Sanmati Library, Jaipur

Pracheen Bhagwatgeeta

Puri, Mangalanandji · 2009/09

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सूचि ।
अध्याय
पृष्ठ
विषय
१-३ | पूनरावृति की भूमिका
प्रस्तावना
१
-
आरम्भ।
२
भूमिका
३
६-१६/७० श्लोकी गीता कहां से मिली ।
१६-२३, इस ७० श्लोकी गीता को क्यों प्राचीन
माना जाय?
२४-२५ श्लोकों की संख्या।
५
२५-२८७० श्लोकी गीता की सूची।
२८-३२ इस गीता की अपूर्वत्व ।
६
मूल पुस्तक २३-७८ प्राचीनभगवद्गीता (७०० के स्थान में
७० श्लोक।
परिशिष्ट-१७६-८४ गीता का एक श्लोक।

पुनरावृति की भूमिका । बड़े हर्प की बात है कि मेरी इस प्राचीन भगवद्गीता का जनता ने यथोचित् आदर किया, क्योंकि सं० १९८२ से ८४ तक फे केवल दो वर्षों में ही सारी प्रतियां २००० खप गई और मांगे बढ़ रही है ( श्री युक्त जैमिनी मेहता जी बी० ए० वैदिक मिशनरी ने, जो मार्च १९२८ ई० में फिज़ी द्वीप में धर्म प्रचारार्थ चले गये. है एक पत्र में यह लिखा था कि इस पुस्तक की अगर ५०० प्रति- यां मेरे पास भेज दें तो मैं फौरन खपा दू" परन्तु उनकी इस. मांग की मैं पूर्ति न कर सका)। हिन्दी के सिवाय अन्य भाषाओं में भी इस ग्रन्थ के अनुवाद हुये हैं। पञ्जाव शाहपुर नगर के पंडित श्रुतिकान्त जी शास्त्री ने मुझ से आज्ञा लेकर उद् अनु- बाद छपवाया है और गुजराती में छपवाने वाले हैं कलकत्ता के पण्डित ज्योतिन्द्रनाथ मल्लिक उपदेशक आर्य समाज ने भी इसी प्रकार बंगला भाषा में उलथा कर लिया है जो शीघ्र छपेगा, इस प्राचीन भगवद्गीता परजो अनेकों समालोचनायें प्रकाशित हुई थी, उन में भी अधिकांश प्रशंसा परक पाई गई इस लिये पाठकों के सूचनार्थ मैं उन में से केवल एक को यहां उद्धत किये देता है। प्राचीन भगवद्गीता के बारे में मुविख्यात दार्शनिक लेखक ..

... ... (२) श्रीमान कन्नोमलजी । एम० ए० नन धौलपुर राज्य लिखते हैं (देखो प्रताप कानपुर ता. १५ अगस्त १९२६ )। "स्वामी जी ने श्लोकों की संगति लगाने में बड़ा परिश्रम किया है और इस कार्य में आपको सफलता भी प्राप्त हुई है। इस पुस्तक के ७० श्लोक पढ़ने से यह भली भांति ज्ञात हो जाता है कि जो कुछ भगवद्गीता का सिद्धान्त है वह सभी इनके अन्तर्गत है। खामी जी ने श्लोकों की संगति वड़ी कुशलता और बुद्धिमत्ता से लगाई है। अपने बहुत से प्रमाणों से यह भी सिद्ध किया है कि असली गीता यही है। ...हमें यह कहने में कुछ भी संकोच नहीं हैं कि खामी जी की पुस्तक विद्वानों के विचार करने योग्य है। सर्व साधारण लोगों के पढ़ने के लिए यह अत्यन्तोपयोगी है। आपने श्रुतियों के जो प्रमाण दिये हैं, उनसे श्लोकों का महत्व और भी बढ़ गया है। हिन्दी संसार के लिये यह पुस्तक एक नई वीज़ है।" इन सम्मतियों से उत्साहित हो कर मैं इस अपूर्व ग्रन्थ की पूनरावृति उचित मानता हूँ और स्वयं निर्धन संन्यासी होने के कारण इस समय श्रीयुत् गोविन्दराम हालानन्द जो कलकचा को इस पुस्तक को एकबार मात्र छपवा कर धार्मिक साहित्य का प्रचार कराने की आज्ञा देता है। विशाल भारत (३१ सर्कुलर रोड) कलकत्ता के १, २, ३, अंकों में एक लेख-माला 'प्राचीन विशाल भारत की यात्रा' शीर्षक श्रीकालीदासजी नाग पम०प०डी० लिंट (पेरिस) की ओर से छपा

है उस में उन्होंने उस वाली द्वीप (जहां से यह प्राचीन भगवद्गीता
प्राप्त हुई थी) की सैर करके बहुत कुछ हालात छपाये हैं अतः
नो लोग इस सम्बन्ध में छान चीन ( Research )करना चाहे उक्त
लेखों से भी लाभ उठा सकते हैं
सर्वहितैषि
वर्तमान निवास कलकत्ता
मंगलानन्द पूरी
१६ कार्नवालिस स्ट्रोट
तिथि चैत्र शुक्सवत् १९८५ वि० १३८अतर सुया, प्रयाग

प्रस्तावना। मोम पूर्ण मंद: पूर्ण मिद पूर्णात् पूर्णमुदच्यते । पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ॥ ॐ शान्तिः । यह प्राचीन भगवद्गीता क्या है, कहीं से कैसे मुझे प्राप्त हुई और इसका मान्य क्यों किया गया? इत्यादि बातों को पाठक आगे भूमिका में पढ़ेंगे। गीता-प्रेमी सन्ननों से प्रार्थना है कि भूमिका को अवश्य आद्योपान्त पढ़े क्योंकि ७०० श्लोकों वाली वर्तमान प्रचलित भगवद्गीता के स्थान में ७० श्लोक मात्र को क्यों प्रकाशित कराया गया? यह बड़ा गम्भीर प्रश्न है, जिसका उत्तर तभी ठीक ठीक समझ में आयेगा जव आप मेरो भूमिका को अन्त तक पढ़ लेंगे। इन सत्तर श्लोकों का अनुवाद यथा सम्भव सरल भाषा में ही किया गया है और आवश्यकतानुसार कठिन विषय को समझा देने के लिये मैंने टिप्पणियां भी दे दी है। ':गीताप्रेमी सज्जन गण यह देख कर बहुत प्रसन्न होंगे कि किन गीता वाक्यों का आधार किन वेद या उपनिषद-वाक्यों पर है, यह भी बड़े परिश्रम से मैं ने अपनी टिप्पणियों में अंकित कर दिया है। : * उपनिषद् वाक्यों को भी "श्रुति" कहा गया है, यद्यपि "श्रुति" शब्द केवल इयजुः, साम. अथर्व इन चार संहिताथों मात्र का बोधक है, परन्तु यतः हमारे वेदान्ती विद्वान् गण उपनिषदों को भी श्रुति कहते हैं अतः उनके सुभीते के लिये मैने भी इसी परिपाटी का अनुकरण किया है।

(५ ४-जिस कार्य में मुझे सब से, भारी परिश्रम उठाना पड़ा, वह यह है कि इन सत्तर श्लोकों का एक दूसरे से सम्बन्ध सोचने विचारने में बहुत मनन करना पड़ा; परन्तु सफलता प्राप्त हो जाने पर जो अपूर्व आनन्द प्राप्त हुआ वह अकथनीय है। पाठक प्रत्येक श्लोक के भाषार्थ से पूर्व "सङ्गति" पढ़ेगे, इन सत्तर श्लोकों में किस की किल से क्या सङ्गति है, यह निर्णय कर लेना बड़ा कठिन कार्य था, क्योंकि प्रत्येक गीता प्रेमी के मस्तिष्क में वर्तमान गीता के श्लोकों का सम्बन्ध घर किये हुये है मेरा भी यही हाल था लेकिन इस प्राचीन गीता की दशा सर्धशा भिन्न है ! अगर इसमें एक श्लोक वर्तमान गीता के दूसरे अध्याय का ३७वां है तो अगला प्रलोक ४७वां है, अतः प्रत्यक्ष है कि ३७वे की सङ्गति ३८वे के साथ तो सरलतया लग सकती पर बोच के श्लोकॉको छोड़ देने पर कैसे मेल लगाया जाय और क्या किया जाय ? यहो बड़ा टेड़ा सवाल था जिसने ७० श्लोकों के मनन पर मेरे 8 मास का भारी समय खर्च करा दिया । अच्छा अब जब कि मैं उस कठिन समस्या को हल कर चुका हूं, जनता पर यह हर्ष-सूवंना प्रकट किये देता हूं कि बहुत सम्भव है कि प्राचीन गीता इतने ही और इन्हीं श्लोकों में रही होगी।हां शायद कुछ वाक्य और भी होंगे जो तालपत्रों के कीड़ों सेखाये जाने मादि कारणों से नष्ट हो गये होंगे, क्योकि , ५

अनेक श्लोक आधे चौपाई मात्र मिले हैं।
धन्यवाद-जिन पुस्तकों की मैंने सहायता ली है उनके
लेखकों को धन्यवाद देता हूं। मुख्यतया स्वर्गवासी लोकमान्य
श्री पण्डित बाल गङ्गाधर तिलक महाराज की गीता रहस्य तथा
श्रीयुक्त कन्नोमल जी एम, ए, के गीता दर्शन से मुझे सहायता
मिली है। और “माडर्न रिन्यू कलकत्ता की तो आधार शिला
ही रखी हुई है। उस के सन्चालकों को जितना धन्यवाद दिया
जाय थोड़ा है।
क्या प्राचीन पुस्तकों-कठ, मुण्डक, छान्दोग्य, वृहदारण्यक
आदि-के लेखक ऋषि महर्षियों को भी धन्यवाद दिया
जाय ? अभी तक यह प्रणाली जारी नहीं हुई परन्तु मेरी समझ
में तो होनी ही चाहिये । हमारे पूर्वज तो इस निमित्त "ऋषि-
ऋण तथा दैनिक ऋषि तर्पण की प्रथा डाल गये हैं अतः मैं
उन जगद्गुरू महर्षियो को सतशः नमस्कार करता हूं।
सर्व-हितेच्छु,
मङ्गलानन्दः।

प्राचीन भगवद्गीता
(७०० के स्थान में ७० श्लोक)
भूमिका ।
पहला अध्याय।
श्री मद्भगवद्गीता संसार के अनुपम ग्रन्थों में से एक
बह महाभारत के भीष्म पर्व में है, जहां से पृथक निकाल कर
प्रचार किया गया है। वहाँ यह १८ अध्याओं में ७०० श्लोकों में
पाया जाता है।
महाभारत युद्ध के आरम्भ में अर्जुन को शंका हो गई
थी कि भाई बन्धुओं खास कर गुरु और पितामह पर बाण

प्राचीन भगवद्गीता
"
.
-
चलाना पाप है। इस शंका का उत्तर उसको भगवान श्री कृष्ण
जी महाराज ने जो कुछ दिया था वही "भगवद्गीता"
(भगवान के द्वारा गायन किया गया हुआ) कहलाती है।
बहुतेरे लोगों का यह ख्याल है कि उस युद्ध काल में रणभूमि
में खड़े खड़े इतना भारी व्याख्यान (७०० श्लोकों में) दिया
जाना सम्भव न था, किन्तु बहुत सम्भव है कि श्री कृष्ण जी
ने कुछ थोड़ा सा उपदेश दिया होगा जो पोछे से बड़ता
चला गया ।
लोकमान्य पण्डित बाल गङ्गाधर तिलक महाराज अपने
गीता रहस्य के पृष्ट ७ पर इसी प्रसङ्ग को उठा कर अन्त में
लिखते हैं-
"गीता की रचना के सम्बन्ध में मन की ऐसी प्रवृति
होने पर गोता सागर में डुबको लगा कर, किसी ने सात,
किसी ने अट्ठाईस, किसी ने छत्तीस और किसी ने सौ मूल
श्लोक गीता के खोज निकाले हैं.......
..यह नहीं कि
बहिरंग परीक्षा की ये सव बातें सर्वथा निरर्थक है।"
निदान मैं खयं भी गत ३७ सालों से भगवद्गीता का
प्रेमी होने के कारण काफी युक्तियों के आधार पर इसी निर्णय
पर आरूढ़ था कि निस्सन्देह श्री कृष्णार्जुन संवाद वर्तमान
भगवद्गीता से बहुत ही न्यून रहा होगा। मैं इस कोशिश में
लगा थाकि इस बात की जांच करू कि वस्तुतः कृष्णार्जुन
सम्वाद में कितने और कौन कौन से श्लोक हो सकते हैं ? परन्तु

भूमिका
यहुत हाथ पांव मारने पर भी यथेष्ट सफलता न प्राप्त हो सकी
इतने में मुझे यह ७० श्लोकी गीता देखने का अवसर प्राप्त हुआ।
मैंने इन श्लोकों को ध्यान से पढ़ा और परस्पर इनका एक दूसरे
के साथ सम्बन्ध या सङ्गति लगा कर विचार किया तो मेरा
दूढ़ विश्वास हो गया कि भगवान कृष्ण जी का उपदेश इतने
ही में आ जाता है, मानों मूल रो १० श्लोक थे और इन्हीं की
व्याख्या में शेष श्लोक रचे गये, अतः मूल और टोका मिल कर
आज ७.० श्लोकों की भगवद्गीता मिलती है।
इस प्रकार इन ७० श्लोकों की गीता के मिल जाने से
मेरे अन्तः करण में जो आनन्द प्राप्त हुआ वह अकथनीय है
और मैं गीता प्रेमी भाइयों को भी अपने इस "आनन्द में
सम्मिलित करने के लिये इस ७० श्लोकी गीता को पुस्तकाकार
रुप में प्रकाशित करता हूं।
दूसरा अध्याय !
७० श्लोकी गीता कहां से मिली ?
अब मैं पाठकों को
का यह बतलाता हूं.कि यह ७० श्लोकी
गीता कहाँ से किस प्रकार प्राप्त हुई ?
इसको मैंने प्रथम
बांकीपुर के साप्ताहिक "पाटलिपुत्र
श्रावण शुक्ला २, शनिवार संवत् १६७१ वि० में पढ़ा, फिर वहां
जिस लेख के आधार पर छपा था, उसको भी देखा जो सन

प्राचीन भगवद्गीता १० १६१४ ई०के जुलाई मास के “माइन रिव्यू कलकत्ता" Modcan Review में पृष्ट ३२ से ३८ तक में प्रकाशित हुआ है। इसके लेखक डाक्टर नरहर गोपाल सर देसाई महाशय हैं। लेखका शीर्षक है:- The Bhagavad Gita from the Island of Bali. "वाली द्वीप से प्राप्त भगवद्गीता ।" इस लेख का सारांश निम्न प्रकार है:- बाली नामक एक छोटा सा द्वीप जावा द्वीप के पास है। जावा टापू में हिन्दू वसतो थी, राज्य भी हिन्दुओं का था जिसे सन १५७८ ई० में अरबवाले (मुसलमान जाति) ने नष्ट कर डाला। यहां के हिन्दुओं को मुसलमान बना लिया गया जिन में अब तक भी हिन्दुत्व के संस्कार पाये जाते हैं। जावा में कुछ घौद्ध मो हैं पर अव हिन्दू नहीं हैं। यह अति प्राचीन ऐश है, वाल्मीकि रामायण में इसका वर्णन (“यव द्वीप" नाम से आया है)। जावा द्वीप हिन्दू सभ्यता का केन्द्र था और बढ़े । देखो प्रमाण:- यत्न तो यव द्वीपं सप्त राज्योप शोभितम् । सुवर्ण रुपकं दोष सवर्ण कर मण्डितम् ।। वा० रा० किष्किंधा कां० ४० वा सर्ग ३० वा श्लोक । मर्थ-और तुम बड़े यतन के साथ सप्त राज्य सुशोमित यव द्वीप সুনিদা बड़े विद्वान, हुनरमन्द, शखधारी, शूरवीर तथा सभी प्रकार के लोग यहां पहुंचते थे। चौद्ध लोग भी पहुंचे, और भारत से ब्राह्मण लोग भी संस्कृत की पुस्तकें लेकर वहां पहुंचे थे। डाक्टर देसाई जी कहते हैं कि मैं पेनांग देश में नौकरी पर था। वहां एक पुस्तक पढ़ते हुये अनायास मेरी दृष्टि एक शब्द "घाली द्वीप में हिन्दु रामायण तथा हिन्दुओं के ४ वर्ण" पर पड़ी। निस्सन्देह डाक्टर जी के हृदय में स्वभावत: यह उत्कण्ठा उत्पन्न हुई कि “वाली" कहां है ? इसकी खोज करनी वाहिये। नक्शा (ऐट्लस) को ध्यान पूर्वक देख कर यह ज्ञात किया कि जावा द्वीप के पास यह वाली टापू विद्यमान है। निदान किसी न किसी प्रकार आपने भई सन् १९१२ ई० में याली को प्रस्थान किया । जावा द्वीप के बन्दर सुर्वजा (Surbaia) में जाकर ठहरे, क्योंकि वहीं से बाली को जहाज जाते हैं! में जाना और सुवर्णकारी पुष्पों से शोभित रूपक द्वीप में बुढ़ना यह तुम्हारा कर्तव्य है ॥३०॥ 'यव' का 'जव' या जावा यन गया है और इसी श्लोक में जो अन्य सुवर्ण-रुप द्वीप कहा गया है वह आज कल "सूमात्रा टापू' कहलाता है।" (सुग्रीव ने सीता जी की खोज निमित्त जिन्हें भेजा उन्हें बतलाया कि किन किन देशों में वे जाय इसी बीच का यह श्लोक है)। ,

..
प्राचीन भगवद्गीता
डाक्टर देसाई जी ने बहुत कुछ चाहा कि
बहुत कुछ चाहा कि इस सुर्वजा
में बाली के हिन्दुओं का कुछ हाल ज्ञात हो, परन्तु कुछ भी पता
न लगा, लेकिन अन्त में एक भारतीय
एक भारतीय मुसलमान ( बोहरा
जाति वाला ),मिल गया, जो बाली द्वीप के राजधानी बूलेलांग
Bure Lang में रहता था और यहां व्यापारी माल खरीदने
आया था। उसने बतलाया कि बाली में पढ़े लिखे ब्राह्मण
लोग हैं जो "पण्डा" कहलाते हैं और उस द्वीप के एक बन्दर
करंग आसेम Karang Assm में एक हिन्दू राजा भी रहता है।
यह भेद पाते ही डाक्टर देसाई महाशय इसी बन्दर (करंग०)
के जहाज पर जो सवार हुये। दो दिनों को समुद्रोय यात्रा
पश्चात् वहां पहुंच गये
रात के ६ बजे जहाज बन्दर पर पहुंचा। अतः बिस्तरा
सामान लिये हुये उस समय तीन मील जाना परदेशी कुली के
साथ कितना कष्ट साध्य था ।
अस्तु, प्रात: काल डोक्टर जी उस गांव में इधर उधर
घूमने लगे कि पण्डा लोगों तथा राजा जी का दर्शन करें, यह
सुन कर कि राजा जी ११ बजे के पश्चात लोगों से मुलाकात
करते हैं डाक्टर जी अपने मुसलमान Cuide "पथ-प्रदर्शक
के साथ किसी पण्डा के मकान की तलाश में निकल पड़े !
मार्ग में वह मुसलमान पथ-प्रदर्शक वहां की जनता को यह
सुझा रहा था कि तुम्हारे देश का यह ब्राह्मण आया हुआ है।
जिसे वे लोग आश्चर्य की दृष्टि से देखते थे। 'डाक्टर जो दो
।
१.
."

