Shri Abhaya Jain Granthalaya, Bikaner
Tatvarth Sutra Saral Padm Rupantkar
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- निवेदन "आरमा को मुक्ति का या उपाय है ?" यह एक विश्वव्यापी तथा सनातन प्रश्न है । ससार के नाशवान सुख-दुसी की उपेक्षा निर्वाध तथा मनात सुख को सोज में मानमारमा सदैव से भटकती रही है। इस गसार में भी किस प्रकार मधिकाधिक सुमति पूर्वक जीवन व्यतीत किया जा सकता है यह प्रश्न भी साथ ही मलान है। जैन दर्गन मे उक्त प्रश्नों का उत्तर बरे विस्तार तथा वैज्ञानिक रूप से दिया गया है। नागम के बहन महार में इन्ही प्रश्नो का उत्तर भरा पड़ा है । उमी यूहन शान समुद्र या सार आचार्य श्रीमद् उमास्वामी (समय दूसरी मताब्दी) ने तत्वार्थ सूत्र' में गागर में सागर के समान में भी दिया है। इसी कारण इसे मोक्ष शास्त्र भी कहते हैं । इसके प्रथम मूत्र 'सम्यग्दर्शनशानचारित्राणिमोक्षमागं.' में ही मोक्ष का मार्ग दर्शाया गया है । अर्थात सम्यक दर्शन, सम्यक ज्ञान और सम्यक चारित्र मिल कर ही मोक्ष के मार्ग हैं। दूसरे मूत्र मे बताया गया है कि तत्वो का प्रदान ही सम्यक दर्शन है। चौये मूत्र में जीव, अमीर, पासव, वध, सवर, निर्जरा और मोध इन सात तत्वों का निर्देश है । प्रप के दस अध्यायो के ३५७ सूत्रो मे इन्ही सात तत्वों का प्रमगः विस्तृत वर्णन है । प्रथम चार अभ्यायो मे जीव तत्व का, पांचवें अध्याय में अजीव तत्व या, एठे और मानवे अध्याय में यात्रव तत्व का, आठवे अध्याय मे बघ तत्व का, नये अध्याय में रावर और निर्जरा तत्व का तथा दसवे अध्याय में मोक्ष तत्व का वर्णन है। जिस प्रकार वैद, वाइबिल तथा कुरान यादि अन्य धर्मों के प्रमुख प्रथ हैं उसी प्रकार 'तस्वार्थ गूत्र' भी जैन साहित्य का प्रमुख पूज्य प्राय है। जैन धर्मावलम्बियो के दोनो सम्प्रदायों में इम ग्रन्थ की समान रूप में मान्यता तथा आदर है। दोनो सम्प्रदायो के मान्य आचार्यों ने इस पर महत्वपूर्ण टीकाएं लिखी हैं । सस्कृत भाषा में होने के कारण हर व्यक्ति उनको समझ नहीं पाता। हिन्दी गद्य
में भी इसकी अनेक टी. farm
बटय होता है। सथा सार
। तथा जर मी मान्द :
4 गय में नहीं भा पाना 04
पाट करने के उपरान fatta
राने का एक विशिष्ट आनन्द
मार हिन्दी में पद्य उधरपा ५4 sitenam
afमायोपादा:
स्वायं मूत्र के सूत्रों को स} Hit Me
भावग १ हु। मंग 15 mins It is
शानी का महामना गया 11tni
बायाम किया है। nि ant!
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प्रगुत्र को माया
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तातार्श सत पिपप गूची और शार रामप्यार . fuरे स्वामी १ निमितानमामी" सम्बदनापान मन मानकर 11 मदारी २रीमपिता रममा १२ निसार ३ मतियानमा सालि जनमाने पार बम प (पट अदुपोष) ४ मन पारि गजानने के अपमानाविषय ५ माय तिने माल गर है मान ४ श्रीमान पोत पाप हान हो मानगो मार माहित करने है इस पानों में मरभर मश्विानरामानर मारहान किमी उत्पत्र होता है भविमान मराह मारिशानो के २र जीवपरिभाव या पिकविण इन मारे माह आदि में अलर मौरमिकमारकर १८ जान माह किम नहीं होगा शायिक मार कर भेद १९ थामान भेद मिश्र भाव १८ भेद प ७ मरामपाय . REETसभेत १ । गोarin TRATHITी. २१ in 77 nr r . #t'मन ग RT ART fritt 7 41 77!! गवार २३ - प्रा" TTIRT -- . पो प्रामा . भीमप्रगान । . . भ . । T .4 ग . 1 . - - . . . . , . . . * . # 4 I . . . - . 44 .
१२ . first 1 १.५ मनास: गोry Jerrani irtiaries r more Inान famirary Rana RTETTER 4. पारस पाहै 71 17 Tangrit ॐTTER समसपर मायु fotीपीfin जो भाका Airf-Tोरे में: मोकामन पानी परिपार को कोपा बन गोधर्मनगमायु १८. स्वामी माणु सीमा मानिसको मारमा गासयोगमायु काबीजन्य नया टायु १ wnदेकों की भाग मिया ४. मि गई वन में सरकार ।
भनिधिसभागामापार प्रोपरापर जमा की गुमाया ससपना तिचार ११५ कोकोपापानिया दानवासान ११६ दान के पन में विशेषता मामाय ११४ -- ९१९ गुप्ति का माण मवरमा सण पाठ्यो अध्याय अध के कारण मवा के कारण 1१७ 4पा स्वरूप ११९ मवराप्रमुधारण बध के भेद मूल प्रति बध के भेद १२. समिति के भेद आठो कर्मों वी उत्तर प्रातियों १२१ समिति और मुस्ति में अन्ता शानावरण कर्म के ५ भेद १२१ दम धर्म रानावरण कर्म के ९ भेद १२१/ बारह अनुदा (भावना) वेदनीय वमके २ भेद १२२ । परोपह सहने का उद्देश्य मोहनीय यम के २८ भेद १२३ | परोपही के २२ स्वरूप मायु कर्म के ४ भेद १२५ । विभिन्न गुणस्थानो मे परिषह १४२ नाम कर्म का ४२ प्रकृतियाँ १२५ किस कर्मोदय से कौन परिपह गोत्र धर्म के २ भेद एक साथ अधिकतम परिवह भन्तराम कर्म के ५ भेद १२९ । पारिन के भेद जमों की उत्कृष्ट स्थिति ११ बाह्य तप के ६ भेट समोसी जघन्य स्थिति वायलेश तथा परियह मे अतर १४१ यनुमय बध कायन अम्यतर तप के भेद बम के ममान फन १३२ अभ्यतर तपा के उपभेद फलोषरातकर्म निजरा प्रायश्चित के ९ भेद १४ बीमारा लक्षण पृषकच वित एरव विध विनयर बचावाय तप के १ भेट स्वाध्याय सपके ५ भेट पुरमर्ग (साग) के २ भेद त्याग, परिग्रह त्याग तथा पुरमर्ग में मगर प्पानावर ध्यान के ४भेद १५८ १२. | मूक्ष्म किया प्रतिपति १५८ मुपगत किया नियति मम्मदृष्टियों के असमान निजरा १५९ निर्पयो भेद १५१ पुनाक आदि मुनियों को अन्य विशेषताए भातं ध्यान के भेद मा ध्यान केधारक रोम्यान व रोड ध्यान धारक धर्म प्याना स्वरूप मुक्न ध्यान के स्वामी गुस्न ध्यान के भेद गुमान ध्यानश मालम्बन मादिक २ शुक्ल ध्यानो का विशेष कयन मायनबायपवाद वितर्क का समय बस मध्याय देवल जान कब होता है मोश सलक्षण और कारण कोपी निराका कम मुम्भावस्था मे शेप शायिक भार १६५ मुक्त जीवनीवं गति उध्वंगति का कारण मुक्न जीव सो मन्त्र ताही १५६ यो जाता है १५६ मुक्त गीयों में परम्पर १५७ भेद म्यवहारमा विशार START "चौतीसी स्तुति" (रपिता : मन्दकिशोर जैन, एम० ए.) तीर्थकर पौगीम हमारे गुधि गिनती गर पाना सारे ॥ माति, अजित सभर अभिनन्दन, गुमति, परमप्रभु. करलो वन । यो गुपा, पन्दा प्रभु प्यार ।। तीर्थंकर • ॥ पुष्पदन. शीतल, मुगारी, प्रभु. थंयाग की शोभा प्यारी । दुखियो के गब कष्ट निवारे ॥ तीर्थकर • ॥ बारा पूज्य, पुनि विमन, अन ना, धर्म, शान्ति, सोहे भगवता । भाए हैं हा शरण तिहारे ॥ तीर्थकर • ॥ कुथनाय जी, यरह यशस्वी, मल्लिनाय से महत तपस्वी । जिन तप कर अप सारे जारे। तीयंकर ॥ मुनिमुवन, ममिनाथ हमारे, नेमिनाथ जी राजुल मौर क तप हेतु सिधारे ॥ तीर्थकर • ॥ पार्वनाथ की छवि अति न्यारी, शेषनाग करते रखबारी। की आँखो के तारे ॥ तीर्थकर.॥ महावीर का यश अति भारी, वालपने जिन दीक्षा निशला मो, सिद्धार्थ दुलारे ॥ तीर्थकर ॥ भक्ति भाव से जो नित ध्यावे, आवागमन मिटाये। गयो नहिं नर-भव जनम मुधारे ॥ तीर्थकर.॥ प्यारे। धारी। BAYMAXAMET ALANKEN
तत्वार्थ सूत्र
मंगलाचरण
1:-मोक्षमार्गस्य नेतार भगार पर
माधार विचनावान व
--
पा.- फर्म रूप पयंत :
मोक्ष मार्ग पुनि रिसर
पिश्य सत्य :
की
Tamitun 12t
REET को लान ।
पुति Tum MR नान॥
AMIT in बार।
अपमि मो मार्गको पात्र 11211
-
सम्पारन Rem -
मृग ~ नयाधमान गम्यमानम् ॥
पातु स्यमाय फहा तत्याय ।
उसको मधिजन जाने साथ।
ता पर होय अटस थद्धान।
सम्यक दर्शन सो ही मान ॥२॥
सम्पग्दर्शन को उतात्ति के भेद
भूल :- तमिराविधिगमा ॥३||
भाषा :-- उपजे घोहि प्रकार विशेष ।
निज स्वभाव अरु पर उपदेश।
निजहि स्वभाव 'निसर्गम' कहा ।
नाम 'अधिगमन' दूजा सहा ॥३॥
तत्वो के नाम :-
मूल :- जीवाजीवानव-यघ-मवर-निर्जरा-मोक्षास्तत्वम् ।।४।।
भाषा :- सात तत्व हैं-'जीव', 'अजीव' ।
'आश्रय', 'बंध जगत की नीव ।।
पचम 'संवर' पुनि 'निर्जरा'।
सप्तम 'मोक्ष' महा सुख मरा ॥४॥
निक्षेपी के प्रकार -
मूल :- नाम स्थापना द्रव्य भावतम्तन्यास ॥५॥
भापा: लोक काज हित विन गुणसार ।
नाम निक्षेपण चार प्रकार ॥
'नाम', 'स्थापना', 'द्रव्य निक्षेप।
सपर्याय 'भाव' निक्षेप ॥५॥
५३ सूत्र का भावार्थ :-
सो चारी अब लीजे जान । जा सो ही सबकी पहिधान ॥
'नाम'-वीर रख दीजे कोय । आवश्यक नहिं गुण सो होय ।।
दो प्रकार 'थापना' बताए । 'तदाकार'जिन मूति सुहाए॥
घोड़े, हाथी, ऊँट विचार । शतरज हिं के 'अतदाकार।
जिस पत्थर से प्रतिमा होय । कह दीजे यदि प्रतिमा सोय ॥
शक्ति परिणमन की बतलाए । सोही 'द्रव्य' निक्षेप कहाए।
जंसा हो तस करहि बखान । इन्द्र रहे इन्द्रहि गुणसान ।।
वर्तमान कहिए । पर्याय । सो ही 'भाव' निक्षेप कहाए ॥५॥
. -- Rोजाना 1JIT बमानमा भाग जीय-गीय पारग जोय । इनका mm करा योम ॥ सरल वस्तु का गाग 'प्रमाण। एक देश 'ग' सीजे गान ॥६॥ जाय आदि सम्वाको जानने अन्य गलाय माय :-- मूल -निदेश-स्वामित्व-गाधनाधिकरण रियनि-विधानत || भाषा :-पट अनुयोग महायक जान । पूर्ण यातु पतु फा होये फा होये भान सत.श्रद्धान कहा निर्देश । अर स्वामित्व' न संशय लेश ।। तीजा साधन' पुनि अधिकरण'। "स्थिति' हो हे पंचम चरण ॥ पष्ट विधान' कहावे वही । भेद-प्रमेद बतावे सही ॥७॥ ७ वें मूत्र का भावार्थ :-- अधिकारी 'स्वामित्व' बताए । सम्यकदर्शन जीव लहाए । उत्पत्ति हि कारण बतलाए । सो 'साधन' अनुयोग कहाए । ''अधिकरण' वस्तु आधार । 'स्थिति' कहिए काल विचार १७॥
जीवादि को जानने के कुछ और सहायक उपाय :-
मूलः-सत्मत्या-क्षेत्र-स्पर्शन कालान्तर-भावाल्पबहुवंश्च ।।।
भाषा :-सत', 'संख्या' अरु क्षेत्र विचार ।
'स्पर्शन', 'काल' भेद उरधार ॥
'अन्तर', 'माव' आदि अनुयोग ।
'अल्पबहुत्व' सु अप्ट प्रयोग ।।८।।
८ ३ सूत्र की प्यारया-
'सत' है जो मस्तित्व बताए । 'सत्या' गिनती भेद यहाए ।
मिले जहाँ सो क्षेत्र' यखान । 'स्पर्शन' विचरण क्षेत्रहि जान ।।
'काल'-समय जानें सब कोय । विरह काल ही 'अन्तर' होय ॥
एक दशा तज दूजी लहै । पुनि पहली मे आकर रहे ।।
यौपशमिक आदिक अय 'भाव' । तुलना 'अल्पवहुत्व' बनाव ।।।
-
ज्ञान के भेद :-
मूल.-मति-श्रुतावधि-मनःपर्यय-केवलानि ज्ञानम् ।।९।।
भाषा :-ज्ञान कहे आगम में पंछ ।
'मति', 'श्रुत','अवधि' न संशय रंच ॥
चौथा 'मन पर्यय' ही कहा ।
पंचम केवल
जिनवर लहा ॥६
TTPla, ग"-"म भारा सोही पंग माल परगा। दन्त्रिप शान गराय जान ॥ माम यस्तु हो या अति दूर। इन्द्रिय हिम जाने भरपूर ।।१०।। पूर्वोतवाची मानो म भ - मूत-प्राय परोक्षम ॥ ११ ॥ प्रत्यक्षमन्यत ।। १२ ।। भापा - पर वश उपजे सो ही मान । दो परोक्ष हैं मति,श्रुत मान ।।११॥ अवधि आदि प्रम अतिम जोय । हैं प्रत्यक्ष कहावें सोय ॥१२॥ - ११ व व १२ वे मूत्र का भावार्थ- इन्द्रिय, मन, उपदेश सहाय । परवश सोइ परोक्ष काय ॥११॥ अक्ष नाम मातम का मान । ता सोही प्रत्यक्ष यवान ।। - इन्द्रिय आदि सहाय न होय । आतम से ही उपगे सोय ॥१२॥ k । [ ७ ॥ मतिमान फनामानर :- मूलः-मतिः स्मृतिः समा चिन्ताभिनिरोप इत्यार्थान्तरम।।१३।। नापा:-पुनि नामान्तर है मतिज्ञान । 'मति', 'स्मृति', 'संजा', 'चिन्ता' मान ।। साधन करे साध्य अनुमान । पंचम अमिनियोध' सो जान ॥१३॥ १३ ये मूत्र वा भावार्थ- इन्द्रिय मनहि अवग्रह होय । रूप ग्रहण 'मति' पाहिए मोय ।। याद पुरानी 'स्मृति' यही । जव तय मन मे आये सही ॥ पूर्व वस्तु से पारहि मिलान । जोड प सो 'समा' जान ।। घुमदेस पर अग्नि हि मान । तर सोइ चिन्ता करि जाना॥१३॥ मतिमान किससे उत्पन्न होता है मूल :- तदिन्द्रियानिन्द्रिय-निमितम ॥१४॥ भाषा :--पंचेन्द्रिय मह मन के मिले। मतिज्ञान मातम में खिले ॥१४॥ मनिमान के भेद मूल :--अवग्रहेहावाय धारणा. ॥१५॥ भाषा :- 'अवग्रह', 'ईहा' और 'अवाय'। भेद 'धारणा' सहित बताय ॥१५॥ १५. वें मूत्र की व्याया- सन्द्रिय दर्शन पहले मान । तत्क्षण होय 'अवग्रह जान ।। इच्छा हवि ज्ञान विशेष । 'हा' सोइ अनिश्चय लेश ।। दोक वस्तु का निर्णय होय । भेद 'अवाय' कहावे सोय ॥ अविस्मरण 'पारणा' वहाय । मतिज्ञान चव भेद बताय ।।१५।।
जोfan fry ताके गुण र दो m || याहा कमी यह मेर। 'म afar'गुजाण ॥२०॥ २. 47 मार्ग बागमाराम गणराग 4 बनाया गया | मग पनि प्रापार गीगाभार॥२०॥ - - - भव प्रत्यय धिमानवमी मूल भय प्रत्ययोधिदेवनारयाणाम् ॥२१॥ भापा अयपिज्ञान दो भेद बताए । प्रयम-सो भय प्रत्यय' कहलाए । देय नारकीयों को भय ही कारण कहिए सोय ॥२१॥ २१ वे मूत्र का भावार्थ :- आयु, नाम कर्मज पर्याय । आगम में शो भव कहलाए । - देव, नारकी जन्में जीप । अवधिमान जन्महि रो होय ॥२१॥ होय ।
सापोरननिमितर अधिमान थेम्मामी:- मूल :-अयोपामानिमित्तः पविषम पाणाम् ॥२२॥ मापा: •है द्वितीय क्षयोपशमनिमित'। पट प्रकार मुनिय पर चित्त । यह मनुष्य तियंचन होय । 'गुण प्रत्यय' भी फहिए सोय ॥२२॥ २२ में मूत्र का भावार्थ :- भय उपगम पारण हि प्रधान । भय नहि, मो गुण प्रत्यय जाना। ग्वामि जीव सँग जाये जोए । 'अनुगामी' ही काहिए सोए ।। मग साय नहि जीवहिं जाय । साह 'अननुगामी' नहलाए ।। परिणामहि विमुद्धि कम जान । 'वर्धमान नित प्रति तो मान ।। पारण मलेशित परिणाम । 'दीयमान' घट आठो याम । घटा बिन जी एस ममान । ताहि 'अवस्थित' बहते जान ।। आमें जब सब घट बढ़ होय । अवधिमान 'अनवस्थित सोय।।२२।। मनः पर्ययान के भेद :- मून :- जु-विपुलमती मनः पयः ॥२३॥ भाषा:-मन पर्यय के भी दो फाम । "जुमति' और 'विपुलमति' नाम ॥२३॥ २३ वें मूत्र वा भावार्थ :- सरल रूप में पर मन जोय । शान ताहि का 'जुमतिहोय ॥ सरल, जटिल सयही का मान । ता का नाम 'विपुलमति' जाना . " trail - " + . . - " - 4 7 मा बनाए। प्रथम - Am" देश मारपीका मरmlinाय ॥२१॥ २१व मुरमा प. नाम कर्म TRI HITRI 17॥ द, नामी ...!
