Agarchand Bhairondan Sethiya Jain Parmarthik Sanstha, Bikaner
Kamyunijam Kya Hai
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कम्यूनिज्म क्या है ?
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लेखक
राधामोहन गोराजी
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फरवरी सन् १९२७
मूल्य १० आना
ॐ विषय सूची
अध्याय
श
मुखगन्ध
१ विपय प्रवेश
२ कम्यूनिम
३ आर्थिक पूजी
४ शासन तृष्णा
५ असिनीति
३६-१४
६५-७५
७६-८५
७ राष्ट्रीयता
८ सेना का निवन्ध
न्याय
१० शिक्षा
१६-१०३
१०४-१२३
१२४-१३१
१३२-१४३
१४४-१५२
१५३-१५६
१२ उद्योग का सम्विधान
१३ पती वारी
१४ श्रम-रक्षा और सामाजिक कल्याण के काम
पुस्तष मिलने का पता-
सोशलिस्ट बुकशाप
पटकापुर, कानपुर
मुखबन्ध। अभी तक हमारे देश वासियों को केवल कम्यूनिज्म या चोलशेविज्म का नाम ही सुनने में आया है या यह बात सुनने में आई है जो कम्यूनिज्म के घोर विरोधियों ने उसके सम्बन्ध में फैलाई है। इसलिए. जब तक उन्हें कम्युनिज्म का पूरा पतान लग जाय कि वह पया है, वे कोई राय नहीं कायम कर सकते। सुतरा, दूसरे पक्ष कम्यूनिज्म का असली रूप विना अपनी ओर से नमक मिर्च लगाये बिल्कुल विज्ञान इतिहास और वास्तविक घटनाओं के आधार पर दिखला देना मेंने अपना कर्तव्य समझा। मैंने कालमार्स, फ्रीडरोक एञ्जिल्स, प्राउढन, रेनिन और जीनोवीफ के लिसे लेसों और छोटे मोटे ग्रन्थों को पढ़ा है, परतु इस प्रबन्ध में मैंने अधिकाश सहायता 'चुहारिन' और दो एक अंग्रेज कम्यूनिष्टों के रेखों से ली है । यह भी अपने दायित्व को पहचानने वाले और कम्यूनिष्ट पार्टी के नेता थे या हैं । इनके लेखौंका सार पढनेको पाद यह सन्देह नहीं रह सकता, कि मेंने कम्यूनिष्टों के विचार कम्यूनिष्टों के मुंह से नहीं सुना इसलिए न जाने कम्यूनिष्ट कौन है, कम्यूनिश्म किसे कहते है, उसका प्रादुर्भाव क्यों हुआ भारतवर्ष कम्यूनिज्म के लिए तय्यार है या नहीं, कम्युनिज्म अच्छा हे या युरा, इस बात का निर्णय मैं पाठकों -परही छोडता हूँ। ।
यहां इतना और बतला देना सहरी है कि किन दिन
अंग्रेजी शब्दों का व्यवहार किस किस अर्थ में हुआ है और
जहां जरूरी हो उसका सूक्ष्मतम इतिहास दो चार शब्दों में
पतला दिया जाय, अस्तु.-
'कम्यूनिष्ट--वह व्यक्तिहै जो कम्यनिएमके सिद्धान्तका मानने
वाला हो।
कम्यूनिष्टिम-कम्यूनिस्ट सम्बन्धी ।
कम्यूनि:म-युटुम्मता, यसुधैव कुटुम्बकम् का जीता जागता
आदर्श।
योलशेविषम-साम्यवादी दल जो पहले स्थापित हुआ था,
उसके लक्ष्य भूष्ट हो चलने पर फम्यूनिष्ट दल तय्यार हुआ।
सन् १९०३ में इस पार्टी में भी मतभेद हो कर दो दल हुए, तो
बहु मतानुयायी योलशेविक और अल्प मतानुयायी मेनशेविक
कहलाये।
इन्हीं दोनों शब्दों से दो भाव वाचक सक्षायें धनी बोलशे
विषम और मेनशेविज्म अर्थात् बोलशेषिक सिद्धान्त घ
मेनशेविक सिद्धान्त ।
केपीटेल-पूजी, धन ।।
फेपोटेलिस्ट स्टेट-धनिक शासित राज्य क्योंकि वर्तमान
शासन में सर्वत्र धनिकों की इच्छा को प्रधानता मिलती है।
इस पुस्तक में केपोटेलिस्ट के लिए 'सम्पन्न' शब्द का व्यवहार
किया गया है
- प्रोलाटेरियट-के लिए यहा श्रमिक शब्द काम में लाया गया है । इस में किसान कारीगर और सब तरह के मजदूर अथात गरीन अधिकार विहीन लोग शामिल है। चूर्ज वावजे-अधिकार प्राप्न धनवाना को कहते है, इसके लिए मैंने अमिजात शब्द लिखा है। मैने कोशिश की है कि कम्यूनिस्टक विचारों के अनुसार -जीवन के हर अङ्ग पर, समाज की हर एक सस्था पर, रीति रिवाज, चाल व्यवहार पर प्रकाश डालू , लेकिन यह कहना मेरे लिप मठिन है कि मैं कहा तक अपने अमीट को सिद्ध कर सया हूँ। फम्यूनिज्म क्या है ? इसी प्रश्न का उत्तर इस निबन्ध में सरलतम भाषा में देने का उद्योग किया गया है, इस लिए इस निबन्ध का नाम भी मैंने "कम्यूनिम्म यया है ?" रक्सा है। भूमिका कई उद्देशो से लिखी जाती है, मैमी चाहता तो उन्हीं में से किसीएफ को या ज्याद को लेकर लिखना। लेकिन यह समझ कर कि यह छोटा सा निस यसप भूमि है, में इन्हीं थोड़े से शब्दों पर सन्तोप करता है। लेखक-
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कम्यनिज्म क्या है? पहला अध्याय. विषय प्रवेश। ससार में दिना दिन दुनियों और दोनों की वृद्धि होते देस जिस तरह भगवान बुद्ध का हृदय पसीजा था उसी तरह १९ वीं शताब्दि में भगवान कार्लमार्स का जी गरीबों के दुख से दुसी हुआ। इन्होंने भगवान बुद्ध की तरह अन्धकार मय वैचारिक ससार में अपना समय लगाकर और वस्तु स्थिति को पहिचान कर प्रत्यक्ष जगत में काम करना अपना लक्ष्य बनाया। उन्होंने अपना जीवन शाब्दिक अध्यात्मवाद में बिताया। इन्होंने प्रत्यक्ष जगत में जान डाली। दोनों के कारनामें और दिये हुए कामों के नमूने ससार के सामने है, विवेक दृष्टिसे जोचाहे देख सकता है। कोन नहीं जानता कि भूमण्डल के निवासी जन समुदाय में सम्पनों की एक मुट्टी सरया हे शेष पृथ्वी विपनों के आर्तनाद से गूज रही है । चारों ओर रोटी के झगडे की प्रचण्ड अग्नि मनुष्यत्व को भस्म किये डालती है। फिर जो थोडे से सम्पन्न है उनमें भी विलासिता के लिए एक दूसरे का धन छीनने का
वल प्रयत्न चल रहा है। इन सब बातों का विस्पष्ट रूप रंग
स निवन्ध में आगे चलकर देखने को मिलेगा। हमें तो भगवान
यान का एक वचन याद आता है, यदि कम्युनिज्म से उसको
ति होती हो तो अच्छा ही है ।
थ यता
धर्म सर्वस्वं धृत्वा चैवावधार्यताम् ।
आत्मन. प्रतिकुलानि परेपान समाचरेत् । व्यास ।
इसी को व्यास से अनुमान २५०० वर्ष पीछे महात्मा मसीह
दुहराया Do unto others as you would they should
do unto you इसी की रुह खींच एक राजनैतिक लेखक ने
ई शीशी में भरकर यों पेश की-
Except Government by the people for the
people, all sorts of Governments in general and
oreign government in particulır are Governments
by dacoits and robbers यदि इस घाफ्यम से in general
से लेकर Particular शद तक निकाल दिये जाय तो यह रूह
और भी विशुद्ध और पवित्र हो जाती है । क्योंकि जनता अपने
हित के लिए अपना शासन आए करे तभी सच्ची स्वतन्त्रता
और सञ्चा मुख हो सकता है।
सर्व पर यश दुखम् सर्व आत्मघश सुग्नम् ।
फिन्तु जाता का अर्थ एक मुट्ठी अधिकार प्राप्त धनिक और
उन भाड़े के सहायकों का नाम नहीं है । सृष्टि की मानव जाति
न -- ( ७ ) मात्र का नाम जनता है। यही कम्यूनिष्म का सुनहला सिद्धान्त न है। यही भगवान् मार्क्स के साम्पचिक सिद्धान्तका महामन्त्र है। वर्तमान सम्पत्ति शास्त्र के ज्ञाता पएिउत कहते हैं कि अमुक देश का धन यद गया इसलिए कि उसमें थोड़े से ( एक मुट्ठी) लोगों के पास सोने, चादी, अन्न और वस्त्र का अटू भाण्डार । है । कम्यूनिस्ट कहता है यह ताकि भूल है, तर्क छल है ( fallacy है,sophistry है)। देश में जन गरीयों की सख्या बढ़ रही है तब देश का धन बढनो फैसे ठीक माना जाय । अस्तु पाठक गण सावधानी के साथ, विचार शीलता से, धर्य से इस छोटे से निवन्ध को पढ़े ओर कम्यूनिस्टों को भूलों को या बुराइयों को और भलाइयों को एक ओर रखे और प्रचलित शासनो की बुराइयों,मलाइयोंकोदूसरी ओर,फिर तौल करदेखें,कोनसाशासन अच्छा है । कम्यूनिस्ट के वादानुवाद का प्रधान विषय रोटी है। इसमें कमली ( ags ) ओर दुशाले ( cricks) का झगड़ा है, मोती और बिनौले की लड़ाई है। मनुष्य अपनी आदत से लाचार हो जाया करता है, हमारे वयोवृद्ध पूज्य नेता सर सुरेन्द्रनाथ महोदय तक को भारत क उद्धार वर्तमान कोसलों द्वारा दीखता था। भारत के प्रिय पूस्ट नेता भगवान गाधी को भारत के कोटि २ भूखों का पेट एय मार चसे सेही भरता नजर आताहै ।मारे धर्म प्राण भाता को २६८००००० विधवाओं की ओर से भाख वाद करने में है -- धर्म का आदर्श और मुक्ति दिखलाई देती है। इसी तरह हमारे देश के विपनों को भी यह कहकर सन्तोप हो जाता है कि. कोउ नृप होहु हमें का हानी । चेरी छाडिन होये रानी ॥ फम्यूनिज्म उद्योग शीलता की शिक्षा देने वाला महामन्त्र माना जाता है, इसे एक बार पढ़कर देखें तो यह चीज क्या ? योरोप ओर अमरीका के धनवानों के कहने के अनुसार यह कोई हदा तो नहीं है ? यदि है तो सावधान हो जायें, यह कहीं एक दिन हमें भी न आदवाये। अन्त में हमारी नम प्रार्थना है कि प्रत्येक स्त्री पुरुष जो थोड़ा भी पढ़ना जानता हो एक बार इसे अवश्य पढे और पढ़ चुकने के बाद दूसरों को पढ़ने को दे, पढ़कर सुनाये और कम्यूनिज्म की बुराइयों या भलाइयों से स्वयम् परिचित होकर औरों को भी परिचित करे। कम्यूनिस्ट किसी का बुरा नहीं चाहता, वह चाहता है कि ससार के सभी मनुष्य सुखी रहें, इनमें से परस्पर विरोध और चैमनस्य के कारण, जो मनुष्यों की भूल से पैदा हो गये है, मिट जाय । लेकिन समस्त संसार को हित-कामनासे उद्योग करने में जो थोड़े से स्वार्थान्ध रोगों को कष्ट प्रतीत हो तो इसका फोर्ड इलाज नहीं ! मार्म की एफ यात याद रजने के योग्य है, वह | कहता है कि 'पजीपतित्य अपनी समाधि आपसोदता है, इसके फल पुर्जे निसरने ही वाले हैं और इनको श्रमनीषियों .
की बगावत विखेरेगी और संसार को अभिनय साचे में ढिालेगी।' जिसको सच्चा कम्युनिस्ट पाना हो वह कम्यूनिस्टों के 'प्रोग्राम' को ध्यान से पढ़े, समझे और तदनुसार काम करे । इम निवन्य में तो उनके गुण दोषों के परिचय कराने के लिए उनके अनुशासन का दिग्दर्शन मान कराया गया। पूजीपतियों फे शामन साल के रूस से वर्तमान सोवियट सरकार की तुलना करने के लिए पूरी बातों के लिराने का न स्थान, न समय, न अवसर । कम्युनिस्ट समझता है कि प्रत्येक पदार्थ जो पैदा किया जाता हे माल नहीं कहलाता । जो वस्तु पैदा करने वाला या चनाने वाला अपने स्वर्च के लिए, पनाता या पैदा करता हे वह तो उपभोग्य है । हा, जो यात सा मामान बेचने के लिए बनाया जाता है उसकी सज्ञा माल है । इस माल को जो कोई सरीदता है वही उसका मालिक है। इसी के साथ साय प्राइवेट (नि) स्गमित्व का भाव प्रादभूत होता है । स्वतन्त्र कारीगर अपने ओजारी से अपने कारखाने में थोडा माल तयार करता है और व २ कोटीवाल फल कारसानों आदि से अधिक माल तयार करते है, इस तरह दो माल तय्यार करने वालों में परीदारों के रिप झगडा और माल के दामा में हेडाहोटी होती है । इमीको जरा विस्तार के साथ विचार या तो मारम हो सकता है फि .
(१०) बाजार में बेचकर धनवान होने के लिए माल की तयारी करना सारे फसाद की जड़ है। जो याद माल बनाकर सस्ता वेच सकता है. वह अनेकों कम माल बनाने वालो को तबाह कर डालता है, क्योंकि इन गरीबों का माल महगा पड़ता है। क्या कोई कोरी या जुलाहा मिली के मुकाबले में ठहर सकता है ? तमाम चैल गाड़ी घोडा गाडी, ऊट वालों आदि को सत्यानाश परके थोड़े से रेल्धे कम्पनी के हिस्सेदार मालामाल हो जाते हैं । इसी तरह गरीबों का काम छिनता जाता है वे भूख मरने लगते हैं तव मजदूर बनकर उन्हीं धनवानी के कारखानों या दुकानों में जाकर नौकरीदते हैं। जो बेचारे दो हाथोंकी यदी- लत स्वतन्त्रता के साथ कमाखाते थे, उस की नींद सोते थे वे आज मिलों में मालिक से मजूर बार गुलामी करते है। सार यह कि थोडे से सम्पन्नों के पास घरवार,हाट हवेली, कलकारखाना,सोना चॉदी,सब कुछ और जनता अर्थात् विपन्न जन समूह के पास सिवा दो हाथों के और कुछ भी नहीं । सारे कामों का 'इजारा' ( monopoly ) यनिक समाज ने लेलिया और करोड़ों प्रजा भूखों मरने लगी। अब इसे मजूरी के सिवा जीने का कोई मार्ग ही नहीं रहा। जिस तरह लोग पशुओं को दाना चारा देकर उनसे मनमाना फाम लेते हैं, उसी तरह इन बेचारे मजदूरों को भी जीवित रखने के रायक युछ बोडासा देकर रात दिन काम में जोते रहते हैं। यह सच है कि अब पहले की तरह दास विकत नहीं,परमजदूरी की दशा झोत दामो को सी हो हे और कहीं २ रूपान्तर और नामान्तर से अब तक दास सरीदे बेचे जाते है। हमारे देश वासियों को मिरच का मुल्क, हॉरान डमरा, सास पर केनिया' और आसाम, फोजी का किन्सा अभी भूला न होगा ! अब अगर मानले कि मजूर खरीदे येचे नहीं जाते तो उनकी काम करने की शक्ति सरीदी जाती है। एक आदमी को प्रभात से सायकाल तक काम कराकर !)) या 110) देने का यही तो अर्थ है। मजूर दुख पाते है, पेट को ज्वाला उन्हें काम करने को मज्ञ चूर करती है। मालिक से कहा जाय तो वह कहदेगा, 'तुम्हारा जो चाहे नो काम करो नहीं तो चले जावो,मुझपर क्या अहम्मान है, मैतो तुम्हें काम देता हूँ तुम न करोगे तुम्हारा भाई दूसरा आकर करेगा।' इसतरह गरीर आदमी का श्रम भी एक बाजार में शिक्ने वाला माल बन गया है। योंज्या गरी की सप्या बढ़ती जाती हे त्यो त्यो इस माल का दाम ( मजूरी वा दर) घटता जाता है । इसतरह निमुक्षिती की सरया दिन दिन बढती जारी है। घेज्ञानिक सोजी ओर आविष्कारों की वृद्धि के साथ साथ सारे काम बिजली, स्टीम आदि साधनों से होते जाते है, थोडे आदमियों द्वारा थोड़े समय में बहुत सा काम होजाता हे या बहुत सा अभीष्ट पदार्थ तयार शेजाता है और सस्ता कि सकता है, उसी काम के अलग अलग करने वाले आदमी वे रोजगार होते जाते है और बन जो लापों आदमियो के हाथ में जाता था सिमट २ कर १००-२०० लोगों की थैली में पहुँच जाता है । यह सब शासन परति का दोप है। यह कम्यूनिष्टों का मत है। शासन पद्धतिको और साम्पत्तिक स्वत्व की प्रथा को बदल कर ऐसा बनाना चाहते हैं जिससे कोई भूसा न रह सके। उनका दावा है कि सोवियट सरकार (श्रमिकों के प्रति- निधियों की सभा)में न कोई लूला लंगड़ा भूखा रह सकताई, न कोई बीमार विना दवा के रह सकता है, न कोई लड़का रुपया न होने के कारण शिक्षा से वञ्चित रह सकता है। आज कल हम जो दृश्य देखते हैं कि थोड़े से आदमी बड़ी २ हवेलियों में रहते है और कितनेही भीख मागते फिरते हैं, सड़कों पर सोकर रातें काटते हे, विना अन्न वस्त्र भून और ऋतु को क्रूरता से मरे जाते है,यह सव सोवियट शासन में देखना नहीं पड़ता । यह कैसे होता है इसका सूक्ष्म विवरण देना भी इस निवन्धका एकप्रधान उद्देश है। .
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दूसरा अध्याय.
कम्यूनिज्म ।
पूजीपति-शासन का विनाश अवश्यम्भावी है । अपतो यह
हमारी आखों के सामने मरणोन्मुस हो रहा है। इसके नाश के
दो मूल कारण हैं। एक ओर माल के पैदावार को गदर जिससे
क्रय चिमय की होड़ा, होड़ी रुपये के बाजार का विप्लव और
युद्ध होते ही रहते है, दूसरी ओर सामाजिक भेदभाव.--
एक दरिद्रभिक्षक दूसरा धनुकुवेर ।
जिसके कारण धनिकों और श्रमिकों की लड़ाई कभी बन्द
ही नहीं हो सकती, दोनों चूहे बिल्ली की तरह एक दूसरेके शत्रु
बने रहते है। पूजीप्रधान (धनिक) समाज उस फल
(machine) की तरह है जिसका एक अग सदा दूसरे अग के
काम में बाधक यना रहता है, फिर भला ऐसी बेतुकी मैशीन
आज हो या कल हटे विना केसे रह सकेगी।
अव सोचना यह है कि जब कभी यह पू जो प्रधान समाज
नष्ट भूट होजाय तो इसकी भस्मसात् चिता पर ऐसी दृढ़ और
पकी समाज पद्धति की नींव डाली जाय जो पहिली तमाम खरा-
रियों से घरी हो।
कन्यनिस्ट के वस्तुओं के बनाने या पैदा करने को रीति में
कुछ खास बातों कीजरूरत होगी । पहिले तो समाज सराड यण्ड
,
(१९)
नही बल्कि ख व सगठितहो, उसके अगो सामञ्जस्य हो, चीजा
के बनाने या पैदा करने में गदर न मचे, जुदा २ उद्यम करने
वालों में होडा होडी की श्राग न जल सके, युद्ध की नौयते न
आर्यन रुपये के बाजार में घातक प्रश्न खड़े है।।
पैदावार की गदर मिटाने से हमारा अभिप्राय है कि खपत
से अधिक माल न बनाया जाय जिसके बेचने के लिये दूसरों से
मुकाबला करना पड़े। विक्री के लिए बाजार हाथ में करने के
युद्ध करने पड़ें, माल का दर घटा कर छोटे कारीगरों या कार
खाने वालों को नुकसान पहुंचाना पडे, कारखानों को कुछ समय
के लिये बन्द कर के मजदूरों को इस लिये कष्ट में डालना है।
कि हमारा स्टाक निकल जाय तब और काम करें।
दूसरे, समाज में भेद भाव नहों, सब एक समान भाई, एक
दूसरे के हित चिन्तक और सहायक हो । एक दूसरे के स्वार्थ
में विरोध होना ही झगड़े की जड़ है। मजदूर कहेगा कि मजदूरी
अधिक मिलनी चाहिए जिससे वह आराम के साथ रह सके,
पूजी पति चाहेगा कि कम से कम मजूरी में ज्याद से ज्याद.
काम लेकर मैं और भी बड़ा धनपान बन जाऊ, तो पारस्परिक
द्वन्द्व युद्ध वनाही रहेगा और समाज कदाचित ससी न हो
सझेगा।
कम्यूनिस्ट चाहना है कि उसके रंगठित समाज की बुनि-
याद सामाजिक प्रभुत्व पर रखी जाय । समाज दी उन फुल
कारखानों, गोदामों मोर भाएदारों का मालिक हो जिनमें चीजें
.
--
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चनती है, पैदा होती है, रसी जाती है और फिर खर्च के लिए
एक हाथ से दूसरे हाथ में जाती है। यह सारे साधन किसी
व्यक्ति की निजी सम्पत्ति न रहें । कल पुर्ज, रेल, जहाज, आकर,
तार, डाक, धरती, पशु पक्षी सभी चीजों का मालिक समाज हो-
न कि यह साह कार ओर वह कम्पनी । इस दशा में समाज
देख लंगा कि उसे कितने अन्न, कितने कपड़े की जरूरत है
ओर उसी के अनुमार अनुमान बाध फर चीजें पैदा करेगा
और सारे समाज फी जरूरतों को पूरा कर देगा । इस से पैदा
चार का गदर मिट जायगा।
इन व्यवस्था के लिए अवस्था भी ठीक बनानी होगी ।
समाज के सभी सदस्यों को मिलकर एक सर्व सयुक्त संगठन
करना पडेगा। जाज कल को पूजी पनियों की पद्धति जिससे
निर्धन मजूर किसान वगेरह लुटते हैं बन्द करनी होगी, तभी
सामाजिक भेद भावों की अत्येष्टि हो सकेगी। पर केवल संगठन
से काम नहीं चल सकता । उदाहरण के लिए मानलो पूँजी.
पतियों ने मिलकर काम किया, सर चीज पर अपना आधिपत्य
रक्खा और पूंजीपतियों की आपस की छोड़ा होडी (Com.
retition) मिट गई तो इसम लागत के ऊपर जितना भी नफा
होगा मजदूरों से छिन कर पूंजीपतियों के पास हिस्मा
रसदी चला जायगा, इससे उन गरीबों का क्या लाभ होगा जो
घृणित गुलामी की दशा को पहुंचाए जा चुके हैं।
इस तरह पर काम के सगठित होने पर भी गरीच मजदूरोंका
लुटना चन्द न होगा। यह वात कम्यूनिज्म नहीं चाहता। यह तो केवल पूंजीपतियों का सम्मिलित स्वामित्त हुआ न कि सारे समाज का, जिसमें मजदूर, कारीगर, किसान सभी शामिल हों । इससे पैदावार की गदर ओर पंजीपतियों की आपस की लडाई चाहे कुछ, बन्द हो जाय किन्तु मजदूरों और पूजीपतियों के झगड़े का अन्त नहीं हो सकता । क्योंकि यह तो घरापर लूटते ही रहेंगे और वह लुटते ही रहेंगे तो झगडा फैसे मिटेगा । कम्यूनिस्ट समाज केवल पैदानारका प्रबन्ध नहीं करना चाहता, वह प्रजा को दूसरे के अत्याचारों से बचा देना चाहता है । कम्यूनिस्ट आद्योपान्त हर एक बात का सुसगठन चाहता है। कम्युनिज्मके अधीन काम होने पर कारखानोमें स्थायी प्रवन्ध कर्ता न रहेंगे, ऐसा न होगा कि एक आदमी एकही तरह का काम सारी उम् करतो रहे । यह तो पूजीपतियों के आधिपत्य में हुआ करता है । कम्यूनिषम हर एक व्यक्ति को कई कई तरह के काम सिखलाना चाहता है,एक आदमी को कई तरह के पैदावार के काम में योगदान करने के योग्य बनाता है। जो आज प्रबन्ध कर्ता वन कर यह हिसाब लगाता है कि अगले महीने में कितने थान गर्म कपडे बनाने की जरूरत है वही कल लोहे के फिर साबुन के कारसाने में काम करता मिलेगा। यह तभी हो सकती है जव समाज के सब सदस्यों को समुचित शिक्षा दी जाय । कम्यूनिस्ट चीजों को अपने खर्च के लिए बनाता या पैदा .
करता है, यह बाजार में पंचने के लिए माल पैदा करने की
चिन्ता भी नहीं करता ! इस लिए. फम्यूनिस्ट माल नहीं
तय्यार करता जरूरत का उपभोग्य पदार्थ बना लेता है और
स तुष्ट रहना है । कम्युनिस्ट के बनाये या उपजाये पदार्थो का न
तो विनमय (अदल बदल जैम रई देकर गुड लेना, चना देकर
तेल वरीदना इत्यादि) होता हे न उनका क्रय विक्रय ही होता
है । समस्त कम्यून (कुटुम्न) मिज़ कर काम करते हैं, पदार्थ
पैदा करते है ओर मिलकर ही उसका उपभोग भी करते है।
यह लोग जितना सामान तय्यार करते है, रादान से निकालते
हे या येनों में पैदा करते हैं, सर एक माण्डागार में रख देते हे
और जिसे जितनी जरूरत होती हे दे देते है। इस दशा में
माने चादी के सिधा (धन दौलत) की भी कोई जरूरत पाकी
नहीं रह जाती।
यहाँ शका हो सकती है कि यह कैसे सम्भव है? किसी
को बहुत कम सामान मिलेगा और किसी को कहीं अधिक,
यह नो निभाग ठीक नहीं होता। इसके उत्तर में कम्युनिस्ट
कहना है कि प्रारम्भ म निस्सन्देह कुछ दिन १० वर्प हो या २०
वर्ष हम इस बात के लिए कई तरह के कानून कायदे रसने
पउगे । याजा • चीजें हो सकता है कि उन्हीं लोगों को दी
जाय जिनकी कार्यवाही में राम'कलम' रानी गई हो, या जिनके
काम फर्दगी के पुर्जे में लिख दिया गरा हो । जर इस दलका
पूरा २ सगठन हो जायगा तय ऐसे नियमों की जरूरत न,
रहेगी। सब पैदावार का काफी प्रमाण रहेगा और जिसे जितनी
चीज की चाह होगी उसे उतनी ही मिलेगी जरूरत से ज्याद,
लेने से उनका कुछ लाभ न होगा इसलिए वे लेंगे ही नहीं।
कौन ऐसा मूर्ख होगा जो रेल में ५ टिकट खरीद ले और सिर्फ
दो आदमी चैट ३ की जगह खाली पड़ी रहे ? जब कम्यन के
हर आदमी को एक समान सव भोग्य पदार्थ चिना रोक टोक
मिलेंगे तो काई ज्याद. लेकर क्या करेगा? जो चीज चिक नहीं
सकती उसे केवल फेंकने के लिए तो पागल ही ले सकता है।
हम कह चुके हैं कि रुपये का कोई मूल्य न रहेगा न चीजों का
परस्पर अदल बदल हो सकेगा क्योंकि सब पदार्थ सबको अटूट
सयुक्त भण्डार से ईच्छा अनुसार मिलता रहेगा। प्रारम्भ में
काम के अनुसार ही पदार्थ मागने वाले को दिया जायगा,
फिर कुछ दिन बाद हर एक साथी को उसकी आवश्यकता
के अनुसार सामान, मिला करेगा।
यह समझना भूल है कि जो जितनी मेहनत करेगा उसे
उसी के अनुसार सामान दे दिया जाया करेगा। जो जितना
कमायेगा सब खालेगा तो वह सदा दिवालिया बना रहेगा।
नये आविष्कारों की जरूरत होगी, नई २ मशीनों की आवश्यकता
पडेगी। देश को समुन्नत बनाने के उपायों को काम में लाना,
रोगी, धौमार, पञ्चो, लूलों, लगहों, चारपाई पर पड़ी जच्चों
की परवरिश करना कम्यून का धर्म होगा, इस दशा में यह फैसे
हो सकता है कि सारी मेहनत का पूग फल हर एक को चुका
दिया जायगा। निस्सन्देह कुछ बचाना होगा जिससे देश को
फला फौशल, उद्योग धधों को समुन्नत किया जाय, नई फलें
आ और यो २ कारखाने सोले जाय। इसलिए कुछ अर्थ
काम की उन्नति घ वृद्धि के लिए रक्खा जायगा, तो भी यही
मशीनों से इतना सामान निकाला जायगा कि सबकी सारी
आरश्यकताए पूरी हो सकेगी।
कम्यूनिःममें वर्गमेद-ऊँच नीच, स्वामी और नौकर भादि
का भेद-नहोगा, इसका यह मतलब है कि इसमें कोई राज्य भी
म होगा। हमें जान लेना चाहिये कि राज्य शासक वर्ग का एक
वर्गीय संगठन हुआ करता है । राज्य में हमेशा एक वर्ग दूसरे
फविरुद्ध चलता हे । सम्पन्नों का शामन होगा तो वह श्रमिकों
(proletarint) के विरुद्ध चलेगा और श्रमिकों का होगा तो
यह सम्पन्नों के विरुद्ध । कम्यूनिम्म चाहता है कि न कोई जमींदार
हो, न पूजीपति, न कोई मजदूर और मेहनती जितने हों सध
समान जनपद के लोग हो, भाई भाई हो, साधी हो । न वर्ग
होंगे न वर्षों के झगडे होंगे,न वर्गों का जुदा जुठा सगठन होगा।
यदि आज धर्म ( religion ) ससार में न होता तो धर्म
के नाम पर लोग क्यों आपस में लड़ते । हिदू मुसलमान,
ईसाई आपस में केवल धर्म की कल्पना ही के कारण तो लड़ते
हैं । इसलिए धन व धर्मके भेद से जो वर्ग स्थापित हुए हे उनके
हटा देने में ही मनुष्य का कल्याण है। जहा झगड़ा नहीं
* यहा हमने class शम्द के लिए घर्ग भ्यमहार किया है।
।
( २० )
यहां शासन या राज्य की जरूरत नही। जो संमार से चोरी
उठ जाय तो पुलिस की जरूरत भाप से आप हट जाती है,
जेलसाने ओर हवालात बेकार हो जाती है, अदालतों का
अस्तित्व निरर्थक बन जाता है।
हमारे आशकित मित्र प्रश्न करते हैं, भगवन् ! यह आप का
प्याली
पुलाव
कैसे पकेगा? कौन पहावेगा? पया इतना बडा
और महत्वपूर्ण सगठन चिना राज प्रवन्ध के चल सकेगा?
