Government College, Kota

Nrisinghchampu

Pt. Surya · 2012/04

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॥ श्रीः॥ विद्याभवन-संस्कृत-ग्रन्थमाला ४३ श्रीमदैवज्ञपण्डितसूर्यप्रणीता नृसिंहचम्पूः 'प्रकाश' संस्कृत-हिन्दीव्याख्योपेता 'सम्पादकः संस्कृतव्याख्याकारः भूमिकालेखकश्य- डॉ. श्रीसूर्यकान्तशास्त्री, एम.ए., डी. लिइ. काशीहिन्दवि विद्यालयस्थ- संस्कृतपालीविभागाध्यक्षः हिन्दीव्याख्याकार:- साहित्याचार्यः श्रीराममूर्तित्रिपाठी, एम. ए. काशीहिन्दविविद्यालयाध्यापक: चौखम्बा विद्याभवन, वाराणसी-१ ०१६] भूयं २-५० [ई. १९५७

प्रकाराक-चौखम्बा विद्याभवन, वाराणसी
मुदर-विद्याविलास प्रेस, वाराणसी
प्रथम संस्करण, संवत २.१६
पुनर्मुद्रणादिकाः सर्वेऽधिधरा प्रकाराकाधीनाः
The Chonkhamba Vidya Bhawan
Chowk, Varanasi? ( India ) ..?
1859

दो शब्द
चम्पू का लक्षण सर्वप्रथम दण्डी के काव्यादर्श ( १.३१ ) में इस प्रकार
मिलता है
'गद्यपद्यमयी काचिच्चम्पूरित्यभिधीयते ।'
इसी को प्रकारान्तर से साहित्यदर्पण में यों लिया गया है
'गद्यपद्यमयं काव्यं चम्पूरित्यभिधीयते ।'
इस परिभाषा में अतिव्याप्ति-दोप है; क्योंकि गद्य-पद्यमय होने के कारण
नाटक भी इसमें श्रा जाता है । फलतः हेमचन्द्र ने चम्पू की परिभाषा इस
प्रकार को है
'गद्यपद्यमयी साङ्का सोच्छासा चम्पू: ।'
इसी का विकास करके बाद में चम्पू का लक्षण इस प्रकार किया
गया है :-
T
चम्पूरुदाहृता ॥
'गद्यपद्यमयी साङ्का सोच्छ्वासा कविगुम्फिता ।
उक्तिप्रत्युक्तिविष्कम्भशून्या
इन लक्षणों में चम्-काव्य को सीमित कर दिया गया है। अङ्क और
उच्छ्वास किसी चम्पूविशेष के गुण हो सकते हैं, उन्हें सभी पर लागू करना

( २ ) । उचित नहीं । इसी प्रकार क्योपश्यन का प्रयोग होने पर भी चम्पू की श्रात्मा अभुषण बनी रह मकता है । वस्तुत चम्मू एक ऐमा काध्य है जिसमें जीवन के सरम कान्यमय तत्त्वों को पत्र में और क्वल वर्णनामक अंगों को गद्य में नियम किया जाता है। कवि अपने चित्रण में जब भावाविष्ट हो उठता है तब उसकी भाषा गद्य का परिघान छोडकर ऐन्दोबद्ध हो जाती है । वस्तुत' चम्प एर मगीत-समन्वित काम्य-क्या है। चम्मू-काम्य यद्यपि मस्कृत साहित्य में अनेक हैं, किंतु उनका ममुचित विकाम कुछ कारणों से नहीं हो पाया । प्रमुख कारण तो इसका यही है कि रक्षण ग्रन्यों ने चम्पू काव्य का परिभाषा कुछ ऐसे टा मे की निमसे चम्पू का विस्तृत हेन मकुचित-सा बन गया, जिसके कारण चम्पकार अपनी मौरिकता को अभिव्यक्त करने में श्रममय रहे। किंतु चम्पू काव्य का एक बहुत ही उत्तम रूप धन मक्ता है, क्योंकि उसमें कवि को यह स्वतन्त्रता है कि वह विवरणात्मक अशा को गद्य के कलेवर में रखकर अपने भावौदेक को स्वरमगत कर दे, और इस प्रकार गय के सूत्र में पय कुमुमों की मनोहर माला गूय है। शात चम्पुओं में त्रिविक्रम भट्ट का नलचम्मू मर्वप्रयम है। उसका समय ९१५. के श्राम पाम है। दिगम्बर जैन मोमप्रभ मरि का यशस्तिलक चन्पू ९५९. के श्राम-पाम है। ये दो दोनों चम्पू चम्मू-साहित्य में विशेष महत्व के हैं। इनके अतिरिक्त हरिचन्द्र का नावधर चम्, भीर के नाम पर रामायण चाम, अनन्तमट्ट का भारतवम् मा उल्लेख्य हैं। भागवत चम्नू नामक तीन रचनाए उपलब्ध हैं इनके का है चिदम्बर, रामभद्र और रामनाय । नृमिह चम्भू नामका मा चार रचनाए हैं। इनके फर्ता है केशव मह, ( ३ ) नारायण, दैवज्ञ सूर्य और संकर्षण । इनके अतिरिक्त कुछ और चम्पू भी प्रकाशित हुए हैं जिनकी संक्षिप्त सूची इस प्रकार है समरपुङ्गच दीक्षित : (तीर्थ ) यात्रा-प्रबन्ध तिरुमलाम्बा वरदाम्बिकापरिणय वेड्डटाध्वरिन् विश्वगुणादर्श अन्नयार्य : तत्त्वगुणादर्श कवितार्किक्रसिंह वेदान्ताचार्य : वेदान्ताचार्य-विजय रामचन्द्र चिरञ्जीव भट्टाचार्य : विद्वन्मोदतरङ्गिणी कृष्ण : मन्दारमरन्द रघुनाथ दास मुक्ता-चरित जीव गोस्वामिन् गोपालचम्पू परमानन्ददास सेन : आनन्दवृन्दावन इत्यादि उपर्युक्त चम्पूकारों में दैवज्ञ सूर्य-विरचित नृसिंहचम्पू ही हमारा प्रति- पाद्य विषय है। दैवज्ञ-सूर्य का काल अनिश्चित सा है । ए. एन. दास गुप्त और एस. के. दे के संस्कृत साहित्य के इतिहास (पृ. ४३७ टि. ६) में सूर्य दैवज्ञ- विरचित कंसवध नामक नाटक का भी उल्लेख है । इन्होंने नृसिंहचंम्पू के प्रथमोच्छ्वास के चतुर्थ श्लोक में अपने को ज्ञानराज का पुत्र बतलाया है। इससे अधिक इनके सम्बन्ध में कुछ ज्ञात नहीं है। नृसिंहचम्पू का प्रस्तुत संस्करण इंडिया आफिस पुस्तकालय की एक हस्त- लिपि के फोटो पर प्राधृत है, जिसे हमने लाहौर में १९५५ में वहां से मंगाया (४) था। उम हस्तलिपि में भूल चमार या, जिमका समझना छात्रों के लिये दुमाध्य था। फलत उसकी संस्कृत टीका हमें स्वयं करनी पड़ो, जो कि आज पाठकों के मंमुख प्रस्तुत है। टीका की प्रामाणिकता के विषय में हमें कुछ नहीं कहना है । इसकी उपादेयला पाटरों की महृदयता पर निर्भर है। संभवत' इम मम्बरण में और इस टीका में कुछ त्रुटियो रह गई हो। उनके लिये हम विद्वानों में क्षमा चाहते सूर्य देधा पण्डित एवं तत्त्वशनी वाणई ये। श्रीमद्भगवद्गीता पर इनकी परमा प्रभा टीका प्रसिद्ध जिगमें जगह-जगह इन्होंने ऋग्वेद एवं यजुर्वेद के मन्त्रों श महारा लिया है और यहुत में स्थलों पर गीता का अपना अलग हो व्याख्यान दिया है। नृ संहावतार में नर नारायण का मर्वोत्तम समन्वय हुआ था। दोनों के इसी समन्वित रूप को सूर्य देवर ने चपने गद्य पद्य ममन्वित बरू में प्रमाधिन किया है। अपने कुमारसंभव के सस्करण में हमने शिव पार्वती कन्द के ममन्वित रूप की बाराधना की है। प्रस्तुन चन्चू के प्याभ्यान द्वारा हमने नर नारायण के मंतित रूप की धाराधना करके अपने जीवन को कृतकृत्य किया है। औवन की संध्या में शिव वितु का चचा करके हम अपने पार से तहस्य कर रहे है। बामा हिन्दू विश्वविद्यालय सूर्यकान्त भूमिका संसार में जब-जब पाप का बोलवाला होता है तब-तब उसके निरास के लिये भगवान् धराधाम पर आते और त्रस्त मानव जाति का उद्धार करते है। भगवान के इन अवतारों में नृसिंह अवतार का अपना निराला महत्त्व है-क्योंकि इस अवतार में भगवान् ने मानव का रूप धारण करके उसे नृम्णता की परा कोटि पर पहुंचा दिया था और इसके द्वारा मानव जाति के संमुख शालीन वीरता का ज्वलन्त उदाहरण प्रस्तुत किया था। नृसिंहावतार का वर्णन पुराणों में स्थान-स्थान पर आता है और हर वर्णन में कुछ ऐसी विशेषताएं हैं जो कि अन्य वर्णनों में नहीं मिलती। इन वर्णनों के तुलनात्मक अध्ययन से नृसिंह एवं प्रहाद के आविर्भाव-क्रम पर महत्त्वपूर्ण प्रकाश पड़ता है। फलतः नृसिंहावतार के वर्णनों का सिंहावलोकन उपाख्यान के मर्म को हृदयंगम करने के लिये आवश्यक प्रतीत होता है। ब्रह्मपुराण के २।३ अध्याय में नृसिंहचरित का वर्णन इस प्रकार है:- वाराह एप कथितो नारसिंहस्ततो द्विजाः। यत्र भूत्वा मृगेन्द्रेण हिरण्यकशिपुर्हतः ।। ४३ ॥ पुरा कृतयुगे नाम सुरारिवलदर्पितः । दैत्यानामादिपुरुषः चकार सुमहत्तपः ॥ ४४ ।। दश वर्षसहस्राणि शतानि दश पञ्च च । जपोपवासनिरतः तस्थौ मौनव्रतस्थितः ॥ ४५ ॥ ततः शमदमाभ्यां च ब्रह्मचर्येण चैव हि । प्रीतोऽभवत्ततस्तस्य तपसा नियमेन च ॥ ४६ । तंवै स्वयंभूभगवान् स्वयमागम्य भो द्विजाः । विमानेनार्कवर्णेन हंसयुक्तेन भास्वता ॥ ४७ ॥ आदित्यैर्वसुभिः साधै मरुद्भिर्दैवतैस्तथा । रुद्रैर्विश्वसहायैश्च यक्षराक्षसकिन्नरैः॥ ४८ ॥ चराचरगुरुः श्रीमान् वृतः सर्वैः सुरैस्तथा । ब्रह्मा ब्रह्मविदां श्रेष्ठो दैत्यं वचनमब्रवीत् ॥ ४९ ॥ ब्रह्मोवाच- प्रीतोऽस्मि तव भक्त्याऽहं तपसाऽनेन सुव्रत । वरं वरय भद्रं ते यथेष्टं काममाप्नुहि ।। ५०॥ हिरण्यकशिपुरुवाच- 'न देवासुरगन्धर्वा न यक्षोरगराक्षसाः । ऋषयो वाऽथ मां शापैः क्रुद्धा लोकपितामह ॥ ५१ ।। शपेयुस्तपसा युक्ता वर एष वृतो मया । न शस्त्रेण न वाऽस्त्रेण मिरिणा पादपेन वा ॥ ५२ ॥ न शुष्केण न चाट्टैण न चैवोव न चाप्यधः । पाणिप्रहारेणैकेन समृत्यबलवाहनम् ।। ५३ ।। यो मां नाशयितुं शक्तः स मे मृत्युभविष्यति । भवेयमहमेवार्कः सोमो वायु ताशनः॥ ५४ ।।

( २ )
सलिल चान्तरिक्ष व आकाच चेव सबंश । महकोपय कामश्च वरुणो दासको सम ॥
धनदश्च धनाध्यक्षों यक्ष विपुरपाधिप ॥५५॥
प्रयोवाच-एते दिन्या घरास्तान मया ददातिवादभुता ।
सर्यान्वामानिस्तिात प्रापयसि त्वन मशय ॥ ५६ ।।
व्यास उवाच-
एचमुक्त्वा तु भगवान् जगामासु पितामह 1 वैराज वलसदन बनर्षिगगसेवितम् ॥ ५७ ॥
ततो देवाश्च नागश्च गर्दा मुनयस्तथा । वरप्रदान हुवैद पितामहमुपस्थिता ॥ ५८ ॥
देवा ऊचु-
वरेणानेन भगवन् वषिष्यनि स नोडसर । नरप्रसादागु मगवन् वधोऽप्यस्य विचिन्त्यताम् ।।
भगवन् सर्वभूताना स्वयभूगदिक प्रभु । स्रष्टा च हव्यद यानामन्यक्त प्रतिध्रुवम् ॥६॥
व्याम उवाच-
तनो लोकहिन वाय भुवा देव प्रजापनि । प्रोदाच मगवान्वाक्य सदेवमस्तिथा ॥११॥
ब्रह्मोवाच-
अवस्य विशारतेन प्राप्तव्य तपस पलम् । नमोऽन्ते च भगवान् वध विष्णु करि पनि ।।
माम उवाच-
एनवा मुरा मवें वाक्य पजजमन ।
स्वानि स्थानानि दिव्यानि जग्मुरत दे मुदान्विता ॥१३॥
समान परे चारि मा मोनाथन प्रम! । हिरण्यरशिपुदैत्यो घरदानेन दर्षित ॥६४।
आश्रमेषु महामागान मुनीन् सशिनवतान् । सत्यधर्मरतान्दानान् सदा पिन वास्नथा ॥३५१
त्रिदिवस्थामा देवान् पराजित्य महान गेय वशमानीय स्वर्गे वमति सोऽमुर । ६६॥
यदा वरमदोनची विचरन्दानको मुवि । यशैयानकरोदैत्यानयशीयांश्च देवता ॥६॥
मादित्या चमव माझ्या विवे च मरतालथा शरप्य सारण विमुक्तस्युर्मारकम् । ६८॥
देवरमामय यह ब्रामदेव मनातनम् । भून मन्य भविष्य च प्रभु लोकनमएनन् ।
नारायण बिनु देव शरण्य शशरण गना ॥६॥
देवास
पायस्व नोऽय देश हिरण्यकशिशेमयात् । वहिन परमो देव वहिन परमो गुरु ।।
विहिन परमो धाता प्रासादीनां मुऐचम । उत्युल्मपत्रास आपलक्षयकर।।
वयाय दितिवनस्य शरण त्वमवस्व न ॥७॥
वामदेव उदार-
मय यजध्वममरा ममय यो ददाम्यहन् । तथैव त्रिदिव देवा प्रतिसत्यय मा चिरम् ॥१२॥
सोमदेव बरदानेन तिम् । अवश्यममरन्द्रा दानवद्र निम वम् ॥ १ ॥

( ३ ) - व्यास उवाच- एवमुक्त्वा तु भगवान् विराज्य विदशेश्वरान् । हिरण्यकशिपोः स्थानमाजगाम महाबलः ।। नरस्यार्द्धतनुं कृत्वा सिंहस्या तनुं प्रभुः । नारसिंहेन वपुषा पाणिं संस्पृश्य पाणिना ॥ ७५ ।। घनजीमूतसंकाशो धनजीमूतनिस्वनः । घनजीमूतदीप्तौजा जीमूत इव वेगवान् ।। ७६ ॥ दैत्यं सोऽतिबलं दृष्ट्वा दृप्तशार्दूलविक्रमः । दृप्तदैत्यगणैर्गुप्तं हतबानेकपाणिना ।। ७७ ।। उद्धरण का सार यों है:- कृतयुग में दैत्यकुलावतंस हिरण्यकशिपु ने सहमों वर्ष घोर तप करके ब्रह्मा को प्रसन्न किया और उनसे वर मांगा कि ऋषि-मुनि-देव, गन्धर्व, किन्नर आदि में से कोई भी उसे शाप न दे सके, और अख, शल, पर्वत, वृक्ष आदि किसी भी प्रहार से किसी भी ओर से, उसका वध न हो सके। जो व्यक्ति एक ही चपेट से ससैन्य एवं सवन्धु- बान्धव उसे मार सके वही उसकी मृत्यु का कारण बने । सूर्य, चन्द्र, आकाश, वायु, वरुण आदि सभी देवता उसके आत्मसात् बन जायें और इस प्रकार त्रिलोकी में शिव के समान उसी की तूती बजती रहे । एवमस्तु कह कर ब्रह्मा अपने आस्पद की ओर चल पड़े और इधर देवता लोग उनके इस वरदान से त्रस्त हो उनकी सेवा में पहुँच कर फरयाद करने लगे कि आपका उक्त वर पाकर तो यह दैत्यराट आपे से बाहर हो प्राणिजात 'पर अत्याचार को आँधी चला देगा। भगवन् ! इसे वश में रखिये और इसके वध का उपाय सोचिये। उनके अनुनय-विनय पर प्रसन्न होकर ब्रह्मा वोले-तप का फल तो दैत्यराट को मिलकर ही रहेगा। किंतु जब मदोन्मत्त होकर वह अत्याचार की परा- कोटि पर जा पहुँचेगा तब विष्णु भगवान् नृसिंहावतार लेकर उसका संहार कर देंगे। वर का मिलना था कि दैत्यराट आपेको भूल चराचर पर अत्याचार को आग उगलने लगा और सब देवताओं को अपने वश में करके स्वर्ग का स्वामी बन बैठा। उसने उनका यशांश छीन कर स्वयं भोगना आरंभ कर दिया। इस बात ने देवनाओं पर जले पर नमक छिड़कने का काम किया और वे कांदिशोक हो विष्णु की सेवा में पहुँचे। आर्त जनवर्ग की टेर को सुनकर विष्णु भगवान् पसीज गए और उन्होंने नृसिंह का अवतार धारण करके कंचनकान्त दैत्यराट् का संहार कर, संसार को विपत्सागर से उबारा । प्रत्यक्षतः इस कथानक में प्रहाद का नाम कहीं नहीं आता। हिरण्यकशिपु के परिवार में भी उनका संकेत नहीं है। नृसिंहावतार का कारण इस कथानक के अनुसार जन-जनपद का त्रास है न कि प्रहाद की यातनाएँ, और यह बात नृसिंहोपाख्यान में ध्यान देने योग्य है। स्कन्दपुराण के अवन्ती क्षेत्र-माहात्म्य नामक पांचवें खण्ड के ६६वें अध्याय में निशानिका म पकार है:- , :- ( ४ ) न मनमार उवाच- भूर भृगु पर म्यामानानामुत्तम वरम् । तत्तीय मर्वपापघ्न नमिहम्य महात्मन ॥ यस्य दर्शनमाने सर्वपार ममुत्रं । दैत्यराज समारया हिरण्यकशिपु पुरा नेनेय वसुधा सर्वा सप्रामा च दुगत्मना । दुष्टदेत्याव्यांना भाराकान्ता मुनादिता ॥३॥ गोभूवाऽप्रमुग्पा देवमा पारप ययौ। भाराकान्ना घरा दृष्ट्वा नामा शव पितामह ॥४॥ उवाच साया वाचा श्रम तस्या व्यपोहिनुम् । अया मोसने पुण्ये भवत्या उपकारकम् ।। वची वदामि ने नय्य देशकागेचिन तथा ! पुरानेन नपा दुघर सर्वदेहिनाम् ॥ ६ ॥ गायन्युपासना दन कृता मनियतात्मना । मया चास्य वरी दत्त. मोतियुक्तेन चनमा ॥ ७॥ न दिवा न तथा रात्रौ नान्नरिक्षे न भूनले । नातिशुष्का चानन चास्त्रसम्मघातः ॥८॥ देवासुरगन्धर्वन यक्षोरगकिन्नरः । पिशाचपराश्च रामसनक्दाचन ।। ९.॥ मानव. पक्षिबानेश्च न मे मृत्युभवेदिनि । एप करतलापाने मकुल बरवाइनन् ।। १० ।। मारयिष्यति मावीर म मे मृत्युभविष्यति । चत्युक्त्वातिदष्टात्मा तमह च तदावने ॥११॥ आगम चैव रोक रख देत्यो पोरशामन । बभूव सर्वलोकानां शारता चानुदिनमः ॥१२॥ तस्यैवाधिकृना रोका बभूवुर्विगतज्वरा । रोक्य अमुजे नित्य सर्वदेश्यननेश्वर ॥ १३ ॥ तरमापूर बन यात महाकाल महेशिनुःतत्र सीथै महचासीत् सर्वनीवरोत्तमम् ॥ १४॥ मगमेश्वरस्य दक्षिणकर्कराजोत्तरे दया। शिप्रातीरे शुभे देशे पूर्व वैकुण्ठसन्निभम् ॥ १५ ॥ नर्मिहात्य पर धाम सस्य टीय प्रतिष्ठितम् । तत्र गत्वा मुरयेयाः स्नानदानादिका किया. कुरल सत्वर सर्वे पुनटोंकानवाप्स्यथ । से तस्य वचनं शुत्वा देवा इन्द्रपुगेममा- ॥ १७ ॥ महाकालवन प्राप्ता यत्र शिमा पयस्विनी । नृसिहतीर्थोपकले उपिस्वा शाश्वती. समाः ॥१८॥ स्नानदानादिक कृत्या गसिंहस्यान तथा । व कृत्वा विधानेन परा सिविचितोगताः नृसिंहस्य स्वरूपेग हतो दानबहवः । समामध्ये तदा म्याम हरिणाऽमित्रयानिना ॥२०॥ वरेणेकरारेण हिरण्यकशिपुनः । तरः पुरगणाः सर्वे वाधिकारान्यगुस्सदा ॥ २१ ॥ शिरपुष कुमार कार्तिकेय की अर्चना में रचे गये स्कन्दपुरा में पहुँच कर सिंह दीका दुध शिवरा-सी गई और दा देव-गन्ध किन्नरों की ओर से स्वयं धरा अनाजी से विश्व के बाकी मिशा मांगती है । ममा पृथ्वी को दैत्यराट की अनुल तपस्या के विषय में लाने और उसके बदले में से दिये अपने घर की मी बर्चा करते। माप ही वे देव-वर्गगेसगमेश्वर सैदशित करराज से स्वर, विशु नदी नट पर वैकुण्ठ के समान प्रनिमिन 'नमिहधाम' पर स्नानादि करने की सलाह मी देव हैं। उनका मादेश पारर देव-गपर्व नृसिंहमार्य में बाकर पिपिवर स्नान ध्यानादि करके माने कृत्य करते और ममि चित पर की प्राति करते हैं। उनकी तपश्चर्या से प्रमत्र हो मगवान् विष्णुने नृसिंहावतार धारण करके कही चपेट में हिरण्य- हरिपु का संहार कर दिया और इस प्रकार उसके प्रचन्ः +8 से विश्व का हार दिया। .

( ५ ) . स्कन्दपुराण के उपाख्यान में एवं पूर्वोद्धृत उपाख्यान में ध्यान देने योग्य सान्य यह है कि इन दोनों में दैत्यराट् अपनी मृत्यु ऐसे वीर से मांगता है जो कि एक ही चपेट में सकुलबलवाहन उसका. विनाश कर दे। दोनों का भेद तो तुतरां स्पष्ट है ही। यहां देवताओं को ओर से पृथ्वी ब्रह्मा के पास पहुँचती है। उपाख्यान के संघटन में भी 'कुछ बहकी-सी जोड़-तोड़ दीख पड़ती है। उदाहरण के लिये एक ही बात को ले लीजिये। ममी नृसिंह ने धरा पर हिरण्यकशिपु का संहार भी नहीं किया कि उनके नाम पर तीर्थ पहले की स्थापित हो गया जहाँ जाकर कि देवगण स्नान-ध्यान करते और इष्ट फल की प्राप्ति करते हैं। इस एक ही उदाहरण ते वर्तमान पुराणों के ढांचे का लचरपन प्रत्यक्ष हो जाता है वायुपुराण के द्वितीय भाग के छठे अध्याय में नृसिंहचरित का वर्णन इस प्रकार है:--- ऋपय ऊचुः- दैत्यानां दानवानां च गन्धर्वोरगरक्षसाम् । सर्वभूतपिशाचानां पशूनां पक्षिवीधान् ॥ उत्पत्ति निधनं चैव विस्तरात् कथयस्व नः ।। ४८ ॥ एवमुक्तस्तदा सून उवाच ऋषिसत्तमान् । दितेः पुत्रद्वयं जज्ञे कश्यपादिति नः श्रुतम् ॥४९॥ -कश्यपस्यात्मजौ तौ वै सर्वेभ्यः पूर्वजौ स्मृतौ । सूत्येहन्यतिरात्रस्य कश्यपस्याश्वमेधिक ॥५०॥ हिरण्यकशिपु म प्रथमं ऋत्विगासनन् । दित्या गर्भाद् विनिःसत्य तत्रासीनोच्चसंसदि ।। हिरण्यकशिपुस्तस्मात् कर्मणा तेन स स्मृतः ।। ५१ ।। ऋपय ऊचुः- हिरण्यकशिपोर्नाम जन्म चैव महात्मनः। प्रभावं चैव दैत्यत्य विस्तराद् बेहि नः प्रभो ॥५२॥ सूत उवाच- कश्यपस्याश्वमेधोऽभूव पुण्यो वै पुष्करे पुरा। ऋपिभिर्देवतामिश्च गन्धवैम्पशोभितः ॥५२॥ उत्कृष्टेनैव विधिना आख्यानादौ यथाविधि । आसनान्युपक्लुप्तानि काञ्चनानि तु पञ्च वै ॥५३॥ कुशपूतानि त्रीण्यत्र कूत्र(-चः?)फलकमेव च । मुख्यत्तिजश्च चत्वारस्तेषां तान्युपकल्पयेत् ।। शुभं नत्रासनं यत्तु होतुरर्थे प्रकल्पितम्। हिरण्मयं तथा दिव्यं दिव्यास्तरणसंस्तृतम् ॥५६॥ अन्तर्वत्नी दितिश्चैव पत्नीत्वं समुपागता । दशवर्पसहस्राणि गर्भस्तस्या अवर्तत ।। ५७ ।। स तु गर्भाद् विनिःनृत्य मातुर्वै उदरात्तदा । उपक्लृप्तासनं यत्तु होतुरर्थे हिरण्मयन् ।। निपसाद स गर्मोऽत्र तत्रासीनः शशंस च ॥५८॥ आख्यानपञ्चमान् वेदान् महर्षिः काश्यपो यथा । तं दृष्ट्वा मुनयस्तस्य नामाकुर्वस्तु तद्विधम् ।। ५९ ॥ हिरण्यकशिपुस्तस्मात् कर्मणा तेन विश्रुतः। हिरण्याक्षोऽनुजस्तस्य सिंहिका तस्य चानुजा । राहोः सा जननी देवी विप्रचित्तेः परिग्रहात् ॥ ।

हिरण्यकशिपुदैत्यश्वचार परम तप । शन वर्षसहसाणा निराशरो र शिरा ॥६॥ त ब्रह्मा इदयामाम दैत्य तुष्टो वरेण तु । सर्वामरत्व विप्रेभ्य ममनेभ्य एव च ॥ योगाद् देवान् विनिर्जित्य सर्वदेवस्वमास्थिन ॥६२ ।। दानवाचासुराश्चैव देवा ममा भवतु मे। मारतयं महेश्वयमेष मे दीयता वर. ॥ १३ ॥ एवमुतीय ब्राह्मा तु तस्मै दत्वा यस्मिनम् । दत्वा तस्मै वसन् दिन्यान् सत्रैवान्तरधीयन ।। हिरण्यकशिपुदैत्य लोगीत पुरातने. ॥ १४ ॥ राजा हिरण्यरशियों यामाशा निवते । तस्यास्तस्या दिशो देवा नमश्चक्रमंदषिमि ॥६४ ॥ चप्रभाबो देपेद्र हिरण्यकशिपुदिना । तस्यासीनरमिह म विष्णुमृत्यु पुरा किल ।। नपेस्तु तन निर्मिन्नस्तर सुदा नया स्मृना ॥६६॥ हिरण्याक्षमुना पत्र विक्रान्ता समाबला । उकुर शनिश्चैव कालनामस्तथैव च ॥६७. महानामश्च विक्रान्नो भूतसतापनस्तथा । हिरण्याक्षमता यते देवैरपि दुरासदा ॥ ६८ ॥ ने पुत्राश्च पौत्राश्च वादेय सगण स्मृन । शन तानि सहस्राणि निहतास्तारकामये ।६।। हिरण्यकशिपो पुत्राश्चत्वाररतु महाबला । प्रहाद' पूर्वजस्वेषामनुहादस्तथैव च ।। सहादश्च हदव हदपुत्रान्निबोधन ॥ ७० ॥ भाव और भाषा दोनों की इष्टि से इस वर्णन के निकटतम पहुँचा हुआ दूसरा वर्णन हमें प्रमाण्डपुर(दिलीप) के पांचवें अध्याय में इस प्रकार मिलता है- सूत उवाच- दिव पुत्रक्ष्य नशे कन्या का महावय। कश्यपरयात्मजौ तौ सर्वेम्य पूर्व औ स्मृतौ ॥१॥ मोयेऽइन्यनिरामस्य कश्यपल्याश्वमेधिका । हिरण्यकशिपुनाम प्रथित पृथगामनन् ॥ ४॥ दिस्या गर्माद् विनि सत्य तत्रामीन समन्नत । हिरण्यकमिपुस्तम्मान मर्मगा देन स स्मृत ॥ ४ ॥ ऋषय ऊचु- हिरण्यरशिलीम नाम । महामन प्रभाव वदेत्यस्य विस्मरा दिन प्रमो॥ मन उबार- वश्यपस्याश्वमेधोभून पुण्ये २ पुधरे तापिभिर्देवनाभिश्च गन्धवपशोभिन. ॥ ७ ॥ उन्मम्मे च विपिना आल्यानादौ यथाविपि त आमनान्युपकट मानि सौवानि तु पर वै॥ कुरस्यदापि त्रीप्यत्र कून परकमेव च । मुस्यन्विजम्नु चत्वारर तो तान्युपरसायन् ।।९।। बनत वामन चेहरोदर हिरण्मयम् । नियमाद स गमोऽत्र आसीन दास च ॥१०॥ अग्यानमार महर्षि कश्यो यथा । वा ऋषयरतस्य नाम कुर्वन्धि वस्तिम् ।। हिरण्यकशिपुस्लम्मा कमगा देनम रमृत । हिरण्यास नुजस्तस्य मिहिका तस्य चानुमा। राहो मा उननी देवी विचित परिया । हिरण्यकशित्यश्वार परमना ॥ १३॥ - - ( ७ ) - शतं वर्षसहस्राणां निराहारो ह्यधःशिराः । वरयामास ब्रह्माणं तुष्टं दैत्यो वरेण तु ।। १४ । सर्वामरत्वमवधं सर्वभूतेभ्य एव हि । योगाद् देवान् विनिर्जित्य सर्वदेवत्वमास्थितः ॥१५॥ कारयेऽहमिहेश्वर्य बलवीर्यसमन्वितः । दानवास्त्वसुराश्चैव देवाश्च सह चारणैः ॥ १६ ।। भवन्तु वशगाः सर्वे मत्समीपानुभोजनाः । आर्द्रशुष्कैरवध्यश्च दिवा रात्रौ तथैव च ।। एवमुक्तस्तदा ब्रह्मानुज सांप्रतं वरम् ॥ १७ ॥ ब्रह्मोवाच:- महानयं वरस्तात वृत्तो दितिसुत त्वया । एहीदानी प्रतिज्ञानं भविष्यत्येवमेव तु ॥ १८ ॥ दत्त्वा चाभिमतं तस्मै तत्रैवान्तरधादथ । सोऽपि दैत्यस्तदा सर्व जगत्स्थावरजंगमम् ।।१९।। महिम्ना व्याप्य संतस्थे वहुमूतिरमित्रजित् । स एव तपति ब्योम्नि चन्द्रसूर्यत्वमास्थितः ॥ स एव वायुभूत्वा च ववौ जगति सर्वदा । स गोपालोऽविपालश्च कर्षकश्च स एव ह ॥ स शाता सर्वलोकेषु मन्त्रन्याख्याकरस्तथा । नेता गोप्ता गोपयिता दीक्षितो याजकः स तु ॥ तस्य देवाः सुराः सर्वे तदासन् सोमपायिनः। एवंप्रभावो दैत्योऽसावतो भूयो निवोधत ।। तस्मै सर्वे नमस्कार कुर्वन्तीज्यः स एव च । हिरण्यकशिपोदैत्यैः इलोको गीतः पुरा विह ।। हिरण्यकशिपू राजा यां यामाशां निरैक्षत । तस्यै तस्यै तदा देवा नमश्चक्रुर्महर्षिभिः ॥२५।। तस्यासीनरसिंहस्तु मृत्युर्विष्णुः पुरा किल । नरात्तु यस्माजन्मास्य नरमूर्तिश्च यत्प्रभुः ॥२६॥ तस्मात् स नरसिंहो वै गीयते वेदवादिभिः । सागरस्य च वेलायाभुच्छ्रितस्तपसो विभुः ।। शरीरं तस्य देवस्य घासीद्देवमयं प्रभो। नाम्ना सुदर्शन चैव विश्रुतश्च महाबलः ॥ २८ ॥ ततः स बाहुयुद्धेन दैत्येन्द्रं तं महाबलम् । नविभेद संक्रुद्धो नार्दाः शुष्का नखा इति ।।२९।। हिरण्यकशिपोः पुत्राश्चत्वारः सुमहाबलाः। प्रहादः पूर्वजस्तेषामनुहादस्तथापरः । सहादश्चैव हादश्च हादपुत्रौ निबोधत ।। सुंदो निसुंदश्च तथा हादपुत्रौ बभूवतुः ॥ ३० ॥ ऊपर उद्धृत किये दोनों उपाख्यानों में न केवल भावसाम्य व्यक्त है अपितु भाषा एवं छन्द का साम्य भी ध्यान को पकड़ लेता है। कश्यप ऋषि अश्वमेध रचते और उसमें होता के लिये एक हिरण्मयासन विधाते हैं। माता दिति के गर्भ में सैकड़ों वर्ष झोंकने वाला बालक माता के उदर से निकल इस आसन पर आ बैठता हैं और इस हिरण्मयासन पर बैठने के कारण ही उसका नाम 'हिरण्यकशिपुर पढ़ जाता है। इसके अनुज का नाम हिरण्याक्ष एवं बहिन का नाम सिंहिका रखा गया। आगे चलकर यही सिंहिका राहु की जननी बनी। जन्मजात मनीषी हिरण्यकशिपु ने सैकड़ों वर्ष घोर तप किया और इस अमोध तपश्चर्या के बल पर उसने ब्रह्मा से अवध्यत्व का वरदान पाया। वर में साफ तौर से मांग की गई थी कि सूखे या गीले किसी भी पदार्थ से उसकी क्षति न होने पावे । ब्रह्मा से दैत्य को वर मिल गया और वर की सफलता के साथ-साथ देवताओं से वैर की भावना भी उसमें वलवतो होती गई । यहाँ तक कि कुछ हो काल में वह देवताओं का स्वामी वन बैठा और सारे दी देवनाओं में उम एक की ही प्रतिमा काम करती दीपने सगा। यच्च अब टमी हो गए और नववरण की प्रक्रिया पर अब उसकी थाक वेट गई। विश्व का सन्नवर्ग त्राहि त्राहि करने लगा। विगु वा आमन रिल गया और उन्होंने नृमिद का अवतार देकर अपने नयों में दैत्यराट का काम तमाम कर दिया । नख मी कारण पवित्र बन गए। हिरण्यकशिपु के चार मदापनी पुत्र दुर-महाद, अनुहार, सत्ता और हार । हार के दो महापराक्रमी पुष हुए सुर और निमुन्न । पुराणों के मशोधन की दृष्टि से गेनों वर्णन अत्यन्त महत्त्व के हैं। इनके लोगों की तुलनानक विवचा में व्यक्त हो जाता है कि किम स्वरा र विवेकहीनता के साथ वनमान पुराणों या मनन किया गया है। उदाहरण के लिये लीजिये हिरण्यकशि के पुत्रों का नामावनि को। दोनों पुराणों में यह रिम प्रसार नगण्य भेद के साथ आई है, किंतु इन दोनों में मिलने वाला भेद पुराण मादन की दृष्टि में मिलने महत्त्व का है। पाठदृष्टि से तुलना कीजिये वायुपुराये ५ वे इलोष की और नाटपुराग के नवन लोक को जिममें कुलरदापि सभवन कुशनानि ये स्थान पर है। दोनों उपाण्यानों में प्रसाद का नाम तो आता है किनु मिह भगवान् उनके पास के लिये अवतार न धारण करते, अपितु देव-ग पर्यों के प्रामहरण के लिये परायाम पर पधारत है। कूर्मपुराण १६ असाय में मिहरित का वर्णन म प्रकार है- देश ऊचु- हिरण्यरशिपुनर्नाम मागे परदापित । बाधते भगवदत्यो देवान्सर्वान् सहपिभि ॥ अवध्य मयंभूनाना सामृत पुरषोत्तमन् । हनुमईमि सपा प्रातासि त्व जगमय ।। दुवा तहवनरक्त म निशुपमावन । पाय दैत्यमुग्यम्य मा सन पुरष स्वयम् ।। मेम्पनयामा घोर मयानकम् । अगदारी न प्राह पर पत्र ॥ इन्दा त दैत्यराजन हिरण्यरशिपु पुन । इम देश ममागन्तुं शिमममि पौग्यात् ॥ निशम्य व वाक्य प्राय पुषोतमम् । मदारपमन्यक्त थयो दैत्यमहारन् । बिनुन् भैरव नाद समगदाधर । आरम गम्ट देवो महामेगरवापर ।। भाव दैत्यमरी महादेपरवीरमम् । मम चरि नाद नया दैत्यातयन् ।। रविवागन्यानि महान् पुम्पो देवनोदित बिनुन् भैरव नाद न जानीमी जनार्दनम् ।। ११ महामरहिरण्यकशिपु स्वयम् । मन मायुरे पुत्रं महादसा दो। इदा गदारूट सूर्यकोरिमनप्रमम् । पुरम पर्वकार नारायामि वापरम् । चिन्योन्यमयु मम्भ्रान्त गचना । असो वाना गेला नाराय-रिपु । अामाकमव्ययो नन नमुनो या मागन ॥

(६ ) इत्युक्त्वा शनवर्षाणि ससृजुः पुरुषाय ते । स तानि चाक्षतो देवो नाशयामास लीलया ।। हिरण्यकशिपोः पुत्राश्चत्वारः प्रथितौजसः । पुत्रं नारायणोद्भूतं युयुधुर्मेधनिःस्वनाः ।। प्रहादश्चानुहादश्च संहादो हाद एव च ।। प्रहादः प्राहिणोद् नाममनुहादोऽथ वैष्णवम् । संहादश्चापि कौमारमाग्नेयं हाद एव च ॥ नानि तं पुरुषं प्राप्य चत्वार्यस्त्राणि वैष्णवम् । न शेकुश्चालितुं विष्णु वासुदेवं यथातथम् ॥ अथातौ चतुरः पुत्रान् महाबाहुमहावलः । प्रगृह्य पादेषु करैश्विक्षेप च ननाद च ।। विमुक्तेष्वथ पुत्रेषु हिरण्यकशिपुः स्वयम् । पादेन ताटयामास वेगेनोरसि तं वली ॥ स तेन पीडितोऽत्यर्थं गरुडेन सहानुगः । अदृश्यः प्रययौ तूर्ण यत्र नारायणः प्रभुः ।। गत्वा विशापयामास प्रवृत्तमखिलं तदा । सनिन्त्य मनसा देवः सर्वज्ञानमयोऽमलः ।। नरस्यार्द्धतनुं कृत्वा सिंहस्याईतनुं तथा । नृसिंहवपुरव्यक्तो हिरण्यकशिपोः पुरे ।। आविर्वभूव सहसा मोहयन्दैत्यदानवान् । दंष्ट्राकरालो योगात्मा चुगान्तदहनोपमः ॥ समारुह्यात्मनः शक्ति सर्वसंहारकारिकाम् । भाति नारायणोऽनन्तो यथा मध्यंदिने रविः ।। 'दृष्ट्वा नृसिंह पुरुष प्रहादं ज्येष्ठपुत्रकम् । वधाय प्रेरयामास नरसिंहस्य सोऽसुरः।। इमं नृसिंह • पुरुषं पूर्वस्मादूनशक्तिकम् । सहैव तेऽनुजैः सर्वैर्भाशयाशु मयेरितः ।। स तन्नियोगादसुरः प्रलादो विष्णुमव्ययम् । युयुधे सर्वयत्नेन नरसिंहेन निर्जितः ॥ 'ततः सम्मोहितो दैत्यो हिरण्याक्षत्तदानुजः। ध्यात्वा पशुपतेरस्त्रं ससर्ज च ननाद च ॥ नस्य देवाधिदेवस्य विष्णोरमिततेजसः । न हानिमकरोदस्त्रं यथा देवस्य शूलिनः॥ दृष्ट्वा पराहतं त्वस्त्रं प्रहादो भाग्यगौरवात् । मेने सर्वात्मकं देवं वासुदेवं सनातनम् ।। सन्त्यज्य सर्वशस्त्राणि सत्त्वयुक्तेन चेतसा । ननाम शिरसा देवं योगिनां हृदयेशयम् ।। स्तुत्वा नारायणं स्तोत्रैःऋग्यजुःसामसम्भवैः। निवार्य पितरं भ्रातृन् हिरण्याक्षं तदात्रवीत् ।। अयं नारायणोऽनन्तः शाश्वतो भगवानजः । पुराणः पुरुषो देवो महायोगी जगन्मयः॥ अयं धाता विधाता च स्वयंघोतिनिरसनः । प्रधानं पुरुषं तत्त्वं मूलप्रकृतिरन्यया ।। ईश्वरः सर्वभूतानामन्तर्यामी गुणातिगः । गच्छध्वमेनं शरणं विष्णुमव्यक्तमव्ययम् ॥ 'एवमुक्ते सुदुर्बुद्धिः हिरण्यकशिपुः स्वयम् । प्रोवाच पुत्रमत्यर्थे मोहितो विष्णुमायया ।। अयं सर्वात्मना वध्यो नृसिंहोऽल्पपराक्रमः । समागतोऽस्मद्भवनमिदानी कालचोदितः ॥ विहस्य पितरं पुत्रो वचः प्राह महामतिः । मा निन्दस्वैनमीशानं भूतानामेकमव्ययम् ।। कथं देवो महादेवः शाश्वतः कालवर्जितः । कालेन हन्यते विष्णुः कालात्मा कालरूपधृक् ।। ततः सुवर्णकशिपुर्दुरात्मा कालचोदितः । निवारितोऽपि पुत्रेण युयुधे हरिमव्ययम् ।। संरक्तनयनोऽनन्तो हिरण्यनयनाग्रजम् । नविंदारयामास प्रहादस्यैव पश्यतः।। 'हते हिरण्यकशिपो हिरण्याक्षो महाबलः । विसृज्य पुत्र प्रह्लादं दुद्रुवे भयविहलः ।। अनुहादादयः पुत्रा अन्ये च शतशोऽसुराः। नृसिंहदेह-सम्भूतैः सिंहैनीता यमक्षयन् ।। ततः संदत्य तद्रूपं हरिर्नारायणः प्रभुः । त्वमेव परमं रूपं ययौ नारायणाझयम् ॥ गते नारायणे दैत्यः प्रहादोऽसुरसत्तमः । अभिषेकेण युक्तेन हिरण्याक्षमयोजयत् ॥ १ ( १० ) म बाधयामाम सरावगे जित्वा मुनीनपि । लम्ध्वाधक महापुत्र नपसाराध्य शकरम् ।। देवाणिचा मदेवेन्द्रान क्षुग्ध्वा च घरगोमिमाम् । नीत्वा रसातल चके वेदान्दै निष्प्रमास्तथा ॥ नन. सनाका देवा परिम्लानमुमश्रिय । गत्वा विज्ञापयामासुर्विष्णवे रिमन्दिरम् ॥ स चिन्तयित्वा विश्वामा तदवोसयमन्य य. । सर्वदेवमय शुभ्र वाराह पुरा दधे ।। गत्वा हिरण्यनयन हत्वा त पुरषोत्तम ।दष्टयोद्वारयामाम क्त्यादी धरणीमिमाम् ।। त्यस्त्वा वाराहसस्थान सस्थाप्यैव सरदिप । स्वामेव प्रकृति दिव्या ययौ विष्णु" पर पदम् ।। सरिमन्ह तेऽमररिपो प्रहादी विष्णुतत्पर । अपालयत्स्वक राज्य माव त्यक्त्वा नदासुरम् ।। यज ते विश्विर वान् विगोराराधने रन । निमपत्न सदा राज्य नस्यासीद् विष्णुवैभवात् ।। नन कदाचिदमुरी ब्राह्मण गृहमागहम् । न च मम्माषयामाम देवानाम्चैव मायया ।। तेन तापसोऽत्यर्थं मोहितेनावमानिन । शशापासुरराजान कोषमरतलोचना यस बर समाश्रित्य बामणानवमन्यमे । मा शक्तिवणवी दिव्या विनाश ने गमिष्यति ।। इत्युक्त्वा प्रययौ पूर्ण प्रहादस्य गृहाद् दिज । मुमोह राज्यममक' मोऽपि शापवलगत्तन.।। बाधयायास विन्दान्न विवेद जनार्दनम् । पितुर्वधमनुस्मृत्य और चके हरि प्रनि । नयो मममवद युद्ध सघोर रोमहर्षगन् । नारायणस्य देवस्य प्रसादस्यामरदिप ॥ कृत्वा म मुमहद् युर विष्णुना तेन निर्जित । पूर्वमस्कारमादात्म्यार परस्मिन् पुरुपे इरी।। सात नस्य विज्ञान शरण्य शरण ययौ । वन प्रभृति देत्येन्दो घनन्या भक्तिमुदहन् । नारायो महायोगमवार पुरुषोत्तमे ।। हिरण्यकशिपु के अत्याचारों से मेजित हो देवगग विष्णु भगवान् की शरण में पहुँचे और उन्होंने उनसे प्रार्थना की कि भगवन् ! दैत्यराट् के चाल से जगती की रथा कौजिये। देवताओं के आर्न वचन को मन कर भगवान् विष्णु ने मेरपर्वतार -चक्र गदाधारी महा भैरव को दैत्यराज के महार के लिये पठाया। यह महापुरष देवरान की पुरो में आया और इमने वहाँ के दैत्यपुगों को प्रचारा। तुमुल युर हुआ, किंतु हिरण्यकशिपु के प्रहार भादि चारों पुर महापुरष का बाल बागान कर सके, स्ट, उमकी मार से बराबर ही वे समराहा से भाग सोए । बम पर दैत्यराज ने स्वय महापुरष से रोहा लिया और उसने उमके वक्ष स्पल में मी लात मारी कि वह रण में परामुमो विष्णु भगवान् की शरण में भाग निकला। माम्प की पराजय को मुन कर विशु मगवान् स्वय नृमिइ का रूप धारण करके राधमों से जूमने आए । उन्हें देग देस्यराम ने अपने पुत्र प्रसाद को उनमे रोहा लेने के लिये पटाया। दोनों का [मुलन्द इमा: महार मार पाकर भाग रखा हुआ। उमे मान हो गया कि उसका 'विरदी मत्यं नही मपि तु स्वय निगु मगवान् है। यह उनकी स्तुति करने ए और ने माने दिला को भी युर से उपरत हो उनकी पत में गाने की मार दी किंतु ( ११ ) .. .. दैत्यराज तो मद में चूर था ; बोला कि तुम सब कायर हो; मैं अकेला इस नराधम को यमलोक पठाऊंगा। ऐसा कह कर भयंकर गर्जना करता हुआ वह नृसिंह पर चढ़ दौड़ा; किंतु वात्या की चढ़ाई से पहाड़ का क्या दिगड़ता ? नृसिंह ने एक ही चपेट में उसके वक्ष. को चीर डाला और इस प्रकार उसके आतंक से धरती माता का उद्धार किया । हिरण्यकशिपु को इस प्रकार मरा देख उसका भाई हिरण्याक्ष माग निकला और अदा वहां केवल प्रहाद रह गया। कुछ काल पश्चात् प्रहाद ने अपने मितुल्य हिरण्याक्ष का राज्याभिषेक कर स्वयं विष्णु की आराधना आरंभ कर दी। सुख पाकर गर्वा कौन नहीं जाता? हिरण्याक्ष ने शंकर के वरदान से अन्धक नाम का पुत्र पाकर देवताओं को सालना आरंभ कर दिया। देवता रो पड़े। उनकी टेर को सुन कर विष्णु भगवान ने वराहावतार धारण कर उससे जगत् की रक्षा की। पितृन्य के दिवंगत हो जाने पर प्रहाद ने राज्य की बागडोर अपने हाथ संभाली। राजकान का प्रपञ्च समझो अथवा स्वाभाविक वैभवमद ! राजा प्रहाद एक ब्राह्मण का निरादर कर बैठा। ब्राह्मण के मुंह से निकले शाप ने सांप चन कर प्रहाद को असंच बना दिया और अब वह भी प्रजा को सताने पर उतारू हो गया। विष्णु भगवान् से न रहा गया। वे आए और दोनों का रोमहर्षण द्वन्द्व हुआ। प्रहाद की हेठी हुई और तब वह फिर से भगवान् विष्णु का सच्चा आराधक बन गया। कूर्मपुराग का यह उपाख्यान रोचक तत्त्वों को पुट से खिल उठा है। इसमें शंख-चक्र- गदाधारी महापुरुष का दैत्यराज के साथ लड़ने के लिये आना और उसका संहार करने में उनकी अक्षमता नृसिंहावतार की गरिमा में चार चांद लगा देते हैं और इस बात से उनके ओज एवं शौर्य में अनोखा पूर आ जाता है। नृसिंह के हाथों प्रहाद को पराजय उसकी आन्तरिक दृष्टि को खोल देती है और उसे परम तत्त्व का अनायास ही भान. हो जाता है। राजगद्दी पर बैठ कर प्रहाद भी ब्राह्मण का निरादर कर देता है-'प्रभुता पाय काहि मद नाही' तो इसे ही कहते हैं । भक्त की आंख खोलने भगवान् तुरंत आते और जब आसानो से वे उसे नहीं जगा पाते तब कर्कश प्रहारों से वे उसकी नींद को दूर करते हैं । उन्निद्र प्रहाद फिर से भगवान् को आराधना में लग जाता है। स्पष्ट है कि कूर्मपुराण का यह उपाख्यान पहले वर्णित उपाख्यानों से कहीं आगे निकल गया है; क्योंकि जहां उनमें प्रसाद का नाम-संकेतन मात्र था वहां इस उपाख्यान में प्रहाद प्रतिनायक का भाग अदा करते हैं और वे अपने पिता के कहने पर विष्णु भगवान् से खुल कर लोहा लेते हैं। किंतु इस उपाख्यान में भी प्रहाद का पिता उसे यंत्रणा नहीं देता-यह सब तो वाद की बातें हैं इनके उद्भावन में ही प्रस्तुत रचना की गरिमा सन्निहित है। मत्स्यपुराण में नृसिंहोपाख्यान की पाखें भर जाती है और वह अपने प्रपूर्ण कलेवर में सज कर हमारे संमुख आता है। मत्स्यपुराण के १६१ वें अध्याय में यह उपाख्यान इस प्रकार आरंभ होता है:-

( १२ )
अपर ऊचुन
दानी श्रोतुमिच्यामि हिरण्यकशिपोवंधम् । नरसिंहस्य माहात्म्य तथा पारविनाशनम् ।।
सून उवाच-
पुरा कृतयुगे विधा हिरण्यकशिपुः प्रनु । दैत्यानामादिपुरपरकार म महत्तः॥२॥
दशावर्षसहनागि दवारपानानि च । जलवामी समभवास्नानमौनता ॥३॥
ना शमनमाम्यां च भामचर्येग चैव हि । प्रन्या प्रीतोऽभवत्तम्य तपमा नियनेन च ।। ४ ।।
नन स्वयभूभगवान स्वयमागम्य नत्र हि । विमाने नाव न हमयुक्तन भास्वता ॥५॥
आदित्येवमुमि मा यमद्भिदेवनस्तथा । ग्ट्रैविश्वमहायश यक्षरासमपन्नगे.॥६॥
दिग्मि विदिग्मिश्च नामि सागरैस्तथा । नक्षत्रैश्च मुहूत्तश्च पचरश्च महाग्रई ॥ ७ ॥
देवेन मर्षिभि मामिदं सप्तपिभिस्तस्था । राजपिभि पुण्यदिगन्धर्वाम्मरमा गणेः ॥ ८ ॥
चराचरगुर श्रीमान् घृत सबंदिवौकमै बिमा प्राविद श्रेष्ठो दैत्य वचनमब्रवीत् ॥ ९॥
श्रीनोस्मि तय भवस्य तपमाऽनेन सुवन । वर वरप भद्र ते यष्ट काममाप्नुहि ॥१०॥
हिरण्यकशिपुस्बाच-
न देवानरमपन पोरगराधमा.। न मानुमाः पिशाचा वायुमो देवमन्तम १ ११.३५
ऋषयो वा न मा शाप. दापेर प्रपितामह । यदि मे भगवान् प्रीतो दर एप पूनो मया ॥१२॥
न चाम्ग न सम्वणगिरि पादपेन च । न वो न चाग न दिवा न निघाल्यया ।।
संवेयमहमेवा. सोमो वायुनाशन । मरिल वातरिक्ष च नक्षत्रागिदिशोदश ॥ १४ ॥
अद नोरश बामश्च वो वामबो यमः । धनदश्य पनाध्यक्षो यश मिपुरुषाधिप ।। १५ ।।
मागोवाच-
एने दिव्या वरास्तात मया दत्तास्तवा ता ।
मान्कामान्मदा वत्स प्रास्यसि वन मशय ॥१६॥
पवमुकयाम भगवाधमानाकाश व हि। राज प्राममदनं मनपिंगामे विनम् ॥ १० ॥
मतो देवाशनानाश गन्धर्वा ऋषिभिसर । वरप्रदान व निामहमुपस्पिता॥१८॥
देवा कचु--
वरमदानाद् मगवन् यषिष्यति मनोमुरः।
तत्प्रभादानु मगवन् पोऽप्यस्य विचिन्त्यताम् ॥ १९॥
मगमन्मन्नानामादिकां स्वय प्रनु । सास हव्य अश्यानामभ्यतप्रतिjथा ॥ २० ॥
मोदित पाय धुवा देश प्रवाति । आश्वामयामाम मुगन् सुशानवचनान्युमिः ॥
अवर विशाग्नेन प्रातच नाम पलन् । उपमोदम्य भगवान् वध विगु करिष्यति ।।
दच्या विद्या वाक्य मर्च पावजन्मनः।
स्वानि स्थानानि दिम्यानि विप्रजग्मुर्नुदान्विताः ।।
रममा वरे चाय मुर्गः मौलापत्र प्रमा. पहियरशिपुदत्यो बरदानेन दपिठ ॥२४॥

( १३ ) आश्रमेषु महाभागान् स मुनीन्छसितव्रतान् । सत्यधर्मपरान्दान्तान् धर्षयामास दानवः ।। देवांस्त्रिभुवनस्थांश्च पराजित्य महात्तुरः । त्रैलोक्यं वशमानीय स्वर्गे वसति दानवः ॥ २६ ॥ यदा वरमदोरिसक्तश्वोदितः कालधर्मतः । यशियानकरोदैत्यान् अयज्ञियाश्च देवताः ॥२७॥ तदादित्याश्च साध्याश्च विश्वे च वसवस्तथा । सेन्द्रा देवगणा यक्षाः सिद्धद्विजमहर्षयः॥ शरण्यं शरणं विष्णुमुपतस्थुमहावलम् । देवदेवं यज्ञमयं वासुदेवं सनातनम् ॥ २९ ।। देवा ऊचुः-- नारायण महाभाग देवास्त्वां शरणं गताः । त्रायस्व जहि दैत्येन्द्रं हिरण्यकशिपुं प्रभो ॥३०॥ त्वं हि नः परमो धाता त्वं हि नः परमो गुरुः । त्वं हि नः परमो देवो ब्रह्मादीनां सुरोत्तम ॥ ३१ ॥ विष्णुरुवाच- भयं त्यजध्वममरा अभयं वो ददाम्यहम् । तथैव विदिवं देवाः प्रतिपद्यत मा चिरम् ॥३२॥ पोऽहं सगणं दैत्यं वरदानेन दर्पितम् । अवध्यममरेन्द्राणां दानवेन्द्रं निहन्म्यहम् ॥३३॥ एवमुक्त्वा तु भगवान् विसृज्य त्रिदशेश्वरान् । वधं सकल्पयामास हिरण्यकशिपोः प्रभुः ।। साहाय्यं च महावाहुरोंकारं गृह्य सत्वरम् । अथोझारसहायस्तु भगवान् विष्णुरव्ययः ॥३५॥ 'हिरण्यकशिपुस्थानं जगाम हरिरीश्वरः । तेजसा भास्कराकारः शशीकान्त्येव चापरः ॥३६॥ नरस्य कृत्वाऽर्धतर्नु सिंहस्यातनुं तथा । नरसिंहेन वपुषा पाणिं संस्पृश्य पाणिना ॥३७॥ ततोऽपश्यत विस्तीर्णा दिव्यां रम्यां मनोरमाम् । सर्वकामयुतां शुभ्रां हिरण्यकशिपोः सभाम् ॥ ३८ ॥ विस्तीर्णा योजनशतं शतमध्यर्धमायताम् । वैहायसी कामगमां पञ्चयोजनविस्तृतान् ।। जराशोकक्लमापेतां निष्पकम्पां शिवां सुखाम् । वेश्महर्मवती रम्यां ज्वलन्तीमिव तेजसा ।। अन्तःसलिलसंयुक्तां विहितां विश्वकर्मणा। दिव्यरत्नमयैर्वृक्षैः फलपुष्पप्रदैर्युतान् ॥ ४१ ॥ नीलपीतसितश्यामः कृष्णैलोहितकैरपि । अवतानैस्तथा गुल्मैर्मजरीशतधारिभिः ॥ ४२ ॥ मिताभ्रधनसाशा प्लवन्तीव व्यदृश्यत । रश्मिवती भास्वरा च दिव्यगन्धमनोरमा॥४३॥ सुसुखा न च दुःखा सा न शीता न च धर्मदा। न क्षुत्पिपासे ग्लानि वा प्राप्य तां प्राप्नुवन्ति ते ॥४४॥ अति चन्द्रं च सूर्य च शिखिनं च स्वयंप्रमा । दीप्यते नाकपृष्ठस्था मासयन्तीव भास्करन् ।॥४५॥ सर्वे च कामाः प्रचुराःये दिया ये चमानुषाः। रसयुक्तंप्रभूतंच भक्ष्यभोज्यमनन्तकम् ॥४६॥ पुण्यगन्धनजश्चात्र नित्यपुष्पफलद्रुमाः। उष्णे शीतानि तोयानि शीतेचोष्णानि सन्ति च ॥४७॥ पुष्पिताया महाशाखाः प्रवालाडरधारिणः । लतावितानसंछन्ना नदीसु च सरस्सु च ॥४८॥ वृक्षान्बहुविधास्तत्र मृगेन्द्रो ददृशे प्रभुः । गन्धवन्ति च पुष्पाणि रसवन्ति फलानि च ॥४९॥ नातिशीतानि नोष्णानि तत्र तत्र सरांसि च । अपश्यत् सर्वतीर्थानि सभायां तस्य स प्रभुः।। सुकान्तैर्धार्तराष्ट्र राजहंसैश्च मुप्रियः। कारण्टवैश्वक्रवाः सारसैः कुररैरपि ॥ ५५ ॥ --

( १४ )
विमले सारिकाभैध पाण्दुरच्ददनदिजै । बहुइसोपीनानि सारसामिरतानि च ॥५२॥
नानापुरपोपेना यराजन्त समन्तत । चकोरा शनपत्राश्च मतकोपिलसारिका ॥५॥
पुष्पिना पुषिताश्व सम्पति महाद्रुमा । रचपीतारणास्तव पादपामगता रागा 1॥५४॥
परस्परमवैक्ष ने प्रष्टा जीवजीवका । तस्या समाया देत्ये द्रो हिरण्यकशिपुस्तदा ॥१४॥
मासहस्र परित्तो विचित्रामरणापर । अनध्यमगिवाचि शिवाज्वलितकुण्डल ॥५६॥
मामीनाश्चामने चित्र दशनवप्रमागव । दिवाकरनिभे दिव्ये दिव्यास्तरणसंस्तुते ॥५७,
दिव्यगधवासा माग्न मुमुखो ववो । हिरण्यकशिपुदैत्य आरने ज्वलितकुण्डर ॥५॥
टपचेस्मशादत्य हिरण्यवशिषु तदा । दिव्यतानेन गैतानि जगुर्गन्धर्वसत्तमा ॥५॥
विश्वाची सहम या च प्रम्गेचेत्यमिविश्रुता । दिव्याऽथ मौरभेयी च समीची पुजिकस्थरी ।।
निकेशी च रम्मा च चित्रलेसा गुचिस्मिता।
चारकेशी घृताची च मेनका चोर्वशी तथा ।।६१॥
पना महनशश्वान्या नृत्यगीतविशारदा । उपनिष्ठन्ति राजान हिरण्यकशिपुत्र प्रभुम् ।।६२॥
नाऽऽमीन महाबाद हिरण्यकशिपु प्रभुम् । उपामते दित पुया मलमवरारतया ॥६॥
नमप्रतिमांग शानशोध सहनश । बलिविरोचनस्तत्र नरवः पृथिवीमत ॥६४।
प्रहाली विप्रवित्तिय गविष्टश्च महामुर । मुरदन्ना मुनामा च प्रमति मुमतिवर ॥६५॥
घोरी महापाव कपन पिठरस्तथा । विश्वरूप मुरूपच स्वबलश्च महार ।६६॥
दशग्रीवश्व वाली च मेपवासा महामुर । परास्योलम्पनश्चैव प्रजनशेतापन ॥६॥
त्यदानवसपास्ने समलिन
कुरा ।सग्विणो वाग्मिन सोमदेव चरितबमा १६८॥
म लापवरा भूगास विगतमृत्यव । एते चावे च बहवो हिरण्यकशिपु प्रमुम् ॥१९॥
उशमनिमहामानस दिव्यपरिच्छदा । विमान विविकारानमारिवाग्निमि ॥७॥
मह वपुए म विनिनादवाद 1 भूपिनागा रित पुत्रास्तमुपशमन मवश ॥७॥
मस्या सभायां दिव्यायामसुरा पर्वोपमा । हिरण्यवपुष सबै दिवाकरसमममः ॥७२
न हुन नेत्र विहिरण्यकशिपोयंपा । ऐषय देत्यमिहरय यथा तस्य महात्मन १७३॥
अथ द्विपट्यधिकशततमोऽध्यायः
सून उवाच-
मतो दृष्ट्वा महामान कालचकमिवान् । नरसिंहवपुछन्न मरमच्छभिवानमन् ॥ १॥
हिरण्यरशिरी पुत्र प्रहादो नाम बीर्यवान् । दिव्येन चभुषा मिहमपश्यदेवमागतन ॥२॥
त दृष्ट्वा समवेलाममा ठनुमापिनन् । विमिना दानवा सहिरण्यकशिपुरवस ॥३॥
प्रादटवार--
महामाहो महाराव देत्यानामादिममरान न न नो इष्ट नारामहमिद वा ॥४॥
मम्वरमर दिव्यं शिमिदै समगठन् । दैत्याकरण घोर तीन मनो मम ॥५॥