सपशमनिमिता अवधिमान, स्वामी:- मुग:-क्षयोपानिमितः पवित्रायः पाणाम् ॥२२॥ भाषा :-है द्वितीय सयोपामनिमित' । पर प्रकार सुनिय पर चित्त ॥ यह मनुष्य तियंचन होय । 'गुण प्रत्यप' नी पहिए सोय ॥२२॥ २२ व मूत्र का भावार्थ :- क्षय नागम कारण हि प्रपान । भव नहि, सो गुण प्ररपय जाना। म्यामि जीव मग जाये जोए । 'अनुगामी' ही माहिए सोए ।। गंग साप नहि जीवहि जाप । द 'अननुगामी पहनाए । परिणामहि विशुद्धि वा जान । 'अमान' नित प्रनि सो मान ।। पारण गल्लेगित परिणाम । 'होयमान' घट आटो याम || घट-बद बिन जो एक समान । ताहि 'अवरियत' बहने जान ।। जामें जब तब घट बढ़ होय । अबधिमान 'अनास्थित सोय।।२२॥ मनः पर्ययमान के भेद :- मूल :- ऋतु विपुलमती मनः पर्ययः ॥२३॥ भाषा:-मन पर्यय के भी दो काम । "अनुमति' और 'विपुलमति' नाम ॥२३॥ २३ देंगूत्र का भारार्थ :- गरल म्प में पर मन जोय । भान ताहि पा 'जुमति' होय ।। मरस, जटिल सबही पा मान । ता का नाम 'विपुलमति' नाना२३)
12tuft
4 - Fagan I fit ॥२४॥
बोगों को nि।
प्रथम fr:'रांगाश।
गान आवरण एटो गई।
शनिपात' सो संयम पड़े ॥२४॥
अअधिमान और मन पर्यय भार मे अनर
-
मुल -विशुद्धि-स्वामि मियोवधि-मन पर्ययोः ॥२५॥
भाषा
अधि और मन पर्यय ज्ञान ।
चार अपेक्षा अंतर जान॥
प्रथम विशुद्धि', 'क्षेत्र' पुनि कहा।
'स्वामी', 'विषय' भेद का रहा ॥२॥
२५ वे सूत्र का भावार्य :-
भूमाने में अन्तर मान । आगम ताहि विशुद्धि' वसान ।।
'क्षेत्र' होय अन्तर स्थान । 'स्वामी' सो किनकी हो जान ।
सैनी पचेन्द्रिय गति चार । तिनके अवपित्रान चितधार"
कर्म भूमि के मानव मान । कुछ में ही मन पर्यय ज्ञान !!
मान कौन वस्तू का होय । "विषय' भेद ही कहिए सोय ॥२५॥
नय के भेद :- . मूल :- नंगम-समहव्यवहार-जुमूत्रशब्द-ममभिस्तवभूतानया::३३॥ भाषा :- 'नगम', 'संग्रह', अरु 'व्यवहार' । नय आगम में विधिध प्रकार ॥ 'समभिरुढ़', 'प्राजु सूत्र व शब्द । 'एवं मूत' सप्त उपलब्ध ॥३३॥ ३३ वें मूत्र का भावार्थ :- हर पदार्थ में धर्म अनेक । शान नयों से हो प्रत्येक ।। भूत, भविष्यति जो पर्याय । वर्तमान में सो बतलाय ।। रखकर इंधन, पानी, धान । हे पकाता भोजन पान ।। आगे जो है बनना मान ! पूर्ण रूप दे 'नंगम' जान ।। एक पहे पूरा समुदाय । या उसकी विभिन्न पर्याय ।। ट्रय बहे मब ट्रट्यहि जान । सैन्य कहे कुल सैन्य वखान ।। सग्रह रूप शान मे आए । सोही 'संग्रह' नय महलाए। संग्रह वा नहि पूर्ण विचार । भेद-प्रभेद करे 'व्यवहार' । भूत, भविष्यत को तज देय । वर्तमान पायहिं लेप ।। एक समय इक ही पर्याय । मनुष्यायुपर्यन्त कहाए । प्रहण दृश्य पर्यापहि जान । सो नय ही 'ऋजुमूत्र' बखान ।। संख्या, लिंग आदि भ्यभिचार दूर 'शब्द' से हो चितधार ॥ त्रिया, पुरुष, कालादिक भेद । से अर्थों में होय प्रभेद ॥ - अर्थ भेद हो बिन व्यभिचार । एक वस्तु में कई प्रकार ।।
एर माय कितने मान होगाते है
मन :- एकादीनि माग्यानि युगपरेकम्मिमा चतुभ्यः ।।३०
भापा
ज्ञान जीव में निम्न प्रकार ।
एक होय या क्रमशः धार।
एक होय तब फेवल ज्ञान ।
दो सँग हों बस मति श्रुत जान ।
तीन होय मति श्रुत संग लेख ।
अवधि, मन: पर्यय में एक ॥
चार साथ हों 'केवल' छोड़।
और
न कोई नूतन जोड़ ॥३०॥
तीन मिथ्याज्ञान -
मूल : मति-श्रुतावधयो विपर्ययश्च ॥३१॥
भापा - मति, श्रुत, अवधि विपर्यय सहित ।
तीन ज्ञान करते हैं अहिंत ॥
कुमति, फुश्रुत आदिक प्रय नाम ।
अहित रूप हो तिनके काम ॥३१॥
मिथ्याज्ञान किस प्रकार अहित करते है :-
मूल :-- सदसतोरविशेपाच दृन्छोपलब्धे हामत्तवत ॥३२॥
भाषा :- सत अरु असत न कर पहिचान ।
मिथ्यावृष्टि भ्रमित-मति-ज्ञान ।।
सो उन्मत्त पुरुष की नाय ।
यस्तु ग्रहण में निज रुचि लाय ॥३२॥
नयके भेद :- . मूल :-नगम-राग्रह व्यवहार-जुभूयशव्द-ममभिवभूतानमा १३३ । भाषा :- 'नंगम', 'संग्रह', अरु 'प्यवहार' । नय आगम में विविध प्रकार ॥ 'सममिहद', 'ऋजु सूत्र व शब्द । 'एवं मूत' उपलब्ध ॥३३॥ सप्त ३३ वें मूत्र का भावार्थ :-- हर पदार्थ में धर्म अनेक । ज्ञान नयों से हो प्रत्येक ॥ भूत, भविष्यति जो पर्याय । वर्तमान मे सो बतलाय ।। रखकर इंघन, पानी, धान । बहे पकाता भोजन पान ।। आगे जो हैं यनना मान । पूर्ण रूप दे 'नंगम' जान ।। एक बहै पूरा समुदाग । या उमको विभिन्न पर्याय ।। द्रय कहे सब द्रव्याहि जान । गन्य कहे कुल सैन्य बसान ।। संग्रह रूप शान मे आए । गो ही 'संग्रह' नय कहलाए ।। संग्रह वा नहि पूर्ण विचार । भेद-प्रभेद करे 'व्यवहार' । भूत, भविप्यत यो तज देय । वर्तमान पर्यायहिं सेम ।। एक समय इक ही पर्याय । मनुप्यायुपर्यन्त कहाए ।। ग्रहण दृश्य पर्यायहि जान । सो नय ही 'जुमूत्र' बखान ।। सम्या, लिंग आदि व्यभिचार। दूर 'शब्द' से हो चितधार ।। क्रिया, पुरुष, कालादिक भेद । से अर्थों में होय प्रभेद ।। अर्थ भेद हो बिन व्यभिचार । एक वस्तु में कई प्रकार ।। ।
१८ } इन भावो के भेद - मूल द्विनवाप्टादशाविंशतिरिभवा पयागमम् ॥२॥ भाषा दो, नय, मेद प्रथम दो कहे। तीजे के अठारह इविकस भेव 'औदपिक' भाव । परिणामिक' के प्रय मन लाव ॥२॥ औषमिक भाव के दो भेद मूल मम्यस्त्वचारित्रं ॥३॥ भाषा :- उपसम फर्म प्रकृति जन सात । ओपशमिक सम्पयत्व' कहात । उपशम मोहनीय सब मित्र । कहते 'औपमिक-चारित्र' ॥३॥ मूत्र न्तानुवन्धी विक्षोभ । क्रोध, मान, माया अह लोभ ।। प्यावहि', 'सम्यमिथ्यात्व' । अरु 'सम्यक्त्य' सहित सो सान ।। प्रकृतियो के उपशम । जो सम्यव-ब आत्म में जमे ।। शिमित सम्पनन यसान । भविजन मन कीजे श्रद्धान ।। प्तिानुबन्धी' इक जान । दुजी सोइ 'अप्रत्याख्यान' । नी 'प्रत्याभ्यान' बताय । चौधी है 'सज्वलन' कपाय ।। , मान, मापा अम लोभ । गुणन लिए सोलह विक्षोभ ।। कपाय पुनि नो चितधार । 'हास्य' 'अरति' 'ति' शोक' विचार ।। 'हि, 'जुगुप्मा' हो मत खेद ) 'स्त्री'-'पुरुष' 'नपुसक' घेद । प्यारव' हि, 'सम्यक्रमियारव' । भर 'सम्यक्त्व' हिय हो जात ॥ हनीम अादम मित्र । उपशम 'औपसमिर चारिम' ॥३॥ की व्याख्या
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[ २६ ]
संज्ञी (अर्थात् मन सहित) जीव :-
मूल :- सजिन. समनस्काः ॥२४॥
भापा :- मन युत
जो सो संज्ञी जान ।
बिन मन जीव असंजो मान ॥२४॥
नया गरीर धारण हेतु जीव का गमन :-
विग्रहगती कर्मयोगः ॥२५॥
भापा कर्मयोग विग्रहाति गहे।
तब नय फर्म जीव पुनि लहे ।।
मृत्यु थान से चय कर पाए।
न तन जन्म जगह में आए ॥२५॥
जीय और पुद्गली ये गमन का बम :-
भूल :- अनुश्रेणी गतिः ॥२६॥
भापा: पुदगम जीयादिक चितधार ।
गति होती श्रेणी अनुसार ॥२६॥
२६ व मूत्र
लोक मध्य से आर जोय । नीचे का निरयो रिश होय ।।
नभ-प्रदेश की मोय नारायेगी बहाली बिनधार ॥२६॥
भापा:- पालोक जाते समय गंसारी जीव की गति :- भून :-विग्रह्मती व मसारिणः प्राकचतुम्यः ॥२८॥ भाषा :- गति संसारी जीवहि जान। चार समय से पहले मान । जो नहि होवे सीध अतीय । मोड तीन तफ लेवे जीय ॥२८॥ विन माह की गति में समय :- मून :- एक रामयाविग्रहा ।।२९॥ विन मोड़ों को प्रातुति लेख । मात्र समय लगता है एक ॥२९॥ चिग्रहगति में अनाहारक का नियम :- मूल : एकंदी पोन्वानाहारकः ॥३०॥ भाषा - विग्रहनाति जीयहि जब होय । अन-आहारफ कहिए सोय ॥ इक-दो-तीन समय परिमान । अधिकाधिक यह गति है जान" सोपा मार्ग जीय जब होय । आहारक हो जाये सोय ॥३०॥ ३० में सूत्र को व्याख्या: योग्य शरीरहिं पुद्गल जान । ग्रहण करे जब जीव न मान ।। अनाहार सो ही चितधार । वन-आहारक जीव विचार ॥३०॥ आहारतः और - . H
[]
:-पर पर मूटमम् ॥३७॥
T:- औदारिक
तो है साकार ।
सूक्ष्म, सूक्ष्मतर क्रमशः चार ॥३७॥
:-प्रदेशतोगन्येयगुण प्राय जसात् ॥३८ ।।
IT:- अधिकाधियय घनत्य मुजान ।
असंख्यात गुने
परमान॥
पहले से दूजे में
में कहे
दूजे
से आहारक
लहे ॥३८॥
अनन्तगुणे परे ॥३९।। अप्रतिघाते ॥४०॥
पा:- हैं अनन्तगुन तेजस माहि।
अन्तहु सो क्रम संशय नाहि ॥३६॥
अप्रतिपाती अंतिम दोय ।
अग जग रोक सके ना कोय ।।४०॥
ह पिंड मे अग्नि समान । धुरा सकते सर्वहिं जान ।।४।।
नस और कामंण शरीरों का आत्मा से सबंध :-
ज :-- अनादिसम्बर्षे च ॥४१॥
पा:-तेजस और फार्मण वोय ।
आतम से सम्बंधित सोय ॥
आतम साथ सवा सु अनादि ।
बंध निर्जरा नय सों सादि ॥४१॥
एक जीव के एक साथ कितने शरीर हो सकते है :-
मूल :-दादीनि भज्यानि युगपदेकस्मिन्ना चतुभ्यः ॥४३॥
भाषा :-जीव-शरीर सो निम्न प्रकार।
देय हों या फिर हम से चार ।।
'तेजस', कार्मण विग्रहगती।
औदारिक
युत
आगे गती ॥
चार तभी हो सुनिए नेक ।
'आहारक', 'वक्रिषिक' में एक ॥
एक साथ नहिं पंच शरीर ।
निविवाद गुनिए घर धीर ॥४३॥
मूल :--निरुपभोगमन्त्यम् ॥४४॥
भाषा :- २५ शरीर प्रथमहिं उपभोग ।
अंतिम द्वय में नाहिं सुयोग ॥४४॥
मूल :-गर्भ-सम्मूर्छनजमाद्यम्॥४५॥ औपपादिक वैक्रियिकम् ।४६
भापा:-जन्मे गर्भ, सम्मूर्छन जोय ।
सो शरीर औदारिक होय ॥४॥
जो शरीर जन्मे 'उपवाद।
होय वैफियिक बिन अपवाद ॥४६॥
मूल :- लब्धिप्रत्यय च ॥४७॥ तेजसमपि ।।४।।
भाषा :-तप से उपजे लब्धि विशेष ।
तासों भी बैंक्रियिक अशेष ॥४७॥
लब्धि सहित संजस है दोय ।
कांति प्रदायक सबमें होय ॥
इजा तप विशेष से लहे ।
शुम अरु अशुभ भेद दो कहे ॥४॥
[ ३० ॥
---
मूल :-पर पर सूक्ष्मम् ॥३७॥
भाषा :- औदारिक तो है साकार ।
सूक्ष्म, सूक्ष्मतर क्रमशः चार ॥३७॥
मूल :-प्रदेशतोऽसख्येयगुण प्राक् तैजसात् ॥३८ ।।
भापा:-
अधिकाधिक्य घनत्व सु जान
असंख्यात गुने परमान॥
पहले से दूजे में
दूजे से
आहारक लहे ॥३॥
मूल :- अनन्तगुणे परे ॥३९॥ अप्रतिधाते ॥४०॥
भाषा :- हैं अनन्तगुन तंजस माहि ।
अन्तहु सो क्रम संशय नाहि ॥३६॥
अप्रतिघाती अंतिम दोय।
अग जग रोक सके ना कोय ॥४०॥
लौह पिंड में अग्नि समान । धुरा सकते सर्वहिं जान ॥४०॥
तेजस और कार्मण शरीरों का आत्मा से सबध :-
मूल :- अनादिसम्बय च ॥४॥
भाषा :- तंजस और कामण वोम।
आतम से सम्बंधित सोम ।।
आतम साय सदा सु
अनादि।
बंध निर्जरा मय सौ सादि ॥४१॥
तेरस कार्मण सब जीवों के होते हैं :-
भूल :-मर्वस्य ॥४२॥
भापा:-तंजस कामंण अंतिम दोय ।
राम संसारी जोवहि होय ॥४२॥
[१]
एक जीव के एक साथ कितने शरीर हो सकते हैं :-
:- तदादीनि भज्यानि युगपदेकस्मिन्ना चतुभ्यः ॥४३॥
T:- जीव-शरीर सो निम्न प्रकार ।
द्वय हों या फिर कम से चार ॥
'तेजस', कार्मण' विग्रहाती।
औदारिक
युत
आगे गती ।।
चार तभी हों
सुनिए नेक।
'आहारक', 'क्रिषिक' में एक ।।
एक साथ नहि पंच शरीर ।
निविवाद गुनिए घर धीर ॥४३॥
:-निरुपभोगमन्त्यम् ॥४४॥
1:- अम शरीर प्रथमहि उपभोग ।
अंतिम द्वय में नाहिं सुयोग ।।४।।
:-गर्भ-सम्मूर्छनजमाद्यम्।।४५।। औपपादिकं प्रियिकम् ।४६
T:- जन्मे गर्भ, सम्मूर्छन जोय ।
सो शरीर मोदारिक होय ॥४॥
जो शरीर जन्मे 'उपवाद ।
होय वैफियिक बिन अपवाद ॥४६॥
:--लब्धिप्रत्ययं च ॥४७॥ तंत्रसमपि ॥४८॥
T-तप से उपजे लब्धि विशेष ।
तासों भी बैंक्रियिक अशेष ॥४७॥
लब्धि सहित संजस है दोप।
कांति प्रदायक सबमें होय ॥
दूजा तप विशेष से लहे ।
शुभ अरु अशुभ भेद दो कहे ॥४॥
गत :-पर परमम् ॥३७॥ औदारिक, सो है साकार । प्रश्म, प्रथमतर क्रमशः चार ॥३७॥ मून :-प्रदेगसोमायेयगुण प्रारमजमात ॥३० ।। भाषा :- अधिकाधिपय घनत्य मुजान । असंश्यात गुने परमान। पहले से दूजे में दूजे से आहारक लहे ॥३८॥ मूल :- अनन्तगुणे परे ॥३९॥ अप्रतिपाते ।।४।। भाषा :- हैं अनन्तगुन तेजस माहि । अन्त सो क्रम संशय नाहि ॥३६॥ अप्रतिघाती अंतिम दोय । अग जग रोक सके ना कोय ॥४०॥ लोह पिंड मे अग्नि समान । घुस सकते सर्वहिं जान ॥४०॥ तेजस और कार्मण शरीरों का आत्मा से सबध :- मूल :- अनादिसम्बधे च ॥४१|| भापा:- तेजस और फार्मण दोय । आतम से सम्बंधित सोय।। आतम साथ सदा सु अनादि । बंध निजग नय सों सादि ॥४१॥ तेजस कार्मण सब जीवों के होते है :-- मूल :- सर्वस्य ।।४।। भाषा :-तेजस कार्मण अंतिम दीय। सब संसारी जोवहिं होय ॥४२॥ । - -- तृतीय अध्याय म अध्याय में अधोलार तथा मध्यलोक का वर्णन किया गया है। भाषा:- मन :-गलगरावानुवापर, धूमवमोमशनमः प्रमा भूमयो धनामुबानाकाम प्रतिष्ठाः मप्नापोध ॥१॥ अधोलोक का वर्णन मुनो। सप्त भूमियाँ नीचे गुनो। रत्न', 'शरा' पहली दोय । प्रय 'यालुका', 'पंक' चव होय ।। 'धूम', 'तमः' आगे विस्तार । सप्तम 'महातमः' चितवार ।। नाम समान प्रमा सब लहें। ताते रन-प्रमादिक कहें । 'वलय-धनोदधिवात' अधार। सो 'धनवात-बलय' साधार।। यह 'तनुबात-चलय' से घिरा। अंत अनंताकाराहि निरा ॥१॥ १ ले मूत्र का विस्तार:- इक लख अस्मी योजन मान । रत्नप्रभा है मोटी जान ।। कम मे कम है आठ हजार । 'महातमः' क्रमश चितघार ॥ एक राजु नीचे लोकान । निश्चय जानें भव्य प्रगति ।। मोर्ट योजन वीस हजार । तीनों बात-लय चितघार ।। मंगा रग धनादधि जान । धनवानहिं गो-मूत्र समान ।। वान-वनय-तनु यतिम जोय । रग अन्यत्राहि ताका होय ।। .