समाज के लिये वस्तु प्रस्तुति का भार फोन उठायेगा ? श्रम
शक्ति को कौन रथानान्तर में, जगह २ बाटेगा ? समाज के आय
व्यय का लेग्वा कौन रसेगा ? इन सब, प्रदनों का उत्तर देना
कम्यूनिष्ट माधारण बात समझता है, और बतलाता हे
प्रधान सञ्चालन का भार कई मुनीमों गुमाश्तों के कदम्बार
को सौपा जायगा । यह रोजाना पेंशवार और जरूरताका हिसाब
रसते रहेंगे। इन्हीं के जिम्मे यह तय करना भी होगा कि कहा
प्रमिकों को लगाव, कहां से हटा और कितना कौनसा काम
करना चाकी है। जब बचपन से ही लोग यह समझ लेंगे
कि काम करना ही जीवन का पवित्र उद्देश है, जब यह
सामाजिक काम में अभ्यरत हो जायंगे, जब इनमें समझ आ
जायगी कि काम जरूरी हे और जीवन तभी आराम से व्यनीत
होता है जब काम एक पहले से निश्चित किये हुये ढग पर किया
जाता है । जब समाज अन्छी तरह पर आगी हुई गाड़ीकी भाति
हमने यहा (Bureau) के अर्थ में कदम्न (समूह) लिसा है।
सुगमता से चलने लगेगा तो सारे काम ठीक २ इन कदमों
के बताये हुये मार्ग से चलते चले जायंगे । हमें आमात्या,
पुलिस, जेल, कानून कायदा, डिगरियो ओर फरमानी की
कोई भी जरूरत वाकी न रहेगी।
निस्सन्देह यह सारी बातें दृढ़ कम्यूनिष्ट पद्धति के अनुसार
तभी चल सकती है जब प्रोलौटेरियट की पूर्ण विजय हो और
पार्टी पूरी निकाशावस्था को पहुँच जाय । प्रारम्भ में तो प्रोली-
देरियट की विजय होने पर कुछ समय तक कठिनाइयों का
सामना करना पडे गा । श्रमिकों को अपने शत्रुओं से लोहा
लेना दोगा और बहुत दिन की प्रचलित अशिष्ट रूढ़ियों के
साथ मी युद्ध करना अनिवार्य होगा, क्योंकि सुस्ती, ढीलापन,
निकम्मापन, अहकार और पाप परायणता जो हमारे स्वभावों
मैं धुम चुकी हैं निकलती सी नियागी, एक दिन में नहीं
निकल सकती । अनेक पीढ़ियो का पिाहा ओ नील का माठ
मुधरेगा तर ही सम्पन्नों के शासन काल की दुर्गध मिटेंगी
और कानून, दण्ड, दगार की दल न नीति विनट होगी। इस
धीच में भी तो श्रमिको को जीना ही होगा, इस लिये धमिक
शास में भी राज्याधिकार की छाया कुछ काल तक रहेगी फिर
इसका भी अन्त हो जायगा । सर श्रेणी के लोग मिल जुल कर
एफ पुष्ट दल बन जॉयो और एक सार्यभौम श्रमिक दल भुक्त
छो भागन्द से काम करेंगे और सुग्न से रहेंगे। कुछ ही
दशान्दियों में एक दम नई दुनिया नजर:
रोलगेगी, सारी रोतिया
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( २२ ) नई और सुख ठेने वाली; सारे लोग नये साचे में दले और परपायों, और निश्चिन्त च आनन्दित दीखने लगेंगे। श्रमिकों के विजयी होने के बाद जय पिछले धाव भर जायेंगे तय कम्यूनिस्टिक पद्धतिके अनुसार पैदावार की शक्ति बहुत जल्द घढ जायगी । इस वृद्धि के कारण नोचे संक्षेप से बतलाये जाते हैं। पहले तो लोगों की बहुत सी शक्ति जो इस समय घर्गीय झगड़े में नष्ट होती है काम करने के लिये धच रहेगी। हम देखते हैं कि कितनीशारीरिक शक्ति,मानसिक घल औरश्रमराज- नैतिक झगड़ों में, हडतालों में, पैर विरोध, सरकशी और इनके दयाने में , अदालतों को सहकीकात या मुकद्दमें बाजी में और पुलिस की दौड़ धूप में, विनष्ट हो जाया करते हैं। यह सब बात आती रहे तो कितना समय और बल बचे और दूसरे अच्छे कामों में लगे। इसी तरह जो तमाम घार्मिक झगडे मिट जाय, यनावरी धर्म को कोसला शेप न रहे तो औरभी और विरोध का अन्त होजाय और दूसरे कामों में तन,मन लग सकें। दूसरे वह धन और यल जो आज कल प्रति द्वन्द्विता, होहोट्टी में खराब हो जाता है, रुपये के बाजार और माल फी विक्री की उथल पथल में और युद्धों में बरबाद होता है घह भी हमारे भोग और अच्छे कामों के लिए यच जाय । फेवल समरामन में ही नष्ट होने वाले धन और यल का विचार करें तो बदन के सेंगटे खडे होते हैं । खरीदारों और विकवालों की बनासनी और होड़ाघोड़ी कम अनर्थ नहीं करती।
- -- । ( २३ ) तीसरे सार्यमोम सुख के पके उद्देश से जो उद्योग धन्धों पा सगठन किया जायगा तो हम अनावश्यक नुकसान और खराबी से बचकर अच्छी२ कला से बढ़े. कारखानों में किफा यत के साथ यदुत ज्याद सामान निकाल कर उससे लाभ सठायेंगे और किसी को कोई नुकसान न होगा। क्योंकि विफ्री होता होड़ी और आस पारी को दृष्टि से तो काम होगा नहीं, काम होगा अपनी जरूरत को दूर करने और काम को बढ़ यनाने के लिए, कलों को पूरी तरह से समुन्नत करने, सुधारने और बनाने के लिए । आज कल सम्पन्न लोग तो नई कलों की तय काम में लाते हैं जब उन्हें काफी और सस्ते मजूर नहीं मिलते। नई फलोंसे थोड़े मजूरों के जरिये अधिक माल पैदा करके दूसरे सौदागरों के मुकाविले में धन पैदा करना मात्र इनका अभीए होता है, न कि सारी जनता का सुख साधन । यह समझना भूल है कि फम्यूमिज्म की प्रधानता में विज्ञान नष्ट हो जाय गा,कारीगरी सम्बन्धिनी चतुराई जाती रहेगी, बल्कि इनकी अधिक उन्नति होगी, क्योंकि सभी को विद्या पढ़ने और बुद्धि बल को काम में लाने का पूरा २ सुयोग मिलेगा । अब थोड़े से धनिक ही विद्या पढ़ सकते हैं, विज्ञान और कला और कौशल की शिक्षा तो निर्धन श्रमिकों के लिए और भी दुर्लभ होती है । अधिकांश जनता रोटी की ही चिता में अपना जीवन गवां बैठती है। छोटे २ यचे ओर स्त्रिया तक कारखानों में गुलामी करने चले आते हैं फिर भी इनका पेट नहीं भरता।
( २४ )
कम्यनिष्ट समाज में हरामनोगे न रहेगी, न हरामसोरों को
कोई ऐसास्थान मिलेगा जहा रहे ओर खायें पर कमाई,न करें। जो
यक्ति आज कल के सम्पन्न समाज में नाक तक साने में, माल
उड़ाने में, नशा पीनेमें, गुलछरें उड़ाने में बग्वाद हो जाता है वही
अधिक सामान पैदा करने के काम में आगा। सम्पनों के
शामदी, आश्रित, पडे, पुजारी, पुरोहित, गणिम सर का
अन्त हो जायगा। खाने और गुर्राने वालों के स्थान में कमाने
ओर पाने वाले लोगों से भूमि परिपूर्ण हो जायगी।
इसके साथ जितना काम श्रमिकों को अये करना पडता हे
उतना काम भी न करना पड़ेगा। दिन में कुछ घण्टे काम
करने के बाद पढ़ने लिसने सेलने कूदने, आमाद, प्रमोद आदि
के लिये काफी समय मिला करेगा। लोगोंको स्लोजो आविष्कारी
के लिये भी समय और अवसर अधिक मिलेगा। मनुष्य बुद्धि
का विकाश चढेगा और पिछले समय से कहीं ज्याद पुषि,
कारीगरी, अन्वेपण और आविष्कार की वृद्धि होगी। जहा
मनुष्य के साथ मनुष्य का अन्याय उठ जायगा वहा मनुष्य के
कृपर से प्रति का अन्याय भी काफूर होजायगा । जो नर नारी
अव पशु की तरह जीकर मर जाते है वे विचार शील मनुष्य का
सा जीवन व्यतीत करेंगे।
कम्यूनिस्ट दल के विरोधी, शत्रुता, स्वार्थ परता और कभी
कभी मूर्खता घश यह कह टिया-करते है कि 'कम्यूनिष्म में
कोई हर किसी की चीज ले लिया करता है, सब चीजा आपस
।
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है । घरावर हिस्से कर लेता है 'धरती, औजार, मशीन पैदावार का आपस में भाग कर लेत हैं। लेकिन यह सरहदा याते इस तरह सार्वभौम चरतुओ का विभाग होना असम्भव भला कलो, नागों, रेलों का घंटवारा एक २व्यक्ति कैसे करा उकता है ? यदि हो भी तो इससे सुस कैसे हो सकता है, यह तो उलटा दुम्ब ओर अवनति का रास्ता होगा। इससे तो छोटे छोटे मालिक बारा से हो जायगे। फिर वही होड़ा होटो आपा धापी फैलने लगेगी । अमिक समुदाय का कम्यूनिजम प्राचीन हिन्दू घगनों की नग्ह होगा। सर जो जो काम करके फमालाते एक घर में एकात्र कर देते है, छोटे वडे उसी में से आवश्य- फतानुसार रोटी सात हे कपड़ा पहनते ह और प्रेम से रहते हैं । क्या कोई कभी यह कहता है कि 'य' ने रोटी खाइ 'य' ने एक ही पाई इत्यादि । यो २ हिंदू समाज में दूसरे देश के शासकों का आदर्श चढता गया समाज की गति विगड़ती गई कम्युनिस्ट दल या समाज सम्मिलित और सार्वभौम होगा । पम्यून (अर्थात् कटुम्र, इसीसे पम्युनिज्म ना है) अपनी जरूरत की नितनी चीज ह सब पैदा गरेगा और एक स्थान पर र काभाएडार स्थापित करेगा और अपने हरेक सदस्य को उहर जरूरत की सारी चीजें जितनी वह चाहेगा देगा! सप जर एक सा साने पहरने को यथेट ठीक समय पर पाते रहेंगे तो चोरी, शाम, स्पर्धा किसी भी बात को स्थान शेप न रहेगा।
( २६ ) तीसरा अध्याय. आर्थिक पूंजी। हम देखते हैं कि नटयार माल के संग्रह करने वालों में लगातार खरीदारों के लिये घोर सींचतान चलनी रहती है। इस खींचा तानी का अनिवार्य फर यह होता है कि बड़े बढे सौदागरों की ही नीत होती है। छोटे सौदागर बरवाद हो जाते हैं । सारा धन और सारी पैदावार यड़े बड़े पूजीपनियों के में सिमिट सिमिट कर जमा हो जाती है। इसी को पूंजी का एकत्र होना या केन्द्री भूत होना कहते है । १६ वीं सदी के अन्त से इस तरह से धन का थोडे से लोगों के हाथ में जमा होना बहुत जोर पकड़ गया है। अलग अलग वैयक्तिक मालिकों या सौदागरों के स्थान में बहुत सी ज्वाइण्ट स्टाफ कम्पनिया, सयुक्त व्यापारी मडल और हिस्सेदारों की कम्पनियां काय हो गई है और होती जारही है। यह क्यों हुआ? क्यों य कम्पनिया बहुत बहुत से लोगों ने मिलकर सम्मिलित पूर से खोली १ ज्वाइन्ट स्टाक कम्पनियों का आविर्भाव क्यों हुआ इन प्रश्नों के उत्तर की ओर ध्यान देते हैं तोअनायास ही मालु हो जाता है कि आज कल हर एक काम में बहुत से धन व जहरत होती है विना इसके इस पूजी-वृद्धि के युद्ध में कर
( ०७ )
कार्य्यता नहीं होती। थोड़ी पू जी से काम करने वाले पडे पजी
पतियों से होड़ा होडी में हार जाते हैं । उदाहरण के लिये दो
परफ बनाने याला के कारखाने लीजिये, एक ५ टन(१३५मन )
घरफ बनाता है, दूसरा अपने यहे कारसाने में ५० टन यरफ
पनाने लगा। यह ५० टन वाला अपनी यरफ पैसे सेर येचने
लगेगा जिससे ५ टन बनाने वालों को भी अपना माल पैसे सेर
पेचना पडेगा और इस होडा होडी में पाच टन बनाने वालों का
दिवाला निकल जायगा । अन्त में सब प्राहक ५० टन पाले
फारसाने के हाथ में आजायेंगे । घडे कारखाने वाले पयो जीतते
है, क्यों सस्ता चंच सकते हैं ? इसका जवाय मीधा और सरल
है। यह थोडे समय में थोह मजदूरों से ज्याद माल पैदा कर
लेते हैं क्यों कि इनकी मैशीने (कले) बड़ी है, फिर इनके पास
अधिक पूजी है इसलिये यह कुछ दिन अपना माल दाम के
दाम बेच सकते है, कभी कभी कुछ घाटा देकर भी बेच सकते
है । लेकिन यह बात छोटे कारखाने घाला नहीं कर सकता
इसलिये या तो तुरन्त अपना कारखाना उठा लेता है या
दिवाला निकाल भागता है। यही बात और कारखानों के
सम्बन्ध में भी समझनी चाहिये।
अब हम दो एक ऐतिहासिक घटनाओं से बतलायेंगे कि
किस तरह यह पूँजी थोडेसे लोगों के हाथमें धनीमत हुई । इस्वी
। १७५० में 'चरी' स्थानके 'ई' नामक महाशयने फ्लाईटिल लूम
। (डारके इशारे से फिरनेपाली नठी दार कपड़ा मुनने का फरमा )
( २८ )
तय्यार किया। इससे थोटे समय में अधिक काम होने लगा,
क्योंकि एक बार दाहिने दूसरी बार वायें हाय स नली फेंकने में
ज्याद समय लगता था, अब डोर के इशारे से सटाखट नली
दोनो तरफ दौड़ने लगी। १७६० में धुनाई की पद्धति में भी
उन्नति हुई । १७६७ में 'हारग्रीज' नामक एक गोरेने कातने का
नवा चर्खा (Spinning-yenny) ईजाद किया । इस आविष्कार
(ईजाद) से धीरे धीरे ८० तकुए एक साथ काम करने लगे।
इससे अधिक मूत तय्यार होने लगा और ग्राम के कानने वाले
बेकार हो चले। सपत से अधिक माल पैदा होगा तो सस्ता
होगा और माल पैदा करने वालों को घाटा लगेगा और जो
अत्यन्त ज्याद• माल धना तो पड़ा सड़ता रहेगा। इन गरीयो को
जो बेकार होगये थे, क्रोय आया और उन्हों ने 'हारनीज' के
घर में घुस कर उसका चर्खा नष्ट कर डाला । परन्तु अन्त में
'आराइट' ने १७६६ में और भी बड़ी और पुष्ट कातो की फल
बनाकर सरकार में रजिष्ट्री कराली । धीरे धीरे इस
आविष्कार
ने चों को उठाही दिया और सारे कता के काम वाले पुरुष
स्त्री कुली बनकर मजूरी के लिए दर बदर फिरसे लगे। १७८४
में फेण्ट के कार्टराइट ने भाप से चलने वाली कपडे की मशीन
(पुतलीघर का) आविष्कार किया और फिर वीरे धीरे जुराहों
का सत्यानाश हुआ। सब कारीगर जो घर में स्वामी बने
अपने स्त्री बच्चों के साथ अपने छोटे से कारखानों में सुत्र से
काम करते और रहते थे उली बन कर मलों में रात दिन
(६) सहते हैं, अपमान सहते है फिर भी पेट भर साने का नहीं मिलता। क्यों जाइये, भारत वर्ष में रेलों के आने के पहिले का हाल ध्यान में लाये । तिने चौपाये, गाडिया, घोडे, ऊँट हर- कारे आदि काम करते थे, कितनी सराय थीं, फितने गरीनों का पालन पोषण होता था, रेल ने सारा काम बन्द कर के सब आमदनी थोडे से रेल्वे कम्पनी के हिस्सेदारी की जेवों में भर कर लोगों का कुली वनारिया। इसी तरह सैकड़ों ही याने हे जिन पर विचार शील पाठक ध्यान देंगे तो मालूम हो जायगा के ससार में भूना और फगाने की सरया दिन २ बडे जोर के साथ घढती जारही और थोडे से सम्पन्न लोग अति सम्पन्न होते हैं तो कुछ सम्पन्न भी निर्धन श्रमिकों में शामिल होते जाते है । ससार में जो असन्तोष फैला है उसका यही एक कारण है। इसी से अनुमान होता है कि सालार में शीघ्र ही भारी अति- नाति होने वाली है। इस अति कान्ति के बाद जन शान्ति होगी तो कम्यूनिस्टिन सिद्धान्तों ही फे ग्रहण करने से होगी, दुसरा कोई उपाय ही नहीं है। तय तक यह अतिक्रान्ति नहीं होती जर तक पूजी के प्रभुत्व २ पाप का घडा, जो दोही अगुल साली हे, भर नहीं जाता। अर इन खेटे और बडे पूजीपतियों की भी पारस्परिक प्रतिस्पर्धा का हाल कुछ थोडासा यतलादेना जरूरी है । यड़े २ सम्पन्न रोग थोदी पूजी बालीक धन को इकट्ठा कर के अपनी मिलता रहता है परन्तु प्रवन्ध पो ठोस बने हुये पुजीपति संघ के हाथ में रहता है। सिण्डीकेट और ट ट एक देश के बाजार पर पूरा आधिपत्य करलेते हैं। इन्हें होडा होडी का डर नहीं रहता क्योकि हाड़ा होली का यह पहले ही कुचल छोड़ते हैं। कमी २ एकटस्ट सारे अपने विभाग के कामका इजारदार पन जाता है। कई र स्ट एक से अधिक विभाग के कामों को लेकर उसके मक्का (monopoly holder) हो जाते हैं। हम देखते है कि सयुक्त राज्य अमरीका में रुइका काम प्राय. सोलह आने के हाथ में है । वर्जीनिया की तमाकू प्रसिद्ध है यह भी टस्ट के ही अधिकार में हैं। कप का कामड़े आधे से ज्याद', काच और कागज़ का काम तीन चौथाई ट्रस्टों के ही हाथ में है। स्टेण्डर्ड आयल ट्रस्ट(मिट्टी के तेल काव्यापारीसघ)जगत्प्रद्धि है। सिण्डीकेंट या ट्रस्ट केवल एक ही प्रकार के उद्यमों को ही आत्मसात् नहीं करते, धीरे २४ न बढ़ने पर व्यापार की दुसरी शाखाओं पर भी हाथ मारते हैं। एक प्रकार के कामसे लगाव रखने वाले अन्य अनेको काम में पहले हाथ डालते हैं । कपड़े वाले ट्रस्ट को रुई, कपास और कोयला दरकार होता है, इस लिए वह इनपर भी अपना प्रभुत्व कर लेता है। उसे मशीनो। की जरूरत रहती है इसलिए वह लोहे की आगे पर फजा करके अपना लोहे का कारखाना भी खोलना चाहता है । सार यह कि एकही प्रकार के नहीं अनेको प्रकार के कामो को भी दूरद हस्तगत फरता चला जाता है। इस तरह यौगिक संघ ( ५ ) (Combined Trusts) सब हो जाते हैं। चीसवीं सदी के आरम्भ से ऐसे कई बड़े टूर पैदा हो गये है या बन गये हैं जो कई प्रकार के मालों की पैदावार अपने हस्तगत करचुके है। अर हम दो चार शन्द को के सम्बन्ध में फहना चाहते है। पूजो का एकस्य ओर केन्द्रीमत होना बहुत ही बड़ी हद तक पहुंच जाने पर पू जी को जरूरत ओर भी ज्याद बढ़ गई, क्योंकि बडे २ उद्यमों के लिए बहुत ही बड़ो पू जी की जरूरत होती है। इसीलिए प्वाइन्ट स्टाक कम्पनी की भी रीति निकली थी । जय इस रीति से भी यथेष्ट फाम न चलता दीखा तय दूसग मार्ग देखना पड़ा । यह मार्ग बैंकों का माश्रय है। यह से ? सुनो। जो धन जीपति कमाता है या यों कहें कि नफे को शकल में पाता है, वह सब का सब अपने खाने पहरने, आमोद प्रमोद आदिम खर्च नहीं कर डालता । जो उसके नित्य के खचों से वच रहता है उसे वह जोड़ता जाता है। सम्भव है कि उसे कभी अपने काम को बढ़ाने के लिए पुष्फल बन की आवश्यकता हो। नफे का रुपया ता धाडा २, धीरे २, समय २ पर ज्यों २ माल विकता रहताहै, आताहै, तय एकदम काम बढ़ानेमें धनिक बहुत साधन कहासंल्गासकताहै,इसलिए धनका जोड़ना बहुत जरूरी होता है। मानलें कि उसे एक भारी मेशीन मँगानी है, यह उसे जय तक काफी रुपया न इकठा हो जाय नहीं मिल सकती और है थोड़ा २ रुपया जो बचता रहता है वह घर में बेकार पहारहता है, यह समस्या सभी पूंजीपतियों के सामने रहती है, एकदा ही नहीं। साथ ही पूजी की माग भी बरावर बनी ही रहती है। किसी को मेशीन या कश्चे माल फी सस्त जरूरत पड़ी और समय पर काफी रुपया पास न हुआ तो उसे उधार लेना ही पड़ेगा, यही पंजी की माग है। एक और जी वेकार रहती है दूसरी ओर उसकी जोर की माग है, इन दोनों कष्टों का मिटाने के लिए बैंक होती हैं। जिनके पास फालतू रुपया बैंक में जमा कर देते हैं ४) ६) सैकड़ा सालाना व्याज लेते हैं। जिन्हें जी की जरूरत है और मातवरी रखते हैं उन्हें बैंक ८) है) सैंकड़ा सालाना पर उधार देतीहै । ६) ६) के बीच का नफा ३) सैकडा सालाना बैंक आप खाजाती है । इसमेंसे खर्च चुकाने के बाद जो बचता है वह हिस्सा रसदी अर्थात् अनुपातानुसार भागीदारों को दे दिया जाता है । क्योंकि ये भी प्रायः प्वाइट स्टाक कम्पनी ही हैं। इसके भी हिस्सेदार (शेअर होस्टर होते हैं। बैंक केवल रुपये के लेन देन का काम करती हैं। 'अवाम समझ सकते है कि पूजीपति प्राधान्य-काल में कैसे बैंकों का महत्व इतना बढ़ गया है । यह चही किस तरह पर लगातार निर्धनों को पीसा करती है। जुआड़ियों की नाल की तरह दूसरों को चूस २ कर के मोटी होती जाती हैं और इसी कारण से मो? पूँजी पत्तियों को और मोटे घनाती रहती है। बैंक की पूजी उद्योग धन्धों में लगती है, उद्योगों के नफे ।
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(३७)
इनमें जमा होते रहते हैं । येक की पूजी और उद्योगस्थ जी
साथ, यहनी है । इसी जी का नाम आर्थिक पूजी
( Financial capital ) है।
निचोड यह कि बैंकको 'जी आर्थिक पूँजीहै जिसको कलम
(Item) औद्योगिक पूजी में लगती रहती है । येके अपने स्वार्थ
की रक्षा के लिए उद्योग की हर शाखा में, सामजस्य धनाये
रहने की कोशिश करती है, इनके ही सञ्चालक (Directors)
प्राय यही २ कोठियों, कारखानों, टूलों और सिण्डीकेटों और
कम्पनियों में भी सञ्चालक रहते हैं। इन सब बातों से परि-
णाम यह निकला कि सारे देश के ट्रस्टी, सिएडीटों और
सम्मिलित उद्योगों का धन्धा सयुक्त होता है, यह सब बैंकों से
मम्मिलित रहते है। प्रधान शासक और सञ्चालकमण्डल एक छोटा
सा दल महत्तम पूजीपतियों का होता है। राज्यशक्ति इन्हीं के
अभीटा की पूर्ति में लगी रहती है। इसलिए देश के प्रधान
शाक ओर स्वामी एक मुट्ठी पूजीपति होते है,शेष जनता इनके
ही लिप रात दिन कोल्ड के बैल की तरह पिसा करती है।
अमरीका, ब्रितानिया, फास और जर्मनी प्रभृति सभी देश
'राजकीय पूजी पतियों के ट्रस्ट मान हैं। दृस्ट मुग्गियो, सराफों
(Banker) का बलशाली संगठा अपने स्वार्थ के लिये कोटि
कोटि श्रमजीवियों के खसारता है और उन पर शासन
करता है । यह कम्यूनिस्टों का कथन है, पाठक सोचें कदा तक
ठीक है।
(३८) हम कह चुके हैं कि कच्चा माल सुभीते के साथ लेने और तय्यार माल बेचने के लिये बाजारों की जरूरत होती है। जब इन बाजारों पर सुगमता से लाभ प्रद अधिकार नहीं जम सकता तो युद्ध किये जाते है और निर्वल राज्य को सवल जीतकर अपने राज्य में मिला लेता है । इस जबरदस्ती के लिये जो सैन्य और रण-सामग्री एकत्र करने का भाव व नीति है, उसे अंग्रेजी में मिलीटेरिज्म (militarism) कहते हैं। अव म २ अध्यायों में 'शासन-तृष्णा' और 'असिनीति' पर कम्यूनिस्टिक दृष्टि से विचार करेंगे।
चौथा अध्याय.
।
.
शासन-तृष्णा।
Imperialism.
