम, नूपति यशासन करे जीरेजी ॥जी॥ नूपति पूजे चतुर्थ खम १४५ एम, केम थाव्या तुमें एणी परें जीरेजी ॥ २२ ॥ जी० ॥ रुदन करो केम एम, तव मूलथो मामी कहे जोरेजी ॥ जी० ॥ सांजली नृप खेदाय, दुख तेहथी अधिकु लहे जीरेजी ॥ २३ ॥ जी० ॥ निदे नगिनीनाथ, नास्तिक वादि शिरोमणि ॥ जोरेजी ॥जी॥ मत्र्यादिक तस मूढ, निदे सहुनें अवगणी जोरेजो ॥ २५ ॥ जी० ॥ खेद न कीजें वहेन, देशु शिक्षा अव सरें जीरेजी ।। जी ॥ कर्म तणो अपराध, वीजा निमित्त पणु धरे जीरे जी॥२५॥जी॥ एम थाश्वासी तास, चोथे खंमें ए कही जीरेजी ॥जी॥ चोथा ढाल रसाल, पद्मविजय गुरुथी लदी जीरेजी॥ २६ ॥ ११ ॥ ॥ दोहा ।। ॥ एहवो ए अपराधीयो, शिक्षा देशुं तास । संघले शोध कराव, पुत्री तुम चिट्ठ पास ।। १ ॥ नाणेजी लावी नली, प्रगुण करावु प्राय ॥ ब्रह्म वैश्रवण वारू अडे, वद ते थावे दाय ॥२॥ पूढे कोण तव नूपति, सघलो कदे सवध । निज सुत कस्यो नीरोगीयो, पनणे तेह प्रबध ॥ ३ ॥ सांगली तेह सबधनें, आपन थंग न माय ।। पुत्री सुख पाबु पडघु, सुखनी वात सुणाय ॥ ४ ॥ नागवती सुख नामिनी, प्रणमे नणदना पाय ॥ घालिंगन थाशीप घे, दियडे दर्प न माय ॥ ५ ॥ ॥ ढाल पांचमी ॥ देश मनोहर मालवो ॥ ए देशी ॥ ॥ थाप मुखासनें बनीने, लावे निज थावास ललना ॥ महा महो त्सव श्रति गौरवें, रायनें दर्ष वनास जननां ॥१॥ पुरस्य सवि थाची म ले ॥ ए श्रांकणी ॥ विजयसूर नत्रीज जे,फनें प्रणमे पाय ल॥थाशीप देश शिर चुवती, बुडणां वलीय कराय ल० ॥ पु० ॥ ३॥ मणिमुक्ताफलथी करे, वर्धापन सुविशेप त ॥ कुन नाग्याविक वर्णवे, ब्रह्म वैश्रवण विशेष लापु०॥३॥ सर्वने सतकारी करी,रदे सुखें जानें गेहल ॥ ब्रह्म वैश्रवण प्रिया प्रत्ये, देखी उपजे नेद ल० ॥ पु० ॥ ४ ॥ पासें राखे ब्राह्मणी, वात करावे प्रेम ल ॥ मातने उनखी ब्राह्मणी, मात न उलखे नेमलम् ॥ पु०॥ ५॥ दवे नरपतियें निमित्तियो, तेडयो पूबवा हेत ल० ॥पूरव परि चित रायनो, पुत्र निमित्त सकेत ल० ॥ पु०॥६॥ नाणेजी हि पूठतो,ते कहे सानतो राय लम् ॥ कालें निजपति शिशु, मलशे इणदिज वाय स०॥ पु० ॥ ७॥अधिक न जाणु एहथी, रायें करी सतकार स॥ वि ।

१४४ जयानंद केवलीनो रास. प्रमाण, वीजा तो सारखी तेहनें जीरेजी॥ ६ ॥ जी० ॥ नूपें मानी मात, राणी पण यगीकरे जीरेजी ।। जी० ॥ नगर पदमपुर नाम, तिहां एक वात इण अवसरें जीरेनी ॥४॥जी० ॥ तिहां पदमरथ राय, पुत्री रूपवती घणु नीरेजी ॥जी॥ ते कपर करी रोप, वली श्रतिशय रानस पशु जीरे नी॥ ७॥ जी० ॥ तादृश निन्नने दीघ, पद ग्बको मत्री दीये जीरेजी। ॥जी० ॥ राणी पण करे सोर,तव नृप धरे अनुशय हिये जीरेजी ॥ए । जी०॥ निबनें शोधवा ताम,निन्नवाडे नर नीकल्या जीरेजी ॥जी॥ शोष करी वन तास, पण नवि को थानके मल्या जीरेजी ॥ १० ॥ जी० ॥ नाना पुरवर गाम, पालि गिरि वन निजनरें जीरेनी ॥ जो० ॥ शोध करा वे राय, पण नवि लाधा को परें नोरेनी ॥ ११ ॥ जी० ॥ स्नेह सुतानो थाणि, शोच करे नृप 5 ख धरी जीरेनी ॥ जी० ॥ अनुक्रमें वारी शोक, वेगे ले परपद करी जीरेजी॥ १२ ॥जी॥ एपो अवसर नरसिह, नपर पुरंदरनो धणीजीरेनी॥जी॥ नर कुलर तस पुत्र,याव्या तिहां सेवा नणी जीरेनी ॥ १३ ॥ जी० ॥ जयसुंदरी नृप धूय, राग थयो तेह ठपरें जीरेनी ॥जी॥रायें दीधी तास, उत्सव मामचो नली परें जीरेनी ॥ १४ ॥ ॥जी॥ निजनयरें गयो तेद, नोग नोगवे तेदयं जीरेनी ॥ जी ॥ क मला नयरों देख, 5 ख शलक्यु पण नेद; जोरेजी ॥ १५ ॥ जी०॥ निज पुत्रीनी शोध, नवि लाधी वली शोक्यनी जीरेजी ॥ जी० ॥ पुत्रीनो विवा द, देखि वियोग विलोकिनी जीरेनी॥ १६ ॥ जी० ॥ रुदन करी बहु का ल, राय ऊपर कोर्षे नरी जीरेनी ॥जी॥ पुत्री विडवी मुजा, कांश मिल नयाशा धरी जीरेनी ॥१॥जी॥ केशक दिवस गमाय, देखी जयसु दरी तो नीरेजी ॥जी॥ विवाह शोकनें मोद, वाजिनादि उत्सव घणो जीरेजी॥१७॥जी॥ क्रोध ईर्ष्याने शोफ, खपी तिहां नवि रही शकी जीरेनी॥जी॥ई निज परिवार, रायतणी थाहा थकी जीरेजी ॥ १॥ ॥जी॥ चाप्ती तातमें गेह, नयर श्याने यावी रही जीरेजी ॥जी॥ दासी मोकली ताम, निज नाई पासें वही जीरेजी ॥५॥ ॥जी॥चंतेर परिवार, लेई नृप सादमो गयो जीरेनी ॥जी० ॥ प्र एमे बहेनना पाय, देखी खीयो यति थयो जीरेजी ॥२१॥जी॥ सखथी रोती ताम, नूपति थशासन करे जीरेजी ॥ जी० ॥ नूपति पूजे चयुर्थ खम २४७ कहे नटनें इयु, सातमे दिन तुमें सर्व ॥ श्रावजो एम कही वर्जिया, ग या ते धरता गर्व ॥ ४॥ नटपेटकमा निरखीने, कुमरे काढया केई । युवती युवान यथा मति, सद्भुनें थादरसेंई ॥ ५ ॥ ॥ ढालबही॥ माली केरा बागमां ॥ ए देशी॥ ॥ हवे तेहनें सवि चातुरी, कला शीखवे सार रेलो॥थहो कता शीख वे सार रेलो॥ सामग्री सवि मेलवी, करी सवि शणगार रेलो॥५०॥१॥ रायनें कही सातमे दिने, थाव्या सना मकार रेलो॥थ ॥ रंगममपमा अपविशे, नृप नृपपरिवार रेलो ॥ थ॥ ५॥ नगरलोक सवि तेडिया, तिम नटपरिवार रेलो ॥ १० ॥ बहेन कन्या निज राणीयो, यव न्यतर तार रेलो॥थ ॥३॥ नि ते सवि जोयती, दवे नाटक मामे रे लो॥थ ॥ वश वीणादिक वाजता, मृदग वली ताडे रेलो॥१०॥४॥ नाटकिणी थाने वी, निजनारी सुजाण रेलो ॥१०॥ पात्र वीजां तस भूमिका, अनुसार प्रमाण रेलो ॥ १० ॥ ५॥ गधर्व गीत मधुर ध्वनि, गाये मनोहार रेलो ॥ १० ॥ तालने लयना तानशु, माया बटु विस्तार रे लो॥ थ० ॥ ६ ॥ मांमधु चरित्र ते थापनु, जय विजय दो नाय रेलो ।। थ॥ विजयपुरीना राजीया, पुत्र एकेक थाय रेलो ॥ श्र॥ ७ ॥ सिह सार सुत प्रथमनो, थन्यायी तेह रेलो ॥ श्र॥श्रीजयानद बीजातो, ते गुणगणगेह रेलो॥श्र०॥७॥रातें पर्वत ऊपरें, केवलीने पासें रेलो॥ थ॥ धर्म पामी देशांतरें, जाता सनासें रेतो ॥थ० ॥ ए॥ विशालपुरें विद्या नस्या, परस्या नृपकन्या रेलो ॥8॥ प्रतिबोधी गिरिमालिनी, देव थई धन्या रेलो॥॥१॥ कनकपुरे जूवटु रम्या, परस्या नृप कुमररी रेलो॥ थ। प्रतिवोधि देवी रेलणी, ते थतिशय सुमरी रेलो ॥ १० ॥११॥ सूथर युद्ध कस्यु तेरों, कस्यो तापस बोर रेलो॥थ॥ तस पुत्री परस्या वती, शूरवीर ते यो रेलो ॥श्रणा१॥ मलयमाल क्षेत्र देवता,सायें युद कीधु रेलो॥१०॥ जीत्या तेदशु जेटले, रवि वर दीधु रेलो ॥ थ॥ ॥ १३ ॥ रत्नपुरे नाटक वत्ती, रतिसुदरी केरो रेलो ॥ थ ॥ पाण। ग्रहण कर्तुं तिहां, निलरूप नलेरो रेलो । थप ॥ १४ ॥ ते सवि अनि नय विधियकी, नाटकमां देखावे रेलो ॥थ ॥ पद्मपुरें नृप निमने, क न्या परणावे रेलो ॥१०॥१५॥ देवकुलें ते थांधली, निन थोपधि योग २४६ जयानद केवलीनो रास. सज्यो निमित्तियो, धरतो हप अपार लग ॥ पु०॥ ॥ बहेन नणी बाबी कहे, ते पण हर्पित थाय ल० ॥ निन चर चिई दिशि मोकले, ग्राम पुरा दिक गय ल० ॥ पु०॥ ए॥ दूत मृक्या वली चिद्ध दिशे, पण नवि लायी शुदिल ॥ उमस्थनें पासे थका, पण नवि चाले बुदिला पु॥१०॥ ब्रह्म वैश्रवण ते जाणतो, शोध निवारे न तेह ला नास्तिक शिक्षा बोधा विना, प्रगट था नहीं रेह ल० ॥ पु०॥ ११ ॥ एहवी प्रतिज्ञा धारतो, प्रगट न थाये तेद ल० ॥ एणे अवसर परदेशियो, थाव्यो कला गुणगेह ल० ॥ पु॥ १॥ नाटयकला मद थाफरो, थाप समो परिवार ल॥जे मुज जीते हु तेहनो, दास थान निरधार त ॥ पु० ॥ १३ ॥ एहवी प्र तिज्ञा प्रसिक्ष्थी, चारि तथा वलीनीर ल ॥ राज मारे ग्वे दर्पथी, राय कहे सुण धीर ल०॥ पु०॥ १४ ॥ नाटक देखाडो तुमें, जोउ कला धमें जेण ल० ॥ नाटक सूचि थसि कुतना, थग्रनागें कयु तेण त ॥ पुरा ॥ १५॥ देखी रीज सही सना, थनिनय वीर चरित्र लम् ॥ नवरस के खाडे तथा, सह तन्मय थाय चित्र लग ॥ पु०॥ १६॥राय प्रमुख सड ए सना, विस्मय लदी दीये दान ल० ॥ लोक प्रशसा बढ़ करे, तास कला नहीं मान लण् ॥ पु० ॥ १४ ॥ ब्रह्मवैश्रवण तदा नणे, मुख मरडीने वाणि ल० ॥ विपरीत नगादिका, देखाडे जद गण ल॥ पु०॥१७॥ निज नाटकिया मेलवी, नाखे एम नूपाल लण् ॥ एहनें जीते एहवो, जे कोइ मुज पुर नाल ल॥पु०॥१९॥रायने नाटकिया घणा, विविध क लाना जाए ल० ॥ पण नीच मुख करी रह्या, जीतवा तास बजाए ल॥ पु० ॥ २० ॥ ब्रह्मवैश्रवण कहे मुणे, शी क्ला एहमा नूप ला ॥ ली लायें जीतुं एदनें, जून तमें थनुरूप ल० ॥ पु० ॥ २१ ॥ चोथे खमें ए कहो, परवडी पंचमी ढाल ल॥ पद्मविजय कहे सनिलो, बागल वात रसाल लग ॥ पु० ॥ २२ ॥ सर्व गाथा ॥ १४ ॥ ॥ दोहा॥ ॥ ब्रह्म वैश्रवण वदे इश्युं, पुरुप नारी परिवार ॥ नाटकीयामां निरखाने, श्रापो इण दिज वार ॥१॥ तुम जायें ल्यो तुरत, वातें न करो वार ॥ नृप कहे नटपेटकथकी, लेई शीखवो लार ॥२॥ कुमर कहे करा थमें, नाटक सातमे दिन ॥ जिम एदनो मद गती जशे,बाखु तुम बासन्न ॥२॥ नरपति

चतुर्थ खम
१dए
पण थाप न लेवे, तेहनु दारिश कापे ॥ सा०॥ ५॥ विस्मय पाम्या तेहनी
देखी, कला कलावत सघला ॥ सायर थागल कूप तणी परें, हस थागल
जेम बगला ॥ सा ॥ ६ ॥ प्रवलो नाटकियो चमक्यो, बटु नाटकीयो दे
खी॥ दास्रो बटुकनें पाये लाग्यो, बीजु सर्व वेखी ॥ सा०॥ ॥ कहे
तादारो दु दास बु साचो, तें मुजनें थाज जीत्यो ॥ कोई मुजनें नवि जी
त्यो नाई,एटलो काल व्यतीतो ॥ सा ॥ ७ ॥ सूरय किरणें हिम गले जि
म, तिम मुज मद तें गलीयो ॥ परिकर सहित दु ताहारो चाकर तुहि शि
रोमणि मलियो ॥ सा ॥ ए ॥ बटुक कहे मुज नहीं प्रयोजन, ना था
पणे नाम ॥ अधिक कला जगमाहे दीसे, मद करवो केणे काम ॥सा॥
॥१०॥ रायें विसयो नाटकीयो हवे, पोहोतो थापणे नाम ॥ सना विस
र्जी नरपति बटुनें, पूजे एम धनिराम ॥ सा ॥ ११॥ कमला पासें राखी
जे, नृप धगज कोण एद ॥ जेदनो थनिनय तें देखाडो, नाटकमां
धरी नेह ॥ सा ॥ १५ ॥ निल ते देवकुलमाथी विहाणे, गयो किहो लेई
नारी ॥ तव कहे बटुd सनिल नरपति,धागल कदु थधिकार सा॥१॥
प्रिया सहित दु कौतुक जोतो, पृथिवीमाहे जमतो ॥ विचित्र प्रकारना ना
टक करतो, जोगपुर गयो रमतो ॥ सा० ॥ १४ ॥रदेवा स्थानक बीजे न
जडघु, वेवकुलमा कयो वास ॥ निल्न दपती दोय विपरीत देखी, मनमां
थयो विखास ॥ सा॥१५॥ निमने पूज्यु तुं कुरूपी,एद देवांगना नारी ॥
तादारे हाथे केणीपरें थावी,कहे तु तास विचार ॥ सा०॥ १६ ॥ स्यारे ते
में सघलु नोख्यु, चरित्र पोतानु एद ॥ कोण नवि थादरे एह सुणीने, चि
नकारी होये जेह ॥ सा० ॥ १७ ॥ सुखनिज्ञार्ये सद्ये सूतो, विहाणु विहा
यु ज्यारे, जागीनें थमें जोयु ततहण, नवि दीतु कोइ त्यारें ॥सा॥१॥
प्रिया सहित दु नमतो नमतो, थाव्यो तुमचे नाम ॥ चित्रकारी ए चरित्र
जाणीने, नाटक की थाम ॥ सा० ॥१ए ॥ थागल वात तो तेदन ना
णे, चोथे खमें ढाल ॥ सातमी पद्मविजय कहे सुणजो, थागत वात रसा
ल ॥सा ॥ २०॥ सर्वगाया ॥ २१ ॥
॥ दोहा ॥
॥ सुणी राजा विस्मय लह्यो, कमला कमल विकाश ॥ यदो बह एम
चितवे, श्यो ए वचन विलास ॥ १ ॥

१UG जयानद केवलीनो रास. रेलोय ॥ नव लोचना करो ततहणे,काढयो तस रोग रेजो ॥ १०॥ ॥ १६ ॥ जेम नापन्यु तेम नाटक. प्रत्यक्ष देसावे रेतो ॥ २० ॥ नित्र पासे ते कुथरी, सद्भुने नम थावे रेलो ॥ २०॥ १७ ॥ माता देखे विपी, सकल्प मन थाय रेलो॥थ ॥नाम परावर्तन करे, पद्मपुरने गय रेलो। थ॥१७॥नोगपुर के राजीयो,नास्तिक नोगदत्त रेलो ॥थ ॥ सुजया विजया दोय ,राणीयो वरगत रेलोपधारणा सुदामा सुनगा घई, दोय पु त्री तास रेलोया पहेली दीधी कोई रायनें, बीजी लिन सकाश रेलो। थ॥ २० ॥ नाम परावर्तन सुष्य, पण निलने पासे रेलो॥२०॥ विज यमुदरी सत्य देखीन, माय हर्प नासे रेलो॥०॥२१॥ यवनिकामापी नीकली, पुत्रीने गले वलगी रेलो ॥ थ०॥नाग्यथी दीनी तुज प्रत्ये किहां गईती अलगी रेलो॥थ॥२२॥इत्यादिक कहेता थका, चोथे खमें ढाल रेलो ॥॥ो पद्म कहे सुणो,यागें वात रसाल रेलो ॥थ॥२३॥१७६॥ ॥ दोहा ॥ ॥ एहवे ब्राह्मण थावीया, करी ब्राह्मणी ततकाल ॥ कहे माता का इम करो, घ्रांत थव नाल ॥ १॥ ए मादारी नारी थडे, सुनगा तामें सार ॥ पण तुम ए पुत्री नहीं, सरिखे रूप सनार ॥ २ ॥ रूप नाटका जे कयु, केम प्रमाण फराय ॥ यनुत व्रीडा खेद एम, व्याकुल तस व्यवसाय ॥ ३ ॥ मूकी दीधी मनथकी,करे विचार थनेक ॥ शुरूपांतरें ए दशे, थथवा सदृश थनेक ॥ ४ ॥ दी एहनें दरिशणे, वधतो स्नेह विशे प ॥ ब्राह्मणनी वनिता किमु,थागत लहिरा थशेष ॥ ५॥ ॥ ढाल सातमी ॥ बेडले नार घणो ने राज,वाता केम करो गे॥ए देशी। ॥ सुनगा थई वेवकुलमा साजी, तिहां लगें नाटक कीधु ॥पण तिहां सर्व सनानु तेणें, चित्तहु चोरी लीधु ॥१॥ साजन प्रेम धरीने एद, नाटक नवलु देखो ॥ एथोकणी ॥ वलिय विशेषे वचरज हेते,नाटक नवखं क रतो ॥ कुतात्मे सूचि मामी तसपरें, फूल एक वर धरतो ॥ सा० ॥ ३ ॥ ते पर नाटक ते करतो, एम जे जे रस पोखे ॥ ते ते रसमा तन्मय स दुये, न रहे चित्त को धोखे ॥ सा ॥३॥ माझे पुरुषे नाटक मांहे,पण नवि दोष ते दीओ, बेनगादिक सूक्ष्म पण को, जोता नहींय यनिो ॥ ।। सा० ॥ ४ ॥ नृपमत्रीमुख दान दीये ते, नटपेटकनें थापे ॥ महावान .

चतुर्थ खंभ २५२ ॥सा॥ चढती जास जगीश तो॥१॥राय कहे ब्राह्मण प्रत्येसा॥ रूपें रंन समान तो॥ कन्या मुज सुलक्षणीसा॥परणो देन बद्दमान तो॥१७॥ पुत्र साजो जे मुज करे ॥सा॥ तेइनें कन्या दान तो ॥ कर एह प्रतिज्ञा जे सा॥ न चले मेरुपरें धार तो ॥१॥ बटु बोले ए साचलु ॥सा॥ पण एक सनिलो वात तो॥धान्यनी रांधणी ब्राह्मण सा०॥ मादरे सु जात तो॥२०॥थधिक प्रिया नवि जोश्यें ॥सा॥ जेद सामान्य नर होय तो ॥ मदन कथाने साननी सा॥ वोय प्रिया न करे कोय तो॥१॥ कोण ते मदन कह्यो तुमें।सा॥ वाडव नांखे ताम तो॥ सरस कथा तुमें सनिलो सा०॥ मदन कथा कदु थाम तो ॥ २२ ॥ चोथे खमें एकही ॥सा॥ पद्मविजय वर ढाल तो ॥ धामीथधिके रंगलं सा॥ सुणतां मगलमाल तो॥ ३ ॥ सर्व गाथा ॥२५॥ ॥ दोहा॥ ॥ सुखश्वक सट्ठ जीव , जाणे सुख नवि कोय ॥ जिदा थात्मिक सुख नापजे, ते शिवमदिर होय ॥१॥ र्बु६ि सुखज्रांतिथी, रमे विषयमा लोन ॥ न गमे सजान पुरुषनें, जास सुकत मात पीन ॥२॥ तेह विपय साधन थडे, मुख्ययकी वर नार ॥ तेतो क्रूर कुटिल कही, सापण परें निर धार ॥ ३ ॥ जूनी क्रोध मुखी घणु,निर्दयी साहस वत ॥ कलहकारी कपटी वली, पार लहे नहीं सत ॥ ४ ॥ कटुकविपाक परिणामथी, सुणजो दां दृष्टांत ।। मदन तथा धनदेवनु,विवरी कद्ध वृत्तांत ॥ ५॥ चरित्र देखी नारी तणु,विरम्या जेद महत ॥ ते सुखीया ससारमां, ते थाये गुणवत ॥६॥ तेप ए ए दृष्टांतथी, जाणो सुगुण निधान ॥ केम थादरी बामी वली,जाणी दुख निदान ॥ ७ ॥ कौतुकनें वैराग्यनी, वात घणु सुविनोद ॥ सांजलता सुख झपजे, पूरण लहे प्रमोद ॥ ७॥ ॥ ढाल नवमी॥ माली केरा बागा, दोय नारिंग पक्के रेलो॥ अहो दोय नारिंग पक्के रेलो॥ ए देशी ॥ ॥ जय्दीप लख जोयणो, जगतीशं सोहे रेलो ॥ श्रदो जगतीनं सोहे रेलो। मेरुपर्वत मध्यनागमा,देखो मन मोदे रेलो थ०॥१॥ तेहथी दक्षिण दिश नलु, क्षेत्र नरत देदारु रेलो ॥ १०॥ वचमां नग वैताढय रूपानो वारू रेलो॥था॥ तेहथी दक्षिण जरतमा, साहे सन्निवेश रेलो ॥श्रा २५० जयानंद केवलानो रास ॥ ढाल श्रापमी ॥ तेह नगरमाहे वसे, साहेजही रे ॥ ए देशो ॥ ॥ नाइ नगिनी एम चितवे॥सादेलडी रे ।। एहना रूप थनुसार तोरा न धनादिक नवि घटे । सा० ॥ वरसे जेम जलधार तो विप्ररूनि नज दशे ॥ सा ॥ श्रथवा उत्तम कोई विप्र तो ।। चेष्टा गड्न एहनीय णु ॥ सा० ॥ मालिम न पडे हीप्र तो॥ २ ॥ ब्राह्मणी रूपें मुज सुता । ॥ सा०॥ के अथवा अन्य एह तो ॥ फत्तावतां चरित्रनी ॥सा० ॥को प जाणे गति जेह तो ॥ ३ ॥ ए हो के थथवा थन्य हो ॥ सा०॥ परा एक निश्चय थाय तो ॥ कलावत कोई नाग्यनिधि ॥ सा ॥ परस्यो मुज सुता थाय तो॥ ४ ॥ दिव्यनेत्रवती थई । सा०॥ हरख तो बहु ठप तो॥ एह बटु शहा रहेतां ॥ सा०॥ जाणगु थागे जे थाय तो ॥५॥क मला एणीपरे चितवी ॥ सा ॥ नाखे नाइने एम तो॥ कमलसुदरी पीजी यें ॥ सा॥ पूरो प्रतिज्ञा नेम तो ॥६॥ जिम तिम राखो एहनें ।सा। एणी परें करीय विचार तो ॥ नरपति बटु तेही कदे ॥ साया तुम विज्ञान थपार तो॥॥ जे नवि दीनी न सानली ।सा॥ तेह कला तुम पास तो। एकज नाटकनी कला ॥ सा ॥ देखाडी मुविलास तो ।। G॥ माहारी उन्नति बहु करी ॥सा॥ वदोंत्तेर कला निधान तो॥ शोल कलायें चश्मा ॥सा०॥ नवि दोये तुम समान तो।ए॥ रहेवु मुज पासें तुमें आताइष्ट दर्शन तुम मुह तो॥ श्रगोकार वाडव करे ।।ता॥ पण नवि लहे को गुक तो ॥१०॥ सद्ध निज निज थानक गया ॥प्ता॥ स्तवता तास विज्ञान तो ॥ वधते प्रेमें बटुप्रिया साण॥ कमला करी सनमान तो ॥ ११॥ राखे पुत्रीनी परें ।सा॥ करे नित्य प्रीति थालाप तो॥ राज्य लानादिकथी घ यो।सा॥ लहे सतोपनो व्याप तो॥१॥ कमलसुदरी दवे एकदा ॥सा०॥ कहे निजमातने एम तो । ब्राह्मणने मुज नरपति ।।सा॥ दजीवन यापे कम तो ॥ १३ ॥ श्राप प्रतिज्ञा पुरवा ॥सा ॥ सहन न करे वार तो ॥ नाटकथी रोजी तेणें ।साणा बट्ठ वाजे जरतार तो ॥१॥ राणीयें कह्योरा यनें |ता॥ निजपुत्री थनिप्राय तो॥ नूपति सानली दरषियोप्ता॥ तत थाशय शुन गय तो ॥१५॥ एक दिन शेव सेनापति ॥सा०॥ मत्री सामत परिवार तो ॥ घेतो पूरीने सना ॥सा॥ दीपतो नूनरतार तो ॥ १ ॥ ब्रह्म वैश्रवण ते थाविया ।सा०॥ येई नृपनें श्राशीप तो ॥ बेगे रायनें दूकरो चतुर्थ खंम. २५३ ते मुनिराजनें, दूर बमी नार रेलो॥ थ० ॥ सयम ले सुखीया थ या, पाम्या नवपार रेलो ॥ थ० ॥ २० ॥ नवमीचोया खममा, नांखी ए म ढाल रेलो ॥ थ ॥ पद्मविजय कहे साचलो,थागें वात रसाल रेलो ॥ १० ॥ १ ॥ सर्वगाथा ॥ २५ ॥ ॥ दोहा॥ ॥ प्रचमायें दीठो प्रबल, सुजगम नयकार ॥यागणाथागल थावीयो, कीनाशनें अनुकार ॥ १॥ कोघे ते देखी करी, तनु वर्तन ताम ॥ करी मलमिनी गोलिका, नाखे सन्मुख जाम ॥ ३॥ नकुल थया ते ततक्षण, नाग कस्यो नवखम ॥ चमक्यो मदन ते चित्तमा, चमाथीथा प्रचम ॥३॥ जोतां जोतां नोलीया,सर्व थया विसराल॥नाना रस वेदे मनें,चिते मदन रसा ला॥ अहो चमाना कोपथी,थाव्यो प्रचमा पास ॥ शरण यश ए मुजनें, राख्यो वे शाश्वास ॥ ५ ॥ पण जो दैवयोगें करी, कोपे प्रचमा एद ॥ तो कोण शरण दवे तदा, जाउ केहनें गेद ॥ ६॥ वाहालो पण कोपेन दी, एडवो उर्लन कोय ॥ तो नारीने कुनारजा, नवि कोपे केम होय ॥७॥ ए रादसिणी दोय जणी, मी जान परदेश ॥ श्राप कुशलने कारणे, त्य जीयें राज्यनें देश ॥ ७॥ यत ॥ त्यजेदेक कुलस्याथै, ग्रामस्यार्थे कुल त्यजेत् ॥ ग्राम जनपदस्याथै, यात्मार्थे प्रथिवीं त्यजेत् ॥ १ ॥ ॥ ढाल दशमी॥ पुस्य प्रगट ययुं ॥ ए देशी ॥ ॥ एम चितवीने नीकल्यो रे सुद्दङन । साथै बढ्नु धन लेय ॥ पुस्य प्रगट ययुं ॥ मठन नमे देशातरें रे सु० ॥ स्वेचायें गत खेय। पु०॥१॥ केशक वासर वही गया रे सु०॥ दृथिवी जोतां तास । पुनमतोनमतो था वियो रे सुगा नगर नाम सकाश ॥पु॥२॥ जीते निज लखमीयकी रे सु०॥ सुरपुरी लकावास ।। पु०॥ तेह नगर उद्यानमा रे सु०॥ वेगे थशोक सफाश ॥ पुण्॥३॥ण थवसर एक थावियो रे सु॥ नानुदत्त एवं ना म ॥ पुण्॥ शेवमांद शिरोमणि रे मु॥ बोले ते हवे थाम ॥ पु०॥ ॥ म दन सुखें तु थावियो रे सु० ॥ कुशल थडे सुखशात ॥पु० ॥ चालो निजघर जाये रे सुगा मानो श्रमची वात ॥ पु॥ ५॥ नाम सुणी चित्त चमकियो रे मु॥ गुजारो मुज नाम ॥ पु०॥ चाल्यो नगरमा तेहशु रे सु॥ पोहोतो तेहनें धाम ॥ पु० ॥ ६ ॥ ओठ करावे तेहनें रे॥ स्नान नोजन नलि २५ जयानन केवलीनो रास. नाम कुशस्यल जाणी, बद्र पुण्य प्रवेश रेलो ॥ २०॥३॥ तिहा कुल पुत्र सोहामयो, रूपें जिस्यो काम रेनो ॥ श्र०॥ मदन नामें प्रतिहजे, लखमीन धाम रेलो ॥०॥४॥ किदाहीयकी वालकालथी, विद्या बहु पामी रेलो॥ १०॥ कोधमुखी कुटिला घणु, नारी गुण जामी रेलो। ॥ ५० ॥ ५ ॥ नारी दोय सोहामणी,जाएगीय रति प्रीति रेलो॥ १० ॥ मा प्रचमा नामथी, तेम गुपथी प्रतीति रेलो ॥ थ॥ ६ ॥ प्रेम घणो वि हु नपरे, तेदने पण प्रेम रेलो ॥ श्र॥ पण वेद शोश्यो कतह करे, शो क्य धर्म ए नेम रेलो ॥॥॥ यत ॥ दोहो । शोक्य वर श्रति थाकरां, जेहवा तीखा तीर ॥ नाला शूल तणीपरें, परें परें दाग्वे पीर॥ १ ॥ पूर्वडा ल ॥ मदन वारे पण नवि रहे,कोपर्ने वली मान रेलो ॥ थ॥राखी प्र चमा नारिनें, पासें गामने थान रेलो ॥श्र०॥ ७ ॥ एक एक दिनना निव मथी, रहे मदन तेवार रेलो ॥ १० ॥ मदन ते नियम चूके नही,एम क रता केवार रेलो ॥ थ॥ ए ॥कारण कोक पामीने, परचमा गेह रेलो ॥ १० ॥ एक दिन अधिको तिहां रह्यो, धरी तास सनेद रेलो ॥थ ॥ ॥ १० ॥ श्राव्यो चमानें घरे, कण खामती तेद रेलो ॥ ॥ थावतो टीठो निजपति, कोघे जरी देह रेलो ॥थ ॥ ११ ॥ मुशनु नारख्यं सन मुखें,मुखें एणीपरें नास रेजो ॥थ ॥ रे रे उष्ट अनागोया,तुज नदि इहां वास रेलो ॥ १० ॥ १५ ॥ इष्ट प्रचमा तुकानें, घणु प्राण वाधार रेलो ॥थ ॥ जा तेहने घर मुखथकी, रहेजे धरी प्यार रेलो ॥थ॥१३ ॥ ते देखो बीदिनो अति, नातो तेणीवेला रेलो ॥ ॥ थोडी नूमिका ज ई करी, पू- ज्वे देला रेलो ॥ २० ॥ १ ॥ सर्पनयंकर देखीयो, फणा टोप विशाल रेलो ॥ २० ॥ स्थूल मूशल सम थावतो, जाणीवे महा काल रेलो ॥ थ॥ १५ ॥ नागे सविशेर्षे वली, परचमा पास रेलो ॥थ ॥ दीनो तेणी थावतो, नवि माये श्वास रेलो ॥५॥१६॥ पूजे केम नयनांत तु, श्राव्यो ततकाल रेलो॥ श्र०॥ मदन कहे चमा घ रो, पूवें तुं नाल रेलो ॥ २० ॥ १७ ॥ सानली परचमा कहे, मत नय मन थाण रेलो ॥ थ ॥ तु भुज प्राणथी वालहो, द्र करणं त्राण रेलो ॥ १० ॥ १७ ॥ धीरो या काय जय नथी, एदनो श्यो नार रेलो ॥०॥ एम कही थाश्वास्यो तेणे, नारीचरित्र थपार रेलो॥थारा धन्य धन्य चतुर्थ खम २५७ ग मुर्गम कचरे ॥ गिरि नदीयो यति विषम ने वाटें, नावा चित्त केम पसरे ॥ स्वा० ॥ ७ ॥ शरद कालें जब पायस उतरे, तव नाजो तुम स्वामी । वात सुणीने मान्यु मदने, स्त्रीने वश होये कामी॥ स्वा० ॥ ॥ नोगसुखें हवे काल गमावे, शरद ऋतु जब थावे ॥ तव जावा उत्कलित्त पूजे, जाउं जो तु फरमावे ॥ स्वा० ॥ ए॥ का विचार करीने मान्यु, सबल साथे थापे । करी सुंगधि करंबो विधिशु, मदनने साथै थापे ॥ स्वा० ॥ १० ।। कुशस्थल न णी चाल्यो वेगें, खेश करबो तेह ॥ जातां थयो मध्यान्ह समय तब, कोइ गामें गयो एद ॥ स्वा० ॥ ११ ॥ तास उद्याने सरोवर तीरें, तरुमूलें विश्रा म ॥ नादी देवगुरु सनारी, खे लोजन काम ॥ स्वा० ॥ १२ ॥ चितवे जो कोइ थावे थतिथि, नयणे इणदिन काल ॥ तो तस यास श्रई थापीने, पुरस्य करु ततकाल ॥ स्वा ॥ १३ ॥ परने शब्द करीने मुंजे, जगमा ते ध न्य प्राणी ॥ अतिथि सविनाग कस्यु तेणे, जखमी करतल थाणी स्वा॥ ॥ १४ ॥ एम चितवतां दीतो पासे, देवकुलथी नीकलतो ॥ जटा मुकुटने नस्म विलेपित, गाम नणी सल सजतो ॥ स्वा० ॥ १५ ॥ तपती देखी दरख्यो हृदयें, वोलाव्यो बट्ठ मानें ॥ थाप्यो करंबो थाहार प्रमाणे, वली वलियो निजथानें ॥ स्वा० ॥ १६ ॥ नूख्यो तपसी खावा बेगे, तेह सरो वर तीरें ॥ खावा मदन थारने जेते, लेई समीप ते नीरें स्वा॥१॥ एदवे बीक थई तव चिते, काइ विलब ते कीजें ॥ एदवे योगी धकरो दू,करब प्रनाव वदीजें ॥ स्वा० ॥ १७॥ श्रीगुरु उत्तम विजयप्रनावें, चोथे खमें ढा ल ॥ बारमी पद्मविजय कहे पुरस्यें, होवे मगलमाल ॥ स्वा० ॥१॥३२॥ ॥ दोहा ॥ ॥ वे करतो बोकडो, चाल्यो नगर सकाश ॥ मदन लह्यो विस्मय घj, देखी तेह विलास ॥ १ ॥ किहा जाये वे बोकडो, जोउ पू जाय ॥ एम चितीने चालीयो, कौतुक मन नवि माय ॥ २ ॥ मदन वोकडो बिनु नणा, पोहोता नयर मकार ॥ पेतो वकरो नवनमां, लिहां विद्युत्लता नार ॥३॥ मदन नोवा बानो रह्यो, को थानक ते पास ॥ जोउ बकरो \ करे, पेशी ने श्रावास ॥ ४ ॥ वकरो श्राव्या जाणीने, विद्युत्लता दीये क्षार ॥ लकुटने मारवा, उठी धो नार ॥ ५॥ वूब पाढे ते बोकहो, तव बोले २५७ जयानट केवलीनो रास. ते नार ॥ निरपराध मुलने त्यनी,रे तुज पडो धिकार ||बहुका पण पूर्व नी, नारीया विरम्यो नाहि॥चाल्यो त्यो उत्करथी, गुंजोश्याव्यो श्राहिम॥ ॥ ढाल तेरमा । करेलडो घड देनें ।। ए देशी ॥ ॥नारी कहे मुसलें करी, दया करीने थाजमारु नहीं करता जी, जाणी महोटु थकान ॥ १॥ नविकजन सुजो रे ॥ नारीचरित्र विचित्र, हृदयमा मुजो रे ॥ एषांकणी॥वीदीनो चमा मुशलथी,गयो प्रथमा पा स ॥ मुज मारतां दवे कहो, चित्तमा केहनी थाश ॥ ज०॥ २ ॥ कहीक हीने एम मारती, मलीयो लोक अपार । मदन विचारे चित्तमा, अहो अहो चरित्र थपार ॥ ज० ॥३॥ करवो जो खातो कदा,माहारी पण ए रीता लोफ वुबारव सोनली,देखी एह थनीत ॥ न० ॥ ॥ रे रे मूट पानणी, मारे तु केम ॥ वणिक कु० तु उपनी, केम दिसा करे एम ॥ ॥५॥ तव पाणी मत्री करी, बांटयु तेहनें जाम ॥ नस्मयमित जटा धरो, करण योगी थयो ताम ॥ ज० ॥६॥ लोक देखी पूढे इश्युं, नगवन शी ए वात ॥ तव ते थांमु नाखतो,नांखे निजयवदात ॥ न० ॥ ७ ॥ बीहीकें तपसीना सतो, विस्मय पाम्यो लोक ॥ विद्युतलताने उपन्यो, मनमाहे घणु शोक। ॥०॥ ॥ घिग धिग निरपराधी ए, तपसी मायो बाज ॥ नवि जाणं किहांदी गयो, पति जाणी एथकाज ॥ ॥ ॥मनशे थथवा नहीं म ले, ते माहारो जरतार ॥ में जास्यु शिक्षा देई, नोग नोगवां सार ॥०॥ ॥ १० ॥ मनना मनोरथ मनमा रह्या, जनमां थयोधपवाद ॥ पतिविरहि पीद थई,किहां करुं शोरने वाद ॥ न॥ ११॥ पदोंक खवाणो पण न ही, दार्थे वाधो जेम ॥ ए उखाणो मुज थयो,कदो दवे करियें केम ॥न॥ ॥१३॥ मदन विचारे देखीने,निज चरित्रं करी एह ॥ घमा प्रथमा वेडज णी, जीती कपटणी गेद ॥ न०॥ १३ ॥ योगीने पण गम्य नहीं, नारीच रित्रनो यत ॥ धिग धिग विषयी जीवनें, तो पण तिहां राचतान०॥१॥ रासणी सापण वजी,वाघणी जीती एण ॥ जे विश्वास करे नरा,ते पशु नर रूपेण ॥न॥१५॥ पुस्य प्रणथी बूटीयो,हवे करु निन काजाएम चितवतो श्राीयो, नाम दसंती पुरी पाजनरायत ॥पच्यते लघने रोगा , फल कालेन पच्यते॥मित्रे पच्यते राना,पापी पापेनपच्यते॥१॥पूर्वदाला तेरमी चोथाखममा, पद्मविनयकहीढाल ॥ पुस्य मति सबली दुवे,पुस्ये मगलमाला चतुर्थ खम. २थए ॥ दोहा॥ ॥ गौरी घर घर वारणे, ईश्वर मानुष्य मात ॥ रेना वन वन देखीये, ध नदनी के कटु वात ॥ १ ॥ गौरी ईश्वर स्ना धनद,सदुने हसती तेद ॥ नाम दसती तेदनु,सुरपुरी अधिक के एद ॥ २॥ तस सद्यानमा चैत्य जे, नाणे मेरु गिरिंद ॥ कनकथन पंचालिका, जिहा श्रीझपन जिलद ॥३॥ ॥ ढाल चौदमी ॥ नवि तुमें वदो रे, मुमतिने शांति जिपदा ॥ ए देशी॥ ॥ मदन देउलमा पेठो दरखे,रुपन जिनेसर वीग ॥ जनम मरण टाले नवि जननां, मनमा लागा मीना ॥ १ ॥ जिपवर निरखी लाल,हियडे दर्प धरीजें ॥ जिनगुण परखी लाल, नरनव सफल करीजें ॥ए थांकणी ॥ नवसायरमा नमता जननें, थालवन जिनराया ॥ देवनो देव सुरासुर वदित, पूरव पुस्य पाया ॥ जि० ॥२॥ हाये नही दथियार न माला,नहीं उत्सगें वामा ॥ अविकारी थकपायी मुश, निर्नयीने गुणधामा ॥ जि०॥ ॥३॥ एह सरूप न जगमां दीसे, सफल थयो अवतार ॥ नयन कृतारथ माहारा इयां, धन्य हूं जग शिरदार ॥ जि० ॥ ४ ॥ नवसायरनो पार पाम्यो, उलन जिनपद पामी ॥ नवखय कारण नवउ ख वारण, हवे थयो शिवगतिगामी ॥ जि० ॥ ५ ॥ एम वह मानें जिनवर प्रणमी, बेगे तिए दिज गम ॥ वणिकपुत्र इण अवसर थाव्यो, धनदेव तेदनु नाम ॥ जिन ॥ ६ ॥ तेपण परमातम प्रणमीने, मनमा तनसित नावें ॥ मदनने धनदेव रंग ममपमा,दरखे बिद्द्व जण थावे ॥ जि०॥ ७॥ पूछे धनदेव स्ने द धरीने, सार्मिक तस जाण ॥ नइ तमें थाष्या कहो किदाथी, जिन मुख जोवा जाणी॥ जि० ॥ ७ ॥ख हृदयमां तुम बद देखु, तव चिते ते एम ॥ कोइ महातमा मुजने पूढे, पाणी वदुलो प्रेम ॥ जि ॥ ४ ॥ वोल्यो मदन नइ दु थाव्यो, नगरसकाशथी जाणी ॥ उ ख कारण मुज हृदयनु पूज्यु, ते सनिल गुणखाणी ॥जि॥१॥ वात लक्का जेदवो ने तो पण, तुमचु दरिसण देखी ॥ स्नेह घणो दोतो तेणें नाखु, वीज सर्व वे ख। जि॥११॥ यत ॥ वर न राज्य न कुराजराज्य, वर न मित्र न कुमि त्रमित्र । वरं न दारा न कुदारदारा, वरं न शिष्योन कृशिष्य शिष्य ॥१॥ ॥ ढाल ॥ निजवृतांत सर्व तेणें नरिव्यु, धनदेव वोल्यो तिहारें॥ केटलु मुल इख बागल तादारु, तुजयी अधिक ख माहारेपनि जयानंद केवलीनो रास. माहारी वात धणी थचरननी सुपता अचरज थाय ॥ नार्या माहारे तुज थी थधिकी, सुपता तुज 5ख जाय ॥ नि॥ १३ ॥ मदन कहे कहो तु म जार्यानी, वात ते विस्मयकारी ॥ धनदेव कहे ते कहिये सुणजो, वर्ष धरी नरनारी ॥ जि ॥ १४ ॥ चोथे खमें चौदमी नाखी, श्रीजयावने रास ॥ पद्मविजय कहे गुणिगुण सुपता, होये लील विलास जि॥१५॥३७ ५५ ॥ दोहा ।। ॥ण नयरीमहे वसे, धनपति नामें शेठ ॥ निश्चल श्रीजिनधर्ममा, बीजु जाणे वेठ ॥ १॥ मुनिजननी सेवा करे करे वली पर उपकार । गुण रागी गिरु घणु, श्रीमतमा शिरदार ॥॥ लखमी नाम सोहामणु, नाम तिस्यो परिणाम ॥ लखमी घर थागण वसे,सकल कलानु धाम ॥शा एड वो नारीशु शेवजी, उनय लोक अविरुद्ध ॥ साधतां सुत दोय थया, तेह सदा सुविशु६ ॥ ॥ तिहा पहेलो धनसार ,वीजो वे धनदेव ॥ यौवन वय थाव्या विद्, स्वामी कार्तिक महादेव ॥ ५ ॥ ॥ढाल पदरम॥ गेव सागरनी पाल,उनी दोय नागरी माहारा लालाए देश। ॥ दोय कला हवे शीख्या, यौवनवय थावीया माहारा लाल ॥ रूप लावस्य विशिष्ट, कन्या परणावीया मा॥ नित्य नित्य निज व्यापार,करे ते बेहु जणा मा०॥ काल गमावे एणी परें,सहुए एकमना मा॥१॥जीवलोकनें मरण,थतें थावे सदा मा०॥समय समय विसे रस, रूपनें सपदा मागा धनपति शेत थायु निज, थथिर जाणी करी मा० ॥ शत्रु मित्र समनाव, हृदयमांहे धरी मा० ॥२॥ थई विरक्त ससारथी, सह जीव खामणां मा०॥ मन एकायें पंच, परमेष्टि सुमरण मा॥ पंथ साध्यो परलोकनो, धनपति वाणीये मा० ॥ मरण सयुं एम उत्तम,श्रावक जाणी मा० ॥३॥ निज नरतार वियोग, शोक हवे बढ़ करे मा०॥ लखमी पण घरवास, बीहामणु चित्त धरे मा०॥ बढ़ सवेग विषयथी, विमुखी निस्य रहे मा॥ तपथी विशेर्षे शोपवी, काय मरण लहे मा॥ ॥ मात पिताना मरणथी, शोक करे घणो मा॥ नवि सुख पामे किणही, गम चित्त दोय तणो मा०॥ तजीयो सकल व्यापार,हवे एणे अवसर मा श्रीमुनिचद मुणींद, थाध्या पुर प रिसरे मा० ।। ५॥ तेणें उपदेश कस्यो एम, नोनो केम करो मा०॥ एवडो शोक सनार, धरो चित्तमा खरो मा० ॥ नवि ससार सरूप, चतुर्थ खंग. २६१ निरूपण चिस करो मा० ॥ चरथिर सकल ससारमा, सर्वने यम ह रोमा ० ॥ ६ ॥ नित्यपंथी ए प्राण, शरीर ए चल थडे मा०॥ यौवन घपल मरण ध्रुव, अनुक्रमें सवि गछे मा० ॥ एक जिनेश्वरनापित, शरण ते धर्म के मा०॥ तेह श्राधार गति स्थिति, थवर थधर्म ले मा॥ ॥ तेद सुणीने शोक,मद करी घर गया मा॥ निजघर कार्य व्या पारमां, बिटुंये सज थया मा०॥ बिटुनी नारी ते घरमां, नित्य कलह करे मा० ॥ वेद जण समजा निन्न, निन्न राखे घरे मा०॥ ७ ॥ जाते दिन एक दिन, पूब्यु १ नाश्ये मा०॥ केम उद्वेग सहित तुज मनहुँ पायें मा॥ तव लघु नाइ कहे मुज, नारीनु ३ ख घणुं मा०॥ तेणें मुज उदवेग थाय, तनु उबलपणु मा ॥ ए ॥ महोटो नाइ कहे तुं,मन मत 5ख करेमा०॥ कन्या बीजी परणावं,तेदथी मुख धरे मा ॥ लघु नाई कहे एमज, फरों जेम सुख-लहु मा०॥ एह वात तुम थागल, जाजी शी कट्ठ मा०॥ १० ॥ तव वृक्ष नाश्ये कोश्क, कुलवती कनी मा॥ परणाव्यो धनदेवनें, बीजी शोना बनी मा०॥ चोथे खमें ढाल, पंवरमी एकही मा॥ पद्मविजय कहे श्रीगुरु, उत्तमयी सही मा०॥ ११ ॥ सर्व गाथा ॥ ३१ ॥ ॥ दोहा ॥ ॥थनिनव परणी नारिद्यु,नोगवे नवला जोग ॥ नाविनावना योगथी, सरखो मल्यो सयोग ॥१॥स्वेछाचारी नारि ते, पहेली सरखी एह ॥ चिस सतोप न उपन्यो, धनदेवनें तिदा रेह ॥ २॥ मन चिते निर्भाग्य हु, घर यो गयो रत्न । तिहां पण नावि नावथी, लागी बहोत थगन्न ॥३॥ तास परीक्षा कारणें, जोवे तास चरित्र ॥ एक दिन वेठो धूजतो, ना रीनें कहे एणि रीत ॥ ॥ शीतज्वर मुज थावियो, वेशी न शकुं तेण ॥ ॥ बदेली शय्या पायरो, शयन करु ढुं जेण॥ ५ ॥ प्रगुण करी शय्या तेणें, धनदेव सूतो नाम ॥ पावरण सीरप प्रमुख, वदाडयां तस तामा॥ । ढान शोलमी ॥ जांजरीया मुनिवर, धन्य धन्य तुम अवतार ।। ए देशी ॥ ॥ तेणे समे सूरय थायम्योजी,रातें थयोश्रधकार॥थालादे सवि दोपने जी, गुहड करे घुतकार ॥ १ ॥ सोनागी सयणा, सानलो नारीचरित्र ॥ ए थांकणी ॥ घोरनाद कपटें करीजी, उघे तिहां धनदेव ॥ तव मोहोटीस घुने कहेनी, सोनल रे तु हेव ।। सो० ॥ २ ॥ तु परवार उतावलीजी, २६२ जयानंद केवलीनो रास. थापणने ते काम ॥ तवाते काम उतावलीजी, करीने प्रगुण या साम ॥ सो० ॥३॥ घोर निभा याव्यो वहीनी, जाणी ते वोय नारि ॥ घरमा थी ते नीकलीजी, घर उद्यान महकार ॥ सो० ॥ ४॥ ते पर दोई चरी जी, पाउलया धनदेव । तेने यनुसारे गयोनी, हलुवे हलुवेदेव ॥सो॥५॥ तेहज अवि वस्त्रथाजी, वाध्य थाप शरीर ॥ वेठो दृथिवी उपरेजी, साह स धरीने धीर ॥ सो० ॥ ६ ॥ मत्र सनाखो तेणीजी, शक्ति यचित्य ने मत्र ॥ कडीने थांवो गयोजी, चाल्यो ते गगनांत ॥ सो० ॥ ॥ जलजंतु बीहामणोजी, रयणायर मध्यनाग ॥ रत्नदीप रजियामणोजी, थवर बीप वडनाग ॥ सो० ॥ ७ ॥ तस शिर मुकुट मणिसमुनी, नगर रयणपुर त ॥ रतनें ममित घर घणांजी, सहस गमे वे जठ । सो० ॥ ॥ विया धर वासो जिहांजी, रूपें जीत्यो थनग ॥ विद्याधरी रूपेंकरीजी, रति हा री एकग ॥ सो ॥ १० ॥ तिण नगरी उद्यानमांजी,उतरीयो सहकार । धनदेव तिहाथी नीकलीजी, दूर गयो को गर ।। सो० ॥ ११ ॥ नार्यान पण तरीजी,पेनी नगर मजार ॥ धनदेव पण पू ययोजी,तास घरण अ नुसार ॥ सो० ॥ १५ ॥ कौतुक नगरीमा जुवेजी, नानाविध मनोहार ॥ निज श्वायें विचरतीजी, पूवे तस जरतार ॥ सो० ॥ १३ ॥ तेह चरित्र जोता थकाजी, चित्तमा चमक्यो एह ॥ जाणे स्वर्गमा थावीपोजी, स्वपन परे लहे तेह ॥ सो० ॥ १४ ॥ चोथे खमें ए कहीजी, शोलमी ढाल रसा ज ॥ पाविजय कहे पुस्य पीजी, होवे मगजमाल ॥ सो ॥ १५ ॥ ॥ दोहा॥ ॥ एणे अवसर ते नयरमा, श्रीपुन नामें शेन ॥ बीना सद्ध व्यवहारिया, मानु एदथी हे ॥ १ ॥ चार पुत्र उपर सुता, श्रीमती नामें तास ॥ तिलक समी बिनु लोकमा, रूप लावस्यनो वास ॥ २॥ एदवी नारी न पामीयो, क्षीणवेद तेणें काम । हलुये दप्लुये थनग थयो, ते 5 खथी मानु था म॥३॥ विद्या कला सर तिहा, स्पर्श करो वास ॥ सौनाग्य स्था नक ए समुं, नवि लाधु को पास ।। ४ ॥ सार्थवाह वसुदन तिहां, तेहना पुत्रने तेह ।। फस्यो विवाद दवे परणवा, ममियो उत्सव गेह ॥ ५ ॥ ॥ ढाल सत्तरमी ।। राग खनाती॥ हवे श्रीपाल कुमार ॥ए देशी ॥ ॥ सारथवाहनो पूत, वस्त्र थमूलिफ धगें धरेजी ॥ रयणतणा थल - चतुर्थ खम. १६३ कार.तास किरण थति विस्तरेनी॥१॥सांबेला श्रीकार, पदेना वाघा फरक शोजी ।। नाटक करे वर पात्र, जाणे रंना उर्वशीजी ॥ २॥ वाजे विवध वाजित्र, सरणा टहके घणीजी ॥ साजन मलियो साथ, मगल गावे जान पीजी॥३॥ बोले बिरुद थनेक, लोक जोवा बहु यावीयो जी॥ श्रीफलने वली पान, वरराजा कर नावीयोनी ॥ ४ ॥ वींजे चामर पास, बत्र धस्युं शिर नपरेंनी ॥ नोबत गडगडे बदि, चटे चाले एणी परेजी ॥ ५॥ देखी नारीचरित्र, धनदेव चिते ण समेजी ॥ वलशे जब ए नारि, तव व ल दु अनुक्रमेंजी॥६॥ जोतो उत्सव तेह, श्रीपुजशेठ घर थांगरोजी ॥ ननो तोरणें तेद, दीसे ते रलीयामरोजी ॥ ७ ॥ एण अवसर वरराय, तुरंग चढयो शो घणुजी ।। वसुदत्त सुत श्रीपुज,शेउनु सोहावे अांगणुंजी ॥ ७॥ लोक तणी नीडनाड, जोवा मलीयो ने घणोजी॥थन ते मगीयो ताम, तीखी धार तोरण तणोजी ॥ ए॥ पडीयो तिर्यो तेह, नवितव्यता योगें करी करीजी ॥ लाग्यो ते उत्तमांग,वर ततकाल गयो मरीजी ॥१०॥ वमुदत्त परिजन जेह, तेह शोकातुर बह ययोजी॥ रोवे सवि परिवार, शिर कूटे पीटे दियोजी॥११॥ सह गया ते निजघेर, हवे श्रीपुज चित्त चित वेजी ॥ श्यो श्राव्यो थंतराय, कहो दा शें करीये हवेजी ॥१२॥शी गति होशे घूय, खेद करे चित्त थापणजी ॥ निजपरिवारने साथ, चितवे एणी परें मापणेंजी॥ १३ ॥ यत ॥ प्रारब्धमन्यथा कार्य, देवेन विदधेऽन्यथा ॥ कोवेति प्राणिनां प्राच्य, कर्मणां विपमा गतिम् ॥१॥ पूर्व ढाल ॥ परणे नहीं जो बाज, लगनें तो ए धनागणीनी ॥ एम लोकें परसिम, सकलकी कन्या नणीजी ॥ १४॥ नहीं परणे नर कोय,सहुनें जीवित वालपुंजी॥ पर णातु को थाज,कन्यानाग्य शास्खे कहूंजी ॥१५॥ सयण कहेकाहि खेद,तुम ने करवो नवि घटेनी ॥ विण नावीनवि होय,नावि नाव ते नवि मटेनी।। ॥ १६॥ बीनाने द्यो एह, सनिली चित्तमा हरखियोजी ॥ निजनरने करे श्राण, लावो कोई नर परखियोजी॥१॥ ते नर ततक्ष्ण ताम, वर जो वाने नीकल्माजी ॥ राजमार्ग सवि ताम, जोता कोइनें नवि मल्याजी ॥१॥ इण अवसर धनदेव, नयरों पडियो तेहनेजी। दिव्यरूपधर जेह, थाव्यो ते नर, यौवनेंजी ॥ १५ ॥ साध्या होने पास, निजपुत्री सम निरखि योनी ॥ प्रार्थना करे तात, रोगीयो देडे हरखीयोली,॥२०॥ चोथे खमें २६२ जयानंद केवलीनो रास. थापणने काम ॥ तवाते काम उतावलीजी, फरीने प्राण पर ताम। ॥ सो० ॥ ॥ घोर निश श्राव्यो वहीजी, जाणी ते दोय नारि ॥ परमा थी ते नीकलीजी, घर उद्यान महकार ॥ सो० ॥ ४ ते उपर दोई ची जी, पाठलथी धनदेव ॥ तेने अनुसारे गयोनी,इलुवे हवेहेव |सो० ॥५॥ तेहज अवि वस्त्रथीजी, वाध्य थाप शरीर ॥ वेठो दृथिवी सपरेनी, सार स धरीने धीर ॥ सो ॥६॥ मत्र सनायो तेणीनी, शक्ति यचित्य ने मत्र ॥ कडीने थांबो गयोजी, चाल्यो ते गगनांत ॥ सो० ॥ ७॥ जलजंतु बीहामणोजी, रयणायर मध्यनाग ॥ रत्नदीप रलियामणोली, थवर दीप वडनाग । सो ॥ ७ ॥ तस शिर मुकुट मणिसमुजी, नगर रयणपुर त ॥ रतनें ममित घर घणांजी, सहत गमे ठे जय ॥ सो० ॥ ॥ बिया धर वासो जिहांजी, रूपें जीत्यो थनग ॥ विद्याधर रूपेंकरीजी, रति हा री एकग । सो ॥१०॥ तिण नगरी उद्यानमांजी,तरीयो सहकार । धनदेव तिहाथी नीकलीजी, दूर गयो कोइ गर || सो० ॥११ ॥ नार्याउ पण कतरीजी,पेती नगर ममार ॥ धनदेव पण पूतें थयोजी,तास चरण व नुसार ॥ सो० ॥ १५ ॥ कौतुक नगरीमा जुवेजी, नानाविध मनोदार ॥ निन क्षायें विचरतीजी, पूढे तस नरतार ॥ सो० ॥ १३ ॥ तेह चरित्र जोतो यकांजी, चित्तमा चमक्यो एह ॥ जाणे स्वर्गमा श्रावीपोनी, स्वपन परे लहे तेह ॥ सो० ॥ १४ ॥ चोथे खंमें ए कदीजी, शोलमी गाल रसा ज ॥ पद्मविजय कदे पुरस्य पीजी, होवे मगजमाल ॥ सो॥ १५॥ ॥ दोहा॥ ॥ एणे थवसर ते नयरमा, श्रीपुज नामें शेत ॥बीना सढ व्यवहारिया, मानु एदथी देव ॥ १ ॥ चार पुत्र उपर सुता, श्रीमती नामें तास ॥ तिलक समो प्रिट्ठ लोकमा, रूप लावस्यनो वास ॥ २॥ एदवी नारी न पामीयो, क्षीणदेह तेणें काम । इलये हलुये थनग थयो, ते 5 खथी मानु था म ॥३॥ विद्या कला सरवे तिहां, स्पर्शायें कयो वास ॥ सौनाग्य स्था नक ए समु, नवि लाघु को पास ॥ ॥ सार्थवाह वसुवन तिहां, तेहना पुत्रने तेह ।। कमो विवाद दवे परणवा, मामयो उत्सव गेह ॥ ५ ॥ ॥ ढाल सत्तरमी ।। राग खनाती॥ दवे श्रीपाल कुमार ॥ए देशी ॥ ॥ सारथवाहनो पूत, वस्त्र थमूनिक थगे घरेजी ॥ रपणतणा अलं ने चतुर्थ खम २६५ तोऽनाग क च ॥ सूनुर्घनमते ग्या,नदेवोऽज्यगाश्रियं ॥१॥ ढाल ॥ द संती नगरी किहां सु० ॥ किहां रतनपुर नाम ला० ॥ किहां थांबो गगनें चल्यो सु० ॥ किहां कहो धनदेव नाम जा ॥ १०॥ कांक कार्य उद्देशी सु०॥ नीकलीयो दवे तेह ला ॥ बांबे चढी ते दोय जणी मु०॥ म नमा दर्प धरेय लाम् ॥ ११॥ यांचे पूर्वपर रह्यो सु० ॥ नारीये गणियो मत ला० ॥ चाल्यो थाकाशे थांवलो सु॥ पोहोतो निज घर तंत ला ॥ १५ ॥ उतनो निज उद्यानमा सु० ॥ धनदेव बानो ताम ला॥ घरमा जई सुतो वली सु० ॥ शय्यायें करी थाराम ला० ॥१३॥ उढी निशा नर थयो सु० ॥ श्रावी हवे दोय नार ला ॥ नरनिहायें देखियो सु॥ सूनो निज नरतार ला ॥ १४॥ शका रहित सूती बेतु सु॥ जागी कणका जाम ला ॥ थयो प्रनात रयणी गई सु० ॥ सूरय उग्यो ताम ला० ॥ ॥ १५ ॥ सवि थधकार नसाडियो सु० ॥ चमकिरण दिन नाह लाव लगी घर कारज नणी मु॥ धधो घरनो अथाह ला० ॥ १६॥ किमहिंक दवे लघु नारिये सु० ॥ सोड बाहिर रह्यो हाथ ला० ॥ ककण सहित ते देखीयो सु० ॥ विवाहवतो नाथ ला ॥१७॥ मोहोटीने देखाडीयो सुन तव कहे महोटी वाण ला ॥ तें तिहां कार्य ते सवि मल्यु सु ॥ देखी एहनो पाणला ॥ १७ ॥ किमर्दिक श्राव्यो तिहां कणे सु० ॥ परस्यो कन्या ताम ला॥ जाण्यु एणे थापणु मु०॥ सवि वृत्तांत ते थाम ला०॥ ॥ १५ ॥ मत वीजे मनमाहिथी सु० ॥ कर तस प्रतिकार ला ॥ कर वु तो बिहियं कि सु॥ सघनु थाशे सार ला० ॥ २०॥श्रीजयानदना रासमा सु०॥ चोथे खंमें ढाल लाम् ॥ बढारमी पद्मे कही सु॥थाग ल वात रसाल ला ॥ २१ ॥ सर्वगाथा ॥ ४६६ ॥ ॥दोहा॥ ॥ विदिक म कर तु बापडी, करुं एहनो उपचार ॥ सात गांठ देश में त्रीने, कोरो करो तैय्यार ॥१॥ धनदेवने मावे पगें, नारिये बांध्यो ताम ॥ मूरखनें निर्दयीपणु, कूड कपटनु धाम ॥ २ ॥ मत्र तणा प्रनावथी,सूढो थयो ततखेव ॥ देखी निज सूडापण,दीन वदन धनदेव ॥३॥ नवि ठोडघु ककण लरें, नवि सोनरियं जेण ॥धनदेव मनमा चितवे का प्रावी तेण ॥ ४ ॥ रातिकृतांत जाणी करो, खुडो कीधो थाम ॥ एणे चरित्र ए नारिमें, १६४ जयानंद केवलीनो रास. दाल, सत्तरमी शोहामणीजी ॥ पग्नपिनय कही एह, श्रीजमानर रातब तपीजी ॥ २१ ॥ सर्व गाथा ॥ ४२ ॥ ॥ दोहा ।। ॥ प्रार्थना सुणी शेग्नी, चिते चित्त मकार ॥ ए रूपवती देखी,जेहमी पूरव नार ॥ १ ॥ क्षेम कुशल निज चांगते, पूरव रमवीनार ॥ पण नारी विण माहारो,श्रफल थयो ससार ॥ २ ॥ अतिपिने वली प्रादुणा,न सहे थादर मान ॥ नारी विना हाली समो, पुरुप ते विटल समान ॥ ३ ॥ तात करे एम प्रार्थना, बादर करी थपार ॥ एहवी केम हवे,नारी रतिब नुहार ॥ ४ ॥ एम करी हाकारो जल्यो,न्दवराव्यो धनदेव ॥ करिय विलेप न चदने, वस्त्र पहेखा ततखेव ॥ ॥ ॥ थानूपण थर्ग घश्या, परेरीने फुल माल ॥ श्रीमती कन्या परणियो, ह य वजमाल ॥ ६ ॥ शेतकन्या धन देवनें, थाणद वो एम ॥ देखी जमाई रूअडो, शेत धरे बहु प्रेम ॥ ४ ॥ ॥ ढाल श्रढारमी ॥ वाडी फूलीथति नली, मन नमरा रे ॥ए देशी ॥ । धनदेव चितातुर थयो, सुणो सयो रे ॥ वो देखे बाहार,जालस णो वयण रे । दोय नार्या धनदेवनी सु०॥ फरि फरि नयर मफार ला: ॥ १ ॥ सांजली कौतुक थनिनवु मु०॥ विवाह जोवा कान ला ॥ महो टीन्दानीने कहे सु० ॥ रात घणीने थाज ला॥२॥ जोश्य यस्तव हे जय सु० ॥ जघुयें पहिवज्यु तेह ला० ॥जोवे बेतु जणी रंग सु० ॥ ल 'घु बोजी सुणो एद ला० ॥३॥ देव देवी सम मनदरू सु०॥ वरवरच तिहि उदार ला ॥ थार्यपुत्र सम देखी सु॥ महोटी कहे तव नार ला ॥ ॥जोली तु कोहि नविलहे सु०॥ सरस्वा नर बहु दोय ला० ॥ आर्यपुत्रने सारिखो १०॥ दासे बीजो कोय ला ॥ ५॥ शीतज्वरें करी पीडियो सु० ॥ तेतो सूतो गेह ला ॥ निशमहेि थावीयो सु०॥ नदी विद्याबल एदला ॥६॥ किदापी धाब्यो होय इहामु०॥ण एक रही तेणे नाय सा॥ कौतुक देखी वेद जणी १० ॥ सहकार साहामी जाय ला० ॥ ॥ उंच गोरखें घेतो दवे सु०॥ नवपरिणित स्त्री मुत ला॥ धनदेव शका धारतो सु०॥ गमन नारीनुं गुत्त ला ॥ ॥ श्रीमती व खने बेहडे सु०॥ लोक ते लखियो एक ला॥ कुकुम रसथी सहिनाणी मु० ॥ करी निपुणा कला० ॥ यत ॥करसंती वारसा पुरै चतुर्थ खम २६५ तोऽनाग क च ॥ सूनुर्धनपते ग्या,नदेवोऽज्यगाभियं ॥१॥ ढाल ॥ द सती नगरी कहां सु० ॥ कहां रतनपुर नाम ला॥ किहां थांबो गगनें चल्यो सु० ॥ किहां कहो धनदेव नाम जाम् ॥ १०॥ काश्क कार्य उद्देशी में सु॥ नीकलीयो हवे तेह ला ॥ थांबे चढी ते दोय जणी सु०॥ म नमा हर्प धरेय ला० ॥ ११॥ थावे पूर्वपरे रह्यो मु० ॥ नारीयें गणियो मत ला० ॥ चाल्यो थाफाशें थांवलो सु०॥ पोदोतो निज घर तंत ल॥ ॥ १२ ॥ तस्यो निज उद्यानमा सु० ॥ धनदेव बानो ताम लागा घरमा जई सुतो वली सु० ॥ शय्यायें करी थाराम ला० ॥१३॥ उढी निा नर थयो सु ॥ थावी दवे दोय नार ला ॥ जरनिहायें देखियो सु॥ सूनो निन जरतार ला ॥ १४॥ शका रहित सूती बेतु सु॥ जागी कणका जाम ला० ॥थयो प्रनात रयणी गई सु ॥ सूरय ठग्यो ताम जा० ॥ ॥ १५ ॥ सवि थधकार नसाहियो सु ॥ चमकिरण दिन नाह ला॥ व लगी घर कारज जणी मु॥ धधो घरनो थथाह लाम् ॥ १६॥ किमहिक हवे लघु नारिये सु० ॥ सोड बाहिर रह्यो हाथ ला० ॥ ककण सहित ते देखीयो मु० ॥ विवाहवतो नाथ ला० ॥१॥ मोहोटीने देखाडीयो तव कहे महोटी वाण ला ॥ ते तिहां कत्यु ते सवि मल्यु सु॥ देखी एहनो पाण ता० ॥ १७ ॥ किमर्दिक श्राव्यो तिहा करो सु० ॥ परस्यो कन्या ताम लामा लास्युं एणे थापणु सु०॥ सवि वृतांत ते थाम ला॥ ॥ १५ ॥ मत बीजे मनमाहिथी सु॥ करय तस प्रतिकार ला०॥ कर वु तो बिदिव कि सु० ॥ सघनु थाशे सार ला० ॥ १०॥ श्रीजयानदना रासमा सु० ॥ चोथे खंमें ढाल ला० ॥ अटारमी पढ़ें कदी सु०॥थाग ल वात रसालता ॥ १ ॥सर्वगाथा ॥ ४६६ ॥ ॥दोहा॥ ॥ विहिक म कर तु बापडी, करु एहनो उपचार ॥ सात गांठ देश में त्रीने, दोरो करो तैय्यार ॥१॥धनदेवने मावे पगें, नारिये वाध्यो ताम ॥ मूरखनें निर्दयीपणु, कूड कपट→ धाम ॥ २ ॥ मत्र तणा प्रनावथी,सूटो थयो ततखेव ॥ देखी निज सूडापण,दीन वदन धनदेव ॥३॥ नवि ठोडयु ककण करें, नवि सोनरियं जेण ॥ धनदेव मनमा चितवे, शका प्रावी तेण ॥४॥रातिवृत्तांत नाणीकरी, सूढो कौधो थाम ॥ एणे चरित्र ए नारिमें, २६६ जयानंद केवलीनो रास असनाध्य नहीं काम ॥ ५॥ मन चिते हा हारियो, मानवनो अबतार। पशुपण दुपामियो, एम ध्याये तेणी वार ॥ ६॥ कडवा जाये जेटने, . रथी चाप्यो तास ॥ एणि परें बोले पापिणी, कोष तणो श्रावास ॥ ढाल थोगलीगमी॥ बटाउनी देशी। ॥ धोखे समजावे यन्यनें रे, करे वली श्रन्या वात ॥ अन्य इदया धारती, कोइ नारी कुटिल कुजात रे, जो होये पोतानो घात रे, बली जो होये निजनो तात रे, तेहने पण वचवा नात रे, एहवा गुण जगत वि ख्यात रे ॥ १ ॥ सयण सतूणे सांगलो मेरे लाल ॥ए थोकणी ॥ कोपनी न होये ए कदा रे,मूको निनपति राय ॥ रांक सार्थे रमे रंगा,तस जाणे जी वित प्राय रे नदीनी परें नीची जाय रे,सापण परें कुटिल सदाय रे,राकृतिणी परेखावा धाय रे, जिहां मन मान्युं त्यां उजाय रे ॥सा॥क्षण एक रोवेश ण इसे रे,क्षण देखावे राग ॥ दणमा विरागिणी दुश् रहे कणमां कहे मीनी वाग रे,क्षणमा कटु वचननो लाग रे, क्षण रूसे तूसे थथाग रे, हणमा करे निजघर ताग रे, हणमा दिये निजपति दाग रे ॥सा॥ निजपति परदेशे जता रे, परम दोये सुख देह ॥ मुख कहे तुम विण केम रह रे, या सूनु ढढेर जे गेह रे, तुम मुज थतिथ सनेह रे, घडी वरस समी मुज एद रे, हवे थाशे कहो करु तेह रे, हवे 5 खना वरसशे मेह रे ॥ स ॥४॥ नारीरंग पतंग श्यो रे, जातां न लागे वार ॥ जेम वादलनी बगदडी, जेम वीजनीनो चमकार रे, जेम राज्यमान अल्पवाररे, जेम कपटी ध्यान विचार रे, नहीं साचु वचन किवार रे, श्रचि थपवित्रनंमार रे ॥स० ॥५॥ पंखी पगलु थाकाशमा रे,जलमा मत्स्यपद जोय ॥ तेम नारीना हृदयनो, जन न लहे मारग कोय रे, बुझे सुरगुरु यदि दोय रे, तारानुं गणित करे लोय रे, एहनो पार न पामे सोय रे, क्षण दसती क्षणमा रोय रे स॥॥धीव हृदय नारी हवे रे,बोले एणी परें वाणथम चरित्र जोवा नएी, तें की। एम ममाण रे, सूतो जुगे ज्वर थाण रे,थम साथे परदीप गण रे,थावी पक उपो कनी पाए रे, श्रावी सूतो उढघु वस्त्र ताण रे ॥ स॥ ॥ तेहD फल हवे देखजे रे, ते विण न वले शान ॥ एम करी पांजरे घालियो, सूडाने देश थपमान रे, बद् वचन प्रहारर्नु दान रे, सोनले सूहो निजकान रे, लघु मोटीवें करे यह मान रे, तुम सम नहीं अंबर को गम रे॥ समाजापर चतुर्थ खंमः परिजन देखी घj रे, शुक करे पश्चात्ताप ॥ धिग् मुज सूहानो नव लह्यो, मुज थावी पोहोतु पाप रे, न कस्यो परमेष्टीनो जाप रे, तेणें पाम्यो एम सताप रे,हवे परवश करु थाप रे,नवि थामा थावे माय बाप रे सा ॥ए॥ घर कारय करतीयकी रे, राधे जब ते नार ॥ तब नाजी बमका वती, तेदना होये बमकार रे,लावी सूडो तेणी वार रे,बिदिवरावे शस्वनी धार रे, कहे सानल तु निरधार रे, करु एहवो तुज परकार रे ॥ स॥१०॥ तुजने मारी एणी परें रे, एक दिन एह हवाल ॥ बमकावी तुजने, एम बोले ते विकराल रे, सुणी पामे नय थसराल रे, नित्य नित्य ए 5 खर्ज जाल रे, लदेतो काढे को काल रे, जाणे मलीया ने नरकपाल रे स०॥ ॥११॥धन्यधन्य ते नर राजिया रे, जाणी एहवी नारि ॥ दूर रह्या महा लाग्य ते, जाणो जेम जबकुमार रे, वसो वयरस्वामी थणगार रे, चोथे खमें ए सार रे, ढाल उगणीशमी अधिकार रे, कहे पद्मविजय धरी प्यार रे । स॥ १२ ॥ सर्व गाया ॥ १५॥ ।। दोहा ॥ ॥ दवे जे रत्नपुरे थयो, ते सुणजो अधिकार ॥ शे- नायुं किदां गयो, श्रीमतीनो नरतार ॥ १ ॥ गयो ते पाहो नावियो, खोलाव्यो बहु नाम ॥ विदाणे वीठो जे लख्यो, श्लोक मनोहर ताम ॥ ५ ॥ तथाहि ॥ हसंती पुरें धनपति, शेतनो सुत धनदेव ॥ व्योम मार्ग श्रावी करी, परण गयो ततखेव ॥३॥ तेय सुणी शेनें दवे, श्रीमती रोती जेह ॥ थाशासना देश एम कहे, शहां तेडावु तेह ॥ ४ ॥ ॥ ढाल वीशमी ॥ वींबीयानी देशी। ॥ एकदिन एक सारथपति, सागरदन नामें शेत रे ॥ व्यापारने थर थे तिहां नतो,हसती पुरी जिहां वेन रे ॥१॥ जू जून कर्मविटवना ॥ ए थोकणी ॥ तेहने श्रीपुंजे थापियो, बहुमूल्य रयण अलंकार रे ॥ कहे धनदेवनें तुमें थापनो, करी थावर यति सतकार रे ॥ जू० ॥ २॥ कहेजो सदेशो एणी परें, तुमें थावो एणे वाम रे ॥ निजनारी सनालो मोद[, तुम न घटे एह काम रे ॥ जू० ॥३॥ हवे सागरदन पण चालियो, उनष्यो सागर जहाज रे ॥ पोहोतो हसती नयरीयें, तिहां करे व्यवसायना काज रे ॥ नू ॥ ४ ॥ धनदेव घर गयो अन्यदा रे, नवि दोगे २६६ जयानंद केवलीनो रास असनाध्य नहीं काम ॥ ५॥ मन चिते हा दारियो, मानवनो अवतार। पशुपण हूं पामियो, एम ध्याये तेणी वार ॥ ६॥ कडवा जाये जेटले, रथी चाप्यो तास ॥ एणि परें बोले पापिणी, क्रोध तो श्रावास ॥ । ढाल योगपीशमी ॥ वटाउनी देशी॥ ॥ प्रांखे समजावे अन्यने रे, करे वली श्रन्या वात ॥ अन्य दिया धारती, कांड नारी कुटिल कुजात रे, जो होये पोतानो जात रे, बली जो होये निजनो तात रे, तेहने पण वचवा जात रे, एहवा गुण जगत गि रख्यात रे ॥ १ ॥ सयण सलूणे सनिलो मेरे लाल ॥ए थोकणी ॥ कोपनी न दोये एकदा रे,मूको निनपति राय ॥ राक साथे रमे रंगशु,तस जाणे जी वित प्राय रे,नदीनी परें नीची जाय रे,सापण परे कुटिल सदाय रे,राकृसिणी परें खावा धाय रे, जिहां मन मान्युं त्यां उजाय रे ॥साशा क्षण एक रोवेश ण हसे रे,क्षण देखावे राग ॥ दणमा विरागिणी दुइ रहे,कणमां कहे मीठी वाग रे,क्षणमा कटु वचननो लाग रे, कण रूसे तूसे थथाग रे, हणमा करे निजघर ताग रे, हणमा दिये निजपति दाग रे ॥सणा॥ निजपति परदेशे जता रे, परम दोये सुख देद ॥ मुख कहे तुम विण केम रद रे, श्रा सूनुं ढढेर ले गेह रे, तुम मुज थतिथ सनेह रे, घडी वरस समी मुज एह रे, हवे थाशे कहो करु तेह रे, हवे उखना वरसशे मेद रे ॥स ॥३॥ नारीरंग पतंग श्यो रे, जाता न लागे वार ॥ जेम वादलनी गंदडी, जेम वीजलीनो चमकार रे, जेम राज्यमान अल्पवाररे, जेम कपटी ध्यान विचार रे, नहीं साचु वचन किवार रे, श्रधि थपवित्रनमार रे ॥स ॥५॥ पंखी पगजु थाकाशमा रे,जला मत्स्यपद जोय ॥ तेम नारीना हृदयनो, जनन लहे मारग कोय रे, बुझे मुरगुरु यदि होय रे, तारानुं गणित करे लोय रे, एहनो पार न पामे सोय रे, कण हसती क्षणमा रोय रे स०॥६॥धीन हृदय नारी हवे रे,बोले एणी परें वाण श्रम चरित्र जोवा नणी, तें कीच एम मंमाण रे, सूतो जुठो ज्वर बाण रे, श्रम सार्थे परदीप गण रे,श्रावी पर डपो कनी पाण रे, श्रावी सूतो उठचु वस्त्र ताण रे॥ स०॥ ॥ तेहनु फल हवे देखजे रे, ते विण न वले शान ॥ एम करी पांजरे घालियो, सुखाने र अपमान रे, बटु वचन प्रहारनु दान रे, सानले सूडो निजफान रे, लघु मोटीन करे यह मान रे, तुस सम नहीं अबर को गम रे ॥ सणामा पर चतुर्थ खंझ १६७ परिजन देखी घणुं रे, शुक करे पश्चात्ताप ॥ घिग मुज सूडानो नव सह्यो, मुज थावी पोहोतुं पाप रे, न कस्यो परमेष्टीनो जाप रे. तेणें पाम्यो एम सताप रे,हवे परवश ऐ करु थाप रे,नवि थामा थावे माय वाप रे सा ॥ ए॥ घर कारय करतीथकी रे, राधे जब ते नार ॥ तब नाजी बमका वती. तेदना होये बमकार रे,लावी सूडो तेणी वार रे,बिहिवरावे शस्त्रनी धार रे, कहे सानल तु निरधार रे, करु एहवो तुज परकार रे ॥ स॥१॥ तुजने मारी एणी परें रे, एक दिन एह दवाल ॥ बमकावी/ तुजने, एम बोले ते विकराल रे, सुणी पामे नय घसराल रे, नित्य नित्य ए 5 खर्ज जाल रे, लहेतो काढे कोइ काल रे, जाणे मलीया ने नरकपाल रे सा ॥११॥ धन्यधन्य ते नर राजिया रे, जाणी एदवी नारि ॥ दूर रह्या मदा नाग्य ते, जाणो जेम जवकुमार रे, चलो वयरस्वामी अणगार रे, चोथे खमें ए सार रे, ढाल गणीशमी थधिकार रे, कहे पद्मविजय धरी प्यार रे॥स ॥१२॥ सर्व गाथा ॥ ५॥ ॥ दोहा॥ ॥ दवे जे रत्नपुरें थयो, ते सुणनो अधिकार ॥ शेठे जाण्युं किहाँ गयो, श्रीमतीनो जरतार ॥ १ ॥ गयो ते पाठो नावियो, खोजाव्यो बहु नाम । विदाणे दीतो जे लख्यो, श्लोक मनोदर ताम ॥ ॥ तथाहि ॥ दसती पुरें धनपति, शेतनो सुत धनदेव ॥ व्योम मार्ग थावी करी, परणी गयो ततखेव ॥३॥ तेय सुणी शेठे हवे, श्रीमती रोती जेद ॥ थाशासना दे एम कहे, हा तेडावं तेह ॥ ४ ॥ ॥ ढाल वीशमी ॥ वीडीयानी देशी ॥ । एकदिन एक सारथपति, सागरदत्त नामें शेत रे ॥ व्यापारने पर थें निहीं जतो,हसती पुरी जिदा ठेठ रे ॥ १ ॥ जू जूठ कर्मविटबना ॥ ए थोकणी ॥ तेहने श्रीपुंजे थापियो, वद्गुमूल्य रयण बलकार रे ॥ कहे धनदेवनें तुमें थापनो, करी थावर थति सतकार रे ॥ जू० ॥ २॥ कहेजो सदेशो एणी परें, तुमें थावो एणे ठगम रे ॥ निजनारी सनालो मोदा, तुम न घटे एह काम रे ॥ जूंग ॥ ३ ॥ हवे सागरदत्त पण चालियो, उलघ्यो सागर जहाज रे ॥ पोहोतो इसती नयरी, तिहां करे व्यवसायना कान रे ॥ ॥ ॥ धनदेव घर गयो थन्यदा रे, नवि दोगे रे॥ १६७ जयानद केवप्लीनो रास. धन देव रे ॥ तव पूरे तेहनी नारिन, नाखो मुमने ततमेवरे ॥ जु० ॥ ५ ॥ धनदेव किहा वे दाखवो, तव बोली ते सुणो नार २॥ देशांतरें व्यापार गयो, थावशे ते दिन दश बार रे ॥०॥६॥करे सार्थवाह नारी प्रत्ये श्रीपुजें दीयो यलकार रे॥ धनदेव नमाझ्ने कारणे,मी मती फूरे तस नार रे ॥ ॥ ७॥ ते कारण तेड्या ने तिहां, तव बोली ते वेहु नार रे ॥ ए वात तो तेह कहेता हता, तत्सुकता धित पदुपार रे ॥ ० ॥ ॥ पण कार्यवशे देशांतरे, जावु पडियु ततकाल रे ॥ माता ते में एणी परें नारखी, धरी हर्पने थचनमाल रे ॥ जू० ॥ ॥ ॥ रमपुर थी थावे जो को, थापनो तस ए शुकराज रे ॥ मुन नारी नवोस रम एने,वली प्रेम उपावण काज रे ॥ जू०॥ १०॥ जो वली ससरो मोक ले, एम कही थाप्यु तस हाय रे ॥ शुक सहित रु९ ते पांजरु, लोधी में लरुतिनी थाय रे ॥ ० ॥ ११॥ हवे सागरदत्त ते नयरमां, करी क्रय वि कय व्यवहार रे ॥ चढीयो घर जावा प्रवदणे, कमें सागर पाम्यो पार ॥ जू० ॥ १२ ॥ उतरी हवे नयरमां सचसो, पोहोतो श्रीपुंजनें गेह रे । कायु सर्व वृत्तांत ते शेग्नें, जे नारी नास्युं तेद रे । जु०॥ १३ ॥ श्रा शुकपिजर तेणें वापियु, नारीने रमवा हेत रे ॥ ते लेने अति मोव, नि जपुत्रीने दे सकेत रे ॥ जू० ॥ १४ ॥ जरतार प्रसाद ए पामीनें, मुकार मती सुरसात रे ॥चौथे खमें ए वीसमी, पनविजय नांखी ढाल रे॥०॥ ॥दोहा॥ ॥ रमा रमतां एकदा, दवरक दीठो पाय ॥ विस्मय पामीरोडीयो, त व तिहां श्रपरिज पाय ॥१॥ मूलरूपें धनदेव ते, देखी हर्ष न माय ॥ वि स्मय जश्ने पूबती, प्रणमी निजपति पाय ॥ ५ ॥ स्वामी ए यात कि श्युं, कहो मुजने अवदात ॥ ते कहे जिम देखो तुम, तिमदिज ए वात ॥३॥ दमणां अधिक म पूबशो, सनिली एह विचार ॥ हर्षे जई निज तातर्ने, नाख्यो तेह प्रकार ॥४॥ सर्वगाथा ॥ ५० ॥ ॥ ढाल एकवीशमी । थावो जमाई प्रादुणा जयवताजी ॥ए देशी ।। ॥ श्रीपुजशेव दवे दर्षशु जयवताजी ॥ जो जमाई रूप गुणवताजी ।। थति दर्पित सह कुटुंध ते ॥ ज०॥ सानली तेह स्वरूप ॥ गु० ॥१॥ ति थादर सन्मानथी जा रहेवाने यावास गु० ॥ याप्यो स्वर्ग विमान " M चतुर्थ खंम. २६ए ग्यो ज० ॥ वहु धन पूरित ग्राम गु० ॥ २ ॥ तिहां धनदेव सुखें रहे न नवपरिणित लेइ नार गु० ॥ स्वेष्टायें अति स्नेहथी न० ॥ नोगवे नोग श्रीकार गु० ॥३॥जाणे पुस्य उदयथकी जा पाम्यो फरी अवतार गुप करे व्यवसाय घणा तिहां ज॥ सकलकला नंमार गुण ॥ ॥ तान घ पो तेहमा थयो ज० ॥ इध्यपात्र दु ताम गु० ॥ काल केतोहिक निर्ग मे जग ॥ रहेतां तिणहिन गम गु० ॥ ५ ॥ श्जाल सुपना समो जा एह थनित्य तसार गु० ॥ थायु दये तिणें कारणे न०॥ शेव गया यमा र गु०॥ ६॥ नाई नोनाई एकमना ज० ॥ श्रीमती ऊपर राग गु०॥ध प थयो तिहां अनुक्रमें ज० ॥ विरुई वोले वाग गु० ॥ ४॥ यत ॥ स्त्री पीयर नर सासरे, सयमीया सहवास ॥ एता दोय थलखामणा, जो ममे थिर वास ॥ १ ॥ ढाल ॥ श्रीमती निन नरतारशु ज० ॥ नावाने परिणा म गु० ॥ मन चिंते जरतारनुं न० ॥ केहवु रहेवा गम गु० ॥ ॥ के हवी दोय नारी थठे ना ॥ जो तास स्वरूप गुणा उत्कलित चित्त तेह शु नः ॥ कहे पतिने करी चूप गु०॥ ॥ जनकनु घर निज स्वामीजी जा ॥ नवि देखाडो केम गु० ॥ सासरे रहेवु नारीने ज० ॥ जनकगृहे नर नेम गु० ॥१॥ यश कीर्ति पामे घणी ज०॥ थन्यथा होये अपमान गु०॥ तव वोल्यो धनदेव ते ज॥ अवसरें मेलशु तान गु० ॥ ११ ॥धी रजवती श्रीमती न० ॥ मौन करी रही ताम गु०॥ वली कालांतरें एकदा ज० ॥ श्रीमती कहे मुणो स्वामि गुण ॥ १२ ॥त्रण जातिना पुरुष ठे न० ॥ जघन्य उत्तम नर नात गु० ॥त्रीजा मध्यम जाणीये ज० ॥प्र थम श्वसुर गुणें ख्यात गु० ॥ १३ ॥ निनगुण ख्यात उत्तम कह्या ज॥ मध्यम पाप गुणेष गुण ॥ तेणें तुमनें रहेता शहां ज॥ श्वसुर तणे व्येण ॥॥१॥ उत्तमता नवि एहा जा वली सुगोत्रण प्रकार गुणा वाप गुणें उत्तम कहा ज॥ मध्यम मात प्रकार गु०॥ १५॥ नारीगरों जे विस्तखा ज० ॥ तेह जघन्य कहेवाय गुण॥ यद्यपि गुणवता तुमें ज॥ सकल कसाना वाय गु०॥ १६ ॥ समरथ इध्य पार्नवा ज॥तो पण एम कहेवाय गुणा जमाई श्रीपुन शेवनो ना कहे जननो समवाय गु०॥ ॥१७॥ तेणें तो उत्तम पुरुपना ज० ॥ मारगनी करो चाह गु० ॥ जनम नूमि तो श्रनुसरो ज॥शु कहियें चणु नाद गु०॥ १७ ॥ खम चोधे एक १६७ जयानंद केवलीनो रास. धन देव रे ॥ तव पूरे तेहनी नारिने, नौलो मुममें ततसेवरे ॥ जु० ॥ ५ ॥ धनदेव किहां वे दाखवो, तव बोली ते मुणो नार रे॥ देशांतरे व्यापार गयो, श्रावशे ते दिन दश बार रे ॥॥॥करे सार्यवाह नारी प्रत्ये,श्रीपुजें दीयो थलंकार रे। धनदेव नमाझ्ने कारण,मी मती फूरे तस नार रे ॥ ० ॥ ४॥ ते कारण तेड्या ने तिहाँ, तव बोली ते घेह नार रे॥ ए वात तो तेहूँ कहेता हता, वत्सुकता विस बहु पार है ॥ ॥ ॥ पण कार्यवशे देशांतरें, जावु पहियु ततकाल रे ॥ जाता ते में एणी परें नारखी, धरी हर्पने थईचजमाल रे ॥ जू० ॥ए । रमपुर थी थावे जो कोश, थापजो तस ए शुकराज रे ।। मुन नारी नवोडा रम एने,वली प्रेम उपावण काज रे ॥ ॥ १०॥ लेजो वली ससरो मोक ले, एम कही थाप्यु तस हाय रे ॥ गुक सहित रुटुं ते पांजरु, लीधी भ तरुतिनी थाय रे ॥ जु० ॥ ११ ॥ हवे सागरदत्त ते नयरमां, करी कय वि कय व्यवहार रे ॥ चढीयो घर जावा प्रवदरों, कमें सागर पाम्यो पार रे। ॥ जू० ॥ १५ ॥ उतरी हवे नयरमा सचनो, पोहोतो श्रीपुंजनें गेह रे । कप सर्व वृत्तांत ते शेगनें, जे नारीयें नास्युं तेह रे ॥ ॥ १३ ॥ श्रा शुकपिंजर तेणें पापियुं, नारीने रमवा हेत रे॥ ते लेइने अति मोदी, नि जपुत्रीने दे सकेत रे । जु०॥ १४ ॥ जरतार प्रसाद ए पामीने, शुकार मती सुरसाल रे ॥ चोथे खमें ए वीशमी, पविजयें नोखी ढाल रे॥०॥ ॥ दोहा॥ ॥ रमा रमतां एकवा, दवरक दीगो पाय ॥ विस्मय पामी त्रोटीयो, त व तिहां श्रचरिज पाय ॥१॥ मूलरूपें धनदेव ते, देखी दर्ष न माय ॥ वि स्मय जश्ने पूजती, प्रणमी निजपति पाय ॥ ३॥ स्वामी ए अद्भुत ह श्युं, कदो मुजने अवदात ॥ ते कहे जिम देखो तुमें, तिमहिज ने ए वात ॥ २ ॥ दमण अधिक म पूरशो, सानली एक विचार ॥ दर्षे जई निज तात, नारख्यो तेह प्रकार ॥ ॥ सर्वगाथा ॥ ५० ॥ ।। ढाल एकवीशमी ॥ श्रावो जमाई प्रादुणा जयवताजी ॥ ए देशी॥ ॥ श्रीपुनशेत दवे दर्षशु नयवताजी ।। जो जमाई रूप गुणवताजी ॥ अति दर्पित सह कुटुंब ते ॥ ज०॥ सनिलो तेह स्वरूप ॥ गु० ॥१॥ ति थादर सन्मानथी जा रदेवाने यावास गु० ॥ पाप्यो स्वर्ग विमान . 4 चतुर्थ खंम. २७१ चाल्यू जाय, धनुक्रमें घूटी पग वोलाय ॥ रूप ॥ १५॥ ढोचणें थाव्यु रे सायनो चूडती रे, कटितटने वली नानि प्रमाण, उदर हृदयने करने मा ए रू० ॥ १६ ॥ वधतुं वधतु रे नासायें थड्यु रे, धनदेव मनमा थति खेदाय, केम थाशे जल वधतुं जाय ॥ रू० ॥ १७ ॥ श्रीमती नाखे रे न य मन माजो रे,करुं एदनी हवे दु प्रतिकार,जो जो माहारो ए चमत्कार ॥ रू० ॥ १७ ॥ घुटडे एके रे ते जल पी गई रे, जेम नवि धरतीये जल देखाय, एक विड नवि तेणें गय ॥ रू० ॥ १५ ॥ वेहु ते नारी रे श्रीमती पाय पडे रे,शक्तियें जीती तें एणी वार,तु विद्या गुणनो नमार रूणार॥ तुजने थाराधु रे स्वामिनीनी परें रे, प्रणे प्रीति परस्पर नोडी, काम करे घ रना मन कोड ॥ 5 ॥ २१ ॥ कुछ विद्यायें रे त्रणे वरावरी रे,प्रीति घ णी नित्य वधती नाय, सरिखे शीलें सद्ध सम गाय ॥ रू० ॥२२ ॥ दोय सम त्रीजी रे स्वेधाचारिणी रे, घवगुणी सगें थवगुण थाय,गुण सघला तस नाशी जाय ॥ रू० ॥ ३३ ॥ यत ॥ अंवस्सय निवस्सन, दोएहवि समा गयाइ मूलाइ ॥ सतग्गीय विणछो, अंबो निवत्तण पत्तो ॥१॥ढाल॥ धनदेव चिते रे मनमा एणी परें रे, जो ए वे सम त्रीजी थाय, तो दु शरण फरु किहां जाय ॥ रू० ॥ २४ ॥ राक्षसी सरखी रे त्रगनें बॉमीने रे, कलं हवे थातम केरु हित, जेम नवि दोय मुज एदवी जीत ॥ रू० ॥ २५ ॥ चोथे खमें रे ढाल वावीशमी रे, पद्मविजयें एम नोखी सार,धनदेव पाम शे जयजयकार ॥ रू० ॥ २६ ॥ सर्वगाथा ॥ ५५६ ॥ ॥ दोहा॥ ॥ कांश्क कारय मिश करी,धर टोहणने हेत ॥ रुपनदेवनें देहरे,श्राव्यो धर्मसकेत ॥ १॥ ते धनदेव दु जाणजे,वेठो ताहारी पास ॥ सूडापणु में थ नुनव्यु, केवल 5 ख थावास ॥ २ ॥ पशुता यावी ढूकही, पण को देव सयोग ॥ पशुपणु नवि पामीया, तेणें तुमें मुखीया लाग ॥३॥ में तो म हारा तनुथफी, उख थनुनवियुं जोर ॥ तेणें दुमथी मुज थाकरां,जाणो कर्म कगेर ॥ ४ ॥ मदन सुणी रोज्यो वपु, विस्मय लही कहे एम ॥ तु म ख जाएी कीजीयें,थातम दित विद्गु प्रेम ॥ ५ ॥ । ढाल त्रेवीशमी ॥ वे वे मुनिवर विहरण पांगस्या जी॥ ए देशी ॥ ॥ण अवसर तिहां मुनिवर थावीयानी, विमलवादु जानु नाम रे॥

, ១ ០ जयान केवलीनो रास. वीशमी ज० ॥ पद्मविजयें कही दाल गु०॥ श्रीजयानंदना रासमा न॥ मुणता मगलमाल गु०॥ १५॥ सर्व गाथा ॥५२॥ ॥ दोहा॥ ॥ धनदेव नारी वयणथी, वोले एणी परे बोल ॥ श्वसुर तणे घर जे रहे, जाएं तेह निटोल ॥ १॥ पण ठमका नानी तणा, नवि वीसरिया मुह ॥ हैडामा खटके घणा,शु नांखु दु तुझ॥शाते सनिली श्रीमतीकहे, बमकानी कहो वात॥तव ते धुरथी सवि कहे,मकानो थवदात ॥ ३ ॥ ॥ढाल बावीशमी ॥ रूडीने रढीयाली रे,वाहाला ताहारी वांसती रे॥एदेशी ॥ रूडीने रढीयाली रे, मुगुणा श्रीमती रे,दतीने वोली तव तेणी वार, एदनो श्यो गणवो चित्त नार ॥ रूप॥ १ ॥ मुजने देखावो रे ते तुम ना रजा रे, शक्ति हूं जोन केहवी तास, मुजनें जोवा थति पीपास ॥ 1 ॥ ॥ २॥ शका मूकी रे चालो निजघरे रे, तुमने वाधा नहीं लगार,मुज स रिखी पासें थकां नार ॥ रू० ॥ ३ ॥ तेह सुणीने रे धीरय धारतो रे, ६ व्य करी सद्ध नेतु ताम, साथै लेई पोतानी वाम ॥6॥ ॥सयणने पूजी रे धनदेव चालियो रे, सागर कतरी पाम्यो पार,पोहोतो हसतीनपरी मकार ॥ रू॥५॥ बद्धन देतो रे दीन धनाथनें रे, गधदस्तीपरें पोहोतो कार, विस्मय पामी तव बेहु नार ॥ रूप ॥६॥ ए श्यो थचनो रे बाप्यो किहाथकी रे, शुक टलियो केम धरे सदेह, मतपतो थाध्यो ए निजगेड ।। ॥5॥ ॥ एम विचारी रे बेतु कनी थई रे, जाणीये हैयडे दर्ष न मा य, फरे मगल उपचार बनाय ॥10॥ गौरव करतीरे विनय देखावती रे, चित्रशालीमा लाची ताम, सिदासन मामा तेणें ठाम ॥ रू० ॥ए । धनदेव वेतो रे साथै श्रीमती रे, कुशल खेमनी पूजे वात, धनदेव कहे मु जले मुखशात ॥ रू० ॥१०॥ मोहोटी नावे रे न्हानीने सुणो रे, जल थी पखालो पियुना पाय, लघु पण शीघ्र थई जल जाय ॥ रू० ॥११॥ जकियी न्हानी रे पाय पखालती रे, प्रांबाकूमीमाहे तेद, ते जल महो टी यही ससनेद ॥ रू०॥१२॥ मत्रे मत्री रे तिम थानोटी रे, षिवी उपर बलथी ताम, मत्रनो महिमा थचिस्य ने श्राम ॥ रू० ॥ १३ ॥ वध वा लागु रे पाणी बेल ज्यु रे,नय पाम्यो धनदेव थत्यंत, श्रीमती सादामु जोवे तंत ॥ रु०॥ १३ ॥श्रीमतीनोखे रे मत बीहीजे मर्ने रे,पाणी वर्तु चतुर्थ खंम. २७३ वीधी ताम रे ।। ग्रहण श्रासेवना शिक्षा विद्वं यदेनी, बादशांगी धरे जेम निज नाम रे ॥ ३०॥ १६ ॥ तीन तप चरण धाराधे बिलु मुनिजी, बिटुं जण स्नेह परस्पर धार रे ॥ गुरुकुल वासे वसता विळ जणाजी, प्रायें ते सार्थ करता विहार रे ॥३०॥ १ ॥थनशन थाराघि गया सोहमेंजी, पंच पन्योपम थायु रसाल रे ॥ खम चोथे त्रेवीशमी ए कहीजी, पनविनय वर दाल रे ॥ ३० ॥१७॥ सर्व गाथा ॥ ५७ए॥ ॥ दोहा॥ ॥ देवनवें प्रीतिन घणी, करता कार्य थशेप ॥ तिहाथी चची हवे कप ना, ते सांजलो सुविशेष ॥ १ ॥ ॥ ढाल चोवीशमी ॥ करकमुनें करं वदना दु वारी लाल ॥ ए वेशी ॥ ॥ मदनजीव हवे कपनो हु वारिलाल,महाविवेह मकार रे दु वारिला ल । नयर विजयपुर शोदतु दु० ॥ थलकापुरी थनुदार रे टुं० ॥ १ ॥ समरसेन तिहां रानीयो ॥ विजया वली तस नार रे ढुं० ॥ मणिप्रन नामें ते थयो ढुं० ॥ सकल कला शिरदार रे दु॥ ३ ॥ यौवन पा म्यो जेटले दु॥परणाप्यो तस ताम रे दु॥ पलि देखी प्रतिबूजीयो दु० ॥ थाप्यो सुत निज ठाम रे दु० ॥३॥ मणिप्रन राज्यनें पालतो दु वश कीधा वदु राय रे हुए। सामत मत्रीश्वर घणा द्रु० ॥ प्रेमें प्रणमे पा य रे दु० ॥ ४ ॥ काल गयो एम केटलो दु० ॥ गज चढीयो एक दिन रे हु० ॥रयवाहीयें नीकल्यो दु० ॥ करी एकाग्र मन्न रे हूँ ॥५॥ एक स रोवर मोटकु दु ॥ कमल विकश्वर मांदि रे दु॥ गगन तारा गणनी परें हु० ॥ शोने यतिशय त्यादि रे दु० ॥ ६ ॥ देखी रमणिकता घणी दु० ॥ जोइ रह्यो चिरकाल रे दु० ॥ पायक पासें अणावियु दुः॥ एक कमल त तफाल रे ई० ॥ ४॥राय गयो दवे थागः दु० ॥ वलियो तेहज मग्ग रे दु० ॥ तेद सरोवर देखियुं दु० ॥ शोना गइ ते अलग्ग रे दु० ॥ ॥ ७॥ अहो थहो ए कहो र थप दु० ॥ पूजे परिजन राय रे दु० ॥ परिनन कहे मुणो नरपति दु० ॥ जेम शोना कमलाय रे दु०॥ए ॥ कमल एके सह लीये दु ॥ तव ए नीपनु एम रे दु०॥ सुणी राजा मन चित वे दु॥थदो एसरोवर जेम रे दु॥१०॥राजझदि विण नर तथा दु॥न वि शोने कोई काल रे दु० ॥ शदि थशाश्वती जाणीय दु॥ सुपनने जे २७२ जयानंद केवलीनो रास. बहु मुनिवरने दें परिवरखाजी, साधुगणे थनिराम रे ॥ ३०॥ ॥ पंपस मिति सुमता सदाजी, त्रण गुपतिना धार रे ॥ दशविध साधु धर्म मा राधताजी, नावनानावता वार रे ॥ ३० ॥ २ ॥ जिनवर चैत्यमा जिनबर वांदीयाजी, स्तवना करीने स्तविया देव रे ॥ तेह ममपमा मुनिवर श्रागी याजी, जिहां मदन धनदेव रे॥ ३० ॥३॥ शिष्ये कबल प्रामुक पान केंजी, पाथस्य यावी वेता ताम रे ॥ जतिथी विदु जणे मुनिवर वदीपाजी, करिय पचांग प्रणाम रे ॥३०॥॥ धर्मलान दीयो मुनिवरेजी,ज्ञानें करीना णी तास चरित्र रे ॥ वर्मदेशना दीये प्रतिबोधिनीजी,सानलो प्राणी कर्म कि चित्र रे ॥ ३० ॥ ५ ॥ जीवित तटिनीपूर समु करघुजी, नटपेटक सम एड कुट्ठव परिवार रे ॥ शरदना यत्समी लखमी कदीजी, धर्मा जे मुजे ते गमार रे ॥३०॥६॥थापद कालें शरण न को होयेजी, स्वारथ तत्पर ए परिवार रे ॥ सहन पडन विध्वसी ए तनुजी, ललना कूड कपट थागार रे॥ ३०॥ ॥ एणी परें विघ्न नया ससारमांजी, जीवने सुख नहीं लवलेश रे ॥ विपयनु मुख थणुसम ते मानतोनी, ते ललना थायत ने मुविशेष रे॥३०॥॥ललना तो थापदानी ने प्रिय सखीनी, सापण वापण रा कृतिणीने तोल रे ॥ स्वर्गनी नोगल नरकनी दीपिकाजी,राचे कोण पमित जेद अमोल रे ॥३०॥ ॥ कार्य थकार्य न गणे प्राणियोजी, विविध प्र कारना करतो पाप रे ॥ तेहथी ए ससारमादे नमेजी, खमतो ते बिहुग तिनां 5 स्व थापा रे ॥ ३०॥ १० ॥ ते कारण तुमें धर्म समाचरोजी, विप यथा विरमी महानुनाव रे ॥ सर्व विरति रुडी थगीकरोजी, धर्म कार्यमा थाणी नाव रे ॥३०॥ ११॥ निग्रह कीजें सर्व कषायनोजी, इश्यि जे जे चपल तुरंग रे॥र्दम दमी तपथी तेहनेंजी, गुरु कुलवासें वसीय रंग रे॥5॥१॥ठपसर्गने वली सहियें परिसहाजी,तो जवसायर तरियन व्य रे । जनम जरा कम्मो न बूडियेजी,निर्मल दोय शुवानम इष्य रे॥ ३०॥१३॥ सकल ससारिक उखने वामताजी,थकल अबाधित लहे निर्वाण २॥ निदेवी शाश्वत सुखने धनुनवेजी, विलसे वर केवल दसणनाण रे ॥ ॥३०॥ १४ ॥ देशना सानली मन सवेगीयानी, मदननें धनदेव प्रणमी पाय रे ॥ कहे नव थधकूथायी सरोजी, दीक्षा कर बालबनें गुरु राय रे ॥ ३०॥ १५॥ करो उपकार स्वामी थम रांकनेजी, गुरुर्षे पण दीला चतुर्थ खंझ. २७५ तेणें, पाम्या यौवन वेश ॥ परणाच्या वेद पुत्रनें, रत्नचूड सुविशेप ॥ ॥ योग्य जाणीने खगपति, रत्नचूडनें ताम | पदवी दिये युवराजनी, राज्य नारना काम ॥6॥ ॥ ढाल पञ्चीशमी। जगतगुरु दीरजी रे ॥ ए देशी ।। ॥णे अवसर दवे एकदा रे,थशुन करमनें योग ॥ पूर्व निकाचित व दयपी रे, राणीने थयो रोग ॥१॥ देखो गति कर्मनी रे,कर्मे मुख ख होय ॥ दे० ॥ए थोकणी ॥ रतनमाला राणी तणे रे, थंगें ज्वर असराल ॥ सूख गई थन्न नवि रुचे रे, टलवले जेम मच जाल ॥ दे॥२॥ दाद घ यो अंगें थयो रे, बलती फूरे जोर ॥ क्षण पण निक्ष नविलहे रे, थिर न रहे एक वोर ॥ दे ॥ ३ ॥ मुख कुमला' मालती रे, फुल ते जेम कुमलाय ॥ राजवैद्य वढु तेडीया ने, विकल्प बढ़ करे रा य ॥ दे० ॥ ४ ॥ औषध विविध प्रकारनां रे, करता तेह उपाय ।। ॥ मत्रवादी मत्रे घणा रे, पण ते गुण नवि थाय ॥ दे ॥ ५ ॥रा णीने रोग व्यापीयो रे, वैये जाणीवसाध्य ॥ हाथ खंखेरी वतिया रे,को इ उपाय न लाध ॥ दे ॥ ६ ॥ श्रनुक्रमें घायु थपिरथी रेडमयां तेणी ये प्राण ॥ तव थाकद ते तस्यो रे, रोवे सह तिणे वगण ॥ ३० ॥ ॥ राय थांसु जर लोयणे रे, करतो थनेक विलाप ॥ दा देवी तु मुकने रे, केम नवि थापे जवाप ॥ दे ॥ ७ ॥ पोक मेली राजा रूवे रे,बोले रोतो वाणि ॥ ककेली दल रातडा रे, हा तुज चरणने पाणि ॥ दे ॥ ए॥ ने त्र ते कमलनां वलसमा रे, चद वयणी दे बोल ॥ कुंद सुदर दत ताह रा रे, विधुम अधर अमोल ॥ दे० ॥ १० ॥ तुजने किदा हवे देखा रे, त्रिवन सूनु बाज ॥ नासे तुज विण मुजने रे,एम रोवे महाराज दे० ॥ ११ ॥ दाघ देश हवे तेहनें रे, वोय पुत्र राय ।। रोतो न रहे कोयथी रे, न करे काय व्यवसाय ॥ दे ॥ १२ ॥ राज काज सवि मीयों रे,रहे योगीश्वर रीति ॥ मत्री प्रमुख सवि रायनें रे, एम समजावे नीति ॥३॥ ॥ १३॥ तुम सरिखा धीर पुरुपर्ने रे,न घटे करवो शोक ॥ राज्य सीदायें तुम तणु रेखीयो होयें लोक ॥दे॥१४॥ उत्पत्तिलययुत सर्व वे रे,थिर नही नगमां काय ॥ समजाव्यो समजे नही रे,यधिक धरे इख राय ॥ ॥ दे० १५ ॥ राणी सानरे कण क्षणे रे, ख धरे तास वियोग ॥ शाता ទម जयानंद केवलीनो रास. मजाल रे दु० ॥ ११ ॥ रमणिक निम किपाकना ९०॥ फल कहा परिणामरे दु० ॥ इत्यादिक चिता परो हुणा चाव्यो थागल माम रे हु०॥ ॥ १२ तव वीमा ग्यानमा दु० ॥ सूरिजिनेश्वर नाम रे दु०॥ धर्म कपा कहेता थका दु० ॥ फीधो तास प्रणाम रे दु० ॥१३॥ देशना सनिली ह पलं दु० ॥ सुतने सोंपी राज्य रे दु० ॥ सयम लिये सूरिकने हुं० ॥ थाप थया कपिराज रे दु० ॥ १४ ॥ तीच तपस्या थादरी दु। पाले शुरु थाचार रे दु० ॥ गगनगामिनी उपनी दु० ॥ लब्धि बीजी प ण सार रे दु० ॥ १५॥ अवधिनाण वली उपनु हु० ॥ जाणे जगत खना व रे दु०॥ विचरी एथिवी पावन करे दु । लब्धि तणें परनाव रे दु० ॥ ॥ १६ ॥ धनदेव हवे उपनु हु०॥ ते सुणनो थधिकार रे दृ०॥ नग वैवा उघ शोहे घणुं हु० ॥ जोयण पचाश विस्तार रे हु० ॥१४॥ जोयण पत्री श उचो वली हुँ ॥ गगनर करतो वात रे हु०॥ निर्डर कण शीतल घणा हुं० ॥ फरशी पवन थायात रे हुं०॥ १७॥ तेणे सुर किन्नर यक्ष्ना हुं० मुखीयां मिथुन उद्यान रे हु०॥ रयणायें श्रौषधि दीपती हुँ॥ दीपे दीप समान रे हु० ॥१॥ तिहां नयर वर नामथी हु॥ रथनेवर चक्रवाल हुं० ॥ प्रतिनवनें जिहां धूपना हु ॥ धूम्र ते मेघनी माल रे हु० ॥२॥ रयण मणि पंक्तितो हु० ॥ प्रना तें चाप रे हु० ॥ गगर्ने विद्याधर मणि तणा हुँ० ॥ किरण ते विजली व्याप रे हु० ॥२१॥ चोथे खमें चो वीशमी ९० ॥ श्रीनयानदनें रास रे हु० ॥ ढाल पग्में कही पुस्यथी हु॥ होये लीलविलास रे हुए ॥ २२ ॥ सर्वगाथा ॥ ६०५ ॥ ॥ वोदा ॥ ॥ विद्याधर चक्की वहो,महेंइ सिह थनिधान ॥ बनुविद्याधर पय नमे, तेह महें समान ॥१॥ दश विशि जस कीर्ति घणी, करतो सबलो न्या य ॥ बधुने पण परिहरे, जो जाणे थन्याय ॥२॥ न्यायवतने बधुपरें, जाणे तेद नरिंद ॥ पररामाथी परमुदो, गुणगण केरो वृद ॥२॥ राणी र यएमाला नली,पाणी पन समान ॥ वाणी सोहग गुण तणी,वाणी कोकि ल. मान ॥ ४ ॥ रायहाणी कदर्पनी, पहिचाणी मुखचद॥ रीसाणी दोषा वली,जाणी सोयण अरविंद ॥ ५ ॥ सुख भोगवतां दंपती,वोय पुत्र यया तास ॥ रत्नघूड मणिचूड तिम, करे कला थन्यास ॥६॥ साधि विद्या बहु रे चतुर्थ खम २७७ तव गुरु बोल्या ज्ञानथी, तुज मुज सबंध रे ॥ एम कही धनदेव मदन नो,सर्व कह्यो प्रवध रे ॥ ए० ॥ १४॥ धनदेव ते तु उपन्यो, मदन ते मुजनें जाण रे ॥ सोदमयी थाव्या विदु,ए सबध प्रमाण रे॥ ए॥१५॥ तुज प्रतिबोधन कारणें, दुथाव्यो मुण राय रे ॥ श्रापण मित्र पूरव नवें, नारी नुं 5 ख चित्तलाय रे ॥ ए॥१६॥ सयम ले गुरुकुलें वस्या, उपन्या एक वि मान रे ॥ नारी तणें दवे कारणे,केम 5 ख धरे थमानो रे ॥ए॥१७॥ सां जली हापोह थया,जातिस्मरण पायो रे ॥ नरपति गुरुने वीनवे,नगवन स त्य कहायो रे ॥ ए० ॥ १७ ॥ मुज उपर अनुग्रह करी, पानधास्या मुनिरा य रे ॥ नवसायरमा बूडताकीधो मुज सुपसाय रे ॥ ए ॥ १५ ॥ रत्न हनें यापियो, उत्सवयी निज ठाम रे ॥ विरचावे जिनमदिरें, पूजा श्रति थ निराम रे ॥ ए० ॥ २० ॥ गुरुपासें वीक्षा ग्रही,श्रुत सायर लह्या पार रे ॥ तप तपता थति श्राकरा,अनियह थनेक प्रकार रे॥ ए० ॥ २१॥ विद्या धर मुनि श्रनुक्रमें,लब्धि तण नमार रे ॥ बिहुँ मुनि थनुक्रमें विचरता, क्तध्यान लहे पार रे॥ ए॥ २२ ॥ पकौणि मामी करी,पाम्या केव लहान रे ॥ सकल कर्मनो क्ष्य करी पाम्या शाश्वत थान रे॥ ए०॥ २३ ॥ चोथे खमें बबीशमी,पद्मावजय एम ढाल रे ॥ ब्रह्मवैश्रवण वदे वजी,थाग ल वात रसाल रे ॥ ए० ॥ २४ ॥ सर्वगाथा ॥ ६५४ ॥ ॥ दोहा ॥ ॥ धनपति मदन उविध तणु,चरित्र विचारे जेह ॥ शहनव परनव 5 ख दीये, तरुणी केम यदे तेद ॥ १ ॥ सनिली सक्नु विस्मय लह्या, चम क्या चातुर लोक ॥ राय कहे चित्त रीजीयुं, हृदय थी वाणी रोक ॥ ५ ॥ वात कही वारू परें,नारीचरित्र निदान ॥ 5 खे तनाये देवता,मांमधु जेणे घर मान ॥ ३ ॥ निदनीक सघनी नही, अबला ए एकांत ॥ मुगतें गई म दिना घणी,पुष्ट घणु ते पंत ॥ ४ ॥ कर्मवशे सङ कोयनें, गुणने दोपग पाय ॥ थाव तस कारण थडे,निदा थाश्रव न्याय ॥ ५ ॥ ॥ ढाल सत्तावीशमी ॥ सुदर पापस्थानक तजो शोनम् ॥ ए देशी ॥ ॥ सुदर तुमें थमने धुरै नांखि{, वयण सनालो थाप हो । सुदर सा मान्य घर नवि घटे, दोय प्रिया सताप हो ॥१॥ सुदर तुमें श्रम बद्ध उपफारिया ॥ ए थोकणी ॥ सुदर नहीं सामान्य पुरुप तुमें, जेहने पोहे . २३