( ३४ )
यथाश्रमम् ॥२॥
रत्नप्रभा आदि भूमियों में नौ को गम्या :-
মুল :~ গিৰিৱনিরবধি ধীমান-
নাগালি पच चैव
रत्न प्रमादिक में अब कही।
नरकों की संख्या सुन सही ॥
तीस, पचीस, पन्दरह जान ।
दस पुनि तीन सुक्रमशः मान ॥
गिनती सब लाखों में कही।
पंच कम लाख छठी में रही ।
सप्तम में बस केवल पंच ।
नरक होहिं नहिं संशय रंच ॥२॥
भापा-
नारकीयो का वर्णन: -
मूल . नारका नित्यशुमतरलेश्यापरिणामदेह वेदनावित्रिया:।
देहादिक, लेश्या, परिणाम ।
सहि अशुभतर होते काम ॥
देवन और अशुम विक्रिया ।
नारक जीव महादुख जिया ॥३॥
भापा:-
मूल :--परस्परोदीरितदुखाः ॥४॥
देहि परस्पर दुःख अपार ।
आपस में ही विविध प्रकार ॥४॥
मूल :-मक्लिप्टामुरोदीरित दुःखाश्च प्राक् चतुर्थ्याः ।। भाषा :-- तिन्हें लड़ावें पुनि सुन लेव । असुर कुमार कलह प्रिय देव ॥ तोजी पृथ्वी तक सो जाय । दुख देने के करहिं उपाय |शा नरको की आयु:- .. मूल :-तप्वेकः त्रिमप्त दश-सप्तदश-हाविशति- यास्त्रिशत्सागरोपमा सत्वाना परा स्थितिः ॥६॥ भाषा.- आयु नरक अब सुनिए सोय । इक, त्रय, सात प्रथम त्रय होय ॥ दस, सत्रह बाइस क्रम जान । तेतिस सागर अंतिम मान ॥६॥ ६ मूत्र का विस्तार :- अधिकाधिक मो आयु वताए । कम से कम कहते समझाए । दम हजार वर्षों की मान । रत्न प्रमा में होनी जान ।। अधिकाधिक पहले की जोय । आगे को कम से कम होय ।। मख्या आयु नियंक अपार । ज्यों सागर में जल विस्तार ।। नाते ही दीर्घायु बखान । करते सागर उपमा जान ॥६॥ 1 - -- उसे । मध्य गोरा वर्णन मूल - जम्ब दीप-मोदार गुमनामानी द्वीप समुद्राः॥ भापा अब मयिमन का घरह यियेरु । द्वीप अनेक, समुद्र अनेक ।। तिन सय ही के हैं गुम नाम । स्थित मध्यलोक सुमधाम ।। जम्बू द्वीप प्रथम चितवार। नामहि जम्बू वृक्ष अधार. ॥ लवणोदधि घरे घेरे है ये ही क्रम आगे भी लसे ॥७॥ द्वीप समुद्रो मादि का विस्तार :- म्ल .-द्विदिविष्कम्भाः पूर्वपूर्वपरिक्षेपिणो वलयाकृतय, ॥८॥ श्रम से द्वीप समुद्र विचार । दुगुन दुगुन जिनका विस्तार ॥ घेरे चूड़ी के आकार। जम्बू द्वीप मध्य चितधार ॥६॥ ८ वे सूत्र का विस्तार :- घरे जम्बू द्वीप विचार । लवणोदधि जलराशि अपार ।। खड-धातकी पुनि विख्यात । कालोदधि है ता पश्चात ।। जितने द्वीप समुद्रहि जान । आगे दोनो नाम समान ।। अंतिम दौर समुद्रहि जोय । नाम 'स्वयम्भूरमणहि' सोय ॥ प्रथम दीप का जो विस्तार । ताते दूना उदधि विचार ।। दूना टोप उदधि सो होय । ता के आगे स्थित जोय ॥८॥ भापा द्वीप का कपन :- --तामध्ये मेस्लामिवंतो योजनामहविपामो जम्बूद्वीप' ||९|| :- गोर मूर्य सम जम्बू द्वीप । मध्य मेरु गिरि मनह महोय ॥ भव्य आकार। एक लाख पोजन विस्तार | जम्बू द्वीप द्वीर के सानधन:- --मरतहैमवतहरिविदेहरण्यकाहरण्यवतंगवतवर्या क्षेत्राणि ॥१०॥ :- सात क्षेत्र उसमें क्षेत्र उसमें सुप्तधाम । 'भरत', 'हेमवत' यादिक नाम ।। 'हरि', 'विदेह', 'रम्यक' है पंच । चित धरिए नहिं संशय रच ।। पट 'हैरण्यवत' हि है कहा। सर 'ऐरावत सप्तम रहा ॥१०॥ वें मूत्र का विस्तार :- । सत्र सर हिमवान । लवण ममुद्र दिया य जान ।। , सिन्धु नदी मनुहार । गाभित भरतहि होत्र हार | रविनया मच शोमाए । उत्तर-दक्षिण बनाए॥ नक्षेप पट भाग विशेष करगना दारण मौत, विजय पत्रीको कहावे मार गीत।। + निपथ, नील पवं विव जान । क्षेत्र विदेह अपस्थित मान !! कर्मनाश में तत्पर जान । मानव रहहि विदेह समान ॥ ताते क्षेत्र विदेह कहाए । मध्यभाग गिरि मेरु गुहाए । शत-राहन योजन विस्तार । ता में भूतल एक हजार॥ मेरु गिरी पर हैं वन चार । 'भदशाल', 'नन्दन' बिनधार ।। 'सोमनस' हिं पुनि 'पांडुक जान । मेक शिखर ता मध्य बसान ।। चार शिला चव दिश मनुहार । तिन ऊपर सिंहासन चार ।। तीर्थकर अभिषेक कराए । देव मन हि मन में हाए । भविजन सो सक्षिप्त विचार । आगम में पढिए विस्तार ॥१०॥ जम्बू द्वीप के सात क्षेत्रों का वर्णन करने वाले छः पर्वत :- मूल . तद्विभाजिनः पूर्वपरायता हिमवन्महाहिमवन्निपघ-नील. हविम-शिखरिणो वर्षधरपवंता. ॥११॥ भाषा:- सप्त विमाग सफल सुख साज । सीमांकन करते गिरिराज ।। पूरब से पश्चिम तक जात । नाम 'वघर' भी विख्यात ॥ पहला पर्वत है हिमवान' । 'महाहिमवान' । निषध' 'नील' 'रुपमी'पुनि कहा । 'शिखरी' नाम छठे ने लहा ॥११॥ दूजा सोइ नदिया का वर्णन :- मूप-गणागिन्धु-रोहिदीहितास्या-हरिहरिकाला-गोवा- सोतीदा गारीनसांसा-गुवर्णप्यमा-रारतीया गरितस्तन्मध्यगा: ॥२०॥ भाषा :-सप्त क्षेत्र की नदियां गुनो। गंगा-सिन्पु प्रयम को गुनो। को 'रोहित रोहितास्य। 'हरित' मु 'हरिमारता' पुनि लास्य ॥ 'सीता', 'सीतोदा' चय रहें। 'नारी' गरकांना 'स्वर्ण-हप्यफूला "रक्ता रक्तोदा' सत वहीं पंच सहें पट (.) इन नालायो का विस्तार मूल .-प्रथमो योगा गमायामना किम्भा हयः ।।१५।। भापा:- लम्बाई हब पर विचार । पूरव पश्चिम एक हजार ॥ उत्तर दक्षिण चौड़ा जान । पंच शतक योजन परमान ॥ मूल -दश योजनावगाहः ॥१६॥ तन्मध्ये योजन पुकरम् ॥१७॥ भाषा: दस योजन सो गहरा कहा । बोच कमल इक योजन लहा ॥१६ व १७॥ हृदो और कमलों का आकार .- मूल :-तद्धिगुण-द्विगुणा हृदा पुष्कराणि च ॥१८॥ भापा:- कमल सरोवर आगे जोय । दुगुन दुगुन विस्तृत हैं सोय ॥१८॥ इन कमतों पर निवास करने वाली देवियां :- मूल:-तनिवासिन्यो देव्य, श्री-ही-ति-कोति-बुद्धि-लक्ष्म्यः पल्यापमस्थितयः ससामानिकपरिपलाः ।।१९।। भापा:-उन कमलों पर भव्य निवास । जिनमें छ देविन के वास। 'श्री', 'हो', 'धृति' आदिक हैं नाम । 'कोति', 'युद्धि', 'लक्ष्मी' सुखधाम ।। पल्प फी लहें। सामानिक, परिषद् सँग रहैं ॥१६॥ - आपू भूल :-भरत रायत्यो विहायो षट् गमयाम्पामुलापिण्यद. रापिगौम्याम् ॥२॥ भापा: भरतहि, ऐरायतहि विचार । आयु आदि घट बढ़ चितधार। उत अर अयसपिणीनुसार । छ ममयों में विविध प्रकार ॥२७॥ २७यें मूत्रधारपा:- गुण घटता ही जाए विचार । यटना जाये दुग अपार ॥ अवमपिणी याल सो जान । उरस पिणी दिलीमहि मान । 'गुषमा मुपमा' सुषमा' दोय । 'मुममा दुषमा'तीजा होय ॥ 'मुपमा-मुपमा' चौया जान । 'दृपमा' पंचम भेद बसान ।। 'दुषमा-दुपमा अवसरिणी। इनके उल्टे उरसपिणी ।। इनमें मुग बढ़ता ही जाए । श्रमगः राय दुस जाए बिलाए 1॥२७॥ मेष क्षेत्रोपी दशा:- मूल : ताम्यामपरा भूमयोवस्पिता' ॥२८॥ मापा: छोड़ भरत, ऐरावत मही । हानि वृद्धि नहिं होती फहीं ॥ एक समान दशा ही रहे।
( ४२ )
मूल :- चतुर्दश-नदी-सहस्र-परिवृता-गङ्गा सिन्ध्वादयी नद्य.।।२३।
भाषा:- गंगा-सिन्यु नदी परिवार ।
चौदह चौदह सोइ हजार ॥
दुगुन-दुगुन आगे क्रम जान ।
घेरे नदियां निश्चय मान ॥२३॥
भारत क्षेत्र का वर्णन
मूल ~भरत: पविशति-पञ्चयोजन-शत-विस्तार:
पड्नकोनविंशतिभागा
योजनस्प ॥२४॥
भापा:-
भरत क्षेत्र विस्तृत घर शोस ।
मोजन पंच शतक छब्बीस ॥
कर योगन के उन्निस माग ।
योग करह ता के छ माग ॥२४॥
मूल -तद्-द्विगुण-द्विगुण-विस्तारा वर्षधर-वर्षा विदेहान्ता.॥२५॥
भाषा:-
दक्षिण पर्वत क्षेत्र विचार ।
क्रमशः दुगुन दुगुन
विस्तार ॥
सो कम है विदेह पर्यन्त ।
संशय तनिक न मानें संत ॥२५॥
मत:-उनर दक्षिणतुम्याः ॥२६॥
माता-
उत्तर कगिरि क्षेत्र विचार ।
दक्षिगही सम है विस्तार ॥२६॥
घातको खडद्वीप की रचना :- मूल :--विर्धातकीखण्डे ॥३३॥ भापा - क्षेत्र भरत आदिक हैं जोय । खंड-पातकी दो दो होय ॥३३॥ पुष्कर द्वीप का वर्णन :- मूल:-पुकरा च ॥३४॥ भाषा: दो दो पर्वत द्वीप विचार मा पुष्कर द्वीप मझार आधे पुष्कर द्वीप में ही भरत आदि क्षेत्र क्यो मूल :-प्राह मानुपीत्तरान्मनुष्याः ॥३५॥ भाषा : कारण सो सुनिए घर ध्यान मानुपोत्तर गिरि तक जान मानव का ही है आवास दोप-अढ़ाई करहि निवास मनुष्यों के दो भेद:- मूल :-आर्या म्लेच्याश्च ॥३६॥ मानय के दो मेद बताए प्रथम आप पुनि म्लेच्छ कहार भूमियों का वर्णन :- -भग्नंग. भूमगोन्पा देवर सरयुगए पंच भरत, ऐरायत पंच। पंच विदेह न संशय रंच ।। पंद्रह फर्मभूमिर्गा कहीं। छोड़ 'देय उत्तरकुद' मही ॥३७॥ प्यो की आयु:- :-नस्थिती परावरे विपत्योपमान्तमुहर्ने ॥३८॥ मानय आयु कही सो सुनो। उत्कृष्ट अरु जघन्यतम गुनो। तीन पल्य अधिकाधिक जान। अन्तमुहूतं न्यूनतम मान ॥३८॥ ञ्चो की स्थिति :- :-तिर्मग्योनिजानां च ॥३९॥ 1:-- तियंञ्चों की स्थिति यही । मानय को जो पहले कही ॥३६॥ (तीसरा अध्याय समाप्त) ::-देवाश्चतुणिकायाः ॥१॥ पा:- देवों के हैं चार निकाप । प्रयम मवनयासो' यतलाय ॥ 'ध्यन्तर'पुनि ज्योतिप्क'गुहाया 'वैमानिक अंतिम कहलाय ॥१॥ मूल :-आदितस्त्रियु पीनामलेगः ॥२॥ आदि देय प्रय, सेश्या मीत। नीस, पोतहि, पीत ॥२॥ पार प्रसार के देवों के यथागर भेद:- ग्रा-माप्ट-मच-दादाला बन्नाः ॥३॥ भाषा:- देय 'मवनवासी' बस पहे। आठ मेद 'रयंसर के रहे। देव 'ज्योतिषी पांच प्रकार। मानिक' यारह चितपार ।। अंतिम ल्पोपन्न पर्यन्त । गोसह देवों के विषय में विशेष कथन :- मूल -इन्द्र-सामानिक-प्रायस्त्रिया-परिषद्-आ लानीक-प्रकीर्णकाभियोग्य-किस्विपिक- भापा:- देवन भेद प्रत्येक निका निम्न प्रकार कहे समझो 'इन्न'प्रद्धि अणिमादिक युद 'सामानिक' आदर संयुक्त मास्त्रिा'प्रोहित सम जान 'परियद' इन्द्र समासद मान 'आत्मरक्ष' पंचम सुखदा- रक्षा हेतु मनहु गोमा 'लोकपाल'पट, सप्त मनीष 'प्रकोणक पुरजन हि प्रतीक मामियोग्य' सेयक समजा- कित्यिधिक हि चांडाल सम्म धे मूत्र की मात्रा:- तरिम घोहित गम बनाए तामा करें धनारा जोप । मापाल'
पूर्व कपन में अपवाद :-
मूल :-त्रास्मिश लोकपालवा व्यन्तरज्योतिप्का. ॥५॥
भाषा:- यंतर', 'ज्योतिर्हि नहि होय ।
लोकपाल, प्रायस्त्रिंश दोय ॥५॥
इन्द्र का नियम :--
मूल:-पूर्वयौन्द्रिाः ॥६॥
भाषा:-- प्रयम निकाय कहीं जो दोय ।
दो-दो इन्द्र दुहुन मा होय ॥६॥
वीस 'भवन-वासी' यो भये । सोलह इन्द्र सु 'व्यतर' सहे ॥६॥
देवों में कामेच्छा की पूति:-
मूल :-काय प्रवीचारा आ ऐगानात् ।।७।।
भाषा:- काम भाव 'प्रविचार बखान ।
प्रथम तीन देयन में मान ।।
साय देव सौधर्मीशान।
काय रमण मानव सम जान ॥७॥
- पाति मूल :-शेपा: स्पर्श-रूप-शब्द-मनः प्रयोचाराः भाषा क्रमशः सूक्ष्म लहें प्रविचार। शेष देव मी निम्न प्रकार ॥ स्पर्श, रूप, शब्दहि, मन, लाय । शांत कामना सब हो जाय ॥८॥ ८वे भून की व्याख्या :- स्वर्ग महेन्द्र हि सनतकुमार । आलिंगन ही है प्रविचार ।। ब्रह्म, ब्रह्मोत्तर, लातब मान । अरु कापिष्ट स्वर्ग मे जान ।। प्रविचारहि का ढग अनूप । शात काम हो लख कर रूप । शुभ, महामहिं, सातार । चौथा स्वर्ग कहा महबार ।। कामना होती मीत । सुनकर मिप्ट वचन अरु गीत।। आनत, प्राणत, आरण मान । चौथा अग्युत स्वगं बखान ।। काम व्यथा राव ही मिट जाए । केवल मन में चिंतन लाए ॥ परम तुष्टि सब ही को होय । देविन के मन भावे सोय ॥८॥ मूल :-परेऽपविचाराः ॥९॥ भापा: सोलह स्वगों से गो परे। फाम तिन्हें महि प्याकुलफरे ॥६॥ एवं मूत्र को पास्या:- नौ देयक पहले मान । पुनि नो अनुदिश आदिक जान ॥ पाच अनुत्तर में भी सोय । याम वेदना तनिक न होय ।। देबिन का है पूर्ण अभाव । यो नदि काम पूर्ण हो भाव ।। साम अमावहि कारण जान । परम मुवी शो देव रवान ॥९॥ .
