Shri Jawahar Vidyapith Binasar, Bikaner

Jeene Ka Raaz

Muni Gyan · 2011/01

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जीने का राज
-
मुनि ज्ञान
प्रकाशक
..
श्री अखिल भारतवर्षीय साधुमार्गी जैन संघ
समता भवन, बीकानेर (राज.)

जीने का राज
० मुनि ज्ञान
*
प्रथम संस्करण : अगस्त 2002,2100 प्रतियां
मूल्य : 20/-
अर्थ सहयोगी : श्री सायरचन्द जी छल्लाणी
:
प्रकाशक:
श्री अ.भा.साधुमार्गी जैन संघ,
समता भवन, रामपुरिया मार्ग, बीकानेर
मुद्रक :
अमित कम्प्यूटर्स एण्ड प्रिन्टर्स, बीकानेर
दूरभाष:547073

प्रकाशकीय श्रमण भगवान महावीर ने चतुर्विध संघ के कुशल संचालन का उत्तरदायित्व आचार्य श्री सुधर्मा स्वामी के कंधों पर रखा। सुधर्मा स्वामी ने आचार्य श्री जम्बू स्वामी एवं जम्बू स्वामी ने आचार्य प्रभव स्वामी के कंधों पर रखा। उसके पश्चात् से आचार्य परम्परा निरन्तर गतिमान चली आ रही है। साधुमार्गी के इस दीर्घकालीन इतिहास में हास और विकास का क्रम चलता रहा है। यह सुखद संयोग रहा है कि हास के विकट काल में भी समर्थ एवं सुयोग्य आचार्यों का पावन सानिध्य इस परम्परा को प्राप्त होता रहा है। श्रमण परम्परा में लगभग 200 वर्ष पूर्व शिथिलाचार व्यापक रूप से फैलता जा रहा था। शुद्ध साधुत्व के दर्शन दुर्लभ होते जा रहे थे। क्षेत्र, धर्म स्थल एवं शिष्यों के व्यामोह में साधुता भग्न होती जा रही थी। ऐसे युग में आचार्य श्री हुक्मीचन्द जी म.सा. का जन्म हुआ और उन्होंने दीक्षित होकर आगमिक ज्ञान और शुद्ध साधुता के बल पर साधुमार्गी परम्परा को प्राणवान बनाया। आचार्य श्री हुक्मीचन्द म.सा. के बाद इस परम्परा को पश्चात्वर्ती आचार्यों ने उत्तरोत्तर आगे बढ़ाया। आज हमें परम प्रसन्नता है कि समता विभूति, समीक्षण ध्यान योगी आचार्य श्री नानेश के पट्टधर प्रशान्तमना, व्यसन मुक्ति के प्रेरक, श्री वाल प्रतिबोधक, आचार्य श्री रामलालजी म.सा. के सानिध्य में साधुमार्ग की वह धारा विकसित रूप में उभर कर आ रही है। आचार्य श्री रामेश के निर्देशन में श्री अ.भा. साधुमार्गी जैन संघ जिनशासन की सुरक्षा/संवर्धन के लिए कृत: संकल्प है। संघ की शासन उन्नयन की विभिन्न प्रवृत्तियों में सत्साहित्य का प्रकाशन भी एक अहं प्रवृत्ति है। प्रस्तुत कृति जीने का राज का प्रकाशन उसी ध्येय की पूर्ति है। प्रस्तुत कृति विद्वद्वर्य ओजस्वी व्याख्याता, संत प्रवर श्री ज्ञानमुनिजी म.सा. के ज्ञान का संदोह है। साधुमार्गी धर्म संघ के अष्टमाचार्य श्री नानेश के अन्तेवासी सुशिष्य श्री ज्ञानमुनिजी ने 13 वर्ष की अल्प आयु में दीक्षित होकर उत्कृष्ट ज्ञान साधना, अथक लगन एवं रचना धर्मिता द्वारा अपने नाम को सार्थकता प्रदान की है। मुनि श्री विद्वान साहित्यकार और सफल प्रवचनकार है। अपनी विद्वता और वक्तृत्वकला से उन्होंने शासन की जो भव्य प्रभावना की है उससे संघ गौरवान्वित है। इतिहास, चिंतन स्मरण, काव्य उपन्यास, कहानी, प्रवचन आदि अनेक विधाओं और विषयों पर आपकी गद्य व पद्य में अनेक {5}