२७६
जयानंद केवलीनो रास.
क्याहिए नवि लहे रे,कलिन फर्मनो नोग ।। देगा१६॥ चोपे खमें एकही
रे, पंचवीशमी ढाल ॥ पद्म कहे मुनि श्रावशे रे, उख पाशे विसराज ।।
॥३०॥१४॥ सर्वगाथा ॥ २४ ॥
॥दोहा॥
॥ गगनगामिनी लब्धिथी, मणिप्रन जेथपगार ॥ गगन मारगषीया
वीया, तास उद्यान मकार ॥१॥ कुमर सहित वदन जणी, नाय विद्या
धर राय ।। परम दर्प धरतो थको,प्रणमे मुनिवर पाय ॥शा वेगे निज अधि
तासनें, मुनिवर दीये उपदेश ॥ नव्यजीव समनाववा,वली विशेष नरेशा३॥
॥ ढाल बीशम ॥ वात म काढो हो व्रत तणी ॥ ए देशी।
॥थग चार कयां दोदिलां, तिहां मानव थवतार रे ॥ दश दृष्टांत को
हिलो, नमता एवं ससार रे॥१॥ एमनाणी व्रत धादरो॥ एयांकणी।
ते पामे पण दोहिल, सनिलवु तिघांत रे॥ घांची मोची आहेडी तणा,
नव वली म्लेशमा
दूत
रे॥ ए॥२॥ वाघरी माछी कसाइना,
जीपाने
सूत्रधार रे ॥ सनिलवु किहांधी दोये,पामी एह अवतार रे ॥ए॥२॥ कुल
पामे रोगी घणा, निरोगी कदी थाय रे ॥ सोनले अक्षा दोदिली,मिथ्यामति
मुजाय रे ॥ ए॥४॥श्रधा पुस्य पामीयो, उर्लन सयम सार रे॥ विषय
कषायमा राचियो, वती थारंन थपार रे॥ए॥५॥श्रणवाहाला भावी
मजे, तेम वादालांनो वियोग रे, तेहखें 5 ख धरतो अको, न लहे तस्व
संयोग रे ॥ ए॥६॥ मोहें बात ध्याकुलो, करे विषाद अनेक रे॥ नवि
जाणे २६ जाल ए, सुपनथकी अतिरेक रे॥ ए॥७॥ तीर्थकर धक्री
जिस्या, बलदेवनें वासुदेव रे ॥ का कोई रह्या नही,जस करता सुर सेवरे
॥ए ॥७॥ कुश थम जल बिंद्य,चपल जीवित तेम जोय रे॥ नेत्रक
टाक्षने सारिखा,प्रिय संगम तेम दोय रे ॥ ए.॥ए ॥ गिरि नदी कनोज
सारिखी,लखमीअधिर असार रे ॥ यौवन गन कर्ण सारिखु,रूप सध्यारंग
धार रे । ए॥१०॥ देशना मुणी कहे स्वगपति, स्वामी मुणे मुज वात
रे । तुम देखी मुज दियरले, दर्ष श्राद न मात रेस॥ २० ॥ ११ ॥ शोक
गयो मुज वेगलो, हियई हसवा जाय रे॥ तुम मुखपद विलोकवा, अषि
क पिपासा थाय रे ॥ ए० ॥१॥वात न जाये ते फही, कारण सस
होय रे ॥ तुमच पूरव नव तणो, स्वामि सबप ने कोय रे॥ ए० ॥१३ ॥

चतुर्थ खंझ २७ए कायक उचित प्रकार हो । मुं०॥तु॥१॥ सुं०॥ नगिनी जो दीधी को लनें, तो ए धनरथ कीध हो ॥ सु० ॥ देव जो पुत्री तस कुलें,तो धनरथ प्रतिम दो मुंगातु॥१पासुं०॥ ए नृप शूरवीर घणो, कोश सैन्य बलसार हो।संगामी वयणे निपेधीये,न्याय युक्ति थनुहार दोमुंगातु॥२०॥९॥ एम विचार करी कहे, न करी में शोध हो। मुं० ॥ निनकुमरी कोइ था नके, नवि पाम्यो तस बोध हो । सुं०॥ तु०॥ २१॥ सुं०॥ कुमरने जे साजो करे, निजपुत्री देउ तास हो । सु० ॥ एह प्रतिज्ञा कारणों, दीधी ब्राह्मणने खास हो ॥सुतु॥शामुं०॥ कुमरीने पण ए गम्यो, देखी कला विलास हो ॥९॥ ए सम अवर न को गुणी,जोता जोडीन जास हो मुंगातु॥ ॥ २३॥ सु० ॥ चोथे खमें ए कही, सत्तावीशमी ढाल दो। मुं० ॥ पद्मवि जय कहे सनिलो, सुणतां मगलमाल हो । मु०॥ तु०॥ २४ ॥ सर्व ॥६७३॥ ॥ दोहा ॥ ॥ निझुकने नली दौकरी,दूत कदे केम दीध ॥ नूप कहे निमज नणी, प्रवें थर्पण कीध ॥१ ॥ ब्राह्मण वारु निमथी,व दूत तव वाणि ॥ को धवशे ए कीधलु,जगतीपति कहे जाणि ॥२॥ प्रतिज्ञा अमें पालवा, कीधु एह काम ॥ दपणे दूतज कहे यवलु कीधु थाम ॥ ३ ॥ राजकुमर थ तरंग दे, ब्राह्मण वाह्य सरूप ॥ मारग पाधरो मूकीने, विरुन करो विरूप ॥ ४ ॥ रूपें दरथ्यो रतिपति, किहां ए कुमर स्वरूप ॥ नट विद्या प्रमुखें नि खर, किहाँ ए ब्रह्म कुरूप ॥५॥ उपकारीने थापीयें,दक्षिणा धन दान ॥ राजकुमरी ए विप्रने, पण देवी न प्रधान ॥ ६ ॥ ॥ ढाल अहावीशमी ॥ उलगडी श्रादिनाथनी जो ।। ए देशी।। ॥ इतनें कहे दवे नरपति जो, करी प्रतिज्ञा लेह जो । तेह युगांते नवि फरे जो, निर्वहेतुं धरी नेद जो ॥॥ दू॥१॥ यत ॥ दिग्गजकूर्मकुला चल, फणिपतिविधृतापि चलति वसुधेयं । प्रतिपन्नममलमनसा, न चलात पुसा युगातेपि ॥ १॥ पूर्वढाल ॥ सह सम्मत में ए कम्यु जो, दवे न करो थन्य विचार जो॥ दूत कहे देत तुम कट्ठ जो,मानो वचन ए वार जोदू०॥ ॥ २ ॥ वलीयाशु सहानपणु जो,राखीयें तो सोफे कान जो ॥ कन्या राज कुमारने नो, नहीं थापो तो नहीं रहे लाज जो ॥ दू० ॥ ३ ॥ वलथी लेशे जो कदा नो, कोण वारणहारो तास जो ॥ शूरवीर ते नूप २०G जयानंद केवलानो रास. नारि हो।सु०॥ प्रार्थनानग फरे नहीं,सझन फोर प्रकार होगसुंगातु सु॥ मुज पुत्री श्रगी करो,तव बोले नूदेव हो ॥सुं॥ एम ने तो पण पर खीयें, अवसरे नाणणु देव दो सु०॥ तु॥ ३ ॥ सु०|| कायक प्रतिज्ञामा हरे, ते जिहा नवि पूराय हो । सु०॥ तिहां लगें तुम नवि बोल, एम सुणी चुप रह्यो राय हो । सु० ॥ तु० ॥ ४ ॥ सु० ॥ राय मत्री मुख हर खिया,सांजली कन्या तेह हो । सु० ॥ मोद सदी मनमा घणु, बगीक री ससनेह हो । सु०॥ तु०॥ ५ ॥ सु। एक दिन राय सना करी, बेन सङ परिवार हो। सु॥ तेणे समे प्रणमी वानवे, श्रावीने प्रतिहार हो । सु॥तु०॥ ६ ॥ सु०॥ दूत थाव्यो पद्मरय तणो, ते थावे के जाय हो सु०॥ मोकल वहेलो तेइनें, एणी परें वोले राय दो ॥ सुता॥ ९॥ मोकल्यो दूत ते थावियो, परपद देखे ताम हो ॥तु ॥ रत्न धानूपण जलकता, रूपें जेदवो काम हो ॥ ॥ तु॥ ॥ सुणामत्री सामतने शे तीया, सेनापति समवाह हो ॥ सु॥थग रक्क विविधायु, परिवमो नृप उन्साद हो । सुणा तु॥ए ॥ सु॥ वेठो कनकसिंहासनें, चामर सत्र धरंत हो । सु० ॥ ब्रह्म वैश्रवण पासे रह्यो दूत ते नृप प्रणमत हो। सु०॥ तु०॥ १० ॥ सु०॥ पंमित कथकनें 5ईरा,बकतरीथा वड वीर हो। सुणा शोना थपिकी थी, चमक्यो देखी नृप नीर हो । सुातु ॥११॥ ॥॥ दृष्टि सझायें बेसाडीयो, पूरे तृप मुखशात हो ॥ सुं० ॥ नगिनीपतिने वली कहे,तुज थागमनी वात हो॥णातु ॥ १२ ॥ सु० ॥ ते कहे तुम पसायथी, मुजने के सुखशात हो। सुणा तुम नगिनीपति सुखें रहे, हवे सुणो मुल थवदात हो ॥ सु०॥ तु०॥ १३ ॥ सु०॥ तुम पासें मुज मोक क्यो, सजिलो कारण तेद हो ॥सुा दैवयोगें क्रोध उपनो, पुत्रो उपर मुज वेद हो ।। सुं० ॥तु॥१॥ सु०॥ विजय सुवरी दीधी निमने, तेद गर्या को नाम हो । सु० ॥ खोल करी घणी तेदनी,वन वाही पुर गाम हो । सुगा तु॥ १५॥ सु॥ खबर न लाधी तेदनी, तेणे नित्य स्वेद ते थाय हो । सु०॥ तुमें पण तस जोवरावजो, विविध प्रकारना नाय दो । सु॥ तु॥१६॥९॥ वात मुणे एक मादरी, जे तुम पुत्री जेद दो ॥सुमापन दत्त मुज पुत्रनें, परणावो तुमें तेह हो । मु॥तु ॥ १ ॥ सु० ॥ तेह वचन अवणे सुणी, नरपति करे विचार हो । सु । उत्तर एदने पापीयें, चतुर्थ खंभ २जर सघलो तेदनो अवदात जो ॥ नरपति सुणी कोप्यो घणुं जो, थनिमा मधु नो पात जो ॥ दू० ॥ २०॥ चोथे खमें ए कही जो, थाहावीशमी रुडी ढाल जो ॥ पद्म कहे मेद बांमायें जो, मदधी दोये वद् जजाल जो ॥ दू॥२१॥ ॥ दोहा ॥ ॥ सैन्य मेव्यु तिदा सामटु, वाज्यां रण वाजिन ॥ गजवर बेतो गेला, चाल्यो सैन्य विचित्र ॥ १॥ अति उत्साह श्लापति, बत्र चामर बार्जत ॥ गाजे वाजि गगन, हैयडे दर्प धरत ॥२॥ शब्द शकुन वारे सकन, पण न रह्यो पल एक ॥ कमलपन नृपनें निकट, धाव्यो थति थविवेक ॥३॥ हाथी त्रीश हजारगं, रथ पण त्रीश हजार ॥ त्रीश लाख वली तुरंग, चचल पवन प्रचार ॥॥त्रीश कोही पायक तुरत,याव्यो मेली थाम । सानली निज मत्री सहित,करे विचार एह काम ॥ ५ ॥ ॥ ढाल गणत्रीशमी। जोहो जाम्य अवधि प्रयुजीने ॥ ए देशी ॥ जीदो कमलप्रन कहे मत्रीने, लाला बलीयाचं जरी बाप ।। जी हो कोप मानशुं वोलीया,लाना केम रहेशे एक साथ ।। १ ॥ नविकजन जोजो पुस्य प्रकार ॥ ए थांकणी। नीदो मत्री कहे जे कोषलु लाला श्रण कीधु नवि होय ॥ जीहो पर परानव न सही शके,लाला छत्रीकुलनो कोम ॥ न० ॥ ॥जीदो दोष देखी नास्तिक कुलें, लाजा कन्या नवि देवराय ॥ जीहो थपघटती ए का नयो,लाला सैन्य करो समुदाय ॥ ज० ॥३॥जी हो वप्रसङ्ग करी जूझीयें, लाला नरी कणने नीर ॥ जोहो नृप कहे न गरथी नीकली, साला यु-६ करु ण तीर ॥ ज० ॥ ४ ॥ जोहो गढमा रहीने जूजीयें, लाला देशनग निज थाय ॥ जीदो शत्रु देशने थाकमे, लाला वीरथा केम सदेवाय ॥ न० ॥ ५॥ जोहो ब्रह्मवैश्रवण कहे त दा,लाना नूपें कही सत्य वात ।। नोदो नय मनमा मत राखजो,नाला जय थाशे मुखशात ॥ न ॥ ६ ॥जोहो जीत ह ए एकलो,लाता रहो सघ ला सुखमाहिं ।। जीहो नाटकनी परें देखजो,लाला सगर मुज उत्साहिनि॥ ॥७॥जीहो सानती नरपति हरपियो,लाला मेजी सैन्य अपार ॥जीहो पंच परमेष्टी समरतो,लाला करे मगल उपचार न॥७॥ जोहो चामर पत्र धरावतो,लाला वेतो ते गजराज ॥ नीदो शुन शकुने ते नोकल्यो, लाला पुरबाहिर नरराज ॥न० ॥ ॥ जोहो विविध थायुद्धधरी रथ चढयो,सा , --- राह जो॥ , पूर्व ढाल 260 जयानंद केवलीनो रास. ति जो, प्रतिवीर ते तृण ते जास नो ॥ दू० ॥ ४ ॥ तेहना सैन्य तमु इमा जो, तुम वल साधुचूर्ण प्रमाण नो॥ तेद थाक्रमो तुलने दो, तव नवि याशे कोइ त्राण जो । दू० ॥ ५ ॥ तेमाटे तुज राज्यनी जो, जी वयानी जो होये चाह जो ॥ तो कन्या यो नृपकमरने जो,एहज सोपो ने दू० ॥६॥ सनिली रायने उपन्यु जो. बद्ध कोष तथा निमान जो ॥ कहे रे दूत तु बोलवा जो,पणो निपुण ने वली सावधान जो ॥ ॥७॥ मुज पागल पण बोलतो जो, धीमाई धरीन तोर नो ॥ पण निय स्वामीने नवि कहे जो, उपदेश वचन करी सोर जो ॥ दूणा ज॥ क्षत्री कुन्त मेलु करे जो, ते क्षत्री पक्तिमा नाहीं जो ॥ नास्तिका अग्रेसरी जो, कम अतर केम उत्सादि जो ॥ दू॥ ए॥ तेहगु सहनता करे नो, कुलवतने थावे लाज जो ॥ पापी थन्यायीने नहीं रहे जो, चिरकाल लखमीने राज जो ॥ दू०॥ १० ॥ यत ॥ तरुवत्तटिनी तटोजत, प्रमदाहगतगुह्यमत्रवत् ॥ जल व मृदामनाजने, न चिर तिष्ठति पापिपु प्रिय ॥ १ ॥ शूरता ते निज गेहमां जो, पण शूरता नहीं तग्राम जो ॥ सहेजें तृण सरिखा थशे जो, गली जाशे सघनु धाम जो ॥ दू॥ ११॥ तेदना सैन्यने सायरें जो, साधुचूर्ण ते बोजा राय जो ॥ पीवा ते सायर जणी जो, मुज वडवानल सम काय जो ॥ दू॥ १२ ॥ कोण वीदे जे एहथी जो, निज जी वित रूतो एद जो ॥ तो सन्न यथावजो जो, सग्रामें जोश्यं तेह जो॥ दृ ॥ १३ ॥ निग्रह योग्य ने मादरे जो, मुज नाणेजीने थपमान जो । कीच पण में राखियं जो, स्वाजन्यपणु बहु मान जो। दू०॥ १३ ॥ म दमातो उकुराश्यी जो, जो लोपे खानपण तेद जो ॥ तो खोरखाम घृत नोजनें जो, नूख्याने थाव्यु एह जो॥ दूणारा जा वहेलो निज स्वामीने जो, फहेजे तु माहारी वाण जो॥ कौलकुले नवि दीजीयें जो, ए कन्या थनरथ जाण जो ॥दू ॥१६॥ करजो जेम जाणो तुमें जो, तव बोल्यो ब्राह्मण वाणि जो॥ थदो राजन अतिशय क्षमा जो, तुमची दोती गुण खाण जो॥ दूप॥ १७ ॥ एम कहे पण दूतने जो, दनी गल दस्त न कीय नो॥ कोक सुन ते सनिली जो,दूतनें गल दस्त ते दीप जो ॥दू॥१॥ दूतनें क्रोध चढयो घयो जो, देखी निज थपकार जो ॥ चाल्यो पागे वेग शं जो, श्रमरप धरतो थपार जो ॥ दू० ॥१॥ पसरथ राजानें कह्यो जो, चतुर्थ खम २०३ हित के पया,लाला कर पद रहित थनेक ॥ जोहो निजसैन्ये थोपधि व में, लाला सह करे ते चेक ॥॥२६॥ जोहो चक मदा मुजर वली, ला ला खड्ड ते थयां धर्कल ॥ जीहो शत्रु सैन्य सही त्रासने, लाला देखी ते प्रतिकूल ॥ ज० ॥ २७ ॥ जोहो केश्क मुखे तरण दीये, लाला केश्क मूके शव ॥ नीदो के जलाये केइ वली,लाला पहेरे नारीनां वस्त्र । ॥ न० ॥ २७ ॥ जीदो केशक गव्हरमां गया,लाला के लीये जपमाल ॥ जीदो केशक शरण तेनु करे, लाला मारो रखे कृपाल ॥ न ॥ श्ए । जीहो नमो थरिहताण कहे, लाला कपट श्रावक थई तेह ॥ जोहो मूके तेहनें जीवता, लाला कुमर कृपानो गेह ॥ न०॥ ३० ॥ जीहो थरिहंत नामें विशेषथी,लाला मूके पाणी प्यार ॥ जीदो पुरस्य जयलची वरे, लाला कोइ न लोपे कार ॥ ज०॥ ३१ ॥ लीदो चोथे खमें एणीपरें,लाला गण त्रीशमीढाल जोहो पन कहे श्रोता घरें,लालादोजो मगलमालान॥३२॥ ॥दोहा॥ ॥ सैन्य विसस्थल निज सवल, देखी तेह नारद ॥ठी को थावियो, सुनटना साथै वृद ॥ १ ॥ ब्रह्म वैश्रवण प्रत्ये वदे,याज सुगाल थनत ॥ निका कण दीये नामिनी, मागी खाउ मरणांत ॥२॥ ताम्रजाजन देव ति गवती, पर कामें केम प्राण ॥ बामे बोकरवावयी, एडवो केम अयाण ॥ ३॥ ब्रह्म जाणी वेखियो,मारतां तुज मुक्त ॥ लाजे याण ते लोकमां, तेणें नवि मारु तुक्क ॥ ४ ॥ नाथ थतु सेना तणो, मारे तेदनें केम ॥ क्रोध करी तव विज कहे, प्रथिवीपति सुणो प्रेम ॥ ५॥ जिहां पराक्रम नो यें, तिहा ब्रह्म क्षत्री न देत ॥ कुलन काम ताहारे किश्यु, जाए इयु युद्ध सकेत ॥ ६ ॥ परनिदानो प्रेम तुज, मादारे पराक्रम प्रेम ॥ सेना नाथ त णो दवे, थाणु थंत दु एम ॥ ७ ॥ ताहरां प्राणयकी तुरत, सारो करूं सगाल ॥ प्रेतपति घर प्रेमथी,जाय सनु जंजाल || G ॥ विधि निझा देशे जली, तादारु राज्य तैय्यार ॥ नहीं ताम्रपात्रनु काम मुज, वली सनिलो विचार ॥ ए॥ पुत्री वधथी पापीया, नवि वीदिनो मनमाहि ॥ ब्रह्महत्या नी वातथी, समजावे वा थाहिं ॥ १७॥ ब्रह्म जाणी उवेखियो, ए कायर श्रवदात ।। परठपकार पराकमें, करवो मुज एकांत ॥ ११ ॥ रविधुम च वारिद वती, दृष्टांत तु देख ॥ धर्म में करी थांधली,निजपुत्री निरवेप २३ जयानदं केवलीनो रास. ला नृपनें पू जाय ॥ जोहो ब्रह्मपैश्रवण शोने घणो,लाला युद्ध सामयी समजाय ॥ ॥१७॥ जोहो पूरचे फमलायें कर्पु,जाला तुमें कोइ धनम सरूप ॥ जीहो मुन जरतार मत मारजो,लाला यद्यपि भाग अनूप । ॥न०॥ ११ ॥ जीहो निजनारी पण एम कहे,लाला मत मारेजो रे तात ॥ जोहो ब्रह्मवैश्रवणें अंगीक, लाला तास वचन विख्यात न०॥१॥ जीदो शीघ्र यश साहामो नई लाला जे निज देशनी सीम ॥ जीहोर य गय रह नट थ६,लाला पण उत्साह अनीम ॥ न० ॥१३ ॥ जीरो बिगु दल सुनट उत्सव परें,लाला माने निजनिज गम ॥ जीहो शस्त्रजान रिका जागता, लाला सूर उदय थयो ताम ॥ न ॥१४॥जीदो रण । जितर वाजीयां, लाला दोय सैन्यमा ताम ॥ जोहो नादें बिल फणी सल सल्या लाला गज गया गन्दर नाम ॥ न० ॥ १५ ॥जीहो कौतुक जोवाने मल्या,लाला राक्षसने नूत प्रेत ॥ जोहो सन्न व थई मन्या, लाला दोय सुनट रण देत ॥ न ॥ १६ ॥ जीहो दय गय रथ नट बिलु तपो, लाला निज निज गम रहत ॥ जीदो थग्रसेनानी बिदु तणा, लाला माहो माह मिलत ॥ न ॥१७॥ जोहो गजवर शोहे गिरि समा, लाला रप ते नाशु विमान ॥ जीहो सुनट पडे वली ठहले,लाला दीसे सिह समान ॥ न ॥ १७ ॥ जीदो गरुड परें दय हीसता,लाला गज गरिव जोर ॥ जीदो रथ चित्कार घणा होये,लाला सुनट तणा बढ़ शोर ।। न॥१५॥ जोहो थहाट्ट हास्य नूत व्यंतरा, लाला फूटयु मानु थाकाश ॥ जोहो जट मुजरें हस्ती पब्या, लाला पदावेद नग खास ॥ ज० ॥ २० ॥ नीहो पाप ड परें रथ जांजता,लाला बाण ममप तिहां दोत ॥ जीदो श्रातप तिही पसरे नही,लाला शस्त्र अग्नि द्योत ॥ ॥ २१ ॥ जीदो एम नैरव स मामा,लाला दायुं कमलप्रन सैन्य ॥ जोहो कमलप्रन वे हवे,लाला रातो रोष रसेन ॥०॥ २२॥ जोहो ब्रह्मवैश्रवण वदे तदा, जाला श्यो तुम उद्यम एद ॥ जीहो मुज बेता मुखमा रहो,लाला एम वारी नृप तेह ॥ न०॥ २३ ॥ जीदो रथ बेगे विविधायुधे, लाला चाल्यो वरसे माण ॥ जीहो कवच सहित दणे सुनटनें,लाला केश्कना शिरप्राण ॥ न ॥४॥ जोहो लोदत्राण दाथीया,लाला पाखर सहित तुरंग ॥ जोहो समकाबें सहस्रो गमे,लाला लागे अलक्षित श्रग ।। न ॥ २५ ॥ जीहो मस्तक र चतुर्थ खम. २न्य ॥ २०॥ १७ ॥ शूरवीर जय श्छता, थाको नूपति ताम रे ॥ माया विष थाको नहीं, गजशुं हरि जिम दाम रे ॥ शू० ॥ १७ ॥ मुष्टियें मास्यो हृद यमां, मूओ लह्यो तव नूप रे । मुखथी तेम लोदी वमे, पडियो काष्ठ स रूप रे ॥ शू ॥ १५ ॥ शूर सुनट लाखो गमे, नृपनें लेवा भावे रे ॥ तव वाडव वर्षा तिहा, वाण तणी वरसावे रे ॥ ॥ २० ॥ शस्त्र सवे तस नांजीयां, नाता मृग परें तेद रे ॥ बाणे थाकुल व्याकुला,थति उत्सुक प ण जेह रे । यू० ॥ २१॥ सयामें क्ष्य कालमां,स्वामीनें न लेवाय रे॥ सझा करी सुनटनें, प्रेरे कमलप्रन राय रे ॥ शू० ॥ २२ ॥ पद्मरथ राजा प्रत्ये, बांधी निज रथे धाले रे ॥ तेहना सुनट देखी करी,चितवे एम तेणें का रे ॥ शू० ॥ २३॥ दवे जूझवु शे कारणे,एदनु शरण करीजें रे॥ ए म करी विजशरणु करे, दिन पण तास वदी रे ॥ २० ॥ २३ ॥ बीहिक म करो स्वामी अड,एम थाशासना देवे रे ॥ जयजय शब्द थया तिहापु प्पवृष्टि सुर खेवे रे ॥ शू०॥ २५ ॥ सनि वाजे थाकाशा, जयवाजो बढ़ वाजे रे ॥ कमलप्रन नृप सैन्यमां, जयनय शब्द विराजे रे ॥ शू० ॥ २६॥ थरिहा देव गुरु नि स्टही, धर्म केवलीनो नांख्यो रे ॥ जेदना हृदयमांहे व स्या,जय पण तेदनो दाख्यो रे ॥ शू० ॥ २४ ॥ चोथे खमें त्रीशमी, पन्न विजय कही ढाल रे॥ धर्म करो नवि प्राणीया,धर्मथी मगल माल रे॥२७॥ ॥ दोहा॥ ॥त्रण तत्त्व जस चित्त नहीं, ते लहे मुख थनत ॥ सुखनाजन न वि संनवे, केम करे कर्मनो श्रत ॥ १॥ सासू वयण सनारीने, वली निज वधूनी वात ॥औषधिधी कीधो थवल, वाडवें जग विख्यात ॥ २॥ निग हित करीने नाखीयो, पिंजरमा नपाल । मत नास्तिकनो मूकशे, बोडीश तव बोगात ॥३॥ शत्रुसैन्य निजसैन्यमा,सह कस्या सवि जीव॥श्रौषधि जल सींची एणे,ते लह्या दर्प अतीव ॥॥ यदो स्वपर सरिखा थने,उत्तम करे उप कार ॥ एम स्तवना अतिशय करे, प्रमुक्ति थई थपार ॥ ५॥ ॥ ढाल एकत्रीशमी ॥ जीरे म्हारे नाग्यो कुवर जाम ॥ए देशी॥ ॥ जीरे म्हारे कमलप्रन दवे राय, कुमरने आलिंगन करे जीरे जी ॥ जी० ॥ स्तवना करे एम तास,तुम सम कोण श्रम उपगरे जीरेजी॥ १ ॥ जी॥थदो तुम शक्ति थगाध, अहो शूरवीर गनीरपणु नीरे नी ॥ .

. १४ जयानंद केवलीनो रास. ॥ १२ ॥ वली नास्तिक थइ चांगतो,पुत्री पानी प्रेम ।। तस फल देसाई तनें, जो तु करिये जेम ॥ १२ ॥ सर्वगाया ॥ १० ॥ ॥ ढाल त्रीशमी ॥ धवल शेत ल नेटणु ॥ ए देशी ॥ ॥ क्षत्रीपट हरे दाखयो, गुण तो फाथी जपाय रे ॥ उत्तम नर तर नधि करे, सोनस तु नरराय रे ॥ १ ॥ शूरपणु जुन शूग्नु ॥ए थोकशी। कोध अनि दीप्यो घणु, वरसे जडोजड वाण रे ॥ ब्रह्मवैश्रवण करे तरा, खको खम प्रमाए रे ॥ ॥ ॥ २ ॥ सुलट नूपतिना कोढयो गमे, बाण मूके समकाल रे॥ ते सहुनें ब्रह्म एकलो, बाणे वींधे ततकाल रे । शुरु ॥३॥ व्याधथी मृगपरें नासता, जाय दिशो दिश नागा रे ॥ लेता मूक ता बापने,नवि देखे कोइ लागा रे ॥ शू० ॥ ४ ॥ श्रन्त शक्ति देखी करी, सहुये विस्मय पाया रे ॥ नाग्य तणी स्तवना करे,घहो यन श्रतिशय ना या रे ॥ शू० ॥ ५ ॥ कमलप्रनना सुनटने,थति वधित उत्साह रे ॥नर ह्या वास्या ते सगु, पेना सगरमाह रे ॥ शू० ॥ ६ ॥ कुमरने नृप वेहुल हे, जूजे सैन्य ते दोय रे ॥ सुनट मस्तक बहु गगनमा,रादुमय परे होय रे ॥ शू० ॥ ॥ शस्त्र मूकी जा मूकीयो, कायरने नवि मारू रे ॥ जो क्षत्री पणु धारतो, तो बल जीउ ताहारु रे ॥ शू० ॥ ७ ॥ बाल तु फोकट का मरे, जा तु मूल्यो जाणी रे ॥ वीर तु शर वींध्यो थको,जूके में एम बाणी रे ॥ शू० ॥ ५ ॥ उदो उगे मारो तुमें, मारो मारो एम नाखे रे॥ शोर मको र घणो थयो कविजन केतु दाखे रे॥शू०॥१॥ रायन धनुप बेयु हवे, बत्र चामर शिरत्राण रे ॥ राय यहे थनिनव धनु, तेहथी चलावे बाण रे॥ ॥११॥धनुष वाडवनु बेदी, वाडव थाणी रीश रे ॥ ले मोघर रथ जां जीयो, हवे कोपे एथिवीश रे ॥शू॥ १२ ॥ विप्रनो रथ खेमो खम कमो, गदा करी चकचूर रे ॥ ब्राह्मणे धनुष विधा क्युं, थाणी अतिशय शूर रे ॥ शू० ॥ १३ ॥ खड्गयात तव नृप करे, ते ब्राह्मण वचावे रे ॥ खड्ग वारव नुं छेदी, उलट पालट एम थावे रे ॥शु० ॥ १५ ॥ श्रमर्प धरी ब्राह्मण तदा, नृपर्ने एम बोलावे रे ॥ महमयु६ करीयें बिहु, नृप पण सन्मुख यावे रे ॥॥१५॥ जास्फोट पघातथी, ते पृथिवी कपावे रे ॥ कुर्कट परें । पडे पड़े, विस्मय सह तिहां पावे रे ॥ शूम् ॥ १६ ॥ तहना करे गाजे ष गु, टते थालोटे दोय रे ॥ उपर थध थाये बली, वलगे विबरे दोय रे Gg चतुर्थ खंग. अपराधी जरतार, पतिव्रता सेतु अमें ॥ जीरे जी ॥ १७ ॥ जी० ॥ नृप कहे एद अनाथ,दीनां क्रोध घटे नहीं जीरे जी॥जी॥ प्रणामांत होय क्रोध, सहान ते कहीयें सही जीरे जी॥१॥जी॥ क्रोध शक्ति तुम दीत, दवे प्रसाद ते दाखवो जीरे जी॥ जी० ॥ कीजें नूपस्वरूप, ए थम वच न ते राखवो जीरे जी॥ २०॥जी॥ विप्र कहे जो एद, जैनधर्म चित्तथी करें जीरे नी॥जी॥ तो करूं मूलस्वरूप,पूडो एदने दील खरे जीरे नी ।। ॥ ११ ॥ जी० ॥ पूलघु तेहने ताम, चेष्टायें कहे ए खलं जीरे जी॥जी॥ मूकं नास्तिक वाद, जैनधर्म साचो करुं जोरे जी ॥ १२ ॥जी॥ ब्रह्मवै अवरों कीध, मूलगु रूप औषधिथकी जीरे जी॥ जी०॥ निगड नजावी ताम, थाश्वासना दीये प्रतीतकी जीरे जी ॥ २३ ॥ जी० ॥ सिंहासने ते राय, वेसाइपो थानद थयो जीरे जी ॥ जी० ॥ कमलप्रन मुख राय, प्रणमे चित्र हृदय नयो जीरे जी॥ २५ ॥ जी० ॥ सोप्युं सघलु सैन्य, ते प्रणमे थति नेदयं जीरे जी॥जी॥ बोले तव नूपाल,नीच मुख फरी तेद में जीरे जी॥ २५ ॥ जी० ॥ एकत्रीशमी दाल, चोथे खमें ए कदी जीरे जी ॥जी॥ पविजय सुरसाल, नारखी जिम शास्खे लदी जीरे जी॥२६॥ ॥ दोहा ॥ ॥ गदगद स्वरथी नृप वदे,नमवा योग्य हूँ नाहि ॥ महा पाप पंकिल मनें,केम जाणु नश्युं फ्यादि ॥ १॥ दी सानल्यु नहीं कदा,की, कर्म को र॥ पुत्री हत्या करी पापीयें,श्रध करी वली र ॥ २ ॥ निजनी कीपीना मिनी,किहांये ग कोई गय ॥ ए पातक सदय थयुं, कीधुं कर्म न जाय ॥३॥ ठयपाप पुस्य उदयथी,श्राव्य तुरत थचान ॥ सहसगमें नट साखथी, पक डयो वाडवें पाण॥४॥ मर्कट कीधो मानवी,ए 5 खनो श्यो थंत ॥ मरण श्रेय मुजने थने,सर्वप्रकारें सत ॥ ५ ॥ प्रगुण करो चय पेशीये,एम सुणी श्रवनीपाल ॥ कमलपन कहे सांनलो,रूडी वात रसाल ॥ ६ ॥ ॥ ढाल बत्रीशमी ॥ कर्म न बूटे रे प्राणीया ॥ ए देशी ॥ ॥ बढयें जीत्यो एम जाणी, कुमला मत स्वामी ॥ नादिक परानव सह्या, बाहुबली मुख पामि॥१॥ कर्म तणी गति एदवी ॥ ए बांकपी॥ बटुट मात्र म नाणजो,विष्यपुरुप को एह ॥तेतो थवसर जाणश,तव वो से जि तेह ॥ क० ॥ ॥ एतो फूल ठग्यां थडे, फल तो नारकमांहि ॥ व . , २६ जयानंद केवलीनो रास. जी० ॥ पुरवपुण्य पसाय, श्रमे हतार्थ थया घणु नोरे जी ॥ १ घुणाक्षरने न्याय तुमें एक विधि निपनावीया नीरे जी॥जी॥ नृप पम्यो गनवर खध,साये कुमर वेसारीया ॥३॥जी॥ पेसे नगरीमहि, विविध वाजिन वजावतो जीरे नी ॥ जी० ॥ ब्राह्मण शत्रु सैन्य, नगर बासन थापतो जीरे जी॥ ॥ जी० ॥ मत्री सेनानी मुरल्प, परिकर सार जोई। री जीरे जी॥जी॥ राखे तेहाथी थाप, सेवा कारण वित्त परी जीरे जी॥५॥जी॥ घर घर तोरण माल,स्वस्तिक मुक्ताफलें करे जीरे जी ॥जी॥ नाटक नव नव नाति, ध्वज थापण घरने शिरें जीरे नी ॥६॥जी॥ पृथिवीपति विजयुक्त, चामर स्त्र धरावता जीरे जानी॥ महा महोत्तर ममाण,नृप मदिर कमें पावता जीरे जी॥७॥जी॥ मत्री सामत सा लोक, विसा निजघर गया जीरे जी॥जी० ॥परिवसो निन परिवार, विज पण निजघर थावीया जीरे जी॥ ॥जी॥ राजवर्गी पुर लोक, ब्रह्मवैश्रवणना गुण स्तवे जीरे जी ॥जी॥रणकथा तेह सनारि, करेसा लाप ते नव नवे जीरे जी॥णाजी॥ पजर रथमा थापि,तेडामो पपरप प्रत्ये जीरे जी ॥ जी० ॥ दुकम करी विजरान, मुंजायो अवसर पते जीरे जी॥ १० ॥जी॥ बीजे विन हवे नूप, वेग पीसनें दिन मजी जीरे जी॥जी॥ मेली सना तेणी वार, तेडचो पद्मराना वली जीरे जी ॥११॥जी॥ काढी पंजर बाहेर, बोलावी विज एम कहे जीरे जी॥जी॥ पुत्री विटंबण पाप, तुज सरिखा एणी परें लहे जीरे नी॥११॥ नी० ॥ दनीय न थाल्यो थत, फल देखावु ते दवे जीरे नी ॥जी॥ धौषधि मस्तकें थापि, मकड कीधो वाडवें नीरे जी ॥ १३ ॥ जी० ॥ जोर श्रृंख जा श्राणी,घाली गले कौतुक करी नीरे जी ॥जी॥ सना लोक सहुलि, होशें जोवे फरी फरी जीरे नी॥ १४ ॥जी॥निन नरनें कहे विप्र, मार्ग त्रिक चाचरें जीरे जी ॥ जी० ॥ फेरवो घर घर दाट, जेम वली फ रीन समाचरे ॥ जीरे जी॥१५॥जी॥ मारो कोरडा तास, ते सदु नर अंगीकरे जीरे नी॥जी॥ लेई जाये जाम, तव कमाता बांसु फरे जीरे जी॥ १६ ॥जी॥पतिविठबना देखी, कहे निज नृप नाता जणी जीरे नी॥जी॥ मुन तुज थाय अपवाद,वात वारो धनरथ तणी मीरे जी॥१७॥ जी॥ कमला कहे पुणो वत्स, मात वचनें मूको तुमें ॥ जीरे जी॥जी॥

चतुर्थ खम एनए मुज एह ॥ तातकोध ते ततक्षण, हितकारी हुन देव ॥ ५ ॥ सांजली व यण सनेदयी, थालिंगे श्रवनीश ॥ बोले वेसारी खबर,पूजे नव एथिवीश ॥३॥ निहन नणे तव सनिलो, जिम उलखी निज जात ॥ मुज उलखे का महीपति, तव कहे पृथिवी तात ॥ ॥ लक्षालच तुमें लखु, स्या बाद जेम सूत ।। रूप कमलाने झदि तुम, केम सही थाकूत ॥ ५॥ पंमित पण परखे नहीं, शक्ति तुमारी स्वामि ॥ पुत्री जे थापी प्रथम, रू पें ते थनिराम ॥ ६ ॥ कमलप्रन मुख एम कहें, कीधु कारिमुं रूप ॥ नि हन तणु तेम बननु,नारीनु तेमज थप ॥ ॥ विप्र वखत एदवू नही, लक्षणे लखीयें एम ॥ तव पद्मरथ बोलतो, पाणी थधिको प्रेम ॥७॥ ॥ ढाल तेत्रीशमी ॥ मनमोहन मनमोहन पावन देदडीजी ॥ ए देशी॥ ॥ स्वामी थरन स्वामी थरज सुणो एक श्रम तणीजी, कहे पन कहे पद्मरथ राजान हो ॥ जेम कीg जेम कीधु स्वरूप ते निल जी, तेम दा खवो तेम दाखवो मूल सस्थान हो ॥स्वा॥१॥ मुंजावो मुंजावो केटलुथम प्रत्येजी, मायानिन मायानिल ते वोले तष्ठ हो ॥ जब चूरणें जब चूरणें थांधती निज सुताजी,करी तहारे करितदारे में साजी सुसब दोस्वा॥२॥ तिहा कीधी तिहां कीधी प्रतिज्ञा क्रोधयी जी, देठ शिक्षा देवं शिक्षा ए नरराय दो॥ तिहां सुधी तिहाँ सुधी प्रगट न थायवु नी ॥ निजरूपें निन रूपें में कांस्वाय हो ॥वाणाशा ते की ते कीधु धास्युं जे हतुं जी,तुम दीधु तुम दी। उ ख घसरात दो ॥ ते खमजो ते खमजो पूज्य तुमें श्रबोजी, दवे ययो दवे थयो प्रतिज्ञा पाज हो ॥ स्वा० ॥ ४॥ हवे परगट हवे पर गट या एम कहीजी, निज दाख्यं निज वारस्युं मूल स्वरूप दो ॥ निज प रने निज परने नानारूप करणथी जी, नवि जाणे नवि जाणे प्रजा तेम नूप हो । स्वा० ॥ ५ ॥ रूप देखी रूप देखी नृपादिक दरखीयाजी, मोद पामी मोद पामो स्तवे गुणरूप हो ॥ श्रदो नाटक श्रदो नाटक एरोहि ज कीधलु जी,वरणवीय वरणवीय / गुणकूप हो ॥स्वा०॥६॥ लाज मूकी लाज मूकी थावी सुणी वारता जी,धरी हर्प धरी दर्षनें लई वरमाल दो ॥ नृपकुमरी नृपकुमरी कुमर तणे गले जी, नाखे थति नाखे थति प्रेम वि शाल हो ॥स्वा०॥४॥ रुडो वरियो रुडो वरियो सगु एम नाखता जी, वाज्यां तव वाज्यां तव मगल तूर हो ॥ वंदिजन वविजन वोखे विरुदावली जी, २० जयानंद केवलीनो रास चनें कहेवाये ते नहि, एहवा जोगवशी त्यादि ॥क० ॥३॥श्रा नाम व सुख दीये,थादरो श्रीजिनधर्म ॥ दीना पापना फल तुमें,मूको नातिक में॥ क० ॥ ४ ॥ राणी मनावो रूपी तुमें, नोगवो चापर्नु राज्य ॥ श्रीविन धर्म प्रनावथी,सरो सपना रे काज ॥क० ॥ ५॥ नृप सानजी तस बार डो,चिसमां पान्यो समाधि ॥ कहे पुत्रीक्षिपामीने, करणं वचन धारा घि ॥ ॥ ६ ॥ पामी थाणा जरतारनी, बटुनार्या कहे एम ॥ जपसुर री कप ते खस, किं विजयसुदरी केम ॥ ॥ ॥ राय चिंते एस णे किश्यु,ज्ञानीय नारव्यु होय एह ॥अथवा विनय ए सुंदरी,रूपांतरपी से द॥ क० ॥ ७॥ अथवा कमलापासे रहे, सांजली' तस पास ॥ नृपा हे सकटमा दुपडयो,ते न रखाणो रे खास ॥ का ए| तो परजा मुज थी सुखी,केम कहेवाये रे एम ॥ पुस्य सुखीया रे बटु परें, पापें मुन सम नेम ॥ ० ॥ १७ ॥ सा कहे जो एम तो तुमें,पुण्य करो नही केम ॥ पुत्री पीहा जो तुम नहे, तो पूगे वढ प्रेम ॥ क॥ ११ ॥ निमित बों कहे शे सवे, थतीत धनागत वात ॥ पूरे नूप मनशे कदा, पुत्री थाशे मुख शात ॥ क० ॥ १२॥ फरी थामवर बटु कहे, क्लेश न कीजें नूपाल ॥ल गन बनें एम तुम कगु, मलशे ते ततकाल ॥ ॥ १३ ॥ पण श्रम पतीने तुमें,काइ उजखो बो के नाहि ॥ तृप को तुम गुणें उलखु,तुमें अभि का जगमादि ॥ क० ॥ १४ ॥ तव विवाहने अवसरें,जेहा निबर्नु रूप ॥ प्रगट करीने तनो रह्यो, पत्नीमूल स्वरूप ॥ ० ॥ १५ ॥ रूपवती शिरसं दरी, कुरुपी निस्म एद ॥ क्रोधने माने विडंबीयो,दीधी निभने जेद का॥ ॥ १६ ॥ सा कहे दवे मुंज लखो, तव नृप वदन नमाय ॥ उलझु हुँ दु नली परें,बोले एणि परें राय ॥क० ॥१॥ र्बुद्धिमाद शीरोमणि, से देखाई हु मुख ॥ विस्मय खेद चिंता नसो, वली काश्थापक सुख ।। का १७ ॥ विविधरसें नया रायना,प्रणमे सुदरी पाय ।। बोजे सुपरी जे दवे, ते पागल कडेवाय ॥१५॥ चोथे खमें बत्रीसमी, पावि जय कही ढाल ॥ श्रीजयानदना रासमा, मुणतां मगलमाल ॥२०॥ ॥ दोहा ॥ ॥ मम करो खेद महीपति, करो तुमें जे कोप ॥ सुखदायक मुन सा मटो, थ रह्यो थिर योन ॥१॥कोष न जो मुजने करत, तो केम पति चतुर्थ खम २१ हो ॥ कमलप्रन कमलप्रन गौरव बढ़ करे जी, नृपने ये नृपनें ये वस्त्र थलंकार दो ॥ स्वा० ॥ २० ॥ पद्मरथनें पद्मरथने बत्र चामर दीये जी, पामी थाणा पामी थाणा कुमरनी ताम हो ॥ निज सेना निज सेनामा पोहोंचिया जी, हवें कमल दवे कमल मुदरी नाम हो ॥ स्वा० ॥ १ ॥ निज पुत्री निज पुत्री कमलप्रन राजीयो जी, परणावे परणावे करी मनो हार हो ॥ देश थापे देश थापे पराणे कुमरने जी, नवोढाने नवोढाने दोये ते सार हो ॥ स्वा० ॥ २२ ॥ गज घोडा गज घोडा तो लीधा नहीं जी, रहे तृपना रहे नृपना दीधा थावास हो ॥ रतने करी रतने करी दान देतो थकोजी, प्रवपरें पूरवपरें करे विलास हो ॥ स्वा० ॥ २३ ॥ पद्मरथ पण पद्मरथ पण थापे जमाइनें जी, विवाह समय विवाद समय उचित एक देश हो ॥ थापे तस थापे तस पुत्रीने देश ते जी, कमजानें कम लाने मनावे नरेश हो । स्वा० ॥ २३॥ नाश्ये पण नाश्य पण सत्कारी घशु जी,कमलप्रन कमलप्रन कुमर ए दोय दो ॥ पूजीनें पूजीने विदाय क रे दवे जी,सैन्यशुं ते सैन्यच्च ते प्रिया से सोय हो ॥स्वा ॥२५॥ निन न यरें निजनयरें पोदोतो ते लपतिजी, गुरु पासें गुरुपासें सुणी उपदेश हो । चुननावें ननावें धर्म अगीकरे जी,श्रावका श्रावफनां व्रत धरे देश हो। स्वा॥२६॥ चितामणि चितामणि पाम्यो दु मानतोनी, वधादिक बंधादिक पाम्यो जेह दो ॥ ते थापद ते थापद तत्त्वथी सपदा जी, धर्मपाम्या धर्म पाम्याथी माने तेह हो ॥ स्वा० ॥२७॥ रतिप्रीति रतिप्रीतिशुं काम परें रमे जी, दोय नारी दोय नारीशु कुमर विलास दो ॥ मूल थनिधा मूल थनि धा कोइ जाणे नहीं जी,गुणथी कहे गुणथी कहे नाम ते तास हो ।स्वा०॥ ॥ नादानलीला दानलीला धन उकुराश्यीजी,बलरूप बलरूप कलागुण्या म हो ॥ लोक क्षत्री नु लोक क्षत्रीनुं तेज देखी घणुजी,कहे क्षत्र कहे छत्र वै श्रवण ते नाम हो । स्वा० ॥णा बदमित्र बहुमित्र स्नेही थया कुमरनेंनी, जक्तिवतो नक्तिवतो सद्ध परिवार हो ॥ लोक रोजे लोकरीफे देखी एहनीनी, जखमीनें लखमीने पर उपगार दो॥३॥ एम चोथे एम चोये खमें तेत्रीशमी जी,ढाल पूरी ढाल पूरी थइचोथे खम हो ॥ सत्यविजय सत्यविजय पन्यास सवेगीया जी,शान किया ज्ञान क्रिया जास प्रचम हो ॥ स्वा० ॥१॥ तस शिप्य तस शिष्य कपूर विजय कवि जी,क्षमाविजय दमाविजय ते तेदना .

२० जयानंद केवलीनो रास. सगुनें मुख सहुने मुख वाध्या नूर हो ॥ स्वागा ॥धानी कमला भावी कमला राणी ते सुपी जी,विजय सुंदरी विजय सुंदरी प्रणमे पाप हो ॥ मा ताने माताने पै थलिंगती जी, थासु थावे यांसु थावे हर्प पराप हो। स्वाoया जन्म सफलो जन्म सफलो याज यमारढो जी, थया पूरा पता पूरा मनोरथ थान हो ॥ गई थापद गई थापद सुख सपदमली जी,बान सौधों याज सीधां सघलां काज हो ॥स्वा॥१०॥ सासूनें सासूने कुमर नमे वली जी, थाशीप दीये थाशीप दीये वर सास दो। लही कुमर सही मरनी थाणने पुत्री जी,पोहोती ते पोहोती ते निजथावास हो ।स्वा०॥ ॥ ११ ।। सह देखी सदु देखी शीश धूणावतां जी, हवे कमल हवे कमल प्रन राजान हो ॥ ममाव्यो ममाथ्यो उत्सव नयरमा जी, नेट लेवे प्रेट लेवे देवे दान दो ॥ स्वा॥ १२ ॥ खमावी खमावी श्वसुरनें प्रणमतो जी। प्रतिबोधन प्रतिबोधन काज कुमार दो ॥ कहे सेवक कहे सेवक अन्य रा जा तुमें जी, तुमें दाता तुमें दाता थन्य याचनार हो । स्वा० ॥१३॥ फल पुस्यने फल पुरस्य ने पापना एसवे जी,घरलखमी घरलखमी याचक करे शस हो ॥ हृदयें चुमि हृदय बुद्धि शरीरें सौलाग्यता जी,यश दश दिश यक्ष दश दिश बल होय थंश हो ।स्वा०॥१४॥ एह जिनना एह जिनना धर्म, फल थने जी,नीच कुलमा नीच कुलमा जन्म दोनाग्य हो । रोगनिर्धन रोगनिर्धनने कुक्कुटवता जी,वघयपजश वध थपजशनें नहीं ताग हो ॥स्वाए ॥१५॥षणवादला वणवादला सहेजें थावी मले जो, वादालांनो वाहालांनो थाय वियोग दो॥ए पाप ए पाप तणां फल देखजो जी, परा नवनें परानवनें वजी बढ़ शोग दोस्वा॥१६॥ विपुलाशय विपुलाशय सा स्त्रना जाबो जी, सुकुलीना सुकुलीना थतिय विवेक हो ॥ करो सफलो करो सफलो नव जिनधर्मथी जी, इद परनव इह परनव जिनधर्म मेक हो ॥स्वा०॥१॥ पुस्यनां फल पुस्यनां फल पामी तुम सुताजी,तुमें वोतु तुमें दो तु नयणे साक्षात दो ॥ दवे करवी हवे करवा टोल न धर्ममा जी,नृप बोळे नृप बोले सत्य ए वात हो ।स्वा०॥१॥ प्रतिबूयो प्रतिबूजयो तुम वपण थो जी,गुरुपासें करु गुरुपासें बगीकार दो॥मत करजो मत करजो सस य एदमा नी, धन्य तुमनें धन्य तुमनें कहे कुमार हो ॥ स्वा० ॥ १५ ॥ यापदायें थापदायें पए बूफे नहीं जी, उर्जननें उर्जननें कहे बहु वार पचम खंम. २६३ था ॥ एम बावन चैत्यो चौमुखाजी ॥ ३ ॥ एकसो चोवीश जिननाण, एक एक देदरे जाण, था० ॥ घडतालीशनें चोशन सयाजी ॥ ॥ शोल थळे वली नइ, सोहम ईशान जे ३६, था०॥ थड थड तस थय महीपी नाजी ॥ ५ ॥ शोल प्रासाद वली तेह, प्रणमो थाणी नेह, पा० ॥ शो ना तस केती कट्ठजी ॥ ६ ॥ थागममा विस्तार, कहेतां नावे पार,था॥ मान प्रमाण तणो बहुनी ॥४॥ यहा महोत्सव त्यांहि,करशे श्रति उत्सा हि, था० ॥ चैत्रमास ने ते वतीजी ॥ ॥ मालशे सुरना वृंद,तिम विद्या धर इ६, था० ॥ उत्सव महोत्सव बहु थशेजी ॥ ए॥ थाइनु पर्व, वि द्याधर सुपर्व, वा० ॥ शाश्वतु नाणी धाराधशेजी ॥ १०॥ धन्य तेह नर नार, शाश्वतु पर्व ए धार, था ॥ त्रिकरण शुधे धाराधोजी ॥११॥ ते कारण ए लोक, जाये जिनवर क, था० ॥ सांजली कुमर ते चितवेजी ॥ १२॥ क्रीडायें काटु काल, द पण प्रणमुं दयाल था० ॥ घर जश् नारी ने एम कहेजी॥ १३ ॥ वृक्ष नारीशु वोय, चित्त समाधि जेणे होय, था॥ करजो धर्म कथा सदानी॥ १४ ॥ नदीश्वरनी यात्र, करवा निर्मल गात्र, था ॥ विद्याधर सायें जशुजी ॥ १५ ॥ रहेनो तुमें मुखमाहि, तुरत था बुदु थादि, था ॥ साथ जाये जे उतावलोनी ॥ १६ ॥क्ति विनयथी ताम, माने वचन दोय वाम, था०॥ वेशी पन्यकें चालीयोजी ॥१॥ खेचर उचा जाय, कुमर पल्यंक खलाय,या॥जबूछीपनी जगतीयें जी॥ ॥ १७ ॥ जाणे धर्म श्रतराय, कुथर मन खेदाय, था॥ गगनगामिनी वतो जी॥१ए ॥ विद्या जो होय पास, जाउ मन उल्लास, था० ॥ एम चिती पाबो वल्यो जी॥२०॥ एक नगर उद्यान, चैत्य सोवन शुनवान, था ॥ मणिकलशे गगनें बडयुजी॥ २१ ॥ तीर्थ तमघन थाय, आशात ना चित्त लाय, आ॥ तस्यो हेगे धरतीयेंजी॥ २२ ॥ चैत्यमा पेठो ते द, विधिपूर्वक ससनेह, था० ॥ रयणमयो रुपन प्रचुजी॥२३॥ देखी क रे परणाम, स्तवना करे अनिराम, था० ॥ रोम रोम तनु चानसेनी ॥२४॥ पांचमे खेमे दाल,नाखी प्रथम रसालथाना पनविनय पुस्ये करीज॥२५॥ ॥ दोहा ॥ ॥ चैत्य बाहेर चित्त चमकतो, नीकलीयो निरधार ॥,देखे तिहां दृप्टें करी, रूडा राजकुमार ॥१॥ वीणा वश करे वरु, रसिकनें रसनु नाण ॥ , रए जयानंद केवलीनो रास. शिष्य हो । जिनविजय जिन विजय विबुधवर तेदना जी,अत जगा बत जगमा चढतीजगीश दोस्वा॥३॥तस शिष्य तस शिष्य उत्तमविजमान योजी,सिमांत शिरोमणि सिद्धांत शिरोमणि सार हो। तस सेवक तप्त सेवक पनविनय कहेनी, सुणता दोय सुपा होय जयजयकार दोस्वा०॥३॥ ॥ इतिश्रीमउत्तमविनयगणि विनेय पमित पद्मविनय गणिविरचिते श्री श्रीजयानद केवलिचरित्रे प्रारुतप्रवधे गगनगतिपल्यंकवलसकलत्रकमलपुर प्राप्ति कमलप्रननूपपुत्राद्युपकारस्वपुत्रीविजयसुदरीपितृपप्ररथजयपूर्वक तिवोध कमलसुदरीपरिणयन वर्णनोनामा चतुर्थ खम समाप्त । खमत्रए मलिने गाथा॥२१२या चतुर्थखम गाथा ॥६॥ सर्वगाथा ॥३०१ पासंग त्रय वक्तश्लोक ॥४२॥ चतुर्थ उक्तश्लोक ॥१॥सर्वे थइ उक्त श्लोक ॥ ४ ॥ सवइयो एक,समस्या एक,दोदो एक,सर्वढाल ॥१०॥ चतुर्थरखंम सपूर्ण । ॥ अथ ॥ ॥पंचमखम प्रारंन॥ ॥ दोहा॥ ॥ नदीश्वर प्रमुखें नमु, शाश्वतनिन शुज ध्यान ॥ रुपन चानन र घडा, वारिषेण वईमान ॥१॥ पंचम खम प्रेमें करी,प्रोता मुणो सुजाणा श्रागें श्रागें रस धवल, चित्तमा जुन पहिषाण ॥ २ ॥ एकदिन कोठा याना, कीठा करवा काज ॥ मानिनीने निन मित्रो, सघलो ले सान ॥ ॥ वीता तिदा विद्याधरा, मानातीत विमान ॥ देवपरें तिहां देखतो, थाकाशें थसमान ॥ ॥ किदा जाये कोडयो गमे, चित्तमा करे विचार॥ एक विद्याधर बावीयो, वावीमां पीवा वारि ॥५॥ पाणी पाय प्रिया प्रत्ये, तव जइ तिहा कुमार ॥ पूछे तेहनें प्रेम ,कहो ए किश्यो विचार ॥ ६ ॥ कहो नाये के कारणे, एवडा खेचर एह ॥ तेह कहे तुमें सजिलो, नि ए कारण नाय जेह ॥ ७ ॥ ॥ ढाल पहेली ॥ थाने लालनी देशी ॥ ॥ दीप नदीसर नाम,पाठमो ते धनिराम,थाने लाल ॥बावन धौमु खें सोदतो जी ॥ १ ॥ चार दधिमुख सार, एक यजनगिरि पार, आ॥ रतिकर थान मनोहरु जी ॥ २ ॥ एकविशे ए तेर चिटुं विशें नहीं का फेर, पचम खंग रए मरी भागल सद्ध खलीया हो राज || सां० ॥ १७ ॥ ते कुमरोने शोखवा सारु, नृपें धन थाप्यु थति वारू, उपाध्याय थया देदारू दो राजाला॥ ॥ २० ॥ कदे क्षत्रि कुमार शीखावो, उद्यानमा जाइ रखावो, पण लोकने घणु न देखावो दो राज ॥ सां० ॥ २१॥ नेणें उद्याने उपाध्याय, शिखवे में कला णे गय, थन्यास युवान कराय दो राज ॥ सां० ॥२२॥ म हीने महीने नूपाल, परीक्षा करे सुविशाल, कुमरी थागें सट्ठ बाल हो राज || सां॥ २३॥ के शीखता नागा जाय,केश शीखवाने स्थिर थाय, तेणें गत थागत करे नाय दो राज ॥॥ २४ ॥ तुमें पूजी ते में नोखी, काहीं नविकणीम राखी,कुमर पण थाय धनिलारखी हो राज ॥सांग॥२५॥ पल्यंक ठव्यो गुप्त तामें, वज्जादिक थायुक्ष वामें, कौतुक करवाने कामें दो राज ॥ सांग ॥ २६॥श्रौषधीयो वामण रूप, लोकनें होय दास्य सरूप, थलंकारनें वस्त्र थनूप हो राज ॥ सां०॥ २७ ॥ पाठकनें कीध प्रणाम, था शीष दीधी तेणें ताम, पूढे पाठक दवे थाम हो राज ॥सां॥ २७ ॥ खम पांचमे बीजी ढाल, कहीं पद्मविजय सुरसाल, सुणतां दोय मगलमाल हो राज | सो० ॥ ए॥ सर्व गाया ॥६॥ ॥ दोहा॥ ॥ कोण बो थाव्या किहायकी, शे कामें कहो साच ॥ पावक एम थके, वामन वोले वाच ॥ १॥ नयर देश नेपालमा, विजय पत्तन वरना म ॥ कृत्रीय श्रगज दु खरो, वामन कर्म ए वाम ॥ ५॥ कुकुणक नाम क ह्यो मुनें, यौवन पाम्यो जाम ॥ कला नहीं कोई मुज कनें, धन तो तातने धाम ॥ ३ ॥ को न दीये कन्या कदा, वामन रूप विचार, पण तातने त्रि य वति घणो, थाप्या वस्त्र बलकार ॥ ॥ कला ग्रहण कामें चल्यो, था ध्यो फरतो थाहिं ।। नाटघादिक मुजने कला, थापो धरी उत्साहि ॥ ५॥ ॥ ढाल त्रीजी ॥ थारा माथा उपर मेद, जबूके वीजली हो साल ॥ ऊचूके वीजली ए॥देशी। ॥ तेह मुणीने राज कुमर हसता सद्ध हो लाल ॥ कु० ॥ अदो श्रदो थाष्यो नत्र, नाग्य गुरुनु वह हो लाल ॥ना॥ एहनें जणावे नूप, कन्या देशे खरी दो लाल का तेदयी सतोप दान, देशे गुरु घर नरी दो ला ल॥ दे० ॥१॥ कन्या केरु नाग्य, घणु ए वर मल्यो दो लाज ॥१०॥ ए .

- २४ जयानंद केवलीनो रास. फरे अन्यास कला तणो, गीत नृत्य गुण जाण ॥ २ ॥ जाणु गंपर्व मन मन्या जाता थावतो जाण ॥ पूजे कोक पुरुपर्ने,कहो हो किश्युं मंमाण ॥ ढाल वीजी ॥ सत्तर, पापनु थान ॥ ए देशी ।। ॥ कदे पुरुष ते सनिलो वाण, लखमीपुर नयर ते नाण, उपमान न ही कोई ताण हो रान ॥ १ ॥सानलो वयण रसाला ॥ एथोकणी ॥ श्री पतिनामें राय, देखी उकुरा थचरिज थाय, श्रीपति पण लाज नराय हो राज ॥ सां० ॥२॥त्रण कन्या तेहनें थाय, तेहनी जूदी जूदी माय, नरप तिने थावे दाय हो राज ॥सां ॥३॥ स्त्री सर्वनु । परमाणुं, सारता रथी ए घडी जाएं, तेणे सर्व स्त्री साजनु वाणु हो राज ॥सां॥४॥पूर वें पुण्य तु की), तेणें एहनु रूप न सीधु, देवी चितवे दान न दीy दो राज ॥ सांग ॥ ५॥ फरी सहीये मनु अवतार,तप दान दीजें अपार, एहवं रूप लहीयें निरधार हो राज ॥ सा ॥ ६ ॥ विप्र नामकला विलास, कला वेदि धनुत्तर खास, जैनधर्ममा मति के जास हो रान ॥ सा० ॥ ४ ॥ गंनी र घणो गुणवत, धन थापी तस नूकत, नणवा कुमरी दिये खत हो राज ॥ सांग ॥ ७॥ जैनधर्मी मातने तात, नपाध्याय जैन विख्यात,जैनधर्मी छ मरीयो थात दो राज ॥ सां०॥ ए ॥ जणी थोडा दिनमा तेह, ते प्रज्ञा नु मानुं गेह, त्रण रूपें सरसती एव हो राज ॥सांग ॥ १० ॥ पहेली ना टघकलानी धार, नृप नाम दीये श्रीकार, नाट्यसुंदरी जगमा सार दो राज ॥ सां० ॥ ११ ॥ नाटकथी जीते कोय, वली जैनधर्म जग होय, वरु करी य प्रतिज्ञा सोय दो राज ॥ सां० ॥ १२॥ बीजी गीत कलायें रुडी, गी तर्सदरीनाम न कूडी, तस एद प्रतिझा मी हो राज ॥ सा ॥ १३ ॥ जैनगीत कला मुज जीतें, वरु तेदने जग वधीते, करी एह प्रतिज्ञा नीतें हो राम ॥ सा ॥ १४ ॥ नृप नादसुंदरी दीये नाम, त्रीजीनु थति अनि राम, तेतो वीणा नाव गुणधाम दो राज ॥ सा ॥ १५॥ मुज नाव क लायें जीपे, वली जैनधर्मी अति दीपे, वरु एह प्रतिज्ञा समीपें हो राम ॥ स० ॥ १६ ॥ नृप पडद वजावे ताम, मुज कन्या प्रतिज्ञा घाम, ए वात विस्तरी गम गम हो राज सां॥१॥ निज परराज्य दूत मूके, वा त सनलावे नवि चूके, मुणी ते पण बाथी दूके हो राज ॥ तां ॥ ॥१७॥ सद्गु क्षत्री कुमर ते मलीया, मन गमता घमासमा नलीया, , , पंचम खंम रएस एद सीपारश माहारी, करो तुमें वेगर्छ हो लाल ॥०॥ सा पण दान वशीकृत, वे थतिरेगा हो लाल के ॥ २० ॥१०॥ कहे मुजपति ने तव,निज थानक गयो हो लाल के॥नि॥ नाहे से घर दास, दासो परिवृत्त नयो हो साल ॥ दा० ॥ जिनपूजादिक रक्त,थावे पाठक कने हो लाल ॥ था॥ पाठकनें कहे नारी, मुणो तुमें एक मनें हो साल ॥९॥ ॥ ११ ॥ जेहतु थचुत दान,नणावो वामणो हो लाल ॥ न० ॥ एहवो नही दानेसरी, जन मन कामणो दो लाल के ज॥ सदु मली थापे तो पण, इण समोवड नहीं हो लाल के ॥ ३० ॥ बहु मूकी तुमें एक, नगा वो रही थही दो लाल ॥ ज०॥ १२॥ पाठक कहे नवि जगमा,ककए ए हतु दो साल के ॥ क ॥ पूर्वं दोधु मुजनें, ए पण तेहबु दो लाल के ॥ ॥ ए॥ थाप्युं नारीने ते पण, पहरे दोय करें हो लाल के ॥पणा निज यातमने माने, अप्सरा उपरें हो लाल के ॥थ ॥ १३ ॥ पाठक कदे हुनणावीश, एहने यन्नथी हो लाल के ए॥ पण नवि समजे काइ, बढ़ प्रयत्नथी दो लाल ॥ व०॥ सा कहे श्रग लालित्यनें, स्वर वली जोश्य हो लाल के ॥ स्वणा नाटक गीत थावे तव, सद्गु मन मोहियें दो साल के स०॥ १४ ॥ वीणानो अन्यास, करावो केम नहीं हो लाल ॥७॥ पाठक फदे त्रणे नग, वात वेगें वही हो लाल ॥ वा ॥ तंति उर्बल जूनु तुबडु, होशे सा कहे दो साल के॥ दो॥ सडीयो दम होये ते, केणी परे नि वहे दो साल के ॥ के० ॥१५॥ नविन वीणा देव एम कदी, एकांत रही दो साल के ॥ए ॥ गोखवे तेहनें बात्र, हांसी चित्तमा लदी दो लाल ॥ हां ॥ याव्यो परीक्षा समय, दवे सह थावीया दो लाल ॥६० ॥ राय परिवट नगरना, लोक ते नावीयां हो लाल के ॥ सो०॥ १६॥ यावे पाठक तात्र, सगुन परवरी हो लाल । सा तव वामण कहे वात, सुणे एक मुज खरी हो लाल ।। सु०॥ श्रावु तुमची साथ, पासें वेसाडजो दो साल ॥ पा० ॥ नाटघादिक यवसरें मुज, मत वीसारजो दो साल के । म० ॥ १७ ॥ पाठक कहे तुज पास, वे लाजु घणो हो लाल ।। वे ॥ थाण करु केम नहीं, थन्यास कला तो दो साल ॥१०॥ कोडी मूल्य नो हार, पाठकनें थापियो दो साल पा० ॥ तव मान्यु सवि तेद, दर्प बहु व्यापीयो दो लाल ॥ ह० ॥ १७॥ मन चिंते सवि नवा. एदव न ॥

रए
जयानंद केवलीनो रास
हबु रुपन विश्वमा,तेणे सहजय टख्यो हो सात गते०॥ सानती मात्रा
वयण,गुरु ताज्यो घणु हो लाल || गु०॥ गुरु कहे पाठ कला नहीं,तब
योग्यतापणु हो लाल केतु॥शा करयी उतारी करुण,पाठकने दीये हो सा
ल के पा॥ लाख सवानु देखी,ते गुरु हररख्या दइये हो लाल तिकी
खवे नाट्यकला गुरु तेहने धादरें दो लाल के पते पण ते कुनार परें,
मृत्तिकामईन करे हो नाल ॥ मृत्तिः ॥३॥ पवधातें कपावे, पृथिवी :
घले दो साल के ॥ ॥ कडक परें वली गिरि, शिला परें खललखे हो
लाल ॥ शि० ॥ पदना करे धवकार, तेणें जन सह हसे हो लाल ॥ ते॥
शीखवतां दिन दोय, त्रण एम नीकसे हो लाल ॥त्र०॥ ४ ॥ खेद लड़ी
गुरु कहे तुज, नाटय न धावडे हो लाल के ॥ ना ॥ जण तु गीत करे
तव, ते मुज धावडे हो लाल के पते॥ गुरु कहे तुननें केह, थावडे तर
कहे दो लाल के या॥ विस्त मुख ध्वनि करी कहे, जिम हास्यता लरे
हो लाल के ॥ जि ॥ ५ ॥ यत ॥ पच नियमा सुरइ पविता, कविस्त हि
हा, त सनिविता ॥ पंमिथ कविहानग्गं एगस्स सीस, अघो दसती किल
तीह सेसा ॥१॥ पूर्वढाल ॥ सानली गीतने बात्र,सद्गु खडखड हसे हो लाल
॥स०॥ अहो थहो गीतनें गाननु, मादापण चितवसे हो लाल मारा एणे
गीते नृप कुमरी, परणशे एदने हो लाल ॥ ५० ॥ श्रधिक लस्यानु काम,
ते जेहन हो लास के । ते ॥ ६ ॥ तो पण अधिक दानथी,पाठक
हरखता दो साल के ॥पा ॥ याम रागादिक याथी, तेदने वरखता हो
लाल के ॥ ते ॥ पण नवि समजे कांइ, घणे यमे करी हो लाल ॥१०॥
खेद लही क्षण षट दिने गुरु कहे हितधरी दो लाल गुणा वीण कला
तुम शीखवु, ल्यो वीणा करें दो लाल के ॥ व्यो॥ एम करी शीखवे
वीण, कला गुरु शुनपरें दो लाल ॥ क० ॥ ततक्षण त्रूटी तोत, बीजी
वीणा दीये दो लाल ॥बी॥ नारख्यु तुबहु नांजी, तदा त्रीजी लोये हो ला
त ॥ त॥ ७ ॥ दम नांज्योत्रीजी वार,गुरु तव ख घरे दो लाल ॥१०
तुजने न थावडे काइ, वीसज्यों ततपरें हो लाल ॥ वी॥ चामो कलागु
रु गेद, पाठकणीने मल्यो दो लाल ॥ पा॥ कफण थापा अन्य, हेजें ते
दशु हट्यो हो लाल ॥ हे ॥ ॥ पामी विस्मय ताम, श्वे कारण किराएं
दो लाल ॥ पू० ॥ते कहे तुजपति मुक, नणावे नेहरुं हो जाल ॥७॥

पंचम खंम रए नाटयसुंदरी, नाचवाने काम ए॥ चित्त दरती विश्वनां तिहां, जाणना मद गालती॥ नाटक विविध प्रकार करती, कुमर दोप देखावती ॥ ६ ॥ढाल॥ नासा अधरने रे, नयन तारा पयोधर वली ॥ चलावती रें, तेमन कपो लने सलसली॥ देखी विपरीत रे,कपोल नयन तारा नग ए॥ वामन तव रे, वारे तुमुल नहरंग रे ॥ ७ ॥ त्रुटक ॥ बोले वामन मुणो सुंदरी, प्रथम शास्त्र रीतें कस्यु,पढ़ी तो विपरीत कीधु,नयन तारा जग धस्सु ॥ एदवो नाव शास्त्र कह्यो , तव चमकी कहे सा सुणो ॥ नरतशास्त्रे विधि को , एदमा दोप न को गणो ॥ ७ ॥ ढाल ॥ कहे वामन रे, मत कहो एहवी वात रे ॥ कठे मादरे रे, जरतशास्त्र थायात रे ॥ मुनि नरतें रे, नवि नाख्यो ए नाव रे ॥ तेदना श्लोक रे वामन बोल्यो ताव रे ॥ ए॥ त्रुटक ॥ तव कहे सुंदरी 'नोति थ दशे, वामन कदे होये नहीं ॥ भ्रांति सूक्ष्म विज्ञानमाहे,पण जाणु एण विध सही । परीक्षार्थे कस्यु एणी परें, पण सनामा मृग वसे ॥ नहीं सूदम विज्ञान ज्ञाता, जे देखी हैहु इसे ॥१०॥ढाल॥ लोक नांखे रे,गुरु धनुग्रह एहनें थडे, नाटघसुंदरी रे, दोप निदाली निज पडे ॥ करे नाटक रे,नमा धरी फल रे ॥ नपर नाचती रे, वात घणी थमूल रे ॥ ११ ॥ त्रुटक ॥ कला करीने सर्व जीत्या, जय जय रव तव उम्मल्यो, वर चिंतातुर नूप बोले, उपाध्यायजी सनिलो ॥ परीक्षा विण कोइ तुमचो,बात्र के नहीं हवे ॥ हवे दानप्रीणित कदे पातक,एद वा मन सनवे ॥ १२ ॥ ढाल ॥ नूप चिंतवे रे, वामनमा नवि सनवे ॥कदी सनवे रे, मत जीतो कोई कैत । मुज पुत्री रे, वामनने वरशे कदा, 5 ख थाशे रे, मुल मनमर्माहे बहु तदा ॥ १३ ॥ त्रुटक ॥ तोदे सदेह टालवाने, वामन थाणा करी ॥ नाटयकला जो नाणतो होये, तो वो चित्ता धरी ॥ बुढक्षितने जेम परमान्ने, निमत्रणा को करे ॥ वामन नाटक क रण छन्, दर्प हैयडे अति धरे ॥ १३ ॥ ढाल ॥ कला सघली रे, करी दवे शी करतो कला ॥ नथी मृतिका रे, खुदशे एम चिंतवे खला ॥ हाती करतां रे,केश्क नाखे एणी परें ॥ बो नाचतो रे,शाने निपेघो परपरें ॥१५॥ ॥ त्रुटक ॥ हास्य थाशे लोकनें घशु, वगोवाशे ए खरो ॥ ते मुणी चामन सतु तवेखी, नाटघ करवा तत्परो ॥ पंच परमेष्टी नमीने, गायन वादक मानवी ॥ परीक्षा करी सङ करतो, कला करवा थनिनवी ॥ १६ ॥ दा रएन जयानंद केवलीनो रास. पामीपो हो साल के ॥ ए०॥ ते एपणे एक पलकमी, मुजने धामीयो हो लाल के ॥ मु०॥ ए यावर्य सहित गुरु वामन लेने हो लाल है। वा० ॥ वेता परीक्षा मम. थाशीष देइने हो लाल के ॥ था० ॥१२॥ नूपना कुवर सवे राज, वर्गीय श्रावीया हो लाल के ॥10॥ निज निज परिठद लेई, कन्या चित्त नावीया हो लाल कण ॥ वारे तव कोलाहल, नृप थाणा लदी हो लाल के ॥ नृ०॥ कहे प्रतिहार सुणो सना, लोक थाव्या थहीं दो साल के लो॥ २०॥ नाट्यकला निज दाखवी, जीते जे कुथरी हो लाल ॥ जी० ॥ तेहन परणे नृपनी, ए नाटयसुदरी हो साल के ॥ ए० ॥ पंचमे खमें ढाल, त्रीजी ए मन वसी दो साल ॥त्री०॥ पद्मविजय कहे सजिलो, नविजन चनसी दो साल के ॥ न ॥ ११ ॥ ॥ दोहा ॥ ॥ सामग्री सवि साथ सइ, थव्या कुमर थनेक ॥ एक एकथी अधिक रस, विज्ञानी सुविवेक ॥ १ ॥ नाचे नव नव नाता, कौतुककारी केम ॥ वरणवीयें वयरों करी, पण कहुँ काइक प्रेम ॥ २ ॥ ॥ ढाल चोथ ॥ एकवीशानी देशी ।। ॥ढाला। एक नाचे रे, धनुप पण उपर रही। एक नाचे रे, खड्ग धारा सपर सही। कोश वाणायें रे,कोइ नानाय जाणी ॥ हवे कोइक रे, जज नानन शिर थापीयें ॥ १ ॥त्रुटक ॥ वाणी जलने दाय गोलक, चलावे तेम पगथकी चक्र माहे नाच करतो, दस्तादिकं सद्ध रह्या चकी को इफ करने दत माहे, खड़त्रण ग्रही करी, किरणें करीने भ्रमण करतो, थनातपरें चित्तमा धरी॥ २ ॥ ढाल ॥ कोई अधोमुख रे, कर्ध्वपादें मुश लो घरे ॥ रमतां तिहां रे,गोल नचावे निज करें। निज मस्तके रे, नाटक फरतो एणीपरें ॥ खड़ नमाडे रे, कोश्क मेली दोय करें ॥ २ ॥ त्रुटक ॥ वली पादांगुलें चक्र फेरवे, शिर घरी जल नाजन ॥ बिड खंध उपर दीपि का धरी, नानी सुंगल वादन ॥ मणि व्रात जीव्हा परोवे, करे नाटक एणीपरें,राय प्रमुख सनु लोक देखी,शिर धूणी शसा करे ॥धाडाला। दस्त कादिके रे,नाटघसुंदरी विपर्यास रे॥ देखावे रे,दूषण तेहमा तास रे ॥ या मन पण रे,मुख मरडे करे हास्य रे ॥ रूहु कीधु रे,तुम सम कोण करे स्वा स रे ॥५॥ त्रुटक ॥ दवे सुवर वेष धरीने, नूप वाण पामी ए॥ सामग्री पंचम खंम ३०१ मंदादिनेदत ॥ तस्यारिखकसस्पर्श, वशेनोत्पद्यते किल ॥२॥ एव वेरोपि वीणाया, नालवस्तु वर्जनात् ॥ शत्यादीनां तथा तुब, दिवृत्तादिकैर्गु हैं ॥३॥ तत्रीबितिस्नायु, वालाद्युवित्ततत्कृते ॥ इत्यादि वेणुसारगी, त्रिसर्यादिष्वपीष्यते ॥ ४ ॥दोहा॥ इत्यादिक शास्त्रे थति,विस्तर जे व्याख्या न ॥ केतु कहिये शहां कहो, गांधर्वनु सुणो गान ॥ ए ॥ नहीं उर्वल थूजज नहीं, गल मुख रोग न होय ॥ यौवन मुदित निरुज वली,कहियें गायन को य॥१०॥ तिल कलमापने तेल गुड, खाय नहीं वली खाय ।। साकर दू ध सगत पिये, गदगदी तेदज गाय ॥ ११ ॥ सात प्रकारे स्वर वली, त्र ण ग्राम वली तह ॥ ग्रामें ग्रामें सग गणो॥ एकवीश मूर्चना एक ॥१२॥ साते षटरागें सदित, एम वेंतालीश एह ॥ श्रीरागादिक पट सवे, रागिणी षट्क करेह ॥ १३ ॥ पट्रागिनी पटत्रीश होय,रागिणी रग मकार ॥ जेद घणा तेहमा जलो,थनिनव होय विचार ॥ १४ ॥ यनुक्रमें हु नणियो भ बु, काळं ते कहेवाय ॥ प्रायें निदा स्तुतिपणे, गीत सकल गवराय ॥१५॥ ॥ ढाल पांचमी ॥ राग सारग॥ हम मगन नए प्रनुध्यानमा ॥ ए देशी ॥ । सहु मगन जए तस गानमा,सलन मुख निदा नवि होवे, च कहि ये ते मानमां ॥ स्तुति पण विविध बता थबता गुण,ते सुजो सट्ठ शान मां ॥ सद्गु ॥ १ ॥ विवाहादिक कारणें अबता,गुण गाये थनिमानमा ॥ ते पण मरपादोपथी सजान, नवि नाखे निज वाणिमा ॥ सदु० ॥ २ ॥ अबता गुण केइ विविधप्रकारे, गावे देव घझानमा ॥ केशक श्रगना धरे उ स्सगें, के धरे शस्त्र पाणिमा ॥ स० ॥३॥ केती वात कठ्ठ अज्ञानकी, ह टिरागना तानमां ॥ बुधजन अगीकरे नहीं कोई, सम्यक् दृष्टिनानास॥ ॥४॥थरिदंत शासनमा जे नीरागी,जेद बता असमानमते गुण्थी पावन जीहा करु, सानलो तुमें सदु कानमा ॥ स ॥ ५ ॥ दोप थढार रहित जे देवा, गुरु निस्प्ट रह्या ध्यानमां ॥ एम कही सगुनी हासीय वगुणी, निज सम पुरुप ले ताना ॥ स ॥ ६ ॥ वामन गीत गाये ह वे एहवां, थधिक सुधारस पाना ॥ हाहा हूहू देव गायन जे, श्रोताने करे थपमानमा ॥ स ॥ ७ ॥ एक ध्याने सवि लीन थक्ने, श्रोता रहे ते णे टाणमा । उत्कृष्टे रसें गान थयु तब, निलही अचानमा स॥७॥ नूप प्रमुखना शस्त्र बलरुति, लेई मुक्या कोड थानमः ॥ वली होतीका .

२०० जयानंद केवलीनो रास. ल ॥ सामग्री युत रे, विश्वमोहन नाटक करे ॥ वल ताकता रे, मा थनेक परें परें ॥ पण दुपण रे, हस्तकादिकमा नविलहे ॥ एक विरे, जोवे सना चित्न गहगहे ॥ १७ ॥ त्रुटक ॥ करी नाटक वली नाला, पूज अपर सूची धरी । तेह उपर कुसुम उपर, नाचतो रंगें करी ॥ वामेतर का दश किरण दिये, थोखे फूल लीये तदा । ह वोले सद्ध सना तिहां, जी त्यो जीत्यो एसदा ॥१॥ढाल॥ जय जय रव रे, वाजिब नाद बहु थया । वंदि बोले रे, गायन गीत तत्पर नया ॥ थाने रे, दान दीये बटलक पणे॥ नाटचसुदरी रे, रीजी सही कौतुक घणे ॥१॥ त्रुटक ॥ नाटप सुंदरी वरे वामन, देव कहे साधु वस्तु ।। नप चितवे खेद धरौने, है है देव अवलु कसु ॥ एणे वामन वस्रो हवे वोय,रानकुमरने जो वरे ॥ प्रतिहारने हवे तुमुल रोकी, एणी परें थाझा करे ॥ २० ॥ ढाल ॥ नूप पाणची रे, कुमारोने एणी परें उच्चरे ॥ गीतसुदरी रे, एह कलामा सद्ध धुरें॥ जेर जीते रे, कर ग्रहण एहनु करे ।। गीतकुशला रे, सानली जैनधर्मी शिरें ॥ ५१ ॥त्रुटक ॥ सांगली जिन सामयी सयुत,गावे यतिह करी ॥ चोषी ढाल ए खेम पचम, पद्मविनये चित्त धरी ॥ नखी जे जे रसें गावे, तन्म यता सघला यया॥ जाण पुरुष ते गीत लीना,जख तृषादिक गत नया ५२ ॥ दोहा ॥ ॥ चडते रस ते चतुर नर,गातां विरम्या गीत ॥ निजपुत्रीने नरपति, प्रे रे धरतो प्रीत ॥ १॥ गीतसुदरी हवे गायतां, मनुज थया रसमग्न ॥ नि ा पाम्या नर सवे,थतिमूर्थाित जेम थज्ञ॥२॥ संकेतित वासी सवे, या मुझ प्रमुख थपार ।। नूपाविकना नली परें, बेइ गोपवे लगार ॥३॥ गार रही गीतसुदरी, तव ते जाग्या ताम ॥ खड़ादिक खोले स्वरा, मन जाणे गइमाम ॥ ४ ॥ मान देने मानिनी, थापे संघला थाण ॥ जय जयरव जीत्या तणो, प्रगटघो जग परमाण ॥ ५ ॥ पूजे जूप पाठक प्रत्ये, वर नदि पामी वाम ॥ वरमाला वामणो, देखाइयो दाम ॥ ६॥ यामनने नरपति वदे, गाइजाणे गीत ॥ तास स्वरूप कहो तुमें, राखी सस्वरी रीत ॥ ४॥ गुरुप्रसादें गीतनु, सखरूं लट्ठ स्वरूप ॥ स तुमने सधे, नाखु मुजो नूप ॥ ७ ॥तथादि श्लोक ॥ गांधर्व त्रिसमुडान, त्रीवे पुनरोद्रव ॥बी णात्रितरिका सार, म्यायातंत्र्यात्वनेकधा ॥ १॥ रागोवजृनमाणोनु, हदि पंचम खंग २०३ कन्या जीती एम जय जय रव, लोकें कस्यो स्वयमेव ॥ तु० ॥ ६ ॥ खेदल होने राजा पूजे, उपाध्यायनें जाम ॥ प्रव परें वामन देखाडे, उपाध्याय पण ताम ॥ तु०॥ ॥ वामन दोय मालायें रमणिक,मनो धागल थाय ॥ वीणा वजाववा वामनने तव, नूपति थाणा थाय ॥॥ तु० ॥ ७ ॥ तव वा मन तिहां वीणा मागे, रायपुरुप तव एक ॥ वीणा थापे नूपवयणथी, वामन कहे सुविवेक ॥ तु ॥ ए॥ वीणादमाहे के कीडो, पाम्यो कौतुक जप ॥ नांगीने ते कीट देखाव्यो, सदयें दीठो थनूप ॥ तु० ॥ १० ॥ बीजी वीणा थापी तेदन, तुबहु कडुनं नांखे ॥ ते पण नागी तास देखाव्यु,प्रत्य च जाणी साखें । तु० ॥ ११ ॥ त्रीजी वीणा तांत मांदे, सूक्ष्म दे खो वाल ॥ चोथीनो दम जलमा नीनो,तेह रह्यो घणो काल तु॥१॥ एम अनेक दूपवी वीणा, लीधी कोश्क सार ॥ थलवे वीण वनावे वामन, लोक लहे चमत्कार ॥ तु० ॥१३॥ कानें अमृत ए वरइयु,अथवा मूक्यो ॥ एथिवी लोकनें सुख देवानें,ए तप महिमावृद ॥ तु०॥ १३ ॥ लय थाणदें सुख थपैतें, नि पाम्यो लोक ॥ पूर्व सकेतित महावत गजने, म दिरा पाई वोक ॥ तु० ॥ १५ ॥ कान बांधीन हाथी मूक्यो, थाव्यो सना थासन्न ॥ पण थाव्यो नवि जास्यो कोयें,उनो रह्यो चासन्न ॥तु॥१६॥ श्रकशने प्रहार पडे पण, नवि चाले मंगमात ॥ घात देश देने थाका, तव माहावतना बात ॥ तु० ॥ १७ ॥ जय जय शद करे तव महावत, सो पण तव कीध ॥ वीणा नाद रह्यो तव सुदरी, वरमाला गले दीध ॥ ॥ तु० ॥१॥ नादसुदरी एम विचारे, जीताणी दु याज ॥ फूलष्टि देवी शिर करती, जय जय वामनराज ॥ तु०॥ १८ ॥ दान दीये याचकनें वांवित, लोक वखाणे दान ॥ थदो कलाने श्रदो चतुराई, वामन गुण नि धान ॥ तु० ॥ २० ॥ गुणवतो एहवो में रूपें,वामन ए दोप ॥ विधिने नराजीतानो ए, दोप तो थयो पोप ॥तु॥१॥यत ॥ शशिनि खल्लु कलक कटका पद्मनाले, प्रिययुवतिवियोगोउर्नगत्व मुरूपे ॥ जलधिनल मपेयं पंमिते निर्धनत्व,धनवति रुपणत्व रत्नदोपी कृतांत ॥२॥ पूर्वढाल । अथवा वामन रूपें कोक, दीसे दिव्य सरूप ॥ वादलथी जेम बायो दी से, अद्भुत जिम दिन नूप ॥ तु० ॥ ॥ वामनमा एहवा गुण न धरे, विधि जिम थमृत सार ॥ काचा कुनमाहे जिम न धरे,जाए पुरुप निरधा ០១ जयानंद केवलीनो रास. रक नर मस्तक,मूझे जे पंच प्रधानमः ॥ स० ।। ॥ वेद रसांतर नहीं हज रस, कोइ न जाणे तेणे करी ॥ गाई रह्यो तव चमतकार लही,बोलो जीत्यो कहे फरी फरी ।। स० ॥१०॥ सदु मगन 25 कहे चित्त धरीए पाकणी ॥ जय वानित्र पाज्यां जय जय रव थयो,वामनें मुज कला हरी । एम चिती वरमाला नाखे, चामन गले गीतसुदरी॥ स०॥ ११ ॥ नृप कुलदेवी बहु परशस्यो, बिहु शिर पुप्पष्टि नरी ॥ निज शिर मुमित रे खो लाज्या, नाशी गया हाती खरी । स० ।। १२॥ थायुर वस्त्र चालक ति थापे,दासीयोधन श्रादरी ॥ दासीयो पण वामन प्रशसे,थमने पण ए णें तरी ॥स० ॥ १३ ॥ नृप चिते दलका मुज थर, वेद पुत्री वामन र ॥हरखु जो कोइ राज्यकुमर वरे, जीतीने नाद सुदरी । स० ॥१४॥ एम विचारी उद्घोपणा करे, वामने वरी टोय कुमरी ॥ जीते कोइ कुमर नाद मुदरी, सहुमा थथग्रेसरी ॥स॥१५॥पचम खमें पचमी दालें, पय विजय उत्तम चरी ॥ श्रीजयानदना रासमा नास्यु, बागल सुणो श्रोता वरी। स० ॥१६॥ सर्व गाथा ॥ १५ ॥ ॥ दोहा ॥ ॥ वामने थमने लाजव्या,एम मनथाणी खेद ॥ नूप तथा कुमर नला, यधिको धरत उमेद ॥ १॥ नाना राग निपजावता,तेदने नादें तेह ॥ प रिहरी सर्व व्यापारने, सना थया ससनेद ॥ ॥ ॥ ढाल ही ॥ तुम तो न बिराजोजी ॥ सिहाचलके ॥ ॥ वासी सादेष,नले बिराजोजी ॥ ए देशी॥ ॥ तुमें तो जोजो जोजो रे,वीणाने बनावे ॥ तुमें तो॥ सद्धये अनुक्रमें तेह बनावे, सानले सद्ध लय जाय ॥ एक एकथी चढीयाती वाजे, चित्र परें अनाय ।। तु ॥ १॥ निस्तिनी परें सहुये धूमे, कोश्क बजावे ताम॥ उत्कृष्ठे रसें तेह कला थई, कुमर तणे परिणाम तु॥२॥ पूर्वसकेतित महा वत महागज,मूके बूटो जाम ॥ गकारव करतो ते यावे,नागसना तेणें ठा म ॥ तु० ॥३॥ नावना रसथी वादाखं सहुनें, नीवित यतिसम दोय ॥ नादसुवरीने दवे थाणा, नरपति थापे सोय ॥ तु॥॥वीण वजावे ना दसुदरी, कानें थमृत समान ॥ गज थनाणो सना लोक पण, चनाणा ग ईशान ॥ तु० ॥ ५॥ विरम्यो नाव तदा तिहां महावत,गज खेंचे ततखेव ॥

पचम खम
श्य
एवं एम || समकालें कला दाखवी हो नाई, कन्या लीधीत्रण नेम रे,
मुणो मोरा नाई वा॥२॥ फोकट पाउनो श्रम कखो दो नाइ,जो जाणता
ए वात ॥ तो धागलथी मारता हो नाई, तो उपव नवि थात रे ॥ सु॥
॥३॥ दजीय गयुं कांही नथी हो नाइ, ए निराश्रय ले एक ॥ कन्या लीये
ते न खमी शकु हो नाइ, मारी धरो मन टेक रे ॥ मु०॥ ४ ॥ कुल
शीन को जाणे नहीं हो नाइ, कन्या लीये कुरूप ।। हांसी पामीय पंच
मां हो ना, करशे एह नूप रे ॥ सु॥ ५॥ माया अपराधी एहनें हो
नाइ, मारता नवि दोप ॥ मारतां देखी मूकशे हो नाइ,वरमाला करी शोप
रे ॥ सु॥ ६ ॥ करिय विचार थाणा लइ हो नाइ, शूरपाल एक राय ॥
मुख्य कहे वामन प्रत्ये
नाइ, सांजल तु हितदाय रे ॥ सु० ॥ ॥
सहाध्याय
ने श्रम तणो दो ना, तेणे कहिये हित वात ॥ नाटक तो ले
सोदिलु हो नाइ, मर्कट मोर विख्यात रे ॥ १० ॥ ७॥ कोकिल चांमाला
दिक घणु हो नाइ, गाय मनोहर गीत ॥ वीण ताल वजावता हो नाइ,
एतो सर्व प्रतीत रे ॥ मु०॥ ए ॥ पण राय कन्या नवि वरे दो नाइ, तेम
तुं पण नहीं योग्य ॥ सुवर्ण घटा नवि सोहिये हो नाइ, खरका सयोग रे ॥
मु०॥ १०॥ वीर नोजन नवि श्वानने हो नाइ, उटगले मणिहार ॥ तेम
तुजने राजकन्यका दो नाइनवि सोहे किरतार रे ॥ सु॥॥११॥ माला
मूक
ते कारणें हो जाइ, वर तुज योग्य जे नार ।। नाटकिया परें कला क
री हो जाइ,जीव तु एवं ससार रे ॥ सु०॥ १२॥ थन्यथा तुज मरवु य
शे हो जाई, जाणे तु सवि तेद ॥ तव कोधे वामन कहे हो नाई, सनिलो
हु कटु जेद रे ॥ १०॥ १३ ॥ नाग्य कला नहीं तुम्हमा दो नाई, हजी
थ न जाणो केम ॥ कलावादे नकारा कस्या हो नाई, रणजीवित क्षेत्र ते
म रे ।। सु० ॥ १४ ॥ मुज नारी जेह निरखशे हो नाई, तस जोशे जमराय
॥ शूरपाल कहे वामणा हो जाई, जो होंशे रण कराय रे ॥ १०॥१५॥
तो ले शस्त्र तु हाथमा होनाई,वामन बोले ताम ॥ सुर थसुरपति जे होवे
हो नाई, प्राधा थावो थाम रे ॥ सु० ॥१६॥ शस्त्र परिश्रम तुमें कस्यो हो
जाई, मुज जीतने काज ॥ पण चपेटो मुज दाधनो हो नाई, नवि खमी
शके सुररान रे । मु॥ १७ ॥ तो तुम शशला कपरे हो नाई, शस्त्र तणु यं
काम ।। ऐरावत शुढापरें हो जाई, मुन कर शस्त्रने गम रे ॥ १० ॥१७॥