(१)
भावामी देश के गभेद:-
पून:-भवनागिनो गुर-नाग-पित-गुपर्णाग्नि-
वास-निनामधि-वीर-दिसुमारा: ॥१०॥
मान।
भाषा:- भेद नवनवासी दस
'असुर', 'नाग' पुनि विद्युत जान ।।
षय 'गुपण, पंच 'अग्निकुमार'।
'यात', 'स्तनित', उपिचितपार।।
'दीप' अरदिपकुमार बस पहे।
नाम कुमार
समी ने लहे ॥१०॥
१० गूत्र की पाग्या:-
एक अवस्था में चितधार । रहहिं देव माजन्म कुमार ॥
देव भवनवामिन में मान । सो गुण अधिधिक है जान ।।
रहन-सहन में पूर्ण कुमार । मोद पृमार पहें पितधार ॥
रत्नप्रभा पृष्त्री मनुहार । प यहाल
में
अमुर कुमार।
देवन के हैं भवन पलाम । मौके पर नागहि में धाम ।।
भवनों में ही सो सब रहे । देव मवनवासी यों कहें ॥१०॥
नरदेवा के आठ भैः-
गूर -गग: frमरनिगुम-मोरग-गपाया
गाम-भूग-पिशापाः ॥११॥
भाषा :- ध्यंतर रहहि विमिन स्यान ।
आठ प्रकार सुनिश्चित जान ॥
'किन्नर', 'किम्पुष्प' हि हैं दोय ।
और 'महोरग' तीजा होय ॥
चव 'गंधयं', 'यक्ष ही पंच ।
'राक्षस', 'भूत','पिशाचहि पंच ॥११॥
११ सूत्र का विस्तार :-
भूतल पर भी करहिं निवास । ग्राम नगर चौराहा वास ॥
मदिर, उचानादिक मान । मे भी 'व्यतर' रहते जान॥११॥
ज्योतिप्क देवो ये भेद :-
मूल -ज्योतिप्का: सूर्याचन्द्रमसो ग्रह-नक्षत्र-प्रकीर्णक-तारकाश्च
॥१२॥
भापा:- 'ज्योतिप्क' हि के पांच प्रकार ।
'नाम चमक फारण चितधार ॥
'सूर्य' 'चन्द्रमा' 'ग्रह' 'नक्षत्र'।
पंचम तारें
'तारे हैं
हैं सर्वत्र ॥१२॥
१२ गूत्र का विस्तार:-
भूमे तारे पोमन मान । सातपातका और नम्मे जान ।।
पूर्व, पन्द्र, ग्रह मासिनोय । कार-आर स्थित सोय।।
एक मगर दम पोरन माहि। देव ज्योतिषी माय नादि।
पातु मलप-पनउपि मगार IIT सो पे है विसपार ।।
गूर्य पद ही इन्द्र समान । ज्योनिक हि देयों में पान ।।१२।।
मम :-परदक्षिणा नित्यगतयो नतोके ॥१३॥
नित प्रदक्षिणा मेहि करें।
दाई द्वीप का तामरा हरे॥१३॥
१३ मूत्र पी पारया :-
दाई दोष या सागर दोष । मानव सौक पहीं ताहोय ॥
ताके देव ज्योतिषी जान । मे प्रदक्षिण नित मान ।।
म्याग्ह गौ योजन रह दूर । प्राय मानव भरपूर ॥१३॥
गून:-ततः माल विभागः ॥१४॥
भापा:-
ज्योतिष-देवनाति मापार ।
कास विभाग किए व्यवहार ॥१४॥
१४यें गूत्र की प्यास्या:-
पटा, मिनट, पड़ो, दिन, रात । व्यवहारहिं सो काल पहात ।।
बोष ताहि सो निश्चय काल । ता मुनिएगा मागे हाल ॥१४॥
भाषा:- मूल :-बहिरवस्थिताः ॥१५॥ मानय लोक परे गतिहीन । नाम 'अवस्थित ताते दोन ॥१५॥ वैमानिक देवों का वर्णन :- मूल :-वैमानिकाः ॥१६॥ कल्पोपन्नाः कल्पातीताश्च ॥१७॥ भाषा:- देव भेद वैमानिक मौत। 'कल्पोपन्न' अरु 'कल्पातीत ॥१६ व १७॥ १६वें तथा १७वें मूत्र को व्याख्या :- पुण्यवान जैह जीवहिं जान । कहलावे सो जगह विमान ।। जन्म तहाँ जो लेय विचार । वैमानिक सोही चितधार ॥ जिनमें रहना पुण्य कहाय । सो विमान नय भेद बताए । मध्य इन्द्र सम 'इन्द्रक' जान । श्रेणिवद्ध चहुँ 'थेणि' विमान । विदिशाओं में पुरुष समाग । 'पुष्पप्रकीर्णक' विसरे यान ।। दस प्रकार इन्द्रादिक जोय । 'कल्पोपप्न' सोलह स्वर्ग परे गुन लेव । सब 'अहमिन्द्र' कहावे देव 1१६ १७॥ मूल :-उपपरि ॥१८॥ भाषा: कल्प कहो या सोलह स्यगं। स्थित है कमराः अपवगं ॥१८॥ पहायें सोय ॥
सोलह स्वर्गों का वर्णन :-
मूल :-सौधर्मशान-सानत्कुमार-माहेन्द्र-ब्रह्म-ब्रह्मोत्तर - लान्तव
कापिष्ट-शुक्र-महाशुक्र-शतार-सहस्रारेवानत - प्राणतयो-
रारणाच्युतया वसु वेयकेषु विजय वैजयन्त-जयन्ता
पराजितेपु सर्वार्थसिद्धौ च ॥१९॥
भाषा:- सोलह
सोलह स्वर्ग-प्रथम 'सौधर्म ।
पुनि 'ऐशान' गुनहु चित ममं ।
'सनत्कुमार महेन्द्र' बताए ।
'ब्रह्म' सु 'ब्रह्मोत्तर' सुखदाए ।
सप्त 'लांतव', अप्ट "कपिष्ठ'।
"शुक्र' 'महाशुक्र' रह हैं इप्ट ।
पुनि शतार' द्वावस 'सहस्रार' ।
'आनत', 'प्राणत' आदि विचार ।
'आरण', 'अच्युत' अंतिम मान ।
कम से सोलह स्वर्ग सु जान ।।
ता पर नो
प्रवेयक कहें।
नौ अनुदिश आदिक भी रहें।
रहें 'विजय' 'बंजयन्त' 'जयंत'।
'अपराजित' चव मानें संत।
पुनि 'सर्वार्थसिद्धि' ही मान ।
पच विमान अनुत्तर जान ।।
बमानिक तह
करहिं निवास ।
मोति-मोति सुख बिना प्रयास ॥१९॥
। २२वें सूत्र की व्याख्या:- तीव्र वर, क्रोधादिक, क्लेश। लेश्या कृष्ण न संशय लेश ॥ माया, तृष्णादिक, अतिमान । नीलहि लेश्या की पहिचान ।। मात्म-प्रशंसादिक ही भाए । सो कपोत लेश्या कहलाए। दया, दान, सत्यादिक भीत । लक्षण हैं सो लेश्या पीत ॥ क्षमा, दयादिक, सात्विक दान । पहि लेश्या लक्षण जान ॥ बोतराग, पर दोष भुलाए ! शुक्लहिं लेश्या सो महलाए । नाम कर्म वश रंग शरीर । द्रव्यहि लेश्या सो गुणधीर । हो कपाय वश मन-वच काय । भाव हि लेश्या सोकहलाए।॥२२॥ कल्प किसे कहते हैं :-- मूल :-प्राग्वेयकेभ्यः कल्पाः ॥२३॥ मापा:- स्वर्गादिक ग्रंयेपक पूर्व। इन्द्र सहित सो 'कल्प' अपूर्य ॥२३॥ २३ मूत्र का विस्तार :- प्रपमहिं से सोलह तक जान । स्वर्गों में ही इन्द्र बसान ।। प्रेवेपक, अनुदिश पुनि जीप । और अनुत्तर इन्द्र न होय ॥ सोलह स्वर्ग परे बतलाएँ । सबहि देव अहमिन्द्र'कहाएँ ॥२३॥ १
.
-भेद ।
लोकान्तिक देवों का वर्णन :-
मूल : महानोकालपा लौकान्तिकाः ॥२४॥
भाषा:- ब्रह्मलोक में रहते 'मान।
'लोकान्तिक सो निश्चम जान ।।
एक जन्म से मुक्ती सहें।
ताते ही लौकान्तिक कहें ॥२४॥
लोकान्तिक देवो के भेद:-
मूल :-सारस्वतादित्यवाहयरुण-गर्दतोय तुपिता मावाधा-
रिष्टाश्च ॥२५॥
भाषा:- सोशान्तिक के सुनिए
ऊँच-नीच का नाहि विमेद ।।
'सारस्वत, 'आदित्य' विचार।
'वह्नि 'अरुण' क्रमशः चितधार ।।
गतोय' पुनि तुपित' कहाय ।
'अध्यावा' ,'अरिष्ट' सुहाय ॥२५॥
२५ सूत्र की व्याख्या:-
इन्द्रादिक के माहि अधीन । विषय विरक्त देव स्वाधीन ।
ता सों ये देवपि कहाएँ । पाठी चौदह पूर्व बताए।
सो वैराग्य समय सुखदाय । तीर्थकर प्रतियोहि जाय ।।
अधिकाधिक सस्या में मान । दो-दो श्रमश: जदपि समान ।
सात-सात सौ प्रथम लहत । ग्यारह सहसहि-ग्यारह बंत ॥२५॥
भाषा:- द्वि चर्म देवो का वर्णन :- मूल :-विजयादिषु द्विचरमाः ॥२६॥ भापा: नो अनुविश, विजयादिक चार। ता के देव द्वि चर्म'विचार ॥२६॥ २६वे सूत्र की व्याख्या :- विजयादिक से भूतल आए । पुनि सयम घर ऊपर जाए । पुन. वहाँ से नर भव धरें । मुक्ति रमा को तब जा करे ।। दो मानव भव घरते मान । मोक्ष प्राप्त करते तव जान ।। पर सर्वार्थ सिद्धि के देव । एक चरम होते चित लेव ॥२६॥ तियंञ्चों की पहिचान - मूल '- औपपादिक-मागेच शेपास्तिर्यग्योनयः ॥२७॥ जन्मुपाय नारकी, देव । अरु मानय तजि शेहि लेव ।। जीव सोइ तिर्यञ्च हि मान । सब लोगों में स्थित जान ॥२७॥ देवी की आयु का वर्णन :- मूल '-स्थितिरमुरनाग गुपणं-दीप-मोपाणा सागरोपम निपल्योपमादहीनमिता ॥२८॥ आयु भवनवासिन की कही । असुरकुमारिफ सागर सही ।। नाग कुमारों को अय पल्य । और गुपणं अढ़ाई पत्य ।। मायु पल्प दो द्वीप कुमार। डेद पत्य तक शेष' विचार ॥२८॥ भापा:- गौतु:- पुन: गोप९ि॥ मौदगान। होगापर परमान ॥२६॥ TREnा:- पुन: पुरानो र tent पगार, महेश हिमा सनिलपिक रमा॥ HT:--Trar मिति मोगमाराम मा द्वारा स्प पितपार सौन, सात, मो, ग्यारह नाम। ए, पहभागे माग 19॥ दो सीम, पोरोम हि पौष। निमारका ( २ ) परमातीत देयों को मायु:- मून :-भारणान्युतादूर्वमन नबसु अदेयकेतु विजयामिण सर्वासिलो ॥३२॥ माn:- नो ग्रेयेयक आयु प्रसिद्ध । एक-एक सागर क्रम पति॥ भारण, अपुत है कही। इस से कहिम तक रही। क यह है अनुविश हि विमान । पत्तिा सागर सो हो जान॥ विजयारिक घय में एक द्धि । सेनिम ही गायिं हि सिद्धि' ॥३२॥ वैमानिदेवों की जघन्य माणु:- मर -मागपल्योगममणिम् ॥३३॥ माग:- मायु अन्य स्वगं दो नाम । पुष बा एक पन्य से मान ॥३३॥ पत्र:-त. TT जला! :- मोचेको अधिकापित और। ता र म कम होय ॥३ गया पथ गमगर firmer मोर ॥ र म च म मे कम हो दामा
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द्रव्यो के बारे में विशेष कथन :-
मूल :-नित्यावस्थितान्यरूपाणि ॥४॥
भाषा :- नित्य' 'अवस्थित' सब हो मान ।
पुद्गल छोड़ अरूपी जान ॥४॥
दो प्रकार गुण सब मे मान्य । प्रथम विदोप पुनः सामान्य
गुण विशेष गति होय सहाय । अस्तित्व हि सामान्य बताय
धर्ग द्रव्य गुण सो चितधार । दो-दो सबमें इसी प्रकार
द्रव्य गुणों का नाश न होय । ता ते 'नित्य' कहा सोय
छ सरया नहिं घद-बन जान । द्रव्य 'अवस्थिन' सो ही मान
पुद्गल स्पी, है गुण चार । अन्य अरूपी सब चितधार ।।४
पुद्गल द्रव्य रूपी हैं --
मूल :-सुपिण.
पुदगला ॥५॥
भाषा:- फेवल पुद्गल
रूपी कहे।
रस-स्पर्श गंधादिक
लहे ॥५॥
धर्मादि द्रश्य यहुन नहीं हैं -
मूल:- आकाशापद्रपाणि ॥६॥
भाषा :-- 'धर्म', 'अधर्म', 'अपारा हि एक ।
तीन द्रव्य जो शेष-अनेक ॥६॥
पुद्गल, जीर बनानानन्त । अगम्यान अण काल महा
गोपाय अमन्य प्रदेश । हर पर ति कालाणू एक ॥६
मूल :-नितियागिय ।।
भाग:- 'धर्म', 'अपमं अEN' हि तीन ।
हना घलन यिन रिया बिहीन ॥७॥
.
भी ना हो।
Prernार, पि॥
पुराना पुलिस
ToxinshrI-RIT मिग ॥
चार-itarरान ! पाप कर्म मान ।
रममा पनि घरशिपार !