भूमिका । . . तीन पण्डाओं के घरों पर पहुंचे, परन्तु वहां जो संस्कृत पुस्तके हैं वह देव' नागरी अक्षरों में नहीं है, कवि भाषी अक्षरों में लिखी हैं। * वहां से निराश होकर डाक्टर देशाई जी'उस राजा के महल पर पहुंचे। राजा जी भारत के ब्राह्मण को ओया देख कर दंग रह गये, बहुतेरी बातें भारत के सम्बन्ध में पूछो,' आतिथ्य निमित्त गाय का दूध मंगाया जो वहाँ दुष्प्राप्य है, क्योंकि उस देश के लोग दूध नहीं सेवन करते, यद्यपि गायें वहाँ बहुत हैं। डाक्टर देशाई वहां तीन दिन ठहरे रहे और यह ज्ञात किया कि पूर्व काल में चाहे अनेकों संस्कृत ग्रन्थं वहाँ रहे हों, परं अब नहीं हैं। हां, धार्मिक गाथाओं को उन लोगों ने वाली द्वीप की भाषा में लिखें रखा है, जिन को वें पढ़ा सुना करते हैं। हमारे देसाई जी निरोश होकर केवल जहाज की प्रतीक्षा में ठहरे थे कि इतने में बूढ़े राजा के नवयुवक पुत्र ने इन को धुला भेजा और अन्य बातों के सिलसिले में यह भी पूछा कि क्या हिन्दुस्थान में इस समय महाभारत के सारे पर्व मिल सकते हैं ? उत्तर "हो" पाने पर इस राजपुत्र ने एक ब्राह्मण को आज्ञा दी किं पुस्तकालय में से भीष्म पर्व निकाल लावे। यह लकड़ी के सन्दूकों में बड़ी सफाई के साथ सुरक्षित है। ये ताड़ के पत्रों पर लिखे रखे हैं, १४ इञ्च लम्बे २॥ इन्च चौड़े पत्र * इसी प्रकार मंगला बालों ने गंगला अक्षरों में तथा महांस वालों ने अपने तामील तैलंगी भादि भक्षरों में संस्कृत पुस्तकों को लिख-रक्ख्य है।

प्राचान भगवद्गीता -- हैं, बीच में छेद करके डोरे से सब को नत्थी कर दिया गया है। इन पत्रों पर वाली द्वीप की कति भाषा में सुई से कोंच कोंच कर अक्षर अङ्कित कर दिये गये हैं, जो बहुन स्पष्ट और अब भीष्म पर्व पढ़ा जाने लगा -उन बाली निवासी ब्राह्मण का उच्चारण संस्कृत श्लोकों का ऐसा अद्भुत था कि डाक्टर देसाई बड़ी मुशिकल से यह भांप सके कि वह संस्कृत है। अव आक्टर जीके मनमें ख्याल आया कि भीष्म पर्वमे ही तो भगवद्गीता मौजूद है !! अच्छा उसे ही निकलवाना चाहिये, पर वहां वाले भगवद्गीता नाम से सर्वथा अपरिचित थे; निदान बहुत देर तक उलट पलट करने के पश्चात् डाक्टर देसाई ने भगवद्गीता के कुछ श्लोकों को ढूंढ़ ही निकाला। वहां वादे संस्कृत मात्र को श्लोक कहते हैं। डॉक्टर देशाई यह देख कर दंग रह गये कि उस वालो द्वीप के भीष्म पत्र में भगवद्गीता १८ अध्याय के स्यानमें एकही अध्याय की है, जो २३ वं ले ४० चे पत्र तक है । उस द्वोप के सब से बड़े विद्वान् पण्डित पडडा बयान् पिडाड ( PadandatWayan Pidad) के द्वारा पढ़वा कर उन गीता-श्लोकों की नकल डाक्टर देसाई ने कर लो। श्री डाक्टर देसाई अपने उसी लेख में यह प्रकट करते हैं कि ऐसे होताल-पत्रों पराप्राचीन संस्कृत पुस्तकें भारत के सब भागों में परेरित है। ।

१५
भूमिका
उस वाली-वाली गीता में निम्न विशेषतायें हैं :-
१—यह गीता “ धर्म क्षेत्र " के स्थान में "दृष्ट्वैवं
खजन"-श्लोक से आरम्भ होती है।
२-इस में अध्यायें नहीं हैं ( सब श्लोक एक ही अध्याय
३-७०० श्लोक नहीं हैं।
४-कुछ श्लोकों का तात्पर्य वहां की कवि भाषा में
अङ्कित हैं।
५- हमारे ( १८ अध्यायों वाली) भगवद्गीता के सब
अध्यायों के श्लोक इस में नहीं है।
६-डाक्टर देसाई ने इस गीता में भारतीय गीताके अध्यायों
और श्लोकों की संख्या जांच करके अङ्कित कर दी है । :
७-जिस प्रकार हम लोग गीता आदि का पाठ किया
करते हैं, इस प्रकार बाली द्वीप में एक पुस्तक कामन्दक नीति-
सार का बड़ा प्रचार है।
८–बाली वाले हिन्दू यह कहते थे कि जब सन १४७८
ई० में जावा द्वीप पर मुसलमानी राज्य स्थापित हुआ, उस
समय जावा से एक ब्राह्मण बाराह Wahu Rahu अपने धर्म की
रक्षा के लिये कुछ धार्मिक पुस्तके साथ लेकर वाली में भाग
आया था, अतः इस वाली में महाभारत के आठ पर्व ( आदि,
बिराट, भीष्म, मूसल, अस्थानिक, स्वर्गारोहण उद्योग, और
आश्रमवासी) मौजूद है, शेष पर्व जावा द्वीप में हैं।

प्राचीन भगवद्गीता
१६
---
६
-दो पर्वो----आदि और विराट को डच (Dutch) सर:
कार ने हालैण्ड देश के हेग ( Hague) स्थान में रोमन अक्षरों
मैं छपवाया है।
4
१०-अगर कोई जावा को जाकर वहां की वैटेविया विवि.
त्रालय ( Fataria AMuseum ) में रक्खो हुई इन अपूर्व पुस्तकों को
ध्यान से पढ़े तो जावा का संस्कृत-साहित्य संसार में प्रकाशित
हो सकता है।
तीसरा अध्याय ।
इस ७० श्लोकी गीता को क्यों माचीन माना जाय ?
यह गीता कहाँ से किस प्रकार प्राप्त हुई ? इस वात को
ऊपर मैं दर्शा आया हूँ। अंव प्रलं यह है कि वर्तमान गीता के
७०० श्लोकों में से किन्हीं को नवीन और किन्हीं को प्राचीन
क्यों माना जाय?
कुछ लोगों का ख्याल यह है कि चाहे कृष्णार्जुन संवाद
थोड़ा ही रहा हो और ७०० श्लोकों को पीछे से ही किसीने
निर्माण किया हो, तो भी क्या हरज है। पूरे सात सौ श्लोकों को
ही प्राचीन और प्रामाणिक क्यों न माना जाय ?
हमारा उत्तर यह है कि प्राचीन ग्रन्थों की छानवीन करके
यह खोज निकालना कि किस ग्रन्थ में कितना और कौन कौन
सौ भाग मूल प्राचीन है; और क्या क्या पीछे की मिलावट, क्षेपक
रोमन अक्षर अंग्रेजी की ए, बी, सी, डी यादि है।
M.

- भूमिका या टीका आदि हैं---यह जानना और तदनुसार मानना परमाव- श्यक है। गीता की भी इसी न्याय से जांच पड़ताल होनी चाहिये। समुद्र में डुबकी लगाने वाला जैसे मोती निकाल लाता है, उसी प्रकार इन शास्त्रों के गहन विषयों में डुबकी लगाने वाले भी अनेकों रत्नों को अवश्यमेव खोज निकालेंगे। पाटलीपुत्र समाचार पत्र (बांकीपुर) के सम्पादक श्रीयुत काशीप्रसाद जी जायसवाल एम० ए० (आक्सफोर्ड) वैरिष्ठर एट ला ने इस ७० श्लोकी गीता को प्रकाशित करते जो अपना निर्णय प्रकट किया था वह इस प्रकार है:- "इस पुरानो प्रति के सब श्लोक एक साथ पढ़ने से विषय भंग नहीं मालूम होता। इसे मूल पढ़ने वाले स्वयं देख सकते हैं। गीता के मूल सिद्धान्त सभी इन सत्तर श्लोकों में ओ गए हैं। विश्व रूप दर्शन पर लम्वी स्तुति की जगह नम- स्कार का केवल एक ही श्लोक इसमें है। और विश्व रूप के चित्रण में केवल तीन, जिनसे वर्णन भली भांति व्यक्त हो जाता है। मक्ति-योग के दो ही श्लोक हैं जो अन्तिम श्लोक हैं। इसके पढ़ने से बहुतेरे लोगों के विचार में आयेगा कि भगवद्गीता का यह पुराना रूप है, जिस में श्रीकृष्ण जी के वचन सत्तर श्लोकों में हैं। प्रचलित गीता के बड़े रूप में कोई भिन्न सिद्धान्त नहीं हैं। सत्तर श्लोकों वाली प्रति मूल है। वर्तमान गीता में मूल और टीका का समावेश है, कोई बाहर की यात नहीं है।"

प्राचीन भगवद्गीता
-
मैं भी ऐसा ही समझता हूं कि मूल गोता न्यूनाधिक
इतने ही श्लोकों में रही होगी। मूल का आशय समझाने के
लिये और भी श्लोक रचे गये होंगे, जो
मूल
और व्याख्या
'सहित इस समय सात सौ श्लोक मिलते हैं। अतः मूल गोता
पर श्रद्धा रखने वाले गीता प्रमो सज्जनों के अन्तःकरण की
सन्तुष्टि का साधन मान कर मैं इस शास्त्र को प्रकाशित
करता हूं।
गीता तथा जिस भारी अन्य के अन्तर्गत यह है, वह
महा भारत कितने बड़े भारी परिवतेनों का आधार बनाया गया
था, इस बात पर मैं कुछ प्रकाश डालना चाहता हूं:-
"१-~~-महाभारत आदि पर्व में लिखा है कि महाभारत
के ८८०० श्लोक ऐसे हैं जिन को व्यास और शुकदेव के सिवाय
और कोई नहीं जानता।
इससे यूरोपियन विद्वानों का यह विचार है कि वस्तुतः
मुल महाभारत केवल ८८०० श्लोको का हो छोटा ग्रन्थ रहा
होगा।
२-फिर आदि पर्व में हो लिखा है कि व्यास जीने
२,००० श्लोकों का महाभारत रवा था।
३---फिर महाभारत के दूसरे पर्व में श्लोकों की संख्या
८४, ८३७ बताई गई है।
४-परन्तु आजकल
के महाभारत में १०७, ३६६
श्लोक हैं।"

AN- - . भूमिका उक्त वाक्य श्रीमान् कोमल जी एम० ए० के गीता दर्शन पृष्ठ ४५ से उद्धृत किया गया है। अब देखिये लोकमान्य तिलक महाराज श्या कहते हैं: गोता रहस्य परिशिष्ट भाग ४ पृष्ठ ५५७ पं० ७ पर लिखा है:- "तथापि हम यह भी नहीं कहते, कि जय मूल भारत का महाभारत बनाया गया होगा, तब मूल गीता में कुछ भी परिवर्तन नहीं हुआ होगा।" (फिर इसो पृष्ठ के पंक्ति २२ पर कहते हैं कि ):- “इसके सित्रा, उक्त प्रकार के मूल परिवर्तन भो गीता में हो गये होंगे। ......अत एव यही अनुनान करना गोता में जो कुछ परिवर्तन हुए होगे वे कोई महत्व के न थे, किन्तु वे ऐसे थे जिन से मूल ग्रन्य के अर्थ को पुष्टि हो गई है।" (फिर आगे पृष्ठ ५५८५०२६ पर कहा है ):- "यहां पर पाठकों को स्मरण रखना चाहिये, कि ये दोनों अर्थात् वर्तमान गीता और वर्तमान महाभारत वही ग्रन्थ हैं, जिन के मूल स्वरूप में कालान्तर से परिवर्तन होता रहा और जो इस समय गोता तथा महाभारत के करम . उपलब्ध हैं। ये उस समय के पहले के मूल प्रन्थ नहीं हैं।" और सामो दयानन्द सरखतो महाराज के. जीवन चरित्र श्री सहयानन्द प्रकाश) के गला कोएड ११३ खो:- । पड़ता है कि - - -- -

प्राचीन भगवद्गीता
------ +------
पृष्ठ १५३ पर हम पढ़ते हैं:-
"वैद्य रामदयाल ने स्वामी जी से कहा कि ग्वालियर
राज्य को रहने वाला एक ब्राह्मण हमें कचुरा में मिला था,
वह कहता था कि मेरे पास कालिदास. रचित संजीवनी नामक
एक पुस्तक है। इसमें कालीदास ने अपने समय में महाभारत
के ग्यारह साल श्लोकों और दश पुराणों की विद्यमानता
प्रकट की है।
पाठक! इन उद्धरणों से यह स्पष्ट हो रहा है कि न
वर्तमान महाभारत मूल ग्रन्थ है और न ही हमारी ७०० श्लोकों
की गोता ही भगवान श्री कृष्ण जी के मुखारविन्द की वाणी
है। हाँ, इसमें सन्देह नहीं कि लाख श्लोकों के ही अन्दर मूल
महाभारत वाले आठ सहस्र श्लोक शामिल होगे, इसी प्रकार
७०० में ही कृष्णार्जुन संवाद के कुछ थोड़े वाक्य छिपे पड़े हैं।
ऐसी दशा में जव कि वालीद्वीप से ७० श्लोकी गीता
प्राप्त हुई है तो क्यों न यह मान लिया जाय कि मूल अन्य यही
लो. तिलक महाराज का कथन है कि यह गीता वाली
और जावा द्वीपों में संवत् ५३५ में विद्यमान था (देखो गीता
रहस्य परिशिष्ट भाग ५ पृ० ५५६) अतः मानना पड़ेगा. कि
भारत से जावा द्वीप को महाभारत आदि ग्रन्थ पांवीं शताब्दी
विक्रमी से तो बहुत पूर्व ही भेजे जा चुके होंगे!! • अच्छा अगर
५०० वर्ष पूर्व का समय माना जाय तो मानों माज से २००

भूमिका ४ वर्ष पूर्व भारत से यह गीता जावा द्वीप' को गई होगी। और बहुत सम्भव है कि उस समय कृष्णार्जुन संवाद केवल सत्तर पचहत्तर श्लोकों में ही रहा हो; जो भारत से जावा में जाकर सुरक्षित रह गया, किन्तु यहां और श्लोक टीका टिप्पणी व्याख्या रूप में सम्मिलित होते गये। प्रश्न-परन्तु श्री स्वामी शंकराचार्य जी महाराज ने तो पूरे ७०० श्लोकों को गीता पर भाष्य रखा है, इसलिये यह तो मानना हो पड़ेगो कि उक्त स्वामी के समय में पूरे ७०० श्लोकों की गोता विद्यमान थी? उत्तर-हां, परन्तु खामी शंकराचार्य जी महाराज का समय विवादास्पद है। अच्छे अच्छे विद्वानों का निर्णय यह है कि स्वा० शं० ११ वीं शताब्दी सन् ईसवी में (आज से केवल ६०० वर्ष पूर्व) हुये थे। अतः बहुत सम्भव है कि आज से २००० वर्ष पूर्व गीता में केवल ७० श्लोक रहे हों और तब से लेकर स्वामी शक के समय तक के १०० वर्षों में मिलावटें होकर ७०० बन गये हों। एक बात ध्यान देने योग्य यह है कि स्वा० शं० जी ने गीता में एक श्लोक क्षेपक माना है (१३ वें अध्याय का प्रथम श्लोक) उसे क्षेपक मान कर भी शामिल रहने दिया है, अतः क्या पाश्चर्य है कि और भी अनेकों श्लोक क्षेपक रहे होंगे जिन्हें स्वामी शंकराचार्य जी महाराज ने मिकाल डाला होगा। इसका प्रमाण भी मिलता है सुनिये : .