३०४ जयान केवलीनो रास. र ॥ तु० ॥२२ ॥ कन्यानी एधिक प्रतिहाधिक विधिनिषित काम पनि मुजने जेणे श्राणा दोघी, धिग् ए कुमर निकाम ॥ तु॥ २४ ॥ न्या रूप थनोपम, वाहाली जीवन प्राण ॥ देवयकी वाम ए वरियो,जो कमांद दुइ हाण ॥ तु० ॥ २५ ॥ कांइ थयुं में काम चितव्यु उनपे कोड देव ॥ देव प्रमाणे थात्मपरिणति, चाले जेह सदैव ।। तु० ॥ २६ त ॥ प्रारब्धमन्यथा कार्य,मिद निव्यूंढमन्यया ॥ इद जातमसनाथ, देव को लघितु म ॥१॥थनह चित्तियमाण,उदय पउंगेण धनहा जापं । चितोदय विवरीप, तम्हा नो चिंतए मुणिदा ॥शाथवश्यनावेह्यऽनवमदम हा ,पया दिशा धावति वेधस स्टहा। तृणेन वात्येव तयानुगम्यते,जनस्य धि तेन नृशा वशात्मता ॥३॥ यन्मनोरथगतेरगोचरो,यत् स्टगति न गिर क वेरपि ॥ स्वप्नवृत्तिरपि यत्र उनना,हेलयैव विदधाति तदिधि ॥४॥ पूर्वढाल । एम चितातुर राजा पूठे,कला गुरुने एम ॥ देश जाति कुल एहनी जातो, नाणो यथारथ जेम ॥ तु० ॥ २७ ॥ पंचम खमें बही ढालें, श्रीजयानदनें रास ॥ पद्मविजय कहे सुणता होवे,घर घर सील विलास ॥ तु॥१७॥ ॥ दोहा॥ ॥ मास मातेरो मुज कनें,याव्याने थयो थाज ॥ पूघु गुरु कहे में प्र थम,कोणतु थायो शे कान ॥१॥ विपय नेपाल विनयपुर, क्षत्रीपुत्र हु खांत ॥ कला शीखवा कारणे, थायो एकांत ॥२॥ अधिक स्वरूप न एदनु, जाणे को मुजाण ॥ दिव्य बलकरणादिकें,दाने धनद प्रमाणा३॥ फला प्रयत्न घणुं करी, शीखवियो साक्षात् ॥ अमनें मूर्खपणु थति,एटला दिन थारख्यात ॥ ४ ॥ दमण तो एणे होशथी, कला देखाची कोय ॥जे देखीने सद्ध जना, चमत्कार चित्त होय ॥५॥अलख वरूप ए उलखो, गुरु कहे एदनुं गूढ ॥ चतुर दोय ते चिंत्तवे, मानवी न लहे मूढ ॥ ६ ॥ वाणी सुणी विकल्प करे, नरपति चित्त अनेक ॥ वैरी परें ए वामणो, श्रमनें थयो शतिरेक ॥७॥सर्वगाया ॥ १२ ॥ ॥ ढाल सातमी ॥ जिनवचनें वैरागीयो हो धन्ना ॥ ए देशी॥ । राजकुमर इवे चिंतवे दो नाई,सघला मतीलही खेद ॥वामणेशा पण विगोविया दो नाई, कोचो नाकनो छेद रे, सुणो मोरा नाई ॥ १ ॥ वामणे वगीया वे ॥ ए श्राकण॥ मूर्खपणु देखावीपु हो ना धागलपी पंचम खंम २०७ गयुं सवि नाजी ॥ सहुनें प्राण पोतानां वादाला,कोइ न उतघो गाजी के । था० ॥ १२ ॥ श्रीपति राजानो सेनानी,सेना नागी जाण ॥ राय थाणा थी शस्त्र जरीने, रथ लाव्यो तिहां ताणी के ॥ था ॥ १३ ॥ तेहनें उa में वली उनघा, निज निज सेना ले ॥ क्रोघे चडिया चम्पालादिक, युद्ध करण थाध्या केश के ॥ था०॥ १॥ न नमाडे निज श्रग पारवति, श त्रु शस्त्र न लागे॥ शत्रुसेना दणतो तिहा चाल्यो, पकडे मुनटनें पार्टी के ॥ था ॥ १५ ॥ चक्रपरे नमाडी उबाले, दूर पडयो तस लेई ॥ नूमि प बाडी मूर्छित कीनो,वली नर मोकले के के ॥ था ॥ १६॥ मूर्धित तेढा वी चिकित्सा करे, वली कोइ रथ शस्त्रे नरियो॥ तिहां वेशी सारथीने रे, शत्रु सैन्य सचरियो के ॥ था ॥ १४ ॥ चम्पालादिक बाण वरसता, ते नट रथनें रूधे ॥ वामन चोक फेर वरसे शर,मानु सुनट निज नधे के ।। श्रा० ॥१७ ॥ हय गय नट वींचे सग्रामें, रथ नांगी धनु खेदे ।। चमपालनु तुम मुम बिलु, मुझे कुर खे के ॥ थो० ॥ १५ ॥ वामन उपर खड्ग ले इने, चम्पाल करे घात ॥ वामन वचावी ते खड्नें, चूंटीनें करें मु प्टिधात के ॥ था॥ २०॥ मूळ पमाडी तेहर्ने वस्त्रे, बांध्यो जकडी जा म ॥ दृढरय कम्यो वामन साथै, बाण वरसे वितु ताम के ॥ था॥२१॥ झुर वामन तस मुंमे, लल्लायें नागे तेद ॥ एणी परें सात मुम करी मू क्या, नाना सद् गतनेद के ॥ था ॥ २२ ॥ वीजा पण कुमरोयें विचा यु,वामणे सद्भुनें इणिया ॥ नहीं को गरास वधारे न कीर्ति,मरणमा कि म जान गणिया के ॥ श्रा॥ २३॥ एम जाणी जीवितना वक, नाग जीवित लेइ ॥ तास सेनाने धीरय थापे,थाशासना घणी देश के ॥था॥२५॥ फूलवृष्टि करे वामन अपर, व्यतर देव रसाल ॥ पद्म कहे ए पंचम खमें, श्रावमी ए थइ ढाल के ॥ या॥ २५ ॥ सर्व गाया ॥ २२ ॥ ॥ दोहा॥ ॥ श्रीपतिराजा सक हुवे, एहबु देखी एथ ॥ श्रावी प्रधान थाखे । इयु, कहो नाशो तुमें केथ ॥ १ ॥ एम नक्षतपणं याचरी, थावरु जाडो श्राल । मुझे मस्तक वामणो, केम करो तेहा काज ॥२॥ए वामनने थागलें, सहु नट तृणा समान ॥ मरवानु केम मन करो,समजण घाण शान ॥ ३ ॥ सैन्य सहित समजावो,वामन वारु रीत ॥ शी कीर्ति थाने ॥ २०६ जयानद केवलीनो रास. विक्रम ते वक्तर नतु दो नाई, जाग्य सखाई जाण ॥ रे तुम मुज नदि उत्तयो हो नाई, हनीय लगी तो घजाण रे । सु० ॥१५ । सातमीका चमा खममा हो नाई, पद्मविजय कदी ढाल ॥ श्रीजयानवना रासमा हो नाई, थाशे मगलमाल रे ॥ सु० ॥ २०॥ सर्वगाथा ॥ २० ॥ ॥ दोहा ।। ॥ सन्न थाउ तुम सवे, शस्त्र लियो सयाम || कौतुक तुम पूरु करु, देखो तुमें उद्दाम ॥ १ ॥ ॥ ढाल थामी ॥ पारी रे जातनु छल स्वरगथी । ए देशी ॥ ॥ उर्जय जाणी सद् सन्नयया,निज निज वल ले साथें । मुमित शिर पांच थावी बागल,टोप बाजादित माथे के॥१॥श्रावो के अडि के, साहामा सदु पहेला के हारे वाहाला अमें लड एह साथे रे । एड साथै एह साथै अम वयरी, देखो पराकम केहवु रे ॥ ए थांकणी ॥ को बलतां पांच ते वोले, एहने हाये हणशु ॥ निज सेना से श्राव्या वर्मा, थमें शरम नवि गणरों के ॥ यावो के०॥ २॥ हांसी करतो वामन बोले, मुमित शिर लजाणा ॥ याव्या ते रुटुं कखु दवे तुम,लाज जाउ मजा पाके ॥श्रा०॥३॥ एम सनिली कोधे चढचा पांचे, वरसे वानी श्रेणी, व्योम पूरे बीजा पण वाणे,बाया करी मानु तेण के॥था॥५॥ वामन सिह उत्यो तव सादामो, पंच परमेष्टि सनारी ॥ यंन वपाडी ते मृग छ पर, धाश् चोट करे नारी के ॥ ॥५॥ गिरि शूग परें गजनें तिहां पा से, माहावतने ते जमाडी॥ पारेवा परें गगनें उप्ताप्ले, केईक नूमि पहाडी के ॥था ॥ ६ ॥मूर्खावतनें दयालु न मारे, पापड परें रथ नांजे ॥ ध नुष मोघर नाला थसिनें गदा, चूरण करतो गाजे के ॥था॥ ॥ कण गगर्ने क्षण धरतीयें दीसे, सैन्य थानें क्षण माहे ॥ क्षणमा यतें रिपुबल हणतो, वीर्यवत उत्साहे के ॥ था ॥ G॥थन मुष्टि पदघात करीने, सादि निषादिने मारे ॥ पडतां उपहतां नवि लखीये, मार परे सनारे के ॥था ॥ ॥ मारवा उतघाने हवे वामन,घातें मूळ यापे ॥ कास्कध पाद य विचमा, ते पांचने थापे के ॥श्रा० ॥१०॥ बाली पत्नीने ते सोपे, मानु थापण कीधी ॥ वासीयो पासे ते पधावे, वली प तिथे थाणा दीधी के ॥था॥११॥ शीतल उपचारें जीवाहपा, सैम्प २०ए पंचम खंभ. हूड, हवे नूपति कहे वात ॥ 5 ॥ १५ ॥ जेम गुण प्रगट कस्खा तुमें पो ते, तेम प्रगटावो रूपजी ॥ दाक्षिणथी औषधी प्रनावें,कीधु शुम स्वरूप ॥ ॥ म॥१६॥ ते देखी सह विस्मय पाम्या,थानद थंग न मायजी॥ जय जय शब्द कोलाहल दूर, वाजिन गीत गवाय ॥ 5 ॥ १७ ॥ण थव सर कोई दूरथी श्राव्यो, वंदी उलखी नाषेजी ॥ नाग्य नमतां दीना तुम ने, छत्र वैश्रवण प्रकासे ॥ 5 ॥ १७ ॥ जखमी वरपी जग तृप्तो कखो, ते सुणी पूजे रायजी ॥ छत्र वैश्रवण कहो कोण नांख्यो,थम मन कौतुक थाय ॥ म० ॥ १ ॥ तव बदी पद्मरथ राजानी,पुत्री परवा यादेंजी ॥ कमलप्रन नूपालनी पुत्री, परल्या लगें अविवादें ॥ म० ॥ २० ॥ चित्र कारी चरित्र को सघलु, तव सद् करे विचारजी ॥ थापण नवि हावा पा मरथी,एतो मोहोटो कुमार ॥ म० ॥ २१॥ सहु नेला मला कुमरनें कहे, अपराध कीध थन्नारोंजी ॥ ते खमजो थपराध तुमारूं, कोइ स्वरूप न जा ॥ 5 ॥ २५ ॥ कुवर पण थपराध खमावे, प्रीति वधि मांहो माहिजी ॥ कन्या एद स्वरूप देखीने,ईप धरे उत्साहिं । म० ॥ २३ ॥ नूपति निज चित्रशालामांदि, दे परिवारने राखेजी ॥ एक दिन पाणीग्रहणने हेते, नरपति एणी परें नाखे ॥म० ॥ २४ ॥ पाणीग्रहण करो कन्यानु, कुवर कहे तव वाणीजी ॥ माहारे नाही प्रयोजन एदनु,मादारे बहु राणी ॥ ॥ ॥ ५५ ॥ कलाकरण रणजय तो केवल, कौतुकथी में कीधुजी ॥थ ण जाणे कुलें पुत्री देवी, ए नवि किहांये प्रसिधु ॥ ॥ २६ ॥ कलावत कोई राजकुमरने, कन्या श्रापो एहनी ॥ एहनी पण महेनत थाये सफली, तव नूपति कहे तेद ॥ म० ॥ २४ ॥ रुडु कस्यु एम देवी नांख्युं, प्रतिज्ञा पण पूरीजी ॥ बलात्कारथी एम मनावी, विघ्न सवे चकचूरी ॥ म० ॥२॥ शुनलगने परणावे त्रणे, महामहोत्सवयी रायनी॥गज रथ घोडा पायक थापे, सुंदर मदिर नाय ॥म॥णा घर वाखरो वली देश ते थापे, कीड़ा करे स्वीसगेंजी ॥साते क्षेत्रे धन ते वावरे, देव गुरु पूजे रंगें ॥ म॥३०॥ श्राय प्रमाणे वय ते करतो,एहना पुण्यथी वाघेनी॥राज्य राजानु जन गु ण गाये, नित्य नित्य एम थाराधे ॥ ० ॥३१॥ परदेशे पण जयश्री पा मे पुण्यवत जे प्राणीजी ॥थादर करीने पुण्य करोनवि, जिनशासन एम जाणी ॥ म० ॥३॥ नवमी ढाल ए पंचम खमें,पचम खम पण दृत जी॥

q០០ जयानद केवलीनो रास. कहो, जो न थई तुम जीत ॥ ४ ॥ नीयता मूको जालिन, ससरो वामन सत्य ।। मुख केम दाखशो मानमा, मोटी राखो मत्य ॥ ५ ॥ ॥ ढाल नवमी। सोनल रे तु सजनी म्हारी,रजनी किहां ग्मी श्राव्यांजी। ए देशी॥ ॥सानल रे तु रानन वयणा,मत्रीश्वर एम नापेनी ॥ प्रनु होय ते हित फारी जाणे, सेवक सत्य प्रकारे ॥१॥मर नपि धरियेजी ।। पूर्व अपर स विवात, चितवी करियेंजी ॥ ए थांकणी॥ शस्त्र विना एकत्लडे एणे, कुमर वि डव्या सवलाजी। एहनें थागल शक सरीखा, दीसे अतिशय नवला । म०॥२॥ कलावतने बलीयो एहयो, कन्या नाग्य पाम्योजी ॥ वर एह पनु थानक पामी, खेद कहो केम जाम्यो ।म० ॥३॥ एह पराक्रम एद कला वली, एह दयाने दानजी ॥ वामनमा गुण विण नवि सनवे, सत्यक दु राजान ॥ म० ॥४॥ विद्यादिक शक्ते करी वामन, कीडा करे धरतीय जी॥ महापुरुष कोइ सारूपी, ए धनुमान वरतीय ॥ म० ॥ ५ ॥ कुल देवी पण कुसमष्टि करे, एद थर्थ पण धारोजी ॥ प्रारथीयो कलापरें कर शे, सहजरूप निरधारो ॥ म० ॥ ६॥ प्रार्थना करो तेहनी एहनें, वासी सुणी हितकारीजी ॥ दर्प लही वाजिन वजडावे, नरपति चित्त विचारी ॥ ॥ २० ॥ ॥ वदी विरुदावली बोलते, गायन गीत ते गावेजी॥ मत्रीप्रधा न सहित दवे नूपति, वामन पासें थावे ॥म ॥ ॥ दान देतो तेदने ते वामन, रथथी उतरी प्रणमेजी ॥ श्वसुर धाशीप दीये जमाइनें, थालिंग न वीये झणमें ॥ 5 ॥ ए॥ कनकासन सुपर बेसाडी, सुख जय पूजे रा यजी॥ वामन कदे सयाम कलामां, दु नवि जीत्यो प्राय ॥ 5 ॥ १० ॥ पण मुज हृदयें पंच परमेष्ठी, मत्र वसे में मोदोटोनी ॥ सुर पण वश हो य ग्रह पण न नहे, विघन तणो थाय त्रोटो॥ 5 ॥ ११ ॥ पश्व न होये घट नूपनो,लखमी चाली थावेजी॥ सानली पर्पदा जैनधरमनें, स्तव ता अतिशय नावें ॥ म०॥१३ ।। वीर बांध्या ते सघला मूक्या,मुममुमित चमपालजी ॥ तेदनी हांसी करतो कुंवर, दास्य करें नरपाल ॥ 2 ॥ ॥ १३ ॥ चम्पाल इसतो तव बोले, पंचशुं ख नवि धरीयेंनी॥ श्रौप धी जलथी दय गय नट सह, वामने साजा करी ॥ 5 ॥ १४ ॥ प्रायें रूपालु सुनटने सपरें, सापेक्ष मूक्या घातजी ॥ तेणें बहु जननो घात न , षष्ठ खंम. २११ एम विचारी दया करे,मूकावी तेह चोर ॥ घर लावी न्दवरावीयो, तेम नो जन शुन गेर ॥ चो० ॥ १० ॥ण रहीने तस पूनियु, कोण तु केम करे चोरी । कुमरने उत्तखी चोर ते, उती हैयामा दोरो ।।चो० ॥११॥ नीचुं मुख करीने रहे,तव बोले कुमार ॥ श्रनय दीधुं तव बोलियो,गद गद वय ए प्रकार ॥ चो० ॥१शा पापीनु चरित्र सुणाववु, योग्य नहीं शुं नाखु ॥ रूपस्वरें करी उतरखी, कुमर कहे सुण थाखु ॥ चो० ॥ १३ ॥ बांधव मादारो रूघडो, नामें सिह कुमार ॥ एहवी अवस्था केम लह्या, नारखो तेह विचार ॥ चो० ॥ १३ ॥ स्नेहें श्रालिंगन करी, वेशी पूढे वात ॥ पा लीनु राज्य किहां गयुं, केम व्रणनो व्रात ॥ चो० ॥ १५ ॥ कपट पोतानु गोपवे, कहे कल्पी वात ॥सुता तुमें देवी मदिरें,दु पोहोरीयो रात ॥चो॥ ॥ १६ ॥ सिद दीठो में थावतो, तेहने करवा त्रास ॥ पूलें दूर गयो वही, पालो बलीयो उल्लास ॥ चो० ॥ १७ ॥ नमतां मारग नूलीयो, थयो जव परनात ॥ देवी देहरे तब थावियो, मनमां धरी ब्रांत ॥ चो० ॥ १७ ॥तु मनें नवि वीना तदा,जोया पर्वत पालि ॥ जलधिमा रत्न गया परें,शाशा त्रू टी नाली ॥ चो० ॥१॥ तुज वियोगें पालु पालिने,इण समय महासेन ॥ मुज धरतीने दाबतो, थाव्यो सेई सेन ॥ चो० ॥ २० ॥ तु पण साहामो निकल्यो, युछ एहणं कीधो ॥ मुज लसकर दारी गयुं, मुज बांधो लीधो ॥ ॥ चो० ॥ २१ ॥ जानरो कीधो प्रहारथी,नारख्यो बदीखाणे॥ राज्य करे वे पालिनु, मन मद बढ़ थाणे ॥ चो० ॥ २२॥ चामडे मढीयो मुजनें, गिरि टुक चढावी ॥ नाख्यो पलाशपत्रं पडयो, कम होय जे नाव ॥चो॥२३॥ जावी नावणी वरसीयो, मेघ थकालें ताम ॥ चरम गध तव उबल्यो,यावी शीयाल ते गम ॥ चो॥२॥ चरम नल्यु तेणें वायरो, थायो चेतना पाम। ॥ मूळ ग अनाग्यथी, 5 ख तणो विशरामी ॥ चो० ॥ २५ ॥5 • खीयाने मरण ते दोहिनु, नमतो पुरवर गाम ॥ इहां थावी निदा नमु, वणे जर्जर थाम॥ चो० ॥ २६ ॥ नख्यां त्रण दिन वही गया, निक्षा न विलाधी। चोरी कीया एणी परें,नूस्खें देहही दाधी॥ चो० ॥ २७ ॥ यत बुन्नुदित किं न करोति पाप, वीणानरा नि करुणा नवति ॥थाख्याहि नई प्रियदर्शनस्य, न गगदत्त पुनरेति कूप ॥ १ ॥ पूर्वढाल ॥ थागत तु में जाणो सवे,जीवाडयो वट्ठ वार ॥ उरणीयो न थाठ किमे,दासपणे पण ७ २० जयानंद केवलीनो रास एकपिमनी पुण्यप्रनावे, उपराजण तम जूठ ॥ म० ॥ ३३ ॥ श्रीगुरु गणम विजय पसायें, पद्मविजय एम नापेजी। श्रीजयानदना रासमा जातो, दिन दिन थधिक उन्नासें ॥ म० ॥ ३४ ॥ सर्वगाथा ॥ २६ ॥ ॥इति श्रीमत्तमविजयगणि विनेय पमित पद्मविजयगणिविरचिते श्रीश्रीम यानदकेवलिचरित्रे प्रारुतप्रवधे नाटयसुदरी गीतसुदरी,नादमुंदरी,परिणयन नामा पंचम खम समाप्त ॥ चतुफखम मनिने गाथा॥३२१५। पचमखम गाथा ॥२६॥ सर्वगाया ॥३२७॥ पूर्वखमचतुष्के उक्तश्लोक || ए पंचम खमे उक्तश्लोक ॥१०॥ सर्वश्लोक ॥पणा सच एक,समस्या एक,उहो एका ॥अथ पष्ठखम प्रारंना॥ ॥ दोहा॥ ॥शांतिनाथ प्रतुं शोलमा, दान अनय दातार ॥ पदकज प्रणमुं पा सना, चिता चूरणदार ॥ १ ॥ पंच खम पूरण कस्या, चढते रगें चग ॥ ह वे बहो कहु दोशथी , थाणी मन उतरग ॥ ५॥ कीडा वनमा क्रीडता, धर्म करता धीर ।। काल केतो एक काढतो,व्यवहारे वह वीर ॥३॥ ॥ ढाल पहेली ॥ कड्डयां फल दे कोधनां ॥ ए देशी ॥ ॥ एक दिन रमवा निकल्यो, श्रीजयानद कुमार ॥ रमवाने उद्याना, तिहां देखे तेणी वार ॥१॥ चोरी व्यसन थाकरु ॥ ए थांकणी ॥ खर सपर थवले मुखें, शिर पटियां पाडी ॥ बेसाडी राख चोपडी, मुखें मेश लगाडी।चो॥ ॥ श्राकोश ताडना बहु करे, बोकरी धूल समावे ॥ कांकरा नाखे थति घणा,फूटु वान्नु वजावे ॥चोगाशा व्रण नरित नूख्यो घणु, नर क वानकी थावे ॥ पापनी मूर्चि ते बनी,मारवा जे जावे ॥ चो॥३॥ वष्य ममन देखी करी, कोटवाल पूजे कोण ए फेम विटंबना, एहने यो शं ने ॥ चो० ॥ ५॥ तेह कहे थान रातिमा, व्यवहारी गेह ॥ खातर देश इस काठी, जन जाग्या तेह ॥ चो० ॥ ८ ॥ लोकें कोलाहल करो. पोहोता ताम ॥ रायनी बाणथकी अमें, मारवा जाउ थाम ॥ चो० ॥ ॥ ७ ॥ पापनां फल एदवा का, चोरनी गति पण एद ।। तव कुथर मन चितवे, एद थनित्यनु गेह ॥ चो० ॥ ७ ॥ दाता नाम डे माहरू, ए चोरी करे एम ॥ पाहा पामे अति घणी, वांक तेह मादारो नेम ॥ यो॥ ए॥ थमें पष्ठ खमा ३२३ करे रे,एवहो कुथर थादर मान॥ एदने नाई रे एहवा नवि होये रे,वाली की घु बहु धननु दान ॥३॥ एक दिन पूछे रे कुमरनें नूपति रे, एहने केम करो धादर मान ।। गुणथी थपिका रे बाजा बमीनें रे,सिह शीयालने एह उपमान ॥ ॥ए। कुमर कहे नाई माटे यादर करुं रे,पण नवि माने ते राय ॥ एक दिन राय पूढे सिहसारने रे, कौतुकथी निरमाय ॥ ॥१०॥ ते पण अवसर पामी माया करी रे, बोले एणी परें वाण॥ में उपकार कस्रो पूर्वे घणो रे, माने ने तेद जाण ॥ 5 ॥ ११ ॥ वधती वात कहे वाये नहीं हो रे,सम दीधा में ते माट ॥ कुमरें निपेथ्यो जे वली तुमनें रे, मुख थाये इण वाट ॥ 5 ॥ १२॥ नूपति कौतुक थाशका नखो रे, नूप कहे तोदे नांख ॥ जो मुन मानतो होय कोइ रीतिथी रे, तो कांश बानु म राख ॥ १० ॥ १३ ॥ कुमरथकी तुम थाणा मोटकी रे, स्वामीदिनु पाप ॥ में साननियु ले तेणें नावियें रे, सांजलो फतु ते बालाप ॥5॥ ॥ १५ ॥ विजयपुर जय नाम राजा तणो रे, सुत व त्यागी थथाग ॥ ते कारण चोरी पण दु करु रे, तव नृप कहें धरी राग ॥ 5 ॥ १५ ॥ यदो निज दोप कदे ने केदवो रे, सत्यवादी शिरदार ॥ एणी परें राय विचारे निज मने रे, हवे थागल कहे सिंहसार ॥ 5 ॥ १७ ॥ मधुगीत नामें गा यन रुथडु रे, उपनो कुल ते चमाल ॥ मधुर स्वरें करी रायनें रोजवे रे, करे प्रसाद नृपाल ॥ 5 ॥ १७ ॥ सुरगीत नामें सुत थयो तेहनें रे, तो नागी शूरवीर ॥ वालषकी पण सुस्वर थति घणो रे, प्रज्ञावत सुधीर ॥ मु०॥ १७ ॥ सौजाग्यादिक गुण थागर थयो रे, पंकजमा जेम गध ॥नी चकुळे पण तेहनें तस पिता रे, शीखवे ते रागबंध ॥ ३० ॥ १५ ॥ मुज थागल गाये सुस्वरें रे, दान देठ सुविशात ॥ चीजी कला इछे पण को नहीं रे, पानवे नाणी चमाल ॥३०॥ २०॥ देशांतर जावानुं मन करे रे, पण धन नहीं निज पास ॥ मुज पासें माग्यु धन में तदा रे, चितव्यु करे ए धन्यास ॥१०॥ २१॥ शीखी कला मुजने देखाडशे रे, श्राप्यु में धन कोडी ॥न विशालपुरे विद्या नस्यो रे, धन थापी मन कोहि॥ ॥२२॥ स्त्रीपणु निज लोकमा दाखतो रे, दाखवो कलाने विज्ञान | कोक इट थाराधी सुर लिये रे, श्रौषधि जाज्वव्यमान ।। 50 ॥ २३ ॥श्टरूप कर तो एथिवी नमे रे, रीजवे लोकनां वृद ॥ मनोवांनित धन मेल्ए लोकपी २१२ जयानंद केवलीतो रास. धार ॥ चो० ॥ २७ ॥ पद्मविनय पहेली कही, के खमें डाल || श्रीला नदना रासमां, श्रागल वात रसाल ॥ चो० ॥ २० ॥ सर्वगाया॥१ ॥ दोहा॥ ॥ वचन यगोचर वासहा, प्रवलु मुज पाप ॥ पासु वापद पग पर्ने, अधम सगति सही थाप ॥ १ ॥ यत ॥ अधमसगतिधर्मति स्पता, प्रतिपदं वघवंधपरानव ॥ प्रियवियुक्त्यरिनीतिरापद , खलु फलानि हि उतशाखिन ॥१॥ दोहा ॥ कुमर सुणी किरपालु, कहे तुमें न करो खेद ॥ सद्भुनें विपद ससारमां, न लहे पण निर्वेद ॥ २ ॥रमणिक राज्य ने दिए, ताहारु जाणी तहत्ति ।। लखमी पण तेहन लहो, निजदुनु जे निरति ॥ ३ ॥वण टाल्यो थोपधि वनें,थापे वस्त्र थलकार ।। दाताक पपादप परें, गनीर गुण गणधार ॥ ४ ॥ नाईपणु जनमां नप्यु, परगट राखे पास ॥ सोंप्यां काम एहनें सवे, थादर करी उल्लास ॥ ५ ॥ सही धन सरको गमे, न मले नाइ निदान ॥ निजदेश चिंतक नारिने, अनु मत करे थचान ॥ ६॥ ॥ ढाल बीजी ॥ तट यमुनानु रे यति रलियामणुं रे । ए देशी॥ ॥ कुमरें दीधु रे धन वितसे सदा रे, लोकमां मान थयो सिहसार ॥ सपदा कुमरनी देखी चित्त बले सदा रे, निज थापद सनारे गमार ॥१॥ उर्जन ते सहन न होये कदा रे ॥ ए योकण॥ देखी देखो अवलो ते होग रे, जेम जवासो वरपा काल ॥ देखी तेज कुमरनु रविपरें रे, अस्त वाळे जेम घूक ते काल ॥ 5 ॥२॥ मन चिते सपद मुज नवि मली रे, तो हरु एदनी कोय उपाय ॥ शत्रुवध तो वेखु नहीं रे, मारु तो ए सवि मुज थाय ॥ 5 ॥३॥ नूपसेवाथी काम सिको सवे रे, एम चिती हवे कुमरनी साथ ॥ जश्ने रायनी सेवामा रहे रे, अनुक्रमें नरपति कीधो हा थ॥३०॥४॥ उष्टनो थाशय मालम नवि पडे रे,कचरामा जेम कटक होय ॥ मुखथी मीठो धोतो हृदयमा रे,तेदनी रीति न जाणे कोय ॥४०॥५।। जाण कुमर प्रिया जाणी इष्टता रे, कुमरनें कहे पण माने नांदि॥ सल न ते सद्भुनें सलन लहे रे,उष्ट तेने सद्गणे इष्ट माहि ॥3॥९॥ सूर्य यज थालु देखे सदा रे,चूक ते देखे नित्य थधकार ॥ जे जेदवो होये ते तेहवो होये रे, चोर तथा शाहुकार ॥ 5 ॥ ॥ लोक विधारे रे चोरने केम षष्ठ खंग ३२५ तें, राजमार्गे थइ जाते रे ॥ धि० ॥ बेदु जण मलीने मारजो तेह, को धागल कहे जो म एह रे ॥ धि० ॥ ६ ॥ अगीकार करी ते थादेश, रह्या शुनक परें ते देश रे ॥ घि० ॥ सावधान थई वगर विचारें, रहे ते ताकी तेवारें रे धिणा कोइ नर मूके श्रीजय पासें, ते नइ एम प्रकाशे रे ॥ धि० ॥ कांक कार्यनो करवा विचार, तृप तेडे एणी वार रे॥ धि० ॥ ७ ॥ सरलपणे सुणी श्रीजयानद, धरतो विनय धमद रे ॥ धि० ॥ मूकी शय्या धरी विशवास, जव जावाने उन्नास रे ॥ धि०॥ ॥ निपुण स्त्रीयो तव कुम रनी बोले, सरल नहीं तुम तोले रे ॥ पियु प्राण श्राधारा ॥ नीतिशासना जाण कहा, नविय विचार मन ला रे॥ पि॥१०॥ श्यो अवसर था थालोच केरो, पाबली रात थधेरो रे ॥ पि०॥ तेडवानो नहिं अवसर स्वा मी, तुमें गुणगणना धामी रे ॥ पि० ॥ ११ ॥ नर नारीनी न शसा करिये, सरलपणु नित्य धरिये रे ॥ पि० ॥ वनसपति जे फूले थकालें,थरिष्ट थाये शरवाले रे ॥ पि ॥ १२॥ पुष्ट कारण विण णहिज वेला, तेहे न एम एकेला रे ॥ पि० ॥ नृपचित्त जूठनें जूदी वाणी, किरिया जिन्न वखाणी रे ॥ पि०॥ १३ ॥ जूउ फल वेश्यानी रीतें, खबर पडे नहीं चिर्ने रे ॥ वि०॥ ते कार्य कहो केणी परें करीयें, जेहा सशय धरी रे ॥ पि०॥ १५ ॥ विश्वास न करीये विशे, त्रण अवगुण जस देखे रे ॥ पि० ॥ सर्व कार्य करता सिहसार,मोकलो तस इण वार रे ॥ पि० ॥१५॥श्ये कामें फदो श्रावशे एह, ए थवसर नाशे न जेह रे ॥ पि०॥ न्याय युक्त ए सानली वात, कुमर चित्त दरखात रे ॥ पि० ॥ १६ ॥ तेडी सिहने नांखे एम, जूप तेडे तुम नेम रे॥ पि०॥ पूबवा तेडपो मुजनें राय, घात कुम न्नो उपाय रे पि॥१॥ नोखिश मन मान्यु तिदा जाई, सिह चिते एम नाई रे ॥ पि ॥ तुरगारूढ पर हवे चाल्यो, थईमारगें जमादायो रे ॥ पि० ॥ १७॥ दोय पासें दोय बाणुयी मास्त्रो, पडियो मूर्खायें घायो रे ॥ पि० ॥ नाई शेदन फल एद पायो, पर चितव्युं निज थायो रे ॥ वि० ॥ ॥१॥ ते पुरुपें नई राजाने थारव्यु, काम कस्यु तुमें नरिव्यु रे ॥ पि० ।। प्रायें जूपनें न होय विवेक, हर्प लह्यो यतिरेक रे ॥ वि० ॥ २० ॥ यत ।। विवेकोलन प्रायो, विशेपो महतामिद ॥ धनाढघनृपदेवेषु, स मनागपि नेक्ष्यते ॥ १ ॥ पूर्व ढाल ॥ कोलाहल सुपी कोटवाल थायो,वादार मोकले २४ जयानद केवलीनो रास. रे, करी उपकार थमद ॥ १०॥ २४ ॥ कोई ठहट कलापी परणाचो रे, राजकन्या नाम नाम ।। नाग्यका गुण थागल कोण जूए रे,जाति, ल धनिराम ॥ 5 ॥ २५ ॥ मुन सगतिथी शील्पो दानने रे, पाने गोत्र ढकाय ।। फरतो फरतो हा याव्यो पखें रे, तुमथी गनु न कोय । ॥२६॥ के खमें वीजी दालमा रे,उर्जन एदया दोय ॥ पप्रविजय कडे तत विश्वासडो रे, मत करजो तुमें कोय ।। १० ॥ २७ ॥ सर्व गाथा ॥ २५॥ ॥ दोहा॥ ॥ विण उलखे वारू परें,मूकाव्यो एवं मुक ॥ लाव्यो निजघर लहणे, लख्यो मुज ए गुहा ॥१॥ देई धन दोलत तदा, सहुर्मा कस्यो सतकार । एकातें मुज थाखियुं,सुण रे तु सिहसार ॥२॥ मुजकृत मत परकाश जे,सम दीधा सो वार ॥ वचने एम विलखो थई, वाध्यो बद्ध प्रकार ॥२॥ राखे पार्स रीति, विणचिते विशवास ॥ करे बहु मान मन कातियें,थापे नहीं अवका श || तुम थाणा वशथी तुरत,गोप्य कत्यु गोस्वामि॥ गुणवत कुल गणि नहीं, थप्रसन्न मत हो थाम ॥ ५ ॥ सांजली नृप विस्मय लह्यो, मनर्मा क्रोध न माय ॥ वालित फल्या विचारनिं, सिद उन्नास सवाय ॥ ६ ॥ सिर विसयो शुनपरें, को नृप थकुलाय ॥ जैन नूपर्ने पण जूध, दोष व्रण सुखदाय ॥७॥ यत ॥ तस्मिन् ललकर्णव, मविमृश्य विधायता। स्वैरत्व चेति जैनेपि, सति दोषास्त्रयोनृपे ॥१॥ ॥ ढाल त्रीजी। मादारी सही रे समाणी॥ ए देशी॥ ॥ नरपति चिंते क्रोध नरायो, मुज कुल एणे वटलायो रे ॥ धिक धिर ए जमाई ॥ पापोयें बहु नृपक्कुल बटलाव्यां, सढुनें 5 ख एणी परें थाया रे ।। धि० ॥ १॥ कुल नवि नघु रानस उत्ते,कुमरीयो दीधी मन प्रीतें रे।। धि०॥ पंक्तियें वेशीने नोजन करीयें, कहो कैम एणी परें पिंम जरीयें रे॥ धिक्षत्र वैश्रवण ए नाम धरावी,फरी घूर्त विद्या एवं गवी रे ॥धि॥ पसरथ पनपन बेतरीया, महारां पण वस्र वेतरियां रे ॥ धि० ॥२॥रा ज्यातरमा वात विस्तरो, तो मुन निदा फरशे रे ॥ धि० ॥ कुल मुन तज शे ने दासी करो, ए केम मुन प्रवहण तरशे रे ॥ धिः ॥ ४ ॥ बाजज मारीय रयणीयें एद, तो थाबरु रहे रे रे । घिon एम चितवे दोय घा यक तेडे, विश्वासीने तेही नेहे रे ।। धिः ॥ ५ ॥ तुरगारूड जे थाजनी रा पष्ठ खंम २७ पामे मनमा खेव,चिंते रे विपरीत कारज केम थयुंजी ॥चितव्युं काय में नी पन्यु काय,देववक सद्ध वांकु थ गपुंजी ॥३॥ पत ॥ अन्नद चितियमाण, उदय पगेण थनदा नायं ॥ चितोदय विवरीय,तम्हा नो चितए मुपिदा ॥ १ ॥ पूर्वढाल ॥ मारण योग्य न थाव्यो एद, पालन योग्य ते हितु एम मुजी ॥ गोप्य जे वात ते यश् परगट,काम न सीधु मादारुं किम दू उनी ॥ ४ ॥ खाधु अनक्ष्यने न गयो रे ताव, व्रतनो रे नंग थयो ए चि त दहेजी ॥ गोत्रनो ध्वस कस्रो वली राज्य, बलीया रे वयरी थावीने प्र हेजी ॥५॥ हाथ वन्या नें न खवाणो पोंक,ए दृष्टांत ते माहारे नीपन्यु ज। मारवो प्रगटपणे करी जोर, एदबु रे नरपति चित्ता उपन्युं जी ॥ ६ ॥ सुनट सहस गमे सन्न बम, मोकले सूतो मारो एदनेजी ॥ सहस गमे म ती श्राव्या रे तेह, कुमरनी पोलें मद बढ़ जेदनेजी॥ ॥ जोह मोघर थीभांजे रे पोल, तेटले पोल उघाडी कुमरनटेंजी ॥ तेद/ रे करवा मां मधु युद्ध, वीटया रे तेहने वलने उत्कटेंजी ॥ ७ ॥ कुमरनटें बढ देखा डपो त्रास, नाता रे नृपनट नृपना गेहानी ॥ कुजमा जेम पेसे रे शीया ल, शक्ति न रही लव लेश ते वेदमांनी ॥ ए ॥ कुमर नटें थम नसाव्या रे स्वामि, रविकर जेणी परें मदोटुं तम दरोनी ॥ सांजली कोघे घडियो रे राय, नेरी वजडावे विदाणे मद घरोजी ॥ १०॥ युद्ध करणने मलि यु रे सैन्य, जाग्यो रे कुमर कस्य विहाणां तणांजी॥ करीने रे रमवा सो गत पास, वेसे रे नारीने कहि वयणां घणां जी॥११॥ सैन्य सहित नृप थावतो जाण, तूरीनो कटुक ध्वनि सुणी कानमांनी ॥ जयथी रे चांत या कहे वाणी, तानसो स्वामी कट्ठ ते शानमांजी ॥ १२ ॥ नृपनट तुम नटें नगव्या रे स्वामि, क्रोधे रे नूप नराणो थावियोनी ॥ तुमचो रे नि ग्रह करवा काज, सैन्य लेने केम नविनावियोजी ॥ १३॥ कीडानो थ वसर नहीं इण वार,व्यो करवाल ते शत्रु कारणें नी ॥ थमने रे रमवा म न नवि थाय, बीदी रे मन नवि रहे थम धारणें नी ॥ १४ ॥ वोले रे लीलायें हसीने कुमार, शस्त्र विना बढ्नु कुमरने जीतीया जी ॥ वलीयारे बत्ता याव्याता तेद,मादारी इजायें सद्धये विगूतीया जी ॥१५॥ क्रीडा करो तुमें निर्णय चित्त, क्रीडा रे करवा वेठी पण मनेंनी ॥ स्त्रीना स्वना वथा शका रे धार, सैन्य सजावे दाखवी नयननजी ॥ १६ ॥ कृमरना म २२६ जयानंद केवलीनो रास. नररायो रे ॥ पि०॥ कोइक नरें कही कुमरने वात, सानती मन खेल रे॥पि० ॥ २१ ॥ नारियो कहे स्वामी तमें दीतु, नृपन कार्य अनी है। पि० ॥ मान्युं न होत जो थमचु वयण, शी गति होत श्रम सयण रे । पि० ॥ २२ ॥ श्राजथी रहेजो दवे सावधान, राजयल होय कान रे । पि० ॥ खलसगति थई रायने नमी, एह वात नहीं कूडी रे ॥ पि०॥२३॥ सरस्वती स्त्री तेणें तुम चिन खेले, नरनें दूर मेहेले रे । पि० । कुमर करे स्त्रीने एम वयणां, तुमें मुज तो जेम नयां रे ॥ पि० ॥ २४ ॥ नारोंने एम थानद पमाढी, वचनयुक्ति कही जाही रे ।। पि० । पतिव्रता जे जा मिनी होय, नर्ता सम नहीं कोय रे ॥ पिणा २५॥ उछे खमें त्रीजी ढाल, सुणतां मगलमाल रे ॥ वि० ॥ पद्मविनय कहे थागल देखो, उर्जन स सान विशेपो रे। पि० ॥ २६ ॥ सर्व गाया ॥ ए७ ॥ ॥ दोहा॥ ॥जीवतो सिह होयें यदि, तो लावो ततकाल ॥ मोकले एम कही मा नवी, श्रीजयानद सनाल ॥१॥साव्या सास तो थको, थोपषि जल तव थाए ॥ सह कियो बांटी शुनपरें, उत्तम नर एम जाण ॥५॥ त ॥ उपकारिणि वीतमत्सरे वा, सदयत्व यदि तत्र कोऽतिरेक ॥ अहिते सहसापराधलुब्धे, सदय यस्य मन सतां स धुर्य ॥१॥ दोहा ॥ मरण थावे कण क्षण मनें, मूकावे ए मुक्त ॥ एहथी शी थापद अधिक, सिह विचारे सुज ॥३॥धातायें थापद घरी, वन्यस्थानक या पाम ।। पुल्य रहित मुज उपरें, मानुं मूकावी माम ॥ ३ ॥ दूबली वारे देखीयें, श्रषवा बि थनेक ॥ श्रथवा काम एवं कन्यु,अंधारे अविवेक ॥ ५ ॥ एहज अर्थ एवं कनो, बहु सत्कार बनाव । जाल्यो धूर्त में थानथी, जेणे करूनो एह जमाव ॥ ६ ॥ठपकारने लहे थपकिया, तेह नीच सेणि वार ॥सूर्य किर ण नास्वर घणु,तम लहे घूक तेवार ॥ ४ ॥ ॥ ढाल चोथी ।। रह्यो रे श्रावास दुवार ॥ ए देशी ॥ ॥जीवाडी सिहनें सूता कुमार, निर्नय थक्ने सिहपरें ताजी ॥सूतो न बीहे मृगयी रे सिद,पण तस पन्नी शक घरे सदाजी ॥१॥ सुनटोने क हे तुमें था सावधान, जानवो पोल प्राकार नली परेंजी ॥ रायनें जश कहे कोश्क वात, सिंह माखो कोइ वैरी एणी परेंजी ॥ २ ॥ राजा रे पष्ठ खंम. ए ॥ दारे माहारे महापराक्रमी वासुदेव सम कोय जो, कुलतो गुण ल कृपने नाग्यथी जाणीयो रे लो॥ हो ॥ एदने मस्तक थई कुसुमनी र टि जो, कुलदेवी घोप करी जे वखाणीयो रेलो ॥ १ ॥ हो ॥ ए सवि वीलरिघु केम राजन तुम जो, थविवेके श्रसमजस करवा मामियुं रे लो ॥ हो० ॥ नरमा तुमें नृप तेम गुणमाहे विवेक जो, दोषमा तेम अविवेक ए, मादापण बमियुं रेलो ॥ २ ॥ यदुक्तं ॥ सगुणमपगुण वा कुर्वता का यजात परिणतिरवधार्या, यत्नत पंमितेन ॥ थतिरनसकतानां, कर्मणा माविपत्ते, नवति हृदयदाही शल्यतुल्योविपाक ॥ १ ॥ तथा ॥ सहसा विदधीत न क्रिया,मविवेक परमापदां पदम्॥ वृणुते दि विमृश्यकारिण,य एएलुब्धा स्वयमेव सपद ॥ २ ॥ पूर्वढाल ॥ हा ॥ लीलायें क्रीडा कर तो बेगे तेद नो,एणि परें तुमें तो उद्यम मामचो ने वृथा रे लो॥हा॥ लीलायें तुम बल नगवे जास सुनट जो, नाग्य परीक्षा कीजें एणी रीतें यथा रेलो ॥ ३ ॥ दो० ॥ तुम सेनाचं उर्जय जाणो एद जो, यूथ सदि त करी सिहने जीते केणी परें रेलो ॥ हा०॥ कुमर ससैन्य सग्रामें जीत्या एण जो, तेम सेनापतिने पण ए विलखो करे रेलो ॥ ॥ हो० ॥ एह दया जो न करे तेणें काल जो, जीवतो कोण रहे एह वात विचारी रे लो ॥ हा॥ राज्यधणी कहो तुमें पण केणीपरें होत जो, कुमर विटषणा था ते सवि सनारीय रेलो ॥ ५ ॥ हा ॥ बिरुदावली बंदी वोल्यो के पी रीत जो, कोटि अनेक सुनट/ पद्मरथ जे हतो रे लो॥ दां० ॥ जी त्यो वामण रूपें एकण पिंम नो, तेहा रण करीने कोण जगमा जीततो रे लो॥ ६॥हांगासैन्यनें मारशे क्रोध चढयो जब एद जो,निदा पामशो सफल नूपमादे तुमें रे लो॥दा ॥ जीववु दोहिनुं तेणें तुम थ मने खेम जो,वांडो तो तजो एह थकारय कहु थमें रे लो॥ ॥ ७ ॥ हां० तुमनें हणतां थमें जीवाशे केम जो, सानती सचिवनी वाणी विहिनी मनमा घणु रे लो। हांग॥ सिहनी वात ते कूडी हृदयमा धारिलो, वोले रे तव नरपति वयण सोहामणु रे लो ॥ ॥ ७ ॥ हा० ॥ तुमें प्रयुन क्ता मुकतुं नारव्यु वयण नो, पण ते पापी माहारो स्नेह तारीयो रे लोहा॥ मनड माहारु न मले एहन कोय जो,चली तुमें जाता मुजन एणी परें वारियो रे लो॥ ए॥ हां ॥ जश्ने पूठो सम्यग् कुन श्रवदात जो, जयानंद केवतीनो रास. विर सन्मुख ताम, जाता रे वेग्ने सथियादिक सद्धनी ॥ काल थावे कामो धाने ताम, जाय रे वाघरीवाडे ते बहुजी ॥ १ ॥ यावीने प्रणमे चला पाय, चीनवे कर जोडी एम रायनेजी । सैन्यगुं चाल्या कोण परिवार कोने रे मारशो एणी परें धायनेंनी ॥ १७ ॥राये रे नासपुं सवि निक त,सिंहें जे नारख्यु सपनुं ते सुणीनी ॥ नाखे रे सचिव ते खलनी रे। णि, सांगली अवगुणो केम न तुम गुणीजी ॥१॥ कारण विण सज ! त्रु कहाय, धरतो रे मत्सर परगुण देखीनेजी ॥ कांटा रे साहामो जाये । ट, फल फूलें पूरी वाडी वेखीनेजी ॥२०॥ यत ॥ खलोमृगयते दोगन, गुणपूर्णोपि वस्तुन ॥ वने पुप्पफलाकोणे, करन कटकानिव ॥ १ ॥ व ढाल ॥ पापी रे खल पण तेहथी थधिक,खलनी जे वात सुणे कानें रोजी ॥ खलनी रे पूल पूरे तेह जीव, मानु रे उर्गति जातां मन धरोनी ॥ २१ ॥ महोटा ते विरुखन सानले कान,या उपानकें मुख नांजे तमा जी॥ कटक सरिखा खलने रे जाणी,थादर न दीये सत खलने सदाजी। ॥ २२॥ यत ॥ कटकानां खलानां च,सदृश्येव प्रतिक्रिया ॥ सपानन्मुख गोवा, दूरतोवा विसर्जन ॥ १ ॥ पूर्वढाल ॥ सानले सङन खलनी न वात, जो कवी सानले पण चित्त नवि धरेजी॥ कुननी परें नवि वासे का सार, जोजो रे सद्धये जगतणे गरेंनी ॥ २३॥ बछे रे खमें चोची बाल, नोखी रे पद्मविजय सोहामणीजी ॥ श्रीजयानदना रासमां सार, सजन गुण श्रगीकरो ए सुणीजी ॥ २४ ॥ सर्वगाथा ॥ १२ए ॥ ॥दोहा॥ ॥ तेजोमयी पूजित जनें, पण मले लोह असम ॥ अग्नि कूटाये थाफ एणी,ए खल सग एकत ॥१॥ खलसमें थापद खरी, पामे मदोटा प्राय ॥ कांफरी घट निश्ति करे, जज ने शोना जाय ॥२॥ तुंष ते जलमा जापत खें, मध्यम मृत्तिका सग ।। तेणे नवि सनिलवु तुमें, वयण जे खलनु व्यं ग॥२॥यसनाध्य नवि पाखियें, जोश्ये मुक्कामुक ॥ वारु कुल वम्प चोरनु, संनालो वली सूक्त ॥३॥ यत ॥ खल सक्रियमाणोपि,वाति कलह सतां॥ दुग्धधौतोपि कि याति,वायस कलहंसतां ॥१॥दोहा।। गिरुठने गुणव त ए,जामाता एहनाए ॥दुष्ट कुल तस वास्वियुं,पण केम पाय प्रमाण ॥५॥ ॥ ढाल पांचमी॥हारे मारे जोबनीयानो लटको वाहाडा चार जोए रेशी॥

पष्ठ खम. २३२ ॥ दोहा ॥ ॥ तातजी सैन्य तणो तुमें, थकस्मात् थारंन ॥ रण करवाने रीजथी, याव्या एह अचन ॥ १ ॥ सिहवात सवि सामटी,मूलयकी ममाण ॥ क ही ते सांनती कुमारियो, बोली वुदिनी खाण ॥ २ ॥ सकल शौर्य सपन्न धैर्यादिक गुण धार ॥ लक्षणे चक्री ए सख्यो, सवि सहान शिरदार ॥ ॥ ३ ॥ नीचकुले जो नर श्या,कोण कहो कुलवत ॥ मुर्खायें मरवा त पी, कहो कोण होंश करत ॥ ४ ॥ चितामणि सरिखो चतुर,परिगल पुरस्य पाम। ॥ उपरातो करो श्राफणी, पहेलो दीसे निगाम ॥ ५॥ र्जन एह 5 रारमा, सिह ते जाणो शियाल ॥ थमें तो पूर्वं उलख्यो,नली परें नूपाल ॥६॥ वार वार धमें विनयथी, कर्पु विचित्र प्रकार ॥ पण सौजन्यपणा थकी, माने नहीं कुमार ॥ ७॥ कपटथकी एणे कुमरनें, रीजवीयो नररा य॥न त्यजे नोलो नाद ए,जेम शशि कलक न जाय॥७॥ तुमें पण मान्यो तेणें तुमें, थापद लह्या थपार ॥ जिहां कपोत वेसे जदा, शाखा सूके ति वार ॥॥ यत ॥ कपटी चित्त न दीजीये,पेट पेशी बुध लेत ॥ पेली याग वनायकें, पी. गोथां देत ॥ १ ॥ काज विचारी कीजीयें, जेम नोल बर दृष्टांत ॥ युसगम रतु नेहनृप, नट तिय श्वानप्रधान ॥ कटत जटत ठ ग्रत प्रदत,फिर पी पळतान ॥ ५ ॥ ॥ ढाल बही ॥ दरणी जव घरे लासनो॥ ए देश।।। ॥ कर जोडी कुमरी कहे लालना ॥ सा हो तात वयण अवधार । ए वर वारू रे लालना ॥ श्खो जो निज पर कुशलने लालना । ला तो रीजवो ए कुमार ॥ए०॥ १ ॥ घमें हित कहीयें तुम तणे ला ॥ ल० ॥ कट्ठ पण मानो वाण ॥ ए॥ रोग शमाववा कारणे जा० ॥ ॥ कटु श्रीपध करे वाण ॥ ए. ॥शा राय कहे कुमरीमो लालाथामबर कसो एह ।। ए०॥ मूकता लाज थावे घणी ला ॥ला मान नहे व हु देह ॥ ए० ॥ ३ ॥ तात नक्ति तुम चित्त होये ला ॥ल ॥ तो पति कुन निरधार ॥ ए० ॥ पूबीने मुजनें कदो लााला तो थाय नयनय कार ए॥३॥ तात वचन मानी करी लागाल०॥ विनय नक्ति धरी स्नेह ॥ ए॥ पूवे कुल तव ते कहे ला ॥ लगा केदेशे सिह ते एह ए॥ ॥ ५॥ नारी कहे सुणो स्वामीजी ला ॥ ल॥ एवं करो सर्व उपाधि २३० जयानंद केवलीनो रास. जेम मन निर्मल थाय विपन दूरे टले रे लो हाा सचिव कहे कम उत्तम नाखे नाम नो,तो केम कुल को चली शूर घणो बले रे लो॥१॥ हा० ॥ तो पण तुम थाणायें जायं तय जो, कदेशे तो श्रावी तुममें खशु रे लो॥ हांग ॥ प्रथमी नृप गया कुमरनी पास प्रणाम जो, मरी में कहे तुम उत्तरे थमृत चाखणं रे लो।। ११ ॥ हो० ॥ तुमें भने कि क्षा देवा शूर जो, गुरुजनना नक्ता नतवत्सल गे सदा रे लो। हो। जगम कल्पवृक्ष सम तुम जो जोप जो,अर्थीने देता तुमें नवि पाको करा रे लो॥१२॥ हां० ॥ निजकुज नाखो प्रार्थना न करो लोप जो, Fe पापी कोश्ये नृपनें नरमावियो रे लो॥हा॥ तुम वयणे करी सहुना समय नाय जो, थमें तुम पूतु जे नूपें फरमावियो रे लो॥ १३ ॥ दा॥३ मर कहे सुणो न करु प्रार्थना नग जो,मुज कुल मुन कर नाखशे समा करी रे लो॥ दांग ॥ उत्तम नर ते फलथी दाखवे वश नो,पण नवि नांचे कोई कालें कहें धरी रे लो॥१४॥ हां० ॥ वैरी केरो थाशे तिहा कि नाश जो, तुम सरिखा सहन ते वृक्षिपणु लहे रे लो॥ हां० ॥ सकन थइनें सैन्य सहित नूपाल जो, थावो तुमें जेम मुज सुजा मुज कुल रे लो॥ १५॥ दांग ॥ सानली प्रणमी नूपनी पासें थाय जो, सनला ते सुणीने नृप मन खेदियो रे लो॥ दां०॥ थामबर करी बायो केम जवाय जो, युझे पण नवि सिदि एम मन वेदीयो रे लो॥१६॥ हॉ०॥ थयो वनयथा भ्रष्ट कदो गति कोण जो, एम चितातुर देखी सचिव ते बोलीया रे लोहाणा समाणो समा थति शूर जो,कुल केम प्राणे नांखे जग तृण तोलीया रे लो॥१॥हा॥ कुल पने एं गुणधी सर्व नणाप नो,रमाफरथी उपन्यो मणि तेजें कहे रे लोगा जो तुम बाणा दोप तो मीठे वयण जो, वीर्घ रोष टाजु जेम प्रसन्नपणु लहे रे लो॥ १७ ॥ हो० ॥ लानु कुमरनें स्वामी तुमचे पास जो, इण अवसर तिहां कुमर थाए लदी फरी रे लो। हा॥थावी पुत्री त्रणे राय हजूर जो, प्रणमी पाद पिताना सत्रम वद्ध धरी रे लो ॥ १५ ॥ दो० ॥ कुमरी कहे हवे तात में निपुण वचन्न जो, ते कदेवाये बागल मुणनो रंगयी रे लो॥ दो० ॥ बहे संमें पांचमी ढाल रसाल जो, पविजय कही श्रीगुरु उत्तमसंगची रे जो ॥ २० ॥ सर्व गाथा ॥ १५ ॥ कहे पष्ठ खंम. २२२ ॥ दोहा ॥ ॥ तातजी सैन्य तो तुमें, अकस्मात् श्रारंन ॥ रण करवाने रीजथी, श्राव्या एह थचन ॥ १ ॥ सिहवात सवि सामटी,मूलथकी ममाण ॥ क दी ते सोनली कुमरियो, बोली बुधिनी खाण ॥ ॥ सकल शौर्य सपन्न ए, धैर्यादिक गुण धार ॥ लक्षणें चक्री ए लज्यो, सवि सहन शिरदार ॥ ॥ ३ ॥ नीचकुलें जो नर इश्या,कोण कदो कुलवत ॥ मुर्खाश्ये मरवा त पी, कहो कोण होश करंत ॥ ४ ॥ चितामणि सरिखो चतुर,परिगल पुरस्में पामी ॥ अपरागे करो आफणी, पहेलो दीसे निगाम ॥ ५॥ उर्जन एह 5 रात्मा, सिह ते जाणो शियाल ॥ श्रमें तो पूर्वं उतरल्यो,नली परें नूपाल ॥ ६ ॥ वार वार थमें विनयथी, कयुं विचित्र प्रकार ॥ पण सौजन्यपणा थकी, माने नहीं कुमार ॥ ४ ॥ कपटयकी एऐ कुमरने, रीनवीयो नररा य॥न त्यजे नोलो नाद ए,जेम शशि कलक न जाय॥॥ तु पण मान्यो तेणें तुमें, थापद लह्या थपार ॥ जिहां कपोत वेसे जदा, शाखा सूके ति वार ॥ए। यत ॥ कपटी चित्त न दीजीयें,पेट पेशी वुध लेत ॥ पेली थाग बनायकें, पी. गोयां देत ॥ १ ॥ काज विचारी कीजीयें, जेम नोल बर दृष्टांत ॥ युद्धसगम ऋतु नेदप, नट तिय श्वानप्रधान ॥ कटत जटत ठ ग्रत ग्रहत,फिर पीछे पडतान ॥ ५ ॥ ॥ दाल बही॥ दरणी जव घरे लालना ॥ ए देशी॥ ॥ कर जोडी कुमरी कहे लालना ॥ लजा हो तात वयण अवधार ॥ ए वर वारू रे लालना ॥ श्छो जो निज पर कुशलने लालनां ।। लासो रीजवो ए कुमार ए॥१॥ थमें हित कहीयें तुम तणे ला० ॥ तम् ॥ क? पण मानो वाण ॥ ए॥ रोग शमाववा कारणे लो० ॥ल ॥ कटु थोपध करे थाण ॥ ए॥शा राय कहे कुमरी सुणो लालाथाम्बर कस्यो एह ॥ ए० ॥ मूकता लान थावे घणी ला ॥लमान नडे व दु देह ।। ए० ॥ ३ ॥ तात नक्ति तुम चित्त होये लाल ॥ तो पत्ति कुल निरधार ॥ ए. ॥ पूबीने मुजनें कहो लाला तो थाय जयजय कार ए॥३॥ तात वचन मानी करी लाल०॥ विनय नक्ति धरी स्नेह ॥ ए० ॥ पूठे कुल तव ते कहे ला ॥ ल०॥ केहेशे सिह ते एह ॥ए॥ ॥ ५ ॥ मारी कहे सुणो स्वामीजी ला० ॥ ॥ एवं कसो सर्व उपाधि २३२ जयानंद केवलीनो रास. ॥ ए॥ पापी नाम शु वञ्चरो ला० ॥ल॥ नामें दोये माहा मावि ॥ ए॥६॥ तातनी बात सवे कही ला० ॥ ॥ सुणी कहे तामा २॥ए०॥शु एहयो ए वल थठे लाल ॥में तो कमो सत्कार ॥ ४॥ ए केम एदवु थाचरे ॥ सा॥a त्यनवो दूरपी तेइ ॥रा एम चिती कहे नारीने ॥ ला ॥ ल० ॥ सनिलो कटु ते जेह एGHam यौपधी ल्यो ए मुनथकी ला० ॥ ॥ पूतली शिर थारोप ॥ ए० ॥जे न माने ते पूठिये ला० ॥ ॥ ते न करो लोप ॥ ए० ॥ ए॥ अती त थनागत सद्ध कहे लागालणासानलीयचरिज थाय ए॥ औषधी ३ तातने ला ॥ ल । पासे थावी सुखसाय ॥ ए०॥ १० ॥ सर्व सन जोता थका ला॥ ल॥ शिर औषधि वी ताम ॥ ए॥ पूजे प्रतलीने दवे ला० ॥ल ॥ कुमरनु कुल नाम गम ॥ ए॥ ११ ॥ मानुषिणीनी परें कहे ला० ॥ स ॥ विजयपुराधिप राय एा विजय राय सुत सुरु ला० ॥ ॥ श्रीजयानद कहाय ॥ ए० ॥ १२॥ वर क्षत्री कुल उपन्यो लाल० ॥ गुणनिधि महिमा निधान ।। ए० ॥ सांजली दररमा सहन ना ना ॥ल ॥ चमक्यो सुणी राजान ॥ ए॥ १३॥ मगलवाना वाजी यो जा० ॥ ल० ॥ जय जय नणे नर नार ।। ए ॥ मान मूकी नरपति है वे जा ॥ लम् ॥थाम खमावे कुमार ॥ ए॥ १४ ॥ निजपुत्रीने समा वतो ला॥ ल० ॥ निज थपराध नूपाल ॥ ए० ॥ सह निज निज पा नक गया ला॥ल ॥ एकदिन सना विघाल ॥ ए॥ १५ ॥ पूजे म श्रीने नरपति ला ॥ ल॥ कहो ए इजाल ॥ ए० ॥ पूतली बोली नवि सुणीला ॥लए अचरिज असराला ए॥ १६॥ मत्री कहे ए कुमरना ता० ॥ ॥ नाग्यथी औषधि पाम ॥ ए० ॥ देव पेसे ते व लथकी ला० ॥ लण्॥पूतली बोले श्राम ॥ ए० ॥१॥ तो पण जो सशय होये ला ॥ ज० ॥ तो शतबुधि प्रधान ॥ ए० ॥ बुकिंचा सुत तेहनो ला ॥लन बुद्धि यसमान ॥ ए ॥ १७॥ ज्योतिप प्रमुख जाणे घणं ला॥ ल॥ निपुण में तुम जक्तिवत ॥ए ॥ विनयपुरे तस मोक ली ला ॥ ॥ निर्णय कीजें महत ॥ ए ॥ १९॥ सानली नृप हर्षि त थयो साल ॥ शीखवी मोकल्यो तास ॥ ए० ॥ नवमे दिन फरी घावयु ता० ॥०॥ करिय प्रतिज्ञा खास ॥ ए॥ ५० ॥ सात पुरुष षष्ठ खं. २२३ पालीयो ला॥ ल॥ करने बेश। वेगवत ॥ ए॥शो योजन पर रस ला ॥ ला विजयपुरे पोहोचत ॥ ए॥ २१ ॥ वेष निमित्तियानो करी ला ॥ ज० ॥ पुस्तक राखी पास ॥ ए. ॥ प्रतिदार राय थाणायकी ला ॥ ॥ पेसवा दीधो तास ए॥ २२ ॥ बही बम खंममा ला॥ स॥ पविजय कही ढाल ।। ए ॥ निमित्तियो विस्मय लह्यो ला॥ ज०॥ देखी सना विशाल ए॥ २३ ॥ सर्व गाथा ॥ १६ ॥ ॥ दोदा ॥ ॥ सौधर्मा सरिखी सना, स्फटिक जीत थति फार ॥ रत्नधरा रतीयाम णी, मनगमती मनोहार ॥ १ ॥ बेठा बांधव वेहु तिहां, सेनानी सामत ॥ शेठ मत्रीश्वर सामटा, मलीया बहु माइत ॥ २॥ सोहे मणि तिहास, पायफ सेवे पाय ॥ ६ समा अवनीपति, सुर जेम सर्व सखाय ॥३॥ श्रायु ने अलकार, अगरदक श्रनिराम ॥ कर्व थायुक्ष्थी उद्यमी, करे रक्षा नृप काम ॥ ॥ सौधर्मनें ईशान सम, चामर ढलके चार ॥ नाना देशथी नवनवां, प्रानृत थावे अपार ॥ ५ ॥ बत्र शिरें बाजे घणु, राय तथा युव राय ।। जयने विजयन जोडलु, शशि सूरय समजाय ॥ ६ ॥ थाशीर्वाद देई श्यो,सर्वज्ञ थापो सिदि॥ नव ग्रह सुख यो नवनवां,वली विशेषे र दि॥ ॥ यत ॥ सर्वज्ञ शिवमातनोतु सविता, चारोग्यमिउ प्रियं ॥ नौम शत्रुजय बुधश्चविशद बोध धियं गी पति ॥ सौनाग्यं नृगुज शनिववि तुता,राहु प्रताप॑श्च यं,केतु कीर्तितती सुखानि च गुरुस्तुन्य सदा नूपते ॥१॥ ॥ ढाल सातमी॥ प्रथम जिनेसर पूजवा ।। ए देशी॥ ॥ नूसझायें थापतो॥ साजन महारा ॥ वेसवा थासन ताम हो ॥ वेगे निन परिवारशु ॥सा०॥ पूजे तव धरा स्वामि दो ॥१॥ न चलें थायातुमें, श्रम मन नाया तुमें, पमित राया तुमें प्रीलियें ॥ साजन माहारा नांजो धन्द सदेद हो । ए थोकणी । किदांना वासी किहांथी थावीया ॥ सा॥ जावु किहां कहो तेह हो । शु शुं जागो शास्त्रथी ॥ सा ॥थम मन पूग्नु ए ह दो ॥नाशा विप्र कहे सुणो राजीया ॥सा॥ वसियें सुरंगपुर गम हो ॥ देश जोता थाव्या इहां ॥ सा ॥ निरखवा तुमचुं गाम हो ॥ न ॥३॥ नयन कतारथ थम थयां ॥ सा० ॥ दीगो तुम देदार हो ॥ जाणु अष्टांग निमित्त वलें। सा॥त्रण काल मुविचार हो । न० ॥ ४ ॥ फल मूकी 98 जयानंद केवलीनो रास. तस बागलें ।साा यतिशय करी बहुमान दो॥वेत्रण प्रश्न पूगेकी ॥ सा० ॥ पूढे ते तत्त्व विज्ञान दो ॥ ज० ॥ ५॥ देवमात्रची नि। ॥ सा ॥ दोय थमें सुत दोय हो । सिहसार के प्रथमनें ॥ सा ॥ श्रीव यानद वीजो दोय हो॥०॥ ५॥ पहेलो थन्यायकारी पोसा काठी मूक्योश्रमें वास हो। मुर्गध मल थर्ग ठपज्यो॥ साकेम नविन जीयें तास हो । न० ॥४॥ वीजो निमित्तिये नोखीयो । सा ॥ राम योग्य गुणवत हो ॥ सह जननें घणु वालहो । सा० ॥ ॥ जीवपी अधि क फहत दो ॥ ॥ ॥ कल्परक्ष थकूर ज्यु ॥ सा ॥ राखी बा थपार हो ॥ पण कूड कपटथी नानें ।। सा० ॥ ई गयो सिहसार हो । ॥न ॥ ॥ ते पण सरल हृदयथकी ॥सा० ॥ वगर कहे तेह साप हो ॥ चाट्यो खोल करी घणी ॥ सा० ॥ पण थाव्यो नवि हाय दो ॥ ॥१०॥ विशालपुरे तेह सानव्या ॥ सा ॥ करता कला थन्यास हो । यो ख्या धर्म सहनथी सा॥ तिहाथी गया कोई वास हो ॥ ज०॥ ११॥ खबर न लाधी तेहनी ॥ सा ॥ काम नहीं सिहसार हो ॥ श्रीजपाना जडपो नही ॥ सा ॥ जेम समुइँ रत्नसार हो। न० ॥ १२ ॥ तेणें अमें खीया बद्धलु ॥ सा० ॥ निमित्त प्रमुख जोर-जाण हो । मिलन श्रा शायें जीवियें । सा ॥ स्वास मात्र धरु प्राण हो ॥न॥१३॥ निमित्त कुनने स्वपननी ।सा॥ अग फुरण वली जेह हो ॥ देव उपासनथी कहो । सा० ॥ देम प्रमुख दोये तेद दो॥ ॥१४॥ श्राव्यो नदी घर एव लीसा॥ शुदि मात्र नवि लक्ष दो ॥श्रावे तो राज्य पापी में सा॥ तपोवन दृष्टिबह दो ॥०॥ १५॥ साथे नीकलवा कारणें ॥ सा० ॥ राज्य जीये नवि नाय हो ॥ तप वय जाप थमारडु ॥ सा० ॥ तेणें थम मन खेवाय दो ॥ न ॥ १६ ॥ दय गय रथ गयां बागुडे ॥सा० ॥ व्य कुटुब परिवार दो ॥ पण नरनव नवि बागुडे ॥सा॥ तेणें विनति अवधा र दो ॥ ज० ॥ १७ ॥ जीवे के नही ते कदो सा॥ किहाँ ले ते मल शे केम हो । मलशे केवारे ते कहो ॥सा॥ थाणी बम पर प्रेम हो । ॥०॥१जा एम कही पुत्र वियोगयी ।सागारुदन करे नरराय दो॥ दग्ध पर जलयोगथी ॥ सा ॥ जेणी परें धूम वमाय हो ॥ न० ॥ १५ ॥ चश्बुद्धि थाम्बर करी ॥सा०॥ मामी लगन धरी ध्यान हो ॥ कहे नृपने पष्ठ खम २२५ खेद का करो॥सा० ॥ पुत्रवियोग चित्त थाण हो ॥ न ॥ २० ॥ पुत्र मुखी डे तुम तणो |सा ना लगन विन्नाण दो ॥ चोथाना स्वामाना योगयी ॥ सा ॥ सुख पामे थप्रमाण हो ॥ना१ ॥ दशमपतिनी दृष्टि ने सा॥ जोगवे राज्य महंत हो ॥ वली तेम सप्तम पति देखे ॥प्ता॥ तेम त्रण ग्रह देखत होन॥२॥ नरपति पुत्री त्रनो ॥ सा ॥ ए जोगें जरतार हो ॥ सांजली नृप श्रापदियो ॥ सा ॥ पूछे वलीय विचार हो ॥ न० ॥ २३ ॥ कहो किहां ले तव निमित्तियो ॥ सा ॥ मेषादिक गणी राशि हो ॥ होठ फरकावी बोलीयो।सा ॥ लखमीपुर वसे वास हो । ॥ नाश्व ॥ पूतलीने नृप वयण ते ॥सा॥ मलियो एकाकार हो॥ वर्ण सस्थानने वय कहे ॥ सा ॥सानली दर्प थपार हो ॥ ज० ॥ २५ ॥ दो य नाई तव वरसता ॥ सा॥ कनकमणि थलंकार हो ॥ वस्त्र तथा फल फूलनी ॥सा ॥ दृष्टिकर। श्रीकार हो ॥ न० ॥ २६ ॥ब खमें सातमी॥ ॥सा० ॥ श्रीजयानदने रास दो ॥ पनविजयें कही ढाल ए सा॥ सुग तां लील विलास हो । न० ॥२७॥ सर्वगाथा ॥ २० ॥ ॥ दोहा ॥ ॥ राय विसया रीति, चमि चल्यो जाय॥ महीपतिनी ते मार्गमा, श्लाघा करे समवाय ॥१॥थहो उदारता एदनी, घदो थम्ह नाग्य अ मान ॥ थछत वचन कला इसी, दाखवी जेणे लघु दान ॥ ॥ लखमी पुरे लीलाथकी, श्रीपतिराय सकाश ॥ नवमे दिन थावी नमे, पूढे नृप तस पास ॥ ३ ॥ हर्षवत दोशे करी, वारू का वृत्तांत ॥ दानभिन्न निन्न दाखवे, धनद परें धीवत ॥ ४ ॥ वाप तिस्या वेटा होये, एह वात खरी थत्र ॥ कुमर दानमाहें किश्यु, चित्रकारी जे चरित्र ॥ ५ ॥ कहे हांसीथी केई जना, ए सघलोथारंन ।। हे चित्रबुद्धि हतो, एहमा नांदियचन ॥६॥ ॥ ढाल थामी॥ साहेवजी श्रीसिदाचल नेटीयें दो लाल ॥ ए देशी। ॥ साहेबजी॥ खेद थापद विस्मय घणो दोजी,बहु रस मय थयु चित्त सादेवनी ॥ सादेवजी॥ नूपति नवि बोली शके होजी,एवं समे सुणणे शुन रीत सा० ॥१॥साणा पुस्यवत एम परखीय होजी॥ए थोकणी ॥ सा॥ श्रीजयानदर्ने तेडवा दोजी, पुरुष थाव्या परधान सा ॥ सा० ॥ श्रीजय रायें मोकल्या दोजी, ना गोपुर थान सा० ॥२॥सा॥ पुण्य ०॥ सा॥

३६ जयानंद केवलीनो रास म पोलीये नृप चीनच्यो दोजी, नृप कहे मोकल वेग साासात्री सहित ते थापिया होजी, वस्त्र धानरणे सतेग सा० ॥ ॥ साon पु.॥ मा० ॥ नूप नमी उचितासने दोनी, वेग तव नरराय ।। सा० ॥ सा॥ केम कुशल पूवे तदा होनी, प्रीति घणी परखाय सा॥ ४ ॥ सा०॥ पुण ता० ॥ ते नृपर्ने एम विनवे होनी, तुम मित्र नृप युवराय ॥ सा॥ सा॥ कुशली पुरजनशें थठे होनी, वरते सुख साय सा० ॥ ५ ॥ सा॥ पु० ॥ सा० ॥ तेहुयें एम कहेवरा वियुं दोनी, साजलो स्नेद रसाल ॥ सा० ॥ सा ॥ श्रीजयानद थम जीव वे होनी, कल्पवृक्षनी माल सा" ॥ ६ ॥ सा । पुसा० ।। तुमें उन्नति एहनी करी होनी, निमित्तियाने वयण सा०॥ सा०॥ जाण्युं थमे नली रीतिशु होजी, तुमें थमचा स्वरा सयण सा ॥ ७ ॥ सा ॥ पु० ॥ सा० ॥ च सूरय लगें पिर करी हो जी, यम्ह कुलगु तुम प्रीति साणा सागा मोकलो थम पासे हवे होनी तो मानु दीघ नीवित सा० ॥ ७॥ सा॥पु०॥ साथमें वियोगें त पाश्या दोजी, शीतल करो तुमें नात सा ॥ सा ॥ नहीं ठपकार वीसा रीयें दोजी, त्रीजा म्रात श्रम ज्यात सा ॥ ए ॥ सा ॥ पु० ॥ सा. थम्ह सम काम कहेजो सदा होजी, सानता कहे नूपाल सा॥ सा॥ तुम वच अमृत थनिनवु होनी, पीता थांउ पाल सा ॥ १० ॥सा॥ ॥ पु० ॥ सा० ॥ तुम का ते रुहु थशे होजी, रयण थमूलक सार सा. ॥ सा ॥ जेटणु लेवे नरपति दोजी, जे तेणे कीधु सवार सा० ॥ ११ ॥ ॥सा॥पुणासा॥ तास सतारोकरावियो दोजी,मोकल्या कुंधर पास।सा० ॥ सा० ॥ प्रतिहारें नणाव्यं सवे दोजी, कुमरने धरो समास सा॥१॥ ॥ सा० ॥ पु० ॥ सा ॥ प्रणमे ते नर जेटले दोजी, कुमर सनामा साम सा ॥ सा ॥ उना थई मजिया सद्ध होजी, निन्न निम्न उत्तखी नाम सा० ॥ १३ ॥ सा ॥ पु० ॥सा॥ हर्ष तण बांसु जरे होनी,श्रासने बेशीने घात सा ॥ सा ॥ पितृ पितृवाता नणी होनी, पूजे कुशल म खशात ता० ॥ १३ ॥ सा ॥ ॥ सा ॥ साते मुख ने तेदने दोजी, पण एक तुम वियोग सा० ॥ सा॥ ते पीहे नृपने घएं दोजी, सनारे बदु लोग सा० ॥ १५॥ सा॥ पु० ॥ सा ॥ नाजो पप्रथकी सद्ध होजी, एम कही थापे लेख सा॥ सा ॥ कुमर चढावी मस्तके दोजी, षष्ठ खंग , शश वाचे वर्ष विशेष सा० ॥ १६ ॥ सा० ॥ पुण्॥ सा ॥ स्वस्तिश्री नमी दे वनें होनी, जे सर्वज्ञ महेश सा ॥ सा० ॥ होंशे विजय पाटणयकी दो जी, श्रीजयनाम नरेश सा० ॥१७॥ सा॥ पु० ॥ सा० ॥ श्रीविजयनाईस ह लिख्यो दोजी, लखमी पुरवर वाम सा ॥सा ॥ मदिर मालिये सोहतुं होजी, तिहां श्रीजयानद नाम सा ॥ १७ ॥ सा० ॥ पु० ॥सा ॥ तेह कुमरने स्नेदयी होजी, ह थालिगन देय सा० ॥ सा० ॥ नाखू खेम कुश लथ होनी, तुम खेम कुशलनु ध्येय ॥ सा० ॥१ए ॥ सा॥ पुसा॥ समाचार एक प्रीउजो दोजी, विगर नणावें श्रम सा० ॥ सा०॥ सिहसार साथ गया होनी, करवु न घटे तुम सा० ॥ ५० ॥ सा० ॥ पु० ॥ सा० ॥ खालसग करवो नवि घटे होजी,सहाननें 5 खदाय सा० ॥ सा० ॥ राज्य नो जीवित तु थजे दोजी, खेद घणो थम थाय सा० ॥ २१॥ सा॥पु०॥ ॥ सा०॥ सपदा तु पाम्यो घणी होनी, श्रम सनारेन केम सा० ॥ सा ॥ जगत्नो एह स्वनाव ने दोजी, पण तुज न घटे एम सा० ॥ २२॥ सा० ॥ ॥ पुसा ॥ महोटा मोदोटा सही होनी, थधिक पुष्टि करे तात सा॥ ॥सा॥थधिक उदय लही चश्मा होजी, समु पुष्ट करे जात सा० ॥ ॥ २३ ॥ सा ॥ पु० ॥ सा ॥ कटें दिवस धमें काढीयें दोजी, तुज विर हो उ खदाय सा ॥ सा० ॥ राज्यधुरा नवि वही शक्कु होजी, गलियो बल द जेम ठाय सा०॥ २४ ॥ सा० ॥ पु० ॥ सा ॥ सदाय करो थावी हवे हो जी, जो होय था परें नक्ति सा० । सा० ॥ तो महा पनपरें तुमें हो जी, देखाहो निज गति सा० ॥ २५॥ सा० ॥ पु० ॥ सा० ॥ वांची पत्रने श्रावजो होजी, पाणी पीजो थम देख सा० ॥सा ॥ ए लिस्यु सहस्त गुणु जाए जो दोजी, शु घणु लखीये विशेष सा० ॥ २६ ॥ सा०॥ पु०॥ ॥ सा०॥ बहे खमें थामी दोजी, पद्मविजय कही ढाल सा० ॥ सा० ॥ श्रीजयानदनारासमां होनी,सुणतां मगलमाल सा॥२॥तापु॥२५॥ ॥ दोहा ॥ ॥ वांची पत्र विवेकछु, चितवे चित्त मजार ॥ तातन दुख देवा तशु, कारण थयो करार ॥१॥ वारू अचेतन वृक्ष ते, पत्र पहनव पथराय ॥ पंथी रविकर तापिया,सघताने सुखदाय ॥२॥ सपदा जही स्वपिता जणी, सुखकर न थयां सह ।।ख वियोगनु दाखियु, रह्यो नहु निज रज ॥

. ច जयानंद केवलीनो रास. ॥३॥ जइ सुख करिये जोपणे, एपी पेरें करी बालोव ॥ स्नान जोबन साथे करे,वर पुरुपागु विकोच ॥४॥ वेत्रीय वात सर्व वदी,नरपतिनं निपरि । राजा चिते रागयी,फिमहिक जागे कुमार ।।५मुज नर कही ते सर मला, तेहे पितरियो तात ॥ रहेगे नहीं मुज राज्यनो, धि कारक विग्यात ॥६॥ ॥ ढाल नवमी ॥ सासू पूठे रे वथर वात,माला किहां रे । ए वेशी ॥ राजा चिते स्वजनकै वयरी,वाला महारा॥ कोण जाणे थशे केहदो रे ॥ सोनागी प्रियदर्शन सुखकर, जगमा न जहे एहयो रे ॥ १ ॥ कहो केम करी रे, जेम तेम करीने एह,समजावी धरीये रे । एथांकणी ॥ पि तामणि मुज हार्थे चढीयो, वा० ॥ म मूर्ख ते दाखो रे ॥थज्ञाने अमृत बमीने, प्रतिकुल कयो न विचारलो रे । क० ॥२॥ महामनावी विश्वर्मा नूषण,वा० ॥ पुरुप रतन नवि जास्यो रे ॥ पूतली जेह थचेतन ते पण, स्तवती मन नवि थाल्यो रे ॥ क॥३॥ पुत्री विधवा थापद न गणी, वाणा राज्यविरोध अनेक रे ॥ पुरुप चितामणि दाणी में न गणी, सपलो गयो विवेक ।। क० ॥ ४॥ एम चितवतां हृदय सघटथी, वा० ॥ मूर्धा पाम्यो राय रे ॥ पहियो प्रथिवी सिहासनथी, मत्री प्रमुख यकुलाय रे ॥ कर ॥ ५॥ शीतल उपचारें थयो साजो, वा० ॥ पूछे सदशं एह रे ॥ नरपति निज कुकर्म ते निदे, परपदमा कहे तेह रे॥ ॥ ६ ॥ सुणो सह क्रूर ई कुकर्म करता, वा ॥ अविवेकी थज्ञान रे ॥ कृतघ्नो मुज सरिखो नहीं जम मां, ए सम नहीं परधान रे ॥०॥ ॥ मुज थपराधीनी नहीं शुद्धि वा० ॥ मरण विना को रीतें रे ॥ खड्ड काढीने मरण करेवा, वा०॥ मूके निज गले नीते रे ॥ ॥ ७॥ सचिवें फूटावी खड्ग ते लोधु,वा० ॥ शत बुधि तव बोले रे ॥j असमंजस राजन मामयु, कोई नहीं तुम तोलें रे। का ॥ ए ॥ न्यायी धर्म उन्नति तुमें करता, वा०॥ विश्वतो वाधार रे ॥ नोलाशे मरवा केम श्यो, कर्म तणा सद्गु प्रकार रे ॥ १७ ॥ यत । कस्य वाम्यति नो बुद्धि कर्मणा को न खमित ॥ नासुचत् घातर हेतु, पर्क किं नरताधिप ॥१॥ पूर्व ढाल ॥ शास्त्र जाण पण करमें मुजे, वा॥ नि दा प्रशता थाय रे ॥ पापनी गुदि मरणें न होये, तपथी कर्म सवि जाय रे॥०॥ ११॥थात्मप्रदेशें कर्म रघु ने,वा० ॥ मरण शरीर विनाश रे॥ पाप टालो प्रायमित्त थादरी, जाई गुरुने पास रे॥क० ११ ॥ जीवता ए

षष्ठ खंम
शए
सवि वात निपजाये, वा ॥ तेणें चिरजीवो स्वामी रे ॥ एम का पण
नाना विकल्प, न करे जोजन पामी रे॥क० ॥१३॥ ते साजलीने पुत्रीयो
श्रावी, वा ॥ प्रणमी एणी परें नासे रे ॥ न घटे तात ए तुमनें करवु,दोप
नहीं तुम पासें रे॥ क० ॥१॥ ए कारय सवि खलसगतिनु, वा॥ नित्य
वहे गिरिमा पाणी रे ॥ कठिन हतो पण खाडा पाडे,ए केम वात न जाणी
रे ॥ क० ॥ १५ ॥ नीचुं वदन करी कहे राजा वा ॥ दूर रहीने बोलो
रे ॥ मुख न देखाडी शकीये तुमनें,केम मुजने तुमें जीलो रे ॥ ॥१६॥
में तुम विधवापणुं वेखी, वा० ॥ काम कतूं में रे ॥ तुमनें जमाश्ने
मुखयं देखाडु, कहो में कस्यु ॐ रूडं रे ॥ ॥ १७॥ कुमरी कहे श्यो खेद
फरो बो, वा ॥ तुमें धन खरची थमने रे ॥ कला नणावी निपुण करी घणु,
ए शोना सवि तमनें रे ॥क० ॥१७॥श्रमची प्रतिज्ञानो जे सागर वा० ॥
विश्वोत्तम ए टाली रे ॥ कोण पूरत ए वातनो मनमा,हरख करो हो सना
ती रे॥क ॥ १९॥ बोरु कबोरु होये पण मावित्र, वा०॥ दीणां न होये
क्यारें रे ॥ ते विपरीत करतां नृप कदे, सतोप्यो सुप्रकारे रे ॥क॥२०॥
पण लानु दु जमाईथी अधिको, वा० ॥ सानली गई पति पासें रे॥वात सु
णावी मोकले पतिने,ते पण श्रावे तमासें रे ॥का २१ ॥ लजानन नूपति
में प्रणमी वा॥ कहे मुख एणी परें वाणी रे ॥ कन्या त्रणने राज्य वीच तु
में, सागर सम तुमें प्राणी रे ॥ क० ॥ २२॥ एक स्खलित खलना प्रेस्थायी,
वा० ॥ विधिवशथी थयु एहव रे ॥ध्रांतिथकी कहो कोण न नूले,तो ख क
रतु केहेतु रे ॥कण॥ २३ ॥ पश्चात्तापें कर्म खपे वली,वा० ॥ जेम बाछबली
जरत रे ॥ घात उद्यम ते पश्चात्तापें, कर्म विलय थया तरत रे॥॥२४॥
म करो खेद में काम करो निज,वा०॥ स्वस्थ तुमें जब था रे ॥ परना स्व
स्थ पाये तब सघली, एह विचार मत लाउरेक०॥ २५॥ एदवा वयण
सुणी कहे नूपति, वा० ॥ तुम अमृत सम वाणी रे ॥सांनली खनो
ताप गयो मुज, तुम सम को नहीं नाणी रे ॥ क० ॥ ॥ नाग्यवत
तु तु थविवेकी, वा ॥ जगमा जोडी न लाधे रे ॥ खलसगति मूको तुमें क
दु जुए थम हृदयमा बाधे रे ॥ क० ॥ २७॥ कुमरें मान्यु नृप प्रणमीने,
वा०॥ निजघर गया कुमार रे ॥ हे ख- नवमी ढालें, पद्मविजय कदे ज
यकार रे॥क० ॥ २७ ॥ सर्वगाथा ॥ २७ ॥

२३० जयानंद केवलीनो रास. ॥ दोहा ॥ ॥ थशन करे पण श्वतो,फरे न राज्यनु काम ॥ पाप मुदिपरका थम, धारीने रहयो धाम ॥ १ ॥ सिंह मारवा सुनटने, थाल में थवनीश ।। चोर पर खर घाटीने, राखशो मा करी रीश ॥ २॥ तेमज । रे ते तुरतमा, जाण्यं कुमरें जाम ॥ तव चिते 5 ख तातने, उपजशेन श्राम ॥ ३ ॥ कही प्रधान मुखे कुमर, मूकावे महानाग ॥ प्रेरणा करे । धान तव, सही अवसरनो लाग ॥४॥ ॥ ढाल दशमी॥श्रम घर मांझव सीयलोए । ए देशी॥ ॥ कुमर पूढे तव रायने ए, राय कहे सुणो वात ॥ साहेब मुणो । खकरु ए॥प्राण थमारा ले चलो ए,तुम विण ते न रहात ||सा ॥१॥ ह्या उग मुज पापथी रे, मानु न रहे मुज पास ॥ सा ॥ कुमर करे तव वीकथी रे, करवा नूप उन्नास ॥ सा ॥२॥ तुमयी थधिक न तात बे ए, रहेछ सुख थावास सा॥ करिय प्रणाम घरें गयो रे, चितवे ज्ञान प्रकाश ॥ सा ॥ ३ ॥ जागु जो नृप वेखीने रे, तो करशे निजघात । ॥साणा राज्यनो इक पण नथीए, एम नजरें थायात ॥ सा ॥४॥ जीवे मुज गुणवातथी ए, तेणें नवि मूकी जवाय ॥ सा॥ सिह यर्थी के राज्यनो ए, तेणें ए करे ये उपाय ता तात पदें पुत्रन रहे ए, ए हमा कां न विचार ॥ सा ॥ संतोषाशे खल वली ए, एम चिंतवी सुप्र कार ॥सा॥ ६ ॥ सिदनें कहे नाई सजिलो ए, तुमें जा निजधाम ॥ ॥ सा ॥ राज्य पिता, नोगवो ए, माहारे नहीं राज्यकाम ॥ सा ॥७॥ द्रुतो रहेछ तेणे हां ए,एम करी मोकले तास ॥ सा० ॥ युक्ति करी सम जावीया ए, तेह प्रधानने खास ता॥ पत्र लखे निज तातने ए,यापे प्रधाननें एद ॥ सा० ॥ सत्कारी विसर्किया ए, सिद सघातें तेद।सा० ॥ ॥ ए ॥ विजयपत्तन पोहोता वली ए, रायनें करे परणाम ॥ सा० ॥ हे तु नवि थाव्या तो ए, नांखे विस्तार ताम ॥ सा ॥ १०॥श्रीपति था यह सवि कह्यो ए, कुमरनां वयण रसाल सा० ॥ सिहसारने बोलावता योग्य वयणे नपाल ॥ सा॥११॥ श्रापे प्रधान कागल प्रत्ये रे, वाच तां दर्ष न माय ताणावस्तिश्री जिनवर नमी ए, विजयपसन वर गय ॥ सा ॥ १२ ॥ पूज्य थाराध्य काका प्रत्ये ए, तेम प्रोविजय निज तात ए,

षष्ठ खंम.
२३२
॥ सा ॥ लखमीपुरवर थी लखे ए, श्रीजयानद तुम जात ॥सा॥१३॥
एमी साष्टांगें नक्तिथी ए, अंजलि करी शिर गय ॥सा॥ विधियें विनयथ
की नमी ए, विनति करे चित्त लाय ॥सा॥१॥ पूज्य प्रसाद कुशल बड़े
ए, शुज चितन धनुनाव सा॥ पूज्यप्रसाद पत्र दीजीयें ए, जेम उल्लसे
मुज नाव ॥ सा० ॥ १५ ॥ कार्य मुणो समाचारनु ए,तापित तात वियोग
॥ सा० ॥थमृत सींचे जीवियो ए, जे तुम पत्र सयोग ॥ सा ॥ १६ ॥
जीवीशु ढवे धागलें ए, ते तुमचे मुपसाय ॥ सा० ॥ मुज वियोग न सही
शके ए, ते समजावी राय ॥ सा॥ १॥ योडादिन मांहे श्रावगुं ए,प्रणम
तातना पाय सा॥ ध्यान करु नित्य तातनु ए, लीलामा दिन जाय
॥ सा ॥१॥ सिहतारने मोकल्यो ए, ते स्थानक उद्देश ॥ता॥ शाखाम
ण नित्य कहावजो ए,शिर धरु तुम थादेश ॥सा॥१॥ विज्ञप्तिनें थाध्या
नहीं ए, हर्ष खेद घणो थाय सा॥ परिकरने दोय बांधवा ए, सुख उख
मिश्रित पाय ॥सा॥२॥ बचायी तेह पुरुप कहे ए, श्रीपमरथ नेपाल
॥ सा ॥ पुत्री पाणीग्रहणथी ए, मांझी कहे सुरसाल ॥सा ॥ २१ ॥
चरित्र कुमारनुं सांजली ए, ( खदायी सिहसार,) पर्षदा तेम दोय राय ॥
सा॥ चित्र थानदमयी थरे,कुमर प्रशस कराय ।। सा० ॥ २॥ सिहसार
निंदे सहुए,दवे नरपति देशमान॥साणा विसा सिंहसारयं ए,सद्ध गया नि
ज निज थान सा॥२॥ दशमी बहा खममा ए,पविजय कही ढालासा
॥ श्रीजयानवना रासमा ए,सुणतां मगलमाल ।सा॥श्वासर्वगाथा॥१५॥
॥दोहा॥
॥ एक दिन जयराजा श्श्युं, चिते चित्त मकार ॥ नाने राज्य नावे
नहीं, कहो नविश्राथ्यो कुमार ॥ १ ॥ अथवा निज करें अरजतो, राज्य
जखमी रणमांहि ।। थावे केम ते इहां कणे, थादर धरी उत्साहिं ॥ २॥
परथर्जित नवि मांस पण,सिह लीये ज्यु शीयाज ॥ वय ते तप विण व्य
तिक्रमे, था नव जाये थाल ॥३॥ एह राज्यनो ए धणी, निमित्तिये नि
रचार नारख्यो वे ते नली परें, वित्तथ न थाय किवार ॥ ॥श्राखे पराक्रम
एहनु, एदन थरथ थवन ॥ दोशे मोकल्यो सिइन,नृप थावाने नवदन ॥
॥ ५॥ थापी थापद बढ़ एणे, महोटी जे मरणत ॥ पापी दूरे पेखीयो,
इखदायी जे सुरंत ॥ ६ ॥

२३२
जयानदं केवलीनो राम.
॥ ढाल थगीयारमी ।। गो वानरूया चारती, शाहिरनो
अवतार ॥ रुद्ध गोकलीयुं । एदेशी ॥
॥ श्रापु राज्य हु एदने, नाइने मूक पास | पहल रुढ ने लिए
देशे एहनें, मागें चलायो तास ॥ए ॥ १ ॥ जो परजान पीडा,तो न
वि सहेश कुमार ॥ ए० ॥ एम चितवीन थापीयो,राज्य ते सिहसार Hy
॥ २ ॥नाईने प्रार्थना करी, राल्पा घरमा तेह ॥ ए॥ सिह पण धामा
करी, काको राख्या गेद ॥ ए॥३॥ पुत्र मिलन श्राशये रह्या, इवे श्री
जय राजान ए॥ महाजट गुरु पासे करे, तापस व्रत श्रादान । ए॥
॥ ॥ नाम रतनजट थापियु, हवे श्रीपति जे राय ॥ ए० ॥ राज्य विता
कांश नवि करे, धर्मे काल गमाय ॥ ए॥५॥ वनपालक हवे एकदा,
करे
थावी राजान ॥ ए ॥ धर्मप्रन सूरिवरू, पाठ धारीया उद्यान ॥ ए० ॥६॥
पूर्वं वैरागी हता, वली सनिली एह वात ॥ ए० ॥ दूधमा साकर परें, म
नमा दर्प न मात ॥ ए॥ ॥ दान थापी सतोपियो, वेगे गनवर खं
ध ॥ ए०॥ कुमर सामत मत्री मुखा, वत्र चामर सवध ॥ ए॥ ७ ॥ अंते
उरशु थावीया, पचानिगम प्रकार ॥ ए॥त्रण प्रदक्षिणा देनें, गुरुमें
करे नमस्कार ॥ ए०॥ ए ॥ धर्मलान गुरुये दियो, बेसे यथोचित गय ।
ए. ॥ धर्मवेशना गुरु दीये, धर्म सदा सुखदाय ॥ ए॥१०॥वापर
नासे वेगली, शिवमुख करतल धाय । ए॥ बाह्य अतर घरि मित्र जे,
नवमा नवि उलखाय ॥ ए० ॥ ११ ॥ मोद श्रतर शत्रु अ, बाह्य जन
काविक होय ॥एगातेद तज्यां सुख उपजे,तेणे तजीयें सद्ध कोय॥ए॥१५॥
सवेगाधिक मित्र,थतरगुरु ते बाह्याए॥ह नव परनव सुख दीये,एहज
जाणो माह्य ॥ ए॥१३॥ इत्यादिक मणी देशना, अवधिज्ञानी गुरु पा
स ॥ ए॥ प्रतिबोध्या बद्ध नव्यनें, पाम्या जिनधर्म वास ॥ ए०॥ १५ ॥
के आवक के सयमी,केक समकित्तवताए॥के कदाविक अनिमही,
नकनें गुणवत ॥ ए ॥ १५ ॥ नूप श्रति सवेगोयो, चित्तमा करे वि
चार ॥ए॥ बाह्य थरि मित्रन उतरल्या, अंतर वात अपार ॥ए॥१६॥
वाह्य थंतर परियह प्रत्ये, तेणें मी जंजाल ॥ ए. ॥ जैन दीक्षा श्रगी
करु, अतरशत्रुनें टाल ॥ ए॥१॥ एम पिती गुरुनें कहे, खेत कीक्षा
तुम पास ॥ ए ॥ पुत्र बनावें कुमरने, थापे राज्य समास ॥ ए॥१॥

पष्ट खम २३३ दीक्षा सेवरावे तदा, उत्सव करी अपार ॥ ए. ॥ अमारि पढा महीना लगें, सधपूजा करी सार ॥ ए ॥ १७ ॥ अहाई महोत्सव करे,दे दीनने दान ॥ ए॥ सूरि वचन वैराग्यना, सनिलीयां जेणे कान ॥ ए॥ २०॥ पांचशे राजकुमर तदा, तेम राणी शत पांच ॥ ए० ॥ निर्मम राज्य विषय व्यजी, मोह तणो परपंच ॥ ए॥१॥ स्नानादिक मगल करी, वस्त्र था जरण अनेक ॥ ए॥ चामर बत्र धरावतो, गज बेगे सुविवेक ॥ ए॥२॥ तूर अनेक वाजी जते, घढलक देता दान ।। ए ॥ लोक प्रशस करी जते, थाव्या नृप उद्यान ॥ ए० ॥ २३॥ मगल धवल गाई जते, गज रथ नट वट्ठ कोहि ॥ ए॥ वदी विरुद बोली जते, देश् श्राशीप कर जोडि ॥ ए॥ ॥ २४ ॥ सरवे लोक खमावीने, लोच करी गुरुपास ॥ ए० ॥ कहे नवसा यर तारीयें, करुणानिधि श्रावास ॥ ए॥ २५॥थागम विधियी दाखीया, दे तेदने उपदेश ॥ ए॥ किरिया शिक्षा नली परें,शास्त्र जणे सुविशेप ॥ ए० ॥ २६ ॥ नूपर्ने घणुं स्तवता थका, पोहोता निज निज गेह ॥ ए॥ श्रीजयानंद गुण रागीया, मुनि पर धरता नेह ॥ ए० ॥ २॥ दवे सिद्धांत जाता थका, करता उग्र विदार ॥ ए॥ तप वादश जे करे,गीतारथ पद धार ।। ए० ॥ २०॥ योग्य जाणी सूरिपद दीये, परिकर दीधो सर्व ॥ ए॥ नव्यजीव प्रतिवोधता, विचरे मही निर्गर्व ॥ ए०॥ ए॥ जिनशासन पर जावता, लब्धि तो नमार ॥ ए॥ केवलज्ञान लही करी,शिववधू वरिया सार ॥ ए॥३०॥ श्रीजयानदना रासमा, बसे खमें ढाल ॥ ए ॥ पद्म कहे अग्यारमी, सुणतां मगलमाल ॥ ए ॥३१॥ सर्वगाथा ॥३५॥ ॥दोहा॥ ॥ श्रीजयानदनी नृप सवे, सेवा करे सुखदाय ॥ विविध देशने वश क री, राज्य वधारे राय ॥१॥ जिनमत प्रौढ़ता जगतमा, पुस्यवत एथिवीश ॥ कर टाले न्यायज करे, दान दिये निश दीश ॥२॥ प्रजा सुखी तव सपजे, सुर तिम सुरनो स्वामि ॥ तृण समान गणे ते तदा मट थहकार वदाम ॥३॥ ॥ ढाल वारमी ॥ मुगुण मुगुण सोनागी नहीपमा दोजी ॥ ए देशी ॥ । एकदिन एकदिन नृपने वीनवे दोजी, थावीने वनपाल ॥ मावित्र मा चित्र तुमचा उद्यानमा दोजी, थाव्या एणे ताल ॥ ए॥१॥ सायें सा थे परिकर थोडलो होजी, सांजली हर्ष न माय ॥ दान दान दीये तस ह २३४ जयानंद केवलीनो रास. पेनु होजी, श्रगे पुलकित थाय ॥ ए॥२॥ चाल्यो घायो नृप पालो को होजी,हय गय विण परिवार ॥ उत्सुफ उत्सुकतायें टक्या नहीं रोगी, गया उद्यान मजार ए॥॥ दर्प हप यांसुये परखालतो होजी, प्रामे मा वित्र पाय ॥ वे देश श्रालिगन चुवता होजी, याशिष बह दीये मात्र । ए॥४॥थानद थानद सहीने पूछता होनी, खेम प्रमादिक बात ॥ णी राणी त्रणे जाणी करी दोजी,यावी करें प्रणिपात ॥ ए॥ ५॥ वडुरो वगुरो देखी थाणदीया होजी,याच्यो हवे परिवार ॥ तातन तातने गज वेता रिया दोजी, मात सिहासन धार ॥ ए०॥ ६ ॥ पोते पोते उत्र नृपने घरे होजी, गौरव करी बद मान ॥ लाव्या लाव्या नृप निजमदिरें दोजी बेठा विष्टर थान ॥ ए॥ ॥ पाठ पाठ पी वेशी करी होनी, उत्संगें पर लाय ॥ देखी देखी सना थति रीजती होनी, सद्भुनें करे विदाय ॥ ए. ॥ ॥ ॥ पूजा पूजानें स्नान नोलन करे दोनी, साथे सद परिवार ॥ श्रय सरे अवसर पूछे तातने दोजी, स्नेह नक्ति अपार ।एजाए। कधि दिने परिकर थोडले होजी, थावत् केम अकस्मात ॥ यांसु थांसु मित्र यांखें कहे दोजी, सोनल वत्स तु वात ॥ ए॥१०॥राज्य राज्य देश सिहसा रने दोजी, नाता तापस थाय ॥थातां यातां तापस मुज वारियो होजी, सिहें विनय देखाय ॥ ए॥११॥ नक्ति नक्ति देखावे तेदवी होजी, वीतो केतोक काल ॥ माया मायावान मन नवि लघु दोजी, उष्टनु मन विक राल ॥ ए॥ १२ ॥ एकदिन एकदिन थालोचन मि होजी, तेडपो मुन ने एकांत ॥ ऐ पण तु पण विश्वासें गयो दोजी, एकज धरी मन खांत ए॥ १३ ॥ पूर्वे पूर्वे रचित सामग्री दोजी, बांधी बंधन मुङ॥ बदी बंधी खाने मुज नाखीयो दोजी, तिमदिन माता तुक । ए॥ १४ ॥ महारा म हारा वस्ता नारखीयां होजी,बांधी गुप्तज थान ॥ केश्क केश्क नाशीने गया होजी, पामी अवसर तान ॥ ए॥ १५॥ माहारु माहारु घर लूटपु एवं होजी, निज वश कीधतो देश ॥ चोकी चोकीमाहे दु रहूँ दोजी, विवर न लनु लवलेश ॥ ए॥ १६ ॥ परजा परजा बद्ध मुज रागिणी होजी, जाणी राज्यनो नाश ॥ तेणें ए तेणें ए काम कस्यु वृथा होजी, मिथ्या मि च्या निवास ॥ए॥१॥ सेवक सेवक सुरदत्त माहरो दोजी,बीजो वीरदच नाम ॥ माहरा मादरा नक्तिवता घणा दोजी, नाशी गया कोई गम ।।

पष्ठ खंभ स ॥ २३५ ए॥ १७ ॥ सेवक सेवक पण मुज मित्र ने होजा, नामें नरपति धीर ॥ तेदनें तेदने घर ते बिद्व रह्या होजी, साहस वड गनीर ॥ ए० ॥ १ ॥ दोधी दीधी सुरंग तिहाथकी दोजी, यावत गुप्नि थान ॥ कालें कालें हुन नर परखीये दोजी कोधी मुज तेणें शान ॥ ए॥ २० ॥ प्रिया प्रिया सहित मुन काढायो होजी, लाव्या रात्रियें गेह ॥ स्वामी स्वामीनी नक्ति एम जापीयें होजी, न गणे प्राणनो नेह ॥ ए॥ २१ ॥ पूर्वं पूर्व सामग्री करी दोजी, नाशी थाव्या मुज सग ॥ सर्व सर्वे सत्त्व धरी करी होजी, धरता चित्त उमग ॥ए॥२२॥ धीर धीर शूरवीरशु चढ्या होजी,कोक स्या नक पाम ॥ श्राव्या श्राव्या सकेतिक नर सद्ध होजी,यानादिकशु ते गम ॥ ए ॥ २३ ॥ सहन सकन सघले माहरा होजी, थाव्या अनुक्रमें एय ।। स्वजन वजन केक ठे गुप्तिमा होजी, खीया ने हजी तेथ ॥ ए ॥ २४ ॥ तेदनें तेहने मृकाववा योग्य तु दोजी, सनिलो तेह कुमार ॥ खेद खेद प्रमोद याश्चर्यथी होजी,चिते चित्त मकार ॥ ए॥ २५॥ कीधो कीयो उपकार में केटलो दोजी,पण उर्जन सिहसार ॥ प्राण प्राण बढ़ वार ठगारिये दोजी, खल नवि निज निरधार ॥ ए॥ २६ ॥ यत ॥ धूम पयो धरपद कयमप्यवाप्य, वर्षावुनि शमयति ज्वलनस्य तापं॥देवादवाप्य खल नीचजन प्रतिष्ठा, प्राय स्वबंधुजनमेव तिरस्करोति ॥१॥ पूर्वढाल ॥ खेद खेद करो शे मुज बता दोजी,फरशु सर्वनी सार ॥ देशुं देशु शिक्षा नलि ना तिशु दोजी, जे कर्त्ता थपकार ॥ ए॥ २७॥ करशु करशु प्रसाद ते उपरें होजी, जेणें तुम कयो उपकार ॥ त्रणे त्रणे सुनट वोलाविया होजी,गुण स्तवे वार वार ॥ए॥ना स्वामी स्वामी नक्ता तुम सत्त्वनें दोजी,वरणवीयें कहो केम ॥ तेहना तेदना कुटुबनें तेडीने दोजी,करे सत्कार ते एम ॥ए ॥२॥ वस्त्र वस्त्र थानरणादिक घणां होजी,दीये प्रत्येक तास ॥ देश देश एकेक दिये त्रणने होजी, ते लह्या दर्प उन्नास ए॥३०॥ यत ॥ सुवर्ण पुप्पां एथिवी, मुश्चिन्वति नरास्त्रयारश्चस्तविद्यश्च,यश्चनानाति से वितु॥१॥ ॥ पूर्वढाल ॥ निजवश निजवश देश ते जर करे दोजी,सेवे दोय राजान ।। बीजा वीजा साथै थाव्या तेहनें दोजी,करता ग्रासनु दान ॥ए॥३१॥ उसे के खेमें वारमी होनी, पने नाखी ए ढाल ॥ सुपजो सुगनो श्रीजयान दना होजी, रासमा वात रसात ॥ ए० ॥ ३२ ॥ सर्वगाथा ।। ३७ ॥

से २३६ जयानंद केवलीनो रास. ॥दोहा॥ ॥शीवामण सिंहसारन, श्रीजयानद सनर ॥ माणस निज मूकारक, दूत मोकले ॥१॥ विसजयपुर जा वेगन, कहेजे एणीपर काम । म ज्य ब्रश नय राखीने, हाथ थयो हराम ॥ २ ॥ ते दी। इस तातनें,लोपी सहुनी लाज ॥ राज्य थाप्यो में रंगशु, फीधु थपतु काज ॥३॥ देने या दान करु, वारू नही ए वात ।। मूकजे वजन ते माहरां, पागल सुणीभ वदात ॥ ॥ हरिनु मांस जवूक हो, कहेवी वात कहाय ॥ न मूके तो निग्रह करु, एहमा नही थन्याय ॥ ५ ॥ कूतरो पय कुत्सित करे, ताटनम पामे तेद ॥ लेख लखी एम मोकले, पागल कहु वली एह ॥ ६ ॥ ॥ ढाल तेरमी । मनमोहन मनमोहन पावन देहडीजी ॥ ए देशी ॥ ॥ वली सुराजे चली सुणजे महारा तातनुजी, सूटधन लूटयु धन थणी वध हो ॥ तिम वजन तिम स्वजनने सत्कारी घणुजी, मोकलजे मोकलजे टाली धध हो ॥ १ ॥ जगमाहे जगमाहे श्रीजयानद लयोनी ॥ ए थाकणी ॥ एम न करे एम न करे तो युझने सज थजे जी, दूतमुख थो दूतमुखथी जाणे सिहसार दो॥ वांची पत्र वांची पत्रनें कप्यो हृदय मां जी, नयनीत नयनीत थयो तेथपार हो ॥ ज०॥॥ श्रीविजय श्री विजयरायनु धन सवेनी,वली स्वजन वली स्वजननें दिये बहुमान हो ॥ वली नेटणु वली नेटणुं श्रीनयानदनेजी, सखे लेख लखे लेख मूकी थनिमान हो ॥ ज० ॥ ३ ॥ देश तृपनो देश नृपनो पालो थापीयोजी, इतनें कहे दू तर्ने फहे नरम वचन्न दो ॥ दूत स्वजन दूत स्वजन पोहोता सद्गु नृपकने जी, वात सघली वात सघली सुरो नृप कन्न दो ॥ज॥॥देखी जाणी देखी जाणीने दरो ते बिटुंजी,नृप थापे नृप थापे स्वजनने देश हो । एक दि वसें एक दिवसें श्रीजयानदनेजी, माय ताय माय ताय ने मुविशेष हो ॥नम् ॥ ५ ॥ विजयपुरथी विजयपुरयी गया ते विनथकीजी, कहो चरि त्र कहो चरित्र जे निपन्यु तुम्म दो ॥ श्वाविण श्वाविण तात थाणाथ की जी, कहे कुमर कहे कुमर चरित्र मुणो श्रम्म दो ॥ ज०॥ ६॥ मुणी माचित्र सुणी मावित्र थाणदमय थयांजी, मुतनः सुतन श्रीविज य राय हो । चित्त चमक्या चित्त चमक्या बहु नृप सेवांजी, काढ़े मुखर्मा काढे सुखमां काल थमाय हो ॥ ज०॥ ॥ सप्तांग सप्तांग राज्यनें पालता पष्ठ खंम. २३७ जी, निज थर्जित निज अर्जित राज्य विशाल हो । निज तातने निज ता तने घाग्रह वनु करीजी,राज्य थापे राज्य थापे सुत नूपाल हो जाता नृप उत्तम नृप उत्तमनें निरीह घणो जी ॥ पुत्र प्रेम पुत्र प्रेम दादिये ते ह हो ॥ करे थंगी करे थंगीने श्रीजयानद जी, युवराज्ये युवराज्ये नवे ससनेद हो ज०॥ ए॥ कोइयाणा कोयाणा न लोपे ते विट्ठ तपीजी, समसिंहासने समसिहासने बेमत हो ॥ वेप नूपण वेष नूपण न्याय तेजें करीजी, दोय सरिखा दोय सरिखा महापुण्यवत हो ॥ज॥१०॥ नीमकांत जीमकात गुरों दोय सोहताजी, च सूरय च सूरय के दोय इद हो । पिता पुत्र पिता पुत्रस्नेही मुखमा रहेजी ॥ एक दिवस एक दिवस श्रीश्रीज यानद हो ॥ ज० ॥११॥ देश साधवा देश साधवानी ना करीजी, राज्य चिता राज्यचिता पिता शिर थापी हो ॥ शक विक्रम शक्रविक्रम राज्य चू डामणिजी, सद्ध नृपमा सदु नृपमा थति परताप हो ॥ ज०॥ १२ ॥ मध्य खमें मध्यखमें लीला साधीयोजी, चक्रपुरनो चकपुरनो नृप चक्रसेन हो। जयपुरनो जयपुरनो जयी शत्रुजय करेजी, थति बलीयो थति बलीयो जी तायें केन दो ॥ ज० ॥ १३ ॥ जयती जयंती नयरीनो धणी जी, जयंत जयंत शत्रु करे अंत हो ॥ पुरदरपुर पुरदरपुर पति नर केशरी जी, नीमरा जा नीमराजा नोगवती कत दो ॥ ज॥१४॥ सुमगल सुमगल कौशल नो पति नी, नदीपुरनो नदीपुरनो नरपति नद हो । सूर्य पुरनो सूर्य पुरनो सुरमदी पतीजी, वली एथिवी वली प्रथिवीचट कलाचद हो ॥ज॥१५॥ रुपराजा रुपराजा प्रमुख सेवक कस्यानी, एम साधी एम साधी नूप थ नेक दो ॥ सैन्य सायर सैन्य सायर लग्नें थावीयाजी, मध्यखम मध्यख मसाधी सुविवेक हो॥ज०॥१६॥ तात प्रणमे तात प्रणमे निजपुर धावीने जी, सेवा करता सेवा करता निर थहकार हो ॥ राजराजा राजराजा नो बिरुद वहेतो श्रकोजी, प्रसिद्धि प्रतिदि लहे मुविस्तार दो ॥ ज० ॥ ॥१७॥ ससराने ससराने पासेंथा तेडावतो जी, निजपरणी निजपरण। पूरवला नारि दो ॥ लेखमाहे लेखमांहे निशानी प्रमुख लखोजी, ससरा पण ससरा पण मुणीथ तिवार हो ॥ ज० ॥ १७ ॥ प्रचुरीत प्रचुरीतें सेव वो एहनें जी, सहानायें सङनाश्य सेववो सार दो ॥ एम चितवी एम चितवी सद्गु ल नेटणां नी, निजकुमरी निजकुमरी खेई हार दो ॥ज॥