मा wifornाएर रमाए।
'गरपान' अपग मार गोभी दोहि प्रभार।
'rren'पामा जान माग, पोहा मान
PL ARM बाप्प मां निर
It Trirat'सान पाद युगमा ।
माहा माहिए। दु : ॥
दान-मोर एरिया मे पहिरि ||
सोलगि अगु पदामोदाई पर मनाए ।
मायाम' को मार
कम कीमत में होग। पूरा मा गो गाना दोष।
गृmदिमामीन पर '3rn
पुर
गर:-प्रभाग ॥२॥
मा:-
पुरगम के से मेर सताए ।
'परमा', 'कम्प' पहाए।
अण अधिभागी एक प्रदेश।
एमपिर कप' विशेष ॥२५॥
( २ ) खट्टा, मोठा, कड़वा जान । तीता और बसला मान ॥ रसहिं पच सो, दो हैं गंध । नाम सुगध और दुर्गन्ध । काला, नीला, लाल, सफेद । पंचम पीत वर्ग के भेद ॥ मूल वर्ण सो केवल पच । बहु प्रभेद नहिं सराय रंच ।।२३।। पुद्गल द्रव्य की मुख्य १० पर्याय :- मूल .-शब्द-बन्ध-सौक्षम्य स्थौल्य-सस्थान-भेद-तमश्यायातपो- धोतवन्तश्च ॥२४॥ भाषा :- सज्जन बन्द सुनहु अब नेक । पुद्गल की पर्याय अनेक ॥ 'शब्द' 'बन्ध' 'सौक्षम्य' बताए । पुनि-'स्यौल्य' 'संस्थान' कहाए ॥ 'मेद' और 'तम' 'छाया' मान। 'आतप' अरु 'उद्योतहि जान ॥२४॥ २४३ मून की ध्यास्या :- दाब्द भेद यो होहिं अनूप । भाषा और अमापा ५॥ भाषा पुनि दो रूप बखान । अक्षर और अनक्षर जाने । मानव सब करते व्यवहार । भाषा अक्षर रूप विचार ॥ पशु पक्षिन की बोली जोय । भाषा अन्-अक्षर है सोय ॥ रूप अभापा सद? दोय । पुरुप पल 'प्रायोगिक' होय ॥ मेघ गर्जना आदिक जान । 'स्वाभाविक नैसगिका मान " प्रायोगिक पुनि चार प्रसार । वाय चाम के 'तत' चितधार ।। तार बादि के याने जोम । वितत' नाम ही तिनका होय । मटा आदिक धन बहसाए । वशी यादि 'सुपिर' मन भाएं ॥
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- पुदगम हो र लाए।
अप मागीएर प्ररे।
एपिर पर विशेष ॥२५॥
( २ ) खट्टा, मीठा, कडु वा जान । तीता और पसंला मान ॥ रसहि पंच सो, दो हैं गंध । नाम सुगंध और दुर्गन्ध । काला, नीला, लाल, सफेद । पंचम पीत वर्ग के भेद ।। मूल वर्ण सो केवल पच । वहु प्रभेद नहिं संशय रच ।।२३।। पुद्गल द्रव्य की मुख्य १० पर्याय :- मूल :-शब्द-बन्ध-सौम्य स्थौल्य-संस्थान-भेद-तमश्यायातपो- द्योतवन्तश्च ।।२४॥ भाषा :- सज्जन वृन्द सुनह अब नेक । पुद्गल की पर्याय अनेक ॥ 'शब्द' 'बन्ध' 'सोक्षम्य' बताए । पुनि-'स्यौल्य' 'संस्थान' कहाए ॥ 'भेद' और 'तम' 'छाया' मान । 'आतप' अरु 'उद्योतहि जान ॥२४॥ २४वें सूत्र की व्याख्या:- दाम्द भेद को होहिं अनूप । भाषा और अभाषा रूप भाषा पुनि दो रूप यखान । अक्षर और अनक्षर जाने । मानव सय करते व्यवहार । भाषा अक्षार रूप विचार ।। पशु-पक्षिन को बोली जोय । मापा ,अन्-अमर है सोय ।। रूप अमाषा शब्दहुँ दोय । पुरुष पत्न 'प्रायोगिक' होय ।। मेघ गर्जना भादिक जान । 'स्वाभाविक नैसगिक मान ।। प्रायोगिक पुनि चार प्रसर । वाद्य धाम के 'तत' चितधार । तार आदि के याने जोप । वितत' नाम हो तिनका होय ।। घटा आदिक 'पन' कहलाए । यशो आदि 'सुपिर' मन भाएँ ।
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1:- पुगन के रो भेर मताए।
'परमागू, r' पहाए ।
भण अधिमागी एस. प्रदेश।
एमपिक कप' विष ॥२५॥
भापा:- २५ गती -- मोगुण गार वर्ग रग प्रकार ॥ मी. MOTAPAIKrisी जान ।। दो मार्गमा प्र. ना ॥२५॥ मान: मू-भागा ॥२६॥ सिंधी का कारण माग । भेर' और 'संपात' या ॥२६॥ २६ये मूत्र की माया का टूटना में अणु गगाम पहा॥ मेर थापा जिलने होय मी 31 गोय ॥२६॥ अणु पाने का कारण - मूल -भेदार ॥२७॥ अणु बनने में कारण मान । स्कन्धों का भेद यतान ॥२७॥ स्कय का कारण भेद गधात कमी बहा:- मूल :-भेद मघानाम्या पापः ॥२८॥ भापा: कारण भेव संघात बताए । आँखों से स्कन्ध विखाए ॥२८॥ द्रव्य तथा सत या लक्षण.- मूल :-सद् द्रव्यलक्षणम् ॥२९॥ उत्पाद-व्यय-धोव्ययुक्त सत् ॥३०॥ भाषा :- द्रयहि लक्षण सुन चित लाए। सत है जो सो द्रव्य कहाए ॥२६॥ सत कहिए 'उत्पाद' हिं युक्त । हो 'व्यय' और 'प्रोग्य' संयुक्त ॥३०॥ भापा:- ३. गूत्र की मारया:- नव पर्श नाम 'उस्तादातामा क्षय 'य'बिना विवाद ।। निज स्वभाव नहि यो सोय । पर्याय रितनी भी होय ।। मरतु 'घोटय गुण मोही मान । त्रय गुण गौ सय दयाहिं जान ।। से पट मिट्टी पर्याय । टूटे मिट्टी गहि दिनमाय ।। एर साथ ही तीनो धर्म यो में परिवर्लन मम ।। मात मा नहिं गर्यपा विनाश । असन न उपजे साग प्रयास ॥ निज स्वमाय महि धोई पोप । जड़ चेतन पुर कयह न होय॥३०॥ नित्य पा स्वता:- मूल :-तमायाप निरयम् ॥३१॥ भाषा:- यस्तु स्यमाय कहा 'तमाय । कुछ अविनश्यर नित्य यताय ।। तासों पुनि प्रयन पहिचान । नित्य-अनिरय दोऊ हैं जान ॥३१॥ २१ मूत्र की माया:- पट फटा-पर्याय अनित्य । मिट्टी ऐप अपेक्षा नित्य ।। निरय-अपेक्षा है सामान्य । पर पर्याय अनित्य वापान ।। एक व्यक्ति सम्बन्ध अनेक । भिन्न अपेक्षा ही प्रत्येक ॥३१॥ यस्तु य मुस्य और गौण धर्म:- मूल :--अस्तिानपितसिद्धः ॥३२॥ भाषा:- मुश्य धर्म को 'अपित' गौण हि धर्म 'अपित' रहा।। दोनों से मिल कर हो सिद्ध। यस्तु कई गुण युक्त प्रसिद्ध ॥३२॥ -
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MA - मर: पिरिणाम मपिट गुणों से गोरो पुर। सोफर से निमें गंपुरत ॥३७॥ - - पूर्व भागारमान ! १५ मा तोत्री पिन पर भागे । को गुन पनि RT 1 पहिला नादि भाषा सीमाप सपशेष ॥३॥ मामा प्रारम:- ग: गाम ॥३८॥ ना में होवे गुग पर्याय । पातु 'दस्य सो ही पहलाप ॥३८॥ गुनीभाग्या:- पाई रिनी हो पा र गाए गी गुण पाप आदिमम मान । ओr नीष पागल है मार। घयपना बानुबदलायला ही पर्याप ।। समयान मा पर्यायानगगो ' गाय पराम। गुग पान'अन्यादा मरिनहाय ॥३॥ पारम्प यापन:- मार:-चाला॥ काम दृश्य है रप विहीन । मसंप्यात, निष्क्रिय गतिहीन॥३६॥ नपणाriहीन बार अनिल परिहीन ।। धनं मागत है गोपते पाल अर्पतन होय ।।
मोराग अगर प्रगाहर पर, पाणू पर। रन राशिराम गो या तो ति काय ।। मग-अलग रिमा,महिए am म परमार अनेक ॥ गिनने सोपा प्रदेश । उसो यापन गाय रो। एः प्रदेश न दूजे जाते । राम निशिय हलाएँ।।३९। ध्यवहार माल का प्रमाग :- मूल :-सोमनागमय ॥४॥ भाषा: सो अनन्त समयों से युक्त । मूत मविप्यत नाम प्रयुक्त ॥ वर्तमान है 'समय' प्रमान । भूत भविष्य अनंतहि जान ॥४०॥ काल अश मुनिए चितलाय । सबसे छोटा 'समय' कहाय ॥ समय-समूह काल-व्यवहार । घटा, मिनट आदि चिनधारा॥४०।। गुण का लक्षण :- मूल :-द्रव्याश्रया निर्गुणा गुणा. ॥४१॥ द्रव्याश्रय से ही जो रहें । यों निर्गुण, तिनको गुण कहें ॥४१॥ परिणाम का लक्षण :- मूल :-तभावः परिणामः ॥४२॥ भापा:- सो ही पुनि परिणाम कहाए ॥४२॥ धर्म द्रव्य गति होय सहाय । तद्भावहि परिणमन कहाय ॥४२॥ (पांचवा अध्याय समाप्त) भापा :- निज स्वभाव तद्भाव बताए ।
दठा अध्याय
मायाद में वापरतानापन।
मूलः नाना मना मनोगत
भाग--पाय, पचन भर मन को दिया।
'योग' नाम सा हो होरिया ॥१॥
पाय::-
भारम दम परमागम योग' मा गोर॥
भेत निमादिग्विार, पमन, मन मोगनिपार ||
दो पर मार I 'T' मा पाए।
यम-मर्म-प-उरम मान । सज पाहवर्मनी जाम ॥
गरपान रह हा सोप । योगाभार गौर हो |
पर योगको मापद:
7:-गापय: ॥२॥
भाषा:- भारम प्रदेशहि हलपप योग ।
यात्रप हेतु कहें राब सोग ॥२॥
गरे मूत्र सीमा:-
पुष्प पारो रम प्रसार । बाप है योगदार ॥
मम पर मि मादि यो गर । पम-मार श्यों महे ।।
भारमपणापदिनम नम हो । योग महा माय गोप ॥
सप्त तोह ग्यों उस गोगाय । मलारम पोंगा पाय ॥२॥
-
मणिकरण मे, भे-
पून-मधिकरण जीवानीमा ॥७॥
मा:- अधिकरण हि आलय आधार ।
जीय गनीयहिं विविध प्रकार ॥७॥
जीयाधिकरण मे भेर-
पूलः-आप गरम्भ-रामारामारम-योग-कताकारितानुमत
कपाय विगस्त्रियस्त्रिग्यतुरीसम ||
भापा:-- यश प्रमाद 'समरम्म' नयीन ।
'समारम्म', 'आरम्म मु तीन ॥
तीन भेद पुनि मन-यच-काय ।
कृत-कारित अनुमोदन माय ॥
कोप-मान-माया अब लोम ।
इन सबसे उपजे विक्षोम ॥
सो जीवाधिकरण के मेद ।
गुणन किए शत-आठ प्रमेव ॥८॥
८
सूत्र
की व्याख्या:-
कर्मानव शत-आठ प्रकार । क्षरण हेतु माला चितधार ।।
निश्चय ही 'समरम्म' कहाय । 'समारम्भ' साधन हि जुटाय ।।
कार्यारम्भ 'आरम्भ' हि मान । भावहि साधन तीनो जान ।।
स्वय करे सो 'कृत' कहलाए । 'कारित' दूजे से करवाए।
कार्य सराहे अन्यहि जोय । 'अनुमोदना' कहावे सोय ॥
हर कपाय के चार प्रकार । गुणन विए सोलह विस्तार ॥
तीन भेद हर इक बतलाय । ये अड़तालिस मन-बच-काय।।
यो जीवाधिारण कुन भेद ! चार शतक बत्तीस प्रभेद ॥८॥
अजीवाधिकरण के भेद:--
मूल :-निर्वतेना-निक्षेप संयोग-निसर्गादि-पतुति-त्रि-
भेदा परम् ॥९॥
भाषा:-मब अजीय अधिकरण घताए ।
रचना
'निर्वर्तना' कहाए ।
रख-रसाद
निक्षेप पसान ।
मेल घस्तु 'संयोग' हि जान ।।
मेव होहिं श्रमशः दो चार ।
संयोग हि पुनि
दोष प्रकार ॥
नाम 'निसर्ग' प्रवृत्तिहि लहे ।
मन-यच-काय भेद अप कहे ॥६॥
र सूत्र की प्यास्या:-
निर्वर्तन दो भेद बखान । मूल और उत्तर गुण जान ।।
मूल दारीर, वचन, मन जान । श्वासोच्छ्वासहि सहित वखान ।।
दूजा उत्तर गुण कहलाय । काष्ट आदि पर चित्र बनाए ।
वस्तु परे बिन देसे जोय । 'अप्रत्ययेक्षित' कहिए सोय ।।
दुष्ट मनस्पिति रसे-रखाए । 'दुष्प्रमुष्ट' निक्षेप पहाए ।
पटके जत्दी-पल्दी जान । सो सहसा निक्षेप बसान ।।
साफ किए बिन मेंटे जोय । 'अनामोग निक्षेप हि सोय॥
सान-मान में मेल मिलाय । 'मुक्तपान संयोग' कहाय ॥
अन्याहि वस्तु मिलाये जान । 'उपकरणहि सयोग' खान ।
प्रय "निसर्ग' के भेद बताय । दुष्ट प्रवृत्ति हि मन,यच, काय ॥
यान व ग्यारह भेद बताय । सो अजीय अधिकरण कहाय ।।
कर्मात्रय सामान्य प्रकार । मागम में जानह विस्तार ॥९॥
बंधात ॥१०॥ ज्ञानावरण तथा दर्शनावरण कर्मों के आस्रव के कारण:- मूलः-तत्प्रदोष-निन्हव-मात्मन्तिरायासादनोपघाता ज्ञानदशं. नावरणयोः ॥१०॥ मापा:- ईर्ष्या आदि 'प्रदोष' कहाय । 'निन्हव' निज अज्ञान बताय ॥ 'मात्सर्य' निज ज्ञान छिपाए । विघ्नहि 'अन्तराय' कहलाए.॥ 'आसादना' और 'उपधात'.। ज्ञान-दर्शनावरण १०३ मूत्र की व्याख्या ज्ञान अर दर्शन के आवरण | कर्म कहे आसव पट धरण। पर समापण बाधा गाय । कर प्रयोग निज बल पंच, काय ॥ मान करे नहिं सम्यक ज्ञान । 'आसादना' कही सो जान । ता ही को यदि झूठा रहे । सो उपधात' हेतु को सहे ।। प्रदोपादिदी भेद "वसान | जिन वश मतादर्शन,गान ॥१०॥ अमाता वेदनीय कर्म आसय के कारण:- मूल:-दुरा-मोफ-सापत्रन्दन यध-परिदेवनान्यात्म-परोमयर पा. नान्य-सचिस्य ॥११॥ भाषा:- 'दुख', 'शोक' अब 'ताप' कहाए । 'आफन्दन' पुनि 'वघ' यतलाए ॥ 'परिदेवन' यह पादन मान। स्य-पर दुखी हो जा सों जान ।। राग्य फाज। सभी गनुयत रहे गिराज ॥११॥ कर्म जसाता ११ पूरी - दुराचार र दुर पाय । अषणा पर कोहो गदाय ॥ गा दोनों को ही होना बर्मा, गहिगाम भेग एम पर हमारा सामान बरे शिवार। सौरपर दुप पाये जाट तर मी दुसी महान ।। निरपर दोनों को दुसर । गो उनपरपरेश राय ॥१॥ साताविपनोर कर्मरे मामा के पारगः- দু-পবেলার বাঘমাংস খায় যাব मिति स १२॥ भाषा:- प्राणी और पसी पर बया । माम गौर 'मनुकम्पा मया ॥ 'दान' गौर संपम-सहराग। मारमशान मिन मी हो स्याग ।। मन एकाप करे पर ध्यान । मो.ही जान ॥ समा.माय सो शान्ति' यसाए । सोन घोड़ना 'सोच' कहाए । फर्मानय हो उपत प्रकार सातदिनीय मितधार ॥१२॥ दीपारा:-- गुणाभारा में पारण जान पातायनीय गो मान ॥ औषय, वार, अमर अहार दागबताया चार प्रकार॥१॥ 'योग' पहाये + १२३ गूत्र २३वे मूत्र की भारया :- सन पुरुषों को जो आदरे । मन संसार भोरता घरे । अप्रमाद, निश्छल चारित्र । नाम कर्म शुभ कारण मीत ।। तासो वदन मिले मनुहार । सुन्दर, बलयुन विविध प्रकार॥२३॥ तीर्थकर नाम फर्म के आरव के कारण:- मूल-दर्शन विशुद्धिविनय सम्पन्नता शीलवतेवन तिचारोड भीषणज्ञानोपयोग-सवेगो शक्तितस्त्यागतपसी साधु समाधि-वैयावृत्यकरण-महंदाचार्य-बहुश्रुत-प्रवचन भक्ति रावश्यकापरिहाणिर्मार्गप्रभावना प्रवचनवत्सलत्वमिति तीर्थकरत्वस्य ॥२४॥ भापा:- नाम कर्म तोयंकर शेष । सोलह कारण कहे विशेष ॥ 'दर्श-विशुद्धि' प्रथम बतलाए । 'विनय-यानता'पुनि कहलाए । दोष रहित प्रत शील विचार । 'शोलवतेषु बिना अतिचार ॥ 'पाठन-पठन सु सम्यग्ज्ञान। भगोद्विग्न संवेग' बखान । शक्तिनुसार करे जो 'त्याग' । शक्ति प्रमानहि 'तप' वैराग । .
विघ्न तपस्वी, मुनि करि दूर । 'साधु-समाधि' लहे भरपूर ।। पुनः साधु की विपदा हरे। 'ययावत्यकरण' सो करे ।। "श्री अहंत देव', 'आचार्य' । उपाध्याय, आगम शिरचार्य। भक्ति माय इन सब में होय । 'बहुत','प्रवचनमक्ति हिं सोय ॥ नियत समय,प्रतिदिन, चितलाय । पट 'आवश्यक कम' बताय॥ जिनमत 'मार्ग प्रमावन' फरे। 'प्रवचन वत्सलरव' मन परे ॥२४॥ २४वें मूत्र की व्याख्या:- दर्ग विगुट हि अग बताए । पाठ प्रकार कहे समझाए ।। शंका हीन निशकित होय । 'निष्काक्षित' इच्छा विन जोम ॥ मम्यक दर्शन-ज्ञान-चरित्र । भरे हुए भार पवित्र ऊपर दिहि बसुन्दर जान । तो भी विरति न मुनि प्रतिमान | खेद न तनिक हृदय में आप । 'निविचिकित्सा' अग महाय । किषित नहि मिथ्या प्रदान । सो अमूढदृष्टिता' जान । मन दोष नहिं सहि बताय । सो ही 'उपगृहन' कहलाय ॥ - ९४ ) अन्तराय कर्म के आन्नब के कारण:- मुल:-विघ्नकरणमन्तगयस्य ॥२७॥ भाषा :- दानहि, लाम, भोग, उपमोग । पंचम वीर्य कहें सब लोग ॥ इनमें विघ्न करे जो कोय । अन्तराय कर्मास्रव होम ॥२७॥ २७वें मूत्र को ट्याम्या:- पांचों में से .रोके मोय । सोइ नाम कर्माखव होन दान ममय यदि विघ्न लगाय । कर्माधव 'दानान्तराय ता का हो अनुमाग बिगेप । माग सप्त कमो में शेप इमो भाति सव ही में जान । कर्मासव हा निश्चय मान ।। - (छठा अध्याय समाप्त)