२२
प्राचीन भगवद्गीता
पट् शतानि स विशानि श्लोकानां मोह केशवः ।
अर्जुनः सप्त पञ्चाशत् सप्त षष्टिं तु सञ्जयः।
धृतराष्टः श्लोकमेकं गीताया मानमुच्यते ॥
(महा० भीष्म० ४३॥ ४.५)
अर्थ-६२० श्लोक केशव ने कहे हैं। ५७ अर्जुन ने, ६७
सञ्जय ने और एक धृतराष्ट्र ने कहा है। यह गीता
की श्लोक-संख्या है।
इस लेखानुसार गीता में ७४५ श्लोक होने चाहिये,
परन्तु उसमें केवल ७०१ ही श्लोक हैं। क्या हम मान लें कि
महामारत का उक्त श्लोक धनते समय गीता में ७४५ श्लोक रहे
होंगे, परन्तु श्री स्वामी शंकराचार्य महाराज ने ४४ श्लोकों को
क्षेपकं मानकर निकाल डाला होगा।
प्रश्न-लोकमान्य तिलक महाराज तो उक्त लेख में यह
सम्मति प्रकाशित करते हैं कि जावा और बाली टापू में जो
इतने लोक गीता के मिले हैं, सो यह बात नहीं है कि भारत
से वहीं '७० श्लोकी गीता गई हो; वरन् यह बात हैं कि वहां
वालो ने ७०० का तो अर्थ अपने कवि भाषा में लिख लिया है,
किन्तु वीच बीच में चुने हुये श्लोक ज्यों के त्यों रख लिये हैं ?
उत्तर-यह बात कहां तक ठीक है ? इसकी पूरी जांच करने
के लिये इस बात की आवश्यकता है कि कोई अन्वेषणकर्ता
वहां जाकर "कवि" भापा को सीख कर उन ग्रन्थों को * पढ़ें तो
मै स्वयं अब वहां जाने का इच्छुक है ! यदि परमात्मा ने सहायता
दीतो सफल कार्य हो सकूँगा।

भूमिका ठीक ठीक पता लगे। फिर तो गीता ही नही बल्कि महाभारत की भी जांच हो जायेगी। क्योंकि डाक्टर देसाई जी ने अपने उल लेख में यह भी लिखा है:- 18 It seems that the Maha Bharata is in an abridged forun and not as big as the Indian one अर्थ-ऐसा मालूम होता है कि वहां पर जो महाभारत है वह संक्षेप-रूप में है, हमारे स्वदेश जैसा भारी ग्रन्थ नहीं है।" इस प्रश्न पर मैं एक बात और भी गीता-प्रेमी सजनों के विचारार्थ उपस्थित करता हूं , वह यह कि अगर ये ७० श्लोक अन्यों की अपेक्षा प्राचीन न भी माने जायं और यही सिद्ध हो जाय कि जावा या वाली वालों ने चुन चुन कर जिन्हें सर्वोत्तम माना उन श्लोकों को सुरक्षित रक्खा हो, तौं भी इन ७० का मान्य करना उचित .ही हैं, क्योंकि जहां वे अन्यों से उत्तम माने जा कर चुन लिये गये, वहाँ खास बोत विचारणीय यह है कि इतने श्लोकों में समस्त गीता का आशय आजाता है। और श्लोकों की परस्पर सङ्गति बड़े ही उत्तम प्रकार से लग जाती है, जिसे पाठक वहीं देखेंगे। इस लिये मैं बालो वाले ७० श्लोकों का मान्य करता हूं- वे अन्य श्लोकों से प्राचीन हैं तव तो माननीय हैं ही, पर ऐसा न हो तो भी ७०० में से चुने हुये हाने के कारण भी श्रद्धा-पात्र हैं।

प्राचीन भगवद्गीता चौथा अध्याय । श्लोकों की संख्या । वाली द्वीप से जो गीता आई है उस में कई श्लोक आधे कई एक पादमात्र हैं, इस लिये पाठकों के सूचनार्थ मैं यहाँ एक चक्र में उनकी संख्या दिये देता हूं :--- बाली की गीता-श्लोक सचो । अध्याय पूरा श्लोक ३ श्लोक, १ श्लोक, १ श्लोक, विशेष हैं , १ १ ... ... ... ... प्रथम दूसरा १४ तीसरा ३ चौथा ६ पांचा १ छठवां सातवा आठवां ३ नवा ३ दसवा ग्यारहवां तेरड्या चौदहवां ... १ . .. ... ... १ ४ ३एकशब्द अधिक है ... अठारहवां १ जोड़ ५७ है भूमिका २५ इस प्रकार ५७ पूरे श्लोक हैं, तीन पाद वाले ५, आधे १७ और एक पाद वाले हैं। इन आधे चौथाई को पूरे श्लोकों में लेखा लगाने से ७१॥ साढ़े इकहत्तर श्लोक होते हैं। मैंने आधे चौथाई श्लोकों को पूरे के साथ लगा दिया है, जिससे संख्या ७० की ही ठीक लग जाती है, अतः इसका "सत्तर श्लोकी गीता" नाम रक्खा जाना सार्थक है। पांचवां अध्याय । ७० श्लोकी गीता को सूची । इन श्लोकों में क्या क्या विषय आगये हैं, यह बतलाने के लिये मैं यहां इसकी एक सूची बनाये देता हूं:- (१)--प्रथम दो श्लोकों में पहले अध्याय के ४७ श्लोकों का संक्षिप्त तात्पर्य आ जाता है। (२) तीसरे, चौथे श्लोकों को साथ पढ़ने से ज्ञात होता है कि वर्तमान गीता के दूसरे अध्याय के तीसरे से १० वें श्लोक तक में जो अर्जुन का वाक्य है वह अनावश्यक है, क्योंकि वह सब बातें तो प्रथम अध्याय में आ ही चुकी थीं। तीसरे के साथ ११वे का सिलसिला बड़ी उत्तमता के साथ मिल जाता है। इसी प्रकार अन्यत्र भी हैं परन्तु मैं विस्तार भय से उनका उल्लेख नहीं कर सकता।

२६ प्राचीन भगवद्गीता (३) बौथे से आठ तक जीवात्मी के अजर अमर अवि- नाशी होने का ज्ञान बतलाया गया है जी सांख्यदर्शन का सारांश है। (वर्तमान गीता में १११ से २३० तक में इसी का विस्तार है। (8)-११वें श्लोक में निष्काम कर्म का उपदेश दिया हैं (५)---१२वें से १६ वें तक में “योग" का उपदेश है। वर्तमान गीता में २०३८ से १७२ तक में इसी का विस्तार - (६)---१७ से १६ तक कर्म काण्ड का उपदेश है। जो वर्तमान गीता के तीसरे अध्याय के ४३ श्लोकों का सारांश हैं। (७)--.-२०-२२ तक पुनर्जन्म (कर्म के फल निमित्त आवाग- मन आवश्यक है ) कहा गया। (८)---२३ चे से २६ चे तक ज्ञान काण्ड का उपदेश है (जो वर्तमान गीता के ४ थे, पांचवें अध्यायों का सारांश है)। (e)–२७ वें में कर्म काण्ड की महिमा है। (१०)-२८ वें ले ३२ तक योग (भक्ति का महत्व दर्शाया है। (११)-३३ वें में उस योग (जीवात्मा के परमात्मासे मिल जाने के उद्योग) का फल बतलाया हैं। (१२)-३४ वें से ३८ वें तक परमात्मा की सर्वव्यापकता दशायी है। (१३). "३६ चे से ४२ वें तक भकों के कर्तव्य बतलाये हैं।

भूमिका
0
(१४)...४३ वें में भगवान की भक्ति कैसे करे यह बतलाया
(१०)...४४, ४५३ में भक भगवान का दर्शन किस रूप में
करे, यह बतलाया है।
(१६)."४६ वे में भगवान का दर्शन पाने का सुगम उपाय
( निष्काम कर्म ) बतलाया है। (इस को श्लोक संख्या ११ से
मिला कर पढ़िये)।
(१७)."४७ वें से ५४ वें तक परमात्मा के विभूतियों का
वर्णन है। इससे अभिप्राय यह है कि मुमुक्षु प्रभु परमात्मा
को सर्वान्तर्यामी रूपमें सर्वत्र रमा हुआ देखने का अभ्यास करे
इसी का विस्तार वर्तमान गीता का दसवां अध्याय है।
(१८) ५५ वें में परमात्मा के विश्व-रूप का वर्णन है।
(१६).."५६ वे में यह कहा है कि मनुष्य अपने इनहीं
आंखों से परमात्मा के रूपका दर्शन नहीं कर सकता।
(२०).."५७ में परमात्मा का विश्वरूप दर्शन ।
(२१)...५८ में अर्जुन की ओर से स्तुति ।
(२२)...५६, ६० में अर्जुन का विश्व-रूप परमात्मा को
नमस्कार।
(२३)."६१,६२ परमात्मा का दर्शन कौन कर सकता है।
(२४)."६३६४ परमात्मा का सर्व-व्यापक होना दृष्टान्तों
से समझाया गया।
(२५).६५,६६ सत्व, रज, तम का वर्णन ।

२८ प्राचीन भगवद्गीता (२६)."६७,६८ उक्त तीनों गुणों को पार कर लेने [गुणा- तीत बन जाने का उपाय दर्शाया है। (२७). ६६ वें में गुणातीत बन जाने का फल बतलाया हैं। (२८) .७० वे में गुणातीत बना हुआ महात्मा फिर क्या करे? वह परमात्मा के शरणागत हो जाय । - छठवां अध्याय । इस गीतो की अपूर्वता । ऊपर सूची द्वारा पाठकों ने यह शात कर लिया है कि भगवद्गीता जिन उपदेशों के लिए प्रख्यात है वे सब ही प्रायः संक्षेप रूप से इन ७० श्लोकों में आ गये हैं। आरम्भ में शरीर और जीवात्मा का भेद बतला कर पर- मात्मा का वर्णन किया गया है। फिर कर्म, उपासना (भक्ति), ज्ञान (जो वेदो के तीन विषय कहलाते हैं ) का वर्णन आया है। कर्म और उपासना दोनों का साथ कर देने का उपाय निष्काम कर्म है, वह भी आ गया है। उपासना का एक अङ्ग “योग" [समाधि ] है, उसका भी विवरण कर दिया गया हैं और अन्त में सर्वोच्च दरजे वाले गुणातीत का भी वर्णन आ गया है। इस प्रकार भगवद्गीता के ७०० श्लोकों में जो कुछ है, भूमिका २६ वह सब * ही बीज रुप से इन 8 श्लोकों में आ गया है। हां! कोई बात संक्षेप में और कोई विस्तार में हैं। हम देखते हैं कि जिस बात को सबसे ज्यादा वि तार के साथ और जोरदार शब्दों में कहा गया है वह परमात्मा के सनन्यापक होने का सिद्धान्त हैं। ७० में से २५ श्लोक इसी विषय को समझाने के लिये आये हैं। वर्तमान गीता के दो अध्याय [१० वां, ११ वां] पूरे तथा अन्योंके भी कुछ भाग इसी सिद्धान्तके अर्पण किये गये हैं। इससे यह भली भांति स्पष्ट हो जाता हैं, कि गीता (उप- निषदों वेदों के आधार पर) मनुष्यों को यह दर्शाती है कि तुम्हारा इष्टदेव तुमसे दूर नहीं है, वह घट घट व्यापक सर्वान्त- र्यामी है, उसको जहां दुढ़ोगे वहीं पा जावोगे। वर्तमान गीता के दसवें अध्याय में जो विभूतियों का वर्णन आया है, उसका अभिप्राय केवल यही है कि जो ईश्वर-भक्त अभो प्रत्येक २ वस्तु में ब्रह्म का दर्शन नहीं कर सकता, वह संसार के खास २ वीज़ों ही में ब्रह्म का दर्शन करे। जैसे कहा है कि "वृक्षों में मैं पीपल हूँ" इसका तात्पर्य यह है कि प्रथम तो उपासक को उचित है कि प्रत्येक प्रत्येक घृक्ष में ब्रह्म परमात्मा को व्यापक देखने का परन्तु वैतवाद-जीव, ब्रह्म, प्रकृति. इन तीनों के अनादि होने का सिद्धान्त जो वर्तमान गीता के १३ वें अध्याय के १६-२२ तथा १५वें म० के १६, १७वें श्लोकों में वर्णन किया गया है, इल ७० श्लोकी गीता में नहीं है। कोई इसका प्रसंग भी यहींबा । .

३० प्राचीन भगवद्गीता अभ्यासी बने, लेकिन जो अभी इतना उन्नतात्मा न हो कि सब वृक्षों में परमात्मा को देख सके, वह कम से कम यही भावना धारण करे कि पीपल के पेड़ में मेरा मालिक प्रभु विराजमान हो रहा है इत्यादि। यह विषय हमारो इस गीता में है श्लोक संख्या ४७ से ५४ तक में आया है। पाठकों को ज्ञात हो कि वर्तमान गीता के ११ वें अध्याय में जो विश्वरूप दर्शन आया है, इससे अनेक लोग भ्रम में पड़ गये हैं, परन्तु वस्तुतः उसका अभिप्राय और कुछ नहीं है सिवाय इसके कि परमात्मा को सर्वत्र व्यापक देखा जाय। भगवान श्री कृष्ण जी ने अर्जुन को दसवें अध्याय द्वारा खास खास चीज़ों में परमात्मा को देखने का ज्ञान देकर ग्यारहवें अध्याय में यह समझाया कि अव एक पग और आगे बढ़ामो तो देखोगे कि ब्रह्म परमात्मा साक्षात् सामने विराजमान हैं। एक बात जो इस.७० श्लोको गीता पर मनन करने ले मैंने ज्ञात कर पाया है, पाठकों को सुनाता हूं.- वर्तमान गीता में ११३ अध्याय के १५ वे से ३१ व श्लोक तक अर्जुन से लम्बी स्तुति कराई गई है, परन्तु इस प्राचीनं गीता में केवल दो श्लोक ( ५८.५६) स्तुति के आये हैं और इनमें परमात्मा के उस रुप का संकेत है जो रणभूमि में हो सकता है, या जो एक शूरवार योद्धा के मन में युद्ध-अमि, में जाकर डट जाने पर आना स्वभावतः सम्भव है। । अवश्य ही सूक्ष्म विचार करनेवाले गीता-प्रेमी सजना को यह मानना भूमिका पड़ेगा कि वर्तमान गीता में इस स्थल पर जो (१५-३१) सत्रह श्लोकों में स्तु नि वर्णन की गई है उनमें से केवल ये ही दो श्लोक प्रसंगानुकूल और प्राचीन हो सकते हैं। हो सकते हैं। अन्य श्लोकों जो "ब्रह्मा, शिव, पि, सर्प आदिकों को आपके शरीर में देखता ह" (११-१५) इत्यादि बातें कही गई हैं वह अप्रासङ्गिक होने के सिवाय अनैदिक भी हैं। क्योंकि ब्रह्मा विष्णु शिव इत्यादि देवताओं के ऐसे रूपों (कि विष्णु की नाभि से कमल उत्पन्न होकर उससे ब्रह्मा उपजे "कमलासनस्थं" का वर्णन तो पुराणों: में ही आया है। प्राचीन ग्रन्थों (वेदोउपनिषदों आदि) में ऐसी बातों का लेश मात्र भी नहीं है, अतः मानना पड़ेगा कि वर्तमान, गीता की ११ वें अध्याय का यह १५ वां (तथा ऐसे अन्य ) श्लोक पुराणों के वन चुकने के पश्चात् भगवद्गीता में मिलाये गये होंगे। हमारी इस ७० श्लोकी गोता में कोई ऐसी बात नहीं पाई जातो, जो आधुनिक काल की गढन्त हो और प्राचीन आर्ष ग्रन्थों से विपरीत हो, इस लिये निस्सन्देह हमें इन ७० श्लोकों को अन्यों की अपेक्षा प्राचीन मानने पर विवशत होना पड़ता है। अन्त में एक बात और कथन करके मैं इस भूमिका को समाप्त करता हूं:- गीता के अन्तिम श्लोक "सर्व धर्मान्०" पर विद्वानां में बड़ा भ्रम फैला हुआ हैं कि यह कैसा उपदेश है कि "सारे धर्मों को छोड़ दो" -इस पर शङ्का होती है कि धर्म कर्मों

३२
प्राचीन भगवद्गीता
को छोड़ कर क्या अधर्मी बन जाय ? इस शङ्का का उत्तर
यद्यपि विद्वानों ने अनेकों प्रकार दिये हैं, परन्तु पूर्णतया समा-
धान नहीं हुआ। हर्ष की बात है कि हमारी इस ७० श्लोको
गीता ने इस समस्या को बहुत उत्तमता पूर्वक हल कर दिया
है। कैसे? इसको जानने के लिये पाठक ७० चे श्लोक को
टिप्पणी को
पढ़
ऐसी अनेकों लाभ दायक बातें हैं जो इस प्राचीन गीता को
ध्यान से पढ़ने और मनन करने से ज्ञात होगी और आशा है कि
गीता प्रेमी सजन गण उनसे यथेष्ठ लाभ प्राप्त करते हुए मेरे
परित्रम को सफल करेंगे इत्योम् शान्तिः ।
शुभम् भवतु जगताम् ।
१३८ अतरसूया, प्रयाग।
बैसाख, कृष्ण, १२ संवत् १६८२ वि०
(२० अप्रेल १९२५)
--
सर्वहितैच्छु ।
मंगलानन्द पूरी संन्यासी

ॐ प्राचीन भगवद्गीता। (७०० के स्थान में ७० श्लोक) यह ७० श्लोकी गीता “दृष्ट्वेमं० श्लोक से आरम्भ होती है। पहला श्लोक यह है:- दृष्ट्वेमं खजनं कृष्ण युयुत्सु समुपस्थितम् । न च श्रेयोऽनुपश्यामि हत्वा खजन माहवे । नकांचे विजयं कृष्णा न च राज्यं सुखानि च ॥१॥ (भवद्गीता अ० १ श्लो० २८, ३१, ३२) अर्थ-(अर्जुन ने कहा ) हे कृष्ण! अपने निज लोगों को युद्ध की इच्छा से यहां पर एकत्र हुए देख कर (मैं दुखी हो रहा हूं)। (क्योंकि इन खजनों को मार कर मैं अपना कल्याण नहीं देखता। हे कृष्ण! इस प्रकार के विजय, राज्य और सुख की मुझे तनिक भी आकांक्षा नहीं है। पदिमाय प्रतीकारमा पत्र पाशवः .

३४ प्राचीन भगवद्गीता में धार्तराष्ट्र रणे इन्युस्तन्मे क्षेप तरं भवेत् ॥२॥ (भ० गी०१।३२ ४६) अर्थ:--बल्कि अगर ऐसा हो कि मैं स्वयं न तो बदला वाला बनू और न शस्त्रों को हाथ में धारण करू', इस दशा मुझ को धृतराष्ट्र की सन्तान (दुर्योधनादि ) मार डालें, तो अवश्य मेरा कल्याण हो जाय । क्लै व्यं मास्म गमः पार्थ नैतत्वय्युप पद्यते । क्ष हृदय दौर्बल्यं त्यक्तोत्तिष्ठ परंतप ॥ ३ ॥ (म० गी० २।३) सङ्गति---अर्जुन की उक्त बातें सुन कर श्रीकृष्ण जी महाराज ने उत्तर दिया... अर्थ-हे पार्थ ! ऐसा नामर्द मत बना तुझे यह शोभा नहीं देता । अरे शत्रु ओं को ताप देने वाले ! अन्तःकरण की इस चुद्र दुर्वलता को छोड़ कर (युद्ध के लिये ) खड़ा हो. जा। अशोच्यानन्वशोचस्त्वं प्रज्ञावादाश्च भाषसे । गतासूनगताश्च नानुशोचन्ति पण्डिताः॥४॥ (म० गी० २ । ११). सङ्गति-वह अन्तःकरण की दुर्वलता क्या है ? यह बतलाते हैं। अर्थ-(और हे अर्जुन!) जिनके बारे में शोक नहीं करना चाहिये, तू उन्हीं के लिये शोक कर रहा है। तू तोहानियों की प्राचीन भगवद्गीता । ३५ जैसी बातें कर रहा है (पर शानी नहीं हैं, क्योंकि वे पण्डित लोग तो किसीके प्राण जाने न जाने का शोक नहीं किया करते। देहिनोऽस्मिन यथा देहे कौमारं यौवनं जरा । तथा देहान्तरमाप्तिर्षीरस्तत्र न मुखति ॥५॥ (भ० गी०२।१३) सङ्गति-क्यों नहीं करते ? यह बतलाते हैं। अर्थ-जिस तरह इस देह में लड़कपन, जवानी, बुढ़ापा हुआ करते हैं (शरीर की दशा बदलती रहती है) इसी प्रकार इस देहवाला (जीवात्मा) इससे निकलने पर दूसरा देह पा जाता है (ऐसा समझ कर) वे धीर लोग किसी के मरने जोने का शोक नहीं किया करते । नासतो विद्यते भावो नाभावो विद्यते सतः । उभयोरपि दृष्टोऽन्तस्त्वनयोस्तत्व दर्शिभिः ॥६॥ (भ० गी०२।१६) सङ्गति-और अगर यह शंका हो कि संसार में मरना याने नाश हो जाना तो देखा ही जाता है, फिर शोक क्यो न किया जाय--तो उत्तर यह है... आवागमन पर यहां दृष्टान्त दिया गया है। जैसे लड़के का शरीर जवान हो जानेपर यद्यपि शरीरका आकार बदल जाता है, पर जीवात्मा वही बना रहता है। इसी प्रकार दूसरा जन्म लेने पर भो यद्यपि परीर बदल जाता है पर जीवात्मा वहोबना रहता है। इस परमति याहै:- बोनिमये'प्रश्यन्तेपरोस्वाव देहिनामक उपनिषा..] .

