Agarchand Bhairondan Sethiya Jain Parmarthik Sanstha, Bikaner
Chtuarvinstijhin Poja Vidhan
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पन्नालाल बाकलीवाल
महामंत्री-भारतीयजनामिनिमहागिनी संस्था,
Anit, पापा, करना)
श्रीलाल जैन काव्यतीर्थ,
अगसिसातपकाशफ पवित्र प्रेम
विलोपोन. पो• पापयामार-कालकता।
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ए
श्रीनागनाय नमः
सगीय कविवर पंडित श्रीमद्-रामचंद्रजी विरचित
श्रीचर्विशतिजिनपूजाविधान ।
मंगलाचरण
.
नोहा।
सिधिवुधिदायक कर्मजित, भरमहरन भयभंज।
चोवीसी जिन घो मुझे, ज्ञान, नमू पदकंजः॥१॥
अपजिमशेतमामकार। C गा संसारिमझारि असाताता हूं, वामिन् । आयो सरानि हरो दुख, भक्त हूं। सरो निस्सह तुम्ही भोगते नायजी, नम् नम् तुम पाय जोरिके हाथजी ॥१॥ तीर्यकरपद पंदि जिनापीसा नमू, विभू नमू सुधमती नम् जिन दुख चमूं।" अग्लेको नमिनम् महाबोधक सही, केरलपोषक जितु न महानंद ही ॥२॥ मदानंद नमिचिदानंदबुद ही, विस्नु स्वयंभन निदौतम मुड प्रया ईमार मुन धनंजपईनम् शंकर काम मुगत पोखर ते रम् भाम जितांतक केवली, स्वयंज्योतिभूते स्मृतं जयजीवली. नमंजिनोचग हरी कलाधर शुकही,जजू उमापति चंद्र विधूचतुवक्त्रही वेदवित नमि नमूं वेद पारंगत तुही, कमलासनश्रीमानवृषभनमिट्ठसही नमू वृहसपतिमजितकर्मकरताजजू द्वादस आतम सुद्ध करमहरता भनूं नमू केवलालोक स्वयंभूमाधव । गातगभूतं नामि नमूं मजमू साधव ॥ नमू नमू ईसान भूत वत्सल नमू।स्वामी वासव नमूं अर्धनारी पy ॥१॥ जेष्ट नमू श्रीकंठ आत्मभूध्यायही, नमूदकरतार निरंजन गायही॥ समतागत बंदि सुवागीसादिही, कोविदके नमि पाय नमू अष्टादिही नमू निरंवर सांति निराकांखीतुही,निरारेक नमि नमूनिकल निर्मलसही संसारापरवरजितके पद वंदिही, चेतन चेतावदि धीर सुखकंद ही ॥ बंदू में चिद्रूप अकरता निर्गुणो, नमू महोचम पाय मारजित सदगुणो by जितमत्सर नमिन मिद्धि भानामही नमधर्म करनार धमनकी तुही वीतराग नमिनविदामान्यो सदा सुवर्माभृतनामि नर्म विधानाजी मुदा नगमानझिान निराहाक तुही, म्प द्वाद विपिवेद अधयो सुममद्दी मलमार पाम तुम पाषाक्षही द्वेषभाग नमिनम सुनय गुरुभाषिही ५ नयागास नयाने नाही. तुही सुनय ममार विधिवेषक सही। नमम एनिमना मनही नम निरस्ता पापममुच्चय ये मही॥ ५ अष्टाचर नाम अमल गुण न भा. चतुर्वीम नीस पूजि लखि परे मंत अष्टोचर नाम कंठ से बुध घरे, महा मुष्ट सुधार नरोत्तम उघरे नर सुरके सुख भोगि चकूवति यायई। द्धि वधूवर होई सदासुखपाय हो दोहा-जेनर पढे त्रिकालही संपति राज्य महान रामचंद्र जिन सम लहै पामोछि निदान ॥१५॥ पासुमा शिक्षा १ --- समुन्धय चौवीस तीर्थकरकी पूजा, पादि। वृषभ आदि अतिवीर चतुर्विशति जिना ध्यान खडग गहि इते कर्म वसु दुर्जना। वसुगुणजुत वसुघरा ठये भव छारिक, आह्वानन विधि करूं गुणीच उचारिकें ॥१॥ ओपभादिचतुर्विशतिजिनाः अत्रावतरत अवतरत संशेपट् । वी पभाविचश्चितिनिता:! अब तिष्ठत निष्ठत घों ही एपमादिचततितिनिना । अन मम सन्निहिता भवत भपत पपट् । गाता छंद कर्पूरवासित सरद ससि सम धवल हार तुपारतें। 30 पाठन
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धवल सालि अखंड डिंडी, पिंडना मुक्ता जिसी। नृप भोग जोग मनोग्य चितहर, गंधते मधुकर खुसी। पद अखे कारन क्षालि जलते, उभे करमें लेयही । चउवीस जिन वृपभादिके, पद जजू गुण गण धेयही ॥३॥ मोदी श्रीपमादिपीसोभ्योऽयंगपरमाये अक्षगान निर्ष सापीति स्वाहा ।। विमल गंध सुगंध कृत दिग्, कुसम वर्न सुहावने । ललचाय लोचन घाणहारी, मधुप कोरलिया बने । सो समेरवाण विध्वंसकारण, अगर तरुके लेय ही। चउवीस जिन वृषभादिके, पद जजू गुणगण धेय ही ॥४॥ ओपी श्रीपगादिवोचतेभ्यः कामपाणविध्वंसनाय पुष्पाणि निमीति स्वाहा । सुरहि धीव सुगंधते, पकवान बहु विधि कीजिये । रस खड जुदै करि सुवन भाजन सद्य मनहर लीजिये ॥ ।
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THIS ओ ही श्रीपमादिवीरतभ्योऽयकर्मदहनाप धूप निकामीवि स्वाहा । फल मनोहर पक मधुरे, सुर्नसे रलिया बने। ललचाय लोचन घान रंजन, रसन• प्रिय पावने ॥ भरि याल कनकमय अमर तरुके, उमै करमें लेय ही। चउचीस जिन वृपभादिके, पद जजू गुणगण धेयही ॥८॥ ओवी यीपमादिवीरति पो मोक्षफलमासये फलं निपामीति स्वाहा ।। नीर गंध इत्यादि ले पद , चतुर्विशति जिनतने । जो जजें ध्यावे वंदि सतवे, ठानि उत्सव अति घन ॥ सुर होय चक्री काम हलधर, तीर्थपदकी श्रेयही । सुख 'रामचंद' लहंत सिवाके, अर्घकरि प्रभु घेयही ॥१॥ जो पी श्रीपभादिवीतेभ्योऽनध्यपदप्राप्तये अप निर्वपामीति स्वाहा । शामिका बचन सुधासम भापि सबै जन तोपिया, नृपपदमें धनधान देय बहु
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प्रने मुरगिरि मनपन ठानि, पमनाथ पूज धार ध्यान ith नाम सामालिनाग श्रीमादिनामिनाय नी. । । 1 . मन जुग निय कन्यादोयानाने उपाधि सब मुनिवर होय। पानाचानी लेन अमेन । पूणे में पूजूं मिवदेत ॥३॥ . it iगडिताय श्रीमादिनानिदाप भयं निी. 'फागुन अमिन इकादमि जान, उपज्यो धर्म कहो। भगवान । चतुर निकाय देव नर नारि, पूणे में पूजु भव तारि ॥ ५॥ NT. ITTERTAमरिना भीत्रादिनायनिद्राय म निपा. 17 अमित गोदाग विधिमेन, हने मोक्ष पायरी सिवदेन । सुर नर मग फेलाम गुथान, पूने में पूजूं धरि ध्यान ॥५॥ या पाया पोधगंगालमदिमाग श्रीमादिनापजिना पनिी. । १७ अप जयमाला। पू : आदि जिनेशर आदि लब्धि केवलमई। समोसरन पनदेव रच्यो को चरनई ।। द्वादस जोजन ठीक महा सोभा घरें। वीस सहस सोपान सुरासुर जे करें । परि । जयप माल पण रतन चूर, ढिग मानसयंभ उद्योत सर !! 13 वापी मषि अंबुत सुहाय, लखि मानीको मद भंग थाय ॥१॥ जय गाई मधि नीरज गराल, वन लिलता यहु कुसुम जाल । प्रारार रतनमय तेज भान,नउ गोपुर प्रति द्वै धूप दान ॥ २॥ मत मत तोरण नाट साल, सुरनिय गायें जिनगुण विशाल ॥ पन सुरतरु पैस अशोक भाग, पुजबरन बरन वन सर्वठाम ॥१॥ BarackREPLACE १८.
पु. 1. , गामी कर दी र दुवार, गन च्यारि फेरि शोभा अपार ॥ परमोन गर दो नंग, चव गोपुर पूरव उत सुचंग ॥४॥ दी वन गार वार ,कई नंदी परवत गेह सार । मियम गनहर मरूप, जिन वियांकित बहु पुनि सरूप ॥५॥ का चना भान गारे कल्यान, बहु बाजे बीन मृदंगतान ना किंनर गंधर्व गीन, जिनगुण गायें अपलर संगीत ॥ ६॥ मग द्वारपाल कर गदाना, कर जोरि चले सुर खबर भूप ॥ फिरि फटिक कोट सोभा अमान, 3 गोपुर मंगल द्रव्य जान ॥७॥ माधि सभा यनी दादम अनूप, सित चंद्रकांति मणिको सुतूप ॥ ? जग गंधकुटी आमोद सार, शुज सिखर कलम उद्योतकार ॥ ८॥ ग आदि पीठ पोडम मिवान, मनु पोडा भावनके निधान । जग दुनिग पीठ वसु गुण चढाग, जय त्रितिय पीठ वसु भव लसाय।
जय सिपपीठ परि कंवल सार, जिन अंतरीक आनन सुच्चार । जय भामंडल लपि कोटि भान, अरु छत्र तीनतें ससि लजान।१०। जय तरु अशोकतें शोक दर, जखि चवर करें चउसठि हजूर ।। है मागपि भाषा कोस यार, सुर पुष्पवृष्टि शोमा अपार ॥११॥ नभ दुंदभि वाले अति गभीर, अघ द्वादस कोटिन शब्द भीर ॥ सुर असुर करें जय नंद नंद, चालै समीर अति मंद मंद ।।१२।। जय देव अनंत चतुष्ट धार, दरसन सुख वीरज ज्ञान सार । जय तीन काल दिव पनी होय, सुनि समझि जाय दस प्रान सोय॥ भु दर्पण मम कंटक न कोय, पटनु फल फूल मुगंध होय ।। जन्माविरोध प्राणी न रोप, पद कमल र जाते सर्व तोप ॥१५॥ प्रभु गुण अनंत भाषे न जाप, में अलर बुद्धि सुरगुरु थकाय ।। में अरज करूं करि पारि सीस, मुझ तारि तारि भवतें जगीस ।।५। TORIES पू० २.२.२ हम जिन गुण मार्ग, अमाल अपारं, जो भविजन ठे धाई। हनि जर मरणापलि, नामि भापलि, 'रामचंद' शिवत्तिय वरई ।। प्रो मानिागनिद्रा पापये व निरामीति साहा। नि भौचविनाय तिगाल ममता अथ श्रीअजितनाथजीकी पूजा । अधि। मकल कर्म हानि अजित जिनं मिय खेतमें। गिरि समेदले गये तिनों के देत में। आहानन मंशापन अरु सनधि करूं। मन मनन कारि सुद्धवार त्रय उमरूं ॥१॥ को धोतिनामिनदा मा प्रकार याला गर यही श्रीवित नाथ २१
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प्रतिनिधीममिलनाय जिनेन्द! पत्रमा समितिको
PERRORIES
विभगी।
गंगा समनीरं, प्रामुफमीरं. कनकरतनमय भृग भरौं ।
जर रन पिपास, हरि सर त्रास, मन वन तन त्रय धारकरी ॥
श्रीअजितजिनेस्वर, पुहमिनरेस्वर, सुरनरखगवंदित चरण ।
में पूजपा, गुण गण गाऊं, सीस नाऊं अघहरनं ।'
श्रोत धीअजिनामानिनेन्द्राय जन्ममृत्युरिनाशनाय र नि. सारा
मलिपागर ल्या, अगर मिलावें, केसरयुत धनसार घसें ।
भवताप निशान,मिव मुघकारन पूजि जिनेश्वर पाप नसें ॥ श्री.
। जननायमाभिनेाप संसारनापविनाशनाय चंदनं नि साहा ।
नंदुल मुजसंडित,माभिमंडिन, मुक्तानम जिनपद आगें।
को पुंजपिपारी भा धमटारी लदे अखेपद भय भागे। श्री.
To ओf श्रीमजितनागनिद्राग नयपदमागे मातान निपामीति साहा । देखन ही सोहे सब मन मोहे कुसुम कनकमय रतन जड़ा। मुर नर पशु सारे काम विदारे पूजत वाण मनोज उड़ा । श्री अजित जिनेश्वर पुहमि नरेश्वर सुर नर खग वंदित चरनं में पूजं ध्याऊं गुण गण गाऊं सीस नवाऊं अघहरनं ॥ ४॥ श्री निनाममगजिनदार कामराणाविध्यसना पुष्पं निपानीति (पाहा अति मिष्ट मनोहर घेवर गूजा फनी मोदक थाल भरूं । वह छुधा सतायो पूजन आयो हरो वेदना अरज करूं॥ श्रीअजित जिनेश्वर पुरुमि नरेश्वर सुर नर खग बंदित चरन । मे पूजू याऊ गुण गण गाऊं सीस नवाऊं अघहरनं ॥५॥ it if श्रीगनिगमागमणजिनदाय जुगारोगविनाशनाय नैवेद्यं निर्मपामीति स्वाहा । धरि कनकरकावी. रतनसुदीपक. जोति ललितकरि प्रभुआगे।
सप मोह नसाय ज्ञान पधावे लखि आयो परयुधि भागे। थीभाजित जि.सुर पुमिनसुर मुर नर सग दिन चरनं। में पूज़ पाउं गुण गण गाऊ मीस नवाऊं अघहरनं ॥ ६ ॥ wril ulfaनायमाबजनेशाय हायक विनाशनाय दी निर्वरामीति वाहा । कृष्नागा लेऊ जिन दिग सेऊ गंध दसोंदिसि घावत है। बहु मधुकर आवे परिमल भावें अप्टकर्म जरि जावत हैं। श्रीमजिन जिनेसुर पुहमिनासुरसुर नर सग बंदित चरनं। में पूजु पाऊँ गुण गण गाऊं सीस नाऊं अघहरनं ।। ७ ।। ओहो पानामगाजिनद्रापाट कर्मदानाय धूपं निपामीति स्वा. अनि मिष्ट मनोहर नैनन के हर उत्तम मासु फल लावें। शोजिनपद धारे व उगति टारे मोक्ष महाफल लहु पावं ॥ भीभजित जिनसुर पुइमिनरेमुर सुरनर खगवदित चरनं । CorrecTc ( २४ में पूजं ध्याऊ गुण गण गाऊं सीस नवाऊं अघहरनं ॥८॥ मोदी नानाथमगाजिनंद्राय मोक्षफलमाप्तये फल मियामी त माहा। मुभ निरमल नीरं गंधगहीरं तंदुल पहुप सु नरुल्यायें । फुनि दीपं धूपं फलसु अनूगं अरघ "राम" करि गुण गावें ।। श्र, अजित जिनेसुर पुहमि नरेसुर सुरनर खग बंदित चरनं । में पूजं ध्याऊ गुण गण गाऊं मीस नवाऊं अघहानं ॥ ९॥ titश्रीनिननामगजिनद्राग अनादप्राप्तये अर्थ निर्मपामीति साहा। पंच कल्याणक अर्घ । दोहा। पिजे विमानथकी चये, विजया गर्भमझार । जेठ अमावसि अवतरे, जजू भवार्णवतार ॥१॥ Reace २५ पू. भों । ज्येष्ठकाणामावस्यायां गर्भमंगलमंडिताय श्रीअजितनाथ जिनंदाय निपामीति स्वाहा। माघ सुकुल दसमी सुरा, जन्म जिनेस निहार । सुर गिरि सनपन करि जजे, मैं पूजूं पदसार ॥२॥ ओ माघशुलदशम्यां जन्मकल्पाणसहिनाय श्रीअजितनाथाजनाय भर्घ निर्वाति ना माघ शुकुल दसमी धरयो. तप वनमें जिनराय। सुर नर खग पूजा करी. हम पूजे गुण गाय ॥ ३ ॥ औं ही पशुलदशम्या तपोमंगलमंडिताय श्रीअमितनाथ जिनंदाय अर्थ निप मीति वा। पोह सुक्ल एकादसी, कंवलज्ञान उपाय । कहो धर्म पदजुग जजे, महामक्ति उर लाय ॥४॥ २ -- गों की पीपशुफ्लैकादश्यां शानकल्याणपंडिनाय श्रीअमितनापजिनद्राय अर्थ निनामनि स्वाहा चेत सुकल पंचमि विर्षे, अष्ट कर्म हनि मोख । अजित समेदाचल थकी, गए जिजू गुण घोख ॥५॥ ओं ने चश्शुक्ल पंचम्यां गोक्षमंगलमंदिताय श्रीअजितनाथ जिनद्राप महा निर्मः पामीति चाहा। अथ जयमाला. मकल तत्त्व ज्ञायक सुधी, गुण पूरन भगवान । धरम धुरंधर परम गुरु, नमू नमू धरि ध्यान ॥ १ ॥ पगड़ी। २० जय जय श्रीअजित जिनेस देव, तुम चरन करूं दिनरैन सेव ॥
जप मोक्ष दातार धीर, जय कर्मसेलभंजन मुवीर ॥१॥ जगपंचमहाया परनहार, नजि राज्य मरे वन पान पार ।। जयपंच मामनिपाला जिनंद, गुप्ति हरन पनि परमकंद ॥२॥ परि पान भए विप भुप, गिरि मेरु समानौ अवल रूप ॥ जयपति फरमको नास ठान, उपजायो केवलज्ञानभान ॥३॥ ना समवसरण रचना बनाय, हारे हरिष्यो मन आनंद पाय । कुछ हरिदो वरना भाक्त भाय, जिस वलन इपिक अंवसाय ।। जप पंवरतनमप पूलसाल, चउ गोपुर मन मोहन विसाल। जप मानमधम सुरंग नंगा लखि मानी नावे आय अंग॥५॥ 43 वापी निर्मल नीर सार, सुभ बोलनजह वकवा मार। जल भरीयातिका गिरंदरूप. पुष्पनिकी वाडी अनि अनूप ॥६॥ १EARREरोसरहा। RECE 24 प्र० " सुभ कोट दिपं जिम तेज भान. नृतसालामें गावें कल्पान । पनि वन मोभा वरनी न जाय. राजत वेदी बहु धुज उडाय ॥७॥ फिर कोट हेममय सुघरसार.बहु कल्पद्रुम वन सोभकार । नव ग्ननगमि सोमित उतंग, ऊंचे मंदिर जहं बहु सुरंग ॥८॥ फिर फटिक कोट सोभा अमान, मंगल द्रव्यादिक धूप दान। ? मधि द्वादम बनिय सभा अनूप, मुनि सुर नर पशुबेठे सुभूग ॥ ९ ॥ विचि नीन रतनमय तुंग पीठ, वेदी सिंहासन कमल ईठ । जिन अमेरीक आनेन सुचार, धर्मोपदेश दे भव्यतार ॥ १०॥ मिन छत्र तीन उद्योतकार, तर हे अशोक जन शोक टार। गंधार विष्ट जुन पुष्प विष्ट, नभि दुंदुभि वाजे मिष्ट मिष्ट ।। . भाकामाला पू. अनि पाल नंवर पोसठ दुराय, भामंडल उवि वरनीन जाय। की विभूति जिनराज देव, नमि नमि फुनि फुनि करहों जु सेव।१२। भाजजिन जिनेमुर, नमत सुरेसुर. पूजें खेचरगण चरणं । पनि यह यात्रे, सिर पद पावें 'रामचंद्र ' भवभयहरणं ॥ १३॥ * अविनापविद्राप मा नियामीति सारा । If श्री अजितनापजोकी पूजा संपूर्ण। अथ श्रीसंभवनाथपूजा। ECORRECER: सभा रम हने सरे, सिव समेदतें पाय । आहानन स्थापन करूं, मम सनिहनि भर आय ॥१॥ को दि जामसेट । जी ही धीमानायtern - मि. अनिल विष्टःओंधीभानायजिनेंद्र 1 अप्र मम मनि faat मर मर । । त्रिीय मंतृपा गतायो,अति दुख पायो, जल लायो प्रभु तुम आगे। भरि कंचन झारी,धार उतारी, जन्म मृतीनछिन भागे। मभव भव नोस्यो, मोह मरोस्यो, जोरयो आतमसा नहा। ई पू ध्या, सीस नवांबू तारि तारि चिलम जु केहा ॥१॥ जोमी श्री पवनाममगनिद्राय मागमृत्युमिना नाग जल निर्मपा. मीति स्याहा भव ताप सतायो, तुम ढिग आयो, चंदन ल्यायो अति सीरा। हो सिद्ध निरंजन, भवभयभंजन, तुम पूजू हरि भवपारा॥ गरण मीनि। ३ पगा। गाल।
मा भातारपो, मोह मरोल्पो जोरपो आनयमों नेहा । पा. भीम नग नारि नारि विरम जु केह।। को भनिनाय संसारधिनाशनाय पान निपपीति मारा भर वाम वसेरा. तोरो भेरा. में चेरा तुम गुण गावू । नदुल सुभयोडत. मौरभि मंडित, पूजा करूं शिव पद पावू ॥ मा भर तोपो. मोह मोरयो जोरयो आतममों नेहा । हजपा मीर नायूं तारि तारि पिलम जु केदा ॥३॥ x NAभनय पतिकार प्रयासोऽन् निशानीति माहा। पो काम महारल. वामि कारे लीनों हरि हर प्रधिक मव सारे। मे पूजन आयो, पामुक लायो. कुसुम मदनसर हरि प्यारे॥संभ३० । को मनाया नद्राय मानताशनाय पुर्ण निशानीति माहा। HerCasik पू० यह छुपा हत्यारी अति दुखकारी मोहि सतावत है ताते । वर मोदक लामो पूजन आयो, हरो वेदना प्रभु यति॥ संभव भव तोरयो मोह मरोस्यो जोरयो आतमसों नेहा ।। हं पूजू पावू सीस नवाबू तार तार विलम जु केहा ॥५॥ ओं ही श्रीमंयनाथभगवजिनेंद्र'य सुधारोगविनायनाय नैवेद्यं निर्वामीति स्वाहा । मोह महातम छाय रह्यो मम ज्ञान हन्यो अति दुख दीनो। माप ल्याओ. धांन नप्तायो पूजत पद चेतन चीनो ॥ संभव सभामा समाजिनेंद्राय मोहाच काररिनाशनाय दीपं निवपामीति स्वाहा । दुष्ट जकर्म वडे अधर्म दुख देवें कवलौं गावें । कृम्नागरधूप मलय अनूपं पद खा लहु जरि जावें ॥ संभव भव० ॥ ओं ह्रीं श्रीसंभवनाथ जिनेंद्राय अष्टकर्मदहनाय धूपं निर्मपामीति साहा । मोक्ष महा मग रोक रह्यो, अंतराय कर्मवल मो रोधा। फल प्रासुक लावू तोहि चढावू मोक्ष मिलावो हो वोधा ॥ संभव० पू० को धीमेभानागजिने छाप मोधर नमाप्तरे निगमीति फलं स्वाहा। निर्मल नीरं, गंप गहीर, तंदुल पुष्पं चरु लायो। मणिदोपं घूपं फल सु अनूां अरथ "रामचंद" करि गायो।। सं० भोंदही घीसंभवनायजिनेंद्रापाध्यादरामये अयं निशमीति स्वाहा। अथ पंच कल्याण अघ। दोहा। फाल्गुण सुदि अष्टमि चये नव ग्रीसकते ईद । . सेनादे उर अवतरे जजू धर्मकं कंद ॥ १॥ ओ हीराल्गुगामायांगारकरापार श्रीसंपनापजिनेदाय माप० ॥१॥ कातिक सुदि पुनिम सुरा संभव सुर गिरि लेय ।। जन्म महोत्सव कार जजे हम पूगुण ध्येय ॥२॥ ओंकपूर्णारयां जन्मपंगामंडितए संभवनायजिनेंताप महापं निपाति. AD
दिनार श्रीगंगानाथ जिनेदाप महा नि।
साथि असित कार्तिकविष ध्यान खड्ग गहि वीर।
धाति हानि केवल लयो जजू ज्ञान हित धीर ॥ ४ ॥
fil काफिया मानगंगलदिना श्रीसंभवनायजिनंदाप अर्थ निर्वगामीतिक
चेन मुकल पष्ठमि विष शेप करम निरवार ।
मोक्षपरांगनपनि भये जनुं गुणोध उचार ॥ ५॥
माहा गुरपाया मोधयाणदिनाय श्रीसंभवनापजिदाय निर्वामी
अथ जयमाला
दोदा-संभव निज संभव हरयो मो संभव हरि नाय ।
करूं वीनती सुमरि गुण नमूं सीस धरि हाथ ॥१॥
