Allahabad University

Shishupal Badh Mahakavaya

Dr Adaya Prasad Mishra · 25.06.06

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माघ-प्रणीत
शिशु पाल वध महाकाव्य
प्रथम सर्ग
[हिन्दी अनुवाद एव व्याख्यादि के साथ ]
व्याख्याता
डा० आद्या प्रसाद मिश्र,
अध्यक्ष सं० वि० प्रयाग विश्वविद्यालय
डा० चन्डिका प्रसाद शुक्ल,
रीडर, प्रयाग विश्ववि
द्वितीय सस्करण, १९६६
मह संस्कृत साहित्य भण्डार
६२६५ युनिवर्सिटी रोड,
इलाहाबाद-२

प्रकाशक:
भट्ट संस्कृत साहित्य भण्डार
६२६, युनिवर्सिटी रोड,
इलाहाबाद-२
सर्वाधिकार लेखकाधीन
जय भारत प्रिन्टिग प्रेस
युनिवर्सिटी रोड,
इलाहाबाद-२

F Pusta अंग्रेजी मे कुछ - नम्र निवेदन वैसे तो शिशुपालवध के कई अनुवाद निकल चुके हैं। उनमै तथा कुछ हिन्दी मे भी है । अंग्रेजी के अनुवाद मल्लिनाथ की सस्कृत टीका के साथ व्याकरणात्मक टिप्पणियो के होने से अधिक उपादेय है पर अब विश्व- विद्यालयो की बी० ए० परीक्षाओ मे हिन्दी माध्यम ही से उनमे बैठने वाले छात्रो के लिए उनकी उतनी उपादेयता नही रह गई है । इसके अतिरिक्त माघ का यह काव्य शास्त्री आदि परीक्षामो के पाठ्य क्रम मे भी निर्धारित है । अत. विशेष रूप से उनके लिए हिन्दी मे ऐसा अनुवाद होना चाहिए जिसमे अनुवाद के साथ व्याकरण, कोष, अलकार आदि के सम्बन्ध मे भी टिप्पणियाँ दी गई हो। इसी दृष्टि को लेकर इस काव्य का प्रथम सर्ग छात्रो के सम्मुख प्रस्तत किया जा रहा है। द्वितीय मर्ग भी शीघ्र ही निकल रहा है । आशा है, यह पुस्तक विद्यार्थियो के लिये उपयोगी सिद्ध होगी। द्वितीय संस्करण के सम्बन्ध मे निवेदन प्रस्तुत ग्रन्थ का प्रथम सस्करण आज से पन्द्रह वर्ष पूर्व वि० स० २०११ प्रकाशित हा था और प्रकाशित होने के तीन ही साल के अन्तर्गत समाप्त भी हो गया था। परन्तु व्यक्तिगत व्यस्तताओ एव कठिनाइयो के कारण इसके लेखक द्वितीय सस्करण प्रकाशित न करा सके । इसके टकसाली हिन्दी अनुवाद एव सुन्दर टिप्पणी आदि के कारण इसकी मॉग पाठको की ओर से सदैव होती रही। उनके अनुरोध से ही यह द्वितीय सस्करण पूरे पन्द्रह साल बाद निकल रहा है । पूर्व सस्करण की छापे की अशुद्धियो को प्रायेण परिहार हो गया है । यत्र-तत्र कुछ और भी सशोधन कर दिए गए है। हमे विश्वास है कि पूर्ववत् ही गुणग्राही पाटको द्वारा गृहीत होकर यह पुस्तक उनका अमित कल्याण करेगी। नागपचमी, २०२६ विक्रमाब्द प्रयाग आद्याप्रसाद मिश्र माघ और उनका काव्य नवम शताब्दी के बाद सस्कृत कवियो पर कालिदास के अतिरिक्त जिनका सबसे अधिक प्रभाव दिखाई पड़ता है, वे है शिशुपालवध के रचयिता अमर महाकवि माघ । और दशम शताब्दी के बाद की सस्कृत काव्य-रचना को देखने से तो कभी २ ऐसा प्रतीत होता है कि जैसे उस समय के कवियो के आदर्श कालिदास की अपेक्षा माघ ही अधिक रहे हो (कुछ-कुछ भट्टि की शैली का भी अनुकरण दीख पडता है) क्योकि उस समय तक काव्य मे पाण्डित्य-प्रदर्शन की भावना अधिक प्रबल हो चुकी थी, जिसके लिए कालिदास मार्गदर्शक नही बन सकते थे । यद्यपि सर्वप्रथम भारवि ने पाण्डित्य-प्रदर्शन की शैली को अपने काव्य मे जन्म दिया किन्तु अपने प्रबल स्पर्द्धालु [श्रद्धालु ? ] माघ की प्रतिभा से वे इतने आच्छन्न हो चुके थे कि शिशुपालवध के सम्मुख किरातार्जुनीय एक सरल काव्य बन गया था। - यद्यपि महाकवि माघ भी अपने जीवन-काल आदि के विषय मे कालिदास आदि अन्य संस्कृत कवियो की ही भाति मौन है, परन्तु सौभाग्यवश इन्होने अपने काव्य 'शिशुपालवध' के अन्त में अपने पिता, पितामह आदि का तो नामोल्लेख कर ही दिया है । इन्होने अपने १-"तावद् भा भारवे ति यावन्माघस्य नोदयः॥" २-"मावेन विधिनतोत्साहा नोत्सहन्ते पदक्रमे । स्मरन्तो भारवेरेव कवयः कपयो यथा ॥ "कृत्स्नप्रबोधकृद्वाणी भारवेरिव भारवेः । माघेनेव च मान कम्पः कस्य न जायते ॥" ३-द्रष्टव्य शिशुपालवध के अन्तिम पॉच श्लोक ।

( १३१ ) स्मरत्यदो दाशरथिर्भवन्भवानम वनान्ताद्वनितापहारिणम् । पोधिमाबद्धचलज्जलाविलं विलय लङ्का निकषा हनिष्यति ।। अन्वय-भवान् दाशरथिः भवन् वनान्तात् वनितापहारिणम् अमुम आबद्धचलज्जलाविल पयोधि विलय लङ्क निकषा हनिष्यति । प्रदः स्मरति ? अर्थ-आपने दशरथपुत्र राम बनकर दण्डकारण्य से सीता जी को चुराने वाले उसे, बांधे जाने के कारण चञ्चल अत एव गन्दे समुद्र को पार कर, लङ्का के समीप मारा था-स्मरण है न ? स्मरतीति ॥ भातीति भवान् । भातेर्डवतुः। दशरथस्थापत्य पुमान्दा- शरथिः । 'प्रत इन' इतीज प्रत्ययः । भवन् । रामः सन्नित्यर्थः भवतेलंटः पत्रा- देशः । वनान्ताद्दण्डकारण्याद्वनितापहारिण सीतापहर्तारममु रावणम् । प्राबद्धः प्रक्षिप्तादिभिर्वद्धसेतुः प्रतएव चलन्ति जलानि यस्य स च । अत एव प्राविलश्च प्राबद्धच लज्जलाविल पयोधि विलवर लङ्का निकषा लङ्कासमीपे । 'समयानि- कषाशब्दौ सामीप्ये त्वव्यये मतौ' इति हलायुधः । 'अभितः परितः समयानिकषाहा- प्रतियोगेऽपि' इति द्वितीया । हनिष्यति अवधीत् । अभिज्ञावचने लुट् इति भूते लुट् । अदो हनन भवान्स्मरतीति काकुः । प्रत्यभिजानासि किमित्यर्थः । शेषे- प्रथमः॥ व्याकरण-दाशरथिः--दशरथस्य अपत्य पुमान् इति दाशरथिः (दशरथ +इ)॥ वनितापहारिणम् - वनितामअपहृतवान् इति वनितापहारी (वनिता +अप+ह+णिनिःकर्तरि), । तम् ॥ पाबद्ध-चलज्जलाविलम्-चलन्ति जलानि यस्य स चलज्जलः (ब० बी०)। आबद्धश्च चलज्जलक्च प्रा-ल: ( कर्मधा०)। तादृशश्च प्राविलश्चेति प्राबद्ध-लः (कर्मधा०), तम्॥

( १३२ ) लङ्काम्-निकषा ( समीपार्थ अव्यय) के योग मे लङ्काम मे द्वितीय प्रयुक्त हुई है। हनिष्यति-हन् + लृट् तिप् ( यहां 'मभिज्ञावचने लुट् ३।२।११२" अर्थात् जहा अतीत की स्मृति दिलाने वाला शब्द प्रयुक्त होता है, वहा भूतार्थ मे ही लुट् लकार का प्रयोग किया जाता है.---' इस नियम से लृट् लकार का प्रयोग किया गया है। कोष-वनिता= "वनिता जनितात्यर्थनुरागाया च योषिति" आविल = कलुषोउनच्छ प्राविल:-अमर । भावाथ-तदा दशरथपुत्रत्वेनावतीर्णो भवान् वनमध्यात् दाराप-हारिणम एन पयोधौ सेतु निर्माय्य तमुल्लड्ध्य लङ्काञ्चाक्रम्य युद्धे हतवान् इति कि स्मरति ? अथोपपत्ति छलनापरोऽपरामवाप्य शैलूष इवैष भूमिकाम् । तिरोहितात्मा शिशुपालसंज्ञया प्रतीयते सप्रति सोऽप्यस परैः॥६६॥ अन्वय-अथ सप्रति छलनापरः एषः शैलूषः भूमिकाम् इव अपराम् उपपत्तिम् अवाप्य शिशुपालसज्ञया तिरोहितात्मा सोऽपि परैः असः प्रतीयते । अश्व--इसके अनन्तर अब दूसरो को छलने मे तत्पर यह रावण अन्य रूप धारण करने वाले नट की भांति दूसरा जन्म धारण करने एवं शिशुपाल नाम द्वारा पूर्वस्वरूप के छिप जाने से वही होने पर भी दूसरों को उससे भिन्न प्रतीत होता है। अथेति ॥ अथ राक्षसदेहत्यागानन्तरं संप्रति छलनापरः परप्रतारणापरः एष रावणः शैलूषो नटः। तस्य भूमिका रूपान्तरमिव । “श लूषो नटभिल्लयोः' 'भूमिका रचनायां स्यान्मूर्त्यन्तरपरिग्रहे इति विश्वः । अपरामुपपत्तिम् । जन्मान्तर- मित्यर्थः । अवाप्य शिशुपालसज्ञया तिरोहितात्मा। तिरोहितस्वरूपः सन् सोऽ ( १३३ ) पि रावण एव सन्नपि परैरितरैः स न भवतीत्यसः तस्मादन्य एव । 'नन ' इति नन समासः। अत एव एतत्तदोः सुलोपो-' इत्यादिना न सुलोपः । प्रतीयते ज्ञायत इति प्रतिपूर्वांदिणः कर्मणि लट् । यथैक एव शैलूषो रूपान्तरमास्थाय तद्दे- शभाषादिभिरन्य एव प्रतीयते तद्वदयमपि मानुषदेहपरिग्रहादन्य इव भाति । दौजन्य तु तदेवेत्यवश्य साहर्य इति भावः व्याकरण-उपपत्तिम् -उप+पद् +क्तिन् भावे स्त्रियाम्, ताम् ।। छलनापरः-छलना पर प्रधान यस्य सः छलनापरः ( ब०वी० ) अवाप्य- पव+आप् + ल्यप् ॥ तिरोहितात्मा-तिरोहितः आत्मा यस्य स तिरोहितात्मा (ब० बी० )॥ शिशुपालसंज्ञया - शिशुपाल इति सज्ञा शि-ज्ञा (कर्मधा०). तथा ॥ प्रतीयते-प्रति+इ+लट् त कर्मरिण ।। असः-न सः असः ( नन में तत्पु०) नत्र समास होने के कारण ही यहाँ तद् (सः) का विसर्ग (मागे हल वर्ण के रहते हुए भी ) बुप्त · नही हुआ-"एतत्तदोः सुलोपोऽकोरनन - समासेहलि ६।१।१३२॥ भावार्थ-यथा नटः रूपान्तरमाधाय अन्य इव प्रतीयते तथैव स रावरण एव साम्प्रत शिशुपाल इति मनुष्यविग्रहमाधाय अन्य इव भासते ॥ अथैतद्दौर्जन्य त्रिभिराविष्करोति- स बाल आसीद्वपुषा चतुर्भुजो मुखेन पूर्णेन्दुनिभस्त्रिलोचनः । युवा कराक्रान्त महीभुदुच्चकैरसशय सप्रति तेजसा रविः ॥७॥ अन्वय–स बालः ( सन् ) वपुषा चतुर्भुजः, मुखेन पूर्णेन्दुनिभः त्रिलोचनः प्रासीत् । सम्प्रति युवा (सन्) कराक्रान्तमहीभृत् उच्चकैः तेजसा असशयं रविः (अस्ति)। + ( १३४ ) अर्थ-यह शिशुपाल बालक रहने पर शरीर से चार भुजामो वाला, मुख से पूर्ण चन्द्रमा के समान एव तीन नेत्रो वाला था । इस समय जवान होने पर यह ( बलवान् ) करों से राजाओ को आक्रान्त कर अपने महान वेज से निस्सन्देह स्वकिरणों से पर्वतों को प्राकान्त करने वाला सूर्यं ही है। टिप्पणी-चतुर्भुज और त्रिलोचन पदो से यह भी अर्थ ध्वनित होता है कि वह विष्णु और शिव के समान दुर्घष एव अजेय है । स बाल इति-स शिशुपालो बालः सन् वपुषा चतुर्भुजो भुजचतुष्टयवाना- सीत् । विष्णुरिति ध्वनिः मुखेन पूर्णेन्दुनिभस्तत्तुल्यः त्रिलोचनो लोचनत्रयवाना- सीत् । त्रयम्बक इति ध्वनिः । बालविशेषणात्संप्रति तत्सर्वमन्तहिनमिति भावः । संप्रति तु युवा सन्करेस बलिना आकान्तमहीभदधिष्ठितराजकः सन् । अन्यत्रा- शुब्याप्तशेनः । बतिहस्ताशवः करा' इत्यमरः । उच्चकैस्तेजसा रविरसंशयम् । सशयो नास्तीत्यर्थः । अर्थाभावेऽव्ययीभावः । वपुषा मुखेन चेति । 'येनाङ्गविकारः इति तृतीया । हानिवदाधिक्यस्यापि विकारत्वात् । तथा च वामनः-'हानिवदा- धिक्यमप्यङ्गविकारः' इति । तेजसेति 'प्रकृत्यादिभ्य उपसंख्यानम्' इति तृतीया । कराकान्तेत्यादिना श्लेषानुप्राणितेयमुत्प्रेक्षा । रविरसशयमिति तस्य पूर्णेन्दुनिभ इत्युपमया संसृष्टिः । हरिहरादितुल्य-महिमत्वादतिदुर्धर्षः स इति भावः ।। व्याकरण- वपुषा–यहाँ येनाङ्गविकारः से तृतीया विभक्ति हुई है । इसी प्रकार मुखेन मे भी समझना चाहिए । यहाँ अंग-विकार अगहीनता के कारण नहीं अपितु अंगाधिक्य के कारण है । पुणेन्दुनिभः-पूर्णः इन्दुः पूर्णेन्दुः (कर्मधा० ), तेन तुल्यः पूणेन्दु-निभः ( नित्य समास ) ॥ कराक्रान्तमहीभृत्- करेण आक्रान्ताः कराक्रान्ताः (तृ० तत्पु०), कराक्रान्ता महीभूतः (राजनजाः,) ( १३५ ) पर्वता वा) येन सः करा-भृत् (ब० वी ) ॥ तेजसा- यहाँ 'प्रकृत्यादिभ्य उपसङ्ख,यानम्' नियम से तृतीया हुई है ।। अलङ्कार-यहाँ 'कर' तथा महीभृतू' मे आए हुए श्लेष से अनुप्रारिणत 'यह निश्चय ( असशयम् ) रवि हो है' इस प्रकार का उत्प्रेक्षामलङ्कार है। फिर इस उत्प्रेक्षा अल कार को 'पूर्णेन्दुनिभः' में प्रयुक्त उपमा के साथ 'संसृष्टि' भी है। भावार्थ-असौ शिशुपालः बाल्ये. त्रिभिलॊचनः चतुर्भिभुलेश्च युक्तः पूर्णचन्द्रसदृशाननः आसीत् सम्प्रति यौवने च धाम्ना साक्षात् रविरिव प्रतोयने ।। स्वयं विधाता सुरदैत्यरक्षसामनुग्रहावग्रहयोर्यदृच्छया दशाननादीनभिराद्धदेवतावितीर्णवीर्यातिशयान्हसत्यसौ १७६॥ श्रश्वय--पदृच्छया स्वयं सुरदैत्यरक्षसाम् अनुग्रहावग्रहयोः विधाता असो अभिराद्धदेवतावितीर्णवीर्यातिशयान् दशाननादीन् हसति । अर्थ-स्वेच्छा से देवताओं, दैत्यों और राक्षसो पर स्वयं ही अनुग्रह (प्रसाद) एवं निग्रह ( दण्ड ) करने वाला यह शिशुपाल आराधित (शिवादि) देवो के द्वारा दिए गए महान् पराक्रम वाले रावरण आदि का परिहास करता है। टिप्पणी--शिशुपाल रावरस आदि अन्य ऐश्वर्यशाली राक्षसो का इसलिए परिहास करता है कि देवो और दानवों पर होने वाला उनका प्रभुत्व शिव आदि देवों से ही (तपस्या करने पर) प्राक्ष हुआ था परन्तु उसका प्रभुत्व अपने ही सामर्थ्य के कारण था। स्वयमिति ॥ यदृच्छया स्वय मामयन । न तु देवताप्रसादबलादिति भावः । सुरदैत्यरक्षसा देवदानक्यातुधानानामनुग्रहावग्रहयो प्रसादनिग्रहयोर्विधाता ( १३६ ) कर्ता असौ शिशुपालः अभिराद्धाभिराराधिताभिर्देवताभिरीश्वरादिभिर्वि गों दत्तो वीर्यातिशय प्रभावातिशयो येषा तान्दशाननादीन्हसति । अनन्यप्रसादल- धैश्वर्यं मयि कथं याचकैस्तुल्यतेति गर्वाद्धसतीत्यर्थ ॥ व्याकरण-सुरदैत्यरक्षसाम्-दितेः अपत्यानि पुमासः दैत्याः (दिति+ ण्य ) । सुराश्च दैत्याश्चरक्षांसि च सुरदैत्यरक्षांसि ( द्वन्द्व ), तेषाम् ।। अनुग्रहाव- ग्रहयो:-अनुग्रहश्च (अनु+ग्रह+अप् भावे ) अवग्रहश्चेति, अनु- हौ (द्वन्द्व) तयोः ।। अभिराद्ध देवतावितीवीर्यातिशयान्-अभिराद्धाः (अभि+राधु + क्त कर्मणि) देवताः, अ-ताः ( कर्मधा)। ताभिः वितीर्णः, अभि--र्णः (तृ. तत्पु०); अभिराद्धदेवतावितीर्णः वीर्यातिशयः येभ्यः ते अभि-याः (ब० वी), तान् ॥ भाव--सर्वथा स्वच्छन्दस्य देवदानवराक्षसानपि अभिभवितुः मे पुरतः अन्यप्रसादाल्लन्धेश्वर्याणाम् दशाननादीना पूर्वषा का गणनेति शिशुपालः सावहेल -तान् हसतीव ॥ बलावलेपादधुनापि पूर्ववत्प्रबाध्यते तेन जगजिगीषुणा सतीव योषित्प्रकृतिः सुनिश्चला पुमांसमध्यभ्येति भवान्तरेष्वपि ७२ अन्वय-जिगीषुणा तेन बलावलेपात् अधुनापि पूर्ववत् जगत् प्रबाध्यते । सती योषित् इव सुनिश्चला प्रकृतिः भवान्तरेष्वपि पुमासम् अभ्येति । अर्थ-विजयाभिलाषी यह शिशुपाल अपने पूर्व जन्मो की भांति इस जन्म में भी जगत् को सन्ताप दे रहा है। सती स्त्री की भांति मनुष्य की सुस्थिर प्रकृति दूसरे जन्मो में भी उसका अनुसरण करती है-उसे प्राप्त होती है । बलेति ॥ जिगीषणा । नित्योत्साहवतेत्यर्थः । तेन शिशुपालेन बलावले- पावलगर्वादधुनापि पूववत्पूर्वजन्मनीव जमत्प्रबाध्यते। तथा हिसती पतिव्रता ( १३७ ) योषिदिव सुनिश्चलातिस्थिरा प्रकृतिः स्वभावो भवान्तरेषु जन्मान्तरेष्वपि पुमांसमभ्येति । 'पति या नाभिचरति मनोवाक्कायसयता सा भतुलो कमाप्नोति सद्भिः साध्वीति चोच्यते ॥ इति मनुः । उपमोपमेयपुरस्कृतोऽर्थान्तरन्यासः ॥ व्याकरण-बलावलेपात्-बलस्य अवलेपः (अव+लिप्+धन) ब-~-प: (पं० तत्पु०) तस्मात् ॥ पूर्ववत्-यथा पूर्वयो : (हिरण्यकशिपुरावणजन्मनोः) इति पूर्ववत् (पूर्व-+वति ) ' यहा 'तत्रतस्येव' ५११११६ 'वहाँ की भांति' तथा 'उसकी भांति' इस अर्थ मे प्रातिपदिक (शब्द) से वति प्रत्यय हुआ । जिमीषुणा-- जेतुमिच्छुः जिगीषुः (जि+सन् +उ कर्तरि), तेन ॥ भवान्तरेषु-अन्ये भवाः भवान्तरारिण (मयूरव्यसकादि समास), तेषु ।। कोष-प्रकृति-'प्रकृतिमुणसाम्ये स्यादमात्यादिस्वभावयोः। योनौ लिङ्ग पौरवगे' इति मेदिनी ॥ भव-'जन्महरौ भवौ इत्यमरः । अलङ्कार-यहाँ पूर्व का उत्तर से समर्थन होने के कारण अर्थान्तरन्यास अलकार है और इसकी पुष्टि 'सतीव योषित्' मे प्रयुक्त उपमा द्वारा की गई है। भावार्थ:-यथा पूर्वयो. हिरण्यकशिपुरावणजन्मनोः जगत्पीडनम् अस्य स्वभाव आसीत् तथैव अस्मिन् शिशुपालजन्मन्यपि बलगर्वात् वर्तते । वस्तुतस्तु पतियता भाये व जनस्य प्रकृतिः जन्मान्तरेष्वपि तमनुयात्येव ।। तदेनमुल्लचितशासन विधेर्विधेहि कीनाशनिकेतनातिथिम् । शुभेतराचारविपक्त्रिमापदो निपातनीया हि सतामसाधवः ॥७३॥ अन्वय - ततः विधे. उल्लङ्घितशासनम् एनं कौनाशनिकेतनातिथि विधेहि शु मेतराचारविपक्त्रिमापद' असाधव सतां निपातनीया हि । .

( १३८ ) .. अर्थ-अतएव विधाता की (भी) अाज्ञा का उल्लंघन करने वाले इस शिश पाल को यमपुरी का अतिथि बनाइए क्योकि (अपने) दुराचारों के फलस्वरूप प्राप्त हुई आपदाओ वाले दुर्जनो का विनाश तो सज्जनों को करना ही चाहिए। तदेनमिति ॥ तत्तस्माद्विधेर्विधातुररप्युल्लङ्घितशासनम् । स्वयं विधातेत्याधु क्तरीत्यातिकान्तदेवशासनमित्यर्थः । सापेक्षत्वेऽपि ममकत्वात्समासः । एन शिशुपाल कीनाशनिकेनातिथि कीनाशो यमस्तस्य निकेतनं बृहं तत्रातिथि प्राधुणिक विधेहि कुरु । यमगृह प्रेषयेत्यर्थः । 'कीनाश. कर्षके क्षुद्रे कृतान्तो- पाया घातिनोः' इति विश्वः । न चैत्प्राधुरिणकहस्तेन सर्पमारम भवादृशामवश्य- कर्तव्यत्वादित्याह-श भेतराचारेण दुराचारेण विपवित्रमाः परिपाकेत निवृत्ता कानपरिपाकेन प्राप्ता आपदो येषां ते तघोक्ताः। डिवतः त्रिः' इति पचे पत्रेमम्नित्यम्' इति तद्धितो मम्प्रत्ययः । असाधवो दुष्टा. सर्ता भवादृशां जगन्नियन्तृणां निपातनीयाः वध्या हि न च नेधुण्यदोषः । स्वदोषेणेव तेषां विनाशे निमित्तमात्रत्वादस्माकमित्याशयेन शुभेतराचारेत्यादिविशेषणोक्तिः । सामान्येन विशेषसमर्थनरूपोऽर्थान्तरन्यासः॥ व्याकरण-उल्लवितशासनम्-उल्लङ्घितं ( उद्+बड+क्त करिण) शासनं येन स रल्ल-नः (ब० वी०), तम् ।। कीनाशनिकेतना- तिथिम - को (कुत्सितार्थे अव्ययम् ) नाशयति इति' कोनाशः यमः ( की+नश +णि+अच् )। तस्य निकेतनम् को-तनम् (प. तत्पु०)। तस्य अतिथिः कोना....."तिथि: (१० तत्पु०) तम् ॥ शुभेतराचारक्पिवित्र माप दः-शुभात् इतरः शुभेतर (सुपसुपा)। तादृश आचारः, शूभे" चार. ( कर्मधा० ), तेन विपक्त्रिमा (वि+प+वित्र भावे+मम् - विशेष ( १३६ ) - भार सर्वडूषा मे ) ॥ तादृश्यः आपदः येषा ते श मे म पदः (ब० बी० ) । सताम्-(अस +शतृ कर्तरि) सन्त., तेषाम् -यहाँ कृत्यानां कर्तरि वा २।२।७१ नियम से विकल्प से षष्ठी विभक्ति हुई है । )। कोष-कीनाश-कृतान्ते पुसि कीनाशः क्षुद्रकर्षकयोस्त्रिषुः इत्यमरः। अलङ्कार- यहाँ विशेष ( शिशुपालवध ) का समर्थन सामान्य ( सज्जन द्वारा असाधुवध होना चाहिए-इसके) द्वारा किया गया हैं अतः अर्थान्तरन्यास अलङ्कार है। भावार्थ -अतः अतिक्रान्तमर्याद दुष्टमेन शिशु पालं भवान् अवश्य निपात- यतु यतः दुराचारिणः सद्भिः सदा दण्डनीया एव । अर्थ-शत्रु हृदयमरिववादयादुदूढढिम धातु पुनः पुरंदरस्य घनपलकपुलोमजाकुचाग्र तपरिरम्भनिपीडनक्षमत्वम् ॥४॥ अन्वय-परिवधोदयात् उधम पुरन्दरस्य हृदय पुनः धनपुलकपुलो- मजाकुचाग्रदु तपरिरम्भनिपीडनक्षमत्वम् दधातु । के नाश से दृढीभूत इन्द्र का वक्षःस्थल फिर से अत्यन्त पुलकित इन्द्राणी के स्तनो के गाढालिङ्गन को पीडा को सहने योग्य बन जाय। हृदयमिति ॥ अरिवघोदयाद्रिपुनाशलाभात् । उदूढढिम नैश्चिन्त्या तदायम् । स्वस्थमितियावत् । पृथ्वादित्वादृढशब्दादिमनिष्प्रत्ययः 'र ऋतो हलादेलघोः' इति ऋकारस्य रेफादेशः। पुरः शत्रुपुराणि दारयतीति पुरंदर इन्द्रः। 'पू:सर्वयोर्दारिसहोः' इति खच्प्रययः 'खचिह्वस्वः' इत्युपधाहस्वः। 'वाचयमपुरंदरौ च' इति निपातनादनन्तत्व मुमामगम्श्च तस्य हृदयं पुनर्भूयोऽपि ।

१४० ) वध. - पूर्ववदेवेति भावः (घनपुलकयो सान्द्ररोमाञ्चयोः । पुलोम्नो जाता पुलोमजा शची तस्याः कुचाग्रयोp तपरिरम्भ औत्सुक्याच्छोघ्रालिङ्गनं तत्र यत्पीडनं तस्य क्षमत्वं सहत्व दधातु । प्राक्चित्तविक्षेपात्त्यक्तभोगेन शक्रेण सप्रतित्वत्प्रसादान्निष्कण्टकं स्वकीय राज्य भुज्यतामित्यर्थः । अत्र दाढयपदार्थस्योदूढद्रढिमेति विशेषणगत्या निपीडनक्षमत्वं प्रति हेतुत्योक्त या पदार्थहेतुक कायलिङ्गम् । हृदयनिपीडनक्ष- मत्वसंबन्धेऽप्यसबन्धोक्त यासबन्धेऽसबन्धरूपापितिशयोक्तिरित्यर्थालकारो वृत्त्यनु- प्रासश्च तैरन्योन्य ससृज्यते । पुष्पितागा वृत्तम् । 'अयुजिन्युगरेफतो यकारोयुजि च नजौ जरगाश्च पुष्पितागा' इति लक्षणात् ॥ व्याकरण-अरिवधो यात्-अरेः अरिवधः (ष० तत्पु०) स एव उदयः अरि 'धोदयः ( कर्मधा० ), तस्मात् ॥ उवढिम- उदूढः ( उद् + वह+क्त कर्मणि) द्रढिमा ( दृढ+ इनिच ) येन तत् उदुढिम (ब० वो) ॥ पुरन्दरस्य-पुरः शत्रुपुराणि दारयति इति पुरन्दरः (पुर्++णि+खच् -विशेष सर्वदूषा मे ।) (उपपद तत्पु०) । घनपुल कपुलामजाकुत्राग्रदूतपरिरम्भनिपीडनक्षमत्वम्-धनः पुलकः यथोस्तो धनपुलको (ब० वी० ), पुलोमजायाः कुचाम्रौ पुलोमजाकुचाग्री घनपुलकौ च तौ पुलोमजाकुचाग्रौ घन "चागौ ( कर्मधा०) तं परिरम्भ ( सुप सुपा)। धन 'अयोः द्रु तपरिरम्भः, इति घने घने 'रम्भः (१० तत्पु.) तत्र यत् निपीडनम् धन-पीडनम् (सुपसुपा), तस्य क्षमत्वम् धन "त्वम् (१० तत्पु० ) ॥ कोष-घन-घनो मेघे मूर्तिगुणे त्रिषु मूते निरन्तरे - अमरः परिरम्भ-परिरम्भः परिष्वङ्ग. सश्लेषउपगृहनम-अमरः अलङ्कार-यहाँ हृदय का 'उढद्रढिम' विशेषण उसके निपीडनक्षम ५ ( १४१ ) होने का हेतु है, अतः पदार्थहेतुक काव्यलिङ्ग अलङ्कार है । फिर हृदय मे निपीडनक्षमता रहने पर भी उसका न होना माना गया है, अतः सम्बन्ध मे असम्बन्ध रूप अतिशयोक्ति अर्थालङ्कार है । और द, ढ, प आदि का वृत्यनुप्राम शब्दालङ्कार भी है । इस प्रकार पूर्वोक्त तीनो अलङ्कारो की ससृष्टि है।" सर्वदुषा। भावार्थ-- शिशुपालवधात् वीतचिन्तो महेन्द्रः स्वस्थमनाः सन् इन्द्रास्या सह सुखम् अनुभवतु ॥ ओमित्युक्तवतोऽथ शाङ्गिण इति व्याहृत्य वाचं नभ- स्त'स्मन्नुत्पतिते पुरः सुरमुना विविन्दोः श्रियं विभ्रति । शत्रु णामनिशं विनाशपिशुनः ऋद्धस्य वैद्य प्रति भोम्जीव न कुटिच्छलेनवदने केतुश्चकारास्पदम् ॥७५।। इति श्रामाघकृतौ शिशुपालवधे महाकाव्ये श्र यङ्के कृष्ण- नारदसभाषरण नाम प्रथसः मर्गः॥१॥ अन्वय--तस्मिन् सुरमुना इति वाच व्याहृत्य नभ उत्पतिते पुरः इन्दोः श्रिय बिभ्रनि अथ प्रोम् इति उक्तवतः चैद्य प्रति क्रुद्धस्य शाङ्गिणः वदने व्योम्नि इव अनिश शत्रूणा विनाशपिशुनः केतुः भ्र कुटिच्छलेन प्रास्पदं चकार । अर्थ --इस प्रकार वचन कहकर आकाश की ओर उठ जाने पर जब देवर्षि नारद ने भगवान् के सम्मुख चन्द्रमा की शोभा धारण की, तब (स्वीकृतिसूचक) 'ओम्' ऐसा कहते हुए तथा शिशुपाल पर क्रुद्ध हुए भगवान् कृष्ण के व्योमसदृश मुखमण्डल पर कुटिल भृकुटि के रूप मे सर्वदा (अर्थात् अनिवार्यरूप से) शत्र-विनाश की सूचना देने वाले केतु ने स्थान बना लिया।

1LKSVलभूतया IDR ( . १४२ ) टिप्पणी-माकाश में केतु या पुच्छल नामक तारे का उदय नृपति- विनाशादि अनर्थ का सूचक होता है। इधर भगवान् के मुखमण्डल पर विद्यमान कुटिल भृकुटि भी शिशपाल जैसे वृपति के अवश्यम्भावी वध की सूचक है । इसी से कवि ने भगवान् के मुखमण्डल का साम्य प्राकाश से तथा भृकुटि का केतु से दिया है। श्रोमिति ॥ तस्मिन्सुरमुनी नारदे इति इत्यभूतां वाचव्याहृत्योक्त्वा नभ उत्पतिते समुद्गते परोऽगेने इन्दोः धियं बिभ्रति सति । अथ मुनिवाक्या- नन्तरमोमित्युक्तवतस्तथास्त्विङ्गीकृतवतः । 'प्रोम्प्रश्नेऽङ्गीकृती रोष' इति विश्वः । बेदीनो जनपदानामयंचैद्यःशिश पाल. । 'वृद्धकोसलाजादा ञ्यड्इति ज्यङ्प्रत्ययः । तं प्रति क्रुद्धस्य शाङ्गिणोवदनेव्योम्नीवानिश 'सर्वदा । अव्य- भिचारेणेत्यर्थः । शत्रुणां विनाशस्य पिश नः सूचकः । 'चन्द्रमभ्युत्थितः केतुः क्षितीशाना विनाशकृत्' इति शास्त्रादिति भावः। केतुरुत्पातविशेषः। 'केतु- शुतो पताकायो महोत्पातारिलक्ष्मसु' इत्यमरः भ्र कुटिच्छलेन भ्र भगव्याजेना- स्पदं प्रतिष्ठा स्थिति चकार । "प्रास्पद प्रतिष्ठायामइति निपातनात्सुडागमः । अनेन वाक्यार्थभूतस्य वीररससहकारिने रौद्रस्य स्थायी क्रोध स्वानुभावेन भ्र कुट्या कारणभूतोऽनुमेय इत्युक्तम् । तथा तदविनाभूतस्यागिनो वीरस्थ स्थायी प्रयत्नोपनेय उत्साहोऽप्युत्पन्न एवेत्यनुस धेयम् । इन्दोः श्रिय बिभ्रतीयत्र मुनेरिन्दु श्रियोऽयोगात्तत्सदृशीमिति सादृश्याक्षेपादसभन्द्वस्तुसबन्धरूपो निदर्श- नालंकारः वदने ब्योम्तीवेत्युपमा । भ्र कुदिच्छलेन केतुरिति छलादिशब्देनासत्यत्व- प्रतिपादनरूपोऽपहवः । तत्र शत्रु विनाशसूचके त्वपेक्षितेन्दुसान्निव्योमावस्था- नसपादकत्वे निदर्शनोपमयोरपह्रवोपकारसत्वादङ्गाङ्गिभावेन सकरः । चमत्कार सर्गान्त्यश्लोकेषु श्रीशब्दप्रयोगः। यथाह ३ पिता का नाम दत्तक सर्वाश्रय तथा पितामह का नाम सुप्रभदेव दिया है। इनके पितामह सुप्रभदेव वर्मल [ वर्मलात ] नामक महाराज के महामन्त्री थे। इसके अतिरिक्त कवि ने अपने विषय मे कुछ भी नही कहा है । भोजप्रबन्ध मे प्राप्त 'माघ का अपनी पत्नी को धाराधीश भोज के दरबार मे एक श्लोक के साथ भेजना' मादि उल्लेख के आधार पर माध को भोज का समकालीन बताना तो, अनर्गल सा ही लगता है, क्योकि भोज के शताब्दियो पूर्व के कवियो ने भी माघ के नाम तथा काव्य का उल्लेख किया है । यो तो नवम शताब्दी के मध्य में होने वाले आनन्द- वर्धन ने भी अपने 'ध्वन्यालोक' मे, शिशुपालवध के उद्धरण दिए है और इस प्रकार माघ इनके पूर्ववर्ती सिद्ध होते है, परन्तु माघ के काव्य का उल्लेख करने वाले सब से प्राचीन प्राचार्य वामन है, जिन्होने अपने 'काव्यालकार सूत्रवृत्ति'५ मे शिशुपालवध से कई उदाहरण दिए है । वामन का समय आठवी शताब्दी का अन्तिम भाग माना जाता है, अतः माघ इनके भी पूर्ववर्ती ठहरते है । फिर, माघ के पितामह के प्राश्रयदाता नरेश वर्मलात का एक शिलालेख भी ६२५ ई० का मिलता है, इससे माघ का समय ६२५ई० के कम से कम पचीस-तीस वर्ष बाद अर्थात् सातवी शताब्दी का उत्तराध माना जा सकता है। इसके अतिरिक्त माघ के काव्य पर भारवि की स्पष्ट छाप दिखाई पड़ती है, और भारवि का समय ६३४ ई० के ऐहोल शिलालेख के आधार पर छठी शताब्दी का उत्तरार्ध या अन्तिम पाद जान पडता है । इस प्रकार माघ, इनके बाद के होने से सातवी के ठहरेंगे। परन्तु सातवी शताब्दी के पूर्वार्ध मे होने वाले बाण ने अपने 'हर्षचरित' के प्रारम्भ मे भास, कालिदास आदि के साथ माघ का उल्लेख नही किया है। इससे यह स्पष्ट है कि माघ बाण के अनन्तर अर्थात् सातवी के उत्तराध में हुये होगे। -द्रष्टव्य ध्वन्यालोक, द्वितीय उद्योत, पृ० ११४, ११५ (नि० सा०-प्रेस प्रकाशन, १९११ ई०) पर उद्धृत माघ के ५।२६ तथा ३५३। ५-द्रष्टव्य काव्यालंकारसूत्रवृत्ति ४।३।१० मे उद्व त ३८ तथा शराब मे उद्धत ११२५ श्लोक । . . ++ ४ ( ४ ) अब तक बहिरङ्ग प्रमाणो के आधार पर हो माघ का समय निश्चित किया गया है । पर अब देखना यह है कि अन्तरङ्ग प्रमाण भी कोई ऐसा मिल सकता है जिससे माध का समय निश्चित किया जा सके । शिशुपालवध के द्वितीय सर्ग मे कवि ने राजविद्या को समता शब्दविद्या से करते हुये लिखा है- अनुत्सूत्रपदन्यासा सवृत्तिः सन्निबन्धना । सब्दविद्य व नो भाति राजनीतिरपस्पशा ।। शि० व० २१११२ . इस श्लोक मे कवि ने दो व्याकरण ग्रन्थो का स्पष्ट उल्लेख किया है काशिकावृत्ति, और (२) न्यास । काशिकावृत्ति की रचना जयादित्य और वामन ने ६५० इ० मे की थी। अतः माघ का समय इसके बाद ही माना जा सकता है । "किन्तु उक्त श्लोक मे न्यास शब्द से किस ग्रन्थ-विशेष की मार सकेत है, इस विषय मे विद्वानो मे मतभेद है । पाठक महोदय का कहना है कि उक्त न्यास से अभिप्राय काशिकावृत्ति को जिनेन्द्र बुद्धि-रचित 'न्यास' नामक टीका है, जिसकी रचना लगभग ७०० ई० मे हुई | उनके मतानुसार माघ का समय इस आधार पर ७५० ई० के आसपास सिद्ध होता है । पर यह कहना उचित नही कि माघ ने उक्त श्लोक मे जिनेन्द्रबुद्धि के ही न्यास की ओर सकेत किया है । जिनेन्द्रबुद्धि के पहले भी एक न्यास नामक ग्रन्थ की रचना हो चुकी थी । काणे महोदय ने दिखाया है कि बारण ( ६२० ई०) ने अपने 'हर्षचरित' मे न्यास का उल्लेख किया है [कृतगुरुपदन्यासा लोक इव व्याकरणेऽपि] । सम्भव है बाण के समान माघ ने भी इसी 'न्यास' की ओर सकेत किया हो, न दि जिनेन्द्र- ६-इण्डियन एण्टीकरी १९१२ ई०, पृ० २३५, तथा जे०बी०आर० ए० एस० १३वॉ भाग, पृ० १८ । ७-अलङ्कार शास्त्र का इतिहास, पृ० २६ ।