प्रायोन भगवद्गीता। अर्थ-असत् ( नेसती Non-Existence) से भाव (हस- ती Existence या उत्पत्ति ) नहीं हुआ करता, और सत् का अभाव (हसती से नेसती) नहीं हो सकता। इन दोनों के अन्त (असलियत) को तत्वदर्शी फिलासफर लोगोंने देख लिया है (१) अन्तवन्त इमे देहाः नित्यस्योक्ताः शरीरिणः । भनोशिनोऽप्रमेयस्य तस्माधु द्धयख भारत ॥ ७ ॥ (म० गी० २११८) . सङ्गति-ऊपरी श्लोक में आये सत् अअत् से यहाँ क्या तात्पर्य है, यह बतलाते हैं... अर्थ--ये देह [ असत् होने से ] अन्त वाले हैं और शरीर के मालिका जीवात्मायें ] सदा [सत होने से ] नित्य ( अन्द न होनेवाले) कहे गये हैं। हे भारत ! वह [जीवात्मा] तो अविना- शी और अप्रमेय [ अचिन्त्य ] है, इसलिये[तू उस के मरने या . (१)माशय यह है कि जीवात्मा "सत" पदार्थ है और सत्[ हस्ती वस्तु कभी असत [अभाव ] या नेसती नहीं हुआ करती. इसी कारण जीवात्मा का प्रभाव [ नेसती अर्थात माश नहीं हो सकता। शरीर के मरने पर भी वह बना रहता है, इसलिये शरीर से जीव के निकल जाने का शोक करना मुखों का काम है, ज्ञानियों का नहीं। इस पर यह श्रुति है - नासदालीनो सदासीलदानी नासौदजो भो व्योमा परोयत। [द प्राचीन भगवद्गीता। --- --- मारे जाने की फिक्र छोढ़ कर] युद्ध में डट जा(१) । य एनं वेत्ति हन्तारं यश्चेन मन्यते इतम् । उभौ तौ न विजांनीतो नायं हन्ति न हन्यते ॥८॥ (भ.गी. २०१६) अथ-[क्योंकि ] जो कोई इस (जीवात्मा) को मारने वाला मानता है और जो मारा जाने वाला मानता है, वे दोनों असलियत को नहीं जानते [ कारण यह कि ] वह न तो मारता है न मारा जा सकता है । (२) ख धर्मपपि चावेक्ष्य न विकम्पितुपर्हसि । धाद्धि युद्धाच्छ्रेयोऽन्यत्तत्रियस्य न विद्यते ॥६॥ (भ० गो०२।३१) सङ्गति-अच्छा अगर जीवात्माके अमर होनेकी बात पर ध्यान न भी दिया जाय, तो भी अर्जुन को युद्ध से इनकारी न बनना चाहिये था, क्यों? सुनोः... अर्थः-अपने धर्म का ख्याल करके भो तुझे (युद्ध से) नहीं (१) इस पर यह श्रुति है:- मजायते म्रियते वा विपश्चिमायं कुतश्चिन्न बभूव कश्रित् । [कठो०३११८] (२) क्योंकि मरना शरीर का धर्म है, परन्तु जीवात्मा अमर है। इस पर यह अति है इन्ता चेन मन्यतेहन्तुहतम्चेन् मन्यते हवम् । [१०२११६] ४ प्रामोन भगवद्रीता। डिगना चाहिये, [-क्योंकि क्षत्रिय के लिये तो युद्ध रूपी धर्म से (१) यह कर श्रेय (कल्याणकारी) और दूसरा कोई काम नहीं है। इतो वा प्राप्स्यसि स्वर्ग जित्वा वा भोक्ष्यसे महीम् । तस्मादुत्तिष्ठ कौन्तेय युद्धाय कृत निश्चयः ॥ १०॥ (भ.गी०२।३७) सङ्गति--वह कल्याणकारी कैसे है सुनो... अर्थ-अगर तू युद्ध में मारा जायगा तो स्वर्ग को पायेगा और अगर जीत लेगा तो पृथ्वी का राज्य भोगेगा (अतः दोनों हाथ लड्डू हैं) इसलिये है कोन्तेय ! उठो, युद्ध के लिये निश्चय करके खड़े हो जाओ। कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन । मा कर्म फल हेतुर्भूर्मा ते संगोस्त्वकर्मणि ॥११॥ (म० गी०२।४७) सङ्गति-अगर अर्जुन यह कहे कि युद्ध में मार काट रूपी निर्दयता का अनुचित व्यवहार क्यों कर ? तो भगवान उत्तर देते हैं... अर्थ-तेरा अधिकार कर्म करने ही में हैं. किन्तु फल भोगने में नहीं है। कमों के फलों के कारण.मत बनो (अमुक फल मिले यह हेतु मन में रख कर काम करने वाले मत बनो) . (१) इस पर मनुस्मृति का प्रमाण देखो ७ लोक ४, ६५ | प्राचीन भगवद्गीता । है । और तेरा सङ्ग अकर्म में न हो (अर्थात कर्म करना छोड़ भी मत देना) (१) सिद्धथसिद्धयोः समो भूत्वा समत्वं योग उच्यते । श्रुति विमति पन्ना ते यदा स्थास्यति निश्चला। समाधावचला बुद्धिस्तदा योग मवाप्स्यसि ॥ १२ ॥ (भ० गी० २।४८, ५३) सङ्गति -उक्त प्रकार के निष्काम कर्म करने में सुगमता कैसे हो? सुनो... अर्थ-सफलता असफलता में समान रहना (सफलता होने पर खुशी के मारे फूल कर कुप्पा न बन जाना, और असफ- लता पर दुःख से व्याकुल न होना) चाहिये । ऐसी समता ही योग है ।(२) ( नाना प्रकार के ) वेद-बा- (१) यह निष्काम फर्म का उपदेश है कि कम तो करो परन्तु उसके फल की इच्छा मत रक्खो। कमों को केवल अपना कर्तव्य मान कर करो, इस पर ये श्रुतियां हैं:- १ . ईशावास्य तेन त्यक्तन मुजीथाः। २ कुर्वन्न यह कर्माणि॥[यजु०४०। १,२] अर्जुन से कहते हैं कि युद्ध करना तेरा कर्तव्य कर्म है, इसीलिये उसे करना ही चाहिये। (२) "योग" शब्द का अर्थ है "मिलना और भावार्थ में जीवात्मा का परमात्मा के साथ मेल मिलाप होने को "योग" कहते हैं। हमारा परमात्मा के साथ योग कब होगा? यहां श्री कृष्ण जी बतलाते हैं कि जब हम सफलता असफलता को बराबर समझने लग जायगे तभी यी [ईश्वर भक्त] बन प्राचीन भगवद्गीता। क्यों(१)ले दुविधा में पड़ी हुई तेरी बुद्धि जव समाधि वृति (२) में स्थिर और निश्चल हो जायगो, तब तू योग को प्राप्त कर लेगा। *अजहाति यदा कामान् सर्वान् पार्थ मनोगतान् । आत्मन्येवात्मना तुष्टः स्थित प्रज्ञस्तदोच्यते ॥ १३ ॥ (भ० गी० २।५५) सङ्गति- अब समाधि में अवल होने वाले का लक्षण बतलाते हैं... अर्थ-हे पार्थ! जब वह ( योगी मन में आनेकालो) सारी कामनाओं को छोड़ देता है और आत्मा(३)ले आत्मा में सन्तुष्ट रहता है, तब वह "स्थित प्रक्ष” (अचल बुद्धिवाला) कहलाता है। (१) एक वेद वाक्य कहता है कि "यश करोगे तो स्वर्ग भिलेगा", दूसरा कहता है दान दोगे तो अगले जन्म में धनाढ्य बनोगे", तीसरा यह है कि "विया पढ़ाओगे तो स्वयं विद्वान बनोगे इत्यादि २ वाक्यों ले मनुष्यका मन स्वभावतः उन उन कर्म पर ललचाता है। परन्तु जो मनुष्य ब्रह्म को पाना [मुक्ति में जाना ] चाहे, वह उक्त कमों में न फंसे किन्तु मन को सब ओर से हटा कर समाधि में लगा देवे तभी सफलता प्राप्त होगी। (२) जिसका रूप ध्यान किया जाय उसके स्वरूप में कायम और अपने रूप को भूल जाना, समाधि कहलाता है। * एक पाउ [ यदा संहरते भी दियो हुआ है। (३) आत्मा से आत्मा में संतुष्ट रहना यह है कि जीवात्मा अपने प्रभु परमात्मा ही के चिन्तन में लीन रहे। "मात्मा" शब्द वेदान्त ग्रन्थों में, जीवात्मा तथा परमात्मा दोनों के लिये प्राता है। इस पर यह श्रुति है।

प्राचीन भगवद्गीता। दुःखेष्वनुद्विग्नमनाः सुखेषु विगतस्पृहः । वीत राग भयक्रोधः स्थितधी, निरुच्यते ॥१४॥ (भ० गो० २।५६) अर्य-जिसके मन को दुःख में खेद नहीं होता और न सुख में आसक्ति होती है, जिसने प्रीति, भय और क्रोध को छोड़ दिया है, वह मुनि स्थित-धीः ( अवल बुद्धि वाला ) कहलाता है। विषया विनिवर्तन्ते निराहारस्य देहिनः । रसवर्जरसोऽप्यस्य परं दृष्टबा निवर्तते ॥१५॥ (भ० गी० २१५६) सङ्गति-प्रश्न-यह जो ऊपर कहा है कि सुख में आसक्त न होना अचल-बुद्धि वाले का लक्षण है, तो यतः गरीब निर्धन लोग भी सुखों से दूर रहा करते हैं, इसलिये क्या उनको भी अच- ल बुद्धिवाला मान लिया जाय ? इस प्रश्नका उत्तर देते हैं कि... अर्थ-निराहारी मनुष्य (जिसे खोन, पान या अन्य सुख सामग्री नहीं मिलती ) के विषय भोग तो छूट जाते हैं, परन्तु उनकी बासना नहीं छूटती (मन में उन अप्राप्त विषयों का मनन होता रहता है।) अलवत्ता परब्रह्मपरमात्मा को देख (१) लेने पर वासनायें भी निवृत्त हो जाती हैं। आत्म क्रीडात्म रतिः क्रियावानेप ब्रह्म विदां वरिष्टः ।। [मुपखक उ०५॥४] (१) देखने से ज्ञान रष्टि से देखना भर्यात साक्षाकार लेना अभीष्ट है।

प्राचीन भगवद्गीता। या निशा सर्व भूतानां तस्यां जोगति संपपी। यस्यां जाग्रति भूतानि सा निशा पश्यतो मुनेः ॥ १६ ॥ (भ० गी०२१६६) सङ्गति-ऐसे परमात्मा का दर्शन कर लेने वालों की दशा किस प्रकार की होती है ? सुनो... अर्थ-सर्व साधारण लोगों को जो रात होती है उस में वे संयमी (परमात्मा के दर्शन करने वाले योगी) लोग जागते हैं, और जिस अवस्था में वे दुनियादार लोग जागते रहते हैं वह उन योगियों की रात्रि है ।(१) देवान भाव यतानेन ते देवा भावयन्तु वः । परस्परं भावयन्तः श्रेयः परमवाप्रपथः ॥ १७ ॥ (भ० गी० ३१११) सङ्गति-जो लोग ऊपरी श्लकों के अनुसार अभी योगी (१) यहां रात दिन अलंकारिक भाषा में पाये हैं। अभिप्राय यह है कि योगियों की दशा सांसारिक लोगों से सवथा उलटी रहती है ये दुनियादार लोग तो विषय भोगों में लिप्त रहना हो मात्र परम उद्देश्य मान गैठे हैं; परन्तु वे ब्रह्मज्ञानी इन दुनियावी मुखों पर लात मार कर आगे बढ़ रहे हैं। श्रतःमानो सांसारिक मोगोंने फलना उनकी रात्रि है और परमार्थ चिन्तना ही उनका दिन है। अर्जुन से श्री कृष्णजी कहते हैं कि तू उधर हो या इधर ! कहीं दोनों से भ्रष्ट न हो जो कि धोबो का कुचान घर का रहेन भाट का । भवाद योगी नहीं बन सकता, इसलिये कर्मकाण्डो[दुनियादोर ] हो बना रहमांव युद से पृथक मत हो।

प्राचीन भगवद्गीता। RANS- -- नहीं बन सकते, वे कर्मकाण्डी ही यने रहें, यह उपदेश यहां करते है... अर्थ-.--देवताओं को (अपने यज्ञ कर्मों से ) प्रसन्न करोगे तो वे खुश हो कर तुम्हारा कल्याण करेंगे। इस प्रकार एक दूसरे को प्रसन्न करते हुए परम कल्यण को प्राप्त कर लोगे (१) यज्ञशिष्टाशिनःसन्तो मुच्यन्ते सर्व किल्विषैः । भुजते ते त्वघं पापा ये पचन्त्यात्म कारणात् ॥१८॥ (भ.गी०३।१३) सङ्गति---यज्ञ(२) हो से देवता प्रसन्न हुआ करते हैं, इसलिये यश की महिमा सुनो... अर्थ---यज्ञ से बचे हुए पदार्थों को खाने वाला सन्त सब पापों से छूट जाता है। परन्तु जो लोग केवल अपने लिये ही भोजन पकाते हैं वे मानों अपने पापों को खा रहे हैं ।(३) (१) अर्जुन को यह संकेत करते हैं कि युद्धरूपी ज्ञान-धर्म [कर्म] द्वारा रुद्र भगवान को प्रसन्न करना हो उस समय परम कर्तव्य था। २) यशी वै विष्णुः (शतपथ । (३) मनुस्मृति तथा शतपथ ब्राह्मण में पांच महायज्ञ प्रति दिन करने कावधान है, अतः १संध्या कर के २ हवन कर के, ३ बलि वैश्व द्वारा कुत्ते शादि का भाग देवर, ४ पितरों को लिखा कर, ५ अतिथि अभ्यागतों को भोजन करा लेने के पश्चात गृहस्थी स्वयं भोजन करे. ऐसा न करने वाले पापीहोंगे। अर्जुन को प्रादेश देते हैं कि युद्ध कर के राज्य प्रास वर-लेवें तो खूब दान, पुल्य, यज्ञ हवनादि कर सकेगा।

४४ प्राचीन भगवद्गीता । श्रेयान् खघोविगुणः पर धर्माद खनुष्ठितात् । खध निधनं श्रेया पर धर्मो भयोवहः॥१६॥ (भ० गी०३१३५) सङ्गति---यज्ञां का अनुष्ठान धर्मात्मा लोग ही कर सकते हैं, इसलिये धर्म का विवरण सुनो... अर्थ---अपना धर्म खराब प्रतीत होता हो, तो भो दूसरे के धर्म को बहुत उत्तम प्रकार पालन करने से भी वह श्रेष्ठ ही है। अपने धर्म में मरना भला है, किन्तु दूसरे का धर्म अपने को भयदायक हो है।(१) बहूनि मे व्यतोतानि जन्मानि तव चार्जुन । तान्यहं वेद सर्वाणि नत्ववेत्थ परंतप ॥ २० ॥ (भ.गी०४।५) सङ्गति-पूर्व में जो धर्म का महत्व कहा है, उस पर कोई यह शंका करे कि धर्म करने में कष्ट उठाना वृथा है क्योंकि कई (१) “ यहां बर्णाश्रम धर्म से अभिप्राय है। ब्राह्मण का धर्म पड़नो पढ़ाना धादि है. तथा क्षत्रिय का दुष्टों को मार कर धर्मात्माओं की रक्षा करना। यहां अर्जुन को कहा गया है कि क्षसिय है, युद्ध करना तेरा धर्म है। उसे छोड़ कर जो भागा जाता है यह तेरी मारी भूल है। अरे क्षात्र धर्म कितता ही खराव क्यों न हो, पर वह तेरे लिये तो अच्छा ही है। कई लोग "धर्म" से मत मतान्तरों तथा मज़हबों का तात्पर्य लेते हैं पर वह प्राथय यहां नहीं है। कृष्णाजुन संवाद के समय तक संसार भर में केवल एक वैदिक धम था. ये "मजहब" वो पीछे चले हैं।

४५ पायेंगे। प्राचीन भगवद्गीता । धर्मात्मा लोग दुःखी देखे जाते हैं ? तो इस के उत्तर में यहाँ आवागमन का उपदेश करते है कि वे दुःखी तो पूर्व जन्मों के कर्म फलों से होते हैं परन्तु अव जो धर्म करते हैं उसके फल में अगले जन्मों में सुख अर्थ-हे अर्जुन! मेरे और तेरे भी बहुतेरे जन्म चीत चुके है, किन्तु मैं उन सव (जन्मों के हालत ) को जानता(१)हू, परन्तु हे परन्तप! तुम नहीं जानते। यदा यना हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत । अभ्युत्थानपधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम् । परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम् ॥ २१ ॥ (भ० गी०४।७,८) सङ्गति-अब यह बतलाते हैं कि किन दशाओं में श्री कृष्ण जी या ऐसे महान योगी लोग संसार में आ कर जन्म अर्थ हे भारत! जब जब धर्म की ( संसार में ) कमी और अधर्म की ज्यादती हो जाती है, तब तब मैं साधुओंकी रक्षा करने और दुष्टों को नाश करने के लिये अपने को सृजता हूं (२) (२)श्रीकृष्ण जी अपने पूर्व जनसों को क्यों कर जानते थे? इसका उचर यह है कि योगी थे और योगबल से सब कुछ प्रत्यक्ष हो जाता है। (२) "भपने को सृजता" यह वाक्य श्रीकृष्णाजी का है, जिसका अमि- प्राव यह होता है किभोकृर जी महाराज अपने योग बल से जब उचित अममते हैं तब मानुषी शरीर धारवा लेते हैं।

४६ प्राचीन भगवद्गीता जन्म कर्म च मे दिव्यमेवं यो वेति तत्वतः । त्यक्त्वा देहं पुनर्जन्म नैति मायेति सोऽर्जुन । न मां कर्माणि लिम्पन्ति न मे कर्म फलेस्पृहा ॥ २२॥ (भ० गी४।६, १४) सङ्गति-योगी लोगों के जन्म और कर्म कैसे होते हैं ? यह बात श्रीकृष्ण जी अपने निजदृष्टान्त से प्रकट करते हैं - अर्थ मेरा (या मेरे जैसे योगियों का) जन्म और कर्म दिव्य ( अदभुत प्रकार का ) है (क्यों कि) न तो कर्म(१) मुझमें (योगी होने से ) लिपटते हैं, और न मैं (परम ज्ञानी होने से) उन, में फंसता हूं। इस बात को जो कोई ठीक ठीक जान लेता हैं वह देह त्यागने पर पुनर्जन्म को नहीं पाता किन्तु हे . अर्जुन! वह मुझ (परमात्मा) को पा जाता है ।(२) अवतारवादी महाशय गण इसी रलोक का प्रमाण अपने पुष्टि में लगाते हैं, परन्तु यहां परमेश्वर के शरीरधारी बनने की कोई बात नहीं कही गई। (२) इस पर यह श्रुति है:- शाह कामस्य स्पृहा, अर्थात जो शात्मज्ञानी हैं उनको कुछ भी किसी काम के फल से प्रयोजन नहीं है। (२) "मुक से अभिप्राय "ब्रह्म परमात्मा से है। श्रीकृष्ण जी ने परमा- मा के स्थान में अपने को क्यों कहा ? इसका उचर यह है कि श्री कृष्ण जी परम योगी थे, इस कारण वे परब्रह्म परमात्मा में इतने लवलीन थे कि अपने को उससे मिन्न नहीं देखते थे। ऐसे पूर्ण योगी महात्मा गय इसी प्रकार बोसा करते हैं, इसका प्राचीन प्रमाण भी मिसता है-हदारण्यक उप.