( १५ )
अस्य देवाः शरीरस्थाः सागराः सरितश्च याः। हिमवान्पारियात्रश्च ये चान्ये कुलपर्वताः ।।
चन्द्रमाश्च सनक्षत्रैरादित्यैर्वसुभिः सह । धनदो वरुणश्चैव यमः शक्रः शचीपतिः ॥ ७ ॥
मरुतो देवगन्धर्वा ऋषयश्च तपोधनाः । नागा यक्षाः पिशाचाश्च राक्षसा भीमविक्रमाः ॥८॥
ब्रह्मा देवः पशुपतिर्ललाटस्था भ्रमन्ति वै । स्थावराणि च सर्वाणि जङ्गमानि तथैव च ।। ९ ।।
भवांश्च सहितोऽस्माभिः सर्वदैत्यगणैर्वृतः । विमानशतसंकीर्णा तथैव भवतः समा ।। १० ।।
सर्व त्रिभुवनं राजंल्लोकधर्माश्च शाश्वताः । दृश्यन्ते नारसिंहेऽस्मिन् तथेदमखिलं जगत् ।।
प्रजापतिश्चात्र मनुर्महात्मा ग्रहाश्च योगाश्च महीरुहाश्च ।
उत्पातकालश्च धृतिर्मतिश्च रतिश्च सत्यं च तपो दमश्च ॥१२॥
सनत्कुमारश्च महानुभावो विश्वे च देवाः ऋषयश्च सर्वे ।
क्रोधश्च कफायश्च तथैव हो धर्मश्च मोहः पितरश्च सर्वे ॥ १३ ॥
अहादस्य वचः श्रुत्वा हिरण्यकशिपुः प्रभुः । उवाच दानवान्सर्वान् गणांश्च स गणाधिपः ।।
मृगेन्द्रो गृह्यतामेष अपूर्वा तनुमाश्रितः । यदि संशयः कश्चिद् वध्यतां वनगोचरः॥ १५ ॥
ते दानवगणाः सर्वे नगेन्द्रं मीमविक्रमन् । परिक्षिपन्तो मुदितास्त्रासयामासुरोजसा ॥१६॥
सिंहनादं विमुच्याथ नरसिंहो महाबलः । वभक्ष तां समां दिव्यां व्यादितास्य इवान्तकः ।।
सभायां भज्यमानायां हिरण्यकशिपुः स्वयम् ।
चिक्षेपास्त्राणि सिंहस्य रोषाद् व्याकुललोचनः ॥ १८ ॥
सर्वास्त्राणामथ ज्येष्ठं दण्डमन्त्रं सुदारुणम् । कालचक्र तथाऽधोरं विष्णुचक्र तथा परम् ॥१९॥
पैतामहं तथात्युग्रं त्रैलोक्यदहनं महत् । विचित्रामशनि चैव शुष्काई चाशनिद्वयन् ॥२०॥
रौद्रं तथोग्रं शूलं च कङ्कालं मुसलं तथा । मोहनं शोषणं चापि संतापनविलापनम् ।। २१ ।।
वायव्यं मथनं चैव कापालमथ कैकरन् । तथाऽप्रतिहतां शक्ति क्रौञ्जमस्त्रं सथैव च ।। २२ ।।
अस्त्रं ब्रह्मशिरश्चैव सोमास्त्रं शिशिरं तथा । कम्पनं शातनं चैव त्वाष्ट्रं चैव सुभैरवम् ॥२३॥
कालमुद्गरमक्षोभ्यं तपनं च महाबलम् । संवर्तनं मोहनं च तथा मायाधरं परम् ।। २४ ।।
गान्धर्वमत्रं दयितमसिरत्नं च नन्दकम् । प्रस्वापनं प्रमथनं वारुणं चास्त्रमुत्तमम् ।।
अस्त्रं पाशुपतं चैव यस्याप्रतिहता गतिः ।। २५ ।।
अस्त्रं हयशिरश्चैव ब्राह्ममस्त्रं तथैव च । नारायणास्त्रमैन्द्रं च सार्पमस्त्रं तथाद्भुतम् ।।२६।।
पैशाचमस्त्रमजितं शोषदं शामनं तथा। महाबलं भावनं च प्रस्थापनविकम्पने ॥ २७ ॥
एतान्यस्त्राणि दिन्यानि हिरण्यकशिपुस्तदा । असृजन्नरसिंहस्य दीप्तस्याग्नेरिवाऽऽहुतिन् ।।
अस्त्रैः प्रज्वलितैः सिंहमावृणोदतरोत्तमः । विवस्वान् धर्मसमये हिमवन्तमिवांशुभिः ।।
स मनिलोद्भूतो दैत्यानां सैन्यसागरः । क्षणेन प्लावयामास मैनाकमिव सागरम् ।।
ते दानवाः पाशगृहीतहस्ताः महेन्द्रतुल्याशनिवजवेगा।
समन्ततोऽभ्युद्यतबाहुकायाः स्थितात्रिशीर्षा व नागपाशाः॥३१॥
सुवर्णमालाकुलभूपितागाः पीतांशुकामोगविभाविताङ्गाः ।
मुक्तावलीदामसनायकक्षाः हंसा इवाssमान्ति विशालपक्षाः ॥ ३२ ॥

( १६ ) क्षिद्भिग्रेज्वरित महाबल महासपूर्ण मुममारतो बभी। गिरियथा सतनवर्षिभिर्घने कृनान्धकारानरकन्दरो द्रुमैः ॥ ३३ ॥ ईन्यमानौरि महाखबार महावर दैत्यगणे. समेत । नाम्पनामी मगवान् प्रतापस्थित प्रकृया हिमवानिवाचल ॥३॥ सत्रासितास्नेन नमिहरूपिला दिते मुना पादस्तुल्यनेजमा । मयादिचेतु पवनो नाना पयोमय. सागरवारिसमका ॥ ३५॥ अथ त्रिपष्टयधिकशनतमोऽध्यायः हिरण्यरशिपुदैत्यो भूय प्रासजदूजितान् । शक्ति प्रज्वलितापोराधौनशस्त दिप्रमाम् ॥१॥ वामापनन्नी सप्रेक्ष्य मृगेन्द्र तिमुज्ज्वलाम् ! कारेशैव रौद्रेण वमय भगस्तिदा ॥२॥ रराम भग्ना सा शक्तिमृगेन्द्रेण महीतले । सविसूलिगा अलिना महोल्केव दिवच्युता ।। नाराचपतिः सिंड्रय प्राप्ता रेजेऽविदूरन । नीलोत्पल्पाशाना मालेबोन्जलदर्शना ॥४॥ सबिता यथान्याय विक्रम्य च यथामुखन् । तत्मैन्यमुत्सारितवान् तृगामागेव माग्नः ॥ ततोमवर्ष दैत्येन्द्रा न्यसृजन्न नमोगता. 1 नगमात्र शिणसण्टेगिरि महाप्रभ ॥६॥ वाश्मोपदत्यगणाः पुनः सिंहमरिंदमम् । यादयाचतिरे मेघा धाराभिरिव पवनम् ।। न च त चालयामामुदत्यौपा देवमत्तमम् । मोमवेगोचलप्रेष्ठं समुद्र इद मन्दरम् ॥ ८ ॥ दोभमवर्षे विहते जरवर्षमनन्नरन् । धाराभिरक्षमात्राभि प्रादुरामीत्ममन्ततः ॥९॥ नमस प्रच्युना धारास्तिग्मवेगाः समन्ततः। मृत्य सर्वनो व्योम दिशचीपदिशस्तथा ।। पारा दिवि न सर्वत्र वमुपाया च सर्वशः। न सशनि च ता देव निपतन्त्योधनि भुरि॥ बामनो वयुवर्ष नोपरिधाव वधः । मृगेन्द्रप्रतिरूपस्य स्थितस्य युपि मायया ॥ १२ ॥ इडरमव तुमुले जनवर्षे च छोपिते । सोऽसबहानको मायामग्निवायुसमौरिनाम् ॥ १३ ॥ महेन्द्रस्तोपदैः साध सहया महायुतिः। महता तोयवन मयामास पारकम् ॥ १४ ॥ मस्या प्रनिहतायां तु मायावा गुपि दानव. असूजघोरसकाश तमरनीय समन्ततः।। बममा सबने रो देत्येवाताधेषु च स्वितेजमा परिवृतो दिवाकर स्वामी ॥ १६॥ विशिखा मुकुर्टि चास्य शुनिदा रणे । सारस्था विशुमादा गां विश्वगामिव ॥१७॥ ततः सर्वामु मायासुलामदितिनन्दना । हिरण्यकशिपु दैन्य विवर्ना शरण ययुः ॥१॥ ततः प्रज्वलितःोपाद प्रदहनिय तेजमा । नरिमन्यु तु दैत्येन्द्र तमोभूतमभूज्जगत् ।। भावहः प्रबहश्व विशोष पदावा । परावदः संवारच महावस्पराक्रमाः ॥२०॥ तथा परिवहः यीमान् उत्सातमवासिनः । इत्येव सुमिताः सप्त मस्ती गगनेचराः ॥२१॥ में ग्रह सर्वगेकस्य क्षये प्रादुर्भवन्ति । तुमः गगने या व्यचरन्त यथामुमम् ॥२२॥ अयोग्तचाप्य चान मार्ग निधि निशाचरः। सग्रहः । नत्र राकारतिरदिन्दमः ॥२३॥ शिव चहिदि गती भगवान् विचाकरः । कृष्ण कान नया लहान मुमहरिपि ॥२८॥ अमुभवादिता पद भूमिद्धिविमावनु । मगनपश्च भगवान अमीय परिदृश्यते ॥२५॥ - ( १७ ) सप्त धूनिमा घोराः सूर्या दिवि समुत्थिताः । सोमस्य गगनस्थस्य ग्रहास्तिष्ठन्ति शृङ्गगाः ।। वामे तु दक्षिणे चैव त्थितौ शुक्रवृहस्पती । शनैश्चरो लोहितागो ज्वलनागसमद्युतिः ।। समं समधिरोहन्तः सर्वे ते गगनेचराः । शृङ्गाणि शनकै?रा युगान्तावर्तिनी ग्रहाः ॥ चन्द्रमाश्च सनक्षत्रैहैः सह तमोनुदः ! चराचरविनाशाय रोहिणी नाभ्यनन्दत ।। गृहीतो राहुणा चन्द्र उल्काभिरभिहन्यते । उल्काः प्रज्वलिताश्चन्द्रे विचरन्ति यथासुखम् ।। देवानामपि यो देवः सोऽप्यवर्पत शोणितम् । अपतनगगनादुका विद्युद्रूपा महास्वनाः ॥ अकाले च द्रुमाः सर्वे पुष्पन्ति च फलन्ति च । लनाश्च सफलाः सर्वाः ये चाहुदैत्यनाशनम् ॥ : फलान्यजायन्त पुष्पैः पुष्पं तथैव च । उन्मीलन्ति निमीलन्ति हसन्ति च रुदन्ति च ॥ विक्रोशन्ति च गम्भीराः धूमयन्ति ज्वलन्ति च । प्रतिमाः सर्वदेवानां वेदयन्ति महद्भयन् ।। तदा हिरण्यकशिपोर्दैत्यस्योपरि वेश्मनः । माण्डागारायुधागारे निविष्टममवन्मधु ॥ असुराणां विनाशाय तुराणां विजयाय च । दृश्यन्ते विविधोत्पाताः घोरा घोरनिदर्शनाः ।। एते चान्ये च बहवो धोरोत्पाताः समुत्थिताः । दैत्येन्द्रस्य विनाशाय दृश्यन्ते कालनिर्मिताः ।। मेदिन्यां कम्पमानायां दैत्येन्द्रेण महात्मना। महीधरा नागगणा निपेतुरमितौजसः ।। विषज्वालाकुलैर्वक्त्रैविमुच्छन्तो हुताशनम् । चतुःशीर्षाः पञ्चशीर्षाः सप्तशीर्षाश्च पन्नगाः ।। वासुकिस्तक्षकश्चैव कर्कोटकधनञ्जयो । एलामुखः कालियश्च महापद्मश्च वीर्यवान् ।। सहस्रशोपों नागो वै हेमतालध्वजः प्रभुः। शेषोऽनन्तो महामागो दुष्प्रकम्प्यः प्रकम्पितः॥ दीप्तान्यन्तर्जलस्थानि पृथिवीधरणानि च । तदा क्रुद्धेन महता कम्पिनानि समन्ततः ।। नागात्तेजोधरावापि पातालतलचारिणः । हिरण्यकशिपुदैत्यस्तदा संस्पृष्टवान्महीन् । संदष्टौष्ठपुटः क्रोधाद् वराह इव पूर्वजः । नदी भागीरथी चैव सरयूः कौशिकी तथा । यमुना त्वय कावेरी कृष्णवेणा च निम्नगा । सुवेणा च महाभागा नदी गोदावरी तथा ।। चर्मण्वती च सिन्धुश्च तथा नदनदीपतिः। कमलप्रभवश्चैव शोणो मणिनिभोदकः॥ नर्मदा शुभतोया च तथा वेत्रवती नदी । गोमतो गोकुलाकीर्णा तथा पूर्वसरस्वती ।। मही कालमही चैव तमसा पुष्पवाहिनी। जम्बूद्वीपं रत्नवरं सर्वरत्नोपशोमितन् ।। सुवर्णप्रकटं चैव सुवर्णाकरमण्डितन् । महानदं च लौहित्यं शैलकाननशोभितम् ।। पत्तनं कोशकरणमृपिवीरजनाकरन् । मागधाश्च महाग्रामाः मुण्डा शुगास्तथैव च ॥ सुह्या मल्ला विदेहाश्च मालवाः काशिकोसलाः। भवनं वैनतेयस्य दैत्येन्द्रेणामिकम्पितम् ।। कैलासशिखराकारं यत्कृतं विश्वकर्मणा । रक्ततोयो महामीमो लौहित्यो नाम सागरः॥ उदयश्च महाशैल उच्छ्रितः शतयोजनम् । सुवर्णवेदिकः श्रीमान् मेघपंक्तिनिपेवितः ।। भ्राजमानोऽर्कसदृशैर्जातरूपमयदुमैः । शालैस्तालेतमालैश्च कर्णिकारैश्च पुष्पितैः ।। अयोमुखश्च विख्यातः पर्वतो धातुमण्डितः । तमालवनगन्धश्च पर्वतो मलयः शुमः ।। सुराष्ट्राश्च सवाहोकाः शूरामोरास्तथैव च । भोजाः पाण्ड्याश्च पक्षाश्च कलिनास्ताम्रलिप्तकाः ॥ तथैवोण्डाश्च पौण्डाश्च वामचूडाः सकेरलाः । क्षोभितास्तेन दैत्येन सदेवाश्चाप्सरोगणाः ॥०३॥ अगस्त्यमवनं चैव यदगन्यं कृतं पुरा। सिद्धचारणसंघश्च विप्रकीर्ण मनोहरन् ॥ ७४ ॥ २ नृ० ब० भ० - ( १८ ) - विचित्रनानाविरुण सुपुरिपनमहाद्रुमन् । जातरूपमयै मृगैरप्मरोगानादिनम् ।। ७५॥ गिरि पुष्पितश्चैव रक्ष्मीवान् प्रियदर्शन । उत्थिन सागर मित्त्वा विश्रामश्चन्द्रमर्ययो । रराज भुमहागगन विन्सिन्निव ।। ७६ ॥ चन्दागुमवारी सागरा दुममावृते । विद्यु वान् मर्दन ग्रोमान् आयन शनयोजनन् ।। विघुना यत्र सपाना निपात्यन्ने नगगेचमे । ऋषम पर्वत व श्रीमान्पममशिन ॥ ८ ॥ सुभर पर्वन श्रीमान् यत्रारम्त्यगृह शुभम् । विशालाक्षश्च दुर्धर्ष सांगामान्य पुरी ८९|| तथा भोगवनी चापि देवेद्रणामिकम्पिता। महामेनो मिरियैव पारियापपर्वत ॥८॥ चक्रवाश्च गिरिमठो वाराहश्चैव पर्वत । प्राग्ज्यौतिपपुर चापि जानरूपमय शुभम् ।। ८१ ॥ यस्मिम् वसनि दुष्टात्मा नरको नाम दानब । मेघश्व पर्वतश्रमो मेवगम्मीरनिम्वन ॥८२। पष्टिस्तत्र सहस्राति पर्वनानां द्विजोत्तमा । तर गादित्यसकाशो मेरम्नय महागिरि १८|| यशराशमान्धनित्य सेविनकन्दर । हमगर्मो महासरस्नया हेमसागे सिमी ॥४॥ बैंडासश्चैव शैलेद्रो दानवेन्द्रेण कम्पित । इमपुष्परसदन तेन वैसनम सर ॥५॥ कम्मिन मानम चैव हमारण्डबाकुटन् । विगाव वैव कुमारी च सरिहरा ।। ८६ ॥ तुपारचयसो मन्दरश्चापि पर्वत । रशीरविन्द्रश्च गिरिश्चन्द्रररथरनथादिराट् ।। ८७ ।। प्रजापविगिरिष तथा पुष्करन । देवाप्रवनक्षेत्र तथा ३ रगुरोर 1८८॥ नौश्च सप्तपिलश्च धूमवरच पर्वत । एने चान्ये च गिरयो देश ननपदास्तथा ।। ८९ ।। नव ममागरा मर्दा सो कम्पयत दानव । कपिलश्च महीपुत्रो च्यानवाव वपिन ।९०॥ खेचराश्च सतीपुत्रा पातारनलबासिन । गगस्तथा परो रौद्रा मेधनामारा युर ॥९॥ सर्वगो मीमवेगश्च मर्व एवाभिवपिना । गदा शूली कगारच हिरण्यकशिपुस्त11|| जीमनघनसकाने भीमूनपनि स्वन । जीमूतधननिर्घोषो जीमत व बगवान् ॥ ९३ ।। देवारिदिति बीरो नमिद ममुशावर। ममुत्पत्य उतरनीलम देश महान ।। तदोबारसहायन विदार्य निहलो युषि ॥१४॥ दैत्यराट् हिरण्यकशिपु सहस्रों वर्ष पर्यन अधशिरा कर उग्र तपस्या करना है और ब्रमा से यह इस बात का वर पाता है कि कोर मी जन र उममा मार न घर समीर फिसौ मा कम-सम्म से किमी भी समय टमको क्षति होने पाये पर मिल गया और उसके मितेरी पोस्मित देस्यराट् विश्व के सब देवी दवों में समा गया और चारों और मीका प्रताप दमकने एगा। स्वामी की नाई सके शरीर से अत्याचारों को सादा निकलने ली जिममे प्रस्न हो देव भारत में पहुंचे और गोरे कि भगवन् ! इसे श्राममान में भी बदाया है, अब इसके पतन या मार्ग भी तो इलिये माने यशश कि हम अपने पारों की नैया मर हेने दो। जब यह भर जायगी तर विशुश्मय सहार कर दंगे। देवराट् है अत्याचार आइ सीमा मे बाहर हो र-वमने सब देवों का यौन विदा और निळे पारेही न के बरार दिये। टर मगाद विकोकारो साय से

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। उसकी सभा में पहुँचे। सभा क्या थी विश्व के वैभव की प्रदर्शनी थी। सारे ही नृत्य-
वादा अशेष अप्सराओं के सारे ही विलासोल्लास, वासनाओं के उद्दीपन सारे ही
उपसाधन वहां एकत्र थे। नृसिंह को देखते ही प्रहाद भांप गया कि वह कोई मर्त्य नहीं,
स्वयं भगगन् हैं और वह उनका उसी क्षण से भक्त बन गया। किन्तु दैत्यराट की तो
पोरी-पोरी में गर्व खौल रहा था। वह आगे बढ़ा और उसने अपने सारे ही संहारक
अस्त्र उन पर ऊल दिये । दानवों के वादल के बादल नृसिंह पर छा गये किंतु सूर्य की
प्रखर किरणें इन वादलों को पार कर गई और वे सब धरती पर आ गिरे । नृसिंह का
द्वन्द अव दैत्यराट से हुआ जिसमें अस्त्रों की भरमार से धरती-अंवर एक हो गए और
अपने-पराए की संशा जाती रही। पर दैत्यराट आखिर मानव ही था। भगवान् के
पंजों ने उसकी छाती विदीर्ण कर दी और वह यमलोक सिधार गया।
प्रस्तुत उपाख्यान ब्रह्मपुराणान्तर्गत नृसिंहोपाख्यान का परिवर्धित संस्करण प्रतीत
होता है। श्लोकों में भारी समानता है। कुछ इलोक तो जैसे के तैसे दोनों में
उपलब्ध होते हैं।
विदग्धता एवं वर्णन की विशदता की दृष्टि से यह उपाख्यान अन्य उपाख्यानों से
कहीं आगे बढ़ गया है और इसमें प्रहाद को ज्ञानलाभ के लिये न तो नृसिंह से ही
लोहा लेना पड़ता और न और ही किसी प्रकार की श्रान्ति सहनी पड़ती है। निश्चय
ही मत्स्यपुराण ने 'न ऋते श्रान्तत्य तख्याय देवाः' इस उक्ति को भुलाकर अनायास
ही भक्त को भगवान के दर्शन करा दिये हैं और यह एक बात ही इस उपाख्यान को
नवीनता को स्थापित करने के लिये पर्याप्त है।
दैत्यसभा का वर्णन अनूठा है किन्तु दैत्यसभा में इतने वनस्पतियों का क्या काम ?
सभा में तो चन्द हो वेल-बूटों से सजावट का काम चल जाता है। फिर अन्य बहुत से
प्रसाधनों को जुटाना (जैसे नदी आदि) जहां इस उपाख्यान के रचयिता को देशकालान-
भिज्ञता का द्योतक है वहां वह उसकी रसहीनता का भी परिचायक है। युद्ध का वर्णन
इस उपाख्यान का जितना हो व्यापक है उतना ही वह रोमांचभेदक भी है-कितु
नृसिंह दैत्यराट् के तुमुल द्वन्द पर इससे गहरी धूप नहीं पड़ती और लावोद्गारी वह
लोकालोक अनुद्भासित ही रह जाता है। दैत्यराट के निधन का चित्र भी एकाएक हमारे
संमुख आ जाता है। उसके आवश्यक प्रारूप हमारी आंखों से ओझल ही रह जाते हैं।
निश्चय ही मत्स्यपुराण का उपाख्यान अपेक्षाकृत आधुनिक है और इससे प्रहाद के
चरित्र में आवश्यक विकास का क्रम अनुद्भूत ही रह जाता है।
पद्मपुराण के पञ्चम खण्ड के ४२ वें अध्याय में नृसिंहचरित का वर्णन इस प्रकार है:-
4
मोष्म उवाच-
-
इदानीं श्रोतुमिच्छामि हिरण्यकशिपोर्वधन् । नरसिंहस्य माहात्म्यं तथा पापविनाशनम् ॥१॥

( २० ) - पुलस्त्य उवाच- पुरा कृतयुगे राजन् हिरण्यरशिपु प्रमु' । दन्यानामादिपुरुषदचकार समहत्तपः ॥ २॥ दशवर्षसहस्रागि दशवर्षशतानि च । जलवामी सममवत् स्नानमौनधृतवतः ॥३॥ इत. समदमाम्यां च ब्रह्मचर्येण चैव हि । बझा प्रीनोमदत्तस्य तपमा नियमन न॥४॥ तन स्वयभूमंगवान् स्वयमागत्य ना हि । विमानेनाकवर्गेन इमयुकेन मास्वना ।। ५ ॥ मादित्येवमुभि साध्ये मद्भिदेवरे सह । रदौविश्वसहायश्च यक्षराक्षमपन्नगः ॥६॥ दिग्विभागविदिग्मिश्च नदीमि. सागरस्तथा । नक्षत्रश्च मुहूश्च राचरैश्च महामहै ॥ ७ !! देवशापिमि' सार्थ मिट्टै' सप्तर्षिभिस्तथा । राजर्षिभिः पुण्यद्भिर्गन्धर्वाप्मरमा गगै 1॥८॥ चराचरगुरुः श्रीमान् वृत' मदिवौक्स । नन्ना ब्रह्मविदा श्रेष्टो दैत्य वचनमत्रांद ॥ ९ ॥ वासोवाच- मोतोऽरिम तव मत्स्य सामाग्नेन मुन्नन । वर वरय मद्र ते यथेष्ट काममाप्नुहि ॥१०॥ हिरण्यकशिपुरवाच- न देवामुरगन्धर्वा न यहोरगराक्षमा न मानुश पिशाचाच इन्युमो देवमसम ॥ ११ ॥ ऋपयो मानवा मायेनं शपेय पिनामद । यदि मै भगवान्मोतो वर म्प पृती मया ॥ १२॥ न शस्त्रेगन चास्त्रैण गिरिजा पादपेन वा । न शुष्कान चारेण न स्याचान्यन नै वः ।। भवेयमहमेशा सोमो वायुनाशन' । सलिल चानरिक्षच नक्षत्रामि दिशो दश ॥१४॥ अहं बोधश्च कामश्च बरगी वामवो यम । धनदश्च पनाध्यक्षो पक्ष विपुम्पाथिप ॥ १५ ॥ बमोवाच- एष दिल्यो बरस्तान मया दरलवादलुन । सर्वकामपनो वत्म प्राप्स्यसि त्व न साया पुदस्य उवाच- एवमुस्त्वा स भगवान् जगामासाशमेव है । वैरा ब्रह्मसदन प्रापिंग-सेवितम् ॥ १७ ॥ तनी देवाश गन्धर्वारिभिः सह चार वरमसन इत्वैवं पितामहमुपरिरला॥१८॥ देवा कचु- बरपानार मगान् वरिष्यनि म नौमर । सप्रसादश्च मगवन् वधो-स्य च विविन्यताम् ॥ पुरस्व रवाच--- भगवान् सर्वभूतानामादिशा स्वर प्रभुः । सा च व्यकन्यानामन्यचप्रकृति पर ॥२an मांगेरिस वाश्य छादेव. प्रजापति । मायामयामास तदा पीतवचनामि ॥२५॥ प्रोवाच- मारय सिनेन प्रादरमः परम् । बरसोल्स्य भगवान विष्णु करिस्पति ( २१ ) पुलस्त्य उवाच- तच्छ्रुत्वा विबुधा वाक्यं पङ्कजजाननात् । स्वानि स्थानानि दिव्यानि विप्रजर मुर्मुदान्विताः ॥ लब्धमात्रे वरे सोऽथ सर्वा अबाधत प्रजाः । हिरण्यकशिपुदैत्यो वरदानेन गर्वितः॥ २४ ॥ आश्रमेषु महाभागान् मुनीन्वै संशितव्रतान् । सत्यधर्मपरान्दान्तान् धर्षयामास दानवः ॥२५॥ देवांत्रिभुवनस्थांश्च पराजित्य महातुरः । त्रैलोक्यं वशमानीय स्वर्गे वसति दानवः ॥२६ ।। तदा वरमदोसिक्तश्चोदितः कालधर्मिणा । यशियानकरोइत्यान् अयशीयांश्च दैवत्तान् ॥२७॥ यथादित्याश्च साध्याश्च विश्वे च वसवस्तथा । रुद्रा देवगणा यक्षा देवद्विजमहर्षयः ॥ २८ ।। शरण्यं शरणं विष्णुमुपतस्थुमहावलम् । देवदेवं यशमयं वासुदेवं सनातनम् ॥ २९ ।। देवा ऊचुः- नारायण महाभाग देवास्त्वां शरणं गताः । त्रायत्व जहि दैत्येन्द्र हिरण्यकशिपुं प्रभो ॥३०॥ त्वं हि नः परमो धाता त्वं हि नः परमो गुरुः । त्वं हि नः परमो देवो ब्रह्मादीनां सुरोत्तमः ।। विष्णुरुवाच- मयं त्यजध्वममराः अभयं वो ददाम्यहम् । तथैव त्रिदिवं देवाः प्रतिपद्यत मा चिरन् ।॥३२॥ एवं हि सगणं दैत्यं वरदानेन गर्वितन् । अवध्यममरेन्द्राणां दानवेन्द्र निहन्म्यहम् ॥३३॥ पुलस्त्य उवाच- एवमुक्त्वा तु भगवान् विश्वपो विष्णुरव्ययः । हिरण्यकशिपुत्थानं जगाम हरिरीश्वरः ॥३४॥ तेजसा भास्कराकारः शशी कान्त्येव चापरः । नरस्य कृत्वाऽर्धतनुं सिंहस्यातिनुं तथा ॥३५॥ नारसिंहेन वपुषा पाणी संगृह्य पाणिना । ततोऽपश्यत विस्तीर्ण दिव्यां रन्यां मनोरमान् ।। सर्वकामयुतां शुभ्रां हिरण्यकशिपोः सभाम् । वित्तीर्णी योजनशतं शतमध्यर्धमायतन् ॥३॥ वैहायसी कामगमा पञ्चयोजनमुच्छ्तिान् । जराशोकक्षमापेतां निष्प्रकम्पां शिवां सुखान् ।। वेश्मासनवती रम्या ज्वलन्तीमिव तेजसा । अन्तःसलिलसंयुक्तां विहितां विश्वकर्मणा ॥३९॥ दिव्यवर्णमयैर्वृक्षैः फलपुष्पप्रदैर्युताम् । नीलपीतासितश्यानः श्वेतैर्लोहितकैरपि ॥ ४० ॥ अवदातैस्तथा गुल्मै रकमक्षरिधारिभिः । सिताभ्रधनसंकाशांप्लवन्ती चाभ्यदृश्यत ।। ४१ ।। रश्मिमती स्वभावेन दिव्यगन्धमनोरमा। न मुखा न च दुःखा सा न शोता न च धर्मदा ।। न क्षुत्पिपासे ग्लानि वा प्राप्य तां प्राप्नुवन्ति ते । नानारुपैरुपकृतां सुचित्रैश्च शुभ(सुभा १ )स्वरैः ।। ४३ ।। अतिसूर्य च चन्द्रं च शिखिनं च त्वयंप्रभा । दीप्यते नाकपृष्ठस्था भासयन्तो च भासुरा ।। सर्वे चकासिरे तत्यां मुदिताश्चैव मानुषाः । रसवन्तः प्रभूताश्च भक्ष्यमोज्यानमुत्तमम् ॥ पुष्पगन्धाः जश्वापि नित्वकालफलद्रुमाः । उणे शीतानि तोयानि शीते चोष्णानि सन्ति वै ॥ पुष्पिताम्रान्महाशाखान् प्रवालाकुरधारिणः । लतावितानसंछन्नान् कल्पयामात स प्रभुः ।। गन्धवन्ति च पुष्पाणि रसवन्ति फलानि च । तानि शोतानि चोष्णानि तत्र तत्र सरांसि च ।। अपश्यद् भूपतीर्थानि सभायां तस्य स प्रभुः । नलिनैः पुण्डरीकैश्च शतपः सुगन्धिभिः ॥

( २२ )
रकै कुवरयेश्चैव कहार स्वले स्तथा । नानाश्चयंसमोपेने. पुषैरन्यैश्च मुप्रियः ।। ५०॥
कारण्डवेश्चकवाः सारमै कुरररपि । विमरस्फटिकामानि पाण्दुरच्चदनदिजे. ॥५१॥
बहमीपगीतानि सारमाना कतानि च । गन्धवत्यो लतास्तत्र पुष्पमरिधारिणी ॥५२॥
दृष्टवान्मगवान्दष्ट सदिरावेतमार्जुनान् । चुना निम्बा नागवृक्षा कदम्बा बकुला पवाः ।।
चकोरा शतपत्राश्च मतकोरिरसारिका । पुस्मितान्पुगिनामाश्च सरनन्नि महामान् ।
रस्पीनारगास्तत्र पादपायगता. सगा। परस्परमदेशन्त प्रहृष्टा जीवजीवनाः ॥५॥
नस्या समाया देवेन्द्रो हिरण्यकशिपुस्तदा । आमीन आमने चित्र दशनवप्रमागतः ॥६॥
दिवाकरनि दिन्ये दिव्यास्तरणसस्तृते । हिरण्यकशिपुदैत्य. आरते दलितकुण्डलः ।।
उपाचरुमहादेत्या हिरण्यकशिपु तदा । दिव्यतालानि गोतानि जगुर्गन्धर्वमत्तमाः ॥ ५८ ॥
विश्वाची सहजन्या च प्रम्लोचेति च विश्रुता। दिन्याय मौरभेयी च समीची पुचिकरपला ।
मिश्रकेशी च रम्मा च चिनमा श्रुतिविभ्रमा । चारनेत्रा घृताची च मेनका चोवंशी नया ॥
एटा सासरचान्या नृत्यगीतविशारदा । आतिछन्न राजान हिरण्यरशिपु प्रमुम् ॥६॥
उपामने दिने पुत्रा. म। एयवराम्नया । बलिवरोचनिस्तत्र नरक पृथिवीमुन' ॥६॥
प्रसादी विप्रचित्तिश्च गविठश्च महावर 1 मुरहन्ना दुस्सकना मुमनाः मुमनिस्तया ॥ ६३ ॥
घटोदरी महापायनः पिठरस्तथा । विश्वरूप. मुरूपश्च विश्वरायो महावन ॥६॥
दशग्रीवश्च वाली च मेषवामा महासुरः। घामो विटरूपश्च ज्वलनरचन्द्रतापन ॥६॥
दैत्यदानवमधारते म लिनकुण्डला 1 सम्वियो वर्मा सर्वे स च चरितबना ॥६६॥
मरे लम्बवरा पुराः सर्वे विहितमृत्यव । एते चान्ये च बहवो हिरण्यकशिपु प्रभुम् ॥६७।
उपामने महात्मान स दिव्यपरिच्ददाःविमानविविधाकारानमानैरिवामिभिः ॥६॥
महेन्द्रवपुष. सर्वे विचित्रासाहवः । भूषिताहा दिले. पुनारलनुपामन मर्वनः ॥ ६ ॥
दिस्यां समाया दिव्यायाममुग सर्वतोचमा । हिरण्यकशिपो सबै दिवाकरममप्रमा.॥
नथुन नैव नो इष्ट हिरण्यवसियोर्यथा ॥७०11]
ऐश्वयं दैत्यमिहस्य यया तरय महात्मनः । न कुन नैव इष्ट च क्म्यापि भुवनयये ।। १ ||
रजननरचित्रवेदिकायर्या परिवारसविचित्रवीक्षिायाम् ।
स ददर्श मृगापित ममाया मगचिरजागवायनोमिनायान् ॥ ७२ ।।
कनकर यहारभूषितादिनितनस म माविमो दद।
दिवाकरकरणाम स्वान्त शितिमहसननिषेदमागम् ॥ ७३ ।।
तो इवा महामान कानामिवागतम् । नारमिह बरसन्न मरमाननियनरम् ॥
हिरण्यकश्मिी पुत्र प्रहदो नाम वीर्यवान् । रिम्येन यगुण मिदनपश्यदेवमागतम् ।।
त या परमोटामागची गुमाथितम् । पिरिमया दानवा महिपश्चिमः ।।
महादाच-
महाराव महागाहो देस्थानानादिमनन । न न नेव मे इष्ट नारम्झिन्द्रि वपुः ॥ ७ ॥
भयन्तं परम दिन्यविमिद समापन् । दैत्यानरमपोर समभीर मन मग ॥ ७८॥

( २३ ) अस्य देवाः शरीरस्थाः सागराः सरितत्तथा । हिमवान्दारियात्रश्च ये चान्ये कुलपर्वताः ।। चन्द्रमाश्च सनक्षत्रैरा(त्र आ)दित्या रश्मिभिः सह । धनदो वरुणश्चैव यमः शमशचीपतिः ।। मल्तो देवगन्धर्वा ऋषयश्च तपोधनाः । नागा यक्षा पिशाचाश्च राक्षसा भीमविक्रमाः ।। ब्रह्मा देवाः पशुपतिललाटस्था भ्रमन्ति हि । स्थावराणि च सर्वाणि जङ्गमानि तथैव च ॥२॥ भवांश्च सहितोऽस्माभिः सर्वैर्देवगणैर्वृतः । विमानशतसझीर्णा सर्वा या भवतः सभा ॥८३॥ सर्व त्रिभुवन राजहोकधर्मश्च शाश्वतः । दृश्यते नरसिंहेऽस्मिस्तथेदं निखिलं जगत् ॥८४|| प्रजापतिश्चात्र मनुर्महात्मा प्रहाश्च योगाश्च मही नभश्च । उत्पातकालश्च धृतिर्मतिश्च रतिश्च सत्यं च तपो दमश्च ।। ८५ ।। सनत्कुमारश्च महानुभावो विश्वे च देवाः ऋषयश्च सर्वे । क्रोधश्च कामश्च तथैव हर्षो दर्पश्च मोहः पितरश्च सर्वे ॥ ८६ ॥ पुलस्त्य उवाच--- प्रहादत्य वचः श्रुत्वा हिरण्यकशिपुः प्रभुः । उवाच दानवान्सर्वान् गणांश्च स गणाधिपः ।। हिरण्यकशिपुरवाच- नृगेन्द्रो गृह्यनामेष अपूर्वा तनुमास्थितः । यदि वा संशयः कश्चिद् वध्यतां वनगोचरः॥ पुलस्त्य उवाच- ते दानवगणाः सर्वे मृगेन्द्र भीमविक्रमम् । परिक्षिपन्तो मुदितास्त्रासयामासुरोजसा ।। ८९ ॥ सिंहनादं विमुच्याध नरसिंहो महावलः । वमन तासभा सा व्यादितात्य इवान्तकः ॥९॥ सभायां भज्यमानायां हिरण्यकशिपुः स्वयम् । चिक्षेपास्त्राणि सिंहत्य रोषव्याकुललोचनः ।। सर्वाताणामय श्रेष्ठं दण्डमखं तुदारुणम् । कालचक्र तथा घोरं विष्णुचनं तथापरन् ।। ९२ ॥ पैतामहं तथात्युनं त्रैलोक्यनिर्मितं महत् । विचित्रामशनि चैव शुष्काः चाशनिद्वयम् ॥१३॥ रौद्रं तथोग्रशूलं च हुंकारं मुशलं तथा । असं ब्रह्मशिरश्चैव ब्राह्ममस्वं तथैव च ।। ९४ ॥ नारायणास्त्रमन्द्रं च आग्नेयं शैशिरं तथा । वायव्यं मन्थनं चैव कपालमथ किंकरम् ॥१५॥ तथाऽप्रतिहतां शक्ति कौञ्चमत्त्रं तथैव च । [अत्वं ब्रह्मशिरश्चैव सोमास्त्रं शैशिरं तथा ॥ ९६ ॥ मोहन शोषणं चैव सन्तापनविलापनन् । कम्पनं शातनं चैव महात्वं चैव रोधनन् ॥९॥ कालमुद्गरमशोन्यं तापनं च महावलम् । संवर्तनं मोहनं च तथा मायाधरं वरन् ।। ९.८ ।। गान्धमत्त्रं दयितम् अमिरलेच नन्दकन् । प्रस्वापनं प्रमथनं वारुणं चास्त्रमुत्तमम् ।।९९|| अस्त्रं पाशुपतं चैव यस्याऽप्रतिहता गतिः । एतान्यखाणि दिव्यानि हिरण्यकशिपुस्तदा । अजन्नरसिंहस्य दीप्तस्याग्नेरिवाहुतिन् । अस्त्रैः प्रज्वलितः सिंहमावृणोदतुरोत्तमः ।। विवस्वान्धर्मसमये हिमवन्तमिवांशुभिः । स हमर्यानिलोद्भूतो दैत्यानां सैन्यसागरः ॥१०४॥ क्षणेनाप्लावयत्सर्व मैनाकामिव सागरः । प्रासैः पाशश्च सड्नश्च गदाभिर्मुसलस्तथा ॥१०३।।

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( २४ )
बजेरशानिमित्व बहुशासनहादुमैः । मुद्गर. बूटपाशैश्च शिलोलूसलपर्वतैः ।
शुतनीभिश्च दौमाभिदण्डैरपि मुदारण ॥ १०४ ॥
सोसजदानको मायामग्नि वायुमभीरितम् । तमिन्द्रस्लीपदै सार्धं सहयाक्षी महाद्युति ॥
महता तोयवर्षेग समयामास पावरम् । नस्य प्रनिहनाया तु मानायां युषि दानव ॥१०॥
मसृजद् घोरसकाश तमस्तीन ममन्तन । दममा सयन लोके देत्येवाचायुधेषु च ।।१०।।
सनेनसा परिजनो दिवाकर स्वोद्गन । त्रिशिखा मुकुरी चास्य दानवा रणे ॥१०॥
स्टाटस्था निकटस्था गंगा विपथगामिव । नत सर्वासु मायाम इतामु दिनिनन्दना ॥१९॥
हिरण्यकशिपु दैत्या विषण्णा शरण स्यु' । तर, प्रचलित मोात्मदाहनिय तेजमा ॥१०॥
परिमन्नु तु देवेन्द्रे तमोभूतभभूज्जगत् । आवह. प्रवइचव विवहोऽथ समीरण. ॥११॥
परावहः सवहरच उदहश्च महादल । तथा परिवहः श्रीमानुत्पानमयासिन. ।। ११२ ॥
ल्येव सुमिनाः सप्त मरतो गगनेचरा.। ये ग्रहाः सर्वगेकस्य हये प्रादुर्भवनि हि ॥ ११३ ॥
ते सर्वे गगने दृष्टा व्यचरदच यथामुखम् । भयोगतरचायचरद् योग निधि निशाचर]
सप्र. सह नक्षत्रेतारापतिररिन्दम । विवर्णता च भगवान् गो दिवि दिवाकरः ॥११॥
कृतः कवन्धश्च सदा रक्ष्यने सुमहान्दिवि । सजच्चासिता मूर्यो धूमपनि त्रिभावमः ॥११६॥
गगनस्थश्व भगवानमीक्षा परिविष्यने । सप्तधूमनिमा घोराः सूर्या दिवि समुस्लिा. ॥१२॥
सोमस्य गगनभाय ग्रहास्तिपनि मुनगाः। वामे च दक्षिी चैद स्थिती शुरुवाती ।
धनेश्वरो रोहिनाझो रोहिनाममति । सम समपिरोहल सर्व वे गगनेवरा ॥ १३१ ।।
गृहाणि अन्?रा गुगान्नावर्तनप्रहा । चन्द्रमाच मनायो म सर समानुपः ॥१३२॥
चराचरविनाशाय रोहिणी भाभ्यनन्दन । गीती राष्ट्रमा चन्द्र उल्लाभिरभिहन्यत ।।१३३।।
उल्का प्रमरिताश्चन्द्र व्यवन्त यथामुलम् । देवानामधिरो देवः सोऽप्यन छोडिम् ॥
भपन्द् गगनाला विमुपा महास्वना । भकाले च द्रुमाः सर्वे पुति च परन्ति च ।।
सगश्च सरला मा पा माइदैत्वनाशिसापले पनगन्यमापन पुरेपुप तव 70
उन्माननिनिमोनिहमति प्रतिशनि यमीर थमायने पनि च ॥
प्रतिमा. मदेवानां सरपन्यो महद्भयम् । आरयःमदम माम्याइव मृगा ।।
चुर भैरवन्य मृगद अम्बिने । नर प्रतिकूलानि वहन्ति पार ||३९ ॥
न प्रति च दिदो रसरेणुममारना । दानपत्या न मन्ने पूजनाहा यवन ।।
वाट वेपन इन्दो मायाले प्रमानि तथा च माभूताना वाया न परिवर्तन ॥२४॥
धरण दे स साना दुश्वारदा हिरण्यकशिदस्योगविश्मनः ॥ १४ ॥
मादागारे बुरे निरिग मुकिनानाय मुगामिनायच ।। १४३ ।।
दान विदिशा.मोरा घोर निदर्शनाः। ते चान्ये च पदी पोराः समुगिः ।।
देवेन्द्रम्प विनासाय दृश्यन्ते रमिन. । दिन्दा कममानायां देत्येन्देश महात्मना ।।
महोपरा नाममा निपेतुरपिटोरम-विषम्यामा विनइनोसामनन् ॥४६॥

( २५ )
चतुःशीर्षाः पञ्चशीर्षाः सप्तशीर्षाश्च पन्नगाः । वासुकिस्तक्षकश्चैव कर्कोटकधनायौ ।। १४७ ॥
एलामुखः कालियश्च महापद्मश्च वीर्यवान् । सहस्रशीर्षः शुद्धागो हेमतालध्वजः प्रभुः ॥१४८॥
शोषोऽनन्तो महानागो ह्यप्रकम्पश्च कम्पितः । दीप्यन्तेऽन्तर्जलस्थानि पृथिवीविवराणि वै।।
सप्त दैत्येन्द्रकोपेन कम्पितानि समन्ततः । नानातेजोधराश्चापि पातालतलचारिणः ॥१५०।।
पाताले सहसा क्षुब्धे दुष्प्रकम्प्याः प्रकम्पिताः । हिरण्यकशिपुर्दैत्यस्तदा संस्पृष्टवान्महीम् ।।
सन्दष्टौष्ठपुटः क्रुद्धो वराह इव पूर्वजः । गङ्गा भागीरथी चैव कौशिकी सरयूरपि ॥ १५२ ।।
यमुना नाथ कावेरी कृष्णा वेणा च निम्नगा। तुङ्गमद्रा महावेगा नदी गोदावरी तथा ।
चर्मण्वती च सिन्धुश्च तथा नदनदीपतिः । मेलकप्रभवश्चैव शोणो मणिनिभोदकः ॥१५४॥
नर्मदा च शुभस्रोतास्तथा वेत्रवती नदी । गोमती गोकुलाकीर्णा तथा पूर्वा सरस्वती ॥१५५॥
महाकालमही चैव तमता पुष्पवाहिनी। जम्बूद्वीपं रत्नवन्तं सर्वरत्नोपशोभितम् ।।
सुवर्णपुटकं चैव सुवर्णाकरमण्डितम् । महानदश्च लौहित्यः शैलः काञ्चनशोभितः ॥१५७।।
पत्तनं कोपकाराणां कुशिं च रजताकरम् (?) । मगधाश्च महाग्रामाः पुण्ड्रा उग्रास्तथैव तु ।।
सुझा मल्ला विदेहाश्च मालवाः काशिकोशलाः । भवनं वैनतेयस्य दैत्येन्द्रेणापि कम्पितम् ।।
कैलासशिखराकारं यत्कृतं विश्वकर्मणा । रत्नतोयो महाभीमो लौहित्यो नाम सागरः ।।
उदयश्च महाशैलः उच्छ्रितः शतयोजनः । सुवर्णवेदिकः श्रीमान् मेघपङ्क्तिनिषेवितः ॥
भ्राजमानोऽर्कसदशैर्जातरूपमयैर्दुमैः । शालैस्तालैस्तमालैश्च कर्णिकारैश्च पुष्पितैः ॥१५२॥
अयोमुखश्च विख्यातः सर्वतो धातुमण्डितः। तमालवनगन्धश्च पर्वतो मलयः शुभः ।।
सुराष्ट्रश्च सवाहीकाः शूद्राभीरास्तथैव च । भोजाः पाण्ड्याश्च वझाश्च कलिङ्गास्ताम्रलिप्तकाः ।।
तथैव पौण्ड्राः शुभ्राश्च वामचूटाः सकेरलाः । क्षोभितास्तेन दैत्येन देवाश्चाप्सरसां गणाः॥
अगत्त्यभवनं चैव यदगस्त्यकृतं पुरा । सिद्धचारणसंघेश्च विप्रकीर्ण मनोहरम् ।। १५६ ।।
विचित्रनानाविहगं सुपुष्पितमहाद्रुमम् । जातरूपमयैः शृद्वैरप्सरोगणसेवितम् ॥ १५७ ।।
गिरिः पुष्पितकश्चैव लक्ष्मोवान् प्रियदर्शनः । उत्थितः सागरं भित्त्वा विश्रामश्चन्द्रसूर्ययोः ।।
रराज स महालै गर्न विलिखन्निव । चन्द्रसूर्यांशुतकाशैः सागराम्बुसमावृतैः ॥ १५९ ।।
विद्युद्वासो यतः श्रीमान् आयतः शतयोजनः । विद्युतां यत्र संपाता निपात्यन्ते नगोत्तमे ।।
ऋपभः पर्वतश्चैव श्रीमानृपभसंस्थितः । कुक्षरः पर्वतः श्रीमानगस्त्यत्य गृह शुभम् ॥१६॥
विमलाख्या च दुर्धर्षा सर्पाणां मालती पुरी । तथा भोगवती चापि दैत्येन्द्रणाभिकम्पिता ।।
महासेन गिरिश्चैव पारियात्रश्च पर्वतः । चक्रवांश्च गिरिश्रेष्ठो वाराहश्चैव पर्वतः ।। १६३ ।।
प्राग्ज्योतिषपुरं चापि जातरूपमयं शुभम् । यस्मिन्नुवास दुष्टात्मा, नरको नाम दानवः ।।
मेषश्च पर्वतश्रेष्ठो मेघगम्भीरनिस्वनः । पष्टिस्तन सहस्राणि पर्वतानां विशांपते ।। १६५ ।।
तरुणादित्यसकाशो मेरुश्चैव मदागिरिः । यक्षराक्षसगन्धनित्यं सेवितकन्दरः ।। १६६ ।।
हेमगर्भो महासेनस्तथा मेघसखो गिरिः। कैलासश्चैव शैलेन्द्रो दानवेन्द्रेण कम्पितः ।।१६७।।
हेमपुप्परसच्छन्नं तेन वैखानसं सरः। कम्पितं मानसं चैव हंसकारण्डवाकुलम् ॥ १६८ ॥

( २६ )
विगह पर्वन श्रेष्ठः कुमारी च सरिदरा । तुषारचयमंत्रो मन्दरश्चापि पर्वत ।। ११९॥
उशीरनीजश्च गिरिमंद्रप्रस्थस्तथाद्रिराट् । प्रजापनिगिरिश्चैव तथा पुष्करपवंत. ।। १७०॥
देवाम' पर्वन शेव तथा वै वालुकागिरिः । कोश' सप्तपिशेरच धूम्रवर्णश्च पर्वतः ॥ ११ ॥
एने चान्ये च गिरयो देशा जनपदास्तथा । नघ समागरा. सौ. सोऽकम्पयन दानवः ।।
कपिलदच महीपुत्रो ज्याप्रवाश्च प्ररम्भित । रोचराश्च निशापुत्रा पातालतलवामिन ।।
गगनथापरो रौद्रो मेघनामाऽङ्ग्यायुध. । ऊर्ध्वगो मीमवेगश्च सर्व एतेऽमिर पिता ॥
गदी मूली करालदच हिरण्यकशिपुस्लया। जीमूनधननिषोपो जीमूत व वेगवान् ॥१७॥
देवारिििननो तो मिह समुपाद्रवत् । स तु तेन नास्तीदोगेन्द्रेण महानसे ॥
नदोबारमायेन विदार्य निहतो युधि ।। १७६ ॥
मही च कालदच राशी नमश्च पहा समूर्याश्च दिशश्च मा.।
नाच शेगदच महापंवादच गता प्रमाद दिनिपुष नादानात् ॥ १७७ ।।
तत' प्रमुदिता देवा ऋपयरच तपोधना । तुष्टुवुर्नाममिदिव्यरादिदेव सनातनम् ॥ १८८॥
देवा ऊचु-
यत्वया विधन देव भारमिंहमिद वपु । एतदेवाचयिष्यन्ति परामरविदो जनाः॥ १८ ॥
मह्मोवाच-
भवान्नमा च रद्रश्च महेन्द्रो देवमत्तम । मवान्का विकाच रोवानां प्रमोऽन्ययः।।
परांच मिचि पर च सत्व पर रहस्य परम इविश्च ।
पर च धर्म परम यशरच लामाहुरमध परम पुराणम् ॥ ११०।।
पर च सत्य परम तपदच पर पवित्र परम च मार्गन् ।
पर च यज्ञ परम च होय स्वामातुरम्य परम पुरापन् ।। १८२ ॥
पर शरीर परमं च मन पर च योग परमां च वतीन् ।
पर रहस्य परमा गनि च स्वामाहुरम्य परम पुरागम् ।। १८३ ।।
पुनल्य उवाच
एवमुक्ता तु भगवान् मर्वरोकपिनामइ. 1 स्दुल्ला नारायण देवं वाक गनः प्रभु.॥
तो नदस में नृयन्नीयमर' च ।क्षारोदस्योचर कूल अमाम हरिरीश्वर ॥१८॥
नारमिह वपुर्देव स्थापयित्वा मुदीसिमान् । पौरागम्पमारसाय प्रययौ गरुडध्वजः ॥८६॥
अष्टचकी यानेन भूनिधन भारदता । अयतातिर्देव स्वस्थान गतवान् प्रभुः ।।१८७ ॥
पद्मपुराणे पश्चमखण्डे विचत्वारिंशतमऽध्याये-
मीन उवाच-
अनुगमनदिनामिह(ख) दि. 1 माहास्य लन्नुम मान्मुस पाममनन् ।
परदिप अयान अनुरुपयपारी देवानां हृदयानि विक्रम्मत ॥२॥

( २७ ) यद्भयाद् वाति वातोऽपि मन्दं मन्दरयो रविः । नाति प्रतापं कुरुते प्रजासंयमनो यमः ॥३॥ यत्प्रजाभ्यो बिभ्यतीव तथेन्द्रो वरुणोऽपि च । तदाशायां स्थिता(सेन्द्रा)देवाश्चात्यन्तपीडिताः॥ भवन्ति लोकत्रितयं यद्वशे निखिलं स्थितम् । एवं विधोऽपि यो दैत्यो हिरण्यकशिपुर्महान् ।। विदारितो नखानेश्च नारसिंहेन विष्णुना। नारसिंहस्य माहात्म्यं विस्तरेण त्वयेरितम् । समासाद् भव माहात्म्यं भैरवस्याभिधीयताम् ।। क्या कथा, क्या भाव, क्या मापा, यहां तक कि श्लोकों की आनुपूर्वी में भी पद्मपुराण का यह उपाख्यान मत्स्यपुराण के उपाख्यान से मिलता-जुलता है। ध्यान से पढ़ जाइये आप भांप जायगे कि पद्मपुराण का रचयिता आँख वन्द करके मत्स्यपुराण के पन्ने उठा कर अपनी पिारी में सजा रहा है अथवा यो कहिये कि इन दोनों के रचयिता अपने से पूर्व विद्यमान किसी एक ही प्रपुराण ( Ur-Purana) से अपनी अपनी सामग्री उठा रहे हैं, किंतु इस सामग्री को वहां से लेते समय इतना भी भूल गए कि इसे अपनी बनाने के लिये इस पर अपने व्यक्तित्व का जामा तो सजा दें। यह दशा है जिसमें कि वर्तमान पुराण हमारे संमुख आये हुए हैं। इनके संपादन में अत्यन्त विवेक एवं परिश्रम की आवश्यकता है। पद्मपुराण के पष्ठ खण्ड के ६५ वें अध्याय में नृसिंह चरित का वर्णन फिर आता है- जो कि प्रस्तुत चम्पू के कथानक से सर्वांशतः मिलता-जुलता है-इसी के आधार पर सूर्य दैवञ्च पण्डित ने अपने चम्पू की रचना की है । कथा यों है:- पद्मपुराण पष्ट खण्ड अध्याय २६५ रुद्र उवाच- भ्रातरं निहतं शात्वा हिरण्यकशिपुस्ततः । तपस्तेपे महादैत्यो मेरोः पार्थे च मां प्रति ॥२॥ दिव्यवर्षसहस्राणि वायुभक्षो महावलः । जपन्पञ्चाक्षरं मन्त्रं पूजयामास मां शुभे ॥ २ ॥ ततः प्रहृष्टमनसा तमवोचं महानुरन् । वरं वृणीष्व दैतेय यत्ते मनसि वर्तते ॥ ततः प्रोवाच दैतेयो मां प्रसन्नं शुभानने ॥३॥ हिरण्यकशिपुरुवाच- देवासुरमनुष्याणां गन्धर्वोरगरक्षसाम् । पशुपक्षिमृगाणां च सिद्धानां – महात्मनाम् ॥४॥ यक्षविद्याधराणां च किंनराणां तथैव च । सर्वेपामेव रोगाणाम् आयुधानां तथैव च ॥ सर्वेपाम् ऋपिमुख्यानामवध्यत्वं प्रयच्छ मे ॥ ५॥ रद उवाच--- एवमस्त्विति तद्रक्षस्त्वत्र प्रियदर्शने । मत्ती महावरं प्राप्य स दैतेयो महादलः ॥ ६ ॥ जित्वा महेन्द्र देवांश्च स त्रैलोक्येश्वरोऽभवत् । सर्वाश्च यशभागांश्च त्वयमेवाग्रहीद् बलात् ।। त्रातारं नाधिगच्छन्ति देवतास्तेन निजिताः । तस्यैव किंकराः सर्वे गन्धर्वा देवदानवाः- - न !

( २८ )
यहाश्च नागाः सिदाश्च तस्यैव वशतिनः । उत्तानपादस्य मुतां कल्यागी नाम कन्यकाम् ।।
पयेने विधानेन दैत्यराजो महावन । नस्यां जानो महातेजा प्रसादो दैत्यराट मुभे । १०॥
अनुरचो ऋपोकेशे गर्भवासेऽपि यो हरी । सर्वावस्थासु कृयेषु मनोवाकायमंमिः ॥१९॥
नान्य जानानि देवेशात्पधनामात् सनातनात् ।
मकाने चोपनीन. सन् गुरुमेहेत्रमा मुधीः ।। १२ ॥
अथीत्य सर्ववेदाश्च शास्त्री विविधानि च । करिमश्चित्वय काले च गुर सह दैत्यज ॥
पितु- समीपमागत्य ववन्दे विनयान्दिन । त परिष्वज्य बाहुभ्या तनय सुमल मगन् ।
श्रङ्के निधाय देत्येन्द्र, प्रोवाचे शुचिस्मिते ॥ १४ ॥
हिरण्यकशिपुत्वाच-
प्रसाद चिरकाल त्व गुरुगहे निवेशिन । यदुक्त गुरुया वेष नन्ममाचक्ष्व मुना ॥ १५ ॥
रुद्रउवाच-
इनि पृष्टी स्वपित्रा वै प्रहादो जन्मवैष्णव । प्राद दैत्येश्वर प्रोत्या वचन बनाइन् ॥१६॥
प्रसाद उवाच-
यो वै सर्वोपनिपदामर्थ पुरष ईश्वरः । तबै सर्वगतं विष्णु नमस्कृत्वा प्रवीमि ते ॥ १७ ॥
रुद्र उवाच-
पति विष्णुम्नव शुन्या दैत्यराद् विस्मयान्विन । उवाच त गुरोपान कि स्वयोत ममात्मजे।।
ममात्मजस्य दुर्बुद्धे हरिसम्नवमीशन 1 किमयमुक्तवान्जायमसाय नामोचितम् ॥ १९ ॥
अमान्य मदमित्रस्य नवमेव ममाग्रत । दारे नारि कृत पातत्याप्रमादाद् दिजाधम 2011
इत्युक्त्या परितो वीक्ष्य दैत्यराट मोचम्छित. 1
प्रद दत्यानमी दिनो वपनामिनि गक्षस ॥ २१ ॥
युवा राममा मुद्धा वटवे (दन्धन )रनुभिः।
सन्युम्न दिजवर भृश देन्येश्वरा॥
दमान गुरु वा प्रहादो माप-निय उवाच पिन मापद मे नौरुवान् गुर. 1 २३॥
शाया देवदेवस्य शिक्षित ग्मि हरे मो. नान्यो गुल्में वदति म एक प्रेरको हरिः॥
सोता मन्ना तथा बचा द्रष्टा सवंग स्वर- हरिरवाशय या नियन्ता सर्वदेहिनान् ।।
रस्मादनागमो वित्री मोयो मे गुरुप्रभो ॥२॥
वाच-
पति पुत्रदच. शुत्वा हिरण्यगपुग्नत. 17 प्रमोचविन्या स्वपन माइपिरमयाद ॥६
हिरण्यकशिपुर काच--
शिदमत्व भ्रमस्व मिथ्यावश्यौदामन. ।
कोरियाशिनु नपं कुमान मरिनो हरिः ॥ २७ ॥

( २६ ) अहमेवेश्वरो लोके त्रैलोक्याधिपतिर्मतः। मामेवार्चय गोविन्दं त्यज शत्रु दुरासदम् ॥ २८ ॥ अथवा शङ्करं देवं रुद्रं लोकगुरु प्रभुन् । अर्जयस्व सुराध्यक्षं सर्वेश्वर्यप्रदं शिवम् ॥ २९ ॥ त्रिपुण्ड्धारणं कृत्वा भस्मना दैत्यपूजितन् । पूजयित्वा महादेवं पाशुपतोक्तमार्गतः ॥ ३० ॥ रुद्र उवाच- इति दैत्यपतेर्वाक्यं श्रुत्वा दैत्यपुरोहिताः ॥ ३१ ॥ पुरोहिता ऊचुः- एवमेव महाभाग कुरुष्व वचनं पितुः । त्यज शत्रु कैटभारि पूजयस्व त्रिलोचनम् ॥ ३२ ॥ रुद्रात्परतरो देवो नास्ति सर्वप्रदो नृणान् । पिता तवापि तस्यैव प्रसादादीश्वरोऽभवत् ॥३३॥ - रुद्र उवाच- इति तेषां वचः श्रुत्वा प्रलादो जन्म वैष्णवः॥३४॥ प्रहाद उवाच- अहो मगवतः श्रेष्ठथं यन्मायामोहितं जगत् । अहो वेदान्तविद्वांसः सर्वलोकेषु पूजिताः ।। ३५ ॥ ब्राह्मणा अपि चापल्याद् वदन्त्येवं मदान्विताः। नारायणः परं ब्रह्म तत्वं नारायणः परम् ।। नारायणः परो ध्याता ध्यानं नारायणः परम् । गतिविश्वस्य जगतः शाश्वतः स शिवोऽच्युतः ॥ ३७॥ धाता विधाता जगतो वासुदेवः सनातनः । विश्वमेवेदं पुरुषः तद् विश्वमुपजीवति ॥ ३८ ॥ हिरण्यवपुनित्यः पुण्डरीकनिभेक्षणः । श्रीभूलीलापतिः सौम्यो निर्मलो शुभविग्रहः ॥ ३९ ॥ तेनैव सृष्टौ ब्रह्मेशौ सर्वदेवोत्तमावुभौ । तस्यैवाशां पुरस्कृत्य वर्तेते ब्रह्मशङ्करौ ॥ ४० ॥ भोपाऽत्मादाति पवनो भीपोदेति दिवाकरः। भोपाऽस्मादग्निश्चेन्द्रश्च मृत्युर्धावति पञ्चमः ॥ आसोदेको हरिदेवो नित्यो नारायणः परः। न ब्रह्मा न च ईशानो न च चन्द्रदिवाकरौ ।। न द्यावापृथिव्यौ च नक्षत्राणि दिवौकसः । तस्य विष्णोः परं धाम सदा पश्यन्ति सूरयः॥ एवं सर्वोपनिषदामर्थ हित्वा द्विजोत्तमाः। रागाल्लोभादाप्यन्यत्र मतिमानसाः ॥ ४४ ।। तं सर्वरक्षकं देवं त्यक्त्वा सर्वेश्वरं हरिम् । कथं पापण्डमाश्रित्य पूजयामि च शङ्करम् ॥४५}} लक्ष्मीपतिं देवदेवमनन्तं पुरुषोत्तमम् । इन्दीवरदलश्यामं पद्मपत्रायतेक्षणम् ॥ ४६ ॥ श्रीवत्सलक्षितोरकं सर्वाभरणभूषितम् । सदाकुमारं सर्वेषां नित्यानन्दसुखप्रदम् ॥ ४७ ।। कृष्णं ध्यायेन् महात्मानो योगिनःसनकादयः। यमर्चयन्ति ब्रह्मेश शनाया देवतागणाः॥४८॥ यस्व पत्न्याः कटाक्षार्धदृष्टया हृया दिवौकसः । ब्रह्मेन्द्ररुद्रवरुणयमसोमधनाधिपाः ॥ ४९ ॥ यन्नामस्मरणादेव पापिनामपि सत्वरम् । मुक्तिर्भवति जन्तूनां ब्रह्मादीनां सुदुर्लभा ॥ ५० ॥ स एव रक्षकः श्रीशो देवानामपि सर्वदा । तमेव पूजयिष्यामि लक्ष्म्या संयुतमीश्वरन् । प्राप्स्यामि सुसुखे नैव तद्विष्णोः परमं पदम् ॥

( ३० ) रुद्र उवाच- इति तस्य वच. शुस्वा हिरण्यकशिपुस्तनः। पौधेन महताविध जबाटाभिरिवापर. । परिवो वीक्ष्य देवयानित्याद दोषमूक्दिन ॥१२॥ हिरण्यकशिपुश्वाच- मीपणे शस्त्रसहाने प्रहाद पापकारिन् । ममाश्या घानयध्व शत्रुपूजनतत्परम् ॥ ३ ॥ रक्षिता हरिरेति वक्ष्यते नेन वै बगन् । अव मपाल नस्य पश्येय हरिरक्षणम् ॥ ५४॥ उवाच--- तनो धृताला दैतेया हन्तु दैत्येश्वरानजन् । परिवार्य महात्मान तस्थुदैत्येश्वराच्या ॥५॥ प्रछादोऽपि नया विध्यात्वा हृदयपजे । उपनयाभर मन्त्र नम्थौ गिरिरिवापरः ॥५६॥ त जनु परिलो वीरा मूल तोमरसतिमि । प्रहादस्य बस्ता हरिसस्मरणाराभे ।।१७। विली. प्रभावाद् दुध वनभूतमभूद् भृशम् । अथ समाप्य नद् गात्र महापानि मुरदिषाम् ।। दिनानि च शिनी पेनुन गेल्टानि वै । अल्पमध्यस्य न गात्र मेत्तुं दैत्या न च क्षमा ।। विस्मिनाबादमुखास्तस्युदत्यरान्तिके मटाः । ताइविध महारमान दृष्ट्वा पुष नमनाम् ॥ ६ ॥ विस्मय परम गत्वा दैत्यराट् कोपमूच्छितः । आदिदेश नतः मन्दिन्दसूकान महाविधान् ॥ ६ ॥ बामपित्रभृतीन मीमान् मादयध्वनिति अग्न् । आदिष्टास्नेन राक्षाय ने नामा. मुमहावरा ॥६२ ।। ज्यरिनास्था महाभीमारन सानुमंशावलम् । गरुटध्वजमत न विदश्य गरलायुगः ॥६३॥ निविमादिरमदाना वारनिलाशनाः ननेदमहलेग दिनगावा. मविस्तः ॥६॥ प्रदिशः सत्रां वमन्तो गरिर मूशन् । ताग्विधान्नु महामान् दृष्टदा दैत्यपनिस्तदा ।। आदिदेश ततःमुमो दिग्गजास्तु मदान्वितान् । नोदिनारन रामाय दिग्गजाश्च मदोदताः ॥६६॥ परिचयाय त जानुदने पृथुतर शन् । अथ दिग्गजदलाव दिसमूदापतन्नुनि ॥६॥ दन्नविना ना नागा मातां विप्रः । नान्दृष्टवाव्य महामागान् दैत्येन्दः पितो दटी ६८ ॥ प्रजम्वात्य महाधी विधेर मुतमान्मन । बशायिप्रिय दृश्वा महाद हव्यवाहनः । ६॥ न ददारच तु धीर प्रशान्दो प्रमवस्तिमा। अपमान त पाल इक्षा राहा अविस्मित ॥ ७० ॥ प्रादातरम सिं पोर सर्वभूतार तदा सरय वि. प्रमावा विषमप्यमृत मवेर 11 ७१ ॥ अनास्प देवस्य तदेवामृतनगुने । एवमापोपादेवाररूप. मुदाः॥ ७ ॥ मोदपिवारमा तस्याध्ययमेश्य ३ । तद सम्राट मत प्रार देरपराइ विस्मयाकुलः ॥७३ !