कृतियां प्रकाशित हो चुकी है। जो जैन-समाज में समादृत है। प्रस्तुत कृति के लिए
हम मुनि श्री के आभारी हैं। प्रस्तुत कृति जीने का राज का प्रकाशन असावरी
जिला नागौर निवासी संघ/शासननिष्ठ सुश्रावक श्री सायरचन्द जी छल्लाणी के
अर्थ सौजन्य से हो रहा है। साहित्य के प्रकाशनार्थ प्रदत्त अर्थ सहयोग हेतु संघ
हार्दिक साधुवाद एवं आभार ज्ञापित करता है। प्रकाशन प्रक्रिया में सहयोग हेतु
श्री उदय नागोरी धन्यवाद के पात्र हैं। पूरा विश्वास है मुनि श्री की कृति में
सन्निहित संदेश आत्मसात कर पाठक अंतरावलोकन करने में समर्थ होंगे और
जीवन को सम्यक् दिशा में अग्रसर करेंगे।
निवेदक
शान्तिलाल सांड
संयोजक
साहित्य प्रकाशन समिति
श्री अ.भा.सा. जैन संघ, समता भवन, बीकानेर
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अर्थ सहयोगी परिचय विद्वद्वर्य, ओजस्वी व्याख्याता श्रद्धेय श्री ज्ञानमुनि जी म.सा. की प्रस्तुत कृति जीने का राज का प्रकाशन संघ/शासननिष्ठ, सेवाभावी सुश्रावक श्री सायरचन्दजी छल्लाणी के अर्थ सौजन्य से हुआ है। मूलत: ग्राम असावरी जिला नागौर निवासी श्रीमान झूमरमलजी छल्लाणी के आत्मज श्री सायरमलजी को सरलता, सेवा व समर्पणा के संस्कार विरासत में मिले, जिन्हें आपने वृद्धिगत रखा और समाज में अपनी पृथक् पहचान बनाई। आपके पितृश्री विगत तीन दशक से नित्य सामायिक, स्वाध्याय एवं त्यागमय जीवन व्यतीत कर रहे हैं। आप दोनों समय सामायिक की साधना करते हैं तथा लगभग 25 वर्षों से चौविहार का पालन करते हैं। ईमानदार, सादगीपूर्ण जीवन, सरल/सहज व्यवहार, सत्य के प्रति समर्पित जैसे गुणों से युक्त व्यक्तित्व है आपका । श्री सायरचन्द जी व इनके अनुज द्वय-श्री कैलाश चन्दजी एवं श्री सुमेरचन्दजी ने कक्षा 5 से 11 तक जैन हॉस्टल, भोपालगढ़ में रहकर जैन विद्यालय में अध्ययन किया एवं तदनन्तर जैन दिवाकर होस्टल, ब्यावर से बी.कॉम किया। सन् 1978 में इन्होंने मामाजी व ननिहाल वालों के साथ निर्यात (Export) का व्यवसाय किया और अथक परिश्रम, प्रतिभा व लगन से अनवरत सफलताएं अर्जित कीं। विगत 25 वर्षों में इन्होंने 60-70 बार विदेश यात्रा की। अमेरिका, इटली, फ्रांस, जर्मनी, स्पेन, डेनमार्क, U.K. आदि देशों में प्रामाणिकता व विश्वसनीयता की छाप छोड़कर आपने जैन समाज, राजस्थान व भारत को गौरवान्वित किया है। सन् 1985 में तीनों भाइयों ने संयुक्त रूप से Jewellery (जवाहरात) व Handicrafts (हस्तकला) का व्यापार प्रारंभ किया। जवाहरात में दिल्ली राज्य का अवार्ड (Award) मिला व दो बार अखिल भारतीय स्तर का (1993 व 1999) Jewel का अवार्ड मिला। 1994 में आपका श्री ज्ञानमुनिजी म.सा. से एवं तदनन्तर पूज्य गुरुदेव आचार्य प्रवर श्री नानालालजी म.सा. से सम्पर्क होना जीवन में महत्वपूर्ण मोड़ सिद्ध हुआ। तभी से आप नियमित सामायिक, स्वाध्याय करते हैं और भक्तामर का पारायण भी। अब प्रतिक्रमण भी सीख लिया है। आपने उत्तराध्ययन सूत्र, दशवैकालिक सूत्र, स्थानांग सूत्र सहित जैन धर्म का मौलिक इतिहास (चार भाग) जवाहर किरणावली आदि का स्वाध्याय/अध्ययन कर लिया है। विगत चातुर्मास {7} में श्रावक के बारह व्रतों को भी अंगीकृत किया है। उल्लेखनीय है कि आपने एक बाल्टी से नहाना, पुष्प नहीं तोड़ना या उपयोग में न लेना, इत्र आदि के त्याग- प्रत्याख्यान किये हुए हैं, जो स्तुत्य व अनुकरणीय है। आपकी धर्मपत्नी पुष्पाजी भी नियमित सामायिक की आराधना करती हैं व प्रतिक्रमण, पुच्छिसुणं आदि कंठस्थ कर लिये हैं। आपका परिवार दिल्ली में पधारे हुए संत-सतियां जी म.सा. आदि की सेवा से बराबर लाभान्वित होता है और धर्म-लाभ से वंचित नहीं रहता। स्वाध्याय के प्रति विशेष रुचि व साधु-संतों, महासतियांजी म.सा. के स्वास्थ्य संबंधी कार्य में छल्लाणी परिवार का सदैव योगदान रहता है, जो श्लाघनीय है। विश्वास है सद्-साहित्य के प्रकाशन हेतु आपका सहयोग भविष्य में भी मिलता रहेगा। उदय नागोरी सदस्य साहित्य प्रकाशन समिति {8} कोटा शहर के रामपुरा बाजार में "स्टेट बैंक आफ इंडिया' (State Bank of India) की सुप्रसिद्ध बैंक ब्रांच है, जिसमें अनेकों कर्मचारी अपनी अपनी योग्यतानुसार विविध कार्य करके वेतन पाते हैं। कनकसिंह नामक एक अत्यन्त सामान्य स्थिति वाला कर्मचारी भी उसी बैंक में कार्यरत था, जो कि एक साधारण चपरासी की नौकरी करके 1500 रुपया प्रतिमाह वेतन पाता था। कनकसिंह (Nature) प्रकृति से अत्यन्त सीधा, सरल व नैतिकता से परिपूर्ण था। अत्यन्त गरीबी के क्षणों में भी उसने अपने आपको बेहद तकलीफों से गुजारना मंजूर किया पर कभी भी अनैतिक हथकण्डों का सहारा नहीं लिया। भीषण मंहगाई की इस ज्वाला में जब कि दैनिक अनिवार्य आवश्यकता की वस्तुएं दाल, चीनी, गेहूं, सब्जी आदि के भाव आसमान छू रहे हैं, मात्र 1500 रुपयों से अपना, अपनी अर्धागिनी, एक पुत्र व एक पुत्री का उदर पोषण कर पाना बड़ा मुश्किल था। कनकसिंह दिन रात चिंताग्रस्त रहता था कि कैसे हो परिवार में सुख समृद्धि । आवश्यक वस्तुओं को जुटा पाना ही जब कठिन हो रहा है, तब मैं अपने बच्चों का श्रेष्ठतम विकास कैसे कर पाऊंगा? कनकसिंह बचपन से ही बड़ी विपत्तियों से गुजरा था। उसके माता-पिता का वह इकलौता पुत्र था। उसके जन्म के समय घर धन-धान्य से परिपूर्ण था। पर व्यक्ति के सभी दिन समान नहीं होते। कभी उत्कर्ष तो कभी अपकर्ष। चक डोलर के झूले में जैसे पालखियां कभी ऊपर तो कभी नीचे होती है वैसे ही व्यक्ति का भाग्य भी उसे उन्नति के शिखर पर खड़ा कर देता है तो कभी अवनति के गर्त में ढकेल देता है। कनकसिंह के माता-पिता के पास अपार दौलत थी, जिसकी छाया में कनकसिंह का शैशव बड़े आराम से बीता। पर एक दिन अचानक ही भयंकर घटना घट गई। हुआ यह था कि वर्षा ऋतु का समय था। सावन की रिमझिम फुहारें कभी तेजी से बरसती, कभी धीमी तो कभी एकदम रुक जाती। चारों ओर सुहावनी घटाएं घिरी थी। बाग-बगीचे हरियाली से परिपूर्णता को प्राप्त कर अपनी सौन्दर्य श्री से सभी को आकर्षित कर रहे थे। नदी, नाले, कूप सभी लबालब भर चुके थे। ऐसे मन भावन मौसम को देखकर कनकसिंह के पिता शंकर प्रसाद जी ने अपनी पत्नी सत्यवती को कहा-अरी ! सुनोरी ! आज {9} मौसम बड़ा सुहाना है, अतः घर में मन नहीं लग रहा। आज तो इच्छा हो रही है, चम्बल गार्डन (Garden) में धूम आएं। कुछ खाने पीने का सामान भी साथ ले लो व जल्दी से कनक को भी तैयार करके ले चलो, आज सैर सपाटे की मौज लूटें। सेठ शंकर प्रसाद की बात सत्यवती को भी बड़ी मन भाई। उसने कहा- हां-हां जरूर चलिये। ऐसे मन भावन अवसर तो बहुत कम आया करते हैं। पर साथ में लेने के लिए सामान्य मिठाई- नमकीन तो अच्छी नहीं लगेगी। आप कहो तो गरमा-गरम पकौड़े व सूजी का बढ़िया हलवा भी बनालूं। हॉट (Hot) बैग में ले जाएंगे तो ठंडा भी नहीं होगा। बगीचे के अन्दर जो बढ़िया झूले लगेंगे, वहीं झूलते हुए खाएंगे। हां ! यह तो बहुत अच्छी योजना है, बड़ा मजा आएगा सेठ सा. ने कहा। पतिदेव का समर्थन पाकर सत्यवती तुरन्त रसोई घर की ओर बढ़ी। सोचा कि कनक तो अभी नींद ले रहा है, तब तक मैं रसोई घर में काम कर लूं, वह जग जाएगा तो बहुत दिक्कत हो जाएगी। रसोई घर में जाकर जल्दी-जल्दी उसने नमक, मसाले, बेसन, सूजी घी, शक्कर आदि सामान पास में इकट्ठे किये व गैस जलाने के लिए लाइटर, (Lighter) भी ले आई। शंकर प्रसाद जी भी उसे कार्य में कुछ सहयोग करने के लिए उसके पीछे-पीछे ही आ गये थे। सत्यवती ने गैस का बटन खोलकर ज्योंही लाईटर (Lighter) चालू किया, अचानक भयंकर धमाका हुआ। गैस टंकी से गैस पहले ही लीक हो रही थी, लाइटर लगाते ही गैस ने आग पकड़ ली, टंकी फूट गई, सारा कमरा धधक उठा। ऊपर की छत भी उस भयंकर विस्फोट से धड़ाधड़ गिर पड़ी। देखते ही देखते मकान से ज्वाला उठ गई, सेठ शंकर प्रसाद व सत्यवती दोनों ही आग से बुरी तरह झुलस गए, फिर ऊपर से छत और आ पड़ी दोनों दब गये। मन के अरमान मन में ही रह गये। कहां पिकनिक (Picnic) मनाने का प्रोग्राम (Programme) था, कहां यह अग्नि की लपटें। क्या सोचा क्या हुआ ? दुनिया में हजारों व्यक्ति प्रतिदिन कितनी ही कल्पनाएं संजोते हैं, कितने ही श्रावण के झूले झूलते हैं, और कितने ही मौत का झूला झूल जाते हैं ? व्यक्ति सोचता क्या है, और होता क्या है। होता वही है जो उसके कर्मों में लिखा होता है। कभी-कमी कर्मों के आगे पुरुषार्थ भी बौना प्रतीत होने लगता है। आसपास के पड़ोसियों ने शंकर प्रसाद की हवेली से जब ज्वालाएं उठती देखी तो सभी दौड़े बुझाने के लिए। किसी ने अग्नि शमन केन्द्र पर {10} फायर बिग्रेड (Fire Brigade) बुलाने फोन किया। वहां किसी को जल्दी से विश्वास ही नहीं हो रहा था- श्रावण का मास, रिमझिम बरसात और आग। गर्मी के मौसम में तो फिर भी यदाकदा आग लग जाया करती है। पर वर्षा काल में....... । फिर भी जल्दी ही फायर ब्रिगेड (Fire Brigade) गाड़ी आई आग बुझाई गई। इधर रिमझिम वर्षा जो इतनी देरी से थमी हुई थी वह भी प्रारंभ हो गई, जिससे आग पर कंट्रोल (Control) शीघ्र ही हो गया। पुलिस ने अन्दर जाकर देखा-रसोई घर के हालात को देखकर सारी स्थिति समझ ली गई कि गैस टंकी का विस्फोट होने से यह दुर्घटना हुई है। सेठ सेठानी को मलवे में से किसी तरह बाहर निकाला, वे बेहोश थे, धीमी-धीमी श्वांस चल रही थी। हास्पिटल ले जाया गया, डाक्टर्स पहुंचे तब तक तो उनके प्राण पखेरु उड़ चले किसी अन्य स्थल की ओर......... । पास पड़ोसियों में से किसी को ध्यान आया अरे ये दोनों तो चले गए पर इनके बेटे कनकसिंह का क्या हाल है उसे तो किसी ने देखा ही नहीं ? सभी तुरन्त घर की ओर भागे, बहुत बड़ी हवेली थी, रसोई घर व उसके आसपास के कमरों में आग लगी थी पर सेठ जी का बेडरूम इन सब से अलग था, वहां तक आग नहीं पहुंची थी। बेडरूम में जाकर देखा तो बालक कनकसिंह मात्र 2 वर्ष का ही था, पालने में आराम की नींद सोया था। उस नन्हें को क्या मालूम कि कौनसे दुःख के काले बादल उसकी जिंदगी पर छा गये हैं। अब उस नन्हें लाल का लालन पालन कौन करे ? निकटतम रिश्तेदार तो कोई थे नहीं, दूर-दूर के रिश्तेदारों तक तो खबर ही नहीं पहुंची, किसी के पास पहुंची तो भी स्वार्थमय इस संसार में परमार्थ का कार्य कौन करे ? विरले ही व्यक्ति होते हैं, जो परमार्थ में जिया करते हैं। सेठ के मुनीम व खास पड़ौसियों ने मिलकर दोनों पति-पत्नी का दाह संस्कार कर दिया। मुनीमों ने रीति रस्म पूरे किये, थोड़े दिन गम दिखाया गया, पर आखिर कब तक ? जिस दीपक में तेल समाप्त हो गया वह कब तक जलेगा? मुनीमों ने ऊपर से दिखावा किया व अन्दर ही अन्दर सेठ की संपत्ति पार करने लगे। सारा मूल धन, हीरे, जवाहरात, सोना-चांदी पर कब्जा करने की होड़ लगी। देखते ही देखते हवेली व दुकान सब खाली हो गये। थोड़ा बहुत धन चोर लुटेरे लूट ले गए। बालक कनकसिंह सुख-वैभव के झूले में झूल रहा था, वह दुख व तिरोभाव की चटाई पर आ गिरा। कोई उसे सहारा देने वाला, सही राय देने वाला नहीं मिला। संसार में सन्तान के {11} । . माता-पिता ही प्रमुख आधार होते हैं। जब आधार ही नहीं रहे तो आधेय टिकेगा कैसे। अगर टिके तो वह आश्चर्य ही समझना चाहिए। कनकसिंह की उम्र अभी लम्बी थी, माता-पिता का साया उठ जाने पर भी उसकी जीवन गाड़ी किसी तरह चलने लगी। पड़ोस में एक बुढ़िया मांजी रहती थी, जो अकेली थी, उसे उस बच्चे पर दया आई। देखा कि इस तरह तो यह कनक भी संसार से चल पड़ेगा। मुझको इसकी परवरिश किसी तरह करना चाहिए। वह स्वयं मजदूरी करके अपना जीवन चलाती थी, उसी पैसे से वह कनकसिंह का पेट भी भरती थी। कभी कोई उसके लिए दूध आदि की व्यवस्था भी कर देता था। समय बीतता गया। कनकसिंह मांजी की छाया में बड़ा होने लगा। धीरे-धीरे वह 5 वर्ष को हो गया। मांजी ने कुछ सेठ लोगों को कह कर उसके पढ़ाई की व्यवस्था करने की ठानी। पर कौन सुने। दनियां में दुःखी की पीर सुनने वाले विरल ही मिलेंगे। सभी अपने सुख के लिए हजारों रुपये खर्च कर सकते हैं पर पराये के लिए 50 पैसे भी नहीं। बालक कनकसिंह की पढ़ाई की कोई व्यवस्था नहीं हो पा रही थी, फिर भी मांजी ने प्रयास नहीं छोड़ा। उसने एक सेठ को हाथ जोड़े, उसकी प्रार्थना से दयार्द्र हो सेठ ने जो हवेली खण्डर का रूप बन चुकी थी, वह बेची। कुछ रुपया अपने पास रख लिये व दस हजार रुपया से कनकसिंह की पढ़ाई के लिए व्यवस्था की। कनकसिंह स्कूल जाने लगा, पढ़ाई करने लगा, प्रतिवर्ष वह पास होता गया व धीरे-धीरे आठवीं कक्षा में प्रविष्ट हुआ। अब तक वह 13 वर्ष का हो चुका था। वृद्धा मां जिसने कनकसिंह को जीवनदान दिया था, एक दिन उसे ज्वर ने आ घेरा। कनकसिंह अधिक तो समझता था नहीं, पर फिर भी अपनी अक्ल के अनुसार पास ही रहने वाले डॉक्टर को बुला लाया। डॉक्टर ने वृद्धा की हालत देखी, बुखार के कारण शरीर तवे जैसा तप रहा था, थर्मामीटर (Thermometer) लगाया तो पारा 106 डिग्री पर था, डॉक्टर ने तुरन्त उसे अस्पताल ले जाने को कहा। कनकसिंह दौड़ा और ऑटोरिक्शा (Autorikshaw) लाया उसमें अपनी पालित मां जिसे वह अम्मा कहता था, को बिठाकर हास्पिटल ले गया। डॉक्टर ने इलाज प्रारम्भ किया, विविध इन्जेक्शन, दवाईयां दी गई, जिसमें कनकसिंह के पास जो लगभग 1000 रुपये की पूंजी थी, उसमें से 800 रुपये खर्च हो गए। रुपया खर्च भी हुआ पर बुखार ठीक नहीं हुआ। लगभग 3 दिन हो गए, अब तो थर्मामीटर {12} । (Thermometer) में पारा और अधिक बढ़ गया। कनकसिंह की अम्मा तड़फने लगी, उसे लगा अब ये प्राण जाने वाले हैं। कनकसिंह को समीप बुलाया, उसके सर पर हाथ रखते हुए बोली- बेटा ! अब मैं जा रही हूं मेरे से हो सकी इतनी सेवा मैंने की, अब तुम स्वयं स्वावलम्बी बनना। दुनियां बड़ी विचित्र है, सुख के साथी सब है, दुःख के कोई नहीं। मेरे प्यारे बेटे ! खुश रहना हरदम............ | मां की आंख बेटे के चेहरे को निहार रही थी। किशोर बालक कनकसिंह की आंखों से आसूओं का सैलाब बह चला, वह चिल्लाया. ..मां......मां मुझे यूं मझधार में छोड़ जा रही हो, मां मैं तेरे बिना जी नहीं सकता। मां ऽ ऽऽऽ........ | गला रूंध गया। शरीर कांप उठा। और उधर वह परोपकारी मां किसी अनजान देश की यात्रा की ओर चल पड़ी। देह निढाल पड़ी रही, देह का सरताज कहीं चला गया। कनकसिंह 13 वर्षीय बच्चा ही था, पर जन्म-मृत्यु के बारे में कुछ-कुछ समझने लगा था। अम्मा की निष्प्राण देह देखते ही वह घबरा उठा, आसपास पड़ौस के 2-3 आदमी वहां आ गये थे, उन्होंने उसे कुछ समझाया। बुढ़िया मांजी का दाह संस्कार किया। कनकसिंह अकेला ही रह गया। एक मात्र जो सहारा था वह भी उठ गया। जमा पूंजी समाप्त हो जाने से पेट भरने की समस्या खड़ी हो गई। इतने दिन तो उसकी अम्मा मजदूरी करके गुजारा करती थी। आखिर कनकसिंह ने सोचा अब मुझे कुछ कमाना होगा। आसपास नौकरी की खोज करने लगा। एक चाय की होटल पर उसे कप प्लेट धोने के लिए रख लिया गया। वह सुबह से लेकर रात तक वहीं कार्य करता। एक माह के 400 रुपये वेतन मिलता, इसी से किसी तरह अपना पेट भरता। पढ़ाई छूट चुकी थी। समय बीतने लगा। एक दो तीन करते करते 5 वर्ष बीत गए। वह 18 वर्ष का हो गया। चाय की होटल की नौकरी छोड़कर उसने अखबार लाकर बांटने की सर्विस (Service) करली। और दिन में जो भी समय मिलता उसमें चाय, शक्कर, साबुन आदि वस्तुएं दुकान मालिक से खरीदकर घरों में बेचने का कार्य किया करता, जिससे उसकी आमदानी कुछ बढ़ी। और पास में कुछ बचत भी होने लगी। वह बड़ी इमानदारी से कार्य करता, जिससे आसपास के पड़ौसी व बाजार में दुकानदारों को उस पर विश्वास जम चुका था। उसकी इस नैतिकता से प्रभावित हो एक विधवा महिला ने जो कि अत्यन्त निर्धन थी, उसने अपनी बेटी कुसुमवती का विवाह उसके साथ कर दिया। कुसुमवती हालांकि गरीबी में पली थी पर थी बड़ी {13} समझदार, लज्जाशील व मधुर व्यवहारी। उसे पाकर कनकसिंह का जीवन कुछ आराम से बीतने लगा। फिर भी पैसों की समस्या तो ज्यों की त्यों ही थी ही। उसने एक बैंक में नौकरी के लिए आवेदन किया। भाग्य अच्छा था, 15 दिन बाद ही उसे चपरासी की नौकरी मिल गई। लेकिन वेतन बहुत कम था, मात्र 1500 रुपये मासिक, जिससे पति-पत्नी दोनों का जीवन बसर करना बहुत मुश्किल था। फिर भी सोचा कि कोई बात नहीं, सरकारी बैंक में नौकरी तो मिल गई धीरे-धीरे तनख्वाह बढ़ जाएगी। बैंक की सर्विस (Service) के अलावा समय में कुछ दूसरा काम धंधा करेंगे ताकि आर्थिक तंगी न रहे। {14} -2- 30 अप्रेल की सुबह 7 बजे थे। इमेन्युअल (Imumanual) स्कूल की प्राथमिक माध्यमिक विद्यालय की परीक्षाओं का रिजल्ट (Result) घोषित होने लगा था। इस विद्यालय में पढ़ने वाले पहली से आठवीं तक के सभी विद्यार्थियों के मन में आज बड़ी उत्सुकता थी। अपने वर्ष भर की मेहनत का प्रतिफल आज मिलने वाला था। सभी विद्यार्थी सुबह जल्दी उठे व तैयार होकर अपने विद्यालय के आंगन में पहुंच गये। हेड मास्टर साहब व सभी अन्य मास्टर जी भी वहां जल्दी ही पहुंच गये थे। एक के बाद एक परीक्षा परिणाम (Result) घोषित होने लगा। पहली दूसरी, तीसरी, चौथी का रिजल्ट सुना दिया गया। सभी क्लासों में प्रथम स्थान पाने वाले विद्यार्थी बालकों का हेडमास्टर सा. विशेष स्नेह से स्वागत कर रहे थे। उन्हें अपने हाथों से प्रशस्ति पत्र दे रहे थे। पांचवी क्लास का परीक्षा परिणाम सूची लेकर मास्टर सा. खड़े हुए। और बोले पांचवी कक्षा में प्रथम स्थान प्राप्त किया है अनुराग शुक्ला सुपुत्र कनकसिंह शुक्ला। सुनते ही सारी सभा में एक आश्चर्य सा फैल गया। अरे अनुराग ने प्रथम स्थान प्राप्त किया है........ | एक साधारण नौकरी पेशा आदमी कनकसिंह का पुत्र है यह अनुराग। जो कितना गरीब है, जिसके पास खाने-पीने की सामग्री व पढ़ने की पुस्तकें भी बराबर नहीं, यह फर्स्ट क्लास फट (First Class First)। अहो गजब हुआ है। सभा में कुछ हलचल भी होने लगी तब अध्यापक श्री मित्तल सा. ने आगे बोलते हुए कहा- अनुराग वस्तुतः बड़ा होनहार लड़का है। इसकी प्रतिमा कितनी उच्च है, साधारण सुविधा में जीने वाले इस बालक ने असाधारण सफलता हासिल की है। कुल 500 अंकों में से इसने 480 अंक प्राप्त किये हैं। याने 480 अंक पाने वाला यही एक मात्र विद्यार्थी है। जिसमें गणित व अंग्रेजी में 100 में से 90 अंक इसने हासिल किए हैं। वाह........ | धन्यवाद । आओ अनुराग। पास में आओ, लो ये तुम्हारा परीक्षा फल व प्रशंसा पत्र । अनुराग आगे बढ़ा......हैडमास्टर सा. ने उसे स्नेह से चूमते हुए प्रशंसा पत्र प्रदान किया। इसके बाद छठी, सातवी, आठवीं कक्षा के लिए विद्यार्थियों के परीक्षा फल घोषित हुए। उनमें प्रथम स्थान वाले-नरेश, राजीव, पारस का भी {15} स्वागत किया गया। सभी विद्यार्थी अपने अपने घरों की ओर लौटने लगे। अनुराग शुक्ला जो कि पांचवी क्लास में प्रथम आया था उसे उसके दोस्तों ने घेर लिया। बोले अनुराग ! बधाई है, आज तो मिठाई खिलानी ही पड़ेगी। तभी किसी ने कहा- अरे मिठाई तो रहने दे, आज तो हमें केवल केडबरीज (Cadburys) ही खिलादें, कोई बात नहीं। हां-हां, केडबरीज जरूर खिलाऊंगा लो ये ! जब में हाथ डालकर 20 रुपये का नोट निकालकर देते हुए अनुराग ने कहा। सामने खड़े अभिनव ने वे रुपये लिये व तुरन्त केडबरीज चाकलेट (Cadburys Chocklate) खरीद लाया। सभी ने बड़े प्रेम से एक दूसरे को खिलाई और हर्ष के साथ बातें करते हुए सारे दोस्त अपने-अपने घर की ओर बढ़ चले। अनुराग भी अपना परीक्षा परिणाम लेकर अपने छोटे से घर में पहुंचा। माता-पिता उसका इन्तजार कर ही रहे थे। बेटे के घर में आते ही उसके हाथ का परीक्षा फल कनकसिंह अपने हाथ में लेकर देखने लगे। मां कुसुमवती ने पूछा-लाल ! तूं पास हो गया। अरी पास होने का क्या पूछती है। देख अपना बेटा तो पूरी क्लास में फर्स्ट (First) आया है। ओ हो 96% अंक प्राप्त किये हैं। शाबास !........ .हर्ष विभोर होते हुए कनकसिंह ने कहा- ये सब आपके ही आशीर्वाद का प्रतिफल है। आपने मेरी पढ़ाई के लिए कितनी तकलीफें झेली हैं...। दिन रात परिश्रम करके आप दोनों ने मेरी पढ़ाई का खर्च उठाया है। अनुराग पिता जी के चरणों में झुकता हुआ बोला। हां बेटा। बात तो तेरी सही है। अगर तेरे पापा जीवन विकास के लिए साइड-बिजनेस (Side Business) छोटे-मोटे मेहनत मजदूरी के कार्य नहीं करते तो आज तुझे यह सफलता मिल पाना असंभव था। कुसुमवती ने कहा। कनकसिंह बोले- इसमें क्या ? ये तो मेरा कर्त्तव्य ही था कि मेरी संतान का पूर्ण विकास करने में सहभागी बनूं। जो माता-पिता अपनी सन्तान के प्रति अपने दायित्व का निर्वहन नहीं करते, उन्हें योग्य शिक्षण प्रदान नहीं करते, वे सच्चे माता-पिता न होकर बालकों के लिए दुश्मन है। मैंने तेरे जन्म के साथ ही यह दृढ़ संकल्प कर लिया था कि चाहे जो हो, मुझे जितना भी अतिरिक्ति परिश्रम करना पड़ेगा, मैं करूंगा, भूखे रहना पड़ेगा, तो भूखा रहूंगा, अभावों में जीना पड़ेगा तो जीऊंगा, लेकिन अपने पुत्र को बढ़िया से बढ़िया पढाई करवाऊंगा। ताकि मेरे बेटे को वो दिन नहीं देखना पड़े जो मैंने .... {16 बचपन से आज तक देखे हैं। मैं तो परिस्थितियों का मारा आठवीं तक ही पढ़कर रह गया पर मेरी यह कंगाली मेरे पुत्र-परिवार के लिए अभिशाप न बने । मैं दुःखों में जीऊंगा, पर अपने बेटे को सुख के पालने में झूलते देखूगा, तो मेरी सारी मेहनत सफल हो जाएगी तभी कुसुमवती ने कहा- आपके इन उन्नत विचारों ने ही अपने बेटे अनुराग व पुत्री विमा को कान्वेन्ट स्कूल (Convent School) में इंगलिश मीडियम (English Medium) की पढ़ाई कर पाने में सफलता प्रदान की है। अन्यथा हमारे पास है ही क्या ? मात्र बैंक की आपकी नौकरी 1500 रुपये से क्या होने वाला। उससे तो हम चार प्राणियों का पेट भर पाना भी मुश्किल है, आपने कितने कष्ट सहे हैं-सुबह उठते ही घर-घर में अखबार बांटना, फिर बैंक में सर्विस पर जाना, वहां से आते ही 2 घंटे सेठ धनराज की फैक्ट्री (Factory) पर दवाईयों की पैकिंग (Packing) करना, लेबिल (Label) चिपकाना आदि कार्य करना। फिर शाम को कमी दूध बेचना, कभी चने, सिंगदाने आदि का ठेला चलाना, दिन रात आपने न अपने खाने-पीने की परवाह की न सोने व आराम करने की। और कुसुमवती तूने भी कुछ कम नहीं किया। प्रतिदिन घर का सारा कार्य संभालते हुए, हमेशा 5, 6 घरों में बर्तन मांजने, कपड़े धोने, रसोई बनाने जाना। दोनों बच्चों का ध्यान रखना उन्हें पढ़ाना। दिन भर तूं भी कब आराम करती है, तूने मेरी इच्छा की पूर्ति के लिए कितना सहयोग किया है ? कनकसिंह बोले। और हां हम तो अपनी ही रामायण गाने बैठ गए, बेटा! इतने अच्छे नम्बर लाया है, इसका मुंह तो मीठा करें। और हां आज बढ़िया गरमा-गरम हलवा बना, हम सब भी खायेंगे और अपने बेटे को भी खिलाएंगे। और विमा कहां गई ? वह अभी तक आई ही नहीं ? कनकसिंह ने पूछा। कुसुमवती- हां ! पड़ौसी वाली आंटी की लड़की पूजा के साथ गार्डन (Garden) में खेलने गई है। अभी तक आई नहीं, उसे भी जरा आवाज लगा दो। मैं रसोई घर में जाती हूं। कनकसिंह घर के बाहर निकल गये, गार्डन की ओर जाकर विमा को बुलाने लगे। उधर कुसुमवती बड़ी तेजी से रसोईघर में जाकर हलवा बनाने लगी। अनुराग अब तक माता-पिता की बातें सुनने में तल्लीन बना था, अब जब बातों का सिलसिला पूरा हुआ तो पास पड़ी राजस्थान पत्रिका उठाकर पढ़ने लगा। । {17} पापा की आवाज सुनकर विमा तुरन्त दौड़ आई। उसके आते ही कनकसिंह ने कहा-देख विभा तेरा भैया फस्ट डिवीजन (First Divison) पास हुआ है, यही नहीं सभी विद्यार्थियों में फस्ट भी आया है। तू तो खेल रही है, देख तो सही, भैय्या के अंक कितने बढ़िया आये हैं। तू भी अच्छे नम्बर लाएगी ना, मेरी बिटिया। विमा जो अभी तीसरी क्लास में ही पढ़ रही थी, तुतलाते हुए बोली- हां पापा ! मैं भी अच्छे नम्बर लाऊंगी फिर आप मेरे लिए एक नई साइकिल लाएंगे ना। हां जरूर जरूर तू फस्ट आएगी तो मैं तेरे लिए नई साइकिल और खिलौने भी लाऊंगा। पिता पुत्री के बीच ऐसी बातें चल रही थी कि तभी रसोई घर से कुसुमवती ने आवाज दी-अजी ! हलवा बन गया है, जल्दी आइये ! मैंने प्लेटे तैयार कर दी है। पिता, पुत्र मां व बेटी चारों ही बड़े प्रेम से स्वादिष्ट हलवा खा रहे थे और अपनी प्रसन्नता बढ़ा रहे थे। अनुराग व विमा बड़े खुश थे तो उससे भी अधिक खुशी कुसुमवती और कनकसिंह को थी, क्योंकि इस प्रसंग से उन्हें अपने भावी के लिए संजोये सपने साकार होते नजर आ रहे थे। {18} -3- इमेन्युअल स्कूल की छट्टी कक्षा का छात्र अनुराग अपने हम उम्र के अन्य सभी छात्रों से अधिक प्रतिभा संपन्न छात्र था, वह अपने दोस्तों के साथ हर प्रकार की प्रतिस्पर्धा चाहे वह खेल कूद हो, भाषण हो, गायन हो, नेतृत्व कला हो, आगे रहता था। हर प्रतिस्पर्धा में इनाम जीतने वाला यह बालक एक प्रतिस्पर्धा में सदैव पिछड़ जाया करता था। वह क्या ? वह प्रतिस्पर्धा थी वैभव प्रदर्शन की। कान्वेट (Convent) स्कूल में चूंकि अधिकांश छात्र बड़े-बड़े धनाढ्य सेठों, डॉक्टरों, वकीलों के पुत्र थे, जिनके पास धन संपदा की कोई कमी नहीं थी। प्रतिदिन ही उन्हें जेब खर्च के लिए 10-15 रुपये अपने मम्मी डैडी से मिला करते थे। जिनसे वे प्रतिदिन स्कूल में मौज मस्ती किया करते। अनुराग के दोस्त भी कुछ इसी तरह के थे। किसी के पिता मिल-मालिक थे तो किसी के हीरा व्यवसायी। कोई कार एजेन्सी (CarAgency) के मालिक का सुपुत्र था, तो कोई प्लास्टिक फैक्ट्री (Plastic Factory) के स्वामी का इकलौता लाल। जो कि जब-जब नये वस्त्र पहनकर आते व अपना बड़प्पन जताते थे। ये रईसजादे पैसे की दौड़ में अनुराग से बहुत आगे थे, और सदा ही अनुराग को चिढ़ाया करते थे। एक दिन इन्टरवेल का समय चल रहा था। सभी छात्र अपने-अपने टिफिन लेकर स्कूल गार्डन में नाश्ता करने जाने लगे। अनुराग के दोस्तों ने देखा अनुराग अभी तक चुपचाप बैठा है, नाश्ता करने नहीं चल रहा है तो उन्होंने उससे कहा-चलो अनुराग ! ऐसे चुपचाप क्यों बैठा है ? अनुराग- नहीं ! तुम जाओं ! मैं थोड़ी देर बाद खाऊंगा। दोस्त पंकज- क्यों ? बाद में क्या है ? चलो-चलो हमारे साथ ही तुम्हें भी खाना पड़ेगा। अनुराग- अच्छा ! तुम कहते हो तो चले चलता हूं। और उसने अपना टिफिन उठाया व उनके साथ-साथ गार्डन में पहुंच गया। आम के वृक्ष की शीतल छाया में बैठ कर सबने अपने लंच बाक्स खोले। लंच बाक्स खोलते ही पारस बोला आज तो मेरी मम्मी ने नाश्ते में इडली सांभर भेजा है। देखो ना कितना स्वादिष्ट है ? अरे ! मेरे टिफिन में तो आज रसगुल्ले व कचौरी है। तेरी इडली तो मुझे नहीं भाती, रसगुल्ले {19} खाओगे तो खाते ही रह जाओगे। कमल ने कहा- ये इडली और रसगुल्ले-कचौरी तो रोज दिन ही खाते रहते हैं, मेरे बाक्स में तो आज काजू की कतली और मेवे का मिक्चर आया है जयेश ने बीच में ही अपना बड़प्पन जताया। और मेरे टिफिन में तो देखो ना मेरी बहिन ने एक नई वैरायटी (Variety) भेजी है, जो तुम लोगों ने कभी नहीं खाई होगी, ये देखो....... । राजीव ने कहा और साथ में सेब केले, अंगूल आदि का फूट सलाद (Fruit Salad) और अनुराग तुम्हारे बाक्स में क्या है ? जरा दिखाओ तो सही। कमल ने उसका टिफिन छीनकर खोलते हुए कहा- वाह-वाह क्या सुन्दर चीजें भरी है इसकी मम्मी ने। पराठे भी नहीं, कल की बासी रोटी भरकर भेजी है, और इस सुखी रोटी को खाएगा भी किससे? सब्जी तो दूर रही, अचार का भी पता नहीं। पंकज उचकते हुए बोले ! अरे ये कोने में नमक मिर्च पड़ा है इसी से खा लेगा ये ठंडे टुकड़े और तो क्या खाएगा ये बेचारा ? इसके किस्मत में ये ही लिखे हैं। जयेश ने कहा। अनुराग चुपचाप बैठा सबकी बातें सुन रहा था। धनिक मित्रों के व्यंग भी सह रहा था। अरे ! तुम सब इस बिचारे के पीछे ही क्यों पड़े हो? ये एक ही तो गरीब बाप का बेटा है, क्या हो गया यदि तुम अपने टिफिन में से थोड़ा-थोड़ा इसे भी दे दो तो ! राजीव ने झूठी शेखी बधारते हुए कहा। नहीं ! मुझे कुछ नहीं चाहिए। मैं मेरे टिफिन में जो कुछ है वही खा लूंगा। मेरी मां ने मेरे लिए जो कुछ भेजा है वह तुम्हारी मिठाइयों से भी बढ़कर हैं" अनुराग ने स्पष्ट कह डाला। लो ! ये तो नाराज हो गया ! नहीं नहीं अनुराग ! हम सब दोस्त हैं, दोस्त की इन मजाकिया बातों में नाराज नहीं होना चाहिए। लो, आओ हम सब एक साथ मिल बांट कर खाएंगे।" कमल ने अनुराग को मनाते हुए कहा। अनुराग- मैं कोई नाराज थोड़े ही हुआ हूं। मैंने तो अपने मन के विचार तुम्हें कह दिये। जो कुछ भी हो अनुराग- तुम्हें हमारे साथ मिलकर खाना ही होगा। । लो जरा मुंह खोलो, ये मीठा रसगुल्ला ऽ ऽ ! जरा मजे से खाओ तो सही! कहते हुए कमल ने एक रसगुल्ला जर्बदस्ती अनुराग के मुंह में ढूंस दिया। अनुराग ने रसगुल्ला खाया। सभी दोस्तों ने अपनी-अपनी वस्तुएं मिल बांटकर खाई। ! {20} इधर इन्टरवेल (Interval) का समय पूरा होते ही घंटी बज उठी सभी छात्र अपना कार्य जल्दी-जल्दी पूरा करके कक्षा में पहुंच गये। अनुराग भी अपनी पढ़ाई में लगा। पढ़ाई वह मनोयोग पूर्वक किया करता था। जो भी टीचर्स (Teachers) होमवर्क (Homework) देते वह शीघ्र ही पूरा करने के बाद ही सोता था। जब कि उसके वे धनाढ्य दोस्त जब तब मटरगस्ती में ही लगे रहते थे। उनका होमवर्क (Homework) कभी भी पूरा नहीं होता था। स्कूल के खाली पीरियड (Period) में भी वे लोग कोई न कोई शरारत किया करते थे। स्कूल आने के बाद भी उनका लक्ष्य पढ़ाई नहीं, मौज मस्ती ज्यादा रहता था। व्यवस्थित अध्ययन न होने से वे जब तब अध्यापकों की डांट फटकार व दण्ड के पात्र बनते थे। यही कारण था कि ये सब, क्लास में सदैव पिछड़े रहते थे। और अनुराग सबसे आगे। वह जानता था कि मेरे मम्मी-पापा किस तरह तकलीफें झेलकर मुझे इस स्कूल में भेज रहे हैं। वे स्वयं भूखे रह जाते हैं, पर मुझे व मेरी बहिन विभा को उन्होंने कभी भूखे नहीं सुलाया। वे खुद फटे पुराने कपड़े पहनकर ही अपना तन ढक लेते हैं वे हमारे लिए अच्छी से अच्छी ड्रेस (Dress) लाने की कोशिश में रहते हैं। अनुराग की उम्र अभी अधिक नहीं मात्र 14 वर्ष की थी। लेकिन अपने घर की स्थिति व माता-पिता के कष्ट को बखूबी समझने लगा था। वह चाहता था कि मैं अपने मम्मी-पापा के अरमानों को पूरा करूं व इसके लिए परिपूर्ण अध्ययन होना आवश्यक है, अपने इन अमीर दोस्तों के साथ अगर मैं भी मस्तियां मारने लगा तो फिर...... | यही कारण था कि इस प्रकार के रईसी सर्किल (Circle) में रहकर भी वह अपने आप में सादगी पूर्ण ढंग से जीता था। और वे उनके दोस्त ऐसे थे कि अनुराग के गरीब होने पर भी उससे वे हर संभव तरीके से मित्रता कायम रखते थे, क्योंकि अनुराग पढ़ाई आदि हर कार्य में आगे था और उसी के सहारे से वे भी कुछ-कुछ अध्ययन करके परीक्षा में पासिंग मार्क (Passing Mark) पा लेते थे। अनुराग से सहयोग पाते हुए भी वे जब कभी मौका मिलता तो उसे चिढ़ाने में उसकी गरीबी हालत पर व्यंग कस कर उसका अपमान करने में नहीं चूकते थे। फिर भी अनुराग सदैव उनसे मिलकर रहता व उनका भला ही किया करता था। पढ़ाई चल रही थी, और मित्रता भी आगे बढ़ती जा रही थी। एक के बाद एक क्लास में सफलता हासिल करते हुए ये सभी साथी 12वीं क्लास में पहुंच गए। {21} -4- ! कमल- क्यों रे अनुराग ! आज इतनी लेट क्यों आया है ? आज तो पिकनिक (Picnic) का प्रोग्राम रखा गया है। हम सब तो सुबह 7 बजे से यहां आ गये हैं और तू है कि 9 बजे तक भी उपस्थित नहीं है। अनुराग- क्या करूं यार ! आज आना तो जल्दी ही था। लेकिन अपनी ड्रेस (Dress) तैयार करने में लेट हो गया। ड्रेस (Dress) गंदी पड़ी थी, गंदी ड्रेस (Dress) पहनकर कैसे आता ? और आज नल भी 1 घंटा देरी से आया। पानी के अभाव में मेरे शर्ट, पेन्ट कैसे धोये जा सकते थे। नल आने पर मेरी मां ने जल्दी से मेरे कपड़े धोये, सुखाये वह मैं पहनकर सीधे आ ही रहा हूं। कमल- ओ हो अनुराग। तो क्या तुम्हारे पास स्कूल यूनिफार्म (Uniform) के अलावा और अन्य ड्रेसे नहीं है। अहा ! आज ही मालूम पड़ा। इसीलिए तुम विदाउट (Without) यूनिफार्म के दिन हमेशा यही वाला शर्ट पैंट पहनकर आते हो। पारस- और देखना। कमल ! ये नीला शर्ट-पैंट भी कितना पुराना हो गया है। फटने भी लगा है। वाह रे ! वाह रे भीख मंगे तू ऐसे कपड़े पहनता है। राजेश- डीयर (Dear) पारस ! तुम इस प्रकार अपने दोस्त अनुराग को अपशब्द क्यों बोलते हो? इसका बाप बेचारा गरीब है, बैंक में सामान्य पोस्ट (Post) पर कार्यरत है। वह कहां से नई-नई ड्रैसें लाएगा ? वह तो इसे अच्छी स्कूल में पढ़ने भेज रहा है, वही बहुत है। राजीव- अरे ! तुम सब भी बड़े अजीब लड़के हो। जब भी देखें प्यारे दोस्त अनुराग के कपड़ों की ही नोक-झोंक करने लगते हो। वाच (Watch) में देखो टाइम (Time) क्या हुआ है ? 27 बज रहे हैं और इस तरह नोंक-झोंक करते हुए तो तुम दोपहर कर दोगे और चंबल गार्डन (Garden) के बजाय पिकनिक (Picnic) इस स्कूल के अहाते में ही हो जाएगी। कमल-हां राजीव ! तुम्हारी बात एकदम ठीक है। अपन लोग व्यर्थ ही इस तू-तू मैं-मैं में लग गए। वस्तुतः अच्छे कपड़े पहनने मात्र से क्या ? बाहरी टीपटाप से नहीं, अपितु आन्तरिक सौन्दर्य से ही व्यक्ति की पूजा होती है। {22} अनुराग- यस कमल ! मैं भी यही सोचता हूं। बाहर के बजाय भीतरी सुन्दरता को बढ़ाये। क्रान्तिकारी, सर्वजन हितकारी नये-नये विचारों के परिधान हम अपने अर्न्तजीवन में धारण करें, यही श्रेयस्कर है। पारस-अच्छा बाबा ! हो गई अब तुम्हारी आदर्शमय बातें। बहुत सुन्दर हैं तुम्हारे विचार। अब तो आगे बढ़ो, कोई आटोरिक्शा पकड़ते हैं, और तो सारी तैयारी है ही । है ना राजीव । राजेश- तो चलो............... | सभी दोस्त अपने स्कूल के अहाते से रवाना हो गये। दो ऑटोरिक्शा में बैठकर सभी चंबल गार्डन मे पहुंचे। इधर-उधर घूमते हुए बगीचे की सुन्दरता का अवलोकन करने लगे। बगीचे में कही गुलाब, कहीं चमेली, कहीं केवड़े के फूल खिल रहे थे। लक्ष्मण झूला भी बंधा था। पास ही कलकल सा निनाद करती चंबल नदी भी उद्यान की शोभा बढ़ा रही थी। पांचों दोस्त इधर-उधर घूमते जा रहे थे, तभी उन्हें एक भयंकर चीख सुनाई पड़ी। एकदम चौंककर पीछे देखा तो उनका ही दोस्त पारंस अपने पैर को पकड़कर जोर-जोर से चिल्ला रहा था। उसके समीप से ही एक काला लम्बा सर्प जाते हुए सभी ने देखा। सभी को समझते देर न लगी कि इसी ने पारस को काटा है। सब दौड़े। कोई पारस के पैर को पकड़ने लगा तो कोई पत्थर उठाकर सांप की तरफ फैंकने लगा। तभी अनुराग ने कहा-अरे कमल । तुम उस सांप को जाने दो, उसे मार डालने से तुम्हें मिलने वाला भी क्या है ? तुम तो इधर आओ, लो पारस का पैर पकड़कर अपने टावल से कसकर बांध दो। अनुराग के कहे अनुसार वह टावेल को लाया और पैर पर बांधने लगा। अनुराग ने देखा-सांप ने जोरदार काटा है, बड़ी तेजी से जहर फैल सकता है। और ये क्या ? पारस की हालत तो एकदम खराब होती जा रही है। अगर तुरंत जहर नहीं उतारा गया तो खतरा है। राजीव ने कहा- इसका जहर इसी समय उतारना जरूरी लग रहा है पर उतारें कैसे ? कोई उतारने वाला दिख ही नहीं रहा है। कमल- और किसी को बुलाने की क्या जरूरत है ? कहते हैं ना, कि मुंह से चूस-चूस कर थूकें तो भी जहर उतर जाता है। जयेश- तो कमल, तुम ही चूसोना जहर .......? {23} .. कमल- हां, मैं चूस तो लूंगा, पर यह जहर मेरे गले से भी नीचे उतर गया तो........? मैं मर न जाऊंगा? जयेश- तो तुम्हें अपने मरने का खतरा इस कार्य से रोक रहा है, अपने दोस्त के बजाय अपने प्राणों का मोह अधिक है। कमल कुछ नहीं बोल पा रहा था, अन्य मित्र भी एक दूसरे का मुंह ताक रहे थे, खतरा कौन मोल ले ? फिर खतरा भी छोटा मोटा नहीं, प्राणों की बाजी.... अनुराग ने देखा- यह समय सोच-विचार करने का नहीं, कुछ कर गुजरने का है। अगर इस समय खतरे से डरा तो मेरा दोस्त अभी-अभी परलोकगामी हो जायगा। तुरन्त अपना मुंह पारस के अंगूठे से लगा जहर चूसता जा रहा था और थूकता जा रहा था। 10-15 बार ऐसा करने से जहर सारा बाहर आ गया, पारस की तबियत स्वस्थ होने लगी। धीरे-धीरे वह अपनी सामान्य स्थिति में आ गया। उसे स्वस्थ देख सभी प्रसन्न हो गए। खुशी से उछलने लगे। पारस ने कहा- आज तो अनुराग ने मेरी जान बचाली, नहीं तो मैं तो मरा ही समझो। अनुराग- वो तो कुछ नहीं। पर पारस । तुम ये तो बताओ तुम क्या कर रहे थे, जो अचानक सर्प ने तुम्हें काटा ? क्या तुम्हें पहले सर्प नहीं दिखा था ? पारस- अरे अनुराग ! वह सर्प मुझे पहले ही दिख गया था। वह तो इस पास वाली झाड़ी में चुपचाप पड़ा था, मैंने सोचा कि यह जिंदा है या मरा हुआ? इसका परीक्षण करने के लिए यह छोटा सा पत्थर लेकर उस पर मारा था, मारते ही वह उछल कर, मेरे पैर पर काट गया। अनुराग- ओ हो ! तो गल्ती तुम्हारी ही हुई। जैसा करोगे वैसा भरोगे, तुम्हीं ने उसे छेड़ा, मगर तुम्हारा यह कुतूहल आज तम्हारी जान ही ले लेता। पारस जो अभी भी भयभीत था, बोला- हां अनुराग ! आज मैंने गल्ती की, आज तो तुमने मुझे बचा लिया, अनुराग, मैं तुम्हें कभी नहीं भूल सकता । कहते हुए पारस का गला भर आया, उसकी आंखों में आंसू आ गए। नहीं पारस ! मैंने तो कुछ विशेष नहीं किया, यह तो मेरा कर्त्तव्य था, अपने साथी को अपनी आंखों के सामने मरते हुए मैं कैसे देख सकता हूं। ....खैर ! चलो, अब हम सब यहां से रवाना होते हैं। देर भी बहुत हो चुकी है। .... {24} । । और हां अब अपनी पिकनिक समाप्त। एक बार किसी अच्छे डॉक्टर के पास जाकर तुम्हें दिखाना भी है। जहर का कोई थोड़ा बहुत अंश शरीर में नहीं रह गया हो। हां हां! यह बात एकदम ठीक है। चलो हम सब अब रवाना होते हैं। डा. जैन की डिस्पेन्सरी (Dispensary) यहां नजदीक में ही है। सभी साथी शीघ्र रवाना हुए और डिस्पेन्सरी (Dispensary) पहुंच गए। डॉक्टर जैन वहां बैठे थे ही। सारी स्थिति जानकर उन्होंने पारस का चैकअप किया। वह एकदम स्वस्थ था। डॉक्टर को आश्चर्य हो रहा था कि इतना जहर चढ़ने पर भी उसका उस पर कुछ असर नहीं था। अनुराग की चूसकर जहर उतारने की कला पर सभी को सुखद अनुभूति हुई। सभी रवाना होने लगे। तो जयेश ने कहा- अरे जाने से पहले अनुराग का भी तो चैकअप करवा लो। इसने भी तो मुंह से जहर चूसा है कहीं थोड़ा बहुत अंश अन्दर पहुंच गया हो तो। नहीं-नहीं मैं एकदम स्वस्थ हूं, परीक्षण की जरूरत नहीं। अनुराग बोला। नहीं, तुम्हें भी चैकअप तो करवाना ही पड़ेगा कहते हुए कमल ने जबर्दस्ती उसे डॉक्टर के पास ले जाकर खड़ा कर दिया। डॉक्टर सा. ने देखा और बोले- वैसे तो अनुराग आप स्वस्थ हैं फिर भी गले के नीचे नली में जहर का कोई थोड़ा-थोड़ा असर है। मैं आपको ये टेबलेट (Tablet) देता हूं। एक अभी, एक दोपहर, एक शाम होने से पूर्व ले लेना, बस एकदम सब ठीक हो जाएगा। अनुराग ने टेबलेट्स (Tablets) ली व अपने साथियों के साथ रवाना हो गया। सभी अपने-अपने घर की ओर बढ़ चले। सभी के मन में अलग-अलग विचार थे। अनुराग अपना कर्तव्य पूरा करने के सात्विक हर्ष से विभोर था तो पारस अपने साथ घटित हुई घटना से, मौत को सामने देखकर उससे बच निकलने से हर्षित था तो साथ ही अनुराग द्वारा कृत उपकार के प्रति बार-बार आभारी हो रहा था। मन ही मन कुछ-कुछ सोचता ही चला जा रहा था। अन्य सभी अपनी दोस्ती की परीक्षा में प्राप्त अनुतीर्णता पर खेद खिन्न थे, फिर भी संतुष्ट थे, किसी तरह होने वाले अघटित से हम बच गए। । {25} सर्दी का मौसम। कालेज के क्रीडा प्रांगण में बैठे 5-7 नवयुवक मस्ती मार रहे थे। स्कूल के कड़े अनुशासनमय जीवन को पार कर ये सब अब स्वतंत्र जीवन को पाकर के बड़े प्रसन्न थे। 12वीं तक स्कूल की पढ़ाई में हर पीरियड (Period) अटैंड (Attend) करना अनिवार्य था पर कॉलेज लाईफ में ऐसा कोई बंधन नहीं था। अतः ये सभी छात्र चलते पीरियड में उठकर क्रीडाप्रांगण में आ बैठे थे। आजकल इन सबके दिमाग कुछ फिरे हुए थे। अनुशासन रहित जीवन इन लोगों को बुराईयों के गर्त में ढकेल रहा था। धीरे-धीरे इन सब की उच्छृखलता बढ़ती जा रही थी। मन ने चाहा तो पढ़ाई का पीरियड अटैण्ड (Period Attend) करना नहीं तो बाहर घूमना, कभी होटल में गये तो कभी सिनेमा हाल में। कोई पूछने वाला नहीं था, इन सबको। इनके उन अमीर मां-बापों को तो अपने रईसजादों को यह भी पूछने की फूर्सत नहीं थी कि तुम कॉलेज गए या नहीं ? शायद उन रईस पैरेन्टस को यह भी पता नहीं, उनके सपूत कौनसी क्लास में पढ़ रहे हैं। उन्हें तो अपने व्यापार धंधे से एक मिनिट भी फुर्सत नहीं मिल पाती थी। ऐसी निरंकुश स्थिति में ये, सभी छात्र जो कि प्रतिभा सम्पन्न छात्र अनुराग के आज से नहीं बचपन से ही मित्र थे, अपने यौवन की मस्ती में उन्मत हो रहे थे। पूरे कॉलेज टाईम (Time) में ये आवारागिर्दी किया करते थे। कभी मौका हाथ लगते ही किसी शरीफ लड़की को छेड़ने से भी नहीं चूकते थे। अनुराग को अपने दोस्तों की ये आदतें पसंद नहीं थी। पर वह उनके साथ चली आ रही मित्रता को तोड़ नहीं पा रहा था। और वह उनसे ठीक-ठीक व्यवहार रख रहा था। उसके वे दोस्त उसके साथ में व्यवहार किसी भी तरह तोड़ना नहीं चाहते थे। क्योंकि अनुराग प्रतिभा सम्पन्न, बुद्धिमान व होशियार छात्र था, बचपन से लेकर अब तक वह प्रतिवर्ष कक्षा में फस्ट रैंक (First Rank) ही प्राप्त कर रहा था। उसके हर विचार से, हर प्रकृति से क्लास टीचर ही नहीं स्वयं प्रिंसिपल महोदय भी बड़े प्रभावित रहते थे। अनुराग में अन्य पर नेतृत्व करने का गुण भी बड़ा प्रशंसनीय था। जिससे हर छात्र पर उसकी धाक जम गई थी। सभी अनुराग से अनुराग करते थे। कुल मिलाकर पूरे विद्यार्थी परिसर में प्रारम्भ से ही उसकी बड़ी प्रतिष्ठा जम चुकी थी। ऐसे सर्वगुण सम्पन्न अपने दोस्त अनुराग को उसके मित्र कैसे छोड़ । {26} - सकते थे। उसके साथ रहने से उनकी प्रतिष्ठा भी जमी रहती थी, क्योंकि सभी जानते थे कि ये अनुराग के बचपन के साथी हैं। अनुराग के प्रति मित्रता होने से इन सभी दोस्तों की उच्छृखलता भी छिपी रहती थी, इनकी बुराईयों पर पर्दा डाला रहता था। कोई उन पर जल्दी से अंगुली नहीं उठा पाता था और यह भी एक कारण था कि ये चारों दोस्त जिन्दगी के लक्ष्य से दूर भटकते जा रहे थे। वैश्यागमन व सुरापान करने का शौक भी अब इन्हें लगने लगा था। अनुराग को भी वे अपने अनुरूप ढाल लेना चाहते थे। लेकिन वे जानते थे अनुराग जल्दी से हमारी पकड़ में आने वाला नहीं है। फिर भी उसे कैचअप (Catch up) तो करना ही है। रुपये पैसे की तो उनके पास कोई कमी थी नहीं । प्रतिदिन 100-120 रुपये का तो ये लोग यूं ही धुंआ कर देते थे। जबकि अनुराग को डैली (Daily) खर्च के लिए 5-7 रुपये भी कभी मिलते कभी नहीं। फिर भी अनुराग मितव्ययी स्वभाव के कारण बड़ी प्रसन्नता के साथ अपनी कॉलेज लाईफ (Life) व्यतीत कर रहा था। अरे ए अनुराग ! कालेज से छूटते ही तूं इतनी जल्दी कहां भाग रहा है ? अपने हाथों में डायरी व एक पुस्तक लिए पारस ने जाते हुए अनुराग को रोककर पूछा। भाग तो नहीं रहा हूं पर हां छुट्टी हो गई है तो अब घर जाना ही है, मम्मी इन्तजार कर रही होगी। अनुराग ने जल्दी से उत्तर दिया। मम्मी इन्तजार कर रही होगी ये तो ठीक है,पर जरा 2-4 मिनिटं रुक गया तो क्या हो जाएगा? हम भी तो तेरे दोस्त हैं, इस तरह जब देखो तब तूं अकेला ही क्यों भागता है। घर तो वहीं का वहीं है, तेरे को छोड़कर कहीं भागेगा नहीं। तू थोड़ी देर तो हमारे साथ ही रहा कर। पूरे दिन कॉलेज में भी तूं एक पीरियड मिस नहीं करता, जिससे कि एकाध पीरियड (Period) अपन थोड़ा मनोविनोद कर सके। पारस ने अपनी बात कही तब तक जयेश, कमल, राजीव, अमिताभ आदि भी उसके पास आकर खड़े हो गए। जयेश ने कहा- हां अनुराग, आज तो तुम्हें हमारे साथ होटल में चलना पड़ेगा। साधना होटल अभी नई-नई खुली है। आज वहीं चलेंगे। आज तो चलेंगे ही सही। राजीव ने भी समर्थन दिया पर मैं आज नहीं चल सकता, फिर कभी....... ..... | अनुराग ने उन्हें टालते हुए कहा। । "पर क्यों' ऐसा नहीं हो सकता? आखिर तुम हमेशा हमें टालते क्यों हो ? सभी एक साथ बोले। {27} - अनुराग- नहीं टालने जैसी तो कोई बात नहीं........... ! जयेश- टाल तो रहे हो फिर कहते हो टालने जैसी कोई बात नहीं। तो चले चलो ना यार। किस बात के ये नखरे हैं। राजीव- अरे इसकी जेब खाली होगी। कहीं मेरे को सब बिल चुकाना नहीं पड़ जाए इसलिए ये नहीं आ रहा होगा ? अनुराग कुछ बोला नहीं। कमल- तेरी जेब खाली है तो क्या हुआ? हम हैं जो तेरे दोस्त । सब बिल पेमेन्ट (Payment) करेंगे। अरे ! हमारे जैसे दोस्त के होते हुए तुम चिन्ता क्यों करते हो? देखोना आज घर से पापा को बिना बताए ही ये 500 रुपया उठा लाया हूं। आखिर ये रुपये किस काम आएंगे। अनुराग- इस तरह मम्मी-पापा के बिना दिये या उन्हें बिना कहे रुपया उठा लाना तो चोरी है। कमल ! ये एकदम गलत बात है। कमल- अपने मां-बाप का ही तो पैसा है। कोई दूसरे का तो है नहीं, जो पूछने की जरूरत पड़े। अनुराग-अपने मां-बाप का धन है तो क्या हुआ ? हम उन्हें पैसा कमाकर दें या उनका पैसा ले ? और लें भी तो बिना पूछे ? इस तरह तो तुम्हारे मम्मी-पापा का विश्वास तुम पर से उठ जाएगा। कमल- अनुराग ! इससे क्या विश्वास उठ जाएगा? अपना धन अपन ही मालिक। मेरे बाप का मैं ही तो इकलौता बेटा हूं। आज खर्च करूं तो भी सब धन मेरा है और कल करूं तो भी मेरा। फिर सोच काहे का। भले वह सब पैसा तुम्हारा ही हो पर अभी उसके मालिक तुम नहीं तुम्हारे पिता जी हैं, बिना पूछे रुपये उठा लाना तो सरासर चोरी है। तुम चाहे कुछ भी कहो। कहते हुए अनुराग के स्वर में थोड़ी तेजी आ गई। कमल-अच्छा बाबा ! इतने नाराज क्यों होते हो? रात को पापा घर आयेंगे तो उन्हें बता दूंगा कि 500 रुपये ले गया था। फिर तो कोई चोरी नहीं होगी। चलो अब तो चलने को तैयार हो हमारे साथ...... ! हां अनुराग ! बहुत देर हो चुकी है। तुम्हारी इस नोंक झोक में। अब चले चलो हमारे साथ..... | कहते हुए उसने अनुराग का हाथ खींचा और आगे बढ़ गया। सारे दोस्त भी उसके साथ हो लिये। अनुराग को बिना मन ही उनके साथ होना पड़ा। सभी की यह तो पहले से ही योजना थी कि आज सिटी (City) से बाहर जो नई होटल (Hotel) साधना खुली है वहीं पर हम {28} सबको चलना है। फाइव स्टार (Five Star) होटल से भी वह होटल कुछ अन्य विशेषता लिए हुए है। अत्याधुनिक सुविधाओं से इसे सजाया गया बताते हैं। उसकी हर वस्तु अपने आप में आकर्षक बताई जाती है। वेजिटेरियन, (Vegetarian) नान वेजिटेरियन (Non-Vegetarian) की भी सुविधा है। अन्दर क्या हो रहा है, इसकी बाहर कहीं कोई हवा भी नहीं लग सकती। सुरक्षा एवं गोपनीयता की भी पूरी व्यवस्था है। अनुराग को ये कुछ भी पता नहीं था। वह तो दोस्तों के साथ जिधर ढकेला गया उधर ही बढ़ गया। आगे कुछ दूरी पर जाने के बाद कमल ने एक टैक्सी (Taxi) ली, वे सब शीघ्र ही उसमें बैठकर साधना होटल में पहुंच गए। अनुराग ने वह होटल बाहर से देखी और बोला-ये तो कोई नई होटल खुली लगती है, मैं तो इधर पहली बार ही आया हूं। जयेश- हां नई होटल खुली है, कल ही उसका उद्घाटन हुआ है। हमारा इरादा तो कल ही यहां आने का था, पर तुम कॉलेज से बहुत जल्दी रवाना हो गए, कॉलेज से निकलते ही हमने तुम्हें देखा पर तुम कहीं नजर न आए, मानो पंछी की तरह कहीं उड़ गये थे। अनुराग- हां कल घर पर जरूरी काम था। मम्मी ने रसोई घर की कुछ खाद्य सामग्री बाजार से खरीदकर जल्दी ही मंगवाई थी, अतः मैं फटाफट चला गया था। राजीव कोई बात नहीं। कल नहीं तो आज ही सही। आज भी तुम्हें हम जबर्दस्ती लाए हैं, अब हम जो भी कहें वह खा-पी लेना, मना मत करना। पारस-हां अनुराग, राजीव की बात बिल्कुल सही है। तुम भी आज कल लड़कियों की तरह क्या नाज नखरे दिखाने लग गये हो। कमल-नखरे की क्या बात। अनुराग ठहरा गरीब बाप का बेटा इसे संकोच बहुत आता है। 'गरीब बाप का बेटा' प्रतिदिन ये शब्द सुनकर अनुराग बड़ा परेशान हो गया था। उसे ये शब्द बड़े अपमान जनक लगते थे। उसके हृदय को तीर की तरह बींध देते थे। फिर भी वह कुछ बोलता न था। बस सोचा करता था- ये दुनियां भी कैसी है ? दुनियां की नजर में दौलत ही सब कुछ है, व्यक्ति का ईमान कुछ नहीं है। जब कि मेरे पिता गरीब जरूर हैं पर नैतिकता व ईमानदारी के ऐश्वर्य से भरे पूरे हैं, जिसकी मेरे दोस्तों के करोड़पति बाप रतिभर भी बराबरी नहीं कर सकते। पर यह सब अवगति इन्हें कराये । {29} कौन ? दिल के हर विचार को सुनने के लिए योग्य पात्र चाहिए। अयोग्य पात्र में डाला हुआ बढ़िया दूध चंद मिनटों में खराब हो जाता है। सभी दोस्त बातें करते-करते होटल के अन्दर पहुंच चुके थे। होटल नई थी, सभी सुविधाओं से परिपूर्ण थी। हर तरह की व्यवस्था उसमें बड़े आकर्षण तरीके से की गई थी। उसमें पहुंचने पर सभी को लग रहा था, यह कोई होटल नहीं अपितु किसी बड़े सेठ की सजी सजाई कोठी है। एक आकर्षण डायनिंग टेबल (Dyeing Table) पर सभी साथी जा बैठे। जाते ही बेरे ने सभी के लिए सुन्दर सी ट्रे में ग्लासों में पानी भर कर ला रखा। फिर बोला- क्या लाऊं साहब ! आप सबके लिए। कमल ने तुरन्त आर्डर (Order) दिया- हम पांच व्यक्तियों के लिए सबसे पहले आइसक्रीम ले आओ। बैरा तुरन्त ही बढ़िया नक्काशीदार प्यालों में आइसक्रीम ले आया। आइसक्रीम खाने के बाद कमल ने पूछा- और क्या खाओगे ? राजीव- मैं तो आज चाइनीज खाऊंगा। अनुराग तुम ? अनुराग- मुझे तो अब कुछ खाना नहीं है, तुम न मानों तो निम्बू की शिकंजी भले पी लूंगा। जयेश- यार। नई होटल मे आये हैं तो आज तो कोई नई चीज खायेंगे, ये शिंकजी तो घर पर ही बहुत है। कमल- तो मंगा लूं चाइनीच व चाकलेट (Chocklete) केक। राजीव- हां साथ में कुछ ठण्डा पीने का हो तो वह भी चलेगा। पारस- अरे ! तुम सब तो होटल के इस पहले हाल में ही टिक गये। यही से खा पीकर खाना हो जाओगे या दूसरे कमरे भी देखोगे। आगे के रूम में जाकर देखो तो सही। वहां की सजावट कैसी है ? कमल- हां पारस ! तुम्हारी बात एकदम सही है। चलो उठते हैं। यहां से दूसरे रूम में चलते हैं। चलो उठो सब स्टेण्डअप (Stand-up) सभी को यह सुझाव पसंद आया व एक साथ सभी उठ खड़े हुए। आगे बढ़ गए। दो-तीन कमरे देखे। उनमें की गई पैटिंग, रंग की इन्द्र धनुषी घटाएं देखकर सभी बाग-बाग हो रहे थे। हर कमरे में अलग-अलग रंगों के सुन्दर फर्निचर व उन पर सुन्दर नक्काशी की गई थी। गद्दे तकियों पर की गई कशीदाकारी तो आश्चर्य जनक ही थी। सभी कमरों को पार करने के बाद 5-7 सीढ़ियां {30} - सामने दिखाई दी। जिनसे नीचे उतरकर वे एक शानदार हॉल में पहुंच गये। यह हाल बड़ा शानदार सजा हुआ था। गद्दे, तकिये, सोफा सेट, आराम कुर्सिया, डाईनिंग टेबल (Dining Table) आदि सभी की घटाएं अपने आप में निराली थी। उस हाल में 2-3 व्यक्ति थे जो वहां के कर्मचारी थे, बाकी तो पूरा हॉल खाली था। पांचों दोस्तों ने उस हाल में जैसे ही प्रवेश किया। वैसे ही सामने खड़े व्यक्ति ने उनका स्वागत करते हुए कहा- आइये-आइये पधारिये। कमल-आपकी इस नई होटल की साज सज्जा देखते हम यहां तक आ गये हैं, देखकर हम बड़े दंग हैं, गजब का डेकोरेशन (Decoration) किया है। आप केवल देखने ही आये हैं या कुछ पीयेंगे भी। अपने पास ही पड़ी बोतल की ओर ईशारा करते हुए उस होटल के कर्मचारी ने कहा- आगे वह फिर बोला-यहां आप लोग आये भी हैं और बिना पीये जायेंगे तो फिर मजा अधूरा ही रहेगा, ज्यादा नहीं तो आधा-आधा जाम ही सही। अच्छा-अच्छा ठीक है। आज थोड़ी-थोड़ी तो....... | कहते हुए कमल ने अनुराग की ओर मुस्कराते हुए देखा । अनुराग ने तुरन्त सिर हिलाते हुए कहा- नहीं यार। कमल ये मेरे से नहीं होगा। मेरी मम्मी-पापा ने प्रारंभ से ही कसम दिला रखी है कि मैं कभी भी मांस, मदिरा, अंडे नहीं खाऊंगा। अच्छा कोई बात नहीं, तुम नहीं पीओगे। थोड़ी सी देर रुको तो सही। हम थोड़ी-थोड़ी लेकर अभी चलते हैं। कहते हुए कमल ने अनुराग का हाथ पकड़ा और पास पड़ी आराम कुर्सी पर जा बैठा। तीनों दोस्त भी उनके साथ-साथ वहीं आ बैठे। तुरन्त बोतलें खुली व आधी-आधी ग्लास भर कर उन सबके सामने आ गई। कमल-राजीव, पारस व जयेश ने एक एक ग्लास उठाली। हालांकि वे सभी उच्च खानदान के सभ्य परिवार के लड़के थे, लेकिन पैसे व यौवन की इस अंगड़ाई में सब कुछ भूल चूके थे। पर इन्हें क्या पता कि जिन्दगी का असली लुफ्त मौज मजा इन भोग-विलासों में नहीं, संयम पूर्ण जीवन में है। अनुराग बड़ा असमंजस की स्थिति में फंस चुका था, इस विलासिता के वातावरण में वह आ फंसा था, यहां से निकलें तो कैसे ? वह इसी अधेड़बुन में था कि जयेश ने कहा- {31} , अनुराग बाबू- क्या सोच रहे हो? अरे ! इसमें इतना सोच विचार की क्या बात है। आजकल व्हीस्की (Whisky) तो आम बात हो गई है, हर सभ्य आदमी इसे अपने गम को भुलाने के लिए पीने लगा है। वैसे भी इसमें कोई विशेष बुराई या पाप वाली बात नहीं है। ये है क्या ? अंगूर आदि का ज्यूस (Juice) ही तो है, विशेष रीति से तैयार किया हुआ। इसे पीने से तुम्हारी कोई कसम-वसम टूटेगी नहीं। अनुराग चुपचाप था उससे न तो हां करते बन रहा था और न ही ना करते। इतने में पारस ने टेबल (Table) पर पड़ा वह ग्लास जो अनुराग के लिये था, उठाया व उसके मुंह के पास ले जाकर बोला लो एक दो बूंट ही ले लो, बस ज्यादा कोई जरूरी नहीं। अनुराग- तो क्या व्हीस्की (Whisky) पीना जरूरी है, मैं नहीं पीता। राजीव-यार दोस्त। तुम हमारी इतनी भी बात नहीं रखोगे। हम कोई तुम्हें मांस तो खिला नहीं रहे, वह तो बड़ी बुरी चीज है, पर इसमें तो कोई बुराई नहीं। यह तो ज्यूस (Juice) है केवल । जरा चख तो सही कैसा लगता है। और अनुराग के मना करने पर भी जबर्दस्ती उसके मुंह में ग्लास टेढ़ा कर दिया। एक दो बूंद उसके मुंह में चले गये। "वाह" मजा आ गया। आज तो अनुराग को भी पिला ही दी। सभी दोस्त खुश होकर बोले-सभी ने अपनी-अपनी गिलासे मुंह से लगाली। एक ही श्वास में सारी शराब खाली करके बोले-यार ! विशेष मजा नहीं आया। एक बार और हो जाए। हां-हां रोज-रोज तो यहां आने का मौका मिलता नहीं है। आज आये हैं तो पूरा लुफ्त लेकर ही उठेंगे। कमल ने कहा और थोड़ी व्हीस्की (Whisky) और ले आने का आर्डर दे दिया। उसको आज रुपये की गर्मी जो थी। वह घर में 100-200 नहीं पूरे 5000 रुपये उठा कर लाया था, अनुराग को तो उसने 500 रुपये ही दिखाये थे। इधर अनुराग ने देखा- आज तो मैं फंस गया हूं। मुंह में जबरदस्ती उडेले गये शराब के चूंट को तो उतारना, पड़ा, पर अब गिलास में और बची शराब का क्या करे। उसने इधर-उधर झांका। और कोई जगह तो उसे दिखाई नहीं पड़ी पर पास ही दो चार गमले पड़े दिखाई दिये, चारों दोस्त तो शराब के जाम पीने में व्यस्त थे, इसी व्यस्तता का फायदा उसने उठाया व अपने गिलास की शराब एक गमले में डाल दी। । -- .. {32} उसने देखा शराब का दूसरा जाम भी आ गया है और सभी उस मस्ती में उतरे हुए हैं तो वह धीरे से उनके बीच से उठा और होटल से बाहर आ गया। जल्दी ही रवाना होकर अपने घर पहुंच गया। उसकी मम्मी और बहिन विमा उसका कभी से इन्तजार कर रहे थे। विभा घर के बाहर ही खड़ी थी। अनुराग को देखते ही बोली- भैया ऽ ऽ। आज आप कितनी देरी से आए हैं ? देखोना! मैं और मम्मी कभी से आपका इन्तजार कर रहे हैं। आज मम्मी के पूर्णिमा का व्रत था, लेकिन उसने अभी तक खाना नहीं खाया। बोल रही थी अनुराग आ जाये तो अपन साथ-साथ ही खाएं। गरम-गरम दाल बाटी बना रखी है। आपका इन्तजार करते-करते ठंडी होने लगी है। अनुराग-हां! आज मुझे देर हो गई। मैं तो घर जल्दी ही आ रहा था पर दोस्तों ने रोक लिया। विमा-भैया आपके दोस्त भी कैसे हैं ? जब देखो आपको रोक लेते हैं..............! अनुराग- तूं मेरे को दरवाजे पर ही खड़ा रखेगी या अन्दर भी आने देगी। शायद घर पर लेट पहुंचने के अपराध की सजा दे रही है। यह कहते हुए मुस्करा दिया। विभा- ऊं हूं। आप भी बड़े खराब हैं। मैं और आपको सजा दूं। कभी नहीं। मेरे प्यारे भैया। मैं आपके इन्तजार में कितनी परेशान थी, एक घंटा हो गया घर से अन्दर बाहर चक्कर लगाते हुए। कहते हुए विभा ने अपना मुंह । । फूला लिया। अनुराग- ओ हो तू तो नाराज हो गई। मैं तो मेरे से मजाक कर रहा था। इतने में उनकी आवाज सुनकर मम्मी कुसुमवती बाहर आ गई। बोली तुम लोग दरवाजे पर ही रुठते व मनाते रहोगे या घर के अन्दर भी आओगे। हां- मम्मी ! अब चलते हैं अन्दर ! विभा का हाथ खींचते हुए अनुराग घर में घुस गया। वे रूम में बिछी अपनी चटाई पर बैठे, तब तक पापा भी घर आ गए। उन्हें देखते ही विभा बोली- अहा ! आज तो पापा भी जल्दी घर आ गए। बड़ा मजा रहेगा। आज हम सब साथ-साथ खाना खाएंगे। पापा-कनकसिंह ने उन्हें यों बैठे हुए देखा तो बोले-क्या तुमने इतनी देर तक खाना नहीं खाया। घड़ी में 7 बज रहे हैं। लोग 5/2 या 6 बजे ही खाना खा लेते हो। {33} ! हां पापा ! रोज तो अनुराग भैया कॉलेज में छुट्टी होते ही साढ़े पांच बजे घर आ जाते हैं, और हम साथ-साथ ही खाना खाते हैं। पर आज तो भैया बहुत लेट आये हैं, अभी कोई 10 मिनिट ही हुए हैं, इनको घर आये हुए। और आज तो मम्मी के भी पूर्णिमा का व्रत था, ये भी सुबह से भूखी हैं, अनुराग कॉलेज से घर आएगा तो फिर साथ-साथ ही खाएंगे। विभा ने सारी बात कह डाली। बेटे अनुराग ! आज तुम लेट हो गए। कॉलेज में कोई जरूरी कार्य था क्या ? अनुराग की ओर मुखातिब होकर कनकसिंह ने पूछा ! नहीं पापा। कॉलेज में तो कोई कार्य नही था। कॉलेज की छुट्टी होते ही मेरे दोस्त कमल, पंजक आदि ने मुझे घेर लिया था...... | कह रहे थे हमारे साथ घूमने चलना होगा। मुझे क्या पता मम्मी मेरे पीछे भूखी है, नहीं तो मैं उनसे छूटकर आ जाता, अनुराग ने उत्तर दिया। अच्छा कोई बात नहीं। फ्रेंडशिप (Friendship) ऐसी ही होती है। कभी-कभी दोस्तों का मन भी रखना पड़ता है। और फिर तुम्हारे वे सारे दोस्त तो बड़े अमीर है, मैं उन सबको जानता हूं, कोई मिल मालिक का बेटा है तो, कोई जौहरी का बेटा है। किसी के पिता के पास खिलौने की फैक्ट्री है तो किसी के पास साबुन की फैक्ट्री। तुम्हें उन सब के साथ कैसा लगता होगा ? क्योंकि मैं तो एक साधारण नौकरी पेशा आदमी हूं। कनकसिंह के ये शब्द सुनते हुए अनुराग ने उन्हें रोकते हुए बीच में ही कहा- नहीं पापा ! कोई विशेष अटपटा नहीं लगता है। क्योंकि मेरे बचपन के मित्र हैं और मेरे प्रति उन सबका गहरा लगाव है। वे मेरा हर बात में खूब ध्यान रखते हैं। वैसे भी मित्रता तो मित्रता ही है। सुरूपता या कुरूपता, दौलत या निर्धनता इसमें कभी नहीं देखी जाती। मित्रता में तो एक दूसरे के गुण, व स्वभाव की एक रूपता देखी जाती है। जहां ये एकरूपता होती है, वहां मित्रता सहज ही स्थापित हो जाती है। सच्ची मित्रता कोई सामान्य चीज नहीं जो दौलत या अन्य किसी वस्तु से खरीदी जा सके। बेटे ! तुम्हारा कहना ठीक है, सच्ची मित्रता एक अनमोल संपत्ति है, जो व्यक्ति इसे प्राप्त करता है वह परम सौभाग्यशाली है। पर आज मैं देखता हूं कि मित्रता में भी स्वार्थ की मिलावट होने लगी है। और स्वार्थ युक्त मित्रता, मित्रता नहीं, वह एक ऐसी दुश्मनी है जिसे हम पहले नहीं, बाद में जान पाते हैं। मित्रता की सुन्दर पैकिंग (Packing) में छुपी ऐसी दुश्मनी बड़ी खतरनाक होती है। कनकसिंह ने अनुभवों को शब्दों का परिवेश पहनाते हुए कहा। {34} । पूज्य पापा जी ! आपका कहना यथार्थ है। मैं आपकी हित शिक्षा का ख्याल रखूगा..... | अनुराग बोल ही रहा था कि कुसुमवती ने बीच में ही कहा- आप लोग तो बातें क्या करने लगे मानों किसी महात्मा का लेक्चर (Lecture) ही शुरू हो गया। अब बस भी करो। भोजन का समय हो चुका है देखो ! मैंने सब तैयारी कर ली है। सब ठण्डा हो रहा है। अरी भागवान ! तू भी इतनी क्या जल्दी करती है। सुबह से जाता हूं तो अब शाम ढले ही तो घर आता हूं। अब भी अपने बेटे-बेटी से दो बात न करूंतो कब करूं। कनकसिंह ने मीठे स्वर में कहा- आप दो क्या दस बातें करो ना? आप और आपके बेटे-बेटी से। मेरी कौनसी मनाई है। पर जरा वक्त तो देखा करो। पहले भोजन कर लीजिए फिर भले पूरी रात लेक्चर (Lecture) देते रहना...... | कुसुमवती ने उलाहने के स्वर में कहा। अच्छा बाबा- अच्छा तेरी बात ठीक है। अब तुम्हारी ही मान लेता हूं। लाओ क्या बनाया है आज? कनकसिंह ने नरम शब्दों में कहा- और परोसा हुआ थाल अपने सामने खींच लिया। अनुराग विभा भी उसके पास आ बैठे, कुसुमवती भी बड़े प्रेम के साथ खाने व खिलाने लगी। भोजन पूर्ण हुआ और सभी अपने-अपने कार्य से निवृत्त हो निद्रा देवी की गोद में चले गये। सुखमय रात बड़ी शीघ्रता से व्यतीत हुई। सुख की घड़िया बीतते कितनी देर लगती है। {35} -6- अनुराग 25 अप्रेल सायंकाल 5 बजे अपने घर पर बैठा ही बी.काम (B.Com.) द्वितीय वर्ष परीक्षा की तैयारी कर रहा था। कॉलेज में पढ़ाई पूर्ण होने से 25 अप्रेल से 4 मई तक अवकाश घोषित कर दिया था। ताकि सभी छात्रगण अपना अध्ययन, परीक्षा की पूरी तैयार घर पर एकाग्रता पूर्वक कर सकें। अनुराग के दोस्त जिन्हें परीक्षा की काई चिन्ता नहीं थी वे तो चीटिंग (Cheating) या नकल बाजी करके पास हो जाने की नई-नई अटकलें सोचा करते थे। उन्हें अपनी चींटिग (Cheating) पर विश्वास था कि पास तो हो ही जाएंगे, और करना क्या है। अनुराग को फस्ट (First) डिवीजन बनना है, वह तो है कि पूरा किताबी कीड़ा उसे पढ़ने दो। अपने को तो 10 दिन की छुट्टियां मिली है गुलछर्रे उड़ायेंगे। कभी सिनेमा हॉल, तो कभी पार्क, कभी क्लब, तो कभी खेल कूद व संगीत संध्या में। ये लोग अपना समय बिताने की योजना बना रहे थे। उधर अनुराग अपनी पढ़ाई में व्यस्त था, गणित के सवाल हल कर रहा था। विमा की पास में बैठी अपना अध्ययन कर रही थी, कुसुमवती रसोई घर में भोजन तैयारी में जुटी थी। अरे ओ अनुराग भैया ऽ ऽ ! अनुराग भैया ऽ ऽ। दौड़ना देखो, तुम्हारे पापा को क्या हो गया है ? पड़ौसी के लड़के पिंकेश ने हांफते-हांफते आकर आवाज दी। अनुराग ने ज्योंही ही आवाज सुनी तुरन्त उठ खड़ा हुआ। है ऽ ऽ क्या हुआ मेरे पापा को ? कहां है वो ? और वह तुरन्त दौड़कर अपने घर से बाहर आया। वो यहां नहीं। माल रोड़ की उधर वाली सड़क पर। वहां बहुत भीड़ एकत्रित हो चुकी है। पीकेश ने कहा। ओ मम्मी ! मैं जा रहा हूं, पापा को क्या हुआ है ? चिल्लाता हुआ अनुराग पैदल ही दौड़ गया। साईकल स्कूटर वगैरह तो उसके पास कुछ थे नहीं। विभा चिल्लाई-मम्मी ! ओ मम्मी जल्दी करो क्या हो गया है, चलो अपन भी चलें। घर को ज्यों का त्यों छोड़कर मां बेटी दोनों ही भाग चली। अनुराग आगे-आगे बड़ी तेजी से भाग रहा था। कोई 4-5 मिनिट में वह एकत्रित भीड़ के समीप पहुंच गया। हांफ्ते-हांफ्ते भीड़ को चीरते हुए वह घटना स्थल पर पहुंचा तो हक्का-बक्का रहा गया। उसके पापा श्री . {36} कनकसिंह जी ट्रक से कुचले पड़े थे। उनके मुंह, नाक व सिर से खून बहा जा रहा था। अनुराग के मुंह से एक भयंकर चीख निकली ओह ! पापा ! ये क्या हुआ ? भगवान मेरे पापा की ये हालत ? भीड़ में से किसी ने कहा- इस तरह इनके शरीर से बहुत खून चला जाएगा, जल्दी करो इन्हें सरकारी हॉस्पिटल (Hospital) में ले चलो। डॉक्टर सक्सेना अभी हॉस्पिटल में ही होंगे। अनुराग जो अब तक किंकर्तव्य विमूढ़ था, कुछ संभला और तुरन्त एक टेम्पो (Tempo) वाले को बुलाकर लोगों की सहायता से उन्हें टेम्पो में लिटाया तब तक उसकी मम्मी और विभा भी वहां आ पहुंची थी, यह दुर्दशा देख उनकी आखों में अश्रुधारा बह चली। शीघ्र ही टेम्पो में वे भी चढ़ी और हॉस्पिटल पहुंच गये। डॉ. सक्सेना फुर्सत में ही मिले, केस देखते ही वे बोले स्थिति बहुत बिगड़ चुकी है। उनके सिर पर गंभीर चोट आई है, मस्तिष्क का आपरेशन अभी तत्काल ही करना पड़ेगा, व कम से कम दस बोतल खून चढ़ाना तो अनिवार्य है। उससे ज्यादा भी जरूरत पड़ सकती है। जल्दी व्यवस्था करो। डा. साहब ! व्यवस्था क्या करूं ! अनुराग ने पूछा ! क्या-क्या करते हो? तुरन्त 10000 रु. लाकर रखो, मैं अभी सब ठीक किये देता हूं। डॉक्टर ने कडक होकर कहा। 10000 रु........? हां दस हजार रुपये मैंने तो कम ही बतलाये हैं, इससे ज्यादा भी लग सकते हैं, क्योंकि मस्तिष्क का ऑपरेशन कोई साधारण बात नहीं है, एक आपरेशन के कम से कम 800 रुपये तो मेरी फीस है। डॉ. सा. ! हम गरीब हैं जरा हम पर रहम करो। इतने रुपये तो हम कहां से लायेंगे। कुसुमवती ने रोते-रोते कहा। कहां से कैसे लाएंगे? ये मुझे नहीं मालूम ? ये फालतू बातें करने का मेरे पास टाईम नहीं। अगर 10000 रु. ला सकते हो तो ठीक वरना........ये केश यहां से उठा ले जाओ। डॉक्टर ने बेरहमी से कह डाला। ओ हो ! साहब ! ऐसा मत करिये। मैं आपके पैरों पड़ता हूं, डॉक्टर सा. आप मेरे पापा का आपरेशन शुरू करिये, तब तक मैं कहीं से रुपये की व्यवस्था करता हूं। अनुराग ने गिड़गिड़ाते हुए कहा। डॉक्टर ने देखा ये कंगाल लोग क्या 10000 रु. की व्यवस्था पायेंगे। अतः इन्हें टालना ही अच्छा है। तब कड़कड़ाती आवाज में 4 ३ {37} तरह मेरे आगे गिड़गिड़ाने से काम नहीं चलेगा। ऐसे गरीबी का रोना रोने वाले, भीख मंगे यहां रोजाना ही आते रहते हैं। पहले 10000 रु. लाकर मेरी मेज पर रखो तो ठीक है नहीं तो ऽऽऽ। मैं जा रहा हूं ? घर पर श्रीमती जी इन्तजार कर रही होगी मैं कोई फालतू आदमी नहीं जो तुमसे बकवास करता ? रहूं। कितना स्वार्थमय है यह संसार ? धिक्कार है ऐसी श्री मंताई को, जिससे व्यक्ति की क्रूरता-चरम सीमा पर पहुंच जाती है। जिसमें गरीबों की दर्द भरी प्रार्थना के शब्द सुनना भी बकवास लगता है। जिसमें मानव, दानव बनकर क्रूर अट्टहास करने लगता है। वस्तुतः जिसे पैसे से ही प्यार है उसे मानवता से प्यार कहां? अनुराग की आंखों में आंसू आने लगे थे पर वह उन्हें किसी तरह अन्दर ही अन्दर पीकर बोला-डॉक्टर साहब ! मेरे जीवन रक्षक, मेरे पापा की जिन्दगी का सवाल है। आप जरा ठहरिये। मैं अभी रु. ले आता हूं और अनुराग झट से बाहर निकल पड़ा। वह जानता था कि घर में तो 10000 रु तो दूर रहे 400-500 रु. मिल पाना मुश्किल है क्योंकि घर की आर्थिक तंगाई की अवस्था उससे छुपी नहीं थी। महीने की 25 तारीख थी, अतः पापा को प्राप्त वेतन, मम्मी को मिलने वाली मजदूरी तो घर खर्च में व परीक्षा की फीस में ही समाप्त हो जाती थी। बहुत कंजूसी करते हुए भी प्रतिमाह का खर्चा इतना हो जाता था कि महिने के अंत में 100-50 रु. भी मुश्किल से कभी बच पाते थे तो कभी वे भी नहीं। अब अनुराग क्या करे, कैसे करें ? उसे याद आये अपने करोड़पति मित्र जो हमेशा उसे, साथ देने का वादा किया करते थे। जो उसकी हर इच्छा पर अपने प्राण लुटाने की बातें करते थे। वह सबसे पहले कमल के पास ही पहुंचा। कमल के पिता जी जौहरी थे, प्रतिदिन लाखों का लेन-देन हुआ करता था। 5-7 मिनट में ही कई हीरे खरीदकर वे बैठे-बैठे ही हजारों का मुनाफा कमा लिया करते थे। यार कमल ! आज मुझे तुमसे कुछ सहयोग चाहिये। अनुराग ने घबराते हुए कहा। तुम घबराते क्यों हो? क्या हुआ। किस बात का सहयोग ? में ऽऽ मेरे पापा का ट्रक से एक्सीडेंट (Accident) हो चुका है। उनके इलाज के लिए डॉक्टर ने 10000 रु. मांगे हैं। हैं 5 5 10000 रुपये। रुपये देने की बात आते ही कमल की आंखें । {38} फिर गई। बोला अनुराग 100-50 रुपये की बात होती तो मैं अपनी जेब खर्च में से दे सकता था पर इतने रुपये तो (कुछ रुककर) असंभव है। असंभव क्यों ? तुम ही तो कहते थे-मेरे पिताजी का मैं इकलौता पुत्र हूं। उनकी संपत्ति मेरी संपत्ति है। तुम अपने पिताजी से रुपये मांगकर...............! नहीं अनुराग ! यह नहीं हो सकता ! मेरे पिता जी बड़े कंजूस हैं वे तुम्हारे लिए इतने रु. कभी नहीं देंगे? और फिर मेरे बाप से मैंने कभी मांगना सीखा नहीं। अनुराग को लगा- कमल किसी भी हालत में रुपये देने को तैयार नहीं है और समय तो बीतता जा रहा है, मेरे पापा मौत से संघर्ष कर रहे हैं। अतः वह कुछ बोला नहीं और वहां से रवाना होकर पारस के घर पहुंचा। जहां पर उसके अन्य साथी राजीव-जयेश भी आये हुए थे। अनुराग के अत्यन्त मुहये चेहरे को देखकर तीनों ने सोचा- क्या बात है ? हमेशा खिलते रहने वाला यह मुखारविंद इतना मुाया हुआ क्यों है ? तीनों ने एक साथ ही पूछा- अनुराग ! इतने सुस्त क्यों हो ? क्या बताऊ ? मेरे पापा अपनी बैंक की छुट्टी होने पर साइकिल से घर आ रहे थे, पीछे से आ रहे ट्रक ने उन्हें टक्कर मार दी, मेरे पापा का बुरी तरह एक्सीडेन्ट (Accident) हुआ है। डॉक्टर ने इलाज के लिए 10000 रुपये मांगे हैं, मुझे तुम पर भरोसा है कि तुम मेरे बचपन के सच्चे मित्र हो, मुझ पर जी जान लुटाने वाले हो, आज तुम मुझे थोड़ा सहयोग.......? कहते हुए अनुराग ने तीनों की आंखों में झांका पर रुपये देने की बात आते ही-जयेश- राजीव, पारस एक दूसरे का मुंह ताकने लगे। रुपये कौन ? अनुराग ने फिर पूछा- कहो ! क्या हुआ तुम सब चुप क्यों हो ? समय जा रहा है, मेरे पापा मौत के झूले में झूल रहे हैं, उन्हें बचाना ऽ ऽ ऽ। आखिर राजीव ने मौन तोड़ते हुए कहा दोस्त अनुराग ! जहां तक रुपये का सवाल है, 10000 रुपये कोई छोटी-मोटी बात तो है नहीं, हम इतने रुपये लायें तो कहा से ? 100-50 की बात हो तो फिर भी दे सकते हैं। अनुराग ने सोचा यह मित्र है या और कुछ। प्रतिदिन 500-700 रुपये मेरे सामने यूं ही खर्च कर देने वाले ये मेरे साथी मुझे 10000 रुपये के लिए इस तरह भना कर रहे हैं। पर रुपये लेना तो इनसे ही पड़ेगा और कोई रिश्तेदार या मेरे जान पहचान का व्यक्ति तो इस कोटा सिटी में है नहीं, {39) जिनसे इतने रुपये मांग लाऊ। अतः उसने कहा पारस ! मैं जानता हूं, तुम्हारी जेबों में प्रतिदिन ही हजारों रुपये ऐसे ही पड़े रहते हैं, अगर तुम तीनों चारों मिलकर 2-2 हजार रुपये भी दो तो भी मेरा काम बन जाय। ये समय है तुम्हारी मित्रता के परीक्षण का। इस तरह ऐसे वक्त पर धोखा देना तो अनुचित है। अनुराग के शब्दों में थोड़ी तेजी थी। जाने दो अनुराग, ये परीक्षा-वरीक्षा की बातें ! पैसा कमाना आसान बात नहीं है, हमारे बाप दादों ने कितनी मेहनत की है, तब कहीं जाकर इतना पैसा घर में है। क्या वे पैसे तुम कंगालों को यूं ही लूटा दें ? जा हट हमारे सामने से ? आज कह रहे हो बाप का इलाज कराना है, कल कहोगे मां का, परसों कहोगे बहिन का....... | क्या पैसे की खदान खुदी हुई है, हमारे पास, जो तुम्हें दे दें। अनुराग विचलित हो के बोला- मैं कौनसा तुम से रोज रुपया मांगने आया हूं। इतने वर्ष हो गए मैंने तुमसे दो पैसे भी नहीं मांगे। आज मैं मुसीबत का मारा ऽऽ। क्या तुम मुझे जरा भी सहायता नहीं दोगे ? क्या इतनी भी मित्रता नहीं निभाओगे ? जयेश- जा-जा ये बातें हमें नहीं सुनना है। ऐसे भीख मंगे मेरे बंगले पर रोज ही आते हैं। कौनसी मित्रता? कौनसा साथ व कौनसा साथी। वह मित्रता तो केवल कॉलेज तक ही है, पढ़ाई तक ही है, उसके बाद कोई किसी का नहीं ऽऽऽ अनुराग-बस.......बस करो जयेश ! मैंने नहीं सोचा था तुम मेरे ऐसे स्वार्थी मित्र हो। मैंने आज तक तुम लोगों पर विश्वास किया था पर तुम सबने मेरे उस विश्वास की जड़ों को उखाड़ डाला है। घोर आश्चर्य और महान् दुःख है मुझे तुम्हारे इस विश्वास घात पर। आज तुमने मेरा दिल तोड़ डाला है । राजीव -रहने दो अनुराग। ये सब बातें। फालतू की बकवास तुम किसे सुना रहे हो? आगे बढ़ो यहां से दूसरा द्वार खटखटाओ ! अरे तुम तो अपने बाप के पास जाओना कहीं वो बेचारा तुम्हारे बिना ऽ ऽ और कहीं तुम उस दरिद्री का मुंह देखे बिना ही न रह जाओ ऽऽ। अनुराग को काटो तो खून नहीं, ऊपर से नीचे तक हिल गया। वाह रे दुनियां गजब है ये स्वार्थ ? धिक्कार है इस स्वार्थ को ? जिसके पीछे बचपन की मित्रता भी नष्ट हो जाती है। स्वार्थ की कैंची, मित्रता, स्नेह, सौजन्य, सहृदयता, आदि सभी सद्गुणों के टुकड़े-टुकड़े कर डालती है। । {40} - । । ........ अनुराग को मित्रों के वे हृदय भेदी शब्द अन्दर तक चुभ गये। उसने देखा यहां पर अब कुछ मिलने की आशा नहीं है, और इस तरह अब समय भी बहुत व्यतीत हो गया है। ज्यादा देरी करने से फायदा नहीं। उधर पापा का क्या हाल होगा ? कहीं ......? वह चुपचाप मित्रों के समीप से दूर हटा व ऑटोरिक्शा पकड़कर हॉस्पिटल पहुंचा। वहा जाकर देखा तो वही हुआ जिसकी आशंका थी। उसे देखते ही डॉ. सक्सेना बोले-क्यों रे दुष्ट! इतनी देर लगा दी। मुझे यहां बिठा गया और गया रुपये लेने। ले आया रुपये ? तूं ने मुझे क्या सड़क छाप व्यक्ति समझ रखा है। जो इस तरह तुम जैसे कंगालों के लिए अपना बेशकीमती समय गंवाता रहूं। अब देख अपने बाप को ? यह तो मर चुका है, तूं भी कैसा बेटा है जो अपने बाप को नहीं बचा सका। डॉक्टर सा. ! मुझे माफ करना। आपका समय मैंने बर्बाद किया, पर क्या किया जाय? मेरी भी मजबूरी थी। कहते हुए अनुराग फफक-फफक कर रो पड़ा। अपने मृत पिता के समीप जा गिरा। डॉक्टर सा. रवाना हो गए और अपने कर्मचारी को कहते गए इन लोगों को जल्दी ही यहां से रवाना करें। बेकार में भीड़ इकट्ठी कर रखी है दो चार मिनिट में ही कर्मचारी आया और बोला उठाओ इस लाश को। अनुराग, कुसुमवती व विमा फूट-फूटकर रो रहे थे। सिर पर जो एक सुख का साया था वह उठ चुका था, वे आज निराश्रित बन चुके थे। कुसुमवती ने देखा-जो होना था। वह तो हो चुका है, अब कुछ हिम्मत धारण किये बिना काम नहीं चलेगा। वह उठी और अनुराग से बोली-बेटा अनुराग ! उठ, अब तुझे ही सब कुछ करना है। जो करने वाले थे वो चले गए हैं। इस घोर विपत्ति के समय में तुझे ही हिम्मत रखनी होगी। अन्यथा तो इस दुनिया में अपना कहलाने वाला और कौन है ? जो इस वक्त में काम आए ? अनुराग जो अब तक धार-धार आंसू रो रहा था मां के शब्द सुन कुछ हिम्मत धरकर उठ खड़ा हुआ। आज उसके दिल में अपने बाप के चले जाने से जितना गहरा गम था उतना ही गहरा गुस्सा? उसे अपने वे चारों ही दुष्ट मित्र घोर दुश्मन नजर आ रहे थे। डॉ. सक्सेना का क्रूरता भरा वह मदमाता चेहरा आंखों के सामने घूम रहा था ? जिसने पैसों को ही सर्वोपरी मानकर मानवता, दया, करुणा, नैतिकता को तिलांजली दे दी थी। दीवार के सहारे सिर टिकाकार वह सोचने लगा- मेरे पापा व मैंने आज तक ईमान को अपनाया, दौलत को नहीं। मैंने इन्सानियत की पूजा की, हैवानियत की नहीं। लक.. इस ईमान की राहों पर चलने का नतीजा क्या आया ? अगर मेरे पापा । 1411 व मैं इस इमान के चक्कर में नहीं पड़ते तो आज यह दिन मुझे नहीं देखना पड़ता। मेरी ईमानदारी व इन्सानियत का ही प्रतिफल है-मेरे बाप की अकाल मौत ? अगर मैं इन सबको तिलांजली देकर अनैतिकता की पगडंडी पर चलता तो आज मेरे सामने लक्ष्मी निवास करती। शरीर पर ये फटे टूटे वस्त्र न होकर बेश कीमती राजसी वेशभूषा होती। मेरे रहने के लिए वह टूटी-फूटी झोंपड़ी न होकर आलीशान कोठी होती और सबसे बड़ी बात होती मैं दौलत के सहारे अपने बाप को बचा लेता। डॉ. सक्सेना जैसे व्यक्ति की पैसे की प्यास पूरी करके उनका ऑपरेशन करवा लेता, खून की 10 बोतलें क्या 100 बोतले चढ़वा देता। ओ हो ! मैं भूला, अब तक भटकता रहा, इस ईमान व इन्सानियत की अटकलों में अटकता रहा। अब ऐसा नहीं होगा। यह दुनियां इमान की नहीं, बेईमान की है। यह दुनियां मानव से प्यार करने वाली नहीं, दौलत से प्यार करने वाली है। यह संसार इन्सानियत का नहीं, हैवानियत का है, मुझे इस दुनियां की चाल में अपनी चाल मिलानी होगी। दुनियां की चाल से विपरीत चलकर मैंने वात्सल्य मूर्ति, जीवन रक्षक पूज्य पिता जी को खो दिया। यह मेरी भयंकर भूल थी। अब आज से ही मैं प्रतिज्ञा करता हूं- मैं इस ईमानदारी व इन्सानियत को कभी प्रेम नहीं करूंगा। कभी नैतिकता करुणा, व स्नेह को गले नहीं लगाऊंगा। अब मैं चलूंगा हिंसा, झूठ, बेइमानी व भ्रष्टाचार की राहों पर और मजा चखाऊंगा इन धन के लोभी डॉ. सक्सेना जैसे नर पिशाचों को। उन बेईमान, मतलबी दोस्तों को बता दूंगा कि किसी सच्चे मित्र का दिल तोड़ना कैसा होता है ? विश्वासघात का परिणाम कितना भयावह होता है ? दीवार के सहारे सिर टिकाये अनुराग न जाने क्या-क्या सोचता ही चला जा रहा था। उसके गम भरे विचारों का अन्त नहीं आ रहा था, तभी कुसुमवती ने आवाज दी- बेटे ! इस तरह कब तक गम में डूबे रहोगे ? देखोना, तेरे पापा का यह देह यों ही पड़ा है, घड़ी 8 बजा रही है, अब देर रात तक यहां रूकना ठीक नहीं, इधर यहाँ से लाश उठाना भी आवश्यक है। यहां के कर्मचारी बार-बार लाश उठाने का कह रहे हैं। अनुराग बोला – हां मम्मी ! इस दौलत की दुनियां में गरीबों की क्या वेल्यू (Value) है ? यहां पर अगर दो-चार गरीब एकत्रित हो तो भीड़ इकट्ठी हो जाती है और दो-चार अमीर एकत्रित हो तो महफिल कही जाती है। दुनियां की नजर पर दौलत का विचित्र नक्शा चढ़ा हुआ है, जिसमें उसे केवल स्वार्थ, धन, सम्पत्ति, पद, प्रतिष्ठा व अमीरी ही नजर आती हैं। परमार्थ, {42} इन्सानियत, निर्लिप्त्ता व इन्साफ तो उसकी निगाहों में अदृश्य है, पैरों तले कुचले जाते हैं। खैर...... | मम्मी, मैं अब जाता हूं किसी टेम्पो को ले आता हूं। कहते हुए अनुराग हॉस्पिटल के आहते से बाहर निकल पड़ा। बाहर कई टैम्पो वाले खड़े थे, उन्हें वस्तुस्थिति बताई और चलने को कहा तो एक टैम्पो वाले ने कहा मैं चल तो सकता हूं। पर डेड बॉडी (Dead Body) को ले जाना है। अतः 100 रुपये लूंगा। अनुराग ने अपनी जेब संभाली तो उसमें केवल 5 रु. निकले उसने सोचा इन 5 रुपये से तो टैम्पो आएगा कैसे? और मान लीजिए घर ले जाकर घर में जमा रुपये से 100 रुपये इसे दे दूं तो वह भी नहीं जमेगा ? क्योंकि घर पर जमा पूंजी केवल 400-500 रुपये होंगे, उन 400-500 रुपयों में से यदि इन्हें 100 रुपये दे दूं तो बाद में पापा के अन्तिम संस्कार के लिए पैसा ....? यह कहां से लाऊंगा, उसमें भी तो 400-500 रुपये लग जाएंगे? एक ही मिनिट में उसने यह सब सोचकर टेम्पो वाले से कहा- भाई, इतने रुपये तो मैं नहीं दे सकता। कोई और साधन देखता हूं। यह कहकर वह वहां से रवाना हो गया। इधर-उधर देखा तो संयोगतः सामने ही एक ठेले वाला दिखलाई दिया। वह उसके पास दौड़ा और सारी स्थिति बताकर पूछा- तुम चलने को तैयार हो ? ठेले वाले ने कहा- हां! चल तो सकता हूं पर डेड बाडी (Dead Body) ले जाने की बात है, 25 रुपये में तैयार हूं। अनुराग 25 रुपये तो बहुत ज्यादा होते हैं, कुछ कम करो तो ऽऽ। ठेले वाले ने देखा यह कोई खानदानी लड़का परिस्थितियों के मारा मेरे पास आया है। अन्यथा तो डैड बाडी (Dead Body) को ठेले गाड़ी में कौन ले जाता है ? जिसकी थोड़ी भी अच्छी स्थिति हो वह अपने पिता को टेम्पो मेटाडोर (Matador) में ही ले जाना चाहता है। मैं भी गरीब हूं, गरीबों की पीड़ा कैसी होती है ? यह भलीभांति जानता हूं। मुझे इसके साथ कुछ रहमियता दिखानी चाहिए। ऐसा कुछ सोचकर बोला-भाई ! वैसे मेरा भाड़ा तो 25 रुपये ही है लेकिन तुम कितना देना चाहते हो? तुम्हारी जितनी इच्छा हो उतने ही दे दो। भाई ! बात ऐसी है कि अभी मेरी जेब में केवल 5 रुपये है, अधिक नहीं। पॉकेट खोलकर दिखाते हुए अनुराग ने कहा। अगर इतने से न हो तो घर पहुंचने पर मैं तुम्हें थोड़े रुपये और दे दूंगा। । {43} नहीं नहीं, तुम भी मानव हो मैं भी मानव हूं। मानवता के नाते हम भाई, भाई हैं। भाई ही भाई के काम नहीं आएगा तो और कौन आएगा। लो चलो, मैं तैयार हूं। तुम्हारी जो इच्छा हो दे देना, न भी दो तो कोई बात नहीं। ठेलेगाड़ी वाले ने कहा और अपनी गाड़ी ढकेलने लगा। अनुराग ठेले गाड़ी वाले की सहृदयता व सहानुभूति के प्रति गदगद् था। वह उनके साथ ले गया। दोनों हॉस्पिटल पहुंचे। कुसुमवती व विमा इन्तजार करते खड़ी थी। ठेले गाड़ी को देख कुसुमवती ने कहा- अनुराग ! क्या कोई टेम्पो नहीं मिला? हां मम्मी ! टेम्पो वाले तो किराया बहुत अधिक मांग रहा है। ये ठेलेगाड़ी वाला भैया कितना सज्जन व दयालु है मेरे कहते ही शीघ्र आ गया। क्या फर्क पड़ता है टेम्पो नहीं तो हाथ गाड़ी ही ठीक है। अनुराग ने प्रश्न भरी निगाह से कुसुमवती की ओर देखा। हां, ठीक है। उठा लो अपने पापा को। कहते हुए कुसुमवती ने कदम बढ़ाया। तुरन्त अनुराग, विभा भी उनके साथ हुए। हाथगाड़ी वाला भी उन्हें सहयोग देने लगा। चारों ने मिलकर कनकसिंह की निर्जीव देह को गाड़ी में रखा। और आगे बढ़े घर पहुंचे तब तक रात्रि के 10 बजे चुके थे। घर पहुंचने पर अनुराग ने कनकसिंह की देह को व्यवस्थित रूप से घर में रखा, गाड़ीवान को 5 रुपये अपनी जेब के और 5 रुपये अपने घर में पड़े रुपयों में से, यों 10 रुपये निकाल कर देने लगा तो गाड़ीवान बोला- नहीं भैया ! मैं ये रुपये नहीं लूंगा। तो 10 रुपया और 20 रुपया ले लो। अनुराग ने कहा- नहीं मुझे रुपये नहीं चाहिए न 10 चाहिए न 20 न 25 रुपये। ये रुपये आप अपने पास रखो। तुम्हारे सामने ये विकट परिस्थिति खड़ी है तो क्या मैं तुम्हारा इतना सा कार्य भी नहीं कर सकता। अनुराग अचरज में पड़ रहा था, ये भी क्या व्यक्ति है, 25 रुपया किराया की जगह 5 रुपया भी नहीं ले रहा है। कितनी सहानुभूति है इसके पावन हृदय में। उसने जबर्दस्ती रुपये देने चाहे, पर उसने नहीं लिये अन्ततः अनुराग को हार माननी पड़ी। वह उसे हाथ जोड़ते हुए बोला- तुम्हारे जैसा मानवता प्रिय, सहृदय व्यक्ति मैंने दूसरा नहीं देखा। अनुराग जी ! तुमने मुझे पहचाना नहीं, मैं तो तुम्हें पहचान गया। मेरा नाम प्रदीप है, बचपन में पहली से पांचवी कक्षा तक मैं तुम्हारे साथ ही पढ़ा था, तुम तो अब कॉलेज में पहुंच गये हो, पर मुझे तो पांचवी कक्षा पढ़ कर {44} ही स्कूल छोड़ना पड़ा था। क्योंकि पिता जी बीमार हो गए थे, घर में कोई कमाकर लाने वाला नहीं था, तब पढ़ाई छोड़कर मैं तो मजदरी करने में लग गया। खैर...... 1 अब मैं चलता हूं। और भी कुछ काम हो तो मुझे याद करियेगा। कहते हुए वह ठेलेवाला आगे बढ़ गया। अनुराग ! देखता रह गया। अरे यह वही प्रदीप है जो मेरे साथ बचपन में पढ़ा करता था, हां अब याद आया, यही लड़का कई बार मुझसे पढ़ाई में सहयोग लिया करता था। एक से लगाकर पांचवी कक्षा तक सदैव जब मैं कक्षा में प्रथम स्थान प्राप्त किया करता था तो यह हमेशा दूसरा स्थान प्राप्त किया करता था। ओ हो ! इसके समान कितने ही प्रतिभा सम्पन्न बालक गरीबी के कारण बीच में ही पढ़ाई छोड़ देते होंगे। मेरी भी यही हालत होती, अगर मेरे पापा-मम्मी कठिन परिश्रम व मेहनत मजदूरी करके मुझे पढ़ाई नहीं करवाते.....। अनुराग सोचता ही जा रहा था कि कुसुमवती ने पुकारा अनुराग ! हां- मम्मी क्या सोच रहे हो। यूं ही खड़ा हूं। देख रहा हूं। उस ठेलेवाले की सहृदयता। बोलो- अब क्या करूं? पापा चले गए ! मम्मी अब हमारा क्या होगा ? क्या बताऊं बेटा ? सुख की ठंडी छाया से हटकर अब हम दुःख की कड़काती धूप में आ पड़े हैं। तेरे पापा का कितना सहारा था, फिर बचपन से लेकर आज तक उन्होंने कभी सुख के दिन नहीं देखे, अब कुछ तूं बड़ा हुआ, तेरे से आशा बांधकर वे चल रहे थे कि अनुराग अब पढ़ लिख गया है, थोड़े ही वर्षों में अच्छी सर्विस कर लेगा, या कोई व्यापार धंधा शुरू करेगा व कमाने लगेगा तो फिर मैं आराम करूंगा। पर आराम के दिन आने से पहले ही बेटा ! वे तो चले. | कहते हुए कुसुमवती की आंखों में अश्रु देख अनुराग भी अपने आप को रोक नहीं सका। उसकी रूलाई फूट पड़ी। इधर विमा ने देखा- मां और भैया दोनों ही क्रन्दन कर रहे हैं। हृदय जो पहले ही भरा था फिर सुबक पड़ा लेकिन उसने सोचा-अगर इस तरह मैं भी रोती रही तो क्या होगा? इस तरह रोने से तो मानसिक दुःख और बढ़ जाएगा। उसने कहा भैया ऽऽ। ओ अनुराग भैया । आप ऐसा नहीं करोगे। मम्मी, आप तो बड़े हैं, आप अगर इतने कायर दिल बनोगे तो हमारा क्या होगा? आप को तो और अधिक हिम्मत रखनी चाहिए। {45} विमा के शब्दों को सुनकर भी कुसुमवती व अनुराग के आंसू थमे नहीं। बहती हुई अश्रु लड़ियों को देख विभा विह्वल हो उठी। वह जोर से चिल्लाई-मम्मी 5 | आप चुप हो जाओ, मैं किसी भी तरह आपके आंसू नहीं देख सकती। पापा चले गए-यह एक गहन दुःख तो है ही और आपके ये आंसू इस गम को और अधिक गहन बनाये जा रहे हैं। रोने से अगर दुःख कम होता चला जाता हो, तो मैं भी आपके साथ रोलूं। आप कितने ही आंसू बहाओं पर पापा तो अब वापिस आने वाले हैं नहीं ? फिर ये रोना क्यूं ? कुसुमवती सुबकती हुई बोली- विभा ! तू कहती है वह सच है, रोने से गया हुआ व्यक्ति वापस नहीं आता। इस संसार का यह अटल नियम है, कि इस देह से जो जा चुका है वह वापिस नहीं लौटता। पर मेरा मन रोके नहीं रूक पा रहा है। बेटी ! तेरे पापा ने तेरे लिए भी कितने अरमान संजोये थे, कितने ऊंचे स्वप्न उन्होंने देखे थे। वे कहा करते थे, विमा को एम.एस. सी पास कराऊंगा। जब मेरी बेटी पढ़-लिखकर होशियार हो जाएगी, वह मेडिकल (Medical) शिक्षण ग्रहण कर डॉक्टर बन जाएगी, तब मैं किसी डॉक्टर लड़के के साथ ही उसकी शादी करूंगा। मेरे घर पर तोरण मारने वाला मेरा जवाई डॉक्टर होगा या फिर कोई बहुत बड़ा इन्जीनियर (Engineer) होगा या वकील होगा। बेटी उनके वे सब सपने अधूरे....! कहते हुए कुसुमवती बड़े जोरों से रोने लग गई। उनके दिल का दर्द आंखों से बह रहा था। उनके नेत्रों से प्रवाहित मानो गंगा-यमुना में विमा भी अब डूबने लगी थी। वातावरण क्रन्दन व अकुलाहट व पीड़ा से भरा था। कुसुमवती का रुदन सुनकर आस पड़ौस दौड़ आये। घटित हुए इस दुखद हादसे से सभी व्यथित थे। मधुर व्यवहारी, प्रामाणिकता एवं नैतिकता से परिपूर्ण कनकसिंह की इस अकाल मृत्यु ने सभी को खिन्न बना दिया था। दुःख तो उन सबको बहुत था ही, फिर कुसुमवती के रुदन से सभी के हृदय को हिला दिया था। सब की आंखों में आंसू बह चले थे, कुछ समय तक तो यही क्रम चलता रहा, गहरे निःश्वास, हिचकियां व सिसकियां वातावरण को अत्यन्त दुःखद बनाती चली गई। आखिर पड़ोस में रहने वाले अंकल किशोरीलाल ने उन्हें ढाढ़स बंधाते हुए कहा- कनकसिंह का जीवन हकीकत में अपने आप में अनूठा रहा। वह ईमानदारी व इंसानियत के सहारे आजीवन गरीबी से संघर्ष करता रहा। उसने अपनी जिन्दगी में हजारों कष्ट उठाये, पर किसी अन्य को कष्ट देना स्वीकार नहीं किया। ऐसे व्यक्ति के जाने से कुसुमवती जी ! दुःख किसे नही {46} । है ? पर इस प्रकार रोने से तो कोई फायदा नहीं। समझदार व्यक्ति ऐसे प्रसंगों पर हिम्मत व धैर्य का परिचय देते हैं, वे रो धोकर अपने दुःख को अधिक नहीं बढ़ाते हैं। हिम्मत व धैर्य के शस्त्रों के द्वारा दुःखों से संघर्ष करना विरल व्यक्तियों का ही काम है। कुसुमवती जी व बेटे अनुराग ! परिस्थिति में जो अपना मानसिक संतुलन बनाये रखता है वही महान् होता है। किशोरीलाल जी के इन सहानुभूति पूर्ण शब्दों से वातावरण की गमगीनी कुछेक अंशों में कम हुई। सभी चुपचाप थे। घड़ी में देखा तो 11.30 हो चुके थे। आस पड़ोस के एकत्रित व्यक्ति अपने-अपने घर लौटे। दो-तीन सज्ज्न पड़ौसी वहीं ठहरे। दुःख की रात्रि भी व्यतीत हुई। प्रातःकाल होते ही आस-पड़ौसियों ने मिलकर स्नेहिल हृदय श्री कनकसिंह की देह का दाहसंस्कार किया। निकट का रिश्तेदार तो कोई था नहीं, जो वहां उपस्थित होता। अनुराग जिसके ऊपर मानों व्रजपात हुआ था, इस भीषण कष्ट के समय अपनी गृहस्थी का निर्वाह करते हुए अन्दर ही अन्दर न जाने क्या-क्या सोचता रहता था। कभी उसकी नजरों के आगे डॉ. सक्सेना का क्रूर चेहरा घूम रहा था तो कभी मतलबी दोस्त कमल, राजीव, पारस आदि के निर्दयी चेहरे। कभी हाथगाड़ी वाले प्रदीप की मानवता याद आ रही थी तो कभी पड़ौसियों की सहृदयता। एक दो तीन करते धीरे-धीरे दिन बीत रहे थे और अनुराग का संकल्पशील हृदय किन्हीं संकल्पों को पूर्ण करने के लिए योजनाएं बना रहा था। उसकी इन्सानियत अब हैवानियत के रूप में उभरने लगी। उसकी मासूमियत ने कठोरता का रूप अपना लिया। दौलत का नशा गहराता चला गया। अब उसे दौलत के बिना सब कुछ बेकार नजर आने लगा। उसने तो मन मैं दृढ़ निश्चय कर लिया कि अब अधिक से अधिक दौलत कमाना ही मेरा लक्ष्य होगा, चाहे वह वैध तरीके से कमाया जाय या अवैध तरीके से। इससे मुझे कोई मतलब नहीं, पर इस मतलबी दुनियां को शिकस्त देने के लिए मुझे धन कमाना ही होगा। इस दृढ़ निश्चय के साथ ही वह रात्रि में सोचने लगा कि हर आने वाला प्रभात मेरी जिन्दगी का दूसरा ही रूप होगा। वाह री दुनियां ! जिसने एक शरीफ इन्सान को हैवान बना दिया। एक सन्मार्गगामी नवयुवक को उन्मार्ग में धकेल दिया। हकीकत में समाज की इसी दयनीय दशा के कारण आज के नवयुवक कई बार अपराध करने के लिए विवश हो जाते हैं। उन अपराधी नवयुवकों का जितना अपराध नहीं उतना आज के समाज के ठेकेदारों, राजनेताओं की स्वार्थपरस्ता का है। {47} -7- । । राजधानी एक्सप्रेस दिल्ली से कोटा जाती हुई बड़ी तेजी से बम्बई की ओर बढ़ी जा रही थी। अभी कोई रात्रि के 3 बज रहे होंगे अधिकांश यात्री मस्ती से सो रहे थे। कोई-कोई ही ऊंग रहा था, बाकी सबको नींद आ चुकी थी। उसी ट्रेन में यात्रा कर रहे एक नौजवान को न तो नींद आ रही थी न ऊंग रहा था। उसका दिमाग कुछ और ही काम कर रहा था। उसने देखा कि एक महिला अपने पर्स को सिरहाने रख कर बेखबर सो रही है। आसपास सीट पर बैठे यात्री भी निद्राधीन है। बस अवसर पाकर उस नौजवान ने उसके पर्स के एक भाग की ओर धारदार पत्ती का निशान लगा ही दिया। पर्स उस स्थान से कट गया वहां अंगुली डाली तो उसके हाथ में कुछ नोट आ गए, उसने फूर्ती से उसे जेब में डाले और शौचालय की ओर बढ़ गया। वहां जाकर उसने देखा कि 500-500 के दस नोट थे, कुल मिलाकर 5000 रुपये थे। उसने रुपयों को शौचालय की खिड़की के पास ही सुरक्षित स्थान पर छिपा दिये और अपनी सीट पर आकर ऊंगने लगा। रात्रि की नींद में क्या कुछ हुआ, किसी को कुछ भी पता नहीं चला। सवेरे आठ बजे राजधानी एक्सप्रेस बम्बई सेन्ट्रल पर आकर खड़ी हो गई। सभी यात्री अपने-अपने डिब्बों में से निकले और टैक्सियों में बैठकर गन्तव्य की ओर बढ़ते चले। वह नौजवान और कोई नहीं था यह वही अनुराग था जो अपनी पूरी कॉलेज में ईमानदार एवं नैतिकता के उच्चादर्शों पर जीने वाला छात्र था। परिस्थितियों ने जिसकी जिन्दगी को बदल डाला था। पिता जी के स्वर्गवास हो जाने के बाद घर का सारा भार उसी के कंधों पर आ पड़ा था। उसे अपने चल रहे अध्ययन को बीच में ही रोकना पड़ा था। क्योंकि नौकरी से उसे कोई विशेष पैसा मिलने की आशा नहीं थी। जबकि उसे इस धनिकों की दुनियां में अपने अस्तित्व को बहुत शीघ्रता के साथ प्रतिष्ठित करना था। इसके लिए उसे कोई मार्ग शीघ्रगामी प्रतीत नहीं हुआ। बस इन्हीं सब विचारों ने उसे "क्राईम" (Crime) की दुनियां में प्रवेश करने के लिए विवश कर दिया। अतः अपराध की दुनियां में अनुराग शुक्ला का यह पहला ही प्रयास था, जिससे उसने 5000 रुपये प्राप्त किये थे। यह सोचते हुए वह फुटपाथ पर आगे बढ़ रहा था व मन में सोच रहा था कि बम्बई में बिना पैसा क्या होने वाला है। खाने के लिए रोटी और रहने के लिए स्थान भी नहीं मिलने वाला है। इसीलिए उसने ट्रेन में सो रही लेडिज (Ladies) के पर्स पर हाथ साफ कर लिया, और उसमें सफलता प्राप्त की थी। {48} --- बंबई फुटपाथ पर चलते हुए किसी रेस्टोरेन्ट (Restaurent) को देखकर अनुराग वहां पहुंचा और पहले पेट भर भोजन किया। उसके बाद जिन्दगी में पहली बार ही सही, सिगरेट को मुंह पर लगाया और उसका धुंआ उड़ाते हुए अगली योजना की तैयार करने में लगा। इसमें तो कोई शक नहीं कि अनुराग शुक्ला अत्यन्त स्मार्ट (Smart) प्रतिभाशाली नौजवान है। उसकी प्रतिभा जो सद् जीवन की ओर लगने वाली थी उसे समाज के आर्थिक अभिशाप ने अपराध की ओर लगा दिया। अनुराग ने सबसे पहले तो अपना नाम बदला। अनुराग शुक्ला की जगह वह रायबहादुरसिंह बन गया। गांव भी बदला तो नाम भी बदल लिया। गांव और नाम ही नहीं, जीवन की सारी शैली बदल ली। अभी गर्मी का टाईम (Time) था और बरसात भी चालू नहीं हुई थी, अतः रात्रि में सोने की तो इतनी समस्या नहीं थी। यही कहीं जूहू चौपाटी समुद्र के किनारे सो लेता था और सवेरे ही वह अपने काम में लग जाता था। उसने अपनी योजना के अनुसार भीड़ भरी ट्रेनों और बसों में चलना, इधर-उधर यात्रा करना चालू किया। कभी बांद्रा से चर्चगेट तो कभी दादर से कल्याण इस प्रकार कभी यहां तो कभी वहां। इन ट्रेनों व बसों की भीड़ में दिनभर में वह मौका मिलने के साथ ही दो चार के पॉकिट तो मार ही लेता था। इस प्रकार हजार पांच सौ रुपये रोज उसके हाथ लगने लगे। कभी-कभी कुछ भी नहीं मिलता। लेकिन जितना भी पैसा उसके हाथ लगता वह उसे फिजूल खर्च नहीं करता था। उसे जोड़-जोड़ कर कुछ नया काम करने की धुन थी। हां एक रामपुरी चाकू और एक पिस्तौल जरूर उसने अपनी सुरक्षा के लिए खरीद ली थी। जो हर वक्त वह अपने पास रखता था। कुछ भाग्य का प्रबल संयोग ही समझिये कि 5-6 महिने में ही उसने इस छोटी मोटी लूटपाट में एक लाख रुपये इकट्ठे कर लिये और एक सैकिण्ड हेण्ड (Second Hand) कार खरीद ली। बस खुद ही ड्राईविंग (Driving) सीखकर उसे किराये पर चलाने लगा। किन्तु किराये पर चलती गाड़ी से कितना पैसा प्राप्त हो सकता था। किन्तु वह कई बार शरीफ आदमियों को मौका देखते ही पिस्तौल दिखाकर डरा धमकाकर लूट लेता था। जब उसके पास कुछ पैसा और जुड़ गया तब वह बंबई के अंधेरी में धाराबी झोंपड़पट्टी में 500 रुपये महिने में किराये से एक खोली ले ली। अब वह कभी खोली पर तो कभी कार में रातें गुजारने लगा। झोंपड़ पट्टियों में भी अपराधी तत्त्व के लोग कुछ ज्यादा ही रहा करते थे। जिसके कारण दुर्बल लोगों पर कहर बरसाया जाता था। कहावत है "समरथ को नहीं दोष गुसाई" समर्थ व्यक्ति के लिए दोष नहीं रह जाता। {49 - रायबहादुर के तो कोई परिवार था नहीं, वह अकेला ही था। इसलिए उसे तो आगे पीछे की वहां कोई चिन्ता नहीं हुआ करती थी। झोंपड़पट्टी में खोली-खोली पानी पहुंचाने के लिए पाइप लाइन (Line) नहीं लगी हुई थी। वहां तो झोंपड़ पट्टी के बीच एक ट्यूबवेल (Tube-Well) खुदा हुआ था। सभी लोग वहीं से पानी भरा करते थे। वहां पर भी मैं पहले, मैं पहले के चक्कर में कई बार सिर फूट जाया करते थे। एक बार एक शिवा नामकी भोली-भाली लड़की जिसके पिता घर पर बीमार थे। मां उसकी सेवा में लगी थी। वह लड़की पानी भरने आई। उसके 15 मिनिट बाद एक हालिदा नामक तेजतर्रार लड़की आई। वह शिवा को पानी भरते हुए एक तरफ हटाकर स्वयं पानी भरने लगी। शिवा कहती रह गई कि नम्बर मेरा है पर वह कुछ भी सुनने को तैयार नहीं। जब उसे ज्यादा कहा गया तो हालिदा ने उस मासूम शिवा को दो चार थप्पड़ की ओर मार दी। धक्का देने से उसका मिट्टी का घड़ा भी फूट गया। वह बिचारी रोने लगी। ठीक उसी समय रायबहादुर अपने घर से निकलकर काम पर जा रहा था। उसने जब यह अन्याय देखा तो उसने हालिदा को फटकारा और उसे अपना घड़ा हटाने के लिए विवश कर दिया। हालिदा तेज बोलने लगी- ओ हराम जादे । तूं कौन होता है, हमारे बीच में आने वाला जानता नहीं मैं कौन हूं। मैं इस झोपड़पट्टी के दादा सलीम की बहिन हूं। मुझे छेड़ने की इस झोंपड़पट्टी में किसी की भी हिम्मत नहीं है। तुम नये-नये आए हो। मालूम नहीं है तुम्हें। कहीं मेरे भाई के सामने आए तो मारे जाओगे। रायबहादुर उन गीदड़ भभकियों से कहां डरने वाला था। वह बोलो- ए छोकरी ! जबान संभालकर बोल । हराम जादा, मैं हूं या तूं है। यह समय बता देगा। तूं अपने भाई का मुझे भय बता रही है तो सुन ले तेरे भाई जैसे 5660 आ जाय तब भी मेरा कुछ नहीं बिगाड़ सकते। उस जैसे लफंगे को मैं जेब में रखता हूं। यह कान खोलकर सुन ले। अब इस झोंपड़पट्टी में हम चाहेंगे वो होगा। यह कहते हुए रायबहादुर आगे बढ़ गया। लेकिन हालिदा के अभिमान को जबर्दस्त चोट लगी थी। उसने अपने भाई सलीम को सारी बात बताई उसे सुनकर उसका गुस्सा सातवें आसमान पर चढ़ गया। उसने सोचा यह सिर फिरा कौन आ गया। वह समझता क्या है अपने आपको फन उठाने के साथ ही कुचल डालना जरूरी है। उसने उसी वक्त योजना बना ली। अपने दोस्त, करीम, जहीन, किरीट, अब्दुल, रहमान सलमान, विनोद, राजेश आदि सबको अपनी योजना बतला दी। {50} ज्योंही रात को कोई 12 बजे रायबहादुर अपनी झोंपड़ी पट्टी पर आया तो एक तरफ से उस पर लकड़ी का जबर्दस्त प्रहार हुआ। लेकिन प्रहार होने से पहले ही आपत्ति उसने सिर पर चोट लगने से पहले ही लकड़ी को हाथ में पकड़ लिया और बिजली की फूर्ति के साथ उसी लकड़ी से सामने वाले पर प्रहार कर उसे भूमि चटा दी। इस बीच दूसरे लोगों से भी अपना बचाव करता हुआ, गजब का चमत्कार दिखाया। किसी को पैरों से तो किसी को लाठी से तो किसी को हाथों से ऐसी चोट पहुंचाई कि सभी बेहोश होकर भूमि पर पड़े तड़फड़ाने लगे। इस मारामारी में उसे भी चोटें लगी थी। लेकिन उसकी इसे चिन्ता नहीं थी। रायबहादुर बड़े इत्मीनान के साथ बोला- दोस्तों ! और भी कुछ कर गुजारी करने की इच्छा हो तो बोलो। सभी को रायबहादुर के दिमाग और ताकत पर बड़ा आश्चर्य था। वे सोचने लगे कि इस अकेले ने हम जैसों को पटखनी मारी है। ऐसे व्यक्ति से भिड़ना खतरे से खाली नहीं होगा। शक्ति के सभी पुजारी होते हैं। उन्होंने भी रायबहादुर से उसी वक्त संधि कर ली, दोस्ती कायम कर ली। बल्कि यही नहीं, उन सबने उसे अपना कमाण्डर मान लिया। जो तुम कहोगे वही होगा। बस फिर क्या था। अब पूरी धारावी झोंपड़ी पट्टी में राय बहादुर का नाम गूंजने लगा। सभी उसका लोहा मानने लगे। रायबहादुर ने झोंपड़ी पट्टी में हो रही हिंसा एवं अन्याय पर ताकत के साथ कड़े प्रतिबंध लगा दिये। उसका यह निर्देश जारी हो गया कि कोई भी झोंपड़ीपट्टी वाले, इस बस्ती में किसी भी व्यक्ति के साथ धोखाधड़ी नहीं करेंगे। किसी भी लड़की के साथ बदसलूकी से पेश नहीं आएगा। ईमानदारी के साथ सारे काम करने होंगे। कहीं भी अराजकता आई तो रायबहादुर एवं उसकी गैंग के लोग कड़े से कड़ा जो भी दण्ड देंगे, वह मंजूर करना होगा। रायबहादुर की इस घोषणा से झोंपड़ीपट्टी वासियों की जिन्दगी में अद्भुत परिवर्तन आ गया। अन्याय का राज्य खत्म हुआ। सभी में भाई चारा कायम हो गया। कोई किसी की भी लड़की के साथ छेड़खानी करना ही भूल गया। क्योंकि रायबहादुर का गहरा आतंक जो सब पर था। हर अन्यायी व्यक्ति उससे घबराता था। झोंपड़ीपट्टी के बाहर रहने वाले व्यक्तियों को लूटा-खसोटा जा सकता है। पर झोंपड़ियों के लोगों को नहीं। बाहर तो रायबहादुर खुद भी यही काम करता था। इस व्यवस्था के कारण झोंपड़ पट्टी में रहने वाले सभी लोग उसका अहसान मानने लगे। क्योंकि अब उन्हें किसी अपराधी तत्त्व का कोई डर नहीं रह गया था। {51} - रात्रि के कोई बारह बजे थे। भायंदर में समुद्र किनारे एक सामान्य-सी होटल के ग्राउण्ड फ्लोर (Ground Floor) के किसी कमरे में कुछ आदमियों की कहा कहीं के साथ घुसर-फुसर भी चल रही थी। होटल के बाहर ही रायबहादुर अपनी कार की पिछली सीट पर ऊंघ रहा था। उसे जब घुसर-फुसर सुनाई दी तो लगा कि कोई महत्त्वपूर्ण बात हो रही है। सुनना चाहिये क्या बात कर रहे हैं लोग। वह दिवाल के पास गया और खिड़की से सटकर खड़ा हो गया ताकि कमरे के भीतर वालों को कुछ आभास न हो। अब वह सुनने लगा। आवाज भी साफ आ रही थी। अन्दर चार श्रीमंत परस्पर बात कर रहे थे। सेठ हजारीमल ने लक्ष्मीचन्द से कहा-सुनो दोस्त ! इस बार तो करोड़ों का लाभ होने वाला है। वह कैसे ? सुनो विदेश से जो मालवाही जहाज आ रहा है, उसमें अपना कोई 20 करोड़ का माल है। उसमें अपने को 50 प्रतिशत कमाई है। कल रात्रि को 11.30 बजे वह अपने संकेत के अनुसार उधर से गुजरेगा तो हमें कोई दस बजे तक अपने गंतव्य तक पहुंच जाना है क्योंकि उबड़ खाबड़ रास्ते को पार करने में 1/2 घंटे जो लग जाएगा। फिर सामान जहाज उतारना और झोपड़ी में रखकर व्यवस्थित करने में भी समय लगेगा। अतः कल रात काफी काम रहेगा। अलर्ट (Alert) रहना जरूरी है। इस प्रकार का निर्णय लेकर चारों साथ निकले। रायबहादुर तो पहले से ही सावधान था। वह फिर पहले की तरह अपनी कार में ऊंघने लगा। उन चारों सेठों में से तीन दादर की तरफ जाने वाले थे। जिनका एक ही कार में चले जाना संभव था। पर एक को ठाणा जाना था। उसके लिए टैक्सी की जरूरत थी। उसने देखा-यह टैक्सी पड़ी है। ताली बजाकर आवाज लगाई तो दह बहादुर हड़बड़ाता हुआ उठा। सेठ लक्ष्मीचंद बोला- सुनो- ठाणा चलना है। टैक्सी वाला बोला- रात्रि के 1272 बज रहे हैं। डबल चार्ज (Double Charge) लगेगा। सेठ बोला- ठीक है, गाड़ी बढ़ाओ आगे। रायबहादुर ने गाड़ी स्टार्ट (Start) की गियर (Gear) में डालकर आगे बढ़ा दी। आधा घण्टा लगातार दौड़ने के बाद गाड़ी ठाणा पहुंच गई। सेठ के निर्देशानुसार उसे रायबहादुर ने चौराहे तक छोड़ दिया। सेठ लक्ष्मीचंद बाई तरफ मुड़ता हुआ एक पतली {52} ! गली में घुस गया। चुस्त-दुरूस्त रायबहादुर भी अपनी टैक्सी को एक तरफ खड़ा करके उसका पीछा करने लगा। सेठ लक्ष्मीचंद ने पतली गली पार करके चौड़ी रोड़ पर दाई तरफ 57 नम्बर बंगले के बाहर जाकर बैल बजाई। भीतर से खाकी वर्दी पहने लौकर आया। उसे रोबीली आवाज में सेठ बोला- बहादुर ! यह क्या बदमाशी है। तुम्हें पूरी रात बाहर चौकसी करने के लिए रखा है, न कि अन्दर बंगले में जाने के लिए। तुम अन्दर कैसे थे ? बहादुर बोला- मालिक ! मैं तो बाहर ही था। पर पर........ ! यह पर........पर..........क्या होता है। सच बताओ अन्दर क्या कर रहे थे। सेठ बोला। वाचमेन से कुछ कहते नहीं बन पाया। इतने में तो लक्ष्मीचंद की लड़की बाहर आई। उसने कहा- इसे तो मैंने बुलाया था। क्योंकि रात को ए.सी. चलते-चलते खराब हो गया था। अब इतनी रात कोई कारीगर ठीक करने को आने के लिए तैयार नहीं था। इधर गर्मी कितनी तेज पड़ रही है। मैं झुलस सी गई तब वाचमेन बोला- मुझे ठीक करना आता है। मैंने कहा- जल्दी से ठीक कर दो। इसलिए. यह मेरे रूम का ए.सी. ठीक कर रहा था। बात इस तरह सफाई से प्रस्तुत की गई कि उन दोनों के वासनात्मक. कुकृत्य को महाघाघ लक्ष्मीचंद भी समझ नहीं पाया। वह वाचमेन को बाहर खड़े रहने का आवश्यक निर्देश देकर अन्दर चला आया। सत्य है कड़वे बीज से मीठे फल की आशा नहीं रखी जा सकती है। यदि बाप स्वयं ही दुराचारी हो तो संतान के सदाचारी होने की कल्पना केवल स्वप्न की तरह व्यर्थ है। खैर.... रायबहादुर छाया की तरह सेठ लक्ष्मीचंद के पीछे लगा हुआ था। उसने सेठ को बंगले में घुसते हुए, साथ ही नौकर को डांटते हुए एवं उसकी लड़की को भी लाईट के प्रकाश में देख लिया। इसी बीच नौकर का नाम बहादुर और लड़की का नाम निशा है, यह भी जान लिया। सेठ के भीतर प्रवेश करने के बाद रायबहादुर ने सेठ का बंगला नम्बर भी नोट कर लिया। अब रायबहादुर पुनः अपनी टैक्सी के पास पहुंच गया। और टैक्सी को किसी टैक्सी स्टेण्ड (Taxi Stand) पर लगाकर वह फिर से पिछली सीट पर सुस्ताने लगा। लेकिन अब उसे नींद नहीं आ रही थी। वह अपनी अगली योजना पर बड़ी ही जागरूकता के साथ विचार करने लगा। उसने उन चारों सेठों की बातों के हर पहलू पर चिन्तन करना प्रारंभ किया। उसे लगा कि चारों सेठ बड़े नामी तस्कर हैं। इनका देश विदेश में लम्बा जाल फैला हुआ है। कस्टम (Custom) विभाग से लेकर मिनिस्टरी (Ministery) {53} तक भी इनके हाथ में रहती है। पानी का जहाज (Ship) के कर्मचारियों से भी मिली भगत है। इसीलिए 20 करोड़ का दो नम्बर का माल आज रात को 11 बजे आ रहे जहाज से आने वाला है। जिसे कुछ किलोमीटर की दूरी पर उतार लिया जाएगा। रायबहादुर सोचने लगा- जहाज कहां से आ रहा है, और कितने किलोमीटर की किस दिशा की दूरी पर माल उतरेगा। बहुत गहन सोच के बाद ही उसे समझ में आया कि यह जहाज सिंगापुर से आ रहा है और भायंदर की तरफ से आएगा। अब माल किस जगह उतरेगा ? तो रायबहादुर ने सोचा कि 17 घंटे में उस जगह तक जीप में पहुंचा जा सकता है। जैसा कि वे चारों बोल रहे थे और जीप उबड़-खाबड़ रास्ते में भी 40 कि.मी प्रति घंटा की रफ्तार से चल सकती है। ऐसी स्थिति में 60 कि.मी. की दूरी होनी चाहिए। आईडिया (Idea) ठीक जमेगा। अब रायबहादुर सोचने लगा। क्यों न इन चारों सेठ को ब्लेकमेल (Blackmail) करके अपना उल्लू सीधा किया जाय। यह सब योजना बनाते-बनाते उसे 2-3 घंटे के लिए नींद आ गई। जब वह जागा तो फिर उसके मस्तिष्क ने अपनी योजना को मूर्त रूप देने के लिए सारी व्यवस्था बिठाने में गति देना प्रारंभ किया। नाश्ता करने के बाद रायबहादुर मनीष मार्केट (Manish Market) अर्थात् चोर बाजार में पहुंच गया। वहां सस्ते भाव में महंगी से मंहगी चीज मिल सकती है। एक ऑटोमेटिक (Automatic) ढंग से चलने वाला कैमरा खरीदा। एक छोटी सी आधुनिक सिस्टम (System) से चलने वाला टेपरिकार्डर (Tape Recorder) खरीदा। साथ ही साईलेन्सर (silenser) लगी पिस्तौल भी खरीद ली। सारी सामग्री खरीदने के बाद वह एक बार अपनी खोली पर पहुंच गया। वैसे दो-दो तीन-तीन दिन तक भी वह अपनी-खोली पर नहीं आता था। यह पड़ौसियों को मालूम था। अतः उसके आने न आने से कहीं कोई आश्चर्य महसूस नहीं होता था। आज वह तीन दिन बाद अपनी खोली पर आया था। अन्दर गया। और अपनी खाट पर सोकर अगली योजना को सफल बनाने के लिए चिन्तन करने लगा क्योंकि किसी भी पहलू पर फाल्ट (Fault) होने पर रायबहादुर को अपनी जान का खतरा था। अतः वह हर पहलू पर सूक्ष्मता से सोचा करता था। सायंकालीन 5 बजे बुलेटप्रुफ (Bullet proof) मोटर साइकिल किराए पर लेकर रायबहादुर सिंगापुर की तरफ से आ रहे पानी के जहाज के साथ साथ समुद्र के किनारे-किनारे उसे चलाने लगा। करीब घंटा सवा घंटा चलने {54} के बाद वह संकेतित स्थल पर पहुंच गया। उसे चार झोंपड़ियां दूर से नजर आने लगी वह समझ गया यही स्थल है, जिसके लिए सेठ लक्ष्मीचन्द रात को ईशारा कर रहा था। उसने झोंपड़ी के पास आकर उसका सूक्ष्मता के साथ अवलोकन किया। उसे देखकर आश्चर्य हुआ कि झोंपड़ी बाहर से जरूर घास फूस की है किन्तु भीतर में पक्की चूने पत्थर की बनी हुई है। एक झरोखा भी है। लेकिन इस समय बंद है। रायबहादुर को भीतर होने वाली बात को भी टेप करना था। अतः उसने झोंपड़ी के मुख्य द्वार पर जहां जाइंट पाइंट (Joint Point) था। वहां झोंपड़ी के बंद होने के बावजूद भी कुछ छिद्र बना रहता है। उस पाइंट (Point) पर टेपरिकार्ड (Tap Record) का क्लीप (Clp) लगा दिया। जो की रिमांट से सेट था। अतः दूर से ही उसे चालू किया जा सकता था। फिर उसने झोंपड़ी के मुख्य द्वार के सामने कुछ ही दूरी पर एक झुरमुट था वहां बैठकर मुख्य द्वार पर क्या हो रहा है, इसका पूरा ध्यान रखा जा सकता था। झोंपड़ी में बैठा आदमी आसानी से झुरमुट के भीतर की ओर नहीं देख सकता था, पर झुरमुट में बैठा व्यक्ति झोंपड़ी में देख सकता था। सब कुछ सावधानी के साथ निश्चय कर लेने के बाद रायबहादुर उस झुरमुट में सतर्कता के साथ बैठ गया और सिगरेट का धुंआ उगलने लगा। इधर वे सफेद पौश सेठ कहलाने वाले चारों ने सेठ रात्रि के 8 बजे अपनी कमाण्डर (Commander) जीप ली। उनमें से एक ड्रायविंग (Driving) करना लगा। उबड़-खाबड़ जमीन से एवं पत्थर से गाड़ी को बचाता हुआ। मंद मंद प्रकाश में ही गाड़ी आगे बढ़ाये जा रहा था। हाथ सधे हुए होने से कहीं कोई भारी झटका नहीं लगा था। करीब 972 बजे चारों सेठ कमाण्डर (Commander) जीप द्वारा मेन पाइंट (Main Point) पर पहुंच गए। यद्यपि चारों निर्भय थे। उनकी दृष्टि में यह सुरक्षित स्थान था। फिर भी जागरूक थे। बड़ी सावधानी से आगे बढ़ते हुए झोंपड़ी के पास पहुंचे। सब कुछ यथावत लगा। कहीं कोई अनहोनी नहीं थी। इधर रायबहादुर ने उनके आने से पहले ही 3-4 फर्लाग तक मोटर साईकिल के निशान मिटा दिये थे। ताकि उन्हें किसी तरह की शंका न हो। वैसे भी वह मोटर साईकिल को जीप वाले मार्ग से नहीं लाकर अन्य मार्ग से लेकर आया था। जिस मार्ग से जीप नहीं आ सके। ताकि उन्हें लाईट (Light) के प्रकाश में भी किसी वाहन के जाने का कोई निशान ही नजर नहीं आए और रायबहादुर छिपा भी ऐसी जगह था। जहां जल्दी से किसी की {55} ।