१३७ जयानंद केवलीनो रास. ॥१ामणिमजरी मणिमजरी लेयाचीयो जी,श्रीविगाल श्रीविगाल अनो नाथ हो ॥ श्रतेवर अतेउरण यावी नमेनी. दीये पुत्री दीये पुत्री हा हाथ हो ॥ ज० ॥ २० ॥ हेमपुर हेमपुर धणी सोनाग्यमनरी जी, पण थनृप पद्मरथनृप थावे वेग हो ॥ निज विजय निज विजयसुदरी सावि यो जी, थतेतर थतेवर लेड सतेग हो॥०॥ २१ ॥ कमलपन कमलान से निन कुवरीजी, कमलसुंदरी कमलसुदरी रति थनुहार हो ॥ श्रीजय ए श्रीजय पण धादर थापता जी, वासयाम वासग्राम थापे तस सार हो ॥ ज० ॥ २२ ॥ रमणीशु रमणीशु रमतो नित्यप्रत्येजी, राज्य सोपी रा ज्य सोपी तातने ताम हो ॥ श्रीजय पण श्रीजय पण नूपति रगझुंजी, सुख नोगवे सुख जोगवे अति उद्दाम हो ॥ ज० ॥ २३ ॥ तस शोना तस शोना सिरिवल देखीनेजी, सतरादिक ससरादिक लहे चमत्कार हो । खमें बछे खमें ढाल ते तेरमीजी,कहे पद्म कहे पद्मसुएयो जयकार हो॥३३॥ ॥ दोहा॥ ॥ श्रीजयानद सना करी, ताता वेता ताम ॥ ससरा प्रमुख मलिस वे, थचरिज लहे थनिराम ॥ १॥ एणे थवसर तिहां भावीयो,दूरदेशची वह ॥ गायन पेटक गुणी घणु, सुकत तेहमा सुलक्ष ॥ ५ ॥ मधुरध्वनि गाये मोजमा,वली एक तेदने वाम ॥ सर्वकला सावधान जे,गीतना स्वरने ग्राम ॥ ३ ॥ जरता गावा नणी,तुरत मेलवे तान ॥ राजसनामा रंग, थाव्या थवसर जाए ॥४॥ ॥ ढाल चौदमी॥ मोहनगारा दो राज, रूडा माहारा सांजल मुगुणा सूडा ॥ ए देशी॥ ॥ मुगुण सौनागो दो राज, वारू म्हारु गीत सुणो सुखकारू ॥ए था कणी ॥ पदमरथ राजा तणीजी, पुत्री दोय निधान || लघु थापी तिहा निघ्ननें जी,इतर दीधी राजान के ॥१॥१॥ तिहाथी मामीनें कहेजी, गायन घर गई जाव ॥ सुख दुख पूर्वन सांनस्युजी, रुदन कञ्जु तेरों ताव के ॥ 5 ॥ २ ॥ सुकन कहे रोवे किश्युंजी, रंगमाहें करे नंग ॥ था अवसर के दाननोजी, साजन मलियो संग के ॥ सु० ॥३॥ यत ॥ तुद गीय गु ऐण रंजिया, सुचिरं सुदरी कामदायया ॥ कह रोऽसि मुठया खया, व सरे नो मुलको स्वणो पुणे ॥१॥ पूर्वढाल ॥ रोतु सूकी गायतीजी, किम पष्ट खम २३ए कहि गदगद वाणी ॥ गीतना बलथी सर्वनेंजी, चित्रकारी गाय गान के ॥ ॥ मुण् ॥ ४ ॥ तयाहि ॥ किदपउम पुर किह परमपहु, किह पिथडा न गिण निल्न गदु ॥ जयसुंदरि गायण घरिहिं गया, दह गाय धएकति द व दया ॥ १ ॥ पूर्वढाल ॥ निन नरतार थनिधा मणी जी,विस्मित पद्म रथ राय ॥ चोपथी जूवे नृप जेटले जी, निजमुता उलखे ताय के ॥ सु० ॥ ॥ ५ ॥ वत्त वत्स रे तु किदांजी, केम यावी ए गय ॥ एम विलपती वलगी गलेजी, थावी एहनी माय के ॥ ॥ ६ ॥ बेतु परस्पर रोवता जी, थाव्यो तेहनो ताय ॥ ते पण उलखी रोवता जी, प्रणमे तातना पाय के ॥ मु० ॥ ४ ॥ करुणामय ते सना थजी, जाणवा तत्त्वस्वरूप ॥ जपनें पूजे ए किश्यु जी, तव नांखे एम नूप के ॥ सु०॥ ॥ वे कन्या मुज तेह में जी, थापी समस्या एक, पूरी अनुकूल पहेली जी, चित्तमा धरीय वि वेक के ॥ सु०॥ ॥ बीजी प्रतिकूल पूरती जी, रीश चढी मुन ताम ॥ कारिमा निननणी तदा जी, आपी होणे नाम के ॥ सु०॥ १० ॥ तूने ज यमुंदरी जणीजी, नरकेशरी नृप जात ॥ थापी हर्षे राखीयो जी, केक दिन वहीजात के ॥ सु०॥ ११॥ शीव दीधी में एकदा जी, सेश प्रिया ग यो घेर ॥ गातां हमणां उलखी जी, जयसुदरी एणी पेर के ॥ १०॥१२॥ स्वर थनुसारे जाणीयें जी,पुत्री 5 खमां लीन ॥ श्रागल हु जाए नहीं जी, एहज कहेशे अदीन के ॥ सु० ॥१॥ नृप थाणाथी सा कहे जी, नाj निज सहेर ।। नोग क्रीडा मुजरां करेजी, अति थासक्त निजघेर के ॥ Ho ॥ १४ ॥ वसत ऋतुमा थन्यदा जी, कुसुमाकर उद्यान ॥ दोय गाव ते नय रथी जी, रमवा गया तेणे थान के ।मु०॥ १५॥ क्रीडाघर तिहां मुबरु जी, ढाकी कुसुमनी माल ॥ रंजास्तने सोदतु जी, दीसे शय्या सुकुमाल के ॥ सु०॥१६॥ लोग सामग्री ले। सवे जी, दोय मासनें काज ॥ दूर सु जट चौकी रह्या जी, दासी वृद चिटु पाज के ॥ सु० ॥१॥ गीत नाटक वारांगना जी, करती थतिहिं रसाल ॥ नोगासक्ता एणी परेंजी, काढेरीज मां काल के ॥ ९॥ १७॥ एवं श्रवसर हवे अन्यदा जी, सहसकूटनो स्वामी ॥ सैन्य सहित तिहा यावीयो जी, महासेन एवं नाम के ॥ १० ॥ ॥ १५ ॥ जुटवा कोइक गामने जी, पण तस द्रुवो जाण ॥ खाली पाव्या ते फरीजी, यास्या थम तेरों टाण के ॥ सु० ॥२०॥ तुम जमाइ लडवा ग 980 जयानंद केवलीनो राम. याजी, रात्रि समे तव तेह ।। नागे जमाऽ तुम तणोजी, खटगु केली और के ।। सु० ॥ २१ ॥ मुज पकढी ले गयो जी, कहे मुज करणुं नारी नगना जयथकी जी,त्रण दिन कौधो न थाहार के ।सु०॥२२ ॥ परिवार कहे तुलाने जी, थापर तुज जरतार ॥ धन से तेणे कारणे जी, कर मुखमा श्राहार के ॥ सु०॥ २३ ॥ जाणी समाधान में कन्युनी, श्राहार परी विशवास ॥ हवे जे थागत नापजे की, ते सुणो कम क्लिास के सु.॥ ॥ २४ ॥ खमं चौदमी जी, पद्मविजयें कही टाल ॥ श्रीजयानदना रा समा जी, धागल वात रसाल के ।। सु० ॥ २५॥ सर्वगाथा ।। ४४६ ॥ ॥ दोहा॥ ॥ पन्नीपतिनी जे प्रिया,शोक्य एमाहास शाल॥पर्वतमाथी पाधरी,ौष धी लावी घाल ॥१॥ नोजनमा नेली दीये,जलोदर वाध्य जोर ॥ वैद्य औषष विण गद कहो, केम टले कर्म कठोर ॥ २ ॥ सुकठ उपर समजणे, ठेवारी के दान ॥ गीत सुणी रगें करी, शोक्यनी श्राणी शान॥३॥पलिपति पोते तदा,धारी एहवु ध्यान ॥ शाता करवा सोपतो, विजयसुदरी शुन वान ॥ OR रूप लोनें रंगें ग्रही, सज करच एम शान ॥ पसखम पत्तन पामीयो,इयत | करी दान ॥ ५ ॥ वारु मुमति वैद्य ने, मालम करी गद मूल ।। रेच प्रमु ख देई रोगनें, उपशम करे थनुकूल ॥ ६॥ सुमतिने सतोपोयो, मानिनी कीवी मुह ॥ गीत शीखव्यां गेलछु, गाउ गीत ए गुरु ॥ ४ ॥ नूपादिकने ज ली परें,रीजवी क्षेत्र रिति॥ महाधनी मुजपति भयो, सर्वकला परसि॥७॥ ॥ ढाल पंदरमी॥ सनव जिन अवधारीयें। ए देशी ॥ ॥ जाणी श्रीजयानदनें, मलीय बकुला राय सोनागी ॥ श्राव्या तब तुम जाणीयां, सनस्यो सुख समवाय सोनागी॥१॥ मद मत करजो मानवी ॥ ए थांकणी ॥ चरित्र पोतार्नु जणाववा, गायु गीत नवीन ॥ सोग थागल वात सवे लदो, छ कदु तुमें बो प्रवीण सोपा म॥ २॥ विजयस दरी निम्नने, दीधीशु थयुं तास सो ॥ किदा बे खबर न तेदनी, बडु रखनो श्रावास सो म॥॥ निन्न नहीं ते नृप कहे, एतो राजकुमार सो० ॥ नाग्य परीक्षा कारणे, ताशरूपनो धार सो० ॥ म० ॥४॥ मुज जीत्यो जगनीत तो, श्रीविजयनृप पूत सो० ॥ राजें श्रीजयानदजी, जे राखे घरसूत सो०॥म ॥ ५॥ मावे पासें ए रही, नूपतिनु षड्न मान पष्ठ खं २४२ सो० ॥ विजयसुंदरी बहेनडी, ताहरी जो थसमान सो ॥ म ॥ ६ ॥ अंगुलीयें देखाहतो, मलवा जाये जाम सो॥ वलगी कहें तीने,विजय सुदरी ताम सो ॥ म ॥ ७ ॥ रोवे तव ते बिट्ठ जणी, रुधी रुदन तिवा र सो ॥ विजयमुदरी एम कहे, धन्य तुज शीयल थाचार सो० ॥ म॥ ॥ ७॥ तेदिन वात साची कही,ते दिन सना मकार सो ॥ देव गुरु धर्म तत्त्वनो, महिमा अगम अपार ॥सोगामाया में समस्या पूरी तदा, तेद यतात्त्विक जाण सो० ॥ फल विहुनें तेदवां थयां, कार्य कारण परमाण सो० ॥ म०॥ १० ॥ नास्तिकवादे दु हणी, रुडु मनाववा तात ॥सो॥ पूरी समस्या तेह ,फल थापद थायात सो० ॥ म०॥ ११ ॥ नूप प्रसन्न अप्रसन्नथी,न दोय मुख ख कोय सो० ॥ सुख 5 ख पुस्यनें पापथ), शहां दृष्टांत श्रम होय सो० ॥ म० ॥ १२॥ वात सुणी ते बेतु तणी, ए म कहे श्रीजयानद सो० ॥ परषदाने समजाववा, धुणतां धर्मजिणद सो० ॥म॥१३॥ विस्मय लोक लयां घणो दवे सुकत बोलाय ॥ सो० ॥ इष्ठित धन श्रापी करी, विजयसुंदरी थादाय सो० ॥ म० ॥ १४ ॥ थापी तेदना तातनें,ते पण घरमां लाय सो ॥ शास्त्र विधे तस शुरू करी, घरमा राखे ताय सो० ॥ म० ॥ १५ ॥ तेदना नगरथी तेडियो, नरकुलर य सो० ॥ लवको देश बढ़ थापतो, विजयसुदरी सुपसाय सो० ॥ म० ॥ ॥ १६ ॥ ससरादिकथी लाजतो, लेइ प्रिया निज पाणि सो० ॥ वीर नद्य निजपुरे गयो, दर्प घणो मन थाणि सो० ॥ म० ॥ १ ॥ प्रीति वधारी सद्गु प्रत्ये,करी थादर सत्कार सो० ॥ वोसा निजपुरें गया, करता धर्म विचार सो ॥ म ॥१८॥ राज्य सोंपा निज तातने, कुमर प्रिया के लि सो० ॥ करता धर्म लोपे नहीं, चित्तहु तेदमा नेली सो० ॥म॥१॥ वनपालक थावी कहे, फूल्यो नूप वसत सो० ॥ कोकिलहा टनुका करे, चदनवास वमत ॥ सो॥ म॥ २०॥ चपक चोखा फूलीया, तेम पु नागनी श्रेणि सो ॥ अली जकार करी रह्या, करु विनति तुम ते सो० ॥ म ॥ २१ ॥ नूप श्रीविजय ते सांजली, कहे निजपुत्रने एम सो० ॥ वय वीयु कीहाता, तेरों रमवा जाचं केम सो० ॥ म ॥२२॥ तेणे तुमें नीकलो कीडवा, तुम विण जन नहीं जाय तो ॥ तात था णा शिर उपरें, धारी कुवर राय सो० ॥ म० ॥ २३ ॥ अतेवर परिवारशं, जेरा , २४२ जयानंद केवलीनो रास. सामग्री सवि लेय सो० ॥ नगर लोकशुं निकल्या, देता दान अमेय सो। आम ॥ २४ ॥ के खर्म ए कही, पन्नरमी वर ढाल | सो०॥ पवित कहे सोनलो, थागत वात रसाल सो० ।। म० ॥२५॥ सर्वगाथा ॥m ॥दोहा॥ ॥ निज निन करें नीकल्या, पुरजन वह परिवार ।। वामित्र बडुपिय वानते, नवरंग गीत गाय नार ॥ १ ॥ नाटकीया बद नाचता, खेला खेले खांत, खजूर प्रमुख खाय खायन, तरुण रमे एकांत ॥२॥ नाघर सूवे, प्रतिपादपपुप्प पाणि ॥ वसत किणविध वरणवु, जिहां बद्ध कामनु जाण ॥३॥ क्रीडासरें बढ़ कीडतां, नर नारी निर्वाण ॥ साँचे जल शृगी घणु, गाये वसतनां गाण ॥ ४ ॥ क्रीडा करी काठे रह्या,शोनावे सरपाल । सिहासने सोहे थति, नरनारी नृपाल ॥ ५ ॥ ॥ ढाल शोलमी ॥ शारद बुदि दायी ॥ ए देशी ।। ॥ ढाल ॥ण अवसर थाव्यो, जिन एक कर चाप ॥ व्याघ्रचर्म ते पहेखा, दीन करे थालाप ॥ श्वान रहायें वांध्यो, मोरपिच धस्यां माथे ॥ वाणनाथा वितु दिश, केइ निन्न तस साथे ॥ १ ॥ त्रुटक ॥ तेहमाथी ए क श्रावी प्रणमे, नरपति पूछे ताम ॥ कोण तुमें तव जिन्न कहे सुणो, मा हारी वात ते थाम॥ चमसिद पलिपति राज्ये, यमर्ग पर्वत स्वामि ॥ प्ति दव्याघ्र नामें सुत तेदने,तात ते परनवगामि ॥२॥ढाल। चिद्ध जाइयें लीधु, वहेंची राज्य उदार । सिंद लीये तव बलथी,राज्य तथा वर नारि ॥ ते : खथी जमतो, वनमा मृगें जीवतो, तुम पासें थाव्यो, ते ई थरज करतो ॥ ३ ॥त्रु० ॥ ते ना मुज क्रीडा करतो,सिंह थायो इण वनमा ॥ मुज पत्नी रमतो बलीयो, दु पण बलु घणु तना ॥ उबलनु बल राजा जा णी, थाव्यो ढुं तुम पासें ॥ तुम सैन्यनो कोलाहल मुणीने, रखे ते दोषी नासे ॥४॥उक्त च ॥ तस्य बल राजा,बालस्य रुदन बल ॥ बल मूर्ख स्य मौनत्व, तस्करस्पानृतं बल ॥ १ ॥ पुर्बलानामनापानां, पालवत पस्विना । थनार्यपरिनूतानां,सर्वेषां पार्थिवोगति ॥२॥ शकट पंचदस्तेन दशहस्तेन वाजीन ॥ कुंजर शतहस्तेन, देशत्यागेन उर्जन ॥३॥ श्रा चार कुलमाख्याति, देशमाख्याति नाषित ॥ सनम स्नेहमारख्याति, वपुरा ख्याति नोजन ॥ ॥ दूघेतो धात वधे,घीय वधे कोपरी ॥ गोजें तो पेपर र षष्ठ खंम. २४३ धे, घशे वधे उफरी॥१॥ ढाल ॥ तेणें कारण चालो, एकाकी तुमें राय ॥ जो शक्ति होवे,तो विलंब बहु थाय ॥ ते उष्टने मारी,माहारी प्रिया मूकावो, सलान उपकारी, माहारुं राज्य थपावो ॥ ५ ॥ त्रु०॥ सजान पर थापद दे खीने, अधिक सौजन्य धारे ॥ ग्रीपमें तरु नव पल्लव दोवे, यातप सदुनो वारे ॥ ते सांजलीने राजा कोप्यो, मुज धरतीमा थन्याय ॥ केम करे एहवु माहारा राज्यनें, मोहोटुं कलंक ते थाय ॥६॥ढाल॥ देखाड तु मुनने, एहवो निग्रह कोजें ॥क्षण मात्र न सही,एणी परें राय वदीजें ॥बाना निकलिया, निलयं ले समशेर । मदोटा जे वोले, तेहमा न पडे फेर ॥ 8 ॥त्रु०॥ व न निकुजने मुख जई वोले,निन्नरायने एम ॥ था वनमा मादारो नाई,ते गेंद पेमु केम ॥वीहीक लागे तेणे हाहिज रहेयं, एम सुणी पेसे राय ॥ वनमा सघले खोल्यो पण ते, न सह्यो किणही वाय ॥ ७ ॥ ढाल ॥ नृप पाठो थाव्यो, निम्र तिहां नवि देखे, नृप एम विचारे, इश्जाल ए लेखे ।। पुरनपी जव थावे, गगनथी एक विमान ॥थाव्यु तेदमांथी, नोकल्यो खे चर प्रधान ।। ए ॥त्रुणाथावि नूपने प्रणमी बोले, शाने करो विचार ॥ ए सपली माया माहारी, हुलाव्यो एणे ठार ॥ तेदनु कारण सोनल नर वर, वैतादय नगर पचाश ॥ दक्षिणदिशि तेदमा रथनूपुर, चकवाल ते खा स ॥१७॥ ढाल ॥ तिहां पवनवेग दु,वनुविद्याधर स्वामी ॥ दक्षिणदिशि खग सह, माहारी थाणाना कामी ॥ वजवेग माहारे मुत, वनुविद्या जेरों सा धी॥ कस्यु पाणीग्रहण, कीर्ति जगमा वाधा ॥ ११ ॥ त्रु० ॥ हेमगिरिशृगें हेमपुर थाप्यु, तिहां कीडे सुविशाल ॥ बछे खमें पद्मविजयें कही, रगें शो लमी ढाल ॥ श्रीजयानदना रासमा रुडी, साता मगलमाल । पुस्यनां व लथी थागल वातो, सुदर घणु सुरसात ॥ १२ ॥ सर्वगाथा ॥ ४ए६ ॥ ॥ दोहा॥ ॥ बलियो विद्यावलयकी, परित बहु परिवार ॥ वसे नालधर पुर पहुं, सुवर्ण मणिग्रह सार ॥ १ ॥ सार सूरि तस स्वामिनी,कामादी श्रीकार ॥ योगिनी वृद पूजे जिका, परिहदरूप अपार ॥ २ ॥ नगर मध्ये जुवनें रदी, तेद नुवनपुर ताम ॥ पीठ सुवर्ण मणिमय प्रवर, योगिनी पीठ जग नाम ॥ ३ ॥ थाराधक तिहां थावीने, साधि योगिनी सहित ॥ पीउने चिद् दिशि रे ក្នុង जयानंद केवलीनो रास. परिसरें, वसे योगिणी वडपित्त ॥ ४ ॥ चोग शक्विंती चतुर, परनट, परिवार ॥ नाम ए तेहना निरखीये, सुजो तास विचार ॥ ५ ॥ ॥ ढाल सत्तरमी ॥ हरि हारे सादेवा रे, गोकुल गामने गोदरे, उनला नदकिशोर रेलाल ॥ए देशी॥ ॥ हारे हारे साहेवा रे, १ वाराहीने चली २ वामनी रे, गारुडी। इक्षणी नाम रे लाल ॥ ५ श्राग्नेयी ६ व्यामा वली रे, नैकती सातमे आम रे लाल ॥१॥ योगिणी नगमा जागती रे लाल । एथोकणी होगा बाल पी ए वायव्या कही रे,१० सौम्या ११ ईशानी जाण रे लाल ॥१५ ग्राम णी १३ वैष्णवी तेरमी रे,१४ माहेश्वरी मन बाण रे लाल आयोगिमा हां ॥ १५ वैनायकीने १६ शिवा सुणी रे, १७ शिवदूती शिरवार रे न ज॥१७ चामुमी १ए जया जाणीय रे, २० विजया १ अजिता पार लाल आयोगिणा॥हा॥ २२ थपराजिता २३ हरतिदिने रे, २४ कालिका २५ चशविचार रे लात ॥ २६ सुचमा उनीशमा रे, करे उपकार अपकार रे 'लाल ॥ यो० ॥ ४ ॥ हा० ॥ २४ कनकदता २० सुनता २ए तमा रे, ३० घटा ३१ सुघटा सार रे लाल ॥३२ मांसप्रिया ३३ थाशापुरी रे, २४ लो दिता ३५थवा उदार रे लाल ॥ यो॥ ५॥हा॥३६ थस्थिनही २० नारायणी रे, ३७ नारसिही सुप्रसिप रे लाल ॥ ३ए कौमारी ४ वानरती सुरी रे, ४१ अगा ४५ वगा रिखे ई रे लाल ॥ योगा ६॥ हां ॥४२ दंष्ट्रा व सुदंष्ट्रा नली रे, ४५ प्रना ४६ सुप्रना वरदाय रे लाल ॥धल बा जलबोष्ठी धए नश वली रे, ५० सुना वर काय रे लाल ॥ यो॥ ॥ ॥ हांग॥ ५१ काली ५२ रोड़ी ५३ रौमुखी रे, ५४ कराली वली तेम रे लाल ॥ ५५ विकराला ५६ साक्षी नली रे, ५७ विकटाक्षी धरे प्रेम रे लाल ॥ यो० ॥ ७ ॥ हा० ॥ ५७ तारा एए सुतारा ६ रजनीकरी रे, ६१ रंजना ६२ श्वेता सुजाण रे लाल ।। नड्कालीने ६५ क्षमाकरी रे, ए चोशत ममाण रे लाल ॥ यो॥ ए॥ दा० ॥ काम रूपी ए पूजे जिके रे, ते जगा पूजाय रे लाल ॥ विविध प्रकार वरदायिनी रे, ख दारिद पलाय रे लाल ॥ यो॥१०॥ हा॥श्रणिमा लघिमा ऐश्वर्यता रे, व शिता गरिमा श्रादि रे लाल ॥ शक्ति विविध ले तेहनी रे, नवि पोहोंचे को वादी रे लाल ॥ यो॥११॥ हो० ॥ पर्वत वननें समुश्मा रे, श्व वर्ष पष्ट खंम. ४५ नदीने कासार रे लाल ॥ दीप प्रमुखमा ए रमे रे, दिव्य शक्ति सा धार रे लाल ॥ यो॥१२॥हा॥ कोपी नर लोकमा करे रे, मरकी प्रमुख उप सर्ग रे लाल ॥ तूठी दोये बढ़ सपदा रे, पुत्र कलत्रना वर्ग रे लाल ॥ यो ॥ १३ ॥रांकनें बीहिवरावे घणु रे, महोटाने दीये मोद रे लाल ॥ वेप किया बद नातिनी रे, करती विविध विनोद रे लाल ॥ यो॥१४॥हा॥ हेम शृगगिरि क्रीडा तणु रे,योगिणीनुं वे गम रे लाल ॥ मुजपुत्र थजाणतां रे, तिहां वास्यु वर गाम रे लाल ॥ यो० ॥ १५॥ हा ॥ योगिणीयो को पी तदा रे, मरकी थतिशय कीध रे लाल ॥ लोक नार्ग उपचथकी रे, ले निज निजनी कति रे लाल ॥ यो० ॥ १६ ॥ हां । योगिणी वश क रवा नणी रे, श्रीपर्वतमा जाय रे लाल ॥ वज्जवेग विद्याधरू रे, सिहां ज्वालामालिनी नाय रे लाल ॥ यो॥ १७॥ हा ॥ तेदनी दृष्टि धागल रही रे, करे तिहां जापनें ध्यान रे लाल ॥ लाख बीला होमे तिहां रे, करे मन इधित वान रे लाल ।। यो० ॥ १७ ॥ हां ॥ एक रीति देवी तणी रे, वचवेग पण ताम रे लाल ॥ सामग्री सवि मेलीने रे, वेगे नापने गम रे लाल ॥यो॥ १५॥ हां० ॥ योगिणी जाणे ते सवे रे, सातमे दिन तिहां थाय रे लाल ॥ करे प्रतिकुल उपसर्ग, रे, पण न खोनाणो जाय रे ला ल॥ यो ॥ २० ॥ हांणा के खंमें ए कही रे,सत्तरमी वर ढाल रे लाला। पद्मविजय कहे सनिलो रे, थागत वात रसाल रे लाल । यो० ॥ २१॥ ॥ दोहा॥ ॥ जालिम तुमें योगिणी कहे, रूप अनोपम धार ॥ तुती बु तुम अपरें, साहसिकमां शिरदार ॥१॥ जरी तुम करी जोगबु,नोग नला मन नावि ॥ रूप लखमी सफली करु, परगट अवसर पावि ॥२॥ सेवा करशु साचली, दुनिन दैवत नोग ॥ नर रूपें नोगवी नवल, शुन पामी सयोग ॥३॥ क्लेश फोकट कहो कोण करे,ध्यान तपादिक धार ॥ मोदक पामी मानवी,वाल न राधे किवार ॥॥ थालिगन दे उनि तु,रागिणी थमें रसाल ।। खारां जल पीधा खरां, नलां थमृत तु नाल ।। ५ ॥ एम कही नाटक थादयु, गाये मोदन गीत ।। नेठर ककण रण फणे, चमके जिण्या चित्त ॥ ६॥ काम उद्दीपन कारिम, सांजली लागो स्वाद ॥ कदर्पने वश थर्ड करी, नवि बोले २४६ जयानंद केवलीनो रास. ज्या नाद ॥ ७ ॥ हसती बांधे होशथी, निगडित करीने नार ॥ निजल मोनाखियो, कौडा करे किवार ॥ ७॥ सर्वगाथा ॥ ५३॥ ॥ टाल थढारमी । तुं कुत्तमाहे कपनी, उपजीन ते खोपु हो परियागतm पापी हो राज ॥ ए देशी॥ ॥ में ते जाणी वातडी, विविध प्रकारें पूजा हो, स्तवना पण या ही धी हो राज ॥ पुत्र मूकावण फारणे, सतोपी घणु तेहन हो, पण नपि जाये लीधी हो राज ॥ १॥ दवें वैतादचनो थपिपति, उत्तरश्रेणिमा सार हो, गगनवन्ननपुर राजे दो राज ॥ चक्रायुध तिहां राजियो, सर्व वियार स्वामी हो, चकी नाम ते वाजे हो राज ॥२॥ज्योतिपीमां सूर्य परें, कल्प वृद जेम तरुमा हो, हरि जेम मृगमा वलियो हो राज ॥ मेरु जेम पर्वत मांहे, तेम ए सम श्रय थधिको हो, वल विद्यायें न कलीयो हो राज। ॥ ३ ॥ विद्याधरमा को नहीं, नूचरनी शी वात हो, उनय श्रेणि तस सेने दो राज ।। मुजरो करी में विनव्यो, मुज सुतने मूकावो हो,तव मुज उपर देवे हो राज ॥३॥ मूकावीश तुन पुत्रने, योगिणीनो शो नार हो, एणी परें मुजने नाख्यो दो राज ॥ एम बढ़ वार में प्रेरीया,एहनो एहन मुजने हो, उत्तर फरि फरि दाख्यो हो राज ॥५॥ विषयादिक परमादथी,महोटानें क हीयें दो,शक्तिनो सनव थावे दोराज ॥ पण मुज सरिखा मानवी,शक्ति यश क्ति न जाणे हो, कार्य सहु चित्त नावें हो राज ॥६॥ वजसुवरी माहरे,सुर सुदरोने सरखी दो, सुर जवे थनिमेष नयणें दो राज ॥ पुत्रनी धनुजा तेद बे,सर्वगुणे करी सरखी हो, शु कटु जानु वयणें दो राज ॥ ७ ॥ जैन धर्म रुचि तेहनें, जैनकलामा कुशला दो, नाटयकला मुविशेषे हो राज ॥ नदनवननी धरतीय, बहुतहमांहे करूप हो, वृक्षनी श्रेणिने लेखे हो रा ज ॥॥ चक्रायु ते सनिली,दूतमुखें मुज याचे दो, तव में चित्त विचासु दो राज ।। बट्ठ पत्नी दोये जेदने, त्रिगुणाधिक जस वर्ष दो, तेहनें देवी न धाख्नु दो राज॥ ॥ यमुक्त ॥ वपु शील कुल वित्त, वयो विद्या सना थता ॥ एतानि यस्य विद्यते,तस्य देया निजा मुता॥१॥ मूर्ख निर्धन दूर स्थ, बद्नार्याशिवार्थिना, त्रिगुणाधिकवर्षाणां, चापि देया न कन्यका ॥ ॥२॥ पूर्वढाल ॥ जेम तेम ना न कही शकु, पृथिवीनो पति बलीयो हो, दूतने उत्तर वाल्यो हो राल ॥ योगिणीयें मुन पुत्रनें,राख्यो जे ते इख हो, , पष्ठ खम २४७ मुज हृदयमा साल्यो हो राज ॥१०॥ साजरे नहीं विवाहनी, वात ते मु जनें स्वामी हो, सुत मूकावो माहारो हो राज ॥ सर्व पनी सारु थशे, दूतें पण नई नारव्युं दो,दीधो एम लाहरो हो राज ॥ ११ ॥ माहारी सना मा एकदा, निमित्तियो एक थाव्यो दो, नाव्यो चित्तमा कानें हो राज ।। फल पुष्पादिक दोश्यां, देश सरकारने पूघु हो, कारय दोय मुज राज्ये हो राज ॥ १२ ॥ मुज मुत कोण मूकावतो, कोण मुज पुत्री वरशे दो, कहो ते चित्तमा धारी हो राज ॥ निमित्तियो कहे ए बिदु, एकज प्राणी करशे हो,में कटु ताम विचारी दो राज ॥ १३ ॥ उलखशु कहो केणी परें,निमि त्तियो कहे सुजो हो,वांधी पद्मरथ रूप दो राज ॥ जेह पमाडशे धर्मनें, वती श्रीपतिनृप जीते हो, निजकला दाखी अनूप हो राज ॥१५॥ कन्या त्रण तस परणशे, ते तुज सुत मूकावी हो, तुज पुत्री पण वरशे हो रा ज ।। सांजली बढ़ थाणदियो, ए जाण्यु एह काम हो,एवहां महोटा करशे हो राज ॥ १५॥ फल थलकारें तापियो, में हवे कीधी तेहनी हो, शुद्धि ते सघले जाणी दो राज ॥ हानी वचननें लदों,तुनने उलखी निम्न दा, मिश करी लाव्यो ताणी हो राज ॥१६॥ मात पिता जो तुज जाणे,तो जा वा नवि थापे दो,लाव्यो तेणें एकाकी दो राज ॥ पुत्र मूकावो माहरो,थव नीमा उपकारी हो, मूको सर्व ते वाकी हो राज ॥ १३॥ नदी जल वहे पण नवि पिये, वृक्ष फले नवि खावे दो, नोगवे रयण न खाणी दो रा न ॥ पर उपकारने कारणे, सतना जनम ते कीधा दो, पदवी ग्रये वाणी हो राज ॥ १७॥ क्लेश पोतानो नवि गणे, पर उपकारने माटे हो, सहान तरुवर सरिखा दो राज ॥ बाया फल दीये पर नगी, खमे तडकानें शीत हो,वली खमे थतिशय वरषा दो रान ॥१एका दुइ खियामां शिरोमणि,सम रथ पर ख हणवा दो, तु मल्यो बिदुनो योग हो राज ॥ हवे निज ठ चित्त करो तुमें, सानली चिते राजा हो, परउपकारी लोग दो राज ॥२०॥ शूरनें जेम सग्रामनो, नैयायिकनें साहमो हो, वादी थावे जेम हो रान ॥ दानशाला मली हुधितनें, रोगीने मल्यो वैद्य दो, उर्गतिनें निधि प्रेम हो राज ॥ २१॥ अवसर पर उपकारनो,महोटा पुरुपर्ने थावे दो, उत्सव स रिखो जाणे दो राज ॥ एक दिशि पर उपकारने,वीजी दिशि स पुस्य हो, तोले सुर को टाणे दो राज ॥२२॥ पर उपकार वधे घणो,सविनाग नवि . . ចុមច जयानंद केवलीनो रास. कोजे हो, पुण्य उपार्जन रेला दो रान ॥ जोना मात्र ने शुरने, सेतो परिवार हो, काम करे एफेला हो राज ॥ २२ ॥ एम विचारीन कहे, पकारने काजें हो. इं समरथ तु एक हो राज ॥ एम कही खेट विमान वेशी चाल्यो साथे हो, महोटो परिय विवेक हो राज ॥ २५ ॥ लेख सहित कोइ खेटनें, पवनवेग ते मूके हो, नृपना तातनी पासे हो राज ॥ पीस देवा कारों, श्रीनगें पोहोता तेद दो, श्रागल मगल पागे हो राम ॥ ठो खमें अढारमी,श्रीनयानदनें रास हो,पद्मविजयें कही ढाल हो राम। सुणता शाता उपजे,पुस्यवतनी वात हो,दिन दिन रग रसाल दो राज १९ ॥ दोहा ॥ ॥ पवनवेग कहे नृपप्रत्ये, विद्यावारु एक । मुज पासे ने मोटकी, सामो ते सुविवेक ॥१॥ साधवा द समरथ नहीं,ज्वालामालिनी जोर ॥ वश पाझे विद्याथकी, नमशे करी निहोर ॥२॥ योगिणी पण वश जेहनें, साद सथी ते सधाय ॥ तेणें ए ल्यो तुमें तुरतमा, साधन विधि समुदाय ॥ ३॥ नूप लेइने एम नणे, बीजांदिक बढ़ वार ॥ कोण होमशे मुजने कहो, पा पी पाप अपार ॥ ३ ॥ सत्त्वें विद्या सिफशे, सत्त्व धरी सद्ध सार ॥ एम कही विधे थाराधवा, ततक्ष्ण थया तैय्यार ॥ ५ ॥ सर्वगाथा ॥ ५६१ ॥ ।। ढाल उगणीशमी ।। पत्नीसंयुत पोसह लीधो ॥ ए देशी ॥ ॥ नानादिक करी उपवास कीधो, देवीनी पूजा करीनी ॥ साधर्मिणी बुद्धे विविध प्रकारें, नक्ति घणी चित्तमां धरीजी ॥ १॥ क्षेत्राधिष्ठायक प्रमु खना काठस्सग्ग, करीने मुख प्रवदिशेजी ॥ श्रातम रक्षा कर। परमेष्टी प दथी, देवी मदिरें उपविशेजी॥॥मानने शासन पद्मासन करी, विद्या जाप दवे करेजी ॥ मन थिर राखी ध्यान धरीने, मुश प्रमुख विधि घरेजी ॥३॥बीजे दिन दवे योगिणी जाणी, थावे तिहां शका करेजी ॥ जो ए विद्या सिह ते याशे, तो अमें वश था खरीना ॥ ४॥ प्रतिकुल उपसर्ग करवा मामे, खोनना करवा कारणे जी॥ साप सदिकडो महोटी काया, फुत्कारा नस धारणेनी ॥५॥ वींटी वींटी कररे नृपनें, दाटपो नांगे नि विष होयजी॥ नांगे दाडनें मणि पण त्रूटे, सरे तिहां न फरी जूयेजी। ॥ ॥ जैननी रक्षाने परनावें, परानव करी शकीया नहींजी ॥ पंच परमे टि पण मत्र ते मोहोटो,एडवो महिमा जग नहीं कहींनी ॥ ॥ गरिव पष्ठ खम २४ए करता गज मूके, वींधे दंतुसलें करीजी॥ शुंढानें वली चरणे मर्दै, पण न चान्या दृढता धरी जी ॥ ७॥ घोर शब्द करता वाघ मूके, तीखी दाढ़ें विदारताजी॥ नखथी घात करी करी थाका, पण रोम पण न सचारता नी॥ ए ॥ ज्वलती थनि विकू योगिणी, त्रट त्रटकार घणा करेजी॥धू थाहाथी अंधित दिशिगण, ज्वाला चिटुं दिशि सचरेजी ॥१०॥ महा ता पण ध्याने न चलीयो, अचलपरें नरराजीयोजी ॥ रौधरूप करी थावे ते दवे, नादयी पर्वत गाजीयोजी ॥ ११ ॥ ज्वलती याख्यो नयंकर वाखे, वदनें अगनि ते वरसतीजी ॥ पर्वत दरि सम वदन देखाडे, सत्त्वव त सत्त्वकर सतीजी ॥ १२॥ मम मम वाजे ममरुक वाजु, पडबंदा छठे घणाजी॥श्रष्टाट हास्यथी फेत्कार मूके, बध बूटे गगन तणाजी ॥१३॥ हाथमा जाला खड्डनें तोमर, मोघर कपावे घणुजी ॥ पदघातें करी धरती कपावे, वयण बोले मुखें ते नणुजी ॥१४॥ थम्ह पूज्या विषु विद्या साधे, रे मूढ व तु ना परोजी ॥ नहीं तो मारशु तुजने कदेती, दाखवे नय तस थाकरोजी ॥१५॥ मारवा दोडे करे प्रहार, सागें तस अगें नहींजी ॥ ध्यान एकामें जैननी रक्षा, मत्त्व धरे चित्त गहगहीजी ॥१६॥ तेद पुरुषयी देवें न चाले, कोण मातर ते योगिणीजी ॥ १७॥ त्रण दिवस एम उपसँगै काढघा, रोम मात्र पण नवि चल्योजी ॥ खेद लहीने चितवे चित्तमा, एतो मेरु सम अटकल्योजी॥१७॥ दिव्यांगनानां रूप करीने, सर्व बलकारें सोहतीजी ॥ चदा वयणी कमल पाखडी, थारख हीथी मनमोहतीजी ॥१५॥ कचन वरणी रूप यौवन वय, सुनग था कार सविथगनाजी ॥ कंचुकती पीनस्तनी वली, पहेखां वस्त्र नाना रंगना जी ॥ २० ॥ दसगति जस कोकिल स्वरथी, गीत गाये एम बच्चरेजी ॥ जयजय स्वामी अहो तुज धीरज, सत्व शौर्य गुण सद्ध शिरेंजी ॥ २१ ॥ थम थपराध ते खमजो स्वामी, उपसर्ग कारणे श्रमें कखोजी॥ हेतु सां जल नर थमें खोलु, रूप यौवनथी अलकस्योनी ॥ २२॥ सत्ववत तुत पसगै न चल्यो, स्वामी करी क्रीडा करुजी थम नारीपणे अंगीकर तु, तुज थाणा थमें शिर धरुंजी ।। २३ ।। नरनें उर्लन नोगते सुरना, स्वेचार्य तुमें जोगवोजी ।। ताहारे वश में सघती जाणे, जन्म लगें ते जोगवो नी॥ २४ ॥ धन धन श्रीजयानद नृपतिन,णे वचने पण थिर रह्यानी ॥ १२ ॥३॥ दूर ते पासे २५० जयानंट केवलीनो रास. प्रतिकूल थनुकूल विविध प्रकारें, कीधा उपसर्ग सद्ध सह्यानी ॥ ३५॥ खमें गणीशमी ए,दाल पनविजय कदीजी ॥ योगिणीयो बली को ते सनिलो थागत सहीजी ॥ २६ ॥ सर्वगाथा ।। ५ ।। ॥ दोहा॥ ॥ क्वेश विद्या साधन फरे, शाने थमें तु ति ॥ सहु विया धमकी सधे, निपजे वली नवनिध ॥ १ ॥ थापु बद्ध विद्या यमें, पानसिकता नाव ॥ जेहथी वश फररी जगतने, जुगतें था जमाव ।।शा मनवरित मन्ने हारिणी, नारी परणो अनेक ॥धाकरपु जगने थमें, व्यल जे होये के दाखवु,थम नोगनो थनुनाव ॥ जरा न थावे तस र रा, बलक्ष्यनो न बनाव ॥ ॥ हानि न यिनी होये, यामय नावे । ग ॥ काम सेवे कदर्प वधे, रूडो करिये रंग ॥५॥ सुख जोगव थम साप तु, शकने उर्जन सोय ॥ बहुरूपें युगपत् बद्द, होशै रमवु होय ॥ ६ ॥ विविध वचन एहवां सुणी,जगतने मोहे जेह ॥ न जलनृत कुनमा, तेम नृपन बच्यो तेह ॥ ४ ॥ ॥ ढाल वीशमी ॥ वेण म वाइश रे, विल वारुं तुजने ॥ ए देशी ॥ ॥ हृदयनें स्तन आगल का नोडे, कांक चुवन करती ॥ कांश्क था लिंगन वली करती, नयरों नेद धरती ॥१॥ धमें जलें दीना रे, मनमो इन प्रल तुमनें ॥ ए थांकण। ॥ वीणावशने पडद वजावे, नाटक करे श्रम वाली ॥ गीत गाये एम मोदन केरा, फूदडी दीये दीये ताली ॥अमें ॥३ ॥ श्रथ गीतं ॥धावी चोशठ योगिणी, नित्य विलसु नवनव नोगिणी । थमें कामज्वर रोगिणी, रति न सह तुम वियोगिणी ॥ १ ॥ एम गाये रंमें कामिणी, नव यौवन नशे योगिणी॥श्रमें रंना गोरीय श्रगिणी, सोना गी नर/ रंगिणी॥२॥ तुम रूप सौनाग्य रावती, हा यावी हर्षे ना चती ॥ तुं प्रियतम पामी मलपती, नवि मुकुं कहमवि जीवती ॥३॥वर चपक सोवन गोरडी, गुण गाती नानर नोलटी। पयसेव करेशु तोरडी, थमें दु सोदग रही॥४॥श्रम श्रग सुगधे महमहे, दिशि पसरें परि मल जे वहे ॥ नव पठमणी मालती केवडी, हिमवावुथ मृगमद बेवड़ी ॥ ॥ श्रम पायें नेटर रणफणे, कर कपन ककण रणरणे ॥ उरें मो तीहार सुलहलहे, तुम देखी हैयह गहगहे ॥ ६ ॥श्रम कानें कुमज फज षष्ठ खेम श्य इलें, तनु मनमथ कंफू खलनले ॥ थम माथे उसके राखडी,गले जवकत माणिक पदकही॥७॥थति शोहती निजवट तिलकडी, मणिमेह मोहे कडितही ।। मुजें थगढ़ ज्यु थलि मणि जडी, थम सांजल पियुडा वातई ॥ ॥ श्रम अंगुली दीपे मुड्डी, तुम विरहें नावे निड्डी ॥ मणि सोवन खलकती चूडली, प्रिय पामीथ पुण्ये रुघडी ॥ए । उत्कलित थावी वहे ही, घण लाम ते प्रेम गदेलडी॥ रंगें नाचु लोडत बांदडी, तुम करशु हाथ बांदडी ॥ १० ॥ श्रमें कत तुमारी दासडी, शिर वहेशु तुमची खासडी। तुम लोपु थाण न लीहडी, उर धरशु तोरी शीखडी ॥ ११ ॥ श्रम सः हामु जोय ने सामिया, ते थलवें थमें सवि पामियां ॥ थमें देवदेवीनी सामिणी,तुज थावी शे वर कामिणी ॥ १२ ॥ ठप उनने कता करी कृपा, श्रम परण तुं मेहेली दवे प्रपा ॥ थमें तेवड तेवडी वेहेनही, सवि एकमनी सवि नानही ॥१३॥थमें फाल विलंबण नवि सद्ध, तुम पागल परम हवे कट्ठ ॥ थम जीवितनें धरि हाथडी, कर तेडीने थापण साथही ॥१॥ सुरसुदरी चग सोनागिणी, कत का कवेखे सुरागिणी ॥ थमें जी शररों तुम तणे, हवे पडिवज जोइणि एम नणे॥१५॥ इति गीत ।। ।। पूर्वढाल ॥ सुस्वर जनकुतुहलने काजें, नृपर्नु जे वड शील ॥ दृढता कहेवा गीत ए नारव्युं, जिनधर्म प्रियनी लील ॥थ ॥ ३॥ सना जोनें कहे सघले, जेमतेम कहेतु नाहीं ॥ राग वसतादिक वर ढालें, गावा सु स्वरें याहि था॥ थग दारादिक विश्वनें मोदन, मृतकदर्प जगावे ॥ एहवां त्रण दिवस लगें गाइ, तनमय तान लगावे ॥श्रणा॥ गाइ गाइने थाकी सघली,नाची नाची खेदाणी ॥ वज्जनें टंक न लागे तेम नृप,रोम न च लियुं जाणी॥था ॥ सातमे दिन हवे तुरी देवी,महाज्वाला थनिधानें। शिर उपर करे सूरय उदय, पुष्पवृष्टि वद् माने, मेंतो न दोनो रेशमा॥ ए थांकणी ॥ करती दश विशिमां थलथातु, रूप प्रगट देखावे ॥ सिमवि द्याशु जब ते श्रावी, योगिणी नाती जावे ॥ में॥७॥ महाज्वाला मधुरे स्व र बोले, हू तूनी तुज राय ॥ शील ध्यान पिरता तुज देखी,पण सुण तु थिर थाय ।। में ॥ ॥ हे वत्स वर देश नवि शकीयें, विधि कीधा विषु तुजनें ॥ जो वर श्छे तो विधि कर तुं, नृप कहे विधि कहो मुजनें ॥ में ॥१॥ एक जीवनु मांस जो थापे, तो मुज उपजे प्रीत ॥ राय कहे जैन तु जा ३५२ जयानंद केवलीनो रास. चो, सह जीव मादारा मित्त ॥ में ॥ ११ ॥ विण अपराधी जीवन मारे, जो तुज नोइये मांस ॥ तो मुज तनु वेदीने यापुं, ज्याने करे विखास ॥ ॥ में ॥ १२॥ देवी कहे तो एमन कर तुं, तव नृप लीये करवाल । उरु तव खड्ग उलाली, लीये देवी उजमाल || में॥ १३ ॥ देवी कोई पण न जैनी, मांसनो खप नहीं मादारे ॥ दया सलने जैन धर्म तुज, परख्यो में धरी प्यारें । में० ॥ १४ ॥ जगत वीर साधर्मिक माहारो, पा ततिदि देव विद्या ॥ योगिणी प्रमुख थाकर्षणी ले तु, तव नृप प्रणमे थनिया ॥ में ॥१५॥ पूजा देई विधि पूर्वक विद्या,लिये हर्षे नूपाल ॥ देव ताप्रमुख त्रिविध हरे उपश्व, बाजुबध तेणें ताल ॥ में॥ १६ ॥ सूर्यहा स वली खड्ने थापे, चक्र दिये वर धार ॥ वैरी चक निकदन करवा, शस्त्र शिरोमणि सार ।। में ॥ १७ ॥ शक्ति शस्त्र थापीने देवी, अश्य मान ते थाय ॥ दिव्य मूर्ति हवे पूजे राजा, स्तवना करें सुखदाय ॥ में ॥ ॥ १७ ॥ ज्वालामालिनी विद्या बोले,लक्षादिक जप होम ॥ करतो पण को श्कनें सीजु, बढुनें थाउ जेम व्योम ॥ में॥ १५ ॥ तादरे यरूप प्रयासें सीधी, दृढघर्मा तुज जाणी॥थाका सुर थावशे ताहरे, विद्या तिजशे शाणी ॥ में ॥ २० ॥ एम कही रायनां दिलमा पेनी, शचित थापे समरी ॥ विश्वमा थर्थ ते थापे बेनी, बलवती ए श्रमरी ॥ में ॥ २१ ॥ वे दे चीनी मूर्ति पूजी, वली जे देव होय पासें ॥ बजी प्रमुखें सतोपी निसरे,वेव गृहथी मलासें । में ॥१॥ब ख वीशमी नांखी, परविजय कहे दाल ॥ सुदर ए तुमें श्रोता सुनो, धागल वात रसाल ॥ में ॥ १३ ॥ ए ढालना दोहा सात बने वञ्चमा गीतनी गाथा पंदर मनी पोनालीश गाथा या सर्व गाथा ॥ १३ ॥ ॥ दोहा॥ ॥ विद्याधर परिवारशु, प्रणमे थावी पाय ॥ ति विद्या यह सुखपकी, प्रश्न नूप पूाय ॥ १ ॥नूप पधारथयो नणे,धमत्कार सह्या विच ।। स्तव ना नृपनी सहु करे, परगट धरता प्रीति ॥ २ ॥ पूजी जिन प्रणमी गुरु,सा गर सम गनीर ॥थाहार करे दिन थामे, विद्याधरj वीर ॥३॥धपर विद्या थापे वली, शुन मुहूर्त शुनवार ॥ आकाशगामिनी श्रादि दे, सि ६विद्या श्रीकार ॥॥ मासे सिजे मेहनतें, ते साघे ततकाल ॥ शील तपा , पष्ठ खंमः श्य३ वली सत्वनें,परनावें नरपाल ॥ ५॥ धरणीधव जालंधरें, पवनवेगणु पत्त॥ पो रही विद्या प्रगट, सनारे धरी सत् ॥ ६ ॥ तस अनुनावें ते तुरत, थाकाण थाय ॥ जगतीपति कदे योगिणी,सोनलो रे सुखदाय ॥७॥प वनवेगना पुत्रनें, मूको हृदये मानि ॥ नहीं तो हूँ मूक नहीं, मुजो सा ची वाणि ॥ ॥ थगदना अनुनावधी, उपश्व न करो वंश ॥ मूळ क हे मूको तु, स्वामी तुमें शुनवश ॥ ए ॥ ॥ ढाल एकवीशमी ॥ धणरा ढोला ॥ ए देशी ॥ ॥ मूके श्रीजयानदनी रे, योगिणी गई निज गम ॥ मनना रंगी ॥ बे डी नांगी तेदनी रे,लावी नृप पुर ताम ॥ १॥ सुखना सगी॥ श्रावो था वो रे सजन मुखसगी, कीजें वात एकांतें सुरंगी, गुणीसगें वाधे प्रीति ॥म न० ॥ए थोकणी ॥ नूपतिने वली तातने रे, चरणे लागो तेद ॥म०॥ प वनवेग निजपुत्रने रे, थालिंगे घणे नेह ॥ ९ ॥धा॥ ५॥ पुत्र थागल संघलो कहे रे, निज उद्यम श्रवदात ॥ म० ॥ नूपर्ने लाप्यो एणी परें रे, ते सघली कही वात ॥ सु०॥ था॥ ३ ॥ कोई न मूकावी शक्यो रे, यो गिणी घरथी तुज ॥ म० ॥ राजराजायें मूकावियो रे, मेहेर करी बद्दु मुज मुाथा॥३॥ प्राण दीयां वत्स तुजनें रे, वजवेग मुणी एम मस्तवना करे नर रायनी रे, वज वेग धरी प्रेम ॥ सु॥था ॥ ५॥ जाये गगर्ने जे टले रे, योगिणी बोले ताम ॥म ॥नायें थम तुम पामीया रे, श्रावो थमचे धाम ॥ सु०॥ श्रा० ॥ ६ ॥ प्राकृणा गति करु तुम तणी रे, नूपति करे विचार ॥ म॥ प्रार्थना भंग न कीजीये रे, एम करी कहे दाकार ॥ सु० ॥ श्रा०॥ ॥ योगिणी निज दाथें करी रे, स्नानादिक प्रतिपत्ति ॥ ॥म० ॥ अमृत सम थाहारें करी रे,करती थतिशय नत्तिासुगाथा॥ गीत नाटकें संतोपिया रे, हवे रदेवानें रात ॥ म॥ वारादी जुवनें नूप ति रे,राख्या जगत विख्यात ॥९॥था ॥ ए ॥ विद्याधर ब्राझी घरें रे, रातें राख्या दोय ॥ म ॥ शय्या सुगधी सृष्ठ घणी रे, तिहां सूधास्वा सो य॥ सु० ॥ था० ॥१०॥ कामाक्षा स्वामिनी कन्हे रे,जोगिणी जकदे तेद। म ॥ निन परानव याकर्पवु रे, हत्या तीधो जेह ॥ सुमाथा०॥ ॥ ११ ॥ कामादा कहे क्रोधथी रे, शीलभ्रष्ट करु तास ॥ म०॥ तुमनें सों वांधिनें रे, ठित करो करी दास ॥ सु॥धा॥ १२ ॥ दरि दर ब्रह्मादिक २५४ जयानंद केवलीनो रास. सवे रे, देखो माहारु रूप ॥ मा ॥ मूमा रहे मनपकी रे, कोण मातर नर नूप ॥ सु०॥था ॥ १३ ॥ एम थावासना वेश्ने रे,भावी बिदा नूप ॥ म ॥ विश्वमोहन परगट करे रे, कामाक्षा निज रूप ॥ ९ ॥ ॥ था० ॥ १४ ॥ काम जगावे योगिणी परें रे, एदवी चेष्टा करत | मon चार पोहोर जोग प्रार्थना रे, करी पण नवि खोनत ॥ सु०॥था ॥१५॥ शील अमृत जेणे स्वादायु रे, ते केम मधु खाय ॥म० ॥ जैन नीवित तजे बापणुं रे, परस्त्रीये पण न लेपाय ॥ सु० ॥ था ॥ १६ ॥ याकी प्रात समय हवे रे,शीनयी थचरिज थाय ॥म ॥ स्तवना करती थापी यो रे, सोह मोघर वज्जकाय ॥ सु० ॥ था ॥ १७ ॥ थक्ष्य वाण नाथा बिटु रे, वजप्टष्ठ धनु दाय ॥ म० ॥ थामेय' नाग पाशादिका रे, दिव्य स्त्र तमुदाय ।सुथा॥ १७ ॥ थाप्यां थनेक शस्त्र नूपर्ने रे, बके खेमें ढाल म०॥ एकवीशमी पग्ने कहीरे,शीलथी मगल माल ।सुगावा॥१ए। .॥ दोहा॥ ॥ कुट ज्वर का हरे, वन्हिदाह व्रण जाय ॥ शीत यातप नल केय सवि, सदरे उपजे साय ॥ १ ॥ सर्व श्रगें सुख दे फरस, थविनाशी योत ॥ नहीं मलिन नगर नही, जेहनी जागती ज्योत ॥२॥ एहवा वस्त्र थापती, वारु करी वखाण ।। थापे बहु थलंकारनें,पुस्प तणे परिमाणा२॥ ॥ ढाल बावीशमी ॥ हमचडीनी देशी ॥ ॥ मरकी वारवा मुकुट ते थापे, कुंमल ज्वरने टाले । कुष्टाविक व्यापि दरे तेदवा, कंठ थानूषण थाले रे ॥१॥ हमचडी । फेर हरण मुज्ञ ते श्रापे, वली केयूर छदार ॥ शाकिणी माकिणी व्यंतर प्रमुखना, कोषने टा लण दार रे । द० ॥ २ ॥ घातनां व्रण पूराये सहेजें, कटक जराव ते थापे ॥ सर्व वश थाये वली एडवो, हार गलामा थोपे रे ॥हा॥३॥ जे वांका दोय ते थाये सरला, थापे कटि कंदोरो ॥ एम सप्रनाव अलकतरे तो, वाध्यो पुरस्यनो जोरो रे॥६॥ ॥ देवता ना र्श नवि थापे, वली रायर्नु शील ॥ तास प्रनावथकी होये सघले, जयजयकार सलील रे हा ॥ ५॥ अर्घ्यपूजा दीधी जव रायें, तब ते बहश थाय ॥ ज योगिणीने कामादा कहे, दैय डेहर्ष न माय रे ॥ ६॥६॥शील चलावया देतें एड नो, बहु उद्यम में कीधो ॥ पण न चलावी शकी हु एहनें, एड केम जापे

षष्ठ खं.
२५५
लीधो रे॥हा॥७॥ वायुथकी जेम मेरु न चले, तेम ए धर्मे धीर ॥ श्रा
राधी सत्कार करो तुमें, एद महा वडवीर रे॥३०॥ ॥ उत्तम क्षेत्र ए
हनें जाणी, वावो वीज ए गम ॥ फलवतु ए बोहोचु थाशे, श्रावशे याग
ल काम रे॥ह ॥ ए॥ तास वचन प्रमाण कस्युं तव, तेह गइ गुण का
म ॥ कामाक्षा निन थानक पोहोती, शुम वासना धाम रे ॥६० ॥१०॥
तेह पीठ उपर क्षण वेग, दोय विद्याधर राय ॥ योगिणीयो मुख थागत
थावे, चमत्कार चित्त लाय रे ॥३०॥११॥ सघली नेली मली खमावे,
थापे ते थलंकार ॥ दिव्य वस्त्र तेम निन्न निन्न सवि, थापे यति धरी
प्यार रे॥०॥१॥ ते सघनु भंतेउर काजें, दिव्य शस्त्र दिये ताम ॥
थश प्रमुख शक्ति बढ़ थापे, करती सह गुणग्राम रे ॥१०॥१३॥ पूजा
स्तवना करी सतोषी, वनवेगें सुरनारी ॥ तेहवें मत्सर रहित थइ वली,
रायनु दाक्षिस्य धारी रे॥६॥१४॥ देमकूट गिरि उपरे थापे, नृप वयणे
तस गम ॥ थर्घ्य दिये तव शहश थाये, जाये निज निज धाम रे ॥६॥
॥१५॥ सरसा गीत ए नूप चरित्रना, बांधे रासा बध ॥ गिरि वन प्रमुखें
क्रीडा करती, योगिनी गाय प्रबंध रे । ह ॥ १६ ॥ खेचरी योगिणी पासे
शोखे, एह चरित्र रसाल ॥ खेचरी पास मनुष्यणी शीखे, चित्त धरी प्रेम
विशाल रे ॥१०॥१७॥ प्रति थयु ए चरित्र वनमां, दवे ते त्रिद ज
ण थावे॥ हेमकूट नग उपर हेमपुर, पूरव रीतें वसावे रे । द० ॥ १७ ॥
शीनगुणे एम विद्या धौपधि, पाम्या वली सत्कार ॥ थापद सघली दूर प
जाणी, हुधा जयजयकार रे ॥ ६ ॥ १५॥ एम जाणीने शोल धरो तुमें,
इह परनव सुखकारी ॥ शीलें विधन टले वली सपद, थावे यति उपकारी
रे॥१०॥२०॥ खमें बावीशमी ए, नाखी रुडी ढाल ॥श्रीजयान
दना रासमा सुणतां, होवे मगलमाल रे ॥०॥१॥ सत्य विजय प
न्यास सवेगी,कपूर विजय तस शिष्य ॥ तास शिष्य श्रीखिमाविनय वर, च
ढती जास जगीश रे॥६० ॥ २२ ॥ तास शिष्य पंमित जिनविजयो, सो
जागी शिरदार ॥ पमित उत्तमविजय सोनागी, समता गुण नमार रे ।।
द० ॥ २३ ॥ तेहना चरण कम थति सरिखो, पविजय ए नाल्यो ।
वो खम ए प्रण कीघो,गुणिजने चित्तमा राख्यो रे।ह॥२४॥ १७ ॥

. २५४ जयानंद केवलीनो रास. सवे रे, देखो माहारु रूप ॥ म० ॥ मूंजा रहे मनपकी रे, कोण मातर नर नूप ।। सु०॥था० ॥ १३ ॥ एम थावासना वेड्ने रे,खावी विरा नूप ॥ म० ॥ विश्वमोहन परगट करे रे, कामाक्षा निज प ॥ सु.॥ ॥था०॥ १४ ॥ काम जगावे योगिणी परें रे, एदवी चेष्टा करत ॥ म॥ चार पोहोर नोग प्रार्थना रे, करी पण नवि खोजत ॥ सुगाथा ॥१५॥ शोल थमृत जेणें सादायु रे, ते केम मयुं खाय ॥ म० ॥ जैन जीवित तजे थापणुं रे, परस्त्रीये पण न क्षेपाय ॥ सु० ॥ था ॥ १६ ॥ थोकी प्रात समय हवे रे,शीजयी थचरिन थाय ॥म० ॥ स्तवना करती थापी यो रे, लोह मोघर वजकाय ॥ सु०॥ था० ॥ १७॥ यक्ष्य वाण नापा बिदु रे, वजप्टष्ठ धनु वाय ॥ म० ॥ थामेय' नाग पाशादिका रे, दिव्यश ख तमुदाय ॥सु था०॥ १७ ॥ थाप्यां थनेक शस्त्र नपने रे, बछे स्वंमें ढाल म०॥ एकवीशमी पग्ने कहीरे,शीजयी मगल माल ।सुगाया॥१ए ॥ दोहा॥ । ॥ कुष्ट ज्वर का हरे, वन्दिदाद व्रण जाय ॥ शीत यातप जल केद सवि, सदरे उपजे साय ॥ १ ॥ सर्व अगें सुख दे फरस, थविनाशी योत ॥ नहीं मलिन नगुर नही, जेहनी जागती ज्योत ॥२॥ एहवां वन ते थापती, वारु करी वखाण ॥थापे बहु थलकारने,पुण्य तणे परिमाणा॥ ॥ ढाल बावीशमी ॥ दमचडीनी देशी ॥ ॥ मरकी वारवा मुकुट ते थापे, कुमल ज्वरने टाले ॥ कुष्टादिक व्याषि हरे तेहवा, कठ थानूषण वाले रे ॥१॥ दमचडी ॥ फेर हरण मुज्ञ थापे, वली केयूर सदार ॥ शाकिणी माकिणी व्यंतर प्रमुखना, दोषने टा सण दार रे । द० ॥ २ ॥ घातनां व्रण पूराये सहेजें, कटक जडाव ते थापे ॥ सर्व वश थाये वली एहयो, दार गलामा थापे रे ॥६० ॥३॥जे वांकां होय ते पाये सरला थापे कटि कवोरो ॥ एम सप्रनाव अलंकृत वे तो, वाध्यो पुस्यनो जोरो रे ।। द॥ ॥ देवता वा एं नवि थापे, वली रायन शील ॥ तास प्रनाथकी दोये सघले, जयजयकार सजील रे ॥६० ॥५॥थर्घ्यपूजा दीधी जव रायें, तब ते बहश थाय ॥ जइ योगिणीने कामाक्षा कदे, दैयडेदर्ष न माय रे॥१०॥६॥शील चलाववा हेतें एह नो, बहु ठयम में कीधो ॥ पण न चलावी शकी एहनें, एड केम जाये सप्तम खंम. शल देशल का रूडी, साधर्मिणी वर धन्या ॥०॥ ४॥ तेणे पण पर णावी नली जाते, सागर ते हवे जाणो॥ देशलने ते जेम जेम देखे, एख लहे मत्सर वाणी ॥ ज० ॥ ७॥ नामें शेव तिहां वैश्रमण, तेहनें पुत्र ने चार ॥धन धनपतिनें धवल में त्रीजो, सुजश चोथो गुणधार ॥नाए॥ परणाच्या चारेने तातें,सोप्यो सवि व्यापार ॥ शेव करे निज आतम साध न, पामवा नवोदधि पार ॥ ज० ॥ १०॥ काल गयो बहु एणी परें करता, थते धर्मना जाण ॥ मरण उचित करणी करवाने,स्वजन तेडे तेणे टाण। न०॥ ११॥ सात लाख इष्य साते क्षेत्रे,थापे शेत ते हर्षे ॥ चार पुत्र बोला वी नांखे, रहेजो प्रीतें सरिखे ॥ न० ॥ १३ ॥ प्रीतें सद्गु निर्वाह थशे तुम, बाहिर वात न पडशे ॥ ला रहेतां कोक कालें, कदी को थायडशे ॥ न ॥ १३ ॥ त्यारें जूदा रहेवु पडशे, तव घरने चिहुं खूणे॥ कलश एके को दाव्यो ने में, ईशानादिक कूणे ॥नमा १४ ॥ ते लेहेजो धनुक्रमें वहें ची, पण सक्नेश न करजो ॥ जो सक्लेश करो तो सद्ये, शाखामण नती धरजो ॥न ॥ १५॥ एम शाखामण सडन थापी, विधियें धर्म थारा धी॥ दृढता धरीने शेजें सुरगति, सहेजें सुखमा साधी ॥॥ १६ ॥ चारे पुत्रे प्रीते काढयो, तातवयरों चिरकाल ॥ नारीना प्रेया जूदा थावा, कलश लीये सनाल ॥०॥ १७॥ निज निज नामांकित ते लेवे, पहेले मृत्तिका खम ॥ वीजामा दाड त्रीजामा कागल, दवे चोथामा प्रचम ॥ न॥ १७ ॥ कचन मणि जरियां ते देखी,त्ररों कीध विचार ॥ तात धर्मी पण जून बेतरीया, विश्वासें तेणी वार ॥ ॥ १॥ लघुर्ने सघजी ल खमी थापी, वचना न होये प्रमाण ॥ लखमी जूदी वहेंची लीजें, चारे नाग समान ॥ न० ॥ २० ॥ वेंचवा लघु पासें त्रण मागे, पण ते जघु नवि थाले ॥ साखीया स्वजनने साख प्रावी, क्लेश करे वतकालें ।ज ॥५१॥ स्वजन जोड्ने चित्त विचारे, एयं कदीये ना ॥ साखीथापण प ए थपघटती, वात ते करियें कां॥ ॥ २२ ॥ ऊगडो नवि नांग्यो ए कोयथी, स्वजन/ गया राजार ॥ सघलो व्यतिकर तिहां सनलाव्यो, सां नली करे विचार ॥॥२३॥ एके कणा पांचशे मत्री, करवा वेता न्या य ॥ पण कोई नहीं समरथ चूकववा, तव चितवे ते राय ॥ न०॥ २४ ॥ सागर प्रमुख ते सघला थाका, पुरमा पडद वजावे ॥ जे कोई एह विवा .

२५ जयानंद केवलीनो रोस. चारण मुनिवर तिदा मल्याजी, ज्ञानी गुरुना नम्या पाय ॥ परिधर सस परिसरेजी, वेगे हु चित्त लगाय । श्री॥२१॥ मुनिवरें देशना तव करीजी, पुण्यथी देव जिनराय ।। गुरु मले शुरू चारित्रीयाजी धर्म तस नापित पा य ॥ श्री० ॥ २२ ॥ मन यनुजाइ ससना मलेजी, परिधदने धणे स्नेह ।। पुत्र विनीत पुण्य मलेजी, हवे सुणो पापथी जेह ॥ श्री॥ २३ ॥ नीच लें जन्म दरिस्तानी, वचन निार घण रोग ॥ वध परानव अपयश घणे नी, उष्ट कुटुब सयोग ॥ श्री० ॥ २४ ॥ पाप मी ते काररोजी, धर्म करिये नित्यमेव ॥ इष्ट पामे में थनिष्ट टलेजी, जस मन श्रीजिनदेव ।। ॥ श्री० ॥ २५ ॥ सातमे खम पहेली कहीजी, पद्मविनये वर दाल ॥ श्री जयानदना रासमांजी, धर्मथी मगलमाल ॥श्री॥ २६॥ सर्वगाथा ॥३३॥ ॥ दोहा॥ ॥ सांगली मुनि वयणां सखर, कहे नृप केम करु धर्म ॥ पन्नीवियो ग पीडे घणु, करु बध बढ़ कर्म ॥ १ ॥ प्रसन्न थइ नाखो प्रस्तु, कामिनी थपहरि केण ॥कारण शु ने किहां,जहशे के नही जेण ॥२॥ योग्य पु त्री जरता जीको, नांखो मुज जगवत ॥ वली तुम देखी मुद वधे, ते कहो सख विरतंत ॥ ३ ॥ महानाग्य कहे मुनिवरु, पूरव नव परवध ॥ जाणु ज्ञाने जगतने, सानलो एद सवध ॥४॥ सदेह जाशे सामटो, इस दिन नरतें थाम ॥ शेठ पूरन सिमपुरे, धर्मवत धनधाम ॥ ५ ॥ ॥ ढाल बीजी ॥ बेड नार घणो ने रान, वातो केम करो डो॥ ए देशी। ॥ दोय पुत्र तेदनें थया सुवर, कौशल देशल नाम ॥ बालयकी सम किती व्रतवता, जैनधर्मशं काम ॥ १ ॥ नविजन नाव धरीने एह, सनिलो चरित्र रसाल ॥ सानली कर्म न करशो कोश, जेहथी नवजंजाल ॥ न०॥ ॥ ॥ गुणदास शेठ वसे तिण पुरमा, जैनधर्मी गुणवत ॥ गुणमाला ना र। गुणसुवरी, पुत्री बहु रूपवत ॥ न॥३॥ देव गुरुनीति करे घy, बालथी धर्मे राती ॥ देवराज नृपनो एक सागर, मत्री मिय्यामति माती ॥०॥४॥ चैत्यथकी नीकलता दीनी, गुणसुदरीने तेणें ॥ जाची पण नवि थापी तातें, मिथ्यात्वी जेणें ॥०॥ ५॥ कौशलने परणावी तातें, कन्या गुणवती नामें, विधिपूर्वक पूर्णन थाराधी, पोहोता सुरवर धामें ॥न॥६॥ कोइक दिवस पनी हदे जाचे, गुणवच शेवनी कन्याको .

सप्तम खंफ. श्र पञ्चस्कियां, ए खर कर्म विचार ॥श्रा० ॥ १३ ॥ मत्रीमुज्ञ विण नर राजी यो, मुख्यपणे करे तास ॥ सर्व कार्यमा पूजे एहनें, घरनो व्यय दीये खा स॥था ॥ १४ ॥ बीजा मत्री बद्ध इां करे,सागर वली सुविशेष ॥ एक इध्यना सदु थनिलाषिया, तिहा इयाने रे देष ॥था॥ १५ ॥ एक दिन मत्री कहे नररायनें, रिपुमर्दन जेद राय ।। उर्दम बलीयो थाण माने नहीं, देवगिरि तस गय॥था ॥ १६ ॥ कौशल मोकलीयें तेणें कारणे, संधि करे बुद्धिमत ॥ ग्रास खाये ते वलवतो होय, परीक्षा पण होये तं त॥था ॥ १७॥ तेहने योग्य ते नेटणु धापीयें, सागरने कहे ताम ॥ एह दिशे थपूर्व ते मोकलो, एटलु करो थम काम ॥था ॥ १७ ॥ जा त्य अश्व वस्त्रादिक मोकलो, सांजली सह दरपंत ॥ ईर्ष्यायें तस वधनें । वता, करमोयो एक अर्पत ॥ था ॥ १८ ॥ कनककुंन तेदमा धूलें नसो, मुझ देइने तास ॥ थाप्यो तेणे पण सरलथी ते ग्रह्यो, तेदनो धरी विश्वा स ॥ था ॥ २० ॥ कौशल लेश्ने रे नृप थाणायकी, देवगिरि पोहोतो ति हा नूप॥प्रणमीथागल नेटणु मूकतो, नृप जाणे ए थनूप ॥था॥१॥ मुखप्रश्नादि करे पूढे नूपति, कौशल कहे सुणो स्वाम ॥ सधि मेल करण मुज मोकल्यो, देवराय मुज थाम ॥था॥ २॥ मित्रायें करी रे प्रीति धरी घणी, नेटणुं मोकव्यु एह ॥ तव करंमक उघाडी जोईयो, चित्तमा धरी यति नेह ॥था॥२शा सातमे खंमें रे ढाल त्रीजी कही, श्रीजयानवनें रा स॥ पविजय कहे सानलता थका, पामे लीलविलास ॥था॥२॥ ॥ दोदा ॥ ॥धूली नस्लो पृथिवी धरे, दीटो कुनदेदार ॥ कोप्यो नृप कौशल प्रति, वयण कहे तेणि वार ॥१॥ तुज स्वामी चन्मत्त थयो,मरवानु करे मन्न । नेटणें धूल नरी करी, प्रानृत जू प्रचन्न ॥ २॥ क्रोध रासने वलि करु, तुज परिवार समेत ॥ वध्य नहीं नृप मत्रवी, शु करु ए सकेत ॥ ३॥ तुज स्वामाने जइ तुरत, सनलावे धरी शान ॥ थावु वं उतावलो, तेरों युक्नु करे तान ॥४॥ चित्तमा कौशल चितवे, नीति में लघी न्याय ॥ ईायें कन्यु एणी परें, एह मारणनो ठपाय ॥ ५ ॥ ॥ढाल चोथी। यात्रा नवाणु करीये विमलगिरि, यात्रानवाणु करीयें ॥ए देशी।। ॥ नाग्य तुमारु नारी ॥नूपति जी॥ नाग्य तुमारु नारी ॥ दसतो दसतो ७६० जयानंद केवलीनो रास. दने नांजे, तस मंत्रि शिर वारे॥०॥ २५॥ सातमे खमें पविजय हो, बीजी ढाल रसाल ॥ श्रीजयानवना रासमा रूडी, सुणतां मगलमा लोन ॥ २६ ॥ सर्व गाथा ॥६॥ ॥ दोहा॥ ॥ कौशल सनिली कानमा,पडद वे निन पाणि ॥ नृप बागल नमिने कहे, सनिलो राय सुजाण ॥ १ ॥ ॥ ढाल त्रीजी॥ थाो रंग लाज्यो रे, माणिगर महाराजा ।। ए देशी ॥ ॥ मुणो नरराजा रे वाद हु टालरों, ऊगडो वाको वे थति एह ॥ कोयनं खवर पडे तो टालजो, दु टालु नि सदेह ॥१॥धागे न्याय करजो रे, शेत तुमें सोनागी॥ए थांफणी॥ एम कहे राजा रे तेदने वयणड,तव तेणें ते ध्या ते नाइ चार ॥ पूठे तात तुमारो जीवता, श्यो श्यो करता व्यापार ॥ था॥२॥ खेती वाडी हु करतो तदा, पहेलो वोले ए रीति ॥ शेव कहे थन्न केटलु तुम्ह थतु, ते कहे धरी प्रीति ॥था ॥३॥ लाख मूहा अन्न थावतु मादरे, पन्नर लाख ते मूल ॥ बीजो कहे दु थापण माहरे, पशु व्यापार थनुकूल ॥ था० ॥ ॥ वेचु तुरगादिक दश सहस्रना,लान पनर लाख थाय ॥ त्रीजो कहे छ व्याज वटतरें, थापु मालिक राय ॥ आए ॥ ५॥ पनर लाखनो सान तेदमा दोये, चोयो कहे मुज कोश ॥ सों प्यो दतो तस मूल जो कीजियें, पनर लाखनो जोस ॥ श्रा॥ ६ ॥को शल कहे नृपनें मुणो स्वामी, जे जे कामनो वच ॥ ते ते काम सोप्यु ए चारने, सद्भुनें पन्नर लक्ष ॥ था॥ ॥ माटी फलशथी नेतर जा णीयें, दाड फलशे पश्चवृव ।। कागलथी नामें देखे करी, धन पामे सुख कद ॥ था॥७॥ परगट दीधी लखमी चोया प्रत्ये, कोश तणो अधिका र । एदने दतो तेणें तातें थापियो, नवि धावडे को व्यापार ॥धा० ॥ ॥ ५॥ सरिखे जागें सरिखे यापि{, मूर्ख करे रे विवाद ॥ चारे नाइ सां जजी दर्षित थया, सद्ध गया मूकी विषाद ॥ था ॥ १० ॥ कौशलनी बु दिने वरणवे, चारे धरता ते प्रीति । तात उपर बद्ध सादर उपन्यो, तात जाणे वह नीति ॥था ॥११॥ चमत्कार पाम्यो तस बुद्धिषी, राय कहे मुणो शेव ॥ यो मत्रीमुश तुमें हर्षशु, मत्री सद्गु तुम हे ॥धा०॥१२॥ कैशल कहे मुश खेठ नहीं, दू आवक व्रत धार ।। राज्य नियोगादिक में सप्तम खंम. . २६३ परे, सत्य तो तुज वच थाय ॥ ॥ गजने थनावे देवाणा, कार्य का रण जणाय ॥ नू० ॥ १७॥ कौशल गयो गजवरनी पासें, लेई परिसद समु दाय ॥ नू० ॥ परगट थाण देई निज नृपनी,हृदयमा मत्र सोहाय ॥५॥ ॥ १७॥ तास प्रनावी तेह मतंगज, मत्रवर्षे यंनाय ॥नू॥ चमत्कार पा म्यो ते राजा,मत्री प्रत्ये बोलाय ॥॥१ए॥ तुज धूलि सरखी दिव्य वस्तु नही, महारा घरमा काय ॥नू॥ तेहिन हाथी नेटणे थाप्यो,वढ सत्कार कराय ॥नू॥२०॥ एहवी वेला थमनें सनारनो, कहीये वारंवार ॥ मत्री श्वर में कहीयें वारंवार ॥ ए थांकणी ॥ परिद सहित पढेरामणी करतो, वस्त्र तथा थसंकार ॥ म॥ १॥अनुक्रमें सिमपुर परिसर पोहोता, ति हां कीधा उतार ॥ म॥ पूर्वमत्रीश्वर सनिली बोहिना, थाप करणी सना र ॥ म० ॥ २५ ॥ साहामा थावीने ते खमावे, बहु पश्चात्ताप धार म॥ गजवर धागल करीने चाल्या, नृपनें करे नमस्कार ॥ म॥ २३ ॥ नूप पू ने सुखशाता तेहनें, मत्री करे उच्चार ॥ म ॥ तुम परतापें सुखशाता , कह्यो सघलो थधिकार ॥ म० ॥ ४ ॥ धूनिवृत्तांत ते गोपवी राख्यो, स जानता अनुतार ॥ म० ॥ बलीया रायश्च मेल सुम्यो वती, गजवर नेट विचार ॥ म०॥ २५॥ यसनाव्य एह वात मुणीने, नृपनें हर्प थपार ॥म ॥ सातमे खमें चोथी ढालें, पविजय जयकार ॥ म॥२८॥१२॥ ॥ दोहा॥ ॥ तुष्टमान तेद सपरें, देशलनाइनें देश ॥ थापे बहु थायद करी, मेवे नहीं ते लेश ॥१॥ पांचमु व्रत पञ्चहरव्यु थवे,ते केम नागे तेह ॥ सत्कास्त्रो स्तवना करी, गयो थापणे गेद ॥ २ ॥ मत्रीमा महोटो थयो, सस्यादिक वली स्नेद ॥ पोहोंचाडे नृप पाधरु, मोदयकी जेम मेद ॥ ३ ॥ धून बात धरणीध, सौनली कोइक पास ॥ पाप बार्नु परगट दाये, विरूप असण जेम वास ॥४॥ यत ॥बीज चव मुमित बुरे,थब्रह्म लसणनीवास ॥ गनु पाप नाते दिन, किमहिक होय प्रकाश ॥१॥ ॥ ढाल पांचमी। सोना केरु वेडलु, मारुजी वाव खोदाव ।। रूपला इढाणी हेठ, वावडली पातालनी, पाणीडां नरु रे तलाव ॥ ए देशी। ॥ नरपति चितवे एणी परें, जेटणु लगयो धूल ॥ पण को बुद्धि प्रना व, फारय करी भावीयो,सपने कखो अनुकूज ॥२॥ सर्व नमार नो वीजीयें, २६२ जयानंद केवलीनो रास. कौशल वोले, एणे वय निरधारी ॥५०॥ चार बुद्धिनिषि धतुर विचार प, बुद्धि उपनी थति सार। ॥॥१॥ राय कहे तु एम केम बोले, रपयें दृढता धारी ॥नूगा कनक कुनमा रज कोण नरशे, चित्तमा जुन विचारी ।। नू ॥ २॥ नृप कहे कहो तुमें तेहनु कारण, कौशल कहे अवधारी ॥ जू० तुम प्रसाद होये तो हुनाखु, नृप कहे कहो सह मारी ॥नू॥ ३ ॥ मत्रो कहे सिमपुरमा नाणों, उपश्व थ बहु मारी ॥ ॥ श्रचलरेल्या देवा थाराधि, नरपति थ उपगारी॥०॥४ वह चौटानी धूत नेली करी, देवायें तिहां अवतारी ॥ ॥तुष्टमान या एणी परें नाखे, करजो तिलक सुखकारी ॥५॥५॥ मरकी उपश्व सघलो टलशे,तुमनें कद् हित थाणी ॥ नूपतिजी तुमनें कहु हित थाणी गए थोकण॥ व्यंतर शाकिनी विविध पश्व, विविधनी होशे हाणी ॥नू॥६॥ रायें पूजा करी रज लीधी, शिर धरी तेहनी श्राण ॥ नू० ॥ नगरलोक चली थते उरने, तिलक करावे जाण ॥ ॥०॥ ॥ सद्भुना उपच पुरमा टलीया, हवे तुम प्रान्त दाण ॥जू० करवानें तुम पासे मोकव्यो, रज नरी कुन प्रमाण ॥ नू०॥ ॥ मृगमदथी पण ए बहु मूली,श्यां करु थतिदी वखाण ॥ ४०॥ वात सानलीने ला ज्यो राजा, प्रीति धरे थप्रमाण ॥ नू ॥ ए॥ को धागल तुमें वात न करजो, नरपति कहे एम वाण ॥ नू॥ रानात वृत्तियें में एम नास्यु, थ विचारे इण ताण ॥०॥ १० ॥ तेदनु तिलक करे निजना, बहु गुण तेदनो जाणि ॥ नूपतिजी बद्दु गुण तेदनो जाणि ॥ एकणी ॥ चपटो चपटी देइ परिवारने, वत्ती जे यतेतर राणी ॥ ॥ ११ ॥ तुष्टमान था कौशजने कहे,यदो बहो तुं नलो प्राणी ॥नू॥ तुज स्वामीनें जश्ने तु कडे जे,थापणी प्रीति मचाणी ॥५॥ १२ ॥ जावलीव अखंमित जाणे, नहीं जाये ते खमाणी ॥ नू॥ श्रम सरिखु जे काम दोये ते,कहेवरावजो निज जाणी ॥ नू० ॥ १३ ॥ पूजे नृप तुज रायनी थाणा, शक्ति ते केहवी पिडा णी ॥ नू० ॥ कौशल कहे शं फदायें तेदनु, पशुयें पण सुप्रमाणी ॥ ॥ ॥ १४ ॥ मुज नृपनी थाणा जो दीजें, गज पण माने वाणी ॥५॥ एवं श्रवसर तिहां गजवर लूटो, कल कल वाणी सनलाणी ॥ नू०॥ १५॥ से वकनें नृप पूठे गु ए, सेवक कहे सुणो राय ॥ ॥ गज बूटो अहिरावण सरिखो, उपश्व पद्भुत फराय ॥ ५० ॥ १६ ॥ नरपति कहे कौशलने एणी सप्तम खंम २६५ खर तस पुत्र, यौवन थाव्यो यदा, विद्या कलानो नमार ॥२०॥ कन्या व त्रीश परणाचीयो, नव नव खेले रे खेल । देशल देव चवी थयो, चगति पणे, तुं ते करतोजी केल ॥ २१ ॥ प्रवनवे जे नामिनी, गुणसुंदरी जे ना रि॥ तुज वियोगें तेद लीये, व्रत तप तपी बगु, वरषां लगे सार ॥ १२ ॥ चोथे वगै सुर पयो,तिदायी चवियो रे तेह । तनो पुत्र थयो, चंचमुख नामें खरो, रूपकला गुण गेह ॥ २३॥ धर्मधीर गुरुने कनें, जोगवी नोग उदार ॥ दीक्षा लेने तिकांत नस्यो, बहु तप तपी, देव थयो श्रीकार ॥२॥ पांचमे देवलोकें मुखी, तिहाथी चवि तुज नारि ॥ चष्माला थनिधानथी, स्नेह पूव तो, इहां तुमनें निर्धार ॥ २५ ॥ सातमे खमें पांचमी, पन्य विजय कदी ढाल ॥ श्रीजयानवना रासमा, नविनन सोनलो, बागल वात रसाल ॥ २६ ॥ सर्वगाथा ॥ १५० ॥ ॥ दोहा॥ ॥ सागर जे पूर्व सचिव, मिथ्या दृष्टि महत ॥थारंन परिग्रह थति फरी, प्रथम नरक पदोचत॥१॥ नरकमांदेथी नीकली, सारग प्रमुख थ सख्य ॥ नव कीधा बहु नातिना, शु कटु तेहनी सख्य ॥२॥ 5 खियो ब्रा झण दरिश्ता, परित्रानक पणुं पाम ॥ हवे सुणो तिहाथी जे दवु, कही ये तेदन काम ॥ ३ ॥ ॥ ढाल बही॥ सुण मेरी सजनी रजनी न जावे रे ॥ ए देशी ॥ ॥ लवण समुपने वैताठच पासें रे, वनराजी घणुं शोहें विकारों रे॥ व वकूट पर्वत ले तब रे, वह देवता क्रीडा करे यह रे ॥१॥त्रण योजन पोहोलो में लबाए रे, उचानु पण एहिन माण रे॥ तेहनें गर्ने सुवन ने एक रे, गाठ उजु पोदोलु मुविवेक रे ॥ ॥ लांबो पण एक गाव जाणो रे, मणिमय कांति सद्योत पिबाणो रे ॥ सरोवर वन वापी तिहां शोहे रे, इश्यि सुखकारी मन मोहे रे ॥३॥ टथिवी ने पर्वत थई विराजे रे, नर ने अगम्य ते थानक बाजे रे ॥ चार देवीए वजमुख नामें रे, कीडा करे ते सुर तेणे वामें रे॥४॥ तिहां उपजे तस नाम ते एह रे, दवे मत्री जीव ब्राह्मण जेह रे ॥ परिव्राजक मरी वजमुख थाय रे, तुज नारीने ते द रिजाय रे ॥ ५ ॥ प्रव थन्यासथी धरतो राग रे, क्रीडा करणनो पामी लाग रे ॥ दृढ सस्कारनु बीज जे होय रे, जन्मांतरे ते था जोय रे ॥६॥ 17 २६४ जयानंद केवलीनो रास. पण न वले उपकार ।। देशादिक देव तेहन सेवे कोइ परें, एणी परें मनमा रे धार ॥ २॥ राय प्रसाद बहु धरे, सागर दमयो रे सोय ॥ एणहिज मोक ली धूल,ए थपराधी घणो,ए सम पापी न कोय ॥३॥ सागर चिसमां चित वे, देश माहारी वातारायथागल कहि तिण,धरें पथाकरे,देशलधुंधरे घात ॥ ४ ॥ नारीनो पठे धुरथकी, वली तस थधिको रे थाय ॥ पोतें करी थपराध, ढाले शिर पारके, अधम ते थवगुण गाय ॥ ५॥ प्रीतिदान नृप मोकले, एकदिन कौशल गेह ॥ घृतना दश सदसकुन, मूडा तेम शाली ना, श्राणीथतिशय स्नेह ॥ ६ ॥ व्रतथी वमणा यावीया, वीहिकण व्रत ने रे नग ॥ देशलनें कहे एम, सहस पांच मोकलो, पाठ व्रतने रे रंग ॥७॥ थथवा धर्ममा वावरो, पण नवि राखो रे एद ॥ व्रत आपणनु नग, था य तेम मत करो, चूकनो मत तुमें रेह ॥ ७ ॥ एम कही कौशल गया, दे शल चितवे ताम ॥ राज्यकुले गर्यु जेद, ते पाबु नहीं फरे, केम मोकलीयें ते थाम ॥ ए॥ एम चितवीने अधिक जे, श्राप निन परिवार ॥ थापण देते तेह, विश्वास ना प्रत्ये,उपनावे धरी प्यार ॥ १०॥ एम बढुवार के यो एणे, व्रतमाद थतिचार ॥थायु पूरु करी देशल, व्यंतर ते थयो, रुधि श्रलपनें थसार ॥ ११॥ तिहाथी दलिइ ब्राह्मण ययो, वली थयो दति हीनें घेर । वसिककुलें धन काज, उपाय करे थति, क्लेश करे बहु पेर ।। ॥१२॥ पण नवि पामे पायको, व्रतखंफन फल जोय ॥ कौशल निरति चारें, श्रावक धर्म पालतो, महावैरागी दोय ॥१३॥ धर्मगुप्त गुरुनें कनें, श्रादरे ते व्रत नार ॥ त्रिकरण योगें थाराधी, सातमे कठ थया, क्षित पो नहीं पार ॥ १४ ॥ सत्तर सागर बायखे, तेह थयो सुरराय ॥ व्रत था राधन ए फल, जाणी थाराधजो,जेम लदो मुखसाय ॥१५॥धवधि ज्ञा नथी देवता, ना तj 5 ख जाणी॥ इति देखाडी थाप, सविक दीक्षा आहे, जागी नवख खाण ॥ १८ ॥ तप कीधु अति थारु, सातमे वेव लोकें देव ॥ नाइये कसो सपकार, धर्मना रागथी, सुख भोगवे नित्यमेव ।। ॥ १७ ॥ पूरव नव श्रन्यासथी, एण नव पण बनु स्नेह ॥ जिनपूजा वली तीर्थ, यात्रा बन करे,पुण्य संचय करे तेह ॥ १७ ॥ सुस्वा चव। तेह देव ता, कौशजनी मुणो वात ॥ वैताढये मणिमविर, पुरनो राजियो, विद्याधर कदेवात ॥१॥ मणिधर नामें ते पयो, मणिमाला सस नारि ॥ मणिशे - सप्तम खंम 3 मैं ने तेणें व्रत नावे रे ॥ २५॥ लेजे दीक्षा वहेलो नाइ रे,मोक्ष ते लक्ष्य साथै सखाइ रे ॥ सांगली पूर्व नव संनारे रे, शासक्त नहीं पण प्रिया मन धारे रे ॥ २३ ॥ मुनि प्रणमीनें हूँ गयो गेह रे, मुनि विचरे बीजे ना म तेह रे ॥ वज्रवेग मूकावण हार रे, ते दिनयो खो हु प्यार रे ॥४॥ विद्याधरथो वात दुजाण रे, श्राव्यो तुम पासें मन थाणी रे॥ सातमे खमें बही ढाल रे, पद्म कहे सुस्यां मगलमाल रे ॥ २५॥ सर्वगाथा ॥१४॥ ॥ दोहा॥ ॥ रखे प्रारथना ए करे, एणी परें मन अवधार । कामकुनादिक सद्ध करे, प्रारथनायें प्यार ॥ १ ॥ हूँ चेतन थचेतन तणो,थतर श्यो होय ए थ ॥ प्रार्थना विण प्रथमथी, प्रारंज्या शुनपंथ ॥ ॥ उत्सव मारे था वीयो, नाग्य उदय मदानाग्य ॥ दोय कार्य इहां देखीये, पर अपकार परा ग ॥ ३ ॥ बीच उष्ट निमद बने, उत्तम तृप्ति उपकार ॥ नृपध्य विज थन्नथी, वणिक लाने व्यवदार ॥४॥ कामें वेश्या स्त्री कलहें, लांच नियो गी लेय ॥ खल बलथी तृप्तो खरो, दाता दानने देय ॥ ५॥ श्रीमत रोगी सनिली, वैद्य हर्ष लहे वेगातेम तुज काम करु तदा, तृप्ति लट्ठ श्रति रेग॥६॥ ।। ढाल सातमी ।। योगमाया गरमें रमे जो ॥ ए देशी॥ ॥सानलो वली एक वातडी जो, केम सहे थन्याय ते नूप जो ॥ देव नो पण बीहीकण य जो, तो प्रजानु शु स्वरूप जो ॥१॥ धीरजें सदु धावी मले जो॥ ए थांकणी । जइ परवत चुरण करुं जो, जीतु सुर उष्ट ते जाय जो ॥ विजय रायनो उपन्यो जो, तो वाजु तादरी जाय जो ॥ धी० ॥ २ ॥ पवनवेग साय ले। जो, वलीचश्गति/ जेद जो ॥ वज्जकूट नग उपरें जो, सात्विक धाव्यो सत्वगेह जो॥धी॥३॥ उच्चस्वरें बोले तिहां जो, रे थधम इष्ट परनारी जो ॥ खे पेगे पातालमा जो,यदि जेम विसमा लेई हार जो ॥धी॥ ४ ॥ सन्नवर थथाव्य तु जो, जो सम रथ ने सग्राम जो ॥ नहीं तो नारीने वापीयें जो, धन्यथा फेडु तुन वा म जो॥धी० ॥ ५॥त्रण वार एम बोलीयो नो, पण परगट न थयो देव नो, क्रोधयकी तव धमधम्यो जो, गिरि चूरवा ममियो देव जो॥धी० ॥ ॥ ६ ॥ तथाहि ॥ मुजर कामाक्षा दियो जो, जेदनु बल वज समान जो । शृगशीला पाहे घणी जो, मदारद समूलां थमान जो॥ धी०॥७॥ गगशी जयानंद केवलोनो रास. राग वल्दायो ते चली जागे रे, ससंधी देखी लय लागे रे ॥ मेघ देखी जेम हडकवा थाय रे, ते सुर पोहोतो थपने गय रे ॥ ४ ॥ प्रार्थना कर तो नोगनी तेह रे, सती थन्य इछे न धरे नेद रे । काल काठवा एणी परें जासे रे, ब्रह्मचर्य व्रत मुज एक मासे रे ।। ७ । विद्या कामें ए में कीधु रे, ते केम नाये मेन्यु सीधु रे ॥ एम करतो जो लोपिश शील रे, तो जीन चांपी मरण लहूं लीन रे ॥ ५ ॥ एदमा का सदेह न जाणे रे, साजली सुर बीदिनो तेणे टाणे रे ॥नोग यागायें पडख्यो मास रे, श्राशायें नीवे जाव उध्वास रे ॥ १० ॥ नैन सती न चलावीयें देवें रे, जैनधर्म, जे नित्य सेवे रे ॥ हवे कौशल सुर खेचर जेह रे, मणिशेखर कोहा करे तेत रे॥११॥ एक दिन धर्मरुचि थणगार रे, थाव्या नगर व्यान मकार रे ।। प्रणमी तेदना नक्तं पाय रे, धर्म साजन्यो चित्त लगाय रे ॥ १२ ॥ वैराग्यें वासित थ तीधी रे, दीका जैननी जेह प्रतिक्षि रे ॥ धीर पुरुप ते न करे ढील रे, धर्मकार्यमा उद्यमशील रे ॥ १३ ॥ सुव्रता गणिनी पासें दीक्षा रे, तेदनी नारी ले धरे शिक्षा रे ॥ श्रनुक्रमें मुनिवर थया चटनाणी रे, ते दु विचरतो श्राव्यो जाणी रे ॥ १४ ॥ वियोगथी तु पीडाणो रे प्रति बोधवा श्राव्यो ए टाणो रे॥ ते पण पूर्वनवनो नेह रे, तुमने पण उपजे ले तेह रे ॥ १५ ॥ बुऊ तु विरमी विषग विकार रे, लेइ चारित्रनें था श्रण गार रे ॥ सातमा देवलोकना नोग रे, जोगव्या विविध ते देवी सयोग रे।। ॥ १६ ॥ मनुष्पना जोग तो थचि नंमार रे, तेहमा केम मूल्यो एणी वा र रे ॥ सागरोपम सरिखा जिहां काल रे, तृप्ति न पाम्यो ते नोग रसाल रे॥१॥बिच सम नर नोग ते थागें रे, शल्प थाट केम तरष ते नागे रे ॥ ते सानती में नारख्यु एम रे,बधु परें तुमें राख्यो प्रेम रे ॥ १७ ॥ क पवृक्ष परें तुमें उपकारी रे, तुम वाणी मुनने हितकारी रे ॥ पण दु ना रीने स्नेहें बधाणो रे, वती सुर दरि गयो तेणें पीहाणो रे॥ १५ ॥ हुन त्यली शक तेणें मुन दाखो रे, नारी वाल्यानो उपाय ते नाखो रे॥ कन्या वर कोण थाशे एह रे, कदो मुजनें सघलु करु तेह रे ॥ ५० ॥ थइ कता थे रदी को काल रे, लेणं दीक्षा परम दयाल रे ॥ मुनि कहे पवन वेग सुत जेह रे, वजवेग मूकावशे तेह रे ॥ २१ ॥योगिणी घरची स्वशक्ते राय रे, ते तुज पुत्रीनो वर थाय रे । ताहारी नारीने ते मूकावे रे, नोग क सप्तम खं. . . शहए ॥ दोहा ॥ ॥ शीलें नवनिधि सपजे, शी सिद शियात ॥ शीले सुरसान्निध करे, शील धरो सुरसाल ॥ १ ॥ शी सर्प होय रासटी, शोलें थाग शमत ॥ शीलें थल होये सागरें,शील थानूपण सत ॥२॥ नेत्र ज्वाजल्य निरख तो, क्रोधीने महाकूर ॥ रे रे को मरवा तj, शरण करे ने शुर ॥ ३ ॥ शै ल नांजे तु शूरथी, थाणुं ताहारो यंत ॥ मूरख तुं महीपति कहे, तुज क रु अंत ए तत ॥४॥ परखी ले पातालमा, वेदर श्रीपधी लेय। बिल पे से बलवत तिम, उटके केम बुटेय ॥ ५ ॥ । ढाल थाम ॥ थरणिक मुनिवर चाल्या गोचरी ॥ ए देशी ॥ ॥ सोनल रे मुज वात शोदामणी, मुज बेग थन्याय जीरे ॥ दैववशे ते कीधु एव९, पण ते नवि बूटायजी रे ।। सां॥१॥ चगति नीरे पत्नी थाप तुं, मत कर मरवानु मनजी रे ॥नग चूस्तो पण नवि लूटो थयो, चू रे मोघर तुज तन्न जीरे ॥ सां० ॥ २ ॥ देव कहे क्रोधे करी एडवु, तु बा लक नरमात जीरे ॥ सिदथी मृगली मूकाववा मन करे, तुंहिज मू ए णि वात जी ॥ सां० ॥ ३ ॥ मोघर उपाडी दवा नणी, नूप उपर सुर धायो जीरे ॥ पवनवेगादिक बोहीकथी नासता, नृप पुंठे सगु थायो जी रे । सो०॥ ४ ॥ नरपति विद्यायें सद्भु थनीया, वजमोघर से धाय जीरे ॥ घात मोघरना रे मांदो माहे पडे, मार्नु गगन फोडाय जीरे ॥सांग ॥५॥ बहु वेला एम मोघरे जूझीया, निज मोघरे नरराय जीरे ।। सुर मोघर ते रे चूरी नाखीयो, तव ते को नराय जीरे ।। सा० ॥ ६ ॥ ज्वलती ले करवालने दोडोयो,सूरय दासें नूप जीरे ॥ रंनास्वनपरें खमित करी,लीला यें धरी चूप जीरे ॥ सां० ॥ ७॥ दिव्य त्रिशूल गदादिक शस्त्रथी, यु६ करे ते धनेक जीरे ॥ नागपाशथी रे वांधे परस्परें, सघले नृप जय टेक जीरे ॥ सा ॥ ७॥ समकेत शीलने जिनशासनी वली, न परानव करे वो जीरे ॥ तो ए सुर किंकरनु शु गजु, जे पडयो परस्त्री फदो जीरे ॥ सांगा ॥ नृप मस्तकमां रे तरु फूडीयो, पुष्प वेराणां ताम जीरे ॥ मानु सुर वृष्टि करे फूलनी, कुमर शिरै थनिराम जीरे । सा०॥ १० ॥ नृप पण तरु लेइ तस तरु नांजतो, तव ते शिलायें यु६ जीरे ॥ यु६ करे वे? तेह मुनट थश्रोपथकी अतिक्रुझ नीरे । सा० ॥ ११ ॥ शिलायें वली मुष्टिय चूरतो,

२६७
जयानंद केवलीनो रास.
लाना घोपथी जो, विश्वने पण उपजे प्रास जो ॥ पृथिवी गाजे मेपन
जो, फलके सायर जलराशि जो ॥ धी॥॥ त्रास सहे जलचर भागो,
उठले तिहां जलकामोल जो ॥ ज्योतिषी नासे वेगला जो, करता माये
माहे दलबोल जो ॥ धी० ॥ ए ॥ नवी इह नल बहु बहजे जो, उन्मा
चाले तेह जो॥ गाम नगर वदेवरावता जो, बद वायरे ठरे खेद हो।
धी॥१०॥ शिला चूर्ण बहु उठले जो,तेणे दिशा पधारी थाय नो॥ सूरब
नाखो देखोयें जो, मानु जूप प्रतापें हराय जो॥धी० ॥ ११ ॥ पूज्मा बडु
बीजा गिरि जो, मानु जयथी कंप्या जोर जो ॥ निकरण यांसु फरे जो,
निनजातिन 5 ख धरे घोर जो ॥ धी० ॥१२॥ पर्वत चूरता कपती नो,
क्ष्य थाय ने निज थाधार जो॥ वसुमती मानु ते नये नो,केम थाशे एमथ
वधार जो ॥धी० ॥१३॥ शग पडघाना शद जे जो, एपिवी घर घड करे
सोर जो ॥ शेषनाग धरे कष्टथ जो, पृथिवीने करी बद्ध जोर जो ॥धी॥
॥ १४ ॥ पडती शिला चूरण करे जो, वनराजी वृक्ष समुदाय जो ॥ गन
सिद प्रमुख सावज घणा जो,ते नयथी नाग जाय जो ॥ धी० ॥ १५ ॥
व्यंतर किन्नर देवत्ता जो, जे क्रीडा गुफामां करत जो ॥ शक्रवजनातक
रीजो, दा हा करता ते नासत जो॥धी॥ १६ ॥ योगिणी नूतनी कंगना
जो,वली व्यंतर प्रेतनी नार जो ॥थाकद करता नासती जो, जगने ते खो
ननाकारिजो॥धी० ॥१॥ चार घडी थइ चूरता जो, पोहोतो सुर नवन
नी पास जो॥ विद्या नाम्य बल थाकरु लो, नृपनें ब्रह्मचर्यनो वास जो ॥
॥धी० ॥१७॥ घोर शब्द सुणी तेदना जो, निन थालय जोइ ताम जो ॥
शीतज्वरें जेम कंपतो जो, वजमुखनु मुख थयु श्याम जो॥धी॥१५॥
एवं ए शुं चितवे जो, संघ्रांत थश्मन माहि जो ॥ विनंग ज्ञाने जोवतोजो,ए
यभुत l थर्पु थांहि जो॥धी० ॥ २०॥ नवि थयु में नवि पायशे जोको
धे घमघमतो देव जो, दोस्रो निज परिवारशें जो,शीघ्र थायो तिहां स्वयमे
व जो ॥धी०॥२१॥ धन्य ए नूपना धैर्यनें जो,वली शोजवतो ससनेह
जो ॥ वात ने यमुत जेदनी नो, नवि कहेवाये मुखें तेह जो ॥ पी॥
॥ २२॥ सातमे खमें सातमी जो, ढाल पनविजय कही प्यार जो॥ शोल
थीसवि कारय सरे जो, शीत्तथी होय जयजयकार जो ॥धी॥२०॥

सप्तम खंग. हए ॥दोहा॥ ॥ शीलें नवनिधि सपजे, शी सिह शियात ॥ शीलें सुरसान्निध करे, शीत धरो सुरसाल ॥ १॥शीलें सर्प होय रासड़ी, शीलें थाग शमंत ॥ शीलें थल होये सागरें,शील थानूपण सत ॥२॥ नेत्र उवाजव्ये निरख तो, कोधीने महाकूर ॥ रे रे कां मरवा तणुं, शरण करे ने शूर ॥ ३ ॥ शै ल नांजे तुं शूरथी, बाएं ताहारो थंत ॥ मूरख तुं महीपति कहे, तुज क रुथत ए तंत ॥४॥ परस्त्री से पातालमां, उंदर धौपधी लेप। बिल पे से बलवत तिम, बटके केम बुटेय ॥ ५॥ ।। ढाल थाउमो॥थरणिक मुनिवर चाख्या गोचरी ॥ ए देशी ॥ ॥ सनिल रे मुज वात शोहामणी, मुज वेतां थन्याय जीरे ॥ दैववशे तें कीधु एवडु, पण ते नवि लूटायजी रे ॥ सां०॥१॥ चगति नीरे पत्नी थाप तुं, मत कर मरवानु मन्नजी रे ॥नग चूसो पण नवि बूटो थयो, चू रे मोघर तुज तन्न जीरे ॥ सां० ॥ २ ॥ देव कहे क्रोधे करी एदव, तु बा लक नरमात जीरे ॥ सिदथी मृगली मूकाववा मन करे, तुहिज मूड ए णि वात जीरे ॥ सां० ॥ ३ ॥ मोघर ठपाडी हवा नणी, नूप उपर सुर धायो जीरे ॥ पवनवेगादिक बीहीकथा नासता, नृप पुंते सद्ध थायो जी रे ॥ सांस॥ ४ ॥ नरपति विद्यायें सट्ठ थ नीया, वजमोघर लेश धाय जीरे ॥ घात मोघरना रे मांदो माहे पढे, मानु गगन फोडाय जीरे ॥ सा० ॥५॥ बहु वेला एम मोघरे जूझीया, निज मोधरें नरराय जीरे ।। सुर मोघर ते रे चूरी नारखोयो, तव ते को नराय जीरे ॥ सा ॥ ६ ॥ ज्वलती करवालने दोडीयो,सूरय दासें नूप जीरे ॥ रनास्तनपरें खमित करी,लीला यें धरी चूप जीरे ॥ सां० ॥ ७॥ दिव्य त्रिशूल गदादिक शस्त्रथी, युर करे ते थनेक जीरे ॥ नागपाशथी रे बांधे परस्परें, सघले नृप जय टेक जीरे ॥ सा ॥ ॥ समकेत शीलने जिनशासनी वली, न परानव करे दो जीरे। तो ए सुर किंकरनु शु गज्जु, जे पडयो परस्त्री फदो जीरे ॥ सांगाए ॥ नृप मस्तकमां रे तरु ले फूडीयो, पुष्प वेराणा ताम जीरे ॥ मानु सुर वृष्टि करे छलनी, कुमर शिरें धनिराम जीरे ॥ सां०॥१०॥ नृप पण तरु लेइ तत तरु नांजतो, तव ते शिलायें यु६ जीरे । युर करे वेहु तेह सुजट यशरोपथकी थतिकुछ जीरे । सा० ॥ ११ ॥ शिलायें वली मुष्टियं चूरतो, २० जयानंद केवलीनो रास. तास शिलाना बंदो नोरे । तस रजथी मुख मस्तक परिपुं, तोपण मूके न ददो जीरे ॥ सांग ॥ १२ ॥ वजवदन दवे शस्त्रनें मृकतो, पामी खेर धपार जीरे ॥ मुष्टिये मुहिरे युद्ध करे तदा, मदथी करता होकार नीरे ॥ सात ॥ १३ ॥ यु६ फरता रे मुष्टिघातथी, प्रथिवी तुम कपावे जीरे ॥ चिडविल फरता वेगु नट गाजता, सर्व दिशा गर्नावे जीरे ॥ सा ॥ १४॥ देव म व्या कौतुकथी गगनमा, वेद पडता यावे देग जीरे । उपडता ठचा जाब देवता, एम करे बहु चेहा जीरे ॥ सा० ॥१५॥ जमतां दृष्टि नमे जो नार नीशूरवीरनी साथ जीरे ॥ कोण न चाले रे बुद्धिमत कहो,जस हैयु होम हाथ जीरे ॥सां॥१६॥ यु करे एम सुर नरराजीयो, एणी परें गयो बहु काल जीरे ॥ 5ष्ट थन्यायीयो रे देवता जाणीने, चितवी ते नपाल जीरे । सांग ॥ १७॥ पग पकडीने रे मस्तकें फेरवी, शिला उपर पबाडे जीरे ॥ वस्त्र धूवे जेम धोवी तेणी परें, वेदनथी वुब पाडे जीरे ॥ सा ॥१७ बातीय पग देने दृढ रह्यो, वोले एणी परें वाणी जीरे ॥ तुजमा बल हो य तो देखाहजे, रे रे थधम बन्नाणी जीरे ॥ सांग ॥ १५ ॥ ताहारा श्टनें तु सनारजे, नहीं तो श्राप तु नारि जीरे ॥थाकद करतो रे सुर एणी परें कदे, तु मादारो थाधारो जीरे ॥ सां० ॥ २० ॥ जगतमात्र हवे मुजने मूक तु, ताहारो हु बु दास जीरे ॥ तेद कपालु रे कृपापात्रनें, नरपति मूके तो स नीरे ॥ सा॥ २१ ॥ जय जय शब्द करे तिहां देवता, कुसुमवृष्टि तिहाँ कीधी जीरे ॥ देवता जर्ने लाव्यो नारीने, नूपने नेटणे दीधी जीरे ॥सांप श्शाथाठमी ढाल ए सातमा खममा, श्रीजयानदने रास जीरे॥ पद्मविजय कहे सनिलता थकां, होवे लील विलास जीरे ॥ सां० ॥ २३ ॥ १५ ॥ ॥ दोदा ॥ । निजथपराध निर्जर हवे,खमावे बड खात ॥ पवनवेग मुख पामिया, थतिशय दर्ष एकांत ।। १ ॥ सद् परिवारशु सुर दवे, प्रणमे नरपति पाय ॥ कर जोडीने सुर कहे, तुं समरथ तुं ताय ॥२॥तुदी पराक्रमी तुं नयी, वा विण्यवत दयला ॥ सुर श्रभुरा तुज सारिखो, मनुजादे न मयात ॥३॥ कोइ न नीत्यो मुन कदा, तुरत नीत्यो तु मुज ॥ मृफ्यो कृपा करी मुहनें, तेणें शु देठ तुक ॥४॥ - सप्तम खंग २७२ ॥ ढाल नवमी। गरवो केणेनं कोराव्यो के ॥ नवजीना लाल गए देशी ॥ ॥ तुजने थापी कतारथ थान के,गुणगण धामरे ॥ एहबु जगमा कां न पावं के ॥ तुजवर नाम रे ॥ वोले तव नरपति वाणि के ॥ गु०॥ माहा रे नही कर प्रमाण के ॥ तु॥ १ ॥ मिथ्यामत महाड खकार के ॥गु०॥ ते बांमो नरक कार के ॥ तु०॥ मुनिनाषित जास्युं जेद के ॥ गु० ॥ चहग तियें कापु तस तेह के ॥ तु०॥ २ ॥ पूरव नव हितने काजे के ॥ गु० ।। सनिलीयो ते सुरराजें के ॥ तु०॥ महाकष्टमयी संनारे के गुण थारन प रिग्रह परकारें के ॥ तु॥३॥ ख दवा धर्मनें पूजे के ॥3॥ कहो सु खकारी धर्म शु के ॥ तु०॥त्रण तत्त्व स्वरूप सुणवे के ॥ गु०॥ तेहने मिथ्यात्व वमावे के ॥तु॥॥ नृप वयणथी समकेत पाम्यो के ॥गुण॥ नृ पनें तव शिरथी नाम्यो के ॥तुणा देव गुरु पूजा करे थंगी के गुणा गुण वत थयो नृप संगी के तु॥॥ तु बोधिनो दाता मुज के गुणा शु था पुंठें दवे तुज के ॥तु॥ तुज देवा योग्य न दान के ॥गुणा ते शिव सुख दाधुं प्रधान के ॥तु॥६॥ पण थापुं शक्ति प्रमाण के ॥ गु०॥ चितामणि दीये तेणे गण के तुगा एदनु स्वरूप सुणो स्वामि के ॥ गुणा एद रयण सनारे नाम के ॥ तु० ॥ ॥ जेदवां रूप श्छे मनमां के ॥ गु० ॥ निज परनां निपजे कृणमा के ॥ तु ॥ ते पण निपजे बढ़ रूप के ॥गुण॥ वली विद्या कामित रूप के ॥ तु० ॥ ७॥ साधन सहित थापे तेह के ॥ गु०॥ नृपें दोय ग्रयां ते जेह के ॥ तु ॥ विधिपूर्वक खेड राय के ॥ गु० ॥ सुर रायनी स्तवना कराय के ॥ तु॥ ए ॥ नृप कहे धन्य तु मुरराय के ॥ गु० ॥ बोधि पाम्यो ने परस्त्री स्यजाय के ॥तु० ॥ चगतिने मैत्री कराय के ॥ गु०॥ सघलो थपराध खमाय के ॥ तु॥ १०॥थदृश्य थयो ते सुर ताम के । गु०॥ चगतिने सोंपी वाम के तु॥ हरषी कहे एणी परें वा णि के ॥ गु० ॥ मुन कन्यानो ग्रदो पाणि के ॥ तु ॥ ११ ॥ श्रीजयानद कुथर राय के ॥ गु०॥ सह विसरजे निज ठाय के ॥ तु०॥ चगतिने पव नवेग ताम के ॥ गु०॥ कानमां कहे सांजलो श्राम के ॥ गु॥ १२ ॥ मुज कन्या पाणियह थाय के ॥ गु०॥ तुज पुत्री ले ते गाय के ॥ तु०॥ श्राव जो तव चगति नूप के ॥ गु०नृपनें नमी तस थनुरूप के ॥ तु॥१३॥ निज धाम गयो प्रिया ले के ॥ गु०॥ ते सांजली स्वजन मिले के ॥ तु॥

100 जयानंद केवलीनो रास. तास शिलानां वृदो नोरे ॥ तस रजथा मुख मस्तक पूरिघु, तोपण मूके न ददो जीरे ॥ सा ॥ १२ ॥ वजवदन हवे शस्त्रने मूकतो, पामी खेद अपार जीरे ॥ मुष्टियें मुष्टि रे युद्ध करे तदा, मदथी करता होकार नीरे । सा॥ ॥ १३ ॥ युद्ध करता रे मुष्टिघातथी, पृथिवी डुम कपावे जीरे ॥ बिदु दिक फरता वेदु नट गाजता, सर्व दिशा गर्नावे जीरे ॥ सा ॥ १४ ॥ देव म व्या कौतुकथी गगनमा, बेतु पढता थावे हेग जीरे । उपडता उमा जाप देवता, एम करे बहु चे जीरे ॥ सां० ॥१५॥ नमतां दृष्टि नमे जो नार नी,शूरवीरनी साथ जीरे ॥ कोण न चाले रे बुद्धिमत कहो,जस हैयु होय हाथ जीरे ॥सां॥१६॥ यु६ करे एम सुर नरराजीयो, एणी परें गयो बहु काल जीरे ॥ उष्ट थन्यायीयो रे देवता जाणीने, चितवी ते नूपाल जीरे ॥ सां ॥ १७ ॥ पग पकडीने रे मस्तकें फेरवी, शिला उपर पबाडे जीरे ॥ वस्त्र धूवे जेम धोवी तेणी परें, वेदनथी वुब पाहे नीरे ॥ सां० ॥१७॥ बातीय पग देने दृढ रह्यो, वोले एणी परें वाणी जीरे ॥ तुजमा बल हो य तो देखाहजे, रे रे थधम थन्नाणी जीरे ॥ सा ॥ १५ ॥ ताहारा श्टनें तु सनारजे, नहीं तो थाप तु नारि जीरे ॥ याद करतो रे सुर एणी परें कहे, तुं मादारो श्राधारो जीरे ॥ सां० ॥ २० ॥ जगतमल दवे मुजने मूक तुं, ताहारो हु बु दास जीरे ॥ तेह रूपानु रे कृपापात्रनें, नरपति मूके ता स जीरे ॥ सा०॥ २१॥ जय जय शब्द करे तिहां देवता, कुसमष्टि तिहां कीधी जीरे ॥ देवता जश्ने लाव्यो नारीने,नूपने नेटणे दीधी जीरे ॥सां०॥ २॥ थामी ढाल ए सातमा खमा, श्रीजयानवनें रास जीरे॥ पद्मविजय कहे सॉनसतां थकां, होवे जील विलास जीरे ॥ सां० ॥ २३ ॥ २५ ॥ ॥ दोहा॥ ॥ निजथपराध निर्जर दवे,खमावे बद्ध खांत ॥ पवनवेग मुख पामिया, थतिशय दर्ष एकांत ।। १ ॥ सद्ध परिवारशु सुर दवे, प्रणमे नरपति पाय ॥ कर जोडीने सुर कहे, तु समरथ तुं ताय ॥२॥ तुदी पराक्रमी तुं नयी, वा किल्पवत दयला ॥ सुर थसुरा तुज सारिखो, मनुजमर्माहे न मयाज ॥ ३ ॥ कोइ न जीत्यो मुज कदा, तुरत जीत्यो तु मुन ॥ मृफ्यो रूपा करी मुनें, तेणें शु देवं तुज ॥४॥ - अष्टम खंभ. १७३ ॥ इति श्रीमउत्तमविजयगणि विनेय पंमित पद्मविनयगणिविरचिते श्री श्रीजयानदराजर्षिकेवलिचरित्रे प्रारुतप्रबधे पंचमव्रतनिरतिचारसातिचार पालनविषये कौशलदेशलनिदर्शनगर्नवजकूट गिरिचूर्णनववमुखसुरविज यंतचितामणि महाविद्या प्रदानवजमुदरीचसुंदरीपाणिग्रहणवर्णनोनामा सप्तम खम समाप्त ॥पट्खम गाथा ॥३६॥ सप्तम खंभे गाथा ॥२६॥ सर्वगाथा ॥४२३५॥ षट् खमे उक्त श्लोक ॥ ॥ सप्तम खेमे उक्तश्लो क वे, सर्व सक्त श्लोक ॥ ७० ॥ सवश्यो एक, समस्या एक, दोदा बे ॥ ॥ अथाष्टमखम प्रारन्यते॥ ।। दोहा ॥ ॥अभिनव सूरय वगियो, शांतिनाथ जगवान ॥ त्रण जगत्नां । ख ते, टाले तमोवितान ॥ १॥ प्रणमी पदकज तेहना, थाखु थामो खम् ॥ सानलता जे उघशे, तेहनें दम प्रचम ॥ २॥ लंघे ने यूं नहीं, कहे तस दोहो? पाप ॥ उघमाहे जूतुं नव्यु, ए महोटो संताप ॥३॥ जेह जगाडे तेद, उलटो थाणे क्रोध ॥ दोप परंपर एणी परें, वाधे जाये बोध ॥४॥ उघणनु श्रुत उघशे, नवि उघो ने काम ॥ घण मृतकनी वानगी, तेदथी अधिको श्राम ॥ ५॥ धूणे नूधानी परें, व्यंतर पेठो जेम ॥ जागतां हांसी करे, तेणें कहो उघीयें केम ॥ ६ ॥ तेम विकथा वर्जी वली, विकथा न क रोजेणाविकथा ते वितथा करे, नविमुणवा दिये जेणतेहथीनच्योरूथ हो, जे नवि सानले श्रापास्वपर न सनिलवा दिये, तेरों ए महोटु पाप ॥७॥ निशा विकथा परहरी, सनिलो चतुर सुजाण ॥ खम खम चढतु श्र, श्रीजय पुस्यप्रमाण ॥ ए॥ ॥ ढाल पहेली ॥ प्रथम गोवाला तणे नवेंनी ॥ ए देगी ।। ॥ एक दिन उपवना गयाजी, श्रीजयानद कुमार ॥ थान विद्याधर नर पतिजी, धावि करे नमस्कार ॥१॥ नविक जन जुनु पुस्य विशेप ॥ दिन दिन चढतु अशेष ॥ न० ॥०॥ ए थोकणी ॥ वेसारे सिहासनेजी, पवनवेग नरराय ॥ सुख प्रभादिक पूलताजी, मनमां थानद थाय ॥ न०॥ ॥ ॥ श्रीजयानदने वागलेंजी, ते थावेनु स्वरूप ॥ पवनवेग नृप वर्णवे नी, सनिलजो तुमें नूप ।। न० ॥३॥ दक्षिणश्रेणी वैताढघमाजी, जाणो सपला रे एह ॥ १॥ नोगरति ए रानीपोजी, नोगपुरी धपी जेद ॥ न॥ १५

के
२०० जयानंद केवलीनो रास.
उत्सव करे नव नव रंगे के || गु० ॥ वे श्रीजयतातने सगे के ।
तु०॥ १४ ॥ योगिणी दीधा बलकार के गुणा वली विनति पत्र पार
के ॥ तु० ॥ खेचर साथे ते मूक के । गुण्॥ विश्वास हेते नवि चूके के।
तु॥१पाहवे पवनवेगादिक सगें कागुणावताठ थाव्या मनरंगें केतु
तिहां शाश्वत चैत्यनें वादे के ॥ गु०॥रोमांचित थ थालवे के ॥ तु॥
॥१६॥ गौरव करी प्रार्थना करतो के । गुणानिन नयर लावे मन हरतो
के॥ तु०॥ पवनवेग दक्षिण श्रेणें के ॥ गु०॥ चगति बोलाय्यो तेणें के।
तु०॥ १७॥ सुता चश्मदरी तास के ॥ गु०॥ निन वजमुदरी खास के ।
तु॥न मूहूर्ते दोय परणावे के।गुणावगु थायहथी सुख पावे के ॥तु॥
॥१७॥ चक्रायुरू नये सखेवे के ॥ गु०॥ बहु गन थश्वादिक देवे के ।
तु०॥ शत्रुमर्दिनी विद्या एक के ॥ गु०॥ पवनवेग घर लेक के ॥ तु०॥
॥ १५ ॥ पण 5 खथी सधाये तेद के ॥॥नवि साधी शके तेणें
॥ ॥ शील सत्त्वनें नाग्य विशाल के ॥गुणा उत्कृष्ट एदनु जाल कोतु॥
॥२॥ नृपर्ने विधि सहित ते थापे के ॥गु०॥ वली मणिघरमां नृप पापे के
॥तु दोय नारीशु जोग विलास के गुणा तिहां रहेता सुख श्रावास के
॥तु०॥५१॥ चक्रायुवई युद्ध थाय के गु०॥ सैन्यगु तिहां बावजो नाय के
॥तु०॥ एम कदीने चगतिने वात के ॥ गु०॥ पवनें मोकन्यो सुखशात
के
॥तुणा२॥ जैनधर्म प्रनावें राय के॥ गु०॥ वोय नारीशु मुखमा गय के
॥४०॥ कौशल देशज दोय नाय के ॥ गु० ॥ पंचमव्रत केरे पसाय के ॥
तु०॥ २३॥ थाराधि विराधि फल पाया के ॥ गु०॥ तेम श्रीजयानदजी
राया के ॥तु०॥ चोथा अतथी थरि पे के ॥ गुण॥ तेम पालो जेम पुरुप
वीपे के ॥तु ॥ ३ ॥ सातमे खमें ए नाखी के ॥ गु०॥ सत्यवचनपी
शास्त्र के साखी के ॥ तु॥कीर्ति जस कपूर समान के ॥ गु०॥ श्रीनया
नद रास प्रधान के ॥ तु० ॥ २५॥ ए नवमी ढाल रसाल के ॥ गु० ॥ ए
सातमो खेम विशाल के ॥ तु॥ प्रीखिमा विजय गुरु नाम के ॥ गुज् ॥
शिष्य जिन विजय गुणधाम के ॥ तु ॥ २६ ॥ तस उचम विजय सुशिष्य
के । गु०॥ फहे पविजय सुजगीश के ॥ तु०॥ सुणता होये मगजमाता
के ॥ गु०॥ वली घर घर लधि विशाला के तु॥ २७ ॥सर्वगया ॥२१॥