( ३१ )
हिरण्यकशिपुरुषाच-
त्वया विष्णोः परत्वं च सम्यगुक्तं ममाग्रतः।
व्यापित्वात्सर्वभूतानां विष्णुरित्यभिधीयते ॥ ७४ ।।
योऽसौ सर्वगतो देवः स एव परमेश्वरः । तस्य सर्वगतत्वं वै प्रत्यक्षं दर्शयस्व मे ॥ ७५ ॥
ऐश्वर्वशक्तितेजांसि शानवीर्यबलानि च । पश्येयं तस्य परमं रूपं गुणविभूतयः ॥ ७६ ।।
सन्यग्दृष्ट्वा प्रयत्नेन विष्णु मन्ये दिवौकसम् । मम प्रतिवलो लोके नास्ति देवेषु कश्चन ।।
ईशानवरदानेन सर्वभूतेष्ववध्यताम् ।
प्राप्तवान् सर्वभूतानां दुर्जयत्वं च मानद । ईश्वरत्वं लभेद्विष्णुमी जित्वा बलवीर्यतः ॥ ७८ ॥
महादेव उवाच---
इति तस्य वचः श्रुत्वा प्रहादः प्राह विस्मितः । हरेः प्रभावं दैत्यस्य कथयामास सुनतः ।।
प्रहाद उवाच-
योऽसौ नारायणः श्रीमान् परमात्मा सनातनः । वसनात्सर्वभूतेषु वासुदेवः स उच्यते ।।
सर्वत्यापि जगद्धाता विष्णुरित्यभिधीयते । न किञ्चिदस्मादन्यत्र जगत्स्थावरजङ्गमम् ।।८१॥
सर्वत्र चिदचिवस्तु रूपं तस्यैव नान्यथा । त्रिपाद्व्याप्तिः परव्योम्नि पादव्याप्तिरिहाच्युतः ॥
योऽसौ चक्रगदापाणिः पीतवासा जनार्दनः।
योगिभिर्दृश्यते भक्त्या नामक्त्या दृश्यते कचित् ।। ८३ ॥
द्रष्टुं न शक्यो रोपाद्वै मत्सराद्यैर्जनार्दनः । देवतिर्यङ्मनुष्येषु स्थावरेऽपि च जन्तुषु ।।८४॥
व्याप्य तिष्ठति सर्वेषु क्षुद्रेष्वपि महत्सु च ।। ८५ ॥
महादेव उवाच-
इति प्रहादवचनं श्रुत्वा दैत्यवरस्तदा । उवाच रोपताम्राक्षो भयिन्स्वसुतं मुहुः ।। ८६ ।।
हिरण्यकशिपुरुवाच-
असौ सर्वगतो विष्णुरपि चेत्परमः पुमान् । प्रत्यक्षं दर्शयस्वाद्य बहुभिः किं प्रलापितैः ।।८७॥
इत्युक्त्वा सहसा दैत्यः प्रासादस्तन्ममात्मनः । ताडयामास हस्तेन प्रहादमिदमब्रवीत् ।।
हिरण्यकशिपुरुवाच-
अस्मिन्दय तं विष्णु यदि सर्वगतो भवेत् ।
अन्यथा त्वां वरिष्यामो मिथ्यावाक्यप्रलापिनम् ।। ८९ ।।
महादेव उवाच-
इत्युक्त्वा सहसा खड्गमाकृष्य दितिजेश्वरः । प्रह्लादोरसि चिक्षेप हन्तुं खड्गेन तं रुपा ॥१०॥
तस्मिन्क्षणे महाशब्दः स्तम्भे संश्रूयते भृशम् ।
संवशिनिसरावैः खमिव स्फुटितान्तरम् ॥ ९१ ॥
तेन शब्देन महता दैत्यश्रोत्रविधातिना । सर्वे निपातिता भूमौ छिन्नमूला इव द्रुमाः ॥९२ ॥

( ३२ ) विम्यनि सप्लुत दैत्या मेनिरे वै जगत्त्रयम् । तत सम्भे महातजा निष्फ्रान्नोवैमराहरिः ॥ १३ ॥ चकार सुमहाघोर जगत्क्षयवर स्वनम् । तेन नादेन महता तारकाः पतिता भुवि ॥ १४ ॥ नृमिह वपुरास्थाय तवाऽऽविरभूवरि । अनेककोरिमूर्याग्नितेजसा प्रममावृत. ॥९५ ।। मुखे पश्चाननाल्य' शरीरे मानुषाकृति । दष्टापरावदन स्पुरजिहावरोधमः ॥ ९६ ।। ज्जालावलिनदेशान्तस्तप्तालातेशणो विभुः । सहनमामिदीपै. मर्वायुधसमन्विते. १९७॥ वृनो मेगरिबामानि बहुशासनमान्वित । दिव्यमालाम्बरधरो दिव्याभरणभूषित ॥ ९८॥ तस्थौ नृकेमरी तत्र सहतु सर्वदानवान् । तं दृष्ट्वा घोरसकाश नारसिंह महाबलम् ॥९९ ॥ [दग्धाक्षिपक्षमो दैत्येन्द्रो विङ्गलाग. पपान ह । प्रछादोऽथ तदा दृष्ट्वा नारमिहोपम हरिम् ॥ १०.] जमादेन देवेश नमश्चके जनार्दनम् । ददर्श तस्य गात्रैगु नृसिंहस्य महात्मनः ॥ १० ॥ लोकान्ममुद्रासदीपान् मुरगन्धर्वमानुपान् । अण्डजानां सहस्र तु साये तस्य दृश्यते । दृश्यन्ते तस्य नेपु मोमसूर्यादयस्तथा । [वर्णयोरश्विनी देवो दिशश्च विदिशस्तथा ॥ १०३॥] हाटे प्रारदी च नमो वायुश्च नासिके । इन्द्राग्नी तस्य वात्रान्ते जिज्ञायां च सरस्वती ।। १०४॥ दष्ट्रामु मिशालशरमाश्च महोरगा। कण्ठे च दृश्यते मे स्कन्ध-वपि(यरि च)महादयः॥ १०५॥ देवनियमनुष्याच वावपि महात्मनः । नामो चास्यान्तरिक्ष च पादयोः पृथिवी तथा ॥ १०६ ॥ रोनस्वीपषय सर्वा. पादसा नसपचिपु । निश्यामेषु च वेशश्च साङ्गोपाइसमन्विता ॥१०॥ भादित्या वसवी रुद्रा विश्वेदेवा मद्गगा । मोदषु प्रदृश्यन्त गन्धर्वाप्मरस ये ॥१०॥ र विभूनयस्तस्य दृश्यन्ने परमात्मनः। श्रीवत्सकोस्नुमोररक वनमालाविभूषितम् ॥ मचक्रगदासद्गशाधि तिभिर्युतम् । सर्वोपनिषदामर्थ दृष्ट्वा दैत्येश्वरात्मज. ॥११०॥ पांचजलमित्राग मनाम मुहुर्मु. । दैत्येन्द्रस्तुहर पृष्ट वा सोपान्मृत्युक्रे स्थितः ॥११॥ योधु मग मनुषम्य मिई तमयादव ॥ १२ ॥ रवान्यायुधानि चादाय हरि जम्नुम्बरान्चिता । पललाकाहानि यथा वो शितान्यनेन। तथैव भस्मना यान्ति महान्यायुधानि । नान्यनेकानि देत्यानां दृष्ट्वा नरहरिस्तदा ।। मोवाह च ज्वानगमालाविरचितरपुटः । नृकेमरिसोदभूतादिना दानवा भृशम् ।।११।। निमंम्मिताः पातु सर नि.शेष तदभूद् बटन्। प्रसाद सानुग हित्वा मरिमने रक्षमा बले ॥ ११६ ॥ पददैत्यपनि सहगमाप्यान्यपदन । सदाइल नु दैत्येन्द्र जपान बाहुना ॥११॥ पायामास देवेरी या शाखा महानिल 1 गृहीत्वा पतित भूमौ महाकाय नमरी ११८॥

( ३३ )
स्वोत्सङ्गे त्यापयित्वा च ददर्शासौ मुखं हरेः (हरिः)।
विष्णुनिन्दाकृतं पापं तथा वैष्णवद्वेषजम् ॥ ११९ ॥
नृसिंहस्पर्शनादेव निर्भस्मितमभूत्तदा । अथ दैत्येश्वरस्यासौ महद्गात्रं नृकेसरी ॥ १२० ॥
नविदारयामास तीक्ष्णैर्वजनिभर्घनैः । स निर्मलात्मा दैत्येन्द्रः पश्यन्साक्षान्मुख हरेः ॥१२१॥
नखैनिर्मिन्नहृदयः कृतार्थो विजहावसून् । तद्गात्रं शतधाभित्वानखैस्तीक्ष्णैर्महाहरिः ॥१२२॥
आकृष्यान्त्राणि दीर्घाणि कण्ठे संसक्तवान् प्रियात् । अथ देवगणाः सर्वे मुनयश्च तपोधनाः॥
ब्रह्मरुद्रौ पुरस्कृत्य शनैः स्तोतुं समाययुः । ते प्रसादयितुं भीता ज्वलितं विश्वतोमुखम् ॥१२४॥
मातरं जगतां धात्री चिन्तयामासुरीश्वरीन् । हिरण्यवर्णी हरिणी सर्वोपद्रवनाशिनीम् ॥१२५||
विष्णोनित्यानवद्याह्नीं ध्यात्वा नारायणी शुभाम् । देवीसूक्तं जपन्ती वै नमश्चक्रुः सनातनीम्॥
तैश्चिन्त्यमाना सा देवी तत्रैवाऽऽविरभूत्तदा । चतुर्भुजा विशालाक्षी सर्वाभरणभूपिता ॥१२७॥
दुकूलवस्त्रसहिता दिव्यमालानुलेपना। तां दृष्ट्वा देवदेवस्य प्रियां सर्वे दिवौकसः ॥१२८॥
ऊचुः प्राजलयो देवी प्रसन्नं कुरु ते प्रियम् । त्रैलोक्यस्याभयं स्वामी यथा दद्यात्तथा कुरु॥
महादेव उवाच-:
इत्युक्ता सहसा देवी प्रियं प्राप्य जनार्दनम् । प्रणिपत्य नमस्कृत्य प्रसीदेति उवाच तम् ।।
तां दृष्ट्वा महिपी स्वस्य प्रियां सर्वेश्वरो हरिः।
रक्षाशरीर क्रोधं तत्याज स तु तत्क्षणात ॥१३१॥
अङ्कमादाय तां देवीं समाश्लिष्य दयानिधिः । कृपासुधादृष्टया वै निक्षत महाहरिः॥१३२॥
ततो जय जयेत्युच्चैः स्तुवतां नमतां तदा । तद्यथादृष्टि तुष्टानां सानन्दः संभ्रमोऽभवत् ॥
ततो देवगणाः सर्वे हर्षनिर्भरमानसाः । ऊचुः प्राञ्जलयो देवं नमस्कृत्य जगत्पतिम् ॥१३४॥
देवा ऊचुः--
द्रष्टुमत्यद्भुतं तेजो न शक्तास्ते जगत्पते । अत्यद्भुतमिदं रूपं बहुवाहुपदाङ्कितम् ॥१३५॥
जगत्वयं समानान्तं तेजस्तीक्ष्णतरं तव । द्रष्टुं स्थातुं न शक्ताः स्म सर्व एव दिवौकसः॥
महादेव उवाच-
अत्यर्थितस्तु विवुधैस्तेजस्तदतिभीषणम् । उपसंहृत्य देवेशो बभूव तुखदर्शनः ॥ १३७ ।।
शरत्कोटीन्दुसंकाशः पुण्डरीकनिभेक्षणः । सुधामयसटापुञ्जविद्युत्कोटिनिभः शुभः ॥ १३८ ।
नानारत्नमयैर्दिव्यैः केयूरैः कटकान्वितैः। बाडुमिः कल्पवृक्षस्य शाखौधैरिव सत्फलैः ॥१३९॥
चतुर्भिः कोमलैर्दिव्यैरन्वितः परमेश्वरः । जपाकुसुमसंकाशैः शोभितः करपङ्कजैः ॥ १४० ॥
शङ्खचक्रगृहीताभ्यामुवाहुभ्यां विराजितः । वरदाभयहस्ताभ्यामितराभ्यां नृकेसरी ॥१४॥
श्रीवत्सकौस्तुभोरस्को वनमालाविभूपितः । उद्यद्दिनकरामाभ्यां कुण्डलाभ्यां विराजितः॥
हारकेयूरकटकभूपणैः समलङ्कृतः । सव्याङ्गस्थश्रिया युक्तो राजते नरकेसरी ।। १४३ ।।
लक्ष्मीनृसिंहं तं दृष्ट्वा देवताः समहर्षयः । आनन्दाश्रुजलैः सिक्ता हर्षनिर्भरचेतसः ॥१४४॥
आनन्दसिन्धुमग्नास्ते नमश्चक्रुनिरन्तरम् । अर्चयामासुरात्मेशं दिव्यपुष्पसमर्पणैः ॥१४५॥

(३४) रत्नकुम्भे सुधापूगैरमिषिच्य मनातनम् । वस्त्रैरामरगैर्गन्धपुष्पधूपमनोरमै. ॥१४॥ दिव्यनिवेदितदीपैरचयित्वा नमरिन् (0)। तुष्टुयुदिव्यस्तुनिभिनंश्च मुंदमुंदु. ॥१४॥ ततः प्रसन्नो लक्ष्मोशस्नेषामिष्टान्वरान्ददौ । ततो देवगणै. साथै सर्वेशो मस्वत्सलः ॥१४॥ प्रहाद सर्वदैत्यानां चके राजानमभ्ययम् । भाइवास्य भक्त प्रसादममिपिच्य मुरोत्तमैः॥ ददो तस्मै वरानिष्टान भक्ति चाव्यभिचारिणीम् । नतो देवगणे. साध सूपमानो नृवमरी ।। विकीर्णः पुष्पवर्षस्तु तत्रैवान्तरपीयन । तनः मुरगणाः सर्वे व स्व स्थान प्रपेदिरे ॥१५॥ पुनश्च यवभागाश्च बुभुजु. प्रीतमानसाः। सती देवा सगन्धा निरानकाऽमवस्तथा ।। १५२ ।। नरिमन्ह ते महादेत्ये सर्व एव महर्षिता । महादस्तु तदा चक्रे राज्य धर्मेण वैष्णव. ॥१५३॥ हरे. प्रसादलप तु वैष्णव राज्यमुत्तमम् । बहुभिर्यशदानाद्यैरचयित्वा नकमरिम् ॥१५४॥ काले हरिपद प्राप्तो योगिगम्य सनातनम् । एतत्महादचरित ये तु मृण्वन्ति नित्यशः॥१५५१ ते तवे पापनिर्मदा यास्यन्नि परमा गतिम् । एतत्ते कथित देवि नृसिंह वैभवं हरे॥ शेषां च वेमवावस्था मृग देवि यथाक्रमम् ॥ १५६ ।।

कथा-सार । कथा का सार यों है: भगवान् रुद्र पार्वती से बोले कि अपने भाई हिरण्याक्ष को युद्ध में मरा देख हिरण्यकशिपु को दारुण संताप हुआ और उसने दिव्य सहस्र वर्ष पर्यन्त श्री शंकर की अर्चना की। शंकर ने प्रसन्न होकर उससे इष्ट वर मांगने को कहा जिस पर उसने देव- दानव, यक्ष, गन्धर्व, किनर आदि सभी से अवध्यता का वर माँगा। शंकर 'तथास्तु' कह कर चले गये। अवध्यता का वर पाकर दैत्यराट् अभिमान में चूर हो मनमाने अत्याचार करने लगा और यश में देवताओं को दिये जाने वाले भाग को भी स्वयं ही भोगने लगा। इन्हीं दिनों उसने उत्तानपाद की कल्याणी नामक कन्या से विवाह किया जिससे उसे विष्णुभक्त प्रहाद नामक पुत्र का लाभ हुआ। प्रलाद की शिक्षा-दीक्षा यथाविधि संपन्न हुई और वह गुरुकुल से सब विद्यानों में निपुण होकर घर लौटा। घर आते ही पिता ने उसे गोद में ले लिया और उससे पूछा कि तुमने गुरुकुल में क्या-क्या सीखा है। प्रह्लाद ने अपनी कथा विष्णु को नमस्कार करके आरम्भ की। किन्तु विष्णु का नाम सुनते ही हिरण्यकशिपु के कान खड़े हो गये और वह तड़क'कर वोला कि 'यह विष्णु कौन है जिसका नाम तुमने इतने प्रेम से लिया है। उसकी विष्णुमक्ति का दोष गुरु के माथे मढ़ कर दैत्यराट ने गुरु के वध की आशा अपने भृत्यों को दी; किन्तु प्रहाद ने यह कह कर कि 'इसमें गुरुजी का क्या दोष ? यह तो मेरो अपनी ही सहज भक्ति है' अपने गुरु की रक्षा की । तब दैत्यराट प्रहाद से बोला कि विश्व में विष्णु का क्या काम ? इसका पालक एवं संहर्ता तो मैं हूँ-तुम मेरी पूजा करो-और यदि तुम्हें मेरे से पृथक् ही देव की वन्दना करनी है तो श्री शंकर की आराधना करो, जिन्होंने कि मेरा मनोरथ साधा है। विष्णु को मन से भुला दो; वह है ही कहाँ कि तुम उसे पूजो किन्तु कल्याण-मार्ग के पथिक प्रसाद ने पिता की एक न सुनी-उसे तो जग के कण-कण में विष्णु की लीला दीख रही थी; जिधर देखो वहीं उसे उन्हीं का रास चलता दीख रहा था। उसने फिर पिता के सम्मुख विष्णु का स्तव आरम्म कर दिया। दैत्यराट् के क्रोध का पारा उछल गया और उसने दैत्यों को प्रसाद का वध करने की आशा दे दी।

( ३६ ) दैत्यराट का आदश होना था रिप्रसाद पर अरू शत्रों की पौधार पहने रगी- टमे पहाड से गिराया गया, माँपों से कटवाया गया, दिग्गों से कुचरवाया गया-- यही नक कि रमे अग्निकुण्ड में डाल दिया गया। किन्तु निमका वर्म स्वय विण भगवान् वन गरे हों उम पर चोट केसी १ दैत्यों के अन्न कुण्ठित हो गये, पहा रार वन गए, मार गिजाद बन गर, दिग्गर हिरण्य बन गर और अग्निकुण्ड से सोते फूर निकले-विनामद ' उसके चेरे को ओंव केमो' इत्या के ममी उपयों को प्रहाद पर बेकार होने देव दैत्यराट से न रहा गया और वह स्वय स्दा लेकर उस पर लपका और बोला 'कहाँ है सर नेरा वह विशु। मुग उसे मामने । यदि वह मर्वन्यापक है तो क्यों नहीं निकलना मामने के इम स्तम्म से १ अब तुम न हो और तुम्हारा विष्णु न होगा। दोनों ही मेरी तल झार से सन रहेंगे। यह बहकर उसने अपनी दाग तलवार प्रसाद पर पंक दी। तलवार का प्रहाद तक पहुँचना था कि सम्भे से दिन्य नाद हुआ और उसी के साथ उसमें से नृसिंह आविर्भूत हो गये। प्रहाद उस अवतार का दर्शन करते ही गद्गद हो उमको आगधना में ढा गये, किन्तु देत्या उसके विजनी मो रूप को देस भाग पटे हुए, और बुद्ध वहीं पर गिर पड़े। किन्तु हिरण्यरशिपु तो शेर भी मजा पर पग था-वह न डरा और न विचारत हा तुझा, उग्ग पग उठाकर नमिर पर शपग, किन्तु उसके आने से पहल हो नृसिंह ने अपने पनों से उसे चीर डाला। हिरण्यरशिपु के गिरते ही सार दैत्य डट पह गये । नृसिंहवा कोष पराशहा पर जा लगा था, जगती उमे देश धरा उठी और देवताओं ने महालमी का आराधना करके उमे ननके सम्मुग भेगा । भगवती का दर्शन याकर नृमिसन हो गये, और उन्हें अपनी में मिठासर उन्होंने शा मुद्रा से देवताओं की ओर देण। देवनाओं को प्रत देसवर बाहोंने उन रूप त्यागकर अपने यथार्थ सौरवमय रूप को धारण कर लिया। नद देवमा प्रमग्न हावर 'जय जय बोर छ। म घग्ना ने प्रसाद की मरि को चार चौदण दिये और उसकी नस-नम में अव विशु की मति रम गर । उमरा यानिधि राजनिक हुआ और लक्ष्मी का मस्प पाकर उम्की भक्ति मोर भी निगर उठी। पमपुरा का यह क्यांश कुदवानों में अनूटा है। इसमें मान् ने प्रहाद पर होन पाले अयाचारों से पोरकर नमिहार भारत किया और हिरण्यधने प्रहाद को विमनि छोर कर की आराधना करने की दरबार महार दो, जो कि उसका मारिसमा परिचायक है। उसरा यापन भयवा गरर देव ष्ट्र रोक गुरं ममुम् । अदरक मराध्या सर्व पर्दप्रद शिवम् ।।

( ३७ ) उसको आस्तिक भावना का ज्वलन्त प्रतीक है। किन्तु शैवों और वैष्णवों में यथार्थ- तत्त्व को न पहचानने के कारण झगड़ा होता रहा है-एक सन्प्रदाय रुद्र-शंकर का पुजारी रहा है तो दूसरा सम्प्रदाय मनोरक्षक शंकर (= विष्णु) की आराधना करता आया है। एक ने भगवान् के दारुण रूप की नीराजना की है तो दूसरे ने उसके रुचिकर लोक-संग्राहक रूप की अर्चना की है। मत्स्यपुराण के प्रस्तुत उपाख्यान में (शंकर के दारुण रूप का परित्याग करके) विष्णु के दारुण रूप की उत्थानिका की गई है और बताया गया है कि विष्णु ही समय-समय पर भक्तभयहरण के लिये दारुण रूप धारण करते है। वह हुआ पद्मपुराण का नृसिहावतार-वर्णन । सूर्यदैवञ्च ने इसी के आधार पर अपने चम्पू का निर्माण किया है और विष्णु-स्तवन को हो ज्ञान-विज्ञानों का तार मान कर अपने जीवन का चरम लक्ष्य इसे ही बनाया है। उद्धृत पुराणखण्डों में कौन सा पूर्व और कौन सा वाद का है इसका निर्णय करना कठिन है, किन्तु यदि उत्तरोत्तर विकास-क्रम को कसौटी मान लिया जाय तो कुछ निम्न प्रकार की रूपरेखा उभरती दोखेगी। 'हिरण्यकशिपु के वधार्थ नृसिहावतार हुआ' इस बात पर सभी पुराण एकमत है। अतः कथा का मूलतत्त्व इस बात को मान लिया जाय तो अनुचित न होगा। इसी एक रेखा के द्वारा सब कथाखण्डों में तात्त्विक एकता उभरती है। सब से पहले ब्रह्मपुराण को लीजिये ; इसमें इसी मूलतत्त्व का मुख्य रूप से प्रति- पादन है। हिरण्यकशिपु को आततायिता के कारण नृसिंह का अवतार हुआ बस यही इस पुराणांश का प्रतिपाद्य विषय है। यहां न तो नृसिंह का वैशिष्टय हो अभिधेय है और न प्रहाद की विष्णुभक्ति हो । इसके बाद स्कन्दपुराण के कथाभाग को लीजिये-इसमें नृसिह-तीर्थ का वर्णन करके मूलकथा में वैशिष्टय का समावेश किया गया है। सच पूछिये तो इसमें नृसिंह-तीर्थ का वर्णन अपेक्षित है न कि नृसिंह के माहाल्य का प्रतिष्ठान । फलतः यह कथाभाग ब्रह्म- पुराण के बाद का दीख पड़ता है। इसके अनन्तर ब्रह्माण्ड तथा वायु-पुराण को रखा जाय तो अनुचित न होगा। इन पुराण-खंडों में मूलकथातत्त्व के साथ प्रसाद का नामोल्लेख समाविष्ट है। भागवत आदि पुराणों में प्रहाद ही की उपनायक के रूप में प्ररोचना की गई है। प्रस्तुत कथा का चतुर्थ संस्करण हमें कूर्मपुराण में होता दीख पड़ता है-इसमें प्रसाद हमारे संमुख एक भक्त पात्र के रूप में आते हैं जो कि पहले-पहल पिता के मादेश पर भगवान् नृसिंह से युद्ध करते हैं, पर जब उनके सारे ही अब वेकार हो ( ३८ ) जाने है तब वे विष्णु के मक्क बन जाते हैं। इस प्रकार यहाँ प्रहाद एक अभिनायक के रूप में प्रकट शेते है। इसके अनन्नर हम मत्स्य व पद्मपुराण के कयांशों को ररोग। इन उपारयानों में प्रसाद भगवान् नृमिह के विराट रूप का दर्शन पाते हैं और उनके हृदय में विष्णु भक्ति का स्रोत फूट पडता है। वहीं वे पिता के आदेश पर विधा से युद्ध नहीं करते-- अपितु अपने पिता को विष्णु की महिमा बताते हुए उनके सामने आते है। इन दोनों पुराणों में दैत्यरा की सभा का विस्तृत एव मनोरमक वर्णन है और उसके प्रचण्ड क्रोध एव तज्जनिन उपप्स्त्र का पटकना चित्रण है। एमपुराण के पासद का क्या माग इम पारयान का चरम सस्करण प्रतीत होना है। श्रीमद्भागवन एव नृसिंहपुराण आदि में भी इससे मिलना-जुगना उपाररान उपलब्ध होता है। यहां पहुँच हिरण्यकशिपु, नृसिंह आदि सभी प्रसाद की विष्णुमक्ति में पीके पर जाते है और वही एक ज्वलन्त नछत्र को न्याई आकाश में प्रकाशमान दोस पहते है। अब से पनि ता सारी ही कथा यहाँ प्रहाद के चहुँ और घूमती है। शेष वैशव का भेद भी यहाँ पहुँच बर भारी पड़ जाता है-पिता यदि सकर की आराधना का हामी है तो पुत्र विष्णु की पूजा पर निर्बन्ध दिखाता है। यहाँ माकर नृसिंहावतार के मूल में मी भेद पढ़ जाता है, अन्य पुराणों में नृसिंहावतार का कारण प्रजा प्व देवताओं पर किये गये हिरवशिपु के अत्याचार है तो यह उसका कारण पिता के हाथों प्रहार पर क्येि गये भायाचार है सूर्य देव ने अपने चग का निर्माण इसी क्या के आधार पर किया है। वैदिक काल से ही भारतीय भायों ने अनेकता को दुरा एकता में भानन्द दा है और मौलिए उन्होंने दान के उमेर में रद्र, मित्र वरुण, यम आदि समो देवताओं का पर्यवसान एक महान् इव में किया है, जिसका नाम कि उन्होंने बक्ष (बा) रखा है। उमी की रोज व उसी एक में तमय हो जाने में होंने अपने जीवन की इति कन्यता मानी है। और यह बाल है भी दमारे अनुभव के अनुकूल हो- क्योंकि जर तर पर प्राया अपने प्रियतम से मिरर नदान नहीं हो जाता तर तक प्रेम रम अनसना रहता है और न दोनों की सत्ता एकता के परम रम में सराबोर न हो जाने के कारण कुछ दिनरी सी, कुचरकी मी, अपनी असली अगइ मे कुर सरको मा पर उपर मटकती रहती है। उपनिषदों ने मिनीपाद वे भय भवनि' इसी रिएकहा। प्रेम का माफी मानिएपना ही रखामाविक है जितना कि पानी के लिने रहना और वायु के लिये चहना। रितु बह चाह किम काम को जिमका विषय नहारो-नरवर का मिठाम तो अविनाशी से उधार लिया दुमा है। उसका भाना ( ३६ ) कुछ भी नहीं है। इसी लिए मनीषियों ने आदि काल से ही उस अविनाशी तत्त्व से दिल लगाया है जो त्रिकालाबाधित है, और जो सत् , चित् , आनन्द का धन रूप है। आहाद के इसी मूल स्रोत को तत्त्वज्ञानियों ने परमात्मा ( महान् आत्मा) कह कर पुकारा है। यह परम तत्त्व इन्द्रियों की पहुँच से अतीत है, किन्तु क्या कहना इसकी करामात का ? इस अव्यक्त ने अपने जादू से इस व्यक्त को प्रकट किया है और क्यों कि व्यक्त करने के समय उस अव्यक्त के अतिरिक्त और कुछ भी नहीं था, इस लिये कह सकते हैं कि उस अव्यक्त ने अपने आप को ही इस व्यक्त प्रपत्र के रूप में प्रकट किया है। बस, अद्वैतवाद को भित्ति व्यक्तान्यक्त के इसी भेदाभेद पर निर्भर है। संक्षेप में अव्यक्त व्यक्त के रूप में प्रपलित हुआ-यह कत्र हुआ और इसका अन्त कब होगा-इन समस्याओं से एक समझदार व्यक्ति को क्या ? अव्यक्त का न्यजन होना ही था और व्यक्त को एक दिन अन्यक्त वन ही जाना है-इसमें मानव का क्या चारा ? हमारा नाता तो वर्तमान के साथ है; हमें तो वर्तमान प्रपञ्च के अन्तस्तल में पहुँच उसकी सतह हूँढ़नी और वहाँ अपना बसेरा डालना है। इस व्यक्त प्रपञ्च को चलाने वाले तत्त्व को मनोषियों ने विष्णु कहकर पुकारा है- क्योंकि विष्णुतत्त्व इम प्रपञ्च के कण-कण में व्याप्त है और वह इसे संतत किसी अज्ञात दिशा की ओर ले जा रहा है, या कहिये कि स्वयं विष्णु भगवान् इस विशाल प्रपञ्च रूपी देह को धारण किये हुये किसी अज्ञात पद की ओर तेजी से चले जा रहे हैं। यह अनन्त प्रपञ्च, यह विपुल काय, यह असीम शक्ति जो इसे तेजी से आगे बढ़ा रही है- मानव के आश्चर्य के लिए पर्याप्त से अधिक है। फिर इसके किसी एक कण को ध्यान से देखिये-कितने रंग हैं उसमें, कितनी भगियां हैं उस एक में, कितनी अदाएँ, कितनी चितवने और कितना मिठास है उस एक में । गुलाब की एक पंखड़ी को लीजिये- गिनिये उसके रेशों को और परखिये उसके मुसकराते रंगों को-वे कितने हैं, कैसे हैं: कितने चुप हैं पर कितना अधिक बोल रहे हैं वे अपनी उस मौन मुद्रा में ? गुलाव की पंखड़ी के रेशे की चुप्पी में ब्रह्माण्ड का अमित रव मरा हुआ है। और यदि गुलाब के स्मित मौन तन्तु में आपको आनन्दमद नहीं मिल पाता तो आप अपने प्रियतम की पुतली के एक रेशे को निहारिये। कितना मादक महान समुद्र उमड़ रहा है उसमें ? उसकी लहरों में आप झूल रहे हैं-उनमें आप सुतरां खोए जा चुके हैं किन्तु फिर मी आप सब कुछ कर रहे हैं। इस जीने-न जीने, रहने-न रहने को ही माया कहते हैं। इसी असीम मायावरण को छाती पर लिए हुए विष्णु भगवान् किसी अशात दिशा की ओर आगे बढ़ रहे हैं। हमें अपनी चाल को उनकी चाल में मिलाकर एक कर देना है-. अपने तिल समान देह को उनके विपुल, काय में लीन कर देना है क्योंकि वस्तुतः - - (४० ) दोनों एक है-इम उमी विपुल ज्वालामाल के गोल मात्र है, उसरा विस्गरमार है। यह हुआ वैभवों का यर । रामानुन ने इस विशिष्टादन के रूप में, निम्बा ने देनादैन के कम में, मध्य ने दैतवाद के रूप में और वम ने शुद्धादैनबाद के रूप में प्रमापन किया है, जब किरकर का नितान्त अद्वैत मभी वादों की पारियों को पार करके पद के परम पद पर नारा है- पूजा उममें भी प्रतीयमान प्रवनमान परम तत्त्व होती है। बरदेव के अचिन्त्य भेदाभेदवाद में भी विष्णुतत्व हा यी प्ररोचना हुई है, जबकि एक मात्र पोरण्ठ शैवाचार्य ने अपने ब्रममूग मा य में शिवार चरम तत्व पी रत्यानिका काके उमी में विलीन हो जाने में अपने जीवन को मायक माना। वाने का आशय यह है कि अदेत की विशद रभ राग विष्णु के नाभिकमल में प्रवाहित हुई है क्योंकि परम तत्व का वर्तमानकारिकरूप विशु है और एक मानव का पहुँच वर्तमान काल के साथ इन कि अतीन अथवा मविभ्यत् के साथ । वर्तमान के साथ उत्पन्न हुए रममरे 'सहितपन में ही साहित्य का उमेप हुआ है। का मते है कि जो वाणी परम तत्त्व के साथ मानव का 'सहितपन' अथवा नादात्म्य उमारती है मच्चा साहित्य वही है। शाश्वत तत्व के माघ महिनाना हान चर्चा से नहीं होता, विशान से नहीं होता, वह तो किमी रहनी हुईक्ति के द्वारा अन्नीत होता है को अल कारिणी प्रक्रिया में एन-दन कर, परिणत दोहोकर सनी मदीनगदम्बा बन गई है कि पत तत्व का मारा हो व्यक्तित्व उममें समा गया है, ममें प्रतिलित, सचिन पच उन्मिपिन हो गया है। इस प्रकार की उक्ति ववि के अन्तरात्मा से निकल विश्व के किमी एक बिन्दु पर पहता और मे इतन विपुल आकार में परिवर्तित करके हमारे समुख पेश करती है कि उसमें विगु का व्यापकरूप झनक जाता है और उसके असीम सौन्दर्यमय व्यक्ति या वह का केन्द्र बन जाता है जिसे कि कवि आपकी आंखों में रमाना चाहता है । और क्योंकि भन इस विन्दु में विष्णुरूप अपार मार मर गया है इसलिये अब यह बिन्दु मी अमर बन गया है-यावचन्द्रदिवाकर महायों को पिराने और हमाने बागमन गया है । साहित्य या यथा मर्म रमी बात में है। मार निसे दिल से चाइने है उसे देखते नहीं, उसे नो भार अपनी आने से पिया कान है। मान द्वारा देखने पर गन्ने का गौगबहा मनोरम द्वीप पटना है। गन्ने के अग्रमा का मुमार दले में विभक्त होम हवा में नाचना और आरा में इसना व पतियाना कितना प्यारा मादम पढना है। किन्तु जर आपने को चमन और नियम के उन्माद में उसकी पोरी पोरी के टुक कर हालत पाप गन्ने को देगन नहीं, उसे पीछे है। और यह पाना कितना स्वा! कितनी माभों का रमममें भरा हुआ है। इस रमोबाप चपोरना ना सकते, क्योंकि यह पाया अपना मागीरथरले भोकमारीमान समोर देखने की प्रक्रिया ( ४१ ) आपको एक अनोखी, किरणों में उतराती-सी लोकोत्तर आकृति दिखाती है तो पीने की प्रक्रिया आपको दृश्यमान आकृति का ध्वंस करके एक ऐसी आकृति का निर्माण करने में सशक्त करती है जो सुतरां वायुमयी या किरणमयी लजीली आकृति है, पर फिर भी जिसकी पोरी पोरी में मादक रस जोश मार रहा है; आपका अपना आपा छलक रहा है। इस रस के साथ आप एक हो जाते; पानी में नमक की न्याई आप उसमें घुल-मिल जाते और आपके रोम-रोम में एक अनोखी पीर फिरने लगती है; जिसे हम साहित्य की पीर कह कर पुकारा करते हैं । आचार्यों ने इसका नाम रसास्त्राव रखा है। हमारे पुराणों में रस के उद्भव का अत्यन्त मनोरम वर्णन आता है। वृहद्धर्मोत्तर पुराण के ४३ वें अध्याय में स्वर्गलोक में गंगा अपनी जयमाला शिवजी को पहनाती हैं- प्रकृति-पुरुष के उस अनोखे सम्मिलन पर नारदमुनि एकत्र हुए देवगणों को एक ऐसी दिलकश तान सुनाते है जो धरती, अंवर को वेध श्रोताओं को अनिर्वचनीय आनन्द में सराबोर कर देती है और तव शिव-गंगा, देव-दानव, गन्धर्व-किन्नर समी सगीत की पीर झूम पड़ते है । ४४ वें अध्याय में राग और रागिनियों का मार्मिक विश्लेषण किया गया है-इन्हें सुन कर विष्णु का अन्तरात्मा दैवी रस में फूट पड़ता है और जगत का कण-कण उस रस में सराबोर हो जाता और उसमें इतना और ऐसा रस मर जाता है कि अब आप किसी भी विन्दु पर अपनी कविता की चोट मारिये उसी विन्दु से आपके सम्मुख पावन वैष्णव रस का स्रोता फूट निकलेगा। यह वैष्णव रस जगती के नाना जन-जनपदों में, उपवनों-आरामों में, खेतों और खलिहानों में वन को डाली-डाली में और घर की वाली-वाली में समान रूप से भर गया। ब्रह्मा ने लालायित होकर इस पावन रस को अपने कमण्डलु में भर लिया जिसमें कि गंगा जी पहले ही विद्यमान थीं। अव गंगा की वूद-बूँद में यह दैवी रस समा गया और उनके तट पर लगी प्रवाहित होने शाश्वत साहित्य की विशद धाराएँ, जिनसे मारत का कण-कण कूक उठा। वैष्णव रस को पुराणों ने वासुदेव कह कर पुकारा है-गोपियों के साथ उन्होंने इसी वैष्णव रस का रास रचाया है। वासुदेव का ही दूसरा नाम पुराणों ने स्कन्द बताया है जिनकी उत्पत्ति शिव जी के वीर्य से अग्नि के द्वारा गंगा में हुई थी। इस प्रकार आप देखते है कि किस प्रकार संगीत, साहित्य, वैष्णव रस, वासुदेव-गोपी-रास, वासुदेव कुमार एवं शिव तथा गंगा साहित्य के एक तन्तु द्वारा आपस में मिल कर एक हो गए हैं- इन सब की एकता में हो यथार्थ रस का प्रादुर्भाव होता है-इस प्रादुर्भाव का सर्वोत्तम साधन एवं माध्यम यथार्थ साहित्य है। हमारे वेद भी यथार्थ साहित्य है-किन्तु उनके साहित्य रस पर आध्यात्मिकता की पपड़ी जम गई है-देवपूजा की चादर ने उनके रस को ढक लिया है। साथ ही धर्म की भावना उनमें बलवती है-जिसके परदे में उनका साहित्यिक पहल कुछ दव सा गया ( ४२ ) है। किंतु वेदों की यह कमी हमारे दृश्य वाव्य में पूरी हो गई है और लक्षण शास्त्र के प्रवर्तक भरन मुनि न रम की चर्चा नारक का रम लेने वाले दर्शकों के हदय में अभिनय को देखकर उडुन होने वाले आहाद के रूप में विस्तार के साथ की है। बैदिक युग में अभिनय का अभीष्ट प्रचार था और वर्षों चलने वाले प्रलम्ब सत्रों के मध्य मनोविनोदार्थ अभिनय रचे जाया करते थ जिनमें कि वेद में आने बाल आरपानसूक्त वार्तालाप का नाम दिया करते थे। स्वस्थ ममाज में मनोविनोद का साधन मुग्यतया अभिनय हुआ करता है-इस अभिनय का वैदिक युग में पूरा चल्न था। मरतमुनि ने अभिनय प्रक्षकों के हृदय में प्रवाहित होने वाले साहिस्यिक रस का निरूपण करके अभिनय को प्राचीनना पर अच्छा सकेन किया है। दाने दाने भारतीय आर्यों का उल्लाम मन्द पडता गया और उनका अभिनय पीका पड़ने के साथ माय कम भी होता गया, यहां तक कि एक युग ऐसा आया जब कि अमिनय राजाओं के दरबार की चारदीवारी में सीमित हो गया। अब दृश्ययाध्य के स्थान पर अन्य काव्य का महत्त्व उमरा और लाक्षणिकों ने अब उसी के द्वारा होने वाग रसनिष्पत्ति पर बल देना आरम कर दिया। भरत ने रम को साहित्य का हृदय मानते हुए अहदारों को उसके प्ररोचक के रूप में माना है। मामद ने अपने काम्यान कार में 'शमार्थयुगल को याम्य बताकर मरतपनिपादिन दम गुणों का ओज, माधुर्य तथा प्रमाद न तीन गुणों में समावेश करते हुए वक्रोक्ति को समस्त अरवारों का मूल बनाया और दस प्रकार के दोषों का विशद विवेचन किया है। मामद की विवेचना में रम कुछ गौग बन गया है भोर मस्कारों को प्रधानता मिल गई है जो कि उनके बाद सातवीं सदी में होने वाले आचार्य दादी की रचना कान्यादर्श में भाषण बनी रही है। दण्टीने याच्यादर्स के प्रथम परिच्छेद में राज्य का लक्षा, भेद, देवमो तथा गोडी रीति, प्रव दश गुणों का वर्णन किया है, दूसरे परिच्छेद में भर कारों के लक्षण एव उदाहरण दिये हैं, तोमरे में शम्दार इसरों का विशद वर्णन किया है और चौथे में दम दोषों के एग एक उदाहरण दिये हैं। इन्होंने अपनी रचना में पहली बार रीति पर प्रकाश सागरे। वामन ने एम रीनि दीको काव्य का भात्मा बताते हुए मे चमकाने वाले अलदारों का अपने सन्याल बारसूत्र में मामिर निरूपत किया है। दोने वैदमी, गौरी, व पौचालये दोन सानिया मानी १, बोक्ति वा अच्छा विवेचन क्रिया, भोर समल अरवारों को उपमा का परच माना है। वामन के ममकालीन भाचार्य उड़ाने भएवारशास्त्र का समर्थन करते हुए अपने क्या कारमारमग्रह नाम प्रम में ४१ महारों का मप्रपच निरूप दिया है जिमकी मरने भरने 'न्यापार में विरोचना की। .

( ४३ ) इन आचार्यों के वाद आचार्य आनन्दवर्धन आते हैं। इन्होंने अपने ध्वन्यालोक में ध्वनि को काव्य का आत्मा बताते हुए उसी की विधाओं का मार्मिक विश्लेषण किया एवं आचार्यों का रुख अलङ्कारशास्त्र से मोड़ कर ध्वनितत्त्व की ओर आकृष्ट किया है। इनके ध्वन्यालोक पर आचार्य अभिनव गुप्त ने ध्वन्यालोकलोचन नाम की मार्मिक टीका लिखी और अपनी अनूठी रचना अभिनवभारती के द्वारा भरत के नाट्यशास्त्र की ओर आचार्यों का ध्यान आकृष्ट किया । 'कुन्तक ने अपने वक्रोक्तिजीवित में काव्य का आधार वक्रोक्ति को सिद्ध किया जब कि महिमभट्ट ने अपने व्यक्तिविवेक' में ध्वनि को अनुमान का ही एकरूप ख्यापित किया। आचार्य धनञ्जय ने अपने दशरूपक के द्वारा नाटय की ओर जनता का ध्यान फिर से आकृष्ट किया। भोजराज ने अपने सरस्वतीकण्ठाभरण में एवं शृङ्गारप्रकाश में शृङ्गार को ही सव रसों का मूल बताते हुए रस की मार्मिक विवेचना की और अलंकार एवं गुण-दोषों को सहायक के रूप में उपस्थित किया। आचार्य मम्मट का काव्यप्रकाश ध्वनिवाद के समर्थन में अनूठा उपकरण वनकर काव्यशास्त्र में अवतीर्ण हुआ, जब कि प्रख्यात आचार्य क्षेमेन्द्र ने अपनी औचित्य- विचारचर्चा में औचित्य ही को काव्य का आधार बताया है। रुय्यक ने १२ वीं सदी में अलङ्कारसर्वस्व लिखकर अलङ्कारों पर फिर से जोर दिया; हेमचन्द्र के 'काव्या- नुशासन' में यही प्रवृत्ति अनुप्राणित हुई। १४ सदी में कविराज विश्वनाथ ने अपना प्रसिद्ध ग्रन्थ साहित्यदर्पण लिखा और उसमें काव्य का लक्षण 'काव्यं रसात्मकं वाक्यम्' बताकर रस की फिर से पुष्टि की। पंडितराज जगन्नाथ ने अपने रसगङ्गाधर में इसी रस का अन्तिम परिपाक किया। यह हुआ संस्कृत काव्यशास्त्र का छोटा सा सिंहावलोकन । भरत के साथ इसका प्रारम्भ रस में हुआ है और पंडितराज जगन्नाथ की रचना रसगङ्गाधर के साथ इसका पर्यवसान भी रस में हुआ है। जगन्नाथ ने अपनी रचना का नाम 'रसगंगाधर' रख कर साहित्यिक रस के आधारभूत वैष्णव रस की ओर मार्मिक संकेत किया है जो कि 'रस- गङ्गा' इस समस्त पद से व्यक्त है। प्रस्तुत चम्पू के निर्माता सूर्य देव को रसमार्ग ही मान्य था और उन्होंने अपने चम्पू में इसी वैष्णव रस को अनेक विधाओं का अनूठा उत्थापन किया है। इस प्रकार हमने देखा कि साहित्य के अन्तस्तल में प्रवाहित होने वाला रस आहाद- रूप है और वह परम वैष्णव रस का ही स्थूलरूप है । परम वैष्णवरस-और उसके द्वारा साहित्यिक रस समानरूप से कण कण में विद्यमान है-साहित्य इसी की प्ररोचना करता और श्रोता एवं दर्शक के हृदय में इसी रस का उन्नयन करता है।

( ४४ ) किन्तु म रम की व्याक्ना हो इम रम पर आश्रित दुर साहित्य के रक्षणों का दोर है, क्यों कि टीक इसी रम की उत्थानिका संगीत को मुनदर, पटकन चिन को देवघर एवं दु स-दर्द व यो हाम की वीचियों में रमाने वाली मूर्ति को देख कर द वे हदय में हो जाती है। साहित्य को आत्मा रस वो इसी दृष्टि से दाद के भाचार्यों ने साहित्य का भारमा बना कर साहित्य को शनि सामों की परिधि मे पृथक करने के लिए उनके लक्षों में कमी वक्रोक्ति पर, मो अनुमान पर और कभी पनि पर दल दिया है- जो कि सर के मद समान रूप से अन्य ललित कलानों में न मिलकर एक मात्र रमरमा साहित्य में उपलब्ध होता है। और इस प्रकार नत्र कि मरन ने साहित्य के भामा रम को साहित्यिक जनता के सम्मुग्ग रमा था वहां वाद के भाचार्यों ने साहित्य के शब्द रूप का आर्थिक विदटेपणा परके टस भन्म रहित बनाओं से पृथर करन तुर उमका रूप सुस्थिर एव भतियाति दोप से बरी कर दिया है। हमारे साहित्यदर्शन के ऋमिक विकास की रूपरेश कुछ इस प्रकार की है-मेहदयगम कर के लभुशास्त्र का अध्ययन करने पर उममें एर अनूठी व्यापकता उमर आनो है जो कि हमें रक्षाशाल के आज तक के अध्ययनों में नहीं दीख पडती। - काव्यशास्त्र का मूल और स्वरूप ऋग्वेद के दशम महल के १७७ वे मुक्त का मरा मत्र वा के उदम की तान अवस्थाओं पर मार्मिक प्रकाश हानता है पतको वाच मनमा विमति ता गन्धवोऽवद् गर्ने अन्त । सविनाना स्वय मनीषाम् इनस्य पदे वयो नि पान्ति ॥ मत्र सूर्यपरक है, किंतु अनायास ही यह कवि वी आविष्ट वाणी पर पर गता है। वाणी या उद्गम सक्षेत्र में इस प्रकार है-अनिमावी अग्नि में हररर कवि पनन भोर सूर्य का रूप धारण कर लेता है और अपने देवी आदेश के द्वारा वह जगता दे काका में नव जीवन फूंक देना है। प्रनिमाविपुद का बटन वचन ही उसके अनम् में बात के अकूर निकले हैं। वाणी को यह अवस्था परा कहाती है। प्रतिमान की दूरी स्टेज पर कवि गधर्व अर्थात् गैरूपवानीको धारकाने वाला बन जाता है और इम स्थिति में उनकी बाबा में व्याहत होने के लिए आग बढती है, यमत्री यही अवस्था मध्यमा है। प्रतिमा ही तृतीय अवस्था में पहुंच कर कवि की वा मवागपून वर्ग-पर-वाक्य में विरार बाती है और अपनी सहरियों म १६ समार को मरमित करने वाले 'न' को दरहित कर देती है। इस अवसर रम को विश्व में प्रवाहित करना और जगती के कारण को टममें सरार कर देना ही मच्ने कडाकार शं वाका परम सबको भी अवस्था प्रेम करो मदा देते हैं।

( ४५ ) मंत्र का पहला शब्द 'पतङ्ग कवि के अंतस में उद्दीप्त होकर जलने वाली प्रतिभाग्नि के व्यापार को उपलक्षित करता है। इस देवी अग्नि के जल उठने पर कवि को भौतिकता उनमें मत्म हो जाती है और नितरां सूक्ष्म रह जाने के कारण कवि जीवन के आदिस्रोत 'रहस्' तत्व के साथ एकाकार हो जाता है। रहस् के साथ तदात्म होते हो कवि उसके तेज से आविष्ट होकर पतङ्ग (सूर्य) को न्याई दमकने लगता है और उसकी गति चराचर में उसी प्रकार निर्वाध हो जाती है जैसे कि स्वयं सूर्य भगवान् की। देवी आवेश का स्नेहभरा धक्का कवि को रभसा रवि रूप में बदल देता है और अब वह अनायास ही उस विश्वसंगीत की तान छेड़ देता है जिसके कारण सूर्य भगवान् का नाम रवि अर्थात् 'शब्द उत्पन्न करने वाला' पड़ा है । रवि शब्द की व्युत्पत्ति र धातु से है, जिसका अर्थ 'शब्द करना है। वेदों के अनुसार भुवनभास्कर 'रवि' वेदत्रयी के जन्मदाता हैं; इड़ा, सरस्वती और मारती के वे आदिस्रोत हैं; और अव्यक्त को व्यक्त रूप देनेवाले स्फोट के वे परम निधान हैं। हमारे पुराणों ने 'रवि' के लयवाही रूप की बार-बार प्रशंसा की है और विश्व के आर्ष कवि वाल्मीकि, व्यास, कालिदास, दांते, शेक्सपीयर एवं गेटे आदि ने कवि को विश्वसंगीत का जन्मदाता कहकर उसकी आरती उतारी है। रवि-रूप कवि अपनी रमा-प्रसूत वाणी को द्वितीय अवस्था में गन्धर्व का रूप धारण कर लेता है और तब उसकी वाणी वर्णपदादि में व्याकृत होने के लिए अग्रसर होती है। तीसरी दशा में पूर्ण रूप से व्याकृत होकर जब उसकी कूक प्रस्फुटित होती है तब वह अनायास ही विश्व को चलाने वाले ऋत की रागात्मक व्याख्या में व्याकृत हो जाती है। कवि वाणी की इस प्रक्रिया में अथर्ववेद का ४,३३ वां मंत्र एक नई छटा ला देता है- अपूर्वेणेषिता वाचता वदन्ति यथायथम् । वदन्तीयंत्र गच्छन्ति तदाह्मिणं महत् ॥ अर्थात् अपूर्व (प्रतिभातत्त्व ) के द्वारा प्रेरित हुई कविवाणी जगत् के रहत्यमय रूप को अनावृत करने में समर्थ होती है। वस्तु-तत्त्व के अनावरण में व्याकृत हुई कवि-वाणी का.जहाँ पर्यवसान होता है महत् ब्रह्म वही है। कवि की रचना का परम लक्ष्य यह महत् ब्रह्म ही है। मंत्र की पदावलि से स्पष्ट है कि विश्व के रहस्य को वही वाणी व्यक्त कर सकती है जो प्रतिमा के तेज से चमत्कृत हो और जिस में दैवी तवस्त्वरा वस गई हो। कविता के उद्गम एवं उसके लक्ष्य का निर्देश करते हुए ऋग्वेद का १, १६४,४९वां मंत्र सरस्वती से निम्नलिखित प्रार्थना करता है:- यस्ते तनः शशयो यो मयोभूर येन विश्वा पुष्यसि वार्याणि । यो रत्नधा वसुविद् य नुदवः सरस्वति तमिह धातवे कः ।। -- - अर्थात हे वापि तुम मुदो अपना वह शिव एव सौख्यमय, भरपूर स्तन पीने को दो जी भोष परणीय पदार्थों का पोषण करनेवाला है, जो रनों का दाना, शोमन पदायों का प्रापयिता एव अनायाम ही सब कुर देने वारा है। निसन्देह वैदिक ऋषियों के अनुसार सरस्वती रसमयी है, और हमारे वेद ने रमसारी सरस्वती म होवोत्तर निद्रा एव प्रमाद उत्पन करने वाले लन्य की प्रार्थना परके काव्य के आत्मभूत रस की ओर सकेट किया है जिमका आस्वादन करके फगकार तो अमर हो ही जाना है, पर माप ही वह श्रोता एव प्रेक्षक को मी ब्रह्मानन्द में सराबोर कर देता है। उक्त मन्त्र से स्पष्ट है कि लयसारी वाणी का भात्मा 'रस' है और इमी के उज्ज़ मण से रससिद्ध कलाकार अपने आप को धन्य करते आए हैं। यदि के आमरूप 'रस' का दाव्याचार्यों ने मुन्दर विवेचन किया है। ऋग्वेद का ८ १००.१० वा और ११ वा मन्त्र वाणी के भात्मरूप पयोरम की और फिर से मवेत करता है यद्वार वदन्त्यविचेतनानि राष्ट्री देवाना निषसाद मन्द्रा। चतन ऊज दुदुहे पयासि क स्विवस्या परम जगाम ।। देवी वाचमजनयन्त देवास्ता विश्वरूपाः पशवो बदन्ति । सानो मन्द्रेषमूर्ज दुहाना धेनुर्वागरमानुप सुटुनेतु ।। दोनों मन्त्रों में रयवाही वाणी को धेनु नाम से पुकारा गया है और दोनों ही मन्त्रों में से मन्द्रा अर्थात् प्रसादक वह कर उसके पयोरस की लोकोत्तरता को व्यजित किया गया है। पयसारी वाणी के आत्मरूप 'रस' की मन्द्रता एव प्रसादकता को बेद ने तरह-तरह से गाया है और ऐसी सरस्वनी के स्तन को शययु (- आयुशी स्वप्ने), शिव (शी स्वप्ने), अश्वा मौलिक चिस्थिति में पहुँचाने बाल नता कर उसके रसास्वाद में हो वानी का पर्यवसान माना है। आविष्ट वाणके मात्मरूप रस को दण्डी ने इन पदों में व्यक्त किया है:- मधुर रसव वाचि वस्तुन्यपि रसःस्थिन। येन मापन्ति धीमन्तो मधुनेद मधुबना ॥१॥ अर्थार मधुर रस वागी और अर्थ दोनों में ही सवलित रूप से निवास करताहै- क्योंकि ये दोनों तरद मौनिक रूप से परस्पर अमिन है। इस रस को पीकर मनीषी रोग मौलिक अगल से ऊपर उठ उमदे मूल में पहुँच ना? और वा जाकर अमर से जाते है। ऋग्वेदका र ८ का पहला मन्य गोरस की गरिमा पर फिर से सकेन करता है:- पराग वाच अनपत्रमियर भरी बमानो अभि गा पक्षनि।।

( ४७ ) अर्थात प्रतिमा के आवेश में चमाचमाता (पतंग) कवि लयसारी स्वर में फूट निकलता है, और तब वह लोकोत्तर क्रियाशीलता को धारण कर के इस वाणी की सेवा में जुट जाता है। कह सकते हैं कि प्रतिमा की अग्नि में गल कर वहने वाला कवि का आत्मा ही वाणी के रूप में फूट निकलता है। आविष्ट रचना के इसी रहस्य को आनन्दवर्धन ने इस प्रकार व्यक्त किया है:- वाक्यस्यात्मा स एवार्थस्तथा चादिकवेः पुरा । क्रौंचद्धन्दवियोगोत्थः शोकः इलोकत्वमानतः ।। अर्थात् आविष्ट आत्मा की निभृत पीर हो किसी दृश्य को देख कर जब पक निकलती है तब कविता का उदय होता है। उस दैवी पीर में पियराया कवि अपने आप को भूल जाता, तब वह किसी लोकोत्तर संविधान में जा पहुँचता, और तब जगती के मूलरस के साथ एक होकर बहने वाला उसका आत्मा ही वाणी के माध्यम से वर्गों में विखरते लगता है। उसकी यह फूट नितांत स्वाभाविक एवं ऋजु होती है और इसीलिये यह अलंकारों की फुलझड़ी में उघड़ती चलती है क्योंकि आविष्ट कलाकार के अपने ही प्रदीप्त गुण प्रतिमा की सर्चलाइट में झिलमिला उठते और अलंकार बन कर उसके प्रयत्न विना ही, उसकी रचना में सजने लगते हैं। और जब प्रतिभा-विद्युत् का धक्का लगने पर कवि सामने पड़े विश्व की ओर अग्रसर होता है तब वह उसके कण-कण में अलंकारों का मन्त्र फूकता चलता है और साथ ही अपनी रचना पर भी अलंकारों के पन्ने जड़ता जाता है। वैदिक रचना के अलंकारों का मूल रचना की इसी प्रक्रिया में संनिहित है। आविष्ट वाणी के आत्मरूप 'रस' के साथ-साथ वेद ने वाणी के रमणात्मक पक्ष पर भी यथेष्ट प्रकाश डाला है। ऋग्वेद का ३. ५५ का ७वां मन्त्र यों है:- प्ररण्यानि रण्यवाचो भरन्ते । अर्थात् रुचिर वाणी वाले ऋत्विक अथवा कवि रमणीय वस्तु प्रस्तुत करते हैं और यह वात है भी स्वाभाविक ही क्योंकि यदि रचना के मूलस्रोत कवि-हृदय में मधु का प्रवाह है तो उसमें से उघड़ने वाले लयसारी वर्गों का भी मधु में सना होना स्वाभाविक है; और मधुसिक्त वाणी वाले भावुकों से मधुसारी रचना ही की आशा की जा सकती है। काव्यशास्त्रियों के अनुसार रमणीय वाणी का ही दूसरा नाम कान्य है-और यथार्थ काव्य के निमीता अपनी रचना के माध्यम से अनायास ही विश्व में लावण्यतन्तु फैलाने वाले रमणतत्त्व के साथ तदाकार हो जाते हैं। इसी वात को हम साहित्यिक भाषा में इस प्रकार कह सकते हैं:- (१८) . 'रमणीया प्रतिपादर रमवाव्यन्' । 'वाय यशमेऽर्थक व्यवहारविदेशिवनरक्षनये । सच परनिवृतये शा-नासमिततयोपदेशयुजे ।।' बात टोक हे-मीठे बोल से क्या नहीं मिल जाता रि यदि कवि-रचना में मिटाम मर गया ने उनके लिये कौन सी वस्तु दुष्प्राप्य रह जाती है। यह सब कुछ है, दिनु काव्याचाया ने पास के इमी एक तत्व को पाग्य का सर्वस्व मान पर उमी में कविता का पर्यवमान कर दिया। सुकरा ने प्रेम की विवेचना करते हुए रमीयता के माध्यम में उमरा 'शाश्वत सौदर्य तत्त्व' में पर्यवमान किया है और नि मन्देश पारवेधी कवि-रचना का यथार्थ लक्ष्य भी यह सौदर्य तत्त्व है। ऋग्वेद के ९७३ का वो मन्त्र वाणी के अलकरम को अनन्त शक्ति का সৗন বালা सहस्रधारे विनने पवित्र मा वाध पुननि कवयो मनीषिणः। रदाम पामिपिरामो अद्रुह सपशः स्वचा मुसो नृचक्षसः।। मन्त्र सोमपरक ई, किंतु रवि रचना पर भी यह सहज हो घर जाना है, क्ये कि पारवेषी कराकार सहन कुस्याओं में प्रवाहित होने वाले पावन, सर्वमारी, सोमका गुणगान करक अपनी वाणी को परिपूत करते और उसे नवोदा वधू की न्याई माति- मानि के कारों में चमन करते हैं। अलकृत दाणी वाले दवियों की मधुबाड़ी मोनिया विश्च के प्रेरक, प्रियदी, जगद के चितेरे, छोमनगामी देव को भी अपने वश में कर लेनी हैं। मसार को ग्ला देने वाले देवताओं को भी अपने मिठाम से मोह लेने वाली कवि रचना का इन्दर निरूपा है:-क्योंकि पहुँची हुई बविता है ही वह जो सूर्य मगदान के समान उगती के काका पर छा जाती हो और जिसके पद पद से प्रतिमा को किरगी पहनी हों। पेमी ही पारवेधी भविष्ट कुन यथार्थ कविता कहा मानी ? और सेमी हो या पवित्र व चमका दोने के कारण गयक, मोता व प्रेक्षक मन्त रानाको भावजित करने में मक्षम होनी है। विश्व के माग बवि वाल्मीकि याम, होमर, काटिदाम, ददि, विमीयर व गैटे की रचना इमीग्रेटिकी। ऋग्वेद के१० ७२ दमरे मन्त्र में वानी के सस्कार पर बल दिया गया है:-- सक्नुमिद निउना पुनन्नो यत्र धोग मनमा वाचमनन । सा मगायःमस्यानि जानने मद्रेषा मीनिदिनाधि वाचि ।। भार बर बुद्धिमान् मावि, जिम प्रकार राज से अन्न घटा खातार हम प्रकार अपने मन से वाीधे परिपून करके उभे रम्य पक्षाबलि के रूप में सजाते है, सब विष (e) - वै.२०.६८.२१ को प्रसादक लक्ष्मा बिन माग उनकी रचना में आ विराजती है। भद्र वाणी वाले गायक का चराचर जगत् के साथ सहज ही रागात्मक सम्बन्ध स्थापित हो जाता और ऐसा ही कलाकार अपनी आविष्ट लय के द्वारा विश्व के अन्तस्तल को निनादित करने में समर्थ होता है। पवित्रता एवं अलङ्करण के परम स्रोत शाश्वत तत्व को मुखरित करने के लिये वाणी का पवित्र एवं मनोहर होना परमावश्यक है। इसी कारण हमारे वैयाकरणों एवं साहित्य- शास्त्रियों ने वाणी के संस्कार पर इतना अधिक और इतनी वार बल दिया है। वेद तो स्थान-स्थान पर 'धुमती' वाणी के लिये प्रार्थना करता है। उदाहरण के लिये देखिये :- दधामि ते धुमती वाचमासन् । ऋ. अस्मे धेहि धुमती वाचमासन् बृहस्पते अनीवामिपिरान् । यया वृष्टिं शंतनवे वनाव दिवो द्रप्सो मधुमां आ विवेश ॥१०.९८.३ अर्थात् तेरे मुख में प्रकाशमयी वाणी का आधान करता हूँ। हे भगवन् ! हमारे मुख में प्रकाशमयी वाणी का आधान करो। ओ बृहस्पति ! ऐसी वाणी का, जो आधि- व्याधियों से परे हो, जो जगती के कण-कण में कंपन बहा देती हो, जिसको स्वर- लहरियों से हम शन्तनु के लिये आकाश से वादल बरसा दें। उस प्रकाशमय सोम का मधुमय बिंदु मेरी जिहा पर आ विराजा है, मेरा रोम-रोम सोम के मादक रस से भिन्ना उठा है। अथर्ववेद ६.६९ के द्वितीय मन्त्र ने घुमती के स्थान पर भर्गस्वती शब्द का प्रयोग किया है- अश्विना सारघेण मा मधुनाब्तं शुमस्पती। यथा भर्गस्वती वाचम् आ वदानि जनां अनु । ओ अश्विन देवताओ! ओ सुन्दरता के स्वामियो ! मेरे रोम-रोम में मधु भर दो, जिससे मैं जनता के प्रति भ्राजस्वती वाणी का प्रयोग कर सकू। निश्चय ही इन मन्त्रों के द्वारा वाणी में मधु एवं अलंकरण उत्पन्न करने की प्रार्थना की गई है क्योंकि वेद के अनुसार आविष्ट वाणी में रस एवं अलंकरण दोनों ही उचित मात्रा में होने वांछनीय हैं। वाणी के उक्त अलंकरण से आगे बढ़ कर दूसरी स्टेज भरत मुनि द्वारा संकेतिन एवं अग्निपुराणद्वारा प्रपञ्चित अलंकारशास्त्र है । अलंकारों के विषय में दण्डी ने यो कहा है:- काव्यशोमाकरान् धर्मानलंकारान् प्रचक्षते ॥ ४ नृ० च० भू० (५०) वे ने वागी में चमत्कार हारने वाले अलंकारों का निराला प्रयोग किया है, और उपमार तो जैसी वैद ने ढढा है वैमी अन्यन्त्र देखने को मिलती ही नहीं । प्रवीत होता है कि वैदिक कूक को सुनकर स्वय उपमारकार मनिमान् हो उठ बैठा हो। उदाहरण के रिये पदिये ऋग्वेद के प्रथम मण्डल के ६६वे सूक्त को-यहां आपको एक से एक बन कर उपमा उघडनी दीम पढेगी। घृत सूक्त में जुभारियों के क्षण में ऊचा और धग में नीचा दिसाने काल पासों को 'कुमारदेण' अर्थात बच्चों की तरह शट देने और पर छीनने वाले बना कर तो वैद ने उपमा की पराकाशही कर दा है। 'शीना सन्तो हृदय निर्दहन्ति में विरोभामाम की छटा देखते ही बनती है। बद के विमी मी सूत को पद जाइये-उममें, भापो कोई न कोई अलकार अपने गरि रूप में निमन बैठा टार्च की न्यार रचना के शम्द और अर्थ दोनों को मासिन करता दीप पडेगा। न केवल शम्दाल कार अथवा अर्यालदार, अपितु दोनों सहित रूप में वैरिक रचना को एक निराले धरातल पर उठाते दीप पटेंगे-और वह भी अपने स्वारमिक रूप में, प्रशान्त किंतु सुगरा दूरगामी, अनमाने हो रचना को कूट-कूक में दिपे बैठे वय अनदेखे किंतु जगती ये कण-वणको सिगदने वाले है। बेटों के बल कार विन्याम से मुग्ध होकर बापाचायों ने काव्य का सर्वस्व ही सरकारों को मानना आरम्भ कर दिया और उन्हीं के भेदोपभेदों की मीमामा में होनेवाच्य-समीक्षा की इन कर दी। अपववेद का १०४ ३३वा मन्त्र रहस्यवाद का मादिम सकेत है। मन्त्र यों है अन्ति सन्न न जहात्यन्ति मन न पश्यनि। देवस्य पश्य मान्य न ममार न जायंति। यह कवि रचना की रोकता का अनूठा निदर्शन है। प्रतिमा विधुर की धमाल में भावर पर उठा वणवार सामने पेली बगनी को झोरता भी नही भोर वह उसे देखा मा नहीं है। प्रनिभा के ताप मे पिपर कर कवि का पारमा तरल बन जाना, नर वह मानने के विश्व की प्रतिमाग्नि में गला कर उसके स्थान पर एक नवीन आया-जगत का निर्माग फरता भौर परमताव के निदरीर रूप में उसका रम पिया करता है। देवी उन्मेष का रहस्य कवि की इम खोने में पाने वाली महाशक्ति में सनिहित है। इम पारवेधी दृष्टि से धुन गए अर्थ प्रसून भौर रहे शान करने वाली कविका मचमुर अमर होती है वह कमी जी ही होती मोर न वह कभी नष्ट होती है। क्योंकि भर उसमें निम्नलिवित परम तस्य का पूरी तरह प्रविहिन हो गया है कि अमरतारे जीवन का वास । मृद जीवन का चाम विकास (पामा'५८) - ( ५१ ) और अव वह परिवर्तन के पार शून्य के उस पुलिन पर जा लगी है जहाँ कि सब प्रकार का आदिसूत्र एक गोली के रूप में सिमटा पड़ा रहता है। इस आदिम सूत्र को प्रत्यक्ष करते हो कवि-पदावली की तर्ज बदल जाती और उसका विषय यह स्थूल जगत् न रह कर उसके उर में ज्वार लेने वाला 'कनकरस' वन जाता है। उक्त विवरण से स्पष्ट है कि कविरचना का लक्ष्य कवि के सम्मुख फैला हुआ भौतिक जगत् नहीं, अपितु उसके अन्तस्तल में प्रवाहित होने वाला लावण्य परिपूर्ण छाया- जगत् है और उसी का समुचित उत्थापन कवि की आविष्ट रचना का प्रमुख लक्ष्य है। यह तो हुई स्फोट के उस पक्ष की बात, जिसके अनुसार कि इस शब्द का अर्थ नाद के माध्यम से व्यक्त होने वाला पदार्थजात है, जो कि अपने तरल रूप में कविरचना से ध्वनित होता है। अब लीजिए स्फोट शब्द के उस पक्ष को जिसके अनुसार कि पदार्थजात को व्यक्त करने वाला नाद इसका अर्थ है; इस पक्ष में भी कविता का असली रूप कवि की व्यक्त पदावली नहीं, अपितु इस पदावली के माध्यम से ध्वनित होनेवाली वह मूलभूत परम ध्वनि है, जिसको झंकृति-मात्र से मूल अव्यक्त चराचर जगत् के वर्तमान रूप में बदल जाता है। उसी आदिम नाद की रचना-कारिणी शक्ति कवि- पदावलि में अवतीर्ण होकर उसे नव-नव छाया-जगत् रचने की शक्ति प्रदान करती है और उसमें वह तवस्त्वराला देती है जो कि परमात्मा की अपनी रचना में दृष्टिगत होती है। समग्र वेद को ध्यान से पढ़ जाइये, उसके पद-पद के पीछे आपको एक निराला तोमिल जगत् उभरता दीख पड़ेगा, एक अनोखी दुनिया दूर से झनझनाती सुन पड़ेगो, जिसका कविरचना की स्फुट पदावलि से कोई सम्बन्ध नहीं रहता, किन्तु जो कविकूक के तरङ्गित होते ही रमसा श्रोता एवं प्रेक्षक के संमुख आ खड़ी होती है। और यह चात इसलिए है कि वैदिक कवि ने विश्व के भूतजात को अनुप्राणित करनेवाले चरम सूत्र को आत्मसात् कर लिया है और उसके द्वारा विन्दु में समुद्र को और समुद्र में विन्दु को एकाकार देख लिया है। तभी तो अथर्ववेद के १०.८ ३७-३८ में यों कहा है:- यो विद्यात् सूत्रं विततं यस्मिन्नोताः प्रजा हमाः। सूत्रं सूत्रस्य यो विद्यात् स विद्याद् ब्राह्मणं महत् ।। वेदाई सूत्रं विततं यस्मिन्नोताः प्रजा इमाः । सूत्रं सूत्रस्याहं वेहाथो यद् ब्राह्मणं महत् ।। चराचर में रमे परब्रह्म को वही जानता है जिसने इस विश्वव्यापी सूत्र को देख लिया है, जिसमें जाती के जन्मजात धुने पड़े हैं और जिसने इसमें जान डालनेवाले उस परम सूत्र को साक्षात् कर लिया है जिसके विषय में महादेवी वर्मा ने निम्नलिखित पंक्तियाँ गाई है:- ( ५२ ) 'एक तर अगणित पन का एक सूत्र सदके धन का। आदि में छिप जाता अवसान अन्त में बनता नन्य विधान। सूत्र ही है क्या यह ससार गुथे जिसमें मुख दुख जय-हार ।' वैदिक कवि कहता है कि मैंने उस सूत्र को देख लिया है जिसमें अशेष जन जनपद जब पड़े हैं, और मैने इस विस्तृत सूत्रजाल को अनुप्राणित करनेवाले चरम सूत्र मी देख लिया है। तमी तो में रहता हूँ कि मैने परबन का माक्षात्कार कर लिया है। यथार्थ कवि रचना की मी व्यापक गइनता को शेक्सपियर ने अपने मिट ममर नाइट्स टीम में यों व्यक्त किया है- The poet's eye in a fide frenzy rolling, Doth glance from heaven to earth from carth to beaten. And, as imagination bodies forth The forms of things uokoown, the Smoet's ren Taras them to shapes, and gives to alry Dothing A locul hibitation and a bande ( lct 5 12 20 ) काव्यप्रक्रिया का इससे अधिक मार्मिक एव यथार्थ वर्णन अन्यय कहीं नहीं मिलना क्योंकि शेक्मपियर कविता-वामिनी के मौ रमिया थे और उनवी चुरकी-चुरी में चराचर का पासोच्दास मेन्द्रित रहा करता था। भारतीय भाचार्यों का यह कपन- अपारे काव्यममारे विरेक प्रजापनि । यथारमै रोचते विश्व तद परिवर्तने।। तोक्मपीयर के प्रत्यक्ष दर्शन का मामाममात्र है। हो, तो मानिराला होता? तवान में बौराया हुआ एक बगमार, जिमको पदावनि बनी तो कुदकितु आगर जिसका कुछ मोर ही दुमा करता है। उसी मा उस लोकालोक पर्वत सी बन जाती है निम पर आटोक और मयकार साप-माय फैले होते हैं और जहाँ का धरातल बुद्ध कसित-मा, बुद्ध महमरीचियों में पदा निधपरमा एक साथ सरसाप हुआ करता है। मेरकी समय रचना कवित्व की रस पारवेधी शक्ति से उकासित है। इसे पदहर पाटक के सम्नुपएक ऐमा मदिर जगर उपहना जो मौलिक होने पर भी मुरी भूमाती है, और जो भीदिए सचमुच मुन्दर, शिव एव परम साय है।