( ५ ) बुद्धि के 'न्यास' की ओर । अतः माघ का समय जिनेन्द्रबुद्धि के पीछे नहीं माना जा सेकता और सम्भवतः वे सातवी शताब्दी के उत्तरार्ध मे ही हुए थे। , माध के जीवन के विषय मे किवदन्ती के सिवा अन्य कोई प्रमाणित विव- रण नही मिलता । 'शिशुपालवध' की गणना सस्कृत साहित्य की बृहत्त्रयी मे है । माघ ने काव्य-कथानक तो महाभारत [ सभापर्व, अध्याय ३३-४५ ] से लिया है, किन्तु अपनी प्रतिभा तथा भारवि की शैली के अनुकरण द्वारा उसका रूप नितान्त नवीन कर दिया है । महाभारत में युधिष्ठिर के राजसूय मे भीष्म द्वारा कृष्ण की अग्रपूजा का प्रस्ताव, शिशुपाल द्वारा उस प्रस्ताव का विरोध तथा सभा छोड कर उठ जाना, कलह मे शिशुपाल का भीष्म को दुर्वचन कहना तथा कृष्ण को अनेक गालियाँ देना, कृष्ण का शिशुपाल की माता को दिये गये अपने वरदान के कारण शिशुपाल के सौ अपराधो को क्षमा करते जाना, फिर प्रतिज्ञा पूर्ण हुई जान कर चक्र से शिशुपाल के सिर को काट डालना इत्यादि प्रकार से कथा वर्णित है। किन्तु माघ ने इस कथानक मे बहुत कुछ परिवर्तन कर दिया है । प्रथम सर्ग मे ही नारद का शिशुपालवध के लिये इन्द्र का सन्देश लेकर द्वारका मे वसुदेव के घर पाना माघ की अपनी कल्पना है। फिर बलराम तथा उद्धव के साथ कृष्ण की मन्त्रणा, द्वारका-वर्णन, कृष्ण का इन्द्रप्रस्थ के लिए प्रस्थान, मार्ग मे रैवतकवर्णन, जलक्रीडावर्णन, षड्ऋतुवर्णन, सन्ध्या-रजनी- प्रभातवर्णन, फिर शिशुपाल द्वारा दूत-प्रेषण, दूत-वचन, चित्र-बन्ध द्वारा युद्ध- वर्णन आदि माघ की अपनी कल्पना है । . - ८-सस्कृत साहित्य को रूपरेखा, तृ० सस्करण पृ० ७२-७३ । शृण्वन्तु मे महीपाला येनैतत्क्षमितं मया । अपराधशत क्षाम्य मातुरस्यैव याचने||म०भा०,सभा० प०४५।२३।। -एवमुत्त्वा यदुश्रेष्ठश्चेदिराजस्य तत्क्षणात् । व्यपाहरच्छिरः क्रुद्धश्चक्रणामित्रर्षणः ॥ वही ४५।२५।। १ ( ६ ) यदि प्रबन्ध-कल्पना की दृष्टि से देखा जाय तो माघ ने महाभारत के कथानक में जो परिवर्तन किये है उनमे से अधिकाश काव्य-कथानक के लिए अनुपयुक्त ही है । चतुर्थ सगं से द्वादश सर्ग तक का भाग तो ऐसा प्रतीत होता है मानों अनेक खंडकाव्यो का संग्रह हो, वहां प्रबन्ध-कथानक की गन्ध तक नही मिलती । कहाँ तो कृष्ण यदुसेना के साथ युधिष्ठिर के राजसूय मे भाग लेने जा रहे है जहाँ शिशुपाल का वध मुख्य लक्ष्य है, और कहाँ रास्ते मे उनके सैनिक सुन्दरियो के साथ क्रीडायें करते हैं, छहो ऋतुमो का आनन्द लेते हैं एव पुष्पावचय, जलक्रीडा, पानगोष्ठी आदि करते है ? ऐसा स्पष्ट प्रतीत होता है मानो कवि ने अपनी कला के प्रदर्शन के लिए बलात् इन प्रसङ्गो को काव्य मे ठू सा है। माघ मे पाण्डित्य के साथ उच्च कोटि को काव्यशक्ति तथा प्रबन्धपटुता भी अवश्य थी । प्रबन्ध-सौष्ठव के लिए क्या-क्या अपेक्षित होता है, यह वे पूर्ण रूप से जानते थे । उन्होने स्वयं कहा है-"बह्वपि स्वेच्छया काम प्रकीर्णमभि- धीयते । अनुज्झितार्थसम्बन्धः प्रबन्धो दुरुदाहरः -शि० '०व० २।७३। वे यह भी जानते थे कि काव्य मे शब्द (ध्वनि) तथा अर्थ का क्या सम्बन्ध तथा कितना महत्त्व होता है-शब्दाथों सत्कविरित्र द्वय विद्धानपेक्षते-(शि० व० २।८६)। अब प्रश्न यह उठता है कि इतना प्रबन्धपटु होते हुये भी माघ ने शिशुपालवध मे इतने व्यर्थ अनेक प्रसग क्यो रक्खे ? इसका एक ही उत्तर है कि माघ ने अपने पूर्ववर्ती कवि भारवि का इतनी स्पर्धा के साथ अनुकरण किया कि उसमे उन्होंने बहुत-कुछ अपनी मौलिक प्रतिभा ही विनष्ट कर दी । भारवि के ही मार्ग पर चल कर माघ उन्हे उन-उन रचनाओ मे अपने से हेठा दिखाना चाहते थे । इस स्पर्धा पूर्वक अनुकरण से माध का काव्य उपयुक्त ऋतुवर्णन, केलि, पानगोष्ठी इत्यादि प्रसगो मे भारवि के काव्य से भले अच्छा अवश्य हो परन्तु ये प्रसग बलात् पारोपित किए गए अतश्च अनुपयुक्त ही लगते है। भारवि के काव्य मे तो ये किसी प्रकार उचित हो भी सकते थे, क्योकि वहाँ यात्रा करने वाला एक ही व्यक्ति (अर्जुन) है, जिस तपस्या के लिए वह जा रहा है उसका शीघ्र आरम्भ होना यद्यपि आवश्यक है, तथापि उसकी कोई तिथि निश्चित नही है, अतएव आकर्षक एव मनोहारी पर्वतीय दृश्यो मे से होकर जाता हुआ यात्री मानवसुलभ सौन्दर्य-प्रेम के कारण यदि ( ७ ) कुछ काल के लिये उनमे रम जाता है और थोड़े बिलम्ब से गन्तव्य पर पहुँच कर तपस्या आरम्भ करता है तो बहुत तो क्या, शायद थोडा, भी अनुचित न हो परन्तु यहाँ तो राजसूय की तिथि निश्चित है और उसी मे आने वाले शिशुपाल का वध होना है, फिर भी इतनी आश्चर्यजनक निश्चिन्तता से और एक दो व्यक्ति नही अपितु समूची सेना की सेना प्रानन्द-सुख मे ऐसी निरत है, जैसे पूर्व से यही कार्यक्रम नियत रहा हो, राजसूय मे भाग लेना नही । माघ के काव्य मे यह अनौचित्य उनके अन्धानुकरण के कारण ही आया । यदि माघ ने अपनी काव्य- शक्ति का मौलिक भावो को रखने में उपयोग किया होता तो सम्भवतः सस्कृत भाषा एव साहित्य और भी धन्य हो गये होते । यद्यपि यह अनुकरणरूपी कलंक उनकी प्रतिभा रूपी चन्द्रिका के वैशद्य एवं आह्वादकारित्व को किसी भी प्रकार कम नही कर सका है, पर है तो कलङ्क ही । अस्तु । अब देखना है कि माघ ने भारवि का कहाँ क्या अनुकरण किया है । स्व० पं० चन्द्रशेखर पाण्डेय के शब्दो मे"माघ का आदर्श भारविकृत किरातार्जुनीय था, यह बात दोनों ग्रन्थों की पारस्परिक तुलना करने से स्पष्ट विदित हो जाती (१) दोनो महाकाव्यो की मुख्य कथा महाभारत से ली गई है। (२) दोनो ग्रन्थो का प्रारम्भ'श्री'शब्द से होता है, किरात के प्रारम्भ मे 'श्रियः कुरूणा- मधिपस्य पालिनीम्' है, तो माघ के प्रारम्भ मे "श्रियः पतिः श्रीमति शासितुं जगत्' है । (३) दोनो के प्रथम सर्ग में सन्देशकथन है, किरात मे वनेचर के द्वारा युधिष्ठिर के प्रति और माघ मैं नारद के द्वारा श्रीकृष्ण के प्रति (४) किटात के द्वितीय सर्ग में युधिष्ठिर भीम और द्रौपदी के बीच राजनीति-विषयक संवादं होता है तो शिशुपालवध के द्वितीय सर्ग से बलराम, श्रीकृष्ण और उद्धव के बीच सी विषय पर परामर्श होता है । (५) किरात में महर्षि वेदव्यास पाण्डवों कोमार्ग सुझाते है तो माघ में देवर्षि नारद ऐसा ही करते है (६) किरात में + (८ अर्जुन इन्द्रकील पर्वत पर तपस्या करने के लिये जाते है तो माघ मे श्रीकृष्ण रैवतक पर्वत के समीप ठहरते है (७) किरात मे यदि हिमालय का यमकालकारो के द्वारा वर्णन हुआ है तो माघ मे इसी प्रकार रैवतक का वर्णन है । (८) दोनो मे अप्सरानो के विहार का चारु चित्रण है । (E) किरात मे किरातवेशधारी शिव अर्जुन का अपमान करने के लिये दूत भेजते है तो माघ मे शिशुपाल श्रीकृष्ण का अनादर करने के लिये दूत भेजता है । (१०) किरात के १३वें तथा १४वें सर्ग मे अजुन तथा किरातरूपधारी शिंव मे वाद-विवाद हुआ है तो माघ मे १६वें सर्ग मे ऐसा ही विवाद शिशुपाल के दूत और सात्यकि मे हुआ है । (११), किरात के पन्द्रहवे तथा माघ के १६वे सर्ग मे चित्रबन्धो द्वारा युद्धवर्णन है । (१२) दोनो मे सन्ध्याकाल, रात्रि, चन्द्रोदय, ऋतुप्रो ऐव यात्रा का यथास्थान बर्सन हुआ है । (१३) भारवि ने किरात मे प्रत्येक सर्ग के अन्तिम पद्य मे लक्ष्मी शब्द का प्रयोग किया है तो माघ ने इसी प्रकार अपने काव्य के सर्गान्त पद्यो मे 'श्री' शब्द का प्रयोग किया है । (१४) दोनो के वर्णन-क्रम मे भी समानता है । (१५) दोनों काव्यो मे द्वन्द्व युद्ध के पूर्व विपक्षियो की सेनानो मे सघर्ष होता है।" इन पूर्वोक्त प्रसगो के अतिरिक्त कही-कही माघ के श्लोको के भाव भी किरा- ताजुनीय से मिलते हैं, पर वे किरात की कोरी नकल नहीं है, जैसे नारद के माने पर कृष्ण अपने हार्दिक आनन्द को व्यक्त करते हुए कहते है-"हरत्यघ सम्प्रति हेतुरेष्यतः शुभस्य पूर्वाचरितैः कृतं शुभैः । शरीरभाजा भवदीयदर्शन व्यन- क्ति कालत्रितयेऽपि योग्यताम् ॥ शि० व० १/२६ । कुछ इसी प्रकार के भाव व्यास के आने पर युधिष्ठिर ने किरातार्जुनीय' मे व्यक्त किये है: "अनाप्तपुण्योपचयेदुरापा फलस्य निधूतरजाः सवित्री । तुल्या भवद्दर्शनस- म्पदेषा वृष्टेर्दिवो वीतबलाहकायाः ॥ कि० ३।५। फिर आगे कृष्ण माघ मे अति नम्र भाव से देवर्षि नारद से कहते है:-"विलोकनेनैव तवामुना मुने कृतः कृतार्थोऽस्मि निहितांहसा । तथापि शुश्रू पुरहं गरीयसीगिरोऽथवा श्रेयसि केन तृप्यते ॥ शि० व० १/२६ । इस श्लोक पर किरात के निम्नाङ्कित श्लोक की स्पष्ट छाया झलकती है, जिसमें युधिष्ठिर व्यास जी से इसी प्रकार से अपने हृदय के भावों को व्यक्त करते हुए कहते है:- - h - ( ६ ) निरास्पद प्रश्नकुतूहलित्वमस्मास्वधीन किमु निःस्पृहाणाम् । तथापि कल्याणकरीं गिर ते मा श्रोतुमिच्छा मुखरीकरोति ।। कि०५/९ भारवि के अतिरिक्त माघ पर कालिदास का भी प्रभाव कही-कहीं परिलक्षित होता है। माघ मे नारद द्वारा कृष्ण के सम्मुख रावरण के प्रताप मादि के वर्णन मे कुमार मे बृहस्पति द्वारा वर्णित तारक के प्रताप की बहुत-कुछ झलक दिखाई पडती है । परन्तु यहाँ भी भावो की दिशा ही समान है, स्वयं भाव तथा उन्हें प्रकट करने वाले शब्द एव अर्थ कदापि एक नहीं कहे जा सकते । इसका कारण यह है कि माघ मे अपने पूर्ववर्ती महान् काव्यसाधकों के उत्कृष्ट काव्यतत्त्वो को अपनाने की सुरुचि तो थी, साधारण तुक्कणों की भाँति सस्ती नकल की प्रवृत्ति नहीं थी। उनमे उच्चकोटि की काव्य- शक्ति और सहृदयता थी। नारद जी के आगमन का प्रयोजन भगवान कृष्ण द्वारा जिस वाक्चातुरी एव शिष्टता के साथ माघ ने पु छवाया है, वह सहृदय एवं काव्यकुशल कवि का ही काम है:-गतस्पृहोऽप्यागमनप्रयोजन वदेति वक्तु व्यवसीयते यया । तनोति नस्तामुदितात्मगौरवो गुरुस्तवैवागम एष धृष्टताम् । शि० ०व० १/३० ।। रैवतक पर्वत का बडा ही मनोहारी वर्णन कवि ने किया है । यमक तथा अनुप्रासो का अाश्रय लेते हुए वहाँ छहो ऋतुओ का जो मनोहारी वर्णन । कवि ने किया है, वह सस्कृत-काव्य-साहित्य की अनुपम निधि है । एक ही उदाहरण पर्याप्त होगा -नवपलाशपलाशवन पुरः स्फुट परागपरागलपङ्कजम् । मृदुलतान्तलतान्तमलोकयत् स सुरभि सुरभि सुमनोभरैः ॥६॥ २।। प्रभात के वर्णन मे तो कवि की उत्कृष्ट कल्पना ने बडी ऊँची उडाने ली है। प्राची-सन्ध्या की कन्या से उपमा देने के लिए उसने प्रातःकाल के सुन्दर दृश्यो का कन्या के कमल कोमल अंगो के साथ जो रूपक बांधा है, वह अन्यत्र दुर्लभ है :- अरुण- जलजराजी मुग्धहस्तानपादा, बहुलमधुपमाला कजलेन्दीवराक्षी । अनुपतति विरावैः पत्रिणा व्याहरन्ती रजनिमचिरजाता पूर्व सन्ध्या सुतेव ॥१११४० ।। इसी प्रकार *उदाहरणार्थ शिशुपालवध १/५६ तथा कुमारसम्भव २/२१, शि० व० १/५८ तथा कुमार २/३३, एव शि० व० १/६६ तथा कुमार २/३३ द्रष्ट व्य हैं । .

( १० ) उदय होते हुए सूर्य का उदयगिरि के प्रशस्त प्राङ्गण मे खेलते हुए हसमुख बालक के साथ बाधा गया रूपक चिरस्मरणीय रहेगा-उदयशिखरिशृङ्गप्राङ्गणेष्वेव रिङ्गन सकमलमुखहासं वीक्षितः पद्मिनीभिः । विततमृदुकरानः शब्दयन्त्या वयोभिः, परिपतति दिवोऽङ्क हेलया बालसूर्यः ॥११॥४७॥ राजसूय के अवसर पर सजी इन्द्रप्रस्थ नगरी की रमरिणयो की विभिन्न शृङ्गारिक चेष्टाओं का वर्णन बडा ही मनोमुग्धकारी है:-विपुलेन सागरशयस्य कुक्षिणा भुवनानि यस्य पपिरे युगक्ष- ये। मदविभ्रमासकलया पपे पुनः स पुरस्त्रियैकतमयैकया दृशा ॥१३॥४०॥ उपर्युक्त श्लोको मे रिङ्गन्-रेंगते हुए-(धुटने के बल चलते हुए) तथा मदविभ्रमासकलया (मदविलास से तिरछे कटाक्ष करती हुई) पदो का साहित्यिक सौन्दर्य ध्यान देने योग्य है । बाद वाले श्लोक मे 'अधिक' अलङ्कार का कैसा स्वाभाविक और साहित्यिक प्रयोग हुआ है ? इतने से ही माघ की काव्य-शक्ति का प्रभूत परिचय प्राप्त हो जाता है । माघ में काव्यशक्ति के साथ पूर्ण एव प्रकाण्ड पण्डित्य भी था। व्याकरण शास्त्र के गूढ रहस्यो के वे पण्डित थे। उदाहरणार्थ परोक्ष भूत मे प्रयुक्त लोट लकार का चमत्कार देखिए:-पुरीमवस्कन्द लुनीहि नन्दन मुषाण रत्नानि हरामराङ्गनाः । विगृह्य चक्रे नमुचिद्विषा बली य इत्थमस्वास्थ्यमहर्दिव दिवः ॥ १। ५१ ॥ देवर्षि नारद द्वारा भगवान् श्रीकृष्ण की वन्दना कराते समय कवि ने बडी चातुरी से समस्त दर्शनो के अन्तिम निष्कर्ष को काव्य-पदावली मे बाँधा है:-उदीर्णरागप्रतिरोधक जनैरभीक्ष्णमक्षुण्णतयातिदुर्गमम् । उपेयुषी मोक्ष- पथ मनस्विनस्त्वमग्रभूमिर्निरपायसश्रया ॥ १।३२॥ इसी प्रकार उनकी सगीत शास्त्र की विशेषज्ञता का परिचय इस श्लोक से मिलता है- रणद्भिराघट्टनया नभस्वतः पृथविभिन्नश्रुतिमण्डलैः स्वरैः । स्फुटीभवद्ग्रामविशेषमूर्च्छनामवेक्षमाणं महती मुहुमुहुः ।। शि० व० १ । १० पूरे द्वितीय सर्ग मे उन्होने अपने राजनीलि-विषयक उत्कृष्टज्ञान का परिचय दिया है । उदाहरणार्थ, षड्गुण, शक्तित्रय आदि के त्रिवर्ग का किस कौशल से एक , ११ ) अनुष्टुभ् में उल्लेख करते है--षड्गुणाः शक्तयस्तिस्रः सिद्धयश्चोदयास्त्रयः। ग्रन्थानधीत्य व्याकतु मितिदुर्मेधसोऽप्यलम् ॥ शि० व० २।२६॥ माघ मे दर्शनशास्त्र-विषयक पाण्डित्य भी पूर्ण दिखाई पडता है । बौद्ध दर्शन के आत्म-विषयक सिद्धान्त का वे किस प्रकार उद्धरण करते है-सर्वकार्यशरीरेषु मुक्त्वाङ्गस्कन्धपञ्चकम् । सौगतानामिवात्मान्यो नास्ति मन्त्री महीभृताम् ॥ शि०व० २।२८ सम्पूर्ण योगशास्त्र का सविधि उल्लेख किस कौशल से कवि करता है:-- मैत्यादिचित्तपरिकर्मविदो, विधाय क्लेशप्रहाणमिह लब्धसबीजयोगाः। ख्याति च सत्त्वपुरुषान्यतयाधिगम्य वाञ्छन्ति तामपि समाधिभृतो निरोद्धम् ॥ शि० व० ४/५५ कवि होने के साथ माघ काव्यशास्त्र के भी प्राचार्य थे । बडे कौशल के साथ वे रस के सचारी भावो का उल्लेख करते हैं- - "स्थायिनोऽर्थे प्रवर्तन्ते, भावाः सच्चारिणो यथा । रसस्यैकस्य भूयासस्तथा नेतुमहीभूतः। शि० व० २।८७॥ इस प्रकार माघ-काव्य शक्ति और पाण्डित्य दोनो ही दृष्टियो से बहुत उत्कृष्ट है । वास्तव मे सस्कृत-काव्य-साहित्य उनकी इस अनुपम कृति से धन्य हो गया है । छहों ऋतुओ का क्रमशः आगमन न दिखा कर जो एक साथ दिखाने का दोष अङ्गीकार किया है, वह भगवान् के सेवार्थ होने से क्षम्य है । कवि ने स्वय तुलसीदास की ("एहि मह रघुपति नाम उदारा' इत्यादि वचन की) भांति अन्तिम श्लोक में इस काव्य को 'लक्ष्मीपतेश्चरितकीर्तनमत्र चारु' कहा है। शिशुपाल वध का कवि भारवि का अनुगामी हो कर भी उसके शैवत्व को स्वी- कार न करके वैष्णव ही रहा है और इसी के अनुकूल लक्ष्मीपति विष्णु का चरित-कीर्तन होने मे उसने अपने काव्य की सार्थकता मानी है।

प्रथमः सर्गः ।
इन्दीवरदलश्याममिन्दिरानन्दकन्दलम् ।
वन्दारुजनमन्दार वन्देऽह यदुनन्दनम् ।
दन्ताञ्चलेन धरणोतलमुन्नमय्य पातालकेलिषु धृतादिवराहलीलम् ।
उल्लाधनोत्फणफणाधरगीयमानक्रीडावदानमिभराजमुख नमामः
शारदा शारदाम्भोजवदना वदनाम्बुजे ।
सर्वदा सर्वदास्माक सनिधि सनिधि क्रियात् ।।
वाणी कारणभुजीमजीगरणदवाशासीच्च वैयासिकी-
मन्तस्तन्त्रमरस्त पन्नगगवीगुम्फेषु चाजागरीत् ।
वाचामाकलयद्रहस्यमखिल यश्चाक्षपादस्फुरा
लोकेऽभूद्यदुपज्ञमेव विदुषा सौजन्यजन्य यशः ॥
मल्लिनाथः सुधीः सोऽय महोपाध्यायशब्दभाक् ।
विधत्ते माधकाव्यस्य व्याख्या सर्वकषाभिधाम् ।।
ये शब्दार्थपरीक्षणप्रणयिनो ये वा गुणालक्रिया-
शिक्षाकौतुकिनो विहतु मनसो ये च ध्वनेरध्वनि ।
क्षुम्यद्भावतरङ्गिते रससुधापूरे मिमक्षन्ति ये
तेषामेव कृते करोमि विवृति माघस्य सर्वकषाम् ।।
नेतास्मिन्यदुनन्दनः स भगवान्वीरः प्रधानो रसः
शृङ्गारादिभिरङ्गवान्विजयते पूर्णा पुनर्वर्णना।
इन्द्रप्रस्थगमाद्य पायविषयश्चैद्यावसादः
धन्यो माघकविर्वय तु कृतिनस्तत्सूक्तिससे वनात् ।।
इहान्वयमुखेनैव सर्व व्याख्यायते मया ।
नामूल लिख्यते किचिन्नानपेक्षितमुच्यते ।।
फल

( १३ ) , अथ तत्रभवान्माधकविः 'काव्य यशसेऽर्थकृते व्यवहारविदे शिवतरक्षतये । सद्यः परनिवृतये कान्तासमिततयोपदेशयुजे ॥' इत्यालकारिकवचनप्रामाण्यात्का- व्यस्यानेकवेयःसाधनता, 'काव्यालापाश्च वर्जयेत्' इति निषेधस्यासत्काव्य- विषयता च पश्यन् शिशुपालवधाख्य काव्य चिकीर्षु श्चिकीषितार्थाविघ्नपरिसमा- तिसप्रदायाविच्छेदलक्षरणफलसाधनत्वात् 'पाशीर्नमस्क्रिया वस्तुनिर्देशो वापि तन्मुखम्' इत्याशीराद्यन्यतमस्य प्रबन्धमुखलक्षणत्वाञ्च काव्यफलशिशुपालवधवी- जभूत भगवतः श्रीकृष्णस्य नारददर्शनरूप वस्तु आदौ श्रीशब्दप्रयोगपूर्वक निदिशन् कथामुपक्षिपति- श्रियः पतिः श्रीमति शासितु जगज्जगन्निवासो वसुदेवसद्मनि । वसन्ददर्शावतरन्तमम्बराद्धिरण्यगर्भाङ्गभुव मुनि हरिः ॥१॥ अन्वयः- - जगत का श्रियः पतिः, जगन्निवासो, जगत् शासितु श्रीमति वसुदेवसम्मनि वसन् हरिः अबरात् अवतरन्त हिरण्यगर्भागभुव मुनि ददर्श ।। अर्थः- लक्ष्मी (रुक्मिणी) के पति, जगत् के आधारभूत, नियन्त्रण करने के लिये वसुदेव के श्रीसम्पन्न गृह में (श्रीकृष्णरूप मे ) निवास करते हुये भगवान् विष्णु ने ( एक बार ) आकाश से उतरते हुये ब्रह्म- पुत्र नारद मुनि को देखा । सर्वकषा- श्रिय इति ॥ तत्रादौ श्रीशब्दप्रयोगाद्वर्णगणादिशुद्धेरभ्युच्चयः। तदुक्तम्- 'देवतावाचकाः शब्दा ये च भद्रादिवाचकाः। ते सर्वे नैव निन्द्याः स्युलिपितो गणतोऽपि वा ॥' इति । श्रियो लक्ष्म्याः पतिः। अनेन रुक्मिणीरूपया धिया समेत इति सूचितम् । 'राघवत्वेऽभवत्सीता रुक्मिणी कृष्ण जन्मनि' इति विष्णु- पुराणात् । जगनिवासो जगतामाधारभूतः । कुक्षिस्थाखिलभुवन इति यावत् तथापि - ( १४ ) जगत् लोक शासितु दुष्टनिग्रहशिष्टानुग्रहाभ्या नियन्तु श्रीमति लक्ष्मीयुक्त वसुदेवसद्मनि वसुदेवरूपिणः कश्यपस्य वेश्मनि वसन्कृष्णरूपेण तिष्ठन् हरिविष्णुर- म्बरादवतरन्तमायान्तम् । इन्द्रसदेशकथनार्थ मिति भावः । हिरण्यस्य गर्भो हिरण्य- गर्भो ब्रह्मा । ब्रह्माण्ड प्रभवत्वात् । तस्यानभुव तनूजम् । अथवा तस्याङ्गादवयवा- दुत्सङ्गाख्याद्भवतीति हिरण्यगर्भागभूस्त मुनिम् । नारदमित्यर्थः। 'उत्सङ्गानारदो जज्ञे दक्षोऽङ्ग ष्ठात् स्वयभुवः': इति भागवतात् । ददर्श कदाचिदिति शेषः । अत्रा- ल्पीयसि वसुदेवसद्मनि सकलजगदाश्रयतया महीयसो हरेराधेयत्वकथनादधिकप्रभेदो- ऽर्थालकारः । तदुक्तम् - 'प्राधाराधेययोरानुरूप्याभावोऽधिको मत इति । जगन्नि- वासस्य जगदेकदेशनिवासित्वमिति विरोधश्च । तथा तकारसकारादेः केवलस्यासकृदा- वृत्त्या जगज्जगदिति सकृद्व्यञ्जनद्वयसादृश्याच्च वृत्त्यनुप्रासभेदौ शब्दालकारौ । एषा चान्योन्यनैरपेक्ष्येणैकत्र समावेशात्तिलतण्डुलवत्ससृष्टिः । सर्गेऽस्मिन्वशस्थ- वृत्तम् । 'जतौ तु वशस्थमुदीरित जरौ' इति लक्षणात् । व्याकरण- श्रियः---श्नयति हरिम् इति श्रीः (श्रिन +क्विप कर्तरि), तस्याः । श्रीमति-श्रीरस्त्यस्मिन्निति श्रीमत्(श्री+मतुप ), तस्मिन् । शासि तुम-शासु+तुमुन् (अव्यय-'कृन्मेजन्त.' इस नियम से मान्त तथा एजन्त कृदन्त अव्यय होते हैं।) जगत्-गच्छतीति जगत् (गम्लु+विप कर्तरि) । शासितुम् का कर्म । जगन्निवासः-निवसत्यस्मिन्निति (नि+वस्+घन अधिकरणे) नवासः । जगता निवासः जग०, षष्ठी तत्पुरुष । वसुदेवसद्मनि- वसुदेवस्य मम (प० तत्पु०), तस्मिन् वसन्-वस+शतृ (पु०) ददर्श-दृशिर् +लिट (प्रथमपुरुष एकवचन) अवतरन्तम्-अव+त+शत (पु०) अवतरन्, तम् हिरण्यगर्भाङ्गभुवम्-हिरण्यस्य (हिरण्मयाण्डस्य) गर्भः इति हिरण्य- ( १५ ) गर्भ: =ष० तत्पु० । तस्य अङ्गम् =ष० तत्पु० । तस्मात् भवतीति हिरण्य- गर्भागभूः, उपपदसमासः। भूधातो कर्तरि विप प्रत्यय. । अथवा, अङ्गाद्भवतीति अङ्गभूः, हिरण्यगर्भस्य अङ्गभूः, तम् = ष. तत्पु० । हरिः- हरति (पापम् ) इति, हृअ +इ (कर्तरि) कोप:- श्री:-"अथ सपदि । सपत्ति. श्रीश्चलक्ष्मीश्च" इत्यमर. । तथा "श्रीवेष- रचना शोभाभारतीसरलद्रुमे । लक्ष्म्या त्रि वर्गसपत्ती वेषोपकरणे मत ।" ( इति विश्क्मेदिन्यौ) हिरण्यगर्भ:- - हिरण्यगर्भो लोकेशः स्वयभूश्चतुराननः इत्यमर. अलंकार- (१) यहाँ 'जगन्निवास' (महान् प्राधेय) का वसुदेवसम (लघुप्राधार मे) निवास करना कहा गया है, अत. अधिकनामक अर्थालङ्कार है--"आश्रयाश्रयि- णोरेकस्याधिक्येऽधिकमुच्यते” सा० दर्प० । - (२) जो जगन्निवास है, उसका वसुदेवसद्मरूप जगत के एक अतिस्वल्प भाग मे निवास कथन किए जाने से यहाँ विरोध नामक अर्थालङ्कार भी है- "विरोधः सोऽविरोधेऽपि विरुद्धत्वेन यद्वचः”—(का० प्र०) ३----तकार सकार की पृथक् २ कई बार प्रावृत्ति होने से वृत्त्यनुप्रास तथा 'जगज्जगत् मे ज, ग इन दो वर्णो की एक बार आवृत्ति होने से छेकानुप्रास नामक शब्दालङ्कार है । ४- यहाँ पूर्वोक्त अलङ्कारों का अन्योन्य-निरपेक्ष भाव से तिल-तण्डुल की ( १६ ) भाति एकत्र समावेश हुमा । अतः इसे अलङ्कारससृष्टि कहा जायगा "मिथोऽनपेक्षयतेषा स्थितिः ससृष्टिरुच्यते” (सा० द०) अथवा--"एषा तिलतण्डुलन्यायेन मिश्रत्व मसृष्टिः-अलङ्कारसर्वस्व) भावार्थ-दुष्टनिग्रहशिष्टानुग्रहाभ्या जगन्नियन्तु नारायणः कृष्णरूपेण वसुदेवगृह ऽवतीर्णवान् । चैकदा स हरिरिन्द्रसन्देशकथनार्थमाका शमार्गेणायान्त विरिञ्चपुत्र देवर्षि नारदमपश्यत् । तदानी जनैर्विस्मयादीक्षितु प्रवृत्तमित्याह- गत तिरश्चीनमनूरुसारथेः प्रसिद्धमूर्ध्वज्वलन हविर्भुजः । पतत्यधा वाम विसरि सर्वतः किमेतदित्याकुलमीक्षित जनै ।।२।। নম্ব ERMAN अन्वय- - अनूरुसारथेः गत तिरश्चीनम्, हविभुजः ऊर्ध्वज्वलन प्रसिद्धम्, सर्वतः विसारि (एतद्) धाम अध. पतति । एतत् किम् इति आकुल जनैः ईक्षितम् । अर्थ- , सूर्य की गति तिरछी होती है, अग्नि की ऊर्ध्वगति प्रसिद्ध है, चारो ओर फैलता हुआ (यह) तेज नीचे आ रहा है । 'यह क्या है' -इस प्रकार विस्मय से भरे हुए लोगो ने (उन्हे) देखा । सर्वकषा-अविद्यमानावूरू यस्य सोऽनूरु. स सारथियस्य तस्यानूसारथः सूर्यस्य गत गतिः । भावे क्त. । तिरश्चीन तिर्यग्भूतम् 'विभाषाञ्च रदिस्त्रियाम्' इति तिर्यक्शब्दादञ्चत्यन्तात्प्रातिपदिकात्स्वार्थे खप्रत्यय. । हविभुजो, नेरूद्धज्व- लनमूर्ध्वस्फुरण प्रसिद्धम् । इद तु सर्वतोविसारि धामाधः पतति । किमेतदिति सूर्याग्निविलक्षणमदृष्टपूर्वमिद धाम किमात्मक स्यादित्याकुल विस्मयात् सभ्रान्तं यथा तथा जनरीक्षि तमीक्षण कृतम् सकर्मकादप्यविवक्षिते कर्मणि भावे क्तः 'प्रसिद्धरविवक्षातः कर्मणोऽकमिका क्रिया' इति वचनात् । केचित्कर्मणि क्तान्त कृत्वा ईक्षित मुनि ददर्शति पूर्वेण योजयन्ति । अत्रोपमेयस्य मुनिधाम्नः सूर्याग्नि- - ( १७ ) भ्यामुपमानाभ्यामधःप्रसरणधर्मेणाधिक्यवर्णनान्यतिरेकः । तदुक्त काव्यप्रकाशे- 'उपमानाद्यदन्यस्य व्यतिरेकः स एव सः' इति । 'धाम रश्मौ गृहे देहे स्थाने जन्मप्रभावयोः' इति हेमचन्द्रः। दिवाकरस्तु वृत्तरत्नाकरटीकायां प्रथमपठितेन द्विधाकृतात्मा किमयं दिवाकरो विधूमरोचिः किमय हुताशनः' इति चरणद्वयेन सहेममेव श्लोक षट्पदच्छन्दस उदाहरणमाह । तत्राद्यचरणद्वयेन सदेहालकारो गतमिति तन्निरासश्च बोध्य इत्युपरिष्टात् ॥ व्याकरण- -- अनूरसारथे:-अविद्यामानावूरू यस्य सः अनूरुः (अरुणः) ब० बी० ( नमोऽस्त्यर्थाना वाच्यो वा चोत्तरपदलोपः इति वार्तिकात् ), स सारथिर्यस्य (ब० वी०), तस्य । गतम्-गम्+क्त (भावे) तिरश्चीनम-तिरः अञ्चति इति तिर्यक् = तिरस् (तिरि) अञ्च+किन् (कर्तरि)। तिर्यक् एव तिरश्चीनम् = तिर्यक् +ख (स्वार्थे)। हविर्भुजः हविः भुक्त इति (हविर् +भुज+विप कतरि) हविभुक् (उपपदतत्प०), तस्य । ऊर्ध्वज्वलनम् = ज्वल+ल्य ट (भावे) ज्वलनम्, ऊचे ज्वलनम् (सुप सुपा)। विसारि-वि+सृ+णिनिः (ताच्छील्ये)। ईक्षितम् = = ईक्ष+क्त (भाव)। यद्यपि ईक्ष धातु सकर्मक है किन्तु यहाँ कर्म को अविवक्षा होने से उसे अकर्मक-रूप भाव मे क्त प्रत्यय किया गया है-"प्रसिद्धरविवक्षातः कर्मसोऽकर्मिका क्रिया" । मान कर २ ( १८ ) कोषः- अनूरुः-सूर्यसूतोऽरुणोऽनुरुः काश्यपिर्गरुडाग्रजः इत्यमरः । हविभुक --- हिरण्यरेता हुतभुग दहनो हव्यवाहनः इत्यमरः । धाम-धाम शक्तौ प्रभावे च तजोमन्दिरजन्मसु इति विश्वः। अलकार- यहा मुनिवाम उपमेय है, जो सूर्य और अग्नि इन दोनो उपमानो की अपेक्षा अधःप्रसरण रूप धर्म द्वारा अधिक कहा गया है, अतः इसे व्यतिरेक अलकार कहा जायगा । "उपमानाद् यदन्यस्य व्यतिरेकः स एव सः” -काव्य- प्रकाश। भावार्थ- जना. आकाशे मुनेरधः प्रसरत्त जो वीक्ष्य सम्भाव्यमानयोः आदित्याग्न्येय- तेजसो. क्रमशः तिरश्चीनामूर्ध्वा च गति स्मरन्तः तत्र द्वयोरेकस्यापि सम्भावना न दृष्ट्वा कस्यैतत्त जो भवितु शक्नोतीति सविस्मय विचारितवन्तः । अथ भगवान्निरणैषीदित्याह च पस्त्विषामित्यवधारित पुरा तत. शरीरीति विभाविताकृतम् । विभुर्विभक्तावयव पुमानिति क्रमादमु नारद इत्याधि सः॥ ३ ॥ - अन्वय- विभुः सः पुरा त्विषा चयमिति, ततः विभाविताकृति शरीरीति, (ततश्च) विभक्तावयव पुमान् इति क्रमात् अवधारितम् अमु नारद इति अबोधि । अथ:- सर्वज्ञ उन भगवान् (कृष्ण) ने सर्व प्रथम (कोई) तेजो राशि है', फिर आकार के कुछ २ (धु धले रूप से) लक्षित होने पर (कोई) शरीरधारी है' और फिर अङ्गो के पृथक् २ दिखाई पडने पर 'कोई पुरुष है', इस प्रकार क्रमशः जाने गये उसको 'नारद जी है' यह जाना । , ( १६ ) टिप्पणी- वस्तुनो के स्पष्ट प्रत्यक्ष का लौकिक क्रम यही है। इसी के अनुरोध से प्रस्तुत श्लोक मे ऐसा वर्णन किया गया है अन्यथा भगवान् तो सर्वज्ञ और अन्त- र्यामी होने से सभी समय मे सभी कुछ जानने वाले है। सर्वकषा- चय इति । विभुर्वस्तुतत्त्वावधारणसमर्थः स हरिः पुरा प्रथम त्विषा चय इत्यवधारित तेजःपुञ्जमात्रत्वेन विनिश्चितम् । ततः प्रत्यासन्ने विभाविता विमृष्टा प्राकृतिः संस्थानं यस्य त तथोक्तम् । अतएव शरीरी चेतन इत्यवधारितम् । ततो विभक्ता विविच्य गृहीता अवयवा मुखादयो यस्य त तथोक्तम् अतएव पुमानि- त्यवधारितम् । अमुमागच्छन्त व्यक्तिविशेष नारद वास्तवाभिप्रायेणेति पुल्लिङ्गनि- हिः। क्रमात्पूर्वोक्तसामान्यविशेषज्ञानक्रमेण । लोकदृष्ट्येदमुक्तम् । हरिस्तु सर्व वेदैवेति तत्त्वम् । नारद इत्यबोधि (नारद बुद्धवानित्यर्थः । नारदस्य कर्मत्वेऽपि निपातशब्देनाभिहितत्वान्न द्वितीया। तिडामुपसख्यानस्योपलक्ष णत्वात् । यथाह वामनः-निपातेनाभिहिते कमरिण नकर्मविभक्तिः। परिगणनस्य प्रायिकत्वात्' इति बुध्यतेः कर्तरि लुड् । 'दीपजन-' इत्यादिना चिण्। चिणो लुक, इति तस्य लुक् । अत्रविभाविताकृति विभक्तावयवमित्यादिना प्राकृतिविभावनावयववि- भावनयोः पदार्थयोर्विशेषणवृत्त्या शरीरित्वपु स्त्वावधारणहेतुत्वेनोपन्यास पदार्थ हेतुककाव्यलिङ्गमलकारः । 'हेलोक्यिपदार्थत्वे काव्यलिङ्गमुदाहृतम्' इति लक्षणात् । व्याकरण- चयः-चि+अच् (भावे), । अवधारितम्-अव+धूणिच+क्त(कर्मरिण),तम् । शरीरी-शरीरम् अस्ति अस्य इति शरीरी (शरीर+इनिः मत्वर्थे)। विभाविताकृतिम्-विभाविता (वि+भूणिच्+क्त(कर्मणि) प्राकृतिर्यस्य सः, तम् (ब० वी०)। - 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( २० ) विभक्तावयवम्-विभक्ता (वि+भज्+क्त कर्मणि) अवयवा यस्य सः तम् (ब० वी०)। अंबोधि-बुध+लुड् (कर्तरि, प्रथमपुरुषैकवचने)- अबुध+चिण्+त- अबुध+चिण = अबोधि । कोष- त्विषाम्- स्युः प्रभारुम्रुचिस्त्विड्भाभाश्छविधु तिदीप्तयः इत्यमरः । -- चयः-समुदायः समुदयः समवायश्चयो गणः इत्यमरः । अलकार- यहाँ 'विभाविताकृति' विशेषण पदार्थ शरीरी होने तथा 'विभक्तावयव' विशेषण पदार्थ 'पुमान्' होने के ज्ञान का हेतु है, अतः इसमे पदार्थहेतुक काव्य- लिङ्ग अलङ्कार है-"हेतोर्वाक्यपदार्थत्वे काव्यलिङ्ग निगद्यते"-(सा० ६०)। भावार्थ- - हरिः प्रथम तावत् त तेजोराशिरित्यवबुद्धवान्,ततः तस्मिन् निकदमागते आकृति निरीक्ष्य देहवानित्यवगतवान् ततोऽपि निकटतरमागते सति अवयवान् विभाव्य पुरुष इत्यवधारितवान् । एव क्रमेण च त नारद इति ज्ञातवान् । अथ सप्तभिमुनि विशिनष्टि- नवानधोऽधो बृहतः पयोधरान्समूढ कपूरपरागपाण्डुरम् । क्षणं क्षणोत्क्षिप्तगजेन्द्रकृत्तिना स्फुटोपम भूतिसितेन शभुना ॥ ४॥ - अन्वयः नवान् बृहतः पयोधरान् अधः अधः समूढकपूरपरागपाण्डुरम्, (अतएव) क्षण क्षणोत्क्षिप्तगजेन्द्रकृत्तिना भूतिसितेन शम्भुना स्फुटोपमम् (अमुम् नारद इत्यबोधि)।

( २१ ) अथे- नवीन (काले काले) और विस्तृत बादलो के ठीक नीचे (स्थित) एवं कर्पूर- चूर्ण की ढेर की भाँति शुभ्र, अतएव क्षण भर के लिए ताण्डवनृत्य के समय गजराज का (काला) चमडा ओढे हुए एवं भस्म रमाने से श्वेत हुए भगवान् शिव की स्पष्ट समानता करते हुए (उन्हे 'नारद' समझ लिया) । टिप्पणी:- - प्रस्तुत श्लोक मे नारद की दो बातें वर्णन की गई है--एक तो उनकी शुभ्ररूपता जिसकी उपमा कपूरचूण के ढेर से दी गई है और दूसरी काले बादलो के ठीक नीचे उनकी उपस्थिति । इन्ही दोनो बातो के कारण नारद जी की उपमा उन भगवान् शिव से दी गई है जो श्वेत भूति रमाये हुए है और काला हस्तिचर्म अोढे हुए है। सर्घषाः- नवानित्यादिभिः ।। कीदृशममुम् । नवान्सद्यःसभृतसलिलान् । प्रतिनीला- निति यावत् । बृहनो विपुलान्पयोधरान्मेघानधोऽधः। मेघानां समीपाधःप्रदेशे स्थितमिति शेषः। 'उपर्यध्यधसः सामीप्ये' इति द्विर्भावः । तद्योगे द्वितीया । 'उभसर्वतसोः कार्या धिगुपर्यादिषु त्रिषु' इत्यादिवचनात् । समूढः पुजीकृतः । 'समूढः पुञ्जिते भुग्ने' इति विश्वः । कपूरस्य परागश्चूर्णं तद्वत्पाण्डुरम् । अतएव क्षण मेघसमीपावस्थानक्षणे । अत्यन्त सयोगे द्वितीया । क्षणेषु ताण्डवोत्सवेषु । ' निर्व्यापारस्थितौ कालविशेषोत्सवयोः क्षणः' इत्युभयत्राप्यमरः । उत्क्षिप्ता उपरि धारिता गजेन्द्रस्य कृत्तिश्चर्म येन तेन । 'अजिन चर्म कृत्तिः स्त्री' इत्यमरः । भूत्या भस्मना सितेन । 'भूतिभस्मनि सपदि इत्यमरः । शभुना स्फुटा उपमा साक्ष्य यस्य तं स्फुटोपमम् । स्फुटशभूपममित्यर्थः । सापेक्षत्वेऽपि गमकत्वात्स- मासः । सदृशपर्याययोस्तुलोपमाशब्दयोः 'मतुलोपमाभ्याम्-' इति निषेधात्सा- दृश्यवाचित्वे तृतीयेत्याहुः । केचिदिमं श्लोकं चयस्त्विषामित्यतः प्राग्लिखित्वा ( २२. ) व्याचक्षते । तेषां पुस्त्वावधारणात्प्राक् तेजःपिण्डमात्रस्यशंभूपमौचित्यं चिन्त्यम् । व्याकरण- अधोधः-देश अथवा काल' सम्बन्धी समीपता के अर्थ मे उपरि अधि तथा अधस् इन तीन अव्ययो को द्वित्व हो जाता है-"उपर्यध्यधसः सामीप्ये" (पा० ८।१। ७) फिर इन द्वित्वविशिष्ट शन्नो के योग मे द्वितीया विभक्ति होती है-“उभसर्वतसोः कार्या धिगुपर्यादिषु त्रिषु।" अतएव पयोधरान् मे द्वितीया हुई है। पयोधरान-धरन्तीति (+अच् कर्तरि) धराः, पयसा धराः पयोधराः (ष० तत्पु०), तान् । समूढकपूरपरागपाण्डुरम्-कर्पूरस्य परागाः (ष० तत्पु०), समूढाः (सम् + वह+क्त कर्मणि) कर्पूरपरागाः (कम० तत्पु०), त इव पाण्डुरः (उपमान- पूर्वपद कर्म), तम् । क्षणोत्क्षिप्तगजेन्द्रकृत्तिना-गजेन्द्रस्य कृत्तिः (ष० तत्पु) क्षणेषु उत्क्षिप्ता (उद् + क्षिप् +क्त कमरिण) गजेन्द्रकृत्तिः येन सः (ब० वी०) स्फुटोपमम्-स्फुटा उपमा यस्य (ब० बी०), तम् । भूतिसितेन-भूतिभिः सितः (तृ० तत्पु०), तेन । काषः पाण्डुरः-हरिणः पाण्डुरः पाण्डुः इत्यमरः । पीतसंवलित शुक्ल वर्ण को पाण्डुर कहा जाता है किन्तु कपूर का रङ्ग शुभ्र-श्वेत होता है, अतः पाण्डुर के स्थान पर 'पाण्डर' पाठ अधिक उपयुक्त समभ पडता है-शुक्लशुभ्र- शुचिश्वेतविशदश्येतपाण्डरा इत्यमरः । अलकार:- समूढकर्पूरपरागपाण्डुरम् मे वाचकलुप्तोपमा तथा क्षणोत्क्षिप्त......शम्भुना मे धर्मलुप्तोपमा अर्थालङ्कार है :- लुप्ता सामान्यधर्मादेरेकस्य यदि वा द्वयोः ।

( २३ ) "ौपम्यवाचिनो लोपे ससासे किपि च विधा। द्विधा समासे वाक्ये च लोपे धर्मोपमानयोः” (सा० द०) भावार्थ- कपूरधवलो देवर्षियंदा नवजलधराणामधस्ताल्लम्बते तदा नून ताण्डवरतस्य उत्क्षिप्तगजाजिनस्य शम्भोः-शोभामनुकुरुते स्म । दधान मम्भोरुहकेसरधु तीर्जटाः शरच्चन्द्रमरीचिरोचिषम् । विपाकपिङ्गास्तुहिनस्थलीरहो धराधरेन्द्र व्रततीततीरिव ॥५॥ अन्वय- अम्भोरुहकेसरद्य तीः जटाः दधानम्, शरच्चन्द्रमरीचिरोचिषम् (अतएव) विपाकपिङ्गाः तुहिनस्थलीरुहः व्रततीततीः दधानम् धराधरेन्द्रमिव स्थितम् अमुम् नारद इत्यबोधि। अर्थ- कमल की केसर की सी कान्तिवाली (अर्थात् पिङ्गल) जटाओ को धारण किए हुए, शरत्कालीन चन्द्रमा की किरणों के समान (धवल) कान्ति वाले, (प्रतएव) बर्फीले स्थान मे उगी हुई तथा परिपक्व होने के कारण-पीली लताओ के जाल को धारण करने वाले हिमालय के समान (स्थित उन्हे नारद जान लिया) सर्वषा- दधानमिति ।। पुनः अम्भोरुहकेसरद्य तीः पद्मकिंजल्कप्रभापिशङ्गीरि- त्यर्थः । जटा दधानम् , स्वय तु शरच्चन्द्रमरीचिरिव रोचियंस्यं तम् । धवलमि- त्यर्थः। अतएव विपाकेन परिणामेन पिनाः पिङ्गलास्तुहिनस्थल्या 'तुषारभूमी रोहन्तीति तुहिनस्थलोहा व्रततीततीलताव्यूहान् 'वल्ली तु व्रततिलता' इत्यमरः ।

( २४ ) दधान धराधरेन्द्रो हिमवान्। तुहिनस्थलीति लिङ्गानारदोपमानत्वाच्च तमिव स्थितम् । व्याकरण:- दधानम्-धा+शानच् (कर्तरि), तम् । अम्भोरहकेसरद्य तीः-अम्भसि रोहति इति(अम्भस्+रह+क कर्तरि) अम्भोरुहम् (उपपदतत्पु०),तस्य केसराः (ष० तत्पु०)। तेषा द्युतिरिव द्युतिः यासा ताः (बहु० बी०) ("सप्तम्युपमानपूर्वस्योत्तरपदलोपश्च वक्तव्यः"), ताः । शरच्चन्द्रमरीचिरोचिषम् -शरदः चन्द्रः (ष तत्पु०), तस्य मरीचयः (ष०तत्पु०), ते इव रोचिर्यस्य सः (ब०वी), तम् । विपाकपिङ्गाः-विपाकेन (वि+पच्+घन भावे) पिङ्गाः । यथा किराते प्रिमो पृथुस्तम्बभृतः पिशङ्गतां गता विपाकेन फलस्य शालयः" । तुहिनस्थलीरुहः-तुहिनस्य स्थली (प०तत्पु०), तस्या रोहन्ति इति तुहिन- स्थलोरुहः (तुहिनस्थ ली+रह+क्विप कर्तरि) (उप० तत्पु०), ताः । धराधरेन्द्रम्-धरति इति धरा (धु+अच् कर्तरि स्त्रियाम्), तस्या धराः (ष० तेत्पु०), तेषाम् इन्द्रः (१० तत्पु०); तम् हिमालयमित्यर्थः । यथाह कालिदासः 'यज्ञांगयोनितवमवेक्ष्य यस्य सारं धरित्रीधरणक्षम च । प्रजापतिः कल्पितयज्ञभार्ग शैलाधिपत्य स्वयंमन्वतिष्ठत् ॥ (कुं० स०) व्रततोतेतीः-व्रततीना ततयः (प० तत्पु०), ताः । कोषः- भरोचिः-भानुः करो मरीचिः स्त्रीपुसयोर्दीधितिः स्त्रियाम् इत्यमरः । रोचिः-स्यु प्रभारुगुचिस्त्विड्भामाश्छविधु तिदीप्तयः । रोचिःशोचिरुभे क्लीबे इत्यमरः। पिङ्ग:-कडारः कपिलः पिङ्गपिशङ्गो कद्रु पिङ्गली इत्यमरः ।