दृष्टि नहीं पड़ सकती। चारों सेठ बड़े इत्मीनान के साथ झोंपड़ी खोलकर अन्दर में चार्जेबल लाइट (Chargeble Light) जलाकर बैठकर गप्पें मारने लगे। अब उन्हें सिंगापुर से आने वाले जहाज का इन्तजार था जो कि ग्यारह बजे आने वाला था। रायबहादुर बड़ी सावधानी से भीतर में हो रही हर गतिविधि से दूर से ही दृष्टि जमाए था। रायबहादुर दूरबीन साथ लाना भी नहीं भुला था। पेन्सिल टार्च (Pencil Torch) को दूरबीन से सेटकर वह उस दूरबीन से बड़े आराम से भीतर होने वाली गतिविधि को देख पा रहा था। करीब एक घंटे के बाद समुद्र की छाती पर दूर से आ रही भारी भरकम सीप नजर आने लगी। जहाज ज्यों-ज्यों नजदीक आ रहा था, त्यों-त्यों लाल लाईट (Light) जल बुझ रही थी। इधर ये चारों सेठ तस्कर भी सावधान हो गए थे। उन्होंने भी अपनी तरफ से हरी लाईट (Light) जला बुझाकर लाईन क्लीयर (Line Clear) होने का संकेत दिया। इसके तुरन्त बाद पास वाली झोंपड़ी से एक छोटी सी पनडुब्बी निकाली और उसे पानी में उतारकर दो सेठ उसे चलाते हुए सिंगापुर से आ रहे जहाज के पास ले गए। उसके पिछले भाग से उसे जोड़ दिया गया। जहाज बड़ी ही मंद गति से सरकने लगा। इसी बीच जहाज के कर्मचारी दिलीप व मुदित ने सिंगापुर से आए दो नम्बर के माल के पैक बंद बक्से पनडुब्बी में डालने लगे। कोई दो मिनिट में सारा माल पनडुब्बी में डालकर उसका बड़े जहाज से संबंध काट दिया गया। शिप बड़ी तेजी के साथ आगे चल पड़ा और पनडुब्बी को दोनों सेठ खेते हुए किनारे ले आए। किनारे लगने पर पहले से खड़े दो अन्य सेठों ने माल को पनडुब्बी से निकालना प्रारंभ किया। और बोरे उठा-उठाकर झोंपड़ी में ले जाकर डालने लगे। जब सारा माल झोंपड़ी में पहुंच गया। तब उस पनडुब्बी को पानी से निकाला और फिर पास वाली झोंपड़ी में रखकर उसे बंद कर दिया। अब वे मुख्य झोंपड़ी में आकर बोरे खोलने लगे और माल बाहर निकालने लगे। एक व्यक्ति दूसरे व्यक्ति को माल गिना रहा था। उसमें वह बोल रहा था सोने की छड़ें 500, घड़ियां 500, कैमरे 100, हीरों के हार 100, मोतियों के सेट 200 ऐसे सभी माल को निकाल कर गिना रहे थे और उनकी कीमत बतलाकर माल का हिसाब लगा रहे थे। उनकी योजनानुसार 20 करोड़ के माल में 10 करोड़ का प्रॉफिट (Profit) स्पष्ट नजर आ रहा था। रायबहादुर पूरी तरह जागरूक था। जब ये चारों बात करने लगे थे। ठीक उसी वक्त रिमोट (Remote) से उसने टेप रिकार्डर चालू कर दिया । {56} . था। जिसमें सारी बातें टेप होती जा रही थी। यही नहीं दूर से वह सारे माल की कैमरे से फोटो भी लेता जा रहा था। सेठों ने निश्चित होने से झोंपड़ी का दरवाजा भी बंद नहीं किया था। इसलिए रायबहादुर को फोटो लेने में भी कहीं कोई दिक्कत नहीं आ रही थी। यही नहीं जब बड़े सीप से माल दिलीप मुदित कर्मचारी द्वारा पनडुब्बी में डाला जा रहा था। उस समय की फोटो भी रायबहादुर बड़े आराम से ले रहा था। क्योंकि उसके कैमरे के आगे दूरबीन जो लगा था। वह आधा किलोमीटर दूर की फोटो भी बड़े आराम से लेने का सामर्थ्य रखता था। करीब 2 घंटे में सारा माल अलग-अलग व्यवस्थित करके चारों सेठों ने बोरों में भर कर कमाण्डर जीप में चढ़ाया और बड़ी सतर्कता के साथ गाड़ी को चलाते हुए बॉम्बे की ओर बढ़ते चले गए। इसके बाद भी रायबहादुर काफी देर तक झुरमुटे की ओट में बैठा रहा। जब आधे घंटे तक भी वहां पर कोई हरकत नहीं हुई तब वह वहां से निकला और झोंपड़ी के पास लगे टेप रिकार्ड के तार को निकाला और सभी यंत्रों को व्यवस्थित रूप से झोले में डालकर वहां से धीरे-धीरे सावधानी के साथ चलता हुआ झाड़ी की ओट में पड़ी मोटर साइकिल के पास पहुंचा और उसे स्टार्ट करके उसी उबड़ खाबड़ पगडंडी से उसे चलाता हुआ कोई चार बजे बॉम्बे में अपनी खोली पर पहुंच गया। रातभर जागते रहने से रायबहादुर की आंखों में भी नींद आने लगी थी। अतः उसने अब कुछ देर आराम करना ही उचित समझा और वह अपने टूटे-फूटे साधारण पलंग पर आकर लेट गया। {57} वातानुकूलित शानदार ऑफिस में सेठ लक्ष्मीचंद सिगार पी रहा था। इतने में बाहर से वाचमेन आया उसने कहा कि कोई नौजवान आपके नाम से यह लिफाफा दे गया है। ऐसा कह कर वह लिफाफा सेठ लक्ष्मीचंद की टेबल (Table) पर रखकर वह बाहर चला गया। सेठ ने भी आश्चर्य मिश्रित जिज्ञासा के साथ वह लिफाफा खोला तो उसे एक पत्र हाथ लगा उसमें लिखा था-" सेठ लक्ष्मीचंद ! तुम ऊपर-ऊपर से जाने माने हीरे जवाहरात के व्यापारी हो लेकिन अन्दर में क्या हो? यह बात शायद ही कोई जाने कि तुम इस देश के गद्दार जाने माने तस्कर हो। अपने स्वार्थ के पीछे इस देश को लूट खसोट कर खाने वाले हो। इसके साथ एक टेप कैसिट और कुछ छाया चित्र भेज रहा हूं। इन्हें बड़े इत्मीनान से देख लेना। जिससे तुम्हारी काली करतूतें तुम्हारे सामने आ जाएगी और कैसिट को भी सुन लेना। जिसमें तुम्हारी अत्यन्त विवादास्पद बातें टेप है। अभी तो यह तोहफा तुम्हारे पास ही भेजा जा रहा है, पर हमारी, बात न मानने पर यही तोहफा देश की गुप्तचर एजेन्सी (Agency) सी.बी.आई को और पत्रकारों को भी भेजा जा सकता है जिसके बाद तुम्हारे बचने की कहीं कोई जगह नहीं होगी। यदि तुम्हें बचना है तो बिना किसी होशियारी के बोरीवली नेशनल पार्क (Borivalli National Park) के गांधी धाम पर राईट की दिशा में एक पत्थर के पास एक करोड़ रुपये भरकर ब्रीफकेश (Briefcase) रख दो तो तुम्हें कोई खतरा नहीं होगा। अन्यथा तुम तो क्या तुम्हारे परिवार का कोई भी सदस्य नहीं बच सकेगा। खबरदार !!! यदि पुलिस को या अन्य किसी गुंडा तत्त्व को सूचित करने की कोशिश की तो तुम्हें कहीं का भी नहीं रखा जाएगा। तुम्हारी जिन्दगी और मौत, तुम्हारे हाथ में। हमारे आदमी तुम्हारी और तुम्हारे साथी बिहारीलाल, कजोड़ीमल, मुरारीलाल पर भी कदम-कदम पर कड़ी निगरानी रखे हुए हैं। जरासे ईशारे पर वहीं ढेर कर दिये जाओगे। तुम्हारा हित चिन्तक यह पढ़ते ही तो सेठ लक्ष्मीचंद को ए.सी. (A.C.) में भी पसीना छूट गया और वह घबरा उठा। उसी घबराहट के बीच जब उसने फोटो देखे तो अन्दर तक कांप उठा। यह वे चित्र थे जिसमें शिप से माल उतारकर पनडुब्बी में डाला जा रहा है। दिलीप, मुदित कर्मचारियों के फोटो भी साफ है। फिर {58} । पनडुब्बी से माल झोंपड़ी में पहुंचाया जा रहा है। यही नहीं सारे माल को खोल-खोलकर अलग किया जा रहा है, उन सबके भी छाया चित्र है। करीब 30 फोटो थे। जो कि लक्ष्मीचन्द सेठ के डराने के लिए पर्याप्त थे। जब कैसेट सुनी तब तो सेठ लक्ष्मीचन्द की रही सही हिम्मत भी चूक गई। उस कैसेट में उन चारों की साफ आवाजें आ रही है कि 500 सोने की छड़ें है, घड़ियां 500 कैमरे, 100 हीरों के हार, 200 मोतियों के सेट आदि..... 1 20 करोड़ का माल 10 करोड़ का प्रॉफिट......... | सारी बातें सेठ लक्ष्मीचंद एवं उनके साथियों की आवाज में टेपरिकार्डर बोलता जा रहा था। बस बस ! अब तो सेठ लक्ष्मीचंद की आंखों में अंधेरा छाने लगा। अब तक की गई हराम की कमाई का परिणाम भविष्य में अंधेरे के रूप में सामने आने लगा। वह समझ गया कि हमारे पीछे कोई बहुत ही शातिर एवं तेज तर्राट आदमियों की गेंग लगी हुई हैं। यदि जरासी भी गलत हरकत की तो संपत्ति ही नहीं जान से भी हाथ धोना पड़ेगा। पुलिस में चले गए तो रही सही इज्जत भी जाएगी। बहुत देर वह होश में आया तो तुरन्त ही अपने साथी मुरारी, बिहारी एवं कजोड़ीमल को फोन किया और जल्दी से जल्दी आपातकालीन मीटिंग (Meeting) करने के लिए होटल ताज का 520 नम्बर का कमरा बुक किया गया। आधे घंटे में ही चारों ताज होटल पहुंच गए। कमरा नम्बर 520 में। सभी की जेबों में साइलेन्सर (Silenser) लगी ऑटोमेटिक (Automatic) रिवाल्वर (Revolver) थी। पता नहीं कौनसा खतरा कब सामने खड़ा हो जाय। कमरे को पूरी तरह अन्दर से बंद कर दिया गया। सेठ बिहारीलाल ने कहा- लक्ष्मीचन्द ! तेरे आज इतने होश क्या उड़े हुए हैं। ऐसी क्या घबराहट हो गई है। क्यों तुमने आपातकालीन मीटिंग बुलाई है ? वह पता नहीं प्रश्नों की कब तक बौछार करता रहता। इससे पहले ही मुरारी बोला-यार तुम भी कोई आदमी हो। बिचारे लक्ष्मी को बोलने तो दो, आखिर यह चूहा किसी बिल्ली को देखकर इतना डरा-डरा सा हो गया। इतने में कजोडीमल बोला- कोई बात नहीं मैंने इसकी बिल्ली को डराकर भगाने के लिए कई कुत्ते पाल रखे हैं। लक्ष्मीचंद बोला- यार तुम अपने आपको पता नहीं क्या तीसमारखां मानने लगे हो दुनियां में एक से एक धुरंधर बैठे हैं। कंस अपने को अजेय मानता था, वह भी मारा गया। रावण की सोने की लंका भी मिट्टी में मिल गई। केवल अपनी शक्ति का गुमान मत करो, तुम लोगों से भी बढ़कर दिमागी लोग दुनियां में बैठे हैं। यदि पुलिस के कुत्ते होते तो मैं {59) उन्हें कच्चा ही चबा जाता। पर यह तो कुत्ता नहीं शेर है शेर। अभी तो तूने देखा ही कहां है। देखोगे तो पता चल जाएगा। तो यार ! फिर बतादे ऐसा कौनसा शेर पैदा हो गया है, इस अपराध जगत में। जो हम जैसों को भी आंखें दिखाने लगा है। बिहारी के कहने पर सभी शांत होकर लक्ष्मीचंद की अगली बात सुनने लगे। सेठ लक्ष्मीचंद ने वह पत्र उनके सामने रख दिया। लो पहले इसको पढ़लो। जब तीनों ने पत्र पढ़ा तो उन्हें लगा जैसे बिजली का नंगा तार छू लिया हो, एकदम उछल पड़े। फिर जब फोटो देखे और कैसेट देखी तो उनका भी लक्ष्मीचन्द जैसा हाल हो गया। बल्कि उससे भी ज्यादा बदहाल। एक बोला- यार ! वाकई यह तो बहुत ही खतरनाक खेल है। कैसे पार पड़ेगी यह बात। लक्ष्मीचंद बोला- है इस शेर को पिंजरे में डालने की ताकत। यह तो तुम जैसों को कच्चा ही चबा जाय ऐसा है। हां यार ! मान गए इस बहादुर को। समझ में नहीं आया उस जंगल में कहां से उसने अपनी आवाज टेप कर ली। यही नहीं फोटो भी ले लिए। लगता है उसकी गेंग में 2-4 आदमी न होकर 10-20 आदमियों की गेंग लगती है। अन्यथा इतना बड़ा जाल नहीं रचा जा सकता था। बिहारीलाल बोला दोस्तों ! यह तो हो गया सो हो गया अब करना क्या है, यह सोचने वाली बात है। मुरारी बोला- सोचना क्या है - अभी तो उसे कहे अनुसार उसे एक करोड़ रुपये दे देना चाहिए। अन्यथा ऐसे ही बर्बाद हो जाएंगे। मांग कोई बहुत बड़ी नहीं है, यह तो 5 या 10 करोड़ मांग ले तो भी देना पड़े। खैर 1 करोड़ रुपये देकर अभी तो अपना पिण्ड छुड़ाया जाय। फिर भविष्य में ऐसी ब्लेकमेलिंग (Blackmailing) न हो इसका पुख्ता इन्तजाम करना होगा। सभी ने रायमशविरा करके यह निर्णय लिया। इसमें किसी भी प्रकार की चिटिंग नहीं करना है। यदि गफला करने की कोशिश की तो खतरा बढ़ सकता है। चारों ने मिलकर उसी वक्त 25-25 लाख रुपये का इन्तजाम किया। 500-500 रुपये के नोटों की गड्डियां कोई 200 गड्डियां बनाई गई। उन्हें एक ब्रीफ केश (Briefcase) में भरकर निर्देशानुसार ठीक रात्रि 10 बजे वे अपनी मर्सिडिस (Mercedes) गाड़ी में बैठे और बोरीवली नेशनल पार्क की ओर बढ़ते चले गए। रायबहादुर ने जाल तो इस तरह बिछाया कि उन्हें हकीकत में इस जाल के भागीदार 10-20 आदमियों का अहसास होने लगा। जबकि यह थी . । {60} एक ही आदमी की दिगामी साजिश। जिस में बड़े-बड़े तीस मारखा भी फंस गए। रायबहादुर कोई रात्रि की 10 बजे के बाद में ही गांधीधाम से कोई 200 मीटर की दूरी पर शस्त्रों से लेस होकर बैठ गया। जहां से निर्देशित स्थान नजर आ सकता था। यद्यपि उसे विश्वास था कि जिस तरह का जाल बिछाया गया है उसमें तो कही गड़बड़ होने की संभावना नहीं है। फिर भी सावधानी रखना जरूरी था। ठीक 11 बजने के 2 मिनिट कम में एक छाया उभरती नजर आई और वह निर्देशित पत्थर की ओर बढ़ रही थी। रायबहादुर को समझते देर नहीं लगी कि यही लक्ष्मीचंद है। वह उसी रेंज (Range) में पिस्तोल ताने देखता रहा। कहीं कोई गलत हरकत तो नहीं हो रही है ? उस छाया ने पत्थर के पास पहुंच कर उसके एक किनारे ब्रीफ केश (Briefcase) रख दिया। और बड़ी सावधानी के साथ वह छाया गांधी स्मारक की और बढ़ती चली गई। कुछ दूरी पर जाने के बाद मर्सिडिस गाड़ी में बैठकर साथ रवाना हो गए। कहीं कोई गड़बड़ नहीं फिर भी इत्मीनान के तौर पर कुछ देर तक इन्तजार करना जरूरी था। रायबहादुर के दिमाग मे एक आशंका यह भी थी कि हो सकता है- बिफकेश में रुपये न होकर टाइम बम हो और उठाते ही फट जाय तो मारा जाऊंगा। अतः एक घण्टे की लगातार प्रतीक्षा के बाद कहीं कोई अघटित नहीं हुआ, तब वह धीरे-धीरे उस पत्थर की ओर बढ़ने लगा। पत्थर के पास पहुंचकर पहले उसने ब्रीफकेश को अपने ढंग से जांच की। जब उसे कहीं कोई गड़बड़ नजर नहीं आई। तब वह उसे उठाकर एक बड़े पत्थर की ओट में बैठकर खोला। पेन्सिल टार्च से देखा तो मालूम हुआ कि 500-500 के नोटों की गड्डियों से भरा है। देखते ही उसकी आंखों में एक चमक उतर आई। फिर भी वह बहुत सावधान था। उसे यह लग रहा था कि एक भी गलत कदम उठ गया तो जिन्दगी खतरे में पड़ सकती है। अतः उसने तुरन्त उसे बन्द करके आहिस्ता-आहिस्ता नीचे उतरना प्रारम्भ कर दिया। फिर सड़क पर आकर त्रिमूर्ति के रास्ते से होता हुआ मैन गेट (Maingate) के पहले ही राजेन्द्र नगर की तरफ छलांग लगाकर बंगड़ीकार खाने की तरफ से आगे बढ़ता हुआ मैन रोड़ (Mainroad) के उस पार खड़ी अपनी टैक्सी तक सुरक्षित पहुंच गया। ब्रीफकेश को टैक्सी में रखा और स्टार्ट (Start) करके चल पड़ा अपनी खोली की ओर । । {61} -10- आज रायबहादुर की खोली में उसके नये दोस्त करीम, जहीन, किरीट, अब्दुल रहमान, सलमान, विनोद, राजेश की एक गुप्त मंत्रणा होने लगी। रायबहादुर बोलो-दोस्तों ! नेक नीयति से चलकर कोई भी जिन्दगी में खास सफलता नहीं प्राप्त कर पाया है। ये बड़े-बड़े धनवान लोग जो आज फाइव स्टार होटलों में एश कर हम जैसे गरीबों की मजाक उड़ा रहे हैं कहते हैं- जिसकी लाठी उसकी भैंस"। ऐसी स्थिति में हमें भी कुछ न कुछ बड़ी छलांग लगानी होगी। छोटे-छोटे पाकिट मारने से पेट तो भर सकता पर एश नहीं हो सकता। फिर हर समय खतरा भी बना रहता हैं इसलिए मैं सोचता हूं कि अपन सब मिलकर एक जुट होकर कोई बड़ा काम करे जिसमें करोड़ों की आय हो। रायबहादुर के मुख से ऐसी बात सुनकर सलीम बोला-दोस्त ! हम भी चाहते तो यही हैं। पर हमें ऐसा कोई काम मिल नहीं रहा है। जिससे करोड़ों का धन मिल जाए। यदि किसी व्यक्ति का किडनेप (Kidnap) करते हैं तो खतरा हर वक्त बना रहता है। 2-4 बार ऐसा किडनेप (Kidnap) करने पर पकड़े जाने की पूरी संभावना बनी रहती है। अतः इतना बड़ा खतरा भी मोल नहीं ले पा रहे हैं। इसी बीच विनोद बोला- दोस्तों ! हमें रायबहादुर की तीव्र बुद्धि पर भरोसा है। यदि वह कोई योजना बनाता है तो हम उसे करने को हर वक्त तैयार हैं। हमारी तो बुद्धि भी इतनी काम नहीं करती है। इतने में राजेश बोल पड़ा-बिलकुल सही बात कही है विनोद ने। रायबहादुर जब से इस धारावी झोपडपट्टी में आया है तब से यहां के रहन-सहन में भाइचारे में काफी सुधार हुआ है। दिल और दिमाग दोनों से तेज है दोस्त हमारा। इस प्रकार सभी अपने-अपने विचार रखते चले गए। अब रायबहादुर सबकी बात ध्यान से सुनता हुआ उनके शब्दों के आधार पर उनकी मानसिकता की परख कर रहा था। अंत में वह बोला-दोस्तों! किसी भी काम को अन्जाम देने से पहले हमें संगठित होना जरूरी है। अन्यथा कोई भी काम पूरी तरह सफल नहीं हो सकता। संगठित होने के लिए कुछ बातों का दृढ़ता के साथ ध्यान रखना जरूरी होगा। सभी दोस्त एक साथ बोले-बोलो बोलो जो भी तुम कहोगे, हम सबको सहर्ष मंजूर है। {62} रायबहादुर ने अपनी बातें आगे बढ़ाते हुए कहा सुनो प्रथम तो यह कि हम में से कोई भी एक दूसरे के साथ जरा भी धोखा करने की कभी कोशिश नहीं करेगा। एक दूसरे के प्रति पूरी तरह ईमानदारी से रहना है। दूसरी बात किसी के भी कभी कहीं पकड़े जाने पर उसके छुड़ाने की एवं उसके परिवार के पालन-पोषण की सारी जिम्मेवारी मेरी होगी। लेकिन उसकी जिम्मेवारी यह होगी कि पकड़े जाने के बाद भी मरना मंजूर करले पर अपने साथियों का नाम नहीं बताना और न ही हमारे अति गोपनीय स्थानों की जानकारी देना यदि किसी ने भी धोखा देने की कोशिश की तो उसे गोली से उड़ा दिया जाएगा। जिसे जो काम करने का निर्देश दिया जाएगा उसे वही काम पूरी हुशियारी के साथ करना होगा। । सभी दोस्तों ने रायबहादुर की बात ध्यान से सुनी और उसी अनुसार चलने की कसम खाई। और सबने मिलकर बहादुर गेंग की घोषणा की जिसका सरदार रायबहादुर को घोषित कर दिया। रायबहादुर ने आठों दोस्तों को उसी वक्त 25-25 हजार रुपये दिये और कहा कि सभी अपने कपड़े नये बनालो। बाल आदि बनाकर सवांरकर अपटू डेट (Uptodate) हो जाओ। मवाली की तरह नहीं रहना है। अगला काम फिर कभी बताऊंगा। सभी लड़के सल्यूट मारते हुए खोली से बाहर हो गए। सभी की आंखों में एक उत्साह भरी चमक थी कि अब भविष्य सुनहरा है। इधर रायबहादुर का पत्र शिप के कर्मचारी दिलीप, मुदित के पास पहुंचा। उसमें लिखा था-दोस्तों ! तुम्हारी कार गुजारियों का छायाचित्र साथ में है, उसे भी देख लो। यदि तुमने हमारा काम नहीं किया तो हम तुम्हें कहीं का नहीं रखेंगे। तुम्हारी ही नहीं तुम्हारे परिवार की जिन्दगी भी हमारे हाथों में हैं यदि कुछ भी गड़बड़ की तो सब कुछ साफ होते देर नहीं लगेगी। यदि तुमने हमारा भी काम किया तो सुख पाओगे। नहीं तो मार दिये जाओगे। सोचलो तुम्हें क्या करना है। शाम को 6 बजे तुमसे फोन पर बात होगी। तैयार रहना। यह बात पक्की है कि हमारे पर भरोसा करोगे तो धोखा नहीं खाओगे। दिलीप, मुदित ने पत्र पढ़ने के साथ ही जब अपने फोटो देखे तो अवाक रह गए। ये वे फोटो थे जिसमें वे शिप से माल पनडुब्बियों में डाल रहे थे। सोचने लगे यह तो भारी आपत्ति जनक फोटू है ये, अगर आगे पहुंचा दिये जाय तो नौकरी चले जाने का खतरा है। जेल में भी जाना पड़ सकता है। करें क्या ? {63} मुदित ने दिलीप से कहा-सुनो ! खतरा क्यों मोल लिया जाय। क्यों न हम उनकी बात मान लें और हमारे योग्य कोई बात हो तो या कोई काम हो तो कर देना चाहिए। ताकि हमें भी लाभ ही होगा, क्योंकि उन्होंने लिखा है कि हमारे यहां धोखा नहीं खाओगे। सब निर्णय करने के बाद वे फोन का इन्तजार करने लगे। ठीक समय पर फोन आ गया- हेलो-हेलो के साथ ही आवाज गूंजी। क्यों दोस्त क्या निर्णय है तुम्हारा। दिलीप- वाकई तुम एक जोरदार चीज हो। दूर की कोड़ी मारी है। हम तुम्हारी बुद्धि के कायल हैं। जो भी तुम कहोगे हमारे योग्य होगा, वह हम करने को तैयार हैं। दोस्तों! तुमसे मुझे यही आशा थी। इसीलिए मैंने तुम्हें पहले ही दोस्त मान लिया था। हम भी दोस्ती निभाएंगे और तुम्हें भी निभाना है। अभी तो कोई खास काम नहीं है पर कुछ ही दिनों में सिंगापुर से शिप में माल भरेंगे उसे तुम्हें सुरक्षित रखना है। और बंबई से 150 किलोमीटर की दूरी पर कुछ मछुआरों की नौकाएं मिलेगी। वे जब सफेद झंडा दिखाएंगे तो उनकी नौका में माल उतार देना। एक खेप में तुम्हें 50 हजार रुपये दिये जायेंगे। मान गए दोस्त, मान गए तुमको। तुम भी बहुत ऊंची चीज हो। रायबहादुर ने बड़ी हुशियारी से दिलीप और मुदित दोनों शिप कर्मचारियों को अपनी जाल में फंसा लिया। अब बहादुर करीम जो कुछ होशियार था, उसको साथ लेकर सिंगापुर, बैंकाक, हांगकांग आदि पास के अनेक देशों की यात्राएं की और करीब 50 लाख का माल खरीदा। उस सारे माल को इण्डिया की शिप में चढ़ा दिया गया और रायबहादुर और करीम, फ्लाइट से पुनः बाम्बे पहुंच गए। । बॉम्बे से 150 कि.मी. दूर पर ही चार मछुआरों को 100-100 रुपये का लोभ देकर सारा माल उतरवा लिया गया। वहां पर जहीन व अब्दुल पहले से ही टैक्सी लेकर पहुंचे हुए थे। उन्होंने सारा माल टैक्सी में उतरवा लिया। और रायबहादुर के निर्देशानुसार वे उस टैक्सी को लेकर सूरत पहुंचे। वहां पर पहले से ही चार सुनार तैयार थे। जिनके माध्यम से उस सोने को गलाकर उसके हार बनवाए गए। और उन्हें बॉम्बे में पहले से ही फिक्स शोरूम में बेच दिये गए। प्रथम बार ही उन्हें इस व्यापार में करीबन 1 करोड़ का लाभ हुआ। सभी दोस्तों को आठ इम्पोर्टेड (Imported) आटोमेटिक कैमरे, रिवाल्वर, टेपरिकार्डर आदि दिलवा दिये गए। इसके साथ ही बॉम्बे कस्टम विभाग से संपर्क साधा गया। क्योंकि शिप (Sheep) से माल लाने में महीना लग जाता है। व्यापार में तेजी नहीं आ सकती थी। अतः कस्टम के अधिकारी से गुप्त {64} - मंत्रणा करके हर एक ट्रिप (Trip) में आने वाले माल पर 10 व्यक्तियों को 50-50 हजार रुपये बांध दिये। छोटे कर्मचारियों को 25-25 हजार रुपये देना निश्चित कर दिये। पायलेट और परिचारिकाओं तक के 10-10 हजार रुपये देने का आपस में समझौता कर लिया। इस प्रकार विदेशी कस्टम विभाग से भी सम्पर्क साधा गया। उनके भी इसी रीति-नीति से रुपये बांध दिये। सुरक्षा का पुखता इन्तजाम कर दिया गया। कहीं कोई खतरा नहीं रहा। रहमान और सलमान के साथ में करीब 5 करोड़ के पन्ने, माणक और हीरे लेकर उन्हें अमेरिका भेजा गया था। उसने वहां के व्यापारियों से बात करके सारा माल उचित दामों में बेच दिया। इस बार भी उन्हें विशुद्ध पांच करोड़ का प्रॉफिट हुआ। रहमान और सलमान का दूसरा ट्रिप इण्डिया से अमेरिका का था। रायबहादुर ने यहां सस्ते भावों में 5 करोड़ की हीरोईन खरीदी और उसे अमेरिका में ऊंचे दामों में बेचकर फिर उसमें 5 करोड़ रुपये कमाएं। इस प्रकार उनका व्यापार चल निकाला। उस बहादुर गेंग के आठों सदस्य रायबहादुर के ईशारे पर अपनी जान देने तक को तैयार रहते थे। रायबहादुर भी उनका पूरा ध्यान रखता था। ज्यों-ज्यों अच्छी कमाई हुई रायबहादुर ने बोरीवली, दहीसर भायन्दर, गोरेगांव में अच्छी-अच्छी जगह एक एक बिल्डींग में दो-दो फ्लेट खरीद लिए समुचित व्यवस्था कर दी। स्वयं रायबहादुर ने अपने लिए जुहू पर समुद्र के किनारे फिल्मी सितारों के बंगले के पास ही एक आठ करोड़ रुपये में बंगला खरीद लिया। जहां पर चार नौकरों के अलावा रहने वाला अब तक वह अकेला ही था। माता कुसुमवती और बहिन विमा को तो वह कोटा ही छोड़ आया था। जिन्हें छोड़े करीब 2 वर्ष हो चुके थे। जबकि वह उन्हें साल छ: महीने मे ही कमाकर लाने का आश्वासन देकर आया था। एक रात को सोते हुए उसके मन में विचार आया कि अरे ! मुझे तो ध्यान ही नहीं रहा। मैं तो यहां करोडों में खेल रहा हूं। मेरी माता और बहिन विभा अपना खर्च कैसे चला रहे होंगे? उनके पास तो महिने भर का राशन भी नहीं था। मैं उन्हें यह कहकर चला आया था कि इधर-उधर से उधार लेकर काम चला लेना। लेकिन गरीब को उधार भी कौन देता है। गरीब की हर कोई मजाक उड़ाने में रहता है। ऐसी स्थिति में उन दोनों के साथ क्या बीत रही होगी। जल्द ही कोटा जाना चाहिये। इसी बीच उसे अपने कोटा के हैवान दोस्तों का भी ख्याल आया। जिनकी स्वार्थ परस्थी के के कारण उसके पिता का स्वर्गवास हुआ था। और उस जैसे शरीफ इन्सान को अपराध के दलदल में उतरना पड़ा और मैं कहां से कहां तक पहुंचता जा {65}

रहा हूं। यह सब उन दुष्टों की देन है अब मैं उन्हें नहीं छोडूंगा । उनसे बदला
लेना ही है। यह सोचते हुए कि कल ही बाम्बे दिल्ली राजधानी से दोस्तों के
साथ कोटा जाने का निर्णय लेकर वह सो गया।
{66}