आज कल पूंजीपति जो माल उत्पन्न करते है वह खर्च
जपत का हिसाय करके नहीं करते, इस लिए माल के उत्पन्न
करने में गदर मच रहा है । पक सीमातक पृथक पृथक देशों में
आर्थिक पूजी के शासन का फल है इस गदर का अन्त करना ।
इसी अभिप्राय से अनेक माल उत्पन्न करने वाले पजीपति जो
आजतक एक दूसरे के साथ दूद्ध युद्ध करते रहे हैं, अब अपना
साग बल मिला कर राज्य भरके पंजी पतियों का ट्रस्ट स्थापित
करते हैं। लेकिन हम देखते है कि इस धन के प्राधान्य का नाश
होना अवश्यम्भावी है क्योंकि इसमें पहिले तो संगठन की कमी
होती है, दूसरे यह काम गरीयों और अमीरों के भगडे पर
आश्रित होता है। यदि इन दो में से एक बात भी गलत हो
तो पू जीपतित्व का नाश नहीं हो सकता अत हमारी कल्पना
वेबुनियाद ठहरेगी।
अब हम वस्तुस्थिति को देखते है तो प्रकट है किस्टों के
होने पर भी माल की पैदावार का गदर और विक्री की होडा
होड़ी मिटती नहीं। यदि एक जगह यह गदर मिट जाता है तो
दूसरी जगह और भी अधिक भयानक रूप में फूट निकलता है।
(४०) इस समय का पूजापतित्व संसार व्यापी पजीपतित्व है, एक ही देशको प्रश्न नहीं है । सब देश एक दूसरे से सम्बन्ध रखते हैं, एक देश दूसरे देश से माल खरीदता है । कोई देश ऐसा नहीं जो पूजीपतित्व के पंजे में न दवा हो और अपनी जरूरत की सब चीजें खुद पैदा कर लेता हो । कई चीजें तो ऐसी है जो खोस जगह हो पैदा होती है, जैसे जूट (पाट या पट मन जिसके घोरे बनते हैं) बंगाल में ही होता है, नारंगिया उगडे देशों में नहीं होती, लोहे, सोने, चादी, तार्य की खाने नय देशो में नहीं पायी जातीं । रूई अमरीका, भारत, मिश्र और तुर्किस्तान में ही होती है। कोई देश किसी किसी काम में बहुन उन्नति कर चुके हैं, दूसरे पीछे पड़े हुये हैं । जर्मनी रामायनिक सामान का बडा जवरदस्त घनाने और घेचने वाला है,सारी दुनिया में उसकामाल जाता है। इगलैण्ड, चेलजियम लोहे के निर्यात के लिये अपना खास स्थान रखते हैं । सार यह कि कोई देश ऐसा नहीं जो दूसरे का बिल्युत ही आश्रित न हो । जो एक चोज दूसरे देश के हाथ घेचता हे वह दूसरी वस्तु दूसरे देश से खरीदता भी है। अब सोचने से साफ मालम होजाता है कि आर्थिक पूजी ससार के बाजार से होड़ाहाड़ो का अन्त नहीं कर सकती । यदि किसी एक देश के मारे पूंजीपति लेाग मिलजारें तो इससे सारे मसार का सगठन नहीं हो जाता। किसी एक देश के सारे पूजीपति मिलकर उमी देश में राष्ट्र-पूजीपति-दृस्ट बना "सकते है और थोडा या महत उसी जगह की पैदावार की गवर- और व्यापार की होड़ाहाड़ी अलवत्ता मिटा सकते है । वास मझने की यह है कि जहा इन ट्रस्टों से एक राज्य के भीतर तिद्धन्द्धिता का भत किसी काम को हथिया फर कर सकते हैं हां दूसरे राज्यों या देशों के साथ और भी भयानक झगडा बड़ा हो जाता है। क्योकि अनाप शनाप माल पैदा करते हैं, और उस सयमा धेचने के लिये बाजार जप नहीं रहता तों द एक देश के व्यापारियों और कोली चालों में होता था अप शान्तरों में होने लगता है।पूजी के केन्द्रीभूत होने की यह रह नतीजा है जिसे कोई रोक नहीं सकता। जब देश के छोट यापारी न हो लेते हैं, तो यहे व्यापारियों में फुरती होती है। जव इन में से भी बहुत नष्ट भ्रष्ट हो जाते है, तो थोडे से बहुत पढे व्यापारी मेल कर लेने है और अपने राज की प्रतिद्वन्दिता एक बहुत बड़ी हद तक मिटा देते हैं और दूमरे राज्यों के साथ बुद्ध भारम्भ हो जाता है यही समझाना हमारा असीए था। अब इस एक राज्य के धनयुचेगे को दूसरे राज्य के धनधेरों के साथ की प्रचण्ड हाडाहाडी राज्य को भी अपने साथ लेलेती है, क्योंकि राज्य का शासन इन धनवानों से ही बना होता है जैसा हम आगे चल कर किसो उपयुक्त स्थान में विस्तार से समझायेंगे । इस तरह की देशान्तरों को प्रतिदन्द्धता में एक राज्य ভয় ঘৰু ইবনা ই কি যমই যা কুরা ফাত্বে অঘনা যাত सस्ता घेचता है इस लिये हमारे देश कमाल उराम करने वालों फा माल नही विकता या सापिकाने के कारण व्यापारियों
(४.)
और कोठीवालों को घाटा पड़ना है तो वह दूसरे देशके मारपर
कर धैठाल ताई इस करका नाम होताहै सरक्षककर'(protective
duty )इसका मतलब है अग्ने देशक उद्योगधन्धे को विदेश के
औद्योगिक आक्रमणो से बचाना । मानले कि अगरेज पूजीपति
फलाकोशल की बहुत बड़ी उन्नति के कारण अपना एक माल
मास में १० फेक को बेच सकता है, लेकिन वही माल फ्रांस के
फोठीवाल १२ क से कम में नहीं दे सकते, तोच गर्नमेंट
बाहिरी माल पर, २ केंक कर लगा कर देशके मालकी विक्रीका
मार्ग स्त्रोल देगी। इस तरह धनिक कोठीवालों के लिये गरीब
सरीदारोंको ज्याद. दाम देना पड़ता है।
कमी २ दूसरे देश के माल को एक दम आने से रोक देने
के लिए बहुत बडा कर लगा दिया जाता है। इससे देश का
ही महँगा माल देश में रिकता है और बाहर का सस्ता माल
नहीं आ सकता। इसको 'चाभक कर Prohibitive duty
कहते हैं । आज से अनुमान ११० वर्ष पहिले अग्रेजों ने भारत से
ब्रिटेन में जाने वाले कपड़े पर सौ प्रति सौ कर लगा दिया था
जिससे भारत का माल ब्रिटेन में विकना बन्द हो गया और
भोरत के व्यापारियो के हाथ से ब्रिटेन का बाजार जाता रहा।
इसमें भी देश प्रेम के नाम पर गरीयों का ही खून हुआ करता
है, धनवानो की जेथे भरती हैं।
एक तीसरा कर 'निकासकर' है ( Curtel duttes)| जय
माल यहुत तगार होता है तो देश में नो पुराने महँगे दामों पर
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(४३ ) विकता रहता है पर विदेशों में बहुत मस्ते दामों पर बेचा जाता है। लागत के भाव पर और कभीर घाटा खाकर एक देश अपना माल दूसरे देशमै बेचता हे । जर्मनी अपना अलकोहल जर्मनी में जिन दामों घेचती है उससे ५०फी सैकड़ा क्म पर दूसरे देशों के हाथ वेचती है, इसी तरह से रोहे के गर्डर ३० फी सैकडा कम दाम पर इटली को देती है। कई बार दूसरे देश के क्सिी उद्योग को नष्ट करने के लिए भी एक राज्य अपनी तरफ से अपने धगावेरों का घाटा पूरा करके उनका कोई खास माल दूसरे देश में सस्ता विक्रवाता है । हिन्दुस्तान में चीनी का काम इसी तरह पर जर्मनी और आस्ट्रिया ने नष्ट किया । इस तरह पर जो रुपया राज्य अपने जीपतियों को घाटा पूरा करने के लिए देता है उसे चाउण्टी (Bounty) कहते हैं । हमारे पाठकों को याद होगा कि Bounty fed चीनी हमारे देश (भारत) में बहुत काल तक आती रही है। इन अनेक गैतियो से व्यापारिक हकूमत कायम की जाती है। लेकिन यही नहीं, कच्चे माल की प्राप्ति और अपने तय्यार माल की खपत के लिप बाजार की नलाश में भी बड़ी २ कोशिश होती है और गजनैतिक समर की नौबत आ जाती है। कञ्च माल की खोज और तय्यार माल के लिए बाजार की तलाश में होडाहोटी के कारण बहुत ही यडे परिमाण में धन व्यय हो जाता है । व्यापारिक ट्रस्टों में झगडा और प्रतिद्वन्छिता चल्ती ही रहती है । शानि काल में ही इस खींच तान के कारण अन्न .
( ४४ ) शस्त्रों ओर अन्य लड़ाई के सामानो की वृद्धि भी होनी रहती है, जरा सा बहाना मिलने पर भयानक संग्राम छिड़ जाता है । गत १०-१५ वी से लगातार कच्चे माल का दर चढता चला जाता है, युद्ध काल में ( १९१४-१९२०) बहुत ही चढ़ गया था और समुन्नत पूँजी प्रधान देशों में से हर एक कश्चा माल हस्तगत करने के लिये घेचैनी के साथ कोशिश करता था, अब भी कोशिश करता है और चाहता है कि कच्चे माल के मिलने का मूल द्वार ही हमारे हाथ आ जाय तो सब से अच्छा । कच्चा माल ज्याद मिलता है भारत जैस पीछे पड़े हुए रही देशों में । इन्ही देशो को ओर विदेशो लुटेरो का धावा हुआ फरता है । किसीने रई के लिए भारत और मिश्र पर दात लगाया,तो दूसरे ने इसी अभिप्राय से तुर्फिस्नानको जा दवाया। सभी चाहते है कि कच्चे माल के दाता देश मेरे राज्य में मिल जायें, इसीलिये बड़े २ युद्ध हाते हैं। पू जीपति धनकुवेरों के लाम के लिए उनकी प्रतिपालित सरकार मार-काट करनी है और गरीब बेचारों को पुचकार कर देश प्रेम के नाम पर बलि चढ़ाया जाता है। यही सिनीति Imperatlism का सारा दास्तान या कच्चा चिट्ठा है। फिर भी प्रश्न हो सकता है कि यह सर कैसे होता है। व्यापारिक झगड़े कैसे पढ़ते २ दूसरे देश को अपने राज्य में मिलाने और महायुद्ध करनेकी हद तक पहुच जाते हैं । व्यापा रियो और कोडेरचालों की देटा होखो में तो झगड़े का कोई 1 ३
(४५)
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काम न था। दो सौदागर बुरी लेकर नहीं लगा करते. घे तो
चालाकी से एक दूसरे का व्यापार छीना करते है। फिर संसार
में होडाहोडी का ऐसा भयानक पाशविक परिणाम कैसे हो
जाता है ? हथियार उठाने की जरूरत क्यों पडती है ? यद्यपि
सूत्र रूप से यह बातें बतला दी गई है फिर भी मैं कुछ विस्पट
रूप से और बतलाता है ताकि हमारे साधारण पाठक भी
अच्छी तरह पर समझलें कि बात क्या है।
माल तय्यार करने वाले (कारागर, मिलके मालिक इत्यादि)
प्राय. कहा करते हैं कि उद्योग धन्धों के प्रोत्साहन के लिए
'टेरिफ्स' (आयात निर्यात् कर सग्रह) की बडी जरूरत है।
लेकिन जर हम वातकी तह में घुसकर देसते है तो दूसरा
ही रहम्य पाया जाता है। पिछले ३०-४० वर्ष के भीतर का
इतिहास देसते हे नो जिन देशों ने सर से अधिक हल्ला गुल्ला
ऊँचे २ करो (High Tariffs) के लिए मचाया है, वही सर
से अधिक धनवान और पलिष्ट है। यह वात गलत है कि
उन्होंने अपनी गरीवी और कमजोरी फेसवय अपनी कारीगरी
की रक्षाफे लिए बडे बडे टेरिफ कर चॅधाने को चीनफार
मिचाई थी। इस काम का अमरीका का सयुक्त राज्य ही पथ
प्रदर्शक हुआ था । एक बार धर्मा को आयल कम्पनी ( मिट्टी
का तेल निकालने घाली कंपनी ) की रक्षा के लिए इसी तेल पर
भारतस्थ निटिश सरकारने कर लगा दिया, रूस ने भी भारत
से रूस में जाने वाली चायपर फर बिठा दिया। इस तरह के दाय
धात राज्या में चला करते है जिनसे अमीरो का काम होता है
बड़े २ बन पात्र, धन कुबेर वन जाते है, परन्तु गरीबों का खून
दोनो ओर से चूसा जाता है।
याहर से आने वाले माल पर ओर देश से बाहर जाने वाले
माल पर जो कर लगते हैं उनकी सूची का नाम टेरिफ है। यह
शब्द प्रचलित होने के कारण हमने अपना लिया है।
आयात कर (Import duty)। देश में आने वाले मालपर
कर लगाने से सिण्डीकेट के सम्पन्नों का एक पथ दो काज होता
है । पहले तो विदेशियों के साथ होडाहाड़ी करने से पिण्ड छूट
जाता है, न बाहर का आया हुआ तेल हमारे यहा ३) टिन रिक
सकेगा न हमें अपना तेल ३) टिन वेदना पडेगा । दूसरी पात
यह होती है कि अपने देश बासियो को म पन लेग सूब
उलट छुरे से मड सकते हैं । एक उदाहरण से बात अच्छी
तरह समझ में आ जायगी । कल्पनो करो कि विलायती
कपडे पर ५०) सकड़ा कर हमने लगा दिया तो चिलायत
का माल भारत में अत्यन्त महंगा पड़ने के कारण विकने से
रह जायगा,
धीरे धीरे विलायती कपडे का आना याद हो
जायगा। हिन्दुस्तान के मिलो को जर विलायत्ती धोती ३)
जोडे विकती थी, अपनी धोती भी ३) २) में वेचनी पडती
थी, क्योकि ग्राहक तो अच्छा और सस्तामाल लेता है। अब जब
विलायत का माल बहुत ज्याद. कर लगाने के कारण आना बन्द
होगया तो हिन्दुस्तानी मिलों का विलायती माल के मुकाबले
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(४७)
का डर धाकी न रह गया, इमलिए इहोने वही २i) को धोती
४) को पेचना शुरू कर दिया, देश के हारकर लेना ही पडेगा ।
इस लिए रेरिफ का अर्थ है गरीबों को लूट कर धनगनो का
जेब भरना । भारत में स्वदेशी आन्दोलन का भी यही फल हुआ,
गरीब लुट गये और बम्बई आदि स्थानो के मिल वाले धन
पुचेर धन गये । जिस गरीर के मुह का टुकडा छिन गया यह
तो भूका मरा, टुम्हा छीनने वाला चाहे काला कौआ हो या
सफेद चील । हमारे लिए ल काशायर का मिल मालिक वैसाही
खतीस दिग्वलाइ देता है जैसा वम्बई, अहमदाबाद, कानपुर,
देहली, आगरा, इत्यादि स्थानों का मिल मालिक । जिस देश प्रेम
के नाम पर गरीबों का बलिदा होता हे उस देश प्रेम के लिए
किसा भी मिल मालिकने १६०५ से आज १९२५ तक में कभी
अपने नफे में एक कौडी की कमी नहीं की, अवसर पाने पर
अपनी नफा चौगुनी दसगुनी जरूर को है। १९१४ से १९१६
तक का कपड़े के व्यापार का इतिहास देखो, १६.६ से १० तक
के स्वदेशी अन्दोलन की कथा पढ़ो।
स्पष्ट है कि हमारी टेरिफ का प्रभाव जितने भूभाग
पर पडेगा उसका क्षेत्र फल कम है, तो नफा करने का भी अव
सर कम ही होगा, और जो यह क्षेत्र फल विस्तृत है और
सूच आवाद है तो नफा भी अनुपात के अनुसार याद होना
निश्चित है । जहा नफे की फालतू रकम खासी हह को पहुंची
कि ससार भर के बाजारों में हाथ मारने की हिम्मत बढ़ी।
अत
।
appears that this compulsion is effected under
power conferred on the Governor by the ordinance
of 1922 which authorises the issue of orders com
pelling natives to work on Railway and other
constructional Schemes The wages paid to the
conscripted workers vary from 12 to 15 Shillings a
weeh, and refusal to comply with an order may
involve a native in imprisonment for a period of 2
months Those who are working on plantations
run by Europeans, where Sısal and coffee are
chiefly grown are exempt from compulsion of this
sort The conscripts are those who prefer to live
at home on their reservations, where they grow
food for themselves, and maize and cotton for
export
"उपनिवेश मंत्री मिस्टर 'एमरी' को यह बात हंकारते देख
बहुत से पार्लिमेंट के सदस्य चकित रह गये कि अनुमान ४०००
फेनिया निवासी यूगेण्डा रेलवे में काम करने के लिये जबरदस्ती
भरती किये गये है । जान पड़ता है कि यह वलात् भरती सन
२४२२ के उस विशिष्ट अधिकार के अनुसार होती है जिससे
गवर्नर रेलवे पर या दूसरे तामीर के कामों पर मजूरी करने के
लिये केनिया के आदिम निवासी को पकड़ सकता है । इन घेगा
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रियों को प्रति सप्ताह १२ से १५ शिलिंग तक यथा योग्य
मजूरी मिलती है । यदि इनमेंसे कोई काम करने से इनकार
करता है तो उसे २ महीने की फैद होती है। जो लोग फेनिया के
रहने वाले अगरेजों के सेतोपर, जहा सीसल (sisal) और कहवा
पैदा होता है, काम करते हैं, उनको वेगार से बरी किया गया है।
इन वेगारियों में वे लोग हैं जो अपने घर पर ही रहना पसन्द
फरते हैं और अपने खाने का सामान आप पैदा कर लेते है, साथ
ही मका और रुई याहर भेजने के लिए भी निपजाते हैं।"
विचारशील पाठक उक्त वाक्यावलि में कई बातें विचार
करने योग्य पायेंगे, यया-
(क) जसरदस्तीमा न्यवहार गरीबों और मीधे लोगों के साथफैसाहै।
(ख) राज्य किस तरह सम्पन्नों को गरीबों के खून चूसने में
मदद देता है।
(ग) सम्पत्याभिमानी अगरेजों का अन्त करण कैमा है । पालि-
मेंट के मेम्पर आश्चर्य स्तम्भित तो हो गये पर उन्होंने
इस अमानुपी अत्याचार को हटाने का प्रत नहीं लिया। इस
यातको जानकर भी अंग्रेज जाति सुख में सोती है भोर मज़े
उड़ाती है । यदि धर्म सभ्यता कहीं होती तो लोग इस
अत्याचारके मिटाने के लिए धरती आकाश हिला छोड़ते ।
(घ) छोटे २ देशो को घडी २ शक्तियाने क्यों आत्मसात् दिया ।
(ड) कानून सिना स्वार्थ पूर्ण धडन्त के और कोई अर्थ नहीं
रसते । 'ला परह आइर' ठगी फेजाल का नाम है।
बनाने, दूसरी स्त्रियों की इजत को ग्वराव करने, जुवा खेलने अन्धाधुन्ध शराब पीने आदि के लिये अपसर नहीं है। यह यातें तभी हो सकती हे जय सोने चाँदी की बच्ची 'शासन की तृष्णा' का नाश हो, ससारमें मनुष्य-प्रेम बढ़े। देश प्रेम का झूठा भूत उतरे। सारी पृथ्वी हमारा देश है, सारे मनुष्य हमारे भाई है। हमारे शत्रु वही है जो हमारा हक छीन कर हमसे बडे । यने येठे है। यदि ये खुशी से हममें आजाये तो इहे स्वागत हे, यह हमारामाल हमें सौपदं और हमारे साथ भाइयों की तरह रहें। यदि ऐसा नहीं करते तो हम मनुष्य-भक्तों को मानव जाति की रक्षा के लिये कोई न कोई तदपीर अवश्य ही सोचनी व करनी पड़ेगी। यह तजवीज कम्यूनिज्म का प्रचार हे। *- .
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( ५५ )
पांचवां अध्याय
असि-नीति (militarism.)
सैन्य, नौसैन्प, और हवाई यल की वृद्धि में जो दिन २
अभूत पूर्व सर्च की वृद्धि हो रही है, जिस तरह पर लड़ाई के
सामान की योजना होती है उसी में आर्थिक पूंजी का शासन,
बैंकों के धन कुपेरों का आधिपत्य और टस्ट के प्रभाव शोली
अधिकारियों का प्रभुत्व प्रकट होता है। प्राचीन काल में किसी
भी अत्याचारी ने समस्त ससार पर हुकूमत करने का स्वप्न नहीं
देखा । आज कल प्रभुत्व के प्यासों का ध्यान इस ओर बहुत
धुरी तरह से लगा हुआ है। इससे पहले दीर्घकाय सद राजकीय
ट स्टौ का संघर्प कभी नहीं देखा गया । इस नवीन परिस्थिति
का ही फल है कि राज्य एड़ी से चाटी तक हथियार याद होते
जाते हैं। किसी को भी दूसरे पर विश्वास नहीं है। एक राज्य
दूसरे की ओर आख लगाये रहता है कि कहीं ऐसा न हो कि
मेरा पड़ोसी मुझपर अचानक आक्रमण कर बैठे। हर एक राज्य
इतनी सेना हर दम तयार रखता है कि कोई उससे लड़ पड़े
तो यह उसका सामना कर सके। आज कल सेना केवल
उपनिवशों की मदद और मजदूरों के ही दवाने के लिए नहीं
रहती, यद्यपि आत्म रक्षा की दुहाई दी जाती है । जहा किसी
राज्य ने लडाइ का नया ढग निकाला, नये हथियार या जहाज
घगैरह बनाये कि दूसरे राज्य चौकमे होकर उससे आगे बढ़
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जाने की कोशिश करने लगते हैं, इसलिए कि कहीं हम फितही न
हो जाय । हथियार तय्यार करने, लड़ाई के सारे सामान प्रस्तुत
करने के लिए भा बड़े २ टूस्ट बने हुए है जो सीमातीत लाभ
उठा रहे हैं। यह टस्ट फौज वालों से मिले रहते हैं । यह टर
और सेना के अफसर लोग आग में घी डालते रहते हैं, चाहते
है कि समर छिडे तो हमारा दाघ लगे। लड़ाई छिड़ने पर न
फेवल सैनिकों और हथियार बनाने वाले ट स्टों को ही फायार,
होता है किन्तु जैसा टामस पेन ने 'राइट्स आव मैन' नाम की
पुस्तक में लिया है गज्यके वडेर आमात्यों और कर्मचारियोंके
भी खूब पौयारह होतेहैं,क्योंकि युद्ध कालमें कोई नहीं पूढसकता
कि वन कहा और किस तरह पर पानी की तरह लुट रहा है।
गत महासमर के पहले यही दृश्य सम्पन्न समाज ने
दिखलाया था। राज-टू स्ट धरती आकाश और समुद्र पर
हथियारों की चमचमाहट दिखला रहे थे । भूमण्डल-व्यापी
समर की सारी तय्यारिया हो चुकी थीं। समर के सर्च ।
अनुमान पत्र बहुत ही लम्बे चौड़े बनाये गये थे । ग्रेट ब्रिटन ने
१-७५ ई० में लड़ाई का खर्च समस्त साल के सब प्रकार
के
खर्च का ३६ प्रति सौ रखा, था अथवा एक तिहाई से कुछ
ज्याद ,परन्तु सग १९०७-८ में यह बजट ४॥ प्रति सौ हो
गया । अमरीका सयुक गज्यों का समर-व्यय का बजट ५७
प्रति सौ १६०८ में था। ऐसाही हाल और राज्यों का था।
जर्मनी का माथा सय स ज्याद सराव हो रहा था।
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- इलैंड और जर्मनी की होडा होड़ी का पता इसीसे लगता है कि १६१२ ई० में इंगलैंड ने तय पिया कि जो जर्मनी दो टूड- नाट जहाज बनाये तोहमतीन घताय । १६९३ में जमना क येड़े में १७ डूडनाट थे और अगरेजों के बेड़े में २१ थे, १९१५ में जर्मनी के पास २६ थे और अगरेजों के पास ३६ ! लड़ाई का सर्च वढने का पता नीचे की तालिका से मिलेगा। नीचे जो अ दिये गये हैं यह करोड़ समझते होंगे। ३१ ५ का होगा साढे तीस करोड़। देश सर १८८८ में। सन् १९०८ में। ३१५ करोड़ ७०५ करोड़ जर्मनी २७० मास आष्ट्रियाहगेरी १५० इटली निटेन जापान सयुक्त राज्य। १५० ३०० अमरीका २० वर्ष में इस तरह धाग भर भर फर लड़ाई का खर्च पढ़ता रहा है। हम अपने पाठकों को श्रकों की भरमार से तग करना नहीं चाहते, नहीं तो उ यातला देते किमयेक देश के धनिक प्रधान शासन ने दशा कितना धन और गरीयों को " २२५ " . " " । - ( ५८ ) कितनी बहुमूल्य जाने स्वार्थान्ध होकर नष्ट की है । इन धन कुघरों का जी सदा दूसरे देशों के लटने खसोटने में ही लगा रहता है। इसी अभीष्ट सिद्धि के किए नारकीय सामग्री तयार होती रहती है। अर हम थोड़ा सा गत समर ( १९१४-१८) का वर्णन करके इस अध्याय को समाप्त कर देंगे। जिन बातों का वर्णन ऊपर के अध्यायों में किया गया है उनसे स्पष्ट है कि शासन तृष्णा' के कारण महती शक्तियों में महासमर आगे, पाछे होने वाला था ही, क्योंकि इनकी आपस में निर्दयता पूर्ण लूट मार चलती रही थी, केवल दी हुई आग के फूट निकलने की देर थी। यह तो मूर्ख ही मान सकता है कि सौं (Serbs) ने आष्ट्रिया के राज कुमार को मार दिया इसलिए रण- चण्डी चेती अथवा जर्मनों ने बेलजियम पर आक्रमण किया, इसलिए महा समर प्रघटित हुआ। रूसने जर्मनी को, जमनी ने रूस को अपराधी ठहरानेके लिए सरविया का, ग्रेट ब्रिटेन ने अपना मुंह साफ रखने के लिये बेलजियम का बहाना लिया, क्योंकि बिना बहाने धर्मात्मा कहला कर खून करना कठिन था। फ्रास ने भी ब्रिटानिया के धार्मिक घुर्के में लुपना उचित समझा। घुहारिन कहता है, यह सब व्यर्थ का वितरहा था। यह सव याते श्रमिकों की आसों में धूल डालने की थीं। इस तरह के बहाने न बनाये जाते तो अभिजात कमातियों की:
( ५६ ) गतिर श्रमिक देहाती कैसे रणमें जाकर हँस हँस प्राण देते ? रभि जातीने यह चाल पहली ही वार नहीं चली । हम कह हुके है कि दलों के स्तम्भ ऊँची ऊँची टेरिफ रगाकार देशियों को लूटते और विदेशी बाजारों को फतह करते रहते है। इस रह यह भायात कर (तट कर अर्थात् Customs duty ) रु प्रकार का आक्रमण है, लेकिन अभिजात कहेगा, नहीं जी, हि कर तो स्वदेशी उद्योग और वाणिज्य की रक्षा का साधन है। यही बात इस महासमर में भी दीखती थी। मतलव तो पा संसार को अपने धनकी नाथ से नाथ कर मनमानी गत चाना, सारी दुनिया का धन लूटकर सर्वश्रेष्ट बनजाना, इस- लिए सब के सब अपराधी थे, पर यहाने किये गये परोपकार के, दया के और न्याय के । लेकिन ससार में बहुत दिन बात छुपती नहीं-'उघरहि अत न होद निवाह, कालनेमि जिम रावण राह। १९१७ के नवम्बर महीने में रूस की अतिकान्ति revolution में आगात्यों के कागज पत्रागारसोल कर देखे गये और गुप्त सन्धिया प्रकाशित हुई तब लैकखि प्रमाण इस बात का मिला कि रूसी जार और 'करेन्सकी ने अग्रेजों और फरासी. सियों के साथ मिल कर लूट के लिए समर आरम्भ किया। इनमा इरादा था कि कान्स्टेन्टीनोपिल छीन, तुर्की और पर्शिया फो लूटे, आष्ट्रिया से गेलोशिया रासाट लें। यह सब बातें आज प्रीम के प्रचण्ड मातरड के समान प्रकाशित हो रही है,
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इस आमदनी में से पह और ज्यादा मजूरी खरीदता है (मजर
रखता है), और अधिक औजार और कस्वा माल खरीदता
है, और फिर माल तय्यार करके बेच लेता है। तय्यार माल
हाथों हाथ विकता विकता जव खर्च करने वाले हाथमे पहुँचता
है तो वह भोग डालता है। जैसे गेहूँ विकता २ खर्च करने वाल
के पास पहुंचता है तो वह पीस कर खा लेता है । यह सब है।
फेर धन से होता रहता है।
इस लिए पंजीपतित्व की पद्धति नियमित रहने के लिए
जरूरी हैकि रुपया ठीक २ और वेरोक टोक चलता रहे और माग
के मुताविक रुपया मिलता रहे। इन्हीं दो बातों का विचार हमें
पहले करना है।
यह तो प्रकट है हो कि रुपया (धन का पर्याय) एक
प्रकार का पदार्थ का मूल्य है या पदार्थों के मूल्य का प्रतिनिधि
है जिसे हम अगणित पार बचा सकते हैं और अपरमित परि
माण में एकत्र कर सकते हैं, यह सड़ता है न गलता है । इ.
ठीक २ होना चाहिये, रुपया नोटा न हो, न उसके लेने देने में
कोई बाधा खड़ी हो । इसी प्रथा से धन के बचाने और जोड़ने
की इच्छा पैदा होती है। फल यह होता है कि देश में प्रचलित
धन सदा परिमाणमें उससे ज्यादा होता है जितना चलनके लिए
तत्काल दरकार है । ऐसा न हो तो समय पर आये कहां है।
जितना फालत धन होता है यह जमा रहता है, चलन में नहीं
रहता, लोगों के जेबों या सन्दूकों में रहता है। तभी तो माग
m
। आजाने पर झट से अपने स्थान पर ठीक आ थैठता है। और काम पार पट्टते रहते हैं। हेर फेर और उधार लेन देन की दशाओं के संयोग से रुपये के माग का विचार किया जाता है। इस माग का आदाजा एक खास वळ में इस तरह होता है कि पाजार में चिक माली के दाम के कुल जोड में उन मालों का दाम भी जोड़ देते हैं जिनका दाम हाथ की हाथ नहीं दिया गया था और अप इस खास समय में दिया गया, इस जोड़ में से उन रकमों को काट कर जिनका भुगतान एक दूसरे के साथ मुजरा हो जाता है, बाकी को रुपये के हेर फेर के मध्याश (average) से भाग दे देते है । इस तरह मालूम होता है कि रुपयोको मांग की कमो और ज्यादतो या तो बाजार मालों के दामोऔर परिमाणों पर आश्रित होती है, अथवा उधार के परि- णाम और रहस्यो पर, किम्मा रुपयो के हेर फेर की शीघ्रता पर । सम्भव है कि पाठक न समझ सके हैं। इसलिए एक उदाहरण देना जरूरी है। मानले कि एक सप्ताह में पाजार में जितना माल यिका सब का जोड़ १ लाख रुपया है, और जो दाम हाथ को हाथ नहीं दिया गया उसका जोड ७५०००) है इसमें से २५०००) का दाम भापस में मुजरे होगया। (हरी ने 'राम से खांड ली, रामने हरी से कपड़ा लिया दोने के माल के दाम का भुगतार बिना रुपया लिये दिये होगया, इसे दाम मुजरा होना कहेंगे) अर २५०००) काटकर ५००००) उधार की रफम रही और रुपयोंका .