अष्टम खंम.
२७३
॥ इति श्रीमउत्तमविजयगणि विनेय पंमित पद्मविजयगणिविरचिते श्री
श्रीजयानदराजर्षिकेवलिचरित्रे प्राकृतप्रबधे पंचमव्रतनिरतिचारसातिवार
पालनविषये कौशलदेशलनिदर्शनगर्नवजकूट गिरिचूर्णनवनमुखसुरविन
यंतचितामणि महाविद्या प्रदानवजसुंदरीचश्मुंदरीपाणिग्रहणवर्णनोनामा
सप्तम खम समाप्त ॥पट्खम गाथा ॥३एफए। सप्तम खंभे गाथा ॥२६॥
सर्वगाथा ॥४२३५॥ पट् खमे उक्त श्लोक ॥७॥ सप्तम खंभे उक्तश्लो
क वे, सर्व वक्त श्लोक ॥ ७० ॥ सवश्यो एक, समस्या एक, दोदा ३ ॥
॥ अथाष्टमखम प्रारभ्यते ॥
॥ दोहा॥
॥थनिनव सूरय तगियो, शांतिनाथ नगवान ॥ प्रण जगत्ना इख ते,
टाले तमोवितान ॥१॥ प्रणमी पदकज तेहना, थाखं थाउमो खम ।।
सानलतां जे उघशे, तेहनें दंम प्रचम ॥ २ ॥ वंघे ने उधुं नहीं, कहे तस
दोदोढुं पाप ॥ घमाहे जूलु नव्युं, ए मदोटो सताप ॥३॥ जेह जगाडे
तेही, उलटो थाणे क्रोध ॥ दोप परंपर एणी परें, वाघे जाये वोध ॥४॥
उघणन श्रुत सघशे, नवि उघो ने काम ॥ उघण मृतकनी वानगी, तेहथी
श्रधिको श्राम ॥ ५॥ धूणे नूथानी परें, व्यतर पेठो जेम ॥ जागतां हांसी
करे, तेणें कहो उघी केम ॥ ६ ॥ तेम विकथा वों वली, विकथा न क
रोजेणाविकथा ते वितथा करे, नवि मुणवा दिये जेणा॥तेहथी उध्योरूब
डो, जे नवि सानले थापास्वपर न सनिलवा दिये, तेणें ए महोटु पाप
॥ ७॥ निझा विकथा परहरी, सजिलो चतुर सुजाण ॥ खम खम चढतु
थने, श्रीजय पुस्यप्रमाण ॥ ए॥
॥ ढाल पहेली ॥ प्रथम गोवाला तणे नवेंनी ॥ ए देशी ॥
॥ एक दिन उपवना गयाजी, श्रीजयानद कुमार ।। थान विद्याधर नर
पतिजी, श्रावि करे नमस्कार ॥१॥ नविक जन जुन जुपुस्य विशेष ।।
दिन दिन चढत थशेष ॥नम् ॥ ० ॥ ए बांकणी । वेसारे सिहासनेजी,
पवनवेग नरराय ॥ सुख प्रश्नादिक पूताजी, मनमां थानद थाय ॥ न॥
॥ २॥ श्रीजयानदने थागलेंजी, ते थाठेनु स्वरूप ॥ पवनवेग नृप वर्णवे
जी, सानजजो तुमें नूप ।। न० ॥३॥ दक्षिणश्रेणी वैताढघमाजी, जाणो
सपला रे एह ॥ १॥ नोगरति ए रानीयोजी, नोगपुरी धणी जेह ॥०॥

ខ្ទម जयानंद केवलीनो रास. ॥ ४ ॥ वजपुरीनो रानीपोनी, २ चश्वाटु नरराय ।। रत्नपुरीनो ए पतिनी, ३ महाबाद सुख दाय ॥10॥ ५॥ ४ चश्वेग चोपो लह्मोजी, एडवें पुर मणिधाम ॥ नगर वीरपुरनो धणीजी, ५ रविप्रन जेहनु नाम ॥ ज० ॥६॥ ६ रत्नचूड नृप पुरतणु जी, रत्नालय थनिधान ॥ कनककूट पुर सातमुजी, ७ तडितवेग राजान ॥ न० ॥ ७ ॥ नगरगिरि चूड थाउमो नी, श्रीप शन नूपाल । चार चार पुत्री हवीनी, सवि वत्रीश रसाल ॥ नाम माता सदुनी जूनूनी, सरखी वयनी रे प्राय ॥ सरिखी रूप कला गुणें जी, रूपें रंना दराय ॥ ज० ॥ ए ॥ साथे ते नेली नणीजी, मांहोमाहे रे प्रेम ॥ करे प्रतिज्ञा सहु मतीजी, एकपति करणनो नेम ॥ न० ॥ १० ॥ रूप थनुत्तर जाणिर्नेजी, ते कन्या वतरीश ॥तेहना तातने मोकलेजी,दूत चक्रायुक्ष ईश ॥ज ॥११॥ पुत्र अमाराने दीयोजी, तुम कन्या थनुरूप।। उत्तर थाप्यो तेइनेंनी, सर्व मती एक रूप ॥॥१॥ मेल लहेणां देवा तणोजी, जोवरावीने रे स्वामि ॥ श्रावी उत्तर वालाजी, तुम चरणें शिर नामि ॥ न ॥१३॥ नोगरति नगरें थयाजी,नेला था रे मिज ॥ कहो शुं करवु थापगेनी, था एकल चित्त ॥ न ॥ १४ ॥ निन्न जा च्छे नहींजी, कुमरीयो मनमांह ॥ एक कुमरने जो दीजीयेंजी, मनमा धरी उत्साह ॥ न०॥ १५॥ बीजी स्त्री ईर्ष्या करेजी,तेणे नवि सूजे रे काय॥ जो नवि वीजें सर्वथाजी, तो ए को नराय ॥ ज० ॥ १६ ॥ राज्य जीवि त सह थपहरेजी,रूगे ए महाराय ॥ सकटमा आवी पडपाजी,उत्तर कदो श्यो कराय ॥ न ॥१॥ एवं अवसर तिहां धावियोनी,एक निमित्तियो रे जाण ॥ करी बट्ठ माननें पूनिगुनी, विषम कार्य गति गणान॥१॥ निमित्त जोइ निमित्तियोनी, बोल्यो एणी परें वाण ॥ चकायुक्नो नयतु मोजी, म म करो निमिच प्रमाण नारा राज्य अल्प दिन एदनुजी, तव पूजे फरी तेह ॥ मरण के शत्रु एहनोनी,राज्य जशे कदो केद ॥न ॥ २० ॥ ज्ञानी कहे ए पामशेजी, महा परानव 5 खस्वाणी ॥ वात थ सनव सांजलीजी, प फरी तिण वाण ॥ ॥१॥कोण शत्रु एदनो यशेजी, ज्ञानी बोले रे ताम ॥ वजवेग मूकावशेजी,जे योगिणीने धाम ॥ ॥ न० ॥ २२ ॥ वजकूट नग चूरिनेंनी, 'चगतिनी रे नारि ॥ देव वजन ख जीतीनेनी, मूकावशे निरधार ॥ न॥ २३ ॥ तेहनें कन्या थापजोनी, अष्टम खंम. योग्य नणी ते रे सर्व ॥ राजाधिराज ते थायशेजी, मोहोटो नृप गतगर्व ॥ज० ॥ २ ॥ सानली ही थापियुजी, दान विसयो रे तास ॥ चह गति देखी थमोजी, कस्यो निरधार ते खास ॥न० ॥ २५॥ निज स्वारथ हेतें थमोजी, थाव्या तुमची रे पास ॥ ए कन्या परणी तुमोजी, सफल क रोथम श्राश ॥ न० ॥ २६ ॥ पहेली थाउमा खममांजी, पद्मविजय कही ढाल ॥ पुस्यवत प्राणी लदेनी, सघले मगल माल ॥ ॥२७॥ ॥दोहा॥ ॥थावो थम पुर साहेवा, म म करो प्रार्थना नंग ॥ चकायु नये पर णायें, एकांतें मनरंग ॥१॥ श्रीजयानद कहे तदा, चक्रायुध नय धारि । परणतु जे बानां रही,स्वाद किश्यो थवधारि॥२॥ पडखो नय टलवा लगें, एम कही कया विदाय ॥ पवनवेग कहे कानमा, सजिलो रे तुमें नाय ॥३॥ चक्रायु सगर समे, सैन्य सामग्री समेत ॥ वहेला लश्ने थावजो, ए तुम श्रम सकेत ॥ ४ ॥ सद्गुये ते अगीकरी, पोहोता निज निज धाम ॥ हवे वैता ढपनी उपरें, सिपकूट थनिराम ॥ ५ ॥ पवनवेग अनुमति तिहां,याव्या श्री जयानद । सुर खेचर वीधी तदा, विद्या जे थारगद ॥ ६ ॥ ति प्रतिमानें धागलें, साघवा मामे तेहाविधियो अल्पकालें करी, सिमथइ गुणगेह॥७॥ ॥ ढाल बीजी ॥ साहेबा पचमी मगल वार, प्रनातें चालवु रेलो॥ ए देशी ॥ ॥ साहेवा विद्याधर बहु साथ के, परिवत धावीयो रेलो। साहेबा पव नवेग पुरे खेचरी, वृदें वधावीयो रेलो ॥ साहेवा मुखथी महोलमा थथवा, सनामाकोढा करे रेलो॥साहेवा प्रिया सहित मनमोजमा, जेम हा धरे रेलो ॥१॥ साहेबा पवनवेग दिन बीजे, बेठो सना करी रेलो ॥ सादेवा चक्रायुक्ष्नो दूत, थाव्यो तेणी पुरी रेलो ॥ सादेवा थाव्यो सनामकार, पवनवेग ठठियो रेलो ॥ साहेबा कनकासन वे हर, तास वेसाडियो रे लो॥॥ सादेवा सुख प्रश्नादिक वात, पूने चक्री तणी रेलो ॥ सादेवा श्रा गम कारण पूछे, बीज सवि थवगणी रेलो ॥ साहेवा तेह कहे सुणो चक्री, तुम थाणा करे रेलो ।। साहेव वजमुदरी तुम कन्या, मुज स्वयंवरे रेला ॥३॥ साहेवा मोफल्यो सानली एम, के मनमा खलनल्यो रेलो। सादेवा तो पण धीरय धारि, पवन कहे सांजसो रेलो ॥ सादेवा जो तुम मनमा एम, तो केम विलब कस्यो रेलो ॥ साहेवा श्रीजये पुत्र मूकावी २४ जयानंद केवलीनो रास. ॥ ४ ॥ वज्वपुरीनो रानीयोजी, २ चश्वार नरराय ॥ रत्नपुरीनो ए पतिजी, ३ महावाहु सुख दाय ॥ न० ॥ ५॥ ४ चश्वेग चोथो लहोजी, एदनु पुर मणिधाम ॥ नगर वीरपुरनो धणीजी, ५ रविप्रन जेहनु नाम ॥ ॥६ ६ रत्नचूड नृप पुरतणु जी, रत्नालय थनिधान ॥ कनककूट पुर सातमुजी, 8 तडितवेग राजान ॥ न०॥ ७ ॥ नगरगिरि चूड याठमो जी, श्रीच धान नूपाल । चार चार पुत्री दवीनी, सवि वत्रीश रसाल ॥॥॥ माता सहुनी जूनूनी, सरखी वयनी रे प्राय ॥ सरिखी रूप कला गुणें जी, रूपें रंना हराय ॥ न० ॥ ए ॥ साथे ते नेली नणीजी, माहोमाहे रे प्रेम ॥ करे प्रतिज्ञा सह मलीजी, एकपति करणनो नेम ॥ न० ॥ १० ॥ रूप अनुत्तर जाणिनेनी, ते कन्या वतरीश तेहना तातने मोकलेजी,दूत चक्रायुक्ष ईश ॥न० ॥११॥ पुत्र थमाराने दीयोजी, तुम कन्या धनुरूप। उत्तर प्राप्यो तेहनेंजी, सर्व मली एक रूप ना१॥ मेल लहेणां देवा तणोजी, जोवरावीने रे स्वामि ॥ श्रावी उत्तर वालाजी, तुम चरणे शिर नामि ॥ ॥१३॥ नोगरति नगरें थयाजी,नेला था रे मिज ॥ कदो शं करवु थापणेजी, थाd एकज चित्त ॥ न० ॥ १४ ॥ निन्न नर्ता इच्छे नहींजी, कुमरीयो मनमांद ॥ एक कुमरनें जो दीजीयेंजी, मनमां धरी उत्साह ॥ ज०॥ १५ ॥ बीजी स्त्री | करेजी,तेणे नवि सूजे रे काय॥ जो नवि दीजें सर्वथाजी, तो ए कोधे नराय ॥ ज० ॥ १६ ॥ राज्य जीवि त सह अपहरेजी,रूठो ए महाराय ॥ सकटमांधावी पडपाजी,उत्तर कहो श्यो कराय ॥ न० ॥१॥ एग धवसर तिदा थावियोजी,एक निमिचियो रे जाण ॥ करी बट्ठ माननें पूलियुजी, विषम कार्य गति गणान॥१७॥ निमित्त जोइ निमिसियोजी, बोल्यो एणी परें वाण ॥ चक्रायुचनो नयतु मोजी, म म करो निमित्त प्रमाण ॥०॥रा राज्य शल्प विन एदनुजी, तव पूजे फरी तेद ॥ मरण के शत्रु एहनोजी,राज्य जशे कदो केह ॥न ॥ २० ॥झानी कहे ए पामशेजी, महा परानव 5 खस्खाणी ॥ वात व सनव सानतीजी, पूजे फरी तिण गण ॥ न० ॥१॥ कोण शत्रु एदनो यशेजी, ज्ञानी बोले रे ताम ॥ वजवेग मूकावशेजी,जे योगिणीने घाम ॥ ॥ ज० ॥ २२ ॥ वज्रकूट नग चूरिनेंनी, पगतिनी रे नारि ॥ देव वजमु ख जीतीनंजी, मूकावशे निरधार ॥ ज०॥ १३॥ तेहनें कन्या थापजोनी,

.
अष्टम खंम.
२७
देव गुरु तेम धर्म के, जाणो नूपति रेलो ॥ सादेवा शुक्ष वश उत्पन्न, के
अनीति न होय रति रेलो ॥ सादेवा कुलने कलक करी, परदारा परिदरो
रेलो ।। सादेवा तस हा तुम थाय, के लाज न केम करो रेलो॥१४॥
साहेबा धिर धिग् मदनने होय, के तुम सरिखा नरा रेलो ॥ साहेवा
झान धर्म वृति कीर्ति, के नाणवा तत्परा रेलो ॥ सादेवा तेह कुपंथें
जाय, के तेरों किरपा करी रेलो ॥ साहेबानक वत्सल तुमें तेण, के प्रसन्न
ता मन धरी रेलो ॥ १५ ॥ सादेवा सेवकनो अपराध, के एक खमीय प्रजु
रेलो ॥ साहेबा इत्यादिक उपदेश, के सानली, नूविच रेलो ॥ साहेवा का
इक शांत कोपानि, के खेचर पति थयो रेलो ॥ साहेवा पाडो उत्तर तास, के
एणी परें वालियो रेलो ॥ १६ ॥ साहेवा थाग्मे खमें ढाल, ए बीजी सो
हामणी रेलो ।। सादेबा श्रीजयानदनें रासें के, पनविजय नणी रेलो।सा
देवा जैन मारगना जाण,के थागम सानले रेलो ॥ साहेवा काममदें नवि
देखे, थनरथ थागडे रेलो ॥१॥ सर्वगाथा ॥६॥
॥ दोहा ॥
॥ मध्यवयें दु थावियो, कामथी न करु काम ॥ पण लोपी मुज थ
एने, नवि सही शकीये नाम ॥ १॥ थनि विना बनवु कयुं, शस्त्र विना
वध तेह ॥ थाणानग नरेंड्नी, तुमें सवि जाणो एह ॥ २॥ पवनवेग तेणें
कारणे, राज्य जीवित खप होय ॥ इछे जमाइ जीवतो, तो कहु ते करे सो
य॥३॥ दासी चक्रायु तणी, एदवा वर्णनी श्रेणि ॥ निजपुत्री ककणे
लिखे, मुज शांति होये तेण ॥ ४ ॥ चक्रायु दासीपति, मौलियें लिखें
एणी रीति ॥ ते थापु हूं एदना, जामातानें प्रीति ॥ ५॥ ते पहेरे शिर ठ
परें, वली मुज पुत्री जेह ॥ चक्रमुदरी नामथी, वे कलावती तेद ॥६॥
वजमुदरी थावीनें, मुज दत्त ककण परी ॥ नाटक शीखवे मुज सुता,
चित्त राखी वह पेर ॥ ७॥
॥ ढाल त्रीजी॥ श्रीझपनानन गुणनिलो ॥ ए वेशी।
॥ वात सुणी चक्री तणी, ते पंमित ने परधान रे॥ विनीत ॥ दाकारो न
णी उठीया, थाव्या ते निजपुरथान रे । वि०॥१॥थिवी पुरुप रयणे
जरी ॥ ए थांकणी ॥ सनलावी वात ते पवननें, तिम श्रीजयानदने
तेह रे ॥ विणा विस्तारें सनलावता, चक्रायुक्ष बोल्या जेह रे ॥ वि॥ ॥

३६ जयानंद केवलीनो रास. के, मुजने उपगरयो रेलो ॥ ५ || साया मुज प्रतिज्ञा एह के, तेहने रे कनी रेलो ॥ सादेवा दीधी कन्या तास, के परस्यो ते धणी रेलो ॥ सारेका पुत्र मूकावो मुज, के एम बदु कायु रेलो । सादेवा पण मुज वचन सामित्र, मनमा नवि लघु रेलो ॥ ५॥ साया दूत कहे जो परणी,के पण मोर लो तमें रेलो ॥ साहेवा तो तुम तूसो स्वामि के, वली कडे अमें रे लो ॥ साहेवा पवनवेग कहे ताम, के एम केम वोलीय रेलो ॥ साहेवा घटती वातनु वयण, के मुखथी खोलीय रेलो ॥ ६॥ यत ॥ सरुत्व ल्पति राजान , सरूत् जल्पति पंमिता ॥ सरुत् कन्या प्रदीयते, त्रिस्येतानि सरत् सरुत् ।। १ ।। पूर्वढाल | सादेवा कन्यानु मागु होय, के एदनु नहीं कदा रेलो ॥ साहेबा दूत कहे ए वलियो, के तुम रुसशे जदा रेलो ॥ सा हेवा ससरा जमाइनी नांखो, के गति तुम शी थशे रेलो ॥ साहेवा पवन कहे जे थानार, के थाशे नावि वशे रेलोशासादेवा प्राण जते पण एह,के नवि थाये किमे रेलो। सादेवा मीठे वचनें एद, के समनावजो तुमें रे लो॥ सादेवा ठक्ति युक्तियो कहेलो, के निम रूसे नहीं रेलो । सादेवा तुमें हो चतुर सुजाण, के गति एहवी थहीं रेलो ॥ ७॥ साहेवा दूत गयो हवे ताम, के चक्रोनी कनें रेलो ॥ साहेवा पवन ते मत्रीने पूछे, के वली चितवी मने रेलो ॥ साहेवा नाम पटुवाक सार, के कोविद दीपतो रेलो॥ सादेवा मत्री मूके बहु साथ, के वादनें कींपतो रेलो ॥ए। साहेबा दूतें च कीने वात, के सनलावी यदा रेलो ॥ सादेवा क्रोधथकी धमधमियो, के घ कायु तदा रेलो ॥ साहेबा पट्ठवाफ पोहोतो ताम, के प्रणमीने कहे रे लो॥ साहेवा थी अधिकुं वीर्य, के तुज बालु लदे रेलो ॥ १० ॥ सादे वा कुलवतामा धोरी, के जयवता रदो रेलो ॥ साहेबा तुमथी अनीति ब के सद्ध दूर रहो रेलो । सादेवा खेचर नर सुर असुर, के युगम म ती सदा रेजो ॥ साहेबा कनकाचलें तुज गाय, के कीर्ति सपदा रेलो ।। ॥ ११॥ साहेबा चा उज्ज्वल तुज कीर्ति के जगमा विस्तरी रेलो ॥ साहे बा नारि कारण ते मलिन, के कम करे तुं फरी रेलोसादेबा बदलत क पलावल्प, के कोडीगमें कनी रेलो ॥ साहेबा घर घर वीसे तेह, के रूपें रंना बनी रेलो॥ १५ ॥ सादेबा श्वायें परणी तेह के लोगवो मुख घणु रेलो ।। सादेबा परस्त्रोथी नाये फीर्ति के, थावे लघु पए रेलो ॥ १३ ॥ साहेबा न्याय,

अष्टम खंम.
२७
देव गुरु तेम धर्म के, जाणे नूपति रेलो ॥ सादेवा शुम वश उत्पन्न, के
धनीति न दोय रति रेलो॥ सादेवा कुलने तक करी, परदारा परिहरो
रेलो । सादेवा तस इशा तुम थाय, के लाज न केम करो रेलो॥ १४ ॥
सादेवा धिग् धिग् मदनने दोय, के तुम सरिखा नरा रेलो ॥ सादेवा
झान धर्म धृति कीर्ति, के नाणवा तत्परा रेलो ॥ सादेवा तेह कुपंथें
जाय, के तेणें किरपा करी रेलो॥ साहेबा नक्त वत्सल तुमें तेण, के प्रसन्न
ता मन धरी रेलो ॥१५॥ सादेवा सेवकनो अपराध, के एक खमीयें प्रस्तु
रेलो ॥ साहेबा इत्याविक उपदेश, के सनिली नूविच रेलो ॥ सादेवा का
श्क शांत कोपानि, के खेचर पति थयो रेलो ॥ सादेवा पाने उत्तर तास, के
एणी परें वालियो रेलो ॥ १६ ॥ साहेबा थाम्मे खमें ढाल, ए बीजी सो
हामणी रेलो ।। सादेवा श्रीजयानदनें रासें के, पनविजय नणी रेलो॥सा
देवा जैन मारगना जाण,के बागम सानो रेलो ॥ साहेवा काममदें नवि
देखे, धनरथ पागलें रेलो ॥१॥ सर्वगाथा ॥६॥
॥ दोदा ॥
॥ मध्यवयें हूँ थावियो, कामयी न करु काम ॥ पण लोपी मुज था
णने, नवि सही शकीय नाम ॥१॥ थग्नि विना बलयु कयुं, शस्त्र विना
वध तेह ॥ श्राणानग नरेंड्नी, तुमें सवि जाणो एह ॥२॥ पवनवेग तेरों
कारणे, राज्य जीवित खप होय ॥ श्छे जमाइ जीवतो, तो कहु ते करे सो
य॥३॥ दासी चक्रायुद्ध तणी, एहवा वर्णनी श्रेणि ॥ निनपुत्री ककणे
लिखे, मुन शांति होये तेण ॥ ४ ॥ चकायुक्ष दासीपति, मौलियें लिखें
एणी रीति ॥ ते थापु ढुं एहना, जामातानें प्रीति ॥ ५॥ ते पहेरे शिर उ
परें, वली मुज पुत्री जेह ॥ चकसुंदरी नामथी, वे कलावती तेद ॥६॥
वनसुदरी थावीने, मुज दत्त ककए पहेरी ॥ नाटक शीखवे मुज मुता,
चिच राखी
वह
॥ ढाल त्रीजी॥ श्रीरुपनानन गुणनिलो ॥ ए देशी ॥
॥ वात सुणी चक्री तणी, ते पमित ने परधान रे॥ विनीत ॥ दाकारो न
णी उठीया, थाव्या ते निजपुरथान रे ॥ वि० ॥१॥ एथिवी पुरुप रयों
जरी ॥ ए थाकणी ॥ सनलावी वात ते पवनने, तिम श्रीजयानदने
तेह रे ॥ वि०॥ विस्तारें सनलावतां, चकायु वोल्या जेह रे ॥ विना टा
.
पेर
॥8॥

. q១០ जयानंद केवलीनो रास. ॥२॥ हवे पवनवेग मंत्री सह, श्रीश्रीजयानद एकांत रे ॥ वि०॥ वात गि चार करता कहे, श्रीजय मत मन करो घ्राति रे ॥ वि०॥४॥३॥ने चक्रायुझे तुमनें कपु, ते करिये थंगीकार रे । वि० ॥ वजसुंदरी राखो नो पवी, थोडो काल गेह मकार रे ॥ वि० ॥४॥ ५ ॥ वजसुंदरीनु करी रूप केटली ले साये नारि रे ॥ वि० ॥ चकायुक्ष पासे जइ करी, नणावी तस कनी सार रे ॥ वि० ॥ ४० ॥५॥ सघलु करा रुई यमे, जेम उचित दशे तेम तेह रे ॥ वि०॥ हुँ कार्य करीश सवि एकलो, कांइ फिकर म कर शो एद रे ॥ वि०॥४०॥ ६ ॥ एम कही सह निज निज घर गया, तब चकीना पुरुष प्रधान रे ॥ विसाव्या तस पवनवेग करे, प्रतिपत्ति तथा बदु मान रे ॥ वि०॥ ए॥ ॥ ते कहे चक्री एणी परें कहे, में केदेवराज्यु ने जेद रे ॥ वि० । वजसुदरी मूको शीखाववा, वली वीज कपु जेद तेह रे ॥ वि०॥४॥७॥ नो न करे तो छ थावोयो, युद्ध करवा थाजे ते ग्यार रे॥ वि० ॥ राज्य मूकीने जानो तुमें, त्रीजी गतिनो नहीं नगर रे ॥ वि० ॥ ४० ॥ ए॥ कहे पवनवेग X वोजीया, कोण नवि माने प्रनु थाण रे॥ वि० ॥ करी सामग्री मोकलु, थाजनो दिन पडखो जाण रे ॥वि०॥ ॥४०॥ १० ॥ उतारो थाप्यो एम कही, अशनादिक युक्ति अपार रे ।। ॥ वि०॥ सतोप्या नली नाति, अवसर थयो रातनो त्यार रे ॥ वि०॥ ॥४०॥११॥ तव श्रीजय पांचशे पुरुषनें, परीक्षा करी जेद युवान रे॥विण॥ शस्त्र शास्त्रमा कुशल जे, काढयो ते कर विज्ञान रे॥ वि०॥ ४० ॥१५॥ वीरांगद मदाबाद जे,सुघोष प्रमुख विवित्त रे॥वि०॥ स्त्रीनां रूप करे तवा, थया थाप समान विचित्त रे ॥ वि० ॥ ४० ॥ १३ ॥ वस्त्र धानूषण सा रिखा, विद्यायें ते करे रूप रे ॥ वि०॥ वजसुदरीना जेदवु, थाप रूप फरे नरलूप रे ॥ वि० ॥ ४ ॥ १४ ॥ चितामणि रम प्रनावथी, कडा वस्त्र त था थलकार रे ॥ वि० ॥ र्खन नहीं वज्जमुदरी, गोपवी वली गेह मकार रे ॥ वि० ॥ ॥१५॥ पवनवेग प्रात समे, ते परधाननी साख रे ॥वि०॥ कारिमी पुत्रीनें कहे, सनिलो तुमें महारी नाख रे ॥ वि० ॥ ॥ १५ ॥ नाटक कला शिखावीने, करजो स्वामी सतोष रे ॥ वि०॥ सा कहे तात याणा करु, एदमा नहीं कांइये मोष रे ॥ वि० ॥ ४० ॥१॥ शस्त्र गुप्त राख। करी, बेग सद्गुये विमान रे ॥वि०॥ नाटघसामग्री प्रगट पणे, पोदो अष्टम खंम. जाए ता चकीने थान रे ॥ वि० ॥ ४० ॥१॥ मूकी उद्यानमा ते नरा, जई क हे चकीने वात रे ॥ वि०॥ दासीयो तेडवा मोकले, हैयहे तस हर्ष न मा त रे ॥ वि० ॥ ४० ॥ १७ ॥ पर्वतमां को थानकें जइ, मूके गोपवी ते श स्त्र रे ॥ वि० । कारमी स्त्रीयो मूकी करी, पहेरी थसंकृति वस्त्र रे ॥वि ॥ ४० ॥२०॥ राय हजूर ते याचीया, ते वदन अधोमुख राखि रे ॥ वि०॥ ववसुंदरी उनी रही, दवे लाजमी धूंघट दाखि रे ॥ वि० ॥ ॥ २१॥ वद् नारी घडी घडीने थयो, धाता विज्ञाननी सीम रे ॥ विजानीपजावी पली एदनें,जगमा नही एदवु नीम रे ॥ वि० ॥४०॥२॥ नरपति एणी परें चित्त चितवी,अहो एक रूप प्रमाण रे ॥ वि० ॥ खाण कलानी ए ह शे, नृत्य करवानी थाण रे ॥ वि० ॥ ४ ॥ २३ ॥त्रीजी श्रातमा खम मां,वर पनविजय कदी ढाल रे ॥ वि० ॥ श्रीश्रीजयानदना रातमा, वात सुनो दवे सुरसाल रे ॥विणाट॥२४॥ सर्वगाथा ॥१॥ ॥ दोहा॥ ॥ नृप थाणाधी ते हवे,गीत वात मनोहार ॥ सर्वस्वीयें करी परवरी,ना टक करे सदार ॥१॥ देखी नृप मुख चमकिया, वस्त्र थने थलंकार ॥ देखी देखी रीजतो, देवा दान अपार ॥ ॥ ग्रास दास्यादिक बद् दीये, देथाद र मान ॥ रदेवा श्रावास थापतो, नाणे स्वर्ग विमान ॥३॥ सोंपी पुत्री शी खवा, चकसुदरी जेद ॥ निज परिवार परवरी, रहे श्रावासें तेह ॥ ॥ व जमुदरी शीखवे, नाटक कला थन्यास ॥ निज सम चक्रमुदरी प्रत्ये, नित्य नित्य रावी पास ॥ ५॥ प्रझायें सरसति समी, सोनागिण सुविनीत ॥ सर जनापिणी गुणवती, शीखे धरती प्रीति ॥ ६ ॥ योगिणीव ते गावती, श्रीजयकुमर चरित्र ॥ माया नारी सह मली,स्वर पद वर्ण विचित्र ॥ ॥ च रित्र विचित्र सुणी करी, कन्या कुमरशें राग ॥ धरतीपुळे हे सखी,कोण श्री जय महानाग ॥ ७ ॥ ॥ ढाल चोथी ॥ न्हानोके न्हानो नाइलो रे, न्हानो चापानो ठोड ।। ॥ न्हानो॥ ए देशी॥ ॥ जे तुमें गावो गीतमा रे,श्रीनयानद कुमार ॥ लागी मोहनीरे ॥ चकी के चक्री समोवडे रे, नग नहीं एहवो उदार ॥ ला॥१॥ ते मुज नाखो कोण रे, तव ते बोली नारि लामा योगिणीगण गाती थकी रे, पर्वत , JGO जयानंद केवलीनो रास. केली मजार || ला॥२॥ते थमें सोनाली शीखियो रे, पण नवीन खु तास ला०॥ पण वजसुंदरी वर समो रे, उत्तम गुण थावास ॥ला॥ ॥३॥हानीय उत्कृष्टो कह्यो रे, इणहीज नरत मजार ला॥ सनवीय एम सानली रे, देखी कलादिक वार ।। ला॥४॥ वजमुंदरी रीजती रे, इन्छे रहेवु तस पास ॥ ला॥ नाग्य होये जो माहरु रे,तो एदयो धव खास ॥ला ॥ ५॥ वजसुंदरी जेली रहु रे, पण हवे परस्पो तेह ॥ ला० ॥ ता त धरे क्षेप तेहशु रे,केम थापे मुज एह ॥ ला० ॥ ६॥ तेणें हु अनागिणी मावडी रे, एम मन धरती शोक ॥ ला ॥ थामण दूमणी ते रहे रे, रवि विरहें जेम कोक ला॥॥ तव ते देखी पूलती रे, कारमी नारीयो एम ॥ ॥ला॥रे वत्स तु रंना समीरे, श्छे पुरंदर प्रेमलाजामा सा कहे सां जलो बेहेनडी रे,च प्रदेवा निन पाणि ॥ ला० ॥ दासी थाये जेम तेणी परें रे, शुं थसाध्य वखाण ॥ ला एनारियो कहे तु सानले रे, वज सुंदरी एह ॥ ला॥ एहनें असाध्य का नथी रे, इछे ते करे जेह ला०॥ ॥१०॥ दीठी कला तें जेहवी रे,जगतनें जीतणदार । ला ॥ तेहवु परा क्रम जाणजे रे, फेर पडे न लगार ॥ला ॥११॥ पण मन थिर नवि स नवे रे, तादरं श्रम मनमाहि ॥ ला ॥ नारीनु चित्त चपल होये रे,कपि प थिर नही क्याहि ॥ ॥ ला० ॥ १२ ॥ चपल चिस अर्थ करे रे, कोण विषम ए फाम ॥ ला ॥ सा कदे स्तनसगति परें रे, मादारु मन दृढम म ॥ ला० ॥ १३ ॥ जेम दरिकी धनरागीयो रे,यमृत रोगी मान ला०॥ तरश्याने अमृत परें रे, तेम माहारे बद्ध मान ॥ ला ॥ १४ ॥ नारियो फदे ओ एम जे रे,तो तुं था तैयार ला॥ ते पण यावी तायली रे, स निज धन मुख जार ॥ ला॥ १५॥ नारियो सद्ध सनलावती रे, श्रीजपानवने वात ॥ ला० ॥ ततक्षण रचीया विमानमा रे, बेसाही ते ख्यात ॥ ताम् ॥ १६ ॥ चाल्यो गगनमा तेइवे रे, महोल पर रही एम ॥ सा ॥ उद्घोषणा करे याकरी रे, सुणनो थापी प्रेम ॥ ला० ॥ १८ ॥ रे चक्की रे खेचरा रे, वीर तणु तुज मान लामाले जारा चक्रमुदरी रे, सनलावी तुम कान ॥ ला ॥ १७ ॥ बलवता जो जो तुमें रे,तो श्रीजया नद राय ॥ ला ॥ पासेंथी मूकावनो रे, बल न करूं एपों गय ॥ ला ॥ ॥ १७॥ एम कही नगर सयानमा रे, थावी गुप्त दथीयार ला॥ मगा अष्टम खंम श्र वे बढ़ जातिना रे, श्रीजयानंद कुमार ला॥१॥ थाम्मे खमें चोथीक ही रे, पद्मविजयें वर ढाल ॥ ला० ॥ श्रीजयानंदना रासमा रे, पुरय मग समाल ॥ला ॥ २० ॥ सर्वगाथा॥ ११ ॥ ॥दोहा॥ ॥ ते सांगली विस्मय लह्यो,चितवे खेचर राय ॥ श्रदो पराक्रम नारिनु, थहो थनीति कराय ॥१॥ बढ़ सुनटनें मोकले, कन्या वालवा काम ॥ माया स्त्री जूफिया, धरता अतिशय माम॥२॥ हास्या ते नागथका, थाव्या चक्री पाय ॥ स्त्रीय हरव्या लाजधी, मुखथी नवि बोलाय ॥३॥ पण रुधिरें खरडघा थका, देखी क्रोध नराय ॥ महाबल मोकले विस्मये,पा यकना समुदाय ॥ ४ ॥ के विमान माहे रह्या, केश बेग गजराज ॥ तुरग चढचा के तेजध, ले निज निज साज ॥१५॥ युरू करता तेदां, नाठा सुनट जे नारि ॥ राखो श्रम्ह कहेता थका, जिहां ने श्रीजयकुमार ॥ ६॥ ॥ ढाल पांचमी ॥ जा जा रे रुग्डा नाथ, तुमचं नहीं बोलु ॥ ए देशी॥ ॥ श्रीनयानदजी सतीया, कांइ यु६ करणने कान रे ॥ स्त्रीरूपें थावी नडयो, को बलवतो महाराज ॥१॥ गुणगणवतो रे, मारो मारो रे करे दुकार ॥ गु० ॥ ले ले रे कर हथियार ॥ गु० ॥ शूरवीर थ शिरदार ॥ गुण॥ ए थोकणी ॥ गदा लेइने चूरतो, कोई पापड परें विमान रे ।। महाव त' गज पाडतो, कांश पर्वत शिला समान ॥ गु०॥ २ ॥ गरुड परें दय ले इने, कांश गगनें नमाडे तेह रे ॥ चचा पुरुष तणीपरें, कांड पाहे सुनटनें जेह । गु०॥३॥ केलिनु वन जेम दायीयो, कांश हिम जिम कमलनीख करे॥ स्त्रीरूपें कुमरें तदा, कोई प्रासष्यो तेज प्रचम ॥ गुण ॥ ४ ॥ मूकी मन नाशि गया, कांश निन्न निन्न सह जाय रे ॥ रुधिर जरता लाजता, काइ थाव्या जिहां नरराय ॥ गुण ॥ ५॥ स्त्रीय दरव्या ते लाजथी, कांड मुख न देखाडे थाय रे ॥ तेद स्वरूप चरथो सुणी, कांड नरपति खेद न राय ॥ गु० ॥ ६॥ खेद लाज विस्मय घणणे, कोई कोषधी व्याकुल थाय रे ॥ पुत्री पानी वालवा, कोई ते पोतें राय ॥ गु० ॥ ॥ स्त्री उपर ए ना खतां, कोइ लाजे मुन वाण रे ॥ मोहोटो अपजश चितवी, कांड वेग तिदिन गण ॥ गु०॥6॥ पवनवेग खेचर पति, कांड नोगरत्यादिक भाव रे ॥ बोलाव्या ते थाविया, कार बढ वलनो करी ठाठ ॥ गु०॥

० जयानंद केवलीनो रास. केली मकार ॥ar ॥२॥ते थमें सांजली शीखियां रे, पण नवीन खु तास ला॥ पण वजसुंदरी वर समो रे, उत्तम गुण थावास ॥ता। ॥३॥ ज्ञानीय उलटो कह्यो रे, इणहीज जरत मकार ला सनवीय एम सानली रे, देखी कलाविक वार ॥ सा ॥३॥ वजसुवरी रीजती रे, श्छे रहे तस पास ॥ ला॥ नाग्य होये जो माहरु रे,तो एदवो धव खास ॥ सा० ॥ ५॥ वज्जमुंदरी नेली रई रे, पण हवे परफ्यो तेह । ला ॥ ता त धरे क्षेप तेहशु रे,केम थापे मुन एह ।। ला० ॥ ६ ॥ तेणें दु अनागिणी मावडी रे, एम मन धरती शोक ॥ ला ॥थामण दूमणी ते रे, रवि विरहें जेम कोक ला॥७॥ तव ते देखी पूलती रे, कारमी नारीयो एम ॥ ॥ ला॥रे वत्स तु रना समी रे, श्छे पुरंदर प्रेमलााना सा कहे सा नलो वेहेनडी रे, चदेवा निन पाणि ॥ला ॥ दासी थाये जेम तेणी परें रे, शु असाध्य वखाण ॥ ला० ॥॥ नारियो कहे तु सानले रे, वन सुंदरी एह ॥ ला ॥ एदने थसाध्य का नथी रे, श्छे ते करे जेद ॥ला॥ ॥१०॥ दीनी कला ते जेहवी रे,जगतने जीतहार ॥ ला० ॥ तेहतु परा क्रम जाणजे रे, फेर पडे न लगार ॥ला ॥११॥ पण मन थिर नवि स नवे रे, ताहरु थम मनमाहि ॥ ला ॥ नारीनु चित्त चपल दोये रे,कपि प रे थिर नही क्यादि ॥ ॥ला ॥ १२ ॥ चपल चित्त अर्थ करे रे, कोण विषम ए काम ॥ ला ॥ ता कहे स्तनसगति परें रे, मादारु मन दृढ वा म ॥ला ॥१३॥ जेम दरिछी धनरागीयो रे,यमृत रोगी मान ला॥ तरश्याने अमृत परे रे, तेम मादारे बलु मान ॥ जा ॥ १४ ॥ नारियो कहे जो एम ने रे,तो तुं था तैयार ॥ ला॥ते पण श्रावी उतावली रे, लइ निज धन मुख तार ॥ ला० ॥ १५॥ नारियो सद्गु सनलावती रे, श्रीजयानदने वात ॥ला ॥ ततण रचीया विमानमा रे, बेसाही ते रख्यात ॥ ला ॥ १६ ॥ चाल्यो गगनमा तेइवें रे, महोज उपर रही एम ॥सा०॥ घोषणा करे थाकरी रे, सुणजो थाणी प्रेम ॥ ला ॥१७॥ रे धकी रे खेचरा रे, वीर तणु तुज मान लामाले जाम चक्रसुवरी रे, सनलावी तुम कान ॥ ला ॥१७॥ बलवता जो गे तुमें रे,तो श्रीनया नद राय ॥ जा० ॥ पासेंथी मूकावनो रे, बल न करूं एवं गय ॥ ला॥ ॥ १७ ॥ एम कही नगर सद्यानमा रे, भावी गुप्त इपीयारजा०॥ मंगा अष्टम खम श्र वे बहुजातिना रे, श्रीजयानद कुमार ला॥१॥ थाम्मे खमें चोथी क दी रे, पद्मविनये वर ढाल ॥ ला॥ श्रीजयानदना रासमा रे, पुण्य मग लमाल ॥ला ॥ २० ॥ सर्वगाथा॥ ११ ॥ ॥ दोहा॥ ॥ ते सांगली विस्मय लयो,चितवे खेचर राय ॥ श्रदो पराक्रम नारिनु, थदो थनीति कराय ॥१॥ बद सुनटनें मोकले, कन्या वालवा काम ॥ माया स्त्री जुक्रिया, धरता अतिशय माम ॥ ५॥ हास्या ते नाठायका, याव्या चक्री पाय ॥ स्त्रीय दरव्या लाजथी, मुखथी नवि बोलाय ॥३॥ पण रुधिरें खरड्या थका, देखी क्रोध नराय ।। महाबल मोकले विस्मये,पा यकना समुदाय ॥ ॥ के विमान माहे रहा, केश बेता गजराज ॥ तुरग चढया के तेजj, लेइ निज निज साज ॥॥५॥ युरू करता तेहा, नाना मुनट जे नारि ॥ राखो थम्द कहेता थका, जिहा ने श्रीजयकुमार ॥ ६॥ ॥ ढाल पांचमी ॥ जा जा रे रुग्डा नाथ, तुमधु नहीं वोलु ॥ ए देशी॥ ॥ श्रीजयानदजी उठीया, कांइ युद्ध करणने कान रे ॥ स्त्रीरूपें थावी नडयो, कांश बसवतो महाराज ॥ १ ॥ गुणगणवतो रे, मारो मारो रे करे द्रुकार ॥ गु० ॥ ले ले रे कर हथियार ॥ गु० ॥ शूरवीर थइ शिरदार ॥ गुण ॥ ए थांकणी ॥ गदा लेइने चूरतो, कांड पापड परें विमान रे ।। महाव तर गल पाडतो, कांश पर्वत शिला समान ॥ गु०॥ ॥ गरुड परे हय ले इने, काई गगनें नमाडे तेह रे॥ चचा पुरुष तणीपरें, कांश पाडे सुनटनें जेद ॥ गु०॥३॥ केलिनुं वन जेम हाथीयो, कांश हिम जिम कमलनी खं मरे ॥ स्त्रीरूपं कुमरें तदा, कां त्रासष्यो तेज प्रचम ॥ गु० ॥ ४ ॥ मूकी मन नाशि गया, कां निन्न निन्न सक्नु जाय रे ॥ रुधिर जरता लानता, कार थाव्या जिहां नरराय । गुण ॥ ५॥ स्त्रीय दरव्या ते लाजश्री, कांद मुख न देखाडे थाय रे ॥ तेह स्वरूप चरथी सुणी, कांश नरपति खेद न राय ॥गु०॥६॥ खेद लान विस्मय घणो, को कोधथी व्याकुल थाय रे ॥ पुत्री पाठी वालवा, काइते पोतें राय ॥ गु० ॥ ॥ स्त्री उपर ए ना खतां, कोइ लाजे ने मुज वाण रे ॥ मोहोटो अपजश चितवी, कांड वेगा तिणहिज वाण ॥ गु० ॥ ७॥ पवनवेग खेचर पति, कोई नोगरत्यादिक पाठ रे॥ वोलाव्या ते याविया, कांड बढ़ वलनो करी ठाठ ॥ गु० ॥

ចុច जयानंद केवलीनो रास. केली मकार ॥ला ॥२॥ते थमें सनिली शीखियां रे, पण नवीन खु तात आला. पण वजसुंदरी वर समो रे, उत्तम गुण यावास ला ॥३॥ ज्ञानीय उत्कृष्टो कह्यो रे, इणहीज नरत मकार लाणा सनवीय एम सानली रे, देखी कलादिक वार ।। सा ॥४॥ वजमुंदरी रीजती रे, श्छे रहेतु तस पास ॥ ला॥ नाग्य होये जो माहरु रे,तो एदयो धव खास । लाम् ॥ ५॥ वजमुंदरी जेली रह रे, पण हवे परस्यो तेह ॥ ता० ॥ ता त धरे क्षेप तेहशु रे,केम थापे मुज एह ।। ला० ॥ ६ ॥ तेणें दु अनागिणी मावडी रे, एम मन धरती शोक ॥ ला० ॥ थामण दुमणी ते रहे रे, रवि विरहें जेम कोक ॥ला०॥७॥ तव ते देखी पूबती रे, कारमी नारीयो एम ।। ॥ ला०॥रे वत्स तुं रंना समी रे, श्छे पुरंदर प्रेम लाम॥ सा कहे सां जलो बेहेनही रे,च अहेवा निन पाणि ॥ला ॥ दासी थाये जेम तेणी परें रे, शु असाध्य वखाण ॥ ला ॥॥ नारियो कहे तुं सानले रे, वन सुंदरी एह ॥ ला०॥ एहनें थसाध्य कांश नयी रे, श्वे ते करे जेह ला॥ ॥१०॥दीती कला तें जेदवी रे,जगतनें जीतणदार ॥ ला ॥ तेहवु परा क्रम जाणजे रे, फेर पडे न लगार ।ला ॥११॥ पण मन थिर नवि सं नवे रे, ताहरु श्रम मनमादि ॥ला ॥ नारीनु चित्त चपल होये रे,कपि प रें थिर नही क्याहि ॥॥ला ॥ १२ ॥ चपल चित्त अर्थ करे रे, कोण विषम ए काम ॥ ला ॥ सा कदे स्तनसगति परें रे, मादारु मन दृढम म ॥ ता० ॥१३॥ जेम वरिड़ी धनरागीयो रे,अमृत रोगी मान ला०॥ तरश्यानें थमृत परें रे, तेम माहारे बढ़ मान ॥ लाम् ॥ १४ ॥ नारियो कहे जो एम के रे,तो तुं था तैयार ॥ ला॥ते पण भावी सतावली रे, जइ निज धन मुख लार ॥ला ॥ १५ ॥ नारियो सद्गु सनलावतो रे, श्रीजयानदने वात ॥ ला ॥ ततण रचीया विमानमा रे, बेसाठी ते ख्यात ॥ ला० ॥ १६ ॥ चाल्यो गगनमा तेदवे रे, महोल उपर रही एम ॥ला०॥ उद्घोषणा करे थाकरी रे, सुणनो थाणी प्रेम ॥ ला० ॥१७॥ रे चक्री रे खेचरा रे, वीर तणु सुज मान लामाले जाउं चक्रसुवरी रे, सनसावी तुम कान ॥ सा ॥ १७ ॥ बलवता जो जो तुमें रे,तो श्रीजया नद राय ॥ ला० ॥ पासेंथी मूकावजो रे, बल न करु एवं गय ॥ ला॥ ॥१७॥ एम फही नगर उपानमा रे, बानी गुप्त हमीयारलाना ममा अष्टम खं. २३ स्य ययुं जनादि ॥ अथवा मुज उत्सव थयो, जेणे थाव्यो ए थाहि ॥ ॥३॥ का जशे मुन कर तणी, मुज प्रताप वर थाग ॥ वयरी इंधण पा मीने, थथवा दीपवा लाग ॥ ॥ श्रथवा स्त्री थागल करी, सेनट जूकशे जेह ॥ मुज रण कौतुक पूरवा, केम समरथ ने तेह ॥ ॥ थाप शक्ति थ ण जाणतो,थायो मुज पुर पास ॥ शिक्षा देश ले पुत्रीने,एहने करु नि राश ॥६॥ एम चिती चक्री हवे,वजडावे रण नेरि ॥ सुनट सवे तव सज थया, सांजली नादने सेर ॥ ७॥ ॥ ढाल बही। लाल पीयारीनो सादेबो रे॥ए देशी॥ ॥ स्वामी मोरा रे, गज उपर चढे जेटले रे, पूर्वाचल जेम सूर लाल ॥ म स्तक मुक्कुट पडि गयो रे, तेटले गयुं मानु नूर लाल ॥ १ ॥ पुण्य प्रमाणे स दुनीपजे रे ॥ ए थोकणी ॥ स्वा० ॥ लघु वही नीति साथे करे रे, नयनी परें गजराज लाल ॥ बीक था सन्मुख तदा रे, वारे शकुन ते काज लाल ॥ पु० ॥ २॥ स्वा॥ वस्त्रे पग स्खलितदारे,चामरधारिणी नार लाल ॥ चामर तस करथी पडघु रे, सूचवे थतिथ असार लाल पु०॥३॥ स्वा॥ कारण विण चलियो तदा रे,त्र तणो जेह दम लाल ॥ सचिव ते देखीने नृपप्रत्ये रे, विनवे तेज प्रचम लाल पु॥॥स्वा०॥ ए थपशकुन ते एम कहे रे, रणयात्रा नवि थाय लाल ॥ सनिलो विनती थम्ह तणी रे, वेसो थासन गाय लाल ॥ पु०॥॥स्वा० ॥ वेग खेचर पति तदा रे,हित कोण माने न सयण लाल ॥ बोले सचिव स्वामी सुणो रे, हितकारी थम वयण जाल ॥ पु० ॥ ६ ॥ स्वा० ॥ शत्रु सैन्य नांज्या तुमें रे, लीलायें शूरवीर लाल ॥ नवि नांज्युं सैन्य तुम तणु रे, बलवत तुम धार लाल ॥ पु० ॥ ॥णास्वा॥ नारी एदन सनवे रे, परिकर पण नहीं नारीलाल ॥ पवन वेगादिक रानिया रे, स्त्रीने थावे नविल्दार लाल ॥ पु० ॥ ७ ॥ स्वा०॥ नोगरत्यादिक नूपति रे, विद्याधर तणा वार लाल ॥ महानह मानी थावे नही रे, नारी पूठे थवधार लाल ॥ पु० ॥ ए॥ स्वा० ॥ वजसुदरी वर ए ह रे, देवांगना गुण गाय लाल ॥ तुम वचनें परानव लदी रे, थाव्यो श्रीजयराय लाल ॥ पु०॥ १० ॥ स्वा० ॥ अपजश थापवा तुम्हनें रे, ना रियोनां करी रूप लाल । नारियें जीत्यो ए चक्रीने रे, एदवु मन धरी नूप लाल ॥ पु०॥ ११॥ स्वा०॥ ककए मौलि थक्षर कदा रे, समरथ छत्री .

२५२ जयानंद केवलीनो रास. ॥ ॥ चंगति वली थावीयो, कार लेवह परिवार रे ॥ मित्रादिक सं वधथी, काश् नृप विद्याधर वार ।। गु० ॥ १०॥ दक्षिण श्रेणिना रानी, का पवनवेगशु मेल रे ॥ तस वोलान्या श्राविया,कs तन मन तेहा ने ल ॥ गु०॥ ११ ॥ प्रायें दक्षिण श्रेणिना, काइ पवनवेग सह लेय रे ॥ से न्य घणु नेलु करी, काइ थाव्यो पूर्व सकेय ॥ गु०॥ १५ ॥धकायुक्ष पक्ष खोजियो, कोई देखी तेह बनाव रे॥त्राण रहित जेम जय लहे, काय जे म शनि मकर स्थिति दाव ॥ गुण॥१३॥ काहला त्रट घट वाजती, कार नीषण उठे नाव रे ॥ शस्त्र लेइ नट धावता, करे बूवारव सविपाद । गु०॥ ॥ १४ ॥ कायर सुनट ते नासता. कोइ जय कोलाहल जास रे ॥ करें बालक ले। रोवती, काश् तरलाही लेइ त्रास ॥ गु०॥१५॥ बालान मूल उमेलिने, कांश नाग तिहां गनराज रे॥श्रश्वस्वार नाखी दीये, कोई थश्च ते न खमे ताज ॥ गु०॥ १६॥ जीपण नकारव करी, कांश गायो बोडी राश रे ॥ वृषननें महीपी तेम नमे, काइ नयविन्दल सही त्रास ॥ गु०॥ १७ ॥ पाणिहारी श्रगें फपती, कोइ फोडे घट समुदाय रे ॥ थाजूषण खशीनें पड़े, कां नारि न जाया जाय ॥ ॥ १७ ॥ नासता ढोर ते पाहता, काश नरनारीने पंथ रे ॥ दाल कझोल नगरी थर, कांश स्थिर नहीं कां श्रथ ॥ गु० ॥ १५ ॥ त्रुटपा दार मोती तणा, काइ पुज ते मानु एद रे ॥ कुथर थाववा कारणे, कांश स्वस्तिक प्रवा जेह । गु०॥ ॥ २०॥ के कदे जून नारिथी, काइ नगर खोनाणु एम रे । कोइ कहे ए नट थडे, काश् नारी करे एम केम ॥ गु०॥ ११ ॥ ६ तथा लोकपाल ए, कांड शत्रुपदें थाय रे ॥ नवि जीताये कोई कहे, कोइ चक्रायु जीता य ॥ गु० ॥ २२ ॥ मत बीयो केशक कहे, का एहनो कदो श्यो नार रे ॥ थापण स्वामी थागलें, कोई सदुए तृण धनुहार ॥ गु० ॥ १३ ॥ थाम्मे खंमें पांचमी, कांश पविजयें कही ताल रे ॥ पुण्यपसायें जीवनें, कार हो घे मंगलमाल ॥ गु०॥ २४ ॥ सर्वगाथा ॥ १३ ॥ ॥ दोहा ॥ ॥ परचकागम सनिली, देखी पुरनो कोन ॥ कहे कोण मरवा थावि यो,पाडवा घरनो मोन ॥१॥ चर यावी कहे चक्रीने,पवनवेगादिक नाम । चक्री कहे रंमा थहो, नगर खोनावे थाम ॥ २॥सीमा लघी मारी, हा जय अष्टम खम नही थावमा खममा रे, पद्मविजय कही ढाल लाल || श्रीजयानदना रास मां रे, पुस्य थी मगलमाल लाल पु० ॥ २७॥ स्वा० ॥ सर्वगाया ॥१॥ ॥ दोहा॥ । मत्रि वाणी एम सनिली, बोल्यो खेचर राय ॥ थनिष्ट शंका चित्त मां धरी, स्नेह कारणें कहो थाय ॥१॥ परनारी दतथी करी, परणावु वली एद ॥ श्यो महिमा माहारो रहे, थपत्य न राखे जेद ॥ ॥ पवनवेगनी दीकरी, विद्याकला उन्माद ॥ चेष्टा एदवीधाचरे, उतारूं एद नाद ॥३॥ नारीने न होये बुझही, पूर्वापरनो विचार ॥ अथवा स्त्री रूपें हजो, श्रीज यानद कुमार ॥४॥ विद्याधर चक्री किस्यो, एदनो नय करूं मन्न ॥ नय न धरु मनमां जरा, सोनलजो रेस कन्न ॥ ५॥ नृप सुर कीटक प्राय ते, देवीयो कीटिका प्राय ॥ तेणें जीत्या तो छं थयुं, मुजने नवि जीताय ॥ ६ ॥ शिलावटपरें चूरीयो, एणे पर्वत तो काय ॥ दिव्यशस्त्र मुज धागलें, एहथी नवि रदेवाय ॥ ७॥ ॥ ढाल सातमी ॥ सुगुण सुगुण सोनागी जबूदिपमा दोजी ॥ ए देशी ॥ ॥श्री श्री नरतमाहे रह्या दोजी, नर सुर खेचर कोय ॥ थाण थाण उलपे माहरी दोजी, दीठो न सनिल्यो सोय ॥ थ॥ १ ॥ विद्या विद्या दिव्य शस्त्र नला दोजी,बाद्रुवल मुज जेद ॥ दीतुं दी किढ़ाये तुमें ते कहो दोजी, शु बीवरावे एद ॥थ०॥ २ ॥ ६ ६ च विरोचन यदि होनी, होय जनार्दन जोय ॥ तेहनें तेहनें पण जीतु सदा होजी, ए कोण मातर दोय ॥ थ० ॥ ३ ॥ सेवक सेवक चिरकालें रही दोजी, नारी अनुस यो जेद ॥ वयरी वयरी पवनवेग देखीने दोजी, मुज चक न सहे तेद ।। ॥श्र०॥४॥ त्रास त्रास पमाहुहु केदवो होजी, दरि जेम मृगनां वाल॥ सचिव सचिव वोले ते सानली होनी, सांजलो तुमें नूपाल ॥२०॥ ५ ॥ सैन्य सैन्य विद्याधरना सढ होजी, तेडावो धरी नेद ॥ तेज तेजस्वी पण ए कलो दोजी, पामे परानव तेह ॥ थ॥ ६ ॥ फरतो फरतो गगर्ने एकलो दोनी, सूरय रानु यसाय ॥ अल्प अल्प परिोदें चमा होजी, पूनमें रा द्व ग्रहाय ॥ थ॥ ॥ बीजे बीजे बद्दुपरिवारशु होजी, राद न थावे पास ।। नूप नूप सुणी गरवें करी दोजी, वक वक मुखे सवि खास ॥१०॥ ॥॥ पण ते पण ते मान्य तेणे करी दोजी, मान्यु वचन प्रमाण ॥ एकलो U जयानंद केवलीनो रास. जे होय लाल ॥ एह परानव थाकरो रे, वीर समे नहीं कोय लाल । पु०॥ १२ ॥ ॥ स्था०॥ सानलीय जनगीतमा रे, एहना तो यवदातें ना ल ॥ श्रीविशाल नृप रीजव्यो रे, बुद्धि पराक्रम वातें लाल ॥ पु०॥१३॥ स्वा० ॥ गिरिमालिनी प्रमुखा सूरी रे, वश कीधी प्रतियोधि लाल ॥ गिरि चूड सुर कोल रूपथी रे, जीत्यो ए सक्ष्योघि लाल ॥ पु॥ १४ ॥ स्वाOR जीत्यो एवं क्षेत्रपालनें रे, मलयमाल ते देव लाल ॥ीयधियो तेणें ॥ धी घणी रे, समकेती थइ करे सेव लाल ॥ पु० ॥ १५ ॥ स्वा० ॥ मित्र रूपें वली जीतीयो रे, पद्मरथ नरराय लाल | कोडघो सुनट' एकजे रे, नास्तिक नृपर्ने वधाय लाल ।। पु०॥ १६ ॥ स्वा॥ वानर करीने विडबी यो रे, प्रतिबोध्यो वली तेद लाल ॥ सह कुटुव जेलु कस्सु रे, वाध्यो अति ससनेह लाल ॥ पुग॥ १७ ॥ स्वा॥ वली वामन रूपें नीतीयो रे, राज कुमार थनेक लाल ॥ श्रीपतिरायनी कन्यका रे, जीती कलायें विवेक ला ल ॥ पु० ॥ १७ ॥ स्वा० ॥ परस्यो तिहां त्रण कन्यका रे, वली योगिनी यो पररन्यो लाल ॥ खोन्यो नदी तेद देखीने रे,अतर बातम हरख्यो ला ल ॥ पु० ॥१ए ॥ स्वा० ॥ वजवेग मूकावीयो रे, बलथी योगिणी पास लाल ॥ महाज्वाला कामाक्षा वली रे, न पडयो तेहनें पास लाज ॥ पु०॥ ॥ ५० ॥ स्वा० ॥ योगिणी सहित ते तूपियां रे, दीधी दिव्य ते शस्त्र ला ल ॥ वली शक्ति दीधी नक्तिथी रे, थानूषण वली वस्त्र लाल ॥ पुण॥१॥ स्वा० ॥ चूस्यो वज्जकूट पाहाडनें रे, जीत्यो वजमुख नाम लाल ॥ पग तिनी जे नामिनी रे, ते मूकावण काम लाल ॥ पुण् ॥ २५॥ स्वा० ॥ सा त्त्विकाहे शिरोमणि रे, मूकावी तस नारि लाल ॥ स्त्री रूपें ए उर्जय घणो रे, श्रीजयानद कुमार लाल ॥ पु॥ २॥स्वा०॥ कोप म करजो प्रसादयी रे, कन्या कोश्ने देवी लाल ॥ वर एदवो जडशे नहीं रे, वात के कण मौलि केदवी लाल ॥ पु० ॥ ५० ॥स्वा० ॥ वीसारी सवि वातने रे, कन्या एदने दीजें लाज ॥ स्वार्थ लायो एहने हो रे, पवनवेग वदी जें लाल ॥ पु० ॥२५॥स्वा॥परणी जाशे निज राज्यमा रे, तुम्ह उपर धरी स्नेह लाल ॥ सेवक पवनवेगादिका रे, प्रीति विशेषे धरेद लाज ॥ पु० ॥२६॥स्वा० ॥ पालो निष्कंटक राज्यने रे, एकांत नवि कीजें ला ल ॥ जो रति थवसर जोड्ने रे,हितकारी ए कदिजें राज ॥॥॥स्वा०॥

अष्टम खंत ០១ तडितवेग कौशल वली, कलाचइ हरिवीर ॥ ३ ॥ पवन थंगद महाकीर्ति तेम, सुजतानें बलवीर ॥ नदन पृथु सुनीषण वली, कृतांतास्य महाधीर ॥ ३ ॥ धूमकेतु धूमा तेम, गजरथ वेग एह ॥ नरपति बहुलट परिव खा, नीतरीया रणनेह ॥ ॥ मदन कासरने महायशा, कामकेतु वत्ती नीम ॥ तपन प्रताप तथा रमण, नहि पराक्रमनी सीम ॥ ५ ॥ कामनद न थदोन तेम, इत्यादिक नरराय ॥ सिहयुक्त रथें नीकले, इत्यादिक समु दाय ॥ ६ ॥ सुनट लखो गमे सामटा,देखी बीहे वीर ॥ कायर नवि देखी शके, वली नाखु मादाधीर ॥७॥ ॥ ढाल थाठमी ॥ मोरा साहेव हो श्रीशीतल नाथ के ॥ ए देशी॥ ॥ दवे व्याघ्र दो जोडचा रथ जास के,नाम सुणो तुमें तेदना ॥ प्रल्हा दनें दो शत्रुदम अकुश के, त्रास दीयें नाम जेहना ॥१॥ चमवेग होम हापाणि सुचक्र के, वस्त्रकेतन वली जाणीये ॥ गदाधरने दो वली चपल जोधार के, पराक्रमथी वखाणायें ॥२॥लरको एहवा दो व्याघ्र रथ सयु क्त के, सगुने तृण सम जे गणे॥थश्व रथमा हो वेशाने जाय के, द्रुका रा मुखथी नणे॥३॥ नीम क्रोधन दो रणच महागुर के, सागरने व जायुधो । सुतेजा दो पूर्णच महाथस्त्र के, शतायुध लिशायुधो॥ ४ ॥ इत्यादिक दो लद गमे राजान के, अश्वरथे ते नीसरे ॥ उत्साह हो उन्न लता जेद के, रण उत्सुकता बद्दु धरे ॥ ५॥ बल सिह हो कामांकुर दो य के, धूममाली चोथा वली ॥ शतायुध दो वनमाली दोय के, विजय 5 रत ईर मली ॥ ६॥ महाचक्र दो चक्रधारी नाम के, खेचर नृप मानी पणे॥ इत्यादिक दो विमान थारूढ के, नीकल्या परिवृत नट घणे ॥७॥ गजसिह दो गजानद गजदेव के, गजान गजवीर दारवायें । गजप्रीति हो गजध्वज गजकेलि के, गजवेग गनसेन नाखीयें ॥७॥ गजम हो गजानन वलवत के, गजविक्रम प्रमुखा घणा ॥ लरको लेखे दो गज वाहन जास के, शत्रु करे दीयामणा ॥ ए॥ दयवेग हो महावाजि नरिंद के, दयवादन खेचरपति ॥ महा थश्व दो दयवीर दयानद के ॥ हयसा र दयोदय नृपतति ॥ १०॥श्रश्ववीर दो थश्वसेन राजान के, थश्वानद थर्वे चढयो ।थश्वविक्रम हो दयसेन दयशस्त्र के, लरको गमे रणमा च ढयो ॥११॥ सिद सिहगति हो सिहविक्रमसार के, सिहवाहन सिह केस २७६ जयानंद केवलीनो रास. एकलो जय थर्थी थको होजी, सुनवलनु बढ माण ॥ ॥ ५॥ शत्रुनें कहेवरा विरं होजी,यावं तु थम्ह सह ॥ त्रण प्रण दिवस परलो तुमें दोजी, पठे समामनु कल ॥ ० ॥ १० ॥ सायें साप मूके गोय श्रे णिमा होनी, दूत नूपालने ताम॥ सेना सेना से सगु यावीया डोजी, की करे प्रणाम ॥ ५० ॥ ११ ॥थादर थादर बहु नृपनें दियो होजी, सैन्य सहित दरपत ॥ तत्पर तत्पर रण करवा नणी होनी, नृपनी शिक्षा सुणत ॥॥१२॥ चोथे चोथे दिन चक्री दवे दोनी, स्नान पूजा विरत ॥ नोनन नोजन करे मनमोद दोजी, मगलाचार करत ॥२०॥१२॥ युधनी युक्ष्नी सामयी सवे दोजी, मेलवी ते नरनाद ॥ गजवर गजवर उपर हरखशु दोजी, वेसे धरत उत्साह ॥ यः ॥ १४ ॥ वत्र बत्र चामर वींनी जते होनी, निकलीयो घर वादार ॥ विविध विविध शसं नस्लोरप तदा होनी, सन्न थाइ तैयार ॥ थ॥ १५ ॥ चक चकवेग महावेगनें हो जी, वीरांगद एवं नाम ॥ महावल महावत सुपेणने मुमुखा होनी, नद कुमर थनिराम ॥था१६॥ धीर धीर सेनने दृढायुधा होजी, महाधने चश्सेन ।। सुधीर सुधीर नानु वजानना दोजी,नूवीरने महासेन ॥॥१॥ शूर शूर वीर रविप्रन नामथी होनी,सिहनें चश्मुख तेम॥ वज्जा वजात वज माती वली दोजी, शनि महाबाहु सप्रेम ॥8॥१॥ महावीर्य महावीर्य चकेतन तथा दोजी, वली चान विचार ॥ पुत्र पुत्र इत्यादिक चक्रीना दोजी, विक्रमी बार हजार ॥ १०॥ १५ ॥ गजरथ गजरथ शार्दूल सपरें दोजी, तुरगनें वली वराह ॥ विविध विविध वादर्ने धावी मल्या दोजी, विविध थायुक्ष धरी चाह ।।थ॥ ३० ॥ तूर तूर वाजे समकालमा हो जी, नादें गगन नराय ॥ मेघ मेघ प्रलयना शब्दनें दोनो, मानु लघी जाय ॥थ ॥ २१॥ नगर नगरवासी बढनट वडा होनी, नीकल्या रण कर णाय ॥ एक एकया जाये धागले होजी, पंखी परे ते उजाय ॥१॥२॥ थाउमा थातमा खममा सातमी दोजी, ढाल ए नारखी सदार ॥ पम पम विजय कहे पुस्य या दोनी, दोवे जयजयकार ॥॥२॥ सर्वगापा।१२ ॥ दोहा॥ ॥ सेनानी नट कोटि , परवारीयो परिवर ॥थमवेग सिंहर करी, नीसरीयो ते वादार ॥ १ । बज कत महानुज नला, जानुफेतु नरवीर ॥

बहु स्नेहनें अष्टम खंम. एनए अंपा करे, मूकी गगनावास ॥१॥ सुनट तणी जे मावडी, तिम वली प्रेय सी नारि ॥ देव देवी लदो गमे, मानत करे तिवार ॥२॥ मात जगनीने प्रिय वहू, जय लखमीने हेत ॥ मगल विचित्र प्रकारना, करे ते वीर सके त ॥३॥ नासें तिलक तदा फरे, मगल केलं मात ॥ नाग्य लखमी रेखा परें, नीसरता कहे वात ॥ ४ ॥ । ढाल नवमी ॥ टेकरी रही रे, शहेर नरुथचके मेदान ॥ ए देशी॥ ॥ दल दोय मलियां रे चक्री पुरके मेदान ॥बन सलसलीयां रे फुरके नेजा नीशान ॥ एथांकणी ॥ जव सग्राममा नावा शूर, मायनें पय प्रण मे वड नूर, मात नणे पूर, वीरनी पुत्री रे बु वली वीरनी नार, वीर डे 'नाता रे तुं हवे वीरपणुं धार, तो थाउ मातारे मानु धन्य थवतार ।। द॥१॥ कोइ कहे मुन थाणी स्नेह, पूर्व म देजे मादरी दे ह, मरण जीवन डे तादरी एह ॥ कोइ कहे नारी रे वीरपत्नी पुत्री मात, हवे था नगनी रे जो थाये वीर तु ब्रांत, तो जग गावे रे ताहरा जस अवदात ॥ ७ ॥२॥ माहरे शोक विना दता नोग, दवे सयामनो तुज सयोग, जय लखमी थथवा देवलोग ॥थप्सरा सार्थे रे शोक्यपणु मुज था य, कोइ कहे एहव रे पण मुज सुख नही काय, पण जयलखमी रे था य तो यति सुखदाय ॥ व ॥३॥ कोई कहे जाउ दु तब तेह, बोली शु जूतु कहो एह, नवि निकालियो तु कदी रेद, नोकलीश नाही रे मादरा हृदय थी दूर, तुं मुज राखे रे ताहरा हृदय हजूर, तो सग्रामें रे थडियो होये नरपूर ।। ब० ॥ ४ ॥ नमिश्र कटाद वे जे नाद, ते मुजथी अधिक किण राह, मुजयी अधिको जयश्रीजाद, जग सहु बोले रे जेदनी कीर्ति श्रथाद,ते सुखें लावो रे मुजने दर्प उत्साह ॥ मुज पण तेहपुरे प्रीति धर पनी वे चाह ॥ ६॥ ५॥थालिंगन देता कहे कोय, हमणां स्नेह देखा वो सोय, जयलखमी वरशे नव तोय, थप्सरा अथवा रे मलशे तुमने जेवार, खवर ते पडशे रे स्नेहनी तुमची तिवार, सादमु जोशो रे के नहीं जोशो किवार ॥ द०॥ ६ ॥ गज कुनस्थल मोती स्वामि, तुज जपलखमी केरे गम, स्वस्तिक पुरणनु मुज काम, लावजो तेणें रे कोक बोले ए री ति, तो मुज रदेशेरे तुमशु जनमनी प्रीति, नहींतर रहेशे रे माहारु महे ए नित्य नित्य ॥ द०॥ ॥ इत्यादिक कहेती जे नारि, तेहनें थाश्वासना ទុ០០ जयानंट केवलीनो रास. री॥ सिहवीर हो महासिह सिहास्त्र के, सिहकेतु जोते थरी ॥ १२ ॥ सि हमाल। दो सिहकेतन नूप के, नृसिह सिहसेन शूरथी । चाले रणर्मा हो सिहवाहन एह के, सान से सपूरथा ॥ १३ ॥ व्याघमाली हो महा व्याघ्र व्याघ्रास्य के,व्याघ्रविक्रम चाले दवे ॥ व्याघ्रसेन हो वा चढया एह के, एक एकथा विरुदें स्तवे ॥१४॥ शाईलो दो हरिशार्दूल नाम के ॥ शाई खानद सोदामणा ।। शार्दूलानन हो शार्दू में चढघा जेह के, कदीय न थाये दियामणा ॥ १५॥ शार्दूलविक्रम दो चढीया शार्दूल के, केइ चढीया महा अही॥यष्टापदें दो के वाहन वराह के, केश पामे चढचो ऊक नहीं । ॥ १६ ॥ विविध वाहने हो विविध हथियार के, विविध चिन्हथौ चाली या ॥ कोडयो गमे दो पायक नरराय के, उत्सुकता रणे म्हालीपा ।। ॥१॥ परवरियो हो खेचर चकी राय के, मदथी यशकुन नवि गणे॥ सेना नो वली हो कोलाहल नाद के, तूरनो पोहोतो गयणांगणे ॥१॥ पुर सी मायें दो उतरीया याय के, कुमर सैन्यनें ढूकढा ॥ नाणी कुमर दो खेट चकी सचक्र के, न खसे रणें यदि टूकहा ॥ १५॥ कुवर कटके हो मल्या नेचरवृद के, अकोदिणी शत मित्त मल्यु ॥ चक्रीने दो एक सहस ते जा ण के, थक्षोहिणी माज कल्यु ॥२०॥ यत ॥ सेना चा कोहिणी नाम, खागाऽष्टैकक्कैिगर्ने २१७७० रथैथै २१७७० च्योदयै स्विघ्न, ६५६१० पंचनैश्च पदातिनि १०ए३५० ॥ पूर्वढाल ॥ सहस एकवीश दो आठशे सि तेर के, दाथीने रथ वर कह्या ॥ सदस पशिठ हो बशें दश पाय के, प्रिय या दय चरित्र सह्या ॥१॥ एक लाखनें दो त्रणशे नव सहस के, पं चास पायक जाणी॥थदौहिणी दो एकनु परिमाण के,पंच गुणा मन थाणी ॥२२॥बे कोडिनें दो वली लाख श्रढार के,सीत्तेर सहस उदर वाली ॥ गजनें रथे दो सरिखा वोय होय के,तुरग मुणो कदे केवली ॥१२॥ ब कोडिनें दो बप्पन वजी लाख के, दश हजार चक्री तणा॥ दश कोडीने हो साही त्राणु लाख के, जाणो ए पायक जना ॥२॥खम थाम्मे दो थामी वर ढाल के, सानजो पविजय कद ॥ श्रीजयना हो रासा नवि लोक के, सम्यक रीतें सईही ॥ २५ ॥ सर्वगाथा ॥ १५ ॥ ॥दोहा॥ ॥ कलकत शद ते सनिली, रवि रथ य लया त्रास ॥पभिम समुश् , अष्टम खं. शर था रे कर्मशत्रु जय काज, मोद नृप जीतो रे पहेरी चारित्र साज, जीती ने पामो रे नविनन शिवपुर राज ॥ १७ ॥ सर्वगाथा ॥ २६ ॥ ॥ दोहा ॥ ॥ वजसदृश सन्नादथी, गनकर परिवत सार ॥ घरी चिहुं दिशि धमक ती, पाखर थतिशय फार ॥ १॥ मदिरा पाइ वनमत्त कखा, शुमामा वीया तास ॥ मोघर नाला प्रमुख जे, उलाले थाकाश ॥ २ ॥ दंश वाध्या खड्ड, लोह पंजर बिहु पास ॥ तेहाद धनुर्धर रह्या, वड शाखायें यदि राश ॥ ३ ॥ सन्न महावत उपरें, वेठा सोहे जास ॥ पक्षवता पर्वत शि रें, वेता गरुड सकाश ॥ ४॥ पगमा नेघर खणखणे, घटाना टाकार ।। करता गुलगुल शब्दनें, सिदूरे शणगार ॥ ५ ॥ ॥ ढाल दशमी ॥ तुगिया गिरिशिखर सोहे ॥ ए देशी ॥ ॥ सुनट एपीपरें करे सजाइ,पाखस्या तेम तुरंग रे ॥ श्रश्ववार युत मा नु गोविद, गरुड चहियो रंग रे ॥सुन॥१॥ उबलता पाखवा दीसे,सायर जैम कलोल नलिनीदल सेवाल सयुत,उनले यति लोल रे ॥९॥२॥ गुल गुले गजतुरग हेपे, सन्न करता नाम रे ॥ शकुन मानी गज तुरगर्ने,पूजे थादरें ताम रे।मुं॥३॥ रथवरा वलीकरे वर्मित, मानु क्रीडा गेहरे॥ जय श्रीने खेलवाने, दृढकरे घनस्लेद रे ॥॥ सारथीने केश थापे, निज अधिक सन्नाह रे ॥ रथिक युद्ध तेह थाशे, सारखीया सबाह रे ॥मुगाया बकतर माहे तनु न माये, सगरनें उढरंग रे ॥थाप वाहन सक करता, विविध मनने उमग रे ॥ सु० ॥ ६ ॥ स्तंन ध्वजना दृढ करे केश, निजनिन वादने धारिरे ॥ महासुनट तुं प्रगट करवा, ते ध्वज बहु परकार रे ॥९० ॥ ॥ विविध शस्त्रे रथ नरे नट, रणमा सबल एह रे ॥ उट बक्तरें नरे केश, थाप वारण तेह रे ॥ सु० ॥ ॥ केशक ककट नवि पहेरे, नदीतो थावे कलकरे। वीराधिवीरपणु रहे नही, एदवी धारी क रे॥ सुमाया के शूरा शस्त्र मूके, मन धरी थनिमान रे ॥ पाटु मुष्टि प्रमुखें लडछु,सा दमा वीर समान रे॥सु॥१०॥पखालो जल नरी चाले, प्रपा चालती ते हरे ॥ खाद्य प्रमुखें शकट नरियां, कृधित देवा जेद रे ॥ सु० ॥ ११॥थी पघि नृत पूणि सेवे, केश पर उपकार रे ॥ उत्सुकता वे पण न चूके, विवे की कोई वार रे ॥ मु॥१२॥ नाटकिया परे शस्त्रधारि, पूर्व थरिने दोध रे ॥

ए जयानंद केवलीनो रास. वे सार,महा उत्साह ते धरी थपार, जस करी थागे रे नीकल्या पान विचार, नारी रु रे श्रीजयानव कुमार, हवे करे रातें रे रणना बहुप चार ।। ६० ॥ ॥ पवनवेग सुत जे वजवेग, सद्ध खेचर यनुमति सुविवेक, सेनानी थापे वडवेग॥वेह दलमाहे रे शस्त्र नागरिकायें धार, शस्त्रने पूजेरे पूर्व थया वडवीर, जेहनी करे वातो रे जेणें उताखो यरिनौर ॥ ७॥९॥ संग्रामें शस्त्रज परधान, तेणे शस्त्र थापे पट्टनें थान, चक्र खड्ग धनु वनस मान, त्रिशूल कुता रे तोमर मक्षिका सीर, परशुने शक्ति रेनलिका घरे । डवीर, नडमाल नामे रे मुष्टि थर्थ गनीर ॥ द०॥ १० ॥ ब्रुशने तुरिका मूसल नाम, पाश गदा तरवार उद्दाम, घन पटिश मुजर थनिराम, उस्फो ट लुटि रे करवालिकानें कुदाल, शकुनें गुतिका रे कण्य कपन्न सुविशाल, प्रद गोफणने रे कर्तरी जेद कराल द॥११॥ परपत्रक यष्टि शनिधान, ए त्रीश थायुध बहु मान, पवित्र जलें कराववा मान,चदन सोपे रे अरचे पुष्पनी माल, धूप उखेवे रे गीत नाटक सुरसाल, वली तप्त प्रणमे रेस मरे तस रखवाल ॥ द० ॥१॥ बकतर टोप प्रमुख जे होय,तस संस्का र करे सह कोय, रात बोलावी एणी परें जोय,मित्र जाणीने रे कौतुक ओ वानें काज,उदयाचलने रे शिर थाव्यो दिनराज, शूरने देखी रे, शूर थया थति नाज ॥ दण्॥१शानेरी मादलने कंसाल, तलिमा ना ढका ना ल, दुरुक्क मृदंग वाजिन सनाल, शखने कालदा रे जारी पडह प्रकार,स्व रमुख। करटो रे ममरुक नानक श्रीकार, दईरी वाजे रे ध्यंबक प्रमुख उदा र ॥ ३० ॥ १३ ॥ दोय दलमा एम वाजे वर, सानती वाघे सुनटने शुर, सायर खोनाणो मार्नु क्रूर, वजे हणीयो रे पर्वतनो जेम नाव,जलजीव त्रा वारे नाग गज उनमाद, परवत कप्यारे शलशल्या शेष थविवाद ॥वणा ॥ १५॥ कठप दृढ थइ थिवी नार, पूवें धरता कष्टें तिवार, दशदिशा गा ज रही जयकार, गिरिगुफा गाजे रे छटे मानुथाकाश, सिह ते पेसे रे वरी माहे लदी त्रास, दूरे पेग रे मदोरग बॉमी थावास ॥॥१६॥ वननेसा ते नाता जाय,नांजे क्षतणा समुदाय, सुरगण जोवाने तिहां श्राप, नादें दीया रे सुनट ते रण करणाय, वरसाद पामी रे दोय पलना सक थाय, कण कण वाधे रे सुनटनें दर्ष न माय ॥ द० ॥१७॥थाउमे खमें नवमी ढाल, नाखी पविजय सुरसाल, जेम ए सुनट थया छजमाला, सेम में अष्टम खं. श था रे कर्मशत्रु जय काज, मोह नृप जीतो रे पहेरी चारित्र साज, जीती ने पामो रे नविनन शिवपुर राज ॥ १७ ॥ सर्वगाथा ॥ २६ ॥ ॥ दोदा ॥ ॥ वजसदृश सन्नादथी, गजकर परिवृत सार॥ धूघरी चिहुं दिशि धमक ती, पाखर यतिशय फार ॥ १॥ मदिरा पाइ निमत्त कस्या, शुमामा दीया तास ॥ मोघर नाला प्रमुख जे, उत्ताले थाकाश ॥ २ ॥ देवशलें बांध्या खड्ग, लोह पंजर बिहु पास ॥ तेहाद धनुर्धर रह्या, वड शाखायें यदि राश ॥ ३ ॥ सन्नझमहावत उपरें, वेता सोहे जास ॥ पक्षवता पर्वत शि रें, बेग गरुड सकाश ॥ ॥ पगमा नेतर खणखणे, घटाना टएकार ॥ करता गुलगुल शदने, सिदूरे शणगार ॥ ५ ॥ ॥ ढाल दशमी । तुगिया गिरिशिखर सोहे ॥ ए देशी ॥ ॥ सुनट एणीपरें करे सजाइ,पाखस्त्रा तेम तुरंग रे ॥धश्ववार युत मा नु गोविद, गरुड चहियो रंग रे ॥सुन ०॥१॥ उष्ठजता पावस्या दीसे सायर जेम कनोल नलिनीवल सेवाल सयुत,उनले थति लोल रे ॥सुणा॥ गुल गुले गजतुरग हेपे, सन्न करता जाम रे ॥ शकुन मानी गज तुरंगनें,पूजे थादरें ताम रेसु०॥३॥रथवरा वलीकरे वर्मित, मानुकीहा गेहरे ॥ जय श्रीने खेलवाने, दृढकरे घनस्नेह रे ॥३॥ सारथीनें केश थापे, निज अधिक सन्नाह रे ॥ रथिक युके तेद थाशे, सारखीया छमाह रे ॥५॥ बकतर माहे तनु न माये, सगरनें उदरंग रे ॥थाप वादन सह करता, विविध मननें उमग रे ॥सु० ॥ ६ ॥ स्तंन ध्वजना दृढ करे के, निजनिज वाहने धारिरे ॥ महासुनट प्रगट करवा, ते ध्वज बढ़ परकार रे ॥९० ॥ ॥ विविध शस्त्रं रथ नरे नट, रणमा सबल एह रे ॥ उट बक्तरें नरे केश, थाप वारण तेह रे ॥सु० ॥ ७ ॥ केशक ककट नवि पहेरे, नदीतो थावे फलक रे॥ वीराधिवीरपणु रहे नही, एदवी धारी शक रे ॥ सुपए। के शूरा शस्त्र मूके, मन घरी थनिमान रे ॥ पाट्ठ मुष्टि प्रमुखें लडगु,सा हमा वीर समान रे ॥ सु०॥ १०॥ पखालो जल जरी चाले, प्रपा चालतीते हरे ॥ खाद्य प्रमुखें शकट नरियां, लुधित देवा जेह रे ॥ सु०॥ ११॥यो पधि नृत घूणि लेवे, केइ पर उपकार रे ॥ उत्सुकता ले पण न चूके, विवे की कोई वार रे। मु॥१॥ नाटकिया परें शस्त्रधारि, पूत थरिने दोध रे ।। .

राण जयानंद केवलीनो रास. दे सार,महा उत्साह ते धरी थपार, जस करी थागे रे नीकल्या भान विचार, नारी रूप रे श्रीजयानद कुमार, हवे करे रातें रे रणना बहुरुप चार ॥ १० ॥ ॥ पवनवेग सुत जे वजवेग,सद्ध खेचर थनुमति सुविवेक, सेनानी थापे वडवेग ॥ वेहु दलमाहे रे शस्त्र नागरिकायें धीर, शस्त्रने पूजेरे पूर्वं थया वडवीर, जेहनी करे वातो रे जेणें उतासांथरिनार ।। दाए। समामें शस्त्रज परधान, तेणे शस्त्र थापे पट्टने थान, चक खड्ग धनु वम स मान, त्रिशूल कुता रे तोमर मक्षिका सीर, परशुने शक्ति रे नलिका धरे व डवीर, नडमाल नामे रे मुष्टि थर्थ गनीर ॥ द० ॥ १०॥ शने कुरिका मूसल नाम, पाश गदा तरवार उदाम, घन पहिश मुजर थनिराम,उस्फो ट लुटि रे करवालिकानें कुदाल, शकुनै गुलिका रे कणय कपन्न सुविशाल, ग्रह गोफणने रे कर्तरी जेद कराल ॥॥११॥ परपत्रक यष्टि थनिधान, एबीश थायुध बहु मान, पवित्र नसें कराववा मान,चदन तीपे रे थरचे पुष्पनी माल, धूप ठखेवे रे गीत नाटक सुरसाल, वली तस प्रणमे रे स मरे तस रखवाल ॥ ३० ॥१॥ बकतर टोप प्रमुख जे होय,तस सस्का र करे सद्ध कोय, रात बोलावी एणी परें जोय,मित्र जाणीने रे कौतुक जो वानें काज,उदयाचजने रे शिर थाप्यो दिनराज, शूरनें देखी रे, शूर थयो थति नाज ॥ ॥१शारी मादलने कसाल, तलिमा मना ढका ना ल, दुरुक्क मृदग वानित्र सनाल, शखनें कालदा रे जबरी पडद प्रकार,स्व रमुखकरटो रे ममरुक नानक श्रीकार, दईरी वाजे रे ऽयंबक प्रमुख पदा र ॥ ३० ॥ १३ ॥ दोय दलमा एम वाजे तूर, तानती वाघे सुनटनें शूर, सायर खोनाणो मार्नु क्रूर, वजे दणीयो रे पर्वतनो जेम नाव,जलजीव त्रा गरे नाग गज उनमाद, परवत कंप्यारे शलशज्या शेष थविवाद ॥६॥ ॥ १५॥ कप दृढ यह प्रथिवी नार, पू- घरता कष्टें तिवार, दशदिशा गा न रही जयकार, गिरिगुफा गाजे रे फूटे मान थाफाश, सिद ते पेसे रे वरी माहे सही त्रास, दूरे पेग रे महोरग बांझी थावास ॥७॥१६॥ वननेसा ते नाता लाय,नाजे वक्षतणा समुदाय, सुरगण जोवाने तिहां थाय, नार्वे वीप्या रे सुनद ते रण फरणाय, वरसाद पामी रे दोय दलना सल थाप, ऋण कृष्ण वाधे रे सुनटने वर्ष न माय ॥ ० ॥१॥धारमे खमें नवमी ढाल, नाखी पद्मविनय सुरसाल, जेम ए सुनट थया राजमाला, तेम तुमें अष्टम खंम. २०३ बाण तूणीर अक्षय विगु दिश धरे, वज्ज पृष्ट धनुष सव्य पाणि धारे॥श्रजन गिरि समा गजवर उपरें, इसम सोदतो सुतिथि वारे॥श्रा॥४॥ पांच शे शूर स्त्रीवेपथी तेणी परें, थ सुसन्न गजवर थारोहे । सुनट वर वि कट कोडयो गमे चिह दिशे, परिवस्त्रो मानु प्राकार लोहे॥ श्री० ॥ ५॥ विचित्र वादनें रद्या विविध थायुध धरा, विचित्र ध्वजधारका सैन्य राजा॥ कुमर नरराय ते सर्वयु परिवस्त्रा, सोदता शूर जेम तेज ताजा ॥ श्री ॥ ॥ ॥ मेरु गजदत मुख थचलथी परिवखो, थहव नशालवनथी विरा जे ॥ तेणी परें कुमर नरराय खगरायचं, चिढं दिशे परिवस्यो परम राजे ॥ श्री॥॥खेट चक्रायुधो चक्री पण श्रावको,श्रीवीतरागनी पूज करतो, नमन स्तवना विधियें कर जिनतएं,जिनपणुं याद करी ध्यान धरतो॥खेट॥॥ ए थांकणी ॥ दीप्रशिरस्त्राण सन्नाह मणि जडित ते, पहेरीयो रानु बाया मां चदो॥ तेणी परें दोपतो गर्वै करी जीपतो, शश्ने चइ रवि कुण नागिं दो। खेट ॥ ॥ पार्श्वय सोदा, बाण नाथे करी, दाथमा धनुष सं ग्राम सजीयो ॥ श्वेत सामज चढयो मार्नु थहिरावणे, एह देखीने मादेश लजीयो।खेट॥१०॥ कुमर सन्नर या विविध वर वाहने, परिवस्खो तरु वरो नंबू जेम, जंबूवल करी सदसगमे कुमरथी, परिवस्त्रो वीर लखोयें तेम ॥ खे॥११॥ सैन्य चतुरंग सग्राममा सह य, वीटीयो जंबूमध्य मेरु रीते ॥ थहव सायरपरें दय गय जलचरा, चिट्ठ दिशें नीर कजोल नीतें ॥ ॥खे॥१ शाखेट चकी यथा श्रीजयानद तथा,निन निज सैन्य परिवार लु ता॥ दोय तेम दीपता धातकी खममा, दोय मेरु निज वन सत्ता ॥ खेट चकी यथा ॥ ए थांकणी ॥१३॥ कल्पतरुनी परें दान दोये याची, सूर्य परें सर्वनां तेज लोपे ॥ निज निज सुनटj दृष्टि दीये स्नेहथी, शत्रुनें देखे कल्पांत कोपे ॥ खे॥१॥ महापराक्रमी गणे शत्रुनें तृण परें, शत्रुनें दरिपरें क्रूर नयणें॥ उत्रधारीजते चामरें वीजतें, सैन्यमा एम कहे सुणत सयौँ । खे॥ १५॥थानमे खेम थग्यारमी ढाज ए, श्रीजयानदने रास नापी ॥ पद्मविजयें नजी नविनने सानली, विशद परें कौतुकें चित्त रा खी॥ खे॥१६॥सर्वगाथा ॥१५॥ ॥ दोहा॥ ॥ निज निन सैन्यमा एहवो, करता वेढ सकेत ।। युद्ध करे नहीं तेह

शएश
जयानंद केवलीनो रास.
थापकुलमा थजत थाप्यो, जनम सही धुं कीध रे ।। सु० ॥१॥ तोप
संगर समुं नादी, जीवता जस श्री थाय रे ॥ मूथा स्वर्ग लहे तेणे करी,
सम तीरथ न थाय रे॥सु० ॥१४॥ दीपे क्षणएक रयणी दावो, रवि दिने
विधु राति रे ॥ सयामें जश जेद पाम्यो, युग लगें कीर्ति धमात रे ॥१०॥
॥१५॥ शत्रुजय करता तुमारा, विषन थाशे दूर रे ॥ वैतालिक एम बिरु
व घोले, दान दीये तस पूर रे ॥ 5 ॥ १६ ॥ एम वैतालिक वाणी सुख
ता, पूज्यनी वाशीप रे । शुकन रूहे दरपिया ते, दिगुण ठरताह नमी
रे॥ सु०॥ १७॥ हवे श्रीजयानंद केरा, कटकमा नट जेह रे ॥ समामें
वनमालना कटु, नाम सुनो तेह रे ॥ सु० ॥ १७ ॥ ढाल वशमी पप्रवि
जयें, नाखी ए मनोहार रे ॥ थामे खमें रामगिरिमा, सोनलता जयकार रे
॥5॥१ए ॥ सर्वगाया ॥ २५ ॥
॥ दोहा॥
॥ वजवेगना सैन्यमा, रण रसीया महावीर ।। सिह युक्त रयमा रह्या,स
इसगमे थतिधीर ॥ १ ॥ व्याघ्र रथे वेता थका, बलगर्वित योधार ॥ चशे
वय मुख खेचरा, रणमा करे अवतार ॥ ॥ गज रथ वेसी नीकल्या, पर
नवेगादिक राय ॥ गणता तृणपरें शत्रुनें, सेनानीनो ताय ॥३॥ तुरग
बेठा यका, नोगरत्यादिक नूप ॥ रथ शस्त्रे पूख्या घj, चाल्या मन धरी चूं
प॥॥ श्रीधर श्रीपति श्ररिजयो, कांत दप्सने नद ॥ विक्रम जय अपरा
जिता, थजित तथा थानद ॥५॥ मणिचूडनें नरव्याघ्र तेम, अचल प्रह
ख राजान ॥ गज बेसी सन्न थइ, मन धरता थनिमान ॥६॥ गज वा
जि हरि ध्याघ्र तेम, शार्दूल मदीपनें नाग ॥ जोगमे निज वाहने, खेचर
नृप महानाग ॥8॥
॥ ढाल थगीथारम ॥ करखानी देशीमा ।
॥ श्रीजयानद थानवमा जगजयो, जामिनी रूपथी शत्रु धूजे ॥ स्नान
करीधौत धरी नमन वदन करी, मोदथी श्रीजिनराज पूजे॥श्रीजया॥१॥
इष्ट परमेष्टि सनारी नवकारनु, ध्यान धरी हदया तीन थावे ॥ वज स
नाद ठहादथी पहेरीयो, सर्वदिश मणिय नास्वर सोहावे ॥ श्री ॥२॥
दीप्त मणि लोद वेष्टित शिरस्त्राणजे, शिर परे मेरुपरें श्रृंग सोहे॥ मेघ
परिवसो वीजली सहित मानु, देखता मुनटनां पिच मोहे॥ श्री॥३॥

अष्टम खंम.
शण
एजे, मूक आयु कई एह गूढ ॥ ९॥ १० ॥ कहे प्रतिपक्षी तव वच
ने छु राचतो, निज करें थाप पराक्रम देखा। रूशीयो तुम यमराय एम
जणायें, तुम निनाडे विधि एम लखा ॥ १०॥ ११ ॥ बाण धोरणी ति
हां विस्तरी चिट्ठ दिशे, विचित्र घायुध वरसे तिवारें ॥ पवनथो पक्षीपरें वि
विध थायुध चले, गगनें मारग जतां कोण वारे ॥मु॥ १२॥ गगन नमी
वृक्ष पर पड़े पंखीया, वीर उपरें पडे तेम शस्त्र ॥ वाणमय खड्ग मय
कुत गदा चकमय, झूलमय शक्तिमय कहीक शस्त्र।मु०॥ १३ ॥ विविध
शत्रं तदा घोर सगर थयो, केलि कछक परें मुनट पडिया ॥ नूमें बालो
टता किदांये मातंग तेम, किहांयक तुरग जमराय नडिया ।।मु०॥१४॥
शीर्षनें दस्त पादादि कहीं रडवडे, शत्रु दणवा के सैन्य पेसे ॥ जनरथें
कुसुमनी वृष्टिपरें करी तणा, कुंन नेद्याथी मानु मोती वरसे ॥१॥१५॥
कौतुकी व्यतरा भ्रमत गगर्ने फरे, वाजते झमरुकें खेत्र पाला ॥ माकिनी शा
किनी काकिनी दासिका, कौतुकें केली करती उत्ताला ॥ सु०॥१६॥ वि
चित्र रूपें कर ताल देती थकी, योगिणी कौतुकें नाच करती ॥ विकट थ
हाहहासें मांस थर्थणी, राहत राप्ती गगन फिरती ।। सुं॥१७॥ था
मिपगिरधरा गृध्रवर पंखीया, शत्रुशालापरें घिद्वंदिशि फिरंता ॥ कुमर क
पानिधि देखी नट तुरग मुख, शस्त्र पीडित तणे करुण करता ॥ सु०॥१॥
थौषधी नीर दे मोकले खेचरा, सक करे दोय सैन्ये ते नीरें ॥ विगुण
तष्ठादयी तेह फरी जुजता, काल धनादि थन्यास पीरें ॥5॥१॥
पूर्व थन्यासथा विरमें नहीं प्राणिया, कोद थनिमानी सुजन एह ॥ धि
के पडो कर्मनें धिक हो ससारनें, जो करे धर्ममा चित्त रेद ॥ सु०॥ २० ॥
तो कोण कर्मने कोण ससार ठे,थदव थानोदयें मरण पामे ॥ के परा
नव लहे थगक्य के लहे, पाप परनावणी सुरक वामे ॥ सु॥२१॥
घोर रणमांद पण के थक्त रहे, पुस्पथी जयपताका वरंत ॥ ढाल ए
वारमी थाउमा खममा, नाखी पञ जय जय करंता ।। सु० ॥२२॥
॥ दोहा ॥
॥ केशक पूर्वज निन तणा, तेहना जयनें काम ॥ केशक उरणीथा थ
वा, निज स्वामीने नाम ॥१॥क्रोध थमर्ष थनिमानथी, विविध थायुधना
धार ॥ युक्षकरण ठठया फरी, उदर विविध प्रकार ॥ २ ॥

शए। जयानंद केवलीनो रास. ने, मारवो नहीं कोई हेत ॥१॥ पत्ती जे शस्त्र मूकी दीये, अथवा बीनने होय ॥ अथवा नासतो ने पडयो, तेद न मारशो कोय ॥२॥ समपंकि सगुयें रह्या, सही निजस्वामि थाण ॥ दूझर वाजिन नादी, सैन्य प्रेरणा जाण ॥३॥ वाजि कम गया घातथी, पृथिवी नार नराय ॥शेष नागमा फण सहस, तेहने पीहा थाय ॥ ४ ॥ कप पृष्ठ कतिन घj, प्राणनो सम य तास ॥ दाढ़ वराहनी दृढ घणी, पामो पीडा राश ॥ ५॥ थपूरव सगम नाणीने, मांहो मादे मलवा धाय ॥ पूर्वापर सायर परें, एम सद् उत्सुक थाय ॥ ६ ॥ कोइ उत्सुकतायें करी, सगुथी थागत जाय ॥ वाले पागे तेदने, प्रतिदारज बकाय ॥ ७ ॥ ॥ ढाल बारमी । कडखानी देशीमा ।। ॥ सुनट वर विकट ककट घरी मोदणं, एक एक थागले ते सजाये ॥ रेप्नु पण यागः सद्यकी दोस्ती, शत्रुनें थधपणुं करत प्राये । सु०॥ १ ॥ चिन्ह हरि करि कपि मेप म शिखि तणा, उलखी दूरथी देखी तेह ॥ नाम पूर्वक वरे ते एक एकनें, कीर्ति जस पाम मारी एह ।। सु० ॥५॥ काल बद्या मल्या बांधवनी परें, एक एक शत्रु धादान करता ॥ यमसे नानी बेद्ध माहोमाहे मल्या, मान वश थमरष बद्त धरता ॥ सु०॥३॥ पाखवता गिरिवर समा करिवरा,तुरग ते पाखस्सा गुरुड जेम ॥ न्याय यु लहे साहाम सादामा समा, गज तुरग रथ मनट लडत तेम ॥ सुणा ॥ नूरिरण तूर ढक्का हुरुक्का वली, काहला प्रमुख नजाने मेरी ॥ तास पटर दथी गिरि गुफा गाजती, बधिर दोवत महा कर्ण सेरी । सु०॥ ५॥प्रेत जेम मांस लक्षण होये उत्सुका, विविध थायुध धरी वीर धावे ॥ विपन श्रम मत करो रेणुए सगरें, गज म मानु तेहनें समावे॥१०॥६॥कोटिगमे सुनट थाव्हान परस्परेंकरे, जेम जुजास्फोट गनगाज होते ॥ कोष थामर्ष मुर्धर्ष नीषण रवें, देय हेपारव तथा शब्द जोते ॥ मु॥ ॥ रथ घणस्कार धनुना टणत्कार जे, खड़ खाकार थट्टहासें ॥ तूरनादे गिरि करि परख दथी, स्फोट ब्रह्मांम सरिखो प्रकाशे ॥ सु० ॥ ७॥ जगतनें होनना तेद थी उपजे, कौतुकि ननने श्राव्हान करता ॥ विविध शब्दें करी, गगन H थिवी नरी, जय जय शब्दथी सैन्य फरता ॥१०॥या थावरे घाव उनो रहे रहे इदा, नाशिरे नाशि वहेलो रे मूठ ॥ न वहेलो पर हस्पो इस्यो जा अष्टम खं शए ॥ दोहा॥ ॥नि सुनट थालिंगीने, सुखमां को विलास ॥रण चिता शोकज म ली, तव थयो नि नाश ॥ १॥रण कौतुकीने विघन किम ॥ करिये एम विचार ॥ पूर्ण कौतुक देखाववा, क्षणदा गइ निरधार ॥ ५ ॥ कोण नाता कोण जय लह्या, मरण लह्या कोण जीव ।। उदयाचलें रवि देखवा, था व्यो मानु अतीव ॥३॥ पूरवपरें रण तूर वली, वाज्या कटकें दोय ॥ महा उत्साहें उनय ते,रण करवा सक होय ॥४॥ दोय सेनानी थागत रह्या, दोय नायक विचमाह ॥ पूर्वपरें मलिया बेगु, धरता थति उत्साद ॥५॥ ॥ ढाल चौदमी ॥ कहखानी देशीमा । ॥ बाण विन्नाण महा जाण जे नूवि सुलट, बाणुयी तेणे थाकाश न रीयो ॥ काल कल्पांतें मानु पक्षवता थही, केश बाणे रिपु नेद करीयो । ॥ वा० ॥ १ ॥ केइ सधा धरे एक शस्त्रज तणी, तेणे गदा मुजर चक्र दणि या ॥ अहो बली एक बाणे करी शत्रुनां, थावतां शस्त्र मनमा न गणीयां ॥ बा० ॥ २ ॥ बाणें करी शस्त्र संघलां दस्या शत्रुनां, शत्रु तेहथी उदवे ग पामे ॥ शस्त्र लेश मुकवा शक्ति नांदी रही, केश धमता रहे क्रोध धा में ॥ वा० ॥ ॥ के व्याकुल थका शस्त्र ले नवि शके, वदनमा तरणां देइ तेह वेसे | केइ बाणे समपक्ति स्थित बढ़ दणे, वाहण हय गज प्र मुख नूघन पेसे ॥ बा० ॥ ४ ॥ केश शर शत्रु बेदे निज शरें करी, तेहना चाप नेवी ते दणता ॥ वादि प्रतिवादि जेम तर्कशास्त्रे दणे, वादीने उक्ति प्रयुक्ति नणता ॥बाणा वीर घोरी केइ निज कलायें करी, वाणे शत्रु ह ण गगर्ने जाये ॥ कष्टथी सुर थसुर त्रास पामी करी, नासता चित्त मम मोल थाये ॥ वा॥ ६ ॥ सुनट शिर वीर वाणे दस्यां वन्चले, रादु मानु देव खो वदन चद ॥ देखी प्रसवा नणी जाय श्राकाशमां, जीती लहे वेव ना रिनां वृद ॥ वा०॥ ॥ केश वाणे वपु चिटुं दिशे परिवस्यु,वेगें लता मा नु पखि श्रावी ॥ स्वर्गमा जायवा एह उद्यम करे, वात ए सद्भुतणे चित्त ना वी॥ वा० ॥ ७ ॥ वाण करिवर तनु चिहु दिशे वलगीया, शैलेशे सहित चा लत दीसे ॥ यदव रुधिर स्रवत नि:रणां फरे, गिरिवरा सोहता गेरु मि पें ॥ बा॥ ए॥ पूर्वना नययकी चकाना खेचरा, वरसता विविध थायुरू समीपें । समुश्वेलायें जेम वेग नदी उसरे, तेम कुमर सैन्य नागु प्रता॥

शक्ष जयानंद केवलीनो रास. ॥ टाल ॥ तेरमी कहरवानी देशीमा ॥शुर वडवीर मादाधीर उज्या फरी, सारथी सहित योधारमारे।हय नदि मारिया चित्त दया धारिया, तेह रथे थाप वेसे तेच्यारे । शू० ॥१॥ मवें शस्त्र मूकी निज करें करी, दोय शत्रु दोय हाथ नाले ॥ परस्परें तेज थास्फालीन पारिया, क्रोधणी प्रेतपतिघाम घाले ॥ शू॥२॥ सपरेने परे पति जेम कुर्कुटा,परस्परें वाण्या मरण पामे,गर्वथी के मदजरत हा थिया, गगने ववाले मार्नु मेघनामे ॥शू० ॥३॥ नांगी रथचक लेइ दाप मा थरि हणे, चक्री पणजाणे व चको थाया ।। सुनट उनट महा क्रूर पणे देखीयें, चक्रिनट बद्भुत थाश्चर्य पाया ॥ ॥ ४ ॥ रणमदा गोरमा मर सैन्य तदा, चक्रीन सैन्य थमनु नसाइघु ॥ वार्मिवेला परें उसयु तेह पण, जैत्रवाजिब देवें वनाइघु ॥शूगा५॥ तूररणजीतना कुमर कटकें प या, नय जयारव करे सुनट सर्व ॥ शूरनिज नामथी शूर परानव सही, अपर सायर पडे गलित गर्व ॥०॥६॥ मूकी सम्राम सेनापति थाणथी, स्वस्व तारे सह सुनट थावे ॥ परखी जेम नीहा सर्व सध्या समे, कुमर करुणा हवे चित्त लावे ॥ शू० ॥ ७ ॥ कगत प्राण जे सुनट दय गय मु खा, सक थौषधी न करे तिवार ॥ पतित रणनूमिमा शस्त्र पातीत थ का, शोध तेदनी करावे कुमार ॥ शु०॥ ॥ जीवता जाणी दोय सैन्यमा चिन्दथी, स्वपर अविनागयी ते जीवावे ॥ थोषधि जल प्रचुर मोफती नि न नरें, परोपरुति सकन मन सोहावे ॥ शु०॥ ॥ कुमर महामहोत्सवें जय जय रव थके, बंदिजन बिरुद बोले विशेष ॥ कटका नृपति स्त्री म गल गावां, परिचर्दै थावे थावास देशे ॥ शू०॥१०॥ नरें चक्रायुधो शो घि रणनूमिका, जाय परिवार/ निज उतारे ॥ जीवता शव्यथा व्यथित जे प्राणीया, कुमरजज बाटियुं तेणें तिवारें ॥थाप मत्रित जल दीध धारें । शू ॥११॥ सह इथा सुनट दोय सैन्य तेणे निशि समे, निद करता ते विश्राम पामे ॥ योग्य थाहारें करी हय गय सुख लहे, तेरमी डाल एक दी थारामें ॥थाउमा खममा पन नामे ।। शु०॥ १२॥ सर्वगाथा ॥३५॥ इतिश्री जयानदरानपिचरित्रे चक्रापुध खेटक धक्रवर्ती अक्षाधिकारे सामा न्यतो युझरूपं प्रथमदिनपुर ।

शए अष्टम खंक धनुष लावी नवु नोगरति केरडं, बेदियुं धनुप कीत ताणी ॥ बा ॥ ४ ॥ नोगरति शस्त्र तामस तणुं मूकतो,तेहथी तास थधार थाय ॥ दिनकर शस्त्रे प्रद्योत निज सेन्यमां, करीने बाएँ करी गगन बाय ॥ वा ॥ ५॥ तेहथी व्याकुलो नोगरति मूकतो, जलधर शस्त्र सैनानी त्यारें ॥ पवन शस्त्रे करी, तेह जलधर प्रत्ये, थाप शक्ते करी दूर मारे ॥ बा॥ ६ ॥ धनुष बेदी वली कवच तस ठेदीयुं, बाणे जर्जरित करी नाग पासें । वांधी ने पकडी लीये ता म नृप कुमरने, थाव्यो सेनानी वजवेग पासे । वा० ॥ ७॥ बाणथी ता डीयो हृदयमा पीडियो,नोगरति मूकी कोघे नराणो॥ वजवेगशु लडे दोय सरिखा मल्या, जयसिरि केरडो मन मोलाणो ॥वा० ॥ ७॥ केहनें वरु एम सशय पडी, एणी परें थाने पण पिडाणो ॥ पवनवेग था वीने थाने ले गयो, कर्मनी वात को निन्न जाणो ॥ बा ॥ ए ॥ रायनें थागचे ते वाव्या तव नृपें, दीया पारा श्रदीना ते रायें ॥ गारुडी विधायें सह थौषधि जलें,हाय फरसे थधिक तेज थाये ॥ वा ॥ १७ ॥ पूर्वथी धैर्य उत्साह वधियो घणो, सूर्यकर स्पर्शथी जेम पाषाणा ॥ पूरव परानव थकी धावीया ते फरी, करण सग्राम खे नराणा ॥ बा ॥११॥ देखी सेनानी वोय जूमता सङ जना, निज निज सैन्य सक्नु यु६ करता ॥ केश शर विफल जाये शत्रुशरे खलितथी, धर्म या ज्युं थल्प सत्त्व धरता ॥ वा० ॥१५॥ दोय सेनानी हवे जुद करता थका, धनुप वज्जवेगनु शरथी ठेदे ॥ नविन धनुपें करी तेह चमवेगनु, धनुप दे शरें धरीय खेदें ॥ वा ॥ १३॥ चमवेग मदयकी नविन धनु लावीने, कुरप्रशस्त्र वज्जवेग केरो॥ नांजी रथ पाठी सारथि सिइनें दणे, जाम वनवेग रथ ले नलेरो॥ वा ॥१४॥ ताम बाणे वचवेगनें ताडियो, सहीय मूळ वली जाम मारे ॥ नोगरति ताम थावी अकस्मातथी, चमवेगनें शरें दीये प्रहारे ॥ बा ॥ ॥१५॥ चक्रीनो पुत्र मणिमाली तिहां थाचियो, चक्रीदत्त जलें करी स क कीधो ॥ जोगरति ले गयो वनवेगनें तदा, श्रीजय रायनें सोंपी दी धो ॥ वाण ॥ १६ ॥ वांटी श्रौषधी नसें सल कीधो तिहां, नोगरति विष्णु हवे सात राजा ॥ सात चकी तणा राजवी मोटका, जीतिया सवल जे तेज ताजा ॥ वा० ॥ १७ ॥ वांधी निज सैन्यमां मोकले तेह नृप, कर्मथी जीत में दार पामे ॥ शुन अशन कर्म फल नाणीनं जवि जना, पुस्य करो जे शएन जयानंद केवलीनो रास. बा० ॥१०॥ नोगरत्यादि श्रावे तेह देखीने, रण करण ठीया बास पर से ॥ तेह अमरप धरी सैन्य सजा जुजता, जाणे सङ एम कहो लु १५ रशे ॥ वा०॥ ११॥ वाणनी श्रेणीथी शत्रुवल ढाकी, गान वीजें मा मेघ चढीयो ॥ केश ए वाणने सुनट वचावता, कोक सन्मुख थाइ नि डीयो ॥ वा० ॥ १२ ॥ शत्रुना वर्म नेदी ते वाणावली, हदयमा पेसता तेम जाणो॥जेम मिथ्यात्व तृप्या प्रत्ये वेदता, गुणगुरु गुरु वचन चित्तथा पो॥ वा ॥ १३ ॥ वाण कोई शत्रुने एक विशे पेसीने, नीकले अन्य पिछे थारपार ॥ उष्ट बुझिने जेम गुरुवचन नवि टके, कोने नवि नवे खल प्र कार ॥वा॥१४॥ लोग रत्यादि तृण परें गणे शत्रुने, चिहुं दिशे प्रलपरज रोति व्यापे॥ के मदसाथ रथ प्रवर लांजे तदा, केश केतु जुज साप कापे ॥वा० ॥१५॥के मनोरथ समा मस्तक ठेदता, सल साथै केइ धनुष ना गे। विक्रम साथ खमया केश शस्त्रने,पार्श्व परे हृदय के शूल लागे ॥बा॥ ॥ १८॥ नोगरत्यादि साथै एम जूझता, उसरे चक्री सेना तिवारें ॥ मन ध्य जेम धर्मयी उसरे तेणी परें, चौदमी ढाल ए नांखी प्यारें ॥ बाठमे खम चित्तथी उदारें ॥ बाण॥१०॥ सर्वगाथा ।। ३७०॥ ॥ दोहा॥ ॥ चमवेग सेनापति, नट कोडघोषं जेद ॥ सिदयुक्त रथ बेशीनें,श्रम रथे देखी तेद ॥ १ ॥ सैन्यने धीरज थापतो, यो रण सग्राम ॥ जोग रत्यादिका लडे, एदवा नृप उद्दाम ॥ ॥थकोन कासर रमण नृप, मदन तपनने नीम ॥ नाम प्रतापसिह रथथकी, युद्ध करणनें नीम ॥३॥ ॥ ढाल पंदरमी॥कहखानी देशीमा । ॥ बाण बगु माण थाणी सेनानी दवे, केश्ना कर पद नानें वीधे ॥ केश्नां मुख शिर केनी नासिका, कोक सुनट प्रतिशत्रु वींधे ॥बा॥१॥ नोगरतियें सेनाधिपति संधियो, चश्वानुमवनसाथै लागो॥ रोकीयो तपनने महा बाद्राजीए, पश्वेग नीमने करिय गगो बा॥॥ चश्चूडराये परताप ने वींटी,रत्नचूहें तेथकोन नूप॥तेम तडितवेग कासर प्रत्ये वलगीयो,रमण चाननें करीय चुप बाशा एमजपति बढ़नप सहामा अरपा,सुलटना बाग तेसपै पीधावीरनां प्राण वायुपीमद नखा,वशीने शत्रुथचेत कीपा बागानोगरति चापचंमवेगनुं बेदतो,नष्यमिथ्यात्व जेम गुरुनीवाणी॥

. अष्टम खंम शए धनुष लावी नवु नोगरति केरडुं, बेदियुं धनुप कणीत ताणी ॥वा० ॥ ४ ॥ नोगरति शस्त्र तामस तणुं मूकतो,तेहथी तास थधार थाय ॥ दिनकर शस्त्रे उद्योत निज सेन्यमां, करीने वारों करी गगन बाय ॥ बा ॥ ५॥ तेहथी व्याकुलो नोगरति मूकतो, जलधर शस्त्र सेनानी त्यारें ॥ पवन शस्त्रे करी, तेह जलघर प्रत्ये, थाप शक्ते करी दूर मारे ॥ बा॥ ६ ॥ धनुप बेदी वली कवच तस उदीयुं, बाणे जर्जरित करी नाग पासें ॥ वांधीने पकडी लीये ता म नृप कुमरने, थाव्यो सेनानी वजवेग पासे ॥ वा० ॥ ॥ वाणथी ता डीयो हृदयमा पीडियो,नोगरति मूकी को जराणो॥ वजवेगशु लडे दोय सरिखा मन्या, जयतिरि केरडो मन मोलाणो ॥वा ॥ ७॥ केहनें हूं वरु एम सशय पडी, एणी परें थाने पण पिलाणो ॥ पवनवेग था वीने थावे ले गयो, कर्मनी वात कोई निन्न जाणो ॥ बा ॥ ए ॥ रायने थागचे ते ठाव्या तव नृपें, बेदीया पाश थहीना ते रायें ॥ गारुडी विद्यायें सह थोपधि जलें,हाय फरसें थधिक तेज थाये । वा ॥ १० ॥ पूर्वथी धैर्य सत्साह वधियो घणो, सूर्यकर स्पर्शथी जेम पापाणा ॥ पूरव परानव थकी पावीया ते फरी, करण समाम खेदें नराणा ॥ बा ॥११॥ देखी सेनानी योय जूमता सदु जना, निज निज सैन्य सद्ध युद्ध करता ॥ केश शर विफल जाये शत्रुशरें खलितथी, धर्म या ज्युं थल्प सत्त्व धरता ॥ वा० ॥ १२ ॥ दोय सेनानी दवे शुरू करता थका, धनुप वजवेगनु शरथी ठेदे ॥ नविन धनुपें करी तेद चमवेगर्नु, धनुप दे शरें धरीय खेदें ॥ वा ॥ १३॥ चमवेग मवथकी नविन धनु लावीने, कुरप्रशस् वजवेग केरो॥ नांजी रथ पाठी सारथि सिहनें हणे, जाम वनवेग रथ ले जलेरो॥ वा ॥ १५ ॥ ताम वाणे वबवेगनें ताडियो, सहीय मूळ वली जाम मारे ॥ जोगरति ताम थावी थकस्मातथी, चमवेगनें शरें दीये प्रहारे ॥ बा ॥ ॥१५॥ चकीनो पुत्र मणिमाली तिहां धावियो, चक्रीदत्त जलें करी स स कीधो ॥जोगरति ले गयो वज्जवेगनें तदा, श्रीजय रायनें सोंपी दी धो॥ वा० ॥१६॥ बांटी श्रौषधी जलें सक कीधो तिहां, नोगरति विषु हवे सात राजा ॥ सात चक्री तण राजवी मोटका, जीतिया सवल जे तेज ताजा ॥ वा० ॥ १७ ॥ वांधी निज सैन्यमा मोकले तेह नृप, कर्मथी जीत ने दार पामे ॥ शुज थचन कर्म फल जानि नवि जना, पुस्य करो जे . ३०० जयानंद केवलीनो रास. हथी श्रवन वामे ॥ वा० ॥ १७ ॥ चश्वाहादि ते वीर तेम जूजीमा, चक्रीसेना जेम हार पामी ॥ थाक ते देखता सूर्यने सकम्यो, शांति न तपन स्नान कामी ॥ बा० ॥ १॥ ॥ पश्चिम सायरें मानु श्रम टालीपो, दोय सेनानि निन सैन्य माहि ॥ थाण करे कर्मची जय पराजय जरे, जा सह निज निज गम ज्याहि ॥ वाणा २०॥ मद उत्साह कर सप्त वीर बधन, रणधरा नोटीयो सार लीयो । चक्री खेचरचमू लागते पगम की, जेमतेम रयणी विश्राम कीयो । वा० ॥ २१ ॥ मगत पाठके वीर गु ण वोलते, श्रीजयें थौषधी नीर ॥ पूरव परें सऊ करे सुलट पपई दने, चको पण निज चमूमांहे दे ॥ वा ॥ २२ ॥ मदनमुख रानीया यौषधी नीरथी, सह करी लोद पिंजरमें पाते ॥ पवनवेग राजीये ते ज वल गाजीयें, रहे सावधान ते सर्व वातें ॥वा॥श्शा पनरमी ढाल ए थामा खममा, श्री जयानदना रासमांहि ॥ चरित्रमाहि लही पविजयें कदी, नविनने सर्दही धरि उठादि । वा० ॥ २४ ॥ सर्वगाथा ॥४०॥ इति श्रीश्रीजयानद केवलीचरित्रे वितीय दिने नोगरत्याविसहवष्टकादि जपनामा बाणैरेव युक्षाधिकार ॥ ॥दोहा॥ ॥ जयश्रीयोग्य राजा बजे, युद्धविना नवि तेद ॥ युथवकाश देवा नणी, उदयाचल रवि एद ॥१॥ मगल तूरथी जागीया, रणरसीया महा वीर ॥ पूर्वपरें दोय सैम्यना, सज दुधा साहस धीर ॥२॥ निनसेनानी द्रुकमथी, उतस्या रण करणाय । दोय सेनानां नट वडा, सन्मुख धाख्या धाय ॥ ३ ॥ धणे थगनि धनें नृपति, परधनें नूदेव ॥ मद्यप मयें वीर ररों, पति न पामे थेव ॥ ॥ चिन्हें लखी उत्लखी, बोलावे युद्ध का म ॥ परनिदे निन गुण स्तवे, ठरा श्रावो बाम ॥ ५॥ जास्फोट करता थका, गगन उबाले बाण ॥ पाखवता मार्नु सर्प ए, युझ करे असमाण ॥ ६ ॥ वाहन गजवर प्रमुख जे, सु६ करे माहोमांहि ॥ स्वामि पराकम निज तणु, संक्रमिष्ठ ए यदि ॥ ४॥ ॥ ढाल शोलमी ॥ धवलशेठ लेनेटणु ॥ ए देशी॥ ॥ शंढमां खड़ मोघर मुखा, दतूश करे घाय रे ॥ मेघपरें गाजे घणु, कोहनें जय नवि थाय रे ॥१॥ रणरंग ममयो एणी परें ॥ एकिपी॥

। . अष्टम खंग ३०१ सिंहनाद सुणी नानीया, साहामो सादामा सिंद रे ॥ पन्नग फण थाबोट ता, नाखे फुकारा श्रवीह रे ॥रण ॥ २ ॥ मणिसधि त्रूटी पडे, सूथर क रता कलेप रे ॥ दाढायें हणता थका, धुर्घर शब्द अशेप रे ॥रणम् ॥ ॥३॥ इत्यादिक पञ्चवृंदना, काल अनादि थन्यास रे॥ वीरसगें क्रोधे करी, स्वामि प्रेरण पण तास रे ॥रण ॥ ४ ॥ प्राण ते तृण समोवड गणे,नि हां लगे शत्रु न मारे रे॥पशु पराकम देखीने, वीर अधिक रस धारे रे ।। ॥रण ॥ ५ ॥ चक्कीसैन्य पराक्रमथकी, नरपति सैन्य ते नागे रे ॥ वीरां गद प्रमुखा वदु, थावी सादामा लागे रे ॥रण ॥ ६॥ वीरागद मुख पा चशे, स्वामि निवारी नक्ते रे ॥ स्त्री रूपें जे पराक्रमी, शत्रु वोलावे शक्ते तें रे ॥ रण ॥ ७ ॥ वाण लेताने मूकर्ता, नजरें कोइ न देखे रे ॥ शत्रु शिर ठपरें पडे, जाणे नाम विशे रे॥रण॥ ॥ मरण लह्या बहु वाण थी, केशक कपटें सूता रे ॥ मरणनो नय जग मोटको, कोश्क रुधिरे चूता रे ॥रण ॥ ए ॥ रथविहूणा ते रथी थया, रथि विहूणा रथ थाय रे ॥ तु रग विना सादी थया, तुरगना सादी जाय रे ॥रण ॥१७॥ एम हाथी म हावत विना, मादावत गज विण जोय रे॥ योध विमान विना थया, वि मान योध विण होय रे ॥रणः ॥ ११॥ चक्रीन बल ते निर्वल थयुं, गन सिह तव गज चढीयो रे ॥ देखी नीर करवा जणी, नरपति वल थडी यो रे ॥ रणः ॥ १२ ॥ वलियो दोय ते थावजो, एम कदेतो मुख वाणी रे ॥ गजानद मुख पाचशे, थाव्या थवसर नाणी रे ॥ रण ॥ १३ ॥नि जसैन्यने थाश्वासता, गज वेतीने श्राध्या रे ॥ तेहनें वीरांगदादिक मली, रुधे थवसर फाव्या रे ॥रण ॥ १४ ॥ नारी रूपें जूजता, गजसिहादिक वोले रे॥ रंमा रण योग्यज नहीं, पाणीदारी थाङमोले रे ॥रण ॥१५॥ सूत्र कांतो मांझी रेंटीयो, वैरणी नारी न मारु रे ।। तव माया नारी वदे, इसत वदने वच प्यारु रे ॥ रण ॥ १८ ॥ वयरी ना रंमावियें, तेरोथ में रंमा साची रे ॥ जुझ करो श्रमशु तुमें, वात करु खरी राची रे ॥रण॥ ॥१७॥ जुझे तुमने मारीने, जलांजलिने देवा रे ॥ पाणी तैयार कसु थवे, नवि जाट जल लेवा रे ॥रण॥१॥ वयरी बद्ने वाधवा, सूत्र श्रमारे ते यार रे ॥शे कारण कांतु थमें, चित्तमां करजो विचार रे ॥ रण० ॥ १ ॥ वीरागढ़ महावीर जे, वाएनो धन बरसावे रे ॥ स्त्रीरूपें नम रायनें, सतो ३०२ जयानंद केवलीनो रास. पेनले नावे रे ॥रण॥२०॥ गजसिंह पण निज बालपी, सत्रु जम R मूके रे । नग विद्यायें वीरांगदो, पर्वत मूके न चूके रे ॥रण ॥२१॥ वन मूकी गजसिंह ते, पर्वत चूरण कीधो रे ॥ सिंह विकूर्वी मूकतो, बपरी ज्यान गन सीधो रे ॥रण॥ २२ ॥ वीरांगद विया बलें,यष्टापद सिंघमा थे रे ॥ शरनविद्यायें मूकतो, लढतां गजसिह साय रे ॥रण॥२॥ मन सिह वाण गदा यति, मूके शस्त्र हजारो रे ॥ उपडे नाव धाकाशमा, त व अष्टापद धारे रे॥ रण ॥२४॥ पाडयो हेगे नखे दणी, वीरांग ना गपाश रे ॥ वांधी लीधो तेहनें, हवे महावाह खास रे ॥रण ॥१५॥ गजानद साथै कयु, वाणयु६ स्त्री रूप रे ॥ ज्वलनवर्षिणी शक्तिपी, वरसे अगनि सरू रे ॥रण ॥ २६ ॥ प्रतिशस्त्रे ते निवारतो, तव महा वाढ तास रे ॥ मोहन शस्त्रे मुजावीने, वांधी ग्रह्यो वर पास रे ॥रणा ॥ २४ ॥ एम सुघोप मुख वीर जे, वयरीने दे खेद रे ॥ जर्जर करी प कव्या घj, केता कहूं तस द रे ॥ रण ॥ २७ ॥ नागपाशे ते पांच शे, निज शिविरें सद्गु जाया रोते देखी बलचक्रीनु,त्रासने नय बहु पाया रे ॥रण ॥ ए ॥ थाम्मे खमें शोलमी, ढाल कही सुरसालो रे ॥ प पविजय कहे रायना, सैन्यमा मगलमालो रे ॥ रण ॥ ३० ॥ ४४४ ॥ ॥ दोहा ॥ 'पांचशे सुनट बांध्या गया,चक्रायु ते देखी॥क्रोध मानथी परिनष्यो, उठे सर्व ठवेखी॥१॥मणिमाली त्रीनो तनुज, वीनवे करी परणाम ॥ कोही सपर कटक शु, रंमा उपर राम ॥२॥ वेखी स्त्री जाणीने,तेम एणे फनो सन्माद । एदने तेम यह्या पुरुपर्ने, लावु म करो विषाद ॥शा तात निषेधी गज चड्यो, चाल्यो परदल माहिं॥ परवलने वलतो थको, मारग दीये सद्द त्याहिं ॥४॥ कासर जेम कासारमा, मोहलतो थाप्यो सम॥ वी रांगदादिक पांचशे, सुनट मल्या जन्ठ ॥५॥ ज तेहनें बोलावतो, रे तुमें कपट करंम ॥ नक ने शिर मूमीनें, नवि उलखो रे रंग॥ ६ ॥ तिरस्कार सुणीथापणो, युद्ध करे बलवत ॥ महावीरने सिह नवि, पर धिकार सहंत ॥७॥मणिमाजीने रुघतो, वीरांगद महावीर ।। शरणि वरसावतो,नगर पर जेम नीर ॥॥ मणिमाली पण जूजतो,वीरांगवयं जोर ॥ वीरहाक वाले तिदाय रह्यों सोर वकोर ॥॥ एके नणापांचशे,किरणमाली मुख नात ॥ .