( २५ ) - अलकार उगमा तथा अनुप्रास । भविार्थ- धवलकान्तिः मुनिः शिरसा पिङ्गलप्रभा जटा वहन् तुषारमण्डिताधित्य- कासु उत्पन्ना विपाकेन पिङ्गलवर्णा लता धारयन् गिरिराजो हिमालय इव शुशुभे । पिशङ्गमौञ्जीयु जमर्जुनच्छवि वसानमेणाजिनमञ्जनयुति । सुवर्णसूत्राकलिताधराम्बरां विडम्बयन्त शितिवाससस्तनुम् । । ६ ।। अन्वय-पिशङ्गमौजीयुजम्, अर्जुनच्छविम्, प्रजनधु ति एणाजिन वसानम्, (अतएव) सुवर्णसूत्राकलिताधराम्बरा शितिवाससस्तनु विडम्बयन्तम् (अमुम् नारद इत्यबोधि)। अर्थ-पीली मुञ्जमेखला से युक्त, धवल कान्ति वाले, कज्जल के समान काला मृग चर्म प्रोढे हुए, (अतएव) सुवर्ण को मेखला (करधनी) से अधोवस्त्र (धोती) बाधे नीलाम्बर बलराम के शरीर का अनुकरण करते हुए (उन्हे नारद जान लिया)। सर्वकषा- पिशड्गेतिः ॥ पुनः कीदृशम् । मुञ्जस्तृणविशेषः तन्मयी मेखला मौजी पिशडग्या मौज्या युज्यत इति पिशङ्गमौजीयुक् तम् । 'सत्सूद्वि षइत्यादिना किप 'स्त्रिया: पु वत्-' इति पिशङ्गशब्दस्य पुवद्भावः । अर्जुनच्छवि धवलकान्तिम् वलक्षो धवलोऽर्जुनः इत्यमरः । अञ्जना त्यञ्जनवर्ण एणाजिन कृष्णमृगचर्म वसानमाच्छादयन्तम् । 'वस आच्छादने' इति धातोः शानच् । सुवर्णसूत्रण कनक- मेखलया प्राकलित बद्धमधराम्बरमन्तरीयं यस्यास्ता शितिवाससो नीलाम्बरस्य तनु विडम्बयन्तम् । अनुकुर्वाणमित्यर्थः । प्रार्थीयमुपमा । व्याकरण- पिशङ्गमौजीयुजम् = मुञ्जस्य विकार इंति मौजी (मुज+अण् स्त्रियाम्), पिशङ्गी पिङ्गलवर्णा चामी मौजी च पिशङ्ग (कर्मधा०), तया युज्यते ( २६ ) इति पिशङ्गमौञ्जीयुक (पिशङ्गमौजी-+युज्+विप कर्तरि) (उप० तत्पु०), तम् । (यहाँ 'स्त्रियाः पुवद् भाषितपु स्कादनूड् समानाधिकरणे स्त्रियामपूरणी- प्रियादिषु' इस नियम से पिशङ्गमौञ्जी पद मे पिशङ्गी को पुस्त्व रूप मिला है। --- अर्जुनच्छविम् = अर्जुना (धवला) छविर्यस्य (ब० वी०), तम् । वसानम् = वस+शानच् कर्तरि, तम् । एणाजिनम् = एरणस्य (मृगस्य) अजिनम् (ष० तत्पु०), तत् । सुवर्णसूत्राकलिताधराम्बराम् = सूवर्णस्य सूत्रम् सुवर्णसूत्रम् (प० तत्पु०), अधरम् अधोधतम्) अम्बरम् अधराम्बरम् (कर्म० समास) । सुवर्णसूत्रेण आक- लितम् (आ+कल+णिच् (स्वार्थे)+क्त (कर्मणि) इति सुवर्ण० (तृतीया तत्पु०) । सुवर्णसूत्र कलितम् अधराम्बर यस्याः सा (ब० वी०), ताम् । विडम्बयन्तम्- वि--डम्ब+णिच् (स्वार्थ)+ शतृ (कर्तरि) विडम्ब- यन्, तम् । शितिवाससः = शिति (मेचकम्) वासः (वस्त्र) यस्य सः शितिवासाः (ब० बी०), तस्य बलदेवस्येत्यर्थः । कोष:- पिशङ्ग-"कडारः कपिलः पिङ्गपिशङ्गी कद्रुपिङ्गलौ” इत्यमरः । अर्जुन-अवदातः सितो गौरो वलक्षो धवलोऽजुन:-अमरः शिती--शिती धवलमेचकौ--अमर: अल कार- यहाँ अनुप्रास तथा उपमा अलङ्कार है । ऐसी उपमा प्रार्थी कही जाती है-'प्रार्थी तुल्यसमानाद्यास्तुल्यार्थी यत्र वा वतिः”. सा० द० । यहाँ उपमेय (नारद) पुल्लिङ्ग तथा उपमान (बलदेवतनु) स्त्रीलिङ्ग है । इसे साहित्य के अचार्यो ने अलङ्कार दोष का भग्नप्रक्रम नामक कहा है ( २७ ) अस्याम् (उपमायाम्) एवोपमानोपमेययोर्लिङ्गवचनभेदस्य कालपुरुषविध्या- दिभेदस्य च भग्नप्रक्रमत्वम् (सा० द०, सप्तमः परिच्छेदः)। भावार्थ-मौज या मेखलया समन्विता कृष्णसारमृगाजिनं परिदधानो गौरवर्णो मुनिः सुवर्णमेखलया बद्ध नीलाम्बरं धारयतो धवलवपुषो बलदेवस्य शोभा दधौ। विहंगराजाङ्गरहैरिगयतैर्हिरण्मयोर्वीरहवल्लितन्तुभिः । कृतोपवीत हिमशुभ्रमुच्चकैर्घन घनान्ते तडितां गणैरिव ॥७॥ ५ अन्वय- - विहङ्गराजाङ्गरुहैः इव शयतैः हिरण्मयोर्वीरहवल्लितन्तुभिः कृतोपवीत, हिमशुभ्र, (प्रतएव) धनान्ते तहिता गण (उपलक्षितम्) उच्चकैः घनमिव (स्थितम् अमु नारद इत्यबोधि)। अर्थ:- गरुड के रोमों की भाति लम्बे, सुनहली भूमि मे उत्पन्न होने वाली लतामो के बने हुए (सुनहले) यज्ञोपवीत वाले एव बर्फ के समान गौर वर्ण वाले अतएव विजलियों के सम्ह से युक्त शरत्कालीन उन्नत मेघ के समान लगते हुए (उन्हे नारद जान लिया)। टिप्पणोः-नारद जी का यज्ञोपवीत सुनहले रंग का था और वे स्वयं हिम के समान गौर थे तथा प्राकाश मे ऊंचे स्थित थे। अतः कवि ने उनको उपमा शरत्काल के उस विद्युक्त मेघ से दी है, जो जलहीन होने के कारण श्वेत और उन्नत होता है । (वर्षा के मेघ जलभार से नीचे लटक आते हैं और काले होते है।) सर्वकषा- विहोति । । पुनः । विहगराजाङ्गरुहैरिव गरुत्मल्लोमतुल्यैरायतैर्दीघः । हिरण्यस्य विकारो हिरण्मयी। 'दाण्डिनायन-' इत्यादि नामयटि यलोप- - ( २८ ) निपातः । तस्यामुया॑ रुहा रूढाः । इगुपधलक्षणः कप्रत्ययः । तासावल्लीना तन्तु- भिस्तत्तु ल्यैः सूक्ष्मावयवैः । उपादानगुणात् । हिरण्मयः कृतोपवीत शोभार्थं कल्पितयज्ञसूत्र स्वयं हिमशुभ्रम् । अतएव धनान्ते शरदि तडिता गणरुपलक्षितम् । 'तडित्सौदामनी विद्युत्' इत्यमरः। उच्चै रेवोच्चकैरुन्नतघनं मेघमिव स्थितम् ।। व्याकरण- विहङ्गराजागरुहैः = विहायसा गच्छन्ति इति (विहायस् + गम् +खच् कतरि) विहङ्गाः (उप०तत्पु०), अ गेषु रोहन्ति इति अङ्गहा:(अ ग + रुह +क कर्तरि। उप० तत्पु० । विहगाना राजा इति विह गराजः (विहग+ राजन् +टच्) ष० तत्पु० । तस्य अ गरुहाः, तैः (यह तृतीयान्त पद कृतोपवीतं मे 'कृत' का करण आयतै.-पा+यम् + क्त (कर्तरि) आयताः, तैः । हिरण्मयोरिहवल्लितन्तुभि :--हिरण्यस्य विकारः इति हिरण्मयो (हिरण्य + मयट् स्त्रियाम्, हिरण्मयो चासौ उर्वी चेति हिरण्मयोर्वी (कर्मधा०)। तस्या रोहन्ति इति हिरण्मयोर्वीरुहः (हिरण्मयोर्वो+रह+क कर्तरि स्त्रिप्राम) उप० तत्पु० । तादृश्यः वल्लयः (कर्मधा०)। तासा तन्तव. (ष० तत्पु०), तैः । कृतोपवातम्-(उप+वि+इ+क्त कौर ) उपवीतम् । उपवीतं यस्य सः (बहु० बी०), तम् । हिमशुभ्रम्-हिममिव शुभ्रः हिमशुभ्र. (उपमानकर्मधा०),तम् । घनान्ते-घनस्य अन्तः घनान्त., (ष० तत्पु०), तस्मिन् । अथवा धनाना- मन्तः धनान्तः (१० तत्पु० ) सः अस्ति अस्मिन् इति घनान्तः (धनान्त+अच मत्वर्थ), तस्मिन् । कृतम् कोषः - "वल्ली तु व्रततिलता"-(अमरः) । "तडि त्सौदामिनी- विद्य चलताञ्चला चपला अपि (अमर)। "उपवीत यज्ञसूत्र प्रोद्ध ते दक्षिणे करे"-(अमर)।

( २६ ) अलङ्कार-उपमालकार । (नारद का यज्ञोपवीत स्वरिणम- भूमि पर उगने वाली अतएव स्वर्णवर्ण की लता के तन्तुओ से निर्मित या और उसका विस्तार बताने के लिये ही गरुड के विशाल प खो को उपमान के रूप मे रक्खा गया है । भावार्थः--शुभ्रवर्णो देवर्षिहेमवर्णसूत्र निर्मित यज्ञोपवीत दधानः तडिल्ले- खालाञ्छितः : शरद्घन इव रराज । निसर्गचित्रोज्जवल सूक्ष्मपक्ष्मणा लसद्विसच्छेदसिताङ्गसङ्गिना । चकासत चारुचमूरुचर्मणा कुथेन नागेन्द्रमिवेन्द्रवाहनम् ।। ८ ।। अन्वय-निसर्गचित्रोज्ज्वलसूक्ष्मपक्ष्मणा, लसद्विसच्छेदसिताङ्गसङ्गिना चारुचमूरुचर्मणा कुथेन इन्द्रवाहन नागेन्द्रमिव चकासतम् (अमु नारद इत्यबोधि)। अथः स्वभाव से ही चितकबरे और उज्ज्वल (चटकीले) सूक्ष्म रोमो से युक्त, सुशोभित मृणाल के खण्ड की भाति गौर शरीर पर पड़े हुए सुन्दर मृग- चर्म के मे इन्द्र के वाहन ऐरावत की भाँति शोभित होते हुए (उन्हे नारद जान लिया)। सर्वकषा- निसर्गेति ॥ पुनः निसर्गात्स्वभावादेव चित्राणि शबलान्युज्ज्वलानि भास्व- राणि लोमानि यस्य तेन । लसन्यो विसच्छेदो मृणालखण्डः । 'छेदः खण्डेऽस्त्रि- याम' इति त्रिकाण्डशेषः । तद्वत्सितेऽडगे वपुषि सङ्गिना सक्त न चारुणा मनोह- रेण चमूरुचर्मणा मृगत्वचा कृथेन पृष्ठास्तरणेन । 'प्रवेण्यास्तरण वर्णः परिस तोमः कुथो द्वयोः' इत्यमरः । इन्द्रवाहनं नागेन्द्रमैरावतमिव चकासतं शोभमा- नम् इन्द्रस्य वाहनमिति स्वस्वामिभावमात्रस्य विवक्षितत्वात् 'वाहनमाहितात्' इति न रगत्वम् । यथाह वामनः - 'नेन्द्रवाहनशब्दे णत्वमाहितत्वस्याविवक्षित- त्वात् इति । चकासतेः शतरि 'नाभ्यस्ताच्छतुः' इति नुमभावः । 'जक्षित्यादयः षट्' इत्यभ्यस्तसज्ञा ॥ - व्याकरण- निसर्गचिन्नोज्ज्वलसूक्ष्मपक्ष्मणा-चित्राणि च उज्ज्वलानि चेति चित्रो- ( ३० ) 4 ज्ज्वलानि (कर्मधा०), चित्रोज्ज्वलानि च तानि सूक्ष्माणि चेति चित्रो० (कर्मधा०) तादृशानि पक्ष्माणि यस्य तत् (ब० बी०), तेन ल सद्विसच्छेदसिताङ्गसङ्गिना-विसस्य छेदः (प० तत्पु०), लसन् (लस्+शत कर्तरि) विसच्छेदः इति लसद्विसच्छेदः (कर्मधा०), स इव सितम् (उपमान कर्म०) । तादृशम् अङ्गम् (कर्मधा०), तस्य सड्नी (प० तत्पु०), तेन । चकासतम्-चकास (अदादि)+ शतृ कतारे, तम् । “जक्षित्यादयः षट्' (६।१६) नियम से चकास् भी अभ्यस्त-सज्ञक हो जाती है, अतः “नाभ्यस्ताच्छतुः" (७।१।७८) नियम से इसमे होने वाले शतृ को नुम् नही हुआ । चारुचमूरुचर्मणा- चमूरोश्चर्म (ष० तत्पु०)। चारु चमूरुचर्म (कर्मधा०), तेन । इन्द्रवाहनम्-इन्द्रस्य वाहनम् [ष० तत्पु०) यहाँ “वाहनमाहितात्" (४८) नियम से वाहन के न को, पूर्वपद इन्द्र मे र के होते हुये भी, णत्व नही हुआ क्यो कि यहाँ इन्द्र केवल ऐरावत के स्वामी के नाते प्रयुक्त हुये है, सवार के रूप में नही । यहाँ इन्द्र में माहितत्व [सवारी. विवक्षित नहीं है। कोष:- "स्वरूपं च स्वभावश्च" [अमर] 'पक्ष्माक्षिलोम्नि किञ्जल्के तन्त्वाद्य शेऽप्यणीयसि - [अमर. मृणालं विसम्” [अमर. अलङ्कार-यहाँ अनुप्रास एव उपमा अलकार है। भावार्थ:-देवर्षे रदस्य धवलवर्णेऽङ्ग उत्तरीयस्थाने विचित्रवणं चमूरू- मृगचर्म बद्वम् आसीत् येन स मुनिः पृष्ठास्तरणावृत ऐरावत इव रेजे। अजस्रमास्फालितवल्लकीगुणक्षतोज्ज्वलाङ्गुष्ठनखाँशुभिन्नया । पुरः प्रवालैरिव पूरितार्धया विभान्तमच्छस्फटिकाक्षमालयां ॥६॥ अन्वय--अजस्त्रम् प्रास्फालितवल्लकीगुणक्षतोज्ज्लाड्गुष्ठनखाशुभिन्न- - या, (अतएव) पुरः प्रवालैः पूरिताधया इव अच्छस्फटिकाक्षमालया विभान्तम, (अमुनारद इत्यबोधि)। अर्थ-वीणा के सतत बजाए गये तारो की रगड से (लाल पड़े हुए) अगूठे के नख की उज्ज्वल (लाल) किरणो से मिश्रित होने के कारण अगले आवे भाग मे मानो। म गो से पूरित (युक्त) स्वच्छ स्फटिक की माला से सुशो- भित (उन्हे नारद जान लिया) सर्वकषा- अजस्र मिति ॥ पुनरजस्र प्राचुर्येरणास्फालिनास्ताडिताः । सौष्ठवपरीक्षाथ न्युब्जाङ्ग ष्ठेन तन्त्रीताडन प्रसिद्धम् । तेषा वल्लकीगुणाना वीणातन्त्रीणा क्षतेन सघर्षणेनोज्ज्वलैरन ष्ठनखाशुभिभिन्नया मिश्रया । तद्रागरक्तयेत्यर्थः अतएव पुरः पुरोभागे प्रवालैर्विद्रु मै । '-अथ विद्रुमः पु सि प्रवाल पु नपु सकम्' इत्यमरः । पूरितार्धयेव स्थितया अच्छस्फटिकाना मालया । जयमालयेत्यर्थः । 'अच्छो भल्लूके स्फटिकेऽमलेऽच्छाभिमुखेऽव्ययम्' इति हेमचन्द्रः । तथा प्रसिद्धस्फटिक- ग्रहगाहर्मोक्षार्थित्व व्यज्यते । 'स्फटिको मोक्षदः परम्' इति मोक्षार्थिना स्फटिकाक्षमालाभिधानात् । विभान्त भासमानम् । भातेः शतृप्रत्ययः । अत्र नखाशुभिन्नयेति स्वगुण त्यागेनान्यगुणस्वीकारलक्षणस्तद्गुणालकार तद्गुणः स्वगुरगत्यागात्' इति । व्याकरण-- अजस्रम् = न.जस्यति मुञ्चति (न+जस+कर्तरि)। आस्फालितवल्ल कीगुणक्षतोज्ज्वलाङ्गुष्ठनखांशुभिन्नया-दल्लक्या- गुणा । वल्लकीगुरगाः (ष० तत्प)। अड्गुष्ठस्य नखः अडगुष्टनखः (१० तत्पु०ः प्रास्फालिताः (मा+स्फाल+रिणच्+क्त कर्मणि, वल्लकीगुणाः इति प्रास्फा- लितवल्लकीगुणाः (कर्मधारय०), तेषा क्षतम् (प० तत्पु०), तेन उज्ज्वलः(तृ० तत्पु०) । स चासौ अङ्ग ष्ठनखश्च (कर्मधा०)। तस्य अ शवः (ष० तत्पु०), तैः भिन्ना (तृ० तत्पु०), तया । पूरितार्द्धया--पूरितम , (पूर+णिच् +क्त कर्मणि) अर्द्धम् यस्याः सा पूरितार्धा (बहु० बी०), तया । - ( ३२ ) विभान्तम्-वि+भा+शतृ, तम् । अच्छस्फटिकाक्षमालया-प्रक्षाणा माला इति अक्षमाला (ष० तत्पु०) अच्छाः स्फटिकाः इति अच्छस्फटिकाः (कर्मधारय), तेषाम् अक्षमाला इति अच्छ- स्फटिकाक्षमाला (ष० तत्पु०), तया । कोषः- "नित्यानवरताजस्रमपि' -अमरः। “वीणा तु वल्लकी"-अमरः । 'मुरगज्यासूत्रतन्तुषु रज्जो”-हैमः। अलङ्कार-यहा मल्लिनाथ के अनुसार स्फटिक की माला अपने धवल वर्ण का त्याग कर नख की रक्ताभ किरणो से रक्त गुण स्वीकार करती है, अतः तद्गुण' नामक अर्थालङ्कार है (तद्गुणः स्वगुणत्यागादत्युत्कृष्टगुणग्रहः -सा० दपण)। किन्तु माला अपना पूर्ण गुण त्याग नहीं करती। अतः तद्गुण की अपेक्षा उत्प्रेक्षा अधिक स्पष्ट प्रतीत होती है । भावार्थ:-नारदस्य करे शोभमाना धवलस्फटिकगुटिकाविनिर्मितजय- माला तस्य सतततन्त्रीसघर्षरणेन गाढारुणया अड्गुष्ठनखप्रभया प्रवालपूरितार्की इव बभौ। रणद्भिराघट्टनया नभस्वतः पृथग्विभिन्नश्रु तिमण्डलैः स्वरैः। स्फुटीभवद्ग्रामविशेषमूछनामवेक्षमाण महतीं मुहुमुहुः ॥१०॥ अन्वय-नभस्वत प्रापट्टनया पृथक् रणद्भिः विभिन्नश्रुतिमण्डलैः स्वरैः स्फुटीभवद्ग्रामविशेषमूर्च्छना महती मुहुमुहुः अवक्षमाणम् (अमु नारद इत्य- बोधि)। अर्थ-वायु के आघात से पृथक् निकलने वाले (बजने वाले-अक्षरार्थ) व्यवस्थित (नियत) श्रुतिसमूहो से युक्त स्वरो के द्वारा स्पष्ट फूटते (निकलते') विशिष्ट स्वर- सघातो और उनके प्रारोहावरोहो (लय) वाली अपनी महती नामक वीणा को बार २ देखते हुए (उन्हे नारद जान लिया)।

, टिप्पणी -स्वरो के प्रारम्भ में होने वाले उन (स्वरो) के पूर्वाङ्ग-भूत शब्द- विशेष को श्रुति' कहते है जैसा कि मल्लिनाथ ने अपनी सर्वकषा मे 'श्रु तिर्नाम स्वरारम्भकावयवः शब्दविशेषः कहकर स्पष्ट किया है । स्वरो के सघात को सगीत शास्त्र की भाषा मे 'ग्राम' कहते है और ये ग्राम षड्ज, मध्यम तथा मान्धार के भेद से तीन प्रकार के होते है । 'ग्राम' का लक्षण तथा उसके तीनो भेद नीचे सर्वकषा मे दिए गए है । स्वरो के प्रारोहावरोह या चढाव-उतार को 'मुर्छना' कहते है । एक 'ग्राम' मे सात मूर्च्छनाये होती है। इस प्रकार तीनो 'ग्रामों मे कुल २१ मूर्छनाये होती है । रणद्भिरिति-पुनः नभस्वतो वायोराघट्टनया प्राघातेन पृथगसकीणं रणद्भि- वनद्भिः। अनुरणनोत्पद्यमानैरित्यर्थः । 'श्रु त्यारब्धमनुरणन स्वरः' इति लक्षणात्, तदुक्त रत्नाकरे- 'श्रु त्यनन्तरभावी यः स्निग्धोऽनुरणनात्मकः । स्वतो रञ्जयति श्रोतुश्चित्त स स्वर उच्यते ।' इति । श्रुति म स्वरारभ्भ कावयवः शब्दविशेषः । तदुक्तम्-'प्रथमश्रवणाच्छब्दः श्र यते ह्रस्वमात्रकः । स श्रुतिः सपरिज्ञ या स्वरावयवलक्षणा ॥' इति । विभिन्नानि प्रतिनियतसख्यया व्यवस्थितानि अ तोना मण्डलानि समूहा येषा तैर्विभिन्नश्रु तिमण्डलैः । श्रुतिसख्यानियमश्च 'दर्शितः-'चतुश्चतुश्चतुश्चैव षड्जमध्यमपञ्चमाः । द्वे द्व निषादगान्धारौ त्रि स्त्रिऋ- षभधैवतौ ।।' षड्जादयः सप्तोक्तलक्षणाः। तदुक्तम्-'श्रुतिभ्यः स्युः स्वराः षड्जर्षभगान्धारमध्यमाः। पञ्चमो धैवतश्चाथ निषाद इति सप्त ते । तेषा संज्ञाः सरिगमपधनीत्यपरा मताः ॥' इति । तैः स्वरैः स्फुटीभवन्त्यो ग्रामविशेषाणां षड्जाद्यपरनामकाना स्वरसघातभेदाना त्रयाणा मूर्च्छनाः स्वरारोहक्रमभेदा यस्या ता महनी महतीनाम्नी निजवीणाम् 'विश्वावसोस्तु बृहती तुम्बुसेस्तु कला- वती । महतीं नारदस्य स्यात्सरस्वत्यास्तु कच्छपी ॥' इति बैजयन्ती । मुहुर्म हुर- वेक्ष मारणम् । तन्त्रीयोजनाभेदलक्षरणमहिम्ना पुरुषप्रयत्नमन्तरेणैवाविसंवादं ध्वन- तीति कौतुकादनुस दधानमित्यर्थः । अथ ग्रामलक्षणम्-'यथा कुटुम्बिनः सर्वेs प्येकीभूता भवन्ति हि । तथा स्वराणा सदोहो ग्राम इत्यभिधीयते ।। षड्जनामो भवेशदौ मध्यमग्राम एव च । गान्धारग्राम इत्येतद्ग्रामत्रयमुदाहृतम् ॥ इति । ३ । तथा-'नन्द्यावर्तोऽथ जीमूतः सुभद्रो ग्रामकास्त्रयः। षड्जमध्यमगान्धारास्त्रयाणां जन्महेतवः ॥' इति । मूर्च्छनालक्षण च-क्रमास्वराणां ससानामारोहश्चावरो- हणम । सा मूर्च्छत्युच्यते ग्रामस्था एताः सप्त सप्त च।। ग्रामत्रयेऽपि प्रत्येक सप्त सप्त मूच्छंना इत्येकविंशतिमूर्छना भवन्ति । तत्रेह नामानि तु 'नानपेक्षितमुच्यत' इति प्रतिज्ञाभङ्गभयान्त लिख्यन्त इति सर्वमवदातम् । अत्र पु व्यापारमन्तरेण स्वरा- द्याविभावोक्त्या कोऽपि लोकातिक्रन्तोऽयं शिल्पसौष्ठवातिशयो वीणायाः प्रतीयते। तेन सह स्वतः प्रसिद्धाविशयस्याभेदेनाध्यवसितत्वात्तन्मूला शयोक्तिरलंकारः। सा च महत्याः पु व्यापार विना मूर्छाद्यसबन्धेऽपि स बन्धाभिधानादसंबन्धे संबन्ध- रूपतया पु व्यापाराख्यरूपकारणं विनापि मूर्च्छनादिकार्योत्पचिद्योतनाद्विभावना व्यज्यत इत्यलकारध्वनिरिति संक्षेपः॥ - व्याकरण- रणद्भिः-रण+शतृ (कर्तरि), रणन्तः, ते : आघट्टनया-पा+घट्ट+णिच्(स्वार्थ)+युच् (भावे) आघट्टना, तया नभस्वतः-नभः अस्ति अस्य इति नभस्वत् (नभस्+मतुप) (यहाँ तसौ मत्वर्थे' नियम से नभस् का 'स्' मत्वर्थ प्रत्यय का रहने पर पद न हुआ। अतः इस 'स्' को कोई सन्धि-विकार नही हुआ।) विभिन्नश्रुतिमण्डलैः-श्रु तीना मण्डलानि श्रु तिमण्डलानि(ष० तत्पु०), विभिन्नानि श्र तिमण्डलानि येषा ते (ब० वी०), तैः । स्फुटीभवप्रामविशेषमूर्च्छनाम्-प्रामाणां विशेषाः ग्रामविशेषाः (ष० तत्पु०), तेषों मूर्च्छनाः (ष० तत्पु०)। अस्फुटाः स्फुटाः सम्पद्यमाना भवन्त्य फुटीभवन्त्यः (स्फुट+च्चि+भू+शत+डीप) (गति तत्पु०) । स्फुटीभवन्त्य ग्रामविशेषमूर्च्छनाः यस्या सा (बहु.), ताम् । अवेक्षमाणम्-अव+ईक्ष+शानच (कर्तरि), तम् । कोष- नभस्वद्वातपवनपवाभानप्रभजना" अमर:

( ३५ ) अलकार- यहाँ वीणामे बिना किसी व्यक्ति के प्रयत्न किये ही स्वरो को व्यक्त ध्वनि हो रही है, जिससे उसका अतिशय (वैशिष्ट्य) •द्योतित होता है। अतः इसे असम्बन्ध में सम्बन्ध रूप अतिशयोक्ति अर्थालङ्कार कहा जायगा क्योकि मूच्छंनाओं का जो सम्बन्ध महती नामक वीणा के साथ कहा गया है, वह वास्तव मे किसी व्यक्ति-विशेष के प्रयत्न के बिना वहाँ है नही। फिर इस अतिशयोक्ति से विभावना नामक एक अन्य अलङ्कार भी व्यजित होता है, क्योकि यहां किसी व्यक्ति विशेष के प्रयत्न रूप कारण के बिना ही मुर्छना-रूप कार्य होता है। इस प्रकार यहाँ मलङ्कार से अलङ्कार की ध्वनि (व्यञ्जना) होती है । सस्कृतार्थ :- अवतरति देवर्षों तस्य महतीनाम्न्यां वोरणाया वायोराघाताद् विभिन्नाः स्वरा युगपदेव सञ्जाताः । ते स्वरा अपि गतिवेगवशाद् आरोहावरोहक्रमेणव स्वनन्तः षड्जमध्यमगान्धाराणां प्रामाणा मूर्च्छना प्रकटीचक्र: । मुनिरपि ततः सकौतुकात् ता महतीमवेक्षत। निवर्त्य सोऽनुब्रजतः कृतानतीनतीन्द्रियज्ञाननिधिर्नभःसदः । समासदत्सादित दैत्यसंपदः पदं महेन्द्रालयचारु चक्रिणः ॥ ११॥ . - अन्वय- प्रतीन्द्रियज्ञाननिधिः सः अनुव्रजतः कृतानतीन् नभः सदा निवर्त्य सादितदैत्य- सम्पदः चक्रिणः महेन्द्रालयचारु पदं समासदत् । अर्थ- - इंद्रियो के द्वारा न जानने योग्य ज्ञान के निधान नारद जी अपने पीछे प्राते हुए देवताओं को, जो प्रणाम कर चुके थे, लौटा कर दैत्यों का वैभव ( .३६ ) - L विध्वस करने वाले सुदर्शनचक्रधारी भगवान् कृष्ण के इन्द्रभवन-सदृश सुन्दर स्थान पर आ पहुचे । निवत्येति । अतीन्द्रिया इन्द्रियमतिक्रान्ता देशकालस्वरूपाद्विप्रकृष्टार्था.। 'अत्यादयः क्रान्ताद्यर्थे द्वितीयया' इति समासः। द्विगुप्राप्तापन्नालपूर्वगतिसमासेपु परलिगताप्रतिषेधो वक्तव्यः' इति विशेष्यलिङ्गत्वम् । तेषा ज्ञान तस्य निधिः । सर्वार्थद्रष्टेत्यर्थं । कृतानतीन्कृतप्रणामाननुव्रजतोऽनुगच्छतः नभस्याकाशे सीदन्ति गच्छन्तीति नभःसद. सुरान् । 'सत्सद्विष-' इत्यादिना विप । निवर्त्य प्रतिषिध्य स मुनिः सादितदैत्यसपदः सादिताः विध्वस्तोकृता. दैत्याना सपदो येन तस्य चक्रिणः कृष्णस्य पद स्थान महेन्द्रालयचारु इन्द्रभवनमिव भासमान समासदत् । समाङ्पूर्वाषद्लुधातोलुड् । 'पुषादि--' इत्यड् । अत्र नतीनती पदःपदमिति च द्वयोर्व्यञ्जनयुग्मयोरसकृदन्या छेकानुप्रास. । अन्यत्र वृत्त्यनुप्रास इत्यनयोः ससष्टिः। व्याकरण- निवत्य-नि+वृत्+णिच् + ल्यप अनुब्रजतः- अनुवज् + शतृ+तान् कृतानतीन्-प्रानतिः (आ+नम् +क्तिन् भावे)। कृता प्रानतियः (ब० वी०), तान् । अतीन्द्रियज्ञान निधिः-इन्द्रियम् अतिक्रान्ताः अतीन्द्रियाः (गति तत्प०) । तेषा ज्ञानम् (ष० तत्पु०), तस्य निधिः (ष०तत्पु०) नभः सदः-नभसि सीदन्ति इति नभः सदः (नभस्+सद् + क्लिप कर्तरि) (उप० तत्पु.), तान् समासदत्- सम् + आ + सद् + लुड् तिप । सादितदैत्यसम्पदः-दैत्याना सम्पत् (प०तत्पु ०), सादिता (सद् + णिच् +क्त कर्मणि) दैत्यसम्पत् येन सः (ब० वी०), तस्य ।

३७ ) महेन्द्रालयचारु-महेन्द्रस्य प्रालयः (ष० तत्पु०), स इव चारु (उपमान- कर्म), तत् । चक्रिणः-चक्रम् अस्ति अस्य इति चक्री [चक्र + इनिः मत्वर्थे, तस्य अलङ्कार- यहा नतीनती तथा पदः पदम् मे दो दो व्यञ्जनो की एक बार आवृत्ति होने से छेकानुप्रास है, अन्यत्र वृत्त्यनुप्रास है और इस प्रकार दोनो शब्दालङ्कारों की 'ससृष्टि' है। भावार्थ- त्रिदिवात् अन्वागच्छतः देवान् कृतप्रणामान निवत्यं दिव्यदर्शी देवर्षि वैजयन्तोपम श्रीकृष्णभवनम् एकाकी एवाजगाम । पतत्पतङ्गप्रतिमस्तपोनिधिः पुरोऽस्य यावन्न भुवि व्यलीयत । गिरेनडित्वानिव तावदुच्च कर्जवेन पीठादुदतिष्ठदच्युतः।। १२ ।। ऋन्वयma- पतत्पतङ्गप्रतिमः तपोनिधिः अस्य पुरः भुवि यावत् न व्यलीयत, तावत् अच्युतः : उच्चकैः गिरेः तडित्वान् इव उच्चकैः आसनात् जवेन उदतिष्ठत् । अर्थ । .. के नीचे आते हुए सूर्य के समान (तेजस्वी) मुनि नारद जी भगवान् कृष्ण सम्मुख पृथ्वी पर आ भी नहीं पाये थे कि वे उन्नत पर्वत से विद्युन्मय मेघ के समान अपने ऊँचे आसन से वेगपूर्वक उठ कर खडे हो गए । पतदिति ॥ तन् य. पतङ्गः सूर्यः स प्रतिमोपमान यस्य सः । 'पतङ्गो पक्षि सूर्यों च' इत्यमरः । तपोनिधिमुनिरस्य हरेः पुरो भुवि पुरः प्रदेशे यावन्न ( ३८ ) व्यलीयत नातिष्ठत् । लीड् गतौ' इति धातोद वादिकात्कर्तरि लड् । तावदच्युतो हरिगिरेः शैलात् । तडितोऽस्य सन्तीति तडित्वान्मेघ इव । 'मादुपधायाश्च मतोवों ऽयवादिभ्यः' इति मतुपो मकारस्य वकारः। 'तसौ मत्वर्थे' इति भसज्ञा- यामकसज्ञाधिकारेणापदत्वान्न जश्त्वम् । उच्चकैरुन्नतात्पीठादासनाज्जवेनोद- तिष्ठत् । मुनिचरणस्य भूस्पर्शात्प्रागेव स्वयमुत्थितवान् । 'ऊध्वं प्रारणा ह्य त्क्रा- मन्ति यूनः स्थविर प्रायति । प्रत्युत्थानाभिवादाभ्या पुनस्तान्प्रतिपद्यते' ॥ इति शास्त्रमनुस्मरन्निति भावः । 'उदोऽनूर्वकर्मणि' इति नियमादिहोर्ध्वकर्मणि नात्मनेपदम् । पतत्पतङ्ग इत्यत्र पतङ्गस्य पतनासभ वादियमभूतोपमेत्याचार्यदण्डि- प्रभृतयो बभणुः । अतएवाप्रसिद्ध स्योपमानत्वायोगादुत्प्रेक्षेत्याधुनिकालकारिकाः सर्वे वर्णयन्ति ।। व्याकरण- - पतत्पतङ्गप्रतिमः -पतन् (पत् शतृ) चासो पतङ्गः ( कर्मधा०), पतत्पतङ्गः प्रतिमा यस्य सः (बहु० वी०) पतत्पतङ्गप्रतिमः । तपोनिधिः-निधीयते अस्मिन्निति निधिः (नि + धा + कि अधि- करणे), तपसा निधिः तपोनिधिः (प० तत्पु.] । पुरस्य-यहाँ पुर. दिग्वाची है तो भी चूकि इसमे असि प्रत्यय हुआ है (पूर्व + डि+ असि स्वार्थे) जो अतसर्थ है, अतः 'षष्ठ्यतसर्थ प्रत्ययेन' नियम से अस्य में षष्ठी ही हुई। व्यलीयत-वि+लीड् ( गत्यर्थक दिवादिगणीय धातु )+ लङ् (कर्तरि)। तडित्वान्-तडिदस्ति अस्येति (तडित् + मतुप्) (तसौमत्वर्थे इस सूत्र से तडित् के 'त्' को कोई सन्धिविकार नहीं हुआ) । उच्चकै:--पञ्चम्यन्त अव्यय; 'पीठात्' के विशेषण रूप में प्रयुक्त । उदतिष्ठत्-उद् + स्था+लड् + तिप् ।

( ३६ ) कोष:- पतङ्गः = "पतङ्गौ पक्षिसूय्यौ च । तडित्वान् - "धाराधरो जलधरस्तडि- त्वान् वारिदोऽम्बुभृत्" अमरः । अच्युतः= पीताम्बरोऽच्युतः शाी विष्वक्सेनो जनार्दनः इत्यमरः। o- अलङ्कार- अनुप्रास एवं उत्प्रेक्षा अलङ्कार । विशेष सर्वङ्कषा मे द्रष्टव्य है । भावार्थ- तेजोराशौ देवषौं नारदे आकाशात् स्वसम्मुखमवतरत्येव तत्स्वागतार्थ भूमौ तस्य पादस्पर्शात् पूर्वमेव स्वोच्छितादासनात् वेगेन उत्तिष्ठन् पीताम्बरो भगवान् शौरिः उच्छितात् गिरिशिखरात् उद्गच्छन् विद्युन्मयो मेघ इव बभौ। अथ प्रयत्नोन्नमितानमत्फणैधृते कथंचित्फणिनां गणैरधः । न्यधायिषातामभिदेवकीसुतं सुतेन धातुश्चरणौ भुवस्तले ।। १३ ।। अन्वय- अथ प्रयत्नोन्नमितानमत्फणः फणिनां-गणः अधः कथञ्चित् धृते भुवस्तले धातुः सुतेन अभिदेवकीसुत चरमौ न्यधायिषाताम् । अर्थ- तदनन्तर ब्रह्मा के पुत्र नारद जो ने पातल मे नाग-गणो द्वारा प्रयत्न- पूर्वक ऊपर उठाये जाने पर भी नीचे की ओर झुकते हुये फणो पर किसी २ प्रकार से धारण किये गये. भूतल पर भगवान् कृष्ण के सम्मुख अपने पैर रखे।

( ४० ) अथेति ।। अथाच्युताभ्युत्थानानन्तर धातुः सुतेन नारदेन प्रयत्नोन्नमितास्तथापि मुनिपादन्यासभारादानमन्त्यः फणा येषा तैः फणिना गणैरधोऽधःप्रदेशे कथचिद्धृ- ते स्थापित भुवस्तले भूपृष्ठे । अभिदेवकीसुतं देवकीसुतमभि । लक्ष्यीकृत्येत्यर्थः। 'लक्षणेनाभिप्रती आभिमुख्ये' इत्यव्ययीभावः । चरणौ पादौ । 'पदविश्चरणोs- स्त्रियाम्' इत्यमरः । न्यधायिषाता निहितौ । दधातेः कर्मणि लुड् । 'स्यसिच्सी--' इत्यादिना चिण्वदिटि युक् । अत्र फणाना नमनोन्नमनासबन्धेऽपि मुनिगौरवाय तत्सबन्धाभिधानादतिशयोक्तिभेदः ॥ १ व्याकरण- प्रयत्नोन्नमितानमत्फणैः-प्रयत्नेन उन्नमिताः :-प्रयत्नेन उन्नमिताः (उद्+नम् + णिच +क्त कर्मणि) प्रत्यत्नोन्नमिताः (तृ० तत्पु०) । प्रयत्नोन्नमिताः प्रानमन्तः (पानमन्त्य.वा) फणाः येषा ते (ब० वी० ), तैः । फणिनाम्-फरणाः सन्ति एषाम् इति (फण+इनिः (मत्वर्थे ), तेषाम् । न्यधायिषाताम्-नि+धा+लुड् प्राताम् ( कर्मणि ) अभिदेवकीसुतम्-देवक्याः सुतः इति देवकीसुतः (१० तत्पु०), देवकी- सुतम् अभि अभिदेवकीसुतम् (अव्ययीभाव) । (यहाँ यदि समास न माने तो भी पद अथवा अर्थ मे कोई परिवर्तन न होगा।) धातुः-धा+तृच् + (कर्तरि )+षष्ठी एकवचन । कोष- G -अमरः फरण-"स्फटाया तु फरणा द्वयोः"-अमरः । धातुः-"धाताब्जयोनिद्रुहिणो विरिञ्चिः कमलासन: अलङ्कार-- यद्यपि फरिणयो के फणो का वस्तुत. नमन, उन्नमन आदि कुछ नहीं होता किन्तु मुनि के गौरव का अतिशय व्यक्त करने के लिए कवि ने उसकी ( ४१ ) योजना की है। अत. इसे असम्बन्ध मे सम्बन्ध रूप अतिशयोक्ति अलङ्कार कहा जायगा। भावार्थः- तदनन्तर विरिञ्चिसुतो देवर्षिारदो भगवतो देवकीसुतस्य पुरतो नागगणैः स्वफणैधृते भूतले चरणौ निदधौ । तम र्यमादि कयादिपूरुपः सपर्य या साधु स पर्य पूपुजत् । गृहानुपैतुप्रणयादभीप्सवो भवन्ति नापुण्यकृतां मनीषिणः ॥ १४॥ . अन्वय- - आदिपुरुषः स. अयं तम् अादिकया सपर्यया साधु पर्यप पु जत् । मनीषिणः अपुण्यकृता गृहान् प्रणयात् उपैतुम् अभीप्सव. न भवन्ति । अथ- आदि पुरुष उन भगवान् कृष्ण जी ने पज्य उन नारद जी की अर्ध्य इत्यादि पूजा की सामग्रियो से विधिवत् पूजा की । सन्त जन (अक्षरार्थ- बुद्धिमान्) पुण्यहीनो के घर प्रेम पूर्वक पहुँचने की इच्छा (ही) नहीं करते । टिप्पणी- भाव यह है कि सन्त बडे ही भाग्य से प्राप्त होते है । अतएव जिन पुण्यवान् जनों को वे बिना बुलाए ही प्रेमपूर्वक दर्शन दे , उन्हे उनका आदर-सत्कार करना ही चाहिये। तमिति ॥ मादिपुरुषः पुराणपुरुषः 'अन्येषामपि दृश्यते' इति वा दीर्घः स कृष्णः । अर्घ पूजामहतीत्यर्थ्यः । 'दण्डादिभ्यो य' । त नारदम् । अर्घार्थ द्रव्यमय॑म् । 'पादार्घाभ्या च' इति यत्प्रत्ययः । मूल्ये पूजाविधावर्घ.', 'षट् तु त्रिष्वय॑मर्थि' इति चामरः । अय॑मादिर्यस्यास्तयाादिकया।

( ४२ ) 'शेषाद्विभाषा' इति विकल्पेन कप्प्रत्ययः । सपर्यया पूजया । 'पूजा नमस्यापचितिः सपर्चािहणा समाः' इत्यमरः । साधु यथा तथा पर्यपूपुजत् । परिपूजितवान् । रणौ चङन्तं कर्तव्यम् । युक्त चैतदित्यर्थान्तर न्यस्यति -गृहानिति । मनस ईषिणो मनीषिणः सन्तः । पृषोदरादित्वात्साधुः । अपुण्यकृता, पुण्यमकृतवताम् । 'सुकर्म- पापमन्त्रपुण्येषु कृत्रः' इति भूते क्विप् । गृहान्प्रणयादुपैतुमभीप्सवः प्राप्तुमिच्छवः । माप्नोतेः सन्नन्तादुप्रत्ययः । प्राप्ज्ञप्यधामीत् इतोकारः । न भवन्ति, किंतु पुण्यकृतामेव । अतः कृच्छलभ्याः सन्तः पूज्या इत्यर्थः ॥ व्याकरण- - अध्यम्--अर्धम् अहति इति अर्ध्यः (अर्घ+यत् 'दण्डादिभ्यो यत्'), तम् । अादिकया-अर्धार्थ द्रव्यम् अयम् . (अर्ध+यत्-“पादा- र्याभ्याञ्च")-अयम् पादियस्याः सा मादिका (अादि+कप -शेषाद्विभाषा") (ब० वी० ), तया । आदिपूरुषः:-पादिश्चासौ पूरुषश्च इति प्रादिपूरुषः (कर्मधा०) अपूपुजत् --परि+पूज्+रिण+लुड्तिप । उपैतुम्-उप+मा+इ+तुमुन् । प्रणयात्-प्र+नी+अच् भावे-प्रणयः, तस्मात् (हतौ पञ्चमी) अभीप्सवः-अभि+प्राप्+सन्+उ (कतार) (यहाँ प्राप्ज्ञप्यधामीत्' 'नियम से आप के आ को ईकार हो जाता है पुण्यकृताम्-पुण्य कृतवन्तः इति पुण्यकृतः (पुण्य++विप् कर्तरि भूते ) (उपपद तत्पु०)। न पुण्यकृतः इति अपुण्यकृतः (नन तत्पु०), तेषाम् । मनीषिण :-ईषन्ते इति ईषिणः (ईष् णिनिः कर्तरि , मनसः ईषिणः (१० तत्पु०)। यहाँ मनस के अस् का लोप पृषोदरादि नियम से होता है । , ( ४३ ) अथवा मनसः ईषा इति मनीषा (ष. तत्पु०), साऽस्ति एषामिति मनी- षिणः ( मनीषा इनिः मत्वर्थे)। मनस् मे अस् का लोप 'शकन्ध्वादिषु पर- रूप वाच्यम्' वार्तिक के अनुसार होगा। कोष- सपर्या= "पूजानमस्याऽपचितिःसपर्याचाहणाःसमा"-अमरः । गृह = "गृहाः पुंसि च भूम्न्येव निकाय्यनिलयालयाः"-समरः । मनिषिणः="धीरो मनीषी ज्ञः प्राज्ञः संख्यावान् पडितः कविः"- अमरः। अलङ्कार-यहाँ उत्तरार्ध पूवाध का हेतु समझ पडता है, अतः काव्यलिंग अलङ्कार है। भावार्थ-पुराणपुरुषो हरिस्तं यथाविधि अादिपूर्वकम अपूपुजत् । मनी- षिणोऽपि अपुण्यशीलाना दुरात्मनामातिथ्य नैव स्वीकुर्वन्ति । न यावदेतावुद पश्यदुत्थिती जनस्तुषाराञ्जनपर्वतादिव। स्वहस्तदत्ते मुनिमासने मुनिश्चिरन्तनस्तावभिन्यवौविशत् ॥१५॥ अन्वय-यावत् जनः उत्थितौ एतौ तुषाराञ्जनपर्वती इव न उदपश्यत्, तावत् चिरन्तनः मुनिः स्वहस्तदत्त प्रासने मुनिम् अभिन्यवीविशत् । --जब तक लोगो ने खड़े हुए, हिम तथा कज्जल के पर्वत के, समान इन दोनों महापुरुषों को देखा भी नहीं था कि तब तक पुराण मुनि भगवान श्री कृष्ण ने अपने हाथ से दिये गये प्रासन पर नारद मुनि को सम्मुख बिठा लिया। न यापदिति-उत्थितावेतो मुनिकृष्णो जनस्तुषारञ्जनयोः पर्वताविव यावन्नोदपश्यन्नोत्त्रक्षितवान् । तावच्चिरंतनः पुराणो मुनिः कृष्णः 'पुरा किल भगवान्बदरिकारण्ये नारायणावतारेण तपसि स्थितवान्' इति - पुराणात् । 'साय चिरम्-' इत्यादिना व्यु प्रत्ययस्तुडागमश्च । स्वहस्तेन दत्त आसने मुनि अर्थ- ( ४४ ) - तुषाराञ्जनपर्वतो नारदमभिन्यवीविशत्स्वाभिमुखेनोपवेशितवान् । अभिनिपूर्वाद्विशतेण्यन्ताल्लुङि- 'रिणश्री-' इति चड्।। व्याकरण उत्थितौ= उद्+स्था+क्त कर्तरि । जनः- यहाँ जन शब्द जाति अर्थ •में प्रयुक्त हुआ है, अतः एक वचन होते हुये भी बहुवचन का अर्थ घोतित करता है । ऐसे स्थल पर बहुवचन का भी प्रयोग हो सकता है---"जात्याख्यायाम् एकस्मिन् बहुवचनमन्यतरस्याम्” = तुषारश्च अञ्जनञ्च तुषारञ्जने (द्वन्द्वः) । तयोः पर्वतौ तुषाराजनपर्वतौ (ष. तत्पु०)। स्वहस्तदत्त = स्वः हस्तः स्वहत्त्तः (कर्मधा०) । तेन दत्तम् स्वहस्तदत्तम (तृ० तत्पु०), तस्मिन् । आसने = प्रास्यते अस्मिन्निति आसनम् (प्रास् + ल्युट् अधिकरणे), तस्मिन् । यहाँ अभि और निपूर्वक विश् धातु के योग मे भी आधार-- 'पासन'-मे सप्तमी ही प्रयुक्त हुई, “अभिनिविशश्च (१।१।४७) नियम से द्वितीया नही क्योकि पूर्वोक्त सूत्र मे 'अभिनिविश्' का अर्थ किसी विषय मे "साग्रह लगना" लिया गया है, किन्तु यहाँ अभिनिवश् का प्रयोग सम्मुख बैठने के अर्थ मे किया गया है, अत आधार 'पासन' मे सप्तमी ही रही। अभिन्यवीविशत् =अभि+नि-विश्+रिणच+लुड् तिप । चिरतनः= चिर भव इंति चिरन्तनः (चिरम् +-ट्यु -चिरम्+तुट् +ट्य ) । सायचिर प्राह पगेऽव्ययेभ्यः ट्य ट्य लौ तुट् च ।” ४।३।२३, नियम से सायम् आदि मे ट्य तथा ट्य ल प्रत्यय लगते है और शब्द तथा प्रत्यय के बीच मे 'त्' का गम हो जाता है । अलंकार यहाँ उपमा तथा अतिशयोक्ति अलकारो की ससृष्टि है।