- हेर फेर फेवल एक घार हुआ। इस दशामें कुल १५००००) रुपयाँ फी माग हुई। इसके बाद दूसरे सप्ताह में माल के परिमाण या दर तेज हो जाने से, फुल माल के दाम का जोड डेढ़ लाख रुपया टुआ, ओर परिस्थिति समान रही तो इस बार ५० हजार रुपये अधिक का माल सरीदना पड़ा तो जो रुपया जमा है उसी में से यह पचास हजार देने पड़ेंगे नहीं तो माल नहीं खरीदा जा सकता। इस तरह रुपयों की आमदनी में ५००००) फी वृद्धि हुई और कोर्चे (Hoard) में इतनी ही कमी हुई । फिर मानले कि मालों का दाम गिर गया तो रफम कम लगेगी और बचत मालिक के पास रह जायगी और कोर्चा बढ़जायगा। उधार खरीदे हुए माल के दामों की भी कमी वेशी का यही फल होता है। लेकिन इस बात में उधार लेन देन का व्यापा रिक रहस्य बहुत काम करता है। बैंकों और सराफे के काम की उन्नति होजाने से एक नया 'चल्न बाजार' पैदा हो जाता है। हर व्यापारी अपना रुपया फेंक में रखता है। बैंक इनके पाजाची का काम करती हैं। मानलें कि श्याम और कृष्ण दोनों के खाते बैंक में है । श्यामको जब कृष्णका रुपया देना वह एक चेक काट देता है, कृष्ण उसे बैंक में भेज देता है, पैंक श्याम के खाते में नाम लिख कर कृष्ण के खाते में जमा कर देता है और भुगतान होजाता है । जुदा जुदा को में खाते हो तो, वेको का आपस में ऐसा प्रवन्ध होता है कि दूसरे बैंकों के नाम के आये हुए अपने व्यापारी (constituent or client ) के चिकों .
1
को कवार छॉर कर सब के साथ लेन देन का मिलान
कर लेते हैं जिसका जो पाचना निकलता है वह ले लेता है याको
का जमा खर्च हो जाता है। इसको ( clearing) परिशोध
कहते हैं। हर शहर में बैंक दिनमें एक यार या दो बार इस तरह
परस्पर चिकों का हिसाव साफ किया करती है। मानले कि
पार चक के पास बनारस के ऊपर के जो चिक आये यह सर'
मिल कर १००००) के है और बनारस बैंक में पाव
बैंक के
कार के आये हुए चिक ११०००) के हैं तो पञ्जाब बैंक बनारस
बैंक को १०००) भेज देगी और अपने अपने यहा दोनों चेक
ध्यापारी के खातों में जमा खर्च कर लेंगे। यदि ऐसा नही तो
भुगतान के लिये बहुत रुपयों की जरूरत पड़े और धन इधर
उधर फिरता रहे कोचे में न पड़ा रह सके ।
अव हम देखें कि जो वरावर गाजार के माली का कुल दाम
१ लाख रहे, और तत्काल रोकडी दाम न देकर लिए हुए मालों
का कुल दाम वरार ५० हजार रहे और रुपयों का फेर१यारसे
घढ़कर २ हो जाय तो माल और रुपया दोनों जल्दी जल्दी
प्रचलित होंगे और बाजार उसी रुपये को एक यार की जगई
दो चार काम में ला सकेगा।
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मानले कि एक दुकानदार ने अभी १००) का गुड़ लिया
और झटपट बेचकर फिर उसी रुपये से १००) का गुड़ खरीदा
तो १००) से ही २००) का काम होजायगा । इस दशाम डेढ़ लाख
( ७० )
का काम ७५ हजार से निकल जायगा और ७५ हजार उस
फोर्थ में पड़ा ही रह जायगा।
(पिछले उदाहरण के साथ मिलान करके देखो)
जो इस रुपये रूपी माल की चाल में सुस्ती भावेगी तोप
उल्टा होगा अर्थात् फोर्चे से निकाल कर रुपया लगाना पड़ेगे
इसमे सिद्ध हुआ कि थाजार क्रमवद्ध चलता रहे तो रुपयो ।
आमदनी मांग के अनुसार होती रहती है। कोर्चा एक माण्ड
होता है जहां से धन जरूरत पड़ने पर जाता रहता है में
बाजार में रुपयों की अधिकता होने पर लौट कर आजाता है
पूजापति समाज की वृद्धि और उन्नति के साथ सा
रुपयोंकी गति बड़ेजोरों के साथ बढ़ी, यहां तककि कोर्चेकी संह
से आगे बढ़गई, लेकिन कोर्चामी घढ़ताही गया, नहींतो काम
न चलता। रुपयों की उत्पचि का बढ़ाना भी बहुत जरूरी
गया। जहा.सोने चांदी की खाने निकली वहा ही से दौड दी
कर सब देशों ने खरोदा । सास कर अमरीका से तो बहुत ।
ज्याद. चादी आई । इसलिये सिक्के बहुत बढ़ गये,
यहा
सोने चादी के सिकों का मोल और महत्व पहले से बहुत
होगया, इसी का नाम चीजों की तेजी है। पहले एक रुपा
२४ सेर गेहूं खरीद सकता था, आज ५-६ सेर ही पाता
भर्थात् रुपये का दाम घट गया,
उसको खरीदने की शर्मा
घट गई क्यों कि सोना चादी ज्याद आसानी से मिलने ला
.
तक
।
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( ७१ ) समाज की शक्ति जितनी पहले लगती थी उससे इनकी प्राप्ति में कहीं कम लगने लगी। फिर भी रुपयों को जरूरत इतनी बढी कि धातु के सिको के अतिरिक्त कागज के नोटों की सूझी। नोटों के प्रातु- र्भाव के भी सूक्ष्म इतिहास से पाठकों का मनोरञ्जन होगा। पहले जमाने में बहुन तरह के सिक्के चलते थे। अभी कुछ दिन पहिले रजवाडोके जुदे २ सिक्के थे। हर एकके यहा अपनी अपनी टकसाल थों । जुदा २ सिको का मोल तोल धातु का खरापन अलग २ हाता था। इमसे यहो कठिनाई पड़ती थी विना सराफों के काम नहीं चलता था। जगह जगह पररावने पालों और भाज देने वालो की दुकाने होती थीं। याहुतेरे फेरी पाले भी होते थे जो यह काम करते थे। लोग सराफों के यहां, घेको में अपना धन जमा कर देते थे, वह विका चलन बाजार के हिसारसे जमा करके खाता खोल लेता था, उसीमें लिख कर जमा करने वाले से लेता देता रहता था, जमा करने वाले के पास एक सरखत होता जिसमें जमा की हुई भोर ली हुई रकमें यथा समय लिस दी जाया करती थीं। कमी २ जमा करने वाला सराफ से रोकड़ी रुपया न लेकर उसके बदले में एक पुर्जा रिखा लेता यह पुर्जा सराफ की मात- घरी पर, या लेन देन होने के कारण दूसरे सराफ लेकर रुपया दे देते थे और रिसने वाले सराफ के खाते में नाम लिख देते। सीका एक रुपान्तर नोट है जो आज कल चलता है कहते है . ( ७४ ) देश में धन का भात्य (superflunty or glut) हो जाता है। जो धातु के सिक्क हाँ तो लोग दवा कर रखले (कोर्चा करले) और बाजार में जरूरत से ज्यादा न चल सके। जहा धातु के सिक और नोट (कागजी पर्च) दोनों चलते हैं, वहा धन को दया कर रखने वाले तो सोना ही रखकर संतुष्ट होते हैं, इसलिये सोना लोगों के तले दाता जाता है। दूसरी ओर नोटों की अति पृद्धि का यह फल होता है कि लोग इसके बदले में सोना लेना चाहते हैं, तर नोट निकालने वाली बैंक या राज्य कठिनाई में पड़ जाता है, दीवाला निकाल बैठता है। हम १८९३ से भाज तक का भारत वर्ष का करेंसी सम्बन्धी इतिहास पढ़ने से अच्छी तरह समझ सकते है कि करेंसी की चालें कैसी र हो सकती हैं। गवनमेण्ट थोथे नोटों के लेने को बाध्य करती है और आप भी करों की उगाही में यही कागजी रुपया लेती है, क्योंकि इसके बदले में सोना खजाने से नहीं मिल सकता । यह सारी दिवालिये पनकी कार्यवाही पिछले महासमर के समय सभी लडने पाले राज्यों में देखी गयी थी। कहीं २ अब भी देखी जाती है। सोना और नोट दोनों साथ साथ नहीं चलते। यातो सोना विदेश को माल के बदले दे दिया जाता है या दाय कर रख लिया जाता है और नोट चला करते हैं। नोटों को तो पूछता ही नहीं, इसलिये यह घर में ही लट्ठ के बल चलाये जाते है। इन नोटों को कोई जमा करके नहीं रखना चाहता क्योंकि इनका विश्वास नहीं । यह पाइर लिये नहीं जाते, सह सफने हैं, घादर कोई गल सकते है, जल सकते हैं, राज्य परिवर्तन होने या अति मान्ति होने के बाद रद्दी हो सकते है, दिवाला निकाल कर फै या गवर्नमेंट इनको रही पना सकती है। इसलिये इनका विश्वास कम हो जाता है, इन्हें कोई प्रेम से लेना नहीं चाहता। आजकल जरूरत से बहुत प्यादः नोट चलन में हैं, फिर भी उतना ही काम देते है जितना पहिले इनसे कहीं कम नोटों से निकल जाता था। इसका सार यह है कि नोटों को बहुतायत नोटों का मोल गिरा देती है और उपभोग के पदार्थों का दाम पढ़ जाता है। अगर धातु के सिम भी चलते हों तो नोटों पर पष्टा लगने लगता है। यह सब बातें जगत प्रसिद्ध हैं। पूजी- पति सरकारों की नीति बड़ी अनीति पूर्ण होती है, नोटों के छापने की हद होने पर भी अपने मतलय के चोर दर्वाजे कानून में रखे जाते है उन्हीं के जरिये अपने स्वार्थ घश सजाने की जरूरत के लिए, याजार के चरनके अभिप्राय से नहीं, गवर्नमेंट मनमाने थोथे नोट छाप लेती हैं और उन्हीं से चीजें खरीदती है आर नौकरों को वेतन देतो है । कर से आया हुआ रुपया अनाप सनाप शासक समुदाय हडप जाते हैं और घाटा दिखा कर थोथे नोट छाप छाप प्रजा को लूटते रहते हैं । लड़ाई के समय तो यह चालाकी खुलम खुला और कसरत से देखने में आती है । जर्मनी के 'मार्स (सिफा) और रूस के सपिल, का हाल हमारे पाठकों को भूला न होगा ।- ।
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( ७८ )
मगयारी में भाषण दिया ।विटिश सत्ताधारियों का जो
-णित व्यवहार अफरीका के असली वाशिन्दों और हिन्दुस्ता
नयों के साथ है, जो वर्ताव ऐशिया वालों के साथ अमरीका
आदि में है वह सब संसार भर जानता है। आसाम के
चाय के बगोचों में और उपनिवेशों में भारतीय कुलियों की दशा
कोन नहीं जानता । हम इस पुस्तक की रक्षा के लिये विशेष
विस्तार में जाना नहीं चहते।
सब का सार यह है कि जब किसी राज्य में एक जाति के
लोगों को सारे अधिकार होते हैं और दूसरी जाति के लोगों के '
अधिकार कुछ थोड़े से ही होते है, जर पक जाति दुर्यल और
दूसरी बलवत्तम बन जाती है, जब बलवान जाति दुर्बल जाति
के गले विदेशी भापा, विदेशी रीति रवाज, चाल ढाल उसकी
इच्छा के विरुद्ध बाध देती है, जब दुर्बल जाति अपनी इच्छा के
अनुसार अपना जीवन नहीं अतिवाहित करने पाती तब हम
कहते हैं कि एक जाति दूसरी के साथ अत्याचार करती है ।
इसी का नाम गुलामी है। भारत भी आज इंगलैण्ड का
गुलाम
सम्प्रति हमें एक बड़े महत्व के प्रश्न की मौमासा करनी
चाहिये, जबतक यह सवाल हल न होगा ससार का दुख दूर
नहीं हो सकता । सवाल है, या भारत वासियों के लिये उचित
अफासिस डीक और लुई कसूथ के समय का 'हंगेरी' का
इतिहास देखिये । लाइफ आय कसूथ में भी इसका जिक्र है ।
होगा कि धिना बिचारे सारे अंगरेजों, फरासीसियों, चीनियाँ तातारियों, तुर्को मिसरियाँ इटालियनों से शत्रुता और धृणा करने लग जायें? क्या भारत के श्रमिक दल और किसान समुदाय को इस बात कोनैसर्गिक अधिकार है कि दूसरे देशों के लोगों पर सन्देह करे उन्हें घृणा दृष्टि से देखे, केवल इस लिए कि वे विदशी हैं, दूसरी भाषा बोलते है उनके रहन सहन चाल व्यवहार दूसरी तरह के हैं ? कदापि नहीं,संसारके सभी श्रमिक, किसान, कारीगर वैसेही है जैसे भारत का भाषा 'भाव' आचार विचार, रीति रिवाज जुदा होतो इससे क्या। सभी हमारे भाई है, समी हमारी तरह सत्ताधारियों, धनधानों, राजकर्म चारियों के अत्याचारों से पीडित मनुष्य हैं, सभी गरीगरी, अत्याचार, और अन्याय का दुख हमारी तरह भोग रहे हैं। क्या भारतवासी, भारतवासी सत्ताधारी को इस लिये प्यार करेगा कि वह उसे हिन्दुस्थानी में गाली देता है और हिन्दुस्थानी जूते से मारता है और अगरेजों से इस लिये घृणा करेगा कि घह अगरेजी में डेम, फूल, रान आत्र विच, कहता है और डासन के बूटों की ठोकर लगाता है ? यह यात सभी देश के श्रमिक दल के विचारने की है कि हमें किसी भी मनुष्य से घृणा नहीं है, हमें, घृणा है अत्याचार से, लूट खसोट और धींगा धींगी से। सम्पन्न और शासक मण्डल भी जिसदिन सीधे रास्ते पर आजायेंगे हमारे प्रेम पात्र होजायँगे, हम उनका छुटाकर उन्हें मनुष्य बनाना चाहते हैं, सताना नहीं चाहते। - । . हमें घृणा । ऐष
(८०)
इसी महत् सिद्धान्त को सामने रख कर आज से ७७ वर्ष
पहले भगवान 'मार्स' और महात्मा 'पंजिल्स' ने अपनी घोषणा
में स्पष्ट लिया है कि 'सब देशों के श्रमिक कदमो मिल कर एक
हो जाओ' अर्थात् भूमण्डल के मेहनती भाइयो सब मिल कर
एक कुटुम्ब बनकर प्रेमसे रहो । वसुधैव कुटुम्बकम् । यादरहे कि
साग संसार और उसका (ससार का) सारा धन ससारके श्रम
जीवियों का है। विना विचार जाति पाति, रग रूप, चाल दाल
के संसार के मनुष्य मिल कर कमाये मिल कर खायें सुख स
रहे लडाई झगडे घृणा, स्पर्धा ओर कुटिलता छोड्दै । एकदेशको
दूसरे देश के साथ विरोध करने का का कोई हक नहीं है । यह
चसुन्धरा थोड़े से लोगों के भोग और सारी प्रजा के दुख
भोगने के लिये नहीं है । भमण्डल हमारा देश है, मनुष्य हमारी
जाति है, महनत हमारा पेशा है। न हम किसी को सतावंगेन
किसी का अत्याचार सहन करेंगे।
ससोर भर के श्रमिकों को चाहिये कि मिल जायें। किसी
देशका काम बिना दूसरे देश के सयोग के अच्छी तरह नहीं
चल सकता। कहीं रुई होती है, तो कहीं कोयला, एक जगह
रोश बहुत निकलता है ता दूसरी जगह अन्न खूब पैदा होता
है। हम प्रेत और माइप हो तो हम सब मिल कर बडे भानन्द
से रह सकते हैं । इस तरह सारे संसार के मनुष्यों के आनन्द
में जो थोड़े से स्वार्थो रालल डालते है, उन्हें जाति, देश और
रंग का भेद छोड़ कर श्रमिकों का काम है कि जिस तरह हो
( ८१ )
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अत्याचार करने में असमर्थ कर छोडे । तन मन धन से एक
देश के श्रमिक व शिसार दूसरे देश केश्रमिक और किसानों की
मदद उस रोटी की लड़ाई में कर जो सत्ताधारी और अधिकार
प्राप्त भुण्ड के साथ जारी है। जातीयता और राष्ट्रीयता का
ममनूठा अभिमान और मूर्सना छोड़ कर सम्पन्नों के अनुचित
आचरणों के साथ ससार के श्रमजीवी मिलकर झगडे के लिए
तय्यार होजायें।
इस समय चीन पर मास, इगलैण्ड, अमरीका और जापान
मिल कर जो अत्याचार कर रहे हे यह कहा का न्याय है ? इसके
पहिले इन शक्तियो के साथ जर्मनी भी शामिल थी और पाचों ने
मिल कर इसे लूटा खसोटा था। हांग, काग, शघाई -और
फाएटन प्रति सर चीन के ॲग है, इनमें चीन के श्रमिकों और
किसानों को सुख से रहने ओर अपना प्रबन्ध आप करने का
पुगसार्गक अधिकार है। इस उचित हकको छीनने के लिये
बडे बडे वलशाली गज्यों ने बहुत काल से ढोंग रच रासा हे
और अब अपने विचारों को काग्य रूप में लाया चाहते हैं।
इस समय जापान, मान, अमरीका ओर इगण्ड के अमिकों,
किमानों, कारीगर्ग का धर्म है कि चीनले श्रमिका क साथ
मिलकर, मम्पन्नो, सत्ताधारियो और अभिजानों के इस अ या-
चार को अपने अपने देश में यल्प गे और चीनियों का
माथ दें। जिस तरह भारत के लुट जाने से उपयुक्त देशों के
गरोपों को कोई लाभ नहीं हुमा पेचल सम्पन्ना काही जेवग
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( २ ) . है, वैसे ही चीन के लुटने से भी होगा । केवल इतना कहने से कि इगलैण्ड ने श्राधी दुनिया जीतली इग्लैण्ड के गरीबों वा आज तक दुस दूर न हुआ। कुली मजूरों के पेटकी ज्वाला शान्त न हुई । अमीरों की गुलामी से गरीबों को छुटकारा न मिला। ईस्ट कोस्टका नशा न बदला। इसपर भी जो हमारे इंगलैण्ड के श्रमिक भाई सावधान नहीं होते तो उनकी ही भूल है। यही वात जापान मास और अमरीका के श्रम जीवियों पर भी ठीक लगती है ।जो अमीरों के हाथ की कठपुतली बन कर देश भक्ति का राग गाते हैं, दो दो पैसे पर नर हत्या करने जाते हैं और मरते मारते हे वे अत्यन्त हेय नीच और मनुष्यता हीन लोग हैं। क्या हम नहीं देखते कि मास इगलैण्ड को इंगलैण्ड जर्मनी को, जर्मनी फ्रासको इसी तरह एफ देश दूसरेको कुचल नेके लिए सिंहनाद करता रहा है और अब भी ऐसा ही करहा है । पर हम पूछते हैं कि जर्मनी के कुचले जाने से फ्रास, इंगलेण्डा इटली के देशों के गरीबों की क्या गरोबी मिट गयी ? प्रत्यक्षम हो यही देखा जाता है.कि थोड़े से राज कर्मचारी और बढ़े यडे धन पान और सम्पन्न बडे धनकुवेर बन गये, गरीगों की सरया घढ़ी, वेकारी की वृद्धि हुई, लेकिन मरने वालों में गरीब लोग ही थे।रासों करोड़ों की तादद मेजो सिपाही दोनों पक्ष से भरती होकर गये थे, १०) १०), २०) २०) रुपये मासिक के श्रमिक ही तो थे। यह पा प्रत्यक्ष हरामखोगे वाली वाणी नहीं है कि दमादम, यमाय माई पाच खायें गरीय ही मरे ? ' गरोही मेहनत कर ओर जो माल पैदाहो योस धनवान हड़प फर जाय, या राज और गिरजे के लोग निगल जायें। इस लिये इस प्रकार की अन्तर्राष्ट्रीय लडाइयो का शीघ्र अन्त होना चाहिये और इनका अत करना श्रमिकों के ही हाथ में है। किमी राष्ट्र के भाग्य का निर्णय ठीक ठीक श्रमिक ही कर सकते हैं, पर- राष्ट्रो क साथ अपने राष्ट्र के सयोग के भी श्रमिक ही अधि. कारी है। भारत को ही लीजिये, हमारे दो चार आदमी मनमानी स्वराज्य की परिभापा कर डालते है, कोई प्रजासत्ताक, कोई प्रजातन्न, कोई पार्लिमेंटरी, कोई औपनिवेशिक, कोई किसी तरह की सरकार भारत में स्थापित करने की चर्चा करता है। कभी एक ही आदमी 'औपनिवेशिक सरकार भारत स्वीकार करता है। कहकर सारा भारत पन थैठता है । कम्युनिस्ट कहता है,यह सर स्वार्थी,अधिकार प्राप्त लागह। इस बातक्षा अधिकार भारत के श्रमिकों और किसानों को ही है कि वह कहें कि हम अपने देश का प्रवन्ध किस तरह का रखना चाहते है, हम किस देशके साथ सयोग रागे, किसका सम्बन्ध विच्छेद करेंगे। फिर भी हमारा किसी राष्ट्र से द्वेष न होगा,क्योंकि मजूर और किसान जानते है कि भारत पर जो अत्याचार हो रहा है इसका दायित्व या जिम्मेदारी ग्रेट ब्रिटेन के मजदूरों और किसानों पर नहीं है, बल्कि यहा के थोडे से सम्पन्न लाग अर्थात् सत्ताधारी जत्था ही इसका उत्तरदायी है।
अगर वेरिया में सोवियट सरकार स्थापित होती है और शेष जर्मनी में नहीं हो सकती तो जर्मनी के श्रमिकों को उचित है कि लड़कर घेवरिया को जर्मनी से पृथक रख कर जीने दें। इस सम्बन्ध विच्छेद से कोई हानि नहीं है, न वेवेरिया के श्रमिकों की शेष जर्मनी के श्रमिकों के साथ दुशमनी होती है। इसी तरह जो सारीही जर्मनी में सोवीयट-सरकार-स्थापना की घोषणा हो और सब मान लें लेकिन एक छोटा सा वेरिया का टुमड़ा सम्पन्नों का यल अधिक होने के कारण स्वीकार न कर सके, सम्पन्न उसे अलग रखना चाहते हो और श्रमिक एक में रहना चाहते हो तो श्रमिकों का कर्तव्य होगा कि वेरिया के थमिकों का साथ देकर सोचियट सरकार की स्थापना करावें। हम फिर स्पष्ट कर देनाचहते है कि सोविएट की स्थापनासे हमारा अभिप्राय धनवानों को नष्ट करना नहीं है किन्तु उनके अत्या चारों से अपनी रक्षा अभीर है, इसमें उहें कष्ट प्रतीत हो तो उसका श्रमिकों के पास कोई इलाज नहीं । जो हम अपनी रोटी की रक्षा करें और उससे वन्दर को चुराले जाने का मौका न मिलने के सबव तकलीफ हो तो हम लाचार हैं। हम यह नहीं चाहते कि.यनिकन जीचे पर वे श्रमिक बनकर हमारे साथ भाई की तरह रहें, हमारे मुंह का टुकड़ा न छीने, हमारे ऊपर शासन न करे, हम पर अपना रोय न जमा । मिल कर कमाना बाट फर साना मनुष्यों की मनुष्यता है, न कि शिकारी जानवरों की तरह आदमी का आदमी को लूट कर साना ।
हम समस्त भूमण्डल के राज्यों में से पक २ के उदाहरण
लेकर देख्न सकने हे कि अत्याचार की जड़ कैसे संसार में पढ़
हुई किस तरह अभिजातता ने जन्म पाया। फैसे राजा रईस
जमीदारों की उत्पत्ति हुई । इ गरेंड की फेवियन सोसाइटी के
सप्तनियन्ध पाठ से हम बहुत कुछ जान सकते है। भारत
पासियों को मुगलों का इतिहास, वर्तमान रजवाड़ों की गति
विधि और अग्रेज सरकार का व्यवहार काफी है।
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लिये
आठवा अध्याय।
सेना का निवन्ध
कम्यूनिस्ट चाहता है कि जो फौजे नोकरी देकर यरायर
फारम रपसी जाती है इनको हटा दिया जाय और इनकी जगह
नागरिक सेना बनाई जाय । नागरिक सेना में समस्त देश
वासियो को हथियार देकर सिपाही बना दिया जाय । सेना के
अफसर लोग जो एक खास वर्ग में से लिए जाते हैं न लिय
जाफर उसी साधारण नागरिक सेना में से चुन कर
जाया कर अर्थात् यह न हो कि धनवानों और बडे आदमियों
में से ही फौजी अफसर चुने जाय । इसी प्रकार स्वीटजरलैन्ड
की प्रजातन्त्र में होता है।
लेकिन यह वात अभिजातता के पक्षपाती समाज में नहीं
हो सानी वियोष कर जब फि अभिजातो और श्रमिकों में झगडे
हो रहे हो। गरीयों और अमोरी के झगड़ों के समय तो ऐसी
स्थिर वेतन भोजी फौजों की बारकों के उठा दने का यही मत
ला होता कि वह जगहें तोड़दी जाय जहा जहा श्रमिकों और
किसानों को रखकर यह सिखाया जाता है कि अभिआता
की सातिर काम पड़ने पर तुम अपने किसान और श्रमिक
भाइयों का सिर काटो, फिर भला अमीर या अभिजात साग
इस बात को कैसे पसन्द कर सकते है कि वारके तोड्दी जाय।
जब किसी दूसरे राष्ट्र के साथ अगड़ा होता है तो श्रमिकों और किसानों को लाला कर कभी जरग्दस्ती पकड़ पकड कर अभि जातों की सरकार इन्हीं धारकों में उन्हं सिपाही बनाती हे और एक देश के गर्ग दूसरे देश क श्रोमेकाया गरीयों के गले काटते , लाभ होता है अमीरों का यों कि सरकार तो उनकी है। जो अफसर रक्खे जाते हैं वह भी इन्हीं उच्च यशजी के पक्ष और परिकर के होते है जो लड के बल सेाकी शिस्त (decip line ) कायम रखत है जिससे लिपाहो उनकी आज्ञा का विरोध नहीं कर सकत । इसलिए नागरिक सना जरूरी है कि अफसर भी श्रमिकों और किसानों से बनी हुई सिराह में सेही चुने जायें लेकिन यह बात अमीर लोग मजूर नहीं कर सकते क्योति उनके हित के विरूद्ध है। इसलिए यह अपने ही अफसर ओर भाडे के सिपाही रखते हैं जनता मान हाथ में देना नहीं चाहते । यह चाहते है कि लड़ने मारने काटने का साग साधन इन्हीं को सफेद * गारद के हाथ में रहे। भारत को भी निशस्त्र करने में गवर्नमेंट की दुर्नीति ही है । जहा कही धनिक सरकारों ने सार्वभौम संनिक सेना की पद्धति रसी भी है तो खर कुखी अपने पास रखी है। स्थानान्तर भी पद्धतियों को देखने से स्पष्ट हो जाता है। लाल सेना को पद्धति का सञ्चार शम्भ * सोधिएट सरकार की सेना लाल गारद कहाती आर सारी अमिजात सरकारो की सेना सफेद गारद ।
( ८८ ) पहिल पहिल १८७१ में पेरिस (मास) के श्रमिकों के बनाये हुए कम्यून ने किया था । यहा यह प्रश्न उट सकता है कि जिस जगह साम्यवाद का आधिपत्य हो यहा सारे देशके आदमियों को हथियार बाँधने से पया लाम ? उत्तर साफ है । मानलें कि कुछ देशों में श्रमिकों की विजय हो गई और अभिजात धनिक लोग श्रमिक यन गये तो इन देशों में परस्पर युद्ध होने की सम्भावना न रहेगी। लेकिन यह तो सम्भव नहीं कि सारे भूमण्डल के देशों में एक साथ साम्यवाद फैल गय, कुछ स्थान इस दौड़ में पीछे रहेंगे इनके साथ श्रमिकों को लड़ने की जरूरत पड़ेगी तो एक देश के श्रमिक दूसरे देश के श्रमिकों की सहायता,विना सेना से कर सफेंगे,सुतराम् जब तक सारे ससार में साम्यवाद सुख शान्ति न स्थापित कर ले उसे सेना की जरूरत रहेगी । जो रूस लाल सेना देहातियों श्रमिकों किसानों को न बनी होती तो साम्यवादियो की कभी भी विजय न होती, और अतिक्रांति निष्फल जाती । जिस तरह हगेरी और बवेरिया की सोवियट सरकारों को सत्ताधारियों ने नष्ट भ्रष्ट कर डाला उससे भी हमें स्पष्ट जान पड़ता है कि प्रारम्भ में कम्यनिस्टों को भी सेना रखनी ही पड़ेगी। इसी सेना का नाम लाल सेना है। यह लाल सेना भी कभी सार्वभौम सैनिक सेवा सिद्धान्त पर नहीं स्थापित की जा सकती, क्योंकि किसी देश के प्रमिक विजय होने पर भी जल्दी से पुराने पूंजीपतियों को या मध्यधणी के में - - ( ८६ ) लोगों को हथियार नहीं सौंप सकते। चीन और जर्मनी में आज तक एक मुखी राज सत्ता के प्रेमो मूखों का अभाव नहीं हुआ। लाल सेना में यही अफसर और सिपाही होंगे जो श्रमिकों, (कारीगरों, मजदूरों, किसानों ) का माल मारने वाले न होंगे। इसलिए सेना की जद दरिद्र ग्रामीण किसानों और नगरों के उद्योग के केन्द्रों, बडे २ कल-कारखानों में काम करने घालों को लेकर बनाई जायगी, दूसरे लोगों को प्रधान समराङ्गन से दूर रहकर सहायता करनी होगी। जर्मनी, स्वीटजरलैंड में या जहा कहीं भी ऐसी सार्वजनिक सेना है, वहा देसने में तो सारी जनता की सेना है, पर वास्तव में वह धनिक वर्ग की सेना है । यह यात धनिक लोग छिपाते हे जोर तरह तरह के व्याज से, शब्दाडम्बर से जनता को धोका देत हैं पर श्रमिक-सरकार सब बात स्पष्ट कहती है, पयोंकि वह सय का कल्याण चाहती है । वह नहीं देस सकती कि एक भी मनुष्य भूख से मरे वस्त्र और अन्न को तरसे, घर चिना सड़कों में पढा ऋतु की क्रूरता सहता २ मर जाय । थमिक सरकार (सोवियट सरकार ) का ध्यान रहता है कि यारकों में रहने वाले सिपाहियों की तादाद न्यनतम रहे, रोती धारी, काम काज में लगे प्रमिकों को उनके काम से न टाया जाय, घे काम भी करते रहे और रणनीतिमी सीसा करें। इससे देशमें न माल की पैदावार कम होगी, न समय पर सिपा हियों का घाटा होगा साथ ही सेना विभाग का खर्च भी बहुत .