( ५३ ) कविता के ध्वन्य अर्थ को लेकर काव्याचार्यों ने उसी की मीमांसा में अपनी तर्क- शक्ति की इति कर दी, और कवित्व के उस पक्ष की रुचिरता से कांदिशीक हो वे उसके अन्य पक्षों को भुला बैठे। सुकरात ने प्रेम का विवेचन करते हुए मध्यमार्ग को मनोरम उत्थानिका बाँधी है, जो ग्रीक सफलता की आधारशिला थी और जिसको ओर श्रीकृष्ण ने अपनी गीता में और भगवान् बुद्ध ने अपने व्यावहारिक उपदेशों में मार्मिक संकेत किए हैं। सौन्दर्य का मर्म रचना की इसी मध्यमार्गी समजसता में है और यथार्थ सत्य पराकोटियों के मध्य विराजने वाले इसी माध्यमिक समता बिन्दु पर टिका हुआ है। जीवन की सुस्थता एवं आर्जव इसी में हैं और सुस्थता एवं ऋजुता ही सौन्दर्य के अपने प्राण है। ऋग्वेद के नवम म. के १.९५ सूक्त का दूसरा मन्त्र काव्य के रोनि मार्ग पर सुन्दर प्रकाश डालता है :- हरिः सृजानः पथ्यामृतस्येयर्ति वाचमरितेव नावन् । देवो देवानां गुह्यानि नामाविष्कृणोति बहिपि प्रवाचे ॥ मन्त्र मर्मस्पशी है । इसमें रीतिमार्ग के सभी घटकों की ओर संकेत आ जाता है। रचना करने वाला कवि-प्रजापति ऋत के मार्ग पर अग्रसर होने वाली स्वर-लहरी का सृजन करता है, ठीक उसी ध्यान एवं कौशल से, जिसके साथ कि एक नाविक नाव चलाया करता है। अपनी रचना के माध्यम से वह परम रहस्य के मर्म को छू लेता और रमसा उसे जगती के सम्मुख अनावृत कर देता है। कितनो मार्मिक एवं मनोरम व्याख्या है यह कवि-रचना के मर्म की और कितने रोचक ढंग से यह कविता के रीति- मार्ग का निदर्शन करती है ! क्योंकि संवादी रचना सचमुच है ही वह, जो ऋत के मार्ग पर चलती हुई विश्व के स्थायी संविधान का व्याख्यान करती हो और उसके द्वारा देवी रहस्य का रागात्मक मुखरण करती हो क्योंकि सचमुच ऋत के विश्वव्यापी सितार पर निनादित होकर ही रचना के अक्षर-अक्षर तत्त्व को व्याकृत करने में सफल हो पाते है। वेद ने स्पष्ट शब्दों में कहा है :- ऋतस्य तन्तुर्विततः पवित्र आ जिहाया भग्रे वरुणस्य मायया । धौराश्चित् समिनक्षन्त आशतात्रा कर्तमवपदात्यप्रभुः॥१. वे. ९. ७३.१ अर्थात् ऋत का देवी तन्तु वरुण को गुप्त शक्ति द्वारा जिहा के अग्रमाग की चलनी पर टिका हुआ है। मेधावी कवि उस तक पहुँच कर उसे आत्मसात् कर लेते है। इसके विपरीत वे अल्पश जो इसे प्राप्त करने में असमर्थ रहते हैं, आजीवन नीचे ही पड़े रह जाते हैं।

रहस्य से उगापित हुई दवि रचना वा विनना मार्मिक निदर्शन है। विश्वव्यापी परमात्मा के प्रसाद मे ही पवि की प्रतिमा जागती है और इसी के वर से उसकी दा ऋन के दुरंभ तन्तु का विश्लेषण करने में समर्थ हो पाती है। मेधावो लोग प्रयत्न करके ग्दस्य के परम मूल भी देख लते हैं और उसी की वेदना में वे अपनी वाणी का पर्यवमान रिया करते हैं। हा, तो वेद के अनुसार स्पष्ट है कि ऋत के मार्ग पर चलने वाली कवि रचना हा ऋतरूप सत्य के याग्यान में ममर्थ हो पाती है-और कविरचना की यही सी वेद को वारनीय रही है। किंतु काव्यशास्त्रियों ने अतिशय के पैर में पह कर वारी की गति पोही रचना का सर्वस्व मानना आरम कर दिया । और इसके विश्लेषण में पकर दे रचना के आमा रम' तक भूल वेटे। दिनु वेद स्पष्ट कहता है पुनानो वार्च जन यन्न सिभ्यदत् । ऋ वे ९ । ०६ । १२ । - अर्थात विश्व का प्रेरक वह परम मोम तत्व वाणी को अलकन करता हुआ रस र में बहा करता है। मत्र के हम एक सण्ड में कविता के 'मलकरण' एव 'रस' ये दोनों घक भा जाते हैं। और जब हम इस मत्र-सड को उपरिनिर्दिष्ट मत्रों साथ मिला कर पढते हैं तब हमें काव्य के ध्वनि और राति ये दोनों पक्ष मी हस्नगन हो जाते है। किंतु वेद ने सब जगह "ऋतसारो' वाणी हो की सपर्या की है। यहाँ तक कि रमन वाग का नाम ही सूनृता ( = मु+ऋना) और ऋतमरा आदि रख दिया है। हम न के अनावरण में दी बैदिक ऋषि सचेट रहते आए है । ऋग्वेद कहना? म सूर्यस्य रस्मिमि परि व्यत त तु तन्वानलित यथा विदे। नय नृतस्य प्रशियों नवीयसो पनिजनीनामुप यानि नितन् ॥ १. १८६३२ पारवेधी कलाकार तत्वज्ञान के टिर सत्ता के परम तनु का आरिमोतिक, आधिदैवि, मच आध्यात्मिक इन दोन रूपों में विश्लेपन परता दुभा प्रतिमा-सूय की किरणों से झिलमिला उठता है और सब ऋत की नव-नव प्रशस्तियों में फूटता हुआ वामाओं का बननीय वह परम तत्व को पा सेता है स्पष्ट शन्दों में यह मत्र कवि के पारवेधी मृतीय क्षेत्र की भोर सत करना हुआ उसके सूर्यसम भाउमान रचना निवेश की गरिमा ५ वन करता है और बवाता है फिकत के रागामक म्याख्यान में ही बनाकार के रागरमक जीवन को साता सनिहित है। निश्चय ही इन मत्रों के भनुमार कवि-रचना का अमल एप्य ऋतरूप परम हत की रागात्मक व्याख्या करना है और टमी के घरकूल मुशरण में इन पत्रों ने सच्चा कविता शर्यदमान माना है। जीवन किमी एक पक्ष को लेकर उभी में रम जाने ( ५५ ) वाले कलाकार को ऋत का दर्शन अलभ्य है---क्योंकि ऐसे कलाकार में विस्तार एवं संयम का विकास नहीं हो पाता और हमारे मंत्रद्रष्टाओं ने इन दोनों के उचित विकास को परिपूर्ण जीवन स्वीकार किया है। क्योंकि जीवन में यदि विस्तार का होना आवश्यक है तो उसी मात्रा में उसमें संकोच का होना भी वांछनीय है। मनोवृत्ति के इसी संयम को हम 'समाधि' कहते हैं। इसमें वैखरी चित्तवृत्ति का सम्यक् सन्निधान हो। जाता है और इस समाहित चित्तवृत्ति के द्वारा ऋत का प्रत्यक्ष दर्शन संभव हो जाता है; क्योंकि मनोवृत्ति की इस समाधि में जीवन के समय पहलू सामंजस्य के साथ एक दूसरे से संवलित होकर अखण्ड रस के उस प्ररोचन एवं प्रस्पन्दन को जन्म देते हैं जिनका उत्पन्न करना काव्यकला का परम लक्ष्य है। जीवन एवं कला का यह समंजस विकास ही ऋपियों की दृष्टि में कला का परम लक्ष्य रहता आया है और इसी के उन्नयन में उन्होंने अपनी वाणी को सफल बनाया 'उचित' शब्द की व्युत्पत्ति उच् धातु से है, जिसका अर्थ कि 'प्रसन्न होना' एवं 'प्रसन्न करना है। इसी उच् धातु से ओकस् शब्द बना है जिसका अर्थ घर है; क्योंकि घर सदा सब को समान रूप से प्यारा होता है। अंग्रेजी की 'Home sweet home इस कहावत का मर्म यही है। उचित के भाव को 'औचित्य' कहते हैं और जिस प्रकार 'त्रिवृत्' जीवन की सफलता औचित्य पर निर्भर है उसी प्रकार त्रिवृत् जीवन का रागात्मक न्याख्यान करने वाली कवि-रचना का सौंदर्य भी औचित्य पर निर्भर है। औचित्य के इसी व्यापक मर्म का निदर्शन अथर्ववेद के ३. ३० में इस प्रकार आता है :- सहदयं सामनस्यमविदेष कृणोमि वः। अन्यो अन्यममि हर्यत वत्सं जातमिवान्या ॥१॥ अनुव्रतः पितुः पुत्रो मात्रा भवतु संमनाः। जाया पत्ये मधुमती वाचं वदतु शन्तिवाम् ॥ २ ॥ मा भ्राता भ्रातरं द्विक्षन्मा स्वसारमुत स्वसा। सम्यंचः सव्रता भूत्वा वाचं पदत मद्रया ॥३॥ येन देवा न वि यन्ति नोच विद्विषते मिथः । तत् कृण्मो ब्रह्म वो गृहे संशानं पुम्पेभ्यः ॥ ४ ॥ ज्यायस्वन्तश्चित्तिनो मा वि यौष्ट संराधयन्यः सधुराश्चरन्तः । अन्यो अन्यस्मै वल्गु वदन्त एत सधीचीनान् वः संमनसस्कृणोमि ॥ समानी प्रपा सह वोऽन्नमागः समाने योक्त्रे सह वो युनज्मि । सम्यंचोऽग्निः सपर्यतारा नामिमिवामितः।। सधीचीनान् व संमनसस्कृणोमि एकरनुष्टीत संवननेन सर्वान् । 1 ( ५६ ) देवा श्वामृन रक्षमाणा सायप्रातः मौमनसौ दो अस्तु । विश्व के भगु-अणु को क्रियासूत्र में सवलिन करके जीवनपय पर अग्रमर करने चाले औचित्य तत्व का अववीध कराने के लिए बेद ने दार पार स, सह, एव सम् शम्द का प्रयोग किया है और इसके द्वारा इस तथ्य पर बल दिया है कि मानव-जीवन को बननीय एव सवादी बनाने वाला तत्व औचित्य ही है। और यदि जीवन में सवदन उत्पन्न करने का श्रेय भौचित्य को है तो निश्चय ही चमका रागात्मक व्यारयान करने वाली कवि-रचना दो साल बनाने का काम भी औचित्य ही कारतमी तो दण्डी ने कहा है.. अन्यधर्मस्ततोऽन्यत्र लोकमामानुरोपिना। मम्यगाधीयते यत्र समाधिः स्मृतो यथा ॥ तदेतद वायसर्वस्व समाधिनाम यो गुणः । कविसार्थः समप्रोऽपि तमेकमुपजीवति ।। 'समाथि शम्द से यहाहम औचित्य ही की भोर दण्टी का सकेन समझते है मोर औचित्याधान की दृष्टि से ही इन पक्तियों को ध्यारया करते है। श्रानन्दवन ने औचित्य को 'रम' की परा उपनिषद् बनाया है:- अनौचित्याशते नान्यद् रसमहरय कारणम् । प्रसिदौचित्यबन्धस्तु रमस्थोपनिषत् परा।। एतद् यथोत्तमौचित्यमेव तस्या नियामकम् । सर्वत्र गवन्धेऽपि अन्दोनियमजिते॥ रसबन्धोत्तमौचित्य माति सर्वत्र सथिता । रचनाविषयापेई ततु विविद विभेदवत् ।। अर्थात् सविनचना के आत्मारूप 'रस' के प्रवाह में यदि कोई वस्तु रोड़ा अटकानी ? तो वह है 'अनौचित्य', रस का स्वारसिक प्रबाइनो औचित्य पर ही अववितर। क्या पप और क्या गर सभी प्रकार की कवि-रचना का प्राय मौचित्य ई-रसी के उचित सनिवेश में कवि-रचना को सरलता सनिहित है। आचार्य क्षेमेन्द्र ने मी भौचित्य की अपनी भौचित्यविचारचर्चा में रस-जीवित के रूप में स्थापना की है। प्रन्य के भारग्म में वे कहते है:- भौचित्यस्य चमत्कारकारिपचारचकी। रसजीवितभूनस्य विचारं कुरतेमुना। भयान रचना में चमत्कार उपत्र करने वाले, कांति के स्वादिष्ट चवंग में गम के पोवन बित्य पर भाइस विचार करते है। क्षेमेन्द्र के रक्त कपन से म्यक ?

( ५७ ) कि उनके अनुसार काव्य में चमत्कार की उत्पत्ति औचित्य से होती है और कविता के प्रगाढ आस्वादन में द्रवित होने वाले रस का प्राण भी औचित्य ही है। दूसरे शब्दों में कहा जा सकता है कि कविता श्रोता एवं प्रेक्षक के आत्मा को तभी द्रवित करती है जड़ कि उसके अंग-प्रत्यंग औचित्य के द्वारा परस्परसंवादी संपन्न हुए हों और औचित्य के माध्यम से वह सर्वात्मना आत्मा के साथ एकाकार बन गई हो। कह सकते हैं कि औचित्य ही काव्य के विभिन्न तन्तुओं का संवलक है और उसी से उनमें सौंदर्यो- द्वोधन की क्षमता आती है। जीवन में रसास्राव औचित्य हो से होता है और उसी से चमत्कृत हुई वाणी श्रोता एवं प्रेक्षक को ब्रह्मरस का आस्वादन कराने में समर्थ होती है। औचित्य के महत्व को आगे चल कर क्षेमेन्द्र इन शब्दों में व्यक्त करते हैं:- काव्यस्यालमलंकारैः किं मिथ्याकथितैर्गुणैः। यस्य जीवितमौचित्यं विचिन्त्यापि न दृश्यते ॥ अलंकारास्त्वलंकारा गुणा एव गुणाः सदा । औचित्यं रससिद्धस्य स्थिर काव्यस्य जीवितम् ॥ उचितस्थानविन्यासादलंकृतिरलंकृतिः। औचित्यादच्युता नित्यं भवन्त्येव गुणा गुणाः ।। उचितं प्राहुराचार्याः सदृशं किल यस्य यत् । उचितस्य च यो मावस्तदौचित्यं प्रचक्षते॥ अर्थात् अलंकार तो अलंकार हो हैं और गुण गुण ही है। किंतु सच पूछो तो रस में पके काव्य का रहस्य उसके सर्वावयवसारी औचित्य में संनिहित है। क्षेमेन्द्र के अनुसार अलंकार, गुण और रस उत्कृष्ट रचना के लिए सभी आवश्यक हैं, किंतु इन सब में चमत्कार तभी खिलता है जबकि इन सब में व्यष्टि एवं समष्टि दोनों प्रकार से औचित्य विद्यमान हो। पहले कह चुके हैं कि उचित शब्द की व्युत्पति प्रसादार्थक उच् थातु से हुई है; फलतः उचित शब्द का मौलिक अर्थ मन्द्र, रमणीय, एवं प्रसादकारी है। मन्द्र एवं प्रसादकारी वस्तु ही उचित अर्थात् समंजस, संवादी, ऋजु, एवं शिव होती है। काल्याचायों ने 'उचित' शब्द के इस मौलिक अर्थ पर ध्यान न दे उसके एक अर्थ अर्थात 'समंजसता' में ही उसका पर्यवसान कर दिया है। फल इसका यह हुआ कि औचित्य शब्द अपने मौलिक व्यापक अर्थ से च्युत होकर अपने प्रचलित अर्थ में चल पड़ा और इस कारण समालोचकों ने उस पर संकुचित टीका-टिप्पणी आरम्भ कर दी। किंतु जब हम उचित' शब्द के मौलिक अर्थ 'मन्द्रता' पर ध्यान देते हैं तव अपने मौलिक एवं विकसित दोनों अर्थों को अपने भीतर समाहित करके क्षेमेन्द्र का मौचित्य (५८) तत्व काव्यमिदान के सार में बिन उठना और रचना सागय का सागपूर्ण रक्षण बन जाता है। यह हुआ यथार्थ औचित्य नत्व । यह जिम प्रकार चराचर को चलाने वाले ऋत तत्व से अभिन्न है उसी प्रकार ऋतसारी कवि रचना का भी यह गेवित सूत्र है। २ आइये भर जरा औचित्य की प्रचरित मीमामा का दिग्दर्शन कर । म ममप में क्षम द्रकी निम्न कारिका उद्धृत की जा चुगी है-- उचित प्राहुराचार्यो महश किन यस्य यत् । रचितस्य च यो मावस्तीचित्य प्रचक्षते औ०७ अर्थात् जो वस्तु जिसके अनुरूप है उसे इम उम वस्तु के लिए रचिन कहते हैं। उचित का भाव ही औचिय है। हम जानते है कि सर वस्तुओं का सभी के माध सम्बन्ध ठीक नहीं देता। किसी वस्तु का किमी यस्तु विशर के माय सम्बध ही सचिन हुआ करता है। उाहरण के लिए मोतियों का हार गल में पता है और नूपुर पैरों में । फलत मौक्तिक हार गले के और नूपुर पैरों के लिये उचित है। इसो प्ररार माग्य के क्षेत्र में शगार रस के माय माधुर्य गुण एव वीर और रौद्र रस के माथ योग गुण ठीक बैठता है। दो वस्तुओं के इस सबान अथवा सामजस्य को हम मोचि य कहने है। पहले कह चुके हैं कि श्रीचिस्य को का- मियान्न रूप में प्रतियापित करने का सेदरा आचार्य नेद्र को है। किंतु इसका यह माशप नही कि क्षेत्र से पूर्ववर्ती विचारकों का इस ओर ध्यान नहीं गया था । क्षेमेद्र से पहले भी मरत और आनन्दन औचित्य पर विचार कर चुके थे। मरन ने भोपित्य की नाट्य में प्रतिष्ठा दी थी और मानन्द वर्धन ने उमरी नाट्य एव काय तीनों ही क्षेत्रों में अवनारणा की थी। भाचार्य येमेन्द्र ने औचित्य को पूरे काव्यजगत् में उमर्क उचित आमन पर बिटा कर उसकी एक व्यापक सिद्धान्त के रूप में प्रारतिष्ठा की है। मरत के भनुशार अभिनय का लार प्रयक केय में रम मचार करना है। मी नदेश्य से नारक का मारा क्रियाकलाप रमो मैप की ओर अग्रमर होता है। अमिनया- छन्द, मलकार पव स्वर आदि नाय की ममी ऋदियों का प्रमुख उद्देश्य प्रक्षक के हृदय में रसाने हा देना है। भरत में रस को वाय का आधार मान कर हो गुग दोष प्रविबनन हिदा है। उनके अनुसार रम के अनुरूप होना ही गुण और । wr ( ५६ ) -- ३ उसके प्रतिकूल होना ही दोष है। गुण रसोद्रेक में सहायक और दोष रस के विघातक होते हैं। पात्रों के वेष की देशकालानुकूलता पर बल देते हुए भरत कहते हैं: अदेशजो वेषस्तु न शोभां जनयिष्यति । मेखलोरसि बन्धे च हास्यायैवोपजायते ।। अर्थात् यदि पात्रों का वेष देशकाल के विपरीत हुआ तो वे प्रेक्षकों के उपहास के पात्र बन जाएंगे। क्योंकि गले में तगड़ी और हाथ में नूपुर डालना मूर्खता के सिवाय और क्या है? ध्वनि-सिद्धान्त के प्रतिष्ठापक आचार्य आनन्दवर्धन ने औचित्य सिद्धान्त को आगे दढ़ाने में प्रशंसनीय काम किया है। पूर्ववर्ती आचार्यों ने औचित्य का विवेचन काय के प्रकीर्ण अंगों के संबंध में किया था; पर आनन्दवर्धन ने काव्य के आत्मभूत रस के साथ भी औचित्य का घनिष्ठ संबंध उद्बोधित करके औचित्य को सिद्धान्त के रूप में काव्य के व्यापक जगत् में अवतीर्ण किया। आनन्दवर्धन रस या रस-ध्वनि को काव्य की आत्मा मानते हैं और रस के परिपाक में सबसे अधिक आवश्यक 'औचित्य' को स्वीकार करते हैं। उनके अनुसार वस्तु एवं अलंकार रस के वाह्य उपकरण हैं. इसलिए रस की अपेक्षा ये दोनों गौण हैं। काव्य में इन दोनों का प्रयोग रसोत्यापन के लिये किया जाता है। इसी मान्यता के साथ आनन्दवर्धन ने वस्तु-औचित्य एवं अलंकारौचित्य की अपने ग्रन्थ में चर्चा की है। काव्य में वस्तु एवं अलंकार का अपना स्वतंत्र मूल्य नहीं होता। अलंकार्य रस के चमत्करण पर ही इनकी सजीवता निर्भर है। आनन्दवर्धन कहते है :- रसभावादितात्पर्यमाश्रित्य विनिवेशनम् । अलंकृतीनां सर्वासामलंकार त्वसाधनम् ॥ (ध्वन्यालोक) वस्तु एवं अलंकारौचित्य के साथ-साथ आनन्दवर्धन ने 'रसौचित्य की मीमांसा मी बड़े मार्मिक ढंग से की है और इस बात को स्वीकार किया है कि रसौचित्य के विधात से रसदोष खड़े हो जाते हैं, जो कि सामान्य कोटि के दोष न होकर प्रधान कोटि के दोष गिने जाते है। आनन्दवर्धन के अनुसार रस का सबसे अधिक गहरा रहस्य 'औचित्य है और उसका सबसे बड़ा विघातक है अनौचित्य । इसीलिये उत्तम काव्य के लिये यह आवश्यक है कि उसका अंग-अंग औचित्य के सांचे में गढ़ा गया हो। रसौचित्य की प्रधानता पर बल देते हुए भी आनन्दवर्धन ने इस तथ्य को स्पष्ट कर दिया है कि वाच्य एवं वाचक की औचित्यसंवादीयोजना सारस्वत कवि का प्रधान लक्षण है:- वाच्यानां वाचकानां च यदौचित्येन योजनम् । रसादिविषवेणैतत् मुख्यं कर्म महाकवेः ।।

। ऊपर कह चुके हैं कि काव्य जगत में मौचित्य का आदर प्राचीन काल से है, किंतु यह रात निर्विवाद है कि औचित्य को काव्य वा सुव्यवस्थित न्यापी सिदान्त क्षेमेन्द्र ने बनाया है। उनके अनुमार काव्य के अग पद, काव्य, गुण एव रसादि सबके सब मौचित्य में सवलित होकर ही सजीव वनवे हैं। दूसरे गमों में कह सकते हैं कि काव्य के मर अगों में भाग फूकने वाला भौचित्य हो । भौचित्य की भी व्यापक मान्यता के कारण क्षेमेद्र ने उसका काव्य के २४ अगों के साथ सबध दिखाया है। एक समय था जब कि मालपारिकों ने औचित्य को निरपेक्ष रूप से काल्य का जीवित माना था पर आचार्य अभिनव गुप्त ने हम मन्तव्य का सण्डन किया है। उनके अनुमार रस एव व्यजना से सवलित हुए विना औचित्य के यथार्थ रूप को पहचानने का प्रयत्न औचित्य की विडवना करना है। फ्लन आचार्य अमिनव एव भानन्दवर्धन ने औचित्यसवलित रसम्वनि को काव्य का आत्मा माना है। इन तीनों तत्त्वों का परसर इतना घनिष्ठ संबध है कि हम इहें एक दूसरे से पृथक् नहीं कर सकते। आचार्य अभिनव का सिद्धान्त है कि काव्य का मूल तत्त्व 'रस' है, पलन 'रस' को उसका उच्च आमन दिये बिना औचिय को चर्चा अप्रासगिक है, क्योंकि औचित्य का असली रूप नमी उघडता है जब कि जिसके विषय में मौचित्य को स्थापित किया जाय वह वस्तु अपनी जगह अपने असरी रूप में विद्यमान हो। कान्यजगत् में वह बस्तु काव्य का भामा रम है। इसके विना औचित्य की चर्चा विडमना मात्र है। जैमा कि कहा औचियवनी जीवन मिति चे औचित्यनिनधन रसमावादि मुक्त्वा ना दव विचिदस्तीति। आचार्य अभिनव ने साफ शब्दों में औचित्य-सवन्ति रम को काव्य का भात्मा स्वीकार किया है। किंतु भाचार्य क्षेमेन्द्र ने उनसे कुछ भागे बढ़ कर औचित्य ही को काव्य का जीवन स्थापित किया है। अपनी भौचित्यविचारचर्चा के प्रारम में क्षेमेन्द्र मोचित्यस्य चमत्कारकारिणश्चारचण। रसजीवितभूतस्य विचार कुरतेचना मलकारावलकारा गुगा एवं गुणा सदा। भौचित्य रससिरस्य स्थिर मान्यस्य जीवितम् ।। अार भोचिस्य दो काज्य में मनोरता न करता मोर वही रसम्बई में रस की असली जान है। मरकार बलकार हो? और गु गुग ही। किंद्र भौचित्य तो रम में पके कान्य का स्थायी जीवित निष्कर्ष निकलता है कि काम्य की सिद्धि मर्याद "सका परसान रस में होता है, और रस को बान औचित्य में है। इस प्रकार रस + ( ६१ ) और औचित्य दोनों तत्त्व एक दूसरे के परिपोषक हैं। निम्न उद्धरण से यह बात स्पष्ट हो जाती है :- रसेन शृङ्गारादिना सिद्धस्य प्रसिद्धस्य काव्यस्य धातुवद् रससिद्धस्येव तज्जीवित स्थिरमित्यर्थः । औचित्यं स्थिरमविनश्वरं नीवितं काव्यस्य, तेन विनास्य गुणालंकारयुक्त- स्यापि निर्जीवत्वात् ॥ औ० क्षेमेन्द्र ने अपनी औचित्य-विचार चर्चा में काव्य के निम्नलिखित अंगों में औचित्य- विन्यास आवश्यक बताया है :- पद, वाक्य, प्रबन्धार्थ, गुण, अलंकार, रस, क्रिया, कारक, लिंग, वचन, विशेषण, उपसर्ग, निपात, काल, देश, कुल, वृत्त, तत्त्व, सत्त्व, अभिप्राय, स्वभाव, सारसंग्रह, प्रतिमा, अवस्था, विचार, नाम, और आशीर्वाद । यहां इन सब अंगों के औचित्य पर विचार करना अनुचित होगा; अलवत्ता प्रधान अंगों के औचित्य पर विहंगम दृष्टि डाल देनी आवश्यक है। गुणौचित्य- ओज, माधुर्य, प्रसादादि गुण काव्य की शोभा को तभी बढ़ाते हैं जब उनका प्रकृत अर्थ के अनुरूप प्रयोग हुआ हो। इसीलिये आलंकारिकों ने रस-विशेष के लिये गुणविशेष का उन्नयन ही उचित बताया है। उदाहरण के लिये यदि कान्य का वक्ता वीर है तो उसकी उक्ति में ओज गुण फवता है। और यदि काव्य में शृङ्गार रस की अभिव्यंजना अपेक्षित है तो प्रसंग में कवि को माधुर्य गुण का उन्मेष करना उचित है। . -- अलङ्कारौचित्य- जिस प्रकार उचित अंग पर उचित रूप से सजाये गए आभूषण कामिनी को चार चांद लगा देते हैं उसी प्रकार काव्य में उचित स्थान पर उचित रूप से प्रयुक्त हुए अलंकार उसमें जान डाल देते हैं। अलंकारों का उचित प्रयोग तभी संभव है जबकि वे प्रकृत वस्तु के अनुरूप जड़े हुए हों। क्षेमेन्द्र के शब्दों में प्रकृत अर्थ के अनुरूप प्रयुक्त हुए अलंकारों से कवि-रचना उसी प्रकार खिल उठती है जैसे कि कामिनी के पीन स्तन पर लहराते हार से उसकी शोभा शतगुण हो जाती है। क्षेमेन्द्र कहते हैं :- अथौचित्यवता सूक्तिरलंकारेण शोभते । पीनस्तनस्थितेनेव हारेण हरिणेक्षणा ॥ औ० सच पूछो तो अलंकार की अलंकारता इसी बात में है कि वह प्रकृत अर्थ का उन्नायक हो । नीरस कान्य पर अलंकारों के पन्ने बेजान सावित होते हैं, उन्हें देस रसिकों का ( ६२ ) -- हदय मारित नहीं होता। इसी कारण अनकारिकों ने अलकारों से चमत्कृत किंतु रसविहीन कविता पो अधम कोटि की माना है। रसौचित्य- रसवादियों के अनुमार काव्य की आत्मा रम है। यह सिद्धांत युतियुक्त है। किंतु यह बान मा युक्तिमगत है कि औचित्य से सवलिन होकर ही रस काव्य का श्रात्मा बनता है और औचित्यसवादा रचना ही श्रोता व प्रेक्षक के हृदय को आवजित करती है । क्षेमेन्द्र महते है कुर्वन् सर्वाशये व्यासिमौचित्याचिरो रस । मधुमाम इवाशोक करोत्यकुरित मन ।। यथा मपुरनिकाचा रसाः कुशलयोजिता । विचित्रास्वादन यान्नि शृङ्गाराचास्तथा मिथ' । तेपी परस्पराश्लेषान् कुदिौचित्यरक्षाम् । अनौचित्येन ससः करयेटो रमसकर ॥ अर्थात् जिस मकार मधुमास की सहरन मे अशोक अकुरित उठता है इसी प्रकार औचित्य से सबलित होकर रस योना एव प्रेशक के उदय में देवी पीर पैदा कर देत है । जिस प्रकार कुराक सूद के द्वारा सबलिन हुए पद्सों का भोजन मोसा को विचित्र धानन्द देता है टसा प्रकार परसर मदिन हुए विविध रस थोता पर प्रेक्षक की मनकली को चपका देते हैं। इसलिये रमों के संवार में औचित्य पर ध्यान देना बावश्यक है। रमसकर के औचित्य का उदाहरण देते हुए क्षेमेन्द्र ने व्यास का निम्न रोक सघृत किया है :- मत्य मनोरमा रामाः सस्य रम्या विभूतयः । दिनु मांगनापागमशितोल दीवितम् ।। उक्त पत्र में मार एव शान्त रस का सकर बचिन मन हुआ है। शार रम के औचित्य पर क्षेमेन्द्र ने कालिदास का निम्न रक उद्धृत किया है:- बालेन्दुवक्राण्यविकासमाचार बभु पलाशान्यतिरोहितानि । समो वसन्तेन समागताना नखइनानीव वनस्पतीनाम् ।। इस एप केटिसने का आशय यही है कि कालिदाम शकर के हरय में पाबंदी प्रति अमिलापरूपहार उत्पन्न करना चाहते हैं। हम ममियाय को मानने रसार दोन्होंने पसन के नसों से रोकर बरं वनस्वरी का वर्णन किया है। अमन्द का यह संयोग मशार कर मर्य के टिर निर्यात सादी है। सरकार में पानी के प्रति शृङ्गारिक अभिलाषा उत्पन्न करने के निमित्त वह उपयुक्त उद्दीपन का कार्य कर रहा है। यहां तक हमने भारतीय काव्यशास्त्रों में औचित्य की गरिमा दिखाई है। औचित्य की यह महत्ता भारतीय काव्यशास्त्र में ही नहीं, अपितु पाश्चात्य साहित्यशास्त्र में भी समान रूप से स्वीकार की गई है। प्राचीन काल से ही पाश्चात्य आलोचक औचित्य को काव्य-समीक्षा में महत्त्व देते आए हैं। किंतु इन लोगों ने औचित्य को काव्य के बहिरंग तक ही सीमित रखा है। जहां एक ओर हमारे यहां औचित्य को काव्य का अन्तस्तत्त्व माना गया है वहां पाश्चात्य समीक्षा-पद्धति में इसे वाद्य सौन्दर्य का उपकरण बताया गया है। पाश्चात्य समीक्षा-पद्धति के प्रवर्तक अरस्तू ने अपने पोयटिक्स एवं रेटोरिक्स नामक -ग्रन्थों में औचित्य को मार्मिक मीमांसा की है। काव्य में भाषा के औचित्य पर विचार करते हुए अरस्तू कहते हैं कि रचना में भाषा का प्रयोग विषयानुसार होना चाहिए। सुकुमार विषय का वर्णन कठोर भाषा में एवं उग्र विषय का वर्णन सुकुमार शब्दों में किया जाय तो रचना का प्रभाव विगड़ जायगा । अपनी रेटोरिक्स में अरस्तू कहते हैं :- It is a general result of these considerations that if a tender subject is expressed in harsh languase or a harsh subject in tender danguage, there is a certain loss of perdasiveness. अरस्तू के बाद अन्य आलोचकों ने भी औचित्य पर पर्याप्त विचार किया है। प्रस्तुत प्रवन्ध का उपसंहार इन शब्दों में कर सकते हैं। भारत में वाणी की पूजा वैदिक काल से चली आ रही है और भारत के विचारकों ने वाणी के परिष्कार को अपने जीवन का प्रमुख लक्ष्य बनाया है। वेदों ने अलंकृत भाषा का प्रयोग करके मावी विचारकों को अलंकार शास्त्र का मार्ग दिखाया है, जिन्होंने परिष्कार के एक एक पक्ष को लेकर अपने अपने पृथक् सिद्धान्त स्थापित किए और उन्हें आगे बढ़ाया। प्रचलित काव्यशास्त्र के अनुशीलन से ज्ञात होता है कि कवि-रचना का प्रमुख लक्ष्य श्रोता एवं प्रेक्षक के हृदय में चमत्कृत रस का स्रोत वहाना है, एक अनोखी, दिल से रिसने वाली 'पीर' पैदा करनी है, जिसके आवेश में भौतिक जगत् तरल बनकर एक नवेले छाया- जगत् में बदल जाता और उसके कण-कण से ऐसा रस रिसने लग जाता है जो श्रोता एवं प्रेक्षक की 'पीर' के साथ तदात्म होने के कारण उसे 'शून्य के उस पुलिन पर पहुंचा देता है जहाँ सत् और असत् दोनों एक हो जाते हैं, जहां जीवन और मृत्यु समान रूप - से आनन्ददायक बन जाते हैं। हमारे आचार्यों ने चमत्कार-संवलित शब्द और अर्थ के समवाय को साहित्य माना है और काव्यगत चमत्कार को विभिन्न आलंकारिकों ने विभिन्न नामों से पुकारा है। आनन्दवर्धन इसे ध्वनि कहते हैं जब कि कुन्तक इसे वक्रोक्ति, - ( ६४ ) ममिनव गुप्त वैचित्र्य और क्षेमेद्र इसे औचित्य सवा देते हैं। इनमें से प्रत्येक का अपना- अपना निराला स्थान है-किंतु भौचिय शब्द की निष्पत्ति प्रमादायक उच् थानु से होने के कारण इसका अर्थ अत्यन्न व्यापक है और इसमें रचना को चमत्कृत करने के वे सभी उपकरण था जाते हैं, जो प्रोता एव प्रेक्षक के हृदय को अकुरित करत और बीवन के लिए क्षेमकारी होते हैं। क्षेमेद्र ने अपनी भौचित्यविचारच! नामक रचना में मौचित्य का इसी व्यापक अर्थ में प्रयोग किया है। मारत में ऐसे भी मीमांसक हो गुजरे है जिन्होंने औचित्य की रसादि से मुतरा स्वतन्त्र सामानी है और उसे ही काव्य-नत्त्व का अष्ठ आसन प्रदान किया है। पर माचार्य जमिनवगुप्त ने इस मन्तव्य से अमहमति प्रकट करते हुए भौचित्य को एक मवर विशेष रताया है और इसी रूप में उसे काव्य के आत्मभूत रम का परिपोषक ख्यापित किया है। किंतु क्षेमेन्द्र ने काव्य, रस मोर भौचित्य के विभुज पर सरस्वता की बदना की और उनकी दृष्टि में काव्य की सिद्धि रम में होती है और रस का जीवित भौचित्य में है। क्षेमेन्द्र के निम्नलिखित श्लोकों का माश्य यही है- 'औचित्यस्य चमत्कारकारिपश्चाश्च । रसजीवितभूतम्य विचार कुरुवेधुना ।' 'औचित्य रससिद्धस्य स्थिर कायरय जीवितम् ॥' मूर्यकान्त * श्रीनृसिंहाय नमः * नृसिंहचम्पू: अथ प्रथमोच्यासः आनन्दं स दधातु धातुरपि यो धाता यदघिस्रवद्- दिव्याम्भः सुरधुर्यधूर्जटिजटाजूटावतंसायते । भूयो दानवभारभङ्गुरधरोद्धारैकधीरः स्वयं लीलावैभवनिर्मितस्य जगतो वैकुण्ठकण्ठीरवः ।। १ ।। यस्माद् दोऽजनि सुदुर्लभरत्नमेतत् प्रह्लादरूपमपरं च भवेन्नु तत्र । योऽन्वेषयन्निति ददार सुरारिवतस्तस्मै नमो नृहरयेऽद्भुतविक्रमाय ।। १ ।। अशेषविद्वज्जनसंमतं यत् पवित्रितं सच्चरितैर्मुनीनाम् । श्रीकाशिनाथस्य पदारविन्दं श्रीशुद्धयोधस्य च भावयामि ॥ ईशानुरक्तस्य सतां मतस्य श्रीभिक्षुवर्यस्य पितुः स्मरामि । आत्मानमानन्दयितुं जनन्याः रमाभिधायाश्चरणौ वहामि ।। सूर्याभिधो नवरसां कविचक्रवर्ती चम्पू चकार नृहरेश्वरितैः पवित्राम् । श्रीसूर्यकान्तविबुधोऽथ नृसिंहभक्तो व्याख्यात्यपेक्षितपदैर्गुणिनां हिताय । आनन्दमितियः धातुः ब्रह्मणः अपि धाता विधाता 'यो ब्रह्माणं विदधाति पूर्व यो वै वेदांश्च प्रहिणोति तस्मै' इति श्रुतेः; यः ब्रह्मणोऽपि निर्मातेत्यर्थः । यदद्धिन वदिव्याम्भः यस्य च अधिभ्यां चरणाभ्यां 'पदधिश्वरणोऽस्त्रियाम्' इत्यमरः । स्त्रवत् क्षरत् दिन्यं स्वय॑म् अम्भो जलं गाङ्गं वारीत्यर्थः । सुरधुर्यधूर्जटिजटाजूटा- वतंसायते सुराणां देवानां धुर्यस्य नेतुः धूर्जटेः शिवस्य जटाजूटस्य कपर्दस्य 'कप- दोऽस्य जटाजूट' इत्यमरः । अवतंसायते भूपणमिवाचरति । यो दानवभारभकुरो- दारकधीरः यश्च स्वयं लीलावैभवनिर्मितस्य जगतो भूपः स वैकुण्ठकण्ठीरवः आनन्द दधातु इति योजना। यश्च स्वयं दानवभारभङ्गुरोद्धारैकधीरः दानवानां दनुजानां भारेण मङ्गुरायाः भानशीलायाः चक्राया वा धरायाः सर्वसहायाः उद्धारे उद्धरणे - - २ नृसिंहचम्पूः। एकधी एकमात्र धीर. वर्तते इति शेष। यश्च स्वयं लीलावैभवनिर्मितस्य लीला- या' कीटाया वैभवेन सामयेन निर्मितस्य सृष्टस्य जगतः भूर्भुवः स्वराज्यस्य लोकत्रयस्प भूपः नृप । स वैकुण्टकण्टीरव बैकुण्टलोकस्य कप्टीरव इति पाटी- तपुरष । वैकुण्टो विष्णुरेव क्ण्टीरव सिंहः पालक. इति कर्मधारयो वा । सोऽमी नृसिंहाण्यो हरिः आनन्दम् ऐहलौकिक पारलौकिक च मुखं दधातु विभतुं पोपयतु इत्यर्थः। भार हरयन्त्र 'मजमास' इति पुरच्मययः। एकधीर इत्या 'पूर्वकालैक' इति समासः । वैकृष्ट इति विगता कुण्ठा नाशो यस्य स विकुण्ठः, विकुण्ठ एवं वैकुण्ठः । भशादिरवादण् । अथवा विकुण्टम विविधा कुण्टा माया विद्यते यस्य स ॥१॥ अनुवाद-विष्णुलोक का वह दिव्य मृगराज ऐहिर एव पारगरिक आनन्द को बढावे, जिसके चरणों से निकलने वागं लोगेतर जनधारा मुरशिरोमणि नटराज के जटाजूए को विभूषित परती है, जो ब्रह्मा का भी निर्माग करने वाला है, जो अपने नीला वैभव से निर्मित सृष्टि का शासन है, [इतना ही नहीं, बल्कि ] दानवों के भार से पीरित वमुथा के द्वार में जो एक मात्र धार है॥१॥ विमर्श-मारतीय परम्परा में मारती के उपासाजन सदाचार को प्रमाण मानने हुए प्रकरण के बारम्म में सदैव माङ्गलिस दल वा शेवों का उपन्यास करने आए हैं। उनकी यह धारणरही है कि किसी भी अन्य के समय में तीन प्रकार के प्रतिबन्ध हो सर है-समातिप्रतिबन्धक, प्रचारप्रतिवन्धक व यश प्रतिवन्ध । मङ्गल इन तीनों प्रशार में प्रनिरन्थकों का निरामर होता है, अन भावी सनति भी इम परपरा का पालन करे- यही सोचकर हमारे भूईम महर वो लिपिक कर देना आवश्यक समशते रहे हैं। यह महल भी तीन प्रकार का होता आशादात्मक, नमस्कारात्मर, वं वस्नु निर्देशामक । प्रस्तुत अन्य के आरम्भ में रवि ने माचीवांटानमत्र मगल का विन्याम किया है। इसके पहले कि हम उस मागलिक इलोर का अर्थ चरे, नम्मू काश्य या स्वरूप बता देना आवश्यक समझने है । माहित्यदर्पगार महापात्र विश्वनाथ ने चयू का स्या गिता है- 'पपद्यमय काय परित्यभिधीयते' अर्शद चम्मू व बाय है, जिमने गा एव पद दोनों का मिश्रा हो। यपि पर त्वं पर बानिया रूप में भी दिखाई पडना , तर दोन पासष्ट अन्दर यह है कि रूपक दूस कात्र है और चमूमन्य शाय। हो, यह अपश्य यहा जा सम्मा मिसम्कृत वाकाव्य में च य य का मिसग रहता है और वह भी अन्य पात्यही है,रि उक्त एप को यासि तो नहीं arreम प्रश्न का ममाधान यह है कि चयू गप पचमको माप उममे मिन्न । आगन वान पुरिचितही ३ प्रथमोच्छासः। लगेगी। असल में ध्यान देने की वस्तु है-'मयट्' प्रत्यय । यहाँ यह 'प्राचुर्यार्थक' है। रहस्य यह हुआ कि चम्पू में गद्य एवं पद्य-दोनों का प्राचुर्य होता है, पर कथा-काव्य में गद्य की ही प्रधानता रहती है, पद्य तो क्वचित् ही होता है। कथा-लक्षण में स्पष्ट ही कहा है- 'कचिदत्र भवेदार्या कचिद्वक्त्रापवक्त्रके इस उद्धरण में 'कचित्' पद ध्यान देने योग्य है। इससे स्पष्ट सूचित होता है गध पद्य का मिश्रण उभयत्र होने पर भी दोनों में भेद है। इस प्रकार चम्पू का निष्कृष्ट लक्षण यह हुआ- 'चम्पू वह अन्य काव्य है, जिसमें गद्य एवं पद्य का प्रचुर मिश्रण हो' अलंकारः-(१) 'दधातु धातु २' में यमक तथा छेक का सांकर्य है। (२) 'दधातु धातुरपि यो धाता' यहाँ ('त्') अनेक वर्ण को अस- कृत् आवृत्ति है, अतः वृत्ति अनुप्रास भी हो सकता है। (३) 'जटि जटाजूट' में भी अनेक वर्ण (जट) की असकृत् आवृत्ति है, अतः वृत्त्यनुप्रास है। भाव-यहाँ देवविषयिणी रति, जो कविनिष्ठ है, व्यक्त हो रही है; अतः उसको लेकर भाव-ध्वनि है। 'देवादिविषया रतिर्भावः प्रोक्तः प्रकाशकार ने कहा ही है। 'वैकुण्ठकण्ठीरवः' में यदि वार्मधारय समास स्वीकार किया जाय, तो यहाँ 'रूपक अलंकार भी हो सकता है। छन्द-शार्दूलविक्रीडित । यह एक वर्णिक वृत्त है। जिसमें १९ वर्ण होते हैं। वृत्तरत्ना- फरकार ने इसका अधोलिखित लक्षण किया है- : 'सूर्याश्वैर्भसजस्तताः सगुरवः शार्दूलविक्रीडितम्' म त ज sss, IIS, ISI, is, SI, Sst,s अपि च- यत्संकल्पविकल्पकल्पितजगज्जन्मात्ययाधिष्ठित- प्राधान्यौ विधिशंकरौ किमु परे तत्रामरेन्द्रादयः । अन्तःसंततमन्तरायरहितों योगिभिर्ध्यायते सान्द्रानन्दसुधोदधि निरवधिं तं श्रीनृसिहं भजे ॥२॥ यत्संकल्पेनि-यत्र विधिशंकरौ धातृमहेशावपि यत्संकल्पविकल्पकल्पितजगज्ज- न्मात्ययाधिष्ठितप्राधान्यौ यस्य परब्रह्मणः हरेः नङ्कल्पेन इदमहं करिष्यामि इति नृसिंहचम्पू। मानसम्यापारेण तदैवत बहु स्यां प्रजायेय' 'स ऐसत लोकान्नु हजा' इति स लो. कानहजत' इति श्रुतेः। दिकल्पेन विविधन कल्पेन प्रकारेण चन्द्रादिसूर्यरूपंग करिपतयोः निर्मितयोः जगजन्मास्यययो. जगतो मुवनत्रयस्य जन्मनि सननन्या- पारे अत्यये संहारकर्मगि च अधिष्टित प्राप्तप्राधान्य मुख्यत्वं याम्या ती यतते इति शेषः। अर्थात् जगत उत्पत्तिसहारकारको ग्रह्मर्शकरावपि यस्य सर्गलयशक्यानु- गृहीतादेव जगत उत्पत्तिसहारो कुरुत । तत्र परे इतो अमरेन्द्रादयः निदराम तय किमु तद्वशगा इति रिमु वाध्यमित्यर्थ । इन्द्रादीनां तु कव कथा इत्यर्थः। यः यश्च अन्तरायरहित निर्विग्ने इत्यर्थ , योगिमि चित्तवृत्तिनिरोधपरायणे मुमुभि सन्ततं सतत त्यचान्यध्यापाररित्यर्थः। अन्तः स्वामिनि ध्यायते चि. न्यते ध्यानविषयीक्रियते । सान्द्रानन्दसुधोदधिं सान्द्रानन्दसुधाया. निर्भरानन्दा- मृतस्य उदधि सागरम् आनन्दधनमित्यर्थः। निरवधि निमीमानम् अनन्तं तममुं श्रीनृसिंहाख्य परं ब्रह्म भजे अहं सेवं अनन्यचेता सततं तव्यवणो भवामि इति भाद ॥२॥ जिमके सकरर विषल्प मान से प्रसून होनेवाल जागतिक मुष्टि व ध्वम जैसे वार्यों में बझा तथा शकर को भी प्रमुख भार वहन करना पड़ता है, वहाँ इन्द्र आदि अन्य देवताओं की गणना हो क्या है ! तथा जो निरन्तर एवं निर्विघ्नता पूर्वक योगियों की चिद्ध वृत्ति का विषय बना रहता है, उस असीम व घन मदिल्ट आनन्दाग्रत के महोदधि भगवान् नृसिंह का मैं स्मरण करता हूँ। अलंकार-साल विरल वल्लित' में अनेक वर्ण (ल्प) को अमन आपत्ति है, अतः वृधि अनुप्रास है। इसी प्रकार अन्तिम चरण में वर्गीनी अनेक्श आवृत्ति है, अन. वहीं मी वृत्लनुमान है। छन्द पूर्वोत्त ही है। शेपोऽरोपविशेषणोक्तिनिपुणोऽप्यास्तेतरामस्तघी' यस्योद्यद्गुणवर्णनेऽपि न ययो वागीशागीशताम् । यद् वेदोऽपि न वेद सत्र विपये मर्त्यः प्रवृत्तोऽस्म्यहं यस्मादर्भकमारगर्मितगिरा स्यादेव कीनूहलम् ॥३॥ शेष इनि-यस्य श्रीनृसिंहारयस्य परमहग उघताम् उद्गच्छनां जगति मावि- भवतां, किमुत अन्तहितानामिति माव' । गुगाना निरतिशयमवानां वर्णने कपने अशेषवितोपगोत्तिनिपुण अदशेपागां सर्वेषां विशेषणानां गुणादीनां विशेष्य- धर्मागां उसी कथने निपुगः कुशलः शेषोऽहिरामपि धरतधीः मन्दमन सन् भारते. तरां तूष्णीं तिष्टति मौनमाचरति । जगद्विदितानामपि धीनृसिंहगुगानामनन्त. पमिति भाव' । तथा चागीराबाग वागीशम्य गृहसतेररि पार गीः ईशवा सामय पाटबंधान पयो न प्राप। 'यतो वाचा निवर्तले ममाप्य मनमा माई' ११माच्छास. इति श्रुतेः वाङ्मनसातीतत्वात्तस्येति भावः। किंच वेदोऽपि वेदवय्यपि यत् यन्न- सिंहाख्यं ब्रह्म न वेद न जानाति 'तत्र वेंदा अवेदा भवन्तीति श्रुतेः। तत्र तद्- वर्णने मर्यः मरणधर्मा सन्नप्यहं प्रवृत्तः अस्मि । तद्वर्णनपरः संजातोऽस्मि । यदों शेषादयः शाश्वतिकधर्माणोऽपि तद्वर्णनेऽशक्ताः तदा माहशां तु कैव कथेति मर्योपादानम् । परंतु यस्मात् यतः कारणात् अर्भकभावः अर्भकता बाल्यं गर्भित तिरोहितं यस्यां सा गीः वाणी तया विदुषां किंचित् कौतूहलं कौतुकं स्यादेव भवे- देव । यथा अर्भकाणां स्खलन्ती वाक् सर्वान् कुतूहलयति तद्वत् ममापि इदं काव्यं विदुपां कौतुकमातनिप्यति इति धियाऽत्र प्रवृत्तोऽस्म्यहमिति भावः ॥३॥ अन्तर्निहित गुणों की बात छोड़ें, जिसके व्यक्त एव श्रुतिगोचर गुणों के वर्णनार्थ निखिल विशेषणोंकी उक्ति में कुशल (सहस्रमुख) शेषनाग भी मन्दप्रज्ञ हो मौन साध लेते हैं; यहाँ तक कि स्वयं वाचस्पनि की वाणी भी निःस्पन्द हो जाती है, जिसको अन्ततः वेद भी नहीं जानता, उस परब्रह्म के वर्णन मे मरणधर्मा में जो प्रवृत्त हुआ हूं, वह कोवल इसलिए कि वालचापल्य से भरी हुई बुद्धि के उद्गारों को सुनकर लोगों को कुतूहल हो ॥२॥ प्रथम चरण में वृत्त्यनुप्रास के साथ 'असाध्य कर्म के प्रवर्तक हेतुरूप' में उपन्यस्त चतुर्थ चरणके अर्थ को लेकर कायलिग' नामक अलंकार भी है। छन्द वही है । विष्णोश्चिरं चरणपङ्कजचञ्चरीकः श्रीज्ञानराजतनुजो दनुजान्तकस्य । सूर्यः करोति गुणगौरवकीर्तनेन स्वीयां सुधारसवता रसनां सनाथाम् ।।४॥ विष्णोः इति-दनुजान्तकस्य दानवसंहारकर्तुः विष्णोः नृसिंहस्य चिरं चिर- कालपर्यन्तमावाल्यादित्यर्थः । चरणपङ्कजचञ्चरीकः पादपद्मनमरः तत्समाराधन- पर इति यावत् । श्रीज्ञानराजतनुजः श्रीज्ञानराजरस्य तन्नामधेयस्य पितुः तनुजः आत्मजः सूर्यः तन्नामाहं कविः सुधारसवता अमृतमयेन गुणगौरवकीर्तनेन गुणानां गौरवस्य महिम्नः कीर्तनेन स्तुत्या स्वीयामात्मीयां रसनां जिह्वां सनाथां कृतार्थां करोति वितनुते । 'चञ्चरीकोऽध भ्रमरे' इति कोपः ॥ ४॥ दानवोंके संहारक विष्णु के चरण-कमल का चिरकाल से भ्रमर की भाँति लोभी शानराज का पुत्र सूर्य नामक कवि अपनी वागिन्द्रिय को अमृत रस से सराबोर गुण एवं गौरव के कीर्तन द्वारा कृतार्थ करने जा रहा है ।। छंद-सन्त तिलका है । प्रथम चरण में रूपक नाम का अलंकार है ।। ४ ॥ कुतो रसनिरूपणं त्रिघटिकावतारः कुतस् ततो मम मतिः क च क चरितं जगत्स्वामिनः ।

ur -- नृसिंहचम्पूर। कुतः प्रयिततार्णयो लवणनिर्मिता नौः कुतस् तथापि मम चापलं कविजनाःक्षमध्यं क्षणम् ॥५॥ कुन इति-मनिरूपणं शहारादीनां नवविधानां रसानां निरूपणं प्रतिपादनं कुतः क, विघटिकावतार श्रीविष्णो. नृसिंहरूपेण निघटिकामितं कालं यावत् अव- तारः अवतरणं कुतः क । नोभयं सगच्छते इत्यर्थः। प्रहादरसाकृते विष्णुना केवलघटिकाप्रयमितकालमवतीर्य पुनरन्तहितमिति पौराणिकी कथा स्वल्पकालिक परिते सर्वरसानां सत्त्वेऽतिदुर्लक्ष्यस्वेन न सर्वरसानां स्फुटतरानुभावकं परित जगदीश्वरस्यापि इति तचरितवर्णने सर्वरसप्रतिपादनमपि न स्यात् । ततः ततोऽपि पुर्घटमुच्यते इति शेष' । मम मतिः अस्यरुपविषया मम बुद्धिक कुत्रः जगरस्वा. मिनः त्रिलोकीपतेः विष्णोः परितं च छ । एतदप्युभयं नैव सजायते । प्रदिततः सुविस्तृतः अर्णवः सागरः छतं तरी स्वनिर्मिता लवगेन सैन्धवेन निर्मिता रचिता नौ. सरणिः चक। यया सागरं वरीत लपणनिर्मिता नीः न कार्यवाहिका तद्वत् अस्यल्पमते. ममापि जगरस्वामिनः धरित वर्णयितुं न सामयमि- स्यर्थः । तथापि कविजनाः विद्वांसः ममेदं चापलं तद्वर्णनारममित्यर्थः पूर्ण शमन सहभ्यम् । अर्भकस्य स्पलन्ती यागिय न तेषां उगजनकं भवेदिद मे तद्वर्णना- हमकंचापमिति भावः॥५॥ भला, कहीं नव रसा की चर्चा और यहाँ तीन घटिवा-मात्र बाल तक या सिहा- बनार ? नो क्या सहति है। इसमें भी असगान बान मुनिये, यहाँ मेग अत्यल्प बुदि और कहाँ जगत् के स्वामी का अगाध चरित १ अपनी अल्पबुद्धि से इनके चरित्र का वन तो वैसा ही दुथर है जैसे विशाल समुद्र का सतरा करने के लिए नमकपी बनी नौका वा अवरम्य ! फिर भी म मात्र कार्य को करने के लिए मैं जो उपत दिगई पड़ता है, उम चापल्य को कविजन र समय के लिए क्षमा करें। इमोक में 'विषम' नामक अनकार है। - ॥ शृण्वन्तु मत्कृतिमिति प्रथितान कवीन्द्रान् न प्रार्थयेहमिह कोऽपि गुणो यदि स्यान् । ते चापलोतिरसिका यदि या भवेयुः स्यादादरस्तदतिचारधियाममीपाम् ।।६॥ मनु इनि-अहं सूर्यकरिरित्यर्थ । प्रथितान् जगदिम्यानान् कपीन्द्रान् कविमूर्धन्यार महति ममेमा रचनां भवन्तु आद्रियन्तामिनि न प्रार्यय नाम्य- यिनुमुसह। पस्मात् , यदि इह अस्मिन् मम कान्ये कोऽपि गुणः स्यात् कश्चित् धमकारो भवेत् । यदि वा मम काम्यम्य गुगन्यरऽपि ने कवीन्द्राः चापटोक्ति रसिकाः यालधापलेन प्रयुके याश्य स्पृहावन्त इत्यर्थः। भवेयुः स्युः तहि विनव प्रथमोच्छासः। मम निवेदनम् अतिचारुधियां सुमेधसाम् अमीषाम् एतेषाम् कवीन्द्राणाम् आदरः स्यात् । स्वभावत एव तत्र तेषां प्रवृत्तिरुदियात् न तहते कश्चित्प्रार्थनावसर इति भावः। 'यद्यस्ति वस्तु किमपीह तथानवचं धोतेत तत् स्वयमुदेष्यति चानु- रागः' इति भावः ॥ ६॥ 'प्रख्यात कवीन्द्र जन मेरी इस रचना को सुने-ऐसी प्रार्थना करने का साहस नहीं हो रहा है। मैंने अपने मन में यह समझ रखा है कि मेरे काव्य के संवन्ध में दो बातें हो सकती हैं: एक तो यह कि कदाचित् उसमें कोई गुण हो और दूसरी यह कि वह निर्गुण हो । यदि मेरी कविता में कोई गुण होगा, तब इन सुन्दर बुद्धि वाले कवीन्द्रों को उसमें स्वयं आदर होगा ही और यदि कदाचित् वह गुण-धान्य हुई और फविजन भी संयोग से शिशु-सुलभ-चापल्य-भरी उक्तियों के प्रवणरसिक हुए, तब क्या पूछना ? स्वभावतः श्रवण में प्रवृत्ति होगी ही। सारांश यह कि दोनों पक्षों में प्रार्थना का अवसर नहीं है। यहाँ कायलिङ्ग का सुन्दर निर्वाह है। छन्द-वसन्त तिलका। इसमें १४ वर्ण होते है। गण ये है-त म ज ज एवं २ गुरु वर्ग ॥६॥ भगवतः तत्र श्रीमन्मार्तण्डमण्डलाखण्डप्रचण्डकरनिकरविस्फाररुचिरप्रचुर- तरप्रकाशस्य सुरराजराजितमुकुटमणिविराजितपदनीरजस्य सामराजस्य सुधामाधुरीधुरीणगुणगणववर्णनाकर्णनपूर्णकर्णान् प्रभूतनिर- तिशयतोपाभिलापेण साधवः स्वत एवानुरक्ता भवेयुर्यथा स्वभाव एवा- मोदस्य यन्मधुकरानाकर्षति । ततिश्रीमन्तः कान्तिमतः मार्तण्डमण्डलस्य सूर्यमण्डलस्य ये अखण्डा अवि- कलाः प्रचण्डाः तिग्माश्च करनिकराः किरणसमूहाः तेषां विस्फारवत् सर्वत्रप्रसारवत् रुचिरः सुन्दरः प्रचुरतरः प्रभूततरश्च प्रकाशो यस्य तस्य सुरराजस्य देवेन्द्रस्य राजि- ता विद्योतमाना ये मुकुटमणयः किरीटरत्नानि तैः विराजिते सुशोभिते पदनीरजे चरणकमले यस्य तस्य देवेन्द्रेणापि पूजितस्येत्यर्थः । भगवतः सकलैश्चर्यसम्पतस्य 'ऐश्वर्यस्य समग्रस्य धर्मस्य यशसः श्रियः। ज्ञानवैराग्ययोश्चैव पण्णां भग इतीरणा' इति विष्णुपुराणोक्तमगार्थयुक्तस्य वा सामराजस्य साम्नां राजा सामराजः तस्य, सामनेष्टरूपः। विष्णोः सामरूपत्वात् । 'निसामा सामगः साम' इति विष्णोर्नाम सहस्रे। 'यद्वा सामगर्भस्य' इति पाठः स्यात् । साम गर्ने यस्य स तथा । साम गर्भति विष्णुनाम शब्दस्तोममहानिधौ । एवंभूतस्य नृसिंहास्यस्य सुधामाधुरी- धुरीणाः सुधामाधुर्यधूर्वहाः । सुधामाधुर्यवन्त इति यावत् । ये गुणगणाः गुणनिकशाः तेषामाकर्णनेन श्रवणेन पूर्णाभ्यां कर्णाभ्यां श्रोत्राभ्यां प्रभूतः जातः यः निरतिशय- सोपः निरतिशयानन्दः तस्य अभिलाषेण इच्छया साधवः सन्तः स्वतः स्वयमेव अनु- तिह . रकाराष्टा भवेयुः । यथा आमोदस्य मुरमः अयं स्वमावः यत् स मधुकरान भमरान् भाकपनि आवर्जयति। इसमें भी अनुप्राम का चमत्कार दशनीय है। अथवा जिनग रुचिर व अत्यधिक प्रयाश चमक नै हुए मूर्यमण्डलको अमड नौसी किरणों के प्रसार सा व्यापक है,निनके पद कमल दवेन्द्र को भव्य मुकुटमणि चे मप से निरन्तर शोभित रहा करते है, उन भगवान् सामरान के अमृतमय गुग-ग के अवग से कर्ग-हर के भर जाने पर जो प्रभूत एव अकथनीय आनन्द मिला परत है उसकी अभिलाषा साधुननों को [प्रस्तुन रचना के प्रति शीघ्र से ही भारष्ट का रेगी जिस प्रसर आमोद [ गन्ध ] स्वभावन मधुपरको आकृष्ट कर लेता है ॥ ७॥ नटे सामाजिके यापि रसाविर्भार इप्यते । तदत्रास्त्युभयं यम्मान मन्तिर्यामिता हरेः॥७॥ नट इनि-रसाविर्भाव रसस्य द्वारादेः आरिभावः प्रादुर्भावः नटे अभिनेतरि सामाजिक सद्भरि या इप्यते मन्यते । यस्मात् यतः कारणात् हरे धीविष्णोः सर्पान्तर्यामिता सर्वान्तर्गतरवमस्ति मत नदुभयम् अभिनेतृत्वं दृष्टत्वं चेत्यर्थः । भत्र अस्मिन्नेव नृसिंहे व ते ॥ ७॥ रम का आविर्भाव सामाजिक म्ब अभिनेता दोनों ही में पट है। क्यों कि हरि मां- न्वर्यामी है, अनः उनमें अभिनेतृत्व स्व मामाजिल दोनों यन मरते हैं। ते स्युः क्रमादिह भयानकरीद्रवीराः वीभत्सकाद्भुतमहास्यकृपाभिधाना'। गृङ्गारशान्तसहिताः क्रम एप विद्भिः नाङ्गीक्रियेत यदि तहि कथाविरामः ॥८॥ ते इनि-ते प्रमिदाः झारादयो रमा इह अम्मिन् मयगीते काम्ये अमान् परिपाटीतः पर्यायान् वा स्यु. एवं भवेयु । भयानकरीट्वीरेरयादि-पूर्व भयानक रमनिरूपणमा परिप्यते, तद्नु रोद, धीर', यीमासकः, अद्भुत , महास्यः हास्येन महितः हास्यरस इत्यर्थः । कृपामिधान' करगरस इश्यर्थः। पश्चात् हार. रसनिरूपणम् । तदनु च भन्ने शान्तरस प्रतनिष्यतेन। यदि विद्भिः तसः एप क्रमः एप पर्यायः नाहीकरिष्यने नोररीकरिप्यते नहिं कथारिरामः क्यामिश्राम एव भवेदित्ययं ॥4॥ वैप्रसिर महार आदि रम हमारे कान्य में इस क्रम से रहेंगे मदमे पहले भयानक रस का निमा यहाँ किया जायगा । उमके भनन्तर रौद्र, वीर, बामरम, अमन, हाम्य व फाया। मबके अन्त में गदार की चर्चा की जायगे और इसके मी अनन्तर में मान्न की। यदि विश जन हम मम में महमत न हों तो कथा ही नहीं चल सरनी। .