( ४५ ) भावार्थ-क्षणमात्रमेव यावद् गौरो मुनिः श्यामश्च हरिः जनैः स्थितौ दृष्टावभूताम्, तावत् पुराणपुरुषः श्रीकृष्ण. स्वहस्तेन कल्पिते प्रासने नारदम उपवेशयामास । स महामहानोलशिलारुचः पुरो निषेदिवान्कसकृष स विष्टरे । श्रितोदयाद्रेरभिसाय मुच्चकैरचूचुरच्चन्द्रमसोऽभिरामताम् ॥ १६ ॥ अन्वय-महामहानीलशिलारुचः कसकृष. पुरो उच्चकैः विष्टरे निषेदिवान् अभिसाय श्रितोदयाद्रे. चन्द्रमस' अभिरामताम् अचूचुरत् । अर्थ-बडे महानील मणि के समान कान्ति वाले कसारि भगवान् कृष्ण के सम्मुख ऊँचे आसन पर बैठे हुए नारद जी सायकाल मे उदयाचल पर स्थिर चन्द्रमा की सुन्दरता चुरा रहे थे-चन्द्रमा के समान सुशोभित हो रहे थे। महामहेति ॥ महत्या महानीलशिलायाः सिहलद्वीपसभवेन्द्रनीलोत्पलस्य रुगिव रुग्य॑स्य तस्येत्युपमालकारः । 'सिंह लस्याकशेद्भ ता महानीलास्तु ते स्मृताः' इति भगवानगस्त्यः । क सेकृषा हरेः पुरोऽत्र उच्चकै रुन्नते विष्टर आसने । 'वृक्षासनयोविष्टर.' इति षत्वम् । निषेदिवानुपविष्टवान् । 'भाषाया सदवसश्रु वः' इति क्वसुः । स मुनिरभिसाय, सायकालाभिमुखम् । अव्ययीभावसमासः । सायंकालस्य कात्कृिष्णोपमान त्वम् । श्रित प्राश्रित उदयाद्रिरुदयाचलो येन तस्य चन्द्रमसोऽभिरामता शोभामचूचुरच्चोरितवान् । प्राप्तवानित्यर्थः। 'चुर स्तेये' 'रिणश्रि-' इति च । 'अन्यस्यान्यधर्म सबन्धस भवाच्चन्द्रमसोऽभिराम- तामिवाभिरामताम्' इत्यौपम्यपर्यवसानादसभवद्वस्तुसबन्धरूपो निदर्शनाभेदः स चोक्तोपमयाङ्गाङ्गिभावेन सकीर्यते ।। व्याकरण-महामहानीलशिलारुचः-महानीला चासौ शिला च इति महानीलशिला (कर्मधा०)। महती महानीलशिला इति महामहानीलशिला ( ४६ ) (कर्मधा०) । तस्याः रुक् इव रुक् यस्य सः महामहानीलशिलारुक् (ब० वी०)। तस्य। निषेदिवान् =नि+सद् + क्वसु भाषाया सदवसश्रुवः ३।२।१०८” नियम से निष्ठा अर्थात् भूत अर्थ मे क्वसु (वस्) प्रत्यय लगा है। कसकृष% कस कृष्टवान् इति कंसकृट् (कस + कृष+क्विप कर्तरि) उप० तत्पु०, तस्य । विष्टरे= विस्तीर्य्यते इति विष्टरः, । (वि+स्तृ+अप कर्मणि), तस्मिन् । यहाँ "वृक्षासनयोविष्टरः शE३” नियम से षत्व हुा । श्रितोदयाद्रेः = उदयस्य अद्रिः इति उदयाद्रिः (प० तत्पु०), श्रितः उदयादिः येन स श्रितोदयाद्रिः (ब० वी०), तस्य । अभिसायम् = सायम् अभि इति अभिसायम् (अव्ययीभावः)। अचूचुरत् = चुर्+णि+लुङ तिप । अभिरामताम् - अभि+रम् +धन करणे (अधिकरणे वा), तस्य भावः अभिरामता (अभिराम+त+टाप.), ताम् । कोष-विष्टर:-"विष्टरो विटपी दर्भ-मुष्टिः पीठाद्यमासनम्" इत्यमरः। अलङ्कार-यहां एक का धर्म दूसरे के साथ सम्बन्धित किया गया है, जो स्वय असम्भव है । अतः इसका पर्यवसान उपमा में करना होगा, अर्थात् चन्द्रमा की अभिरामता की-सी अभिरामता इत्यादि । इस प्रकार यह असम्भववस्तुसम्बन्ध रूप निदर्शना अलंकार हुआ। और यह निदर्शना महामहानीलशिलारुचः में कहो हुई उपमा का अङ्ग है । अतः यहाँ निदर्शना तथा उपमा का सकर माना जायगा।" भावार्थ- श्यामकान्तेः श्रीकृष्णस्य सम्मुखे उच्चैरासने उपविष्टो गोरो देवर्षिःसायंसमये उदयगिरौ वर्तमानः (पूर्ण-) चन्द्र इव रेजे ।

( ४७ ) । विधाय तस्यापचिति प्रसेदुषः प्रकाममप्रीयत यज्वनां प्रियः । ग्रहीतुमार्यान्परिचर्यया मुहुर्महानुभावा हि नितान्तमथिन ॥ १७ ।। अन्वय-यज्वना प्रियः प्रसेदुषः तस्य अपचिति विधाय प्रकाममप्रीयत । महानुभावाः प्रार्यान् परिचर्यया मुहुः ग्रहीतु नितान्तम् अर्थिन: (भवन्ति) हि। अर्थ--यज्ञ करने वालो के प्रिय भगवान् कृष्ण प्रसन्नचित्त उन नारद जी की पूजा करके अत्यन्त प्रसन्न हुए। महात्मा लोग श्रेष्ठ पुरुषों को अपनी सेवा से बार-बार वश मे करने के विशेष इच्छुक रहते ही है। विधायेति ॥ यज्वानो विधिनेष्टवन्तः । 'यज्वा तु विधिनेष्टवान्' इत्यमर । 'सुयजोः-' इति यजिषातोड वनिप । तेषां प्रियो हरिः प्रसेदुषः प्रसन्नस्य । 'सदेः क्वसुः' इत्युक्तम् । तस्य मुनेरपचिति पूजाम् । 'पूजा नमस्यापचितिः' इत्यमरः । विधाय विशेषेण मनोवाक्कायकम भिस्तत्परतया कृत्वा प्रकाममत्यर्थ- मप्रीयत प्रीतोऽभूत् । प्रीयतेदेवादिकात्कर्तरि लड्। मुनिपूजायाः प्रीतिहे- तुत्वेऽर्थान्तरं न्यस्यति-महानुभावा महात्मान भार्यान्पूज्यान्परिचर्यया मुहुन हीतु वशीकतुम् 'ग्रहोऽलिटि दीर्घः' इतीटो दीर्घः। नितान्तमर्थिनोऽभिलाषवन्तो हि भवन्ति । अर्थनमर्थोऽभिलाषः स एषामस्तीति मत्वर्थ इनिर्न तु णिनिः । 'कृढ- तस्तद्धितवृत्तिर्बलीयसी' इति भाष्यात् ॥ व्यकरण-अपचितिम्-अप+चायु (पूजानिशामनयोः)+तिन् (भावे) द्वि० एक०। प्रसेदुषः =प्र+सद्+क्वसु षष्ठी एक० । अप्रीयत=प्री+लड् त कर्तरि । इष्टवन्त इति यज्वानः (यज्। वनिप, भूते कर्तरि), तेषाम् । “सुयजोङ्वनिप, ३।२।१०३" नियम से सु और यज् धातु में 'भूत' अर्थ में ड्वनिप लगता है । यज्वनाम् = विधिना ( ४८ ) महानुभावा:--महान् अनुभावः (तेजः) येषां ते । अर्थिन = अर्थः अस्ति एषाम् इति अर्थिनः (अर्थ+इनिः मत्वर्थे)। विशेष सर्वकषा मे देखिये । कोष-अपचिति-श्लोक १४ मे 'सपर्या' का कोष देखिये । परिचर्या-वरिवस्यातु शुश्रूषा परिचर्याप्युपासना इत्यमरः । अलङ्कार-यहाँ सामान्यरूप उत्तरार्ध के द्वारा विशेषरूप पूर्वाध का समर्थन होने से अर्थान्तरन्यास अलङ्कार है । भावार्थ-प्रसन्नमान संस्य नारदस्य पूजा विधाय श्रीकृष्णोऽतितरा सन्तुतोष । गृहागतान् सत्पुरुषान् । पूजयितु महापुरुषाः सदैव अभिलषन्ति । अशेषतीर्थोपहृताः कमण्डलोनिधाय पाणावृषिणाभ्यु दीरिताः । अघोघविध्वंसविधौ पटीयसीन तेन मूर्ना हरिरग्रहीदपः ।।१८ ।। अन्वय-हरिः अशेषतीर्थोपहृताः ऋषिरणा कमण्डलोः पाणौ निधाय अभ्यु- दीरिताः, अघौघविध्वंसविधौ पटीयसीः अपः नतेन मूर्ना अग्रहीत् ॥ अर्थ-भगवान् कृष्ण ने समस्त तीथों से लाये गए, देवर्षि द्वारा कमण्डल से हाथ में लेकर छिडके गए तथा पापो को विध्वस्त करने में समर्थ जल को नत शिर से ग्रहण किया। अशेपे ति ।। अशेषेभ्यस्तीथे भ्य उपहृता । आहृतास्तथा पाणी निधाय । कमण्डलोदकपात्रादुद्धृत्य पाणौ निधायेत्यर्थः । क्रियान्तराक्षिप्तक्रियापेक्षया कमण्डलोरपादानत्वम् । 'अत्री कमण्डलुः कुण्डी' इत्यमरः । ऋषिणाभ्युदीरिता आक्षिप्ता अतएवाघौघानां पापसमूहाना विध्वसविधौ विनाशकरणे पटीयसीः समर्थतराः । पटुशब्दादीयसुनि 'उगितश्च' इति डीप् । अपो जलानि हरिनतेन माग्रहीत्स्वीकृतवान् । पहेलुङ् ॥ व्याकरण-अशेषतीर्थोपहृताः-अविद्यमानः शेषः एषा तानि अशे- पाणि (ब० वी०)1 अशेषाणि तीर्थानि अशेषतीर्थानि (कर्मधा०) । तेभ्यः उपहृताः इति अशेषतीर्थोपहृताः (सुप्सुपा), ताः ।

४६ ) अभ्य दीरिता अभि+उद्+ई+णिच् स्वार्थे+क्त कर्मरिण । अघौधविश्वसविधौ = अघानाम् ओषः इति अघोघः (प० तत्पु०), तस्य विध्वंसः (१० तत्पु०), तस्य विधिः अघौधविध्वसविधिः (ष० तत्पु०), तस्मिन् । पटीयसी-अतिशयेन पटव्यः पटीयस्यः (पट्वी+ ईयसुन् डीप), ताः अग्रहीत् =ग्रह + लुड् तिप । कोप-प्रोध -"समूहो निवहव्यूहसन्दोहविसरबजाः स्तोमौधनिकरबातवारसघातसचयाः ।" अमरः मूर्धन् = 'उत्तमाङ्ग शिरः शीर्ष मूर्धा ना मस्तकोऽस्त्रियाम्' इत्यमरः भावार्थ-देवर्षिः स्वकीयात् कमण्ड लोः पापविनाशकं तीर्थजलं पाणी निधाय अभिमन्य च तेन हरिम् अभ्युक्षितवान् सोऽपि नतमूर्धा सन् तज्जलम- ग्रहीत् । स काञ्चने यत्र मुनेरनुज्ञया नवाम्बुदश्यामवपुन्य विक्षत । जिगाय जम्बूजनितश्रियः श्रियं सुमेरुशृङ्गस्य तदा तदासनम् ॥ १६ अन्वय-तदा नवाम्बुदश्यामवपुः सः मुनेः अनुज्ञया यत्र काञ्चने न्यविक्षत, तत् प्रासनं जम्बूजनितश्रियः सुमेरुशृङ्गस्य श्रिय जिगाय । -उस समय नवीन मेघ के समान श्यामशरीर भगवान् कृष्ण नारद मुनि की अनुमति से जिस सुनहले आसन पर बैठे, उस प्रासन ने जामुन के फलों से सुशोभित सुमेरुशिखर की शोभा जीत ली। स काञ्चनेति।) नवाम्बुदश्यामतनुः स हरिमु नेरनुज्ञया काञ्चने काञ्चनविकारे वैकारिकोऽण्प्रत्ययः। यत्रासने न्यविक्षतोपविष्टवान् । निपूर्वकविशो लुडि नेविंशः' इत्यात्मनेपदेशल इगुपधादनिटः क्सः । तदासनं तदा युपवेशनसमये जम्बूर्नील- फलविशेषः। 'जम्बूः सुरभिपत्रा च राजजम्बूमहाफला' इत्यभिधानरत्नमालायाम्। तया जनिता श्रीर्यस्य तत्तथोक्तस्य भाषितस्कत्वात्पक्षे पुंवद्भावान्न मभावः सुमेरुशृङ्गस्य श्रियं जिगाय अभिभावितवानित्यर्थः। 'सन्लिटोर्जेः इति कुत्वम् उपमानुप्रासयोः ससृष्टिः ।। अर्थ- (५०) व्याकरण-काञ्चने-काञ्चनस्य विकारः इति काञ्चनम् (काञ्चन+अण), मस्मिन् । नवाम्बुदश्यामवपुः-अम्बु ददाति इति अम्बुदः (अम्बु+दा+क कर्तरि) उप० तत्पु | नवश्चासौ अम्बुदश्चेति नवाम्बुदः (कम धा०) स इव श्याम वपु- गस्य सः (ब० बी०) न्यविक्षत-नि+विश + लुड् त कर्तरि । यहाँ विश धातु, पूर्व मे नि उपसर्ग होने के कारण “नेर्विशः" नियम से श्रात्मनेपदी हो गई है। जिगाय-जि+लिट् (गल्) । विशेष सर्वकषा मे । जम्बूजनितश्रियः-जम्बुभिर्जनिता इति जम्बूजनिता (तृ० तत्पु०) तादृशी भीर्यस्य तत् जम्बूजनितश्रि (ब० बी०), तस्य । यह सुमेरुशृङ्गस्य का विशेषण है जो नपुसकलिङ्ग है कोष--सुमेरु-'मेरुः सुमेरुहेमाद्री रत्नसानुः सुरालयः" इत्यमरः । अलङ्कार--यहाँ उपमा तथा अनुप्रास की ससृष्टि है। भावार्थ-नवजलधरकान्तौ भगवति कृष्णे तस्मिन् स्वर्णमये आसने समुप- विष्टे तदासन श्यामजम्बूसमन्वित सुमेरुशृङ्गमिव बभौ । स तप्तकार्तस्वरभास्वराम्बरः कठोरताराधिपलाञ्छनच्छविः । विदियुते वाडवजातवेदसः शिखाभिराश्लिष्ट इवाम्भसां निधिः ॥२०॥ अन्वय-तप्तकार्तस्वरभास्वराम्बरः, कठोरताराधिपलाञ्छनच्छविः सः वाडवजातवेदसः शिखाभिः आश्लिष्टः अम्भसा निधिः इव विदिधु ते । अर्थ-तपाये गए सोने के समान चमकते हुए (अर्थात् पीत) वस्त्र वाले एव पूर्ण चन्द्र के कलक की सी कान्ति वाले वे भमवान् कृष्ण वाडवाग्नि की लपटो स व्याप्त जलनिधि के समान सुशोभित हुए ।

( ५१ ) स तप्तेति ॥ तप्त पुटपाकशोधित कार्तस्वरं सुवर्णम् । 'सम' कार्तस्वर जाम्बूनदमष्टापदोऽस्त्रियाम्' इयमरः । तद्वद्भास्वर दी प्यमानमम्बर यस्य सः। पीताम्बर इत्यर्थः । कठोरताराधिपस्य पूर्णेन्दोर्लाञ्छनस्य छविरिव छवियंस्य स इत्युपमानपूर्वपदो बहुव्रीहिरुत्तरपदलोपश्च । स हरिडिवजातवेदसो वाडवाग्नेः शिखाभिर्वालाभिराश्लिष्टो व्याप्तोऽम्भसा निधिरिव समुद्र इव विदिधु ते बभौ ॥ व्याकरण-तप्तकार्तस्वरभास्त्रराम्बरः-तप्त च तत् कार्तस्वर चेति तप्तकार्तस्परम् (कर्मधा०) । तदिव भास्त्ररम् (भास्+वरच कर्तरि) इति तप्तका- स्विरभास्वरम् (उपमान कर्मधा०) तादृशम् अम्बर (वस्त्रमित्यर्थः) यस्य सः तप्त- कार्तस्वरभास्वराम्बरः (ब०वी०)। कठोरताराधिपलाञ्छनच्छविः-ताराणाम् अधिपः ताराधिपः (ष. तत्पु०) । कठोरश्चासौ ताराधिपश्च इति कठोरताराधिपः (कर्मधा०)। तस्य लाञ्छनम् (प० तत्पु०), तस्य छविः इव छविर्यस्य सः कठोरताराधिपलाञ्छ- नच्छविः (ब० वी०)। विदिधु ते-वि+द्युत् +लिट् त । वाडवजातवेदसः-वडवाया भवः वाडवः (वडवा+मए) । जातेषु विद्यते जात वेत्ति इति वा जातवेदाः (जात+विद्+असुन कतरि), वाडवो यो जातवेदा वाडवजातवेदाः (कर्मधा०)। तस्य । (भृगुवशी) और्व ने अपनी क्रोधाग्नि को समुद्र में डाल दिया था जो वहां अब भी वडवा के मुखाकार माला जलती हुई दिखाई पड़ती है, ऐसी जनश्रुति है । आश्लिष्टः-पा+श्लिष्+क्त (कमणि)। निधि:--नि+धा+कि (अधिकरणे)। दान avaviy कोष-कार्तस्वर-"रुक्मकार्तस्वर जाम्बूनदमष्टापदोऽस्त्रियांम् अमरः Aust ( ५२ ) कठोर-"कठोरो पूर्णकठिनौ” हेमः लाञ्छन-कलङ्काको लाञ्छन च चिह्न लक्ष्म च लक्षणम् ।" " वाडव-'पौर्वस्तु वाडवो बडवानलः" इत्यमरः जातवेदा:-"कृपोटयोनिर्बलनो जातवेदास्तनूनपात्" इत्यमरः । अलङ्कार-यहां उपमा अलङ्कार है। भावार्थ-पीताम्बरधरः श्यामवरणों हरिडिवाग्नेवालाभिर्व्याप्तो जलनिधिरिव शुशुभे ॥ रथाङ्गपाणेः पटलेन रोचिपामृषित्विषः संवलिता विरेजिरे । चलत्पलाशान्तरगोचरास्तरोस्तुषारमूर्तेरिव नक्तमशवः ॥२१॥ अन्वय-रथाङ्गपाणेः रोचिषा पटलेन सवलिताः ऋषित्विषः नक्तं तरोः चलत्पलाशान्तरगोचराः तुषारमूर्तेः अशव इव विरेजिरे । अर्थः-चक्रपाणि भगवान् श्रीकृष्ण जी के कान्तिपटल से मिली हुई नारद जी की कान्ति, रात मे वृक्षों के हिलते हुए पत्तों के बीच से दिखाई पड़ती हुई चन्द्रमा की किरणो की भांति सुशोभित हुई। टिप्पणी भगवान् की कान्ति श्यामल तथा नारद जी की श्वेत थी। अतएव कवि ने भगवान् की श्यामल कान्ति से मिश्रित नारद जी को श्वेत, कान्ति मे रात्रिकाल मे पत्तो की श्यामल छाया से सवलित चन्द्रमा की प्रभा को उत्प्रेक्षा की है। रथाङ्गपाणेरिति ॥ रथाङ्ग चक्र पाणो यस्य तस्य हरेः । 'प्रहरणाथभ्यः परे निष्ठाससम्यौं भवतः' इति पारणेः परनिपातः । रोचिषा छबीना पटलेन समूहेन T

संवलिता ऋषित्विषो नक्त रात्रौ । सप्तम्यर्थे ऽव्ययम् । तरोश्चलतां पलाशाना
पत्राणामन्तराणि विवराणि गोचर आश्रयो येषा ते, तुषारा मूर्तिर्यस्य तस्येन्दोरं-
शव इव विरेजिरे चकाशिरे।।
व्याकरण-रथाङ्गपाणे :-रथस्य अङ्ग रथाङ्गम् (१० तत्पु०), रथाङ्ग
पाणौ यस्य स रथाङ्गपाणिः (ब० बी०), तस्य । बहुव्रीहि समास में
"प्रहरणार्थेभ्यः परे निष्ठासप्तम्यौ (वा०)" अर्थात् निष्ठा (क्तक्तवतु) तथा
सप्तम्यन्त पद शस्त्रवाचक पद के पश्चात् रक्खे जाते है।” इस नियम के
अनुसार यहाँ रथाङ्ग (चक्र) के बाद पाणि ( सप्तम्यन्त) रक्खा गया।]
ऋषित्विष : - ऋषेः विषः (१० तत्पु०)
संवलिता :-सम्+वल+क्त कमणि+टाप् ।
विरेजिरे-वि+र+लिट् क ।
चलत्पलाशान्तरगोचरा :-गावः ( इन्द्रियाणि ) चरन्ति अस्मिन्निति
गोचरः (गो+चर+घन अधिकरणे गोचरसञ्चरेत्यादिनियमान्निपातनम्)
(उप० तत्पु०), चलन्ति (चल+शतृ) पलाशानि चलत्पलाशानि (कर्मधा०)।
तेषाम अन्तराणि चलत्पलाशान्तराणि (ष० तत्पु.),तान्येव गोचरः येषां ते
चलत्पलाशान्तरगोचराः (ब० बी०)।
तुषारमूर्ते:-तुषारस्य मूर्तिः इव मूतिर्यस्य स तुषारमूर्तिः (ब० बी०),
तस्य।
-
अमरः
कोष-रथाङ्ग"= चक्र रथाङ्गम्'
पटल-"छदिर्नेश्ररुजोः क्लीबं समूहे पटल न ना” अमरः
त्विप - "कान्तो वाचि रुचौ त्विट् स्त्री"- रभसः
पलाश-पत्र पलाश छदन दलं पर्ण छदः पुमान्" - अमरः
तुषार-"अवश्यायस्तु नीहारस्तुषारस्तुहिन हिमम्"

(५४ ) नक्तम्-"अथ दोषा च नक्त च रजनाविति"~अमरः अंशवः-"किरणोस्रमयूखाशुगभस्तिघृणिरश्मयः"- अलकार-यहाँ गच्यीत्प्रेक्षा अलंकार है-"भवेत् सम्भावनोत्प्रेक्षा प्रकृतस्य परात्मना । वाच्या प्रतीयमाना सा प्रथम द्विविधा मता । वाच्येवादि- प्रयोगे स्यात्-"साहित्य-दर्पण। भावार्थ-यथा निशि वृक्षपत्राणामन्तरालमारन्तःप्रविष्टाश्चन्द्रकिरणा- स्तिमिरसङ्गताः सन्तः क्वचिच्छुभ्राः क्वचिच्छ्यामाश्चेति राजन्ते तथैव कृष्णस्य श्यामेन तेजसा मिलित मुनेवल धाम सुतरा शुशुभे । प्रफुल्ल तापिच छनि भैरभीषुभिः शुभैश्च सप्तच्छदपांसुपाण्डुभिः । परस्परेण च्छुरितामलच्छवी तदैकवर्णाविव तौ बभूवतुः ॥ २० ॥ अन्वय--तदा शुभेः प्रफुल्लतापिच्छनिभैः सप्तच्छदपांसुपाण्डुभिरच अभी- षुभिः परस्परेण च्छुरितामलच्छवी तो एकवर्णं इव बभूवतुः॥ अर्थ:-खिले हुए तमाल पुष्प के समान श्याम तथा सप्तपर्ण (सतवन) के पुष्प-पराग के समान पीतगौर माङ्गलिक किरणो से परस्पर रञ्जित कान्ति वाले भगवान् कृष्ण तथा नारद जी उस समय मानों एक रंग के हो गये। प्रफुल्लेति ॥ प्रफुल्लनीति प्रफुल्ल विकसितम 'फुल्ल विकसने' इति धातोः पचाद्यजन्तम । फलेनिष्ठायाम 'अनुपसर्गात्फुल्लक्षीबकृशोल्लाघाः' इति निपात- नात्प्रफुल्लमित्येवेति क्षीरस्वामी । तापिच्छस्य तमालस्य पुष्पं तापिच्छम । 'फले लुक्' इति तद्धितलुक् । द्विहीन प्रसवे सर्वम् इति नपुसकत्वम । 'कालस्कन्धस्त- मालः स्यात्तापिच्छोऽपि' इत्यमरः । तेन सदृशैः प्रफुल्लतापिच्छनिभैः । नित्यसमा- सत्वादस्वपदविग्रहः । अतएव 'स्युरुत्तरपदे त्वमी' इति, निभसकाशनीकाशप्रतीका- शोपमादयः' इत्यमरः । 'सप्तपणों विशालत्वक्शारदो विषमच्छदः' इत्यमरः। संख्याशब्दस्य वृत्तिविषये वीप्सार्थत्वं सप्तपर्णादिवदित्युक्त भाष्ये । शेष तापिच्छवत् ।

( ५५ ) तस्य पुष्पाणि सप्तच्छदानि तेषां पासुवत्पाण्डुभिः शुभ्र रभीषुभिरन्योन्यरश्मिभिः 'अभीषुः प्रग्रहे रश्मौ' इति शाश्वतः । परस्परेण झुरिते रूषितेऽमले छवी अन्यो- न्यकान्ती ययोस्तौ । छव्योरभीषूणामवयवावयविभावाद्भेदनिर्देशः । तौ हरि- नारदौ तदैकवर्णाविव बभूवतुः । उभयप्रभामेलनादुभयोरपि सर्वाङ्गीणो गङ्गा- यमुनासगम इव स्फटिकेन्द्रनीलमणिप्रभामेलनप्रायः कश्चिदेको वर्णः प्रादुर्बभूव तन्निमित्ता चेयमनयोरेकवर्णत्वोत्प्रेक्षा॥ व्याकरणम-प्रफुल्ल तापिच्छनि भैः--प्रफुल्लति इति प्रफुल्लम (प्र+ फुल्ल+अच् कर्तरि) (प्रादि तत्पु०) । (विशेष सर्वदूषा मे)। प्रफुल्लं च तत् तापिच्छच प्रफुल्लतापिच्छम (कम घा०)। तेन सदृशाः प्रफुल्लतापिच्छनिभाः (अस्वपदविग्रहनित्यसमास)। सप्तच्छदपांसुपाण्डुभिः-सप्तच्छदस्य पासवः सप्तच्छदपासवः (प० तस्पु०), त इव पाण्डवः सप्तच्छदपासुपाण्डवः (उपमान कर्मधा०), तैः । छरितामलच्छवी-छुरिते(छुर+क्त कमणि+टाप्) अमले छवी ययोः तौ छुरितामलच्छवी (त्रिपद ब० वी०)। एकवौँ–एको वर्णों ययोस्ती एकवर्णी (ब० वी०)। कोष-तापिच्छ="कालस्कन्धस्तमालः स्यात्तापिच्छोऽपोत्यमरः । अलंकार-भगवान् की श्यामल कान्ति तथा नारद जी की शुभ्र कान्ति के परस्पर मिल जाने से गङ्गा-यमुना के सङ्गम की भाति दोनो की एक ही सो कान्ति प्रतीत होती है । अतः दोनों के एक ही वर्ण की सम्भावना करने से यहाँ उत्प्रेक्षा अलङ्कार है। भावार्थ -हरेः श्यामत्वम् ऋषेश्च शुभ्रत्वमिति रागद्वयम परस्परसम्मि- श्रणेन एकमेव प्रतीयते स्म ।

( ५६ ) युगान्तकालप्रतिसंहृतात्मनो जगन्ति यस्यां सविकासमासत । तनौ ममुस्तत्र न कैटभद्विषत्तपोधनाभ्यागमसंभवा मुदः ॥ २३ ।। अन्वय-युगान्तकालप्रतिसहृतात्मनः कैटभद्विषः यस्यां तनौ जगन्ति सवि- कासम आसत, तत्र (एव) तपोधनाभ्यागमस भवा मुदः न ममुः। अर्थ:-प्रलय काल मे सब को अपने मे समेट लेने वाले, कैटभ को मारने वाले भगवान कृष्ण के जिस शरीर मे सविस्तार सारे लोक स्थित थे, उसी मे नारद मुनि के आगमन से उत्पन्न आनन्द नहीं समा सका। युगान्तेति ॥ युगान्तकाले प्रतिसहृतात्मनः आत्माप्युपस हृता प्रात्मानो जीवा येन तस्य कैटभद्विषो हरेयस्यां तनौ जगन्ति सविकास सविस्तरमासता- तिष्ठन् । 'पास उपवेशने' लड् । तत्र तनौ देहे तपोवनाभ्यागमेन सभवन्तीति संभवाः संभूताः । पचाद्यच् । मुदः संतोषा न ममुः । अतिरिच्यन्ते स्मेत्यर्थः । चतुर्दशभुवनभ रणपर्याप्ते वपुषि अन्तर्न मान्तीति कविप्रौढोक्तिसिद्धातिशयेन स्वतःसिद्धस्याभेदेनाध्यवसितातिशयोक्तिः, सा च मुदामन्तःसबन्धेऽप्यसबन्धोक्त्या संबन्धासंबन्धरूपा॥ युगान्तकालप्रतिसंहृतात्मनः-युगस्य अन्तः युगान्तः (ष० तत्पु०) तस्य कालः (समयः) युगान्तकालः (ष० तत्पु०)। युगान्तकाले प्रतिसहृताः (प्रति+सम् +ह+क्त कमणि) आत्मानः (जीवाः) येन सः युगान्तकालप्रति- संहृतात्मा (ब० बी०), तस्य । अथवा, युगान्तकाले प्रतिसंहृतः (संकोचितः) आत्मा (स्वदेहः) येन सः, तस्य । आसत-आस् ल झ । ममुः-मा+लिट् झि । कैटभद्विषः-कैटभ द्वोष्टि इति कैटभद्विट् (कैटभ+द्विष्+क्विपू कतरि), तस्य ।

( ५७ ) तपोधनाभ्यागमसम्भवाः-तपः धन यस्य स तपोधनः (ब० ब्रो०), तस्य अभ्यागमः (अभि+आ+गम +अप भावे) तपोधनाभ्यागमः (प० तत्पु०), तेन सम्भवाः (सम् + भू+अच् कतरि+टाप्) तपोधनाभ्याममसम्भवाः (सुप्- सुपा०)। मुदः-मुस्विप क्र्तरि । कोषः- "आत्मा देह धृतौ जीवे स्वभावे परमात्मनि" विश्वः । मुदः-' मुत् प्रीतिः प्रमदो हर्षप्रमोदामोदसमदाः" अमरः। अलकार-यहाँ सम्बध मे असम्बध रूप अतिशयोक्ति अलङ्कार है क्योकि चतुर्दश भुवनो को धारण करने में समर्थ भी हरि के उदर मे हष के न समाने की उक्ति कविप्रौढोक्ति द्वारा व्यक्त की गई है। वास्तव मे उस उदर मे वह हर्ष भी समाही जाता है । भावार्थ:-प्रलयवेलायां समस्तजगदाधारयोग्येऽपि हरेवपु षि तदा देवर्षेराग- मनाजनितो हर्षोद्रेकः मातुन प्रबभूव । निदाघधामान मिवाधिदीधिति मुदा विकासं मुनिमभ्युपेयुषी । विलोचने बिभ्रद धिश्रितत्रिणी स पुण्डरीकाक्ष इति स्फुटोऽभवत् ॥२४) अन्वय -निदाघधामानम् इव अधिदीधिति मुनिम अभि मुदा विकासम् उपेयुषी अधिश्रितश्रिणी विलोचने बिभ्रत् स पुण्डरीकाक्ष इति स्फुटोऽभवत् । अर्थ-सूर्य के समान देदीप्यमान नारद मुनि के समक्ष हर्ष से विकसित एवं सुशोभित नेत्रो को धारण किये हुये भगवान् कृष्ण स्पष्ट ही पुण्डरीकाक्ष -कमलनयन-ज्ञात हो रहे थे।