सातवाँ अध्याय
इस अध्याय में प्रतादि का स्वरूप बतलाया गया है।
माया स्वरूपः-
मूला-हिंसाग्नत-म्तयाब्रह्म परिग्रहेम्मो विरतितम् ॥१॥
भापा:-
हिसा',
', 'अन त' और 'स्तेय'।
'मह', 'परिग्रह को तन देय ।।
त्याग नियम ले निश्चय ठान ।
व्रत सो मन-संकल्प बखान ॥१॥
ले मूत्र की पाल्पा:-
पर दुख देना हिंसा' होय । 'अन्त' शूट हे सम कोय ।।
चोरी ही 'स्तेय' कहाय । और कुशील 'अब्रह्म' बताया।
धन-दौलत-भोगहि अति प्रीत । सोइ 'परिग्रह कहिए मीत ।।
पाप-विरक्ति विरति कहताय । आगम में सो व्रत मतलाय ।।
धर्म अहिंसा सर्व प्रधान । सा ते कथन प्रथम ही जान ।।
अन्य धर्म चव बाढ़ समान । रक्षा करले धर्म महान ॥१॥
-
-
व्रतों के भेद'-
मूलः-देश-सर्वतोऽगु-महनी ॥२॥
भाषा: एक देश 'अणुव्रत' है
मान।
पूरा स्याग 'महावत' जान ॥२॥
२सरे
मूत्र
की व्याख्या:-
कुछ वस्तूं, कुछ काल प्रमान । त्याग सोइ 'इक देश बखान ॥
अपवा 'अणवत' कहिए सोय । आजीवनहि 'महावत' होय ॥२॥
अमृत (असत्य) का लक्षण:- मूल-असदभिधानमन्तम् ॥१४॥ भापा: पात कष्टप्रद पर को होय । है असत्य या 'अन त' सोय ॥१४॥ १४वें मूत्र की व्याख्या:- मिथ्या झूठ कहैं सब कोय । कटुक सल भी मिथ्या होय ॥ काने को यदि काना कहे । यम-वाण सम ताको सहे ।। हिंस्र वचन है असन समान । स्व-पर दुखी हो जासों जान ॥ धर्म अहिंसा सर्व प्रधान । अन्य चार रक्षार्थ बखान ॥१४॥ चोरी का लक्षण - मूल:- अदत्तादान स्तेयम् ॥१५॥ भाषा: बिना दिए पर वस्तु उठाए। चोरी या स्तेय फहाए ।।१।। १५वे मूत्र की व्याख्या विन अनुमति मान । बुरे भाव गह लेवे जान ।। रहे अप्राप्य, प्राप्त या होय । चौर्य वृत्ति हो जानो सोय ॥१५॥ अग्रह्म का लक्षण:- मूला-मैथुनमब्रह्म ॥१६॥ रति-सुख-हेतु क्रिया,ही मान । है अग्रह्म या मथुन जान ॥१६॥ मूत्र की व्यास्पा:- महिंसादि पालन हित काम । सो ही शाहिए ब्रह्म सलाम ।। पर वस्तू. भापा:- मेमनादि का बापा होर पार्य मास कहा मोर ।। चारित मोह उपयका जाय । नी गुर समागम होय ॥ जा में रनि-गुग हेतु प्रधान । मैपन मां पा जान ।। पभी-भी पुग्पविनार । सपा से स्त्री पिलपार ।। या मेरा सप मान । सब मनन पुन जान ॥१५॥ परिषद का मान- भूर-मूदी परिपाः ।।१७॥ माय ममायहि मूण्ा कहा । नाम परिपह, दूना सहा ॥१७॥ १ये की मारा:- मूद अर्थ यहाँ धीमान । मनाना नहीं है मान॥ बाए यस्तु मे हो मनि पाय । मूल्यों गोड परिग्रह भाव ।। ममता वन-शान चरित । नहीं परिग्रह मूग्या मित्र ।। तृष्णा यह गांट नहि दाम । अंत भाप परिह नाम ।। मांग प्रमनहि मन-पत्रकाप म पार पारण रसलाय ॥१७॥ वतीबापरूप:- मूल:-निः पल्लो प्रती ॥१॥ माया मिथ्या और निदान। सत्य रहित प्रय, प्रती महान ॥१८॥ १८मूत्रकी साम्या:- यही तीनों दुरादाय । मस्य रहित सो वतीनहाय ।। t... He ram Irr armr Immm॥
भापा:- - मा, यम और काय पुष और । 'माया' शमी में सिरमौर ॥ नाहि होय सत्यहि अज्ञान । मिम्यादर्शन राय' बगान ।। विषयासति निदान' महाय । पूरा रामान सभी दुखदाय ।। सोनो शल्य हृदय नहि जोय । सम्यक बनी कहावे सोय ॥ जग-एल-हित पधारण परे । भोग पाइ मा मन में घरे ।। भेप भी हो साधु समान । प्रती कदापि नसाको जान॥१८॥ प्रतीके भेद:- मूल.-अगायनमारश्च ।।१९।। व्रत पालक दो भेद बखान । गृह में यास 'अगारी' जान ।। गृह त्यागी 'अनगारी' कहा । मुख्य विभेद प्रवृत्तिहि रहा ॥१९॥ अगारी प्रती का स्वरूप:- मूलः-अणुव्रतोऽगारी ॥२०॥ एक देश अणुवत ले पांच । ता ही नाम 'अगारी' सांच ॥२०॥ २०वें सूत्र प्रस जीवो की हिंसा याग । त्याग 'असत' वश ईर्ष्या राग । ले ग्रत नहिं पर वस्तु चुराए । 'अचौर्याणुवती' तजे भोग पर-स्त्री जोय । 'ब्रह्मचर्याणुव्रती' सो होय ।। सोमा धन, भोगादिक जान । अणु व्रत सो 'परिग्रह परिमान' ।। पांचों अणु वृत पाले जोय । नाम अगारी' सार्थक सोय ॥२० भापा:- की व्याख्या:- कहलाए।
+ - गण ft in और। ofry * fratr 11 for wran.inft मा । गमनाहिशोमान | पm - मर गोरा मा मात्र पर Tifar', Hindiराम'। faran हिमागासमोर पनि । 'प्रतिविमिति मार ॥२१॥ Har fort मान || 14. Merit Per. गो RATimittari traal airi Hit , र.34॥ ARTIERRER गुमान | गरिमा Ant rint मोक। nt tin | बाजी Irfi -भूमि गए ।
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मो सब कर्म 'प्रमाद चरित्र' । दण्ड अन तीजा मित्र ।।
विष,शस्त्रादि हिस सामान । दिए कहावे 'हिमादान'।
पाप वृत्ति हो सुने, सुनाए । कथा 'अशुभ श्रुति'सोइ कहाए ।
इनका त्याग करे जो कोय । विरति-अनर्थ-दण्डयन' सोय 11
समय नाम आतम का जान । आत्म यान'सामायिक' मान ।।
करे समायिक सन्ध्या तीन । श्रावक सो व्रत में परवीन ।
अशन, भक्ष्य,लेह्य अरु पान । त्याग करे आवासहि जान ।।
पचेन्द्रिय निज तहिं विलास । रहे उसी, सो उपचास ॥
अष्टम अरु चौदस तिथि चार । प्रतिमासहि उपवास विचार ।।
पर्व दिवस ही प्रोषय होय । वृत प्रोग्यासहि सोय ॥
इसादिक अरु भोजन पान । एक बार ही 'भोग' वसान ।
भोगी जावे बारबार । वस्त्राधिक परिभोग' विचार ।
वृत इनका मन सीमा ठान । 'परिभोगोपभोग परिमान'।
तिथि निश्चित नहिं जाको जान । वृतो अतिपि को देवे दान ।
'अतिथि-संविभागहि-वृत' सोय । पाले वृती अगारी होय ।
औषध, शास्त्र, अभय, आहार । 'अतिथि स विभाहि वत'चार।
पच वृतो में दृढता लाए । विरति तीन 'गुणवत' कहलाएँ ।।
आत्म सयमन हेतु विचार । अतिम हैं शिक्षावत'चार ॥२१॥
सल्लेखना का वर्णन:-
भूल:-मारणान्तिको सल्लेखना जोपिता ॥२२॥
भापा: मरण काल को निश्चित जान ।
सल्लेखना मनहि ले ठान ॥
स्थान-पान, मोहादिक तजे ।
काय, कपाय कृशे, प्रभु मजे ॥२२॥
गूत्र आयुर सारगमगर मोटर मापु हाने मीत ।। निपटा कर अनुमान । तर भोगन पान ।। रामग. जामोद मासे मम मार हटाए । प्रारम मा परे । हिमपा पार करे ।। मनहर निम्पित हर मान िकरिए सोय ॥ गग,रेप का आराम विभादिकगाए॥ भारमपात गोहोरो मान बर है भू-गगन गमान । आगमगी यदि पर मैं हय । बानु मन बघावं मोर मरण नाम में गोतममान । धर्म अस्म गहे, समान । पेनमा पटे बिपार घुमति हो परलोकमगार ॥२२॥ अरती के दोषोः- (तिगारो) मा विवेचन करते है। मम्मान असिपार:- मन.-ग- वितिगाष्टिपासा सस्या सम्पादतिधाराः ॥२३॥ भाग:- सम्यक रशंन के अतिचार । अपया दोष सुनह चितपार ।। आगम द्विविधा 'का' मान । मोग चाहना 'कांक्षा' जान ।। पता दुखो, रोगी से होय । अप्रविविस्मिा' कहिए सोय ॥ मन मिप्यारय करे सम्मान ।
तारिया गे मोगररे।
'पटिका गंतव' करे ॥२३॥
मोपरगनिहtfirm TI TIme
और rair-
मूल -पा-मोरोपमा ययारम !! १११
भाषा: यत अर शील काहे अतिचार ।
पांच पांच क्रमशः चितभार ॥२४॥
गत गोल, पन पग चिनार ! के भनिनार ।।
हिगादि बन पन महान मन गो गम जान ॥२४॥
अहिमाणु बन के अनिचार
गुल बन्यवध-दानिभारारोपणानपाननिगंया. ॥२१॥
भाषा: जीय'', 'वध'अयया'छेद।
यत अतिचार अहिंसा मेद ॥
चय 'अतिमारारोपण' जान ।
पंच निरोध हो भोजन-पान ॥२५॥
२५ये मूष को व्यान्या -
पिजरा या मूटादि बंधाए । पशु-पक्षिन की, 'बन्ध' कहाए ।
कोटे, बेतादिक को भार | कहलाये सो 'वध" चितधार ।
वध के अर्थ न हया यह । हत्या विरति हुई, वन जहाँ ।।
कान, नाक, पूछादि कटाए । अतिचार हि मो 'छेद' कहाए ।
बहुत अधिक लादें सामान । सो 'अनिभारारोपण' जान ।।
चारा ठीक समय न खिलाए । 'अन्नहि पान निरोध' कहाए
सो पांची ही हैं चितधार । अहिराागवत के अतिचार ॥२५॥
[णु वन के अतिचार:- -मियोपदेश-रहोम्याम्यान-कूटलेसनक्रिया- न्यामापहार-माकारमत्रभेदा. ॥२६॥ :- 'मिथ्योपदेश', 'रहोस्याख्यान'। 'लेखन-कूट-क्रिया' प्रय पान॥ चव 'न्यासापहार' चितवार । पंचम 'मत्रमेद-साकार' ॥ मो भविजन मन लीजे धार । हैं सत्याणु प्रतहि अति चार ॥२६॥ अहित उपदेश प्रदान । सो 'मिथ्योपदेश' है जान ।। युगल रति करहि बरहान! आशाम मोइ "रहोम्यारयान' ।। चार पर देय फंसाए । 'लेखन-फूट-क्रिया' कहलाए ।। क धरोहर देवे कम । सो 'न्यासापहार' विभ्रम ॥ वश पर बात बताय । 'मत्र भेद साकार कहाए ॥२६॥ र्याणुव्रत के अतिचार- --स्तेनप्रयोग-तदाहृनादान-विरुद्धराज्यातिक्रम- हीनाधिकमानोन्मान-प्रतिस्पफव्यवहारा ॥२७॥ :- स्तेन-प्रयोग' प्रथम है जान । दूजा सो 'तदाहृतादान' । 'विरुद्ध राज्यातिकम'। चोर-बजारी, आदिक, भ्रम ॥ चव 'हीनाधिक मांनोन्मान'। - . प 1 । त्रय + - 112100
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गार निर्माना TET-Trir ?॥
भगद
विकार
पूर-कन्दा को मौसमीपारमा भाग
परिमोगानगपानि ॥३२॥
भापा: 'कोत्पुच्य', 'कन्दपं' वताए ।
अह तीजा 'मोस' कहाए ।
'असमीक्ष्याधिकरण'चम अर्थ ।
'उपमोहि परिमोग अनयं'.॥
'कन्दरी हि है वचन अशिष्ट । बोकुष' मा क्रिया अशिष्ट ।
पिना विचारे करे विवाद । सो मोग' बढ़ा बवाद ॥
बिना प्रयोजन करना काम । 'अगमीक्ष्याधिकरण' है नाम।
सग्रह करना अधिक निरर्थ । 'उपभोहि परिभोग अनयं' ।।
सो अनर्थ दण्डहिं अतिचार | मग में रखिए भव्य विमार ॥३२॥
सामापिसके अनिवार:- पूर: योगदुप्पणियानानादर-मत्यनुपस्थानानि ॥३३॥ भाषा:- सामायिक अतिचार बखान । काय, वचन, मन 'दुष्प्रणिधान' ।। चव अतिचार 'अनादर' सोय । 'स्मत्यनुपस्थापन' पंच होय ॥३३॥ ३३३ सूत्र की व्याख्या -- यदि शरीर निश्चल ना होय । बोले मंत्र अशुद्ध हिं जोय ॥ सामायिक में चित न रमाय । हो कपाय वश इन-उत जाय ।। प रोगो का दुष्पणिधान । शिथिल अमुहि, चचल जान ।। क्रिया समायिक, श्रद्धा नाय । सोइ 'अनादर' है कहलाय ।। नित्य-क्रियादिक,पाठ मुलाए । 'स्मृत्यनुपस्थापन' कहलाय । पांच दोप सोही वितधार । सामायिक के हैं अतिचार ॥३३॥ प्रोषधोपवास व्रत के अतिचार:- मूलः-अप्रत्यवेक्षिताप्रमाजितोत्सगांदान-संस्तरोपक्रमणानादर स्मृत्यनुपस्थानानि ॥३॥ भाषा:- बिन देखे, बिन शोधन मान । मल-मूत्रादि विसर्जन जान ।। सामग्री, वस्त्रादि उठाय। आसनादि मा देय विधाय ।। करे अनादर, क्रिया भुलाए । उपवासहि अतिचार बताए ॥३४॥ भूख, प्यास वा आदर नाय । यत आवश्यक क्रिया मुलाए ।। नन्तु न सस सब क्रिया विचार । प्रोषधं उपवासहि अतिचार। - - स . . - . - + - . + . -- , - . - . है * , ' ' . + 1 ." - are, A 15 माला को कर ममोरयापि पnिsai it.:: :: An नाविकार दर 18IRE 44. HERE'म ।। मर र निtituttar ॥ गोदावार RELEPHuntil . .
(१५) ६३ मूत्र की प.रूमा रे पत्र पर दे आहार । अथवा ता सों के विचार ।। वय न दे पर दे दिलवाए । सो ही 'परव्यपदेश' कहाय ॥ दिर सहित न देव दान । ईर्ष्या औरो के प्रति मान । समय मुनि देवे आहार । अतिथि सविभागहि अतिचार ॥३६॥ लेखना के अतिचार:- ल:-जीवित-मरणाशंसा-मित्रानुराग-मुखानुबन्ध-निदानानि ॥३७॥ पा: जीवित मरणाशंसा दोय । मन मिहि अनुराग समोय ।। सुखानुवन्धन और निदान । सल्लेखन अतिचार बखान ॥३७॥ सूत्र को व्याख्या:- एक बार कर ले व्रत धार । फिर भी हो जीवन से प्यार ॥ तीचार सो पहला होय । जीवन इच्छा कहिए सोय ।। रोग आदि कष्टहि पवड़ाए। शीघ्र मरण इच्छा मन लाय ॥ सो दूजा अतिचार बखान । 'मरणाशसा' ता को जान ।। के साथी मित्र । पूर्वहिं भोगे भोग विचित्र । चनन सो मित्रहिं अनुराग' । 'सुखानुबन्ध' सुखो से राग ॥ लोग चाह परलोक हिं होय । पंच निदान' कलावे सोय ॥ सो पांचों मन लीजे पार ! सल्लेखना व्रतहिं अतिचार ॥३७॥ वेल-कूद.
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प्रवाद हावापार ॥३॥
धनिधि-विभागसनिार-
मन-मनिलोपारिधान-मया मागमा
भापा:- सचित निक्षेप तयापिधान'।
रले, के पत्तों से जान ।।
'पर यहि नो देवे दार' ।
या 'मारमम' ताहि में मान ।।
असमय काल-अतिकम' सार।
hirt Fमाग हि भतियार ॥३६॥
१६ष
हरे पत्र पर माहार । अयमाता गो हो विगा।
सन पर विवाए । गोही 'पापा' पहा ॥
मार हिमन दान। औरो के प्रति मान ।
यगमय मुरियाहार । तिधि गरिमार्गाह भनिगार ॥३६॥
गम्बराना के रिमार:-
भूमः-गोविन-मरणागंमा-मित्रानुगम-गुगानुवन्ध निदानानि
॥३७॥
भापा: जोषित मरणाशंता छोप।
मन मिहि मनुराग समोय ॥
मुखानुयन्धन और निदान ।
सत्सेवन अतिचार यसान ॥३७॥
२७२
गून
पीपारगः-
रामधार कर मस धार । फिर भी हो जीयन गे प्यार ।।
• तीमार सो रहमा होप । जीवन इन्छा महिए सोय ।।
रोग मादि कष्टहि पाए । शीघ्र मरण या मन लाय ।।
सो मा यतिधार बगान । 'मरणाशमा ता की जान ।।
गेल-पूर के सापो मित्र । पूर्वहि भोग भोग विचित्र ।।
जितनगो मित्रहि अनुराग' । 'गुणानुबन्ध' सुनोगे राग ।
भोग पाह परलोक हि होय । म निदान' बहलाये सोय ॥
सो पापी मन लीजे पार । राल्लेसना प्रतहि अनिपार ॥३७॥