-11- मम्मी अब मैं बॉम्बे जाकर धन कमाना चाहता हूं। यहां तो नौकरी करने पर भी उदर पोषण जितना भी अर्थोपार्जन होना मुश्किल है। मैं तुम्हें विश्वास दिलाता हूं कि करीब 1 वर्ष में वापस लौट आऊंगा। तब तक बहुत कुछ कमा लूंगा। ताकि हम आराम से जिन्दगी व्यतीत कर सकें। कुसुमवती बोली- नहीं बेटा नहीं ! मैं अब तुम्हें कहीं पर भी भेजना नहीं चाहती। चाहे आराम से जीएं या दुःख से रहें। पर रहेंगे एक साथ ही। तेरे पिता भी इस दुनिया में नहीं रहे और तूं भी यहां से चला जाय, तब फिर हमारा सहारा कौन रहेगा। अब तुम ही एक मात्र सहारे हो अतः यहीं पर रहो। अनुराग बोला- मम्मी ! आपका कहना किसी दृष्टि से ठीक है किन्तु मैं आपको छोड़ कहीं भाग नहीं रहा हूं। किन्तु धन कमाने के लिए कुछ तो करना ही पड़ेगा। एक वर्ष की तो बात ही है। 1 वर्ष के बाद तो मैं आ ही जाऊंगा। यद्यपि माता कुसुमवती और बहिन विमा, भाई को भेजने के लिए कतई तैयार नहीं थी। पर अनुराग का दृढ़ निश्चय देखकर उन्हें भी झुकना पड़ा। एक दिन अनुराग शुक्ला बॉम्बे के लिए रवाना हो गया। बॉम्बे जाकर वह अनुराग के स्थान पर रायबहादुर बन बैठा। जहां उसने अपना जोरदार रूतबा जो जमा लिया था। इधर कुसुमवती और विमा पर तो मानो दुःख का पहाड़ ही टूट पड़ा था। वे किधर की भी नहीं रही। फिर भी जीना तो था। 2-4 दिन तो ऐसे गमगीन माहौल में निकलते चले गए। विभा की कॉलेज भी छूट गई थी। घर की स्थिति भी नाजुक थी। महीने भर जितना राशन तो था ही, आगे क्या होगा दोनों को यह चिन्ता खाए जा रही थी। 10-15 दिन बीत जाने के बाद कुसुमवती ने आसपड़ौस में कुछ काम करना प्रारंभ किया। कहीं बर्तन मांजना तो कहीं कपड़े धोना तो कहीं घर की सफाई। विमा नहीं चाहती थी कि मेरे रहते मां काम करे। पर कुसुमवती जवान लड़की को कहीं बाहर किसी के घर भेजने के लिए तैयार नहीं थी। यों करते-करते गुजर बसर होने जितना साधन जुटने लग गया। इधर कॉलेज में अनुराग के दोस्तों के दोस्तों के बीच चर्चा होने लगी। कमल ने जयेश से कहा यार ! अनुराग ने तो कॉलेज छोड़ दी। वह तो बहुत दिन से {67} कॉलेज नहीं आ रहा है। जयेश बोला- यार ! खोज करना चाहिये। आखिर क्या बात हुई। वह क्यों नहीं आ रहा है। इतने में बीच में पारस बोल पड़ा यार ! उसके बाप का एक्सीडेंट हो गया था, तो हम से पैसे मांगने आया। उसे 10 हज़ार रुपये चाहिये थे। यह बात अलग है कि अपने पास जेब खर्च के लिए पैसे काफी रहते हैं। पर वह इसलिए तो नहीं कि उन पैसों को ऐसे फटीचरों के लिए उड़ा दिया जाय। वैसे भी अपन इतने धर्मीजीव नहीं जो दान करते फिरें। हो सकता है उसे कहीं सहयोग नहीं मिला हो और उसका पिता मर गया हो तो घर की स्थिति डावाडोल भी हो सकती है। क्योंकि उसके घर में उसके बाप के अलावा कमाने वाला कोई नहीं है। राजीव ने भी पारस की बात में हां में हां मिलाई। बात मुझे भी ऐसी ही लग रही है। तब फिर क्या एक बार उसके घर जाकर देखना चाहिये। उसकी एक बहिन विमा भी तो है। वह भी अब तो बड़ी हो गई है। उसका क्या हाल है, जानकारी करनी चाहिये। तब कमल ने कहा-फिर चलो चलें, अभी ही। परस्पर परामर्श करके पांचों दोस्तों ने अपने टू व्हीलर (Two Wheeler) तो वहीं छोड़े और पारस की मारूति वन थाउजेंट (One Thousand) में बैठकर सभी रखियाल की ओर चल पड़े। कुछ दूर चलने के बाद ही पारस को ध्यान आया और वह बोला कि यार ! अपन जा तो रहे हैं, पर यदि अनुराग वहीं हुआ और वह अपनों को देखकर नाराज हो गया तो एक नई आफत खड़ी हो सकती है। क्योंकि जब वह पिता के एक्सीडेंट (Accident) होने पर रुपये मांगने आया था। तब हमने उसे नहीं दिये थे। उसको गुस्सा भी हो सकता है। इतने में पंकज बोल पड़ा यार ! वह बहुत शरीफ आदमी है। नाराज होने वाला नहीं है। अगर हो भी गया तो हम कह देंगे कि हम तो तुम्हें सहयोग करने आए हैं। वैसे भी वह मेरे पास तो रुपये मांगने आया नहीं था अतः मुझसे तो नाराज होने का कोई प्रश्न ही नहीं उठता है। पारस बोला तब ठीक है, पहले उसके घर में तुम लोग जाना जब ऐसी कोई झंझट नहीं हो तो फिर मुझे बता देना। मैं दूर खड़ा रहूंगा। ईशारा पाते ही आ जाऊंगा। पंकज बोला- ठीक-ठीक है यों बात करते-करते ही रखियाल आ गया। कच्ची बस्ती थी। कुछ दूरी पर गाड़ी रोक दी गई। {68} पारस को छोड़कर चारों दोस्त चलकर अनुराग के घर पर पहुंचे निहायत सीधा सादा घर था। एक कमरे और एक रसोई थी। जब वे घर में घुसे उस वक्त कुसुमवती के पेट में तेज दर्द हो रहा था। विमा उसका उपचार करने में लगी थी। तेल से पेट को मसल रही थी पर वह ठीक नहीं हो रहा था। वह दर्द से कराह रही थी। और अनुराग को पुकार रही थी। पर अनुराग वहां था कहां। ज्योंही राजीव ने देखा कि कुसुमवती की तबियत खराब और वह अनुराग-अनुराग पुकार रही है। त्योंही वह बोल पड़ा माता जी। चिन्ता मत करिये अनुराग का दोस्त मैं आ गया हूं। चलिये जल्द करिये मैं आपका इलाज करा देता हूं। उसने तुरन्त पारस को इशारा करके गाड़ी, मकान के बाहर मंगवाली और कुसुमवती एवं विमा को गाड़ी में बिठाकर पास ही क्लिनिक (Clinic) में ले गए। डॉक्टर को दिखाने के बाद डॉक्टर के कथनानुसार पास ही के मेडिकल स्टोर्स (Medical Store) से दवा खरीदकर एक टेबलेट तो उसी वक्त खिला दी गई बाकी दवा साथ लेकर उन्हें कार में बिठाकर रखियाल में उनके घर पर छोड़ दिया गया। दवा से दर्द में फर्क पड़ गया था। कुसुमवती ने इस संकट में दिये गए सहयोग के प्रति अनुराग के दोस्तों को बहुत-बहुत धन्यवाद दिया। विमा भी कृतज्ञता की नजरों से देखने लगी। राजीव बोला- माता जी ! इसमें ऐसी कोई बात नहीं है। अनुराग हमारा दोस्त है। उसकी मम्मी, हम सब की मम्मी। उसका दुःख हम सबका दुःख है। वह काफी दिनों से कॉलेज नहीं आ रहा है तो हमने सोचा ऐसी क्या बात हो गई। कहीं कोई गड़बड़ तो नहीं है। इसलिए हम उससे मिलने आए थे। पर यहां आते ही देखा तो आप की तबियत खराब है तो हम उपचार कराने में जुट गए। हमारा भाई अनुराग कहां है ? कुसुमवती बोली - बेटा! क्या बताऊं। उसके पिता का एक्सीडेन्ट हो जाने से तथा समुचित इलाज न हो पाने के कारण वे तो इस दुनियां से चल बसे हैं। हमारे घर की आर्थिक स्थिति भी नाजुक है। सारा खर्च उसके पिता के वेतन से ही चला करता था। उनका स्वर्गवास हो जाने से स्थिति और भी खराब हो गई है। यही कारण था कि अनुराग ने और विभा ने दोनों ने कॉलेज छोड़ दी है। यों कहते-कहते उसकी आंखों में आंसू आ गए। कहां तो इसके पिता की तमन्ना थी कि मैं अपने बेटे-बेटी को उच्च शिक्षा दिलाकर हाई सोसायटी (High Society) में जीने लायक बनाऊंगा। लेकिन तकदीर हमारी फूटी थी, बीच में ही चले गए। अब अनुराग रोजी रोटी के लिए बॉम्बे {69} चला गया है। उसे मैंने बहुत मना किया, पर वह माना ही नहीं। वह कहता है मां पैसे बिना कुछ नहीं है। अतः मुझे जाकर धन कमाना है। मना करते-करते भी चला गया। फिर रोते हुए कुसुमवती आगे बोली-बस हम असहाय हो गए। आज की स्थिति भी बड़ी विकट थी। यदि तुम लोग समय पर नहीं आते, तो शायद में जिन्दी रह नहीं पाती। तुम लोगों ने आकर बड़ा उपकार किया है, हमारे ऊपर। लेकिन एक बात समझ में नहीं आई। वह यह है कि जब मैं देखती हूं कि तुम सबका स्वभाव इतना भला है और दूसरी तरफ जब अनुराग पिता के ईलाज के लिए दोस्तों से रुपये उधार लेने के लिए गया तो रुपये उधार देने की बात तो दूर बल्कि उसकी गरीबी की मजाक उड़ाई गई थी। ये कैसे क्या हुआ ? पारस भी सब कुछ सुन रहा था। उसके साथ आए 2-3 दोस्तों के पास वह आया था और इसी ने उसे झिड़की देकर निकाल दिया था। लेकिन कमल ने बात संभालते हुए कहा कि माता जी ! दोस्त तो कोई ओर होगे। हमारे पास आकर तो उसने ऐसी बात कहीं नहीं थी। नहीं तो हम उसी वक्त उसके साथ चल पड़ते। खैर......जो होनी होती है, वह होकर ही रहती है, उसे कोई टाल नहीं सकता। कुसुमवती बोली- ठीक कहते हो बेटा ! तुम लोगों का भला स्वभाव देखकर तो मुझे लगता है। अनुराग को अपने दोस्तों की भी परख नहीं है कि उसे किसके पास जाना और किसके पास नहीं। इतने में जयेश बाजार से सेव, संतरे, मौसमी, चीकू आदि फल उठा लाया और कुसुमवती के सामने रख दिए। कुसुमवती बोली- बेटे ये किसलिए ? जयेश बोला- माता जी ! आप अस्वस्थ हैं। डॉक्टर ने आपको दवाई दी है। पथ्य रूप में फलों का उपयोग करना जरूरी है नहीं तो गर्मी बढ़ सकती है। कुसुमवती की आंखों में कृतज्ञता के आंसू बह चले। वह बोल पड़ी जुग जुग जीओ बेटे, जुग जुग सभी दोस्तों ने कुछ देर इधर-उधर की बातें की फिर आने की बात कहकर उठकर चल दिये। सभी आकर कार में बैठ गए। पारस ने कार को स्टार्ट किया और गाड़ी आगे बढ़ा दी। रास्ते में बोला- यारों ! तुम लोग भी विचित्र आदमी हो। यों तो देने के लिए एक रुपया नहीं देते हो और वहां ! जीओ। {70} इतना खर्च कर दिया। इतने में जयेश बोला- तुम लोग बात को समझोगे भी या नहीं ? अब घर में अनुराग नहीं है। उसकी मां और उसकी बेटी विभा दो ही हैं। अपन बेखटके इस घर में आ जा सकते हैं। कोटा शहर से भी काफी दूर एकान्त में हैं। अतः न कोई देखने वाला है और न ही कोई सुनने वाला। देखा नहीं विमा कितनी, सुन्दर और नवयुवती है। यह हमारे को मिल जाय तो फिर क्या कहना। लेकिन इसके लिए धैर्य और समझदारी से काम लेना होगा। प्रथम तो कुसुमवती के दिल में अपने प्रति विश्वास जमाना होगा। अन्यथा घर में आना जाना ही दूभर हो जाएगा। कुसुमवती और विमा जब अपने उपकारों से उपकृत होगी तो अपना काम सहज ही सरल हो जाएगा। जयेश बोला- यारों ! शादी तो पता नहीं घर वाले कब करेंगे हमारी। पर अब इस दुनियां का मजा लेना है। नगर वधू के यहां जाते हैं तो बदनामी होने का तो डर है ही, साथ ही आजकल डॉक्टर लोग एडस (Aids) जैसी गंभीर बीमारी भी बतलाने लगे हैं। अतः अब उन खुल्ले अड्डों पर जाने का युग नहीं रहा है। अपने को तो किसी भी तरह विभा जैसी सुन्दर युवती को अपने मोहक जाल में फांस लेना है। यहां अपने को किसी बात का कोई डर नहीं है। बेखटके सारा काम हो सकता है। यही सब सोचकर मैंने कुसुमवती का इलाज कराया है। वाकई कलियुग है, जहां हर अच्छाई के पीछे इन्सान का कितना घिनौना स्वार्थ छिपा होता है, उसे समझ पाना मुश्किल है। ऐसा परमार्थ, न होकर इन्सानियत को रसातल में ले जाने वाला है। इधर कुसुमवती, जिसका स्वास्थ्य अच्छा न होते हुए भी घर खर्च चलाने के लिए काम पर जाने लगी। यह विमा से देखा नहीं जा रहा था। आखिर वह बोली- मम्मी ! जब आप कर सकती हैं तो मैं क्यों नहीं कर सकती हूं। छोटे-बड़े काम करने में शर्म किस बात की। लेकिन कुसुमवती उसे भेजने के लिए तैयार नहीं थी। एक दिन विभा को ज्ञात हुआ कि रखियाल से कुछ ही दूरी पर एक प्राईवेट मिडिल (Private Middle) स्कूल प्रारम्भ हुई है। उसने सोचा क्यों न उसमें नौकरी कर ली जाय। मैंने बी.एड. (B.Ed.) नहीं करी तो क्या हो गया। इग्लिश मीडियम से चलने वाली इमेन्युअल स्कूल में हायर हाई सैकण्डरी तक पढ़ाई की है। इसके साथ ही दो वर्ष तक कॉलेज भी जाइन किया है। ऐसी स्थिति में मिडिल तक की सारी पढ़ाई मैं करा सकती हूं। यही सब सोचकर एक दिन वह इन्टरव्यू (Interview) देने पहुंच गई स्कूल में। {71} S स्कूल के प्रबन्धक काशीनाथ अपने रूम में बैठे हुए थे। इन्टरव्यू का दिन होने से कई महिलाएं इन्टरव्यू देने आई हुई थी। उसमें विमा भी एक थी। जब उसका इन्टरव्यू देने का समय हुआ तो उसे आवाज लगाकर रूम में बुला लिया गया। विभा ने बड़ी शालीनता के साथ रूप में प्रवेश किया और हाथ जोड़कर प्रबन्धक काशीनाथ का अभिवादन किया। विमा से उसकी शैक्षणिक योग्यता के बारे में पूछा गया। अन्य दो चार प्रश्न पूछे गए। उसके बाद प्रबन्धक काशीनाथ ने विमा को 1500 रुपये मासिक पर अध्यापिका के रूप में नियुक्ति दे दी। यद्यपि आधुनिकता की इस दौड़ में वेतन बहुत कम था। फिर भी विवशता के कारण विभा ने उसे भी सहर्ष स्वीकार कर लिया। क्योंकि कुसुमवती का स्वास्थ्य ठीक नहीं था। वह विमा को काम पर जाने भी नहीं देना चाहती थी। ऐसी स्थिति में अध्यापन के क्षेत्र में नौकरी करना ही उचित था। 2000 रुपये में मां-बेटी का साधारण तौर पर घर खर्च भी चल सकता था। बैंक्यू (Thankyou) कहती हुई विमा प्रबन्धक के रूप में उठकर जाने लगी। तब प्रबन्धक ने उसे विचित्र प्रकार के भावों के साथ घूरते हुए अगली 1 तारीख को ड्यूटी जाईन करने का आदेश दे दिया। विमा कमरे से बाहर हो चुकी थी। प्रबंधक काशीनाथ के चेहरे पर एक मादकता की जहरीली मुस्कराहट तैर गई। यद्यपि विमा की अध्यापन योग्यता अन्य सबसे अच्छी थी पर उसकी नियुक्ति इस योग्यता के आधार पर न होकर शारीरिक सौन्दर्य के आधार पर हो गई थी। प्रबन्धक काशीनाथ भी दुराचारी था। वह प्राईवेट स्कूलों में विवशता में उलझी लड़कियों को नौकरी देकर उनसे कसकर काम भी लेता था और अपनी कामवासना का शिकार भी यदाकदा किसी न किसी को बनाता रहता था। ऊपर से समाज सेवा का चौला और पहन रखा था। विभा काशीनाथ की शैतानी नहीं समझ सकी थी। विमा ने घर जाकर अपनी मां कुसुमवती को अपनी अध्यापिका पद पर नियुक्ति के समाचार दिये। यद्यपि कुसुमवती को उसका नौकरी करना पसंद तो नहीं था। लेकिन विवशतावश उसे यह स्वीकार करना पड़ा। {72} -12- । विभा शुक्ला स्कूल में आठों पीरियडों (Period) में मन लगांकर पढ़ाई कराया करती थी। बच्चे तो विभा मैडम से काफी प्रभावित हो गए। विभा के अलावा भी स्कूल में पांच पुरुष अध्यापक एवं दो महिला अध्यापिकाएं अन्य भी थी। लेकिन विभा अपने काम से काम में मतलब रखती थी। फिर भी जब उसे अन्य अध्यापकों से भी वार्तालाप करना पड़ता था। न चाहते हुए भी संपर्क रखना जरूरी था। 3-4 महीने तक तो सब कुछ ठीक ठाक चलता रहा। अब प्रबंधक काशीनाथ ने अपना जाल बिछाना प्रारंभ किया। एक दिन विभा शुक्ला से प्रबंधक काशीनाथ ने कहा- विभा मैडम ! आपकी स्कूली रिपोर्ट तो बहुत अच्छी आ रही है। बच्चे तो आपकी पढ़ाई से काफी प्रसन्न रहते हैं। विमा ने संक्षिप्त सा जबाब देते हुए कहा- जी ! यह सब आपकी मेहरबानी है। आपने जिस विश्वास के साथ मुझे नियुक्ति दी है। मैं उसे पूरी तरह सही प्रमाणित कर देना चाहती हूं। काशीनाथ बोला- बहुत अच्छा ! हमने भी इसी विश्वास के साथ तुम्हारी नियुक्ति की थी। यों कहते हुए काशीनाथ ने एक तीर चला ही दिया- तुम अन्दर से जितनी प्रतिभा से तीव्र हो, वैसे ही बाहर से भी बहुत सुन्दर हो। सुन्दरता और बुद्धिमता का अद्भुत संगम है तुम्हारे में। ऐसा कम ही देखने को मिलता है। लेकिन यह बताओ कि तुम्हें कॉलेज बीच में ही क्यों छोड़ना पड़ी। तुम तो पोस्ट ग्रेज्युएट (Post Graduate) बनकर उच्च पद पर जा । सकती थी। विमा को एक बार तो पंडित काशीनाथ की बात अच्छी नहीं लगी। लेकिन उसकी प्रशंसा जो की गई थी। वह उसे भीतर से कुछ कमजोर कर गई। महिला सुलम मन अपने तन की प्रशंसा सुनकर प्रफुल्लित हो उठती है। लेकिन उसके पीछे के दुराशय को समझ पाना मुश्किल रहता है। विमा ने कहा- साहब आपका कहना उचित है। लेकिन हमारे घर की ऐसी परिस्थितियां न होने से मुझे कॉलेज बीच में ही छोड़ना पड़ा। ऐसी कौनसी विवशता ने तुम्हें घेर लिया। हम भी तो जाने काशीनाथ ने विमा ने पूछा। {73} । वे विमा बोली- क्या बताएं सर ! एक परिस्थिति हो तो बताएं, यहां तो विपत्तियों की एक लम्बी श्रृंखला खड़ी है। क्या-क्या बताएं। काशीनाथ ने उसकी दुखती नस को पकड़ते हुए कहा कि ईश्वर भी कितना निर्दयी है जो ऐसी भली लड़की पर दुःख के पहाड़ पटके। लेकिन समझ नहीं आया, इतनी क्या परेशानी है। तुम्हारे पिताजी.......। हां यही तो बात है। उनका एक वर्ष पूर्व एक्सीडेंट में स्वर्गवास हो गया। वे एक सरकारी कर्मचारी थे। जिससे मामूली वेतन पाते थे। उससे घर खर्च भी चलाना और हमें भी मंहगे स्कूल में पढ़ा रहे थे। किसी भी तरह मेहनत मजदूरी के द्वारा हमारा भी जुगाड़ हो रहा था। पर ईश्वर को यह भी पसंद नहीं आया और एक दिन दुर्देव ने एक भारी झटका मारा और पिताजी चल बसे। हम फिर रोड़ पा आ गए। कोई भी हमारा सहायक नहीं था। नजदीक के रिश्तेदार भी दूर हो गए। खाने-पीने के लिए राशन का जुगाड़ करना भी मुश्किल होने लगा था। बीच में ही काशीनाथ बोल पड़ा- क्या तुम्हारे अलावा तुम्हारे और भाई-बहिन नहीं हैं। काशीनाथ, यह सब बातों ही बातों में जान लेना चाहता । था। विमा ने कहा- हम दो भाई-बहिन हैं। मुझसे बड़ा, मेरा भैया है-उसका नाम अनुराग शुक्ला है। तो क्या वह कुछ पढ़ा-लिखा नहीं है ? क्या मेहनत मजदूरी करके पेट नहीं भर सकता है ? काशीनाथ बोला। नहीं ऐसी बात नहीं है। भाई साहब तो बहुत ही ब्रिलियण्ट (Brilliant) हैं। कॉलेज में पढ़ रहे थे। पर पिता जी के स्वर्गवास का इतना गम हुआ कि काफी दिनों तक वे सुध-बुध खो बैठे। बाद में जब कुछ स्वस्थ हुए तब पारिवारिक जिम्मेदारियां की ओर उनका ध्यान गया और उनके मन में विचार आया कि मैं यहां रहकर इतना अर्थोपार्जन नहीं कर सकूँगा। अतः मैं बॉम्बे जाना चाहता हूं। मेरी माता जी ने उन्हें काफी मना किया पर वे न माने और हम मां बेटी को छोड़कर एक दिन बॉम्बे के लिए रवाना हो गए। अब घर पर हम मां बेटी दोनों ही रह गए। हमारे पास इतनी जमा पूंजी तो थी नहीं कि हम बैठे-बैठे घर खर्च चला सकें। आखिर मेरी मम्मी ने आस-पास के घरों में कुछ न कुछ काम करना प्रारंभ किया। लेकिन एक दिन उनकी तबियत ज्यादा खराब हो {74} -- गई तो उनकी मजदूरी फिर छूट गई। क्योंकि वह सेठों के यहां दैनिक मजदूरी पर जाया करती थी। जिस दिन काम पर नहीं जावो उस दिन की मजदूरी कट जाया करती थी। जबकि खाने-पीने की आवश्यक वस्तुएं रोज चाहिये। फिर बीमारी में तो और भी खर्च बढ़ जाता है। ऐसी स्थिति में फिर मैंने नौकरी करने का दृढ़ निश्चय कर ही लिया, और आपकी स्कूल में इन्टरव्यू देने आ गई। आपने मुझे रख भी लिया। इसके लिए मैं आभारी हूं। सारी बातें सुनकर मोहान्ध काशीनाथ की आंखों में चमक आ गई। ऊपरी तौर पर सांत्वना देते हुए बोला-बेटी ! घबराओ मत हौसला बुलन्द रखो। मैं तुम्हारे साथ हूं। जब भी किसी भी चीज की आवश्यकता हो तो बेखटके आ सकती हो। विभा तो उठकर अपने अध्यापन के कार्य में लग गई पर प्रबंधक काशीनाथ अपनी अधेड़बुन में लग गया। उसके सिर पर काम का भूत जो सवार हो गया था। वह भूखा भेड़िया किसी भी तरह अपनी काम वासना शांत करना चाहता था। लेकिन ऐसे कामी कुत्ते अपनी खानदानी इज्जत आबरू को मिट्टी में मिला देते हैं। काशीनाथ, जब तब विमा मैडम से बातचीत करने का प्रयास करता रहता था। शिष्टतावश कभी तो वह बात कर लेती और कभी पढ़ाई का बहाना करके कन्नी काट लेती थी। काशीनाथ भी कहां चूकने वाला था। आखिर एक दिन वह विमा मैडम के घर ही पहुंच गया। विभा ने जब काशीनाथ को घर पर आए देखा तो शिष्टतावश उनका सम्मान भी करना पड़ा। उनको एक रूम में बिठाया। मम्मी कुसुमवती से उनका परिचय करवाया। कुसुमवती ने काशीनाथ का अपनी बेटी को नौकरी रखने के लिए काफी आभार माना। काशीनाथ ने कुसुमवती का जबाब देते हुए कहा ऐसी कोई बात नहीं है, कुसुमवती जी ! इसमें अहसान कुछ नहीं है आपकी बेटी काम करती है, उसका ही तो वेतन देते हैं। नहीं-नहीं फिर भी आपका बहुत अहसान है, हमारे ऊपर। आप चाहते तो नौकरी पर दूसरी लड़की को भी रख सकते थे। लेकिन आपने विभा को प्राथमिकता देकर हमें जो सहयोग दिया है, वह आपकी महानता है। और आज आपने हमारी कुटिया को भी पावन कर दिया। यह बहुत बड़ी बात है। हम आपका स्वागत करने लायक तो नहीं हैं, (75} फिर भी चाय तो बना लाती हूं। काशीनाथ बोले- अरे नहीं। ऐसी तकलीफ करने की जरूरत नहीं है। मैं तो वैसे ही आपका हालचाल पूछने चला आया था और कोई खास बात नहीं है। लेकिन कुसुमवती चाय बनाने किचन में जा चुकी थी। अब कमरे में काशीनाथ और विभा दो ही रह गए थे। काशीनाथ ने धृष्टता के साथ विमा का हाथ पकड़ते हुए कुर्सी पर बिठाते हुए बोला- बैठो, विमा बैठो। दोनों बैठ गए। इधर-उधर की बातें होने लगी। इसी बीच काशीनाथ के हावभाव उसकी कामुकता को स्पष्ट बतला रहे थे। लेकिन विभा को यह हरकत कतई पसंद नहीं थी। पर सहने का और विरोध करने का दोनों का ही साहस उसमें नहीं था। उसकी स्थिति बड़ी असमंजस पूर्ण हो गई थी। क्या करें, क्या न करें। एक तरफ बड़ी मुश्किल से नौकरी मिली है। विरोध करने का मतलब नौकरी से हटाया जा सकता था। दूसरी तरफ वह बूढ़ा काशीनाथ, विमा को बिलकुल अच्छा नहीं लगता। इसी बीच कुसुमवती चाय लेकर आ गई। सारी बातें बंद हो गई। संयत होकर काशीनाथ ने चाय पीना प्रारंभ किया। बीच बीच में कुसुमवती से बोलता भी रहता था बहिन ! आपके बेटे अनुराग का कोई पत्र या फोन आता होगा। अभी वह कहां पर है। क्या कर रहा है। कुसुमवती बोली- नहीं साहब । यही तो भारी मुश्किल है। उसके जाने के बाद न पत्र है और न कोई फोन आया है। वह कहां है, क्या कर रहा है, कैसे क्या हाल है ? कुछ भी जानकारी नहीं है। इससे कई बार दिल में अशुभ आशंका उठती रहती है। पर यह सोचकर संतोष भी कर लेती हूं कि उसके पास भी कोई पैसा तो है नहीं। खाली हाथ गया है वहां जाकर नौकरी करेगा। फिर कभी पैसा मिलेगा। वह हमें एक वर्ष में आने का बोलकर गया है। अतः एक वर्ष तो इन्तजार करना है। तब तक कुछ न कुछ समाचार आ जाने चाहिए। काशीनाथ बोला-बड़े अफसोस की बात है कि इतना पढ़ा लिखा होकर भी अपनी मां को कोई समाचार नहीं देता है। आजकल के छोकरे पता नहीं कैसे सिरफिरे होते हैं जो मां बाप को कुछ समझते नहीं हैं। खैर कुसुमवती जी। आप कुछ विचार न करें। कोई भी आवश्यकता हो तो हमें बोल देना। हम आपकी आवश्यकता की पूर्ति कर देंगे। यह सब काशीनाथ का मायावी रूप था, जिसे कुसुमवती समझ नहीं पाई। लेकिन जब काशीनाथ, हर दो-चार दिन से घर पर आने लगा तब {76} । कुसुमवती को भी उसकी कुत्सित भावना का अन्दाज लगने लगा। परिस्थिति बड़ी विषम थी। क्या करें, क्या न करें। कुछ समझ में नहीं आ रहा था। क्योंकि काशीनाथ से सम्बन्ध तोड़ा भी नहीं जा सकता, नौकरी का जो सवाल था और रखा भी नहीं जा सकता था। क्योंकि उसकी वासनात्मक कुदृष्टि विमा पर थी। इसी बीच अनुराग के नाम मात्र के कहलाने वाले दोस्त पारस, पंकज, जयेश, कमल आदि का भी जाल कुसुमवती, विभा पर फैलता जा रहा था। वे भी हर 5-7 दिन में एक बार वहां पहुंच जाया करते थे। आते वक्त साथ में मिठाई का डिब्बा और फूट लाना कभी नहीं भूलते थे। वे भी विभा को आकर्षित करने में लगे थे। इन गिद्दों की दृष्टि विमा के नाजुक शरीर में ही उलझी हुई थी। इन हैवानों को यह समझ नहीं आ रही थी कि खुद के भी कोई मां बहन है। उनके साथ भी कोई ऐसा सलूक करे तो कैसे क्या लगेगा। एक दिन स्कूल प्रबन्धक काशीनाथ घर पर आए हुए थे, उसी वक्त पारस, पंकज, कमल, जयेश आदि भी अपनी गाड़ी में वहां पहुंचे। ज्यों ही वे अन्दर घुसे और उन्होंने जब अन्दर बैठे स्कूल प्रबंधक काशीनाथ को देखा तो वे एक बार अचम्मित हो गए। क्योंकि उन्हें यह कतई संभावना नहीं थी कि ऐसी जगह पर काशीनाथ सर मिल जाएंगे और न ही काशीनाथ को यह संभावना थी कि यहां पर ये कॉलेज स्टूडेण्ट (College Student) पंकज आदि मिल जाएंगे। काशीनाथ भी उन्हें देखकर एकदम घबरा से गए। मानो दोनों की चोरी पकड़ी गई हो। वर्षों पहले जब पारस, पंकज आदि इमेन्यूअल स्कूल में पढ़ते थे। उस समय काशीनाथ भी स्कूल के वाईस प्रिंसिपल (Vice Principal) रह चुके थे। अतः वे भी इन बच्चों को जानते थे और बच्चे तो काशीनाथ को जानते ही थे। आखिर कुछ क्षणों की हिचकिचाहट के बाद संभलते हुए पारस ने कहा-काशीनाथ सर आप से बहुत लम्बे समय के बाद मिलना हो रहा है। स्कूल छोड़े 4 वर्ष हो गए हैं। कभी आपसे मिलना नहीं हुआ। गतवर्ष स्कूल के दीक्षान्त समारोह में भी हम गए थे, सर आपको नहीं । । । - देखा। अब तक काशीनाथ की भी घबराहट कुछ कम हो गई थी। वे बोले- ओ हो ! वाकई तुम लोगों ने खूब याद रखा। यहां मैं तो कुछ-कुछ भूल गया था। 2 वर्ष पहले ही मेरा रिटायरमेन्ट (Retirement) हो चुका है। अतः मैंने इमेन्युअल स्कूल छोड़ दी है। पंकज ने पूछा- सर वो तो ठीक है, पर आपका यहां पर कैसे आना हो गया। ये कोई आपके रिश्तेदार लगते हैं ? {77} --- सर ! नहीं-नहीं कुछ घबराते हुए और कुछ सहमते हुए उन्होंने कहा- ऐसा तो कुछ नहीं है पर मैंने रिटायरमेन्ट (Retirment) लेने के बाद खाली बैठना उचित नहीं समझा। इसलिए एक प्राईवेट (Private) स्कूल खोल दिया था। अच्छा चल रहा है। उसके लिए सस्ते और अच्छे अध्यापकों की आवश्यकता रहती है। उसी कड़ी में विभा बहिन जी भी हमारी स्कूल में इन्टरव्यू देने आए थे। इनकी शालीनता एवं अध्यापन की तीव्र रुचि देखकर उन्हें सेलेक्ट कर लिया है। एक दिन उन्होंने घर की माली हालात् का जिक्र किया था तो सोचा घर पर मिलता चलूं। इसलिए यहां आ गया था। पारस ने पंकज को ईशारा करते हुए काशीनाथ को कहा वाकई आप तो बड़े दयालू हैं। तभी तो आपने (काशीनाथ की नकल करते हुए) विभा बहिन जी को नौकरी और ऊपर से इनकी सार संभाल भी लेते हैं। आप जैसे इन्सानियत की पूजा करने वाले फरिश्तों से ही यह दुनिया दबी जा रही है। पारस ने एक-एक शब्दों में व्यंग भरी प्रशंसा की। जिसे काशीनाथ भी बराबर समझ रहे थे। पर कर भी क्या सकते थे। अपराध बोध उन्हें भी हो रहा था। क्योंकि इस प्रकार के फरिश्ते इस दुनियां में कम ही मिलते हैं। काशीनाथ भी 60 पार कर चुके थे। अतः अनुभव से बाल भी. पक चुके थे। अपनी परिस्थिति को संभालते हुए, उन्होंने भी एक प्रश्न उछाल दिया बच्चों तुम यहां कैसे आए हो? तुम्हारी भी यह कोई रिश्तेदार है क्या ? इस प्रश्न से एक बार तो सभी दोस्त विचार मग्न हो गए, लेकिन झूठ बोलने में एवं अभिनय करने में मानो मास्टरी कर रखी हो ऐसे पारस ने कहा कि सर ! बात बिलकुल ठीक है। हमारे भी ये कोई पारिवारिक रिश्तेदार तो नहीं लगते, फिर भी इनका हमारे साथ दोस्ती का गहरा रिश्ता है। यह आपको भी याद होगा कि अपनी स्कूल इमेन्युअल में अनुराग शुक्ला नाम का एक निहायत शरीफ लड़का पढ़ा करता था, जो कि पढ़ने में बहुत तीव्र था। टोप किया करता था। काशीनाथ बोले-हां हां, कुछ याद आ रहा है। बहुत ही अच्छा लड़का था वह। तो सुनिये, बात को आगे बढ़ाते हुए पारस ने कहा यह विमा बहिन जी, उसी अनुराग की बहिन है। अनुराग शुक्ला से हमारी दोस्ती गहरी रही है। इस समय वह पारिवारिक परिस्थिति के कारण कॉलेज छोड़कर बॉम्बे चला गया है। इस कारण हम लोग कमी-कभी कुसुम आंटी एवं विभा बहिन से मिलने आ जाया करते हैं। कभी कोई काम हो तो कर दिया करते हैं। ! {78} अब तक काशीनाथ भी संभल गए थे। वे भी घाघ दिमाग के थे। लड़कों पर थोड़ा सा व्यंग कसते हुए उन्होंने कहा- वाकई ! तुम लोग भी बड़े परोपकारी हो गए हो। जब तक बिचारा अनुराग स्कूल में था, तब तक तो उसकी मजाक उड़ाया करते थे और अब उसके बाम्बे जाने के बाद उसके परिवार का सहयोग करके इन्सानियत की कलियुगी सेवा कर रहे हो। कलियुगी शब्द सुनते ही पंकज जयेश को गुस्सा तो इतना आया कि वहीं पर काशीनाथ की जमकर पिटाई कर दे। पर इससे दोनों पक्ष की बदनामी होने का भी भय था। इसलिए खून का चूंट पीकर रह गए। कुसुमवती और विभा इन दोनों की नौंक झौंक को बड़ी दिलचस्पी से सुन रहे थे। उसे भी काशीनाथ का घर आना कतई पसंद नहीं था। बोलने के लिए विवश थी पर आज अनुराग के दोस्तों की मीठी झड़पें उसकी एक राह तो, प्रशस्त कर रहे थे। फिर भी विमा का सुरक्षित रह पाना बड़ा मुश्किल था। क्योंकि पारस, पंकज आदि की भी मंजिल विभा ही थी। अतः यह तो कुए से निकलकर खाई में पड़ने वाली स्थिति थी। पर विभा भी जवानी के जोश में यह समझ नहीं पाई थी। उसको भी पारस, पंकज आदि का घर पर आना अच्छा लगता था। दिल की गहराईयों में विपरीत लिंग का आकर्षण भी काम कर रहा था। जिससे विमा का खिंचाव बढ़ा हुआ था। जवानी के जोश में कई बार व्यक्ति करणीय अकरणीय को भूल जाता है। यही स्थिति विमा की भी बनती जा रही थी। काशीनाथ और पारस, पंकज आदि विमा के घर से चले गए। पर अब दोनों ही सावधान हो गए। क्योंकि भले ये अन्दर से चरित्र- हीन हो पर समाज में चारित्रिक प्रतिष्ठा का आवरण चढ़ा रखा था। इसीलिए अब दोनों ही विमा के घर पर जाने से थोड़ा कतराने लगे। फोन उसके घर पर था नहीं। काशीनाथ जरूर कमी-कमी स्कूल में विमा से बात करने की कोशिश में रहता था पर वहां स्कूल का स्टाफ रहने से ज्यादा कुछ कर नहीं सकता था। इधर पारस, पंकज, कमल आदि का भी बार-बार विमा के घर पर आने पर कंट्रोल हो गया। क्योंकि काशीनाथ का सम्पर्क उनके डैडी से भी था। यदि जरा भी बात इधर-उधर होती है तो उनकी पोजिशन (Position) खराब हो सकती है। यद्यपि इन लड़कों को पिता का या इज्जत का इतना कोई डर नहीं था। खाली डर था तो इतना ही कि यदि इज्जत जाती है तो फिर अच्छे घराने की लड़की मिलना मुश्किल हो सकता है। लड़के को लोफर समझकर कोई शादी करने को तैयार नहीं होगा। इसलिए वे ऊपर से अपनी पोजिशन (Position) बनाए रखने के लिए चरित्र एवं नैतिकता का । {79 आवरण । लाकन काम पाउ६ाम पमा पा रहा से हए जब काम का भूत सवार हो जाता है तो व्यक्ति ज्ञान की दृष्टि से अंधा हो जाता है। यही हाल पारस, पंकज आदि का बना हुआ था। ये जब तब अवसर ढूंढा करते थे। आखिर ताक झांक करने वाले को कभी तो मौका मिल ही जाता है। उन्हें भी विमा के पास आने का मौका मिल ही गया। हुआ यों कि कुसुमवती को टाइफाइड (Typhoid) हो गया था और वह भी बिगड़ गया। जिसके कारण उन्हें हॉस्पिटल भर्ती करवाना पड़ा। विमा को भी स्कूल अवकाश लेना पड़ा। फिर भी वह अकेली क्या कर सकती थी। घर से खाना बनाना हॉस्पिटल जाना आदि बहुत से काम थे। उस वक्त पारस, पंकज, कमल, जयेश उसके सहयोगी के रूप में साथ रहने लगे। कमी पारस उसे कार में घर पहुंचा रहा है तो कभी कमल उसे हॉस्पिटल तक पहुंचा रहा है। तो कभी वे स्वयं ही खाना लेकर पहुंचा रहे हैं। रास्ते में बातचीत कर उसे आकर्षित करने का प्रयास किया जाने लगा। एक दिन बात ही बात में पारस ने कहा- तुम जब स्कूल में पढ़ती थी तो तुम्हें डांस करना भी बहुत अच्छा आता था। अब क्या हाल है ? विभा ने कहा हां पारसजी ! डांस करने का मैंने बाद में भी अभ्यास किया है, बाकायदा प्रशिक्षण भी लिया। एक दो बार प्रतिस्पर्धा में भी भाग लिया है। इतने में बीच में ही कमल बोल पड़ा- हां एक बार टाउन हाल में नृत्य प्रतियोगिता हुई थी, तब तुम प्रथम आई थी। वाकई उस दिन तो तुम्हारा नृत्य बहुत ही जोरदार था। लोगों ने तालियों की गड़गड़ाहट से हाल गूंजा दिया था। विमा अपनी प्रशंसा सुनकर भीतर ही भीतर खिल उठी। चेहरे पर प्रशंसा सुनकर उभरने वाली मुस्कराहट तैर गई जिसे पारस ने भांप लिया। कई बार किसी-किसी की अधिक प्रशंसा करके उससे उचित-अनुचित कुछ भी करवाया जा सकता है। पारस ने उचित अवसर देखकर बात आगे बढ़ाते हुए कहा विमा जी ! हमने तो आपका नृत्य कभी देखा ही नहीं। कमल ने देखा है इसलिए वह बतला रहा है कि आप बहुत अच्छा डांस कर लेती है। हम भी चाहते हैं कि कभी आप हमें डांस करके दिखलाएं। विमा बोली- पारस जी ! अब तो परिस्थितियां इतनी प्रतिकूल हो चुकी है कि मेरा मन ही बूझ गया है। इधर पिता जी का स्वर्गवास तथा भैया {80} । का बॉम्बे चले जाना और घर की यह माली हालात ने मुझे झिंझोड़ कर रख दिया है। फिर दुबले को दो अषाढ़ की तरह मम्मी का स्वास्थ्य भी बिगड़ गया है। मेरे लिए तो एक मात्र वही सहारा है। यों कहते-कहते उसकी आंखों में आंसू टपकने लगे। कमल बोला- विभा जी ! रोती क्यों हो यह भाग्य का चक्कर चलता रहता है। हर संकट का खुशी के साथ सामना करना है। जिस जिन्दगी में उतार चढ़ाव नहीं आवे उस जिन्दगी में जीने का रस ही नहीं आ सकता। फिर हम आपके साथ हैं। हर काम को बांटने के लिए तैयार हैं। विमा - यही तो मैं देख रही हूं। आप सब से हमें बहुत बड़ा संबल मिला है। इसलिए कुछ दिल हल्का हो गया। अन्यथा दिमाग पर भारी बोझ सा बना रहता था। अच्छा-अच्छा विभा जी ! हर गम के पीछे सरगम होता है। हर कड़वाहट के पीछे मुस्कराहट होती है। विभा जी ! जिन्दगी को जीने के लिए अनचाहे भी कुछ करना जरूरी है। जिन्दगी को जीने के लिए रोना भी जरूरी है तो हंसना भी जरूरी है। जिन्दगी में अमृत पीना जरूरी है तो जहर भी पीना जरूरी है। जिन्दगी को जीने के लिए हां और ना दोनों ही जरूरी है। जिन्दगी जीना इतना आसान नहीं है। "जिन्दगी जीने के लिए, जिन्दादिल होना जरूरी है।" हर कड़वाहट के पीछे मुस्कराहट चाहिये। हर गम के पीछे सरगम चाहिये। जिन्दगी की सरिता बहती है, उभयतटों के बीच उसे बहने के लिए दो तट चाहिये। जिन्दगी वह चकडोलर है, जिसे जीने के लिए ऊपर से नीचे घुमाना चाहिये। जिन्दगी को जीने के लिए विभा जी ! नवनीत सा कोमल और इस्पात सा मजबूत दिल चाहिये। विमा जी बोली- वाह-वाह ! क्या खूब कविताएं बोल लेते हैं आप। यह कविता तो बड़ी जोरदार है। आपके बोलने के अन्दाज ने तो मेरे में भी एक नया जोश का संचार कर दिया है। तो फिर विभा जी! आपको भी एक दिन तो हमें डांस करके दिखाना ही होगा। पारस के कहने पर विभा बोली- चलो आपकी बात मंजूर ! इतना सुनते ही सभी दोस्तों ने वाह-वाह कहकर विमा का उत्साह बढ़ा दिया। लेकिन फिर एक बात अटक गई। वह यह थी कि नृत्य कहां पर किया जाय। क्योंकि रखियाल में उसका घर तो नृत्य के लिए अनुकूल है ही नहीं। टाउन हाल आदि में तो बिना प्रोग्राम के कोई डांस (Dance) हो नहीं सकता। फिर किसी के घर पर डांस (Dance) करना विमा को पसंद नहीं। और पारस, पंकज आदि को भी पसंद नहीं। क्योंकि घर वाले इसकी मंजूरी नहीं देंगे। फिर क्या किया जाय। {81} ।