( ५८ ) टिप्पणी-नारद जी के आगमन से उत्पन्न हर्ष से भगवान् के नेत्र खिल उठे थे। नारद जी परम तेजस्वी होने के कारण सूर्य से प्रतीत हो रहे थे। सूर्य के सम्मुख होते ही कमल खिल जाते हैं । अतः उस समय भगवान् के हर्ष- विकसित नेत्र कमल-से लग रहे थे और उनके 'पुण्डरीकाक्ष' नाम की सार्थकता स्पष्ट प्रकट हो रही थी। निदाघेति ॥ निदाघमुष्ण धाम किरणा यस्य तथोक्तम् । 'निदाघो ग्रीष्मकाले स्यादुष्णस्वेदाम्बुनोरपि' इति विश्वः। अर्कमिवाधिदीधितिमधिकतेजसं मुनिमभिलक्ष्य । 'अभिरभागे' इति लक्षणे कर्मप्रवचनीययुक्त द्वितीया' । मुदा विकासमुपेयुषी उपगते । क्वसुप्रत्ययान्तो निपातः । अतएवाधिश्रिता प्राप्ता श्रीर्याभ्या ते तथोक्त । 'इकोऽचि विभक्तो' इति नुमागमः । विलोचने बिभ्रत् । 'नाभ्यस्ताच्छतुः' इति नुमभावः । स हरिः पुण्डरीकाक्ष इत्येवं स्फुटोऽभवत् । सूर्यसनिधाने श्रीविकासभावादक्ष्णा पुण्डरीकसाधात् । पुण्डरीके इवाक्षिणी यस्येत्यवयवार्थलाभे पुण्डरीकाक्ष इति व्यक्तम् । अन्वर्थसंज्ञोऽभूदित्यर्थः । बिभ्रत्स्फुटोऽभवदिति पदार्थहेतुकस्य कायलिङ्गस्य निदाघधामानमिवेत्युपमासा- पेक्षत्वादनयोरङ्गाङ्गिभावेन संकरः । न्याकरण-निदाघधामानम् - नितरां दह्यते अनेन इति निदाघम (नि+दह+घन करणे) निदाघं धाम यस्य स निदाघवामा (ब० पी०), तम् । अघिदीधितिम --अधिगताः दीधितयः येन स अधिदीधितिः (ब० बी०), तम् । यहाँ 'प्रादिभ्यो धातुजस्य वाच्यो वा चोत्तरपदलोपः' अर्थात् 'प्र इत्यादि के अनन्तर आने वाले कृदन्त पद का दूसरे पद के साथ बहुव्रीहि समास बनता है और विकल्प से उसका लोप हो जाता है'--इस नियम से समास बना है। विकासम --वि+कस्+घन भावे । मुनिम्-यहाँ अभि के योग मे द्वितीया हुई है । जब अभि से लक्षण, इत्थम्भूताख्यान अथवा वीप्सा द्योतित होती है तो अभि की कम प्रवचनीय संज्ञा हो जाती है-("अभिरभागे १/४/६१" (और कर्मप्रवचनीय के योग मे "कर्मप्रवचनीय युक्त द्वितीया २/३/८” नियम से ( ६० ) भगवान् के शुभ्र दन्त चन्द्रमा के समान । उनको दन्त-पक्ति से बिखरती हुई किरणे नारद जी के शुभ्र शरीर को और भी उज्ज्वल बना रही थी जैसे चन्द्रमा राजभवन को अपनी शुभ्र किरणो से दीप्तिमान् कर रहा हो । सितमिति ।। अथोभयोरुपवेशनानन्तरमच्युतो हेतुकर्ता । विसारिभिरभीक्ष्णं प्रसरद्भिः । बहुलमाभीक्ष्ण्ये' इति रिणनिः द्विजावलिर्दन्तपतिः ‘दन्तविप्राण्डजाः द्विजाः' इत्यमरः । सैव व्याजः कपट यस्य सः। तद्रप इत्यर्थः। स चासो निशाकरश्च तस्याशुभिः किरणः सितं स्वभावशुभ्र मुनेर्वपुः सौध प्रासादमिव सुतरामत्यन्तम अव्ययाद्धादाम्प्रत्ययः। सितिम्ना धावल्येन प्रयोज्यकर्ता लम्भयन्व्यापारयन् । अतिधवलयन्नित्यर्थः। लभेरत्र गत्युपसर्जनप्राप्त्यर्थत्वात् 'गतिबुद्धि-' इत्यादिना अणि कतुर्ने कर्मत्वम् । यथाह वामनः- 'लभेर्गत्यर्थत्वाण्णिच्यणौ कतु: कर्मत्वाकर्मत्वे' इति । प्राप्त्युपसर्जनगत्यर्थत्वे तु कर्मत्वमेवेति रहस्यम् । 'लभेश्च' इति नुमागमः । शुचिस्मिता वाचमवोचदुक्त- वान् । ब्रुवो वच्यादेशः लुड् 'वच उम्' इत्युमागमे गुणः। अत्र सौधमिवेत्युप- सितिम्ना लम्भयन्नित्यसंबन्धरूपातिशयोक्त: द्विजावलिव्याजनिशा- करेति छलादिशब्दरसत्यत्वप्रतिपादनरूपाह्नवस्य च मिथो नैरपेक्ष्यात्ससृष्टिः ।। - मायाः व्याकरण-सिंतिम्ना = सित+इमनिच भावे+तृतीया एकवचन सुतराम -सु + तर+ आमु- 'किमेत्तिडव्ययघादाम्वद्रव्यप्रकर्षे ५।४।११ नियम से । विसारिभिः--वि+सृ+रिणनिः कर्तरि+तृतीया बहुवचन । लम्भेयन्-लभ+णिच् +शतृ -“लभेश्च ७११६४ नियम से लभ को नुम् का आगम होता है --विशेष सर्वदूषा मे द्विजावलिव्याजनिशा करांशुभिः- द्विजानाम् दन्तानाम अवलिः द्विजावलिः (१० तत्पु०)। द्विजावलिः व्याजः यस्य स द्विजावलिव्याजः (ब० वी० )। स एव निशाकरः द्विजावलिव्याजनिशाकरः ( कर्मधा०) तस्य अशवः द्विजावलिव्याजनिशा- कराशवः (प० तत्पु), तैः शुचिस्मिताम -शुचि स्मितं यस्यां सा शुचिस्मिता ब० वी०), ताम ( ६१ ) अवोचत,-न+लुड्+तिप्-यहाँ 'ब्रु वोचिः २।४।५३ से ब्र के स्थान मे वच आदेश हो जाता है तथा "वच उम् ७१४२० से वच् को उम का आगम होता है। कोष-वपु:- गात्र वपुः सहनन शरीर वम विग्रहः-अमरः । सौधम -सौधोऽस्त्री राजसदनम - अमरः । द्विजः- द्विजः स्याद् ब्राह्मणक्ष- वैश्यदन्ताण्डजेषु ना-मेदिनी । व्याज-कपटोऽस्त्री व्याजदम्भोपधयश्छद्मकैतवे अमरः। अलंकार-यहाँ सौधमिव मे उपमा, सितिम्ना लम्भयन् मे असम्बन्धरूपा अतिशयोक्ति, तथा द्विजावलिव्याजनिशाकराशुभिः मे छल (व्याज) आदि शब्दो द्वारा असत्यत्व प्रतिपादनरूप अपह्नव इन तीन अलङ्कारो को ससृष्टि है-सर्व- दूषा। भावार्थ-पथ हरिर्वाचमाददे । तदा तस्य शुभ्रदन्ताना किरणैः नारदस्य धवलं वपुः ततोऽप्यधिकतर धवलिमान प्राप । हरत्यघ सप्रति, हेतुरेष्यतः शुभस्य, पूर्वाचरितैः कृत शुभैः। शरीरभाजां भवदीयदर्शनं व्यनक्ति कालत्रितयेऽपि योग्यताम् २६ 'अन्वय-भवदीयदर्शन कालत्रितयेऽपि शरीरभाजा योग्यता व्यनक्ति (यतः) सम्प्रति अघं हरति, एष्यतः शुभस्य हेतुः, शुभैः पूर्वाचरितैः (च) कृतम् । अर्थ:-ग्राप का दर्शन शरीरधारियो (जोदो) की त्रैकालिक पवित्रता सूचित करता है क्योंकि यह वर्तमान के पापो को विनष्ट करता है, भविष्य के 'मङ्गल का कारण बनता है और भूत के शुभ कर्मों से प्राप्त होता है। हरतीति ।। भवदीयदर्शन, शरीरभाजाम् । द्रष्ट्रणामित्यर्थः । 'भजो ण्विः'। कालत्रितये भूतादिकालत्रितयेऽपि योग्यता पवित्रता व्यनक्ति गमयति । कुतः-संप्रति दर्शनकाले अघं पाप हरति । एष्यतों भाविनः शुभस्य श्रेयसो हेतुः । तथा पूर्वाच- रितः प्रागर्नुष्ठितः शुभैः सुकृतैः कृतम । एवं त्रैकाल्येऽपि कार्यत्वेन कारणत्वेन च ( ६२ ) पुसि सुकृतसमवायमवगमयते । अत एतादृश दर्शन कस्य न प्रार्थ्यमिति भावः । अत्र हरतीत्यादिना वाक्यत्रयस्यार्थस्य शरीरेत्यादिवाक्यत्रयोक्त्या वाक्यार्थ- हेतुककायलिङ्गमलकारः॥ - त्रयः व्याकरण-एष्यतः-पा+इ+ लृट् शतृ+षष्ठी एक० । पूर्वांचरितैः --पूर्वम् आचरितानि पूर्वा चरितानि (सुप्सुपा), तै । शरीरभाजाम्-शरीरं भजन्ते इति शरीरभाजः (शरीर+भज्+ण्विः कर्तरि --"भजो ण्विः' ३/२/६२ नियम से)। व्यनक्ति-वि+अ+लट् तिप् । कालत्रितये अवयवाः अस्य इति त्रितयम् (त्रि+तयप्) । कालाना त्रितयम् कालत्रितयम् (१० तत्पु० ), तस्मिन् । योग्यताम,-योक्त म् अहः इति योग्यः (युज+ण्यत् कर्मणि) । तस्य भावः योग्यता, ताम् । अलकार-यहा पूर्वार्द्ध के "हरत्यघम्' मादि तीनो वाक्य उत्तरार्द्ध के 'शरीरभाजाम्' आदि वाक्य के हेतु रूप से कहे गये है। अतः काव्यलिङ्ग अलकार हुमा ।-सर्वषा । भावार्थ:-भवदीयदर्शन त्रिष्वपि कालेषु पुण्यवत्ता प्रकटयति, तथाहि-भूते नून सुकृतम् प्राचरितमासीत् यस्य फलमेतद्दर्शनम्, वर्तमाने च समस्तपापौघ- विध्वसकमेतत् तथा च भाविनि कालेऽपि भविष्यतः कल्याणस्य एतद् भवदीय- दर्शनमेव हेतुः। जगत्यपर्याप्तसहस्त्रभानुना न यन्नियन्तु समभावि भानुना । प्रसह्य तेजोभिरसख्यतां गतैरदस्त्वया नुन्नमनुत्तमं तमः ।। २७ ॥ अन्वय-अपर्याप्तसहस्रभानुना जगति यन्नियन्तुन समभावि, अदः अनुत्तम तमः त्वया असंख्यतां गतः तेजोभिः प्रसह्य नुन्नम् ।। अर्थ:-अपरिमेय सहलो किरणो वाले सूर्य के द्वारा (भी) (जो अज्ञानान्धकार), ( ६३ ) दूर नही किया जा सका; उसी सर्वप्रबल अन्धकार को आप ने अपने विविध तेज से बलपूर्वक नष्ट कर दिया। जगतीति ॥ जगत्यपर्याप्ता अपरिच्छिन्नाः सहस्र भानवोऽशवो यस्य तेन भानुनार्केण । 'भानवोऽर्कहराशवः' इति वैजयन्ती । यत्तमो नियन्तु निवारयितु न समभावि न शेके । लुड् । अविद्यमानमुत्तम यस्मात्तदनुत्तम सर्वाधिकमदस्तमो मोहात्मकमसंख्यांगतैस्तेजोभिः प्रसह्य बलात्त्वया नुन्न छिन्नम् । अतः श्लाध्यदर्शनो भवानिति भावः 'नुदविद-'इत्यादिना विकल्पान्निष्ठानत्वाभावः। अत्रोपमानाद्भानोमुनेराधिक्यप्रतिपादनाव्यतिरेकालकारः ॥ व्याकरण-अपर्याप्तसहस्रभानुना-न पर्याप्ताः । (परि+आप+क्त कमरिण) इति अप-ताः (नन तत्पु०)। अपर्याप्ताः सहस्र भानवः (किरणाः) सः अपर्याप्तसहस्रभानुः (ब० बी० ), तेन । नियन्तुम्-नि+यम् +तुमुन् । समभावि सम्+भू+लुड् त (भावे) असख्यताम् --- अविद्यमाना सख्या यस्य तत् असख्यम् (ब० वी०), तस्य भावः असख्यता, ताम् । नुन्नम् - नुद्+क्त कर्मरिण । यहाँ "नुदविदोन्दत्रामाहीभ्यो- ऽन्यतरस्याम्" ८।२।५६ अर्थात् नुद, विद्, त्रा,घ्रा तथा ही धातुप्रो मे निष्ठा के त को विकल्प से न होता है । इस नियम से 'नुन्न' रूप भी बनता है। अनु- त्तमम,-अतिशयेन उत् इति उत्तमम् (उत्+तमप्) । अविद्यमानम् उत्तम यस्मात् तत् अनुत्तमम् (ब० वी०), तत् । कोषः-भानुः = श्लोक २४ देखिये । तमः-'तमो ध्वान्ते गुणे शोके क्लीब वा ना विधुन्तुदे' मेदिनी । यस्य अलंकार--यहाँ उपमान भानु से उपमेय मुनि का प्राधिक्य कहा गया है, अतः व्यतिरेक अलङ्कार है--'प्राधिक्यमुपमेयस्योपमानान्न्यूनताथवा । व्यतिरेक:- साहित्य-दर्पण। भावार्थ:--जगतो बाह्य तमो रविः स्वकीयैरसख्यकिरणे- निरस्यति किन्तु यत्तमः तेनापि विनाशयितु न शक्यते, तन्मोहात्मकम् प्राभ्य- न्तरिक तमो भवतैव समुन्मूल्यते । कृतः प्रजाक्षेमकृता प्रजासृजा सुपात्रनिक्षेपनिराकुलात्मना । सदोपयोगेऽपि गुरुस्त्वमक्षयो निधिः श्र तीना धनसंपदामिव ॥२८॥ अन्वय-प्रजाक्षेमकृता सुपात्रनिक्षेपनिराकुलात्मना प्रजासृजा गुरुः त्वम् घनसपदाम् इव श्रुतीना सदा उपयोगेऽपि अक्षयो निधिः कृतः । अर्थ:-जैसे अपनी सन्तति (प्रजा) का कल्याण करने वाला तथा सुदृढ पात्र मे निधि रख कर निश्चिन्तता प्राप्त करने वाला पिता (प्रजासृजा) धनसम्पत्ति की अक्षय निधि बना जाता है, उसी प्रकार जगत् के जनो (प्रजा) का कल्याण करने वाले तथा सत्पात्र मे रख कर निश्चिन्तता प्राप्त करने वाले प्रजापति ब्रह्मा जी ने सर्वोपदेष्टा आप को श्रुतियो का सदा उपयोग (उपदेश) करते रहने पर भी समाप्त न होने वाला भण्डार बनाया है । कृतइति ॥प्रजाना जनानामपत्याना च क्षेमकृता कुशलकारिणा । ' प्रजा स्यात्सततौ जने' इतयमरः । सुपात्रे योग्यपुरुष कटाहादिदृढभाजने च निक्षेपेण निधानेन च निराकुलात्मना स्वस्थचित्तेन । 'योग्यभाजनयोः पात्रम्' इत्यमरः । प्रजासृजा ब्रह्मणा पुत्रिणा च त्वं धनसपदामिव श्रुतीनां वेदाना सदोपयोगे दान- भोगाभ्या व्ययेऽप्यक्षयः एकत्राम्नानादन्यत्र नित्याच्चेति भावः। गुरुरुपदेष्टा । सप्रदायप्रवर्तक इति यावत् । अन्यत्र महान् । निधीयत इति निक्षेपः कृतः। 'उपसर्ग घोः किः । श्रुतिसंप्रदायद्वारा धर्माधर्मव्यवस्थापकतया जगत्प्रतिष्ठा- हेतूनां भवाहा दर्शनं कस्य न श्लाध्यमिति भावः । अत्र शब्दमात्रसाधाच्छ्ले- षोऽयं प्रकृतविषय इत्याहुः ॥ व्याकरण-प्रजाले मकृता=प्रजाना क्षेमः (ष० तत्पु०) । प्रजाक्षेमं कृतवान् प्रजाक्ष मकृत् (प्रजाक्षेम++विप् भूते कर्तरि) उपपदतत्पुरुषः, तेन । प्रजासृजा-प्रजाः सृष्टवान् इति प्रजासृट् (प्रजा+सृज+विप् भूते ( ६५ ) कतरि) (उप० तत्पु०), तेन । सुपात्रनिक्षेपनिराकुलात्मना शोभनं पात्र सुपात्रम् (प्रादितत्पु०) तस्मिन् निक्षेपः (नि + क्षिप् + धन भावे) सुपात्रनिक्षेपः (सुप्सुपा)। निराकुलः प्रात्मा यस्य स निराकुलात्मा (ब० बी०) सुपात्रनिक्षेपेण निराकुलात्मा इति सुपात्र० (सूप्सुपा), तेन । उपयोगे-उप+युज+घन, भावे उपयोगः, तस्मिन् । अक्षयः अविद्यमानः क्षयो यस्य स अक्षयः (ब० बी०) निधिः-नि+या+कि (प्रधिकरणे)।श्रतोनाम्-श्रूयन्ते इति श्रु+क्तिन् कर्मणि श्रुतयः, तासाम् । धनसम्पदाम् -धनानां सम्पदः (सम् +पद्+क्विप् भावे) इति धनसम्पदः (१० तत्पु०), तासाम् । कोष-'प्रजा-प्रजा स्यात् सततौ जने' इत्यमरः । अलङ्कार-यहाँ उन्हो शब्दो द्वारा दो अर्थ निकलते हैं अतः श्लेष अलङ्कार है-शब्दैः स्वभावादेकार्थं श्लेषोऽनेकार्थवाचनम्-सा०द० । भावार्थ-प्रजाकल्याणकारिणा विधात्रा वीतचिन्तेन भवॉल्लोके श्रुतीना सम्प्रदायप्रवर्तको गुरुरवतारितः । श्रुतिसम्पत्तयश्च निरन्तर समुपयुज्यमाना अपि भवति अक्षया एव तिष्ठन्ति । - विलोकनेनैव तवामुना मुने कृतः कृतार्थोऽस्मि निबर्हितांहसा । तथापि शुश्रषुरह गरीयसीगिरोऽथवा श्रेयसि केन तृप्यते ॥२९॥ अन्वय-हे मुने ! निहिताहसा अमुना विलोकनेनैव 'कृतार्थः कृतः अस्मि, तथापि अह गरीयसीः गिरः शुश्रूषुः अस्मि । अथवा, श्रेयसि केन तृप्यते । तव अर्थ:-हे मुनि ! यद्यपि पाप को दूर करने वाले प्राप के इस दर्शन से ५ । -कृतः हो मैं कृतकृत्य हो गया हूँ, तथापि आप के सारगर्भित वचन सुनना चाहता हूँ। अपने कल्याण से भला किसे तृप्ति हाती है? ... विलोकनेनेति।। हे मुने, निहिताहसापहृतपाप्मना । अतएवामुना तव क्लिीकनेनैव कृतार्थः कृतोऽस्मि। तथाप्यह गरीयसीपर्थवत्तराः। द्विवचन' इत्यादिना ईयसुन्प्रत्ययः । उगितश्च'इति डीप । 'प्रियस्थिर' इत्यादिना गुरोगिरादेशः । निरस्तव वाचोऽपि शुश्रूषुः श्रोतुमिच्छुरस्मि । शृणोतेः सन्नन्तादुप्प्रत्ययः । न चैतत्तथेत्याह-अथवा । तथाहीत्यर्थः । अथवेति पक्षोन्तरप्रसिद्योरिति गणव्या- ख्यानात् । श्रेयसि विषये केन तृप्यते । न केनापीत्यर्थः । कृतार्थताया इयत्ताभावादिति भावः । भावे लिट् ।। व्याकरण-विलोकनेन-वि+लोक् + ल्युट भावे । कृतार्थ अर्थ. यस्य सः कृतार्थः (ब० वी०)। निबहितांहसा-निबर्हितम् (नि+बर्ह हिमायाम् + क कर्मणि) अहः येन तत् निहितांहः (ब० वी०), तेन । शुश्रूषुः- श्रु+सन् +उ कर्तरि गरायसी :--अतिशयैन गुर्व्यः इति गरीयस्यः (गुर्वी+ ईयसुन्+कोप = गर्+ईयसुन्+ङीप), ताः । श्रेयसि--अतिशयेन प्रशस्यम् इति श्रेयः (प्रशस्य+ ईयसुन् =श्र-+ ईयसुन्-"प्रशस्यस्य श्रः” ५॥३॥६० से प्रशस्य के स्थान मे श्र आदेश होता है), तस्मिन् । तृप्यते-तृप +लट त+ भावे। कोष--अहः-'कलुषं वृजिनैनोघमहोदुरितदुष्कृतम्' इत्यमरः श्रेयः-श्रेयो मुक्तौ शुभे धर्मेऽतिप्रशस्ते च वाच्यवत्, इति विश्वः । भावार्थ-हेमुने । यद्यपि पापविनाशकेन तव अमुना दर्शनेनैव अह कृतकृत्यो जाना, तथापि मङ्गलमयी ते वाणीमपि श्रोतुमभिलाषो मयि जागत्यैव । जनः प्रचुरमपि कल्याण प्राप्य सन्तोषं नैव लभत इति नैसर्गिकमेव । यक गतस्पृहोऽप्यागमनप्रयोजन वदेति वक्त व्यवसीयते यया। तनोति नस्तामु दितात्मगौरवी गुरुस्तवैवागम एष धृष्टताम् ॥३०॥ अन्वय-गतस्पृहः अपि मागमनप्रयोजन वद इति वक्तु यया (धृष्टतया) व्यवसीयते, ता धृष्टता नः उदितात्मगौरवः तव एष गुरुः प्रागम एव तनोति। अर्थः- यद्यपि आप निरीह है, तथापि अपने आगमन का कारण बताइये-- यह कहने के लिये जो धृष्टता मुझे उद्यत कर रही है, उसे हमारे गौरव को प्रकट करने वाला आप का यह महत्त्वपूर्ण प्रागमन ही प्रोत्साहित कर रहा है । गतस्पृहोऽपीति ।।गतस्पृहो विरक्तोऽपि त्वमागमनप्रयोजन वदेति वक्त यया धृष्टतया व्यवसीयत उद्यम्यते । स्यतेर्भावे लट् । उदितमुत्पन्नमुक्त वा आत्मनो मम गौरव येन स गुरुः श्लाध्य एष तवागम प्रागमनमेव नोऽस्माक ता धृष्टता तनोति विस्तारयति । 'तनु विस्तारे' लट । भवतो निःस्पृहत्वेऽपि प्रेक्षावत्प्रवृत्त प्रयोजनव्याप्त्या सावकाशः प्रश्नः इति भावः ।। व्याकरण-गतस्पृहः-गता स्पृहा यस्य स गतस्पृहः (ब० वी०)। आगमनप्रयोजनम्-आगमनस्य प्रयोजनम् (प्र+युज+णिच् + ल्युट करणे) इति आगमनप्रयोजनम् (ष० तत्पु०)। व्यवसीयते -बि+अव+सो+लए त भावे । उदितात्मगौरवः- आत्मनिगौरवम् प्रात्मगौरवम् (सुप सुपा)। उदितम् प्रात्मगौरव येन यस्मात् वा स उदितात्मगौरवः (ब० वी०)। आगमः-प्रा+गम् +अप स्य भावः धृष्टता, ताम् । भावे । धृष्टताम्- -धुष्+क्त कर्तरिः धृष्ट, भावार्थः-सांसास्किविषयेभ्यो निस्स्पृहोऽपि भवान् मद्गृहम् प्रामत्य यन्मे गौरव वितीर्णवान् तदेव 'भगवन् । किम्प्रयोजनकमेतद् आगमनमिति' भवन्तं प्रष्टुमपि मा प्रोत्साहयति । इति ब्रुक्तं तमुवाच स व्रती न वाच्यमित्थ पुरुषोत्तम त्वया । त्वमेव साक्षात्कारणीय इत्यतः किमस्तिकार्य गुरुयोगिनामपि ॥३१॥ अन्वय-इति ब्रुन्त त स व्रती उवाच-हि) पुरुषोत्तम त्वया इत्थं न वाच्यम् । योगिनामपि त्वमेव साक्षात्करणोय इत्यतः किं गुरु कार्यमस्ति । अर्थ-इस प्रकार कहते हुए उन भगवान् श्रीकृष्ण जी से नारद मुनि ने कहा- हे पुरुषोत्तम आप ऐसा न कहे क्योकि योगियो के भी तो साक्षात्कार ( दर्शन ) के विषय आप ही हैं। उन्हे भी इससे बढकर ( महत्तर) कौन सा कार्य है ? इति ब्रुवन्तमिति ॥ इति अवन्तं त हरि स व्रती मुनिरुवाच । किमिति । हे पुरुषोत्तम पुरुषेषु श्रेष्ठ, 'न निर्धारणे' इति षष्ठीसमासप्रतिषेधः । त्वया इत्थ 'गतस्पृहोऽपि' इति न वाच्यम् । निःस्पृहस्याप्यत्र प्रयोजनसंभवादिति भावः । तदेवाह । योगिनामपि त्वमेव साक्षात्करणीयः प्रत्यक्षीकर्तव्य इत्यतोऽस्मादन्यद्- गुरु कार्य किमस्ति । न किंचिदित्यर्थः । तस्मान्न प्रयोजनान्तरप्रश्नावकाश इति भावः। व्याकरण-व्र वन्तम्-ब्रु+शतृ कर्तरि ब्रुवन्, तम् । व्रती-व्रतम् अस्ति अस्य व्रती (व्रत+इनिः मत्वर्थे)। वाच्यम्-वच्+ण्यत् (भावे, कर्मणोऽविवक्षया) । पुरुषोत्तमः-पुरुषेषु उत्तमः पुरुषोत्तमः (सुप्सुपा) । तत्सम्बुद्धौ , हे पुरुषोत्तम । साक्षात्करणीयः-साक्षात् कर्तव्यः इति साक्षात्- ( ६ ) करणीयः (साक्षात्++अनीयर् कर्मणि) (गतितत्पु०)- यहाँ "साक्षात्प्र- भृतीनिच" ११४/७४ नियम से साक्षात् को विकल्प से गतिसजा होती है। कार्यम्-कृ+ण्यत् कर्मणि । योगिनाम्--युज्+रिणनिः कर्तरि योगिनः, तेषाम् । भावार्थ-एव कथयन्त हरि नारदः प्रत्युवाच, हे पुरुषोत्तम सिद्ध समाधयो योगिनोऽपि त्वामेव साक्षात्कतु यतन्ते, अतः त्वदर्शनाद् गुरुतर किमन्यत् प्रयोजन ममेहागमनस्य सम्भवेत् । यदुक्त योगिनामपि त्वमेव साक्षात्करणीय इति तदेव द्रढयति- उदीर्णराग प्रतिरोधकं जनैरभीक्ष्णमक्षण्णतयातिदुर्गमम् । उपेयषो मोक्षपथ मनम्बिामस्वमग्रभूमिनिरपायसश्रया ।। ३२ ॥ उदीर्णरागप्रतिरोधक अभीक्ष्णम् अक्षुण्णतया जनैः अतिदुर्गम मोक्ष पथम उपयुष मनस्विनः त्वम् (एव) निरपायसश्रया अग्रभूमिः (असि)। अन्वय . अर्थ--उद्दीप्त विषयतृष्णा जिसमे प्रतिबन्धक (विघ्न) होती है और सतत अनभ्यस्त होने से लोगो के लिए जो दुर्गम है, उस मोक्ष मार्ग को प्राप्त करने वाले मनस्वी पुरुषो के लिए पाप ही वह गन्तव्य स्थान है जिसमे अविनाशिनी सम्यक स्थिति प्राप्त हो जाती है । (अथवा आप ही वह गन्तव्य स्थान है जिसकी प्राप्ति से पुनरावृत्ति नहीं होती।) टिप्पणी (i) प्रस्तुत श्लोक मे जिस अविनाशिनी सम्यक् स्थिति को ओर संकेत किया गया है, उसे ही योमादि शास्त्रो में स्वरूपावस्थान या स्वरूपप्रतिष्ठा कहा गया है । स्वरूप के अविनश्वर, होने मे स्वरूपावस्थान भी दिनाशी होता है और अविनाशी होने से ही यह सम्यक् है ।

(ii) मल्लिनाय ने प्रतिरोधक, अक्षुण्ण, मोक्षपथ, निरपायस श्रया तथा अग्रभूमि पदो के क्रमशः पाटच्चर (चोर), अहत (जिस पर निरन्तर बहुत दिनों से न चला गया हो,) कान्तार (निर्जन मार्ग) तथा निर्बाधस्थान-ये अर्थ लेकर श्लोक को ध्वन्यात्मक माना है। यह ध्वनि इस प्रकार की है-जैसे किसी संकट से मुक्त। हुआ कोई पुरुष निर्जन मार्ग से चलकर तथा किती निर्बाध अथवा आपत्तिरहित स्थान मे पहुँचकर अभय प्राप्त करता है, उसी प्रकार सकटककारिणी विषयतृष्णा से छूटा हुआ साधक योगादि मोक्षमार्ग से चलकर तुम्हे प्राप्त कर जन्म मरण के भय से मुक्त हो जाता है। उदीारागेति ॥ उदीर्ण उद्रितो सगो विषयाभिलाषः स एव प्रति- रोधकः प्रतिबन्धकः पारच्चरश्च यस्मिन् । 'प्रतिरोधिपरास्कन्दिपाटच्चरमली- म्लुचाः' इत्यमरः । अभीक्ष्णमक्षुण्णतयानभ्यस्तत्वेनाप्रतिहतत्वेन च जनैरतिदुर्गम मोक्षपयमपवर्ग मार्ग, कान्तार चापेयुषः प्राप्तवतः । 'उपेयिवान्-' इत्यादिना क्वस्वन्तो निपातः । मनिस्वनः सुमनसः धीरस्य च । प्रशसाया विनिः । त्वमेव 'निरपायः पुनरावृत्तिरहितः सत्रयः प्राप्तिर्यस्याः सा तथोक्ता । 'न स पुनरावर्तते' इति श्रुतेः । अग्रभूमिः प्राप्यस्थानम् । 'अप्रमालम्बने प्राप्ये' इति विश्वः । 'सोऽहम्' इत्यादिश्रुतेस्तत्प्राप्नेरेव मोक्षत्वादिति भावः । तस्मान्मुमुक्षूणामपि त्वमेव साक्षात्करणीय इति सिद्धम् । 'तमेव विदित्वाऽतिमृत्युमेति नान्यः पन्था विद्यतेऽयनाय,' इति श्रुतेः । यथा कस्यचित्कुतश्चित्सकटानिर्गतस्य केनचिकान्तारेण मतस्य, किंचिनिर्बाधस्थानप्राप्तिरभयाय कल्पते तथा त्वमपि मुमुक्षोरिति ध्वनिः॥ व्याकरण+दोपरागप्रतिरोधकम्-उदोसः (उद्+ 1 ( ७१ ) गतौ क्यादिः+क्त कर्तरि) रागः ! ( (रत् +धन करणे ) इति उदीर्ण रागः (कर्मधा०)। सःप्रतिरोधक. यस्मिन् स उदीर्णरागप्रतिरोधकः (ब० वी०), तम् । अक्षुण्णतया-न क्षुण्णः (क्षुद्+क्त कर्मणि) इति अक्षुण्णः (नन तत्पु०)। तस्य भावः क्षुण्णता, तया । अतिदुर्गम-अति + दुर् + गम् +खल (कर्मणि) +द्वि० एक० । उपेयुषः-(देखिये ११२४ में अभ्युपेयुषी) मोक्षपथम् - मोक्षस्य पन्था इति मोक्षपथः (मोक्ष+पथिन् + अ-"ऋक्पूरब्धू पयामानक्षे" ५१४१७४ अर्थात् ऋच्, पुर्, अप, धुर् (जो अक्षसम्बन्धिनी न हो) तथा पथिन् शब्द मे अन्त होने वाले समासों में समासान्त अप्रत्यय लगता है-इस नियम से यहाँ अ प्रत्यय लगा है । मनस्विनः-प्रशस्तं मनः अस्ति अस्य इति मनस्वी (मनस्+विनिः मत्वये), तस्य । मत्वर्थीय प्रत्यय अनेक अर्थों में होते है-"भूमनिन्दाप्रशंसासु नित्ययोगेऽतिशायने । ससर्गेऽस्ति विवक्षाया भवन्ति मतुबादय.।" अग्रभूमिः-प्रग्रा चासो भूमिश्च इति अग्रभूमिः (कर्मधा०). निरपायसंश्रया -निर्गतः अपायः (अप+प्रय+धन, भावे ) यस्मात् स निरपायः (ब० बी०)। निरपायः संश्रयः (सम्+धि+प्रच भावे) यस्याः या निरापायसंश्रया (ब० बी०)। यह विग्रह मल्लिनाथी टीका सर्वऋषा के अनुरोध से संघय का 'प्रासि' अर्थ ग्रहण करके किया गया है। परन्तु संश्यका 'स्थिति'-अर्थ ही सामान्यतः गृहीत होता है। उस अर्थ में उपयुक्त विषह इस प्रकार होगा-गिरपायः (प्रपायरहितः अविनश्वरः वा) संश्रयः (सम्यक् स्थितिः) यस्या सा । भावार्थ-कामान् कथमपि परित्यज्य मोक्षमार्गमनुसरन्तो मुमुक्षवः परमलक्ष्य त्वामेव प्राप्य विमुक्ता भवन्ति च पुनरावर्तन्ते । ननु प्रकृतिविविक्तपुरुषसाक्षात्कारान्मोक्षो नास्मसाक्षात्कारादित्वाशकड्य सोऽपि त्वमेवेत्याह- ( ७२ ) उदासितारं निगृहीतमानसैगृहीतमध्यात्मशा कथंचन । बहि िवकारं प्रकृतेः पृथग्विदु. पुरातनं त्वां पुरुषपुराविदः॥३३॥ अन्वय-पुराविदः निगृहीतमानसैः अध्यात्मशा कथञ्चन गृहीत त्वाम् उदासितारं, बहिर्विकार, प्रकृतेः पृथक्, पुरातनं पुरुष विदुः ।। अर्थ-पूर्वज्ञ ( ऋषि-मुनि ) चित्तवृत्ति का निरोध करने वाले योगियो से प्राध्यात्मिक ( आन्तरिक ) दृष्टि द्वारा किसी प्रकार साक्षात् किये गए आपको अनासंग ( उदासीन ), महदादि विकारों से परे एवं त्रिगुणात्मिका प्रकृति से भिन्न (विविक्त) पुराण पुरुष के रूप मे जानते हैं। उदासितारमिति ॥ पुराविदः पूर्वज्ञाः कपिलादयस्त्वां निगृहीत- मानसैरन्तर्निबद्धचित्तर्योगिभिः आत्मनि इत्यध्यात्मम् । विभक्त यथेऽव्ययीभावः । 'अनश्च' इति समासान्तष्टच । अध्यात्म यादृक्ज्ञानं तयाध्यात्मशा प्रत्यग्दृष्ट्या कथंचन गृहीतं साक्षात्कृतम् । केन रूपेरण गृहीतमित्यत आह-उदासितार- 'मुदासीनम् । प्रकृती स्वार्थप्रवृत्तायामपि स्वयमप्राकृतत्वादस्पृष्टमित्यर्थः । 'आसेस्तृच । विकारेभ्यो बहिः बहिर्विकारम् । महदादिभ्यः पृथग्भूतमित्यर्थः । 'अपपरिबहिरञ्चवः पञ्चम्या' 'इत्यव्ययीभावः । किंच प्रकृतेस्त्रगुण्यात्मनो भूलकारणात्पृथग्भिन्नम् । 'प्रकृतिः पञ्चभूतेषु प्रधान मूलकारणे' इति यादवः । पुरा भवं पुरातनमनादिम् । 'सायंचिरम्-'इत्यादिना ट्यु प्रत्ययः । पुरुषपदवाच्यं विज्ञानधनं विदुर्विदन्ति । 'विदो लटो वा' इति भेसादेशः । यथाहुः-'मूलप्रकृ- खिरविकृतिमहदाद्याः प्रकृतिविकृतयः सप्त । षोडशकश्च विकारो न प्रकृति विकृतिः पुरुषः।' इति । 'प्रजामेका लोहित शुक्लकृष्णाम्' इत्यादिश्रुतिश्च । सोऽपि . +r

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त्वमेव 'तत्त्वमसि' इत्यादिवाक्यरैक्यश्रवणात् । तस्मात्त्वमेव साक्षात्करणीय इति
सुष्ठुक्तमिति भावः॥
व्याकरणम्-उदासितारम् - उद्+पास+तृच् (कर्तरि) उदासिता,
तम् । निगृहीतमान.-मनः एव मानसम् (मानस्+अण् स्वार्थे)।
निगृहीतं मानस यैः ते निगृहीतमानसाः (ब० बी०), तै. । अध्यात्मशा-
पश्यतीति दृक् (दृश् +क्किप कर्तरि)। प्रात्मनि इति अध्यात्मम् (अधि+
आत्मन् +टच् ) ( अव्य० भा० ), अध्यात्मदृक् अध्यात्मदृक् (सुप सुपा),
तया। बहिर्विकारम-विकारेभ्यो बहिः इति बहिर्विकारम् (अव्ययी०)।
“अपपरिबहिरञ्चव. पञ्चम्य.” २११११२ आर्थात् अप, परि बहिः तथा अञ्च् धातु
से बने हुए प्रत्येक, प्राक् इत्यादि पद पञ्चम्यन्त पद के साथ समास बनाते है'-
इस नियम से बहिः का विकारेभ्यःके साथ अव्ययीभाव समास बना है । विदुः-
विद् + लट् झि। पुरातनम् --पुराभवः पुरातनः (पुरा+ट्य ) । नियम के लिये
१। १५ देखिए । पुराविद-पुरा विदन्ति इति पुराविदः (पुरा+विद् + विप
कतरि) (उप० तत्पु०) ।
कोष -विकार- = "परिणामो विकारो द्व समविकृतिविक्रिये--अमरः
प्रकृति-प्रकृतिगुणसाम्य स्यादमात्यादिस्वभावयोः -हैमः ।
पुरुष-क्षेत्रज्ञ आत्मा पुरुषः-अमरः ।
भावार्थ:-पूर्ववृत्तज्ञाः कपिलाद योमनीषिणः चित्तं वशीकृत्यं महता
'यत्नेन त्वा साक्षात्कृत्य साख्यशास्त्रप्रतिपादितमहदादिविकारेभ्यः पृथक्त्वेन
त्रिगुणात्मिकाया मूलकारणरूपायाः प्रकृतेश्च भिन्नत्वेन अपि च अनासङ्गपुरु-
षरूपेरण जानन्ति ।
एवं भगवतो निगुणस्वरूपमुक्त्वा संप्रति प्रस्तुतोपयोगितया सगुणमाश्रित्य
षभिः स्तौति-
निवेशयामासिथ हेलयोद्धृतं फणाभृतां छादनमेकमोकसः ।
जगत्त्रयकस्थपतिस्त्वमुच्चरहीश्वरस्तम्भशिरःसु भूतलम् ॥३४॥

( ७४ ) अन्वय -जगत्त्रयैकस्थपति: त्व हेलया उद्धत, फणामताम् अोकसः एक छादन भूतलम् उच्चकैः अहीश्वरस्तम्भशिरःसु निवेशयामासिथ । अर्थ-तीनो लोको के एकमात्र शिल्पी (स्रष्टा) पाप ने सहज ही उठाये हुए, नागलोक के एकमात्र आवरण इस भूतल को शेषनाग रूपी स्तम्भ के ऊंचे सिरो पर स्थापित किया था (रखा था) । निवेशयामासिथेति ।। जगत्त्रयस्यैकस्थपतिरेकाधिपतिरेकशिल्पी च । “स्थपतिरधिपतो तक्षिण बृहस्पतिसचिवयोः' इति बैजयन्ती । त्व हेलयोद्धृतम् । वराहावतारे इति भावः। फणाभृतामोकस आश्रयस्य, समनश्च । 'प्रोकः सनि चाश्रये' इति विश्वः । एक छादनमावरण भूतलमुच्चकैरुन्नतेषु च अहीश्वरः शेष एव स्तम्भस्तस्य शिरःसु मूर्धसु, अग्रेषु च । फणासहस्त्रेष्विति भावः । निवेश- यामासिथ निवेशितवानसि । विशतेय॑न्ताल्लिटि थल् । 'कृञ्चानुपयुज्यते लिटि' इत्यस्तेरनुप्रयोगः । अत्र श्लिष्टाश्लिष्टरूपकयोर्हेतुमद्भावाश्लिष्ट परम्परित- रूपम् । व्याकरण -निवेशयामासिथ-नि-+विश् -रिणच+लिट उद्धृतम् - उद्++क्त कर्मणि । फणाभृताम्-फणाः बिभ्रति इति ( फरणा+भृ+विप् कर्तरि ) फलाभृतः ( उप० तत्पु० ), । छादनम् -छद्+णिच्+ ल्युट् करणे तत् । जगत्त्रयै- कस्थपतिः-जगतो त्रयम् इति जगत्त्रयम् (प० तत्पु० )। एकश्चासो स्थपतिश्चेति एकस्थपतिः (कर्मधा०-"पूर्वकालैकसर्वजरत्पुराणनवकेवलाः समानाधिकरणेन" २।१।४६ नियम से कर्मघा० समास हुआ ।) अहीश्वर- स्तम्भशिसु-अहीनाम् ईश्वरः इति अहीश्वरः (प० तत्पु०) । स एव स्तम्भः इति अहो श्वरस्तम्भः (कर्मधा०) तस्य शिरसि इति अहीश्वरस्तम्भशिरांसि (ष. तत्पु०), तेषु । थल।

( ७५ . कोष :-हेला 'हेला स्त्रियामवज्ञाया विलासे वारयोषिति'-मेदिनी । अलंकार-यहाँ 'अोकसः' तथा 'स्थपति' मे शिलष्ट रूपक 'छादनं भूत लम् एव 'अहीश्वरस्तम्भशिर.सु' के अश्लिष्ट रूपको के हेतु है, अतः इसे श्लिष्ट परम्परित रूपक कहा जायगा. 'यत्र कस्यचिदारोपः परारोपणकारणम् । तत्प रम्परित श्लिष्टाश्लिष्टशब्दनिबन्धनम" || - भावार्थ-भवानेव तदा ( वराहावतारे) जलनिमग्नामिमां (पृथिवी) पाताललोकात् उद्धृत्य तदावरणत्वेन मृष्टेराधारत्वेन च ता शेषशिरस्सु प्रतिष्ठाप्य समेषा लोकानामार्तिहरो बभूव । । अनन्यगुर्वास्तव केन केवलः पुराणमूर्तेर्महिमावगम्यते । 'मनुष्यजन्मापि सुरासुरान्गुणैर्भवान्भवच्छेदकरै करोत्यधः ॥३५॥ अन्वय-तव अनन्यगुर्वा : पुराणमूर्तेः केवलः महिमा केन अवगम्यते ? मनुष्यजन्मापि भवान् भवच्छेदकरैः गुणः सुरासुरान् सुरासुरान् अधः करोति । अर्थ-तुम्हारे सर्वश्रेष्ठ पुरातन स्वरूप की सम्पूर्ण महिमा कौन जान सकता है ? जब कि मनुष्य रूप में जन्म लेकर भी आप जन्मादि को निवृत्ति करने वाले अपने (जानादि) गुणो से देव-दानवो को नीचे किए रहते हैं। अनन्येति ।। न विद्यतेऽन्यो गुरुर्यस्यास्तस्या अनन्यगुर्वाः इत्यनीकारान्तः पाठः । समासात्प्राड्डोषि 'नद्य तश्च' इति कप्प्रसङ्गः स्यात् । पश्चात्त्वनुपमर्जना- धिकारात् 'वोतो गुणवचनात्' इति प्राप्नोति। "डिक्ति ह्रस्वाच' इति वा - नदीसज्ञात्वात् 'पाण्नद्यः' इत्याडागमः । केचित्तु समासान्तविधिरनित्य इति कपं वारयन्ति तस्याः सर्वोत्तमायास्तव पुराणमूर्तेरमानुषस्वरूपस्य केवलः कृत्स्नः । 'केवलः कृत्स्न एकः स्यात्केवलश्चावधारणे' इति विश्व । महिमा केनावगम्यते ।न केनापीत्यर्थः । कुत :। मनुष्याज्जन्म यस्य स मनुष्यजन्मा भवान् । 'अवयों बहुव्रीहिय॑धिकरणो जन्माशु त्तरपदः' इति वामनः भवच्छेदकरैः ससारनिवर्त- कैगुणैर्ज्ञानादिभिः सुरासुरान् । सुरासुरविरोधस्य कार्योपाधिकत्वेनाशाश्वति- कत्वात् 'येषा च विरोधः शाश्वतिकः' इति न द्वन्द्व कवद्भाव इत्याहुः । अधःकरोति । शेषे प्रथमः' इति प्रथमपुरुषः । भवच्छन्दस्य युष्मदस्मदन्यत्वेन शेषत्वादिति । मानुष एव ते महिमा दुरवगाहः । अमानुषस्तु किमिति तात्पर्यार्थः । द्वितीयार्थेऽसकृव्यञ्जनावृत्या छेकानुप्रासः ।। व्याकरण-अनन्यगुर्वा --अविद्यमानः अन्यः गुरुयस्याः सा अनन्यपुरुः (ब० बी०), तस्याः (विशेष सर्वकषा मे) । पुराणमूर्तेः-पुराणी चासो मूर्तिश्च इति पुराणमूर्ति ( कर्मधा० ), तस्याः। महिमा-महतः भावः महिमा (महत्+इमनिच्)। मनुष्यजन्मा-मनुष्यात् जन्म यस्य सः मनुष्यजन्मा ( व्यधिकरण ब० वी० ) । सुरासुरान्– सुराश्च असुराश्च इति सुरासुराः (द्वन्द्वः) । यहाँ "येषा च विरोधः शाश्वतिकः” २१४६ नियम से एकवद्भाव नही हुआ, क्योकि देवो तथा असुरो का विरोध कार्य-विशेष के कारण हुआ था, शाश्वतिक नहीं था-" सर्वषा । भवच्छेदकरैः-भवतीत भवः (भू+अच् कर्तरि )। भवस्य छेदः (छिद्+धन भावे ) भवच्छेदः (१० तत्पु०)।त कुर्वन्ति इति भवच्छेदकरा: (भवच्छेद++ट कंतरि)(उप० तत्पु०) तैः। कोष-'जन्महरौ भवौ' इत्यमरः । .

(.४७ ) अलङ्कार-“यहाँ द्वितीयाद्ध मे स, भ, क आदि अनेक व्यञ्जनो की अनेक वार आवृत्ति होने के कारण छेकानुप्रास है।" सर्वकषा। भावार्थ-यतः मानुषी तनुमाश्रितोऽपि भवान् भवक्लेशविनाशक- जुनादिगुणैः देवान् दानवांश्च अधःकसेति, अतः पुराणपुरुषस्य भवतः सकल माहात्म्य केनापि ज्ञातु न शक्यते । लघूकरिष्यन्नतिभारभङ्ग राममू किल त्व त्रिदिवाखातरः । उदूढलोकत्रितयेन साप्रत गुरुधरित्री क्रियतेतरा त्वया ॥३६।। अन्वय-त्वम् अतिभारभङ्ग राम् अमू लघूकरिष्यन् किल त्रिदिवादवातरः, (परन्तु) साम्प्रतम् उदूढलोकत्रितयेन त्वया धरित्री गुरुः क्रियतेतराम् । अर्थ-निश्चय ही अत्यधिक भार से टूटती हुई (अर्थात् बोझिल) पृथ्वी को हल्की करने के लिए आप स्वर्गलोक से (इम पर) अवतीर्ण हुए है (परन्तु) इस समय तो आप (अपनी कुक्षि मे) तीनो लोको को वहन करने के कारण इसे गुरुतर ( अधिक भारी, पूज्य) किए दे रहे है। लघूकरिष्यन्निति ॥ त्वमतिभारेणोर्जेन स्वरूपेण भङ्ग रा स्वयं भज्यमा- नाम् “भञ्जभासमिदो घुरच्' । 'भङ्ग रः कर्मकर्तरि' इति वामनः। अमूम् । भुवमित्यर्थः । लघूकरिष्यनिर्भारा करिष्यन् किल । 'कृभ्वस्ति--' इत्यादिनाभूत- तद्भावे च्विः 'च्वौ च' इति दीर्घः। तृतीया द्यौस्त्रिदिवः स्वर्गस्तस्मात् । घनर्थे कविधानम् । वृत्तिविषये सख्याशब्दस्य पूरणार्थत्व विभागादिवत् । अवातरः अवतीर्णोऽसि। सांप्रतं संप्रत्युदूढलोकत्रितयेन । कुक्षाविति शेषः। त्वया धरित्री गुरुः पूज्या, भारवती च क्रियतेतरामतिशयेन क्रियत। 'तिङश्च' इति तरम् । 'किमेत्तिडव्ययघात्-' इत्यादिना आमुप्रत्ययः ॥ लघुकर्ता गुरुकतेति विरोधा भासोऽलकारः । 'माभासत्वे विरोधस्य विरोधाभास उच्यते' इति लक्षणात् , ( ७८ ) व्याकरण-लघूकरिष्यन् = लघु लघु सम्पद्यमाना करिष्यन् इति लघुकरिष्यन् ( लघु+च्चि+कृ + लृट शतृ ) गतितत्पु० ॥ अतिभार- भङ्ग राम् = अतिशयितो भारः अतिभारः (प्रादितत्पु० ) तेन भङ्ग रा (भा + घुरच्+टाप् ) अतिभातरभङ्ग रा ( तृ० तत्पु०), ताम् त्रिदिवात्-तृतीया द्यौरिति त्रिदिवः (त्रि+यो+क. ) उदूढलोकत्रितयेन-लोकाना त्रितयं लोकत्रितयम् (१० तत्पु.) उद्रुढ ( उद्+वह +क्त कर्मणि ) लोकत्रितय येन स उदूढलोकत्रितयः (ब० वी०), धरित्री-धरति इति धरित्री (धृ+तृच् कर्तरि+डीए । क्रियतेतराम्-अतिशयेन क्रियते इति क्रियतेतराम् (क्रियते + तरप्+प्रामु ) यहाँ “तिडश्च" ५।३।५६ नियम से क्रियते के बाद तरप् (तर) प्रत्यय लगा और फिर “किमेत्तिड व्ययधादाम्वद्रव्यप्रकर्षे ॥ ५॥४१११ अर्थात् किम्, तथा ए मे अन्त होने वाले क्रियारूप “एव अव्यय के आगे लगने वाले तरण मार तमप (घ) प्रत्ययो के आगे 'मामु' प्रत्यय लगता है, परन्तु यदि द्रव्यसम्बन्धी प्रकर्ष प्रकट करना हो तब नही” इस नियम से आमु (प्राम) प्रत्यय लगा। कोष- साप्रतम्-“साम्प्रत तूचितेऽधुना" इत्यमरः । गुरु-"गुरुमहत्या- ङ्गिरसेपित्रादौ धर्मदेशके । अलधौ दुर्जरे चापि-" इति हैमः। धरित्री-'धरा धरित्री धरणी क्षोणी ज्या काश्यपी क्षितिः” इत्यमरः । अलङ्कार-“यहाँ भारको लघु करने के लिए अवतीर्ण हुमा यक्ति हो उसे गुरुतर कर रहा है, अतः विरोधाभास अलङ्कार माना जायगा-'प्राभासत्वे विरोधस्य विरोधाभास उच्यते।"---सर्वकषा। भावार्थ-दानबदुराचारभारभज्यमानाया' भुवो भारम् अपाकम..

( ७६ ) भुवम अधिकतर अवतीर्णस्त्रिलाक्याधारो भवान् साम्प्रत स्वगौरवेणेमा भारवती (पूज्या च ) करोति । - निजोजसोज्जासयितु जगद्र्हामुपाजिहीथा न महीतल यदि । समाहितैरप्य निरूपितस्ततः पद दृशः स्याः कथमीश मादृशाम् ।।३७।। अन्वय-निजौजसा जगद्रुहाम् उज्जासयितु यदि महोतल न उपा- जिहीथाः, ततः (हे) ईश समाहितैः अपि अनिरूपितः त्वं मादृशा दृशः पदं कथं स्याः॥ Bre ५६Hard अर्थ-ह भगवन् । अपने तेज से जगद्रोहियो (कसादि राक्षसो) को मारने के लिये यदि आप इस पृथ्वी पर अवतीर्ण न होते तो समाधि लगाने वालो के लिए भी दुर्गम आप मुझ जैसे (सामान्य) जनो की दृष्टि मे कैसे आते ? निजेति ।। निजौजसा स्वतेजसा जगद्भयो द्रुह्यन्तीत जगद्रुहः कसा- दयः । 'सत्सूद्विष-' इत्यदिना क्विप । तेषा उज्जासयितुम् । तान्हिसितुमित्यर्थः। 'जासिनिप्रहण-' इत्यादिना कर्मणि शेष षष्ठी । 'जसु हिसायाम्' इति चुरादिः। महीतल नोपाजिहीथाः यदि नावतरेश्चेत् । 'मोहाड् गौ' लडि थासि रूपम् । ततस्तर्हि समाहितैः समाधिनिष्ठेरपि। सकर्मकादप्याशितादिवद्विवक्षिते कमरिण कर्तरि क्तः । अथवा समाहितः ।समाहितचित्तैरित्यर्थः । विभक्तधनेषु 'विभक्ता भ्रातरः' इतिवदुत्तरपदलोपो द्रष्टव्यः गम्यमानार्थस्याप्रयोग एव लोप इति कैयटः। अनिरुपितोऽगृहीतस्त्वमीश, मादृशाम् । चर्मचक्षुषामिति भावः । विनयोक्तिरियम् । हशो दृष्टेः पद गोचरः कथ स्याः ।न कथचिदित्यर्थः । तस्मात्त्वत्साक्षात्कार एवाममनप्रयोजनमिति भावः॥

( . ८० ) . व्याकरण-निजौजसा=निजम् प्रोजः निजीजः (कमंधा०), तेन ॥ उज्जासयितुम् = उद्+जस्+णिचस्वार्थे+तुमुन ॥ जगव्हाम्-जगद्भ्यो द्रुह्यन्तीति जगद्रुहः (जगत् +द्रुह +विप कर्तरि) उप. तत्पु०, तेषाम् यहाँ "जासिनिप्रहणनाटकाथपिषा हिंसायाम् २।३।५६” अर्थात् हिंसार्थक जस्, नि तथा प्रपूर्वक हन्, ऋथ, नट तथा पिष धातुप्रो के कर्म में षष्ठी विभक्ति होती है-इस नियम से हिंसार्थक उज्जासयितुम् के कर्म (शेष) मे षष्ठी हुई है। उपाजिहीथाः-उप+मा+हा (मोहाङ् गतौ)+ लङ् थास् ॥ समाहितैः- सम्+मा+धा+क्त कर्तरि समाहिताः, तैः। विशेष सर्वकषा मे ॥ दृशः- पश्यतीति दृक् (दृश् विप कर्तरि) तस्याः ॥ स्याः =अस्+शकिलिङ् यास् ॥ कोष-प्रोजः "दीप्तौ बले" इत्यमरः । अलङ्कार-यहाँ अनुप्रास अलङ्कार है । भावार्थ-यदि दुराचारिणाम् उन्मूलनाय भूतल नालक्रियात् तदा योगि- भिरपि दुरापो भवान् अस्मादृग्भिदर्शनीयः कथ भवेत् ॥ कोऽयं नियमो यन्ममैवाय दुष्टनिग्रहाधिकार इत्याशङ्कयानन्यसाध्यत्व- मेवाह- ननु उपप्लुत पातुमदो मदोद्धतैस्त्वमेव विश्वभर विश्वमीशिषे । ऋते रवेः क्षालयितु. क्षमेत कःक्षपातमस्काण्डमलीमस नभः ॥३८॥ समूह अवन्य-हे विश्वम्भर मदोद्धतैः उपप्लुतं अदः विश्वं पातुं त्वमेव ईशिषे क्षपातमस्काण्डमलोमस नभः क्षालयितु रवेः ऋते कः क्षमेत ॥ अर्थ-हे विश्वपालक । मदोन्मत्त राक्षसो से पीडित इस विश्व की रक्षा ( ८१ ) करने में आप ही समर्थ हैं । रात्रिकालीन अन्धकारसमूह से मलिन आकाश को विमल करने में सूर्य के अतिरिक्त और कौन समर्थ है ? उपप्लुतमिति ॥ विश्व बिभर्तीति विश्वंभरस्तत्सबुद्धौ हे विश्वंभर विश्वत्रातः । 'संज्ञायां भृतृवृजि--' इत्यादिना खच्प्रत्यये मुमागमः । मदोद्धतैः कंसादिभिरुपप्लुतं पीडितम् अदो विश्व पातु त्वमेव ईशिषे शक्तोऽसि । विश्वभरत्वादिति भावः । भावः। ईश ऐश्वर्ये लिटि थासि रूपम् । अत्र वैधय॒ण दृष्टान्तमाह-क्षपायास्तमस्काण्डैस्तमोवर्ग: । 'काण्डोऽस्त्री दण्डबाणा- वर्गावसरवारिषु' इत्यमरः । 'कस्कादिषु च' इति विसर्जनीयस्य सत्वम् । मलीमस मलिनम् । 'मलीमस तु मलिनं कच्चरं मलदूषितम्' इत्यमरः । ज्योत्स्नातमिस्रा-' इत्यादिना मत्वर्थीयो निपातः । नमः क्षालयितु रवेः ऋते रवि विना । 'अन्यारादितरते-' इति पञ्चमी । कः क्षमेत शक्नुयात् । न कोऽपीत्यर्थः । अत्र वाक्यद्वये समानधर्मस्यैकस्येशिषे क्ष मेतेति शब्दद्वयेन वस्तुभावेन निर्देशात्तत्रापि व्यतिरेकमुखत्वाद्वधर्म्यण प्रतिवस्तूपमालकारः । वाक्यार्थगतत्वेन वाक्यद्वये पृथनिर्देशे प्रतिवस्तुपमा । सामान्यस्य तदुक्तम्-सर्वस्य व्याकरण-उपप्लुतम्-उप+प्लु+क्त कर्मणि। मदोद्धतैः-मदेन उद्धताः (उद्+हन्+क्त कर्तरि) मदोद्धताः (तृ० तत्पु०) तैः । विश्वम्भर- विश्वं बिभर्ति इति विश्वम्भरः (विश्व + भृ+खन् कर्तरि सज्ञायाम्)-उपपद- तत्पु० । तत्सम्बुद्वौ हे विश्वम्भर । ईशिषे-ईश लट् +थास्। क्षाल- यितुम्-क्षल+णिच् स्वार्थे+तुमुन् । क्षमेत–क्षम् +लिड् (शकि)+त । ६ ( ८२ ) क्षपातमस्काण्डमलीमसम्-तमसा काण्डः तमस्काण्डः (प० तत्पु०)। यहाँ “कस्कादिषु च” ८।३।४८ नियम से तमः के विसग को सकार हो जाता है। क्षपायाः तमस्काण्डः क्षपातमस्काण्डः (१० तत्पु०) तेन मलीमसम् क्षपातम- स्काण्डमलीमसम् (तृ० तत्पु०), तत् । कोष-विश्वम्भर-"विश्वम्भरः कैटभजिविधुः श्रीवत्सलाञ्छनः ।" इत्यमरः । क्षपा-"निशा 'निशीथिनी रात्रिस्त्रियामा क्षरणदा क्षपा" इत्यमरः। अलङ्कार-यहाँ वस्तुतः एक ही भाव 'ईशिष' तथा क्षमेत' इन दो शब्दो द्वारा इस प्रकार दो पृथक् वाक्यों में कहा जाता है कि मानो दो पृथक् भाव हो और विशेषता यह कि उस समान भाव को वैधयं के द्वारा व्यक्त किया गया है । इस प्रकार यहाँ प्रतिवस्तूपमा अलङ्कार होता है-'अलङ्कारसर्वस्व' मे उसका लक्षण.इस प्रकार किया गया है "वाक्यार्थगतत्वेन सामान्यस्य वाक्यद्वये पृथनिदे से प्रतिवस्तूपमा।" पर्वषा । भावार्थ-देव, निशान्धतमसाऽऽवृत नभः प्रकाशयितुं तमश्च विनाशयितु यथा रविरेव क्षमः तथैव दानवैः पीडित जगतीतल रक्षितु दानवांश्च उन्मूलयितु त्वमेव समर्थः। करोति कंसादिमहीभृतां वधाज्जनो मृगाणामिव यत्तवस्तवम् । हरे हिरण्याक्षपुर सरासुरद्विपद्विषः प्रत्युत सा तिरस्क्रिया ॥ ३६॥ अन्वय-जनाः मृगाणामिव कंसादिमहीभृता वधात् यत् तव स्तवं करोति, (हे) हरे ! सा हिरण्याक्षपुरःसरासुरद्विपद्विषः तव प्रत्युत तिरस्क्रिया ।