६ प्रथमोच्छ्वासः । अलङ्कार-अणुप्रास । यहाँ भी वसन्त तिलका छन्द ही है ॥ ८॥ गर्भाविर्भावभाजः कतिकति दनुजवेपिणोनावतीर्णाः पूर्णास्तिर्यड्नराणामपि जगति तथा तेन नासीन्नृसिंहः । यस्यात्मा नैति गर्भ सकदापि मनुजास्तस्य किं गर्भवासः किं तातस्तस्य यस्य स्वयमयमुदरे हेमगर्भोऽर्भकोऽभूत् ।। ६ ।। गर्भ इति--जंगति अस्मिन् लोके संसारादारभ्य तिर्यनराणां-तिरश्चां नराणां । मध्ये भवतीर्णाः अंशत इति शेषः, पूर्णाः परिपूर्णा अपि रामकृष्णादयः दनुज- पिणः असुरविध्वंसकाः कति कति केचन एव गर्भाविर्भावभाजः न गर्भात् योपि- दरात भाविर्भाव ग्रादुर्भाव भजन्ते जुपन्ते इत्यर्थः। केचन एवं गर्भाविर्भावभाज इति न अपि तु सर्व एव इत्यर्थः। यतोऽयं नृसिंहः नरसिंहोमयात्मकः तिर्यड्न- रोभयात्मक इति यावत् । तेन उभयात्मकरवेन हेतुना अयं तथा गर्भाविर्भावभाक् न आसीत् इत्यर्थः। नहि तिर्यग् योपिद्गर्भो नारीगर्मो वा उभयात्मको भवतीति भावः । तेनायं भगवत इच्छाविग्रह इति भावः । वस्तुतस्तु भगवतोऽन्येऽपि अव- ताराः गाविर्भावभावत्वेन प्रतीयमानत्वेऽपि परमार्थतो न तथैल्याह-यस्यात्मे- त्यादिना । मनुजाः है नराः तस्य ईदृशस्य सर्वान्तर्यामिणो हरेः किं गर्भवासः नेत्यर्थः। किं तातः तस्य-किं तस्य परमात्मनः तातो भवितुमर्हति यस्योदरे स्वयम् आत्मना अयं प्रसिद्धः वेदवक्ता हेमगर्भः हिरण्यगर्भो ब्रह्मा अर्भकः अभूत् पुत्रत्वेन उदभूदित्यर्थः । संसारादारभ्य अद्यपर्यन्तं यथाकालं यथादेशं च भनेके भगवद- वताराः धर्मस्थापनार्थ मिहावतेरुः 'धर्मसंस्थापनार्थाय संभवामि युगे युगे' इति गीता । परमिदं सर्व परब्रह्मणस्तस्य मायाविजृम्भितमेव । वस्तुगत्या तु यः परेशः सर्वदा सर्वत्र अतति गच्छति व्याप्नोति तस्यैकदेशप्राप्तिः गर्माविर्भावादि च न सम्भवति । यस्योदरात् हिरण्यगर्भाविर्भावः तस्यैव जनककल्पनमयुक्ततरमिति मावः॥९॥ संसार में अमुरों का विनाश करनेवाले तिर्यक् एवं मनुष्य योनि के बीच मत्स्य, राम आदि ऐसे कितने अवतार हुए, पर क्या नव के सद गर्भ से ही आविर्भूत नहीं हुए ? हो, नृसिंहावतार अयोनिज ही रहा [ और अवतारों से उसको यह विशेषता है। इस अवतार का अयोनिज होना तर्कसम्मत भी है। तर्क यह है कि यह अवतार नर एवं सिह को मिमित रूप है, अतः इतकी उत्पत्ति के लिए भी मिश्रित योनि या गर्भ ही अपेक्षित था और वह था नहीं। और वस्तुतः विचार किया जाय तब तो अन्य अवतार भी आपाततः ही गर्भसंभूत जान पढ़ेंगे, परमार्थतः नहीं ! कारण यह है कि वे सर्वव्यापक है। ऐसे परमतत्त्व को गर्म से आविर्भाव मानना उसे एकदेशी बनाना है । हे मनुजगग ! जिसको आत्मा एक बार भी गम में नहीं आई उसका गर्भवात कैसा?

१० नृसिंहचम्पूः। और इसी प्रकार उसके जनक को क्या कथा जिसके उदर में स्वयं जगद का उनक ब्रह्मा भी शिनु को मौति पड़ा है। अलकार-व्यतिरेक । इन्द-सम्परा है। इसमें २१ वर्ग होते हैं। इसमें मरम न य य य गण होते है ॥१॥ गीणेन्द्रगिरेगुरोरपि गुरुर्धन्यो नृसिंहाचलो यो विश्वंभरमुद्विभर्ति गहनस्तम्भोऽयमम्मोनिधिः । वासो यत्र जगन्निवासविहितः प्रसादमेकं जने मन्ये मान्यतमं तमम्बरसदां योऽन्तर्दधाराच्युतम् ॥ १० ॥ गोर्वाति--स नृसिंहाचलः नृसिंहस्य अचल' पर्वतः ( यस्मात् स्तम्भाव नृसिंहरूपेण श्रीविष्णुरचततार स भचल इव पर्तते इति रूपकम् ) धन्यो वर्तते । य. गुरोः महतः गीर्वाणेन्द्रगिरे. देवेन्द्रपर्वतादपि गुरु महान् वर्तते । धन्यत्वे महत्व च हेतुमाह यो विश्वम्भरमित्यादिना । य नृसिंहाचलः विश्वम्भरं जगदारकं श्रीविष्णु उद्विभत्ति धारयति । अय माव'-गीर्वाणेन्द्रगिरिः गीर्वाणेन्देणाधीयतेऽयं न तत्पश्येन नृसिंहेनेति ततोऽस्य धन्यवं महत्वं चेति । अस्य म्तम्भस्य अम्भोनिधेरपि गमारस्वेन प्रवेश खरूपं गहनत्वमाह-वाम इत्यादिना । अयं स्तम्भः अम्मोनिधेः पमुद्रादपि गहनः गम्भीरो वर्तते । यत्र यस्मिन् स्तम्भे जगनिवामविहित श्रीविष्णुकृतः निवासो:- स्ति । अनोभयत्र स एव स्तम्भः नृसिंहाचलशन्देन गहनस्तम्भमब्देन च ध्यपदि- श्यते व्ययहियते यस्माद् विष्णुराविरासीत् । अयं मा० - चातुर्मासिका निद्रामवेक्षमागेन भगवता अम्भोनिधिस्पं निमंत्रिक स्थान शयनार्थमाधीयते इति पुराणादिप्रसिद्धम् । अयन्तु स्तम्मी मम्मोनिधरपि गहनो यतो अम्भोनिधि परित्यज्य स्तम्भारम्भकारात् शयानो भगवान् हिरण्यक- शिपुकोस्यहरेन प्रहादे करुणया प्रबुद इति । जने अन मार्यपु तमेकं प्रहादम् एव अम्बरमदामपि देवानामपि मान्यतममादर गीयतम मन्य अवमि । यःमहादत ताशम् अच्युनं श्रीविष्णुमन्त स्वहृदये धार धारयामास । सस्यैवानन्यमतम्बाद । य सर्वदा समेव हृदये धारयामास स महादः नूनं देवानामपि मान्यतम एव । स्थावरेषु अघटरूपः गस्तमः स स्तम्मः मरामपि गिरीणां सर्वेषामपि समुद्राणां गहनतमश्च धर्तते । यस्मात् विष्णुरावि- यंभूव, बहमेषु मनुप्यादिषु च स महादर देवानामपि मान्यतमः पोऽन्तरारमनितं । श्रीविष्णु धारति मायः॥ १०॥ इति श्रीनृमिधापूकाध्ये प्रथमोपामः।

द्वितीयोच्छ्वासः।
देवेन्द्र के विशाल पर्वत से भी विशाल वह नृसिंहाचल धन्य है, जो साक्षात् विश्वपालक
विष्णु का उदहन कर रहा है। यह सागर से भी गहनतम वह स्तम्भ है, जहाँ जग-
निवास ने अपना आवास बनाया।[इनके साथ साथ ] मैं तो मनुष्यों के दीच प्रहाद
ही एक ऐसा है, जिसको [ तारतमिक दृष्टि से देखने पर ] देवताओं में भी मान्यतम
समझता हूँ ! कारण यह कि उसोने इस अच्युत को जैसा चाहिए उस रूप में अंतःकरण
में धारण किया है।॥ १०॥
नृसिंह चम्पूकाव्य का यह प्रथम उच्छवास समाप्त ।
HD
अथ द्वितीय उच्वास
आसीद् दैत्यकुले हिरण्यकशिपुः प्रौढप्रतापोद्धरस्
तस्याभूद् भगवप्रियो गुणनिधिः प्रह्लादनामात्मजः।
दैत्येशस्तमपाठयत् स्वनिगमं नाङ्गीचकाराथ तम्
विष्णोनाम विनेतरन्न किमपि प्रायः प्रतिज्ञातवान् ।।१।।
आसीदिति-प्रौढप्रतापोधुरः प्रौढेन प्रकृष्टेन प्रतापेन तेजसा 'प्रतापस्तापते-
जसोः' इति मेदिनी। उधुरः निर्भरः 'उद्धरो निर्भरे दृढे' इति शब्दार्थचिन्तामणिः ।
अनितेजस्वीत्यर्थः । हिरण्यकशिपुः हिरण्यकशिपुनामा प्रसिद्धो दैत्यविशेषः दैत्य-
कुले दानवान्ववाये आसीत् बभूव । तस्य भगवत्प्रियः ईश्वरपरायणः गुणनिधिः
गुणानां दयादाक्षिण्यादीनां निधिः भाकरः प्रह्लादनामा आत्मजः सूनुः 'आत्मजस्त-
नया सूनुः' इति अमरः। अभूत् अजायत । अथ अनन्तरं प्राप्ते समये दैत्येशः
दानवाधिपः हिरण्यकशिपुः तम् प्रह्लादं स्वनिगम स्वनिश्चयं, स्वसिद्धान्तमित्यर्थः ।।
अपाठयत् अपीपठत् । किन्तु प्रहादः हिरण्यकशिपोः तं सिद्धान्तं नाऽङ्गीचकार न
स्वीचक्रे, नानुमेने इत्यर्थः। स प्रह्लादः प्रायः वाहुल्येन विष्णोर्नाम विना विना.
भगवन्नामधेयमितरत् अन्यत् किमपि न प्रतिज्ञातवान् प्रतिजग्राहेत्यर्थः ॥ १ ॥
दैत्यवंश में अति तेजस्वी हिरण्यकशिपु नामक एक दैत्य था। उसके एक पुत्र था,
जिसका नाम था प्रहाद ! यह ईश्वरपरायण तथा दयादक्षिण्य आदि गुणों से युक्त था ।
दैत्येश हिरण्यकशिपु ने उस बालक को अपने ईश्वर-विरोधी सिद्धान्तों की शिक्षा दी, पर
वालक ने उन्हें अङ्गीकार नहीं किया। विष्णुनाम के अतिरिक्त उसने और कुछ भी ग्रहण
नहीं किया।
छंद-शार्दूलविक्रीडित है ॥ १ ॥

१२ नृसिंहचम्पूः। तच्छत्वा कुपित. पितातिपरुपैर्वात्यैः सुतं वासयन् स्नेहादरपि तत्प्रलोभनपरः भूय समाश्वासयन् । तं दृष्ट्वा दृढनिश्चयं पुनरसौ निविण्णचेताः परं भृत्यानात्मजयातनार्थममरारातिर्दिदेशाचिरम् ॥२॥ वरळ वनि-पिता महादजनको हिरण्यकशिपुः सत् ध्रुत्या महादः विष्णुनाम- तरत् किमपि न मनुते इनि दैत्येभ्य आवर्ण्य मुदः सन् कदाचित् अतिपरपैः अति- कटोरेः वाश्यः सुत महाद वामयन् उजियन क्दाचिन तपलोमनपरैः तस्मतारण- परैः स्नेहाद प्रेमाई. वायः भूगो मुहु. समाश्वासयन् सान्त्वेन स्वसिद्धान्तं येध. यन् । ममाश्वासयते समाश्वासनकरण योधनेऽत्र लक्षणा । एवं योधयन्सद्यपि प्रल्हाद पुन: निश्चय समाश्वसनोत्तरकालेऽपि अचलचित्त स्थिराध्यवसाय वा दृष्ट्वा शाखा परम अतिशयेन निािचता विदयः अमरारातिः मुराहत असी स हिरण्यकशिपु भृत्यान् स्वर्मरान् आत्मजयातनाथ स्वपुत्रपीडाय, प्रसाद क्लेशयितुमित्यर्थः । दिदेश आज्ञापयामासेत्यर्थः। दिदेश इति 'दिश यत्तिमजने' इति धातोलि स्पम् । घानूनामनेकात्विात् अनुपएष्टोऽपि दिशिराजार्थे धर्तते। 'निर्दिण्णो विपणे दुविते' इति शब्दापंचिन्तामगिः । इस बात को मुनार द पिता हिरण्यरशिपु बभी से निष्ठुर र कर वाक्यों से उसे धमकाया दया भी विभिन्न प्रकार के रोमन-पूर्ण व स्नेहसित्त वचनों का प्रयोगकर साम-नानि से उने अपना सिद्धान्त ममदाना। इन उपायों के बावजूर जब उसने दारक को अपने नियम से टिगों न देगा, न त में से अत्यधिक निर्वद दुआ और पिर इस देव-शत्रु ने थाने दामों को यह बाधा दी कि ३ मा उमके पुत्र को पर्याप्त यातना॥ दैत्य- अहो सचिवाः ! साम्प्रतं विपक्षपक्षमाश्रितः पुनाधमोऽयमुदरोत्पनो व्याधिरिय तम्सट्टसमुत्पन्नो दावाग्निरियास्मन्नाशहेतुः कुलधूमौतुरियो- दित आस्ते । तस्मादयममी बाह्यः, सलिले क्लेटनीयः, शस्त्रांतनीयः, शैलतटान् पातनीयस्तथा यथा दुःशीलतामसून् वा जह्यात् । ततो भर्तुर्य- थादेश यातनाविपर्य नीतस्य शिशोहनादिषु नृहरिस्वरूपमभिध्यायतो रोमापि न बम्मासीन् । अहो निमदो सचिवा इंदो मन्त्रिाः माम्प्रतम् पनदि प्राधमा निकृष्टपुनः अयं प्रहाद विपक्षप पावर्गम् बाधित. अधिष्टितः भरनीति प.1 मतः उदरो. रपट टदारानातः ग्याधिः पीय तरूणां वृत्रा मपहात गात् उत्पाः १ । । द्वितीयोच्छासः। उद्भूतः दावाग्निः वनाग्निः इव अस्माकं नाशस्य विनाशस्य हेतुः निदानं कुलधूम- केतुः वंशविनाशका उत्पातविशेषः वहिर्वा उदितः उत्पन्नः अस्ति । 'धूमकेतुः उत्पातविशेपे वहौ ग्रहप्रभेदे वा' इति शब्दार्थचिन्तामगिः। व्याधिः स्वनाशहेतुत्वे दृष्टान्तः दावाग्निश्च कुलनाशहेतुत्वे । तस्मात् अयमसौ तथा अग्नौ वह्रौ दाह्यः दग्धव्यः सलिले वारिणि क्लेदनीयः मज्जनीयः शस्त्रैः हेतिभिः घातनीयः घात- यितन्यः शैलतटात् पर्वतसानुतः पातनीयः निपातनीयः यथा येन अयं दुःशीलतां स्वीयमिदं दौःशील्यम् असून् प्राणान् वा जह्यात् त्यजेत् । दाह्यः इत्यत्र 'ऋहलो- येत्' इति ण्यत् । ततः तदनन्तरं भर्तुः स्वामिनः यथादेशम् आदेशम् आज्ञाम् अनतिक्रम्य यातनाविपयं पीडागोचरत्वम् । अत्र विपयशब्दो भावप्रधानो निर्दि- श्यते । द्वयंकयोरित्यादिवत् । नीतस्य प्रापितस्य अस्य प्रहादस्य शिशोः दहनादिपु वह्नयादिपु सर्वेप्वपि भूतेषु नृहरिस्वरूपं विष्णुरूपं चिन्तयतः ध्यायतः पश्यतो वा न रोमापि लोमापि वक्रम् आसीत् न तस्य किंचिच्छिन्नमित्यर्थः ।। हे मन्त्रि-वृद्ध ! इस समय यह अधम पुत्र कुल-परम्परा के विनाशार्थ धूमकेतु की तरह उदित हुआ है। इसकी स्थिति वही है जो अपने ही उदर से उत्पन्न व्याधि की होती है। जिस प्रकार वृक्षों के संवर्ष से उत्पन्न होने वाली अग्नि वृक्षों का ही सर्वनाश कर देती है, उसी प्रकार मुझ से ही उत्पन्न हुआ यह वालक मेरे ही नाश का वीज वन रहा है। अतः यह इस प्रकार अग्नि में जला दिया जाय, जल में डुबो दिया जाय, शखों से मारा जाय, तथा शैलतट से गिराया जाय, जिससे या तो यह अपना दुःस्वभाव ही परित्याग दे, अथवा प्राणों से हाथ धो बैठे। पश्चात् स्वामी की आशा के अनुसार विभिन्न प्रकार की यातनाओं को सहन करते हुए भी उस वालक का, जो दाहन आदि क्रियाओं में निरन्तर नृसिंह का ध्यान करता रहा, एक वाल भी वॉका न हो सका ।। कीलालं स्थलतां स्थलं च जलतां वैश्वानरः शीततां पीयूषत्वमगाद् विपं च विपमं वालस्य तस्यापदि । नित्यं संस्मरतां सतां हृदि कृपाकूपारमीशं हरि विश्वव्यापिनमूर्जितं च कुशलं कस्मादसम्भावितम् ॥ ३॥ कोलालमिति-तस्य बालस्य प्रबहादस्येत्यर्थः। आपदि भर्तृनिदेशेन भृत्यादिभिः वहिदाहादिविपत्तो, कीलालं पयः ‘कीलालं रुधिरे तोये' इति मेदिनी। स्थलतां मरुत्वमाभागात् प्रापत् । स्थलं च मरुश्व जलतां सलिलवम् भागात् । एवं वैश्वा- नरोऽग्निः शीतता शैत्यं, विपमं विपं गरलं च हालाहलं पीयूपत्वममृत्वमागात् । 'पीयूपं सप्तदिवसावधि क्षीरे तथामृते' इति मेदिनी। हृदि स्वात्मनि कृपापारम् कृपायाः दयायाः अपारं सागरम् 'उत्पलादावपारः कुर्मराजे महोदधौ' इति मेदिनी । विश्वव्यापिनञ्च । चो भिन्ननमः । ईशम ईश्वरं तं हरिं विष्णुं नित्यं सततं - ।

भूसिंहचम्पू:। संस्मरतांध्यापता सतां मजनानां कस्मात् कस्य हेतोः अजितं भवृद्ध सर्वोत्कृष्ट मित्यर्थः । कुशलमनामयं वार्ता वा असम्भावितम् न भवितुमर्हदिरयर्थः। तेषां सर्व- देव सर्वमेव मालं भवतीति भावः । सर्नान्तर्यामिण विष्णं ध्यायतां सततं कुशल- स्यैव संभवाद । 'न वासुदेवभक्तानामशुभं विद्यते फचित् । जम्ममृत्युगराव्याधि. भयं नैवोपजायते' इति स्मरणादित्ययः ॥ ३ ॥ इस बालक के रिए इन आपत्तियों में जल स्थल होमाता और स्थल जल, अग्नि शीतल हो जाती और विष अमृत । असल में विश्वव्यापक, ऊर्जस्वी एवं कृपा-सागर भगवान् विष्णु का निरन्तर हृदय में स्मरण करने वाले सज्जनों का पल्या क्या कभी अम- म्भावित है। ॥३॥ अहो मूर्सा माः शृणुत हृदयस्थे नरहरी तदुद्भूतैर्भूतर्मम किमपकारः प्रभवति । हरेश्छत्रीभूते शिरसि भुजगानामधिपती भुजङ्गरत्तु मम किमु भयं सम्भवति या ॥४॥ अहो पनि हो रे मूर्वाः मूढाः अतवार्थदर्शिन इत्यर्थः । मर्या मरण- धर्माणो मनुजाः । गणुत आकर्णयत । नरहरी नृसिंहे विष्णो मम हृदयस्ये चित्ता- न्तर्वतिनि सति तदुभूतैः तस्मात् हरेरेच उद्भुनः जातः मम (तद्भातस्य प्रहा. स्य)सर्वेषामेव भगवद्गतानामिप्यर्थ । किम् कचित् अपकारोऽमलं प्रभवनि भवितुमर्हति । नेत्यर्थ इति यावत् । भुजगानाम् अधिपती शेषनागे सर्पराजे हरे. शिरसि मूर्धनि छत्रीमूने भातपनिते सति उत्तरैः उन्नतरपि भुजः सर्पः मम किमपि किसनापि भय त्रासो दा, अत्र या शन्दोऽपकारस्य समुदायकः। मम्मपति संभ- वितुमर्हति । न कदाचिदपीत्यर्धा ४॥ हे मनो ! विनश्वर जन्तुओ! मुनो, जब तक भगवान् नरसिंह मेरे अतकरण में विराजमान है, तब तक उन्हीं से उद्भूत हुए तुम्हारे जैसे प्राणियों से मेरा क्या अपवार हो सकता है ! अब सक मुजापति शेषनाग भगवान् विष्णु के सिर पर आतपत्र से बने एर है, तब तक इन उठे हुए पणे बाले सो मे क्या मुदा मय हो माना है ॥४॥ मन्मातुरिन्दिराया किमु न जातं सहोदरं गरलम् । मातुलतामुपयातान् तम्मादस्मामु किं भयं भवति ॥ ५॥ मन्मानि-किमु झिम् गरलं मत्पिना मन्मारणार्थ प्रयुक्तं विषं मामातु मम जनन्या इन्दिायाः एमया रिष्णुपन्या इति यावत् । सहोदरं सोदयं न ज्ञात नावगत मूरिनि शेषः। श्रीविष्णु मम पिता, अत लमीस्तरपरनीवेन मम माता वर्तते । तया साधमुत्पना विरादयः मर्यपि मम मानु सोदयां प्यति सतो - चित्ताभिप्रायम् अवधार्य ज्ञात्वा, पूर्व तदभिप्रायं निश्चित्येत्यर्थः तं स्वशीलं स्वाभि- द्वितीयोच्यासः। मम कथ विपत्तिर्भवितुमर्हति इति भावः। एतेन सम्बन्धेन मातुलतामातुलत्वं मातृ- मातृत्वम् उपयातात् उपगतात् तस्माद् विपात् अस्मासु अस्माकमित्यर्थः (औप- श्लेषिकेऽधिकरणे सप्तमी। कुण्डे वदरमितिवत् । अस्मनिष्ठविपादिहेतुकं भयमि- त्यर्थः) किं कथं भयं भवति । मयसम्भावना न कथंचिदपि वर्तते इत्यर्थः ।।५।। इन मूर्जी ने क्या यह नहीं समझा कि यह विष मेरी माता विष्णु-पत्नी लक्ष्मी का सगा भाई है ? भला इस मामा से मुझे क्या भय होगा ॥५॥ ततोऽमात्यवगैर्दैत्यराजमागत्य स्वसमुचितं समूचे । स्वामिन् ! महदिमाश्चर्यमस्माभिरनुभूतं यदर्भकोऽयं ज्वलनज्वालाभिरदायः, कीला- लैरक्लेद्यः, शरच्छेद्यः गरलैरविकलाङ्गः। तस्मादधुना यातनाभिरलं, सामप्रकारेण यत्नोऽस्त्विति । ततः सुरारातिरपि प्रह्लादस्य सवयसः दैत्य- पुत्रानाहूय तानित्यादिदेश । रेः सुशीलाः शिशवः ! अस्मदर्भकस्य दुरा- स्मनः मनोगतमवधार्य तं च स्वशीलमुपदिशन्तु । ततस्तदोमिति दैत्यपुत्राः प्रबादमुपदेष्टुमुपक्रमं चक्रुः । अहो सर्वे सवयसः ! श्रूयतामिदमपूर्व यत्पूर्वजानुष्ठितमध्वानमपहाय सर्वज्ञस्य पितु. रवज्ञामयशश्चाविगणय्य विविधदुरन्तयातनोद्भवदुःखमनुभूय सारासार- विचारविधुरत्वेन यत्किंचित्कुर्वता प्रसादेन किमधिकमसाधि । तस्माद- स्माभिः सर्वैः सहेतुकैर्वचनरुपदेष्टव्यो यथा दुष्टाशयं परिहाय स्वमार्गमा श्रयेदित्येवं सम्प्रधार्य प्रह्लादमवोचुः । तत इति-ततः तदनन्तरं दैत्यराजमागत्य अमात्यवगैः मन्त्रिवृन्दै स्वसमुचितं स्वानुरूपं समूचे वच ऊचे। स्वामिन् ? प्रभो ? अस्माभिः इदं महद आश्चर्यमनु- भूतम् । यत् अयम् अर्भकः ज्वलनज्वालाभिः दहनाचिभिः अदायः दग्धुमशक्यः कीलाल: जलैः अक्लेद्यः आईयितुमशक्यः शस्त्रैरायुधैः अच्छेद्यः छेत्तुम् अशक्यः गरलैविषैः 'गरलं तृणपूले च विप माने नपुंसकम्' इति मेदिनी । अविकलाङ्गः न विकलानि ऊनानि विलानि वा अङ्गानि अवयवा यस्य स तादृशो वर्तते । 'विकल उने विह्वले' इति शब्दार्थचिन्तामणिः । तस्माद् अतो हेतोः अधुना एतर्हि यात- नाभिः पीडाभिः अलम् न किञ्चित् साध्यम् । सामप्रकारेण सान्त्ववचनेन यत्नः प्रयासः अस्तु भवेत् । कर्तव्य इत्यर्थः। ततः तदनन्तरं सुरारातिः दैत्यः ग्रहादस्य सवयसः समानवयसः दैत्यपुत्रान् माहृय आकार्य तान् इति इत्थम् आदिदेश आशापयामास । रे! अहो ! सुशीलाः सुस्वभावाः शिशवोऽभकाः ! दुरात्मनः दुष्टस्य अस्माकम् अस्य अर्भकस्य (प्रहादस्य) शिशोः मनोगतं चित्तान्तर्गत १६ नृसिंहचम्पू । प्रायम् उपदिशन्तु योधयन्तु । तत तदनन्तरं हिरण्यकशिपुवाक्यानन्तर दयपुत्रा ओम् आमिति उपरवा स्वाकृत्येति शेष । महादमुपदेष्टम् उपप्रमम् उद्योग चक्र अकाए । कथमुद्योगमका(रित्याह-अहो । ह हो। सर्वे समे सवयस ममानवयम' इदम् अपूर्वम् अद्भुतवस्तु इति शप, श्रूयताम् यत् पूर्वजानुष्टिनम पूर्वजै अस्माक पितृपितामहप्रभृतिभि अनुष्टिनम् अनुसृतम् अध्यानम् वर्म अपहाय स्यावा सर्वज्ञस्य पितु अवज्ञाम् अवमानम् अयशो अकीर्तिम् च अवि गणय्य अविचार्य विविधदुरन्नयातनोद्भवद् सम् विविधान्य अनेकाम्य दुरन्ता भ्यश्च दुस्दकाम्यो दुरवसानाभ्यो वा यातनाम्य पीढाम्य उद्भवम् उत्पन्ने दुर अनुभूय सारासारविचारविधुरत्वन सारासारयो तत्वातचयो विधारे रिक विधुर विकल तस्य भाव तेन सारासारविचाररहितत्वादित्यर्थ । यत् किचिद- मनुष्टेय कर्म कुर्वता प्रसादेन किम् अधिकम् असाधि साधितम् । इदानीं यावत् विष्णुभक्तिपरायगेन तन अम्मत्तोऽधिक न किंचिदुपार्जितमिति यावत् । तस्मात अस्माभि संरपि मिलित्वा इदानी सहेतुकै युचियुक्त स महाद' उपदेष्टव्य. प्रबोधनीय । बत्र तयति शेष अग्ने यथेति वक्ष्यमाणत्वात् । यया स दुष्टाशय निजमिद विष्णुभवस्यारमक दुरभिप्रेतमपहाय परित्यज्य स्वमार्ग पितृपितामहपर- पराप्राप्ठ स्वमार्गम् माश्रयेत् इत्येवमित्यं सम्प्रचार्य निश्चिस्य ते सर्व प्रहादमयोचु' अचिरे । अवोचुरिति अवोपसृष्टस्य मनो लिट स्पम् । इसके अनन्नर अमात्यवर्ग ने दैत्यराज के सनीप बाबर यथोचिन निवेदन किया- स्वामिन् । हम लोगों ने विचित्र आश्रय अनुभूत किया, कि यह बानक आग की स्परों से नहीं कराया जा माना, जल में नहीं हुआया जा सरता, शत्रों से नहीं पातित किया जामवना, विष मे इसके अह्नों में कोई रियति नहीं उत्पन्न की जा मरना, अत हो चुरा यातना या प्रगेग अब माम नीति का ही महारा राजिये । पश्चात् इस देव ने प्रसाद के ममबारक साथियों को बुलाकर यह आदेश दिया--अरे भुशील पालको। हमारे दुध वानर के मनोभावों को परम वर मे हो] अपने ममान भाचरण वा उपदय करो। इस पर उन मब ने स्वीकृतिसूचक शब्द का प्रयोग रिया और उन दैत्य पुत्रों ने प्रहादपो उपदेश देने का उपाम किया। इ माथियो। यह विटग बाल आरोग मुने पि अपने पूर्वजों के आचरित मार्ग का सजपिता के पिरार व अपक्ष की ओर से विमुनो नाना प्रकार के रसमय परिणाम पैदा करनवारी यातनाओं का अनुमाव , मार व असार ये विचार में पराशुस हो, मनमाना बद्धका कुछ करने वाल प्रहाद ने क्या पा लिया! यात हम सब का पर्वन्य है रितुन वचनों से उसे ऐसा उदेशमस कि बह दुन्मित विरचा परित्याराकर अपने पर रात मानार का आप्रय है-ऐमा निम्नाय पर उन मर ने प्रहार से कहा। परित्याग कर १७ IN द्वितीयोच्वासः। पितुर्वृत्तं यत्ते तदनु जनकानन्दजनकः सुशीलोऽप्यादत्ते सपदि पितुराज्ञां स्वशिरसि । सखे ! पुत्रः श्लाघ्यः समजनि गुणालंकरणतां न सन्त्येवं पुत्राः किमु पशुतिरश्वामितरथा ॥६॥ पितुरिति-हे सखे ! प्रहाद ! स पुत्रः श्लाघ्यः प्रशंसनीयो भवति स एबश गुणानामलकरणतां भूपणतां भजति । गुणा एव अलहरणानि भूपणानि यस्य तस्य भावस्तत्ता तां गुणालङ्कृतत्वं भजते इत्यर्थः। स एव सुशीलोऽपि यः पितुर्थत्त- माचरणं धत्ते । आचरणेन पितरमनुसरतीत्यर्थः। यश्च पितुराज्ञां सपदि शिरसा आदत्ते गृहाति धारयति स्वीकरोतीत्यर्थः । यश्च तदनु पिन्नाज्ञात्वीकारानन्तरं तत्सम्पादनेन जनकानन्दजनका पितुः प्रमोदहेतुः । इतरथा अन्यथा किमु इति प्रश्ने, एवं भवादृशाः पित्राज्ञाएरिपालनेसतयुदयः पशूनां गादीनां तिरश्चा पक्षिणां च पुत्रा न सन्ति अपि तु सल्त्येव । पित्राज्ञाकारिण एन यथार्थतः पुन्ना नेतरे इति भावः ॥६॥ हे सखे प्रहाद ! वही पुत्र प्रशंसनीय होता है, उसी के गुण शोभाधायक होते है, वही सुशील भी कहा जाता है, जो अपने पिता के आचरण को कार्यान्वित करता है, अर्थात् जो आचरण की दृष्टि से पिता का अनुसरण करता है, जो पिता की आशा को शिरोधार्य करता है और तदनन्तर उसका सम्पादन करता हुआ अपने पिता को आन- न्दित करता है । अन्यथा यों तो मनमाना आचरण करने वाले पुत्र पशुओं एवं पक्षियों के भी होते हैं; फिर उनसे आप की विशेषता क्या ? ॥ ६ ॥ छन्द-शिखरिणी ।।६।। प्रता:- तातास्तावदमी समीरणचलस्नेहाः सुतानां मुदे यावन्नेह पिता पितामहपिता संप्राप्यते भाग्यतः । तावद् दीपशिखाप्रकाशवशगं विश्वं क्षणं मोदते यावलोचनगोचरो न भवति प्रातर्निधिस्तेजसाम् ॥ ७॥ ताता इनि-समीरणचलस्नेहाः समीरणवत् वायुवत् चला चञ्चलः स्नेहः वात्सल्यं येषां ते अमी ताताः सांसारिका इमे पितर इत्यर्थः। तावदेव सुतानां पुत्राणां मुदे प्रसन्नताये जायन्ते इति शेषः। यावत् इह जन्मनि भाग्यतः सौभा- म्यवशात् पिता पितामहपिता-पितामहस्यापि पिता अनादिकालतः परम्पराप्राप्तः स वास्तविकः सर्वेपां पिता परमात्मा न प्राप्यते न लभ्यते। दीपशिखायाः प्रदी- पार्चिषः प्रकाशस्य वशगं वशवर्ति इदमदो विश्वं जगत् क्षणं स्वल्पकालं तावदेव - - 1 १८ नृसिंहचम्पूः। मोदते हुप्यति यावत् तेजसां निधि. अर्कः प्रातः प्रभातवेलायां लोचनगोचरो न भवति नौदेति इत्पर्यः ॥७॥ प्रकार का उत्तर है- वायु के समान अस्थिर स्नेह रखनेवाले ये सामारिक पिता तमी तक अपने बालकों के मुसार्थ होते है जब तक कि सौभाग्यसे सबका पिता परमात्मा नहीं मिलता । दीपशिन्या से उत्पन्न होनेवाले प्रकाश का सहारा लेकर यह ससार उनने ही समय तक प्रसाद राम करता है जब तक प्रातःकाल तेनोनिधि दृष्टिगोचर नहीं होते ॥ छन्द-शासविनोटिन । अल्पार-दृष्टान्त ॥ ७ ॥ अगस्त्योऽभूत् कुम्भात् कथयत किमम्मो वहति वा न किं लोके श्लाघ्यः तदनु कलशोऽनेन मुनिना । अभूद् रम्मागर्भादतिसुरभिकर्पूरपटलं तदादत्ते पर्णान्यथ च किमु रम्मा स्थगयति ॥८॥ नहि निर्गुणयोर्जडजडानययोर्मातापित्रोत्तानुसरणं सगुणस्य पुत्रस्य लोके इष्टं प्रत्युत तारापुनजन्मना तयाभूतयोरपि तयोकि भादरोह इत्याह- अगस्त्य इति अगस्त्य. तयामा प्रसिद्धो महर्षि कुम्मात् कलशात् अभूत् अजा: पत। हे दैत्यशिवारः कथयत इद तु वदत स अगस्यमुनिः किम् अम्मी जलं बहति । न यहतीत्यर्थः। कलशयोनिरपि भूया स जलं न वहति । तथापि तदनु अंगरयसम्भवानन्तरम् अनेन मुनिना अगस्त्येन कलशाजातेन लोके जगति कलशो घटः जहाध्योऽपि न श्लाघ्य किमी प्रशस्य एति भाव.। रम्भाया. कदल्या गर्मात् मध्यात् अतिसुरभि अतिमुगन्धि कर्पूरपटल घनसारनिचयः अभूत् । तत् पूरपटलं पर्णानि आदत्ते विमु, नैवेत्यर्थः । अथ च सयापि लोकोऽति- मुरमि कर्पूरपरलं गौरवण तन्मातृमूतामतिजडामपि रम्मा स्यगति पिचते पिघानेन तस्या भादरं करोतीत्यर्थः। एवं जजहाश्रययोरपि मम मातापियोम- दीययिष्णुमतिगुणगौरवेण रोके पूजा भविष्यतीति भावः॥ ८॥ और बड़ो नक माता-पिता के अनुसरण की बात है, वह नि माता पिता के सम्बन्ध में नहीं है, देिखो मनि अगस्त्य की उत्पत्ति बुम्म से दुई, पर क्या वे [ अपने पिता के समान ] जल वहन करते है। नहीं, फिर भी इस महषि के कारण बाद में उस निट की मी प्रदिशा नहादुर ?सी प्रार रम्मा (केला स्वभ)के गर्भ से मति गन्धपू कपूर की उत्पत्ति हुई है। क्या वह अपनी माता के समान पत्र धारण करता है ! नहीं, नना ही नहीं, के मामने रम्भावोसमार देता है। पन्द-गिरि

द्वितीयोच्छासः।
१६
अपि च-
जीवास्तावत् स्वकर्मनिर्मितानेकविचित्रयोनिपु चिरं भ्रमन्तः प्रति
जन्म परस्परं पितापुत्रतां प्रपद्यन्ते एव । तत्र तत्र तज्जातिवर्णाश्रम-
धर्माभिमानेन यावजीवं वर्तमानाः शनैर्देहभोगं समाप्य विधिवशाद-
स्माद् विपद्यन्ते । तथा च कैः केपामुद्धृतिरिति निश्चयेऽपि तन्माया-
अस्ताः पुनर्मोहमेवानुसरन्ति ।
जीवा इति । जीवाः स्वैः स्वैः कर्मभिः निर्मितासु स्वकर्मानुरूपं प्राप्तासु अने-
कासु विचित्रासु योनिपु चिरं भ्रमन्तः परिभ्रमन्तः सन्तः प्रतिजन्म जन्मनि जन्मनि
परस्परम् अन्योन्यं पितापुत्रतां प्रतिपद्यन्ते प्राप्नुवन्त्येव । तत्र तत्र तासु तासु
विचित्रासु योनिषु ब्राह्मणक्षत्रियादितत्तद्वर्णाभिमानेन ब्रह्मचर्यादितत्तदाश्रमाभि-
मानेन च यावजीवं जीवनपर्यन्तं वर्तमाना विद्यमानाः शनैः देहभोगं शरीरभोगं
समाप्य विधिवशाद् अस्मात् देहात् विपद्यन्ते वियुज्यन्ते नियन्ते इति यावत् । तथा
कैः कर्मभिः केपां जीवानामुद्धतिः उद्धरणमिति निश्चयेऽपि निर्णयेऽपि तन्माया-
प्रस्ता तस्य विधेः मायया अत्ताः भगवतो माययाऽपहृतज्ञानाः पुनः भूयोऽपि
मोहमेवानुसरन्ति पितृभक्त्या ममोद्धार इति पुनस्य मोहः, पुत्रकृतपिण्डदानादि-
क्रियया च ममोद्धारः इति पितुर्मोहस्तं परस्परं प्राप्नुवन्तीति भावः ।
और भी-
जीवमान अपने अपने कर्म फलस्वरूप अनेकानेक विचित्र योनियों में अनादि
काल से भरमाते हुए जन्म जन्म में पिता-पुत्र-भाव को परस्पर प्राप्त होते रहते है। और
फिर उस उस योनि में अपनी जाति एवं वर्णाश्रम धर्म के अभिमान से चूर हो होकर
जीवन भर धीरे धीरे प्रारब भोग को समाप्त कर दैवात् इस शरीर से विच्छिन्न हो जाते
है । और यद्यपि यह बहुत ही स्पष्ट हैं कि किन कौं से किसका उद्धार हो सकता है,
चथापि परमात्मा की माया के चंगुल में फंसा हुआ लोक पुनः पुनः मोह को प्राप्त होता
रहता है।
अपरे तु-
यं सखे स्मरसि सोऽस्ति को हरिः किं प्रयोजनमनेन हन्त ते ।
राज्यभोगमपहाय शाश्वतं यातना कथमथानुभूयते ।। ६॥
पनिनि । हे सखे ! यं हरिम् अनन्यमनाः त्वं स्मरसि चिन्तयसि ध्यायसि स ते
हरिः
क कीमो वर्तते। हन्त ? वत? अनेन हरिणा ते तव किं प्रयोजनम् किं
फलं चिन्त्यमानेन साध्यते । शाश्वतं सार्वकालिकं राज्यभोगम् आधिपत्यसुखं परि-
त्यज्य कधं यातनाक्लेशोऽनुभूयते ॥९॥

नृसिंहचम्मूः। अन्य दैत्यशिशुओं ने कहा- हे सखे ! जिस हरि का तुम एकचित होकर स्मरण किया करते हो वह तुम्हारा परि वैसा है। इससे तुमको हेना देना क्या है। इस गाइवत राज्यमोग का परित्याग कर को [अकारण ] यातना का मोग कर रहे हो? छन्द-रसोरता ॥९॥ अपि च- दुर्बलं नरशरीरमीदृशं वसुनर्गुरुगदाधिवर्जितम् । यमवं जगति विस्तृतं सखे मृग्यतेऽथ किमतः परं त्वया ॥१०॥ दुईसमिति । पूर्व तु नरशरीरम नदेह एव ईशामित्थं दुर्यलं कृशं वर्तते । तान सम्पुरीरं यदि गुरुपदाधिवर्वित गुरमि महद्भिः राजयक्ष्मादिभिः गदेः रोग पाधिमिः मानसीमिय॑यामिः यर्जितं रहितं भवेदिति शेपः । जगति लोके विस्तृत मति विपुलं धमव धनधान्यादिकं भवेत् । अथानन्तरम् अतः परम इतोऽप्यधिव रपया कि मृग्यतेऽन्विप्यते यदर्थ हरि. सेव्यते इति भावः। हे महाद! प्रकृत्या मानवाना शरीर दुर्बलं भवसि, किन्तु पदि तत् रोग: मानसम्ययाभिश्च रहिर प्राप्येत । अथ च विपुला सम्पदाप्येत सदा ततोऽधिकं किं मागणीयं घुसः। सरय सत् स्वया सर्वमपि सुखममतः स्वया हरिः किमिन्याराध्यते॥१०॥ और भी, यह मानव शरीर, जो नितान्त पुल है, यदि कहीं बह राजयक्ष्मा बमे दुरन्त रोगों एवं मानसी व्ययाओं से रहित हो जाय और उस पर भी यदि इस संमार में अथाह वैभव प्राप्त हो जाय, दो से त्यागकर ] हे ससे! तुम और इससे अधिक क्या प्राप्त कर सकोगे जिसकी खोज कर रहे हो।हरि की उपासना से क्या मिल जायगा 1] इन्द-रचोदता ॥ १०॥ प्रहादः- आत्मानं स्वशरीरमेव मनुते मुक्तिं सुपुर्ति पराम् आनन्दं विषयोपभोगमजनं विज्ञानहीनो जनः। देहं मूत्रपुरीपपूरितमसो नो वेत्ति निद्रां पुनः चित्ताघ्रान्तिमयं विरामसमये शोकप्रदान गोचरान् ॥ ११ ॥ आत्मानमिति । विज्ञानहीन विशिष्ट ज्ञानं विटणं ज्ञानं याऽनुमररूपं तस्व- साणकारस्तद्रहितः अनः सनः स्वशरीरमेव मामानं भनुते जानाति । देव- प्यतिरिक्त सचिस्यरूपम् मारमानमय नैव येचीत्यर्थः । मुहिमेव, सर्व विषया ज्ञानरूपा निद्रामेव । शोमना सुतिः सुपुति सा धाज्ञानरूपैव मुपदसममि- द्वितीयोच्छासः। ध्याहारात् । तां सुपुप्ति, परां मुक्ति, सालोक्यादिरूपाऽपरामुक्तिस्तदपेक्षया प्रकृष्ट! मुक्तिमपवर्ग मनुते । अज्ञाननाशरूपं ज्ञानसारूप्यं नेत्यर्थः। विपयाणां अज्ञान- नादिविविधपदार्थानाम् उपभोगभजनम् उपभोगः सुखसाक्षात्कारस्तद्भजनं तत्स- म्पादनमित्यर्थः।आनन्दं वेत्ति । असौ अतत्वज्ञः सांसारिको जनः देहं मूत्रेण पुरी- पेण विष्टया च पूरितं निर्भरं नो वेत्ति । यदि स इमं देहं मूत्रादिपरीतं विद्यात् तर्हि ततो जुगुप्सेत न चैनम् आत्मानं प्रतीयात् । निद्रां चित्ताभ्रान्ति चेतसो विष- येषु भ्रमणाभावम् अज्ञानमिति यावत् । चित्तनान्तिमिति त्वपपाठः। तदानीं चेतसो ल्याभ्युपगमेन भ्रमणासम्भवात् । न वेत्ति । किंचायमज्ञानाधिमोहितधीः पुमान् गोचरान् विषयान् विरामसमये अवसाने परिणतौ वा शोकप्रदान् दुःखदायिनो न जानाति । अत एव तेपु आसक्तो भवति । 'गोचर इन्द्रियार्थ रूपशब्दगन्धस्पर्श- रसस्वरूपे' इति शब्दार्थचिन्तामणिः ॥ ११ ॥ प्रहाद का उत्तर है--- पारमार्थिक शान से वञ्चित रहने वाले ये सांसारिक जन अपने शरीर को ही आत्मा मानते हैं, सुषुप्ति को ही चरम मुक्ति समझते हैं। वे यह नहीं जानते कि यह शरीर मल-मूत्र जैसे गंदे पदार्थों से परिपूर्ण है, यह निद्रा केवल चित्त का विषयों से अधिक विच्छेद है । वे यह भी नहीं समझ पाते कि ये इन्द्रियगोचर पदार्थ अन्त में शोकदायी ही होते हैं । छन्दः--शार्दूलविक्रीटित ॥ ११ ॥ अहो अहो महदज्ञानं जनानां यत् पुत्रकलत्रमित्रद्रविणविद्यावयो- मिर्वयमतिरूढाः इत्यहंकाराधिरूढाः केचिन्मूढाः स्वोटिं नाटयन्तः शक्र- मपि न गणयन्ति । केचिदाचारचारुचरितैर्वयमध्वरकर्ममर्मकुशलाः इति दम्भसंभारसंभृताः पितामहमपि हेलयन्ति । केऽपि कृतान्तकलितकव- लायितकलेवरा अपि वयं प्रौढप्रतापचक्रवर्तिन इति स्वभुजगर्व भाप- माणा दानवाः स्वहितमजानन्तः रमारमणचरणपरिचरणपराममुखाः संसरणमरणमालाकुलाः सीदन्ति । तत्र यूयं पुनर्वालिशाः सततमन्धपर- म्परापरिणतिग्रस्ता एच। अहो इति- अहो इति महाश्चर्यद्योतनाथ पुनरुक्तिः। जनानामिदं महदज्ञान- विजृम्भणं यत् तेषु केचिन्मूढा 'वयं पुत्रैः तनयः' कलन्त्रेण दारैः, मित्रैः सुहृद्धिा, दविगेन धनेन, विद्यया ज्ञानेन, वयंसा आयुषा च अतिरूढाः प्रवृद्धाः स्म' इति इममहङ्कारम् अभिमानमधिरूढाः आश्रिता सन्तः स्वप्रौढिं स्वोत्कर्ष नाटयन्तोऽभि- नवन्तः प्रदर्शयन्त इति यावत् । शक्रमिन्द्रमपि न गणयन्ति, इन्द्रमपि स्वस्मा- २२ नृसिंहचम्पूः। दून मन्यन्ते इत्पर्य । अपरे केचित् आचारचारचरित आचारस्य स्नानाचमन- सन्यावन्दनादिशास्त्रविहितव्यवहारस्य चार सम्यक् चरितै अनुष्ठान वयम् अव रकर्ममर्मशिला अध्वरस्य यज्ञस्य कर्मण क्रियाया मर्मणि तत्वज्ञाने दुशला निपुणा स्म इति शेष । इति इत्य मन्वाना दम्भस्य मिथ्याचारस्य सम्भारण अतिशयेन सम्मृता सङ्गता सन्त पितामहमपि ब्रह्माणमपि हेलयन्ति अवजानन्ति । फेऽपि इतर केचन पुनः कृतान्तकलितकवलायितफ्लेवरा वृतान्तेन कीनाशेन कलितो गृहीतकवर ग्राम इति कृतान्तकलितकयलस्नद्वदाचरित कलेवर शरीर येपाते। अथवा एव विग्रहः कृतान्तेन यमेन कलित त कालायित ग्रामीकृत च करोवर शारीर यषां ते । यमराजाप्यन्यधन्यभूता अपि इत्यर्थ । वय, प्रौढ प्रद प्रताप तेज यथा ते, ते घ चक्रवर्तिन इति इत्य स्वयो उयोर्यारो गर्वमहार भापमाणा क्थयन्त दानवा देत्या स्वहितमजानन्त वास्तविक स्वहित पथ्य- मजानन्त अजानाना रमारमणस्य श्रीविष्णो चरणयो पादयो परिचरणात् सेव मात् पराङ्मुखा ससरणस्य जन्मन मरणस्य मृत्योश्च मालया परम्परया आकुला म्यमा सीदन्ति दुसमाजो भवन्ति । तत्रापि यूय पुनलिशा पुन आवृत्त यद्- थालिगारव मौत्य तदन्तोऽतिमूदा स्थ ये सततमनारतम् अन्धपरम्पराया स्वपित्- पितामहाचारप्राप्ताया विष्णुद्वेपरूपाया परिणत्या परिणामेन अनर्थन प्रस्ता एव । अहो । आश्चय है कि इन प्राणियों में कितना अशान भरा है। पुत्र, पत्नी, मित्र, धन, विधा व वय आदि से हम सद भरे-पूरे है--इस अहसार की भावना से परिपूर्ण कुछ मूर्य अपनी महत्ता का अभिनय करते हुए इद्र यो मा कुछ नहीं समझते । बुछ लोगों की दशा यह है कि द स्नान, सध्यावन्दनादि वेद-विहित कर्मों का सम्यक् अनुधान करने के कारण अपने को यह समझा करते है कि हम ही सब यशर के मर्म को जानने वाने ई-और इस प्रसार दम्माचरण से आनसशिव व्याप्त हो नहा की भी अबदलना किया करते हैं। कुछ लोगों की स्थिति यह है कि पधपि उसका शरीर कृतात दारा गृहीत पास से अधिक महत्व नहीं रखना, तथापि समसत यह है कि हम सब प्रौद प्रताप के कारण चक्रवती ही बने रहेंगे। इसी भावना में अपनी भुवाओं की शक्ति पारते हुए ये दानव अपने पारमाथिर रल्या से सर्वथा अनमित रह कर रमारमा की चरणमेवा से परामु रहते हैं और बम-मरण ये चक्कर में पर हुए निरन्तर म्लेश का मनुभव परते है। इस स्थिति में पिर भी यह मूर्स दान्क अपनी मोहग्रस्त परम्परा से ग्रन्त दिखाह पटना ॥ ततो दैत्येश प्रहादवास्येरप्रतिमान् दनुजानुतान् विज्ञाय स्वमुत सम- क्षमाहूय किंचिदानिष्टयान् । ठन रति--ततस्तदनन्तर देस्यैश स हिरण्यकशिपु प्रदादयापये प्रहादस्य द्वितीयोच्छासः। कथनोपकथनैः दनुजानुजान् दानवभ्रातॄन् अप्रतिभान् प्रतिभारहितान् प्रतिहत- बुद्धीन विज्ञाय ज्ञात्वा स्वसुतं समदं प्रत्यक्षमाहूय आकार्य निम्नप्रकारेण किञ्चित् किमपि आदिष्टवान् आदिदेश। इसके अनन्तर उस दैत्यराज हिरण्यकशिपु ने प्रहाद के कथोपकथन से अपने दानव भाइयों को निष्प्रतिम समझ कर अपने पुत्र को सामने बुलाया और कुछ आदेश दिये। मदीयवशवर्तिनस्त्रिदशयक्षरक्षोगणाः तथा भुजगभूभुजः सकलमानवा दानवाः । अभीप्सितफलप्रदो मदनुवर्तिनां वा नृणाम् अहं हि जगदीश्वरः किमु न मां मजस्यात्मज ।। १२ ॥ मदीयेति । त्रिदशानाममराणां यक्षाणां पुण्यजनानां 'यतः पुण्यजने' इति कोपः। रक्षसां राक्षसानां गणाः वर्गाः सकलाश्च दानवाः समग्रा दनुजाः मानवाः मनुप्याः तथा भुजगभूभुजः साधिपाः सर्वेऽप्यमी मदीये वशे वर्तन्ते तच्छीला इति मदीयवशवर्तिनः, मम वशगाः सन्तीति शेपः । अहं वा, अहमेव, 'वास्याद्- विकल्पोपमानयोरेवार्थेऽपि समुच्चये' इत्यमरः । मदनुवर्तिनां स्वभक्तानां नृणाम् अभीप्सितफलप्रदः अभीप्सितं स्वाभीष्टं फलं प्रददाति इति तथाभूतः, जगदीश्वरः जगत्पालकः अस्मि। हि शब्दोऽत्र प्रसिद्धिं द्योतयति । हे आत्मज ! पुत्र! त्वं मां (हिरण्यकशिपु स्वजनकम् ) किमु न भजसि किमर्थं नाराधयसि ? ॥ १२ ॥ देव, यक्ष, राक्षस, सर्पराज, निखिल मानव एवं दानव सभी मेरे वश में है। मेरा ही अनुसरण करनेवाले जो मानव है, उन्हें अभीप्सित फल का विधान करनेवाला जगत्पालक, जगदीश्वर नाम से मैं ही ख्यात हूँ। सो हे पुत्र! तुम मेरी ही भक्ति क्यों नहीं करते ? ॥ १२॥ 4 प्रह्लादः पडूमिपरिदूषितः क्षणिकचित्तवृत्तिः पुमान् अहंकृतपरोऽसुरः परमकोपनो दाम्भिकः । जनेपु ननु निष्कृपः कृपणभाषणो यः स्वयं कथं नु जगदीश्वरं कथयितुं स नो लज्जसे ।। १३ ।। पडूमीति-पुमान् मनुष्यः स्वभावतः पर्मिपरिदूपितः बुभुक्षादिभिः पद्मि- विकारैः परिसूतो भवति । 'बुभुक्षा च पिपासा च प्राणस्य मनसः स्मृतौ । शोक- मोहौ शरीरस्य जरामृत्यू पडूमयः । तथा पुरुषः क्षणिकचित्तवृत्तिः क्षणिका अनव- स्थायिनी चित्तवृत्तिः मनोव्यापारो यस्य स भवति । अस्थिरबुद्धिर्भवतीत्यर्थः ।

। नृसिंहचम्पूः। पुरपेप्वपि असुरः राक्षसः अपकृतिपरः अहतिरहकार तत्परः तत्परायणा भवति । परमकोपनः अस्यर्थ बुपितस्तिष्ठति। दाम्भिकः मिप्याचारी घ भवति । ननु इत्यामन्यणे । 'प्रभावधारणानुशानुनयामन्त्रणे ननु' इत्यमरः। यस्व स्वयं जनेषु मनुष्येषु निष्कृपो निर्दय कृपणभापणः कृपणस्य इन्द्रस्येव पर भापणे यस्य स तथा परपवाक् धर्तसे। 'कदर्यः कृपणइकिम्पधानमितम्पचाः इत्यमरः। स त्व भारमान जगदीश्वरं कथयन् प्रतिपादयन् कथं न लजसे न हणीयसे। न इति प्रश्ने । 'नु पृच्छायां विकल्प चे'त्यमरः ॥ ३॥ प्रहाद ने उत्तर दिया-- पुरुष स्वमावत: ही प्रा एवं मन की बुभुक्षा, पिपासा, शोक मोह और जरा के साय मरण इन या कमियों से ग्रस्त रहता है। इन कमियों के अतिरिक्त उसकी बुद्धि अन्यवसायात्मिा होती है। पुरुषों में भी असुर तो महान महकारी, परम मोभी एव दाम्मिक होता है। जो व्यक्ति (मसुर )प्राणियों में घोर निर एव क्षुद्र के समान बता स्वय है, वह अपने आपको जगदीश्वर बहते हुए क्यों नहीं जा बा अनुभव करता? ॥१३॥ दैत्यः-- चिच्चैतन्यं ब्रह्म चात्मा परात्मेत्येवं नामान्यात्मनोऽहं विजाने । तस्मादन्यः कोऽयमस्ति हरिस्ते भाकारचेन्नश्वरोऽनीश्वराल्यः ॥१४॥ चिचैतन्यमिति हे प्रहाद ! अहम् आरमनः चित्, चैतन्य, ब्रह्म, आरमा, परारमा इति एवमिस्र्य मिचानि नामानि नामधेयानि विजाने बानामि। नास्मादतिरिक्त मन्यत् किमपि ग्रह्मादिक वेधीत्यर्थः । स तु निराकाररवादुपासकस्यामभूतरवास नोपासनमतामहति । उपासनक्रिया हिचिद् गुणमपंचते, न कतय कर्म भवतीति भावः। ते नव मते तस्मादतिरिक्त अयमन्यः कः हरिः अस्ति यं व भजसीत्यर्थः। चेत् यदि स वदभिप्रेत परात्मा माकारः आकृतिमान् तदास मधरः रणिकः अस एवं अनीश्वरश्च अप्रभुश्च भाति ॥ १४ ॥ दैत्य ने कहा- हे प्रहार चिद, चैतन्य, आमा व परात्मा इन सबको नो में आत्मा का नाम समझता हूँ। उमसे मिन्न कौन है यह तेग हरि । यदि तुम्हारा हरि को साकार है तो निश्चय ही वह नश्वर एवं मनीवर है।। छन्द-शादिनी' । शारिनुक्तानी नगो गोपिनो ॥ १४ ॥ : अपि च- आत्मा ताबदसङ्गोदासीनोऽनाकृतिः शुद्ध आकाशकल्पः, तदन्यो हरिश्चेत् त्वलक्षपाती तर्हि शरीरित्यादनित्यः तयकदेशित्वाव्यापकश्च ।