(१०)
कम हो जायगा। श्रमिक सरकार के शासन में कोई निर्दय
धनिक तो हो हींगे नहीं जो १०-१२-१४ घन्टे आदमियों से
दवाकर काम लेंगे, यहां तो खुद मुख्तार मनुष्य होंगे ६-७ घण्टे
काम करेंगे यामी २-३ घण्टे मदाने पेल पेलेंगे, रणनीति
सीखेंगे, वह भी अपने २ गावों में इस तरह श्रमिक सरकार का
पफ एक नागरिक सिपाही, पण्डित और श्रमजीवी तय्यार होगा।
जब कोई शत्रु चढ़ाई करेगा नो गांव से सिपाहियों का झुण्ड
विना कहे आप ही आकर एकत्र हो जायगा। जिस कामके लिए
यहुत धन लगाकर आज कल धनिक सरकार 'रिजर्व' सेन
रखती है वह काम थमिक सरकार की इस रिजर्व लाल सेना
से होगा जिसका ऊपर जिक्र हुआ।
यह बात रूस में अनुभव करके देखो जा चुकी है। ऐसा
सुन्दर प्रवन्ध न होना तो हंगेरी की तरह लोग रूस की मी
सोवियट रिपथलिक को पीसकर पी जाने ।
लह के बल जो शिस्त, हकूमत की दीवानी सरकार रसनी
हे वह दुर्बल होती है, क्योकि उनकी सेना में अनेक प्रकार
सामाजिक तत्व होते हैं । बहुत बार सेंनिक लडने से इनकार
कर देते हैं, उनको गोली से मार दिया जाता है, यहुनों को लम्की
रम्पी के होती है। गये योरोपीय महासमर में एक मुसलमान
रजिमेंट ने तुओं के साथ लड़ने में इनकार कर दिया था,
अगुआओं को प्राण दण्ड हुआ और बहुत से लोग बडी २ मियाइ
के लिए जेल में दे दिये गये। इनमें से कई मुसलमान नागपुर
उनके
( १ )
सेंट्रल जेल में थे और मुझे अनेक यार इनमे मिलने का अवमर,
होता था क्योंकि १९२०-२१ में मैं भी नागपूर जेल का एफ
असहयोगी फेदी था।
जो शिस्त धमिक सरकार की सेना में होती है वह हार्दिक
होती है, प्रेम पर आधित होनी है न कि भय पर। इसमें विभन्न
समाज या वर्ग का स्वार्थी तारिका धार! या घीरचिन्हासित
अफसर धनवानों के लिए शासन नहीं करता वरिक हरेक अमिक
अआनी स्वतन्त्रता अक्षुण्ण रखने के लिए लड़ता है और अपने
माई अफसर की आज्ञा को उत्साह के साथ सुनता और मानता
है। यह बात भाडे के हत्यारा में नहीं हो सकती। उदाहरण के
लिए हम अमारियों को ही देसल कि बिना बुलाये आपसे
आप इतना कष्ट उठाने को तय्यार चले आते है और हंस
हॅसकर अपने जत्थेदारको आमा शिरोधार्य करनेहैं ! क्या इनको
वेतन देकर कोई धुलाये और अपने काम के लिए इन्हें भेजे तो
यह इसी आनन्द अर मग्दानगी के साथ आयेंगे और अपने
अफसर की शिम्त मानेगे? यह बात विचार करने की है।
अपना काम अप काम है, नौकरी के बदले किया हुआ काम
मरे का काम है।
सार्वभौम लाल सेना की शिक्षा और दीक्षा को पद्धति से
पारिफ न्यानम हो जायेगी और अन्त में एकदम हाका नामो
निशान मिट जाय। धीरे लाल सेना की बनावट पैदावार के
लिए काम करने वाली टोलियो की तरह हो जायगी और सेना
- । - सगठन का बनावटी रूप जाता रहेगा। सैनिक का काम भी और कामों की तरह स्वाभाविक काम हो जायगा। एक सैनिक विभाग को केवल लड़ने मरने केहो लिए येकार पडा' रहने को जरूरत न होगी जैसा कि आजकल शाही फौजोंमें देखा जाता है । शाही इन्तजाम में जुदा २ वर्ग के लोग सेना भुक्त किये जाते है । लोगों को अपना नैसर्गिक परिकर छोड़कर सेना में भरती होना पड़ता है। कारीगरों को कारखाने छोड़ाकर, किसानों को हल छोडा फर, दुकानदारों को दुकानें छोटाकर, गुमाश्तों को बहीखाता छोडाफर जबरदस्ती घसीट २ फौज में भरती किया जाता है। फिर इन्हें धारकों में रखकर जुदा २ तरह के लोगों का एक संघट्ट बना सैनिक विभागों में घॉटो जाता है। इससे यह होता' है कि लाग अपने परिकर से छूट जाते हैं और अन्धे होकर श्रमिक सनूहों को सताते हैं । एक प्रान्त के श्रमिक दूसरे प्रांत के श्रमिकों को अपनी गोली का लक्ष्य बनाते हैं। लाल सेना के संगठन का तरीका इससे उलटा होता है। प्रजा विद्रोह या अति-क्रान्ति काल में चाहे शा हो तरीका से ही कुछ दिन काम लियाजाय लेकिन असली गरज दूसरी ही होती है। लाल सेना सङ्गठन का उद्देश यह होता है कि कम्पनी, यटेलियन, रजिमेंट और ब्रिगेड की तय्यारी में इस बात का निश्चय हो कि सेना के उपविभागों में कारखानों. दुकानों, ग्रामों 'घगैरह में सामञ्जस्य हो। यो जो एकता लोगों में अपने हित के लिए थी वह बनी रहेगी। इस दशा में यह अपने लाम के लिये
,
( ६३ )
लड़ेगे व मरंगे, इनको बाहिरी हकूमत और शिस्त की जरूरत
न होगी। दूसरे की सातिर पैसे के लिए हत्या करने का भाव
रेती सेना में पैदा न हो सकेगा।
इस लाल सेना के अफसर या ऊर्द्धतन कर्मचारीके चुनाव के
तीन तरीके होसकते है, (१) चाहे तो पुराने ही शाही सेना के
अफसरों को लाल सेना में यथा स्थान रहने दिया जाय (२)
एक दम सब अफसर श्रमिक दल में से ही चुने जायें, अथवा
(३) दोनों नीतियो को मिलाकर काम किया जाय । १६१७ के
नवम्बर मास में जो अतिक्रान्तिारूस में हुई, जिस में श्रमिक दल
की जय और धनिक शासन का अत हुआ, उस से कम्यूनिस्टों
को कई बातों का अनभव होगया। उन के पास लाल अफसरों
का अपना निज का दल न था और जरूरत इस बात की पही
कि जल्दी सेना तय्यार करके समरानन में भेजी जाय तब उन्होंने
ऊपर कही हुई तीसरी नीति से काम लिया। उन्होंने लाल
अफसरों की तय्यारी के लिये स्कूल सोले, लेकिन स्कूलों में जो
लोग थे उन में आम तौर पर सभी नीचे दर्जे की अफसरी के ही
गायक थे। इस लिये पुरानी सेना के अफसरों को बुला कर सेना
गै तय्यारी और सञ्चालन का भार दिया गया।
इन पुराने अफसरों से काम लेने में अनेकों कठिनाइया और
अडचनें थी जो अभी तक पूरी तरह से नहीं मिट सकीं। इन
अमरों के तीन समुदाय बनाये गये, दो छोटे एक घटा । कुछ
. सगठन का धनावटी रूप जाता रहेगा। सैनिक का काम भी और कामों की तरह स्वाभाविक काम हो जायगा । एक सैनिक विभाग को केरल लडने मरने केही लिए वेकार पड़ा रहने को जरूरत न होगी जैसा कि आजकल शाही फौजोंमें देखा जाता है । शाही इन्तजाम में जुदा २ वर्ग के लोग सेना मुक्त किये जाते हैं। लोगों को अपना नैसर्गिक परिकर छोड़कर सेनामे भरती होना पड़ता है। कारीगरों को कारखाने छोड़ाकर, किसानों को हल छोटा कर, दुकानदारों को दुकाने छोडाफर, गुमाश्र्ता को यहीखाता छोड़ाकर जबरदस्ती घसीट २ फौज में भरती किया जाता है। फिर इन्हें धारकों में रखकर जुदा २ तरह के लोगों का एक संघट्ट बना सैनिक विभागों में यॉटो जाता है। इससे यह होता है कि लोग अपने परिकर से छूट जाते हैं और अन्धे होकर श्रमिक सन्हीं को सताते हैं । एक प्रान्त के श्रमिक दूसरे प्रात के श्रमिकों को अपनी गोली का लक्ष्य बनाते हैं। लाल सेना के संगठन का तरीका इससे उलटा होता है प्रजा विद्रोह या अति क्रान्ति काल में चाहे शा ही तरीका से है- कुछ दिन काम लियाजाय लेकिन असली गरज दूसरी ही होती है । लाल सेना सङ्गठन का उद्देश यह होता है कि कम्पनी, बटेलियन, रजिमेंट और ब्रिगेड की तय्यारी में इस बात का निश्चय हो कि सेना के उपविभागों में कारखानों. दुकानों, प्राम घगैरह में सामअस्य हो। यो जो एकता लोगों में अपने हित में लिए थी वह धनी रहेगी। इस दशा में वह अपने लाभ के लि
लड़ेगे व मरंगे, इनको बाहिरी हफूमत और शिरत की जरूरत
न होगी। दूसरे की सातिर पैसे के लिए हत्या करने का भाव
ऐसी सेना में पैदा न हो सकेगा।
इस लाल सेना के अफसर या ऊर्द्धतन कर्मचारीके चुनाव के
तीन तरीके होसकते है, (१) चाहे तो पुराने ही शाही सेना के
अफसरों को लाल सेना में यथा स्थान रहने दिया जाय (२)
पक दम सर अफसर श्रमिक दल में से ही चुने जायें, अथवा
(३) दोनो नीतियों को मिलाकर काम किया जाय । १९१७ के
नवम्बर मास में जो अतिक्रान्तिास्स में हुई, जिस में श्रमिक दल
की जय और धनिक शासन का अत हुआ, उस से कम्यूनिस्टों
फो क यातों का अनभव होगया। उनके पास लाल अफसरों
का अपना निज का दल न था और जरूरत इस बात की पड़ी
कि जल्दी सेना तय्यार करके समरागन में भेजी जाय,तब उन्होंने
उपर कही हुई तीसरी नीति से काम लिया। उन्होंने लाल
अफसरों की तयारी के लिये स्कूल सोले, लेकिन स्कूलों में जो
लोग थे उन में आम तौर पर सभी नीचे दर्जे की अफसरी के ही
लायक थे। इस लिये पुरानी सेना के अफसरों को घुला कर सेना
को तयारी और सञ्चालन का भार दिया गया।
इन पुराने अफसरा से काम लेने में अनेकों कठिनाइया और
अड्चन थीं जो अभी तक पूरी तरह से नहीं मिद सभी । इन
अमरों क तीन समुदाय बनाये गये, दो छोटे एक यहा । कुछ
न
181 लोग तो सोवियय सरकार के द हितचिन्तक थे, कुछ इस घोर विरोधी होने के कारण धनिक सरकार को जो हार चुकी था, सहायता देना चाहते थे और मोका लगने पर महा यता देते भी थे एक तीसरा समुदाय जो इन दोनों के योग से बना था अर्थात् जिस की जन सरया इतनी थी शिवाको दोनों की जन संख्या जोड़ दे तो भी बरावरी न कर सके। इस दल के अफसर विजेता पक्ष का साथ देने की ओर झुके थे और पैसे के लिये सो वयट सरकार का साथ देना चाहते थे जैसा कि भाडे के सिपाहियों का काम होता है । मजदुर तो उसी का काम करदेगा जो उसे मजदूरी दे। इस परिस्थति म सोविट प्रजातन्त्र के हित चिन्तक अल्प सरयक सिपाहियों से काम लेना पक्ष दूसरों को खूब भींच कर बल हीन करने के बाद काम पर लगाया गया जो लोग भीतरी विद्रोह ( civil war) में दोनों पक्षों से अलग, उदासीन हीहे थे उन्हें भी श्रमिक दल ने रख लिया। जो अफसर धनिक पक्ष के पक्षपाती थे उन से भी काम तो लिया ही गया लेकिन भारीभय का सामना करना पड़ा, पयोंकि कभी कमी इन से ऐसी दगाबाजी देखने में आई जिस का विस्तार दूर तक था। कई बार इन दगाबाजों ने लाल सेना के वहुत बहुत शत्रु के हाथ में छल से फंसा दिये । इस से श्रमिकों में से ही बड़े बड़े सैनिक तय्यार किये जाने चाहिये और इन की शिक्षा लाल-मैनिक विद्यालय में होनी चाहिए । दूसरी बात यह भी ध्यान में रखनी होगी कि कम्यूनिस्ट अफसरों और सेना के सिपाही -- दूसरे दल के मेम्बरों में घनिष्ट सम्बन्ध हो जिस से गैर कम्यूनिष्ट अफसरों की काफी निगरानी होती रहे। लेकिन लाल सेनो योड दिनों के लिये होगी। जो राल सेना भूमण्डल की स्वत सेना को जीत कर सवा सोवियट सरकार का प्रचार कर देगी वही श्रमिक सरकार (वा सोवियट सरकार) की अन्तिम पलटन होगी पयोकि तत. पर सेना की आवश्य- कता ही ससार को वाकी न रहेगी। लेफिन जस्तक ससारमै कहीं भी धनिक सरकार अस्ति परहेगा तब तक लाल सेना को भी रहना होगा धनिक प्रधान शासन चाहे एक मुखी राजसत्ता (Monarchy) हो चाहे, प्रजातन्त्र (Republic) हा सच में ही धनिकों का प्राधाय होता है सभी जगह श्रमिक दल पर धनिकों के खातिर अत्याचार हाता है।
नवां अध्याय ।
न्याय।
है
श्रमिक समूहों को सताने धोका देने के लिये जो धनिक
प्रधान समाज की अनेक संस्थाएं हैं उनमें एक न्याय विभाग
भी है। यह उन कानून के अधीन वर्तता हैं जो स्वार्थपरायण
वा के हित की दृष्टि से बनाये जाते हैं। न्यायालयों ( कोटी)
की बनावट कैसी भी क्यों न हो, कानूनों के संग्रह में पूंजी
पतियों का प्रावाय, पूजी का सम्मान और अधिकार सपन
रहता है, श्रमिको क अधिकारों की सर्वत्र अबहेला पाई जाती
। इन कोर्टी में न्यायाधीश भी सम्पन्न समाज के हो रखे
या चुने जाते है । मजूरी में भी श्रीमेक दल के लोग नहीं
होते।
जब पहले २ श्रमिक शासन स्थापित हुआ तो वह भी
सर्वसाधारण में से न्यायाधीश चुनने में असमर्थ रहा क्योकि
इसने सम्पन्नों को मिलाकर सार्वजनीन चुनाव उचित न
समझा, उसने अपने शत्र, सम्पन्नों को अपना जज बनाने में
हानि समझी। पर जब वर्गीय भेद भाव।
मिटफर भूल
और सभी श्रमिक गनकर रहने में प्रसन्न रहने लगेंगे तब यह
भेद भी मिट जायगा । वह दिन त में यात पास है जर वर्गो
का भेद नजर न आयेगा।
जायेंगे
अपने बहुमत
(७)
सोवियट शक्ति ने न्याय कार्य की पहली मशीनरी को
पिनष्ट करके नये न्यायालय साले है जिनमें वर्गीय पक्षपात का
रंग छल से नहीं छिपाया गया जैसे सम्पनों के अधिकार काल
में होता था कि काम तो हो पूजीपतियों के हितका और घोषणा
की जाय कि सारी प्रजा के मत से यह किया गया है। पहले
सम्पन्न समुदाय श्रमिकों पर अपने बहुमत से फैसला देता
था, अपने स्वार्थ ने प्रचालित होकर आशाएं निकालता था,
अरश्रमिक
समुदाय
से फैसला देता है अपने
हिनों को नजर में रखकर आशाए निकालता है। फर्क इतना
है कि धनिक सारी जनता की सरया में एक अत्यन्त छोटा सा
हिस्ग होता था इसलिए जो करता कुल से, छिपाकर, धोका
देकर करता है । श्रमिको की संख्या बहुत बड़ी है यह जो परते
६ प्रकट करते है, जो कहते हैं विस्पष्ट कहते हैं और चाहते हैं
जल्दी यह भेद भाव मिट जाय। सोवियट सरकार में जजों का
पमि' ही सुनते हैं और श्रमिक दल में हो से चुनते हैं ।
धनिक प्रधान न्यायालयों में न्याय का काम बड़ी पेचेदगी
से होता है, पहले दजेंगर कई नीचे के न्यायालय होते हैं, तय
इनमे ऊ ची को , फिर इनके भी ऊपर अपील निगरानी सुनने
क्रम के समर्थक कानूनश
रोग अभिमान से कहते है कि इस तरह के प्रबन्ध से न्याय
ठीक होता है, अन्याय नहीं होता जो होता भी है तो न्युनतम ।
लेकिन मूर्य भी समझ सकता है कि न्याय का यह प्रपत्र
पाली को इत्यादि । इस
(६८) केवल सम्पन्नों को हो अनुकूल होता है, यही बड़े बड़े वकील वैरिस्टर लगाकर अदालत दर अदालत मुकदमें बाजी कर सकते हैं और अपने अनुकूल फैसला लेकर ही रहते हैं। गरीब के पासतोधन नहीं होता जिससे वह वकीलों वैरिस्टरों अटनियों की मदद ले और बहुत दिन तक खाकर मुकदमें लड़ता रहे। फोर्ट फीस, तलवाना, नजरानाकाल के समान उसकी छाती पर जय पैठते नजर आते हैं तो यह न्यायालयों को हाथ जोड़कर भाग जाता है। गरीबों को न्याय कहा ? किसी गरीब के ऊपर कोई अत्याचार करे तो बेचारा गरीब कम से कम बिना चार रुपयों के अपनी फर्याद हो अदालत तक नहीं पहुंचा सकता। ॥) स्टाम्प 1) लिखाई २) वकील १) फुटकर खाने पीने और कुत्तों को टुकड़े डालने के- सय मिला कर ४) होते हैं। दर सास्त देने के बाद जितनी बार मजिस्ट्रट से बात करने की इच्छा बादी करे उतनीही वार४), ४) रुपया खर्च करे। जो कहीं बड़ी अदालत और हाईकोर्ट या प्रिवी कौंसल की बीमारी लग जाय तब तो सर्च का हिसार हो जुदा है। इस लिये साफ जाहिर है कि गरीबों के लिये न्याय नहीं होता, न्याय वडे दामों यिकता है और उसे धनवान ही खरीद सकते हैं। ऐसे न्याय रूपी प्रच्छिन्न डाकू से गरीय श्रमिकों की जान बची रहे यहीगनीमत है। श्रमिक-शासन मुकदमा चलने से खत्तम होते तक में न्यून राम ममय लगने देता है, सर्च एक प्रकार से होता ही नहीं !
(फेरफारी के अनुसार सारे कानून भी नहीं बना सकी है। सरकार को करने पड़े हैं कि श्रमिक व्यवस्थापक सभा उन के जो थोड़ा समय और साधारण दिकत होती है यह इसलिये कि अभी तक नया प्रबन्ध है । प्ररन्ध पूरा और निदोष होने तक पहिले तो मुकदमे होते ही नहीं, जो इत्तफाक से कभी कोई हुआ तो तुरन्त पञ्च चैठ कर तय कर देंगे। न धन का काम न महीनों 'पर्पो अदालतों में झक मारते फिरने की जरूरत । गरीर से गरीय, अनपढ़ गवारसीधा अदालत म जाकर अपनी शिकायत कर सकता है, न कहीं कुत्ता भूकने वाला न विल्ली राह काटने पाली, खून का प्यासा सिपाही कहीं खोजने से भी नहीं रोमियों की बावत सुनते हैं कि ये युद्ध काल में अदालतें पन्द कर देते थे (Inter arms leges silent) इसका अनुकरण बहुत नहीं तो थोड़ा थोड़ा सभी राष्ट्रों में होता है, पर सोवियट सरकार में ऐसा नहीं होता। आन्तरिक युद्ध काल में (during Civil War) जर कि प्रजा, शासन पद्धति बदलने के लिए अधिकार आत्मसात् किये हुये लोगों से, लड रही थी, देश की परिस्थिति भयानक थी तब भी न्यायालय का काम स्थगित नही किया गयाथा। श्रमिकों के लिये न्यायालय का द्वार सदा खुला रहता था। जिस का जय जी चाहे 'विना दमट्टी खर्च किये क्षण भर में अदालत के सामने अपना अभियोग रस सकता था। नये मबन्ध में जल्दी जल्दी इतने अगणित हेर फेर सोवियट मिलेगा ।
- (१००) पुराने धींगा धींगी के कानूनों को एक दम रदी कर दिया गया है। सोबियट के सारे कानून लिखे भी नहीं गये, न कभी सब के सब लिये हो जायेंगे, कुछ का खाका मात्र लिपिबद्ध हुमा है । इस का कारण यह है किश्रमिक समुदाय अपना राज्य सदा के लिये स्थापित नहीं करना चाहता, इसलिये उन्हें न्यायधाराओं की अगणित पुस्तकों की भी जरूरत नहीं है। अन्त में सारा काम सारे देश के अर्थात् श्रमिकों के हाथ में होगा । जो व्यवस्था थमिक लोग बहुत आवश्यक समझ कर बुनियादी पत्थर की तरह बनादेंगे उसके अनुसार जनता के न्यायालयों में श्रमिकों के चुने जजों द्वारा सारे व्यवहारिक काम होंगे। व्यवस्था का भावार्थ निश्चय करना उनको उपस्थित मामले में लगाना श्रमिक जजों का काम होगा। पह धुनियादी व्यवस्था कम्यूनिष्ट सिद्धान्त की होगी, जो धनिक-प्रधान कालकी सारी अवस्थाओं व्यवस्थाओं के विरुद्ध पड़ेगी और श्रमिक समुदाय के आदर्श के अनुसार काम करेगी दण्ड संग्रह का रूप बदल जायगा, साम्पत्तिक विवादों का आधार ही बाकी न रहेगा। धरा धाम धन के झगड़ों की जही फट जायगी। मनुष्य को मानसिक विचित्रना ओर स्त्री प्रेम सम्बन्धी कोई झगड़ा यदा कदा होना सम्भव है, उसी के लिए साधारण सा दण्ड सग्रह श्रमिक न्यायालय के लिए काफी 4 होगा। .
बोटों की तुलना की जाय तो विचार शोलों को मानना पड़ेगा
आजकल के जनपदीय Popular न्यायालय, जिनमें
सम्म चुनर भेजे जाते हैं। इनमें से पहले जजों को वापत
चुलाया जाता है और चारी बारी से हरेक श्रमिक यो जोकर
न्यायाधीश का काम करना पड़ता है, श्रमिक सरकार के
मामलो न्यायालय हैं । अतिक्राति काल के लिए कान्ति
न्यायालय सुदा स्थापित हुप थे। इनका काम था श्रमिक
समुदाय के विरोधियों का तत्काल कठोर दण्ड देकर मुकदमे
को समाप्त करदेना। यह कोर्ट अत्याचारियों, श्रमिकों के लूटने
पात्रों को दबाने के लिए वैसाही काम करती थीं जैसा कि
लाल गारद, लाटा और अनावारग अतिरिक्त कमोशन इन
अदालतों को सोवियटीने नियत किया था श्रमिकों ने नहीं।
रजप्रवाही समर में प्रमिक समुदाय, अर्थात् मेहनती धर्ग
भी अपो शत्रओं कोप्राण दण्ड देनेमें चूक नहीं कर सकता था।
भीतरी युद्धौ In the civil war मृत्यु दण्ड न देना असम्भयहो
जाता है। फिर भी जय धनिकों की कोर्टी के साथ श्रमिकों की
कि धमिक अदालत धनिक अदालतों से कहीं दयालु, सरल
और दण्ड देने में कम कठोर थीं। श्रमिक प्राण दण्ड केवल
*अमिकों के प्रतिनिधियों की कार्यकारिणी सोवियट है
और श्रमिको को साधारण सभा श्रमिक ममा कहानी है। अपर
.
- मी दलका जिक आ चुका है।
अन्तिम दशाओं में देते थे। इसके अनेक जीवित उदाहरण रूसको अतिक्रान्ति के विस्तृत इतिहास में पाये जाते हैं । ऐसे साधारण मुकदमों में जिनका लगाव अतिक्रान्ति से नहीं था जो सजाएं श्रमिक कोटौं ने दी है वह उन सजाओं से कहीं हल्की थीं जो धनिक कोटी ने उन्हों अपराधों के लिए दी थीं। इसका कारण यही है कि सम्पन्न लोगों में सम्पत्ति प्रधान है, इसलिए सम्पन्नों और उनकी सम्पत्ति कीरक्षाके लिए सापत्तिक अपराधों में क्रोध के साथ बदला लेने का दुर्विचार उनके प्रति- निधि जजों में अधिक होता है, यह बात सम्पत्ति प्रथाहीन श्रमिकों में नहीं हो सकती। पुराने धनिक शासन काल के ही शिक्षित कुछ दुष्ट अब तक रूस में मौजूद हैं जो श्रमिक सरकार के अदालतों के लिए झगड़े तय्यार किया करते हैं फिर भी उनसे श्रमिक दल या श्रमिक कोर्ट जलकर बदला नहीं लेना चाहती- घह इन्हें सुधार कर श्रमिक बनाना चाहती है । बहुधा अपरा- धियों को दण्ड प्रतिबन्ध के साथ दिया जाता है जो कि वास्तव में कोई दण्ड ही नहीं है। यदि दूसरी बार अपराधी फि- अपराध न करे तो उसे दण्ड न भोगना पड़ेगा। इसकाअमि प्राय यही है कि दुर्घत्तों का सुधार हो । बहुतों को सामाजिक लानत मलामत करके छोड़ दिया जाता है या सामाजिक दण्ड दिया जाताहै पर इसका अच्छा असर तभी होताहै जबकि समा पोंमें विभक नहो । जिन्हें कम्यूनिष्ट जेल में रखता है उन्हें हराम खोर नहीं यनने देता, उनसे इतना काम लेता है कि उस .
रोज के पर्व से इतना पचता रहे जिससे मीआद के भीतर उस
क्षति की पूर्ती हो जाय जो उसने समाज की की है । जिन
अपराधियों को समाज के लिए भयानक समझा जाता है उनको
अलग भी रपसा जाता है परन्तु घे अपने नैतिक सुधार और
उद्धार का पूरा अवसर पाते हैं।
( १.४) दसवा अध्याय शिक्षा आजकल धनिक-प्रधान कालमें हम देखते हेकि पाठशालाओं के नीन प्रधान लक्ष्य है। पहिले तो श्रमिक समुदाय की आगे आने वाली सन्तान को धनिक शासनके प्रति श्रद्धाभोर भक्तिसे भरदेना । दूसरे सम्पन्न समाज के नवजवानो को श्रमिक जनता पर हकूमत करने के लिये निपुण कर देना। तीसरे विज्ञान यो खास सास कारीगरियों में इस तरह पर लगाता कि जिससे पूजीपतियों को माल की पैदावार में सहायता मिले और उE अधिक २ लाभ हो । कम्युनिस्ट का सिद्धान्त है इन तीनों बातोंका प्रतिकार करना और मनुप्य मात्र तक शिक्षा असली लामों को पहुँचाना । इसके लिये जैसे सेनामें अफसरोंकाचुनाव और प्रबंध बदल्ना पटता है से ही स्कूलों में शिक्षकों का चुनाव दूसरी तरह से करना होगा। धनिक प्रधान स्कूलों में शिक्षक लोग जंगली पशुओंको हिलाने का ही काम करते हैं, और जो आवमी यह द्वार रखता है उसी को शिक्षक बनाया जाता है। राज्य की सोर से जो शिक्षा मन्त्री होते हैं वे सावधानी रखते हैं कि कहीं जनता के चालक कोई भयानक बात न सीखलें । इनकी दृष्टि में भयानक बातेंयही होतीहैं जिनसे प्रजाको अपने रूप व परिस्थिति फा शान दोठाहो । साम्यवाद, अराजकतावाद, नास्तिकपाद, और .