कमल बोला- क्यों न किसी होटल में हो जाय, यह कार्यक्रम। जयेश बोला- यह नहीं हो सकता क्योंकि होटल में भी कमरे में तो नृत्य हो नहीं सकता और हाल बुक करते हैं तो तब तक के लिए होटल में आवागमन कैसे रोका जा सकता है, रोका भी जाय तो भी होटल के स्टाफ (Staff) को तो पता चलेगा ही। जो वर्तमान की परिस्थितियों में उचित कम होगा। इतने में पारस बोला- यार ! इतना क्या विचार करते हो ! जाने दो इन सबको। मेरे डैडी ने अभी चार महीने पहले ही कोटा जंक्शन में एक नया बंगला बना लिया है। हम सभी घर वाले वहां शिफ्ट (Shift) हो गए हैं। गुमानपुरा वाला बंगला खाली पड़ा है। उधर कोई आता जाता नहीं। वहीं पर नृत्य हो जाय तो महफिल अच्छी जमेगी। सभी को यह बात अच्छी जंची। क्योंकि वहां पर किसी प्रकार की झंझट होने का अंदेशा नहीं था। इस प्रकार 2 दिन बाद रात्रि का कार्यक्रम बना लिया गया। पारस, पंकज, जयेश आदि दोस्त मन ही मन अपनी योजना के सफल होने की स्वीकृति में बहुत खुश हुए। गुमानपुरा बंगले के डायनिंग हाल को सजा दिया गया। एक तरफ नृत्य के लिए स्टेज भी बना दी गई। सभी साजो समान सजा दिये गए। उन कामान्धों को अपनी योजना की सफलता ही नजर आ रही थी। उन्हें नहीं मालूम कि प्रकृति कुछ ओर ही व्यवस्था कर रही थी। दो दिन बाद रात्रि आठ बजे का समय था। सर्दी का मौसम होने से रास्ते में आवागमन कम होता जा रहा था। पारस, पंकज कार लेकर रखियाल बस्ती में विमा के घर पहुंच गये। इधर सर्दी जुकाम के कारण कुसुमवती को अकेली छोड़कर भी जाया नहीं जा सकता था। प्रोग्राम भी बन चुका था। इतने में कुसुमवती को तेज खांसी आई और उसमें कफ गिरने लगा। यह देखकर दवा का बहाना दिया गया कि आपके लिए खांसी की दवा लेकर आते हैं। विभा बहिन साथ चलेगी उन्हें दे देवेंगे। तब तक आप यह गोली ले लीजिये यों कहकर उन्हें कम्पोज (Compose) की गोली दे दी गई। जिससे टेन्सन (Tension) भी समाप्त हो जाय और 4-5 घंटे नींद भी आ जाय। गोली देते ही 15 मिनिट में कुसुमवती को झपकी आना प्रारंम हो गया। कुछ ही देर में तो वह गहरी बेहोशी में चली गई। अब 5 घंटे तक तो कोई चिन्ता की बात नहीं रही। दरवाजा बंद करके वे लोग विभा को गाड़ी में बिठाकर ले चले। 10 मिनिट में ही गाड़ी गुमानपुरा में पारस के बंगले पर पहुंच चुकी थी। जहां पर सारे दोस्त पहले से ही जमा हो रखे थे। यद्यपि विमा अकेली थी। उसे कुछ समय के लिए इस बात का अहसास भी हुआ। । {82} । पर बहुत अर्से बाद वह खुली हवा में आई थी। अतः उसने उसका मजा लेना ही उचित समझा। यह वह नाजुक समय था जब विमा की जिन्दगी जब पतन के गहरे कूप में गिरने जा रही थी। क्योंकि इन कामी कुत्तों का क्या भरोसा की कब झपट पड़े। वह चारों तरफ से घिर चुकी थी। बंगले के डायनिंग हाल (Dining Hall) में पहुंचते ही एक मादक खुशबू महक उठी। उसे इस कदर सजाया गया था कि व्यक्ति में कामोत्तेजना पैदा हो जाय। यह सब हालात देखकर विभा को एक बार फिर नागवार गुजरी। लेकिन अब कर भी क्या सकती थी। एक घंटे भर तक तो गपशप और डिनर (Dinner) का दौर चलता रहा। अब ड्रिंक का दौर शुरू हुआ वे सब पीने लगे और पंकज ने विभा को भी पीने का आग्रह किया। लेकिन उसने साफ इन्कार कर दिया। वह बोली- मैंने कभी पिया नहीं है। अतः मेरे से ड्रिंक का आग्रह नहीं किया जाय । तब तक ये सब लोग एक-एक जाम पी चुके थे। उन्हें कुछ नशा भी आने लगा था। विमा के मना करने पर भी पारस ने उसका हाथ पकड़ लिया और जबर्दस्ती प्रेम भरे आग्रह के साथ आधा प्याला तो पिला ही दिया। जिससे ज्यादा नशा भी न हो और मादकता भी बनी रहे। विभा की इच्छा तो बिलकुल नहीं थी। पर इतने साथियों के प्रेम पूर्ण आग्रह को टाल नहीं पाई थी। उसे भी अब कुछ नशा आने लगा था। इतने में पंकज ने ढोलकी बजाना शुरू कर दिया, और विभा के पैर थिरकने शुरू हुए। टेप रिर्काडर पर फिल्मी धुन शुरू हो गई और विमा का नृत्य भी तेज होता चला गया। बिजली की तरह नृत्य करती हुई विमा की चमक दमक बढ़ती जा रही थी। महफिल अपनी पूरी जवानी पर थी। इधर रायबहादुर अपनी गेंग के साथ करीम, सलीम, रहमान सलमान आदि को लेकर वहां पहुंच चुका था। सभी ने अपनी-अपनी पाजीशन ले ली थी। लेकिन इन काम के अंधे और शराब में धुत्त लोगों को क्या पता कि अब जिन्दगी कुछ क्षणों की ही अवशेष रह गई है। वे तो विमा की और कामुक नजरों से देख रहे थे और मन में उभरती काम ज्वाला को भद्दे विचारों में सजोये जा रहे थे। यद्यपि विमा उनसे बचना चाह रही थी लेकिन उस पर भी काम का नशा और कुछ शराब की मादकता छाई हुई थी। फिर इतने लोगों के बीच में अपने आप को बचाना बड़ा मुश्किल था। लेकिन कहते हैं मारने वाले से बचाने वाले के हाथ लम्बे होते हैं। यही कुछ स्थिति यहां भी घट गई थी। रायबहादुर उर्फ अनुराग शुक्ला की गेंग बॉम्बे से कोटा आकर ठीक समय पर गुमानपुरा स्थित पारस के बंगले पर पहुंच कर पोजिशन ले चुकी थी। सत्य है पाप का घड़ा एक दिन अवश्य फूटता ही है। {83} -13 । बॉम्बे से रवाना हुई राजधानी एक्सप्रेस रतलाम जंक्शन (Junction) को पार करती हुई लगातार दौड़ती चली जा रही थी। डिब्बे में बैठे यात्री इन्तजार कर रहे थे कि कोटा जंक्शन कब आए ? हालांकि वे सभी बॉम्बे से दिल्ली के लिए टिकट लेकर चढ़े थे, पर जैसे ही कोटा जंक्शन (Junction) आया वे सातों यात्री तुरन्त गाड़ी से उतर पड़े । रात्रि के 11 बजे थे, कोटा के प्लेटफार्म (Platform) की चहल पहल राजधानी एक्सप्रेस के आने से कुछ बढ़ चुकी थी। वे सातों व्यक्ति शीघ्र ही प्लेट फार्म से निकल कर कोटा के मैन बाजार (Main Bazar) में पहुंचे। अभी बाजार बंद हुआ ही था। सातों आदमी जो दिखने में सामान्य शक्ल सूरत के थे, एक कार एजेन्सी (Agency)पर पहुंचे। दुकानदार ने देखा कि ग्राहक आए हैं तो उनकी चाहत जानने की इच्छा से बोला- आइए आइए ! कौन सी कार खरीदना है आपको ? सातों व्यक्तियों में जो प्रमुख था उसका नाम रायबहादुर था। वह बोला हमें एम्बेसेडर (Ambessdor) खरीदना है, जो कि एकदम रेडी हालत में हो। दुकानदार बोला- सर 272 लाख रुपया। ठीक है। ये लीजिए 27 लाख रुपया नगद । रायबहादुर ने अपने हाथ की अटैची खोलते हुए कहा। तुरन्त 27 लाख नगद दुकानदार को दे दिये गए। दुकानदार ने शीघ्र ही रुपये गिने और गाड़ी दे दी। कार में सातों आदमी बैठ गए, वहां से रवाना हुए और कोटा के ही रामपुरा बाजार में स्थित सेठ करोड़ीमल की दुकान पर पहुंचे। सेठ जी मसनद के सहारे आराम मुद्रा में बैठे थे, जैसे ही नवागन्तुकों को गाड़ी से उतर कर अपनी ओर आते देखा तो सीधे बैठते हुए उनसे पूछा- क्या बात है, आप किस प्रयोजन से यहां आए हैं ? रायबहादुर ने कहा सेठ सा. हमको अपनी कार बेचनी है। यह एम्बेसेडर गाड़ी हमारी एकदम न्यू (New) है पर अभी है नगद केश की सख्त आवश्यकता है। आप अगर खरीदें तो..........। अच्छा-अच्छा तो बताओ यह कार कितने रुपये में बेचोगे ? साहब ! यो तो इसकी कीमत 27 लाख रुपया है, पर हम आपको सवा दो लाख रुपये में दे देंगे। सेठ करोड़ीमल ने देखा कार तो बिल्कुल नई है और कीमती भी है, बाजार में खरीदने जाओ तो 2/2 लाख से कम नहीं मिलेगी। अतः इसे खरीदना तो है पर सवा दो लाख में इनसे क्यों खरीदूं। अतः वे रायबहादुर की ओर मुखातिब हो- बोले 27 लाख में तो कार कम्पनी से ही खरीद लूंगा, {84} पच्चीस हजार के पीछे तुमसे यह सेकिण्ड हेण्ड (Second Hand) कार क्यों खरीदूं। अच्छा तो आप ही बतादें कितने में खरीदोगे ? हमको अभी रुपये जल्दी में चाहिए, भला 2/2 लाख की कार के हम सवा दो लाख मांग रहे हैं। आप कुछ कम में भी खरीदे तो हम बेच देंगे। मैं तो दो लाख में खरीदूंगा, तुम्हारी इच्छा हो तो दो। अच्छा साहब आप दो लाख रुपया ही दे दीजिए, कोई बात नहीं। सेठ करोड़ीमल को प्रत्यक्ष 50 हजार का फायदा दिखाई दिया, वह कार खरीदने को तैयार हो गया। सेठ बोला मैं कार खरीद सकता हूं, पर अभी इसी समय रुपया उपलब्ध नहीं है, डेढ़ दो घंटे बाद में रुपया मंगवाकर दे सकता हूं। ठीक है। हम 2 घंटे के अन्दर आपके पास पुनः आएंगे, तभी यह कार भी आपको सौंप जायेंगे, पर सौदा तो पक्का है ना ? हां-हां पक्का है ! मैं इस मार्केट (Market) का सबसे बड़ा व्यापारी हूं। सौदा करके कभी पलटता नहीं, अगर ऐसे पलटूं तो क्या मेरी दुकान चूलेगी ! ठीक साहब ! हम जाते हैं दो घंटे के अन्दर पुनः आयेंगे। सातों साथी कार में बैठे, रायबहादुर ने कार स्टार्ट (Start) की, कार भागने लगी। कुछ ही मिनटों में उसकी कार कोटा के ही गुमानपुरा एरिये (Area) में पहुंच गई। वहां जाते ही रायबहादुर ने एक तरफ जहां कुछ सुनसान जगह थी, वहां अपनी कार खड़ी की सातों व्यक्ति कार से बाहर उतर गये। रायबहादुर ने अपने हाथ से एक भव्य बंगले की ओर ईशारा करते हुए कहा- देखो ! ये सामने हरे रंग का जो बंगला दिखाई दे रहा है, बड़ा आलीशान है, जब बंगला इतना सुन्दर है तो इसमें रहने वाला व्यक्ति भी धनाढ्य होगा, आज हम सबको इसी बंगले में जाकर अपना काम करना है। आजकल तो कितने ही दिन बीत गये, कहीं कोई लूटपाट हम लोगों ने की ही नहीं रायबहादुर की बात को ध्यान से सुन रहे छहों आदमियों ने कहा तो चले आज हम इसी बंगले पर.......... | हां चलना तो है ही, पर पूरी सावधानी व तैयारी के साथ, क्योंकि आजकल पूरे राजस्थान प्रान्त में पुलिस बड़ी सजग है, कहीं जरा सी गड़बड़ हुई तो पकड़े जायेंगे। सभी अपने-अपने हथियार तैयार कर लें। यह बात केवल रायबहादुर ही जानता था कि वे जिस बंगले में जा रहे हैं, वहां लूटपाट का मकसद जितना नहीं है, उतना उसके दोस्तों को धन के अभिमान में किए {85} -- छुपा. रखे गए अपराधों की सजा देने का है। जिन दोस्तों से उसे घृणा हो गई थी। जिसके कारण उसे अपमान सहना पड़ा। पिता मृत्यु को प्राप्त हो गए थे। आज जो वह हैवान बना है, उसको भी वे ही कारण है। आज रायबहादुर अपना बदला लेने के लिए, उसी दोस्त के बंगले पर पहुंच गया है। छहों साथी रायबहादुर के कथनानुसार तैयार हो गए। रात्रि के अब तक 12.30 हो चुके थे। जनवरी माह सर्दी की ठिठुरती रात। सभी ने ढीले-ढीले छोटे कोट पहन रखे थे, जिनमें उन्होंने अपने पिस्तौल व चाकू छुट्टै को इस तरह से थे कि देखने वालों को कोई आशंका ही पैदा नहीं हो पाती थी। सभी ने अपने चेहरे विशेष नकाब से ढक लिये ताकि कोई उन्हें पहचान न सके। चलते-चलते सातों आदमी आलीशान कोठी के समीप पहुंच गये। रायबहादुर ने आसपास के सारे वातावरण का जायजा लिया, चारों तरफ सन्नाटा था। सर्दी का वक्त होने से सभी कोई अपने-अपने बंगलों में रजाईयों के बीच दुबके हुए थे। जब सारी स्थिति अनुकूल दिखाई दी तब वे बंगले के और निकट कदम बढ़ाने लगे। देखा कि बंगले के बाहर पहरेदार बैठा है, हाथ में बन्दूक है। बंगले के भीतरी हिस्से में लाईट (Light) जल रही है, जिसका कुछ प्रकाश खिड़की व दरवाजे की दरारों से बाहर आ रहा है, अन्दर से कुछ संगीत की ध्वनि भी सुनाई दे रही है। अपने साथ चल रहे अपने साथियों में से एक को कहा- तुम बंगले के आसपास चारों और चक्कर करो, कोई भी खतरा नजर आए तो हमें सूचित कर देना। दूसरे साथी को कहा- तुम ! बंगले के मेन गेट (Main Gate) पर खड़े रहोगे। शेष 5 मेरे साथ अन्दर चलेंगे। सारी योजना समझाकर वे बंगले के एकदम निकट मैनगेट (Main Gate) पर पहुंच गये। जाते ही देखा पहरेदार कुर्सी पर बैठा है, हाथ में रही बन्दुक को जमीन पर टिका कर उसके सहारे ऊंघने लगा है। तुरन्त ही रायबहादुर आगे बढ़ा और पहरेदार के पीछे से जाकर उसके मस्तिष्क की कनपटी पर भयंकर प्रहार किया। उसके एक मुक्के के प्रहार से ही मुख से चीख निकले बिना ही वह कुर्सी से नीचे गिर पड़ा। इतने में एक मुक्का और उसकी गर्दन की नस पर लगा और वह बेहोश हो गया। रायबहादुर के साथियों ने उसकी स्थिति देखी, वह मरा तो नहीं है पर बेहोश इस कदर हुआ है कि आधा पौन घंटा वह यहां से उठ नहीं सकेगा। {86} पहरेदार का खतरा टला और वे पांचों साथी दरवाजा खोल बंगले के अन्तरंग भाग में प्रविष्ट हुए। देखा कि अन्दर एक बड़े कमरे में महफिल जमी है। जिसमें चार नौजवान बड़ी मस्ती के साथ बैठे हैं, उनके पास पड़े प्यालों व बोतलों से लगा कि वे सब पीये हुए हैं दो के चेहरे पर नशा गहराया हुआ है व दो सामान्य दिखाई दे रहा है। सामने एक नौजवान सुन्दरी आकर्षक-वस्त्रालंकार से सुसज्जित है। नृत्य कर रही है, टेप कैसेट से अश्लील गीत बज रहे हैं, सुन्दरी के नृत्य को देख कर वे नौजवान बेभान हो रहे हैं, उनकी देह लाखों रुपये के हीरे जड़ित अंगूठियों व कीमती वस्त्रों से सुसज्जित है। मुख से अश्लील शब्द निकल रहे हैं और सुन्दरी के साथ गंदी हरकते करने को उतारू हैं। वह बीस वर्षीय कन्या नृत्य कर रही है और किसी तरह अपने आपको उन रूप पतंगों के स्पर्श से मुक्त रख रही है। रायबहादुर ने चंद सैकिंडों में यह सारी स्थिति समझली कि इन युवकों को अगर मार डालें तो मेरे साथियों को संपत्ति मिल जाएगी, और मेरे बदले की आग भी शांत हो जाएगी। अपने साथियों को अत्यन्त धीमे स्वर व ईशारों के साथ रायबहादुर ने समझाया कि तुम कमरे की चारों दिशाओं में एकदम पोजीशन (Position) में खड़े हो जाओ, इन लोगों को लूटना है, अगर ये कुछ विरोध करें तो मेरे ईशारे के साथ ही पिस्तौल चलाना है। आवश्यक हो तो लड़की की भी हत्या करनी पड़ेगी। सारे ही साथी रायबहादुर के ईशारों को समझने में माहिर थे। देखते ही देखते सभी कमरे में प्रविष्ट हो गये। रायबहादुर ने शेरै सी दहाड़ लगाते हुए कहा-खबरदार ! जो यहाँ से हिलने की कोशिश की। तुम्हारे पास जो भी स्वर्ण हीरे, आभूषण रुपये हैं, तुरन्त सामने रखो नहीं तो ये देखो हमारी पिस्तौल, क्षण मात्र में ढेर हो जाओगे। भयंकर आवाज को सुनते ही नवयुवती व नौजवान भयभीत हो गए- ये क्या ? डाकुओं से घिर चुके हैं। हाय ! अब कैसे बचें ? ये डाकू धन संपदा मांग रहे हैं पर ये संपत्ति इन्हें यू ही लूटा दें क्या ? संपत्ति लूटने के बाद तो फिर क्या बचेगा। बिन दौलत दुनियां में रहने से फायदा क्या ? फिर हम भी तो नौजवान हैं, अपनी रक्षा स्वयं कर सकते हैं ? हमने भी चाकू, छुर्रे, पिस्तौल चलाना सीखा है। हमारी सम्पत्ति क्या मुफ्त की है जो इन्हें फ्री (Free) में दे दें। दौलत तो हमारी जान है, इसी से तो ये सैर सपाटे और रंग रेलियां मनाई जा रही है। {87} धन को मुख्य मानकर उन चार में से एक व्यक्ति ने अपने खड़े गद्दे के नीचे छिपी पिस्तौल तुरन्त निकाली व अपने सामने खड़े व्यक्ति पर ज्यों ही चलाने लगा, इससे पहले ही विपरीत दिशा में खड़े व्यक्ति के हाथ में रही पिस्तौल से चली गोली ने उसे सीट पर ही ढेर कर दिया। इसके साथ ही रायबहादुर के ईशारे पर अवशेष तीनों को भी मौत की नींद सुला दिया गया। रूप सुन्दरी नवयुवती यह भयानक दृश्य देखकर चीख पड़ी उसने आंखें मूंद ली। हाय राम ! क्या होगा ? क्या करूं ? कैसे करूं ? ये लोग मुझे मारे उसके पहले भाग जाऊ। ज्यों ही उसने कदम उठाया, त्योही गेंग का एक सदस्य उसे निशाना बनाकर गोली चलाने के लिए ट्रिगर (Trigger) दबाने ही वाला था, इतने में रायबहादुर की दृष्टि उस लड़की के चेहरे पर पड़ी। अब तक उसने लड़की को देखा तो था पर गौर से नहीं। इतने समय तक तो वह उन नौजवानों को खत्म करने में ही लगा था। नौजवानों के खत्म होते ही उसने इधर उस नवयुवती का मुख गौर से देखा और देखते ही चौंक पड़ा – ये क्या ? गजब हो गया...... बड़ा अनर्थ हो जाएगा। इस लड़की की हत्या तो होनी ही नहीं चाहिए। इधर गोली छूट रही है, अब उसे रोका भी नहीं जा सकता, और लड़की को बचाना भी अनिवार्य है। एक सैंकिंड (Second) मात्र का समय है, इतने में तो रायबहादुर ने सब कुछ सोच लिया, उसने समझ लिया कि मैंने अपने साथी को गलत संकेत कर दिया है। अब....अब........लड़की के साइड (Side) में खड़े रायबहादुर ने बिजली सी फूर्ती के साथ अपनी पिस्तौल का बटन अपने साथी के साथ ही दबा डाला। दोनों की गोली करीब-करीब एक साथ छूटी। रायबहादुर की पिस्तौल से छूटी गोली साईड (Side) से आती हुई साथी की पिस्तौल की गोली से टकराई और दोनों गोलियां परस्पर टकराकर जमीन पर गिर पड़ी, नवयुवती सुरक्षित बच गई। रायबहादुर सधा हुआ निशाने बाज था, एक क्षण में वह बिल्कुल सही निशाना साधना जानता था, इसी का परिणाम था कि एक ही सैकिंड (Second) में सब कुछ सोचकर उसने गोली से गोली को काटकर कन्या को बचा लिया। कन्या भागना चाहकर भी भाग नहीं सकी। वह रो पड़ी। उसके मुंह से कोई स्वर भी नहीं निकल पा रहा था, अत्यन्त घबराहट के कारण उसका गला रूंध गया, शरीर कांपने लगा। रायबहादुर तुरन्त आगे बढ़ा और नवयुवती के मुंह पर एक कपड़ा बड़ी मजबूती से बांधा, उसे कंधे पर डाला। साथियों ने मृत नौजवानों के सारे {88} कीमती आभूषण व नगद रुपये इकट्ठे किये व अपने कमाण्डर (Commender) रायबहादुर के पीछे-पीछे रवाना हो गए। बाहर खड़े उनके साथी भी उनके साथ हो गए, देखा आसपास कोई खतरा नहीं है। पहरेदार बेहोश पड़ा था और दो चार मुक्के, इस तरह उस पर जमाये कि वह सुबह तक नहीं उठ सके और वे सातों आदमी बड़ी फूर्ति से कदम बढ़ाते हुए कार के निकट पहुंच रहे थे। उनके पैरो में स्पींगदार जूते थे जिनसे दौड़ने भागने चलने पर भी किंचित् भी आहट नहीं होती थी। एम्बेसेडर में युवती को डाला, एक चादर से उसके सारे शरीर को ढ़क डाला। वह कुछ-कुछ बेहोश की दशा में पहुंच रही थी। रायबहादुर ने मुंख पर डाला नकाब हटाया, अन्य साथियों ने भी उसका अनुकरण किया। रायबहादुर ने अपने ही साथियों को अन्य टैम्पो से स्टेशन जाने का आदेश देकर स्वयं एक साथी के साथ कार में बैठा। रेल्वे स्टेशन के पास एकान्त स्थान पर अपने साथी के साथ लड़की को छोड़ते हुए कहा तुम छहों व्यक्ति मिलकर अत्यन्त सजगता के साथ रहना, दिल्ली से बॉम्बे जाने वाली राजधानी एक्सप्रेस अभी कुछ देरी से आएगी, तब उसमें बैठ जाना, तब तक मैं पुनः कोटा सिटी में जाता हूं। रायबहादुर अत्यन्त तीव्र वेग के साथ सारा कार्य करता चला जा रहा था। अपनी एम्बेसेडर को लेकर वह रामपुरा स्थित सेठ करोड़ीमल की फर्म पर जा पहुंचा। सेठ सा. उसके इन्तजार में ही थे। बोले आ गये तुम। मैं तुम्हारी ही राह देख रहा था। लो ये नगद केस और कार दे दो। रायबहादुर तुरन्त कार से उतरा 2 लाख रुपये लिये अपनी अटैची में रख कर वह चला। वहां से टैम्पो पकड़कर दूर दराज कच्ची बस्ती रखियाला में जाकर एक झोंपड़ी के बाहर पहुंचा। झौंपड़ी का दरवाजा अन्दर से बंद था। उसने दरवाजा खटखटाया। रात्रि के करीब 12 बजकर 10 मिनट हो रहे थे झोंपड़ी में से आवाज आई कौन है ? इस अर्ध रात्रि के समय में। तुम्हारा बेटा ! अहो बेटे तुम आ गये। झोंपड़ी में सोई, विधवा मां, तुरन्त उठी, दरवाजा खोला। बेटे को देख प्रसन्न हुई। मां ! चलो तुम्हें अभी मेरे साथ चलना है। वह बोली- क्यों अमी अर्धरात्रि के समय कैसे चलूं ? और फिर तेरी बहिन भी घर पर नहीं है। उसे पहले बुला ला। मां ! तुम अब वह आए न आए, बस तुम्हें तो अभी इसी समय चलना ही है मेरे साथ। मां! अब ज्यादा सोचने का वक्त नहीं। झोंपड़ी के लगाओ ताला और चलो मेरे साथ। मेरे जरूरी काम है, अब मैं 2 मिनिट भी नहीं रुक सकता। । मैं - {89} मां कुछ बोले इससे पूर्व ही रायबहादुर ने मां का हाथ पकड़ा उसे झोंपड़ी से बाहर खड़ा किया, झोंपड़ी बंद की वह एक ऑटो रिक्शा में अपनी मां के साथ रेल्वे स्टेशन पहुंच गया। जाते ही उसने देखा- राजधानी एक्सप्रेस रेल्वे स्टेशन पर पहले ही आ पहुंची है। रवाना होने में केवल 5 मिनट बाकी है। वह तुरन्त फस्ट क्लास (First Class) के डिब्बे में अपनी मां के साथ चढ़ गया। गाड़ी रवाना हो चुकी थी, रायबहादुर अपनी मां के सामने बैठा है। मां पूछा बेटा कितने वर्षों से आए हो आज तुम्हारा मुंह देखा, मन खुश है पर तेरी बहिन........ | कहते हुए मां ने एक गहरी सांस छोड़ी। उसकी आखें भर आई तो मां बहिन को तुमने इस अंधेरी रात्रि के समय में कहां भेज रखा है। युवा लड़की को इस तरह चाहे जहां भेजना कितना गलत एवं अनर्थ भरा ने कार्य है। बेटा ! तू तो यहां से हमें यह कहकर छोड़कर बम्बई चला गया कि मैं एक वर्ष में ही धन कमाकर आ रहा हूं। कब तक हम लोग इधर-उधर से लेकर काम चलाते। लेकिन तुम्हें गए एक वर्ष नहीं अपितु तीन वर्ष पूरे हो गए हैं। अब तुम ही सोचो कि हमारा यहां क्या हाल हुआ होगा। सारी बात जब तूं सुन लेगा, तो सब कुछ समझ में आ जाएगा। अच्छा मां ! मैं तुम्हारी इतने दिनों की आप बीती सुनना चाहता हूं। लेकिन ठहर जाओ मैं थोड़ी देर कहीं जाकर शीघ्र ही वापिस आता हूं। तब तक तुम यहीं बैठना। मैं आकर सब बात सुनूंगा। कहते हुए रायबहादुर अपनी सीट से उठ खड़ा हुआ। जल्दी-जल्दी कदम उठाकर डिब्बे के भीतर से ही वह पीछे के डिब्बों में गया। राजधानी एक्सप्रेस के पूरे एयर कंडीशन (Air condition) डिब्बों में वह खोजने लगा, अपने छहों साथियों को। क्योंकि वे सभी इसी एक्सप्रेस ट्रेन से चढ़े थे। 5-7 डिब्बों में जाने के बाद उसे अपने साथी दिखाई दे गये। वह उन सबको वहां से उठाकर अपने डिब्बे में ले आया। राजधानी एक्सप्रेस तीव्र वेग के साथ भागती चली जा रही थी कोटा से रतलाम की ओर। नवयुवती के मुंह पर बांधा कपड़ा ट्रेन में चढ़ने के बाद खोल दिया था, उसके देह पर छाई बेहोशी भी इतने समय में अब कुछ ठीक हो चुकी थी। सातों ही युवकों ने एक नवयुवती के साथ जैसे ही उस स्पेशल (Special) कोच में प्रवेश किया, मांजी ने देखा- रायबहादुर के साथ ये नवयौवनाती मेरी बेटी है। वह मारे हर्ष के एकदम चिल्ला उठी हो! {90} विमा तूं यहां आ गई। रायबहादुर अपनी बहिन को यहां कैसे ले आया तो यह सब तेरी करामात थी। बेटी विभा जो अब तक निढाल सी चली आ रही थी, उसके साथ हुई घटना से उसका चित बड़ा बेहाल तथा नर्वस (Nervous) बना हुआ था, वह उन युवकों के साथ आई जरूर थी लेकिन अब तक उसने रायबहादुर का चेहरा ध्यान से देखा ही नहीं था, बंगले में तो रायबहादुर आदि सभी नकाब ओढ़े हुए थे, अतः उनके असली रूप को देखने का तो प्रश्न ही नहीं उठता था। अब विमा ने ज्योंही मां की हर्षा वेग से युक्त आवाज सुनी वह मानों सोते से जागी। उसने देखा कि सरदार तो मेरे बड़े भाई सा. ही हैं, तो वह लपककर उनके सीने से लगी- अरे भैया। तुम...... प्रसन्नता के कारण उसके मुंह से आगे कोई शब्द ही नहीं फूट पा रहा था। भाई बहिन का यह प्रेम मिलन देखकर जहां मांजी के हर्ष का पार नहीं था, वहीं पास खड़े छहों दोस्तों के मन में एक बड़ा कुतूहल पैदा हो रहा था। अचानक यह नजारा देखकर उनके मस्तिस्क में भी विविध प्रश्न उठ खड़े हुए थे। {91} -14- रायबहादुर ने अपने संगठन का ओर भी अधिक विस्तार किया। कुछ तीव्र प्रतिभा सम्पन्न पोस्ट ग्रेज्युएट युवकों को प्रवेश दिया तो कुछ शारीरिक शक्ति सम्पन्न युवाओं को लिया और कुछ अपराध वृत्ति वाले दुर्दान्त लड़कों को। किसी को भी प्रवेश देने के साथ ही सबसे पहली शर्त यह थी कि अपने संगठन के प्रति पूरी तरह समर्पित रहना होगा। अपने अवैध व्यापार को अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर ओर भी अधिक फैलाने का प्रयास किया जाने लगा। इसके लिए एक ऑफिस ब्राजील (Brazil) में खोला गया। दूसरा ऑफिस अमेरिका एवं न्यूयार्क में खोला गया। इसी प्रकार सिंगापुर, बैंकाक, पाकिस्तान, श्रीलंका, भूटान, नेपाल, तिब्बत, चीन आदि इण्डिया से जुड़े देशों (Countries) में भी ऑफिस खोल दी गई। ब्राजील से हीरों पन्नों का कच्चा माल आने लगा। जिसकी मेनुफेक्चरींग (Manufacturing) इण्डिया में कराई जाती। फिर यहां से कुछ माल सीधा अमेरिका एक्सपोर्ट (Export) कर दिया जाता और कुछ माल आभूषणों में जुड़ाकर बेच दिया जाता था। इसी के साथ ही जापान से अन्य इम्र्पोटेंड (Imported) वस्तुओं की स्मगलिंग (Smugling) की जाती थी। उसे तिब्बत, पाकिस्तान, बैंकाक, सिंगापुर आदि के बाजारों में ऊंचे-ऊंचे भावों में बेच दी जाती थी। इन समीप की सभी कंट्रियों के सम्बन्धित कस्टम विभाग के आला अफसरों से रायबहादुर ने सांठ-गांठ कर रखी थी। इन सब कामों में रायबहादुर स्वयं कहीं आगे नहीं आता था। इसके लिए उसके पास अन्तरंग चार युवा साथी थे उन्हीं से सारा काम लेता था, जो पोस्ट ग्रेज्युएट (Post Graduate) एवं बुद्धिमान लड़के थे। जिनके नाम थे कैलाश, श्याम किशोर, युगल और मनोज। परीक्षाओं में खरे उतरने के बाद रायबहादुर इन पर विश्वास करने लगा था। फिर भी वह भीतर में सावधान था क्योंकि नीति का वाक्य है कि किसी पर विश्वास किये बिना काम नहीं चलता लेकिन इतना विश्वास भी नहीं किया जाय कि सामने वाले के धोखा देने पर अपनी जिन्दगी खतरे में पड़ जाय। इन सब चिन्तन के प्रति रायबहादुर पूरी तरह सावधान था। कुछ तो नसीब समझिये और कुछ पुरुषार्थ अर्थात् भाग्य और पुरुषार्थ का अनुकूल संयोग रहने से रायबहादुर का व्यापार बड़ी तेजी के साथ फैलता गया। बंबई इण्डिया की मानी हुई माया नगरी मानी जाती है, उसके गिने - {92} चुने लोगों में रायबहादुर का नाम था। यही नहीं बल्कि अन्य देशों में भी उसका व्यापारिक प्रभाव था। जिस प्रकार रायबहादुर व्यापार एवं अपराध दोनों तरीके से आगे बढ़ रहा था। इसी प्रकार अन्य और भी कई संगठन सक्रिय थे। वे भी अपनी जोड़ तोड़ बिठाकर आगे बढ़ने में लगे हुए थे। उन्होंने जब कम समय में ही रायबहादुर संगठन को इस प्रकार ऊंचाईयां छूते हुए देखा तो वे ईर्ष्या से दुःखी हो उठे। उनकी आंखों में यह सब किर किरी की तरह खटकने लगा। किसी भी तरह इसे डाउन कैसे किया जाय। आदमी अपने दुःख से परेशान न होकर दूसरों के सुख से ज्यादा परेशान होता है। यही स्थिति बॉम्बे सहदेव गेंग की थी। उस का व्यापार इतना बढ़िया नहीं था। उन्होंने रायबहादुर गेंग को गिराने के लिए योजना बना डाली। सहदेव के आदमियों ने रायबहादुर के आदमियों की चौकसी करना प्रारंभ किया। किस फ्लाइट (Flight) से माल आता है और कहां रखा जाता है, किस प्रकार उसे बेचा जाता है। इन सबकी खोज की जाने लगी। इन सबको करते समय उन्हें यह नहीं मालूम था कि उनकी भी कोई चौकसी कर रहा है। रायबहादुर इतना अंधेरे में नहीं था। उसे यह अच्छी तरह मालूम था कि वह जिस तीव्रता से आगे बढ़ रहा हैं उसी तीव्रता के साथ उसके शत्रु भी बढ़ते जा रहे हैं। यदि उनसे सावधान नहीं रहा गया तो वे कभी भी कहर ढा सकते हैं। यही कारण था कि रायबहादुर के आदमी भी इस बात की सतर्कता के साथ चौकसी कर रहे थे। यों समझ लीजिये कि यह रायबहादुर का गुप्तचर विभाग था, जो उसे अन्दर के स्टाफ की और बाहरी गतिविधियों की सूचना देता रहता था। इसी स्टाफ के सदस्य नवीन कुमार ने सहदेव गेंग के सदस्यों द्वारा की जा रही चौकसी की सूचना दी। रायबहादुर ने शारीरिक शक्ति से मजबूत शातिर दिमाग के अपने वफादार सदस्य शेरसिंह, मूलसिंह जोरावर, भवानीसिंह आदि को इस काम को निपटाने का संकेत कर दिया। सहदेव बाहरी पोजिशन में तो एक इन्टलिजेण्ट था लेकिन अन्तरग में एक माना हुआ तस्कर एवं कुख्यात गुंडा था। यह कोई-कोई ही जानता था। चेम्बूर चौराहे से सहदेव की कार गोरेगांव की ओर आगे बढ़ रही थी। उसके आगे-पीछे दो मोटर साईकिलें चल रही थी। जिन पर सवार लोगों की दृष्टि सहदेव पर जमी हुई थी। किन्तु कार बुलेट प्रूफ होने से वह कुछ कर नहीं पा रहे थे। पर उन्होंने भी कच्ची गोलिया नहीं खाई थी। वे बराबर । {93} । कार का पीछा कर रहे थे। ज्यों ही कार एक बंगले के अहाते में घुसी त्योंही मोटर साइकिलों पर सवार चारों व्यक्तियों ने अपनी पोजीशन ले ली। सहदेव के कार से उतरते ही गोली मार दी गई। ड्राईवर को भी और बाहर खड़े दोनों वाचमेन चौकीदारों को भी गोली चलाकर ढेर कर दिया। पिस्तौल पर साइलेन्सर (Silencer) लगा होने से गोलियों की तो आवाज ही नहीं आई पर उनके चीखने-चिल्लाने की आवाज आई। जिसे सुनकर बंगले से लोग बाहर निकले। पर ज्योंही उन्होंने मर्डर देखा तो एक बार सहम गए। बाहर जाने का मतलब था स्वयं को भी मौत के घाट उतारना। सब को अपनी- अपनी जान प्यारी थी। वे बाहर देख रहे थे पर किसी की बाहर निकलने की हिम्मत नहीं थी। जब उस बंगले के लोग भी भय से बाहर नहीं आ पा रहे थे तो अन्य के आने की तो कल्पना ही नहीं की जा सकती थी। शेरसिंह, भवानीसिंह आदि नकाब पाश में थे। काम तमाम करने के बाद चारों सदस्यों ने मोटर साईकिलें विपरीत दिशाओं में दौड़ा दी। ये मोटर साइकिलें भी सामान्य मोटर साइकिलों से अलग ढंग की बनी हुई थी। जो बाहर से तो सामान्य दिखती थी। पर अत्याधुनिक अस्त्र शस्त्रों से भी लेस थी। जिनके साथ ऐसे यंत्र फीट थे कि वहां कि हर सूचना रायबहादुर तक पहुंच रही थी। करीब 30 मिनिट बाद घटना स्थल पर पुलिस पहुंची। लाश का पोस्टमार्टम (Postmartom) हुआ। पुलिस ने खोज करने का बड़ी तीव्रता के साथ काम करने का प्रदर्शन किया। जबकि उन्हें करना धरना कुछ नहीं था। पुलिस के उच्च अफसर रायबहादुर गेंग से मिले हुए थे। अतः होना जाना तो कुछ था ही नहीं। पर अपराधियों की धर पकड़ जारी थी। हर दिन 2-4 अपराधी पकड़े जाते और खोज बीन कर छोड़ दिये जाते। असली अपराधी तक पहुंचना उनके लिए मुश्किल था। एक दो बार तो पेपर में भी सहदेव के मर्डर के समाचार मुख्य पृष्ठ पर छपे। 5-10 दिन तक सरगर्मी रही। उसके बाद तो लोग मानों उस घटना को भूल गए और उसी ढर्रे पर चल पड़े। गुप्तचर विभाग के हाथ में केश सौंप दिया गया। कब तक खोजबीन होगी। असली अपराधी पकड़ में आएगा या नहीं। यह असंभव प्रकिया बनती चली गई। यद्यपि मूल में गलती तो सहदेव की ही है। उसने दूसरों की झोपड़ी में आग लगाने की कोशिश की ही क्यों ? उसे क्या अधिकार था जो रायबइर की गेंग की खोज करके उसे डाउन करे। वह तो हुआ या नहीं पर सहदेव का काम तमाम जरूर हो गया। हम न तो किसी को गिरा सकते हैं और नहीं उठा सकते हैं। सभी अपने कर्मों के कारण उठते {94} गिरते हैं, बाहरी सहयोग तो निमित्त है, मूल में तो वह स्वयं ही होता है। रायबहादुर का व्यापार दिन दूना रात चौगुना बढ़ रहा था। यद्यपि रायबहादुर की उम्र अभी तक 24 साल की ही थी। 17 वर्ष की उम्र में वह कोटा छोड़कर बॉम्बे आ चुका था। करीब सात-आठ वर्षों की कड़ी मेहनत के परिणाम स्वरूप वह इतना आगे बढ़ चुका था। रायबहादुर को एक ही जूनून था, पैसा-पैसा-पैसा। अब तो पैसा, ऐश्वर्य उसके पैरों पर बिछा था। उसके नौकर तक करोड़पति बन गए थे। छोटी सी उम्र में दुनियां की दूरी काफी लम्बी तय कर चुका था। इतना सब कुछ होने के बाद भी उसके भीतर में शान्ति नहीं थी। सारा बाहरी विलास उस के तन को तो सजा सकता था। पर मन को नहीं। मन तो अन्दर से बुझा-बुझा सा ही रहता था। भारी तनाव के बीच कई बार उसे नींद नहीं आने के कारण कम्पोज की गोली तक लेनी पड़ती थी। ड्रिंक (Drink) करने की आदत पड़ गई थी। स्मोकिंग तो वह बॉम्बे में जब से आया तब से करने लग गया। ऐसे कई दुर्व्यसन उसके भीतर में प्रवेश कर गए थे। जो कि उसकी आत्मा को खोखली बना रहे थे। माता कुसुमवती और बहिन विभा के कोटा से बॉम्बे आ जाने से बंगले में तो एक सात्विक रोनक आ चुकी थी। जहां रायबहादुर के न खाने का पता था, न पीने का। लेकिन अब कुसुमवती के जाने से खाने-पीने आदि की तो समुचित व्यवस्था हो चुकी थी। खाने-पीने, घूमने-फिरने की कहीं कोई दुविधा नहीं थी। अब कुसुमवती के भी ठाठ निराले थे। बीसों नौकर काम करने वाले, इम्पोर्टेड गाडियां हर वक्त पास में खड़ी रहती। इतना सब कुछ ऐश्वर्य होने पर भी अनुराग (रायबहादुर) के दुर्व्यसनों को देखते हुए कुसुमवती का मन हर वक्त अशान्त रहता था। वह कुछ कह भी नहीं सकती थी क्योंकि अनुराग कोई बच्चा तो था नहीं। जिससे उसे कुछ कहा जा सके। लेकिन उसकी ये आदतें कुसुमवती को कतई पसन्द नहीं थी। वह रातदिन सोचा करती थी कि किस प्रकार इन आदतों से अनुराग को मुक्ति दिलाई जाय । उसे अनुराग का पूर्व जीवन याद आता था। जब अनुराग पूरे स्कूल में सबसे अधिक सिन्सीयर (Sincere) और शरीफ लड़का माना जाता था और आज देखती है तो रात दिन का फर्क नजर आता है। धन जरूर बेशुमार बढ़ गया है, पर नैतिक आचरण में भारी गिरावट आई है। कुसुमवती के मस्तिष्क में अचानक विचार कौंधा। यदि अनुराग की शादी हो जाय तो हो सकता है इसकी आदतों में परिवर्तन आ जाय। इधर । {95} विभा भी 22 साल की हो चुकी है। इसकी भी शादी करना है। अनुराग तो जैसे बेफिक्र है। एक दिन मौका देखकर कुसुमवती ने अनुराग उर्फ रायबहादुर के सामने बात छेड़ दी। बोली बेटा ! तेरे जैसे सुपुत्र को पाकर धन, संपत्ति और सुख-सुविधा की दृष्टि से तो मुझे कोई कमी नहीं है फिर भी दो भारी कमी मुझे हर वक्त परेशान करती रहती है। जब तक वे कमियां पूरी न हो जाय तब तक यह सब ऐश्वर्य बिना नमक का भोजन है। माता की बात सुनकर रायबहादुर बोला- मम्मी ! ऐसी क्या कमियां तुम्हें खाए जा रही है। बोलो बोलो। मैं सब पूरी करूंगा। पिता की सेवा तो मैं अभागा बेटा नहीं कर सका। गम है मुझे आज तक उस समय का जब मेरे पापा, चिकित्सा के अभाव में तड़फड़ते हुए इस दुनियां से चले गए। मैं विवश था, मेरे पास आर्थिक सम्पन्नता नहीं थी। लेकिन अब तो सब कुछ है। बोलो- तुम्हें क्या चाहिये। मैं आपकी हर तरह की इच्छा पूरी करने के लिए तैयार हूं। बेटा ! वह इच्छा धन दौलत से पूरी नहीं की जा सकती। तो फिर कैसे हो सकती है तुम्हारी इच्छा की पूर्ति अनुराग ने कहा । आखिर ऐसी क्या इच्छा है तुम्हारी, बताओ तो सही। कुसुमवती बोली बेटा ! मेरी इच्छा है कि मेरे घर में बहू आ जाय ताकि यह घर आबाद हो जाय। पोते-पोतियों के साथ खेलने की मनोकामना भी है। दूसरी इच्छा अब विमा के हाथ पीले भी हो जाने चाहिये। वह अब 22 वर्ष की हो चुकी है। यद्यपि इसकी शादी दो वर्ष पहले ही हो जानी थी। पर उस समय घर की परिस्थिति अच्छी न होने से यह काम नहीं हो सका। लेकिन अब तो जल्दी से जल्दी ये काम भी सम्पन्न हो जाना चाहिये। ये दो इच्छा मेरी है, वह तुम्हें पूरी करना है। अनुराग ने कहा- मम्मी ! यह तुमने ठीक याद दिलाया। विमा की तो शादी करना अब जरूरी हो गया। पर अभी तक कोई अच्छा खानदानी लड़का मिल नहीं रहा है। मैं और खोज करूंगा। जल्दी ही इसका काम करने का विचार है। जहां तक मेरी शादी का प्रश्न है। मेरा शादी करने का विचार नहीं है। यह सुनते ही कुसुमवती को झटका लगा। वह बोली-बेटा अनुराग ! ऐसा मत बोलो। जिन्दगी की ट्रेन को पटरी पर चलने के लिए दोनों तरफ लोहे के गाडर होना आवश्यक होता है। शादी बन्धन नहीं अपितु जिन्दगी की धारा {96} -- को उन्मुक्त रूप न देकर व्यवस्थित मर्यादा में प्रवाहित करना है। फिर मेरे कोई दो चार बेटे नहीं, जिससे दूसरे बेटे तुम्हारे पिता की वंश परम्परा चला सके। मैं तो काफी लम्बे समय से यह साध, मनोकामना लिए बैठी हूं कि तुम्हारी शादी हो। घर का आंगन वधू के आगमन पर चमक उठे। यही नहीं मैं तो पोते-पोतियों का मुख देखने के लिए तरस रही हूं और तुम यह कैसी बेहूदी बात करते हो। बेटा जरा सोचो, इतनी अरबों रुपये की संपति का क्या करोगे। जब कोई परिवार ही न हो। इतना सब कुछ करना धरना किस काम का। फिर मेरी भी उम्र पक गई है घर कभी नौकरों से नहीं चला करता है। उसे तो पुत्र वधू ही चला सकती है। नौकर काम कर सकते हैं पर उनमें दिलीय लगाव नहीं होता। घर की शोभा तो कुलीन ललना से ही होती है। अतः तुम्हें शादी तो करनी ही है। अनुराग की इच्छा तो कम थी पर आग्रह बड़ा जबर्दस्त था। जिसे टालना भी उचित कम लग रहा था। अनुराग ने सोचा शादी आज की आज तो करना है नहीं, मम्मी को उचित जबाब देकर संतुष्ट कर देना चाहिये। उसने कहा- मम्मी ! आपका कहना उचित है। कुलीन लड़की मिलने पर शादी कर लूंगा। कुसुमवती को यह सुनकर तसल्ली हुई। बात वहीं पर समाप्त हो गई। {97} ~15- प्रातःकाल का समय सूर्य की लाल अरुणिमा जल की सुषमा को और भी अधिक तरंगित कर रही थी। कुसुमवती एवं विभा, अपने बंगले की खिड़की से समुद्र की सुषमा देख रहे थे। इसी बीच प्रकृति की सुषमा के मध्य निहायत एक प्राकृतिक आलौकिक व्यक्तित्व के दर्शन हुए। श्वेत परिधान में वेष्टित सिर और पैर नंगे, फिर भी अनूठा तेज, दिव्यभाल, प्रलम्बबाहु आइने में से निहारते समता से आप्लावित नेत्र युगल मुख श्वेत वस्त्र से आबद्ध (मुख वस्त्रिका पहने हुए) साधना का चुम्बकीय आकर्षण, गजगति से, दिव्य भव्य नव्य व्यक्तित्व के दर्शन कर दोनों मंत्र मुग्ध हो गई। क्या अनूठा व्यक्तित्व है, क्या दिव्य तेज है। भौतिक विलास के चरमोत्कर्ष के बीच अध्यात्म साधना का चरमोत्कर्ष। विनिमेष दृष्टि के साथ ऐसे पावन दर्शन करने के बाद कुसुमवती ने विमा की तरफ मुखातिब होकर कहा- विभा ! कभी देखा है ऐसा अद्भुत व्यक्तित्व। विभा बोली- मम्मी ! इन्हें तो मैं प्रथम बार ही देख रही हूं। पर इन जैसे वस्त्रधारी साधु को तो कोटा में मैंने कई बार रामपुरा बाजार में देखा है। पर इनमें जो आकर्षण तरंगित हो रहा है वह उनमें नहीं था। कुसुमवती बोली बेटी ! मैंने आज से कोई 20 वर्ष पूर्व कोटा में ऐसे ही एक अद्भुत व्यक्तित्व के दर्शन किये थे। पर उसके बाद आज तक ऐसा व्यक्तित्व नजर नहीं आया। इतने लम्बे अन्तराल के बाद ऐसे साधनाशील व्यक्तित्व के दर्शन हो रहे हैं। यद्यपि ये जैन साधु हैं तथापि ये प्राणी वर्ग से जुड़े हुए हैं। कुसुमवती की बात सुनकर विभा बोली- फिर तो मम्मी इनके पास चलकर दर्शन करना चाहिये। कुसुमवती बोली- जरूर-जरूर। चलो-चलो। वे दूर निकल गए। अभी दृष्टि में आ रहे हैं। फिर कहीं चले गए तो हमें पता भी नहीं चलेगा। अतः यह मौका नहीं चुकना चाहिये। तुरन्त दोनों बंगले से नीचे उतरी। गाड़ी के पास ड्राइवर खड़ा था। उसने तुरन्त कार का गेट खोला। दोनों ने गाड़ी में बैठते ही उन महायोगी के पास ले जाने का संकेत किया। ईशारा पाते ही पलक झपकते ही महायोगी के पास गाड़ी जा खड़ी हुई। बड़े अदब से ड्राइवर ने फाटक खोला। दोनों बाहर आई और महायोगी के सामने जाकर {98} घुटने टेक सिर झुकाते हुए हृदय की असीम आस्था के साथ प्रणाम किया। महायोगी ने दो भद्र महिलाओं को प्रणाम करते हुए देखकर रक्षा रूप दया पालने के आशीर्वचन के साथ सम्बोधित किया। दोनों महिलाएं, महायोगी के मुखमण्डल से टपक रहे ब्रह्म तेज का पान करती हुई मुख से प्रस्फुटित वचन मुक्ताओं को सुनकर कृतार्थ हो उठी। । विश्व बन्धुत्व की भावना से ओतप्रोत योगी प्रवर ने आगे कहा-आप कौन हैं और कहां से आ रही हैं ? कुसुमवती बोली- महायोगी मेरा नाम कुसुमवती है और यह मेरी बेटी विभा है। मेरे पुत्र का नाम अनुराग शुक्ला है। हमारा बंगला इस जुहू के किनारे ही 12 नम्बर का है। जब आपका इधर से पर्दापण हो रहा था तो आपके पावन दर्शन कर हम अभिभूत हो उठे और आपके समीप दर्शन करने की भावना से अनुप्रेशित हो आपकी सेवामें उपस्थित हुए हैं। आपकी धर्मनिष्ठा, संतमक्ति प्रशंसनीय है। इस प्रकार कहते हुए जब महायोगी, आगे बढ़ने लगे तो कुसुमवती ने पूर्ण विनम्रता के साथ कहा- योगी प्रवर ! इस समय आप कहां विराज रहे हैं। आपके सत्संग का समय क्या है। हमारी आपके दर्शन एवं सत्संग का लाभ लेने की भावना है। महायोगी किंचित खड़े होकर बोले- आपकी भावना उत्तम है। इस समय हम अंधेरी वेस्ट के जैन उपाश्रय में हैं। प्रवचन का समय सुबह 8 बजे से 9% बजे का है। आप भी लाभ ले सकती हैं। जी गुरुदेव ! हम अवश्य आएंगे। कुसुमवती ने कहा। महायोगी तो उसी गजगति के साथ अपने शिष्य समुदाय को लेकर आगे बढ़ गए। कुसुमवती भी विमा के साथ गाड़ी पर बैठकर बंगले पर पहुंची। आज दोनों के चेहरे विशेष ढंग से प्रफुल्लित थे। अभी 6% ही बजे थे। ग्रीष्म कालीन समय होने से सूर्योदय 5-30 पर ही हो रहा था। महायोगी शौच निवारणार्थ समुद्र तट पर पधारे थे। इसी बीच कुसुमवती, विभा के सद्भाग्योदय से उनके पावन दर्शन हो गए। बड़ी तत्परता से कुसुमवती और विभा अपने दैनिक कार्यों को संपन्न कर रही थी। नाश्ता भोजन बनाने एवं घर की सफाई करने आदि कार्यों के लिए तो कई पुरुष महिलाएं कार्यरत थीं। कुसुमवती व विमा को ये सब करने की कोई आवश्यकता नहीं थी। वे तो स्नान आदि कार्यों से निवृत्त होकर ब्रेक फास्ट (Breakfast) नाश्ता लेकर आठ बजे से पूर्व ही गाड़ी में बैठकर उपाश्रय पहुंच जाती। {99} ठीक 8 बजे सत्संग का कार्य प्रारम्भ होता है। सर्वप्रथम एक लघुवय के मुनि पधारते हैं वे विशाल हॉल के भव्य पाट पर आकर बड़े शान्तभाव से विराज जाते हैं। तदनन्तर प्रभु प्रार्थना करने के बाद उद्बोधन फरमाते हैं। उन्होंने बतलाया- संसार में मुख्य रूप से दो ही तत्त्व हैं- एक जड़ और दूसरा चैतन्य । इन तत्त्वों के संयोग से ही नवतत्त्व बने हैं। यह सारी दुनियां का विस्तार मूल रूप से उन दो तत्त्वों के संयोग का ही परिणाम है। जड़ चैतन्य दोनों परस्पर एकदम विपरीत होते हुए भी चैतन के अनादिकालीन वासनात्मक संस्कारों के कारण मिल गए हैं। जिसके कारण जड़ देह में अधिष्ठित आत्मा, अपने मूल चैतन्य स्वरूप को भूलकर बाहरी जड़ तत्वों में उलझकर परेशान हो रहा है। जब तक यह स्थिति बनी रहेगी, वह कमी आत्मा के मूल स्वभावगत सुख को प्राप्त नहीं कर सकती। उसे पाने के लिए अपने आप में आना होगा। शरीर एवं उनसे जुड़े सभी तत्त्वों से मोह छोड़ना होगा। लघुवयी साधु जी का उपदेश भी बड़ा मार्मिक हो रहा था। इसी बीच महायोगी का शिष्य मण्डली के साथ पदार्पण हो गया, सभी श्रोताओं ने खड़े होकर स्वागत किया। महायोगी, एक सीधे सादे धवल पाट पर, संत विशेष द्वारा लाए गए श्वेत आसन विशेष पर विराज गए। कुसुमवती को श्वेत परिधान में वेष्टित निष्काम देह श्री के पावन दर्शन से मानो ऐसा लग रहा था जैसे अर्धनिशा में चन्द्रमा की छिटकती चांदनी को पाकर कुमुदिनि खिल रही है। जिनका पावन दर्शन ही भव्यजनों को आकर्षित कर रहा था। तब उनके उपदेश की तो बात ही ओर थी। कुछ ही समयानंतर में महायोगी के मुख से पतितपाविनी, जन संतापहारिणी, पीयूषवर्षिणी दिव्य वाणी प्रवाहित होने लगी। कुसुमवती को लगने लगा कि गंगोत्री से बहती हुई निर्मल धारा के बीच वह बैठी है, जो उसके वर्षों से संतप्त मन को प्रक्षालित कर स्वस्थ बना रही है। महायोगी ने फरमाया-जीव अपने कृतकर्मों से ही सुख-दुःख की अनुभूति करता है। परमात्मा किसी भी कार्य में हस्तक्षेप नहीं करता। ईश्वर के हिलाए बिना संसार का कोई पत्ता भी नहीं हिल सकता। यह धारणा उचित नहीं क्योंकि ईश्वर कृतकृत्य है, वह ऐसे कार्यों में भाग नहीं लेता। यदि ईश्वर ही संसार को बनाता है, यह मान लिया जाय तो ईश्वर पर कई विपत्तियां आएगी। प्रथम तो ईश्वर ने इस दुनियां को क्यों बनाया उसे क्या आवश्यकता पड़ गई। यदि यह कहे वह ऊब गया था तो यह ईश्वर का बचकानापन ही माना जाएगा दूसरी बात यदि दुनियां बनाई भी तो एक को {100} ! सुखी, दूसरे को दुःखी, एक को मूर्ख, दूसरे को विद्वान क्यों बनाया। यदि यह कहें कि उसने अपने कर्मानुसार बनाया है तो कर्म कहां से आए। जब सबसे पहले जीव बनाया तो जब जीव पहले थे ही नहीं तो कर्म कहां से कर लिए। यदि कर भी लिए तो सर्वशक्ति मान ईश्वर क्या जीवों के पापों को नहीं बदल सकता ? यदि नहीं तो फिर सर्वशक्ति मान कैसा। इस प्रकार ईश्वर को सृष्टि का कर्ता मानने पर अनेक प्रान्तियां पैदा होती है। जिनका निराकरण नहीं हो सकता। अतः सत्य है, स्वयं जीव ही अपने सुख-दुःख का कर्ता है। अतः इन्सान को चाहिये कि वह अपने सत्पुरुषार्थ से अपने भाग्य को संवारने का प्रयास करें। महायोगी द्वारा ईश्वर के स्वरूप और स्वयं के पुरुषार्थ का महात्म्य समझकर कुसुमवती और विमा बहुत प्रभावित हुई। अब उनका प्रतिदिन सत्संग में आने का क्रम बन गया। एक दिन कुसुमवती ने महायोगी की सेवा में निवेदन किया- भगवन् ! क्या आप श्री हम जैसी पामर आत्माओं की जिज्ञासा का समाधान देने के लिए समय प्रदान कर सकेंगे ? महायोगी बोले- अवश्य-अवश्य ! आपके मन में जिस किसी भी प्रकार की जिज्ञासा हो, निःसंकोच भाव से रखकर समाधान ले सकते हो। हां, समय मध्यान्ह 3 बजे का उपयुक्त रह सकता है। क्योंकि हमारे यहां महिलाएं सूर्यास्त के बाद नहीं आ सकती। दूसरी बात दिन में भी किसी न किसी पुरुष की भी साक्षी में बैठना आवश्यक है तो मध्याह्न में पुरुष-महिलाएं रहती है। अतः आप आना चाहें तो स्वतन्त्र हैं। योगी श्रेष्ठ ! आप से शंका समाधान करते समय एक पुरुष की आवश्यकता क्यों ? कुसुमवती ने कहा। महायोगी बोले- बहुत अच्छा प्रश्न किया है, आपने। इसका भी समुचित समाधान किया जा सकता है। अभी प्रवचन समाप्त हुआ। अन्य कार्यक्रम भी हैं, आपका जब मध्यान्ह में आना होगा तो उस समय इसका भी समाधान लेने का प्रसंग बन सकता है। जी गुरुदेव ! यों कहते हुए कुसुमवती, विमा ने वन्दन किया और वे अपने बंगले पर पहुंची। उनके अन्य तो कोई काम था ही नहीं लंच लेने के बाद कुछ आराम करने के अनंतर विमा ने कुसुमवती से कहा- मम्मी ! महायोगी जी का लेंग्वेज कंट्रोल कितना जबर्दस्त है। एक शब्द भी व्यर्थ नहीं बोलते। जितना बोलते हैं उतना नपातुला संतुलित। ऐसे महापुरुष से ही धरती टिकी हुई है। यद्यपि विमा, आधुनिक जीवन शैली की होने के बावजूद भी उसे महायोगी का व्यक्तित्व आकर्षित कर रहा था। दोनों ठीक 3 बजे महायोगी - {101} के सानिध्य में पहुंच गई। उन्हें समय के साथ आया देखकर महायोगी ने फरमाया-लगता है आप दोनों की सत्संग के प्रति गहरी रुचि है। तभी आप ठीक समय पर पुनः पहुंच गई हो। महायोगी जी ! ऐसा कुछ नहीं है यह तो आपकी साधना से अनुच्यूत व्यक्तित्व ही हमें खींच लाता है। धर्म की भावना जितनी हमारे में नहीं, उतना आपके निर्विकार व्यक्तित्व का आकर्षण अधिक है। चलो आपका कैसे भी सही, अध्यात्म पथ पर अवतरण निज पर के लिए कल्याणकारी है। यों कहते हुए महायोगी ने उन्हें अपनी जिज्ञासा रखने के लिए कहा। हां आपका प्रथम प्रश्न तो यही है कि बहिनों से धर्मचर्चा करते वक्त भाई की आवश्यकता क्यों ? कुसुमवती जी ! (यह संबोधन ही मानों कुसुमवती के कानों में अमृत घोल रहा था) साधु भी साधना के पथ पर आगे बढ़ रहा है। ऐसी स्थिति में उसकी मर्यादा सुरक्षित रहे, इसलिए बहिन से धर्मचर्चा करते वक्त भी भाई की अनिवार्यता है। इसी बीच विमा बोल पड़ी- लेकिन भगवन् ! सामान्य साधक के लिए यह उचित हो सकता है पर आप तो महायोगी है। आप के लिए इन नियमों की क्या आवश्यकता है ? महायोगी जी बोले- विमा जी ! आपका कहना किसी दृष्टि से उचित हो सकता है, पर नियम तो बड़ों के पालन करने पर ही सामान्य साधकों में साकार हो सकता है। छोटे साधकों के लिए बड़े साधक आदर्श होते हैं, अतः उन्हें तो पहले पालना अनिवार्य है। फिर मैं तो अपने आप में छोटा- अल्पज्ञ साधक ही हूं। अतः वैसे भी मेरे लिए तो नियमों की पालना अनिवार्य है। धन्य है महायोगी श्रेष्ठ ! हमने आपकी प्रभुता का राज पा लिया है। लघुता के भाव कितने गहरे हैं। हम तो आपका पावन सानिध्य पाकर धन्य । हो गए। महायोगी श्रेष्ठ ! आप मुख पर वस्त्र क्यों धारण करते हैं ? विमा के प्रश्न पूछने पर महायोगी बोले- विभा बहिन ! आपका प्रश्न बहुत अच्छा है, यह सबके समझने जैसा है। जैन दृष्टि से हवा में असंख्य जीव बतलाए गए हैं। खुले मुंह बोलने पर गर्म हवा के बाहर निकलने पर उन सूक्ष्म जीवों की हिंसा होती है, अतः मुख पर कपड़ा लगाना आवश्यक है। मारवाड़ में देखा जाता है, जब व्यक्ति शादी करने के लिए जाता है तो घोड़ी पर बैठा, पूरे रास्ते भर मुख पर कपड़ा लगाए रहता है। जबकि शादी करने जा रहा है। शादी करने वाले को वर कहा है। "वर" याने श्रेष्ठ ! श्रेष्ठ व्यक्ति का श्रेष्ठ लक्षण. {102} है, मुख पर कपड़ा लगाना। ऐसे अनेक कारणों से मुख पर वस्त्र धारण करना आवश्यक है। विमा- बहुत ही सटीक एवं हृदयगम्य समाधान दिया है आपने। मैं तो समझी थी, यह केवल जैनियों की रूढ़ परम्परा है या चिह्न है। लेकिन यह तो हर व्यक्ति के लिए आवश्यक है। भगवन् ! लेकिन जैन साधु तो कपड़ा मुख पर लगाते हैं नाक पर नहीं ऐसा क्यों ? विमा के प्रश्न करने पर महायोगी बोले- आपका कहना उचित है। प्रथम तो नाक से निकलने वाली हवा छनकर बाहर आने से जीव नहीं मरते दूसरी बात नाक द्वारा ज्यादातर ऑक्सीजन (Oxygen) ही खींचता है, जबकि खुला मुंह सभी तरह की गैस खींच लेता है, अतः मुख पर वस्त्र लगाने की अनिवार्यता बतलाई है। योगीप्रवर ! मेरा अच्छा समाधान हुआ। क्या मैं ओर भी कुछ पूछ सकती हूं ? महायोगी बोले- अवश्य अवश्य ! जितने भी आपके मन में प्रश्न हो, सब बिन संकोच पूछ लीजिये। जितना आज समय होगा, आज समाधान देने का प्रसंग बन रहा है। अन्यथा कल परसों यथावसर समाधान दिये जा सकते हैं। अच्छा योगीप्रवर ! यह फरमाने कि जैनी जन्म से ही बन जाता है, या हर कोई जैनी बन सकता है ? विमा जी ! आपकी जिज्ञासा समयोचित है। जैन धर्म में जन्मना जाति का कोई महत्त्व नहीं है। जैनकुल में पैदा होकर भी जो जैन नियमों को पालन नहीं करता वह जैन नहीं है। जैनी बनने के लिए सात कुव्यसन, जुआ, मांस, शराब, चोरी, शिकार, परस्त्रीगमन, वेश्यागमन का सदा के लिए त्याग करना जरूरी है। इसके बाद देव अरिहंत, गुरु-निर्ग्रन्थ धर्म अहिंसामय पर सच्चा श्रद्धावान होना चाहिये। योगी प्रवर ! ये देव, गुरु धर्म क्या होते हैं ? विमा ने पूछा। महायोगी जी बोले- विमा जी ! देव से तात्पर्य है, जो राग द्वेष तेरे मेरे की भावना से ऊपर उठ गए हैं। काम, क्रोध, ममत्सर की वासनाओं को दिल से जड़मूल से उखाड़ दिया है। घाती कर्मों को समाप्त कर डाला वे देव ही सुदेव हैं। हमारा उन्हीं पर विश्वास हो ये देव, कोई व्यक्ति विशेष न होकर जिस किसी में भी ऐसी योग्यता आ जाती है वे सब हमारे वन्दनीय हैं। चाहें वे जैनी हो या भले जैनी नाम वाले न हों, पर योग्यता सुदेव की आनी चाहिये। सुगुरु उसे कहते हैं जो अहिंसा, सत्य, अचौर्य, ब्रह्मचर्य, अपरिग्रह आदि सिद्धान्तों का जीवन भर तक पूरी तरह पालन करते हैं। नंगे पैर, नंगे {103} । सिर चलते हैं। पैसा टका अपने पास नहीं रखते। सूर्यास्त के बाद खाना- पीना नहीं करते। दाढ़ी मूंछ एवं सिर के बाल भी आने हाथ से उखाड़ते हैं। जिन्दगी भर तक जो गृहस्थ के घर से सहज स्वाभाविक आहार मिलता है वही लेते हैं। महिला का स्पर्श भी नहीं करते हैं। आदि। ऐसे साध्वाचार के नियमों का पालन करने वाला हर साधक गुरु की केटेगिरी में आ जाता है। जो धर्म अहिंसा को संपूर्ण प्रतिष्ठा देता है, वह हर धर्म हमारा है। इन तीनों मौलिक तत्त्वों पर जो विश्वास रखता है, वह जैनी है। विमा बोली- बहुत अद्भुत व्याख्या की है आपने। आपका जैन धर्म तो ऐसा लगता है कि सभी धर्मों का हार्ट है। इसका अपना कुछ नहीं है जो भी सत्य है, वह उसका है। यों कहा जाय तो सारे धर्मों के सत्यांशों का संपूर्ण रूप है जैन धर्म। महायोगी- विमा बहिन ! आपके पास तो बहुत कम समय में सत्य को समझने की तीव्र मेघा है। भगवन ! यह बतलाएं कि क्या खास कम्युनिटी के अलावा अन्य कास्ट के लोग भी जैनी हैं ? हां-हां, अवश्य विमा बहिन ! अभी क्यों भगवन् महावीर स्वयं काश्यपगौत्रीय क्षत्रिय थे। उनका प्रथम शिष्य इन्द्रभूति गौतम गौत्रीय ब्राह्मण थे। अर्जुन अणगार माली थे। शालिभद्र और धन्ना, वैश्य थे तो हरिकेशी अनगार हरिजन थे। याने उन्होंने जैनी ही नहीं, पर उनके भी पूजनीय जीवन में चार वर्गों के लोगों को प्रवेश दिया है। जैन कोई भी व्यक्ति बन सकता है। जैन, जन्मना नहीं, कर्मणा होता है। योगी श्रेष्ठ (विमा बहिन ने कहा) क्या हम भी जैन बनने लायक हैं ? हैं या नहीं, पर हमारे लिए तो आज से आराध्य पूजनीय, वन्दनीय सब कुछ आप ही हैं और रहेंगे। हमने आपको समझा है, आपकी निर्विकार छवि हमारे दिल की गहराईयों में उतर चुकी है। इस भौतिकता की भारी चकाचौंध में विलासिता नग्न ताण्डव कर रही है, उसके बीच आप जैसा अद्भुत व्यक्तित्व का होना, सचमुच कीचड़ में कमल खिलना है, पत्थरों में हीरा मिलना है। आराध्य देव ! कभी आप हमारी कुटियां भी पावन करें, यद्यपि आप नंगे पैर चलते हैं। ऐसी स्थिति में हमारे लिए चला गया, हर कदम, हमारे लिए कष्टदायी है। हर परिस्थिति में जीवन भर पाद विहार का सोचना भी हमारे लिए तो मुश्किल है। भगवन् ! हमारी यह दिलीय तमन्ना है कि एक बार हमारे । {104} । यहां अवश्य पधारें। वैसे आपका शौच निवारणार्थ उधर पधारना होता ही है। अतः अतिरिक्त श्रम तो शायद नहीं पड़ेगा। यदि आपका पदार्पण हो जाय तो हम धन्य हो जायेंगे। महायोगी बोले- विभा जी ! हम साधु लोग जिस मकान में महिलाएं रहती हैं, वहां विशेष परिस्थिति के अलावा एक दो दिन से ज्यादा नहीं ठहरते। आपके बंगले में रहने से हमारी मर्यादा का प्रसंग कैसे बन सकता है ? इसी बीच कुसुमवती बोली- आराध्य प्रवर ! आपका फरमाना उचित है। परन्तु हमारा बंगला, आपकी शुभ कृपा से दो कोठी जितना विशाल है। आरपार है। आगे भी रास्ता है, पीछे भी। उसमें रहने वाले हम तीन प्राणी ही हैं। हम तो ज्यादातर आगे वाले भाग में ही रहते हैं, पीछे वाला भाग खाली ही रहता है। उसका रास्ता भी पीछे ही है। बीच का रास्ता बंद कर देंगे। फिर तो वह पूरी तरह स्वतन्त्र मकान हो जाएगा। तब मैं समझती हूं आपकी मर्यादा में कोई बाधा नहीं आएगी। महायोगी- कुसुमवती जी ! आपने तो सारी व्यवस्था ही मानो जमा दी है। लेकिन हां, एक बात और पूछना है कि आपने अभी बतलाया कि आप घर में तीन प्राणी हैं, जबकि आपको जब भी देखता हूं तब आप दो मां बेटी ही दिखलाई देती हैं, तीसरा प्राणी कौन है ? कुसुमवती-ओ हो गुरुदेव ! तीसरा प्राणी मेरा बेटा अनुराग शुक्ला है। महायोगी- लेकिन कुसुमवती जी ! वह तो कमी यहां आया हो ऐसा हमारे उपयोग ध्यान में नहीं है। कुसुमवती सच फरमा रहे हैं, गुरुदेव ! उसकी तो कुछ थिंकिंग (Thinking) ही ऐसी है। क्या बतलाएं। वह धर्म कर्म को कुछ मानता ही नहीं है। इसीलिए तो हम चाहते हैं कि आपका वहां पधारना हो जाय तो अनुराग शुक्ला का भी उद्धार हो सकता है। महायोगी- कुसुमवती जी ! आपका कहना उचित है। लेकिन जब उसे संत दर्शन में रुचि नहीं है तो हमारा वहां आना क्या उसके लिए आपत्तिजनक नहीं होगा? यद्यपि हम किसी का आमंत्रण नहीं चाहते पर किसी को हमारा आना रुचिकर न हो तो वहाँ जाने का परहेज भी करना होता है। कुसुमवती – गुरुदेव ! आप ठीक फरमा रहे हैं। पर मुझे विश्वास है कि आपका पदार्पण, फिर आपका यह अद्भुत तेज देखकर तो वह वैसे ही प्रभावित हो जाएगा। {105} महायोगी हो सकता है, आपका कहना सही हो जाय। लेकिन हम आपके यहां आने की सोचें उसके पहले उनकी स्वीकृति भी आवश्यक है। उनके यहां आने की आवश्यकता नहीं। बस यह जानकारी मिल जाना चाहिये कि उन्हें कोई आपत्ति नहीं है। कुसुमवती-ठीक है गुरुदेव ! वैसे तो मैं उसकी मां हूं फिर भी मैं उसकी अनुमति लेकर ही आपके चरणों में प्रार्थना करूंगी। कुसुमवती- विमा ने श्रद्धा की असीम आस्था के साथ गुरु चरणों की वन्दना की। भाव-विभोर होकर वे वहां से घर की ओर जाने के लिए कार में आकर बैठ गई। आज उनका तन-मन सब कुछ प्रफुल्लित था क्योंकि अब तक जो पाया था, वह तन-मन को ही छू पाया था। लेकिन जो इन महायोगी से पाया वह तो आत्मा को छू गया। रोम-रोम में समा गया। आज रात्रि डिनर (Dinner) के समय एक ही टेबुल पर अलग-अलग कुर्सियों पर कुसुमवती, अनुराग एवं विमा बैठे थे। वे भोजन कर रहे थे। इसी बीच कुसुमवती ने बात चलाई-अनुराग बेटे ! इस समय इस बॉम्बे महानगर में एक चलते-फिरते भगवान पधारे हैं। वे अद्भुत साधक हैं। मैं दिन में भी उनके दर्शनार्थ गई थी, दर्शन क्या किये मानो मेरा रोम-रोम खिल उठा। अनुराग बीच में ही बोल पड़ा- मम्मी ! क्या बहकी-बहकी बातें करती हो। क्या अभी तक भी तुम्हारी अंध श्रद्धा नहीं गई। तुमने पिता जी की जिन्दगी एवं हमारे अध्ययन के लिए कितने देवी देवताओं को पूजा होगा? कुछ हुआ है अब तक। बुखार आया, ताबीज बांधती, क्या मिला उससे। यह साधु-सन्यासी तंत्र-मंत्र करके पेट भरने के चक्कर में बहुरुपिये की तरह विविध वेश बनाकर आते रहते हैं और अपना पेट पालते हैं। इनके चक्कर नहीं पड़ना चाहिये। ठीक कहते हो बेटे अनुराग (कुसुमवती ने कहा) आजकल की दुनियां में ऐसे लोगों की कमी नहीं है, पर सब ऐसे ही हो, यह कोई आवश्यक नहीं है। कुछ व्यक्तित्व ऐसे भी होते हैं जो अद्भुत होते हैं। क्या पत्थरों में हीरे नहीं निकलते हैं ? क्या कीचड़ में कमल नहीं खिलते हैं ? यदि हां तो दुनियां बहुत बड़ी है। ढोंगियों के बीच अच्छे साधु, महायोगी भी होते हैं। अनुराग- मां मैंने तो जितने भी साधु देखे हैं, वे ढोंगी ही मिले हैं। गांजा, भंग, दारु पीने वाले भी साधु हैं, शादी तो नहीं करते पर रखेल रखने वाले भी साधु हैं, कारों और मोटरों में बिना कमाई के गुलछर्रे उड़ाने वाले भी में {106} । सन्यासी हैं। लच्छेदार भाषण देकर हजारों लाखों भोले-भाले लोगों को एकत्रित कर ठगने वाले सन्यासी किस काम के। आए दिन पत्र-पत्रिकाओं में उनके चरित्र को प्रश्नांकित करने वाले समाचार छपते रहते हैं। ऐसे साधु तो देश के लिए एक कलंक है। उनसे तो दूर ही रहना चाहिये। कुसुमवती ने बड़े धैर्य से सुना फिर बोली- बेटा ! तुम्हारा अनुभव भी सही है। पर मैंने भी बाल ऐसे ही पक्के नहीं किये हैं। एक उम्र पार कर प्रौढ़ता की देहली पर हूं। मेरी अनुभूति प्रज्ञा ने भी सब कुछ समझा है। जिन महायोगी के लिए कह रही हूं। निश्चय ही वे ऐसे नहीं हैं। अनुराग ने सोचा- क्यों मम्मी का दिल दुःखाया जाय। उसने कहा- अच्छा मम्मी ! ठीक है, हो सकता है वे योगी अच्छे हों। कुसुमवती-ऐसा नहीं बेटे ! मैं तुम्हें जबर्दस्ती नहीं मनवा रही हूं। यह तो दर्शन करके अनुभूति करने का विषय है। तुम एक बार भी उन्हें देखलोगे तो तुम्हें लगेगा वाकई कोई अद्भुत योगी है। अनुराग- पर मम्मी ! न तो मेरे पास समय है, और न ही मेरी कोई रुचि है। तुम चाहती हो तो मैं मना नहीं करता। । इतनी देर चुप बैठी विमा बीच में ही बोल पड़ी- भैया बात तो आप सच कहते हैं। मेरी भी इन साधुओं में कोई रुचि नहीं थी लेकिन मम्मी के साथ मैं भी गई थी। उनके दर्शन करने। यह योगी तो बहुत ही निराले हैं। लगता है उनका दर्शन ही पाप, संताप हरने वाला है। जिस प्रकार भयंकर गर्मी में परेशान व्यक्ति, जब ए.सी. (A.C.) रूम में आकर शान्ति का अनुभव करता है, वैसे ही तन-मन से अशान्त व्यक्ति ऐसे योगी के चरणों में जाकर अनुपम शान्ति की अनुभूति करता है। मैं मम्मी के साथ गत तीन-चार दिन से जा रही हूं। मैंने जो भी उनके सानिध्य में पाया, वह बयान नहीं कर सकती। विमा भी आधुनिक युग में जीने वाली नवयुवती थी। उसके मुख से जब महायोगी की प्रशंसा सुनी तो अनुराग को लगा कि हकीकत में कोई विशिष्ट व्यक्तित्वधारी योगी लगते हैं। अनुराग ने कहा- विमा मैं मानता हूं कि अगर तुम दोनों सत्संग कर आए हो तो वे योगी महान् ही होंगे। इसी बीच कुसुमवती बोली – बेटा ! इसीलिए तो मैं तुम्हें बोल रही थी लेकिन तुम जो हो सुन ही नहीं रहे हो। तुम ही बतलाओ कि मां, अपने बेटे का हित चाहेगी, या अहित। मैं जो तुम्हें दिन-रात दौड़ा-दौड़ी करते देखती हूं सो सोचती हूं कि तुम्हें शांति की आवश्यकता है। और वह ऐसे {107} अद्भुत योगी के पास ही मिलेगी। अनुराग – मम्मी ! आपका कहना, उचित है, परन्तु मेरे पास समय नहीं है। कुसुमवती-मेरे प्यारे बेटे ! यदि मैं बीमार हो जाऊं तो क्या फिर तुम्हारे पास मेरा इलाज करवाने के लिए समय नहीं होगा ? जब हिल स्टेशनों पर तूं मुझे स्वास्थ्य के लिए घुमाने ले जाता है, क्या उस समय तेरे काम में अड़चन. नहीं आती ? मैं मानती हूं कि जिसमें इन्सान की रुचि नहीं हो, उसके लिए उसको समय नहीं मिलता है। पर कई बार रुचि बनानी भी पड़ती है। अनुराग समझ गया कि आज मम्मी छोड़ने वाली नहीं है। उसके लिए दुनियां में जो कोई सारभूत पूजनीय वस्तु थी तो वह उसकी माता ही। पिता तो इस दुनियां में उसके लिए कष्ट उठाते हुए चल बसे थे। अब केवल मां ही बची थी। वह सब कुछ अपनी मां को ही मानता था। इसलिए कई बार न चाहते हुए भी मां का मन रखने के लिए वह बहुत सारे काम कर दिया करता था। आज भी जब कुसुमवती का इतना आग्रह देखा तो वह बोल पड़ा अच्छा मम्मी ! बोलो क्या करना है मुझे। आदेश फरमाएं। कुसुमवती बोली- बेटा ! आदेश वाली तो कोई बात नहीं है। उन महायोगी को मैंने कुछ दिन अपने बंगले पर विराजने की प्रार्थना की तो प्रथम तो वे बोले- उनकी मर्यादा स्वतन्त्र बंगले में ठहरने की है, तो मैंने अपने बंगले के पिछले भाग में पधारने का निवेदन किया तब वे बोले कि आपकी तो विनंती है पर आपका सुपुत्र अनुराग जी शुक्ला की क्या इच्छा है ? मैंने कहा ऐसी कोई बात नहीं है। यद्यपि उसकी धर्म में रुचि तो है नहीं पर वह मेरी बात नहीं टालेगा। लेकिन उनका यह संकेत था कि अनुराग शुक्ला की स्वीकृति लेने पर ही हम आपके बंगले पर आने का सोच सकते हैं। इसलिए तुम्हारी अनुमति की आवश्यकता है। मम्मी जरा सोचें आप। किस योगी को ला रही हो। वे कैसे क्या आएगें ? उनकी क्या व्यवस्था करनी होगी ? बीच में ही कुसुमवती बोल पड़ी- बेटा ! मैंने पहले ही कहा था ना कि वे.ऐसे वैसे सन्यासी नहीं हैं। पाद विहारी है। फिर कुसुमवती ने जैन साधु का परिचय दिया। और उसमें भी महायोगी की विशेषता का दिग्दर्शन करवाया। उनके लिए कोई व्यवस्था की आवश्यकता नहीं है। वे भोजन भी एक घर से नहीं लेते हैं। थोड़ा-थोड़ा सभी शाकाहारी घरों से लाते हैं। वे तो देते ही देते हैं लेते तो कुछ हैं ही नहीं। जब तुम उनके पास बैठोगे तो तुम्हें ही पता चल जाएगा। वे सवेरे 8 बजे से । वे {108} । । 9% बजे तक सत्संग करते हैं। उनमें 8%2 बजे से 9बजे तक महायोगी जी स्वयं उपस्थित जन समुदाय को सम्बोधित करते हैं। हमें तो केवल इतना ही करना है कि अधिक से अधिक लोगों को सत्संग के लिए एक बार प्रेरित करना है, फिर तो उनमें इतनी जबर्दस्त शक्ति है कि लोग स्वतः ही खींचे चले आएंगे। यद्यपि अनुराग शुक्ला की कोई खास रुचि नहीं थी। फिर भी कुसुमवती का दिल रखने के लिए उसने हां भर दी। अच्छा मम्मी यदि वे यहां आएंगे, तो तुम्हारे आदेशानुसार जो भी बन सकेगा वह करूंगा। बहुत प्रसन्न होते हुए कुसुमवती ने कहा- बेटा ! तुमसे मुझे यही आशा थी। तुम मेरी बात नहीं टालोगे। अब कल हम उनकी सेवामें अपने यहां पधारने हेतु प्रार्थना करेंगे। वे कब पधारते हैं, इसकी जानकारी लेंगे। डिनर (Dinner) भी हो गया और बात भी हो गई। नये सूर्य की नई प्रभात/यद्यपि हर दिन सूर्य वही दिन और वही प्रमात लेकर आता है, जो कल था और आने वाले दिन भी होगा। तथापि वह अपूर्व-अपूर्व संगठनों, संरचनाओं में रूपान्तरित होने से अपूर्वता पाता चला जाता है। कुसुमवती और विमा प्रातःकालीन कार्यों से निवृत्त होकर महायोगी के सानिध्य में पहुंची। लघुवय बालयोगी का सत्संग. चल रहा था। वे साधनाशील होने के साथ ही बड़े मार्मिक उपदेष्टा थे। कुछ समय के बाद महायोगी का पदार्पण हो गया। उनके पट्टासीन होने के बाद शांतभाव से जनमानस उनका सत्संग सुनकर भाव विभोर हो उठा। सत्संग के समापन होने पर मां-बेटी ने महायोगी के नजदीक पहुंचकर निवेदन किया- भगवन् ! कब आप हमारी कुटिया को पावन करेंगे ? वैसे आप श्री के संकेतानुसार से पूछ लिया है और उसने भी अपनी ओर से आप श्री के पधारने की प्रार्थना की है। महायोगी बोले-कुसुमवती जी ! आपकी भावना प्रबल है, परन्तु मुझे वहां ले जाने से विशेष लाम क्या होगा ? गुरुदेव विशेष नहीं अपूर्व लाम होगा। ऐसा मेरा दिल कहता है। आप जैसे निस्पृह साधक को अर्थलाम या यशलाम तो चाहिये नहीं। आपको तो धर्म लाम चाहिये। वह अवश्य मिलेगा। महायोगी ने सारी परिस्थितियों का सर्वेक्षण करने के बाद कहा कि आपके प्रबल आग्रह को देखते हुए हम शनिवार को आपके द्वारा निर्धारित हमने अनुराग {109) स्थान पर आने की भावना रखते हैं और हो सका तो रविवार को सत्संग वहां किया जा सकता है। महायोगी के मुख से इतना सुनते ही मां-बेटी हर्षोत्फुल्ल हो उठी। तथा चरणों में वन्दन, नमस्कार करते हुए आभार व्यक्त किया। बंगले पर जाकर अनुराग शुक्ला को सारी स्थिति से अवगत कराया। उसे लगा कि अब तो महायोगी कैसे भी क्यों न हो जब बंगले पर आ ही रहे हैं तो उनका स्वागत अपने स्टेण्डर्ड (Standard) के अनुसार होना चाहिये। अतः स्थान-स्थान पर स्वागत गेट सजा दिये गए। फूल बिछाने की तैयारी होने लगी। इतने में कुसुमवती को लगा कहीं, फूल बिछाना गलत तो नहीं हो जाएंगे, क्योंकि वे महायोगी तो सूक्ष्म जीव की रक्षा के लिए भी नंगे पैर रहते हैं। वे फूल पर कैसे चलेंगे। फिर जब उसने इसकी जानकारी ली तो लगा कि हकीकत में महायोगी फूल पर पैर रखना तो दूर उसका स्पर्श भी नहीं करते हैं। जब महायोगी का पदार्पण होने लगा तो अनुराग शुक्ला को यह देखकर गजब का आश्चर्य हुआ कि जितना विराट व्यक्तित्व उतना ही सिम्पल (Simple) वेश । नंगे पैर स्वयं के उपकरण स्वयं उठाए चले आ रहे हैं एक अवधूत योगी। जब उन्हें लगा कि ये गेट उनके स्वागत में लगे हैं, तो वे एक भी गेट में प्रवेश न कर उसके किनारे बाहर से आगे बढ़ते चले गए। अनुराग शुक्ला भी कम्पनी के स्टाफ मेम्बरों (Staffmembers) एवं अपने परिचित दोस्तों के साथ स्वागत करने के लिए सामने आया था और वह भी महायोगी के पीछे-पीछे चलने लगा। प्रथम बार दर्शन में ही उस पर महायोगी के सीधे और सरल व्यक्तित्व का गहरा प्रभाव पड़ा। महायोगी ने बंगले के परिसर में पहुंचकर ठहरने की आज्ञा ली। स्वतन्त्र उपखण्ड में अपने छोटे-बड़े सभी योगियों के साथ जाकर विराज गए। जब अनुराग शुक्ला ने देखा ये तो डनलप के गद्दों पर भी नहीं बैठते, कालीन पर भी पैर नहीं रखते और भोजन भी एक घर से नहीं लेकर आसपास के सभी घरों से स्वयं लेने जाते हैं। उसने नजदीक से योगियों की क्रियाओं को देख ली, वह कुछ प्रभावित हुआ। अब उसने कल के सत्संग के लिए आसपास के लोगों को ही नहीं, अपितु बॉम्बे के टॉप धनवानों को भी आमंत्रित किया। बंगले के बाहर खुले परिसर में सत्संग करवाया गया। भारी संख्या में लोग उपस्थित थे। महायोगी की वाणी, निर्मल मंदाकिनी की तरह प्रवाहित होने लगी। जो भी इन्सान, दुनियां में आया है उसे एक न एक दिन जाना ही है। जन्म के साथ मृत्यु जुड़ी है। इस अपरिहार्य स्थिति को कोई भी नहीं टाल सकता। । {110) बल्कि जाने का समय भी फिक्स नहीं है। ऐसी अनिश्चित जिन्दगी में स्थाई सुख की चाहना करना व्यर्थ है। जिन भौतिक ऐश्वर्य को इन्सान एकत्रित करने में लगा है। वह स्वयं स्थाई नहीं है तो उस विनाशी ऐश्वर्य से अविनाशी सुख को पा नहीं सकता सुख देने से सुख मिलेगा। यदि गले में किसी से माला पहनना है तो पहले पहनाने वाले के सामने झुकना होगा। सामने वाले का सम्मान करेंगे तो आपका भी सम्मान होगा। यदि हम किसी की रक्षा करेंगे तो हमारी भी एक न एक दिन रक्षा होगी। आदमी अपने नसीब के अनुसार फल पाता है। लेकिन नसीब को बनाने वाला भी आदमी के स्वयं का पुरुषार्थ ही है। अतः निज पुरुषार्थ को समझकर जगाने की आवश्यकता है। अच्छा पुरुषार्थ करते हुए भी परिणाम गलत आता है, तो वह भी अच्छे के लिए समझना चाहिये। अच्छे का अच्छा और बुरे का बुरा फल एक दिन अवश्य मिलता है। यदि अच्छा करते हुए भी परिणाम गलत दिखता है तो वह परिणाम अच्छे कार्य का न होकर कोई अन्य किसी पाप के उदय का परिणाम है। जिस प्रकार नींबू का बीज बोया और आम का अंकुरण होता है तो यह स्पष्ट है कि आम का बीज जमीन के भीतर पहले से विद्यमान है तभी आम का अंकुरण हुआ है। लेकिन आम का अंकुरण नींबू के बीज से नहीं हो रहा है। यही स्थिति पुण्य पाप के उदय के विषय में भी समझनी चाहिये। गृहस्थ जीवन में जीने वाले के लिए मुख्य रूप से चार बातें बतलाई गई हैं-धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष। अर्थ काम बीच में है। उन पर धर्म का कंट्रोल (Control) होने पर ही वे हितकारक साबित हो सकते हैं। जिस प्रकार पायजन (Poison) मारक होता है। पर कब किस परिस्थिति में किसके साथ, कितने अंश में ग्रहण करने का यदि ज्ञान हो तो वह पायजन (Poison) रोग निवारक भी बन जाता है। धर्म की नींव पर ही धन का महल स्थाई टिक सकता है। धर्म का फल यद्यपि स्पष्ट नजर नहीं आता किन्तु वह गाड़ी में पेट्रोल की तरह सहयोगी बना रहता है। बिना धर्म का धन एक आग के प्रम की तरह होता है। जो कुछ ही समय में नष्ट हो जाता है। अन्याय का धन इन्सान को मानसिक तौर पर हर वक्त परेशान किये रहता है। धन की तीन गति बतलाई गई है- दान, भोग और नाश। मारवाड़ी में एक कहावत है- " दे गया सो ले गया, खा गया सो खो गया। और जोड़ गया, सिर फोड़ । गया।" {111} अन्याय अनीति से कमाए धन का स्वयं के उपभोग में ही खर्च करने वाले इन्सान को उसका रिएक्शन (Reaction) हुए बिना नहीं रहता जो रिएक्शन उसके तन-मन दोनों के लिए खतरनाक होता है और बिना उपभोग के केवल सम्पत्ति एकत्रित करने वाला इन्सान तो और भी अधिक अज्ञानी है। क्योंकि पाप भी किया पाया भी कुछ नहीं। दूसरी बात बच्चों के लिए सम्पत्ति छोड़ने की आवश्यकता नहीं। एक कहावत है- पूत सपूत तो क्यों धन संचय। पूत कपूत तो क्यों धन संचय ।। यदि आपका बेटा सपूत है तो वह स्वयं पैसा कमा लेगा और यदि कपूत है तो आपका कमाया हुआ भी उड़ा देगा। अतः संचय करने की कोई आवश्यकता नहीं रह जाती। धन की सबसे उत्तम गति दान ही है। जो कि इस लोक में सम्मान और परलोक में महान् समृद्धि देने वाली बनती है। धन होना कोई महत्त्वपूर्ण नहीं है। धन तो एक नगर वधू के पास भी खूब मिल जायेगा। पर उससे कोई इज्जत नहीं। धन का उपयोग दान में करने पर ही सम्मान की स्थिति बन सकती है। इन्सान विश्व के 84 लाख प्राणियों में सर्वश्रेष्ठ प्राणी है। उस पर सारे विश्व के प्राणियों का प्रतिनिधित्व है। उन सबकी रक्षा करने की उस पर जिम्मेवारी है। उसमें भी इन्सान को इन्सान का ध्यान तो रखना ही चाहिये। जो इन्सान, इन्सान से प्यार नहीं कर सकता, वह कहीं पर भी चला जाय, कितना भी धर्म कर ले, पूजा पाठ कर ले, फिर भी वह परमात्मा से प्यार नहीं कर सकता। कोई हमारे लिए कुछ कर रहा है या नहीं कर रहा है, हमें यह नहीं देखते हुए दूसरों का हित करना चाहिये। यद्यपि हजारों धर्म प्रचलित हो गए हैं। कौनसा धर्म अपनाना, यह भी इन्सान के सामने समस्या का विषय बना हुआ है। लेकिन (अहिंसा) धर्म के नाम पर विश्व के सारे धर्म एक मत है। सभी जीव रक्षा में धर्म मानते हैं। अतः दया धर्म को अपनाने में कहीं कोई विवाद नहीं है। आज इन्सानियत तड़फ रही है। महिलाओं की अस्मिता खुल्ले आम बाजारों में बिक रही है। अनाथ बच्चे दाने-दाने के लिए मुंहताज हो रहे हैं। श्रीमन्तों को इन्सानियत की कराहट सुनने की आवश्यकता है। उनकी दुआएं आपको खुशहाल बना देगी और उनकी बद्दुआएं फटेहाल बनाते भी देरी नहीं करेगी। बिचारा गरीब {112} । आज पैसे-पैसे के लिए तरस रहा है। बहुत बार पैसे के अभाव में सही उपचार नहीं होने से उनकी जिन्दगी, मौत के मुंह में जा रही है। अभय दान देने का प्रसंग है। सभी दानों में सर्वश्रेष्ठ अभयदान है। अपने जमीर को जगाएं और इन्सानियत की सेवा करना सीखें। इन्सानियत की सेवा, अपनी सेवा है। महायोगी का धारा प्रवाह उपदेश चल रहा था। सभी लोग मंत्र मुग्ध होकर सुन रहे थे। अनुराग शुक्ला धर्म का ऐसा विशुद्ध रूप पहली बार ही सुन रहा था। उसके मन में भी यही धारणा थी कि धर्म में भी "अपनी-अपनी ढपली और अपना-अपना राग" सब अपनी-अपनी बात करते हैं। अपने-अपने पूजा पाठ को ही महत्त्वपूर्ण बतलाते हैं, दूसरे की पूजा को गलत बतलाते हैं। पर यहां तो महायोगी ने सभी धर्मों के राज स्वरूप अहिंसा का स्वरूप समझाया है। वाकई में दया धर्म में किसी का कोई विरोध नहीं है। यह बात भी निश्चित है कि दुनियां से कभी भी जाना पड़ सकता है तो.इतनी भाग दौड़ किसलिए। किराये के मकान के लिए इतनी दौड़ करने वाला मूर्ख ही माना जाता है। बिना धर्म के धन तो मैंने कमा लिया, पर महायोगी के कथनानुसार मैं हर समय परेशान रहता हूं, कोई न कोई टेन्शन मुझे घेरे रहता है जबकि इस समय मेरी उम्र भी कुछ नहीं है। हकीकत में अर्थ पर धर्म का कंट्रोल (Control) आवश्यक है। महायोगी तो जैसे लगता है कि हकीकत में ही गहरे ज्ञानी हैं। उन्होंने स्पष्ट कहा कि.......पैसे के अभाव में बिना उपचार के गरीबों की जिन्दगी मौत के मुंह में चली जाती है। मेरे पिता के साथ भी तो यही हुआ था। तभी तो मैंने शराफत की जिन्दगी छोड़कर यह जिन्दगी अपनाई। पर महायोगी कहते हैं कि वह भी मेरे किसी पाप का उदय था। कोई बीज पहले से ही ऐसा बोया हुआ था। सचमुच, महायोगी ने लगता है अपने योगबल से जानकर मेरी गुंथियों को सुलझाया है। यह भी सच है कि-"पूत सपूत तो क्यों धन संचय' मेरे पिता जी मेरे लिए कुछ नहीं छोड़ गए और मैंने कुछ वर्षों में ही अरबों रुपये कमा लिये हैं। फिर मुझे भी किसलिए धन एकत्रित करना है। लगता है इनका एक-एक उपदेश अत्यन्त सारगर्भित है। जो कि मेरी अन्तरात्मा को झकझोर रहा है। फिर महायोगी ने यह संकेत भी दिया कि सम्पत्ति का उपयोग, दया धर्म के लिए हो, इन्सानियत की सेवा की जाय। बहुत ही विशुद्ध चिन्तन है। ये महायोगी, कोई लल्लू-पंजू योगियों की तरह नहीं है। जिनका कि नाम ऊंचा और काम नीचा होता है। ये तो निस्पृह महासाधक निस्वार्थ भाव से जनकल्याण करने वाले । नहीं - । भाषा {1 एवं व्यवहार यह परिचय दे रहा है कि गहरे अध्यात्मनिष्ठ साधक हैं। ऐसे महासाधक तो ढूंढने पर भी नहीं मिल पाते हैं। लगता है मेरे सद्भाग्य का उदय हुआ है....... | यह सोच अनुराग शुक्ला के दबे हुए विशुद्ध विचारों को उभारने लगी। महायोगी का सत्संग सम्पन्न हुआ। सभी लोग एक-एक कर आशीर्वाद प्राप्त करते हुए बढ़ते चले गए। महायोगी अपने प्रकोष्ठ में पधार गए। अनुराग शुक्ला साथ में ही था। उसने कहा- महायोगी श्री ! यदि आपको अनुचित न लगे तो मेरे मन में कुछ शकाएं हैं, उनका समाधान चाहता हूं। इतनी देर तक सत्संग करने के बावजूद भी वही खिलता मुस्कराता चेहरा...महायोगी बोले- अनुराग कुमार जी ! यहां उचित अनुचित वाली कोई बात नहीं है। आप निसंकोच भाव से पूछे। फिर हम तो यह भी कहते हैं कि हम कहें वह न माने। जब तक 5 + 5 =10 सर्वमान्य हैं, उस अनुसार हृदयगम्य उत्तर न मिले तो पुनः पूछ सकते हैं। हमें आपके पूछने पर खुशी ही होगी। महायोगी श्री ! आपके पावन दर्शन निश्चय ही मेरे मन को पावन कर रहे हैं और मेरी सुषुप्त चेतना पर दस्तक लगा रहे हैं। आपके उपदेश से मेरी अनेक समस्याओं का वैसे ही समाधान हो गया है। लगता है आप निगूढ ध्यान योगी हैं। दूसरों के दिल के पारखी हैं। मैं धन्य हुआ, आपको अपने यहां पाकर। महायोगी बोले- अनुराग कुमार जी ! ऐसी कोई विशेष बात नहीं है। हम तो अभी सामान्य साधक हैं। हमें अभी बहुत मंजिलें पार करनी है। अनुराग- महायोगी जी ! मुझे आपकी निस्पृहता ने खूब प्रभावित किया है। अब आप फरमावें कि मैं कब आपकी सेवामें हाजिर होऊं। महायोगी – आप अभी भी पूछ सकते हैं। इस समय भी मेरे पास कुछ समय है, उसका उपयोग आपके लिए कर लेते हैं। लेकिन योगी प्रवर ! इस समय तो आप इतना उपदेश देकर पधारे हैं। कुछ आराम कर लें। फिर देखा जाएगा। अनुराग के निवेदन करने पर वे बोले- ऐसी कोई खास बात नहीं है। यह तो हमारा प्रतिदिन का अभ्यास है। यदि आपको कोई खास काम नहीं हो तो जिज्ञासा का समाधान ले सकते हैं। महायोगी जी ! मेरे ऐसा कोई काम नहीं है। जब आप अपना अमूल्य समय दे रहे हैं तो मैं आपकी सेवा में उपस्थित हूं। अनुराग महायोगी के सानिध्य में बैठ गया। महायोगी जी पाट पर विराज गए। {114} कुसुमवती व विमा अनुराग में आ रहे परिवर्तन को दूर से देख रही थी। उन्हें तो पहले ही पक्का भरोसा था कि ऐसे महायोगी के सानिध्य में आने के बाद अनुराग में निश्चित परिवर्तन आएगा, क्योंकि स्वभाव से तो वह सदाचारी, ईमानदार एवं नैतिक रहा है। किन्तु परिस्थितियों ने उसे अनैतिक एवं व्यसन ग्रस्त बना दिया है। ज्योंही दबी पर्ते उठनी शुरू होगी त्योंही भीतर का सहज स्वभाव जागृत हो जाएगा। जो कि कुसुमवती व विमा को नजर आने लगा। जिससे वे अन्दर ही अन्दर अनिर्वचनीय आनन्द की अनुभूति करने लगी। महायोगी प्रवर ! प्रथम तो मैं आपसे इस बात के लिए माफी मांग लेता हूं कि आपके सामने किस तरह की भाषा में बोला जाता है, इसका मुझे ज्ञान नहीं है। लेकिन अब मेरी श्रद्धा भावना पूरी है, आदर भाव है। बीच में ही महायोगी बोले। अरे अनुराज कुमार जी ! आप इस बात का कतई विचार न करें कि आप किस भाषा में बोल रहे हैं। निंदा-प्रशंसा में समभाव रहना ही हमारी साधना है। दूसरी बात आप तो वैसे भी बड़े आदर व शिष्ट भाव से बोल रहे हैं और हम भाषा नहीं, भावों को अधिक महत्त्व देते हैं। महायोगी की बात सुनकर अनुराग बोला- महायोगी जी ! आपने फरमाया कि न्याय और नीति के साथ चलना चाहिये। मैं जब बचपन में था मेरे पिता न्याय व नीति से चलते थे, उन्हीं के संस्कारों के कारण में भी न्याय- नीति ईमानदारी के पथ पर हमेशा बढ़ता रहा। इसी ईमानदारी की वेदी पर अर्थ के अभाव में हम प्रताड़ित अपमानित होते रहे और यही मूल कारण था कि पिता का ईलाज न हो पाने के कारण उनका स्वर्गवास हो गया। इस घटना ने मुझे झकझोर दिया था। उसके पश्चात् मुझे विचार आया कि इस दुनियां में धन ही सब कुछ है। धन के बिना पढ़ाई, इन्सानियत, नैतिकता आदि सब बेकार हैं। जिसके पास धन है, उसके पास सब कुछ है। जिसके पास धन है उसकी सारी बुराइयां, अवगुण दब जाते हैं। इसी सोच के कारण मैंने भी अपनी जिन्दगी में यह निर्णय ले लिया कि किसी भी तरह मुझे अधिक से अधिक धन कमाना है। हम वैसे तो निवासी कोटा के हैं। पर आज से 7 वर्ष पूर्व मैं बॉम्बे आ गया था और महायोगी जी ! मैं आपको क्या बताऊं संक्षिप्त इतना ही कह दूं कि जो भी धन कमाने का तरीका मुझे समझ में आया मैं बेहिचक उस रास्ते पर आगे बढ़ता चला गया। चाहे वह रास्ता उचित हो या अनुचित। मेरा मुकद्दर ही समझिये कि बस हर क्षेत्र में मुझे सफलता अधिक से अधिक मिलती गई और आज में अरबों का मालिक बन गया। देश-विदेश में {115} में मेरे ऑफिस खुले हुए हैं। सैकड़ों हुशियार और बुद्धिजीवी लोग मेरे अधिनस्थ कार्यरत हैं। क्या आज के युग को देखते हुए मैंने कोई अनुचित किया है ? मुझे तो कोई अनुचित नहीं लगता। पर आज आपके उपदेश ने मुझे सोचने के लिए नई दिशा दी है। इसलिए मैं आपके पास यह प्रश्न रख रहा हूं। महायोगी जी योग की गहराईयों में उतरे होने से विशिष्ट प्रतिमा के धनी थे। उनमें हर जिज्ञासु को समझाने की विशिष्ट क्षमता थी। वे अनुराग शुक्ला को सम्बोधित करते हुए बोले- अनुराग कुमार जी ! आपकी समस्या आज की ज्वलन्त समस्या है। विलासिता के साथ ही अन्याय, अत्याचार के नग्न ताण्डव के बीच ऐसी सोच परिस्थिति के मारे सहज ही हर किसी युवक की बन सकती है। अभी-अभी आपने कहा कि मेरा मुकद्दर कहिये कि मैं सफल होता चला गया। यह मुकद्दर क्या हैं। भाग्य ही तो है। जरा सोचिये यह भाग्य किसने बनाया। कोई विधाता तो नहीं जो भाग्य का निर्माण करे। यदि विधाता भाग्य बनाए तो एक का अच्छा व दूसरे का बुरा क्यों बनावें। सब का ही अच्छा क्यों न बना दे। अत: स्पष्ट है कि भाग्य का निर्माण आदमी के स्वयं के कर्म, पुरुषार्थ के बल पर ही होता है और यदि पुरुषार्थ गलत हो तो अच्छे भाग्य का निर्माण कैसे हो सकता है। आप प्रकृति का नियम भी देख सकते हैं कि जैसा बीज बोया जाएगा, फल भी वैसा ही मिलेगा। तब यह आपके सोचने का विषय है कि अनीति पूर्ण कार्यों से अच्छा फल कैसे मिल सकता है? अच्छा तो महायोगी जी ! यह बतलाईये कि मुझे अनीति पूर्ण कार्यों से अच्छा फल कैसे मिल रहा है। मुझे ही नहीं दुनियां में कई लोग गलत तरीके से पैसा कमा रहे हैं। जबकि नीतिवान, ईमानदार तो भूखों मर रहे हैं। अनुराग के पूछने पर महायोगी जी बोले- इसका कारण बेईमानी नहीं है अपितु कुछ सुकृत्य ऐसे भी इस भव या पूर्वभव के किये हुए होते हैं, जो कि आज हमारी नजरों के सामने नहीं है, उनका फल है कि आज बेईमान भी सम्पन्न बन जाता है। आटे की चक्की में ऊपर से गेहूं डाला जा रहा है और नीचे से मक्की का आटा निकल रहा है तो यह समझते देर नहीं लगती कि इससे पहले मक्की डाली हुई है। यही हाल कर्म के फल परिणाम का भी है। महायोगी जी ! मैंने तो अपनी जिन्दगी में काफी अन्याय, अत्याचार किये हैं। ऐसी स्थिति में आपके उपदेशानुसार तो उसका परिणाम अच्छा नहीं होगा? {116} महायोगी बोले- मेरे उपदेशानुसार नहीं, आप स्वयं सोचिये न्याय की तुला पर किस आचरण का क्या परिणाम आएगा ? न्याय किसी व्यक्ति का तो है नहीं, सब एक समान है। यदि गलत करते हुए भी अच्छा परिणाम आ रहा है तो वह गलत कार्य का परिणाम नहीं है, अपितु पूर्व में कुछ अच्छा कर रखा है उसका परिणाम आ रहा है। अपने कृत्यों का परिणाम तो किसी भी जीव को नहीं छोड़ता है। चाहे वह तीर्थंकर भी क्यों न बन जाए। फिर तो महायोगी जी ! मैंने तो इस छोटी सी जिन्दगी में बहुत कुछ नैतिकता, मानवता और धर्म विरोधी कार्य किए हैं। पहले तो मैं गलत कर रहा यह संवेदन ही खत्म हो चुका था। लेकिन आपके सदुपदेश से फिर एक जुगनू सा प्रकाश भीतर पैदा हुआ। जिससे कि गलत को गलत स्वीकार करने की बात बन पाई है। लेकिन एक बात बतलाइये, महायोगी जी ! आज तो सन्यास जैसी पवित्र संस्कृति में भी भारी विकृतियां आ रही हैं। कई साधु तो ड्रिंक (Drink), स्मोकिंग (Smoking) करने लगे हैं तो कई सार्वजनिक संस्थाओं के नाम से लाखों-करोड़ों रुपये एकत्रित करके मठाधीश बन बैठे हैं तो कई साधुओं ने चरित्र को लांछित करके धर्म के नाम पर पूरी तरह कालिख पोत दी है। आज तो हाल यह है कि लोगों को साधु और धर्म के नाम से ही नफरत होने लगी है। जब साधुओं का यह हाल है तो फिर हमारे जैसे परिस्थितियों के मारे नवयुवक ऐसा कर बैठे तो क्या आश्चर्य है ? अनुराग की बात सुनकर महायोगी बोले- अनुराग कुमार जी ! किसी दृष्टि से आपका चिन्तन भी उपयुक्त हो सकता है। इस समय की साधुओं की हालत भी अत्यन्त शोचनीय बनी हुई है। जिन साधुओं को कुव्यसनों से तो पूर्ण मुक्त होना चाहिये। वे व्यसनग्राही बने हुए हैं। परिग्रही हो रहे हैं। चरित्र का पतन भी निरन्तर हो रहा है। पर यह बात बतलाईये क्या इसमें गृहस्थों का सहयोग नहीं है ? सांसारिक लोग अपना काम चलाने के लिए साधुओं को आकर्षित करते रहते हैं। वे ही पैसा टका देते हैं। साधु तो पतित होता ही है पर गृहस्थ उसमें सहयोगी बन जाता है। अतः गृहस्थों को भी जागरूक रहने की आवश्यकता है। साधुओं के नियमों की जानकारी प्रत्येक व्यक्ति को होनी चाहिये। जिस प्रकार पत्थरों में हीरे भी होते हैं। उसी प्रकार विकृतियों के बीच संस्कृति में जीने वाले सुसाधुओं की भी कमी नहीं है। उन्हें ढूंढने के लिए वैसी ही खोजी आंख भी चाहिये। जिस प्रकार नकली माल की भरमार होते हुए भी कहीं न कहीं असली माल भी मिल जाता है उसी प्रकार सही ढंग से जीने । । 1 । {117} वाले साधु भी मिल सकते हैं। ऐसे समय में तो आपको धर्म से विमुख न होकर अधिक जुड़ने की आवश्यकता है। आप जैसे कर्मठ व्यक्तित्व और तेजस्वी नवयुवक यदि विकृतियों के निवारण के साथ ही संस्कृति को ऊपर उठाने में लगे तो बहुत कुछ काम हो सकता है। साधुओं में आई हुई विकृतियों को देखकर धर्म से दूर हटने में स्वयं की हानि अधिक है। अन्न यदि खराब है तो व्यक्ति भोजन करना नहीं छोड़ देता। बल्कि तत्परता के साथ अच्छे अन्न की खोज करके, उसे लाकर भोजन करता है। जिस प्रकार पेट की भूख मिटाना जरूरी है, उसी प्रकार आध्यात्मिक भूख मिटाने के लिए अच्छे साधुओं की खोज करना भी जरूरी है। आप उनसे संपर्क करेंगे तो आपको लाम ही होगा। महायोगी जी ! मुझे तो इस घोर कलयुग में आप ही अच्छे साधु नजर आ रहे हैं। मैंने तो आप जैसे साधु कहीं देखे नहीं आप महान् हैं। आपका चरित्र और त्याग बहुत ऊंचा है। आपने तो मेरी सोच ही बदल दी है। महायोगी बोले- ऐसा कुछ नहीं, मैं भी साधना के पथ पर बढ़ने वाला अल्पज्ञ साधक हूं। प्रयास कर रहा हूं कि साधना की गहराईयों में पहुंचा जाय। यही महानता है, महायोगी जी ! आपकी। जिसे अपना अज्ञान दिखता हो वही सबसे बड़ा ज्ञानी है। लेकिन योगी श्रेष्ठ ! पता नहीं आपने मुझ में ऐसा क्या बीज देखा है, जिससे आपने फरमाया कि "आप जैसे कर्मठ व्यक्तित्व तेजस्वी नवयुवक विकृतियों के.. | बहुत कुछ कम हो सकता है। जबकि मेरे में स्वयं में बहुत सी विकृतियां भरी हुई है। तब दूसरों की विकृतियां कैसे दूर कर सकता हूं? अनुराग कुमार जी ! इन्सान ही एक ऐसा प्राणी है जो बुरी आदतें डाल भी सकता है और छोड़ भी सकता है। आप अपना संकल्प जगाएं और जिस प्रकार आर्थिक क्षेत्र में आगे बढ़े हैं, उसी प्रकार अब नैतिक जागरण के क्षेत्र में आगे बढ़ जाएं। लेकिन योगी प्रवर ! मैंने जो जिन्दगी में अपराध किये हैं, वे तो मुझे निरन्तर कचोटते रहेंगे। वे मुझे आगे नहीं बढ़ने देंगे। अनुराग के कहने पर महायोगी बोले- अनुराग कुमार जी ! गलती बड़े से बड़े इन्सान से हो सकती है। लेकिन गलती को गलती मान लेना और उसका प्रायश्चित करके भविष्य के लिए न करने हेतु कृत संकल्प बन जाना अपने आप को विशुद्ध और हल्का {118} । करना है। योगीप्रवर ! फिर मैं आपके सामने ही अपने जीवन का सारा कच्चा चिट्ठा खोल देना चाहता हूं। बहुत अच्छा अनुराग कुमार जी ! लेकिन.....यों कहते हुए महायोगी ने पास में बैठे अन्य लोगों एवं बालयोगियों पर दृष्टि घुमाई। दृष्टि संकेत पाते ही सब कोई उठ-उठकर चले गए। कक्ष में केवल महायोगी और अनुराग शुक्ला रह गए। तब महायोगी जी बोले- अनुराग जी ! अपनों से अपने को कहने में कैसा संकोच। आप मुझे पूरी तरह से अपना समझ करके सब कुछ कह डालिये। मेरे में कोई अलगाव छिपाव न हो। आपका मन हल्का हो जाएगा। तनाव हल्का हो जाएगा। आत्मा शुद्ध हो जाएगी। महायोगी का दुलार, स्नेह पाकर कठोर एवं पापी बन गई अनुराग की आत्मा भी पिघल गई। मस्तिष्क का जमाव पिघलने लगा। पापों की पर्त गर्द बनकर वाष्प के रूप में बनती चली गई, ज्यों-ज्यों अनुराग एक के बाद एक अपराध महायोगी के समक्ष रखते चले गए, त्यों-त्यों महायोगी की तेजस्वी कृपा से वे पाप जलने लगे और पावन आशीर्वाद रूप बरस रही निर्मल धारा से अनुराग जी की आत्मा, स्नात पावन हो उठी। सब कुछ कह डालने के तुरन्त पश्चात् ही अनुराग को अपने आप में एक अद्भुत सुख की अनुभूति हुई। बहुत बड़ा सकून मिला जिसके लिए वह बाहर भटका करता था। वह कभी नहीं मिला जो आज मिला है। अब फरमाइये योगी प्रवर ! मुझे क्या प्रायश्चित करना होगा ? योगीप्रवर ने गंभीर एवं प्रशान्त मुद्रा के साथ चन्द्रमा की शीतल चांदनी से भी अधिक शीतलता छिटकते हुए कहा- अनुराग जी ! बहुत सारे पाप तो आपकी निष्कपट अभिव्यक्ति के कारण जलकर समाप्त हो गए हैं। फिर भी प्रायश्चित की दृष्टि से आपके लिए इतना ही निर्देश है कि जनता में चरित्र और नैतिक जागरण के लिए यथाशक्ति पुरुषार्थ करने का प्रसंग है। जो जनजागरण आपके जीवन में उज्ज्वल प्रकाश भरने वाला होगा। जैसा आदेश आपका। मैं आपके समक्ष यह संकल्प करता हूं कि अब जनकल्याण के लिए यथा शक्ति योगदान दूंगा। आपने मुझे सही मार्ग दिखलाया है। इसलिए आप ही मेरे गुरु हुए। गुरु बिना आदमी नुगुरा होता है। अब तक मैं नुगुरा था। अब मुझे आप सच्चे गुरु मिले हैं। आपकी कृपा से ही मैं जनकल्याण के कार्य में आगे बढ़ सकूँगा। इस प्रकार कहते हुए मैं {119} अनुराग शुक्ला ने महायोगी के चरणों में साष्टांग प्रणाम कर आशीर्वाद ग्रहण किया । बंगले पर आकर कुसुमवती को कहा- मम्मी ! तुम्हारी परख भी गजब की है। पत्थरों में कोहिनूर ढूंढा है तुमने। उनके कुछ समय के सानिध्य ने तो मेरा सब कुछ बदलकर रख दिया है। अब मम्मी ! मैं तुम्हें वो करके दिखाऊंगा कि तुम्हें अपनी संतान पर कुछ तो नाज हो सके। बस बस बेटा ! बस। अनुराग को प्यार से दुलारते हुए कुसुमवती ने कहा- अब मैं अपना असली अनुराग पा गई हूं। आज रायबहादुर का नकाबपोश हट गया। मुझे इसकी हार्दिक खुशी है। सब कुछ मिल गया है मुझे। यों कहते-कहते खुशी की अति में शब्द निशब्द हो गए, अन्तरंग आनन्द ने मन को आप्लावित कर दिया। - {120} -16- अर्द्धरात्रि का समय वातावरण में पूरी तरह शान्ति पसरती जा रही थी। लोग अपने-अपने शयन कक्षों में नींद के आगोश में समाते जा रहे थे। समुद्र में जब तब आ रही तरंगें निस्तब्धता को भंग कर रही थी। उस समय अनुराग शुक्ला अपने कक्ष में बैठकर अपने निजी कंप्यूटर को चलाकर चल रहे व्यापार की गहन समीक्षा कर रहे थे। जैसी की उनकी प्रतिदिन की आदत थी। दिन भर में व्यापारिक घटने वाली कोई भी घटना हो उसे कंप्यूटर में फीड कर दिया जाता था। उसके बाद रात्रि में कंप्यूटर पर हर बिन्दु पर गहन छानबीन के साथ आगे के निर्णय लिये जाते थे। अनुराग शुक्ला की इस जागरूकता की ही वजह थी कि इतना जोखिम भरा कार्य होने के बावजूद भी वह व्यापारिक क्षेत्र में एक के बाद एक सफलता पाता जा रहा था। अब उनके व्यापार को तस्करी लाईन से हटाकर सही रूप में करने के लिए विदेशों से हीरों और पन्नों की माईन्स में से सीधा माल मंगाना प्रारंभ कर दिया था। ब्राजील से कच्चा माल आ रहा था। जिसकी मेनीफेक्चरिंग (Manufacturing) यहां होनी थी। इन सारे दस्तावेजों का अनुराग अध्ययन कर रहे थे। ठीक उसी वक्त समुद्र में एक छपाक सी आवाज हुई। जिसने अनुराग को चौंका दिया क्योंकि बंगला समुद्र के एकदम किनारे ही था। उन्हें लगा कि समुद्र में कोई वस्तु या व्यक्ति गिरा है। अनुराग ने तुरन्त कक्ष की खिड़की से समुद्र की तरफ झांका तो लाईट का प्रकाश समुद्र की तरफ तेज होने से उसमें एक मानव आकृति गिरकर उछलती हुई नजर आई। देखते ही अनुराग को लगा कि लगता है कोई व्यक्ति समुद्र में गिर गया है उसे बचाना चाहिये। उसने अपना कर्तव्य निश्चित किया और तुरन्त नीचे उतरा। अपने साथी 4 व्यक्तियों को भी सावधान करते हुए समुद्र किनारे जहां मानवाकृति डूबती मरती नजर आ रही थी, वहां कूद पड़े। वे तैरने के अच्छे अभ्यासी थे, समुद्र में गहरा गोता भी लगा सकते थे। फिर भी अर्धरात्रि में कूदना एक ढंग से स्वयं की जान के साथ खेलना था। उसके सधे हुए चारों बाडी गार्ड (Body Guard) मालिक की रक्षा में अलर्ट (Alert) हो गए। एक ने तेज प्रकाश करने हेतु हाईपावर (Highpower) की लाइटों का मुख समुद्र की तरफ कर दिया। ताकि मालिक को उस मानवाकृति को खोजने में सुविधा रह सके और वे भी मालिक की सुरक्षा कर सके। अवशेष बोडीगार्ड उसी वक्त मालिक के साथ {121} -- ही कूद पड़े क्योंकि उन्हें मालिक की रक्षा जो करनी थी। वे इतने वफादार अंगरक्षक थे कि अपने प्राण देकर भी मालिक की रक्षा करने में तत्पर रहते थे। एक बोडीगार्ड ने पास ही पड़ी मालिक की घूमने के लिए काम ली जाने वाली नौका खोली और वह भी मालिक की तरफ नौका चलाने लगा। ताकि हर सुविधा प्राप्त हो सके। मुश्किल से 10 मिनिट के अन्दर-अन्दर ही अनुराग ने डूबती उस मानवाकृति के बाल हाथ में पकड़ लिए और उसे पानी से बाहर निकाला और अपने सुरक्षा गार्डों की सहायता से उसे नौका में सुलाया। मालिक अनुराग शुक्ला और उसके दोनों अंगरक्षक भी नौका में आ गए। नौका सुरक्षित रूप से किनारे लग गई। लाईट के प्रकाश में जब देखा वह मानवाकृति के रूप में सुन्दर नवयुवती थी। जिसे देखकर अनुराग शुक्ला के दिमाग में अनेक प्रश्न खड़े हो गए। यह पास वाले बंगले से गिराई गई या गिरी। इसके गिरने के बाद खिड़की क्यों बन्द हुई। बंगले वाले ने बचाने की कोशिश क्यों नहीं की। आदि कई प्रश्न एक साथ झनझना उठे। लेकिन फिलहाल उस सोच को स्थगित कर नवयुवती की प्राण सुरक्षा आवश्यक थी। इस समय श्वांस जरूर चल रही थी, पर वह भी बेहोश। बंगले पर प्राथमिक उपचार के तुरन्त बाद उसे प्राईवेट (Private) हास्पिटल में ले जाया गया। अनुराग शुक्ला ने परिचारिकाएं तो साथ रखी ही थी, पर विमा शुक्ला को भी जगाकर उसकी सुरक्षा हेतु साथ कर दिया। पास ही डॉक्टर रोहिताश्व और उसकी पत्नी मीना गौड़ का मीना क्लिनिक था। वहां ले जाया गया। अनुराग शुक्ला के निर्देशानुसार गहन चिकित्सा कक्ष में रखते हुए उस युवती को होश में लाने का डॉक्टर रोहिताश्व और डॉक्टर मीना ने भरपूर प्रयास किया। 2 घंटे के श्रम के बाद वह युवती होश में आ गई। शरीर में प्रवेश सारा पानी बाहर निकाल दिया गया। कुछ स्वस्थता आने के बाद जब उसने आंख खोली तो उसके सामने खड़ा हर चेहरा अजनबी था। उसे लगने लगा कि वह कहां है ? बार-बार आंख खोलकर बंद करने लगी। उसकी घबराहट को देखकर विभा शुक्ला ने कहा-बहिन ! तुम निश्चिंत हो जाओ। यहां पर तुम पूर्ण सुरक्षित हो। मैरे भैया अनुराग शुक्ला के संरक्षण में हो। तुम्हें घबराने की कोई आवश्यकता नहीं। विमा के इन आश्वासन भरे वचनों को सुनकर उस युवती को कुछ सन्तोष मिला। परिणाम स्वरूप धीरे-धीरे वह सहज होने लगी। उसने चारों ओर नजर घुमाई तो एक डॉक्टर के अलावा उपचार करने वाली सभी महिलाएं ही थी। इसलिए उसे और अधिक शकून मिला। सवेरे तक पूरी {122} ? चेतना आने के बाद विभा शुक्ला उस युवती को पुनः गाड़ी में बिठाकर अपने बंगले पर ले आई। विभा का मधुर स्नेह पाकर वह धीरे-धीरे सहज होने लगी। विभा ने यह भी बतला दिया था कि उसके भैया, अनुराग शुक्ला ने उसे समुद्र से डूबते हुए बचाया है। वे नैतिक और चरित्र की दृष्टि से बहुत महान् हैं। उनके सामने अपनी समस्या रखने पर तुम्हें निश्चित ही उचित समाधान मिलेगा। विभा शुक्ला के बहुत कुछ समझाने के बाद वह युवती अनुराग शुक्ला से मिलने को तत्पर हो गई। विभा शुक्ला उस युवती को लेकर अनुराग शुक्ला के कक्ष में गई। अनुराग शुक्ला पहले ही एक कुर्सी पर बैठा था और वह दोनों सामने लगे सोफा सेट पर बैठ गए। अनुराग शुक्ला ने ही बात चलाई। आप कौन हो ? कहां रहती हो, आपका नाम क्या है ? यह तो मैं नहीं जानता पर आप भी एक इन्सान हैं और मैं भी एक इन्सान हूं। इस नाते आपका हर संभव सहयोग करना मैं अपना कर्त्तव्य मानता हूं। अब भी आप अपना परिचय दें तो मैं आपकी इच्छानुसार जहां आप चाहें वहां पहुंचाने की व्यवस्था कर सकता हूं। नवयुवती ने कहा- आप तो मेरे लिए बहुत महान् हैं। जिन्होंने अपने प्राणों को भी जोखिम में डालकर मुझे बचाने का प्रयास किया। बचाया ही नहीं पूरी तरह स्वस्थ करने के लिए अपना अमूल्य समय लगाया। मैं आपके इस अहसान को कभी नहीं भूल सकती। पर मैं अब जिन्दगी से उब चुकी हूं। इसलिए..... | यह सुनते ही अनुराग शुक्ला ने कहा आप ऐसा क्यों सोचती हैं। हर जिन्दगी में उतार-चढ़ाव आते ही रहते हैं। संघर्षों का दृढ़ता के साथ सामना करने से ही जिन्दगी रसदार बनती है। आप यदि जिन्दगी से उबने का कारण बतलाएं तो उसका भी समाधान करने का प्रयास किया जा सकता है। अभी तक तो हमें आपका नाम भी ज्ञात नहीं है ? तब वह नवयुवती बोली- मेरा नाम राजेश्वरी जैन है। मैं राजस्थान में श्री गंगानगर की रहने वाली हूं। मेरे पिता का नाम हुक्मचन्द जैन एवं माता का नाम रीटा रानी है। एक भाई है जिसका नाम प्रेम प्रकाश जैन है। हमारा परिवार आर्थिक दृष्टि से मध्यम कोटी का है। पिता जी स्टेट बैंक में कैशियर हैं। भाई कोई खास-पढ़ा लिखा नहीं होने से गंगानगर में ही एक वस्त्र व्यवसायी श्री करोड़ीमल जी सेठ के यहां नौकरी करता है। कोई खास पैसा नहीं मिलता है। फिर भी कुल मिलाकर घर खर्च चल जाता है। मैं कॉलेज में एम.एस.सी (M.Sc.) की द्वितीय वर्ष की छात्रा हूं। कॉलेज के अध्ययन के {123} साथ गायन एवं नृत्य में भी रुचि रही है। हाई स्कूल और कालेज में मैंने कई प्रोग्राम दिये हैं। जिन्हें देखकर लोगों ने काफी सहराया। इसके बाद जिलास्तरीय कई कार्यक्रमों में भी भाग लिया है। सभी जगह वरीयता प्राप्त की। जिससे मेरे प्रशंसक यह कहने लगे कि यह फिल्म अभिनेत्री बन सकती है क्योंकि नृत्य में अभिनय करना भी अच्छा आता है। गला भी सुरीला है, और दिखने में भी सुन्दर है। लोगों के द्वारा हो रही बार-बार की प्रशंसा को सुनकर मेरे मन में भी यही विचार उठा कि लगता है मैं अच्छी फिल्म अभिनेत्री बन सकती हूं। लेकिन फिल्म इण्डस्ट्री (Film industry) में प्रवेश पाना सहज संभव नहीं था। मेरा दूर-दूर तक भी कोई रिश्तेदार ऐसा नहीं था। जिसका बाम्बे की फिल्म इण्डस्ट्री से सम्बन्ध हो। इसलिए मैं चाहकर भी फिल्म इण्डस्ट्री में नहीं आ पा रही थी। कई कॉलेज के नवयुवकों ने भी मुझे बहुत उकसाया। उन्होंने वादे किये कि हम तुम्हें बाम्बे में फिल्म निर्माताओं से मिला देंगे। हमारा परिचय है। हमारे साथ चल पड़े लेकिन उनके बोलने के तरीके एवं कामी दृष्टि ने मुझे सावधान कर दिया, मैं नहीं चाहती थी कि हीरोईन बनने के लिए मेरा चरित्र का पतन हो और मुझे उन लड़कों की आंखों में वासना के संस्कार स्पष्ट रूप से नजर आ रहे थे। इसलिए मैं उनके साथ जाने को तैयार नहीं हुई। लेकिन फिल्म अभिनेत्री बनने की भावना भी मेरी बलवती होती जा रही थी। आखिर एक दिन अपनी बुआ के लड़के मनोज. कुमार से बात हुई। उसने कहा- बहिन ! मैं तुम्हें सहयोग करने के लिए तैयार हूं। हमें किसी के परिचय की कहां आवश्यकता है, तुम्हारे पास बहुत बड़ी योग्यता ही उसका परिचय है। फिल्म इण्डस्ट्री वाले तुम्हारी योग्यता को देखकर स्वतः ही तुम्हें रखने के लिए तैयार हो जाएंगे और यदि कोई भी खतरा हो तो हम वापस चले आएंगे। मुझे मनोज कुमार की बात जंच गई लेकिन इसके लिए भी हमें कम से कम 30-40 हजार रुपये की आवश्यकता थी। इसके लिए मैंने अपने पास दो सोने के कंगन थे, उन्हें बेच दिये जिसमें 15 हजार रुपये आए बाकी 20 हजार की व्यवस्था मनोज कुमार ने कर ली और एक दिन हम दोनों पिता श्री हुक्मचंद जी की अनुमति लेकर बाम्बे के लिए रवाना हो गये। हमें यहां आए हुए करीब 6 दिन हो गए थे। होटल में ठहरे थे। मैं अपने भैया के साथ फिल्म इण्डस्ट्री के कई फिल्म निर्माताओं से मिल चुकी थी। प्रथम तो वे मिलने का समय ही नहीं देते हैं। बहुत कुछ मेहनत के बाद समय देते भी हैं तो उनके सामने स्कूल, कॉलेज एवं सार्वजनिक कार्यक्रमों के दिये गए प्रोग्राम {124} से प्राप्त प्रमाण पत्र रखते हैं। फिर भी वे इसे मानने के लिए तैयार नहीं होते। हमने उनके सामने अपने प्रोग्राम रखने की पेशकश भी की तो उनका कहना होता है कि आप रात को 11 बजे घर पर मिलिये। वहीं आप से सारी बातचीत करेंगे। मिस्टर मनोज कुमार तो होटल पर ही रहे। आप चले आइये। आपके प्रोग्राम सुनने के बाद आपको सलेक्ट किया जा सकता है। लेकिन मुझे यह पसंद नहीं था कि मेरा भाई होटल पर रहे और में अकेली एक अजनबी व्यक्ति के पास जाऊं। यदि कोई अनहोनी घटना घट जाय और मेरी अस्मिता लुट जाय तो फिर क्या होगा? मैं हीरोईन बनने से अच्छा अपने चरित्र की सुरक्षा समझती रही हूं। लेकिन हीरोईन बनने का लोम भी संवरण नहीं कर पा रही थी। इसी बीच मेरा फिल्म निर्माता श्री रतन कपूर से सम्पर्क हुआ। उनकी फिल्म "विदेशों में" बनने जा रही थी। फिल्म में गीत संगायिका की आवश्यकता थी। उन्होंने मुझे कहा तुम्हारी नियुक्ति की जा सकती है। पर पहले हम तुम्हारे 3-4 गीत सुनेंगे। गले का सुरीलापन परखेंगे। फिर तुम्हें नियुक्त किया जा सकता है। मुझे उनकी बात में आश्वासन और काम होने की झलक मिली तो मैं 3-4 गीत सुनाने के लिए तैयार हो गई। लेकिन यहां पर भी वहीं बात कि आप रात को 11 बजे घर पर जाइये। वहीं सुनेंगे। मिस्टर मनोज कुमार होटल पर ही रहे। आप चली आइये। गीत सुनने के बाद नियुक्ति दे देंगे। मैंने सोचा यहां तो सब जगह एक ही बात है। फिर भी सेठ रतन कपूर की उम्र 60 वर्ष से ऊपर थी। बूढ़े हो चुके थे। इसलिए मुझे चरित्र पतन का इतना भय नहीं था। अतः मैंने घर पर आने की हां भर दी। फिल्म निर्माता सेठ रतन कपूर ने जुहू स्थित बंगला नम्बर तेरह जो आपके बंगले के पास वाला ही है, वह बतलाया। मैं ओ.के. बोलकर आफिस से निकल गई और रात्रि को 11 बजे मेरा भैया मनोज मुझे बंगले के बाहर छोड़कर चला गया। वहां बाहर खड़े वाचमेन से बात हुई तो वह बोला- यस मेडम (Yes Madam) ! मालिक ने आपके आने की बात कही थी। आपका - नामा मैंने कहा- राजेश्वरी ! हां हां यही नाम मालिक ने बतलाया था। चलिये अन्दर। वाचमेन बड़े अदब के साथ मुझे अन्दरं ले गया। बंगले की शोमा तो भव्य थी ही। वह मुझे सीधा मालिक के कक्ष में ले गया। सेठ रतनकपूर शराब के नशे में धुत्त होकर सिगार पी रहे थे। ज्योंही मुझे देखा {125} ।