द्वितीयोच्छासः। २५ तथैव स्मर्तव्य इति चेकिमस्माभिरपराद्धं यदस्मान्न भजसि । उक्तमेवार्थ प्रपञ्चयति अपि चेत्यादिना-आत्मेति । आत्मा तावदसङ्गः सङ्ग- रहितः 'असङ्गोऽयं पुरुषः' इति श्रुतेरित्यर्थः । उदासीनः रागद्वेपादिरहितः। लोके हि रागद्वेषादिरहित उदासीन उच्यते। अनाकृतिः आकृतिरहितः अशरीरीत्यर्थः। अत एव शुद्धः अविद्यादिदोपरहितः इत्यर्थः। आकाशकल्पः सर्वव्यापक इत्यर्थः। चेत् यदि त्वत्पक्षपाती तवाभिप्रेतः अन्यः कश्चित् हरिरास्ते तर्हि स शरीरित्वात् अनित्यः अशाश्वतः भवति। तथा किं च एकदेशित्वात् एकत्र स्थितत्वात् स त्वदभि- मतः परमात्मा अध्यापकः असर्वगः । यदि तादृशमपि तं त्वं 'स्मर्तव्यः चिन्तनीयः' इति वदसि तर्हि अस्माभिः किमपराद्धं कोऽपराधः कृतः यत् अस्मान्न भजसि । और भी, , आत्मा निरासक्त, उदासीन, आकाररहित, शुद्ध, आकाश की तरह व्यापक है । यदि तुम्हारा पक्षपाती हरि इससे भिन्न है तो निश्चित ही वह शरीरधारी होने के कारण अनित्य और सीमित देश से सम्बन्ध रसने के कारण अन्यापक है। और यदि ऐसे ही की उपासना करनी है, तो मैंने क्या अपराध किया है ? जो मुझे नहीं भजते ? प्रहाद:- सान्द्रानन्दं यदन्तः स्फुरति यदुदये दृश्यधीरस्तमेति स्वप्नो यद्वत्प्रबोधि विलसति च यदज्ञानतो विश्वमेतत् । रज्ज्वज्ञानादिवाहिर्यदपि सवितृवत् साक्षितां यातमेव ज्योतिर्नारायणाख्यं तदनु भगवतो नित्यमन्तः स्मरामि ॥ १५ ॥ सान्द्रानन्दमिति--सान्द्रानन्द घनानन्दं यद् ब्रह्म अन्तः सर्वस्यान्तरात्मनि स्फु- रति सञ्चरति । यदुदये यस्योदये दृश्यधीः दृश्यानां पदार्थानां धीः बुद्धिः यदा- र्थान्तरस्मृतिरित्यर्थः । अस्तमेति नश्यति । हृदि यदुदयानन्तरं वस्त्वन्तरप्रतीति- रेव न भवतीत्यर्थः । यद् वत् यथा प्रबोधे जागरणकाले स्वप्नोऽस्तमेति किञ्च रज्जोः अज्ञानात् यथा अहिः प्रतीयते, तथैव यस्य ब्रह्मणः अज्ञानतः एव एतत् विश्व दृश्यमिदं जगत् विलसति विराजते स्फुरतीत्यर्थः । यदाह श्रीशङ्कराचार्यः 'यद- ज्ञानतो भाति विश्वं समस्तं विनष्टं च सद्यो यदात्मप्रबोधे ।' यदपि यच्चापि ब्रह्म सवितृवत् सूर्यवत् साक्षितां साक्षात्सनद्रप्तृतां सर्वावभासकत्वमिति यावत् । यात गतम् । अहं तु नित्यं सततं तदेव अनु सर्वानुगतं नारायणाख्यं ज्योतिः अन्तः स्वात्मनि स्मरामि। प्रदाद-जो सबकी अन्तरात्मा में आनन्दरूप से स्फुरित होता रहता है, जिसके उदय (शन) होने पर अन्य पदार्थों का ज्ञान ही अस्त हो जाता है । अर्थात जिसके शान से सारा प्रपञ्च उसी प्रकार अस्त हो जाता है जैसे जागृतावस्था में स्वा पदार्थ; जिसके नृसिंहचम्पू। अशान से इस विश्व का उसी तरह स्पुरण होता है, जैसे रस्सी के शान से सपैया, जो सूर्य के समान सबका भासक है, मैं उसी सर्वान्तर्यामी भगवान् की नारायणनामक ज्योति का अन्तम्बरण में नित्य स्मरण किया करता हु ।। छदग्धरा ॥१॥ अपि च- य स्वसङ्कल्पमणिनिर्मितानेकप्रचण्डब्रह्माण्डानेक्कटाहकोदिपु चिदे- करसत्वेनारस्थितोऽपि परमात्माऽम्बुदावर्तलहरिवर.रणव इव, कट- कफेयूखुण्डलादिभि सुवर्णमिव, पन्नगनगमुरासुरादिभिरुयावचादियो- निमि' पृथगिवाभासते, स एव प्रकृतिमवष्टभ्य लीलया भक्तजनानु. प्रहगृहीतपिग्रहो चैकुण्ठकएठीरव' सर्वोत्कर्पण वर्तते । यथा मण्डलीकृत. मार्तण्ड एप एकदेशेऽवस्थितोऽपि विश्वप्रकाशयति तथा यत्र येनार- लोस्तिस्तेन तर दृश्यते तथा हरिरपि । अथ वस्तुमहिमाऽयलौकिक एर । यथा मूर्त योरेन स्पर्शान्यपाषाणयोमहिमतारतम्य प्रत्यासिद्धमेव । य रतिय परमारमा स्वमङ्कल्प एवं मगि तेन निर्मितानि रचितानि यानि प्रचण्डानि दुर्वहाणि ब्रह्माण्डमण्डलानि तान्येव कटाहा अयोमया पानविशेषा तेपा कोरिपु कोरिसरयापु महाण्डेप्पियर्थ । चिदकरसवेन ज्ञानघनत्वन श्रव स्थितोऽपि यथा एकोऽपि अर्णव सागर , अम्बुदो मेघ , आवर्तोऽम्ममा प्रम एहरिमहातरणतरङ्गो पीचि, एभियंथा पृथगिवाघमासते यपा एक्मपि सुवर्ण कटककेयूरकुण्डलादिमि कशानदण्टलादिभि पृथक्त्वेनावमासते द्योतते सय वेदमेकमपि ब्रह्माण्ड पनग संप, नगै वृक्ष, मुर देवे , अमुरै दनुनै उचावधा दियोनिभि नैकविघयोनिभिरिन्यर्थ । पृथगिय मिमित्र प्रकाशते । स एव वैकुण्ठकणीरव कदाचित् 'परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुपनाम् ! धर्म सस्थापनार्थाय मम्भवामि युगे युगे' इति स्मृनिमनुमान् दीरया नायासनव स्वामेर प्रतिमाष्टम्प भक्तजनोपरि अनुग्रहेण अनुकम्माविशेषण स्वीकृततत्त पदरीर मारकपंग यन्ते विजयते इयर्य । यया यवत् मण्डलीकृतमार्तण्ड प्रेरणाशविरक्षया धाग्वाँऽत्र माग्नम् , यर्नुलीमून सूर्यविम्बम् एकदेश एकस्मिन् स्याने अवस्थितोऽपि स्थितमपि सकल जगन प्रकारापनि तया किंच यत्र येन भवटोक्ति तौर सेन श्यते, तथा तथैव हरिरमि वैकुण्टकष्टीरकोऽपि सरंय घर्तते । अय अथ प वस्तुमहिमा अपि पदार्थस्वमागतिशयोऽपि अरोकिको विल- पण बस्तीति रोपउदाहरणार्य मूर्तयो करिनया स्थूलयो परिदिनयोरेव या स्पर्शान्यपापागयो स्पर्शस्य (पारम इति सोकरपातस्य मगिभेदस्य पापाग- द्वितीयोच्छासः। भेदस्य वा) तथा अन्यपाषाणस्य तदितरस्य पाषाणस्य महिम्नः उत्कर्पस्य तार- वम्यं तरतमभावः न्यूनाधिक्यं प्रत्यत्तसिद्धमेव सर्वेषां नः लोचनगोचरमित्यर्थः । और भी, - जो परमात्मा अपने संकल्प-रूपी मणि से निर्मित दन अनेक विशाल ब्रह्माण्ड स्वरूप कड़ाहों में चैतन्य रूप से एक-रस वहते हुए भी सर्प, वृक्ष, देव, दानव आदि ऊँची-नीची योनियों से उसी प्रकार अपने आपको भिन्न-भिन्न रूपों में प्रकट करता है, जैसे एक ही समुद्र अपने आपको मेघ, जल भंवर, एवं छोटी बड़ी तरंगों के रूप में व्यक्त करता है; जिस प्रकार एक ही सुवर्ण कारण, अगद, एवं कुण्टल आदि भिन्न-भिन्न रूपों में व्यक्त होता है, वैसे ही अपनी प्रकृति का सहारा लेकर लोलावश भक्तजन पर अनुग्रह-विधानार्थ शरीर धारण करने वाला वैकुण्ठ लोक का सिंह सबके ऊपर है। जिस प्रकार लघु-काय मण्डला. कार मार्तण्ड सीमित देश में स्थित रहकर भी निखिल विश्व को प्रकाशित करता है, और जिस प्रकार जहाँ-कहीं भी स्थित व्यक्ति उसे अपने ही समक्ष देखता है, वही स्थिति हरि की भी है। और दो वस्तुएँ आकार में एक होने पर स्वभाव में भी एक ही हो सो आवश्यक नहीं; उनकी महिमा विलक्षण ही होती हैं। उदाहरणार्थ, स्पर्श (पारस) मणि भी एक पत्थर ही है, पर अन्य पत्थरों से उसका तारतमिक माहाल्य प्रत्यक्ष ही सिद्ध है। दैत्यः- सुतारामे ग्रामे गिरिशिरसि घोपे तरुवरे पुरेऽरण्ये गण्ये वसति ननु यस्मिन्निलयने । श्मशाने वा चैत्ये हपदि च तडागे वसति वा हरिस्ते कुत्रास्ते वद सपदि तस्याधिवसतिम् ।। १६ ।। नुताराम इति- हे सुत ! पुत्र प्रहाद ! स तवाभीष्टो देवो हरिः श्रीविष्णुः कुत्र क्क आस्ते तिष्ठति सपदि शीघ्रमेव तस्याधिवसतिम् अधिष्ठानं वद कथय । स ते हरिः किम् आरामे उपवने, ग्रामे कस्मिंश्चिद् ग्रामविशेषे, तरुवरे अश्वत्यादिभेदे कस्मिंश्चिद् वृक्षश्रेप्ठे, गिरिशिरसि अथवा कस्यचिद् गिरेः पर्वतविशेषस्य शिखरे, कस्मिंश्चिद् घोपे आभीरपल्ल्याम् 'धोप आभीरपल्ली स्यात्' इत्यमरः । पुरे महानगरे इत्यर्थः । अरण्ये वने, अथवा गण्ये श्रेष्ठे कस्मिन्निलयने (निलीयतेऽस्मिन्निति व्युत्पत्त्या) श्मशाने शवदाहस्थाने, चैत्ये देवस्थाने यज्ञमन्दिरे वा। 'चैत्यो देवस्थाने यज्ञ- स्थाने देवतरौ देवावासे इत्यादि' इति शब्दार्थचिन्तामणिः । दृषदि पापाणे तडागे जलाशये वा वसति । अन्न वसतीति पदं सर्वत्र सम्बध्यते । दैत्य:-हे सुत ! तुम्हारा वह उपास्य हरि कहाँ रहता है ? शीघ्र उसका निवास-त्थान वताओ। क्या वह तुम्हारा आराधनीय उद्यान में रहता है अथवा ग्राम में, अथवा पर्वत के शिखर पर, अथवा आभीरों को वस्ती में,अथवा किसी महानगर में रहता है, अथवा वनप्रान्त नृसिंहवन्तः। में, भपका किसी श्रेष्ठ दमशान में, या देवस्थान में,या किमी शिला-पण्ड में, अथवा जगशय में? छन्द-शिरपरिणी है।॥१६॥ प्रहादः- पृथ्व्यां पायसि पारके च परने दिक्ष्वन्तरिक्षे पुनर् मार्तण्डे शशिमण्डलेऽस्ति सुतले यश्चेतनेऽचेतने । अस्त्यन्तर्वहिरस्त्यनन्तविभवो भावप्यभावेऽपि वा सर्वनास्ति सदास्ति किंबहुगिरा त्वयस्ति मय्यस्ति च ॥ १७ ॥ पृथ्व्यामिति-अनन्तविमव' अनन्तमामर्थः स विष्णु' पृथ्ट्याम् अवनी, पायसि जरे, पावकेऽमी, पवने वायी, दिपु कामामु, अन्तरिक्षे चायायिभ्योरन्तरे, मानण्ढे सूर्य, शशिमण्डले चन्द्रमसि, मुनले नागलोकप्रभेदे, 'मुतल इति नाग होकप्रभेटेट्टालिकावन्धे च' इति दार्थचिन्तामगिः, इत्यादि सर्वेष्यपि स्थानेषु वर्तते । किस विष्णु चेतने प्राणमृति भवेतने जडेऽपि जगति अन्तः सर्प- स्यान्तरात्मनि यहिः बाह्यप्रदेश चास्ति । भावे पदार्थमात्रे स तिष्ठति द्रप्यादि- पटकभिन्नेऽपि च स वर्तते एवं । स सर्वदा सर्वस्मिन् काले मर्वत्रच मास्मिन्देशे च वर्तते । कि बहतेन म चय्यप्यस्ति मध्यप्यस्ति । । वह अमीम वैभवसम्पन्न विगुतत्व सर्वत्र सदा विराजमान रहना है। पृथ्वी, बला, अग्नि, वायु, दिशा, आगाशवं भूलोक के मध्य, सूर्य, चन्द्रमा, नागन्गेक, चेतन, अचेतन, बाहर, मौतर, माय, अभाव इयादि सभी स्थानों में रमा हुभा है। अधिक क्या कहें, वह तुम में और मुझ में भी व्याप्त है। छन्द-शार्दूरविनीति ॥ १७ ॥ यदि देहिनोऽपि विष्णोः सरंगतत्वं मृपा पे । तदसापति जयुद्धे सदसः स्तम्भे न दृश्यते कस्मात् ॥१वा यीनि--यदि देहिनः देयारिंगोऽपि विष्णोः मृपा मिप्याभूनं मांगतस्वं सर्व- म्यापकव भूपे तत् सहि अतिजम्युरे! हे मन्दनन । अमो हरिः सदस' समायाः खम्भे स्कम्मे कस्मात् कुन न दृश्यते । अतः तस्य सर्वम्यापकरवं स्वदुरमुरा मिप्यवास्ति । दयारिवं सर्वव्यापम घेन्युमयं विसतिपिदमेतत् 'अनागो धमनाः शुभ', 'न सस्य कार्य करणं प विद्यते' इस्पादि श्रुत्या तस्य देहमतिपेयात् । दैत्य- ददि शरीरधारी विशु की सुनमायापकता सार रहे हो, नौ अरे मूर्ख। यह ने - द्वितीयोच्छासः। २६ वता कि वह इस सभा के स्तम्म में क्यों नहीं दिखाई पड़ता ? और यदि नहीं दिखाई पड़ता तो निश्चय ही तुम्हारी बताई हुई सर्वव्यापकता असत्य ही है। और यह बिलकुल स्पष्ट है कि जो देहयारी होगा वह सीमित देश में हो रह सकता है; उसकी सर्वव्यापकता कैसी ? यदि मूर्त पदार्थ सर्वव्यापक हो जाय, तब तो समझना यह चाहिए कि उस व्यापक तत्व के अतिरिक्त स्थानाभाववश और कोई है ही नहीं । छन्दः- आर्या (उपगीति) ॥ १८ ॥ प्रवादः अस्त्येव वस्तुजाते नास्त्यस्मिन् संशयोऽगुमात्रोऽपि । यत्र स्मरति हरिं स तत्र पश्यत्यवश्यममुम् ।। १६ ।। अस्त्येवेति--स ममाभीष्टो हरिः वस्तुजाते सर्वस्मिन्नपि वस्तुनि अस्ति । अस्मिन् अत्र विपये अणुमानोऽपि स्वल्पोऽपि संशयः सन्देहो नास्ति । यः यत्रापि हरि स्मरति स तत्रैव अवश्यमेव अमुं हरिं पश्यति। 'यो मां पश्यति सर्वत्र सर्व च मयि पश्यति । तस्याहं न प्रणक्ष्यामि स च मे न प्रणयति' इति गीतास्मरणात् । प्रहाद--- मेरा वह वान्छनीय प्रभु सब वस्तुओं में है हो-इसमें अणु-मात्र भी संशय नहीं है। जो जहां भी उसका स्मरण करता है वह वहीं उसे देखता है छंद:--आर्या ॥ १९॥ ततः सुररिपुरपि स्फुरितगुरुतरकरालकरकलितकरालकरवालः कोपकृशानुकलुषितनयनः शयननिलीनभोगः पदाहतिक्षोभितः. भुजङ्ग इव कल्पान्तकालकलितकलेवरोऽपरः कृतान्त इव श्रवणकटुपटुतरवहु- वचनरचनासंभूतसंरम्भारम्भः स्तम्भ विभेद । तत इत्ति-ततः तदनन्तरं स्फुरितः स्पन्दितः गुरुतरः अतिशयगुरुकः करालः भयानकः च यः करः पाणिः तत्र कलितः धारितः करालः भयानकः करवाल: असिः येन सः, कोपः क्रोध एव कृशानुः अग्निः तेन कलुपिते रक्ते नयने नेने यस्य सः सुररिपुः दैत्योऽपि शयनेन स्वापेन निलीनः अन्तर्हितः भोगः फणा यस्य सः पदाहत्या पादाघातेन क्षोभित उद्वेजितः भुजङ्गः सर्प इव, कल्पान्तकाले प्रलया- वस्थायां कलितं धारितं कलेवरं देहो येन स अपरः कृतान्त इव प्रतिकूलतया श्रवण- कट्नां श्रोत्रविदारकाणां पटुतराणाम् उपपत्त्या प्रौढानां बहुवचनानां प्रहादोक्तवहु- वाक्यानां रचनायाः सम्भूत उदभूतः संरम्भारम्भः क्रोधारम्भो यस्य स एतादृशः सन् स्तम्भ स्कम्भ विभेद विदारयामास । इति श्रीनिसिंहचम्पूकाव्ये द्वितीयोवासः।

नृसिंहचम्पू:। इसके अनन्नर उस सुरारि ने मामने बडे स्तम्भ को खण्ड खण्ड कर ही डाला निसने अपनी पहनी हुई विशाल एव क्रूरतर मुनाओं में वराल बरवाल धारण कर रस्सा था, निसी औरों से बोधाग्नि वरस रही थी। इस अवमर पर उमी, शरीर को समे कर सोनेवाले उस काले नाग की स्थिति थी, जोलन मार पर जगा दिया गया हो अथया उम यमरान की मी थी, तो प्रन्यकाल में मूर्तिमान हो उठा हो। वास्तव में हम ममय हिरण्यकशिपु को नो बोध का इतना नवदम्न वेग हो आया था, वह महादती कर्ण कुटु नथा पिना वो निरन्तर कर देने वाली युक्तिगर्भ वाक्य-रचना का परिणाम था। दिनीय उच्छवाम समाप्त अथ तृतीयोच्छासः अथ रसप्रसग तनादी भयानक 'स्यु समादिह भयानकरीद्रवीत्यादिना प्रथम उच्छवासे सायद् भयानका दीना सर्वेषां नवविधाना रसाना निरूपणप्रस्तावोऽभिहित । तदनुसारमिदानी मिह हतीये उच्चासे तान्तिरूपयति । तत्र प्रथम मयानकमाह- यहाँ से रस-प्रसह आरम्भ किया जा रहा है। सबसे पहल भयानर रस की ही चर्चा उठाई जा रही है । मयानका वर्णन कर रहे है-- भ्राम्यद्भूमागभीम सरतरसदिरागारयोरायता कल्पान्तोदामविद्युत्प्रचुररसनया सक्णिी लेलिहान । स्फारोद्यसिंहनादम्पुरितफणिफणाफूस्कृतिवस्तशत्रुर् दष्ट्रादुर्धवस्त्रो हरिरसुरसमास्तम्भ आविर्वभूव ॥१॥ माम्यादति--प्राम्यद्भूभागमीम' प्राम्यश्वासी भूमाग ग्राम्यद्धृभाग तेन मीम' भयानर , परतरम्मदिरामारधोरायता सस्ता नामतर य बदिरामार स्खदिर' पक्रकट 'सदिरो परकण्ट' इति कोष । तस्याहारवत् निधूमाग्निपिण्ड वद । घोरे भयानके दुर्दर्श इत्यर्थ , आयते विशाले दीर्घ अपिणी रोग्ने यस्य म । करपान्तोसमविद्युत्मारग्मनया रूपान्ते प्रत्ये उद्दामा दाम्न उद्ता अति धनति यावत् या विद्युत् सौदामिनी तावत् प्रचुरया विपुरया रमनया जिदया पदिशी ओमान्ती रेरिहान स्वदन् । सारोधसिंहनादारिता गिषापूरक निप्रस्तशत्रु-सारण विस्टन उद्यना उद्रच्छता सिंहनादन पचास्यगर्जनेन सरि सानों कम्भिवाना पनिटानां पराससस्य या फूल्नयस्लाभि परतो मीत तृतीयोच्छवासः । ३१ शत्रुर्हिरण्यकशिपुसंज्ञो यस्य स तथा। दंष्ट्रादुर्धर्षवक्त्रः दंष्ट्राभिः दन्तैः दुर्धर्ष दुरा- लाभ वक्त्रं मुखं यस्य सः। हरिः विष्णुः असुराणां सभायाः परिपदः दैत्यगोष्टी- भवनस्येत्यर्थः । स्तम्भे स्कम्भे आविर्वभूव प्रादुरासीत् । तत्र ददृशे इत्यर्थः । 'स्फारो विपुले विकटे' इति शब्दार्थचिन्तामणिः। 'अङ्गारो निर्धमाग्निपिण्डे' इति च । सर्वत्र हरिरस्ति इति प्रागुक्तप्रह्लादप्रतिज्ञामुपश्रुत्य 'सदसः स्तम्भे न दृश्यते कस्मात्' इति हिरण्यकशिपुकृताक्षेपपरिहाराय स्तम्भादेवाविर्भूतो हरिः सर्वैर्द- हो इति भावः। [फिर क्या, खन्म के फटते हो, शीघ्र ही वह हरि सुरारि के सभा-स्तम्भ को विदीर्ण करता बाहर निकल आया, जो वक्राकार घूमती हुई भौंहों के कारण अत्यन्त भयानक जान पड़ रहा था, जिसकी विशाल आँखें जोरदार लहकते हुए खदिर के अङ्गारे की सी दहक रही थीं, जो प्रलयकालोन चञ्चल एवं कराल विद्युत् की भाँति लपलपाती हुई जिहा से गलफड़ों को चाट रहा था, जिसने अपने विकराल सिंहनाद से शेषनाग को भी ऐसा थर्रा दिया कि वह भी भय के वश भीपण फूत्कार करने लगा। फूत्कार भी वह ऐसी थी, जिससे हिरण्यकशिपु त्रस्त होता जा रहा था; इतना ही नहीं दांतों को देसते हुए उसका वक्त्र अत्यन्त-दुर्धर्ष जान पड़ रहा था ।। छन्द- त्रग्धरा sss sas sil III ISSI SS Iss ॥१॥ . अपि च- उद्यद्वैकुण्ठकण्ठीरवकठिनतराखण्डचण्डाट्टहासं त्रासादासाद्य सद्यो गलितनिगडितं धावदेरावतस्य । दानाम्भो देवमम्भो दशनरुचिरथोदामसौदामिनीयं ग्रीष्मोऽप्याडम्बरं यन्नभसि तदभवद् गर्जितस्योर्जितं च ॥२॥ उद्यदिति-हरेः दैत्यगोष्ठीभवनस्तम्भाविर्भावानन्तरं कस्य किं वृत्तमभव- दिति कतिपयैः पद्यैस्तदेव दर्शयति । उद्यत उद्गच्छतः, सभास्तम्भे दृश्यमानस्ये- त्यर्थः, वैकुण्ठकण्ठीरवस्य वैकुण्ठः विष्णुः स एव कण्ठीरवः पञ्चास्यः तस्य नृसिंह- रूपस्य विष्णोः कठिनतरः क्रूरतरः अखण्डः निरन्तरः चण्डः प्रचण्डः य अट्टहासः महाहासः तमासाद्य प्राप्य श्रुत्वेति यावत् । त्रासात्सद्यः सपदि गलितं भयजनित- कार्यन स्वयमेव निवृत्तं निगडितं बन्धनं यस्मिन्कर्मणि तत् इति धावनक्रिया- विशेषणम् । निगडितमिति निगडयतेः करणार्थे नामधातो वक्तः । धावदैराव- तस्य धावश्चासौ ऐरावतः इति तस्य अभिधावतः ऐरावतस्य सुरकुत्रस्य यद् दा- मचरणमभूत् तदेव भूयस्त्वात् पर्जन्यवर्पणमभवत् । अथ किं च तस्यैरावतस्य दश- नरुचिः दन्तकान्तिः उहामा प्रचण्डा चासौ सौदामिनी विद्युत् अभवत् । श्रीप्ने निदायर्तावपि नभसि अन्तरिक्ष यदावरे धनरवोऽभवत् तत्तु गर्जितस्य ऐरावत- नृसिंहचम्पूर। चीस्कारस्य उर्जितं पृदिश्याभूदिति तात्पर्यम् । 'विद्युत् सौदामिनी तडित् इति कोप। भादम्यरम् धनगर्जितम् । 'हवं दर्प तूपस्वने भारम्भे पनगार्जिते आवमा रम्' इति शब्दस्तोममहानिधिः। गर्जितं वारिवाहादियनी भामरकुरे इति मेदिनी। परभे को पाइकर निकलते हुए उम विष्णु-सिंह के कर एवं कराल भट्टहास को मुनकर स्वरिप ऐरावत वस्नको उठा और इसीलिए शीघ्र ही सीकर सिसशरमाण चला । भागते समय उस ग्रीम्मकाल में भा जो धारा-प्रवाह मदधारा परम चली, पर वर्षाकालीन वृष्टि-सी जान पही। यमीकमी जो उसके दांतों की चमक होती, सोदाम रिजली की सी लगने लगी मोर उम समय गगन में जो मेघनाद मुनाई पडता मह अमल में ऐरावन के गर्जित का ही एक भोमस्त्री रूप था। 55551 ISS 155 13सरधरा ॥२॥ आटोपोत्कटकोटिदुर्घटसटासंघसंस्फोटित- ब्रह्माण्डोदररन्ध्रतामुपगवस्तारागणोऽयं हरेः । नो चेदावरणोदकं यदमितं मेघच्छलादुच्छलद्- धारासारसमुच्चयैरतितरां केनाध्वना वर्षति ।।३।। आटोपेति-यया अण्डभेदानन्तरं तरस्य जल छिद्रतः प्रसवति तदुपदेवेदं ब्रह्मा- पदमपि हरेराविर्भावसमये तरसटामवहाद् मिन्नं तारागणरूपदितो मेघच्छुसार वतीति निरूपयति । हरेः मृसिंहस्य इदं सटामटान्वयि कस्तया आटोपेन संरम्भैण इदमपि सटासमहान्ययि हेतुतया । उस्कटकोटिः तीव्रतरः दुर्घटन लोककसिंहरसुकरः यः सटानां सहसाणं तेन संस्फोटितं मिन्नं यद् ब्रह्माण्ड तस्प उदररन्नता मध्यच्छिद्रतामुपगतः प्राप्तः अयं तारागणः नापलि सर्वर- स्माभिरंश्यते इत्यर्थः । अर्थात् हरिणा यदा कुद्धेन स्वसटा एता' सदैवेदं ब्रह्माण्ड मिन्नं ग्रामाण्डमेनैव च इर्द तारागणरूपं चिद समजनि । वेभ्य एवं दिम्योपड. जलं मैपल्याजादुगच्छति । यघेवमिद ब्रह्माप्टं नैनामेरस्य सहि मेघच्छलाद पर्जन्यच्याजेन धारासारसमुश्य राशिमि. तत्पूर्पकमिन्यर्थः। उछलत उद्गायद अतितरामरयम् इदमावरगोदकमण्डारधादनजल केनाचना केन यामना पति ब्रह्मापदमिति कनपद प्रत्यामत्तिलम्यम् । नावपिप्यद्रियर्थः । यदि ये नाराम नृसिंह के भावेश विकासमा के शेवार एवं मसाधारण मंघर्ष से दिन काण्ड के सिद्ध रूप में अवतीर्ग न हुए होते, तो मेर के न्याज से भारत सम्मानपूर्वक निगलती हुई अपरिमित पब माण्ड को आइन करनेवाली यह भन्न- मिदिन परराशिमे बाहर निकट पाती! यह कल्पना यह है कि जिस प्रकार माह के भेदन से उसका अन्तनिहित जल दिनों m ३ - 3 ISI . तृतीयोच्छ्वासः। ३३ दारा बाहर निकल जाता है, उसी प्रकार नृसिंह की सट के संघर्षसे यदि यह ब्रह्माण्डरूप अण्ड छिन्न-भिन्न न हुआ होता, और ये तारागणरूपी छिद्र न हुए होते ते ब्रह्माण्ड का अन्तवर्ती जल आज बाहर-किस रास्ते निकलता? छन्द:--Sss us 115 SSI SSI Is शार्दूलविक्रीडितन् ॥ ३॥ चण्डाडम्बरभृड्डमड्डमरुकव्वानावधानाकुला क्षुभ्यद्भीषणभूरिभैरवरवैरुभीपिता द्यौरपि । खेलत्खेचरयोगिनी कलकलद्वेतालकोलाहलैः स्वं गर्भ विससर्ज तर्जितमतिस्ताराप्रपातच्छलात् ।। ४ ।। हरेराविर्भावे सति हिरण्यकशिपुनिधनसूचकं ताराप्रपातरूपमृत्पातं वर्णयति- 'चण्डेति-चण्डं प्रचण्डम् आडम्बरं विस्तारं बिभर्तीति चण्डाडम्बरभृत् । इदं ध्वान- विशेषणम् । स चडमडित्याख्यो डमरुकध्वानः । डमरकं वाचविशेषः । तस्य ध्वानेन शब्देन आकुला व्याकुला उद्विग्ना इत्यर्थः। शुभ्यन्तो ये भीषणा भयानकाकाराः भूरयः प्रचुरा भैरवाः शङ्करावतारभेदाः तेषां रवैः शब्दः उद्दीपिता उद्वेजिताः, खेलन्यः क्रीडन्त्य खेचर्यः (खे आकाशे चरन्तीति) योगिन्यः तासां तथा कल- क्लन्तः क्लमव्यक्त शब्दं कलन्तः कुर्वन्तः ये वेतालाः शिवानुचराः तेषां कोला- हलैरजिता मतिः यस्याः सा द्यौरपि धुलोकोऽपि ताराप्रपातच्छलात् नक्षत्रनि- पातव्याजेन स्वं गर्भ विसर्ज मुमोच किमुत वाच्यं दैत्यस्त्रियः स्वं गर्भ विससर्जु- रिति भावः। नृसिंहावतार के अनन्तर हिरण्यकशिपु की मृत्यु के सूचक चिह का वर्णन करते हुए कहते हैं- नृसिंह-गर्जन के परिणामस्वरूप गगन से तारागण टूट टूट कर धरा पर आने लगे। उन्हें देस (कवि पो) ऐसी कल्पना सूझती है कि मानों ये तारागण स्वर्गरूपी नायिका के गर्भ हों, जो भीषण रव-श्रवण के फलस्वरूप नीचे गिर पड़े हों। यह गगनरूपी नायिका स्मर के प्रचण्ड एवं व्यापक मट-टमड्-शब्द को सुन कर व्याकुल हो गर्दै सख्या में अनेक भयंकर एवं विक्षुब्ध भैरववाद्य के निनाद से पूर्णतः भीत हो उठी, आकाश में कीटा-परायण योगिनियों एवं कलकल करने वाले वेतालों के पोलाहल से उसकी बुद्धि अपने आपे में न रह गई। गर्भपात का कारण उस गगन-नायिका की यही स्थिति थी। अलंकारः कैनवापइति । SSSS 11SISI Its ISS SSI Is शार्दूलविक्रीडितम् ॥ ४॥ अपि च- यल्लोलकालकरवालकरालजिह्वा- प्रोद्भूतभीतिभरमंगुरभावनेन । . ३०च० ३४ नृसिंहचम्पू । अद्यापि विद्युदपि मेचकमेघमालाम ईपत्प्रदर्शितत्तनु पुनराविशन्ती ॥५॥ यदिति । यम्य मिहम्य, काल यम इव कालस्येति वा, करवाट असि तदुवकराला मीपणा निहा इति कालकरवाटकरालजिरा, लोला चपला घासी कालकरवात करालजिह्वा, तस्या प्रोमून उत्पन्नो यो भीति-मर भीस्पतिशय तेन यद् भगुरभावन मेघे निलयनार्थ चमनया स्वतारीरसकोचन तेन, श्यन्ते हि लोके स्वल्पे आश्रये भयान्निटीयमाना पसतया स्वशरीर सकोषयनया। अद्यापि अधुनापि ईपरस्वल्प प्रदर्शिता उदभासिता तनु स्वरूप यया सा विद्युत् तडिदपि पुन मेचकमेघमालो कृष्णजलदपद्धिम् आदिशन्ती प्रविशन्ती अस्मा 'भिाश्यते इति शेप । 'मेचकस्तु मयूरस्य पदकरयामले पुमान्' इति मेदिनी । 'कालो मृतौ महाकाले समये यमकृष्णयो' इति । काल के वराल करवाल की भाँति ग्मिवी लपम्पाती निहा को देख कर ] विद्युत् को इस प्रकार मय का अतिरेक हो रहा कि आज भी वह [ पूर्ण रूप से देर तक बाहर नहीं रह पाती और अपना इल की सा झलक दिखाकर अपने [मायम स्वरूप] कृष्ण लदावरी में शरीर-सोच-पूर्वर चर प्रवेश परती जाती है-सारा संसार से देखता है। धुन्द - H ISI ISIS वसन्ततिलका ॥५॥ तद्नु दनुतराजप्रचुरतरकावालनि तुरघातसभेदोद्भूतस्पुरत्तटत- टारायवर्निमनिरनिकानरनिरासुरचमूसमूहाद् उदयशिखरिशिसराा. खराशुरिव उपचलतनु, अरणिमयनादपिरिव तीनतर', रम्मास्तम्मात् कपूर इव कमनीय सुरद्वेषिवेश्मनि सुरश्मिकाश्मीराश्मनिर्मिवस- भास्तम्भगर्भान्नरहरिरानियसीत् । तत प्रलयकाल नलदपटलर्नित- विस्फूर्जितमिर भयरुर, भूरिभरोम'कार इस गभीरतर, भयभरमगुर- भुजगराजविलोलमोलिस्थलान्दोलितभूमण्डलोच्चलल्लोलजलकल्लोलच्छ- लाजलनिधि पुलझयनिक चिरतरयागनिद्रामुद्रितनयन जलशयनमस्मा- नागरयन्निर कम्पितकैलामपेलिविलामिनः पुरहरस्य सहारभ्रममुत्पाद- यनिय नृसिंहविहितसिंहनादोऽप्यसएडब्रह्माएटोदरमापूरयाचवे । तविति- तदनु तदनन्तर मुरदेविवरमनि हिरण्यकशिपोगृहे मुररिमकारमी- राश्मनिर्मितसमास्तम्मगमात्, मुररिममि मुरुचिभि कारमारारममि सगरमीर दशोद्म पापागै निर्मितस्य रचिनस्य ममास्नग्मस्य गोष्टीमवनस्तम्भस्य गर्भाद मायात् नरहरि श्रीनृसिंह भागिरामीत् प्रादुर्यमूव । कतारस्वरमादि .

३५ . तृतीयोच्छासः। त्याह- दनुजेति । दनुजराजस्य हिरण्यकशिपोः प्रचुरतरा अतिवहुला ये कर- चालस्यासेः निष्ठुराघाताः प्रहाराः तेषां यः संभेदः स्तम्भे संवन्धः तस्मादुद्भूतः उत्पन्नः स्फुरन् च चलन् देशान्तरे व्याप्नुवनिति यावत् । यः तटतटारावः तट- तटाशब्दः तेन तर्जिताः भसिताः निर्जराणां देवानां निकराः समूहा: नराणां मानां किन्नराणां देवयोनिविशेपाणाम् असुरचमूनां राक्षसानीकिनां च समूहाः वृन्दानि येन तस्मात् । कस्मात् क इव कीदृशश्च नरसिंहः-उदयशिखरिशिखरात् उदयाचलशृङ्गात् खरांशुः सूर्य इव उज्ज्वलतनुः तेजस्विशरीरः अरणेः काष्ठ- निर्मितस्य अग्निसाधनयन्त्रस्य मथनात् संघर्पणात अग्निः वहिरिव तीव्रतरः प्रचण्डतरः । रम्भास्तम्भ इवेत्युपमितसमासः । तस्मात् कर्पूर इव घनसार इच कस- नीयः कान्तियुक्तः सुन्दरः। भरणिः ऋच्छति प्रापयत्यग्निमिति काष्ठनिर्मितस्या- ग्निसाधनयन्त्रस्य नामधेयम् । ततः-आविर्भावानन्तरं नृसिंहविहितसिंहनादः नृसिंहेन विष्णोरवतारेण नर- हरिणा विहितः कृतः सिंहनादः सिंहगर्जनमपि ब्रह्माण्डोदरं सर्व ब्रह्माण्डमण्डल- • मापूरयांचक्रे अपूरयत् । क इव कीदृशः किं कुर्वनिवेत्याह-प्रलयेति । प्रलय- कालस्य जलदपटलस्य मेघबन्दस्य गर्जितं ध्यान इव विस्फूर्जितं वज्रनिर्घोष इव च भयंकरः भीषणः। गर्जितान्तविस्फूर्जितयोः समाहारद्वन्द्वः। भूरीणां प्रभूतानां मेरीणां बृहड्ढक्कानां भांकार इव गभीरतरः गंभीरतरः । भांकार इति ढकाशब्दानु- कृतिः। भयभरेति-भयभरेण भयातिशयेन भंगुराणि भज्यमानानि संकुचन्ति इति यावत् । यानि भुजगराजस्य विलोलानि मौलिस्थलानि फणासहस्रं तैः आन्दोलितं चालितं यत् भूमण्डलमवनिमण्डलं तस्मादुच्छलत् निर्गच्छत् यत् लोलं चलं जलं सलिलं तस्य कल्लोलानां तरंगाणां छलात् व्याजात् जलनिधिं सागरं 'पुलकयन् इव रोमाञ्चयनिव, पुलकिनं करोतीति विग्रहे ण्यन्तात् शता। चिर- तरेण अतिचिरेण योगनिद्या मुद्रिते निमीलिते नयने नेत्रे येन तं जलशयन- मनन्तम् (हरि) अकस्मात् अतर्कितमित्यर्थः। जागरयन्निव निद्राक्षयं प्रापयन्निव । कम्पिते सिंहनादेनेति शेषः, कैलासे या केलिः सा कम्पितकैलासकेलिः । ' तस्याः विलासिनः विलसनशीलस्य पुरहरस्य त्रिपुरान्तकस्य हरस्य संहारभ्रम प्रलयकालप्राप्तिसंदेहम् उत्पादयन्निव जनयन्निव । अस्मिन्प्रकरणे प्रकृतावस्थो भगवान् नरहरिभयानकरसस्यालम्बनविभावः, तदीया भ्रूजिहाचेष्टासटाब्रह्माण्ड- , मेदनसिंहनादादयः उद्दीपनविभावाः, त्रस्तभुजगराजैरावतधुविद्युतसुरासुरज- गतोऽत्र वर्णितास्तास्ताश्चेष्टा अनुभावास्तैरभिव्यक्तं जगतो भयं स्थायिभावोऽत्र रस- रूपतया आस्वाद्यते । संचारिभावास्तु सम्भविन आश्चर्यजाड्यमूर्छादयोऽनुक्ता अपि उक्तैर्विभावादिभिरातिप्यन्ते इत्यवधेयम् । इसके पश्चात् उस सुरारि के गृह में देदीप्यमान काश्मीरी शिलाओं से बने हुए - .

नृसिंहचम्पू । सभा-रसम्म से नरहरि प्रकट हो गए । यह वही सम्म था, जिस पर दनुरा हिरण्यकशिपु ने अपना तलवार से प्रचुर एव कर वार किया था और इस बार से हो वाले विद्यारण के परिणामस्वरूप जो तह-तड की ध्वनि हुई, उससे सारे देव-गण, मनुष्य विनर, एव असुरों की सेना त्रस्त हो उठी। उस सम्म से प्रकट होते हुए नरहरि के शोमा उदयाचल से उद्रित होते हुए यातिमान् शरीर वाले भानु की सौ दुर, अश्व मराग-मथन से समुदत प्रचण्डसर अग्नि-ज्वालाकी सी दुर, अथवा मौले के साम! जनित बमनाय यपूर-राशि सी हुई। पिर तो नृसिंह के नाद ने भी असण्ड ब्रह्माण्ड के मध्यवर्ती भाग को परिपूर्ण के गिया-अर्थात् सारा गगन पहरा दिया। प्रतीत हुआ जैसे कि वह नाद प्रत्यकालीन में राशिका गर्जन ही हो, अथवा पन का निर्घोष हो। इतना भयर था वह नाद इनना गभीरतर वह नार था, नेमे अनेक भेरी बापों का मिलित पोप हो। [इस नाव क सुनपर भयातिरेक्वा मचित होते हुए पनाग का पणामण्टल पनि हो गय और पिर तो उसा के सहारे रिकी हुई सारी पृथ्वी झूल उटी पृथ्वी के चलने का पल दुना वि समुद्र की रोल-जलमयी तरछे उछल पा उछलनी हुइ तरङ्गो को देख यह सम्भावना होने लगी मानों ये तरङ्गे समुद्र की पुलवावली हो, जो मय के शर मास्पिक माव के रूप में याहर निकल पडी हो। एमा प्रतीत हुआ मानो यइ नाद चिर कार से योगनिद्राश निमीलित नेत्रों वाले क्षीरशायी भगवान् को अकस्मार झा रहा हो अ५वा ऐमा जान पडा कि नाद-वरित क्लास में शेडा-परायण त्रिपुराहि प्रलयकाल के आमन की भ्रान्नि उत्पन्न कर रहा हो। अथ वीररस- तत स्तम्भोद्भताभुततमशरीर नरहरिम् पुन सायाद्वीक्ष्यामृतमरणहेतुर्विधिवशात् । स्फुरद्गविपद् दिवि दिरिपदासादितगदो गदामादायोच्चरवददमराराविरचिरात् ॥ ६॥ तत पति-तत तदनन्तर विधिवशात् देवाशात् । 'विधिविधाने देव च इत्यमर । दिवि दिविपदासादितगद दिवि स्वर्ग आसादिव सम्पादित दिविषय देषु गदो भयननितज्वरादिस्पो रोगो [यन स । अमराराति' मुरारि । हिरण्यकशिपु स्तम्भोद्भूनाद्भुततमशरीर स्तम्भादुभूतम् उत्पमम् अद्भुतत शरीर करेपर याय त नरहार नृसिंह माशात् प्रत्यक्षमय वीक्ष्य रष्टा अवदत् । पुरद्गों कर्षात् पुरन् प्रादुर्भयन् यो गर्व शौर्यामिमानस्तस्योकर्ण उद्देवात् , अचिरात् तकालमेर गदामादाय हरिजिघांसया गदामुपम्य उई नावरण पुन अवदत् थामत् । प्रसाद मापुसार काही प्रह - इसके पश्चात्, तृतीयोच्छासः। ३७ पुनः शब्दप्रयोगः । 'गदो भ्रातरि विष्णोः स्यादामये नाऽऽयुधे गदा' इति मेदिनी । अमृतमरणहेतुरिति अमृतमेव श्रीविष्णुदर्शनमेव मरणस्य हेतुर्यस्य । श्रीविष्णुदर्शनं प्राप्य सर्वोऽपि अमृतो भवति । 'तमेव विदित्वाऽतिमृत्युमेति' इत्यादिश्रुतेः । भन्न तु विष्णुना स हतः सन्नमृतेति तद्विपरीतमेव जातम् । वीररस:- अदृष्टवश स्वर्ग में देवताओं को भी भीति-ज्वर उत्पन्न करने वाले उस नुरारि ने जब स्तम्भ से प्रकट अत्यन्त आश्चर्यजनक शरीर वाले नरहरि को प्रत्यक्ष देखा तव उसका अभिमान जाग उठा और उसी गर्वोद्रेक में शीघ्र ही अपनी गदा तान कर गरजते हुए स्वर में उसने कहा-प्रस्तुत श्लोक में हिरण्यकशिपु का विशेषण बहुत ही सारगर्भ है, अतः उसकी व्याख्या स्वारस्य के उद्घाटनार्थ अलग से लिखी जा रही है । हिरण्यकशिपु अन्त मरणहेतु था । अर्थात् यहाँ अमृत ही उसकी मृत्यु का कारण बना। भगवान् विष्णु स्वयं अमृत स्वरूप है। [अथवा उनको प्राप्त कर के लोग अमृत हो जाते हैं इसलिए औपचारिक रूप में 'आयुर्घतम्' इत्यादि की भाँति भगवान् को अमृत कहा जा सकता है। ] अस्तु । कहने का अभिप्राय यह कि जिसे प्राप्त कर के अन्य लोग अमर हो जाते हैं, उसे ही प्राप्त कर के यह मृत हो गया। छन्दः-15ssssmsu SIS शिखरिणी ॥६॥ ततः सोत्साहं हरिरपि- किं नासन् भ्रातृपूर्वास्तव दनुज पुरा ये पुरारेरशक्यास् तेपा दोर्दण्डकण्डून किमु शममिता मत्प्रतापानलेन । तत्र त्वं भोः कियान् वा कथय कथमथ प्राणनं तेऽतिगर्व सर्वं सर्व सभायां प्रथयसि भुजयोः किं मृपा भाषणेन ॥ ७ ॥ किं नासन्निति-हे दनुज ! हे दानव पुरा प्राक्काले ये पुरारेः .शिवस्यापि अशक्याः धर्षयितुमशक्या इति यावत् । तव भ्रातृपूर्वाः तव भ्राता हिरण्याक्षः पूर्व: आदिउँपां ते तथा। हिरण्याक्षादय इति यावत् । न आसन् ? भासन्नेवेत्यर्थः । किं तेषां हिरण्याक्षादिदैत्यानां दोर्दण्डकण्डः भुजदण्डकण्डूयनं मम प्रतापवहिना न शमं शान्तिमिता प्राप्ता । अर्थात् किं त्वमेतत्सर्वं नाभिजानासि यत, स्वत्तोपि अधिकवीर्यशालिनः पूर्वमपि नैकधा समभूवन् तेषां च कण्शमनार्थं तत्तत्काले मयैच मयलोके अवतीर्णम् । तत्र तेषां मध्ये भोः त्वं कथय कियान् वा कियाने- वासि तव का क्षमता। अब यदि त्वं तेभ्योऽपि वली तदेति शेपः। ते तव अति- गर्व यथा स्यात्तथा कथं सर्व परिपूर्ण प्राणनं जीवनं वर्तते। यदि त्वं तेभ्योऽपि चली स्यास्तदा पूर्वमेव हतः स्या इति न तव सर्व जीवनं स्यादिति भावः । सभायाम् अस्यां संसदि भुजयोः स्ववादोः सर्व सकलं वीर्यादिकं प्रथयसि विस्तारयलि -- ३८ नृसिंहचम्पू। उद्घोषयमि एतेन मृपा मिप्याभापणेन किम् ? न किंचित् प्रयोजनं सापयितुं शाश्यामिति भान । दैत्यः- किं भीपणेन वपुपा किमु गर्जितेन किपलियतेन किमनेन बिभेति वीरः । किं श्वापदानि न वसन्ति गिरेर्दरीपु कि तैर्गिरिर्गुरुभयं समुपैति सिंह ॥ ८॥ किमि हे सिह हे नृसिंह । अनेन ते भीपणेन भयजनकेन वपुपा देहेन किम् ? न किंचिसाध्यमित्यर्थः। एतेन ते गर्जितेन किम् । अनेन ते परिगतेन बहुभाषितेन कि, माशो वीर. अनेन सर्वेण प्रागुक्तन बिभेति किं नेत्यर्थः। कि गिरेः पर्वतस्य दरीपु गुहामु श्वापदानि हिसपशुवो व्याघ्रा वा न यमन्ति ? वसन्स्ये- चन्यर्थ । तथापि कि ते, गिरिदरीमाधितै श्वापदः न किंचिरसाध्यमित्यर्थः । एत- देवोपपादयति-गिरिगुरमय समुपैति । इद काकुवाक्यम् । ततश्च तेभ्योऽपि गिरिः गुरुभयं न ममुपैतीत्यर्थी लभ्यते । दत्य ने कहा- यह क्या भीषण आकार दिसा रहे हो? इस तुम्हारे जैन से का होना है। तुम्हारी यह दावाद निरक है । हे सिंह । क्या मेरे जैसा पोर इन सब आदम्बर्ग में डर जारगा। पर्वन को गुहाओं में क्या बड़े बड़े हिंस जन्तु निवाम नहीं करते तो पर्वन उनमें डर जाता है क्या? छन्द'--5555Iss. ISSISIS नग्धरा ॥ ७॥ नदनन्तर उत्माह में झूमते हुए उम दानव को हरि ने भी वहा- है दाना ! महाकाल शिव भी जिनका कुछ न विगाह याये थे, उन हिरण्याक्ष मे मसदानवों मे अगेत मूना है ? क्या उन मुजाओं दो गुनगरट मैरी प्रतापाग्नि में नहीं झुग्मदा गई तो जब यमे वैसे दानवों का सर्वनाश हो गया, तो उनके बीच तुम्हारा क्या गगना ई ? दौलो। यह तुम्हारा जीवन पिर इतना गमय क्यों हो रहा है। अपनी भुजा काल सभा में [ क्या ] वशार रहे हो। म व्यर्थ वस्ताद से क्या होना नाना है। इन्द'-CBI 21.55 बसन्ततिलया।। ८॥ अपि च- युमत्पड्गस्य तेदण्य परिणमति समास्तम्भमभेदहेतोः दोय लोकशोकमथितमय बलं बालपातकगम्यम् । रे! म्यात्मानं निजानन्नपि यहमि मया यत्नान्तेन साधं स्पर्धा तस्मात्वदन्यो ननु दनुजकुले नास्ति पितानशूरः ।।६।।

तृतीयोच्छासः। ३६ युष्मदिति-किं च हे दानव ? युष्माकं त्वद्वर्याणां खड्गस्य असे तेचण्यं निशितत्वं सभास्तम्भसम्भेदायैव परिणमति फलति । अत्र सम्यग्भेदनं सम्भेद इति योगायों निवतितो न तु सम्भेदो मेलनम् । त्वविधानामसुराणाम् आयुधानि केवलं सभास्तम्भायेव भेत्तुमर्हन्ति, युस्माकं दोप्णां भुजानां वीर्य पराक्रमः लोक- शोकप्रथितं लोकानाम् अनागसां मानां शोकाय शोकनिमित्तं प्रथितं स्यातम- स्ति । अथ अथ च युप्माकं शारीरं बलं बालघातेन एकेन एकया बालहत्यया एव गम्यं विज्ञेयं वर्तते। असमर्था एव वालेभ्योऽपि विभीय तद्धत्यां कुर्वते इति भावः। रे नीच ? स्वात्मानं स्वसामर्थमित्यर्थः । विजानन्नपि विदन्नपि त्वं यत् यस्मात् मया कृतान्तेन यमेन सार्ध सह स्पर्धा सपं वहसि तस्मात् ततः कारणात् मन्ये दनुजकुले दानवान्ववाये त्वदन्यः त्वते कश्चिदपि विज्ञानशूरः ज्ञानपण्डितः नास्ति इत्युपहासः। और भी- हे दानव ! तुम्हारे वर्ग वालों की खड्गशक्ति का अवसान सभास्तन्म के विदारण में होता है। अर्थात् तुम लोगों को शक्ति इतना ही कर सकती है। तुम लोगों की शक्ति की प्रसिद्धि इसी बात में है, कि वह निरपराधों को शोक-व्यथा-उत्पन्न करती है। एक बालक की हत्या से ही तुम लोगों के बल का पता चल जाता है। तुम्हारे पास इतनी ही शक्ति है कि एक बालक की हत्या कर सको। सारांश यह कि बालक से भी डरते हो, नभी तो शद्धित होकर उसे मारना चाहते हो। इस प्रकार अपने आप को अच्छी तरह समझते हुए भी जो मेरे जैसे महाकाल से स्पर्धा कर रहे हो, तो इससे व्यक्त है कि इस दानवकुल में तुमसे बढ़कर कोई पण्डित नहीं हुआ? छन्द:-SSS IS stmississ Iss स्रग्धरा ॥९॥ हरेरुदारां गिरमाकलय्य रूपं च तस्योग्रतरं निरीक्ष्य । गदां विसृज्याथ सुरारिवर्यः कृपाणपाणिः पुनराजगाम ॥१०॥ हरेरिति-ततः सुरारिवर्यः हिरण्यकशिपुः हरेः विष्णोः उदारामर्थमहती गिरं वाणीमाकलय्य श्रुत्वा तस्य उग्रतरमत्तिभयावह रूपं च निरीक्ष्य वीक्ष्य अथानन्तरं गदा विसृज्य त्यक्त्या कृपाणपाणिः कृपाणः पाणौ यस्य स सन् पुनराजगाम हरेरग्रे युद्धार्थमागमत् । 'उदारो दातृमहतोः' इत्यमरः । 'प्रहरणार्थेभ्यः परे निष्ठासप्तम्यौ भवतः' इति पाणिशब्दस्य परनिपातः। इसके बाद वह दानवराज भगवान् की इस अर्थगर्भ वाणी को सुन कर और उनके भयंकर रूप को देख कर गदा को एक तरफ रख तलवार हाथ में ले युद्ध के लिए संमुख था डटा। छन्द:--151 ss is उपेन्द्रवजा ॥१०॥ - -- नृसिंहचम्पू: युद्धाटोपचपेटपाटिततनुं त्रुट पकिरीटसुटद्- रत्नाकीर्णरणागणे निपतितं मूर्छाभ्रमल्लोचनम् । हुंकारस्फुरिताधरं श्लथकरं केशमहाकर्षणाद् दैत्यं जानुयुगे दधार नृहरिः सर्प गरुत्मानिव ॥११॥ युद्धोति-अथ नहरिः गल्मान् गरुड' सर्पमिव युद्धाटोपेन संग्राममरम्भेण यश्नपेटस्तेन विस्तृतालिकेन हस्तेन (चपेटा इति भाषायाम् ) पाटिता लोप्टेन फलमिव विदारिता तनु शरीर यस्य तम्। 'स्त्रियां मूर्तिस्तुनुस्तनू" इत्यमरः । 'चपेटो विस्तृताहुलिके हस्ते पुसलेऽपि च' इति शम्दस्तोममहानिधिः। ग्रुटपदिति- ग्रुटयत दिशात् श्रीिटात् मुकुटात् स्फुटदिः पतगी रन आकीर्ण च्याप्ते रणागणे निपतित मूर्खया मोहन भ्रमन्ती अनवस्थिते लोचने मेरे यस्य तम, हुंकारेण स्पुरितोऽधरीष्टो यस्य तम् , श्लयो शिथिली करी पाणी यस्य तं दैत्यं दानवं हिरण्यकशिपु केशप्रहाकर्षगात् केशेषु गृहीत्वा आकर्षणेनेग्यर्थः। जानुयुगे उम. योर्जान्योर्मध्ये दधार धारयामास । जिस प्रकार गर सर्पको मारपर अपने चगुल में कर लेता है, उसी प्रकार भग वान् नृसिंह ने भी उस हिरण्यकशिपु को बाल पक्हकर पमोर लिया और अपनी दोनों नानुओं के बीच पर दबाया, जो पहले से ही चूर-चूर किरीर से दिली होते हुए रत्न मय रमाइग में मारकर गिरा दिया था, संग्राम के भावेश में चपेटों से जिसका शरीर फार दिया गया था, मूल्यों के उद्भव से जिमी औखे नाच रही थीं, दुकार मुस से बाहर नहीं निकलता था, अत. उसकी अभिव्यक्ति के लिए जिसके अपरोड अमी पटक हीरा थे और जिमत्री मुबाएँ शिथिल पढ़ गई थीं। छन्द'-sits is HSSSISIS शार्दूलविकीरितम् ॥ ११ ॥ ततः समन्ततः समभिव्यातमच्युतमच्युतमवेक्षमाणः पाणिना कृपा- णमादाय विदशरिपोऽपि मोक्षमपेक्षमाण इव अधोक्षजसमक्षमागत्य रिहितगहनतरनादः सादरं हरिहरिहननाय करं व्यापारयामास | ततः समरसमारम्भसंभूतयोररमोत्साहस्कुरितप्रचण्डदोर्दण्डमण्डितप्रतापनपन- तेजः प्रभाजनितासगण पुरः पुरहरादिदुर्धामपं गिरीशगिरिगीर कृतमंप्रामचापलमपि सुररिपुं पुरोऽवस्थितं मशकायमानम्मन्यमानो मनुजकेसरी पटुवरकरचपेटेन पाटिनगन् । ततः सायमस्तगिरेरधस्तात् पनन्तं पतङ्गमिर पुरस्तान् पतित हिरण्यकशिपु स्वजान्योरुपरि चकर्प। सन नि-ततस्तदनन्तर विदशविरः देय. स हिरण्यकशिपुरपि (विद- गानां देवानां विपक्षः सानु.)ममन्तता परितः सममिन्यात मर्या परिपूर्णम तृतीयोच्छ्रास बच्युतम स्वरूपच्युतिर्विक्रिया तद्रहितम् विष्णुमेव, अवेक्षमाणः परिपश्यन्, मोक्षमपवर्गमपेक्षमाणः अभिलपशिव अधोक्षस्य श्रीविष्णोः समक्ष.प्रत्यक्षमागत्य. उपगम्य पाणिना हस्तेनं कृपाणमादाय असिमुद्यम्य हरेः हननाय विष्णुं हन्तुं विहितः कृतः गहनंतरः गभीरतरः नादः ध्वनिः येन सः सादरं करें हस्तं व्यापार- यामास चालयामास । ततस्तदनन्तरं मनुजकेसरी नृसिंहः समरस्य आयोधनस्य समारम्भे प्रारम्भे सम्भृतेन उत्पन्नेन वीररसोत्साहेन स्फुरिताभ्यां कम्पिताभ्यां प्रचण्टाभ्यां दोर्दण्डाभ्यां भुजदण्डाभ्यां मण्डितस्य अलंकृतस्य प्रतापः तपन: (सूर्य) इव तस्य तेजसः प्रभया कान्त्या जनितेन उत्पादितेन अखर्वण गर्वण पुरोऽवस्थितं समक्षे स्थितं पुरहरादिवत् शिवादिवत् यद्वा पुरहरादिभिरपि दुर्धपः दुरभिभवनीयः अमर्पः क्रोधो यस्य तं गिरीशस्य हरस्य गिरिः कैलासः तद्वद् -गौरवं गरिमा यस्य तं कृतं विहितं संग्रामस्य युद्धस्य चापलं येन तं तादृशमपि सुररिपुं दैत्यं तं मशकायमानं मन्यमानः मशक इवाचरन् मशकायमानः तं मन्य- मानः मशकवदाचरन्तं तं दैत्यं मन्यमानः, तं मशकाय मत्वेत्यर्थः, स विष्णुः पटुतरेण दृढतरेण करचपेटेन पाटितवान् जघान ! ततः तदनन्तरं सायं सायंकाले अस्तगिरेः पश्चिमाचलस्याधस्तात् पत्तन्तं निपतन्तं पतंगमिव सूर्यमित्र 'पतंगः पक्षिसूर्ययोः' इत्यमरः । पुरस्तात् स्वाग्रे पतितं तं हिरण्यकशिपुं स्वजान्वोरुपरि चकर्ष आकृष्टवान् । 'जानुशब्दो नपुंसके पुंसि च' 'उरुजंचयोर्मध्यभागे' इति शब्दस्तोममहानिधिः । मशकायमानम् इति मशक इवाचरतीति विग्रहे 'कर्तुः क्यड्सलोपश्च' इति क्यङ् । तस्माच्छानच । भन्न प्रागुक्ते संदर्भ नृसिंहदैत्यराजयोपरस्परं युद्धाय समुल्लाहः स्थायिभावः । परस्परमपेक्ष्य स्वस्वाभिमुखस्थितः शत्रुः आलम्बनविभावः। तस्य शस्त्रोद्यमन- भ्रमणादयोऽधिक्षेपवाक्यानि चोद्दीपनविभावाः । स्वकर्तृकाणि च तान्येवानुभावाः । स्तम्भोद्भूताद्भुततमशरीर मिति आश्चर्यम् , 'स्फुरद्गर्वोत्कर्षादिति गर्वः, "यत्कृतान्तेन साध स्पर्धा'मीति ईर्ष्या, 'मूभ्रिमल्लोचनमिति सूर्छा, 'प्रताप- तपनतेजः-प्रभाजनिताखर्वगणे ति पुनर्गर्वः 'पुरहरादिदुर्धर्पमित्यमर्षः एते संचारिभावाः। इत्थमन्न प्रागुक्तविभावादिभिरभिव्यक्त उत्साहो वीररसरूपता- मापद्यमान आस्वाद्यते । चात्र न विस्मर्तव्यं यत् अन्न 'सोत्साहमिति स्वशब्देन स्थायिभावस्यो- "पादानं संचारिणां च अद्भुतादीनां नौचित्यमावहति । तदुक्तं रसदोपनिरूपणा- वसरे साहित्यदर्पणे-'रसस्योक्ति स्वशब्देन स्थायिसंचारिणोरपि' इति । इसके पश्चात , वह सुरारि अपन स्वरूप में स्थित विष्णु को हो चारों ओर देखता हुआ मोक्ष की अभिलापा से मानो उनके समक्ष पहुँच गया और हाथ में खड्ग लेकर विष्णु पर आक्रमण के लक्ष्य से गरजता हुआ बड़ी ऐंठ के साथ हाय घुमाने लगा। वाद में, .