अष्टम खंभ ३०३ युद्धकरण मणिमालीना, पूथी थायात ॥१॥ वीरांगद विण सुनट जे, पांचशे तेदयं जग्ग ॥ गगन धरा दिशि विदिशिमा,शिलिमुख केरा वग्ग॥११॥ ॥ ढाल सत्तरमी ॥ करेलणां घडदेने ॥ ए देशी ॥ ॥ मणिमाली मूके हवे, शक्ति शस्त्र बगु जाल ॥ वीरांगद प्रतिशतिथी, तेह करे विसराज ॥ १ ॥ सुनट मन जूजे रे, जेतुं पुस्य अगाध, तेदनो जय सूजे रे ॥ ए श्रांकणी ॥ विद्यायें सूथर प्रत्ये,घुघुर शब्द करत ॥ वीरा गद वयरी जणी, ते उपश्व सुमदत ॥ १० ॥२॥ मणिमाली ते उपरें, मूके सिंद शोमोर ॥ विद्यायें ते खाइ नाये, वीरांगद तव वीर ॥ सु०॥ ॥३॥ सिंह उपरे ते मूकतो, शरन ते थावे ताम ॥ सिह नक्षण ते करे, जो मणिमाली हाम ॥ १० ॥ ४ ॥ मेघ गरिव ते करे, शरन मरण लहे तेह ॥ मणिमाली शरथी दणे, वीरांगद गज जेह ॥ सु०॥ ५॥ पवन वेग वाणी दिये, सिहयुक्त रथ ताम ॥ ते उपर बेसी हवे, मूके शरना माम ॥ सु०॥६॥ पाहे गज मणिमालिनो, विद्यारथ तेणी वार ॥ करीने वेठो शर घणां, वरसे ज्यु मेघ धार ॥ १०॥ ॥ वीरांगदनां दीयां, थनु क्रमें धनुष ते सात ॥ वाण लेवाने मूकवा, शक्ति न रही तिलमात ।। सुगा ॥ ७ ॥ वाण मूक्यु नि तएं, तेणे ते उघी जाय ॥ स्त्री जट सघला है धियां, नागपाशे ते बधाय ॥5॥ ए॥ मणिमाली विद्यापटें, मानी जेम म उजाल ॥ लेवा जाये जेटले, पवनवेग तेणें ताल ॥ सु०॥ १० ॥ बलु खेचर नेला करी, श्राप्यो तिणदीज गम ॥ मणिमाली स्त्री नट तजी, सडवा थाप्यो ताम ॥ मु०॥११॥जोगरत्यादिक नूपर्ने, पवन बोलावे त॥ वि चित्र शस्त्रयी जुमता, दिप जेम मृगपत्ति सह ॥९॥१॥ ते एकें निर्मद कस्या, सूर्य जेम ग्रह वग्ग ॥ मणिमालीये नाइ प्रेरियो, थाप सयामें ल ग ।।सु॥ वांध्या स्त्री नट लेयवा, फिरणमाती ततकाल । चगति ते जाणीने, थाव्यो तिहां नूपाल ।। सु० ॥१४॥ पनणी विद्यायें थनी यो,गारुड विद्या ताम ॥ नागपाश सवि लूटीया,वली प्रबोधिनी थनिराम ॥ सु० ॥ १५॥ विद्याथी सगु जागीया, पट नेदीने तेह ॥वडी नूप पासेंग या, धरता थतीय सनेह ॥ सु०॥१६॥ यान वस्त्र थापी करी, दीधो बहु सतकार ॥ नूप दयायें बोडतो, किरणमालीने तिवार ॥ सु०॥ १७॥ य न्यो मूक्यो नाणीने, करतो कोप थपार ॥ मणिमाली श्रीजयप्रत्ये, ले ३०६ जयानद केवतीनो रास. देखशो थागत, तेहनी पेर ॥श०॥२५॥ सेम्पनी स्वामिनी नामिनी म जाल, एतो शिक्षा देवा देवता नगण॥ ॥२६॥यका क्षय करे तुमचो एक, तेणे ए वचननो मिघर केद ॥ श० ॥ २० ॥ मुजची के तुजपी तुन मुज मरण, युद्धमा जाण, केहन के हरण ॥ श० ॥ २८ ॥ दावानल जेम बचे प्रचम वाय, तेम चक्रवेग सुणी ज्वलती, निज काय ॥ १० ॥ २॥ पण जस पुस्य तेहनो जय थाय, वीजा तो वचमा, गडयोला खाय ॥२०॥ पाठमे खमें अढारमी ढाल,सानलता पद्म कहे, मगलमाल|| श० ॥३१॥ ॥ दोहा ॥ ॥ चकवेग मूके दवे, बगनि तणु ते बाण ॥ पवनवेग शर धोरणी, वर से जलधर जाण ॥१॥ श्रयज जूजतो देखीने, महावेग लघु नाय ॥ श्रामो तव तिहा चश्गति तेहने सन्मुख याय ॥शात्रीजो मणिमाली वली,बाष्यो थवसर जाण ॥ नोग रति साहामो थ३, रुध्यो तिहीज गण ॥२॥ मवेग सेनानीजे,याव्यो धनुपनो धाररावज्जवेग सेनानी ते,साहामो थयो तेणि वार ॥ ४॥ थावे परस्पर गरजता, दिग्गजपरें रण घोर ॥ बाण उडे सहस्रो गमे, पोडे शत्रु तोर ॥ ५॥ प्राण गयां जो केश्ना, केश पराक्रम धार ॥ कोज्यो गमे नट परस्परें, जूजे थति जूकार ॥ ६ ॥ ॥ बाल उगणीशमी ॥ जीदो जायु अवधि प्रयुजीने ॥ ए देशी॥ ॥ जीदो पवनवेगनां धनुष जे, लाला कापे ते वारं वार ॥ जीदो नव नव धनुष ले लडे, लाला चकवेग अपार ॥ १॥ सहन नर जू जूठ पुरस्य प्रकार ॥ जीदो पुएं मनवनित मले, लाला पुरये दोये जयकार ॥ ॥ स ॥॥ जीदो चकवेगना कापतो, लाला तपथी जेम कर्मजाल ॥ लीहो रथ नांगे ते परस्परें, लाला एम बहु काढे काल ॥ स ॥ ३॥ जी हो पञ्चरने गदा मोघरे, लाला बेदु जण करे चकचूर ॥ जीदो चक्रवेग गगर्ने जर, लाला मूके सिला थविदूर ॥ स ॥ ४ ॥ जीहो जीवनें मोद र पणा परें, लाला पवन मोघर ले हाथ ॥ जीहो नांगे नवस्थिति दीर्घनें, लाला समकेत तानने साथ स. ॥ ५॥ नीहो चक्रवेग जे शस्त्रने, लाला मूके महावडवीर ॥जीहोते ते पवन निष्फल करे, लाला जाणीचकवेग धी र ॥ स ॥ ६ ॥ जीदो शक्ति शस्त्र सनारतो, लाला ज्वालानो नहीं पा र ॥ जोहो धावीने करमा रघु, लाला करतुंघट घटकार ॥ स॥ ॥जी अष्टम खंम. ३०७ हो तेह नमाडी मूकतो, लाला पवनवेग परिवार ।। जोहो तेह नि फल करवा नणी, लाला नाखे विचित्र हथोयार ॥ स ॥ ७ ॥ जोहो पण ते सवि नि फल गयां, लाला हृदयें हणे तेह शक्ति ॥ जोहो पवन मूळ खाइ पडचो, लाला न लहे काहिये व्यक्ति ॥ स॥ ॥ जीदो शक्ति था वी निज हाथमा, लाला पवन मूर्खागत जाणा जीहो नागपाशे ते बांधीयो, लाला स्नेह रागें जेम जाण ॥स० ॥ १॥ जोहो चगति बद्धा लडयो, लाला महावेग मूके शस्त्र ॥ जोहो थाग्नेय तेढ्ने उलवे, लाला मूकी वा रुण थस्त्र ॥ स० ॥ ११ ॥ जीदो त्रिशूल महावेग मूकतो, लाला चश्शरें करे छेद ॥ जोहो लीये गोल यंत्रं करी,लाला महावेग मूके उमेद ॥सण॥१२॥ नीदो चश्गति हृदयें दस्यो, लाला बांध्यो मूर्खा रे वत । जीहो नागपाशें पवन परें, लाला कर्मनी गति ले थचित्य ॥ स०॥ १३ ॥ जीहो मणिमा ली पण एणीपरें, लाला बांधे नोगरति राय ॥ जीहो श्वासोश्वास न ले। शके, लाला कर्मथी बलियो न थाय ॥ स॥१॥जीदो चमवेग सेनानी यें, लाला वजग पण तेम ॥ जीदो नागपाशें करी बांधीयो, लाला नावि वने ए नेम ॥ स०॥ १५॥ जीदो चक्रवेगादिक चारने, लाला पवनादिकने रे जाव ॥ जीदो लइ जातां वीरांगदें, लाला श्रीजय विनव्यो ताव ॥ स०॥ ॥ १६ ॥ जीदो बाणधारा तिहां वरसतो, लाला भावी रुध्या रे तेह ।। जी हो वाणे ते सवि पीडिया, लाला चक्रवेगादिक जेद ॥स० ॥ १७ ॥जीहो बांध्या मूकी थाविया, लाला युस करणने रे काज ॥ जोहो थाकर्षिणी विद्या तिहां, लाला फोरवे श्रीजयराज ॥ स० ॥१॥ जीदो थाकी ते चा रने, लाला लाव्या निजरयमाहि ॥ जीदो नागपाश ते त्रोडीया, लाला गारुड विद्यायें त्यांहि ॥स॥१५॥जीदो वीरांगद योपधि जले, लाला सत करे तेणि वार ॥ जीहो निज निज वाहन बेसी करी, लाल जु करण योधार ॥ स॥२०॥जीदो पवनवेग चमवेगते, लाला श्रीजय साथै लडत ॥ नीदो देखीने वोलावतो, लाला कोधे रद पोसत ॥ स ॥ २१ ॥ जोहो ते पण सिद परे थावीयो,लाला क्रोधे बोले रे वाणि ॥ जोहो कूड़े केम पर बलयकी, लाला यद्यपि कतगत प्राण ॥ स०॥ २२ ॥ जीदो सूर्य ता रज ठपण जे, लाला केतो काल रहत ॥ जोहो बांधीने मूक नहीं, लाला मुज कर देख तु त । स०॥ २३ ॥ जोही जो मुन शक्ति जाणे न 305 जयानंद केवलीनो रास. ही, लाला तुन सुत पूजे तेह॥नाहो प्राणसशय माहे पडघो,लाला तुज मूकावे जेह ॥ स० ॥ २४ ॥ जोहो जा तुं मृत्यो जीवतो, साला तुन मुज स्वामि रे एक ॥ जीहो स्वामी शेही न था, लाला धरी हदय विवे क ॥ स० ॥ २५॥ जोहो पवन कहे परजयथकी, लाला अथवा जीत्यो रे वाल ॥जीहो एक वार तेरों माचतो, लाला पूच वात सनात ॥ स । ॥ २६ ॥ जोहो वाल पीडयो तें पापीयें, लाला दु तुज मारण काम । जी हो निज वालक पीहा नवि, लाला सिह सही शके नाम ॥ स ॥ १७ ॥ जोहो उक्ति प्रयुक्ति सयाममां, लाला करवी न घटे रे कोय | जोहो पा साहामो तुजमा यदि, लाला काय पराकम होय ॥ स० ॥ २७ ॥ जोहो सानली को कलकल्यो, लाला वाऐं वायो रे तेह ॥ जीहो ते पण वरसे वाणने, लाला जेम थापाढो मेह ।। स० ॥ ॥ जीदो चमवेग थाको ति से, लाला पवनें मायु त्रिशूल ॥ जोहो मूर्तीगत यही पाशथी, लाला बां ध्यो ते प्रतिकूल ॥ स० ॥ ३० ॥ जोहो निज शिविरे ते ले गयो, लाला श्रीजयानद कुमार ॥ जीदो चक्रवेगादिकना सवे, लाला रथ नांगे तेणी वार ॥ स० ॥ ३१ ॥ जोहो बाणे श्रोणितलं नस्या, लाला अनुक्रमें बांध्या तेद ॥ जोहो दया धरी नवि मारीया, लाला चश्गति ग्रह्या एह ॥ स॥ ॥२२॥ जोहो नृप थाणाथी ले गयो,लाला निज शिविरें ततकाल ॥नीहो किरणमाली हो घणु, ताता वधु सगम सुरसाल स०॥३॥जीहो सुन ट तणा जे उबयां, लाला रुधिरें रातो रवि थाय ॥ जीदो पवित्र यावा मा नु कारणे, लाला पछिम समुश्मा नाय ॥ स०॥ ३५ ॥ नीदो निज निज स्वामी थापाथकी, लाला दोय सैन्य निज वाम ॥ जीहो जयनें शोकना शब्दनो, लाला कोलादल थयो ताम ॥ स० ॥३५॥जीहो सेनानी चकी करे, लाला महाबलवत कुमार ।। नीदो महाबल नामें चक्कीने, लाला शो क तणो नदी पार ॥ स०॥ २६ ॥ जीदो सुनट दस्त्यादिक सक करे, ला जे दोय कठगत प्राण ॥जीहो श्रीजयानदना सैन्यमां, लाला जय न यकार कल्याण ॥ स ॥३७॥ जीदो थाउमा खममाहे कदी, लाजा उंग णीशमी ए ढाल ॥ जीदो पनविनय पुस्य करी, लाला होवे मगलमाल ॥ स०॥३७॥ सर्वगाथा ॥ ५५ ॥ इतिश्रीजयानदराजर्षिचरित्रे श्रीनयानव खेचरचकी महा गुदाधिकारे चतुर्थविनयुक्ष ॥ . ला अष्टम खं ३०ए ॥ दोहा॥ ॥ दान पुस्य न करी शके, रात समे नर कोय ॥ तेणें मानुं क्रोघे धरुण इ, ठम्यो सूरय सोय ॥ १ ॥ वाहन शस्त्रादिक सङ, सुनटने थापे नूप ।। चतामणि परनावथी, महिमा जास अनूप ॥ २॥ पूरव परें वेद सैन्यना, सामग्री करी सर्व ॥ मलिया सगर कारणे, चित्तमा धरता गर्व ॥३॥ शर ग्राम करी घणे, पवनवेगादिक राय ॥ नागु चक्री बल तदा, ते सदु ना आ जाय ॥॥ महाबल सेनानी तदा, उग्यो पराकमें इद ॥ मार मार करतो यको, नसव्या सुनटनां वृद ॥ ५ ॥ जीताये नहीं थन्यथी, जाणी श्रीज पानद ॥ शत्रुध्वान रवि थावियो, जेहनु तेज श्रमद ॥ ६ ॥ । ढाल वीरामी।सुण वासलही,वरण पशु लागी व्रजनी नारने ॥ए देशी॥ ॥ तिहां धनुष टकराव ते करतो, वली वरसी बाण ममप धरतो, तव परबत त्रासथी सट्ठ मरतो ॥ १ ॥ मुणो सुनटोजी, श्रीजयानद पराक्रम परपरें देखो ॥ जग जोतांजी, एहना पुण्य प्रबलनो नावे लेखो ॥ ए थां कणी ॥ जिण जिण दिशि नाखे ते बाण, तिण विशि बढ्न सुनट वमे प्राण, कोण करिवरनें कोण केकाण ॥ सु० ॥२॥ ते बाण घातें बीदिना वीर, वती मदापल सेनाएं धीर, तिहां न करे कोइ कोश्नी नीर ॥१०॥ ॥३॥ नासता के पडियां वस्त्र, वली के सुनटना के शस्त्र, नवि खबर पडे लागे शस्त्र । मु॥४॥ सम का कुमर सहस वार, पांचे कणा म दा योधार, बीजा खेचर बहु परिवार ॥१०॥ ६ ॥ वीर मानी विचित्र वायु ६ धार, पांचशे नारी ते कुमार, उपर वरसे शिलीमुख धार ॥९॥ ॥रण कौतुकी बढ़ खेचर निरखे, तेम तेम कुमर चित्तमा दरखे, पोते पण वाण श्रेणी वरखे ॥ सु०॥ ॥ एफलो पण बहु वीरने मारे, पण काय प्रयास न चित्त धारे, जेम मृगपति बट्ठ मृगनें मारे ॥ सुणा ए॥ काऽ थादि मध्य जमी थाकाश, नमतो थरि सेना चिटुं पास, कोय खवर पडे नहीं कि हा वास ॥ सु०॥ ६॥ कोनें मारे करतल घात, कोइनें वली पाट प्रहार लात, फोनें कूपरें दृथिवी पात ।। सुणा १०॥ गवा मोघर खड्ग तथा दम, मांदोमाहे अथडावे परचम, करे जाजरा मूकी बढ कांग ॥ सु० ॥ ११ ॥ एम विविध थायुधे कस्या निखाण, केश शस्त्रहित कतगत प्राण ॥दयाथी नविमारे के जाण ।मु०॥१॥ महाबल प्रमुखनें दिये नागपाश,तेम एक 30G , जयानंद केवलीनो रास. ही, साता तुन सुत पूजे तेह ॥ जोहो प्राणसशय माहे पडयो,लाला तुम मूकावे जेह ॥ स० ॥ २४ ॥ जोहो जातु मूक्यो जीवतो, लाला तुज मुज स्वामि रे एक ॥ जीहो स्वामी शेही न थायें, लाला धरी हृदय विवे क ॥ स०॥ २५॥ जोहो पवन कहे परजयथकी, लाला थथवा जील्यो रे वाल ॥ जीहो एक वार तेणें माचतो, लाला पूरय वात सनात ॥ स H ॥ २६ ॥ जीदो बाल पीडयो तें पापीयें, लाला हु तुज मारण काम ॥ जी हो निज वालक पीहा नवि, लाला सिह सही शके नाम ॥ स॥ १७ ॥ जीहो उक्ति प्रयुक्ति सयाममां, लाला करवी न घटे रे कोय | जोहो था साहामो तुजमां यदि, लाला काय पराकम होय ॥ स० ॥ २७ ॥ जीहो सांनती को कलकल्यो, लाला वाणे वायो रे तेह ।। जीहो ते पण वरसे बापने, लाला जेम थापाढो मेह ॥म०॥ ए॥ जीदो चमवेग थाको ति से, लाला पवनें मास्यु त्रिशूल ॥ जीदो मूर्चागत यही पाशथी, लाला बां ध्यो ते प्रतिकूल ॥ स० ॥ ३० ॥ जोहो निज शिविरे ते ले गयो, लाला श्रीजयानद कुमार ॥ जीदो चक्रवेगादिकना सवे, लाता रथ नांगे तेणी वार ॥ स० ॥३१॥ जोहो बाणे श्रोणित; नया, लाला थनुक्रमें बांध्या तेह ॥ जोहो दया धरी नवि मारीया, लाला चश्मतियें ग्रह्या एह ॥स॥ ॥३॥ जीदो नृप थाणाथी ले गयो,लाला निज शिबिरें ततकाल । नीहो किरणमाती हो घणु, लाला बधु सगम सुरसाल स०॥३॥जीहो सुन ट तणाजे उज्यां, लाला रुधिरें रातो रवि थाय ॥ जीदो पवित्र थावा मा नु कारणे, लाला पछिम समुश्मा नाय ॥ स ॥ ३४ ॥ जीहो निन निन स्वामी थाणायकी, साता दोय सैन्य निज गम ॥ जीहो जयनें शोकना शब्दनो, लाला कोलाहल थयो ताम ॥ स० ॥ ३५ ॥ जीहो सेनानी चक्री करे, जाला महाबलवत कुमार ॥ जीदो महाबल नामें चक्रीमें, लाला शो क तणो नहीं पार ॥ स॥३६॥ जीहो सुनट इस्त्यादिक सक करे, जा ला जे दोय कगत प्राण ॥जीदो श्रीजयानदना सैन्यमां, लाला जय ज यकार, कल्याण ॥ स० ॥३॥जीदो घाउमा खममाहे कही, लाला अंग पोशमी ए ढाल ॥नीहो पद्मविजय पुस्यें करी, लाला दोवे मगजमाल ॥ स० ॥३७॥ सर्वगाथा ॥ ५६६ ॥ इतिश्रीजयानदराजर्षिचरित्रे श्रीजयानद खेचरचकी महा सुक्षाधिकारे चतुर्थदिनपुर ॥

. अष्टम खंम. ३११ लोढा तो, चक्री गोल विरूप ॥ ए॥ मूके नरपति उपरें, नरपति पण तेम तेह ॥ मोदके मोदक नांगोयें, नूप कलानो गेह ॥ १० ॥ सूर्यदास्य चकी लीये, खड्ड नरेंड पण ताम ॥ चहास्यथी बेवतो, दम गदायें सयाम ॥११॥ खड्ड मुष्टि पग मोघरें, मुह करे ते दोय ॥ नवि जीते ते दोयमां, फरी शर युर ते दोय ॥ १२॥ चक्री धरतीय पाडीयो, रथ नांग्यो ततका ल ॥ नवनव रथथी जूजतो,ते नांगे नूपाल ॥ १३ ॥ एकवीश वार एम नांजीया, रथ चकीनां तेण ॥ पण विरमे नही रणथकी, महावीरव्रती जेण ॥ १४ ॥ चक्रीना रथ नाजीया, निजरथ नजण नीति ॥ सहीने खे त्रांतरें गयो, रवि मानु चितवि चित्त ॥ १५॥ विरम्या बेदु सग्रामथी, नि जनिज खंघा वार॥थावी सढुनें सह कस्या, पूवपरें निरधार ॥१६॥ ॥ ढाल एकवीशमी ॥ राग बगालो ॥ ॥ चकी चितातुर बढ होय, शोकमां थास्थाने रह्यो सोय ॥ साजन सानजोपुत्र बंधाणा केम मूकाय, पूने प्रधानने खेचर राय ॥सा०॥१॥ कहे परधान सुणो हित 'याण, तो कहीयें तुम हितनी वाण ॥ सा दिव सनिलो ॥ हितकारी मनगमतुं जेद, वयण जगतमा पुर्खन तेह ॥ सा० ॥ ५ ॥ स्त्रीरूपें ए श्रीजयानद, मत जाणो तुमें स्त्रीनो वृद ॥सा॥ बधन करता तुम सुत सोय, तेणें कदाग्रह मूकवो होय ॥ सा ॥ ३ ॥ मौलिककण मुख नारन्यु जे वयण, तेद समावी कीजें ए सयण ॥सा॥ तुम मन थावे जो विश्वास, तो वली थापो कन्या तास ॥ सा ॥ ४ ॥ ए वे उत्तमनें दयावत, तुम सुत मूकशे जाणो सत॥ सा॥ एटले जाशे थापणे थान, तुम राज्यनो इक न निदान ॥ सा०॥ ५ ॥सानली मन मां धारी मान, विसा नृपें तेह प्रधान ॥ सा ॥ मुज प्रतिज्ञा जाये केम, चक्री शीखवी दूतने प्रेम ॥ सा० ॥ 6 ॥ पाठव्यो पवनवेगनें पास, पोहोता पवन उतारे थावास ॥ सा० ॥ चक्रीयें नास्युं ते नाखे तास, तु में जुना थम्द सहान खास ॥ सा० ॥ ७ ॥ चदन कापे थापे वास, सेल डी पीले रस दीये तास ॥ सा ॥ तेम तुमें साचा सेवक थम्ह, एणी परें न घटे करवु तुम्ह ॥ सा ॥ ७॥ तुमचे जमायें मुज सुत वध, लोक व चनें जाप्यो ए सबध ॥ सा ॥ तेहनी सधि करो तुमें एम, मुन सुत मूका वो धरी प्रेम ॥ सा ॥ए ॥ मुज कन्या वली पांचों यन्य, थापु नृपनी ३१० जयानंद केवलीनो रास. शो कुमर एकज राश, ते देखी सदुनें पड़ी नारा ॥ सु०॥ १३॥ उल्मा नासता सह तेह, सहायें पवनवेग जेह, लेइ चाल्यो सदु वाध्या एह। ॥सु०॥ १४ ॥ चोरनी परे सधा वार लाये, देखी चकी निज चित्त नावे,ब हो महारा सुत वध्या नावे ॥ सु० ॥ १५॥ वली वीजा सुत नाग याये, क्रोधे धमधमीयो एम धावेन मूकावु एम करावे ॥ सु० ॥ १६ ॥ ते रमा कहो तुमें किहां गई,मस्तक ने तत्पर थई,वली मारु दु एदनो पई ॥१०॥ ॥ १७॥ मुज कुमर कहो ते किहाँ थडे,वीनी सवि वात करु पहें, एम क ही धरि शिबिर माहे ग ॥ सु० ॥१७॥ कोइ खलना तेहनें नवि करे, जा पीयें जम रूपांतर धरे, कोइ सुनट न एह थागत ठरे । सु०॥ १५ ॥स हु सुनट दिशो दिश नासता, नयरों चका ते पासता, बोले एम करुणा वासता ॥ सु० ॥ २०॥ रे सुनटो तुम मगल थार, शत्रु दोये ते पण का जान, रमा मुज शत्रुने बतला ॥ सु० ॥११॥ मुजथा अधिको थथ स म नही, तेहने नवि मारु दु यही, पण रमा ते कहो ने कहीं। मुण्॥१५॥ तव स्त्रीरूपें नरपति श्रावी,कहे ते रंमा हु सोहावी,तुज मारु तुन प्रिया रमा वी ॥१०॥ २३ ॥जो पुत्रने मलवाने कामें,तो मलशे करता सयामें,जब त स सम तुज दिशा पामे ॥ सु ॥ २४ ॥ थाम्मे खमें घेद मलिया ने, ढाल विशमी वातोमें नलीया बे, कहे पन क्रोधे खाजललीया जे ॥१०॥१५॥ ॥ दोहा॥ ॥ मरम वचन शस्त्रे करी,वीधाणो खगराय॥मूके वाण जडोल,जेम वा वलीये बाय ॥१॥ बाणवतो लीये तेहनें, दूर करी दिशि सर्व ॥ अस्वल करी नृपं तेणे समे, सुनट थया ते सगर्व ॥२॥ पवनवेगादिक खेचरा, चमत्या दिक तेम॥चक्रीसुत साहामा पया, युरु करणने प्रेम ॥२॥ बेतु सेना सगर यतें, प्रथिवी नग कपाय ॥ सागर मर्यादा तजे,दिशि अधारी थाय ॥३॥ स्वे चरपति नरपति तणु, युरूमध्यु अति जोर ।। एक एफर्ने गजे नही, नवि ने वाये कोर ॥ ५ ॥ वजष्टष्ठ धनु जेहनें,अक्षय बाण तूणीर ॥ कामाक्षायें ज श दी, केम हारे नृप वीर ॥ ६ ॥ नव नवा शस्त्र वांडित दीये, तेह विद्या जस पास ॥ चक्री पण कुर्कीय लह्यो, नवलो वैव विलास ॥ ॥ यकीचा प खमित करे, वली चकी नवलाय ॥ एम शत धनुप ते नवनवां,खको खं म करे राय ॥ ७ ॥ शूल मूके खेचर पति, शूळे व नूप ॥ सहस्त नार

अष्टम खंम
३१३
॥ ढाल बावीशमी ॥ कहखानी देशीमा ।
॥ शूरलट क्रूर रण वर थतिवाजते, चक्र के वक मूके कराल ॥ शक्ति
थतिव्यक्ति उसका सहत मूकती, शस्त्र परस्परथकी थमि लाल ॥॥१॥
कहींक मुजर पडे नड घडे चिट्ठ दिशे,
गृ६ पंखी नमे
बहु आकाशें ॥
कीना वीर प्रतिवीरने मारता, कोई उनो रहे नाही पासें ॥ शू॥ ५॥ सु
नट सहार निराधार शंका धरी, श्रीजयानद नारी स्वरूपें ॥ सिहरथ बेसीने
परदल पेशीनें, तेजयी बढ़ सुनट कोडी जींपे ॥ शू ॥३॥राय समुदाय
जोलावतो चकी सुत, विसरमा बध पडियारे नाइ॥ नाश नाशज करो पा
शमां केम पडो, का मरो मुग्ध जाउ पलाइ॥ शु०॥४॥ कोण सहे तनु
दहे मुज चपेटो कहो, सुर असुर कोइ एहवो न देखु ॥ काष्ठ सम दय ग
| चित्र सम नट नणु, मृत्तिका गज सम गज वेखु ॥ शू० ॥ ५ ॥ शस्त्र
तण वस्त्रपरे खंग खंमित करूं,मारता कोइ रक्षक न याय ॥ मुग्ध तुम जग्ध
करशे जमराजीयो, मुज चपेटो न ३ खमाय ॥शू॥६॥ सांजली वचन
ते देहडी तस बली, क्रोधथी मूकतां योष बाण ॥ तृण समा प्राण निन
नाणी ऊंपा करे, श्रीजयानद तेहनें पिबाण ॥ शू० ॥ ७॥ नांजे रथ सह
के सुनटनें पाडतो,केश नट लेइ गगर्ने उबाले । यु६ करे शुक्ष रणभूमिमा
चक्रधर, थावी श्रीजयतणा वाण खाजे ॥ शू॥७॥ रोषथी तोप नहीं
दोय स्वामी तणे, सैन्य पण दैन्यता मी लहता ॥ मुष्टि बाहे थसि शक्ति
उत्सादयो,यु६ करतां के मुनट पडता॥ शुमाए ॥ दर्दरी वडदडे खांमा
तिहां खड खडे, ढोल वली ढमढमे तव निसाण ॥ गमगमे वली ददामा
तिदा दमदमे, जनरी बम बमे तिणदि टाण ॥ शू॥ १० ॥ ममरु वाजित्र
योगिणी तिहां ममममे, को करी धम धमें वयरीवग्ग ॥ जूजवा टम टमे
कायर कम कमे, दिशो दिश गम गमे पामी खग्ग ॥ शू॥ ११॥ जेम जेम
जह निहे तेम तेम रस चढे, काइला घडवडे सार सहें॥ वकतर कड
कडे नट पडत लडथडे,त्र्यंबक त्रत्रहे नरि न ॥ ॥ १२ ॥ नूमि पडि
या के फडफडे बडवडे, गिरि शिखर खडखडे नीर फलके ॥ वह शिना
रडवडे जूमिका धडदडे, कुत करवाल बद् तेज चलके । शु०॥१३॥ गज
घटा गडदडे प्रेत बह दडहडे,धीर तिहां गहगहे चित्तमाहि ॥ तेह वढु जस
लहे महा ध्वना लहलहे, वृक्ष वली कडकडे पडत ढाहिं ॥ शू० ॥ १४ ॥

३१२ जयानंद केवलीनो रास. रुथडी कन्य ॥ सा० ॥थापु अर्ध ताम्पनु राज, जामाता समजावो बाज ॥ सा० ॥ १० ॥ मौली ककण मुख दिवस ते सात, मुन श्राणा पाले विख्यात ॥ सा० ॥ तो थम्ह वेहुने वाधे प्रीति, जनम लगें पालु एह नीति ॥ सा ॥ ११ ॥ पवनवेग पण सानली जेद, जइ नरपतिने ना खी तेह ॥ सा० ॥ नूपति जे उत्तर दीध, पवन थावी ते इतनें कोय । सा० ॥१२ ॥ तुज स्वामीनें कहेजे नेम, तुज सुत वधव लाखे एम ॥ सा० ॥ नहीं मुज कन्या के काज, वली वैताढय श्रर्वन राज ॥ सा॥ ॥ १३ ॥ महारा नाम थकित दिन सात, मुकुट वहे तुन नृप अवदा त ॥ सा ॥थरधनरत थापु तुज राय, थापणे मेल वे कहेजे जाय ॥ सा ॥ १३ ॥ दूतं जा सनलावी वात, नूत नराड थयो खग तात ।। सा० ॥ क्रोधे चक्री चितवे ताम, सधि करे नही वयणे साम ॥ सा० ॥ ॥ १५ ॥ नितकाशी ए न गणे फोय, जेहन मन गर्वित एम होय ॥ सा० ॥ चकी शक्रनें कृष्ण न एद मनुष्य मात्र थाहकारनुं गेह ॥ सा० ।। ॥ १६ ॥ बीजे शस्त्रे न जीत्यो जाय, विद्या शरे एह जीताय ।। सा० ॥ ते शस्त्रे दणी लावु पूत, जे राखे माहारु घर सूत ॥ सा० ॥ १७ ॥ एम करता जश माहरु थाय, थपनश थलही ते दूर पलाय ॥ सा० ॥ मुन ट निझा सुख थनुनवे रात, एम करतां थयो हवे परनात ॥ सा० ॥ ॥ १७ ॥ थाम्मे खमें नाखी ढाल, एकवीशमी ए राग वगाल ॥ सा० ॥ पविजय कदे पुस्यविशाल, श्रागत सोनलो वात रसाल ॥सा० ॥ ॥१५॥ सर्वगाथा ॥ ६३२ ॥ इति श्रीजयानद राजर्षिकेवलिचरित्रे श्री जयानवनृपविद्याधर चक्रियुक्षाधिकारे पंचमविनयुस । ॥ दोहा ॥ ॥रणवाना वली वाजीयां, वेहुनी सेना महि ॥ नट जेम नादी शव्दथी, वधीयो नट उत्साह ॥१॥ करी रणसामयी सुनट, बाध्या ते सुक्ष्मानाथ पशखें बद थरि दणे, मानु कृतांत अनुमान ॥ ५॥ चक्रीदल नागु तवा, श्राव्या चक्री कुमार ॥ समकाले सग्राममा, धावे क्रोधैं अपार ॥३॥ पवन वेगादिक रोकिया, मुष्ट विकल्प शुन ध्यान ॥ नृप नट मार्नु कूर मह, वक थया थसमान ॥४॥ देखी चक्री कुमार ते, फोरवे विक्रम फार ॥ क्रम मी उत्क्रम लडे, शत कणा सहस बार ॥ ५ ॥ , ३१३ अष्टम खंम ॥ ढाल बावीशमी ॥ कडखानी देशीमां ॥ ॥ शूरनट क्रूर रण र थतिवाजते, चक्र के वक्र मूके करात ॥ शक्ति थतिव्यकि उसका सहस मूकती, शस्त्र परस्परथकी थनि नाल ॥शूणा१॥ कहींक मुजर पडे नड थडे चिट्ठ दिशे, गृह पंखी नमे बहु थाकाशें ॥ च कीना वीर प्रतिवीरने मारता, कोइ तनो रहे नाही पासें ।। शू॥३॥सु जट सहार निराधार शका धरी, श्रीजयानद नारी स्वरूपें । सिहरथ बेसीने परदल पेशीनें, तेजथी बहु सुनट कोडी जीपे ॥ शू ॥३॥ राय समुदाय नोलावतो चकी सुत, विसना वध पहियारे ना॥ नाश नाराज करो पा शमां केम पहो, का मरो मुग्ध जा पलाइ ॥ ॥ ४ ॥ कोण सहे तनु दहे मुज चपेटो कहो, सुर थसुर कोई एहवो न देखु ॥ काष्ठ सम दय ग शु चित्र सम नट नणु, मृत्तिका गज सम गज वेखु ॥ शू० ॥ ५ ॥ शस्त्र तुण वस्त्रपरें खंम खंमित करूं,मारतां को रक्षक न थाय ॥ मुग्ध तुम जग्ध करशे जमराजीयो, मुज चपेटो न ३ खमाय । शु०॥ ६॥ सांजली वचन ते देहडी तस बली, क्रोधथी मूकतां योध बाण ॥ तृण समा प्राण निन जाणी ऊंपा करे, श्रीजयानद तेहनें पिडाण ॥ शू० ॥ ७ ॥ जांजे रथ सम्म के सुनटनें पाडतो,केश नट सेइ गगर्ने उबाले ।। यु६ करे शुक्ष रणभूमिमा चक्रधर, थावी श्रीजयतणा वाण खाले ॥ शू०॥ ॥ रोपथी तोष नहीं दोय स्वामी तणे, सैन्य पण दैन्यता मी जडता ॥ मुष्टि बाहे असि शक्ति उत्साहथो,युत करतां के सुनट पडता ॥ शू॥ ए॥ दर्दरी दडदडे खांमा तिहां खड खडे, ढोल वली ढमढमे तव निसाण ॥ गमगमे वली ददामा तिहां दमदमे, जबरी बम बमे तिणदि टाण ॥ शू॥ १० ॥ ममरु वाजिन योगिणी तिहां ममममे, को कररी धम धमें वपरीवग्ग ॥ जूजवा टम टमे कायर कम कमे, दिशो दिश गम गमे पामी खग्ग॥ शू॥११॥ जेम जेम नह निडे तेम तेम रस चढे, काहला त्रट डे सार सहें ॥धकतर कढ कहे नट पडत लडथडे,बक त्रहन नरि नहें। शू॥ १२॥ नमि पडि या केश फडफडे बडबडे, गिरि शिखर खडखडे नीर जलके ॥ बनु शिना रडवडे चूमिका धढदडे, कृत करवाल बढ़ तेज चलके ॥ २०॥ १३ ॥ गज घटा गडदडे प्रेत बढु दडदडे,धीर तिहां गहगहे चित्तमांहि ॥ तेद वद्ध जत लहे महा ध्वना लदलहे, वृक्ष वली कडकडे पडत दाहिं ॥०॥ १ ॥ ,

३१२
जयानंद केवलीनो रास.
रुथडी कन्य ॥ सा ॥थापु अर्ध वैतावधनु राज, जामाता समजावो
याज ॥ सा० ॥ १०॥ मौली ककण मुख दिवस ते सात, मुन श्राणा
पाले विख्यात ॥ सा० ॥ तो थम्द वेहुने वाधे प्रीति, जनम लगें पातु
एह नीति ॥ सा ॥ ११ ॥ पवनवेग पण सानली जेद, जनरपतिने ना
खी तेह ॥ सा० ॥ नूपत्तिये जे उत्तर दीध, पवन थावी ते इतनें कोष ॥
सा० ॥१२॥ तुज स्वामीनें कहेजे नेम, तुन सुत वयव नाखे ने एम ॥
सा० ॥ नहीं मुज कन्या केरु कान, वली वैताढय थर्धन राज ॥ सा० ॥
॥ १३ ॥ महारा नाम थकित दिन सात, मुकुट वहे तुन नृप अवदा
त ॥ सा ॥थरधनरत थापु तुज राय, थापणे मेल वे कहेजे जाय ॥
सा॥ १३ ॥ दूतें जइ सनलावी वात, नूत नराड थयो खग तात ।।
सा ॥ को चकी चितवे ताम, सधि करे नही वयणे साम ॥ सा ॥
॥ १५ ॥ जितकाशी ए न गणे कोय, जेदनु मन गर्वित एम होय ॥
सा० ॥ चकी शकने कृष्ण न एह मनुष्य मात्र थहकारनु गेह ॥ सा०॥
॥ १६ ॥ बीजे शस्त्रे न जीत्यो नोय, विद्या शस्त्रे एह जीताय ॥ सा ॥
ते शस्त्रे दणी लावु पूत, जे राखे मादारु घर सूत ॥ सा० ॥ १७ ॥ एम
करता जश मादरं थाय, थपजश थलही ते दूर पलाय ॥ सा ॥ मुन
ट निा मुख अनुनवे रात, एम करता थयो दवे परनात ॥ सा० ॥
॥ १७॥ थामे खमें नारखी ढाल, एकवीशमी ए राग वगाल ॥ सा ।।
पाविजय कहे पुरस्य विशाल, थागत सनिलो वात रसाल ॥ सा ॥
॥ १५ ॥ सर्वगाथा ॥ ६३२ ॥ इति श्रीजयानद रानर्षिकेवलिचरित्रे श्री
जयानदनृपविद्याधर चक्रियुक्षाधिकारे पंचम विनयु६ ।।
॥दोहा॥
॥ रणवानां वली वानीयां, बेद्वनी सेना महि ॥ नट जेम नादी शब्दची,
वधीयो नट उत्साह ॥१॥ करी रणसामग्री सुनट, श्राध्या ते युक्ष्मानाथ
ठपशस्त्रे बहु थरि दणे, मानु कृतांत अनुमान ॥१॥ चक्रौदल नागु तवा,
थाव्या चक्री कुमार ॥ समकालें सयाममा, धावे कोधैं अपार ॥३॥ पवन
वेगादिक रोकिया, मुष्ठ विकल्प शुन ध्यान ॥ तृप नट मानु कूर मह, वक
थया थसमान ॥४॥ देखी चक्री कुमार ते, फोरवे विक्रम फार ॥कम बमी
उत्क्रम लडे, शत कणा सहस बार ॥ ५ ॥

अष्टम खंम
३१३
॥ ढाल बावीशमी ॥ कहखानी देशीमा ।।
॥ शुरनट क्रूर रण तूर थतिवाजते, चक के वक मूके कराल ॥ शक्ति
थतिव्यकि उसका सहस मूकती, शस्त्र परस्परथकी थग्नि जाल ॥शू॥१॥
कहींक मुशर पडे नड अडे चिट्ठ दिशे, गृह पंखी नमे बढ़ श्राकाशें ॥ घ
क्रीना वीर प्रतिवीरने मारता, कोई उनो रहे नाहीं पासें ॥ ॥२॥
नट सहार निराधार शका धरी, श्रीजयानद नारी स्वरूपें ॥सिहरथ बेसीने
परदल पेशीनें, तेजथी बढ़ सुनट कोडी फीपे ॥ शू० ॥३॥ राय समुदाय
नोलावतो चक्री सुत, विसना वध पडियारे नाइ॥ नाश नाराज करो पा
शमां केम पडो, का मरो मुग्ध ना पलाइ॥ ॥ ४ ॥ कोण सहे तनु
वहे मुज चपेटो कहो, सुर असुर को एहवो न देखु । काष्ठ सम हय ग
शु चित्र सम नट नणु, मृत्तिका गज सम गज ठवेखु ॥ शू॥ ५ ॥ शस्त्र
तृण वस्त्रपरेखम खमित करु,मारतां को रक्षक न थाय ॥ मुग्ध तुम जग्ध
करशे जमराजीयो, मुज चपेटो न ३ खमाय ॥ शु०॥६॥ सनिली वचन
ते देहही तस बली, क्रोधथी मूकतां योध पाण॥ तृण समा प्राण निन
जाणी ऊंपा करे, श्रीजयानद तेदनें पिबाण ॥ शू० ॥ ४ ॥ नांजे रय सम्म
के सुनटने पाडतो,केश नट ले गगर्ने उबाले ।। यु६ करे शुभ रणनमिमा
चक्रधर, थावी श्रीजयतणा वाण खाले ॥ शू०॥ ७॥ रोषथी तोप नहीं
दोय स्वामी तणे, सैन्य पण दैन्यता मी लहता॥ मुष्टि बाइ थसि शक्ति
उत्साहथो,मुद करतां केश सुनट पडता ॥ शूाए ॥ दर्दरी दडदडे खांमा
तिहां खड खडे, ढोल वली ढमढमे तव निसाए ॥ गमगमे वली ददामा
तिही टमदमे, जमरी बम बमे तिरादि टाण ॥ शू॥१०॥ ममरु वाजित्र
योगिणी तिहां ममममे, को करी धम धमें वपरीवग्ग ॥ जूजवा टम टमे
कायर कम कमे, दिशो दिश गम गमे पामी खग्ग ॥ शू॥११॥ जेम जेम
जह जिडे तेम तेम रस चढे, काहला त्रह हे सार सहें ॥ वकतर कड
कडे नट पडत लडथडे,ऽयंबक त्रबहे नरि नहें। शू॥१२॥ नूमि पडि
या के फडफडे बडघडे, गिरि शिखर खडखडे नीर छलके ॥ बहु शिम्मा
रडवडे जूमिका धडदडे, कुत करवाल बहु तेज चलके । शु०॥ १३ ॥ गज
घटा गडदडे प्रेत बढ दडहडे,धीर तिहां गहगहे चित्तमांहि ॥ तेह वदु जस
लहे महा ध्वना सहलदे, वृक्ष वली कडकडे पडत ढाहिं। सू० ॥ १३ ॥

३१४ जयानदं केवलीनो रास. वीर कर चलचले रुधिर वहे खनखले,लोफ बद्ध कलकले खम्युं न जाप ॥ नगरजन खलनले नाता बहु जजहले, जेह जूजार चूके न घाय ॥॥ ॥१५॥ हाथी शृंखलखानके हानके चलें, कायरा हाड थगें टनके ॥ नाशता तथी वाण मूके नही,एक नट तेजयी श्रति जानके ॥ २०॥ १६ ॥ यान विण जे थया यान तेहने दीये,शस्त्र हीणाने श्रापेते शस्त्र ॥ धितनें वाप जल तृपितने थापता, वस्त्र हीणाने थापे ते वस्त्र । शू॥१०॥ श्रारमे खम थखम वावीशमी,ढाल कही पद्मविनय रसाल ॥ चक्रपति नरपति दोय हवे जूझता,सानतो तेह कहेछ विशाल ॥॥१७॥ सर्वगाथा ॥६५५।। ॥ दोहा॥ ॥ युद्ध करंता परस्परें,नाजे रथ गदाधाय ।। वाहृयुक्ष वली मुष्ठि यु.६, करता रोप नराय ॥ १ ॥ चकी मूके महातरु, नरपति उपर जाम ॥ दां त पीती रो करी, नृप पण तेम करे ताम ॥ २॥ पठी महा शिलायें जू जीया, पनी करे रजनी वुहि ॥ लोक माने उतपात ए,किम थाशे कहो तु 6ि॥३॥ चक्री गिरिवर मूकतो,नूप उपर तरु साथ ॥ कामाक्षा दत्त मो घरे, नृप चूरे से हाथ ॥४॥ ते चूस्खाथी करहा परें, पहे पथरना खमम् ॥ लोक थकालें मानता, ए श्यो देवनो दम् ।।५॥ तेहा तरुथरथी पडघा, कुसुम ते देवें कीध ॥ पुष्पवृष्टि मानु दर्पथी, नृप सपर परप्ति ॥ ६ ॥ ॥ ढाल त्रेवीशमी कडखानी देशीमा ।। ॥ धीर महावीर मुख नीर थाणी घणो, कुछ महा रोड़ ए शत्रु दीसे ॥ एह थजेय श्रमेय विक्रम धणी, केणी परें जीतु जेम दीयडु होसे । धी र० ॥ १ ॥ करिय विद्यारथें महारथे बेसीने, शक्ति मूके महाज्वाल वम ती ॥ तेह निज शक्ति प्रतिशक्तिथी नेवतो, एणी परें नूपमति चित्त रम ती ॥धी० ॥ २ ॥ चक्रधर चक्र थतिवक मूके तदा, नेत्र मीचे सुनट ते द देखी ॥ मूके प्रतिचक्र नूशक तस सन मुखें, कौतुकी नासता तेह पे खी॥धी० ॥३॥ दोय चक खर खडे शनि कणीया जडे,दाद नीकें सु रथसुर नासें ॥ उपडे में पडे गृह पंखी परें, केद, चित्त विस्मय न ना से ॥ धी० ॥ ॥ दलित मद शत्रुनो गलित अगनि सवे, वोय प्रतिहत पराक्रम थने ॥ विरमीथा जुमयी न रमीया शकितथी, रह्या निज स्वा मी पासें जश्ने ॥ धी० ॥ ५ ॥ शस्त्र तामस तणु नामस नाव लदे, नृप अष्टमखम. ३२५ बिलमा अंधकार थावे ॥ राति घमावासनी जातिथी घन सहित, दय गय सुनट नयणें न थावे ॥धी० ॥ ६ ॥ स्वपर थविशेष मांदो माहे दणे, ह य गय तेम पडे रथ ते नांजे ॥ नृप करें रवि करे सर्व उद्योत मय, जेह देखी सहस नानु लाने ॥धी० ॥ ४ ॥ वाण बिन्नाणथी नूप वरसे तदा, चक्री तव खोनीयो मन्न मांहि ॥ सांधवा मूकवा बाण समरथ नही, ने यो शिरस्त्राणने वाली सन्नाह ॥धी० ॥७॥ शत्रु सैन्ये एनट शिर तिहां रडवडे, धित जम केरडा कवल मानुं ॥ सुनटशरे मारीया मूर्धायें घा रीया, गृह थावे तिहां जाणी खाणु ॥धी ॥ ५ ॥ तास बद वायथी थाय चेतन वली,नरपतिपति दय गय न कोई॥पाणथी वींधीयो चिधियो एडवो,सैन्यचक्री तणे नविध हो॥ धी० ॥ १७ ॥ प्राण सह जीवने जा एणी वादाला घणु, नासता चक्रीना सैन्य वाला ॥ वयर करी करकरें च कीवलीया समु,निदता स्वामीनें लहीजजाला ॥धी०॥ ११॥ खेचरपति नरपति बहु वारते, पाहीयो तोहि ठतीने जूझ्यो ॥ शूर अतिक्रूर तेरों एहज एम थडे, एम सह लोक चित्तमाहे बाघो ॥धी० ॥ १२॥ शस्त्र थधकार तिरस्कार करी टालतो, माहरी तेद उद्योत जीपे ॥ लाज धरी थस्त गिरिराजमा रवि थयो, पश्चिम समु. ते समीपें ॥ धी० ॥ १३ ॥थ हवा परताप मुज तापथी थधिक ए, मित्र मुज चक्रीने नृपति मारे ॥ ए म गणी थस्त नणी सूर्य पश्चिम गयो, सैन्यमा दोय निज युक्ष वारे ॥ ॥धी० ॥ १४ ॥ पूर्वपरें सज कसा जेह घायें नना, राति मुख निश्मा सद्भु गमावे ॥ ढाल त्रेवीशमी थाउमा खममा, पन कहे हवे रवि पूर्व थावे पुस्य करवा परमात थावे, मगलतूर सदुये बजावे ॥धी॥१५॥ सर्व गया ॥ ६७६ ॥ इतिश्रीश्रीजयानदराजर्षि केवलिचरित्रे श्रीजयानदनूप च क्रायुरू खेटचकी ययुश्वर्णनो नाम पष्ठदिनांतर्गतो युक्षाधिकार ॥ ॥ दोहा॥ ॥ सूता जाग्या रवि किरणे,गुरु उपदेशे जेम ॥ मोदनिक्ष नवि जीवना, विलयें जाये तेम ॥१॥ जयश्री योग्य ते नूपत्ति, युद्ध विना नवि तेह ॥ तेणे रवि पूर्वाचल चढयो,मानु जोवा एह ॥२॥ वेद सेनामां वाजीया, रण वाजिन थनेक ॥ मयतां जेम सायर तणी, ध्वनि उते अतिरेक ॥॥ जेम शुद धर्म उद्यम करे,पामी गुरु उपदेश ॥ तेम ते वामित्र शब्दयो,रए उ .

३२६ जयानंद केवलीनो रास. द्यम सुविशेप ॥४॥श्राममा वर येला जम्यो, विप्र यतृप्तो होय । पुम करया बहु सुनटें तेम, रण थण तृप्ता दोय ॥ ५॥ मार मार करता पाम, पसयो चकी मार ॥ जखना वालक जेम गले, पानी बग कासार ॥ ६॥ पवन पाचशे स्त्री सुनट, युद्ध करी बहु नाति ॥ विश अमिम श्रदिपासपी, वाध्या ते एकांत ॥ ॥ चश् गत्यादिक खेचरा, लोग रत्यादिक तेम ॥न गवे सुनट तरकोगमे, चक वीना नेम ॥ ७॥ ॥ दास चोवीशमी ॥ कडखानी देशी ।। ॥ चमउर्दम दौर्दम दोनु लडे,खेचरा राय थवाय करतो॥धावीयो पा वीयो जेम मटे यांधलो, मयगल तरुगण कोहि हरतो ॥ च॥ १ ॥ बटु कुमर रोकतो वचनें थति टोकतो, नूप सदारतो सैन्य थावे ॥ चक्री कहे केम रहे हजीथ मुन थागलें, रे रे रंमा न तु दूर जावे ॥१०॥२॥ स्त्रीपणे जाणी मन थाणी उखी में, ताहरा चित्तमा ते न थावेशक पण तृण प रे थपर कोण मुज शिरे, कोइ मुज थागलें बलें न फावे ॥१०॥२॥-यत ॥ वैद्या सति पदेपदे गदगणान् दंतु इमानैपजै , वानर्गतदौख्यसस्थितिह तो, ऽसल्यापुनर्लक्ष्मणा ॥ नत्वेषोस्तिजगत्सुयोप्यपनयेदोकाचपं, शस्वैर्मेस्थितांश्चयोयुधि यशोदत्तेऽथवा पुर्यश ॥ १ ॥ मृगैर्मुगारिर्जुनगैगुरु रमान्, सुरै सुरेंइस्तपनस्तमोनि ॥थमि पतगैर्मुर जिञ्चदैत्यै, ये तथा ई सुनटैन साध्य ॥ २ ॥ पूर्वढाल ॥ माहरु बल निर्बत थाय तुज वपथकी, नातुं मूकी तुज नारि जाणी॥नहितो विद्या न पतंग परे कां बजे,नूपति कहे सुणो ताम वाणी ॥ 1 ॥ नूमि तुं जुनीयो ने वली ठीयो, जीवतो तुज सुता वयणें मूक्यो । नारिवध करण रण करण तु यावीयो, बल नि बल वातमा केम शक्पो च॥५॥ तुज सुनट तादाँ विकट बल देखा, पूर्व षट दिवस पर्यंत माहि ॥ वतीथवशेष विशेष बल दोयतो, फोरवो माचवो जेणे ठादि ॥॥॥ यत ॥ शूरा सति सदसशो जमज प्रो सप्पिदो रघुरा ॥ शस्त्राणि प्रतिवीरजीवतरमालुटाकतवीन्यपि ॥ कोदमा यतसायके मयि पुनर्नि शूर जन्मा मदी, शस्त्रकतृणमेकमेव चहित चके पूर्व तद्विषा ॥१॥ पूर्वढाला सांजली कत्लकली देहरी चक्रीनी,दोयपरस्परे माण नाखे ॥ मेघविद्यायें अमोघ वरसी करे, पक्रिनृपसैन्यमा सुपरे दावे ॥च० ॥ ७ ॥ पवनविद्यायें ते खवननूपति करे, यकीवली पवनविया प्रपुंजे ॥

अष्टम खंफ. ३२७ शृंग गिरिनंग करे नृपतितव थदि धरे, लक्ष्गमे पान करे पवन पूजे॥॥॥ चक्रधर वक्रतनु सर्प कोमघो गमे, नरपति खगपति मूके ताम ॥ वींनी चक्री करे नृपति मयूर धरे, वयरीनो नाश करे ते प्रकाम ॥ १० ॥ ५ ॥ चक्रधर शस्त्र निश श्रमक्ष धरे,तृपनें धगद बचे ते न लागे ॥ चक्री सैन्य दल्या निं दमा नवि गस्या, नूपतिबोध विद्यायें जागे ॥॥१०॥ प्रबलबल सबल चक्री चमुछ लडे, थानेय शस्त्र चक्रधर प्रकाशे ॥ त्रटत घटकार करे जलदथी स दरे,नूप विद्यातणो ने श्रावासाच॥११॥ बांधीयो नागपाशें नृपति सांधीयो, ते कमलनालपरे तुरत त्रोहे ॥ गरुड चको वे शत्रुनें जे खवे, नूप गोविंद थस्त्र तास जोडे ॥ १० ॥ १५ ॥ गरुड नाशि गयो चक्री नि फल नयो, मोहन शस्त्र वे खेचरेश ॥ मांदोमाहे वढे खबर को नवि पडे, तेह देखी दवे नरवरेश ॥ च ॥१३॥ ज्वाला मालिनी वर विद्यायें टालीयुं, एम वि विध चक्रीविद्यानां शस्त्र ॥ नूप सादत धरी नसट विद्या फरी, मूकीने वार तो तेद वस्त्र ॥ च०॥ १४ ॥ उपलमा सफल नवि वीज वाव्यु होये, तेम नृपति उपरे नि फज दु॥ जपराक्रम घणु ज्वालामालिनी तणु, योगि पीपल निन्न जिन्न जया ॥ १० ॥ १५ ॥थौषधिवल कामाक्षा तणु सबल बल, ते कहो केणीपरें हार पामे ॥ खेद लही चकि वही चितवे एणी परें, जीतीये केम गमें ॥ १०॥ १६ ॥ एह थलदय अध्यक्ष्यपणे देखी ये, नारिरूपें पराक्रमथी व ॥ एदने काज शं राज्यमें थरजिय, कीडी सचि त तितरखविंद ॥ च ॥ १७ ॥ यदव सकल्प विकल्प श्यो एदवो, मुजर माहरे ने थसाध्य ॥ युक्ष करी श्रम धरीने पत्रे मारलं, एहथी कार्य थाशे सुसाध्य ॥ च॥१७॥ चक्रधर शक विक्रम रथें बेताने, लूप उपर बहु वाण वरसे ॥ नूप थनूप शर मूको उपञ्च करे, बणित करे चक्रीनु श्रग दरपें ॥ च०॥ १५ ॥ मुजर कर करें रुधिर थर्टी फरें, करी पराक्रम दीये नप मा थे। नयणमींची वयण वधे मूही लह्यो,सैन्यमांदि हाहाकार साथे॥०॥ ॥ २० ॥ मारीयो धारीयो चित्तमा चक्रीये,मोद लदा उपयो फरी घातक रवा ॥ ताम नूपाल ते ताल चेतन लही, पीयो चक्री जमगेह धरवा ॥ च० ॥ २१ ॥ दीध कामाक्षायें लीध वन नेद कर, मूकीयो चक्रिशिर तेणे घाय ॥ लहीय मूळ थतुष्धा पडयो धरतीय, निन्न उद वजेजेम शिखरी था य ॥ १०॥ २२ ॥ नागपाशे जडपो सुदृढवधे घडघो, ले ते नवि शके श्वा ए शत्रु , ३१७ जयानंद केवलीनो रास. सोबास ।। सुनट निषेधतो वाणथी वीधतो,ग्रहण नविकरण वीयें नप ता स ॥ च ॥ २३ ॥ शरण करी मरणन रणथी विरमे नहीं, निजतणु सैन्य ते साथ लडतु ॥ मोहनी मूफतो श्रवसर न चुकतो,परस्परें यपरा जूमि पडतो ॥॥२॥ तेदने मारतानूपति वारता,थमि बूजे किरयुं धूम कूटे । कतगत प्राण तस त्राण नृपति करे, हृदयथी करुणता नृपति लूटे ॥०॥ ॥२५॥ नृपति आकपिणी जटीति चकीतें, खेवीने पवनने सोपी दोघो। नृपति सैन्ये घणो तृपति थानद पणे, सुर थसुरे जय जय शब्द कीयो ॥च॥२६॥ थाउमा खममा रंग थरखममा, टाल चोवीशमी पूर्ण कीधी । पद्मविजयें नती नविजनें सोनली, श्रीजयानदनी दुइ सिदि ॥ एक उत्री थरानझधि ॥ जगतमा जश कीरति प्रसीद ॥ पुण्यवता लहे नवे निधि ॥०॥ २७ ॥ सर्वगाथा ॥ ११ ॥ इतिपंमित प्रवर श्रीपनविजय गणि वि रचिते श्रीश्रीजयानवराजर्पिकेवलीरासके खेचरें श्रीश्रीजयानदनूपति यु दाधिकारे सप्तम दिनयु६ युवाधिकार समाप्त। ॥ दोहा॥ ॥ फूलष्टि तृप उपरें, देवें कीधी ताम ॥ देव उनि थाकाशमा, वाजे थति थनिराम ॥१॥ वाजां चिट्ठदिशे वाजीयां,दूत ते जयजय कार "मो द न माये श्रगा, श्रीजयानद कुमार ॥२॥ चक्रायुक्ष नररायनु, निनायक थयु सैन्य ॥ जयनें खेद विन्दल घणु,थतिशय कर तु दैन्य ॥॥ रथीने थ तिरथी सैन्यमा, कोडघो गमे जोय ॥ नाथ विना सद्ध रोकहा,खेवनें जय लहे तोय ॥४॥ रालु ग्रहे थथ थायमें, जब प्रदपति दिन राज ॥ पण उयोत न ग्रह करे, दिवस सबधि नाज ॥ ५ ॥ ॥ ढाल पच्चीशमी॥ कोडी सोनये कासिषी मारा वाजा जीरे ॥ करनारो नहीं कोय, जश्नें कहेजो माहारा वाजाजी रे ॥ ए देशी ॥ ॥ श्रीजयानव थाणायकी, साजनीया जोरे, पवनवेग खगराय ॥ सुख मा रहेजो साजनीथा जीरे ॥धकीचम् जे नाशती ॥ सा० ॥ तस श्राशास ना दाय ॥ सु॥१॥ नासो मां जय मत करो ॥सा॥ तुम थम स्वामी, ने एक ॥ सु० ॥ श्रीजयानद नरराजीयो ॥सा॥ ते अगीकरो डेक ॥९॥२॥ निज निनराज्यने नोगवो सा ॥ तुम स्वामी पण एह मु॥ नतवत्सल ने मूकशेसा॥ करुणा केरोए गेह ॥१०॥शापवननी वात मुणाकरी सा॥

अष्टम खंम
३२ए
श्रीजयनें करे नाथ सु० ॥ सैन्य खेचर चकी तणुं सा० ॥ निर्नय रहे सद्ध
साथ मु० ॥ निगडवजपंजर दीयो सा० ॥ ज्वालामालिनी जेद सु॥
नडीयो निगहें चकीने सा॥ पंजरमा उध्यो तेद सुग॥ ५ ॥औषधि नी
रे सज करे सा० ॥ बोडे वली नागपाश सु० ॥ गारुड विद्यायें करी ॥ साo
करुणानिधिनो थावास सु० ॥६॥ बधन बीजा नट तणां सा ॥ बोडे स
वना राय सु० ॥श्वौषधी नीरें सज करा सा ॥ स्वपर विनाग न काय
सु०॥४॥ सर्व सैन्य प्रणम्यु दवे सा॥ मागध बजगुण ग्राम सु०॥ बिरु
दावली घोली जते सा॥ जयजयरव गम नाम सु० ॥ ७॥ थासन्न सेव
क पांचशे सा० ॥ स्त्रीरूपें परिवार सु० ॥ वाजिननाद सुणीनते सा ॥खे
टचकीरथे धार सु०॥ ए ॥ गज बेशीने थावीयो सा० ॥ निज उतारे था
वास सु० ॥ गायन गाये गीतने सा॥ विविधप्रकार विलास सु०॥१०॥
खेचरजूप विसर्जिया सा० ॥ उतारे गया सर्व सु० ॥ राय करावे चक्रोने
सा० ॥ जोजन बॉमी में गर्व सु० ॥ ११ ॥ स्नान पूजा जिननी करी सा॥
सैन्य नोजन कोष सु० ॥ विविध मगल उपवयकी सा० ॥ दान वनित
बहु दीध मु०॥ १२ ॥ विवस राति वोली गया सा० वाज्यां मगल तूर
मु० ॥ सिहासन बेठा तदा सा० ॥ श्रीजय पवनादिक नूर मु० ॥ १३ ॥
चक्रसुदरी एणे अवसरे, राजनीया जीरे ॥ वीनवे कररी मनोहार सु० ॥
मुको महारा तातने राम् ॥ हृदयें करुणा अवधार मु०॥ १४ ॥ मुकीयं
नृपति कहे रा० ॥ मोकली खेचर ताम मु०॥ वजपंजर मगावीयं रा०॥
थाव्या खेचर खामि मु० ॥ १५॥ श्रीजय कहे चक्री सुणो रा ॥ मौनि
ककण तेह सु० ॥ श्ट नामांकित लावीयें रा० ॥ सह नृप साखथी एह
सु०॥१६॥ पवन जामाताने सुता रा॥पहेरे तुम धरी थाण सु०॥ जो
नवि घडीया होय तो रा॥ घडो हवे समरथ जाए सु० ॥ १७ ॥ पंजरमा
पण बो विष्ट रा० ॥ उतावल नयी काय सु० ॥ वधथी मारवो सोहिलो
रा० ॥ पण नवि मारु ते गाय सु०॥ १७ ॥ ते तुजपुत्री वचनथी रा॥
समरथ तु पण मुज सु०॥ दया नाव चिचा वस्यो साणातेपो नवि मार्स
दु तुन सु० ॥ १५ ॥ श्रापमा खममाहे कही रा० ॥ पंचीशमी वर ढाल
सु० ॥ पद्मविजय कहे पुस्ययी रा ॥ होवे मगल माल ॥॥२०॥७३६॥

३३० जयानंद केवलीनो रास ॥ दोहा॥ ॥ नूप वचन की सुणी, हैपडे ख न माय ॥ वजपात रणमा की, मरम वचन 5 ख दाय ॥ १ ॥ रोचे चक्री इख थकी, पवनवेग ते देखी ॥ चित्तमा करुणा याणीने, बोले एम सुविशेष ॥ २ ॥ मत रोवो बहु कालना, तुमे थमचा ठो स्वामि ॥ दयावत नृप वीनवी, मूकावु बु श्राम ॥ ३ ॥ मुकावण प्रयोजन नदी,चक्री कहे सुणे वात ॥ जगनीत्यो जोगव्यो, मुधिर काल विख्यात ॥३॥ सुरनर साखे बांधियो, नारि मा ने मुल ॥ एह परानव नवि खमी, शकीय कहु तु तुझ ॥ ॥ वीरने म रण रुडु कयु, जसके स्वर्गनो गर ॥ नविबंधन विटबणा, वली उर्जन धिक्कार ॥ ६॥ साचो सेवक दोय तो, खडग थापी मुज हाथ ।। वध मो व करु करथकी, निज मस्तकनें साथ ॥ ७॥ पवनवेग निश्वत लही, च की मरणनी वात ॥ कदे नुमे जाण पुरुप थइ, केम कहो ए श्रवदात ॥ ॥ ॥ तुमनें नारे न बांधीया, श्रीजयानद कुमार ॥ सर्व विद्या निषि एह बे, देवीदत्तवर सार॥ ए॥ ॥ ढाल बधीशमी ॥ तुम्हेतो नो बिरानोजी ॥ ए देशी ॥ ॥ तुमेंतो जलें घिराजोजी, विद्याधरके चक्री तुमें तो नहें विराजोजी। मान मर दिसु योगिणी केरु, सर्व विद्या थावास ॥ गुण समुदाय ते नारिमा केम, होवे तेद विमास ॥ तु० ॥१॥ महाज्वालाने कामाला वली, वर ते एहनें नाम ॥ वजमुखाविक देव ते जीत्या, विक्रम तेजनु धाम ॥तु॥ ॥ ॥धगना रूप करीने जीत्यो, ते तुम जणववा देत ॥ खेद करो मत नारियें बाँध्यो, मनमा धरी सकेत ॥ तु०॥३॥ एह वचन अमृत बट कावे, कोइफ पाम्यो शांति ॥ पवनवेग कहे कर्म तणो इहां, वांक अने ए कांत ॥ तु ॥ ४ ॥ गर्व अगनियें बाली नारख्यो, फूल्यो रुख विवेक ।। जग त विख्यात ए तुम मत्रीश्वरें, समनाया यतिरेक ॥ तु ॥५॥ स्त्री रूप तुम खशकर जीत्यु, तोही न समज्या काय ॥ पूर्व स्वामि परी में कडेवरा व्यु, सेवक रति फराय ॥तु ॥६॥ पंमित सुपरधान मोकल्या, दीपो ब हु उपदेश ॥ ते अमृतथी गर्वगुताशन, नवि शमियो लवलेश ॥ तु० ॥ ॥ 8 ॥ सामान्य जन पण वास नामांकित, सदी न शके तो एद ॥ वीर पुरुष निन पत्नी परानव, खमी शके कहो केह॥०॥७॥ नारिपायो अष्टम खम. ३१ थपयश देवा, कीधुं नारि स्वरूप ॥ तेणे तुमें क्रोध थमर्प गर्वादिक, दोप बांको प्रति रूप ॥तु॥ ए ॥ मस्तक एदनी थाण धरो तुमें, जेम मूके तुम राय ॥धनन्यगतिक ए वात मुणी तस,थाण धरे शिर ठाय ॥४॥ १० ॥ पवनवेग जइ राय वीनवे, कीजें कृपा दयाल ॥ शौर्यादिक गुण जेम देखा डघा, रूप दाखो जूपाल ॥तु ॥ ११ ॥ टलवले सद्ध तुम रूप जोवाने, मुजवो केटलो काल ॥ वद् विद्याधर पण एम वीनवे,अजलि करी निन ना ल ॥ तु०॥ १२ ॥ रूप स्वनावनु परगट कीधु, पांचशे सुनटनु तेम ॥ जो वा मला तव सुनटनी कोडयो, दर्प थाश्चर्य धरी प्रेम ॥तु० ॥ १३ ॥ तूर प्रमोदना वाजा सघले, मगल पाउ बोलाय ॥ चक्रमुदरी तत्त्वनो निर्णय, करती देखी राय ॥ तु०॥ १४ ॥ पवनवेगादिक खेटक रायनी, प्रारथनायें नूप ॥ विद्यायें पंजर नेदीने, निगड बेदे करी चूप ॥ तु ॥ १५॥ महोटा पुरुपर्ने अति विडबन, अपराधि पण तोय ॥ करवु न घटे एम विचारी, मू क्यो चकी सोय ॥ तु ॥ १६ ॥ चकि तूपरूप देखीनें, दियडे हर्ष न मा य ॥ वीसरी गयो ते सर्व परानव, थचरिज अतिशय थाय ॥ तु० ॥१७॥ चकीने सिहासन बेसाहे, पवनवेगादिक राय ॥ खेटेश्वर सघना थावीने, प्रणमे चकी पाय ॥ तु० ॥ १७ ॥ निज स्वामी मूकाणा जाणी, सैन्यने दर्प थपार ॥ चकवेगादिक सुत चक्रोना, जे बांध्या तेणी वार ॥तु०॥१॥ बीजा पण सहसो गमे बांध्या, मूक्या तेही तेह ॥ नागपाश ते बोडी ना ख्या, सह कसा वली जेद ॥ तु ॥ २० ॥ नूप चक्रीनें प्रणमे सघला, चक्री थाणद थाय ॥ सकल लोक मन थचरिज हू, मगल वर बजा य ॥ तु० ॥ २१॥श्रातमे खंमें बबीशमी ए, पद्मविजय कदी ढाल ॥ श्री जयानदना रासमा रूडी, सुणतां मगलमाल ॥०॥शासर्वगाया॥७॥ ॥ दोहा ॥ ॥ हवे तेही चक्रसुवरी,सोंपे चकोने राय ॥ यो निन हा दोय तिहां, माहरे अर्थ न कोय ॥१॥ में तो कौतुक मात्रथी, कीघो एद प्रकार ॥ चक सुवरी निज तातने, प्रणमी कहे विचार ॥ ५ ॥ चायें वर में वरी, तुमने थापद दोध ॥ पापहेतु निज बोरुनो, खमो थपराध जे कीच ॥३॥ चक्रीकहे तादरो नथी, शहा थपराध लगार ॥ प्रतिपद चधेनु परें, तें उत्तरप्यो जरतार ॥ ३ ॥मादी कन्या नृपतपी, वरे स्वयवर सार ॥ विश्वो ३३० जयानंद केवलीनो रास. ॥ दोहा ।। ॥ नूप वचन चक्री सुणी, हैयडे १ ख न माय ॥ वजपात रणमा की, मरम वचन 5 ख दाय ॥ १ ॥ रोये चकी 5 स थकी, पवनवेग ते देखी ॥ चित्तमा फरुणा याणीने, वोले एम सुविशेष ॥ २ ॥ मत रोवो बहु कालना, तुमे यमचा तो स्वामि ॥ दयावत नृप वीनवी, मूकावु बु श्राम ॥ ३ ॥ मुकावण प्रयोजन नही,चक्री कहे सुणे वात ॥ जगजीत्यो नोगव्यो, सुधिर काल विख्यात ॥३॥ सुरनर साखे बांधियो, नारि मा । मुल ॥ एह परानव नवि खमी, शकीये कह तु तुझ ॥५॥ वीरने म रण रुडु कम्यु, नसके स्वर्गनो नगर ॥ नविबंधन विटवणा, वली उर्डन धिक्कार ॥ ६ ॥ साचो सेवक दोय तो, खडग थापी मुज हाथ ॥ बध मो व करु कर थकी, निज मस्तकने साथ ॥ ॥ पवनवेग निश्चल सही, च की मरणनी वात ॥ कहे नुमे जाण पुरुप थइ, केम कहो ए श्रवदात ॥ ॥ ॥ तुमनें नारे न बांधीया, श्रीजयानद कुमार ॥ सर्व विद्या निपि एह , देवीदत्तवर सारा॥ ए॥ ॥ ढाल बचीशमी ॥ तुम्हेतो नो बिराजोनी ॥ ए देशी ॥ ॥ तुमेंतो जलें घिराजोजी, विद्याधरके चक्री तुमें तो नः बिराजोजी॥ मान मर दियुं योगिणी केरु, सर्व विद्या भावास ॥ गुण समुदाय ते नारिमा केम, होवे तेद विमास ॥ तु ॥ १॥ महाज्वालाने कामाक्षा वली, वर ते एदने नाम ॥ वजमुखाविक देव ते जीत्या, विक्रम तेजनु धाम ॥तु॥ ॥ शाशगना रूप करीने जीत्यो, ते तुम जणववा हेत ॥ खेद करो मत नारिये बांध्यो, मनमा धरी सकेत ॥ तु० ॥३॥ एद वचन अमृत बट कावे, कांइफ पाम्यो शांति ॥ पवनवेग कहे कर्म तणो इहां, वाक घडे ए कांत ॥ तु ॥४॥ गर्व अगनिय बाली नाल्यो, त्यो रुख विवेक ॥जग त विख्यात ए तुम मत्रीश्वरें, समजाव्या अतिरेक ॥ तु ॥ ५ ॥ स्त्री रूप सुम लशकर जीट्यु, तोही न समज्या काय॥पूर्व स्वामि परी में कडेवरा व्यु, सेवक राति कराय ॥ तु० ॥ ॥ पंमित सुपरधान मोकल्या, वीधो ब दु शपदेश ॥ ते अमृतथी गर्वद्धसाशन, नवि शमियो लवलेश ॥ तु॥ ॥ ७॥ सामान्य जन पण दास नामांकित, सदी न शके तो एह॥ वीर पुरुप निन पनी परानव, खमी शके कदो फेद ॥ तु०॥॥ नारिपायो अष्टम खंभ ३३३ म, पण जगजीते एथचरिज गम ॥ म०॥ नाश्ये जीत्यो नरतज राय, पण चक्रवर्तिपणु नवि जाय ॥ म० ॥ १३॥ खेद तजो तुमें महोटा रा य, राज्य नोगवो निज जइ थिर थाय ।। म०॥ कोइक कमै थयो सग्राम, श्रापणे पण एक सोनलो थाम ॥म०॥ १४ ॥ मुज मन वाधे अधिको ने ह, तुम देखी 'नाता परें एह ॥ म० ॥ तेणें प्रवनव जाणु एम, मित्र थ बो ज्ञानी लहे नेम ॥ म० ॥ १५॥ खेद पमाडयो रणमा तुम्द, ते आप राध खमो तुम्हें थम्ह ।। म ॥ श्रीजयवचनें खेद पलाय, खेटचकी कहे सानलो राय ॥ म० ॥ १६ ॥ निपजावी विधियें तुम एक, मूर्ति गुणवतो मुविवेक ॥म०॥ शूरपणुं ने पर ठपकार,सहनता नय धर्म विचार ॥म ॥ ॥ १७ ॥ समरथ गुण स्तववा नहीं इव,तुमें तो मदोटा महाराजे ॥म०॥ कोव थज्ञान श्रने अनिमान, दुतो परवश खूतो निदान ॥ म० ॥ १७ ॥ पंमित पवनना ने परधान, शिक्षा दीधी मुज थसमान ॥ म॥ पण मद थध हाथीपरें तेह, थकुश नवि मानी में रेह ॥ म० ॥ १ ॥ गुणवता तुमें मानवा योग्य, में थपमान्या कर्म सयोग ॥ म ॥ तुम अपराध न ले एम रेप, सुज थपराध खमो मुविशेप ॥ म० ॥ २०॥ शलन पोते वले दी जेह, दीवानो थपराध न तेह ॥ म ॥ समरथनें वली तु लघु बाल, रणमा मायो न तें तेणे ताल ॥म ॥५१॥ दयाधरम तादारोथ त, थपराधी उपर ए थाकूत ॥ म० ॥ तुज उपर थावे मुज स्नेह, निश्च य परनव मैत्री सनेद ॥ म॥ २२॥ सत्तावीशमी नाखी ढाल, थाउमा खममाहे सुरसाल ॥ म ॥ गुणिजन मलिया गुण बढ़ थाय, पन क सद्गु खटपट जाय । म० ॥ २३ ॥ सर्वगाथा ॥ ९ ॥ ॥ दोदा ॥ ॥ मुज उपर सुप्रसन्न थइ, मुज पुर करो पवित्र ॥ प्रार्थना नग नीरू तुमें, तुम्ह यदलत चरित्र ॥१॥ कुमरें मानी विनती, हवे खेचर नरराय ॥ सैन्य सहित पुरमा जश, शणगारे चित्त लाय ॥२॥ माणिक थननो श्रेणिमा, पचाली शुन रूप ॥ चामर श्रेणी वीजती, रंनाने अनुरूप ॥३॥ फरके ध्व जा तिहां चिट्ठ दिगे, घर घर तोरण माल ॥ मचाणि ते मांमियां, राज्य पथे मुविशाल ॥४॥ गीत गान गोरी करे,वाजिन ध्वनि सगीतामच नमोचें सोहता,मुक्ता गुष्ठ पवित्त ॥५॥ चदन जलथी खेचरा, पथ करे उरकाव ।। वस्त्र ३२२ जयानंद केवलीनो रास. नम गुणि श्राश्रयो, तुज गुणनो नही पार ॥ ५॥ गर्व दोष मादरे करी, पाम्यो थापद एह ॥ तुज प्रारथनाथी मनें. जीवतो मूक्यो जेद ॥ ६ ॥ तेणें सह सुखकारी थयु, साधु वयो जरतार । थापद सदो ए वातमा,न करो का विचार ॥ ४॥ ॥ढाल सत्तावीशमी। बावा किसनपुरी,तुमविना मढीयां उजड पडी ॥ए देश। ॥ वात सुधाथी ताप गमाय, पुत्रीने दवे चक्रधर राय ॥ मनहरप नमा य, मलियाजी जो रे तुमें घदोनी थहो । एथोकणी ॥ दासी परिवृत मो कले गेह, निज माताने मली ससनेह ॥ मनदर्प॥१॥ याम वदन करी नीचु जोय, चक्री चितातुर बहु होय ॥ म०॥रे खगराय तुमें मम करो खे द, श्रीजय कहे सुणो तेदनो नेद ॥०॥ २ ॥ तुमें उत्तम नरमा शिरदार, जय तो थयो काकताली प्रकार ॥ म० ॥ तुम सम सुनट न जगमा दोय, सुर नर माहे लोतां कोय ॥ म० ॥ ३ ॥ दिव्यवल दु मुजग्नु सयाम, एटलो काल काढयो तुमें थाम ॥ म॥ एकले विद्यावलथी न काय, जय पराजय तो कर्मथी थाय ॥ म०॥ ॥ जय थन्युदय लाजादिक नाव, पुण्य प्रष्ट ना ए परनाव ॥ म॥ तप करतां मणिम करी काय, तेणें पराजय पण एणी परें थायम॥५॥ हेममा जडे अथवा वींधाय, मणि पण पधरने नहीं काय ॥ म० ॥ जय पराजय तेम शूरने थाय ॥ कायर तो मना मुजाय ॥ म०॥ ६॥ एकवार दाखो पण वीर, वीरपणु नवि जाय सुधीर ॥म०॥ फाल चूपयो हरि एकज वार,पण मारे गजवरना वार ॥म॥ ॥ ७ ॥ सुरवरें मथियो सायर तोय, सागर कणिमता नवि होय ॥म॥ ग्रहित मूकाणे जे वली सूर, पण ग्रहगणनो हरतो नूर ॥ म ॥ ७ ॥ श्रमावास्या लोपाए चद, पुष्ट करे थमृतें सुरवृंद ॥ म ॥ गोघूम रेखा स दित पीलाण, पण सद्ध कथा शिरोमणि जाण ॥ म० ॥ ए ॥ घसीयो वैसूर्य न होये काच, दस मलिन केम कागनी वाच ॥ म० ॥ गोत्रमा च क न चाले कोय, पण परनो सहार करे सोय ॥ म० ॥ १०॥ अगनिनु जोर न जला थाय, पण सदुथी तेनवत कदाप ॥ म ॥ महादेव जिंग बेा पण लोक, थाराघे जन थोकें थोक ॥ म ॥ ११ ॥ पण नवि जाये सार जो पण दुबां नग इनार ॥ म ॥ रथ नोरे ऋषि दरि ने नार, दैत्यनें मारे हरि निरधार ॥ म० ॥ १२ ॥ महादेवें बामो ने का अष्टम खंम. ३श्य परें सोहाय रे सो० ॥ मल्या खेचरना समवाय रे सो० ॥ निज पर वि नाग न जणाय रे सोजा ज॥७॥ सौधर्म ईशाने परें रेलो, प्रणमे स दु तस पाय रे सो० ॥ दवे के विद्याधर राय रे सो ॥ वैताढचमा व जे थाय रे सो० ॥ सार सार ते नेटणुं लाय रे सो० ॥ इय गय पत्ति समुदाय रे सो ॥ ज० ॥ ए ॥ वस्त्र शस्त्र बहु मूलना रे लो, नेटणां मूके ताम रे सो० ॥ पादर दीये तत थनिराम रे सो ॥ विसा ते जाये निज गम रे सो ॥ नृपना करता गुणग्राम रे सो० ॥ थतिराय थानद मन पाम रे सो० ॥ ज०॥ १० ॥ स्नानाविक किरिया करे रे लो,चक्री व यणें नूपाल रे सो० ॥ चक्री सेवा करे सुरसाल रे सो०॥ चक्री प्रार्थना क रे तिण ताल रे सो० ॥ चक्रमुदरी दिये निज वाल रे सो० ॥ मनवनित फल्यां ततकाल रे सो० ॥ ज०॥ ११ ॥ पूर्ववचन समारतां रे लो, नोगर त्यादिक बत्रीश रे सोनिन कन्या चढत जगीश रे सो॥ पाणिग्रहण मानें नरईश रे सो० ॥ बीजा खेचर नेह यधीश रे सो॥ चित्त धारी वि श्वावीश रे सो० ॥ ज०॥१२॥ निज निज कन्या थापता रेलो,थात अधि क मली हजार रे सो॥ तेतो रूपें रति अनुहार रे सो॥ तेडयो ज्योतिषी झान उदार रे सो० ॥ दिये लगन उत्तम मनोहार रे सो० ॥ शुक्लपक्षनें शुन तिथिवार रे सो ॥ ज० ॥१३॥ ग्रहयल जोश्थापियुं रेलो, देश निमित्ति थाने दान रे सो० ॥ वली थादरने बद्दमान रे सो ॥ निजनगरे जसा मान रे सो० ॥ करी थाव्या सद् तेणें थान रे सो० ॥ चक्रीने हर्ष श्रमान रे सो० ॥ ज० ॥ १४ ॥ पाणी ग्रहण श्रीजय करे रेलो,करमोचन वेला दी ध रे सो० ॥ दय गय रथ पत्ति प्रसिह रे सो० ॥ बह थानूषण समृ६ रे सो० ॥ मानु स्वर्गयी मोवें लिप रे सो०॥ सद् खेटराय दीये निदरे सो० ॥ ज०॥ १५ ।। सुख विलसे मणिसौधा रे लो,रमे पत्नी नृप देव रे सोग जेम देवांगनायं देव रे सो० ॥ करे चक्री थहर्निश सेव रे सो० ॥ एदने पर ठपकारनी टेच रे सो० ॥ तेदयी पाम्मो शदि स्वयमेव रे सोज॥१६॥ श्रीविजयसिह सूरीसरू रेलो, तेदना सत्यविजय पन्यास रे सो॥ शिष्य क पूर विजय तस खास रे सो० ॥ जेदन नग नाम प्रकाश रे सो० ॥ तस खि मा विजय शुनवास रे सो॥ तेतो क्षमा तणो थावास रे सोाज॥१॥ जिनविजय वर तेदना रेलो, तस पमितप्रवर प्रधान रे सो०॥ श्रीउत्तमवि ॥ रे ३२४ जयानंद केवलीनो रास. हेम मणि प्रमुखथी, दाट शणगारे साव ॥ ६ ॥ मणि मोतीना प्रीपा, स स्तिक घर घर वार ॥ धूपघटी बहु महमहे, विविध सुगध इव्य सार ॥ ७ ॥ फुल बिठाया पंथमें, थने पुजनी माल | नगर सुगधमयी थयु, विस्तमो गगन विशाल ॥ ७ ॥ हवे नररायनें तेढवा, खगपति ले परिवार । विनवे थाची पधारी, से परिवार सुसार ॥ ए॥ ॥ ढाल थाहावीशमी ॥ बलद नसाठे शोरवी रे लोल ॥ ए देशी ॥ । नरपति मानी विनती रे तो, सायें विद्याधर के कोडि रे सोनागी॥ वयरीना मद सवि मोहि रे सो० ॥ कोण थावे एहनी तोडि रे सो ॥ जे हनी नदी जगमा जोडी रे सो० ॥ कोण करशे एहनी होडि रे सो० ॥ १॥ जय जय नणे नर नारी रे लो॥ ए थांकणी ॥ श्वेतगजें उपर चढयो रे लो, थहिरावण शिर जेम इद रे सो ॥ वत्र मिप सेवायें घाय्यो पद रे सो० ॥ वींजे चामर खेचरी वृद रे सो० ॥ खीर सायर कर्मि श्रमद सो० ॥ चामर मिप सेवे नरिंद रे सो० ॥ ज॥२॥कोडघो गमे तूर वाज ते रे लो, जशनी परें व्याप्यु थाकाश रे सो० ॥ गायन सवे गुण सुवि लास रे सो॥ बदीबिरुदावलीघोले तास रे सो॥ गाये धवल मगल स्त्री रास रे सो ॥ थाये नाटक पग पग खास रे सो ॥ ज ॥३॥ खेचर बढ़ गगनें चले रे लो, मानु स्वर्गर्ने प्रथिवी एक रे सो० ॥ कल्पवृक्षनीप ₹ धरी टेक रे सोजा जाचकने दान थनेक रेसोणा एतो धनद कहायो वे करे ।सो धरतो अतिशय सुविवेक रे सोन०॥३॥ चामर बत्रणं गज व ढयो रे जो, विद्याधर चकोराय रे सोणा तेतो परवस्यो ने जुवराय रे सोपान णिमोतीना समुदाय रे सो० ॥ विद्याधरी वृंद वधाय रे सो० ॥ जुबणा हेम वस्त्र कराय रे सोपज०॥५॥ अनूत रूप शोना घरे रे लो,पहिल्या दिव्य वस्त्र बलकार रे सो॥राज्यर्पण लघी पदार रे ॥ सो॥याध्या च कीने घरबार रे सो॥ सतरे गजवरथी तिवार रे सो चक्री करानं बन धार रे सो० ॥ ज० ॥६॥ स्फटिक निधि को स्थानकें रेलो, क ही वैमूर्यमणिशे घ्रांति रे सो० ॥ पद्मराग कुहिम वन्दिकाति रे सोमर कत बध करी नूपाति रे सोणा नरपति जोतो मनखांत रे सो ॥ पेठा च कीने शांत रे सो० ॥ ज० ॥ ॥सना सौधर्म सना समो रेलो, मणि सिदासने नृप ताय रे सो० ॥ पासें सिहासने खेटराय रे सो० ॥ रवि पद , नवम खंभ ३१७ धार हो मुणो ॥ १ ॥ तात खेचर चक्री तणा रा० ॥ पाय धाखा सया न हो सु०॥ बहुपरिवार परवस्या रा॥ चक्रबल थनिधान दो सु० ॥शा सानली नूपति हरषिया रा॥ थानद थंग न माय हो सु० ॥ हर्षदान दीये तेहने राणा शासन उन्नति थाय दो सु०॥ ३ ॥ पूर्व थति वैरागीया राम् ॥ पाम्या परानव जेण दो मु॥ गुरु थागमन सुणी तदा रा० ॥श केरा पयना एण हो मु॥ ४ ॥ हर्षथी नूपर्ने खगपति रा० ॥ श्रतेवर प परिवार हो सु॥ कोडपो गमे खग परिवना रा० ॥ गन बेसी उत्रधार दो सु०॥ ५ ॥ सूरि वांदवा नीकल्या रा० ॥ श्रनुक्रमें पोहोता उद्यान हो सु० ॥ पंचानिगम ते साचवी रा० ॥ ऋण प्रदक्षिणादान हो सु० ॥ ६ ॥ वदे गुरुने विधियकी रा ॥ गुरु पण दीये धर्मसान हो मु० ॥ बेठा मुण वा धर्मनें रा० ॥ उचित थानक उत्साह दो मु०॥ ॥ धर्मदेशना गुरु दी ये राम् ॥ जैनधर्म नगसार दो सु०॥ थापे त्रिवन सपदा राम् ॥त्रण जगत धाधार हो सु० ॥ ॥ सुख श्रर्थी सवि प्राणिया रा॥ पण सु ख दोय प्रकार दो सु०॥थक्ष्य सुख पहेतुं का रा० ॥ निरुपाधिक थ विकार हो सु०॥ ए॥ विपयादिकथी तपनु रा॥ बीनु मुख ख रूप दो मु० ॥ उत्तरख्यु जिनशासन जेरों रा॥ ते न पडे नवकूप दो मु० ॥१॥ प्रथमज सुख थगीकरे रा० ॥ विषयथी चिट्ठ गति इख हो ० ॥ शीत ताप ज्वर कमूनां रा॥ नरकमां 5 ख क्लीनूख दो मु० ॥ ११॥ गंध फरस कठिन घणो रा ॥ सुरकत बहु सताप हो सु० ॥ ते 5 खथी वी हे नही रा० ॥ विपय थर्थे करे पाप हो सु० ॥१२॥ त्राहननें वहेवराव रा० ॥थहोनिशि तापनें शीत दो मु०॥ नूख तरषनें वायरा रा०॥ 5 ख सहे तिर्यंच नित्य हो सु०॥१३॥ निज परनातिनो जय घणो रा॥ पर वशपणु थसराल हो मु०॥खमीया में खमशे वली रा॥ख पण बीदे न वाल दो सु॥१४ ॥ ईर्ष्या परानव निबलने रा० ॥ देखी वली गर्ना वास हो सु०॥ ते छ खथी लाजे घणों रा० ॥y सुरव देव यावास हो सु ॥ १५॥ इस वियोग थनिष्टनो रा० ॥पामे वली सयोग दो सु० ॥ साते नय वली मनुजमा रा० ॥ पुत्रने वली रोग दो सु०॥ १६ ॥ वि रसता मानव नवतणी रा० ॥ कहेता नावे पारही सु० ॥ सरस करे धर्म थादरी रा० ॥ धन्य तेदनो थवतार दो सु०॥१॥ महा परानव शत्रुथ ३२६ जयानट केवलीनो रास. जय थनिधान रे सो० ॥ तेहनो नाम परिणाम समान रे सोाजेद वि त ज्ञानने ध्यान रे सो० ॥ किरिपा करता यनिदान रे सो० ॥ ॥१॥ थानमा खममाहे कही रेलो, ए यहावीशमी ढाल रे सो० ॥ खम प्रण थयो सुरसाल रे सो॥ श्रीउत्तमविनयनो पाल रे सो० ॥कहे पद्मविजय सुविशाल रे सो० ॥ सुणता होये मगलमाल रे सोगान॥रा २५॥ ॥ इतिश्रीमउत्तमविनयगणि विनेय पमित पद्मविजयगणि विरिचिते श्री श्रीजयानदमहाराजाधिराजकेवलिचरित्रे प्रारुतप्रवघे चक्रायुधविद्याधर चक्रवर्तिजय चक्रसुवर्या दिवसहस्रकन्यापाणिग्रहणादि पुण्यफलप्रकटनानु नवनादि विवर्णनोनामाथटमोखम समाप्त सप्तम खमे गाथा ॥४१३५॥ थष्टमखमेगाथा ॥ २५ ॥ सर्वगाथा ॥५०६० ॥ सप्त खमे उक्त श्लोक ॥०॥ श्रष्टमखमे उक्तश्लोक ॥ ५ ॥ सर्व वक्त श्लोक ॥ ५ ॥ सवैयो एक,समस्या एक, दोहा वे ॥ इत्यष्टम खम समाप्त ॥ ७ ॥ ॥ अथ नवमखम प्रारभ्यते ॥ ॥दोहा॥ ॥ शांतिनाथ प्रस्तु शोलमा,स्वर्णकाय सुखवाय ॥ मनमा वसतांधापदा, पन्नग दूर पलाय ॥ १ ॥ पुरुषादाणी पासजी,जे टाले नवपास ॥ इद जव पण नवि जीवनी, वनित पूरे श्राश ॥ २ ॥ वचन सरस सरसति दीये, गु "गुरु गुरु श्रुत वाय ॥ दीक्षा विद्या गुरु नमुं, नवतारण मुसहाय ॥ ३॥ थात खेम एणी परें कहा, नवलो नवमो खम ॥ नवरसमय दु वर्ण, सां नलो तेद थखम ॥ ॥ सानला जे संघशे, विकथा करशे जेद ।। समू हिम परें हारशे, धर्म अर्थ वली तेह ॥ ५ ॥ वधषच मी मत जशो,मत गुलरावो बाल ॥ बामुथवलु मत जून, जो मुणो वयण रसाल ॥ ६ ॥ वदन प्रसन्न फरी सनिले, समजे रहस्यनी वात ॥ पूर्वापर सवि मेजवे, श्रोता ते कडेवात ॥७॥ ॥ ढाल पहेली ॥ घोडी से थाइ थारा वेशमा मारूनी ॥ ए देशी ॥ ॥ एकदिन वेग सना करी राजनजी, चक्रीप्रमुख परिधारहो मुणो घ मस्नेही प्राणिया राजननी ॥ वनपालक नूपालने राण॥ कहे विनती थव नवम खंक ३२७ धार हो सुणो० ॥१॥ तात खेचर चक्री तणा रा०॥ पाच धास्या उद्या न दो सु०॥ बहुपरिवार परवस्था रा॥ चक्रबल थनिधान हो मु० ॥२॥ सानली नूपति हरषिया रा॥थानद भंग न माय दो सु० ॥ वर्षदान दीये तेहनें राणा शासन मन्नति पाय दो सु०॥३॥ पूर्व अति वैरागीया राण ॥ पाम्या परानव जेण दो मु०॥ गुरु थागमन सुणी तदा रा ॥श र्करा पयना एण हो सु०॥ ॥ हर्पथी नूपर्ने खगपति राम् ॥थतेसर प परिवार दो सु॥ कोडपो गमे खग परिवस्त्रा रा०॥ गज बेसी त्रधार दो सु०॥ ५॥ सूरि वांदवा नीकल्या रा० ॥ श्रनुक्रमें पोहोता उद्यान हो सु० ॥ पंचालिगम ते साधवी रा०॥ त्रण प्रदक्षिणादान हो सु० ॥ ६ ॥ वदे गुरुने विधिथकी रा ॥ गुरु पण दीये धर्मलान हो मु० ॥ बेटा मुण वा धर्मनें रा० ॥ सचित थानक उत्साह दो मुं॥ ॥ धर्मदेशना गुरु की ये रा० ॥ जैनधर्म जगतार दो सु०॥ थापे बिजुवन सपदा रा० ॥ त्रण जगत थाधार हो सु० ॥ ॥ सुख अर्थी सवि प्राणिया रा० ॥ पण सु ख दोय प्रकार हो सु॥ थक्ष्य मुख पहेल्नु का रा० ॥ निरुपाधिक थ विकार दो मु०॥ ५ ॥ विपयादिकथी ठपनु राणा बीज मुस्वष्ठ ख रूप हो सु० ॥ उलरव्यु जिनशासन जेणे रा०॥ ते न पडे नवकूप हो सु० ॥१॥ प्रथमज मुख थगोकरे रा० ॥ विषयथी चिट्ठ गति 5 ख हो तु० ॥शात ताप ज्वर कानां रा० ॥ नरकमा ३ ख क्ली नूख दो सु० ॥ ११ ॥र्गध फरस करिन घणो रा० ॥ सुरकृत बढ्नु सताप हो सु०॥ ते इ खथी वी हे नही रा० ॥ विषय अर्थे करे पाप हो सु० ॥१५॥ त्राडनने वहेवराव रा ॥ श्रदोनिशि तापनें शीत दो सु०॥ नूख तरपनें वायरा रा॥ ख सहे तिर्यंच नित्य हो सु॥१३॥ निज परनातिनो जय घणो रा० ॥ पर वशपणु असराज हो सु०॥खमीया नें खमशे वली रा॥ख पण बीदे न वाल हो सु०॥१४ ॥ ई- परानव निबलने रा० ॥ देखी बली गर्ना वास दो सु०॥ ते खथी लाजे घणो रा० ॥ शुं सुख देव श्रावास दो सु ॥ १५॥ इट वियोग थनिष्टनो रा० ॥ पामे वली सयोग दो मु०॥ साते जय वली मनुजमा रा० ॥ कुपुत्रनें वजी रोग हो मु०॥ १६ ॥ वि रसता मानव नवतणी रा॥ कदेता नावे पारहो मु० ॥ सरस करे धर्म थादरी राम ॥धन्य तेहनो थवतार दो मु०॥१७॥ महा परानव शत्रुथ ३२७ जयानंद केवलीनो रास. की रा० ॥ पुत्र कलत्र विश्वास हो सु० ॥ मरणनीक अति थाहरी रा० ॥ वली अर्ध्यान अन्यास हो सु० ॥ १७ ॥ परिग्रह धारन या करे रा० ॥ पाप करी थति घोर हो सु० ॥ मरण सहीने परनवें राम इख खमे थति जोर दो सु० ॥१ए ॥ वतीय कपाय वीरता राणा चा लता राक्षस तेह हो सु० ॥ प्रव पुण्य खाली करे रा० ॥ विषय वेताल वली जेह दो सु०॥ २०॥ नाश करे विवेकनो राणा राज्य ते नरक ना य हो सु० ॥ माचे राज्यमां पण नदी रा० ॥ 5 खत्रायक कोइ थाय हो मु० ॥२१॥राज्ये मरण न राखीयु राणा रोगनें जय विध्वस दो मुगा न करो तो मद राज्यनो रा०॥ करतां दोय गुणत्रंश हो सु० ॥२५ ॥रा ज्यमा धर्म न करी शके रा०॥राज्यमा वट्ठ जजाल हो सु० ॥ पुत्र कलत्र सद्ध स्वारथी रा॥ लखमी थनित्य सनाल दो सु ॥ २३ ॥ मोह स्थ जो राजचिनोरा० ॥ धर्म करो निरावाध हो सु०॥ धर्म ते बेहु ने कह्यो रा० ॥ गृही यतिधर्म सुसाध हो मु० ॥२४॥ पोहोंचाडे स्वर्ग वारमें रा॥ अनुक्रमें शिवपद थाय हो मुतत्कष्टो गृही धर्म ए रा० ॥ बीजो तुरत शिव दाय हो सु०॥२५॥ पण यतिधर्म धाराधीय रा० ॥ तुरत बीये देववास हो मु० ॥ दान पूना गृही धर्ममा राम् ॥ अक्षा व्रत वली खास हो सु० ॥ २६ ॥ यावश्यक सघ पूजना रा ॥ ए वेड धर्ममा एक हो मु० ॥ यथाशक्ति श्रगीकरो रा० ॥ श्रगें धरीय विवेक हो सु० ॥ २ ॥ नरनव पामी दोदिलो रा० ॥ कोण करे धर्ममा ढील दो सु० ॥ मरण धी दीक केम गइ थडे रा० ॥ थाधि व्याधिनी पोल दो सु०॥ २॥ के फरी थावतु जे नही रा० ॥ के नदी उर्गति इख दो सु॥ उद्यम न करो धर्म नो रा० ॥ जेदथी लदो शिवसुख दो सु०॥ २॥ नवमे खेमें ए कदी रा०॥ पहेली देशना ढाल दो सु० ॥ पद्मविनय सोदामणी रा ॥ सुण तो मगलमाल दो सु० ॥ ३॥ सर्वगाथा ॥३॥ ॥ दोहा॥ ॥ एणी परें सांजली देशना, प्रणमे श्रीगुरु पाय ॥ कर जोडीने वीनवे, श्रीजयानवजी राय ॥१॥शकि नयी चारित्रनी, पुष्कर सयम नार ।। स मकेत मूल में थावस्खा,पहेला अणुव्रत चारशा नियम मढ तुम साखथी, पूजा थष्ट प्रकार ॥ वली गुरु योगें प्रणमीने, कर नित्य आहार ॥२॥ पर नवम खंम ३२ वदिने नित्य धादरूं, ब्रह्मचर्य मनोहार ॥ श्रारंन वर्जु ते दिने, साधर्मिक सत्कार ॥॥ चैत्र प्रमुख अाश्य, वर्तावु थमार ॥ जिनप्रासादने बिंब व ली, सहस्त्र गमे करु सार ॥ ५॥ पुस्तक वली लखावा, जिनवर नापित जेह ॥ सघचतुर्विध पूजशु, विधि पूर्वक ससनेह ॥ ६ ॥ आवक व्रतधारीत णो, कर नवि लेशु कोय ॥ दानादिक वली थाचरु, दीन अनाथ जे दोय ॥ ॥ जिनशासन परनावना, करणं बढ़ प्रकार ॥ गुरु कहे राजन सान लो, पालजो चित्त नदार ॥ ॥ धर्मतत्त्वनु रहस्य ए, पाले कर्म क्य था य॥ पुस्यानुबंधी पुस्य जे, एदथी बहु बधाय ॥ ए॥ निश्चल था थाराध जो, मोक्नां सुख दोये जाव ।। प्रणमी नरपति विनवे, थवसर पामी ता व ॥ १० ॥ एवं नव दोशे के नही, नगवन चारित्र मुक्त ॥ तव गुरु कहे तुज दोयशे, हरप्यो सांजली गुज ॥ ११ ॥ ॥ ढाल बीजी॥ सयमयी सुख पामी ॥ ए देशो ॥ ॥ खेचर चक्रा एम नणे, विनये वदी पाय सुगुरुजी ॥ पाम्यो परानव सगरें, कायफ बज्यो ताय ॥ सु ॥ १ ॥ तुम वयणां यति मीवडा॥ ए थांकणी ॥ तुम वयणें दवे बुजीयो, लेश सयम नार मु० ॥ राज्यथकी दु विरमियो, जाण्यो श्रसार ससार सु० ॥ तु० ॥ ३ ॥ राज्य स्वस्थ करी था वगं, तुम पासें निरधार सु०॥ तावत्काल रुपा करी, रदेवु मुज उपकार सु० ॥ तु ॥३॥ एम कही गुरुना पय नमी, केश्क समकेत धार सु॥ देशविरति के श्रादरी, थावे निज थागार सु० ॥ तु० ॥ ॥ दवे विद्या घर राजियो, मत्री करीय विचार ॥ राजनजी ॥ स्नेहथी श्रीजयानद ने, बोलावे अति प्यार रा॥ तु॥ ५ ॥ राज्य तुमें वैताढधनु, मुज जीती में लीप राण ॥ ते कारण तुमनें हवे, करुं थनिपेक प्रसिद रा० ॥ तु० ॥ ॥ ६ ॥ कहे श्रीजय मुज खप नही, निज राज्य सतोप रा० ॥ थापो नि ज सुतने तुमें, योग्य ने ते सुविशेष रा०॥ तु ॥ ॥ दूरयको पण तेद नी, रक्षा करणं नित्य रा॥ तुम परें हित धरशु सदा, चिता न करवी चित्त राणा तुपाला खेचर पति कहे सांजलो,तुम खोले ते एह राणा राज्य तो एह तुमारडु एदमा नहीं सदेह रा० ॥ तु० ॥ ए॥ तुमें एदने वली श्राप जो, तुम रुचि होये जेह रा ॥ में पण एदवु सनिल्यु, सानलो कहिये तेह रा० ॥ तु० ॥ १० ॥ नरत थईना थधिपति, तिम वैताढच समेत , .