तो उनकी आंखों में चमक आ गई। उन्होंने कहा- अच्छा राजेश्वरी ! तुम आ गई हो। अब तक वाचमेन जा चुका था। कक्ष बाहर से बंद हो चुका था। पूरे कक्ष में सेठ रतन कपूर और राजेश्वरी दो ही रह गए। यह देखकर एक बार तो मैं घबरा गई। पर कर भी कुछ नहीं सकती थी। अतः फिल्म निर्माता सेठ रतनकपूर ने भद्दी मजाक करते हुए कहा- डार्लिंग ! गाना और नृत्य शुरु हो जाए। हम देखेंगे पहले तुम कैसे नाचती हो और गाती हो। मैंने साहस किया और नृत्य के साथ एक गाना भी सुनाया गया। नशे में पागल होकर सेठ रतनकपूर बार-बार वाह-वाह कर रहे थे। 15 मिनिट में ही गायन पूरा हो गया। सेठ रतनकपूर खड़े हो गए और मेरे पास आने लगे तो मैं एकदम घबरा गई। हे भगवान ! क्या होगा अब । तब वे बोले- घबराओ मत, हम भी तुम्हारे साथ नाचेंगे, लेकिन मुझे यह कतई पसंद नहीं था और न ही आज तक में किसी पुरुष के साथ नाची थी। जितने भी मेरे प्रोग्राम हुए मैं अकेली देती रही थी। मैंने कहा- कपूर साहब ! मेरा पुरुष के साथ नाचने का अभ्यास नहीं है। मैं अकेली ही अभिनय करती हूं। तो वे बोले कोई बात नहीं अब अभ्यास हो जाएगा। यों कहते हुए उन्होंने मेरा हाथ पकड़ लिया और नाचने लगे। मुझे उनके साथ नाचना आता नहीं था। पर उनका मन रखने के लिए मैंने नृत्य शुरु किया पर नृत्य के बहाने वे मेरे साथ अश्लील हरकत करने लगे। वह मुझे नागवार गुजरी और मैं एक झटके के साथ उनसे दूर हट गई और मैंने कहा- सेठ रतन कपूर यह नहीं होगा। मैं यहां अभिनय करने आई हूं न कि अपनी अस्मिता लुटाने। सेठ रतन कपूर बोले- राजेश्वरी ! इस दुनियां में तो सब कुछ चलता है। जब तक तुम निर्भय नहीं बनोगी तो कोई भी एक्शन (Action) जानदार नहीं कर सकोगी। अतः छोड़ो इन सब दकियानूसी चारित्रिक बातों को। जब तुम बाम्बे के इस आधुनिक बाजार में आ ही गई हो तो अब इन आदिवासी बातों को छोड़ो। मुझे उनका यह बहसीपन कतई नहीं भाया। मैं दूर हटकर रूम के दरवाजे पर पहुंची तो गेट बाहर से बंद था। मैं समझ गई कि इनके नौकर भी मालिक जैसे ही लगते हैं। अब पिंजरे में फंसे पंछी की तरह मैं कमरे में फड़फड़ा रही थी और सेठ रतन कपूर मेरी अस्मिता लूटने पर उतारु था। मुझे हर हाल में अपने चरित्र की सुरक्षा करना अभीष्ट था। जब भागकर खिड़की के पास पहुंची तो देखा कि खिड़की एकदम समुद्र के किनारे है। उसके नीचे समुद्र ही था। मैंने तुरन्त निर्णय ले लिया। चरित्र भ्रष्ट करने की अपेक्षा मर {126} - जाना अच्छा है। चरित्रहीन नारी का सौन्दर्य मुर्दे का श्रृंगार है। मैंने फिल्म निर्माता मिस्टर रतन कपूर से बचने का भरपूर प्रयास किया पर मुझे लगा कि इससे बचना मुश्किल है, तो फिर मैंने साहस किया और अचानक खिड़की से कूदकर समुद्र में छलांग लगा दी। जिसकी कपूर साहब को कतई संभावना नहीं थी। छलांग लगाने के बाद मैं अनन्त जल राशि में समाती जा रही थी। इसी बीच पता नहीं कैसे मेरी जिन्दगी को तारने वाले अवतार के रूप में आप प्रकट हुए और मुझे डूबते हुए बचा लिया। आपने मुझे नई जिन्दगी दी। मैं आपके अहसानों को नहीं भूल सकती। पर दुनियां की इस विद्रूपन को देखकर मेरा मन ऊब चुका था। पर आप जैसे चरित्र और नैतिकता के मसीहा भी इस दुनियां में होंगे, ऐसा मैंने सोचा भी नहीं था। सच है दुनियां में मारने वाले से भी तारने वाले के हाथ लम्बे हैं। अथाह जल राशि में डूबने के बाद जो कुछ स्थिति बनी, वह सब आपके सामने हैं। अनुराग शुक्ला बड़े ध्यान से राजेश्वरी की जीवन घटना सुन रहे थे। उन्हें भी इस बात का सुखद आश्चर्य हुआ कि इस कलियुग में भी कोई लड़की ऐसी हो सकती है, जो कि अपने चरित्र की सुरक्षा के लिए अपने प्राण भी दे दे। सती सावित्री अंजना आदि सतयुग की घटनाएं तो बहुत मिल जाएगी। पर इस घोर कलियुग में राजेश्वरी का चरित्र निश्चय ही प्रशंसनीय है। इसने तो अपनी तरफ से चरित्र सुरक्षा के लिए प्राण दे ही दिये थे। यह बात अलग है कि इसके पुण्य के अतिशय ने इस बचा लिया। अनुराग शुक्ला बोले- राजेश्वरी ! इस घोर कलियुग में भी आप जैसी चरित्रवान नवयुवती के दर्शन कर मैं भी पावन हो उठा। लगता है घोर पाप होने के बावजूद भी ऐसी चरित्र सम्पन्न नारियों के कारण इस देश की रक्षा हो रही है। राजेश्वरी बोली- आप क्यों मुझे लज्जित कर रहे हैं। क्या आपकी कुर्बानी कम है। लोग तो अपने घर के सदस्य को भी इस तरह मरने से नहीं बचा पाते हैं। वहां आपने एक अजनबी प्राणी के लिए अपने प्राण खतरे में डाल दिये और मुझे डूबती हुई को बचा लिया। ऐसे दया के अवतारियों के कारण ही धरती सुरक्षित है। दोनों एक दूसरे की प्रशंसा करने लगे। पर अनुराग शुक्ला बोले- मेरे में ऐसे गुण नहीं हैं। थोड़े से भी गुण आए हैं तो यह महायोगी की ही कृपा है जो मैं कुछ सुकृत्य कर पाया हूं। राजेश्वरी बोली- ऐसे महायोगी कौन है-हम भी उनके दर्शन करना चाहेंगे। {127} अनुराग- जरुर-जरुर। वे पैदल यात्रा करते रहते हैं। अभी तो यहां से 200 कि.मी. दूर पूना में है। आप चलना चाहोगी तो हम जरूर ले जाएंगे। ऐसे महापुरुष दुनियां में विरल ही मिलते हैं। मैं समझता हूं ऐसे महायोगी की साधना से ही धरती टिकी हुई है। अन्यथा कभी भी समुद्र ले डूबे । अच्छा तो अब ये बताइये कि आप क्या चाहती हैं, अगर घर जाना चाहती हैं तो मैं वैसी व्यवस्था करा देता हूं। अगर यहां रहकर कोई काम करना चाहती है तो मैं वैसी भी व्यवस्था करा सकता हूं। राजेश्वरी ने सोचा ऐसा महान् व्यक्ति कहां मिलेगा। क्यों न यहीं नौकरी कर ली जाय। यहां कोई डर वाली बात तो है नहीं। उसने तुरन्त स्वीकृति दे दी। वह बोली- मेरे योग्य आपके पास काम हो तो मैं यहां रहने को तैयार हूं। अपने भैया मनोज कुमार को सारी बात समझा दूंगी। अनुराग शुक्ला उसे किसी अच्छी पोस्ट (Post) पर रखने को तैयार हो गए। इतने में ही उसके मन में एक विचार कौंधा मम्मी बार-बार शादी करने के लिए कहती रहती है और मैं हमेशा टालता रहता हूं। पर ऐसी महिला रत्न से शादी हो जाय तो गृहस्थ जीवन आराम से चल सकता है। मेरा भी काम बन जायेगा और मम्मी की बात भी रह जाएगी। शादी करने की बात सोचते ही अनुराग को कुछ सुकून सा महसूस होने लगा। मन में हल्कापन आने लगा। तब उसे लगा कि हकीकत में राजेश्वरी के साथ शादी करना सार्थक सिद्ध होगा। तुरन्त ही मन में निर्णय करके अनुराग ने बात को नया मोड़ देना शुरू किया। वह बोला- राजेश्वरी जी ! अगर आप कुछ अन्यथा न ले तो मैं आपसे एक बात कहना चाहता हूं। राजेश्वरी बोली- अवश्य बोलिये। आपकी बात को अन्यथा लेने का तो कोई प्रश्न ही नहीं उठता। आप तो मेरे को नई जिन्दगी देने वाले हैं। अनुराग बोला- मेरी मम्मी जी मुझे शादी करने के लिए पचासों बार कह चुकी हैं। परन्तु मैं उनकी बात को टालता रहा हूं क्योंकि मुझे शादी करना भी बंधन लगता रहा है। लेकिन जब से मैं आपके सम्पर्क में आया हूं तब से ऐसा लगने लगा है कि अगर मेरी शादी आपके साथ हो जाय तो मैं अपने आपको सौभाग्यशाली समझूगा। अनुराग ने बिना आवरण के सीधी-सीधी बात कह दी। किन्तु राजेश्वरी तो यह बात सोच भी नहीं सकती थी। क्योंकि अनुराग की शान शौकत के आगे उसका परिवार तो कुछ भी नहीं था। उसके नौकर के बराबर भी नहीं। इसलिए राजेश्वरी का तो इस रिश्ते के बारे सोचने का प्रश्न ही नहीं था। ज्योंही उसने अनुराग के मुख से इस प्रकार का आफर {128} । । (Offer) सुना तो एक बार तो हतप्रभ रह गई। सोचने लगी वह कहीं सपना तो नहीं देख रही है। उसे इस प्रकार देखकर अनुराग बोला कि आप किसी तरह का संकोच न करें। आपके जो भी विचार हो स्वतन्त्र भाव से बतलाएं। मेरे कारण आपके प्राणों की रक्षा हुई है, इसलिए आपको मेरी बात मानने की कत्तई आवश्यकता नहीं, आपकी अपनी सोच ही महत्त्वपूर्ण है। शादी तो दिल का रिश्ता है। यदि दिल स्वीकार करे तो ही यह बात स्थाई रूप से बन सकती है। अनुराग की आवाज ने उसे झकझोरा पर उसे यह समझ में नहीं आ रहा था कि वह उसे क्या जबाब दे। हां भी कहते नहीं बन रहा था और ना भी नहीं कह पा रही थी। लेकिन जब अनुराग के बार-बार आश्वस्त करने पर वह बोली- अनुराग कुमार जी ! मैंने कभी इस रिश्ते के बारे में तो ख्वाब में भी नहीं सोचा था। कहां आप राजा भोज की तरह हैं और कहां मेरा हाल गंगू तेली की तरह है। आपकी बात तो दूर आपके नौकरों के बराबर भी हमारी स्थिति नहीं है। जबकि शादी तो बराबरी वालों के साथ होनी चाहिए। अनुराग- राजेश्वरी जी ! बाहरी दौलत से किसी का मूल्याकंन नहीं किया जाना चाहिए। दौलत तो आज है कल नहीं। आज से 8 वर्ष पूर्व तो मेरी स्थिति बड़ी बदतर थी। खाने के लिए दो जून रोटी तक नहीं थी और आज यह सब कुछ है। यह तो चंचला है। हां, जहां तक बराबरी की बात है तो इन अर्थों में तो आपकी बात सही भी है कि आप जैसी महिला रत्न के लिए शायद मैं इतना उपयुक्त न होऊ। वैसी स्थिति में मैं आपकी बराबरी नहीं कर सकता। तब तो बात अलग है। इसी बीच राजेश्वरी बोली-अरे आप ऐसा क्या कह रहे हैं। मेरे में ऐसी कोई विशेषता नहीं है जो महत्त्वपूर्ण है। विशेषता तो आप में है कि एक अजनबी व्यक्ति के प्राण बचाने के उद्देश्य से अपने प्राणों को भी खतरे में डाला और मुझे बचाया आपकी तो कोई बराबरी ही नहीं कर सकता। आप बाहरी ऐश्वर्य से नहीं पर भीतरी ऐश्वर्य से भी महान् है। अनुराग- तब फिर आप क्या सोच रही हैं ? हो सकता है आप जैन हैं और मैं ब्राह्मण हूं इसलिए भी अनमेल है। राजेश्वरी-ऐसा भी कुछ नहीं है। यद्यपि वर्ण व्यवस्था की दृष्टि से भिन्न कास्ट में शादी नहीं होती है। लेकिन जैन धर्म व्यक्ति पूजक न होकर गुण पूजक है। यदि गुण किसी अन्य काष्ट (Caste) में भी हो तो वह भी जैन बन सकता है। भगवान महावीर ने जन्मनाजैन न बतलाकर कर्मणा जैन को प्रधानता दी है। सुभद्रा सती की शादी ही बुद्धदास नामक व्यक्ति के जैनी बनने पर हो गई थी ऐसा जैन इतिहास में भी वर्णन आता है। । - {129} । अनुराग- राजेश्वरी जी ! वैसे तो एक महायोगी जी यहां पधारे थे। वे हमारे बंगले पर भी विराजे हैं। मेरे जीवन में उनके उपदेशों से ही अद्भुत परिवर्तन आया है। उन्होंने मुझे जैन संस्कारों से ओतप्रोत किया है। आज मेरे में जो भी कुछ है उनकी कृपा का ही फल है। राजेश्वरी - अरे ऐसे महायोगी का पदार्पण आपके यहां हो गया। आप तो धन्य हो गए। बड़े-बड़े लोग उन्हें अपने यहां लाने को तरस जाते हैं, फिर भी उनका आना नहीं हो पाता है। वे प्रसिद्धि से बहुत दूर सच्चे साधनाशील महायोगी हैं। जब उनकी कृपा आप पर बरस गई है तो आप तो सही माने में जैनी बन गए हैं। अनुराग- राजेश्वरी जी ! आपको किस बात का संकोच है। जिससे आपको मेरा प्रस्ताव पसंद नहीं आ रहा है ? राजेश्वरी-क्या बतलाऊं। एक तरफ तो मन में हीन भावना की ग्रन्थि है कि आपकी मेरे साथ दूर-दूर तक भी कोई समानता नहीं है। दूसरी बात आपके प्रस्ताव से मुझे अपने आपके भाग्य पर भी भरोसा नहीं हो रहा है कि मैं इस देव को भविष्य में संभाल पाऊंगी भी या नहीं ? अनुराग- राजेश्वरी जी ! समानता-असमानता की बात तो दिल से एकदम निकाल दीजिये। आज से आठ वर्ष पहले तो आपके परिवार से भी हमारी स्थिति अधिक खराब थी। जहां तक दूसरी बात है मैं अपनी और से यह विश्वास दिला सकता हूं कि आपको मेरी ओर से कोई शिकायत नहीं आएगी। जैसे एक औरत के लिए पतिव्रत धर्म होता है। वैसे ही एक आदमी के लिए पत्नीव्रत धर्म होता है। मैं पत्नीव्रता धर्म निभाऊंगा। अनुराग जी से इतना सब कुछ सुनने के बाद राजेश्वरी का मन भी पूरी तरह पिघल गया था। अलगाव की बड़ी चट्टानें भी पिघलकर पानी ही नहीं भाप बनकर एकमेक होने लगी। राजेश्वरी की आंखों में अपने सद्भाग्योदय की अति से हर्ष के आंसू छलछला उठे और उसने अनुराग के सामने पूरा समर्पण कर दिया। वह बोली- आप मुझे पूरी तरह पसंद हैं। मैं अपने किसी विशिष्ट पुण्य का उदय मानती हूं कि आप मुझे पति के रूप में मिलेंगे। पर इसके पहले मैं आपसे यह स्पष्ट कर देती हूं, इसके लिए मेरे परिवार से भी अनुमति लेनी पड़ेगी। खुशी से उछलते हुए अनुराग ने कहा- बिल्कुल ठीक। हम आपके परिवार से अनुमति के लिए बिना शादी नहीं करेंगे। उसी वक्त उनके साथ । । {130} आए उसके भुआ के लड़के मनोज कुमार को भी होटल अप्सरा से बुला लिया गया। राजेश्वरी को इस रूप में पाकर वह भी अचम्भे में पड़ गया। लेकिन रात्रि में बीती सारी घटना राजेश्वरी ने उसके सामने रख दी। जिसे सुनकर अनुराग शुक्ला के प्रति उसके मन में गहरे आदर के भाव बन गए और उसने उसी वक्त उनका बार-बार आभार माना। अगली बात रखी, अनुराग ने मनोज कुमार के सामने। जब राजेश्वरी के शादी करने की अनुराग की चाह सामने आई और स्थिति को समझा तो वह बोला- हमारी बहिन का तो यह बड़ा भाग्य का उदय है कि आप जैसा पति मिलेगा। मैं घर जाकर पूरी कोशिश करूंगा कि आपकी चाहत के अनुरूप ही हो जाय। दोपहर का लंच लेने के बाद अनुराग शुक्ला ने उनके लिए इन्डयन एअर लाइन्स से अमृतसर के लिए दो टिकट मंगवा दिये और उनके सामने रख दिये। राजेश्वरी बोली- आपने क्यों कष्ट किया। हम वैसे ही ट्रेन से चले जाते। ओ, हो ! इसमें कोई कष्ट नहीं यह तो मेरा कर्तव्य है क्योंकि आप मेरे यहां हैं। फिर मुस्कुराते हुए कहा कि अब तो आपको मैं अपना ही समझता हूं। यह सुनकर मनोज राजेश्वरी सभी हंस पड़े। 4 घन्टे की उड़ान के बाद ही हवाई जहाज बाम्बे से दिल्ली और दिल्ली से अमृतसर पहुंच गया। अमृतसर एयरपोर्ट पर उतरते ही हवाई अडडे से बाहर आते ही उन्हें एक नौजवान मिला। जिसके पास इम्पोर्टेड गाड़ी खड़ी थी। वह बोला- क्या आपका ही नाम मनोज कुमार, राजेश्वरी है। वे बोले हां, हां ! पर आप कौन हैं, हमने आपको पहचाना नहीं। वंह बोला- मेरा नाम राजेशकुमार बंसल है। मैं अपने मालिक के आदेश से आपको लेने आया हूं। ताकि आपको सुरक्षित गंगानगर पहुंचा दूं। आपके मालिक कौन ? मनोज के पूछने पर वह बोला-अनुराग कुमार जी शुक्ला ! जहां से आप आ रहे हैं। ओ हो ! वे आपके मालिक है ? जी हां। मनोज ने राजेश्वरी से कहा-कहां-कहां उनकी पहुंच है। यहां पर भी हमारी व्यवस्था कर दी है। छोटी उम्र में लम्बी दूरी पार कर ली है। {131} ने दोनों गाड़ी में बैठ गए। गाड़ी फर्राटेदार चलाते हुए राजेश कुमार कहा- हमारे मालिक की पहुंच भारत में ही नहीं विश्व के अन्य देशों में भी है। दिमाग तो कम्प्यूटर से भी तेज चलता है। दो घंटे की सफर के बाद उन्हें गंगानगर पहुंचा दिया गया। जब ये दोनों, हुक्मचन्द जैन एवं प्रेम प्रकाश के पास पहुंचे तो प्रेम प्रकाश ने पूछा क्यों भाई ! राजेश्वरी बन गई हीरोइन ! क्योंकि उसे पहले से ही ऐसी आशा नहीं थी। मनोज ने सारी बात विस्तार से सुनाई। फिर अपने को दिये सहयोग का भी जिक्र किया। साथ ही यह भी कहा कि अनुराग शुक्ला के साथ किसी भी तरह राजेश्वरी की शादी कर देना चाहिये। ऐसा गोल्डन चांस (Golden Chance) नहीं चूकना चाहिये। ऐसा लड़का नहीं मिलने वाला। जब मनोज से सारी बात सुन ली तो हुक्मचन्द जैन शादी करने के लिए राजी हो गए। मोबाइल फोन (Mobile Phone) पर अनुराग शुक्ला ने हुक्मीचन्द जी से बात की तो उन्होंने अनुराग एवं राजेश्वरी की भावना का आदर करते हुए शादी की स्वीकृति दे दी। जिसे सुनकर अनुराग को ही नहीं कुसुमवती एवं विमा को भी बहुत खुशी हुई। 2 मास बाद ही एक सादे समारोह में अनुराग व राजेश्वरी का विवाह सम्पन्न हो गया। दोनों की जिन्दगी में सांसारिक खुशियों की बहार आ गई। दोनों बड़े आराम से रहने लगे। माता कुसुमवती को भी अपार खुशी हुई। उसे एक पढ़ी लिखी, ज्ञानवान, दयावान, चरित्रवान गुणवाली नारी बहुरूप में जो मिल चुकी है। कुसुमवती का एक भार तो हल्का हो गया। अब दूसरा विमा का रहा है। उसके लिए भी योग्य वर की खोज की जाने लगी। - {132} -17- रहमान और सलमान जो अनुराग शुक्ला के पी.ए. थे वे अपनी गाड़ी में बैठकर बाम्बे सेन्ट्रल जा रहे थे। रास्ते में ही गाड़ी के कुछ खराब हो जाने से उन्हें टैक्सी में बैठना पड़ा। टैक्सी में ड्राइवर के पास ही एक नौजवान पहले से ही बैठा हुआ था। जो दिखने में स्मार्ट, ग्रेज्युएट और फुर्तीला था। पर रहमान और सलमान की पारखी नजरें यह भांप गई कि यह लड़का आवारा भी है। बाम्बे सेन्ट्रल पर ज्योंही वे टैक्सी से उतरे उनके साथ एक ब्रीफकेस था, जिसमें कम्पनी के 10 लाख रुपये पड़े थे। वह उठाया तो उन्हें उस पर कुछ निशान नजर आए उन्हें समझते देर नहीं लगी कि इसमें से नोट निकल चुके हैं। लेकिन आश्चर्य तो इस बात का था कि वजन में वह उतनी ही है। फिर नोट कैसे निकले होंगे। यह हो सकता है कि अटैची पर चीरा लगाया हो और रुपया निकाल नहीं पाया हो या फिर और कुछ गड़बड़ है। लेकिन इस स्थिति को वे टैक्सी के बाहर खड़े होकर देख नहीं सकते थे। क्योंकि तब तक टैक्सी जा सकती थी, या अन्य खतरा बढ़ सकता था। इसलिए उन्होंने अटैची को एक हाथ में पकड़े रखा। दूसरे हाथ से सलमान ने जेब से पिस्तौल निकाल ली और इधर रहमान ने भी पिस्तौल निकाल ली दोनों ने ड्राइवर और उसके साथ बैठे लड़के पर पिस्तौल अड़ाते हुए कहा स्टैण्डप सावधान जैसा हम कहे ऐसा करते रहो। अन्यथा गोली मार दी जायेगी। दोनों की कनपटी पर पिस्तौल लगा रखी थी। मरता क्या नहीं करता। टैक्सी को संकेत पाकर स्टैण्ड पर खड़ी की गई। फिर दोनों को गाड़ी से बाहर निकाला और आगे-आगे चलने का संकेत दिया गया। इसी बीच कम्पनी के 5 तगड़े नौजवान जो हर अपराध करने में कुशल थे। वे आ गए। बस फिर क्या था, उन दोनों को घेर लिया गया। टैक्सी ड्राइवर एवं उसने जवानों को देख लिया कि इनसे बचकर निकल पाना संभव नहीं है। अत: वे सिरेण्डर हो गए और सलमान के ईशारे के अनुसार चलने लगे। सलमान उन्हें सीधा ऑफिस में ले गया। उसके बाद जब उसने ब्रीफ केश को खोलकर देखा तो उसमें से 10 लाख रुपये निकाले जा चुके थे और उसकी जगह अखबार भर दिये गए थे, ताकि वजन हल्का न हो और इस कदर सफाई से काम किया था जिससे निशान भी साफ दिखलाई न दे, उन्हें इस ठगी पर बड़ा आश्चर्य हुआ। उसने सोचा- हम तो {133} समझ रहे थे कि जेब कतरों की दुनिया या तस्करी के क्षेत्र में हम ही हुशियार थे। पर ये तो हम से भी दो कदम आगे हैं। यद्यपि ड्राइवर व उस नौजवान का सलमान ही निपटारा कर देता पर यह एक हुशियारी की महत्त्वपूर्ण बात थी जो कि मालिक अनुराग को भी बतलाना आवश्यक लगा। उन्होंने अपने बास अनुराग शुक्ला की ऑफिस में जाकर कहा कि बास ! आज तो हमारे से भी ऊपर एक तीस मारखां मिला है। सलमान रहमान में से एक हो तब भी कोई तुम्हारा सामना नहीं कर सकता तो फिर जहां दो हो तो तीस नहीं साठ मारखां भी आ जाय तो उसकी नहीं चल सकती। ठहाके के साथ अनुराग शुक्ला ने कहा। बॉस ! यह तो आपकी ही देन है। जिसके कारण हम आज इस स्टैज को प्राप्त हो गए हैं। आप की हुशियारी को एक बार तो बृहस्पति भी नहीं नाप सकता। रहमान बोला। तुम बातों में ही उलझाओगे या उस तीस मारखां के कारनामे भी बतलाओगे। अनुराग के पूछने पर सलमान बोला- बॉस ! हम बोरीवली से बाम्बे आ रहे थे। रास्ते में गाड़ी खराब हो जाने से हमने टैक्सी पकड़ी। मुश्किल से 20 मिनिट की सफर के बाद सेन्ट्रल पहुंच गए। ज्योंही हम टैक्सी से बाहर आए तो देखा हमारी ब्रीफकेश के चीरा लगा है। हमें समझते देर नहीं लगी कि रुपये निकले हैं। हमने उसी वक्त टैक्सी ड्राइवर एवं उसके साथ ही बैठे नौजवान को पिस्तौल की नोक पर कवर कर लिया। मोबाइल से सूचना देने पर अपनी कम्पनी के पांचों बाडीगार्ड पहुंच गए। हम उन्हें लेकर आफिस में आ गए हैं। ब्रीफकेस में से 10 लाख रुपये निकल चुके हैं उसकी जगह अखबार के कागज भरे हुए थे। यद्यपि उन दोनों से हम ही बात कर लेते। पर यह अनहोनी घटना आपको बतलाना उचित समझकर यहां आए हैं। यह लड़का मुश्किल से 20 वर्ष का है, पर दिखता पढ़ा लिखा और स्मार्ट है। अब आप मिलना चाहें तो उसे यहां लाएं अन्यथा हम ही उसका इलाज कर दें। ऐसे हुशियार लोगों की आंखों में भी धूल झोंकने वालों पर रायबहादुर उर्फ अनुराग शुक्ला को आश्चर्य हुआ। उसने कहा मैं स्वयं उससे मिलना चाहूंगा। देखता हूं, उसको कौन है वह ! ले आओ दोनों को। अनुराग शुक्ला अपनी रिवाल्विंग चेयर पर बैठा था। उसका कक्ष किस-किस प्रकार के आधुनिक साधनों से सजा था कि उसकी सारी जानकारी तो केवल उसे ही थी और किसी को नहीं। उस कक्ष में आने वाले हर व्यक्ति की जब तक वह {134} कक्ष में रहे ? रील ले ली जाती थी। उसकी आवाज टेप हो जाती थी। यही नहीं उसे मारना भी होता तो भी ऑटोमेटिक मशीनगन (Machine Gun) की व्यवस्था भी। ऐसी बहुत सी आधुनिक तकनीकी से वह लेस था। जब वह ड्राइवर और नौजवान अन्दर आए तो अनुराग शुक्ला ने देखा ड्राइवर जरूर 30 साल का होगा। पर वह साथ वाला तो निहायत 20 साल का ही होगा। उसे कोई आश्चर्य नहीं हुआ, क्योंकि अपराध की दुनियां में वह भी 18 साल की उम्र में आ गया था। अतः यह नौजवान भी कुछ कर बैठे तो क्या बड़ी बात है। अनुराग ने उस नौजवान की और उन्मुख होकर कहा- दोस्तो! मान गए तुमको। बहुत सफाई से काम करने लगे हो। अब एक बात और ध्यान से सुन लो। एक बार पुलिस के शिकंजे से बाहर निकल सकते हो पर हमारे यहां से अब हमारी इच्छा के बिना नहीं जा सकोगे। अतः हम जो भी पूछते हैं, वह सही-सही बतलाओगे हो सकता है सही बोलने पर तुम छूट भी सकते हो। हां तो यह बतलाओ कि तुम्हारा नाम क्या है और कहां के हो ? वह नौजवान भी काफी हुशियार था। वह भी समझ गया कि अनुराग शुक्ला की उम्र भी कोई 25 साल से ज्यादा नहीं है, इतनी छोटी उम्र में जो अरबों का मालिक बन बैठा है तो बिना अपराध के नहीं बन सकता और जिसका शिकंजा पुलिस से भी ज्यादा कसा हुआ है तो अपराधी तो निश्चित होगा ही। अतः सच कहना ही ज्यादा उचित होगा। वह बोला साहब आप से कुछ भी नहीं छुपाएंगे। मेरा नाम भुवनेश कुमार है। मैं राजस्थान के शहर कोटा के पास बारां गांव का रहने वाला हूं। मेरे पिता का नाम अमरनाथ एवं माता का नाम वैजयन्ती था। तब अनुराग शुक्ला बीच में ही बोला- क्या मतलब । मतलब यह की अब वे दोनों इस दुनियां में नहीं रहे। यह कैसे हुआ ? यह सब पारिवारिक कलह का कारण रहा है। मेरे पिता के दो भाई और हैं। एक का नाम पहाड़ सिंह एवं दूसरे का जगत सिंह है। तीनों का बंटवारा हो चुका था। तीनों में जमीन जायदाद चल-अचल सम्पत्ति बंट चुकी थी। मेरे पिता जी के एक किराने की दुकान थी। कुछ भाग्य अच्छे थे जो उनकी दुकान बहुत अच्छी चला करती थी। दिन रात ग्राहक आते ही रहते थे। जमीन पर भी कुआ खुदवा लेने से खेती बाड़ी भी अच्छी होती थी। अधिक आमदनी होने से मेरे पिता से मेरे दोनों काका ईर्ष्या करते थे। लेकिन कर कुछ नहीं पा रहे थे वे इस मौके की तलाश में जरूर रहते थे कि कोई {135} । चांस हाथ लगे। मैं उस वक्त कोटा कॉलेज में पढ़ रहा था। पिता जी व मेरी माता जी बारा में रहते थे। उन्होंने एक सेकेण्ड हेण्ड कार भी खरीद ली थी। एक दिन वे मुझसे मिलने कोटा आए थे और जब पुनः लौटकर बारां जा रहे थे तो रात्रि हो गई थी। रात की 10 बजे अंधेरा हो चुका था। गांव से 10 कि.मी. दूर रोड़ पर बड़े-बड़े पत्थर होने से गाड़ी रोकना पड़ा। ज्योंही पिता जी पत्थर हटाने के लिए बाहर निकले और पत्थरों को हटाएं उससे पूर्व ही इधर-उधर पीछे से 5-7 व्यक्ति आए उन्होंने पत्थर, भाले लकड़ियों से पिता जी एवं मां को बुरी तरह मारा और मारकर गाड़ी पर पैट्रोल छिटककर दोनों की लाशें उसी में जला दी। दूसरे दिन यह घटना जंगल की आग की तरह सब जगह फैल गई। पेपरों में समाचार भी आए पुलिस ने ऊपरी तौर पर खोजबीन भी करी। पर कोई सुराग नहीं मिला। मिलता भी कैसे क्योंकि पुलिस पैसा जो खा चुकी थी। मैं कोटा से कॉलेज छोड़कर घर गया तो आश्चर्य हुआ कि घर के भी ताले टूटे हुए हैं अन्दर तिजोरी के मी ताले टूटे हुए हैं। सारा माल पहले से ही निकाला जा चुका था। यह सारी स्थिति देखकर गांव वालों का यह अन्दाज था कि इस घटना में पहाड़ सिंह एवं जगतसिंह का हाथ हो सकता है। कुछ हालात भी ऐसे ही दिख रहे थे। जिससे अनुमान की पुष्टि मिल रही थी। माता पिता के इस दुनिया से चले जाने के बाद मेरा इस दुनिया में कोई नहीं रहा। सोना और रुपया भी जा चुका था। केवल मकान और जमीन ही सम्पत्ति के रूप में रह चुके थे। मन पर भारी बोझ सा हो गया। 10-15 दिन तो ऐसे ही बीत गए, अन्त में मेरे मन में आक्रोश भड़क उठा। दोनों काकाओं के प्रति मेरे मन ने संकल्प लिया कि मैं इसका बदला लेकर रहूंगा। लेकिन इसके लिए सम्पत्ति एवं अन्य साधनों की भी आवश्यकता थी। यही सोचकर मैंने पढ़ना-लिखना छोड़ा। यही नहीं, गांव भी छोड़कर बाम्बे चला आया। क्योंकि वहां पर मेरी जान को खतरा था और मुझे बदला भी लेना था। इसलिए बाम्बे आकर मैंने किसी भी तरह पैसा एकत्रित करना प्रारम्भ किया। एक बार यह जो टैक्सी ड्राइवर आप देख रहे हैं। इसकी टैक्सी में जा रहा था और इसी का पाकेट मार लिया था। उसी बीच पकड़ा गया था। फिर दोनों में विवाद होने के बाद सुलह हो गई। अब मैं इसी की टैक्सी में घूमता हूं। जिस किसी की पॉकेट लूटते हैं दोनों आधा-आधा कर लेते हैं। इसी कड़ी में आज इन दो व्यक्तियों के ब्रीफकेश पर भी हाथ सफाई की थी, पर यह {136} हमारा दुर्भाग्य था कि हम पकड़े गए और आपके सामने हाजिर हैं। इतना सुनने के बाद अनुराग शुक्ला बोले-दुर्भाग्य नहीं, सद्भाग्य है जो यहां तक पहुंच गए हो। यह कैसे बॉस ! उस भुवनेशकुमार के मुख से भी अचानक यह बास शब्द निकल गया। अनुराग शुक्ला ने कहा- हमने तुम्हारी सारी बातें सुन ली है। अब बताओ तुम क्या चाहते हो। क्या तुम्हें चोरी के अपराध में जेल भिजवा दिया जाय या हम ही तुम्हारा काम तमाम कर दें या फिर तुम कुछ काम करके आगे बढ़ना चाहोगे। वैसे तो बॉस ! अब तो हम आपके हाथों में है जैसा चाहो वैसा करो। हम हाजिर हैं। अनुराग शुक्ला की नजरें पारखी थी। वह एक नजर में ही भुवनेश्वर की उपयोगिता भांप गया था। उसने सोचा कि यह लड़का हिम्मती, साहसी एवं हुशियार होने के साथ ही परिस्थिति का मारा है। मेरी तरह ही यह भी अपराध की दुनियां में प्रवेश कर रहा है। लेकिन कोई जरूरी नहीं कि यह उसमें सफल हो ही। बल्कि अपनी कंपनी में लगने पर अपना कार्य और इसका कार्य भी बन सकता है। यह सब सोचकर अनुराग शुक्ला ने कहा- दोस्त ! यह वफादारी तुम्हें रखनी ही होगी कि जिस कम्पनी में काम करोगे। उसके प्रति पूरी तरह वफादार रहोगे। अपनी कुर्बानी करके भी उसकी रक्षा करना तुम्हारा मुख्य लक्ष्य होगा। यदि इसमें विश्वासघात पाया गया तो उसी वक्त तुम्हें उड़ा दिया जाएगा। हमारे हाथ काफी लम्बे हैं। भुवनेश-यह तो मैं देख ही रहा हूं। लेकिन ऐसा मौका मैं अपने जीवन में नहीं आने दूंगा। तो फिर यह भी पक्का है कि तुम्हारी हर सुविधा का ध्यान कम्पनी रखेगी। आज से तुम्हारी 15 हजार रुपये प्रतिमाह की नौकरी हुई। फ्लेट की सुविधा व गाड़ी भी कम्पनी की तरफ से दी जाएगी। यह जो तुम्हारा साथी ड्राइवर है इसे हम कम्पनी के बाडीगार्ड में नियुक्त करते हैं। उसे वहां पर क्या करना है यह ट्रेनिंग मिल जाएगी। हां मिस्टर भुवनेश्वर कुमार ! आपको कम्पनी में अपनी उपयोगिता जाहिर करना है। योग्यता के आधार पर आपका वेतनमान, अन्य सुविधाएं बढ़ती रहेगी। अच्छा बॉस ! मुझे काम करने का मौका दीजिये। भुवनेश के कहने पर अनुराग शुक्ला का ईशारा पाकर उसके चारों तरफ खड़ी संगीन चौकसी हटा । {137} दी गई। भुवनेश ने भी मन लगाकर काम करना शुरू किया। 6 माह में ही वह अनुराग शुक्ला की कम्पनी का छोटा-बड़ा सब काम करना जान गया। भुवनेश को इंग्लिश की अच्छी जानकारी होने से उसे एक्सपोर्ट डिपार्टमेन्ट (Export Department) में रखा गया। ताकि वह अच्छा चल सके। वर्ष भर बाद तो उसने अपनी पैनी बुद्धि से काम को इतनी गति दी की काम दुगुना बढ़ गया। कम्पनी को भरपूर कमाई हुई। बिना कहे अनुराग ने उसकी नौकरी फैसीलीटी में आश्चर्यजनक वृद्धि कर दी। इम्पोर्टेड वातानुकूलित गाड़ी ड्राइवर। घर पर दो नौकर, पूरे फ्लेट में ए.सी. आदि कई सुविधाएं दे दी गई। भुवनेश भी पूरी वफादारी के साथ काम कर रहा था। अब उसे रहते हुए 2-3 वर्ष का समय हो चुका था। इसी बीच अनुराग शुक्ला के महायोगी का सानिध्य प्राप्त होने से उनके जीवन में अपूर्व मोड़ आया था। जिसका प्रभाव पूरी कम्पनी पर पड़ा। कंपनी में भी अनैतिक व्यापार को रोककर व्यापार को नई दिशा दी गई। इसमें भी भुवनेश कुमार का बहुत बड़ा हाथ रहा। आज कम्पनी के कम से कम विश्व के दस देशों में स्वतंत्र आफिस चल रहे थे। बाम्बे के डायमण्ड बाजार में तो नाम है ही, इण्डस्ट्री (Industry) के क्षेत्र में भी काफी बड़ी इण्डस्ट्रियां चल रही है। अनुराग का सम्पर्क पाकर भुवनेश ने भी व्यापारिक क्षेत्र में कमाल दिया। इसी बीच जहां कोटा में अनुराग ने अपने दोस्तों से बदला लिया था। वैसी ही कुछ स्थिति भुवनेश की थी। पर अनुराग शुकला के विचार तो बदल ही चुके थे। उसी ने भुवनेश को भी समझाया कि किसी के बदला लेने से बदला लिया नहीं जाता। बल्कि उससे वैर परम्परा और बढ़ती है। फिर जिसने जो कर्म किये हैं, वह निश्चित रूप से उसे आज नहीं तो कल भोगने पड़ेंगे। बस फिर हम क्यों बीच में पड़े। हम अगर मारेंगे तो इसका फिर हमें बदला चुकाना पड़ेगा। महायोगी ने मुझे यह बात समझाई थी कि जिस प्रकार तुम्हें कोई मारता है तो तुम उसे वापस मत मारो, उसकी शिकायत सरकार में करो। दण्ड सरकार देगी। यदि मारने वाले को सामने वाला मरता है तो सरकार दोनों को दण्ड देती है। क्योंकि दण्ड देने का अधिकार आप को नहीं है, दण्ड तो सरकार देगी। वैसे ही हम क्यों किसी का बदला लेकर अपने आपको दण्डित करें। यह तो उसके कर्म अपने आप उसको दण्डित करेंगे। अनुराग ने कहा-मैं मानता हूं कि तुम्हारे साथ बहुत ही गलत काम हुआ। तुम्हारे में प्रतिशोध की भावना धधक रही है। पर भुवनेश जी ! सोचिये {138} उसे शान्त करने का यह तरीका नहीं है। दोनों काका को मारने से तो प्रतिशोध भड़केगा ही। इस प्रकार अनुराग शुक्ला के समझाने से भुवनेश में भी अद्भुत परिवर्तन आया। उसने दोनों काका को मारने की बात दिमाग से निकाल दी। लेकिन दिल में उनके प्रति प्यार भी नहीं जग पाया। खैर उसकी अब वैसे भी बारां जाने की इच्छा नहीं थी। वह बोला- बॉस। आप ठीक कहते हैं। मैं यद्यपि बदला तो नहीं लूंगा। पर मेरा प्यार भी उन पर नहीं है। अब तो इस दुनियां में अगर मेरा कोई होता तो आज तक मैं अपराध की दुनियां में कितना आगे बढ़ गया होता कुछ नहीं मालूम। अब आपको ही सोचना है कि मुझे भविष्य में क्या करना है ? अनुराग ने भुवनेश को अपने गले लगा लिया और कहा- दोस्त ! तुमसे मुझे यही आशा थी। तुम किसी प्रकार की चिन्ता मत करो, तुम्हारी चिन्ता मेरी चिन्ता होगी। तुम मेरे अभिन्न साथी हो। बॉस का यह आश्वासन पाकर भुवनेश खिल उठा। क्योंकि कोई तो उसे सहारा मिला। हर आदमी कितना ही क्रूर, अपराधी या कैसा भी हो, वह किसी का सहारा पाकर अन्दर में भर जाता है, वही हाल भुवनेश का था। भुवनेश अनुराग शुक्ला का दायां हाथ था। यह सारी कम्पनी जानती थी। इसलिए कम्पनी में उसका भी उतना ही प्रभाव था। अनुराग शुक्ला को भुवनेश के भविष्य की चिन्ता भी बनी रहती थी। क्योंकि अभी तक उसकी भी शादी नहीं हुई थी। उसने देखा मेरी शादी तो अचानक हो गई अब भुवनेश की भी करनी थी। इधर उसे बहिन विमा की शादी का भी विचार आया। दोनों विचारों में तालमेल हुआ। वह सोचने लगा- अरे वाह ! एक तीर. दो शिकार ! क्यों न भुवनेश के साथ ही विमा की शादी कर दी जाय। जोड़ी जोरदार जमेगी। भुवनेश बहुत ही स्मार्ट प्रभावशाली व्यक्तित्व का धनी है। इधर विमा भी किसी भी दृष्टि से उससे कम नहीं है। मेरी तो दोनों समस्याओं का समाधान हो जाएगा। अनुराग ने इस विषय में जितना सोचा उसे यह निर्णय उतना ही उचित लगा। बस फिर क्या था भुवनेश को बुलाकर अनुराग ने सारी बात रखते हुए विमा के साथ शादी करने का प्रस्ताव भी रख दिया। भुवनेश बोला- बॉस ! यह क्या कहते हैं आप कहां विमा जी ! और कहां, मैं एक मामूली आदमी। {139} अनुराग- अरे यार ! हीरा भी क्या अपना मोल बतलाता है। यह तो पारखी नजरें ही उसकी परख कर सकती है। हम जानते हैं। बोलो विमा तुम्हें पसन्द है या नहीं? आप कैसी बात करते हैं। यह पूछिये, विमा को मैं पसंद हूं या नहीं। बहुत कम संभावना है कि वह हां भरे। अनुराग बोला- भुवनेश ! इतना मेरे पास रहकर भी तुमने मुझे अभी पूरा नहीं पहचाना मैंने तुमसे बात करने से पहले ही विमा से बात कर ली है। । उसे तुम पूरी तरह पसंद हो। वह तुम्हें पाने की स्थिति में खुश रहेगी। अब बोलो तुम क्या चाहते हो। भुवनेश – वैसे तो बॉस मैं साधारण व्यक्ति हूं आपके सामने। फिर भी मेरे लिए आप सब कुछ हैं। अतः आप जो भी निर्णय लेंगे वह मेरे हित में होगा और वह मुझे मंजूर होगा। जहां तक पसंद की बात है, विभा जी मुझे पूरी तरह पसंद है। ऐसी युवती तो आज की दुनियां में मिलना ही मुश्किल है। उसे पाकर तो मेरे पतझड़ में निश्चित ही बसंत आ जाएगी। भुवनेश द्वारा सहर्ष स्वीकृति मिलने के बाद अनुराग अपनी मम्मी कुसुमवती के पास आकर बोला- मम्मी ! मैंने तुम्हारी आधी चिन्ता तो समाप्त कर दी है। अब एक चिन्ता जो तुम्हें बड़ी सता रही है वह विमा की शादी । की। इतने में कुसुमवती बोल पड़ी-हां बेटा ! बस यही बात मुझे दिन रात रह रहकर परेशान करती रहती है। क्योंकि आज के कलियुग में चरित्रवान, समन्वयशील लड़के मिलना दुर्लभ हो गया है। फिर इस माया नगरी बाम्बे के लिए तो कहना ही क्या ? यदि हम कोटा राजस्थान में होते तो वहां तो फिर कोई अच्छा सा लड़का ढूंढा जा सकता था। पर यहां पर न तो इतना लम्बा कोई हमारा परिचय है जिससे कि अच्छा लड़का ढूंढा जा सके। तब अनुराग बोला- मम्मी ! मेरे रहते तुम्हें किसी भी प्रकार की चिन्ता करने की आवश्यकता नहीं है। बाम्बे हो चाहे गांव। हर जगह अच्छे-बुरे दोनों प्रकार के लड़के मिलते हैं। ढूंढने वाला चाहिये। मैं तुम्हें दूर कहां बतलाऊं, अपनी ही कम्पनी में काम कर रहे भुवनेश कुमार को तो तुम जानती हो ? कुसुमवती- हां हां! वह तो कई बार अपने बंगले पर भी आता रहा है। दिखने में स्मार्ट, भला वह ईमानदार नजर आता है। {140} । अनुराग- मम्मी ! वह मेरे पास गत 3-4 वर्ष से काम कर रहा है। मैंने उसे नजदीक से देखा परखा है। ऐसा लड़का लाखों में नहीं मिलता है। यही नहीं, मेरे पूरी कम्पनी में मेरे बाद अगर कोई दक्षता के साथ काम कर रहा है.तो वह भुवनेश है। मैं चाहता हूं कि इसके साथ विमा की शादी हो जाय । कुसुमवती- बेटा ! तुम जो भी सोचते हो वह उचित ही है परन्तु.... । अनुराग बोला-मम्मी यह परन्तु वाली क्या बात रह गई। क्या उसमें कोई कमी देखी है तुमने ? कुसुमवती-नहीं बेटा ! कमी वाली तो कोई बात नहीं है। पर वह कितना ही हुशियार हो पर उस घर में तो नौकर की ही हेसियत से रह रहा है। उससे मालिक की बहिन की शादी कितनी क्या लोगों में जमेगी ? अनुराग-मम्मी ! आप, आप भी इतनी समझदार होकर भी कैसी बातें करती हो? दुनिया क्या कहती है। हमें इसे नहीं देखना है। दुनिया तो न हंसने दे और न ही रोने दे। हमें तो जो उचित लगे, वह करना है। भुवनेश कुमार अगर नौकरी की हैसियत से यहां रह रहा है तो क्या हो गया। क्या पत्थरों में हीरे नहीं मिलते हैं, क्या कीचड़ में कमल नहीं खिलते हैं ? मम्मी जरा सोचो। पहले अपनी क्या दशा थी। फिर पैसा तो कब आ जाय, कब चला जाय। यह कोई निश्चित नहीं होता। पर व्यक्ति का व्यक्तित्व महत्त्वपूर्ण होता है। जिसकी भुवनेश में कहीं कोई कमी नहीं है। दौलत की दृष्टि से भी वह आज भी करोड़पति है। यह तो उसकी वफादारी है, जो मेरी कम्पनी में काम कर रहा है। अन्यथा अपना स्वतन्त्र कारोबार करके करोड़ों रुपये कमा सकता है। लेकिन क्या मम्मी ! आपने महायोगी के मुख से नहीं सुना कि "श्रीमन्तों को इन्सानियत की कराहट सुनने की आवश्यकता है।" महायोगी ने यह भी कहा था-" किसी का दौलत से नहीं, गुणों से मूल्यांकन करना चाहिए।" तो मम्मी ! तुम तो उस महायोगी के प्रति अगाध श्रद्धालु हो। फिर ऐसी मानसिकता कैसे बना रही हो। कुसुमवती -बेटा ! तुमने मेरी आंखें खोल दी। मुझे विमा की शादी भुवनेश से करने में कोई आपत्ति नहीं है। बल्कि प्रसन्नता होनी चाहिए। मैंने महायोगी से सुना जरूर है, पर तुम्हारे जितना गुना नहीं है। तुम भाग्यशाली हो जो उनके स्वल्प सानिध्य को पाकर भी अपने जीवन की शैली को पूरी तरह चेंज कर चुके हो। । 1141 सभी तरह से मंजूरी होने के बाद अब विवाह की तैयारियां की जाने लगी। अनुराग शुक्ला ने अपनी शादी जरूर सादे समारोह में कर ली थी, पर अपनी बहिन विभा एवं भुवनेश की शादी बड़े महोत्सव के साथ सम्पन्न करने की तैयारी में जुट गए। इसका मुख्य कारण भुवनेश था। क्योंकि उसके माता-पिता अब इस दुनियां में नहीं रहे थे। इसलिए उसके मन में किसी भी प्रकार की हीन भावना या मानसिकता न आ पावे। साथ ही कुसुमवती को यह नहीं लगे की विमा की शादी उत्साह के साथ नहीं की। फाइव स्टार होटल में फंक्शन (Function) रखा गया। फिर भी खाना पूरी तरह से वेजिटेरियन (Vegetarian) रखा गया। आधुनिकता के साथ पौराणिकता का समन्वय था। न मांस और नहीं किसी भी प्रकार का विकृत भोजन का ड्रिंक। 100 प्रकार के खाने के आइटम जरूर रखे गए। जो फिजूल खर्ची भी थी। पर शान शौकत का प्रदर्शन भी आवश्यक था। महानगर की जानी मानी हस्तियां भी उपस्थित थी। जहां राजनेता, अभिनेता और कई रईस लोग भी मौजूद थे। वहां पर सदाचार एवं नैतिकता की जिन्दगी जीने वाले आदर्श पुरुष भी उपस्थित थे। यही नहीं गरीबी के स्तर पर जीने वाले सामान्य व्यक्ति भी इस समारोह में आमंत्रित थे। यह समारोह अपने ढंग का विलक्षण था। यद्यपि अनुराग शुक्ला ने जहां भौतिकता का खुल्ला प्रदर्शन किया था तो वहां संयम भी बनाएं रखा। जहां आर्केस्ट्रा (Orchestra) फिल्मी धुनें बज रही थी फिर भी किसी नवयौवनाओं को नचाकर अंग प्रदर्शन करने का अवसर नहीं दिया गया था। कुल मिलाकर पैसा पानी की तरह बहाया गया था। साथ ही परमार्थ का भी काम किया गया। हॉस्पिटल में जितने भी अमावग्रस्त मरीज थे, उनके लिए लाखों रुपये का अनुदान किया गया। बाम्बे के कोई पचास हजार गरीब लोगों को अच्छा खाना भी खिलाया गया। ठंड से ठिठुरते हजारों लोगों को वस्त्र एवं कंबल भी वितरित किये गए। सैकड़ों अनाथ बच्चों के पढ़ने की व्यवस्था भी की गई। विधवाओं की आजीविका की व्यवस्था भी की गई। यह स्वार्थ और परमार्थ का मिलाजुला रूप था। आडम्बर और सदाचार का मिश्रण था। पौराणिकता और आधुनिकता का संगम था। इस समारोह से सभी वर्ग के लोग खुश थे। गरीबों ने भी अपनी दुआएं दी-ऐसी जोड़ी युग-युग जीओ। धनवानों ने भी टिप्पणी की कि हमने शादियां तो बहुत देखी पर ऐसा फंक्शन (Function) पहली बार देखा है। जो अत्याधुनिक होकर भी अश्लील नहीं था। जहां ऐश्वर्य का खुल्ला प्रदर्शन था तो वहां दीनों असहायों के सहयोग {142}.