४२ नृसिहचम्पू । शुद के भारम्भ होते ही उन वीररम का अदमुन उस्माई उमड बाया और इसके फलस्वरूप फट गटाती हुई प्रचण्ट मुजाओं से विभूषित जो तेज -कान्ति प्रसूत हुई, उमके कारण महान् गर्व में भरा हुआ उनके समक्ष स्थित हो गया। उस समय उनके अर्मप की शान्ति महाराल रद्र के लिए मौ अशक्य थी। इतना ही नहीं वह अपने में कैगस को गुरता का अनुभव कर रहा था, उसे इतना आवेश था कि वह युस चापल्य दिखाने पर उतारू हो गया था, पर इन महके बावजूद भगवान् ने रमे मशन के समान ही समझा और दृढतर चपटे से उसे विदीर्ण कर साला पिर सायकाल में अस्ताचल से नीचे गिरते हुए सूर्य-विम्ब के समान सामने पड़े हुए हिरण्यरशिपु को अपनी जानुओं के ऊपर सींच लिया। अब रौद्र-परक वन प्रस्तुत कर रहे है। अथ रौद्र- अरनोधामिकुण्डोज्ज्वलनयनमिलद्बाटीविभ्रदुच्चे सादन् दष्टास्तदुत्यप्रसरतरररयो दन्तदष्टाधरोष्ट । श्वासोन्छासोगनास कथमथ किमिति स्पष्टवाक् स्यैर्नसागै. सिंहास्यो दैत्यभर्तु शमुदरदरीमुहदारादरेण ॥१२॥ करेति-सिंहास्य नृसिंह स विष्णु देयमर्नु दानवाधिपस्य तस्य हिर- भ्यकशिपो उदरदरीम् उदरगुहाम् आदरेण तत्परम्येन स्वै निज नसागै भृक्ष- मत्यर्थम् उद्ददार पिदारयामास । कीदृश म मिहास्य , प्रति-रो विकटो य क्रोधाग्नि कोपवति तस्य कुण्डपत् उपरयो प्रकाशमानयो सयोयों नय नयो नेप्रयोनिरन्ती भ्रूक्टी (द्वितीयाद्विवचने स्पम्) उच्चै विभ्रत् । धारयन् । दष्टा सादन , तदुत्य ताम्य दृष्टाभ्य उत्तिष्टतीति तदुस्थ प्रसरतर तीक्ष्णतर रवो स्वनिर्यस्य मद दशनै दष्ट अधरोष्टो यन स , श्वासोच्दासाम्यामुग्रा नामिका यस्य मा, क्य केन प्रकारण नृसिंहो जात रिमिति क्स्य हतो इति च स्पष्टा पुरा जनाना चाक् यस्मिन् (यद्विपये)स । उदार इवि उदुपस्टस्य विदारणार्थस्य '' धातो परयादिक्स्य सिदि। उम नरसिंह ने दैत्यापि हिरण्यकशिपु के गुदाशय उदर को अपने ना दारा हे अभिनिवेश पूर्वक पाहाण! इम निया के अवसर पर कर कोररूपी अग्नि के कुण्ट सी रहता हु ऑगों की भौहें चट, दोन नदारद थ, और इस चाक पस्वरूप दाँतों से कहरवार की ध्वनि उत्पन्न हो रहा था, दाँतों से अधरोष्ठ रहनाइ वर पाट रहे थे, चास प्रश्वास से नासिरा उग्र एग रही थी, उनके विषय में चारों तरफ यह उनरव मया हुआ था कि यह क्यों पेटा हुआ? पन्द-Season तृतीयोच्छासः। अपि च- -- उग्रकोधकृशानुधूमपटलान्यूज़ विवृद्धानि यत् तेनासीदसित नभोऽपि भगणस्फारस्फुलिंगावलि । किंचिद् दग्धमधस्तदुज्ज्वलजगद्ज्वालाभिरेतजने संध्याराग इति भ्रमं जनयति प्राच्या प्रतीच्या हरेः ॥१३॥ उप्रेति हरेः नृसिंहस्य यत् यस्मात् उग्रः विकरालः क्रोध एव कृशानुः अग्निः तस्य धूमपटलानि ऊर्ध्वम् उपरि प्रदेशे विवृद्धानि तेन हेतुना भानां नक्षत्राणां गणाः वृन्दानि एवं स्फारा वितता स्फुलिंगावलयोऽग्निकणमाला यस्मिस्तत् नभो- ऽपि गगनमपि असितं श्याममासीत् । तस्य क्रोधाग्नेरुज्वलजगद्पाभिवा- लाभिः किञ्चिदधः प्रदेशे दग्धं प्लुष्टं नभः एतजने अस्मिन्मर्त्यलोकवासिनि मनुष्ये प्राच्यां प्रातः वासव्यां दिशि सायं च प्रतीच्यां वारुण्यां दिशि सन्ध्यायाः रागः सन्ध्यारागः, सन्ध्याकालिकोऽरुणिमा इति भ्रमं सन्देहं जनयति । अस्माभिः- प्रातःसायं सूर्योदयास्तमयवेलायां च क्षितिजेऽरुणिमा अवलोक्यते वस्तुगत्या. स हरिक्रोधाग्निना दग्धस्य धुलोकाधःप्रदेशस्य प्रकाश एवं वर्तते इति उत्प्रेक्ष्यते कविना । भनक्षत्रे गभस्ती स्त्री पुंसि स्याद् भृगुनन्दन' इति मेदिनी। और भी:- इस (नृसिंह ) की क्रोधाग्नि से उद्भूत जो धूम-पटल आकाश में जाकर छा गया था उसने ही सारे आकाश को काला कर दिया है। साथ ही वहाँ जो तारिकाएँ दिखाई पड़ रही हैं, वह उस क्रोधाग्नि की चिनगारियाँ है। सायंकाल में पश्चिम दिशा की ओर तथा प्रातः में पूर्व दिशा की ओर जो प्रकाश के रूप में सांसारिक मनुष्यों को ज्ञात होता है, वह भ्रम है। वस्तुतः क्रोधाग्नि की लपटों से जला हुआ वह आकाश का अधोभाग है। अलङ्कारः-अपहति । छंद:--sss us Est Is Ssi SsIS शार्दूलविक्रीटितम् ॥ १३ ॥ - अपि च- अन्याय्यं न कलेवरस्य कलयन् नैवेन्द्रियाणामपि प्राधान्यं न हि तत्र कर्मकरणे त्वात्मा मदंशस्थितः । सर्वानर्थपरंपरापरिणतं चित्तं भवेत् प्रायशो मत्वैवं हृदयं ददार नृहरिगीर्वाणनाथद्विषः ॥ १४ ॥ अन्याय्यमिति-नृहरिः नृसिंहः गीर्वाणनाथद्विपः इन्द्ररिपोस्तस्य दानवस्य सकलेऽपि देहे केवलं हृदयमुर एव ददार विदारयामास । इतराणि सर्वाणि गात्राणि अविकलान्येवं मुमोचेत्यर्थः । कस्मादेवं कृतमिति तत्र हेतुमाह-कलेवरस्य दानवशरीरस्य इदम् अन्याय्यं न्यायादपेतं कर्म न इति कलयन विचारयन् नृहरिः- - ४४ नृसिंहवम्पू.। न तद् ददार । इन्द्रियाणामपि चक्षुरादीनामताणामपि इदमन्याय्य कर्म न सम्भ- यतीति तान्यपि जहौ। हि यत कलेवरे इन्द्रियेषु च स्वस्थकर्मकरणे प्राधान्य न वर्तते । मन परतन्त्राणि हि करणानि कर्म कुर्वन्ति । आत्मा तु मदरा- स्थित जीवरपेण ममैवाश स्थित । मत सोऽपि तस्मिन् कर्मकरणे जघन्यकृत्य क्रियाया कथमपि न वर्तते असगरवादिति भावः । एवमस्याप्यात्मन तत्र प्राधान्य न हि वर्तते इति तमपि मुमोच। 'ममैवाशो जीवलोके जीवभूत' सनातन इति स्मृतिः। प्रायश बाहुल्येन इद चित्तमेव सर्वपामनर्थानामकर्मणा या परम्परा तद् रूपेण परिणत वृद्धि प्राप्त भवत् स्यादिति मरवा शास्वा तदेव हृदय विदारयामा- सेति भाव । और भी- भगवान् नहरि ने उम दानवरार के हृदय का विदारण यही समझ कर दिया कि अविकतर यह चित्त ( हृदय ) हो सब प्रकार की अनर्थ-परम्पराओं से भरा हुआ है। मक्त-पीटन एक अनुचित धर्म है और इस क्रम में शरीर का कोई हाथ नहीं । इन्द्रियों भी पराधीन ही है, अत उन या भी दोर नहीं। सारे कर्मों में वे मन से प्रेरणा पाकर ही प्रयस होती है, और आत्मा तो हमारा ही अब है,अत उसका कम से क्या सवय ? अरकार -हेतु प्रेक्षा । छन्द -Sss as ISSISISशार्दूलविक्रीडितम् ॥१४॥ अपि च- प्रज्वलत्कोधकृशानुगुण्डे इव चण्डनयने विधाय दीर्घतरदनुजदेह हविरिय स्याहारारमिन हाहाकारमुच्चारयतो महीन् ऋत्विज इव तदधि- टातृदेवता सतर्पयन्निर अध्यरहिसाया. वेढयोधित धर्ममाधनत्यमव- धारयन्निन धर्मानुच्छेदपरो भगवान् दीक्षिनत्यमङ्गीचकार । प्रमदिन-धर्मम्य 'श्रुतिस्मृतिम्यामुदित यत् म धर्म' इरयुगस्य श्रौतस्य स्मातस्य च कर्तव्यममंग अनुदेद मस्थापने पर तत्पर भगवान् श्रीविष्णु प्रग्या दह्यमानस्य घशानो कोपनहे कुण्डे इव, कुण्ड होमाधिकरण गर्नविशेष तदिव पण्डनयने प्रचपढनेत्र निधाय, तर दीर्धतरमायत दनुनदेव दानवझाय इविरिव विधाय मानायमित्र हत्या 'सानाय हविरग्नी नु हुत त्रिपु पपकृतम्' इत्यमर । स्वाहाकारमिव हिरण्यकशिपोरस्याचारेण हाहाकारमुच्चार• यतो महीन् प्राधिा इव याजकान् कृत्या आग्नीशायधनवायां ऋत्विनो या- 'जकाच तेइत्यमर । तदधिष्टान्देवना यशाधिष्ठातृदेवता मन्तयन् प्रीपापन्निव अपहिमाया यज्ञहिंसापा येदोधित घेराम्नायबोधित प्रतिपादित धर्ममाघ- भाव धर्मापारगावमवधारयन्निव निरपयन्निव दीधिनाव दीक्षा सजाता यस्य तृतीयोच्छासः। 'तदस्य संजात तारकादिभ्य इतच्' इति इतच प्रत्ययः। तस्य भावस्तत्वं यागादिप ध्वनियमत्वमित्यर्थः। अङ्गीचकार स्वीचकार । और मीः- उस समय ऐसा लगा मानो धर्म के संस्थापन में तत्पर रहने वाले भगवान् ने यश में दीक्षा ली हो, अर्थात् वे एक यजमान के रूप में अवतीर्ण हुए हों । इस यश में उनकी दोनों औखे ऐसी लगती थी जैसे प्रज्वलनशील क्रोधाग्नि के कुण्ड हों; दीर्घतर दानव की देह ही मानो हवि हो, ऋषिगण ही ऋत्विज हों और उनका हाहाकार स्वादाकार की ध्वनि हो । प्रतीत होता था मानो भगवान् स्वयं इस यश के अधिष्ठातू देव को तृप्त कर रहे हो, तथा यशु-संबंधिनी हिंसा को वेधवोधित होने से समर्थित कर रहे हों। ततः संक्षोभोद्भूतनैष्टुर्यवशादु दंष्ट्राखादनजातकर्कशरवेण तर्जयन्निवं, लोचनार्चिपा दहन्निव, श्वासपवनैः शोपयन्निव, उच्छ्वाससमीरणैराकर्प- यन्निव, कुललल्लोलरसनया असन्निव, चिरतररचितापराचं दैत्याधम खर- तरनखरैर्दारितवान् । तत इति-ततस्तदनन्तरं स हरिः संतोभात् क्रोधात् उदभूतम् उत्पन्नं यत् नैष्ठ्यं क्रौर्यं तद्वशात् , दंष्ट्राभिः दंष्ट्राणां खादनेन भक्षणेन जात उत्पन्नः यः कर्कशः खरतरः रवः शब्दः तेन तर्जयनिव भसयन्निव, लोचनाचिंपा नेत्रज्वालया दहन भस्मीकुर्वन्निव, श्वासपवनैः श्वासमारुतैः शोषयन् शुष्कतां नयन्निव, उच्छासस- मीरण: उच्ट्रासपवनैः भाकर्पयन् बलात्स्वसमीपमानयन्निव । कुललल्लोलेति- को पृथिव्यां ललन्ती आस्वाधस्वादनाय चलन्ती लोला चपला या रसना जिह्वा तया प्रसन्निव आस्वादयन्निव, चिरतरात् बहोः कालात् रचितः कृतः अपराधो येन तं दैत्याधर्म नीचं दैत्यं खरतरैः तीक्ष्णतः नखरैः नः विदारयामासा, अत्र रौद्ररसे हिरण्यकशिपु प्रति भगवतः क्रोधः स्थायिभावः । हिरण्यकशिपु- रूपः शत्रुरालम्बनविभावः। स्वभक्तप्रह्लादं प्रति पर्वतपातनसमुद्रमजनाग्निदा-- हादिरूपास्तच्चेष्टाः स्मर्यमाणाः उद्दीपनविभावाः कल्प्याः । द्वादशश्लोकोक्तानि कर्माणि अनुभावाः । उग्रतावेगमोहमदादयश्च संचारिभावा आहार्याः। उत्प्रेक्षा चालंकारो व्यक्षिकतत्तदर्थोपस्कारद्वारोपकारकः । अत्रापि सन्दर्भ तत्र सत्र क्रोध- रूपस्य स्थायिभावस्य स्वशब्देनोल्लेखो नोचितः उस अवसर पर संक्षोभ के कारण जो उनमें अत्यधिक नैष्ठ्यं की भावना जाग्रत हो गई थी, मानों उसी के परिणाम स्वरूप दातों से दाँतों के चर्वणवश उद्भूत प्रखर ध्वनि के व्याज से उसे तनना दे रहे हो, नेत्र से निकलती हुई ज्वाला से उसे जला रहे हो, लम्बे लम्वे श्वासों के रूपमें प्रवाहित वायु से जैसे शुष्क बनाते जा रहे हों, उच्छवास को वायु से जैसे-अपनी ही ओर खींच रहे हों, भूतल में आस्वाद्य के स्वादन में ललचाई - ४६ नृसिंहचम्यू दुइ चल जिला से चाट रहे हो-हम प्रबार श्री नृसिंह ने चिरकाल से अपराध करने वाले उस राइसापन वो अपने तीख नसों से विणेकर हाय। अथ बीभत्स प्रसरनखराधातोदीर्यसुरान्तकवक्षस क्षतशतगलद्रतोद्रिक्तनसान्यपलास्थिमि। सह कफमलमग्नापुङ क्षण परिपश्यतो जनयतु सता विष्णोरुधनुगुप्सितमीसितम् ।। १५॥ प्रखरेति-प्रखरामा तीदगाना नखराणा नसानाम् आधा उहीयंत विदीर्य- माणस्य सुरान्तकस्य हिरण्यकशिपो वक्षम उरस पताना प्रणानां शवम्य गलत धमन रक्तात शोगितात् उदित निगरनि कफमलै मजामा' सारस्य धानुविधीपस्य पुझे ममूह ए सह वसा पाच, अन्य पुरातत् च, पलं मांस , अस्थि कीकस च पामितरतरयोग से परिपश्यत' वीपमाणस्य जनस्य पण स्वल्पकालम् उद्यत् प्रादुर्भपत् जगुप्पित जुगुप्सा यन तद् विष्णो कमवन्यपदार्य भून विशेष्यमायाहार्यम् । सतां सबनानाम् ईप्सित मनोरयं जनयतु पूरयतु । "मेदस्तु चपा यसा' इत्यमर । 'ककस कुत्यमस्थि छ' 'अन्य पुरातत्' 'सारो ममा 'स्याच्यामिपे परम्' इत्यायमर । बीमत्स मन उपस्पिन कर रह है- विष्णु का वह (लिगरण ) यम सजनी के समीहित को परिपूर्ण करे, जिसे देखने पालों में जुगुप्मा की रात्रि अहुरित एव प्रदीप्त हो उठती है। कारण यह है कि वह कर्म देमा है, जिसमें नुरीले नसों के भाषात से विदार्यमा दानव के वध दल में सेकड़ों 'पार हो गए हैं और उन धादों से रक्त की पारा फूर पड़ी है, साथ ही रक्तनाव के अतिरेक्या वसा, मल, भास, अस्थि, वर, व मात्रा का पुध निर्वाध बाहर चलता चा बारहा। छन्द-15ss. IGISहरिणी॥१०॥ अपिच- धिग्दु शरीरमिदमत्र शरीरमाजाम् उध्वं कफ श्रवणनेनमल प्रसूते । अन्तर्विभर्ति रधिरास्थिपलान्यधस्वात् मूत्र पुरीपमिति पातु हरेणुगुप्सा ॥ १६ ॥ off-अनोक शरीरमाशो देहिनाम् इदम् अदी दुसरीर दुए कलेवर धिक् । पस्प शारीरम्योर्ध्वमुपरिभाग तिर इयर्य । मुसैन कर प्रसूने उत्पादयति तृतीयोच्छ्वासः । श्रवणाभ्यां कर्णाभ्यां नेत्राभ्यां च मलं प्रसूते जनयति । अन्तश्च यो देहो रुधिरं रक्तंच, अस्थिकीकसंच, पलं मांसंच तानि विभर्ति धारयति । अधस्तानाभेर- धोभागे च मूत्रं पुरीषं च विभर्ति । इति दृष्ट्वा जायमाना हरेर्विष्णोः जुगुप्सा घृणा नः सर्वान् पातु भवतु । आशिपि लोट् । 'इस संसार में शरीरयारियों के उस घृणित कलेवर को धिक्कार है, जिसका शिरोभाग मुख के रास्ते कफ फेंकता हो, श्रोत्र एवं कर्ण के द्वारा मल पैदा करता हो, अन्तर में रुधिर, अस्थि, एवं मांस धारण करता हो और जिसके अधोमाग में मूत्र एवं मल की स्थिति हो। ऐसे शरीर को देख कर उदित हुई विष्णु की जुगुप्सा हम सब की रक्षा करे। छन्द:-SSISTISI ISIS वसन्ततिलका ॥१६॥ अपि च- दैत्याराते खेभ्यः सपदि कृतभरैः स्वीयदेहोद्गतेभ्यः रक्ताभिषेकैरुपरिपरिपतन्मांसखण्डोपहारैः । आत्मज्योति प्रकाशः प्रचुरसुमनसोऽप्येप हुंकारगर्भः मन्त्रैरन्योपवीतैः सुररिपुरकरोत् प्रेमपूजोपचारम् ।। १७ ।। दैत्येति-स्वीयात् आत्मनः अर्थात् हिरण्यकशिपोः देहात् कायात् उदरमध्या- दित्यर्थः । उद्गतेभ्यः निर्गतेभ्यः दैत्यारातेः विष्णोः नस्त्रेभ्यः (हेतौ पञ्चमी) सपदि तत्कालमेव कृतभरैः कृतो भरो भरणं नखजगतपूरणं यैरिति रक्ताभिषेकविशेष. णम् । भूयोरकाभिपेकः प्रभूततरशोणितस्नानः स्नपन उपरि पतद्भिः मांस- खण्डोपहारैश्च अन्त्राणि पुरीतन्ति एव उपवीतानि यज्ञोपवीतानि तै कारगभैर्म- न्त्रैश्च आत्मनः स्वस्य ज्योतिषः तेजस एव प्रकाश एप सुररिपुः सुरारिः प्रचुर- सुमनसः विष्णोः प्रेमपूजोपचारं प्रेम्णा भक्त्यतिशयेन पूजा परिचर्या तस्या उप- चार सेवन व्यवहारं वा अकरोत् । यदा विष्णुर्हिरण्यकशिपोः उदरदरीमुद्ददार तदा तस्योदरात् बहुशोणितं मांसादि च बहिर्निरगमत् । कविरत्रोप्रेदते यत् स सुरारिः नूनं तेन रक्तादिना विष्णुमपूपुजत् । प्रचुरं सुच मनो यस्य स प्रचुर- सुमनास्तस्य अथवा प्रचुराः प्रभूताः सुमनसो देवाः यस्य स तस्य । सर्वदेवमय- वाद्विष्णोः । यतो विष्णुः प्रचुरसुमना अतस्तस्य पूजां सुमनोभिरकरोत् किंतु , 'असुरजातिस्वाभाच्या भक्त्यतिशयात्साहसिकत्वाच्च स्वकीयमांसरुधिरादिभिरे- वैति भावः। उस अवसर पर मानों इस देवद्वेषी हिरण्यकशिपु ने अपने उदर के मध्य को विदीर्ण कर बाहर निकले हुए विष्णु के नखों से उद्भूत घावों को भरती हुई रक्तधारा से अभिषेक, नृसिंहचम्पूः। ऊपर गिरते हुए मासखण्डों से उपहार, अतड़ियों से उपवीत, हुंकार के रूप में मन सञ्चारण । व अपनी नैसर्गिक कान्ति से ही दीम का काम लेते हुए बडे आदर-पूर्व विष्णु की पूजा की। अलंकार:-रूपक । छंद:-Sssss mississ IS स्रग्धरा ॥ १७ ॥ महदिदमस्मदनह गर्दास्पदं संप्रति प्रतीयते, यत् कुत एवैतत् श्रय- णनयनयुगलाफलितामलरसनागलल्लोलकण्ठनालनासानिःसृतकफोपहित- मुसं, स्रवद्रुधिरप्रवाहमजन्मनापुंजक्लिन्नमेदोमांसयसावसानं, स्नायु- सेवनीमनीनिवद्धास्थिसहस्रसंधिदुर्गन्धिपरिपूरितपुरीपं, सबन्मूत्रचर्म- कारक्षारोपस्कृतनीरपूरितमीपद्गलद्रसमाईचर्मपुटमिव शरीरमेतत् । कुतो याऽस्माकमत्रावस्थान चिदंशत्वेन तन्नापि लीलागृहीतविप्रहाणामपि साक्षादस्मिन्करस्पर्श इति श्वासावरोधपूर्वकं वदतः नृहरेईदयमतीर जुगुप्सास्पदमासीत् । महदिति--सम्प्रति इदमतीव गर्दास्पद निन्द्यमस्माकम् अनहमयोग्यं ध प्रती- यते। यत् यस्मात् कुत एव एतत् शरीरं, कुत्र एवंविधं शरीर, कुतो वाकया अस्माक्मनावस्यानमिति, नोभयं सगच्छते इत्यर्थ इश्युचरेणान्वयः। तत् शरीर 'कीगित्याह तच्छ्वणेति-युगलशब्द उभयत्रान्वेति प्रवणयुगलेन श्रोत्रयुगेन नयनयुगेन च बाकलितः गृहीत' अमलरसनाया: निर्मलजिह्वायाः गलन् , लोलात् कण्टनालात् नासातश्न निस्त. निर्गतः यः कफ तेन उपहत मुख वदनं यस्य तत् शरीरम् । पुनः कीटक शरीरं वर्तते इस्याह-सवमिति । सवन् शरीरात परन् य. रुधिरप्रवाह. तन मन्मन् निमज्जन् यो मजापुक्षस्तेन क्लिन्न मैदशा, मासंच। घसा च एतेषां समाहारः इति मज्जापुञ्जस्टियमेदोमांसवसं तदेव अवसानम् अत्र- सितं रूपमन्तिमरूपं यस्य सदिदं शरीरम् । पुन. कीडग्रीरमित्याह स्नारिवति । स्नायकः नाट्य एव सेवनीमन्यः सूचिकामदास्ताभिः निवदः अस्थिसहससन्धिः तर दुर्गन्धिपरिपूतं पुरीपं यत्र तत् , अत एव सदीक शरीरं, समन्मूत्रमेव धर्म- कारस्य हारेण उपस्कृतं नीरं पयस्तेन पूरितं, ईपद् गलद्रमं आईचर्मपुटमिव पर्वत । अतोऽस्माकमत्र ईदृशं पूतिपूरिते शरीरेश्वस्थानं नोपयुज्यते इति । ताति च लीलया गृहीतः विप्रह' शरीरं यस्तेपामस्माकमस्मिन् शरीरे करेण सासाद मोनोचित इति श्वासावरोधपूर्वकं घदतः नृहरेः हृदयमतीय जुगुप्यास्पदमासीत् । अप्रकृतसन्दर्भ जुगुप्सा स्थापिमावः । तृहरिनम्यविदीर्ण रपमानरधिा. मासमेदो हिरण्यकशिपुशरीरमालम्बनविमाव' । तन मूत्रपुरीपरपिरममिमज्जा "मेदोन्यावरसंसनादिकमुद्दीपनविभाव' । अविनिमीटननासापिधानादिको - 1 तृतीयोच्छासः। ४६ भावः कल्प्यः। संचारिभावा अपि मोहावेगादयः कल्प्याः । अत्र जुगुप्सारूप- स्थायिभावस्य पुनः पुनः स्वशब्देनोक्तिरत्यन्तमनुचिता । इति श्रीनृसिंहचम्पूकाव्ये तृतीयोच्छ्वासः। इस समय, यह अतीव निन्दास्पद एवं मेरे लिये अनुचित जान पड़ता है कि कहाँ यह शरीर और कहाँ मेरी संस्थिति ? दोनों में कोई सङ्गति नहीं । उसका कारण यह है कि शरीर के सभी अवयव नितान्त जुगुप्साजनक हैं। पहले मुख ही को लीजिये, वह दोनों आँखों और कानों से निःसून, निर्मल जिड़ा से गलिन, रोल कण्ठ एवं नासिकासे निर्गत कफादि मलों से भरा हुआ है। दूसरे यह कि प्रवाहित होता हुआ रुधिर का प्रवाह अपने भीतर मज्जा पुल को लिए हुए सारे शरीर को भरे हुए है। और विचारपूर्वक देसा जाय तो यह गरीर क्या है ? मेदा, मांस, वसा की समष्टि हो तो एकत्र है। और देखिये, नार्टी रुपी सूचिकाओं से सिली हुई असंख्य हड़ियों के पक्षर में मलराशि इकट्ठी है जिससे जुगुप्साजनक गंध निकलती है। अधिक क्या कहें, चमारों के क्षार जल से आर्द्र चर्म को जो दशा है, वही बहते हुए मूत्र-प्रवाह ने भाई शरीर की स्थिति है। अब सोचने की वान है कि ऐसे कुरिसत शरीर से संबंध रखना मेरे लिए कितना अनुचित है ? उत्तम भी इस लीलाविग्रह के हाथो से स्पर्श तो नितान्त गईणीय है. इस प्रकार श्वासावरोध- पूर्वक भाषणप्रवण भगवान् नरसिंह का दृश्य जुगुप्सा से भर उठा । नृसिह चन्पू का यह तृतीय उच्च्वास समाप्त । N 44 अथ चतुर्थ उच्चासः अथाद्भुतः- हाहाकारं विदित्वा जगति दिविपदोऽनल्पकम्पान्तकल्पं, प्रोद्यच्छेकाकलंका अवनिमयययुः विमानरमानैः । दूरादालोक्य लोकाद्भुततरवपुष दीर्णदैत्येन्द्रदेह पद्म पद्मोद्भयादिप्रथिवगुणगणां विस्मिताः प्रोचुरच्चः ॥१॥ हाइति-एवं दयेन्द्ररधानन्तरं दिविषदो देवाः 'आदितया दिपिदो हेरा- अदितिनन्दना.' इत्यमरः । जगति मस्र्यलोके अनपकल्पान्तकरूपम् अनल्पश्चासी कल्पान्तश्च ताप मल्यालसहश हाहाकारं विदिया ज्ञाचा शुस्या या प्रोद्य- पएकाकलंकाः प्रोधन उद्गम्छन् मादुर्भवमित्यर्थः, सकारटकः भातकपंकः येषों से दिस्मिताश्च सन्तः देवाः नमाम प्रमागरहित अतिविशालरियर्थः, विमानर्वायु- यानः अवनिम् धाणिम् अवययु. मारुरतुः । देवाः स्वर्गाद धरण्यामायमित्यर्थः।- भागस्य च देवाः लोकाशततरवपुपं लोकायः अद्भुततरं विलक्षणतरं वपुः दारीरं यस्य तं, दीर्णदेत्येन्द्रदेहं दीर्ण. विदीर्णः देपेन्द्रस्य हिरण्यकशिपोः देहो पनर्स विष्णुं दूरादपरोक्य पोद्धवादिप्रथितगुणगा पद्मोद्भवो महा तममृतीनां देवाना प्रथिता याता. गुणगणा यस्यास्तां सर्वदेववन्धामित्यर्थः। तां पन विष्णुपनी हामीम उच्चैः सुर मोजुः अवोधन । मीतास्तदा देवाः देयारातेः प्रमादा जग मातरं लघमी पक्ष्यमागप्रकारेग तष्टयुरिस्पः। 'पमा कमला श्रीहरिप्रिया' यसरः। अदभुत रसमय वर्णन से पारम्म किया जा रहा है। समार में प्रलयकाल के समान दाहाकार सुनकर देवगग भाव-अस्त हो गए और अपने अपरिमेय विमाने से भूनस पर हर भार । रही से लोक में अद्भुत रूप वाले देवेन्द्र के देह को किस देसकर, बझा आदि देवों में रियात गुगगावागविशु. पालीवो विस्मयाविष्ट देवताओं ने उच्च स्वर में कहा। छन्द-SIS su It Isrs Ss सरपरा।" फिमूचुर्देषा इत्याकांक्ष्याह- मावर्जगजननि ? पद्मवाधिवासे ! कोपं निवारय हरमुरमर्दनस्य । नोचेभिरं रचितधारुचरापरस्य सकोधयीक्षणवशा भरिता विनाशःRI मारिति--पचे कामले तो निहितोऽभिवासो निवासी पथा सा तरमंदी है पताधिकामे। पारये इयः । जगतः जगनयस्य जननी उत्पादपित्री, सरसम्बुनी हे जगजननि ! मात । कमलेशी मुरमर्दनस्य मुरं दयविशेष मई

चतुर्थोच्छवासः ।
यति हिनस्ति इति तस्य हरेरित्यर्थः, कोपं क्रोध निवारय अपगमय। नो चेत्
अन्यथा यदि विष्णुकोपं त्वं शीघ्रमेव न शमयिष्यसि तर्हि विष्णोः सक्रोधवीक्षण-
वशात् सकोपावलोकनवशात् सक्रोधं यद् बीक्षणं तद वशात् चिरं चिरकालं यावत्
प्रयत्नेन रचितस्य, चारुणः मनोहरस्य अस्य चराचरस्य जगतः विनाशः प्रणाशः
भविता भविष्यति, सद्य एव नंयति जगदेतदित्यर्थः।
देवताओं ने कहा-
हे माता! हे जगज्जननी ! हे पनवासिनी! मुरारि के क्रोध को शान्त करोः अन्यथा
दीर्घकाल का रचित चराचर जगत् इनके क्रोधपूर्ण वीक्षण ते ध्वस्त हो जायगा।
छन्द:--51 st Is Is ss वसन्ततिलका ॥२॥
लक्ष्मी:-
सिंहः सिंह इति प्रथा प्रथमतः पश्चन्तरोऽयं नरः
पश्चादेप नृकेशरीत्यतितरामाश्चर्यमुज्जृम्भते ।
नैताहक्क च वीक्षितं न च कदाप्याकर्णितं भोः सुराः ?
स्वान्तं किंतु नितान्तमद्भुतरसे मग्नं ममास्ते मनाक् ॥ ३॥
सिंह इति-लघमीरुवाच । भोः सुराः अयि देवाः ? प्रथमतः पूर्व सिंहः सिंहः,
सिंहोऽयं सिंहोऽयमिति प्रथा ख्यातिः 'प्रथा ख्यातौ' इत्यमरः । पश्चादनन्तरमयं नरः
अयं नरः इति प्रथा पश्चात् परस्तात् च अयं नृकेशरी नृसिंहोऽयमिति अतितराम-
त्यर्थमाश्चर्यमुज्जृम्भते ।
। हे देवाः ? मया अद्यावधि एताहक वचनापि न च वीक्षितं
दृष्टं न च कुत्रापि आकर्णितं श्रुतम् । किन्तु तथापि, प्रथमत उद्भूतात्यन्ताश्चर्यस्य
भगवतोऽलौकिकशक्तिविचारेण निवारणेपीत्यर्थः । मम स्वान्तं मनः 'स्वान्तं
हन्मानसं मनः' इत्यमरः । अस्मिन् नितान्तमतिशयेन अद्भुतरसे मनाग ईपत्काल
मग्नं निमग्नम् आस्ते वर्तते । 'मनागित्यत्ययमीपदर्थे मन्दे च' इति शब्दस्तोम-
महानिधिः । भगवतो लोकातिशायिशक्त्या इच्छाविग्रहवत्वं ज्ञातवत्या अपि
अदृष्टश्रुतपूर्वविग्रहावलोकनादीपत्कालमाश्चर्य चेतस्युदेत्येवेति भावः ।
?
.
फिर लक्ष्मी ने कहा-
-
पहले पहल जिन लोगों ने देखा, उन लोगों ने तो यही फैलाया कि यह सिंह है
तह । पर जब फिर ध्यान से देखा, तो मनुष्य; अंत में लोगों ने तय किया कि यह
रसिंह का मिश्रित आकार है-बड़ा आश्चर्य हो रहा है। हे देवगण ! न तो मैंने इस
शार का प्राणी कहीं देखा और न सुना; इसीलिए क्षणभर के लिये मेरा अंतः करण
न्दमुन रस में डूब गया है।
छन्द:---25 15 15t In5 SSI SSI S शार्दूलविक्रीटितन् ॥ ३ ॥

५२ - । नृसिहचम्पूः । अपि च- पित्रा या हनन शिशोः प्रजननं स्तम्भाच मम्भावितम् विष्णोर्या नृशरीरमस्ति कुहचित् सिहागसंमिश्रितम् । इत्याश्चर्यपरम्परा-परिणति-व्याधूत-धैर्य मनो नाद्यापि स्थितिमेति मे मुमनम' कि नत्र कृत्यान्तरम् ।।४।। पित्रेति-- किचित् पिना शिशीरामजस्येत्यर्थः, हनन हत्या सम्भावित, न कनापि सम्भावितमियर्थः । किं च, कचित् स्तम्भात् प्रजनन कस्याप्युत्पत्ति' सम्भाव्यते, न कनापि कदापि सम्भापयिनुमपि शक्यमेतत् । अथवा किं धचित् विष्णोही मिहांगसम्मिश्रित सिहम्य केसरिण अगै अवयः ममिश्रित मिलित नृशरीरमस्ति, नरसिंहरूपेण प्रादुर्भवनं मम्भाव्यते पिम ? अर्थात् किं पमित् केनापि विष्णोर्नृसिंहरूपेण प्रादुर्भग्नमध यावद् दृष्टं श्रुमं वा? न श्रुतं नापि च इष्टमित्यर्थः। सुमनसो देवा.। इतीस्थमाश्चर्याणां परम्पराया. परिणत्या परिणामेन ग्याधृतं पानिनं धैर्यमवष्टम्भो यस्य तत्ताड् मे मनः वर्तते इति शेप' । तच तथा प्रान्तं मे मानसमद्यापि स्थिति स्थिरतांन एति। म प्राप्नोति । तय एयरिधे व्यतिकरे किं त्यान्तरं किमन्यत् कार्य कतुं शक्यते । 'मुपागः सुमनमस्त्रि- दिशा दिनक्म' इत्यमर. । सिंहस्य केमरिणः अगेन अवयन मम्मिश्रित सम्मिलितम्। और मा - मला कमी यह देसा या मुना है कि पिता अपने पुत्र की हत्या करना है ! कहीं यह भी सुना है कि रनम्न से कोई पैदा हुआ है ? मता कमी विष्णुको आकृति नूमिहाकार हुई है। हम सब याथर्य परम्पराओं की परिणति से थर-थर काँपना दुआ मेरा मन भय तर मी अपने आप में स्थिर नही होमवा है। प्रेमी स्थिति में है देवगा! मापही बता, और कौन सा अन्य कार्य किया जा सकता है। जहाँ अपने चित्त को दी में स्पिर नहीं कर पाती, वहाँ और क्या कर सकती है? छन्द.-.-55: 15m 5 शारविधीडितम् ॥ ४॥ देया अहो ! महदाश्चर्यमेतद् अस्माभिरफ्स्मादनुभूयते यन्मनोपि भ्रमवि- पयमकाण्टताण्डक्तिमिव, सिमुत्तरकालानरस्थायां चिरममयावलोकिन- स्वप्न इय, रिमाहोस्थिन्मुरमर्दनस्य मनोरिनोदजनकस्वमायाविलमित: मिरेति सशयविषयषितमनमः- मुमनसोऽपि कादिशीका इस स्म । 15 SHI चतुर्थीच्छासः । अथ किं पुनर्वयं, मधुसूदनसुन्दरीन्दिरापि अननुभूताद्भुततररूपदर्श- नाद् विस्मिताऽस्मदनुकंपाकलितचित्ताऽद्यापि पुरः प्रचलितुं न साह- समवलम्बते । इत्यद्भुतः। अहो इति-अहो इत्याश्चर्यसूचकमव्ययम् । अस्माभिरच अकस्मात् अत- कितोपनतमित्यर्थः, एतत् महत् आश्चर्यमनुभूयते अनुभवगोचरीक्रियते । यत् यस्मात् किम् अकापडताण्डवितम् असमयसमातताण्डवमिव भ्रमविपयं भ्रान्त- मिदं मनोऽनुभूयते, अर्थात् अयं सर्वो दृश्यमानो नृसिंहप्रादुर्भावादिरूपो मनः- कल्पित एवास्माभिरनुभूयते । अथवा किमुत्तरकाले अनवस्थायी न स्थातुमर्हः चिरसमये पूर्व कदाचिदिह जन्मनि परस्मिन् वा जन्मनि अवलोकित्तः स्वप्न इव अनुभूयते । आहोस्वित् अथवा किमिदं सर्व सुरमर्दनस्य श्रीविष्णोः मनोविनोद- जनकं स्वमायाया विलसितं विचेष्टितमिव वर्तते इति शेषः, इतीर्थ संशयविप- येण संशयरूपेण विषयेण दूषितं परिभूतं मनो येषां ते वयं सुमनसोऽपि सुष्ट मनो येषां ते देवाः सन्तोऽपि स्थितप्रज्ञाः सन्तोऽपि वयं कान्दिशीका इव स्मः । भीताः सन्तः कर्तव्याकर्तव्यविमूढा इव जाताः स्मः । अथ किं पुनर्वयं, अथवा अस्माकं तु कैव कथा, स्वयं मधुसूदनस्य विष्णोः सुन्दरी प्रिया इन्दिरा लक्ष्मीरपि अननुभूतस्य पूर्व कदापि अदृष्टस्याश्रुतस्य च अद्भुततरस्य रूपस्य दर्शनात् कि- स्मिता सती अस्माकमनुकम्पायाम् आकलितं धारितं चित्तं मनो यया सा सती। 'अस्मदनुकम्पाकलितचिन्तेति' पाठे अस्मासु दययाऽकलिता गृहीता चिन्ता कथं लोकस्य कल्याणं भविष्यतीत्येवंरूपा यया सेत्यर्थः। अत्र अद्भुतरसे विस्मयः स्थायिभावः। लोकाद्भुतं नृसिंहशरीरमालम्वनम् । तवाद्य श्लोके लोका(तसरवपुपमित्यनेन विशेषणेनोक्तम् । दीर्णदैत्येन्द्रदेहमित्यनेन दैत्येन्द्रदेहदारणरूपा तच्चेष्टा उद्दीपनविभाव उक्तः । प्रोद्यच्छंकाकलंका इति भयरूपो व्यभिचारिभाव उक्तः। विस्मिता इति विस्मयस्य स्थायिभावस्य स्वशब्देनोपादानं तु नोचितम् । द्वितीयपद्योत्तो भगवतः कोपोऽपि सञ्चारिभाव एव तृतीयचतुर्थ- 'पद्योतैरुद्दीपनविभावैश्च स्थायिनो विस्मयस्य पुष्टिरेव क्रियते । भ्रमविषयमकाण्ड- ताण्डवमिति प्रान्तिः, किमुत्तरकालानवस्थायीत्यादि वितर्की, कान्दिशीका इवेति भयम् , अस्मदनुकम्पाकलितचिन्तेति चिन्ताकारुण्ये, एतेऽपि सञ्चारिभावाः । इत्याश्चर्यपरम्परापरिणतिव्याधूतधैर्य मनो नांद्यापि स्थितिमेति इति मनोऽनवस्था- नरूपः सम्भ्रमोऽनुभावः । अन्येऽपि स्तम्भस्वेदरोमाञ्चगवादस्वरभाषणादयोऽनुभावा आक्षेप्याः। इति अद्भुतरसनिस्पणम् । -

नृसिंहचम्पू
देवताओं ने कहा-
-
अहो । इम ममय यह महान् आश्चर्य हो रहा है कि क्यों यह मन एकापक
उथल-पुथल का अनुभव करता हुआ भ्रान्ल हो गया है ? जो कुछ भी मामने दिमाई
पड रस है, यह मत्य है। जथवा गीत अदृश्य हो जाने वालग दृष्ट पुरातन माकार
मप्न है । अथवा मुरारि वा मनोविनोदिनी माया का कि विनाम है? क्या कारण
है कि उक्त विक्रयों में अस्वस्थ चित्त वाले हम धिताच देवगो को भी डर के मारे दिम
दिशा में जाकर दिप-यह वृनि उत्पन्न हो रही है। और हम लोगों को ही क्या बात है
स्वय विष्णुप नी रक्ष्मी भो इस अननुभूत अद्भुनाम प को देखकर बिस्मिन हो टटी
हैं। यही कारण है कि यद्यपि वे हम लेगों पर अत्यन्त कृपाशील है, रि भी कुछ कर
नहा पा रही है।
यहाँ नक अद्भुत रम का निरूपण हुा ।
अथ हास्यरस:-
परस्पर-प्रेपण-कानराणां शंकातुराणामिह सत्यराणाम्।
सवेग-संलापयचो-विचारैः क्षणं सुराणां समभूद् विनोटः ।। ५।।
परस्परेनि-अथ तदद्भुतदर्शनानन्तरं सर्वेषां मुराणों परस्परमेव वस्यमाण-
प्रकारेग मुमदान् विनोदोऽभवत् । परस्पर मिथ. प्रेषगाय श्रीविष्णो. समीपे गम-
यितुं कातरागां चलानामधीराणां वा शंकानुरागाम् भातंकय्याकुलानां सत्वराणां
सरितिकारिणो मुराणां सुमनसां मवेगसंलापे ससम्भ्रमाापे जायचोरिधारः
वाग्मिविचारश्च क्षण मुहूर्त विनोद. पारस्परिक हास्यमियर्थ ममभूत् । 'कानरोs.
धीरे धज भीते' इत्यादि शब्दस्तोममहानिधिः।
अब हास्य रमका निम्मा आरम्भ किया जा रहा है।
[रम अद्भुन जीव का दर्शन होने पर ] आग्रस्त, स्वरासौल व परम्पर पर.
दूसरे को (विशु के समीप ) भेजने के लिए चल चित्त वाले देवताओं में ये कुन्द
देर ना आप होते रहे, उम अवमर पर व्यक्त किये गये शब्दों व विचारों को लेकर
उनमें अपी विनोद होता रहा।
छन्द'--15 SEC 55 उपेन्द्रवजा ५वा का वृत्त है ।।
वादी गणेश:--
आनीतोऽहमिमाननो मृगपति देवरहो यैरिभिः
किं कुर्यामिति भीतिभंगुरतया संकोच्य तां शुण्डिकाम्।
कर्णाभ्यां च पिधाय यान्तमचिरालम्बोदरंधावतो
भारप्रस्सलदुन्दुरोर्निपतितं दृष्ट्वा जहामाच्युतः ॥ ६॥

चतुथोच्छासः। आनीत इति-अहो इति विपादे। अहम् इमाननो गणेशः वैरिभिः देवैः मृग- पतिमिमं नृसिंहम् आनीतः प्रापितः । अर्थात् इमे सखिभूताः अपि वैरायमाणा देवा मां गजास्यं नृसिंहसमीपे आनीतवन्तः । इदानीमहं किं कुर्याम् किं करवाणि इति भीतिभंगुरतया भीत्या भंगुरत्वेन आत्मनस्तां शुण्डिकां करं संकोचं प्रापय्य तां च शुण्डिका निजकर्णाभ्यां पिधायाच्छाद्य यान्तं मूपिकं निजवाहनमाला गच्छन्तं चावतोऽभिधावतः अत एव भारेणा गणेशभरेण प्रस्खलतः प्रभ्रश्यत उन्दुरोः निजवाहनभूताद् आखोः निपतितं लम्बोदरं गणेशं दृष्ट्वा अच्युतो विष्णुः जहास हसितवान् । 'शोके धिगर्थे विषादे ट्यायाम्' इत्यादिप्वर्थेषु अहो इत्यव्ययमिति शब्दस्तोममहानिधिः । 'उन्दुरुर्मूपिकोऽप्याखुः' इत्यमरः । इस अवसर पर सबसे पहले गणेश ने कहा:- बड़े खेद की बात है कि दन वैरी देवताओं ने मुझ गजानन वो सिंह के साम्ने कर खड़ा कर दिया। अब क्या करूँ? इस विचार के अनन्तर भय-प्रत्त गणेश ने अपनी शुण्ड को लपेट कर कानों से ढंक लिया और दौड़ाया मूषक को। मार था अधिक, इसलिए उस मूषक में कुछ स्खलन हुआ और फल स्वरूप लम्बोदर गणेश को नीचे आना पड़ा। इस स्थिति को देखकर भगवान हंस पड़े ॥ छन्दः-sss us is us ssassis शार्दूलविक्रीटितम् ॥ ६॥ अपि च- , विष्णो ? विष्णोः समीपं ब्रज यजनशतैः प्राप्तमिन्द्रत्वमेतद् देवः संयातु पाथःपतिरिति मघवन् ? मेऽस्ति कान्ता नवोढा । चित्ते वित्तेश ? धैर्य कुरु मम शिशवो हन्त पश्यन्ति मार्ग वायो ? वायो ! यजत्रप्रिय उरगपतिः पृष्ठतः किं न दृष्टः ।।७।। विष्णो इति-गणेश उवाच अथवा देवा ऊचुः। हे विष्णो ? हे इन्द्र ! अन्न विष्णुपदेन इन्द्रव्यपदेशः श्लोकस्य द्वितीय चरणे 'मघवन्' इति सम्बोधनपदात् 'यजनशतैः प्राप्तमिन्द्रत्वमेतद्' इति वाक्याच्च । इन्द्वात्मनो व्यापकत्वं वेवेष्टि इति विष्णुरिति व्युत्पत्तेराधायकम् । यथा विष्णुर्विकल्पोज्झित इत्यद्वैतसिद्धि- मंगलश्लोके विष्णुपदं गौडब्रह्मानन्देन व्यापकं जीवस्वरूपमित्यर्थकं योगेन व्याख्यातम् । प्रथमस्यापि विष्णुपदस्य पष्ठयन्तत्वे तु सम्भ्रमे द्विरुक्तिः। त्वमेव विष्णोर्नृसिंहस्य समीपं बज गच्छ इत्युक्त इन्द्र आह । मया यजनशतैः शत- संख्याकैरश्वमेधैर्महता क्लेशेन इन्द्रत्वं इन्द्रपद लब्धमतस्तभ्रंशभिया नृसिंह- समीपं न गच्छामि किन्तु पाथःपतिः पाथसां जलाना, पतिर्देवो वरुण इत्यर्थः, स विष्णुसमीपं संयातु बजतु । तदा स वरुण उवाच हे मघवन् ? हे इन्द्र ? मे मम नवोढा नवपरिणीता कान्ता अस्ति सा मम मार्ग वीक्षमाणा तिष्ठत्तीत्यर्थः ।

५६ नृसिंहचम्पूः। तदा वित्तेश. प्रायते। हे वित्तेश? हे धनाध्य कुबेर ? स्वमेव चित्ते मनसि धैर्य कुरु । स्वमेव मनमि धैर्यमाधाय विष्णोः पार्श्वमुपयाहि । तदा स धनद उप-- इन्तेति खेदे। वनेरयपि । मम शिशवोऽर्मका मे मार्ग परयन्ति । तदास घायु- मूचे । पायो है वायो ? द्विरुक्ति मम्घ्रमे । सम्घ्रमेण प्रवृत्ती यथेष्टमनेस्याप्रयोगी न्यायमिद इस्यनुशासनवलात्। त्वमेव विष्णुसमीपं प्रजेत्युतो वायुस्वदत् । मो. अहमपि जन्तुमच्य । कारणमाह-किं युप्माभिर्यजन्नप्रियो यजत्रस्य यजमानरूपम्य विष्योः प्रिया उरगपति शेष पृष्टन विष्णुमुपसेवमानो न दृष्ट, स उरगपति- ममिशिष्यति। यतो छहं तस्याशनम् । [फिर देवताओं ने कहा --- हे इन्द्र । तुम्ही भूमिह के पास जाओ । [न्द्र ने टसर दिया -] मैने मौ यश करके [ बढे क्लेश से ] इम पद को प्राप्त किया है । अतः जल- पति वरण ही उनके पास जाय । [इस पर वरुण ने उत्तर दिया कि] न्द्र ! इमारी पत्नी अमी नववधू है अर्थात् मैं उसे अमी विवाहोपरान्त लाया हूँ [ वह मेरा रारना देस रहा होगी। दरोगों ने विधेश बुबर से प्रार्थना की और कहा, माई! तुम्ही चित्त में पैर्य धारण रो [भदर्य के साथ जाओ] 1 इस पर धनद ने उत्तर दिया- बड़े क्लेश की बात है कि मेरे छोटे-छोटे बच्चे मेरा रास्ता देसते होंगे। फिर रोगों ने कहा-हे वायु ! तुम्ही विष्णु के पास जाओ । वायु ने उत्तर दिया क्या तुम रोगों ने विष्णु के पास उनकी सेवा में तत्पर उरगपति को नहीं देखा है ? (और जब देसा है तो जानते ही हो कि वायु सर्प का भक्ष्य है। एन्द:--ss sis sil Ill iss tss 5 सम्परा ॥ ७॥ अपि च- अग्रे याहि शशा? यन्निजवपुःपीयूपतः पोपिता- एतावत्समयं मया मुमनसः किं तस्य चैतत्फलम् । अग्ने गच्छ पुरो मुसं मसभुजां युप्माकमेयास्म्यहं मन्नारो समुपस्थिते किमशनं वक्त्रान्तरात् सेत्स्यति ।।३।। यग्रे इति तदा देवा उचुः शशांक? हे चन्द्र ! अग्रे याहि व विष्णुमुपया. हि। तदास चन्द्रो देवान्मन्यभापत । है मुमनसः हे देवा.? मया यव एतावरसम- यमियन्त कालं यूयं निजम पीयूपन स्वारीरामृतम्याभि पोपिनाः पुष्टिं नीता' सस्य वा तस्यैव पोपणस्य महम् एतत् फलं प्रदीयते युष्माभिः किम् ? मदा देया अमिमूचुः। हे भाने ? हे पढ़े ? पुरोग्रे गछ। तदा अग्निधान्यायवदन् । मो देवाः अहं (यदिः) युप्माकं मखमुजा देरानां मुखमस्मिा अहमेव युप्माकमुदरे खाद्यपदार्यान्यापयामि । मम नारी उपस्थिने सति किं युष्माम्मदा भोजन वक्यान्तरात् अन्यस्मात् महशत् सम्पति सम्मास्यते ! न सम्पास्यते पाय चतुर्थोच्छासः। सम्पादनाभावे च युप्मन्मरणमेव ध्रुवम् । अतोऽहं न प्रेपणीयः । 'पीयूपममृतं सुधा' इत्यमरः। और भी:- हे चन्द्र ! फिर तुन्हीं उनके समक्ष जाओ। इस पर चन्द्र ने कहा कि क्या जो मैंने अपने शरीर से झरते हुए अमृत को पिला-पिला कर देवताओं को परिपुष्ट किया, उसीका यह फल है ? [कि तुम देवगण मुझे वहाँ भेज रहे हो १] [अच्छा, फिर ] हे अग्ने ! तुम्ही सामने जाओ! [अग्नि ने उत्तर दिया] हे देवगण ! मैं ही तो आप लोगों का मुख हूँ ? जब मेरा ही नाश हो जायगा, तब क्या तुम लोग दूसरे मुख से साओगे ? [सारांश यह कि तुम लोगों को दूसरा मुस तो है नहीं, जिस से खाओगे ? फल यह होगा कि मेरे मरते ही तुम सब मर जाओगे]॥ छन्दः-sss is as us ss. SSIS शार्दूलविक्रीडितम् ॥ ८ ॥ अपि च- धातस्तात त्वमग्रे भवसि भगवतामग्रणीदेवतानाम् विष्णोः कोपानलोऽयं ज्वलयति च सुराः ? कूर्चपंक्तीः सुदीर्घाः । इत्थं गीर्वाणवाणीमतिकृपणतरां प्रस्खलद्वर्णवाक्या- माकर्योत्फुल्लगल्लाहसितवदनं शांगिणोऽस्मान्पुनातु ।। ६ ।। धातरिति-अग्निरुवाच तात ? ब्रह्मन् ? भगवतां पूज्यानां देवतानामग्रणीधुर्यः रवमग्रे विष्णोः पुरो भवसि ? इति काचा प्रश्नः । सर्वपितृत्वाद्देवाग्रणीत्वाच स्व- मेव विष्णुसमीपमुपयाहि । आपदिहि पितरः पुत्रान् पृष्ठतः कृत्वा स्वयमेव पुरो भवन्ति पुत्रस्नेहात् । अनण्यश्च कार्याकार्यकुशलत्वादनुचरान् इति भावः । इत्य- मुक्तो ब्रह्मा आह-हे सुराः विष्णोः अयं कोपानल मम सुदीर्घा आयताश्चतुर्णामान- नानां कूर्चपंक्तीः श्मश्रुपंक्तीः ज्वलयति । इत्थममुना प्रकारेण प्रस्खलन्तो वर्णा भयान गदस्वरेणोच्चार्यमाणा वर्णा येषु तानि । प्रस्खलवर्णानि तानि वाक्यानि यस्यां ताम्, अति कृपणतरामतिदीनां गीर्वाणवाणी देवगिरमाकर्ण्य शांगिणो नृसिंहस्य उत्फुल्ली विकसितौ गल्लौ कपोलो यस्मिन् तत् प्रहसितं वदनं ग्रहृष्टं मुखम् अस्मान् नः पुनातु पवित्रयतु । अत्र प्रहसितं वदनमिति असमस्तेन भाव्यं, वदनप्रहासस्य विधे- यत्वेन समासाऽयोग्यत्वात् । एवं प्रायोऽत्र चम्प्वामविमृष्टविधेयांशो दोपः प्रस्फुटति । 'फिर आग्न ने कहा है तात ब्रह्मा ! तुम पूजनीय देवों में अग्रगण्य हो, अतः तुम्ही विष्णु के समक्ष जाओ । क्यों ? ब्रह्मा ने उत्तर दिया-हे देवगण ! यह क्रोधानि मेरी लम्बी चौड़ी दादी-मूंछ को जला रही है-इस प्रकार उक्त अर्थ से भरी हुई भयवश प्रस्खलनशील तथा दैन्यपूर्ण विधाता की वाणी को सुनकर भगवान् के विहसित कपोलों वाला वदन हम सब को पवित्र करे । ---SSS SIS SII 111 155 SS SS 7777777 11 91 -- नृसिंहचम्पू अय महर्षऽयोपि- अहो । साम्प्रतमम्माभिविचारितमेक जीवनवीनम् । तच्छृणुत स महर्पय । नरहरिकोपशानुना प्रवृत्तेऽपि कल्पान्ते तत्कृपापानस्य प्रहा दस्य नैव नाशशकाफलकारकाश स्यादतो वयमपि सद्य फूर्चाभय सम्पाय निरस्तसमस्तोत्तरीयरसना सद्य किशोरदशामवलम्न्य सर्नेऽपि प्रहाद एर भगाम । किं परस्परप्रार्थनाव्यर्थप्रयासेन । अपरे तु प्रसाद- मनुनय तमिति प्रार्थयन् तात? त्वदर्थमेतायाननर्थस्त्वयैव निवार्यता मन्यथैक सधित्सितोऽपर प्रच्यरत इति न्यायात् श्रेय मायनाय नृहरि सेवमानस्य सर्वभूतोपप्लयोत्पन्नहिंसाननितप्रत्यवायो दुष्कर एप, अपय श सागरोऽपि सुतरा दुस्तर स्यात् । अथोपकुर्वाण भवन्त वैधन्यभीता अस्मलुटुम्चिन्य परमाशीर्मि प्रत्युपपरिप्यन्ति । तेनोभयमपि यशस्कर मेर स्यात् । इति हास्यरस । महो इति-अहो इति पञ्न । साम्प्रतमधुना अम्माभिरेव जीवनयीज जीवन धारणस्यादिमूर मुपायो या विचारित चिन्तितम् । तत्कारणमुपाय या त सर्व यूय महर्षय शृणुत आकर्णयत । नृहरेनृसिंहस्य श्रीविष्णो कोप फ्रोध ण्य कृशानुरनलम्तेन प्रवृत्ते प्रारब्धेऽपि करपाते प्रत्य तकृपापात्रस्य तदनुकम्पा भाजनस्य महादस्य न कदापि नाशस्य मरणस्य शका भय सैव कलंक दुर्यश कारणे कार्यतादाम्यारोप 1 तस्य अवश अयसर स्यात् । अतो हेतो वय मपि सर्व सद्यो शरिति चामय छुचानाममय सौरकर्मणा यदनादपनीयान्यन स्थापनेनेति । सम्पाच हरवा, स्वान् पूर्चानपनीयेरपर्य, निरस्तानि अपनी सानि समस्तानि उत्तरीयवसनानि उपरिधारणवस्थागि यस्ते मन्दो पय सच सकालमेव घर्चात्तरीयवसनापनयनसमालमेव किशोरदशा कौमारमवलम्या श्रिस्य संवापि वयमिह प्रहादसामा एव मनाम । परस्पर मिय प्रार्थनाया. प्रेरणाया प्यर्येन प्रयासेन किं को लाभ न कोपि इत्यर्य । अपरे तु इनोतु घिन महर्षय महादमनुग्रन्योपगाय समिति यक्ष्यमार- प्रकारेण प्रार्थयन् प्रार्यपामामु । किं तत् प्रायनमिति माह तातेति । तात? स्वयं खस्कृते विष्णुना कृतोऽयमेतागान् इयानमर्थ ! रवध नियायंतामपक्रिय ताम् । अन्यथा नो घेत् एक सधिसत सन्धातुमिन्टन पुम अपर प्रत्ययले. प्रश्यति इति न्यायादामागकात् , श्रेयामाधनाय अपवर्गमार्गममिलपतोन्स पर च नहरि श्रीविष्णु सेवमानस्य तव, सर्वभूतति सर्व भूतानामुपप्रवन उपद्रव हेतुना उत्पन्नया हिंसया बनित उत्पादित प्रत्यवाय एन दुप्कर पय सत्तुम , । । चतुर्थोच्छासः। शक्य एव । अपि च अपयशासागरः अकीर्तिसमुद्रो दुस्तरः स्यात् । अथेति पक्षान्तरपरिग्रहे । एवमस्मानुपकुर्वाणमुरकुर्वन्तं भवन्तं वैधव्यात् भीतास्वस्ता अस्माकं कुटुम्विन्यः भार्या अपि परमतिशयेन आगोभिराशीवादः त्वां प्रत्युपफरि- प्यन्ति । तेन इत्यमुभयमपि उपकारमत्युपकारद्वयमपि यशस्करं कीर्तिकरं सम्प-- स्यते । इति हास्यरसोश्वसिता। अत्र प्रवन्धे समुपवर्णित-विकृताकारवाकचेष्टा गणेशाद्या देवा मालम्बनवि. मावरूपा हास्यरसस्य । तेषां शुण्डिकासंकोचनाच्छादनविकृतवाक्प्रयोगादय उद्दी- पनविभावाः । आकर्योत्फुल्लगल्लमित्युत्फुल्लगल्लवमनुभावः। भन्न वणितं देवानां नृसिंहा भयं व्यभिचारिभावः । अन्येऽपि सम्भविनोऽनुभावादय ऊह्याः । फिर तो महर्षियों ने भीः-कहा ] अहो ! सन्मति हमलोगों ने जीवन को सुरक्षित रखने का एक उपाय सोन रक्सा है। तो उसको आप सब महर्षिजन सुनें। नृसिंह की जोयामिवश प्रलयकाल उपस्थित हो जाने पर भी उनके कृपापात्र प्रहाद के नाश की तो कोई आशका है नीं। अत:. हम सब भी तुरंत दाढ़ी एवं उत्तरीय का परित्याग कर किशोरावस्था का सहारा लेकर प्रहाद ही बन जाय । परस्पर एक दूसरे की निरर्थक प्रार्थना क्यों करें। दूसरे लोगों ने तो प्रहाद का अनुगमन कर उनसे यही प्रार्थना की तुम्हारे हो लिए इतना अनर्थ हो रहा है, तुम्हीं उसका निवारण करो, अन्यथा एकं सन्धित्सतः अपरं प्रध्यवते इस न्याय से [अर्थात् एक ही बनाने की इच्छा रखने वाले का दूसरा बिगड़ जाता है }. परमपुरुषार्थ की सिद्धि के लिए हरि की उपासना करते हुए तुम्हें निखिल प्रागियों की हिंसा का दुष्कर प्रत्यवाय तो लगेगा ही, साथ ही अपयश-सागर भी तुम्हारे लिये दुस्तर हो जायगा। दूसरे यह कि यदि तुमने [हम लोगों की प्रार्थना को कार्यान्वित कर ] उपकार किया, तो इसका फल यह होगा कि भावी वैधन्य से मीत हम सब की पलियाँ तुम्हें आशीर्वाद से उपकृत करेंगी। अथ करुणरस:- हन्ताहं तावदज्ञस्तव चरणकृपापात्रमात्रं मुरारे हन्ताहन्तासि दन्तावलनिबबलस्यापि शत्रोस्त्वमेव । पित्रापि त्रासितं मां प्रभवति भवतः कोऽपरस्त्रातुमुच्चै- र्लोकालोकाग्रभातुर्न भवति यदि तत् केन जीवेत् त्रिलोकी ॥१०॥ हन्नेति-हे मुरारे? हे नृसिंह ? अहं तावदा मन्दधीः स्वां स्वरूपतो ज्ञातु- मदम इत्यर्थः । किन्तु तव चरणयोः कृपाया एकमात्रं पात्रमस्मि । हे नृसिंह ? हन्तेति ह दन्तावलानां हस्तिनां निवहः समूहः तस्य बलं यस्य तस्य अपरि- मितकरिवलधारिण इत्यर्थः । शन्नोः मम पितुहिरण्यकशिपोरपि त्वमेव आहन्ता : 1 - ६० नृसिंहपम्पू । अतिशयन नाशयिता भमि विद्यमे । पिना जनकेनापि नामितमुत्पीडित मा भवत अपर, बहते इत्यर्थ । क उच्च प्रातु रक्षितु प्रभवति समते । लोकविशासित पिता रक्षति पित्रापि नामित मा स्वदपर को रचदिति मार । यदि पोशलोकस्य पर्वतविशेपस्य धप्रमानुन भवति न स्यात् तत्तहि कन अपरेण जीवनाधारेण निरोकी भुवनत्रय जायत् प्राण्यात् । 'दन्ती दन्तावो हम्नी' इत्यमर । भवतोऽपर इत्यत्र 'बन्यारादितरतें दिक' इति पञ्चमी । अन्य यर्थप्राणान् । सस्त्रति, कापरसपरर पणेन प्रारम्भ करने जा रहई स की बात है कि मैं नो अयन्न अरु व्यक्ति हु, मुरारे में सो रह वह के इन तुम्हारे चरणों की कृपामात्र । ६ देव । अनेकानेर हाथियों के से बनाती हिरण्याशिपु का हनन तुमने हो तो दिया। [ोपिना मद से रक्षा करता है ] उस रिला ने भी बर मुझे पस्त पर दिया, तो उसम दराने में आप की अपेक्षा मग ऐसा कौन था, जो अच्छी प्रकार मेरी रक्षा पर सरना था ? हद'-5SSSS! ISIS स्रग्धरा ।। १०॥ अपि च- निर्माता त्वच माता त्वमसि मम पिता त्वच नेता स्नेिता भ्राता माता ससा व भरसि नरहरे ? ल निधिदेयता था। मुक्तिर्मुक्तिपिरतिर्मम विशदयश प्राज्यसाम्राज्ययोग्य भाग्य मौभाग्ययुक्त किमु बचनचर्यस्त्व ममात्मा परात्मा ॥ ११ ॥ निर्मातेनि-६ नृसिंह स्व मम निर्माता रचयिताऽमि व माता जनन्यपि रघमेवासि। मम पिता, नेता निवाहक' सर्वकार्य निवाहक इम्यर्थ विनेता शिक्ष कश्श स्यमेवासि। त्व मे भ्राता, प्राता रक्षक, सपा मित्र, रय भुतिरपभोग मुधिरपवर्ग, विरनिराग्य, प्राज्यस्यातिविस्तृतस्य माम्राग्यस्य योग्यमनुपूर विशद च तद् यश इति विशदपशो विपुला कीर्ति स्वमेवामि । सौभाग्येन युक्त महित भाग्य मागधय समेवासि । नृसिंह ? एविध वचनचर्याश्यसमूह मापगसमूहयां किं, न किंचित् साध्यमि यर्थ । स्वमेर में परास्मासि स्वमय च मे आरमा अन्तरात्माऽसि । मम सर स्वमेवासीनि भाव । वमेव माता च पिता स्वमेव स्वमेव पन्धुम सखा त्वमेव । स्वमेव विधा द्रविण श्वमेव स्वमेव मरमम देवदेव' इत्यर्थ । नेता 'प्रमी, निपाहक, नायके, प्रवर्तके, पापक र इति नान्द स्नोममहानिधि ! मुक्तिभोगे मोनन ' इति । "निधिर्ना शेवधि" इत्यमर । ६ मूसिंह । नुम मेरे निर्माता, माता, पिता, नेना, दिना, माता, रक्षक, सखा, सति, नगदे मौ हो। देव' मुम मेरो मुटे मुक्ति राम्म, विशाल सामान्य योग्य - चतुर्थोच्छासः। भाग्य एवं सौभाग्य सव हो, अधिक वाग्विस्तार क्या करें, तुम मेरी अन्तरात्मा तथा परात्मा हो। छन्द:-SSS SIS SIRSS IS ISS स्रग्धरा ॥२१॥ अथ देवः- कीलाले क्लेदितोऽसि प्रथममथ पुनर्मुग्धदग्धोऽसि वह्ना- वुत्पातर्घात-पातरतिविषम-विपैर्दन्दशकादि-दशैः । मद्वेषात्क्लेशितस्त्वं शिशुहननकृताऽनेन पापीयसा यत् तत्सोढा मन्निमित्तं भुवि भवति तदानुएयमेतच्छिशोः किम् ।।१२।। कीलाल इति-अथानन्तरं पुनर्देव उवाच ! हे पुत्र प्रहाद ! शिशुहननकृता. बालधातकेनानेन पापीयसा पापिना दैत्येन मद्धेपात् मह्यं द्रुह्यता यतस्त्वं मद्ध- कोऽसीत्यतस्त्वं विविधैः प्रकारैः क्लेशितः क्लेशं प्रापितोऽसि । तथा हि-प्रथम कोलाले जले क्लेदितः, अथ पुनः हे मुग्ध सुन्दर ! प्रहाद ! वह्नौ दग्धोऽसि । उत्पातैरुपद्वैः, धाताश्च पाताश्च तैर्घातपातः, घातरस्यादिना हननैः, पातैः पर्व- तादेः पातनैः, अतिविषमविपैः अतिविपममत्युग्रं विषं गरलं येषां तैर्दन्दशूकादि- दशैः दन्दशूकादीनां सादीनां दंशैः दयानः क्लेशितः पीडितोऽसि । 'दन्दशूक बिलेशयः । उरगः पन्नगो भोगी' इत्यमरः । तदेतत् सर्व हे महाद! त्वं मन्निमित्तं मत्कारणात् मद्भक्तिकारणात् सोढा सोडवानसि । तत् तस्माद् एतद् हिण्यकशिपु- वधादिरूपं मच्नेष्टितं शिशोस्तव आनृण्यं भुवि भवति कि, नैवं भवतीत्यर्थः । 'मुग्धो मूढे सुन्दरे च' इति शब्दस्तोममहानिधिः । 'कीलालममृतं जलम्' इत्य- मरः । 'अजन्यं क्लीवमुत्पातः उपसर्गः समं त्रयम्' इत्यमरः। सोढा इति 'गवुल्तृ- चौ' इति पाणिनिसूत्रेण सहेः कर्तरि तृचि रूपम् । फिर स्वयं नृसिंह देव ने कहा:- हे पुत्र प्रहाद ! शिशु की हत्या करने वाले इस पापी ने जो तुम्हें क्लेश दिया, वह केवल इसलिए कि तुम मेरे भक्त हो और तुमने भी इसी लिए उन क्लेशों को सहा कि ये क्लेश भगवान् के लिए सहना पड़ रहा है, ऐसी स्थिति में तुम्ही कहो कि जो कुछ तुम्हारा भक्ति-ऋग है, उसका अपहार किसी साधन से हो सकता है ? देखो, उस पापी ने तुम्हें जलक्लिन्न किया, हे मुग्ध ( भोले बालक)। फिर तुम वहि में जलाये गए। इसी प्रकार विभिन्न उपद्रवों, प्रहारों, शिखर-पातन, एवं अति दारुण विष के प्रयोगों से तुम सताए गए, इतना ही नहीं सपों के दंशों से भी तुम पीड़ित किए गए ।। -SSS SS SLIP IS IS ISS स्रग्धरा १२॥ अपि च- प्रहाद तात किमदेयमिहास्ति तुभ्यम् आत्मानमर्पितवतोऽपि समास्ति लज्जा।