आडल्ल अ कालतूर्य गयो पोंण सेपरह्यो पावही, उपजे संभवनाथ जगत रावही। माता सेनादेवि जितारि पिता नमू, सावंती भवयान पूजि अपकं व ॥ घनुपचारसो तुंग कनकरपुसोइनो, सठिलख पूरव आयु अश्व चिह्न माहने।। वंश इक्ष्वाकुसिंगार पूर्व लख तप कियो, घाति कर्म च उजारि ज्ञान केवल लियो॥३॥ समोसरन धनदेव रच्यो शोभा धनी, ग्यारा योजन वीच एक सतपन गनी। वीच महात्रय पीठ कमल पर जिन लसै, अंतरीक मुख चार छन ससि हंस ॥४॥ चौसठि चेवर जखेश करें अतिही छजे, ३ साढा द्वादस कोडि जाति दुंदभि वजे । दिव्य धुनि करि भवि नारे भवतें नाथजी, मोकुं भवतें तारि देव ! गहि हाथजी ॥५॥ हहमंसार मझारि महादुःख में सहूं,तुमतें छाने नाहि कहा मुखतें कहूं। यात कारज मोहि सरै तुमतें सही औरनतें कहा काज सरनि तेरी गही ।। तेरो नाम अपार उदधि नबका भली,तेरो नाम उवारि होहि सवही रली नेरो नाम जपंत उरग द्वैमाल ही, तेरो नाम जपंतसिंघ द्वै स्याल ही। तेरो नाम जपंत रोग सवही टरें, तेरो नाम जपंत सिद्ध घरमें भरे। तेरो नाम जपंत ज्वाल जल पेखिये, तेरो नाम जपंत दुरद मृग देखिये तेरे नाम पसाय श्वान सुर थाययो, मो मन मैं तुम नाम भलीविधि आययो। तो अव चिंता कौन मोछि पद पायस्यौं, सुर पदकी कहा वाव भृती हवै चायस्यों ।। ९ ।।
३८ दोहा। संभव जिनकी श्रुति इहे जो पढिसी मनलाय । "रामचंद" सुख शिव भले पावै सहज सुभाय ॥ ओंजी श्रीसंभवनायनिद्राय अप निर्वामीति स्वाहा । इति श्रीसंभवनाथपूजा समाप्त । अथ श्रीअभिनंदननाथपूजा। श्रडिल। घाति हने लहि ज्ञान बोधि भवगिरि ठये. हनि अघाति अभिनंद सिवाले थिर भये । आह्वानादि विधि ठानि वारत्रय उचरूं, संवौषट् ठः ठः वषट् त्रियविध करूं॥१॥ BREAK ।। संवोपट दन जिनेंद्र प्रतिष्ठतिष्ठा उठः। याभिनंदन जिनेंद्रात्र गम सन्निहितो मा मा । यपट् । त्रिमंगीचंद। रतम जल प्रामुक, अमल सुवासित, गंगादिक हिम तटहारी। तुम पु.नन आयो, अति सुख पायो, हरा जनम मृति दुखकारी॥ अभिनंदन म्यामी, अंतरजामी, अरज सुनो अति दुख पाऊं। भव बाम वमेरा, हरि प्रभु मेरा, में चेरा तुम गुण गाऊं ॥१॥ को श्री अमिनंदनजिनेन्द्राय जन्ममृत्युविनाशनाय जलं नि । शुभ कुंकुम ल्यावे, धुंदन मिलावै, अगर मेलि घनसार घसे। श्रीजिनवरआगे, पूज रवावै मोहताप तत-काल नसे ॥ अभि० ॥ को धीमभिनंदननिमाय संसारतापविनाशनाय चंदनं निपामीति स्वाहा ।।
पू० ४. मुक्तामम तंदुल, अमल अखंडित चंद फिरन सा भरि थारी। करि पुंज मनोहर, जिन पद आगें लहों अखै पद सुखकारी। अभिगा' ओं ह्रीं श्रीप्रमिनंदनमिनेन्द्राय अक्षयपदमाप्तये अक्षतान् निर्वाति स्वाहा। मंदार जु सुंदर, कुसुम सुत्पा, गंध लुब्ध मधुकर आवे । जिनवर पद आगे, पूज रचावें समरवान नसिकें जावें ॥ अभि०॥ ओं हैश्री ममिनंदनजिनेंद्राप फामवाणविश्वमनाय पुर निपामीति स्वाहा । नानाविध चरुले मिष्ट मनोहर, कनकथाल भरि तुम आगें। पूजन कू ल्पायो, अति सुख पायो, रोग छुध्यादि सबै भागें । मभि०॥ ओं ही मभिनंदननिद्राय नुधारोगविनाशनाय नैवेद्य निर्मापामीति व हा । मुझ मोह सतायो अति दुख पायो ज्ञान हरयो करिकै जोरा। मणि दीप उजारा तुम ढिंग धारा इरो तिमिर प्रभुनी मोरा ।। अभि. ओ ही श्रीअमिनंदन जिनेंद्रीय पोहोरकारबिनाशनाय दीपं निपामीति स्वाहा ।। TreG ka
ॐ
ल्यावं, अगर मिलावं, भरि धूगायन प्रभु ऑग।
खये शभपरिमलने, मधु आ करमजरें निज सुख जागे ।। अभि०
भी ही अंमिनानजिनेंद्रीय अष्टकर्मदहनाय धूपं निर्वामीति स्वाहा ।।
फल उत्तम ल्या, प्रामुक मोहन गंध सुगंधे रसवारे ।
भरि थाल चढावें, सो फल पावे मुक्ति महा तरुके प्यारे । अभिन०
पाही श्रीअभिनंदनजिनेंद्राय मोक्षफलमाप्तये फलं निपामीति स्वाहा ।।
करि अर्घ महाजल, गंध सु लेकरि, तंदुल पुष्प सु चरु मेवा ।
मणि दीप मु धूपं,फल जु अनूपं रामचंद" फल सिबसेवा ॥ अभिन०
ओ ही श्रीअभिनंदनजिनेंद्रीय महाय निर्धपामीति स्वाहा ।।
पंच कल्याणक अर्य।
दोहा-अष्टमि सित वैसाख तजि, विजय विमान सुरिंद।
अवतरि गर्भ सिधारथा, लयो जजू गुण बंद ॥ १॥
पु. SHORORSRECERTERS . ओह शाखशुपटाया गर्भमंगलमैडिनाय श्रीअमिनंदन जिनेंदाप अप निर्वपाल जन्म माघ सुदि द्वादसी, सुरपति लखि इत आय । मनपन करि सुर गिरि जिजे, हम जजि हैं गुण गाय ॥२॥ यही माघशुरुरद्वादश जन्मगरमंडिनाय श्रीअभिनंदनजिनेद्राय महाप नि० श्वेत माघ दादास दिना, अभिनंदन धरि धीर। जगतराज तृनवत तज्यो , जजूं चरन शिवसीर ॥ ३॥ मां ही माप गुरद्वादश्या तपोभूपणभूषितार श्री ममिनंदन जिनेंद्राप अर्घ निः । पोप सुकल चउदास हने, घाति करम जिनदेव । कह्यो धर्म केवलि भये,जजू चरण जुग एप ।। ४ ॥ ही पौषशुक्लचतुका ज्ञानाराणमंडिताय श्रीअभिनंदनजिनेंद्रापा निर्व। सिन १ष्टमि वैशाख सिव, गये सेप हनि कर्म। जजू चरनजुग भक्ति करि, देहु देव निज धर्म ॥५॥ ओं ही वैशाख शुक्लपयां मोक्ष कल्पायुमंडिनाय श्रीममिनंदननायजिनद्रायापं नि । Kaise ESEX ४२ अथ जयमाला। आमिनंदन आनंदके, दाता जगन विख्यात । २ नमन त्रिविधा मदा, मुझ आनंद करि तात ॥१॥ पारिया जय अभिनंदन आनंद कंद । जय तात स्वयंवर धर्मबंद ॥ जय देवि मिधारथा उदर सार । अवतार अजोध्यापुरम झार ॥ वपु कनक चाप त्रियमे पचास । इक्ष्वाकुयोममधि रवि उजाम ॥ प्रभु पुरव आय पचास लरुप, तप धारि हने चउघाति अरुण ॥ केवल उस्मय सुर असुर आय, जय शब्द ठानि कीन्हाँ अघाय । ममवादि भूनि अद्भुत अपार, रचि थुनि आरंभी इंद्रमार ॥४॥ रसना सहस करिक भनंत, तब पार लहें नहिं गुण अनंत ।
. CARECRUICK में भला पुदि किम करुषसान, तुम भक्ति जुप्रेश्यो देव आन । जय तीन जगत पति के सुनाथ, सुर गुरू नमू में जोरि हाथ । जगस्वामिन तुम स्वामि देव, जगपूज्यनिके तुम पूज्य एवं तुम ज्ञाता सर्वज्ञ ईश, तपमिनमें तुम तपसी गिरीस ॥ तुम जोगिनमें जोगी महंत, हो पर्म जिनसुर जिन कहत ॥ ७॥ जय विश्व उधारन दुख निवार, निरवांछिहितू जगके अधार। जप उभे श्रीराजित अपार, निरग्रंय महा भुविके मझार ॥८॥ जय सनी आदि करि मेव्य पाय, सवू महान ब्रह्मवारणाय । तुम साल द्रव्य परजय लखान, जुगपतहिं वरुप निर्मुक्ति ज्ञान तुम दरसन रविकरि तम अज्ञान, जुत पाप नसे प्रगटे कल्यान । है न चरन जुग जोरि पान, गुगसिंधु सरन तुम नाहि आन॥ हूं धाप भयो तुम निकट आय, मोजीनव पनि तुम चरन पाय । ४३ तुम धन्यना किरणानिधान, “चंदराम” कई दे मुक्तिधान ।। पू इह थुति अभिनंदन, पाप निकंदन, जो भवि गावे सुर धाई। के दिवि अमरेसुर, पुहभि नरसुर, लहु पावह शिवसुखबरई ॥ ओं ही अमिनद नजि-द्राय पूर्ण निर्मपामीति स्वाहा ।। इति श्री अभिनंदन निनपूजा समासा ।। अथ श्रीसुमतिनाथजिनपूजा। अपिता संवौषट् ठः ठः वपद त्रिविधा करूं, आहानादि विधि ठानि वारत्रय उचरूं । सुभति जिनेस्वर पाय जजनके काजही, गिरि समेद कल्याणक मोछ विराजही ॥१॥ ४ २ हो तिनराधमगति र संबोट । nu-तिन पक्षणाजिनेंद्र तिष्ठति ठः । । मतिनापभगाजिनामा मन सपरतो भा भर वर । गीता छ । अनि सुच्छ उत्तम नीर प्रासुफ, मिश्र गंध मिलायये। भरिम शारी पुजि जिनपद, जनम मरन नसायये ॥ धीमुमनि जिनवर मुमति द्यो, मुझ पूजिहूं वसु भेवही । म अनन काल अाज भाटिस्यो, विना तेरी सेवही ॥२॥ s)! 4' (किन जिनेवार जामृत्युगिनाशनार अनिपा. कपूर के.सर अगर लेकर, धमों नंदन वारना। जिन पूजि भरिजन भावमेती, मोह नाप नमारना॥ श्रीसुमति॥ भो भनि.पविभाव संसातानिायनाप चंदनं निगमर्माधि स्वाहा ।
. तंदुल मुनिर्मल लेहु दीरघ, जानि मुक्ताफल यही । जिन चरण आगे पुंज करिये, अखेपद पावे सही ॥ श्रीसुमति० ॥ यो गुगनिनाममायनिंद्राण अक्षयादमाये अक्षनान् निपामीति साहा । मण वरण कुसुम सुगंध प्रासुक, अमर तरुकं ल्यायये । जिनपद कमल आगे चहोडे', मदन वाण नसायये ॥ श्रीसुमतिः ॥ गोजी श्री गुपतिनाथ जिनेन्द्राय कामगाणविश्वसनाय पुष्पं निर्णयामीति स्वाहा । मरस मोदक मिष्ट घेवर, कनक थाल भराइये । जिन पूजि भव्य नेवेदि सेती, छुधा रोग नसाइये ॥ श्रीसुमति० ॥ ओंकी अंगुपतिनाथ जिनेन्द्राय जुगारोगविनाशनाय नैवेद्यं निर्धपामीति थाहा । तेज मणिमय दीप सुंदर, करत तमको नासही। जिन पूजि भविजन भाव सेती, होय ज्ञान प्रकासही ॥ श्रीसुमति०॥ ओ श्रीमुमतिनाथ जिनेंद्रा मोहधिकारचिनाशनाय दीपं निपामीति स्वाहा ।
। CAKC पपूर फिस्नागर सुवंदन, धूप दहन हुतासनं । परसेय भपि जिनचरण भागै, अए कर्म विनासनं ॥ श्रीसुमतिः ॥ भानुमतिनापजिनेदाय मधर्मरहनाप धूप निकामीति स्वाहा। पादाम श्रीफल वारु पूंगी, मधुर मनहर स्पायये । पद मल जिनके पूजिते ही, मोछि के फल पायये ॥ श्रीसुमति ॥१॥ भानुमतिमायजिनेन्दार मोलमालये फल मियामीति सार। नीर गंध सुगंध तंदुल, पुष्प वरु अरु दीप ही। वर पर फलले अर्घ काले, " रामचंद्र " अनूप ही। श्रीमुमनि जिनवर सुमति द्यो मुझ, पूजि हूं वसुभेव ही। अनंत बाल अकाज भटिक्यों, पिना तेरी सेवही ॥१०॥ को। यसपनिमापविनाय प्रमामये या नियमादि सार। *QUCHER ५८ 10 ग पू कपूर किस्नागर सुचंदन, धूप दहन हुतासनं। परखेप भवि जिनचरण आगे, अष्ट कर्म विनासनं ॥ श्रीसुमतिः॥ ओं को भीसुमतिनापजिनेन्द्राय भष्टकर्मदहनाप धूपं निपाीति स्वाहा । वादाम श्रीफल चारु पूंगी, मधुर मनहर ल्यायये । पद कमल जिनके पूजिते ही, मोछि के फल पायपे॥ श्रीसुमतिः॥९॥ भों ही श्रीगुमविनायजिनेन्दार मोक्षफलपाये फल निमामीति सार। नीर गंध सुगंध तंदुल, पुष्प चरु अरु दीप ही। वर धूप फल लै अर्घ कीजै, " रामचंद्र " अनूप ही। श्रीसुमति जिनपर सुमति द्यौ मुझ, पृजि हूं वसुभेव ही। मैं अनंत काल अकाज भटिक्यो, विना तेरी सेवही ॥१०॥ भों ही श्रीसुपतिनायजिनेन्दार अमर्यपदप्राप्तये महा नियामीति स्वाहा।
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ओं शुफ्लैकादश्यां शानभूपणभूषिताय श्रीसुपतिनाथाय अर्थ नियामीति. एकादम सित चैतकी, शेप करम इनि मोख । मिखर सभेद थकी गये, जजू चरण गुगघोख ॥५॥ ओ ही चाशुक्लक दश्यां मोक्षरल्याणभूपताय श्रीसुमतिनाथाय महा निपामीति अथ जयमाला। दोहा । सुमति सुमति दायक सदा, घायक कुमति कलेस । लायक सिव पद देनके, ज्ञायक लोक असेस ॥१॥ पड़ी। जय सुमति चरण दुति नख महान ।जय करमभरमतमहरन भान । जय मेघपिता वितपदम लाल। विकसावन कू रवि प्रातकाल ॥२॥ जय मात सुमंगला उदर सार । अवतार लयो त्रय ज्ञान धार ।
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हो करुणानिधि जगपति अवार । सिव देहु अखै सुखको भंडार ॥९॥ storic पत्ता। इह जिन गुणमाला, परम रसाला, 'रामचंद' जो कंठ धरै । 8 मिद्ध निरंजन, भवभय भंजन, मोखरमा ततकाल वरै ।। ओ ही में सुमतिनाथ जिनेंद्राय महाप निर्वपामीति स्वाहा । इति सुमतिनाथाजेनपूजा समाधा। अथ श्रीपद्मपूभजिनपूजा। भडिल। Kitcoice* पदम करम इनि केवल ले भवि वोषिये। कार अघाति निरमूल सिखरते शिवगये। आह्वानन संस्थापन मम सनिहित करूं। KAASUR
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Ste पू. ५५ KACRORSHISHIRECAR अछित अखंडित दीरघ उज्वल, चंद्र किरन समस्यायें। श्रीजिनवर पद पूजि मनोहर, तुरत अखे पद पावें ॥ पदम जिने०॥ ओं ही श्रीपमममजिनेन्द्राय अक्षयपदप्राप्तये अक्षतान् निर्वामीति स्वाहा । पंच वरनमय कुसुम मनोहर, पासुक वक्खु सुहावें । गंध सुगंधी मधुकर आयें, पूजत काम नसावें ॥ पदम जिनेश्वर०॥ ओं ही श्रीपमप्रमजिनेंद्राप कापवाण विनाशनाय पुष्पं निष्पामीति स्वाहा । घेवर मिष्ट मनोहर मोदक फैनी गूजा ल्यावें। श्रीजिनवर पद चरुतें पूजें रोग छुपा नाश जावें ॥ पदम जिनेश्वर पदमादायक, पायक हो भव केरा। है चेरा प्रभु तुमगुण गावू, पावू में गुण मेरा॥५॥ ओं ही श्रीपद्मपमजिनाय सुधारोगविनाशनाय नैवेद्य नि। दीप रतनमय वांत विनाशन कनक रकाची धारें श्रीजिनवर पदपूजत ही नर मोह मिथ्यात्व विदाएँ । पदमः વિનંછ ५४
धूप निवपामाति साह।।
माफल लोग बदाम सुपारी एला आदि मगावें।
श्रीजिनवर पद फलते पूजें मुक्ति महाफल पा । पदम जिनेसुर
भो भरममनिनाप माधफरमाये फल नियामीति स्वाहा ।
जल गंधाक्षत पुष्प सु चरुले दीप सु धूप मगावें ।
उत्तम फल ले अब बनाये रामचंद" सुख पावें ॥ पदम जिनेस
औसधीपमानिनंद्रायाध्यक्षमाये अपं नियामीति स्वाहा ।
पंच कल्याणक अर्घ।
परि प्रीवफतें चये पाठी माघ असेत ।
रा. ५. गर्भ सुसीमा अवतरे जजू त्रिविध धरि हेत ॥१॥ ओं ही मापगपष्ठयां गर्म कल्याणमंदताय श्रीपमप्रभजिनेंद्राय अर्थ नि० । कार्तिक तेगसि कृष्ण ही जनमे श्रीजिनराय । इंद्र महोत्सव करि जजें, जजिहूं तूर वजाय ॥२॥ ओं ही कार्तिकत्रयोदश जन्ममंगलमंहिताय श्रीराममजिनेंद्रीय अयं नि। महाभूति साम्राज्य ताजि, कार्तिक तेरसि स्याम । बसे अरनि तप धारि जिन जजू चरन अभिराम ॥३॥ ओ हो कार्तिक कृष्णप्रयोदश्यां तपोमंगलपंडिताय श्रीपमममजिनेंद्राय अर्धे निर्वामीति. पनिम चैत इने अरी घाति कर्म धरि ध्यान । केवल ज्ञान उपाइयो,जजू पदम भगवान ॥४॥ ओं ही चत्रशुरु पूर्णिमास्यां ज्ञान मंगळमंडिनाप श्रीपन भनिद्राय अयं निवपामीतिक चौथि कृष्ण फागुन वि हनि अघाति जिनराय । मोक्ष समेद थकी गये जजू चरण गुण गाय ॥ ५॥ SERECECKERAYECRUAcies श्री फागुणाचतुर्दश्यां माता पाएशोभिवाय धीपनामजिनेंद्राय अर्ध नि० । जयमाला। पू० दोहा। पदमनाथके पद पदम, महाअरुन अविकार । नमू उभेकर सीस परि, देहु देव मति सार ॥१॥ पद्धरि छंद। जय पदमनाथ कोसंविनाथ । ऊारि ग्रीवक तजि विमान । आये। मुमीमा गर्भसार । वदि माघ पष्ठि चित्रा सुधार ॥२॥ यदि कातिक तेरसि जन्म एव । आये तित चतुर्निकाय देव । जय नंद नंद करते अपार । गिरि मेक कियो अभिषेक सार ॥ ३॥ परि पदमनाम हरि पृजि पाय । नृप धारणके दरवार लाय।
। बहु नृत्य करयोगो कर बवान । लखि मगन भये पित मात आन । जिन वृद्धिभये नन अरुणभान । धनु दोय मना पंचाम जान । नृ र बाल पूर्व उनतीम लम्घ । मुम्ब मगन भये नजि राजदस्य ॥५॥ पट वर्ष करयो नप घोर वीर । ऋतु ग्रोपममें गिरि सिखर धीर ॥ रवि किरन नपे मनु अग्निज्याल । धरि ध्यान खडे निरभै विशाल | ऋतु पावम नमनल चतुरमान । धरि जोग खडे अहिलिप्त डांस ।। ऋतु शीन नरंगनि नाल वाम। वाजे समीर अनुभव विलाम ॥ ७॥ धरि ध्यान अग्नि चउ घाति जारि । लहि ज्ञान चराचर सब निहारि समवादि महित करिक विहार । धमोपदेस दे भव्य तार ॥ ८॥ फ्ट वर्ष घाटि लख पूर्वज्ञान । सब आयु पूर्व लख तीस जान ॥ फागुन वदि चौथि समेदथान । हनिके अघाति पहुंचे निवान ॥९॥ हं करूं वीनती जोरि हाथ । मुझ देहु अखे पद पदमनाथ ॥ PACHER-IATIOPERTAINER ५८ नुम कारन विन जगबंधु देव । इद प्रचुर भवार्णवको न च ॥१०॥ कानिक निधिकारी, रसि तपधारी, चैत पूनिम प्रभु ज्ञान घरं । सुग्नरम्यग आये, गुणगण गाये, 'रामचंद' नमि ध्यान करं ॥११॥ पमनापजनद्रापमा नियामीति सास। पिसनाधमिनमा समाया। अथ श्रीसुपार्श्वनाथ पूजा। प्रति सुरपनि नरपति फणीमभा मधि जिननणी, पाणी सुनि प्रतियुद्ध होय आतम मुणी। जिन सुपास पद जुगल ना सिरनायक,
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படி, 11 1 भोरापानापजिनदायाएकामदानाप पं निर्मपामाnि वादाग धोफर लोंग पिस्ता, मिरवारिक ल्पार हो। जिन पू परम उठाइसेनी, मुक्ति के फल पावही । भव पास ॥ भो श्रीसुशानापभिनन्दाय मोक्षफलमाप्तये फलं नि । नीर गंध सुगंध तंदुल, पुष्प वरु अरु दीप ही। शुभ प फल ले अर्घ कीजै, रामचंद्र , अनूप ही ॥ भव पास ॥ भो । मुपानामिनद्रापानपदराप्तयेऽ निरामीति स्वाहा । पंचकल्याणक अर्घ। दोहा। प्रीवक मध्प यकी चये, पठी भादव सेत । पृथिवीदेवी उर अवतरे, जजूं मोक्षके हेत ॥१॥ भों मारापी गर्मगलरताय भीमुनापाय अप कि. Kawasak re ६२ जेठ सुकल द्वादसि विपे, जनमे सुरपति आय। नृत्य तूर धुनि करि जज, में जाजि हूं गुण गाय ॥२॥ ओजी जेष्ठशुणद्वाददां जन्मल्याणगर्मिनाप श्रीसुपार्शनाथाय अर्थ निर्व। तृणवत तजि सामाज्य तप, धरपो अरनिमें जाय । जेष्ठ सुकल द्वादसि विष, जजूं पदमजुग ध्याय ॥३॥ आं ही जेष्ठशुक्लद्वादश्यो सपोभूपगभूपताय सुपार्श्वनाथाम अर्थ निपा० कृष्ण पष्टि फाल्गुन हने, पानि कर्म धरि धीर । कहो धर्म लहि ज्ञान जिन, जजू हरो भव पीर ॥ ४ ॥ आंदी फारगुणकण पाट्या शानमंगलमोठमाय श्रीमुपार्श्वनाथाय मध निर्वा० सप्तमि फाल्गुन कृष्ण ही, इनि अघाति सिवथांन । गए समेदाचल थकी, जजू मोक्ष कल्यान ॥५॥ oit फाल्गुन कृष्णसाम्पा मोतरंगलाताय सुपार्श्वनाथाय अ
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. । जेठ मुफल द्वादमि विष, जनगे सुरपति आय। नृत्य तर धुनि करि जज, में जान गुण गाय ॥२॥ it in Ifणाप श्रीपाएनाया अनि । तृणवत नजि सामाज्य तप, घरपी अरनिगे जाय । जेष्ठ सुफल हादसि विप, जनुं पदगजुग ध्याय ॥३॥ ओमी अष्टशुमनदादमा गाय पानाधार अनिवपा० कृष्ण पष्टि फाल्गुन हने, पानि कर्म धरि धीर । कालो धर्म लधि ज्ञान जिन, जजूं घरो भव पीर ॥ ४ ॥ vi फागुणमध्य भागसमीरनाय श्रीरापानामा निर्वा० मप्तगि फाल्गुन कृष्ण ही, पनि अघानि मिवथान । गए समंदाचल थकी, जजू मोक्ष कल्यान ॥५॥ itsी पारगुनमाणसाम्पा गोलमासाय गुपायनापाप अनिपानीfro 40 R .. पून भौधीमानायजिनदाय मा निशीति पाए। इति मीसुशर्मनायाश्रमपूजा समास । अथ श्रीचंद्रप्रभजिनपूजा। 3 रिल। शुभ अतिसय पोतीस प्रातिहारिज अधिकाही, अनंत चतुष्टय जुक्त दोष अष्टादस नाही। आशनन विधि करूं नाय सिर सुधारि मनही, लोक मोह तम हरन दीप अदभुन ससि जिनहीं ॥१॥ भोली भीरमः ! तर सर। संबोपद। मोरी धीi! विs वि। ठ । ओह भीरमजिने ! म सनितो मर मा ।। ertestine -- .