सोध और अमिट है, सदा ही बना रहेगा।इके हदयो में धन लिए सर्वधा यट मिलता है। मिडिल और हार हल्ले की ही (१०५ ) अनेक इतिहास धनिकशासन के प्रत्यक्ष और परोक्ष दोनों तरह के समर्थकों के लिये बहे भयानक विषय है। वर्तमान भारत में इंगलैण्ट, फ्रान्स, अमरीका के इतिहास कुछ कम भयानक नहीं माने जाते । रूसको अभिनव मांति के सम्बन्ध में अनेको पुस्तक जो भारत में आही नहीं सकती। जिरानी पाठ्य पुस्तक शिक्षा विभाग से छपाइ या नियत की जाती है उन सब का आन्तरिक अभिप्राय साधारण प्रजा को तदा के लिये गुलाम बनाये रखने का ही होता है। लेखक भी का पंधी, खुशामदो, साचे के ढले गुलाम, स्वार्थान्ध, दयहीन और अभद्र चित्त होतेह । यह समझते है, धनिकोंका दौर दौरा की प्रतिष्ठा, नामवरी फामा, थोथी उपाधियों की अर्चना और अम्पर्थना की इच्छा भरी पड़ी रहती है। ससार मर जाय पर- याद नहीं इनको धनिकों के साथ मिलने से आराम मिलना पाहिये । जिस तरह धर्मयाजा धनके हाथ पिके गुलाम होते दे से ही यह घेचारे शिक्षा विभाग के महत भी होते हैं । इस मकार का शिक्षा और धर्म श्रमिकों को लूटने के लिये धनिक साम्राज्य के दो पलिष्ट हाथ है। धर्म, श्रमिक समाज को सुला देता है, शिक्षा का कौटिल्य उनका धन लूट परधनवानों के घर भर देता है। मध्य Jणी की (Secondary) और उच्चतर काटे को शिक्षा (Higher Educrtior) का द्वार प्रमिकों में - ( १०६ ) शिक्षा इतनी मदेंगी है कि श्रमिक इसे नहीं सरीद सकते । न्याय की भांति शिक्षा के बाजार का भी आधिपत्य सम्पन्नों कही हाथ में है। ये ही पैसा खर्च करके जितनी मानसिक उन्नति चाहे कर सकते हैं, घेवारे गरीब श्रमिक की पहुँच कहां। हाई स्कूल की ही शिक्षा समाप्त करने में पुष्कल धन के अतिरिक्त ८-१० वर्ष फा समय लग जाता है। किसान मजूर कारीगर वेचारे अपने फुन का पेट पालने के लिये अपने बच्चों को खेत, फारखानी या और कामों पर भेज देते हैं। न इनके पास समय न धन ।' इसलिये शिक्षा विभाग केवल श्रमिकों को लूटने खसोटने वालों का ही सहायक होता है। यह विभाग न्यायालय से कम बुरा और पेचीद नहीं है । कितने दुधों ने तो स्वार्थ के यशवर्ती होकर शूद्रों (गरीबों) और नारियों को पढ़ाना पाप पतलाया है, 'स्त्री शूद्रोना धर्मताम् । एक कानून ने भारत में १६ वर्ष की उम के पहले मेट्रिक पास करने को जाना यन्द कर दिया। जो मूर्ख १६ वर्षके पहिले मनुष्यका पण्डित होना पापसमझताहो, उससे मानच जाति का कल्याण कैसे हो सकता है । कानूनके गहमह पडे हुए ऊँचेढेर में न जाने कितनी खुराफात भरी पड़ी हैं जय जिस यात की जरूरत धनिक समुदाय देखता है अपने बड़ी बड़ी तनख्वाह के गुलामों से गदवा लेता है, या गढ़ कर तय्यार करा लेता है । विना कानून तय्यार किए भी धनिक शासन साधारण जनपद को अपने टुकड़ों से पले नादान कुत्तों के जरिये जितना चाहे जब चाहे सता सकता है। शिक्षा विभाग में भी अन्य ( १०७ ) विभागों की सारी पोले मोजूद रहती हैं। पयोंकि विभाग-चाई जितने हों पर उद्दश सबका एक है, वह यह कि थोर से अधि' कारी, धनवान मजे उड़ायें और श्रमिक उन्हें कमा कमाकर लगा. तार देते रहें। पुनश्च, इन स्कूलों में जो शिक्षा दी जाती है उसमें भी यड़ा अन्तर रहता है। इनके सम्पत्ति शास्त्र का याआदम ही निराला है । गत महासमरके कारण सय श्रमिक किसान पारी- गर भूक मरने लगेथे फिरभी धनिकों के योहद सम्पत्ति शास्त्रके अनुसार अनेक देशों को राष्ट्रीय दौलत (national wealth) यह गई थी सिर्फ इसलिये कि थोड़े से इने गिने आदमी कोट्याधीश होगये । सम्पत्ति शास्त्रजो धनिक-गज्य के शिक्षा विभाग में पढ़ाया जाता है वह महारमा मार्स के पवित्र सीधे और सच्चे सिद्धान्तों को मिटाने की ही नियत से पढ़ाया जाता है। इतिहास, समाज शास्त्र, राजनीति सभी शिक्षाओमें अनगुण भरे पड़े हैं जिनसे श्रमिकों को बचाना बहुत जरूरी है। यदि कोई श्रमिक दल का पालक भूल भटक से उच्च शिक्षा पाकर तय्यार भी हुआ जैसा कभी हजारों में एक होता है, तो सम्पन्न लोग उसपर अपना र चढ़ाकर उसे भी अपना सा बना लेते हैं यह दूसरी परिस्थिति का दिग्दर्शन है। धनिक-प्रधान राज्य में श्रमिकों को वैज्ञानिक शिक्षा से सदा यहुत दूर रखा जाता है। धनवान लोग ही विज्ञान के अधिकारी और स्वामी होते हैं । विज्ञान बहुत थोड़े से लोगों के एक छोटे से परिकर (गिरोह ) का रोजगार होता है । वैशा. निक शिक्षा और वैज्ञानिक खोज का श्रमिक वर्ग से कोई सरो- कार नहीं रखा जाता।वैज्ञानिक सचाइयों को जान कर उन्हें माल की पेदापार के लिये काम में लाने की गरज से सम्पन्न समाज को अनेक संस्थायें सोलनी पड़ती है। घहुत भवन यह लोग इसी अभिप्राय से बनाते है फि विशुद्ध विज्ञान ने जितना काम करना सम्भव कर दिया है वह इनके द्वारा कार्य में परिणत हो जाय । इसका अर्थ यही होता है कि विज्ञान भम से सदा के लिए नाता तोता है यों पूजीपति अनेक कलाओं के स्कूल खोलते हैं, इन से सम्पन्न समाज को न केवल खास खास कारीगरी या कला के पछे जानकार हो मिलते है प्रत्युत इन के द्वारा बड़े बड़े प्रसन्न कर्ता ओर ओद्योगिक गण पसि भी तय्यार होकर निकलते हैं। इसी तरह अनेक सौदागरी के स्कूल खोलते हैं जिन से ऐसे लोग निकलें जो तय्यार माल को विक्री स्थानान्तर में खूब बढ़ावें। इन स्कूलों, कोलेजो, मला भवनों आदि में इतनी बड़ी फीसें रखी जाती हैं, इतनो दुख्य पुम्न होती है कि श्रमिक तो इन में पहुँच ही नहीं सकता । इम का मतलर यही है कि सय उच्च कोटि का लाभ दायक काम सम्पन्न गगोंके होध में रहे। इस लिए कम्यूनिष्ट कहना है कि इन माउना में जिन यातों का सम्बन्ध पैदावार के हाथ हे ये नो फारम रह सकगा लेफिन सो वा फंघल पुजी पतियों के पैदावार को है नष्ट होजायंगी।
। विज्ञान नृद्धि के प्रत्येक माधन को अध्यवसाय के साथ उम्पति किया जायगा लेनिन जो कारण विज्ञान को श्रमिफ समाज से विदुरित किये हुयेह उन्हें जड़ से मिटाया जायगा । कुल शिक्षण की पद्धति सुरक्षित रहेंगी, लेकिन हाय पैर की मेहनत को विदा कर के फला-शिक्षा देने की पद्धति को अर्थचन्द्र दिया जायगा। विधान बल के प्रयोग की रक्षा और वृद्धि अवश्य होगी इन के साथ साथ विशान द्वारा पदावार भी बढाइ जायगी, लेकिन ऐसा न होने पायेगा कि धनिक समाज जब चाहे इस के द्वारा अपना उरलू सिद्ध करें। विज्ञान का लाभ मनुष्य मात्र उठायेगा न कि थोडे से धनवान हो। कम्यनिष्ट पार्टी को शिक्षा के मदान में भी जहा अनेक काम बनाने के करने ह वहा कुछ काम पहले पहल बिगाडने भी जरूरी है । शिक्षा विभाग में भी जिन पद्धतियों ने शिक्षा को पूजी पतियों के स्वार्थ का साधन और सम्पन्न वर्ग के निश्चिन्त शासन का हथियार बना रखा है उन पद्धतियों को नष्ट करना अत्यन्त आवश्यक है। ऐसे स्कूल, विद्यालय जिन के द्वारा अच्छी शिक्षा सम्पनों याप दादों की जागीर धन रही हो उहे तोड़ना पड़ता है, चाहे वह उच्च शिक्षा के क्लासिोल स्कूल' हो चाहे नवीन उच्च शिक्षा सम्बन्धी रफूल या सम्था हों, चाहे सैनिक शिक्षा भवन हों। हम पुराने शिक्षकों को निकाल कर ऐसे नये शिक्षक रखगे जो कम्यूनिज्म की शुभ ज्योति से संसार को (-११०) आलोकित करने का बीड़ा उठायेंगे। हमारी शिक्षा पद्धति में पुरानी पद्धति की तरह वर्ग विशेष के लाभ पर ध्यान न दिया जायगा, पवित्र शिक्षा का खुला प्रचार होगा। कसके पुराने स्कूलों में धार्मिक शिक्षा अनिवार्य थी, जबरदस्ती निमाज पढ़ाई जाती थी, गिरजे में जाने को विवश क्यिो नाता था, लेकिन नये कम्यूनिष्ट स्कूलों में धर्म को स्कूलों से निकाल कर बाहर किया जायगा। किसी रंग रूप में छप्रवेश में धर्म स्कूलों में न रहने पायेगा। शिक्षकों, अध्यापकों ओर आचार्यों की सगठित सभायें जो विश्व विद्यालयों पर आधिपत्य रखती थीं तोड़ दी जायगी। यह याहरी शिक्षा के और विद्वानों के शिक्षा विभाग में आने में बाधक होती थी। अब तो जो शिक्षा देने में योग्य होगा शिक्षक बनेगा। हर एक प्रान्त और, देश का वासी अपनी मात्र भाषा में शिक्षा पाने का अधिकारी होगा किसीके गळे जबरदस्ती कोई भापान बांधी जायगी, जैसा कि अत्याचार परायण शासनों में देखा जाता है। जनता में बहुत ही थोड़ा सा हिस्सा सम्पन्न लोगों का होता है, फिर भी इन्हीं के भावों को भरकर स्कूलों में श्रमिकों को इस लिए तय्यार किया जाता है कि यह उन के दास बने रहे, सम्पन्नों ही के विचारों और नीतियों की पैरवी करें और कोई रोक न पड़ने पाये। रुस में नगरों में रहने वाले श्रमिक यद्यपि कम साया है, तोभी भ्रमिकों का पक्ष समर्थन करने वाले उनके नेता और संठन कर्ता यही लोगहें । इसलिए नगरों के श्रमिकों के लिए यह कुदरती बात है कि वह जन अधिकार छीन कर अपने हाथ में लें तो सबसे पहले कम समा प्रामीण श्रमिक जनता को जो बहुत पीछे पड़ी हुई है जगावे और सुधारें फिर उनमें कम्य नेज्म के भाव भरें। जो यनिकों ने स्कूलों को मजूरों को गुलाम बनाने का कारखाना बनाया तो अप श्रमिक लोग स्कूलों को अपनी स्वतन्त्रता का साधन बनायें और अपने बच्चों के मनों में गुलामी के भागों का नामोनिशान बाकी न रहने दें। जहा सम्पनों ने श्रमिकों के बच्चों में अपने भाव भरे ये यहा अर श्रमिक लोग सम्पनों में मेहनत करके खाने के पवित्र भाव भर । जनता के दिलो को नये सामाजिक सम्बन्धों के लिए पुष्ट और नीरोग यनाकर तप्यार करें। शुरू में गरीब लोगों को जो कठिनाई कम्यूनिस्ट समाज के तय्यार करने में पडेगी यह इसीलिये कि उनके दिल पर पुराने संस्कार घर फर गये हे अभी तक ये दूषित सस्कार बिल्कुल नहीं धुले । जवानों के मनों को बदलना और यन्चों को अपने सिद्धातों के अनुकूल बनाकर तय्यार करना श्रमिक स्कूलों का काम है। इस काम को सिद्धि के लिए शिक्षा पद्धति को बदलना ही पडेगा। वर्तमान धनिक शासन में यच्चे मा बाप की सम्पत्तिसमझे जाते हैं । जय माता पिता 'मेरा पुत्र, मेरा पुत्री' कहते हैं तो उसका इतना ही अर्थ नहीं होता कि उनमें ओर घच्चों में केवल से मदाता और सन्तति का ही सम्बन्ध है, ये यह भी समझने हैं
में
( १९४)
कायम किये गये हैं जिनमें या तो बच्चे स्थायी रूप से रहते है
या यहुत काल तक. माता पिता से अलग रह कर विद्याध्ययन
करते है । * इन शाला के अतिरिक्त शेज' अर्थात् लालन
शालाए हैं जहा चार, माढ तीन काम के बच्चे लिए जाते है।
जर'मातापं काम पर जाती है बच्चों को इन में सोप जाती है।
लौट कर ले लेती हैं। इन शालाओं में बच्चों के खिलाने पिलाने
मुलाने खेलाने हसाने आदिका सव सामान च प्रबन्ध होता है।
इसलिए श्रमिकों के अधिकार पाजाने पर या इससे पहले भी
जो होसफे-बच्चों की शिक्षा की पद्धति ठीक रूस की सोवियट
सरकार के अनुसार हानी चाहिये। ऊपर शिक्षा के सम्बन्ध
जो कुछ भी लिखा गया है, सोवियट रशिया को ही वावत
लिखा गया है।
सारियट शिक्षा पद्धति से एक नो शिक्षा थोडे ही समय
में दिग्दिगन्त व्यापिनी हो जायगी और पकी सच्ची उच्च कोटि
की होगी, दूसरे अच्छा फल निकलने से पुरानी पद्धति का प्रेम
जाता रहेगा धनिकों को भी इस पद्धति के साथ प्रेम होगा।
* गुरुकुलों के नमने पर समझना चाहिये कि यह छात्र
उपनिवेश बनते हैं, हा शिक्षा भारत के गुरु थुलों की भांति
स्वेतकेता के समय की नहीं दी जाती। नीन इतिहास छ
विज्ञानानुमोदित यात चतलाई जाती है,बच्चों का समय सध्या
पूजा प्रार्थना में नष्ट नहीं कराया जाता।
-
।
कम्पनि बगगाके शत्रु नहीं परिक उनके सुधारका । कम्युनिष्ट
पार्टी को चाहिये कि विण्डर गार्टन कुरी, सार उपनिवेशों,
स्कूलों आदि को नई पद्धति से कृतफाग्य करके दिग्गलाद कांकि
उनकी असती विजय इमी पर अरम्भित है। कम्यूनिष्ट पार्टी
की स्त्रियों का प्रधान याम है कि स्त्रिया को तलाय और
रुचि दिलाय किव अपने सपा को इन नये ढग के स्कूलों में
जे। साथही जो गिता माता अरो मा ।। इन स्कूला
में
भेॐ घे और दूमरे बन्चे वालों को साथ लेक सगठन करे
जो
ल सस्थाओं की निगरानी करता रहे ताकि काम ठीक
चलने लगे।
भारम्भिक तय्यारी पच्चों की ७ वर्ष तक होता है फिर रे
किल में देने के योग्य हो जाते है । शिक्षा अवार्य हा, अशुल्क
(मुफ्त ) हो, छोटी ही बेणिया में नहीं लेकिन अथ से इति तक
बिना फीसकी पढाई हो। ७ वर्षगे १७ वर्ष तक देशका प्रत्येक
यातक अवश्य शिक्षा पाने, शिक्षा अनिवार्य हो अशुल्क हो,
एक मो हो, भेद भार रहित हो, समतावालय का आदर्श
दिखाने वाली हो।
.
।
-
रूसमें लडके लड़को एक साथ पढार्य
- दोनोंकी
एक साध और एकली शिक्षा हाती है। प्रार्थामक (Primary)
माध्यमिक (Middle) और उच (High) फूलों वर्गीकरण
और भेदन कर सको एक करदिया गयाहै। इा एकीकृत हर
एक स्कूल में एक शिक्षा सोपान बना दिया गया है, इन्ही में
होकर प्रत्येक यालक निकल सकता है, बल्कि हर लड़के लड़क को अवश्य ही निकलना पड़ता है। यह किण्डरगारटेन में प्रारम्भ करते हैं और चोटी तक बिना रोक टोक और भेद भा के चले जाते हैं। यह साधारण अनिवार्य अशुल्क शिक्षा के प्रबन्ध हरेक बच्चे के लिये है। धौं, जातियो,धम्मा,सम्प्रदाय और समुदायों के नामसे,अलगर धन लगाना और जुदार उद्देश्य से पृथक पृथक स्कूलों का होना जनता के लिये बहुत ही हारि कर होता है। इससे भेद भाव बढ़ता है और समता के बदले, विपमता फैलती है। विषमता ही समाज के लिए विष होती है साम्यवादी प्रजातन्त्र का स्कूल एक श्रम-शाला हो अर्थाई शिक्षा और दीक्षा श्रग संयुक और श्रम के ही आधार पर है यने । यह यात फई कारणों से बहुत जरूरी है। सब से पहर' इसका प्रभाव शिक्षा को कृत कार्य बनाता है। शिक्षा न केवर किताची होती है, न शिक्षक के मुंह से निकले हुये शब्दों पर ६ समाप्त होती है, लेकिन बच्चा अपने हाथ से काम करको अपर वैयक्तिक अनुभव से प्रत्यक्ष शिक्षा लेता है। प्रत्यक्ष और परोर शिक्षा में बड़ा अन्तर होता है। जव हमें प्राकृत पदार्थों को लेकर उनपर काम करने, अवसर होता है तभी हम अपने प्राकृतिक परिकर को आसा से समझ सकते हैं । इसी लिये मानसिक और शारीरिक का को अलग अलग न रख कर एक साथ रखा गया है, जिस शिक्षा पूर्ण हो । अधूरी अधुरी शिक्षा दो स्थानसे लेफर पूरी कर -
1
पुस्तक
(११७ )
की जरूरत मिट जाय । श्रम की बच्चोंको यादी जरूरत रहती है,
ससे ये शक्तिशाली और स्वस्थ तो बनते ही है, साथ ही
निको क्षमतामी बढ़ती जाती है, उनकी शक्तियों और योग्यतायों
गरिकाश और उत्कर्ष होता है । अनुभन ने सिद्ध करदिया है
के यच्चे जो समय स्कूलों में व्यवहारिक कामों के करने में लगाते
उससे उनके श्रीपपत्तिक शानम(Theoretical knowledge)
वा नहीं पड़ती उलटी सहायता मिलती है। जो सिद्धान्त
पाठी फी समझ में नहीं आता यह व्यवहारिक
काम करने वाला जल्दी समझ लेता है।
कम्यूनिष्ट समाज चाहता है कि उसका हरेक नागरिक कम
से
कम सर तरह की कारीगरियों और पेशों के तत्वों को जान ले
नेतान्त किसी काम से अनभिज्ञ न रहे । कम्यूनिष्ट समाज में
रीगरों के संघ न हांगे। ऐसा नहोगा कि सुनारी, लुहारी,
धर्मारी सुनार लुहार और चर्म कारों के ही घरको सम्पत्ति
न जाय । बडे से बड़ा विज्ञानवेत्ता भी हाथ से काम करने का
इनर रखता हो । जो लड़का पढ़कर स्कूल से निकलता है उसे
मेसाया जाता है कि 'तुम अध्यापक और आचार्य बनो या न
रनों लेकिन तुम मूल्यवान पदार्थ पैदा करने घाले अवश्य यनो' ।
बच्चा ससेपहले खेलने में अपनी प्रियाशीलता (activity)
देखलाता है। धीरे धीरे इस चतुराई के साथ पालफ के खेल
को बदला जाय कि उसे मालूम न पड़े और रोल उपयोगी
पन जाय । असे छोटे बच्चों को काठ के टुकड़ों से जोड़ जोड़ कर
।
4
अक्षर वन वाते हैं तो उन्हें सेल जान पड़ता है, वे अक्षर पहचान
जाते है और पढ़ने का चोर उनपर तनिक भी नहीं पड़ता।
बच्चे नकल उतारने में प्रानि से ही निपुण बनाये जाते हैं, इस
लिए उनके सामने काम करनाही उनको काम करना सिखाना है,
हा, काम के औजार ओर मैदान के चुनने में चतुराई से काम
लेना पड़ता है। बचपन से काम करने रहने वाला व्यक्ति कमी
मजूरी को बुरा न समझेगा। उसके काम में स्वभाविकता, उसके
भावों में पवित्रता और विचारों में शुद्धता पैदा हो जायेगी।
श्रम मनुष्यक लिये वैसाही जरूरी है जैसे अन्न वस्त्र । इन जमरतो
को स्कूल में ही बच्चों के दिलों और दिमागों में भर कर पुष
कर देनी चाय
'कम्यूनिष्ट । निश्चय है कि जब उनकी समाज
जोर के साथ शिल्प की उन्नति होगी तब आवश्यक होगा कि
बहुत सी श्रम शक्ति एक काम से हटाकर दूसरे काम में लगा
जाय | मानले कि कातने और चुनने के काम में नइ खोज र
इतनी उन्नति होजाय कि कातने वालों और कोठियों की जरूर
बहुत कम रह जाय और रुई की पैदावार बढ़ाने की जरूर
१ढ़ जाय, तोइन बुनने,और कातने वालों को हटासरसईको सेर
काम में तभी भेजा जा सकता है कि वे उस काम का थो
न परिचय रखते हों। इसलिए कम्यूनिट चाहता है कि हरप
उसका नागरिक वामों को थोड़ा थोड़ा जरूर जानने वार
बने। आज कल धनि मानन में सौदागर्ग का यह स्च
परायण प्रयाध होता है कि बहुत से मजूर चेकार पडे भूख मरते फिरते हैं काम पड़ने पर इन्हीं को लेकर जोर दिया जाता है । लेकिन कम्यनिष्ट शासन में तो भूका कार, निम्मा फिरने व भीक मागने वाभावाई होगा ही नहीं, इस लिए जिम किमा आयोगिक घिmम कारीग, काम करने वालों की कमा दागी यहा दूर काम परके योग्य कारीगरों का ही लगाना पड़ेगा । जापक नाम वाले लाग दूसरा काम न जानल तो यह पाव सम्भव हा जायगी, अत हरएक आदमा को कई तरह का काम जानना बहुत जरूरी सिद्ध हुआ। इस जरूरत को पूरा करने के लिये स्कूल से हा प्रबन्ध किया जाना उचित है। १७ २५ की उन तक तो हरएक नागरिक एक समात अनि चार्य शिक्षा पायेगा। इसम सैनिक शिक्षा भी शामिल होगी। प्रत्येक छात्र को घर्ष में कुछ दिन सास खास फोजी कामो को ही मासना पड़ेगा । लेकिन इस तरह के साधारण शान वालों के सिवा विशेषज्ञों की भी आवश्यकता रहती है । कोई चमड़े के काम का विशेपक्ष हो, तो कोई लोहे के काम का, कोई खदान के काम में निपुण हो तो कोई सेना परिचालन और गद निर्माण में। बिना इस तरह के विशेषज्ञों के काम नहीं चल सकता । विज्ञान कारवना विस्तृत क्षेत्र है कि सर विशानों को सब पूरी तरह से नही जान सकते । इसलिए ऊपर कहे हुर स्कूल की शिक्षा के अतिरिक्त विशेष शिक्षा का दरवाजाभी खुला रसना पटता है । ६. यह जरूर है कि जब तक साधारण शिक्षा के अन्तिम सोशन - तक ( १२० )" तक छात्र न पहुँचले तब तक उसको विशेषज्ञता की ओर ध्यान देने का अवसर नहीं दिया जाता । १४ से १७ के भीतर की उम्र में शिक्षा काल में ही यह मालूम हो जायगो कि किस छात्र की क्या योग्यता है और कैसी अभिरुचि है तदनुसार हर एक छात्र को विशेषज्ञता का अवसर दिया जायगा। छात्र का अभिरुचि के विरुद्ध विना सोचे समझे जो विपय सौंपा जायगा तो कृत कार्य्यता बहुत कम होगी। इस लिय श्रमिकों के साधा रण ज्ञान में बाधा देकर विशेषज्ञ बनाने की कोशिश अच्छी नहीं । कम्यूनिष्ट स्कूल में सत्तरह वर्ष की उम्र तक छात्रों में छात्रपन ज्याद. रहताहै, श्रमिकपन कम और क्योंकि इस इस उममं प्रजा तन्त्र की इच्छा भी यही रहती है कि यह देश के बजट में धन न दें किन्तु सुयोग्य नागरिक और श्रमशील दर्ने । अठारह वर्ष का होने पर शिष्य श्रमिक धनजाता है, उसे अपने हिस्से का काम फर देने के बाद विशेषज्ञ बनने का पूरा अधिकार होता है। काम के घरटों के बाद इसी लिये विशेषज्ञों के तय्यार करने का, प्रबन्ध किया गया है । जो अपना मौलिक दायित्व पूरा करने के बाद चाहे विज्ञान विशेष का पूर्ण पाडित्य प्राप्त कर सकता है। दस्तकारी फारसानों की उन्नति होने पर आठ घण्टे का दिन काम करने वालों के लिये माना जायगा, आठ घण्टे काम करने के बाद जो चाहे अपनी इच्छा के अनुसार काम कर सकता है । अगर कोई विशेष योग्यता सम्पन्न व्यक्ति हुआ तो उसे कुछ वर्षों के लिये काम से बरी भी कर दिया जाता है जिसमें यह
( १२१ )
किनी विज्ञान विशेष का पूग जानकार यन सके और नई २
सोज और अभिनन अविकार कर के मनुष्य जाति के हित का
हेतु हो।कमी २ पिल्ल काम से घरी न कर के काम के घण्टोंमें
कमी कर दी जाती है, आठ की जगह चार ही घण्टे काम लिया
जाता है पाको समय विशेष अध्ययन और सोज के लिये दे दिया
जाता है।
अभी तक कम्यूमि का पूरा पूरा प्रबन्ध हर विभाग में
नहीं हो सका इस लिए उच्चतम शिक्षा का अन्तिम रूप व्योरे-
पार नहीं बतलाया जा सकता, तो भी उद्देश्य की झलक स्पष्ट
है। शिक्षालय दा जुदा किस्म के होंगे। ऐसी जगहें भी होग
जहा संक्षेप में ही शिक्षा दी जाया करेगी । प्रत्येक विषय का
लक्षित
पाठ्य
कम को जान लेने से भी बहुत काम हो सकता
है। प्रयोग शालाये और यहुकला-शिक्षा-प्रद विद्यालय भी
होंगे। इन के द्वारा जावश्यकता अनुसार आदेश देकर खोजें
कराई जायेंगी। लेकिन इस में सन्देह नहीं कि वर्तमान विद्या-
लयों की शिक्षा पद्धति, उन के अध्यापक गण का काम तमाम
हो चुका । नवीन प्रबन्ध में अध्यापकों ओर शिष्यों का भेद
बहुत कम हो गया है, अव पितुल मिटा देना होगा। धनिक
शासन काल का एकत्र किया हुआ विद्या धन अर सय
थमिकों को भी प्राय्य हो और होना चाहिये । यह कम्युनिस्ट
का प्रधान ध्यान है।
-
4 ( १२२ ) कम्यूनिस्टिक सरकार जव कि भूमण्डल पर बनने जारहीहै । तो हर कम्यूनिस्ट को अपने पूर्वाधिकारी के अनुभव को सीख लेना व जान लेना कृतकार्य्यता के लिए अनिवार्य है। क्योंकि इस के पहले का कोई इतिहास ऐसा नहीं जो हमारी इस काम में मदद करे । रूस में कम्युनिज्म की विजय होने के बाद बेहद पुस्तकालय खुळे है जिन से थमिकों को पढ़ने की पूरी सुविधा होगई साधारण जनता के लिये अनेक शाला और क्लव (मम्मि लन स्थान) कायम हुये है, नये विश्व विद्यालय स्थापित हुए है। धायस्कोप दिखाने के रग मञ्च जिन से पहले जनसमहों में दुगुण, दुर्व्यसन, और कदाचार की वृद्धि होती जाती थी और तमाशा दिखलाने वाले गरीबों के पैसे से मौला माल होते थे, अर शिक्षा देने वाले उच्च भार और आदर्श जीवन बनाने वाले स्थान बन गये हैं। इन से साम्यवाद के पवित्र भाव उत्पन्न कराये जाते है । व्याख्यान सुनने, कमरत करने आदि उपयोगी कामों के लिए सब लोगों को खूब समय मिलता है क्योंकि अब श्रमिकों को थोड़ी देर काम करना पड़ता है और किसी प्रकार को भी किसी बातमें धन मिल्कुल नहीं देना पड़ता छुट्टियों में इन्हें स्वास्थ्य आनन्द और अनुभव प्राप्त करने की गरज से खूब फिरने का अवसर मिल जाता है जिस से इन्हें देश विदेश का काफी शान मिलना रहता है । यह सरवात केवल कम्यू निस्ट शासन में ही सम्भव है, दूसरे देशों में स्वायत सोवियट सरकार ने सभी बातों में बडे बडे भोरी उपकारक - "
( १२३ )
सुधार किये है कि जितना अधिक और सुन्दर सुधार शिक्षा
विभाग में हुआ है उतना और विभागमें अभी तक नहीं होसका ।
आमदनी का सब से अधिक भाग शिक्षा में गाया जाता है।
शिक्षा ही सुधार और उजार का मूल कारण है । जो शाम
मोचियट सरकारने रुसमें७-वर्पर्म किया उसका सोवा हिस्सा
भी इगलड या मारत में १५० वर्ष से अधिक के भीतर भी नहीं
हो सका इस का कारण स्पष्ट है, सभी जानते है ।
जव तक फम्यूनिज्म को समझ कर शिक्षा दने घाल अन्या
पक नहों तब तक शिक्षा का वास्तविक प्रचार नेकनीयती के'
साध नहीं हो सकता। धनिक प्रधान शामन म सम्पनो की
जरूरत के मुतापिया शिक्षा होती है और प.म्यूनिस्ट'सारे ही
देश वासिया के हिताहित का ध्यान रन कर सक को एकसमान
शिक्षा देता है।