. - नृसिंहचम्पूः। उक्त्वेत्यसी रसनया परिलह्यमानः शान्ति जगाम करुणावरुणालयेन ॥ १३ ॥ प्रहादेति-हे तात प्रहाद ! ६ जगति तुभ्य किमदेयमस्ति । वं सकलस्प वस्तुजातस्य भाजनमसि जात एनेन मदनुरागंण, आत्मान समर्पितवतो दस. वतोऽपि मम लम्जैवास्ति । अर्थात् है ग्रहाद । यद्यपि स्वगवत्यातिनुष्टोऽह सुम्यं स्वमेदापितवानम्मि तथापि स्वगनस्तेनापि अहमनृणो न जातोऽस्मीति, अत एवेय लजा मा मिथुरयति इति भाव। क्रणावरुणालयेन दयासमुदण श्रीनृप्ति- हेन इत्युक्रवा इण्य गदिवा वात्मण्येन रसनया जिदया परिव्यमान. असो प्रहादःशान्ति समंजगाम माप। और मी- हे तात प्रहाद । इस समार में तुम्हारे लिये क्या देय है ! यदि मैं तुम्हें अपने आपको भी ममर्पित करे तो मी मुदो [ तुम्हारी मति को देखकर ] एज्जा या सोच पाही अनुभव होता है। इस प्रकार कहकर वह करणावरगालय नृसिंहदेव वाल्मल्य के आवेश में प्रसाद को अपनी जिहा से चाटने गे और हम स्पर्श अथवा दाम त्य के कारण प्रहार मी निताल मुरती हुए । एन्द:-SISIGISIS सन्ततिलका॥१३॥ गृहनियद्धशिशवस्तृणोपजीयिनः पशवोऽपि स्नेहाचित्ताः स्याहारं परिहाय सत्यरमेव गृहमागत्य वात्सल्येन यत्सानपि निनयन्ति । किच गृहेशं वश्चयित्वा पाययन्ति च । तथा पक्षिणोऽपि चंचूपटसंगृहीतकवलान् तरुचिरोविहितनीहनिहितशिशूनां मुखेऽर्पयन्ति । तथा केऽपि दयालयः पुमांसः परकीयपाकानवलोक्य दोभ्यामालिंग्य मुसमाचुन्थ्य लाल- यन्ति । परन्त्यस्य बालघातिनः कपटपटीयसः पापीयसो नष्ठुर्यमलौकिक- मयलोकितम् । आश्रयपरित्यागलक्षणदोपदूपितत्वात् पुत्रस्य पित्राऽस्य- भार्गोऽद्वेपि इति चेत् तदुत्पन्नमात्रापस्मारादिदोपोपहनपालाः पितृभिः किं न निहन्यन्ते इति । गृति-किंघ, हे प्रहाद ! गृहे निजसदने नियता प्रतिपदाः रजवा- दिना इत्यर्थः । शिशवोऽर्मका' वग्मा श्ययं । येषां ते मृगोपीविनः सृग- रपजीवन्ति सम्झीटाः स्नेहन प्रेग्गा भाई खिग्य रिसन्न चि चतो येषां से पशवोऽपि गवादयोऽपि स्वाहारं परिपज्य मपरं क्षटिस्येव धनाद् गृहमागम्य पासस्येन वरमलतया निमवस्मात् अभंसान् अनि निमयन्ति निमान् कुर्वन्ति । वारसत्येन स्वय व सायत्ताः सन्तो वामानवि यासस्पेन स्वायसान् कुर्वन्तीय।

चतुर्थोच्चासः। ६३ 'अधीनो निन्न आयत्तोऽस्वच्छन्दो गृह्यकोऽप्यसौ' इत्यमरः । गृहेशं गृहस्वामिन बजयित्वा प्रतार्य स्ववत्सान् पयः पाययन्ति चेत्यर्थः । तथा--तथैव पक्षिणोऽपि विहगा अपि चंचूपुटैः निजतुप्रैः संगृहीता आनीताश्च ते कवला प्रासाश्च इति तान् । अत्र 'चंचूपुटसंगृहीतान् केवलान्' इति व्यासेन पाट्यम् । कवलसंग्रहस्य विधेयत्वात् । अन्यथा वहुव्रीह्यर्थावगमादनिष्टप्रसकिः । तरूणां वृक्षाणां शिरस्सु शिखरेयु विहितेषु कृतेषु नीडेषु कुलायेपु निहितानां धतानां (स्व) शिशूनाम् अर्भकाणां मुखे आनने अर्पयन्ति ददति, तरुशिखरेपु स्वनीडेपु तान् स्वाभकान् चपुटैरितस्ततोऽन्नकणादि आनीय तेभ्योऽपयित्वा तान् पुप्यन्तीत्यर्थः। तथा केऽपि विरला इत्यर्थः, दयालकः दयाईचित्ताः पुमांसः पुरुषाः परकीयान् स्वेतरान पाकानर्मकानवलोक्य दोभ्यां भुजाभ्यामालिंग्याश्लिप्य मुखं तेषामाननमावुव्य चुम्बयित्वा लालयन्ति लाडनं कुर्वन्ति । किन्तु अस्य सुरारेहिरयकशिपोस्तु अलौकिकं विलक्षणं नैष्टुर्य क्रौर्यमवलोकित्तं दृष्टम् । कीदृशस्थास्य हिरण्यकशिपोरित्याकांक्षायामाह-वालधातिनःस्वार्भकहत्याकारिणः, कपटेषु पटीयसः पटुतरस्य कुशलतरत्येत्यर्थः । पापीयसोऽतिपापकारिणः । आश्रयस्य स्वपितुर्मार्गस्य परित्यागलक्षणः परिहाणलक्षणो यो दोपोऽपराधः तेन दूपितत्वात् आगस्कृत्वादित्यर्थः, तेन दैत्याधिपेन पित्रा जनकेनापि सता पुत्रस्य निजापत्यस्य प्रहादस्य अस्वमार्गः प्रहादस्वीकृतनिजेतरमार्ग एव अद्वेपि दिद्विपे। न तु ग्रहादोऽद्वेपि इति चेदुच्येत, तदप्यसत् , यतः तदुत्पन्नेति। तस्मात् पितुः उत्पन्नमात्रश्वासौ अपस्मारादिदोपैरुपहतश्चेति तदुत्पन्नमात्रापस्मारादिदोषोपहतः स चासो बालश्चेति । अर्थात् यदि कस्यचित् पुत्रः कश्चिन्जायमान एवार्मका अपस्मारादि (मृगी इत्यादि) दोपैः (रोगः) उपहन्येत परिगृह्येत तदा किम ईदृशो वालः पितृमिनिहन्यते, न निहन्यते इति दैत्येन्द्रेण प्रह्लादं क्लिनताऽतितरा- मागोऽकारीति भावः । 'भुजवाहू प्रवेष्टो दोः' इत्यमरः । 'पोतः पाकोऽर्भकः निम्मः इत्यमरः । अपस्मार इति अपगतः स्मारः स्मरणं यस्मात् (मिरगी) इति ख्यातो रोगभेदः । एतस्मिन् रोगे जाते रोगिणः सर्वविषयस्मृतिनश्यति । और भी- तृण खाकर जीने वाले पशु मी, जिनके बच्चे उनसे पृथक् करके घर में बाँधे हुए ई, सदैव स्नेह-पूरित विच हो अपने भोजन का परित्याग कर शीघ्र ही गृह को लौट आते हैं और वात्सल्य के द्वारा अपने बच्चों को वशीभूत कर लेते हैं। यही नहीं गृहस्वामी को ठगकर उन्हें अवशिष्ट दूध मी पिलाते हैं। इसी प्रकार पक्षिगण भी अपने अपने चंचुपुट में ग्रासों को संगृहीत कर वृक्ष के शिरोमाग में निर्मित नीड (घोसला) में पड़े हुए बच्चों के मुख में अपित करते हैं। तथा कुछ दयालु लोग परकीय शिशुओं को देखकर अपनी भुजाओं से उनका आलिङ्गन कर लेते हैं और मुख चूम चूम कर उन्हें । --

नृसिहचम्पूः।
दुलारने है । परन्तु इस कपर-पटु वालहत्यारे पापी के नेतृयं को मने अन्गकिक हो देवा ।
पिता के आचरित मार्ग का परित्याग ही दोष था और उमसे दूषित होने के पारण
परकाय मार्ग का विरोध हिरण्यकशिपु ने किया, न कि प्रहाद का, तो यह तक भी
मर्वया हायद्गम नहीं होता। कारण यह है कि अपना पुत्र अपम्मार आदि से ग्रस्त
हो जाय तो क्या वह मार द्वारा जाता है।
दीर्घायुभव विक्रमी भव भव श्रोणीशचूडामणि
लोकान् पालय वत्स लालय सुतार शश्वद्यशस्वी भव ।
नित्यं मचरणारपिन्दयुगलध्यानावधानक्षण-
प्रोद्भूते प्रशमोपपन्न-परमानन्दे निमग्नो भर ।। १४ ।।
दीर्घायुरिति-दीघं घिरमायुर्यस्य म दीर्घायु. चिरायुमंव । हे महाद ! वं
दीर्घायुरेधि । विक्रमी पराममी भव, सोणीशानां पृथ्वीशाना चूडामणिरमणी.
भंव। त्वमवती सम्राट मवेयर्थ । हे चरस ? प्रहाद ! पं लोकान् पालय,
सुतान् स्वपुत्रान् लाल्य, व पुनपानवान् भव्यर्थ । शश्वद् यापचन्द्रदिवा-
म यशस्वी भव । किं च हे प्रहाद ! एष भाग्य-सौभाग्ययुक्तस्त्य मम धरणार-
विन्दयोः मत्पादपद्मयोः युगलस्य युगस्य ध्यानाय यदषधानं मनस एकाप्रता.
पादन तत्तणे प्रोद्भूतः मजातः यः प्रामः शान्तिः (आन्तरिकी शान्तिरित्यर्थः)
तेन उपपन्ने उपनते परमानन्दे अतिनयितविदशममृद्धिमुखे सर्वोत्कृष्ट रमे
निमग्न भव । वाणिज्य काश्यपी सिनि.' इत्यमरः ।
अत्र प्रबन्धे धुर्दशाग्रस्नः शोच्या प्रहाद. आलम्बनविभायः। तस्य घात-
पात-दन्दशूक्दशन-दाहादय उद्दीपनविमानाः । स्वानुतापध्याकानि कालाले
क्रेदितोऽसि' इत्यादीनि आशीर्वादपरागि चान्यानि भगवद्वापयानि अनुमाया,
रशनया परिरेहन च । कागया परिरेहमान इत्युक्ता करुणा-भाग्मानमपितवतो-
ऽपि ममास्ति एजा' इति स्वा अन्येऽपि ध विपादादय रोयाः सवारिभाया।
एभिरभिव्यः प्रदादविषयको भगवत शोकः सामाजिक करणरमनास्वापत ।
हे पुत्र प्रसाद ! तुम दोषांउ हो, परारमी हो पृथ्वी में सर्वोच्च दो और रोशी का
पारन रो। हे वास। अपने पुत्रों या मन को और शाश्वत यशवी बनी
नित्य प्रतिदीचरणारविदों के ध्यान के लिए कोविच की कामना के समय प्राप्त
शान्निवसर्गातीत आनन्द में निमग्न रक्षा करो।
सुन्द-5ss IS IS Sपिनोटिनन् ॥१४॥
नेदुर्दुन्दुभयो दिपि प्रतिरबैरानन्दसान्द्र नभ.
पुष्प रनियामिनोऽपि ययपुर्विद्याधराः मंजगुः ।
प्रहादेऽधिकभाग्यमानि निभृनं पानमसाटे हर
अस्तीपीत मुरमिद्ध-चारणगणः श्रीमन्नृमि प्रभुम् ॥ १५॥

६५ चतुर्थोच्छासः। नेदुरिति-प्रहादे हरेनृसिंहस्य सकाशात् निभृतं निशब्दं प्राप्तप्रसादे प्राप्त लब्धः प्रसादोऽनुग्रहो येन तस्मिन् आशीर्वादवाक्यप्रयोगं विना नृहरेः संकल्पे- नैव लब्धानुग्रहे इत्यर्थः । अतएव अधिकं निरतिशयं भाग्यं भजते इति तस्मिन् (प्रलादे)जाते सुराणां देवानां सिद्धानां देवविशेषाणां चारणानां कुशीलवानां व गणो वृन्दं श्रीमन्नृसिंह प्रभु नारायणम् अरतोषीत् तुष्टाव । किं च तदवसरे दिवि दुन्दुभयः भेर्यः नेदुः अनदन् , प्रतिरवैस्तत्नतिध्वनिभिः नभो व्योम आनन्दसान्ध्र घनानन्दम् अभवदिति शेषः । नाकनिवासिनो दिवौकसोऽपि पुप्पैः प्रसूनैः वपुः अवाकिरन् नृसिंहमिति शेपः। विद्याधराः देवविशेपाः संजगुः गायन्ति स्म । 'कै गै शब्दे' इति धातोलिटि रूपम् । ववृपुरिति 'वृप सेचने' इति धातोलिटि रूपम् । धातूनामनेकार्थत्वेनार्थनिर्देशस्योपलक्षणत्वेन चानावकि- रणमित्यर्थः। प्रलाद ने जब चुपचाप भगवान् का प्रसाद प्राप्त कर लिया और जब चे निरतिशय भाग्यशाली होगए, तब स्वर्ग में दुन्दुभियाँ बज उठी और उनकी प्रतिध्वनि से सारा आकाश आनन्द लहरी से व्याप्त हो उठा-स्वर्गवासियों ने पुष्प-वृष्टि की विद्याधरों ने गान किया। तुर, सिद्ध, एवं चारण लोगों ने प्रभु नृसिंह का स्तवन किया। छन्दः-sss us is Is sst sst s शार्दूलविक्रीडितन् ॥१५॥ तत्र प्रथमं सुरगुरुः युग्मेन नृहरेः कीर्ति वर्णयति- 'कीर्ते ! त्रैलोक्यमूर्तेर्मम चरणभवा स्वर्धनीयं धुनीते सद्यः सन्तापमन्तः कलिकलिलमलं भञ्जनान्मज्जनानाम् आविर्भूता प्रभूता प्रभुवर भवतश्चक्रपाणेस्तु पाणे- र्लोकः शोकं विर्युक्त सकृदकृतकृतिर्मत्समाकर्णनेन ॥ १६॥ हस्तन्यस्ता विधाना सततमिह शिरोभूषणं याति शान्त्यै शम्भोरम्भो यदीयं सलिलभवशुषः कर्णवासः शिवस्य । भाले बालेन्दुरास्ते निभृतमिति हरेर्जाह्नवीपक्षपातं दृष्ट्वा सप्टेव कीर्तिस्त्रिभुवनजठराद् दूरदेशं जगाम ।। १७ ॥ कीनि वर्णयेतीनि-कीतिभंगवतोः परस्परमुक्तिप्रत्युक्तिभ्यामिति शेषः । तत्र पूर्व कीर्ति प्रति भगवद्वाक्यं गङ्गास्तुतिपरम् । हे कीर्ते ! त्रैलोक्यमूर्तेर्मम चरणभ- वैयं स्वर्धनी । त्रैलोक्यमूर्तित्वेन गङ्गाया मञ्चरणभवत्वमुपपद्यते इति भावः । मज्ज- नात् स्नानात् , मज्जनानां मद्भक्तानाम् । कलिकलिलमलम् कलिगहनपापम् अन्त:- सन्तापञ्च सद्यो झटिति धुनीते निरस्यति । ततः कीतिराह-हे प्रभवर । अहं ६६ नृसिंहचम्पू। धक्रपाणेर्भवत' पाणेराविर्भूना जाता प्रभूता गङ्गातो लिपुला घ। अय भाव - सड़गादिप्रभवा कीर्तिरित्यभ्युपगमादह भवत पाणिस्थितचमाजातेति पाणि जाता गहातु पादनाताह प्रभूता महती गङ्गा तु मदपेयारपेति गहा मधेय प्रशासति । विश्व मत् एकनारमपि अकृतकृति भकृत किचित्प्रयनोऽपि लोक । सदिति मरममाफर्णनेनेस्यनेन वाऽन्यति । मरसमाकर्णनेन मायग्रेन शोक पियुटते स्वतो नियुक्त करोनि । गङ्गाया सतापकलिमर शामकरव मजन रुपपुरुषव्यापारसापेत मम तु लोकशोकवियोजकरव पुरुषप्रयत्ननिरपेक्ष अषण- मानायुक्तमिति मम गङ्गातो वैशिष्टयमिति भान । ततो मगवान् पुनराह-- विधाना जगतस्रष्ट्रा ब्रह्मगाऽपि गहासदृशी सृष्टिं क शक्तो न गङ्गाम् । हस्त. न्यस्ता हस्ते क्मपइरो न्यस्ता । ति या गा इह लोके सतत शम्भो शिरोभूपणम् । विश्व यदीय गङ्गासम्बधि अम्मो जल मलिलमवरष सटिल. भरेन कालटेन शुप्यत शम्भो शान्त्य याति प्रभवतीत्यर्थ । इत्थं भगवद्- वाक्यमाकर्ण्य कीर्तिमनमि निभृत निशब्द पिचारिलवनी न तु भगवन्त प्रत्यु करती रोपात् । मम शिनस्य कर्णवास । सतत मां शिव स्पृहया शृणोतीति भाव । अन्यच माम्बरपमूतो यालन्दु सतत शिवस्य माले अस्ति । एय शिव शिर स्थितामिव मामय न पश्यति तत्राया गलतु पश्यति इति मिमृत हरे. हिचीपचपात दृष्ट्वा विचार्य अत परमनुस्या रटेर कीर्तिनिमुवनजाराद प्रैलोक्यमायाद् दूरदेश जगाम । लोक्यमूतर्विष्यो स्वरूप सनिधिपरिजिद्दीप थैवति भाव । घटोक्यादपि अधिकदशव्यापिनी तव कीर्तिरिति भणितम् । उनमें सबसे पहल मुरगुरु ने दोहकों से नरहरि की बीति गाई- [पनि के प्रति भगवान् का पहल पहल गदास्तुनिएरक वाक्य है। हे दीनि । मुस पिलोमात्मा के घरों से उपन्न दुई यह गङ्गा स्नान ये पसरूप मनुष्यों के आन्तरिक सताप एव पलियाल के गहन पापों को अविलम्य नष्ट कर देती है।[यह मुनकर कोनि रहती है- इ प्रमुर। मैं नो चक्रपाणि विष्णु के पाणि से (पराश्मवा) उत्पन्न दुर हूँ और गगा से वहों वही हूँ। दूसरी बात यह है कि कोई एक बार मी विना विमा शारीरिख या मानसिक पत्न के मेरा श्रवा पर ले तो निश्चित हो वह शोरमुक्त हो जाता है। अष्टकार-व्यतिरेक । पन्द'-sis STRISIS स्रग्धरा ॥ १६ ॥ [ भगवान् ने फिर कहा- देखो, इस मा को प्रभा ने दस्तगत' यमण्डनु में धारण कर रमा है, और इम ममार में वर सदेव शिव वा शिरोभूषण बनी है। छना ही नहीं, यही वह गाजल है, जिमने मन्द्र से निकले हुए विर के मगधरूप मासने दर सम्म कोशान्त किया था। शिरमाने मरने, मन में सोचा-मेशि चतुर्थोच्छासः के कानों में वास करती हूँ अर्थात् शिव मुझे सदैव सादर नुनते रहते हैं और दूसरे यह कि मेरा स्वरूपभूत वालेन्दु (श्वेत होने के कारण) भी तो शिव के माल पर विराजमान है; फिर क्यों भगवान को इतना जाह्नवी पर पक्षपात है ? लगता है इसी पक्षपात को देख कर कोर्ति उनसे रूठ गई और त्रिभुवन के बाहर बहुत दूर चली गई। अलंकार---उत्प्रेक्षा, व्याजत्तुति । छन्दःसन्धरा ॥ १७ ॥ सर्वे स्वर्गनिवासिनः सुरवराः स्वस्वाधिकारस्थिराः त्वत्सेवारससादराः सरभसं पीयूपपानादराः । स्वर्वेश्याकुचकुम्भसंभृतिपरारम्भोत्सवैनिर्भराः तत्र श्रीनहरे ! चिरं तव कृपापाङ्गः परं कारणम् ॥१८॥ : सर्वे इति-हे श्रीनृहरे ? श्रीनृसिंह ? यत्स्वर्गनिवासिनः स्वर्गीकसः सर्वे अपि सुरवराः अमराः स्वे स्वे अधिकारे स्वस्वकर्तव्यकर्मणि स्थिराः व्यापृताः सन्ति, यच्च ते देवाः स्वसेवारससादराः तव सेवारसे सादराः निस्पृहाः विद्यन्ते, तथा सरभसं सहर्प पीयूषपाने अमृतपाने आदरः येषां ते सन्ति, यच्च ते देवाः स्वर्वेश्यानां स्वर्गस्थानामप्सरसां कुचाः स्तना एवं कुम्भाः घटास्ते पा सम्भृति- 'पराः सन्धारणपरायणाः रम्भोत्सवैः रम्भानाम्न्याः अप्सरसः उत्सवैर्म हैः निर्भरा युक्ताः सन्ति, तत्र सर्वत्र चिरं चिरकालात् तव भगवतः कृपापाङ्गः कृपाकटाक्षः एव कारणं निदानं वर्तते इति शेषः। दिवौकसामपि निरतिशयानन्दस्य सर्व- विधैश्वर्यप्रपञ्चस्य च त्वमेव निदानमितरेपां भूलोकादिवासिनां मादीनां तु सुखादेः त्वं कारणमिति किमु वाच्यमिति भावः। 'वेगे हर्षे औत्सुक्ये रभस' इति शब्दस्तोममहानिधिः । 'निर्भरोऽतिमाने तदयुक्ते' इति च । 'अपाहो नेत्रप्रान्ते तिलके च' इत्यपि । 'पीयूपममृतं सुधा' इत्यमरः । हे नृसिंहदेव ! ये स्वर्गवासो सभी देवगण जो अपने अपने अधिकारों में भलीभांति संलग्न हैं, तुम्हारी सेवा में इतनी आदरखुद्धि दिखाते हैं, और जो निरन्तर पीयूप- पान में तत्पर रहा करते हैं, जो वरावर स्वर्गीय वेश्याओं के कुचकुन्ममर्दन में निरत रहा करते हैं, जो रम्मा नामक अप्सरा के नर्तनोत्सव में मम रहा करते हैं, सो सब तुम्हारी कृपाकराक्ष का ही फल है। छन्दः--5ss us is us ssi ss! S शार्दूलविक्रीडितम् ॥ १८ ॥ चारणा:- त्वदोर्दण्डप्रतापप्रचुरहुतवहात् संप्रतप्तोऽयमग्निः मनोम्भोधावगाचे प्रतिजठरमपि प्राणभाजा प्रविष्टः । - पसल ६८ नृसिंहदम्पूः। योऽसौ न कापि लीनः स सलु नरहरे गाढमूछो प्रपन्नो जीवत्यद्यापि लोफे व्यजनमुसमन्द्वीज्यमानः समन्तात् ॥१६॥ स्वदिति-हे नरहरे? हे नृसिंह? प्रमिद्योऽयमग्निर्वह्निः तव दीपायव भुजा वेष दादी तयो. प्रतापोऽनुमाव एव प्रचुरः प्रभूत हुतवह. अग्नि तस्मात् समतप्त तेन तापिता समित्यर्थः । अगाध प्रतिधारहिते अम्मोधी जटघी मग्न. काल नयति प्रागभाजां शरीरिणा प्रतिजहर जठरे जटरे सर्वस्य जटरे उदरे प्रविष्टः मुगुप्त. सन काल नयति । यश्च तस्यैवाग्नेर भूत. चिदपि न लीन नारमानं प्रच्छादितवान सोऽनला गाठ मूदी चेतनाराहित्य प्रपत्र मापन मन् ममन्तात् सर्वत. व्यजन मुग्पमस्ना प्यजनादिवायुना ध्यजनमुपमरदम्यो वा चीज्यमान. क्य चित् अवापि लोके जीवति प्राणान् धारयति । पदमुनमतापाग्निना तिरस्कृतोऽयं प्राकृतोऽग्नि निस्तेजस्क इव तिएतीत्यर्थः। 'भुजयाहू प्रवेटो दो' इत्यमरः । हुतमग्नी प्रक्षिप्त हविरादि वहति देवान्प्रापयति इति हुतवहोऽग्निः । है नरहरि । तुम्हारी गुजामों से जानन प्रचुर प्रतापरूपी अग्नि ने जगत की प्रसिर मग्ति को पर्याप्त संतप्त कर दिया। यही कारण है कि सासारिक अग्नि अगा सागर के तल में (वाहवान के रूप में) बाबर विप गई, [ उससे भी बची, ही प्रत्येक प्राणी के जठर में (जाठराशि के रूप में) निरोहित हो गई, और को वहीं न हो सकी, उसे गाद मूच्छा हो गई, तो रसीका पल है कि आज ससार में चारों और मुंह से फूक क कर लोग समे हीच में शते है--जिलाते है। छन्दः-ssist In Sirs IS सम्परा 11 १.॥ सिद्धः- सूत्रप्रोतरिचित्रवर्णमणियद् यस्मिन् जगद् वर्तते यस्मिन्नेव जले तरगयदिदं संजायते लीयते । यस्तकर्मवियर्जितः सलिलवत् साक्षी सहस्रांशुपन् तं त्वां श्रीनृहरे पुराणपुरुपं का स्तोतुमीशो भवेत् ॥२०॥ मूत्रति-अथानन्तरं मिद उवाच । श्रीनहरे ! पुराणपुरुष पुरातनं खां क स्नोतुमीशः समर्थो भगेन् न कोऽपि या स्तोतुमीष्टे इत्यर्थ । कीर यामिया यस्मिमिति। पस्मिन् पयि इदं पुरो श्यमानं जहाजहाग्मजगत् स्ने प्रोता स्यूताः विचिम्रवर्णा विविधरना मगयो ग्नानीच यतते इति शेषः। यग्मिन्नर स्मि भवति इद अगत् जले तरन्यत् योनिदत् सजायते उत्पादने पसारथ हीयते तनैव सहतिमुति। यरचा तवमविवर्जित. अगतो विविधः दम नसायसे नलिनपत्रं सस्टिमिन उदासीनः सन् तिष्टसि । यदा लिएर - चतुर्थीच्छ्वासः । तरङ्गच्यापाररहितं प्रशान्त तद्वजगद्व्यापारहितस्त्वं प्रशान्त इत्यर्थः । यश्च स्वं सहलांशुवत् भादित्य इव सर्वेषां साक्षी भूत्वा तिष्ठसि । 'यस्मिन् द्यौः पृथिवी चान्तरितमोतं मनः सह प्राणेश्च सवैः' 'ममान्तरात्मा तव च ये चान्ये देह- संश्रिताः । सर्वेषां साक्षिभूतोऽसौ न प्राधः केनचित् क्वचित्' इत्यादि श्रुतेः स्मृतेश्च । मसङ्गो हायं पुरुषः' इति च श्रुतेः। इति श्रीनृसिंहचम्पूकाव्ये चतुर्थोच्छ्वासः फिर सिद्ध ने प्रार्थना की:- जिस परमात्मा में यह संसार सूत्र में मणि की भाँति पिरोया हुआ है, जिसमें, बल में तरंग की भाँति, संसार उदित और लीन होता रहता है, जो सांसारिक कर्मों से सर्वथा जल की भाँति असंपृक्त रहता है, जो सूर्य के समान निर्लिप्त भाव से जगत् का साक्षी है, हे नृहरि! वैसे तुझ परम एवं पुरागपुरुप की स्तुति करने में कौन समर्थ हो सकता है? छन्दः-शार्दूलविक्रीडित ॥ २० ॥ नृसिंहचम्पू का यह चतुर्थ उच्छ्वास समाप्त ।

अथ पश्चम उच्चास: -- अथ शृङ्गार.- यद्वदनेन्दोमदये हरेश्चकोरायित च नेत्राभ्याम् । तल्लावण्यनिधान रमाभिधान महः प्रयया ॥१॥ यविनि-वदनमिन्दुरिव वदनेन्दुः। यस्या रमाया श्रिय' बदनेन्दो मुर- चन्द्रम्य उदये हरेः श्रीविष्यो नेग्राम्या नयनाम्या चशेराषितम् चोराम्या- मिधाचरितम् । लावण्यस्य निधान निधि रमाभिधान रमाभिधेयं महः तेजःप्रययो श्रीहरिमुपजगाम । प्रहादप्राप्या कारुण्योदयेन क्रोधापगमे सिद्धादिस्तुरया प्राप्त- प्रमादे च भगवति भय श्रीहाश्वमर इति ज्ञात्वा रमा माप्तैति भाव । 'महस्तू. रसवतेजमो' इत्यमरः । 'मुसाफलेपुरछायायास्तरलायमियान्तरा। प्रतिभाति यद- उप तलावण्यमिहोग्यते' इत्युक्तो देहसौन्दर्यभेदो लावण्यम् । चकोरः पशिविशेषः । भव हार का वजन आरम्म करते है- जिसके ददनरूपी चन्द्र के उदित हो जाने पर भगवान के नेय चकोर की लोला धारण कर लेने हैं, उस रावण्यमामर रमा नामक तेजोराशि के समीप भगवान् पहुंच गए। छन्दः-आयो॥१॥ किं वर्णनीयमस्याः कविवर्यः सौकुमार्यमाययाः । जननं क्षीरममुन्द्रे मन्दिरमिन्दीवरं यस्याः॥२॥ विमिनि- कविवर्यरस्मादशैरन्यया कविशिरोमणिमि. भार्यायाः 'कर्तध्यमा- घान् काममर्तब्यमनाचरन् । तिष्टति प्रकृताचारे स था आर्य इति स्मृतः' हरयुक्तलगाया उदारचरिताया अश्या स्माया टपया. सौकुमार्य मुकुमारता किं वर्गनीयं न धयितुं शक्यते इत्यर्थ । यस्या रमाया जननमुत्पत्ति' वारसमुद्रे जानमिति शेप ! यस्याश्च मन्दिर निलयः इन्दीवरं नीलोपटम् । यस्याः श्रियः उत्पत्तिस्थानं सारसमुद्रा, भालयश्च साप्रतमिन्दीवर इयमपि लोकोत्तरमिति तस्याः किमु याच्यं सौकुमार्यमिति भावः । उस आर्या के सौमार्य का विवर क्या वर्णन करेंगे, निमकी उत्पति हो हीरसागर से है और जिमका मन्दिर वय कम है। छन्द-आर्या ॥२॥ अपि च- मौन्दर्येण भृशं दृशोनरहरेः माफल्यमातन्वती सभ्रमहमपाङ्गवीक्षणयशादाकर्पयन्ती मनः।

१ पञ्चमोच्छ्वासः। ७१ स्फूर्जत्कङ्कणकिङ्किणीगणझणत्कारैः कृतार्थे श्रुती कुर्वन्ती शनकैर्जगाम जगतामाश्चर्यदायी रमा ।। ३।। सौन्दर्यनि-अङ्गप्रत्यङ्गानां यः सन्निवेशो यथोचितम् । 'सुश्लिष्टः सन्धिवन्धः स्यात् तत् सौन्दर्य मुदाहृतम्' इत्युक्तलक्षणेन सौन्दर्येण नरहरेः नृसिंहस्य दृशोर्न- यनयोः भृशमतिशयेन साफल्यं सफलतामातन्वती विदधाना । भ्रुवोर्भङ्गः भ्रभङ्गाः भ्रूसञ्चारः तेन सहितं सवैभङ्गम् । अपाङ्गाभ्यां नेत्रप्रान्ताभ्यां वीक्षणं दर्शनं तस्य वशात् कारणात् सभ्रूभङ्गकटाक्षदर्शनात् हेतोरित्यर्थः । हरेमनो मानसमाकप- यन्ती स्ववशमानयन्ती तथा स्फूर्जन्तीनां क्वणन्तीनां कङ्कणकिक्षिणीनां करभूषण- क्षुद्घण्टिकानां 'किक्षिणी शुद्घण्टिका' इत्यमरः। गणानां निकराणां झणकारैः झणझणध्वनिमिः श्रुती कौँ कृतार्थे कृतकृत्ये कुर्वन्ती जगतां लोकानामाश्चर्यदात्री विस्मयोत्पादिनी रमा श्रीः मन्दं जगाम श्रीहरि प्राप । 'अपाङ्गो नेत्रयोरन्तौ' इत्यमरः । 'वेदे श्रवसि च श्रुतिः' इत्यमरः । 'कङ्कणं करभूषणम्' इत्यमरः । हरि के नेत्रों को अपने सौदर्य से अत्यधिक सफल बनाती हुई नेत्रों के प्रान्तमाग से देखने के कारण कटाक्षपात [आदि विलासमयी] चेष्टाओं से उनके चित्त को आकृष्ट करती हुई तथा झनझनाते हुए करण एवं किङ्किणी के मधुर स्वर से उनके कों को कृतार्थ करती हुई संसार को आश्चर्यान्वित करने वालो रमा भी धीरे-धीरे उनके समीप पहुंची। छन्दः---sss us is Is SSI SsI शार्दूलविक्रीडितम् ॥ ३ ॥ अपि च- अन्योऽन्यं परिपश्यतोः सरमसं प्रेमप्रसङ्गोत्सवाद् ईपत्स्मेरमुखाब्जयोरतितरां यूनोरनूनश्रियोः । श्रीश्रीवल्लभयोः क्षणं विरहतः प्रोद्यत्समुत्कण्ठयो- भूयासुर्जगतः शिवाय सततं संकेतभाजो दृशः ॥ ४ ॥ अन्योन्यमिनि-सरमसं सहर्पमन्योन्यमितरतरं परिपश्यतोरवलोकयतोः, प्रेम- प्रसङ्गोत्सवात् प्रेग्णः स्नेहरसस्य प्रसङ्गोऽवसरः तस्य उत्सवात् ईषत् किचित् स्मेरे विकसिते मुखाब्जे मुखकमले ययोस्तयोः, अनूनधियोः न ऊना हीना श्री: शोभा ययोस्तयोः सम्पूर्णशोभयोरित्यर्थः, विरहतः वियोगाद्धेतोः प्रोद्यत्समु- रकण्ठयोः प्रोद्यन्ती प्रोनच्छन्ती समुत्कण्ठा औत्सुक्यं ययोस्तयोः अतितरामत्यर्थं, यूनोः युवा च युवतिश्च तयोः 'पुमान् स्त्रिया' इति युवशब्दस्य शेषः श्रीश्रीवल्ल- भयोः श्रीश्च श्रीवल्लभश्च तो, तयोः लक्षायाः नृसिंहस्य च, क्षणमीपत्कालं, सङ्केत. भाजः सङ्केत भजन्ते इति सङ्केतभाजः दृशः लोचनानि, सततं निरन्तरं, जगतः - ..

नृसिंहचम्पूः। संसारस्य विशय मङ्गलाय भूयासुः भवन्तु । 'इटलाभे औरसुक्ये च उत्कण्ठा' इति शब्दस्तोममहानिधिः। और भी उस प्रेम के प्रसद्ग में एक दमरे को औषों से देखते हुए, पोटा मुस्कराते बदन बाले, परस्पर भतिरेको शोमा वाले, क्षामर के पारस्परिक विरह से भी उत्वपिठन हो भाने वाले श्री पब श्रीवल्लम के गृङ्गारिक सवेनों से भरे हुए नेत्र ससार के कल्याणा सतन बने रहे। एन्द-5s is a 155 SSI ssi s शार्दूलविक्रीडितम् ॥ ४ ॥ लक्ष्मी याप्यदृष्टपूर्व सिंहमुख ते तथापि न भयं मे । चिरतरकृतपरिचरणी चरणी करुणानिधे यतो वेमि ॥५॥ यद्यपीनि-हे करुणानिधे ! दयासागर श्रीनृसिंह ! यद्यपि ते सब इदं सिंहमुपं सिंहाकृतिवदनम् , अदृष्टपूर्व पूर्व कदापि न मया लोचनगोचरीकृतं तथापि मे मम त्वत्तो भयमातको नास्ति । यतो यस्मादेतोः चिरतरात चिरकाला कृत परिधरण सेवन ययोस्ती से पाणी पादी अह सम्यक नि जानामि परिचिनो- मीत्यर्थ है कर निधि ! यपि तुम्हारा यह मिह पी आदि वाग मुंद मने कभी नहीं देखा है, तथापि मुझे इससे कोई भय नहीं है। इस निमयताका कारण यह है कि मैं तुम्हारे उन चरणों को अच्छी तरह पहचानती हू, जिनकी सेवा निवाल से की गई है। अटद्वार:- परिचरणी चर--में यम नामर आहार है। मन्द-ह 'माया' का गीति' नामर एक प्रभेद है। यह मानिस बन्द है। इसमें गम होने है। प्रत्येक गायु के होत है। इसके दोनों चरणों में ३० मात्रा ॥५॥ ततः सकललारण्याविष्टानमिन्दिरापि जगजनमनोमोहनामिय रूपं, भ्रूचापनिहितनिशिन विशिसमिर कटाक्ष मदमुदितमातङ्गगतिवि. लासं घरपरणन्मणिनूपुरपिचिननादित्रनिनादं बिभ्रती कोटिसमूचिमूरिव ललितमयोग सौन्दर्यसिन्धुलहरीप नृहरेः समक्ष प्रचलितुं प्रचक्रमे । नन पति-ततस्तदनन्तरम् जगजनमनोमोहनानम् जगतां प्रयाणामपि लो. कानां जनानां लोकानां मनो मेहयतीति मनोमोहन तयानमिति जगधयमनु- प्या मनम' सम्मेवारीमा सौन्दर्ष विनती यापन्ती भुषा पञ्चमोच्छासः। ७३ वेव चापौ धनुपी तयोनिहिताः संहिता निशितास्वीक्ष्णाः विशिखा बाणा येन तं कटाक्षमिव अपाङ्गदर्शनमिव विभ्रती मदमुदितेति मदेन मुदितस्य मातङ्गस्य गतेविलास इव विलासो यस्य तम् , चरणेति चरणयोः पादयोः रणतां विणता मणिनिर्मितनूपुराणां विचित्रं विलक्षणं वादित्रनिनादं मृदंगादिवाद्यध्वनि विभ्रती, कोटिसमूहा चमूरिति कोटिसमूहचमूः कोटिसंख्याका सेना इत्यर्थः, सा इव, लद्धिता उन्नचिता मर्यादा स्थितियया सा सौन्दर्यस्य सिन्धोः सागरस्य लहरी वीचिरिव सकलस्य सर्वस्य लावण्यस्य अधिष्टानं निवासरता इन्दिरा सा श्रीः अपि गृहरेः नृसिंहस्य समक्षं प्रत्यक्षं प्रचलितुंगन्तुं प्रचक्रमे उद्यता वभूव । पत्कबाण- विशिखाः इत्यमरः । चादित्रं मृदङ्गादिवाचे इति शब्दस्तोममहानिधिः । इसके पश्चात निखिल सौन्दर्य के निधान, करोड़ व्यक्तियों से घटित सेवा की तरह मर्यादा का अतिक्रमण करती हुई, सौन्दर्यलहरी की भांति उस इन्दिरा ने भी भगवान् के समक्ष चल पड़ने का उपक्रम किया, जिसका रूप सारे संसार के प्राणियों के मन को वशीभूत करने में मोहनास्त्र का कार्य करता है, जिसके कटाक्ष धनुषाकार भौहों पर पड़े हुए तीखे बाण के से जान पड़ते हैं, जिसकी गति में मत मतगज का गति-विलास झलकता है, जिसके चरणों में निरन्तर मणिमय नूपुर का निनाद झड्कृत होता रहता है । अलङ्कार :-'भ्रूचाप' में रूपक तथा अन्यत्र कई स्थलों पर उपमा स्पष्ट है। एवमरविन्दविगलमन्दमकरन्दविन्दुसन्दोहचदिन्दिरासुन्दरतरवदन- मधुराधरसुधासंबन्धनिःसृतमृदुतराक्षरनिकररचितकर्णरसायनस्य चिर- तरविरहसोत्कण्ठहृदयसम्भावितसंभोगारम्भसंभवतोपामिलापमिपेण क- : मलाविमलमुखकमलमधुपानसादरनयनभृङ्गस्य विपुलपुलककुलकलित- कलेवरस्य भगवतः क्षणमन्तःकरणं शृङ्गाररसाणवे मन्नमासीत् । एवमिति एवमिस्थमरविन्दात् कमलात् विगलन् तरन् यः अमन्दोऽत्य- ‘धिको मकरन्दः पुष्परसः तस्य पृषतानां सन्दोहवत् समूहवत् इन्दिराया लक्ष्म्याः सुन्दरतरस्यात्यधिककमनीयस्य वदनस्याननस्य यो मधुरोऽधरोऽधरो दन्तच्छदः स एव सुधा पीयूपं तस्य संवन्धात् संकात निःसृतानां निर्गतानां मृदुतराणामतिसुकुमाराणां श्लषणानां वा अक्षराणां कचटतपादिवर्णानां निकरण प्रकरण रचितं कर्णयोः श्रोत्रयोः रसायनं जराव्याधिहरमौषधं, यस्य तस्य चिर- तरेण चिरकालिकेन विरहेण वियोगेन सोस्कण्ठमत्युत्सुकं यद् हृदयं तस्मिन् सम्भावितः यः सम्भोगारम्भस्य संभवः तेन यः तोपस्यातिशयानन्दस्यामिलाप: तस्य मिपेण वान्छाब्याजेन कमलाया लदम्या विमलस्यातिगौरस्य सुखकमलस्य चदनान्जस्य मधुपाने अधररसपाने सादरे नयने नेने एव भृङ्गौ मधुकरौ यस्य तस्य, विपुलैः प्रभूतैः पुलककुलै रोमाञ्चसमूहः कलितं व्याप्तं कलेवरं शरीरं यस्य तस्य -- ७४ नृसिहचम्पूः। भगवत. श्रीनृसिंहस्य अन्तकरणं स्वान्त पण मुहूर्तमान गृङ्गाररसाणवे हार रससागरे मान निमानमासीत् । मकरन्द पुष्परस हायमरः ।। इसके पश्चात् उक्त अवसर पर भगवान का अतर क्षण भर के लिए महाररस के समुद्र में विलीन हो गया। कारण यह था कि उस समय भरविन्द से झरती रे मकरन्द-यरिया की राशि सा पनीन होना हुमा एन्दिरा के मुदरतर बदन मधुर-अधर में नौ सुधा मरी है। उसके सम्पर्क से मुम्ब निर्गत वचनावरी उनके कानों में रसायन या सा काम कर रही थी, मग का विमर मुस-कमल था और उसने घरकते हुए माधुर्य का पान करने के लिए इनके नेत्र मौरों की तरह सादर टूट रहे थे। यह दिक्षा स्वामाविक है, उस अवसर पर चिरकालीन विरह-जनित मौलण्ठय के कारण समाविन समोगमयी वृत्तिवे हदय में उदभूत हो जाने के परिणाम स्वरूप जगा हुआ तोष एव अमिराप तो उम काल के लिए वहाना मात्र था, उनका सारा शरीर पुरकापुर से मदिन को उठा था। भटदार:-fa से केतापति'। उपमा, रूपक एवं भृत्यनुप्राम की मी उधम छा। आश्लेपानसरे फरण न हरेहारः समुत्तार्यते । यल्लम्या न तु वक्षसोऽन्तरमयत्र्याजेन यत्तन्मृपा । सूत्रालम्बितकौस्तुभचिपसोन्मुक्तस्वकीयानुज- प्रोद्भुताधिकलज्जयेत्यनुदिन शस्तशक्षणम् ॥ ६ ॥ भारत-भारपावसरे समागमप्रसने लाया. बिय. मधम उरमा हरे समीपतेः करेग हस्तेन हार न समुत्तार्यते हारो नापनीयते इति यत् तत् अन्तर• भयम्याजेन मानमोगहनुना मापनीयते इति यदि कश्चिदाधीत वाकत था उन्मपा सदसत् । हरिसमागमावसरे लपम्या हार नापनयति तत्र कश्चन गहते पत् पदि हरिहारमपमयेत सदा गाढालिनालया समोर दिसत अतः हरिहर नापनयति । परन्तु कविरमान्यदेवीप्रेक्ष्य हारानपनयनस्यद कारणं मिष्या इत्याह । सत्र हि हारानपनयनस्य वास्तविक कि कारणमिग्यपश्य दशमाह कविः सूत्रेति पुग्ने अबग्यितस्य कौरनुमस्य मगिविशेषस्य प्रशिकमेन प्रकाशन उन्मुका धारि- 'ता या स्वकीयानुजस्य स्वधातु। कौस्तुमस्येत्यर्थः चीरसागरोत्यपालप्मी कौस्तु. मश्च परम्परमुभावपि भ्रातरावेव प्रोद्भूना समुद्मूना अधिका एजादी तया हानाहारो नापनीयते हरिणा इतिहतो अनुदिनमहर्दिवमस्तगपगम् भस्त. भाडे निगत इंपणे होने पस्मिन् इति क्रियाविशेषणम् । अमीटग्मीपतिय परस्परं रमेते इति मन्ये ।

पञ्चमोच्छासः। [इस शृङ्गार रस के आवेश में भगवान् ने लक्ष्मी का आलिङ्गन किया-इस आश्लेष के अवसर पर यद्यपि लक्ष्मी को यह उचित था कि गाढ़ आदलेप में विघ्न डालने वाले हार को हटा दें, फिर भी उन्होंने अपने हाथ से भगवान् के वक्षःस्थल पर पड़ा हुआ हार हटाया नहीं। हार के इस अनपयन में कुछ लोग यह बतलाते हैं कि उस आकस्मिक एवं हठात् आश्लेष के कारण लक्ष्मी के अन्तःकरण में भय एवं उद्वेग पैदा हो गया। इसी भय एवं उद्वेग के कारण लक्ष्मी उसे हय न सकीं। कवि लोग इस कारण को उचित नहीं समझते। उन लोगों की तो निःशङ्क यह उत्प्रेक्षा है कि असल में लक्ष्मी को उस अवसर लज्जा आ गई। भगवान् के वक्षःस्थल पर पड़े हुए हार में कौस्तुम मणि लटकता है। कौस्तुभ मणि एवं लक्ष्मी समुद्र की सन्तान हैं, अतः दोनों परस्पर भाई-बहन हैं। सारांश यह कि आइलेप के अवसर पर साक्षात् भाई को सामने देखकर वे लजित हो गई और लज्जित होने के कारण हार को हटा न सकी। अलङ्कार :--उत्प्रेक्षा। छन्द :-१९ वर्णो का शार्दूलविक्रोडिन छन्द है ॥ ६ ॥ सा पक्रेरुवासिनी नरहरेरङ्केऽधिरूढा रहः सङ्केतेन लयं गतेऽथ विरहातङ्के विशङ्केव सा । कान्ताश्लेषविवृद्धसंभ्रमभरपोद्भूतवाष्पा स्फुरद्- रोमाञ्चस्वरभेदवेपथुपृथुस्तम्भादिभिर्भूषिता ॥ ७ ॥ सेति-प्रियसंगमार्थ गुप्तस्थानं संकेतः रहसि निर्जने संकेतस्तेन विरहातङ्के वियोगमये लयं गते विलीने सति विशङ्का विगता शङ्का सम्भ्रमो यस्याः सा नरहरेः नृसिंहस्य अङ्के अधिरुढा क्रोडमधिष्टिता सा पढेरुहवासिनी सरसिजासना सा लक्ष्मीः कान्तेति कान्तस्य स्वपतेः भारलेपण आलिङ्गनेन विवृद्ध उपचितः यः संभ्रमभरः हर्षातिशयः तेन प्रोभूतमुत्पन्न, वाप्पमानन्दाथु यस्याः सा सती लक्ष्मीः रोमानश्च स्वरभेदश्च, वेपथुश्च, पृथुस्तम्भश्च इत्येतेषामितरेतरयोगः ते भादौ येषां तैः रोमाञ्चादिभिः सात्त्विकविकारैः भूपिताऽलंकृता भभवदिति शेषः। 'शेमाश्च रोमहर्षणम्' इत्यमरः । साविका विकारा यथा 'स्तम्भः स्वेदोऽथ- रोमाञ्चः स्वरभङ्गोऽथ वेपथुः। वैवर्ण्यमथुप्रलय इत्यष्टौ सात्त्विका मताः' इति साहित्यदर्पणे॥ इति शृङ्गारः। रमणोपयुक्त संकेत स्थान का निश्चय हो जाने से जव वियोग का आत जाता रहा,. तब भगवान् के कोड में इन्दिरा निःशङ्क विराजित हुई और कान्त द्वारा किये गए नृसिहचम्पू। आइलेप के फलस्वरूप हर्षातिशयजनित आनन्दाधु से परिपूर्ण लक्ष्मी रोमाञ्च, वैस्वयं, वेपयु, सम्म आदि सात्विक भावों से भूषित हो उठीं। विशेष:-सोक में सभी सात्विक भावों का वर्णन है।॥ ७ ॥ अथ शान्तः । देवः सानन्दम् :- परात्माहं मूलप्रकृतिरियमम्भोजनिलया चिदानन्दाम्भोधी चिरमथ विहारः समुचितः । असङ्गोदासीने निरतिशयवोपैकवपुपि प्रियं क्षुद्रानन्दमयि किमु निमेपार्धगतिभिः ।।८।। देव इति तदनन्तरं देवः श्रीनरहरिरवाच । अहं परारमा पर प्रति यावत् । इय च सम्भोजनिलया अम्भोज सरसिज निलयो वासस्थानं यस्याः सा लघमी. भूटप्रकृतिरप्य फरकृतिरस्ति । अय अथानन्तरम् आवयोः चिदानन्दारमो. धौ चिदानन्दसागरे चिरं चिरकाल विहारो रमण समुचितो युक्त परेयर्थः । तथानिक्षमगे 'असलोऽयं पुरुष' इति श्रुते सगरहिते कमलपातीयवत् इत्यर्थः अतएव उदामीने 'अनश्नसन्यो अभिचाकशीनि' इति श्रुतेः भोपभोग्यरहिते, निरतिशयमत्यर्थ तोप. परमानन्द एवं एक व दारीरं यस्य तस्मिन् आनन्द स्वरूपे इत्यर्थ मयि नृमिहारो परमह्मगि निमेषाधगतिमिः निमेपाचं गतियां ते धगमप्यनवस्यायिभिरियर्थः एभिः पुदानन्दै तुछ मामारिकै. मुप. किमु प्रियम् शिमिष्टम् । 'मायो नु प्रकृति विधान् मापिन तु महेश्वरम् । तस्याश्यवमूः तेस्नु ग्याप्ठ समिदं जगत्' इति श्वेताश्वतरोपनिषदि इति भावः । प्रदिशा के अनुमार यहाँ तक भूगार रस का वान किया गया । यहाँ से भागे छान्न रस का प्रस्ताव रिया जा रहा है। पशाद देवादिदेव सो नरहरि ने कहा--में हम परवन हूँ और यह कमलामना मूलप्रकृति है। हम दोनों का चिदानन्द सागर में ही चिरकाल तक विहार समुचित है। जब यह स्पष्ट है कि में असदा दामीन, मानन्दस्वरूपए, तो पिर मुझे इम इग भर ना मिलने वाले क्षुद्र बोटि के लौकिक थानन्द से क्या! भान इसको महो मोकामना नहीं। इन्द:-सिसरिणी। यह १५ वर्षों का वर्ग-वृत्त ।। ८॥

पञ्चमोच्छ्वासः- किं मित्रं किममित्रतामुपगतं कः स्वः परो वाऽपि मे का मे हर्षविषादितारिविजयश्लाघाविभङ्गश्च कः । मानाशेषविकल्पविस्तृतसरिच्छातोर्मिमालश्चिरं विज्ञानामृतवारिधिनयनयोरने समुज्जृम्भते ।। ६ ।। किमिति-मे मम निरुपाधिकस्य परब्रह्मण इत्यर्थः किं मित्रं कः सुहृत् । किं. मे अमित्रतामुपगतम् अर्थात् कः मे असुहृत् , मे मदर्थ स्वः निजः परः निजेत: अपि कः। न मे कश्चिनिजः नापि च मे कश्चन पर इत्यर्थः । न मे कश्चिन्मित्रं न च कश्विच्छत्रुरित्यर्थः। 'समोऽहं सर्वभूतेषु न मे द्वेप्योऽस्ति न प्रियः' इति गीता. स्मरणात् । हर्षेति हर्षश्च विपादश्च इति हर्पविषादौ तौ अस्य अस्मिन् वा वर्तते इति स हविषादी तस्य भावः हर्षविपादिता मे मम का हर्षविषादिता 'न प्रहृष्येत् प्रियं प्राप्य नोद्विजेत् प्राप्य चाप्रियं' इति हर्षविपादौ स्थितप्रज्ञस्य मुनेन स्मृतौ। मम अरेविजयस्य श्लाघा प्रशंसापि का, न कापीत्यर्थः। कश्च विभंगः पराजयोऽपि वा मम कः। मग्नाशेपेति अशेपा विकल्पा एव विस्तृता वितताः सरितो नद्यः मग्नाश्च ता अशेषविकल्पविस्तृतसरितः, ताभिः छाता लूना अर्मिमालाः तरङ्गावलयः यस्य सः विज्ञानमेवामृतं तस्य वारिधिः सागरः, नयनयोनेंत्रयोरनेऽध्यक्ष समुज्जृम्भते नरीनृत्यते विद्योतते वा। 'भङ्ग- स्तरङ्ग ऊर्मिर्वा स्त्रियां वीचि:-इत्यमरः । छाता 'छिन्नं छातं लूनं कृत्त' मित्यमरः । छातमिति 'दुर्वले छिन्ने वा' इति शब्दन्तोममहानिधिः । छो छेदने इत्यस्मात् कर्मणि कर्तरि वा क्तः । यस्मिन् सर्वमपि विकल्पजातमन्तर्हितं भवति सर्वोऽपि द्वैतप्रपञ्च उपशाम्यति सोऽयं विज्ञानवारिधिरध्यक्षं चकास्तीति तव मित्रामित्रचर्चाया हविषादजयपराजयादीनाम् वा विचारत्यावकाश एवं. नोप- तिष्ठते इति भावः। हमारा कौन मित्र है ? और कौन शत्रु ? कौन अपना है और कौन पराया ? मुझे हर्ष और विपाद कैसा ? शत्रु-विजय से क्या इलावा ? और पराजय से क्या (क्षोम) ? यहाँ तो नेत्रों के समक्ष विज्ञानामृत का वह अघोर समुद्र लहरा रहा है, जिसमें निसिल विकल्प-जात नदियों की भाँति निमग्न हो गया है। छन्द:-शार्दूलविक्रीडित । यह वर्णवृत्त १९ वर्गों का होता है ॥९॥ ततो युगपदुदितानेकप्रचण्डचण्डकरकोटिसमुज्ज्वलसुन्दरशरदिन्दु- सहस्रशीतलसुधाधारासारमधुरपरानन्दैकरसं स्वयं वेद्यं स्वस्वरूपम् , अस्मिन. प्रगृह्यमाणे प्रचुरतरसुखानुभवनिमीलिताक्षः समुद्भूतसकल- नृसिंहचम्मूः। सात्त्विकोद्रेकभूषितांगो योगदशाधिरूढां शान्तिमिव परमहंससंसाधितां मूर्तिमती मुक्तिमिय सहचरीमादाय नरहरिरन्तर्दधे ।। तत इति-ततस्तदनन्तरं युगपदेकपदे एवं उदिताः समुदिताः या अनेका प्रचण्डानां पण्डकराणां तिग्मांशूनां कोटय. मातलपमिता. समयाः वद्वत् समुम्बलं, सुन्दराणा शरदिन्दूनां शरश्चन्द्रागा सहसवत् शीतल सुधाधारासारवत् पीयूष. प्रवाहवत् मधुर, परानन्दैकरसं परश्वासावानन्दः परमानन्द इत्यर्थः तदेकरसं तद्रूपं स्वयमारमनैव वेद्य ज्ञेय अनुभवमात्राम्य न तु वागिन्द्रियगोपामिति भावः। 'न शश्यते वर्णयितु गिरा तदा स्वय तदन्त करणेन गृह्यते' इति श्रुतेः ॥ अस्मिन् प्रगृयमाणे बाधनोऽतीतानन्दे भनुभूयमाने प्रचुरतरस्य माध्यतरस्प सुखस्य सातस्य भनुभवेन निमीलिते इव अतिमी योधने यस्य स भानन्दनिमीलिताप इत्यर्थः। समुनस्य सकटस्य सारिखकस्य मत्वगुगादुदमस्य भावस्य उद्रेका वृद्धिः तेन भूपितानि अगानि यस्य स विष्णुः योगदशाधिरूढा योगावस्थामापा नाशिमिर, परमहसै साविना प्राप्त मूर्तिमती देहधारिणी मुक्तिमिव सहचरी तो पमामादाय सह नीरवा नरहरिः स विष्णु अन्तर्दधे तिरो बभूव । भगवान् का अपना स्वरूप एक साथ उदित कोटि कोटि सूची के समान समुज्वल है, शरत्कालिक सैकडों चन्द्रों के समान कौन है, पीयूए प्रबाह की तरह मधुर है, परमा- नन्द स्वरूप है दया अनुभवमात्र से वेदनीय है। अपने दम सहज सरूप में प्रतिष्ठित हो जाने पर प्रचुरवर सग की अनुभूति से ओस निमालित हो गई, निखिउ सात्तिकमावों के उद्रेक से अंग आ सजोर हो उठा। हम मुद्रा में मगवान् योगदशा में प्राप्त शान्ति की मांति, परमहस को प्राप्त हुई भूनिमती मुक्ति की मौति अपनी प्रवरी को लेकर अंतर्हित शे गए। H अटकार:-माटोपमा । + महाणी यदि शाहिणो गुणगणव्याकर्णनोद्यसुपा- स्याहाहादविवृद्धिभूरिरमसे नायेन हीनं पदम् । फुत्राप्युवती स्वता मयति चेत् तत्साधयः ! शोध्यवां गुञ्जा मौक्तिमहारपुचरतिता पालन किं त्यज्यते ॥ १० ॥ मदान-यदि मागिः नरहरे. गुगानोगगरय प्पाकनेन शवनेन उपन् उहन्छन् यःमुपास्वादअमृतरसपानं तस्य य पाहादः परमानन्दः तरप विदे: समृभूरिरमसे प्रभूतसगे महामी मम वा यदि कुत्रापि पवापि राधेट * पञ्चमोच्छासः। ७६ स्वामिना (शाङ्गिणा) हीनं रहितं पदं शब्दं सुप्तिङन्तादिरूपम् उक्तवती कथितवती चेत् यदि हे साधवः! हे सन्तः! भवतां स्वता आत्मीयता भवति वर्तते भवन्तो यदि मामास्मीयं मन्यन्ते इत्यर्थः । तत्तर्हि शोध्यतां, तस्य शोधनं क्रियता, न तत्र मम दोषो गण्यतां, यतोऽहं शाझिगुणगणाकर्णनामृतरसपानमत्ततयाऽन्यन्नमना मभूवमिति भावः। किं प्राः विद्वद्भिस्तरित्यर्थः, मौक्तिकहारपुञ्जपतिता मौक्ति- कानां मुक्ताफलानां हारपुले पतिता गुमा रक्तिका न त्यज्यते ? अपि तु त्यज्यत एवेत्यर्थः । अत एव भवद्भिरपि तत्पदं परित्याज्यमिति ममेदमावेदनमति ननम् ॥ इस अंतिम श्लोक में कवि अपने वक्तव्य का उपसंहार करता हुआ विनय-गर्म निवेदन प्रस्तुत करता है। हे सज्जनवृन्द ! भगवान् नृसिंह के गुण-गण-श्रवण से ऐसे सुधामय आनन्द की विवृद्धि हुई कि मैं उसमें तल्लोन हो गया और इस तल्लीनता में सम्भव है कोई ऐसा पद निकल गया हो, जिसमें भगवान् का स्मरण न हो, तो ऐसी स्थिति में मेरी प्रार्थना यह है कि मेरे प्रति आप लोग आत्मीय जन का सा भाव रखकर उस पद को शोषित कर लें। क्या पण्डित लोग मौक्तिकहार की राशि में पड़ी हुई गुशा को अलन नहीं कर देते ? छन्द :-शार्दूलविक्रीडित । अलङ्कार :-दृष्टान्त । आसीदस्तसमस्तदोपनिवहं गोदो विदर्भायुतेः। क्रोरेनोत्तरतस्तदुत्तरतटे वार्याभिधानं पुरम् ॥ १॥ तत्रासीद् गणकाग्रणी ..श्रीनागनाथो द्विजः। भारद्वाजकुलेऽथ तस्य तनयः श्रीजानराताभिधः॥२॥ यद्ग्रन्थान् समधीत्य शिष्यनिवहोऽप्याचार्यचर्यामगात् । तत्सूनुर्गणितार्णवप्रतरणे सत्क 'सुधीः॥ संगीतागमकाव्यनाटकपटुः सूर्याभिधानः कविः। चम्पूकाव्यमिदं चकार चतुरं लक्ष्मीपतिप्रीतये ॥ ३ ॥ इति श्रीमद्देवज्ञपण्डितसूर्यविरचिते नृसिंहचम्पूकाव्ये पञ्चमोच्छ्वासः । ॥ श्रीलक्ष्मीनृसिंहार्पणमस्तु । ..

८० नृसिंहचम्पू । इप्वाकाशस्त्रपस्नैमिते वैरमहायने नृसिंहचम्पूकाव्येऽस्मिन् व्यधान् सूर्यो विवेचनम् ॥ १ ॥ - सत्याचारविवर्घनाय महता प्राचा प्रपचारिता । विद्यायोगपथे पृथुधमनुपा प्रथा न सतीति न ॥ एपा मन्कृतिरन श्वन गुणो यद्यस्ति सभाव्यताम् । कर्ता चेन चिरन्तन किमियता होयत च सबना ॥२॥ याइश पुस्तक दृष्ट ताहश निखित मया । यदि शुद्धमशुद्ध वा मम दोपो न दीयते ॥ यदक्षरपदभ्रष्ट स्परध्ययनवनितम् तत्सर्व क्षम्यता देव ! नृसिंहाय नमोऽस्तु ते ॥ शके १५८० भाद्रपददि ३ सोम बंदर्भदशे लिखित श्रीधराश्रमण। श्रीरमान महार्पणमस्तु । नृसिंहचम्पाव्ये गणितश्लोकमन्या शत ३०० सम्पूर्णमस्तु । नृसिंह चपा परम उच्छवास समाप्त ! समानधाय ग्रन्थः श्लोकानुक्रमणिका for ३३ त्रिशैतन्यं ब्रह्म २४ १ अगस्त्योऽभूत् भग्रे याहि शशाक अन्याय्यं न कले अन्योऽन्यं परि - अस्त्येव वस्तुजाते अहो ! महदाश्चर्यम् अहो मूर्खा माः आटोपोरकटकोटि आत्मानं स्वशरीर आनन्दं स दधातु आनीतोऽहमिभा आश्लेपावसरे २० ६ २० ७४ ४७ आसीद् दैत्यकुले १८ गीर्वाणेन्द्रगिरे घातस्तात स्वमने ४३ चण्डडम्बरभृद्ध ७१ तच्छुरवा कुपितः ततः स्तम्भोद्भुता १४ तातास्तावदमी ३२ ते स्युः क्रमादिह स्वदोर्दण्डप्रताप १ | दीर्घायुर्भव विक्रमी ५४ दुर्वलं नरशरीर दैत्याराते खेभ्यः धिग दुःशरीर नटे सामाजिके ३१ निर्माता त्वं च ३७ नेदुर्दुन्दुभयो ३८ | परात्माहं मूल पित्रा वा हननं पृथव्यां पाथसि ६५ पेतुर्वृत्तं धत्ते प्रखरनखराघातो प्रह्लाद तात भाग्यद् भूभागभीमः मदीयवशवर्तिनः ९ । मद्वाणी यदि ४ . • ७६ ५२ ७७ . ७० २८ उपक्रोधकृशानु उद्यद्वैकुण्ठकण्ठी किं नासन् भ्रात किं भीषणेन. किं मिन्नं किममित्र कि वर्णनीय कीत त्रैलोक्य कीलाले क्लेदि कीलालं स्थलता कुतो रसनिरूपणं क्रूरक्रोधाग्नि गांविर्भावभाजः ४६ o २३ ७८ ( २ ) २३ क २५ मन्मातुरिन्दिराया. मातगजननि यं मखे श्मरसि यत्सकएपविकल्प यदि देहिनोऽपि যার पद्दनेन्दोरुदय पोटकालकर युदाटोपचपेट युप्मरम्बरस्य विष्णो ! विष्णो विष्णोचिरं चरण शेषोडशोपविशेष मृण्वन्तु मरकृति ५० मिपरिपितः ११ सर्व स्वानियासिन. मान्द्रामन्दं यदन्त. सा परेरहवासिनी सिंहः सिंह इति सुतारामे ग्रामे ३३ / सूत्रप्रोतविशिम मौन्दर्यण मृशं ३८ | हन्ताई तावदश ५५ । हरेदारी गिरमाकलथ्य इस्तम्परता विधाना हाहाकारं विदिवा ५९ ३९

Nrisinghchampu

Author
Pt. Surya
Title
Nrisinghchampu
File name
Nrisinghchampu
Text
OCR done
Citation
1959
Published
2012/04
Publisher
Varanasi, Chowkhamba Vidyahbawan
Language
Sanskrit
Pages
153
Library
Government College, Kota
Classification
Literature
DLI number
407493
Barcode
99999990303431.00
Scanning centre
Banasthali University
Digital publisher
Digital Library Of India
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