पू. गीग छंद। मियल निरगत तोय सीतल मधुर सुरगथकी परे । भरि ग जिनवर चरण आग धार दे भवमृति हरे ।। श्रीचंद्रप्रभ दुतिदको पद कमल नखसमलगि रह्यो। आतंकदाह निवारि मेरी, अरज सुनि में दुख सह्यो ॥१॥ ओंदी | चंद्रमजि-द्राय नममृत्यु विनाशनाय जलं नि मीति स्वाहा । भवताप दाद दहन मोकू एक छिन न विसारही। घनसार मलय थकी जिनेसुर पूजिहं दुख टारही। श्री चंद्र० ॥२॥ ओं श्रीचंद्रमजिनद्राय संसारतापविनाशनाय चंदनं निर्यपामीति स्वाहा । संसार उदधि अपार तारन भक्ति प्रभु तुमरी सही। शुभ सालि पुंज जिनाय करि हूं लहूं वसुगुण वसुमही। श्रीचंद्र० पर्वत २ मीनीपमा।
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मोही धापामभजिनदाप पक्षपपदप्राप्ठय पक्ष नियामीति स्वारा।
अति सुभट मार प्रचंड सरतें हने सुर नर पसु सवै।
शुभ कुसुमस्यों पद पूजिहूं जिन हरो मनमय दुख अबे ॥ श्रीचंद्रा
ओही भीषाभलापिने कापाणविध्वंसनाय पुणं निर्वामीति स्वाहा ।
यह छुधा मोफू दहै नितही, नेक सुख नहिं पावही
चरु पिटते पद पूजिहूं जिन छुधारोग नसावहीं॥
श्रीचंद्रप्रभु दुति चंदको पद, कमल नख ससि लगिरह्यो।
आतंक दाह निवारि मेरी, अरज सुनि में दुख सह्यो॥५॥ .
भों हां भी दरभावापिने क्षुधारोगविनाशनाय ने नि ।
अति मोहतम मम ज्ञान ढाक्यो, स्व पर पद नहि वेवही।
तुम चरण पूंजू रतन दीपक, फरो तमको छेवही ॥ श्रीचंद्रप्रभुदुतिः
भों पंदूपमस्तापिने मोपकाविनाशनाय दी। नियामीति साहा।
RECEIGADRASTAR
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१०
शुभ मलय अगर सुगंध सौरभ, थकी अलि बहु आवहीं ।
जिन चान आगे घूप खये, कर्म वसु जरि जावही ॥ श्री चंद्रप्रभा
ओ श्रीचंद्रमापामिनेटफर्म दहनाय धूप निर्मपामीसि स्यात |
शुभ मोख मग अंतराय राक्यों, मोहि निरवल जानि।
जिन मोछ यो तव चरण पूंजूं, फल मनोहर आनिक ॥ श्रीचंद्र०
मां श्रीममसामिन मोक्षफलमासये फल निर्वामीति पाहा
जल गंध तंदुल पुष्प चरु ले, दीप धूप फलोपदी।
कन थाल अर्घ वनाय सिव सुख, " रामचंद "लह सही।। श्रीचंद्र०
जों की श्रीचंद्रप्रमस्यापिने अनर्षपदमाप्तये अर्थ निपामीति स्वाहा ।
पंच कल्यानक अध।
पोहा।
चत असित पंचमि चये, जयंततें इंद।
उदर मुलग्ना अवतरे, जजू त्रिविध गुणवृंद ॥१॥
मों की उपपंचम्यां गर्भमंगलम हिताय श्रीचंद्रप्रमजिनेंद्राप भ नि । असित पोह एकादसी, जनमे जुन पज्ञान । वासव उत्सव करि जजे, जजू जनम कल्यान॥२॥ ओं पर कराया जन्माल्याणसहताय श्रीचंद्रषभजिननाय भय निर्वपामीति. चंद्रपुरी साम्राज्य तजि कृष्ण इकादशी पोह। घरचो उग्र तप वनवि जजू नाशहित द्रोह ॥३॥ ओं ही पोपकृष्ण कादश्यां सात्याण सहिताय थं चंद्रप्रभजितेंद्रीय अर्थ निस्पामीतिर फाल्गुण समि कृष्ण ही घाति हने लहि ज्ञान । भव्यातम चोधे घने जजहुं ज्ञानकल्यान ॥ ४॥ भों ही फरगुपकृष्णसप्तम्या ज्ञानालागसहिताय श्रीचंद्रप्रमजिनेंद्राप अप नि. सुकल फागुण सप्तमी, शेप कर्म इनि मोख । गये समेदावल थकी जजू गुणनके कोख ॥ भोंद फागुणशुक्लसम्यो मोतारारंदिताय प्रापंद्रप्रभस्वामिने म निपामीति GRICHECRETRE अथ जयमाला पृ० बोदा। वसुजिन वसु क्रम हानि के, बसे धरा बसु जाय हरो हमारे फर्म वसु, नम अंग वसु नाय ।। १ घास जगत गुरकी। हो चंद्रदुतिनाथ ज्ञायक अंतरजामी। सकल लोक तिरकाल लखे जुगपत गुणधामी । जे घर अचर अपार अनागततीत उपायो। लोकालाफ निहारि लखे कछु नाहि छिपायो ॥२॥ भाख्या न्यों कर माहि सिधारथ धारि निहारे । अथवा अंगुरी रेख लख कर जुत इकवारे ।। एसो ज्ञान मपार और कहुं नाहि सुन्यों है। 6 दरसनको परताप तुहे जिन माहि भन्यौ है ॥ ३॥ में दुख पाये घोर चतुरगति माहि घनेरे। तुमतें छाने नाहिं कहा भावं जिन मेरे ॥ सब शिशुकी पे बात रुपात पित जननी जाने। माश्या विन नहिं देहि तोय पय धान न खाने || देखो करम अपार सुभट जड चेतन नाहीं। चेतनकुं करि रंक चोर जिम बांधत जाही॥ सातों अवनिमझारि नरक दारुण दुख देही। कोऊ मरने नादि धाम विन निह येही॥५॥ तिरजंगति दुख घोर महे विन संजम धारे। भूख प्यास लदि भार भर दे पीठ मझारे । मारत बधकर पाय जाल मपि उडन पंखेरू। पकीर कसाई लेप सरनि नाहिं जिहिवेरू॥६॥ PROVERNORATIOTRENDINIREVIE FORE ७२ पू० ग मानुप गति कुल नीच विकल इंद्री चखि नाही। भूपति आगें दोरि तुबक कांधे धरि जाहीं ॥ अहि निशि चौकी देह मेह सिय घाम सहे ही। विन दरसन दुख येई धने चिरकाल लहे ही ॥७॥ कोऊ पुन्यवसाय वाल तपतें सुर थायो । दस्ती घोटक बैल महिप असवारी घायो। पूरन आव जु थाय त माला मुरझानी। आरतित तजि प्रान कुसुमभव पाय अज्ञानी ॥ ८ ॥ ऐसे दुःख अपार सहे घिरता नहिं पाई। क्रोध मान छल लोभ थकी दिन दिन अधिकाई ।। तुम. करुणानिधि लेखि सरानि आयो ततकारी। दुखको कर निरवार अहो जगपति जगतारी ॥९॥ Hete जगनापक जगदीस जगोचम दृष्टिनिहारी। मोकं दास विचारि करो वपु निरवारो॥ या वसंगति पाय सहे दुख और न हेती। पह निश्चै करि जानि लखे तुम वानी सेती ॥१०॥ करम विचारे कौन भूलि मेरी अधिकाई। अगनि सहै घनघात लोहकी संगति पाई। ऐसे या वपुसंग महे दुख और न सेती। पनि पानी तुम देव सुनी गुरुके मुख एती ॥११॥ तुम अनुकंप पसाय, तजूं दुर ध्यान विकारो। वरनादिकतें भिन्न, लखू चिद्रूष हमारो॥ जोतिस्वरूपी देव, वसे याही घट माहीं। दहूं कौन सघान, लखू तुम ध्यान उपाहीं ॥१२॥ ROASTERECENELON-STRETCre creasinine . पू० तेरे ध्यान प्रताप, करम जरि जाय अनंता। 'रामचंद' करि ध्यान, लहे सुख नर गुणवंता॥ इह भव सुक्ख अपार, और भव सुर पद पावें। अनुक्रमतें निरवान, जिनके सुर धर करि गावें ॥ १३ ॥ दोहा-बसु द्रव्यले सुध भावतें, जजू तिहारे पाय । दहु देव शिव मुझ अबे, अहो चंद दुति राय ॥ १४ ॥ मोह। श्रीचंद्रामस्वामिने महा निर्मपामीवि स्वाहा। इति श्रीचंद्रप्रमपूजा समात! अथ श्रीपुष्पदंतजिनपूजा। If तीन गुपति व्रत पंच महा पन समिति ही, द्वादश तप उपदेश सुधारे संत ही।
पुष्पदंत जिन पाप नमूं सिरनाय ही, आह्वानन विधि करूं एक चित थाय ही ॥१॥ ओही भीषन मगजिनेंद्र ! अब प्रातर अवनर । संऔपट । ओं ही श्रीपुष्पदंत भगवजिनेन्द्र ! अन तिष्ठनिष्ठ । 3. ठः। ओं ही श्रीपुष्पदंत मगर जिनेन्द्र ! अन मम सनिहितो भव मव । वपट । सोरठा क्षीर उदधि सम नीर, भरि झारीत्रय धार दे। नमें जन्ममृति पीर. पुष्पदंत जिनवर जजे ॥ १ ॥ भों ही श्रीपुष्पदंतमगजिनेन्द्राय जन्मजराम विनाशनाय नलं निर्वा। किष्णागर घनसार, कुंकुम गंध मिलायके। भव आताप निवार, पुष्पदंत जिनवर जजे ॥ २ ॥ भों ही श्रीपुष्पदंतमनजिनेन्द्राय संसारतापविनाशनाय चंदन.निपा० । REATERIREALHARASTRI तंदुल धवल अनूग, मुक्ताफल ससि किरण सम । होह मुक्तिको भृप, पुष्पदंत जिनवर जजे ॥३॥ मी श्रीपुष्पदंतमगमिनेन्द्रायाक्षयपदमाप्तयेऽक्षतान निधपा. पोदा। कुसुम कल्पनरु लय, मन मोहे चखि भावने। वाण मनोज रेय, पुष्पदंत जिनवर जजे ॥ ४॥ मोज श्रीपदंतमगलिनेन्द्राय फामवाण विध्वंसनाय पुष्पं निर्यपामीति खंड धिरत चरु सार, रसना रंजन आनिये। होय छुधा निरवार, पुष्पदंत जिनवर जजे ॥५॥ if श्रीपगमगानन्द्राय क्षुधारोगविनाशनाय नय निपा० दीय रतन ज्योति, कंचन भाजनमें धरें । हमें ज्ञान उद्योत, पुष्पदंत जिनवर जजे ॥६॥ ओही श्रीपुष्पदंतमगजिनेन्द्राय मोहधिकार विनायनाय दीप निपामी. :..
प पू LEARNEReci अगर कपूर मिलाय, धूप दहन शुभ कीजिये। अष्ट कर्म जरि जाय. पुष्पदंत जिनवर जजे ॥७॥ ओं छी श्रीपुष्पदंतमगा जनेन्द्रायकर्मदहनाय धूपं निर्वामीति स्वाहा । उत्तम फल अति सार, नामा नेत्र सुहावने । होय मुक्ति भरतार, पुष्पदन जिनवर जजे ॥८॥ ओं ही श्रीभगव जनेन्द्राय मोक्षफलमाप्तये फल निपामीति स्वाहा । अर्घ अनूर बनाय, "रामचंद्र" वसु द्रव्यते। होय मुकतिको राय, पुष्पदंत जिनवर जजे ॥९॥ भों ही ध.पुष्पदंतभगवजिनेन्द्राप मनपरप्राप्तये भ निर्वपामीति स्वाहा पंचकल्याणक अर्घ । दोहा-फागुन नवमी कृष्ण ही, आरण स्वर्ग विहाय । रामादेस अनोज ५० ओं #f फतगुणफणनवम् गर्भमंग नमोभिनाय श्रीपुष्पदंजिनदाय भय निर्यपा० । अगान मित प्रतिपद विपे, तीन ज्ञानजुन देव । जनमें हरि सुसंगरि जजे, जजू मोक्ष हित एव ॥२॥ ओह माजीपंशुमम पदायां जमकर मणहिताय श्रीपुष्प नजिनंद्राय अर्थ नि० । मित मनिपर अगहन घरयो, तप तजि राज्य महान । सुग्नम्खगपति पद जजे, जजिहूं तपाल्पान ॥ ३॥ iii मर्गशीर्ष शुक्लमविपदापोभूपाभूपाय श्रीमदतनिद्राप अर्ध नि. दायज कार्तिक सुकल ही, घातिकर्म इनि ज्ञान । रह्यो धर्म दुविधा कायो, जजिई ज्ञान यल्यान ॥ ४ ॥ मोff . किशुयल 'हनीय या शानमंगल नाय थं पदसजिनेसाय अर्थ निय० । भादव सिन अष्टमि इने, सकलकर्म शिवथान । गये संमेदाचलयकी, जजि९ मोछ कल्पान ॥५॥ जो माशुक्लायस्यां माधकल्याणसहिताय अंपुष्पदंतजिनदाय अर्थ निपा० ८० ASHLECT अथ जयमाल। दोहा। पुष्पदंतके विमल गुण, सकल सुखाकर पेख । सुमरिसमरि वानन करूं, करि करि हरप विशेष ॥१॥ चाल-सीमघर जिनबंदिस्यां जगसार हो। पुष्पदंत जिनबंदिस्या, जगसार हो काकंदा पुर थान ।। पित्रा नमूं सुग्रीवजी, जगसार हो, वंश इक्ष्वाकु महान ॥ महान वंश इक्ष्वाकुमें चय, स्वर्ग आरणत भये । धन देवि रामा मातके उर. कृष्ण फागुनमें थये ।। गर्भावतार कल्याण सुस्पति. ठानि. सुरलोके गये। जननी सु सेवा राखि धनपत्ति, मास नव सुखसों गए ।।२॥ अगहन सित प्रतिपद भली, जग० जनमें सुराधिप जानि ।
, पू० मेरु सुदर्शन ले गये, जग सार हो, छोरोदक शुभ आनि ॥ आनि जल अभिषेक करि फनि, नृत्व तर वजायये । कहि पुष्पदंत पिता सु जननी, सॉपि मंगल गायये। फुनि नृत्य तांडव हरी कीनों, कोन उपमा दीजये । जन्म कल्याण उछाह मनमें, राखि नितही जीजिये ॥३॥ तन शशि सम धनु सच भलो, जग सारहो, आयु पूरव लखदोय लख पूरव सुख भोगिक, जगसारहो, विरकन भवत होय । होय विरकत सुकल परिवा, मास मगसिर बन गये । नमः सिद्धेभ्यः कहि लॉच किनो, ध्यानमें प्रभु थिर भये । हरि केश पंचम उदधि खेप, आय पद पूजा करी। निःकर्म कल्यानक सुमहिमा, पुन्पकरता अघहरी ॥ ४॥ वरप चार बहु तप करे, जगसार हो, ध्यान अग्नि परजालि EMBER कातिक सुदि दोपज भली, जगमार हो, घाति चतुक लहुवालि। सहु वालि घाति उपाय फेवल, लोक करवत पैसही। समवादि सहित विहार कारक , लहो धर्म विसेखही। तुम वचन अमृत पानतें, उर दाह तत खिणही मिट्यो। लखि ज्ञान कल्पानक सुमहिमा मोह तम मेरो फटयो॥५॥ गणधर हरि मुनि थुनि करी जगमार हो सो थुति उनस्यों होय पनि दिन यो धनिया पडी जगमार हो धनि धनि मो चखिदोय मो चखि धनि तुम दरम देख्यो परम पद धनि कर भये। पनि धनि ये कल अंग मेरे यान कर तुमको नये । धान भई रसना आज मनाय धुति तुम करतही। धान उभे पद तुमघाम आयो सबै कारज सरत ही ॥६॥ निर अंवर सुंदर घने, जगतार हो दिग अंबर सुखदाय ।
पू० निराभरण तन अतिलसे, जगसार हो को रवि को शसि काय॥ शसि काय लांछित अभ्रसम, दिन हीन वृद्धि सदा भने । तुम चरण नखदुति कोट रवि ना, और उपमा को परें । दरसन ज्ञान चरित्र भूपण, देखि सिव तिय हो खुसी। आलिंग देने भई सनमुख, तुहे छवि लखि अति हसी ॥ ७ ॥ निरु आयुध निरम घने जगसार दो कोप तणा नही लेश । मोह सुभट किम जय कियो, जगसार हो जुत परिवार महेश ॥ महेश इस्ती ध्यान संनाह, संजम अति छिमा' प्रपलाय असुरन संग लागी, रदी ना तसुकी जमा ॥ सो फेरि निकट न आवही, जुत समर स्वपनन के विखें । हरि दरादिकके दिये, वासी करो जगके अखें ॥८॥ तुम गुण गणपति मन धरे, जगसार हो ये वच कहे न जाय। .