( १२४ ) ग्यारहवां अध्याय धर्म " (Religion.) धर्म और कम्यूनिज्म एक दूसरे से संगति नहीं रखते। फार्ल मार्क्स कहता है 'धर्म जनताकी अफीमहै। धर्मफे द्वारा प्राचीन काल से आजतक एक भी लाभ सर्व साधारण को नहीं पहुँचा । अत्याचारियों के हाथ में धर्म ऐसा निमित्त कारण है जिससे प्रजा में विषमता स्थापित होती चली आती है। यह भनुप्यों में समताको नहीं रहने देता, इसके द्वारा धनिक, विद्वान और राजवर्गीय लोग अपना स्वार्थ सिद्ध करते रहते हैं, श्रमिको में इसी के द्वारा गुलामो की आदत कायम रखी जाती है। बहुत लोग कहेंगे कि ईश्वर में विश्वास करने और किसी धर्म विशेष के मानने से कम्युनिज्म को कोई हानि नहीं पहुँचती, हम ईश्वर और कम्युनिज्म दोनों में ही विश्वास रखते हैं तो इसमें क्या हानि ? लेकिन यह वात न व्यवहारिक दृष्टि से ठीक हे और न सिद्धान्त फी (सैद्धान्तिक ) इष्टि से ही। फम्युनिज्म मनुष्यों के ही पारस्परिक सम्बन्ध के विचार परआधार रखता है। ऐनिहासिक प्रकृतिवाद के सिद्धान्त के वैज्ञानिक आधार पर सामाजिक उन्नति और उत्कर्ष के कानून हद हुएहैं । यह कानून निर्दिष्ट हैं, इसको कम्युनिज्मके सबसे बड़े आचार्य कालमापर्स' और 'मोडरिक पअिल्स ने सिद्ध कर दिया है। इससे विस्पष्ट हो जाता है कि सामाजिक उन्नति किसी प्रकार की अलौकिक शक्ति से नहीं हुआ करती । ईश्चर और अलौकिक शक्ति का भाव मनुष्य जाति के प्रारम्भिक अशानावस्था में पैदा होता हे और प्रौढ़ता आने पर विलीन हो जाता है। बचपन के विचारों को जवानी के व्यवहारिक अपस्था में स्थान नहीं मिलता,न उस फशमकश में ही इनका पता लगता है जो मनुष्य और प्रकृति में चल्तीहे । अनहोनी बातों पर, मोजजी (चमत्यारों) पर विश्वास दिलाकर मनुष्यों का केवल मात्र अशान चिरस्थायी बनाया जाता है । इस तरह के छल से यार लोग अपना काम बनाते हैं, और श्रमिक, नादान, पढ़े लुटतेहे । पडे २ महात,पोप, पण्डे पुजारी, मौलवी मुल्ले, इसी अज्ञान स्थापना पीत आप मजे उड़ाते हैं, धनिकशासन की सत्ता कायम ररात और गरीव रोग बरा घर तुटा करते है। जो घटनायें रात दिन प्रकृति में होती रहती हैं इनमें से एक का भी कारण अलौकिक या अमारत देखने में नहीं आता । 'लाप्लेस' ने गोल पर इतनी यडी पुस्तक लिख डाली कही भी उम्मे अलौकिक शक्ति की कल्पना की जरूरत न हुई। विज्ञान की गाड़ियों पुस्तके मौजूद हैं, विशानसे माज ससार को सभी काम में सहायता मिल रही है, पर कहीं भी ईश्वर और धर्म का सहारा नहीं लिया जाता। बड़े नास्तिक मी आश्चर्य जनक आविष्कार करते है । लोकयात्रा के सारे को काम मनुष्य - नास्तिक की ही तरह बिना ईश्वर की जरूरत भान फिए हुए करता है । समस्त उन्नति की जड़ प्राकृत विज्ञान है न कि ईश्वर व अलौकिक शक्ति । प्रायः सभी परजीवी (मुफ्तसोर) ईश्वर फे ही नाम से हमें लूटने के लिये लुरियाया करते हैं। कम्युनिस्ट पार्टी की पद्धति अपने सदस्यों ( मेम्बरों) को आचरण करने के लिये निश्चित राह बतलाती है। इसी तरह हरेक धर्म का नीति शास्त्र अपने अनुयायियों को चलने के लिये प्रथा निर्दिष्ट करता है । जैसे ईसाई धर्म उपदेश करता हे कि 'जो तेरे दाहिने गालपर थप्पड़ मारे उसे तू अपना बाया गाल भी फ़ेर दे कि भाई इस पर भी मार ले।' लेकिन बहुत हालतों में कम्यूनिस्ट सिद्धा-नों और धार्मिक आज्ञाओं में इतना बड़ा अन्तर होता है कि देने में मेल हो ही नहीं सकता। वह कम्युनिस्ट जो धर्म की आज्ञाओं को अस्त्री- कार करता है और अपने दल, (पार्टी) के अनुशासन के अनुसार काम करता है वह किसी दूसरे धर्मका अनुयायी नहींहो सकता, फिर जो अपने को कम्युनिष्ट कहता है और किसी धर्म का अनुयायी बना रहता है और धर्म के नाम पर अपने दल के विधानों के विरुद्ध चलता है वह कम्यूनिष्ट नहीं रह जाता। कम्यूनिज्म स्वत. एक धर्म है जो प्राकृत विज्ञान को नीव पर ही । सडा होता है। *कुत्ता प्रेम बढानेका जो प्रयत्न करता है उसे लुरियाना कहते है । , " (१२७ ) धर्म के साथ हमारे झगडे के दो पहल है, हरेक कम्युनिस्ट को चाहिये कि इन दोनों के भेद को दूर समझले । एक ओर तो हम सम्प्रदायों के साथ झगडना है, क्योंकि इन्हीं के द्वारा खास तौर पर संगठन करके धर्म का प्रचार होता है, और इनके प्रचार की असली गरज होती है जनता को अज्ञानान्धकार में डाल रखना और वर्मका गुलाम वाये रहना । दूसरी ओर, हमें अधिकाश जगता के उन अन्ध विश्वासों और पूर्व-कुसस्कारों से लड़ना है जो उसमें (जनता में ) गहरा घर कर गये हैं या उसके हृदय पर अकित हो रहे हैं। लोगों का दावा होता है कि सम्प्रदाय ( मुसलमान, ईसाई, हिंदू, जैन कोई भी हो ) अपने धर्म के विश्वासों का समाज है जो सांस बातों पर, साम किताब अनुसार चलता है । रेकिन कम्यूनिस्ट कहता है, नहीं 'सम्प्रदाय उन लोगों का संघ है जो धर्मानुयायियो से धन ठग कर अपनी जीविका का मार्ग दृढ़ यगाये रखते हैं, गरीके अज्ञान और अविद्या से अनुचित लाभ उठाते है । धर्म याजक समूह जमीदारों व पूजीपतियों के ही समान है जो शासनतन्त्र, (State or Government) से मिले रहकर श्रमिकों को दुहा करते हैं। यह तीनों ही प्रकार के लोग शासनतत्र के श्रमिकों के सताने में मदद देते हे और शासनतत्र काम पडने पर, इनको मदद देता रहता है । वर्म और शासन तन्त्र की मिली भगत यात दिना से हे। मन्दिर, मठ, महन्तों की गहिया सभी के साथ जमीन, जागीर लगे । तर यह स्पय ।
( १२८) जमीदारों को गही नहीं तो और क्या है। कई कई महन्त तो खासे महाराजाधिराज हैं। इनसे गवर्नमेन्ट को लाभ पहुँचता है गवर्नमेन्ट से इन्हें लाभ पहुँचता है इसीलिये यह युग बंधारहता है । विना युग के फूटे श्रमिक बाजी नहीं जीत सकते । इसलिये पहली नद जो मारी जानी चाहिये वह धर्म है। धर्म की दस्तन्दाजी से विशेष कर महन्ती मठाधीशों और पोपों की जमीन्दारी से धनिक शासन को पूँजीपति भी अनेक बारधवरा उठते हैं क्योंकि यह चाहते हैं यह सारी सम्पत्ति हमारे पास आजाय । यह तो कारण है कि योरोप में वर्म और शासन का अत्यन्त प्राचीन सम्बन्ध तोड़ दिया गया। आज कल धर्मयाजकों के वे अधिकार नहीं हैं जो पहले थे, फिर भी थोड़ी बहुत लागलपेट बनी ही है । कम्युनिस्ट धर्म रूपी फसाद की जड़ को एक दम भस्मसात् करके मनुष्यों को सुग्वी बनाना चाहता है। मनुष्य जाति को सुखी बनाना ही सय में प्रधान . आज फल भी हम देसते हैं कि धर्म याजकों को यहकारर, उत्कोच देकर, इमचारों द्वारा चोजित करके देश में विवाह का बीज बोया जाता है ताकि धनिक शासन की नीव हिलने न पाय, पर यह अर हो नहीं सकता, इसकी जड़ हिल गई, इस विप वृक्ष को अब हटकर गिरना ही पड़ेगा,कोइ दिन की ही देर है। ईश्वर की ही कल्पना से राजा, गुरु और महन्तों पोपा,
गया
( १२६ )
खलीफों और इमामों को कल्पनाए हुई ओर ससार मिट्टी में
मिला, इस विगाड़ का सुधार जरूरी है।
। आजकल साचियट सरकार ने गिरजा के मकान, धन,
सम्पचि छीनकर श्रमिकों को दे दी है। किसी भी मन्दिर, गिरजा
या मसजिद का काम नहीं रखा। अब धर्म प्रत्येक नागरिक
का ग्यक्तिक काम है, धार्मिक समाज, नीति और राजनीति का
कोई सम्बन्ध नहीं रखा गया। धर्म की मददसे धमिक सरकार
अपने को रद नहीं बनाना चाहती।
स्कूलों से भी धामिक शिक्षा को इसीलिए वहिफत किया
है कि इसने मनुष्यों के आचार विचार में खरायी फैलती
है, चालकाल से धर्म का विष पुसने लगता है, बच्चे गुलामो
और फायरता सोसते है। धर्मान्धता के फैलने से जातिया
नष्ट हा जाती हैं इसलिए इसकी जड इसी तरह कट सकती है
कि धर्म पुस्तकों का पठन पाठन जातीय सस्थाओं से हटा
दिया जाय । जैसे प्रेम अन्धा कहलाता है वैसे ही विश्वास भी
अन्धा कहा जाता है । कम्यूनिष्ट विना आख सोले किसी काम
का करना अच्छा नहीं समझता, इसलिये अन्ध विश्रास को
हटाकर आंख से देखने के बाद बातों का विश्वास करता हे,
निशान के सामने सर झुकाता है,फवित्ताय उपन्यास कौशल और
गप्पों को विज्ञान का स्थान देना पाप समझता है । जिस धर्म
की जड प्रत्यक्ष मूर्खता और नाशनी पर आश्रित है उस धर्म
और उसके अभिजाता झल्पित ईश्वर को- विज्ञान म्यान प्रदान
-
-
( १३० )
फरने को तग्यार नहीं हो सकता। लुटेरे धर्म का समर्थन करते
है, धर्म लुटेरों का समर्थन करता है। आजकल भारत में
अधिक दुराचार और कुकर्म बाह्मणों में ही देखा जाता है, या
उन लोगों में जो इन ब्राह्मणों और धर्म याजकों के गहरे भक्त
है, इसका कारण धर्म ही है। पपमूलक धर्म न होता तो हमें
तारकेश्वर, गया, प्रयाग, प्रभृति में सहस्त्रों बदमाशों के अहो
को महन्त की गद्दी के नाम से देखने का दुर्भाग्य न प्राप्त होता,
न मुसलमान मौलवी, मुले मुजावर सज्जादानशी, पीर और
ख्वाजा मुसलमान जगतको मनुष्य जाति को शत्रु बनाकर उन्हें
कठपुतली की तरह मनमाना नाच नचाते ।
कैसे अन्धेर की बात है कि विज्ञान विरुद्ध मजहबी गों
और घेवकूफियोंको धर्म कायम रखना चाहता गिोल धरा
को चपटी चौकोण बतलाने की घेवकूफी अल्लाह मिया ने की,
धार्मिक किताबों ने इस अशुद्ध वात का प्रचार किया । अब
संसार समझ गया कि पृथ्वी गोल है फिर भी हम गलती करने
पाले ईश्वर, ऋषि, मुनि, पैगम्बर,अवतार को छोड़कर सत्य की
शरण में आने को तय्यार नहीं । दकयानूसी रही हजारों वर्ष की
भद्दी किताबों पर मरना सिवा घजमखों के और किसी भी
आंख चाले से नहीं हो सकता।
बच्चे जो स्कूल में वैज्ञानिक सत्य सौखकर आते हैं उन्हें
धर्म पुस्तके यहकाती हैं और असत्य पाठ पढ़ाकर उनकी
आखों में धूल झोंकने का प्रयत्न करतो है, इसलिए धर्म
पुस्तकों को पढ़ना बहुत ही हानिकर है । यीसवीं सदी में ऐसा कौन लण्ठ होगा जो दूध दही के समुद्रो, अमृत और शराब के होजो, हरों और अपसराओं की गप्पों में अपना जीवन नष्ट करेगा। हममें स्वतंत्र विचार मी आदत हो, हमें धर्म की अफीम बिला कर बालकपन से निकम्मा न बनाया जाय, यह उद्देश्य प्रत्येक समझदार का होना चाहिये । आज कल मनुष्य इतने निकम्में हो गये हैं कि वह किसी बुराई के हेतु को दढ़ कर उसके हटाने में थम नहीं करते, यह कह कर चुप हो जाते हैं कि ईसर की यही मर्जी थी, भाग्य में ऐसा ही लिखा था। बहुतेरे भोले भाले लोग निमाज गेजों से, अप, तप, पूजा पाठ से ही अपने सारे कामों को ईश्वर द्वारा सिद्ध कराना चाहते हैं। एक बार नर द्वीप में मेरे एक भोले भक्तराज ने कहा कि यह हजारों विधायें भजन करने से सदा चारिणी बन जायेगी। मैंने प्रश्न किया कि इतने वर्षों में आप पेमी कितनी विधवाओं के सदाचारिणी होने की जिम्मेगरी देते हैं जिहे भजन ने ब्रह्मचारिणी बनाया हो? इसका उत्तर हम कर टाल दिया गया । मच तो यह है कि ससारकी घरवादी को जड़ धर्म और ईश्वर है जिस दिन इसका अन्त होगा मनुष्य जाति के दुखों का भी अन होजायगा। - -
। १३२ )
बारहवां अध्याय.
उद्योग का सम्विधान।
(Organisation of Industry)
श्रमिक समुदायका पहला काम होता है भोग्य पदार्थों की
दावार का साधन अपने हाथ में लेना। इस के लिए उन्हें
तमीदारों को जमीन से, कोठीवालों और सौदागरों को कोठियों
भोर बड़ी बड़ी सौदांगरी की दुकानों से बेदखल करना
पड़ता है । इस घेदखल करने का यह अर्थ नहीं है कि श्रमिक
यनिकों को लूट कर सारी स्थावर जंगम सम्पत्ति आपस में
चाट लें और धनिकों की तरह रहने लग जायें। इस तरह पर
पहले मालिकों को वे दखल करके जमीन धन सम्पत्ति सय
प्रमिक प्रधान प्रजातन्त्र के पास खालसे में रहती है । अर्थात्
राष्ट्रीय सम्पत्ति बन जाती है । इस पर उन लोगों का जिन्हें
वे दखल किया गया है उतना ही स्वत्व होता है जितना ये
दसल करने वालों का । वात सिर्फ यह है कि सघ एक समान
खायें पहर रहें सह, प्रकृति पर सब का अधिकार बरावर है,
वह बना रहे, आपाधापी मिट जाय।
इस लिये उद्योग धन्धों का सगठन करना अभीष्ट होता है।
न कि किसी को लूट कर आपस में हिस्सा रसदी बाट लेना।
यदि अमिफ लोग ऐसा करें तो 'सोचियट' सरकार और पूर्जवा
सरकार में कोई अन्तर ही न रह जाय । लूट खसोट को जड़ से सदा के लिये मिटा देना ही साम्यवाद का मुख्य उद्देश्य है। इस सम्पत्ति के राष्ट्री करण का नाम 'मेशनेलाई जेशन आप प्रोपाटी' है। पहले जब रूस में धनिक प्रधान शासन था, या जिन देशों में अभी 'सोवियट प्रजा तन्न' नहीं है, सम्पत्ति के राष्ट्रीय करण का अर्थ होता था 'सम्पत्ति को राज्य के हाथ में देदेना' । गज्य या शासक वर्ग के हाथ में सम्पत्ति का सांप देना एक बात है ओर देश के श्रमिक शा- सिन प्रजा तन्त्र के हाथ में सोपना दूसरी बात है। ई० आई० आर० रेल्वे वृटिश सरकार के हाथ में आगई लेकिन आज तक उस से प्रजा को कोई भी स्लाम नहीं पहुंचा, जो हाल पहले था वही अव भी है। इस तरह का नेशनेलाइजेशन' धनिक शासन पनि का काम है। सोवियट सरकार की रेलों में सप को एक सी सुविधा होगी। पहले दूसरे तीसरे दर्जा का भेद करके एक को दुख दूसरे को सुख देना घोर पाप ओर नारकीय कृत्य है। सोरियट प्रयच में तो भाई की किसी को जरूरत ही न होगी। राष्ट की रेल होगी राष्ट्र के सवार होने वाले होंगे राष्ट्र के काम करने वाले होंगे । हम ऊपर एक स्थान पर रतला आये है सिका (चादी सोने आदि की मुद्राओं) की जरूरत ही न रह जायगी। जिन अभागे देशों में सोवियट सरकार स्थापित न होगी उनके साथ व्यवहार करने के लियेजोसोने चादी की जरूरत पखेगी वह हमारे अच्छे सुसलित उद्योग के द्वारा पैदा हुए ( १३४ ) मालों से रफा हो जायगी और देश की आकरों का सोना चादी भी इस काम में लाया जा सकेगा। सार काम तो उद्योग धन्धों को व्यवस्थित करना है जिससे देश का एक भी व्यक्ति स्त्री हो या पुरुष, बच्चा हो या बूढा, बीमार हो या तनदुरुस्त कदा- चित अन्न वस्त्र की कमी का दुख न उठावे, किसी को भीक मागने की जकरत न पटे, भूक से, सड़को पर पड़े हुए ऋतु क्रूरता से मरने का दृश्य स्वप्न हो जाय । यही साम्यवाद है, इसीका नाम कम्यूनिषम है जिसको बाजे बाजे गधे कह देते हैं फि कम्यूनिज्म का अर्थ है कि हर कोई हरकिसी कीचीज लेले'। अय पाठक समझ गये होंगे कि धलिक-शासन में 'सम्पत्ति का राष्ट्रीकरण' क्याहै और 'धमिक शासन' में क्या है। इसलिए वे केवल राष्ट्रीकरण के नाम से ही मुग्ध न होंगे, काम पड़ने पर देखेंगे कि किस प्रकार की सरकार ने देश की सम्पत्तिको लेकर सचमुच राष्ट्र भरको सम्पत्ति यनाई है । हम आगे चल कर देखेंगे कि इस तरह सम्पत्ति के राष्ट्रीय करण से क्या लाभ हैं । इस राष्ट्रीकृत सम्पचि के प्रवन्ध से गरीब मजूर लुट नहीं सकते । प्रारम्भ में उन धनवानों को जिनकी सम्पचि राष्ट्रभक्त को जायगी दुख मालूम होगा क्योंकि मनुष्य भाव का गुलाम है, पर थोड़े ही दिनों बाद यह श्रम जीवियों में मिलकर सुखी हो जायेंगे ।श्रमिक शासन में आने के घाद अमीरों मेंसे नजाकत, अनाना पन जाता रहेगा, ये यीमार कम होंगे, रोटी ज्याद. मानन्द से घा और पचा सकेंगे, आपटरों और वकीलों की और ( १३५ ) लूट का नाम मसार से उठ जायगा। जिम भोग लोलुपता ने दिन दिन पढ़कर समार को नरक बना दिया है उसका मुंह काला हो जायगा, भूमण्डल स्वर्गीय लोगों का आवास बन जायगा । जब सभी श्रमिक होंगतो भेद भाव कहा, कौन किसको ल्टे और सतावे कोई अपने सिर पर आप नहीं चढ़कर थैठ सकता। फिर संसार की सारी बदमाशी, भोग को छोड़ा होड़ी भूकसे होतीहै, भूके चोरी करते हैं । जब कारण मिट जायगा तो कार्य का स्वत. नाश हो जायगा। जिसके दात में कष्ट हो यह दात निकलवादे दर्द जाता रहेगा। जिम देश में अमीरों और धर्म याजकों के साथ ही इनके सहायक राज्य की लूट खसोट न होगी उसमें दुख होना असम्भव है, उदाहरण के लिए हम उन जंगलों के निवासियों को जाकर देखें, जिनमें पापिष्ट सभ्यता फैलाने घाले दुष्ट नहीं पहुंचे, तो मालूम होगा कि वे हम सभ्यों से लाखगर अधिक सुखी है । इसमें सन्देह नहीं कि उनमें शान कम है, प्राति से लड़ने की क्षमता उनमें कम है और हम में ज्यादा है, इसलिए उनसे साम्यपाद हम सीखें और उनको प्रकृति से युद्ध करना हम सिपाला। रूसस्थ सोवियट प्रजातन्त्र ने जो देदखली का काम नवम्पर १९१७ में प्रारम्भ किया था अय पूरा हो चुका है । १९९७ में और मय घनिक प्रधान शासन लडाईमें उल्मे पड़े थे उसी धीच में समने अपना काम बना लिया। आजका समय होता तो पह लोग रस के मनोर्य को विफल करके हवा हंगेरी की सोधियट प्रजातन्त्र को उन्हीं स्वार्थी राष्ट्रों ने नष्ट भ्रष्ट कर दिया, नहीं तो आज हंगेरी में भी श्रमिकों का झण्डा गड़ा होता । झगडा केवल मात्र इतना है कि हराम खोर चाहते हैं कि हम गरीयों मजूरों को मारकर खा जायें, गरीब मजूर यह चाहते हैं कि हम हरामखोरों का अपना सा श्रमिक बना कर हरामखोरी उनसे छुटा दें। पाठक देसलें कि इन दोनों में सदाशय,धार्मिक न्याय परायण, नीतिमान कौन है ? स्वार्थी,पापिष्ट, बेईमान और अन्यायी कौन है? रूस ने नहर, रेल, जहाजीबेड़े, धरती, कल- -कारखाने, आफर सब को राष्ट्र भर की सम्पत्ति मानली, व्यक्तियों का स्वामित्व मिटा दिया, इसलिए संसार भर के मनुष्यों में सोवि यट सरकार के नागरिक सब से अधिक सुसी हैं। सच्चा रामराज्य सोवियट रूस में है। हा, १९१७ से १९१६ तक और वाद में १९२४ तक जो उत्कर्ष और उन्नति उत्तरोत्तर सोवियर रूस ने की है यह इस बात की गवाह है, कि रूस में राम राज्य है। लोग कहते है कि रूस में अराजकता है, यहां के उद्योग धन्धे नष्ट हो गये हैं, लेकिन यह विल्कुल अशुद्ध परिस्थिति दिखला कर हमारी आखों में धूल डालना चाहते हैं। हमारे पास हाल में जो समाचार भाये हैं उनसे मालम होता है कि सब बड़े घडे ६१७ विभाग है, अाकर च धातु विभागों में और रसायन विभाग के अन्तरगत अनेको उपविभाग है । सर्वत्र काम जोरों ( १३७ ) पर चलता है। कास्मानों से जितना माल पहले मैदा होता था उससे अधिक पैदा होता है। परतु पैदावार में गदर नहीं मचाइ जाती, जरूरत के अनुसार पदार्थ पैदा किये जाते है, सोना चादी लूटकर जमा करने के विचारसे देश के नागरिकों के आराम को भूलकर माल का यनाना व पैदा करना सोवियट सरकार धुरा समझती है। छोटे छोटे दुकानदारों कारीगरों का काम यथा पूर्व चलता यह स्वयम् धीरे धीरे कायनिष्ट के सिद्धात को समझते जाते हैं इनसे झगडा करने की जरूरत नहीं पड़ती। पैदावार को समृद्ध और विकशित करना हमारा ध्येय है। उत्पादिका शक्तिको तरकी और फैलार जहा तक ज्याद हो सके उतना ही अच्छा, लेकिन गदर न होने पावे । पैदावार को गदर चुरी बला है । जहा तक हो देश के जरूरत की चीजें देश में ही वना ली जाये । अन्न, रुई, कपडा, जूता, लोहे के मामान, काठ के सामान जितनी भी चीजें हैं सब देश में बने और इतनी बन कि देश वासियोंके खर्च को पूरा करदें, कुछ पच जाय परन्तु घटें नहीं। इसलिये सर विभाग में पैदा करने के लिए 'व' चढ़ाना होगा। सिवा कामकाजियों के बलों की वृद्धि के या पलों को समुन्नत करने के तीसरा कोई उपाय पैदावार बढाने कानहीं हो सकता। लेकिन पहले तो श्रम और घुदि का प्रयोग ऐसे काम में होता याजिसमेघहचीज अधिक वन जिसकादामबाहर अधिक मिलता हो और यय अग्ने देश की जरूरत प्रधान रहेगी।
( १३८) समरकाल में शत्रु लोग शक्ति भर देशान्तरों में परस्पर मालका आदान प्रदान न होने देने के लिये रोक लगा देते है सको 'लाकेडिंग' कहते हैं। न हमें इस दशा में कच्चा या तय्यार माल बाहर से मिल सकता है, न हम बाहर भेज नकते हैं, न हम अपनी श्रम शक्ति को पूरी तरह काम में रा सकते हैं न हमारे पास माल के पैदावार के वास्तविक जरिये की रह जाते हैं। जमीदारों पूंजी ,पतियों से हथियार के जार से तेल और कोयला छीनना पड़ता है । इस तरह म्पत्तियों का राष्ट्रीकरण पहला काम है और पैदावार को चित अधार पर स्थापित करना दूसरा काम है । जय श्रमिक वामी हो तो उनकी जिम्मेदारी होती है, उनका कर्तव्य हो ता है कि कोई भी सोवियट सरकार का नागरिक भूक और रदीसे न मरने पाच, दुर्भिक्ष और महामारी मनुष्योंको न उजाय के । पहले कम्यूनिस्ट का काम होता है पुरानी पद्धति का नष्ट रना जय कम्यूनिस्ट विजयी हो गया तो उसका काम है नयी वहितकारिणी पद्धति को स्थापित करना। पैदावार को बढ़ाने का अर्थ है मजदूरों दारा पदार्थों की यारी अधिक करना । जिनिस अधिक पैदा हो, हर तरह अच्छी तरह से काम हो और मच्छाही फल निकले । भोग्य दायों के निपज (पैदावार) की वृद्धि ही हमारा ध्येय है। के लिये सोवियट शक्तिने कसमें पहले यह सोचा कि देश सारी साम्पसिक क्रियाशीलता को राज्य बसलायेय
पक सार्वभौम प्रक्रिया (general plan) के अनुसार एक
सूत्र में पाया जाय, क्योंकि बिना हमके पैदावार उस स्थिति
पर नहीं बनाई रखी जा सकती जिम्से याद में और ज्यादा
घढ़ाई जा सके । आपाधापी, पींच तान और अन्धेर साते को
हटा कर सामञ्जस्य के साथ हरेक काम का अग्रसर करना ही
कम्यूनिज्म का प्रधान उद्देश है । उद्योग धन्धों के अच्छी तरह
पर सगठित होने से कम्युनिस्ट समाज की जड़ सढ़ और गहरी
हो सकती है । अस्तु जमर है सब के पहले ई धन और कच्चे
माल के प्रस्तुत करने की राजकीय साधारण व्यवस्थामें उद्योग
धन्धों को भी शामिल कर लिया जाय। पोंकि इन चीजों के
देने से काम करने वाले मजूर कारीगर श्रमिक संघटन के
आश्रित यन जायगे और निश्चिन्त होकर काम करेंगे। इनमें
हरेक अपने समाज का काम करने वाला होगा और श्रमिक
राज का ही सहारा लेने से बाहिरी जररदस्ती का डर
न रहेगा।
दूसरी यात प्रारम्भ में यह होती है कि घरू काम करने
घालों को राज्यसे आर्थिक सहायता भी मिले । यह यात धनिक
शासनों में नहीं हो सकती, धनिक लोग यडे २ व्याजों पर रुपया
देते हैं और काम करने वाले अपने मेहनत का फल शताश
मुशकिल से भोग सकते हैं। भारत के किसानों को जो दशा
जमीदारों और साहकारों के हाथ में हो रही है, उसी से हम
'समझ साते है कि गला घोटने वाली रस्सी फासी पर
खूब
( १४०
चढाए हुए आदमी का सहारा बनती है। लेकिन श्रमिक राज्य
वास्तव में घर पर काम करने वालों को धन की मदद दे
सकता है और उससे राज्य की फरमायश के अनुसार काम
तय्यार करा सकता है । इससे राज्य का अभिप्राय व्याज
आदि के रूप में नफा करना और छीनना ससोटना नहीं होता,
जैसा कि पाठक पिछले अध्यायों के पढ़ने से समझ चुके होंगे।
तीसरे यह प्रत्यक्ष है कि श्रमिक राज्य केन्द्रित व्यवस्था
के अनुसार अपनी फरमाइशे घर पर काम करने वालों को ही
दे, इन्हें ईधन और कच्चासामानभी पहुंचावे और यदि जगरत
हो तो औजार (Implements) भी देवे । यह फरमाइशें एक
निश्चित द ग पर श्रमिक सरकार से दी जा जिससे घर पर
काम करने वाले सामाजिक पैदावार के सम्मिलित साधारण
ढाचे में शामिल हो। इस तरह पर धीर २ वे राज्य के अग
हो जायगे और अपनी हानि लाभ को देख कर स्वयम् उसका
आदर करने लगेंगे।
फिर इस तरह पर जो सहायता दी जायगी उसके साथ
यह शर्त होगी कि वे अपने को दूसरे काम करने वालों की तरह
संगठित करलें। इस तरह एक प्रकार के सभी काम करने
चाले संगठित हो कर मिल कर काम करने वालों का समूह
(cartels) धन जायंगे और एक २ विभाग के बड़े २ कारखानों
और कोटियों का काम देंगे। इस रीति से सारे राज्य का काम
सुन्दर सुसंगठित होकर सब को सुग्न देने वाला होगा। इस
untons=मजरों को समा) ६, इम पास मिलकर
हलके थमिक शासनने काम करने वालों के प्रतिनिधियों की
हायों में राजसत्ता है। इसीके हाथ में यमसमय (Trade
(१४१ )
पद्धति का अभीष्ट यह है कि घर पर काम करने वाला को मत
यता और प्रोत्साहन देकर अनायास बिना कट के बड़े भारी
एकी भून, सुसगठित और फल फाटे वाली समाजिक पैदावार
की पद्धति में बदल कर सदा के लिये निष्कण्टक कर दे।
इस तरह पर काम करके रूसमें सोवियट सरकार को बड़ी
सफलता हुई है। (विस्तार के साथ उदाहरण जानने हो तो ए०
यी० सी० आव कम्यूनिज्म पृ० २८७-८८ देखो) यह काम
श्रमजीवी समायों ( Trade unions) के द्वारा ही ठीक
हुआ है । कारीगरों, किसानों और मजदुर्गे के मिलकर
रहनेसे ही काम होता है । लुहार, सुतार, कुम्हार भादि सब काम
फरनेवाले अपने २ कामोका अलग २ गुट्ट बना कर काम करें तो
हर विभाग में काम उन्नति कर जाय और एक से दूसरे को
सहायता मिलने के कारण सब एक शरार के अग हो जायें।
हम अकेले सुखी रहे मजे उड़ावें दूसरे चाहे मर जायें, यह भाव
न होने के कारण इनमें दुख का पता भी न रहे।
अव इन श्रमजीवी समवायों में और धमिक राजसत्ता
क्या सम्ध होगा, इस पर दो चार शब्द फहने की जरूरत
जान पड़ती है।
सोचियट (council कोसिल, परिपत्) कायम की है, मा
-
A
(१४२) वाले हैं । इन सब का काम फलदायक बनाने के लिये जरूरी है यह परस्पर गुथे मिले हो । अब प्रश्न यह होता है कि ये किस सगठन के साथ हलित किये जायें? इसका उत्तर यह है कि इनमें जो सब से अधिक बड़ा और चलशाली हो उसी को केन्द्र चुनना चाहिये । ऐसी अंगी सोवियट-शकि द्वारा सगठित राजकीय संगठन है । इसलिये यह नतीजा निकलता है कि श्रम- जीवी समवाय और मिलकर काम करने वाले इस तरह पर उन्नत हो कि वे साम्पत्तिक विभाग बनकर राज-सत्ता संरक्षक चने और अन्त में शासक-राज-संगठन में बदल जायें। राज के खजाने से मदद पाने वाले समवायों को छोटी वात न समझनी चाहिये। रूम का राजकोष श्रमिकों की सम्पत्ति है। यही श्रमिकों की सत्ता का प्रधान लक्षण है। कारी गरों के छोटे २ समवायों को मिला मिलाकर बडे २ बलवान समवाय कर दिये गये हैं । जैसे धातु के काम करने वालों में सय धातुके काम करने वाले शामिल होगये हैं, इसीतरह सोने, चादी, घड़ी, विजली इत्यादि के काम को जानो। अब श्रमिक शक्ति (Labour power) के सदुपयोग का विचार करते हैं। श्रम शक्ति पर ही सारा दारमदार होता है। जय पैदावार के जरिये करीब करीव अन्त हो जाते हैं और कच्चे माल दुपाप्य होते हैं तय सारा वारमदार श्रम के ही सदुपयोग पर होता है। इस दशा में हमारा कर्तव्य है कि सारे ही काम करने वाले तत्वों को किसी न किसी काम -
में लगा दें, काई येकार न रहने पावे । दुर्भिक्ष के समय हरेक
व्यक्ति जो साता है और काम कुछ नहीं करता यह समाज पर
ध्यर्थ का भार धन जाता है। ऐसे लोगों की तादाद यहुत हुआ
करती है। इनके लिये सरल रीति से करने को बहुत सा काम
होता है। उदाहरण के लिए, फस्वे के कूड़े का हटाना, गलियों,
सरको और रेलों की मरम्मत करना, मार्गा की सफाई
इत्यादि । लकड़ी काटना, ईधन
एकत्र करना, कच्चे
मालों का जुटाना, लकडी का चलान इस तरह के अनेक
कामों से अन्न वस्त्र प्रस्तुत करने के लिये सोच समझ कर
जरिये निकालने पड़ते हैं। लेकिन काम का ढंग होना चाहिये,
एक पद्धति से काम किये बिना कृतकार्य्यता कठिन हो जाती
है। श्रमिकों में सच्चे साथियों की शिस्त हो, सात खास काम
में
लोगों की मदद हो । चन, पल या विद्या के अभिमान
से भी कोई भी हराम सोरी न कर सके, सय मिलकर काम
करें
आवश्यक चीजें उत्पन्न करें और मिल थाट कर हो प्रेम,
पूर्वक स्नाचं पहिने और सुग्म शान्ति और समता के भाव को
मन से हटने न दें।
.