प्राचीन भगवद्गीता । कर्मण्यकर्म यः पश्येदकर्मणि च कर्म यः । स बुद्धिमान मनुष्येषु सयुक्तः कृत्स्न कर्मकृत् ॥२३॥ (भ० गी०४।१८) सङ्गति---ऐसा कर्म से निस्पृह कैसे बन सकता है ? यह बात यहां बतलाते हैं। अर्थ---जो कोई कर्म में अकर्मको और अकर्ममें कर्म को देखता मिषद् में पायो है कि वामदेव ऋषि ने कहा था कि सूर्य में जो पुरुष प्रकाश दे रहा है वह मैं हूँ “सन्दतत पश्यन्नृपिर्वाम देवः प्रतिपेदेऽहं मनुरभवं सुर्यथेति तद दमप्येताह य एवं वेदाह ब्रह्मासमीति। ( वृहदारण्यक उ०१।४।१०) श्री लोकमान्य तिलक महाराज ने अपने गीता रहस्य के नवें प्रकरण में पृष्ट २३२ पर लिखा है कि:- व्याक अधवा अव्यक्त सगुण ब्रह्म की उपा- सना से ध्याय के द्वारा धीरे धोरे बढ़ता हुया उपासक अन्तमें छहब्रह्मास्मि वृ० १।४।१९ “मै हो ब्रह्म ई" की स्थिति में जा पहुंचता है , और ब्रह्मा- त्मक्य स्थिति का उसे साक्षात्कार होने लगता है. पिर उसमें वह इतना मग्न हो जाना है कि इस वात की और उसका ध्यान भी नहीं जाता कि मै किस स्थिति में है अथवा किस का अनुभव कर रहा हूँ। (यह समाधि योग है जिस में) द्वत का जरा सा भी लव लेश नहीं रहता। पाठकों को ज्ञात होकि योगीराज श्री कृष्ण जी की ऐसी हो स्थितिथी जिस का दिग्दर्शन तिलक महाराज के उपरी वाक्य में कराया गया है। अनः जहां जहां “परमेश्वर की उपासना करो 'कहना उचित था, वहां वहाँ कृष्ण जी ने "मेरी उपासना करो' कहा है इसका अभिप्राय यही है कि मैं जिस अम परमात्मा का प्रतिनिधि हुँ उसकी उपासना करो।

४८ प्राचीन भगवद्गीता । (१) है, वही मनुष्यों में बुद्धिमान है, वही योगी है, और कर्मों को ( यथार्थतया) करने वाला भी वही है (२) ? यहच्छा लाभ सन्तुष्टो द्वन्द्वातीतो विमत्सरः। समः सिद्धावसिद्धौ च, कृत्वापि न निवद्धयते ॥२४॥ (भ० गी०४।२२) सङ्गति- ---अब ऊपरी उपदेश पर अमल करने का साधन बतलाते हैं। अर्थ---यदृच्छा (देव से, अनायास ही) जो कुछ मिल जाय, उसी ले सन्तुष्ट हो जाने वाला, द्वन्द्व (जाड़ा, गरमी, हर्ष, शोक, सुःख, दुःख आदि) से मुक्त रहने वाला, और सफलता असफलता को एक समाव मानने वाला (ज्ञानी पुरुष ) कौ को करने पर भी (उन) के पाप पुण्य में नहीं-फंसता (३) । (१) इस पर श्रुति यह है :-"जानाम्यहं शेवधिरित्यनित्यनाघ्र वैः प्रा- प्यतेहि घ्र वंतत, तो मया नाचिकेत श्चितोऽग्निरनित्यद्रव्यैः प्राप्तवानस्मि नित्यम् ॥ कठो०३।१० (२) अकर्म का तात्पर्य ज्ञान है। कर्मकारही और ज्ञानकाण्डो का परस्पर भारी विरोध जारी था, श्री कृष्ण जी ने उसको बड़े उत्तम प्रकार से सिवा- रण कर दिया है। वे कर्म और ज्ञान का मेल कराते हैं-कर्म करनेवाला अगर निष्काम कर्मी वन जाय तो कर्म उसे न फांसेगे और ज्ञानो अगर परोपकार निमित्त संसार के कार्यों को निस्पृह रूप से चलाता रहेंगा तो उसके ज्ञान में कोई त्रुटि न होगी, यही प्राशय श्री कृष्ण जी का है। (३) अर्जुन को यह सब सुनाने का यह अभिप्राय है कि वहशानी बनना. परेमा कर्मकाण्डी, हर हालत में उसको युद्ध करना ही चाहिये।

प्राचीन भगवद्गीता । ४९. . इन्य यज्ञास्तपोयना योग यहास्तयाऽपरे। स्वाध्याय ज्ञान यज्ञाश्च यतयः संशितव्रताः ॥२५॥ (भ.गी०४।२८) सङ्गति-उसी बात को और पुष्ट करते हैं। . अर्थ-ऐसे ( उक प्रकार से) यती लोग जो तोक्षण व्रतों को धारण करते हैं (अनेक प्रकार के यहाँ का अनुष्ठान करते हैं, जैसे) कोई द्रव्य-यज्ञ (हवन, यज्ञ, दान, पुण्य) करते हैं कोई तप-यक्ष (संसार की भलाई के लिये अपने ऊपर कष्ट(१) उठाने का कार्य) करते हैं, और दूसरे कोई लोग स्वाध्याय या शान- पक्ष(२) में लग जाते हैं (३) सर्व कर्याखिलं पार्थ ज्ञाने परि सपाप्यते । तद्विद्धि प्रणिपावेन परि प्रश्नेन सेवया ॥ २६ ॥ (भ० गी०४।३३, ३४) E१] जैसे पर्तमान समय में स्वर्गवासी लोकमान्य पं० बालगंगातिलकर महाराज तथा महात्मा कर्मचान्द मोहन दास गांधी महाराज श्रन्यों की भलाई के लिये बार बार जेल को चले गये । (२) ज्ञानयश कौन से हैं ? पढ़ना पड़ाना, धर्म चर्चा करना, सत्संग, कथा दाता, व्याख्यान मादि मादि ज्ञान यज्ञ में हो सामिल है। एकान्त सेवन अमचिन्सन धादिज्ञान रूपी महल की ऊंची अटारी है। ३] भर्जुम किस यज्ञ में प्रवृत्त हो? वह "तप यज्ञ" करे अर्थात धर्मा- त्माओं के सिर तोज युधिष्ठिर महाराज को रक्षा के लिये दुष्ट दुर्योधनादि कोबर करे । पेसा करने में अगर अपना गला भी कटाना पड़े तो निस्स- न्देह का देवे प्राचीन भगवद्गीता। सङ्गति-उन व्रतों की समाप्ति कहां होती है, सुनो... अर्थ-हे पार्थ! सब प्रकार के कर्मों ( उक्त प्रतों ) की समा- प्ति ज्ञान में जाकर हो जाती है। उस ज्ञान को पाने के लिये ज्ञानी गुरु लोगों को प्रणाम करो और सेवा करके प्रसन्न कर लो तब प्रश्न(१)करो तो उस ज्ञान को पाओगे (२)। संन्यासः कर्म योगश्च निःश्रेयस करावुभौ । तयोस्तु कर्म संन्यासात् कर्मयोगो विशिष्यते ॥ २७ ॥ (भ० गी०५।२) लति-अगर यह शंका हो कि कभी कर्म और कभी ज्ञान को बढ़ो कार (३) कहा है, फिर किस को श्रेष्ठ माना जाय ? तो उत्तर यह हैं... अथ~संन्यास (8) और कर्म ये दोनों ही कल्याण देने [१] इस पर अति यह है :-"द्विजानार्थ स गुरुमेवा मिगच्छेत् समित पाणिगेत्रियं ब्रझनिष्ठन् । (मुण्डको०२१३।१) [२] अर्जुन ने परम शानी श्री कृष्ण जीको प्रणाम करके श्रद्धापूर्वक प्रक्ष किया था, अतः गोता रूपी इस ज्ञानामृत का उपदेश प्राप्त किया। श्रीकृष्ण जी का अर्जुन को यहां यह उपदेश है कि वह नात्र धर्म पालन करता हुआ पृथ्वी से भार रूपी दुष्टों पापियों को उच्छिन्न कर देखें, तो वेदोती माझा तत्वदर्शी ज्ञानो तथा धर्मात्मा तपल्वो लोग अपने अपने कर्मों में लग जाय. बस फिर संसार में सवंत्रज्ञान यज्ञ ही होने लग जाय। (३) कम यह) का महत्व र १६, १७ वे तोक में कहा है और ज्ञान का महत १२, २५३ में पाया है (४ संप्रांत का श्राशय वेदान्त ग्रन्थों में नमज्ञान का है। "ज्ञानो' .

प्राचीन भगवद्गीता। बोले हैं (परन्तु ) उन दोनों में कर्म संन्यास से बढ़ कर है (१)। योग युक्तो मुनिब्रह्म न चिरेणाधि' गच्छति । सर्व भूतात्म भूतात्मा कुर्चनपि न लिप्यते ॥२८॥ (भ० गी०५।६,७) सङ्गति-दोनों कैसे कल्याणदायक होंगे? यह बतलाते हैं । अर्थ---(ज्ञान) योग से युक्त मुनि ब्रह्म को बहुत जल्दी पा जाता है (क्यों कि ) उस (मुनि) को दृष्टि ऐसी हो जाती हैं वह सब भूतों (प्राणियों) के आत्मा में उस "भूतात्मा" (सव वस्तुओं में व्यापक परमात्मा) को देखता रहता हैं अतः वह (ज्ञानी) कम करने पर भी उसमें नहीं फंसता [२] । यह माना जाता है जिसके मन में हरवत ब्रह्म हो का चिन्तन होगा रहे । (१) यद्यपि वस्तुतः तो ज्ञान (कर्म संन्यास)हो श्रेष्ठ और अन्तिम साध्य है, परन्तु जर्म काण्ड (कर्म योग) को बड़ाई यहां श्रद्धा उपजाने के लिये करते हैं क्योंकि साधारण वर्ग के लोगों को तो प्रथम कर्म में हो प्रवृत्त होना चाहिो नहों ता वे भ्रष्ट हो जायंगे। अतः श्री कृष्ण जो उन साधारण सोगों को समाते हैं कि 'तुम्हारी कल्याण इसी में है कि तुम कर्म को ज्ञान से बढ़कर मान लो तो उस में तुम्हारी श्रद्धा होगी फिः कर्म करते करते चाप ही समय पर ज्ञान के अधिकारी बन जावगे इत्यादि । २] कर्म में फसना (लिप्त हाना ) यह है कि पाप पुण्य करने पर उनके काल में दुख सन्त्र मांगना । ज्ञानो पाप पुण्य करने पर भी सुख दुःख में नहीं सतो. क्शंकि जो वस्तुतः ज्ञानी होगा उसका मन ब्रह्म के ध्यान में इलमा लवलोन रहना होगा कि उसको सुख दुखों का भान तक न होगा। इस पर श्रुति यह है:-"तमात्मस्य येऽनुपश्यन्ति धोशस्तेषां शाम्बिः ५२ प्राचीन भगबद्रीता। उद्धरेदात्मनाऽऽत्मानं नात्मानमवसादयेत् । मात्मैव इयात्मनो वन्धुरात्मैव रिपुरात्मनः ॥ २६ ॥ (भ० गो०६।५) सङ्गति-ऐसा उत्तम जो ज्ञान है, उसके प्राप्ति का अब साधन वतलाते हैं। अर्थ-अत्मा से आत्मा को ऊंचा उठावे, किन्तु आत्मा को नीचे न गिरने देवे (क्योंकि ) आत्मा ही अपना मित्र है और वह स्वयं ही अपना शत्रु है [१] 1 योगी युञ्जीत सततमात्मानं रहसि स्थितः। एकाकी यत चिचामा निराशीर परिग्रहः ॥ ३०॥ (भ० गी०६।१०) संगति--आत्मा को ऊंचे दरजे पर उठाने में सफलता कैसे प्राप्त हो यह बतलाते हैं... अर्थ-योगी ( परमात्मा से मिलने की इच्छा वाला ज्ञानी पुरुष) अकेला रहता हुआ, गुप्त स्थान में निवास करता हुमा, विषयों से वचतो हुआ, परिग्रह (दूसमें से सहायता) न लेता शाश्वती नेतरेषाम् (को०५।१२) (१) प्रत्येक मनुष्य अपने को अच्छे कामों में लगा कर अपने यात्मा को उन्नत बना सकता है। पाप कमों से श्रात्मा नीचे गिरेगी। अतः उससे मचा रहे। अजुन से कहते हैं कि अगर तू अपने प्रात्मा को उसत बनाना चाहता है तो युद्ध से मुंह मत मोड़ क्योंकि ज्ञातिय की आत्मा ऐसा करने से गिर जाती है। अपने भात्माको गिरने न दे किन्तु जंभ उठा।

प्राचीन भगवद्गीता । हुआ, आत्मा (परब्रह्म परमात्मा ) के साथ जुट जावे (मेल मिलाप कर लेवे)। समंकाय शिरोगीवं धारयनचलं स्थिरः । संप्रेक्ष्य नाशिका स्वं दिशश्चानवलोकयन् । स्था दोपो निवातस्थो नेंगते सोपमा स्मृता ॥ ३१॥ (भ० गी०६। १३, १६) संगति-परमात्मा के साथ मिलाप होने का और भी उपाय बतलाते हैं... अर्थ-(वह योगो ऐसा थालन लगाफर योग करने के लिये बैठे कि) सारा शरीर और गला सीधा रहे, हिलने डोलने न पावे (बल्कि) बिलकुल स्थिर रहे। और अन्य किसी भी दिशा की ओर न देखता हुआ केवल अपने नासिका के अगले भाग को देखता हुआ, (ओ३म् का जप और प्रणायाम करना रहे ) वह शरीर को ऐसा अचल रखे जैसे दीपक को ज्योति हवा न चलने पर स्थिर रहा करती है। पाल्पौपम्येन सर्वत्र समं पश्यति योऽर्जुन । सुखं वा यदि वो दुःखं स योगो परमो मतः॥ ३२ ॥ (भ० गी०६।३२) संगति---उससे भी और श्रेष्ठ उपाय परमात्मा को जल्दी पा जाने का बतलाते हैं... अर्थ-हे अर्जुन! जो कोई अपने उपमा से सब जगह सब प्राचीन भगवद्गीता लोगों को (अपने ही) समान सुखी दुखी (१) देखता है वह परम योगी माना जाता है। यो मां पश्यति सर्वत्र सर्वच मयि पश्यति । तस्याहं न प्रणश्यापि स च मे न प्रणश्यति ॥ ३३॥ (म० गी०६।३०) सङ्गति और भी सर्वश्रेष्ठ उपाय परमात्मा की प्राप्ति का बतलाते हैं:- अर्थ जो कोई (योगी या भक्त) मुझ (परमात्मा) को सब जगह और सबको सुझमें देखता(२) है उसको मैं (परमात्मा) नहीं नाश(३)करता हूं, और न वह मुझको नष्ट(४)करता है(५) । (१) अर्थात् यह समझता है कि जैसे मैं दुःख नहीं पसन्द करता. उसी प्रकार अन्य लोग भी नहीं पसन्द करते, अतः जैसे मैं अपने दुःखोंको दूर हटानेका यत्न करता रहता है. इसी प्रकार मेरा कर्तव्य है कि दूसरों के दुःख निवारणार्थ भी पुरुषार्थ करता रहूं। ऐसे परोपकारी योगी से परमात्मा प्रक- ग्य प्रसन्न होंगे । अर्जुन भो परोपकारी धर्मात्मा युधिष्ठिर की रक्षा निमित्त युख करे तो वह परम योगी माना जा सकेगा, यह अभिप्राय श्रीकृष्णजीका है। (२) अर्थात् परमात्मा को सर्व व्यापक देखता है। (३) नाश,तो जीवात्मा का होता ही नहीं क्योंकि वह अजर, अमर, है; परन्तु यहाँ 'नाश" से अभिप्राय पतित होने गिरने, या नरकगामी होनेकाहै। (४) परमेश्वर को नष्ट करना यह है कि उसको भूल जाना तथा उसकी माज्ञा के विरुद्ध काम करनाr (५) इस.पर श्रुति यह है:- नस्तु सर्वाणि भूतान्यात्मन्येवानु पश्यसिसर्व भूतेषु धात्मानं ततोगबिजुगुप्सते, (ईसो०७१मा मजः ४०.) .