८४ Home ज्यों तारे सव गगनके जगसार हो, ये करमें न समाय ॥ करमें न तारे आय ज्यों, गुरु सहस रसना धार ही। वरनन कर तो पार पावै, रह्यो पौरप हार ही। में बुधिविना थुति करन उमग्यो, होय कैसें नाथजी। शसिविंच जलमें बाल विनु बुध, गहै किम गहि हाथजी ॥९॥ में विनवू कर जोरिके, जगमार हो, तुम गुणको नहिं बेव । इस भवमें वहु दुख सहा, जगसार हो, देहु अचल पद देव ॥ देव ! अचल पद देहु मोकू, मरन चरणन की गही। करि ' रामचंद्र' लहंत सिव जो, गायसी सुर धरि सही । इन होय मंगल नित नये, घर रिद्धि सिद्धि अनेक ही। अज्ञान तिमर बिलाय ततीछन, हिये होय विवेक ही॥१०॥ -RRESTE ८४ पू ० अष्टमि सित भाद्रं नाशि अघात्य पुष्पदंत सिवनयर गये। सुर नर खग आये मंगल गाये गिरि समेद कल्याण धये ॥ १२॥ नोंद श्रीपुष्पदंवभिनंद्राय महापं निर्वपामीति स्वाहा । इति श्रीपुष्पदंतभिगपूजा सगा।।। अथ श्रीशीतलनाथपृजा। जर अहिल। शीतल जुग क्रम नमू धर्म दशधा इम भाख्या, उतिम छिमा सु आदि अंत ब्रह्मचर्य सु आख्यो। सुनि प्रतिवुध 8 भवि मोछि मारगळू लागे, आह्वानन विधि करूं चरण जुगकरि अनुरागे ॥ १ ॥ मोदी श्रीशीवलनाधभावजिनद्र ! अन अवतर भवता । संवौषट् । PLES ८५ फल लेडि उत्तिम मिष्ट मोहन, लोंग श्रीफलं आदि ही। जिन चरण पूजे मुक्ति के फल, लहै अचल अनादि ही भवि पूजिना मों ही शीतलनायजिनेंद्राय मोक्षफलप्राप्तये फल निपामीति स्वाहा । नीर गंध सुगंध तंदुल, पुष्प चरु अति दीप ही। करि अर्घ धूप समेत फल ले, 'रामचंद्र ' अनूप ही ॥ भवि पूजि०॥ भों ही श्रीशीतलनाथ जिनेंद्रायाऽनध्यादमाप्तये अब निर्वामीति स्वाहा। अथ पंचकल्याणक अर्घ। . HAM दोहा। चैत्र कृष्ण अष्टमि चये, अच्युतते भगवंत । उदर सुनंदा अवतरे, जजूं मोक्षके कंत ॥१॥ ७ ही चकमाष्टम्यां गर्भमंगमंडिनाय श्रीशीवजनायजिनाप भय निर्वामीति. कृष्ण द्वादसी माघकी, जनमें श्रीजिनराय । ६८ पू० उत्सव करि वासव जजे, में जजि हूं जुग पाय ॥२॥ ऑti माघकृष्णदादया जन्ममंगरगंटिसाप त्रीशीसतनायजिनद्राय भर्ष निवपामी० असित माघ द्वादसि तजी, तृणवत भूति महान । नगन दिगंवर वन वसे, जजू दसम भगवान ॥३॥ जो माघकणाद्वादश्यां सामंगलस्विाप श्रीशीवलनाथ जिनेद्राय अर्थ निक पोप चतुरदासि स्याम ही, शुगल ध्यान असि धारि । इने कर्म चउ घातिया, जजू देव मुझ तारि ॥४॥ ओं पापणचरार्दश्यां फेपलानपंटिताय श्रीशीतलनायजिनेंद्रीय अर्ध नि. अष्टमि सित जासोजकी, गये गोक्ष भगवान । बसु विधि पद पंकज जजूं, मोहि देहु शिषथान ॥ ५॥ ऑन आश्विन शुक्लाष्टम्यां मोसफास्याणकाराय धीशीतलनायनिभदाय प्रधं निक -- पू. . अथ जयमाला। दोहा। सीतल तुम पद कमलजुग, नमूं सीस धरि हाथ । भवदधि डूबत काढि मो, कर अवलंब दे हाथ ॥१॥ चाळ मंगलकी। BAR सीतल पद जुग नमू उभैकर जोरिही। भिदलापुर अवतरे अच्युतपद छोरिही। दिढरथ तात विख्यात सुनंदा मायजी। चैत कृष्ण वसु गर्भ लिये सुखदायजी॥ सुखदाय गर्भकल्याण काजे आय सुरपति सब मिले। जननी सुसेवा राखि धनपति आप सुरलोकें चले ॥ षटमास ले नवमास दिनमें वार त्रिय मणि वये। HERERREAKERAGRAPARAN पू० गर्भ कल्याण महंत महिमा दोखि सब जन हर्षये ॥ पूर्वापाढ नछित्र माघ वदि द्वादसी। जनमे श्रीजिननाथ नभोगण सब इंसी। चतुरनिकाय मझारि घंटादि बजे भले । नये मौलि फुनि पीठ सबै हरिके चले ॥ चले पीठ अवधित जिन जन्म निश्चे हरि लखो। डगि सप्त चलि नुति ठानि वासव मेरु चलने अखो। जिन लेय पाहक वनविष अभिषेक करि पूजा करी। पित मात दे जन्मा कल्याणक ठानि थल चालो हरी ॥३॥ हेम वरण तन तुंग नि धनुको सही । लछिन श्रीवछ आयु पूर्व लखकी कही ॥ नीति निपुण करि राज ती तृणवत तवे । ६१ Keecar पू० लोकांतिक सुर आय संबोधि चले सबै ।। संबोघि आये माघ दादास कृष्ण श्रीजिनवन गये। नमः सिद्धेभ्यः कहि लौंच कीनों उपधि तजि कर मुनिभये ।। सुर असुर नृपगण ठानि पूजा धवल मंगल गायही । निकर्म कल्याणक सुमहिमा सुनत सब सुख पायही॥४॥ पष्टमि परि निज ध्यानविर्षे प्रभु थिर भये। पूरन करि अनिकाज सेयपुरमें गये ।। क्षीरदान जुत भक्ति पुनर्वसुजी दिये। हरिप देन माश्चर्य पंच ततखिणकिये ॥ किये आश्चर्य रत्न वर्षे अर्घ दादस कोडि ही धरि ध्यान सुकल उपाय केवल घातिःचारो तोडिही। चर अचर लोक अलोक जुगपति देखि सबही वनिये। ASTRORISARLINx PRERAKHEREFest १. और मुनि इंद्र ज्ञान कल्याण उत्सव पोपवादि चउदास किये ॥५॥ योजन साढा सात लसें समवादिदी। लखि मुनिमें गण देव इकासी आदिधी । पूरव सहस पचीस हीन वप तीन ही। विहरे केवल पाय आयु भई छीन ही ।। भई छीन सगेद गिरित आश्वनी सित अष्टमि सही। असि ध्यान मुकल थकी अघाते हने मुक्तितिया लही। सब इंद्र आय कियो महोत्सव मोक्ष मंगलगायही ।। हूं नमूं सीतलनाथके पद अमल गुणगण ध्यायही ॥ ६ ॥ वसु खित वसु क्रम हानि वसे वसु गुणमई। ज्ञानावरणजघाति विश्व जान्पो मद्दी ।। देखो लोक अलोक हने द्रशनावली। .
पू 4 १४ ॐRAKACCORMANEESer वेदनिको करि नाश अवाध भये वली।। फुनि वली सुद्ध चरित्रमें थिर मोह नाशथकी भये । अवगाह गुण छय आयुते निरकाय नाम गये धये ॥ गुण अगुरलघु छय गोतके अंतराय छय वलनंत ही। सिध भये सीतलनाथजी तिरकाल वंदे संत ही॥७॥ वसु गुण ये विवहार नियत अनंत ही। जाणे गणधरपे न वखानत अंतही। ज्यों जलनिधि विस्तार कहें करते इतों। पालन मरम लहंत न जानत है कितो॥ कितनी न जाने उदधि है, जिम तुहे गुण रणन करूं। में भक्तिवश वाचाल है कछु शंक मन नाहीं घरूं॥ गुण देहु तेरी करूं विनती अहो सीतलनाथजी । *RACHECITECRECIRCRERAGES "चंद्रराम" सरनि तिहारी आयो जोरि करिके हाथजी ।। ८॥ योगा। सीतल पद काल जुग, त्रिविध नमूं सुख पाय । भव दुख ताप मिटाययो, अहो दसम जिनराय ॥१०॥ ओही श्रीशीतलनाथ जिनंद्राय महापं निपामीति स्वाहा । इतिशीलनायजिनपूजा समाव । अथ श्रीश्रेयांसनाथ पूजा । अपिल । सभालोक सुनिधर्म अंग द्वादस श्रुतिसारे, भये अनंदित सर्व श्रेय जिन भवि वहु तारे । ३५ प्रसमविच करि कोप हन्यो बंद जुगकर ही, आद्वानन विधि करूं चरण जुग हिय धरही ॥१॥ भाहत श्रेपाननाय जिनेंद्र ! अत्र मयतर अवता । संवौषट् । औती श्रीश्रेयांसनाय जिनेंद्र ! मन तिट तिष्ठ । ठः ठः। नों ही श्रीश्रेयांसनायजिनेंद्र मय मम सन्निहिनो भव भव । पपट् । मोतीदाम छंद। हिमन उद्भव स्वच्छ गंगोदकं कनक कुंभमरेन सुगंधिकं । जनम मृत्यु जरा क्षय कारणं । परिजजे शिरयांस पदान्जकं ।। ओंगे थीयांसनाजिनंद्राय जन्ममृत्यूविनाशनाय जलं निर्वामीति. अगर चंदन कुकम द्रव्यकं भ्रमर कोटि भ्रमति सुगंधिना। प्रचुर दुख भवार्णव नाशनं परिजजे शिरयांस पदान्जकं ॥२॥ ओं ही घंथियांसनाथ जिनेंद्राय संसारतापविनाशनाप चंदनं निर्वामीति साहा । सरल सालि अखंड मनोहरं लसत सोममरीचि समानकं । १६ मुभग मोम्य अखेपद कारनं परिजजे शिरयास पदाजकं ॥ ३ ॥ भोपायोमनायभिदायमक्षपपदमाप्तये अवतान् निपामीति साहा। कुमम ओध कल्पतरु पायने, हरत चक्षि सुगंध सुहावने अशुभ काम मनोद्भवनासनं परिजजे शिरियांस पदान्जकं ॥४॥ औf श्रीश्रेयांसनाधनिद्राय कामयाण विनाशनाय पुष्पं निपामीति सारा । मरम मोदक घेवर वावरं, लसत कांचन पात्र चरोत्तमं । प्रचुरगेगळुधा निरनाशनं, परिजजे शिरियांस पदान्जकं ॥५॥ il it श्रीयांगनाधनिद्राय सुधारोगविनावनाय पेयं निर्यामीति सारा कनन कांचन पात्र सुदीपकं, लसत जोति विवर्जित धूम्रही। अखिल गोद विधंसन कारनं, परिजजे शिरियांस पदाजकं ॥३॥ गगनापनिगमाय गोपकारपिनाशनाय दीपं नियंपामीति स्वादा अगर फस्न कपूर सुचंदनं, सुरभितागत पटपद वृंदही। निचय कर्म हुतासन जारनं, परिजजे शिरियांस पदाजकं ॥७॥ to . -- 3 ८ SARSex भो भीमेपासनायजिनेंद्रीय टर्मिदहनां धूप निगमीति 10|| मधुर श्रीफल, चार इत्यादिही, ललिन गंध महार अद्भुतं । अतुल सोरुप महाफलदापर्व, परिज़जे शिरियाँस पदान्जक ॥६॥ भो ही थीभेषामनाय नवेंदाय मोक्षफरमाये फले निष्पामीदि साहा सलिल गंध सु तंदुल पुष्पकं, चरु सुदीप सुधूप फलोपक परम मुक्ति सुधान प्रदायक, परिजजे शिरयसि पदाजिक भों हा मी पसिनापमिनेन्द्राप धन पपदंगाये अपं नि अथपंचकल्याणक 1. Atitisurjstan | 1:41:11:44 Aust 181 :: पुप्पोचरतें दरिचय, विमला उर भवता । पप्टी जेठ असेतही लयो जजू अवतार ।।।। भव्य मंगायचधियो नापजिनद्रा पनि
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Auctic
अथ जयमाला।
दोहा।
श्रेय तणे पदकमल जुग, नम उभे करजोर।
पपुर इट्टै भवतार तुम, हो निह नहिं ओर ॥१॥
बाल पंचमंगळकी।
जे जे जे शिरासनमंसिरनापही, चप पुष्पोचरथकी सिंघपुरायही
विमलाउरअवतारजेठवदिछठिलियो गर्भकल्याणकइंद्रसपैमिलिकियो
कीयो गरभ कल्याण सुरपति रुचिकवासिनिपति कह्यो।
तुम करहु सेवा जननिकरी छपन, सुन करि सुख लह्यो।
फुनि धनद वप रतनकेरी मास नव पट लो करी।
वा समे हिरदै बसहु मेरै धन्य दिन पनि वा घरी ॥२॥
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असे तिमित सहज प्रतिसे, लहे दस जिन जनमही। तन हेम अरसी दंड आय, सुलास चवरासी कही। करि राज घास वियाल लखही, त्यागि हणात वन गये। मुर असुर फाल्गुण, कृष्ण, ग्यारसि,ठानि उत्सव सब नये॥ परत चरित मन ज्ञान जिनेस भयो। पाम पूरन ठानि अरिठपुरमें गयो।। तदा दयो पयदान माह नरनंद ही। ....! परसे रतन अपार भयो सुख कंदही..! सुखकंद बरस उभे करयो, तप घोर द्वादश विपि तदा। असियान सुफल धकी हने उघाति दुस्तर विधि जदा।। सुर असुर ज्ञान कल्याण पूजा, ठानि बहुभुति उच्चरी। सो घोस पावन माप मावस, सकल मंगलकी घरी ॥५॥ Beschichte SALSAUCHSASA . ***
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11 संभ मागपिभाप सप जन, तोप पट रितु फल फलें। सघ सच मैत्री अन अट्ट दह, मुकरभू वृष चल चलें ॥ जुतगंधवात गंधोदि घरपा, विमल नभ सुर जे करें। सित वात सोधे द्रव्य मंगल, कमल पद तल सुर घरें ॥ ७॥ हम गुण जुक जिनेस, विहरि भवि तारही। यरस लाख इकवीस, ज्ञान प्रभु धार ही। शेष रह्यो इक मास, समेदाचल ठये । हानि अघाति सिवयान, पूरण श्रावण गये। गपे प्रावण सुकल पूनिम, मोक्ष तव हरि आय ही। वसुभेव पूजा ठानि उतसव, मोक्षमंगल गाय ही। सो मोक्षमंगल देहु मोर, श्रेयजुत श्रियनाथजी । 'चंद राम 'पाचे दिसतवे, जोरिक जग हायजी ॥८॥ SECRETORSecre दोहा। श्रेयतणे पद मो हिये, तिष्ठी आठों जाम । मो हिय श्रेयपदा विपे, रहो होय सिव ताम ॥१६॥ औ श्रीश्रेयांसनायजिनेंद्राय महाप निर्वामीति स्वाहा । इति श्रेयांसनाथाजनपूमा समा। अथ श्रीवासुपूज्यजिनपूजा। रोजा छन। वासपूजि जिन नमरतनत्रय सेखर धारयो। दादस तप सिंगार वधूसिव दिष्टि निहारयो । कंठालिंगन देन लुब्ध है सनमुख आई। आह्वाननविधि करूं वारत्रय मनवचकाई ॥१॥ १०५
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भोपूजिनद्रा मातर अपना संशेषन ।
होगसम्पनिय विष्ठ विध! 8. ठा।
t.inयन्निा मन मम सन्निहियो भा भव । पद ।
16 रिभंगी।
छोरोदधि नीरं, निर्मल सीरं, मिश्रगंध सुभ भंगभरं ।
जिनवरपद मारं, जनि अविकार, जनममृचिके दाहहर।।
चंपापुर पान, सुभ कल्पानं, वासुपूज्य जिनराज वरं ।
वसुविधि करि अरंच भिवंदुसं विराजे, परचे सर्व सुख तास घरं ।।
xift धीवासपनिमार भन्ममृत्युविनाशराय न नियामीवि स्वाहा ।
अति सीतल चंदन, दाह निकंदन, केसर अगर कपूर घसें।
सुभ सौरभ भाषे; मधुकर पावे पूजि जिनेवर पाप नसों। चंपा॥
ओ " श्रीमानेन्द्राय सरसापरिनासनाप नंदन निलामीति स्वाहा ।
सिन सालि भुखंड, दुरित विहंड, मोमसमा मनहर खायें।
श्रीजिनपद मागे, पूज रचा, तुरत अखे पद भवि पावै ॥ चंपा०॥
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शुभश्रीफल पा लेंग मिला, पूगी सारिक मनहार । धाजिनपद मागे, पूज रचा लौ मुक्तिपल सुखकारे ।। चंपापुर० al ft सुपूजि प पोधाराये फलं निसानीति सास । अति निर्मल नीरं गंप गहीर, तंदुल पुष्प सु चरु लावें। पुनि दीपं धूपं फल सु अनूर भर्घ राम" करि गुण गावें ॥ चंपापुर०॥ श्रोत मानिनन्दाय अनपदमारे निपार्माति साहा। पंच कल्याणक। KISALCHER दोस। महासुनने चय लयो, श्यामाउर अवतार । पठी साट असेत ही, जजू भवार्णवतार ॥१॥ भों tiपाको परिवार भीमरनिद्रापरा. ॥
चउदसि फागुण कृष्ण ही, वासवजन्मकल्यान । कीनी उत्सव करि महा, मैं जजि हुं धरि ध्यान । औ६ फागुगाकपणाचतुर्दश्यां जन्ममंगकरिताय श्रीयासपूरपजिनद्राय अब निः॥ फाल्गुण चउदस स्यामही, लखि भव अनित असार। राज त्यागि तप वन घरपो, जजूं चरन सुखकार ॥३॥ यो या फागुणणचतुर्दश्यां तपोमंगलदिसाप श्रीयासुपूज्यनिनेंद्राय अपं निर्यपामीति. माघ सुकल द्वितिया हने, घाति करम धरि ध्यान । कयों धर्म केवल भयो, जजूं ज्ञान कल्पान ॥ ४ ॥ भो मापशुपलहितीया शानगंगलपंडिताप श्रीवासुपृश्पपमिनेन्द्राय भर्ष नि०॥ भादव चउदासि सुकलही, हनि अघाति भगवान। लही मोक्ष सुखमय सदा, पूंजू मोक्षकल्यान ॥५॥ ऑf मापदपलाचतुर्दा मोक्षमंगलमंदिनाय श्रीवासुपूज्यजिनेंद्राय अपं निर्व० ॥
भाजयमाला।
मोरा
अरुन वरन अविकार, चासुपूजि जिनकी की।
प्प भवधिःपार, देहु सुमति विनती करूं।
म पनि
व सुपूजि जिनतने पं नही पापुरमें भरे नम धरि ध्यान ही।
पछी पामभमाद गर्भ विजयातने । महासक आप जिनेवा अपने ॥
पालगुणवउदमिकृष्ण जन्मप्रभुकोभयो तीनलोकमझारिमहा आनंदयो
नप मुकरफुनिपीठ सुरासुरके हले जन्मकल्पणिक काजसदेवासवचले।
रुमियर ले जाय सनानारोपही वामपृजिपरिनाम पिताघरमायही।
मांडयन त्यमहानशकदिनपरिकरयो भूपलरूपावसुदेवमहाशानंदभरयो
मसरि धनुष उतगंकापजिसभानुहोलाखराचरायमहिपचिहजानही
गज कोचिरकाल महामुखदापहीमविनवाजानि भावनामापही ९७
'फालगुन उदमि स्याम देवापि जाय ।।
पुष्पांजलि सुभ देय संबोधे ध्याय।
इंद्रसिंगार बनाय कल्याणक नप कायो।
पालतस्तल जाय जोग वनमें धरयो ॥ ६॥
मनपरज भयो वान ततान्छिन ही जमे ।। १ : !!