( २३ ) अर्थ-हे भगवन् (नृसिंह) | लोग पशुओं ( मृगों) के समान कस इत्यादि राजाओ का वध करने के कारण जो आप की स्तुति करते है, वह तो हिरण्याक्ष इत्यादि असुर रूपी हाथियो का नाश करने वाले आप का उलटे अपमान है । करोतीति ॥ किच जनो मृगाणामिव कसादिमहीभृता वाढेतोः स्तव स्तोत्रम् । 'स्तवः स्तोत्रं स्तुतिनुतिः' इत्यमरः। करोतीति यत् है हरे हे कृष्ण, हे सिहेति च गम्यते । सा स्तुतिक्रिया हिरण्याक्षपुरःसरा हिरण्याक्षप्रभृतयो येऽसुरास्त एव द्विपास्तेषा द्विषः । हन्तुरित्यर्थः । तस्य तव प्रत्युत वैपरीत्येन । 'प्रत्युतेत्युक्तवैपरोत्ये' इति गण व्याख्यानात् । तिरस्क्रियावमानः । यदिति सामान्ये नपुंसकम् । सेति विधेयलिङ्गम् । गजघातिनः सिंहस्य मृगवधवर्णनमिव महासुर- हन्तुस्तव कंसादिक्षुद्रनृपवधवर्णनं तिरस्कार एवेत्यर्थः । अत्रासुरद्विपानामिति हरि- वद्धरिरिति रिलष्टपरम्परितरूपक मृगाणामिवेत्युपमयाङ्गाङ्गिभावेन सकीर्यते ॥ व्याकरण-कसादिमहीभृताम्-मही विभ्रतीति महीभृतः (मही+ + क्विप कर्तरि ) उप० तत्पु० । कसः आदियेषा ते कंसादयः (ब० बी०)। कंसादयश्च ते महीभृतः कसादिमहीभृतः (कर्मधा०) तेषाम् ।। हिरण्याक्षपुरः- सरासुरद्विपद्विषः पुरः (अग्ने) सरति इति पुरःसरः । पुर:++ट कतरि) उप० तत्पु०। द्वाभ्यां पिबति इति द्विपः (द्वि+पा+क कर्तरि ) उप० तत्पु० । असुरा द्विपा इव इति असुरद्विपाः ( उपमितकर्मधा० )। हिरण्याक्षपुरःसराश्च ते असुरद्विपाः हिरण्याक्षपुरःसरासुरधिपाः (कर्मधा०), ताम् द्वष्टि इति हिरण्याक्षपुरःसरासुरद्विट (हिरण्याक्ष +द्विष-क्विप् कतरि) उप० तत्पु०, तस्य । per कोष-हरि-यमानिलेन्द्रचन्द्रार्कविष्णुसिंहाशुवाजिषु । शुकाहिकपिभेकेषु हरिनी कपिले त्रिषु ॥ इत्यमरः ।

( ८४ ) अलङ्कार-"यहाँ असुरो को द्विष मानने के कारण हरि शब्द मे श्लेषबल से हरि (सिह) के समान हरि (विष्णु) यह रूपक माना गया, जिसे श्लिष्टपरम्परित रूपक कहा जाता है और 'मगारगामिव' मे आई हुई उपमा पूर्वोक्त रूपक के अङ्ग के रूप में प्रयुक्त हुई है । अत. इस पद्य मे श्लिष्ट परम्परित रूपक तथा उपमा का अद्भाङ्गिभाव सकर माना जायगा।"- सर्वकषा ।। भावार्थ---यथा गजेन्द्रघातुकस्य सिहस्य मृगवधकीर्तन तस्य गजेन्द्रवधजन्य यशो लघूकरोति तथैव हिरण्याक्षप्रभृतिमहासुरघातिन भवन्त यज्जनाः कसा- दिक्षुद्रनृपतिवधमन्तरा स्तुवन्ति तद् वस्तुतः भवतस्तिरस्करणमेव, नतु स्तवनम् ॥ एवं स्तुत्या देवमभिमुखीकृत्यागमनप्रयोजन वक्त मुपोद्धातयति. प्रवृत्त एव स्वयमुज्झितश्रम. क्रमण पेष्टु भुवनद्विषामसि । तथापि वाचाल तया युनक्ति मा मिथस्त्वदाभाषणलोलुप मनः॥४०॥ अन्वय--(त्वम्) उज्झितश्रमः क्रमेण भुवनद्विषा पष्टु स्वयमेव प्रवृत्तः असि । तथापि मिथ. त्वदाभाषणलोलुप मनः मा वाचालतया युनक्ति । Topner अर्थ-आप परिश्रम को त्याग कर (अर्थात् परिश्रम की कोई चिन्ता न कर) क्रमशः लोकद्रोहियो का वध करने के लिए स्वय ही प्रवृत्त रहते है, तथापि आप के साथ एकान्त मे वार्तालाप करने का लोभी मन मुझे वाचाल बना रहा है। प्रवृत्त इति ।। त्वमुज्झितश्रमस्त्यक्तश्रमः सन् क्रमेण भुवनानि द्विषन्तीति भुवनद्विषो दुष्टास्तेषा पेष्टुम् । तान्हिसितुमित्यर्थः । 'जासिनिप्रहण--' इत्यादिना कर्मणि शेष षष्ठी । स्वयमपरप्रेरित एव प्रवृत्तोऽसि । एव तर्हि पिष्टपोषणं

( ८५ )
किमिति चेत्तत्राह-तथापि स्वतः प्रवृत्तेऽपि मिथो रहसि त्वदाभाषणे त्वया
सह संलापे लोलुप लुब्धम् । 'लुब्धोऽभिलाषुकस्तृष्णक्समौ लोलुपलोलुभो,
इत्यमरः । मनो मा वाचालतया सह युनक्ति । वाचाल करोतीत्यर्थः । वाचो
बह्व योऽस्य सन्तीति वाचालः । 'पालजाटचौ बहुभाषिरिण' इत्यालच् । स्याज्ज-
ल्पाकस्तु वाचालो वाचाटो बहुगावाक' इत्यमरः ॥
व्याकरण-उज्झितश्रमः-उज्झितः (उज्झ+क्त कमरिण) श्रमः येन
स उज्भितश्रमः (ब० बी०) ॥ पेष्टुम्-पिष्+तुमुन् ॥ भुवनद्विषाम् -
भुवनानि द्विषन्ति इति भुवनद्विषः (भुवन+द्विष्+विप कर्तरि) उपपदतत्पु० ।
तेषाम् । षष्ठी के लिए श्लोक ३७ के जगद्रुहाम् पर नोट देखिए । वाचा-
लतया-वाचो बह्वयः सन्ति अस्य इति वाचालः (वाच+पालच्- "माल-
जाटचौ बहुभाषिरिण" ४।२।१२५ नियम से) तस्य भावः वाचालता (वाचाल+तल
+टाप) तया ॥ त्वया सह प्राभाषणं त्वदाभाषणम् (सुप्सुपा)। तस्मिन् लोलुप
(लुप.+यह+अच् तरि) त्वदाभाषणलोलुपम् (सुप्सुपा)॥
कोष-मथोऽन्योन्य रहस्यपि' इत्यमरः ।
भावार्थ-यद्यपि भवान् जगद्रुहा विधाताय स्वयमेव निरन्तर प्रयतते
तथापि भवता सहालाप कतु लोलुप मे मनः भवन्त किञ्चित् कथयितु प्रेर-
यति ॥
अथ स्ववाक्यश्रवण सहेतुक प्रार्थयते-
-
तदिन्द्र सन्दिष्ट मुपेन्द्र यद्वचः क्षणं मया विश्वजनीनमुच्यते ।
समस्तं काये षु गतेन धुर्यतामहिद्विषस्तद्भवता निशम्यताम् ॥४१॥

( ८६ ) अन्वय-तत् उपेन्द्र ! इन्द्रसन्दिष्ट विश्वजनीन यत् वचः मया क्षणम् उच्यते, तत् अहिद्विषः समस्तकार्येषु धुर्यता गतेन भवता निशम्यताम् । अर्थ-इसलिये हे भगवन ! विश्व के हित के लिए इन्द्र के द्वारा भेजा गया जो सन्देश-वचन मैं क्षण भर के लिए कह रहा हूँ, उसे वृत्रासुर को मारने वाले देवराज के समस्त कायों मे अग्रसर होने वाले आप सुनें । तदिति ॥ तत्तस्मादिन्द्रमुपगत. उपेन्द्र इन्द्रावरजः। अत एवेन्द्रसदिष्ट श्रोतव्यमिति भावः । किंच विश्वस्मै जनाय हित विश्वजनीनम् 'आत्मन्विश्व- जनभोगोत्तरपदात्खः' । यद्वचः क्षणं न तु चिरं मयोच्यते, तद्वचोऽहिद्विषो वृत्रस्नः 'सर्प वृत्रासुरेऽप्यहिः' इति वैजयन्ती । समस्तकार्येषु धुर्यतां धुरधरत्वं गतेन । अतोऽपि भवता निशम्यताम् । प्रार्थनाया लोट् । धुरं वहतीति धुर्यः । 'धुरो यड्ढको' इति यत्प्रत्यय । स्फुटमत्र पदार्थहेतुकं काव्यलिगमलकारः॥ व्याकरण-इन्द्रसनिष्टम्-इन्द्रेण सन्दिष्टम् (सम्+दिश+क कर्मणि), तृ० तत्पु० ॥ उपेन्द्र =इन्द्रम् उपगतः उपेन्द्रः प्रादितत्पु०) तत्सम्बुद्धौ हे उपेन्द्र । वामनावतार मे विष्णु अदिति के गर्भ से कश्यप के पुत्र के रूप में इन्द्र के बाद उत्पन्न हुए थे, इसलिये वे उपेन्द्र अर्थात् इन्द्र के अनुज कहे जाते है। यहा उपेन्द्र शब्द का प्रयोग इस अभिप्राय से किया गया है कि इन्द्र के छोटे भाई होने के कारण इन्द्र की आज्ञा मानना उनका कर्तव्य है ॥ विश्वजनीनम् -विश्वो जनः (कर्मधा० ), तस्मै हित विश्वजनीनम् (विश्वजन+ख) । समस्तकार्येषु = समस्तानि कार्याणि ( कर्मधा० ) तेषु । धुर्यताम -धुरं वहति इति धुय्यः ( धुर+यत् ), तस्य भावः धुर्यता, ताम् ॥ अहिद्विषः mmaa ( ८७ ) अहिं ( वृत्रासुरं ) द्विष्टवान् इति अहिद्विट (अहि+द्विष + क्विप. कर्तरि उप० तत्पु०, तस्य ॥ निशम्यताम =नि+शम् +लोट त कर्मणि ॥ कोषः- धुयं --"घूर्वहेधुर्यधौरेयधुरीणाःसधुरंधराः' इत्यमरः । अहि-"अहिवृत्रासुरे सपे” इति विश्वः । अलङ्कार-चू कि इन्द्र का छोटा भाई होना एवं उनके सभी कायों में विष्णु का अप्रणी होना वचन श्रवण में हेतु है, इसलिए यहाँ स्पष्ट ही काव्य- लिङ्ग अलकार है। भावर्थ-हे उपेन्द्र, महेन्द्रसन्दिष्टं जगद्धितकारकं यद् वचोऽहं ब्रवीमि तत् महेन्द्रनिखिलसाघको भवान् समाहितेन मनसा शृणोतु ॥ अथ शिशुपालो हन्तव्य इति वक्त तस्यावश्यवध्यत्वेऽनन्यवध्यत्वज्ञा पनौपयिकतया प्रौद्ध त्यप्रकटनाथं जन्मान्तरवृत्तान्तं तावदुद्धाटयति- अभूदभूमिः प्रतिपक्षजन्मनां मियां तनूजस्तपना तिर्दितेः । यमिन्द्रशब्दार्थनिषूदनं हरेहिरण्यपूर्व कशिपु प्रचक्षते ॥४२॥ अन्वय-प्रतिपक्षजन्मना भियाम् अभूमिः तपना तिः दितेः तनूजः अभूत, हरेः इन्द्रशब्दार्थनिषूदनं यं हिरण्यपूर्व कशिपुं प्रचक्षते । अर्थ-शत्र प्रो से उत्पन्न होने वाले भय से सदा मुक्त (रहित) एवं सूर्य के समान तेजस्वी दिति-पुत्र (दैत्य) था जिसने देवराज के 'इन्द्र'--इस नाम के ('परमैश्वर्यशाली') अर्थ को नष्ट कर दिया था और जिसे लोग हिरण्यकशिपु कहते थे। टिप्पणी--- कि हिरण्यकशिप ने सर्वाधिक प्रभुत्व प्राप्त करके देवराज का ( १८ ) ऐश्वर्य छीन लिया, इसलिए उसने उनकी 'इन्द्र' सज्ञा जिसका अर्थ परमैश्वर्य- शाली होता है, निरर्थक कर दिया था। अभूदिति । प्रतिपक्षाच्छत्रोः जन्म यासा तासा भियामभूमिरविषयः निर्भीक इत्यर्थः। तपना तिः सूर्यतापो दितेस्तनूजो दैत्योऽभूत् । कोऽसावत आह-हरेरिन्द्रस्य इन्द्रशब्दाथ निषूदन इन्दतीति इन्द्रः । इदि परमैश्वये' 'ऋज्रन्द्र-' इत्यादिना रन्प्रत्ययान्त औरणादिकनिपातः तस्य इन्द्र इति शब्दस्येन्द्र इति सज्ञापदस्य योऽर्थः परमैश्वर्यलक्षणस्तस्य निषुदन निवर्तकम् । निवर्तकम् । कर्तरि ल्युट् । हरेरैश्वर्यनिहन्तारमित्यर्थः । य दैत्य हिरण्यशब्दपूर्व कशिपुशब्द प्रचक्षते । हिरण्यकशिपुमाहुरित्यर्थः । अत्र हिरण्यशब्दपूर्वकत्व कशिपु शब्दस्यैव न तु सज्ञिन- स्तदर्थस्येति शब्दपरस्य कशिपुशब्दस्यार्थगतत्वेनाप्रयोज्यस्यप्रयोगादवाच्यवचना- ख्यार्थदोषमाहुः । 'यदेवावाच्यवचनमवाच्यवचनं हि तत्' इति समाधानम् । एव- विधविषये शब्दपरेणार्थलक्षणेति कथचित् सपाद्यमित्युक्तमस्माभिःदेवपूर्वगिरि ते, इति । 'धनुरुपपदमस्मै वेदमभ्यादिदेश' इत्येतद्वयाख्यानावसरे सजीविन्यां घण्टापथे चाविशेषश्चात्र-यदैत्यमुद्दिश्य हिरण्यपूर्व कशिपुं सज्ञात्वेन प्रयुक्त । व्याकरण-प्रतिपक्षजन्मनाम्-प्रतिकूलः पक्षो यस्य स प्रतिपक्षः (ब० बी०), तस्मात् जन्म यासा ताः प्रतिपक्षजन्मानः (ब०वी०), तासाम् ।। भियाम-भी+क्विप भावे (ष० बहुवचन) ॥ तनूजः तम्बाः जातः इति तनूजः (तनू+जन् +ड कर्तरि) उप० तत्पु० ॥ तपना तिः-तपनस्य धुति- रिव द्य तिर्यस्य सः तपना तिः (ब०वी०) ॥ इन्द्रशब्दार्थनिषूदनम् -इन्दति पर- मैश्वयं लभते इति इन्द्रः (इन्द्+रन् कर्तरि औरणादिकः प्रत्ययः) । इन्द्र रूपः शब्दः इन्द्रशब्दः (कर्मधा०), तस्य अर्थः इन्द्रशब्दार्थः (१० त०), तस्य निषू- ( ६ ) दनः (नि+सूद् +णिच् स्वार्थ + ल्यु कर्तरि ) इन्द्रशब्दार्थनिषूदनः ( १० तत्पु०), तम् ।। हिरण्यपूर्वम् -हिरण्यः पूर्वो यस्य स हिरण्यपूर्वः (ब० बी०) तम् ॥ कोष-हरिः-'यमानिलेन्द्रचन्द्रार्कविष्णुसिहाशुवाजिषु । शुकाहिकपिभेकेषु हरि कपिले त्रिषु ।।' इत्यमरः ॥ तनू-'कायो देहः क्ली बपुसोः स्त्रिया मूर्तिस्त- नुस्तनूः' इत्यमरः । तपन:-"तपनः सविता रविः” इत्यमरः । भावार्थ-बभूव किल शत्रुभ्यो निर्भीकः सूर्य इव तेजस्वी दितेः पुत्रो हिरण्यकशिपु म यो निजैश्वर्यसम्पदा इन्द्रस्य इन्द्रत्वमपि अतिचक्राम ॥ समत्सरेणाखुर इत्युपेयुषा चिराय नाम्नः प्रथमाभिधेयताम् । भयस्य पूर्वावतरस्तरविना मनस्सु येन द्यु सदां न्यधीयत । ४३।। अन्वय- समत्सरेण असुर इति नाम्नः चिराय प्रथमाभिधेयताम् उपेयुषा तरस्विना येन द्यु सदां मनस्सु भयस्य पूर्वावतरः न्यधीयत । Homen अर्थः -दूसरो से द्वष रखने वाले 'असुर' इस नाम को सर्वप्रथम चिरकाल तक सार्थक करते हुए बलवान् हिरण्यकशिपु ने देवताओं के मन मे भय का प्रथम प्रवेश कराया था। समत्सरेणेति ॥ समत्सरेणान्यशुभद्वेषसहितेन । 'मत्सरोऽन्यशुभद्वेषे- इत्यमरः । अस्यतीत्यसुरः । असेरुरन् । असुर इति नाम्नः चिराय चिरकालेन । 'चिराय चिरसत्राय चिरस्याद्याश्चिरार्थकाः' इत्यमरः। प्रथमाभिधेयतामुपेयुषा अन्वर्णतया मुख्यार्थता मतेन तरस्विना बलवता । 'तरसी बलर हसी' इलि विश्वः ।

(९० ) येन हिरण्यकशिपुना दिवि सीदन्तीति | सदा देवाना'मनस्सु भयस्य पूर्वा- वतरः प्रथमप्रवेशः 'ऋदोरप' । न्यधीयत निहितः । धानः कर्मणि लिड् । अस्मा- देव देवाना प्रथम भयस्योत्पत्तिरभूदित्यर्थः ॥ व्याकरण-असुरः-अस्यति ( क्षिपति ) इतिः असुरः (अस्+उरन्)। प्रथमाभिधेयताम्-अभिधातु योग्यः अभिधेयः (अभि+धा+यत् कर्म- रिण)। प्रथमः अभिधेयः प्रथमाभिधेयः (कर्मधा०), तस्य भावः प्रथमाभिधेयता, ताम ॥ पूर्वावतर:-अवतरणम् अवतरः (अव+त+अप भावे), "ऋदोरप ३।३।५७” नियम से अप प्रत्यय हुमा ॥ तरस्विना-तरः( बलम् ) अस्ति अस्य इति तरस्वी (तरस्+विनिः मत्वर्थे), तेन । | सदाम्-दिवि सीदन्ति इति द्य सदः (दिव्+सद्+क्विप् कर्तरि) उप० तत्पु ०, तेषाम् ॥ न्यधीयत- नि+धा+लड़त कर्मणि ॥ भावार्थ-देवद्वेषी दानवाधीशः अन्वर्थासुरनामा चासो हिरण्यकशिपुरेव देवानां मनःसु प्रथमं भीतिमुत्पादयामास ।। दिशामधोशांश्चतुरो यतः सुरानपास्य तं रागहताः सिषेविरे । अवापुरारभ्य ततश्चला इति प्रवादमु च्चैरयशस्कर श्रियः॥४४॥ अन्वय-यतः श्रियः दिशां अधीशान चतुरः सुरान् अपास्य त हिरण्यकशि रागहृताः सिषेविरे, ततः आरभ्य अयशस्कर चलाः इति प्रवादम् उच्चैः अवापुः॥ अर्थ-जब से लक्ष्मी दिशाओ के स्वामी चारों देवतामो को छोडकर 'हिरण्यकशिपु के प्रेम से प्राकृष्ट होकर उसी की सेवा करने लगी तभी से उनको 'चञ्चला' नाम से बड़ी ही अपकीर्तिकारी निन्दा हुई।

(११) दिशामिति।। श्रियः संपदो यतः। यदेत्यर्थः। दिशामधीशान्दिक्पतीनपि चतुरः सुरानिन्द्रवरुरणयमकुबेरानपास्य त्यक्त्वा तं हिरण्यकशिपु रागहृता रागकृष्टाः सत्यः । न तु बलादिति भावः । सिविरे । यतो वोरप्रियाः श्रिय इति भावः । ततः प्रारभ्य तदाप्रभृति अयशः करोतीत्ययशस्करम् । दुष्कोतिहेतुरित्यर्थः । 'कुनो हेतुताच्छील्यानुलोम्येषु' इति टप्रत्ययः । 'प्रतः कृमि-' इत्यादिना विसर्जनीयस्य सत्वम् । उच्चैः प्रचुरं चला अस्थिरा इति प्रवादं जनापवादमवापुः । दिगोशानामपि सर्वस्वहारित्वात्तदौद्धत्यस्य प्राकट्यमिति भावः ॥ -- न व्याकरण अपास्य-अप+अस् (क्षेपे दिवादि) ल्यप् । रागहृताः- रागेण हृताः इति रागहृताः (तृ० तत्प०) ॥ सिषेविरे-सेव+लिट में (इरे) ॥ अवापुः-अव+आप+लिट झि (उस) । अयशस्करम यशः अयशः ( नन तत्प०)। अयशः करोति इति अयशस्करम, (उप० रत्पु०)। (विशेष सर्वकषा मे) भावार्थ-सम्पदः हिरण्यकशिपुशौर्यविमोहिताः सत्यः इन्द्रयमवरुणकुबेरान् चतुरो दिगधिपानपि परित्यज्य सानुरागं तं भेजिरे, ततः प्रभृति च ता: “सम्पद- श्चला" इति लोकापवादमपि अवापुः (श्रियः लोकापवादमपि अविगणय्य हिरण्यकशिपु सिषेविरे. इत्यहो तस्य शौर्यातिशयः ।) पुराणि दुर्गाणि निशातमायुधं बलानि शुराणि धनाश्च कञ्चुकाः । स्वरूपशोभैकफलानि नाकिनां गणैर्यमाशङ्कय तदादि चक्रिरे ॥४॥ अन्वय-नाकिना गणैः यम् पाशडक्य तदादि स्वरूपशोभैकफलानि ( ६२ ) पुराणि दुर्गाणि, दुर्गाणि, आयुध निशात, बलानि शूराणि, कञ्चुकाश्च धनाश्चक्रिरे। अर्थ-देवताओ ने उसी (हिरण्यकशिपु ) की आशङ्का से उसी समय से केवल शोभा (दिखावट) के लिए विद्यमान नगरो को (खाई आदि के द्वारा) दुर्ग (किला, अगभ्य ) बना दिया, हथियारो को तेज किया सेनानो को शौर्य- युक्त तथा लौहकवचो को दुर्भेद्य (कठिन या) सुदृढ बनाया । , पुराणीति ॥ किंच । नाकिनां सुराणा गणैः य हिरण्यकशिप माशङ्कय बाधकरवेनोत्प्रेक्ष्य स कालः आदिर्यस्मिंस्तदादि तत्तदाप्रभृति स्वरूपशोभैवैकफलं मुख्य प्रयोजन येषा, तेषा सुरादीनां तानि यथोक्तानि प्रागीगसाध्यशत्रोरभावा- दिति भावः । 'नपुसकमनपुसकेन-' इत्यादिना नपुसकशेषः। पुराणि दुर्गाणि प्राकारपरिखादिना अगम्यानि चक्रिरे । 'सुदुरोरधिकरणे इति गमेर्डः । आयुध निशात निशित चक्र इति विभक्तिविपरिणामेना- न्वयः । 'शो तनूकरणे' इति धातोः क्तः 'शाच्छासोरन्यतरस्याम्' इतीत्वविकल्पा- त्पक्षे प्रात्वम् । बलानि सैन्यानि शूराणि शौर्यवन्ति चक्रिरे सपादितानि | कञ्च - का वारबारणा: लोहवारणीत्यर्थः 'कञ्च को वारबाणोऽस्त्री' इत्यमरः । घना दुभेदाश्चक्रिरे । इत्थ नित्यसनद्धा जाग्रति स्मेत्यर्थः ।। व्याकरण-दुर्गणि-दुःखेन गच्छन्ति एषु तानि दुर्गाणि (दु+गम् +डः अधिकरणे । निशातम् नि+शो (तनूकररमेदिवादि)+क्त कर्मणि । प्रायु ध मप्रायुध्यते अनेन इति आयुधम् (आ+युध+क करणे)। घनाः-हन् +अप भावे । स्वरूपशौभैकफलानि-स्व रूपम् स्वरूपम् (कर्मधा०)। स्वरूपेण शोभा (सुप सुषा), सा एव एक फल येषां तानि स्वरूप० (ब०वी०)॥ नाकिनाम्- (६३ ) न कम् सुखम् इति अकम् (नत्र तत्पु०), न विद्यते अक यस्मिन् स नाकः (ब०वी०), सः अस्ति एषाम् इति नाकिनः (नाक+इनिः मत्वर्थे), तेषाम् ॥ तदादि-स प्रादिः यस्मिन् तत् तदादि (ब०वी०) (क्रियाविशेषणपद) । चक्रिरे- कृ+लिट् +झ (इरे) कर्मणि ।। कोप-बलानि-"स्थौल्यसामर्थ्य सैन्येषु बलम्" इत्यमरः । घना:-धन सान्द्र धन वाद्य धनो मुस्ता घनोऽम्बुदः। घनः काठिन्यसघातो विस्तारो लोहमुद्गरौ इति धरणिः ॥ आयधुम्-'आयुध तु प्रहरण शस्त्रमस्त्रम्' इत्यमरः । भावार्थ- देवा हिरण्यकशिपोरेव भीता. सन्तः स्वकीयानि नगराणि परितः प्राकारपरिखादिभिः दुर्गमानि विदधुः, चिरात् अप्रयोगात् कुण्ठितामधाराणि प्रहरणानि च शाणोल्लेखनादिभिः तीक्ष्णानि चक्रुः, सग्रामाभावात् अलसान् सैनिकॉश्च कृत्रिमयुद्धाभ्यासद्वारेण सस्फूर्तिकान् सोत्साहाश्च अनुतस्थुः तथा लौहवर्माणि प्रतिकठिनानि दुर्भेद्यानि च निर्ममुः ।। स संचरिष्णुभुवनान्तरेषु यां यदृच्छयाशिश्रियदाश्रयः श्रियः। अकारि तस्यै मुकुटोपलस्खलत्करैस्त्रिसंध्य त्रिदशैर्दिशे नमः ४६ । अन्वय-भुवनान्तरेषु सञ्चरिष्णुः श्रियः आश्रयः सः यदृच्छया याम् (दिशम्) अशिश्रियत, तस्यै दिशे मुकुटोपलस्खलत्करै त्रिदशैः त्रिसन्ध्यं नमः अकारि । अर्थ-अन्यान्य लोको मे घूमता हुआ, लक्ष्मी का आश्रय वह हिरण्यकशिपु स्वेच्छा से जिसी दिशा मे जाता था, उसी दिशा को मुकुट के रत्नो पर ( ६४ ) (अर्थात् मुकुट से शोभित सिर से) हाथ जोड ते हुए देवता भी तीनो सन्ध्याओं मे नमस्कार करते थे। स इति । अन्येषु भुवनेषु भुवनान्तरेषु । 'सुप्सुपा' इति समासः । सच- रिष्णु सचरणशीलः। 'अलका --' इत्यादिना चरेरिष्णुच । श्रियो लक्ष्म्या आश्रयः स हिरण्यकशिपु. यदृच्छया स्वैरवृत्त्या । 'यदृच्छा स्वैरवृत्तिः' इत्यमरः। यां दिशमशिश्रियदगमत् । 'श्रयतेलु रिण श्रि--' इत्यादिना चडि द्विर्भावः इयडा देश । मुकुटोपलेषु मौलिरत्न'ष स्खलन्तः करा येषा तैः । शिरमि बद्धाञ्जलिभि- रित्यर्थः । । "उपल. प्रस्तरे रत्ने' इति विश्व । तिस्रो दशा बाल्यकौमारयौव- नानि, जन्मसत्तावृद्धयो वा येषा तैस्त्रिदशैदे वैः। यद्वात्रिर्दश परिमाणमेषामिति 'बहुप्रीही सख्येये डजबहुगणात्' इति समासान्त । तिस्र सन्ध्या समाहृता- स्त्रिसन्ध्यम् । 'तद्धिताथोंत्तरपद-' इत्यादिना समाहारे द्विगुः, द्विगुरेकवचनम् । वा टाबन्त इति पक्षे नपुसकत्वम् । अत्यन्तसंयोगे द्वितीया । तस्यै दिशे करैह स्तैः। 'नम-स्वस्ति--' इत्यादिना चतुर्थी । नमः नमस्कारोऽकारि कृतम् । कृत्र. कर्मणि लुड् 'चिण भावकर्मणो.' इति चिए। सध्यावन्दनेऽपि दिनियम परि- त्यज्य तदागमनभयात्तस्य दिखे नमस्कार कृत इति भाव. || व्याकरण-सञ्चरिष्णु = सम् +च+इष्णुच् (कर्तरि ताच्छील्ये)। भुवनान्तरेषु-अन्यानि भुवनानि भुवनान्तराणि (मयूरव्यसकादिसमास), तेषु ॥ यदृच्छया= ऋच्छनम् ऋच्छा (ऋच्छ गतौ तुदादि+अ भावे), या ऋच्छा यदृच्छा (कर्मधा०), तया । अशिश्रियत्-श्रि+लुड् तिप कर्तरि । अकारि- कृ+लुङ त कर्मणि । मुकुटोपलस्खलत्करैः- मुकुटानाम् उपला. मुकुटोपलाः (प० तत्पु०), तेषु स्खलन्त : (स्खल +शतृ कर्तरि) मुकुटोपलस्खलन्तः (सुप्सुपा समास) । तादृशाः कराः येषां ते मुकुटो० (ब०बी०), ते । त्रिसन्ध्यम ( ६५ ) तिसृणा सन्ध्यानां समाहारः त्रिसन्ध्यम् (समाहारद्विगु०) । यह समास 'तद्धितार्थोत्तरपदसमाहारे' अर्थात् तद्धितार्थ विषय होने पर, अनन्तर कोई अन्य पद होने पर तथा समाहार (समूह) वाच्य होने पर दिक् और सख्यावाची शब्द- समास बनाते है, इस नियम से बना है। त्रिदशैः-तिस्रः दशा येषा ते त्रिदशाः (ब० वी०), तै । कोष-त्रिदश-"अमरा निर्जरा देवास्त्रिदशा विबुधाः सुरा" इत्यमरः। भावार्थ-हिरण्यकशिपुः स्वेच्छया यामेव दिशं प्रापत्, देवगणा सन्ध्या- वन्दनसमये दिनियममुपेक्ष्य तामेव दिशं स्वप्रगतिततिभिः अर्चयन्ति स्म । अथ सोऽपि त्वयैव हत इत्वाह - सटाच्छटाभिन्नघनेन विभ्रता नृसिंह सैंहीमतनुतनु त्वया ।। स मुग्धकान्तास्तनसङ्गभङ्ग रैरुरोविदार प्रतिचस्करे नखैः ॥ ४७ ॥ अन्वय-(हे) नृसिंह, अतनु सही तनु बिभ्रता सटाच्छटाभिन्नघनेन त्वया स मुग्धकान्तास्तनसङ्गभङ्ग रै. नखैः उरोविदार प्रतिचस्करे ॥ अर्थ-हे नृसिह ! विशाल सिंहशरीर धारण कर अपनी जटामो से मेघों को छिन्न-भिन्न करते हुए आपने नवयौवना कान्ता के कठिन स्तनो से भी टेढ़े हो जाने वाले अपने नखो से उस राक्षस का वक्षःस्थल विदीर्ण करके उसे मार डाला। सटाच्छटेति ।। हे नृसिंह, नर. सिंह इवेत्युपमितसमासः । ना चासो सिंहश्वेति प्रस्तावात् । सिंहस्येमा सैंही तनु कायं बिभ्रता । नृसिंहावतारभाजेत्यर्थः । किंभूला । अतनु विस्तीर्णाम् । अतएव सटाच्छटाभिः केशरसमूहैः भिन्ना धना मेघा येन । अम्र कषविग्रहत्वादिति भावः । 'सटा जटाकेिशरयोः' इति 'तनुः काये कुशेऽल्पे च' इति विश्वः । त्वया स दैत्यः मुग्धौ नबौ । 'मुग्धः सौम्ये नके ( ६६ ) मूढे' इति पैजयन्ती । यो कान्तास्तनौ तयोः सङ्गेनापि भङ्ग रैः कुटिलै खैरुरो- विदारमुरो विदार्य । 'परिक्लिश्यमाने च' इति णमुल्प्रत्ययः। प्रतिचस्करे हतः । किरतेः कर्मणि लिट् 'ऋच्छत्यताम्' इति गुणः । 'हिंसाया प्रतेश्च' इति सुडागमः। वज्रकठिनो ऽपि नखैर्विदारित इति वाङ्मनसयोरगोचरमहिम्नस्ते किमसाध्यमिति भावः ॥ व्याकरण-सटाछटाभिन्नघनेन= सटानाछटाः सटाच्छटाः (ष०तत्पु०), ताभिः भिन्नाः घनाः येन सः सटाच्छटाभिन्नघनः (ब० वी०), तेन । नृसिह- ना सिंह इव इति नृसिंहः (उपमित कर्मधा०)। अथवा ना चासौ सिहश्चेति (कर्मधा०), तत्सम्बुद्धौ । अतनुम,-न तनुः अतनुः ( नज तत्पु० ), ताम् । मुग्धकान्तास्तनसङ्गभङ्ग रैः-~~-मुग्धा चासौ कान्ता च, तस्याः स्तनौ मुग्धका- न्तास्तनौ ( कर्मधारयगर्भित १० तत्पु०) । मुग्धौ यो कान्तास्त नौ इति वा ( कर्मधारय० )। तयोः सङ्गः (१० तत्पु० ), तेन भङ्गरैः मुग्ध-भङ्ग रैः (तृ० तत्पु०) उरोविदारम-उरः विदार्य इति ( उरस्+वि++णिच्+णमुल् भावे )। यहाँ 'परिक्लिश्यमाने च' अर्थात् 'चारो ओर से पीडित अग के द्वितीयान्त होने पर धातु मे रणमुल होता है-इस नियम से णमुल हुआ है। उपप्रद तत्पु०॥ प्रतिचस्करे-प्रति++लिट त कर्मणि। यहाँ 'हिसाया प्रतेश्च' अर्थात् 'उप और प्रति पूर्वक कृ धातु को हिंसा अर्थ मे सुट, () आगम हो जाता है, इस नियम से स् आ गया है । भावार्थ-तथाभूतमपि प्रभावशालिनं कुलिशकठोरं तं हिरण्यकशिपुं भवान् नुसिंहरूपमाधाय केवल कररुहैरेव तस्य वक्षःस्थलं विदार्य तं हतवान् । अथास्य जन्मान्तरवेष्टितान्याचष्टे- - ( १७ ) विनोदमिच्छन्नथ दर्पजन्मनो रणेन कण्डवास्त्रिदशैः समं पुनः । स रावणो नाम निकामभीषण बभूव रक्षः क्षतरक्षणं दिवः ४८ अन्वय-अथ सः पुनः त्रिदशैः सम रणेन दर्पजन्मनः कण्डवाः विनोदम् इच्छन् दिवः क्षतरक्षण निकामभीषण रावणो नाम रक्षः बभूव । अर्थ-इसके अनन्तर वही हिरण्यकशिपु देवताओ के साथ पुनः (होने वाले) युद्ध के द्वारा गर्व से उत्पन्न भुजाओ की खुजली को दूर करने की इच्छा से देवलोक की रक्षा नष्ट करने वाला अत्यन्त भयङ्कर रावण नाम का राक्षस हुआ। मा विनोद मिति ॥ अथ स हिरण्यकशिपुः पुनभूयोऽपि त्रिदशैः समं सह । 'साक साधं सम सह' इत्यमरः। रणेन दर्पादन्तःसाराज्जन्म यस्यास्तस्याः कण्डवाः भुजकण्डूतेविनोदमपनोदमिच्छन् । प्रागभवनखक्षतैस्तदपनोदाभावादित्यर्थः । दिवः स्वर्गस्य क्षत नष्ट रक्षण रक्षा येन तत् । क्षता रक्षणमित्यर्थ । सापेक्षत्वेऽपि गमकत्वात्समासः । अनेन देवसर्वस्वापहारित्वमुक्तम् । भीषयत इति भीषणम् । नन्द्यादित्वाल्ल्युः । 'भियो हेतुभये षुक्' इति षुक् । निकाम भीषण । 'सुप्सुपा' इति समासः। रावणो नाम' इति प्रसिद्धः रक्षो बभूव । राक्षसयोनौ जात इत्यर्थः। विस्रवसोऽपत्यं पुमान्रावण इति विग्रह । 'तस्यापत्यम्' इत्यणि कृते 'विश्रवसो विश्रवणरवणौ' इति प्रकृते रवणादेशः। पौराणिकास्तु रावयतीति व्युत्पादयन्ति । तदुक्तमुत्तरकाण्डे –'यस्माल्लोकत्रयं चैतद्रावितं भयमागतम् । तस्मात्त्वं रावणो नाम नाम्ना वीरो भविष्यसि ॥' इति रौतेय॑न्तात्कर्तरि ल्युट रावणरक्षसोनियतलिङ्गत्वाद्विशेष्यभावेऽपि स्वलिङ्गता।

( १८ व्याकरण-विनोदम् = वि+नुद्+घन भावे, तम् । दर्पजन्मनः- दात् जन्म यस्याः सा दर्पजन्मा (ब० वी०), तस्याः ॥ कण्डवाः-कण्डू+ क्विप् भावे स्त्रियाम् = कण्डूः, तस्याः ॥ निकामभीषणम्-भीषयते इति भीषणम् (भी+णि+ल्युः), निकामं भीषणम् इति निकामभीषणम् (सुप्सुपा समास )। क्षतरक्षणम्-क्षत (विनष्ट) रक्षण ( रक्ष् + ल्युट ) येन तत् क्षतरक्षणम् (ब० वी०)। कोष-कण्डू-"कण्डूः खजूश्च कण्डूया" इत्यमरः। निकाम--"काम प्रकाम पर्याप्त निकामेष्ट यथेप्सितम्" इत्यमरः । भावार्थ -अथ स एव भवता शातितो दैत्यः पुन. देवैः साक तादृशमेव वैरमादधानः युद्ध न दर्पजन्यभुजकण्डूयनम् अपनोदयिष्यन् जन्मान्तरे रावणो नाम देवमहाभीतिजनको राक्षसो बभूव । अथास्यौद्धत्यमष्टादशश्लोक्याचष्टे-- प्रभुबु भूषु वनत्रयस्य यः शिरोऽतिरागाहशम चिकर्तिषुः । अतर्कयद्विघनमिवेष्टसाहसः प्रसादमिच्छासदृशं पिनाकिनः ॥४६॥ अन्वय-यः भुवनत्रयस्य प्रभुः बभूषुः प्रतिरागात् दशम शिरः चिकतिष : इष्टसाहसः ( सन् ) इच्छासदृश पिनाकिनः प्रसादम् विष्मम् इव अतर्कयत् । अर्थ-त्रिभुवन के स्वामी बनने की इच्छा से अत्यन्त उत्साह-पूर्वक अपना दसवां सिर काटने को उचत जिस रावण ने साहसप्रेमी होने के कारण इच्छानुसार मिलने वाले शिव जी के वर को भी विघ्न साही समझा ।