- + - + 1 , " - . 41 42ntatin || | IFIM 11 म14: ₹ना।11111111ttill 97141HE मन-diarat Tinar प्रतिर पर aima 'जान',गंना॥ सीना पानी' घोया 'मोहनी' ही मान ।। 'मायु','नाम'सनगारपाय । 'राम' अष्टन दुरादाय ॥४॥ 'ज्ञानावरण' को मान । नाकाम'ही असान ।। वंदनीय' वा मुम दुखाय । मोरना' मां, मौद गाय ।। 'आयु'-मायु निर्धारित करे। 'नाम'-यन, अगालियर।। उच्च, नीष पुल जामो हाप । मे 'गोत्र' कामात गाय ।। दानादिस मे विन लगाम । गोही 'मनगर' पहनाय ।। भोजन बासिवायो सारा अस्थि, माम, मस-मूग याय ।। स्वामी ममं ति मर्मविनधारा (१२१ ) - इन आदों कर्मों की उत्तर प्रकृतिया.- मूल.-पञ्च-नव दुयप्दाविशति-चतुद्धिपत्यारिगद द्वि- पचभेदा पथारमम् ।।५।। भाषा: पुनि प्रभेद माठों के कहे। पंच, नौ, धो, अट्ठाइस लहे ।। चार, बयालिस, दो, पंच मान । सो प्रभेद हैं क्रमशः जान ॥५ पहले मानावरण वर्म के पांच भेद मूप:-मनि थुनावधि-मन' पर्यय केवलानाम् ॥६॥ मापा:- ज्ञानावरण पांच है मान। मति,श्रुत,अवपि प्रथम त्रय जान ।। मन-पर्यय चव, फेवल पंच। ज्ञानावरण न संशय रंच॥६॥ मूत्र की व्याख्या.- इन्द्रिश मान न मन में आए । सो मतिज्ञानावरण कहाए । मात्र पटन पर भी नहिं जान । थुत ज्ञानावरहिं सो जान ।। भूत-भविष्यत ज्ञान न होय । अवधि-ज्ञान-बावरहिं सोय ॥ जात न हो पर मन की बात । मन पर्यय आवरण पहात ॥ पूर्ण ज्ञान को रोके जोय । केवल भानावरहि मोय ॥६॥ दूसरे दर्शनावरण कर्म के ९ भेद:- मुल:-चारचक्षुरवधि केवलानां निद्रा-निद्रानिद्रा-प्रचला. -- 1 . येनोप यश गुग-युग हो । भानु मागेके जोय ।। अन्य कर्म भीगी प्रारमिन-भिनपानापार ।। कर्म स्पमा प्रहगोमात । यायममय हो 'जान ।। तोत्र, मद फन नगि. पिवार । गो 'अनुभाग-य' चितपार ।। कर्म प्रति भर आम प्रदेश । गम्या मिलि हो यप विभा॥ आत्म, कम गत दूध गमान । किन हो यध प्रीति जान ।। ती मन्द जस पांग, कपाय नम गोम अन्तर आय।। 'प्रानि','प्रदेशहि योग यताय । स्थिति पर 'अनुभाग कषाय !! प्रति गघ दो भेद बनाय । मूल अगर प्रति कहाय । मूल प्रकृति के आट प्रभेद । उत्तर शत अनालिस भेद ॥३॥ मूल प्रति घघ के आट भद.- मूल.-आयो शानदर्शनावरण वेदनीयमोहनीषायुर्नाम- गोत्रान्तराया: ॥४॥ मापा:- प्रकृति बंध अठ मेद बताए। 'जान', 'दर्शनायरण' यहाए । तीजा 'वेदनीय' है मान । चौथा 'मोहनीय' ही जान ।। 'आयु','नाम'सत गोत्र' कहाय । 'अंतराय' अप्टन दुपदाय ॥४॥ 'ज्ञानावरण' ढके जो शान | 'दर्शनावरण'-न हो श्रद्धान ।। 'वेदनीय' वश सुख-दुख होय । 'मोहनीय' सो, मोहे जोय ।। 'मायु'-बायु निर्धारित करे । 'नाम'-वदन, अंगादिक घरे।। उच्च, नीष कुल जासो होय । कर्म 'गोत्र' कहलावे सोय ॥ दानादिक में विघ्न तगाय । सो ही 'अन्तराय' कहलाय ॥ भोजन आदिक को न्यो साप । अस्थि, मांस, मल-मूत्र बनाय॥ त्यों ही कर्म प्रकृति अनुसार । अष्ट कर्म बंधते चितधार ||४|| .(१२१) - दन आठों को उत्तर प्रतियो:- भूत-पञ्च नव द्वयष्टाविंशति-चतुद्धिपत्यारिणद् द्वि- पचभेदा यथारमम् ॥५॥ भाषा:- पुनि प्रभेद आठों के कहे । पंच, नो, दो, अट्ठाइस लहे ।। चार, बपालिस, दो, पंच मान । सो प्रभेद हैं क्रमशः जान 112॥ पहले भानावरण एम के पांच भेद- मूकः-मति श्रुतावधि मन. पर्यप केवलानाम् ।।६ मापा:- ज्ञानावरण पांच हैं मान । मति,युत अवधि प्रथम त्रय जान ।। मन-पयंप चव, केवल पंच । शानावरण न संशय रंच ॥६॥ गूत्र की व्याख्या.- इन्द्रिग मान न मन में आए । सो मतिज्ञानावरण कहाए । मात्र पटन पर भी नहिं ज्ञान । श्रुत मानावरणहि मो जान ।। भूत-भविष्यत ज्ञान न होय ! अवधि-मान-आवरणहिं मोय ॥ नान न हो पर मन की बात । मन पर्यय आवरण यहात ॥ पूर्ण ज्ञान को रोके जोय । केवल ज्ञानावरहि सोय ।।६।। दूसरे दर्शनावरण नर्म के ९ भेदः- मूल-चारचक्षुरवधि-केवलानां निद्रा-निद्रानिद्रा-प्रचला- प्रचलाचला स्त्यान गद्धयश्च ॥७॥ L - ( १२.) येस्लीय गग मुग-रोग। आप मागेके जोय ।। अन्य कर्म भोगी प्रार। भिन्न-भिन्न कानापार || पर्म स्यमा प्रतिगोमाग । म ममयो 'पिरजान ।। तोत्र, मद फल कति पिचार । गो 'अनुभाग-यप वितधार ॥ कर्म प्रकृति र आत्म प्रदेश । गामिल हो यप विर॥ आरम, कम ना दूप गमान । ति हो या प्रगति जान ॥ ती मन्द जस योग, कपाय म यमों में अन्तर आय ।। 'प्रति','प्रदेशहि योग यताय । 'यिन' अर 'अनुभाग कपाय ।। प्रकृति नघ दो भेद बनाय । मूल अब उसर प्रकृति पहाय ।। मूल प्रति यो आठ प्रभेद । उत्तर शत-प्रतालिस भेद ॥३॥ मूल प्रकृति वध के आठ भेद मूलः-आयो शानदर्शनावरणवेदनीयमोहनीयायुर्नाम- गोत्रान्तराया: ॥४॥ प्रकृति बंध आठ मेद बताए । 'जान', 'दर्शनायरण' कहाए । तीजा 'वेदनीय' है मान । चौथा 'मोहनीय' ही जान । 'आयु','नाम'सत'गोत्र' कहाय । 'अंतराय' अप्टन दुखदाय ॥४॥ 'ज्ञानावरण' ढके जो ज्ञान । 'दर्शनावरण'-न हो श्रद्धान ।। 'वेदनीय' वश सुख-दुख होय । 'मोहनीय' सो, मोहे जोय ।। 'मायु'-आयु निर्धारित करे । 'नाम'-बदन, अंगादिक धरे।। उच्च, नीष कुल जासो होय । कम 'गोष' कहलावे सोम । दानादिक में विन लगाय । सो ही 'अन्तराय' कहलाम ॥ भोजन आदिक को न्यो साम । अस्थि, मांस, मल-मूत्र बनाय ॥ स्यों ही कर्म प्रकृति अनुसार । अष्ट कर्म बघते चितधार ॥४॥ भापा:- और मोहनीर २८ :- चम-दान मारित्रहनीपारपारपानीमाम्याग्नि मिशः गरियार अपाय-पायो हानिनोर मप मागा. कोयनामा अनन्नानुनमायापान प्रयायानगम्यमनविसम्मानिय शेष मान- माया नोभा मोहनीय थे मुनिए यो मुनिए मित्र मुग्प भेद संग, चारित वरांन मोहनीप पर जान। भेद प्रयम 'सम्यगर मसान। दूमा सो मिपारय' यताए । प्रय सामिप्याय' कहाए । धारित मोहनीय से दो मान । को-कपास-येरन' मो जान। हास्य, बरति, रति, गोरुयान । मय, पुनि पट जुगुप्सा जान । स्त्री-पुरव-नसर 'पेदनीय अपाहि दूमा 'येदनीय सकपाप। ता के सोलह मेद बताय ।। भोप, मान, माया गर लोग। अनन्तानुवन्धी चय क्षोम ॥ येव ।।
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सीगर बम बनाय -
मना-गरम॥
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साता और असाता जान॥
मुगानुमय हो साता' कान ।
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मोहनीय के मुनिए मित्र।
मेर न, पालि॥
दगंन मोहनीर पर मान ।
भेर प्रदम म्याच' मतान।।
दूना मो निपार पाए ।
प्रय गामिम्बार' पहाए ।
पारित मोहनीय हो मान ।
नो-पारमान नौ जाग ।।
हार, यामिति, गोपान ।
गर, पुतिन पटनगुप्ता नान ।।
स्त्री-पुष-गगर
'येदनीय घरपायहि मे ॥
दूमा
विशनोपः सहपाय।
सा के सोलह मेट यताय ।
घोप, मान, मापा भद
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मा नो पानी भरपामा बरनीय गताय॥
जवागत धमनीमा ननन ॥
नागो पुकार चार बनाया नि
कर ननिक दिगाम वरण । गाः
अपयाम्पानापरण।
मा वर्णन गाम हो । प्राय गोग।
गरम के मंगजनी गाय । गाही, मान यात्र
पाषादिक से ही सपाय | नी काय, निशपाय ॥
बुना सामीण इतराय । ता दिइशारे पर दर जाय ।।
नो कपाय भी गांद ममान । किन पाप निया जान।
समे अधिक प्रथम बसवान । दूनी होय अधिक बलवान ।।
अप कपाय बलवान बहाय । प्रमशः घर बनतीन सपाय ॥
धरित मोह के भेद पपीस । दर्श मोह मिस अट्ठाईस ॥९॥
( १२५ ) पांचवें पाप प म फे, ४ भेदः- मूल:-नारक-नग्योन-मानुष्य-देवानि ॥१०॥ भाषा:-- आयु कर्म चय नेर यताए। नारक अर तिर्यञ्च पहाए । मानुप्यायु तोगा, पय देय । सो फर्मानुसार गुन सय ॥१०॥ १० मूत्र यी धारया:- होने पर जीवित पहलाए । अरु अभाव में मृत्यु वताए । भव धारण मे कारण जोय । भविजन 'आपु' कहावे सोय ।। यायु कर्म या गतियां चार । निश्चित हो उक्त प्रकार ॥१०॥ छ नाम कर्म को ४२ प्रकृतियां: मूल.-पति-जाति-शरीराङ्गोपाङ्ग निर्माण-बन्धन-संघात-सम्यान- महनन-साशं रस-गप-वर्णानुपूर्खागुरुलघूपधात-परघाता- सपोयोगीच्छ्वास-विहायोगतयः प्रत्येक भारीर-रा-मुमग मुम्बर-शुभ गूदम-पर्याप्ति स्थिरादेय-यशः कीति-सेतराणि तीपंकररव च ॥११॥ भाषा:-- नाम फर्म है न्यालिस मान । "गति'पुमि'जाति',शरीर बखान । 'अंगोपांग तया 'निर्माण'। 'बंधन', 'सघातहि', "संस्थान' । 'संहनन', स्पर्शहि', 'रस', 'गंध' । 'वर्ण', 'आनुपुरयं' हि हैं धंध ।। पुनः 'मगुरुलघु अरु 'उपघात' ।
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1 टे मून की व्यास्या:- दम्रो धर्म का उच्च स्वरूप । उत्सम सहित मुहाए अनूप ।। कोष काज पर 'क्षमा' प्रदान । गर्व होनता 'मार्दव' जान ।। मन-वच-काय कुटिलता तजे । सो ही 'आज' गुग मे सजे ।। 'सोच' कहाष लोभ अभाव । मुन्दर सन्य' वचन मुख लाव ॥ राग हीनता सपम जान । इन्द्रिय, प्राणि भेद दो मान ।। अन उपवासाहितप' बतलाए । तजे परिपह 'स्याग' कहाए । सरीरादि में ममता नाय । सो 'आकिचन' धर्म कहाय ।। स्त्री-विषय आदि में राग । 'ब्रह्मचर्य में इनका त्याग ॥६॥ बारह मनुप्रेक्षा (भावना):- मूल:-अनित्याशरण-ससारेकरवान्यत्वागुच्यानव-मवर निरा. लोक-बोधिदुर्लभ-धर्मस्वागत-तत्वानुचिन्तन-मनुप्रेशा ।। भाषा:- बारह अनुप्रेया चितधार । सो अनित्य','असर', 'संसार' । 'एकत्वहिं 'अन्यत्व' यताय । माहिं 'भवि धूणित है काय ।। 'आय', 'संघर' अरनिर्जरा'। 'लोक', 'बोधिदुर्लम' है घरा ॥ धर्म हि स्वास्यातरम' सान । भावनाएं संवर हिम जान ॥७॥ ७ मूत्र की माल्या.- मारक अनमा विख्यात मनहि भावना हो दिन रात । 1
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- . मूर:-एसजिने ॥१॥ भाषा: सहें परोपह जिन मगयान । अधिकाधिक ग्यारह ही जान ॥११॥ ११वें मूत्र की माम्पा:- पार पानिया पर्म अभाव । वेदनीय या दुष सद्भाव ।। र परिषद गंभव जान । अधिकाधिक तेरह गुणपान ।। भूरा, प्याम अगमी, गोन । 'दम मसफ' अ 'पर्या' मीत ।। पम्पाप, मल, रोग यमान 1 'तृणा' गव ग्यारह जान ।। मोहनीय का उदयं न होय । शक्तिहीन है परिपह सोय ।। वेदनीय पृष् उदय विचार । वही परोपह सो उपचार ।। गतिहीन विषरे सम जान । पहने ही मर मो सो मान॥११॥ मूल:-दादरसाम्पराये सर्वे ॥१२॥ भापा: 'बादर साम्पराय गुणयान । पद से लेकर नौ तक जान ।। स्यूल कपाय सहित हैं सोय । समी परोपह इनमें हॉप ॥१२॥ प्रिम के उदय से कौन सी परोपह होती है (१६ मूत्र - मूल.-जानावर प्रजामाने ॥१३॥ भाषा:- शानावरण कर्म से मान । परिपह 'प्रता' अरु अनान ॥१३॥ १३३ मूत्र की व्याख्या:- निज पाहिय गर्व नहि होय। 'प्रमा' परिषद जीते सोप ।। यभानी कह दे धिक्कार । मम में तनिक न होय विचार ।। नान प्राप्ति में ही दे ध्यान । जसी परोपह सो अशान ||३||
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भापा- बाह्य तपहिं पट भेद बताए । 'अनशन', 'अवमोदर्य' कहाए । तीजा 'यत्तिपरीसंख्यान'। चौथा रसपरित्याग' बखान ।। पंच विविक्त शय्यासन' रहा। 'काय क्लेश'तप अंतिम कहा ॥१६॥ चितधार॥ १९वे मूत्र की व्याम्या - मुख्य भेद तप के दो मान । 'बाह्य' और 'अभ्यतर' जान ।। पुनि पट भेद प्रत्येक विचार । सो करते मुनिए यश धनादि फल चाह न जान । सयम मिद्धि हेतु ही मान । भोजनादि को त्यागे जोय । 'अनशन' तप को पाले सोग । ताहि हेतु ले अल्पाहार । 'अवमोदय' सहि चितधार ।। मुनि आहार नियम मन ठान । सो तप 'वृत्तिपगैसस्यान' ।। दूध दही, घी, मीठा, तेल । नमक त्याग रस परियह झेल ।। दमन करे रसना जो कोय । 'रस परित्याग' करे तप सोय ।। ब्रह्मचर्य साधन, स्वाध्याय । जतु विहीन जगह में जाय ॥ आसनादि एतस्थान । मो 'विविक्त दाप्यासन' जान ।। वटा तले गर्मी में जाए । शीत गुले मे ध्यान लगाए । पष्ट सहन का हो अम्याम । 'काय बतप कटिन प्रयास ।' ह्य दिया जाने रात्र कोय । कहे याह्य तप ताते सोय ॥ पमा मद साधा जाए। 'परियह सोइ अचानक आए।।१९ दी ध्यान ॥ । धुत फेयली सहें पुनि मान । पर्म,आदि सुरसहि दो ध्यान ॥३७॥ गून की धाररा:- पौरह पूर्वहिं माता गोय । धुन कवली कहावे सोय ।। अष्टम से वादम गुणपान । होते मादि शुक्ल परते समय पंणि हो ' पमान याद में शुरनहिं मम ॥ मुस्तान पर भेर यगान । दिया गूत्र उन्तालिस जान ||३|| पूप.-परे कलिनः ॥३८॥ भापा:- शेप मुक्त दो करहिं प्रयोग। सो केयली सयोग, अपोग ॥३८॥ ३८ मूत्र बीयावा:- मुनि जो है तेरह गुणपान । तिन्हें सयोग येवली जान । जो चौदह गुणपान हिं पाए । सो योग केवली पहाए ॥३॥ शुक्न ध्यान के भेद- मूल स्वरवपित गममणियाप्रतिपाति ध्युपरतत्रिया- निवानि ॥३९॥ मापा.-- शुक्र ध्यान व मेद बताए। इक "पृयकत्ययितर्फ फहाए । -पुनि एकत्य वितर्फ बसान । सूक्ष्मक्रिया प्रतिपाति हिमान।। 'ट्युपरत क्रियानिति हि अंत। लक्षण नाम समान सहंत ॥३६॥ - ।
( १५४ ) सयत रौद्र ध्यान नहिं मान | रोद साय नहिं संय यतिहि कृष्ण, नील, कापोत । जिनकी लेश्या तिन तप्त लौह ज्यो जल सोसाय । रौद्र ध्यान त्यो कम सिंच धर्म ध्यान का स्वरप:- मूल:-आनापाय-विपाक-सस्थान-विचयाय धर्म्यम् ॥३६॥ भापा धर्म ध्यान चव भेद बताय । प्रयम 'आज्ञा' और 'अपाय' । प्रय 'विपाक' चोया 'संस्थान'। सो विचार या विषय बखान ॥३६॥ ३६वें गूत्र की व्याख्या.- मद युद्धि, सद्गुरू हि अभाव । मूक्ष्म युक्ति वा ग्रहण न मात्र ।। तर यागम जो तत्व बताय । 'आमा' सो अडान कहार ।। मषा स्वय होय गुणवान । दे औरों को कंगे शान ।। विसन सो, जिनधर्म प्रचार आशा विषय' सभी विधार॥ मिया दान-ज्ञान-चरित । स्त्र, पर दूर हो फैसे मित्र ।। अपए मसार । विसन सोइ 'माय' विपार ॥ भिन्न-भिन्न जो हैं गुणयान । मं-यय किन में नि जान ।। बम निरा मे होय । प्यान 'FATE' मदाने सोय ॥ वितुन जग मात्र,मारासो स्थान विषय विनयार। धर्मपान अधिकारी जान । घरबापट, रातम गुगवान ॥३५॥ गुर पान के स्वामी: भूमः-गुर पारि .