पष्टम पूरण टानि असनहित जिन तव ।।
पुर सिद्धारध गये दान सुंदर दयो । ।
घरप रतन अपार सरप अति ही भयो । ७॥
पर एक छदमस्त विविधविध तप करे ।। : ।।
ध्यान सुफल अमियकी घाति चउ जिन हरे॥
उपज्यो चंचलतान उभे सित मापही।
परी धर्मकी वृष्टि पिटची भवदाप दी॥८॥
पू विहरे आरज देश बोधि भविलोग ही। गये चंपापुर मांहि निरोध्यो जोग ही ॥ हनि अपाति सिवधान गये जिनराय ही। भादव सित चउदसी सुरासुर ध्यायही ॥२॥ मोक्षकल्याणक थान पूजि उतसव करचौ । मंगल गान उचारि महा आनंद घरयो। "रामचंद" कर जोरि नमें करुणापती। मोकू भवतें तारि अरज सुनियो इती ॥१०॥ पठा एं। चंपापुर थानं, पंच कल्यानं सुरनरखगवंदत सबही। पूजू ध्याऊं गुणगण गाऊं वासपूज्य दे सिव अवही ॥ १९॥ ओं ही श्रीवासपूऽपजिनेंद्राप महापं निकामीति सारा । इति श्रीपासपूरपजिनपूषा समा। १ अथ श्रीविमलनाथ जिनपूजा। रोला एंद। परम सरूपी व्रती विवेकी ज्ञानी ध्यानी। पानी हित उपदेश देय मिथ्यात जघानी। सिरसुखभोगी विमल पाय वंदू जुग करके, आवानन विधि करूं त्रिविध त्रिपवार उपरिकें ॥१॥ titश्रीविमलनाधजिनेंद्र ! अमापता अवनर । संयोपद् । औही श्रीविनकनाननंद अत्र तिष्ठ तिष्ठ । ठटः । ओ श्रीविमानाधजिनंद । अममम पनिहतो मय पर | पपट् । हुतविलंचित । विमल सीतल सजल सुधारया, जनम मृत्यु जरा छय कारया। सकल सौरुष विधान कनायक, परिजजे विमलं चरणाजका। สรรพ प १२४ भो ही श्रीविपलनायजिनेंद्राय जन्मभृत्युविनाशनाय जलं निर्वामीति स्वाहा । अगर कृष्ण कपूर सुकुंकुम रिणित गवटावलि गंधना। अखिल दुःख भवादिकनासनं ।परिजजे विमलं चरणाजकं ॥२॥ ओं ही श्रीविमलनायजिनेंद्राय संसारतापविनाशनाप चंदनं निर्वामीति स्वाहा । अछित उज्जल खंडन तीक्षणं । लसत चंद समान मनोहरं ।। विगत दुःख सुथान सुदायकं । परिजजे विमलं चरणाजकं ॥३॥ ओं ही श्रीविमलनाधजिनेंद्रीय अक्षयपदमासये प्रक्षन निपामीति स्वाहा । कलप वृक्ष भवेन सुगंधना । कुसुम चारु हरे चखि पावनं ।। प्रवलवाण मनोद्भव नाशनं । परिजजे विमलं चरणाजकं ॥४॥ ओ ही श्रीविपरनायजिनेंद्राय कामयाण विध्वंसनाय पुष्पं निर्वपामीति स्वाहा । सरस मोदक मिष्ट मनोहरं । सुभग कांचन पात्र सुथापित ॥ असम दुःख छुधादिविधंसनं । परिजजे विमलं चरणाजकं ॥५॥ ओं ईf श्रीविनानाथर्जिनंद्राय क्षुधारोगविनाशनाय नैवेद्यं निपामीति स्वाहा । PER पू० मणि उद्योत महातम नाशनं । लसत दीप सुकांचन पात्रकं ।। अखिल मोह विधंसन कारणं । परिजजे विमलं चरणाजकं ॥ ६ ॥ ओ श्रीविपन्न नायजिनेंद्राय मोहांधकार विनाशनाय दीपं निपामीति स्वाहा । अगर चंदनं धूप सुगंधिना । मधुप कोटि रवंत दिगालयं ।। अशुभ कर्म महा दुठ जारनं । परिजजे विमलं चरणाजकं॥ ओह धाविमलनाथ जिनेन्द्राय अष्टकर्मदहनाय धूपं निपामीति चाहा । सुपकमिष्ट रसामृत पावनं । सुभग श्रीफल आदि फलोधकं ॥ परम मोक्ष महाफल दायक। परिजजे विमलं चरणाजकं ॥८॥ आदी धीविमलनानिहाय मोक्षफलमाप्तये फल (नपामांति स्वाहा । मलिल गंध सुतंदुल पुष्पकं । वरु सुदीप सुधूप फलोधकं ।। परम मुक्ति सुथान विधायक । परिजजे विमलं चरणाजकं ॥१॥ ओं ही श्रीविमलनाधजिनदाय मनर्यपदप्राप्तये अर्ध नियामीति साहा।
पचकल्याणक दोहा। श्यामादे उर अवतरे, सहसरारतें भाय । दशमी जेठ असेत ही, जजिहूं हरप उपाय ॥१॥ it पाणदशम्यां गर्भकल्याणकाय श्रीविमनायजिनेंद्राप भनि। माप सुक्ल तिथ चौधिको, जनमे सुरपति आय । सुर गिरि सनपन कार जजे, में जजिहूं गुण गाय । २। पाशुपल चतुभ्यो भन्मसंगलमंहिताय श्रीविमलनाथ जिनदाय अर्थ नि. तज्यो राज कंपिला पुरी, श्रीजिनवर बन जाय । चौधि माप सित तप धरयो, जजि है तूर वजाय ॥३ मोही मापशुशलतुया रोगलपंडिताप भारिपलमायजिनेंद्राप अर्धे निमीति. माघ शुक्ल षष्ठी विषे, हने घातिया जान। रह्यो धर्म केवलि भपे, जजाई ज्ञानकल्पान ॥ ५॥ CAR
भी है पाशुप पटयां शानमंगलमंटिनाय श्रीविमल नागिनवाय अर्ध नियामीतिक
अष्टमि साढ असेत ही, हने अघाति शिवथान ।
गये विमल सुर नर जजे, जजि हूं मोक्ष कल्यान ॥
ifपाटणाएम्यां मोक्षवल्यायामरिताय श्रीविमलनाधजिनेंद्राय अर्घ नि० ॥
अथ जयमाला।
.
पंक्षा।
विमल विमल मति दीजिये, हो करुणापनि मोहि ।
करूं वीनती जोरि कर, नमूं नमूं पद तोहि ॥१॥
(बदो जगत गुरु देवकी चाल)
अहो विमल जिन देव, सुनिज्यो अरज हमारी ।
इह संसार मझारि, और न सरनि निहारी ॥१॥
VE सिनिय हरिहर देव, पाल सबै ही खाये । उनको सरनो कोन, आपुनही पिर पाये ॥२॥ तुम निरभ तजि मोह, प्यान शुकल प्रभु पायो । उपन्यो केवल ज्ञान, लोकालोक लखायो॥ ॥३॥ समवसरनकी भूति, दोप यातें लखि भागे। सुपनन तो दिग घाय, असुरनके संग लागे ॥४॥ घरो जनम नहिं फेरि, मरन नहिं निद्रा नासी। रोग नाहि नहिं शोक, मोहकी तोरी फांसी॥५॥ विस्मयको नहिं लेश, धीर भपकृति विदारी। जरानाहिं नदि खेद, पसेव न चिंता टारी॥६॥ मदनादीनदि रेर, विषय नहिं रति नहिं कातें। पास हनी रनि भूख, अष्टदश दोष न यति ।। ७॥ PSECRECENERASACH
RECGLE-
नमूं सीस धरि हाथ, ख्यात देवन के देवा।
छयालीस गुण भंडार. करूं प्रभु तेरी सेवा ॥८॥
नमूं दिगंवर रूप, नमूं लखि निश्चल आसन ।
मुद्रा शांति निहारि, नमूं नमि हूं तुम शासन ॥ ९ ॥
नमू कृपानिधि तोहि, नमृ जगकरता थे ही।
असरन • तुम सरन, हरो भव के दुख ये ही ॥ १०॥
जामन मरन वियोग, सोग इत्यादि घनेरे ।
फेरिन आ निकट, करो प्रभु ऐसी मेरे॥ ११॥
तुम लखि दीन दयाल, सरनिहम याते आये।
ऐसे देव निहारि, भागिते तुम प्रभु पाये ॥१२॥
" रामचंद" कर जोरि, अरज करि है जिन ऐमी।
विपति यह जग माहि, सबै तुम जानततैसी ॥१॥
ग पु. यातें कहनी नाहि, हरो जिन साहिब मेरे। विन कारन जग बंधु, तुही अनमतलब करे ॥१४॥ सरन गहेकी लाज, राखि जगपति जिन स्वामी। करुणा करि संसार, विमल जिन अंतर जामी॥१५॥ दोहा-विनती विमल जिनेशकी, जो पढिमी मन लाय । जनम जनमके पाप सब, ततछिन जाय पलाय ॥ १६॥ भों ही श्रीविमलनायजिनेंद्राप महा निवपामीति स्वाहा । अथ विमलनाथजिनपूजा समाधा। अथश्रीअनंतनाथ जिनपूजा। भडिल्ल। बाझि अभ्यंतर त्यागि परिग्रह जति भये । बहुजन हित शिवपंथ दिखायो हरि नये ।। १२० 1 ऐसे अनंत जिनेश, पाय नमि हूं. सदा । आहाननविधि करूं त्रिविध करिके मुदा ॥१॥ ओ। श्रीमतनामिना अग्र प्रवर अधार | संबापट । भीमरानाधजिनेन्द्र अग्र शिष्ठ निष्ट | टः ठः । और श्रीमानसनागिने अपम समिहिनी मप भय । पद । गाराम । क्षीरनीर हीर गोर सोम शीत धारया, मिश्र गंध रत्न भंग पाप नाश कारया॥ अनंतनाथ पाय सेव मोरुप सोरुप दाय है। अनंत काल श्रमज्याल पूजते नमाय हे ॥१॥ जो श्रीमानायजिनेन्द्राय जनगण युपिनापानाय जल निवामी स्याहा कुंकगादि चंदनादि गंध शीत कारया। संभवन अंतफेन भृरि ताप हारया ॥ अनंतनाथ०॥
Amaves
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१२२
मों । श्रीअनंतनाजिनेन्द्राय संसारतापविनाशनाय चंदनं निपामीति माह ।
स्वत इंदुकुंद हार खंड ना अखितही।
दुर्ति खंडकार पुंज धारिये पविच ही ॥ अनंतनाथ०॥
भों ही श्रीमनंतनायजिनेन्द्रायापपरमातये भक्षतान् निर्वामीति साहा ।
सरोपुनीत पुष्पसार पंच वर्ण ल्पावही।
गंध लुब्ध मुंगद शब्द धारि आव ही ॥ अनंतनाथ०॥
ओं i श्रीअनंतनाथमिनेन्द्राप कामवाणा विध्वंसनाय पुष्पं निपामीति स्वाहा ।
मोदकादि घेवरादि मिष्ट स्वादसार ही।
हेम थाल धारि भव्य दुष्ट भूख टारही ॥ अनंतनाथ०॥
ओं ही भीमनंतनापजिनेन्द्राय क्षुधारोग:पनाशनाय नैवेचं निपामीति स्वाहा।
रत्न दीप तेज भान हेमपात्र धारिये ।
भवांधकार दुःखभार मूलते निवारिये ।। अनंतनाथ०॥
ओं0 श्रीनवनापजिनंदाय मोहांधकारविनाशनाय दीपं निपामीति स्वाहा ।
Recene
KARE
१२२.
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देवदार कृष्ण सार चंदनादि ल्याबद्दी।
दशांग धूप धूमगंध भंगद धाव ही ॥ अनंतनाथ ॥
ओम श्रीमसमानिन्द्रा दानाय धूप निषामासि स्या।
श्रीफलादि खारिकादि वेमथालों भरे।
मुष्ट मिष्ट गंधसार चक्खि नासिका हरे ॥ अनंत नाथ०॥
भी श्रामनाथ जिनेन्द्राय मोफसमा फल निर्यामीति (पा ।
पमय
मलिल शीत पति स्वच्छ मिष्ट चदन मलियागर।
तंदुल सोम समान पुष्प सुरतरुके ला वर ॥
घर उचम अति मिष्ट पुष्ट रसना मनभावन।
गणि दीपक तमदरन धूप कृष्नागर पावन ।
लहि फल उचम कणथाल भरि, अरघ रामचंद हम करें।
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१० भोई जनप्दादश्या तपीगंगरमशाय श्रीमनंगनाथ जिनेन्माए अपेनि। चत अमावसि अरिहने, घातिक दुखदाय । वछो धर्मफेवलि भये, जजू चरण सुखदाय ॥ ४ ॥ ओ चहापाषायां शामगंगरटिशाय धीमरानाधजिनेन्द्राय अर्थ नि० । चतअगावसि शिव गये, इनि अघाति भगवान । सुरनरखगपति गिलि जो, जजहं मोक्षकल्यान ॥५॥ पापायस्मा गोपामगरमटिगाय श्रीमनन्तनाथ जिनेन्द्राय अनिल अथ जयमाला। हो। काल अनंतानंत भय, जीव अनंतागत जिन उतपति व्यय ध्रुव कही, नमूऽनंत भगवंत ॥१॥ १२५ पृ. १२८ SHRECR51 मणि विष्टि अखय करि सुरगण पेखिके जी ।।७।। धरि ध्यान सुकल तवजी, चउ पानि इने जानी, सुर आय मिले सत्र ज्ञान कल्याण ही जी। वदि चैत अमावसिजी, जखि भक्ति तुहे वासजी, समवादि रच्यो तसु उपमा भी नहीं जी। समादि जिते भविजी, सुनि धर्म तिरे सब जी, प्रभु आयु रही जब मास तणी तबै जी। संमेद पधारे जी, सब जोग संघारे जी॥ समभाव विथारि वरी शिवतिय जबजी ॥९॥ वसु गुण जुत भूपितजी, भा छारि बसे तितजी, सुख मगन भये जित मावस चैतकाजी। सुर सय मिलि आयेजी, शिव मंगल गाजी, बहु पुण्य उपाय चले तुम गुणत कीजी॥१०॥ ।१२८ Ke गुण वृंद तुम्हारे जी, बुध कौन उचारे जी, गण देव निहारे पै वचना कहे जी। "चंदराम' को थुतिजी, वसु अंगथकी नुतिजी, गुण पूरन छौ मति गर्म तुढे लहेजी ॥११॥ प्रभु अरज हमारीजी, सुनिन्यो सुम्ब कारीजी, भवमें दुखभारी निवारों ने धणीजी। तुम सरन सहाईजी, जगके सुख दाईजी। शिवदे पितुमाई कहो कालो धणीजी ॥ १२ ॥ घत्ता छंद। इनि गुण गण मार, अमल अपारं, जिन अनंत के हिय धरई। हनि जरमरणावलि, नासिभवावलि मिवमुंदरि तत छिन वरई ॥ १३॥ १२६ आँधीभनंसनायनिंद्राय महा निषपामीसि स्वाहा ।
. . पु. १२८ REKHA मणि विष्टि अखय करि सुरगण पेखिके जी॥७॥ धरि ध्यान सुकल तवजी, चउ घाति इनै जानी , सुर आय मिले सब ज्ञान कल्याण ही जी। वदि चैत अमावसिजी, जखि भक्ति तुहे वासजी, समवादि रच्यो तसु उपमा भी नहीं जी। समचादि जिते भविजी, सुनि धर्म तिरे सब जी, प्रभु आयु रही जब मास तणी त जी। संमेद पधारे जी, सब जोग संघारे जी॥ समभाव विथारि वरी शिवतिय जवेजी॥९॥ वसु गुण जुत भूपितजी, भा छारि वसे तितजी, सुख मगन भये जित मावस चैतकाजी। सुर सव मिलि आयेजी, शिव मंगल गायेजी, बहु पुण्य उपाय चले तुम गुणत कीजी॥१०॥ SHRecketectXARAKSHActed पू० रा गुण बूंद तुम्हारे जी, बुध कौन उचारे जी, गण देव निहारे पे चचना कहे जी। "चंदराम" कर थुतिजी, बसु अंगथकी नुतिजी, गुण पूरन द्यो मति मर्म तुहे लहजी ॥ ११ ॥ प्रभु अरज हमारीजी, सुनिच्यो सुख कारीजी, भवमें दुखभारी निवारों हो धणीजी। तुम सरन सहाईजी, जगके सुख दाईजी। शिवदे पितुमाई कहो करलो घणीजी ॥ १२ ॥ घचा धंद। इनि गुण गण सारं, अमल अपारं, जिन अनंत के हिय धरई। इनि जरमरणावलि, नासिभवावलि! मिवसुंदरि तत छिन वरई ।। १३॥ ओ श्रीअनंतनायजिनद्राय माय निपामीति स्वाहा ।
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अथ श्रीधर्मनाथजिनपूजा।
गरा।
सार दरप पर कहे पदारथ नव मुभ भाखे ।
सप्त तत्व वरनये काप पंचासति आखे।
लोस्तीन धिति कही धर्मजिनवर वृपदायक।
आहानन विधि करुं प्रणमि त्रिविधा शिवनायक ॥
धावायमिन्द सा तर संौषट् ।
भो । भानावजिनेन्द्र का लिष्ट सिष्ठ । ठ ठ ।
भोपीनापजिनेन्द्र अब पर सन्नहितो मन मव ! बट् ।
मरजित कपोज ।
अति निर्मल शुचि नीर तीर्य उद्भव टंग पारे ।
सीतल मिभित गंप सुरभिते मधु झंकारे।।
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ALCHACHAR
पू. जनम मृत्यु आताप दुरित दारिद दुख खंडन । जजूं चरण धरि भक्ति धर्म जिन सिव के मंडन ॥१॥ भो धीधर्मनाथ जिनेंद्राय जम्ममृत्युपिनाशनाय जलं निर्षपामीति स्वाहा । कृस्नागर कसमीरनीर धनसार सुचंदन । पटपद ऑघ भमंत सुरभिते दाह निकंदन जनम०॥२॥ औ ही श्रीधर्मनाथर्जिनद्राय संसारतापविनाशनाय चंदन निधामीति स्वाहा । सोम किरण समस्वेत सुद्ध डंडीर अखंडित । अति निर्मल चखि हरे, सालि सुभ सौरभि मंडित ॥ जनम ॥३॥ गांधीधर्मनामिद्राय अक्षयपदमाप्तये अक्षतान् निपामीति स्यारा । पंच वर्ण मय कुसुम कल्प नरुके मन भावे । गंप लुब्ध गधु ममें समरके वाण नसावें ॥ जनममृत्यु०॥॥ it it धर्मनाथमिद्राय कामबाणविध्वंसनाय पुष्पं निर्यामीति स्वाहा । उज्यल ललित पवित्त कनक भाजन चरु धार ।
- تعدد पूर्ण *ReRevieKHere मधुर घृच रस युक्त छुधा लखतें निरवार जनममृत्यु०॥५॥ ओं हो श्रीधर्मनाथनाधजिनेन्द्राय सुधारोगविनाशनाप नषेधं नियामीति स्वाहा । मणिमय निर्मित दीप कांति तम औघ विदारे। विकसत हैवस्वाधस्वपर लखिगुण विस्तार ॥ जनममृत्यु० ॥६॥ ओं, श्रीधर्मनायजिनेंद्राप मोहांधारविनाशनाय दीपं निपामीति स्वाहा ॥ अगर कृस्न करपूर सुरभि चंदनके दाहन । धूप निर्जरा करै हौ अघ द्वै शिव गाइन ॥ जनममृत्युः ॥७॥ भों ही श्रीधर्मनायजिनेंद्राय मष्टर्मदहनाय नं निर्वपामीति साहा । सुर तरुके फल भूरि कनक भाजन भरि पावन । श्रीफल मिष्ट बदाम चक्षुनासामनभावन ।जनममृत्यु०॥८॥ मोदी श्रीधर्मनापजिनेंद्राप मोसफलप्रासये फन निपापीति साहा। जल गंधाक्षत पुष्प दीप चरुधूप मिलावै । अर्घ रामचंद' कर मेलि फल शिवसुख पावै ।।
जनम मृत्यु आताप दुरित दारिद दुख खा. जजू चरण परि भक्ति धर्म जिन शिव के मंडन ॥९॥ ii। धीधर्मनाधजिनद्राप मध्यादप्राय अयं निर्यपागीति स्या। अSics अथ पंचकल्याणक। सारथ सिति पये, गर्भ सुनचा सार । तेरसि सित घशाखकी, लयो जजूं भवतार ॥।॥ यो पंचायशुपारप्रयोदश्यां गर्भमंगलमंटिवाय धीधर्मनायजिनेंद्राय अयं नि० ॥ जनम माप सुदि त्रोदशी, सुरपनि लखि इत आय । सुरगिरि ले सनपनि जजे, में जजह गुण गाय ॥ २॥ या माप गुपलपापा मगलपं रसाय धोधनानिद्राय मपं नि० ॥ माघ सुकल तेरसि तज्यों, तृणवत राज महान । १६१
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धार तप पन विपे, जजू धर्म भगवान ॥३॥
को मालपोगलभरिताप श्रीधर्मन जिप ॥
पौष मुक्ल पूनिम हने, घाति कर्म लहि ज्ञान ।
कही सकल पिनि लोककी, जज बोष कल्यान ॥ ४ ॥
4. ही पशुपरिमापोहागरमेडिसाय बोधर्मनापजिनेदाप अयं नि०॥
जेष्ठ सुफल तिथि पौथि ही, हनि अघाति शिवधान ।
गपे समेदावल यकी, जजू मोक्ष कल्यान ॥५॥
को र मेधगलहिताय श्रीधर्मनायविनदाय अयं नि।
SisteCRICRETURE
अप जपमाला।
rxxx
हा।
पंदू भी जिनधर्मके, पदनखमंडन भान ।
ममता-रजनी-दरन दिन, भवदधि तारन जान॥१॥
चौपाई। सारथिमिध अहिमिद, चय रतनागपूरी गुणवृंद । पिता भानु गुणवंत अपार , मात सुव्रता गर्भ मझारि ॥२॥ आये मित रसि वैसाख, नये मुकट हरिधरि अभिलाख । चले सबै सुर जुतपरिवार , गर्भकल्याणक कानों सार ॥३॥ पट नव मास थकी मणिविष्ट, वार तीन दिन माहीं सुष्ट । करी धनद, सुरि छप्पन पाय , सेवे माताके सुखदाय ॥४॥ जनम माघ सुदि तेरसि भयो, तीन ज्ञानजुत अचरज थयो। चार्जे घंट सुमनकी विष्ट, इंद्र चले सव नुति करि इष्ट ॥५॥ माया शिशु धरि शची जिनंद, प्रदछिन दे लीने सानंद । वासव नमि लीने हरपाय, चले मेरु पांडक वन जाय ।।६।। छीरोदधित जल सुभ लाय, सनपन करि भवमंगल गाय । वाजें साढा वारा कोरि, जाति धुने करि नृच बहोरि ।।७।। .