३२ जयानंद केवलीनो रास. की रा० ॥ पुत्र कलत्र थविश्वास हो सु० ॥ मरणनीक यति पानी रा० ॥ वली धान थन्यास हो सु०॥ १७ ॥ परिग्रह थारंना करे रा० ॥ पाप करी थति घोर हो सु० ॥ मरण लही, परनवें रा॥ 5ख खमे थति जोर हो सु० ॥१॥ ॥ वतीय कपाय उदीरता राणाचा लता राक्षस तेद हो सु० ॥ प्रव पुण्य खाली करे रा० ॥ विषय वेताल वली जेद दो सु० ॥ २०॥ नाश करे विवेकनो रा॥ राज्य ते नरक ना य हो सु० ॥ माचे राज्यमा पण नदी रा० ॥ इखत्रायक कोइ थाय हो सु० ॥ १॥ राज्ये मरण न राखीयु राणा रोगनें नय विध्वस दो मु०॥ न करो तो मद राज्यनो रा०॥ करता होय गुणभ्रंश हो सु० ॥२१॥रा ज्यमा धर्म न करी शके रा० ॥ राज्यमा बढ़ जजाल दोसु० ॥ पुत्र कक्षत्र सद्ध स्वारथी रा० ॥ लखमी थनित्य सनाल दो सु० ॥ २३ ॥ मोह स्प जो रानाधिनोरा ॥ धर्म करो निरावाध हो सु॥ धर्म ते वेहु ने कह्यो रा० ॥ गृही यतिधर्म सुसाध दो सु० ॥२४॥ पोहोंचा स्वर्ग बारमें रा॥ अनुक्रमें शिवपद थाय दो सु०॥उत्कृष्टो गृदी धर्म ए रा० ॥ वीजो तुरत शिव दाय हो सु०॥२५॥ पण यतिधर्म थाराधीय रा० ॥ तुरत वीये देववास दो सुप ॥ दान पूजा गृही धर्ममा रा० ॥ अक्षा व्रत वजी खास दो सु० ॥ २६ ॥ थावश्यक सघ पूजना रा ॥ ए वेदु धर्ममा एक हो सु० ॥ यथाशक्ति श्रगीकरो राम् ॥श्रगें धरीय विवेक हो सु० ॥ ५ ॥ नरनव पामी दोहिलो रा० ॥ कोण करे धर्ममा ढील दो सु० ॥ मरण बी हीक केम गइ थडे रा० ॥ थाधि व्याधिनी पोल दो सु० ॥ २०॥के फरी श्रावतु वे नदी रा० ॥ के नही उर्गति 5 ख दो सु॥ उद्यम न करो धर्म नो रा० ॥ जेहथी लदो शिवसुरख दो सु० ॥ ॥ नवमे खमें ए कही रा०॥ पहेली देशना ढाल दो सु० ॥ पद्मविजय सोहामणी रा० ॥ सुण तां मगलमाल हो सु० ॥ ३०॥ सर्वगाथा ॥३॥ ॥दोहा॥ ॥ एणी परें सांजली देशना, प्रणमे श्रीगुरु पाय ॥ कर जोडीने वीनये, श्रीजयानवजी राय ॥१॥शक्ति नथी चारित्रनी, पुष्कर सयम नार ।। स मकेत मूल में थावस्या,पदेला थणुव्रत चार॥शा नियम ग्रह तुम साखथी, पूना थष्ट प्रकार ॥ वली गुरु योगें प्रणमीने, कर नित्य थाहार ॥२॥ पर नवम खंम. ३३ वदिने नित्य श्रादरूं, ब्रह्मचर्य मनोदार ॥ थारंन वर्जु ते दिने, साधर्मिक सत्कार ॥॥ चैत्र प्रमुख अहाय, वर्तावु धमार ॥ जिनप्रासादने बिंब व ली, सहस्त्र गमे करु सार ॥ ५॥ पुस्तक वली लखावां, जिनवर नापित जेह ॥ सघचतुर्विध पूजशु, विधि पूर्वक ससनेह ॥ ६ ॥ श्रावक व्रतधारीत णो, कर नवि लेशु कोय ।। दानादिक वली थाचरु, दीन अनाथ जे होय ॥ ७॥ जिनशासन परनावना, करj बढ़ प्रकार ॥ गुरु कहे राजन सान लो, पालजो चित्त उदार ।। ७ ॥ धर्मतत्त्वनु रहस्य ए, पाले कर्म क्ष्य था य ॥ पुल्यानुबंधी पुस्य जे, एदयी बद बधाय ॥ ॥ निश्चल थइ आराध जो, मोना सुख होये जाव ॥ प्रणमी नरपति विनवे, अवसर पामी ता व ॥ १० ॥ एणे जव होने के नही, नगवन चारित्र मुज ॥ तव गुरु कहे तुन दोयशे, दरप्यो सानली गुल ॥११॥ ॥ ढाल बीजी ॥ सयमथी सुख पामी ॥ ए देशी ॥ ॥ खेचर चक्रा एम नणे, विनये वदी पाय सुगुरुजी ॥ पाम्यो परानव सगरें, कायक बज्यो ताय ॥ सु ॥ १ ॥ तुम वयण यति मीठडां ॥ ए श्रांकणी ॥ तुम वयणे दवे जीयो, लेन सयम नार सु० ॥ राज्यथकी छ विरमियो, जाल्यो थसार ससार सु ॥ तु० ॥ २ ॥ राज्य स्वस्थ करी था व, तुम पासें निरधार सु० ॥ तावत्काल कृपा करी, रदेवु मुज सपकार सु० ॥ तु ॥ ३ ॥ एम कही गुरुना पय नमी, केशक समकेत धार सु॥ देश विरति के थादरी, बावे निज थागार सु० ॥ तु० ॥ ४ ॥ हवे विद्या धर राजियो, मत्री करीय विचार ॥ राजनजी ॥ स्नेदथी श्रीनयानद में, वोलावे अति प्यार रा॥ तु॥ ५ ॥ राज्य तुमें वैताढपनु, मुज जीती ने लीध रा० ॥ ते कारण तुमनें हवे, करु धनिपेक प्रसिह रा० ॥ तु० ॥ ॥६॥ कहे श्रीजय मुज खप नही, निज राज्य सतोप रा ॥धापोनि ज सुतनें तुमें, योग्य वे ते सुविशेष रा०॥ तु० ॥ ४ ॥ दूरथको पण तेद नी, रक्षा करा नित्य राणा तुम परें दित धरशु सवा, चिता न करवी चित्त राणा तु॥७॥ खेचर पति कहे सनिलो,तुम खोले वे एह रा०॥ राज्य तो एह तुमारडु, एदा नहीं सदेह रा० ॥ तु०॥ए ॥ तुमें एदने वली थाप जो, तुम रुचि दोये जेह रा० ॥ में पण एहबु सानल्यु, सानलो कहिये तेह रा० ॥ तु० ॥ १० ॥नरत थईना थघिपति, तिम वैताढय समेत ចុច जयानंद केवलीनो रास. की रा० ॥ पुत्र कलत्र थविश्वास हो सु० ॥ मरणनीक अति भारी रा॥ वली नि अन्यास हो मु० ॥ १७ ॥ परियह बारना करे रा० ॥ पाप करी थति पोर हो सु० ॥ मरण नदीमें परनवे रा.. Fख खमे थति जोर हो सु० ॥१ए ॥ वतीय कपाय वीरता रा॥ चा लता राइस तेह हो सु० ॥ प्रव पुण्य खाली करे रा॥ विषय वेताल वली जेह दो सु० ॥ २०॥ नाश करे विवेकनो रा० ॥ राज्य ते नरकनुं ना य हो सु० ॥ माचे राज्यमा पण नही रा० ॥ इखत्रायक कोई थाय हो सु० ॥ २१॥ राज्ये मरण न राखीयु राणा रोगर्ने नय विध्वस हो सु॥ न करो तो मद राज्यनो रा०॥ करतां दोय गुणनश हो सु० ॥२१॥रा ज्यमा धर्म न करी शके रा० ॥राज्यमा वह जजाल हो सु० ॥ पुत्र कलत्र सह स्वारथी रा० ॥ लखमी थनित्य सनास दो सु० ॥ २३ ॥ मोह त्य जी राजाधिनोरा ॥ धर्म करो निरावाध हो मा धर्म ते वेहु नेदें कह्यो रा० ॥ गृही यतिधर्म सुसाध हो सु० ॥२४॥ पोहोंचाडे स्वर्ग बारमें रा॥ अनुक्रमें शिवपद थाय दो मु०॥उत्कृष्टो गृही धर्म ए रा० ॥ बीजो तुरत शिव दाय हो मु०॥२५॥ पण यतिधर्म थाराधीय रा० ॥ तुरत कीये देववास हो मु०॥ दान पूना गृही धर्ममा रा० ॥ अक्षा व्रत वली स्वास दो सु० ॥ २६ ॥ श्रावश्यक सघ पूजना रा ॥ ए वेदु धर्ममा एफ हो सु० ॥ यथाशक्ति थगीकरो रा० ॥श्रगें धरीय विवेक हो सु० ॥ ॥ नरनव पामी दोदिलो रा ॥ कोण करे धर्ममां ढील दो सु० ॥ मरण घी दीक केम गइ थडे रा० ॥ थाघि व्याधिनी पीत दो सु० ॥ २०॥के फरी थावतु वे नही रा० ॥ के नदी उर्गति 5 ख दो सुगा उद्यम न करो धर्म नो रा० ॥ जेदथी लदो शिवसुख दो सु० ॥ श्ए ॥ नवमे खमें ए कही रा० ॥ पहेली वेशना ठाल दो सु० ॥ पविजय सोदामणी रा० ।। सुण तो मगलमाल दो सु० ॥ ३॥ सर्वगाथा ॥३॥ ॥दोहा॥ ॥ एणी परें सांजली देशना, प्रणमे श्रीगुरु पाय ॥ कर जोडीने वीनवे, श्रीजयानदजी राय ॥१॥शक्ति नयी चारित्रनी, 5ष्कर सयम नार ॥स मकेत मूल में यादयां,पदेला थणुव्रत चार॥शा नियम ग्रह तुम साखथी, पूना थष्ट प्रकार ।। वली गुरु योगें प्रणमीने, करां नित्य थाहार ॥३॥ पर नवम खंम. ३३॥ वदिने नित्य थादरूं, ब्रह्मचर्य मनोहार ॥ थारंन वर्जु ते दिने, साधर्मिक सत्कार ॥॥ चैत्र प्रमुख बनायें, वावु थमार ॥ जिनप्रासादने बिंब व ली, सहस्त्र गमे करु सार ॥ ५ ॥ पुस्तक वली लखावगुं, जिनवर नापित जेह ॥ सघचतुर्विध पूजशुं, विधि पूर्वक ससनेह ॥ ६ ॥ श्रावक व्रतधारी त णो, कर नवि लेशु कोय ॥ दानादिक वली थाचरु, दीन अनाथ जे होय ॥ ७॥ जिनशासन परनावना, करणं बढ़ प्रकार ॥ गुरु कहे राजन सान लो, पालजो चित्त उदार ।। ७ ॥ धर्मतत्त्वनु रहस्य ए, पाले कर्म क्ष्य था य॥ पुण्यानुवधी पुस्य जे, एदथी वढु बधाय ॥ ए॥ निश्चल थइ आराध जो, मोदनां मुख होये जाव ॥ प्रणमी नरपति विनवे, अवसर पामी ता व ॥ १० ॥ एणे नव दोशे के नदी, नगवन चारित्र मुज ॥ तव गुरु कहे तुज दोयशे, हरप्यो सनिली गुज ॥ ११ ॥ ॥ ढाल बीजी॥ सयमथी सुख पामी॥ ए देशी ॥ ॥ खेचर चक्रा एम नणे, विनये वदी पाय सुगुरुनी ॥ पाम्यो परानव सगरें, कांयफ व्रज्यो ताय ॥ १० ॥१॥ तुम वयां थति मीवहां ॥ ए शोकणी ॥ तुम वयणें दवे बूजीयो, लेश सयम नार सु० ॥ राज्यथकी हुँ विरमियो, नाल्यो असार ससार सु० ॥ तु ॥ २ ॥ राज्य स्वस्थ करी था वर्ण, तुम पासें निरधार सु०॥ तावत्काल कृपा करी, रदेवु सुज उपकार सु० ॥ तु॥ ३ ॥ एम कही गुरुना पय नमी, केशक समकेत धार मु॥ देशविरति के श्रादरी, थावे निज थागार मु० ॥ तु० ॥ ४ ॥ हवे विद्या धर राजियो, मत्री/ करीय विचार ॥ राजनजी ॥ स्नेहथी श्रीजयानद में, बोलावे यति प्यार राणा तु॥ ५॥ राज्य तुमें वैताढयन्नु, मुज जीती ने लीध रा० ॥ ते कारण तुमनें दवे, करु थनिपेक प्रसिद्ध रा० ॥ तु० ॥ ॥ ६ ॥ कहे श्रीजय मुज खप नही, निज राज्ये सतोप रा० ॥ श्रापो न ज सुतने तुमें, योग्य ते मुविशेप रा०॥ तु ॥ ७ ॥ दूरथको पण तेद नी, रक्षा कर नित्य राणा तुम परें हित धरशु सवा, चिता न करवी चित्त राणा तु०॥७॥ खेचर पति कहे सनिलो,तुम खोले वे एह रा॥ राज्य तो एद तुमारडु, एदा नहीं सदेह रा० ॥ तु० ॥ ॥ तुमें एदनें वलीथाप जो, तुम रुचि दोये जेद रा० ॥ में पण एदबु सोनल्यु, सानलो कहिये तेह रा ॥ तु० ॥१०॥नरत थईना थधिपति, तिम वैतादय समेत

३३०
जयानंद केवलीनो रास.
राण ॥ ज्ञानीय नारयु में सानन्यु.करु थनिपेक ते देत रा| तु॥ ११ ॥
प्रार्थना नग न कीजीये, थाये धर्म श्रतराय रा० ॥ मौन करे तव नूप
ति, तव खेचरपति राय ॥ रा० ॥ तु० ॥ ११ ॥ थापी मणिसिहासने,
सामयी सवि युन राणा पवनवेगादिक खेचरा, कोडयो गमे सयुत्त रा॥
तु० ॥ १३॥ राजानिपेक करे तिहां,माहा महोत्सव विस्तार रा ॥ चक
वेगादिक पुत्रने, सोंपे सेना नमार रा० ॥ तु० ॥ १४ ॥ प्रणमे खेटचकी
तदा, तेम सहु खेचर राय रा०॥ रूपांतरें थावियो, तेम शोना तस
थाय रा०॥ तु० ॥१५॥ करे या महोत्सव वली, सघनक्ति मुविशाल
रा० ॥ पडह थमारि वनावतो, मास लगें खगपाल रा ॥ तु ॥ १६॥
यात सहस खग राजिया, राणीयो शोल हजार रा ॥ सङ थयां सद्ध
सामटा, लेवा सयम नार रा० ॥तु ॥ १७ ॥ शक तीर्थकरनी परें, 3
लव श्रीजयानद रा० ॥ चक्रवेगादिकशु करे, मगल स्नान खगेंद रा० ।।
॥ तु ॥ १७ ॥ देवदूप्य पहेरावतां, दीपता थति अलंकार रा० ॥ बेग
प्रवर विमानर्मा, दीक्षा उत्सुक परिवार रा० ॥ तु० ॥ १॥ श्रमर बत्र
धरावता, चश्वज्ज्वल अनुहार रा०॥ कोडघो मुनटशुं नरपति, धाले था
गल तेणि वार ॥रातुणा॥ विद्या धरी कोडयो गमे, बेठी चाले विमान
रा॥ गीत गान करती थकी, देता दीनने दान रा ॥ तु०॥ १॥ बंदि
बिरुद बोली जते, नाटक नवनव रग रा० ॥ देवता जय जय रव करे,
हर्ष
धरी उबरंग राण ॥तु॥२२॥ वाजे देवनी उदनि, पग पग देता दान
रा०॥श्राव्या गुरु चरणे क्रमे, नगर बाहिर उद्यान रा० ॥तु ॥२३॥
तरीया ते विमानथी, सद साये करे लोच रा॥ गुरुने एणी परें विनवे,
बॉमी मन सकोच रातु ॥ २४ ॥ नव सायरथी तारीमें, गुरुपण ते
हने ताम ॥ रा० ॥ विधिपूर्वक दीक्षादीये, सर्ने गुरु गुण धाम ॥ रा० ॥
॥ तु॥ २५॥ वास सुगध गुरु दीये, सुरसघने थनिराम रा०॥सह मल।
तस मस्तक ग्वे, जय जयकार तवाम रा तु॥१६॥ हित शिक्षा सवि
सघने, देशना दीये गुरुराय रा०॥ वदी गुरुने नरपति, वदे चक्री कपिराय
रातु ॥ २४ ॥ नवमे खमें बीजी कही, पद्मविजय एम ढाल रा० ॥
उत्सव रंग धामण, घर घर मगत माल रा० ॥तु ॥ २७॥ ७६ ॥

नवम खंम. ३३१ ॥ दोहा ॥- ॥ धकायुझ्ने खमावता, नरपति निज थपराध ॥ शेष मुनीश्वरने वली, प्रणमें नक्ति अगाध ॥ १ ॥ सद् निज निज थानक गया, गुरु विचस्या थ न्य गण ॥ बहुपरिवारें परवस्या, विविध शिक्षा दिये दाण॥२॥श्रीजया नद नृपति दवे, बहु विद्याधर वृद ॥ चक्रवेग पवनादिका, सेवे वर्ष श्रमद ॥३॥ वैताढपने थन्य दीपा, वलीवासी वली जेद ॥ श्रन्य पर्वतना नावीया, सेवा थर्थं तेद ॥ ॥ सेनाछु जइ तिहां कणे, लीलायें जय की ध॥एम विद्याधर चक्रीनी,पदवी थपरति-६ ॥५॥ सुखमा एम रहेतां थकां, गगन वनन पुरमांहि ।। काल केतो एक काढीयो,धरता थंगउहादि ॥ ६ ॥ ॥ ढाल त्रीजी ॥ दक्षिण दोदिलो दो राज ॥ ए देशी ।। । एक दिन सूतां दो राज, रयणी समय दो राज, नघे के जागे रेना खे सुरवर एगीपरे जी॥ नृप कहे जागु हो राज, तव सुर वोले हो राज, गिरिचूड नामे रे,देव दुथव्यो तुज घरे जी ॥१॥ तें प्रतिवोध्यो दो रान, इहां श्राव्यो हो राज, तेहनो हेतु रे,सानल तुजनें हुं कहूँ जी ।। तापस बो घि दो राज, आवक कीधा हो राज, फरी तुमें नाव्या रे, वाट जुए तुमची सहनी ॥ २ ॥ हेमप्रन सूरि दो रान, तेदनी वाणी हो राज, सनिली म नमा रे, तेद घणु वैरागीयाजी ॥ तापससुदरी दो राज, विघननो देतु हो राज, दीक्षा सेवा रे, सद्ध चित्त जागीयाजी ॥ ३ ॥ ए प्रतिवघे दो राज, व्रत न लेवाये हो राज, तेणे तिहां धावी रे, निजप्रिया निज पासें करोजी ॥ विघन ते टलशे दो राज, सट्ठ व्रत लेशे दो राज, विण थपरा धे रे,नारीवियोग शाने धरोज॥॥षम करीने दोरान,मुज थाराध्यो हो रा ज, ज्ञानीने वचनें रे, जाणीने थाव्यो शहाजी ॥ तुमनें जणव्यु दो राज, गयो एम कहीने दो राज, गुण सनारी रे, पत्नीना नृप चितवे तिहांजी। ॥ ५॥ मात पितानें हो राज, मलवा मनहु दो राज, तेणें वर खेचर रे, ते ही विचार करी दवेनी ॥ चक्रीसुतनें दो राज, चकवेगनें दो राज, उत्तर श्रे णीनो रे, थधिपति करी राज्ये ग्वेजी॥ ६॥ वीजा नानें दो राज, वधि त ते दोघां हो राज,नगर पुरादिक रे,थापी सह सतोपीयाजी॥थधिपति कीयो हो रान, दक्षिण श्रेणीनो दोराज, पवनवेगने रे, नरपति घणु पो पीयोजी ॥ ७॥ ग्रास पूरवला हो राज, सट्ठने दीपा दो राज,केश्ने दोधा ३३२ जयानंद केवलीनो रास. रे, वलीथ नवा सेवक जणानी ॥ निष्फल न होयें दो राज, कोपी सेवा हो राज, गुणनिधि साहेब रे, सनारे ते सह तणोजी ॥ ७॥ विरु६ स मावी हो राज,योग्य खेचरनें हो राज,पूरी बटुलु रे,सैन्य सहित नृप चाली यानी ॥ वेशी विमाने होरान,सवि प्रिया साथे दोराज,पवनवेगादिक राप रे, चकवेग, म्हालीयानी ॥ एखगपत्ति कोडयो दोरान, साथे चाल्या होराज, अनुक्रमें थाव्या रे, तापस थाश्रम जिहां कणेजी ॥ प्रतिपत्ति क रीने होराज, तापस तोप्या होरान, रोती थाश्वासे रे, निज प्रियाने धैरय घणेजी ॥१०॥ हेमप्रन गुरुजी होरान, ज्ञाने जाणी होरान, व्रतनो अव संर रे, अनुग्रह करीने पधारीयानी ॥ गिरिचूढदेव हो रान,नरपति मलीने हो राज, करता उत्सव रे, वहुविध मनमा धारियाजी ॥ ११॥ हेमनट प्र मुख हो रान,तापस सघला हो राज, लेवे दीदा रे,शिक्षा गुरुनी चित्त धरे जी ॥ करे प्रशसा होराज, तापस केरी हो रान, करकन जोडी रे, विनय धरी बहु थादरेंजी ॥१॥ मुनिवर प्रपमी हो राज,नारीने वेदो राजन खमी पुरने रे, बाहिर थाव्या ते वदीजी ॥ गगन ते गयुं दो राज, विद्याधर एं होराज, नरपति विजय रे, जाणे शत्रु थाव्यो सहीजी ॥ १३॥ यु६ सामग्री दोराज, निकले करीने दोरान, विद्याधर दोय ताम रे, श्रीजयान दजी मोकलेजी ॥ प्रणमी नाखे दोराज,तुम मृत थाया होरान,तस्वमी ती ला रे, श्रीनयानदनी को कलेजी ॥ १४॥ हर्ष श्राश्चर्य होराज, नूपति पा मे दोरान,बबुली कति रे, पुत्र धागमन मुणी करीजी ॥ उचित ते थापी होरान, फरिवरें बेशी दोरान, सादामा थावे रे, विच प्रमोद घणो ध रीजी ॥ १५ ॥ उतरे विमानयी दोराज, श्रीजयानद दोराज, प्रणमे तात नां रे, चरण सरोज सुदंकरुनी ॥ खेचर सगुए दो राज, सद्भुप्रिया सायें होराज, प्रणमे तृपर्ने रे, बोलावे वयण मनोदरुनी ॥ १६ ॥ नवमे खमें होराज, त्रीनी ढाल दोराज, श्रीजयानदने रे, रासें पनविजय कहीजी॥ दर्षे मलिया दोराज, सुखमा नलीया दोराज, पुत्रपितायें रे, अतर प्री ति बट्ठ सहीजी ॥ १७॥ सर्वगाथा ॥ एए । ॥ दोहा॥ ॥ शक जयंत परें बिगु, पेठा नयर मफार ॥ प्रिया सहित माता प्रत्ये, प्रणमे हर्प थपार ॥ १ ॥ पुत्र पुत्रवधु देखीने, मनमा हर्ष न माय ॥ श्री नवम खंम. ३३३ जयपूर्वापर प्रिया, बोलावे चित्त लाय ॥२॥ मधुर वय प्रिय सनिली,धरती शतिशय प्रीति ॥ गौरी गिरीश चकुमुदिनी,गज रेवानी रीति ॥॥ श्रीविज यनी परषदा, माहे अवसर पामि ॥ पवनवेग श्रीजयत', चरित्र कहे थ निराम ॥ ॥ सांजली चित्तमा चमकिया, परषदने वली ताय ॥ स्तवना करता सद्गु जना, हैयहे हर्प न माय ॥ ५ ॥ ॥ ढाल चोथी॥ थाबु थचल रलियामणो रे, जिन राजे ॥ ए देशी ॥ ॥ मध्यखम हवे साधवा ॥ जश गाजे २ ॥ श्रीजयानद राजान, त कुराइ बाजे ॥ पहेला पूरव दिशनण। ॥ जश० ॥ साथै सामत प्रधान ॥ 1 ॥ १ ॥ सेना चतुरगी करी ॥ ज० ॥ सह राजवी कीधा जेर ॥ ७॥ पूरव सायर तट लगें।जण ॥ वलवती जस समसेर ॥ 1 ॥ ॥ वग क लग कालिगना ॥ ज० ॥ देशना जीत्या सद् राय ॥१०॥ पग पग जश थ न रोपीया ॥ ज० ॥ नाम सानती नमवा थाय ॥ १० ॥३॥ महेंनाथ मुख राजिया ॥ ज०॥ जे कोश्नी न माने आण ॥ ॥जोर करी ते जीतीया ॥ ज० ॥ थाप्या पोते ते ताण ॥ १०॥४॥लीधा दमनें नेटणा ॥ज॥ दवे कांठे का जाय तण॥ पुगी तांबूल प्रमुखना ॥न०॥ वृदे शो नित वनराय ॥10॥ ५॥ दण दिश थाव्या दवे ।। ज०॥ कावेर प्रमुख जे देश ॥ ३० ॥ जीती नेटणे लीधला ॥ ज० ॥ मुक्ताफल प्रमुख थशेष ॥ ३० ॥ ६॥ जात्यवत लाखो गमे ॥ ज॥ मानुं सूरयना केकाण ॥ 10 सदस्र गमे गजराजीया ॥ ज० ॥ श्रापे नृप मानी थाण ॥ ३० ॥ ७ ॥म रिच चवन ने एलची॥ ज० ॥ सैन्यनें पण जोगमा थाय ॥ 1 ॥ सह्य वर्डर मलयगिरि ॥ ज० ॥ लघे श्रीजयराय ॥॥॥ केरलादिक नृपजी तिने ॥ज ॥ पश्चिम दिश थाव्या जाम ॥ 1 ॥ युद्ध करीने जीतीथां ॥ ज० ॥ पारसी परमुख नृप ताम ॥ 1 ॥ ए ॥ मूके प्रणमी नेटणां ॥ ॥ ज० ॥ जिहां दिनकर तेज घटाय ॥10॥ श्रनिनव सूरय देखीनें ॥ज मानु पश्चिम समुश्मा जाय ॥ ३० ॥ १० ॥ दवे उत्तरदिश साधतो ॥ज॥ कांबोज ने दूण जे देश ॥10॥ यु६ परानव बढ़ जह्या जि॥ पण जीत्या सर्व नरेश ॥ ३० ॥११॥ दय गय सार ते नेटणा ॥ज॥ वह इव्य देश लख कोडि ॥ ३० ॥ प्रणमी पदकन सेवता ॥ ज०॥ सङ सेवे होडाहोडि ॥१०॥ ॥ १२॥ फैलास रायनें जीतीया जा हिमाचल नग पर्यत ॥ 1 ॥ दोय ॥ ॥ ३३४ जयानंद केवलीनो रास. खम दोय पासना ॥ ज०॥जीत्या ते दम थापंत 130 शत्रण संका धिप था करी ॥ ज० ॥ सदु सैन्य युक्ता रानान ॥ १० ॥ पाला वली प्रौटो त्सवें ॥ ज० ॥साथै पागीथाने परधान ॥ ॥ १४ ॥ निज नगरें वाया तिहां ॥ ज० ॥ सह वियाधर नरराय ॥३०॥ करे थनिपेक सुविस्तरे ॥म. थईच कि पदवी थाय ॥ 10 १५ ॥ गुणवती कन्या गणी ॥ ज० ॥ तर स्रोगमे थापे नूप ॥ वापरणे ते जयानदनी ॥ ज०॥ अप्सरा पण नी ते रूप ॥ ३० ॥ १६ ॥ राज ग्रासादिक सर्वनें ॥ ज० ॥ जेहने योग्य हुता जेह ॥ 1 ॥ तेहने ते ते थापीया ॥ ज० ॥ थइ प्रसन्न ने थाणी नेह ॥ ॥ ३० ॥१॥ जे जे जेम परल्या हता॥ ज० ॥ लघु १६ कमें कीधी ता स ॥ 1 ॥ परिवद ग्रासादिक सह ॥ ज० ॥ नृप थापे योग्य जे जास ॥10॥ १७ ॥ चक्रवेगादिक आवीया ॥ ज ॥ खेचरपतिने सतकार देई सह विसर्जीया ॥ ज०॥ सद् गया निन राज्यनें नगर ॥॥ ॥ १७ ॥ सेवकपणु श्रीजयतणु ॥ ज० ॥ धरता जाणी उपकार ।। 10 ॥ सुख जोगवता स्वर्गना ॥ज॥ नित्य पामे जयजयकार ॥॥२०॥ नवमा खममाद कही ॥ ज०॥ ए चोथी ढाल रसाल ॥०॥ पद्मविजय कहे पुस्य थी॥ ज० ॥ नित्य पामे मगलमाल ॥ ३० ॥१॥सर्वगाथा ॥१५॥ ॥ दोहा॥ ॥ प्रिया सहस्रोj रमें, पण रतिसुदरी नारि ॥ सनारे नरपति तदा, प ण सदेह लगार ॥ १ ॥ गणिका माता कारणे, मूक्यां वह थयो फाल । शील थक्षत केम सनवे, एडवु हृदयें सार ॥ ५ ॥ तास परीक्षा कारणें,शू रदत्त शनिधान ॥ रूपकलावतो घणु, नृपनो मित्र युवान ॥२॥ स्थानक ते विश्वासनु, रतिसुदरीने पास ॥ करी परीक्षा लावीयें,एम कदी मोकल्यो ता स ॥ ॥ बढुधन वेश वोलावीयो पल्यंक बेशी जाय ॥ रमपुरें पोहोतो व दी,तरीयो शुन गय ॥ ५ ॥ ॥ ढाल पांचमी ॥ धारा टोला ॥ ए देशी॥ ॥ बदुधन देइ परिष्द करो रे, नाडे लीधु गेह ॥ चिचना रागी॥ रति माला गृह टूकडु रे, वसीयो घरमा तेद ॥ चि ॥१॥श्रावो थावो रे स यण शुनमित्ता, करियें वात एकांतें एकचित्ता, सयणवातें घणु सुख थाय ॥ चि० ॥ ३॥ एथोकणी ॥ गणिकाने शील किदां थकी रे, स्वामि करे नवम खंम ३३५ शहां राग ॥ चि ॥ महोटानें कहो कोणं कहे रे, कृणमा करुं विराग ॥ ॥ चि ॥ श्रा० ॥३॥ नष्ट करु शीलथी दवे रे, कोक करीने उपाय ॥ चि ॥ दासी रतिमाला तणी रे, एकांतें बोलाय ॥चि ॥था ॥४॥ धन थापाने वश करी रे, पूबे एणी परें वात ॥ चि०॥ एहनें घर नवि दे खोयें रे, कोई पुरुप थायात चिथा॥ ५ ॥ यं कारण तेहनु कहो रे, दासी बोले ताम ॥ चि० ॥ रतिसुदरीने परणीयो रे, श्रीविलास जस नाम ॥ चि० ॥ था० ॥ ६ ॥ थाउ नगर नृपें यापीयां रे,ते दीधा निजनारि ॥ ॥ चि० ॥ केटलो काल नोग जोगवी रे, तीरथ नमन मिपकार ॥ वि० ॥ ॥था॥ ॥ किदाए गयो ते नावी रे, खवर न लाधी काय ॥ चि० ॥ रतिसुंदरी पासे रही रे, रतिमाला निजमाय ॥ चि०॥था ॥ ७॥ सना रे नित्य निज कला रे, नहीं हो पुरप प्रवेश ॥ चि० ॥ यूरदत्त सुणि च मकीयो रे, श्रदो किम शील कुज वेश ॥ चि० ॥ था० ॥ ए ॥ मधुरस्वरें निशि गायतो रे, काम दीपन जेणे थाय ॥ चि०॥ चतुराई घणी केलवे रे,वे शी गोरखने गय चि॥ था ॥ १० ॥ फल पत्रादिक धन करी रे, जेह अपूव होय ॥ चि० ॥ नित्य वासी करें मोकले रे, प्रीतिकरणने सोय ॥ ॥ चि॥था ॥ ११ ॥ रतिसुवरी पण सवि लीये रे,देखी ते सस्कार ॥ ॥ चि॥ तेद कलाथी चमकती रे, थाप कला नमार ॥ चि० ॥ था० ॥ ॥ १५॥ एकदिन दासीने पूबतो रे, सांजली माहारां गीत ॥ चि० ॥राजे ने तुज स्वामिनी रे,के नवि रोजे चित्त ॥ वि०॥ था ॥ १३॥ दासीक हे रोजे खरी रे,पण नवि स्तवती तेह ॥ चि ॥ देवगुरु विण किम स्तवे रे, सती शिरोमणी जेद ॥ चि० ॥ था ॥ १४ ॥ शूगार रस मय ताहरु रे, ने सुंदर गीतगान ॥ चि० ॥ पण तेदने चित्त नवि गमे रे, नवि मां तेह कान ॥ चि० ॥था॥१५॥ शूरदत्त कहे कामिनी रे, तुन स्वामिनी मुजप्रेम ॥चि॥ को ठपायथी कीजीयें रे,सा कहे करीये केम ॥चिणाया॥१६॥ एद सतीना स्वप्नमा रे, परनर पर राग ॥ चि॥ लेश मात्र यावे नही रे, तेणे नवि थावे लाग ॥ चि० ॥ था ॥१॥ शूरदत्त कहे सांनलो रे, ले जाd मुज तष्ठ ॥ चि॥ सा कहे कोई नर तिहां कणे रे,पेसी शके न ही जय ॥ चि० ॥था ॥ १७॥ तिहां केम ले जाउ तने रे, सानली मौ न कराय ॥ चि०॥ दासी गई निज थानकें रे, चित्तवे थन्य उपाय दिन ३३६ जयानंद केवलीनो रास. ॥ था० ॥१॥ सनारतां तस सानपुं रे, श्रीजये थोपधि दीघ ॥ वि० ॥ रूप करी नारी तणु रे, जाउ वठित सिम ॥ चिया ॥२०॥ एकदिन दासीने कहे रे, तीरथे जाणु कारा | चि ॥ गगनगामिनी विद्यापकी रे, जिनवर नमन नाल ॥ चि० ॥या० ॥ २१ ॥ मुज सम रूप कला अने रे, मधुरस्वरें करे ज्ञान॥चि० ॥ मूकी जाय मुज प्रिया रे, सस्नेही इण थान ॥चि॥था ॥ २२ ॥ पगवधन पथे होये रे, तेणे नवि सेट सग ॥धिo नित्य थावी तुमे तेहरा रे, रमजो करजो रंग ॥ चि० ॥ श्रा० ॥ २३ ॥ पा चमी नवमा खममा रे, पद्मविजय कही ढाल ॥ चि० ॥ सजिलो प्रोता जन सवे रे, बागल वात रसाल ॥ चि॥श्रा० ॥ २४ ॥१५॥ ॥ दोहा॥ ॥ दासी हा कही घर गदी,तेणे कस्यं नारी रूप॥थोपधि वल अति था करु, जाप्यु न जाय सरूप ॥ १ ॥ निजथानक मधुरस्वरे, गावे गीत रसा ल ॥ दासी पण नित्य थावती, श्राप वचन सनाल ॥ ॥ निस्य विनोद करे तेहगं, दिवसें गमावे काल ॥ जैनगीत रजनी समे, गावे गुण सुरसाल ॥३॥रीजि लहे ते सांजली, रतिसुदरी धरी प्यार ॥ पूजे दासीने तवा, को ण ए गावे नार ॥ ॥ जरता परदेशे गयो,धनवती ए नार ॥थात्म रमा डे थापणो, गीत गान करे सार ॥ ५ ॥ श्रधिको कांई जाणु नही,एहवु के देती जाम ॥ रतिसुदरी तव एम कहे, तेडो एदने थाम ॥ ५ ॥ ।। ढाल बही ॥ देवानद नरिंदनो रे जिन रंजना लाल ॥ ए देशी॥ ॥माया स्त्री तेडी दवे रे॥मनमोहना लाल ॥धावी करे परणाम रे ।। चित्त सोदना लाल ॥ दासीयें दीधे थासने रे ॥ म ॥ बेठी सुख धाराम रे ॥ चि॥१॥ उक्कर नाम जे पामबु रे ॥म॥ ते पामी हरपत रे ॥ वि०॥ रूप देखी विस्मय लही रे ॥म॥ कदर्पमय एकांत रे ॥ चि० ॥ ५ ॥ चातुर चित्तथी गोपवी रे ॥मा नवि परकाश विकार रे ॥ चिथावर करी रति सुदरी रे ॥ म ॥ पूरे कुशल खेम सार रे ॥ थि० ॥ ३॥रति सुदरी पूजे हवे रे ॥ मण॥ कहो तुम जेद स्वरूप रे ॥ वि०॥ बहेनी कोण तुम किदा रहो रे ॥म॥ किदां परस्यां धनुरूप रे॥ चि॥ ॥ सकल करो ते वारता रे ॥म ॥ ते करे सनिलो वात रे॥ वि०॥ राजकुमरी दु वालदी रे ॥ म०॥ परस्यो विद्याधर जात रे ॥ पि०॥ ५ ॥लीलायें दो

नवम खंम
रे॥
रहेतां थकां रे ॥ म ॥ देतो थढलक दान रे ॥ चि० ॥ मुनयं रतिसुख
नोगवे रे॥ म ॥ काढे काल थमान रे ॥ चि० ॥ ६ ॥ थावु तीरथ वां
दिने रे ॥ म० ॥ गयो मुज मूकी एथ रे।। चि० ॥व्य धणु मूकी करी
रे॥ म० ॥ नवि जाणु गया केथ रे ॥ चि० ॥ ७॥ पूर्व परदेशी हा रे ॥
म॥ वसतो यो एणे गेह रे ॥ चि ॥ तेह गयो तव धम्हें रहा रे ॥
म० ॥ मूकी मुज थति स्नेह रे ॥ चि॥ ॥व्य घणुं विलसुं तेणें रे ।।
म० ॥ मुखिणा बढु परिवार रे ॥ चि० ॥ शील पालुं थिर चित्तथी रे॥
म० ॥ वाट जो जरतार रे ॥ चि० ॥ ए ॥ वात सुगीरीजी घणु
म० ॥ साधर्मिमणी तस जाण रे ॥ चि० ॥ यापणे सखीपणुं जापजो
रे ॥ म ॥ नित्य थावतु एवं ताण रे ॥ चि० ॥ १०॥ कथा वातादिक
कदी तुमें रे ॥ म ॥ मुज मन करवो प्रमोद रे ॥ चि० ॥ माया स्त्री द
वे नित्य करे रे ॥ म० ॥ गमनागमन विनोद रे॥ चि० ॥ ११ ॥ निज
घर नररूपें रहे रे ॥ म ॥ देखी रूप लरूप रे ॥चि ॥ सनारे क्षण द
ण प्रत्ये रे ॥ म ॥ पडियो कदर्पकूप रे ॥ चि ॥ १५ ॥ पुरुषपणे प
रवश थयो रे । म || चितवे चित्त मजार रे ॥ चि॥ अहो एक वार
सगम लट्ठ रे ॥ म ॥ तो सुख पामु थपार रे ॥ चि॥१३॥ तेणे तस थ
रथी था करी रे॥म ॥ तस घर रहे चिर काल रे ॥
विविविध कला
कौतुक करी रे ॥ म० ॥रीजवे प्रेम विशाल रे ॥ चि० ॥ १४ ॥ धरम क
था पण बहु करे रे ॥म ॥ कामकथा विचें थाय रे ॥ चि ॥ जेम ते
म वश करे तेहनो रे ॥ म ॥ तेम करे जो थनिप्राय रे ॥ वि० ॥१५॥
क्षीर थाहारमा जेम दोचे रे ॥ म०॥ नेग कदन्ननो श्रश रे ॥ चि०॥ पण
पुरस्य पुष्टि करे घणी रे ॥ म० ॥ तेणे करती परगस रे ॥ चि॥ १६ ॥
हलुयें हलुयें वधारती रे ॥ म ॥ कामकथा श्रनिराम रे ॥ चि॥ जेम
जेम रुचि वधे तेदनी रे ॥म॥ तेम तेम करे कथा काम रे ॥चि० ॥१॥
जेम जेम प्रीतिवती या रे ।। म० ॥ रतिसुदरी धरी प्रेम रे ॥ वि० ॥ पर
वडे वचने तेहने रे ॥
मरीजवे तस मन तेम रे ॥ चि० ॥१॥ ही
नवमा खममा रे ॥ म०॥ पद्मविजय कही दाल रे ॥ चि॥ शीनवतीर
तिसुदरी रे॥म०॥ पामशे मगल माल रे ॥ चि० ॥ १ ॥ १७ ॥

३३६ जयानंद केवलीनो रास. ॥ था० ॥१॥ संनारतां तस साना रे, श्रीनय श्रौषधि वोध ॥ वि०॥ रूप करी नारी तणु रे, जावं वचित सिम । चिया ॥५०॥ एकरण दासीन कहे रे, तीरथें जायं काल ॥ चि०॥ गगनगामिनी विद्यापकी रे, जिनवर नमन नाल ॥ चि०॥था॥ २१ ॥ मुज सम रुप कला बळे रे, मधुरस्वरें करे हानावि० ॥ मूकी जाशु मुज प्रिया रे, सस्नेही इण पान ॥चि॥था ॥ २२ ॥ पगवधन पथे होये रे, तेणे नवि खेत सग चिo नित्य थावी तुमें तेहा रे, रमजो करजो रग॥ चि० ॥ बा० ॥ २३ ॥ पा चमी नवमा खममा रे, पद्मविजय कही ढाल ॥ चि० ॥ सोनलो श्रोता जन सवे रे, पागल वात रसाल ॥ चि॥था ॥ २४ ॥ १५३ ॥ ॥ दोहा॥ ॥ दासी हा कही घर गही,तेणे कस्यु नारी रूप॥श्रौषधि वल अति था करु, जास्यु न जाय सरूप ॥ १ ॥ निजथानक मधुरस्वरे, गावे गीत रसा ल ॥ दासी पण नित्य पावती, श्राप वचन सनाल ॥२॥ नित्य विनोद करे तेदणं, दिवसें गमावे काल ॥ जैनगीत रजनी समे, गावे गुण सुरसाल ॥३॥रीजि आहे ते सनिली, रतिसुंदरी धरी प्यार ॥ पूजे वासीने तवा, को ण ए गावे नार॥४॥ जरता परदेशे गयो,धनवती ए नार ॥ थाटम रमा हे श्रापणो, गीत गान करे सार ॥ ५ ॥ श्रधिको कां जाणु नही,एडवु के देती नाम ॥ रतिसुदरी तव एम कहे, तेडो एहनें थाम ॥ ६ ॥ ॥ ढाल बची ॥ देवानद नरिंदनो रे जिन रजना लाल ॥ ए देशी॥ ॥ माया स्त्री तेडी हवे रे॥मनमोहना लाल ॥धावी करे परणाम रे ।। चित्त सोहना लाल ॥ दासीयें दीघे वासने रे ॥ म०॥ बेठी सुख धाराम रे ॥ चि॥१॥ उक्कर गम जे पामवु रे म॥ ते पामी हरपत रे ॥ वि०॥ रूप देखी विस्मय लही रे ॥म ॥ कदर्पमय एकांत रे ॥ चि० ॥ ५ ॥ चातुर चित्तथी गोपवी रे ॥मानवि परकाश विकार रे ॥ चिथावर करी रति सुदरी रे ॥ म ॥ पूडे कुशल खेम सार रे ॥ चि०॥३॥ रति सुंदरी पूजे हवे रे ॥ म०॥ कदो तुम जेद स्वरूप रे॥ चि०॥ बहेनी कोण तुम किदा रहो रे ॥मा किहां परस्यां धनुरूप रे ॥ चि॥ ४ ॥ सकल करो ते वारता रे ॥ मातेकडे सनिलो वात रे ॥ वि०॥ राजकुमरी दु वालही रे ॥ म०॥ परस्यो विद्याधर नात रे ॥ चि०॥ ५ ॥ लीलायें शहाँ नवम खं ३३० रहेता थका रे ॥ म ॥ देतो घढलक दान रे ॥ चि० ॥ मुनगं रतिसुख जोगवे रे॥ म ॥ काढे काल श्रमान रे ॥ चि० ॥ ६ ॥ श्रावु तीरथ वां दिने रे । म ॥ गयो मुज मूकी एथ रे।। चि० ॥श्व्य धणुं मूकी करी रे॥ म० ॥ नवि जाणुं गया केय रे ॥ चि ॥ ७ ॥ पूर्व परदेशो इहां रे ॥ म० ॥ वसतो थो एणे गेह रे ॥ चि॥ तेह गयो तव थन्हें रह्या रे ॥ म० ॥ मूकी मुज थति स्नेह रे ॥ चि॥ ॥ इष्य घणु विलमु तेणे रे ।। म० ॥ मुखिणी बदु परिवार रे ॥ चि० ॥ शील पालुं थिर चित्तथी रे ॥ म० ॥ वाट जोन नरतार रे ॥ चि ॥ ए ॥ वात सुणीरीजी घणु रे ॥ म० ॥ सार्धामणी तस जाण रे ॥ चि० ॥ थापणे सखीपणुं जाणतो रे ॥ म० ॥ नित्य थाववु एवं नगणरे ॥ चि० ॥ १० ॥ कया वार्ताविक कही तुमें रे ॥ म ॥ मुज मन करवो प्रमोट रे ॥ चि० ॥ माया स्त्रीद वे नित्य करे रे॥ म०॥ गमनागमन विनोद रे ॥ चि० ॥ ११ ॥ निज घर नररूपें रहे रे ॥ म०॥ देखी रूप सरूप रे ॥ चि० ॥ सनारे क्षण छ । प्रत्ये रे ॥ म पडियो कदर्पकूप रे ॥ चि० ॥ १२ ॥ पुरुषपणे प रवश थयो रे ॥म ॥ चितवे चित्त मजार रे॥ चि ॥ श्रदो एक वार सगम लट्ठ रे ॥म ॥ तो सुख पामुं श्रपार रे ॥ चि॥१३॥ ते तस थ रथी था करी रे ॥म ॥ तस घर रहे चिर काल रे ॥ चि॥ विविध कला कौतुक करी रे ॥ म० ॥रीमवे प्रेम विशाल रे ॥ चि० ॥ १४ ॥ धरम क था पण बहु करे रे ॥ म ॥ कामकथा विचें थाय रे ॥ चि० ॥ जेमते म वश करे तेदनो रे ॥ म० ॥ तेम करे जो थनिप्राय रे ॥ चि० ॥१५॥ कीर थाहारमा जेम दोये रे ॥ म०॥ नेग कदन्ननो यश रे ॥ चि०॥ पण पुरस्य पुष्टि करे घणरे ॥म ॥ तेणे करती परशस रे ॥ चि ॥ १६ ॥ इलुयें हलुयें वधारती रे ॥ म० ॥ कामकया थनिराम रे ॥ चि॥ जेम जेम रुचि वधे तेदनी रे ॥मा तेम तेम करे कथा काम रे चि॥१॥ जेम जेम प्रीतिवती था रे ॥ म || रतिसुदरी धरी प्रेम रे ।। चि० ॥ पर वडे वचने तेहने रे । म ॥ रोजवे तप्त मन तेम रे ॥ चि० ॥ १७॥ वही नवमा खममा रे॥म०॥ पद्मविनय कही ढाल रे॥ चि०॥ शीलवतीर तिसुदररी रे॥ म॥ पामशे मगत माल रे ॥ चि० ॥ १९ ॥१७॥ ४३ २३७ जयानंद केवलीनो रास. ॥ दोहा॥ ॥ एक दिन का रिमी स्त्री कहे, यौवन फोकट जाय ॥ वनवाचीपर लोग विगुं,तुजने केम सोहाय ॥१॥ कामक्रीडा वन यौवनं,तरुणने नवन वन ॥ रूप नहीं तुज सारिखु, विश्वमा मोहे मन्न ।।२।। तुन तनु दीपशिखा परें, तरुणना त्दृदय पतंग ॥रमणिक सहन स्वनायथी, सघलो ताहारा धन ॥ ॥ सामग्री सवि पामीनें, सघली निन थाधान ॥ सफली ते कम नषि करे, रहे जेम खिणी दोन ॥ ॥ सफली पतिसगे होये, तस नवि मालि म काय ॥ खबर न जीवे के मूड, तेणें पति नविन कराय ॥ ५ ॥ यत ॥ नष्टे मृते प्रवनिते, क्लिवे च पतिते पती॥ पचस्वापरसु नारीणां, पतिरन्योकि धीयते ॥ १ ॥ एहवा शास्त्रनां वचनथी,थपयश पण नवि थाय ॥ कुलस्त्री में दूपण नही, तुजयी गनु न काय ॥६॥ वली गणिकानी तु मुता,तुजनें बाधा न कोय ॥ नवो नरता तेणें कोनीय, शु बहु कीधे होय ॥ ४ ॥ ॥ ढाल सातमी ॥ रामपुरा वाजारमा । ए देशी ॥ ॥ एहवां वयण सुणी करी, पीहा सही चित्त थत्यंत मेरे लाल, स्वय शस्त्रे जेम कापी, तेदने धिक्कार करत मे० ॥१॥ सतीरे शिरोमणि एम लहो ॥ ए थांकणी ॥ माया स्त्री तव वोलती, में ताहरी परीक्षा काम मे ॥ सतीपणु तुज निरखवा, दु बोली तुजने थाम मे ॥ स० ॥१॥ इ तादरी उशमन नहीं, मुज वचनें ठपनो खेद मे० ॥ सखीपणा थी ते खमो, द समजी तुमचो नेद मे० ॥ स॥२॥ एहवे मधुरे वयणमी, रतिसुदरीने करी शांत मे ॥ रतिसुदरी पण खामती, वली तिमहिन था निघ्रांत मे० ॥ स ॥ ४ ॥ पूर्वपरें वली गावती, कहेती पुस्यना बाख्यान मे॥ विच विचं काम कथा करे,वली कामना करे गीत गान मेगासणा ॥ ५॥ निजमदिर नररूपथी, राणी चिच सरल स्वनाव मे० ॥ श्रावर्जन करवा नणी, उजमाल थयो सही दाव मे ॥ स ॥६॥यपूरव वस्तु मोकले, वली मोहनना गीत गाय मे ॥ कामें अंतर पीडीयो,धर्मबुद्धिना न ते जाय मे स॥॥अंग बबी श्यामल थइ, रतिसुदरीने नित्य ध्या य मे ॥ नूख तरप गई वेगली, स्वामि शोह पण न गणाय मे॥स॥ ॥ ७ ॥ निश नावे रातिमा, राणीनो वाजे योग मे ॥ थाय उपाय घ णा करे, पण न मले तेदj नोग मे ॥ ॥ए ॥ किमहीक थाकार नवम खंम. ३३ए थंगिते, रतिसुंदरी समजी चित्त मे ॥ गुम हदयथी चितवे,एतो थाये के बल नित्य मे ॥ स० ॥१०॥ ए स्त्री जेहवु गाय ठे, गातो नर पूर्व एम मे० 0 ॥ पाडोशी रदेतो थको, ए वात दशे कहो केम मे ॥ स ॥११॥ मुज देखी एहनें वधे, थंगें केम कामविकार मे० ॥ स्वर गति चेटा थंग नी,लक्षण पण नर थाकार मे ॥सण॥ १२॥ नारी रूपें एद देखीये, पण नारी नहीं निरधार मे ॥ कांक कारक पामीने, थयो पुरुप ते मायाना र मे० ॥ स ॥ १३ ॥ उराचारी को देखीयें, कामातुर पुरुप निदान मे ॥ करवा शीलनी खंमना, 'थाव्यो मुज करतो तान मे॥स ॥१४॥ एहवे याचार करी, थपराधी माहारो एह मे ॥ निग्रह करवो एदनो, में अवसर पामी तेह मे ॥ स ॥१५॥ सतिय शिरोमणि एणी परें, चित्तमांद धारी विचार मे० ॥ तेहथु वात विनोदनी, करे पूरव परें ते उ वार मे ॥ स० ॥ १६॥ एक दिन तेदश्य गोठडी, करता थालाप सलाप मे ॥ लाज मूकीने बोलती, शणगार रसें चित्त पाप मे ॥ स ॥१॥ कामकथा विस्तारती, उत्तम मारग करी दूर मे ॥ सांजली वाह्यथी रीज ती, रतिसुदरी थापद पूर मे० ॥ स० ॥ १७ ॥ कहे रे सखी मुजने वाल ही, मोती लागे तुन वाण मे० ॥ तुज वयणे मुज चित्त चल्युं, रतिमुख जोगवु सुख खाण मे० ॥ स० ॥१॥ पण तु जे खायें, लालच मीठा इनी होय मे॥ करीयें यकारय पण तथा, तेहवो सयोग मले कोय मे० स॥ २० ॥तेदवो तरुण कोइ नर मले, गुणवत थनुत थाकार मे० ॥ पंमित सर्व कलानिधि,लक्षणने रूप नमारमे॥स॥२१॥प्राण दीये प्रियाने वती, एडवो घरे प्रेम विशाल मे । एदवो जरता कीजीयें, रमीय वली रंग रसाल मे ॥ स० ॥२॥ सातमी नवमा खममा, कदी पद्मविजय वर दाल मे ॥ राखे शील केणी परें, ते सांजलो वात रसालामेणासार॥ ॥ दोहा ॥ ।। रतिसुदरीनां वयण ते, सांजली दर्प न माय ॥ माया स्त्री कहे सोनलो, उत्तम कदु उपाय ॥ १ ॥ रूप कलाथोथागलो, माहारो जरतार ॥ रूपें पुरंदर सारिखो, धनद परें दातार ॥ २ ॥ स्नेद धरे तुज उपरें,तेहो तमारी पास ।। श्ठा पूरण कीजीयें, वेहुनी फलशे श्राश ॥शायत ॥ पतिव्रता सदा पत्यु, रनुकूला स्थिराशया॥ प्रियमेवाचरत्यूच, रुचरते च चारुता॥१॥दोहा।। - ३४० जयानंद केवलीनो रास. पतिव्रता पणे मुजने, शोकनीयरुचि न थाय ॥ तेणें तुज जेवो होप ते प्रम ट करो थनिमाय ॥४॥ जे ने मुजपति मोकनु, राणी बोले ताम ।। सर्वसिंग ना सारिख, जिहां नही प्राप्ति दाम ॥ ५॥ ॥ ढाल थामी वेडो नांजी।ए देशी॥ ॥ मुज जरतारने धन ते वदुञ्ज, जोइये ते तमे मागो । नोग सामयी जन मा जोता, नाये कोडीमे नागो ॥ १ ॥ जूथो तुम ख्यालो, सतीयानो प्रपंच, सुणीने चित्त परखालोएम जाणी तुमे नवि जीव के शील ते पालोटनहो न रनव तुमें पामीने जुयालो ॥ ए यांकणी ॥ मोकलु जे मागो ते तुमनें, नोग लान वली थाशे । कामपीडा मुज पतिनी टलगे, बेहुनां 5 खडा जा शे ॥ ॥ २॥ राणी कहे जो देवा शक्ति,तो थापो धन कोडी । जो वि श्वास न श्रावे तुमने,तो दीयो मुज थईकोडि ॥ जूण् ॥ ३ ॥ थर्षकोडी थावे तव लावे, सांगली प्रमुदित थाय ॥अगीकार करीने निज घर, माया स्त्री दवे जाय ।। जू० ॥ ४ ॥कामवशे करी कार न देखे, रात दिवस जे ब ध ॥ अंधयकी कामांध ते थधिको, नावे शीलनो गध ॥ ज० ॥ ५॥ यत विवा पश्यति नो घूक ,काकोनक्त न पश्यतिथिपूर्व कोपि कामांधो, विवा नक्त न पश्यति ॥ १ ॥ पूर्वढाल ॥थई कोडी निज दासी दाणे, मोकल्यु प्रव दिन ॥ सकेतित दिवसें नररूपें, थर्ड कोही लइ धन्न ॥ जू० ॥ ६ ॥ रतन गांउडी लेई उनो, राणीने दरवारमणि कचन थानूषण पहेरी, वली बह करी शणगार॥जू० ॥४॥ वस्त्रादिकनो थाहबर बडु, देखे किंकरी जाम ॥ज ने सनलावे राणीने, वासी दोडी ताम ॥ जूण् ॥ ॥ बारमाहे तेही वे सायो, चित्रशालामांहे तेह ॥ थईकोडी दासीने दाये, वली मोकलतो जे द ॥ ० ॥ ॥ पूर्व पडेना नेला करती, रतिसुदरी ते राण॥ तेजवत बडु रत्न देखीने, चित्तमा चितवे शाणी ॥ जू ॥१०॥ दर्ष लहे विस्मय काय पामी, त्रास रहित ते देखी ॥ श्रदो थपूरव एह रतन बे, पूरव समान गवे षी॥ जू० ॥११॥ मुज जरतारनां रज सरिखां, वृत्तादिक आकार ॥ रक्ता दिक वर्णे वली तेदनो, दीसे में विस्तार ॥ जू० ॥१॥ मार्नु सूर्यममलयी थायां, स्निग्धादिक गुणसार ॥ सख्यातित स्वामि घर दीना, तेहिज ए निरपा र ॥ जू०॥ १२॥ जाणु मुज पतियें मोकलीयो, बङ थापीने रम ॥ मुज देखी चलचित्त थयो ए, तेरों ए फरतो पन ॥ जू० ॥ १५ ॥ जर्मति सा नवम खंम. ३४२ मिशेही पातकी, नरकनो जावण दार ॥ पण मूरख नवि जाणे एटलु, श्रगम्य होये सति नार ॥ ॥ १५॥ तेहमां पण नवि सादामुंजोयें,जे होयें नृपनी राणी ॥ तास गमननी वात तो दूरे, जे माता सम नाणी ॥ ॥ जु० ॥१६॥ यत ॥राजपत्नी गुरो पत्नी, पत्नीच मुहृदस्तथा ॥ पत्नीमा ता स्वमाता च, पंचैता मातर स्मृता ॥२॥ पूर्वढाल ॥ त्रिविध सती उपर ए माया, करतो पण ठवेखु ॥ पण पुरुपाधम निजस्वामिनो, शेहीपणे ए देख ॥ जू० ॥ १७ ॥ थम दपतिनो ए थपराधी, नवि करीयें विशवास ॥ निर्लज इट वुदि सकपायी, वोले मरपा नाप ॥ जू० ॥ १७ ॥ यत ॥थ तईष्टधिय पापा , कृपामुक्तागतत्रपा ॥सततं कोपना केपि,व्रतलोपेप्यनीरव ॥१॥गर्ता शुकरवन्नित्य, नि शूका कामलालसा ॥सकषायामृपावाद, वि पुरा समरोदरा ॥२॥ व्यंसकाव्यसनव्यास,रसिकाविकथारसा ॥ विरसा शुद्ध धर्मेपु, निर्गुणा स्वार्थवनना ॥शालुब्धा लुब्धा शा कुग ,परोपकतिकर्म॥ मुराचाराचाच प्रपंचपटवस्त्रियां ॥ ४ ॥ इत्याद्यशेपउदोप, उर्दशादूषिता त्मनां ॥धमाधमशीलाना, मपि नो सगति शुना ॥५॥ ढाल पूर्वती ॥ध में वर्जित काम अधरा, सती सरूप न जाणे ॥ प्राणांतें पण शाल न लोपे, महासती जेह वखाणे ॥ जू० ॥१॥ फरस न सहे को थन्य पुरुपनो, जे म श्रमिनी ज्वाला ॥ श्रसतिपणु नवि तेह थाचरे, मरण करे पण वाला ॥ ॥ जूण् ॥ २० ॥ कुलस्त्री स्वपर्ने पण निज मेलु, शील न करे को कालें। कुलने रतन दीपपरें रूडी, तेह सती थथाले ॥ जू० ॥ २१ ॥ वलात्कार थी नर सुरपति पण,शीत सतीन न लोपे ॥ जो लोपवा जाये तो तेदने,वा ली नस्म करे कोपें ॥ जू० ॥ २२ ॥ केशरीखध केश थहिमस्तक, मणि वाघण पय जाणणे ॥ चमरी पूल सेवा कोण समरथ, जो पण दोये अति शाणो ॥ जू०॥३॥ जीवतां शील सतीनु न नागे, तेरो ए मूरख माथे । शील माणिक मुज दरवा थाव्यो, सतिशिरोमणि सार्थे । जु० ॥ २५ ॥ धन्य ए रतिसुदरी शोलवती, नाम दीधे थप जाय ॥ नवमे खमें थामी ढालें, पद्मविनय गवराय ॥ जू० ॥ २५॥ सर्वगाथा ॥ १३ ॥ ॥ दोहा॥ ॥ लकुट प्रदार विना नही, शुक्ष वाजरी ज्वार ॥ तेम शिक्षा विण न वि रहे, घरमा जे दोयें नारि॥ १ ॥ मूर्ख चपेटा विण नही, सहेजें पाध ३४२ जयानंद केवलीनो रास. रो होय ॥ तेम शिक्षा देवी खरी, एदमा पाप न कोय ॥२॥ जेम जमा ननु फल तहे, एणी परें करी विचार ।। वासीने तेडी कहे, सानन मुख प्रकार ॥ ३ ॥ सुपनें पण चाड नदी, ए पापीनो सग ॥ पेतवा दीपो भत्र धारमा, ते पण वित्त प्रसग ॥४॥ जश्कदो श्रमची स्वामिनी, स्नान करी शणगार ॥ था तैयार वोलावशे, जाणो हृदय मकार ॥ ५ ॥ ए मसिमन पल्पक ठे, रति सुदरीयें दोध ॥ तिहां लगे रहो तुमे यहां करें, जाणो वठित सि ॥६॥ ॥ दास नवमी॥ प्यारे मोक ले चलो ॥ए देशी॥ ॥ रतिसुंदरी मोकन्यु, ल्यो ए सुगधी तबोल दो ॥ नाना इबई में तीयो, मुख थाये रंगचोल हो ॥ १ ॥ प्यारे तोकु ले चलु, से चलुगी मुज साथ हो ॥प्या॥ ए थांकणी ॥ इत्यादिक वचने करी, उपजावी सुखशात हो । मुज पासें थावो तुम्हें, नाखो मुज अवदात हो ॥ प्या०॥शा ते करी थावी सवे कत्यु, पण तंवोलमा ताम दो ॥ तरप लागे घणी जेहथी, ए दवा व्य थनिराम दो ॥ प्या० ॥३॥ सुखमा रहे रतिसुदरी, पल्यंक छ पर खास दो ॥ शूरदत्तनी सेवा करे, दासीयो विनय विलास हो ॥प्या ॥ ॥ यह उपचार करे वली, पाद पखाले तास हो ॥ मणिपयक रुडी तूलिका, शयन करे सुखवास हो ॥ प्या० ॥ ५ ॥ स्वर्गनां सुख जोगवु थबु, एम माने मनाहि हो ॥ देवांगना सम दासियो, देखी मन सहा दि दो ॥ प्या० ॥६॥ कथा वारता करता थका, उपजे अतर प्रीति हो। सर्वस्वादथी शिरोमणि, तंबोलनी नली रीति हो ॥ प्या० ॥ ॥ वारंवा र बास्वादता, विषय तृष्णपरें तास हो ॥ तंबोजना परजावधी, लागी तिय पिपास दो ॥ प्या॥ ॥ पाणी मागे ते हवे, दासीयो ग घरमांडे दो ॥ निज स्वामिनीने वीनवे, स्वामी तरष अथाह हो ॥ प्या ॥ ५ ॥ स्वामिनी कड़े सुणो किंकरी,मदकारी सुरा सार दो॥थापणा घरमा तैयार बे, इध्य धनेक प्रकार दो॥ प्या० ॥१०॥वासितने महा पराक्रमी, स्वाववत घणु तेद हो ॥ शाकर शाख जलथी घणु, मधुरपणानो गेह हो ॥ प्या० ॥ ११॥ शीतल निर्मल तेह , इव्य सुगध सुवास हो॥ जल थानकें पाठ तुमें, वात म करशो तास हो । प्या० ॥१५॥ स्वामिनी या णा शिरें-करे, स्वाह जल चमकार दो। पातेणें वधतो पयो, काम शश नवम खंग ३४३ नो विकार हो ॥ प्या० ॥१॥ लोचन मीचाइ गयां, बासव नीरनो नेद हो ॥ कनक जाजनें समज्यो नही, वलीय पिपासानो खेद हो ॥प्या॥ ॥ १॥ पान करी सूतो ढोलीये, पापी मन थाराम हो ॥णमां घूमायो घणु, शब परें पडीयो नाम हो ॥ प्या० ॥ १५॥ नवि दाले चाले किमे, साप मश्यो होये जेम दो ॥ मूर्घाणो पीडा लहे, मानु जमें दीगो नेम हो ॥ प्याज ॥ १६ ॥ दी निशानी वेहेनडी, थावी नि ताम दो॥ मृतक स मोजाणी करी,शका रहित थ जाम हो ।प्या॥१॥ शोधे श्रग शूरदत्तनु, देखे तव शिरमाहे हो ॥ वेणीमांहे गोपवी निके, औपधि दीठी त्यांदि दो ॥ प्या० ॥ १७ ॥ वर्षथी वासीयो लेऽनें, थावे स्वामिनी पास हो। थापे रतिसुंदरी करें, ते पण लहे चबास दो ॥ प्या० ॥ १५ ॥ जो जोइनें । लखी, विस्मय पामी चित्त हो । ववनकमल विकस्वर ययु, हवयें धरे जे म वित्त हो ॥ प्या ॥ ५० ॥ विष्य औषधि ए पति तणी, महाप्रनावमु धा म हो ॥ माया मदिर मादरी, मातनें शिक्षा काम दो प्या॥ २१ ॥ मु जपतियें शूकरी करी, ते एहनें परनाव हो ॥ लांबी पोहोली पण तेहवी, वर्ण प्रमुख सवि नाव हो ॥ प्या॥ १२॥ निश्चय दुतेदज लहु, नहींतो ए उराचार दो ॥ नारि रूप ए केम करे, उष्ट धाशय निरधार हो ।प्या॥ ॥ २३ ॥ परनर नवि पेशी शके, कोई मुज श्रावास हो ॥ तिहां ए थाध्यो पापीयो, औपधि धरी निज पास हो ॥ प्या० ॥ २४ ॥ केम एदनें कर ए चढा,विस्मय लट्ठ बद्नु एह दो ॥ श्रथवा स्वामीयें दीधली, जाणj था गज तेद दो ॥ प्या० ॥ २५॥ नवमी नवमा खममा, पद्मविजय कदी ढा ल दोशीलें मनवनित फले, शीलें मगल माल हो ॥ प्या० ॥२६॥२०॥ ॥दोहा॥ ॥ जेम कहेj तेम नाखशे,बीजो नांदि विचार ॥ पण थोपघि परनाव थी, करु मर्कट थाकार ॥ १ ॥ पाहीक देखाडी नली परें, शिक्षा देश सार॥ रतिसुदरीयें चित्तमा,एद कसो निरधार ॥२॥दासीने परशसतो,नक्षु की धु तें काम ॥ थापी थोपधि लावीने, एद पासेंथी धाम ॥२॥ धन्य पुण्य विनीत तुमें, कीधा गुणनी जाण ॥ नुमें स्वामिनी नगति घणु,केतां करु वखाण ॥ ४॥ उपजाप्यो थानद वगु, वयण कही रसाल ।। सूता मुख निश थकी, राति गमाव्यो काल ॥ ५॥ब्राह्म मुहूर्त उठी करी, थावश्यक ३४४ जयानंद केवलीनो रास. दोय प्रकार ॥ करीने चेटीने कहे,जावो ए गेह मजार ॥॥ ते पण लावीत तक्षणे, उगढी तेणी वार ॥ जवनी अंतर पोते रही,बोले वयण दारात ॥ ढाल दशमी ॥ पारधीयानी ढाल स्वामी स्वपप्रन सुंदरुरे ॥ ए देशी । ॥ कामें थध प्रमादीयो रे, दरप लहे थत्यंत रे ।। परवसीयो । मुजनें राणी मती दवे रे, एम घूर्णित राचत रे ॥ सुपरसीयो ॥ १ ॥ औषधी शि र थापी करी रे, मर्कट कीयो तास रे ॥ १० ॥ लोह सांकन दासी कनेंरे, मगावे सुविलास रे ॥ सु० ॥ २॥ परस्त्री संपटनें गले रे. घाती जकडपो तेह रे ॥ ५० ॥ माया खरी पापीलही रे,यावी कोपनें गेह रे ॥१॥३॥ वारवार सनारती रे, त्राडना करे थपार रे ॥ ५० ॥ नित्य नचावे तेहनें रे, वचन कहे तेणी वार रे ॥ सु० ॥ ४ ॥ थमिमा नाखु तुजने रे, रे पापिशिरवार रे ॥पणा दासी पास बीहिवरावती रे, नित्य प्रत्ये वारंवार रे ॥सु० ॥५॥ स्वामी कोही पापीया रे, रे धर्मद उराचार रे ॥१०॥ परस्त्रीनी श्वा तणु रे, फल जोगव ए लगार रे ।। मु० ॥ ६ ॥ शेहमा स्वामी को हनु रे, पापनु फल कहे कोण रे ॥ १० ॥ वली परस्त्रीना जोगनी रे, वामां नही कण रे ॥ सु०॥ ॥ तास विपाक फल कोण कहे रे,सम रथ वली वाचाल रे ॥पा विपय थाशा पासें नडघा रे, ख पामे थसरा ल रे ॥ सु० ॥ ७ ॥ जनम थनत मरण लहे रे, नरकादिक लहे प्राय रे ॥ ५० ॥ तेहना छ व केवली लदे रे, पण मुखथी न कहाय रे ॥ सु॥ ॥॥ यत ॥ सन्न कामा विष कामा , कामा थातिविषोवमा ॥कामा पछे माणा, थकामा जति जग्गा ॥१॥ पूर्वढाल ॥ विपर्ने विषयमा अंतरो रे, जाख्यो ने थति जेण रे॥4॥ एक वार मारे खाधु थक रे,एक सनारे ते ण रे ॥ सु० ॥१०॥ यत । विषस्य विषयस्यैव, दूरमत्यंतमतर ॥ उपयुक्तवि पति, विषया स्मरणादपि ॥१॥ पूर्वढाल ॥ निजपरस्त्री वांडा हवे रे, जो सुख चाहे श्रग रे ॥१०॥ नहीं तो इद नव परनवें रे, सुख पामीश एकग रे ॥ १० ॥११॥ इत्यादिक उपदेशथी रे, हित करती थविशेष रे ॥ ५० ॥ स ऊन पीडया रस दीये रे, शोलडी परें सुविशेष रे॥ मु० ॥१२॥सानला रा णी देशना रे, गर्दित निज थाचार रे॥॥ निज थातम बहु शोचतो रे, निदा करे थपार रे ॥१०॥१३॥मार खाये थांसु जरे रे, दोन वदनें क हे वात रे ॥ ५० ॥ में तुज गुनदो बहु कसो रे, मूक मूक हवे मात रे॥ .

नवम खंम. ५ ३४५ ॥सु० ॥ १४ ॥ राणी कदे 5 खमा पडयो रे, बोले दमण एम रे ॥१०॥ पण ते पापनां फल कहो रे, बूटक बारो केम रे।मु० ॥१५॥ सहेवु उख नरकादिके रे, नव थनंत लगें प्राय रे ॥१॥ पाप हानी वानगी रे,एवं नव तुजनें थाय रे ॥ १०॥ १६ ॥ जेहवु बाध्यु तेदवु रे,नोगवीयें निर धार रे ॥ ॥ धान्य वावीये जेहवु रे, लणीये तेद प्रकार रे ॥१०॥१७॥ कोई जोगवायें सवे रे, शुज के थान जे कर्म रे ॥पण॥ विण नोगवे नवि ठूटी रे, ए जिनशासन मर्म रे ॥ सु॥१७॥ ॥ परशास्त्रपि यत ॥ कृतक मक्ष्योनास्ति, कल्पकोटिशतैरपि ॥थवश्यमेव जोक्तव्यं, कृतं कर्म शुनाशुन॥ ॥ पूर्वढाल ॥ वारंवार एम सनिली रे, राणीनो उपदेश रे ।प० ॥ मारने बीहीक वली सही रे, पाम्यो वोघ विशेप रे ॥ सु० ॥ १५ ॥ जर्मन मूकी ने दवे रे, हीन वदननें नयण रे ॥१०॥ विनयथकी चेष्टा करी रे, पद प्र एमे अधोवयण रे ॥ सु० ॥२०॥ फरी फरीने ते खमावतो रे, परस्त्री निय मकरंत रे ॥प० ॥थगित थाकारें करी रे, राणी तेह तहत रे ॥ सु०॥ ॥ २१ ॥ सरल दयावती घणी रे, सतिय शिरोमणि तेह रे ॥ ५० ॥ मूकावे दासी कनें रे, बंध सांकल दृढ जेह रे ॥ सु० ॥२॥ पूर्वरुप नर कीधलो रे, यौपधी ने सार रे ॥ पणा जीवतो पण थण जीवतो रे, थप अन्न दीये थाहार रे । सु० ॥ २३ ॥ दशमी नवमा खममा रे,पद्मविजय कही ढाल रेपणा पुर्जन सहन सगथी रे, पामे मगलमाल रे ॥ सु॥२४॥३०॥ ॥ दोहा॥ । एकदिन राणी तेहनें, दासी पासें तास ॥ दृढवधन बधावीने,अगनि सावी पास ॥ १ ॥लोद शिली कन्ही करी, श्रीजयानंदनी दास ।। नाम लिखावे नालमा, पामे 5 खनी राशि ॥२॥ नित्र वली बहु परें, कहुई सह वाणि ॥ यशुनना फल सनलावीने, निश्चल करे सुजाण ॥ ३ ॥ पर स्त्री नियम ते धापीने, मूक्यो ते नर नाम ।। वध गेडी स्वस्थन करी, प रियची नारखी ताम ॥ ॥ परनर मुख जोवु नही, परिथचि अतरें तेह।। वेसारी पूठे इस्यु, तु कोण थाष्यो केद ॥ ५॥ किहांनो वासी किहां थकी, श्यो कारय उद्देश ॥ सानु कहे धुरथी सवे, केम कीधो एम वेश ।। ६ ।। m ३४४ जयानंद केवलीनो रास. दोय प्रकार ।। करीने चेटोने कहे,लायो ए गेह मकार ॥६॥ ते पण सावीत तहणे, उगढी तेणी वार ॥ जवनी अंतर पोते रही,बोले वयण सदारा।। ॥ ढाल दशमी ॥ पारधीयानी ढाल सामी स्वपप्रन सुंदरु रे ॥ ए देशी ॥ कामें थध प्रमादीयो रे, दरप लहे थत्पत रे ॥ परवसीयो । मुजनें राणी मला हवे रे, एम घूर्णित राचत रे ॥ सुखरसीयो ॥ १॥ श्रौषधी शि र थापी करी रे, मर्कट कीचो तास रे ।। १० । लोह सांकल दासी कनेंरे, मगावे सुविलास रे । सु० ॥ २॥ परस्त्री लपटनें गले रे, घाली फकरपो तेह रे ॥ १० ॥ माया खरी पापीलही रे,यावी कोपनें गेह रे ॥३॥ वारवार सनारती रे, बाडना करे अपार रे ॥ ५० ॥ नित्य नचावे तेहने रे, वचन कहे तेणी वार रे ॥ सु० ॥ ४ ॥ थनिमा नाखु तुजने रे, रे पापिशिरदार रे ॥१०॥ दासी पासें बीदिवरावती रे, नित्य प्रत्ये वारवार रे ॥सु ॥५॥ स्वामी दी पापीया रे, रे धर्मद उराचार रे ॥१०॥ परस्त्रीनी इवा तणु रे, फल नोगव ए लगार रे ।। मु०॥ ६ ॥ शेहमा स्वामी हो दनु रे, पापनु फल कहे कोण रे ॥ ५० ॥ वली परस्त्रीना जोगनी रे, वामां नही कण रे ॥ सु०॥ ७ ॥ तास विपाक फल कोण कहे रे,सम रथ वली वाचाल रे ॥१०॥ विपय थाशा पासें नडया रे, ख पामे घसरा ज रे ॥ सु० ॥ ७ ॥ जनम धनत मरण लहे रे, नरकादिक लहे प्राय रे ॥ ५० ॥ तेहनां सुख केवली लदे रे, पण मुखथी न कहाय रे ॥ सु॥ ॥ यत ॥ सन्न कामा विष कामा , कामा थातिविषोवमा ॥कामा पछे माणा, थ कांमा जति पुग्ग ॥१॥ पूर्वढाल ॥ विपर्ने विषयमा अंतरो रे, जाख्यो ने थति जेण रे॥4॥ एक वार मारे खाधु थकुं रे,एक सनारे ते ण रे ॥ सु० ॥१०॥ यत ॥ विषस्य विषयस्यैव, दूरमत्यंतमतरं ॥ उपयुक्तवि पं देति, विषया स्मरणादपि ॥१॥ पूर्वढाल निजपरस्त्री वांडा हवे रे, जो मुख चाहे श्रग रे ॥१०॥ नहीं तो श्द नव परनवें रे, 5 ख पामीश एकग रे ॥ सु० ॥११॥ इत्याविक उपदेशथी रे, दित करतीथविशेष रे ॥१०॥स ऊन पीडघा रस दीये रे, शोलडी परें मुविज्ञोप रे ॥ १० ॥१२॥ सानलारा पी वेशना रे, गर्हित निज थाचार रे॥१॥ निज थातम बटु शोचतो रे, निवा करे थपार रे ॥४०॥१३॥मार खाये यांसु जरे रे, दोन वदनें क दे वात रे ॥५०॥ में तुज गुनहो बद्ध कस्यो रे, मूक मूक दवे मात रे॥

नवम खंम. ३४७ न पलो रे॥ मो० ॥१६॥ नवि पालाप संगति करुं रे, न करूं वली श णगार रे ॥ तांबूलादिक नवि लेउ रे, नवि करु स्निग्ध थाहार रे ॥मो० ॥ १७ ॥ नख पण नवि सेवरावीये रे, फूलमालनें स्नान रे ॥ यूपनें थं गराग वली रे, तनीयां करी थपमान रे । मो० ॥ १७ ॥ प्रोषितप्रिय स तीया तणो रे, पालुं सवि थाचार रे ॥ काम शतोपण कपनें रे, नवि पर पुरुपनो चार रे॥ मो० ॥ १ए ॥ थान लगी पर पुरुपनो रे,नवि दीधो प रवेश रे ॥ तुज साथे केम श्रावीयें रे, ए शवधार विशेष रे । मो॥२०॥ एकासन केम वेशीय रे, तेरों ज मुजपति पासें रे ॥ तुमचा साथ विना न ही रे, थावग्यं एम प्रकाशे रे ॥ मो० ॥ २१ ॥ नवमा खममा एकही रे, थगीयारमी ए ढाल रे॥मीती सरस सुधा समोरे, पद्मविजय सुरसाल रे॥ ॥ मो० ॥ २२॥ सर्वगाथा ॥ ३२ ॥ ॥ दोहा॥ । कहेजे स्वामिने जइ,जे कटु वचन प्रकार ॥तुमें पुण्यवता रानीया, सो नागी शिरदार ॥१॥ रूपवती सहसो गमे, गम गम लह्या नार ।। तेदनी प्रीति पटतरें, मुज नवि देखो किवार ॥ २॥ पण तुम दर्शन वाढती, उर्घ ट पामु केम ॥ हु तुमने ध्यान सदा, तुम न संनारो प्रेम ॥३॥ पण हुँ र ति तुमें स्मर अठो, तुम थायत मुज प्राण ॥ वेचाथी लीधी तुमें, तेदन न करो त्राण ॥ ४ ॥ करवो प्रसाट तो वेगलो, चिता पण तजी मुज ॥ कोण बागल कहीयें कहो, स्वामी मूकी तुज ॥ ५ ॥ ॥ ढाल बारमी॥ नराणानी ।। जेम मधुकर मन मालती रे॥ ए देशी॥ ॥बहु नारीना प्रेमथी रे, संध्यु ठे तुम चित्त रे॥राजननी॥ तिहां एक को रे माहरो रे, द्यो अवकाश ते नित्य रे ॥ राननजी ॥१॥ तुम विण थवरj ना रमुगी ॥ एयांकणी ॥ इश्यिमा मन मोटकु रे, तेहनो करी थपदार रे ॥रा ॥ केम मूकी मुज एकत्ली रे, माहारे तुमें थाधार रे ॥ रा ॥ तु०॥ ॥२॥ करुणानिधि चिता करो रे, शरणागत मुज स्वामि रे ॥रा० ॥ र विप्रना परें चचड़िका रे, देहगाया जेम नाम रे ॥रातु ॥ ३ ॥ मुन ठ पर प्रसन्न थरे, तेडवा मोकल्यो जेम रे ॥रा० ॥ माहरी वात जे में क ही रे, कहे जे सनारी तेम रे । रा०॥ तु० ॥ ४ ॥ वली मुज न नी तुमें रे, जाणो यथारथ वात रे । रा० ॥ तुम मुज मन दरखाववा रे, नारखो ३४६ जयानंद केवलीनो रास ॥ ढाल थगीधारमी । जंवू कुमर वैरागीयो रे, मात पिता प्रतें नासे रे॥ ए वेशी॥ ॥ एह प्रश्ने मन हरपतो रे कतारथ निज माने रे ॥ वात पपारप दाखवु रे, सोनलो थिर थइ कानें रे॥१॥ मोरी मातजी रे, सोनलो वात हमारी रे ॥ तुम वातजी रे,अमृतथी अतिप्यारी रे ॥ ए श्रांकणी ॥ विज यपुरे पुरवर समो रे, श्रीविनयराननो पूत रे । रायसहस्र से विनतो रे, वे वता जेम पुरुहूत रे ॥ मो० ॥ २॥ श्रीश्रीजयानद नरपति रे, सूर्य थपूर व सरिखो रे ॥ मृगकरथी विकश्वर करे रे, कमलाकर चित्र परखो रे ॥ ॥ मो० ॥ ३ ॥ छत्री सुत छ तेहनो रे, सुरदत्त मुन नाम रे ॥ सेवक तु मुखीयो सदा रे, परम विश्वासनु नाम रे ॥ मो० ॥ापासे वसीयो तेणें फरी रे, नाणु सद्ध थवदातो रे ॥ राज्य धानी लखमी पुरें रे, करता जग त विख्यातो रे ॥मोणा॥ दिव्य पल्यंक मुज थापियो रे, खग परें नाम था काश रे। तुमने तेडवा मूकीयो रे, रत्न दोघां बह खासो रे ॥ मो॥ ६ ॥ थाव्यो इहां तुम परखवा रे, पासें तीधु गेह रे ॥ वली मुज थापी घोष धी रे, दिव्य प्रनावनी गेदरे ॥ मोण ॥ ॥ विलसु ते धनथी घणो रे, हित देवं दान रे ॥ स्त्री रूपें तुज महासती रें, दर्शन पाम्यो प्रधान रे ॥ ॥ मो० ॥ ॥ जीते रतिरंना सिरि रे, रूप थनोपम तुला रे ॥ देखी बना ग्यना योगथी रे, चपल चित्त थयु मुह रे ॥ मो० ॥ ॥ एद विटंबणा पामीयो रे, ते मदारो सवि वांक रे॥ सदस्यो मुन किरपा करी रे, स्वामि नी हु अति रोक रे ॥ मो० ॥१०॥ परस्त्री नियम तुमें दीयो रे, कीधो मु ज उपकार रे ॥ पुण्य मारग देखाडीने रे,कीयो मुक्त महार रे ॥ मो० ॥ ॥ ११ ॥ लखमीपुर वर राजीयो रे, श्रीजयानद रानान रे ॥ तुम पति ३ 'छे तुम बढ़ रे, करे तुम थागम ध्यान रे ॥ मो० ॥१२॥ जवनी थतरें राणी कहे रे, ताहारु सादस नारी रे ॥ मुज साय जे श्वतो रे, सगम जे परनारी रे ॥ मो० ॥ १३ ॥ पण परनरना परसने रे, नवि इछे शीलवती रे ॥ तेणे ते नियम ग्रहं थडे रे, मत मूकजे करी वतीरे ॥ मो० ॥ १३॥ परनारी बांधव जिके रे, ते सदाचारी कहीये रे ॥शील निधान समोवरे रे, शील थानूषण लहीये रे । मो०॥ १५ ॥ स्वामिप्रसादें हु सदा रे, परनर मुख नवि जो रे । सहन कुटुय पण पुरुप जे रे, तेहन मुख नवम खंम. ३४ाए ॥ तु०॥ १ ॥ रत्नप्रन हवे राजियो रे, सामंतने परधान रे ॥रा ॥ द 4 नगरना जन सवे रे, सेवे करी एकतान रे ॥ रा०॥ तु० ॥ २२ ॥ गज रथ घोडा नेटणे रे, ॥ रत्नादिक बनु वस्त रे ॥रा ॥ जे जे थपूर्व देशमा रे, ने ते दीये सु प्रशस्त रे ॥ रागातु १३ ॥ तिहां सुखमा रहेता था रे, वा रमी या ए ढाल रे॥ रा०॥ पद्मविजयें कही सोनलो रे, नवमे खंमें रसाल रे॥रा० ॥तु ॥ २४ ॥ सर्वगाथा ॥३५७ ॥ ॥ दोहा॥ ॥ केशक दिन तिहां रही करी, पूजी ससरा सास ॥ श्रीजयानद नृपत्ति दवे, जावा मन सन्नास ॥ १ ॥ मात पिता नाता प्रमुख, रतिसुदरीने ता म ॥थाज्ञा दीये महासती प्रत्ये, थाये उखनां धाम ॥ २ ॥ दासी दास में धन बहु, थापे सेवा कान ॥ सहुनें ले विमानमां, श्रीजयानद मदा गज ॥३॥ निजपरिवारछु चालीया, वायुवेग श्रकाशायाम नगर लघता, थाव्या निजपुर वास ॥४॥ उत्सव महोत्सवथी तिहां, थावे निज वर धा ॥ रतिसुदरीने राखवा, महोल दिये थनिराम ॥ ५ ॥ सह प्रिया मेली करी, उचित दान सन्मान ॥ मत्री पासें करावता, श्रीजयानद राजान॥६॥ सतोपी सद्गु तेहनें, सुख सागरमा तीन ॥ पंच विषय सुख नोगवे, सहु राणीशु पीन ॥ ७ ॥ ॥ ढाल तेरमी ॥ केशर वरणोदो के काढ कसुबो मारा लाल ॥ ए देशी ॥ ॥ हवे सदु नूपति दो के परजा पाले मारा लाल, निज परजा सम होके सदु रखवाले मा० ॥ कनक सिहासन हो के एकदिन बेला मा० ॥ चपरमेष्टीना दो के ध्यानमा पेग मा० ॥ १॥ बहु नृप नमता दो के था णाने धारे मा ॥ मुखशशि किरणें हो के दिशि अजुश्राले मा० ॥ परप द बेठी दो के निज निज कामें मा०॥प्रतिहार थावी हो के शीघ्र शिर ना में मा०॥२॥ विनति एणी परें दो के नृपर्ने करतो मा० ॥ लोक बहु था व्यो दो के बहुख धरतो मा०॥विनयपुरथी हो के पोलने वारे मानो तुमचा हो के दर्शन प्यारे मा० ॥३॥ मोकलो वहेला दो के नरपति जा से मा० ॥ मोकले, ते पण दो के जइ तस पासे मा० ॥ थावी प्रणमे दो के नरपति पाया मा ॥ विनतिपत्रिका हो के नृपपुर वाया मा० ॥४॥ मत्री लेख्ने हो के नृप कर देवे मा० ॥ नरपति दर हो के जोइ तस हे इ ३४७ जयानंद केवलीनो रास. सवि थवदात रे । रा० ॥ तु० ॥ ५ ॥ शूरदत्त कहे सानलो रे, सपलोक अधिकार रे ॥ २०॥ तुम जरता नून तो रे, सौनलो धुरपी तार रे ॥रा० ॥ तु० ॥ ६ ॥ लखमीपुर श्रीपति नलो रे, त्रण कम्पानो ताब रे॥रा ॥राना सर्व शिरोमणि रे, जैनधर्म मन नाय रे ॥ रा०॥ तु॥ ॥ ७॥ दीधी त्रणे तुम पति रे, वली दोधु निजरान रे । रा॥ दीक्षा जी धी राजीये रे, वरवा शिवसाम्रान रे ॥ रा० ॥ तु०॥ ७॥ वैताढप जर विद्याधरा रे, बहु वश कीधा तास रे । रा०॥ करी महोटा उपकारने रे, पा म्या जश सुविलास रे ॥ रा० ॥ तु०॥ ए॥ तास पुत्रीयो परणिया रे, वली चक्रायुर राय रे ॥रा० ॥ जीतीने तस कन्यका रे, परस्या सहस समुदा य रे ॥ रा० ॥ तु ॥ १०॥वन उत्सव थामवरें रे, थाव्या निजपुर रा य रे ॥रा ॥ शत्रुनृप जय चिदुदिरों रे, करीने थाव्या नाय रे ॥ रा॥ ॥ तु० ॥ ११ ॥ जे जे श्राश्चर्य शतो गमे रे, वली तस तात सवध रे ॥ ॥र ॥ सूरदत्त सविनोखीयो रे, विस्तारें परवध रे ॥रा ॥ तु० ॥१॥ सनिली सर्व सवधने रे, थानद श्रग न माय रे ॥ रा० ॥ दान देइ सतो षियो रे, कीधो बढ़ सुपसाय रे ॥ रा० ॥तु ॥ १३ ॥ रतिसुदरीयें विस ीयो रे, पोहोतो लखमीपुर गय रे ॥ रा ॥ श्रनुक्रमें राज्यसना गयो रे, निहां श्रीजयानद राय रे । रा ॥ तु०॥ १४ ॥ परीक्षा प्रमुख सवि वातही रे, कही तस थामूल चूल रे ॥ रा० ॥ तेम वली जे कडेवरावी रे, ते नाख्यु अनुकूल रे ॥ रा ॥ तु॥ १५ ॥ तुमनें तेडपा ने वली रे, सांनती श्रीनपानव रे ॥रा॥ निनप्रीया शील शोदामणु रे, धरता यति थापद रे ॥रा ॥तु ॥ १६ ॥ नक्तिवती नार्या तणु रे, दर्शननु थ चित्त रे ॥ रा॥ वली तेडवा पण जायतु रे, बेशी विमान विचिस रे रा॥ तु०॥ १७ ॥ पोहोता दिष्य विमान रे, रमपुरे क्षण मांदि रे ॥रा०॥ सार सौजन्य परिवार/ रे, धरता मन अष्टाहि रे ॥रा ॥ तु॥ १७॥रम प्रन नूपनें मल्या रे, तेम नयरी जन वात रे ॥रा०॥ रममाला नृपनी प्रिया रे, पाम्या थति सुखशात रे ॥ रा ॥ तु० ॥ १५ ॥ सतोषी रतिसुदरी रे, थापी दर्शन थाप रे । रा॥क्षणिक थानव दीये घणे रे,उचित करी था लाप रे । रा॥तु ॥२०॥ अमृतवृष्टि श्रथितवी रे माने आवदु राय रे ॥रा॥ खेम प्रमादिक बढ करे रे, नकतें बमणो नराय रे ।। रा० ॥

नवम खंफ. ३५१ हो के कुशल ते नारी मा० ॥ वली मित्र न तेहवो हो के दीये मति सारी मा० ॥ १६ ॥ पक्क प्रशावत दो के वृक्ष न पासें मा० ॥ रुडु तस राज्य न दो के चाले सरासे मा० ॥ कुलस्थिति नवि होय हो के नवि जश थाय मा० ॥ नासे धन दूर हो के सुरूत न काय मा० ॥ १७ ॥ ममलिक प्र धाननु हो के धन वह लीयु मा॥ परधान विना नवि हो के राज्य ते सीधु मा० ॥ निज पर नवि गणिया हो के लोनें पूरो मा० ॥ अन्याय ते करवो हो के नहीं थधूरो मा० ॥ १७ ॥ जेम कागल थोडे हो के सवि न लखाय मा० ॥ तेम वात ते पूरी हो के ढालें न थाय मा॥ थ नवमे खमें दो के तेरमी ढाल मा ॥ कहे पद्मविजय मुनि हो के वात रसाल मा० ॥ १५ ॥ सर्वगाथा ॥ ३४ ॥ ॥ दोहा॥ ॥ काईये कही नहीं, श्रीविजयराज जे तात ॥ तेढुये पण फल जोग व्यु, श्रवरा केही वात ॥ १ ॥ तेतो सगु जाण्यु दशे, तस मुख वचन प्रमाण ॥ जय नृप काका तुम तणा, सुखदायी राजान ॥ २ ॥ तेदुये तेडाव्या घणु, नवि थाव्या तुमें कोय ॥ नाग्य उदय नहीं थम तणो, तेणें तुम वांक न होय ॥३॥ 5 खदायी तुम ना ए, थम अनाग्यथी थाय ॥ राज्यपदें वेशी करी, एणी परें काम कराय ॥ ४ ॥ वनमा वसवु रूथडो, रूडो वली परदेश ॥ मरण करेवु रुथडु, तप रूड सुविगेप ॥५॥ पण ए राज्यनी बांहही, सुपनें न वांड थंश ॥ सिहसारे एणी परें घणु, कलक दीयो तुम वश ॥ ६ ॥ ॥ ढाल चौदमी ॥ विमलनिन विमलता ताहरीजी ॥ ए देशी ॥ ॥ दृष्टि दया करी टीजीयें जी, सेवक उपर स्वामि ॥ सीदाता केम वेखी या जी, एह परजा तुम नाम ॥ १० ॥१॥ कीर्ति जस सागर बो तुमेंनी, गुणगण रत्न निधान ॥ परउपगार शिरोमणिनी, थशरण शरण परधान ।। ॥६॥२॥ पूरव कृत्रव्रतधर थयानी, तेदमा धुर तुम नाम ॥ पापीथ न्यायीने तुमें दरो नी, एह करो थम तणु काम ॥ ६ ॥शारीति लोपो न पूर्वज तणी जी,मूको न निल प्रजा एह ॥ मूल निज राज्य हवे लीजीयें जी, अनुग्रह करो प्रठ रेद ॥ १० ॥ ॥ तुमें दया चितवी वधुनी जी,नो नवि तुमें करो एह ॥ देश पुर नगर उजड थशे जी,मत करो तेदमा सदे ३५० जयानंद केवलीनो रास. वे मा० ॥ मूल राज्यना हो के लोक ते जाणी मा० ॥ बढ़ श्रादर करेरो के नृप गुणखाणी मा० ॥ ५ ॥ मुश उखेली हो के वांचे पोते मा०॥ तेह कहीजें होके सुणीय श्रोते मा० ॥ स्वस्तिश्रीमति हो के सुरपुर सरि खु मा० ॥ लखमीपुरवर हो के महा शहि निर मा० ॥ ६ ॥ राज्य करे तिहा दो के श्रीजयानद मा० ॥ बदनृप वहेता दो के थाण थापा मा० ॥ जनक विजयनृप हो के परिछद सोहे मा० ॥ नेहर्ने लखता हो के मोद थारोहे मा० ॥ 3 ॥ विजयानिधपुरथी हो के पुरनन मलीने मा० ॥ रानवर्गी पण हो के माद नलीने मा० ॥ प्रणतिपूर्वक दो के करकज जोडी मा० ॥ विनति लखीये दो के मानने मोडी मा० ॥ ७ ॥ सुख श्रेय हा ने दो के पुख्य प्रमाणे मा० ॥ दिन दिन प्रत्ये वाढ हो के प्रनु सुखनाणे मा० ॥ मुजो समाचार दो के पूर्वज जेद मा ॥ तुम चा तेणें पाली हो के परजा नेह मा० ॥ ए ॥ विजयपुरनी हो के वात डी सुजो मा ॥ नृप सिहसार हो के नामज सुजो मा० ॥ कपटें पटु कटु वली दो के करतो काम मा० ॥ तन्मार्गनी मति वली हो के व्यसन धाम मा० ॥ १० ॥ नवि धर्मनी वात ते हो के मनमा नाणे मा० ॥ गुरुकर्मा गाजे हो के थाप वखाणे मा० ॥ वैरी परें परजा होके जाणे मनमा मा० ॥ परजा चित्त जाणे दो के वसियें वनमा मा०॥११॥ थन्यायनो मार्ग हो के नित्य चलावे मा० ॥ तुम राजन कुलना हो के जे जे थावे मा० ॥ विश्वास पमाडी दो के गुप्तिये नावे मा० ॥ बडु कष्ठने देतो दो के मुख न सराखे मा० ॥ १२ ॥ अपराध विना बढ़ हो के दाने दम मा० ॥ वग पमाडे हो के तेन प्रथम मा० ॥ केश्ने नवि जोजन दो के थापे खावा मा० ॥ कोना मुख आगे हो के करियें रावा मा० ॥१३॥ इत्यादिक रीतें हो के इखने देतो मा० ॥ धबत उख दाखी दो के दम ते लेतो मा० ॥लोनांध थइनें हो के दय रथ हाथी मा० ॥ ते लीये उत्ताजी हो के बहु सनमाथी मा० ॥ १४ ॥ तुम प्रव में जन्मथी हो के परजा पाली मा० ॥ तेरों उख नवि वीलु हो के सुपर्ने जाली मा॥ तुम तातें पूरी हो के लाम लमायो मार ॥ सडनी छडावे दोके एह पडायां मा० ॥१५॥ कर ले अष्टादश दो के जे मुस्था कानें मा० ॥ तरणा सम जगतने हो के मनमा माने मा० ॥ जेहनें नही मत्री

नवम खंम
३५३
॥दोहा॥
॥ तुम वरिशण थति दोहेलु, नाग्ये पाम्या थान ॥ऽख अंधकारमा
गीयो, स्वामी तु दिनराज ॥ १॥ काल सत्रि परें एटलो, काल काढयो नय
कार ॥ क्ष्य कीधो धम्ह पुस्यनो,उदय ते तु दिनकार ॥॥चिरंजीवो सफ
करो, मूलराज्य महाराज ॥ अमृत सम दृष्टि देश,पवित्र करो जुम्राज ॥३॥
एम स्तवना करी दर्षगं, पोहोता निज निज गेद ॥ देश नगर पुर गाममा,
वूठा श्रमौरस मेद ॥ ४ ॥ देवपूजादिक कृत्य करे, सचितज वेला होय ॥लो
क तुष्टि हेते तिहां, काप्त गमावे कोय ॥ ५॥
॥ ढाल पन्नरमी ॥ राग मारुणी॥श्रीतीमधर सादेवश्रागें विनति गए देशी॥
॥राज्यमाहे रह्या राज्य काज सवि साचवे रे, तेम तातने परिवार ॥ था
में रे थागें रे, लागें धर्म कथा कहे रे ॥ १॥ जिनवरनाषित धर्म दया गुण
मुख
ने रे,तेम दानादिक चार ॥नाख्यो रे नारख्यो रे,दाख्यो देव गुरु धर्मथी
॥॥ पुस्य पाप फल सुरुत उकत कारण कहे रे,हेतु युक्ति थपार ॥ राज्य
रे राज्य रे, काज करतां पण कहे रे ॥३॥ विचे विचे थवसर सहीनें निपुण
ते नूपति रे, नित्य नित्य करे व्याख्यान ॥ सरसा रे सरसा रे, नदी विरसा ह
टांतथी रे ॥४॥ सारसग्रह करी समकेत नित्य समजावता रे,श्रोताने सुख
फारहितकर रे हितकर रे,श्रतर रहित ते तपदिशे रे॥५॥एम करतां जिन प्रव
चन श्रावक सद्ध कस्खा रे,पुत्र वचन घन सारासांजली रे सांजली रे,काच का
मली गद सवि गयो रे॥६॥ अमृत परें निज थातम सींची धर्मथी रे, थगी
करे गृही धर्म ॥ राय रे राय रे, ताय ते श्रीजयाननो रे ॥॥ जैनधर्मे दृढ
करीने जनकने थापता रे, तेद क्रमागत राज्य ॥ जाणी रे जाणीरे, मन था
पी नृप थादरे रे ॥ ७ ॥ पुत्र वयण गुणवतनु नवि उलंघता रे, दवे जावा
नुं मन्न ॥ श्रीजय रे श्रीजय रे, विजय राय हवें राखता रे॥ए ॥तात सतोप
ने कारण केशक दिन रदी रे, परजानें सुखदाय । थाय रे थाय रे, राय श्री
विनय धर्मी घणु रे ॥१०॥ परजाने पण जैनधर्म समजावता रे, श्रीश्री
विनपनरिंद ॥ जोगवे रे नोगवे रे, जोगवे राज्य श्रखमने रे ॥११॥ एकदि
न विजयराय चित्तमांद दयालु रे, कारागारमा जेद ॥घाल्या रेघाल्या रे,
थाल्या मुगता तेदने रे॥ १२ ॥ सिहसार हवे कारागारमा इख खमे रे,व
घ बंधादिक जोर ॥ खमतो रे खमतो रे,नवि नमतो मनथी कदा रे॥१२॥

,
३५७
जयानंद केवलीनो रास.
ह ॥ १० ॥ ५॥ वोय पक्षमा जे जुगतु दोये जी, तेद कीजें स्वयमेव ॥ यां
ची वली सनिली वयणडोजी, श्रमरप थावियो देव ॥ १० ॥६॥ तातप
रानव वली सोनखोजी, उख प्रजानु चित्त धार । ईनरतपति उठीयो
जी, वयरी जास्पो सिहसार ॥१०॥४॥ करिय सेनापति बागलेंजी, वा
जो वनडावे प्रयाण ॥ सैन्य चतुरग तव सक करीजी, चालीया ते सपराण
॥६०॥ ॥ स्वल्प प्रयाण नई तिहां रहीजी, मोकलीयो तिहाँ दूत ॥ ते
दने जाण करवा नणीनी, सनसावे श्राप थाकूत ॥ १७ ॥ ॥ शत गमे
ताहरा थन्यायनेंनी, खमीय उवेखीयो तुक ॥ एटलो काल सौजन्यपणे
जी, वांक मत काढजे मुळ ॥१०॥ ॥थान नवि खमु दवे तादरो
जी, रास्वी ए राज्यनी नीति ॥ कीध प्रयाण ते पागलेंजी, लोपतो नवि कोश
रीति ॥ ६ ॥ ११ ॥ सैन्य थसख्यशु चालतांजी, कोयनें न होय सताप ॥
पर ठपगारी दयालुयो जी, ते केणि परें करे पाप ॥ १०॥ १२ ॥ निज परदे
श सरिखा गणेजी,खम त्रणनो जे यधीश ॥ तस नगर इकडा श्रावीयाजी,
जाणतो सिह नरेश ॥ ४० ॥ १३ ॥ सन्मुख महावलें नीकलेजी, व्याघ्र स
न्मुख शश जेम ॥ बल सहित सिहश्र जूजीनेजी, नांजे करी वृक्षनें तेम
॥६॥१॥ घात विधुरित पफडी लीयोजी, लीलायें ते सिहसार ॥ बांधीने
निगड घाली करीजी, सोप्यो तातनें तेणी वार ॥६॥१५॥ पडियो कारा
गार माहे ते जी, अनुनवे पीड अपार ॥ कर्म निज शोचतो तिहां रहेजी,
पाप तरु फल ए असार ॥ १० ॥ १६ ॥ कर्म कीर्धा ते मूके नहीजी, पा
प मत करो जवि जीव ॥ पापनां फल ए देखी करीजी,धर्म ते करीये सदै
व ॥ १० ॥ १४ ॥ श्रीश्रीजयानद नूपति जी, जयसिरि करी निल हाथ।
नगर प्रवेश मदामहोत्सवेंजी, राजन्य पुरजन साथ ॥ १० ॥ १७ ॥ करि
य प्रवेश निज तात जी, दय गय रयणने वस्त्र ॥पौर जन राजवर्गी तपा
जी, नेटणे मूके के शस्त्र ॥ १० ॥ १॥ सामत मत्रिपुर जन वती जी,
वतीय सीमाडा राजान ॥ देश परदेशना लोकने नी, नृप बहु थादर मा
न ॥६० ॥१०॥ जेदने योग्य जेम तस करें जी, दानने वली सनमान ॥
करिय प्रणाम स्तवना करेनी, चित्तमा थति बद्ध मान ॥१०॥१॥ख
म नवमे एद चौदमीजी, पनविजयें कही डाल ॥ पुस्पयो सवि सुख नीप
जे नी, पुस्पषी मगलमाल ॥ १०॥ २२ ॥ सर्वगाथा ॥ १२ ॥