प्राचीन भगवद्गीता। -- भूमि रापोऽनलो वायुः खं मनो बुद्धि रेव च । अहङ्कार इतीयं मे भिन्ना प्रकृति रष्टधा॥ अहंकृत्स्नव जगतः प्रभवः प्रलयस्तथा ॥ ३४॥ (भ० गी००।४,६) संगति-भय परमात्मा में श्रद्धा उपजाने के लिये उसकी महिमा वर्णन करते हैं- अर्थ-मेरी (परमात्मा की आठ प्रकार की भिन्न भिन्न प्रकृतियां (शक्तियां ) हैं उनके नाम सुनोः-- -१ भूमि २ जल ३ अग्नि ४ वायु ५ आकाश ६ मन ७ बुद्धि ८ अहंकार-" (१) मैं ( परमेश्वर ) हो इस सारं ( उक्त आठ प्रकृतियों वाले) जगत को रचना और प्रलय करने वाला हूं। पत्तः परतरं नान्यत्किञ्चिदस्ति धनञ्जय । ययि सर्वमिदं प्रोतं सूत्र मणिगणा इव ॥ ३५॥ (भ० गी०७१७) संगति-परमात्मा का और भी महत्व दर्शाते हैं- अर्थ-है धनजय ! मुझ (परमात्मा ) से बढ़कर और कोई मी नहीं है ।(२) (मुझमें ही) यह सब सूत में मणियों की भौति (१) इस पर यह श्रुति है:-"एतस्माजायते प्रायो' मनः सन्द्रियादि जासं घायुज्यों तिरापः पृथ्वी विश्वस्य धारिणी ॥ (मुण्डक उ० २।२३) (२) इस पर श्रुति यह है-"तदुनात्येति करन" (कठ श) 'प्राचीन भगवद्गीता। (पिरोया हुआ है)। (१) रसोऽहमप्सु कौन्तेय ! प्रभाऽस्मि शशि सूर्ययो। प्रणवः सर्व वेदेषु शब्दः खे पौरुपनृषु ॥ ३६ ॥ (भ० गी०७1८) संगति-किस प्रकार पिरोया हैं सुनो- अर्थ-हे कौन्तेय! मैं पानी में रस (रूप से मौजूद हूं)। चन्द्र सूर्य में प्रभा (किरण या प्रकाश ) हूं। सब वेदों में प्रणव (ओ३म् )हूं। आकाश में शब्द हूं और मनुष्यों में पुरुषार्थ ई(२), पुण्यो गन्धः पृथिव्यां च तेजश्चापि विभावसौ। जीवनं सर्व भूतेषु तपश्चास्मि तपखिषु ॥ ३७॥ (भ० गो०७।६) अर्थ-पृथिवी में मैं उत्तम सुगन्ध हूं, अग्नि में तेज ( रूप से विद्यमान ) हूं। सव भूतों (प्राणियों) में जीवन हूं। और तपस्त्रियों में तप (रूप से विराजमान हो रहा ) हूं। बुद्धिर्बुद्धि मतामस्मि तेजस्तेजखिनापहम् । (१) इस श्लोक का एक पाद मूल में नहीं है वर्तमान गीता में "भयिसाय मिदं प्रोक्तं' है अर्थ इसका मैंने कोष्ठक में रख दिया है क्योंकि बिना इसके भाशय नहीं खुलता । (२) अर्थात् प्रत्येक वस्तु काजो सारांय सत्व पा जौहर है उसोको परमा- स्मा की ससा समझो।

प्राचीन भगवद्गीता। - बलंघलवतो चाहम्(१) काम रागविवर्जितम् (२)॥ ३८॥ (भ० गी० १।१०, ११) अर्थ-बुद्धि वालों में बुद्धि, तेज वालों में तेज और बल वालों में काम और राग से रहित बल मैं ही हूँ। चतुर्विधा भजन्ते मां जनोः सुकृतिनोऽर्जुन । प्राों जिज्ञासुरर्थार्थी ज्ञानी च भरतर्षभ वासुदेवः सर्वमिति स महात्मा सुदुर्लभः (३) ॥ ३६॥ (म० गी०७।१६, १६) सङ्गति-ऐसे महान् प्रभु परमात्मा को कौन लोग स्मरण करते हैं ? सुनो- अर्थ-हे अर्जुन ! चार प्रकार के सुकृति (धर्मात्मा) लोग मुझ (परमेश्वर) को भजते हैं । १ आर्त (दुःखी,)२जिज्ञासु (ब्रह्मको जानने की इच्छा घाले), ३ अर्थी ( कामना वाला-स्वाहिशमन्द) और हे भरतर्षभ ! चौथा ज्ञानी। फिर उन सबमें कौन बढ़ कर है ? वह पूर्ण ज्ञानी महात्मा, जो यह समझ लेवे कि सबकुछ(8) (१) "चाहम्" के स्थान में वर्तमान गीता का पाठ "चास्मि है। (२) यह अन्तिम पाद मूल में नहीं है, वर्तमान गीता से .मैंने उद्धृत कर दिया है। (३) यह पाव मूल में नहीं है, मैंने वर्तमान गीता से अदूत कर दिया है। (४) सब बह्म है"भौर "सब में ब्रह्म है...ये दो पक्ष भवत और वादियों के हैं ।तनादी ऐसा मानते हैं कि प्रझको सब में व्यापक देखतां देखता सबको ब्रह्म ही मामने लग जाता है। देखो श्लोक सं०१४ की टिप्पिी प्राचीन भगवद्गीता। - वासुदेव (१) (परमात्मा ) ही है। जरा मरण मोक्षाय मामाश्रिय यतन्ति ये। ते ब्रह्म तद्विदुः कृत्स्नमध्यात्म कर्म चाखिलम् ॥ ४० ॥ (भ० गी०७।२६) सङ्गति-फिर उस महात्मा का आगे का कार्य बतलाते हैं- अर्थ-जो लोग जरा (बुढ़ापा) और मृत्यु से छूट जाने (मुक्तिपाने) के लिये मेरा (परमात्मा का (सहारा लेकर यत्ल करते हैं, वे उस ब्रह्म को, सम्पूर्ण अध्यात्म मान को भौर सव कर्मों को जान (२) लेते हैं। अन्त काले च मामेव स्मरन्मुकूत्वा कलेवरम् । यः प्रयाति स मनावं याति नास्त्यत्र संशयः ॥ ४१ ॥ (भ० गी ८1५) ११) इस शब्द का समास इस प्रकार है:- "वासयति छादयति स्व प्रकाशेन इति वासः। स्वप्रकाशेन दीव्यतीति देवः। स चासौ देवश्च वासुदेवः । भावार्थ-जो अपने प्रकाश से ढांकता है वह 'वा" कहलाता है। और जो अपने प्रकाश से चमकता है वह देव" कहलाता है, इस प्रकार वारदेव प्रद परत्मा वाचक आया है। (२) जान लेने से अभिप्राय साक्षातकार कर लेने का है। जिस प्रकार इस लोग मिठाई को जिहवा पर रखते ही उसके बाद का अनुभव (सातात्कार) करते हैं, उसी प्रकार जो लोग ब्रह्म परमात्मा का प्रत्यक्ष अनुभव कर रहे होंगे हो अझको जान लेनेवाले कहे जायगे। भर्खन यह सब जान कर क्या करें?

प्राचीन भगवद्गीता। सङ्गति—फिर वह महात्मा मुक्ति को कैसे पा सकता है ? यह बतलाते हैं। अर्थ जो कोई अन्त काल ( मरते समय ) मेरा (परमात्मा ही का) स्मरण करता हुआ शरीर को छोड़ जाता है, वह मेरे भाव (मुक्ति धाम) को पा जाता है इसमें कुछ भी संशय नहीं है (१) । तस्मात्सर्वेषु कालेषु मामनुस्पर युध्य च । मर्पित मनो बुद्धिमिवैष्यस्य संशयम् ॥ ४२ ॥ (भ० गी०८1.) सङ्गति-अनः वह उपाय बतलाते हैं कि मरते समय ईश्वर में मन लगा रहे: अर्थ-इसी लिये सब काल मे (२)मुझ (परमात्मा) में मन अर्जुन परमात्मा को अपना मालिक प्रभु मानता.हुआ उसको सर्व व्यापक देखने लग जाय तो यह भेद समझ पायेगा कि कुरुक्षेत्र के संग्राम भूमि में उसको उसके प्रभ ने ला खड़ा किया था, अतः युद्ध से पीछे हट जानो प्रमु की धाज्ञा को उल्लंघन करना ही था। (१) इस पर यह श्रुति है:-"वेदान्त विज्ञान सुनिश्चितार्थाः संन्यास योगायतयः शुद्ध सत्वाः, ते ब्रह्म लोकेषु परान्तकारो परामृताः परिमुच्यम्ति सर्व। (मु० उप०६।६). (२) क्योंकि मरते समय तभी ग्रहाकी याद भायेगी जब जन्म मर उसका ममन करता रहेगा।

प्राचीन भगवद्गीता। और बुद्धि को अर्पित(१) कर के मुभ को ही स्मरण करता हुआ युद्ध करे तो (२) निस्सन्देह मुझको ही पा जायगा (मुक्ति प्राप्त कर मेगा)। सर्व द्वाराणिसंयम्य मनो हृदि निरुध्य च । मूाधायात्मनः प्राणपास्थितो योग धारणाम् ॥ ४३ ॥ (भ० गी० ८।१२) सङ्गति-कैसे स्मरण करे ? सुनोः- अर्थ-सव द्वारो (आंख कान आदि )को संयम करके, मन को हृदम में रोक कर अपने प्राणों को मूर्धा (शिर ) में चढ़ाकर योगाभ्यास में लग जाय(३)। इदं तु तेगुत्तमं प्रवक्ष्याम्पनसूपवे । झानं विज्ञान सहितं यज्ज्ञात्वा मोक्ष्यसेऽशुभात् ॥४४॥ (भ० गी०६।१) (१) कैसे अर्पण करें ? मनमें सिवाय ब्रह्म के और किसी का ममन न करं और न बुद्धि से किसी अन्य का चिन्तन करे, यह कार्य अत्यन्त कठिन तो है पर अभ्यास से सुलभ होगा। (२) यहां स्पष्ट हो अर्जन को कह दिया गया है कि वह परमात्मा को पाना (मुक्तिधाम को जाना चाहता हो, तो भगवान का भजन करता हुमा ही युद्ध में लगा रहे । कैसे ? यह बाण में, धनुष में, लक्ष्य में, तथा अपने भोतर बाहर सर्वत्र ब्रह्म ही ब्रह्म को व्यापक देखता रहे और यह मानकर युद में स्टारहे कि मुझ मेरे प्रभु परमात्मा ने इस कार्य में लगा रखा है। (३) उस दशा में प्रात्मा से परमात्मा का योन तथा सके जोन

प्राचीन भगवद्गीता ।
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सङ्गति-अब उससे और बढ़िया अधिक ज्ञान सुनाने की
प्रतिक्षा करते हैं:-
अर्थ-हे निष्पाप अर्जुन! तुझ को हम अव इससे भी और
उत्कृष्ट ज्ञान, जो विज्ञान के सहित है, सुनाते हैं। जिस को जान
करके तू अशुम बातों से छूट जायगा (१)।
अहं ऋतुरहं यज्ञः स्वधाहमहमौषधम् ।
मन्त्रोऽहमहमेवाज्यमहमगिरह हुतम् ॥
वेद्य पवित्रोङ्कार ऋक् साम यजुरेवच ॥ ४५ ।।
(भ० गी०६।१६।१७)
सङ्गति-वह ज्ञान यह है कि:--.
अर्थ-मैं( परमात्मा) यज्ञ हूँ, मैं ही ऋतु (२) हूं, मैं ही
खा(३) हूं, मै ही औषधि (हवन सामग्रो) हूं, मैं ही मन्त्र हूं, मैं
ही आज्य (घृत) हूं, मैं ही ( यज्ञ की) अग्नि हूं, और यज्ञ में
आहुत हुआ सामान (मो) मैं ही हूं (8) मैं ही जानने योग्य पवित्र
नाम का जप करे । इस पर यह श्रुति है:-
"य: पुनेरतत् त्रिमात्रमित्यनेनैवानरेव परं पुरुषमभिध्यायीत स
समधिगच्छति ॥
(१) वह परम ज्ञान परब्रह्म परमात्मा को सर्वत्र व्यापक देखनेका अभ्यास
करना ही है, अतः भगले श्लोक को पाठक ध्यान से पढ़ें।
(२) कतु से बड़े बड़े यज्ञ अश्व मेधादि से अभिप्राय है।
(३) स्वोधा-पितरों सम्बन्धी यज-सामग्री।
१७)अभिप्राय यह है कि सब वस्तु में परमात्माको व्यापक देखो, यहाँ
.

प्राचीन भगवद्गीता)। भोङ्कार (१) हूं, और मैं ही क् साम यजुर्वेद(२)भी हूँ। . यत्करोषि यदश्नासि यज्जुहोषि ददासियत् । यत्तपस्यसि कौन्तेय तत्कुरुष्व मदर्पणम् ॥ ४६ ॥ (भ० गी०६।२७) सङ्गति---जो इस प्रकार ब्रह्म परमात्मा को सर्वत्र व्यापक जान ले तो फिर वह क्या करे,सुनोः-- अर्थ-- हे कौन्तेय! जो कार्य तू करे, जो कुछ खाय, होम करे, जो कुछ दान करे. और जो कुछ तपस्या करे, वह सत्र (उन पुण्य कार्यों का फल ) मुझ परमात्मा) को अर्पण कर दे(३) । ज्योतिषो पहमंशुमान् *, नक्षत्राणामहंशशि ॥ ४७॥ (भ० गी०१०। २१) । तक कि परमात्मा से पृथक कुछ भान हो न हो। इतना अधिक परमात्मा में लवलोन होकर उसो में तन्मय होजाना हो ऐसा ज्ञान है जो नचम है। और पूर्व श्लोक में इसो के खास उपदेश देने का वाश किया गया था। [१] इस पर यह श्रुति है :- "श्रोमित्येवं ध्यायथ आत्माने "मु०४६) (२) "तम्मादृचः साम यजूंपिक ( मुण्डक उ०३१६) (३) अर्थात् निष्काम भाव से कर्म करता रहे । कर्म का फल परमात्मा को अर्पण कर देने से यह परिणाम होगा कि उनसे होने वाले सांसारिक सुस ममिलेंगे, किन्तु मुक्ति से निकटता होतो जायगो। वर्तमान गोता में इस "महम्" के स्थान में "" पाठ है।

प्राचीन भगवद्गीता। । - सङ्गति--पूर्व श्लोक सं० ४५ में जो अपर्व शान परमात्माका सर्व व्यापक होना का है, उसी की व्याख्या यहाँ से श्लोक संख्या ५३ तक में करते हैं। अर्थात् यह बतलाते हैं कि परमा रमा को किस वस्तु में किस रूप से देखे! अर्थ---ज्योति (प्रकाश) वालों में मैं किरणोंवालो (पर्य) । नक्षत्रों में मैं चन्द्रमा हूं। रुद्राणां शंकरश्चोस्मि विशेशो यत्त रक्षसाम् । महर्षीणों भृगुरहं, पेरु शिखरिणामहम् ॥ ४८ ॥ (भ० गी० १० । २३,२५) भर्थ---रुदों में मैं शंकर हूं, यक्ष राक्षसों में मै कुवेर हूं। महर्षियो में मैं भृगु हूं । और शिखरवालो' में मैं मेरु पर्वत हूं। अश्वत्या सर्व वृक्षाणां देवर्षीणां च नारदः । उच्च अवयवानां सिद्धानां कपिलो मुनिः ॥ ४६॥ (भ० गी०१०।२६, २७) अर्थ---सब वृक्षों में मैं पीपल हूं, देवऋषियो में मैं नारद हूं। घोड़ों में मैं उ:श्रवा (ऊंचे काना वाला धाड़ा हूं। सिद्ध लोगो में मैं कपिल मुनि हूं। ऐरावतं गजेन्द्राणां नराणां च नराधिपम् । प्रायुधानामहं वजू साणामस्मि वास्किः ॥५०॥ (भ० गी०१०।२७, २८) अर्थ...हाथियों में मैं ऐरावन हूं, मनुष्यों में मैं राजा है। आयुधों (शस्त्रा) में मैं वज्र हूं, और.सों में मैं बासुकों हूं।

प्राचीन भगवद्रोता। वरुणो यादसापहम्) यमः संयमतामहम् । प्रहलाद * सर्न दैत्यानां कालः कलयतामहम् ॥५१॥ (भ० गी०१० ।२६, ३०) अर्थ...पानी के जीवा में मैं वरुण हू', नियमन (न्याय) करने वालों में मैं यम हूँ । सव दैत्यों में मैं प्रह्लाद हूँ, गणना करने वालों में मै काल है। मृगाणां च मृगेन्द्रोऽहं नैनतेयश्च पक्षिणाम् ॥ अक्षराणामकारोऽस्मि रामः शस्त्र भृतापहम् । मासानां मार्ग शोर्षोऽहमूतूनां कुसुमाकरः ॥५२॥ (भ० गी० १०१३०,३१,३३,३५ ) अर्थ---दन पशुओं में मैं सिंह हूँ। पक्षियों में मैं गरुड़ अदरों में मैं "अ" । शस्त्रधारियों में मैरान हूं। महीनों में में मार्गशीर्षे ( अगहन) तथा ऋतुओं में वसन्त हूं । वृषणीनां वासुदेवोऽस्मि पाण्डवानां धनञ्जयः मुनीनामप्यहं व्यासः कवीनामुशना कविः ॥५३ ॥ (भ० गी० १० ३७) अर्थ---वृष्णी वंशवालों में मैं, वासुदेव (श्री कृष्ण ) हूँ। पाण्डवों में मैं अर्जुन हूं । मुनियों में मैं ध्यास हूं। और कवियों ® यह चौथा पाद मूल में नहीं है, मैंने वर्तमान गीता से उद्धत कर दिया है। 9 वर्तमान गीता में "प्रहयात्रास्मि' पाठ है।

प्राचीन भगवद्गीता । . में मैं उशना कवि हूँ। " औषधिनाम् (१)" । नान्तोऽस्ति मम दिव्यानां विभूतीनां परन्तप ॥ ५४॥ (भ० गी०१०।४०) अर्थ-हे बड़े तपस्त्री अर्जुन! (निदान कहाँ तक गिनायें, वस्तुतः तो) मेरे (परमात्मा के) इन दिव्य विभूतियों का अन्त ही नहीं है (२)। [१] यह एक हो शब्द है, पार्थ “औषधियोंका" होगा। वर्तमान शामें यह शब्द कहीं भी नहीं है। [२] परमात्मा अनन्त है, उन की विभूतियां भी अनन्त ही हैं। यहाँ जो थोड़ी सो दिग्दर्शन कराई गई, इतने से जिज्ञास और अनेक विभूतियों को समझ सकता है कि सर्वत्र प्रत्येक वस्तु में, जर जरें में, परमात्माको ही रमा हुया देखकर सर्वत्र उसको नमस्कार करे । यजुर्वेद की १६ वें अध्याय में यही उपदेश है कि प्रत्येक वस्तु में परमात्मा को नमस्कार करे। परमात्मा के सब में व्यापक होने की व्याख्या वृहदारण्यक उपनिषद् के अन्तर्यामी प्राह्ममा में अति उत्तम आई है जिसका एक मन्त्र निम्न प्रकार है :- "यः पृथिव्यां तिष्ठन् पृथिव्या अन्तरो यं पृथिवी न वेद यस्य पृथिवी शरीरं यः पृथिवीमन्तरो यमयत्येषत शात्मान्तयाम्यमृतः॥ (बृह० उ०३।७।२) इसी प्रसंग में श्रीमान् कनोमल जी एम० ए० अपने गीतादर्शन पृ०७२ पर कहते हैं:- "पिक और कोकिला के मधुर गान में वही है, पुष्प वाटिका को मुगंधि पही है। नव पौवना के सन्दर रूप में उसी की झलक है। मेष के प्रचार .