( १४४ )
तेरहवां अध्याय.
खेती वारी।
।
रूस में सन् १९१७ के नवम्बर की अतिक्रान्ति के बाद जब
जमीदार लोग अपनी सम्पत्ति से बेदखल कर दिये गये तो
तमाम धरती प्रामीण किसानों की हो गई और छोटे छोटे कृषि
स्थल बन गये । इस समय यद्यपि कम्युनिस्टों का बहुत कष्ट
उठाने पड़े तो भी प्रारम्भ में ही यहुन कुछ भलाई देग्वने में
आगई । उपयुक्त अति क्रान्ति (revolution), के पहले
योरोपीय रूम का भूमि नीचे लिये अनुसार विभक्त या डेस्या
टाना चीधा की तरह एक नाप है।
गवर्नमेंट की धरती १३८०८६१६८' डेस्याटीना
ग्रामीण किसानी १३८७६७५८७
खानगी लागों तथा सस्थाओं के पास ११८३३२७०८,
सरकारो' धरती प्राय. जगली होने के कारण जोतने धोने
योग्य न थी, जब तक कि तोही न जाती। जो धरती व्यक्तिश.
लोगों के पास थी उस का हिसाब नीचे दिया जाता है।
बड़ी बड़ी जमीदारिया १०१७३५३४३ डेस्था
गजा की खास लम्पत्ति में ७८४३११५
महन्तों और उपासरों में ७३३७७७
"
-
"
फुटकर
"
"
-
म्युनिसिपल्टी के पास २०४२५७०
फोलक लोगों
३४५६२४०
६४६८०५
जहा तक रुपको की धरती कासम्बन्ध है, सन १६०५ में
इकडे दिये गये अकों के अनुसार १२२७७३५५ कृषिस्थल
(Farms) थे। इस हिमात्र से एक एक फार्म ११५ डेस्याटीना
फो ओसत से होता है । दूर दूर के, प्रातों में फार्म तो बहुत
पड़े रहे है, लेकिन वरती जातने बोने योग्य नहीं है, इस लिये
रूस क मध्य प्रदश में किसानों को धरती की घड़ी भूक रहती
है।ये किमान जिनको कुछ पहले शीत दापता स
छुटकारा
मिला था, किसानों में मय से अधिक संख्या है, इन के पास
औमत से केवल पाने सात डेस्याटीना वरती है।
इस गरीब किसानों की सातिर बडे बडे जमीदारों की
जमीन लीगड, इमी तरह बडे बड़े मौदागरी धनशोली किसा-
नों और कम्पनियों की जमीन भी चेदसली में आई । इस तरह
किसानों की अतिहान्ति चली। अब अतिक्रान्ति के बाद को
रूपी किसानों की दशा का हाल सक्षेप में कहा जाता है।
अतिक्रान्ति के पहले लोगों की सानगी धरती खास कर
चढ़े बड़े जमीदारों की धरतिया ऋण के भार से लदी थीं।६
करोड़ डेस्याटीना (नाप एकड़ की नाह) धरती ३४६७८६४६००
रूपिर पर ( रुपिल२ शि० २॥ पंस-||) ) यन्धक थी।
,
इसे खली नसों और विदेशी बैंकों से अलग करके गरीब
कानकारों (कृपको ) को सोपा गया ।
धीरे धीरे धरती पर से खानगी अधिकार हटा दिये गये
और धरतियाँ हाथ से काम करने वा किसानो को सौंपी
गयों। किसी को. जोतने योने की सामर्थ के गहर (अधिक)
धरती नहीं दीगयी। अव सबके अधिकार समान हैं। जाति या
ऊच नीच बशज होने का भेद भाव कुछ नहीं रखा गया। जो
साम्यवाद के संसार के कल्याण कार। सिद्धान्तों को मान कर
मोवियद सरकार में रहते है सब ममान है।
जमीदारी के अधिकार उठा कर छोटे बडे धनी और निर्धन
किसान एक श्रेणो मुक्त होकर सुख से काम करते और रहते हैं।
जिन गरीयों के पाम हल बैल बीज नहीं थे उन्हें मालदारों से
लेकर दिया गया । आज रूस में भिक्षुक कहीं नहीं
दिखाई देते । धरती की ममता का प्रबन्ध अभी तक जारी है।
सरप्रकार की धरती कारत में लाई गई है इस से निर्धनता
और भूक प्यास का प्रश्न ही शेष नहीं रहा। जल, सादा
नलाई, कटाई मंडाई लुनाई सभी कामों का प्रबन्ध साम्यवाद
के पवित्र सिद्धान्त के अनुसार इतना सुन्दर हुआ है कि कहीं
पर तनिक भी अडचन नहीं पड़ती सर काम सुखेन होता
है। पशु पालन परभी का ध्यान नहीं है क्योंकि यह खेती
के प्राण है। इन से 'साद और, धी दूध मिलता है और
जोनने योन और माल ढोने के काम लिए बिना
मनुष्य
को
रहता
जीवन दोभर होलफना है अत इनकी यथावत मेगा मनुष्य का स्वार्थ जनित कर्तव्य है। बहुत से जमीदारी के विषय ( सम्पत्ति ) जो १९१७ में लेकर राष्ट्रीय बनाया गया था उनमें कहीं २ आदर्श मेशीमें काम करती थीं कहीं साग ही कारसाना अनुकरणीय सोधनों और व्यवस्थानी का नमूना या, कहीं पीढियोका पत्र वस्तु भाण्डा गार था। इनको सरले सोवियट सरकार ने लकर सुरक्षित रखने का पूर्ण प्रयत्न किया और कृषि शिक्षा के लिये यहा उपयुक्त स्कूल और कालेन नया दिये। किसानों को प्रात्साहित और जानकार करने के लिये मोपियट सरकार ने कापि कार- साने (फार्स ) भी डे विस्तृत रूप में बना कर मीधा राज का आर से कृतकाग्यना के साथ चलाये है । पशुशालायें भी इन कारखानों के साथ लगी है जिनमें पशुओं की नसले सुधारी जाती है। उत्तम मोटा अन्न पैदा करने की तरकीय च लाइ जाती है। इन कारखानों के मेशीनों से काम पडने पर कोई भी किमा आकर धीज छाटने आदि काम में सहायता ले सकता है। हम लोगों के अभागे देश में कुशानन के कारण जो कुछ भी हम सीखना चाहते हे विग पैसा नहीं सीग मफत । निर्धनों के लिये तो एक प्रकार से शिक्षा का वार ही यद है, यह धान कस नहीं है। सर प्रकार की शिक्ष निश्शल्क दी जाती है। अमीर गरीय एक समान ही है।
( १५०) जाति या राष्ट्र पापिष्ट है जो स्वार्थवश दुसरी मनष्य जाति को व्यक्ति को या राष्ट्र को लुटता समोरता है, ऐसे पापिष्ट राष्ट्रों की उन्नति मानव जाति को अभीष्ट नहीं है। सन् १६१६ की शरद ऋतु में सोवियर प्रजातन्त्र (रूस) में १९०१ कम्यन, ३७०० कार्टेल,६६८ सहयोग-कृषि समिनिया र्थी अब तो बहुत ज्यादा बढ़ गयी है। रही, वजह धरतिया भी दिन दिन निपजाऊ बनती जा रही हैं, लेकिन मिथ्यावादी लोग यह कहत दे कि रूस की प्रजा दिन २ दुखी, निकम्मी, निरुद्यम और आलसी होती जाती है। कार्टेल और कम्यन दोनों शब्दोका भावार्थ जान लेना जरूरी है । एक तरह पर दोनो ही पर्याय वाचक शब्द है। रूस के ग्रामी में भी इन शब्दों के भावार्थ में भेद नहीं किया जाता, परन्तु.- 'कार्टल' का काम है केवल बस्तु निपजाना, (पैदा करना) । यह केवल उत्पादिका सस्थाहै इसका दूसरा काम नहीं है। जिसमें सब मिलकर पदार्थ पैदा करते है उस सम्बाय या संयोग का नाम आर्टल है । लेकिन कम्यून माल पैदा करने के साथ साथ उसे स्थानान्तर में वितरण भी करता है, खर्च करने में भी योगदान करता है । उदाहरण-प्रयाग में एक कम्यून ने १ लाख मन अन्न पैदा किया तो उसका यह भी काम है कि दो २ फेन्दी में हर पेन्द्रों की आवश्यकता के अनुसार माल पहुँचाने और वहा से खाने वालों को पाने के लिए दे।
, : सावियट सरकार मशीनोंकी उपयोगितासमझतीय धर्म के विभाग (Dix1sion of Labor) के लामाको पहचानतीदै परन्तु, सर्वत्र खेती यारी की यही २ मशीन उपयोगी नहीं हो सकतीं, छोटे छोटे फारमा (पि झापसानी ) में हाथ के दी द्वारा काम करना हितकर है, इसी प्रकार 'श्रम-विभाग' अर्थात् डिवीजन भाव लेपर का यह परिणाम न होना चाहिये कि बहुत से मनुष्य: खिया पिन के टुकडे करने के दूसरा काम जान ही नहीं । सोयि । यट प्रजातन्त्र को यह दोप रगाना कि यह वैज्ञानिक उन्नति नहीं चाहता, कल कारखानो को नेस्त नायद करना पसन्द करता है, सम्पत्ति शास्त्र के सिद्धान्तों का तिरस्कार करता है-सर्वथा मिथ्या है। सोवियट सरकार जानती है कि स्त्री चर्चा से कैसे और कितना काम लेना चाहिये, मनुष्यों को काम करने में कितना समय देना चाहिये पयोकि यह विना कमाये धनके खाली हराम- खोरों को अपने राज्य में रखना अपनी हतक समझती है। रूस में ऐमा नहीं हो सकता कि 'कमाए माइ बापू खायें हम' । रूस की धरती उसरा (निपजाऊ) है, यहां राइ, गेहूँ, बाजरी, जय, आल पैदा होते है, फिर भी १६०१ से १९१० तक पैदावार का हिसाब देखते है तो रूस की पैदावार हालण्ड, इगलैण्ट, जर्मनी और की सब से कम हुई लकिन १६११ से १६२० तक में कुछ ज्याद हुई है। आशा है अबकी दशादी ( १५२ ) की रिपोर्ट बहुत अच्छी निकलेगों क्योंकि सोवियट का प्रबन्ध अब हद, सरल, सर्व प्रिय होता जा रहा है। पैदावार को सर्वत्र खर्च के लिए पहुंचाने का अलग प्रबन्ध है। खानगी सौदागरी या धाणिज्य की प्रथा तोड़ दी गई है। प्रमजीधी सम्वायों के कर्मचारियों द्वारा छोटे २ दुकानदारी द्वारा और दूसरी अनेक विधियों से माल देश वासियों को मिलता रहता है । इसका पूरा पका प्रबन्ध करने में कुछ समय गगा।
चौदहवां अध्याय श्रम-रक्षा और सामाजिक कल्याण के काम। श्रम संरक्षण अर्थात् श्रमिकों मजूरों की रक्षा क्या है, इस पात को समझ लेना जरूरी है। श्रमिक समुदाय, काम करने वाले लोग कम्यूनिष्ट पक्षति प्राप्त करने के लिये झगड़ते है । क्योंकि इस पद्धति के प्राधान्य से ही वे लोग स्वार्थ पगयां को लूट खसोट से बच सकते हैं । कम्युनिज्म सेही यह सम्भव है कि उत्पादक दल पल की वृद्धि हो और ऐसी वृद्धि हो कि प्रजा को अपना सारा जीवन उपयोगी और भोग्य पदार्थों के तो पैदा करने में न बरबाद करना पडे और कम्युनिज्म हो' अम सरक्षण है। इसका काम है श्रम जीचियों की दशा का उगर और उनकी स्थिति का समुन्नत करना। सोवियट प्रजातन्त्र में काम करने वालों को स्वतन्त्रता होती और यही शासक श्रेणी के लोग होते हैं इसी से प्रकट कि मिक सर्वथा सुरक्षित रहते हैं, सताये या लटे नहीं जा सकते । ही श्रमिक समुदाय की विजय है । लेकिन हम्परा अभिप्राय क्षा पर सर्व साधारण श्रमिक समुदाय से नहीं है, हम यहा न लोगों की बाबत विचार करना चाहते हैं जो आकरों में, २ कारखानों में और धर्क शापों-लोहारी आदि के छोटे कर्य मो-में काम करते हैं। क्योंकि जो लोग घरतुत हाथ से
।
फिसी क्षेत्र में काम करते है उन्हो पर उस क्षेत्र के नैसर्गिक
परिकर का प्रभाव पड़ता है। फैक्टरियों, बकशापों में जो काम
करते हैं 3 हे फलों के बीच में बुरे वातावरण में काम करना
पडता है, यह भयानक परिस्थिति है । यदि यह हररोज यहुन
देर तक काम करेंगे तो बहुत थक जायेंगे, इनकी शक्ति क्षोण
और आयु कम हो जायगी। और उनका ध्यान एक ओर बहुत
देर तक न रह सकने के कारण भी दुघटनायें बहुन बढ जायेंगी
इस लिये इनके काम करने का समय बहुत विचार के साथ नियत
करना उचित है। हम देखते है कि इस अन्तर्गत 'नेस्को' के
जहाज बनाने के कारखाने में (पीटरो ग्रेड में हो है ) नीचे लिखे
अनुसार दुर्घटनाए हुई।
सन घटनाकी सरया श्रमिक सख्या घटनाप्रति १००० श्रमिक
४३८६ ६१८६
४६८६. -
१६१६ २८३०
१६१७ १२६६ ६०५६
२१०
घटना इस लिए दिन दिन कम होती गई कि श्रमिकों की
रक्षा के लिये कई विशेष अनुशासनो,(measures) को सिल
सिले चार जारी किया गया, तो भी १००० श्रमिकों मै २१० घट
नाओं का होना बहुत ही अधिक है । एक बार ब्रिटिश पालामेंट
में रेमजे मेकडानल्ड ने बतलाया था कि जो.१२०० आफरों में
काम करने वाले आदमी मरे उनमें से १६०० इस कारण मरे कि
७०६।
। ७५०२
+
पूंजीपतिया ने आपपक सावधानो के नियमा के पालन में
असावधानी की थी।
यदि यथात सावधानी मने और श्रमिकोंकी प्राण-रक्षा
को अपना फर्तय. समझे तो घटनायें (2ccidents) बहुत
कम हो सकते हैं।
दूसरी विचारणीय बात है काम मे संलग्न हानिकर पाता-
घरण, व्यवसाय जनित रोग और तजनित मृत्यु ।
लेजारेफ कहता है कि रूम की फास्फोरस बनाने वाली
फैक्टरी में जहा कि श्रमिकों की रक्षा का कोई उपाय नहीं किया
गया था श्रमिक ५ वर्ष में ही बेकार मुर्दा के समान हो जाता था।
लोहे के सराद के काम में भी श्रमिकों की आयु घट जाती है
फेफडे के रोग से पीड़ित हाकर मर जाते हैं । यही पात आक्रों
में, काच के कारखानों में और अनेक प्रगर के कामों में दखी
जाती है।
१६०० ओर १६०२ के बीच में इंगलैंड के अशु बतलाते है
नीचे लिये पेशे वालों में प्रति १००० कितने आदमी क्षई
रोग से मरे । पादही ५५ चीनी धर्तन व मिट्टी के पर्तन बनाने
वाले २८५, किसान ७६ कम्पोजीटर ३००, चैस्टिर वकील १२,
नशा यनाने वाले ३२५, सिविल सर्वे ट १२९ चाकू पर सान
धरने वाले ५३३ काच के कारखाने के श्रमिक २८३ आकरों से
काम करने वाले १६
इस प्रकार हम अनेक देशों और जुदा अनेक कामोंके करने
वालो की मृत्यु संख्या दे सकते है, लेकिन पाठकों के विचार
के लिए इतना ही काफी होना चाहिये।
अब देखना है कि रूस ने अपने श्रमिकों की रक्षा के लिए
क्या २ प्रयत्न किये ! आज तक भूमण्डल के किसी भी ने
ऐसे कानून अपने श्रमिकों की रक्षा के लिए नहीं बनाये जो
सोवियट प्रजातन्त्र ने बनाये है। इस प्रजातन्त्र ने सब से पहले
काम करने के घण्टों की हद वाधी।
१-श्रमिकों के काम करने की हद ८ घण्टे करके कानून बना
दिया कि इससे अधिक श्रमिकों से काम न पिया जाय ।
दफ्तरों में काम करने वालों और मानसिक श्रम करने वालों
के लिए ६ घण्टे काम करने को व्यवस्था की।
२-ओवर टाइम काम करने की कानूनी रोक कर दी। घहुन ही
जरूरत पड़ने पर अनिवार्य दशा में अपवाद के तौर पर जो
ओवरटाइम काम करने की गुजायश कानून में रखी गई
है उसकी मजूरी डेगुजी मिलती है।
३-विशिष्ट हानिकर कामो के करने वाले श्रमिकों के काम करने
के घरटे और भी कम किय गये हैं। गैस के थमिकी से
फेवल ६ घण्टे और तम्बाकू के मजूरों से ७ घरटे ही काम
रेने का विधान किया गया।
५-नियमित रूप से ४२ घण्टे काम करने के घाट विनाम का
नियम है। शनिवार को २ घण्टे कम काम लिया जाता है।
जो धमिक विचार फो छुट्टी न ले सके उहें उसके दिले
दूसरे किसी दिन सप्ताह म माराम दिया जाता है।
५-साल म एक बार श्रमिकों को पूरे वेतन पर छुट्टी मिलती
है । साधारणतय. साल में १ महीने की छुट्टी का कानून है
परन्तु राष्ट्रीय कठिनाई के समय, बुरे वक्त में १३ दिन की
छुट्टी का विधान है।
६-रिशेप कर कामों में लगे हुए मजूरों को १५ दिन की
अधिक छुट्टी दी जाना है।
दूसरे स्त्री और बच्चा के सम्बंध में कई विशेष बातों
का ध्यान रखा जाता है।
१-स्कियों से रात में काम नहीं लिया जाता न आवर टाइम
काम कराया जाता है। इनसे ठेके पर भी काम नहीं लिया
जासत्ता।
२ १६ वर्ष से कम के लयकों को नियत रूप से श्रम में नहीं
लगाया जाता । धीरे से हटाकर स्कूलों में भेजने की
आयोजा। होती है। इन्हें सहायता मिलती रहती है।
7ठकों को हानिकर या अनिष्ट करने वाले व्यवसायों के
फाम में तो कदाचिन नहीं लगा सकते।
३-१६ वर्ष से कम केन्चासे केवल ४ घटे काम लेने का
विधान है। १६ स १८ वर्ष तक लड़को को छ घण्टे काम
करना होता है।
न
मातृत्व की रक्षा के
कानुन
चे दिये जाते है । यह कानून
बहुत ही जरूरी
१-गर्भिणी और प्रसूतिका को चाहे वे स्वयम् काम करती हो
चाहे काम करने वालों की बधू हो जब तक वह काम नहीं
करती उन्हें लगातार भत्ता मिलता रहता ह ।
२-शारीरिक काम करने वाली गर्मिणीयों को यह मत्ता बच्चा
पैदा होने के ८ सप्ताह पहले से ही मिलता है और चे काम
से हटा दी जाती है, दिमागी काम करने वालियों को ६
सप्ताह पहले से यह भत्ता मिलता है।
३ -बच्चा पैदा हाने के बाद भी क्रम में ऊपर लिखे अनुसार
८५ ६ सप्ताह भत्ता मिलता है।
४-जो बच्चों को पालती हैं, उन्हें हर तीन घण्टे में आधे घण्टे
का अवकाश दिया जाता है।
५- सभी माताओं को २४ रुविल (रुपिल गरेनी २६ पैस)
रोज यच्चा पैद होने के दिन से ९ महीने तक वन्चों के
पालन के लिए अधिक मिलता है साथ ही सर ७२० रुविल
बच्चे के घस्त्र आदि अनेकों कामों के लिये भी दिया
जाता है।
अभी कई बातों में कानून के अनुसार कुछ काम नहीं बन
सकते,पर धारे २ यह श्रुटि दूर होती जा रही है जैस कई
ध्यतिरिक्त दशाओं में ओवरटाइम काम करने की इजाजत है
लेकिन इस इजाजन के अनुमार भी कोई किसी श्रमिक से साल
(१५६ ) में ५० दिरामे अधिक ओवरटाइम काम नहीं करा सकता। १५ से १६ वर्ष तक के बच्चे ४ घरटे श्रम कर सकते है लेकिन इसे एक दम रोकने का प्रयन्ध हो रहा है। साल में एक माम क आराम को घटा कर फछ काल के लिए १५ दिन कर दिया गया है। रात का काम करने का समय वढा कर ७ घरटे किया गया है। यह सर यातें अब हटती जातीहै । जिन दिनों साम्राज्य वादियों के आक्रमण और अत्याचार रूस पर होते थे उन दिनों नियमो में यह अस्थिर परिवर्तन करने पड़े थे । ज्यों ज्यो बाहिरी सामाज्य धादियों के आक्रमण और धागा धींगी का भय जाता रहेगा रूस में श्रमिकों को अयत सुख मिलुगा और अस्थिर परिवर्तन जो नियमों में हुए हैं, उन्हें रह करके भौतिक फानन के ही अनुसार सारे काम होंगे बल्कि और अधिक सुविधा की जायगी। काम करने वालों की तदुरस्ती स्थिर रखनेके ओर अनेक उपाय रिये जाते हैं। किसी किसी काम पर श्रमिकों को कपडा दिया जाता है जिस से कारसाने की ग्वगवी का प्रभाव उन के वस्त्रां पर नहीं पड़ने पाता । ददायों के सास प्रवध है । प्रमिको के ही पक्ष के निरीक्षक सर्वन निगरानी करते रहते हैं। । *समाप्त*
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