हेतु भी धन के द्वार पूरी तरह से खुले थे। इस शादी की चर्चा काफी दिनों तक होती रही। भुवनेश और विभा परिणय सूत्र में बंध गए। परिणय सूत्र का धागा उद्दाम कामवासना को उच्छृखलता से हटकर संतुलित करता है। गृहस्थ जीवन में जीने के लिए परस्पर एक दूसरे के प्रति समर्पित रहकर आगे बढ़ने की प्रेरणा देता है। अनुराग शुक्ला ने भरपूर दहेज दिया था। कोलाबा क्षेत्र में एक दस करोड़ रुपये की कोठी खरीदकर अपनी बहन बहनोई के लिए दे दी गई। करोड़ों रुपये के आभूषण एवं एम्पोर्टेड गाड़ी भी दी गई। कुल मिलाकर इतना सब कुछ दिया कि भुवनेश कुमार को भी जानी मानी हस्तियों के समान बना दिया। यही नहीं, अब तक व्यापार में भुवनेश का 10 प्रतिशत हिस्सा था, जिसे बढ़ाकर 25 प्रतिशत कर दिया गया। एक सामान्य सा व्यक्ति जो चोरी करते पकड़ा गया था। उसे अनुराग शुक्ला ने ऊपर उठाकर अपने बराबर की श्रेणी में बिठा दिया। गृहस्थ जीवन की यही सफलता है कि बिना किसी स्वार्थ के अपने जीवन में कम से कम एक व्यक्ति को तो अपने जैसा बनाया जाय। अनुराग शुक्ला और राजेश्वरी का जीवन सुखमय बना हुआ था ही। अब विमा और भुवनेश की जिन्दगी में भी गृहस्थ जीवन की बहार आ गई। यद्यपि भुवनेश धर्म कर्म में इतना नहीं समझता था। परन्तु विभा जिसने महायोगी का सानिध्य पाया था उसने समय-समय पर भुवनेश को समझाकर अर्थ के साथ ही धर्म के मार्ग पर भी आगे बढ़ा दिया। कुसुमवती का भार पूरी तरह हल्का हो चुका था। अब उस पर किसी भी तरह की जिम्मेवारी नहीं रह गई थी। वह अपने आपको पूर्ण हल्का महसूस कर रही थी। इन शान्ति के क्षणों में उसे महायोगी का बार-बार स्मरण आ रहा था कि उनके पुण्यप्रताप से ही मेरे आंगन में शान्ति की बयार आई है। सोच सोचकर उसका मन महायोगी के चरणों में परोक्ष रूप से श्रद्धावनत हो उठता था। इस समय महायोगी कहां होंगे। इसकी कुसुमवती को जानकारी नहीं थीं। अब दिल बार-बार ऐसे महायोगी के पावन दर्शन करने को उत्कंठित था। समय की प्रतीक्षा थी कि कब उस अवधूत योगी की जानकारी मिले और उनके चरणों में पहुंचा जाय। {143} -18- आज अनुराग शुक्ला भिण्डी बाजार में जा पहुंचा जो बाम्बे में रूप का बाजार माना जाता है। जहां रंग-बिरंगी तितलियां इधर-उधर मण्डराती रहती है। ऐसे कामोत्तेजक विलासिता पूर्ण बाजार में पहुंचकर अनुराग शुक्ला एक नवयुवती के आमंत्रण पर उसके आवास पर जा पहुंचा। नवयुवती रूप को बेचकर अर्थ कमाना चाहती थी। लेकिन अनुराग ने पूछा- तुम्हारा नाम क्या है ? उस वीरांगना को आश्चर्य हुआ कि यह व्यक्ति नाम क्यों पूछ रहा ? साश्चर्य उसने बतलाया मेरा नाम यामिनी है। तब अनुराग शुक्ला ने दूसरा प्रश्न पूछा- तुम कहाँ की हो ? तुम्हारे माता-पिता का नाम क्या है ? इस. समय तुम्हारे परिवार में कौन-कौन है ? यामिनी को यह सब पूछना बड़ा अटपटा लगा। उसने सीधा और सपाट जबाब दिया- आप आम खाने से मतलब रखिये, गुठली गिनकर अपना समय बर्बाद मत करिये। निश्चित समय के बाद आपको यहां से निकाल दिया जाएगा। आपके पैसे बेकार चले जाना है। तुम इसकी फ्रिक छोड़ा पहले तुम यह बताओ कि तुम हो कहां की ? अनुराग ने कहा। तब यामिनी बोली- लेकिन आपको इससे क्या मतलब कि मैं कहां की हूं। क्या आप कोई जासूस हैं ? जो हमारी छानबीन करने के लिए आए हैं ? हम जैसी नारियों की जातपांत नहीं पूछी जाती है केवल काम से मतलब रखा जाता है। अनुराग शुक्ला बोला- देखो बहिन ! न तो मैं कोई जासूस हूं और नहीं कोई तुम्हारा अनर्थ करने वाला हूं। मैं भी एक मानव हूं और तुम भी एक मानवी हो। इस नाते तुम मेरी बहिन हो। क्या माई को बहिन का हाल पूछने का अधिकार नहीं होता ? यामिनी ने आज पहली बार बहुत अरों के बाद अपने लिए परम पवित्र शब्द का संबोधन सुना था। क्योंकि इस बाजार में आने के बाद तो उसके पास ऐसे ही विलासी कीड़े आते थे जो चंद रुपयों के पीछे उसका देह निचोड़कर चले जाते थे। पहले पहल तो उसने काफी कुछ विरोध किया। । {144} उसका जी भी मचलाया। आत्मा कराहती रही। उन्मुक्त आकाश में जाने के लिए बहुत कुछ हाथ पैर पटके। लेकिन जब वह सफल नहीं हो पाई तो जिन्दगी को इसी प्रकार जीने की अपनी नियति मानकर के वहीं बस गई। धीरे-धीरे अब उसे इसी काम में रस आने लग गया। लेकिन जब पहली बार एक नवयुवक में मुख से अपने लिए बहिन शब्द सुना तो उसके भीतर में गहरी हलचल मच गई। अतीत का जीवन मन मस्तिष्क पर तरंगित होने लगा। वह उत्तरप्रदेश में मुगलसराय की रहने वाली थी। उसके पिता का नाम जुजारसिंह था। चार बहिनें और एक भाई में सबसे पहली लड़की वही थी। यानी की अपने भाई-बहिनों में सबसे बड़ी थी। परिवार की आर्थिक स्थिति बड़ी कमजोर थी। घर का खाने-पीने का खर्च चलाना भी बड़ा मुश्किल हो रहा था। जुजारसिंह एक कम्पनी में मामूली सी नौकरी करते थे। उससे मिलने वाले पैसों से घर खर्च चलना असंभव था। ऐसी स्थिति में कॉलेज में पढ़कर स्नातक बनने की इच्छा होते हुए भी वह नहीं बन पाई। घर पर ही रहना पड़ा। इतने से भी पर्याप्त नहीं था, कुछ नौकरी करने का प्रयास किया गया। मुगलसराय में ही एक अफसर के यहां टाईपिस्ट (Typist) की नौकरी मिल गई। जिसका नाम मानसिंह था। टाईप करना उसने सिख लिया था। वह नौकरी पर जाने लगी। लेकिन मानसिंह का ध्यान जितना उसके काम पर नहीं था उससे ज्यादा उसके जवान जिस्म पर था। वह बार-बार उसे अपनी तरफ आकर्षित करने का प्रयास करने लगा। लेकिन वह अपने काम से ही मतलब रखती थी। किन्तु कामी मानसिंह ऐसे ही छोड़ने वाला नहीं था। उसने पूछा तुम कितने भाई-बहन हो। यामिनी ने संक्षिप्त में जबाब दिया। फिर पूछा तुमने दसवीं तक ही पढ़ाई करके स्कूल क्यों छोड़ दिया। यामिनी ने घर की आर्थिक स्थिति की कमजोरी का कारण बताया। तब मानसिंह बोला-चलो तुम मेरे यहां काम करती हो, मैं तुम्हें छात्रवृत्ति देकर आगे बढ़ा सकता हूं। मैं तुम्हारा सहयोग करूंगा। यामिनी को पढ़ने की तमन्ना तीव्र थी अत: उसने सहयोग लेना स्वीकार कर लिया। उसका पहले ही एक साल खराब हो चुका था। अतः ग्यारहवीं छोड़कर बारहवीं के लिए प्रायवेट फार्म भर दिया गया। प्राइवेट परीक्षा के लिए पढ़ना स्वयं को ही पढ़ता है। कई विषय स्वयं को समझ में नहीं आने पर ट्यूशन करना होता है। ऐसी कंडीशन उसकी नहीं। ऐसी स्थिति में वह मानसिंह के पास आकर पढ़ने लगी। बार-बार के इस एकान्त सम्पर्क ने उसकी मानसिकता को भी विकृत कर दिया था और एक दिन ऐसा । {145} आया कि उसके चरित्र का पतन हो गया। प्रथम बार तो उसकी आत्मा बहुत घबराई। पर उसके बाद जो सिलसिला चल पड़ा, वह अविराम चलता ही चला गया। और वह भी उसमें ढल गई। इधर मानसिंह उसे फांसे रखने के लिए नये-नये आकर्षण देता चला गया। लेकिन वह शादी तो कर नहीं सकता था क्योंकि उसकी 10 वर्ष पहले ही शादी हो चुकी थी। उसके दो बच्चे भी थे। लेकिन उसने झूठे झांसे देने में शादी करने की स्वीकृति दी थी। उसी के परिणामस्वरूप यामिनी शादी करने के लिए बार-बार आग्रह करने लगी। इससे मानसिंह भी काफी परेशान था और अब यामिनी के प्रति उसकी कोई विशेष रुचि भी नहीं रही थी। ऐसी स्थिति में वह इस कांटे को निकालना चाहता था। इसके लिए एकदिन अत्यधिक रूप से कोमलता एवं सहानुभूति दर्शाता हुआ यामिनी से बोला- यामिनी मुझे तुमसे शादी तो करना ही है। मेरी सच्ची मोहब्बत तो तुमसे ही हैं। मेरी पहले वाली पत्नी तो नीरस है। घर वालों ने मेरे नहीं चाहते हुए उससे जबर्दस्ती शादी कर दी थी। जिसके कारण मैं आज तक पछता रहा हूं। पर तुम्हारे आ जाने से मेरी जिन्दगी में एक नई बहार आ गई है। मैं तुम पर न्यौछावर हूं। इस प्रकार प्रशंसात्मक प्रेम भरी बातें सुनाने से यामिनी बेहद खुश हो गई। अपनी सुन्दरता की झूठी प्रशंसा सुनकर भी खुश होकर सीमा का अतिक्रमण कर जाना नारी की अन्तरंग कमजोरी है। मानसिंह ने आगे कहा कि चलो पहले बाम्बे आदि बड़े शहरों में घूम आएं और शादी के बाद विदेशों में हनीमून मनाने चलेंगे। यामिनी ने इस बात को सहज रूप में मान लिया और घर पर लड़कियों के साथ घूमने जाने का बहाना बनाकर एक रात अचानक वह मानसिंह के साथ बाम्बे के लिए रवाना हो गई। बाम्बे पहुंचने के बाद एक होटल में ठहर गए। दो दिन तक तो सब ठीक ठाक चलता रहा। उसके बाद एक दिन मानसिंह ने बाम्बे की कोठे की संचालिका से बात करके कुछ पैसे के लोभ में उसे बेच दिया और भुवाजी से मिलने का बहाना बनाकर उसे कोठे पर छोड़कर चला गया जो आज तक वापस नहीं आया। यामिनी को 2-4 दिन बाद यह पता चला कि वह जिन्दगी का सबसे बड़ा धोखा खा गई है। लेकिन अब तक उसके पर कट चुके थे। अतः उसने भी परिस्थितियों के साथ समझौता कर लिया और तब से वह उस ढर्रे पर बढ़ चली थी। जो भी नया ग्राहक आया उसे फांसने में लगी रहती थी। {146} जिन्दगी गन्दगी के एक कीड़े की भांति खिसकती जा रही थी। लेकिन आज जो ग्राहक उसके कोठे पर आया। वह उसके तन को नहीं जीवन को सजाने आया था। उसके मुख से बहिन शब्द सुनकर उसकी जमी हुई चेतना फिर से तरो ताजा बनने लगी थी। कोठे के विलासिता पूर्ण माहौल में एक सम्पन्न बलिष्ट नवयुवक अनुराग शुक्ला के मुख से इस प्रकार के पवित्र शब्द सुनकर यामिनी के मन मन्दिर की घंटिया बज उठी और उसके चेहरे पर भी धीरे-धीरे सात्विक आभा उभरने लगी। इस मानसिक उतार-चढ़ाव के कारण वह काफी देर तक बोल भी नहीं पाई। जड़वत खड़ी रह गई। इसी बीच अनुराग शुक्ला ने कहा- क्या हुआ बहिन ! तुम इस प्रकार खड़ी रहकर किस सोच में पड़ गई हो। मैंने तो तुमसे सहृदयतावश परिचय ही तो मांगा था। तब तक तो यामिनी के आंखों में आंसू भी टपक पड़े और वह बोली- साहब ! आपने इस कोठे जैसे गन्दे माहौल में जीने वाली औरत के लिए बहिन जैसे शब्द प्रयोग कर अनुचित किया है। क्योंकि कहां आपकी महानता और सम्पन्नता और कहां मेरी जैसी गंदगी में जीने वाली नारी, भाई-बहिन के रिश्ते का कहीं कोई मैच नहीं। तब अनुराग शुक्ला बोले-बहिन यामिनी ! भाई-बहिन के लिए सम्पन्नता-विपन्नता या और कुछ आड़े नहीं आता। एक मनुष्य होने के नाते मानव-मानव एक परिवार हो जाता है। तुम भी मानव जाति हो और मैं भी। अतः भाई-बहिन स्वतः हो जाते हैं। अब रही बात गंदे माहौल की तो बड़े से बड़े इन्सान से भी गलती हो जाया करती है। लेकिन गलती को गलती मानकर सुधारने वाला व्यक्ति महान् बन जाता है। अतः तुम्हें किसी भी प्रकार की हीन भावना लाने की आवश्यकता नहीं है। अपने को समझने की कोशिश करो। यामिनी को इन अमृत घुले शब्दों से आश्वासन मिला और उसने अपने अतीत जीवन की सारी घटना ज्यों की त्यों अनुराग शुक्ला के सामने रख दी और अन्त में बोली-भैया ! जब में जिस मार्ग से इतनी आगे बढ़ चुकी हूं तो फिर पीछे लौटना असंभव है। लौट भी जाऊं तो सामाजिक प्रतिष्ठा मिलना संभव नहीं है और वैसे भी मैं इस लायक हूं भी नहीं। अतः मैं जिस हाल में जी रही हूं उसी हाल में जीने दो। आपने मेरी दुःख भरी दास्तान धैर्य से सुनी। यह भी बात कोई कम महत्त्वपूर्ण नहीं बहिन यामिनी ! तुम इस बात को मूल रही हो कि बुरे व्यक्ति को सामाजिक प्रतिष्ठा नहीं मिलती। बशर्ते कि वह अपना आचरण सुधार ले। तुमने इतिहास में पढ़ा होगा कि वाल्मिकी भयंकर चोर थे। जो कि सदाचारी बनकर कितने बड़े महात्मा बन गए। अंगुली माल रोहिणेय चोर, अर्जुनमाली जैसे नामी गिरे हुए ॥ {147} छंटे हुए बदमाश भी जीवन बदलकर महान व्यक्ति बन गए। जबकि जैन इतिहास में तो प्रभवस्वामी जैसे ऐसे व्यक्ति का वर्णन आता है जो कि 500 डाकू दल का सरदार था, वह जम्बू कुमार का सम्पर्क पाकर इतना सुधरा कि सब कुछ छोड़कर अपने दल सहित जैन सन्यास स्वीकार कर लिया और भविष्य में जैन समाज का सर्वोत्तम आचार्य पद भी उसने प्राप्त कर लिया। समूचे जैन समाज में ही नहीं, जन समाज में भी प्रतिष्ठा प्राप्त कर ली। व्यक्ति अपने आप में अच्छा बुरा नहीं होता है, उसके कर्म ही उसे अच्छा बुरा बना देते हैं अतः बहिन तुम भी अपने इस दुराचरण का परित्याग कर दो तो सारे जहान में प्रतिष्ठा पा सकती हो। यामिनी बोली- साहब ! आपका कहना किसी दृष्टि से ठीक भी हो सकता है, लेकिन अब मैं जाऊं भी तो कहां जाऊं। प्रथम तो इस चाल की मालकिन विजया मुझे जाने नहीं देगी। क्योंकि उसने मुझे खरीदा है। दूसरी बात उससे छुटकारा पा भी जाऊं तो घर तो जा नहीं सकती। नहीं जाने के कई कारण हैं, एक तो इतने लम्बे समय से घर से भाग चुकी हूं। सभी परिचित लोग यह जानते हैं कि किसी प्रेमी के साथ भाग गई है। लेकिन जब वापस जाऊंगी तो सभी लोग तरह-तरह के प्रश्न पूछेगे और जब मेरी इस जिन्दगी का कीचड़ जनता के सामने आएगा तो वहां मेरा जीना तो दुर्भर हो जाएगा। साथ ही कीचड़ के छींटे परिवार पर भी उछलेंगे। परिवार वालों की भी बदनामी होगी। उनकी बची हुई प्रतिष्ठा भी धुल में मिल जायेगी। मेरे कारण मेरे परिवार पर संकट गहराए यह मैं नहीं चाहती, इसलिए मैं इसी हाल में रहना चाहती हूं। बहिन यामिनी ! यद्यपि तुम इस अति भोग वाली जिन्दगी में जी रही हो, फिर भी तुम्हारी सोच सूक्ष्म और उचित है। यह सही है कि तुम्हारे घर जाने से तुम्हारे एवं तुम्हारे परिवार के ऊपर कई संकट आ सकते हैं। अतः वहां जाने की आवश्यकता कहां है ? अनुराग के कहने पर यामिनी बोली- फिर कहां जाऊं, अपने भैया के घर। भैया ! कौन ? अभी तक तुमने नहीं पहचाना ? कौन भैया ? मेरा भैया तो ऐसा है कि वह अपनी जिन्दगी भी सही ढंग से चला नहीं सकता तो मेरा क्या निर्वहन करेगा? ओ हो........वहां जाने की तो बात ही नहीं रही। {148} फिर भैया कौनसा ? अरे यह सामने जो खड़ा है ? हाय आप ! क्या आप जैसे महान् व्यक्ति के घर पर मेरी जैसी नारी, नारी ही नहीं अपितु नारी जाति का कोढ़ रूप बदनाम औरत के लिए पनाह मिलेगी? क्यों नहीं मैंने पहले ही कहा था ना, व्यक्ति अपने काम से ही अच्छा बुरा बनता है। जब तुम यह काम छोड़ दोगे तो तुम्हारा जीवन भी पवित्र बनता चला जाएगा। मैं तो तुम्हारे भीतर उस महान महिला के अस्तित्व का दर्शन कर रहा हूं जो पवित्रता का नूर है तथा जन कल्याण से ओत प्रोत है। लेकिन उस पर जमाने की आई हुई है। जिस प्रकार दहकते अंगारे पर राख आई हुई है। अतः उठो साहस करो। दृढ़ संकल्प करो, छोड़ो इस गन्दगी पूर्ण माहौल को। मानव जीवन अमूल्य हीरा है, उसे नमक जीरे जैसे मामूली से कार्य के लिए बर्बाद मत करो। जीवन का विशिष्ट उल्लास तुम्हारा इन्तजार कर रहा है। उसमें समा जाने के लिए कदम आगे बढ़ाओ। मैं तुम्हारे साथ हूं। यामिनी किसी ऐश्वर्य सम्पन्न व्यक्ति के भीतर में मानवता की महकती सुगन्ध का पहली बार अहसास कर रही थी। अब तक जितने भी धनीमान लोग आए, उन्होंने यामिनी को अपने जाल में फंसा कर बर्बाद किया था। लेकिन यह पहला व्यक्ति आया, जिसने यामिनी को अपने रूप जाल में उलझाकर बर्बादी से उबारने में लगा है। अर्थात् अब तक यामिनी से रूप के पतंगिये प्रभावित हो रहे थे, लेकिन इस बार यामिनी, अनुराग से प्रभावित हो गई, वह भी उसके बाहरी रूप से नहीं उसके अन्तरंग के विशुद्ध रूप से। वह यह भी नहीं सोच सकती थी कि भौतिकता का ऐश्वर्य जिसके चारों तरफ बिखरा पड़ा है, बाम्बे जैसी माया नगरी में जिसके पास किसी भी प्रकार की कमी नहीं है, ऐसा व्यक्ति भी चरित्र की दृष्टि से इतना महान् हो सकता है। पता नहीं यह कीचड़ में कमल कैसे खिल गया है। जो कि हम जैसी नारियों का उद्धार करने के लिए इस गंदे माहौल तक चले आया। यह तो इन्सान न होकर कोई फरिश्ता है। यामिनी को इस प्रकार विचार मग्न देखकर अनुराग फिर बोला- क्यों बहिन ! क्या विचार में पड़ गई हो। क्या मेरा घर पसंद नहीं आया। अरे क्यों नहीं। आप जैसे व्यक्ति के मुंह से बहिन शब्द सुनकर ही मेरा रोम-रोम पुलकित हो उठा है। लेकिन मैं आपके योग्य नहीं हूं। {149) योग्य अयोग्य की बात छोड़ो यामिनी बहिन ! मैं तुम्हारी सब व्यवस्था कर दूंगा। तुम्हें किसी प्रकार का विचार करने की आवश्यकता नहीं है। यह तो ठीक है पर मुझे आपके आवास में रहने से काफी संकोच है दूसरी बात इससे लोगों में काफी अफवाहें उड़ सकती है। मेरे कीचड़ के छींटे आप पर भी उछल सकते हैं। इसकी मुझे कोई चिन्ता नहीं है। आपको है या नहीं, पर मुझे अवश्य है। मेरे ही उद्धारकर्ता की बदनामी हो, यह मुझे सह्य नहीं है। खैर........ यामिनी बहिन ! मैं तुम्हारी अलग स्वतन्त्र व्यवस्था कर देता हूं। मेरी दिल से तमन्ना है कि तुम यहां से बाहर निकलो और जिन्दगी को मानवता की महक के साथ खुशमिजाज माहौल में व्यतीत करो। मेरे उद्धार की आपकी इस प्रबल इच्छा को देखते हुए मेरे अन्तर मन ने भी यह दृढ़ निर्णय ले लिया है कि चाहे कैसी भी स्थिति में मैं उसका सामना करते हुए जी लूंगी। पर मुझे अब इस भोग की गन्दगी में नहीं रहना। बहुत-बहुत शुक्र गुजार। तुमसे मुझे यही अपेक्षा थी। तुम्हारा जीवन यहां से हटने के बादं शान्ति से गुजरेगा। इसकी गारंटी मेरी है। मैं आपके इस अहसान से जिन्दगी भर उऋण नहीं हो सकूँगी। लेकिन एक बात कह देती हूं कि यहां पर मेरी जैसी कई महिलाएं हैं। देश के विभिन्न स्थानों से आकर भाग्य की मारी अनचाही घोर यातनाएं सहन कर रही है। क्या....... | अनुराग शुक्ला यामिनी के कहने का तात्पर्य समझ गए। वे तुरन्त बोले-क्यों नहीं मैं। उन सबको सहयोग देने के लिए तैयार हूं। जो इस काम को छोड़कर मानवता की राह पर आगे बढ़ना चाहती हैं। तुम उन सबसे बात करो। और जो भी आने को तैयार हो उन्हें सहर्ष साथ में ले लो। अब एक सप्ताह तक तुम्हारा यही काम होगा। पूरी चाल में स्वतन्त्रता संग्राम की तरह एक आन्दोलन चलाओ। मैं भी हर रात को यहां पर आऊंगा और किसी न किसी को समझाने का प्रयास करूंगा। यदि कुछ महिलाएं इस काम से मुक्त हो जाय तो एक नैतिक चरित्र जागरण में बहुत बड़ी क्रान्ति आ जाएगी। बाहर और भीतर जहां गहरा अंधेरा छाया रहता हो वहां अनुराग शुक्ला महायोगी की शिक्षा से आलौकिक चरित्र का दिव्य प्रकाश लेकर पहुंचा {150} और यामिनी जैसी वासना से ओतप्रोत नारी के दिल में चरित्र की बुझी बत्ती को प्रज्वलित कर दिया। अनुराग शुक्ला की स्नेह भरी बातों से यामिनी के दिल में उसके प्रति भ्रात प्रेम जाग उठा। और अनुराग शुक्ला के बार-बार प्रेरित करने पर उसने भी भैया कह कर अनुराग शुक्ला को पुकारा और दोनों बाई बहिन का एक पवित्र सम्बन्ध कायम हो गया। दोनों एक दूसरे के प्रति सहोदर भाई बहिन की तरह ओतप्रोत हो गए। अनुराग शुक्ला को जाते वक्त यामिनी बोली- भैया ! आपने अपने सिर पर बहुत बड़ा दायित्व ले लिया है। तब अनुराग शुक्ला बोला- चिन्ता की कोई बात नहीं, तुम जैसी बहिन को पाकर वह सब भी पूरा होगा। यों कहते हुए रात के उतरार्द्ध में एक शुभ काम शुरू करके अनुराग ने वहां से विदा ली। दूसरे दिन फिर वह उसी चाल में भामिनी नामक युवती के कक्ष में पहुंचा तो वहां भी वहीं हाल । उसकी दशा तो और विचित्र थी। 10 वर्ष की नाबालिक लड़की थी। तब उसे उठाकर यहां लाया गया था। उसे तो पूरा यह भी मालूम नहीं कि उसके मां बाप का नाम क्या है। इतना जरूर याद था कि उसका गांव जयपुर के आसपास था। इससे यह फलित होता है कि उसका गांव राजस्थान के जयपुर शहर के पास ही है। उसे विजया ने पालपोष कर बालिक होने से पूर्व ही इस काम में डाल दिया। यद्यपि उसे यह काम बिलकुल भाया नहीं, पर उसकी नियति में यह लिखा था तो वह उस काम में लग गई थी। जब उसने अनुराग शुक्ला को देखा तो वह हतप्रभ रह गई। ऐसा नौजवान सुन्दर और आकर्षक नवयुवक उसकी चाल पर कमी नहीं आया। अब तक तो दुनियां के लोग उस पर आकर्षित होते थे, लेकिन आज वह पहली बार किसी के प्रति आकृष्ट हुई। लेकिन अनुराग शुक्ला उसकी तन की सुन्दरता के लिए वहां नहीं आया था। वह तो उसके दिल की सुन्दरता को सजाने संवारने निखारने के लिए आया था। यहां भी यामिनी की तरह पहले तो किसी भी प्रश्न का जबाब सही नहीं मिला। लेकिन ज्यों-ज्यों आत्मीयता के साथ उसने यामिनी के दिल को कुरेदना शुरू किया। त्यों-त्यों उसके दिल का जमाव पिघलने लगा। भामिनी अनुराग शुक्ला से बोली कि जब भोग सुख की चाह नहीं है तो इतने पैसे खर्च करके यहां क्यों आए। तुम्हारे अन्तरंग में दबी हुई स्वस्थ सुन्दर आत्मा के दर्शन करने के लिए। क्या कमी गिरे हुए लोगी की आत्मा भी अच्छी होती है ? {151}.