(६६ ) प्रभुरिति ॥ यो रावणः भुवनत्रयस्य प्रभुः स्वामी बुभूषुर्भवितुमिच्छुः । भुवः सन्नन्तादुप्रत्ययः । प्रतिरागादुत्साहात् । न तु फलविलम्बननिर्वेदादिति भावः । दशम शिरः चिकतिष : कर्तितु छेत्त मिच्छुः । 'कृती छेदने'इति धातोः सन्नन्ता- दुप्रत्ययः। इष्टसाहसः प्रियसाहसः अत एवेच्छासदृशमिच्छानुरूप पिनाकिनः प्रसाद वरं विध्नमिति वातर्कयदुत्प्रेक्षितवानिति परमसाहसिकत्वोक्तिः । ६ त मारभ्य श्लोकषट्केऽपि यच्छब्दस्य च रावणो नाम रक्षो बभूवेति पूर्वेणान्वयः । रङ्गराजस्तु 'न चक्रमस्याक्रमताधिकंधरम्' इति उपरिष्टादन्वय इत्याह । तदसत् । 'गुणानां च परार्थत्वात्' इति न्यायादारुण्यादिवत्प्रत्येकं प्रधानान्वयिना मिथः सबन्धायोगादित्यल शाखाचङ्क्रमणेन । पुरा किल रावणः काम्य कर्मणि पशुपतिप्रीणवाय नव शिरांस्यग्नी हुत्वा दशमारम्भे सतुष्टात्तस्मात्त्रैलोक्याधि- पत्य वव्र इति पौराणिकी कथात्रानुसधेया। व्याकरण-बुभूषुः--भू+सन् +उ कर्तरि ॥ भुवनत्रयस्य- भुव- नाना त्रयम् इति भुवनत्रयम् (१० तत्पु०), तस्य (शेषे षष्ठी) ।। दशमम्- दशाना पूरणम् इति दशमम् (दशन् +डट -दशन् +मट डट् ) ॥ चिकर्तिषुः-कृत्+सन् + उ कर्तरि ।। अतर्कयत्-त+णिच् स्वार्थे + लङ् तिप् ॥ इष्टसाहसः- इष्टं साहस यस्य स इष्टसाहसः (ब० वी०)। इच्छासदृशम्-इच्छायाः सदृशः इच्छासदृशः (प०तत्पु०), तम् । पनाकिनः-पिनाकः अस्ति अस्य इति पिनाकी (पिनाक + इनिः मत्वर्थे ), - तस्य। कोषः-मृत्युञ्जयः कृत्तिवासाः पिनाकी प्रमथाधिपः इत्यमरः । भावार्थ-पुरा किल त्रिलोक्याः प्राधिपत्यमीप्सू रावणः स्वकीयैः नवभिः ( १०० ) शिरोभिः शिवमपूजयत् किन्तु यदा तथापि हरः प्रसन्नो नाभूत् तदा भक्त युद्र कात् परमसाहसिकः स शेष दशममपि शिरश्छेत्तुमैच्छत् । तेन शिवोऽपि तस्मै अतितरामतूतुषत् यथेप्सित वरमपि च ददौ । अथ कैलासोत्क्षेपणवृत्तान्तमाह - समुत्क्षिपन् यः पृथिवीभृतां वरं वरप्रदानस्य चकार शूलिनः। सत्तु षाराद्रिसुताससंभ्रमस्वयग्रहाश्लेषसुखेन निष्क्रयम् ॥५०॥ अन्वय-यः पृथिवीभृता वर समुत्क्षिपन् वरप्रदानस्य -शूलेन शकरस्य त्रसत्तुषाराद्रिसुताससम्भ्रमस्वयग्रहाश्लेषसुखेन निष्कयं चकार । अर्थ-जिस रावण ने पर्वतराज कैलास को ऊपर उठाकर वर देने वाले शिव जी को, डरती हुई हिमालय-कन्या पार्वती के वेगपूर्वक स्वय उनका कण्ठ पकडकर आलिङ्गन करने से उत्पन्न हुआ सुख देकर, प्रत्युपकृत किया । टिप्पणी-वस्तुतः रावण ने दर्प से कैलाम को उठाया था। पर कवि की कल्पना ने इस पौराणिक घटना को उपर्युक्त साहित्यिक एव हृदयग्राही रूप देकर अपनी सहृदयता और सरसता का उत्कृष्ट परिचय दिया है। कवि का कहना है कि कैलास के जोर से डगमगा जाने पर पार्वती जी स्त्रीजनसुलभ कातरता से शिव जी के कण्ठ मे बाहे डालकर उनसे लिपट गई और इस प्रकार बिना याचना, किए ही शिव जी को त्रैलोक्याधिपत्य के वरदान से भी बढक : प्रियालिङ्गन सुख देकर रावण ने वर-प्राप्ति का मूल्य चुका दिया। कैसी अनूठी उक्ति है ? समुक्षिपन्निति ॥ यो रावणः पृथिवीभृतां पर्वतानां वरं श्रेष्ठ कैलास समुरिक्षान् । दादिति शेषः। शूलिनो वरप्रदानस्य पूर्वोक्तस्य । असन्त्याः ( १०१ ) शैलचलनेन बिभ्यत्यास्तुषाराद्रिसुताया पार्वत्याः ससंभ्रमो यः स्वयग्रहः प्रियप्रार्थना विना कण्ठग्रहणम् । 'सुप्सुपा-' इति समासः । तेन पाश्लेषः संमेलनं तेन यत्सुखं तेन । त्रैलोक्याधिपत्यसुखादुत्कृष्टेनेति भावः । निष्क्रयं प्रत्युपकार- निर्गतिं चकार 'निष्क्रयो बुद्धि योगे स्यात्सामथ्र्य निर्गतावपि' इति वैजयन्ती । यद्वा निष्क्रय चकार क्रयेण व्यवहारेण याच दोषदैन्यं ममाजेत्यर्थः । अत्र सुग्ववरदानयोविनिमयात्परिवृत्तिरलंकारः ।। तस्य ॥ व्याकरण-समुत्क्षिपन्- सम् + उद्+क्षिप् + शतृ कर्तरि । पृथ्वी. भृताम्-पृथिवी बिभ्रति इति पृथिवीभूत : (पृथिवी+भू+विप् कर्तरि) उपपदतत्पु०, तेषाम् । वरप्रदानस्य-वरस्य प्रदान वरप्रदान (१० तत्पु०), तस्य ॥ शूलिनः -शूलम् अस्ति अस्य इति शूली (शूल+इनिः मत्वर्थे ), त्रसत्त षाराद्रिसुतामसम्भ्रमस्वयंग्रहाश्लेषसुखेन- -तुषाराद्रः सुता इति तुषारा० (१० तत्पु० ) त्रसन्ती चासौ तुषाराद्रिसुता च इति त्रस- सुता (कर्मधा०)। ससम्भ्रमो यः स्वयग्रहः इति ससभ्रमस्वयंग्रहः (कमंधा०), त्रसत्तुषाराद्रिसुतायाः ससम्भ्रभस्वयग्रहः इतित्रस --ग्रहः (ष० तत्पु०), तेन प्राश्लेषः, त्रस-श्लेषः (तृ० तत्पु), तेन तस्य वा सुखम् (तृ० अथवा १० तत्पु०), तेन ॥ निष्क्रयम्-निर् अथवा निस्+की+अच भावे =निष्क्रयः, तम् ॥ कोष-शूलिनः-- शवः शली महेश्वरः- इत्यमरः। सम्भ्रम-सम्भ्रमस्त्वरा-इत्यमरः अलङ्कार-शिव जी ने रावण को वर दिया और रावण ने उन्हे पार्वती के आलिङ्गन का सुख दिया । इस प्रकार सुख और वरदान का परस्पर विनिमय ( १०२ ) होने के कारण यहाँ परिवृत्ति नामक अलङ्कार है-"परिवृत्तिर्विनिमयः समन्यूनाधिकैर्भवेत्”-सा० द० भावार्थ:--स रावण एकदा शिवनिवास त महागिरि कैलासमपि उदतोलयत् येन पर्वतप्रचलन भीतिचकिता देवी पार्वती सत्वर शिवस्य कण्ठं सुदृढम् प्रालिलिङ्ग । इत्थ चाय राक्षसराजः देवाय प्रियालिङ्गनसुख विदधत् वरदानस्य प्रत्युपकारमिवाकरोत् ॥ १ पुरीमत्रस्कन्द लु गोहि नन्दनं मघाण रत्नानि हरामराङ्गनाः । विगृह य चक्रे न मुचिद्विषा बली य इस्थमस्वास्थ्यमहर्दिव दिवः ५१ अन्धय-बली यः नमुचिद्विषा विगृह्य पुरीम् अवस्कन्द, नन्दन 'लुनीहि, रत्नानि मुषाण, अमराङ्गनाः हर; इत्थम् अहर्दिवं दिवः अस्वास्थ्य चक्रे । अर्थ-जिस बली रावण ने इन्द्र के साथ विरोध करके अमरावती पर चढाई की, नन्दन वन को छिन्न-भिन्न कर दिया, रत्न चुरा लिए तथा देवाङ्गनायें छीन ली। इस प्रकार उसने प्रतिदिन स्वर्ग मे उपद्रव कर रक्खा था। । पुरीमिति ।। यो बली बलवान्रावणो नमुचिद्विषा इन्द्रण विगृह्य विरुध्य पुरीममरावतीमवस्कन्दावरुरोध । नन्दनमिन्द्रवनम्, 'नन्दनं वनम्' इत्यमरः लुनीहि चिच्छेद । 'ई हल्यघोः' इतीकारः। रत्नानि श्रेष्ठवस्तूनि मणीन्वा 'रत्नश्रेष्ठे मणावपि' इति विश्वः। मुषारण मुमोष । मुष स्तेये । हलः श्नः शानज्झौ इति श्नः शानजादेशः। अमराङ्गनाः हर जहार । सर्वत्र पौनःपुन्येनेत्यर्थः । इत्थमनेन प्रकारेण अहनि च दिवा चाहदिवम् । अहन्यहनीत्यर्थः । 'अचतुर- इत्यादिना सप्तभ्यर्थवृत्तौ द्वन्द्व समासान्तो निपातः। दिवःस्वर्गस्यास्वास्थ्यमुपद्रवं -- है १०३ ) चक्रे । अत्रावस्कन्देत्यादौ 'क्रियासम भिहारे लोट् लोटो हिस्वौ वा च तध्वमोः' इत्यनुवृत्तो 'समुञ्चयेऽन्यतरस्याम्' इति विकल्पेन कालसामान्ये लोट् । तस्य यथो- पग्रह सर्वतिडादेशो हिस्त्रौ च । प्रकरणादिना त्वर्थविशेषावसानम् । 'प्रतो हेः' इति यथायोग्य हिलुक । पौनःपुन्य भृशार्थो वा क्रियासमभिहारः। अवस्कन्द- नादिक्रियाविशेषाणा समुच्चयः क्रियासमभिहारः । तत्सा पान्यस्य करोते. 'समुच्चये सामान्गवचनस्य' इत्यनुप्रयोगः चक्रे इति । अत्र तिड्वैचित्र्यात्सौशब्दाख्यो गुण.। सुपा तिडा परावृत्ति. मौशब्दम्' इति लक्षणात् । समुच्चयश्चा- लकारः॥ व्याकरण-अवस्कन्द -अव+स्कन्द + लोट् हि ( भूतानद्यतनपरोक्ष- विषये )--यहाँ “समुच्चयेऽन्यतरस्याम्" ३/४/३ अर्थात् अनेक क्रियानो के समुच्चय ( समाहार ) द्योतित होने पर धातु या धातुरो से सभी काल मे लोट लकार तथा सभी पुरुष एव वचन मे (परस्मैपद से) हि तथा (आत्मनेपद से) स्व का प्रयोग होता है । इस नियम से परोक्षभूत अर्थ मे लोट लकार तथा प्रथमपुरुष के एकवचन के अर्थ मे हि का प्रयोग हुआ है । इसी प्रकार '"लुनीहि,' 'मुषाण' तथा 'हर' मे भी समझना चाहिए । इस श्लोल मे 'चक्रे, क्रिया का अन्त मे प्रयोग हुमा है, समच्चयार्थ मे अनेक धातुप्रो के प्रयुक्त होने पर अन्त मे इस प्रकार की एक सामान्य अर्थ घोतित करने वाली क्रिया का प्रयोग करना पडता है--"समुच्चये सामान्यवचनस्य" ३/४१५” उसी के काल, पुरुष तथा वचन द्वारा समुच्चयार्थ मे प्रयुक्त क्रियानो के भी काल, पुरुष वचन आदि की अभिव्यक्ति ( स्पष्टीकरण) हो जाती है-'समुच्चये लोड्विधौ सामान्या- र्थस्य धातोरनुप्रयोगः स्यात् अनुप्रयोगाद् यथायथ लडादयस्तिबादयश्च । ततः सङ्खयाकालयोः पुरुषविशेषार्थस्त्र चाभिव्यक्तिः ।" सि० कौ० ॥ यहाँ ( १०४ ) मल्लिनाथ ने लोट् का प्रयोग क्रियासमभिहार मे माना है, जो वास्तव मे समीचीन नहीं समझ पडता, क्योकि क्रिया-समभिहार में एक तो उसी क्रिया को दो बार प्रयुक्त होना चाहिए था, (क्रियासमभिहारे द्वे वाच्ये- वा० ) फिर अन्त मे उसी लोट् वाली क्रिया का ही वास्तविक काल, पुरुष, वचन के साथ अनुप्रयोग होना चाहिए था-"यथाविध्यनुप्रयोगः पूर्वस्मिन्" ३।४।३ । अतएव मल्लिनाथ की इस व्याख्या पर भट्टोजिदीक्षित ने सिद्धान्त- कौमुदी मे कहा है-"इह पुनः पुनश्चस्कन्देत्यादिरथ इति तु व्याख्यानं भ्रममूलमेव द्वितीयसूत्र क्रियासमभिहार इत्यस्याननुवृत्तः । लोडन्तस्य द्वित्वापत्तेश्च ॥" लनीहि-लु+लोट् ( परोक्ष भूतार्थे ) हि ॥ ( परोक्ष भूतार्थे ) हि ॥ मुषाण-मुष् + लोट् (परोक्षभूतार्थे ) हि । हर-हृ+लोट् ( परोक्षभूतार्थे ) हि ।। अमराङ्गनाः- प्रशस्तात्यड्गान्यस्याः इति अङ्गना (अङ्ग+न+टाप-यहाँ 'अङ्गात् कल्याणे'- गरा० ५।२।१०० से न प्रत्यय हुआ है) अमराणाम् अङ्गनाः इति अमरा० (ष०तत्पु०) । नमुचिद्विषा-न मुञ्चति इति नमुचिः (नत्र +मुच् +इन् औरणादिक, कर्तरि) (नमुचि शुम्भ-निशुम्भ का तीसरा छोटा भाई था। इन्द्र ने जब इसका सिर जल के फेन से काट डाला तो उस कटे सिर ही ने इन्द्र का पीछा किया । अतएव उसे नमुचि कहा जाने लगा-"चिच्छेदास्य शिरो राजन्नपा फेनेन वासवः । तच्छिरो नमुचेश्छिन्न पृष्ठतः शक्रमन्वियात्-" मार्क० पु०।) नमुचिं द्विष्टवान् इति नमुचिद्विट् (नमुचि+द्विष्+क्विप् भूते कतरि) उप०, तेन ॥ अस्वास्थ्यम्-स्वस्मिन् तिष्ठति इति स्वस्थः (स्व+स्था+क कर्तरि ) तस्य भावः स्वास्थ्यम् । न स्वास्थ्यम् इति अस्वा- स्थ्यम् ( ना तत्पु०)॥ अहर्दिवम्-अहनि च दिवा च इति अहर्दिवम् (द्वन्द्वः)। यहां प्रचतुरविचतुर-५४७७” नियम से समासान्त अच् प्रत्यय हुमा है।

( १०५ ) अलङ्कार-यहाँ कई क्रियानो का समुच्चय होने के कारण समुच्चय अलङ्कार है-"गुणक्रियायोगपद्य समुच्चयः"-अलङ्कारसर्वस्व । भावार्थ -बलवान् रावणः इन्द्रेण सह विरुष्य पुरोममरावतीम् अवरुरोध, लन्दनवनम् चिच्छेद, इन्द्रसम्बन्धी नि रत्नानि लुलुण्ठ, सुराङ्गनाश्च जहार, इत्थ च प्रत्यह त्रिदशालये आतङ्क प्रसारयामास ।। सलीलयातानि न भतुरभ्रमोन चित्रमच्चैःश्रवसः पदक्रमम् । अनुद्रुतः संयति येन केवल बलस्य शत्र, प्रशशस शीघ्रताम् । ५२ अन्वय-सयति येन अनुद्र तः बलस्य शत्रुः अभ्रमोः भतु: सबीलयातानि तथा उच्चैःश्रवसः चित्र पदक्रम न प्रशशस, केवल शीघ्रता (प्रशश स)। अर्थ-युद्ध मे जिस रावण द्वारा पीछा किए जाने पर बल ( नामक राक्षस ) के शत्रु इन्द्र ने अपने ऐरावत हाथी के लोलापूर्वक गमन तथा उच्चैः श्रवा घोडे की विविध चालो की प्रशंसा न की, केवल उनके शीघ्र गमन को ही प्रशसा की। , सलीलेति ।। संयति युद्ध । 'समुदायः स्त्रिया सयत्ममित्याजिसमिद्यधः' इत्यमरः । येन रावणेन अनुद्र तोऽनुधावितः बलस्य शत्रुरिन्द्रः अभ्रमोभंतु रैरा- वतस्य सलीलयातानि सभङ्गीकगमनानि न प्रशशस तथा उच्चे श्रवसः स्वाश्वस्य चित्रं नानाविध पदक्रमं पादविक्षेपम् । अर्धपुलायितादिगतिविशेषमित्यर्थः । न प्रशशंस । किन्तु केवलं शीघ्रतां शीघ्रगामित्वमेव प्रशशस मामास्कन्ध ग्रहीष्यतीति भयादिति भावः ।। व्याकरण सलीलयातानि- लीलया सह सलीलानि (ब० श्री०) ( १०६ ) सलीलानि च तानि यातानि (या+क्त भावे) इति सलीलयातानि ( कर्मधा० )। पदक्रमम्-पदाना क्रमः (विक्षेपः ) पदक्रमः (१० तत्पु० )॥ अनुद्रुतः- अनु++क्त कर्मणि ॥ सयति-सयम्यते ( शत्रुः ) अस्याम् इति संयत् (सम् +यम् +क्विप् अधिकरणे), तस्याम् ॥ कोष-संयत्-"समुदायः स्त्रिया सयत् सयत् समित्याजिसमियुधः” इत्यमरः। अभ्रमुभर्ता-ऐरावतोभ्रमातङ्गरावणाभ्रमुवल्लभाः इत्यमरः ॥ भावार्थ - सड़ग्रामेषु रावणेन निर्जितः पुरन्दर ऐरावत गजम् उच्चैः- श्रवस हयं वा प्रारुह्य बहुवार पलायितः तदा च महेन्द्राय तयोः द्रुतगामित्वमेव अभीष्टमासीत् नतु सविलासगामित्वम् । अशक्नुवन् सोढुमधोरलोचनः सहस्ररश्मेरिव यस्य दर्शनम् । प्रविश्य हेमाद्रिगुहागृहान्तर निनाय बिभ्यदिवसानि कौशिकः ५३ अन्वय-अधीरलोचनः कौशिकः सहस्ररश्मेः इव अशक्रुवन् हेमाद्रिगुहागृहान्तर प्रविश्य बिभ्यत् दिवसानि निनाय । अर्थ-सूर्य के समान ( तेजस्वी ) जिस रावण की ओर देखने में भी असमर्थ, व्यग्र (कातर ) दृष्टि वाले इन्द्र ने सुमेरु के गुहा-गृहो के भीतर घुसकर (भी) डरते हुए (ही) दिन बिताये थे । टिप्पणो-'कौशिक' पद श्लिष्ट है जिसके 'इन्द्र' और 'उलूक' दोनो ही अर्थ हैं परन्तु प्रस्तुत 'इन्द्र मात्र' का वाचक होने से कौशिक का 'उलूक' अर्थ क्ष्लेष का नही, शब्दशक्तिमूलक ध्वनि का उदाहरण है और 'सहस्ररश्मेरिव' इस उपमान का निर्वाहक होने से यह वाच्यसिध्यन नामक गुणीभूत व्यङ्ग य यस्य दर्शनं सोढुम् ( १०७ ) हो गया है । श्लोक का भाव यह है:-जैसे उलूक सूर्य की ओर न देख सकने से सूर्योदय होते ही गुफानो मे छिपकर दिन बिताता है, उसी प्रकार तेजस्वी रावण की ओर न देख सकने के कारण इन्द्र ने भी सुमेरु की गुफानो मे छिपकर दिन बिताया था। अशक्नुवन्निति ।। अधीरलोचनोऽस्थिरदृष्टि: कौशिको महेन्द्रः, उलूकश्च । 'महेन्द्रगुग्लूलूकव्यालग्राहिषु कौशिकः' इत्यमरः । सहस्ररश्मेः सूर्यस्येव यस्य रावणस्य विक्रमकर्मणो दर्शन सोढुमशक्नुवन् हेमाद्रगु हैव गृह तस्यान्तर प्रविश्य बिभ्यत्तत्रापि वेपमान एव । बिभेतः शतरि 'नाभ्यस्ताच्छतुः इति नुमभावः । दिवसानि वासराणि निनाय । वा तु क्लीबे दिवसवासरौ इत्यमरः । यथा पेचकः सूर्योदये भीतः सन् तिष्ठति, तथा सोऽपी ति भावः। कौशिक इत्यभिधायाः प्रस्तुतैकगोचररवेनोभयालेषेऽपि विशेष्यश्लेषासभवादुलूकविषयशब्द- शक्तिनूलो ध्वनिः । सहस्ररश्मेरिवेत्युपमाननिर्वाहकत्वाद्वाच्य सिद्ध्यङ्गम् ॥ व्याकरण-अशक्नुवन्- न शक्नुवन् (शक+शतृ कर्तरि) इति अशक्नुवन् (नन. तत्पु०)॥ सोढुम्-सह +तुमुन् । अधीरलोचनः-अधीराणि लोचनानि यस्य सः (ब० ब्रो०)। सहस्ररश्मेः-सहस्र रश्मयः यस्य स सहस्ररश्मिः (ब० बी०), तश्य ।। हेमाद्रिगुहागृहान्तरम् –हेमाद्रेःगुहा, हेमाद्रिगुहा (१० तत्पु०), सैव गृह महे मा० (कर्मधा०), तस्य अन्तरम् हेमा- न्तरम् (१० तत्पु० ) ।। निन य-नी+लिट् तिप् ( णल् ) । बिभ्यत् भी+शतृ कर्तरि ॥ -- अलङ्कार-यही कौशिक मे यद्यपि श्लेष ( महेन्द्र तथा उलूक दो अर्थ ) विद्यमान हैं, किन्तु इसका प्रयोग विशेष्य ( इन्द्र के नाम ) के रूप मे ही ( १०८ ) हुआ है, अतः वह श्लेष मान्य नहीं होगा, क्यो कि श्लेष विशेषण में मान्य होता है । अतः यहाँ कौशिक का केवल महेन्द्र ही अर्थ किया जायगा।' 'सहस्र- रश्मेरिव' मे उपमालकार है। भावार्थ-दिवा सूर्यप्रकाशभयात् तरुकोटरेषु गुहादिषु वा विलीन उलूक इव महेन्द्रो रावणभयात् हेमाद्रिकन्दरसदनान्तरे प्रच्छन्नः भूयास यापयामास ॥ काल बृहच्छिलानिष्ठुरकराठघट्टनाद्विकोर्णलोलाग्निकण सुरद्विषः । जगत्प्रभोरप्रसहिष्णु वैष्णवं न चक्रमस्याक्रमताधिकधरम ॥५४॥ अन्वय-वृहच्छिलानिष्ठुरकण्ठघट्टनात् विकीर्णलोलाग्निकरणम् अप्रसहिष्णु वैष्णवं चक्रं जगत्प्रभोः सुरद्विषः अस्य अधिकन्धर न अक्रमत ।। अर्थ- जगत् के स्वामी एवं देवो के शत्रु इस रावण के विशाल एव शिला जेसे कठोर कण्ठ से टकराने के कारण निकलती हुई चञ्चल चिनगारियो वाला, इसे पराजित करने में असमर्थ भगवान् का सुदर्शन चक्र इसको ग्रीवा तक न पहुँच सका (प्रतिहत हो गया )। बृहच्छिलोत ॥ बृहति शिलेव निष्ठुरे कण्ठे धट्टनादभिधातादिकीर्णा विक्षिताः लोलाश्चाग्निकरणाः स्फुलिङ्गा यस्य तत् । अत एवाप्रसहिष्णु अनभिभा- वकम् । प्रसहनमभिभव इति वृत्तिकारः । 'अलकृन -' इत्यादिना इष्णुच् । वैष्णव चक्र सुदर्शन जगत्प्रभोः सकललोकैकस्वामिनः । अस्य सुरद्विषो रावणस्य कधरायामधि अधिकंधरमधिग्रीवम् । बिभक्त यर्थे ऽव्ययीभावः । 'अव्यीभावश्च' इति नपुसकत्वात् 'हस्त्रो नपुंसके प्रातिपदिकस्य' इति ह्रस्वत्वम् । 'कण्ठो गलोऽथ ग्रीवाया शिरोधिः कवरेत्यपि' इत्यमरः । नाक्रमताप्रतिहत न क्रमते स्म न प्रवर्तते स्म । किंतु प्रतिहतमेवेत्यर्थः । वृत्तिसर्गतायनेषु क्रमः' इति वृत्तावात्मनेपदम् । वृत्तिरप्रतिबन्धः॥ व्याकरण -बृहच्छिलानिष्ठुरकण्ठघट्टनात्-शिली इव निष्ठुरः शिलानिष्ठुरः (उपमानकमंधा०)। तादृशः कण्ठः, शि-कण्ठः (कर्मधा०), बृहन् य शिलानिष्ठुरकण्ठः इति-~-(कर्मधा०), तेन घट्टनम् बृ-घट्टनम् (सुप्सुपा समास), तस्मात् ॥ विकीर्णलोलाग्निकणम्-विकीर्णाः ( वि++क्त कमरिण ) लोला: अग्निकरणाः यस्य तत् वि-करणम् (ब० बी०)। अप्रसहिष्णु - न प्रसहिष्णु (प्र--सह-+ इष्णुच् कर्तरि) इति (नन तत्पु०) । वैष्णव म,--विष्णोरिदम् वैष्णवम् (विष्णु+अण्)॥ अक्रमत-क्रम+ लङ् त । अधिकन्धरम-कन्धरायामिति अधिकन्धरम् (विभक्त्यर्थे ऽव्ययी भावः) भावार्थ -रावरणस्य प्रस्तरशिलाघने कण्ठे विष्णुना प्रहृत चक्रमपि क्षत कतु नापारयत् ॥ कलुषीभवन्मुहुम देन दन्तीव मनुष्यधमणः । निरस्तगाम्भीर्यमपास्तंपुष्पकम, प्रकम्पयामास न मानसं न सः॥५५॥ अन्वय-स मदेन दन्ती इव विभिन्नशखः कलुषीभवत् निरस्तगाम्भीर्यम् अपास्तपुष्पक मनुष्यधर्मणः मानसं मुहुर्ने कम्पयामास (इति) न । अर्थ- नीरस्राव के कारण सरोवर के श खो को तोड़ फोड़कर, उसको गन्दा करके, उसकी गहराई की उपेक्षा करके तथा उसके पुष्पों को छिन्न-भिन्न करके उसे मथ देने वाले हाथी के समान रावण ने अपने बल के गर्व से कुबेर को शंख नामक निधि को तोड़ कर एवं पुष्पक विमान को छीन उनके अत्यन्त ( ११० ) क्षुब्ध एव अधोर (कातर) चित्त को बारम्बार नही कॅपाया-सा नही (अर्थात् कपाया ही)। विभन्नेति ।। स रावरणो मदेन दर्पण, इभदानेन च । 'मदो दर्पभदानयोः इति विश्वः । दन्तीव गज इव विभिन्नो विघट्टितः शङ्खो निधिभेदः, कम्बुश्च येन सः सन् 'शङ्का निध्यन्तरे कम्बुललाटास्थिनखेषु च' इति विश्वः। प्रकलुष कलुष क्षुब्धमाविल च भवत्कलुषोभवत् । निरस्त गाम्भीर्यमविकारित्वम् अगाधव च यस्य तत् । अपास्तानि पुष्पाणि, पुष्पक विमान च यस्मात्तत् । पुष्पपक्षे वैभाषिकः कप्प्रत्ययः । मनुष्यस्येव धर्मः श्मश्रुलत्वादिर्यस्येति स्वामो । तस्य मनुष्यधर्मणः । 'धर्मादनिच केवलात्' इत्यनिच् । मानस चित्त, तदीयं सरश्च । 'मानस सरसि स्वान्ते' इति विश्वः । मुहुर्न कम्पयामास न क्षोभयामासेति न । किंतु कम्पयामासैवेत्यर्थ. । कुबेरस्य महामहिमतया सभावि- ताप्रकम्पित्वनिवारणाय नत्र द्वयम् । 'सभाव्यनिषेधनिवर्तने नत्र द्वयम्' इति वामनः । अत्र दन्तिरावण्योः प्रकृताप्रकृतयोः श्लेषः । व्याकरण-विभिन्नशङ्ख-विभिन्नः (वि+भिद्... क्त कर्मणि ) शङ्खः येन सः विभिन्नशङ्खः (ब० बी०)! कलुषी भवेत्-अकलुष कलुषं भवत् इति कलुषीभवत् (कलुष+वि+भू + शतृ कर्तरि ) गतितत्पु० ॥ मनुष्यधर्मणः-मनुष्यस्य धर्म इव धमों यस्य सः मनुष्यधर्मा ( मनुष्य+ धर्म+अनिच (ब० बी०), तस्य । यहा 'धर्मादनिच् केवलात्' अर्यात् 'यदि बहुव्रीहि के अन्त मे धर्म शब्द हो जिससे पूर्व एक ही पद हो तो समासान्त अनिच् प्रत्यय लगता है-इस नियम से अनिच् प्रत्यय लगा है। निरस्तगाम्भी- यम्-निरस्त ( निर्+अस्+क्त कर्मणि ) गाम्भीर्य यस्य तत् नि- यम ( १११ ) . (ब० बी०)। अपास्तपुष्पम् -अपास्त (अप+अस्+क्त कर्मणि) पुष्प पुष्पक वा यस्मात् तत् अपास्तपुष्पकम् ( ब० बी०)।। प्रकम्पयामास- प्र+कम्प+णि+लिट् तिम् ।। कोष-मनुष्यधर्मा-"कुबेरस्त्यम्बकसखो यक्षराड् गुह्यकेश्वरः । मनुष्य- धर्मा धनदो राजराजो धनाधिपः ॥” इत्यमरः अलङ्कार-यहा सभी विशेषण दन्ती ( गज ) तथा रावण के लिए समान रूपसे प्रयुक्त हुए है, अतः श्लेष अलङ्कार है । भावार्थ: -यथा मदोन्मत्तो मतङ्गः सरोवर प्रविश्य तत्रस्थानि शङ्खादि- रत्नानि विनाशयति जल मलिनयति तस्य गाम्भीर्यमालोडयति पुष्पाणि उन्मूलयति, समस्तं सरश्च प्रकम्पयति तथैव स रावणः कुबेरस्य (नगरी प्रविश्य ) शङ्खनिधि विलुण्ठ्य पुष्पक हृत्वा तस्य मानस भीतिभीतम् अधीर च चकार । रणेषु तस्य प्रहिताः प्रचेतसा सरोषहुकारपराड्मुखीकृताः। प्रहतुरेवोरगराजरज्जवो जवेन कण्ठ समयाः प्रपेदिरे ॥५६।। अन्वय-रणेषु प्रचेतसा प्रहिताः उरगराजरज्जवः तस्य सरोषहुकार- पराड्मुखीकृताः (अतएव) सभयाः जवेन प्रहतु: एव कण्ठं प्रपेदिरे । अर्थ-रणभूमि मे वरुण द्वारा चलाये गए नागपाश क्रोधपूर्वक किए गए उसके हु कार से पराङ्मुख होकर भयपूर्वक प्रहर्ता वरुण के कण्ठ मे ही वेग के साथ फिर आ लिपटे । रणेष्विति ।। किंच रणेषु प्रचेतसा वरुणेन प्रहिताः प्रयुक्ता उरगराजा महासस्तेि रज्जव इव उरगराजरज्जव । नागपाशा इत्यर्थः । तस्य रावणस्य .

( ११२ )
सरोषहुंकारेण पराङ्मुखीकृता व्यावति ताः। अत एव सभयाः सत्यः जवेन
वेगेन प्रहतु: प्रयोक्त : प्रचेतस एव कण्ठ प्रपेदिरे प्राप्ताः । अत्र परहिंसाप्रयुक्त-
स्यायुधस्य वैपरीत्येन स्वकण्ठग्रहणादनर्थोत्पत्तिरूपो विषमालकारः । 'विरुद्धकार्य-
स्योत्पत्तिय त्रानथस्य वा भवेत्' इति लक्षणात् ॥
व्याकरण-प्रहिताः-प्र+हि प्रेरणे+क्त कर्मणि । सरोषहुङ्कार-
पराड्म खीकृताः-परा अञ्चन्ति इति पराञ्चि (परा+ अञ्च + क्विन् कर्तरि)
परा अञ्चन्ति मुखानि यासा ताः पराङ्मुखाः (ब० वी०) अपराङ्मुखाः पराड्-
मुखाः कृता इति पराङ्मुखीकृताः (पराड्मुख+च्चि++क्त कर्मणि) गतितत्पु०
सरोषश्चासौ हुड्वारश्च इति स-ङ्कारः (कर्मधा०) तेन पराड्मुखीकृताः सरोष-
कृताः (तृ०तत्पु०) । उरगराजरज्जवः -उरसा गच्छन्ति इति उरगाः (उरस्+
गम् +ड कर्तरि ) उपपदतत्पु०, तेषा राजानः इति उरगराजाः (उरगराजन्
+टच् समासान्त) ष० त० । ते रज्जव इव इति उरग-रज्जवः ( उपमित-
कर्मधा०)
कोष-प्रचेतस्-"प्रचेताः वरुणः पाशी यादसापतिरप्पतिः"।
अलङ्कार-यहाँ दूसरे को मारने के लिए प्रयुक्त हुआ अस्त्र उलटे अपने
हो गले मे आ लिपटा अतः विषमालङ्कार हुमा-"विरुद्धकार्यस्योत्पत्तियंत्रान-
र्थस्य वा भवेत्" सर्वकषा।
भावार्थ-सङ्ग्रामे वरुणेन रावणेपरि प्रयुक्ताः महानागपाशाः रावणस्य
सरोषहुङ्कारैः परावर्तिताः वरुणस्यैव कण्ठ जगृहुः ।
परेतभतुमहिषोऽम ना धनुविधातुम खातविषाणमण्डलः।
हृतेऽपि भारे महतस्त्रपाभरादुवाह दुःखेन भृशानतं शिरः ॥५॥

( १९३ ) अन्वय-अमुना धनुः विधातुम् उत्खातविषारणमण्डलः परेतम्भ: महिका भारे हृते अपि महतः त्रपाभरात् भृशानतं शिरो दुःखेन उवाह । अर्थ-इसी रावण द्वारा धनुष बनाने के लिए उखाडी हुई सीगो वाला यमराज का ( वाहन ) भैसा सीगभार के दूर कर दिए जाने पर भी लज्जा के महान् भार से अत्यन्त झुके हुए अपने सिर को दुःख से वहन करता था। परेतभर्तु रिति ॥ अमुना रावणेन धनुः शाङ्ग विधातु निर्मातुमुत्खात- मुत्पाटितं विषाणयोः शृङ्गयोमण्डलं वलयं यस्य स परेतभतुर्यमस्य महिषः । वाहनभूत इति भावः । भारे विषाणरूपे । भवो धन । हृतेऽपि महत्तस्त्रदेव भरस्तस्मात् 'ततोऽपि दुर्भरादिति भावः । भूधातोः क्रयादिकात् "ऋदोरम्' इत्यप्प्रत्ययः । भृशमत्यर्थमानतं नम्र शिरो दुःखेनोवाह वहति स्म । 'असयोगा- ल्लिट कित्' इति कित्त्वात् 'वचिस्वपि' इत्यादिना सप्रसारणम् । हृतेऽपि भारे नतमिति विरोधः। तदनुप्राणिता चेयमवनतिहेत्वसाधावपाभारत्वो प्रेक्षा॥ व्याकरण-परेतभतु:-परेताना (परा+इ+क्त कर्तरि ) भर्ता प- भर्ती (ष. तत्पु०), तस्य । उत्खातविषाणमण्डल:- उत्खात (उद्+खन्+ क्त कर्मणि) विषाणयोः मण्डलं यस्य स उत्खात-मण्डला (ब० वी०) त्रपाभरात्-त्रपायाः भरः (+अप् भावे) त्रपाभरः (१० तत्पु०), तस्मात् । उवाह -वह +लिट् +तिप् रणल । भृशानतम्-भृशम् मानतम् इति भृशानतम् (सुपसुपा)। कोष-परेतभर्ता-धर्मराजः पितृपतिः समवर्ती परेतराट् । कृतान्तो ( ११४ ) यमुनाभ्राता शमनो यमराड् यम, इत्यमर ॥ विपासा- विषाणा स्यात् पशुशृङ्ग भदन्तयोः इत्यमर. अलंकार-यहाँ 'हृतेऽपि भारे नतम्' मे विरोधाभास अलङ्कार है, और फिर 'त्रपाभरात्' मे उसी विरोध ने अनुप्राणित उत्प्रेक्षा है जो शिरोवनति के हेतु के रूप में की गई है। भावार्थ-रावण स्वधनुर्विधित्सया यममहिषस्य शृङ्गमेव उत्पाटितवान् येन निर्विष्णोऽसौ महिष सदैव व्रीडावनत एक तिष्ठति । स्पृशन्सशाङ्कः समये शुचावपि स्थितः करात्रैरसमनपातिभिः । अधर्मधर्मोदकबिन्दुमाक्तिकैरलंचकारास्य वधूरहस्करः ॥५८।। अन्वये-अहस्करः शुचौ समये स्थितः अपि असमनपातिभिः कराः सशङ्कः स्पृशन् अधर्मत्रमोदकविन्दुमौक्तिकैः अस्य वधुः अलञ्चकार । अर्थ-ग्रीष्म ऋतु मे स्थित रहकर भी सूर्य अपनी सकुचित किरणो के ( केवल ) अग्नभाग से भयपूर्वक स्पर्श करता हुआ इसकी स्त्रियो को शीतल स्वेदबिन्दु रूपी मोतियो से अलकृत करता था । स्पृशनिति ।। अहः करोतीत्यहस्करः सूर्यः । 'दिवाविभानिशा-' इत्यादिना टप्रत्ययः। कस्कादित्वात्सत्वम् । शुचौ समये ग्रीष्मकाले, अनुपहते प्राचारे च स्थितोऽपि । 'शुचिः शुद्धेऽनुपहते शृङ्गाराषाढयोरपि । ग्रीष्मे हुतवहेऽपि स्यात्' इति विश्वः । समय' शपथाचारकालसिद्धान्तस विद' इत्यमरः। असमग्रपा- तिभिः । सकुचितवृत्तिभिरित्यर्थं । कराणामशूना, हस्तानो चाग्ने । 'बलिहस्ता- शव , कराः' इत्यमरः। सशङ्क. स्पृशन् । अविश्वासभयादिति भावः। अधर्मा अनुष्णाः धर्मोदकबिन्दवः स्वेदोदबिन्दव' । 'मन्थौदन-' इत्यादिना

( ११५ )
-
विकल्पादुदकशब्दस्योदादेशाभावः । तैरेव मौक्तिकैरस्य वधूरलचकार । ग्रीष्मे
तद्भयान्नासर तपतीत्यर्थः । अत्र प्रस्तुतसूर्यविशेषणमात्रसाम्यादप्रस्तुतप्रसाधक-
प्रतीतेः समासोत्ति रलकारः ॥
व्याकरण--असमग्रपातिभि:--असमग्र यथा तथा पतन्ति इति असमग्र-
पातीनि (असमग्र+पत् +णिनिः कर्तरि) उप० तत्पु०, तैः। अधर्मधर्मोद-
कबिन्दुमौक्तिकः-न धर्मा अधर्माः ( नन, तत्पु० ), उदकस्य बिन्दवः उदक-
बिन्दवः (१० तत्पु०), धर्मस्य उदकबिन्दव इति धर्मो-वः (कर्मधा०),
अधर्माश्च ते धर्मो-वः, अघ-वः (कर्मधा०) त एव मौक्तिकानि इति अधर्म-
कानि ( कर्मधा० ), तैः। अलञ्चकार-प्रलम्+ +लिट् तिप् (गल्)।
अहस्करः-- प्रहः करोति इति अहस्करः (अहन् + +ट कर्तरि)।
कोष-अहस्कर "भास्कराहस्करबध्नप्रभाकरविभाकरा.” इत्यमरः ।
अलङ्कार-यहाँ सूर्य (प्रस्तुत) के 'शुचौ अपि स्थितः असमग्रपातिभिः
करागः सशकः स्पृशन्'--इन विशेषणो मे 'शुचि' का 'शुद्ध आचार, तथा
'करार' का 'हस्तान' भी अर्थ होने के कारण उससे प्रसाधक (सजानेवाले)
(अप्रस्तुत) की प्रतीति होती है, अतः यहाँ समासोक्ति अलङ्कार है-"समासोक्तिः
समैयंत्र कार्यलिङ्गविशेषणैः। व्यवहारसमारोपः प्रस्तुतेऽन्यस्य वस्तुनः" -
-
सा० द०
भावार्थ -सूर्यः ग्रीष्मर्तावपि रावणभीत्या कतिपयैरतिमृदुभिरेव स्वकिरणैः
तस्य प्रियाः स्पृशन् मुक्तासदृशैः स्वेदबिन्दुभिस्ता अलञ्चकार ॥
कलासमग्रेण गृहानमुञ्चता मनस्विनीरुत्कयितुपटीयसा।
विलासिनस्तस्य वितन्वता रतिं न नम साचिव्यमकारि नेन्दुना। ॥५६॥

( ११६ ) समग्रेम अन्वय-कलासमप्रैण, -कलासमण, गृहान् अमुञ्चता, मनस्विनीः उत्कयितु पटीयसा, रति वितन्वता इन्दुना विलासिनः तस्यनमसाचिव्य न अकारि (इति) न अर्थ-अपनी समस्त कलाओ के साथ ( रावण के) भवन को कभी न छोड़ता हुआ, मानिनियो को ( केलि के लिए) उत्कण्ठित करने मे परम चतुर एवं इस विलासी रावण के विषयराग को बढाता हुमा चन्द्रमा कामक्रीडा के विषय मे उसका मन्त्रित्व नहीं करता था-ऐसा नहीं (अर्थात् करता ही था)। कलासमग्रेणेति ॥ कलाभिः षोडशाशैः शिल्पविद्याभिश्च संपूर्णेन । 'काले शिल्पे विनवृद्धौ चन्द्राशे कलने कला' इति वैजयन्ती । गृहानर मुञ्चता सदा तद्गृहेष्वेव वसता । दण्डभयात्सेवाधर्मत्वाच्चेति भावः । मनस्विनी- मानिनीरुत्का उत्सुकाः कर्तुम् उत्कयितुम् । 'उल्क उन्मनाः' इति निपातना- दुत्कशब्दात् 'तत्करोति-' इति एयन्तात्तुमुन् । पटीयसा मानभेदचतुरे- णेत्यर्थः । कुतः। रति वितन्वता चन्द्रिकाभिश्चतुरोक्तिभिश्च रागं वर्धयता इन्दुना विलासिनो विलसनशीलस्य । 'वौ कषलस-' इत्यादिना घिनुण प्रत्ययः । तस्य रावरणस्य नर्मसाचिव्य क्रीडासबन्ध्यधिकारित्वे सचेष्टत्वम् ।' 'लीला क्रीडा च नर्म च'इत्यमरः । नाकारीति न । कित्वकार्यवेत्यर्थः । अनौचित्यात्प्राप्तनर्मसाचिव्यनिषेधनिवारणार्थ नद्धयम् । 'संभाव्यनिषेधनिवर्तने नद्वयम् इति वामनः । अत्रेन्दोः प्रकृतस्याप्रकृतेन ना सचिवेन श्लेषः ।। व्याकरण-कलासमग्रेण-कलाभिः समग्रःक-ग्रः (सुप्पा), तेन । उत्कयितुम्-उत्कः कर्तुम् इति उत्कयितुम् (उत्क+णि+तुमुन्)। पटीयसा-अतिशयेन पटुः इति पटीयान् (पटु+ईयसुन् ) तेनः । विलासिनः- वि+लस्+घिणुन् कर्तरि= विलासी, तस्य ॥ नर्मसाचिव्यम्- नमणि माचिव्यम् इति नर्म साचिव्यम् (सुप्सुपा)। अकारि-कृ+लुङ्+त कर्मणि ॥ भ ( ११७ ) कोष-'समग्रं सकल पूर्णमखण्डं स्यादनूनके' इत्यमरः । अलङ्कार-“यहाँ प्रस्तुत इन्दु का अप्रस्तुत नमसचिव के साथ श्लेष हुआ है'-सर्वकषा भावार्थ-सकलकलासम्पूर्णश्चन्द्रः सदा रावणगृहे विद्यमानः मानिनीना काममुद्दीपयन्, विलासिनस्तस्य च रति वर्द्धयन् क्रीडासचिवतामिव निर्वाहयति स्म ॥ विदग्धलीलोचितदन्तपत्रिकाविधित्सया नूनमनेन मानिना। न जातु वैनायकमेकम द्धतं विषाणमद्यापि पुनः प्ररोहति ॥६॥ अन्वय-मानिना अनेन विदग्धलीलोचितदन्तपत्रिकाविधित्सया नूनं जातु उद्धृतं वैनायकम् एक विषाणम अद्यापि पुनः न प्ररोहति । अर्थ -इस अहंकारी रावण के द्वारा अपनी चतुर विलासिनी स्त्रियो के लिए उपयुक्त कर्णभूषण बनाने की इच्छा से निश्चय ही कभी उखाडा गया गणेश जी का एक दन्त आज तक भी फिर नही जम रहा है। विदग्धेति ॥ मानिनाहकारिणा अनेन रावणेन विदग्धलीलाः चतुरविला. सिन्य इत्यर्थः । तासामुचिताश्च ता दन्तपत्रिकाश्च कर्णभूषणानि । 'विलासिनी- विभ्रमदन्तपत्रिका' इति साधीयान्पाठः । अन्यथा विप्रकृष्टार्थप्रतीतिकत्वेन कष्टाख्यार्थ दोषापत्तेः । 'कष्ट तदर्थावगमो दूरायत्तो मवेत्' इति लक्षणात् । अत्र विलासिनीना या विभ्रमदन्तपत्रिका विभ्रमार्थानि | दन्तमयपत्राणि विभ्रमदन्तशब्दयोः षष्ठीसमासपर्यवसानातादर्थ्यला तासा विधित्सया विधातुमिच्छया । विपूर्वाद्दधातेः 'सनि मीमा- इत्यादिना प्रच इस् । 'सः सि' इति तकार । 'अत्र लोपोऽभ्यासस्य' इत्य- भ्यासलोपः । ततः स्त्रियाम्' इत्यनुवृत्तौ ' प्रत्ययात्' इत्यकारप्रत्यये टाप् ।

(११८ )
.
+
नूनं निश्चितं जातु कदाचिदपि । 'कदाचिज्जातु' 'इत्यमरः । उद्धतमुत्पाटितं
विनायकस्य गणेशस्येदं वैनायकम् एव विषाणं दन्तः । 'विषाणं पशुश ङ्ग
स्यात्क्रीडाद्विरददन्तयोः इति विश्वः। अद्यापि पुनर्न प्ररोहति न प्रादुर्भवति ।
प्रपूर्वात् 'रुह प्रादुर्भाव' इस्यस्माल्लट् । किमन्यदकार्यमस्येति भावः । एतदन्यथा
कथं गजाननस्यैकदन्तत्वमुत्प्रेक्ष्यते ननमिति ॥
व्याकरण-विदग्धलीलोचितदन्तपत्रिकाविधित्सया-लीलाः
सन्ति प्रासाम् इति लीलाः (लीला+अच् मत्वर्थे । विदग्धाश्च ता. लीलाश्चेति
विदग्धलीलाः ( कर्मधा०)। अथवा विदग्धाः लीलाः यासा ताः विदग्धलीला
(ब० बी०), तासाम् उचिता: वि-ताः (१० तत्पु.), तादृश्यः दन्तपत्रिकाः
वि-काः (कर्म) तासा विधित्सा (वि+या+सन्+अ भावे+स्त्रिया टाप्)
वि-त्सा (प० तत्पु०), तया ॥ मानिना-मानः अस्ति अस्य इति मानी
(मान+इनिः मत्वर्थे) तेन । वैनायकम्-विनयति विघ्नान् अपाकरोति इति
विनायकः (वि+नि+ण्वल कर्तरि) तस्य इदं वनायकम् (विनायक+मए)।
अलङ्कार-गणेश जी एकदन्त हैं । पर ऐसा क्यों है ? कवि को उत्प्रेक्षा है
"कि रावण ने आवश्यकता पड़ने पर जड़ से एक दांत उखाड लिया, अतः वह
भाज तक जमा नही । इस उत्प्रेक्षा का सूचक 'नूनम्' पद है।
भावार्थ:
बाथ - नूनं कदाचित् रावणः स्ववधूकर्णभूषणनिर्मिमित्सया गणेशस्या
एक दन्तम् उत्पाटितवान् येन तदाप्रभृति स देवः एकदन्त एव जातः॥
Na
निशान्तनारीपरिधानधूननस्फुटागसाप्यरुषु लोलचक्षुषः ।
प्रियेण तस्यानपराधबाधिताः प्रकम्पनेनानुचकम्पिरे सराः॥६१॥

( ११६ ) अन्वय--निशान्तनारीपरिधानधूननस्फुटागसा अपि ऊरुषु लोलचक्षुषः दस्य प्रियेण प्रकम्पनेन अनपराधबाधिताः सुराः अनुचकम्पिरे । अर्थ- अन्त पुर की रमणियो के वस्त्र उडा (खिसका ) देने का स्पष्ट अपराध करने पर भी उनके ( नग्न ) जघो पर सतृष्ण दृष्टि से देखने वाले उस रावण के प्रिय वायु ने निरपराध पीडित किए गए देवताओ पर अनुकम्पा टिप्पणी -भाव यह है कि यद्यपि वायु ने रावण के अन्तःपुर मे प्रवेश करके तथा उसकी रमणियों के जंघों पर से वस्त्र उडा कर उन्हे नगी कर देने का महान् अपराध किया, तथापि रुष्ट होने के बदले वह वायु से अत्यन्त प्रसन्न हुआ, क्योकि नंगी जांघों को देखने के लिए लालायित विलासी रावण की तृप्त हो गई। उसके पुरस्कार रूप में वायु ने निरपराध दण्ड दिए गए स्वजातियों देवों पर अनुकम्पा करके उन्हें दण्डमुक्त करा दिया। तृषित आँखें निशान्तेति ।। निशान्तं गहम् 'निशान्तं गृहशान्तयोः' इति विश्वः। तत्र या नार्यः । शुद्धान्तस्त्रियः इत्यर्थः । तासां परिधानान्यन्तरीयाणि । 'अन्तरोषो- पसव्यानपरिधानान्यधोऽशुके' इत्यमरः । तेषा ध ननं चालनम् । ध जो ण्यन्ताल्ल युट् । 'ध अ प्रोजोनु वक्तव्यः' इति नुक् । तेन स्फुटागसा व्यक्तापरावेनापि । अन्तःपुरद्रोहस्य महापराधत्वादिति भावः। ऊरुषु तासा सक्थिषु लोलचक्षुषः सतृष्णदृष्टेः। 'सक्थि क्लीबे पुमानरुः' इति, 'लोलश्चलसतृष्णयोः' इति चामरः । अतएव तस्य रावणस्य प्रियेण प्रमोदास्पदभूतेनाङ्गीकृतः । ग्लानिर्न दोषायेति न्यायादिति भावः। प्रकम्पनेन वायुना अनपराधेऽपराधाभावेऽपि बाधिताः । राजपुरुषैरिति शेषः । सुरा अनुचकम्पिरे । स्वयमुपायेनान्तः ( १२० ) अपराधः - प्रविश्यानपराधबाधातिवेदनेन मोचयता वायुनानुकम्पिता इत्यर्थः । एकस्य वैदग्ध्यावहवो जीवन्तीति भावः ।। व्याकरण-निशान्तनारीपरिधानधून नस्फुटागसा--निशान्ते (गृहे) नार्यः इति नि-यः (सुप्सुपा ) तासा परिधानानि (ष० तत्पु० ) तेषा ध नन (ष० तत्पु०) तेन स्फुटम् आगः यस्य सः निशा-स्फुटागा:(ब०वी०) तेन । लोलचक्ष षः-लोले चक्षुषी यस्य स लोलचक्षुः (ब० बी० ) तस्य ।। अनपराधबाधिता:--न अनपराध, (नन तत्पु०), अनपराधे बाधिताः अन-ताः ( सुपसुपा ) । अनुच कम्पिरे -अनु+कम्प+लिट् झ (इरे) कोष-निशान्त-निशान्तपस्त्यसदनं भवनागारमन्दिरम् । आगस्- पापाराधयोरागः इत्यमरः । प्रकम्पन-प्रकम्पनो महावातः इत्यमरः । भावार्थ-बनोऽन्तःपुरे सुन्दरीणा जघनस्थलात् वसनापसारणेन विलासिनः रावणस्य प्रियमाचरन् प्रसादरूपेण तस्मात् निरपराधपीडितान् देवान् मोचयामास ॥ तिरस्कृतस्तस्य जनाभिभाविना मुहुमहिम्ना महसां महीयसाम् । बभार बाप्पैद्वि गुणोकृत तनुस्तनूनपाद्धमवितानमाधिजैः ।।६२॥ अन्वय-तस्य महीयसा महसां जनाभिभाविना महिम्ना मुहुः तिरस्कृतः तनुः तनूनपात् प्राधिजैःवाष्पैः द्विगुणीकृतं धूमवितानं बभार ।। अर्थ-उस रावण के महान् तेज की लोकविजयी महिमा से बार बार पराभूत होने के कारण ही] कृश अग्निदेव अपनी मनोव्यथा से उत्पन्न निःश्वासो को ऊष्मा [भाप के कारण दुगुना धूपमण्डल धारण करते थे ।