ॐ पूजि पदांयुज पितु परलाय, तांडव निरत कियो सुरराय । धर्मनाथ कदि निजथल गये, वाल चंद्रसम बढते भये ॥८॥ तन कंचन पनु पन चालीस, आयु वरप लख दसकी ईस पांच लाख आप कीनो राज, कछु कारन लखि धर्मजिहाज ॥९॥ तृणवत त्याग्यो भावन भाय, देव रिषी नय पूजे पाय । और सुरासुर खग अवनीस, सिवका ले थापे वन ईस ॥१०॥ कचलोचत उपज्यो मनज्ञान, पष्टम घरि तिष्टे भगवान । तेरति माघसुकल सुरराय, करयो कल्याणक तप सुखदाय ॥ ११॥ बर्द्धमानपुर भोजन काज, गये दयो पय धर्मजिहाज । कोटि अर्थदादस मणि धार, भई विष्टि घरसनि अगार ॥ १२॥ बरस एक तप दुर्दर पारि, पनिम पोस ध्यान परजारि । भस्म घातिया कर वरवीर, केवल ज्ञान उपायो धीर ।। १३॥ Rec घम अढाईलख उपदेस, भविजन भवत तार गंप माम इक आय जु रही, गिरसमेद पहुंचे प्रभु सही ।। १५ ।। जोगनिरोधि करे समभाव, हानि अघाति भये सिवराय । चतुर्निकाय देवता माय, उत्सव कीनों मंगल गाय ॥१५॥ मो मंगल दे जिनपति मोहि, जोरि उभे कर बिनचूं तोहि । जे चर अचर लोकत्रियमादि । तुमते परनति छानी नादि ।। १६ ।। याने गोपनकी सब बात । हो त्रिभुवनपति कर विख्यात । "रामचंद" पिनवे प्रभु तोहि । धर्मनाथ जिन दे शिव मोहि ।। ७॥ घा 1 इनि श्रीजिनधर्म गुणगणपरमं जोभवि मनवचतन गावे । लहि मुर सुखसार अमल अपारं नर हुय मिव सुख लहु पावे ॥१०॥ श्रीधर्मनापजिनेंद्राय महा निपानीति स्वाद।। इति पर्गनागिनपूजा सम ॥ १५॥ - RES sok सुष्ट मिष्ट हेमथाल धारि भव्य स्वादि ही ॥रोग सोग०॥५॥ भों ही श्रीशांतिनाथ जिनेंदाय सुधारोगविनाशनाप नै निपामीति स्वाहा । दीप जोतिको उद्योत धूम होत ना कदा। रत्नथाल पारि भव्य मोहयांत हे विदा॥ रोग सोगः ॥६॥ भों ही श्रीशांतिनाथनिनेंद्राय मोहांधकारविनाशनाय दीपं निर्यपामासि स्वाहा। अग्र चंदनादि द्रव्य सार सर्व धार ही। स्वर्ण घूप दानमें हुत्तास संग जार ही ॥ रोग सोग०॥ ७ ॥ ओं ही भीशांतिनाथजिनेंद्राय अष्टकर्मदहनाप धूपं निपातीति पाए। घोटकेन श्रीफलेन हेमथालों भरें । जिनेसके गुणोघ गाय सर्व ऐनकू हरै ॥ रोग ॥ ८ ॥ ओं श्रीशांतिनाथ जिनेंद्रीय मोक्षफलमानये फलं निपामीति साहा। सरद इंदुसम अंबुतीर्थ उद्भव तृरहारी । पप्पय!
चंदन दा निकंद सालि शामिन दुति भार ।। सुर तरुक वर कुसुम मध चरु पावन धा। दीप रतनमय जोति धूपतं मधु शहारें। सहि फल उत्चम अरघ करि सुम "रामचंद" कन थाल भरि । श्रीशांतिनाथके चरण जुग वसु विधि अरचे भाव धरि ॥९॥ धीशामिनाजिनंद्राप मनध्यप मामये अनिसायीति स्याहा। अब पंच कल्याणका दोहा। सारथ मिधित चये, भाद्रय मतमि स्पाम । ऐरादे उर अवतरे जनुं गर्भ अभिराम ॥१॥ जो मापदणसम्पां गगगगाय श्रीमानिनामजिनदार मनिशा०॥ जेट चतुरदास कृस्नही, जनमे श्रीभगवान ।
सनपन करि सुरपति जजे, में जज हूँ धरि ध्यान ॥२॥ ओं ही ज्येष्ठकशाचतुर्दश्यां जन्ममंगळयहिनाय धोशातिनायजिनेंद्रीय अर्घ नि. जेठ असिन चउदसि घरयो, तप तजि राज महान । सुर नर खगपति पद जजें, मैं जज हूं भगवान ॥३॥ भों ही जेप्टकृष्ण चतुर्दश्यां तपोमंगलमंडिनाय श्रीशानिनायनिंद्राप अप निर्वामीति. पोस सुकल ग्यारसि हने, घानि कर्म दुखदाय । केवल लहि वृष भाखियो, जजू शांति पद ध्याय ॥४॥ ओं ही पोपशुक्लकादमां ज्ञानमंगलमंडिताप धीशांतिरायमिनेन्द्राप भ निः। कृस्न चतुरदमि जेठकी, हनि अघाति सिवथान । गये समेदाचल थकी, जजू मोक्ष कल्यान ॥५॥ ओ ही येष्ठकृष्णचतुर्दश्या मोसमंगलमहिनाय श्रीशांतिनाथायजिनेंद्रीय अर्घ निर्व०॥
अध जयमाला।
गा।
कति जिमेस्वर पाय, बंद, मन वच कायते ।
दर मुमति जिनराय, जगी विनती रुचिमों करों ॥१॥
पाल-सार सपा मावोरिला ।
शांनि करम असुहानिय, मिद्ध, भय सिव जाय ।
मानि करो मन लोकम, आज यह मुखदाय॥
सांति करो जग निजी ॥१॥
धन्प नपरि एथनापुरी, धन्य पिता विस्वसेन ।
पन्य उदर अपरा सती, सांति भये सुख देन । सांति०॥२॥
भादव सममि स्पामही, गर्भकल्याणक ठानि ।
रतन धनद वरपाइये, पट नव मास महान ॥ सांति०॥३॥
स पू. xx जेठ अमित चउदस विपे, जनम कल्याणक इंद। मेरु करयो अभिषेक, पूजि नवे सुरवृंद ॥ सांतिः॥४॥ हेम वरन तन सोहनो, तुंग धनुष, चालीस । आयुवरसलस नरपती, सेवत सहस वतीस ॥ शांतिः॥५॥ पटखंड नवनिधि तियसवे, चउदहरनन भंडार । पछुकारण लखितजे, पण अमिय अगार ॥ सांति०॥६॥ देव रिपी सब आयक, पूजि चले जिन बोधि । लेय सुरा सिवका धरी, पिरछ नंदीस्वर सोधि । साति॥७॥ कृष्ण चतुरदसि जेठकी, मनपरजै लहि ज्ञान । इंद कल्याणक तप करचो, ध्यान धरयो भगवान ॥ सांति०८॥ पष्टम करि हित असनकै, पुर सोमनस मझार । गये दयो पप मितजी, वरपे रतन अपार ॥सांति०॥९॥ १४४ मोनमदिन यमु दुगुणही, वरस करे तप ध्यान । पोम सुकन्ट ग्यारसि हुने, घातिलयो प्रभुज्ञान । सांति०॥१०॥ ममममरन धनपति रच्यो, कमलामनपर देव । द नरा पटद्रव्यकी, मुनि थिनि थुति करि एव ॥सांति॥११॥ घन्य जुगलपद मीतनो, आयो तुम दरवार । धन्य उभे चखिये भये, बदन जिनंद निहारि॥सांति॥१२॥ आज सफल कर ये भये, पृजत श्रीजिन पाय । मीम मफल अब ही भयो, धोक्यो तुम प्रभु आय॥सांति०१३॥ आज सफल रसना भई, तुम गुणगान करत । धन्य भयो दिय मो ननो, प्रभुपदध्यान धरंत ॥ सांनि०॥१४॥ आज सफल जुग मो ननो, श्रवन सुनन तुमचैन । धन्प भये यस अंग , नमत लयो अनि चेन ॥ सांति॥१५॥ १४१ : राम कटे तुम गुणतणा, इंद लेह नहीं पार । में मनि अलप अजान है, होप नहीं विसतार ॥सांति ॥१६॥ पाप सहम पचीसही, पोडस कम उपदेस । देय समंद पधारिपे, मास रहे इक सेस ।। मांति० ॥१७॥ जंठ असिन चउदासि गये हानि अघाति सिवथान। सुरपति उत्सव अति करे, मंगल मोछि कल्यान॥ सांति ॥१॥ मेवक भरज करें सुनो, हो करुणानिधि देव । दुयमय भवदपि मुझे, तारि करूं तुम सेव ॥ सांति॥१९॥ पत्ता : इनि जिन गुणपाला, अमल रसाला जो भविजन कंठे धरई । हुप दिवि अमरेस्वर, पुहामि नरेस्वर, शिवसुंदरि ततछिन वरई ।। भों पतिनाथ जिनेंद्रीय पूमा निपार्माति ससा ॥ विधीमदिनापजिन REE | ॥
अथ श्रीकुंथुनाथ जिनपूजा।
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૨૪૭
अटिल।
जे परसंसा करें राग तासीनही, करै विरोध न दुष्टचकी दुख ना कही।
सुद्धातममें लीन कुंथु जिनकून, आह्वान विधि ठानि सवै अघळूच ॥
ओं ही श्रीधुनायजिनेंद्र चत्र अवतर अवसर । संयोपट् ।
ओं ही श्रीकुंथुनायनिंद्र ! अन तिष्ठ तिष्ठ । ठः ठः ।
ओं ही श्रीकुंथुनाथ जिनेन्द्र । अत्र मम सन्निहितो भव भव । वपत् ।
पिभगी एंद।
अति आमय दुसतरतें तृट् थावे, दुख पावें अतिही भारी ।
तिसनासन कारन पूजन आयो, तीरथको जल भरि झारी ।
श्रीकुंथु जिनेश्वर आपनसे चर, लखि पोपे पद धरि करना।
में काल अनंत अकाज गुमायो, अव तारों तुम पद सरना ।। १॥
ओं श्रीकुंथुनाथ जिनेद्राय जन्ममृत्युविनाशनाय जल निर्वपामीति स्वाहा ।
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+ पू० भवगाहत धमतें दाद भयो मुद्दा, छिनसुख नाही का वरना। पति कुंकुम चंदन दाह निकंदन, पूजन ल्यायो हरि सरना । श्री कुंथु० मेरी धारधुनापजिनेदार संसारतापविगायनाय चंदनं निशमीति बारा ॥ इसंसार अपार उदपि, तारन भाक्त तुही नवका। मिन नदुल ल्पा पुंज वनावें लह पावें ते सुख सिवका ।। श्री कुंथु०॥ lt 4 इंधनापमिनमाय मलयपदमा मानन निर्मपामीति स्वाहा ।। सुर असुर विद्याधर हरिहर प्रतिहर, ब्रह्मा भ्रष्ट मदन कोने। सुरतरुके कुमुस्यकी पद पूजू, हरो समर इन दुख दीने ॥ श्रीकुंथु०॥ ओहो ११माजिनंद्राय हमरामसिनाप पुर्ण निसामीति स्वाहा। दोप आठारा यात हो, क्षुधा तृपति ना नित सातें। सद पेपर मोदक पूजन त्यायो, हरो वेदनादुख पाते। श्रीकुंथु०॥५॥ ओस भाई नापजिनेदाप सुधारोगविनाशप नवे निपीति सा || मोह मदातम छाय रह्यो मम, ज्ञान हरयो अति दुख दीना। aceCRACTICE
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अथ पंच कल्याणका AAPKCRECORA दोहा। दमी श्रावण कृस्नही, तजि सरवारथ सिद्धि। गर्भ लयो श्रीमतिउदर , जजू देहु सिवरिदि ॥१॥ ओंभाषणकृष्णदशम्या गर्भमंगलमंडिताय भीकंधुनायजिनेंद्राय अर्थ निपा० । पतिपद सित वैसाख ही, जनम सुराधिप जानि । उत्सव करि सुरगिरि जजे, में जज हुं भव हानि ॥२॥ भों शाखालप्रतिपदायां जन्ममंगलमंडिताय श्रीकुंथुनायजिनेंद्राय अपं नि०॥ तज्यौ राज पट खंडको, तृणवत दिच्छा धारि। परिवा सित वैशाखही, जजू भवार्णव तारि॥३॥ भो । बैशाखमपतिपदायां सपोपंगरपंडिताप धाधुनायजिनेंद्राय अर्थ नि० । चैत सुकल त्रितिया इने, घाति करम लदि ज्ञान । HEReceneCREERSCREECHEREGeet ५० .. कहो धर्म सुनि भवि तिरे, जजहूं ज्ञानकल्यान ॥४॥ भो । प्रपलवतीयायां शानमंगलपरिसाय श्रीपंचनाधजिनेन्द्राय भ नि पामी। पडिया सित वैशाख ही, सफल कर्म हनि मोखि । गये समेदाचल थकी, जजू चरण गुण घोखि ॥५॥ यो पेशामरालपतिपदायां गोमंगलगरिलाय धीयुनायजिनेंद्राय अपं नि० । . अथ जयमाला। पोहा। कुंथु जिनेस्वरके चरन, त्रिविध नमूं कर जोरि । धरि दिच्छा पट् कायपूं, पोखे पखंड छोरि ॥१॥ घाफ-विशुन गुरु स्वामीफी। जय कुंथ जिनेस्वरजी, बंदु परमेस्वरजी, सरवारथ सिद्धथकी, चय माइयेजी। श्रीमति उर थायजी, नृप सूर्य सुहायेजी, वदि श्राव- १५२ गदममी मंगल गाइएजी,॥२॥ वारणपुर पानाजी, हरि जन्म कल्या: नाजी, मिलि आए पैसाख सुकल परिवा सबैजी। सुरगिरि ले आये जी. जल छीर सुल्यायेजी, अभिषेक सिंगार करी पूजा सर्वजी॥३॥ फिर पितु ढिगल्पायेजी, नवितूर बजायेजी, लखि अंग न माये मात पिना सबैजी । तन कंचन सोहेजी, रवि कोटिक को है जी, धनुतुंग पैंतीस अजा लच्छन फजी॥४॥ वय वाल विहाईजी, नृप पदवी पाईजी, सुभवक इत्यादि भंडार विपै भयेजी। पट खडके भूपाजी, वरधार अनूशजी, सुर संग मझारि इत्यादि सो जयेजी॥५॥नृप मेखर धाराजी, से पद माराजी, बत्तीस हजार तियातिगुणी लही. जी। कछु कारण पायोजी, भव चंचल भायोजी, नवनिधि सिंगार विभौ विषवन जही जी॥६॥ लोकांतिक आयजी, पद पुष्प चढाये है जी, नुति कर धुति ठानि संघोषि घरां गयेजी सिवका हरि कीनी To - . जी, गिलि कांध लीनीजी, बन जाय तिलक तरु तलि ठये जी ॥७॥ मिगार उतारेजी, सिर केस उपारेजी, नमःसिद्ध उचारि सुधातम ध्या. इयां जी । शाख उजार मी, परिवा तप धारंजी, तबही मन ज्ञान जिनघर पाइयोजी॥ ८॥ पटग करि पूरोजी, भोजन दिन सूरोजी पुर मंदिर धीर लखत भूपा घरेजी। घरदच निहारेजी, नमि लिष्ट उचाजी, पयदान सुरा लखि पंचाचर करेजी॥९॥पोटस वर्ष ताईजी करि नप अधिकाई जी, आतम लयल्पाय हने चउघातियाजी। केवल लाद ज्ञानीजी, त्रिलोक्य वखान्योजी, मिततीज फल्पानों चत सुरां कियोजी॥१०॥सव आरज विहरेजी, भवितारि घमेरेजी, सत्र आयु निवरि समंदाचल गयेजी। ये माख सु प्रतिपदजी, अघाति करे रदजी, तब मोक्ष महापद कुंथुजिना गयेजी ॥ ११ ॥ श्रीजिनवर म्यागीजी, गुणपूरन धामीजी,करुनानिधि नामी अरज सुनो करूंजी। भववास महावनजी, इसमें सुख नाछिनजी, विन कारन ये जनावरकरें . म
नी॥१२॥ तुम सरन सहाईनी, पिन कारन भाईजी, हो त्रिभुवन
राई सरनि तुहे गहुंजी । गुणगण सर धारेजी. "रामचंद उचारेजी,
दरियर हमारे सौरुप सदा लहूंजी ।। १३ ॥
पू.
घता
curemararth
गुणगण अविकारं भवदपि तारं कुंथु जिनेस्वरके अमलं ।
सुर नर खगध्या सिवपद पावें, "रामचंद" पदजजि कमलं ॥
मों को धीकुंपुनाजिन्द्राय पूर्णा निर्वपापीति स्वाहा ।
से भी नायजिनपूजा समामा || १७ ॥
अथ श्रीअरनाथजिनपूजा।
महिल।
तजि पट सैंडभूरिद्ध जीर्ण तृणवत सबै ।
सुद्धातममें लीन भपे अरजिन ज॥
PUR
' ध्यानखडगत ने करम वसु में नमूं। आइवानन विधि ठानि सबै अघ बम ॥१॥ गोधी भरतापनिजेंद्र ! अन थरार अपार । संयोपद। औदी श्री अनानि अप्रतिध विधा टा। गोधी भरनापनि मम सनिगो मप भय । पर । मासा | सरद रितुके इंदुत सित, तीर्थ उद्भव नीरही। भरि भंग मणिमय धार देखें, नस त्रिविधा पीरही। अरनाथ दुस्तर हानि अरि, पसु मोछ निरीदे गये। सत इंद्राय उछाह कीनी, जजूं पुलकित अंग ये ॥१॥ जो धी भरनापनिन्द्राय नमामिनाशनाय नर्स निर्यपागीति स्या घनसार अगर मिलाय फुफुम, घसत परिमल दिग महे। १५५ RE रा. पू० चचरीक शब्द करत आयें, पूजि जिन भवतप जहै ॥ अरनाथ ॥२॥ ओं ही श्रीमानायजिनेंद्राय संसारतापविनाशाय चंदन निशीति स्वाहा । सितसालि ससित खंड नाही, सरल दीरघ आनही। करि पुंज जिनवर चरन आँग, लह अविचल थानही॥ अरनाथ०॥ ओं ही श्री अनायजिनेंद्राप अक्षयपदमाप्तये अक्षतान् निर्वपामीति स्वाहा । शुभ कुसुम चारु अपार परिमल, कल्पतरुके पावने । चखि घाणहारी भरूं थारी, समरवाण नमावने ॥ अरनाथ०॥ ६॥ ओह श्रीभरनायजिनाय कापाणविध्वंसनाय पूर्ण निर्वामीति स्वाहा । वरखंड घृत पकवान सुंदर, स्वर्ण भाजनमें भरे। अति मिष्ट रसना भावने जिन पूजि रोग छुपा हरै ।। अरनाथ०॥ ओं ही श्रीअरनायजिनेंद्राय क्षुधारोगविनाशनाय नया नियंपामीति स्वाहा । मणि दीप जोति उद्योत अदभुत धांत नासन भान ही। REP - धरि कनकभाजन पूजि जिनपद लहें केवलज्ञान ही ! अरनाथः॥ श्री श्रीमरनाथ जिनेद्राय मोहधिकाविनाशनाय दीप निपामीति स्वाहा । धनमार अगर दसांग धूप सु सुर्न धूपायनि भरें। जिनचरण आगे खेय भविजन दुष्ट कर्म सवे जरें ॥ अरनाथ० ॥७॥ ओही श्रीअरनाथ जिनेन्द्राय अष्टकर्मदहनाय धूपं निवपामीति स्वाहा। वादाम श्रीफल दाख खारिक आदि फल बहु मिष्ट ही । भरि कनकथाल जिनान धार लहै सिव फल सुष्ट ही ॥अरनार्थ० ॥ औहा धीभरनाजिनद्राय मोक्षफलप्राप्तये फल निवपामाति साहा । वर नीर गंध सुगंध तंदुल पुष्प चरु अरु दीपही। करि अर्घ धूप फलार्घ लेकरि " रामचंद, अनूप ही ॥ अरनाय दुस्तर हानि अरि वसु मोक्ष निरभ हवे गये। सत इंद्र आय उछाह कीनों जजू पुलकित अंगये ॥९॥ ओंकी श्रीमरनाजिनंद्राय अनर्यपदप्राप्तये ,अर्ध नियामीति स्वाहा ।
अथ पंच कल्याणक । दोहा। फागुण सुदि त्रितिया चये, अपराजित" इंद। उदर सुमित्रा अवतरे, जजू देव गुण वृंद ॥ १ ॥ नों ही फारगुणशुलतृतीयायां गर्भमंगलपरिताय धीमरनापजिनेन्द्राप भय नि। अगहन वउदमि सुकल ही, जनमें जुत त्रय ज्ञान । हरि सनपन कर गिरि जजे, जजहं जनम कल्यान ॥२॥ भों ही मार्गशीर्ष चतुर्दश्या जन्ममंगपंडिताय धीमरनाथजिनेन्द्रीय अर्ष निपा. मगसिर दसमी सुकल ही, पद् खंड राज महान । तृणवत तजि तप वन घस्यो, जजू चरण धरि ध्यान ॥३॥ भों ही मार्गशीदशम्या पोमंगमंडिताय धीमरनायजिनेन्द्राय भ नि । कार्तिक द्वादसि सुकल ही, घातिकर्म इनि ज्ञान।
पूर्ण लामो धर्म दुविधा कहो, जजहूं ज्ञानकल्यान ॥ ४ ॥ ओह मानिकशुक्ल द्वादश्यां शानमंगरमरिताय श्रीअरनाथ जिनेन्द्राय अर्थ नि चत्र अमावस सिव गये, सर्व कर्म हनि देव । चतुर निकाय सुरा जजे, में जजहूं वसु भव ॥ ५ ॥ गोदी महामावस्या मोक्षमंगलमटिमाय श्रीगरनायजिनेन्द्राय अर्थ निक अथ जयमाला। दोहा। अर जिनके पद कमल जुग, बंद, मीस नवाय । देहु सुमति विनती रचूं, पढ़े पाप नसि जाय ॥१॥ (चाल-चंद्रमा जिनध्याइयोजी) अर अराति बसु हानिके, सिवतियके पति थाय। सुख अनंत ता संग लहै, बंद गुण मग लाय, बुधहो, अर जिन ध्यावो भावसोजी ॥२॥ .