क्यों नहीं ! कांच गंदा जब तक ही रहता है, जब तक उसकी सफाई नहीं होती है। ज्योंही उसे साफ कर दिया जाता है तो वह चमकने लगता है। उसी प्रकार परिस्थितियों ने तुम्हारी आत्मा पर चरित्रहीनता की कालिख पोत दी है। उसे धोने का प्रयास करो। तुम्हारी आत्मा फिर से चमक उठेगी। तुम्हारा जीवन चांद की भांति दूसरों को भी शीतलता देने वाला बनेगा। भामिनी भी अनुराग शुक्ला के बाहरी व्यक्तित्व से भी अधिक आन्तरिक व्यक्तित्व से प्रभावित हो गई। बहिन का सम्बोधन उसे भी बहुत भाया। वह भी अनुराग शुक्ला की प्रेरणा पाकर वहां से मुक्त होने को तैयार हो गई। उसे भी अनुराग शुक्ला ने यामिनी की तरह समझाया और स्वतन्त्र स्थान पर रखने का आश्वासन देकर उससे भी विदा ली। तीसरी रात अनुराग शुक्ला फिर किसी कोठे पर पहुंचा। इस बार तह निलिमा नामक नवयुवती से मिला। वह कुछ तेज तर्रार थी। साथ ही भोगी जीवन में आसक्त होकर आधुनिकता में रहने वाली थी। जब उससे अनुराग शुक्ला ने नाम पूछा तो उसने पहले उसे घूरा फिर रूखे व्यवहार के साथ इतना ही कहा कि निलिमा। अनुराग शुक्ला ने आगे पूछा कि तुम कहां की हो? इस बार वह भड़क उठी और बोली कि दिख नहीं रहा मैं कहां की हूं। जहां रहती हूं वहीं मेरा घर है। अनुराग शुक्ला को समझते देर नहीं लगी कि इसे समझाने के लिए धैर्य और सहनशीलता की आवश्यकता है। उसने कहा-ओ हो निलिमा बहिन ! तुम यहीं की हो तो तुम्हारे पिता का क्या नाम है ? निलिमा-शटअप तुम्हें मेरे अन्तरंग जीवन में झांकने की कहां आवश्यकता है। अपने काम से मतलब रखो। नहीं तो रास्ता नापो। अहो ! तुम नाराज क्यों हो रही हो। मैंने तुम्हें अपनी बहिन माना है। ऐसी स्थिति बहिन के सुख-दुःख का ख्याल रखना हर भाई का नैतिक कर्त्तव्य हो जाता है। लेकिन मैं तुम्हारी बहिन नहीं। तुम्हारे मानने या न मानने से क्या फर्क पड़ेगा बहिन तो बहिन ही रहेगी। तुम जिस भारत माता की गोदी में जन्मी हो मैं भी उसी की गोद में जन्मा हूं। अतः एक सहोदर होने से भाई बहिन हो ही जाते हैं। मेरी इच्छा है कि तुम्हारे जीवन का विकास हो। {152} निलिमा- वह तो हो ही रहा है। अनुराग शुक्ला – हां हां यह तो मैं देख ही रहा हूं। लेकिन मैं चाहता हूं कि ऐसा विकास हो कि सारा जहान देखे। निलिमा- हां हो लिया-ऐसी लाइफ में तो ऐसा विकास। जहां देह शोषण एवं अर्थ प्रधान ही जीवन हो, वहां खान-पान, वेश-विन्यास के अलावा अन्य विकास संभव नहीं। अनुराग को तुरन्त बात समझ में आ गई कि निलिमा यह बात तो अच्छी तरह जानती है कि इस वारांगना की जिन्दगी में उच्चस्तर का विकास नहीं हो सकता और इसके दिल के किसी कोने में यह बात जरूर जमी हुई है कि विकास तो मेरा भी ऊंचे स्तर का हो। बस अनुराग शुक्ला को निलिमा के भीतर में उतरने का सूत्र मिल गया। उसने कहा- बहिन ! मैं तो यही चाहता हूं कि तुम्हारा उच्चस्तर का विकास हो। चाहे वह देश की राजनीति में हो, अर्थ निति में या जनकल्याण में हो। लेकिन यह संभव कैसे हो, मेरे चारों और संगीन पहरा है। मेरे पास इस काम के अलावा कोई काम नहीं है। अनुराग बोला यह मेरी जिम्मेवारी है। मैं तुम्हारी सारी व्यवस्था कर दूंगा। तुम्हें इस सम्बन्ध में किसी प्रकार की चिन्ता की आवश्यकता नहीं रहेगी। परन्तु मुझे यह संभव नजर नहीं आता कि यह सब कैसे होगा ? अनुराग-आखिर क्यों ? निलिमा- वह इसलिए कि मेरी मां ही इस अड्डे की मालिक है- विजया। वह मुझे कमी भी इस पेशे से मुक्त नहीं होने देगी। अनुराग को एक बहुत बड़ा सूत्र मिल गया अपने मिशन को आगे बढ़ाने का। उसने सोचा अगर निमिला सुधर जाती है तो यह पूरा अड्डा सुधर जाता है। उसने निलिमा से कहा- बहिन ! जरा सोचो। यह भी कोई जिन्दगी है। माना कि तुम विजया की बेटी हो। लेकिन मां की तरह बेटी भी बदस्तर की जिन्दगी जिए। यह कैसे संभव है। हर माता-पिता यह चाहते हैं कि हम कैसे भी जी लें पर हमारी औलाद अच्छी जिन्दगी जिए, सुख से जिए। सम्पन्नता प्राप्त करे। वैसे ही तुम्हारी मां विजया भी क्यों नहीं चाहेगी कि मेरी बेटी भी दलदल से निकलकर सामाजिक प्रतिष्ठा प्राप्त करे। जहां तक विजया के आमदनी का प्रश्न है, यदि वह इस काम को छोड़ देती है तो मैं {153} उसकी सारी व्यवस्था कर देता हूं। तुम मेरी बहिन हो मैं तुम्हारा कल्याण चाहता हूं। निलिमा पर अनुराग शुक्ला की बातों का चमत्कारिक असर हुआ। उसने कहा चलो मैं आपकी बात मान भी लूं और यह धन्धा छोड़ भी दूं तो आप मेरी क्या व्यवस्था करेंगे। कैसे मैं अपनी जिन्दगी यापन करूंगी। अनुराग बिलकुल सही बात कही तुमने। तुम चाहो तो मेरे आफिस के कार्यों में लग सकती हो। बहुत सारे काम हैं। जैसी तुम्हारी योग्यता होगी? वैसा काम मिल जाएगा। या चाहो तो हेण्डी क्राप्ट (Handi Craft) का एक स्वतन्त्र व्यापार खोला जा सकता है और इसका हुनर सिखने के बाद तुम इसका संचालन स्वयं कर सकती हो। तुम्हारे साथ और भी बहिने काम कर सकती है। हाथ से बनी वस्तुओं की विदेशों में भारी खपत है। अतः माल का एक्सपोर्ट किया जा सकता है जिससे अच्छी कमाई हो सकती है। वह सब तुम्हारी व तुम्हारे साथ काम करने वालों की होगी। मैं तो चाहता हूं कि तुम ऐसा माहौल बनाओ कि यहां से अन्य लड़कियां भी इस धन्धे को छोड़े और अपनी जिन्दगी में रचनात्मक कार्य करके आगे बढ़े। जब तुम्हारा जीवन पूरी तरह से चरित्र एवं नैतिकता के धरातल पर आगे बढ़ने लगेगा तो हमारी पूरी कोशिश होगी कि तुम अच्छे खानदानी घरानों की बहुएं बन सको। तुम्हें सामाजिक प्रतिष्ठा मिल सके। और भी कोई खातिरी करना हो तो कर सकती हो। निलिमा- नहीं नहीं ! आप जैसे महान् व्यक्ति पर सन्देह करना ही पाप होगा। इस बॉम्बे की माया नगरी में हमारे द्वार पर आने वाला कोई भी व्यक्ति हमारे सुख-दुःख सुनने का इच्छुक नहीं होता। वे रूप के पतंगें देह का शोषण करके चले जाते हैं। आप पहले व्यक्ति आए जिन्होंने हमारी भीतरी जिन्दगी में झांकने का प्रयास किया। यद्यपि मैं आपकी बहिन बनने लायक नहीं हूं। लेकिन जब आपने बहिन मान ही लिया है तो यह लीजिये- यों कहते हुए उसने अपनी साड़ी फाड़ी और एक टुकड़े से अनुराग के रक्षा सूत्र बांधकर कहा- भैया ! मेरी जिन्दगी का कोई भी दाग आपको न लगे। लोग यह न कहे कि अनुराग की बहिन कैसी है ? मैं आज से इस कुकर्म का सदा सदा के लिए त्याग करती हूं और भैया आज के बाद मेरा कोई भी आचरण चरित्रहीन नहीं होगा। अब मैं आपके मिशन को आगे बढ़ाने के लिए सारे चकले में अनुकूल वातावरण बना दूंगी। {154} अनुराग शुक्ला को निलिमा में हुए परिवर्तन से वो खुशी हुई जो कि एक-एक दिन में करोड़ों रुपये कमाने में भी नहीं हुई। उसने कहा- बहिन ! आज तुमने मुझे बहुत अधिक खुशी दे दी है जिसे मैं व्यक्त नहीं कर सकता हूं। अब मैं चलता हूं पर यह बतलाओ कि मैं वापस कब आऊं। निलिमा- भैया ! बहुत जल्दी। अब यह काम कल से प्रारंभ समझो। आज मंगलवार है आप अगले सण्डे (Sunday) तक पहुंच जायं। अनुराग शुक्ला ने जाने से पहिले अपना एड्रेस (Address) उसे दे दिया। साथ ही 2 लाख रुपये नगद दिया। ताकि कहीं भी किसी को समझाने में रुपयों की आवश्यकता पड़ जाय तो दिये जा सके। निलिमा ने बहुत मना किया पर अनुराग नहीं माना। दूसरे दिन सवेरे ही निलिमा ने अपनी मम्मी विजया के सामने बात छेड़ दी। मम्मी ! मेरा मन इस धन्धे में नहीं लगता। विजया, एकदम हतप्रभ रह गई, क्या बात हुई निलिमा अचानक ऐसा कैसे बोल गई। आज तक इसने कभी अरुचि नहीं दिखलाई। आज ऐसा क्या हुआ ? विजया बोली- बेटी ! ऐसी क्या बात हुई जो इस काम से तेरी रुचि खत्म हो गई। निलिमा- मम्मी ! जरा सोचो। यह भी कोई जिन्दगी है जो चंद चांदी के टुकड़ों के पीछे तन को निचोड़ता चला जाय। जैसे कि मेरे कोई दिल है ही नहीं। मैं कोई जड़ मशीन तो हूं नहीं कि जिधर चाहे उधर लगा दिया। मेरे जिगर में भी एक दिल धड़क रहा है। मुझे किसी भी आदमी का अपने जिस्म पर हाथ लगाना बिल्कुल पसंद नहीं। विजया- अरे निलिमा आज तुम्हारा दिमाग कैसे फिर गया। कैसी बिन सिर पैर की बातें करने लगी हो। मम्मी ! मैं अब तक बिन सिर पैर की जिन्दगी गुजार रही थी। लेकिन मैंने जिन्दगी जीने का कुछ सार समझा है। अतः अब मैं किसी भी स्थिति में देह व्यापार करने को तैयार नहीं। विजया बोली- बेटी ! ऐसा नहीं कहते अपने लिए तो यही धन्धा है। इसके बिना तो अपन कुछ कर ही नहीं सकते। बिना देह व्यापार के तो अपने को पेट भरना भी मुश्किल हो जाएगा। निलिमा- बोली -मम्मी ! ऐसा कुछ नहीं है, मेहनत मजदूरी करके पेट तो भर ही सकते हैं। पेट भरने के लिए ऐसा जघन्य कर्म करने की आवश्यकता नहीं रह जाती। यह बात अलग है कि मेहनत से की गई कमाई {155} - से ऐसी शान-शौकत नहीं मिल सकती। पर पाप पूर्ण कमाई से मिली शान- शौकत कोई महत्त्व नहीं रखती। कोई भी भले घराने की महिला अपने से मिलना पसंद नहीं करती। बड़े-बड़े सेठ साहूकार भले रात्रि में यहां लुके-छिपे आ जाते। पर दिन में तो वे इस रास्ते से निकलना भी पसंद नहीं करते। हमारी छाया भी उनकी सामाजिक प्रतिष्ठा खत्म करने वाली बन जाती है तो फिर चंद रुपयों के लिए इस जिन्दगी को इस प्रकार बर्बाद करना मेरी दृष्टि में ठीक नहीं है। विजया- पर मुझे यह समझ में नहीं आया कि यह सब ज्ञान आज ही तुमको समझ में कहां से आ गया। किसी साधु सन्यासी का उपदेश सुनने चली गई क्या ? लेकिन मैंने तो तुझे कहीं जाते देखा नहीं। फिर पता नहीं किसने तुम्हारा दिमाग घुमाया है। निलिमा- मम्मी ! तुम इस चक्कर में क्यों उलझती हो कि मुझे किसने समझाया। तुम तो यह समझने की कोशिश करो कि यह धन्धा ठीक नहीं है। यह भी साफ सुन लो की अब यह धन्धा मैं नहीं करने वाली। विजया- पर अपना काम कैसे चलेगा? निलिमा- मम्मी ! तुम यह चिन्ता मेरे ऊपर छोड़ दो। मैं बिना देह व्यापार के भी घर धंधा चला लूंगी। विजया- अगर ऐसा है तो मुझे ऐसे धन्धे को छोड़ने में कोई एतराज नहीं होगा। मम्मी के मुख से ऐसी बात सुनकर निलिमा को बड़ी खुशी हुई। अब वह अन्य महिलाओं को भी समझा कर इस रास्ते लाना चाहती थी। उसने यामिनी, भामिनी जो उसकी अन्तरंग सखियां थी। सबसे पहले उन्हीं से बात करने की सोची। मध्यान्ह में लंच के बाद मकान के एक कमरे में बैठी तीनों बातें कर रही थी। इसी बीच निलिमा ने ही बात छेड़ दी, यामिनी, भामिनी भी बात करना चाहती थी। पर उन्हें यह संकोच था कि निलिमा उनकी बात मानेगी भी या नहीं ? क्योंकि वह विजया की बेटी थी। निलिमा का बात मानने का मतलब था कि उसका सारा व्यापार ठप्प हो जाना। किन्तु यहां तो निलिमा ने ही अपनी तरफ से ही बात छेड़ दी। वह बोली- यामिनी क्या बतलाऊं अब इस देह व्यापार से मेरा मन पूरी तरह उचट गया है। मैंने तो मम्मी से आज बोल दिया कि आज के बाद मैं यह धंधा बिल्कुल नहीं करूंगी। {156} इसी बीच भामिनी बोली- फिर मम्मी ने क्या कहा ? निलिमा- वह क्या कहती। पहले तो मम्मी ने मुझे विभिन्न तरीके से समझाने का प्रयास किया। लेकिन जब मैं अपनी बात पर अटल रही तो वह भी झुक गई। और उसने मान लिया कि अगर तुम्हारी ऐसी इच्छा है तो छोड़ दो इस व्यापार को। पर कमाई कैसे होगी ? निलिमा- तब मैंने कहा कि यह मैं विश्वास दिलाती हूं कि हम दूसरा धन्धा करके भी अपना गुजारा करने की स्थिति में आ जाएंगे। तब वह इस विश्वास पर मान गई। लेकिन यामिनी, भामिनी तुम दोनों भी मेरी सखियां हो। मैं चाहती हूं कि तुम दोनों भी इस धन्धे को सदा सदा के लिए तिलांजली दे दो। निलिमा के मुख से यह बात सुनकर यामिनी, भामिनी को ऐसा लगा मानों उसने उनके दिल की बात कह दी। वे बोली- सखी तुमने तो बहुत अच्छी बात कह दी, हम दोनों तुम्हारे साथ है जो भी तुम कहोगी। आज से ही हम इस व्यभिचार-कदाचार को छोड़ते हैं। हम तो सब तुम्हारी मम्मी विजया के कारण कुछ कर नहीं पा रहे थे। लेकिन अब जब तुम्हारा इतना बड़ा संबल मिला है तो हम इन्सानियत की जिन्दगी जीने के लिए पूरी तरह तैयार हैं। फिर क्या था निलिमा, यामिनी, भामिनी ने तीन दिन में तो पूरे चकले की करीब 20-25 गणिकाओं को यह धंधा छोड़ने के लिए तैयार कर लिया। सभी महिलाएं इस धंधे से परेशान अवश्य थी। क्योंकि एड्स जैसी भयंकर बीमारी भी इसी से फैल रही थी। लेकिन अन्य धंधा न होने से विवश थी। लेकिन निलिमा का आश्वासन भरा आहान पाकर सब की सब गणिकाएं यह कुकर्म छोड़ने के तैयार हो गई। रविवार को अनुराग शुक्ला ठीक 10 बजे सवेरे उस चकले पर पहुंचे तो उसे यह देखकर बड़ा आश्चर्य हुआ कि वहां का तो वातावरण ही एकदम परिवर्तन हो चुका है। जो भड़कीले कामोत्तेजक चित्रों से भरा मकान था, अब वहां सीता-सावित्री, दमयन्ती आदि शीलवती नारियों के चित्र लगे हैं। भक्ति रस से भरे प्रभु के गीत गाये जा रहे हैं। सभी गणिकाएं आज शीलवती सन्नारियां बन चुकी है। यह सब देखकर तो अनुराग शुक्ला को भी रोमांच हो आया। उसका दिल प्रसन्नता से भर गया। {157} निलिमा, यामिनी, भामिनी ने उसका जोरदार स्वागत किया। सभी के सामने बतलाया कि यह वही होनहार नवयुवक हमारे लिए एक फरिश्ता बनकर आया है। इन्हीं की प्रेरणा से आज हम सबके जीवन में यह अदभुत परिवर्तन आया है। लेकिन अनुराग शुक्ला ने उसी वक्त कहा- कि यह कृपा मेरी नहीं होकर उस महायोगी की है जिसके कारण से मेरे जैसी पतित आत्मा में परिवर्तन आया था। और वह मैं आपके पास लाया था। मुझे बहुत-बहुत प्रसन्नता है कि आप सबने बहुत जल्दी ही अपने में अदभुत परिवर्तन कर लिया है। अनुराग शुक्ला के पास में पैसों की कतई कमी नहीं थी। उसने उसी वक्त बोरीवली में चार फ्लेट (Flate) उन गणिकाओं के लिए जो अब शीलवती सन्नारियां हो चुकी थी, खोल दिये थे। उनके लिए खाने पीने रहने-सहने के लिए समुचित व्यवस्था कर दी। इसके अतिरिक्त हाथ खर्च के लिए सभी को 50-50 हजार रुपये दे दिये। अनुराग शुक्ला ने उन्हें काम कराने हेतु हेण्डीक्राफ्ट का काम प्रारंभ किया। 5 कारीगर बुलाए गए। जिन्होंने उन महिलाओं को यह काम सीखाना प्रारंभ किया। 6 महीने में सभी महिलाएं काम में दक्ष बन गई। हाथ से निर्मित वस्तुओं का विदेशों में काफी मूल्यांकन किया जाता है। ऐसी स्थिति में उन वस्तुओं का विदेश विक्रय प्रारंभ किया गया। इन सब के पीछे अनुराग शुक्ला के 2 करोड़ रुपये खर्च हो गए थे। पर उसके मन में जरा भी गम नहीं था, बल्कि इन महिलाओं के सुधर जाने से उसे भारी सगुन मिल रहा था। 3 वर्ष में तो निलिमा, यामिनी, भामिनी सभी महिलाएं अपने व्यापार में दक्ष हो गई थी। अब वह स्वयं एक्सर्पोट आदि का कार्य संभालने लगी। कमाई बहुत अच्छी होने लगी। तब सभी ने मिलकर अनुराग शुक्ला का जितना पैसा लगा था, वह बड़े आग्रह पूर्वक लौटा दिया। लेकिन अनुराग शुक्ला ने यह पैसा अपने पास न रखकर उसका जनहित के लिए एक ट्रस्ट बना दिया। जिससे अन्य लोगों को भी सहयोग दिया जा सके। महाराष्ट्र की नहीं अपितु देश-विदेश की पत्र-पत्रिकाओं में तथा दूरदर्शन ने भी एक जन उद्धार के पवित्र कार्य को भारी कवरेज किया। अनुराग शुक्ला की शोहरत पूरे देश में फैल गई। सभी लोग उसे आदर की दृष्टि से देखने लगे। पर वह अपने आप में पूर्ण विनम्र था। क्योंकि उसे यह लग रहा था कि यह श्रेय मुझे नहीं होकर उन निष्पृह महासाधक-महायोगी को है। जिसने मुझे सही रास्ता दिखलाया। उन्हीं की कृपा से मैं आगे बढ़ रहा हूं। सच में श्रेष्ठ व्यक्ति कमी किसी का उपकार नहीं भूलते। {158} -19- । अनुराग शुक्ला का नाम बाम्बे में ही नहीं पूरे महाराष्ट्र में प्रसिद्ध हो गया था। हर प्रबुद्धजीवी व्यक्ति ने अनुराग शुक्ला के कार्य की प्रशंसा की । वैसे भी अनुराग शुक्ला ने ऐसे अनेक कार्य सम्पन्न किये, जो मानवता के भाल को ऊपर उठाने वाले बने। अनुराग शुक्ला ने अब तक जन-उद्धार के कार्यों में 50 करोड़ रुपये लगा दिये थे। जन-उद्धार का कार्य, अनुराग शुक्ला की जिन्दगी में व्यापार की तरह ही मुख्य धारा के साथ जुड़ गया था। जन-उद्धार के कार्य को तेजी के साथ सक्रिय बनाने के लिए प्रशासन के सहयोग की आवश्यकता अधिक लगने लगी। तब अचानक अनुराग शुक्ला के दिमाग में एक विचार आया कि क्यों न महराष्ट्र में एक नई पार्टी बनाई जाय और पूरे महाराष्ट्र में उसके उम्मीदार खड़े किये जाय तो यह कार्य बड़ी तेजी के साथ आगे बढ़ सकता है। विचार को क्रियान्वयन करने की योजना बनने लगी। यद्यपि नई पार्टी बनाना सरल कार्य नहीं था। पर जिसके संकल्प में मजबूती हो उसके लिए कहीं कोई कठिनाई नहीं रहती। अनुराग शुक्ला ने अपनी सोच के अनुसार कार्य करना प्रारंभ कर दिया। पहले तो "आपकी अपनी पार्टी' के नाम से रजिस्ट्रेशन करवा लिया गया। उसके बाद उसका व्यापक प्रचार किया जाने लगा। यद्यपि विधान सभा चुनाव होने में अभी एक वर्ष बाकी था। पर पार्टी का नाम जन-जन तक पहुंचाने के लिए अनुराग शुक्ला और उसके सहयोगी पूरी तेजी के साथ लग गए। गांव-गांव नगर-डगर में पहुंच कर पार्टी का नाम, चिह्न जुड़े हुए हाथ उद्देश्य बताने लगे। महाराष्ट्र के कोने-कोने में प्रचार कर दिया गया। साधारण जनता का आकर्षण बढ़ने लगा। ज्यों-ज्यों इलेक्शन (Election) का समय नजदीक आता गया त्यों-त्यों प्रचार भी तेजी से बढ़ने लगा। नई पार्टी को उभरते देखकर अन्य पार्टियां भी चकरा गई। पर अनुराग शुक्ला अपनी गति से पार्टी का प्रचार बढ़ा रहा था। इलेक्शन (Election) की तारीख की घोषणा होने के साथ ही अनुराग शुक्ला ने आपकी अपनी पार्टी के 228 केंडीडेट घोषित कर दिये। आश्चर्य की बात यह थी कि सब के सब केंडीडेट (Candidate) करोड़पति अरबपति से नीचे नहीं थे। एक भी गरीब को टिकिट नहीं दिया गया। उसका कारण स्पष्ट किया गया यदि गरीब को टिकिट दिया जाता है तो वह जीतने पर अपना घर भरने की कोशिश करेगा। । {159) वैसी स्थिति में वह स्वस्थ प्रशासन नहीं चला सकता। जनता को सही न्याय नहीं दे सकेगा। जो धनवान व्यक्ति है उसका आर्थिक दृष्टि से पेट भरा होगा। अतः उसका पैसा कमाने का कोई लक्ष्य नहीं होगा। वह तो नाम कमाना चाहेगा। और उसके लिए वह अच्छे-अच्छे जनकल्याण के आयोजन चला सकेगा। अतः वोट श्रीमंत को ही दिया जाय ताकि वह देश का कल्याण कर सके। दूसरी बात हर केंडीडेट (Candidate) से 5-5 लाख रुपये, जनकल्याण के लिए पार्टी ने पहले ही ले लिए। कुछ मिलाकर पार्टी ने 10 करोड़ रुपये एकत्रित कर लिए। पार्टी के जीतने के साथ ही ये 10 करोड़ रुपये जन कल्याण में लगा दिये जाएंगे। जब साधारण जनता ने सारी बात समझ ली तो उनका आकर्षण पार्टी के लिए निरन्तर बढ़ता चला गया। अन्त में वोटिंग (Voting) हुई। 228 सीटों में से 205 सीटों पर "आपकी अपनी पार्टी के केंडिडेट जीत गए। यह सबको सुखद आश्चर्यकारक लगा। पहली बार ही पार्टी प्रचण्ड बहुमत के साथ उमर कर सामने आई। पार्टी ने महाराष्ट्र में अपनी सरकार बनाई और उसके नेता अनुराग शुक्ला को सर्वानुमति से पार्टी का मुख्यमंत्री चुना गया। उसके बाद मंत्री मण्डल का विस्तार हुआ। करीब 35 व्यक्तियों को मंत्री बनाया गया। उन प्रत्येक मंत्रियों से जनकल्याण के लिए पांच-पांच लाख रुपये और लिए गए। इस प्रकार 2 करोड़ रुपये और एकत्रित किये गए। सारी सरकारी मिशनरी को एलर्ट कर दिया गया। कोई घूस लेता हुआ पाये जाने पर उस पर सख्त से सख्त कार्यवाही की जायेगी। हर मंत्री अपने विभाग की देखभाल अच्छी तरह करने लगा। हर विधायक अपने क्षेत्र की समस्या का समाधान करने लगा। जहां जिस काम की कमी पाई गई उसे तुरन्त पूरा किया जाने लगा। हर विभाग में ईमानदारी आने से सरकार को करोड़ों रुपये की इन्कम (Income) बढ़ती चली गई। सब के सब रुपये जनकल्याण में लगने लगे। कहीं भी भ्रष्टाचार नहीं पनपे इसके लिए पूरी जागरूकता रखी गई। यही नहीं किसी के साथ अन्याय हो रहा हो तो उसे न्याय दिलाया जाने लगा। कोई केश कोर्ट में लम्बित नहीं करने दिया जाएगा। शहर एवं गांवों में नैतिकता एवं चरित्र के विकास के प्रति सख्त आध्यादेश जारी किये गए। 3 साल के प्रशासन में ही महाराष्ट्र की काया पलट गई। लोगों को रामराज्य की याद आने लगी। सुना था रामराज्य में अमन चैन की बंशी बजती थी। लेकिन यहां अनुराग के शासन काल में जनता को शान्ति का अनुभव {160} हो रहा था। मुख्यमंत्री अनुराग शुक्ला के दूर-दूर तक गुण गाये जाने लगे। मानों भारत के एक प्रान्त महाराष्ट्र में स्वर्ग उतर आया हो। स्कूल, कॉलेज वाचनालय, अनाथालय, वृद्धाश्रम आदि का विकास किया गया। सड़कों की व्यवस्था सही की गई। बगीचों से प्रान्त की शोभा निखारी गई। मानवीय सभ्यता नैतिकता के आदर्श को ऊपर उठाया गया। मीडिया से हो रहे गलत प्रचार को रोका गया। गुंडागर्दी को तो जड़ से उखाड़ दिया गया। अनुराग शुक्ला को प्रान्त में अमन चेन देखकर शांति और सुख मिलने लगा। उसे लगा अब कुछ जनकल्याण का काम हो पाया। उसके मन में रह-रह कर महायोगी का स्मरण आता रहता था। उसको लगता था कि उनका आशीर्वाद हरपल उसके साथ है। जिससे वह जिस किसी काम में हाथ डालता है, वह उसमें पूरी तरह सफल हो जाता है। अब उसे एक बार महायोगी के दर्शन की प्रबल भावना पैदा हुई सोचा अब शीघ्र ही उनके पावन दर्शन करने चाहिये। . {161) -20- मुख्यमंत्री अनुराग शुक्ला ने वित्तमंत्री चैतन्यसिंह से कहा कि मैं तो दो दिन के लिए राजस्थान जाना चाहता हूं। वित्तमंत्री बोला- क्या राजस्थान घूमना है या फिर अपनी जन्म भूमि पर किसी से मिलने जाना है। यार ! ये दोनों ही काम नहीं है। वित्तमंत्री बोले- तो फिर ऐसा क्या काम है जो आप राजस्थान जाना चाह रहे हैं। मुख्यमंत्री- एक बहुत ही विशिष्ट कार्य है। क्या राजस्थान के मुख्यमंत्री भवानीसिंह ने बुलाया है। मुख्यमंत्री- अरे यह सब कुछ नहीं है। वित्तमंत्री तो फिर क्या काम है ? मुख्य मंत्री- सुनो मैंने जानकारी की है कि समता साधक महायोगी उदयपुर विराज रहे हैं। उस पावन पुरुष के दर्शन करने जाना है। वित्तमंत्री - इतने बुद्धिमान होकर भी आप किस चक्कर में पड़े हो। सन्यासियों में क्या पड़ा है ? ये सब नशा करने वाले होते हैं। सुल्फा, चरस, शराब पीने वाले होते हैं। रुपये पैसे एकत्रित करके मठ बनाकर ऐश आराम करते हैं। समाज का भारी शोषण करते हैं। मुख्यमंत्री- तुम्हारा कहना भी ठीक है मैं भी यह चाहता हूं कि शोषण बंद हो। इसके लिए गृहमंत्री नटवरसिंह को निर्देश दे चुका हूं कि महाराष्ट्र में जितने मन्दिर, मस्जिद, गिरिजाघर, गुरुद्वारा आदि धर्म स्थान है, उन सबकी लिस्ट बनाई जाय। उनका क्या ट्रस्ट है, क्या आय है। इन सबका हिसाब व्यवस्थित रूप से तैयार किया जाय। लेकिन मैं जिस महायोगी के लिए कह रहा हूं वे ऐसे नहीं है। बल्कि सबसे विलक्षण व्यक्तित्व है उनका। यों समझ लो कलियुग में सतयुग का अवतार है। इतने असाधारण साधनशील होकर भी साधारण से साधारण परिवेश में जीने वाले हैं। वित्तमंत्री - ऐसा क्या अदभुत व्यक्तित्व है, उनका ? वित्तमंत्री का भी आकर्षण बढ़ने लगा। मुख्यमंत्री- मैं उनके नजदीक से सम्पर्क में आया हुआ हूं, आज से 15 वर्ष पूर्व से अपने बंगले में पधारे थे चाहता तो मैं भी नहीं था, पर मेरी माता {162} है । । । 1 जी व बहिन के आग्रह पर उन्हें घर पर आमंत्रित किया। जब वे पधारे तो उनके सानिध्य में रहा। उनका समीप्य ही अदभुत शान्ति देने वाला बना। उनके उपदेश ने मेरे सोच की दिशा ही चेन्ज (Change) कर दी। जिन्दगी में आमूल क्रान्ति खड़ी हो गई। आज जितने भी जनकल्याण के काम मेरे द्वारा हुए हैं। यह नई पार्टी जो खड़ी करके चुनाव जीता हूं इन सबका श्रेय उस महायोगी को जाता है। क्या तुम्हें आश्चर्य नहीं होता कि प्रथम बार तो पार्टी बनाई और चुनाव लड़कर प्रचंड बहुमत से जीत भी गए। इन सबके पीछे महायोगी जी का आशीर्वाद ही काम कर रहा वित्तमंत्री- जब तो बड़ा अदभुत व्यक्तित्व है उनका फिर भी लोग उन्हें जानते भी नहीं। लोग तो पता नहीं कहां-कहां जाते रहते हैं। लेकिन ऐसे महायोगी का नाम तो हमने सुना नहीं। मुख्यमंत्री- तुम्हारी बात बिलकुल ठीक है। वे इस प्रसिद्धि से बहुत दूर हैं। वे एक सच्चे साधक हैं। प्रसिद्धि ही किसी की करवानी हो तो बड़े आराम से हो जाती है। आजकल तो विज्ञापन का युग है। विज्ञापन से रद्दी से रद्दी माल भी बिक जाता है। तो अच्छी चीज तो बिकेगी ही। पर वे महायोगी ऐसे प्रचार-प्रसार से बहुत दूर हैं। वे अपनी ही साधना में जीने वाले महासाधक हैं। उनके पावन दर्शन करने से तो इस भव में भी अभी शान्ति मिलती है। जैसे गर्मी से तपे व्यक्ति को ए.सी. में जाने से शान्ति मिलती है। उसी प्रकार संसार के दुःखों से उद्विग्न व्यक्ति को उनके पास जाने से शान्ति मिलती है। वे इतने बड़े महायोगी होने पर भी नंगे पैर और नंगे सिर रहते हैं। देशभर की सारी यात्रा पैदल करते हैं। पैसा टका कुछ भी नहीं रखते हैं। न कोई मकान, न कोई संस्था। भोजन भी अनेक घरों से थोड़ा-थोड़ा लाकर सन्तुष्टि कर लेते हैं। वे दुनियां से लेते बिलकुल स्वल्प है पर देते बहुत अधिक हैं। आज के युग में पेट की खुराक से मस्तिष्क की खुराक ज्यादा महत्त्वपूर्ण है। मस्तिष्क में तनाव आने पर कई बार व्यक्ति को ब्रेन हेमरेज (Brain Hemrage) या अन्य कोई गंभीर बीमारी हो जाती है। कई बार तो वे कोमा में भी आ जाते हैं। ऐसी स्थिति में उनका सारा शरीर व्यर्थ हो जाता है। अतः मस्तिष्क को स्वस्थ रखना जरूरी है। इसके लिए शुद्ध वैचारिक खुराक जरूरी है। उसे पाने के लिए ऐसे महायोगी के सानिध्य में जाना चाह रहा हूं। जो कि हिलस्टेशन से भी ज्यादा महत्त्वपूर्ण है। हिल स्टेशन पर तो केवल शरीर को हवा मिलती है। पर यदि मन का सन्तुलन सही नहीं है तो वह हवा {163} . भी कुछ कारगर नहीं होती। वित्तमंत्री-आपने तो अच्छा समझा और समझाया। यदि आपकी स्वीकृति हो तो हम भी आपके साथ चलना चाहते हैं। मुख्यमंत्री- जरूर चलो ! मैं तो चाहता हूं कि आप लोग भी उनका सानिध्य प्राप्त करें तो आपके जीवन के विकास के साथ ही आपके माध्यम से देश का विकास भी होगा। वित्तमंत्री ने महाराष्ट्र की सारी मिनिस्ट्री को मुख्यमंत्री के प्रोग्राम से अवगत कराया। जिसे सुनकर सब के सब मिनिस्ट्री विथ (With) फैमली (Family) तैयार हो गए। स्पेशल (Special) हवाई जहाज की व्यवस्था की गई। राजस्थान सरकार को पता चला कि महाराष्ट्र की सारी मिनिस्ट्री उदयपुर आ रही है तो उन्हें भी आश्चर्य हुआ। फिर पता चला कि वहां पर किसी पहुंचे हुए महायोगी के सतसंग का लाभ लेने आ रहे हैं, तब और भी अधिक आश्चर्य हुआ। इस कलियुग में भी जहां चरित्र एवं नैतिकता का पतन निरन्तर होता जा रहा है, वहां धर्म और अध्यात्म के प्रति रुचि तो आकाश कुसुम की तरह असंभव है। पर यहां तो संभव हो रहा है लगता है महायोगी निश्चय ही बहुत सिद्धि सम्पन्न साधक है। राजस्थान का मुख्यमंत्री भवानीसिंह सोचने लगा, लगता है उसी महायोगी के आशीर्वाद का ही परिणाम है कि महाराष्ट्र में जो पार्टी बनी। वह पहली बार तो बनी और पहली ही बार चुनाव में प्रचंड बहुमत से चुनाव में जीतकर सरकार भी बना ली। सरकार बनाने के बाद जन उद्धार का काम जितना इस समय महाराष्ट्र में हो रहा है, उतना अन्य प्राप्त में नहीं है। इसके साथ ही भ्रष्टाचार भी जड़मूल से उखड़ता जा रहा है। जनता चैन की बंशी बजा रही है। पार्टी की लोकप्रियता निरन्तर बढ़ती जा रही है। इस चुनाव में 285 में से 205 सीटें आई है लेकिन लगता है अगले चुनाव में तो शतप्रतिशत सीटें इसी पार्टी की आएगी। क्योंकि पब्लिक आकर्षण इसके जनकल्याण के कार्यों के कारण निरन्तर बढ़ रहा है। जबकि देखा यह जाता है कि जो पार्टी जीत जाती है, सरकार बना लेती है, उसके बाद उसका आकर्षण निरन्तर घटता जाता है। और अगले चुनाव में ज्यादातर हार जाती है। पर इस पार्टी का आकर्षण तो निरन्तर बढ़ता जा रहा है। भवानीसिंह- सोचने लगे- जिस महायोगी के लोग दर्शन करने के लिए महाराष्ट्र से आ रहे हैं। ऐसे महायोगी का मेरे प्रान्त में रहते हुए मैं उनके दर्शन नहीं कर पाया। उसने तुरन्त निर्णय लिया कि मुझे भी उदयपुर जाना {164} है। महाराष्ट्र के मंत्रीमण्डल का स्वागत करना है साथ ही महायोगी के दर्शन भी। मुख्यमंत्री- भवानीसिंह के साथ 6 मंत्री और तैयार हो गए। सभी पहुंचे उदयपुर, सबसे पहले डबोक एयरपोर्ट पर। वहां महाराष्ट्र के मंत्रियों का स्वागत किया। उनकी सभी प्रकार से उचित व्यवस्था की। उसके बाद सबके सब महायोगी के दर्शनार्थ उनके धर्म स्थान पहुंचे। महायोगी जी, श्वेत साधारण परिधान में एक काष्ट के पाट पर विराजमान थे सभी ने उस अलौकिक महापुरुष को श्रद्धा से प्रणाम किया। सभी को अनिर्वचनीय शान्ति की अनुभूति हुई। सभी शांतभाव से बैठ गए। कुछ ही देर में महायोगी ने ध्यान पूर्वक नेत्र उन्मीलित किये तो सामने अग्र पंक्ति पर दो मुख्यमंत्री अनुराग शुक्ला और भवानीसिंह बैठे थे। उन्होंने फिर महायोगी को प्रणाम किया। महायोगी ने अपना हाथ उठाकर सभी को आशीर्वाद प्रदान किया। हाथ के आशीर्वाद से सभी कृतार्थ हो गए। दृष्टाओं को लग रहा था, जैसे कलियुग में सतयुग का अवतरित हुआ हो। महायोगी ने पूछा- आप तो अनुराग शुक्ला लगते हो और आप भवानीसिंह ? अनुराग शुक्ला बोला- ठीक पहचाना महयोगी प्रवर आपने। यद्यपि मुझे आपके साक्षात दर्शन किये तो कोई 8-10 वर्ष हो गए हैं। पर दिल से तो मैं आपके प्रतिदिन दर्शन करता रहा हूं। साक्षात् दर्शन तो इसलिए नहीं किया सोचा कि जब तक आपके उपदेशानुसार अपने जीवन में थोड़ा भी परिवर्तन न कर लूं तब तक अपना अपवित्र मुख आपको नहीं दिखलाऊं। महायोगी- अनुराग जी ! ऐसी तो कोई बात नहीं। इन्सान अपने ही कृत्यों से अधर्मी बनता है। आपने जब प्रायश्चित द्वारा अपना मन बदल लिया तभी से आपकी आत्मा पावन होती चली गई। खैर अब तो आपने जनकल्याण के बहुत से कार्य सम्पन्न किये हैं। चाहे वह गणिकाओं का उद्धार हो, गरीबों को सहयोग करना हो या फिर अब पूरी महाराष्ट्र सरकार को नैतिकता-चरित्र एवं मानवता के धरातल पर चलाकर देश को ही नहीं पूरे विश्व को चमत्कृत करना हो। अनुराग- महायोगी जी ! यह सब तो आपकी ही कृपा का सुफल है। आपके निर्देश ही मुझे सतत् प्रेरणा दे रहे हैं। इस शुभ आशीर्वाद से मैं कुछ कर पाया हूं। भवानीसिंह को भी बड़ा आश्चर्य हुआ कि महायोगी को तो सब । । {165} . कुछ पता है। उन्हें समझते देर नहीं लगी कि इनका तीसरा नेत्र भी खुल चुका है। इनसे भूत भविष्य की कोई बात अगम्य नहीं है। मुख्यमंत्री-भवानीसिंह बोले-योगी जी ! मैं तो बहुत घाटे में रहा। महायोगी- वह कैसे ? भवानीसिंह- यह तो आप स्वयं जानते हो। आप जैसे महायोगी मेरे प्रान्त में होकर भी मैं अभागा वंचित रहा। इतने में अनुराग शुक्ला बोले- भवानीसिंह जी ! यह सब तो समय की बातें है। अब भी कुछ नहीं बिगड़ा है। आप तो अब भी दर्शन सेवा का लाभ ले सकते हैं। भवानीसिंह- वह तो लूंगा ही सही। इसके बाद अनुराग शुक्ला ने अपने सारे मंत्रियों का परिचय कराया और राजस्थान के मंत्रियों का भी परिचय कराया। उसके बाद सभी ने कुछ देशना सुनने की जिज्ञासा दर्शायी। महायोगी ने देशना की उपयोगिता को समझकर कुछ क्षण के लिए ध्यानस्थ हो गए। उसके बाद नेत्रों को उन्मीलित करते हुए देशना प्रदान की शरीर और आत्मा भव-भव से साथ होने के कारण आत्मा अपना मौलिक स्वरूप भूलकर शरीर को ही अपना मान बैठा है। लेकिन इस मनुष्य जीवन में सत्य तथ्य जानकर योग के बल पर आत्म स्वरूप को व्यवस्थित रूप से जगाया जा सकता है। सांसारिक सुख, हकीकत में सुख न होकर सुख का अहसास देने वाले होते हैं। जिस पदार्थ में सुख मिलने लगता है, उसी पदार्थ का बार-बार उपयोग करने पर वह पदार्थ अधिकाधिक सुख न देकर दुःख ही अधिक देने लगता है। सत्ता और संपत्ति का उपयोग स्वयं के लिए करने पर इतना सुख नहीं मिलता, जितना कि दूसरों के उपकार के लिए करने पर सुख की प्राप्ति होती है। अति उपलब्ध साधनों का उपयोग जनकल्याण में करना ज्यादा हितकर होता है। किसी का भी कोई भी स्तर सदा-सर्वदा एक सा नहीं रहता। अतः अनुकूल संयोग मिलने पर अहंकार और प्रतिकूल सहयोग मिलने पर अपमान का भाव मन में कभी नहीं लाना चाहिये। किसी धर्म के क्रियाकाण्ड से पहले इन्सान में इन्सानियत आना जरूरी है। जिस इन्सान में इन्सानियत नहीं वह भगवान को प्यारा नहीं हो सकता अर्थात् उसमें भगवद् रूप प्रकट नहीं हो सकता। {166} कुव्यसन यद्यपि सुख नहीं देते। परन्तु ना समझी वश जिस प्रकार कुत्ता हड्डी को चूसता है, जबकि खून हड्डी से नहीं उसके मसोड़ों से निकलता है। और अन्त में उसके मसोड़े छिल जाते हैं। उसी प्रकार दुर्व्यसन भी व्यक्ति के अन्दर और बाहर के जीवन को क्षत-विक्षत करने लगते हैं। कई बार गम्भीर बीमारियों को आमंत्रित कर देते हैं। यही नहीं दुर्व्यसनी व्यक्ति अपनी वंश परम्परा को भी खराब कर देता है। अतः दुर्व्यसनों से मुक्ति अनिवार्य है। सुख देने से सुख मिलता है, प्रधानमंत्री जी को जब देहाती भी गले में माला डालता है तो झुकना पहले प्रधानमंत्री जी को ही पड़ता है। प्रकृति का नियम है कि अनाज खेत में अन्दर जाने पर शत गुणित रूप से फलता है। उसी प्रकार पुण्य पाप भी, व्यक्ति यदि गुप्त रखता है तो वह भी शतगुणित फल देने वाले बनते हैं। अतः व्यक्ति को चाहिये कि पुण्य को बढ़ाने के लिए गुप्त रखे और पाप को घटाने के लिए लोगों के सामने प्रकाशित करे। गलती को गलती के रूप में स्वीकार कर ले। आज व्यक्ति अपने पुण्य-दान को तो सबको बतलाता है। और अपने पापों को छुपाता है। इसलिए परेशानियां बढ़ रही है। इसलिये कहा गया है- जिन्दगी का आनन्द, खाने में नहीं खिलाने में है। पीने में नहीं, पिलाने में है। जीने में नहीं, जिलाने में है। निन्दा करने में नहीं, प्रशंसा करने में है किसी के अवगुण गाने में नहीं, गुण गाने में है। जीवन का स्तर धन से नहीं धर्म से उठाईये। कदाचार से नहीं सदाचार से उठाईये। अहंकार से नहीं सत्कार से उठाईये। जिन्दगी बहुत छोटी है। उसकी शमा को अपने लिए नहीं दुनियां के लिए जलाईये। सच्चा सुख तभी प्राप्त होगा। इतना कहते-कहते महायोगी पुनः ध्यानस्थ हो गए। सभी लोगों ने भाव विभोर होकर महायोगी की देशना का पान किया। देशना सीधी और सरल थी। जो महायोगी की उत्कृष्ट भावना से जुड़ी होने से श्रोताओं के दिल - {167} को छूती चली गई। अनुराग शुक्ला ने उठकर महायोगी को प्रणाम करते हुए कहा- आप तो इस कलियुग के भगवान है। आपके सानिध्य को पाकर पतित से पतित आत्मा भी पावन बन जाती है। हम आपको विश्वास दिलाते हैं कि आपके निर्देशानुसार स्वयं का और इस युग के निर्माण करने का भरसक प्रयास करेंगे। सभी मंत्रीगण हाथ जोड़कर खड़े हो गए। इतने में महायोगी का आशीर्वाद परक हाथ ऊपर उठा और सभी भाव विभोर हो उठे। अन्त में महायोगी देह से ऊपर उठकर विदेह आत्म साक्षात्कार में लीन हो गए। 000 {168}

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Jeene Ka Raaz

Author
Muni Gyan
Title
Jeene Ka Raaz
File name
Jeene Ka Raaz
Text
OCR done
Citation
2002
Published
2011/01
Publisher
Shree Akil Bharatiya Sadhu Margi Jain Sang Samta Bhawan Bikaner
Language
Sanskrit
Pages
168
Library
Shri Jawahar Vidyapith Binasar, Bikaner
Classification
Literature
DLI number
548827
Barcode
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C-DAK, Kolkata
Digital publisher
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