सो कोरियन भान । मी प्रसार हो प्रामु समान ।। सा गमर भी हो पान। 'गुण प्रिया fammान ।। शादियान पुनि गुस्साए परम प्रियानि पहा॥ मागोमागमा योगनरनिा मात्र प्रयोग ।। मन मनन गया भागा २५ मत नगाए। कि निगरा हो । भगवती गोय ध्यान अनिमें मं माम मुस्मन बन पाए। मु आम बारामा निर्वाग महान ॥४॥ मराष्टियों ये सामान frir- मनः-सम्पादिपावर framaविषादनमोह- Nirmiraraमोर पसीपमोह-निना: मनोमयगुणनियरा ॥४॥ भा:- 'सम्मकदष्टो' 'मापक मान । विरत', 'अनन्तषियोजक जान ।। 'दर्शनमोह दापर्क', 'उपरामर' । पुनि 'उपसांत मोह मा 'पर'। शीण मोह', 'मिन' जो निजरा। 'असंरपान गुन रमशः करा ॥४॥ ४ गत्र भी ध्याग्या:-- पर्म निरा पोजे जान । मद में होती नहीं समान॥ दस स्थान विगुल निमगुम्पात गुन क्रमशः परा।। 'अविरत सम्याप्टी' जान । पहले से चौथे गणपान । है
( १५८ )
सीधा वदन, खुले अघ नैन । स्वासोश्वास मंद मुस
मस्तक उर या नामि प्रदेश । पर कर मन एकाग्र वि
दांत मिले, मुसस्मिति होय । ध्यान मुमुक्षु बताया स
सप्तम से अष्टग गुणयान । द्रव्य, भाव परमागू ध्या
सोइ समय होवे वीचार । ध्येर, वचन, योगहि वितधार
मोहनीय क्षय, उपगन हेतु । सो 'पृथकत्व वितकं हि सेतु
मोहनीय के आप हित जान । सो धाता मन निश्वय ठान ।।
दूर हटा तीनों वीचार । शुद्ध अनन्तगुणा चितवार ।
मन पिर कर द्वादस गुणयान । पोधे पुन. न हटता जान ।।
पाति-कम ध्यान-अग्नि जनाय । सो 'एकत्व-वितर्क कहाय ॥
कर्म पटल हट, मूर्य समान । केवल ज्ञान प्रकट हो जान ।।
पा तब पर केवति, महन्त । करें विहार आयु पर्यन्त ।।
वैद, नाम, गोत्र, मायु यताय । अन्तमुहूर्त शेष रह जाय ।।
तो बधन, मन, पादर काय । गूगम काय योगहि रह जाय ।।
साहि समय जो होरे ध्यान | 'मूक्ष्म किया प्रतिपात' समान ।।
अलमहनं आयु हो ोष कमनयिति अपि विशेष ॥
ममपात करते मुनि मान । भाट समय सगते है जान ।।
माम प्रदेशदि गामार प्रथम समय फसा विचार ।।
पुनि सपाट आर बनाए । तीजे प्रारम्प जाएं।
घौ गमरमर म्तिार | मारमरगति
मोर
मोहोर में पटते माए । मष्टम समप गरीर समार॥
परमाको मिलिग्राम मोर ही प्रामु समान ।। शाहगमन भी होगा | मnिान' पलान, पहिनि गुरन रायपुरन प्रिनिनिहा गमोगा पास गोmarपिम मात्र प्रयोग। हमन-मनन गरहोस। आप पप समस्तनमाए । मांग friश हो रे पग-वली सोय ॥ सन अग्नि में मं जपाए । बाम गुलपिनमा आए रखनप्रपा भातम भारपायनित महान II गम्यग्दृष्टियों में सममान निग मुला-मम्माधिपायर-बिरतानारियोजनमोर. हारनपानमोर सापकोलमोजिना करतो पैर-मृणनिराः ॥४॥ भाषा:-- सम्मादृष्टी' 'पाय' मान । विरत', 'अनन्तषियोज' मान । दर्शनमोह थापा, 'उपरामक' । पुनि उपगति मोह पक्षपक' । शोण मोह', 'जिन' जो निगरा। 'मसंस्पात गुन क्रमशः करा ॥४॥ ४५३ गूत्र की प्याग्या - म मिग सोने जान । अब में होती नहीं समान ।। स्थान विशुन निरा । अमत्यात गुन माः करा॥ 'अविरत सम्यग्दृष्टी' जान । पहले - 11 से चौपे गणपान ॥
'थावक' अगुवन सहित कहाए । पंचम गुणस्थान बतलाए॥ 'विरत' महामुनि कहिए सोय । गुणस्यान पट, सप्तम जोय ।। अनन्तानुबन्धी नहिं जोय । सोइ 'अनन्त वियोजक' होय ॥ दर्श-मोह सम्पूर्ण नसाए । 'दर्शन मोड सापक' कहलाए । साधु 'उपरामक' होते जान । अठ, नौ और दसम गुणथान ।। चारित मोह नसावे जान । 'उपशान्त हि ग्यारह गुणथान ।। श्रेणि 'क्षपक' आरोही सोय । चारित मोह तनिक नहिं जोय॥ सो भी अठ, नो, दस गुणथान । उपराम, नाश भेद है जान ॥ 'क्षीण मोह' द्वादस गुणयान । चारित-मोह न नाम निशान । चार घातिया पूर्ण नसाए । 'जिन' तेरह गुणथान कहाए । चव से ले आगे गुणथान । अधिकाधिक्य विशुद्धि वसान । असंख्यात गुन कर्म नसाए । क्रम आगे-आगे ज्यो जाए ॥४॥ निगन्यों के भेद :- मूल :-पुलाक-वकुश कुशील-निन्य स्नातका निन्थाः ॥४६॥ नियहि पंच भेद बताए । प्रथम 'पुलाक', 'बकुश' कहलाए । प्रय 'कुशील', 'निगंन्याहि' चार । 'स्नातक' ही पंचम चितधार ॥४६॥ ४६ वे मूत्र की व्याख्या :- उत्तर गुण से कोरे निरे । पून गुणों में जब सब गिरे । बिना पके जो पान समान । सो 'पुलाक' कहलाते भान ।। मूल गुणों को पा जोम । दिवं मुदर्शन न्या हो । भापा:-
गमी नि आमा मोर दिपार ।।
यामा सामादि मारिदिउ ।।
for 'ग' मागिरिका र को पार ।।
मीन' frisaना'. पाय पाए।
र गुम ITR-3द उगर in यान ।
नाहा गय। हिरोयन होय ॥
मन free Tiहिदिया।
नीरा उदान माल ! मैं न ग गमान ।।
नागरि। मुनि fri.' बहायें सोच ॥
मामान | शे ग्यापार गुमपान ॥
मह पोरगुपपान । के मुनि हैं यंग समान ॥
मर्म पपहीबिननामी पनि नाप' परराए।
पिनाही पारित गर निय
है परियार-बाप । सम्पगदाटी मभी यहाय ४६॥
यादि भनियों की अन्य विशेषताएं
:- रायम-धन-प्रति वना-सोप-मिग-म्योरपा:-
रपान-वि. साया ॥rsi
या:- निगन्यादि मुनिन में मान ।
निम्न अपेक्षा अंतर जान ।।
'संयम', 'पत' में अंतर रहें ।
'प्रतिसेवना', 'तीय पुनि कहें ।
लिग' हि लेश्या'नंतर जान ।
'उपराव' हिं अप मेद 'स्यान' ॥४७॥
तत्वार्थ सूत्र १.७१२ १.११५ १.८.२१ अधम व्य अकगाय वेदनीय काम निरा माल मरण भत्रिज्ञान भमारी भगुल्ल नाम मन प्रतिए मन बाप मगोपन नाम भातभार मज्ञान परिषह मज्ञान मिप्याल १२.१ ४.२० २.10 का पारिभाषिक शब्द संकेत १२४११ अतिवार अयिनिमविभाग १२.२५ अनिभारारोपण ८.१५ अदर्शन परिषद १.४.२२ १२७.१९ अधिकरण १०.९ / अधिकरण अनुपोग १०.१. अधिगमन १२१.१८ मोरित्रम ११.२० अवज्ञान 1४२.० अशोमोक ११०२२ मनगारी अनंग मनिषार २८२. अननुगामो मनम्नविपोरन মশানুষ) 51.1 भनयंग 110[अनाति ९१.२२ बम्बित अनमना ८.११ अपादन 11..1 अरित योनि अपसमावनाए अवीवापरण ७१.११ अना • सपने मोर दूसरे ४८ पnि.
२०११ रिसर जपानचन्म उपभोग भरार স্বামীণ বমি লং २८९ १२.१८ 11२२४ २२.९ रिक्षा ११०.१६ उपधि पाम उरपापना १.६५ १४८.१८ १५२१९ है पियाग समिति ६०.२२ उरणम ५६.१२ | उपांत गुप.) ७.२२ । उनिग आगायि ८.१५ १२.४ १२७२४ एपख मनुका ७३.११ १२९२४ एकta मिप्यारव एक्स्य विन १५८१. पाय माम एक विधि प्ट स्पिति गं समिति पिणी एवमूत मय एपणा समिति तमाम करण सयोग प्रहन श्री, मे, औरयिक भाव बौदारिकपारीर योपमिक परित मोपमिक भाव भोपामिक सम्यवरख अवर अनुयोग अवमुंह २४.१० ८३.२० २१.२० ८४.८ १२७२१ १४९.६ १८.१२ १८.१८ पातमाम १२८.२० ६५१८ १३९.८ यर्ध नराच अपित थलाभ परिपह अलौकाकाश अल्प ज्ञान अल्पबहत्व अवगाहना अवग्रह अवधि ज्ञान अवद्य अवमोदयं वाहतप अवपिणी সবখিরি अवाप अवियाक निरा अविभागी प्रतिच्छेद अविनेय अधिरति अशरण अनुप्रेक्षा अगुचि ( १७२ ) १२७.११ | अमाप्नागपाटिका ७५/२१ अमाता वेदनीय १४२३ अगिद्धन्व ६८१३ अम्यिर नाम ८.१४ | अहमिन्द्र आ १६८१२ आकाशद्रव्य ७२१ आकिंचन धर्म आगोश परिपह ९१८ | आचार्य आशा विचय यातप नाम ४३ २० आत्मरश ७२४ आदान निशेपण १३२.२३ आदेय नाम थानयन १.०.१२ आनुपूयं ११.३ आभियोग्य आम्नाय स्वाध्याय १४०.५ | आयुर्मि १२८.१३ भारम्भ मानव धर्म १.१.३ मा ध्यान ७५.७मालोति पान भोमन मालोपना आमादना १२७२३ १२८.२१ १२७१७ १२५१ ८२.११ थगुभ नाम अगुम योग अशुभ यति मसगाव अमनी ११.१४ १४८.५ ८४.८ --- माहारक बाहारक शरीर त्य समण त्वरिपा २८९ १२९.१८ ११२.२४ २२९ १५..१८ १०६८ १४८.१५ १४९१५ १७.५ इष्ट वियोग विषिष मानव ईयो समिति उ,ऊ २७.११ उपपाद जन्म ३२.१ उपभोग भतराय उपभोग परिभोग मनर्थ ७३.९ उपयोग ११०.१६ | उपधि उपवास १५२१९ उपस्थापना उपाध्याय ८..२२ उपशम ९६१२ उपशात (गुण) ७२२ | उनित्रम ऊध्वंगति ८.१५ १२९.४ १२७२४ एवरव मनु क्षा ७३.११ १२९२४ एत मिथ्यात्व ७५.२ एवंभूत मय १३६.१३ एपणा समिति मौ, अं, १२७.२३ | बोदयिक भाव २४.१०।यौदारिक शरीर ०३.२० | बोपशामिक चरित्र २१२० औपमिक भाव ८४.८ योपामिक सम्यक्त्व १२७.२१ | अंतर अनुयोग १४९.६ | अतहाँ एकत्व वितर्क १५८,१. स्मत (ज्ञान) उच्च गोत्र उवाम नाम उत्कर उत्कृष्ट स्थिति उत्पाद उत्मगं समिति उत्मपिणी उपोतमाम उपकरण इन्द्रिय उपकरण सयोग उपगृहन उपधात उपघात नाम उपचार विनय एक विधि २९४ १८.१२ २१.. १५१.१२ ( १७२ ) थ, नराच १२८.२० अपित अलाभ परिपह अलीकाकाश अल्पज्ञान अल्पबहत्व अवगाहना अवग्रह अवधिज्ञान अवच ६५१८ १४१.२३ अवमौदर्य बाह्मतप १२७ ११ जगप्राप्तामृपाटिका अमाता वेदनीय १४२.३ अमिद्धन्व अस्थिर नाम ८.१४ अहमिन्द्र आ १६८.१२ आकाशद्रव्य आकिंचन धर्म आगोश परिपह आचार्य १४६.१२ आज्ञा विचय यातप नाम आत्मरत आदान निशेषण आदेय नाम थानयन १.०.१२ | आनुय्यं ११८.३ आभियोग्य आम्नाय स्वाध्याय १४०.५ | आयुर्म १२८.१३ भारम्भ ८.. भाव धर्म १५४.१४ १२७.२३ ४३ २० ४८.१० १२८.२१ अवपिणी अवस्थिति भवाय अविधाक निर्जरा अधिभागी प्रतिच्छेद अविनेय अधिनि अशरण अनुप्रेक्षा अशुधि अशुभ नाम १२७१७ १५०.७ ८२.११ यगुम योग अगुमति म मातं ध्यान १५१.२१ ७५.७/मालोषित पान भोजन मामोचना भासारना भगनी यसपदभाव
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(१७८ ) पुलाक १९०.२१ पुष्कर दोप प्रमत्तमपत प्रभावना ११८.१८ ९२.३ १६७.८ प्रवचनयरसत्व १५०.५ प्रवीचार १५८६ प्रशस्त २९१. प्रायश्निन ४८.१३ | प्रेप्य प्रयोग १११.२४ | घोषध १२२१५ प्रोरधोवाम १२२.१६ १२८.३ १४.१० ११.१४ पूर्व प्रयोग पृष्यना पृषकत्व वितंक पोश प्रशीक प्रति देय प्रचना प्रचना-प्रपना प्रसारिवह বিগ प्रवर प्रतिक्रमण प्रार. पिप भ्यवहार प्रविना अपना मोन पम्यान प्रयामान १.८१७ बध यन्ध अधिकार २१५.६ पन्ध धेर ११.८ यानाम १९२१ यद गात १५... जान याहरनाम १२१.२० ८ यादरमपप वन्या क. बदल १.२२२ 1:- भवनवासी ८२.१७ मशाल भरत क्षेत्र भाव अनुशेग ४७४ मार्ग प्रभावना २२.४ माद धर्म माला ४२.६] मृत्यु ५१२ मियादर्शन ३२१ | मिप्या शल्य मिथ्योपदेश मिग्रमाव २४.१७ भाव निक्षेप १०४.२ २०.१ भावना मावेन्द्रिय भवसपर भापा ममिति भुसान सयोग मूर्धा ८३.१९ / मूलगुणनिवनना ७४.८ ३७५ भोग भोगालगय मेह गिरि मंयुन मोक्ष मोहनीय कम मौवयं म १२३.१ ११२.२२ य १२१.१५ यथास्यात चारित्र यश कीनिनाम याचना परिषद योग योग वरना योग सवाति १२८.२२ १४२.२ मतिज्ञान मनिज्ञानावरण मनपान मध्यत्रोक मनोगुप्ति मनोज मरणासमा मल परिषद महावन मात्म मानुपांत्तर मायाचार माया शल्य १४९.२३ ८९६ १५७.२० र १५.२२ रति मोहन म रस रस परित्याग रोम्याख्यान १२४.९ ७२२ ( १७८ ) पुलाफ पुष्कर दी ११८.15 १२.३ ९२.१८ पूर्व प्रयोग पृम्धना पृपसत्य पिir पोर प्रकीर्णक १२८३ प्रगति वेध प्रथया प्रपना-पता प्रजापरिषद পি १६०२१ प्रमत्तसयत ४५.५ प्रभायना १६७.८ प्रवचनपत्हसरव १५०.५ / प्रवीचार १५८.६ प्रगरत २९१. प्रायश्चित ४८.१३ प्रेप्य प्रयोग पोप १२२१५ | प्रोषधोगाम १२२.११ बाग ९२१५ यन्ध अनिवार २१५ बध घेत ११.८ बधन माम १९२१ वरगान 1.वविध मान बारनाम १११.१४ २ १.८१७ १२६.२. प्रतिमा प्रार. RTE पवार বম্বিনা प्रतिमेला पुनीत श्यान 55 १२८१ बार मापाय बासा ...1 व'T म: ५ १.१ २२ भ न ७.१० " र तरेरी यारोपण युमग तप प्रायश्चित श्त क्रिया नितिन (शुक्लध्यान) पहन सक्राति ति जी श का दिनय दिनुपात १२४१६ २८.८ ८८.२४ ६३.७ ८२१८ या परिपह ९२७ ११७.२० १४०.२ १२६.२२ परीर नाम ५ न्य गुमनाम तुम योग शशावत श सघात १०११३ सघात नाम १४७ १२ संज्ञा १४८१३ | सजी मज्वलन १५६ ११ | समूर्थन जन्म १५७१८ मयमा मयन ९५२ सपता सयन १०४४ सयम धर्म मयोग १०७.१७ सरम्भ सदर ११२.५ | सवेग ७२१५ माय मिथ्यात्व १४१.२२ समार अनुप्रेक्षा १२६.१७ सस्थान नाम ६ १०३.२२ सस्थान विचय १२८.१३ सस्थान 2.९ सहनन ६ १०६१८ मचित्त यो ने १४९.१७ | सचित्त १२४९ सचित्त अपिधान ६४.१७ सन अनुयोग मत्कार पुरस्कार सत्यव्रत भावनाएं समचतुरन सस्थान १२१.१६ समभिरूढ नय समय समरम्भ १५७.१३ | समारम्भ समिति १५१४ | समन्वाहार सम्यक दर्शन १२७.५ २८.२० ११४.२ ११४.१६ ५.८ १४२.७ गौच पावक तज्ञान त कुतज्ञानावरण णि ९७१ १२६.२३ स १०६.५ ८२.१८ ८२.१५ मोति ख्या ग्रह नय उप 1 १५२.१५ २१२ ( १८०) रोग परिपह रौद्र ध्यान स लब्धि ५ लन्धि (इन्द्रिय) लब्धि (प्रत्यय) १७४ विरत लवणोदधि लाभान्तराय लिंग लेश्या लेण्या (प) लोक भनुप्रेक्षा लोकाश लोकपाल देव लोकातिक देव १४२.४ । विनय तप ११३.१४ विनेय विपरीत मिथ्यात्व २०.१७ विपाक धर्मध्यान २४.२२ विपुल मति विमान विमोचितावास १२९१५ विरुद्धराज्यातित्रम २१.१९ विविक्त शम्यासन वृत्तपरीसध्यान विवेक (प्रायश्चित) ६८.१४ विशुद्धि विवारन विषय विषय मेरमाणाना २१.१/विहायोनि १२७.७ बोचार ধীবা १४.१२ १२८१ वचन गुप्ति दम वृषभ-माराच सहनन वय नाराच सहनत बघ्र अतिचार वध परिपह धना वर्धमानमवधि ८१.२० वोलिराम ७१.. वस्तीय ११.११ वेदना प्राध्यान 4पिपिक भर १५..४ अयिक मिया वैमानित १२ बामन मस्पात . विधि:-मा वैरान . ०१२ MT १.२
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१५३.१९ १२०१९ सम्यान्व सम्यग्दृष्टि सयोग केवली सराग सयम सल्लेपना सविपाक निर्जरा सहसा निक्षेप सर्वार्थसिद्धि साकार मतभेद सागर (आयु) साता वेदनीय साधन अनुयोग साधु साम्परायिक आसव सामानिक सामायिक सामायिक चारित्न सासादन सामान्य शरीर सिद्धत्व सुखानुवध मुभग नाम सुस्वर नाम मूक्ष्म किया प्रनिपात सूक्ष्म साम्पराय चारित्र मूक्ष्म शरीर गूधमपन सोमनस स्कन्ध स्तन प्रयोग रतेय त्यानदि यी परिपह १०८.३ स्त्री ये ११८२० म्नेयानद ८८.२३ स्तव स्थावर १३२.२. स्थित बध स्पिर नाम ५५ २० स्थावर जीव स्थापना निक्षेप स्थितीकरण १२२.२२ स्नातक ४.१९ स्पर्श १४९.२२ स्पर्शन ८०.२१ स्मृति ४८.७ स्थिति अनुयोग ९२८ स्मृत्यनुपस्थापन स्मृत्यन्तराधान १६१.१२ १२७.१४ ४.२० ११३१२ स्पर्श गुण ३६.२२ १२८७ स्वयभूरमण १६६५ | स्वर्ग १६ ११५.१८ | स्वमुख अनुभवन १२८.१० स्वाध्याय १२८१२ / स्वामित्व अनुयोग १५८.१५ स्वास्ति १४७.१२ ४.१० १२७.२ ह १२४.९ १२८.१४ | हास्य ७६.६ | हिंसा ३८.६ । हिमादान ७३ २१ हिसानद ११०.२ ] होनाधिन मानोन्मान हीयमान १२२.१७ हरक सस्थान ११.१२
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प्रतीक्षा कीजिए
छा रहा है
प्रतीक्षा योजिए"
[ श्री नन्द किशोर जैन, एम० ए० लिखित ]
মুননির
सामाजिक कुरीतियों एवं समस्याओं का दिग्दर्शक द्रामा
इसमे काम ममम्याय ही नहीं, उनके अनूठे तथा नवीन परन्तु
फलप्रद समाधान भी है ।
आहा, धर्म के बालाइबर, समान, अशिक्षा, दहेज, विधवा-
विवाह, बालायन, प्रेम मियाह, धर्म एव काम शिक्षा, निकाह
नया बिहेतर काम नवय, हे युवक-युवतिया, कंगन आदि
अनेक गमस्यानो के सम्बन्ध में नये दृष्टिकोणो से विचार ।।
यह प्रेरणाप्रा ड्रामा जो दिनार १२-२-७० को जनयाम,
डालीगज, समनऊ में मयस्य ही है. अपने परिवति तथा
गगोधिन में प्रकाशनाधीन है। अभी से अपनी प्रति गुरक्षित
कगा।
एक नयाायिक र गाम, गुमित वर. fiyat jी, नगन
पीछे दीवाने पुष गुचिों को गेना गया।
सोपहार प्राव मोसने के fanfan हो गया
वरम में मे नि :-'
'हो, नी।"
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