विहरि समैदा चलगये, आयुरही हक मास । जोगनिरोधि अघातिया,
हनि लीनो मित्रवास । बुधहो, अगजिन ध्यावो मावस्यौजी ॥१५॥
अविनासी सुखमय नहीं, ज्ञानरूप निरवाध । लखैकालभवकीसवे,
परणति बोध अगाध, बुधहो अर जिन ध्यावो भावस्यौंजी॥१६॥
तुम करुणानिधि जगपति, जगनायक भगवान । रामचंद विनतीकरें
द्यों मुझ अविचल ज्ञान । बुधहो, अरजिन ध्यावो भावस्याजी।
ध्यावत मिवपदवी लहै, नरपदकीकहाबात । भृत्य होय सुरपति चले,
देखो फल अवदात, बुधहो अर जिन ध्यावो भावस्पोंजी ॥१८॥
यत्ताद।
अर जिन गुण मारं, विबुध अपारं गावत अहनिसि मन घई।
तसु कीरनदेवा, खगनृपमेवा, ठानत उत्सव बहु करई ॥ ९९ ॥
ओं ही श्री अनायजिनंद्राय मह. निशामीति साहा
इति श्रीमाजिनपूना समाप्ता ॥ १८ ॥
अथ श्रीमल्लिनाथजिनपूजा। पाधि मलि मनाह सजि सील मदन दुसत्तर हरवों। अनुप्रेक्षा सर संधि मोदमट जय करयों। प्रयज्या सिवका साजिवरांगन सिव वरी। आदाननविधि करूं मणमि गुण हिय धरी ॥१॥ feनादि अन अपार अपसर । संपट । attrufeatजिनेन्द्र पनि निट : द .। भी श्रीमतिनामिनेन्द्र अप्रसार समितिको भय गप । पपट् । मारामा इंदु कुंद छीरत अपार स्पेन वारही। मिश्रगंध ग धारिक निकारि धारही।
RA अनेक गीत नृत्य तूर ठानिये विनोदस्यों। अनर्घ द्रव्य त्याय मल्लिनाथ पूजि मोदस्यो॥१॥ ओंका महिनापजिनेंद्राप जन्ममृत्युविनाशनाय जल निवामीति स्वाहा । गंध चंदनादि ले भवादि दाह• हरे। सरद हे सनेह उस्न बूंद एक जो परे ॥ अनेक०॥२॥ भो भीमसिनाथ जिनेद्राय संसारतापविनाशनाय चंदन नियामीति साहा। राय भोग्यके मनोग्य तंदुलोष सारही। सरल विचार स्वेत पुंज भव्य धारही ।। अनेक०॥ को ही श्रीपतिनाजिनेन्द्राय भक्षपपरमाप्तपे भक्षतान् निर्वामीति साहा । सुरोपुनीत पुष्पसार पंच वर्ण ल्याइये । जिनेंद्र अग्र धारिके मनोजकू नसाइये ॥ अनेक० ॥२॥ मो0 श्रीमस्निायनिनेन्द्राप कामगाय विधमनाय पुष्पं निपापीति स्वाहा । मोदकादि घेवरादि घृत खंडतें करें। ASTRORTS स्वर्न थाल धारतें छुध्यादि रोग• हरें । अनेक० ॥५॥ ओ श्रीमलिमायनिन्द्राय क्षुधारोगपिनाशनाय मैयेय निपामांति स्वाहा । रत्न दीप तेज भान हेम थालमें भरें। जिनेंद्र अग्र धारि भव्य मोह ध्यांत हर ॥ अनेक० ॥६॥ of श्रीमस्निायनिद्राय मोदधिकारपिनाशनाय दीपं निपामीति स्वाहा । दसांग धूप चंदनादि स्वर्न पात्रों और। हुतास संग घारि कर्म ओघ भव्यके जरें। अनेक०॥७॥ ओ श्रीममिनायजिनेन्द्राय मध्यमदहनाय धूप निर्यपामीति स्वाहा। मिष्ट सुष्ट श्रीफलादि घाण चक्खिफू हरें । मनोग्य चिचदार पूज जोग्य थालमें भर ॥ अनेक मी धामहिमायजिनेन्द्राय मोक्षफलमातये फलं निर्वामीति स्वाहा । सलिल सुच्छ सुभ गंध मलयतें मधु झंकार । तंदुल शशित स्खेत कुसुम परिमल विस्तार । पप्पय।
Partianita * cractarx छुपा हरन नैवेद रतन दीपक तम नासे। घूप दहै वसु कर्म मोख मग फल परकासे ॥ इम अर्घ करें सुभ द्रव्य ले, रामचंद कन थाल भरि ॥ श्रीमल्लिनाथके चरण जुग, वसु विधि अरचे भाव धरि॥९॥ ओं में श्रीपटिनायजिनेंद्राय अनर्षपदमाप्तये अर्थ निपामीति स्वाहा । अथ पंचकल्याणक । दोहा। चैत सुकल प्रतिपद चये, अपराजितते इंद। प्रजावती उर अवतरे, जजू मल्लि गुणवृंद ॥१॥ ओ ही चित्रशुक्लपतिपदायां गर्भमंगलमंहिताय श्रीपतिनायजिनेंद्राय अय निर्वामीविका अगहन सुदि एकादसी, सुरपति चतुरनिकाय । सुरगिरि सनपन करि जजे, मै जजहूं गुणगाय ॥२॥ मोही मार्गशुषलेकादश्या जन्ममंगल मंदिताय श्रीमल्लिनाया RecemecordPER १६॥
भवभय करि तृणवत तज्यो, जगतराज पाधीर । सित अगहन एकादशी, जजू धरयो तप वीर ॥३॥ मो मार्गशुपालकादश्यां सपोमंगळमंटिताय श्रीमहिनापजिनदाय मय निर्वयामीतिः । पोप कृस्न दोयज हने, पानिकर्म दुखदाय । केवल ले वृप भाखियो, जजू ज्ञान गुणगाय ॥४॥ भी दी पोपमा वितीयापा शानमंगलगंटिनाय श्रीमलिनिद्राय अप निर्यपामी० । फागुण पंचमि सुकलही, शेप कर्म हनि मोख । गये समेदाचल थकी, सिवहित पद गुण घोख ॥५॥ ओन फारगुणशुपमपंचम्यां मोक्षमगलमंदिताय श्रीमधिनायजिनेंद्राप अनि०॥ अथ जयमाला। पोदा। वालपन मलिनाथजी, विपय अरनि दुखकार । प्रगट भस्म तप अग्नितें, करें नमूं पद सार ॥१॥ १६७ 84 १६८ परि । जय तीन जगतपति मल्लिदेव । भव उदधितार तुम सरन एव ।। जय धर्मतीर्थ करता जिनेस । जगबंधु विना कारन महेस ॥२॥ जय तीर्थराज किरपानिधान । जय मुक्तरमा-भरता सुजान ।। जय स्वयंवुद्ध संभू महान । जय ज्ञानवक्षि करि विश्व जान ॥३॥ जय स्वपर हितू मदमोह सूर । दिक्षा कृपाण गहि तुरत पूर ॥ जय तेरह चारित अमल धार । हत राग देष वय अति कुमार॥२॥ तुम ज्ञानपोत लहि भवि अनेक । भवसिंधु नरे संप्तय न एक ॥ तुम वचनामृत तीरथ महान। वे पावन जे कार हैं सनान ॥५॥ दुःकर्म पंक छिन ना रहाय । तुम वेन मेघ करिके जिनाय ।। तुम ज्ञान भान करिके महेस । तिमर मोहको छय असेस॥६॥ सिवपंथ भव्य निर्विघ्न जाय । तेरी सहाय निर्वान पाय । ACARASHARE बहु जोगीस्वर तुम सरन धाय । निर्वान गए जासी अघाय ॥ ७ ॥ जय दर्शन ज्ञान चरित ईस धमापदेस-दाता महीस ॥ जय भव्यनिकर तारन जिहाज । भवसिंधु प्रचुर तुम नाम पाज ॥८॥ त्वं नाम मंत्र जोचित घरेय । सारथसिधि सिवसौख्य लेय ॥ में विनऊं त्रिविधा जोरि हाथ । मुझ देहु अछपद मल्लिनाथ ॥ ९॥ घता छंद। श्रीमलि जिनेस्वर नमत सुरेस्वर, वसुविधि करि जुग पद चरचे ।। दुइ जर मरणावलि नस भवावलि, रामचंद सिवतिय परचे ॥१०॥ ओं ही श्रीमलिनायजिनेंद्राय पूर्ण निर्वामीति स्याहा || इति श्रीमान्लनाधजिनपूजा समाव 11 १९ ॥ १६६ पृ. अथश्रीमुनिसुव्रतनाथजिनपूजा। प्ररित। सकल परीसे जीति ध्यान असित हने, पाति चतुक लहि ज्ञान भव्य योघे घने । मुनिसुबूत जिन पाय नम् सिर नाप, आह्वानन विधि करूं चरण ला ल्याय॥१॥ ओं मनसुवाधिमेंद्र व प्रातर आता । संयोष्ट । भों होना निमुनि! य तिष्ठ तिष्ठ ! ठः। भोगी भावनिमुक्नेि प्रय मम सन्निहिलो भा भव । वाद । चाल जोगीरासा। इंदु सरद रितुका अंगते सिन, मुनि चित सम अविकारी। सीत सुगंध तूट परसत नास, तीदिक भरि झारी॥ cucIORRETRIOR sae 1. मुनिसुव्रत जिनके पद पूंजे, दोष दुगुणनव नासे। लोक सकल कर रेख ज्यों देखें, ऐसो ज्ञान प्रकासे ॥१॥ यो श्रीनिसुव्रतजिनंद्राय नममृत्युविनाशनाय नलं निर्यपामीति स्याहा। घसि मलियागर कुंकुमके सँग कृस्नागर धनसारं । दाहनिकंदन परिमलतें आलि, धावत वृंद अपारं ॥मुनिसुव्रत०॥ ही धीनिगुवजिनेन्द्राय संसारतापविनाशनाय चंदन निर्मपामीति साहा। चंद किरन सम उजल दीरघ, मनरंजन अनियारे । तंदुल औघ अखंडित लेकरि, पुंज करों द्रिग हारे ।। मुनिसुव्रतः ।। मोह श्रीनिमुवतजिनेंद्राय अक्षयपदपालये अक्षतान् निर्मपामीति सादर कुसुम मनोहर पंच वरण ही, सुरतरुके सुभ ल्यावें । गंध सुगंधे घ्राणहि रंजन, गुंजत पटपद आवें ॥ मुनिसुव्रत ॥ आँधीनिस्ववजिनंद्राय कामयाण विध्वंसनाय पुष्पं निर्वपापीति स्वाहा । मोदक गूजा घेवर फेनी, सुरही घृच बनावें । १०१
on-
नगन दिगंवर वन वसे, जजूं चरण जुत राग॥३॥
भों ही शामकृष्णदशम्यां तपोमंगलमंडिनाय श्रीमुनिसुवजिनद्राग अयं निर्वामीतिः ।
नौमी वदि वैशाखही, हने धाति दुखदाय ।
कयौ धर्म केवलि भये, जजू चरण गुनगाय ॥४॥
ओं ही वैशाखकष्ण नवम्गं ज्ञानमंगलपंडिताय श्रीमुनिसुव्रतजिनेन्द्राय अर्ध नि।
फागुण द्वादसि कृस्नही, हनि अघाति निरवाण ।
गये सुरासुर पद जजे, जज हूं मोक्षकल्यान ॥५॥
ओं ही फाल्गुणकृष्णदारया मोसमंगलमंडिनाय श्रीमुनिसुव्रतजिनेंद्राय अर्घ निर्व० ।।
अथ जयमाला।
RECEMute
दोहा।
श्रीमुनिसुव्रत जिनतने, नमू जुगल पद सार ।
भवदधि तारनतरनहो, पतित उधारनहार ॥१॥
चाल-सीमंधाजिनयंदिया नगसारदो। मुनिसुवून जिनवंदिस्यां जगमारहो; नगर कुसागरभूप । पिता नमूं सुमितजी जगमारहो, श्रीहरिवंस अनूप ।। अनूप श्रावण वीजकारी सुरग प्राणतते चये। तव मात स्यामा गर्भ आये लोकत्रयमें सुख भये ।। सुर असुरके नय मुकट कंधे पीठ सव हरि आयही । गर्भावल्यान महंत महिमा ठानि मंगल गायही ॥१॥ पटनवमास त्रिकालदी जगसारहो, वरपे रतन अपार । वदि दसमी साखकी जगसारहो, जिनजनमें तिहबार ।। तिहवार घंटा आदि वाजे, सवे सुर मिलि आयही । जिन लेय पांडुक वन नहाये, खीर जल सुभल्यायही । सिंगार करि पितु मात सोपे, नृत्य तांडव हरि करयो । लखि हदै हरपित गये दंपति, नाम मुनिसुव्रत घरयो॥२॥ .
NAKINER स्याम वरण तन तुंग है, जगमारहो, वीस धनुप परिमान । तीस सहप्स कृप आयु है जगमारहो, कछलांछिनमुमजान ॥ सुभराजपद दससहम कोनो त्यागि तृणवत बन गये। नमः सिद्धभ्यः कहि लॉच कीनो,ध्यान में प्रभु पिरथये। तबही भयो मनज्ञान सुरनर पूजि पद गुण गाहये। वैसाख दसमी कृष्ण चंपकवृक्षतलि बूत भाइये ॥३॥ करि पष्टम मिथुला गये जगसार हो, भोजन हित जिनराय । विशनपजी दयो जगसार हो, पय लखि सुर हरपाय ।। हरपाय सुर आश्चर्य कीनो पंचफिरि वन जाय ही। तप करे ग्यारा वरप दादस भांति निरभै थाय ही। वैसाख नवमी कृष्ण हरिये घाति चउ धरि ध्यान ही। लहिज्ञान लोक अलोक पेरुयो, भयो बोध कल्यान ही ॥४॥ BREAKISies gfk पृ० समोसरन धनपति रच्यो जगसार हो, मानसथंभत्रिसाल । चउ चउ गोपुर सोहने जगसार हो, खाई सजल मराल || मराल वन वन कल्पतरु फुनि चैत चंपक अंवही। धुज सेल सरित सतूप सुर तिय नचे हलत नितंव ही ।। मधि सभा द्वादस सभामंडप कमल आसन जिन ठये। चतु वक्त्र अंगुल च्यारि अंतर भई धुनि सुनि हरपये ॥५॥ तरु असोक त्रिय छत्र है, जगमार हो, चवसठि चवर दुरंत । जोजन वानी मागधी जगसारहो दुदुभि मधुर घुरंत ॥ घुरंत दुदभि सुमन वरपे तुंग मासन त्रिय लसे । तमपटल भामंडल विधसे कोटिरविकी छवि नसे ॥ वसु प्रातिहारिज सहित आरिज देसके भवि वोधि ही। संमेदगिरि समभाव प्रणये भूरि जोग निरोधिही ॥६॥ 100
।
१७
फागुण द्वादास कृस्नहीं जगमारहो, ध्यान सुकल आस धार।
हनि अघाति सिरपुर लयो जगसारहो सुख अनंत भंडार॥
भंडार सुख अविकार अवपु सु हीनवृद्ध नही कदा।
त्रैलोककी तिरकाल परणति ज्ञान गर्भित है सदा ॥
तित जनम मरन जरा न व्यापै नांहि सेवक भूपही।
चिद्रूप वसुगुणमयी राजै सदा एक सरूप ही ।। ७ ।।
तुम गुण सु गुरु वरनवै जगसार हो, जिह्वा सहस बनाय ।
तोऊ पार लहै नहीं जगतार हो, तो हम किम धाय ।
विम थाय हमपे तुहे वरनन देवगुरु से थकि रहे ।
हो कृपानाथ अनाथके पति इहै भव दुख में सहे ॥
तुम तरण तारण दुखनिवारण तारि भवते नाथजी।
"चंदराम,, सरानि निहारि आयो जोरिके जुग हाथजी ।।
AREKARCHASEAST
यादा । श्री मुनिसुयूत देवकी, विनती परम रसाल । जो पढसी सुनिसी सदा, पासी मोक्ष विसाल ॥२॥ जानिएयरानापभिनंद्राय पूर्णा नियामीति स्वादा। परीश्रीनिगममनाथ जिनपना समाप्त ॥ २० ॥ अथ श्रीनमिनाथ जिनपृजा। पटिसन सुकल ध्यान पर जालि भस्म करि घाति ही, केवलज्ञान उपाय धर्म कहि ख्याति ही। मुनि प्रतिबुध भवि भये नमूं नमि पाय ही, माद्वानन विधि करूं तिष्ठ इत मायही ॥१॥ माँ धानमिनायजिनेंद्र ! अन अपयर अपसर । संगोपट् । १७..
श्रीरामममिनामिनेंद्र ! म तिष्ठतिष्ठाठः। भो । श्रीनमिनायनिन । म मर समिहिनो भा भरा वषट् । गीताउंद। सरति गंगा हिमन परवत थकी पूरव घावही । भरत सनमुख होय नभते परी कुंडमें आव ही। सोनीर निरमल अतिहि सीतल त्रिपानासन लेय ही। नमिनाथ जिनके चरण पूजूं अमल गुणगण घेय ही ॥१॥ को पीनमिनायजिनेद्राय भन्ममृत्युविनाशनाप जलं निशामीति स्वाहा । उद्यान निरजन मांहि पन्नग, घाम दुखत अति भनें । लखि मलयचंदन दाह कंदन, तासपे सुसते रमें ।। सो दारु पासुक नीरतें घसि, कनक भाजन लेप ही ॥ नामनाथ ॥ सही भीनमिनापविदाय संसारतापविनाशनाय पंदनं निममीति सारा ॥ सरद इंदु समान उजल गंधते मधुकर भने । MANTRASRAEXAMER १८.