प्राचीन भगवद्गीता! पश्य ये पार्थ स्पाणि शतशोऽय साखः। नाना विधानि दिव्यानि नाना वर्णाकृतोनि च ॥५५॥ (म० गी०११। ५) संगति, जो.परमात्मा को उक्त प्रकार सव में व्यापक देखने का अभ्याली हो जाय, उसके लिए और आगे का मार्ग दर्शात अर्थ- हे अर्जुन ! (मेरी विभूतियों को समझ लेने पर अव) तू मेरे ( परमात्मा के अनेक प्रकार के अनेक रंगों और आकारों वाले सैकड़ों हज़ारों दिव्य रूपों को देख (२).। गजनमें उसोका शब्द है । नक्षत्रों को ज्योति वही है।अन्तःकरणको शान्त वाणि में वही बोलता है। समुद्र को तुग तरंगों में उसो को शक्ति है। . मागोरथा के जलप्रवाह में उसो का उद्योग है। वका के पदलालित्य में उसी का प्रभाव है । चित्रकार को लेखनी में उसो का महत्व है। शिल्पकार को टांकी में उसी को शक्ति का आविष्कार है। न्यायाधीश का वहो न्याय है। योद्धाला वहो वारत्व है। परोपकारी का वही धर्म है। सिंहका काप, बकरी की दोनता, हिरन की चंचलता, सव उसोको शक्तिक रूप है।" (१) नक्षत्रोंमें चन्द्रमा. वृत्तोंमें पीपल आदि देखते देखते प्रबं यह भावना धारण करो कि सर्वत्र परमात्मा विराजमान है। न केवल चन्द्रमा में वरन् प्रत्येक नक्षत्र में वह मौजूद है। न केवल पोपल में बल्कि प्रत्येक वृक्ष में और उसको ढालो डाली थोर पत्ते पचे मंत्र विराजमान हो रहा है । इस विश्वरूपदर्शन" का मुख्य यही अभिप्राय है कि मनुष्य प्रभु परमा- समा.को प्रत्येक वस्तु में अन्तर्यामी समझ कर उसको सर्वत्र नमस्कार करे। इस पर यह.अति है:- प्राचीन भगवदीता। न तु मां शक्यसे दृष्टुपनेनैव ख चतुषा। दिव्यं ददामि ते चतः पश्य ये योगपैश्वरम् ।। ५६ ॥ (भ० गी० ११1८) संगति--अब उस अद्भुत रूप वाले को किन आंखों से देखें यह बतलाते हैं:- अर्थ---परन्तु मुझ (परमात्मा) को तू इन आंखों (चर्म चक्षुओं) से तो नहीं देख सकता, ( इसलिए ) तुझको मैं दिव्य- चक्षु (१) देतो हूँ । अब मेरे योग के ऐश्वर्य (२) को देख। "सहन घोपी पुरुषः महम्राज्ञः सहस्रपात्:- (यजुः३१११) (१) दिव्य चज्ञः खोस प्रकार को आंखें-ज्ञान नेत्र । इस पर यह भुति हैं:- “ममात्मा मनोऽस्य दैवं वासवा एव एतेन देवेन वषा मनसेतान् कामान् पश्यन रमते छा०3०८1१२१५) ( १२) इससे स्पष्ट है कि अर्जुन को विश्वरूप का दर्शन श्री कृष्ण जी ने अपने योग चल से कारा था। जो लोग यह समझते हैं कि अर्जुन ने किसी खास रूप का दशन किया होगा, उनको ज्ञात रहे कि यहां स्पष्ट कह दिया गया है कि "इन प्रांखों से तुम उस निराकार प्राश नहीं देख सकतं इस लिये श्री कृष्णजो ने अपने योगवल ते अर्जुन क हदय में अपना ज्ञान भा दिवा (जिस प्रकार मानल मिस्मेरिजम • Hes nerion वाले लड़कों के प्रात्माओं पर अपना प्रभाव रासा करते हैं यहो दिव्य चन दे देना था। अब ज्ञान को प्रांतों से भजन ने देखा सोब्रह्म परमात्मा को सर्वस व्यापक पाया,- यहो "विश्वल दर्शन है।लोकमान्य तिलक महाराज भो गोता रहस्प के नवे प्रकाश "अध्यात्म" ६८ प्राचीन भगवद्गीता अनेक वक्त्र नपनमनेकाद्भुत दर्शनम् । अनेक दिव्याभरणं दिव्यानेकोधतायुधम् ॥ ५७ ॥ (भ० गी० ११ । १०) संगति-वह रूप बसा है ? सुनो अर्थ-अनेको मुखों (१) और आंखों वाला है और अनेको प्रकार का दीखता है। अनेको उसके दिव्य भूषण वस्त्र हैं। और अनेको आयुधा (शस्त्रों) से वह सुसजित है यथा नदीनां वहवोऽम्मवेगाः समुद्रयेवाभि मुखाद्रवन्ति । तथा तवामी नर लोक वीरा, विशन्ति वक्त्राण्यंभि विज्वलन्ति ॥५८ ॥ (भ० गी० ११ १२८) संगति-परमात्मा का दर्शन करलेने पर उसकी स्तुति कैसे करे? यह बतलाते हैं ( यह तथा अगला श्लोक अर्जुन की ओर से स्तुति रूप है।):- अर्थ-जिस प्रकार नदियों का जल-प्रवाह बड़े वेग के साथ समुद्र की ओर दौड़ा चला जाता है, उसी प्रकार (हे विराट रूप भगवन्!) में मनुष्य लोग शूर-बीर आदि (बड़े वेग से) में पृष्ठ २०५ पंक्ति १ पर वाहते हैं कि-गीता में वर्णित भगवान का अजुन को दिखलाया हुमा विश्वरूप भी मायिक ही था। (१) इस पर श्रुति यह है- विसबहाल विश्वतो मुखो।

प्राचीन भगवद्गीता । आप के मुखों में प्रवेश करते चले जा रहे है(१) । यथा प्रदीप्तं ज्वलनं पतङ्गा, विशन्ति नाशाय समृद्ध वेगा। तथैव नोशाय विशन्ति लोका- स्तवापि वक्त्राणि समृद्धवेगाः ॥५६॥ (भ० गी०११ । २६) अर्थ-जैसे जलते हुये दीपककी ओर मच्छर आदि नाश होने के लिये बड़े घेग से दौड़े चले जाते हैं, उसी प्रकार ये लोग भी नाश होने ( मरने) के लिये आपके मुख में बड़े वेग से घुसते चले जा रहे हैं(२)। आख्याहि ये को भवानुग्ररूपो, लोकान्समाहर्तु मिह प्रवृत्तः। नमो नमस्तेऽस्तु सहस्र कृल्वः . नमः पुरस्तादथ पृष्ठतस्ते ॥१०॥ (भ० गी० ११ । ३१:३२, ३६,४०) अर्थ-(हे बड़े अद्भ,३ रूप वाले!) आप ऐसे उग्र (तेज़ तर्रार तीक्ष्ण, काल) रूप वाले कौन हैं ? (मैं समझता हूं कि - (१) मरने वालों के लिये परमात्मा काल रूप है। कुरुक्षेत्र के स संग्राम भूमि में १८.अक्षोहिणो सेना मरने के लिये प्रा डटो थो, उसी का दृश्य अर्जुन को मासिन हो रहा था कि वे सब मौत के मुंह में दौड़े चले जा रहे हैं (२) करीबात को पुष्टि यहां दूसरे दृष्टान्त से भी की है। ।

प्राचीन भगवद्गीता। ------- यहां पर भाप इन सब लोगों को समेट लेने के लिये प्रवृत्त हो रहे हैं !!! आपको नमः हो (नमस्ते) नमः हो, हज़ार बार नमः हो, भापको आगे से नमः हो, और पीछेसे भी नमः होव(१)। नाहं वेदैर्न तपसा न दानेन न चेज्यया । शक्य एवं विधो द्रष्टु दृष्टवानसि मां यया ॥ ११ ॥ (भ० सी० ११ । ५३) संगति-विश्व रूप दर्शन समाप्त हुआ; अब उसकी महानता प्रकट करते हैं: अहे अर्जुन ! मेरे (परमात्मा के जिस अद्भुत रूप को तूने अभी देखा है, वह ऐसा है कि उसे कोई न तो वेदों को पढ़ने से, न तप से, न दान से, और न यज्ञ करने से ही देख सकता है (२)। (१) प्रत्येक मनुष्य को इसी प्रकार अर्जुन की भांति परमात्मा को प्रति दिन (प्रातः सायंकाल की सन्ध्योपासना में नमस्कार करना चाहिये। इस पर यह अति है :-- "नमोऽस्तु रुद्रेभ्यो ये पृथिव्यां येवामा मिषवः । तेभ्यो दश प्राचीन दक्षिणा दश प्रतीचोर्दशोदीचीर्दशोध्या। तेभ्यो नमो अस्तु ते नोऽवन्तु ते नो भृष्टयन्तु ते यं द्विप्मो यश्च नो द्वष्टि तमेषां जन्मे दध्मः ॥ (यजुः । १६ । ६६) (२) इस पर यह अति है :-"नायमात्मा प्रवचनेमसभ्यो न मेषया-न बहुमा भ्रुतेन पमेष वृपते तेन लभ्यस्तस्यैप भात्मा वृसते सनूस्वाम् ॥ (मुपटक उ०६३) ..

प्राचीन भगवद्गीता । मत्कर्म कृन्मत्परमों पद्भक्तः संगवर्जितः। निरः सर्व भूतेषु यः स मामेति पाण्डव ॥ ६ ॥ (म० गी० ११ १ ५५) संगति-फिर आखिर किसी प्रकार देखभी सकेंगा इस प्रश्न का उत्तर देते हैं अर्थ है पाण्डव ! जो कोई मेरे (परमात्मा के लिये कर्म करता है (निष्काम कर्मी बनता है) मेरा (परमात्मा का) भक्त वन जाता है, सव भूतों (प्राणियों) से निर्वैर (शत्रुता नरखनेवाला) और संग रहित (किसी से ज्यादा प्रम न रखने वाला) चन जाता हैं, वह ही मुझ (परमात्मा) को पाता है। (परमात्मा का दर्शन कर लेता है) (6) (१) इस श्लोक को टोका में श्री लोकमान्य पं० बालगङ्गाधर तिलक महाराज अपने गीता रहस्य में कहते हैं उसे सारे व्यवहार इस निरिभमान बुद्धि से करना चाहिये कि जगत के सभी कर्म परमेश्वर के हैं, सपा कर्ता और कराने वाला वही है, किन्तु हमें निमित्त बगा कर वह हमसे कर्म करवा रहा है...शांकर भाष्य में भी यही कहा है कि इस श्लोक में पूरे गीता शास्त्र का तात्पर्य भागया है। इस से प्रकट है कि-गीता का भक्तिमार्ग यह नहीं कहता कि पाराम से राम राम जपा करो, प्रत्युत उसका कथन है कि उत्कट भक्ति के साथ ही साथ उत्साह से सब निष्काम कर्म करते रहो"। इस पर यह श्रुति है:- "पदा सर्वे प्रमुच्यन्तेकामा येऽस्व हदि त्रिंताः अथ मल्योऽमृतो भव- लाम समानुते। (कठ उ०६ । १४) AMANA- प्राचीन भगवद्गीता। यथा सर्व गतं सौम्यादाकाशं नोपलिप्यते । सर्वत्रावस्थितो देहे तथाऽऽत्मा नोप लिप्यते ॥६॥ (म० गी० १३ । ३२) सङ्गति- ऊपर परमात्मा का दर्शन करने का उपाय बतलाया गया है। अब कहते हैं कि उसकी खोज में हमें कहीं दूर देश- काशी, प्रयाग, जगन्नाथ, रामेश्वर आदि-नहीं जाना पड़ेगा :- अर्थ-वह आत्मा (परमात्मा) सर्वत्र देह (के रग रग) में उहरा हुआ है (परन्तु) इससे उसी प्रकार लित नहीं होता जिस प्रकार आकाश सब जगह रहने पर भी सूक्ष्म होने से (किली वस्तु के साथ ) लिप्त नहीं होता (१),। यथा प्रकाशयत्येकः कृत्स्नं लोकमिमं रविः । क्षेत्र क्षेत्री तथा कृत्स्नं प्रकाशयति भारत ॥ ६४ ॥ (स० गो०१३१३३) सङ्गति-ऊपर आकाश का दृष्टान्त दिया गया, अब सूर्य का दृष्टान्त देते हैं:- अर्थ-जिस प्रकार अकेला एक सूर्य सब लोकों को प्रकाशित (१) इसलिये उसका दर्शन करने के लिये बाहर नहीं बल्कि अपने हृदय के अन्दर और यात्मा के भी अन्दर ही ढूंढो (देखो त्रलो० ४३ ) । इस पर यह श्रुति है :- "भाकायो वै नाम नाम रूपयोनिहिताते यदन्तरा तब्रह्म तदमृतं स प्रोत्मा प्रजा पतेः सभा वैश्य प्रपोछा० उ० २१९४१) 1 प्राचीन भगवद्गीता । ---- . - करता है। हे भारत! उसी प्रकार वह क्षेत्रो(१) (परमात्मा) इस सारे क्षेत्र (समस्त ब्रह्माण्ड ) को प्रकाशित कर रहा है (२)। सत्वं सुखे संजयति रजः कर्मणि भारत । ज्ञानमात्य तु तमः प्रमादे संजयत्युत.॥६५॥ (भ० गी० १४।६) सङ्गति-परमात्माके दर्शनको दृढ़ इच्छा कैसे हो सकती है ? यह बतलाते हैं:- अर्थ-हे भारत! (तीन गुण मनुष्य के शरीर के अन्दर रहते हैं-सत्व, रजः, दमः) सत्व गुण जब बढ़ जाता है तो सुख में (१) इस श्लोक में क्षेस-क्षेत्री पारिभाषिक शब्द श्रोये हैं। श्रीस्वामी गंकराचार्य महाराज का भाष्य इस प्रकार है:-क्षेत्रम् महा भूतादि घृत्यन्तम् (भापार्य-"महा भूतों को आदि ले के धृतिपर्यन्त समुदाय रूप) क्षेत्रो-परमात्मा (२) पूर्व ग्लोक में प्राकाश तथा इस श्लोक में सूर्य के दृष्टान्त से ब्रह्म परमात्मा के सब व्यापक होने का सिद्धान्त समझाया गया है। एक बात स्मरण रखने योग्य है कि पूर्व श्लोक में जहां परमात्मा का हमारे शरीर में व्यापक होना दर्शाया है, वहां इस श्लोक में उसका समस्त ब्रह्माण्ड में विद्य- मान होना कथन किया गया है। तात्पर्य यह कि प्रथम अपने शरीर के रंग में उसको हम देखें फिरसर्वत्र देखने का अभ्यास करें। इस पर यह श्रुति है:- "सूर्यो यथा सर्व लोकस्य चक्ष न लिप्यते चान र्वाह्य दोपः। एकस्त- था सर्व भूतान्तरात्मा न लिप्यते लोकदुःखेन वाह्यः॥ (कठ उ०५११), रंग प्राचीन भगवद्गीता। 'लगाता है। रजोगुणकर्म में लगाता है । और तमो गुण ज्ञान को छिपा करके प्रमाद (आलस्य ) में लगा देताहै (२) । ऊर्ध्वं गच्छन्ति सत्वस्या मध्ये तिष्ठन्ति रोजसाः । जघन्य गुणं रत्तिस्था अधो गच्छन्ति तामसाः॥६६॥ (भ० गी०१४ । १८) सङ्गति -उन तीनों गुणों का फल सुनो- अर्थ-सत्व गुण वाले ऊपर (२) को जाते हैं। रजो गुण वाले मध्य में रहते हैं। और खराब वृत्तियों वाले तमो गुणी लोग नीचे को जाते हैं (३)। सप दुःख सुखः स्वस्थः सप लोष्ठाप काञ्चनः । तुल्य पियामियो धोरस्तुल्य निन्दात्म संस्तुतिः॥६७.॥ मानापमानयोस्तुल्यस्तुल्यो मित्रोरिपक्षयोः । सर्वारम्भ परित्यागी गुणातीतः स उच्यते ॥ ६८ ॥ (भ० गी०१४ । २४, २५) (१) इस लिये जो कोई अपना भला चाहे ( परमात्मा का दर्शन करना चाहे ) वह तमो गुण को बढ़ने न देवे, तामसों पदार्थों को खाने तथा तमो गुणी लोगों को सङ्गति में रहने से तमो गुण बढ़ेगा, अतः उनसे बचा रहे। (२) "ऊपर" से यहां अभिप्राय ऊंचा दरजा, उच्च पद या उन्नतावस्थासे है। इसी प्रकार "नीचे" से पतित दया समझो। (३) इसलिए उन्नति ( परमात्मा का दर्शन ) चाहते हो, तो संस्व गुबी स्नो अच्छे धर्मात्मा सजन लोगों की संगति में रहने तथा सात्विको भोजन साने ग्रादि से सात्यिको स्वभाव वाले बनोगे।