नवम खंत ३५५ ॥ ढाल शोलमी ॥ पीछजी पीउजी नाम जपु दिन रातायां ॥ ए देशी ॥ ॥ गो महिपी घट थधिक दीये पय लोकनें, थानक थानक पूरी धरा धान्य थोकनें ॥ कालें वरसे मेघ करे पुष्टता घणी थापे फलने फल पटक तु थाप थापणी ॥ १ ॥ रत्न सुवर्णना थाकर नोपजे नग नगें,रयणनिधा न प्रगट होये धरतीय पग पगें ॥ पूर्वजें दाटघा धन परजाने नीसरे,नारी मुगुण सुखकर सुशील सगु शिरे ॥ २॥ द्यूत मद्य वेश्या परनारी गमन न ही, चोरीने मृगया मांस ए व्यसन टाले सही ॥ निनपर चक्रनो नय त पसर्ग नहीं कदा, नहीं थतिवृष्टि अनावृष्टि उखदायी सदा ॥३॥ कलह ममर नहीं दश मसादिक नवि नडे, मुषक तीडना नय सुपर्ने पण नविन हे ॥ विविध उपायें मत्री प्रधान बलें करी,राष्ट्र कोशादिकें पूरण राज्य सि रिधरी ॥ ॥ हवे श्रीविजय नूप दानादिक श्राचरें. लक्षादिक वरसां ल में धर्म विविध करे ॥ नि स्टह पणे राज्य पाले थजातशत्रु पणे, उख टाले परजानां राखे सुख घणे ॥ ५ ॥ जीर्ण उधार करावे इध्यनो व्यय करी, जैन शिरोमणि थने पुस्यलक्ष्मी नरी॥ श्रीजयानदनी घाण जही लघु सुत नणी, शुनदिवसे राज्य थापे शीख देई घणी ॥ ६ ॥ नाम शता नद योग्य उत्तम गनीर ते, सद्भुनें सम्मत तेजस्वी धुरें धीर ते ॥ विनीत ने गुण थनुत्तर धर्मे थिर हितकरु, निश्चल था नृप धर्म करे निन सुख करु ॥॥ थागमसागर सद्गुरु तेणे समे थावीया, नाग्यथकी तेणे कालें मनमा नावीया ॥ ले प्रनानी थाणने दीका मन धरे, निजसुत नरपति उन्लव मदोष्ठव वह करे ॥ ७ ॥ सुख वाहन बेसीने दान बह दीये, जैन धरम परनावना, बद्ध थापद दीये ॥ योग्य पुरुप परिवारथी गुरु पासें ज इ, करी परणामने थावरे व्रत शीघ्रज थइ ।। ए ॥ विजयराज्य कपि दक्ष गुरु सेवा करे, ग्रहण थासेवन शिक्षा अनुक्रमें दोय घरे । तत्त्व जाण सत्ववत थशेप थागम नरो, थतर शत्रु जय करे कर्म कठिन हणे ॥ ॥ १० ॥ तप करता विचरे गुरु साये विनय करे, शांतजितेंक्ष्यि गुण थ णगारना श्रादरे ॥ तात दीक्षाथी हर्प खेद नूपति लहे, सद्ध मुनिवदना क रोने, नायें निज गृहे ॥ ११॥ श्रीशतानद राजान जैनधर्म पालता, सैन्य परिचवलं शासन थन्थालता ॥ केशक दिन निज राज्ये रही वह नेहथी, अग्रज परें जक्ति घणी चित्त गेहथी ॥ १॥ श्रीनयानदनी सेवा करवा

३५४
जयानंद केवलीनो रास.
नत्रीज जाणी काढीमूक्यो देशथी रे,पाले राज्य महाताराय रे रायरे नविश्व
न्याय कवा करे रे ॥ १४॥ श्रीजयानंद हवे थवसर लदी एकटा रे, तात
ना प्रणमी पाय ॥ जगते रे जगते रे, युकतें पूठी तातर्ने रे ॥ १५॥ मात
प्रमुख गुरु जन प्रणमीने थादरे रे, केइनें वात्सल की ॥ केने रे देने
दृष्टि सोहामणी रे ॥ १६ ॥ केश्ने मधुर वयणथी सतोप्या पण रे, राज
ननें परधान ॥ जेह रे जेह रे,नेद धरी घणुं पूछतो रे ॥ १७ ॥ जनपद लो
क प्रजानें प्रीति उपायतो रे, बोलावा सद्ध नाय ॥थावे रे थावे रे,नावे खे
चर नृप बहु रे ॥ १७ ॥ शोल सहस नृप थरधा जरतना यावीया रे, निज
निज ले सैन्य । वलीया रे वलीया रे, टलीपा नही रण कर्ममा रे ॥१ए।
चतुरगी सेनायें चतुर ते चालीयो रे, निन पुर जावा कान ॥ कोइरे को
रे, नवि होये प्रतिमन कदा रे ॥२॥ वाजिन शब्दें दिशा वलय सविपू
रोयु रे, शत्रुवृदनें त्रास । थापे रे थापे रे, कापे 5 ख मित्रज तणां रे ।।
॥ २१॥ केटलीक मजलें कोइ थटवीमा उतना रे, पूजा करी जिनराज ॥
नूप रे नूप रे, कूप थगाध ते सत्वनो रे ॥२२॥थशनादिक करीने सदुरा
जन्य लोकनें रे, वाले दन्थी राय ॥ अनुक्रमें रेथनुक्रमें रे, जिनधर्मे जन
"वासतो रे ॥ २३ ॥ श्रनुक्रमें थाव्या लखमी पुर महामहोत्सवें रे, अनुक्र
में पोहोता गेह ॥ पाले रे पाले रे, टाले कटक राज्यमा रे॥२॥ सद्गुन
प नृघर खेचर प्रणमी मोदणं रे,निज निज थानक जाय ॥ गाय रे गाय रे,
राय तणा गुण नित्य प्रत्ये रे ॥२॥ नवमे खमें ढाल पन्नरमी एकही रे,
श्रीजयानवनें रासालाखे रे नाखे रे, दाखे पविजय मुनि ॥२६॥४४३॥
॥ दोहा॥
॥ श्रीजयानदना राज्यमां, जलचर नवि पकडाय ॥ थलचर खेचर प
रस्परें, नवि को दवा धाय ॥ १ ॥ जनम मरण थकालें नहीं, कटक
कमलनी नात ॥ सरोगता कमलें रघु, दम देशलशिर नाल ॥२॥ कलह
'ते गजशाला रह्यो, बुदियां मदिर होय ॥ स्नेहनो क्ष्य दीपक विषे, कुटिल
सापिणि गति जोय॥३॥घहव कुटिल सरिता कही, छलके वेणी बघा
य ॥ कर प्रथम करिनो रणे,सकलक शशी कहेवाय ॥ ४ ॥ निर्दयता खड़ें
रही, कोरण। मविर मांहि ॥ पण ए लोक माहि नहीं, रहेता वित्त
सहाहि ॥ ५॥ सर्वगाथा ॥ ४ ॥

नवम खंम. ३५७ पटुवचन पण गुण लेशनें, समरथ न कहेवा होय ॥ करे नक्ति एदनी तेहने, नवि थावे नवनय कोय । म ॥ १० ॥ तेणे नगरनां जन सद्रु मली, ए थावे ने वली जाय ॥ ते सुणी श्रीजयानंदजी, चित चितवे महाराय ॥ म ॥ ११ ॥ मनमा माननो नवि जीव, नवस्थिति विचित्र सदैव ॥ म० ॥ एयांकणी॥यज्ञान महाउ खे दीयें, घन निविडनें थ नत ॥ काल रात्रि परें मदा 5 ख दीये, प्राणीनां सुख दरंत म॥१॥ सन्मार्गनें ए थाचरे, उर्दशा कारण एह ॥ तिरियंच नरकना नव नमे, सवि उखनु ए गेद ॥ म ॥ १३ ॥ मिथ्यात्व रुखनु कंद ए, सद्ज्ञान- ए चोर ।। सह कर्ममा ए शिरोमणि, थज्ञान थतिहि कोर ॥ म०॥ १४ ॥ तृष्णा विषयनी जे नदी, तेदनो ए गिरिवर जाण ॥ विचित्र नवनाटक करे, ते जाणो महिमा थन्नाण ॥ मम् ॥ १५॥ चेतन ते पर सारिखो, नवि जीव माने कोय ॥ एपीपरें थक्षानें करी, वेठो ते निज शदि खोय ॥म० ॥ १६ ॥ पंचेंही पण थज्ञानथी,गत नयनपरें करे काम ॥ तेणें थध तम थान ए, तत्त्वदृष्टि न रहे नाम ॥ म० ॥१७ ॥ तेणें एद काका मा हरा, बुद्धिवत पण अज्ञान ॥ मारग विना केम जश् शके, नेत्र हीन वनित थान ॥ म० ॥ १७ ॥ तेणे द ए पीतरीया प्रत्ये, करूं सम्यग्दर्शनवत ॥ शुनहान अमृत थांजीनें, करुं दिव्य नेत्र महत ॥ म॥१४॥ एम चित्त महेि चितवी, श्रीजयानद नूपाल ॥ पितृष्ययोधन कारणे, उपनी बुद्धिवि शाल ॥ म ॥२०॥ नवमे खमें ए सत्तरमी, घणु ढाल एद रसाल ।। फ हे पन श्रीजयानवजी, करशे ते मगलमाल मण॥॥सर्वगाथा॥1॥ ॥ दोदा ॥ ॥ प्रज्ञप्ति विद्या प्रतें, समरे श्रीजयानद् ॥ थावी प्रगटपणे तिहां, पूछे परमाणद ॥ १ ॥ प्राप्ति कहे सानलो,एहनें बोध उपाय ॥ पंचाग्नि साधन करे, तापस ए ऋषि राय ॥२॥ प्रवविशे यमि स्थलें,महोदूं काट पोलार॥ महोटो नाग तिहां वले,प्रथम तो ए थवधार ॥३॥ दक्षिण दिशिना काठमां, काकिडो लहे वाद ॥ श्वण तापथोथाकुलो,नविनासपनो राह ॥३पनि मदिशिथमिस्थलें,नदेही व्यपार॥ काठमां बसती तेहनें,नवि कोइ राखण हार ॥५॥ उत्तरविरों ने काठमां, टेडकोनो नही मान ॥ केश मूड के जीव तो,केशक मूथा समान ॥६॥ तिहा जर काष्ठ कढावीने, फरजो दो दो नाग ।।

३५६ जयानंद केवलीनो रास. छतो, सार सैन्य से लखमीपुर नणी गछतो॥राज्य सोपी विक्षनाती रुपनें चालीयो, पोहोतो जखमीपुर गम ताम चित्त म्हालीपो॥१३॥ श्री जयानवनरिंद चकीने जइ मल्या, धनुननी नतिषी श्रादर करी सुसमा नल्या ॥ नवमे खमें ढाल ए शोलमो मन धरो, पन कहे नवि धर्म करी जवजल तरो॥१४॥ सर्वगाथा ॥ ४६॥ ॥ दोहा॥ ॥ बहु थादर सतकारिया, वली कीधु वह मान ॥ गुणीने गुणवता मले, वाधे प्रमोद प्रधान ॥१॥ शतानद नृप थादि दे, बांधव बटुपरि वार ॥ सहस गमे नूचर तथा, खेचरना पण वार ॥ २॥ राज्यापिराज्य एक दिन दवे, रयवाडी सद्ध सग ॥ श्रीजयानदनी थावीया, नगर पाहि र मनरग ॥३॥ ताम लोक एकण दिशें, जाता देखे जाम ॥ तेम था वता वत्ती जावता, सरको नर थनिराम ॥ ४ ॥ तेदमाथी कोई पुरुषनें, तेडी पूढे राय ॥ श्यो उद्यम डे लोकनें, केम गमनागम थाय ॥ ५ ॥ ढाल सत्तरमी ॥ राग बिदागहो, मुज घर थावजो रे नाथ ॥ ए देशी ॥ ॥ते नर कदे नरपति सुणो, ए वात ने अनुत । एवं नगर दूकडा थावीया, पूर्व दिशे अवधूत ॥ १ ॥ मन मानज्यो रे नाथ ॥ ए नगरी कीधी सनाथ म॥ एयांकणी ॥ मनोरम सयानमा जयनाम ते कृषिरा य, तप करे ने थति थाफरी,पंचामिनें तेह तपाय ॥ म ॥ ३ ॥ समता घण। डियो दमी, यम नियम पाले सार । ते शषि नमवा जाय , ए लोकना हजार ॥ म० ॥ ३॥ ठपकरण ले। पूना तो, के घरी लोक विवेक ॥ ज पूजशे ते ऋषि प्रत्ये, चित्त धारी धर्मनी टेक ॥ म॥ ४ ॥ केश सोवन फूल के वस्त्रथी, केइ विलेपन लेई जाय ॥ पण नि स्टदा ए थवधि , तपनो निधि झषिराय ॥ म ॥ ५॥ सत्कारथी से नहीं, रूसे न लह। अपमान ।। ए निरीहनें मणि मृत्तिका, शत्रनें मित्र समान म०॥ ५ ॥ फनक पहर समयडे, हथिवी करे सुपविच ॥ करे स्नान प्रण वेला वली, घरे जटा मुकुटनी रीत ॥ म ॥ ॥ वस्त्र पदेरीयां तरु बालना, कंद मूल फलनो थाहार ॥ सृगचर्म भरी सम्या करे, निशा तजी निरधार ॥ म० ॥ ॥ रहे ध्यान महि विधियकी, नि स्टह पोता ने देव ॥ वनवास नित्य जेणे करो, शास्वना थन्यासी जेट माए।

नवम खंम. ३५ पटुवचन पण गुण क्षेशनें, समरथ न कहेवा होय ॥ करे नक्ति एदनी तेहने, नवि थावे नवनय कोय । म ॥ १० ॥ तेणे नगरनां जन सद्ध मली, ए थावे ने वली जाय ॥ ते सुणी श्रीजयानंदजी, चित्त चितवे महाराय ॥ म० ॥ ११ ॥ मना माननो नवि जीव, नवस्थिति विचित्र सदैव ॥ म० ॥ एथांकणी ॥ यज्ञान मदाउ खे दीयें, धन निविडनें थ नत ॥ काल रात्रि परें महा सुख दीये, प्राणीनां मुख दरंत म॥१॥ सन्मार्गर्ने ए थाचरे, उर्वशा कारण एद ॥ तिरियंच नरकना नव नमे, सवि उखनु ए गेद ॥ म० ॥ १३ ॥ मिथ्यात्व रुखनु कद ए, सद्ज्ञान ए चोर ॥ सद्ध कर्ममा ए शिरोमणि, श्रज्ञान थतिहि कगेर ॥ म ॥ १४ ॥ तृष्णा विषयनी जे नदी, तेहनो ए गिरिवर जाण ॥ विचित्र नवनाटक करे, ते जाणो महिमा थन्नाण ॥म ॥ १५॥ चेतन ते पर सारिखो, नवि जीव माने कोय ॥ एणी परें थक्षाने करी, बेठो ते निज शधि खोय ॥म० ॥ १६ ॥ पंचेंडीपण थहानथी,गत नयनपरें करे काम ॥ तेणे थंध तम थज्ञान ए, तत्त्वदृष्टि न रहे नाम ॥ म० ॥१७ ॥ तेणें एह काका मा हरा, बुद्धिवत पण थज्ञान ॥ मारग विना केम जश् शके, नेत्रहीन वजित थान ॥ म० ॥ १७ ॥ तेणे दु ए पीतरीया प्रत्ये, करुं सम्यग्दर्शनवत ॥ शुनझान अमृत यांनीने, करुं दिव्य नेत्र महत ॥ म० ॥१५॥ एम चित्त मांदे चितवी, श्रीजयानद नूपाल ॥ पितृष्यवोधन कारणे, उपनी बुद्धिवि शाल ॥ म० ॥२०॥ नवमे खमें ए सत्तरमी, घणु ढाल एद रसाल ।। क दे पन श्रीजयानदजी, करशे ते मगलमाल मा१॥सर्वगाथा ॥ दोहा॥ ॥ प्रज्ञप्ति विद्या प्रतें, समरे श्रीजयानद ॥ थावी प्रगटपणे तिहां, पूडे परमाणद ॥१॥प्राप्ति कहे सनिलो,एदनें बोध उपाय ॥ पंचाग्नि साधन करे, तापस ए शपि राय ॥२॥ पूरवदिशें श्रमि स्थलें,महोटु काष्ट पोलार॥ महोटो नाग तिहां बले,प्रथम तो एथवधार ॥३॥ दक्षिण दिशिना काठमां, काकिहो लहे दाद ॥ धण तापथीयाकुलो,नविनासपनो राह॥४॥ पश्चि मदिशिथग्निस्थलें,उदेदो व्यपार । काष्ठमां बलती तेहनें,नवि कोइ राखण हार ॥५॥ उत्तरदिशे ते काष्ठमां, देडकोनो नही मान ॥ के मू के जीव तो,केश्क मूथा समान ॥६॥ तिहां नश्काष्ठ कढावाने, करजो दो दो नाग ।

३५६ जयानंद केवलीनो रास. हतो, सार सैन्य से सखमीपुर जणी गप्ठतो॥राम सोपी विशवासी ! रुपनें चालीयो, पोहोतो लखमीपुर ग्राम ताम चित्त म्हालीपो॥१॥ श्री जयानवनरिंद चक्रीने नई मल्या, बनुननी नक्तिपीश्रादर करी सुलमा जल्या ॥ नवमे खमें ढाल ए शोलमो मन धरो, पन कहे नवि धर्म करी जवजल तरो॥१४॥ सर्वगाथा ॥१६॥ ॥ दोहा॥ ॥ बहु धादर सतकारिया, वली कीधु बहु मान ॥ गुणीने गुणवता मले, वाचे प्रमोद प्रधान ॥ १ ॥ शतानद नृप श्रादि दे, बांधव पदुपरि चार ॥ सहस गमे नूचर तथा, खेचरना पण वार ॥२॥ राज्यापिराज्य एक दिन दवे, रयवाडी सद्गु सग ॥ श्रीजयानदनी यावीया, नगर बाहि र मनरग ॥ ३ ॥ ताम लोक एकण दिशे, नाता देखे जाम ॥ तेम था वता वली जावता, सरको नर थनिराम ॥ ४ ॥ तेहाथी को पुरुषनें, तेडी पूने राय ॥ श्यो उद्यम ने लोकनें, केम गमनागम थाय ॥ ५ ॥ ढाल सत्तरमी ॥ राग बिहागडो, मुल घर थावनो रे नाथ ॥ ए देशी ॥ • ॥ ते नर कहे नरपति मुणो, ए वात ने अनुत ॥ एवं नगर दूकता थावीया, पूर्वदिश अवधूत ॥ १॥ मन मानज्यो रे नाथ ॥ ए नगरी कीधी सनाथ ॥म०॥ ए योकणी॥ मनोरम उद्यानमा जयनाम ते शपिरा य, तप करे ले अति थाकरी, पंचामिनें तेह तपाय ॥ म० ॥ ॥ समता घण। इडियो दमी, यम नियम पाले सार ॥ ते ऋषि नमवा जाय , ए लोकना दनार ॥ म० ॥२॥ उपकरण ले पूना तणां, केश् घरी लोक विवेक ॥ ज पूजनशे ते ऋषि प्रत्ये, वित्त धारी धर्मनी टेक ॥ म०॥ ४ ॥ केश सोवन फूल के वरथी, केश विखेपन लेई जाय ॥ पण नि स्टहा ए अवधि , तपनो निधि शषिराय ॥ म० ॥ ५ ॥ सत्कारथी तसे नहीं, रूसे न लद। अपमान ॥ ए निरीहने मणि मृसिका, अपने मित्र समान ॥म॥ ६ ॥ फनक पर समवडे, एथिवी करे सुपवित ॥ करे स्नान प्रण वेला वली, घरे जटा मुकुटनी रीत ॥ म ॥ ॥ वल पहेरीयो तरु बालना, कद मूल फलनो थाहार ॥ मृगचर्म घरी सध्या करे, निशा तजी निरधार ॥ म० ॥७॥ रहे ध्यान महे विधियकी, निस्टह पोता ने देव ॥ वनवास नित्य जेणे करो, शास्त्रना थन्यासी जेह माया .

नवम खं. ३५७ पटुवचन पण गुण लेशनें, समरथ न कहेवा होय ॥ करे नक्ति एदनी तेदने, नवि थावे नवनय कोय । म ॥ १०॥ तेणे नगरनां जन सद मली, ए थावे ने वली जाय ॥ ते सुणी श्रीजयानंदजी, चित्त चितवे महाराय ॥ म ॥ ११ ॥ मनमा माननो नवि जीव, नवस्थिति विचित्र सदैव ॥ म ॥ ए थांकणी॥अज्ञान महाकु खें दीयें, घन निविडनें थ नत ॥ काल रात्रि परें महा सुख दीये, प्राणीनां सुख दरंत म॥१॥ सन्मार्गने ए थाचरे, पुर्वशा कारण एद ॥ तिरियंच नरकना नव नमे, सवि 5 खनु ए गेद ॥ म ॥ १३ ॥ मिथ्यात्व रुखनु कंद ए, सद्ज्ञानतुं ए चोर ॥ सद् फर्ममा ए शिरोमणि, थज्ञान थप्तिहि कठोर ॥ म ॥ १४ ॥ तृष्णा विषयनी जे नदी, तेदनो ए गिरिवर जाण ॥ विचित्र नवनाटक करे, ते जाणो महिमा थन्नाण ॥ म० ॥ १५॥ चेतन ते पर सारिखो, नवि जीव माने कोय ॥ एणी परें थज्ञानें करी, बेठो ते निज कमि खोय ॥म० ॥ १६ ॥ पंचेंडीपण थक्षानथी,गत नयनपरें करे काम ॥ तेणें थंध तम थंझान ए, तत्त्वदृष्टि न रहे गम ॥ म० ॥१॥ तेणें एद काका मा हरा, बुद्धिवत पण यज्ञान ॥ मारग विना केम जश् शके, नेत्र हीन वनित थान ॥ म० ॥ १७ ॥ तेणे छ ए पीतरीया प्रत्ये, करुं सम्यग्दर्शनवंत ॥ शुनज्ञान अमृत थांजीने, करुं दिव्य नेत्र महत ॥ म०॥१५॥ एम चित्त माहे चितवी, श्रीजयानद नूपाल ॥ पितृष्ययोधन कारणे, उपनी बुझिवि शाल ॥ म ॥२॥ नवमे खंमें ए सत्तरमी, घणु ढाल एह रसाल ॥क हे पन श्रीजयानवजी, करशे ते मगलमाल आमा१॥सर्वगाया|| ॥ दोहा॥ ॥ प्रज्ञप्ति विद्या प्रतें, समरे श्रीजयानद । थावी प्रगटपणे तिहां, पूछे परमाणद ॥ १ ॥ प्राप्ति कहे सांनलो,एदने बोध उपाय ॥ पंचाग्नि साधन करे, तापस ए झपि राय ॥२॥ पूरवदिशें थग्निस्थलें,महोटु काष्ट पोलार ।। महोटो नाग तिहां वले,प्रथम तो ए थवधार ॥३॥ दक्षिणदिशिना काठमां, काफिडो लहे दाह ॥ धण तापथोथाकुलो,नविनासपनो राह॥४॥पश्चि मदिशियनिस्थलें,उदेही अपार ॥ काठमां बलती तेदने,नवि कोइ राखण हार ॥५॥ उत्तर दिशे ते काठमां, देडकोनो नही मान ॥ के मूड के जीव तो,केइक मूथा समान ॥६॥ तिहां जश्काप्ठ कढावाने, करजो दो दो नाग ।

३५६ जयानंद केवलीनो रास. वतो, सार सैन्य से सखमीपुर जणी गधतो॥राज्य सोपी विक्षपाती रुपनें चालीयो, पोहोतो जखमीपुर गम ताम चित्त म्हालीपो॥१३॥श्री जयानवनरिंद चक्रीने नई मल्या, अनुननी नक्तिथी यादर करी सुखमा जल्या ॥ नवमे खमें ढाल ए शोलमो मन धरो, पन कहे नवि धर्म करी जवजल तरो ।। १४॥ सर्वगाथा ॥ ४६॥ ॥दोहा॥ ॥ बहु बादर सतकारिया, वली कीधु वह मान ॥ गुणीने गुणवता मले, वाधे प्रमोद प्रधान ॥ १ ॥ शतानद नृप थादि दे, बांधव बद्धपरि वार ॥ सहस गमे नूचर तथा, खेचरना पण वार ॥ २॥ राज्याधिराज्य एक दिन दवे, रयवाडी सद्ध सग ॥ श्रीजयानदनी थावीया, नगर पाहि र मनरग ॥ ३ ॥ ताम लोक एकण दिशे, जाता देखे जाम ॥ तेम था वता वली जावता, लरको नर थनिराम ॥ ४ ॥ तेदमाथी कोई पुरुषनें, तेडी पूजे राय ॥ यो उद्यम ने लोकनें, केम गमनागम थाय ॥ ५ ॥ ढाल सत्तरमी ॥ राग बिहागडो, मुज घर बावनो रे नाथ ॥ ए देशी ॥ ॥ ते नर फहे नरपति मुणो, ए वात ने थभुत ॥ एणे नगर दूकडा थावीया, पूर्व दिशे अवधूत ॥१॥ मन मानज्यो रे नाथ ॥ ए नगरी कीधी सनाथ ॥म॥ ए श्रांकणी॥ मनोरम द्यानमा जयनाम ते शषिरा य, तप करे ले यति थाफरी, पंचामिनें तेद तपाय ॥ म० ॥ ॥ समता घण। इडियो दमी, यम नियम पाले सार ॥ ते ऋषि नमवा जाय , ए लोकना हजार ॥ म० ॥ ३॥ ठपकरण ले पूना तणां, केश धरी लोक विवेक ॥ नइ पूजशे ते कृषि प्रत्ये, पित्त धारी धर्मनी टेक ॥ म॥ ४ ॥ केश सोवन फूल के वस्त्रथी, केश विखेपन खेई जाय ॥ पण नि स्टहा ए अवधि , तपनो निषि षिराय ॥ म॥ ५ ॥ सत्कारथी से नहीं, रूमे न लह। अपमान ॥ ए निरीहनें मणि मृत्तिका, शत्रने मित्र समान ॥म०॥ ६ ॥ कनक पर समवडे, एथिवी करे सुपवित्त । करे स्नान त्रण वेला वजी, धरे जटा मुकुटनी रीत ॥ म० ॥ ॥ वस्त्र पहेरीयो तरु बालना, कंद मूल फलनो श्रादार ॥ मृगचर्म परी सम्या करे, नित तजी निरधार ॥ म० ॥ ॥ रहे ध्यान महे विधियकी, नि स्टह पोता ने देद ॥ वनवास नित्य जेणे करो, शास्त्रना यन्यासी जेह म॥ए।

नवम खंम
३थए
चनं, थाप्त दोषक्ष्यादिङ ॥ वीतरागोऽनृतं वाक्यं, न ब्रूयादेवसंजवात् ॥
॥ पूर्वढाल ॥ विण थाधार श्राधेय न होय, गुरु विण थागम नही कोय
॥ जि० ॥ ज्ञान क्रिया सयुत गुरु जाणो, जिनवचन सम को न पीबाणो रे
॥ जि० ॥ ११ ॥ ज्ञान दर्शन चारित्र में जेहमां, वली देव गुरु धर्म एहमा
रे॥जिणानावथी दोय ए त्रिक थाराधे,तव केवल ज्ञाननें साघे रे ॥जि॥
॥१२॥ योग ते एह दया जे पाले, दया विण योगनें गाले रे ॥जी॥
नागो रहे वली शिर मुमावे, मौन धरे वली राख लगावे रे ॥ १३ ॥ वकिलां
पहेरे जटानें धरावे,करे स्नान थग्निहोत्र थावे रे ॥जि०॥ कद मूल वली क
रे थाहार, मृग प्रमुख चर्म वली धारे रे ॥ जि०॥ १४ ॥ वली पाखंम क
रे थधिकेरा, पंचामिप्रमुख वद्वतेरा रे ॥ जि ॥ चांायणादिक तप बहु
तपतो,ध्यान नियमने नाप ते जपतो रे ॥ जि॥ १५ ॥ देवार्चन वेद था
गम नणतो, श्रातापना क्लेश न गणतो रे ॥ जि ॥ एकादशी मुख व्रत
थाचरतो, सन्यास प्रमुख थादरतो रे ॥ नि ॥ १६ ॥ नूमिशयन वली
विद्या साधे, वौधादिक दीक्षा थाराधे रे ॥ जि० ॥ दया विना सवि फोक
ट जाणो, एहमा सदेह न थाणो रे ॥ जि० ॥१७ ॥ तात दया पालो न
लीरीते, दया सर्वधर्मने जीते रे ॥ नि० ॥ पचाग्नि तपमा नही लेश, दया
केरो का प्रवेश रे ॥ नि० ॥ १७ ॥ नवमे खमें बढारमी ढाल, कहे श्री
गुरु उत्तम बाल रे ॥ जि०॥ ऋषिनें श्रीजयानद नूपाल, केहवा करे जिस
प्रतिपाल रे ॥ नि॥१ए॥ सर्वगाथा ॥ ५१५॥
॥दोहा॥
॥ तातजी सुो पूरवदिशे,काष्ठमां वलतो नाग ॥ दक्षिणविशि सरहो
वले, धर्मनो केहो लाग ॥१॥ जू पश्चिम दिशि काठमां, उदेदी सदार ॥
उत्तरदिशि बद्ध देडका, बतलावे निरधार ॥२॥ नू जल वायु थनल वली,
वनस्पति सत जीव ॥ हेतुदृष्टांतें साधतो, श्रीजयानद समीव ॥३॥ ते का
रण हे तातजी, तत्त्वातत्त्व विवेक ॥ करनारा तुमें पूज्य हो, हिसा न घटे
नेफ ॥ ॥ इत्यादिक सुणी रायना, वचन विचार पवित्र ॥ राजज्ञपि ज
य वूजीया, श्रीजयवात विचित्र ।। ५ ॥ थादेय वचन तणा धणी, वयण
न निष्फल होय ॥ मेघधारा थमृत तणी, निष्फल कदिन जोय ॥ ६ ॥

३५G जयानंद केवलीनो रास. पचें वसता था,देखावनो त लाग ॥णा धर्मदयामयी नापीने,गपत सुकोमल रीति ॥ पितृव्य तापस झपि प्रत्ये, प्रतिबोधनो धरी प्रीति ॥ ॥ ॥ ढाल बढारमी ॥ श्रासपरा जोगी ॥ ए देशी।। ॥ देवी थानक गइ हवे तिहा रे, नरपत्ति चित्त विचारे रे ॥ जिनशासन रसीयो ॥ निनवचनें थापु एह तपसी, निम न पडे फरी लपसी रे ॥जि. ॥ १॥ तेणें मारग चास्यो नरपात, तिदा पोहोतो परम दयाल रे॥जि० लोक सगुने दूर करावे, नरपति पासें नावे रे ॥ जि० ॥२॥ पादरपी नब रहित नूपाल, कांयक नमतो नाल रे ॥ जि० ॥ धर्म स्वरूप हु तुमने नासु, तेहमा खलखच न राखु रे ॥जि॥३॥धर्मनु मूल दया ने सपले,पटदर्शना पग पगले रेजि सवि सपद सुख हेतु एह,कही वेद पुराणे जेह रेजि पातेद दयाशं तप नप करीयें,तो नवसायर तरी रे॥जी॥तक्ताददातु वान विदधातु मौन,वेदादिक चापि विदा करोतु ॥ देवादिक घ्यायतु सतत वा, न चेहया निष्फलमेव सर्व ॥१॥न सा दीक्षा न सा निक्षा, न तहान न त तप ॥ न तच्चान न तन्मौन, दया यत्र न विद्यते ॥ २ ॥ पूर्वढाल ॥ एद वया सवि धर्मनु मूल, ते विण सवि ने प्रतिकूल रे । निमा ५॥ मुख सप लानुं साधन तात, जे जगमाहे विख्यात रे ॥ जि० ॥ एह क्या जेहनें चिच थावी, तस नय नवि दोये जावी रे ॥ जि० ॥ ६ ॥ यत ॥ रुपानदी महा तीरे, सर्व धर्मास्तृणांकुरा ॥ तस्यां शोषमुपेताया, कियन्नदति ते चिरं ॥१॥ ढाल ॥ नाणे जीव यजीव स्वरूप, तव पाले दया अनुरूप रे ॥ नि०॥ तमुक्त ॥ जो जीवे विवियाणाश्थनीवे विवियाण ॥ जीवाजी वियाणतो, सोनु नादि ३ संजम ॥ १ ॥ पूर्वढाल ॥ जीवाजीव स्वरूप न जाणे, केम दया पाले बजाणे रे ॥ जि॥ ॥यत ॥ जो नीवेवि न यारो, थजीवेवि न याप॥ जीवा जीवे अयाणतो,फद सो नादि इसजम ॥१॥ ॥ ढाल ॥ जो जैनागम होय थल्यास तो, दोय सदगुरु पास रे ॥जि०॥ ते विण एह दयानो थंश, नविश्रावे सत्तट होये ब्रश रे॥नि ॥ ॥ निधि श्रौषधि मणि पगपग वाण, कोइ सिमपुरुष म जाण रे ॥ नि०॥ तो ते हाथ थावे सुख पावे, नहिं तो महेनत सवि जावे रे ॥जिण॥ ए॥ जैनागम गुरु विण धर्ममूल, केम पामीनें श्रनुकूल रे ॥ जि० ॥ ते बागम थाप्तनो उपदेश, थाप्त तेथरिहंत विशेष रे । जि॥ १० ॥ यत ॥ यागमाचाप्तव नवम खम ३५ए चन, थाप्त दोषक्ष्यादिड ॥ वीतरागोऽनृतं वाक्प, न ब्रूयाक्षेत्वसनवात् ॥ ॥ पूर्ववाल ॥ विण थाधार थाधेय न होय, गुरु विण बागम नही कोय रे ॥ जि० ॥ ज्ञान क्रिया सयुत गुरु जाणो, जिनवचन सम को न पीबाणो रे ॥ जि० ॥ ११ ॥ ज्ञान दर्शन चारित्र दे जेहमा, वली देव गुरु धर्म एहमा रेजि०॥ नावथी दोय एत्रिक धाराधे,तव केवल ज्ञानने साधे रे ॥जिना ॥१२॥ योग ते एद व्या जे पाले, दया विण योगर्ने गाले रे ॥जी॥ नागो रहे वली शिर मुमावे, मौन धरे वली राख लगावे रे ॥ १३ ॥ वाकला पहेरे जटानें धरावे,करे स्नान थग्निहोत्र थावे रे ॥जि०॥ कद मूल वली क रे थाहार, मृग प्रमुख चर्म वली धारे रे ॥ जि०॥ १४ ॥ वली पाखम क रे थधिकेरा, पंचाग्निप्रमुख बहुतेरा रे ।। जि०॥ चांायणाधिक तप बहु तपतो,ध्यान नियमने नाप ते जपतो रे ॥ जि०॥ १५ ॥ देवार्चन वेद था गम नणतो, श्रातापना क्लेश न गणतो रे ॥जि० ॥ एकादशी मुख व्रत थाचरतो, सन्यास प्रमुख थादरतो रे ॥ लि ॥ १६ ॥ नूमिशयन वली विद्या साधे, वौधादिक दीक्षा थाराधे रे ॥ जि० ॥ दया विना सवि फोक ट जाणो, एदमा सदेह न थाणो रे ॥ जि ॥१७॥ तात दया पालोन लीरीते, दया सर्वधर्मने जीते रे ॥ जि ॥ पंचाग्नि तपमा नही लेश, दया केरो कां प्रवेश रे ॥ निः॥१७॥ नवमे खमें थढारमी ढाल, कहे श्री गुरु उत्तम बाल रे ॥ जि०॥ ऋषिनें श्रीजयानद नूपाल, केहवा करे जिस प्रतिपाल रे॥जिए। सर्वगाथा ॥ ५१५॥ ॥दोहा॥ ॥ तातजी सुणो पूरव दिशे,काष्ठमा बलतो नाग ॥ दक्षिण दिशि सरडो बले, धर्मनो केहो लाग ॥१॥ जू पश्चिमदिशि काष्ठमा, उदेदी सहार ॥ सत्तरदिशि बद्ध देडका, बतलावे निरधार ॥२॥ नू जल वायु थनल वली, वनस्पति सद्गु जीव ॥ हेतुदृष्टांतें साधतो, श्रीजयानद समीव ॥२॥ ते का रण हे तातजी, तत्त्वातत्त्व विवेक ।। करनारा तुमें पूज्य बगे, दिसा न घटे नेक ॥ ॥ इत्यादिक सुणी रायना, वचन विचार पवित्र ॥राजपि ज य बूजीया, श्रीजयवात विचित्र ।। ५ ॥ थादेय वचन तणा धणी, वयण न निष्फल होय ॥ मेघधारा अमृत तणी, निष्फल कदिन जोय ।। ६ ।।

३६० जयानंद केवलीनो रास. ॥ ढाल गणीशमी ॥ नमो नमो मनक मदा मुनि । एदेशी ॥ ॥ श्रीजयरान झपि हवे, धुरथी पण वैरागरे ॥ नवनमणे दवेगीया, वली नृप वयणनो लाग रे ॥१॥ धन धन ए तापस ऋषि।। ए थांकणी॥ शुवधर्मनु मूल है, समफित घरे निज थंगें रे ॥ तापस पणू हवे जमीने, चारित्र मन करे रगें रे॥ध॥ २ ॥ तावत कोई नर श्रावीने,श्रीनयानद में नासे रे ॥ गुरु थाव्या उद्यानमा, तव नृप एम प्रकाशे रे ॥३०॥ ३ ॥ कोण गुरु कोण थानकें, तव उत्तर कहे तेह रे ॥ पूर्व उद्याने चपकवने, पाठ धावा गुणगेह रे ॥ध ॥ ४ ॥ सरि धागमसागरू, नाम तेहयो परि णाम रे ।। पांचशे मुनिवरें परिवस्खा, उतना निर्जीव ठाम रे ॥ध० ॥ ५॥ विजयराजपि साथ वे, जे तपना करनार रे॥ वचन सुणी नृप हरपियो, कुद ज्यु मेघनी धार रे ॥ध ॥ ६॥ विपुल दे तस दाननें, नगर मांडे को जाण रे ॥ यतेवर पुर जन प्रत्ये, गुरु श्रागमनु नाण रे ॥ध०॥ ७॥ तापस शपि श्रागल करी, श्रीजय तापस नाम रे ॥धन्यलोक साथे थया, जोवा वात वदाम रे ॥१०॥ ॥ सर्व शशि परिवस्था, नृप शोना जेम ३६ रे ॥ गुरु देखीने साचवे, पचा निगमनो वृद रे॥५०॥ ॥ वदन विधि सवि लालवी,त्रण प्रदक्षिणा देई रे ॥ सूरि वदी वली वांदता, विजयादि क मुनि के रे ॥ध ॥ १०॥ स्तुति करी श्रीगुरु राजनी, वेसे निज निन थान रे ॥ पितृव्य सहित राजा प्रत्ये, करे धर्मलाननु दान रे ॥ध ॥११॥ वेशना सरस सुपा रसें, मेघ धारा परें वरसी रे॥ नव्य वक्ष विकश्वर करे, गुण नवपमव फरसी रे ॥ ५० ॥ १३ ॥ केशक देशना सनिली, सम्यग् दर्श न पामे रे ॥ देश विरति के यादरे, कश्क मादाव्रत कामे रे ॥३०॥१३॥ केशक समकेत व्रत लिये, तपसी श्रीजयराय रे ॥ वैरागें चारित्र थावरे,म होत्सव करे चक्रीराय रे ॥ध ॥ १४ ॥ गुरु वयरों जय मुनिवरु, विज पमुनीश्वर पासें रे ॥ ग्रहण वासेवना बेद्ध प्रत्ये, शिक्षा निस्य अभ्यासे रे ॥ घ० ॥ १५ ॥ गुरु तेम तात काका प्रत्ये, रानपिमा वडेरा रे ॥धन्य वाली मुनिराजना, घरण नमे सझकेरा रे ॥ ५० ॥ १६ ॥ परिकर सहित घरें गया, प्रण खम राज्य पाले रे॥श्वातम परें प्रजा पालतो,सर्व अमर्थने टाले रे ॥१॥१॥ दमदेवे अन्यायीने,न्यायवतथीरीजे रे ॥ तात पितृष्य संचारतो,यविरतिथी मनस्वीजे रे ॥१०॥ १७॥त्रण पर्ष निल अवसरे, ,

नवम खम
३६१
साचवतो नित्य नित्य रे॥ राजगुणें राज्य पालतो, नीमकात वडचित्त रे ॥
आपापा यत ॥धर्मार्थकामेषु मिथो, व्यावाधा परिहत्य य ॥ प्रवर्तते
कृतीशच, तस्य लोकश्यं शुनम् ॥ १ ॥ पूर्वढाल ॥ मुख्यफल नावथी बढु
सुखी, व्यथी सतति होय रे ॥ पुत्र एक लद तक्ष्ण धरा, बट्ठ कलावत
ते जोय रे ॥ध॥ २०॥ शास्त्र बहु नाण यौवन लह्या,सत्यसधा शूरवीर
रे॥ ॥ मुगुण मतिवत माहाशय धणी, प्रगुण थाचार महाधार रे ॥धण॥१॥
लोकप्रिय तात थाणा करे, देश पुर गामने नाम रे ॥ प्रौढ नृपकुलनी क
न्या वस्या, जैनशासनी अनिराम रे ॥ध ॥ १२॥ महापराक्रमी विनयी
घणा, करे क्रिया जेद निष्पाप रे । तातनता ने न्यायी वली, करे
नो जाप रे ॥ध ॥ २३॥ जिनवर पूजना नित्य करे, जुजबल जास अन
त रे ॥दय गय सैन्यशं परिवस्या, कोश नमार नरत रे ॥ध ॥ २४॥ नू
धर धीर गनीर ते, रूपथी जीत्यो अनग रे ॥ शशिपरें कीर्ति बहु उजली,
रुतगुण जाण शुन सग रे ॥५०॥ २५ ॥ शत्रु उपर थति क्रूर ते, धाण
चाले घणी तास रे ॥ बहु प्रतापी परिवार थति, सार सस्थान वली जा
स रे ॥ध० ॥ २६ ।। श्रीजयानदना पुत्रनी, शदि वरणवी कही जेम रे॥
खम नवमे गणीशमी, ढाल पने कही प्रेम रे॥॥॥सर्वगाथा५४ ॥
॥ दोहा॥
॥ शतधनु संचि देहडी, सोवन वर्ण शरीर ॥ सूर्यपरें तेजें तपे, समुह
परें गनीर ॥ १॥ लाख पूर्व टोय थाखु, रोग रहित थाणद ॥ राज्य स्व
र्ण
मुशधरे, न्याय माणिक सुखकद ॥ २ ॥ चश्परें कुवलय प्रत्ये, करतो
नित्य विकाश ॥ तम रानु जस नवि ग्रहे, पसरे नित्य प्रकाश ॥३॥ सदानी
कल्पवृक्ष परें, सुविधि नाथ जिनराज ॥ तेदनु तीर्थ प्रनावता, श्रीजयानद
माहाराज॥दानममप पगपग करे, तिहां दीये दान थपार ॥ दीन शनाय
कोडयो गमे, सतोपे तेणी वार ||५|| स्थान शयन परदेशीनें, निपजावे
बद्ध
राय ॥ जिनप्रासाद घणकरे,पुण्यराशि मानु थाय ॥६॥ ते पण गाम गामें
करे,नगर नगर गम गम॥ कोडयो गमे ते जरावतो,जिनप्रतिमा शुन काम
॥७॥ तास प्रतिष्ठा करे वली,थापे देहरा महि ॥ पूजाविधि नित्य साचवे,ध
रतो थग उन्चाहें ॥ ७ ॥ ग्रास ग्राम दीये देहरे, पुष्पवाडीयो चग ॥
वावि प्रमुख चैत्य कारणे, तृप दीये घरी उतरग ।। ए ॥ ५५६ ॥

३६२ जयानंद केवलानो रास ॥ ढाल वीशमी ॥ सादेवा मोतीडो हमारो॥ मोहना मोतीडो० ॥ए देशी॥ ॥ एक दिन राज्य सना नृप जोडी, श्रवर नूपाल रह्या कर जोरी ॥ साहेवा विनति सुपो मोरी, मोहना दिनति ॥ करकज नोडी कहे वनपा ल, सानलजो मुज वात रसाल ॥ सा० ॥ १ ॥ गुरु थागमने वधावु राय, नृपमन अधिक प्रमोद ते थाय ॥ विमलमति राना कहे एम, कोण गुरु किदां से कहो जेम ॥ सा० ॥ २ ॥ वनपालक कहे सुणो नूपाल, गुरु गुणसायर पटकाय पाल ॥ महिमा जेहनो को न लाय, जगतमाहे गुण जास गवाय ॥ सा० ॥३॥ नाम देता निद थाये पवित्र, त्रिनुव नमा अभुत चरित्र ॥ नामथकी 5 ख विलये जाये, गुण सखमी जस तनु नवि माय ॥ सा ॥ ॥ अवधिज्ञान मोक्ष्यी थधिकेरु, प्रतिपाति नदि तेह नलेरु ॥ बहु साधु सेवे जस चर्ण, निरतिचार पाले जे चरण ॥ सा ॥ ५ ॥ पृथु उद्यानमा निरवद्य नाम, थवग्रह मागी रह्या गुणधा म ॥ रानझवि चक्रायुं नामें पाठ धाया ने मुज थारामें ॥सा ॥ ६ ॥ सूरि तेजें सूरज छिपे, शांति गुणे शशीनी परें दीपे ॥ लब्धि थनेक निधान मुषिद, प्रणमे सुर नर नारीवृद । सा॥ ॥ पुर पुण्य होये जो अतोल, तो दर्शन थाये एथमोल ॥ महाक यावी मनरगें, प्रणमो ते गुरु थति सबरगें ॥सा ॥ ॥ सांजली विकसे नृप रोम राय, थग थानूषण वस्त्र थ पाय ॥ पडद वजडावे नयरमां नूप, चालजो गुरु वदन करी चूप ॥सा॥ आए। करी सामग्री समय नरिंद,सैन्य सामत प्रजानां वृद ॥ वानित्रनादें ग गन ते गाजे, नृप धारोहे पटगज राजे ॥ सा ॥ १७॥ वीजाये चामर श शि परें श्वेत, बत्र वारे थातप नूनेते ॥ नीकलीयो गुरुवयन हेते, राणीयो सक थ दवे तेते ॥ सा० ॥ ११॥ रतिसुवरी विजयादिक राणी, सहस्रग मे दुश् सपराण ॥ निकले ते निज निज परिवारें, नृप पू बहु दर्षनें धारे |प्ता०॥१२॥ सद्गुरु दर्शन दी जिदारें, गजवरथी उतरे नृप तिहारें ॥ पंचानिगम साचवे राय, त्रण प्रदक्षिणा दीये तेण गाय ॥ सा ॥ १३ ॥ विनय नन धरिय विवेक, वदना करे नथतिरेक ॥ विद्याचारण प्र मनां धोरी, वदे गुरु निजपाप विजोरी ॥ सा०॥ १४ ॥ दीये धर्मलान म हालानकारी, श्रीनयानदने वद वर्षकारी ॥ श्रीजयानद पण विकसित व यणे, गुरु सन्मुख जोड रसनर नयणें ॥ ता० ॥ १५॥ गुरुस्तवना करेक नवम खंम. ३६३ रकज जोडी, पाप तणा परपचनें तोडी ॥ थनुक्रमें बीजा पण राजान,प रजा यंतेतर परधान ॥ सा ॥ १६ ॥ हर्षे प्रणमी स्तवना करता, नक्ति घणी मनमविर परता। गुरुमुख वागल श्रीजयानद, वेसे धरतो परमानद ॥१॥ उचितस्थानक निज निज सद्ध वेसे, जेम गुरु वयणां हृदयमा पेमे ॥ सुर असुरां नर पर्पद देखी, देशना दीये नव्य जीव गवेपी ॥ सा ॥१॥ नवमे खमें वीशमा ढाल, श्रीजयानदने रास रसाल ।। पद्म कहे मुपो वा ल गोपाल, श्रीगुरुथी होये मगलमाल ॥ सा०॥ १५ ॥ सर्वगाथा ॥५४६॥ ॥ दोहा॥ ॥ देशना नवनी नाशिनी, साधारण दीये तोय ॥ श्रीजयानद वदेशि में, प्रारंने गुरु सोय ॥ १ ॥ कीराव लब्धं करी,देवा नृप प्रतिबोध ।। पूर वनव कही दाखवे, थाप तणो सवध ॥ २ ॥ ॥ ढाल एकवीशमी ॥ निडी वेरण दुई रही ॥ ए देशी ॥ ॥ धारामिक नवे प्रनु तणी, पूनानां दो फल पाम्यो सार के ॥ राजप साद घणो थयो, दोय नारी हो तिहां प्राण थाधार के ॥ १ ॥ जिनपूजा फल सनिलो ॥ वलीव्रतदाने हो फस दोय धनत के, पठो मतिसुदर तु थ यो, मत्रीसर दो माहारो गुणवत के ॥ जि०॥२॥ पूरवनवनी दोय प्रिया, ए नवा दो थइ ताहरी नार के ॥ यतिबल राजझपिकनें,थरिहतनो हो लह्यो धर्मप्रकार के नि॥३॥ दोय प्रियाशु थाराधीयो, तुमें त्रण नए हो तिहाथी थया देव के ॥ तिहाथी चवीने तु थयो,त्रण खमना हो न न करता सेव के ॥ जि ॥४॥पूरवनव पत्नी थई, रान कुलमा हो कन्या रूपवत के ॥ ते तुल रतिमुदरी तथा, विजय सुंदरी दो सती मदाशीलवत के नि॥५॥तु नरवीर नृपति तणणे, मतिसुदर हो मत्री निरमाय के ।। धर्म पमाढयो रायनें, स्याहादें दो नारख्यो जिनराय के॥ जि ॥ ६॥ध में श्राराधी सुर थयो, तिहाथी चवी हो चकबल नूपाल के | तस सुत च कायुम थयो, द नरपति दो दोय श्रेणीप्रतिपाल के ॥ जि० ॥ ॥ राज्य जोगवं दोय श्रेणीनु,तु जीत्यो हो तेणे थाव्यो वैराग्य के ॥ चार ज्ञानयी विशेपशुं, उपन्यो वती दो थयो चारित्र लाग के ॥ जि० ॥ ॥ नारी प्रयो लने तुजनें, बौधीने दो खेपव्यो कारागार के ॥ पूर्व तेणें तें मुन प्रत्ये, बांधीन हो काठ पिजर मकार के । जि० ॥ ॥ बंधन माहेथी काढीयो, ३६२ जयानंट केवलोतो रास ॥ ढाल वीशमी ॥ सादेवा मोतीडो हमारो॥मोदनां मोतीडो० ॥ए देशी। ॥ एक दिन राज्य सना नृप जोडी, अवर नूपाल रहा कर जोरी ।। साहेबा चिनति सुलो मोरी, मोहना चिनतिः ॥ करकज नोडी कहे वनपा ल, सोनलजो मुज वात रसाल ।। सा० ॥ १ ॥ गुरु थागमनें वधावु राय, नृपमन थधिक प्रमोद ते थाय । विमलमति राजा कहे एम, कोण गुरु किहां कहो जेम ॥ सा० ॥ २ ॥ वनपालक कहे सुणो नूपाल, गुरु गुणसायर पटकाय पाल ॥ महिमा जेदनो कह्यो न जाय, जगतमाहे गुण जास गवाय ॥ सा० ॥३॥ नाम देता जिद थाये पवित्र, त्रिव नमा अनुत चरित्र ॥ नामथकी 5 ख विलये जाये, गुण लखमी जस तनु नवि माय ॥ सा० ॥ ४ ॥ अवधिज्ञान मोक्ष्यी थधिकेरु, प्रतिपाति नहिं तेह नरु ॥ बहु साधु सेवे जस चर्ण, निरतिचार पाले जे चरण ॥ सा ॥ ५॥ पृथु उद्यानमा निरवद्य गम, थवग्रह मागी रह्या गुणधा म ॥ रानझवि चक्रायुं नाम, पाठ धाया में मुज थारामें ॥सा० ॥ ६ ॥ सूरि तेजें सूरज छिपे, शांति गुणे शशीनी परें दीपे ॥ लब्धि थनेक निधान मुषिद, प्रणमे सुर नर नारीवृद ॥ सा॥ ॥ पुर पुण्य होये जो अतोल, तो दर्शन थाये एथमोल ॥ महार यावी मनरगे, प्रणमो ते गुरु थति बरगें ॥ सा ॥ ७ ॥ सोनली विकसे नृप रोम राय, थग थानूषण वस्त्र थ पाय ॥ पडद वजडावे नयरमा नूप, चालजो गुरु वदन करी चूप ॥सा॥ ॥ए॥ करी सामयी समय नरिंद,सैन्य सामत प्रजानां वृद ॥ वानित्रनादें ग गन ते गाजे, नृप थारोहे पटगज राजे ॥ सा ॥ १७॥ वीजाये चामर श शि परें श्वेत, बत्र वारे श्रातप नूनेते ॥ नीकलीयो गुरुवदन हेतें, राणीयो सन थ दवे तेते ॥ सा० ॥११॥ रतिसुदरी विजयादिक राणी, सदस्रग मे दुश् सपराण ॥ निकले ते निज निज परिवारे, नृप पू- बहु हर्षनें धारे सा०॥१॥ सद्गुरु दर्शन दी जिदारे, गजवरथी उतरे नृप तिहारें॥ पंचानिगम साचवे राय, प्रण प्रदक्षिणा दीये तेण गाय ॥ सा० ॥१३ ॥ विनय नम्र थ धरिय विवेक, वदना करे नक्तं अतिरेक ॥ विद्याधारण श्र मणनां धोरी, वदे गुरु निजपाप विबोरी ॥ सा ॥ १४ ॥ दीये धर्मलान म दालानकारी, श्रीजयानदने बढ दर्षकारी ॥ श्रीजयानद पण विकसित व यणे, गुरु सन्मुख जोइ रसनर नयणें ॥ सा० ॥ १५॥ गुरुस्तवना करे क

नवम खंम.
३६५
उष्टातमा, पामे
थरिदत धर्मे विशेप ॥ धर्म नामें थमरप धरे,अधर्मनो उपवेश ॥३॥थ
धर्म पपाता वली, तें कस्लोवद्व उपकार ॥ तोपण क्षेप घरे घणो, पूर्व वैरें
सिहसार ॥३॥ तुज चटु ग्रही एणे यदा, ते दिनथी करे पाप ॥ थान लगें
बहु सताप ॥ ५॥ पुण्य पाप फल व्यक्तिना, हेतु पुरव नव
जाण ॥ धर्म उद्यम करवो तुमें,जेह सदा सुख खाण॥६॥शुम धर्म थापण
बेगु, धाराधि शुनरीति ॥ पुण्यानुवधी पुस्य थी,
जोगवायें
मुख
नित्य ॥॥
॥ सनिली नृप मौनज रह्या, कण एक करे विचार ॥ पूरव नव थालोच
तां, विस्मय लह। अपार ॥ ॥ श्रीजयानद प्रमुख सवे, लघुकर्मा ते जी
व ॥ जातिसमरण पामीया, थावरण गयां थतीव ॥ ए॥ ६ ॥
॥ ढाल वावीशमी ॥ कठमारा थाया गुरुनी प्रादुणा ॥ ए देशी ।।
॥श्रीजयानदजी एम नणे, प्रलु तुम वचन प्रमाण ॥ तुम वयणे
मुज उपन्युं, जाति समरण नाण ॥१॥ महारा ज्ञानी गुरुजी, वाणी
मुणी में अमृत सारिखी ॥ ए थांफणी ॥ जेम तुमें नारख्यु तेम लयु,
वती नमे गुरुना पाय ॥ कर जोडीने विनवे, स्वामी करो सुपसाय ॥
मा॥॥ तात पितृव्य स्वामी माहारा, वीवादिनथी वात ॥ शी शी बनी
कहो धागले, सघलो मुज अवदात ॥ मा० ॥ ३ ॥ मोक्ष जाय तिहां लगें
कहो तव गुरु कहे मुणो राय ॥ गुरु साथै दीक्षा लेई, विचरे ते मुनिराय
॥ मा० ॥ ४ ॥ वार वरस लगें कीघलो, शिक्षा दोय अभ्यास ॥ ज्ञान किया
दोय शिखीया, जिन शासन शुनवास ॥ मा० ॥ ५ ॥ निरतिचार चारित्रि
या, विचरे मदियल मांद ।। वोध करे नवि जीवनें, शुरू कियानो उत्साह
॥ मा० ॥ ६ ॥ गुरु थाणा नित्य पालता, गुरुनी करे थति जति ॥ बाल
वृक्ष मुनिवर तणु, वैयावञ्च यथाशक्ति ।। मा० ॥ ४ ॥ तप करता यति
आकरां, वली ते शम दमवत ॥ राग देष वर्जित मुनि, नि स्टदने गुण
वत ॥ मा०॥ ७ ॥ निर्मम ने कदायह नही, सघले थप्रतिबध ॥ सत्तावीश
गुण साधुना, पाले ते नि ॥ मा०॥ ए॥ परिसद उपसर्गे कदा, न चले
ते तिल मात ॥ दृथिवीने पावन करी, पाली प्रवचन मात ॥ मा०॥१॥
श्रणसण करीय समाधिमां, सनत कुमार माहिद ॥ देवलोकें सात धयर
ने,थधिक पाउखे दोय इद ॥ मा० ॥ ११॥ मुख जोगवी ते शश्नां, मा
हाविदेह ममार ॥ निन्न निन्न देशे थो, नरपतिनो अवतार ॥ मा० ॥१॥

. ३६४ जयानंद केवलीनो रास. पूरवनवें हो तुजनें ततकाल के ।। उपकारी तुन जाणीने, पद्ध मान्योरो धरी प्रीति विशाल के ॥ जि० ॥ १७ ॥जेणें तें मुनने हा मूकीयो, राप कन्या हो दोधी घणी प्रीति के॥थापणन नित्य वापती, नवी संघे हो कोई कर्मनी रीति के ॥ जि० ॥ ११ ॥धर्मोपकारने कारणे, घाव्यो दु हो वली सनिलो वात के ॥ राय मत्री नवे श्रापणे, श्रावकनो हो कसो धर्म विख्यात के ॥ जि० ॥ १२ ॥ कल्पवृक्ष समो धर्म ते, गुचनावें हो या राध्यो ताम के ॥ राज्य सपद प्रवली नयां, नोग सुख लह्या हो एणो परें श्रनिराम के ॥ जि०॥१३॥ अतिशय श्रमा तुज दती, तेणे अतिशय हो लह्यो मुनथी कधि के ॥ कर्मथी को बलीयो नदी, तेम धर्मथी दो पामे सवि सिदि के ॥ नि ॥१॥ नेत्र गयां के मुजे नही, इत्यादिक हो पूरव नवें जेद के ॥ तें मुनिने नाख्यं हतु, तेणे थांख्यो हो गई एवं नव एड के ॥ जि ॥१५॥ पहेलीयें कुल निदा करी, बीजीये का हो निभने यो अध के ॥ वेश्याकुळे वीजी अध थई, वली निसनो हो पामी सवध के ॥ ॥ जि० ॥१६॥ पश्चात्तापयकी वली, कर्म खपीयो हो रह्यो कांक अझ के ॥ तेणे इण नवें उदय थयो, नोगव्या विण दो नही कर्मनो नृश के ।। ॥ जि० ॥ १७ ॥ सिहनो नव दवे सांनलो,पुरोहित मुन हो वसुसार जे द्रुत के ॥ नास्तिक धर्म शिरोमणि,में दीधु दो थपमान अत्यंत के ॥जिए ॥ १७ ॥ काढी मूक्यो देशथी, नवमांदे दो नमीयो बबु काल के ॥ परिवा जक थयो कोई नवे, ययो ज्योतिषी हो सुर प्रेम विशाल के ॥ जि० ॥ ॥ १५ ॥ बद्नव जमीयो तिहाथकी,तुन पितृव्य दो सुत थयो कुमार के। पापानुबंधी पुरस्य थी, थयो महोटो हो नामें सिहसार के ॥ नि ॥२०॥ ते पुरोहितने एम कर्पु, धमालनो दो श्यो फरवो सग के ॥ तेणें तुज को पदीयो एणे,चमालनो हो नवि कर्मनो भंग के॥ जि॥१॥ नवमे व में ए कही, एकवीशमी दो वर प ढाल के ॥ कर्म म करनो को सही, कर्मे करी हो होये बहु जंजाल के ॥ जि० ॥ २२॥ सर्वगाथा ॥ ६०० ।। ॥दोहा॥ ॥ नास्तिक धर्म प्रव कयो, तेणे ययो कर्म जमाव ॥ दोष नसो नि र्गुण थयो, मायी कूर वनाव ॥ १॥अन्यायी निर्दयी घणो, झोपीने नि नांग। लोनी पी थाकरो, पापमसिनो जागा।शापर्म देपी निरंकुश वली,

नवम खंम.
.
३६०
॥ ढाल वीशमी ॥थादर जीव क्षमा गुण थादर ॥ ए देशी॥
॥ चक्रायुध सूरि कहे सोनलो, सिंह तणो यवदातज। ॥ पाप करीब
द्व व्यसनने सेवी, अशुन ध्यान दिन रातनी ॥ च० ॥१॥ किदायक
चोरीमा पकडायो, मरण लह्यो तेणी वारजी ॥ पाप तणां फल कडुथांना
णी, पाप न करशो किवारजी ॥ च ॥ ॥ सातमी नरकें घोर पापथी,
उपन्यो थापद गाजी ॥ महादु ख सागर जोगवतो तिहां, बावीश थयर
प्रमाणनी॥ च ॥३॥ तिहाथी नीकली मत्स्यादिकना, श्रतरे नव करी ए
मनी ॥ साते नरकें वार धनती, उपन्यो नदी कहीं खेमजी ॥ च ॥ ४ ॥
सर्व तिर्यचर्ने देव दीणामा, तेम दुष्ट नरकमां जायनी ॥ वार थनति फरी
फरि नमशे, पाप तणे सुपसायनी ॥ १० ॥ ५ ॥ एणी परें पाप विपाक
थाकरो,नव धनत दु खदायजी॥ तास दृष्टात ए सिदनो नारन्यो, कर्म कस्खा
नवि जायजी ॥१॥६॥ एम जाणीनवि पाप न कीजें,पुस्य मारग श्रादरी
यनी॥जेहथीनवड ख राशि न लहीयें वहेलु शिवमुख वरीयेंजी ॥७॥॥
तुज साथै जे दीक्षा लेशे, थंतर रिपु जय करताजी ॥ तुजप्रिया तुज सेवक बी
जा, नरपति पण व्रत वरतानी ॥१०॥७॥ खर्गादिका सुरसुख लेदीने, महा
विदेद उपजशेजी। उत्तम चरण पाली ते सर्वे,अल्पनवें शिव लहेशेजीच
॥ ए॥ एह सर्व जे तुजने नारव्यु, ते मुज बुधे न जाणोजी ॥ पण दु विहर
मान जिन वदन,मादाविवेदनें वाणोजी ॥च॥१०॥ तिहाँ श्रीमर किणि नग
रीयें, जिनवर करे व्याख्यानजी ॥ नव्यजीव प्रतिबोधन कारण, जेने सद्ध
ये समानजी ॥ १० ॥ ११ ॥ देशनामां तुज चरित्र वर्णव्यु, प्रजुनीये करी
विस्तारनी॥धुरथी मामीने जे नारख्यो, ते में सुस्यो थधिकारनी ॥ १० ॥
॥१॥ अवधिझाने में जास्यो गुतो, ए सघलो वृत्तांतजी ॥ दायिक ज्ञानीनी
वली साखें, दृढता थ दृष्टांतजी ॥ च ॥ १३ ॥ तुजने प्रतिवोधन हु था
व्यो,तें मुज कसो उपकारनी॥ पूरवनवें जिनधर्म पमाडपो, तेहनो प्रत्युप
कारनी ॥ १० ॥ १४ ॥ तुननें ए ससार थसारथी, तारवा थायो जाणी
जी॥ देव देशना नवनय दरणी, सनिल तु मुज वाणीजी॥ च० ॥ १५ ॥
नवमे खमें ढाल त्रेवीशमी,श्रीजयानदने रासनी ॥ पद्मविजय कहे सांगतो
नविनन, सुणतां लीनविलासनी ॥ १० ॥ १६ ॥ सर्वगाथा ॥ ६५८ ॥

-
जयानंद केवलीनो रास.
प्रौढराज्य तिहां पासता, लेशे सयम नार ॥ केवल लही मुकत जशे, सा
श्वत शिव सुख सार ॥ मा० ॥ १३ ॥ सानली म्ररि मुखथकी, तात पित
ध्य विरतेत ॥ हरप लही प्रणमी करी, नरपति वली परत ॥ मा० ॥१४॥
महारु तेम सिहसारनु, तेम मुज नारीनु जेह ।। नवस्वरूप स्वामीनापीयें,
करीय प्रसाद मुज एह ॥ मा० ।। १५॥ दु नव्य के बनव्य दु, नव्य तो
इण जय सिदि॥ थथवा थागें नवांतरे,नाखो करी हित बुधि मा० ॥
॥१६॥ अथवा मुज प्रिया थादिके, केम सेहो निग्वाण ॥ अथवा नही
जाये ते कहो, सघनु मामि ममाण ॥मा॥ १ ॥ सूरि कहे सुणो नूपति,
तुज पत्ल्यादिक जेद ॥ थासन्नतिमि ते नव्य ठे, इतर अयोग्य कहेद
॥ माए ॥ १७ ॥ तेहमा तु तथा तादरी, नारीयो पूरवनी दोय ॥ तेम दुप
ए एणेहिज नवें, सहुनें शिवमुख होय ॥
मारा देश कणा लाख व
रसनो, केवलीनो पर्याय ॥ ज्ञान ठयोते जगतनें, तारता करी सुपसाय ॥
॥मा० ॥ २० ॥ एथिवीने पावन करी, चरणकमले चित्त लाय ॥ चोराशी
लख बरसनु, पाली मुनि पर्याय ॥ मा ॥ २१ ॥ सकल कर्मनो क्ष्य करी
वरशो शिववधू सार ॥ तु पण केवल लही करी, करी नव्यर्ने उपकार ।
॥ मा० ॥ २२ ॥ केश्क वर्ष विहरी करी, पामोश शाश्वत सुख ॥ सिहनी
वात दवे मुणो, जेम पामे यतिख ॥ मा० ॥ २३ ॥ नवमे खमें बावी
शमी, पन विजय कही ढाल ॥ श्रीजयानदना रासा, पुण्य थी मगलमाल
॥ मा०॥ ॥ सर्वगाथा ॥ ६॥
॥ दोदा ॥
॥ सिहसार पुर बाहरें, नीसरीयो ते जाम ॥नमतो एथिविमा फिरे, देश
नगर पुर ग्राम ॥१॥ वदर नरणने कारण, जिहां जिदा करतो वास ॥ तिहा
तिहां थावे यापदा,मूके मुख निस्सास ॥ ३ ॥ तिहां निछ परे वली, ते
हनु कारण एद ॥ ज्ञानी निमितिया वयणथी, जाणी निचले तेद ॥३॥
लोक कोप फरी एहनें, काठी मूके ताम ॥ सिह सेवे जे नूपने, प्रायें जाये
नमधाम ॥ ॥ लोक कहे पगला बुरां, एहना पीसे नाय ॥ शरण या
घार जे आपणो, मरण लह्यो जूठ राय ॥ ५ ॥ साउन तर्जना महु करे,
काढी मूके तास ॥ घोर पाप फल अनुनये, नवि पामे कहीं वास ॥ ६ ॥

नवमे खंम. ३३ ॥॥ क्षेत्र लहे कुल दोहखं, कुल पामे उत्तम जाति रे ॥ जाति लदे बुद्धि दोदिली,बढ़ जड जगमा विख्यात रे ॥व०॥ ए ॥ बुद्धि लहे गुरु दोहिला, जे निर्ममनें निरमाय रे ॥ गुरु पामे पण दोदिलु, श्रवणे सनिलवु थाय रे ॥१०॥१०॥ अन्यत्तीर्थी सेवे घणा, अथवा करे कानीया नगरे । धर्म मुल्यो गुरू सगतें, उर्जन प्रदानो रग रे ।। 5० ॥ ११ ॥ इव्य नाव अग नेदयी, सरधा तिहां इव्यथी जाण रे ॥ तत्त्वरुचि जिन वयणमा, य यपि परमारथ थजाण रे ॥ यः॥ १२ ॥ नावथी परमारथ लहे,अथवा वली दोय प्रकार रे ॥ निश्चयने व्यवहारथी, ६ देतु ते होये व्यवहार रे ॥ १० ॥ १३ ॥ ज्ञान दर्शन चारित्रना, निश्चयथी गुन परिणाम रे ॥ कारक रोचक दीपकें, ए त्रिविध नेद दोये नाम रे ॥ ए॥ १४ ॥ श्रा सम किरिया करे, ते कारक समकित होय रे ॥ गौतम प्रमुख तणी परें, तेतो दीसे विरला कोय रे ॥ ते ॥ १५ ॥ रुचि मात्रज अदा होये, जेम श्रेणिक प्रमुख नरिंद रे ॥ रोचक समकेत ते लहो, करणी विण जे नवि वृंद रे ॥ का ॥ १६ ॥ दीपक समकेत जाणीये, देशनादिकें दीप समान रे ॥ दीपे पण निजमा नही, होये थनव्य प्रमुख एणी वाण रे ॥ दो० ॥ ॥१॥ समकेत रोचक जो लहे, पण कारक थतिउलिन रे ॥ विषय कषायमा मुनीयो, वली पुत्र कलत्र थारन रे ॥व०॥ १७ ॥ यत ॥ मुरका निकखिस्स विमाण वस्त,ससार निरुस्त विधस्स धम्मे ॥न तारिसत्तरमछि लोए, जहिलि बाल मणोहरा ॥ १ ॥ ए ए थसग समक्कमित्ता, मुद्र तराचेव नवति सेसा ॥ जहा महासागरमुत्तरित्ता, नई नवेथ विगहा समा पाशा सम्म कामा विसकामा, कामा थातिविसोवमा॥कामा पछे माया, थकामा जति उग्ग ॥ ३ ॥ पूर्वढाल ॥ मुर्गति दायक काम जे, पंमित करे तेदनो त्याग रे ॥ जे कारण ग्रहीन होये, अनासकिय कामनो राग रे ॥ १० ॥ १५ ॥ ब्रह्मवती पर्वनें दिने, थन्यदिवस तणु परिमाण रे ॥ ती वामिलाप न तेदमा, एदवो दोये गृही घर ताण रे । ए० ॥ २० ॥ एम जाणी ब्रह्म थादरे, नदीतो स्वदारा सतोप रे । निजनरतार सतोपिणी,ना रीने एम व्रत पोप रे॥ना ॥२१॥ सर्वथकी ब्रह्म पाचरे, घर नार त्यनी यणगार रे ॥ शीलांगरथ मुनिराजनो, परिमाण थढार दनार रे ॥१०॥ ॥ ५५ ॥ करण योगें त्रिक नेदथी, थाहारादिकसहा चार रे ॥ इश्यि प 3 ३६० जयानट केवलीनो रास ॥ दोहा ॥ सुधा मुधा करे देशना, सांगली श्रीजयानद । कर जोरी विनय करी,विक सित मुख अरविद ॥१॥ निश विकथा वरनतो, निभा करे व्याघात ॥ नि का शवनी यानकी, कर्मवध पण यात ॥ २ ॥ निभावतने सङ हसे, जाग तो नर जेह ॥ साचु प्रायें नवि वदे, सानली न शके तेह ॥ ३ ॥ अमली परें ते धूणतो, न रहे काश् शुदि। उधे श्रुत उध्या तएं,जागता वाधे बुद्धि ॥४॥ उघण नर उटन समो,कटकमा मुख जाय ॥ शख ममप सम नि न वयण, मी ते उपाय ॥ ५ ॥ तेम विकथा वर्जी वली, जेदथी बट्ट जजाल ॥ नवननानु नोव रोहिणी, जेम पामी सुख जाल ॥ ६ ॥ विक याथी उध्यो नसो, नवि मोले व्याख्यान ॥ विकथा कारक महीष सम,ना रख्यो प्रगट प्रमाण ॥ ४ ॥ जया टांकामा नारखोयें, मूतर चलुक प्रमाण । विकया ते वितथा करे, वक्ता तणु वखाण ॥ ॥ तेमाटे तुमें मत करो, निशा विथा कोय ॥ एम सुणतां प्रमुदित होये, वक्ता श्रोता दोय ॥ए । ॥ ढाल चोवीशमी॥ हस्तिनागपुरवर जलो,जिहां पांसुराजा सार रे॥ ए देशी ॥ ॥ श्रीजयानदजी सोनलो, नरनव सही म करो प्रमाद रे ॥ फरि फरि नरनव दोहिलो, पामवो एम शास्त्र सवाद रे ॥ १॥ पामवो एम शास्त्र स वाद, सुणो नवि प्राणीयां, जिनवाणी रे ॥ जिनवाणी विन्नाण मलिक, क हे नविहित जणी, गुण वाणी रे॥ए थोकणी ॥ काय स्थिति अति जी वनी, पुढवी अपचनलने वाय रे ॥ असख्याती उत्सर्पिणी,रहे निन्न नि त्र एक काय रे ॥ रहे ॥२॥ वनस्पतिमाहे जो रहे, शनति सार्पणी थाय रे ॥ विति चसरिदिय कायमां, सख्यातो काल रहाय रे । स०॥३॥ पंघिश्यिमाहे जो करे, जव सात धात सलग्ग रे ॥ ससरतां बह 5 ख ज हे, नही सुख तयो संसग्ग रे ॥ न० ॥ ४ ॥ नव एकेक सुर नरकनो, एम जाये प्रमादमां काल रे ॥ त्रस पा थति दोहिलु, थावरमा रहे बड बा जरे ॥ या० ॥ ५ ॥ त्रसपणु लहे दोदिल्ल, पंचेंशियपणु जगसार रे ॥ विकश्यि बीसे घणा, दीण इडिय वली ससार रे ॥ दी० ॥६॥ पंचेंदि य लदो परवहां,पण उलेन मनु थवतार रे॥ मुर तिरि नरका बहु नमे, लड़तो तिहाइख अपार रे ॥ ॥ नरनव पामे दोदिलो, धारय खेत्रनो सवध रे ॥ म्लेवादिक दोसे घणा,बद्ध पाप करम करे बंध रेब नवम खंम. ३७२ रे ॥रा ॥२॥ याशिष वचन परजा तणे रे, नरपति वाघे दोलत घणे रे ॥रा ॥ तेणे परनाने तुमें पालजो रे, पूर्वजनी रीति थथालजो रे ॥ रा० ॥३॥ परजा नृपनें लोपे नही रे, नवि नृप परजाने कोपे सही रे ॥ राण ॥ परजा दानादिक जे करे रे,वजी धर्म महोत्सव बढ़ थादरे रे ॥रा ॥ ॥ इदिने जशथी परना वधे रे, वलीपर गुणे पण जे सधे रे ॥रा० ॥ तेम तेम नृपर्ने थापद घणो रे, परजा उपर प्रेमन पणो रे॥ रा॥॥ धन्य माने प्रना मुन एहवी रे, पुस्यवती प्रजा मुजनें हवी रे ॥ रा॥ ए राज्यस्थिरीनावें रहे रे, जस कीरति वित्त जगा लहे रे ॥रा॥ ॥ ६ ॥ वत्स राज्य पालनो एणीपरें सदा रे, जेम धर्म सीदाये नवि कदा रे ॥रा ॥ चिंतामणि परें उत्तम तयो रे, धर्म ते वीतरागनो जे कह्यो रे ॥रा॥॥ ते समकेतसार इलित दीये रे, वडबीज परें ते वपीजी ये रे ॥रा॥ शत शाखायें ते विस्तरे रे, इष्ट वयण वायुयें नवि फर फरे रे ॥रा० ॥ ॥ पुरमा सात व्यसन निवारनो रे, थकुता पुरमा म लावजो रे॥राणा देश पुत्रने शिक्षा एणीपरें रे, ते पुत्र सह अंगीकरे रे॥ राणाहवे स्वजन प्रधाननें पागीया रे,महेता मसुदी ने राजीयारे॥रा॥पूछे सगुनें नर रा जीयो रे,पुत्रपत्नीने गुणगण गाजीयोरे॥रा॥१॥प्रमुदित करी सह परजाप्र स्थे रे,करे महोत्सव दिन दिन वाधते रे॥राणा जिनवर चैत्य महोत्सव करे रे, थात दिवस लगें नवनव परें रे ॥रा ॥११॥ वजडावे पडद थमारिना रे, परराज्य माहे श्रीकारना रे ॥रा ॥ नक्कि करे साधर्मिक तणी रे, वस्त्र थाहार दानादिक थति घणी रे॥रा॥१२॥ पञ्चवोशमी नवमा खममा रे, ढाल नाखी रंग थखमा रे ॥ रा ॥ सुणो श्रोता पद्मविजय कहे रे, शासनरागी थानद लहे रे ॥ ॥रा ॥ १३॥ सर्वगाथा ॥ १३ ॥ ॥ दोहा ॥ ॥ शासन उन्नति जेम होये, तेदवां कार्य थनेक ॥ निज थातम हित कारणे, करता धरिय विवेक ॥१॥ ॥ ढाल बधीशमी ॥ टुक थने टोडावचे रे, मेंदीनां दोय रुख, मेंदी रग लागो । ए देशी ॥ ॥ श्रीजयानदना सुत जला रे,श्रीकुलानद नरिंद ।। सयम रंग लागो।। सामग्री थनिपेकनी रे, मेलवे उपकरण वृद ॥ स०॥१॥ विधिपूर्वक मज ३७० जयानंद केवलीनो रास. चनो जय फस्रो, एथिव्यादिक दशपद धार रे ॥ ॥ १३ ॥ जल चल न अनिल तरु, विकलेंश्यि वली त्रण द रे ॥ पंचेंडियने यजीव ए, र श नेदनो सयम वेव रे ।।द० ॥ २४ ॥ खात्यांदिक वश धर्मची, जोरता दो ये सहस थढार रे ॥ एहवा थढार र करी, गुण नरिया श्रीयणगार रे ॥ गु० ॥२५॥ते थणगार पणु धरे,नगा धन्य तस अवतार रे ॥ तस उपमान न जगतमा, जे सकल गुण। शिरदार रे ॥ जे० ॥ २६ ॥ इनमे चरणने, उत्कृष्टथी तेणे नव सिदि रे ॥ सात था जव नये न ही, ए समयमहि प्रतिम रे ॥ ए. ॥ २७ ॥ तेणे सयम लेवु घटे, हवे करी ससारनो त्याग रे॥ जनम मरणना जय टले, वरवा शिव मुंदरीता गरे॥ व ॥२॥थातम तत्त्वं रमण होये, परजाव प्रसग न कोय रे ।। चरण धरमना गुणयकी, चिदानद प्रगट कमें होय रे ॥ चि० ॥ १॥ ढाल चोवीशमी एणी परें, नवमे खमें सुरसाल रे ॥ पद्मविनय कहे धर्म थी, दोये घर घर मगल मात रे॥ दो० ॥ ३० ॥ सर्वगाया ॥ ६ए॥ ॥दोहा॥ ॥ चक्रायुध चारित्रीया, दीपो एम उपदेश ॥ रोम रोम मुणी हरपीया, श्रीजयानद नरेश ॥१॥ दान सुपात्रं दीधलु, पूर्व सस्कार ते पाम ॥ सफल थयो उपदेश ते,दोलत न गमे वाम ॥॥ वधतो थयो वैराग्य ते,पूर्व वैराग्य प्र माण ॥ पयमा साकर जेम पडे, समज्यो तेद मुजाण ॥३॥ चिस अयं था रित्रनुं कहे गुरुने किरपाल ॥ हितदेशक दित वाडकू, मुज हित का मया ज ॥॥ प्रसन्न थर शहां पडखीयें, जश्ने ईनिन धाम ॥ पुत्रने राज्य पा पी करी, थावुनु दु थाम ॥ ५॥ जव ठदवेग लह्यो जलो, राज्य न रीजे मन्न ॥ उत्सव इहां श्रावीनें,आदरें तुम्ह वासन्न ॥ ६ ॥ वक्षपणे वीक्षा य,तुमची पासें ताम ॥म करो विलब ए काममा,पर्मी गयो निजपाम॥॥ ॥ ढाल पश्चीशमी। मीग मीठु बोलीने शं रीजयो रे ॥ ए वेशी ॥ ॥ राजन मीतुं बोलीने सहरीजवो रे, रखे को प्रजाने खीजवो रे॥ ॥ रा० ॥ पुत्र थापे महामहोत्सव करी रे, शीखामण दीये नृप हित धरी रे । रा ॥ सदोवरनी परें पालजो प्रजा रे, मत करजो कोश्नी कूडी क जा रे ॥रा० ॥१॥ दूजे कामधेनुनी परें रे, जो मुखणी प्रना होये थिरपरें रे ॥ राम् ॥ नृपनें मार ए चालतो रे, सुस्वमा प्रजालोक मो माहालतो नवम खंम. ३३ परजाने पण तेणीपरें रे, धर्म करावे नूपाल ॥ सं० ॥ २० ॥ पग पग तात सनारतो रे, करतो तस वढु मान ॥ स० ॥ हवे श्री श्रीजयानवजी रे, गुरु साथै थसमान ॥ स० ॥ १॥ विचरे सयम साधता रे, विनय तणा नंमार ॥ स० ॥ सामाचारी शीखीया रे,गुरुपासें विधि सार स॥२॥ तिमहिज पोते याचरे रे, करे श्रुतनो श्रन्यास स॥ श्रनुक्रमें थोडा कालमा रे, ST दशांगधर खास ॥सण॥२२॥ नवमे खम बवाशमी रे,पद्मविजयें कदी ढाल ॥स० ॥ मुनिगुण मुणतां गायतां रे,होवे मगल माल ।स॥२॥३०॥ ॥ दोहा ॥ ॥ समितिपंच समिता सदा, गुप्ति त्रण थागार ॥ थप्रमादी अकिंचनी' थसगी थणगार ॥ १ ॥ साधुगुणणं शोनता,निर्ममनें निकषाय ॥ तप क रता थति तीव्र ते, निर्मदने निर्माय ॥२॥ श्रीजयानद सूरिपदें, गुरु थापे गनीर ॥ लायक नाना लब्धिनें, धरता साहस धीर ॥३॥ थाणा गुरुनी थादरी, पृथिवी करे पवित्र ॥ सूत्र नणावे साधुने, निरति चार चरित्र ॥ ॥४॥ बत्रीश बत्रीशी गुणे, शोनित जास शरीर ॥ गुरु पासे थाव्या गुणी, वदनने वह वीर ॥ ५॥ ॥ ढाप्त सत्तावीशमी । कर कमुने करु वदना हुँ वारी लाल ॥ ए देशी ॥ ॥ चक्रायुध सूरी सरू, हुं वारीलाल ॥ विचरे बट्ठ साथे श्रीजयानदजी ॥ दु० ॥ चरण करण व्रत धार रे ॥ ॥१॥ ए मुनिनें करु वदना दुवारी लाल ॥ ए थांकणी ॥ चार ज्ञानी चारित्रीया दु० ॥ चक्रायुड़ सूरिराय रे दु० ॥ लखमी पुरनें ढूकडा दु॥ श्रावी शा खा पुर गाय रे दु ॥ ए०॥ २ ॥ थायु थत जाणी करी दुण् ॥ श्री जयानदने ताम रे दु० ॥ गनार सट्ट सौंपीयो ढुं० ॥ गणेशपद थनिरा म रे दु० ॥ ए ॥ ३॥ कोइफ तीरथ न करी हु ॥ उपधि शिष्य करी त्याग रे दु ॥ पादपोपगम धादरे द्रु०॥ अणशण परम वैराग्य रे ह ॥ ए॥ ४ ॥ त्रीश दिवस थणतण रह्या दु० ॥ घातीकर्म खपाय रे ॥ दु० ॥ केवलज्ञान गुणें करी दु० ॥ लोकालोक जणाय रे दुम् ॥ए॥ ५ ॥ शलेशी करणे करी दु० ॥ शेष कर्म करी नाश रे हु० ॥ थजर थमर सु ख शाश्वता हु० ॥ नरिया शिव श्रावास रे दु०॥ ए ॥ ६ ॥ थातन दे परिवार रे ॥ दु॥ ॥ ॥

३७२ जयानंद केवलीनो रास. न करे रे, वाजिन गीत संगीत ॥ सं०॥ वावना चदन परवीधारे, अंग सूही सुपवित्त ॥स० ॥ २ ॥ पुष्पमाल्य पहेरें वली रे, दिग्य वस्त्र बलकार ॥ स ॥ शिबिकामा थारोहीने रे, पृथिवी पालण हार ॥ स॥३॥ सि हासन नृप सोही रे, वत्र चामर श्रीकार || स०॥ सर्व थामवर इक्षि रे, देतो दान थपार ।। स० ॥ ४॥ प्रधानने वली पागीया रे, परजानो स मुदाय ॥ स० ॥ महेता मसुद्दी सह मल्या रे, मगल गीत गवाय ॥ सं०॥ ॥ ५॥ नानाविध नाटक करे रे, पात्र विचित्र विशेष ॥स ॥ बिरुदावली वढ बोलता रे, बदीजन सुविशेप ॥सणा॥ उत्र चामर हयगय नला रे, मगल कुंन चलाय ॥ स ॥घटमगल बागल चले रे, ध्वज मोहोटोस हकाय ॥ स० ॥ ७॥ चतुरगी सेना चले रे, विद्याधर परिवार सासुर नर कोडी गमे मयां रे, देवांगना नही पार ॥ स० ॥ ॥ पुष्पवृष्टि करे सुरवरा रे, वाजे उनि खास ॥ सा वाजिब पडदें करी रे, जरीयो व र थाकाश ॥ स० ॥ ए॥थनुक्रमें नगर मध्ये थरे, थावे तस ठयान ॥ स० ॥ शिधिकानें मूके तदा रे, मानु मूके मान ॥ स० ॥१०॥श्रग न मावी विधि थकी रे, वदे गुरुना पाय ॥ सं० ॥ स्वजन वर्गनें पूजतो रे,थ ग वैराग्य न माय ॥ स॥११॥धीर गनीर शिरोमणि रे, नरपति श्री जयानद ॥ स० ॥ वस्त्र थानूपण मूकतो रे, धरतो परमानद ।।स॥१॥ पंच मुष्टि करे लोचनें रे, थावे गुरुनी पास ॥ सा ॥ सयम मुजने दीजीयें रे, मुजने थति उल्लास ॥ सं०॥ १३ ॥ दीका गुरु पण बापता रे, करता नवि उपकार ॥ सं० ॥ सार्थवाद परें नरपति रे, साथै षदुपरिवार ॥स॥ ।। १४ ॥ जरकोगमे जन थादरे रे, दीक्षा व मुजाण ॥साथतेठर रा णी घणी रे, सार परिवार वखाण ॥ स॥ १५॥ पटराणी रतिसुवरी रे, प्रमुख लीये व्रतनार ॥ स०॥ पुत्र पौत्रादिक सहयोगमे रे, तेम नृप एक दजार ॥स॥१६॥ ते पण निज थतेष्टरी रे, साथें जीये व्रत नार स॥ जन जनपदमा नृपालें रे, हर्ष प्रमोद थपार ॥ सं० ॥१॥ घर घर एदि ज वातही रे, जीजी सयम सार ॥ स ॥ दवे कुलानद जे राजीयो रे, परवलो निन परिवार ॥ स ॥१७॥ श्रीजयानवना तातने रे, तेम श्री श्रीजयानद ॥ स ॥ तेम गुरु चकायुध तणा रे, प्रणमी पर अरविद ।। । स०॥ १५ ॥ घरेंथावी नित्य याचरे रे, श्रीजिनधर्म विशाल ॥ स० ॥

नवम खंम.
३७५
नवमे खेमे ए कही हु ॥ सत्तावीशमी ढाल रे ढुं० ।। मुनि गुण गातां प
अने दु० ॥ होये मगलमाल रे ढुं० ॥ ए॥ २३ ॥ सर्वगाथा,॥ ७६६॥
॥ दोहा॥
। ग्राम नगर पुर पाटणे, थानक कोडयो प्रमाण ॥ विचरी बहुजन ता
रिया, केश मुजाण अजाण ॥ १ ॥ अपराधी जे जे द्रुता, तस बालोयण
दोध ॥ इव्यनावें ते प्राणीने, निर अपराधी कीध ॥ ॥ जेहनी सरिता
देशना, तेहमा जव्य जे मीन ॥ उत्तम जन मकन करे, पामे रति
थति पीन ॥३॥
॥ ढाल थहावीशम। ॥ गिरुथा रे गुण तुम तणा ॥ ए देश ।
॥ श्रीजयानद केवली तणी, काय देशना गगा सरखी रे ॥ तास संगे
सुपवित्र थया, कोई धर्म मार्ग के परखी रे ॥श्री० ॥ १॥ केशक वै
मानिक थया, कोई केशक अनुत्तर वासी रे ॥ केइक चक्रवर्चि पणु, काश् श्रा
गामी नवे याशी रे॥ श्री० ॥ ॥ केशक मोक्ष नवांतरें, काश् केशक ते
ऐ नवे सिह रे ॥ इत्यादिक उपकारथी, कांश मुखमय प्राणी कीप रे ॥
॥श्री॥३॥ राजरुपि वर केवली,श्रीजयानद नगख्यात रे। विचरतां वसु
धा तलें, का निर्मल जस श्रवदात रे ॥ श्री० ॥ ४॥ विचरता पाउधारी
या, श्रीसोरवदेश मकार रे ॥ जिहां प्रचपन समोसस्या, कार पूरव नवा
णु वार रे ॥ श्री० ॥ ५॥ पांमवनें पुमरिक वली, काई इविड वारिविघ्न
दोय रे ॥ सांब प्रद्युम्न वली कृष्णना, जे दोय पुत्र वली होय रे ॥श्री०॥
॥ ६॥ कोडयो गमे मुनिराज,कांश शिवपद वरिया जेट रे ॥ राम नरत
नारद वली, कांई तत्त्व वस्त्रा निज तेद रे॥ श्री० ॥ ॥ थावच्चा सुत्त सय
मी, वली सक परिव्राजक तेम रे ॥ सुव्रत बहुथणगारj,कांश एरोगिरि था
व्या प्रेम रे॥ श्री॥॥ श्रातम तत्त्व नीपनावीयो, कां सादि थनतह
नगें रे ॥ नारद एकाणु लाखj, का निज गुण वरिया रगें रे॥श्री॥॥
ए गिरिनो मदिमा घणो,काइ मुखथी कहो न जाय रे ।। हिंसक पापी जीव
नो, कांश शहा यक्षार ते थाय रे ॥श्री० ॥ १०॥ थनव्य न देखे नयाथी,
फाइ शत्रुजय महात्म्य बोजे रे ॥ जगमा जोता ए समुं, का तीर्थ नावे
तोले रे ॥श्री० ॥ ११ ॥ शाश्वत प्राय ए गिरिवरू, कांश रुपनकूट परें जा
यो रे ।। जयूमीप पन्नत्तिनी, काश् त्तिमाहे मन थाणो रे ॥ श्री॥१२॥

रे
३०४
जयानंद केवलीनो रास.
वता तिहाँ करे १० ॥महोत्सव थधिक मंमाण रे ९० ॥ गाजिन गीत संगी
तई दु० ॥ करे उत्सव निर्वाण रे हु०॥ ए॥ए उठनिरव सनिली
दु०॥ श्रीजयानंद मुणिदरे ० ॥ अप्रतिपाती वैराग्यपी० ॥ सहे एक
ल ध्यान थमद रे टुं० ॥ ए॥ ॥ पक श्रेणी मामी करी ई० ॥ वेदक
पायनो नाश रे दु०॥ मोह नयी त्रण कर्मने दुभा क्षय करता शुन वास
रे ढुं० ॥ ए० ॥ ॥ श्रीजयानदनी पामीया हु० ॥ निर्मल केवल ज्ञान
दुः॥ प्रगट प्रसन्न करयुं सह लहे हु० ॥ सर्वहान परधान रे हु०॥ ए० ॥
॥ १० ॥ पटव्य गुण पर्यायनें दु० ॥ ध्रुव व्ययने उतपाद रे दु० ॥ एक
समयमा जाणता ढुं० ॥ चिद अमृत थास्वाद रे इं॥ ए० ॥ ११ ॥ मुनि
महिमायें थाकीया हूँ ॥ वैमानिक सुर थाय रे दु । महोत्सव केवल
झाननो दु०॥ करता सह समुदाय रे ॥ ० ॥ ए॥१२॥ दिव्य कमल
विरचे तिहां हूं० ॥ सहस्र पत्रनु महत रे दु॥ अदभूत एक सोवन त
एं हूँ० ॥ ते उपर वेसत रे हु० ॥ ए० ॥ १३ ॥ नगरलोक सहु यावीया
दु० ॥ वेठा करीय प्रणाम रे दु॥ श्रीजयानवजी केवली दु॥ देशना
देवे साम रे दु० ॥ ए० ॥ १४ ॥ जवि उपकारनें कारणे दु० ॥ नाखे च
तुर्विध धर्म रे दु० ॥ दान शील परनावथी ढुंगा जेहथी लहे शिवशर्म रे
दु०॥ ए० ॥ १५ ॥ श्रीकुलानद हवे नूपति दु० ॥ जाणे तात नाण
रे दुम् ॥ चतुरंगी सेना सनी दुम् ॥ श्रावे यति ममाण रे ढुंग ॥ ए० ॥
॥ १६ ॥ विश्वपूज्य केवली प्रत्ये हु०॥ देखी करे प्रणाम रे द्रु ॥ पंच
अनिगम साचवी दु ॥ विधि पूर्वक थनिराम रे दु०॥ ए॥ १७ ॥ ती
न'प्रवक्षणा देने दु० ॥ स्तवना करे नरराय रे दु॥ वदना करी सचि
तासने गुण ॥ बेसे केवली पाय रे दु ॥ ए ॥ १७ ॥ केवजी श्रीजया
नवजी ढुं० ॥ देशना देवे तास रे दु० ॥ श्रावक धर्म प्ररूपीयो दु०॥ का
वश व्रत सुविलास रे दुपए ॥ १५ ॥ मुनिवर धर्म पण उपदेशे १० ॥
समकेत वोयर्नु मूल रे दु० ॥ केश्क नविजन धावरे हुँ । समकेत मन
अनुकूल रे दु० ॥ ए० ॥ २० ॥ केश्क देशविरति ग्रहे टुं० ॥ केश्क मुनि
वर धर्म रे दु॥ केशक महेशनिग्रह घणा दु॥ केशक प्रकतें नर्म रे द्रु
॥ ए॥ २१ ॥ एम थनेक नचि जीवने दुणा विविध करी उपकार रे ई०
श्रीजयानदजी केवती दु० ॥ तिहाथी करे विहार रे ई० ॥ ए० ॥ २२ ॥

नवम खंम . ३७७ जन तणा, मनमा हर्ष न माय ॥ ४ ॥ ए श्रीजयानंदनी कथा, गुणगए महिम विशाल ॥ नणे गुणे नवि सानले, तस घर मगलमाल ॥ ५ ॥ ॥ ढाल गणत्रीशमी ॥ तू तूगे रे मुज साहेव जगनो वो ॥ ए देशी॥ ॥ फलियो फलियो रे मुज सकल मनोरथ फलियो ॥ श्रीजयानंदनो रास करतां, नाग्य थपूरव नलियो रे ।मु०॥१॥ मुनिगुण गान नरें फरी माहारो, पाप पंक खलनलीयो॥नाम गोत्र सुणतां महा निर्जरा, सू त्रमाहे एम कलीयो रे ॥ मुज० ॥ ॥ मुनिगुणना मान करता, ज न्मनुं फल रलीयो ॥ थाधि व्याधि उपश्व सवि दुरे,मुजयी जाये टलीयो रे ॥ मुज० ॥३॥ एथिवि मोक्ष साम्राज्यनी लखमी,श्रीजयानद ते मलि यो ॥ वाह्य थतर शत्रु दोय जीत्या, ए बट्ठ नाग्यथी बलीयो रे।मुज॥४॥ धीरज गुण महोटो मेरु सम, कोइ वातें नवि चलीयो।जे मुनि दान दीये एणी रीतें, तस 5 ख जाये गलीयो रे ॥ मुज ॥५॥ रंनाफल सम श्रीज यानंदना, गुणमा दोप न वलियो ॥ लोद समान हु तेदमा मुनिगुण,रसकू पी रस ढलीयो रे ॥ मु० ॥ ६ ॥ मुनि गुण नक्तियकी दवे मादारो, 8 खनो दिवस ते दलियो ॥ मुनिगुण गातां यतरंग मुज, धनुनव हेजें द लीयो रे ॥ मुज० ॥ ७ ॥ ॥ थथ कलश प्रशस्ति ॥ राग धन्याश्री॥ ॥ तपगठपति श्रीजगतचद सूरि, चौंथालीशमे पाटेंजी॥ जावळीव जे ऐ थांबिल की, तपगष्ठ तेहिन माटेंज॥१॥तस प? श्रीदेवेश्वरि,गोता रथ सपगारीजी ॥ तालीशमे धर्मघोष सुरि, तास्यां वद्ध नरनारीजी ॥२॥ सोमप्रन सूरि तस पट्टराजें, सुडतालीशे गमेंजी ॥ सोमतिलक सूरि थड तालीशमे, पाटें गुणगण धामजी ॥२॥ तस पहें श्रीदेवसुदरसूरि, गुणवता गुणरागीजी ॥ सोमसुदर सूरि पाट पञ्चाशमे, किरियावत वैरागीजी ॥४॥ मुनिसुदर सूरि एकावनमे, पाटें गुण गण दरीया जी ॥ सहस्त्रावधानीवा लपणाथी, तास्या जिहां विचरीयाजी॥ ५॥अध्यातमकल्पम नामें,सति कर जेरों कीघोजी। एकशोथा हायनो कागल,लखीने गुरुने दीधोनी॥६॥ एकशो थात वर्तुलिकाना रव, निन्न निन्न उलखीयाजी॥ तपदेश रत्नाकर ने 0 कीघो, वादिगोकुल शांढ लखीयाजी ॥ 8 ॥ इत्यादिक बहु ग्रंथना कर्ता, श्रीनयानद चरित्रजी॥ जेणे कीधु न्हाना रस सपुत्त, बहु वैराग्य पवित्रन . ४० रे ३७६ जयानंद केवलीनो रास. कल्याणक पण एणे गिरि, काइ निनवर केरां थागे रे ॥ पूर्वे थया वली एणे गिरें, वहु मोद गया वली नाशे रे ॥ श्री ॥ १३ ॥ महिमावत ए देवमा, श्रीजयानदजी थावे रे ॥ गिरि उपर थणसण करे, कां पादपोप गम गवे रे ॥ श्री० ॥ १४ ॥ पटदिन श्रणसण पालीयु, का योग निरोप करत रे ॥ शैलेशी फरणे करी, कांई शेष कर्म करे थत रे॥ श्री॥ १५॥ त्रीजो नाग सकेलीने, करे थगुरु लघु थवगाह ॥ महानद पद पामी या, कोई निदां सुख अव्यावाद रे ॥ श्री० ॥ १६ ॥ समणि एक समय मां, कांश लोकारें फस्रो वास रे ॥ सिम बुझ समृम थया, काश् यजराम र अविनाश रे ॥ श्री० ॥ १७ ॥ फरी नवि नवमा थाव, जिहां एक ति हां अनत रे ॥ देश प्रदेशे फरसीने, रह्या असख्य गुणा नगवत रे॥श्री. ॥ १७ ॥ पण निज निज स्वरूपमा, रहे चिदानद जगवत रे ॥ धरूपी को कोईने, काय पीडा ते न करत रे ॥ श्री ॥ १५ ॥ सकीरण पण नवि होयें, कार धनत चतुष्टयवत रे ॥ ज्ञान दर्शन सुख वीर्यनां, कांश लोगो तेद महत रे ।। श्री० ॥ २० ॥थशरीरी थाहारी जे, काइ निरुपाधिक मु ख वरीया रे ॥ जेहनी उपम नग नही, जे नवसायर निस्तरीया रे ॥श्री० ॥ २१ ॥ नाण दसण उपयोगीया, कई समयांतर पलटाय रे ॥ पण एक समयमा सवि लहे, मुख्यता गौणता कहेवाय रे ॥ श्री० ॥ १२ ॥ परम ज्याति परमातमा,कांश परम ब्रह्म स्वरूप रे ॥ जाणे पण नवि कही शके, कां केवलज्ञानी चतूप रे ॥श्री० ॥ २३ ॥ अहवीशमी ढाज ए, काइन वमे खमें नाखी रे ॥ श्रीनयानदना रासमा,काश्तेदनु चरित्र साखी रे ॥ एम पविजय चित्त राखी रे, शिवसुखना था थनिलाषी रे,परनाव दी। सदु नाखो रे ॥ श्री० ॥ ५५ ॥ सर्वगाथा ॥ १३ ॥ ॥ दोदा ॥ ॥ तत्कण मलीया देवता, चार निकाय मिलत ॥ श्रीजयानद वियोग नो, थतिशय शोक धरंत ॥ १ ॥ पण निर्वाण तणो करे,उत्सव यति वि स्तार ॥ प्रायें तीर्थकर परें, प्रमुदित थ अपार ॥ ५॥ चत्सव कर। नदी श्वरें, थमा मह सार ॥ करीने निज थानक गया, मुनिगुण चित्त सनार ॥३॥ एणी परें श्रीजयानदजी, केवली जे शषि राय ॥ गुण गाया गुणी नवम खम ३जए वि प्राणी, सेशे लछि विशालाजी ॥ श्रनुक्रमें शाश्वत पदवी पामी, वरशे मगलमालाजी ॥ २७ ॥ सर्वगाथा ॥३॥ प्रथमखमे ढाल॥१५॥गाथा॥ ४४३॥ उक्तश्लोक॥१शाक्तिीयखमेढाल ॥३॥गाथा ॥ए ॥ उक्तश्लोक ॥ २७ ॥ तृतीयखमे ॥ ढाल ॥२॥ गाथा || Bए ॥ उक्तश्लोक ॥१३॥ चतुर्थखमे ढाल ॥३३॥ गाथा ॥ ७७६ ॥ उक्तश्लोक ॥ १७ ॥ पचमखमे ढाल ॥ ॥ गाथा॥२६७ ॥ वक्तश्लोक ॥११॥ पठखमे ढाल ॥२२॥ गा था॥ ६ ॥ उक्तश्लोक ॥१॥ ॥ सप्तमखमे ढाल ॥ ॥ गाथा ॥२६॥ उक्तश्लोक ॥ ॥ अष्टमखमे ढाल ॥२॥ गाथा ॥ २५॥ वक्तश्लोक ॥ ॥ ५ ॥ नवमखमे ढाल ॥ ए ॥ गाथा ॥७३॥ मक्तश्लोक ॥ १ए॥ सम ग्ररासनी ढाल ॥२०शा समग्ररथ गाथा ॥५ए ॥ सर्वपथना उक्तश्तो क, सवैया, दोदा, अने समस्या मलीने ॥११॥ ॥ इतिश्रीमत्तम विजयगणि विनेय पंमित श्रीपनविनय गीणविरचि ते श्रीश्रीजयानदराजपिकेवलिचरित्रे प्राकृतप्रवंधे श्रीजयानटराजेंवीक्षा केवल ज्ञानादिवर्णनोनामा नवम खम समाप्त ॥ तत्समाप्तौ च श्रीश्रीजया नदकेवलिचरित्र समाप्तम् ॥ इति मुनिश्रीपद्मविजय गणिविरचिते श्री श्रावत पालनफलमहात्म्योपरि श्रीश्रीजयानट केवप्ती रास सपूर्ण ॥

३७ श्रीजयानदकेवलीनो रास- ॥ ॥ तेह चरित्रधी रास रच्यो में, उठो थधिको लिखायोजी ॥ ते मुज मिछाकड दोनो, पाप रति न रखायोनी ॥ ॥ तस पाटें रलशेस्वर सूरि, जे अतिशय गुणवतानी ॥ लक्ष्मीसागर सूरि त्रेपनमे, पाटे जेह महताजी ॥१०॥ सुमतिसाधु सूरि पाट चोपनमे, हेमविमल सूरि जाणोजी॥थी पद विमल सुरि उप्पन्नमे, पाटें गुणमणि खाणोनी ॥११॥जेणे किरि या उभार करीने,कुमति वृद बहु काप्योजी॥ विजयदान सूरि तस पटधर, बद प्रतिष्ठा मह थाप्योनी ॥१२॥ तस पाटें श्रीहरिविजय सूरि, पातगाह दीयो माननी॥ विजयसेनसूरि तस पटधर, ग्रथतणु बहु झानजी॥१शातस पाटे श्रीविजयदेवमूरि, पाट शाठमें जापुंजी ॥ विजयप्रनसरितस पाटें,एक शमें मन थाणुजी ॥१४॥ विनयरत्नमरि तस पटधर, श्रीविनयखिमा सू रिंदजी ॥ विजयदया सूरीश चोशनमे, पाटे जेम दिणदजी ॥१५॥ विजय धर्म सूरि तस पाटें,पुण्यवत वडनागोजी ॥ विजयजिनेंसूरि नाशवमे,पाटें यधिक सोनागीजी ॥ १६ ॥ विद्यमान वरते जसु थाणा, तेहनें राज्य की धोनी ॥ रास एक सुंदर मुज मतिसम, मनदमनोरथ सीधोजी ॥१७॥ सं वत थढार असावन वर्षे, सीवडी रही चठमासनी ॥ पौप दि एकादशी दिवसें, कीधो एह थन्यासजी ॥ १७ ॥थल्पबुथसमजस नोख्यु, ते स ज्ञान शोधाज्योजी ॥ खलबुझे जे दूपण दाखे, ते नवि मनमा लाज्योजी॥ ॥ १५ ॥ नव खमें करी नव नव रचना, नवरसमयी निरधारजी ॥ सघ श्रामदयी प्रण कीघो, दुउ नयजयकारजी ॥ २० ॥ श्रीविनयदेवसूरी श पटोधर, विजयसिद गणराया जी ॥ तास शिष्य श्रीसत्य विजय बुध, पंमितनन सोदायानी ॥ २१ ॥ कपूरविनय तस शिष्य सोनागी,खिमाविज य तस शिष्यनी ॥ पंमितप्रवर सुलक्षण लक्षित, जिनविजय सुजगीशजी। ॥ २२ ॥ तास शिष्य समुदायमा उत्सम, उत्तम विजय मुणिदनी ॥ समताव तर्ने श्रुता बन्यासी, नरिया गुणगण वृदजी ।। २३ ॥ तस पदपन शिलीमु ख सरिख, पाविजय अनिधाननी ॥ एद रासनो रचना कीघो, मुनिगुण में बह मानजी ॥ २४ ॥ जिहां लगें रवि शशी दीपनें सागर, जिदा लगें मेरु गिरिंवानी ॥ तिहां लगे एद रास थिर दोजो,वांचनो नविजन वृवाजी ॥ ३५॥ साहा थान सदसनी उपर,श्लोक थग्यार गणायानी॥ ढाल पर्श दोय कलशे कीघो, शांति पास सुपसायानी ॥२६॥ नशे गाशे जे न .

१ १ १ M - ३तर शा बगन टक्का. १ | शा लालचद हरजीवन तथा जबेरी नीमचद धर्मचद श्रमीचद नाराजी शा प्रागजी दीपचद १ दोशी नवजी देवचद तथा व पारेख हेमचद मोनजी नमालीरायचद शा दीपचद मागेकचर १ | सतोत उनजी गुलाबचद शा गनीर शामजी धुलिया शा मोतीचद साकलचद १ शेत सखारामनाई उलनदास वोरा बगन देवचद गारीयापार, शेठ माणेकचद नाराजी १/शा गोपालजी गोविंदजी दोशी जगजीवनास धर्मचद १ शा हीराचद गोविंदजी पारेख जगजीवनदास कस्तूरचद र वरल दोशी दामोदर दयाल १ दोशी विल बेचर वकील बकोर कफल वढवाण शा नगीनदास मोतीचद शा मगलजी जसराज शा हरजीवन कीना शा गोकल जाएजी शा गोविंदजीमकन पालीताण अमरेली श्री जैन विद्याशाला ५ जैनझानशालातरफथी शा वीर मास्तर तलकचद मागेकचद चद जीवा, शेठ नाराण हीरजी थगाशी शा मागेकचद जेा शा. केवल खीमचद मेता जीवा पीताम्बर कुमला श्री जैनशानश्ठकसना दा० शेव वेचर राघवजी शा बगन जेग मढुवा धोलेरा शा शूरचद सवाईचद शा हीराचद मोतीचद १ शा गांमालाल श्राणदजी. माना वरतेज सलोत उमेदचठ जवेरचद १ शा देमचद प्रागजी M १ - १ १ २ १ ३७० आग्रंथने प्रथमथी आश्रय आपनारा सुझजनीनां नामो १ १ - १ १ १ ३ बालोचर प्रां मुर्शीदावाद शा. लालुलाई काननी रायलक्ष्मीपतिसिहजी वाहादूर १० शा चुन्नीलाल दोलतपद थजीमगन प्रां मुर्शीदावाद शा गिरधर वावा रायधनपतिसिहनी वाहादूर २) शा. दामोदर हरजीवन नावनगर दोशी थापदनी पुरुपोत्तम शा पानाचद तेजा बुकसेलर. १० | शा नानचद ताराचद वोरा हतीसिह जवेरचद ५ गपची चतुर्नुज धनजी श्री जैनज्ञानवर्धक सना हा० मत्री पारेख मोतीचद रामजी दीपचढ़ बगनलाल ५ श्री जैनधर्मगुनेठकसना तरफथी वोरा श्रमरचद जसरान पारेख शामजी रामनी शा नरोत्तमदास दाउ २शा रायचद दीराचद शा नानचद रायचद २ वोरा मगनलाल दरखचद श्री जैनधर्मप्रसारक सना २ शा दरगोविंद जीवा तथा मगन वोरा नानचद करशन २ लाल नानचद वोरा थमरचद ताफरशी २ शा तलकचद नाराजी शा हीराचद लखमीचद २शा दहीसग गांगजी शा मूलचंद वि नथुनाई २ शा गोविदजी दीपचद शा मगनलाल सुंदरजी | शा ठाकरशी वर्धमान शेत दामोदर नाराजी २ मास्तर अमरपद वखतचद शपची शिवचद वेला २ शा हेमचद मगल नावसार जवेर नाराण १ शा नानचद गांमा १ शा सोमचद रावजी १ शा जखमीचद कल्याणजी शा नानचद थापदजी १ | शा बकोर उजमशी शा गांमा वेला १ पारेख रघुनाथ नधु १ वोरा बगन जीवन १|शा बगन मूलजी शा बफोर शामजी १. शा दरिचद देवचद शा पुरुषोत्तम हेमनी १ दोशी फतेचद दुकमधद १ - १ १ १ m १

No text on this page.

१ १ १ १ १ ~ ५ ३७२ सुरत गोमल शा कल्याणचद पानाचद १ शा. नारणजी मूलजी. शीहोर तीबडी शा. कुंवरजी मूलजी १शा गिरधर सालचद गोपा चोकसी कालिदास वजेचद श्रीजैनशानदीपकसना दा० पारेख नानचद जेसग शा नीखानाई मानचद वडोदरा श्रीजैन विद्याशाला गांधी फतेचद लालनाई शघवी खूपचद पीताम्बर १ झवेरी हीराचंद ईश्वरदास दोशी उत्तमचद दामजी १ झवेरी माणक्लाल घेलानाई दोशी नरोत्तम पुरुषोत्तम नारतवीय जैनपुस्तकालय वला मुबई मेता कालिदास मोतीचद १ शेठ परवत लक्षा जैन विद्याशाला १/शेठ शामजी नरसी केशवजी धोरांजी शेठ फकीरचद प्रेमचद शा बावा नाराजी १ शेत वीरचद राघवजी शा जगजीवनदास सोनागचद १ मोदी थनुपचद जगजीवन कछ मामवी मेता मोतीचढ़ जवेरचद. शेठ नागजी विसनजी १० शा वाडीलाल बोघानाई वीरमगाम शा न्यासचद वेलचद शेत वीरजी वालजी १ | मारवाडी राजाजी माजी १/ जवेरी नेमचद मेलापचद बगसरा मारवाडी खुमाजी प्रेमचद दोशी कपूरचद करशननी मारवाडी दीपाजी कृष्णाज। पालपुर शेत तलकच मागेकचद रा रा मगलजीनाई ईश्वरजी शेठ वीरचद दीपचव शा नाथानाई जेचद १ | शेठ विस्तवास मोतीचद सायला शेव करमचद कल्याणजी शा मामर नथु १ 'शेठ सवजी देवजी २ १ १ १ M १ बेन परशन m १ १ M १ १ १

No text on this page.

Shri Shri Jayanand Kevlino Ras

Author
Manak, Bhim Singh
Title
Shri Shri Jayanand Kevlino Ras
File name
Shri Shri Jayanand Kevlino Ras
Text
OCR done
Citation
1942
Published
2011/07
Publisher
Mohmyya, Nirnyasagar Mudralaye
Language
Sanskrit
Pages
454
Library
Acharya Shri Vinaychandra Gyan Bhandar, Jaipur
DLI number
313982
Barcode
99999990312141.00
Scanning centre
Banasthali University
Digital publisher
Digital Library Of India
VMLT id
PRZjrdFpuxO
Download PDF

Shri Shri Jayanand Kevlino Ras