मरल दीरघ नांहि खंडित, जोति मुक्ताकी दमें ।। मो अग्विन जलते क्षालि भति मन, उभे करमें लय हीनमिनाथ०॥ श्रीनमिनाजिनद्राय अक्षयपदमाये अक्षा निपामीति थाहा || कनक मणिमय सुघर धरिये, पंचवरन सुहावने । जावत्रि आदि अनेक विधिही, अमर तरुके पावने ।। सो कुसुम अद्भुत घ्राणहारी, लगे मधु कू पेय ही ॥ नमि० ॥ ४॥ औ श्रीममिनायजिनेंद्राय कामपाविनाय पुष्पं निपामीति स्वाहा । खट घृत पकवान सुंदर, सघ अनुपम मोहने । अति मिष्ट रसना हरे देखत, छुधा डायन कुं हने ।। मो मुष्ट मोदक चारु फेनी, स्वर्ण भाजन लेय ही ॥ नमि०॥५॥ iff धीनमिनायजिनंद्राय धुधारोगविनाशनाय नषेध निर्वामीति स्वाहा । दीपमाणिमय जोति सुंदर, धूमवर्जिन ललित ही। तम मोह पटल विलाय ऐसें, पर। ज्यों धन चलत ही ॥
पू . ओमी मिनापनिनेंद्र मित्र तिष्ठ तिष्ठ 18 :। भो ।। श्रीनामिनाजिनद्रा न मर समिहिमो भर मद। पद । गीताउंद। सरति गंगा हिमन परवत थकी पूरव धावही । भरत सनमुख होय नभते परी कुंडमें भाव ही॥ सो नीर निरमल अतिहि सीतल त्रिपानासन लेय हो। नमिनाथ जिनके चरण पूजूं अमल गुणगण घेय ही ॥१॥ भों पीनामिनायजिनेद्राय जन्ममृत्युविनाशनाय जलं नियामीति स्वाहा । उद्यान निरजन मांहि पन्नग, घाम दुखत अति भमैं । लखि मलयचंदन दाह कंदना तास सुखते रमैं । सो दारु प्रासुक नीरतें घसि, कनक भाजन लेय ही॥ नामनाथ ॥ यह भीनमिनायजितदाप संसारतापविनाशनाय पंदनं निरमीति सारा ॥ सरद इंदु समान उजल गंधते मधुकर भम । ॐSPEAKER सरल दीरघ नांहि खंडित, जोति मुक्ताकी दमें ॥ सो अखित जलते क्षालि भविजन, उभे करमें देय ही ॥नमिनाथ ॥ ओं को श्रीनमिनायमिनद्राय अक्षयपदमाप्तये अक्षान् निर्मपामीति स्वाहा ।। कनक मणिमय सुघर धरिये, पंचवरन सुहावने । जावत्रि आदि अनेक विधिही, अमर तरुके पावने ॥ सो कुसुम अद्भुत घ्राणहारी, लगे मधु पेय ही ।। नमि० ॥ ४॥ ओं में श्रीनमिनायजिनेंद्राय कामपाणवियसनाय पुष्पं नियामीति स्वाहा । खंड घृत पकवान सुंदर, सद्य अनुपम मोहने । अति मिष्ट रसना हेरै देखत, छुधा डायन • हर्ने । मो मुष्ट मोदक चारु फेनी, स्वर्ण भाजन लेय ही ।। नमि० ॥ ५॥ ओंज धीनगिनायजिनेंद्राय शुधारोगविनाशनाय नै निर्यपामीति स्वाहा । दीप मणिमय जोति सुंदर, धूमवर्जिन ललित ही। तम मोह पटल विलाय ऐसे, पवना ज्यों घन चलत ही ।।
मोकनक भाजन धारि भविजन, परिषअति प्रेयही ॥ नमिः॥ ओहो मानमिनायमिन्दाय मोविकारविनासनाय दीर निपार्मातिसार। सुभग धूप दसांग पूरन, स्वर्ण घूपायन भैरे । ससु सुरभित मधु भमें अतिही, दसों दिसिमें रख करें। सोप भविजन लेहि उत्तम, भगनिके संगखेप हीनमि॥७॥ iii श्रीनमिनायनिंद्राय अष्टकमदानाय धूपं निपामावि स्वाहा । पादाम श्रीफल चार पुंगो, आदि सुभ रलियारने । तसुगंपते हे प्राण रंजन, लखे चक्खि सुहावने ॥ कनपाल फलतें भरों उत्तम, अमर तरुके लेय ही नमिः ॥ ८॥ भी मिनामिनद्राय माफरमाइये फलं निपामोति स्वाहा । विमल नीर मुगंध चंदन, अछित स्खेत उजासही। घर फुसुम चरुते हुधा नास, दोपत तम नासही। रामचंद"हम अप कोजे, धूप फल सुभ लेप ही। NeCristeevrect १२ पू० . नामिनाथ जिनके चरण पूजू अमल गुणगण धेय ही ॥९॥ ओं ही श्रीनमिनायजिनद्राय अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्ध नियामीति स्वाहा । अथ पंच कल्याणका दोहा। अपराजितते हरि चये, विपुला उर अवतार । दोयज स्याम असोजही, लयो जजू भवतार ॥१॥ ओंनी पाश्विन कृष्ण द्वितीयायां गर्ममंगलमंटिनाय श्रीनमिनायजिनेंदाय अब निर्व। दसमी असित अमाढही, जनम सुराधिप जान । सुर गिरि ले सनपन जजे, जजहूं जनम कल्यान ॥२॥ मोही मापाढकृष्णदशम्यां जन्ममंगलपंडिताय श्रीनमित्राथजिनंद्राय अर्घ नि० ॥ वदि अपाढ़ दसमी तज्यों, जगतराज्य तप धार । सुथिर भए निज ध्यानमें, जजू चरण जुग सार ॥३॥ ओंकी अपादकृष्णदशम्पा तपोमंगळमंटिवाय धीनमिनायजिनेंद्राय अर्धे नि०। १५२ २६४ मगसिर सुदि एकादसी, हने घातिया कर्म कहो धर्म केवलि भपे, जजू चरण नजि भर्म ॥ ४ ॥ ओं ही पार्गशीर्षशुक्लैकादश्यां शानमंगल ताय श्रीनमिनाथ जिनेन्द्राय भ निर्मपामी. चतुरदसी वैसाख वदि, इनि अघानि सिवथान। गये समेदाचल थकी, जजहूं मोक्ष कल्यान ॥५॥ भों ही पेशासकृष्ण चतुर्दश्यां मोक्षमंगलमडिनाय श्रीनमिनायजिनेंद्राय अब नि । अथ जयमाला। SSSSS दोहा। इंद्र नमत मणि मुकटकी, नेक न दुति दरसाय । नमि जिन नखमंडलथकी, त्रिविध नमूं निनपाय ॥१॥ पद्धरि छंद। जय नमि जिनवरके जुगल पाय । प्रणम् मनपचत्तन सीसनाय । अपराजित नाम विमान सार । चप आये मिथलापुर मझार ॥२॥ १६५
विजयारथ तात इख्याक वंस । विपुला देवी उर सहस अंस।
अम्बनि फुवार दोयज असेत । जिन गर्भ लयो हरि धारि देत ॥३॥
आये कल्याण गरभादि काज । करि उत्सव चाले देवराज ।
धनपति करि तिरकाल विष्ट । पटमाम आदि नव रत्न सुष्ट ॥४॥
जय जिन जनमत्रप ज्ञान धार । आपाढ कृष्ण दममी मझार।
आये सब चतुरनिकाय देव । निजनिज वाहन निज नारि एव ।।५।।
नव मची जाय परसूति थान । नगि गुप्त लये जिन तेज मान ।
हरि नमसकार करि गोद लय । मिर छत्र तीन ईसान देय ॥६॥
फुनि सनतकुमार महिद इंद । मिन चवर करें सोभा अमंद ।
सुरगिरि पाहक वनमांहि जाय । अभिषेक कम्यो जल खीर लाया।
सचि पॉछि करे सिंगार सार । बहु तर बजे निन को न पार ।
वसु विधि पूजा करि निरति टानि । संतोपे मातपितादि आन ॥८॥
तनहम धनुप पणदह उतंग। दस सहस वरपकी आयु चंग। कीर राजतज्यो भय भीत होय । भवभोग विनस्वर काय जोय ॥१॥ तबही लोकांतिक आय देव । संघोधि चले अतिठानि एव । सौधर्म आदि सुर खचर भूप । सिक्का ले चाले वन अनूप ॥१०॥ तरु बकुल तले सिरकेस टारि । तजि उपधि सुधातमध्यानधारि। आषाढ कृष्ण दसमी महान । इंद्रादि वले करि तप कल्यान ।।११॥ करि पष्टम नगरी सुजग मांहि । अन काज गये नृपदत लखोहि । पय दान दियो सुर भक्ति देख। आश्चर्य करे पण विधि विप्लेख॥ १३॥ नव मास महातप उग्र ठानि । धरि ध्यान सुकल चउघातिहानि । अगहन सित चउथि सुज्ञान भान । उपज्यो सुर असुर कल्यान ठान समवादि सहित करिक विहार । संमेद ठये वह भव्यतार । बैसाख कृष्ण चौदासि मझारि । सिववधू वरी सु अघाति जारि ॥mattee नव चतुरनिकायक देव आय । बसु भेष पूजि बहु पुनि उपाय । करि उत्मय मंगल मोच्छ ठान । निज थान गये करिके कल्यान । जय महा अमल गुण सहित धार । जे लोक बोषदर्पण मझार ॥ दर्मन मब जुगपत लखत भूप । वल अनंत काल ध्रुव एकरूप ॥१६॥ मुहमंत देस सूच्छग अपार । गुण अगुरलघू दल को न भार ॥ तन चर्म कछु अवगाह हीन । नहि आपय अव्यावाध चीन ॥ १७ ॥ गुण अष्ट इह निह अनंत । को पनि सके भुरिमादि संत ॥ विनवू श्रीनामिनाथ देव । मुश देहु मदा तुम चरण सेव ॥ १८ ॥ हां कृपानाथ जगपति जगीस । तुम तारन तरन निहारि ईस । में मरनि गही मुझ तारि नाथ । "चंद राम" नमें धरि सीस हाथ॥१९॥ पता। १८ एह नगि गुणमाला, परमरसाला, मन वच तन कंठे धरई ।
१८८ 1., हुय सिद्ध निरंजन, भव दुख भंजन, अगणित सुख सिव मंग करई ॥ ओं श्रीन मिनाथजिनद्राय पूर्णा निर्वपामीति स्वास ॥ इति श्रीनामिनायाजिनमा समाया ॥२१॥ अथश्रीनेमिनाथाजनपूजा। अडिल। पणे जंतु रख करचो नेमि सुनि गिरि गये, वाज रजमति भव अनिति पेखि मुनिवर भये । ध्यान खडग गहि हने कर्म सिव तिय वरी, आहानन विधि करूं मणमि गुण हिय धरी ॥१॥ ओं ही धीन मिनायजिनेंद्र ! अनावर अवतर । संवौषट् । ओं ह्रीं श्रीनेमिनाथ जिनेंद्र अम विष्ठ तिष्ठ 18.30 Ma THAनिहितो अव म प । १८८ . v द विभी। निमंट ल्याय महातीधादक, कनक रतनमय भरि झारी । मनवमन सुध करि जिनपद पूजे, नसे जन्म मृति दुखकारी ॥ श्रीममि जिनेश्वरक पद पंद, रजमति सी नताछिन छारी। पसुगनिका ख मुनिक करुणा धरि, जाय चढे प्रभु गिरनारी ॥१॥ मानमिनायमिनाय मन्ममृत्यूनागनाय न निवामीनि साहा । है तुम मु.पु.म स्पाय अगर मिला, चंदनने घनसार घमें । मामु पगि समीर चलें अति नतिल, महा दाह ततकार नसे श्रीनेमि० anti श्रीनमिनाजिनद्रामापविगतमा दनं निशमीतिमारा। मुभ मालि अनि मारभि मंटिन, ममि मम उजल अनियारे । भूपन गोमर मुनामी दुति, पुंज करें भवि मनहार ।। श्रीनेमि० ॥ जीराधानमिनापानाप अक्षयपरमामय मधमान् निपामानि स्वाहा। फुसुम मनोहर माणन के दर, पंचवरन अति मुग्यकारी।
पू. सुर तरुके पावन चखि ललचावन, अति मृदुते भवि भरि थारी श्रीनमि ओं ही अनेमिनायजिनद्रेय कायवाणविध्वंसनाय पुरष निर्वामीति स्वाहा । अति मिष्ट मनोहर घेवर फैनी, मोदक गूझा भरि थारी। रसना के रंजन रसके पूरे, छुधा निवारन वलकारी ॥ श्रीनेमि०॥ ओं ही श्रीनेमिनायजिनेंदाय सुधारोगविनाशनाय नैवेद्यं निशमीति स्वाहा । दीप स्तनमय जोति मनोहर, कनक रकावीमें धारें। तम मोहनसे जिम पवनथकी घन, स्वपर लखे गुण विस्तारैश्रीनेमि० भों ही श्री मिनायजिनेन्द्राय मोशिकारविनागनाय दीप निपामीति स्वाहा । सुभ धूप दसांग हुतासनके संग, लै धूपायण मांहि भरें। तसु सौरभ मधु गुंजत आवे, अष्टकर्म ततकाल जरें। श्रीनेमिः। भों ही धीनेमिनायजिनेंद्राप भाटकर्मदहनाय धूपं निपामीति साहा ।। पूगी दाख बदाम छुहारा, एला श्रीफल जुत ल्यावें ।
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HISTERROR
पू.
१६४
जग दोष निराकन धर्म घोख । भवतारक संभव करन मोख ।
जय मोहन मूरति मिष्ट पाल । पितु मात पद्म रवि प्रातकाल॥५॥
बहु नृत्य ठानि पितु मातु देय । जय वृद्ध भये गिन राज हेय ।
मिन श्रावण पष्ठी जंतु पेखि । भयभीत भये भवतें विसखि ॥६॥
तप धारि तज्यो परिगह पिसाच । नुनि सिद्धोंको करित्याग वाच ।
गहि ध्यान खडग वउघाति मार। लहि केवल मिवप्रतिपद कुआर।७॥
धन देव रच्यो समवादिमार। जिन अंतरीक करिके विहार ।
वन ग्राम नगर पुर सर्वदेस । कहि धर्म भव्य तारे महेस ॥८॥
भवकूप इहै अघको भँडार । तिसमें दुख है सुख ना लगार।
तुम तारण विग्द निहारि देव । में सरन गदी मुझितारिदेव ॥९॥
दिन सप्तमि सित आषाढ मोखि। जिन प्रकृति पिचासी सेप सोखि।
गिरनारि सिखर निर्वाण थान । चंदराम नमै निति धारिध्यान ॥१०॥
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मम मोह निविड विध्वंस कारण, लेय जिनगृह आयडी॥ श्रीपार्श्व०
भों ही भीपार्श्वनाथ जिनेंद्राय मोहांधकारविनाशनाय दीपं निर्वपामीति स्वाहा ।
श्रीखंड अगर दसांग धूप, सु कनक धूपायनि भरें।
आमोदतें अलिबुंद आवें, गूंजते मनकू हरें।
वसु कर्म दुष्ट विध्वंम कारण, अग्निसंग जराय ही॥ श्रीप वि० ॥
ओं ही श्रीपार्श्वनाथ जिनेंद्रीय अष्टकर्मदहनाप धूपं निर्वपापीति स्वाहा ।
अनि मिष्ट पक मनोग्य पावन, चक्खि प्राणन• हरे।
अलि गुंज करत सुगंध सेती, सुधाकी सरभरि करें।
सो फल मनोहर अमरतरुके, स्वर्णथाल भराय ही॥ श्रीपार्श्व०॥
ओं ही श्रीगर्वनाथ जिनेंद्राय मोक्षफलप्राप्तये फलं निर्वामीति साहा।
सलिल सुच्छ सु अगर चंदन अछित उज्जल ल्यायही ।
वर कुसुम चरुतें छुघा नासे, दीप वांत नसायही॥
करि अर्घ धूप मनोग्य फल लै," राम' सिव सुख दायही। .
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श्रीपायनाय जिनंद्र पूजें, निद हरप उपाय ही ॥ ५ ॥ श्री श्रीपाविधिनियमापनि स्वाहा। अधपंचधम्याणक । । माणन स्वर्ग की चय, यामा उर अवतार । दोज अमित ययासही, लयो जजूं पद सार ॥१॥ मोनावमापाप्मनायाया मगायधीपार्थ नागजिनमा निः। पौर शाम एकादमी, तीन बान जुन देव । जन रिमुर गिरि जज, में जज९ कारि सेव ॥ २ ॥ श्रीवामनगरमागधीपायनाजिनद्राय अनि ॥ दुदर तप सुकुमार चप, फाशी देस विधाय। पार यरन एकादसी, घरची जनुं गुण गाय ॥ ३ ॥ सिपोरा गरमायापानापभिनद्राप म नियामीतिः ।
पू. कृस्न चौथि सुभ चेतकी, हने घाति लहि ज्ञान । कह्यो धर्म दुविधा मुदा, जजूं चोध भगवान ॥४॥ ओं ही चैत्रकृष्णचतुर्यो शानमंगळमंडिनाय श्रीपार्श्वनायजिनेंदाय अर्घ नि०॥ सममि श्रावण सुकल ही, सेप कर्म हनि वीर। अविचल सिवथानक लयो, जजू चरण घर घीर ॥५॥ ओ ही श्रावण शुक्लसप्तम्पा मोक्षमंगलमंडिताय श्रीपार्श्वनायजिनेन्द्राय अब नि० । अथ जयमाला। दोहा । पार्श्वनाथ जिनके नमू, चरण कमल जुगसार। प्रचुर भवार्णव तुम हस्यो, मुझ तारौ भव तार ॥१॥ चाल-ते साधु मेरे र सो मेरी हरहु पातक पीर । श्री पार्सनाथ जिनेंद्र, बंदू, सुद मन वच काय। धनि पिता आसासेनजी पनि धन्य वामा माय ॥ SECRUSCALCRICKecter SPORTS पनि जनम काशी देसमें मानारसी सुभ ग्राम । प्रभु पास घो मुझ दासको सुनि अरज अविचल ठाम ॥१॥ अतिशय मनोहर मजल जलद समान सुंदर काय । भुख देखिकललवाय लोचन नेक नृपति न थाय ।। पदकमलनखदुतिकवल चपला मोटिरपि छवि खाम । प्रभुपास० ॥२॥ अधोमुख पंचाग्नि तपती य मटको चर फूर । सिन अगनि जरते नाग घाँध देय व वृष पूर ।। वेभ द पर पदमा भवनाधिकारिधि धाग ।। प्रभुपास ॥३॥ हम उरग मरत निहारिक सय अथिर सरन न जाय । संमार योभम जाल जिम चपल चपला होय ॥ एयः पतन सामतो मित्र लहूं तजि धाम । प्रभुपास ॥ ४ ॥ हम चितवता लोकांत सुर आय पूजे पाय। २०१ परणाम करि संबोधि चाले चितवते गुण ध्याय ॥ धनि धन्य वय सुकुमारमें तप धरयो अतिबल धाम ! प्रभुपास०॥५॥ चंद समे जिन धरी दिव्या विहरि अहिछिति जाय । तित ठये वनमें दुष्ट वो सुर कमठको चर आय ॥ मतिरूप भीपण घारिक फुकार पन्नग स्याम । प्रभु पासः॥६॥ है तुंग वारण सिंघ गरज्यो उपलरज वरसाय । करि अगनि बरपा मेघ मूमल तडित परलय वाय ॥ प्रभु धीर वीर अत्यंत निरभय असुरको बल खाम । प्रभु पास०॥७॥ बाही समै धरणेद्रको नय मुकुट कंप्यो पीठ । हरि आय सिंधान रच्यो फणमंड कीनों ईठ॥ तव असुरकरनी भई निरफल अचल जिन जिम धाम ।। प्रभु पास ८ धरि ध्यान जोग निरोपिके चउघाति कर्म उपारि। CAREECE पू० लदिवान केवल चराचर लोक सकल निहारि॥ समयादि भूनि कुवर कीनी कई किम युधि खाम । प्रभु पास०॥९॥ परिकरी नुति कर जोरि विनती धन्य दिन इह वार । पनि घही या प्रभु पासजी हम लो भयकी पार ॥ पनि धन्य पानी सुनी में अपनासनी पुनि धाम ॥ प्रभु पास० ॥१०॥ घसु फर्म नासि विनासि वपु मियनयरि पाई वीर। पसु प यह धान पूजे टरे सवही पीर ।। सो अचल दे समेदपं गम भाव वसु जाम । प्रभुपास ॥ ११ ॥ फार जोरिगः" चराग, भापं अहो धनि तुम देव । भवि वोषिक भवसिंधुतारे तरन तारन टेव ॥ गनमतमो तारि अपदी ढील क्यों तुम काम । प्रभु पास० ॥१२॥ निति पढे जे नरनारि सपदी हर तिनकी पीर ।
पू. सुर लोक लहि नर होय चक्री काम हलधर वीर ॥ १.०६ फनि सर्व कर्म जु घाति के लहि गोख सवसुखधाम । प्रभु पास घौ मुझ दास की सुनि अरज अविचल ठाम॥१३॥ ओराधीपालनाधजिनेंद्राय पूर्थि निपामीनि स्वाहा ।। इति श्रीपासनाभजिनपूजा समाr || २३ ।। अथश्रीमहावीरजिनपूजा। +CEREDGE प्रडिल। योष सुद परकासक इक प्रभु भान ही । लोक अलोक-मझारि और नहीं आन ही ।। प्रणम् श्रीवर्द्धमान वीरके पाय ही। आद्वानन विधि करूं विमलगुण पाय ही ॥१॥ भो । भीमापारविनंद्र ! अपना अवतर। सौषट् । २.४ 件 परि पज करन गये पदके, उभाग लेयही। प्रोवीर ॥३॥ * मन्दिाय अक्षपदमाप्तये प्रधान निर्मपामीति स्वाहा। मंदार मेरु सुपारि नरके. सुनन गंधासक्त ही। मधुवृद आ भनिनक, चसिलसं होय पवित ही। मो ममरवाण विधम कारन, कुसुम उत्कर लेय ही। श्रीवीर०॥ काही महावीर जिनंद्रा कारागविपसनाय पुष्प निमामीति स्वाहा । पदमा-निवाम मरोज आश्रित, मुधाकी आमोदस्यों। चिन मुधा भ नको नृपनि ह वै मधुकर मोदस्यों । मोहीया विधमन, चारु चरु कर लेयही ॥ श्रीवीर०॥५॥ ..' ! ५ बजिनेद्वाय सुधारोगविनाशनाप नै निपामीति स्वारा। त्रैलपपमादि जिनेंद्र महिमा, नेजते दरसाय दी। पाप नम दिगदमो नियट सु, मूलतें नसि जाय ही। -
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मोदी गणियनेज भारका, कनक भाजन लेगही। श्रीवीर०॥
भो । श्रीमान मोहतका विनामनगदी निपामीति साहा।
मनाम नार, मादिगांव।
दिगारमिनो छिपा, नीलांग आय हो ।
मोगरायपरिमार रंजन, मुनिको अनि प्रेयसी । श्रीवीर०॥
जो धीमान, मंदाना नीति सारा ।
मम . याकर , सीम मागू दरें।
आगार पायन पुंज पाई, गनांवामित पाल करें ।।
भरि पाल पाणमय अगर नरक, लख चावि प्रपदी । श्रीधीर०॥
It मजाय माफमा पर निगमीति यात।
नीर गंध यादि द्रव्यल, कमलपद सनमति तने।
जोजोपाय यदि मनध, ठानि उत्तमय अति घने ।
सुर रोय पीयाम दलपर, तीर्थ पदयो श्रेयही ।
सुख "रामचंद' लहंत सिवके, अर्घ करि प्रभु ध्येयही ॥९॥ ओ हो धीमहावीर जिनेंद्राय अनादमामये भ निपामीति स्वाहा । अथ पंचकल्याणका दोहा । पष्ठी सुकल अपाढही, पुष्पोचरतें देव । चय त्रिमला उर अवतरे, जजू भक्ति धरि एवं ॥१॥ ओली पपाःशुगरपष्टयां गर्भमंगलमंडिताय श्रीमावीरजिनेंद्राय अर्थ नि० ॥ चैत्र सुकल तेरसि सुरां, कीनों जन्म कल्पान । छोर उदयित मेरुपै, मैं जज हूं धरि ध्यान ॥२॥ ओं ही घगुक्लबपोदश्यां जन्मंगलमंडिताय श्रीमहावीरजिनेंद्राय अपं नि०॥ अगहन दमपी कृस्नही, तप धारयो वन जाय। सुरनरपति पूजा करी, में जजहूं गुण गाय ॥३॥ भी मार्गरणसम्यांसपोगमंदिताय श्रीमहावीरजिनंदाय अय निर्वामीतिः। PEReciliticketer २.८
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जय कुंटलपुर जिन जन्मधान । हरिवंस व्योममधि सुप्ठु भान ।। जय कनक वरन करसप्तकाय । हरि विष्ट पहचर वरस आय ॥३॥ जप इंद्र व हो अति वीर सूर । सुनि देव चल्यो है सर्प ऋर ॥ पुंकार बाल विकराल देख । कीडत कुमार भाजे विशेख ॥४॥ प्रभु पीर महा पंनग अज्ञान । करि कीड़ हरयो मदको वितान । है गट देव नय पूजि पाय । परसंसि को महावीर राय ॥५॥ लपि पूरव भव अनुप्रेक्ष चिंता भयभीत भये भवतें अत्यंत ।। लोकांन आय धुति पूजि पाय । निज धान गये सुर असुर आय ॥५॥ रवि मिश्रका करि उत्सव अपार । वन जाय घरे प्रभु तजि सिंगार ॥ नुनि सिद्ध लोच कच नगन थाय । परि पष्टम लय चिद्रूप लाय । तप दादस द्वादस पठानि । चउघाति हुने गहि खडग ध्यान ॥ जपत पएपलब्ध देव । वमु भातिहार्प अतिरी सुमेव ॥८॥ MARACANCIES २९.
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'५ २१२ धर्म अर्थ लहि कामदेव नरपति पदपावें। वृषभ आदि जिन जजै अर्घकार जे नरध्यावे ॥१॥ ओं में श्रीपमादिवीरान्तेभ्यों पूर्णा निशामीति स्वाहा । मिल। वृषभ आदि चवीस जिनेस्वर ध्यावही । अर्घ करें गुण गायर तूर बजावही ।। ते पावें सिव सम भक्ति सुरपति करें। "रामचंद, सक नाहि कीर्चि जग विस्तरें ॥२॥ इत्याशीर्वादः। aroo Octor इति श्रीचतुर्भिगतिजिनपूना समाता।
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