प्राचीन भगवद्गीता। सङ्गति -ऊपर तीनों गुणों का विवरण सुनाकर अब यह उपदेश देते हैं कि परमात्मा का दर्शनाभिलाषी गुणातीत बन जाय। अर्थ-गुणातीत ( उक्त तीनों गुणों की पहुंच से आगे बढ़ जाने काला ) वह कहलायेगा, जो सुख दुःखको बरावर समझ ले; जो स्वस्थ-अपने अन्दर रमण करनेवाला-हो, जो ढेला, पत्थर, सोना, चांदी को समान मानता हो; जो प्रिय मौर मप्रिय को बजारड़ समझता हो, धीर (धैर्य रखने वाला) हो, जो अपनी निन्दा और स्तुति को बराबर मानता हो, जो मान और अपमान को तुल्य (एक समान ) जानता हो, जो मित्र शत्र के पक्ष को तुल्य रखता हो, और (सव से बढ़ कर यह कि)जो सव (प्रकार के) कार्यों को त्याग (१) कर चुका हो (ऐसा महात्मा परमेश्वर का दर्शन करने का पात्र माना जायगा)। मांच योऽव्यभिचारेण भक्ति योगेन सेचते । स गुणासमतीत्यैतान ब्रह्म भूयाय कल्पते ॥६॥ (भ० गी० १४।२६) (१) सब कायों को त्यागनेसे अभिप्राय सांसारिक कार्यो-खेती,व्यापार राज्य-शासन श्रादि-को त्यागने से है, किन्तु जप, तप, स्वाध्याय, योगा- भ्यास-मादि ऐसे कार्य नहीं हैं, जिनका त्याग किया जाय। इस पर यह श्रुति है:- "कामस्याहिं जगतः प्रविष्ठां तोरमन्त्य मभयल्प पारम् ।तोमं मह- दुरु गार्य प्रतिष्टा दृष्टवा धृत्या धीरो नचिकेतोत्यमाजीः॥' • कठ०२ ।११] प्राचीन भगवद्गीता । सङ्गति-उक्त प्रकार गुणातीत वन जाने का फल बतलाते हैं- अर्थ-जो कोई अव्यभिचारी (डांवाडोल न होनेवालो ) भकि योग द्वारा मेरी (परमात्मा की ) सेवा (उपासना ) करता है, वह इन (तीनों) गुणों को पार करके (गुणानोत बन करके) मुक्ति को पा जाता है [१] । सर्व धर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज । अहं त्वां सर्व पापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः ॥ ७० ॥ (भ० गी० १८ । ६६) सङ्गति-जो महात्मा गुणातीत बन गया हो वह फिर क्या करे ? यह बतलाते हैं- अर्थ-सय धर्मों को छोड़कर केवल एक मेरे (परमात्मा के ) शरण में आ जा, तुम को सब पापों से छुड़ा दूगा, शोच (चित्ता, फिक) मत कर (२) । [२] इस पर यह श्रुति है "वेदान्त विज्ञान मुनिश्चि तार्थाः संन्यास योगाद्यतयाऽयुद्ध सत्वाः। ते ब्रह्म लोकेषु परांत काले परामृताः परिमुच्यन्ति सर्वे ॥ (मु० उ०६।६) (२) इस श्लोक से बहुत लोग भारी भ्रम में पड़ गये हैं कि यह कैसा उपदेश है कि सब धमों को छोड़ देवे। परन्तु अब उन्हें जानना चाहिए कि वर्तमान भगवद्गीताके इस १८२ अध्याय के अन्तिम श्लोक को सङ्गति १४वें अध्याय के ऊपरो २६ वें श्लोकके साथ मिलाने से स्पष्ट यह अभिप्राय निकल आता है कि मैं 09 . प्राचीन भगवद्गीता । यह उपदेश (सय धर्म छोड़ने का) और किन्हीं लोगों को नहीं दिया गया, बल्कि गुणातीत लोगों को ही यह आदेश है। उनके लिये और आगे का यह मार्ग दर्शाया गया है कि वे सुख दुःख के बराबर माने, मित्र शत्रु में भेद न होने और सर्वत्र ब्रह्म को ज्यापुरखने का अभ्यास करते करते गय और आगे बढ़ें और वर्णाश्रम के धर्मों और कर्तव्य कर्मों के बन्धन की परवाह छोड़ कर सारा समय और अपनी सारी शक्ति ब्रह्म में तन्मय हो जाने (समाधि आदि) में लगा दें ( उसके शरण में चला जाना यही है) तो परमात्मा उस पर कृपा करके उसको अपनाय लेंगे (पापों से छुड़ाय देंगे)। प्रश्न-क्या परमेश्वर पाप को माफ कर देंगे, फल नहीं भुगायेंगे ? उत्तर-योग (ध्यान, धारणा, समाधि) तथा ज्ञान रूपो अग्नि में पाप रूपी मल दग्ध हो जाता है। यही वात उपनिषदों में कही गई है "भिधते हृदय ग्रन्थिश्छिद्यन्ते सर्व संशयाः। तीयन्ते चास्य कर्माणि तस्मिन् द्रष्टे परावरे"। (मुण्डक उ०४।८) भला जी! अर्जुन इस पर कैसे अमल करता ? अर्जुन को यह कहा गया है कि तू अभी तो अपने वर्णाश्रम धर्म में बन्धा हुआ है, इसीलिये इस रणक्षेत्र में आ जाने से इस युद्ध में भाग ले। फिर विजय होनेपर यज्ञ दानानि शुभ कार्यों को करता हुआ निष्काम कर्मी बन जाना, पश्चात् गुणातीत बनने का अभ्यास करना और उसके पश्चात् इस श्लोक पर अमल दरामद करके

७८
MA
इसप्र.
'का उस
मुक्ति का
भर के लिये
दे दिया गः
इस श्लोक पर एक बात और भी ध्यान में रखनन दिये
कि जिस प्रकार विद्यार्थों को क्रमशः एक एक कक्षा की पुस्तक
पढ़ाई जाती हैं और आगे की पाठ्य पुस्तकें कठिन होती जाती
हैं किन्तु प्रथम कक्षा के विद्यार्थी को एम० ए० कक्षा का पाठ
नहीं पठाया जा सकता, उसी प्रकार यों समझना चाहिये कि
इस अन्तिम श्लोक की शिक्षा उनके लिये हैं, जो मुकि रूपी
कालिज के एम० ए० क्लास में पहुंच गये हैं। लाधारण कक्षा
चाले से (वर्णाश्रम धर्मी) इस उपदेशका कुछ भो सरोकार नहीं
है, यह इस पर आरूढ़ होना बाहेगा तो-
"इतोम्रटस्ततो भ्रष्टः"-बन जायगा, इसलिए भ्रम छोड़ कर
गीता गास्त्र के अपूर्व उपदेशों पर अमल करते हुए कल्याण को
प्राप्त करो।
इति मलानन्द पुरी संन्यासिना सम्पादिता आर्य
भाषया सहिता यव द्वीपान्तर्गत बाली द्वापार
माता सप्तति श्लोक युक्ता श्री मत् . प्राचीन
भगवद्गीता समाप्ता...
इसोम् शान्तिः।

परिशिष्ट !
।
.
ज्यापक
: .ता का एक
संवत् १६६, वि० में मेरी एक
"श्री भगवद्गीता
रत्न माला" को यम्बई के एक सेठ डॉ.,
उडीद
पटेल (नडियाद -
निवासी)ने प्रकाशित कराया था। उस मैंने ११ श्लोकों की
एक विशेष प्रकारकी टीका छपायी थी। उसका एक श्लोक यहां
पाठकों के विनोदार्थ उद्धृत करता हूं:-
यह वर्तमान भगवद्गीता के दूसरे अन्याय का ४७ वां तथा
इस प्राचीन गीता का ११ वा श्लोक है। अच्छा देखिये :-
कर्मण्ये वाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन ।
मा कर्म फल हेतुर्भूर्मा ते संगोस्व कर्मणि ॥
पदच्छेद-१ कर्मणि २ एव ३ अधिकारः ४ ते ५ मा ६ फलेषु
७ कदाचन ८ मा ६ कर्म-फल-हेतुः १० भूः ११ मा१२ ते १३ सङ्गः
२४ अस्तु १५ अकर्मणि।
शब्दार्थ-(१-४). तेरा अधिकार कम करने में ही हो
(५, ६, ७) जिन्तु कभी भी फलों (के भोगने ) में न हो।(८,
६, १० )तू कर्मों के फलो का हेतु (निमित्त) न बन (११-१५)..
और न तेरी सङ्गति अफर्म (कर्म न करने ) में ही हो।

८. गीता का एकश्लोक। - । । व्याख्या-इस श्लोक में यह उपदेश दिया गया है कि कर्म करो किन्तु फल की लालसा न करो। कर्म से अभिप्राय संसार के सारे ही कोंसे है। खाना पीना, चलना, फिरना, सोना, जागना, आदि कर्म हैं: पञ्च महाया से लेकर अश्वमेध तक अनेक प्रकार के होम, यज्ञ, तथा दान, पुण्य, धर्म, कर्म, तीर्थ, व्रत इत्यादि भी कही है। गर्भाधान से लेकर मुण्डन, छेदन, क्याह, शादी और मरण पश्चात् शरीर दाह तक सारे संस्कार भी कम हो हैं । विद्या पढ़ना, वेदों शास्त्रों को अध्य- यन करना, कला कौशल और सारे हुनरों को सोखना तथा अंग- रेज़ी फारसी इत्यादि पढ़ना पश्चात् इनों द्वारा संसार में काम करना भी कम ही हैं ईमानदारी सचाई से जीविका उपार्जन करना और चोरी बेईमानी इत्यादि न करना भी कर्मही हैं। ब्रह्मवर्य आदि चारों आश्रमों के कर्तव्य पूरा करना तथा गृहस्थियों का अपने माता, पिता, स्त्री, पुत्रों का पालन पोषण करना इत्यादि भी कर्म ही हैं। धर्मशाला सदावत (सुपात्रों के निमित्त ) देवालय, कुवा. तालाब, बावली, साधु आश्रम, अनाथालय, विद्याधों आश्रम (बोर्डिंग हाउस), पाठशाला, कन्या पाठशाला, अन्धों, पहिरों, ललो, लाड़ों के आश्रम, चिकित्सा शाला ( अस्पताल), पुस्तका. लय (लायब्ररी) इत्यादि २ धर्मखाते बनवा देना भी कर्म ही हैं। मकान बनवाना, बाग बगीचे लगाना, जमीदारी मोललेना तथा और भी अनेक प्रकार से अपने वंशजों के भविष्य लाभ निमित्त धन, सम्पत्ति की वृद्धि कर देना और दूसरों के साथ उपकार ।

गीता का एक श्लोक। । करना तथा देश और जाति की भलाई के सारे ही कार्य करना इत्यादि इत्यादि भी कर्म ही हैं। रेल बनाना, नहर खुदाना, किले (दुर्ग) बनवाना, जहाज़ चनवाना, दुष्टों को ताड़न करके सजनों की रक्षा करने के लिये सेना रखना इत्यादि इत्यादि बड़े बड़े काम भी राजाओं महाराजाओंके कम ही हैं। निदान कहाँ तक गिनायें संसार के सारे ही अच्छे और शुभ कामों को कर्म और उनसे उलटे (धुरे, खोटे या अशुभ को विकर्म समझो॥ प्रश्न-आपने तो संसार के सारे ही कामों को कर्म में लिख डाला, परन्तु अन्य लोग ऐसा नहीं मानते; वे तो केवल पारमा- र्थिक कामों जैसे यज्ञ, तप, दान, तीर्थ, व्रत इत्यादि को ही कर्म- काण्डमें लेते हैं अतः प्रश्न यह है कि आपने उन सबसे निराला मार्ग क्यों ग्रहण किया? उत्तर–भगवद्गीता का जो मुख्य उद्देश्य और ठीक ठोक तात्पर्य है वही हम प्रकट कर रहे हैं, और जिन लोगों की बात तुम कहते हो उनके समझ में यह धंसा है कि संसार और इसके सारे कार्य व्यर्थ (प्रपञ्च या मिथ्या ) हैं। इसीसे वे कर्म काण्ड का ठीक ठीक अभिप्राय नहीं प्रकट करते। भला यह तो विचार करो कि अर्जुन को गीता का उपदेश रणभूमि के बीच में दिया गया और इसके समाप्ति पर महाभारत का युद्ध आरम्भ हुआ, इससे ही ज्ञात है कि गीता ने युद्ध जैसे कर्म को भी क्षात्र धर्मा- नुसार कर्मकाण्ड में सिद्ध किया है, इसी लिये हम भी कहते हैं कि ये सारे कार्य जो संसार की उन्नति के लिये किये जायं कर्म- ६ गीता का एक श्लोक। या काण्ड में समझे जाने चाहिये। इस प्रकार संसार के सभी कार्य जो "कमें" (१) के अन्तर्गत माने जाते हैं ऐसे हैं जिन्हें लोग फल को लालसा से किया करते हैं-अगर कोई यज्ञ करता है तो इस लिए कि स्वर्ग मिलेगा, दान देता है तो इस आशा से कि अगले जन्म में उसका दस गुना, सौ गुना याहजार गुना पायेगा; सन्तान उत्पन्न करके उनका पालन पोषण करता है तो इस ख्याल से कि वंश बना रहेगो, या वे सन्ताने वृद्धावस्था में सेवा शुश्रूषा फरेंगी, कमा कर खिला- सांगो, आज्ञा मानंगी इत्यादि। इसी प्रकार मनुष्य जितने कार्य करता है उनके फलों की आशा प्रथम से ही बांध लेता है। इस श्लोक में भगवान श्री कृष्ण महाराज यह उपदेश देते हैं कि कर्म तो करो परन्तु फलों के लिये नहीं, वरन् इसलिये कि वह तुम्हारा कतन्य हैं। तुम कर्म मात्र करो, फलों की परवाह न करो, चाहे वह अनुकूल हो या प्रतिकूल। अगर किसी कार्य में तुम्हें हानि हो तो रंज या फिक न करो उसके लिए अपने मन को दुखो और उदास करो। वस्तुतः जो मनुष्य कर्मको इस ख्याल से करेगा कि इसका करना हमारा धर्म, कर्तव्य और ईश्वराज्ञा है वह उस कर्मसे होने वाले फल की परवाह न करेगा। वाहे उस का फल मुख दायक हो या दुःख दायक, दोनों दशाओं में वह प्रभु परमात्मा को वैसी ही मरजी मान कर सन्तुष्ट, आनन्दित और प्रसन्न वित्त रहेगा। (१) कर्म से ऊँचा दरजा उपासना का और उससे उत्कृष्ट ज्ञान का है। जिन का वान अन्ध श्लोकों में पायेगा।

गोता का एक श्लोक श्लोक के दूसरे भाग में (८-१०) इसी बात को और भी स्पष्ट कर दिया गया है कि-"तू कर्मो के फलोंका हेतु न बन"-- अर्थात् कर्मों को आरम्भ करते समय तुम्हारी दृष्टि फलों की ओरं न रहनी चाहिये-दूसरे शब्दों में यह तात्पर्य है कि निष्काम कर्म करो। अभिप्राय यह कि यह ख्याल बाँधकर कर्मका प्रारम्भ न करो कि वह हमें अमुक फल देवेगा-तुम विद्या पढ़ते हा यह एक कर्म है, पढ़ो अवश्य पढ़ो, परन्तु यह भावना मनमें मत ग्क्खो कि हम विद्या इसलिए पढ़ते हैं कि हम विद्वान् हो जाने पर सुखी होंगे। नहीं नहीं ऐसा ख्याल छोड़ दो, किन्तु यह भावना रक्खो कि विद्वान् बनना हमारा धर्म है, क्योंकि “विद्या विहीनः पशुः"-जो विद्या नहीं पढ़ता वह पशु है, इसका तात्पर्य यही है कि हम विद्या पढ़े और हम विद्वान् बन कर संसार के अनेक उपकार कर सकेंगे, क्योंकि परोपकार करना हमारा धर्म है। निदान इम धर्म ही की खातिर विद्वान् बनते हैं ऐसी भावना रखना चाहिये, यहो तात्पर्य है। इसी प्रकार धन सन्तान, राज्य इत्यादि के विषय में भी समझना । आगे जो श्लोक के अन्त में कहा है कि (११-५) तेरी सङ्गति अकर्म ( कर्म न करने ) में न हो, इसका अभिप्राय यह है कि तुम कर्मों का त्याग भी न करो; अर्थात् कोई यह ख्याल न करे कि जब हमें कर्मों के फलों की वासना न रह गई और हम कोई कामना नहीं चाहते तो फिर कर्म क्यों करें, इसीलिये कहा गया है कि कमों' को छोड़ कर आलस्य-मूर्ति बन कर नष्ट मत हो जाय । -

गीता का एकश्लोक।
ओज हम देखते हैं कि इस मारत खण्ड में लाखों मनुष्य
सारे कर्तव्य कर्मो को छोड़ कर आलसी बन रहे हैं, इसी कारण
देश की ऐसी दुर्दशा हो रही है कि जो हिन्दू जाति किसी समय
सारे संसार की सिरताज थी. वह आज दूसरों के माधीन और
दाने दाने को महताज हो रही है। यदि अव भी हमारे भाई अपने
परम पवित्र गीता शास्त्र की आज्ञा पर चलने लग जाय तो उनके
गये दिन फिर वापस आ सकते हैं।
।
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पता-मंगलानन्द पुरी,
मुहल्ला अतरसूया, प्रयाग ।
(इलोहावाद)

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इसलास का परिचय तर्क इसलाम पस्पति रहल्य हमारी प्रकाशित पुस्तकें नीसहयानन्द प्रकाश (मोटा राइप) वैदिक सन्ध्या मार्थ चिसापली २॥) | धर्मवीर पालक हकीकतराय ॥ चिन्नमय क्यानन्द या मांस मनु कास्वा माहार हैं। संस्कार-प्रकाश-शर्थात संस्कारविधि भापाटिका सहित श. ईश-केन उपनिषद् भाषाभाष्य वीर सन्याली श्रद्धानन्द वल्लभाचार्य मतका संक्षिप्त इति०) मार्यपथिक लेखराम पादरीसाहय भोंदू जाटका प्रश्नों आर्य समाज संकीर्तन(सचित्र) -) दर्शनानन्य अन्धमाला प्रथमभाग १) सलाम विश्वासोंपर विचारष्टि -) दर्शनानन्य ग्रन्थमाला द्वि०भाग १) विधवाविवाह-सैदों प्रमाणों युक्त ।) (वित्चन्द्र विद्यासागर कृत)॥) | इसाई मत खण्डन १) सचित्र बाल शिक्षा स्थामो श्रद्धानन्दकी हत्या सौर मूर्तिपूजा विचार इसलामी शिक्षा "जहाद" ॥) H श्राद-व्यवस्था उपासनायोग वा भक्तिमार्ग 2) पुनर्जन्मवाद ॥ पतितों की शुद्धि शाख सम्मत है ।-)| नवीन वेदान्ती व भार्यका प्रश्नोत्तर ! गृहस्थ कर्तव्य शिक्षा ३) आस्तिक किसे कहते हैं? M मृत्यु रहस्य " देह ब्रह्माण्डका नकया है N प्राचीन भगवद्गीता 1-)| पाप और पुण्य प्राणायाम विधि -धर्मशिक्षा पचमहायज्ञविधि भार्यसमाज का परिचय इसके अतिरिक्त सब प्रकारको सामाजिक, धार्मिक पुस्तकें हमारे यहां मिलती है। सूचि पत्र मंगा देखें। मिलनेका पता- गोविन्दराम हासानन्द । वैदिक प्रेस। २० कर्नवालिस स्ट्रीट, कलकत्ता।

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Pracheen Bhagwatgeeta

Author
Puri, Mangalanandji
Title
Pracheen Bhagwatgeeta
File name
Pracheen Bhagwatgeeta
Text
OCR done
Citation
1918
Published
2009/09
Publisher
Culcutta, Vaidik Press
Language
Sanskrit
Pages
88
Library
Sanmati Library, Jaipur
Classification
Vaidik sahitya
DLI number
345446
Barcode
99999990233786.00
Scanning centre
Banasthali University
Digital publisher
Digital Library Of India
Rights
Copyright permitted
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PbhxIc0ezHk
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