( १२१ ) । टिप्पणी-भाव यह है कि तेजस्वी रावण के समक्ष अग्नि भी निस्तेज हो गए थे। अब वे तेजोराशि न रह कर केवल धुमसमूह रह गए थे। तिरस्कृत इति ।। किंच तस्य रावरणस्य जनाभिभाविना लोकतिरस्कारिणा महीयमामतिमहतां महसां तेजसा महिम्ना महत्त्वेन । 'पृथ्वादिभ्य इम निज्वा' इतीमनिच् । मुहुस्तिरस्कृतः अत एव तनुः कृशः । तनु न पातयति जाठररूपेण शरीरं धारयतीति तनूनपादग्निरिति स्वामी । 'नभ्राट-इत्यादिसूत्रेण निपात- नान्नको नलोपाभावः । प्राधिजेदुखोत्थैर्वाष्पैः निःश्वासोष्मभिः । 'बाष्पो नेजलोष्मणोः' 'पुस्याधिर्मानसी व्यथा' इति विश्वामरौ । द्वौ गुणावावृत्ती यस्य सद्विगुणः। ततश्च्विः। द्विगुणीकृत द्विरावृत्तम् । 'गुणस्त्वावृत्तिशब्दा- दिज्येन्द्रियामुख्यतन्तुषु' इति वैजयन्ती । धूमवितान ध ममण्डलं बभार । अग्नि- रपि तत्सनिधी निस्तेजस्को धमायमान मास्त इत्यर्थ, । ध म गुण्यासबन्धे संबन्धाभिधानादतिशयोक्तिः ॥ व्याकरण-तिरस्कृतः-तिरस्+कृ+त कर्मणि (गति तत्पु० )। जनाभिभाविना--जनीन् अभिभवति इति जनाभिभात्री (जन+अभि+भू+ रिणनिः) उप० तत्पु०, तेन ॥ महिम्ना=महतो भाव महिमा ( महत्+ इमनिच-"पृथ्वादिम्य इमनिच् बा" ५।१।१ २२ नियम से इमनिच् हुआ ), तेन ॥ महीयसाम् = अतिशयेन महान्ति इति महीयांसि ( महत्+ईयसुन् ), तेषाम् ॥ द्विगुणीकृतम्-दौ गुणौ यस्य तत् द्विगुणम् (बबी० । अद्विगुणं द्विगुण कृतम् इति द्विगुणीकृतम् (द्विगुण+कि++क्त कर्मणि) गतितत्पु०॥ तनूनपात्-न पातयति इति नपात् ( नन +पत्+रिण+क्विप् कर्तरि) नन तत्यु । तन्वाः नपात् इति तनूनपात् (प० तत्पु०)॥ आधिः- प्राधेः जायन्ते प्राधिजाः (प्राधि+जन् + ड कर्तरि भूते) (उप० तत्पु०), तैः॥ -- , कोषा-तनूनपात्-"कृपीटयोनिज्वलनो जातवेदास्तचूनपान"। अलंकार- यहां अग्नि को तेजोविहीन दुगुना ध मवितान मात्र कहा गया है, जो बात वास्तव मे उनमें नही है, अतः यह असम्बन्ध मे सम्बन्धरूप अतिशयोक्ति अलङ्कार का उदाहरण है । भावार्थ:-रावरणस्य अतिमहतां तेजसां लोकातिनेन महत्त्वेन भूयोभूयः भर्सितः अतएव कृश. अग्निः निर्विण्णः सन् स्वैनि:श्वासोष्मभिः द्विगुणं धूममण्डलं दधौ । इदमुक्त भवत्यनेन यत् पूर्व स्वलिङ्गभूतध मसमन्विततेजोरा- शिरूपोऽग्निः इदानी रावणतेजसः समक्षं निस्तेजस्कत्वात् ध ममात्रावशिष्टो विद्यते । परस्य मर्माविधमुज्झतां निजं द्विजिह्वलादोषमजिह्मगामिभिः । तमिद्धमाराधयितु सकर्णकैः कुलैन भेजे फणिनां भुजङ्गता ॥६३॥ अन्वय-इद्ध तम् पाराधयितु परस्य मर्माविषं निजं द्विजिह्वतादोषम् उज्झतां फणिनाम् अजिह्मगामिभिः सकके कुलैः धुजङ्गवा न भेजे ॥ -उस उन रावण को प्रसन्न करने के लिए सर्पो ने दूस के मर्मस्थल को भेदने वाले अपने दृष्टिविष दोष को छोड़कर, सीधी चाल चलकर तथा कर्णयुक्त होकर । अर्थात् आँखो से सुनने की आदत छोडकर ] सर्पता का परित्याग कर दिया ॥ ध्वन्यर्थ-एवं खलो ने भी दूसरो के रहस्यों को खोलने वाले अपने सूचकत्व दोष तथा छल-कपट को छोड़कर और निमन्त्रण में रहकर खलत्व का परित्याग कर दिया। परस्येति ॥ किंच इद्ध दीप्तम् । उनमित्यर्थः । 'इन्धी दीप्तौ कर्तरि क्तः । त रावरणमाराधयितु सेवितु परस्य स्वेतरस्य मर्माणि हृदयादिजीवस्थानानि प्रथ ( १२३ ) . कुलाचारव्रतानि च विध्यतेः क्विप् 'अहिज्या-'इति संप्रसारणम् । 'नहिवृति- इत्यादिना पूर्वस्य दीर्घः । तं मर्माविध निज स्वीयं द्विजिह्वतायां सर्पत्वे यो दोषो दृष्टि विषत्वादिस्तम् । अन्यत्र द्विजिह्वता पिशुनता । 'द्विजिह्वौ सर्पसूचकी' इत्यमरः । सेव दोषस्तमुज्झता त्यजता फरिणना संबन्धिभिरजिह्मगामिभिः करचरणादिमद्विग्रहधारित्वादृजुमतिभिः, अकपटचारिभिश्च । तथा कर्णाभ्यां सह वर्तन्त इति सकर्णकाः तैश्चक्षाश्रवस्त्वं विहाय । प्राविष्कृतकरित्यर्थः । तेन सहेति तुल्ययोगे' इति बहुव्रीहिः । 'शेषाद्विभाषा' इति कप् । अन्यत्र कर्णयति सर्व शृणोतीति कर्णको नियन्ता । कर्णयतेवुल् । ततः पूर्ववत्समासे सकर्णकः। सनियामकरित्यर्थः । फरिणनां साणा कुलवंगै जङ्गता सर्पता, विटत्वं च । 'भुजगो विटसर्पयोः' इति हलायुधः । न भेजे त्यक्तः । भुजैगच्छ- न्तीति भुजंगाः । गमेः सुपि 'खच् च डिद्वा वान्य.' । तस्मिन्नियन्तरि खलैः खलत्वमपि, सर्पत्वमपि विहाय । वेषभावक्रियाभिः सौम्यत्व श्रितमित्यर्थः । पत्र प्रस्तुतसर्पविशेषणसाम्यादप्रस्तुतखलव्यवहारप्रतीतेः समासोक्तिः ॥ व्याकरण-मर्माविधम् -मर्माणि विध्यति इति मर्मावित् ( मर्मन+ व्यध +क्विप् कतरि) उपपदतत्पु०। यहाँ 'अहिज्यावपिच्यधिवष्टिविचतिवृ- श्चतिपृच्छतिभृज्जतीनां डिति च ।। ६।१११६ ॥ अर्थात् 'उक्त धातुओं के मागे कित् भौर डित् प्रत्यय लगने पर संप्रसारण (य, व, र, ल के स्थान में इ, उ, ऋ, लू,) हो जाता है - इस नियम से विप के कित् प्रत्यय होने के कारण व्यध के य के स्थान मे इ होगा। फिर 'नहितिवृषिव्यधिरुचिसहितनिषु क्वौ ॥ ६॥३॥११६।। अर्थात् 'उक्त धातुप्रो के क्विबन्त रूपों के उत्तरपद होने पर पूर्व पद को दीर्घ हो जाता है, इस नियम से मर्म को दीर्घ होकर मर्मा हो जायगा। इस प्रकार 'मर्माविध्' पद बनेगा॥ द्विजिह्वतादोषम्द्व जिह्वे ( १२४ ) येषां ते द्विजिह्वाः, तेषां भावः द्विजिह्वता। सा एव दोष इति द्विजिह्वतादोषः (कर्मधा० ), तम् ॥ अजिह्मगामिनः-प्रजिह्म यथा तथा गच्छन्ति इति जिह्मगामिनः (अजिह्म+गम+णिनिः कर्तरि तारछील्ये), उपपद तत्पु०, तैः ॥ इद्धम् = इन्ध+क्त कर्तरि । सकणकैः = कर्णाभ्यां सहेति सकर्णका; सह-+कर+क समासान्त) तुल्ययोगबहुव्रीहिः सूचकपक्षे-कर्णयति शृणोति इति कर्णक (कर्ण+ण्वल) नियन्ता इत्यर्थः, तेन सह इति सकर्णका (तुल्ययोग बहुव्रीहिः) तैः॥ भजङ्गता = भुजेन कौटिल्येन गच्छति इति भुजङ्गः (भुज + गम् +खच् कर्तरि) उपपदतत्पु०, तस्य भाव भुजङ्गता ॥ अलकार-यहाँ प्रस्तुत सर्प के लिए कहे गए विशेषणो से अप्रस्तुत खल (सूचक) के व्यवहारो की प्रतीति होती है, अतः समासोक्ति अलंकार है । भावार्थ-रावणे शास्तरि तं तोषयितु सर्पाः परमर्मस्थलभेदिदृष्टि. विषत्वकुटिलगामित्वचक्षुःश्रवस्त्वादिरूप सर्पत्वं खलाश्च पररहस्यसूचकत्वकुटिल- गतित्वादिरूपं खलत्वं परित्यज्य सौम्यत्व श्रिता इति भावः । + तदीयमातङ्गघटाविघट्टितैः कटस्थलप्रोषितदानवारिभिः । गृहोत्तदिक्कैरपुनर्नितिभिश्चिराय याथाय मलम्भि दिग्गजैः ॥६५॥ अन्वय-तदीयमातङ्गघटाविघट्टितैः कटस्थलप्रोषितदानवारिभिः गृहीतदिक्कैः अपुनर्निवर्तिभिः दिग्गजेः चिराय याथार्थ्यम् मलम्भि । अर्थ-उसके हाथियों के दलो से घायल होने के कारण मजल (नीर) से विहीन गण्डस्थल वाले दिग्गजों ने (भागकर) दिशामो मे आश्रय लेकर तथा वहा से फिर न लौटकर चिरकाल के लिए 'दिग्गज' नाम सार्थक कर दिया। तदीयेति ।। तदीयमातङ्गाना घटाभिव्यू हैः विघट्टितैरभिहतैः । 'गजाना ( १२५ ) घटना घटा' इत्यमरः । अत एव कटस्थलेभ्यः प्रोषितान्यपगतानि दानवारीरिण येषां तैः । गृहीताः पलाय्य सश्रिता दिशो यैस्तैगृहीतदिक्कः। शेषाद्विभाषा' इति कप । अपुनर्निवर्तिभिर्भयात्तत्र व स्थितैर्दिग्गजः चिराय याथायं दिक्षु स्थिता गजा दिगजा इत्यनुगतार्थनामकत्वमलम्भि लब्धम् । लभयन्तात्कमरिण लुङ । विभाषा चिण्णमुलोः' इति विकल्पान्नुमागमः । व्याकरण"तदीयमातङ्गघटाविघट्टितैः-तदीयाः (तद्+छ) ये मातङ्गाः तदीयमातङ्गाः (कर्मधा०'), तेषां घटाः (१० त०), 'ताभिः विघट्टिताः (तृ० तत्पु), तैः।। कटस्थलप्राषितदानवारिभिः-प्रशस्तः केटः कटस्थलम् (नित्य कर्मधा०-'प्रश सावचनैश्च' नियम से 'स्थल' यहाँ नित्यस- मास मे प्रश सावाचक शब्द है -"मतल्लिकोद्धमिश्राः स्युः प्रकाण्डस्थलभित्तयः । हस्तपाशतटाः पादपालीमचर्चिकादयः ।") कटस्थलात् प्रोषितानि दानवारीरिण येषां ते कठ-वारयः ( ब० बी० ), तैः ।। गृहीतदिक्कैः-गृहोताः दिशः यैः ते गृहीतदिक्काः (गृहीतदिश +कप् समासान्त ) ब० वी०, तैः ।। अपुनर्निवार्तभिः-पुनः निवर्तन्ते इति पुनर्निवर्तिनः (उप० तत्पु०), न पुनर्निवर्तिन इति अपुन"नवर्तिनः (नन तत्पु०)। याथार्थ्यम-यथार्थस्य भावः याथार्थ्यम् ( यथार्थ+ यड्)॥ कोष - मातङ्ग-गजेऽपि नागमातङ्गौ' इत्यमरः । कट-'गजगण्डे कटीकटौ' इत्यमरः। दिग्गज-'ऐरावतः पुण्डरीको वामनः कुमदोऽञ्जनः । पुष्पदन्तः सार्वभौमः सुप्रतीकश्च दिग्गजाः ॥' इत्यमरः । भावार्थ-रावणस्य महाबलैगजैः पराभूताः ये गजाः दिगन्तानधिश्रित्य अद्यापि भयातङ्किताः तत्र व स्थिताः ततो न पुनरावर्तन्ते, त एव दिग्गजाः इति मन्वर्थ निगद्यन्ते ॥

( १२६ ) अभीक्ष्णमुष्णैरपि तस्य सोष्मणः सुरेन्द्रबन्दीश्वसितानिलैर्यथा । सचन्दनाम्भःकणकोमलैस्तथा वपुर्जलापवनैर्न निवौ ॥६५॥ अन्वय-सोष्मणः तस्य वपुः अभीक्ष्णम् उष्णः अपि सुरेन्द्रबन्दीश्वसिता- निलैः : यथा निर्ववौ, तथा सचन्दनाम्भःकरणकोमलैः जला पवनः न (निर्ववौ)। nama अर्थ -मदन-ज्वर से सन्तत उस रावण का शरीर देवराज इन्द्र की बन्दियो के अत्यन्त उष्ण निःश्वास से जैसा शान्त (सुखी) होता था, वैसा चन्दन-मिश्रित जल के कणो से सिञ्चित होने के कारण मृदुल ताड के पखो के वायु से (भी) नही। टिप्पणी-रावण देवराज इन्द्र की सुन्दरियो को बलात् बन्दी बनाकर जब उनसे अपने यहाँ पखा डुलाने आदि का कार्य लेता था तो सुरसुन्दरियाँ अपनी दुर्गति देख कर दुःख का उष्ण एव दीर्घ निःश्वास छोडती थी। रावरण को जो सुख इससे होता था, वह पखे के वायु से भी नहीं। अभीक्षणमिति ॥ ऊष्मणा स्मरज्वरेण सहितः सोष्मा तस्य सोमणस्तस्य रावणस्य वपुरभीक्ष्ण भृशमुष्णैरपि। शोकादिति भावः ! सुरेन्द्रस्य बन्धः बन्दीकृताः स्त्रियः तासां श्वसितानिलैनिःश्वासमारुतैर्यथा निवौ निवृतम् । 'निर्वाण निवृतौ मोक्षे' इति वैजयन्ती। तथा सचन्दनाम्भःकरणाः चन्दनोदक- विन्दुसहिताः ते च ते कोमला मृदुलाश्च तैर्जलाणा जलोक्षिततालवृन्तानां पवनैर्न निर्ववौ । 'धुवित्र तालवृन्त स्यादुत्क्षेपव्यजन च तत्' । 'जलेना जलार्दा स्यात्' इति वैजयन्ती। अत्र संतप्तस्योष्णोपचारान्निवृतिरिति कारण- विरुद्धकार्योत्पत्तिरूपो विषमालंकारः॥ व्याकरण-सुरेद्रबन्दीश्वसितानिलैः-सुरेन्द्रस्य बन्धः इति सुरेन्द्रबन्धः ( १२७ ) . (५० लसु०), तासा श्वसितानि (ष. तत्पु०), तेषाम् अनिलाः सुरे-निसा: (प० तत्पु.), तैः ॥ मचन्दनाम्भःकणकोमलैः-चन्दनेन सह सचन्दनम् (१० बी०), सचन्दनम् च तत् अम्भश्च (कर्मधा०), तस्य कणाः (प० त०), तः कोमला: (सुपसुपा) ॥ जलापवनैः-जलारणा पवनाः' (१० तत्पु०), निर्वौ -निर+वा+लिट तिप् (ल.)। कोष-अभीक्ष्णम् 'मुहुः पुनः पुनः शश्वदभीक्ष्णमसकृत् समा'-अमरः। बन्दी-'प्रग्रहोपनही बन्याम्' इत्यमरः । अलङ्कार-यहाँ 'सतप्त रावण को उष्णोपचारो (शीत नही ) से शान्ति मिलती है। इस प्रकार कारण के विरुद्ध कार्य को उत्पत्ति हो रही है। प्रतः विषमालङ्कार है। सर्वकषा। भावार्थ-स्मरज्वरततो रावरणः चन्दनजलादिशीतलीकृतव्यमनपचनेन तथा न शान्तिमाप यथा व्यजनचालने नियुक्ताना बन्दीना सुरेन्द्रसुन्दरीणां दीर्घदुःखनिःश्वासमारुतेन ॥ है तपेन वर्षाः शरदा हिमागमा वसन्तलक्ष्म्या शिशिरः समेत्य च प्रसूनक्लुप्ति धतः सदर्तवः पुरेऽस्य वास्तव्यकुटुम्बिता ययुः ॥६६॥ अन्वय-सदा प्रसूनकनृप्ति दधतः वर्षाः तपेन, हिमागमः शरदा, शिशिरः वसन्तलक्ष्म्या च समेत्य अस्य पुरे वास्तव्यकुटुम्बिता ययुः। अर्थ-ग्रीष्म के साथ वी, शरद् के साथ हेमन्त तथा शिशिर के साथ वसन्त मिल कर उस रावण की राजधानी में सदा कुसुमो की वृद्धि (सम्पत्ति) लिए हए साथ के रहने वाले कुटुम्बी-पडोसी-बन गए थे।

( १२८ ) टिप्पणी-माघ का यह श्लोक सदोष लगता है । ऋतुओं की रावण के पड़ोसी परिवारो के रूप मे जो कल्पना प्रस्तुत की गई है, उसका आधार उनके पति-पत्नी रूप की कल्पना तथा उनके आने से उत्पन्न फूलों के सन्तति- रूप की कल्पना ही है । पत्नी पति की अनुगामिनी होती है-इस भाव को लेकर ग्रीष्म के बाद आने वाली वर्षा तथा शिशिर के बाद प्राने वाले वसन्त की स्त्रीरूप मे कल्पना की गई है। इसमें 'वर्षा' शब्द का स्त्रीत्व तथा 'वसन्त' के साथ लक्ष्मी पद का योग सहायक हो गए है । पर इस क्रम का 'शरदा हिमागमः' में निर्वाह न होने से परिवार की कल्पना सम्यक् नही की जा सकती । इसके अतिरिक्त तपेन वर्षाः' की भांति 'शिशिरेण वसन्तलक्ष्मीः' न होने से भग्नप्रक्रम दोष भी है। तपेनेति ॥ सदा नित्य न तु यथाकाल प्रसूनक्लुप्ति कुसुमसंपत्तिम् । 'प्रसूनं कुसूमं सुमम्' इत्यमरः । दधतो धारयन्तः ऋतवो वर्षाः प्रावृट् तपेन ग्रीष्मेण । 'उष्ण उष्मागमस्तपः' इति, 'स्त्रियाँ प्रावृट् स्त्रिया भूम्नि वर्षा अथ शरत्स्त्रियाम्' इति चामरः। तथा हिमागमो हेमन्तः शरदा, तथा शिशिरो वसन्तलक्ष्भ्या च समेत्य मिथुनीभावेन मिलित्वा अस्य रावणस्य पुरे वसन्तीति वास्तव्याः वस्तारः । 'वसेस्तव्यत्कर्तरि णिच' इति तव्यत्प्रत्ययः । ते च कुटुम्बिनश्च तेषा भावं तत्ताम् प्रतिवासित्वमित्यर्थः । ययुः समेत्य ययरिति समुदायसमुदायिनोरभेदविवक्षया समानक कत्वम् । अत्र पुरे युगपत्सर्वतुसंबन्धा- भिधानादसंबन्धे संबन्धरूपातिशयोक्तिः ॥ de व्याकरण वर्षाः-स्त्रीलिङ्ग बहुवचन--"आपः सुमनसो वर्षा अप्सर- स्तिकतासमाः । एते स्त्रिया बहुत्वे स्युरेकत्वेऽत्युत्तरत्रयम् ॥" हिमागम- हिमम् आगमयति इति हिमागमः (हिम+पागम् + णिच् +अ कर्तरि ) ( १२६ ) उपादतत्पु० ॥ वास्तव्यकुटुम्बिताम-वसन्ति इति वास्तव्याः (वस्+रिणच +तव्यत् कर्तरि="वसेस्तव्यत् कर्तरि णिच्च" (वा) नियम से वस धातु से णिच् होकर फिर कर्ता अर्थ मे तव्यत् प्रत्यय हुआ।) वास्तव्याश्च ते कुटुम्बिन- श्च इति वास्तव्यकुटुम्बिनः (मधा०); तेषां भावः, ताम् ॥ अलङ्कार-यहां रावण के पुर मे एक साथ सभी ऋतुओ का रहना कहा गया है, अतः असम्बन्ध मे सम्बन्ध-कथन-रूप अतिशयोक्ति अलङ्कार है । भावार्थ-सवें ऋतवो रावणपुरे युगपदेव निवसन्तः तत्र प्रतितज्ञ प्रसूनवृद्धि चक्रुरति भावः। स चायमासन्न विनाशस्तुभ्यमपि द्रुग्ध्वा पुनस्त्वयैव हत इति युग्मेनाह- अमानवं जातमजं कुले मनोःप्राबिनं भाविनमन्तमात्मनः। मुमोच जानन्नपि जानकी न यः सदाभिमानकधनः हि मानिनः ॥६॥ 'अन्वय-प्रमानवम् अज (तथापि) मनोः कुले जात प्रभाविनं (भवन्तं ) आत्मनः भाविनं अन्तं जानन्नपि यः जानकी न मुमोच । मानिनः हि सदा अभिमानकधनाः । अर्थ -अमानव एवं अजन्मा तथापि मनुवंश में उत्पन्न, प्रभावशाली आप को अपना भावी हन्ता ( विनाशक) जानते हुए भी उसने जानकी जी को नही छोड़ा । मानियों का अभिमान ही सदा एकमात्र धन होता है। अमानवमिति ।। मनोरयं मानवः । 'तस्येदम्' इत्यप्रत्यये पर्यवसाना- ज्जावावेकवचनम् । अन्यथा मनोर्जातमित्येव स्यात् । अमानवममानुषम् । न जायत इत्यजम् । 'अन्येष्वपि दृश्यते' इति डप्रत्ययः । तथापि मनोः कुले जात है ( १३० ) रामस्वरूपेरणोत्पन्नमिति विरोधः। स चाभासस्वादलंकार इत्याह-प्रमा- विनमिति । महानुभावे तस्मिन्न कश्चिद्विरोध इति भावः । भाभीक्ष्ण्ये गिनिः । इनिर्वा मत्वर्थीयः । भवन्तमिति शेषः । आत्मनः स्वस्यान्तमत्यन्त करोतीत्यन्तम् । अन्तशब्दात् 'तत्करोति-'इति ण्यन्तात्पचाद्यच् । भाविन भविष्यन्तम् 'भविष्यति गम्यादय.'। जानन्तपि यो रावणः जनकस्यापत्य स्त्री जानकी सीता ता न मुमोच नामुञ्चदित्यन्क्या-1 जानतोऽप्यमोचने कारणमाह- मानिनः सदाप्राणात्ययेऽप्यभिमान एक मुख्य धन येषा ते । प्रारणात्ययेऽपि न मान मुञ्चन्तीत्यर्थः । कारणेन कार्यसमर्थनरूपोऽर्थान्तरन्यासः ।। व्याकरण-अमानवम्-न मानवः अमानवः (नम, तस्थु० ) तम् । अजम्-न जायते इति अजः (नत्र + जन् +डा कर्तरि भूते) उप० तत्पु०, तम् ।। प्रभाविनम्-प्रभावः अस्ति अस्य इति प्रभावी (प्रभाव+ इनिः मत्वर्थ ), तम् । यहाँ न कोण विकल्प से होता है "प्रातिपदिकान्तनुविभक्तिषु च ५१४१११" अभिमानकधना- अभिमानः एव एक धन येषा ते (बो०)। अलङ्कार-यहाँ 'प्रजम् मनोः कुले जातम्' मे विरोधाभास है, तया अन्न मे 'अभिकानकधना हि मानिनः' इस कारण से 'जानकी न मुमोच' आदि कार्य का समर्थन किया गया है, अतः, अर्थान्तरन्यास अलङ्कार है-“सामान्य विशेषभावकार्यकारणभावाभ्या निर्दिष्टप्रकृतसमर्थनमर्थान्तरन्यासः।" अलङ्कारसर्वस्व । भावार्थ-स एव रावणः ( वैवस्वत-) मनुवशे अवतीर्ण मानुषविग्रह- धारिणमपि साक्षात् प्रभविष्णु विष्णु रामरूप भवन्त स्वाभिहन्तार जाननपि बने भवत- पत्नी जानकीम् अपहृत्य पुनः आमरणं नार्पयत् ।

( १३१ ) *स्मरत्यदो दाशरथिर्भवन्भवानमु वनान्ताद्वनितापहारिणम् । पयोधिमाबद्धचलज्जलाविल विलय लव निकषा हनिष्यति ।। अन्वय-भवान् दाशरथिः भवन् वनान्तात् वनितापहारिणम् अमुम आबद्धचलज्जलाविलं पयोधि विलय लङ्का निकषा हनिष्यति । अदः स्मरति ? अर्थ-पापने दशरथपुत्र राम बनकर दण्डकारण्य से सीता जी को चुराने वाले उसे, बाँधे जाने के कारण चञ्चल अत एव गन्दे समुद्र को पार कर, लङ्का के समीप मारा था-स्मरण है न ? स्मरतीति ॥ भातीति भवान् । भातेर्डवतुः। दशरथस्यापत्य पुमान्दा- शरथिः । 'प्रत इन' इतीज प्रत्ययः । भवन् । रामः सनि त्यर्थः भवतेलटः शत्रा- देशः । वनान्ताद्दण्डकारण्यावनितापहारिण सीतापहर्तारममु रावरणम् । प्राबद्धः प्रक्षिप्ताद्रिभिर्वद्धसेतुः अतएव चलन्ति जलानि यस्य स च । अत एव माविलश्च प्राबद्धच लज्जलाविल पयोधि विलङ्घय लङ्का निकषा लङ्कासमीपे । 'समयानि- कषाशब्दौ सामीप्ये त्वव्यये मतौ' इति हलायुधः । 'अमितः परितः समयानिकषाहा- प्रतियोगेऽपि' इति द्वितीया । हनिष्यति अववीत् । अभिज्ञावचने लुट् इति भूते लुट् । अदो हनन भवान्स्मरतीति काकुः। प्रत्यभिजानासि किमित्यर्थः। शेपे- प्रथमः॥ ब्याकरण-दाशरथि:--दशरथस्य अपत्य पुमान् इति दाशरथि: ( दशरथ + इ )॥ वनितापहारिणम् - वनितामअपहृतवान् इति वनितापहारी (वनिता+अप+ह+णिनिःकर्तरि), । तम् ।। आबद्ध-चलज्जलाविलम्-चलन्ति जलानि यस्य स चलज्जलः (ब० बी०)। आबद्धश्च' चलज्जलश्य प्रा-ला ( कर्मधा०)। तादृशश्च प्राविलश्चेति तादृशश्च आविलश्चेति प्राबद्ध-लः (कर्मधा.), तम्।। and ।

( १३२ ) । लाम--निकका ( समीपार्थ अव्यय) के योम में लङ्काम् मे द्वितीय प्रयुक्त हुई है । इनिध्यति–हन्+ लृट् तिप् ( यहाँ 'मभिज्ञावचने लुट् ३।२।११२" अर्थात् जहा अतीत की स्मृति दिलाने वाला शब्द प्रयुक्त होता है, वहा भूतार्थ मे ही लुट् लकार का प्रयोग किया जाता है-' इस नियम से लुट् लकार का प्रयोग किया गया है। कोष-वनिता="वनिता जनितात्यर्थनुरागायां च योषिति" आविल- कलुषोउनच्छ प्राविल:-अमर । भावार्थ-तदा दशरथपुत्रत्वेनावती? भवान् वनमध्यात् दारांप-हारिणम् एन. पयोधी सेतु निर्माग्य तमुल्लध्य लाञ्चाक्रम्य युद्धे हतवान् इति कि स्मरति, अथोपपत्ति छलनापरोऽपरामवाप्य शैलूष इवैष भूमिकाम् । तिरोहितात्मा शिशुपालसज्ञया प्रतीयते संप्रति सोऽप्यस परैः ॥६६॥ अन्वय-अथ सप्रति छलनापरः एषः शैलूषः भूमिकाम् इव अपराम् उपपत्तिम् अवाप्य शिशुपालसंज्ञया तिरोहितात्मा सोऽपि परैः प्रसः प्रतीयते । अथ-इसके अनन्तर अब दूसरों को छलने मे तत्पर यह रावरण अन्य रूप धारण करने वाले नट की भांति दूसरा जन्म धारण करने एवं शिशुपाल नाम द्वारा पूर्वस्वरूप के छिप जाने से वही होने पर भी दूसरो को उससे भिन्न प्रतीत होता है। अथेति ॥ अथ राक्षसदेहत्यागानन्तरं संप्रति छलनापरः परप्रतारणापरः एवं रावणः शेलूषो नटः। तस्य भूमिका रूपान्तरमिव । “श लूषो नटभिल्लयोः' 'भूमिका रचनायां स्यान्मूय॑न्तरपरिग्रहे इति विश्वः । अपरामुपपत्तिम् । जन्मान्तर- मित्यर्थः । अवाप्य शिशुपालसंज्ञया तिरोहितात्मा । तिरोहितस्वरूपः सन् सोऽ " ( १३३ ) पि रावण एव स्न्नपि परितरैः स न भवतीत्यसः तस्मादन्य एव । 'नत्र' इति नन समासः । अत एव ऐतत्तदोः सुलोपो-' इत्यादिना न सुलोपः । प्रतीयते ज्ञायत इति प्रतिपूर्वांदिणः कर्मणि लट् । यथैक एव श लूषो रूपान्तरमास्थाय तद्दे- शभाषादिभिरन्य एव प्रतीयते तद्वदयमपि मानुषदेहपरिग्रहादन्य इव भाति । दौर्जन्य तु तदेवेत्यवश्य साहर्य इति भावः ।। ताम् ॥ छलनापर:- व्याकरणा-उपपत्तिम् --उप+पद्+क्तिन् भावे स्त्रियाम्, -छलना पर प्रधान यस्य सः छलनापरः ( ब०वी० ) अवाप्य- मव+प्राप् + ल्यप् ।। तिरोहितात्मा-निरोहितः आत्मा यस्य स तिरोहितात्मा (ब० वी० )॥ शिशुपाल सज्ञया - शिशुपाल इति सज्ञा शि-ज्ञा (कर्मधा०). तथा ॥ प्रतीयते--प्रति+इ+लट् त कर्मणि ।। असः-न सः असः ( नन - तत्पु०) न समास होने के कारण ही यहाँ तद् (स:) का विसर्ग (आगे हल वर्ण के रहते हुए भी ) लुप्त नही हुआ"तित्तदोः सुलोपो ऽकोरनन • समासेहलि ६।१।१३२ ॥ भावार्थ-यथा नटः रूपान्तरमाधाय अन्य इव प्रतीयते तथैव स रावण एव साम्प्रत शिशुपाल इति मनुष्यविग्रहमाधाय अन्य इव भासते ।। अथैतद्दौर्जन्य त्रिभिराविष्करोति- स बाल आमीद्वपुषा चतुभुजो मुखेन पूर्णेन्दुनिभस्त्रिलोचनः । युवा कराक्रान्त महीभृदुच्च कैरसशय सप्रति तेजसा रवि ॥७०॥ अन्वय-स बालः ( सन् ) वपुषा चतुर्भुज., मुखेन पूर्णेन्दुनिभः त्रिलोचनः आसीत् । सम्प्रति युवा (सन्) कराक्रान्तमहीभृत् उच्चकैः तेजसा असशय रविः (अस्ति)।

पर्वता वा) येन सः करा-भृत् (ब० वी ) ॥ तेजसा- यहाँ 'प्रकृत्यादिभ्य उपसङ्ख,यानम् नियम से तृतीया हुई है ।। अलङ्कार यहाँ 'कर' तथा महीभृतू' मे आए हुए श्लेष से अनुप्राणित 'यह निश्चय ( असमयम् ) रवि हो है' इस प्रकार का उत्प्रेक्षामलङ्कार है। फिर इस उत्प्रेक्षा अलंकार को 'पूर्णेन्दुनिभः' में प्रयुक्त उपमा के साथ 'संसृष्टि' भी है। भावार्थ-असौ शिशुपाल: बाल्ये त्रिभि!चनैः चतुर्भिभुजेरच युक्तः पूर्णचन्द्रसदृशाननः आसीत् सम्प्रति यौवने च धाम्ना साक्षात् रविरिव प्रतीयते । स्वयं विधाता सुरदैत्यरक्षसामनुग्रहावग्रहमोयंहच्छया दशाननादीनभिराद्धदेवतावितीर्णवीर्यातिशयान्हसत्यसौ १७९॥ अन्वय-पदृच्छया स्वय सुरदैत्यरक्षमाम् अनुप्रहावग्रहमोः विधाता असो अभिराद्धदेवतावितीर्णवीर्यातिशयान दशाननादीन् हसन्ति । अर्थ-स्वेच्छा से देवताओ, दैत्यों और राक्षसो पर स्वयं ही अनुग्रह (प्रसाद) एवं निग्रह ( दण्ड ) करने वाला यह शिशुपाल आराधित (शिवादि) देवों के द्वारा दिए गए महान् पराक्रम वाले रावण आदि का परिहास करता है। टिप्पणी--शिशुपाल रावण मादि अन्य ऐश्वर्यशाली राक्षसों का इसलिए परिहास करता है कि देवों और दानवों पर होने वाला उनका प्रमुख शिव आदि देवों से ही (तपस्या करने पर) प्राप्त हुआ था परन्तु उसका प्रभुत्व अपने ही सामर्थ्य के कारण था। स्वयमिति ।। यदृच्छया स्वयं सामर्थ्येन । न तु देवताप्रसादबलादिति भावः । सुरदैत्यरक्षसा देवदानक्यातुधानानामनुग्रहावग्रहयोः प्रसादनिग्रहयोर्विधाता T कर्ता असौ शिशुपालः अभिराद्धाभिराराधिताभिर्दवताभिरीश्वरादिभिर्विीरें दत्तो वीर्यातिशय प्रभावातिशयो येषा तान्दशाननादीन्हसति । अनन्यप्रसादल- ब्धैश्वर्यं मयि कथं याचकैस्तुल्यतेति गर्वाद्धसतीत्यर्थ ॥ व्याकरण-सुरदैत्यरक्षसाम्-दितेः अपत्यानि पुमासः दैत्याः (दिति + ण्य ) । सुराश्च दैत्याश्चरक्षांसि च सुरदैत्यरक्षासि ( द्वन्द्व ), तेषाम् ।। अनुग्रहाव- ग्रहयो:-अनुग्रहश्च ( अनु + ग्रह+अप भावे ) अवग्रहश्चेति, अनु- हौ (द्वन्द्व) तयोः ।। अभिराद्ध देवतावितीर्णवीर्यातिशयान्-अभिराद्धाः (अभि+राधु + क्त कर्मणि) देवताः, अ-ताः ( कर्मधा० )। ताभिः वितीर्णः, अभि--र्ण. (तृ० तत्पु०); अभिराद्धदेवतावितीर्णः वीर्यातिशयः येभ्यः ते अभि-याः (ब० ब्री), तान् ।। ५ भावर्थ-सर्वथा स्वच्छन्दस्य देवदानवराक्षसानपि अभिभवितुः मे पुरतः अन्यप्रसादाल्लब्धेश्वर्याणाम् दशाननादीना पूर्वेषा का पणनेति शिशुपालः सावहेल तान् हसतीव ॥ बलावलेपादधुनापि पूर्ववत्पबाध्यते तेन जगजिगीषुणा सतीव योषित्प्रकृतिः सुनिश्चला पुमांसमभ्यभ्येति भवान्तरेष्वपि ७२ । अन्वय-जिगीषुणा तेन बलावलेपात् अधुनापि पूर्ववत् जगत् प्रबाध्यते । सृती योषित् इव सुनिश्चला प्रकृतिः भवान्तरेष्वपि पुमासम् अभ्येति । अर्थ-विजयाभिलाषी यह शिशुपाल अपने पूर्व जन्मो की भांति इस जन्म मे भी जगत् को सन्ताप दे रहा है। सती स्त्री की भांति मनुष्य की सुस्थिर प्रकृति दूसरे जन्मो मे भी उसका अनुसरण करती है-उसे प्राप्त होती है । बलेति ॥ जिगीषणा। नित्योत्साहवतेत्यर्थः । तेन शिशुपालेन बलावले- पाद्वलगर्वादधुनापि पूर्ववत्पूर्वजन्मनीव जगत्प्रबाध्यते । तथा हिसती पतिव्रता ( १७ ) योषिदिव सुनिश्चलातिस्थिरा प्रकृतिः स्वभावो भवान्तरेषु जन्मान्तरेष्वपि पुमासमभ्येति । 'पति या नाभिचरति मनोवाक्कायसयता सा भतुलो कमाप्नोति सद्भिः साध्वीति चोच्यते ॥' इति मनुः । उपमोपमेयपुरस्कृतोऽर्थान्तरन्यासः ।। व्याकरण-बलावलेपात्-बलस्य अवलेपः (अव+लिप्+धन) ब-पः (१० तत्पु०) तस्मात् ॥ पूर्ववत्-यथा पूर्वयो : (हिरण्यकशिपुरावणजन्मनोः) इति पूर्ववत् (पूर्व+वति) यहा 'तत्रतस्येव' ५१११११६ 'वहां की भाँति' तथा 'उसकी भांति' इस अर्थ मे प्रातिपदिक (शब्द) से वति प्रत्यय हुआ । जिगीषुणा-- जेतुमिच्छु: जिगीषुः (जि+सन् +उ कर्तरि ), तेन ॥ भवान्तरेषु--अन्ये भवाः भवान्तराणि (मयूरव्यसकादि समास), तेषु ।। कोष-प्रकृति-'प्रकृतिगुणसाम्ये स्यादमात्यादिस्वभावयोः। योनौ लिङ्ग पौरवगे' इति मेदिनी ॥ भव-'जन्महरौ भवौ इत्यमरः । अलङ्कार-यहाँ पूर्व का उत्तर से समर्थन होने के. कारण अर्थान्तरन्यास अलकार है और इसकी पुष्टि 'सतीव योषित' में प्रयुक्त उपमा द्वारा की गई है। भावार्थ--यथा पूर्वयोः हिरण्यकशिपुरावणजन्मनो. जगत्पीडनम् अस्य स्वभाव आसीत् तथैव अस्मिन् शिशुपालजन्मन्यपि बलगर्वात् वर्तते । वस्तुतस्तु पतियता भायें व जनस्य प्रकृतिः जन्मान्तरेष्वपि तमनुयात्येव ।। तदेनमुल्लचितशासन विधेविधेहि कीनाशनिकेतनातिथिम् । शुभेतराचारविपवित्रमापदो निपातनीया हि सतामसाधवः ॥७३॥ अन्वेय - ततः विधे उल्लङ्घितशासनम् एन कीनाशनिकेतनातिथि विधेहि शु भेतराचारविपक्त्रिमापद असाधव सता निपातनीया हि । 4 ( १३८ ) अर्थः -अतएव विधाता की (भी) प्राज्ञा का उल्लघन करने वाले इस शिश पाल को यमपुरी का अतिथि बनाइए क्योकि (अपने) दुराचारो के फलस्वरूप प्राप्त हुई आपदाओ वाले दुर्जनो का विनाश तो सज्जनों को करना ही चाहिए। तदेनमिति ॥ तत्तस्माद्विधेर्विधातुररप्युल्सङ्घितशासनम् । स्वयं विधातेत्याधु क्तरीत्यातिकान्तदेवशासनमित्यर्थ: । सापेक्षत्वेऽपि गमकत्वात्समासः । एनं शिशुपाल कीनाशनिवेनातिथि कीनाशो यमस्तस्य निकेतनं गृह तत्रातिथि प्राघुणिक विधेहि कुरु । यमगृह प्रेषयेत्यर्थः । 'कीनाश. कर्षके क्षुद्रे कृतान्तो- पाश धातिनोः' इति विश्वः । न चैत्याधुरिणकहस्तेन सर्पमारणं भवादृशामवश्य- कर्तव्यत्वादित्याह-श भेतराचारेण दुराचारेण विपवित्रमाः परिपाकैन निवृत्ता. कालपरिपाकेन प्राप्ता आपदो येषां ते तघोक्ताः । डिवत: वित्रः' इति पचे मत्रमंम्नित्यम्' इति तद्धितो मम्प्रत्यय । असाघवो दुष्टा: सती भवाशां जगन्नियन्तृणां निपातनीया. वध्या हि न च नेण्यदोषः । स्वदोवेव तेषां विनाशे निमित्तमात्रत्वादस्माकमित्याशयेन शुभेवराचारेत्यादिविशेषणोक्तिः । सामान्येन विशेषसमर्थनरूपोऽर्थान्तरन्यासः॥ व्याकरण-उल्लवितशासनम् -उल्लङ्गितं ( उद्+जब+क्त करिण) शासनं येन स रल्ल-नः (ब० बी०), तम् । कोनाशनिकेतना- तिथिम् -को (कुत्सितार्थे अव्ययम् ) नाशयति इति कीनाशः यमः (की+नश +णि+)। तस्य निकेतनम् की-तनम् (१० तत्सु०)। सस्य अतिथि: कीना....."तिथि: (१० तत्पु०) तम् ॥ शुभेतराचारविपवित्र मापदः-शुभात् इतरः शुभेतर (सुपसुपा)। तादृश प्राचारः, अभे" चारः ( कर्मधा० ), तेन विपक्त्रिमा (वि+पच्+वि भावे+मम् - विशेष ( १३६ ) सर्वषा मे)| तादृश्यः मापदः येषा श भे" म-पदः (ब० द्रो.) ॥ सताम् - (मस +शतृ कतरि) सन्त , तेषाम् -यहाँ कृत्यानां कर्तरि वा २।२।७१ नियम से विकल्प से षष्ठी विभक्ति हुई है।)। कोष-कीनाश-कृतान्ते पुसि कीनाशः क्षुद्रकर्षकयोस्त्रिषु- इत्यमरः। अलङ्कार- यहाँ विशेष (शिशुपालवध ) का समर्थन सामान्य (सज्जन द्वारा असाधुवध होना चाहिए-इसके) द्वारा किया गया हैं अतः अर्थान्तरन्यास अलङ्कार है। भावार्थ-अतः अतिक्रान्तमर्याद दुष्टमेन शिशु पालं भवान् अवश्यं निपात- यतु यतः दुराचारिणः सद्भिः सदा दण्डनीया एव । हृदयमरिवधायादुदूढढिम धातु पुनः पुरदरस्य घनपुलकपुलोमजाकुचाग्रद्र,तपरिरम्भनिपीडनक्षमत्वम् ।।७४॥ अन्वय-परिवधोदयात उडधिम पुरन्दरस्य हृदयं पुनः धनपुलकपुलो- मजाकुचाग्रद्रु तपरिरम्भनिपीडनक्षमत्वम् दधातु । अर्थ-शत्रु के नाश से हड़ीभूत इन्द्र का वक्षस्थल फिर से अत्यन्त पुलकित इन्द्राणी के स्तनों के गाढालिङ्गन को पीटा को सहने योग्य बन जाय। हृदयमिति ॥ अरिवषोदयाद्रिपुनाशलाभात् । उढद्रढिम नैश्चिन्त्यार- तदायम् । स्वस्थमितियावत् । पृथ्वादित्वादृढशब्दादिमनिच्प्रत्ययः 'र ऋतो हलादेलंघोः' इति कारस्य रेफादेशः। पुरः शत्रुपुराणि दारयतीति पुरदर इन्द्रः। 'पू:सर्वयोर्दारिसहोः' इति खच्प्रययः 'खचिहस्वः' इत्युपचाइस्वः। 'वाचंयमपुरंदरी च' इति निपातनादनन्तत्व मुमामगम्श्च तस्य हृदयं पुनभूयोऽपि ।

Shishupal Badh Mahakavaya

Author
Dr Adaya Prasad Mishra
Title
Shishupal Badh Mahakavaya
File name
Shishupal Badh Mahakavaya
Text
OCR done
Citation
1969
Published
25.06.06
Publisher
Bhatt Sanskrit Sahataya Bhandar Uni Road Alld
Language
Sanskrit
Pages
151
Library
Allahabad University
Classification
Literature(sanskrit)
DLI number
485395
Barcode
5990010098444.00
Scanning centre
IIIT, Allahabad
VMLT id
Pecnd6YRHGt
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